ISSN 2229-547X VIDEHA 𑒀 विदेह ३६९ म अंक ०१ मई २०२३ (वर्ष १६ मास १८५ अंक ३६९) [विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। कॉपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- २०२३. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२३. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. It is a platform for scholars, researchers, writers and poets to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, and poetry in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@gmail.com. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Videha e-Journal: Issue No. 369 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अक्खर खम्भा (आखर खाम्ह) तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ (कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।) माने आखर रूपी खाम्ह निर्माण कऽ ओइपर (गद्य-पद्य रूपी) मंच जँ नै बान्हल जाय तँ ऐ त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लत्ती केना पसरत। Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. -Robert Louis Stevenson ... Videha: Maithili Literature Movement 𑒀 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्ति: 𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱: अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृ. २-३) १.२.अंक ३६८ पर टिप्पणी (पृ. ४-७) रचनाकार अशोक विशेषांक २.१.प्रस्तुत विशेषांकक संदर्भमे (पृ. १०-१३) २.२.अशोक जी केर संक्षिप्त परिचय (पृ. १४-२०) २.३.अशोक- हम आ हमर परिचय (पृ. २१-२४) २.४.कल्पना झा- ठाँहि-पठाहिँ बाजब/लिखब सहज नहि (पृ. २५-२८) २.५.आभा झा-डैडीगाम- मध्यमार्गक अन्वेषणक कथा (पृ. २९-३३) २.६.दिलीप कुमार झा- मैथिल आँखिक वैश्विक कथाकार छथि कथाकार अशोक ['मातबर' कथा संग्रहक पुनर्पाठ'] (पृ. ३४-४५) २.७.अजित कुमार झा- डैडीगाम: एक अप्रतिम कथा संग्रह (पृ. ४६-५१) २.८.कुमार राहुल- मैथिल आंखि सं डैडीगाम देखबाक सेहंता (कथाकार अशोकक कथा पर एकटा पाठकीय हस्तक्षेप) (पृ. ५२-५६) २.९.लाल देव कामत- कथाकार अशोक मादे (पृ. ५७-६१) २.१०.हितनाथ झा- कथाकार अशोकक व्यंग्य संग्रह: नीक दिनक बायस्कोप (पृ. ६२-६५) २.११.शिवशंकर श्रीनिवास- अशोकक कथा (पृ. ६६-७१) २.१२.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'- अशोकजीक कथामे कथापर विमर्श (पृ. ७२-७५) २.१३.नारायणजी- मूल्यांकन- अशोकजीक लेखन वैशिष्ट्य (पृ. ७६-८५) २.१४.शिव कुमार मिश्र- अशोक ओ मैथिली साहित्य संस्थान (पृ. ८६-८९) २.१५.शैलेन्द्र आनन्द- अशोक: एकटा जीवन्त कलाकार (पृ. ९०-९४) २.१६.गजेन्द्र ठाकुर- कवि अशोक (पृ. ९५-१११) २.१७.गजेन्द्र ठाकुर- कथाकार अशोक (पृ. ११२-१२९) २.१८.गजेन्द्र ठाकुर- कथेतर गद्यक लेखक अशोक (पृ. १३०-१३४) २.१९.प्रदीप बिहारी-मातबर कथाकार (पृ. १३५-१४०) २.२०.आशीष अनचिन्हार- मैथिल दृष्टिदोष (पृ. १४१-१४३) २.२१.मुन्ना जी- त्रिकोणक धुरी- श्री अशोक (पृ. १४४-१४५) २.२२.श्रीधरम- गतिशील यथार्थक कथाकार अशोक: किछु टिपौत (पृ. १४६-१५५) ऐ अंकक अन्यान्य रचना ३.गद्य खण्ड ३.१.जगदीश प्रसाद मण्डल- सुचिता (धारावाहिक उपन्यास) (पृ. १५८-१७५) ३.२.जगदीश प्रसाद मण्डल- निरन्तर (लघुकथा) (पृ. १७६-१८६) ३.३.नन्द विलास राय- फादर्स डे (पृ. १८७-१९०) ३.४.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- २६-३० म खेप (पृ. १९१-२१६) ३.५.कुमार मनोज कश्यप-दृश्यावलोकन (पृ. २१७-२१८) ३.६.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (खेप-१८) (पृ. २१९-२२६) ३.७.प्रणव झा-भौकाली मुर्गा (लघु व्यंग्य) (पृ. २२७-२२८) ३.८.आचार्य रामानन्द मण्डल-अगस्त क्रांति शहीद रामफल मंडल: जीवन वृत/ कमीना विद्वान (पृ. २२९-२३९) ३.९.डा. किशन कारीगर-मैथिली साहित्यक एलीट बोनबिलाड़ आ सर्वनाशी दलाल (पृ. २४०-२४३) ३.१०.लाल देव कामत- सुनैना बेटी- मैथिली सामाजिक उपन्यास (समीक्षा) (पृ. २४४-२४७) ३.११.कुन्दन कर्ण- मैथिली बीहनि कथा- न्यूटन्स लॉ (पृ. २४८-२४८) ४.पद्य खण्ड ४.१.राज किशोर मिश्र-भोरहरबा (पृ. २५०-२५३) ४.२.कामेश्वर चौधरी- प्रश्न रामसँ (पृ. २५४-२५५) 𑒀 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्तिः पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म 𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑓁 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒰𑒣: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒼𑒭𑒡𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹 𑒠𑒹𑒫𑒰: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧 ब्रह्मणसँ प्रार्थना जे द्युलोकमे, अंतरिक्षमे, पृथ्वीपर, जलमे, औषधमे, वनस्पतिमे, विश्वमे, सभ देवतागणमे आ ब्रह्ममे शांति हुअय। ॐ-ब्रह्मण, द्यौ-सूर्य-तरेगण, अंतरिक्ष- पृथ्वी आ द्यूलोकक बीच, आप:-जल, विश्वेदेवा- सभ देवता, ब्रह्म- सर्जक। 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝𑒮𑒿 𑒣𑓂𑒩𑒰𑒩𑓂𑒟𑒢𑒰 𑒖𑒹 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒧𑒹, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭𑒧𑒹, 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲𑒣𑒩, 𑒖𑒪𑒧𑒹, 𑒎𑒭𑒡𑒧𑒹, 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒱𑒧𑒹, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒧𑒹, 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰𑒑𑒝𑒧𑒹 𑒂 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒧𑒹 𑒬𑒰𑓀𑒞𑒱 𑒯𑒳𑒁𑒨। 𑓇-𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝, 𑒠𑓂𑒨𑒾-𑒮𑒴𑒩𑓂𑒨-𑒞𑒩𑒹𑒑𑒝, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭- 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒂 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒏 𑒥𑒲𑒔, 𑒂𑒣:-𑒖𑒪, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹𑒠𑒹𑒫𑒰- 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰, 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧- 𑒮𑒩𑓂𑒖𑒏। 𑒀 ॐ, स॒हस्र॑शीर्षा॒ पुरु॑षः। स॒ह॒स्रा॒क्षः स॒हस्र॑पात्। 𑓇, 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒬𑒲𑒩𑓂𑒭𑒰↓ 𑒣𑒳𑒩𑒳↑𑒭𑓁। 𑒮↓𑒯↓𑒮𑓂𑒩𑒰↓𑒏𑓂𑒭𑓁 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒣𑒰𑒞𑓂। स भूमिं॑ ग्वंग वि॒श्वतो॑ वृ॒त्वा। अत्य॑तिष्ठद् दशाङ्गु॒लम्॥ 𑒮 𑒦𑒴𑒧𑒱𑓀↑𑓅 𑒫𑒱↓𑒬𑓂𑒫𑒞𑒼↑ 𑒫𑒵↓𑒞𑓂𑒫𑒰। 𑒁𑒞𑓂𑒨↑𑒞𑒱𑒭𑓂𑒚𑒠𑓂 𑒠𑒬𑒰𑒓𑓂𑒑𑒳↓𑒪𑒧𑓂॥ हजार माथ, हजार आँखि, हजार पएर संग विश्वकेँ आच्छादित केने अछि, दस आंगुरक गनतीक वशमे नै अछि ओ। प॒द्भ्याग्ँ॑ शू॒द्रो अ॑जायत॥ 𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑒑𑓂𑒿↑ 𑒬𑒴↓𑒠𑓂𑒩𑒼 𑒁↑𑒖𑒰𑒨𑒞॥ पएरसँ शूद्रक उत्पत्ति भेल॥ प॒द्भ्यां भूमि॒र्दिशः॒ श्रोत्रा᳚त्। 𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑓀 𑒦𑒴𑒧𑒱↓𑒩𑓂𑒠𑒱𑒬𑓁↓ 𑒬𑓂𑒩𑒼𑒞𑓂𑒩𑒰↑↑𑒞𑓂। मुदा पएरेसँ भूमियोक उत्पत्ति। ❀ (White Florette- innocence and purity) ☸ (Wheel of Dharma) ࿕(Swastik) ꣼ (सिद्धिरस्तु, सिद्धम 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒱𑒩𑒮𑓂𑒞𑒳, 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒧 Devanagari Anji) 𑓅 (Gwang ग्वंग- two small circles connected by u and a dot placed over it, used in reference of Vedic texts) 𑒀 (Tirhuta Anji, Ankush of Ganeshji, placed at the beginning of something) 𑒀
१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.अंक ३६८ पर टिप्पणी १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय कवि अशोक, कथाकार अशोक आ कथेतर गद्यक लेखक अशोक ओना तँ अशोक अपनाकेँ आब कथाकार अशोक कहै छथि (हुनकर फेसबुक प्रोफाइलक यएह नाम छन्हि) मुदा हुनकर पहिल प्रकाशित पोथी अछि एकटा कविता संग्रह 'चक्रव्यूह' जे प्रकाशित भेल १९८६ केर जनवरी मासमे। ओही वर्ष अशोक, शिवशंकर श्रीनिवास आ शैलेन्द्र आनन्दक सम्मिलित कथा संग्रह 'त्रिकोण' प्रकाशित भेल, नवम्बर मासमे, जइमे तीनू गोटेक ५-५ टा कथा छलन्हि। अशोक कम लिखै छथि, कविता तँ आरो कम। मूलधाराक लेखकमे कम लिखबाक फैशन छै। जखन प्रेमचन्द तीन सय कथा लीखि लेलन्हि तखन जा कऽ ओ एकटा संग्रह बहार केलन्हि- 'मेरी प्रिय कहानियाँ' सन् १९३३ मे। ऐ पोथीमे प्रेमचन्द ई स्वीकार करै छथि जे नै चाहियो कऽ लेखकक सभ रचना नीक नै भऽ पबै छै। आ ईहो जे जँ पाठक एक लेखकक सभ रचना पढ़ि जाय तखन ओ जिन्दगी मे पाँचो छह टा लेखककेँ नै पढ़ि सकत। से हुनकापर दवाब पड़लन्हि जे ओ पाठक लेल ऐ तीन सयमे सँ किछु कथा चुनि कऽ अपन प्रिय कथाक रूपमे प्रस्तुत करथि। हमरो विचारे जहिया एकटा लेखक तीन सय कथा लिखि लिअय तखने ओकरा अपनाकेँ कथाकार घोषित करबाक चाही। ओना ओतऽ प्रेमचन्द ईहो कहि जाइ छथि जे लोककथामे मात्र उड़ैबला घोड़ा आदि होइ छै से कथाक महत्व लोककथासँ बेशी छै। प्रेमचन्दक ऐ गपसँ हम भिन्न विचार रखै छी आ फिराक गोरखपुरीक कथनसँ सहमत छी। फिराक गोरखपुरी अपन रुबाइक संग्रह 'रूप' मे लिखै छथि जे 'हिन्दू लोक गीत' जे हमरा दैत अछि से ओकरा मानवीय आ स्वर्गीय संगीत बना दइ छै, आ से गालिब, इकबाल आ चकबश्त सेहो हमरा नै दऽ सकला। ओ उदाहरण दइ छथि- "बाबुल मोरा नैहर छूटल जाय, ऊ ड्योढ़ी पर्वत भयी, आङन भयो विदेश।" महाभारत आब लोकगीत बनि गेल अछि, लोकगाथा बनि गेल अछि, 'भील महाभारत' तकर उदाहरण अछि। अशोकक 'चक्रव्यूह' महाभारत आधारित किछु कविता अछि, से ओ लोकगीत आधारित अछि, लोकगाथा आधारित अछि। से हमरा नजरिमे रचनाकार अशोक तीन टा छथि- कवि अशोक, कथाकार अशोक आ कथेतर गद्यक लेखक अशोक। अरविन्द ठाकुर अपन पोथी रोशनाइक लोकपक्षकेँ कथेतर गद्य कहै छथि, से निबन्ध-प्रबन्ध-समालोचना लेल हमहूँ ऐ शब्दावलीकेँ प्रयुक्त कऽ रहल छी। -Gajendra Thakur, editor, Videha (be part of Videha www.videha.co.in -send your WhatsApp no to +919560960721 so that it can be added to the Videha WhatsApp Broadcast List.) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १.२.अंक ३६८ पर टिप्पणी निर्मला कर्ण आदरणीय संजू दास जी के चित्र पर हमर प्रतिक्रिया- आदरणीय संजू दास जी बहुत नीक चित्रकार छथि। हुनक श्रेष्ठ कलाकार होमय में कुनो संदेह नहि। विदेह पत्रिकाक अंक 368 में हुनक लिखल आलेख पढ़ल। ओ कला में नग्नता पर बहुत सारगर्भित आलेख लिखलथि। हुनक आलेख सँs अत्यंत प्रभावित भेलहुँ। आदरणीय संजू दास जीक विचारधारा सँs हम शत-प्रतिशत सहमत छी। कोनो चित्र में नग्नता देखs सs पूर्व ओकर भावना देखवाक चाही।मुदा एहि अंक में हुनक किछु बीछल चित्र देखलहुँ। ओहि चित्र में मात्र तीन चित्र पर हमरा किछु आपत्ति अछि। ओहि तीनू चित्र पर हम आदरणीय संजू दास जी सँs किछु जानकारी चाहैत छी। एक स्त्री संपूर्ण नग्न ठाढ़ छथि एवं हुनका किछु कामुक पुरुष ललचाएल दृष्टि सँs देख रहल छथि। निकट लेटल शेर पर्यंत जे संभवत: हुनक अपन कर्मचारी थिक। वैह स्त्री संपूर्णा नग्न रूप में शेर पर लेटल आराम कs रहल छथि। मादा पशु के स्त्री रूप में चित्रण।ओ मादा नग्न रूप में बैसल दर्पण में अपन सौंदर्य देखि रहल छथि एवं एक गोट कामुक पुरुष रूपी हिंश्र जीव जे संभवत वृद्ध अछि ओहि स्त्री के आलिंगन में कएने अछि। हम कला मर्मज्ञ जानकार चित्रकार नहि छी। हुनक कला के प्रशंसा करैत हम मात्र एक बात आदरणीय संजू दास जी सs पूछs चाहैत छी। तीनू चित्र में महिला पात्र के संपूर्ण नग्न रूप में चित्रण करवाक औचित्य की थिक? कोन भावना के वशीभूत स्त्री के नग्न देखाओल गेल ? प्रणव झा इंटरनेट के जाल पर विचरण करैत जखन कखनो विदेहऽक पेज पर पहुचय छी श्री गजेन्द्र ठाकुर के आलेख वा लिंक से किछ न किछ इन्फोर्मेटिव चीज मैथिली भाषा के माध्यम से भेंट जाय अछि। एहि क्रम मे निती नवल दिनेश कुमार मिश्र आलेख सीरीज के अंतर्गत ऐ अंक मे महानंदा से जुडल दिनेश मिश्र के सूचनात्मक लेख के सार मैथिली मे पढ़ लेल भेंटल जे सुखद अनुभूति। विदेह ऐ अंक मे संजू दास के कलाकृति के ल क कै टा आलेख छापलक अछि जे हालिया हुनकर कोनो पेंटिंग विवाद के केंद्र मे घुमइत अछि। फेसबुक पर प्रमुख रूप से कुमार पद्मनाभ द्वारा उठाओल ऐ मुद्दा के इर्द गिर्द अनेकों लोक आपन राय आ दृष्टिकोण रखला य। पद्मनाभ जी द्वारा आपन बात बहुत दृढ़ता से आ तर्क के साथ राखल गेल आ ओतबे दृढ़ता आ तर्क से संजू दास अपन आलेख द्वारा ओकर खंडन करैत नजरि आबय छईथ। किएकि हम चित्रकला के पारखी नै छी तै अपन कोनो अंतिम पक्ष नै राखि सकय छी मुदा ऐ तरहक मामिला मे तार्किक रूप से वाद प्रतिवाद के डोक्युमेंटेड केला से ऐ तरहक विषय मे समाज के भविष्य मे अपन विचार बनेबाक लेल तार्किक सामाग्री भेंट सके अछि। प्रोफेसर उषा चौधरी कला,कला होइछ। ओ अश्लील नहि भ सकैछ।इ हमरा लोकनिक नजरिया थिक,जे हम ओहिमे की देखि रहल छी।अपन दृष्टिकोण मे परिवर्तन कैने अनेक अर्थ निकलैत अछि। कल्पना झा, पटना बहुत नीक विदेहक नबका अंक। पठनीय ओ संग्रहनीय। अत्यधिक व्यस्तता रहैए, तथापि पढ़ब सुरुह केलहुँ, तँ बहुत किछु पढ़ि गेलहुँ, ततेक इंटरेस्टिंग टॉपिक सभ अछि। डॉ. उदयनाथ झा 'अशोक' जीक आलेख "गामक नामकरण:एक परिशीलन" बहुत नीक लागल।दरभंगा-मधुबनी सँ नेपालक धनुषा,जनकपुर आ समस्तीपुर, सीतामढ़ी धरिक बहुतो गामक नामकरणक चर्चा बहुत रोचक ढंग सँ केलनि अछि।मिथिलाक गामक नामकरणक पाछाँक इतिहास सँ लोककेँ अवगत करओलनि अछि लेखक,चाहे ओ राजनीतिक इतिहास हो वा सांस्कृतिक इतिहास।एतेक नीक आलेखक लेल लेखककेँ साधुवाद !अपनेक लिखल "श्वेता झा चौधरी-एकटा परिचय" पढ़ि आह्लादित भेलहुँ।एहि तरहक लोकक कृत्यकेँ चर्चा हेबाक चाही।कतेक लोक श्वेता झा चौधरीक नाम सँ अनभिज्ञ छल हेताह।अपनेक लिखल "कृष्ण कुमार कश्यप आ शशिबाला-एकटा परिचय" सेहो पढ़लहुँ। एहेन एहेन व्यक्तिक व्यक्तित्व ओ कृतित्वक चर्चा हेबाक चाही पत्र-पत्रिका सभमे।रवीन्द्र कुमार दास जीक-"परिवारक सहयोग सबसँ जरूरी" एकटा नीक संदेश दैत अछि। आचार्य रामानंद मंडल, सामाजिक चिंतक सह साहित्यकार, सीतामढ़ी कलाकृति बनाम अश्लीलता/ कला साहित्य मे संजु दास के कलाकृति आइ काल विवाद मे हय।कुछ लोग के दृस्टि मे कला मे अश्लीलता हय।असल मे अश्लीलता आ श्लीलता दृस्टिये होइ छैय। संत तुलसीदास के अनुसार जाके रहि भावना जैसी हरि मूरत देखि तिन तैसी। पौराणिक साहित्य के देखियौ त अश्लीलता से भरल हय। परंतु धार्मिक दृस्टि से वो अश्लील दृस्टिगोचर न होई हय। जेना भगवान शंकर के लिंगाकार रुप जेकर पूजा कैल जाइ हय।नागा साधु आ दिगम्बर जैन मुनि जेइ के दर्शन में अश्लीलता दृष्टिगोचर न होइ छैय। मां काली के नग्न मूर्ति में अश्लीलता दृस्टिगोचर न होइ हय। सति अनुसूया के कथा एगो चर्चित कथा हय। अनुसूया के सतीत्व परीक्षा के लेल ब्रह्मा विष्णु महेश कहलथिन कि अंहा नग्न होके हमरा सभ के भोजन करायब त हम सभ अंहा इंहा भोजन करब।सति अनुसूया हुनका सभ के तप बल के आधार पर बच्चा बना दलथिन आ नग्न होके गोद मे रख के भोजन करैलथिन। कारण कि बच्चा निर्दोस होइ छैय।वो श्लीलता आ अश्लीलता से अंजान होइ हय। बौद्ध कालीन मूर्ति अजंता -ऐलोरा आ भगवान जगन्नाथ आ दच्छिन भारत के मंदिर पर उत्कीर्ण मैथुन मूर्ति में अश्लीलता नजर न अबऐय हय। भगवान रजनीश संभोग से समाधि में एगो घटना के उल्लेख करैय छथिन।जौ एक युवा प्रेमी -प्रेमिका के प्रेमिका में माता -पिता मैथुन मूर्ति के देखैयत खजुराहो में टकरा गेलन। घटना इ बताबैत हय कि सापेक्ष रूप में अश्लील हय परंतु निरपेक्ष रूप में अश्लील न हय। संजु दास के कला सापेक्ष रूप में लोग के अश्लील भले लगैय परंतु निरपेक्ष रूप से अश्लील न हय।कलादृस्टि निरपेक्ष होय के चाही। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। रचनाकार अशोक विशेषांक २.१.प्रस्तुत विशेषांकक संदर्भमे २.२.अशोक जी केर संक्षिप्त परिचय २.३.अशोक- हम आ हमर परिचय २.४.कल्पना झा- ठाँहि-पठाहिँ बाजब/लिखब सहज नहि २.५.आभा झा-डैडीगाम- मध्यमार्गक अन्वेषणक कथा २.६.दिलीप कुमार झा- मैथिल आँखिक वैश्विक कथाकार छथि कथाकार अशोक ['मातबर' कथा संग्रहक पुनर्पाठ'] २.७.अजित कुमार झा- डैडीगाम: एक अप्रतिम कथा संग्रह २.८.कुमार राहुल- मैथिल आंखि सं डैडीगाम देखबाक सेहंता (कथाकार अशोकक कथा पर एकटा पाठकीय हस्तक्षेप) २.९.लाल देव कामत- कथाकार अशोक मादे २.१०.हितनाथ झा- कथाकार अशोकक व्यंग्य संग्रह: नीक दिनक बायस्कोप २.११.शिवशंकर श्रीनिवास- अशोकक कथा २.१२.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'- अशोकजीक कथामे कथापर विमर्श २.१३.नारायणजी- मूल्यांकन- अशोकजीक लेखन वैशिष्ट्य २.१४.शिव कुमार मिश्र- अशोक ओ मैथिली साहित्य संस्थान २.१५.शैलेन्द्र आनन्द- अशोक: एकटा जीवन्त कलाकार २.१६.गजेन्द्र ठाकुर- कवि अशोक २.१७.गजेन्द्र ठाकुर- कथाकार अशोक २.१८.गजेन्द्र ठाकुर- कथेतर गद्यक लेखक अशोक २.१९.प्रदीप बिहारी-मातबर कथाकार २.२०.आशीष अनचिन्हार- मैथिल दृष्टिदोष २.२१.मुन्ना जी- त्रिकोणक धुरी- श्री अशोक २.२२.श्रीधरम- गतिशील यथार्थक कथाकार अशोक: किछु टिपौत २.१.प्रस्तुत विशेषांकक संदर्भमे विदेह द्वारा लेखकपर विशेषांक 'जीबैत मुदा उपेक्षित' शृखंला रूपमे कएल गेल छल २०१५ सँ जकरा आब २०२३ मे एहि विशेषांक संग "विदेहक जीवित मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशकपर विशेषांक शृंखला" नामसँ जानल जाएत। दिसम्बर २०२२ मे विदेह "अशोक विशेषांक" प्रकाशित करबाक सार्वजनिक घोषणा केलक आ प्रस्तुत अछि ई विशेषांक। एहि सूचनाकेँ एहि लिंकपर देखि सकैत छी-घोषणा। मैथिलकर्मीसँ हमर सभहक आशय जिनकर काज मिथिला-मैथिली-मैथिली लेल कोनो माध्यमसँ भेल हो। ओ संगठनकर्ता सेहो भऽ सकै छथि, आन भाषाक लेखक सेहो। तहिना संगीतकर्मी मने गीत-संगीतसँ जुड़ल लोक। एहन शृखंलामे, एहि विशेषांकसँ पहिने विदेह ८ टा विशेषांक प्रकाशित कऽ चुकल अछि आ एहिठाम आब हम कहि सकैत छी जे ई एकटा चुनौतीपूर्ण काज छै। अनेक संकट केर सामना करए पड़ैत अछि लेख एकट्ठा करएमे। मुदा संगहि ईहो हम कहब जे संकटसँ बेसी हमरा लग समर्थन अछि। हँ, ई मानएमे हमरा कोनो दिक्कत नहि जे जतेक लेख केर उम्मेद केने रहैत छी हम ततेक नै आबैए, जतेक लोक लिखबाक लेल गछैत छथि से सभ अंत- अंत धरि आबि चुप्प भऽ जाइत छथि। आ एकर कारणो छै, किनको ई लागै छनि जे आनपर लिखब से हम अपने रचना किए ने लीखि लेब, किनको लग पोथिए नै रहै छनि, जखन कि हम सभ पाठककेँ विकल्प रूपमे पोथीक पी.डी.एफ फाइल सेहो देबाक लेल तैयार रहैत छी। कियो विदेहक समावेशी रूपसँ दुखी छथि, तँ किनको मित्रकेँ विदेहसँ दिक्कत छनि तँइ ओ नहि देता। एकरो हम संकटे बुझै छियै जे सभ फेसबुकपर लंबा-लंबा लेख वा कमेंट टाइप कऽ लै छथि सेहो सभ विदेह लेल हाथसँ लिखल पठाबैत छथि। जे सभ कहियो काल फेसबुकपर टाइप कऽ लीखै छथि तिनकर आलेख हम सभ टाइप करिते छी। खएर पहिने कहलहुँ जे संकटसँ बेसी समर्थन अछि तँइ आइ पहिलसँ लऽ कऽ नवम विशेषांक धरि पहुँचलहुँ हम। २०१५ सँ लऽ कऽ २०२२ धरि ८ टा विशेषांक प्रकाशित भेल मने बर्खमे एकटा। निश्चिते समर्थन बेसी भेटल हमरा। जखन कि विदेहक ई आठो विशेषांक केर अलावे आनो विषयपर विशेषांक प्रकाशित भेल अछि। एकर अतिरिक्त ईहो बात संतोषदायक अछि जे विदेहक हरेक विशेषांक अभिनंदनग्रंथ हेबासँ बाँचि गेल अछि। मुख्यधारा जकाँ विदेहकेँ अभिनंदनग्रंथ नहि चाही। अभिनंदनग्रंथ अहू दुआरे नै चाही जे ओहिसँ लेखक वा जिनकापर निकालल गेल छनि तिनकामे सुधारक गुंजाइश खत्म भऽ जाइत छै। तँइ विदेहक विशेषांकमे आलोचना-प्रसंशा सभ भेटत। एहन नै छै जे अशोक जीपर लिखल नै गेलै मुदा ओ सभ एकट्ठा नै भऽ सकल छै तँइ ओकर प्रभाव हेड़ा गेल छै। एहि संदर्भमे हम कहि सकै छी जे विदेहक ई प्रस्तुत विशेषांक एहन पहिल प्रयास अछि जाहिमे ई बुझबाक प्रयास कएल अछि जे अशोक जीक रचना केहन छनि। ई अलग बात जे हम सभ कतेक सफल वा असफल भेलहुँ से पाठक कहता। एहि विशेषांक केर शुरूआत विदेहक आने विशेषांक जकाँ अछि। संगे-संग ई क्रम ने तँ उम्रक वरिष्ठता केर पालन करैए आ ने रचनाक गुणवत्ताक। हँ, एतेक धेआन जरूर राखल गेल छै जे पाठकक रसभंग नहि होइन आ से विश्वास अछि जे रसभंग नै हेतनि। पाठक जखन एहि विशेषांककेँ पढ़ताह तँ हुनका वर्तनी ओ मानकताक अभाव लगतनि। वर्तनीक गलती जे थिक से सोझे-सोझ हमर सभहक गलती थिक जे हम सभ संशोधन नै कऽ सकलहुँ मुदा ई धेआन रखबाक बात जे विदेह शुरुएसँ हरेक वर्तनी बला लेखककेँ स्वीकार करैत एलैए। तँइ मानकता अभाव स्वाभाविक। एकर बादो बहुत वर्तनीक गलती रहल गेल अछि जे कि हमरे सभहक गलती अछि। मैथिलीमे किछुए एहन पत्रिका अछि जकर वर्तनी एकरंगक रहैत अछि आ ई हुनक खूबी छनि मुदा जखन ओहो सभ कोनो विशेषांक निकालै छथि तखन वर्तनी तँ ठीक रहैत छनि मुदा सामग्री अधिकांशतः बसिये रहैत छनि। ऐतिहासिकताक दृष्टिसँ कोनो पुरान सामग्रीक उपयोग वर्जित नै छै मुदा सोचियौ जे ७२-८० पन्नाक कोनो प्रिंट पत्रिका होइत छै ताहिमे लगभग आधा सामग्री साभार रहैत छनि, तेसर भागमे लेखक केर किछु रचना रहैत छनि आ चारिम भागमे किछु नव सामग्री रहैत छनि। मुदा हमरा लोकनि नव सामग्रीपर बेसी जोर दैत छियै। एकर मतलब ई नहि जे वर्तनीमे गलती होइत रहै। हमर कहबाक मतलब ई जे संपादक-संयोजककेँ कोनो ने कोनो स्तरपर समझौता करहे पड़ैत छै से चाहे वर्तनीक हो कि, मुद्राक हो कि विचारधारक हो कि सामग्रीक हो। हमरा लोकनि वर्तनीक स्तरपर समझौता कऽ रहल छी मुदा कारण सहित। प्रिंट पत्रिका एक बेर प्रकाशित भऽ गेलाक बाद दोबारा नै भऽ सकैए (भऽ तँ सकैए मुदा फेर पाइ लागि जेतै) तँइ ओकर वर्तनी यथाशक्ति सही रहैत छै। इंटरनेटपर सुविधा छै जे बीचमे (इंटरनेटसँ प्रिंट हेबाक अवधि) ओकरा सही कऽ सकैत छी मुदा सामग्रिए बसिया रहत तँ सही वर्तनी रहितो नव अध्याय नै खुजि सकत तँइ हमरा लोकनि वर्तनी बला मुद्दापर समझौता केलहुँ। हमरा लोकनि कएलनि, कयलनि ओ केलनि तीनू शुद्ध मानैत छी, एतेक शुद्ध मानैत छी एकै रचनामे तीनू रूप भेटि जाएत। आन शब्दक लेल एहने बूझू। उम्मेद अछि जे पाठक विदेहक आने विशेषांक जकाँ एकरा पढ़ताह आ पढ़ि एकर नीक-बेजाएपर अपन सुझाव देताह। विदेह अरविन्द ठाकुर विशेषांक केर पोथी रूप "स्वतंत्रचेता" केर नामसँ प्रकाशित भेल उम्मेद जे भविष्यमे अशोक जीपर केंद्रित एहि विशेषांक केर पोथी रूप सेहो आएत। विदेह द्वारा विशेषांक शृंखलामे प्रकाशित भेल विशेषांक सबहक सूची एना अछि, ऐठाम जे सूची देल गेल अछि तइ सभपर क्लिक करबै तँ ओ अंक सभ खुजि जायत। १) अरविन्द ठाकुर विशेषांक ०१ नवम्बर २०१५ अंक १८९ (ई विशेषांक २०२० मे पोथी रूपमे सेहो आयल अछि) २) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक ०१ दिसम्बर २०१५ अंक १९१ ३) रामलोचन ठाकुर विशेषांक ०१ अप्रैल २०२१ अंक ३१९ ४) राजनन्दन लाल दास विशेषांक ०१ नवम्बर २०२१ अंक ३३३ ५) रवीन्द्र नाथ ठाकुर विशेषांक १५ जून २०२२ अंक ३४८ ६) केदारनाथ चौधरी विशेषांक १५ अगस्त २०२२ अंक ३५२ ७) प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' विशेषांक ०१ नवम्बर २०२२ अंक ३५७ ८) शरदिन्दु चौधरी विशेषांक १५ नवम्बर २०२२ अंक ३५८ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.अशोक जी केर संक्षिप्त परिचय एहिठाम प्रस्तुत अछि अशोक जी केर संक्षिप्त परिचय। सोशल मीडियापर हुनका कथाकार अशोक केर नामसँ बेसी जानल जाइत छनि। एहि परिचय केर अधिकांश तथ्य पहिनेसँ सार्वजनिक छै। किछु तथ्य जुटाओल गेल अछि आ फोटो सभ स्वयं अशोकजीक सौजन्यसँ भेटल अछि। नाम-अशोक जन्म तिथि : 18 जनवरी, 1953 माता : स्व. नन्दा देवी पिता : स्व. उमापति झा स्थान : लोहना, मधुबनी (बिहार) शिक्षा : बी.एस-सी., डी. सी. एम. (मास्को) वृत्ति- बिहार सहकारिता सेवाक सेवानिवृत्त पदाधिकारी अशोक जी केर परिवारक अन्य सदस्य : पत्नी : स्व. पूर्णकला पुत्र : 1) प्रवीण (हिनक पत्नी पल्लवी), 2) प्रभात (हिनक पत्नी शिल्पा) प्रकाशित कृति मौलिक: (एखन धरि अशोकजीक जतेक मौलिक पोथी प्रकाशित भेलनि ताहिमेसँ अधिकांश विदेह पोथी डाउनलोडपर राखल गेल अछि आ एहिठाम जे पोथीक लिस्ट देल गेल अछि ताहिमे पोथीक नामपर क्लिक करबै तँ ओ पोथी खुजि जाएत)- 1) चक्रव्यूह (कविता संग्रह) (1986) 2) त्रिकोण (कथा संग्रह) (1986) 3) ओहि रातिक भोर (कथा संग्रह) (1991) 4) मातबर (कथा संग्रह) (2001) 5) मैथिल आँखि (2007) 6) संवाद (साक्षात्कार संग्रह) (2007) 7) कथाक उपन्यासःउपन्यासक कथा (2012) 8) आँखिमे बसल (यात्रा कथा) (2013) 9) बात-विचार (आलोचना) (2015) 10) डैडीगाम (कथा संग्रह) (2017) 11) नीक दिनक बाइस्कोप (व्यंग्य संग्रह) (2018) 12) राजमोहन झा (विनिवन्ध, 2019) 13) कथा-पाठ (2022) विदेह एवं आन पत्रिकामे प्रकाशित रचना सभ जे कि एखन पोथी रूपमे नहि अछि- 1) अशोक-सेलेक्शन्स (विविध) 2) अशोक-नव कविता 3) मुन्ना जी द्वारा साक्षात्कार (पृ. 382-385) 4) बनैत कम बिगड़ैत बेसी (पृ. 2023-2031) 5) सम्पादक राजनन्दन लाल दास आ कर्णामृत (पृ. 119-122) 6) रामलोचन ठाकुरक कविता पढ़ैत (पृ. 327-341) 7) केदार नाथ चौधरीक उपन्यास (पृ. 101-106) 8) शरदिन्दुजी (पृ. 70-73) प्रकाशित कृति सम्पादन: 1) प्रतिमान (विचार गोष्ठीक आलेख ओ विमर्शक संग्रह) 2) सन्धान (अंक 1- 2- 3- 4, अनियतकालीन पत्रिका) 3) मैथिली आलोचना (सम्पादन) (2017) अशोक जीक माता-पिता, स्व. उमापति झा एवं स्व.नन्दा देवी अशोक जी पत्नी स्व. पूर्णकला जीक संग अशोकजी अपन पौत्री श्रेया केर संगे अशोक जी, अपन पत्नी, दूनू पुत्र ओ पुत्रवधु (पल्लवी)क संग अशोक जीक पुत्र, प्रभात ओ पुत्रवधु शिल्पा अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.अशोक- हम आ हमर परिचय अशोक हम आ हमर परिचय हमर जन्म १८ जनवरी १९५३ केँ लोहना (मधुबनी) मे भेल। हमर पिता रहथि स्व. उमापति झा एवं माता रहथि स्व. नन्दा देवी। हमर जन्मक बहुत पूर्वेसँ हमर पिता कासीमे रहैत छलाह। महारानी लक्ष्मीवती द्वारा निर्मित राम मंदिरक व्यवस्थापक रहथि ओ। लक्ष्मीवती अपन जीवनकालमे कटिहार जूट मिलसँ बजा कऽ हुनका मंदिरक व्यवस्थापक बनौने रहथिन। हम सपरिवार ओतहि रहलहुँ। हमर जेठ भाइ स्व. प्रो. सुशील झा ओतहि पढ़लनि-लिखलनि। बी.एच.यूसँ एम.ए केलनि। जखन ओ एम.ए केलनि तँ हम छह वर्षक रही। भाइ एम.ए पास कऽ १९५९ ईस्वीमे सरिसव गाममे महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह महाविद्यालयमे प्राध्यापक भऽ गेलाह। हुनकासँ छोट हमर बहीनि स्व.गीता देवीक बियाह हमर जन्मसँ एक मास पूर्व दिसम्बर १९५२ मे भऽ गेल रहनि। भाइ हमरासँ पंद्रह वर्ष आ बहीनि बारह वर्षक जेठ रहथि। स्वाभाविक रूपसँ हमर स्थिति परिवारमे एक ललबबुआ सन रहए। सभ अल्लो-मल्लोमे लागल रहए। ताहिपरसँ नेनहिसँ हम बहुधा दुखीत पड़ि जाइ। से क्रम मैट्रिक तक चलल। परिवारक लेल ई एक पैघ चिन्ताक कारण बनल रहल। भाइ के प्राध्यापक बनि गाम चल अएबाक कारण माए संग हमहूँ गाम आबि गेलहुँ। एक वर्ष गामेमे पैटघाट स्कूलमे पढ़लहुँ। मुदा ठीकसँ नहि पढ़बाक कारणे माए हमरा १९६० मे पिता संग फेर आगू पढ़बाक लेल काशी पठा देलनि। हमर स्कूली जीवनक आरम्भ सुनियोजित रूपसँ बेसिक पाठशाला, हौजकटोरा, वाराणसीसँ भेल। ओतहिसँ पचमा क्लास उतीर्ण भेलहुँ। फेर छठमामे पढ़बाक लेल हरिश्चंद्र इंटर कालेजमे एलहुँ। १९६९ ईस्वीमे मैट्रिक केलहुँ। इंटरमे डी.ए.वी कालेज आबि गेलहुँ। मुदा उतीर्ण नहि हेबाक डरसँ परीक्षा छोड़ि देलियैक। गाम आबि गेलहुँ। सरिसव कालेजसँ आइ.एस.सी केलहुँ। गोयनका कालेज, सीतामढ़ीसँ बी.एस.सी (वनस्पति शास्त्रमे प्रतिष्ठा) केलहुँ। बी.एस.सीक रिजल्ट १९७५क जनवरीमे निकलल आ ओही वर्ष जूनमे हमर विवाह मधुबनीमे डा. जयधारी सिंहक सुपुत्री पूर्णकला देवी संग भेल। ओकर बाद हम प्रतियोगिता परीक्षा सभक तैयारी करए लगलहुँ। प्रतियोगिताक माध्यमसँ पहिल नौकरी जनसंपर्क विभागमे अपर जिला जनसंपर्क अधिकारीक रूपमे १९७७ मे शुरू केलहुँ। तकर बाद बी.पी.एस.सीक संयुक्त परीक्षा द्वारा सहकारिता विभागमे सहायक निबंधक, स.स. केर पदपर इटाठी (बक्सर) मे १९७८ मे योगदान देलहुँ। ओही विभागमे विभिन्न पदपर काज करैत वर्ष २०१३ मे ३१ जनवरीकेँ सेवानिवृत भेलहुँ। एहि अवधिमे हमर माताक देहावसान १९८७ ईस्वीमे, पिताक १९८८ ईस्वीमे, बहीनक १९८९ ईस्वीमे आ भाइक १९९० ईस्वीमे भऽ गेलनि। चारि वर्षमे हमरासँ जेठ चारू गोटा चल गेलाह। आब हमरासँ जेठ परिवारमे हमर भौजी वीणा देवी छथि जे गाममे रहैत छथि। हुनका संग हमर भातिज राजीव सपरिवार रहैत छथि। ओ सरिसव कालेजमे सहायक के रूपमे कार्यरत छथि। संपूर्ण परिवारकेँ सम्हारने छथि। भौजी आ राजीव के गाममे रहलाक कारणे हमरो आ हमर परिवारक संबंध अनवरत गामसँ बनल रहल अछि। साहित्य के प्रति हमर झुकाओ काशीमे मैथिल छात्र संघक गतिविधिकेँ देखला-सुनलासँ भऽ गेल। छात्र संघ द्वारा मैथिलीमे अनेक कार्यक्रम होइत छल। ई सभ कार्यक्रम राममंदिरेपर हुअए। हम बच्चेसँ सभटा देखऽ लगलहुँ। नटाक, कविता-पाठ, भाषण प्रतियोगिता, जयन्ती, सरस्वती पूजा आदि कार्यक्रममे क्रमशः भाग लिअ लगलहुँ। मिथिला-मैथिलीक मादे सुनऽ लगलहुँ। हमर पहिल रचना कविता छल जे बटुक पत्रिकामे १९६८ ईस्वीमे छपल "शशि चन्दा के समान"। चन्दा झाक जयन्तीमे पढ़ने रही। फेर १९६९ मे मिथिला-मिहिरमे दोसर कविता छपल। पहिल कथा "विराम सँ पहिने" १९७१ ईस्वीमे मिथिला-मिहिरमे छपल रहए। तकर बाद क्रमशः साहित्यमे रमैत गेलहुँ। साहित्य जीवनक अंग भऽ गेल। अनिवार्य बनैत गेल। नौकरी जीवनमे हम बक्सर आ कटिहार पदस्थापनक अतिरिक्त बेसी अवधि पटनेमे विभिन्न पदपर रहलहुँ। हमर दूनू बालक प्रवीण ओ प्रभात पटनेमे पढ़लनि-लिखलनि। प्रवीण देहरादूनसँ बी.टेक कऽ स्टील अथारिटी आफ इंडियामे कार्यरत छथि। वर्ष २००९ मे हुनकर विवाह पल्लवीसँ भेलनि। एकटा बेटी छनि श्रेया जे एहि बेर छठमा क्लास पास केलक अछि। ओ सभ बोलानी (उड़ीसा)मे रहैत छथि। एहिसँ पहिने कीरीबुरू (झाड़खंड)मे छलाह। प्रभात अंग्रेजीमे एम.ए, पी.एच.डी कऽ एखन पटना वीमेंस कालेजमे पढ़ा रहल छथि। वर्ष २०१६ मे हुनक विवाह शिल्पासँ भेलनि। साहित्यमे हुनक खूब अभिरुचि छनि। अंग्रेजीमे बेसी लिखैत छथि से कविता। मैथिलीमे सेहो लिखऽ लगलाह अछि लेख सभ। अनुवाद सेहो करैत छथि। तारानंद वियोगीक कविता सभक अनुवाद अंग्रजीमे पोथीक रूपमे प्रकाशित छनि। हमर पत्नी पूर्णकला झाक देहावसान २०१९ ईस्वीक जनवरीमे भऽ गेलनि। वर्ष २००२-०३ मे हुनका गंभीर बिमारीक कारणे दिल्लीक गंगाराम अस्पतालमे अढ़ाइ मास रहऽ पड़लनि। आपरेशन भेलनि। एकैस दिन धरि आइ.सी.यूमे मृत्युसँ लड़ैत रहलीह। देहमे सामर्थ्य लेल बहुत समय लगलनि। २००४ ईस्वमीमे धरि ओ विभिन्न आपरेशनक अपार कष्ट भोगलनि। कतेको बेर लागए जे ओ आब नहि बचती मुदा बचि त गेली आ ओकर बाद बाद सतरह वर्ष धरि जीवित रहलीह। मुदा समान्य जीवन नहिए जीबि सकलीह जकर हुनका बहुत अभिलाषा रहनि। अंतिमो समयमे ओ मरए नहि चाहैत रहथि। जाबत धरि स्वस्थ रहथि ताबत धरि घर-परिवार, दूनू बालककेँ वएह सम्हारने रहथि। नेनामे दूनूकेँ वएह पढ़ौलनि-लिखौलनि। हम तँ सरकारी काज, सेवा-संघक काज. साहित्यिक-सांस्कृतिक काज सभमे हरदम व्यस्ते रहैत छलहुँ। आब हम सत्तरि वर्षक भऽ गेल छी। पाछू घूमि कऽ तकैत छी तँ लगैए जे इंटरमे पढ़ैत काल काशीमे कोठलीक देवालपर अपन भाइक लिखल पाँती "महत्वाकंक्षा का मोती निष्ठुरता की सीपी में रहता है" के पढ़ि तँ गेल रही मुदा आब जा कऽ ओकर अर्थ लागब शुरू भेल अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.कल्पना झा- ठाँहि-पठाहिँ बाजब/लिखब सहज नहि कल्पना झा ठाँहि-पठाहिँ बाजब/लिखब सहज नहि विदेह मैथिली पोथीक आर्काइव पर जखन आदरणीय अशोक सर रचित पोथी सभक लिस्ट देखलहुँ, तँ कथा संग्रह, कविता संग्रह,साक्षात्कार संग्रह, यात्रा कथा,आलोचना, विविध आ नव कविताक पोथी सभक संग एक गोट व्यंग्य संग्रह पर नजरि पड़ल। "नीक दिनक बाइस्कोप" शीर्षक व्यंग्य संग्रह पर नजरि पड़ितहि हम बिनु एकहु क्षण गमओने एहि पोथी केँ डाउनलोड केलहुँ।मोन मे आएल "अशोक सर आ व्यंग्य संग्रह?" कनि अविश्वसनीय सन लागल,तैँ जिज्ञासा अत्यधिक प्रबल छलए, जे देखी,आखिर केहन अछि पोथी।जतबा हम अशोक सर केँ देखलियनि/सुनलियनि,स्वभाव सँ ओ बहुत बेसी सौम्य, मृदुभाषी लोक बुझेलथि हमरा। तैँ अविश्वसनीय सन बात लागल,जे एहन लोक व्यंग्य कोना लिखि सकैत छथि। ककरो पर कटाक्ष करब,ठाँहि-पठाहिँ बाजब/लिखब सहज नहि । आ जखन ओ स्वभावक विपरीत हुअए, तखन तँ आरो नहि। ठाँहि-पठाहिँ बात अधिक काल कटुए होइत छै,आ कटु बाजब सभक बुत्ताक बात नहि। पोथी पढ़ब सुरुह केलहुँ, तँ लेखक द्वारा दू शब्द कहबाक क्रम मे "कहबाक अछि......"मे सभटा खिस्सा लिखल देखलहुँ/पढ़लहुँ,जे कोना संजोग बनलनि दैनिक हिन्दुस्तानक एकटा स्तम्भ "ठाँहि-पठाहिँ" लेल व्यंग्य लिखबाक। आ कतेक अबूह लागैत छलनि लेखक केँ व्यंग्य लिखब,तकर चर्चा सेहो केलनि अछि। लेखक स्वयं ई बात स्वीकार कएने छथि,जे "ठाँहि-पठाहिँ लिखब महाग मुश्किल।" आगाँ लेखक इहो बात स्वीकार करैत छथि जे एहि स्तम्भ लेल लिखैत "किछु सामयिक घटना-समाचार पर सोचबा-विचारबाक अवसर भेटल।संगहि इहो महत्वपूर्ण रहल जे अपन स्वभावक विपरीत कने-मने ठाँहि-पठाहिँ कहबाक-बजबाक अवगति भेल। हिम्मति भेल।"अवगतिए टा नहि भेल सर ! खूब सुतरल व्यंग्य लिखब। आगाँ आरो एहन व्यंग्य संग्रह पढ़बालेल भेटए,से अपेक्षा। सभ सँ पहिने गप्प करब जीवनक लेल सभ सँ महत्वपूर्ण प्राणवायुक श्रोत गाछ-वृक्ष सँ संबंधित विषय पर लिखल गेल "हाइवे पर हरियाली"क। लेखक कतेक नीक संदेश देलनि अछि से देखल जाउ-"हाइवेक निर्माण मे जेना वृक्ष-संहार होइत अछि,से जीवन लेल मारुक भ' रहल अछि। मुदा सरकारे पर सभटा दोष मढ़ि देब,अपन जिम्मेदारी सँ भागब भेल। तैँ सरकारक संग हमरो सभ केँ योजनाक शत-प्रतिशत पालन लेल मोस्तैद रह' पड़त।जँ अपने चाँकि नहि रहत,त' आन केँ कोन गरज छै।" लेखकक मोन फगुआ आ चुनावक गठबंधन देखि गारडेन गारडेन भेल छलनि, हमरा तँ "अतत्तह" पढ़ि मोन गारडेन गारडेन भ' गेल। कतेक सूक्ष्म ऑब्जर्वेशन ! मित्रता त'अतत्तह,शत्रुता त' अतत्तह। सत्ते,प्रकृति आ स्वभाव मे आइ काल्हि अति के डंका बाजि रहल अछि।अतत्तह भ' रहल अछि। कोनो सीमाक आब मोजर नहि रहि गेल अछि।सेहन्ता तँ सीमा पार। प्रेम तँ सीमा तोड़ि क'। क्रोध तँ अकास ठेकल। ओना "अतत्तह" सन आरो बहुत टॉपिक सभ बहुत नीक लागल पढ़ैत। "भ्रमक कुहेस", "मुखौटा","सपनाक रेल",सभटा बेजोड़ टॉपिक। "बिलाइत गाम"मे यथार्थक चित्रण करैत लिखैत छथि -"गाम अछि कि गायब भ' गेल।निट्ठाहे गायब भ' गेल कि किछुओ बचल अछि।छहर आ बाँध ओकरा गीड़ि गेल।डैम ओकर अस्तित्व लोप क' देलक।" गामक चिन्हास विशाल बड़क गाछ,घनगर पीपड़क गाछ,झोंटहा पाकड़िक गाछक चर्चा, बड़द-गाए-महीसक चर्चा,कुमहर,खम्हाउर,ओल,पोरोक सागक चर्चा करैत बिलाइत गामक मार्मिक चित्रण केलनि अछि। लेखकक कहब छनि जे शहर सभक आधुनिकीकरण मे बेहाल सरकार गामे केँ एना बसा दिअए,जे काज-रोजगारो भेटए आ अपन समाज-परिवारक संग रहियो सकी। मुदा एहिलेल बाजत के? "गुनक करु मान"मे अपना मिथिलाक प्रचलित फकड़ा सभ पढ़ि नीक लागल। कतेक सार्थक, सटीक होइत छलए, सभटा फकड़ा सभ।जे आब बोलचाल मे एकदम प्रयोग मे नहि रहि गेल। अपना केँ पैघ लोक आ मॉडर्न शो करबाक चक्कर मे ओझराएल समाज आब ई गमैआ,देहाती फकड़ा सभ किएक बाजत। बहुत रास प्रश्न ठाढ़ केलनि अछि लेखक,जाहि पर विचार करबाक बेगरता छै-"ई कोना भेल जे हित-अहितक बात बिसरि पैघ-छोटक फेर मे पड़ि गेलहुँ ?एना एक दिसाह,एक भगाह किएक भ' रहल छी हमसभ ?" "पोखरि सभ के कहिया उड़ाहब" बहुत महत्वपूर्ण विषय लागल। मरणासन्न भेल हुकुर-हुकुर करैत पोखरि सभ लेल लेखकक चिंता उचिते छनि। लेखक कहैत छथि,"अपना सभक इलाका नदी- पोखरिक मामला मे धनीक रहए। मुदा आब तहिना गरीब आ विपन्न भेल जा रहल अछि।"एकटा चौंका देमए बला आँकड़ाक उल्लेख सेहो केलनि अछि लेखक। देशक आजादीक समय अपना मिथिला मे जाहिठाम चौबीस लाख पोखरि छलए ताहिठाम आब मात्र साढ़े पाँच लाख बाँचल अछि। विडम्बना ई जे (लेखकक शब्द मे)- "गाम-गाम मे पूजा-पाठ बढ़ि रहल अछि। जत' कहियो बासंती दुर्गा पूजा नहि होइत छल,ओतहु लाख-लाख खर्च क' धूमधाम सँ पूजा भ' रहल अछि।भरि-भरि राति भिडियो चलैत अछि।नाच-गान होइत अछि।मुदा कूपोत्सव,तरागोत्सव नहि होइत अछि।इनार आ पोखरि खुना क' उत्सव नहि मनाओल जाइत अछि।एहन उत्सव नहि होइत अछि जाहि सँ लोकक उपकार हुअए।"समाज केँ चेतबति लेखक कहैत छथि-" पानि बिना की जीवन।पोखरि बिना की गाम घर। आउ,जीवन बचाओल जाए।पोखरि खुनाओल जाए।" सभटा विषय-वस्तु बहुत महत्वपूर्ण आ सार्थक चुनल गेल अछि लेखक द्वारा। समसामयिक विषय सभ,जाहि मे राजनीति आ राज नेता सभ पर व्यंग्य सेहो सम्मिलित अछि। "चुनावक फगुआ","ई ककर बजार छियै हो भाइ","टमाटर आ पियाजक सत्ता सुख" एहि श्रेणी मे आएत। मौसमक मिजाज सँ संबंधित सेहो किछु विषय अछि,जेना-"नामी भेल पटनाक गर्मी" ,"आब' हे अखाढ़!"समाजोपयोगी काज दिस लोकक ध्यान दिअबैत विषय सभ सेहो अछि। समाजक प्रति सेहो हमर सभक किछु जिम्मेदारी अछि,से आबक लोककेँ विस्मृत भ' गेल छनि। सभ अपनेलेल बेहाल रहैए। लोक आत्ममंथन करए।मनुष्य-जन्मक सार्थकता मात्र अपनालेल जीबए मे नहि छै,से लोक बूझए। कथेतर साहित्यक श्रेणी मे आबए बला पोथी "नीक दिनक बाइस्कोप" समाजक लेल उपयोगी तँ अछिए,संगहि रोचक सेहो लगतनि पाठक केँ। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.आभा झा-डैडीगाम- मध्यमार्गक अन्वेषणक कथा आभा झा डैडीगाम- मध्यमार्गक अन्वेषणक कथा संस्कृत में एकटा वाक्यांश छैक -' गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति' अर्थात् कवित्वक कसौटी गद्य होइछ।छन्द,लय गति यतिक बन्धनसॅं मुक्त हयबाक कारण गद्यमे भाषागत अथवा विषयगत छूट भेटबाक कोनो गुंजाइश नहि होइत छैक।एत' एकटा गप ध्यातव्य अछि जे संस्कृतमे गद्य,पद्य,नाटक, चम्पू सभ काव्यक श्रेणीमे अबैत अछि। कथाकार अशोक मैथिली कथाक सुस्थापित नाम छथि। यद्यपि ओ पाठकवर्गकेॅं कविता- संग्रह एवं आलोचना आदि विधामे सेहो सशक्त रचनाक उपहार देने छथिन,तथापि स्पेशलाइजेशन कथाक्षेत्रीये। आइ किछु गप हुनक कथासंग्रह 'डैडीगाम'क।प्रारंभ करैत छी शीर्षकथासॅं। प्रवास मनुक्ख लेल विवशतो अछि आ महत्त्वाकांक्षा सेहो। मुदा जेना- जेना वयस बितैत छैक,कार्यालयीय दायित्व क'म होइत छैक,धिया-पुताक जिम्मेवारी खतम जकाॅं होइत बुझाइत छैक,यानी समयक फरागति होइ छैक,अपन जड़ि तीव्रताक(शिद्दत) संग मोन पड़ैत छैक। किछु एहने सन अनुभव होइत छनि कथानायक रघुवंश बाबूकेॅं जीवनक सान्ध्यवेलामे आ ओ विकल होमए लगैत छथि गाम घुरबा लेल। मुदा एत' सकारात्मक पक्ष ई जे पत्नी आ धिया-पुता सेहो रघुवंश बाबूक इच्छाक समर्थक। यद्यपि देखल गेलै अछि जे बाहर रहनिहार बालबच्चा सभ एतेक मैटेरियलिस्टिक भ' जाइत छैक जे मायबापक भावना सेहो हानि- लाभक बटखरा पर जोखैत अछि । मुदा साहित्यकारक काज मात्र यथार्थ देखायब नहि,ओहि धरातल पर आदर्श स्थितिक सृजन सेहो होइत अछि।से कथाकार एत' परोक्षत: कह' चाहैत छल हेताह- एहनो भ' सकैछ, प्रयास त' करह। गामक लोक मंदिर-निर्माणक नाम पर स्वागत करत,एतेक दिन धरि कयल गामक उपेक्षा मोन नहि पाड़त, तैं राममंदिर- निर्माण निर्णय कए रघुवंश बाबू सपरिवार गाम एलाह।मुदा गामक नवयुवकक प्रश्नक मादें लेखक संभवतः अपन मनोभाव व्यक्त करबाक प्रयास करैत छथि, धनिक प्रवासीकेॅं कर्त्तव्य मोन पाड़ैत छथि- 'कने विचारि क' देखियौ माणिक बाबू, कतेकरास मंदिर तँ अछिये चारूकात। तै पर फेर एक नव मंदिर बनि क' की होयत? जोहो त' एक टा 'लाइबिलीटीये' भ' जायत। एहि सँ बरु अहाँ सभ अस्पताल बनबितहुँ । स्कूल खोलि दितहुँ। कॉलेजक निर्माण करितहुँ । दुनियामे एक सॅं एक ज्ञानक प्रचार-प्रसार भ' रहल छै। ओकरे शिक्षण-प्रशिक्षणक व्यवस्था करितहुँ । लोक के कत्ते उपकार होइतै।' एत' एक दिशि गामक नवयुवक लोकनिक जागरूकता व्यक्त भेल अछि त'दोसर दिशि धनाढ्य लोकनिक सामंती प्रवृत्ति पर चोट सेहो पड़ैत अछि।'गामक लोकक एतबहि टा अकाश' एहि सोचमे परिवर्तनक खगता देखाओल गेल अछि। ई एकटा आशावादी कथा अछि,जाहिमे सभ बुझनुक बुझना जाइत छथि,कथानायक,हुनक पुत्रद्वय,पत्नी आ समाज सभ।आ सभ मिलि जीवनक सुखमय राग गबैत अछि। 'गामक कातक हाइवे' भौतिक विकासक संग गामक ग्राम्यपन,निश्छलता आ नैसर्गिकताक अंत देखि भावुक भेल साहित्यकारक अंतर्वेदनाक उद्गार अछि । 'छुट्टीक एक दिन' समयक संग सामञ्जस्य-विधान करैत लेखकक एकटा सुखान्त कथा अछि,जाहिमे दू टा शिक्षित युवक- युवती सामाजिक विधानक विरुद्ध प्रेम विवाह करितो मैथिली साहित्य एवं मैथिल समाजक प्रति अक्षुण्ण अनुराग रखैत छथि। किछु अही भाव पर आधारित कथा सन बुझाइत अछि 'स्वाधीन'।मुदा,ओत' वैवाहिक बलात्कारक पुरजोर विरोध देखाओल गेल अछि।एकटा स्वाभिमानिनी स्त्री कोनहु परिस्थितिमे ओ गर्भ रखबा लेल तैयार नहि छथि,जे जबर्दस्तीक सम्बन्धक प्रतिफल होमए। हॅं,ओ बुझैत छथि जे जबर्दस्ती करैबला पुरुष नितान्त अधलाह लोक नहि छथि, तैं तलाक नहि लैत छथि,ई कहैत जे 'हम खिस्सा खतम नहि शुरू कर' चाहैत छी'।मुदा तैंयों वैवाहिक मूल्यक अवहेलना स्वीकार नहि करैत छथि। स्त्रीक अस्मिता- दलन कुपुरुषक प्रवृत्ति रहल अछि, मुदा स्त्रीक ओहि चोटसॅं उपजल टीसक अनुभूति सेहो पुरुष लेखक कए सकैत अछि,कारण लिखबा काल ने ओ पुरुष रहैछ आ ने स्त्री,ओ रहैछ मात्र ओ पात्र।पात्रक संग मानवीकरण आ समानुभूति नीक लेखकक चेन्ह होइत अछि।से अनुभव करैत लेखक अपन टीस कथामे नायिकाक मोनक संवेदना लिखैत छथि - जेल मे शान्त आ स्थिर भेल बैसल बिमला के बेर-बेर एक्केटा बात मोन मे घूमि-फीरि कं' अबैत छलनि-' अध्यक्ष बनौलनि त' अध्यक्षक काज किए नहि देलनि? हम त' हुनकर सहधर्मी छलियनि। सहकर्मी किए नहि बनौलनि? हमरो दसखत किए अपने क' देलथिन ? एहन बेइमानी किए? की बेइमान समठाम बेइमाने होइत अछि? बाहरो मे बेइमान आ घरो मे बेइमान। ' 'उमकी' ऊपरसॅं प्रेमकथा बुझाइत अछि, परञ्च 'अति सर्वत्र वर्जयेत्' सिद्धांतक अनुसार ओकर अंत आतंकित करैत अछि।की प्रेमक एहनो रूप भ' सकैत छैक?की प्रेमक सेहो कोटा होइत छैक -एतबा जरूरति,एतबा आपूर्ति,तकर बाद कोनो सुख,दु:खक असरि नहि? निस्संदेह नहि, तैं नाम थिक उमकी। मनुष्य कतबो व्यस्त रहओ,कतबो दायित्वमे किऐक नहि ओझरायल रहओ,ओकरा अपन रुचि- प्रवृत्ति पर अवश्य ध्यान देबाक चाही ।लोक की कहत?हमर इमेज की अछि? आदि- आदि निरर्थक सोचमे अपन खुशीक आहुति देब बुद्धिमानी नहि, परञ्च ओहि एक क्षणक खुशीक अनुभव करब जिनगीमे न'ब ऊर्जा भरैछ,ई सार अछि 'लाथ' कथाक। 'छल' कथा जबरदस्त नाटकीय कथा अछि। कोनो व्यक्ति (भोलीझा)किछु क्षणक लेल कोनो पार्ट लैत अछि त' जेना ओ ओएह भ' जाइत अछि ।अभिनयक जीवन्तताक उत्कृष्ट निदर्शन अछि एहि कथामे। 'मनसूबा' मे कैरियरमे बुलंदी पयबाक उन्मादमे युवावर्ग द्वारा घ'र-गृहस्थीक जिम्मेवारीसॅं पलायनक बढ़ैत प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त करैत छथि लेखक त' 'खुशीक नाम जीवन' मे अन्तर्जातीय विवाह पर स्वीकृतिक मोहर लगबैत छथि।एत' लेखकक मध्यमार्गीय दृष्टिक पोषण, सामाजिक स्वीकृति आदि बदलैत समयक संग कदमताल करैत अछि जे आवश्यको। आशावादी दृष्टिकोण देखबैत अछि कथा 'अभयक बेटाकेॅं दूटा दांत भेलनि अछि' त' मानसिक बीमारी दिशि इंगित करैत अछि 'एना भ' क' कियो'।एकर अतिरिक्त 'ओ दुनू साइकिल सिखैत अछि','राग','लेमन आइसक्रीम' आदि कथा नीक बनल अछि। संक्षेपमे जॅं कही त' डैडीगाम एकटा संवेदनशील कथाकारक पन्द्रह गोट रमणगर कथाक संग्रह अछि।कथाक प्रस्तुतिक छटा सुंदर आ मोहक अछि।मात्र चिंता व्यक्त करब, साहित्यकारक उद्देश्य नहि, अपितु अपन पात्रक माध्यमसॅं ओकर निवारणक उपाय देखायब,मुदा एना सन जेना हम कहाॅं किछु कहलहुॅं,हम त' खिस्सा कहैत छलहुॅं। कथाकारकेॅं एकटा अत्यंत सामान्य पाठकक अभिनन्दन! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.दिलीप कुमार झा- मैथिल आँखिक वैश्विक कथाकार छथि कथाकार अशोक ['मातबर' कथा संग्रहक पुनर्पाठ'] दिलीप कुमार झा मैथिल आँखिक वैश्विक कथाकार छथि कथाकार अशोक ['मातबर' कथा संग्रहक पुनर्पाठ'] समकालीन मैथिली कथाकारमे बेछप नाम छथि कथाकार अशोक। हिनक कथा कें ताकि - तकि केँ पढ़तै रहलहुँ अछि।हिनक कथाक बिषयमे टिप्पणी करब सहज नै छैक। विद्वता आ समीक्षकीय दृष्टिकोण सँ देखल जाय तँ बहुत विशद विश्लेषणक माँग करैत अछि हिनक कथासभ मुदा से अवगति हमरा नहि अछि तथापि हम ई मानैत छी हिनक कथाक भाव,कथ्य आ बहुत हद धरि कथाक अभिष्ट साधारण सँ साधारण पाठक बुझि पबैत छथि ताहि परिप्रेपेक्ष्यमे हिनक दोसर कथा संग्रह 'मातबर' जे बहुत पहिने पढ़ल छल एहि बीच एकर पुनर्पाठ कयलहुँ।ताहि क्रममे इच्छा भेल कियेक ने एहि पोथीपर अपन किछु पाठकीय टिप्पणी राखल जाय।तकरे एकटा प्रयास अछि एहि विशिष्ट कथा संग्रहपर ई दूटप्पी। हिनक कथा संग्रह पढ़ैतकाल सबसँ पहिने हमरा ई भान भेल जे कथाकार अशोक समयक संग बहुत यथार्थवादी ढंग सँ चलबामे विश्वास करैत छथि।ओ लकीर के फकीर नहि छथि। कथा कहैत नहि छथि, रचैत छथि से सम्पूर्ण तथ्यक संग।भूत,वर्तमानक तालमेल बैसबैत भविष्योन्मूख कथाक सृजनशील्पी छथि कथाकार अशोक। एकैसम शताब्दीक आरंभे मे (२००१ई.)ई कथा संग्रह अबैत अछि।एकैसम शताब्दीक आरंभिक बर्षमे दुनियांमे अनेक परिवर्तन भेल। दुनियाँक कम्युटरीकरण,मुक्त व्यापार समझौता, इंटरनेटक अविर्भावक प्रभाव वैश्विक पड़य लागल।भारत सेहो प्रभावित भेल सहजहि मिथिला सेहो।एहि सभ बातक प्रभाव एहि कथा संग्रहमे संग्रहित कथा सभपर देखल जा सकैछ। पाठ आ पुनर्पाठ क पछाति हम जे किछु बुझि सकलहुँ तकर ई आत्मिक अनुभूति मात्र थिक। हम सबसँ पहिने एहि संग्रसक 'राँड़' कथापर चर्च करय चाहब।विधवाक जीवनपर मैथिली मे घनेरो कथा लिखल गेल अछि मुदा राँड़ कथा ओहि कथा सभसँ बहुत फराक अछि ,एना कहि जे क्रान्तिकारी अछि तँ बेजाय नहि।ई एकटा विद्यार्थी मनीषक कथा सँ आरंभ होइछ जे वास्तवमे बदलैत परिवेशमे स्त्री- पुरुषक साम्यताक कथा कहैछ।विधवा जीवनमे आयल बदलावक कथा कहैछ।मनीष अपना मामी सँ आत्मिक स्नेह करैत छथि जखन हुनका मामीक वैधव्य हेबाक खबरि भेटैत छनि तँ ओ व्यग्र भ' जाइत छथि जे एतेक सुन्नरि मामी कोना क' उजरा साड़ी पहिरि क' रहती? केहन लगती ? आदि आदि चित्रक मनोदशा बनैत छनि।एहि छण हुनका मोन पड़ैत छथिन अपन विधवा पितामही ,अपन पिसियौत बाल विधबा बहिन। मामाक मृत्यु सँ मनीषक मोन बिचलित होइत छनि आ ओ मामीक लेल मुँगा रंगक शाल ल' जेबाक आ हुनका ओ शाल ओढ़ा देबाक विचार करैत छथि।जखन मनीष मामी सँ भेट करबाक लेल काशी जाइत छथि तँ हुनका मोनमे अतिरिक्त संतोष होइत छनि से मामीक परिधान देखि क' ।मामी आसमानी रंगक नुआ ब्लाउज पहिरने छथि।।हाथमे सोनाक चूड़ी आ घड़ी ।ई हमरा समाजमे एकटा पैघ बदलाब भेल अछि।विधवाक जे अभिशप्त जीवन छल ताहिमे बहुत सुधार भेल अछि।आब तँ रहरहां विधवा विवाह सेहो भ' रहल अछि।कथाक माध्यम सँ मिथिलाक विधवा स्त्रीक काशीमे केहन दुर्दशा छलनि तकरो उल्लेख भेल अछि। से लेखक रानी कोठाक'नेपोभाटिन 'क वर्णन आओर विश्वनाथ गलीमे भीख माँगवाली सभक स्थितिक चित्रण सँ बहुत सटीक तुलनात्मक अध्ययन कयलनि अछि। एतबहि नै एहि कथाक माध्यम सँ स्त्री काज क'के अपन पैरपर ठाढ़ हुए।अपन परिश्रमक पाय सँ अपन धियापुताक भरण पोषण करय ।स़गहि अपन स'ख सिंगार पर अपन कमायल किछु टाका व्यय करय। एहिमे बेजाय की? मामीक प्रसंग मनीष कहै छथि अहाँ केँ काजक ईलम अबैये ,तँ अपन सेवा केँ पाय मे किये ने बदलब।सेवाक्षेत्र बहुत दिन धरि उपेक्षित रहलैक अछि।एहि कथाक माध्यम सँ कथाकार सेवाक्षेत्रक महत्वक जे रेखांकण कयल अछि से अति महत्वपूर्ण अछि।आइ सं बीस बर्खक पछाति हम सेवा क्षेत्रक बढ़ैत डेग केँ अकानि सकैत छी। 'मातबर' जे एहि संग्रहक शीर्षक कथा अछि। आइ सभ किछु पु पूंजीपर टिकल अछि।बाप बेटाक सम्बन्ध तक टाकापर आबि क' ठमकि गेल अछि। कोनो धरानी सब मातबर बनय चाहैत अछि।आइ डेग -डेग पर महाराज बैसल अछि।ओकर संग देबाक लेल ,जी हजुरी करबाक लेल कविया आ महबूब सनहक मुँहलगुआक कोनो कमी नहि छैक।मुदा एहिमे पीढ़ीक संघर्ष सेहो देखाइत अछि।हँ, एकटा बात शेख साहेब सन मुँहपर कनियों उचित बजनिहारक दिन- दिन अभाव भेल जा रहल अछि। एकटा कथा अछि 'दसखत'।एहि कथामे आचार्यजी सन आइ .ए. एस आजुक युगमे भरल पड़ल छथि।भ्रष्टाचार आओर विलासिता आजुक नौकरशाहीक पर्याय भ' गेल अछि।विलासिताक परराकाष्ठा भ' गेल अछि जे आचार्यजी सनक लोक जीवन जे अपन हाथ पैर साफे हिलब' नहि चाहैत छथि।एतय धरि जे फाइलपर दसखतो सांकेतिक करय लगैत छथि।परिणाम एहन- एहन लोकक स्थिति आचार्यजी जकाँ भ' जाइत छनि जे हुनक अंग सब शिथिल भ' जाइत छनि अनेक रंगक व्याधि गछारि लैत छनि।शक्तिहीन भ' टुकुर- टुकुर तकैत रहैत छथि। 'कोठा' आजुक राजनीतिक व्यवस्थाक सटीक चित्रण अछि। आइ डेग डेग पर राजनीतिक व्यवस्थामे रामलाल मंडल सन नेता भरल पड़ल अछि।मजाल छै जे कियो कल्ला अलगा सकय।ई काज जैह किछु साहित्यकारे क' सकैये।से कथाकार बहुत फरिछा क' ,बेकछाक' मंत्रीक किरदानी कें उघार के अछि।ई मात्र मंत्रीक किरदानी नहि आजुक लोकतांत्रिक बेवस्थाक सहज पहिचान भ' गेल अछि।ककरा कहबै?नागनाथ के हटाउ सांपनाथ केँ लाउ ,की बाघनाथ कें लाउ ,सब एके रंग।बदलैल- बदलैत जनताक मोन सेहो अगुताय लागल अछि।जाति धर्मक स्वर्ण तुलापर लौल क' भ्रष्टाचार,आतंकक सबटा सौ फिसदी टंच फार्मूला सभक अविर्भाव नेता लोकनि क' लेलनि अछि। देखियौ कथाकारक पैनी नजरि कोना दौड़ैत छनि," प्यादा,फर्जी,किश्ती ,घोड़ा...।सह आ मात खेलाइत रहैत छथि।ब्रह्मण,दलित,पिछड़ा,मुसलिम...गोटी पर गोटी।तर्जनी आ औंठा।दिमाग के खेल।दिमाग तेज आ बुद्धा प्रखर भेल जाइत छनि।एडभाइस लैत छथि ब्राह्मण सँ।राशि लैत छथि दलित सँ।रोटी बेटी पिछड़ा सँ।सम्मान लैत छथि मुसलिम सँ।" अंन्तमे रामलाल मंडलक पोसल सांप बेसम्हार भ' जाइछ आ सौंसे सांप सरसराइत सनसनाइत रहैत अछि।भ्रष्टाचारक सांप,सामाजिक वैमनस्यक सांप।मुदा जे हौक मंत्री ,संत्रीक कोठा पर कोठा तँ बनिये रहल छैक। एकटा कथा अछि सहज- असहज' ई दू मित्रक कथा अछि,जे नेनपने सँ मित्रताक बन्हनमे बन्हल छथि ।कामेश्वर चौधरी आ राधेश्याम बाबू दुनू नेनपनेक संगी छथि से संगियारे प्रौढ़ावस्था धरि निमहि रहल छनि।कामेश्वर गामे पर रहि गेलाह ,ओतहि खेतीबारी करैत छथि आ निचैन सँ जीवन गुदस्त करैत छथि।खुलि क' मेहनति करै छथि आ जमि क' भोजन करै छथि।सुख सँ भरि राति सुतै छथि मुदा राधेश्याम पैघ पदाधिकारी छथि,पटना सन नगरमे सभटा सुख सुविधाक अछैत रातिक' निन्न परा गेल छनि।बिनु गोटी खयने आँखि नहि मुनाइत छनि। राधेश्याम पटनामे आलीशान घर बनबै छथि से अपन मित्र केँ देखब' चाहैत छथि।ओ एक तरहें जबरदस्ती कामेश्वर चौधरी केँ अपन घर देखेबाक लेल पटना लबै छथि।कामेश्वर घर देखि क' खूब प्रसन्न होइत छथि।कामेश्वरक खूब आदर सत्कार करैत छथि। कामेश्वर गाम सँ नगर आयल छथि मुदा जीवनचर्या अपनेसन छथि कोनो बदलाब नहि जलखै मे पाँचटा परौठा आ भरि बट्टा तरकारी खाइत छथि।एयरकंडीशन कोठरी सँ निकसि फुजल छतपर अकासक नीचां अखरा पटियापर खूब चैन सँ सुतैत छथि मुदा सबटा सुख सुविधाक अछैत राधेश्याम बाबूक आँखि सँ निन्न परा जाइत छनि।ई कथा मनुक्ख विकसित होइत एकटा नव तरहक जीवन शैली कथा कहि' रहल अछि। सुविधा सँ सुख नै कीनल जा सकैछ।सुख भोगक लेल चाही चैन, से भेटैछ यथालाभ संतोष सँ ।मनुक्ख आब जिनिस' भ' गेल आछि।पाइक हबस मनुक्ख केँ कतय पहुंचा देने छैक? से जिनिस कथामे देखल जा सकैछ।एकबेर जँ गलत काजक दलदलमे फँसलहुँ तँ बाहर निकसब बहुत मोसकिल अछि। रुपा आ सतीशक दाम्पत्य जीवन रुग्ण भ' जाइछ।एहि रुग्णताक कारण कोनो पारिवारिक आ नीजी समस्या नहि अछि।एकर कारण अभाव सेहो नहि अछि। एकर कारण अछि लिप्सा।एकर कारण अछि मुँहमे खून लागब। रुपा ई बुझितो जे श्रम करैये से सुखी रहैये तथापि ओ सतीश पर अनर्गल दबाव बनौने रहैत छथि।एकर कारण स्वयं सतीश छथि ।आइ लोक इमानदारीक टाकापर गुजर करब नहि जनैत अछि वा एना कहि जे एहिपर असोकर्य होइत छैक। उपभोक्तावादी संस्कृतिक दौरमे के बाँचल अछि से कहब कठिन? कोनो चीजक 'हिस्सक' बड़ खराप नीको बातक हिस्सक कखनो -कखनो मनुक्ख केँ संकट मे आनि दैत छैक ।तखन बेजाय काजक कोन बात?भ्रष्टाचार करब, अनैतिक आचरण करब आब लाजक गप नहि रहल।जहल जायब आब मर्यादा हनन के गप नहि रहल।आब लोक भ्रष्ट आचरणक लेल जहल जाइछ आ जखन जमानति पर छुटैत अछि तँ हाथी पर चढ़ि क' जुलूसक रुपमे नगर भ्रमण करैछ। हिस्सक कथा मे एकटा साहेब लाजक परिभाषा बड़ नीक सँ देने छथि,"लाजक एहिमे कोन प्रश्न छैक ? हम सभ जाहि उद्योगमे(भ्रष्टाचारक उद्योग) लागल छी ताहिमे लाजक कोनो महत्व नहि छैक।लाज तँ पहिनहि संग छोड़ि दैत अछि।अथवा लोक लाजेके छोड़ि दैत छैक।लाज धाख त' तोरा सभक लेल अछि" एहि टाकाक उद्योगमे किछु संभव छैक।जेलमे रहितो जावन्तो सुविधाक उपभोग क' सकैत छी।राति विराइत ज ल सं निकसि क' घुमियो सकैत छी। 'भोज' कथाक माध्यम सँ ब्रह्मण समाजक जे अन्तर्विरोध अछि से फरिछ सँ उजागर कयलनि अछि।एखनो समाजमे छोटका- बड़का लोकक अवशेष बाँचल अछि।मात्र कर्मकांडे धरि ब्राह्मण रहब तँ की भेटत? भोज शीर्षक कथा अनेक तरहक सामाजिक प्रश्न ठाढ़ करैये। एकटा कथा अछि 'खुशीक प्रश्न' कथा मे बाल मनोविज्ञान प्रयोग कयल गेल अछि मुदा अछि विशुद्ध रुप सँ एकटा शहरी मध्यम वर्गीय परिवारक कथा। शहरी मध्यम वर्ग कोना अपना दैनिक जीवनमे तनाव आ कुंठा सँ जीवन जिवैत अछि जाहिमे नेना लोकनिक कोमल मोनक कोन तरहेँ उपेक्षा होइत अछि।कोना एकटा कवि अपना पुत्र केँ कवि बनबा सँ रोकैत अछि।एहि सवेदना के की कहबै? भगत सिंह होथि मुदा हमरा घरमे नहि से कोना चलत? आजुक समाजक ई चरित्र आम भेल जा रहल अछि। लोक एतेक तनावमे रहैत अछि।ईर्षा आ द्वेष सँ ततेक ने व्यथित रहैत अछि जे अपन दैनिक जीवनक खौंझ आ तामस कोमल मानसबला नेना सभपर उतारैत अछि।ई कथा एखनुक मध्यमवर्गक सही प्रतिनिधित्व करैत अछि। 'तानपूरा' कथामे कोना लोक अपन अपूर्ण महत्वाकांक्षा के अपन बेटा- बेटी पर लादि रहल अछि से नीक सं देखार भेल अछि। विनोद बाबू अपने संगीत सिखय चाहलनि हुनका अपन पिता सँ सहयोगो भेटलनि मुदा अपन अयोग्यता वा परिश्रम नहि क' सकबाक कारण ओ संगीत नहि सिख सकलाह मुदा जखन हुनक पुत्र गौतमक अभिरुचि संगीत दिस जगलनि तँ ओकरा उत्साह कतय सँ बढ़बितथिन उन्टे ओकरा हतोत्साहित कयलखिन।लोक एखनो बच्चा सभक भविष्य अपना हिसाबें तय करैत अछि।ओहि हिसाबे बच्चाक व्यक्तित्वक निर्माण करय चाहैत अछि जाहिमे ओकरा बेस टाका भेटै,ओकर ख्याति आ रौबदाव होइ।बच्चाक अभिरुचिक कोनो महत्व नहि। एहि तरहक कुंठित शिक्षासँ समाज के उबरबाक बेगरता छैक।गौतम के संगीतक प्रति एतेक उत्साह रहितो एकटा तानपूरा ओ नहि किनैत छथि।ई एकटा सामंतवादी सोच अछि।एहि संग्रहमे एकटा महत्वपूर्ण कथा अछि 'हरिसिंहदेवी'। सामन्तवादी समाजमे एहन- एहन वर्गीकरण कयल गेल जे समाज बँटल रहय आ शोषणक कारखाना चलैत रहय।समाज अनेक जातिमे तँ बँटले छल फेर अनेक उपजाति बनाओल गेल ताहिमे ब्राह्मण आ कायस्थ वर्गक लेल जे पंजी ब्यवस्था बनाओल गेल ताहि बेवस्थापर एहि कथाक माध्यम सँ बेस धरगर प्रहार कयल गेल अछि। एहि बेवस्थाक सभटा अवगुणे रहल।अन्तत: एहि वर्गीकरण सँ समाजिक एकता कमजोर भ' गेल आओर बेवस्था लागू करयबला राजा हरिसिंदेव के स्वयं तुगलक आक्रमणक सामना नहि क' भेलनि आ हारि क' जंगल दिस परा गेलाह।जँ समाज एकताबद्ध रहितय तँ हुनका एहन स्थितिक सामना नहि करय पड़तनि। पंजी बेवस्था मे जाति -उपजातिमे विभाजन सँ समाजकमे झूठक देखाबटी,एक दोसराक उपहास करब,हीन बुझब एहि सबसँ सामाजिक तानी भरनी बहुत तन्नुक होइत गेल।अन्तत: एकैसम शताब्दीयो मे मिथिलामे जातिक श्रेष्ठताक दंभ एखनो बहुत किछु बाँचल अछि। बुड़ि कहाइयो क' सोति बनल रहब ई कोन श्रेष्ठता भेल ? एहि कथाक माध्यम सँ कथाकार जाति बेवस्थामे श्रेष्ठताक झूठक दंभ पाल'बला लोक सभकेँ नीक सँ देखार करबामे बहुत सफल भेलाह अछि। एहि संग्रहमे एकटा कथा अछि 'सीवन रजकक हितचिन्तक' सीवन रजक धोबि जातिक अछि ।मैट्रिक पास अछि।बैंक मे आदेशपाल अछि।एतय तक बड़ बढ़ियां मुदा जखने ओ प्रोन्नत भ'क', रोकड़पाल (कैसियर) भ' जाइए।होब' लगैत छैक ओकर उखाही से गामक बाबू भैया सँ आफिसक बाबू आ आफिसर सभ अपना -अपना तरीका सं सीवनकें उपेक्षा आ तिरस्कार करैये।सीवन ईमानदारी सँ कैसियरक काज करैत रहैत अछि ताहिपर ककरो धियान नहि जाइत छैक। बैंकक फिल्ड आफिसर द्वारा जे ऋण लेबा मे किसानक सभक शोषण कयल जाइत अछि तकर सीवन विरोध करैत अछि।सीवन चेयरमैन रामदहिन मिश्रक बड़ आदर करैत अछि।हुनका कहला पर ओ शराब पिअब छोड़ि दैत अछि। सीवन नीक लोक भ' जाइत अछि मुदा ओ अपन स्वाभाविक क्रिया- कलाप बिसरि जाइए से एहि बात केँ ओकर पत्नी तक अकानि लैत छैक। सीवनक पत्नी कहैत छै,' हँसियो करै छियै तँ मुसकिया दै छै।एना किये भ' गेलैए चुनियाक बाप के?आब बजबो कम करै छै।ठहक्का त' एकदम बिसरि गेलैए।धौर एहिसँ त' पहिने नीक रहै।' भाय रामलखन त' ओकरापर सोझे सोझ आरोप लगा दैत छैक जे ओ आब बड़का लोक नाहित गप करैये। सीवन कें एकाएक अपन स्थितिक भान होइत छैक।ओ फेर सँ अपन पुरना सहजतामे आपस आबि चाहैये।निश्चय करैये जे ओ पहिने जकाँ हँसत ,बाजत ,गप करत।जीवनमे आगू बढ़ब बेजाय नहि मुदा ओहि संग अहाँक बदलैत सहजता अहाँकें जीवन राग सँ बहुत दूर धकेलि सकैया। 'महतो'बदलैत कुदृष्टि कथा थिक।अपना राज्यक कार्यालयी संस्कृति केँ जीवन्त वर्णन करयबला कथा अछि।सरकारी कार्यालय कोना निठल्लापनक अड्डा अछि।कियो बिना पेपरवेट के काज करबाक लेल तैयार नहि अछि।ईमानदार आ सोंझ लोक कें बुरबक,बेहूदा बुझल जाइछ।जेना एहि कथाक महतों केँ बुझल जाइत छैक।अपने कार्यालयमे पी. एफ सँ अग्रिमक लेल कोन दशा होइत छैक महतोक।कोना कार्यालय मे काजक अतिरिक्त सबटा मसखरापन होइत रहैत छैक।हद तँ तखन भ' जाइत जखन कार्यालयक स्टाफ गुलाबरतन बड़ा बाबूक सहयोग सँ साहेबक पत्नीक सम्बन्ध मे अश्लील बात करय लगैत अछि ।तखन महतो सभटा बिसरि क' गुलाबरतन कें कालर पकड़ि क' तीन- चारि चमेटा घींचि दैत अछि।ई छियै बेहूदा लोकक प्रति प्रतिरोध थिक।कखनोकाल महतो सन सुधुआ व्यक्ति कें जखन बात हद सं आगां बुझाइत छैक त' एहने प्रतिक्रिया दैत अछि।ओतय जं कियो पढ़ल लिखल काबिल व्यक्ति रहैत त' हें हें हें क'क' अपन काज निकलबा लैत। 'सनेश' कथा बहुत मार्मिक कथा अछि।अपना समाजमे एखनो सभटा जातिक नपनापर नापल जाइए।अपना जातिक स्वर्ण तुलापर लौलल जाइए मुदा बात सांच ओतय छैक जे कोनो गरीबक अपना जातिक धनीक वा बड़का लोकक समक्ष कोनो सम्मान नहि छैक ।चाहे ओ मिसरजी होथि वा दिवाकर रविदास। ई सभ जनितो तैयो सभ भरिदिन जाति- जाति खेलाइत रहैत अछि।मिसरजी आ रविदासजी संगे रहैत छलाह।एक दोसरापर खर्च करैत छलाह। बात आयल गेल भ' गेल।एकदिन दिवाकर रविदास मिसरजीक ओतय पुरना स्टीरलक औंठी जे हुनका मिसरजी देने छलखिन।ओहि नापक एकटा सोनाक अंउठी लाल पाथर लागल मिसरजीक ओतय एकटा पत्रक संग दिवाकर द' गेलाह। एहि सनेशपर मिसरजीक प्रतिक्रिया आ पत्रक मजमून दुनू सोचबापर विवश करैत अछि। आखिर हम सब कतय जा रहल छी? राग - बिराग बहुत हल्लुकसन कथानक कें कथा बनाओल गेल अछि।एहि कथाकेँ पढलाक पछाति हमरा लागल जे एकटा मांजल कथाकार कतेक आसानी सँ अपन कथानकक चयन करैत छथि।एहि कथामे कथानायक कें पटना सँ दरभंगाक यात्राक क्रममे एकटा सहयात्रीक संग जे संवाद होइत छनि ओकरे महीनी सँ कथा मे परिवर्तित क' दैत छथि। एकटा सोझमतिया लोक कें कोना साकांक्ष कयल जा सकैछ। कथा बहुत रोचक ढंग सँ लिखल गेल अछि। 'आबेस' आइ धियापूताक कैरियरक प्रति लोक बेस साकांक्ष भ' गेल अछि , से नीक बात मुदा कैरियरक अतिरिक्त जीवनमे आर बहुत किछु छैक,जे सिखबाक अनुभव करबाक दरकार रखैत अछि।लोक बुझै अछि बच्चा पढ़ि लिखि लेत नीक नौकरी- चाकरी भ' जेतै बस आर की ?मुदा बात ओतहि धरि सीमित नहि रहि गेल छैक।उचित संस्कार प्राप्त करब,जीवन संघर्षमे आगां उत्पन्न होइबला समस्या सभ सँ कोना लड़ल जाय? ई सभ भेटैत छैक पारिवारिक आ सामाजिक जीवनक अनुभव सँ।मुदा आजुक जे संस्कृति विकसित भ' रहल अछि ताहिमे बच्चाक गलती कम आ अभिभावक बेसी बुझना जाइछ।आबेस आ दुलारओतबय जतेक आवश्यक।जतय हटन- डटन जरुरी ओतय ओहो हुए।अज्ञाकारिता,नम्रता मनुक्खक जीवनक आभूषण अछि।दिनेश बाबू आओर अनिता अपन बेटा केँ घ'र ल' जेबाक लेल गेल छथि। कएक घंटा सं टीशनपर प्रतीक्षामे बैसल छथि। आओर बिनु बेटाक नेनहि टिशनपर सँ घर आपिस आबि जाइ छथि ।हुनक पुत्र महेश अपन संगी प्रशान्तक संगे बतिआइत रहि जाइये। माय बापक कोनो परबाहि नै करैत देखाइये।ओकर चालि- चलनिमे माय- बापक प्रति कतहुँ अनुराग नहि झलकैत छैक।ई बहुत चिंताक बिषय छैक आजुक पीढ़ीक लेल।सब चाहैत अछि हमर बेटा दूर ,बहुत दूर देश चलि जाय,खूब टाका कमाय।समाजमे एहि रुपमे हमर चर्चा होइत रहय जे फल्लां बाबूक बेटा युरोप,अमेरिकामे एतेक अमेरिकन डालर कमाइत छनि ।फल्लां बाबू खुशी सँ फुइट जकाँ फटैत रहैत छथि।अवस्था खसलापर ओएह बेटा घुमियो क' जखन नहि देखैत छनि फेर आहि अबैत छनि।आबेस एतबय जते जरुरी। 'बूढ़ा जिबैत रहलाह' एकटा विलक्षण कथा अछि।एहि कथामे लोक बूढ़ा केँ बेबकूफ बूझैत अछि मुदा हमरा जनैत बूढ़ा सभकेँ बेबकूफ बुझैत छथि।समाज कतेक संवेदहीनअछि? हुनक परिवारमे एतेक गोटा मरि जाइये तैयो बूढ़ा जिबैत छथि।ई बूढ़ाक जिजीबिषा छनि। से बुझबाक ज्ञान एखनो हमरा समाजमे विकसित नहि भेलैक अछि वा लोप भ' गेलैक अछि ।से जे कही।बूढ़ा एहु अवस्थामे लोकक स्वागत- सत्कार करैत छथि।उपकार करैत छथि।मुदा बूढ़ा समाजक चालि चरित्र कें नांगट सेहो करै छथि।ओ अठारह बर्षक युवती सँ विवाह करबाक घोषणा करैत छथि।ने अठारह सँ कम आ ने बेसी।किये जँ उनैस बरखक युवती सँ विवाह करितथि तँ जुलूम भ' जइतै? वास्तवमे बूढ़ा केँ विवाह नै करबाक छनि।ओ समाजक चरित्र केँ देखार करय चाहलनि अछि।ताहिमे ओ सफल भेलाह अछि।कथाकार सेहो सफलतापूर्वक कथा केँ बुनाबटि मे, ओहिमे रंगटीप देबै बहुत सफल रहलाह अछि।एकटा कथा अछि 'प्रतिलोम' ई कथा एकदिस कथाकार श्रोत्रीय समाजक यथास्थितिवादिता पर धरगर प्रहार केलनि अछि तँ दोसर दिस समाजमे जे जातीय दुर्भावना चरमपर अछि तकर नमूना सेहो भेटैत अछि।अर्जुन के जीह कटबाक के प्रयास करैत छैक? ओकरे जातिक लोक।ओहि जातिक कहबैका सभ अर्जुन सनक नि:सहाय लोकक लेल किछु जीविकाक ओरियान किये ने करैत छथि? कियेक नहि अर्जुक कें पढ़बाक लिखबाक ओरियान समाज करैये?तखन पेट पालैक लेल जत' कतौ कियो चाकरी करैये तकर मजाक उड़बैवला ,ओकरा प्रताड़ित करैबला ई केहन समाज अछि? ई द्वैध बहुत भयंकर अछि।से सभ जातिमे बरोबरिये अछि। श्रोत्रीय समाजक भोजक वर्णन अद्भुत अछि एहि कथामे।भोज खेबाक आ करबाक संस्कृति श्रोत्रीय ओ ब्राह्मण समाजमे कने बेसिये अछि। से व्यंग्यात्मक शैलीमे भोजकअद्भुत संगीतात्मक वर्णन केलनि अछि। " भोज शुरु भेलैक त' प्रारंभमे वातावरण गभिनायल छल।क्रमश: मुसकी,कनफुसकी,टोकाटोकी,हंसी,ठट्ठ,ठहक्का,पिहकारी,सात सुर बाज' लागल।आस्ते -आस्ते भोजमे एकटा आलाप आयल।......... आरोह वा अवरोह मे दही,अम्मट,श्रीखण्ड,लड्डू,रसगुल्ला आ पायसक स्वाद वातावरण मे पसरैत रहल ।भोज एकदम संगीतमय भ' उठल।" कथाकार एतय व्यंग्यमे जे संगीतात्मकता उत्पन्न केलनि अछि तखन सहजहिं प्रो. हरिमोहन झा मोन पड़य लगैत छथि। से सब त' ठीक मुदा कथाक अंत प्रदीप लग आबि क' होइये ।ओएह प्रदीप जे 'दास- दासिनक' दानक प्रतीक प्रावधानक विरोध कयलनि।हलांकि हुनक विरोध यथास्थितिवादक छत्तातर झपा गेल।भले झपा गेल, विरोध त' भेल। एहि संग्रहक अठारहो कथा पढ़लाक पछाति बहुत आनंदक अनुभव क' रहल छी ।हमरा गर्वानुभूति भ' रहल अछि जे हमरा बीच मैथिली भाषामे एहन उद्भट्ट कथाकार सब छथि।कथाकार अशोकजीक जे छबि हमरा मोनमे अंकित अछि 'जे ओ मैथिली कथा कें लोकल सँ ग्लोबल बना देलनि अछि।ई धरणा एहि पोथीक पुनर्पाठ सं कने बेसी मजगुत भेल अछि।हेबनिमे हिनक प्रकाशित कथासंग्रह 'डैडीगाम'पढलाक पछाति जे आर आस्वस्ति भेटल छल से 'मातबर' कथा संग्रहक पुनर्पाठ सँ हमर धारणा आर बहुत बेसी मजगूत भेल अछि।बीस बर्ख पहिने प्रकाशित एहि पोथीक कथासभ एखनो टटका बुझा रहल अछि। प्रस्तुत पोथी दीर्घ अवधि धरि मैथिली कथाक प्रतिनिधित्व करैत रहत ,तकर हमरा पूरा भरोस अछि।।जे पाठक वा कथाकार एहि पोथी कें नहि पढ़ने होइ कृपया अपने अवश्य पढ़ी से विनम्र आग्रह। -संपर्क-6207627509 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.अजित कुमार झा- डैडीगाम: एक अप्रतिम कथा संग्रह अजित कुमार झा डैडीगाम: एक अप्रतिम कथा संग्रह विदेह जे काज क' रहल अछि से निस्संदेह प्रशंसनीय अछि। अहि नीँक काज मे कोनो रुप मे शामिल भेनाई मोन केँ प्रफुल्लित करैत अछि। अहि बेर कथाकार अशोक जी पर विशेषांक निकालबाक हेतु संकल्प बद्ध छथि। हम बड्ड असमंजस मे छलहुँ कारण हिनका पढ़ने त' छलियन मुदा मैथिली पत्रिकाक माध्यम सँ। सब पत्रिका हमरा उपलब्ध भेल हो आ हिनकर सब कथा हमरा पढ़बाक सौभाग्य प्राप्त भेल हो से त' संभव नहि। अजीब दुविधा मे छलहुँ जे हिनकर कोनो पोथी कोना प्राप्त करी? एहन मे आशीष जी सँ गप्प भेल आ हम अपन समस्या सँ हुनका अवगत करेलियन आ लगले ओ हमर समस्याक समाधान क' देलाह। विदेह आर्काइव पर उपलब्ध मैथिली रचना संसार केँ विषय मे विस्तृत जानकारी भेटल आ पोथी डाउनलोड केनाई आसान भ' गेल। कथाकार अशोक जी केर किछु कथा संग्रह जे कि अहि पर उपलब्ध छल से डाउनलोड कैलहुँ आ पढ़लहुँ जेना कि: आँखि मे बसल (यात्रा कथा ), ओहि रातिक भोर, मातबर आ डैडीगाम। ओना बहुत कथा त' विभिन्न पत्रिका सब मे पढ़ने छलहुँ मुदा पोथी रुप मे सब कथा एकठाम भेटि गेल त' मजा द्विगुणित भ' गेल। एक-सँ-बढ़ि एक कथा सब पढ़लहुँ आ ओहि बीच कोनो आन काज करबा मे मोन नहि लागि रहल छल। विदेहक माध्यम सँ ई अमूल्य निधि हाथ लागल अछि आ सेहो बिना कोनो कष्ट केँ। अहि अपूर्व काज लेल हिनका सब केँ साधु वाद । विषय सँ विषयांतर नहि भ' जाइ तैँ घुरि आबैत छी कथाकार अशोक जी पर। ओहि रातिक भोर सन् 1991 मे, मातबर सन् 2001 मे, आँखि मे बसल ( यात्रा कथा ) सन् 2013 मे आ डैडीगाम सन् 2017 मे प्रकाशित भेल। आइ हम अपने सब सँ चर्चा करब हिनक कथा संग्रह 'डैडीगाम' पर। नवारम्भ प्रकाशन, पटना सँ सन् 2017 मे प्रकाशित कथाकार अशोक जी केर पोथी ' डैडीगाम ' मे कुल 15 टा कथा शामिल अछि।अहि पोथीक प्रथम कथा 'लाथ' एक साधारण कथा लागल। कथा नायक प्रोफेसर साहेब एकटा कुर्ता खरीद क' आनैत छथि आ ओहि पर सबहक केहन प्रतिक्रिया रहैत छन्हि तकर नीँक चित्रण केने छथि। दोसर कथा अछि 'छल'। को-आपरेटिव सोसाइटी केर आम सभा मे डेलीगेट सब केँ स्मृति स्वरुप एकटा ब्रीफकेस भेटबाक गप्प छल तैँ को-आपरेटिव सोसाइटी केर अध्यक्ष अपन मित्र भोली झा केँ फर्जी डेलीगेट मुहम्मद असलम बना क' ल' जाइत छथि। भोली झा एकबेर अपन गामक नाटक मे बहादुर शाह जफर केर पार्ट खेलने छलथि आ हिनकर खूब प्रशंसा भेल छलनि। अहिबेर डेलीगेट मुहम्मद असलम केर किरदार रियल लाइफ मे निभा रहल छलाह आ सच पुछु त' अपन किरदार मे जबरदस्त ढ़लि चुकल छलथि। वास्तव मे जीवन सेहो एकटा नाटके त' छैक। तेसर कथा अछि 'स्वाधीन' जे कि आजुक नारी सशक्तिकरण पर अछि। अजय-जया केर प्रेम विवाह होइत छन्हि आ जया कहैत छथिन्ह - " हम अहि सन्तान के जन्म नहि द' सकैत छी।" अजय पुछैत छथि- "किए जन्म नहि द' सकैत छी?" जवाब मे जया कहैत छथि- " पतिक बलात्कार सँ उत्पन्न संतानक माय हम नहि बनय चाहैत छी। भरि जन्म ई अपमान हम नहि सहि सकैत छी। " एक पिता-पुत्र आ पति-पत्नीक संबंध मे द्वंदक अद्भुत चित्रण भेल अछि अहि कथा मे। चारिम कथा अछि 'ओ दुनु साइकिल सिखैत अछि'। दंगा आ कर्फ्यू सँ ग्रस्त शहर मे दूटा बच्चा भाड़ा पर साइकिल ल' क' चलेनाई सिखैत अछि आ एकटा मुसलमान केँ धक्का लागि जाइत छैक। नीँक बेजाय लोग त' सब धर्म मे रहैत छैक। पाँचम कथा केर चर्चा अन्त मे करय चाहब। छठम कथा अछि 'राग'। इहो कथा हिन्दू मुस्लिम केर धार्मिक एकता पर आधारित अछि। सातम कथा अछि 'लेमन आइसक्रीम'। परदेसिया बेटा जिनकर गाम पर कोनो संगी साथी नहि छैक तकर गामक यात्रा आ वापस शहर आबि अपन पिता सँ गामक चर्चा केर नीँक चित्रण भेल अछि। आठम कथा अछि 'उमकी'। दू बाल सखा प्रकाश एवं दिनेश केँ बहुत सालक बाद भेँट आ बालपनक नास्टैलजिक स्मृति केर सजीव वर्णन भेल अछि। नवम कथा अछि 'मनसूबा'। आजुक प्रगतिशील युवा तरक्की केर होड़ एवं आधुनिकताक चकाचौंध मे न' त' अपना लेल पलखति छन्हि आ न' त' माता-पिताक मनसूबा पूर करबाक लालसा। दसम कथा अछि ' अभयक बेटा केँ दूटा दाँत भेलनि'। गामक यात्रा एवं स्मृति सँ जुड़ल कथा। अपन गाम मे गाम खोजैत लोकक कथा। वास्तव मे गाम मे आब गाम कहाँ बसैत अछि। गाम त' बसैत अछि रोजी रोटीक जोगाड़ मे प्रवासी बनल लोकक हृदय मे। एगारहम कथा अछि 'खुशीक नाम जीवन'। धिया पुता केर खुशी मे अपन खुशी खोजय वाला माता पिताक कथा। आजुक बदलैत सामाजिक परिवेशक कथा। बारहम कथा अछि 'टीस'। नारी सशक्तिकरण केर पोल खोलय वाला कथा। बिमला अपन पति केँ देखि सदैव गौरव बोध करैत रहलीह आ हुनकर पति लक्ष्मीनारायण हिनका बस माटिक मुरुत बुझैत रहलनि। भ्रष्टाचार मे लिप्त लक्ष्मीनारायण केँ चलते मात्र कागज कलम पर बनल को-आपरेटिव सोसाइटी केर अध्यक्ष बिमला पुलिसक गिरफ्त मे पड़ि जाइत छथि। जेल मे गेलाक उपरांत बिमला केँ बोध होइत छन्हि जे बेइमान त' सभठाम बेइमाने होइत अछि, चाहे घर हो कि बाहर। तेरहम कथा अछि 'छुट्टीक एक दिन'। अहि कथा केँ पढ़ि कोलकाताक काॅफी हाउसक अड्डा मोन पड़ि गेल। मैथिली साहित्य पर चर्चा हेतु मैथिलीक एक साहित्यकार साहेब केँ घर पर उपस्थित होइत छथि एक नव दम्पति अंकिता ओ अभिनव आ प्रारंभिक परिचय पात केँ बाद ओहि छुट्टीक दिन शुरु होइत अछि साहित्य पर चर्चा। साहित्यकार महोदय मैथिली मे किएक लिखैत छथि ताहि प्रश्नक जवाब मे कहैत छथि- " सोचै छी मैथिली मे, तैँ लिखै छी मैथिली मे।" ओनाहुतो मैथिली अपन मातृभाषा थीक। मगर अभिनव कहैत छथि- " लेकिन सर, मैथिली अपन भाषा रहि कहाँ गेल छैक जखन माइयो अपन धिया पूता सँ मैथिली मे गप्प नहि करै छै त' ओ अपन भाषा कोना हेतै?" अंकिता साहित्यकार महोदय सँ पुछैत छथि जे जौँ कोनो प्रेम कथा मैथिली मे पढ़बाक हो त' कोन किताब पढ़ी? अचानक सँ कोनो किताबक नाम हिनका मोन नहि पड़ैत छन्हि। वास्तविकता छैक जे अजुका साहित्यकार केँ अपन रचना केँ अलावे अन्य साहित्यकार सबहक रचना पढ़बाक कोनो प्रयोजन नहि बुझाइत छन्हि। वर्तमान साहित्यकारक रचना केर स्तर पर सवाल उठैत अछि तखने साहित्यकार महोदय केर पत्नी नीलम सेहो अहि चर्चा मे शामिल होइत छथि चाय आ भूजल मखान केर संग आ बाजि उठैत छथि- " मैथिलीक साहित्यकार के एक दोसराक अदगोइ-बदगोइ सँ फुर्सत होइन तखन ने पढ़बा जोगर रचना करताह।" चौदहम कथा अछि ' गामक कातक हाइवे'। बर्बाद होइत पर्यावरण आ ओकर दुष्प्रभाव केर नीँक चित्रण भेल अछि। प्रकृतिक संतुलन बिगड़ि रहल अछि आ आधुनिकताक होड़ मे साँस लेब दूभर भेल जा रहल अछि मुदा हमरा सब लेल धन्न सन। वास्तविकता त' इएह अछि जे गामक नामो निशान मिटा रहल अछि। अन्तिम कथा अछि ' एना भ' क' कियो'। बड़का हाकिम चौधरी जी केँ अधीनस्थ कर्मचारी सब हिनकर कमजोरी केँ गमि लैत छनि आ सब मिलि हिनकर परिहास मे जुटल रहैत छथि। चौधरी जी केँ पचपनक उमिर मे बचपन वाला हरकत देखि संजय केँ ग्लानि होइत छन्हि मुदा चौधरी जी कृष्ण आ गोपी केर रास मे कृष्ण बनि जागल मे स्वप्न देखैत रहैत छथि । एक दिन जखन संजय केँ बर्दाश्त नहि होइत छन्हि त' अपन बड़का हाकिम चौधरी जी केँआँखि खोलबाक अभिनव काज करैत छथि आ चौधरी जी हुनका गला सँ लगा लैत छथि। कथाक विषय मे अपन बात कहैत काल क्रम भंग करबाक कोन प्रयोजन छल से सोचि रहल होयब। पंचम कथा केर शीर्षक भेल 'डैडीगाम' आ हिनकर कथा संग्रह केर सेहो इएह नाम अछि। कथाकार अशोक जी केर रचना संसार मे एक-सँ-बढ़ि एक अनुपम कथा सब अछि। पढ़ैत काल कोनो कथा केँ बिनु खत्म कयने पोथी छोड़नाई मुश्किल अछि। सब कथा वर्तमान सामाजिक परिस्थिति पर लिखल बुझायत। हिनकर कथा सब मे यथार्थ केर दर्शन होयत, कल्पना लोक मे ई विचरण नहि कराबैत छथि। पंचम कथा केर विशेषता हमरा ई लागल जे यथार्थ केर संगहि अहि मे आदर्श सेहो झलकैत अछि। गामे गाम ढ़ेउआ ढ़ाकी मन्दिर बनि रहल छैक आ वास्तविकता त' इएह छैक जे ओहि मे पूजा अर्चना करय वाला तक केओ नहि रहैत छथि। दोसर गप्प जे आजुक समय मे लोग सेवानिवृत्ति केर उपरान्त घुरि क' अपन गाम नहि आबय चाहैत छथि आ एहन मे डाक्टर रघुवंश लन्दन सँ वापस गाम लौटैत छथि आ सेहो सपरिवार। हँ जे अपन माता-पिताक मृत्युक उपरान्त गाम नहि अबैत छथि तिनका अपन मातृभूमि मे जीवनक अन्तिम क्षण बिताबय केर इच्छा जागृत होइत छन्हि। अपन गाम पर सीतारामक एकटा मन्दिर बनबाबय केँ विचार ल' क' गाम पहुँचल छलाह। एक तरफ डाक्टर साहेब केर बड़का पुत्र सुब्रत मन्दिर निर्माण केर ओरियान मे लागल रहैत छथि, त' दोसर तरफ छोट पुत्र माणिक टोले टोल घूमि लोग सब सँ भेँट कय मिथिलाक संस्कृति ओ साहित्यिक चर्चा मे। गाम आबय सँ पूर्व माणिक अपन पिता सँ पुछैत छथि जे - "मिथिला मे अतेक गरीबी किएक छैक? जवाब मे डाक्टर साहेब कहैत छथिन्ह- " अपना ओहि ठाम गरीबी के ग्लैमराइज करबाक परम्परा रहल आछि।" मन्दिर निर्माण केँ लेल गामक लोग सँ एक बेर विचार करब जरूरी बूझि पड़ैत छन्हि तैँ अहि मादे विचार विमर्श हेतु गामक संस्कृत पाठशाला केर प्रांगण मे एकटा सभाक आयोजन होइत अछि। गामक लोग मन्दिर बनबाक खबर सुनि क' प्रफुल्लित छलथि मुदा माणिक केर किछु नबका नबतुरिया साथी सब सभा मे प्रश्न ठाढ़ करैत छथि जे मन्दिर बनला सँ गामक कोन उपकार होयत? अहि केँ स्थान पर स्कूल, कालेज अथवा अस्पताल किएक नहि बनाओल जाय जाहि सँ गामक उपकार होयत? पूरा सभा मे किछु गोटे मन्दिर त' किछु गोटे अस्पताल के पक्ष मे बँटि जाइत छथि। अपन बाल सखा फेकन केँ विचार अस्पतालक पक्ष मे सुनि डाक्टर साहेब अपन दुविधा केँ खत्म करैत गामक बेगरता आ अपन अनुभव केँ ध्यान मे राखि स्वेच्छा सँ अपन गाम मे अस्पताल बनबाबय केर निर्णय लैत छथि। सभा समाप्त होइत अछि आ सुब्रत अस्पताल निर्माण केर ओरिआओन मे जुटि जाइत छथि। गामे मे नहि मुदा आसपास केर गामक लोग सेहो ई खबर सुनि प्रसन्न होइत छथि। डाक्टर रघुवंश अपन गाम ओ माटि पानि मे अन्तिम साँस ल' सकथि से सोचि गाम अयबाक निर्णय लेने छलथि मुदा जखन सँ अस्पताल बनयबाक निर्णय लेलनि अछि जीबय केर सिहन्ता बढ़ि गेलनि अछि आ अपन पत्नी सँ कहैत छथि - "गाम मरबाक लेल नहि, जीबाक लेल होइत छैक।" - संपर्क-9472834926 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.८.कुमार राहुल- मैथिल आंखि सं डैडीगाम देखबाक सेहंता (कथाकार अशोकक कथा पर एकटा पाठकीय हस्तक्षेप) कुमार राहुल मैथिल आंखि सं डैडीगाम देखबाक सेहंता (कथाकार अशोकक कथा पर एकटा पाठकीय हस्तक्षेप) मिथिला मे खिस्सा कहबाक प्राचीन संस्कृति रहलै-ए आ खिस्सा कहबाक जे लुतुक आ कला छैक तकर प्रभाव मैथिलीक आधुनिक कथा साहित्यक परंपरा बनि गेल. वैचारिक स्तर पर भारतीय साहित्य सं कदमताल करैत रहलाक बादो मैथिली कथा साहित्य 'कहन' मे अलग रहल. संभवत: अही 'देखन' कें कांचीनाथ झा किरण, अशोक आ विभूति आनंद प्रभृत्ति मैथिली साहित्यकार 'मैथिल आंखि' कहैत छथि. ऐ संदर्भ मे जं वरिष्ठ कथाकार अशोकक कथा कें देखी तं दृष्टिक एक नव दुआरि खुजैत देखा पड़त. कथाकार अशोकक कथा पढ़लाक बादो सुनबाक सेहंता जगबैत छै. कथाक रूपक परिमार्जन आ ओकर सामर्थ्यक विस्तार मैथिली कथा साहित्य मे होइत रहलै-ए. अशोकक कथा ऐ सं फराक नै रहल. कथाकारक सफलता या असफलताक निर्णय करब तं कठिन, मुदा इ तं मानल जा सकैछ जे अपन परंपरा सं प्रभाव ग्रहण करैत अशोकक कथा अलग लीक बनबैए. हिनक प्रारंभिक कथा हमरा हिसाबें हड़बड़ी मे लिखायल बुझाइ छै आ कत्तौ-कत्तौ फार्मूलाबद्ध सेहो, मुदा इ कथाकारक प्रारंभिक अभ्यास रहल होइतनि जे 'हेयरपिन' सं 'बौका चुप अछि' होइत 'डैडी गाम' तक पहुंचल. जं ऐ तीनू कथा कें एक संग पढ़ी तं अलग रहितो रस निस्पत्ति एक बुझा पड़त. तीनू कथा मिथिलाक पारिवारिक-सामाजिक ताना-बाना कें देखबैत ऐ. जं मिथिलाक गाम-घर महीन बदलाव सं अहां परिचित छी, तं इ कथा सभ समयक नब्ज कें जनबाक लेल थर्मामीटरक काज करत. यैह बात मैथिली कथा कें मैथिल आंखि सं देखबाक लेल प्रेरित करैत छै. इ तीनू कथा तीन ध्रुव पर ठाढ़ ऐ. तीनू तीन कथ्यक संग आगू बढ़ैछ, मुदा इ बुझा जायत जे इ अशोकक कथा थिक, जे पढ़बा सं बेसी सुनबाक इच्छा जगबैत छै. हेयरपिन मे कोमल भावना अपन चरम पर ऐ तं बौका चुप अछि मे शोषणक एकटा अलग तरीका दिस समाज कें इंगित करैछ आ डैडी गाम बदलैत समयक दस्तावेजी कथा थिक. तीनू कथा अशोकक कथाकार मन कें मापक लेल बैरोमीटरक काज सेहो क' सकैछ. हेयरपिन पढ़ला सं पहिने लागत जे कथाकार कें बहुतो गप कहबाक छनि. हुनका लग बहुत रास खिस्सा छनि, मुदा ओ कहि नै रहला अछि. किछु पंक्ति सं काज चला लेलनि. तहिना बौका चुप अछि मे एक संग बहुत रास कथ्य छै, जेकरा विस्तार पयबाक छलै, मुदा कथाकार कोनो हड़बड़ी मे छथि. ओ पूरा बात खोंइचा छोड़ा कें नै कहलनि. एकर कारण इ भ' सकैछ जे जखन इ कथा लिखल गेल ओहि समय मे यैह परिपाटी रहल होइ जे सब किछु नै कहल जाइ. जं कहलो जाइ तं किछुए पंक्ति मे. ऐ बात कें बल अहू सं भेटि सकैए जे अशोकक पहिल कथा संग्रह सं बेसी दोसर कथा संग्रहक कथा मे हुनक कथाकार मन विस्तार पाओलक अछि. तेसर संग्रह मे आरो बेसी. तैयो कत्तौ ने कत्तौ हुनक लगभग सभ कथा मे एकटा हड़बड़ी अथवा अधूरापन बुझा पड़ै छै. ओना यैह अधूरापन अशोकक कथा साहित्य कें पढ़बाक लेल उकसबितो छैक. एकर दोसर पक्ष सेहो छै, जे अशोकक कथा कें अलग पहचान दैछ. ओ थिक कथा मे कविता सन सूक्तबद्ध पंक्ति. कम शब्द मे बिंबक प्रयोग करैत अपन बात कहब. इ बात अशोकक कथा साहित्य कें पढ़ैत जानल जा सकैछ. सिप्टीपिन कथा मे कविता भावक कम प्रयोग छै, बौका चुप अछि मे ओइ सं बेसी आ डैडी गाम मे तहू सं बेसी. ध्यान देबाक गप इहो छैक जे अशोक जं एक दिस मार्क्सवादी विचारधारा सं प्रभावित छथि तं दोसर दिस फ्राइडक मनोविज्ञान सं सेहो. हिनक कथाकार कें धीरेंद्र-सोमदेवक साहित्य सं प्रेरणा भेटैत छन्हि, तं राजकमल चौधरीक साहित्य हिनक मोन कें सेहो मथैत छन्हि. इ बीचक रस्ता अपनबैत छथि आ अपन कथा चास तैयार करैत छथि. डैडीगाम संग्रहक छह कथा कें हम पढ़बा सं बेसी सुनबाक इच्छा रखैत छी. इ हमर पाठकक सीमा सेहो भ' सकैए, मुदा इहो मानल जेबाक चाही जे मैथिली कथाक जे खिस्सकर परंपरा छै, तेकर वाहक अशोकक कथा ऐ, अर्थात खिस्सा कहबाक कला अशोकक परिपक्व कथाकार मन अर्जित क' चुकल ऐ आ यैह अर्जन मैथिली कथाक संपत्ति थिक. हेयरपिन मे राति छै, तकिया छै, नीन छै... सभटा एकटा बिंब सन उभै छै कथा मध्य. ओहिना बौका चुप अछि मे राति छै, नीन छै, तकिया छै... मुदा हेयरपिन सं आगूक बात इ कथा अपन बिंबक माध्यम सं कहैए. बौका कें बीमारी छै, सेहो ह्रदय रोग. ओ ह्रदय बला लोक ऐ. जं कथाकार चाहितथि तं स्पष्ट कहि सकैत छलाह जे फलां रोग, मुदा नै. ओकरा कोनो आन असाध्य रोग नै छै, ह्रयक रोग छै. पूरा कथा ह्रदय सं शुरू होइ छै आ ह्रदय सं समाप्त. एतय हेयरपिन सं आगू बढ़ि कथाकार एकरा सामाजिक विद्रूपता आ शोषण दिस ल' जाइ छथि, सेहो नहुंएं सं. बौका कें सांप डसलकै. अजोध सांप. समाजक ओ सांप जे एखन धरि फेन काढ़ने अछि. जं कथाकार चाहितथि तं एकरा बीमारी सं सेहो मारि सकैत छलाह, मुदा तखन कथाक टोन बदलि जइतै आ अर्थ विस्तार ओतेक व्यापक नै भ' सकितैक. जं ऐ कथा कें नहुंएं सं कोमल ढंगे विस्तार नै देल गेल रहितै तं संभव जे इ कथा 'अंतिम शह' शीर्षक कथा सन लगितै. संभवत: इ कथा नक्सलबाड़ी आंदोलन सं उपजल साहित्यिक प्रतिरोधी स्वर कथा थिक. एकदम इंकलाबी कथा. हमरा व्यक्तिगत रूपें इ कथा पसिन्न ऐ, मुदा जं खिस्सा रूपें अहां एकरा पढ़बै, तं इ ओतेक प्रभावी नै लागत. बौका चुप अछि कथा सेहो शोषणक बात कहै छै, मुदा सीधे नै, बिंबक माध्यमे. समाजक अजोध केना निम्नवर्गीय वर्ग कें डसि रहल छै, तेकरा बिंबक आवरण मे कथाकार कहैत छथि. हम एकरा जं दोसर शब्द मे कही तं कहि सकैत छी जे अशोकक कथाक तानी-भरनी सबसं पहिने मिथिलाक जीवनक यथार्थक भूमि कें सांकेतिक रूप मे निर्वाह करैए. हुनका पाछू अपन कथा कहबाक विराट परंपरा तं छन्हिएं, दोसर दिस दोखरल वर्तमान सेहो. नेहरूकालीन स्वप्न पूरा नै भेलाक बाद मोहभंग आ तक बाद विद्रोह, फेर ओहि विद्रोह अवनति आ तकर बीच मे कथा कहबाक हिस्सक-हिम्मति अशोकक कथा कें एक अलग मूड मे ल' जाइए. एक दिस सामाजिक आलोड़न आ दोसर दिस देह-मोनक टूटन परस्पर विपरीत बुझा पड़ैत दू अलग-अलग धाराक विशेषता कें साधब एकटा साहसिक काज छल जे समन्वित रूप सं अशोकक कथा संसार मे देखा पड़ैछ. संभवत: तैं हुनक किछु कथा स्थूल आ किनको ओझरायल बुझा सकैए, मुदा कथाकार अशोक मैथिल समाजक मांसल भूमि कें कतौ-कतौ छोड़ि वाक्य संकेत सं एकरा पूरा करैत छथि, जै सं कथ्य रस्ता नै भटकैए आ यैह कारण छै जे हुनक कथाकार रूप आलोचकीय रूप कें छोड़ि अलग रस्ता चुनैए. किछु कथा मे कलात्मक प्रभाव पर दृष्टि रखैत ओ अपन बात अभिधा मे नै कहि कें एक संकेतक रूप मे कहैत छथि. संभवत: तैं हुनक लेखन ओझरायल प्रतीत होइछ. यथार्थक प्रामाणिकताक संग सांकेतिक प्रभावान्वितिक समन्वयकक सभ प्रयत्न सफल भेल हो से हमर कहब नै ऐ, मुदा कतोक कथा एहन ऐ, जै मे ऐ विशेषताक निर्वाह सफलतापूर्वक भेल अछि. ओहि रातुक भोर, बौका चुप अछि सन किछु कथाक वातायन सजीव आ सक्रिय चरित्रक रूप मे ट्रेजेडीक निर्माण करैए. एना भ' क' कियो, गामक कातक हाइवे बदलैत समाजक गह कें पकड़ैत ऐ, तं अभयक बेटा कें दूटा दांत भेलनि, खुशीक नाम जीवन, टीस सन कथा मोन आ परिवारक गहींर इनारक भत्थन देखबैत ऐ. अर्थात मोन, परिवार आ अंतत: समाजक नब्ज कें अशोकक कथा नीक जकां पकड़ैए. समाजक बीमारी कें अशोक कथा पकड़ैत अछिए, कतौ-कतौ निदानक रस्ता सेहो देखबैए. अशोकक कथा कतौ मानव-मनक विकृतिक चित्रण क' ओइ वातावरणक भयावहताक संकेत सेहो दैए, जे ओहि विकृति कें जन्म दैत ऐ. किछु ठाम एक चरित्र अथवा एक वातावरणक चित्रण सं कथाकार सलाह देबाक प्रयत्न करैत छथि. तैं हम एकटा पाठकक रूप मे कहि सकैत छी जे अशोकक रचना संसार एकांगी नै ऐ. ओ एकटा सुन्नर संसार रचबाक तैयारी सेहो करैत देखाइए. -संपर्क-8825288748 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.९.लाल देव कामत- कथाकार अशोक मादे लाल देव कामत कथाकार अशोक मादे मैथिली साहित्याकाशमे एकटा पैघ नाम उभैर आयल अछि कथाकार अशोक। नामेगुण अर्थ लागैत य ,जतय नै कोनू तरहक रहैछ शोक। से एकटा बूजूर्ग असाधारण व्यक्तित्वक अशोक कुमार झा,जिनक मधुबनी जिला आ दरिभंगा जिलाक मिलन स्थान प्रसिद्ध लोहना गाममे 18 जनवरी 1953 ई0 मेँ जन्म भेल छन्हि। 50 सँ अधिक कथा लिखनहार मिथिला मेँ अनेको रचनाकार भेल छथि। परँच नाम सँ पहिले कथाकार रूपेँ ख्याति हिनकेटा भेटलनि अछि। मैथिली साहित्य आन्दोलन मेँ जतेक जानल - पहचानल आ मानल कथाकार भेलाह अछि, ताहिमे सबसँ पहिले ओ लोकनि कविता गढलनि ; पछाति कथा दिसन उन्मुख भेल छथि। सयह आरम्भिक लक्षण हिनकोमे देखमे अबैछ। मुर्धन्य विद्वानक जुटान बनारस मेँ होइत रहैक। ओतय मैट्रिकमे पढैत कहियोकल अशोक जी स्रोता रूपेँ कविता सुनल करथि। से मनेमन हिनको किछ-किछ फुराइत रहय आ ई ताहिके शव्द आ वाक्य रुपेँ अपना रफ कागतमे उतारथि। फेयर करैत चोटीक विद्वान लोकमे अपन रचना देखाकय संशोधन कराबथि। आरम्भे मेँ हुनक रचल साहित्यक पन्ना के अपनैह हाथे फारि देबाक आदेश सेहो होईन,जे कष्टप्रद लागैन। तैयो विद्वतजन के बीच अपन मौलिक कविता ल'के' पाठ करबाक अवसर भेटनि। मुदा नव लोक छलाह,से कविताक काज छोड़ि खिस्सा लिखय ले नेर्देश भेटलनि। भारी मोन सँ लघुकथा - कथा लिखकय देखेबाक अनुभव प्राप्त कयलनि। सन् 1960 सँ 68 धरिमे 10-15 कविता गोष्ठीमे सुना चुकल छलाह,जे धियापुता पत्रिका आ मिथिला मिहिर मेँ करीब दर्जनभरि कथा धीरेन्द्र जीके देखेलाक वाद 1971 दिसम्बर अंकमे छपलनि। 1980 मे हिनक कविता संग्रह चक्रव्यूह आयल।अशोक जीक कविताक बनशव्त कथाके लोक बेशी पसीन करैन। गाम-घरमे लोक अपना नानी - मैयाँ, नाना - बाबा मुँहेँ बालपन सँ मनलगू खिस्सा रातिमे सूते सँ पहिले सुनल करय। ई हिस्सक रहने पत्र - पत्रिका मेँ कथा पढैत पाठक डुमि जाथि। ओना कथा लेखन कार्य यूरोप सँ आयल अछि,जे वर्तमान समस्या केँ केन्द्रमे राखि लिखल जाइक। कुरीति उन्मूलन - पतन संदर्भमे कथा लिखबाक प्रचलन बढल। करुण कथा सँ हरिमोहन झा व्यंग कथा दिसन आगू बैढ़ नव ढंगक कथा परसबाक परियास पाठक लग आरम्भ कयलनि। से देखा-देखी आधुनिक कथा लेखन क्रम चलैत गेल । तकरवाद छठम दशक सँ समकालीन दौड़ चलल अछि। कथाकार अशोक'क मत छन्हि- " 40 ई० सँ पूर्व करुण भावक रचना होय,1940 - 50 केर बीच खूब झमटगर कथा लिखेबाक मैथिली भाषा मेँ परिपाटी भेलैक।" देश स्वतंत्र भेलासन्ता आमूलचूल परिवर्तन'क नव - नव विषय पर कथाकार लोकनिक डेग उठलनि । बिहार सहकारिता सेवा (1978) मेँ पदाधिकारी रूप सँ काज करैत, आब सेवानिवृत्त भेल छथि अशोकजी। हिनक कथा लेखन क्रम अनबरत चलैत रहलैन,आगुओ चलैत रहत । हिनक प्रथम कथामे शुमार "विराम सँ पहिले" छैक। ओना रचना सक्रियता बढौलनि 'बौका चुप छल' रचिकय। एखनो मैथिली भाषा मेँ कथा प्राय: जे कोनू रचनाकारक नीक लागैत छैक, तँ ओहिक पाठक तकर रसास्वादन करैत तहतक केर कथ्य पर स्वंय भाव सँ हंसनाई - कननाई वा जोर-जोर सँ हँसब,रोदन करय लागब ; ई तँ अन्त:करण केर असर होईछ। दोसर बात जे कथाक गरहैन जौँ व्यंग परक होईछ तँ पाठक अध्ययन- मनन करैत काल ओहिक आभाक प्रभावमे आबि उद्वेलित होईछ। पाठकक उपर जे मानसपटल केँ गुदगुदी लगैछ से मुश्की देवा ले रहि-रहिके जोर मारैत छैक। कविता सँ कथा दिश उन्मुख होइत रहल अशोक जीक शूरूआति परिवेश कथा मादे केन्द्रीत रहल । हुनका विषयमे वा कहू जे हुनक कथा विषयमे जौं मनोयोग पूर्वक अध्ययन कय ओहिक वास्तविक अखियास करब ,चाहे पाठक हुनक समवयसक होथि वा जेष्ट-कनिष्ट होथि पढ़ाकू लेल सम नज़र सँ देखैत छथि। पढ़ाकू वा अध्ययनशील लोक कथाकार अशोक केँ 21म् शताब्दीमे आन लेखकक तुलनामे खूब पढैत छन्हि। ई दीर्घ कथा यात्रा पर छथि। एखन बहुत किछ आरो लिखब शेष हुनक निजी अभिष्ट छन्हि। नवारम्भके प्रकाशक अजीत आजाद अपन मधुबनी डेरापर हमर परिचय कराबैत हुनका कहलकैन - ई लाल देव कामत हमर गामक संगी छथि आ हमर दुश्मन नहिँ छथि। संगहि इहो बतेलकनि कामतजी मैथिली जगतके नव पुरान लेखक पर अध्येता छथि। ओना वरेण्य साहित्यकार जगदीश प्रसाद मंडल जीक गाम बेरमा मेँ आयोजित सगर राति दीप जरय 'कथा गोष्ठीक ' अवसर पर सेहो आ कतेको ठाम अशोक जी सँ भेंटघांट भेल अछि। हिनक वकतव्यमे सुनने छी -: बेसीतर ग्रामीण क्षेत्रमे कथा गोष्ठी " सगर राति दीप जरय" कार्यक्रम आयोजन होईछ,जाहि सँ नव कथाकार बनैत अछि।" कथा पाठ कयलाक वाद लेखक केँ समीक्षक लोकनि ओहि कथा पर सोझा सोझीमे अपन नव विचार प्रवाहित कय कथाक त्रुटि पर धीयान दिअबैत छैक। आब तँ दीवा आ संध्या काल ओहि तिथिमे कथा प्रसंग आन - आन ठाम सेहो बैसारीक आयोजन हुअय लागल हन्। अनियमितकालीन संधान पत्रिका माध्यम आ संरक्षक हैसियत सँ ' उपमान ' त्रिमासिक साहित्यिक पत्रिका सँ अलख जगेबामे अशोक जी मैथिली भाषा अभियानीक बीच अगुएलाह अछि। तेँ बहुआयामी व्यक्तित्व के धनीक अशोक जीक खातामे हिन्दी क' समीक्षात्मक आलेखक प्रसंशाक सँग हिनका यशस्वी रचनाकार, कथाकार,कवि, सम्पादक,निवंधकार, व्यंग्यकार आ आलोचक रुपेँ जगजियार भ' लोकक बीच चिन्हाय छथि। हिनक चर्चित पोथी -: मैथिल आँखि (निवंध संग्रह) दाम 69 टाका, कथाक उपन्यास - उपन्यासक कथा (नोवेल) दाम 75 टाका , डैडी गाम (कथा संग्रह) दाम 200 टाका,बात विचार (निवंध संग्रह) दाम 150 टाका , नीक दिनक वाईस्कोप (लघु कथा ) व्यंग संग्रह किमत 50 टाका आ आँखिमे बसल (यात्रा कथा) दाम 150 टाका 'क मैथिली मेँ छन्हि। मैथिल बीच दृष्टिसम्पन्न रचनाकार अशोक जीक ओहि रातिक भोर, मातबर कविता संग्रह आ चक्रव्यूह निकलल छन्हि। अशोक जीक तानपुरा कथाक बानगी ऐ तरहक होई छैक,यथा -: खर्चा आ आमदनी 'क लेखा जोखा संधारण लेल सरकारी कार्यालयक औडिट करय सँ बिनोद बाबू छीहकैत रहैत छै। हुनका बस- ट्रेन मेँ सड़क सँ यात्रा करैत आ आनो जगह तथा घरोमे आराम सरिया केँ नहिँ होई छै। घरक झंझटि तँ आरो जानमारा बुझाइछ।आफिस सँ आडिट काज कय डेरामे अयलापर पैन्ट सर्टक बटन फोलैत काल अव्यवस्थित होई छै। लुंगी बदैलैत घरी टुटल बटन देखि पत्नी रमझौहैर ठाढ क' दई छैक। पति-पत्नी क' बीच वाक्युद्ध सँ थाह चलैत छै जे दाम्पत्य जीवन नोंकझोंक सँ भरल छै। पत्निक लोहछब वाणी जेना बरछी भोकल जाइत होउ। बटनों तँ आखिर पत्नी माया केँ टांकि टँच करय पडै़त छै। ऐहनसन बिकट स्थिति सँ बढ़ल उलझन फेर सँ मिलानमे परिणत होई छै। एकबेर पुर्णिया सँ आडिटर महोदय घर अबैत छै, तँ रेडियो पर प्रसारित गीत ...बनके चकोड़ी........बजैत सुनैत य। ई गीत सुनि 15 साल पुरान समयके दृश्य मोन पड़ैत छै। इयह गीत न विनोद बाबु मायाजी केँ पहिलखेप गाबि सुनौने छलैक। आ गीतक रस मुरी गोंतिके माथ झूकौने माया गंभीर भ' सुनने रहथिन। 15 वर्षीय बेटा आब सेहो संगीत सीखय चाहैत छैक। बालपनमे अपन बाबूक जूटमिल बाला डेरामे रहथि तँ ओतय अपनों संगीत पढय गुणै चाहने छलैक। परँच अंग्रेजी आओर गणितक' नीक ज्ञान रहने ,राधा कृष्ण मंदिर पर आयल गानबजान मंडलिक गबैया देखि मोनमे आयल रहैन मूलगाईन बनी।मुदा बाबूजी तैयार नहिँ भेल रहैक। हुनका तत्काल जे शिव नचारी सुनि आयल रहथि, से पाँति गबैत ....गौरा तौर अंगना ..अपन मीठ कंठ सँ पिताजी केँ सुनौने धरि रहय। पिताजी बंगाली टोलक घोषबाबू लग जाकय संगीत साँझखनके दूई घंटा २० टाका महिना दर पर नियमित सिखबाक निश्तुकी बात बताबैछ। परिवारिक आन- आन खरचमे कपैच बीश टाकाक औरियान तँ बड़े कठिनता सँ भ' सकलैक। आब की हो! नव बखेरा समक्ष ठाढ होईछ, सुरसाक मुंह बौने। से घरेलू कोन खर्च तोरल जाए जाहि सँ २०० टाकाक हारमुनियाँ नैका आनल जायत ! एकटा किफायती जुगत धरबैत पुरना मुस कटबा बाजा मेँ मोम सँ भुरकी भरि काज निकालबाक निठाहे योजना बनलैक। डेरा पर आब अभ्यास शुरू करैत सरगम गाबैक लेल सुर सँ लगनपुरवक मेहनैतक आवश्यकता रहैक। से छुटि गेला सँ संभव नहिँ होईछ। आब तँ पिताजी जहाँति आर्थिक अभाव नहिँ छैक। तेँ सेहन्ता सँ अपन दुलारू बेटा गौतम केँ अवश्ये रियाज कराओत। पत्नी सँग अंग्रेजी सिनेमा देखेबाक एक पृथक आनन्दक अनुभूति होइत छैक। से आई पत्नी सँ विनोद बाबू आग्रह करैत छथि जे चलू भोरका उखराहाक शो मेँ ब्लू फिल्म देख अबैत छी। पत्नी निधोख भ' बजैत छथीन हम अंग्रेजी सिनेमा नहिँ देखय जाएब। ओई राति सौखगर लोक सब हमरा दिश घुईर- घुइर निहारैक। तेँ घरेमे वीसीपी० आनि फिल्म देखेबाक नियार भास होईछ। परंच विचार मेँ पत्निक सम्पुष्टि नहिँ होई छन्हि। कारण एहन फिल्म पारिवारिक वातावरण मे देखब उसके - अनसोहान्त बुझाइछ। अगिला मास सँ पुत्र तानपुरा किनिकय मल्लिकजी सँ अवश्ये सँगीत सिखत। मुदा पैघ हाकिम बनैमे ई संगीत - गीत सीखनाई बड बाधक भ' सकैछ। ऐ बात पर दूनू प्राणिक बीच विशेष रूपेँ सहज सहमति बनि जाईत छै। साजबाज आ गीतनादक फेरमे पड़ि बेटा बंगट बनै सँ थम्हैत य। मैथिली साहित्य आन्दोलन मेँ एक समय एहनो आओत जाहिमे कथाकार अशोक केर वादक कथा आ अशोक सँ पूर्वक कथा बीच अशोक युगक कथा विधा पर सम्यक विमर्श होएत। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१०.हितनाथ झा- कथाकार अशोकक व्यंग्य संग्रह: नीक दिनक बायस्कोप हितनाथ झा कथाकार अशोकक व्यंग्य संग्रह: नीक दिनक बायस्कोप व्यंग्य लिखब असान गप नहिँ छै। तै पर ठाहि-पठाहि । महाग मुश्किल । ई बात श्री अशोकजी स्वयं कहैत छथि मुदा सेहो काज अखबार हिन्दुस्तान ,हिनकासँ करबाइए लेलकनि ।भलें ई अपनाकेँ कथाकार मानथु (मानिते छथि ,तैं ने फेसबुकपर अपन नामक पहिने कथाकार लिखने छथि) नीके केने छथि ,हिनकर नामधारी अनेको फेसबुकपर छिड़िआयल छथि ,तै मे ,हिनका बिकछायब कठिन काज भय सकैत छलैक् सामान्य पाठककेँ , से काज ई स्वयं कय देने छथि । ई स्वयं नहिँ ,मैथिली साहित्य संसार हिनका मैथिलीक विशिष्ट कथाकार मानि चुकल छनि । मुदा इहो बात सत्य जे हिनकर अध्ययनशीलता , हिनकर बजबाक शैली ,हिनकर बॉडी लैंग्वेज ,हिनकर सोचक विस्तार,हिनकर लिखबाक कला आ मैथिलीक हेतु सदिखन चिन्ता रखबाक कारणे हिनका कथा लिखबामे स्थिर नहिँ रहय देलकनि । मैथिलीकेँ जेतय जेहन जेना जरूरत पड़लैक ,हिनकर उपयोग कयलकनि । साहित्यिक मंच हो ,संयोजनक आ उद्घोषकक प्रयोजन पड़तैक ,तँ श्री अशोक सामने ठाढ़ । कथा तँ सहजहिं ,कोनो पत्रिकाक लेल कोनो समीक्षाक विशेषक प्रयोजन पड़तैक ,तँ श्री अशोक । कविताक पोथीसँ अपन यात्रा प्रारंभ केनिहारि श्री अशोक एक विधा डेबने नहिँ रहि सकलाह ,जतय जेना जाहि तरहक प्रयोजन पड़लैक ,लिखैत चल गेलाह आ बजैत चल आबि रहल छथि ,तैं ने विविध विधामे हिनक अनेक पुस्तक प्रकाशित छनि । हिनकर व्यंग्य साहित्यपर चर्चा करबासँ पहिने ,हिनकहिं मुँहे सुनल गप्प कहय चाहैत छी ,जे ओ कमजोड़ी हमरोपर लागू अछि । जखन हमर यात्रा संस्मरण निकलल ,तँ एक पाठक (नाम स्मरण नहिँ अछि ,अछियो तँ एतय नहिँ कहब) पढलनि आ जखन ओ रूस गेलाह तँ हुनको यात्रा संस्मरण लिखबाक मन भेलनि ,ई बुझि जे लिखब बहुत आसान काज छैक , जे देखलियै ,सुनलियै , गुनलयै ओकरा लिखब कोन भारी बात ! मुदा ओ एक पेजसँ बेसी नहिँ बढ़ा सकलाह ,लिखल नहिँ भेलनि । सत्त्ते लिखब बहुत दुरूह काज छैक ,खास क' साहित्य । ओ सभ बूते नहिँ भय सकैत छैक ,ओना आइ काल्हिपर ई लागू नहिँ अछि ,ने फेसबुकपर ,ने पत्र-पत्रिकामे आ ने सुन्दर ,सुव्यस्थित मोट गेटअप-सेटअपमे प्रकाशित किताबपर ।जेना मोन भेल लिखि देलहुँ ,जकरासँ मोन भेल प्रसंशा करबा लेलहुँ आ समयानुकूल जोगाड़मे लागि गेलहुँ । साहित्यकार भेनाइ बहुत विरल आ कठिन काज छैक , जकरामे ईश्वर प्रदत्त प्रतिभा रहैत छैक ,निरन्तर साधनारत रहैत छथि ,वैह साहित्यकारक रूपमे चिन्हल ,जानल आ मानल जाइत रहताह । बाँकी वर्तमानमे जे लूटि लेथु , वर्तमाने टामे रहताह । आगू क्यो नामो लेनिहार नहिँ ! श्री अशोकजी ओहि विरल साहित्यकारमे छथि ,जनिक मैथिलीकेँ खगता छैक । कथासँ समीक्षा दिस झुकाब , ई तँ अधिकांश लोक हिनकर विषयमे बुझैत छनि ,मुदा ई व्यंग्यो लिखलाह , ई बात हमरा जनैत कम लोक बुझैत हेतनि । जेना ऊपरमे कहलहुँ ,सेहो काज हिनकासँ 2014सँ 2016क बीचमे पटनाक दैनिक हिन्दुस्तान लिखबा लेलकनि । दू सालमे 31 टा लिखलनि आ ओ स्तम्भ बन्द भय गेलैक तँ हिनको व्यंग्य लिखब बन्द भय गेलनि ,ई एहिसँ बुझा पड़ैत अछि जे ओकर दू सालक बाद पुस्तक प्रकाशित भेलनि ,ओहिमे ओएह 31टा । एको टा बेसी नहिँ । तैं जे लिखलनि से मजबूरीवश लिखने हेताह ,मुदा लिखलनि तँ ओ सर्वत्र प्रसंशित भेलनि ,चर्चित भेलनि । हिन्दीक अखबारमे मैथिलीक स्तम्भ छपब ,ओहो हिन्दुस्तान सन प्रसिद्ध अखबारमे , जकर एक अलग आ सजग पाठक रहैत छैक , निश्चिते प्रत्येक मैथिली जननिहार पढ़ेत छल होयताह आ तै श्री अशोकजी नीके केलनि ,एकर पुस्तकाकार प्रकाशित कय ,स्थायी महत्वक बना लेलनि ,। फेर कोनो अखबार पकड़तनि ,तखने हिनकर कलम एहि विधा लेल ससरतनि । श्री अशोकजी स्वयं स्वीकारैत छथि - अखबारक कारणे चर्चित भेलहुँ । जे सभ हमर कोनो पोथी नहिँ पढ़ने रहथि सेहो एकरा पढलनि ।कतेक लोक फोन क' कए प्रसंशो कहियो क' करथि ।सेवा जीवनक त' कतेको सहकर्मी हमर लेखनसँ एही माध्यमे परिचित भेलाह ।* आब एहि पुस्तकक विषयमे । एखन बाढ़िक समयअछि , मिथिलाक बहुल क्षेत्र बाढ़िमे डूबल अछि । हिनकर एक व्यंग्य छनि "निचू चाड़ तर सोहाय मलार * । कतेक सटीक व्यंग्य छनि - जखने कारी-कारी मेघ लगैए तखने कोढ़ कॉपय लगैए । अंतमे कहैत छथि - एहन घर हो जाहिमे चुआठ नहिँ हो । निचू घर रहत तखन ने सोहायत मलार। स्मार्ट सिटीसँ लय नेपाल सरकार सँ वार्तापर तक नीक व्यंग्य छनि । *धूर्त समागम *मे कहैत छथि । नाटक देखि चकबिदोर लागि गेल । चकविदोर एहि दुआरे जे एक्केइसम शताब्दीक गप चौदहमे देखाओल गेल छल । सात सौ वर्षहुमे लोकमे कोनो बदलाव नहिँ । बढियाँ तुलनात्मक व्यंग्य कयने छथि । चुनावक फगुआ पहिल व्यंग्य छनि । बढियाँ जकाँ पार्टी सभकेँ क्लास लेलानि अछि । 22 मई 2014 क लिखल व्यंग्य *नीक दिनक बाइस्कोप* जाहि नामपर किताबोक नामकरण पडल अछि ,पाँच सालक बाद पढि रहल छी , नीक "बाइस्कोप" देखेने छलाह । एहिना एकसँ एक व्यंग्य छनि , किछु व्यंग्य तँ बहुत नीक सुतरलनि अछि ,ओना सभ रचना अपन नाम(शीर्षक)क सार्थकता देखबैत अछि । पुरनो लिखल व्यंग्य एखन टटका लगैत अछि । आ आगुओ पढ़ब तँ लागत एखनुक तँ बात थिक । यैह एहि पुस्तकक सार्थकता अछि । शेखर प्रकाशन,पटनासँ प्रकाशित ई पोथी मात्र ₹50/-मे उपलब्ध अछि ।तैं हम आब हिनकर अन्य रचनापर नहिँ कहब । स्वयं पढ़ी आ अपने निर्णय करी । हमरा विश्वास अछि ,हमरासँ अपने पूर्ण सहमत होयब । हँ ! श्री अशोकजीक कोनो विधा साहित्यक अमूल्य निधि भय मैथिली साहित्यमे सभ दिन पढ़ल जयताह आ से एक मानदंड साबितक संग । -संपर्क-09430743070 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.११.शिवशंकर श्रीनिवास- अशोकक कथा शिवशंकर श्रीनिवास अशोकक कथा अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१२.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'- अशोकजीक कथामे कथापर विमर्श जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल' अशोकजीक कथामे कथापर विमर्श अशोकजीक कथामे मैथिली कथापर विमर्श आकर्षित करैत अछि । मैथिली कथाक अतीत, वर्त्तमान आ भविष्यपर विमर्श अशोकजीक 'छुट्टीक एक दिन' सँ पहिने कोनो कथामे हम नहि पढने छी । वर्तमान स्थिति ई अछि जे बहुत घरमे गप-सपमे मैथिलीक प्रयोग कम भ' गेल अछि । माइयो अपन धिया-पूतासँ मैथिलीमे गप नहि करै छथि, पढ़ाइ-लिखाइ, नोकरी-चाकरी,बजार-हाट,टी.भी.-सिनेमा सभ ठाम हिन्दी-अंग्रेजी पसरल अछि । जीवनमे मैथिलीक लेल स्थान बहुत कम भ' गेल अछि, जकर परिणाम अछि जे मैथिलीक प्रति अपनत्व आ ममत्व कमल जा रहल अछि । बहुत मैथिल एहेन छथि जे मैथिली बाजि त लै छथि मुदा पढ़ल-लिखल नहि होइत छनि । जखन मैथिली पढले ने होइ छनि तखन मैथिली कथा-कविता कोना पढ़ता ? पोथी पत्रिका कोना बिकेतै ? प्रकाशन व्यवसायक लेल व्यवसायी बुद्धि वला पूजीपति आगाँ कोना एताह ? मैथिलीक बजार नहि रहतै त साहित्यकार मैथिलीमे किए लिखताह ? बहुत साहित्यकार जे मैथिलीमे सोचैत छथि ,अपन भाषामे अपनाकें बेसी नीक जकाँ अभिव्यक्त क' सकैत छथि,से मैथिलीमे लिखैत छथि, तें एखन पोथी त छपि रहल अछि । अतीत ई कहैत अछि जे हरिमोहन झाक साहित्य पढबाक लेल बहुत गोटे मैथिली सिखलनि । वर्तमानमे सेहो हरिमोहन बाबू आ यात्रीजीक साहित्य खूब पढल जा रहल अछि आ हिनकासभक पोथी सभसँ बेसी बिकाइयो रहल अछि । तखन स्थिति चिंताजनक किए लागि रहल अछि ? की मैथिलीमे पढबा जोगर साहित्य नहि रचल जा रहल अछि ? की मैथिलीक साहित्यकार खाली एक-दोसरक खिधांसमे लागल रहैत छथि ? हरिमोहन बाबूक साहित्यक जे सामाजिक सौन्दर्य छनि से आइयो हुनका प्रासंगिक बनौने छनि । की आजुक रचनामे सामाजिक सौन्दर्यक अभाव अछि ? की साहित्यमे कलात्मकताक संग सामाजिक चिन्ताक अभाव रहैत अछि ? की सामाजिक सरोकारक व्यापकताक उपेक्षा होइत अछि ? की रचनाकारक जुड़ाओ आ लगाओ समाजसँ कम भ' गेल छनि ? की मैथिल समाज आगू भ' गेल अछि आ साहित्य पाछू चलि रहल अछि ? युवा वर्गक सोच बदलि रहल अछि । हरिमोहन बाबू अपन कन्यादान उपन्यासमे ई कामना व्यक्त केने छलाह जे शारीरिक ओ मानसिक स्तर पर समान स्थितिक युवक-युवती यदि स्वेच्छापूर्वक विवाह करैत छथि त यैह आदर्श विवाह थिक, एहिसँ समाज बदलत । से भ' रहल अछि । प्रेम-विवाह भ' रहल अछि, जाति आ धर्मक बन्धन टूटि रहल अछि । समाज बदलि रहल अछि, नव समाज बनि रहल अछि, मुदा साहित्यमे जेना अभिव्यक्त हेबाक चाही से नहि भ' रहल अछि । प्रश्न इहो उठैत अछि जे हमर समाज धन अथवा जातिक हानिके सहर्ष स्वीकार क' रहल अछि अथवा अभिभावकक असह्मतिक कारण युवक-युवतीकें कोर्टक शरणमे जाय पड़ैत छनि । प्रश्न अछि जे नव समाजक हलचल मैथिली साहित्यमे किए नहि देखाइ द' रहल अछि ? परिवर्तनक आकांक्षी युवा पीढ़ीक लेल की साहित्यक अभाव भ' गेल अछि ? की मैथिलीमे प्रेम प्रगट करबाक लेल 'आइ लव यू' सन शब्दक अभाव अछि ? यैह सब किछु प्रश्न अछि जाहिपर विमर्श अछि एहि कथामे । विमर्शमे चारि गोटे भाग लैत छथि अभिनव,अंकिता,नीलम आ स्वयं कथाकार । अभिनव एम बी ए क' क' नोकिया मोबाइल कम्पनीमे काज करैत छथि, अंकिता अंग्रेजी साहित्यसँ एम. ए. कय पी.एच.डी. क'रहल छथि,नीलम डी.ए.बी.मे विज्ञानक शिक्षक छथि । अभिनव आ अंकिता अंतरजातीय प्रेम विवाह केने छथि । अंकिताकें साहित्यमे रूचि छनि, कथा, कविता सभ पढैत छथि, अनुवादक माध्यमसँ सभ भाषाक कविता,कथा पढैत रहैत छथि, मैथिलीसँ लगाओ छनि, मैथिली साहित्य बेसी नहि पढने छथि मुदा, पढबाक इच्छा रहैत छनि । बजारमे ओल किनबाक लेल अभिनव आ अंकिताक बीच मतान्तरक बात कथाकें सरस बनबैत अछि । अभिनव आ अंकितासँ इहो पता चलैत अछि जे समाज एखन एहि परिवर्तनके सहज स्वीकृति देबामे सक्षम नहि भेल अछि, एकटा पक्ष एकरा धनक हानि बुझैत अछि आ दोसर जातिक हानि । हिनका दुनू गोटेकें सेहो कोर्टक शरणमे जाय पड़लनि । साहित्यमे एहि तरहक सोचपर कम रचना एबाक ईहो एकटा कारण भ' सकैत अछि । हिनका लोकनिक माध्यमसँ मैथिली साहित्यक प्रति शिक्षित युवा वर्ग,अन्य प्रौढ़ शिक्षित वर्ग आ मैथिली लेखकक दृष्टिकोण बुझबाक आ समस्याक समाधानक लेल सार्थक चिन्तन भेल अछि एहि कथामे । वस्तुतः मातृभाषाक अस्तित्वपर जे संकट आएल अछि ताहिपर सेहो संवाद चलैत अछि कथामे । ई कहब पूर्णतः सत्य नहि अछि जे नव समाजक हलचल वर्त्तमान मैथिली साहित्यमे नहि आएल अछि अथवा मैथिलीमे प्रेमकथाक अभाव अछि, तथापि जतेक अछि ततेकसँ संतुष्ट होयब उचित नहि अछि । प्राथमिक कक्षामे मातृभाषाक माध्यमसँ पढाइ नहि हेबाक विषय पर ई कथा मौन अछि, तथापि मैथिलीक संकटक समाधानक दिशामे एकटा स्वस्थ चिन्तन लेल प्रेरित करैत अछि अशोकजीक चर्चित कथासंग्रह 'डैडीगाम'क कथा 'छुट्टीक एक दिन' । -संपर्क-8789616115 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१३.नारायणजी- मूल्यांकन- अशोकजीक लेखन वैशिष्ट्य नारायणजी मूल्यांकन- अशोकजीक लेखन वैशिष्ट्य अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१४.शिव कुमार मिश्र- अशोक ओ मैथिली साहित्य संस्थान शिव कुमार मिश्र अशोक ओ मैथिली साहित्य संस्थान प्रसिद्ध साहित्यकार अशोक कुमार झा अपन लेखनक बलें साहित्यकार विशेषरूपसं कथाकारक मांझमे विशिष्ट स्थान पाबि गेल छथि। सरकारी पदाधिकारीक रुपमे जहिना हिनक विलक्षण दायित्व प्रसंशनीय रहल अछि तहिना साहित्यिक संस्थान सभक संगठन ओ संचालनमे सेहो हिनक दीर्घ अनुभवक सहयोग भेटैत रहल अछि। मैथिली साहित्य संस्थान,पटनाक क्रियाकलाप पुनः आरंभ कयल जाय ताहि विषय पर 2014 इस्वीमे अशोक जी, भैरव लाल दास ओ हम बिहार रिसर्च सोसायटीक कार्यालयमे विमर्श कयल। एहिलेल एकटा कार्ययोजना पर सेहो चर्चा भेल। हमरालोकनि एहि लेल सेहो चर्चा कयने छलहुं जे आन संस्था द्वारा विद्यापति पर्व मनाकय सांस्कृतिक कार्यक्रमक परम्पराकें आगू बढाओल जा रहल अछि मुदा मैथिली साहित्य संस्थान मैथिली दिवसक आयोजन कय मिथिलाक सांस्कृतिक परम्परा विषयक अनुसंधान कार्यकें आगू बढाओत। मैथिली दिवसक आयोजनक पाछू एहि तथ्य पर विचार भेल छल जे संविधानक अष्टम अनुसूचीमे मैथिली भाषाक प्रवेश जाहि तिथि क' भेल छल ताहि तिथिकेँ मैथिली दिवसक रुपमे मनाओल जाय। हमरा तीनू गोटे एहि विषय पर एकमत भय एकटा बैसारक आयोजन बिहार रिसर्च सोसायटीक सभागारमे कयल जाहिमे ओहि विद्वान सभकेँ आमंत्रित कयल गेल जे लोकनि एकर स्थापना कालसं संबद्ध छलाह। ओना मैथिली साहित्य संस्थानक स्थापनाक श्रेय स्वर्गीय राजेश्वर झाकें देल जाइत छनि जे 1969 ईस्वीमे ताहि कालक मैथिल ओ अमैथिल विद्वानसभक सहयोगसं पटनाक बिहार रिसर्च सोसायटीक कार्यालयमे कयलनि। दीनानाथ झाक अध्यक्षतामे एकर गठन भेल जकर सचिव स्वयं राजेश्वर झा भेलाह। संरक्षक बाबू लक्ष्मीपति सिंह छलाह ओ रमानाथ झा, जटा शंकर झा, गौरी नंदन सिंह, गोपी रमण चौधरी, प्रोफेसर जगदीश चंद्र झा (मुख्य संपादक, मिथिला भारती), सुधांशु शेखर चौधरी,आचार्य परमानंदन शास्त्री,कुलानंद नंदन,बलदेव मिश्र, सुरेंद्र मिश्र, प्रोफेसर हेतुकर झा,लेखनाथ मिश्र, इन्द्र कान्त झा,सुशील कुमार झा, शैलेंद्र मोहन झा,चित्तरंजन प्रसाद सिन्हा, अभय कांत चौधरी, दया शंकर उपाध्याय, राधा कृष्ण चौधरी, उपेंद्र ठाकुर, रामदेव झा,जगदीश्वर पांडेय, विनोदानंद झा, कमल नारायण झा कमलेश, हंसराज, अमरेश पाठक, बी पी मजुमदार, परमेश्वर झा,जय नारायण ठाकुर, वेदनाथ झा, विजय कुमार ठाकुर, राजेंद्र राम,नरेंद्र झा,रमाकांत झा, करुणानंद दास,सच्चिदानंद सहाय,जटाशंकर दास,भीमनाथ झा,मंत्रेश्वर झा, प्रबोध नारायण झा,बाल गोबिंद झा,गंगेश गुंजन, नवीन चंद्र मिश्र, कपिलेश्वर झा, गोलोक नाद मिश्र, इन्द्र नाथ सिंह ठाकुर, गिरीन्द्र मोहन भट्ट, सीताराम राय,प्रफुल्ल कुमार सिंह 'मौन',प्रकाश चरण प्रसाद, उपेंद्र दोषी, उदय चंद्र झा 'विनोद' प्रभृति कतोक विद्वानसभक सहयोग एहि संस्थानकें भेटैत रहल। त्रैमासिक शोधपत्रिका मिथिला भारतीक प्रकाशन 1969 सं प्रारंभ भेल छल। कुल पांच अंक प्रकाशित भेलोपरांत 1977मे एकर प्रकाशन बन्न भय गेल। पंडित राजेश्वर झाक स्वर्गवास भेलाक पछाति एकर कार्यकलाप ठमकि गेल। एहिमे जे शोधालेख प्रकाशित भेल छल ताहि सभ पर कतोक शोध प्रबंध पछाति तैयार भेल मुदा एकर अभाव मिथिलाक अनुसंधान विधाकें बेस आघात पहुंचेलक। मिथिला भारतीक अतिरिक्त कतोक आओर शोधग्रंथ ओ साहित्यसभ प्रकाशित भेल छल।अवहट्ट :उद्भव ओ विकास नामक पंडित राजेश्वर झाक पोथीकेँ साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल छल।लोकगाथा विवेचन नामक शोधग्रंथ एकटा विशिष्ट उपलब्धि छल। पंडित राजेश्वर झाक पछाति एकर शोध ओ प्रकाशन कार्य बन्न भेलोपरांत दोसर स्तरीय शोधपत्रिकाक प्रकाशन नहि भय सकल। ओना रांटी ड्योढ़ीसं किछु अंक जिज्ञासाक अवस्स प्रकाशित भेल मुदा ओहो अल्पायु रहल। मैथिली साहित्य संस्थान द्वारा साल भरिमे मात्र विद्यापति स्मृति दिवसक एक गोट बिध पुराओल जाय लागल। बिहार रिसर्च सोसायटीक कार्यकलाप बन्न भेलापर 1997सं ओहो बन्न भय गेल। बिहार रिसर्च सोसायटीके बचयबाक लेल प्रायः बारह बर्ख धरि संघर्ष करय पड़ल। तीस गोटसं बेसी मामिला लड़य पड़ल।2009मे एकर सरकार द्वारा अधिग्रहण कय पटना संग्रहालयमे मिला देल गेल। तकर पछाति सेहो कतोक मामिलासभ चलैत रहल।2014मे किछु संघर्ष विराम भेल। एतेक पैघ संघर्षक अवधिमे कतोक बुद्धिजीवी ओ विद्वानलोकनिक सहयोग भेटल। एहि क्रममे 2008-9मे बिहार विधान परिषदक परियोजना पदाधिकारी भैरव लाल दासजीसं संपर्क भेल। संघर्षक अवधिमे सदिखन ई अभिलाषा रहल जे जहिया संघर्षक अंत हएत आ बिहार रिसर्च सोसायटी अपन कार्यकलाप प्रारंभ करत तकर पछाति मैथिली साहित्य संस्थानक क्रियाकलाप सेहो फेरसं प्रारंभ कयल जायत। हमर चिरप्रतीक्षित अभिलाषाक कार्यान्वयनमे भैरव लाल दासजी ओ अशोक कुमार झाजी सहयोग भेटल। अस्तु, अशोक कुमार झाक संयोजनमे एकटा बैसार हमर कार्यालय बिहार रिसर्च सोसायटीक सभागारमे भेल।प्रोफेसर हेतुकर झा,प्रोफेसर रत्नेश्वर मिश्र, प्रोफेसर इन्द्र कान्त झा, प्रोफेसर महेन्द्र नारायण कर्ण,रामचंद्र खान,योगानंद झा,भैरव लाल दास प्रभृति कतोक विद्वानसभ उपस्थित भेलाह आ मैथिली साहित्य संस्थानकें पुनर्जीवित करबाक निर्णय लेल गेल।मिथिला भारतीक नवांक शृंखलाक प्रकाशनक सेहो निर्णय भेल जाहिमे अंग्रेजी भाषाक शोधालेख सेहो प्रकाशित करबाक निर्णय भेल।मैथिली दिवस 8 जनवरीकें मनेबाक निर्णय सेहो भेल।पछाति पटना उच्च न्यायालयक न्यायमूर्ति वी के वर्माजीक निदेशानुसार एकर तिथि 7 जनवरी कयल गेल आ मैथिली दिवसक आयोजन सात जनवरी क' होमय लागल। एकर आयोजनमे आदरणीय अशोकजीक सहयोग सदिखन भेटैत रहल अछि। प्रसिद्ध समाजशास्त्री प्रोफेसर हेतुकर झाक निर्देश पर हम आ भैरव लाल दासजी मिथिला भारतीक संपादक दायित्व ग्रहण कयलहुं।संपादक मंडल मे वरिष्ठ विद्वानसभकें स्थान भेटलन्हि। सभक सहयोगसं एखन धरि मिथिला भारतीक नौ अंक प्रकाशित भेल अछि।एकर स्तर बचेबाक सदिखन चुनौती बनल रहैछ। बिहार -झारखंड राज्यक ई एकमात्र शोधपत्रिका भय गेल अछि जकरा विश्वविद्यालय अनुदान आयोगक आर्ट एंड ह्यूमनिटी शाखाक केयरलिस्टमे स्थान भेटल छैक।एहिमे मैथिलक अलावा अमेरिका, जापान, कनाडा, नेपालक विदेशी विद्वानसभक संगहि बंगाल, असम,मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश प्रभृति अन्य प्रांतक विद्वानसभक शोधालेख सेहो प्रकाशित होइत रहल अछि।एवम् प्रकारेँ मिथिला भारती अंतरराष्ट्रीय शोधपत्रिकाक स्वरूप ग्रहण कय लेलक अछि। एहि तरहेँ मैथिली साहित्य संस्थानकें पुनर्जीवित करबाक लेल आदरणीय अशोक कुमार झाजीक योगदान स्मरणीय रहत।हम हुनक आभारी छी। हुनक स्वस्थ ओ सुदीर्घ जीवनक कामना करैत छी। -संपर्क-9122686586 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१५.शैलेन्द्र आनन्द- अशोक: एकटा जीवन्त कलाकार शैलेन्द्र आनन्द अशोक: एकटा जीवन्त कलाकार अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१६.गजेन्द्र ठाकुर- कवि अशोक गजेन्द्र ठाकुर कवि अशोक ओना तँ अशोक अपनाकेँ आब कथाकार अशोक कहै छथि (हुनकर फेसबुक प्रोफाइलक यएह नाम छन्हि) मुदा हुनकर पहिल प्रकाशित पोथी अछि एकटा कविता संग्रह 'चक्रव्यूह' जे प्रकाशित भेल १९८६ केर जनवरी मासमे। ओही वर्ष अशोक, शिवशंकर श्रीनिवास आ शैलेन्द्र आनन्दक सम्मिलित कथा संग्रह 'त्रिकोण' प्रकाशित भेल, नवम्बर मासमे, जइमे तीनू गोटेक ५-५ टा कथा छलन्हि। अशोक कम लिखै छथि, कविता तँ आरो कम। मूलधाराक लेखकमे कम लिखबाक फैशन छै। जखन प्रेमचन्द तीन सय कथा लीखि लेलन्हि तखन जा कऽ ओ एकटा संग्रह बहार केलन्हि- 'मेरी प्रिय कहानियाँ' सन् १९३३ मे। ऐ पोथीमे प्रेमचन्द ई स्वीकार करै छथि जे नै चाहियो कऽ लेखकक सभ रचना नीक नै भऽ पबै छै। आ ईहो जे जँ पाठक एक लेखकक सभ रचना पढ़ि जाय तखन ओ जिन्दगी मे पाँचो छह टा लेखककेँ नै पढ़ि सकत। से हुनकापर दवाब पड़लन्हि जे ओ पाठक लेल ऐ तीन सयमे सँ किछु कथा चुनि कऽ अपन प्रिय कथाक रूपमे प्रस्तुत करथि। हमरो विचारे जहिया एकटा लेखक तीन सय कथा लिखि लिअय तखने ओकरा अपनाकेँ कथाकार घोषित करबाक चाही। ओना ओतऽ प्रेमचन्द ईहो कहि जाइ छथि जे लोककथामे मात्र उड़ैबला घोड़ा आदि होइ छै से कथाक महत्व लोककथासँ बेशी छै। प्रेमचन्दक ऐ गपसँ हम भिन्न विचार रखै छी आ फिराक गोरखपुरीक कथनसँ सहमत छी। फिराक गोरखपुरी अपन रुबाइक संग्रह 'रूप' मे लिखै छथि जे 'हिन्दू लोक गीत' जे हमरा दैत अछि से ओकरा मानवीय आ स्वर्गीय संगीत बना दइ छै, आ से गालिब, इकबाल आ चकबश्त सेहो हमरा नै दऽ सकला। ओ उदाहरण दइ छथि- "बाबुल मोरा नैहर छूटल जाय, ऊ ड्योढ़ी पर्वत भयी, आङन भयो विदेश।" महाभारत आब लोकगीत बनि गेल अछि, लोकगाथा बनि गेल अछि, 'भील महाभारत' तकर उदाहरण अछि। अशोकक 'चक्रव्यूह' महाभारत आधारित किछु कविता अछि, से ओ लोकगीत आधारित अछि, लोकगाथा आधारित अछि। से हमरा नजरिमे रचनाकार अशोक तीन टा छथि- कवि अशोक, कथाकार अशोक आ कथेतर गद्यक लेखक अशोक। अरविन्द ठाकुर अपन पोथी रोशनाइक लोकपक्षकेँ कथेतर गद्य कहै छथि, से निबन्ध-प्रबन्ध-समालोचना लेल हमहूँ ऐ शब्दावलीकेँ प्रयुक्त कऽ रहल छी। कवि अशोक पहिल चरण: अशोकक 'चक्रव्यूह' (सामान्य पाठ) महाभारत एकटा अद्भुत ग्रन्थ अछि। ई जय संहिता कथा लेखकक वर्कशॉप अछि, महाभारत कथा, मुदा ई कथा सभ पद्यमे अछि! महाभारतक अति लघु पद्यात्मक मैथिली रूप हमर त्वञ्चाहञ्च- गीत प्रबन्ध मे भेटत। फेर तेरहम दिनक युद्ध भेल शुरु जखन, संसप्तक आ त्रिगर्तकेँ पछुआबैत गेल अर्जुन। तखनहि युधिष्ठिरकेँ पता चल चक्रव्यूहक, अभिमन्यु देखि चिन्तित काकाकेँ कहल, गर्भमे सुनल पिता माताकेँ वर्णन सुनबैत छल, चक्रव्यूहक छह द्वारकेँ तोड़बाक सभटा, स्मरण युद्धक वर्णनक विधि बचल नहि कोनोटा। मुदा सातम द्वारक युद्धक वर्णन सुनल नहि, माता सुतलि तखने बचल एकेटा द्वार सैह। कवि ब्यासक पेटमे सीखि अएबाक बिम्ब, शब्दार्थ नहि वीरक अछि ई प्रतीक । सोझाँ तखन बढ़ल अभिमन्यु ककरो नहि बुझाएल, कतए अछि द्वार कतए प्रवेश जयद्रथ रक्षक जतए, आउ भीम काक ई अछि प्रवेश द्वार पैसब एतहि। अभिमन्यु कए प्रहार जयद्रथपर वाणसँ गेल भीतर, भीम दोसर सेनानीकेँ रोकि जयद्रथ ठाढ़ ओतहि। दोसर द्वारपर द्रोण ठाढ़ जखने वाण चलाबथि, काटल धनुष द्रोणक व्यूह भेदि बढ़लाह आगू। तेसर द्वारपर चकित कर्णपर कए वाण बरखा, बढ़ल चारिम द्वारपर अश्वत्थामा जतए छल, युद्ध भेल घनघोर एतए मुदा रोकि सकल नहि, अभिमन्युक रथ बढ़ल दुर्योधन भेल चिन्तित, कर्ण आब करब की बाजू पराजय बुजाइछ निश्चित। कर्ण बाजल सभ मिलि सातो महारथी हम सभ, रोकि सकब एहि बालककेँ नहि क्यो सकत असगर। सभ रथी आ पुत्र दुर्योधनक नाम लक्ष्मण जेकर, पहुँचि गेल सातम द्वार पहुँचल अभिमन्यु तावत। अभिमन्युक सारथी देखि ई दृश्य ओतए कहल, ई सभ अधर्मी अछि जुटल, कहू तँ रथ घुराएब, अर्जुन पुत्र हम नहि छोड़ब युद्ध हम एना देखू, पार्थ-पुत्रक शौर्य रथ घुमाऊ चक्राकार कए अहँ। तखन लक्ष्मण आएल सोझाँ अभिमन्युक ओतए, वाणसँ काटल मस्तक लक्ष्मणक, द्रोण कहल, अजेय ई अछि अभेद्य एकर कवच करू प्रहार सिरसि आ तखनहि सारथि अभिमन्युक खसल टूटि गेल रथ । नीचाँ आबि तरुआरि चक्र गदा लए ओतए ओ चलल, दुःशासनक पुत्रसँ गदा युद्ध भेल दुनू ओतहि खसल । पहिने उठि दुःशासनक पुत्र प्रहार कएलक मस्तकपर, सप्तरथीक बीच खसि पड़ल सुभद्रापुत्र पति उत्तराक। (गजेन्द्र ठाकुर, त्वञ्चाहञ्च- गीत प्रबन्ध, २००९) 'चक्रव्यूह' कविता संग्रहक पहिल कविता अछि 'चक्रव्यूह' जइमे आइ ने कृष्ण छथि ने युधिष्ठिर आ ने अर्जुन, आइ (महाभारत युद्धक तेरहम दिन) तँ रचल अछि चक्रव्यूह। 'हम किछु पूछब मे' चीर-हरणक वर्णन अछि। खिसियाकेँ दुर्योधन देलक ई आज्ञा पुनः ई, चीर-हरण करू दुःशासन द्रौपदी दासी छी। द्रौपदी कएलन्हि नेहोरा श्रेष्ठ लोकनिसँ विनय ई अछि लाज बचाऊ करैत छी विनती। सभ क्यो झुका माथ अपन ओहि सभामे, कृष्णा छोड़ल सभ आश सभ दिशासँ, भक्त्त वत्सल अहाँसँ टा अछि ई आशा, कोहुना राखू हमर ई लाज अछि प्रत्याशा। आर्द्र-स्वरसँ छलि रहलि पुकारि द्रौपदी, गोहाड़ि खसलि सभा-बिच, मूर्च्छित । लागल खीचय द्रौपदीक वस्त्र दुःशासन, सभासद देखल चमत्कार ई प्रतिपल, यावत रहल खिंचैत वस्त्रकेँ दुःशासन, बढ़ैत रहल वस्त्र द्रौपदीक तावत तखन। (गजेन्द्र ठाकुर, त्वञ्चाहञ्च- गीत प्रबन्ध, २००९) कृष्णक भूमिकासँ व्यास प्रसन्न छथि, मुदा अशोक अप्रसन्न। आ हुनकर अप्रसन्नताक कारण अछि, हुनका लगै छन्हि जे 'एहि चीर-हरणमे आइ/ कृष्णक भूमिका/ दुष्सासनक आगू/ ठेहुनियाँ दऽ दैत अछि'। आ से हुनकर सम्बन्धक द्रौपदी नाङट भऽ गेल छन्हि, अपन लाश अपन पीठपर उघैत बैताल कहिया हेता, विक्रमादित्य कहिया हेता, से जिज्ञासा छन्हि।'सोवियत रूस सँ' कविता अछि एकटा नैरेटिवक जे अशोकक पीढ़ीकेँ परसल गेल रहै, जतऽ सोवियत संघक बड़ाइ आ अमेरिकाक खिधांश कएल जाइत रहै, आ जे से करैत रहथि ओ अपन बाल-बच्चाकेँ पढ़ैले अमेरिका पठबैत रहथि। हमरा मोन पड़ैए जे एकटा हमर संगी कोनो परीक्षा दइले दरभंगा गेल आ यूनिवर्सिटी एरिया घूमि कऽ चलि आयल, कहलक जे दरभंगासँ नीक शहर तँ पूरा बिहारमे कोनो नै छै। ऐ कवितामे अशोक सेहो सएह केने छथि। सालमे चरि बेर भोट दैत लोक आ भोट दऽ फोंफ कटैत लोक हुनका पसिन्न नै छन्हि, मुदा ऐ बेर-बेर होइत भोटक लेल जे सामाजिक समीकरणक निर्माण होइत अछि से अशोक देखबासँ चूकि गेला। ओइ समीकरणक परिणामस्वरूप जे सामाजिक परिवर्तनक उत्प्रेरक तत्वक तरंग उठैए से अशोक चीन्हि नै सकला। 'गीत जे नै लिखल गेल' आ 'की सुनाउ अहाँकेँ?' कवि कर्मक वेदनापर आधारित अछि। 'लोक किछु नहि करैए' मे मनुक्खक अकर्मण्यता आ 'तोरा गछने रही' मे मनुक्खक स्वार्थ विषय बनल अछि। 'संचिकास्त' कार्यालय शब्दावलीक आधारपर रचित अछि। 'शिलालेख' क बिम्ब सुन्दर अछि। कवि आततायीकेँ कहै छथि जे ओकर अत्याचारकेँ शिलालेखपर खचित कऽ सुरक्षिता गरबा दी की? आ ओ तँ भगवान छथि, आ से ओ हुनका मृत्यु स्वीकार करबा लेल कहै छथि, मुदा व्यंग्य सेहो करै छथि जे हुनकर पुनर्जन्म अवश्य हेतन्हि । तीनसँ बेशी डाइमेन्सनक विश्वक परिकल्पना आ स्टीफन हॉकिन्सक 'अ ब्रिफ हिस्ट्री ऑफ टाइम' सोझे-सोझी भगवानक अस्तित्वकेँ खतम कऽ रहल अछि कारण ऐसँ भगवानक मृत्युक अवधारणा सेहो सोझाँ आयल अछि, से एखन विश्वक नियन्ताक अस्तित्व खतरामे पड़ल अछि। इतिहासक अन्तक घोषणा कयनिहार फ्रांसिस फुकियामा -जे कम्युनिस्ट शासनक समाप्तिपर ई घोषणा कयने छलाह- बादमे ऐसँ पलटि गेलाह। कम्यूनिस्ट शासनक समाप्ति आ बर्लिनक देबालक खसबाक बाद फ्रांसिस फुकियामा घोषित कएलन्हि जे विचारधाराक आपसी झगड़ा (द्वन्द्व) सँ सृजित इतिहासक ई समाप्ति अछि आ आब मानवक हितक विचारधारा मात्र आगाँ बढ़त। मुदा किछु दिन बाद ओ ऐ मतसँ आपस भऽ गेला आ कहलन्हि जे समाजक भीतर आ राष्ट्रीयता सभक मध्य अखनो बहुत रास भिन्न विचारधारा बाँचल अछि। भगवानक मृत्यु आ इतिहासक समाप्तिक परिप्रेक्ष्यमे 'शिलालेख' महत्वपूर्ण अछि।'फेर कोनो विजुरी चमकल' मे कवि हृदय आ प्रकृतिक बीचक सम्बन्ध जँ देखऽ चाही तँ देखि सकै छी, जेना 'गोबर सँ नीपल अंगना मे बरसल'। 'अहाँ केँ के चाही?' शब्द आकि अर्थ, शब्द माने भुस्सा बा खखड़ी आ अर्थ माने दाना, जे अहाँकेँ चाही कवि देता। 'चुप्पी नहि सोहाइये' मे कवि उलहन दइ छथिन, पेट लेल चुप्पी अङेजल मुदा तैयो पेट कहाँ भरैए? गाम लगक पैटघाट मोन पड़ै छन्हि, आ जखन हाकिम दबाड़ै छन्हि तँ अगिला कविता 'पाँती आइ जरूर लिखबै' मे गाम फेर मोन पड़ै छन्हि, मोन होइ छन्हि सभ छोड़ि-छाड़ि गाम घुरि जाथि। 'असगर' मे समय के दर्पण मे नोर देखबाक चर्चा अछि, बिछुड़ि गेलापर भेटल एकान्तीक हाक्रोश अछि। 'रचना सँ पहिने' मे कवि केँ सभटा पाँती अनचिन्हार लागि रहल छन्हि, छगुन्ता होइ छन्हि केना एतेक जीवन जीबि गेला। 'शून्य' अछि नै मिलबाक कविता, ई समानान्तर चलबाक कवितो नै अछि।'मोनक घण्टी' मे मोनमे एलापर चानन सन शीतल हेबाक आ मोनसँ गेलापर सहसह करैत साँपक आगमन हेबाक चर्चा अछि। चानन आ साँपक बिम्ब संस्कृत सुभाषितानिसँ मैथिलीमे अनलनि अछि कवि, मुदा कने भिन्न रूपमे। चानन गाछक जड़ि परजीवी होइत अछि, एकर जड़ि पानि आ खनिज दोसर गाछक जड़िकेँ फाड़ि कऽ ओतऽ सँ ग्रहण करैत अछि। वर आ पीपड़क गाछ परजीवी नै होइत अछि मुदा जखन ओ छोट अवस्थाक रहैत अछि ओकरा दोसर गाछक आवश्यकता पड़ै छै, सहारा लऽ ठाढ़ हेबा लेल, सोंगर सन। शनै:शनैः वर आ पीपड़क जड़ि सहारा देनहार सोंगर बनल गाछ सभकेँ तेना कऽ गछाड़ि लैत अछि जे ओ सभ बिन पानि आ सूर्यप्रकाशक पिचड़ा भऽ जाइत अछि। आ आब की अहाँ 'शीतल चानन गाछमे लपेटल रहबो उपरान्त साँप विषहीन नै होइत अछि ' केर बिम्ब देलासँ पहिने मोनकेँ ओझरायल पबै छी? मुदा कवि सतर्क छथि, ओ चानन सन शीतल हेबा धरि सीमित राखलन्हि अपनाकेँ। हम अनेरे जेक्स डेरीडाक विखण्डनात्मक पद्धतिक प्रयोग समीक्षामे तँ नै कऽ रहल छी? 'दबकल कुकूर' द्वारा हिलाओल जा रहल नाङरिक बिम्ब सङ संस्कृतक सुभाषितानि [काक चेष्टा बको ध्यानं, श्वान निद्रा तथैव च। अल्पहारी गृह त्यागी, विद्यार्थी पंच लक्षणं ॥] जइमे विद्यार्थीक लक्षणमे एकटा लक्षणमे 'श्वान निद्रा'क चर्चा अछि, माने कनियो आहट भेलापर ओ उठि जाइए। मुदा हमर गाम लग बनल फोर-लेनपर मनुक्ख तँ हजारोक संख्यामे एक्सीडेण्टमे मरल अछि मुदा कुकुड़ ओतबे संख्यामे मरल अछि सुतलमे, सड़कपर सुतल, लोक कहै छै जे कुकुड़क नीन बड्ड मोट होइ छै! तँ श्वान निद्रा कतऽ गेलै? की ओकर स्थल हम सभ छीनि लेलिऐ, की गाड़ीक गति तते तेज छै जे ओकर आहटि कुकुड़क साकांक्ष हेबासँ बेसी तेज छै से ओ नै सुनि पबैए, आ की संस्कृतक सुभाषितानि मनुक्खक पर्यावरणमे हस्तक्षेपक कारण फेल भऽ गेलै? जेक्स डेरीडाक संग पर्यावरण विमर्शमे हम अनेरे ओझरा गेलौं, एतऽ तँ कवि दबकल कुकूरक नाङरि हिलेबाक बिम्ब मात्र प्रयोग केने छथि। 'बिन फ्रेमक तस्वीर' फेर हुनकर असगर हेबाक चर्च करैत अछि। 'हमर कोनो नाम दऽ दे' मे ओ ओकर विराट रूपक आगाँ अपनाकेँ अस्तित्वहीन हेबाक अनुभव करै छथि। 'उदास भोरक एक गीत' अछि टीसक गीत, टीस हृदयसँ शरीर धरिक। 'कहिया धरि' मे कवि मेला ताकि रहल छथि हेरेबा लेल, आशाक माटि लगबैत रहैत छथि रंगीन सपनाक बर्तनमे। मुदा से कहिया धरि? 'एक विन्दु: तीन बिम्ब' मे एक बिम्ब अछि कोनो इच्छाक पूर्ति, दोसर अछि सोनिताएल आँखि आ तेसर बिम्ब अछि बिनु बचबाक प्रयास करैत खसैत जायब। 'प्रेमक तीन आखर'मे एक अछि- जे ओकर आँखिक भाषा पढ़ि लिखल शब्द, कतबो झटकारि कऽ लिखै छथि मोतीये सन पाँति बहराइत छन्हि, दोसर- ओकर प्रतिबिम्ब देखै छथि अपन मोनक अइनामे, आ से तेहेन प्रतिबिम्ब देखै छथि जे घोंटि लेबाक, पीसि कऽ चिबा कऽ लहूलुहान हेबाक मोन करै छन्हि। तेसरमे लग एलासँ डरो होइ छन्हि।आ यएह छी प्रेमक ढाइ आखरसँ आगाँक तीन आखर। 'एक राति' मे रातिक शीतलता, नीक-नीक अनुभूति, मुदा दिनक रौद? दिन--- नहि नहि। 'साँझ' सभ दिन आबि जाइए निर्लज्ज बनि, कवि ओकरा भागि जाइले कहै छथि नै तँ बड़ा देता इजोत। 'नव सीन' अछि नववर्षक आगमनक गीत, विलेनसँ हीरो बनबाक प्रयासमे नै भऽ जाथि एक्सट्रा, फेर वएह शंका आ निराशा। 'सीप महक मोती' मे आदर्शक जुलुसमे गाँधीक सहिष्णुता आ असहयोग (आन्दोलन) क चर्चा अछि । जितलापर नै वरन् हारलापर ठठा कऽ हँसि सकै छी! टघरल नोर जरिये कऽ बनि सकत मोती। आ तकर बाद अछि 'पाँचटा अनेरुआ कविता' जइमे पहिल अनेरुआ कविता अछि कृष्णक सभ साल होइत जन्मपर (कृष्णाष्टमी), मुदा ऐ बेर बाँसुरी बिसरि वायलिन लऽ कऽ आयल छथि कृष्ण। माने कवि वायलिनकेँ विदेशी वाद्य मानै छथि, हिन्दुस्तानी संगीतक हिसाबे ओ ई सही छै मुदा कर्नाटक संगीतमे ई विदेशी वायलिन आइसँ दू सय साल पहिने सम्मिलित कऽ लेल गेल छल। दोसर अनेरुआ कविता अछि डांस फ्लोरक मुदा ओत्तौ पएर पिछड़ि गेलन्हि। तेसर अनेरुआ कविता अछि रिक्शाबलाक, मुदा जखन अगिला पहिया झटकासँ टेढ़ भेलै तखने ओ संसार बुझि पेलक। चारिम अनेरुआ कविता अछि जीबा लेल जोड़ल जिनगी भरिक सम्बन्ध, मुदा! पाँचम अनेरुआ कविता अछि विनाशक करिया जीहक। चक्रव्यूहक अन्तिम कविता अछि 'दू बून्द नोर' तूफान, बिहाड़ि मुदा हृदयक बिहाड़िसँ पैघ नहि। साँवरिया नहि मृत्युक प्रतीक्षा। आ हम मरि जाइत छी! माटिक, पतलोइक टूटल घर दहाइत, माटिक शरीरक संग। दोसर चरण: अशोक चक्रव्यूहक बाद (सामान्य पाठ) 'फेर सँ' मे छोट बेटाक दुखीत हेबापर कारी मेघक घटाटोप आ कविता लिखबाक सूर चढ़ब देखबैए जे कविक कविताक वातावरण दुखी भेलेपर बनै छन्हि। 'दाँत' मे सासुरमे कनियाँकेँ मुँह नै खोलबाक जे सलाह देल जाइ छै तकर चर्चा अछि। 'आब..' मे माटि, काठ, बाँसक प्रयोग कम भेने आ सिमेण्ट, बालु, गिट्टी, लोहा, संगमरमरक प्रयोग बढ़ने लोकोक्तिमे अबैत परिवर्तन कवि देखि रहल छथि। 'ब्रह्मोत्तर' मे विकास लेल गाछ, घर, खेत आदिक अधिग्रहणक दंश, पहिने खेतिहरसँ खेत लऽ कऽ ब्रह्मोत्तर बाँटल जाइ छल, आइ लोकसँ जमीन लऽ कऽ नव-ब्राह्मणकेँ बाँटल जा रहल अछि। मुदा विश्वग्रामकेँ नन्दीग्राम चुनौती देलक अछि। 'मोछ' मे अस्त्रक महत्व बुझबैत ज्येष्ठ मोंछकेँ पैघत्वमे बाधक तत्त्व चिन्हित केने छथि, बा तेना कऽ काज करू, कमाउ जे मोंछमे नै लागय, से उपदेश दइ छथि। 'मुक्ति समारोह' मे शान्ति प्रतीक परबाकेँ उड़ाओल जायत, एकसँ दोसर राजेताक हाथमे जाइत ओ मुक्तिक आशमे अछि त्रस्त, मेरा भारत महान। 'आब किछु करू आचार्य!' मे आचार्यक मात्र चिन्तित होयब मुदा शिष्यकेँ नै अरघैत छन्हि। 'जखन पियासे मरि जायत' मे जिनकर चुप्पी कविकेँ नै सोहाइत छलन्हि से तँ आब हुनके चुप्प करेबापर लागल छथि।'एहि भ्रम मे नहि रहऽ' मे राजनीति मिसरकेँ चेतायल गेल अछि। 'सन्दर्भ:चुनाव वर्षक' क 'चुनाव'मे जनतंत्रक द्रौपदी छथि तँ 'भोट' मे भोट लेल होइत छल-प्रपञ्च अछि। 'राजनीति आब महकि रहलैए' मे राजनीतिक विद्रूप रूप देखार होइत अछि। 'कहलनि तूफान अली' मे नकली हिन्दू आ मुसलमान गढ़ल जेबाक चर्चा अछि। 'बुधियार' मे वर आ पीपड़ सन घरे-घर दरारि तकैत कक्का पात्र छथि। 'मनुक्ख धर्रोहि थिक कविता' मे कवि कविता की अछि तँ लिखिते छथि सङे ई की नै अछि सेहो लिखै छथि 'शिश्नपूजी लोकक बेलपात नहि थिक कविता'। 'विष' मे कवि ताकि रहल छथि विषधर। 'खायब आ नहायब' मे चर्चित अछि जे पहिने पुरुखक खायब आ स्त्रीक नहायब कम्मे लोक देखै छला मुदा आब? 'जिन्न'मे अपने जनमाओल जिन्न बकार बन्न कऽ रहल अछि। 'की भेल' मे मुरुत भेल मनुक्खक चर्चा अछि। 'आठम अनुसूची मे मैथिली'मे मनोरथ पूर्ण भेलापर कविकेँ वैष्णव भऽ जाथि, पचीसी खेलाथि बा गंगा नहा आबथि से फुरा नै रहल छन्हि जेना आब किछु करबा लेल बाँकी नै अछि। साहित्य अकादेमीमे हुअय बा अष्टम अनुसूचीमे मैथिलीक प्रवेश, ई मूलधाराक कट्टरताकेँ आर बढ़ेलक अछि, सशक्त केलक अछि। मूलधाराक किछु हार्डबाउण्ड पोथीक लाइब्रेरी द्वारा खरीद आ बिनु परिणामक मूलधारा द्वारा कएल जा रहल सेमीनारक अतिरिक्त मैथिलीकेँ किछु नै भेटल छै, हँ समानान्तर धाराकेँ ऐ सभसँ निपटबाक लेल उनटे आब बेशी मेहनति करय पड़ि रहल छै। 'ऋतु बदलि रहल अछि' मे वायुमण्डलक ताप बढ़बाक चर्चा अछि, मुदा बहुत प्रयासो सँ बदलैत ऋतु, बढ़ैत ताप आ उड़ैत बगुलाकेँ कवि देखि नै पाबि रहल छथि।'चलि गेला महाप्रकाश' मे सुकान्त सोम द्वारा देल महाप्रकाशक मृत्युक सूचना, आ कविकेँ जड़कालामे काज एतन्हि मात्र हौसला। ऊपरमे अशोकक कविताक सामान्य पाठ छल। कवि अशोकक समीक्षा: प्राच्य आ पाश्चात्य सिद्धांत सभक आलोकमे समीक्षा: (सिद्धान्त लेल देखू हमर पोथी मैथिली समीक्षाशास्त्र, विदेह पोथी www.videha.co.in पर उपलब्ध) मार्क्सवाद, ऐतिहासिक दृष्टि, संरचनावाद, जादू-वास्तविकतावाद, उत्तर-आधुनिक, नारीवाद आ विखण्डनवाद दृष्टिसँ अध्ययन संगमे भारतीय सौन्दर्यशास्त्रक दृष्टिसँ सेहो अध्ययन कवि अशोकक चक्रव्यूह आ चक्रव्यहक बादक कवितामे चक्रव्यूहक एक्कोटा कविता अहाँकेँ निराश नै करत, मुदा बादक कविता सभ अहाँकेँ झुझुआन लागत (अपवाद अछि 'जखन पियासे मरि जायत')। संरचनावादी दृष्टिकोणसँ देखी तँ लागत जे 'चक्रव्यूह' आ 'हम किछु पूछब मे' एकटा सार्वभौम महाभारत कथापर आधारित अछि, मात्र स्थान, काल आ पात्र बदलि गेल अछि। चीर-हरणक वर्णन अछि। कृष्णक भूमिकासँ व्यास प्रसन्न छथि, मुदा अशोक अप्रसन्न। आ हुनकर अप्रसन्नताक कारण अछि, हुनका लगै छन्हि जे 'एहि चीर-हरणमे आइ/ कृष्णक भूमिका/ दुष्सासनक आगू/ ठेहुनियाँ दऽ दैत अछि'। आ से हुनकर सम्बन्धक द्रौपदी नाङट भऽ गेल छन्हि, अपन लाश अपन पीठपर उघैत बैताल कहिया हेता, विक्रमादित्य कहिया हेता, से जिज्ञासा छन्हि। आब कने संरचनावादसँ हटि कऽ एकर ऐतिहासिक विश्लेषणपर आउ। 'सोवियत रूस सँ' कविता अछि एकटा नैरेटिवक जइमे नुकायल छल एकटा सोवियत निरंकुशवाद, जे आइ ध्वस्त भऽ गेल अछि। 'गीत जे नै लिखल गेल' , 'की सुनाउ अहाँकेँ?', 'लोक किछु नहि करैए' आ 'तोरा गछने रही' क मार्क्सवादी दृटिकोणसँ देखलापर लागत जे कविक काजकेँ काव्यसँ आगाँ भऽ देखल गेल अछि। ऐमे सकारबाक भावक संग ओकरा फुसियेबाक, पुरान आ नव; आ विकास आ मरण दुनूक नीक जकाँ संयोजन भेल अछि। जँ ई अपन परिस्थितिसँ कटि कऽ आह-बाह करऽ लगैत तँ मार्क्सवादी दृष्टिकोणसँ ई निम्न कोटिक कविता भऽ जाइत (जकर भरमार मैथिलीक सुखाएल मुख्यधाराक मिथिला ऐश्वर्य गीत सभमे अछि), मुदा कवि एकरा एकटा गतिशील प्रक्रियाक अंग बना देलन्हि। 'संचिकास्त', 'अहाँ केँ के चाही?', 'चुप्पी नहि सोहाइये', 'पाँती आइ जरूर लिखबै' केँ आब कने विखण्डनवादी दृष्टिकोणसँ देखी। विखण्डनवादी कहत जे संरचनावादीक ध्रुव दार्शनिक स्वरूप लैत अछि। कविक कथन स्वयं कविक ध्रुवीकरणक स्थायी वा क्षणिक हेबापर प्रश्नचिन्ह लगेबाक प्रमाण अछि। गामसँ वंचित वर्ग पलायन कऽ सामाजिक लांछनकेँ फेंकि दैत अछि मुदा सबल वर्गकेँ गामक रुतबा मोन पड़ै छै जे संचिकास्तमे देखाइ पड़ैत अछि। 'पाँती आइ जरूर लिखबै' मे सेहो हाकिमक लाल-लाल आँखि देखि कऽ गाम घुरबाक मोन होइ छन्हि। 'अहाँ केँ के चाही?' मे आदर्श आ नैतिकताक अन्तक घोषणा अछि, शब्द जे चाही से भेटत, साँच आ झूठ- शब्द आ अर्थ ढेरी रास छै, मुदा आदर्श आ नैतिकता आउट ऑफ स्टॉक छै, एक दस्तखतमे सभ किछु बिकाउ छै मुदा तखनो आदर्श आ नैतिकता नै। से कविक ध्रुवीकरणक स्थायी वा क्षणिक हेबापर ई सभ प्रश्नचिन्ह लगबैत अछि। । 'शिलालेख', शिलालेखमे मुदा उलटवासी अछि, लोक शिलालेखमे अपन कीर्ति लिखबै छथि मुदा कवि ओकरे शिलालेखमे ओकरे खूनक पिपासा लिखबऽ चाहै छथि! आब फेर कने कविताक ऐतिहासिकतापर जाउ। जादू-वास्तविकतावादी साहित्यमे भविष्यकालमे गेलापर हम देखै छी जे ओइ स्थितिमे जादू-वास्तविकताबला साहित्यक पात्र लग ई कविता जायत तँ ओ ऐ कविताक तेसरे अर्थ लगाओत। कविक अस्तित्व ओतऽ खतम भऽ जायत आ शब्दशास्त्र अपन खेल शुरू करत। जादू-वास्तविकताबला साहित्यक ओ पात्र जे भविष्यमे जीयत तकरा लेल सेहो ई एकटा अलगे अर्थ लेत, आ कविक कविताक भावक ताकिमे रहत। कने आगाँ बढ़ब तँ लागत जे ई तँ भगवानक विषयमे अछि, कवि हुनका भाभट समेटबाले कहै छथि, पूछै छथि जे की ओ हुनकर मृत्युक घोषणा कऽ देथि? नीत्सेक कथन जे भगवानक मृत्यु भऽ गेल छन्हि तकर अर्थ सेहो सएह रहै, भगवान एकटा आइडिया, एकटा सोच अछि जे पश्चिममे एनलाइटेनमेण्ट (ज्ञानोदय) क बादक वैज्ञानिक सोचक बाद ओइ आइडियाकेँ खतम केलक। भारतमे तँ पूर्व मीमांसा आ सांख्य पहिनहियेसँ भगवानक आइडियाकेँ नै मानैत अछि (मुदा दुनू आस्तिक दर्शन अछि माने वेद केँ मानैत अछि, मुदा भगवानकेँ नै। से अशोक नै चाहियो कऽ मिथिलाक शतपथ ब्राह्मणक परम्पराक मूलधारासँ बहुत ठाम भिन्न छथि आ मिथिलाक समानान्तर परम्परासँ लग। वैदिक संस्कृतक प्राचीनतम ग्रन्थ ऋगवेदसँ पहिनेसँ भाषा अस्तित्वमे रहल हएत। कतेक मौखिक साहित्य जेना गाथा, नाराशंसी, दैवत कथा आ आख्यान सभ ओहिमे रचल गेल हएत। एहने गाथा सभक गायकक लेल "गाथिन", "गातुविद्" आ "गाथपति" ऋगवेदमे प्रयुक्त भेल। वैदिक कालेसँ गाथा आ नाराशंसी समानान्तर रूपमे रहल। विश्वामित्र गाथिन रहथि, गाथिनक पुत्र, गायत्रीक द्रष्टा। प्राकृतसँ वैदिक संस्कृत बहार भेल आकि वैदिक संस्कृतसँ प्राकृत? वेदमे नाराशंसी नाम्ना जन आख्यान यएह सिद्ध करैत अछि जे दुनू समानान्तर रूपेँ बहुत दिन धरि चलल। ई समानान्तर परम्परा दुनूकेँ प्रभावित केलक। आब ऋगवेद देखू- ओतए दुर्लभ लेल- दूलभ, (ऋगवेद ४.९.८) प्रयोग की सिद्ध करैत अछि? अथर्ववेदमे पश्चात् लेल पश्चा (अथर्ववेद १०.४.१०) की सिद्ध करैत अछि? गोपथ ब्राह्मणमे प्रतिसन्धाय लेल प्रतिसंहाय की सिद्द करैत अछि? (गोपथ ब्राह्मण २.४)। जे आर्य छथि से भारतक पच्छिम भागसँ मिथिलामे एलाह, आ हुनका सभक एबासँ पूर्व वेदक किछु अंश विद्यमान छल, तेँ ने बहुत रास शब्द जे मैथिलीमे अछि, बहुत रास उच्चारण जे मैथिलीमे अछि ओ वैदिक संस्कृतमे अछि, मुदा लौकिक संस्कृतमे नै अछि। अविद्या, कर्मसिद्धान्त, जन्म आ पुनर्जन्मक आवाजाही आ मोक्ष ई सभ अनार्यसँ आर्यकेँ भेटलै। तेँ ने उपनिषदमे मोक्ष प्राप्तिक मार्ग छै, स्वर्ग प्राप्तिक नै। मोक्ष भेटत कोना? यज्ञ केलासँ? नै, ई भेटत ज्ञानसँ आ मनन-चिन्तन आ समाधिसँ। राजा जनकक संरक्षणमे याज्ञवल्क्य बृहदारण्यक उपनिषदक तिरहुतक अनार्य क्षेत्रमे रचना केलन्हि। वाचस्पति मिश्र सांख्यकारिकाक सन्तावनम सूत्रक व्याख्या करैत कहै छथि जे की ई कहि सकै छी जे अचेतन दूध केर पोषणसँ परु पोसाइए आ अचेतन प्रकृतिक संचालनसँ जीवकेँ मुक्तिक ज्ञान भेटैए? ईश्वर तँ स्वयंमे पूर्ण छथि तँ ओ कोन उद्देश्ये विश्वक सृष्टि करताह आ जीव लेल जँ ओ सृष्टि करताह तँ सृष्टिक बादे तँ जीव बन्हाइए आ सृष्टिसँ पूर्व तँ बन्हेबाक प्रश्ने नै अछि, तखन जीवक प्रति कथीक दया? से प्रकृति द्वारा सृष्टि होइए आ जीव अपन प्रयाससँ अपवर्गक प्राप्ति करै छथि। आ विवेकसँ होइए प्रलय। से ईश्वरवाद नै निरीश्वरवाद अछि वाचस्पतिक व्याख्या। प्रकृति संचालनमे जँ ईश्वर भाग लै छथि तँ ओ चेतन प्रक्रिया हएत जे कोनो उद्देश्येसँ हएत आ तकर कोनो खगता ईश्वरकेँ छन्हिये नै। न्यायसूत्रक रचना केनिहार मिथिलाक गौतम सोलह पदार्थक ज्ञानसँ जीवक निःश्रेयस प्राप्त करबाक चर्च करै छथि, मुदा ऐ सभमे ईश्वरक कतौ चर्च नै अछि जे हुनको द्वारा मुक्ति सम्भव अछि। वैशेषिक सूत्र कहैए जे वेद विद्वान लोकनि द्वारा रचल गेल अछि नै कि ईश्वर द्वारा। कुमारिल भट्ट कहै छथि जे सृष्टिक पूर्व ईश्वरक विषयमे कोनो विश्वसनीय चर्चा असम्भव अछि। अशोकक 'शिलालेख ' मे अशोक एक डेग आगाँ बढ़ल छथि, हुनका सेहो बूझल छन्हि जे भगवानक मृत्योपरान्त पुनर्जन्म हेतन्हि। 'दू बून्द नोर' मे सेहो साँवरिया नहि अछि मृत्युक प्रतीक्षा, 'आऽ हम मरि जाइत छी!' जादू वास्तविकतवाद फेर अबैए, ओ अपनाकेँ बहैत देखि रहल छथि। 'असगर'क लय अद्भुत अछि। 'फेर कोनो विजुरी चमकल' , 'मोनक घण्टी', 'हमर कोनो नाम दऽ दे' आ 'उदास भोरक एक गीत' क ध्वनि सिद्धान्तक हिसाबसँ पाठ करू। अशोक अर्थ आ प्रतीक दुनू सोझाँ अनै छथि। ध्वनि सिद्धान्तक न्याय दर्शन विरोध केलक। मुदा अशोक ध्वनिक जोरगर संरचना सोझाँ अनै छथि। ऐ प्रतीक सभसँ भरल कविता सुगठित रूपे आगाँ बढ़ैत अछि। रूपवादी दृष्टिकोणसँ एकर पाठ करू। भाषाक अनभुआर पक्षक कवि नीक जकाँ उपयोग करै छथि। आ अहीसँ हुनकर कवितामे कवित्व आबि जाइत अछि। विरोधी शब्द सभक बाहुल्य आ संयोजनक अनभुआर प्रकृति शब्दालंकारसँ युक्त भाषा कविताकेँ विशिष्ट बनबैत अछि। संयोजन ऐ कविताकेँ रूपवादी दृष्टिकोणसँ श्रेष्ठ बनबैत अछि। स्फोट सिद्धांतक आधारपर पाठ करू। शब्दसँ नै मुदा स्फोटसँ अर्थक संप्रेषण भेल अछि। 'एक राति', 'साँझ', 'नव सीन', 'सीप महक मोती', 'पाँचटा अनेरुआ कविता', 'कहिया धरि', 'रचना सँ पहिने', , 'दबकल कुकूर', 'बिन फ्रेमक तस्वीर', 'एक विन्दु: तीन बिम्ब' आ 'प्रेमक तीन आखर'केँ अस्तित्ववादी दृष्टिकोणसँ देखी तँ अपन दशा लेल, असगर जीबा लेल, चिन्ता लेल अपने जिम्मेदार छथि। औचित्य सिद्धान्तक हिसाबसँ पाठ करू, वर्णन कविक कविताक औचित्य अछि। 'शून्य' कविताक पाठ विखण्डनवादी पद्धतिसँ करू। गणित ओकरा शून्य बनबै छै, मुदा थकनी जे भेल की उत्तर देब? ई तकरा बाद अपने जालमे फँसि जाएत, बहुत रास बात नै रहत मुदा बहुत रास बात रहत। दोसर चरण: अशोक चक्रव्यूहक बाद दोसर चरणक कविता सभ समाजशास्त्रीय समीक्षा पद्धतिक दृष्टिसँ पाठ मांगैत अछि। 'फेर सँ', 'आब..', 'ब्रह्मोत्तर', 'मोछ', 'मुक्ति समारोह', 'आब किछु करू आचार्य!', 'एहि भ्रम मे नहि रहऽ', 'सन्दर्भ:चुनाव वर्षक', 'भोट', 'राजनीति आब महकि रहलैए', 'कहलनि तूफान अली', 'बुधियार', 'मनुक्ख धर्रोहि थिक कविता', 'विष', 'जिन्न', 'की भेल', 'ऋतु बदलि रहल अछि' कोनो ने कोनो समस्यापर आधारित अछि। 'जखन पियासे मरि जायत' चक्रव्यूहक 'चुप्पी नहि सोहाइये' केर सेक्वेल अछि। 'ऋतु बदलि रहल अछि' पर्यावरण तँ 'भोट' राजनीतिपर टिप्पणी अछि। मुदा की ऐ विषयवस्तुपर गद्यमे बहुत बेशी हम सभ नै पढ़ने छी? आ तेँ ई कविता सभ तँ सामान्य नै लागि रहल अछि? 'आठम अनुसूची मे मैथिली' फैजक पाकिस्तान निर्माणक बादक हाक्रोश 'ई ओ भोर तँ नै जकर सपना देखाओल गेल' मात्र लक्षित अर्थमे अछि, शब्दार्थ तँ व्यंग्यात्मक अछि। 'फेर सँ', आ 'चलि गेला महाप्रकाश' व्यक्तिगत मनविज्ञान आधारित अछि। 'दाँत' आ 'खायब आ नहायब' नारीवादी दृष्टिकोणसँ पाठ मंगैत अछि। समाजशास्त्रीय समीक्षा पद्धतिक दृष्टिसँ पाठ करू। कविता प्रथाक विरोधक कविता अछि। नारीक लेल वएह सिद्धान्त, किए ने ओ काव्येक सिद्धान्त हुअए, जे पुरुष केन्द्रित समाजमे पुरुष लोकनि द्वारा बनाओल गेल अछि, समीचीन नै अछि। आ तेँ जँ ऐ विषयपर दुनू कविता कमजोर अछि। अलंकार सिद्धान्तक हिसाबसँ अशोकक कविताक पाठ सेहो अहाँ कऽ सकै छी। बातक अप्रस्तुत उपमा, रूपक आ सादृश्य-विरोध कबीर सिखा गेल छथि। रस सिद्धान्तक हिसाबसँ पाठ सेहो सम्भव। विभाव सँ अनुभाव माने परिणाम बहार करै छथि कवि अशोक। से कवि ठाम-ठाम खास कऽ 'चक्रवूहमे प्रयुक्त केने छथि। 'चक्रव्यूहक' बाद कवि अशोक एत्तौ निराश करै छथि। जे अशोक भगवानक मृत्युक बाद पुनर्जन्म धरि कविताकेँ आगाँ बढ़ेने रहथि से कवि अशोक चक्रव्यूहक बाद ठमकि गेला। मूलधाराक छद्म समालोचना कवि अशोककेँ मारि तँ नै देलक? मुदा कवि अशोकक पुनर्जन्म हएत, शीघ्र। आ चक्रव्यूहक 'चुप्पी नहि सोहाइये' केर सेक्वेल 'जखन पियासे मरि जायत' ओइ पुनर्जन्मक बीज रोपण कऽ देने अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१७.गजेन्द्र ठाकुर- कथाकार अशोक गजेन्द्र ठाकुर कथाकार अशोक ओना तँ अशोक अपनाकेँ आब कथाकार अशोक कहै छथि (हुनकर फेसबुक प्रोफाइलक यएह नाम छन्हि) मुदा हुनकर पहिल प्रकाशित पोथी अछि एकटा कविता संग्रह 'चक्रव्यूह' जे प्रकाशित भेल १९८६ केर जनवरी मासमे। ओही वर्ष अशोक, शिवशंकर श्रीनिवास आ शैलेन्द्र आनन्दक सम्मिलित कथा संग्रह 'त्रिकोण' प्रकाशित भेल, नवम्बर मासमे, जइमे तीनू गोटेक ५-५ टा कथा छलन्हि। अशोक कम लिखै छथि, कविता तँ आरो कम। मूलधाराक लेखकमे कम लिखबाक फैशन छै। जखन प्रेमचन्द तीन सय कथा लीखि लेलन्हि तखन जा कऽ ओ एकटा संग्रह बहार केलन्हि- 'मेरी प्रिय कहानियाँ' सन् १९३३ मे। ऐ पोथीमे प्रेमचन्द ई स्वीकार करै छथि जे नै चाहियो कऽ लेखकक सभ रचना नीक नै भऽ पबै छै। आ ईहो जे जँ पाठक एक लेखकक सभ रचना पढ़ि जाय तखन ओ जिन्दगी मे पाँचो छह टा लेखककेँ नै पढ़ि सकत। से हुनकापर दवाब पड़लन्हि जे ओ पाठक लेल ऐ तीन सयमे सँ किछु कथा चुनि कऽ अपन प्रिय कथाक रूपमे प्रस्तुत करथि। हमरो विचारे जहिया एकटा लेखक तीन सय कथा लिखि लिअय तखने ओकरा अपनाकेँ कथाकार घोषित करबाक चाही। ओना ओतऽ प्रेमचन्द ईहो कहि जाइ छथि जे लोककथामे मात्र उड़ैबला घोड़ा आदि होइ छै से कथाक महत्व लोककथासँ बेशी छै। प्रेमचन्दक ऐ गपसँ हम भिन्न विचार रखै छी आ फिराक गोरखपुरीक कथनसँ सहमत छी। फिराक गोरखपुरी अपन रुबाइक संग्रह 'रूप' मे लिखै छथि जे 'हिन्दू लोक गीत' जे हमरा दैत अछि से ओकरा मानवीय आ स्वर्गीय संगीत बना दइ छै, आ से गालिब, इकबाल आ चकबश्त सेहो हमरा नै दऽ सकला। ओ उदाहरण दइ छथि- "बाबुल मोरा नैहर छूटल जाय, ऊ ड्योढ़ी पर्वत भयी, आङन भयो विदेश।" महाभारत आब लोकगीत बनि गेल अछि, लोकगाथा बनि गेल अछि, 'भील महाभारत' तकर उदाहरण अछि। अशोकक 'चक्रव्यूह' महाभारत आधारित किछु कविता अछि, से ओ लोकगीत आधारित अछि, लोकगाथा आधारित अछि। से हमरा नजरिमे रचनाकार अशोक तीन टा छथि- कवि अशोक, कथाकार अशोक आ कथेतर गद्यक लेखक अशोक। अरविन्द ठाकुर अपन पोथी रोशनाइक लोकपक्षकेँ कथेतर गद्य कहै छथि, से निबन्ध-प्रबन्ध-समालोचना लेल हमहूँ ऐ शब्दावलीकेँ प्रयुक्त कऽ रहल छी। कथाकार अशोक त्रिकोण (कथा संग्रह) (१९८६) स्व. डॉ ब्रज किशोर वर्मा 'मणिपद्म' केँ समर्पित त्रिकोणमे अशोक, शिवशंकर श्रीनिवास आ शैलेन्द्र आनन्दक ५-५ टा कथा छन्हि। अशोकक ५ टा कथाक नाम छन्हि- हड्डी, हेयरपिन, अन्तिम शह, एकटा मुस्कुराइत आँखि आ खौंझ। हड्डी: जागेशर, पत्नी सीमा, बेटी गुड़िया आ बेटा पप्पू। जागेशरकेँ ऑफिसमे देरी भऽ जाइ छै, डेरा ऑफिससँ दूर छै, लगमे महग भेटै छै। एकटा आत्महत्या भेलैहेँ बगलमे प्रायः दहेज लेल देल प्रतारणा, ओकील साहेबक पुतोहु नै सहि सकलि। ऐ मोहल्लामे सभकेँ डर लगै छै। जागेशरकेँ लागै छै जेना कण्ठमे हड्डी फँसि गेलैहेँ आ तेँ कथाक नाम हड्डी। नामकरणसँ लऽ कऽ सम्पूर्ण कथा सामान्य कोटिक अछि। हेयरपिन: चन्दर आ उर्मिला। पहिल बेर बियाहक बाद दुनू दूर भेल अछि। उर्मिला पाँच दिन पहिले गाम गेल छथि। चन्दर पत्रिका उठबैए, मौगी सबहक फोटो जे पहिन्ने ओकरा पसिन्न नै पड़ै, आइ ओकरा आकृष्ट कऽ रहल छै। दूधबाली आबै छै, पहिने ओ खाली दूधे देखै छल मुदा आइ दूधबालीकेँ सेहो देखैए, पहिने किए नै ओकरा देखलक, दोसर कोठलीमे दूधबाली दूध राखैले जाइए, चन्दर दरबज्जा बन्द कऽ लै छै। दूधबालीकेँ ओकरासँ डर होइ छै मुदा ओ दू सय टाका खोंसि दै छै, दूधबाली सभ बिसरि जाइए आ घर छड़ा जेतै, से सोचैए, ओकरा गाम जेबाक छै, किछु दिन नै एतै। चन्दर बिहाड़िमे उधयाय लगैत अछि, बरखामे भीजऽ लगैत अछि- कथाकार ई दुनू वाक्य संभोग लेल प्रयुक्त केने छथि। फेर कथाकार कहै छथि जे आइ तातिल छिऐ, से आइ काजपर नै जायत, माने बुझि जाउ जे कथा आब उलटवासी दिस जायत। चिट्ठी सभ पढ़ैए चन्दर, ओइमे उर्मिलाकेँ देल रामानन्दक दू मास पुरना चिट्ठी पढ़ि चन्दर क्रोधमे अबैत अछि, ई प्रेमी अछि उर्मिलाक? तँ ओकर प्रेम फूसि। भोरमे उर्मिला रामानन्द संग आयलि। चन्दरकेँ तामस उठै छै, मुदा उर्मिला सिनेमा स्टाइलमे कहैए जे ओ ओकर पिसियौत छिऐ, बियाहक दू मास पहिने कलकत्तामे ओकरा नोकरी भेटि गेल रहै, तेँ बियाहक काजमे नै आयल आ तेँ भेँट नै भेलै। चन्दरक शंका समाप्त, मुदा आब उर्मिलाक बेर एलै, ओकरा दोसर कोठलीमे हेयरपिन भेटलै, ओ हेयरपिन नै लगबैत अछि, तँ ई ककर छिऐ? ओ चन्दरसँ पुछैए। यएह हेयरपिन कथाक शीर्षक अछि, उर्मिलाक हाथमे हेयरपिन चिचिया रहल अछि, कथा समाप्त मुदा हम माने पाठक ठकायल सन अनुभव करै छी। दू सयमे जेना दूधबालीक रेट लागल तइपर ध्यान चलि जाइए, अरघनाइ मोश्किल। मुदा कथाकार चाहै छथि जे स्त्री-पुरुष चरित्रपर, पुरुख केन्द्रित चरित्र दिश पाठकक ध्यान खीची, हिप्पोक्रेसीपर खीची, मुदा से भऽ पाबि असम्भव भऽ गेल छन्हि। अन्तिम शह: बिशेशर, ओकर स्त्री, बेटा कुशेशर आ पुतोहु फुलेशरी। बेटा कुशेशर रमरचना सङे पटना चलि गेलै रिक्शा चलबै छै। पन्द्रह साल पहिने बिशेशर फूल बाबू सँ दू सय टाका लेने रहय बेटी धनमंतीक बियाह लेल। बेटा कुशेशर छोटे रहै तखन, सुकरातीमे धरमपुरक पहलमानकेँ माटि चढ़ा देने रहै, गिरहथ पीठ ठोकने रहथिन्ह, खूब सर्रो खेलाइए, महीसपर राखि लेने रहथिन्ह, मुदा ओकरा बान्हल-छेकल नीक नै लगै। आ कुशेशर पटनासँ आबि गेलै, किरायाक रिक्शा ओ आब नै चलबै छै, अपन रिक्शा छै, ओकर यूनियन छै। फूलबाबू शतरंज खेला रहल छथि, सूद मूरक दूनासँ बेशी भेटि गेल छन्हि, मुदा सूद जोड़िये रहल छथि। कागज वापस नै करताह, मुदा करऽ पड़लन्हि, जमाना बदलि गेल छै, प्रेमचन्दक हिन्दी कथा 'सवा सेर गेहूँ' सँ बहुत आगाँ। ओम्हर शतरंजोमे मिसरजी 'अन्तिम शह' दऽ कऽ फूल बाबूकेँ हरा देलखिन्ह। आब फुलेशरकेँ हवेली-महर नै जाय पड़तै। एकटा मुस्कुराइत आंखि: प्रोटैगोनिस्टक एकटा ट्यूशन पढ़ेनिहार मास्टर साहेबक स्मृति, जीवन तेना जीबू जेना अभिनय कऽ रहल छी, से प्रोटैगोनिस्टकेँ लोकक मृत्युसँ बेशी जीवित लोकक दूर गेनाइ असहज करै छन्हि, मुदा अभिनयक बलेँ तकरा तोपि दइ छथि। मास्टर साहेबक फेरसँ बसुली ताकब आ झारि-पोछि अपन शिष्य लेल बजायब, बाँसुरीक उदास तान सुनि दुखीतमे दर्द बिसरि प्रोटैगोनिस्टक सूतब। आ आरो ढेर रास नोस्टालजिक गप प्रोटैगोनिस्टकेँ मोन पड़ै छन्हि। खौंझ: घूर-धुआँ, रामनारायणक अठन्नी फेकि पानक ऑर्डर देब, रविशेखरक बैग लेने गामसँ आयब, बोर्ड ऑफिसक कोनो काज छै। घरमे कनियाँ सुधीरासँ किछु भेल छै से रामनारायण रविशेखर सङे डेरा दिस बिदा तँ होइए, मुदा लागै छै जेना पएरमे उक्खड़ि बान्हल होइ। फेर गामक नाटकक दुर्गतिक चर्चा, बाइली आमदनीकेँ खराप बुझबाक चर्चा, दूधक अभावमे नेबो चाह। फेर कथाकार कथाकेँ सम्हारऽ चाहलनि, एक्केटा मशहरी छन्हि, चौधरीजी सँ उधारी लऽ अनता, मुदा सुधीरा जोगा कऽ पचास टाका रखने छै, मशहरी लेल देतन्हि। आ सुखान्त, आ तखने बिजलीयो आबि गेलै, रविशेखरक कोठलीक पंखाक अबाज अबै छन्हि, आब बिन मशहरीयो कऽ ओकरा मच्छड़ नै लगतै। काँच कथाक ऐ संग्रहमे 'एकटा मुस्कुराइत आंखि' भविष्यक प्रति कने आश्वस्त करैत बुझाइत अछि। ओहि रातिक भोर (कथा संग्रह) (१९९१) स्व. सुशील झा केँ समर्पित ओहि रातिक भोर मे अशोकक १५ टा कथा छन्हि। ऐ पोथीक 'प्रसंगवश' लिखने छथि कुलानन्द मिश्र जे कथापाठमे बाधा उत्पन्न करैए, जेना कुला बाबू लिखै छथि जे "असामर्थ्य दूर होइत गेल--- अशोक जीक ७७क कथा 'बौका चुप छल' आ हुनक ८९ क कथा 'सरिसबक साग' केँ एक संग पढ़ि बूझल जा सकैछ।" मुदा से केलापर 'बौका चुप छल' उनटे 'सरिसबक साग' सँ बीस पड़ैत अछि, स्त्री-पुरुषक (जे दुनू ठाम पति-पत्नी छथि) मनोविज्ञानमे 'बौका चुप छल' केर पति आ पत्नी दुनू अपन विराट रूप देखेने छथि, मुदा 'सरिसबक साग' केर पति-पत्नी चालू हिन्दी सीरियल सन व्यवहार केने छथि। ऐ संग्रहक कथा सभ एना अछि: विरामसँ पहिने: समीर परीक्षा छोड़ि देलक, पिता सन्न छथिन। (परीक्षा) केन्द्रक घण्टा बाजल, परीक्षा शुरू हेबाक समय भेलै, ओ परीक्षा छोड़ने अछि, ओकरा बोखार भऽ गेलै। प्लॉट ठीक छल मुदा कथाकार अदहा कथा बितला धरि मुख्य मुद्दा पर नै आबि सकला, अन्तिम पैरामे कथा सम्हारबाक असफल प्रयास केलन्हि। बौका चुप छल: डाकदर साहेबक कनियाँ गाम गेल छन्हि से इजोरिया गड़ि रहल छन्हि, विवरण कने नमड़ि गेल अछि, मुख्य प्लॉट शुरू होइए बौकाक साँप कटबासँ, डाक्टर साहेब ओत्तऽ बिदा होइ छथि। मुख्य कथा ओत्तऽ छै, बौका सभटा बुझियो कऽ चुप रहैत अछि, माटि काटऽमे पक्का ओस्ताद छल, मुदा बेमारी धऽ लेलकै, स्त्री रधिया देरी कऽ अबै, सेण्ट लगेने, मुदा बौका किछु नै पूछै जे के कतऽ सेण्ट लगेलक। रधिया कहै जे बिगड़ल छी तँ मारू मुदा बौका ओकर केश सोझरा दइ। ओकर दियादनी सेहो रधिया दिया बाजै मुदा बौका किछु नै बाजै। आ मुइल तँ बेमारी सँ नै, साँप कटलासँ। फेर रधियाक हाक्रोश, एतेक सुन्दर मनोविश्लेषणक बाद कथाकार द्वारा, डाक्टरकेँ रधिया कऽ देखि कऽ दोसर तकिया मोन पड़ि एलै, सँ कथाक समाप्ति करबाक आवश्यकता नै छलन्हि। कथाक आरम्भ आ अन्त दुनू ऐ कथाक कमजोरी अछि, आ एतेक सुन्दर कथाक सत्यानाश भऽ गेल अछि। मूलधाराक छद्म समीक्षाक परिणामक ई ज्वलंत उदाहरण अछि। एकटा दोसर ब्रह्मा: मृत्युक बाद ब्रह्मभोज। छीतनक पाइ कियो ठकि लेलकै, मुदा लोक सभ कहै छै जे भोजक डरे ओ फूसि बजैए, से छीतन जमीनक एवजमे पाइ उठाओत आ भोज करत। जहलमे टाङल मोन: मुख्य पात्र छथि तमसाह असित ओकर संगी शान्त स्वभावक किशोर आ असितक बहिन मीना। असित जेलमे छै आब एमरजेंसीक बादे छुटतै, असितक पिताक चिट्ठी। मीनाक बियाह असितक परोच्छेमे करऽ पड़ि रहल छै। फेर बैकफ्लैश, मीना आ किशोर, मीना चंचल, टिकुला तोड़ैबाली। मीना एक दिन भैया कहनाइ शुरू केलकै, किशोरकेँ नै नीक लगलै। बियाकक किछुए दिन छै। कथा समाप्त। एकटा चौक माने चण्डीनाथ: एकटा चौकक विवरण। फेर ओइ चौकपर आबाजाही करैबला चण्डीनाथक विवरण। चण्डीनाथक माय सपता-विपताक कथा कहि, चूल्हा-चेकी बना गूड़ा-खुद्दीक इन्तजाम कऽ लइ छथिन, आब चण्डीनाथक कनियों बाहर निकलऽ लागल छथिन, हँ बाल-बच्चा नै छन्हि। इमरजेंसीमे एक बेर टिकट चेकिङमे जेल गेला, अगत्ती छौड़ा सभ उड़ा देलकन्हि जे नसबन्दी कऽ देलकन्हि, कनियो पुछि देलकन्हि तँ ओकरा मारबो केलखिन्ह। लोकक मुँह बन्द करबा लेल बच्चा आवश्यक छन्हि, मुदा से अखन धरि सम्भव नै भेल छन्हि, आब मुखियामे ठाढ़ हेता। कथा समाप्त। ओ मनुक्ख भऽ गेल: जिनका अहाँ आइ कथाकार अशोक कहै छियन्हि तकर बीजारोपण ऐ कथामे भेटत। नॉर्मल कमाइ-खटाइबला मनुक्ख बनबाक कथा, जे जीवन खतम हेबाक कथा अछि, हमर संग छोड़बाक कथा अछि, हम बहुत प्रयास केलौं जे तूँ मनुक्ख बनबासँ बचि जाह मुदा पूर्णता तोरा नीक लगै छह, किछु रिक्तता हम रखने रही जइसँ तोहर लेखन आ चिन्तनमे प्रवाह रहतह। नीलू तोहर जीवनमे आबि कऽ दोसराक भऽ गेल कारण ओकरा मनुक्खक भूख छलै आ ओइ समयमे तूँ ओकरा मनुखाह तृप्ति नै दऽ सकलह, कारण तोरामे किछु रिक्त छलह आ तेँ तोहर मानस-प्रेयसी मीनूक जन्म भेलै, मुदा हमरा बुझल अछि जे दुनूमे कोनो अन्तर नै छै। मीनू जीवन छलि ओ कहियो किछु आर नै भऽ सकैत छलि। छात्रावास घटना, कोनो जूनियर विद्यार्थीसँ लगाव, छोट भाइ सन, तोरा छोट भाइ नै रहौ तेँ। मुदा लोकक नाजायज सम्बन्धक आरोप पर तोहर ओ बलात् हँसी, अस्वस्थ मस्तिष्कक उपज, से तूँ सोचलेँ मुदा आरोपकेँ फूसि कहियो नै कहि सकलेँ। हमरा बूझल अछि जे ओ हँसी तोरा लेल कोनो शब्द गढ़ैत छल मुदा अनका लेल एक्के टा अर्थ रखैत छलै, आ ओही अर्थक मूल्यपर तोहर अधिकार बन्हकी रहि गेल ओइठाम, तोरा दुनूक बीच चुप्पीक देबाल ठाढ़ भऽ गेल रहय। बाजा-भुक्की बन्द भेनाइ चिन्तनकेँ गति दैत छै। आइ तोरा लग स्त्री, घर, रुपैया सभ किछु छौ मुदा तूँ कमजोर भऽ गेल छेँ। नीलू आब मरि गेल अछि कहनिहार तूँ सेहो आब मरि गेल छेँ आ से हमहीं टा देखि रहल छियौ, कारण हम नै मरल छी। तेसर प्रश्न: अति सामान्य कोटिक कथा। रामप्रवेश चौधरी रिटायर कऽ गाम एला, बेटा कृष्णकान्त बेरोजगार, भागि कऽ कलकत्ता गेल, खूब कमेलक। बहिनक बियाह गनि कऽ केलक, रामप्रवेश डाकपर जमीन कीनऽ लगला, हलाल कएल माउस खाय लगला। मुदा पाइ तँ पठबन्हि कृष्णकान्त मुदा गाम नै अबैत रहन्हि,, बहीनक बियाहोमे नै एलन्हि। आ जहिया एलन्हि तँ पाछू सी.बी.आइ.क एरेस्ट वारण्ट संगे एलन्हि, नकली दवाइ बनबैत छला। डेरबुक: एकटा आर मेडियोकर कथा। सुभाष, आमक कलम, सुभाष आ मंजूमे आमक टिकुलाले झगड़ा होइ छै। मंजूक बियाह ओही साल हेतै। फेर सुभाष अनचोक्के ओकरा भरि पाँज लऽ कऽ गाछक पाछाँ जाइए आकि तेजुआ आ शंकर आबि जाइ छै, लाठी बजरै छै। पंचैती। गामसँ निकालबाक आदेश, सुभाष पड़ा जाइए। दस बरखक बाद आइ घुरल अछि, माय मरि गेलै, भातिज छै। भैया कहै छै जे मंजू बादमे सुभाषक पक्षमे बाजलि, ओ सुभाषसँ बियाह करत, लोक सुभाषकेँ ताकैले गेलै, सुभाष नै भेटलै। मंजूक बियाह टूटि गेलै। आ आब अहाँ बुझिये गेल हेबै जे भौजी मंजूए हेतै, आ सएह छै। नचनियाँ: आब कन-मने अशोक अपन रङमे आबि रहल छथि। नैनीताल, रजनी शर्मा, जे अछि प्रोटैगोनिस्ट आनन्दक सीतामढ़ीमे कॉलेजक सङी, मुदा आब एकटा नपुंसक दोबर उमेर बलासँ बियाहलि, कारण दहेज। ओकरासँ आनन्दक नैनीताल होटलमे भेंट। आ ओतऽ छल पूर्णियाँक बेरा सोहन मण्डल, दुखी दासक बिदापत मण्डलीक, दुखी दासक मृत्यु, बिदापत नाचक मृत्यु आ सोहन आबि गेल नैनीताल। मेडियोकर कथा होइत होइत बचि गेल ई। अन्तिम आठ पाँतीमे कथाकार कथा सम्हारबाक प्रयास केलन्हि, आ सम्हारियो लेलन्हि। सोहन आ रजनी बियाह कऽ लेलक, सोहन नृत्य सिखैए, प्रोटैगोनिस्टसँ पटनामे भेँट करय एलन्हि दुनू गोटे। मिर्जा साहब: संग्रहक दसम कथा अछि ई। कथा नै सम्हरलनि। सुशीलक कथा सभ मोन पड़ि गेल, अस्मिता (लघुकथा संग्रह) (विदेह पेटारमे उपलब्ध) मे संकलित 'मस्जिद' आ आन कथा, उत्कृष्ट, खोंइचा छोड़ाओल, कोनो हड़बरी नै। मुदा मिर्जा साहेब मेडियोकर, नीक प्लॉटक अछैत। मिर्जा साहेबक बेगम नावाब परिवारक, माय मरि गेलखिन्ह, पिता पोसलखिन्ह। मामा मामी सभ पाकिस्तानमे, ओतुक्का चर्चा करैत रहैत छली। से मिर्जा साहेबकेँ नै नीक लागनि, फेर पिताक मृत्युक बाद बेगमक नैहरि बुझू पाकिस्तान भऽ गेलन्हि। बियाह पुरैले बेटा सलीमक संग गेली पाकिस्तान। तही बीच बझलै भारत-पाकिस्तानक युद्ध जइमे बहीनक पतिक मृत्यु भऽ गेलन्हि, से तमसा कऽ चिट्ठी लिखलन्हि भारतक विरुद्ध मिर्जा साहेबकेँ। चिट्ठी पत्री फेर शुरु भेल जखन सलीम ओतऽ डॉक्टर बनि गेल, आ जखन सलीम संगे बेगम घुरली तँ मिर्जा साहेबक बम्बै दंगामे मृत्यु भऽ गेलन्हि। प्लॉटे-प्लॉट, कथाक प्रारम्भ आशा जगेने छल, फ्रायडक पद्धतिसँ स्वप्नक विश्लेषण करऽ लागल छलौं। मुदा से धएले रहि गेल। सरोकार: स्वांग धरैबला संगी सुरेश, बादमे ओकरा पत्नी संग चन्द्रनाथ आ ओकर साथी सब द्वारा सामूहिक बलात्कारक बाद न्याय नै भेटब आ बलात्कारी नेता जे छल एम.पी. एलेक्शनक उम्मेदवार चन्द्रनाथ, तकर हत्या सुरेश द्वारा। अमिताभ बच्चनक आखिरी रास्ताक पीअर कपीश रूप। सभ किछु मेडियोकर, मुदा अन्तिम आठ पाँतीमे कथाकार कथाकेँ कने सम्हारने छथि। सुरेशक बेटा परेश आब प्रोटैगोनिस्टक संग रहै छन्हि, ओहने नटकिया, स्वांग निकालैमे ओस्ताज, मुदा चन्द्रनाथ ओकरा नै जानि केना बेशी मोन छै, ओकर नेता बला स्टाइलक खूब नीक जकाँ स्वांग धरैए। जहिया सुरुज नहि उगलै: जोगियाक कथा, जोगियाक चारूकातक समाजक कथा। बौआसीनक कथा। जोगियाक बाप मरि गेलै, माय दोसर टोलमे सम्बन्ध कऽ लेने छै, आंगनमे मौसा मौसी रहै छै आ ओ रहैए गिरहत लग, जतऽ बौआसीनकेँ बाँझ हेबाक कलंक दऽ मारि देल जाइ छै, छोटका गिरहत दोसर बिआह करत। ओ जोगियाकेँ गोहार केनै रहै मुक्ति दिआबय लेल। जगियाक मायकेँ मुक्ति भेटलै मुदा बौआसीनकेँ नै। छोटका गिरहत बौआसीनकेँ डाक्टर लग नै लऽ जाइ छै, ओकरा बच्चा नै होइ छै तँ मानि लेल गेल जे बौआसीनेमे गरबड़ी हेतै, बा कोनो आर कारण। कथामे दू समाजक बात व्यवहार आयल अछि, दहेज आयल अछि, मुदा जगदीश प्रसाद मण्डल, राजदेव मण्डल, रामविलास साहु, रामानन्द मण्डल, संतोष कुमार राय 'बटोही', कपिलेश्वर राउत, सन्दीप कुमार साफी, उमेश पासवान, उमेश मण्डल, किशन कारीगर, राम चन्द्र राय,लालदेव महतो, आ नन्द विलास रायक विशाल आकाश देखलाक बाद ई सभ झुझुआन लागि रहल अछि। सरिसवक साग: एकटा आर मेडियोकर कथा। प्रोटैगोनिस्टक कनियाँ जखन आयल रहथिन्ह तँ डेरायल रहै छलखिन्ह। मुदा आब से नै छै। तरकारीबला अपन दुखनामा सुना कऽ महग बेचैए, ठकैए प्रोटैगोनिस्टक कनियाँ केँ। प्रोटैगोनिस्ट ईर्ष्यालु होइ छथि, कनियाँक तरकारीबलासँ हँसि कऽ गप करब हुनका पसिन्न नै मुदा कनियाँ कहै छथिन्ह जे हँसि कऽ गप्प केलासँ जोखो ठीक दै छन्हि आ सस्त सेहो! धरती गोल छै: मास्कोमे ट्रेनिङ, मनोज, सुधाकान्त आ तपन। गप सरक्का। पी कऽ पार्कमे सूति रहै जाइए। कथाकार अशोकक खाहिश रहै छन्हि जे अन्त कने चौकाबै बला होइ, से एकटा बूढ़ स्त्रीकेँ आनै छथि, ओ रूसी बाजैए आ तपनक माथपर हाथ राखैए, तपनकेँ माय सन लगै छै, स्नेहिल, जेना ओ भेस बदलि कऽ आबि गेल होइ। मुदा अन्त कोनो खास नै लागि रहल अछि। ओहि रातिक भोर: टाइटल कथा। दू सङी, हीरा ब्राह्मणक पानक दोकान, पुलकित अमातक चाहक दोकान, मुखिया एलेक्शनमे सुबोध मिसर ब्राह्मण आ रैमाक सत्तन मण्डल ठाढ़ रहै, जे पुलकितक जातिक रहै!! भऽ सकैए रैमामे मण्डल टाइटिल अमातक होइत हेतै। दुनू सङीमे एलेक्शनेमे झगड़ा भेलै, सभटा पाइ कौड़ी केस मोकदमामे जखन खतम भऽ गेलै तखन बुइध एलै। फेर अन्तकेँ रोमांचक बनेबाक फेरमे राति एगारह बजे छाहक रूपमे पुलकित केँ आनै छथि कथाकार, हीरा कहै छै जे मारमे तँ फेर मारि ले, मुदा फेर दुनू गरा मिलि लइए। मातबर (कथा संग्रह) (२००१) 'सगर राति दीप जरय'क सभ सहभागी कें जे कथा सुनलनि आ विचार केलनि' केँ समर्पित मातबरमे अशोकक १८ टा कथा छन्हि। 'एकसँ एकैस' सँ ई प्रारम्भ होइत अछि जकर लेखक छथि गप-सरक्कानुमा मूलधाराक आलोचना लेखक मोहन भारद्वाज। अशोकक समाज अध्ययन हुनका अचम्भित करै छन्हि, मूलाधाराक लोककेँ हेबाको चाही, दुनू (अगड़ा-पिछड़ा) समाजक अध्ययन! अशोक दुनू पक्ष राखै छथि, मुदा बैलेंस निबन्धमे बनाओल जाइ छी, कथाकारकेँ अपनापर ई दवाब लेब अनुचित। फेर ओ अशोकक कथाकेँ मैथिल बनावटिसँ भूषित करैत छथि, आ मैथिल बुनावटिक दू टा लक्षण ओ घोषित करैत छथि- पहिल खिसक्कड़ बनि कऽ आ दोसर यथार्थ वर्णनक विस्तारमे जा कऽ! दोसर लक्षणकेँ ओ मैथिली (मैथिल नै मैथिली) कथा बनबाक शर्त अगिले पैराग्राफमे घोषित करैत छथि। तखन तँ दुनियाँमे किछु गएर मैथिल भेबे नै कएल। ऐ तरहक गप्प सरक्काबला समालोचनाकेँ हमरा गाममे बकथोथी कहल जाइ छै आ नीक नै मानल जाइ छै। फेर ओ अशोककेँ विकासमे विश्वास करैबला आ यथार्थवादी (तकर विस्तार करैत ओ जातीय आ धार्मिक मानसिकताकेँ सेहो यथार्थवादी मानसिकता कहैत छथि!) कहै छथि। ऐ तरहक विचारकेँ आइ काल्हि पाश्चात्य जगतमे 'वोक' कहल जाइ छै आ ओत्तौ तकरा नीक नै मानल जाइ छै। समानान्तर धाराक कथाकार लोकनिक 'सगर राति दीप जरय' मे आगमन पूर्व अही तरहक समालोचनाक जमाना रहै, आ कथापर अही तरहसँ विचार 'सगर राति दीप जरय' मे होइत रहै। आब आउ मातबरक कथा सभपर विचार करी। मातबर: 'ओहि रातिक भोर' कथा संग्रहक टाइटल कथा संग्रहक अन्तिम कथा छल। मातबर अछि पहिल कथा 'मातबर' कथा संग्रहक। महराज जी छथि नेटवर्किङ चीफ, आइ काल्हि ऐ तरहक लोक रहै छै जे सिंगल विण्डो सर्विस दइ छै। पाइ कौड़ी बला पोस्टिङ लेल महराज जीसँ बात करत 'ओ', साहेब हरामी छै तेहेन तेहेन काज दइ छै जे एक्को भूरबला पाइक आमदनी नै होइ छै, कने महराज जी ओकरो रगड़तै। सभक मजमा महराज जी ऐठाम लागै छै, पीबि-पाबि कऽ गप-सरक्का करै जाइए, दारू सङे दू-तीन टा चखनाक विवरण कथाकार दइ छथि, उसनल अण्डा आदि। 'ओ' जइ असल काजले गेल रहय तकर की भेलै? घर घुरती कालमे मारि खाइसँ बचि जाइए, प्रायः चोर सभ चीन्हि गेलै। घरमे बेटा आ पत्नी सेहो तमसायल छै। खिस्सा खतम। अति सामान्य कोटिक कथा। दसखत: एकटा आइ.ए.एस. अफसरक कथा, आंगुरक विवरणसँ प्रारम्भ भऽ औंठाक विवरण धरि। भ्रष्टाचार, चरित्रहीनता आ लालफीताशाही सभटा रिपोर्ताज सन वर्णित अछि। अन्तमे औंठा काज केनाइ बन्द भऽ जाइ छन्हि, अमेरिका इलाजले जेता, मुदा बिनु दसखते पासपोर्ट केना बनतन्हि, आ ओहीसँ कथाक शर्षक आयल अछि। कोठा: मंत्रीजीक कथा, रिपोर्ताज। दसखतक आइ.ए.एस. केर रिपोर्ताज सन कथाकेँ आगाँ लऽ जाइ छथि कथाकार। उत्कृष्ट कथा। सहज-असहज: कथाकार अशोक आब रङमे आबि रहल छथि। कामेशर हाकिम बनि गेल, नग्र आबि गेल, गोटी खा कऽ सुतैए, खाइमे परहेज छै, सफलताक मूल्य चुकबऽ पड़ै छै। राधेश्यामक पढ़ाइ छुटि गेलै मुदा ओ कामेशरक बच्चा सभ लेल कॉमिक्सक सुपरमैन अछि। जिनिस: पति-पत्नीक घर गृहस्थी, टोना-मानी। सङे ऑफिसक झमेल इटैलिक्समे कथाक बीच-बीचमे, तीन बेर। बाइली आमदनीक हिस्सक, पत्नीकेँ उलहन आ पत्नीक उतारा। हिस्सक: पाइक उद्योग, पाइ कमेबाक हिस्सक। नीक विश्लेषण। एकरा हास्य-व्यंग्य कथाक श्रेणीमे राखि सकै छी। चेखवक कथा सन किछु किछु अनुभव हएत। प्रोटैगोनिस्टकेँ हाकिम कहै छन्हि जे अहाँ गपशप मारि सकै छी, पाइक उद्योग सम्हारबाक टैलेण्ट अहाँमे नै अछि। भोज: श्राद्धक भोज उपनयनक एक साल बाद धरि नै खा सकै छी। भोजक मैथिल विमर्श, प्रोटैगोनिस्ट ब्राह्मण बालकक नजरिसँ, बालकथा श्रेणीक उत्कृष्ट कथा। खुशीक प्रश्न: ईहो बाल मनोविज्ञान आधारित प्रोटैगोनिस्ट बालकक नजरिसँ अपन परिवारक कथा अछि। बालकथा श्रेणीक उत्कृष्ट कथा। तानपूरा:शास्त्रीय संगीतकेँ भीमसेन जोशी जे ग्लैमर देलन्हि तकर साक्षी अछि हुनकर मर्सीडीज कार आ पछाति भेटल भारत रत्न सम्मान। भारत रत्न सम्मान ग्रहण करैत काल हुनकर ई वक्तव्य जे ओ ई सम्मान संगीतक गुरु लोकनिक प्रतिनिधिक रूपमे लऽ रहल छथि, गरिमापूर्ण छल। वएह संगीत रक्षक लोकनि जे वेस्टर्न क्लैसिकलक सोझाँ दूटा भारतीय क्लैसिकल, हिन्दुस्तानी आ कर्नाटक शैली केँ अपन पेट काटि कऽ जीवित राखलन्हि। अही तरहक जीविकाक मरि जेबाक कथा अछि तानपूरा। शरदिन्दु चौधरी ऑफसेट मशीन एलाक बाद ब्लॉक प्रिण्टिंग क्षेत्रक हालतिपर अपना शैलीमे संस्मरण लिखने छथि तँ जगदानन्द झा 'मनु' धातुक बासन एलाक बाद माटिक बासन बनेनिहारक स्थितिपर 'माटिक बासन' बालकथा लिखने छथि। 'हरसिंहदेवी' पञ्जी प्रथाक दुष्परिणामपर कथा अछि मुदा विषय वस्तु मात्र नीक अछि, कथा साधारण अछि, निबन्धात्मक। 'सीवन रजकक हितचिन्तक' मे जाति आयल अछि, राजनीति आयल अछि, सीवन रजकक बैंकक नोकरी अयल अछि। अन्तमे आयल '..बाड़ी-झाड़ीसँ उखाड़ि कऽ गमलामे रोपि देलथिन..' सेहो कथाकेँ सम्हारि नै सकल। 'महतो' सेहो जातिक कथा थिक, सर्वसाधारण नोकरिहारा कर्मचारी, मालीक पदपर कार्यरत महतोक कथा थिक। कूट शब्दावली, घूसक पर्सेण्टेजक, महतोक ऑफिसक अलाबे अफसर सभक घरोपर काज करब, ऑफिसक गप्प सरक्का, राजनीति, खिस्सा खतम। अशोकसँ रजक आ महतोक नामपर लिखल कथासँ बेशी आशा छल मुदा ई भाँज पुरायब सन लागि रहल अछि। 'सनेश'मे एक्जीक्यूटिभ इंजीनियर पासवानजी बच्चाक ट्यूशन छोड़ि देलापर पासवानजी द्वारा दिवाकर रविदासकेँ खूब गाड़ि पढ़ल जेबाक चर्चा अछि। किछु निबन्धात्मक दलित विमर्श आयल अछि। फेर अन्तमे कथाकेँ टर्न देबा लेल प्रोटैगोनिस्टक स्टीलक औंठी दिवाकर रविदास द्वारा मांगब आ ओही नापक सोनाक ओंठी आपस देब वर्णित अछि, ऐसँ मात्र कने नाटकीयता आयल अछि, ओ. हेनरीक कथा 'द गिफ्ट ऑफ द मैगी' केर पीअर छाह सन अछि ई कथा। 'राग-विराग' मे पाइबला आ बुधियार लोक सभ द्वारा हुहकारी आ बोलारो दऽ कऽ केना सोझ लोककेँ ठकल जाइ छै ओइपर ई कथा अछि, आ सामान्यसँ ऊपर श्रेणीक अछि। 'आबेस' एकटा मेडियोकर कथा अछि, मायक आबेस वर्णित अछि मुदा किशोर मनोविज्ञानकेँ कथामे दबा देल गेल, आ कथा एकपक्षीय भऽ गेल अछि। 'बूढ़ा जीवैत रहलाह' कथा ओ कथा अछि जे अशोकक वैशिष्ट्य छन्हि जइपर हुनकर एक्सपर्टाइज छन्हि। मुदा मूलधाराक भोथ समालोचनाक दोष अछि जे ओ हिनका तकर भान नै हुअय देलकन्हि, मुदा ओ एकरा चिन्हलन्हि आ अन्तिम कथा संग्रहमे ऐ तरहक आर कथा लिखलन्हि। बूढ़केँ कोनो बियाह-तियाह नै करबाक छन्हि, से ओ अठारह बरखक सँ बेशी बयसक स्त्रीसँ बियाह नै करता, अठारह बर्खक कथा एबो केलन्हि, तँ दोसर कमी निकालि देलन्हि, मुदा घटक सभ लेल जे शर्बत घोरैक परम्परा छै तइसँ बेशी आवभगत ओ करै छथि। स्त्री आ तीन-तीन टा बेटाक मरलोपर ओ हँसै छथि, कारण ओ जीबऽ चाहै छथि। मुदा कुहरैतो हेता, असगरम, आ कुहरला शिष्य सत्तन लग। 'प्रतिलोम' सेहो एकटा मेडियोकर कथा अछि, जइमे गामक पिहकारी, श्राद्ध-बाध, जाति-विमर्श सभटा एक्के कथामे मिज्झर भऽ गेल अछि, निश्चिन्तीसँ फरिछेबाक अवश्यकता छल। 'राँड़' सामान्यसँ ऊपरक कथा अछि, 'बूढ़ा जीवैत रहलाह' कथा सन। ऐ कथामे तीनटा फ्लैश प्वाइंट अछि, पहिल मामीक मनीषसँ पूछब जे सिराजुद्दीन सत्ते खराप छै आ जँ ओ नीक लोक छै तँ मनीष पिताजीकेँ से किए नै बुझा सकल? दोसर फ्लैश प्वाइंट छै मामीक पूछब जे काज कऽ कय पाइ कमेनाइ खराप छिऐ? आ तेसर पतिक मृत्युक बादो मामीक नीक पहिरबा-ओढ़बाक मनीष द्वारा प्रशंसा। मनीष मामीकेँ ऐ रूपमे देखि चौंकल, ई लिखलासँ कथा शिल्प रूपमे कमजोर भेल, मामीक एतेक दृढ़ चरित्र देखेलाक बाद जँ मनीष हुनका उजरा नूआमे देखितैन्ह तखन ओकरा चौंकेबाक चाही छल, एत्तऽ नाटकीयताक जरूरति छलै, से कथाकार चूकि गेला। दूटा फ्लैश प्वाइण्टक बाद ई तेसर फ्लैश प्वाइण्ट कने झुझुआन लागल। ई मामीक कथा छल, प्रारम्भ सेहो ठीक अछि मुदा बैकफ्लैशक पूर्व आ प्रारम्भक बीच कोनो क्रम बा डैश-क्रॉश देल जा सकै छल, आ दोसर शिल्पगत विधिक प्रयोगसँ गामक दोसर विधवाक विवरण देल जाइत तँ ई उत्कृष्ट कथाक श्रेणीमे आबि जाइत। डैडीगाम (कथा संग्रह) (२०१७) दीदा (स्व. गीता देवी) केँ समर्पित डैडीगाममे अशोकक १५ टा कथा छन्हि। 'लाथ' अछि लहकदार कुरताक कथा, अति सामान्य कोटिक ई कथा अछि। दैनन्दिनी श्रेणीक। 'छल' कथाकार अशोकक सर्वश्रेष्ठ कथा अछि, ई अति उच्च कोटिक कथा अछि जकर सामान्य कोटिक अंग्रेजी अनुवाद विद्यानन्द झा केने छथि [The Book of Bihari Literature (Abhay K. Editor, Harper Collins, 2022) मे संगृहीत], मुदा कथे तते सशक्त छै जे तहू अनुवादमे जान आबि गेल छै। मनोविज्ञान, अहाँ जकर अभिनय करब, तकर आत्मा अहाँमे पैसि जायत, उगनाक बिछोहमे विद्यापतिक अभिनय करू, अहाँकेँ बिन ग्लिसरीन लगेने नोर चुअय लागत। भोली झा, चुस्त-चलाक, मुदा एहने आत्मा ओकरामे पैसि गेलै। 'स्वाधीन' कथा मैरिटल रेप आधारित कथा अछि, मुदा कथाकार समाजशास्त्रक समस्याक टॉपिकपर लिखबामे व्यस्त भऽ गेला, तेँ कथा सामान्य अछि। 'ओ दुनू साइकिल सिखैत अछि' सेहो समसामयिक समस्याक आधारपर रचित अछि, मुदा ने सएह आबि सकल आ ने कथे सोझरायल। 'डैडीगाम' टाइटल कथा अछि, 'ओहि रातिक भोर' आ 'मातबर' सन अशोक अप्पन सभसँ दुलारू कथाकेँ टाइटल कथा बनबै छथि, सोंगर पर सोंगर लगबै छथि मुदा तीनू टाइटल कथा सामान्ये कोटिक अछि। डैडीगाम मे विकास आ झंझमंझ आदिक सामान्य कथाक्रम अछि। 'राग' सेहो हिन्दू-मुस्लिम दोस्तक सामान्य कथा अछि, मासुपर गपशप। 'लेमन आइसक्रीम' उच्चकोटिक कथा अछि, कथाकार अशोकक कथा। प्रोटैगोनिस्टक कथा, माय नीक बनबनि तँ कहथिन, होटल सन बनल अछि। मुदा पत्नी मीरा केँ होटल पसिन्न नै। गुजरि गेली। बेटा-बेटी जावत संग रहन्हि प्रोटैगोनिस्टकेँ कनियों खेनाइ बनेनाइ नीक नै लागनि। बेटा गाम गेलन्हि, सभ देखैले स्नेहसँ जुमि गेल, हुनकर मायक प्रशंसा, हुनकर प्रशंसा। आ फेर.. 'उमकी' उत्कृष्ट कथा होइत होइत बचि गेल। सेक्सिस्ट आचरणपर बहुत रास तथ्य आयल, अन्त सेहो नीक। 'अहाँक संगी तऽ ओहिना हर घड़ी नचबैते रहै छथि। फूटसँ नाच की देखेबनि।' केर संग किछु सस्पेंस। मुदा किछु मिसिंग अछि.. 'मनसूबा' मे टुटैत परिवार आ भावनाक खिस्सा कहल गेल अछि। कृत्रिम जिनगीमे भावनाक, सामाजिक संस्थाक कोनो स्थान नै, कथाकार विषयक प्रति क्रूर भऽ गेल छथि आ तेँ कथा सामान्य कोटिक भऽ गेल अछि। 'अभयक बेटा केँ दूटा दाँत भेलनि' उत्कृष्ट कोटिक कथा अछि, गाम रहबा जोग नै रहलै, मुदा.. 'खुशीक नाम जीवन' मे कन्हैया बाबूक बेटा बियाह लेल तैयार भऽ गेलनि, ओ खुश छथि, मैथिल ब्राह्मण लड़का आ केरलक नायर लड़की। केरलक कनियाँ अपने सभ सन छै, सँ समाप्त। सामान्य कोटिक कथा। 'टीस' केस फाइलसँ लेल कथासन, केसो बहुत सामान्य, पति द्वारा पत्नीक हस्ताक्षर कऽ गबन करब, पत्नीक सकारब, जेल। कथो तेँ सामान्य कोटिक। 'छुट्टीक एक दिन' कथा अछि मैथिली लेखन आ पाठन समस्यापर, किछु एम्हर-ओम्हरक गप, अन्तर्जातीय प्रेम विवाह, आ अन्तमे कहबी जे झगड़ाउ लोककेँ ओल कबकब लगै छै, अभिनवकेँ नै लगतै। सामान्य कोटिक निबन्धात्मक कथा। 'गामक कातक हाइवे' चकरका सड़क सभक कथा अछि। उमेश पासवान लिखै छथि 'मौतक चौराहा बनल अछि एन.एच. भुतहा मोड़' (भुतहा मोड़, वर्णित रस, २०१२, साहित्य अकादेमी मैथिली युवा पुरस्कारसँ पुरस्कृत पोथी)। एन.एच. मे ठामे-ठाम चौराहा सभक नाम आब भुतहा मोड़ छै, कारण ओतऽ डिजाइनक, फ्लाइओवरक कमीक कारण होइत दुर्घटना। आ हमहूँ लिखने रहौं ऐ विषय पर एकटा कविता: आ तखन जे देखबा जोग रहितैक शान अपन गामक ! आ देखबा जोग रहितैक शान एहि छह लेन बला सड़कक सेहो ! हमरो सभक अंगपर रहितए जे वस्त्र ओहने वस्त्र जेहन ओहि लाल कारमे बैसल बच्चाक रहए ! माए! हमरा तँ लगैत रहैए जे अपन गामक ई सड़क ओहि लाल परदेशीक ओहि लाल कारसँ बेशी अछि लग दुनू टा लगैए बिदेशी सन (गजेन्द्र ठाकुर, बड़का सड़क छह लेन बला, कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक, २००९) गोला मरि गेल, पिचड़ा भऽ गेल, गामकेँ गीड़ऽ चाहैए ई एन.एच.। सौंसे गामक कुकुड़ मरल जा रहल अछि। कथा उच्च कोटिक रिपोर्ताज अछि। 'एना भऽ कऽ कियो' बोरोलीन, बोरोप्लस, श्वेत श्याम टी.भी., रिपोर्ताज नोस्टालजिक, मुदा फेर चौधरी साहेबक वर्णन शुरू, निरुद्देश्य बढ़ैत कथा, सुन्दर लगबाक धुनि, महिला सभक बड़ाइ, फेर एकटा जूनियरक तमसायब आ आँखि खुजब चौधरीजीक। निरुद्देश्य कथा समाप्त, सामान्य कोटिक हास्यक अन्त। कथाकार अशोक कम कथा लिखने छथि आ तेँ उच्च कोटिक कथा सेहो कम्मे छन्हि। कथाकार अशोकक विशेषता अछि जे ओ आधुनिक सामाजिक समस्याक प्रति सचेत छथि, विषयमे विविधता अनै छथि, मनोविज्ञान केँ भावनाकेँ नीक चीर-फाड़ करै छथि। मुदा विषयकेँ फरिछेबाक कला बेसी काल मारि खाइत छन्हि बेसी काल हुनकर पंचलाइन-एण्डिंगक इच्छाक कारण, कारण ओ पंचलाइन कखनो काल बहुत सामान्य, आ पुनरुक्ति युक्त लगैत अछि। कथाकार सुशीलक माँजल फरिछेबाक कला आ कथा लिखबाक कला, नव आधुनिक कथा लिखबाक कला बेर-बेर मोन पड़ैत अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१८.गजेन्द्र ठाकुर- कथेतर गद्यक लेखक अशोक गजेन्द्र ठाकुर कथेतर गद्यक लेखक अशोक ओना तँ अशोक अपनाकेँ आब कथाकार अशोक कहै छथि (हुनकर फेसबुक प्रोफाइलक यएह नाम छन्हि) मुदा हुनकर पहिल प्रकाशित पोथी अछि एकटा कविता संग्रह 'चक्रव्यूह' जे प्रकाशित भेल १९८६ केर जनवरी मासमे। ओही वर्ष अशोक, शिवशंकर श्रीनिवास आ शैलेन्द्र आनन्दक सम्मिलित कथा संग्रह 'त्रिकोण' प्रकाशित भेल, नवम्बर मासमे, जइमे तीनू गोटेक ५-५ टा कथा छलन्हि। अशोक कम लिखै छथि, कविता तँ आरो कम। मूलधाराक लेखकमे कम लिखबाक फैशन छै। जखन प्रेमचन्द तीन सय कथा लीखि लेलन्हि तखन जा कऽ ओ एकटा संग्रह बहार केलन्हि- 'मेरी प्रिय कहानियाँ' सन् १९३३ मे। ऐ पोथीमे प्रेमचन्द ई स्वीकार करै छथि जे नै चाहियो कऽ लेखकक सभ रचना नीक नै भऽ पबै छै। आ ईहो जे जँ पाठक एक लेखकक सभ रचना पढ़ि जाय तखन ओ जिन्दगी मे पाँचो छह टा लेखककेँ नै पढ़ि सकत। से हुनकापर दवाब पड़लन्हि जे ओ पाठक लेल ऐ तीन सयमे सँ किछु कथा चुनि कऽ अपन प्रिय कथाक रूपमे प्रस्तुत करथि। हमरो विचारे जहिया एकटा लेखक तीन सय कथा लिखि लिअय तखने ओकरा अपनाकेँ कथाकार घोषित करबाक चाही। ओना ओतऽ प्रेमचन्द ईहो कहि जाइ छथि जे लोककथामे मात्र उड़ैबला घोड़ा आदि होइ छै से कथाक महत्व लोककथासँ बेशी छै। प्रेमचन्दक ऐ गपसँ हम भिन्न विचार रखै छी आ फिराक गोरखपुरीक कथनसँ सहमत छी। फिराक गोरखपुरी अपन रुबाइक संग्रह 'रूप' मे लिखै छथि जे 'हिन्दू लोक गीत' जे हमरा दैत अछि से ओकरा मानवीय आ स्वर्गीय संगीत बना दइ छै, आ से गालिब, इकबाल आ चकबश्त सेहो हमरा नै दऽ सकला। ओ उदाहरण दइ छथि- "बाबुल मोरा नैहर छूटल जाय, ऊ ड्योढ़ी पर्वत भयी, आङन भयो विदेश।" महाभारत आब लोकगीत बनि गेल अछि, लोकगाथा बनि गेल अछि, 'भील महाभारत' तकर उदाहरण अछि। अशोकक 'चक्रव्यूह' महाभारत आधारित किछु कविता अछि, से ओ लोकगीत आधारित अछि, लोकगाथा आधारित अछि। से हमरा नजरिमे रचनाकार अशोक तीन टा छथि- कवि अशोक, कथाकार अशोक आ कथेतर गद्यक लेखक अशोक। अरविन्द ठाकुर अपन पोथी रोशनाइक लोकपक्षकेँ कथेतर गद्य कहै छथि, से निबन्ध-प्रबन्ध-समालोचना लेल हमहूँ ऐ शब्दावलीकेँ प्रयुक्त कऽ रहल छी। कथेतर गद्यक लेखक अशोक अशोकक कथेतर गद्यमे छन्हि मैथिल आँखि (२००७), संवाद (साक्षात्कार संग्रह) (२००७), कथाक उपन्यासःउपन्यासक कथा (२०१२), आँखिमे बसल (यात्रा कथा) (२०१३), बात-विचार (आलोचना) (२०१५), नीक दिनक बाइस्कोप (व्यंग्य संग्रह)(२०१८), राजमोहन झा (विनिबन्ध, २०१९) आ कथा-पाठ (२०२२)। संगमे किछु विदेह आ अन्यत्र छिड़िआयल समालोचना आ आन कथेतर गद्य सेहो छन्हि जेना 'बनैत कम बिगड़ैत बेसी' (सुभाष चन्द्र यादवक 'बनैत बिगड़ैत' पर), सम्पादक राजनन्दन लाल दास आ कर्णामृत, रामलोचन ठाकुरक कविता पढ़ैत, केदार नाथ चौधरीक उपन्यास, शरदिन्दुजी आदि। संवाद (साक्षात्कार संग्रह) मे अशोक साक्षात्कार लेने छथि राजमोहन झा, धूमकेतु, कुलानन्द मिश्र आ मोहन भारद्वाजसँ। एक्को गोटेसँ ओ असहज प्रश्न नै पूछि सकला, राजमोहन झा द्वारा सुभाष चन्द्र यादवक राजकमल चौधरी मोनोग्राफ प्रसंगमे साहित्य अकादेमी पुरस्कार लेल कएल कम्प्रोमाइज हुअय (देखू हमर पोथी नित नवल सुभाष चन्द्र यादव, गजेन्द्र ठाकुर, २०२२ विदेह आर्काइवमे उपलब्ध), धूमकेतुक लाल झण्डाक सोंगर लऽ साहित्य रचब हुअय बा मोहन भारद्वाजक मैथिल ब्राह्मणक संस्कार गीतकेँ मिथिलाक संस्कार गीत कहब (देखू हुनकर सम्पादित मैथिली अकादेमीसँ प्रकाशित पोथी। बादमे जा कऽ उमेश मण्डलक सभ जातिक संस्कार गीत उमेश मण्डल द्वारा संकलित भेल आ विदेहमे ई-प्रकाशित भेल, जे असली मिथिला संस्कार गीत अछि।) आदि आदि। हँ 'छुट्टीक एक दिन' (डैडीगाम, २०१७) कथामे ओ अपना मोनक सभ सवाल जे ओ नै पुछि सकला, से उठा लेने छथि। प्रभास कुमार चौधरीसँ साक्षात्कार हुनकर मृत्युक कारण नै भऽ सकल आ तकर एवजमे ओ सन्धान अंक-३ प्रभास विशेष निकाललनि। आँखिमे बसल (यात्रा कथा) (२०१३) अछि एकटा नैरेटिवक विवरण जे अशोकक पीढ़ीकेँ परसल गेल रहै, जतऽ सोवियत संघक बड़ाइ आ अमेरिकाक खिधांश कएल जाइत रहै, आ जे से करैत रहथि ओ अपन बाल-बच्चाकेँ पढ़ैले अमेरिका पठबैत रहथि। हमरा मोन पड़ैए जे एकटा हमर संगी कोनो परीक्षा दइले दरभंगा गेल आ यूनिवर्सिटी एरिया घूमि कऽ चलि आयल, कहलक जे दरभंगासँ नीक शहर तँ पूरा बिहारमे कोनो नै छै।यात्रा कथाक अतिरिक्त 'सोवियत रूस सँ' कवितामे सेहो अशोक सएह केने छथि (चक्रव्यूह, १९८६)। मैथिल आँखि (२००७), कथाक उपन्यासःउपन्यासक कथा (२०१२) बात-विचार (आलोचना) (२०१५) आ कथा-पाठ (२०२२) हुनकर निबन्ध आ निबन्धात्मक आलोचनाक आलेख सभक संग्रह छियन्हि। अशोकक आलोचना आ निबन्ध विधाक पक्ष आ विपक्षमे निम्न तथ्य सोझाँ अबैत अछि: (१) हुनकर रचनामे मात्र मूल धाराक लेखकक अध्ययनक प्रमाण भेटैत अछि, समानान्तर धाराक गत १५ बर्खक अवदानसँ ओ अनभिज्ञ बुझाइत छथि, बा डेराइत छथि जे ओकर चर्चा हुनका मूलधारासँ काटि देत। 'मैथिली कथाक विकास: बदलैत स्वर एवं प्रवृत्ति' मे ओ लिखैत छथि जे मैथिलीमे सभसँ बेशी कथा जीवकान्त लिखलन्हि आ तकर संख्या ओ दू सय गनबैत छथि, ऐ आलेखकेँ ओ नव तथ्यक आलोकमे सुधारबाक अखन धरि आवश्यकता नै अनुभव केलनि, जखन कि जगदीश प्रसाद मण्डल अखन धरि ८५० कथा लिखि चुकल छथि। (२) हुनकर जीवित रचनाकारक समालोचनामे आह-बाह आ विवरण मात्र भेटत। जीवित रचनाकारक समालोचनामे जँ ओकर कमजोर पक्षकेँ नै देखाओल जाय तँ फेर ओ अपन रचनामे सुधार केना कऽ सकता, उदाहरणक रूपमे 'दूर देस पलायनक मृगतृष्णा आ श्रमशील स्त्रीक संघर्षगाथा- हसीना मंजिल' देखल जा सकैए। मृत साहित्यकारक आलोचनामे ओ कने हिम्मत देखबैत छथि, जेना 'ललितक पृथ्वीपुत्र', मुदा ओत्तऽ ओ आर गड़बड़ कऽ दै छथि, ओ पुछै छथि- 'एतऽ ई स्वाभाविक प्रश्न उठैत अछि जे ललित खेतिहरक जीवन-संघर्षक उपन्यास रचैत काल कलपू आ बिजलीक प्रेम-प्रसंग के बीच मे किएक अनलनि? ब्राह्मण आ अछोपक बियाह-सम्बन्ध सन सामाजिक समस्या के उठायब किएक जरूरी लगलनि हुनका? ललित सन चेतना सम्पन्न लेखक अनेरे ढाही किए लेलनि?' अशोक आलेखक अन्तिम पाँतिमे तकर कारण बतबैत छथि- 'वस्तुतः ललितक मैथिल संस्कारक ई अवधारणा वर्णवादी वैचारिकताक देन थिक।' आ ऐ लेल ओ रामदेव झा संगे ललितक कोनो गपक सोंगर लेलनि, जकर आवश्यकता नै छल। प्रेम आ सेक्स एकटा शाश्वत विषय अछि आ अकाल हुअय आकि प्लेग ओ खतम नै भऽ सकैए, अशोककेँ ऐ लेल कोनो सोंगरक जरूरी नै छलन्हि। गैब्रियल गार्सिया मार्क्विसक 'लव इन द टाइम ऑफ कोलेरा' तकर प्रमाण अछि। (३) नीक दिनक बाइस्कोप (व्यंग्य संग्रह) मे हुनका अपन सभ गप रखबाक अवसर छलन्हि, होलीक जोगीरा सन मुदा ओतऽ सेहो ओ चूकि गेला। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१९.प्रदीप बिहारी-मातबर कथाकार प्रदीप बिहारी मातबर कथाकार अशोक माने फेसबुकक कथाकार अशोक माने मैथिलीक कवि, कथाकार आ आलोचक, जिनक अद्यावधिक रचना कर्ममे मिथिलाक लोक आ सम्पूर्ण मिथिला जगजियार होइत देखाइत अछि। ई अपन मैथिल आंखिसं विश्व आ वैश्विक परिदृश्य कें देखैत छथि, गुनैत छथि आ तकरो अपन रचनाक विषय बनबैत छथि। आ से एहि तरहें बनबैत छथि से सोझे-सपाटे जं पढ़ि क' ससरि गेलहुं, तं बुझयबे ने करत। माने ई हिनक शिल्पक कलाकारी छनि जे अहांकें लागत जे बड़ सहज बात कहैत छथि, मुदा कहैत रहैत छथि ओतबे गंभीर गप। बहुविधावादी छथि अशोक जी। आरंभमे कविता लिखलनि...लिखैत रहलाह...आ तकर बाद कथा दिस मुड़लाह। हमर कहबाक तात्पर्य ई नहि जे पहिने कथा नहि लिखथि, मुदा कविता प्राय: छोड़लनि आ कथा पर केन्द्रित भेलाह। संगे संग अन्य विधा सेहो चलैत रहलनि। हम एत' कथाकार अशोक आ अशोकक कथा पर गप कर' चाहैत छी। अशोकक लेखन आठम दशकसं आरंभ भेलनि अछि। आठम दशक कहबाक माने जे एहि समयसं पाठककें हिनक प्रकाशित रचना सभ पढ़बा लेल उपलब्ध होम' लगलनि। ई जहिया लेखन शुरू कयलनि ताहिसं पहिलुक दशक, माने सातम दशकमे मैथिली कथामे छठम दशकक कथाक विषय, स्वरूप आ भाव-भूमि सं आगांक बात नहि देखना जाइत अछि। सामाजिक चेतना आ प्रतिरोधक जे भुम्हुर छठम दशकमे पजरलैक, से सातम दशकमे पझयलैक नहि, मुदा धधरो नहि बनि पौलैक। तकर एकटा कारण हमरा इहो बुझाइत अछि जे एहि (सातम) दशकमे मैथिली कथामे नव कथाकारक आगमन आंगुरे पर गन' योग्य भेल। एकटा बैच चललै, मुदा नियमित कमे कथाकार रहलाह। अशोक जी सातम दशकक धोन्हिकें फाड़ैत अपन कथा सभक संग अबैत छथि। व्यक्ति, समाज, संवेदना, सौमनस्यता, चेतना आ प्रतिरोधक सोझ-सोझ बाट बनबैत छथि। ई अपन बात सोझ-सोझ पाठककें कहैत छथि, जाहिमे हिनक भाषाक जादूगरी देखबा योग्य रहैत अछि। अपने लाथे पूरा समाजकें युग-सत्य देखबैत छथि। ई बात हिनका मैथिली कथामे एकटा फराक पहिचान आ स्थान दैत छनि। लेखक समयक संग बदलैत व्यक्ति, समाज आ देशक भाव-स्वभावक संग चलैत अछि आ ओकरा अपना रचनाक विषय बनबैत अछि। जे समयक संग होइत परिवर्तन कें नहि देखैत अछि, ओ खाधि खुनि क' स्वयंकें गाड़ि दैत अछि। कथाकार अशोक एहि मामिलामे हरेक समयक संग चलैत देखाइत छथि। एकर बानगी हिनक 1986 ई मे छपल कथा "मिर्जा साहेब" (ओहि रातिक भोर) आ "छल" (डैडीगाम- 2017) मे देखल जा सकैत अछि। "मिर्जा साहेब"क मिर्जा मुजफ्फर आलम जे भारत-पाकिस्तानक संबन्ध खराप भेला पर भारतमे रहैत छथि। एकटा बियाहमे भाग लेबा लेल पत्नी आ बेटा पाकिस्तानेमे घेरा जाइत छथि। बहुत प्रयासक बाद जखन ओ दुनू घुरैत छनि आ अपने पत्नी आ बेटाकें लेब' बम्बई जाइत छथि आ ओत्तहि तत्काल भेल दंगामे मारल जाइत छथि। मुखिया जीक संग पत्नी आ बेटा अबैत छनि, जिनक अयबाक तैयारीमे गाम प्रफुल्लित छल, भव्य आयोजनक व्यवस्था कयने छल, ताहि पर पानि पड़ि जाइत छैक। ओत्तहि कथा 'छल'मे भोली झा कोआपरेटिवक आम सभामे ब्रीफकेसक लोभें मुहम्मद असलम बनैत छथि। कोआपरेटिवक मीटिंग मे जाइत छथि। आ अंतमे एकटा बात लेल तामसे माहुर भ' जाइत छथि आ बाज' लगैत छथि- 'अरे, ई हाकिम तखनी सं हम्मर मजहब के की-कहां कहि रहल छथ। कहै छथ जे इसलाम बहुत कट्टर मजहब हय। तलबार के जोर पर चलै हय। मुसलमान सब गाय के मांस खाइ हय। हिंदु के काफिर कहै हय। हम तब्बे से हिनका समझा रहल छली। अरे भाइ, अइ मे हम्मर की कसूर हय। एतना दिन सं हम सब एक-दोसरा के संग रहल छी। तब्बो एक-दोसरा के नहि समझली? कौआ के पाछू दौड़ल जाइ छी। पर ई मानिते नहि छथ। की-कहां बकने जाइ छथ।' साम्प्रदायिकताक दू टा स्थिति दुनू कथामे राखलनि अछि कथाकार। 1986 सं 2017 धरि अबैत-अबैत साम्प्रदायिक सद्भाव कतेक विकृत भ' गेल अछि, तकर बानगी। मिर्जा साहेबक पत्नी आ बच्चा पकिस्तान सं औथिन, तें गामक लोक स्वागतक भव्य ओरिआओन कयने रहैछ। ई प्रायः एहि दुआरें जे मिर्जा साहेबक मोजर हुनक समाजमे धर्मक कारणें नहि, मनुक्खक कारणे छलनि। मुदा, सामाजिक स्तर पर धार्मिक वैमनस्य एत' धरि पहुंचि गेल अछि जे मुहमद असलम के ठाह-पठाहिं ओकरा धर्मक खिधांस क' दैत अछि लोक। बहुतो असलम अपन समाजमे छथि जे कहैत रहैत अछि जे कौआक पाछू नहि दौड़ू। मुदा...। कथाकार दुनू समयक चित्रण करैत वाजिब चिन्ता रखैत छथि। दोसर, एकटा आर बात! मिर्जा साहेबक संग मुखिया जी बम्मई (आजुक मुम्बई) जाइत छथिन। मुदा, आजुक स्थिति ई बनि गेल अछि जे कोनो मिर्जा साहेबक संग कोनो मुखियाजी कतहु जयबा लेल तैयार नहि भ' सकैत छथि। दुनूक बीच अविश्वसनीयताक खाधि एतेक गहींर क' देल गेल छैक जे रमजान आ रामनवमी मे एक-दोसराक भेंट-घांट सेहो बनौआ लगैत छैक। आजुक समयक ई सभसं पैघ त्रासदी भ' गेलैए जे एहि देशक मुसलमानकें कह' पड़ैत छैक जे हमर देश भारत अछि। आ एकरा लेल दुनू धर्मक लोक जिम्मेदार छथि जे तेसर, मदारीक होहकारा पर नाचि रहल छथि। सद्भावक एहने एकटा कथा डैडीगाम संग्रहमे अछि- 'ओ दुनू साइकिल सिखैत अछि'। सुधीर आ रमेशक साइकिल सिखबाक बहन्ने कथाकार बड़ीटा बात करैत छथि। एहि कथाक अलाउद्दीन आ कैंची मिस्त्रीक चरित्र समाज लेल एकटा आदर्श स्थापित करैत अछि। कथाकार अशोकक कथा रूपी तरकसमे रंग-विरंगक वाण छनि। हिनक एकटा कथा मोन पड़ैत अछि- भोज। एहि कथामे लगैत छैक जे कथाकार एकटा नेनाकें भोजक प्रति आकर्षणक वर्णन क' रहल छथि। भोजक खाद्य-पदार्थक अद्भुत वर्णन अछि। तकर कारण ई जे कथाकार स्वयं सेहो भोजन संदर्भमे विन्यासी छथि। भोजे नहि, आन-आन कथा सभमे सेहो भोजनक वर्णन मनोयोगपूर्वक करैत छथि। 'भोज' कथामे नेनाक मनोविज्ञानक चित्रन अद्भुत अछि। मुदा, पैघ बात ई जे एहि कथाक बहन्ने गामक आपसी सद्भावक गप कहि जाइत छथि कथाकार। भोज गामक लोककें एकठाम बान्हि क' रखबा लेल जरूरी छैक। हिनक बहुत रास कथा अछि जे मानवीय संवेदनाक विभिन्न आयामकें सफलतापूर्वक छुबैत अछि। हिनक कथा-संसारके अवगाहन कयने पाठककें बुझबामे औतनि जे ई कथाकार ओहू सभ विषयकें अपन कथामे आनलनि अछि जे मनुक्ख आ समाजक समृद्धिक कारक भ' सकैत अछि। हिनक संग्रह 'डैडीगाम'क कथा सभमे एकटा केन्द्रिय बात ई देखबामे अबैत अछि जे फोरलेन/सिक्सलेनक बढ़ैत जालक अछैत गामकें कोना बचाओल जाय? मनुक्खकें बचबा लेल गामक बांचब जरूरी छैक। मल्टीनेशनल कम्पनी सभक अधिकारी आ कर्मचारी सभ प्रोमोशन आ पदक जाहि वृत्तमे घूमि रहल अछि, जे ओकर व्यक्तिगत आ सामाजिक जीवन धूमिल भेल जाइत छैक। ओकरा पाइ आ पद चाही। एहि विषय पर मैथिलीमे किछु नव-पुरान कथाकारक कथा अयलनि अछि, जाहिमे विभिन्न प्रकारक चिन्ता आ चिन्तन प्रस्तुत कयल गेल अछि। एहने घुरमुरिया दैत लोक सभक लेल हालहिमे अशोक जीक एकटा दोसरे रंगक कथा अयलनि अछि- 'जिम्मेदारी'। एहिमे ओ 'वर्क लाइफ बैलेंस'क नीक उदाहरण प्रस्तुत कयलनि अछि। परिस्थिति तं यैह छैक आ एहिना कि एहूसं बेसी व्यस्ततम भ' सकैत छैक। मुदा, एहन परिस्थितिमे जीवनक राग-अनुराग कोना बचा क' राखल जा सकैछ, से बात कथाकार अशोक अपन एहि कथामे कहैत छथि। अशोक भाइसं मासमे एकदिन अबस्से भेंट होइत अछि। ओ दिन होइछ 'उपमान'क मासिक गोष्ठीक। ओ मैथिलक प्राय: सभ महत्वपूर्ण विधामे लिखलनि अछि। एकटा विधा छुटल छनि। एकबेरक गोष्ठीक समापनक बाद वियोगी (तारानन्द वियोगी) आ हम कहलियनि जे भाइ, उपन्यास छुटल अछि। लिखियौ ने। ओ साफे नकारि गेलाह। नहि, उपन्यास नहि लिखायत। एकबेर सोचने रही, मुदा नहि । एहि लेल कहियो मूडे ने बनल। जे, से। ई गप हमरा दुनूक मुंहसं प्राय: एहू दुआरें बहरायल जे ओहि गोष्ठीमे वियोगी अपन उपन्यास अंश पढ़ने रहथि। एहि गपक बाद हम दुनू गोटे हुनका संग कौफी पीब' पटना गांधी मैदानक मैकडोनाल्ड मे गेलहुं। कौफीक संग गपसपक बला फोटो हम फेसबुक पर तखनहि द' देलियैक। उनतीस मई 2022क गप थिक। फेसबुकक टाइटिल देने रहियै - कौफीक संग कथा-वार्ता करैत मैथिलीक तीन टा कथाकार। एहि पोस्टक बहुत रास प्रतिक्रिया आयल। मुदा मुख्य प्रतिक्रिया आदरणीया उषाकिरण खानक आयल छल। ओ लिखने छलीह -'तीनू मिलि क' एक टा दीर्घ कथाक सूत्रपात तने करता? बड़ नीक प्रयोग हेतनि- मधुबनी, सहरसा आ बेगूसरायक परिवेश मे। बगअप भाइ लोकनि। एकर प्रतिक्रिया पर आदरणीय भीमनाथ झा तीनू गोटेकें उपन्यास लिखबा लेल आग्रह कयलनि। हमरा मादे कहलनि जे हाथ झारल छनि। लिखिए देताह। वियोगी जी आ अशोक जी गछथु। एहि पोस्ट पर बहुत संवाद भेल। वियोगी गछलनि। भीम भाइ अंतत: अशोक जी सं सेहो गछबाइए लेलनि। कथाकार अशोक अपन पोस्ट उषाकिरण खानक उतारामे लिखलनि- "प्रणाम। अहांक आदेश त' पहिनहि सं अछि। भीम भाइ सेहो कहि देलनि। वियोगी बहुतो दिन सं पाछू पड़ल छथि। लगैए आब एकटा उपन्यास लिखैए पड़त।" हम सभ अशोक भाइक एहि घोषणाक स्वागत कयने रही। आ, आब हुनक उपन्यासक प्रतीक्षा क' रहल छी। -संपर्क-6202140561 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२०.आशीष अनचिन्हार- मैथिल दृष्टिदोष आशीष अनचिन्हार मैथिल दृष्टिदोष "मैथिल आँखि" कांचीनाथ झा 'किरण' जीक देल एकटा नारा अछि जाहि अंतर्गत मिथिला-मैथिली-मैथिलकेँ अपन दृष्टिसँ देखबाक बात कहल गेल छै। मुदा ई "अपन दृष्टि" कोन रूपे आएत तकर मापदंड कतहुँ नै सोझराएल गेल छै। "मैथिल" शब्द केर अर्थे संकुचित कऽ देल गेल छै। एकर अर्थ एखनो मात्र ब्राह्मण-कायस्थ होइत छै। कागजपर लिखबाक लेल सभ नीक-नीक आ उदात विचार लीखै छथि मुदा व्यावहारिक जीवनमे ओ उदात विचार नै आबि पाबै छनि। टैक्स पेयर केर पाइसँ चलए बला संस्था जेना अकादेमी सभकेँ सेहो अही मैथिल अर्थ बला बना देल गेल छै। एहन परिस्थितिमे 2007 मे मैथिली अकादमी, पटनासँ अशोक जी केर "मैथिल आँखि" नामक पोथी प्रकाशित होइत अछि। एहि पोथीमे 24 टा आलेख अछि जाहिमे किछु आलेखमे किरणजी पक्ष भेटि जाएत आ किछुमे ओ नै भेटत। नै भेटबाक एकै टा कारण जे आब ओ समयमे नै छै जे एकै दृष्टिसँ अहाँ प्रगति कऽ लऽ लेब। अपने आप मैथिल आँखिमे आनो दृष्टि सभ आबि जाइत छै आ मिथिला-मैथिली-मैथिलक विकास तहीसँ होइत छै। एहि पोथीक सभ आलेख कोनो-ने कोनो पत्रिकामे प्रकाशित भेल अछि। बहुत लेखमे मैथिल आँखि वा दृष्टि स्पष्ट नै भऽ सकल अछि जेना पृष्ठ-21 पर आलेख अछि "विकास संदर्भ" जे कि संधान पत्रिका केर जुलाई 2000 केर अंकमे प्रकाशित भेल छल। ओहि आलेखक शुरूमे लेखक अपन किछु संगीक संगे कोनो बैंक अधिकारी संगे वार्तालाप करैत रहथि। बैंक अधिकारी कहब रहनि जे मैथिली साहित्य पचास बर्ख पाछू अछि। अधिकारी ईहो कहलखिन जे एखन सूचना-तकनीक-इंटरनेटक जमाना अछि जे मैथिलीमे नहि अछि। मुदा अशोक जी आ हुनका संग रहल आन लेखक जे संगे रहथि से ओहि अधिकारीकेँ गोलिया लेलाह। मुदा देखियौ, ने अशोकजी ओहि अधिकारीकेँ ओहि समयक इंटरनेटपर मैथिली सामग्री देखा सकलाह आ ने हुनका संगमे रहल आनो लेखक। बर्ख 2000 मे मैथिलीमे "भालसरिक गाछ" छल जकर संचालक गजेन्द्र ठाकुर छलाह आ एकर अलावे तीन टा आर साइट छल जे कि अमेरिकासँ संचलित छल जाहिमे अधिकांशतः अंग्रेजीमे मिथिला-मैथिली-मैथिलपर सामग्री रहैत छल। एहि सभहक विस्तृत विवरण हमर पोथी "मैथिली वेब पत्रकारिताक इतिहास" मे भेटत। एहि विवरणसँ ई स्पष्ट होइत अछि जे जतबे दूर धरि ओहि अधिकारीक दृष्टि गेल छलनि ततबे दूर धरि अशोकजी एवं हुनका संगमे रहल आन लेखक केर छलनि। जखन कि लेखक लग अपन समकालमे घटैत हरेक घटनापर नजरि रहबाक चाही। हमरा हिसाबें ओ बैंक अधिकारी मात्र पाठक छल तँइ ओकरा लग कम सूचना भऽ सकैए मुदा लेखक लग तँ सूचना रहबाके चाही। पृष्ठ-54 पर आलेख अछि "विकासक फल" जकर मुख्य मुद्दा छै पलायन। मुदा मात्र मजदूरक पलायन। हमरा जनैत ई विशुद्ध मैथिल महासभा बला मैथिल दृष्टि छै। मजदूरक पलायन, पलायन भेलै आ बाबू साहेबक बेटा जे दिल्ली-बंबइ- अमेरिका-लंदनमे कमा कऽ राजमहल बना लैए से कमाइ भेलै। मजदूरक पलयान कम करबाक पहिल शर्त छै ब्रेन ड्रेन (पढ़ल-लिखल लोकक पलायन) रोकब। अन्यथा हमरा नजरिमे मजदूरक पलायन रोकब, मिथिलाक गरीबकेँ गरीब रहबाक लेल अभिशप्त कऽ देत। आ संभवतः मैथिल महासभा केर मैथिल दृष्टि इएह चाहै छै। उपर जे हम दू उदाहरण देलहुँ तेहन आर किछु उदाहरण भेटल एहि पोथीमे मुदा पाठक सभसँ आग्रह जे ओ एहि पोथीकेँ कीनथि आ ओकरा पठथि। एकर अतिरिक्त एहि पोथीमे हमरा बहुत रास विशेषता सेहो भेटल मुदा हम नकारात्मक लोक मात्र दुइए टा विशेषता देब। पहिल एहि पोथीक सभ आलेख छोट अछि। आ ई सामान्य पाठक लेल नीक बात छै। दोसर, अहाँ सहमत होइ वा कि असहमत मुदा ओहि लेख सभमे लेखक केर अपन निष्कर्ष भेटत। मैथिलीमे तँ किछु एहनो धुरंधर लेखक सभ छथि जिनकर लेख दू-किछु बेर पढ़लाक बादो नै बुझाइ छै जे आखिर एहिमे की लीखल गेल छै। ओना ई संतोषक बात छै जे एहन धुरंधर लेखक कम छथि मुदा जे छथि से अपनाकेँ मठाधीश मानै छथि। अशोकजी अपन एहि दू विशेषताकेँ अंत धरि बचा कऽ राखथि इएह असल मैथिल दृष्टि हेतै। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२१.मुन्ना जी- त्रिकोणक धुरी- श्री अशोक मुन्ना जी त्रिकोणक धुरी- श्री अशोक
मिथिलाक झंझारपुर प्रखण्डान्तर्गत लोहना, भूंइयाथान निवासी श्री अशोक, श्री शिवशंकर श्रीनिवास आ शैलेन्द्र आनन्द क बीच 1983 मे कथाक त्रिकोण बनल छल। तीनू गोटें कथा मे अपन अपन फरीछ आ स्वतंत्र अस्तित्व मे जनलाक पछातियो कथाकार श्री अशोक जी अपनाकें फराक दृष्टिकोण सँ एकर धुरी साबित भेल छलाह। सदिखन ने काहू सँ दोस्ती ने काहू सँ बैर कें चरितार्थ करैत अपन फरिछएल आ कतिएल क्रियाशील रहि आइ अपन पीढ़ीक सर्वाधिक पढ़ल जाय बला सर्वश्रेष्ठ कथाकारक रूप मे उपस्थित छथि। श्री अशोक जी पहिने अशोक झा छलाह फेर अशोक आ अपन परिचितिकें घोरमट्ठा हेबा सँ बचेबाक क्रम मे भ' गेलाह कथाकार अशोक। बनारस सँ शिक्षा पाबि गाम धेलनि 1975 मे वैवाहिकबन्हन मे बन्हा गृहस्थ जीवनक पछाति पहिनने किरानी आ कालान्तरें कोपरेटिव विभाग मे अधिकारीक सेवा दैत सेवानिवृत्त भ' संप्रति पटनावासी रहि सृजनरत छथि कथा सृजनक संग-संग उपन्यास पर हिनकर गहींर दृष्टि प्रभावित करै बला रहल। संगहि उपन्यास, कथाक ऑपरेशनल व्यू हिनका श्रेष्ठ आलोचक श्रेणी मे आनि ठाढ़ केलक। मंच, माला, माइक आ हाँजी-हॉंजी बला रूप कहियो दृष्टिगोचर नै भेल। --- जुलाई 1995 , ओइ समय पटना मे पत्रकारिताक छात्र रही।शैल भाई ( शैलेन्द्र आनन्द)के संग अशोक भाइक सरकारी आवास पर पहिल भेंट भेल छल।एकै पंचायतक रहितो भेंट नै छल।ओना फॉलोवर त' रही जुलाई 91क पैटघाटक कथा गोष्ठीये सँ। बीहनि कथा विधा पर हुनका सँ होइत गप सप सदिखन सकारत्मक आ प्रोत्साहित करैत रहल। आ तकरे परिणामस्वरूप दिसंबर 2011 मे हुनक संयोजन मे भेल पटना कथागोष्ठी मे हमर बीहनि कथाक एकल पोस्टर प्रदर्शनी लगाओल गेल छल। आब जहिया दिल्ली आबैथ त' सूचित करथि।आ सदति सोझगर बाट देखबैत रहलाह।
-मुन्ना जी, हटाढ़ रूपौली मो. 9958396353 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२२.श्रीधरम- गतिशील यथार्थक कथाकार अशोक: किछु टिपौत श्रीधरम गतिशील यथार्थक कथाकार अशोक: किछु टिपौत
अशोक खाँटी आधुनिक मैथिल-कथाकार छथि। मैथिली में खाँटी कथाकार त' बहुत छथि, मुदा कैक बेर हुनक दृष्टिक कोराँटी हुनक छद्म वैचारिकताक पोल खोलि दैत अछि। एहि दृष्टिएँ कथाकार अशोकक वैचारिकता आ प्रगतिशीलता मे कोनो झोल नहि छनि आ से हुनक कथा मे अनुस्यूत छनि। से बिना कोनो नारेबाजी आकि डफली बजेनहि। अशोक मिथिलाक जन-जीवनक कें अलग-अलग कोन आ दृष्टिकोण सँ देखैत छथि। ओ आम जीवन, जगत आ प्रकृतिक अनेक बिम्ब कें गतिशील चित्रकारी संग उतारि दैत छथि। हुनकर जे 'मैथिल आँखि' छनि तकर कैनवास बहुत विस्तृत छै, लोकल सँ ल' क' ग्लोबल धरि। हिनकर कथाक वितान मे मिथिलाक माटि-पानि, खेत-खरिहान, जातिक अनुसार बाँटल टोल-पड़ोस, दाम्पत्य जीवनक आशा-निराशा, राग-द्वेष सभ किछु व्याप्त अछि। बभनटोली सँ बाहर निकलि क' दलित-टोल आ मियां टोल धरि जाइत छथि आ एक दोसर टोलक बीचक राग द्वेष, छल-छद्म, तनावक संग आत्मीयताक सूत्र कें सेहो पकड़बाक प्रयास करैत छथि। सब सँ पैघ बात जे हिनकर कथा कहबाक शैली छनि से 'इस्स' ककरा नहि ठमका देत? कथ्यक अनुसारें 'कहन' कें साध' में माहिर छथि कथाकार अशोक।
'ओहि रातिक भोर' संग्रहक भूमिका मे प्रसिद्ध कवि-आलोचक कुलानन्द मिश्रक हिनका कथाक मादे टिप्पणी छनि जे "ई युगसत्य कें सामूहिक नजरि सँ बेसी व्यक्तिक नजरि सँ देखब सार्थक बुझैत छथि तें हिनकर कथा मे युगीन संघर्षक बात परोक्ष रूप सँ लक्षित होइत छै।" देखल जाय त' एहि कथन मे प्रश्नक संग उत्तर सेहो निहित छै। एत' कुलानन्द जीक कहबाक आशय यैह छनि जे अशोक अपन समकालीन समय, समाज आ जन-संकुलक यथार्थ कें अपन पात्रक नजरि सँ अकानैत छथि नै कि भीड़ आ नारेबाजी सँ। हिन्दी मे प्रेमचंद सँ अमरकांत धरिक कथा मे समाज आ समूह कें 'व्यक्तिक नजरि' सँ थाहबाक ई परंपरा देखल जा सकैत अछि। प्रश्न यैह हेबाक चाही जे व्यक्ति-चरित्र वर्गीय चरित्र बनैत अछि कि नहि। आलोचक मोहन भारद्वाजक उचिते कहब छनि जे "अशोक विकास कें पुनरावृत्तिक रूप से नहि देखैत छथि। विपरीत तत्त्वक एकताक रूप में विकास कें देखब हुनक विशेषता छनि।" भारद्वाज जी इहो लिखैत छथि जे हिनक "कथाक कथ्य सार्वभौम होइत अछि, मुदा ओकर बनाबटि मैथिल रहैत अछि। कथाक तानी-भरनी अर्थात संरचना मे मैथिल सुवास रहैत अछि।" निःसन्देह मोहन भारद्वाज अशोक कें एकटा एहन प्रगतिशील कथाकार रूपें देखैत छथि जे सामाजिक द्वंद्व कें वैश्विक आ वैज्ञानिक दृष्टिएँ मैथिल गंधक संग चित्रित करैत छथि। एहि प्रक्रिया मे कथाकार अशोक अपन पाठक आ पाठकीयता कें गसियौने रहैत छथि। जेनाकि युवा कथाकार-समीक्षक शुभेन्दु शेखर अशोक कें 'पाठकक कथाकार' कहैत लिखैत छथि जे "अशोकजी मिथिलाक जीवन-राग, ओकर छोट-पैघ आकांक्षा, ओकर उदात्त जीवनक नकारात्मक आ सकारात्मक विंदु सभ कें बहुत सूक्ष्मता सँ देखैत छथि।" शुभेन्दु अशोकक कथा-यात्राक एहि विशेषता कें सेहो रेखांकित करैत छथि जे कथ्य आ शिल्पक स्तर पर ई कथाकार लगातार ऊर्ध्वमुखी आ प्रयोगशील छथि। आ जकरा कैक बेर ठमकल मैथिल-नजरि नहि पकड़ि पबैत अछि। एवं प्रकारें कथाकार अशोकक जे थोड़-बहुत मूल्यांकन भेल से बहुत कम अछि। तें 'विदेह'क ई प्रयास एहि चर्चा-परिचर्चा कें आगाँ बढ़ाओत से विश्वास अछि।
अशोक 1980 के आसपास कथा लेखन आरंभ कैने छलाह। लगभग चारि दशक मे हुनका लग संख्या मे भने कथा कम हो, मुदा उत्कृष्टताक प्रतिशत हुनका लग बहुत अधिक छनि। निःसन्देह सृजनात्मक रचनाकारक भीतर सेहो एकटा आत्मालोचक हेबाक चाही, जाहि सँ साहित्य मे निंघेस नहि पसारि सकय। एहि सँ साहित्य आ पाठकक बहुत भलाइ होयत। अशोक पिछला शताब्दीक अवसानक संग मलकैत सांढ़ जकां आँखि मुनने भागल जाइत नव सदीक यथार्थ कें अपन कथा मे गूँथय मे माहिर छथि। पिछला सदीक अंतिम दू दशक भारतीय समाज आ राजनीति मे परिवर्तनक काल रहल, जकर समाज पर असरि बहुत बेसी पड़ल। यैह समय आवारा-पूंजीक वैश्विक आवागमनक सेहो थिक। पारंपरिक सामाजिक संरचनाक पुनर्रचना भेल आ एहि क्रम मे टकरावक संग सामंत केंद्रीय टोल सँ हाशियाक टोल दिस सेहो शिफ्ट भेल। एहि बदलावक प्रक्रिया कें अशोक बहुत महीन रुपें 'मातबर' कथा मे अभिव्यक्त करैत छथि। कथा मे आयल 'अंबेडकर-चौक' परिवर्तनक मेटाफर बनि जाइत अछि। निम्न वर्ग सँ मातबर बनबाक एहि प्रक्रिया मे जनता अपन राजनेते जकां दिशाहीन आ दिकभ्रमित अछि।
गोर्की चेखवक कहानी कलाक वर्णन करैत लिखने छथि - "चेखवक कथा पढ़ैत एना सन प्रतीत होइत अछि जेना कि मानि लिय' जे शरद ऋतुक उदास अवसानक दिन मे अहाँ टहलि रहल छी, जखन कि हवा एतेक पारदर्शी होइत अछि जे ओहि में झाड़-पात, गाछ-बिरिछ, संकीर्ण मकान आ धूमिल सन लोक सभकिछु एकदम स्पष्ट देखा पड़ैत अछि। सभकिछु एकदम विचित्र- एकांत, निश्चल आ निश्शक्त लगैत अछि। चारू भरि गहींर नील सँ बोरल असीमित दूरी पसरल रहैत अछि। आ जे फिक्का सन आसमान संगे जा मिलैत अछि। ठंड सँ जमल आ कादो सँ भरल धरती पर आसमान 'सर्द आह' भरैत अछि। लेखकक बुद्धि शरद ऋतुक सूर्य जकां निर्मम आ स्पष्ट रुपें ऊबड़-खाबड़ बाट, टेढ़-मेढ़ गली, संकीर्ण आ गंदा मकान सभ पर प्रकाश पसारैत अछि, एहि मकान सभ मे दीन-हीन तुच्छ लोक सभक विकलता आ काहिली सँ दम घुटैत जाइत छै। ओ सभ मूस जकां अपन निरर्थक, ओंघायल भागम-भाग मे लागल रहैत अछि ।" अशोकजीक कथा सभ कें पढ़ैत कैक बेर ई कथन सार्थक बुझना जाइत अछि। अशोक अपन निजी पेशा में सरकारी अधिकारी रहलाह। हुनका लग सरकारी तंत्रक बेस नीक-अधलाह अनुभव छनि, जकरा ओ अपन कथाक विषय बनौने छथि। सरकारी लालफीताशाही पर अशोकक कैक टा कथा छानि। 'दसखत' आ 'कोठा' कथा मे राजनितिक भ्रष्टाचार कें जाहि तरहें उघाड़ल गेल अछि से अपन कथ्य मे पुरान होइतो प्रस्तुति मे नव अछि। अनेक तथ्य आ पक्ष कें जोड़ैत। 'कोठा' मे 'सांप' मेटाफर के बहुत समुचित प्रयोग भेल अछि। पहिने 'अवर्ण' कें 'सवर्ण' लूटैत छला आ आब 'मंडल' लूटि रहल छथि। रामलाल मंडलक सांप सभ सीसाक घर सँ बाहर भ' गेल। "चारूकात गाम मे सरसराइत-सनसनाइत ससर' लागल। फुफकार सँ आसामर्द क' देलक समूचा वातावरण के।" अहिना 'जिनिस' कथा में भ्रष्टाचारक संग दाम्पत्य आ बदलैत स्त्री-पुरुष संबंधक सार्थक रेखाचित्र खींचल गेल अछि। 'स्त्री-पुरुखक दियाद नहि थिकैक।' एहि कथन सँ अनेक तथ्य ध्वनित होइत अछि। रूपाक एहि कथन 'मोन पाडू त' कत्तेक दिन भ' गेल हैत हमर देह छूना अहाँके?' कें आधुनिक स्त्री-विमर्शक दृष्टिएं सेहो देखल जा सकैत अछि।
अशोकक एकटा कथा छनि 'हरिसिंहदेवी'। आब इहो कोनो कथाक 'कथ्य' भ' सकैत अछि? मुदा एहन शोध आलेखक विषय कें लेखक जाहि तरहें बिखिया के बखान करैत छथि, से हुनकर 'किस्सागो'क प्रमाण थीक। कथाकार एत' जाति-पांतिक समाजशास्त्रीय विश्लेषणक संग मनोवैज्ञानिक 'स्कैन' सेहो करैत चलैत छथि। 'रागविराग' कथा एहि तथ्य कें रेखांकित करैत अछि, जे हजारो बर्ख सँ मारि-गारि सुन' बला दलित, मजदूर लेल सम्मान आ स्नेहक दू टा मीठ बोल कतेक आह्लादक होइत छै। हजार रुपैया कमेनिहार ड्राइवर अपन सेठानी कें माँ कहैत अछि। हजारो सालक सामंती गुलामी सँ बाहर निकलल ई वर्ग एक बेर फेर 'प्रेम लपेटे अटपटे बैन' मे फंसिक' शोषणक शिकार भ' जाइत अछि। अही कड़ीक विस्तार मे 'महतो' 'प्रतिलोम' आ 'सीवन रजकक हितचिन्तक' शीर्षक कथा कें देखल जा सकैत अछि। मुदा 'सीवन रजकक हितचिन्तक' कथाक अंत मे जे द्वंद्व हेबाक चाही ताहि सँ पात्र वंचित रहि जाइत अछि। बहुत आसानी सँ सीवन कें मुक्ति भेटि जाइत छै। एहि दृष्टि सँ 'प्रतिलोम' कथाक विकास आ उरूज स्वाभाविक अछि।
'मातबर' संग्रहक कथा ''बूढा जीबैत रहलाह' आ 'डैडीगाम' संग्रहक 'ऐना भ' क' कियो' कें एक संगे पढ़ल जेबाक चाही। भारतीय समाज मे सोलह-सत्रह बर्ख मे बियाह आ चालीस जाइत-जाइत वानप्रस्थी बनि जएबाक आग्रह रहल अछि। सभटा शास्त्र-पुराण मे ययाति आ देवब्रत सन अनेको उदहारण रहबाक अछैतो बूढ़क गंजन करबा मे 'विश्वगुरु' सेहो पाछाँ नहि रहल अछि। हमरा जनैत बूढ़क 'राग' पर मैथिली मे लीखल अन्यतम कथा थीक- बूढा जीबैत रहलाह। अहिना दाम्पत्य जीवन आ प्रेमक कथा- 'लाथ' कें सेहो देखल जा सकैत अछि। मध्यवर्गीय व्यक्ति अपन गृहस्थक गाड़ी कें खींचैत-खींचैत कहिया जवान सँ अधबयसू आ बूढ़ भ' जाइत अछि तकरा एकटा 'कुर्ता'क प्रतीकक माध्यम सँ कहल गेल अछि।
'मातबर' संग्रहक एकटा आरो विशेष उल्लेखनीय कथा थिक- 'रांड़'। ओना ई कथ्य आब मिथिलो लेल पुरान सन भ' रहल अछि, मुदा जं एहि विषय कें हटा दी त' मैथिली कथा-साहित्यक दू तिहाइ हिस्सा अप्रासंगिक भ' जायत। इतिहास समजशात्रीय अध्ययनक आधार होइत अछि। अस्तु, अशोक अपन कथा 'राँड़'क बहन्ने विधवाक लेल निर्धारित पारंपरिक मापदंड कें तोड़ैत छथि, ओहि पर प्रश्नचिन्ह लगबैत छथि। कथाक नैरेटर मनीषक आंखिये विधवा जीवन, ओकर संघर्ष आ विकसित चेतना कें समग्रता मे देखल गेल अछि। एत' विधवा स्त्रीक विकसित होइत स्वतंत्र व्यक्तित्व कें देखल जा सकैत अछि। विधवाक लेल जे ताना-बाना समाज द्वारा निर्धारित कैल गेल अछि, ओकरा ओ नकारैत अछि, जेना- उज्जर नुआ पहिरब, सिंऊथ से सिनूर धोई देब, चूड़ी फोड़ि देब, अनकर छूल नहि खैब, माछ-मांस नहि खैब, देह साधि के हड्डी बना लिय' जे मोन आ देहक बीच कोनो तार ने जुडी जाय। देहक राग ने बाजि उठय... आदि। मुदा पत्नी मरला पर पुरुषक लेल कोनो नियम-संयम नहि। मनीष कें मोन छै जे माय के मरला पर बाबू लाश सँ मांफी मांगने रहथिन-'जीवित मे अहाँ कें बड दुःख देलहुं। बड़ क्रोध केलहुं। मांफ क' देब हमरा।' मुदा पत्नीक मृत्युक करण हुनकर दिनचर्या मे कोनो अंतर नहि आयल। 'माछ-मासु खाइते रहलाह। सभटा काज ओहिना करैत रहलाह, जेना पहिने करथि।' मनीष कें अपन विधवा पितामही मोन पड़ैत छै जे उज्जर नुआ पहिरने, गोपी चनानक ठोप केने भगवतीक पूजाक बाद माटिक बासन मे अपने सँ भानस करथिन। ओही भगवतीक पूजा जे कहियो स्त्रीक पक्ष मे ठाढ़ नहि भ' सकलीह। विधवा जीवनक कष्ट कें कनेको कम नै क' सकलीह। कोना क' सकैत छलीह जत' धर्मराज सन महापुरुखक मुंहें महाभारत मे कहा देल गेल-"यदि कोनो पुरुष के सौ टा जीह (मुंह) होई, आ सौ बरख धरि ओ ज़िंदा रहय आ ओकरा जीवन भरि स्त्रीक दोषक बखान करबाक अलावा कोनो दोसर काज नहि देल जाई, तैयो ओ स्त्रीक दोष कें बिना बखान केने मरि जायत।" एहना मे विधवाक आर्तनाद शास्त्र पर चलानिहार कोन पुरुख सुनि सकैत छल?
मनीष अपन मामी कें विधवा रूप मे देखबाक कल्पनो नहि क' सकैत छल। किएक त' ओकर नेनपन काशी मे मामीक आँचरक छहारि मे बीतल रहै। ओ मामी, जे मैथिल द्वारा काशी-लाभ लेल (मरै लेल) छोड़ि दै बला बूढ़ माता-पिता कें मरै तक देख-भाल करथि। जीवन सँ मृत्यु धरी सेवा मे दू पाई कमा लेथि आ तकर बदला मे लोक सभ बिखिन बिखिनक खेरहा पसारनि। मुदा, मामी ककरो बात पर ध्यान देने बिना 'स्वान रूप संसार है भूकन दे झख मारि'क अंदाज मे अपन काज मे लागल रहलीह। आखिर काशी कबीरक सेहो नगरी थिक, जतबे आडम्बर-युक्त ततबे आडम्बर-मुक्त। आ से मामी जखन विधवा भ' गेलीह त' मनीष सोचैत अछि जे हुनकर उज्जर वस्त्र के ओ मूंगाक रंग-बला शाल सँ झाँपि देत। "मुदा मनीष जखन मामीक ओत' गेल त' हुनका आसमानी रंगक नुआ मे देखलक। आसमानी रंगक नुआ-ब्लाउज पहिरने मामी जेना सम्पूर्ण अकास के समेटने छलीह। हाथ मे घड़ी रहनि। सोनाक चूड़ी रहनि।" मामीक आसमानी रंगक साड़ी ओहि अकास कें अपना मे समेटने अछि, जाहि पर पुरुषक 'बपौती' रहल, स्त्रीक 'मैयौती' नहि। (एत' आसमानी रंग स्वतंत्रता ओ स्वच्छंदताक प्रतीक थिक।) ई देखि प्रगतिशील मनीष कें एक पल लेल ठकमका जायब स्वाभाविक छल। मामीक ई कथन जे 'हम राँड़ नहि भेलहुँ मनीष। हम राँड़ नहि छी।" आधुनिक मैथिलानीक उद्घोषणा थिक जे हजारो साल सँ जमल पितृसत्ताक शिला पर हथौराक चोट सन बुझइत अछि। आ मामीक अहि उक्ति कें सुनि मनीष कें अपन माताक मृत्युक बाद पिताक जीवन कें मोन पारब प्रतीक मे बहुत किछु कहि दैत अछि। (ओना ई कथाक अंत एतहिये भ' जैत त' हमरा जनतबे नीक।)
ई कथा अपन कलेवर मे छोट होइतो मिथिलाक विधवा-जीवनक अनेक रंग (सफ़ेद सँ आसमानी धरि) कें अपना मे समेटने अछि। मनीषक विधवा पितामही सँ विधवा मामी धरिक मिथिलांचलक वैधव्य-यात्रा मे बहुत किछु बदलि गेल अछि। बहुत किछु टूटि गेल अछि। बहुत किछु पाँछा छुटि गेल अछि। परंपरावादी पागक पाछां गन्हाइत दिमागक बिखपादे टा बचल अछि। अतीत-गायनक संग संग जखन अतीतक मूल्यांकन होइत अछि, तखने स्वस्थ भविष्यक कल्पना कैल जा सकैत अछि।
'डैडीगाम' धरि अबैत-अबैत अशोक कथ्य आ शिल्प, दुनू स्तर पर नव-नव प्रयोग करैत छथि। शीर्षक कथा डैडीगाम एक संग ढहैत सामंतवाद, पलायन, गामक प्रति नास्टेल्जिया, गामक राजनितिक-सामाजिक-आर्थिक बदलावक संग बदलैत चेतनाक कथा थीक। रघुवंश लंदन मे अनेको बर्ख धरि रहि डाक्टरी करबाक अछैतो गाम मे सीतारामक मंदिर बनाब' चाहैत छथि। गाम सँ पुनः जुड़बाक लेल मंदिर कें ओ कड़ी बनाब' चाहैत छथि। हुनकर बेटा सब एहि कार्य मे हुनकर सहयोग करैत छनि। मुदा गामक नवतुरिया ई बुझैत अछि जे मंदिरक निर्माण सँ शिक्षा, स्वास्थ्य आ बेरोजगारी दूर नहि भ' सकैत अछि। तें नवतुरिया मंदिरक बदला मे अस्पताल बनेबाक आग्रह पर अडिग भ' जाइत अछि। सवर्ण सँ अधिक अवर्ण समुदायक लोक शिक्षा आ स्वास्थक महत्त्व कें बूझ' लागल अछि। फेकनक ई कहब जे 'मिथिला मे सीताराम मंदिर बनेबाक परंपरा नहि रहल अछि' मिथिलाक सांस्कृतिक धरोहर पर सँ गर्दा झारैत वर्तमान मंदिरवादी राजनीति के पोल सेहो खोलि दैत अछि। रघुवंश गाम मरबाक लेल आयल छलाह, मुदा गाम अयलाक बाद हुनकर दृष्टि बदलि जाइत छनि- 'गाम-घर तं जीवाक लेल होइ छै। मरबाक लेल नहि।'
रचनाकारक दायित्व कमजोरक संग ठाढ़ हैब होइत अछि। घोर अमानवीय वातावरण मे मानवताक सूत्र खोजब होइत अछि। कोनो धर्म, जाति, वर्ग, अथवा क्षेत्र सँ राग-द्वेष अथवा पूर्वाग्रह रखनिहर लेखक कोनो राजनीतिक पार्टीक प्रचारक भ' सकैत छथि, लेखक नहि। अशोक सांप्रदायिक तनावक माहौल मे सांप्रदायिक-सौहार्दक कथा लिखैत छथि। अहि सन्दर्भ में 'छल', 'ओ दुनू साईकिल सीखैत अछि' आ 'राग' कथा विशेष उल्लेखनीय अछि। 'छल' कथा मे भोली झा जाहि तरहें इस्लाम कें गरियाब' बला हाकिम सँ लड़ि जाइत अछि, से ओकर अभिनय नहि, सैकड़ो वर्ष सँ सह अस्तित्वक संग हिन्दू-मुसलमानक संग रहबाक प्रमाण थिक। तहिना कैंची बला मुसलमान द्वारा रमेश आ सुधीर कें पिटाई सँ बचा लेब आ साइकिल मिस्त्रीक ई कहब जे 'अब कहिया आयब' साइकिल सिख' आश्वस्त करैत अछि जे मिथिले नहि भारतीय समाज बहुत अधिक दिन धरि धर्मक निशा मे बताह नहि रहि सकैत अछि। 'राग' कथा त' मैथिलक भोजन-प्रियताक समाज-मनोवैज्ञानिक पोस्टमार्टम थीक। गणेश बाबू आ मुजफ्फर साहेब एकटा सवर्ण हिन्दू दोसर सवर्ण मुसलमान 'अन्न-ब्रम्ह'क लेल अपन जातीय आ धार्मिक टैबू कें छोडि दैत छथि आ एक दोसराक घर अष्टमीक बलि आ बकरीदक कुर्बानीक मासु नाक डूबा क' खाइत छथि। मुदा दुनू कें अहि लेल सामान्य होब' मे समय लागलनि। हिन्दू आ मुसलमान दुनू एक गाम, एक ठाम रहितो कतेक दूर अछि। एक दोसरक लेल कतेक पूर्वाग्रह पोसने अछि तकर प्रमाण थिक ई कथा। कथाकार कें कोनो हड़बड़ी नहि छनि। ओ हिन्दू मुसलमानक एकता देखेबाक लेल कोनो नारेबाजी अथबा रूढ़ प्रतीकक आसरा नहि लैत छथि। एक दोसराक संग रहैत, एक-दोसरक दुख-सुख कें बंटैत ई सह-अस्तित्व कथा मे विकसित भेल अछि। गणेश बाबूक अहि कथन मे लेखकक दृष्टि सेहो समाहित छनि, " औ, अहाँक बदना हथहर बनि बैसल अछि। अदद सँ हौसला धरि अंगेजने छी हम सभ। दुनू गोटे कें अफ़सोस आ अंदेशा एके रंग होइये।" 'राग' मैथिली कथाक परिधिक विस्तार करैत अछि। गणेश्वर बाबू मुजफ्फर साहेब संग टूटल राग कें पुनः जोड़बाक प्रयास करैत छथि। एखनो गाम मे मियां-टोलक सामने हिन्दू टोल नहि बना सकल अछि राजनीति।
स्त्री स्वधीनाताक प्रश्न 'स्वाधीन' कथा मे देखल जा सकैत अछि। हमरा जनैत 'वैवाहिक-बलात्कार' पर भारतीय साहित्य मे कथा बहुत कम लीखल गेल अछि, खास क' पुरुष लेखक द्वारा। जया जाहि तरहें पति द्वारा बलात्कार सँ ठहरल बच्चाक गर्भपात करेबाक जिद पर अड़ल रहैत छथि से स्त्रीक बदलैत स्वाधीन चेतनाक प्रमाण थिक। कतेको ना-नुकुर करैत अजय कें सेहो तैयार हुअ' पड़ैत छै आ अपन गलतीक पश्चाताप ओकरा सेहो होइत छै, ई लेखकीय दृष्टिक परिचायक थीक। जखन स्त्री आर्थिक रूपें सबल हेतीह, अपना कें दान मे उत्सर्गक बदला अपन जीवनसाथीक चयन स्वयं करतीह त' फैसला सेहो लेतीह। मुदा, 'टीस' कथा अपन अंत सँ निराश करैत अछि। विमला कें पति कोपरेटिवक अध्यक्ष बना देलकनि आ हुनक नकली हस्ताक्षर क' गबन करैत रहल। एक राति पुलिस आबि क' विमला कें गिरफ्तार क' लैत छै, पति पहिनहि निपत्ता भ' गेल रहै। विमला पतिक तमाम फरेब कें अपन भीतर दबा क' ओहि नकली हस्ताक्षर कें अपन असली हस्ताक्षर मानि लैत अछि। जं विमला एत' नकारि जाइतय त' ई कथा स्त्री स्वाधीनताक सन्दर्भ मे एकटा विमर्श ठाढ़ करैत।
'मनसूबा' आ 'लेमन आइसक्रीम', दू पीढ़ीक द्वंद्वक संग शहरीकरण, नव पीढ़ीक मनोभावक मशीनीकरणक कथा थीक। "पापा एकटा बात अछि। गाम मे अहाँक लाबिंग बहुत तगड़ा अछि" बबलूक ई कथन नव टेक्नोक्रेट युवाक बदलैत मानसिकताक प्रमाण थीक। ई द्वंद्व 'मनसूबा' कथा मे आरो विस्तार लेलक अछि। पलायन मजबूरी थीक। शहर अपना भीतर हेंजक हेंज गाम कें पचौने जा रहल अछि। संस्कृतिक संक्रमण अपन स्वाभाविक गति सँ पसरि रहल अछि। मध्यवर्ग सुविधाभोगी आ इएमआइजीवी होइत अछि। मध्यवर्गक पुरनका पीढी में प्राचीनता आ आधुनिकताक द्वंद्व रहै, से नव पीढी मे समाप्त भ' रहल छै। रणजीत कंपनी मे पैघ ओहदा पर अछि। ओ अपन जिनगी अपने ढंगे जीब' चाहैत अछि। माता-पिताक कोनो हस्तक्षेपक बिना। दिल्ली अयला पर माय अपन हाथक भोजन बेटा कें कराब' लेल व्यग्र छथि मुदा बेटा कें होटलक व्यवस्था पर अभिमान छनि। पिता कें बुझाइत छनि जेना "ओ तथा रणजीत नदीक दू छोड़ पर ठाढ़ छथि। दू-टा फराक फराक द्वीप पर।" अहि कथाक ट्रीटमेंट किछु आरो शब्दक मांग करैत अछि।
'खुशीक नाम जीवन' कें 'मनसूबा' कथाक विस्तार मे देखल जा सकैत अछि। मंसूबाक रणजीत अपन कैरियरक प्रति एतेक लिप्सित अछि, जे बियाहे नहि कर' चाहैत अछि। मुदा, एत' संदीप अपन जीवनसाथीक रुपें दक्षिण भारतीय स्वजातीय सुभद्रा नायर कें चुनैत अछि। कन्हैया बाबू आ हुनक पत्नी जेना तैयारे बैसल रहथि ई सुनबाक लेल। बियाह भ' गेल। कनियाँ मैथिली सीखि लेलीह। कोनो द्वंद्व नहि। कोनो कुट्टीचालि नहि। सब बड़ नीक। मुदा 'छुट्टीक एक दिन' मे नवतुरिया वर्गक प्रेमविवाहक मादे चर्चा बहुत स्वाभाविक रूपें आयल अछि। अशोक मूलतः गतिशील यथार्थक कथाकार छथि। हुनकर अधिकांश कथा 'हम' नैरेटर द्वारा संचालित होइत छनि। कथा कहबाक ई तकनीक अपन सरलताक अछैत बहुत कठिन होइत अछि। सबसँ पैघ बात जे एकरसता आ आत्मालापक शिकार हेबाक शंका प्रबल रहैत अछि। मुदा एहि चुनौती कें अशोक कथ्य संग निलिप्त भ' आ 'बतकही' मे पूर्णतः लिप्त भ' निबाहि लैत छथि। हुनक कथा मे 'प्रेम' सर्वत्र व्यप्त अछि। मनुक्ख-प्रेम हुनकर अभीष्ट छनि। दाम्पत्य प्रेमक कतेको बिंब हिनक कथा मे देखल जा सकैत अछि। पत्नी त' हर दोसर कथा मे अलग अलग रूपें ठाढ़ छथिन। एकटा कथाकार अपन बाहर-भीतर एक रंग रहिए क' अपन 'हम' कें 'सार्वभौम' बना सकैत अछि। अंत मे ई कहब जे आलोचक अशोक जी पर विस्तार से विचार हेबाक चाही से फेर कहियो। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ऐ अंकक अन्यान्य रचना ३.गद्य खण्ड ३.१.जगदीश प्रसाद मण्डल- सुचिता (धारावाहिक उपन्यास) ३.२.जगदीश प्रसाद मण्डल- निरन्तर (लघुकथा) ३.३.नन्द विलास राय- फादर्स डे ३.४.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- २६-३० म खेप ३.५.कुमार मनोज कश्यप-दृश्यावलोकन ३.६.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (खेप-१८) ३.७.प्रणव झा-भौकाली मुर्गा (लघु व्यंग्य) ३.८.आचार्य रामानन्द मण्डल-अगस्त क्रांति शहीद रामफल मंडल: जीवन वृत/ कमीना विद्वान ३.९.डाॅ. किशन कारीगर-मैथिली साहित्यक एलीट बोनबिलाड़ आ सर्वनाशी दलाल ३.१०.लाल देव कामत- सुनैना बेटी- मैथिली सामाजिक उपन्यास (समीक्षा) ३.११.कुन्दन कर्ण- मैथिली बीहनि कथा- न्यूटन्स लॉ ३.१.जगदीश प्रसाद मण्डल- सुचिता (धारावाहिक उपन्यास) जगदीश प्रसाद मण्डल सुचिता (धारावाहिक उपन्यास) 'सुचिता' धारावाहिक रूपेँ छपब प्रारम्भ भेल 'मिथिला दर्शन'मे, जे पहिने प्रिंटमे छपब बन्द भेल आ मात्र पी.डी.एफ. मे ई-प्रकाशित हुअय लागल आ फेर सेहो बन्द भऽ गेल। आ तेँ 'सुचिता'क सेहो छपब/ ई-प्रकाशित हएब बन्द भऽ गेल। अही आलोकमे ई उपन्यास धारावाहिक रूपेँ ई-प्रकाशित कएल जा रहल अछि।- सम्पादक। पहिल पड़ाव दस बजे राधारमण गामसँ भुवनेश्वरक लेल विदा हेता। चारि बजे भोरे राधारमण पत्नीकेँ उठा माएकेँ उठबैत बजला- "माए, दस बजे घरसँ विदा भऽ जाएब।" ओछाइनपर सँ उठैत सुनयना बजली- "पान-छअ घन्टा अखन समय अछि, तैबीच हमहूँ सभ ओरियान कऽ दइ छिअ। पुतोहुजनीकेँ सेहो उठा दहुन जे अपन सभ वस्तु-जातकेँ सेरियौती। हम भानस सम्हारि लइ छी।" माइयो आ पत्नियोकेँ उठबैत राधारमण नित्यकर्ममे जुटि गेला। मनमे अनेको रंगक विचार उठए लगलैन मुदा तइ सभ विचारकेँ मनेमे समेटि अपन जेबाक तैयारीकेँ क्रमश: शुरू केलैन। चारि मास पूर्व राधारमणक रिजल्ट निकलला पछाइत माने आई.ए.एस.क रिजल्टसँ गाममे अनेको रंगक विचार दोरस-तेरस हवा जकाँ बहए लगल। किछु गोरेक मनमे बेहद खुशी भेलैन जे अपनो गाममे, माने कमलपुरोमे, एकटा आई.ए.एस. भेला..! किछु गोरेक मनमे जलन सेहो भेलैन आ अधिकांश लोक ओहन छैथ जे आई.ए.एस.क महत्व बुझिते ने छैथ। अखन तक कमलपुर गाममे, जे हजार परिवारक वस्ती अछि, मात्र एकटा अर्थशास्त्रक प्रोफेसर, तीनटा हाइस्कूलक शिक्षक, एकटा एम.बी.बी.एस. डॉक्टर आ एकटा हाइ कोर्टक वकील मात्र भेला हेन। माने अधिक पढ़ल-लिखल लोकमे मात्र छबे गोटे गाममे भेला अछि। लोअर प्राइमरी स्कूलसँ लऽ मिड्ल स्कूल तक पनरह-बीस गोरे शिक्षक छैथ आ ब्लॉकसँ लऽ कऽ सचिवालय तक सेहो दस-बारह गोरे किरानीक नोकरी करिते छैथ। ओना, गामक आधासँ बेसी नोकरिहारा परिवार अछि मुदा ओ सभ, सभरंगक नोकरी करै छैथ। माने कल-कारखानासँ लऽ कऽ बेवसायी ऐठाम धरि। गामक खेतियो-पथारी नीक अछि, किए तँ गाममे एकोटा धार-धूर नइ अछि जइसँ दाही हएत आ ने उस्सर-खासर आकि बलुआह माटि अछि जे उपजबे ने करत। रौदीक प्रकोप जरूर होइए किए तँ डेढ़ हजार बीघाक गाममे मात्र पाँचटा वोरिंग अछि। तहूमे दूटा नहियेँ जकाँ चलैए, मात्र तीनटा सँ पटौनीक काज होइए। पत्नी आ माएकेँ उठा राधारमण अपन जेबाक तैयारीमे जुटि गेला मुदा ने पिता विलासदेव केँ उठौलैन आ ने हुनकर नीने टुटलैन। माने विलासदेव सुतले रहला। पिताक प्रति राधारमणक मन छेलैन जे अपना समयपर उठबे करता, हम तँ दस बजेमे घरसँ निकलब। जेबाकाल प्रणाम कऽ आसीरवाद लऽ लेब। ओना, दुनू बापूतक बीच माने राधारमण आ विलासदेवक बीच ऊपरे-ऊपर तँ पिता-पुत्रक सम्बन्ध छेलैन्हे मुदा भीतरे-भीतर जे सम्बन्ध पिता-पुत्रक बीच हेबा चाही से नहि छेलैन। तेकर अनेको कारण अछि। अनेको कारणमे प्रमुख अछि जे तीन भाँइक भैयारीमे जेठ राधारमण तँ आई.ए.एस. कऽ लेलैन मुदा छोट दुनू भाँइ सुखदेव आ वामदेव मैट्रिको पास नहि कऽ सकल। जइसँ तीनू भाँइक बीच शिक्षाक दूरी बनि गेल। ई विचार विलासदेवोक मनकेँ कचोटिये रहल छैन। दोसर कारण माने पिता-पुत्रक बीचक दूरीक, ईहो छैन जे वैचारिक रूपसँ पाँच-छह बर्खसँ दुनूक बीच गपो-सप्प आ कोनो काज-उदममे पुछो-आछ नहियेँ जकाँ छैन। तेसर जे दुनूक बीच दूरीक प्रमुख कारण छैन राधारमणकेँ अपना विचारसँ विवाह करब। राधारमणकेँ अपना मनसँ विवाह करैक पाछू पिताक जे मतान्तर छेलैन ओ दहेज लऽ कऽ छेलैन। मैट्रिक पास केलाक पछातिये राधारमणक मनमे किछु एहेन मानवीय विचारक उदय भऽ गेल छल जे विलासदेवक विचारसँ ठीक विपरीत अछि।
कौलेजक पढ़ाइक क्रममे राधारमण अपन मुँहकेँ चुप रखने छला, किए तँ ने अखन पढ़ाइ छोड़ि आगूक किछु करैक अछि माने पारिवारिक विचार आ ने अपना निमित्ते कोनो काजे रहैन। राधारमण सोचि विचारि लेलैन जे अखन मात्र पढ़ब अपन काज भेल आ पिताक जे अपन काज जीवनानुकूल छैन, जइ अनुकूल चलि रहला अछि तइसँ ने हमरा कोनो तेहेन अवघाते अछि जइसँ कोनो विवाद दुनू गोरेक बीच स्पष्ट रूपेँ उभरत। परिवार होउ कि समाज, सभकेँ अपन-अपन जीवन आ जीवन-क्रिया अछि। सुभ्यस्त परिवार रहने राधारमणकेँ पढ़ाइक खर्चमे कहियो कोनो कोताही नहियेँ भेलैन। तइ पाछू ईहो कारण छल जे विलासदेवक मनमे रहैन जे जे सम्पैत अछि तेकर अधिकारी राधारमण सेहो अछिए। जँ कोनो तरहक बाधा उपस्थित करब तँ समाजो आ सरो-सम्बन्धी दुसबे करता। दुसबेटा किए करता जे जँ कहीं बँटबरे करा देलैन तैयो राधारमणकेँ पढ़ैमे असोकर्ज तँ नहियेँ हएत मुदा अपने नाँहकमे दोखी बनबे करब...।
कौलेजक जीवनमे राधारमणक विचारमे बहुत किछु मजगूती एलैन। ओना, अध्ययनक प्रति लगन सेहो नीक छेलैन जइसँ नीक रिजल्ट सेहो होइते रहलैन। अध्ययनक क्रममे राधारमणक चिन्तनशीलता सेहो दिनो-दिन तेना बढ़ए लगलैन जे अपन जीवनक भविसकेँ नीक जकाँ आँकि लेलाह। जइसँ स्वतंत्र जीवनक विचारो आ क्रियो-कलाप सभ अपन नजैरिक आगूमे झलकए लगलैन। जइसँ परिवारक बीचक माने पिताक प्रति जे मतभेद छेलैन ओ राधारमणकेँ महत्वहीन बुझि पड़ए लगलैन। स्पष्ट बुझए लगला जे भैयारी हुअए कि पिता-पुत्र हुअए आकि समाजे किए ने हुअए, सभ अपन-अपन जीवनक कर्तो-धर्तो आ जीवन संचालनक मालिक सेहो अपने होइत अछि। बाहरी जे सम्बन्ध अछि माने भाए-भैयारीक वा पिता-पुत्रक वा परिवार-समाजक ओ ऊपरी होइए, माने बाहरी होइए। जइसँ लोक सम्बन्धित सेहो होइए आ मतभेद भेलापर सम्बन्ध-विहीन सेहो होइते अछि। ओकरो अपन एक सीमा होइ छइ। जइ सीमाक बीच लोक अपन-अपन सीमा निर्धारित करैए।
राधारमणकेँ नोकरीपर जाइक समाचार गाममे सेहो पसैर गेल छल। जइसँ गामक जे शुभचिन्तक सभ छैथ ओ मने-मन बेहद खुशी होइत राधारमणकेँ अन्तिम विदाइक संग भेँट-घाँट करैक समय सेहो बना लेलैन। मुदा जिनका सबहक मनमे जलन माने राधारमणकेँ आई.ए.एस. करैक जलन छेलैन ओ यत्र-तत्र अन्ट-सन्ट बात सेहो तरे-तर परोछा-परोछी कइये रहल छल। गामक अधिकांश लोक ओहन छैथ जे ने डिग्री-डिप्लोमाक अरथे बुझै छैथ आ ने ओकर गुण-धर्म आकि पदे-प्रतिष्ठा बुझै छैथ, तँए ने हुनका कोनो हरखे छेलैन आ ने विषादे। सीतानाथ आ गीतानाथ सेहो बी.ए.मे पढ़ैए। दुनू गोरेकेँ जानकारी छल जे आइ राधारमण भैया गामसँ नोकरीपर जेता तँए भेँट करब आवश्यक बुझि दुनू गोरे संगे राधारमण ऐठाम पहुँचल। पहुँचते दरबज्जापर सँ राधारमणकेँ शोर पाड़ैत सीतानाथ बाजल- "भायजी, यौ राधारमण भायजी?" राधारमण अपन कोठरीमे, माने जइ कोठरीमे रहै छैथ, अपन कपड़ा-लत्ता, चीज-वौस सहिआरि रहल छला। सीतानाथक आवाज सुनि कोठरीए-सँ राधारमण बजला- "के सीतानाथ.! बैसह अबै छी।" कहि अपन चीज-वौस सहिआरब छोड़ि दरबज्जापर एला। राधारमणकेँ देखिते दुनू गोरे सीतोनाथ आ गीतोनाथ एक्केबेर बाजल- "गोड़ लगै छी, भैया..!" जहिना दुनू गोरे दुनू हाथ जोड़ि मुहसँ बाजल छल तहिना राधारमण सेहो दुनू हाथ जोड़ि मुहसँ बजला- "नीक रहअ बौआ। की हाल-चाल छह?" सीतानाथ बाजल- "सभ बढ़ियाँ अछि।" कहि तीनू गोरे तीनू कुरसीपर बैसला। बैसते गीतानाथ बाजल- "घरपर सँ कखन निकलब?" घड़ी देखि राधारमण बजला- "अखन सात बजैए। दस बजे निकलैक विचार अछि।" ओना, सीतानाथ गपो-सप्प कऽ रहल छल आ मने-मन राधारमणक चेहराकेँ सेहो निहारि रहल छल जे मनमे केहेन खुशी छैन। राधारमणक चेहरासँ स्पष्ट दुनू रूप झलैक रहल छेलैन। पहिल, नव जीवनमे पदार्पणक खुशीक रूप आ दोसर अखन तक माने चौबीस बर्खक जे सामाजिक जीवन रहलैन ओइसँ अलग होइक कारणेँ मलिनता सेहो छेलैन। मुदा दुनूकेँ सामंजस करैत राधारमण बीचक सीमापर अपनाकेँ असथिर रखने छला। सीतानाथ बाजल- "भैया, अपने तँ कमलपुरक ओहन सहस्र दल कमल जकाँ बनि गामसँ निकैल रहल छी जेकर महमही देश भरिमे पसरत..!"
सीतानाथक बात सुनि राधारमणक मनकेँ जेना कोनो भारी वस्तु दाबि देने होनि तहिना भेलैन। मनमे उठलैन जे सीतानाथ कोनो अधला बात तँ नहियेँ बाजल। किए तँ देशक कोनो कोण आकि भागमे एक जवाबदेहक रूपमे काज करैक भार पड़बे करत। भारक माने एतबे नहि ने जे नियम-कायदा माने अधिकारक जे कानून-कायदा अछि, तइ अनुकूल अपनाकेँ स्थापित करैत समय बीता ओइठामसँ बदैल दोसरठाम चलि जाइ। एकर तँ दोसरो पक्ष अछि किने। ओ अछि जे ओइठामक जन-मानसक बीच अपन की छवि अछि, तेकरा प्रदर्शित करैक अवसरो तँ अछिए। नीक छवि केना बना पएब ई तँ अपने केने हएत। यएह ने अपन कार्य-शैलीक प्रमुख अंग भेल। अपन देश सभ तरहेँ विशाल अछिए। जहिना लम्बाई-चौड़ाइ अछि तहिना जनसंख्या सेहो अछि। जइमे रंग-रंगक जीवन माने मनुखक जीवन सेहो अछिए। तैसंग अनेको जाति, अनेको भाषा आ अनेको सम्प्रदाय सेहो अछि। जहिना भाषाक बीच, तहिना जाति-सम्प्रदायक बीच किछु-ने-किछु विवाद होइते रहैए। एहेन परिस्थितिमे केना सामंजस करैत अपने-आपकेँ सुरक्षित राखि सकब, नान्हिटा बात थोड़े अछि। तहूमे समाजक बीच एहेन मनोवृत्ति बनि गेल अछि जे जे शक्तिशाली आ बहुसंख्यक अछि ओ शक्तिहीन आ अल्पसंख्यककेँ सेहो सदिकाल निच्चाँ देखबए चाहैए। मनमे उठल घनघोर विचारकेँ सामंजस करैत राधारमण बजला- "बौआ सीतानाथ, कमलोक महमही तखने छिटकैए माने पसरैए, जखन ओकरा पवित्र स्थान भेटै छै। जँ से नहि भेटि दुर्गन्धित स्थान भेटि जाइ छै तखन ओकर महमही थोड़े हवामे पसैर पबैए। मुदा तूँ जे बजलह ओकरो महत तँ अछिए।" गीतानाथ बाजल- "भैया, अपने तँ ओहन डिग्री प्राप्त कऽ लेलिऐ जे सामान्य विद्यार्थीक लेल असंभव अछि।" गीतानाथक विचार सुनि राधारमणक मन थोड़ेक ठमकलैन, मुदा अपने मन जेना भीतरसँ धक्का देलकैन जे जे विचार गीतानाथक मनमे अछि ओ केते सही अछि? राधारमण बजला- "बौआ, जखन आई.ए. पास केलौं आ बी.ए.मे प्रवेश केलौं तखने मनमे उठल जे आई.ए.एस. करब, मुदा जखन देश भरिक प्रतियोगी परीक्षापर नजैर गेल तखन मन आगू-पाछू करए लगल।" आगू-पाछू सुनि सीतानाथ बाजल- "की आगू पाछू करए लगल, भैया?" गीतानाथपर सँ नजैर हटा सीतानाथपर नजैर दैत राधारमण बजला- "बौआ, दू तरहक विचार मनमे उठए लगल। पहिल, ई जे देश भरिक प्रतियोगी परीक्षा छी, जइमे हजारो-हजार विद्यार्थी शामिल होइए आ सामान्य रिजल्ट जकाँ रिजल्टो नहि होइए। जे पास मार्क आनत ओ पास करबे करत आ दोसर ई उठल जे एहनो तँ नहियेँ अछि जे कियो पास करबे ने करैए। अही, दुनू विचारक बीच अपनो मनमे विचार उठि रहल छल।" गीतानाथ बाजल- "तखन, निर्णय केना केलिऐ?" राधारमण बजला- "बौआ, पिताजीक जे कुदृष्टि छेलैन तइसँ मनमे ठना गेल छल जे केतौ-ने-केतौ नोकरी करैक अछि। किएक तँ जँ अपन जीवन माने अपन परिवारक भार अपना कन्हापर उठा नहि चलब तँ सदिकाल परिवारक बीच किछु-ने-किछु विवाद होइते रहत आ अनेरे ओइमे ओझराएल रहब। जखन नोकरी मनमे रोपा गेल तखन विचार उठल जे नोकरियो तँ केते रंगक अछिए। तइमे नीक नोकरी केना पेब सकब तइ ले तँ अपनो ओहन साधना करए पड़त।" गीतानाथ बाजल- "की साधना?" राधारमण बजला- "हाइ स्कूल तक, ओना हाइये स्कूल नहि, कौलेजक आई.ए. तक रिजल्टोक हिसाबसँ आ विद्यार्थियोक बीच हमहूँ सामन्ये कोटिक छेलौं, मुदा बी.ए.मे प्रवेश केलाक पछाइत जेना विचारक नव चेतनक उदय मनमे भेल जइसँ जीवनक क्रियामे बदलाव आबए लगल।" सीतानाथ बाजल- "की बदलाव आबए लगल?" राधारमण बजला- "बदलाव अबैसँ पहिने संकल्प उठल जे या तँ आई.ए.एस. करब वा जँ से नहि भऽ सकत तँ प्रोफेसर बनब। अही दुनू उद्देश्यकेँ अपन प्रणपनसँ पूर्ति करैक पाछू अपन दृढ़ शक्तिकेँ जगेलौं आ दुनियाँक सभ किछुसँ विरक्त होइत अपनाकेँ पढ़ाइक पाछू एकाग्र केलौं।" सीतानाथ- "की एकाग्र?" राधारमण- "अखन जे जीवनक दिनानुदिनक क्रिया अछि ओ तँ सभकेँ पूर्ति करए पड़ै छै, ओ पूर्ति करैत अतिरिक्त क्रियाक रूपमे मात्र अध्ययनपर अपनाकेँ एकाग्र केलौं। ओना, अखन तक जे अध्ययनक रूप छल तइमे सेहो सुधार भेल।" सीतानाथ बाजल- "की सुधार भेल?" राधारमण बजला- "आई.ए. तक जे अध्ययन करै छेलौं ओ सामान्य दृष्टिएँ, परीक्षामे पास करैक खियालसँ करै छेलौं, विषय-वस्तुक तहमे प्रवेश नहि करै छेलौं मुदा संकल्पित भेला पछाइत विषय-वस्तुक मूल तत्वकेँ पकड़ैक प्रयास करए लगलौं। ओना, शुरूमे किछु दिक्कत जरूर होइ छल किए तँ नीक जकाँ विषय-वस्तुक मूल तत्वकेँ नहि पकैड़ पबै छेलौं, मुदा तइसँ घबड़ेलौं नहि, बल्कि ओकरा पकड़ैक परियास सदैत जारी रखलौं।" सीतानाथ बाजल- "तखन की भेल?" राधारमण बजला- "किछु दिनक पछाइत विषयक मूलतत्वकेँ बुझए लगलौं। जखन मूल तत्व बुझए लगलौं तखन जे पाछू उनैट तकलौं तँ बुझि पड़ल जे अध्ययनक बहुत किछु छुटि गेल अछि। तखन ओकरा पूर्ति करैले अध्ययनक समयमे बढ़ोत्तरी केलौं। बी.ए. फाइनल परीक्षामे बहुत नीक रिजल्ट भेल।" सीतानाथ बाजल- "नीक रिजल्ट की भेल?" राधारमण बजला- "जेकर आशा अखन तक मनमे नहि छल, तइ आशाक पूर्ति भेल। माने प्रथम श्रेणीमे ऑनर्सक रिजल्ट भेल। बी.ए. ऑनर्समे प्रथम श्रेणी भेने मनमे एते तँ बिसवास जागिये गेल जे जँ अहिना मेहनत करब तँ एम.ए.मे सेहो एहने रिजल्ट हएत। जखन प्रथम श्रेणीक रिजल्ट एम.ए.मे हएत तखन जरूर केतौ-ने-केतौ, कोनो-ने-कोनो कौलेजमे प्रोफेसरीक नोकरी हेबे करत। जइसँ जे संकल्प मनमे केने छेलौं तइमे आधाक आशा जागि गेल। जखन मनमे आशा जागि गेल तखन बिसवासो जगल।" विचार बदलैत सीतानाथ बाजल- "भैया, ई की कहलिऐ जे पिताजीक कुदृष्टि?" पिताजीक नाओं सुनि राधारमण थोड़े धकमकेला, मुदा ओइ धकमकीकेँ नजैरसँ हटबैत सीतानाथकेँ कहलखिन- "बौआ, पिताजीक कुदृष्टि शुरूमे नहि छेलैन, मुदा जहिया बी.ए. फाइनलमे एलौं तहियासँ शुरू भेल।" सीतानाथ बिच्चेमे बाजल- "कुदृष्टिक तँ किछु कारण ने रहल हएत?" राधारमण बजला- "हँ! कुदृष्टिक कारण ई भेल जे जइ कौलेजमे पढ़ै छेलौं, ओइ कौलेजमे गोविन्द बाबू नामक शिक्षक छेला। सात्विक लोक। डेरासँ तीन किलोमीटरपर कौलेज छेलैन। प्रतिदिन पएरे अबै-जाइ छेला। गोविन्द बाबू जेहने विचारक सात्विक छेला तेहने पढ़बैमे सेहो छेला। एक दिन कौलेजसँ डेरा जाइ छेला कि पाछूसँ गाड़ी धक्का मारि देलकैन।" 'धक्का' सुनि बिच्चेमे सीतानाथ बाजल- "बाप रे..! पछाइत की भेलैन?" राधारमण बजला- "डाँड़क हड्डी तेना थौआ-थाकर भऽ गेलैन जे दू मासक पछाइत मरि गेला। मृत्युक समाचार सुनि हमहूँ गेलौं। अपना लगा चारि गोरेक परिवार छेलैन, माने दुनू परानी आ दूटा बेटा-बेटी। बेटी जेठ जे आई.ए.मे पढ़ै छेलैन आ बेटा छोट जे हाइ स्कूलमे पढ़ै छेलैन।" सीतानाथ बाजल- "बाप रे..! तखन तँ परिवारे..?" राधारमण बजला- "जखन ओइठाम माने गोविन्द बाबूक ऐठाम गेलौं आ तीनू गोरे पत्नी, बेटी आ बेटा केँ ओंघरा-ओंघरा कानैत देखलौं कि मन पघिल गेल। ओना, हमहींटा देखनिहार नहि रही, आरो विद्यार्थियो आ शिक्षको सभ छेला, जे जाइ छेला दस-पनरह मिनट रूकि बोल-भरोस दए घुमि जाइत छेला। मुदा हमरा मनमे ई उठि गेल जे एक तँ परिवारक जीवनो-यापन भारी (कठिन) भऽ गेलैन आ तैपर विवाह करै-जोकर बेटी सेहो भऽ गेल छैन...।" सीतानाथ बाजल- "एहने-एहने परिस्थितिमे नीक-सँ-नीक परिवार नष्ट होइए!" राधारमण बजला- "हँ! सेहो तँ होइते अछि। मुदा विकट परिस्थितिमे माने एहेन-एहेन परिस्थितिमे जँ दोसराकेँ समुचित सहयोग भेट जाइ तँ ओ परिवार बँचियो सकैए किने।" सीतानाथ बाजल- "हँ, से तँ बँचि सकैए मुदा समाजक जेहेन किरदानी बनि गेल अछि तइमे केकरा के सहयोग करैए। गामो आ आनो-आनो गाममे देखै छी जे बाप-बेटाक बीच मारियो-पीट होइए आ केसो-मोकदमा होइए। भाय-भाय तँ सहजे दियादे भेल। कहलो जाइए जे दियाद आ दालि जेतेक गलए तेते नीक होइए।" सीतानाथक बात सुनि राधारमण मुस्कुराइत बजला- "बौआ, सभ दुनियेँ दिस माने अनके दिस तकैए जइसँ अपन पएर तरक जमीन देखिते ने अछि। जँ से देखए लगत तँ अनेरे ने विचारो आ जीवनक गति सेहो सुधरए लगत। जखन गति-मति सुधरए लगत तखने ने जीवनो आ जीवनक क्रियो सुधैर जाएत।" स्वीकार करैत सीतानाथ बाजल- "हँ, से तँ हएत।" राधारमण बजला- "ओइ समय माने जखन ई घटना भेल तखन हमहूँ पूर्ण आश्रित परिवारेपर छेलौं। ओना, जखन बी.ए.मे पढ़ैत रही। पिताजी हमर विवाहक चर्चा उठा देने छेला। जइसँ केतेको कन्यागत सूर-पता लगबए लागल छेला, मुदा पिताजीक जे मांग (दहेज) रहैन तइसँ काज (विवाह) रूकल छल, जे बात अपनो बुझै छेलौं। ओना, सामाजिक परिवेश सेहो ओहने माने अधिक-सँ-अधिक लेन-देनक बनियेँ गेल अछि। तहूमे अपना जमीनो-जत्था अछि, परिवारक सेहो मान-प्रतिष्ठा अछि आ कौलेजमे सेहो पढ़िते छेलौं।" राधारमणक परिवार कमलपुर गाममे सभसँ बीस जमीन-जत्थामे छेलैन। पचास बीघासँ ऊपर जमीन विलासदेवकेँ छेलैन। ओना, जमीन्दारी तँ नहि रहैन मुदा राजक गुमस्ता विलासदेवक पिता हरिहरदेव छेलखिन, जइसँ सम्पैत बटोरैक रस्ता छेलैन्हे। अपना अमलदारीमे हरिहरदेवक दरबज्जापर हाथियो छेलैन। शुरूमे हरिहरदेवकेँ ओतेक अजगज नहि छेलैन, साधारण किसान परिवार रहैन। जे राज्यक सम्पर्कमे एला पछाइत भेलैन। बापक एकलौता बेटा विलासदेव, जे पढ़ि-लिखि तँ नहि सकला, मुदा रईसीक जे जीवन होइ छै से जरूर भोगै छला। ओना, सामान्य लोककेँ पढ़ैयो-लिखैक सुविधा नहियेँ छल, पिताक परोछ भेने माने पिताक मृत्यु भेलाक पछाइतियो विलासदेवक ओहने रईसीक जीवन रहल, मुदा बाहरी आमदनी कमने खेत-पथार बिकब शुरू भऽ गेल छेलैन। गोटि-पंगरा परिवारक उठाइन समाजमे सभ दिनसँ रहबे कएल अछि, तहूमे जइ परिवारक सम्बन्ध राज-काजसँ होइत गेल ओ तँ उठबे कएल। ओहने परिवार हरिहरदेवक सेहो रहलैन। सीतानाथ बजला- "पछाइत की भेल?" राधारमण बजला- "गोविन्द बाबूक परिवारक दशा देखि मने-मन विचार केलौं जे सोल्होअना परिवारक भार उठबैक शक्ति तँ अपना नहि अछि मुदा आंशिक भार उठबैक शक्ति तँ अछिए। जहाँधरि बनि सकत तहाँधरि मदैत करबैन।" सीतानाथ बाजल- "वाह! तखन तँ किछु सहारा ओइ परिवारकेँ माने गोविन्द बाबूक परिवारकेँ भइये गेल हेतैन?" राधारमण बजला- "हम कइये केतेक सकै छेलौं, तखन एते जरूर केलिऐन जे अनुशंसाक नोकरी पत्नीकेँ दियबैमे सहयोग केलिऐन। ओना, तेहेन पढ़ल-लिखल पत्नी नहियेँ छथिन जे शिक्षण कार्य करितैथ आकि ऑफिसेमे लिखा-पढ़ी करितैथ। मुदा कौलेजक पुस्तकालयमे चपरासीक काज भेट गेलैन।" सीतानाथ बाजल- "खाएर, जीबैक किछु आशा तँ परिवारकेँ भइये गेलैन।" राधारमण बजला- "ओतबे मदत नहि केलिऐन। बेटीसँ विवाह करैक भार सेहो गछि लेलिऐन। मुदा ओ गछलयैन एक शर्तपर।" सीतानाथ बाजल- "की शर्त्त?" राधारमण बजला- "जखने पिताजीक कानमे समाचार पहुँचलैन जे राधारमण अपन विवाह अपने ठीक कऽ लेलक तखनेसॅं आगि-बबूला भऽ गेला। विवाहक भीतर जे समस्या छल, जइसँ प्रभावित भेल छेलौं, माने एकटा नष्ट होइत परिवारकेँ सहारा बनि बँचबैक परियास केलौं, तेकर चर्च छोड़ि पिताजी लेनो-देन आ कुलो-खनदानकेँ अगुआ विरोधमे वातावरण तैयार कऽ लेलैन।" सीतानाथ बाजल- "तखन तँ विचित्र संकटमे पड़ि गेल हएब?" मुस्कुराइत राधारमण बजला- "से तँ संकट सोझामे आबिये गेल मुदा मड़ुओ भरि ओइसँ विचलित नहि भेलौं। मने-मन विचारि लेलौं जे अखन पढ़ब हमर मुख्य काज अछि, रहल खर्च-बर्चक, से तँ सम्पैतमे अपनो अछिए। जँ खर्च दइमे बाधा उपस्थित करता तँ कोर्टक शरण लेब आ जहिना विरोधमे पिताजी वातावरण बनौलैन तहिना हुनको सिखा देबैन। मनमे दृढ़ संकल्प रोपि लेलौं।" मुड़ी डोलबैत सीतानाथ बाजल- "पछाइत की भेल?" हँसैत राधारमण बजला- "जहिना साँप धरतीपर टेँढ़-टुढ़ होइत चलैए मुदा बिलमे जेबाकाल सोझ भऽ जाइए तहिना सोझ भऽ गेला। खर्चमे कोनो कोताही नहि केलैन मुदा वैचारिक रूपमे मतभेद बढ़िते गेल। ओना, मतभेदसँ एते लाभ जरूर भेल जे अपन दृढ़ शक्ति आरो बढ़ि गेल। जइसँ जी-जानसँ पढ़ैक पाछू लागि गेलौं। जहिना बी.ए.मे नीक रिजल्ट भेल तहिना एम.ए.मे सेहो भेल। जइसँ एतेक आशा तँ बनियेँ गेल जे नइ कौलेजमे तँ हाइयो स्कूलमे शिक्षक बनबे करब।" राधारमण आगाँ बजला- "पढ़ैक जिज्ञासा आरो उग्र भऽ गेल आ आई.ए.एस. केलौं। सावित्रीकेँ माने गोविन्द बाबूक पत्नीकेँ, कहलयैन जे सुवासिनी संग विवाह कऽ लेब मुदा हमर परिवारक जे स्थिति अखन बनि गेल अछि तइमे विदागरी नहि कराएब। जखन अपना पैरपर ठाढ़ भऽ जाएब तखन विदागरी कराएब।" सीतानाथ बाजल- "भाय साहैब, इच्छा अछि जे अपनेकेँ विदा केलाक पछाइत जाइ, मुदा अहूँकेँ ओरियान-बात करैक अछि। ता अहूँ अपन तैयारी करू, सम्भव हएत तँ दस बजेमे पुन: आबि जाएब।" राधारमण बजला- "बड़बढ़ियाँ।" सीतोनाथ आ गीतोनाथ विदा भऽ गेल आ राधारमण सेहो अपन तैयारीक पाछू लगि गेला। आई.ए.एस.क रिजल्ट भेला पछाइत राधारमण सुवासिनीकेँ सासुरसँ विदागरी करा अपना ऐठाम लऽ एला। दू बर्खक बेटी सुचिता सेहो भऽ गेल छेलैन। परिवारमे सुवासिनीकेँ अबिते पिता विलासदेवक मनमे जलन सेहो दिनो-दिन बढ़िये रहल छेलैन मुदा माइसुनयनाक मनमे कोनो तरहक मलिनता नहि छेलैन। जहिना राधारमणकेँ अपन जेठ बेटा बुझि बेवहार करैत रहली तहिना सुवासिनीकेँ सेहो अपन पुतोहु जकाँ बेवहार करए लगली। पतिक संग माने विलासदेवक संग सुनयनाकेँ कहियो-कहियो कहा-कही सेहो भऽ जाइत रहैन मुदा तइ सभ बातपर कहियो, तेना भऽ कऽ धियान नहि देली। जहिना सभ परिवारमे छोट-मोट काजे वा विचारे-ले कहा-कही होइए आ किछुए समैयक पछाइत मेटा जाइए तहिना होइत रहलैन। जखन विलासदेव भिनसरूपहरमे चाह पीबैत रहैथ, सुनयना लगमे आबि कहलकैन- "बौआ राधारमण आइ काजपर जाएत।" ओना, विलासदेवकेँ सेहो बुझल रहबे करैन। किए तँ तीन मासक ट्रेनिंग केलाक पछाइत, पाँच दिन पहिने राधारमण गाम आबि बाजल छला जे पाँचम दिन ड्यूटी ज्वाइन करए भुवनेश्वर जाएब। उड़ीसाक राजधानी भुवनेश्वर, जैठामसँ थोड़बे दूरपर जगरनाथ धाम सेहो अछि। समुद्रकातक राज्य उड़ीसा छीहे। दरभंगासँ डायरेक्ट गाड़ी सेहो अछिए। पत्नीक बात सुनि विलासदेव 'हँ-हूँ' किछु ने बजला। पतिकेँ चुप देखि सुनयना अपन काजमे पुन: लगि गेली। तैबीच माझिल बेटा सुखदेव आएल। सुखदेवकेँ देखिते विलासदेव पुछलखिन- "बौआ, भोरसँ अखन धरि केतए निपत्ता छेलह?" पिताक लगमे बैसैत सुखदेव बाजल- "बाबू, निपत्ता कहाँ छेलौं। चौक दिस गेल रही। गामक हाल-चाल सुनैमे कनी देरी भऽ गेल।" विलासदेव पुछलखिन- "गामक की हाल-चाल अछि?" तैपर सुखेदव कहलकैन- "गामक की हाल-चाल रहत। यएह हो-हल्ला भऽ रहल छल जे जखन गाममे केकरो आम नहि फड़ल आ जेकरा फड़बो कएल ओहो झाँट-पानि-पाथरसँ सभटा नष्ट भऽ गेल। तेकरे क्षति-पूर्तिक हेतु सरकार दिससँ सहायता भेटत मुदा ओ तँ सभकेँ ने भेटक चाही, माने जेकरा-जेकरा गाछी-कलम छै। से नहि भेटि किछु गोरेकेँ भेटल आ अधिकांश लोक माने गाछी-कलमबला किसानकेँ नइ भेटल..!" विलासदेव बजला- "किए ने भेटल?" सुखदेव बाजल- "जे सभ कृषि मित्रकेँ चौथाइ माने सहायताक चौथाइ रूपैआ कमीशन देलक तेकरा सभकेँ आठे दिनमे भेट गेलइ। मुदा जे ओकरा अनुदान बुझि कमीशन नहि देलक तिनका सभकेँ एको पाइ नहि भेटलैन। तेकरे हो-हल्ला होइत रहइ।" विलासदेव- "फेर भेल की?" सुखदेव बाजल- "की हएत, जहिना सभ अनुदानमे होइत आबि रहल अछि तहिना हएत।" विलासदेव बजला- "की माने?" सुखदेव बाजल- "माने यएह जे गाममे किछु किसान एहेन छैथ जे सरकारी किसान छैथ, हुनका सभकेँ बुझले छैन माने कोनो सरकारी सहायता अबैए तँ कृषि मित्र हुनका सभकेँ जानकारियो दऽ दइए आ अपन कमीशन लऽ कऽ अनुदानो दियाबैए। जइसँ गामक किसान बँटा गेल छैथ।" विलासदेव बजला- "की बँटा गेल छैथ?" सुखदेव बाजल- "किछु किसान सरकारी बनि गेल छैथ। आ बाँकी सभ गैर-सरकारी छैथ।" तही बीच वामदेव सेहो पहुँचल। वामदेवकेँ देखिते विलासदेव पुछलखिन- "बौआ, भोरसँ नहि देखने छेलियह?" वामदेव बाजल- "बाबू, भोरूपहरकेँ जहिना सभ दिन टहलए जाइ छी तहिना गेलौं। दछिनवरिया सड़क धेने जखन करीब दू किलोमीटर बढ़लौं तँ पनरह-बीस गोरेकेँ अबैत देखलयैन। सबहक पीठपर परदेशिया बैग लटकल छेलैन। ओना, अपना गामक एको गोरे नहि छेला। पुछलयैन जे अहाँ सभ केतए रहै छी तँ एक गोरे बजला जे भगवतीपुर रहै छी।" बिच्चेमे विलासदेव बजला- "भोरे-भोर केतएसँ अबै छेला?" वामदेव बाजल- "पुछलयैन जे अहाँ सभ केतएसँ अबै छी, तँ एक गोरे बजला मुम्बइसँ। फेर पुछलयैन जे सभ कियो मुम्बइयेसँ अबै छी तँ सभ कहलक 'हँ', सबहक मुँह-कान सुखाएल बुझि पड़ल।" विलासदेव बजला- "किए सुखाएल छेलैन, किछु भेल रहैन?" वामदेव बाजल- "पुछलिऐ तँ कहै गेला जे जैठाम छेलौं तैठाम करोना बीमारी तेते भेल छै जे सभ कारखाना-कारोबार बन्न भऽ गेल तँए गाम आबि रहल छी। अपनो बुझल छेलाए-हे जे जहिना हैजा, चेचक, स्वाइन फ्लू इत्यादि महामारी लसेरियाह होइए माने एक-सँ-दोसरमे लसैर लगने होइए तहिना करोना सेहो छी, तँए सभ मुम्बइसँ पड़ा कऽ गाम आबि रहल छैथ।" विलासदेव बजला- "बीमारी तँ बीमारी छी, तइ ले भागैक कोन काज छै। ओकर तँ इलाज हेबा चाही किने। तहूमे की कोनो आइये एहेन बीमारी आएल अछि, समय-समयपर एहेन लसेरिया बीमारी तँ सभ दिनसँ होइते आबि रहल अछि।" वामदेव बाजल- "सएह तँ हमहूँ कहलयैन जे गाम-घरमे केकरो कोनो बीमारी होइए तँ शहरक अस्पतालमे जाइए आ अहाँ सभ शहरसँ गाम आबि रहल छी, जैठाम ने डॉक्टर अछि आ ने अस्पताल। तखन एक गोरे बजला जे जखन कारखाने बन्न भऽ गेल तखन ओइठाम खेबो-पीबो की करितौं। तहूमे घरसँ माने डेरासँ निकलैपर सेहो रोक लगि गेल।" विलासदेव बजला- "अच्छा छोड़ह ऐ सभकेँ।" पिताक बात सुनि सुखदेव बाजल- "बाबू, भैया तँ आइ कामपर जेताह?" ओना, विलासदेवकेँ बुझल छेलैन, मुदा अनठबैत बजला- "हमरा कहाँ बुझल अछि। तोरा के कहलखुन?" सुखदेव बाजल- "भैया अपने तँ नहि कहलैन, मुदा पाँच दिन पहिने सुनने छेलौं जे पाँचम दिन राधारमण भुवनेश्वर जेता। ओतइ नोकरी भेलैन अछि।" सभ वस्तुजातकेँ सेरिया राधारमण माएकेँ कहलैन- "माए, समय भऽ गेल। भानस तँ भऽ गेल हएत किने?" सुनयना बजली- "हँ।" माइक बात सुनि राधारमण पत्नीकेँ कहलैन- "बेरा-बेरी जँ खाए लगब तखन देरी भऽ जाएत। तँए हमहूँ खाइले बैसै छी आ अहूँ खा लिअ। समयसँ किछु पहिनहि तैयार भऽ विदा भऽ जाएब। ओना, टेम्पूबलाकेँ सेहो कहि देने छिऐ जे पौने दसे बजे आबि जइहह। साढ़े नअ बजैए, ओहो जइ-घड़ी ने पहुँचल...।" पतिक बात सुनि सुवासिनी 'हँ-हूँ' किछु नहि बाजि भनसा घर दिस विदा भेली। अपना समयपर टेम्पूबला पहुँच हॉर्न बजौलक। हार्नक आवाज सुनि राधारमण कोठरीसँ बाहर निकैल टेम्पूबलाकेँ कहलखिन- "बस, हमहूँ तैयारे छी।" टेम्पूबला गाड़ियेक सीटपर ओङ्गैठ आराम करए लगल। सुवासिनी सासुक कोरामे सुचिताकेँ दैत अपने बैग-एटैची कोठरीसँ निकालि टेम्पूक आगूमे लऽ जा कऽ रखलैन। तैबीच राधारमण माएकेँ गोड़ लागि दरबज्जा दिस बढ़ला। पिताकेँ दरबज्जापर नहि देखि खरिहाँन दिस नजैर उठा-उठा ताकए लगला। ने पिते नजैरपर पड़लैन आ ने दुनू भाँइ सुखदेवे-वामदेवे नजैरपर पड़लैन। एक दिस राधारमणकेँ अपन समय, घरसँ निकलैक समय मनकेँ खिंचैत रहैन तँ दोसर दिस तीनू गोरे माने दुनू भाँइयो आ पितोकेँ नहि देखि मन दोसर दिस सेहो औनाए लगलैन। मुदा उपाइये की। तहीकाल सीतानाथक संग गीतानाथ सेहो पहुँच गेल। ओना, तीनू गोरेकेँ माने दुनू भाँइयो आ पितोकेँ नहि देखि राधारमणक मनमे अनेको विचार उठए लगलैन मुदा तइ सभ विचारकेँ मनेमे दाबि सीतानाथकेँ कहला- "बौआ, घरसँ निकलैक समय भऽ गेल। आब तँ मोबाइलिक जुग आबि गेल तँए गप-सप्प करैत रहिहह।" अपन बढ़ैत सम्बन्धकेँ देखि सीतानाथ बाजल- "भाय साहैब, अहाँसँ बहुत किछु सिखैक अछि तँए सभ दिन तँ नहि मुदा समय-समयपर रस्ता देखबैत रहब। हमरा समैयक तँ ओते महत्व नइ अछि, जेते अहाँक समैयक अछि। तँए नीक हएत जे जखन अपने निचेन रहब तँ कहियो-काल अपनहि फोन करब। आब तँ सहजे महीनवारी मोबाइलिक चार्य भऽ गेल अछि, तँए समैयक पैबन्द सेहो नहियेँ अछि।" सीतानाथक विचार सुनि राधारमण बजला- "बौआ, जखन जे पुछैक जरूरत हुअ, निधोख पुछि लिहह। नोकरी आकि पद अपना जगहपर अछि मुदा अपन जे सामाजिक सम्बन्ध अछि ओकर महत्व अपन अछि। तहूमे अपन इच्छा ई छल जे जँ कोनो कौलेजमे प्रोफेसर बनितौं तँ अपन जे विद्यार्थी जीवनक अनुभव अछि ओ सभ बात विद्यार्थी सभकेँ बुझा कऽ कहितौं, मुदा से तँ भेल नहि।" राधारमणक विचार सुनि गीतानाथ बाजल- "भाय साहैब, एकटा साधारण विद्यार्थी केना नीक विद्यार्थी बनि उच्च कोटिक स्थान पेब सकैए ई अनुभव तँ अपनेकेँ बेवहारिक रूपमे भइये गेल अछि तँए अपनेसँ...।" गीतानाथक विचार सुनि राधारमण मुस्कुराइत बजला- "बौआ, बहुत बात कहबो केलियह आ आगूओ कहैत रहबह। अखन तँ विदा भऽ गेल छी, तँए बहुत बात करैक समय नहि अछि मुदा चलैत-चलैत एकटा बात जरूर कहि दिअ चाहै छिअ जे जाधैर अघ्ययन करै छह ताधैर दुनियाँक सभ किछु बिसैर एतबे धियानमे राखह जे जखन पढ़बेटा काज अछि तखन नीक-सँ-नीक किए ने कऽ सकै छी। जखने मन एकाग्र भऽ काजकेँ पकैड़ लेतह तखने दिनानुदिन अपन उन्नैत होइत देखबह। परीक्षा कोनो किए ने होइ वा केतबो विद्यार्थी किए ने हुअए, मुदा प्रश्न पत्रमे जे प्रश्न रहत ओतबेकेँ तोरा जवाब दइके छह। ओ केना समुचित ढंगसँ समुचित उत्तर लिख पेबह, बस एतबेपर धियान केन्द्रीत करैक छह।" राधारमणक विचार सुनि जहिना सीतानाथक तहिना गीतानाथक हृदय खुशीसँ भरि गेल। आगू बढ़ि राधारमण माएकेँ कहलकैन- "माए, जहिना अखन तक बेटा बनि मनमे रहलियौ तहिना सभ दिन...।" बेटाक बात सुनि सुनयनाक मन दल-दल, थल-थल हुअ लगलैन। दुनू आँखिमे नोर आबि गेलैन। राधारमणक मनमे नाचए लगलैन। पितो आ दुनू भाँइयोक बेवहार देखि माने तीनू गोरेकेँ नहि रहने सुनयनाक मनमे मर्माहत तँ भेबे केलैन मुदा तेकरा मनेमे दाबि बजली- "बौआ, बुड़हा क मन केतबो बगैद किए ने जाइन मुदा पिता तँ वएह छथुन। मनमे कोनो तरहक मान-रोख नहि रखिहह। सभ अपने छथुन आ अपने रहथुन। बेटा धन छह, दुनियाँमे केतौ रहह मुदा अपन परिवार अपने छिअ आ अपने रहतह।" माइक बात सुनि राधारमण सामंजस करैत बजला- "माए, सालमे एकबेर मास दिनक छुट्टी हेबे करत, ओ मासो दिनक छुट्टी गामेमे बिताएब।" अपन कोरासँ सुचिताकेँ सुवासिनीक कोरामे दैत सुनयना बजली- "कनियाँ, दुनियाँमे की अहींटा परदेश बास करब। जेते कमासुत बेटा अछि, जे परदेश नोकरी करए जाइए, सबहक बालो-बच्चा आ पत्नियोँ तँ जाइते अछि। दुनू गोरे प्रेमसँ रहब।" सासुक बात सुनि सुवासिनी अपन दू बर्खक बेटी सुचिताकेँ कोरासँ उतारि बजली- "बुच्ची, दादीमाँ केँ दुनू हाथ जोड़ि, गोड़ लगहुन।" ओना, दुइये बर्खक सुचिता अछि, मुदा आन परिवारक माने गरीब-पछुआएल परिवारक बच्चासँ चफलगर अछिए। आन परिवारक माने पिछड़ल-पछुआएल-गरीब परिवारक बच्चा जे कुपोषणसँ सभ तरहेँ कुपोषित रहैए, से तँ सुचिताकेँ नहियेँ छल। जहिना खेबा-पीबाक अभाव नहि छल तहिना सुशिक्षित माता-पिताक आश्रय सेहो छेलैहे। माइक बात सुनि सुचिता दुनू हाथ जोड़ि सुनयनाक दुनू पएरमे गोर लगलक। सुचिताकेँ गोड़ लगिते सुनयनाक मन एकाएक कलैश उठलैन। कलैशते बजली- "बुच्ची, भगवान नीक करथुन।" तैबीच टेम्पूक ड्राइवर हॉर्न बजौलक। राधारमण अपन समानक गिनती कए, टेम्पूमे बैस चुकल छला, सुचिताकेँ नेने सुवासिनी सेहो आबि बैसली। गाड़ी आगू बढ़ल। (जारी---) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.जगदीश प्रसाद मण्डल- निरन्तर (लघुकथा) जगदीश प्रसाद मण्डल निरन्तर (लघुकथा) जीवनमे निरन्तरता पौने जीवनक आनन्द भेटिये जाइ छै, भलेँ ओकरा आनन्दित जीवन कहियौ वा नइ कहियौ मुदा ओ आनन्दित रहिते अछि, बिना दुनियाँक परवाह केने। काल्हियेसँ पत्नीक संग कनी फुल्ला-फुल्ली भऽ गेल अछि। फुल्ला-फुल्लीक कारण अछि, परसुका कुमरमक नौत-हकार सासुरसँ आएल अछि। अप्पन सासुर भेल, पत्नीक तँ माइये-बापक घर-दुआर बुझियौन आकि अप्पन नैहर। ओना, पत्नी सालमे दू बेर, एकबेर माएसँ भेँट करैक नामपर नैहर जाइ छैथ आ दोसर बेर बापक नामपर जाइ छैथ। कहिया घुमती आकि नइ घुमती तेकर कहा-बधी नइ करै छी। एकर माने पुरुखपना नइ बुझब। एकर माने ई भेल जे अप्पन अधिकार ने अपना घरमे अछि, मुदा माता-पिताक घरक अधिकारी तँ अपने नइ ने भऽ सकै छिऐ, तैठाम घुमतीक गारंटी अपने केना करा सकै छी, तँए मुँह चुप्पे रखै छी। काल्हि पत्नी उत्साहित होइत लगमे आबि बजली- "दुनू बेकतीकेँ नौत-हकार आएल अछि। लऽ दऽ कऽ तँ एकटा गहना अछि मोहरमाला, तेकरो अहाँ बन्हकी लगा नेने छी, बिनु गहने देखि नैहरक लोक दुसत नइ।" पत्नीक विचार अपना मनमे जँचबो कएल आ नहियोँ जँचल। कहब जे लोककेँ एकटा होइ छै, माने 'जँचल' वा 'नइ जँचल', तोरा किए दूटा भऽ जाइ छौ? तोरो विचार भाय नइ काटै छिअह, मुदा हमरो विचारक मानि देबह की नहि? अपना समाजमे, परिवारसँ लऽ कऽ दसगरदा स्थान धरि, जेतेक प्रेमसँ वैवाहिक पद्धति बनल अछि, ओतेक कोनो देवी-देवताक स्थानसँ लऽ कऽ परिवारक आन उत्सव तकमे नइ अछि। माने ई भेल जे, मानि लिअ अहाँ सभसँ पैघ देवता वा भगवान 'महादेव बाबा'केँ बुझै छिऐन, मुदा ओइ स्थानपर गेला पछाइत नचारी छोड़ि आरो किछु कहै छिऐन? तहिना आनो-आन स्थानो आ अपनो परिवारक दोसर-तेसर काज सेहो अछि। एहेन दोसर काज तँ नहियेँ अछि जे बिआहक प्रियगर वातावरण तैयार करैए। माने भेल जे जीवनक जे साहित्य-संस्कृतिक विधान अछि, तइ अनुकूल बाल-सोहरसँ लऽ कऽ विदाइ-सोहर धरि अछि। माने जीवनक मूल केन्द्रबिन्दु विवाह छी। खाएर ऐ सभसँ अपना सभकेँ कोन मतलब अछि, अपना मतलब एतबे ने अछि जेतेक मतलब दू बीघा जमीनबला किसानकेँ छैन। प्रश्न उठैए जे जखन दू समाजक बीच बेटा-बेटीक लेन-देन होइए, तैठाम बिआहक बेवहारिक पक्ष एहेन किए अछि जे सदिकाल आन समाज माने बेटा-पक्ष, दोसर पक्ष माने बेटी पक्षकेँ हेय दृष्टिसँ देखबो करै छैथ आ हेयो मानिते छैथ। जखनसँ दोसर समाज माने बरियाती बनि अपना समाजमे दरबज्जापर अबै छैथ, तखनसँ बेटी पक्षक छाती धक-धक करैत डोलए लगै छैन जे कखन बेइज्जत भऽ जाएब तेकर कोनो ठीक नहि। की यएह छी मानवीय दृष्टि? एक दिस मानवीय सम्बन्ध, माने मनुक्खक जोड़ प्रेमसँ लगबै छी आ दोसर दिस विषवमन नइ करै छी सेहो केना नइ कहल जाएत। खाएर एकरा छोड़ू। पत्नीक विचार सुनि चुप्पे-चाप, माने पत्नीकेँ बिनु कहनहि, बन्हकीबला ऐठाम गेलौं। जाइते ओ सूचना देलैन जे छह मास भऽ गेल, आब गहना तमादी भऽ जाएत। बहुत सूदि भऽ गेल अछि। जहिना बनिया कहलैन तहिना अपनो ओकरा हँसीमे लैत कहलयैन- "ई रोग की कोनो आइये अहाँ सभमे भेल अछि आकि पुस्तैनी अछि। केते हिसाब अछि, सएह बुझए एलौं हेन।" मनकेँ मना लेलौं जे सम्बन्धमे ऐसँ बेसी तीखपन नहियेँ नीक। बनिया महाजन ऐठामसँ घुमला पछाइत, चुल्हिपर राखल कोनो बरतनक पानिमे जहिना निच्चाँसँ आगिक ताव देला पछाइत तरंग उठैए तहिना मनमे उठए लगल। जैठाम हमरा सन किसान परिवारक एहेन स्थिति अछि, जे कृषि काजसँ जुड़ल रहनौं, आजुक ऐ मशीनी युगमे माने एकैसमी सदीक वैज्ञानिक युगमे, की एकोटा ओहन मशीन किसानक हाथ एलैन अछि। हो-हा मे कियो दमकल कीनलैन तँ बोरिंगक पाइपे फुटि गेल रहैए आ केतौ इंजन-बोरिंगमे लगल रहैए तँ बिजलीए बेमाक रहै छै। यएह तँ छी छोट किसानक जिनगी। तैठाम जँ हमरा सन परिवारमे मोहरमाला सन गहनाक लौल महिलाजगतमे अछि तँ ओ ओकाइतसँ बेसी नइ भेल तँ की भेल। हर मनुक्खकेँ अपन ओकातिक सीमाक जानकारी राखक चाही। भाय, जिनगी ठट्ठा नइ ने छी जे सुतब खढ़पर आ सपना देखब नअ लाखक..! भीतरे-भीतर पत्नीपर मन तरंगि गेल, मनमे भेल जे किए ने 'मोहरमाला'क दाम लगा बेचबेक गप-सप्प कऽ लेलौं। पत्नीकेँ टिटकारि देबैन जे ऐसँ नीक नबका मोडलमे दोसर गहना देब। स्त्रीगणोकेँ कि ठकब असाध काज थोड़े छी। भेल तँ साए रूपैआक साड़ीकेँ पान साए दाम कहि दियौन ओ तिरपित भऽ जेती। तहिना दोसर दिस पान साए रूपैआक साड़ीकेँ साए रूपैआ कहि दियौन, भऽ गेल दुनू परानीमे फुल्लम-फुल्ला। ओ किए अहाँक दशा वा परिवारक दशा देखती, महिलाकेँ पुरुखक बराबरीक अधिकार हौ, नीक बात, मुदा तइसँ पहिने परिवारकेँ देखैक दृष्टिकोण आ एक ढंगसँ चलैक कर्तव्य सेहो अछि किने। खाएर दुनियाँदारीक बात छोड़ू, जखन अपना घरमे फुल्ला-फुल्ली भेल अछि तखन अनका घरक बात सुनैले जे निरलज जकाँ चकभौर मारब से बेबकूफपने ने हएत। मनमे जेना पाँतीक विराम अबैए तहिना आएल। पत्नीक संग फुल्ला-फुल्लीक विचार मनमे दौड़-बरहा करए लगल। दौड़ैत-दौड़ैत मन पहुँच गेल राजा भरथरीपर। अपना केतबो दशा अखन तक भेल अछि मुदा भरथरी जकाँ पत्नीक मनसँ ओतेक बिमुख तँ नहियेँ ने भेल छी जे घर छोड़ि पड़ा जाएब आ पेटक खातिर पिंगले ऐठाम जा कऽ भीख मांगब। जखन पिंगलाकेँ तियागि देलौं तखन दोहरा कऽ ओकर मुँह किए देखब। महाजन ऐठामसँ हेराइत-भोथियाइत घरपर पहुँचलौं। अपना ऐठाम दू रंगक कौआ होइए। एकटा होइए कागकौआ आ दोसर होइए कारकौआ। कागकौआक बोलकेँ लोक शुभ मानै छैथ आ कारकौआक बोलकेँ अशुभ। कागकौआ जकाँ पत्नी आगुएसँ टाँहि मारि बजली- "महाजन ऐठामक काज भेल की?" एकाएक मनमे उठल जे बजलौं तँ केतौ नहि, मुदा पत्नी केना बुझि गेली? मुदा लगले अपने मन कहलक, भरिसक गहनाक जे चर्च केने छेली सएह हीयमे गड़ि गेल छैन। अजेगर साँप जकाँ गेरुली मारि बजलौं- "ओही काजमे ने लगल छी।" संजोग बनल, बिच्चेमे पत्नीकेँ कोनो बिसरल काज मोन पड़लैन। हमरा मुहल्लत दैत आगू बढ़ैत बजली- "अखन छुट्टी नइ अछि तँए बेसी गप नइ करब। पहिने काज केने अबै छी तखन आगूक गप करब।" अनका जकाँ अपना नइ भेल, किए तँ आनगोटे पत्नीकेँ कहै छथिन पहिने गप कऽ लिअ, पछाइत काज बुझल जेतइ। मुदा अपना विचारमे से नइ अछि, अपने काजकेँ जीवनक गति-विधि बुझै छी, तँए काज छोड़ब भेल जीवन छोड़ब। पत्नीकेँ काज दिस सुमुख होइते मनमे राग आएल। राग ई आएल जे जीवनमे जँ संगी नइ रहल तँ ओ जीवन कोनो जीवन नइ भेल। मुदा पत्नीक जे नैहर जेबाक तगेदा मनमे छल ओ दोसर दिस भकमुड़ि गेल। भकमुड़ि ई गेल जे दुरागमनक पछाइत, अखन बिआह-दुरागमन संगे होइए। तइसँ एत्ते तँ लाभ भइये रहल अछि जे पहिलुका जकाँ आब गाए-महींसिक पोसियाँक फरिछौठ जकाँ आब नइ होइए। पहिने दुरागमनसँ पूर्वे नैहरेमे धिया-पुता होइ छल। आब तँ समाजो आ अपन माइयो-बाप दुनियाँ दिस धकेल विदा कइये दइ छैथ जे दुनियाँ कनियेँटा थोड़े अछि जे घुरि-घुरि एकटा मालाकेँ एक साए आठ बेर जप करैत रहू। दुनियाँ तँ दुनियाँ छी, करैत चलू, देखैत चलू, छोड़ैत चलू आ आगू बढ़ैत चलू। मन तेते घोर-मट्ठा भऽ गेल जे की नीक की अधलाह से बुझैक विवेके खतम भऽ गेल। भाय, 'समाप्त' आ खतमकेँ एक नइ बुझब। 'समाप्त'क माने 'विराम' होइए आ 'खतम'क माने 'मृत्यु' सेहो होइए। अपना मनमे से नइ भेल। ओना, आँखि तँ झलफलेबे कएल मुदा विवेक फरीच छल। विचार देलक जे अपना समाजमे अदौसँ शिक्षाक एहेन पद्धति रहल अछि जे बिना मूल्यक, माने बिनु दैछना लेने एक-दोसरक सवालकेँ उत्तरो दइ छैथ आ जँ काजक दौड़ रहल तँ काजक कला (हुनर) सेहो दइ छैथ। किसानी जीवनक जे दुनियाँ रहल अछि ओ पूर्ण जिनगीक रहल अछि। माने किसानीक सभ क्रियामे दानक कोनो मूल्य नहि रहल अछि। माने भेल जे खेतीक कोनो काजक प्रक्रिया होउ आकि परिवारेक क्रिया, माने घर बनाएबसँ बच्चाकेँ पढ़ाएब-लिखाएब, बिआह-दुरागमन कराएब इत्यादि धरिक, राय-विचारक दानकेँ कोनो मूल्य नहि दिअ पड़ै छल, मुदा आजुक परिवेश एहेन भइये गेल अछि जे ओकर मूल्य माने कीमत दिअ पड़ैए। चिड़ै-चुनमुनी जहिना अपन बीतोसँ छोट पेट ले भरि दिन तवाह भऽ उड़ैत रहैए तहिना भऽ गेल अछि। आने जकाँ अपनो मनमे दुनियाँक प्रति, माने परिवारसँ समाज धरि, राग-विराग उठए लगल। जहिना धरतीपर एकोअना लोक एहेन नइ हेता जे पत्नीसँ झगड़ा करिकऽ भलेँ घरसँ भागल नइ हेता मुदा कमसँ कम खेनाइ वा जलखै एक्को साँझ नइ बाड़ने हेता। विराग भेला पछातियो तँ भरथरीए ने पिंगलाकेँ अपन दुखरा सुनबैत रागियो बनिते छैथ। मनमे अपने उठल जे गामोमे तँ ओहनो लोक छथिये जे हँसैत-खेलैत दुनियाँक संग चलै छैथ। मनमे जेना बिढ़नी कटला पछाइत उड़ी-बीड़ी उठैए तहिना उठि रहल छल। तैसंग मने-मन ईहो हुअए जे अप्पन घरक बात लोककेँ केना कहबै। सभ बुझिते छी जे अपन हारल आ बहुक मारल लोक अनका लग नइ बजैए। कोनो विचार भाँजपर चढ़बे ने करए। जेमहर देखी तेहमर कुभाँजे भऽ जाए। ताधैर मन रविकान्त काकापर चलि गेल। रविकान्त काकापर नजैर पहुँचते जेना मनमे थोड़ेक तुष्टि भेल। तुष्टि भेल हुनकर जीवन देखिकऽ। आजुक परिवेशक अनुकूल ओ अप्पन जीवन धारण केने केना सफल शिकारी जकाँ जीब रहला अछि। शिकार करैक प्रथा अपना ऐठाम सभ दिनसँ रहल अछि, मुदा से अखन नहि, अखन बस एतबे जे के कोन तरहक शिकारी बनिकऽ केहेन शिकार करै छैथ। गाममे रविकान्त काका ओहन लोक छैथ जे लाखो लोकक बीच अप्पन जीवनक परिचय देने छैथ। ओ निर्विवाद रूपेँ मानि रहला अछि जे जातीय उन्माद लोकक मनकेँ तेना मोथि देने अछि जे नजैर बन्हाकऽ एक सीमामे केन्द्रित भऽ गेल छइ। एकर जीवन्त उदाहरण आँखिक सोझमे अछि जे जातीय दृष्टिसँ समाजक ओहन लोक जे निच्चाँसँ अबै छैथ, ओ जँ कला वा विज्ञान वा कोनो पैघ ज्ञान अप्पन कर्मसँ अर्जित करै छैथ, तिनको आगूक लोक माने ऐगला जाइतिक सीढ़ी, निकृष्ट नजैरसँ नइ देखै छैथ, सेहो केना नइ कहल जाएत। खाएर जे अछि ओ सबहक सोझेमे अछि, तइसँ अपने आकि रविकान्ते काकाकेँ कोन मतलब छैन, मतलब अछि अप्पन जीवन आ अप्पन कर्तव्यसँ। रविकान्त कक्काक परिवार थोड़ेक नमहर छैन। माने पाँचक श्रेणीसँ निच्चाँक नहि छैन, दसक श्रेणीसँ ऊपर छैन। मुदा, की विशेषता हुनकामे छैन जे सभसँ जुड़ल जीवन छैन। अखन एतबे। चौदह गोरेक परिवारक बीच रविकान्त काका किसानी जीवनसँ जुड़ल रहितो अप्पन जीवन-यापन ओइ रूपमे केने छैथ, जइ रूपकेँ कहल जाइए जे 'हम सबमे, सब हममे'। मन मानि गेल जे रविकान्ते काका टा अप्पन बेथासँ मुक्ति दिया सकै छैथ। विदा भेलौं। पहिनेसँ रविकान्त काका चिन्ह कऽ बैसल छला आकि आगूमे पड़ला पछाइत चिन्हलैन, से तँ ओ जानैथ मुदा निशाएल लोक जकाँ देखिते बजला- "बालगोविन्द, अहीं सभक देश-दुनियाँ छी, जेना राखी।" रविकान्त कक्काक विचार कोनो भाँजेपर ने चढ़ल। मुदा जहिना लोक लग, लोक अपन लाज बँचबैक कोशिश करैए, तहिना अप्पन बीच-बचाव करैत बजलौं- "काका, ई अहाँ सन भेल जे हम्मर प्रणाम करब पछुआएले अछि आ अहाँ की-कहाँ कहै छी।" अप्पन विचारकेँ सम्हारैत रविकान्त काका बजला- "की कहाँ, कहाँ कहलियह। तोहर रंग-रूप देखि मुहसँ निकैल गेल। एकर मद्दी नइ दहक।" मनमे भेल, मुहसँ जे विचार निकैल गेल ओ वाण स्वरूप ने आगू बढ़त आकि मद्दी नइ दऽ ओकरा गरभेमे नाश कऽ देबइ? मुदा बजलौं किछु ने। बजलौं एतबे- "रंग-रूप देखि देबहरिया सभ चिन्हैए, अहाँ केना चीन्ह गेलौं?" हमर बात सुनि रविकान्त काका ठहाका मारिकऽ तँ नहि मुदा मुस्कुरीसँ आगू बढ़ि, हँसैत बजला- "देखबहक जे कोनो मूर्ति हुअए। ओ चाहे माटिक मूर्ति हुअए कि पाथरक आकि कागजपर छापल हुअए कि भीतपर पाड़ल हुअए, ओकर रंग-रूप देखि अप्पन मन ओहने खुशी वा दुखी होइए, जेहेन जीवन रहैए।" रविकान्त कक्काक विचार सुनि अपन मन धकचुकाए लगल। तँए कहलयैन- "काका, नीक जकाँ नइ बुझलौं?" अप्पन हारि देखि आकि समाजक चलैन देखि, समाजक बात-चीतक चलैनमे एहेन अछिए जे झूठो-फूस जोड़ि लोक अप्पन जानकारीक परिचय दइते अछि, तइ अनुकूल कहलौं अछि। हम्मर पैछला जीवन रविकान्त काका आंकि नेने छैथ। समाजक बीच शिकारी वएह सभ ने भेला जे जीवनक हर क्षेत्रक एक-एक पहलूकेँ आँकि अप्पन शिकारक वन निर्मित कए, शिकारी बनि जीवन गुदस करै छैथ। अप्पन आँकक अनुकूल रविकान्त काका सेहो आँकि नेने छैथ जे बालगोविन्दक जीवनमे निरन्तरता नइ अछि। जँ निरन्तरता रहैत तँ एक दृष्टिक अनुकूल एक्के स्थानपर ठाढ़ भऽ एकरंग समाज वा दुनियाँकेँ देखैत, मुदा से तँ नहि अछि। पुरुख-नारीक बीच खाली प्रकृतिके दूरी नइ अछि बल्कि जीवनक असंख्य पहलूक दूरी सेहो अछि। रविकान्त काका बजला- "बालगोविन्द, तोरा हम की कहबह, तूँ ते अपने सभ किछु जनै छह।" रविकान्त कक्काक विचार सुनि मनमे तुष्टि एबे कएल, किए तँ हर मनुक्खक एहेन मरल संस्कार बनियेँ गेल अछि आ बनितो अछिए जे सभ किछु जनिते छी, सभकिछु हमरा बुझले अछि। बुझले टा नहि अछि, अनकासँ बेसी बुझै छी। भलेँ चाइन परक चानन देखि अरबा चाउरक पीठारसँ सिरा आगू किए ने छछाड़ल देखि पड़ए..! बिनु विचारले बजा गेल- "काका, जँ अपने सभ किछु जनितौं तँ घरसँ बहार धरि, माने पत्नी लगसँ लऽ कऽ बनिया-महाजन तक, अहिना दुतकार पेबितौं।" रविकान्त काका बजला- "बालगोविन्द, अनकर बात नइ कहै छिअ जे झूठ-फूस हएत। तोरा परिवारक बीच जीवनक निरन्तरता नइ छह। अप्पन सम्बन्ध बुद्धिनाथ भायसँ भेँट भेला पछाइत केना निरन्तर अखन तक चलि रहल अछि, मात्र चलिये नहि रहल अछि, बढ़ितो चलि रहल अछि आ तोहर?" रविकान्त कक्काक विचार सुनि मनमे ठहकल। ठहकल ई जे खिस्सा-पिहानीक जँ जीवनधार चलैए तँ जीवनक किछु-ने-किछु एहेन अमूल्य रत्न धारामे भेटिते अछि जे अपनो जीवनक रत्न बनैए। अपने मनमे शंका ईहो हुअए जे जहिना घटिया लोक कहियौ आकि असज्जन बेकती, ओकरा संग मित्रता जोड़ैये काल मनमे शंका समा जाइ छै जे ई मित्रता केतेक दिन चलत आ कोन रूपेँ चलत। तँए राम-रामक लूट सम्भव भइये जाइए। माने कखन तक रहत आ कखन जाएत, तेकर कोनो ठेकान नहि। मुदा सज्जन लोकक मित्रता विश्वास भरल पात्रक होइए। ओ ई होइए जे दुनियाँक हर जीव-जन्तुमे एहेन गुण होइए जे किछु दइते अछि, लइ किछु ने अछि। ओना, महाकवि विद्यापति सेहो लोकेकेँ देखिये कऽ कहने छैथ- 'सज्जन जनसँ नेह कठिन थिक'। मुदा नेह करबे कठिन छी, तेतबे नहि, नेह भेला पछाइत निमाहबो कठिन थिक। जेकरामे जेहेन निरन्तरता रहत ओ तेहेन रूपमे चलैए। जँ से निमाहैक शक्ति बना सकी तँ निश्चये राम भक्त हनुमान जकाँ भइये जाएब। 'लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल'। सज्जन सिर्फ शब्द नहि छी, जेकर माने बुझै छिऐ सोझ-सपाट लोक। सज्जनपन जीवन छी। ओ जीवनधारमे ओहन बेकती-बेकतीक अपन-अपन धारा सेहो प्रवाहित होइते अछि। मुदा ओइ प्रवाहकेँ जखन सामाजिक धारामे सम्मिलित करैत प्रवाहित बनबए चाहब, तखन टकराहट होइते अछि जे स्वभाविक सेहो अछि। पहाड़क ऊपरसँ प्रवाहित होइत झरनाक पानि जखन दोसर पहाड़क झरनाक पानिमे समाहित हुअ लगैए तखन अप्पन-अप्पन प्रवाहक गतिक अनुकूल समावेश करिते अछि। अपन जीवनक विपरीत दिशामे बुद्धिनाथ भाइक नाम सुनि, अपने मन धिरकारलक। धिरकारलक ई जे किए ने बुद्धिनाथ भाइक गाथाकेँ धियान लगा अपनो जीवन दर्शन बनाबी। बजलौं- "काका, अहाँकेँ बुद्धिनाथ भायसँ केना सम्बन्ध बनल आ अखन कोन रूपमे अछि से कनी..?" हेराएल चीज भेटला पछाइत जहिना मनमे खुशी होइए तहिना रविकान्त कक्काक मनमे सेहो भेलैन। जहिना एक्के सुरिमे कियो एक-सँ-साए तक गनि लइए, गनि तँ जरूर लइए मुदा अंकक माने ई नइ बुझैए जे एक आ साएमे केतेक दूरी वा अन्तर अछि, तहिना एक्के सुरिमे रविकान्त काका बजला- "बौआ, बुद्धिनाथ भाय आइ.ए.एस.क डिग्री प्राप्त कएल बेकती छैथ। जखन ओ आई.ए.एस. नहि भेल छला तइसँ पहिनहि ओ अप्पन साहित्यिक परिचय दऽ देने रहैथ।" रविकान्त काका जहिना बजला तहिना अपनो बुझि गेलौं, मुदा मनमे तेतेक रंगक जिज्ञासा जगि गेल जे आरो गहाराइसँ बुझैक इच्छा भेल। तँए अनेरे मुहसँ निकैल गेल- "साहित्यिक बात कनी नीक जकाँ कहियौ, काका?" रविकान्त काका बजला- "बुद्धिनाथ भाइक लिखल कथामे एकटा कथा पढ़ैक मौका हमरा हाइये स्कूलमे भेटल छल। हाइ स्कूलमे मैट्रिक कुलेशनमे जे कथा संग्रह पढ़ाइ होइ छेलै, तइ संग्रहमे। कथाक गढ़ैन देखि मनमे तुष्टि आएल जे एहेन कथा हमहीं कि सभ लिखि सकैए। दोसर उत्कंठा कथाक सही सोचक दिशासँ भेल। सचमुच जइ समयक कथा छी, मध्यवर्गीय जीवनक सच्चाइ छी।" बजैत-बजैत रविकान्त काकाकेँ ओहिना भेलैन जेना दूरक सफरमे गाड़ीमे पेट्रौल सठने होइए। मुदा गाड़ीए जकाँ पाछूसँ धकियबैत बजलौं- "काका, जहिना धोती वा कुर्ता जखन पहिरै-जोकर होइए, माने अंगक सिनेह अङेज लइए, तखन ओ फटिये जाइए, तहिना अहाँ किए बिच्चेमे..?" ओना, रविकान्त काका फटल नहि छला, विस्मित भऽ गेल छला, हमर बात सुनि विह्वल होइत बजला- "बौआ, बुद्धिनाथ भाइक जीवन अनमोल रहलैन अछि। बच्चेसँ जे धियान धारणाकेँ धारण केलैन आ कौलेज-जीवन तकक रिजल्ट जे रहलैन, ओ जहिना लंकामे प्रवेश करैसँ पहिने एकचलिया हनुमान समुद्र लंघन केने छला तहिना ओ एक स्तरक परीक्षाफल प्राप्त कऽ लेलैन। जे हुनका आई.ए.एस. तक पहुँचा देलकैन।" अखन तक अपना समाजमे दू तरहक धारा प्रवाहित होइत रहल अछि। पहिल- शासन-धारा, जेकरा राजधारा सेहो कहि सकै छिऐ आ दोसर अछि- जन-धारा, जे सामाजिक जीवनमे जन्म लइत चलैए। समाजक अधिकांश जाति राज-धारासँ सेहो सम्बन्धित रहला अछिए। कर्म विभाजित जाइतिक कर्मसँ समाज सेहो ठाढ़ अछिए। जीवनक हरक्षेत्रमे ओकर खगता छइहे। जे परिवार राज-धारासँ सम्बन्धित रहल अछि ओकर विचारेटा नहि, बेवहारोमे जन-धारासँ दूरी बनले अछि। बुद्धिनाथ भाइक परिवार उच्च जाइतिक होइतो ओइ धारासँ, माने राज-धारासँ अलग रहलैन। पाछूसँ उधकियबैत बजलौं- "काका, एना बीच-बीचमे गाड़ी रोकि किए दइ छिऐ। चक्कामे केतौ चोरसिलिप ने ते अछि।" हृदय खोलि रविकान्त काका बजला- "चोरसिलिप नइ अछि, कखनो-कखनो गाड़ीमे हब-कप ढील भऽ जाइए तँए भेकम कम बेसी भऽ जाइए।" शुरूसँ अन्त धरिक जीवन एक स्वस्थ प्रशासक रूपमे बुद्धिनाथ भाइक रहलैन। सेवा निवृत्त भेला पछाइत, ताधैर रविकान्त काका सेहो एक जीवन टपि दोसर जीवनमे प्रवेश कऽ चुकल छला, पछाइत पुन: हुनकामे लिखब-पढ़ब जगलैन। बीचक समय व्यस्तताक कारणेँ अव्यवस्थित भइये गेल छेलैन, जइसँ जीवन अस्त-व्यस्त रहलैन। बजलौं- "अपनेक जे सुतल विचार, हाइ स्कूलक कथा अपनेक मोने अछि, ओ पुन: केना जगल?" रविकान्त काका बजला- "ओना, सतासीक (1987 ई.क) बाढ़िक साल घरक चुबाठ तेते भेल जे सभ किताबकेँ दिवार खा गेल। तँए पहिलुका किछु रहल नहि। मनमे उठल जे किए ने बुद्धिनाथ भाइक ओ कथा पुन: पढ़ी। मुदा मनक विचार मनेमे औनाइत रहल। जे निरन्तरता एलासँ अपने हाथे माने बुद्धिनाथ भाइक हाथे प्राप्त भेल। फोनपर बुद्धिनाथ भायसँ सम्बन्ध बनल। ओना, कार्यक्रममे माने साहित्यिक कार्यक्रममे केता बेर चेहरा देखि चुकल छेलिऐन, मुदा प्रणाम-पातीसँ बेसीक सम्बन्ध नहि छल।" अपने बजा गेल- "तेकर पछाइत की भेल?" रविकान्त काका बजला- "आग्रह केलिऐन जे 'अपने पैछला पीढ़ीक जीवित सम्मानित रचनाकार छी, किछु कथा हमहूँ लिखलौं, से अपने कने सुधारि दैतिऐ'। तैपर हलैसकऽ ओ कहलैन, 'पठा दिअ'।" अपना सुनल अछिए जे एक-एक कथा वा कविता शुद्ध करैमे मासक-मास समय खिंचा जाइए, तैठाम हुनकर गति-विधि केहेन छैन, यएह सोचि बजलौं- "केहेन सुधार केलैन?" मुस्कुराइत रविकान्त काका बजला- "सुधार तँ ओहने केलैन जे आइ छी।" तही बीच दोसर महानुभाव पहुँच गेला। महानुभाव भेला ओहन बाहरी लोक जे अपनासँ कनी दूरपर अछि। माने परिवारक हिसाबे दोसर परिवारक आ समाजक हिसाबे दोसर समाजक। ओना, जँ निच्चाँ-ऊपर गज-फीतासँ नापए चाहब तँ ओकरो लंकाक हनुमान जकाँ नाङैर बढ़िते जाएत मुदा से अखन नहि। दरबज्जापर, माने रविकान्त कक्काक दरबज्जापर जखन अभ्यागत पहुँच गेला तखन अप्पन गाम-घरक विचारक गप-सप्पकेँ विराम दिअ पड़त ने। ओना, अपना मनमे एकटा तेसरे विचार उठि गेल। मुदा से बजलौं नहि। तेकर फल ई भेल जे अपने-अपने विचारमे तेना बोहिया गेलौं जे अभ्यागतक संग रविकान्त काकाकेँ की गप-सप्प भेलैन से सुनबे ने केलौं। अपना मनमे उठि गेल छल जे एक दिस साढ़े पाँच क्विन्टल माने मोंट-सोंट लोक छैथ, दोसर दिस पनरह-बीस किलोक नहि अछि, सेहो केना अपना मने मानब। एकरा फूसि केना कहबै जे एक दिस तल्लाक बीच तल्ला साए तल्लाक बीच लोक सुतैए आ दोसर दिस आम-कटहर पीपर-बड़क निच्चाँक घास-फूसपर नइ सुतैए, सेहो केना नइ कहबै। तही बीच चाह आबि गेल। अप्पन-अप्पन विचारसँ आगू बढ़ि जीवनक चाहक विचार, तीन घोंट चाह पीलाक पछाइत उठए लगल। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.नन्द विलास राय- फादर्स डे नन्द विलास राय फादर्स डे छअ बजे साँझमे चौकपर एलौं। मोबाइलमे फेसबुक खोललौं तँ देखै छी कताक गोटा अपन-अपन पिताजीकेँ सम्मान कऽ रहला हेन। कियो अपना पिताजीकेँ आरती देखा रहल छैथ तँ कियो फूलक माला पहिरा रहल छैन, कियो अपना हाथसँ अपना पिताजीकेँ रसभरी मिठाइ खुआ रहल छैथ तँ कियो पएर छुबि प्रणाम कऽ रहल छैन। एक गोरे अपना बाबूजीक सम्मानमे एकटा कविता लिख कऽ पोस्ट केने रहैथ आ एक गोरे अपना पिताजीपर आलेख लिख फेसबुकपर देने रहैथ। हमरा बुझबामे कोनो भांगठ नहि रहल जे आइ फादर्स डे छी। हमहूँ फेसबुकपर लिखलौं- 'तीनू लोकमे माए-बाबूसँ बढ़िकऽ कियो ने छैथ।' ऐ एक वाक्यकेँ पोस्ट केलाक थोड़ेकालक बाद पुन: फेसबुक खोलि देखए लगलौं। पूरा फेसबुकपर फादर्स डेसँ सम्बन्धित फोटो, कविता आ आलेख छल। यएह सभ देखैत-देखैत हमर नजैर एकटा फोटोपर आबिकऽ अँटैक गेल। ओ हमर मित्र रंजीतक फोटो छल। फोटोमे रंजीत अपन दिवंगत पिताजीक तस्वीरपर माला पहिरा आरती देखा रहल छला। रंजीत हमर गौंआँ। पहिला वर्गसँ इन्टर धरि हम दुनू गोरे संगे पढ़लौं। तँए दुनू परिवारमे दोस्तीआरे भऽ गेल अछि। रंजीतक पिताजी भिखारी काका एकटा साधारण खेतीहर मजदूर। दुनू परानी माने भिखारी काका आ सुगिया काकी बोइन-बुत्ता करि कऽ रंजीतकेँ इन्टर पास करौलखिन। जखन लालूजी माने मुख्यमंत्री श्री लालू प्रसाद यादवजीक सरकारमे शिक्षा मित्रक लेल विज्ञापन निकलल तँ रंजीतो आवेदन केलक। हुनकर माने रंजीतक बहाली शिक्षा-मित्रक पदपर भऽ गेलैन। पछाइत श्री नीतीश कुमारजी बिहारक मुख्यमंत्री भेला तँ शिक्षा-मित्रकेँ पंचायत शिक्षकक दर्जा दऽ स्थायी कऽ देलखिन आ पनरह साए रूपैआ प्रति मास मानदेयकेँ बढ़ाकऽ चारि हजार रूपैआ प्रति मास कऽ देलखिन। आब ते सहजे पंचायत शिक्षकक वेतन कहियो आकि दरमाहा कहियो आकि मानदेय कहियौ, तीस हजार टकासँ बेसीए प्रतिमास भऽ गेल हेन। खाएर जेतेक भेल हेन पंचायत शिक्षक आकि प्रखण्ड शिक्षक केर भेल हेन तइसँ हमरा कोन लाभ...। हँ तँ रंजीतकेँ अपना पिताजीक फोटोपर पुष्पक माला पहिरा आरती देखबैत देखलौं। हमरा हँसी लागि गेल आ तीन बरख पहिलुका बात मोन पड़ि गेल। सिनेमाक रील जकाँ एक-एक घटना हमरा आँखिक सोझमे आबए लगल। रबि दिनक समय रहए। बाजारक काजसँ हमरा निर्मली जेबाक छेलए। अपना तँ एकटा साइकिल अछि सेहो पंचर भऽ गेल छेलए। रंजीतकेँ मोटर साइकिल छइ। ओहो बरमहल निर्मली बाजार जाइत-अबैत रहैए। सोचलौं, रंजीते ओइठाम जाइ छी, जँ ओ निर्मली जेता तँ हुनके मोटरसाइकिलपर निर्मली चलि जाएब आ जे बाजारक बेगरता अछि, सभ कऽ हुनके संगे ओइ मोटरसाइकिलसँ वापसो आबि जाएब। यएह सभ सोचि हम कपड़ा पहिर एकटा झोरा लऽ रंजीत ओइठाम विदा भऽ गेलौं। रंजीतक घर हमरा घरसँ लगधक अदहा किलोमीटरक दूरीपर अछि। जखन रंजीतक घरपर पहुँचलौं तँ ओ कपड़ा पहिरि मोटरसाइकिल निकालि रहल छला। हमरा देखिते पुछलैन- "निर्मली चलब भाय?" हम कहलयैन- "हँ, एलौं हेन तँ यएह सोचिकऽ। अपन साइकिल पंचर भऽ गेल अछि। सोचलौं अहींक गाड़ीपर चलि जाइ आ बाजारक बेगरता पूरा कऽ फेरो अहीं गाड़ीसँ आपस आबि जाइ।" रंजीत बजला- "तँ चलू ने। ऐमे कोन हर्ज छै।" रंजीत गाड़ी स्टार्ट केलैन आ हमरा कहला, 'बैसू भाय, गाड़ीपर।' तखने रंजीतक पिताजी दलानक चौकीपर सँ उतैर मोटरसाइकिल लग आबि कऽ रंजीतसँ पुछलखिन- "बौआ, निर्मली जाइ छहक?" रंजीत बाजल- "हँ, निर्मली जाइ छी। की बात?" तैपर भिखारी काका कहलखिन- "हौ बौआ! ब्लड-पेसरक दवाइ काल्हिये सधि गेल। कीनने अबिहह।" तैपर रंजीत कहलकैन- "पाइ छह?" भिखारी काका बजला- "हमरा लग कोन पाइ रहत। बिरधो पिलसीन जे भेटैए सेहो तोहीं लऽ लइ छहक। तखन हमरा लग कोन पाइ रहत।" रंजीत खोंझाइत बाजल- "तंग आबि गेलौं तोहर फरमाइससँ। अखन पाइ नहि अछि। गहुम बिकै छै तँ आनि दइ छिअह।" ई कहि रंजीत मोटरसाइकिल स्टार्ट केलक आ निर्मली लेल विदा भऽ गेल। निर्मली बाजारमे रंजीत कताक चिज-वौस कीनलक मुदा भिखारी काका लेल ब्लड प्रेशरक दवाइ नहि कीनलक। पाँचम दिन सुनलिऐ, भिखारी काका मरि गेला। हुनकर ब्रेन हेमरेज भऽ गेलैन। हम देखए गेलिऐन, भिखारी काका मरि गेल रहैथ। हमरा देखिते सुगिया काकी कनैत बजली- "बौआ नन्द, पाँच दिन पहिने बुड़हाक ब्लड पेसरक दवाइ सधि गेल छेलइ। पाँच दिनसँ ब्लड पेसरक दवाइ नइ खेने छेलइ।" भिखारी काकाकेँ देखैले जे सभ अबै जाइ छला, सभ गोटा एकेटा बात बजैथ- "ब्लड प्रेशरक दवाइ बन्न भऽ गेलासँ बुढ़ाक ब्लड प्रेशर बढ़ि गेलैन तँए ब्रेन हेमरेज भऽ गेलैन आ भिखारी काका मरि गेला।" अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.४.रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)- २६-३० म खेप रबीन्द्र नारायण मिश्र मातृभूमि (उपन्यास)- धारावाहिक खेप २६-३० २६ ई संसार आश्चर्यसँ भरल अछि । एतए सभकिछु स्वयं नियंत्रित होइत रहैत अछि । हम-अहाँ तँ नियतिक हाथक एकटा मामुली यंत्र छी । जीवन यात्रामे के कतए भेटत,के कतए फराक भए जाएत कोनो ठेकान नहि । कहि सकैत छी जे सभ भाग्यक खेल अछि । जयन्त सन अनाथ लोक एहन महान विद्वान भए गेलाह । ततबे नहि ,एतेक सुयोग्य होइतहु आ मौका भेटलोपर ओ राजसुखकेँ छोड़ि अपन गाम लौटलाह। ई उम्मीद रहनि जे अपन पूर्वजक कीर्तिकेँ आगू करब । समाजक सेवा करब। गाम-घरमे शिक्षाक प्रचार-प्रसार करब । मुदा से करब आसान नहि भेलनि । अपने पितिऔत बाधक भए गेलखिन । कहबी छैक जे लोभी मनुक्खकेँ अपन स्वार्थक आगू किछु नहि देखाइत अछि । सएह हाल रहनि सुधाकरक । नहि तँ पाठशालाकेँ बुलडोजर लगा कए ढाहि देबाक की औचित्य छल? एहन तँ नहि छल जे ओ रस्तापर भिजैत रहथि । घर तँ हुनका रहबे करनि । सुधाकरक वयोवृद्ध पिता देवीकान्त हुनका कैकबेर कहलखिन- " सुधाकर! ई जगह सार्वजनिक छैक । हमरा लोकनिक पूर्वजक कृति अछि । जयन्त विद्वान छथि। हुनकर अभिलाषामे सभक कल्याण अछि ,आदि,आदि ।“ मुदा सुधाकर तँ छलाहे डपोरसंख । बापेकेँ धमका देलाह। दस हजार फज्जति केलाह । ओहो की करितथि? एक्केटा बेटा रहनि। वृद्धावस्थामे के देखितनि? फेर एकसरे ओ बहुत किछु नहि कए सकैत छलाह । दछिनबारिटोलक छौंड़ासभकेँ सुधाकर मिला लेने छल । ओ सभ छोटछीन लोभमे पड़िकए ओकर पाछू-पाछू चलैत रहैत छल । उतरबारिटोलक लोकसभ जरूर विरोध केलक आ कइए रहल अछि,मुदा थाना पुलिस सभ सुधाकरेक संग दए रहल छलैक । लोकसभ देखिते रहि गेल आ पाठशाला बुलडोजरक चोट पड़िते हहरि कए खसि पढ़ल । किछुए दिनमे ओ जगह सपाट भए गेल छल। ओहीठाम सुधाकर अपन घर बना लेलाह । आब तँ ई हाल अछि जे ओतए कहलोपर केओ पाठशालाक चर्चा नहि करए चाहैत अछि । दछिनबारिटोलक लोकक कहब-"ककरा लेल कानू? जकरा लेल कानब तकरा आँखिमे नोरे ने?" माने जे दछिनबारिटोलबलाक छलैक पाठशाला । ओएहसभ ओहिमे शिक्षक होइत छलाह,हुनके बालवच्चा ओहिमे विद्यार्थी रहैत छल। उतरबारिटोल लोकसभ तँ जन बनिहार छल । बेसी सँ बेसी ओहिमे रखबार वा एहने कोनो छोटमोट काज भेटि जाइत छलैक । समय बदललैक । ओकरसभक समाजपर वर्चस्व बढ़लैक । शिक्षा आ संपत्ति दुनूमे ओ सभ आगू भए गेल । ततबे नहि विचारो श्रेष्ठ भए गेलैक । तेँ ने ओएहसभ जयन्तक संग ठाढ़ भेल । से तँ भेल, मुदा सुधाकर जे चाहलक से केलक । जयन्त जानकीधाम जएबाक हेतु विवश भए गेलाह । ई सभ घटनाक्रम सीनेमाक रील जकाँ आइ जयन्तक माथमे घुमि रहल छलनि । कालीकान्तक दरबारमे पुस्तक विमोचनक गरिमामय वातावरणमे जयन्त आजुक उत्सवक केन्द्रविंदु छलाह । कालीकान्त सपरिवार मंचपर विराजमान रहथि । चंद्रिका तँ रहि-रहि कए जयन्तकेँ उचकि-उचकि कए देखैत रहैत छलि । आइ जयन्त लागिओ रहल छथि तेहने , जेना कोनो राजकुमार होथि। गौर वर्ण,नमगर,सोटल देह ,तेजस्वितासँ परिपूर्ण हुनकर आभामण्डल देखैत बनैत छल । " अपनेक आज्ञा हो तँ आजुकसभा प्रारंभ कएल जाए।"-आचार्यजी बजलाह । "अवश्य । आज्ञा अछि ।"- कालीकान्त बजलाह । सभसँ पहिने ’जय जय भैरवि असुर भयाविन” गाओल गेल । गीत गेनिहारक नेतृत्व कालीकान्तक कन्या चंद्रिका कए रहल छलीह। संपूर्ण वातावरण जगदंवाक आराधणामे लीन लगैत छल । भगवती गीतक बाद आचार्यजी, नागबाबा दिस ताकि कए कहैत छथि- " ई छथि जानकीधामक प्रसिद्ध संत नागबाबा । हिनके अनुकंपासँ सुधाकरक जान बाँचल । अन्यथा तँ टुगर जयन्त बागमतीमे डुबि कए प्राण देबए जा रहल छलाह । तेँ हमर आग्रह जे ओ सभसँ पहिने जयन्तकेँ आशीर्वाद देथि।' नागबाबाकेँ ओना के नहि जनैत छल । कतेको लोककेँ ओ अपन शक्तिसँ जान बचओने छथि । चारूकातसँ लोक बाजि उठल-"नागबाबाक जय!" नागबाबा कहैत छथि-"हम तँ मात्र निमित्त छलहुँ। जयन्तकेँ लिखल छलनि तेँ हम हुनका जानकीधाम आनि सकलहुँ। ओना हिनका विद्वान बनेबामे आचार्यजीक अमूल्य योगदान अछि। संगे कालीकान्त सेहो हुनका उत्साहित करैत रहलथि । हमरा लोकनिक हुनका बहुत-बहुत आशीर्वाद अछि । निश्चय ओ मानवताक हेतु एकटा वरदान सिद्ध हेताह ।"- से कहि नागबाबा बैसि गेलाह । "आब हम जयन्तसँ आग्रह करबनि जे अपन एहि शोधग्रंथक बारेमे हमरा लोकनिकेँ किछु जानकारी देथि।' जयन्तक शोभा देखैत बनैत छल । पचीस सालक तेजस्वी युवक पीत वस्त्र पहिरने जहाँ ठाढ़ भेलाह कि एकस्वरसँ लोक बाजि उठल- "जयन्त अमर रहथु!" जयन्त संपूर्ण एकाग्रतासँ अपन शोधग्रंथक बारे मे बाजि रहल छलाह। “ई ग्रंथ हमर पूर्वज द्वारा कएल गेल शोध काजकेँ आगू बढ़बाक प्रयास मात्र अछि । एहिसँ बहुत बेसी काज ओ सभ पहिनहि कए चुकल छथि । हम तँ मात्र ओही काजकेँ आगू केलहुँ अछि । ई ग्रंथ मूलतः मिथिलाक संस्कृतिकक गौरव गाथा थिक । मिथिलाक माटि-पानिमे कतेको मनीषि लोकनि उतपन्न भेलाह आ अपन सर्वस्व ज्ञान संचयमे लगा देलाह । हमरा विश्वास अछि जे पाठक लोकनिकेँ एहिसँ मिथिलाक संस्कृतिकक बारेमे बहुत किछु बुझबाक मौका भेटतनि ।" जाबे जयन्त बजैत रहलाह,ताबे लगबे नहि करए जे हजारों लोक हुनका सुनि रहल अछि । जयन्तक ओजस्वितापूर्ण भाषण सुनि सभ मंत्रमुग्ध छलाह । आब ओ अपन भाषण समाप्ते करए जा रहल छलाह कि ज्योतिषी हुनका टोकलाह- " अहाँ अखन नेना थिकहुँ। अपने मुँहे अपन एतेक प्रशंसा करब अहाँकेँ शोभा नहि दैत अछि जयन्त! हम एहि पोथीकेँ पढ़लहुँ अछि । ई तँ मात्र पुरनका पोथीसभक नकल अछि । अहाँसँ बेसी कतेको नीक विद्वान हमर गाममे भेल छथि आ छथिहो। एहन पोथी के पढ़त? इ तँ मात्र समय खराब करब भेल।.... आदि..आदि...।" ओ आओर बाजएपर प्रवृत छलाह कि ओहिठाम उपस्थित लोकसभ चिचिआ उठल- “बैसि जाउ,बैसि जाउ” । हमसभ अहाँक पक्षपाती आ दुर्भावनापूर्ण विचार नहि सुनए चाहैत छी ।.." सौंसे हल्ला होबए लागल । एक क्षण लेल सभ बिसरि गेल जे कालीकान्त सपरिवार ओतए विद्यमान छथि । कारी भुट्ट , बड़ीटा माथ नाक पीचल ,चानिपरसँ केश उड़ल ज्योतिषीजी मिथिलेक छलाह । नेनामे संगतुरिआसभ हुनका नकपीच्चा कहैत छल ,केओ मुण्डा कहैत छल । कालीकान्त हुनकर ज्योतिष ज्ञानसँ बहुत प्रभावित रहथि । तेँ हुनका अपन ज्योतिषी बनाकए रखने छलथि। सभटा सुख-सुविधा हुनका छलनि। मुदा कहबी छैक जे चालि,प्रकृति आ बेमाए,ई तीनू संगे जाए -सएह हुनका संगे रहनि । ओ जयन्तसँ ततेक ईर्ष्या करथि जे होनि की करी, की नहि । हुनकर शोधग्रंथकेँ नष्ट करबाक प्रयास सेहो ओ केने रहथि । मुदा पकड़ल गेलाह । तथापि कालीकान्त छोड़ि देलखिन कारण जे किछु रहल होउ । मुदा आजुक घटनासँ कालीकान्त बहुत तमसेलाह- "की अड़बड़ बाजि रहल छी? अहाँसँ एहन आशा नहि छल। ई सभा विद्वान लोकनिक हेतु अछि । व्यक्तिगत ईर्ष्या द्वेष प्रकट करबाक ई उपयुक्त स्थान नहि अछि । " "कालीकान्तक टोकारा दैते आरो लोकसभ विरोध प्रकट करए लगलाह । ' कालीकान्त सही कहि रहल छथि। हमरा लोकनिकेँ जयन्तक विद्वताकेँ आदर करबाक चाही । जयन्त कतेक परिश्रमपूर्वक एहिग्रंथक रचना केलनि अछि । अनेरे चिरौरी नहि करथि-ज्योतिषीजी ।' ज्योतिषीजी लाजे कठौत भए चुप भेलाह से चुप्पे रहि गेलाह आ मौका देखितहि बिना ककरो किछु कहने ओहिठामसँ घसकि गेलाह । ज्योतिषीजीकेँ चलि गेलाक बाद सभामे फेरसँ शांति भेल। लोककेँ नहि बुझाइक जे आखिर ई व्यक्ति के छथि आ एना किएक केलाह? आब तँ जे हेबाक छलैक से भइए गेलैक ,मुदा एतेक रमनगर माहौलमे एकाएक तनाव उतपन्न कए गेलैक । आचार्यजी ई बात बुझलथि । ओ कालीकान्तसँ मंत्रणा कए कार्यक्रममे कनीक परिवर्तन केलथि । " आब किछु काल संगीत कार्यक्रम होएत । तकर बाद जलखै आ चाह पान कएल जाएत । शेष कार्यक्रम तकरबाद होएत। कालीकान्तक दरबारक बात छलैक । एक सँ एक गबैया सभ आएल छलाह । कैकटा तँ विद्यापति गीत गेबामे माहिर रहथि। गीत गोविंद गायनक सेहो ओरिआन छल । सभसँ पहिने गीत शुरु केलीह चंद्रिका- "के पतिआ लए जाएत रे मोर प्रियतम पासे.... । आश्चर्य,बेजोड़ .....। लोकसभ एकस्वरमे बाह! बाह! कए उठलाह। जयन्त सेहो आश्चर्यचकित रहथि जे चंद्रिका मैथिलीमे एहन सुंदर केना गाबि रहल छथि । मुदा हुनका चंद्रिकाक बारेमे कतेक बात बुझले रहनि? कालीकान्त चंद्रिकाक गायनपर लोकक थपड़ी सुनि,सुनि मंत्रमुग्ध रहथि । एकहि क्षणमे सौंसे पंडाल नि:शब्द भए गेल । जेना सभहक चित्त हरि लेल गेल हो । जयन्तक उत्सुकताक तँ अंते नहि रहनि । ओ ई नहि बूझि सकल रहथि जे चंद्रिका एतेक नीक गबैत छथि आ सेहो मैथिलीमे? एकबेर हुनका मोनमे शंका भेलनि जे कहीं इहो मैथिले तँ नहि छथि? फेर भेलनि जे ई कोना भए सकैत अछि? कालीकान्त मिथिला की करए जेताह? मुदा मैथिली शब्दसभक एतेक शुद्ध आ स्पष्ट उच्चारण तँ किछु कहि रहल छल? चंद्रिकाक संगीत समाप्त होइते पण्डाल थपड़ीसँ गड़गड़ा उठल । सभ एतबे कहए जे एकटा आओर,एकटा आओर...। कालीकान्तक सीना गर्वसँ फुलि गेलनि । दर्शकक आग्रहपर चंद्रिका एकटा आओर मैथिली गीत गेनाइ शुरु केलथि- सुनु,सुनु पनिभरनी गे कनी घुरिओक ताक........।" ऐँ ई तँ मधुपजीक गीत गाबि रहल छथि । एकरा मैथिली गीतक एतेक ज्ञान केना भेलैक? जयन्त बेरि-बेरि सोचथि । ओमहर जनता तँ बुझू गीत सुनि-सुनि भावविभोर भए गेल छल । पंडालमे आओर कलाकारसभ छलाह । मुदा सभ चंद्रिका, चंद्रिका चिचिआ रहल छल । आचार्यजी कहुना कए सम्हारलनि । तकरबाद एकटा आन गायककेँ सेहो मौका देल गेल। भोजनक समय भए गेल छल। अस्तु,सभगोटेकेँ भोजनगृहमे चलबाक आग्रह भेल । "कालीकान्तक भोजनक हेतु बनल विशिष्ट प्रकोष्ठमे कालीकान्त, गौरी, चंद्रिका, जयन्त, आचार्यजी, नागबाबा आ किछु विद्वान लोकनि छलाह । जकरे देखु सएह चंद्रिकाक गायनक चर्च कए रहल छलाह । " हमरा नहि बूझल छल जे अहाँ मैथिली गीतसभ एतेक नीकसँ गाबि लैत छी ।"-जयन्त कहलखिन। "अखन अहाँकेँ बहुत किछु बुझबाक अछि ।"-से कहि चंद्रिका जोरसँ हँसि देलखिन । कालीकान्त ओमहरे देखि रहल छलाह। जयन्त लजा गेलाह । ताबे गौरी सहटि कए जयन्त लग आबि गेलीह । “चंद्रिकाक मात्रिक मिथिलेमे छैक।" "ऐँ! से नहि बूझल छल । कोन गाम?" “दरभंगासँ सटले "महिपुर ।" "ओ ई तँ हमरा बुझले नहि छल । तेँ ने एतेक नीक मैथिली गीत गबैत छथि ।" " जाबे जानकीधाममे रहलहुँ ताबे पढ़एमे लागल रही । तकर बाद अहाँ रहबे नहि केलहुँ तँ बुझबैक कोना?" जयन्त बड़ असमंजसमे पड़ि गेल बुझाइत छलाह । आचार्यजी ई बात बुझलखिन । ओ बातकेँ बदलैत कहैत छथि- "भोजनक बाद कालीकान्तक भाषण हेबाक अछि । विद्वानसभ प्रतीक्षा कए रहल छथि।" "ठीक छैक । हमरा लोकनि ओतहि चली ।"-कालीकान्त बजलाह । आगू-आगू कालीकान्त आ पाछू-पाछू सभगोटे सभा मंडप दिस बिदा भेलाह । बैसक फेरसँ प्रारंभ होइतहि कालीकान्त जयन्तक गुणगान करए लगलाह- "ओना एहि दुनिआमे एक सँ एक विद्वान छथि । मुदा एकहिठाम एतेक तरहक व्यक्तिगत गुण जे हमसभ जयन्तमे देखैत छी से बहुत दुर्लभ अछि । निश्चय ई ईश्वरक आशीर्वादक बिना संभव नहि अछि । जयन्त संस्कृतेटाक विद्वान नहि छथि,अपितु एहिठाम रहैत ओ कतेको देशी,विदेशी भाखामे महारत प्राप्त केने छथि । विद्वान तँ ई छथिहे संगे हिनकर व्यक्तित्वमे त्याग,कर्तव्यक प्रति निष्ठा भरल अछि । ओ उच्च कोटिक गायक आ सिद्धहस्त ज्योतिषी सेहो छथि । एतेक कम समयमे एतेक रास गुण हासिल कए लेब अपना-आपमे दृष्टांत अछि । तेँ हमर इच्छा अछि जे जयन्तक हमरा ओहिठाम राज-पाट सम्हारथि । एहिसँ हमरा लोकनि हुनकर अनुग्रहित होएब ।" संकोचवश जयन्त किछु जबाब नहि दए पाबि रहल छथि। आचार्यजी हुनकार कानमे किछु कहैत छथि । ओहो किछु जबाब दैत छथिन । फेर आचार्यजी बजैत छथि- " ई परम सौभाग्यक बात हमरो लेल आ हमर विद्यार्थी जयन्तोक लेल अछि जे अपने हुनकर प्रतिभाक एतेक सम्मान करैत छिअनि । परंतु उचित होएत जे जयन्तकेँ विचारबाक हेतु किछु समय देल जाए " कालीकान्तक मोन छोट भए गेलनि । ओ आगू किछु नहि बजलाह । चारूकात मौन पसरि गेल । "सएह कहू ,एहन अवसरकेँ जयन्त गमा रहल छथि । आपसमे लोकसभ गप्प कए रहल छथि । "अपन सिद्धांतपर अड़ल रहएबला लोक लागि रहल छथि।"-दोसर बाजल । "कपार फुटि गेल छनि, नहि तँ एहनो काज केओ छोड़ैत अछि ।"-तेसर बाजल । एहि तरहें तरह-तरहक बातसभ चारूकात होइत रहल । सभा विसर्जित भए गेल । जयन्त आचार्यजीक संगे आगू बढ़लाह। चंद्रिका एकटक हुनका देखैत रहि गेलीह । २७ कालीकान्त परिवार सहित त्रिकुट भवन पहुँचलाह । हुनका गुमसुम देखि कए गौरी पुछैत छथि-"की बात छैक? बड़ उदास लागि रहल छी?" "बात की रहतैक? कतेको दिनसँ इच्छा छल जे चंद्रिकाक बिआह कए दिअनि । ताहि हेतु जयन्त बहुत उपयुक्त व्यक्ति लागि रहल छथि । चंद्रिकाकेँ हुनका प्रति आकर्षण सेहो देखाइत अछि। ओही द्वारे हम हुनका राज-काजमे लगाबए चाहलहुँ । मुदा ओ तँ एकदम बहीर भेल छथि । जहाँ एहि तरहक कोनो प्रस्ताव होइत अछि की तुरंत ओकर प्रतिवाद कए दैत छथि । इहो नहि जे सोच-विचार करबाक हेतु किछु समय लगाबथि । की करी किछु फुरा नहि रहल अछि ।" "एहिमे चिंता करबाक कोन बात भेलैक? जयन्त कोनो नेना तँ छथि ने? ओ परमविद्वान व्यक्ति छथि। सभसँ बड़का बात छैक जे हुनका अहाँक राज-पाटक कोनो लोभ-लालच नहि छनि । तेँ हुनका एहि तरहें तँ काबू नहि कएल जा सकैत अछि ।" "तखन की कएल जाए?" " ओ कोनो मूर्ख नहि छथि । अहाँक मोनक बातकेँ ताड़ि जाइत हेताह। हुनका मात्र प्रेमेसँ जीतल जा सकैत अछि । ताहि हेतु चंद्रिकापर छोड़ि दिऔक । जँ ओकर सिन्नुर जोर पकड़तैक तँ काज भए जेतैक नहि तँ जे भावी । एहि लेल अपन शांति खराब करब कोनो बुद्धिमानी नहि होएत।" "बात तँ ठीके कहि रहल छी । असलमे संतानक मोहमे लोक आन्हर भए जाइत अछि । सभकिछु बुझितो हम परेसान अही लेल भए रहल छी ।" “बैसारमे ज्योतिषीजीक व्यवहारसँ जयन्त बहुत दुखी रहथि ।"-गौरी बजलीह । " जाहि तरहें ओ बजलाह ककरो खराब लगितैक । हमहु बहुत परेसान भए गेल रही । अहाँक पितिऔत छथि नहि तँ हम हिनका सभदिनक हेतु छुट्टी कए दितिअनि ।"' "कोनो जरूरी छैक जे सभबातमे तमसाइए जाइ । एहिसँ तँ समस्या आओर बिकट भए सकैत छी । हमरा लोकनिकेँ ई जानबाक प्रयास करबाक चाही जे आखिर ओ एना केलथि किएक? हुनका नीकसँ बूझल रहनि जे ओ जे किछु कए रहल छथि से पसिंद नहि कएल जाएत,तथापि ओ एहन बजलाह आ बजिते रहि गेलाह।" "हमरा लोकनिकेँ हुनकासँ गप्प करबाक चाही । आखिर बुझिऐक तँ जे हुनकर मोनमे की छलनि आ आगू ओ की चाहैत छथि । जँ हुनकर एहने विचार रहि गेल तखन हमरासभकेँ सोचए पड़ि सकैत अछि जे की करी?" "ठीक कहलहुँ । हुनकासँ साफ-साफ गप्प करब जरूरी अछि ।" कालीकान्त ज्योतिषीजीकेँ समाद पठओलखिन जे ओ तुरंत भेंट करथि । ओहि समय ज्योतिषीजी किछुगोटेसँ गप्प कए रहल छलाह । कालीकान्तक समाद भेटिते ओ बिदा भेलाह । "बढ़िआँ होएत जे अहाँ हुनकासँ असगरेमे गप्प करी ।"-से कहि गौरी उठि गेलीह । ओ चौकठि धरि गेल रहथि की ज्योतिषीजी भेटलखिन । "हम तँ अहींसँ भेंट करए अबैत रही।" "कालीकान्त अहाँक बाट ताकि रहल छथि । हम कनी जरूरी काजसँ जा रहल छी ।" “ठीक छैक ।" ज्योतिषीजी कालीकान्त लग पहुँचि गेल रहथि । मुदा कालीकान्तक ध्यान कतहु दोसर ठाम रहनि । कनी काल तँ प्रतीक्षा केलाह । तकरबादो जखन ओ अपनेमे रमल रहथि तँ ओ टोकलखिन - " हमरा बजओलहुँ ।" "ओ ज्योतिषीजी! आउ,आउ ।" दुनूगोटे आमने-सामने बैसलाह । जलखै,चाह-पान आबि गेलैक । चाह पीबैत गप्प-सप्प होइत रहल । "हम ई नहि बूझि सकलहुँ जे ओहि दिन पुस्तक विमोचनक समयमे अहाँ जयन्तक खिलाफ किएक भए गेलहुँ?" " हम किछु बाजए नहि चाही । मुदा हमरा बाजए पड़ल।" "से की?" "हुनकर ग्रंथमे मौलिकता नहि अछि । ओ तँ एमहर-ओमहरसँ नकल कए लेने छथि आ कहैत छथि जे हुनकर ओ शोधग्रंथ छनि ।" "मुदा अहाँक तँ ओ विषयो नहि अछि । ओहिठाम एक सँ एक विद्वान बैसल छलाह । ओ सभ किछु नहि बजलाह, अपितु हुनकर काजक प्रशंसा करैत गेलाह, अहींकेँ की समस्या भए गेल जे एना भरल सभामे हुनका अपमानित केलिअनि ।" "क्षमा कएल जाए । हमरा हुनका कोन मोकाबला अछि। ओ हमरा लग नेना छथि ।" "तेँ ने सोचबाक छल ।" "जयन्त तँ हमर कुटुम्ब छथि । हम हुनकर अहित किएक करबनि।" "मुदा अहाँक काज तँ तेहने भेल ।" "हमरा जे वाजिब बुझाएल से बजलहुँ । यदि अपनेकेँ खराब लागल तँ हम क्षमा प्रार्थी छी ।" कालीकान्त गुम्म पड़ि गेलाह । "ठीक छैक । अहाँ जा सकैत छी ।" ज्योतिषीजी कालीकान्तक आज्ञा पाबि बिदा भेलाह । मुदा कालीकान्तक तामस बढ़िए गेलनि । ओ ई बात नीकसँ बूझि गेलाह जे ज्योतिषीजीक मोन शुद्ध नहि छनि । ज्योतिषीजीसँ गप्प केलाक बाद कालीकान्त आश्वस्त भए गेलाह जे ओ किछु जबरदस्त खेल खेला रहल छथि । २८ नान्हिटा मनुक्खक जिनगीमे कहि नहि कतेक तरहक खेलसभ होइत रहैत अछि । की-की घटना-दुर्घटना होइत रहैत अछि । केहन-केहन काज लोक करैत रहैत अछि । ओकरा होइत रहैत छैक जेना ओ अमर हो । जे किछु नीक अछि से हमरे बखरामे आबए । सभक हक हम मारि ली तँ कोनो हरजा नहि । बस हम सुखी रही,आओर जे हेतैक से हेतैक । मनुक्खक इएह स्वार्थी प्रवृति सर्वनाशक जड़ि अछि । एही कारणसँ ई संसार एहन भेल जा रहल अछि जे जयन्त सन विद्वानकेँ अपन डीह-डाबर छोड़बाक हेतु विवश कए देलक । ओ तँ समाजक सेवा हेतु गेल छलाह । ककरोसँ किछु लेब तँ हुनकर स्वभावमे छनिहे नहि । तथापि सुधाकरसन प्रचंडमूर्खसँ हुनका सामना भेलनि । तकरा की कहबैक-नियति,आओर की कहल जा सकैत अछि? कहबी छैक-"विधि बामके करनी कठिन , जेहिं मातु कीन्ही बावरी। असगरमे बैसल जयन्तक हृदयमे रहि-रहि कए टीस उठि जाइत छनि । मातृभूमिक प्रति मोह कही वा कर्तव्यक भावना कही, हुनकर मोन बेरि-बेरि लखनपुर स्थित पाठशालापर पहुँचि जाइत अछि । हुनका बिसरने नहि बिसराइत छनि ओ क्षण जखन दूपहर रातिमे कहुना कए सोङरपर लटकल ओहि चारक तरमे सुधाकरक लठैतसभ पहुँचि गेल छल । कहि नहि ओ सभ की जुलुम करैत,मुदा धन कही उतरबारिटोलक रखबारसभकेँ जे जानपर खेपि कए जयन्तक आ हुनकर कृतिक रक्षा केलक । आब जखन पुस्तकक विमोचन भए गेल,जयन्तक माथ हल्लुक लगैत छलनि। पुस्तकक मूलप्रति कालीकान्तक पुस्तकालयमे सुरक्षित राखि देल गेल छल । आब ओ एहि समस्यासँ तँ मुक्त छलाह। मुदा ज्योतिषीजीक व्यवहार लए कए ओ बहुत दुखी रहथि। संवेदनशील स्वभावक लोक हेबाक कारण बेरि-बेरि हुनका एहि बातपर सोचाइत रहैत छनि । ई हुनका बूझल रहनि जे ज्योतिषीजी मैथिले छथि । मुदा हुनका ई जानकारीमे नहि रहनि जे ओ गौरीक पितिऔत छलाह। हेबो कोना करितनि? निरंतर अध्ययनमे लीन रहबाक कारण हुनका लगपासोक बहुत कम जानकारी रहैत छलनि। जयन्तकेँ अखनहुँ विश्वास नहि होनि जे सुधाकर योजनावद्ध तरीकासँ हुनकर पाछू पड़ल रहथि,सेहो एहि हद धरि जे जानकीधाममे लठैत पठा कए हुनकर शोधग्रंथक चोरी करबा देलाह। ई तँ संयोग रहैक जे बादमे ओ भेटि गेल । तखने जयन्तक माथा ठनकल रहनि जे ई लठैतसभक जड़ि कतहु आओर अछि कारण पोथी चोरा कए चोर की करत? सोना-चानी होइत ,टाका पैसा होइत तकर चोरी करितए । मुदा हुनकर शोधग्रंथक पाछू किएक पड़ि गेल? आब तँ हुनका बहुत किछु स्पष्ट भए गेल रहनि । ज्योतिषीजी सुधाकरसँ मिलि कए षड़यंत्रसभ करैत रहैत छलाह । आश्चर्यक बात छैक जे सद्यः पकड़ेलाक बादो कालीकान्त हुनका किछु नहि केलखिन आ ओ अखनो कालीकान्तक कृपापात्र बनले छथि,त्रिकुट भवनमे रहिते छथि । मुदा से होइत किएक नहि? ओ तँ आब सुधाकरकेँ बुझबामे अएलनि जे गौरीक ज्योतिषीजी पितिऔते छथि। अस्तु,जयन्त सम्हरिकए रहए लगलाह । साइत ओ अपन प्रयासमे सफल रहितथि । मुदा चंद्रिका लए कए बेस मोसकिलमे पड़ि जाइत छलाह । फेर ओहो तँ मनुक्खे छलाह । कोना पाथर तँ रहथि नहि। चंद्रिकाक प्रति कतहु-ने -कतहु हुनको मोनमे स्थान बनि गेल छलनि । करथि तँ की करथि? बहुत विकट समस्यासभ भेल जा रहल छल । भने ओ अपन गाम चलि गेल छलाह । मुदा विधाताकेँ से मंजूर नहि भेलनि। मुदा आब की कएल जाए...? ई समस्या बेरि-बेरि हुनका परेसान करैत रहैत छलनि। समय द्रुतगतिसँ भागि रहल छलैक । नान्हिटा किशोरसँ बढ़ैत-बढ़ैत जयन्त आब युवक भए गेल छलाह । तुलसीबाबा कहने रहथि- " बरसहि जलद भूमि नियराये..जथा नवहि बुध विद्या पाए...!" कहक माने जे विद्या भेलासँ विद्वान विनम्र भए जाइत छथि, से जँ सद्यः देखबाक हो तँ जयन्त लग चलि जाउ । घमंडक तँ कतहु लेश नहि छलनि हुनकामे। शांत, गंभीर आ चिंतनमे लीन रहैत छलाह जयन्त । जेहने विलक्षण बुद्धि, तेहने देखबामे सुंदर छलाह ओ । तेँ ने चंद्रिका हुनका पछोड़ केने छलीह । असलमे जयन्त एहिसभमे पड़ए नहि चाहैत छलाह । हुनकर मूल लक्ष्य तँ अपन मातृभूमिमे पूर्वजक स्थानपर बनल पाठशालाकेँ पुनर्जीवित करबाक छल । मुदा से आब होएत कोना? एमहर चंद्रिका, कालीकान्तक आकर्षक प्रस्ताव,तँ ओमहर छल गामक उजरल-उपटल पाठशाला जकर आब नामो-निसान मेटा देने छल-के? हुनके पितिऔत सुधाकर । लोभक कारण सुधाकर सभकिछु पीबि गेल छलाह । कोनो कुकर्म करए हेतु तैयार छलाह। किंकर्तव्यविमूढ़ जयन्त नदीकातमे बैसल छलाह । मंद-मंद हवा बहि रहल छल । सूर्यास्तक समय छल । अस्ताचलगामी भगवान सूर्य अपन तेजकेँ समेटि रहल छलाह कि अचानक हुनका एकटा महिला नदीमे स्नान कए बाहर अबैत देखेलथि । "ई तँ चिन्हल लगैत छथि.....।“-जयन्त मोने-मोन सोचैत छथि । क्रमशः ओ महिला आओर लगीच अबैत गेलीह । जयन्त किछु बजितथि ताहिसँ पहिने ओएह चिचिआ उठलीह- "जयन्त! ..जयन्त!" अहाँ के....?" सएह कहू, तूँ आब हमरा चिन्हितो नहि छैँ ने ? हद भए गेल । हम छी शीला.........." अहाँ एहिठाम कोना?"-जयन्त बजैत छथि । " नदीमे स्नान हेतु आएल रही।" "ओ मुदा तूँ रहैत कतए छही?"-जयन्त पुछलखिन । शीला चुप भए गेलीह । किछु नहि बाजि सकलीह । आँखि नोरसँ भरि गेलनि । जयन्तकेँ भेलनि जेना किछु गलती भए गेल। हुनकर ध्यान शीला दिस गेलनि । गोर-नार,नमगर,पैघ-पैघ आँखि, ,सोंटल देह सभ किछु अपूर्वे छलैक शीलामे । शीला एखनो अत्यंत रमणीक लगैत छलीह । ओ चुरी पहिरने छथि । माथमे सिंदूरो केने छथि । छीटबला नुआ पहिरने छथि । कहक माने बिआहल छथि,सधबा छथि तखन असगर किएक छथि? जयन्तक मोनमे तरह-तरहक संशय उठि रहल छलनि कारण गाममे जखन ओ शीलाक पुछारी केने छलाह तँ केओ निजगुत जानकारी नहि दए सकलनि , आचार्योजी नहि । ओ तँ शीलाक पिता बैदजीसँ पुछबो केने रहथिन । सभ गुम पड़ि गेल रहनि । मुदा ई अकस्मात सामने आबि एकटा पैघ प्रश्न ठाढ़ कए देलथि। जयन्तक नेनाक संगी छलखिन शीला । एतेक दिनक बाद एहि हालमे हुनकासँ भेंट हेतनि से ओ सोचिओ नहि सकैत छलाह । जयन्तकेँ किछु पुछल नहि होनि आ शीला किछु बाजथि नहि । एहि तरहें दुनूगोटे एकदोसरकेँ एकटक देखैत रहि गेलथि । चुप्पी तोड़ैत जयन्त पुछैत छथि - "आइ-काल्हि कतए रहैत छही?" लगेपासमे ।" "अपन पता दे जाहिसँ कहिओ काल भेंट-घाँट भए सकैत।" शीला अपन पता लिखा देलखिन । "अबिहैं जरूर ,बहुत रास गप्प करबाक अछि । "-से कहैत ओ आगू बढ़ि गेलीह । जयन्त एकटक हुनका देखैत रहि गेलाह। संयोग केहन होइत छैक । आइ कतेको सालक बाद शीलासँ अकस्मात भेंट भए रहल छलनि, ओहो नदीक कातमे । मुदा ओकर हाल की अछि,कोन परिस्थितिमे जीबि रहल अछि ,गाम-घर जाइतो अछि कि नहि,से सभ जानबाक इच्छा रहनि मुदा ओतेक गप्प करबाक उपयुक्त परिस्थिति नहि छल । शीला चलि गेली,मुदा जयन्तक मोन हुनकेपर टाङल रहि गेलनि । २९ बिआहक बएस भए गेलाक बाद शीलाक पिता हुनका हेतु कथासभक पता लगबए लगलाह । इच्छा रहनि जे नीकठाम काज ठीक कए ली । कैकटा कथासभ भेटबो करनि । मुदा शीला टरका दैत छलखिन। "बिआह कतहु भागल जाइत छैक,हम अखन पढ़ि रहल छी । पढ़ाइ-लिखाइसभ दिन नहि पार लगैत छैक । तेँ पहिने ई काज कए ली ।"- से सभ कहि ओ पिताक बातकेँ काटि दैत छलखिन । बैदजी शीलाकेँ बहुत मानैत छलखिन । तेँ हुनकर इच्छाक खिलाफ जा कए बिआह कए देब हुनका उचित नहि लगैत रहनि । एहि तरहें बहुत समय निकलि गेल । कहि नहि,शीलाक मोनमे की रहैक । मुदा जखन बहुत समय बीति गेल,शीला पढ़ाइ-लिखाइ सेहो कए लेलनि तँ बैदजी शीलाक बिआह लए कए बहुत चिंतित रहए लगलाह। गाम-घरमे शीलाक बिआहमे भए रहल विलंब एकटा चर्चाक विषय भए गेल । गाहे-बगाहे गामक लोक टोकारा दए दैत छल । शीला ई बात बुझलखिन । फेर ओ ओहन आदमीक बाट कतेक दिन धरि तकितथि जकर कोनो अता-पता हुनका लग नहि रहनि ? हारि कए हुनकर बिआह बैदजी ठीक कए देलखिन । बर दिल्लीमे कोनो नीक निजी कंपनीमे प्रबंधक छलथि। घरक स्थिति सेहो सुभ्यस्त छलनि । गामेक सुधाकर घटकैती कए रहल छलाह । बर आ ओकर परिवारक प्रति ओ बैदजीकेँ आश्वस्त कए देलखिन । बैदजीक प्रस्ताव ओ एकहि बेरमे मानि गेलाह । शीलाक बिआह भए गेल। बरिआती -सरिआती सभ बहुत प्रसन्न रहथि । शीला चारिए दिनक बाद सासुर चलि गेलीह। शीलाक चलि गेलाक बाद बैदजी बहुत उदास रहए लगलाह । असगर समय काटब मोसकिल होइत छलनि । रहि-रहि कए शीला मोन पढ़ैत छलखिन। मुदा ओ एहि बातसँ संतुष्ट रहथि जे बेटी नीकठाम गेलखिन। कोनो पिताक हेतु एहिसँ बेसी खुसीक बात आओर की भए सकैत छैक? मोने-मोन ओ भगवानकेँ धन्यवाद दैत रहैत छलाह । मुदा हुनकर ई खुसीपर कहि नहि ककर नजरि लागि गेल । शीला सासुर जाइते महासंकटमे पड़ि गेलीह। ओतए जाइते पता लगैत छनि जे हुनकर बर तँ पहिनेसँ बिआहल छथि। असलमे ओ दिल्लीमे पढ़ैत काल एकटा कालेजक सहपाठिनीक संगे प्रेम विआह कए लेने छलाह । ओ महिला विधर्मी छलि। जखन ई बात बरक पिताकेँ पता लगलनि तँ ओ अनसन कए देलाह । ओ बर माता-पिताक दबाबमे आबि कए शीला संगे दोसर बिआह कए लेलाह । बिआह तँ भए गेल । मुदा हुनकर पहिल पत्नीक परिवारक लोक हुनकापर आक्रमण कए देलक,जानसँ मारबाक धमकी देबए लागल । आब ओ करितथि की? पहिल पत्नीकेँ राखए पड़लनि। से बात जखन शीलाकेँ पता लगलनि तँ ओ हुनका संगे रहबाक हेतु किन्नहु तैयार नहि भेलीह । सभदिनक हेतु हुनका छोड़ि जानकीधाम ससुरक डेरापर चलि गेलीह । जयन्तकेँ शीलाक बारेमे ततेक उत्सुकता भेलनि जे ओ ऐकदिन हुनकर देल पतापर पहुँचि गेलाह। हुनका देखितहि शीलाक प्रसन्नताक अंत नहि छलनि । दुनूगोटामे गप्प-सप्प होइत-होइत समय केना बितल से नहि बूझि सकलाह । साँझ भए रहल छल । शीलाक स्थिति-परिस्थितिसँ ओ बहुत चिंतित भए गेलथि । मुदा कइए की सकैत छलाह? "हमरा ओहि आदमीक संगे एको घड़ी रहब संभव नहि बुझाएल । एहन धोखेबाज, दुष्ट व्यक्ति संगे जीवन बिताएब तँ बहुत दूरक बात थिक ।" "तखन की भेलैक?" "की हेतैक? हमर ससुर बहुत प्रयास केलाह जे हम मानि जाइ । मुदा हमरा हुनकापर विश्वास नहि भेल । जखन हुनकर बेटाक बिआह भए गेल रहनि तँ दोसर बिआह करेबाक की औचित्य छल?" "अहाँक ससुर के छथि आ ओ कतए रहैत छथि?" "ओ कालीकान्तक ओहिठाम ज्योतिषीजीक नामसँ जानल जाइत छथि । अहींक पितिऔत सुधाकरक कुटुम्ब छथिन।" " सएह कहू, ओ एहन काज केलाह? हद भए गेल ।" "एहिमे सभटा दोख सुधाकरक छैक । ओएह हमर पिताकेँ फँसओलथि । हुनकर बातपर विश्वास कए ओ हमर बिआह ठीक कए देलथि ।" "बहुत अन्याय भेल अहाँ संगे । एहि तरहें अहाँ कतेक दिन रहब?" शीला कानए लगलीह । जयन्त केँ बहुत दुख भेलनि। मुदा कइए की सकैत छलाह?" हम फेर आएब "-से कहि ओ बिदा भेलाह । जयन्त चौकठि लग पहुँचले हेताह कि ज्योतिषीजी गाडी़सँ उतरलाह । जयन्त प्रयास केलाह जे काते-काते निकलि जाइ । मुदा से संभव नहि भेल । चौकठिसँ बाहर होइतहि दुनूगोटेक आमना-सामना भए गेलनि । जयन्तकेँ ओहिठामसँ निकलैत देखि ज्योतिषीजी बाजि उठलाह । "एहिठाम केना अएलहुँ?" "शीला हमर नेनाक संगी छथि । संयोगसँ आइ नदीकातमे देखा गेलीह । बहुत दिनक बाद भेंट भेल रहए तेँ जिज्ञाशावश नहि रहल गेल । मुदा हुनका देखि कए बहुत कष्ट भेल । अहाँक रहैत एतेक अन्याय होएब बहुत दुखक बात थिक । अहाँ शीलाक जीवन बरबाद कए देलिऐक । मानवताक नामपर अहाँ एकटा कलंक छी।“-जयन्त बजलाह । "अहाँकेँ एहिसँ की मतलब? ई हमर पारिवारिक समस्या अछि आ हम एकर समाधानमे लागल छी।" “आब की समाधान हेतैक । जखन अहाँक पुत्रक बिआह पहिनेसँ भेल छलनि तखन एहन अन्याय करबाक की औचित्य छल?" "हमरोसभकेँ ई बात नहि बूझल छल । बादमे पता लागल।" "गलत बाजि रहल छी । अहाँकेँ सभबात नीकसँ बूझल छल । " "अहाँ अनेरे एहि मामलामे टांग अड़ा रहल छी ।" "एक आदमीक जिनगी नष्ट केलाक बादो अहाँ एना बाजि रहल छी । एतेक भारी अपराध अहाँक व्यक्तिगत समस्या कोना भए सकैत अछि? कहि नहि सदति शांत रहएबला जयन्तकेँ अचानक एतेक तामस किएक भेलनि? संभवतः ओ शीलासंग कएल गेल अन्यायसँ पहिनेसँ बहुत दुखी छलाह । संयोगवश ओ सामने आबि गेल रहथि आ हुनका लोकनिमे वाद-विवादक स्थिति बनि गेल छल। बात बढ़ैत देखि शीला बाहर भेलीह । ओ जयन्तकेँ इसारा कए किछु कहए चाहथि। मुदा ओ अंठा कए आगू बढ़ि गेलाह । ३० पुस्तक विमोचनक समयमे ज्योतिषीजीक व्यवहारसँ कालीकान्त बहुत दुखी रहथि । कालीकान्त नहि बुझि सकलथि जे ओ एहनो कए सकैत छथि,सेहो जयन्त सन विद्वानक संगे । मुदा एहिमे तँ ओ बहुत दिनसँ लागल रहथि । सुधाकर आ हुनक लठैतसभसँ हुनकर पुरान संपर्क रहनि। सुधाकरकेँ शुरुएसँ ई प्रयास रहनि जे जयन्त गाम घुरि कए नहि आबथि । एहि हेतु ओ अपना भरि प्रयासो केलाह, मुदा से होइत नहि देखि तरह-तरहसँ जयन्तकेँ तंग करए लगलाह । एहिमे ज्योतिषीजी सेहो सुधाकरक संगे भए गेल रहथि । ओहि दिन शीलासँ भेंट केलाक बाद ज्योतिषीजी संगे जयन्तकेँ विवाद करैत देखि शीला बहुत चिंतित भए गेल रहथि। ज्योतिषीजी तँ शीलाकेँ पहिनेसँ बहुत तंग करैत छलाह । ओहि दिन तँ हदे भए गेल। जयन्तकेँ एहिठामसँ गेलाक बाद ज्योतिषीजी जे-से बाजए लगलाह । ओतबे नहि कालीकान्तकेँ जा कए जयन्तक सिकाइत कए देलखिन । जतेक नून-तेल लगा सकलाह से लगा कए बातकेँ बतंगर करबाक चेष्टा केलनि । "जयन्त एहन काज नहि कए सकैत छथि । ओ विद्वान छथि, हुनकर निष्ठापर हमरा लोकनिकेँ पूर्ण विश्वास अछि । हमरा तँ अहींक व्यवहारपर सक भए रहल अछि ।"-कालीकान्त बजलाह। "अहाँ स्वयं जयन्तसँ गप्प कए लिअ । हम अपनेकेँ गलत बात किएक कहब? " "अहाँ अखन जाउ । हम जयन्तसँ गप्प केलाक बादे किछु कहि सकैत छी ।-कालीकान्त बजलाह। कालीकान्त जयन्तकेँ बजओलखिन । जयन्त शीलाक ओहिठामसँ लौटि कए बहुत परेसान रहथि । हुनका अपने मोन होनि जे सभटा बात कालीकान्तकेँ जा कए कहथि जाहिसँ शीलाक समस्याक किछु न्यायोचित समाधान होनि । ताबे कालीकान्तक बजाहटि आबि गेल । ओ सभ काज छोड़ि कालीकान्तसँ भेंट करए पहुँचि गेलाह। कालीकान्तक ओहिठाम जयन्त पहुँचैत छथि । ओहि समय ओ असगरे अपन बैसकीमे किछु चिंतामे रहथि । जयन्तकेँ देखतहि कालीकान्त बाजि उठलाह- "आउ, आउ जयन्त! हम अहींक बाट ताकि रहल छलहुँ। "हम स्वयं अपनेसँ भेंट करए चाहैत रही ।" "की बात?" "ज्योतिषीजी बहुत अन्याय केलाह ।" "की भेलैक?" "हमरे गामक शीला हिनकर पुतहु अछि । ओ नेनामे हमरा संगे पढ़ैत छलि । संयोग एहन भेल जे बहुत दिनक बाद ओकरा हम धारक कातमे देखलिऐक । ओकर परिस्थिति ठीक नहि बुझाएल । हम बहुत चिंतित भए गेलहुँ । मुदा ओ किछु बजबे नहि करए । तखन कहुना कए ओकर पता लेलहुँ । हम की जाने गेलिऐक जे ओ ज्योतिषीजीक पुतहु छथि आ हुनके संगे रहैत छथि। हम हुनकर देल पतापर शीलाक ओहिठाम गेलहुँ । ओतए शीला अपनासंग भेल अन्यायक बात कहए लगलीह । हुनकर दशा देखि हम बहुत दुखी भए गेल रही । ताबतेमे ज्योतिषीजी पहुँचि गेलाह । हमरा ओतए देखि हुनका की भेलनि की नहि से तँ ओ जानथि । मुदा हमरा तँ बहुत तामस भेल । तथापि हम बहुत संयमसँ रहलहुँ । हम तँ एतबे पुछलिअनि जे ओ अपन विवाहित बेटाक दोबारा बिआह शीलाक संगे किएक करओलाह जखन कि सभबात हुनकर जानकारीमे रहनि । बस एतबे बात भेलैक कि ओ हमरापर दुनिआभरिक तामस निकालए लगलाह । ततबे नहि तरह-तरहल धमकी सेहो देबए लगलाह । अहीं कहू जे एहिमे हमर की गलती अछि ?" "हम बात बुझि गेलिऐक । ज्योतिषी अछिए बदमास । हम तँ गौरीक कारणें चुप छी।" " ऐँ! गौरी...." "गौरीक पितिऔत छथिन ज्योतिषीजी । तेँ मोसकिल भए जाइत अछि । मुदा अहाँ चिंता नहि करू। हम हिनकर समाधान शीघ्रे निकालब । लगैत अछि जे हिनकर समय हमरासभ लग पूरा भए गेल छनि।" "हमर से उद्देश्य नहि अछि । हम तँ एतबे चाहब जे शीलाक संगे न्याय होनि । हुनकर पिता बहुत प्रतिष्ठित लोक छथि। तिनका संगे ई धोखा केलनि । एकटा निर्दोष जिनगीकेँ नष्ट करबाक पाप केलनि अछि । तकर समाधान तँ अपनहि कए सकब।" कालीकान्त जयन्तक बातसँ बहुत प्रभावित रहथि। जयन्त जएबाक उपक्रम कए रहल छलाह कि गौरी चंद्रिकाक संगे आबि गेलखिन। "एना कोना चलि जाएब जयन्त! किछु जलखै कए लिअ।" -गौरी बजलीह । "हम तँ अखन पूजा-पाठो नहि केलहुँ अछि । " "सरबते पीबि लिअ ।" जयन्तकेँ देखितहि चंद्रिका बहुत प्रसन्न भए गेल रहथि । मुदा किछु बाजथि नहि। गौरीक संकेत पाबि ओ अपने हाथे सरबत बना कए जयन्तकेँ देलखिन । दुनूगोटेमे कनीकाल हँसी-ठठ्ठा भेल। फेर जयन्त चलि गेलाह । जयन्तक गेलाक बाद चंद्रिका बड़ीकालधरि त्रिकुट भवनक ऊपर जा कए हुनका देखैत रहि गेलीह । त्रिकुट भवनसँ निकलि कनी फटकी गेलाक बाद ओ पाछू तकैत छथि तँ चंद्रिकाकेँ हँसैत देखलाह। ओमहर जयन्त गेलाह आ ऐमहर ज्योतिषीजी बाजए लगलाह। “हम अपने केँ कहए नहि चाहैत रही । मुदा अहाँ महान छी, हमरा लोकनिक कुटुम्ब छी, तेँ अपनेकेँ नहि कहब तँ कहबे ककरा?'' "बात की छैक?" "जयन्त..." "एतबे ओ बाजल छलाह कि कालीकान्त क्रुद्ध भए गेलाह। "अहाँ बहुत लंपट आदमी छी । आइधरि हम कुटुंब बुझि कए अहाँक सभबातकेँ अंठेने रहैत रहलहुँ । मुदा बात हदसँ बाहर भए रहल अछि ।" "हम नहि बूझि सकलहुँ । " "भगल नहि करू । ओहि दिन पुस्तक विमोचनक कार्यक्रममे अहाँक व्यवहारसँ हमसभ बहुत दुखी छी। अहाँकेँ बुझबाक चाही जे ओ कार्यक्रम हम स्वयं आयोजित केने रही, जयन्त तँ हमर बात मानि कए आबि गेल रहथि । ततबे नहि...।" कालीकान्तकेँ बेसी तमसाइत देखि गौरी रोकलखिन - "छोड़ू बितल बातक घमरथन केलासँ की लाभ । अखन की भेलैक जे अहाँ एतेक तमसा गेल छी? "सुनैत छी जे ज्योतिषीजी अपन पुतहु संगे बहुत अनुचित केलनि ।" "से की?" कालीकान्त शीलाक बारेमे सभटा बात गौरीकेँ कहलखिन। " ई सत्य नहि अछि । " "तँ की सत्य अछि?" "हमरोसभकेँ सभबात नहि बूझल छल । एतबे सुनने रहिऐक जे कतहु कनी-मनी छैक ।" "अहाँकेँ सभटा बात बूझल रहए ,तैओ अहाँ अपन बेटाक दोसर बिआह शीलाक संगे करओलहुँ । ई तँ बहुत अनुचित भेल।" "जे भेल,से भेल । मुदा आबो किछु करू जाहिसँ शीलाक संग न्याय होनि नहि तँ हम न्याय करब ।"-कालीकान्त चेतौनी देलखिन । " "आब हमरासभकेँ ज्योतिषीजीसँ फराक भए जएबाक चाही । हिनकर चलते हमहुसभ अयशक भागी भए रहल छी ।" "मुदा ओ तँ संबंधी छथि । तकर की करबैक?" "जे होथि, मुदा हम आब हुनका अपन राजकाजमे सामिल नहि राखि सकैत छी । बढ़िआँ होएत जे ओ अपन डेरा सेहो फराक राखथि ।" " डेरा तँ तुरंत नहि बदलल जा सकैत अछि, ताहि हेतु हिनका किछु पलखति दिऔन । आगू अहाँक मर्जी ।" एहि घटनाक बाद कालीकान्त आ हुनक पत्नीमे एहि तरहें आपसी चर्चा भेल । ज्योतिषीजीकेँ सभ बात कहि देल गेलनि । ओ की बजितथि? तथापि हुनकर डेरा तत्काल ठामहि रहए देल गेलनि । -रबीन्द्र नारायण मिश्र, पिताक नाम: स्वर्गीय सूर्य नारायण मिश्र, माताक नाम: स्वर्गीया दयाकाशी देवी, बएस: ६९ वर्ष, पैतृक ग्राम: अड़ेर डीह, मातृक: सिन्घिआ ड्योढ़ी, वृति: भारत सरकारक उप सचिव (सेवानिवृत्त), स्पेशल मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, दिल्ली(सेवानिवृत्त), शिक्षा: चन्द्रधारी मिथिला महाविद्यालयसँ बी.एस-सी. भौतिक विज्ञानमे प्रतिष्ठा : दिल्ली विश्वविद्यालयसँ विधि स्नातक, प्रकाशित कृति: मैथिलीमे: प्रकाशन वर्षः२०१७ १.भोरसँ साँझ धरि (आत्म कथा),२. प्रसंगवश (निवंध), ३.स्वर्ग एतहि अछि (यात्रा प्रसंग); प्रकाशन वर्षः२०१८ ४. फसाद (कथा संग्रह) ५. नमस्तस्यै (उपन्यास) ६. विविध प्रसंग (निवंध) ७.महराज(उपन्यास) ८.लजकोटर(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०१९ ९.सीमाक ओहि पार(उपन्यास)१०.समाधान(निवंध संग्रह) ११.मातृभूमि(उपन्यास) १२.स्वप्नलोक(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२० १३.शंखनाद(उपन्यास) १४.इएह थिक जीवन(संस्मरण)१५.ढहैत देबाल(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२१ १६.पाथेय(संस्मरण) १७.हम आबि रहल छी(उपन्यास) १८.प्रलयक परात(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२२ १९.बीति गेल समय(उपन्यास) २०.प्रतिबिम्ब(उपन्यास) २१.बदलि रहल अछि सभकिछु(उपन्यास) २२.राष्ट्र मंदिर(उपन्यास) २३.संयोग(कथा संग्रह) २४.नाचि रहल छलि वसुधा(उपन्यास) २५.दीप जरैत रहए (उपन्यास)। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.५.कुमार मनोज कश्यप-दृश्यावलोकन कुमार मनोज कश्यप १ टा लघुकथा दृश्यावलोकन गर्मी धपिते भूमि जल के स्तर नीचा आ फेर वैह पानिक विकट संकट! पोखरि-झाखरि पहिने सs भाथल .... सुखायल! .... मालो-जाल के जान आफत मे! चापा-कल मे पानिये नहिं अबैत! जाहि कोनो-कोनो चापा-कल मे पहर राति बितला बाद कनी-मनी पानि खसै तकरा लsग लोक जगरना कs कs पानि लेल पँतियानी लगेने ठाढ़। यैह पँतियानी, झगड़ा-झंझट, धक्का-मुक्की होई जखन कहियो टैंकर अबै तखनो। करोड़ो टाकाक लागत सs सरकारक नल-जल योजना के तs आब भग्नावशेषे कतहु-कतहु भेटै छै.... पानि तs सरि भs कs कहियो एलै नै! लोकक समक्ष जलक व्यवस्था सभ सs भारी समस्या आ तैं सभतरि चर्चा के विषय केवल आ केवल पानिक समस्या .... कारण सs निदान तक सभक अपन-अपन मत ...... किछु सुनल, किछु पढ़ल, किछु कल्पना के उड़ान .... मुदा बेस मनलग्गू! " हौ हमरा सभक पितामह पैघ-पैघ पोखरि के अथाह पानिक उपयोग करैत छलाह। हमर पिता के समय पोखरि सs सिमटि लोक इनार पर आबि गेल। हमरा सभ आर सिकुड़ि चापा-कल पर आबि गेलहुँ। नवतुरिया सभ बोतल-बंद पानि के उपयोग करैत अछि। शनैः शनैः यदि एहिना ह्रास होईत रहलै तs अगिला पीढ़ी के कैप्सूले टा मे जल भेटतै ... आ हमरा सभ तैयो नहिं चेतलहुँ तs तकरा बाद नोरे टा मे पानि भेटत..!" बजैत-बजैत कक्का के स्वर भहरा गेलनि .... लोक सभ अवाक् छल। -कुमार मनोज कश्यप, सम्प्रति: भारत सरकार के उप-सचिव, संपर्क: सी-11, टावर-4, टाइप-5, किदवई नगर पूर्व (दिल्ली हाट के सामने), नई दिल्ली-110023 मो. 9810811850 / 8178216239 ई-मेल : writetokmanoj@gmail.com अपन मंतव्य editorial.ऽtaff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.६.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (खेप-१८) निर्मला कर्ण (१९६०- ), शिक्षा - एम् ए, नैहर - खराजपुर,दरभङ्गा, सासुर - गोढ़ियारी (बलहा), वर्त्तमान निवास - राँची,झारखण्ड, झारखंड सरकार महिला एवं बाल विकास सामाजिक सुरक्षा विभाग मे बाल विकास परियोजना पदाधिकारी पद सँऽ सेवानिवृत्ति उपरान्त स्वतंत्र लेखन। मूल हिन्दी- स्वर्गीय जितेन्द्र कुमार कर्ण, मैथिली अनुवाद- निर्मला कर्ण अग्नि शिखा (भाग- १८)
पूर्व कथा: लक्ष्मी स्वयंवर नाटिका के मध्य में भरत मुनि केर श्राप उर्वशी के भेटलनि,जाहि में पुरूरवा स्वयमेव सम्मिलित भs गेलथि l उपस्थित दर्शक वर्ग में किनको ई बात ज्ञात नहि भs सकलनि l पुरूरवा उर्वशी के प्रेम में विकल भs स्वर्ग लोक में भ्रमण करैत संतान वृक्ष के नीचाँ सोच पूर्ण मुद्रा में बैसल रहथि l आब आगू: उर्वशी के प्रेम ह्रदय में बसौने पुरूरवा संतान वृक्ष के नीचाँ विह्वल-विकल भय हुनके स्मरण करैत प्रेम विदग्ध भेल छलाह l जखनि अतहु हुनका शांति नहि भेटलैन्हि,तखन ओ ओतह सs उठि कs एक दिशि प्रस्थान केलथि l चलैत चलैत ओ एकटा सरोवर के निकट पहुंचि गेलथि l सरोवर के कात में पारिजात वृक्ष में खिलल पुष्प अपन सुंदरता पर गर्वोन्नत छल l एक पुष्प के तोइर कs राजा अपन हाथ में लs लेलथि। ओ अपन मोनहि मन सोचs लगलाह - "ई वैह पुष्प अछि जेकरा धारण करनिहार के सम्पूर्ण मनोकामना पूर्ण होइत अछि। एखनि हम एकरा धारण कएने छी। एकरा धारण कएने हम उर्वशी के कामना कs रहल छी। की एकरा धारण कएल में हमरा उर्वशी संs भेंट भs सकत ? अथवा ई सब जनश्रुति मात्र अछि ? हँ! हँ ! अवश्य ई सभ बात मात्र कल्पना पर आधारित होयत ! नहि! एहेन कुनू गुण एहि पुष्प में नहि होयत ! यदि ई पुष्प तेहने गुण युक्त होइत तs इन्द्र एकरा धारण कs दानव पर विजय नहि प्राप्त कs सकैत छलथि ? नहि!नहि!!ई सभ किंव दंती झूठ अछि "! सरोवर के निकटस्थ चबूतरा पर बैसि गेलाह राजा। पुन :पारिजात पुष्प के तोइड़-तोइड़ कर ओकर पंखुड़ि के एम्हर-ओम्हर छींट लगलाह। तखने हुनका एक अत्यंत मधुर स्वर सुनाई पड़लनि - "किनको हृदय रूपी पुष्प के एहि प्रकारें नहि तोड़वाक चाही राजन्! एना केहुँ के आकांक्षा के तोइड़ कs मसलनाइ घोर पाप अछि!" ई मधुर कर्णप्रिय स्वर लहरी सुनि राजा चिहुँकि उठलाह। "उर्वशी आहाँ कतs नुकायल छी,आब आबि जाऊउ प्रिये" - थरथराईत स्वर निकसलनि राजा के मुख सौंs। उर्वशी गंभीर मुद्रा में राजा के निकट समुपस्थित भs गेलीह। राजा के संकेत पाबि ओ हुनके निकट चबूतरा पर बैसि गेलथि। "कतेक आकाँक्षा छल आहाँक दर्शन के। आई हमर मनकामना पूर्ण भे"। "हँ राजन् ,आहाँक मनकामना तs पूर्ण भेल। मुदा हमर कामना कथि अछि, की आहाँ ई नहि पूछब "? आश्चर्यचकित सन राजा पुरूरवा उर्वशी के सौंदर्य के अपलक निरखैत रहलाह। पुनः किछु क्षण थमि कs अत्यंत मधुर स्वर में पूछलथि - "की मन कामना अछिै आहाँ के "? "हमर मनकामना अछि आहाँ के प्राप्त करवा के। हम आहाँ सs दूर नहि रहि सकैत छी राजन्"। "काश ई सम्भव भs पबैत ! तखन तs हम - हम त अपना के भाग्यशाली बुझितहुँ। हम कृत-कृत्य भs जइतहुँ "। " आहाँ एना किएक बजैत छी ? ई किएक नहि भs सकैत अछि"? "हम शासक सत्ता के बंधन में जकड़ल एकटा परतंत्र पक्षी थिकहुँ। हम स्वतंत्र कहां जे आहाँ के प्रेम के अपना सकी"? "लेकिन आई नहि तs काईल्ह.... परसू ई तs निश्चित होयत l आहाँ के हमर प्रेम के समक्ष झुकहि पड़त"! "आहाँ एतेक विश्वास सs ई बात कोना कहि रहल छी ? इन्द्र एहि बात के स्वीकार कs लेताह "? "इन्द्र मानथि अथवा नहि मानथि,परिस्थिति एहेन अवश्य बनत कि आहाँ के हमर वरण करहि पड़त"l "भला ई कोना कs संभव होयत "? "आहाँ एतेक जल्दी भरत मुनि के श्राप बिसरि गेलहुँ ? हम आहाँ के लक्ष्मी स्वयंवर नाटिका के समापन के बाद आहाँ सs भेल अपन प्रथम भेंट में बतौने तs छलहुँ ऋषिवर भरतमुनि के श्राप के विषय में! हम आहाँ सs कनेको मिथ्या नहि कहने छलहुँ राजन्! हमरा आहाँ दिशि आकर्षित एवं नाटिका सs ध्यान विमुख भेल देखि कs ओ हमरा श्राप दs देने रहथि। ओ श्राप तs हमरा देने रहथि राजन् ,मुदा ओहि श्राप में सम्मिलित तs आहाँ पर्यन्त भs गेलहुँ। हुनक श्राप कूनो परिस्थिति में विफल नहि भs सकैत अछि l ओहि श्राप के फलित होयबा के लेल हमरा सभ के उनसठ वर्ष धरि संग-संग तs रहs पड़त कि नहि? ताहि सs हम कहलहुँ एहेन परिस्थिति अवश्य बनत राजन् जखन अपन सबहक मिलन अवश्य होयत। सच कही तs महर्षि भरतमुनि अपना सब पर उपकार केलनि ई श्राप दs कs। परंतु हम श्राप के दूसर पक्ष सs भयभीत छी "। "भला ओ कथि अछि"? "आहाँ ओहो सभ बिसरि गेलहुँ? ओ आहाँ के बिरहाग्नि में तपै के श्राप देलथि"? ओ श्राप तs हमरा देने रहथि,हमर प्रेमी के बिरहाग्नि में तपै के रहैक ओ श्राप!मुदा हमर प्रेमी तs अहीं थिकहुँ राजन्! ताहि कारण ओहि श्रापक अधिकारी परोक्ष रूपें आहाँ भय गेलहुँ।" ओह हँ,याद आयल । आहाँ ई बात बतयने छलहुँ। मुदा ई असंभव अछि। प्रथम बात अपन मिलन भेनाई असंभव थिक । एहेन परिस्थिति में हुनक श्रापक दूसर अंश कोना कs पूरा होयत से कहु"! उर्वशी किछु क्षण मौन रहली। पुरूरवा ओहि मौन के तोड़लथि - "आहाँ के नींद आबि जाइत अछिै उर्वशी"? " आहाँ के नहि अबैत अछिै"? "हम राजा भेलहुँ कि हमर नींद पर्यन्त अन्य लोकक समान हमरा सs डेराय लागल अछिै"। "आहाँ के हमर याद नहि अबैतअछिै"? "आहाँ हमर परीक्षा लs रहल छी"? "नहि राजन् हम भला आहाँ के परीक्षा कोना कs लs सकैत छी? मुदा आहाँक निश्चिंतता हमर मोन में आहाँ के प्रति आशंका उत्पन्न कs रहल अछिै। कहियो हमरा सs भेंट करवाक कनियों प्रयास नहि भेल आहाँ के दिशि संs। आ हम - हम त जखनि-जखनि हृदयक वेदना संs विवश भेलहुँ आहाँ के विरह में तखनि-तखनि विक्षिप्त समान दौड़ पड़लहुँ आहाँ संs मिलन के लेल, आ चलि अयलहुँ आहाँ के निकट"। "आहाँ यदि राजा होइतहुँ तखनि हमर विवशताबूझि सकितहुँ"। "हम आब राजा होमय सs तs रहलहुँ। हँ यदि आहाँ चाहब तs रानी बनि सकैत छी "। "हमर हार्दिक अभिलाषा अछिैै आहाँ के अपन रानी बना ली l हमर हृदय के रानी तs आहाँ ओहि क्षण भs गेलहुँ जखन आहाँक आँगुड़ीक प्रथम स्पर्श भेल छल हमर ललाट पर,आ हमर आँखि आहाँक सुंदरता में डूबि गेल छल"। "तखन आहाँ के विवशता केहेन"? ओ सभ तs हम आहाँ के पूर्वहि में बता चुकल छी। स्वर्गक अर्धासन आहाँ सs हमर मिलन के मार्ग में बाधक अछिैै। लेकिन हम बेसी दिन बाधा नहि बनs देब स्वर्गक अर्धासन के। हम जखन आहाँ के प्रेम में अपना के अत्यधिक विवश अनुभव करs लागब,आहाँ के वियोग में जीवन हमरा वास्ते दुरूह भs जाएत,तखन हम स्वर्ग के अर्धासन के ठोकर मारि आहाँ के अपन रानी बना पृथ्वी पर लs जायब"। "हँ!आब हम आहाँ के विवशता बूझि रहल छी राजन्! स्वर्गक शासन के दायित्व एतेक कम समय में छोड़ि देमय पर हमर सभ के अपार बदनामी भs जाएत l संगहि तखनि तs हमरा पत्नी रूप में स्वीकार कएला पर इन्द्र आहाँक दुश्मन बनि जएताह l उपहार के रूप में हमरा ओ आहाँ के तs नहिये देताह"। मरणशील मानव आ अमर अप्सरा के मिलन त्रिलोक में केओ पसिन्न नहीं करत"l "हम आहाँ के प्रेम में पागल होइत जा रहल छी उर्वशी,आ अहुँ तs हमर प्रेम प्राप्ति के अभिलाषा रखैत छी " - मधुर मुस्की के संग कहलथि राजा पुरूरवा । "हँ राजन् हमरा सभ के एक-दूसर सs वास्तविक दिव्य प्रेम भs गेल अछि अछि । सच्चा प्रेम प्रथम दृष्टि में भs जाइत अछि"। "हँ ! उर्वशी! आहाँ सत्य कहलहुँ, वास्तव में कहु तs प्रेम हृदय के बंधन थिक सभ प्रकार के वासना सs अलग। प्रेम जाति,धर्म अथवा ऊंच-नीच के बंधन के नहि मानैत अछि । वासना शारीरिक मिलन केर नाम थिक,मुदा प्रेम हृदय के मिलन अछि"। " आब चलवाक चाही" - किछु बेरि तक मौन रहि किछु सोचैत रहली उर्वशी, तदुपरांत उठवाक प्रयास करैत ओ राजा सs कहलथि l "नहि प्रिये किछु देरी तक आरो बैसू ने ! अखनि तs प्रिये हम आहाँ के पूर्ण रूप देख तक नहि पयलहुँ अछि"l "ठीक बात छैक राजन्! हमरा किछु देरी तक आरो बैसs में कुनू दिक्क़त नहि,हम तs आहाँ के लेल सोचैत छलहुँ"l "नहि हमरा कुनू जल्दी नहि अछि"l किछु बेरि तक मौन रहि किछु सोचैत रहलथि दुनू, फेर उर्वशी एहि मौन के भंग करैत बाजि उथलथि- "आहाँ के ज्ञात अछि कि हम आहाँ सs कहिया सँs प्रेम कs रहल छी "? "हँ,शायद ओहि दिन सँs जाहि दिन सँs हम आहाँक स्थापना अपन हृदय में कs लेलहुँ"l "नहि हम तs आहाँ के ओहि दिन सँs पहिले...बहुत पहिले सँs प्रेम कs रहल छी"l "से कुना ? हमर आ आहाँ के साक्षात्कार तs ओहि दिन भेल छल पहिल बेर "? ""नहि हम तs आहाँ के ओहि दिन सँs पहिले देख चुकल छलहुँ। जाहि दिन आहाँ स्वर्ग पहुंचल रही। मुदा प्रेम तs ओहि दिन सँs पूर्वहि सs भs गेल छल आहाँ सँs,जखनि एक दिन नारद ऋषि आहाँ के प्रशंसा देव सभा में देवेन्द्र सँs कएने छलखिन "। "ओह उर्वशी आहाँ तs चोर निकललहुँ "! "चोर हम नहि,चोर तs आहाँ थिकहुँ। पहिले तs हमर हृदय अहीं चोरी कएने रही "। "उर्वशी हमर हृदय चाहैत अछि कि आहाँ अहिना हमर समक्ष बैसल रही ,आ हम आहाँ के देखैत रही "। "भला कखनि तक" - बिहुँसइत उर्वशी पूछलथि। "जखनि तक हमर सांसक डोरि शरीर सँs बंधाएल रहत -तखनि तक"। "काश ! ई सम्भव भs सकैत! यदि ईश्वर हमरा सँs एखनि कोनो वरदान मांगैक लेल कहथि,तs हम आहाँ के कल्प पर्यंत अपन समक्ष देखैत रहवाक वरदान मांगि लितहुँ "l "आहाँ बहुत चतुर छी उर्वशी"l "आहाँ सs कम छी हम, देखू आहाँ कुना चोरी-चोरी हमर हाथ के चुम्बन लs लेलहुँ"l "उर्वशी हम एहि कमल पंखुड़ी के रसास्वादन कs सकैत छी"? "नहि-नहि! आहाँक अभिलाषा एहि तरहें बढ़ल जाएत " - उर्वशी प्रतिरोध केलथि, मुदा पुरूरवा उर्वशी के अधर के चुम्बन लs लेलथि । लज्जा सs उर्वशी के मुख-मंडल आरक्त भs गेल । ओ कृत्रिम क्रोध प्रगट करैत बाजि उठलथि - "ओह तs आहाँ एहि कारण सँs हमरा किछु देरी आर बैसs के वास्ते कहलहुँ"? "नहि हमर अभिलाषा तs मात्र आहाँ के देखैत रहवाक छल,जाहि कारण सs हम ठहरल छलहुँ,मुदा आहाँक अप्रतिम सौंदर्य हमर हृदय के एहि धृष्टताक वास्ते प्रेरित कs देलक l यदि आहाँ के दु:ख पहुंचल तs हम क्षमा चाहब आहाँ सँs"। घबड़ा कs तड़प भरल स्वर में जल्दी सs उर्वशी बाजि उठलीह - "नहि-नहि राजन्! हम तs अपना के आहाँक प्रति समर्पित कs चुकलहुँ, बहुत पहि नहि । ओ...ओ....ओ... तs... हम हंसी करैत छलहुँ "। अपन प्रति उर्वशीक व्यवहार अपनापन में घुलल प्रतीत भेलैन्हि राजा के। किछु काल धरि गंभीर रहला उपरान्त पुरूरवा कहलथि - ' आब हम चलि जाएब प्रिये"l "एतेक शीघ्र"? "हँ,हमरा तs एतः आ पृथ्वी दुनू के शासन व्यवस्था सम्हारवाक अछि। अहिठाम तs देवराज छथि, पृथ्वी के व्यवस्था हमरा स्वयं देखs के होयत"! "किछु दिन आर ठहरि जइतहुँ, आहाँ बिन हमर हृदय व्यग्र रहत"। "आब एखन ठहरनाई तs संभव नहि अछि प्रिये । हँ,जखन हम आहाँ के प्रेम में अपना के बहुत अधिक विवश अनुभव करब।आहाँ बिन हमर हृदय व्यग्र भs जाएत, हमर हृदय आहाँ के विरह सहन नहि कs पाएत ,आहाँ क विरह-ज्वाला हमरा विदग्ध करs लागत तखन स्वर्ग लोक में चलि आएब आहाँ के दर्शन सs अपन हृदय के ज्वाला शांत करवा लेल "। "आ हमर हृदय के ज्वाला के की होयत!" उर्वशी के आंखि l में अश्रु झिलमिला उठलनि। किछु बून्द दुनू कपोल पर ढरकि हॉट गेलनि। कनला सs भारी भेल स्वर में ओ कहलथि - "तखन तक हम कोना कs अपन हृदय के ज्वाला शांत करब राजन्"? पुरूरवा अपन एक हाथक गली सs अंगूठी उतारि उर्वशी के कोमल कमल कर के पकड़लथि आ हुनका उंगली में पहिरा देलथि - "एकरा देखि-देखि आहाँ अपन ज्वाला शांत करब प्रिये"l उर्वशी भावावेश में पुरूरवा के वक्ष सs लागि हुनका आलिंगनबद्ध कs लेलथि। पुरूरवा दाहिन हाथ सस उर्वशी के पीठ पर धीरे-धीरे थपकी देमs लग लाह l किछु काल धरि दुनू ओहि मुद्रा में स्थिर रहलथि l दुनू के भाव भंगिमा देखि एना बुझाईत छल जेना दुनू दिशि लागल आगि शीतल भs गेल होय l दुनू के मुख पर असीम शांति व्याप्त भs गेलछलनि l आँखि में संतुष्टि के भाव भरलनि तs पलक स्वमेव मुँना गेलनि l किछु क्षण बाद मधुर स्वप्न के भंग करैत उर्वशी कहलथि - "आब अपना सभ के चलवाक चाही राजन्"l "ठीक छैक! हमहूँ यैह सोचैत रही"l ओतह सँ s उठि गेलथि दुनू:। पुन दुनू एक दूसर के हाथ में हाथ थामि चलि देलथि l अमरावती में पहुंचि क दुनू अलग-अलग दिशा में मुड़ गेलथि l मुदा विदा होइ सs पूर्व राजा उर्वशी के दुनू हाथक मधुर चुंबन,आ पृथ्वी सs पुरूरवा के शीघ्र वापस आबै के वचन उर्वशी लs चुकल रहथि l क्रमशः अपन मंतव्य editorial.ऽtaff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.७.प्रणव झा-भौकाली मुर्गा (लघु व्यंग्य) प्रणव झा भौकाली मुर्गा (लघु व्यंग्य) मुर्गा के एकटा गाम मे बिलाड़ि के आतंक बढि गेल छल। गामक मुखिया मुर्गा सब के बेर-बेर ऐ समस्या से छुटराकार के आश्वासन दैत छलाह मुदा अक्सरहा पेपर मे बिलाड़ि के आतंक के ख़बरि छपाइत रहई छल। ऐ सब से उबिया चुकल मुर्गा सब अंततः मुखिया बदलबा के निर्णय लेलक आ एकटा भौकाली मुर्गा के अपन मुखिया चुनलक। सब के ई उम्मीद छल जे ई भौकाली मुर्गा बिलाड़ि के आतंक के समाप्त क देत। नबका मुखिया मुर्गा सब के बीच बिलाड़ि के आतंक समाप्त कर’ लेल अजीब-अजीब निर्णय लेब’ लागल। मुदा ओकर सुखद परिणाम कम देखाई आ मुर्गा सब के किछ न किछ नया आफैत से साक्षात्कार भ जाय, किएकि निर्णय सब के आधार ज्ञान आ शोध कम, अनुभूति, जिद्द आ लोकलुभावनवाद बेसिआई छल। मुदा तैयो मुर्गा खुश छल, किएकि भौकाली मुर्गा मुर्गा सब के बिलाड़ि के आतंक से बचबाक एकटा गूढ गुरुमंत्र द देने छल। ओ अपन प्रचारतंत्र के माध्यम से सबटा मुर्गा के ई बता देने छल जे कतौ जे कोनो बिलाड़ि के गंध लागौ त सब अपन आंखि, नाक मुइन लीहें, बिलाड़ि अपने मोने भागि जेतौ। आब सब मुर्गा एहिना कर’ लागल छल। ऐ बीच बिलाड़ि चुपचाप आबई आ कोनो मुर्गा के अपन शिकार बना लै। किएकि मुर्गा के आबादी एत्तेक छल कि बिलाड़ि के ई गुपचुप खेल के पता ककरो नई लागई। किछ मुर्गा शक करय आ जांच के मांग करई त भौकाली मुर्गा के गुर्गा के द्वारा ओय मुर्गा सब के समाज विरोधी घोषित क के चुप करा देल जाय छल। ऐ तरहे कालचक्र अनवरत चलि रहल छल। लागय छल जेना बिलाड़ि सब के शिकार होनाई मुर्गा सब के नियति बनि गेल छल। नोट: मुर्गा- आम नागरिक , बिलाड़ि - भ्रष्टाचार /घोटाला ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.८.आचार्य रामानन्द मण्डल-अगस्त क्रांति शहीद रामफल मंडल: जीवन वृत/ कमीना विद्वान आचार्य रामानंद मंडल अगस्त क्रांति शहीद रामफल मंडल: जीवन वृत/ कमीना विद्वान १ अगस्त क्रांति शहीद रामफल मंडल:जीवन वृत बिहार मे अगस्त क्रांति अंतर्गत फांसी पर लटके वाला सात शहीद मे एकटा आ मिथिला अन्तर्गत जिला सीतामढ़ी के पहिला शहीद रामफल मंडल रहथिन। महान् क्रान्तिकारी अमर शहीद रामफल मंडल 06 अगस्त 1924 के सीतामढ़ी जिला के बाजपट्टी थाना के मधुरापुर गांव मे धनुवंशी धानुक कुल मे पिता गोखुल मंडल आ माता गरबी देवी के पुत्र रत्न के रूप मे पैदा होयल रहे। रामफल मंडल चारि भाई मे तेसर रहथिन।पहिला रामशरण मंडल,दोसर मंहथ मंडल आ चौथम मिश्री मंडल रहे।सभ भाई कुश्ती खेले आ किसानी करे।माल-जाल पोस के आ वोकर खरीद-बेच करके अपन आमदनी जुटावत रहे।हुनकर बाबूजी गांव मे एकटा किराना के दोकान चलबैत रहथिन।वो14 बरख के उमर मे मिडिल पास कर गेल रहथिन।पहलवानी के चलते इनकर देह कसल रहे।5'5''के गोर देह,चमकैत आंखि,भव्य लिलार आ औंठिया केश सहजैय मन मोहे वाला रहे।चेहरा हंसमुख, सौम्य, मृदुभाषी,साहसी आ रोबदार रहे।17बरख के उमर मे सीतामढ़ी जिला के रुन्नीसैदपुर थाना भीतैर गंगवारा निवासी अमीन मंडल के बेटी जगपतिया देवी से विआह भेल रहे।वो धार्मिक आ दयालु महिला रहथिन।विआह के एक बरिस बाद 15सितम्बर 1942के दिन हुनका एकटा पुत्र रत्न भेल रहे जौं रामफल मंडल जेहल मे रहथि। अखिल भारतीय कांग्रेस अधिवेशन सर्वसम्मति सं गांधी जी के अगुआई आ अब्दुल कलाम आजाद के सभापतित्व मे 08अगस्त1942 के एकटा प्रस्ताव पास कैलन रहे जे समूचा देश मे भारत छोड़ो आन्दोलन वा अगस्त क्रांति के नाम से जानल जाय हैय।जे इतिहास के पन्ना मे स्वार्णांकित हैय। अगस्त क्रांति के ज्वाला के लपट पूरा हिंदुस्तान के अपना आगोश मे ले ले रहैय। मधुरापुर के युवक विन्देश्वरी प्रसाद गांव मे एकटा सभा कैलकआ आजादी के लड़ाई लड़ें लेल रामफल मंडल के नेतृत्व मे एकटा युवा दल के स्थापना कैलन।हरिहर प्रसाद, कपिल देव सिंह, शत्रुघ्न सिंह,मुनेश्वर सिंह,श्री कृष्ण प्रसाद,रामप्रीत साह,फूलवारी मंडल, सहजानंद शर्मा, भुवनेश्वर राय आ जनार्दन झा आदि अई युवा दल के सदस्य रहथिन।तै समय के पुपरी थाना के दरोगा अर्जून सिंह के अत्याचार आ अनाचार से थाना के जनता तबाह रहे।अइसे जनता बौखला गेल रहे। 19अगस्त1942के दिन अंग्रेजी सिपाही खादी भंडार,बाबा नरसिंह दास,रामनंदन सिंह आ मोहन सिंह के घर जला देलक।पता चलल कि24अगस्त 1942के दिन उत्पात मचावे आतातायी दरोगा अर्जून सिंह बाजपट्टी आबे बाला हैय। आंदोलनकारी एगो गुप्त मिंटीग बनगांव मे कैलन आ वीर रामफल के नेतृत्व मे कथित देश के गद्दार दरोगा अर्जून सिंह के देश के आजादी के राह से हटावे के शपथ ले लेलन।बैठक मे बाबा नरसिंह दास, सकलदेव कुंवर,रामबुझावन ठाकुर,हरिहर प्रसाद, विन्देश्वरी प्रसाद आ वीर रामफल मंडल आदि सम्मिलित रहलन। 24अगस्त 1942 के दिन ब्रितानी शासन आ आजादी के बिरोधी आतातायी दरोगा अर्जून सिंह कोहराम मचाबे बाजपट्टी आबे बाला रहे।परंच युवा दल के मंशा वो गुप्त रुप से जान गेल।त अर्जून सिंह कोनो बहाना बनाके अपने न आयल आ क्रूर आतातायी अंग्रेजी हुकूमत के एसडीओ हरदीप नारायण सिंह, पुलिस इंस्पेक्टर राममूर्ति झा पुलिस श्याम लाल सिंह, चपरासी दरवेशी सिंह आ ड्राइवर आदित्य राम के युवा दल के आंदोलन के कुचले के लेल भेज देलक। बाजपट्टी चौक पर रामफल मंडल के नेतृत्व मे आंदोलनी लाठी , डंडा,भाला,बरछी, तलवार,फरसा से लैस चौक के जाम कैलै रहे।तही बीच मे आतातायी एसडीओ हरदीप नारायण सिंह अपन टीम के साथ पहुंचल। आंदोलनकारी और उत्तेजित हो गेल। यही बीच मे अंग्रेजी सरकार के इंस्पेक्टर राममूर्ति झा आंदोलन के कुचले के लेव अपन पिस्तौल से हवाई फायरिंग करे लागल। आंदोलनकारी अइसे भड़क गेल। अइ बीच मे रामफल मंडल इंस्पेक्टर राममूर्ति के हाथ से झपट्टा मार के पिस्तौल छीन ले लेलक। आंदोलनकारी इंस्पेक्टर से जुझे लागल। तब वीर रामफल मंडल सभसे पहिला वार फरसा से एसडीओ हरदीप नारायण सिंह के गर्दन पर कैलन।छपाक के आवज गर्दन कट के लटक गेल आ खून के फव्वारा फूट पड़ल।लहू से रामफल मंडल नहा गेल।लगैय जेना अंग्रेजी हुकूमत से खून के होली खेललन हैय।आंदोलकारी लाठी डंडा भाला फरसा से इंस्पेक्टर राममूर्ति झा,हवलदार श्यामलाल सिंह आ चपरासी दरवेशी सिंह के भी मार देलन। भीड़ के फायदा उठा के चपरासी आदित्य राम भाग गेल। वीर रामफल मंडल एसडीओ हरदीप नारायण सिंह के लाश आ आंदोलनकारी सब इंस्पेक्टर राममूर्ति झा, हवलदार श्यामलाल सिंह आ चपरासी दरबेशी सिंह के लाश के अपना कंधा पर उठा के बगल के अधवारा नदी मे विसर्जित कै देलक। आंदोलनकारी भारत माता के जय बोलैत रहे।अइ तरह से देश के आजादी के आंदोलन के बाधक देश के आंतरिक दुश्मन के अंत भे गेल। भाग के चपरासी आदित्य राम सीतामढ़ी मजिस्ट्रेट कोर्ट मे पहूंचल आ रामफल मंडल, बाबा नरसिंह दास एवं तीन चार सौ अज्ञात पर हत्या केश नं-473/42 का मुकदमा कर देलक।अइ हत्याकांड के बाद अंग्रेज कलेक्टर आ पदाधिकारी सिपाही सभ के साथ बाजपट्टी मे अत्याचार आ अनाचार करे लागल। रामफल मंडल आ आंदोलनकारी के घर मे आग लगा के घर के राख कै देवकी। बहु बेटी के इज्जत से खेले लागल। बुझावन ठाकुर संगे बहुत लोग के गिरफ्तार कर लेलक। बनगांव जानकी सिंह के दरवाजे पर गोली मार देलक। प्रदीप सिंह के काला पानी भेज देलक। बहुत से लोग नेपाल भाग गेल। रामफल मंडल अपना परिवार के सुरक्षा के लेल अपना बड़का भाई के ससुरार लछमिनिया, नेपाल मे रखे चल गेलन। ससुर नंदु अधिकारी संरक्षण देलन।वीर रामफल मंडल कहलन कि हमरा पत्नी के सुरक्षित राखू।हम त भारत माता के आजादी के लेल अपन देश भारत जायब।नंदु अधिकारी बहुत रोकलन।परंच आजादी के दिवाना के छिपना रूकना मंजूर न रहे।10 दिन बाद मधुरापुर आ गेलन।डरल लोग सभ कहे लागल-भाग जा रामफल। एसडीओ, इंस्पेक्टर, पुलिस आ चपरासी के मारे मे तोरे हाथ हौव।तू पकड़ा जैयबा।भाग जा रामफल।भाग जा। वीर रामफल कहलन-हम कोनो चोरी डकैती न कैली हैय।हम देश के लेल,लोग के भलाई के लेल,अमन आ सुख चैन के लेल अंग्रेजी मुलाजिम के मार ली हैय।जेल आ फांसी के लेल हम तैयार छी। हमरा न चिंता हैय,न डर हैय,न भय हैय। बाजपट्टी हत्याकांड के बाद25 अगस्त 1942के दिन आंदोलनकारी आ अंग्रेजी पुलिस के झड़प मे चरौत मे चरौत के भदई कबारी शहीद हो गेलन। पुपरी मे सहदेव साह, महावीर गोप,बहेरा के रामबुझावन ठाकुर शहीद भे गेलन। हरिहरपुर के रामलगन सिंह, राम स्वार्थ सिद्ध,रामचरण मंडल,झगरू मंडल, रामस्वरूप सिंह लोगन नेपाल मे भूमिगत हो गेलन। 29अगस्त1942के दिन रीगा रेवासी मे मथुरा मंडल शहीद हो गेलन। राजाराम मंडल, लीला मंडल,रक्टू मंडल,सूरज कुर्मी, बंगाली मंडल, यमुना मैहता, नंदलाल मेहता,बुनीलाल राय, सहदेव राय, सुंदर मेहता,नेबी मंडल संगे दर्जनों आंदोलनकारी घायल हो गेलन। रीगा स्टेशन पर रेल पटरी उखाड़ैत बेर मे पुलिस गोली से मौजें झा आ सुखराम महरा शहीद हो गेलन।नूनू मियां घायल आ बाद मे शहीद भे गेलन। 30अगस्त1942के दिन तरियानी छपरा (शिवहर) मे पुलिस आ आंदोलनकारी के लड़ाई मे बलदेव सूंड़ी,सुखन लोहार,वंशी ततमा,परसत साह, सुंदर महरा,छठू कानू,जयमंगल सिंह,भूपन सिंह आ नौजाद सिंह शहीद भे गेलन।बिकन कुर्मी,बुधन कहार,बुझावन चमार, मुक्ति सिंह, गुलजार सिंह,रामेश्वर सिंह, बंगाली नुनिया,मौजे सूढ़ी,चुल्हाई ठाकुर, रामलोचन सिंह, रामदेव सिंह,रामपुकार ततमा, राजेंद्र धानुक,गुगुल धोबी,पुरन सिंह आ दर्जन आंदोलनकारी घायल हो गेलन। 06सितम्बर 1942के दिन वीर रामफल मंडल गिरफ्तार कैल गेलन।छह महीना डुमरा सीतामढ़ी जेल मे रहला के बाद हुनका सेन्ट्रल जेल भागलपुर भेज देलक। ग्रामीण जनक मंडल, सहोदर भाई महंथ मंडल खुशी से जेल मे रामफल मंडल के बतैलक रामफल तोरा एकटा पूत्र रत्न प्राप्त भे लो हैय।हंसैत वीर रामफल मंडल कहलक-आबि हमरा फांसी मिल जायत।अब हम घर पर न लौट पायब। आठ महीना बाद हुनकर पुत्र के देहांत भे गेल। घरवाला इ सूचना वीर रामफल मंडल के न देलक। भागलपुर कोर्ट मे 12,13,14 अगस्त1943के लगातार बहस भेल।वीर रामफल मंडल के बचाव पक्ष मे तीन नामी वकील के बहस करे ला प्रांतीय कांग्रेस कमिटी भेज ले रहे। वकील सभ वीर रामफल मंडल के सुझाव देलक-कोर्ट मे जज के सामने कहब,हम न मार ली हैय। संदेह के लाभ मे अंहा बच जायब। परंच जौं जज पूछलक - रामफल मंडल तूं एसडीओ के मार ला ।वकील के सुझाव के ठुकरा के वीर क्रांतिकारी रामफल मंडल कहलक-हं। हजूर।पहिला फरसा हम ही मार लियै। जिला जज, वीर रामफल मंडल के फांसी के सजा सुनैल कै। 23 अगस्त 1943 के भोर04 बजे भारत के वीर सपूत रामफल मंडल हंसैत हंसैत फांसी के फंदा के चूम लेलन। फांसी के फंदा चूमे से पहिले हुनका से अंतिम इच्छा पुछल गेल रहे त वीर रामफल मंडल कहलन-अंग्रेज सभ हमर देश छोड़ कर चल जाय आ हमर प्राण से भी प्यारा देश आजाद हो जाय। अगस्त क्रांति के वीर शहीद के नाम तत्कालीन जिला मुजफ्फरपुर के टावर मे स्वर्णाकित हैय।आ सीतामढ़ी जिला के बाजपट्टी चौक पर के टावर मे आदमकद मूर्ति प्रतिष्ठापित हैय।जे आइ भारत के संतान के भारत के आजादी के अक्षुण्ण रखे के संदेश दे रहल हैय। हिंदी के एकटा कविता अंश के रूप मे- हम लायें हैं तूफान से किश्ती निकाल के, इस देश को रखना, मेरे बच्चे संभाल के। हमरा सभ के अइसन वीर क्रांतिकारी, फांसी के फंदा के चूमे वाला शहीद रामफल मंडल पर गर्व हैय। २ कमीना विद्वान कुमार विश्वास प्रसिद्ध मैथिली साहित्यकार रहलन।वो एक साथ कवि, कथाकार, उपन्यासकार आ आलोचक रहलन। सोना मे सुगंध इ कि वो मैथिली विश्वविद्यालय मे मैथिली विभाग के विभागाध्यक्षो रहलन। हुनकर पढाबे के शैली पर विद्यार्थी दीवाना रहय।दोसरो विभाग के विद्यार्थी हुनकर क्लास मे बैठ जाय। खचाखच क्लास भरला के बाद क्लास के खिड़की आ गेट पर खड़ा होके सुनय लागे। परंतु कोई शोर गुल न। केवल कुमार विश्वास के आवाज। लेक्चर के समय पाठ के अनूकूल भाव भंगिमा मन मोहक। कुमार विश्वास के रहन सहन मे रइसपन टपके। गर्मी में सफेद कुर्ता -पैजामा त कहियो सफेद धोती कुर्ता।जाड़ा मे कोट-पैंट आ मफलर। मुंह में पान आ आंख पर गोग्लस। सायं मे मदिरा। कोनो कंजूसी न। रिक्शावालो हुनकर दिवाना। रिक्शावाला के नज़र जौं प्रोफेसर साहब पर परल कि दोसर सवारी के लेवे से मनाही।कारन प्रोफेसर साहब कहियो भाड़ा गिनके न देलन।जेबी से जे निकल जाय। जौं जेब खाली तैइयो रिक्शावाला के मुंह न म्लान। कुमार विश्वास साहित्य के संगे नारी सौंदर्य के दिवाना रहतन।वो हमेशा सुंदर नारी से घिरल रहतन। चाहे वो प्राध्यापिका रहे वा छात्रा। हुनका कोनो कोनो से वासनात्मक संबंधो रहय। पीएचडी करेवाली एगो छात्रा त शिकायतो करैले रहे। परंतु हिनकर विद्वता आ उच्च संपर्क के आगे शिकायत निरस्त हो गेल। प्रोफेसर कुमार के पत्नी रहे कामिनी। उच्च कुल के बेटी। बाबू ब्लाक के बड़ा बाबू। कामिनी स्नातक रहे।खुब सुन्नर।साक्षात कामिनी। परंतु कामिनी सेयो बीस रहे वोकर छोट बहिन काम्या। काम्या एम ए मैथिली मे कुमार विश्वास के छात्रा रहे। सौंदर्य के भ्रवंरा से सौंदर्य के फूल कंहु बच के रह सकैय हय। कुमार से काम्या बच न पायल। भ्रवंरा जेते फूल के चाहैत हय,वोतवे फूल भ्रवंरा के चाहैत हय। प्रेमी लुटे चाहय हय त प्रेमिका लुटाय।इ दूनू के परस्पर विरोधी आकर्षक संबंध हय। रहल कामिनी के विरोध के बात त उच्च कुल आ कुमार विश्वास के विद्वता बाधक। समाज मे विद्वान के गलत काज के विरोध करे मे समाज असमर्थ हो जाइ हय। छोड़ूं वो विद्वान छथिन, हुनका लेल एकटा खून माफ हय। त कुमार एगो खून क देलन। रहस्यमय खून।जेइमे खून न बहल। कुमार विश्वास अपना सारी आ छात्रा के विआह अपन स्वजातीय छात्र शेखर से करा देलन।आ वोकर हत्या के खडयंत्र रचलन। एकांत में कुमार बजलन -काम्या अब हम दूनू गोरे बिना लाग लंपट के साथ रहब।लिव इन रिलेशनशिप। काम्या बाजल -कोना। जीजा जी। कुमार बाजल -अंहा के मनमोहनी विस कन्या बने पड़त। अंहा रात मे अपना दुल्हा के दूध में जहर मिला के पिला दूं।आगा सभ हम देखि लेबय। काम्या बाजल -जीजा जी। अंहा सौंदर्य के खतरनाक खिलाड़ी छी। कुमार बाजल -कोनो अंहा कम खेल्हाड़ि छी। काम्या बाजल -बेश जीजा जी। काम्या आइ रात बिस कन्या बन गेल।अपन सौंदर्य जाल मे समेटित शेखर के जहर मिलायल दूध पिआ देलक। सबेरे शेखर विछावन पर मृत पायल गेल रोना रोहट भेल। कुमार विश्वास के पहल पर पुलिसो के सूचितो न कैल गेल। बातों खतम भे गेल। कामिनी त अपन मुंहे बंद क लेलक।कुमार विश्वास आ विधवा काम्या लिव इन रिलेशनशिप मे रहे लागल। आइ लोग कहय हय कुमार जेतबे विद्वान हय ओतबे कमीना इंसान हय। -आचार्य रामानंद मंडल सामाजिक चिंतक सीतामढ़ी,सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक, माता-चन्द्र देवी, पिता-स्व०राजेश्वर मंडल, पत्नी-प्रमिला देवी, जन्म तिथि-०१ जनवरी १९६० योग्यता- एम-एससी (रसायन शास्त्र), एम ए (हिन्दी)। रूचि- साहित्यिक, मैथिली-हिन्दी कविता -कहानी लेखन आ आलेख। प्रकाशित पोथी - मैथिली कविता संग्रह भासा के न बांटियो। २०२२ प्रकाशित रचना - सझिया कविता संग्रह पोथी - जनक नंदिनी जानकी आ शौर्य गान। २०२२ पत्रिका -मिथिला समाज, घर -बाहर आ अपूर्वा (मैसाम)। अखबार -दैनिक मैथिल पुनर्जागरण प्रकाश। सामाजिक-सामाजिक चिंतन, दायित्व- पूर्व जिला प्रतिनिधि, प्राथमिक शिक्षक संघ, डुमरा, सीतामढ़ी। स्थायी पत्ता- ग्राम-पिपरा विशनपुर थाना-परिहार जिला-सीतामढी। वर्तमान पता-पिपरा सदन,मुरलियाचक वार्ड-04 सीतामढ़ी पोस्ट-चकमहिला जिला-सीतामढी राज्य-बिहार पिन-843302 मो नं-9973641075 ईमेल-ramanandmandal001@gmail.com ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.९.डा. किशन कारीगर-मैथिली साहित्यक एलीट बोनबिलाड़ आ सर्वनाशी दलाल डा. किशन कारीगर मैथिली साहित्यक एलीट बोनबिलाड़ आ सर्वनाशी दलाल मैथिली साहित्य, मैथिली साहित्यकार, अकादमी पुरस्कार, मैथिली रत्न डंका पिटा रहलै बलू ई सब कतअ हई? जनता लक, लोक काज में लोक वेबहार मिथिला समाज में कतौ हई की मैथिली साहित्य? हँ मैथिली साहित्यक गिरोहवादी दलाल टा तक जरूर हई आ एकरा सब छोइड़ मिथिला लोक समाज तक मैथिली साहित्य कतौ नै रहलै आ नै लोक के मोन भवै छै? कारण कतेको छै आ सब स बेसी दुर्गंध मचौने छैई एलीट बोनबिलाड़ आ सर्वनाशी पेटपोसुआ दलाल सब? एकरे सब स जनता जनार्दन ललकाइर के पुछौ ने जे बलू कतअ हई केकरा सब लक गिरबी बन्हाएल हई मैथिली साहित्य? जनता आ समानांतप साहित्यकार सब एकरा सबके खिहारब शुरू करौ त जवाब दै बेर बकार हरण भऽ जेतै की. मुदा लोक अभिरूचि कम हेबाक कारणे अई दलाल एलीट बोनबिलाड़ सबहक मनमाफिक साहित्यिक दलाली खूब फलाभूत भऽ रहलै की. एलीट बोनबिलाड़ माने साहित्य अकादमी नामे परामर्शी, संजोजक, जूरी, सलाहकार, मैथिली भोजपुरी अकादमी, मैथिली अकादमी मे सदस्य बनि मैथिली साहित्यक नामे जे सरकारी राशी, पुरूस्कार, पद, के भरपूर फायदा उठा बोनबिलाड़पनी करत आ अप्पन पेट भरत आ अपना साहित्यिक गिरोहक दलाली चमकौने फिरत आ वरिष्ठ मैथिली साहित्यकार हेबाक दाबीए निशा में चूर रहत. जबकी एकरा सबके लिखल साहित्य एकरा गिरोहक लोक छुटभैया साहित्यकार छोइड़ आन कोइ तेसर लोक आम जन सब नै पढ़ै छै. दोसर दिस सर्वनाशी पेटपोलुआ दलाल सह सेहो खूब उतपात मचौने अछि की. चंदाखोरी क ई दलाल सब साहित्यिक आयोजन क खूब अनेरूआ डंका पीटत पुरूस्कार बांटत अपनो पुरूस्कार रत्न बटोरत आ ई ओकरा सम्मानित करत उ ओकरा फला चिलां के आ चिल्ला झा फल्ला झां के सम्मानित क साहित्यकार हेबाक डंका दशमी के डगर जेंका डूग डूग क देत की करा देत आन कोनो लेखक वा की आन गिरोहक लेखक के साहित्यकार मानै काल दस टा बहन्ना बतिआएत. आभासी पटल पर एकरा सबहक कुकृत्यक बिरोध भेला पर ई दलाल एलीट सब एक आध बेर कोनो चुपचापी मंडल/ गिरगिटीया मंडल वा चुपचापी चलाक जादव महतो कांपरि लाभ आदी के पुरस्कार द अनघोल करत जे मैथिली साहित्य सबहक छियै? असल मे त मैथिली साहित्य मात्र एलीट पेटपोसुआ दलाल सबहक टा रहलै आ रहतै.
मैथिली साहित्य मुख्य रूप से चारि टा गिरोह मे बँटाएल छै/ हई क.
1. इलीट बोनबिलाड़ गिरोह- अई ग्रुप मे सब दिन स साहित्यिक बोनबिलाड़ सब समूह मे रहलै आ मैथिली साहित्यक नाम पर सबटा मलाई खरांत यैह सब चा खाइत रहलै. अनका ककरो कहियो भाभंस नै हुअ देलकै आ परामर्शी संजोजक जूरी बनल मैथिली साहित्यक फरदबाली क खूब मौज उड़बैयैए आ खूब लोक के दिआस दियौलक जे मैथिली साहित्य सबहक छियौ आ फायदा टा हमरे हेतौ. एकरा सबहक दलालीक खिस्सा पर त कए पन्ना लिखा जेतै आ लिखा रहलै मुदा निरलज्जा के लाजे कथी के? बिरोध भेलाक बादो तइयो एकरा सबहक वर्चस्वाद बनले रहलै कारण आम लोक जनक अरूची. सबटा अकादमी पुरस्कार पोस्ट आदी ई सब अपने हाथे हसोंइत लैतो आ खूब जयकारी उद्घोषणा करते रहतौ.
2. पेटपोसुआ मानकी दलाल गिरोह:- ई होहकारी सब त ईलीट ग्रुपक खेलाक बाद बंचल खूचल हड्डी बाइस खा मैथिली साहित्यक दलाली करने फिरत. लोक भाषा मैथिली के मानकी नाम पर शुद्ध अशुद्ध पैछमाहा दैछणाहा राड़ कोसिकन्हा में बाँटि अप्पन मानकी दाउ सुतारैत रहलै. ई सब कोनो लोक शैली के छपवा कला संपादित कर मानकी कर देतौ. ई मानकी दलाल सब अपने गिरोह टा लोक के साहित्यकार मानतौ अनका बेर मानकी बहन्ना बतिआए लगतौ. ई सब मैथिली साहित्य पर कब्जा दुआरे पत्र पत्रिका छपतौ समीति संगठन बना साहित्यकार हेबाक टैग दुआरे मैथिली मे हमरे टा बपौती बनल रहैए तइ दुआरे की सब खेल ने खेलेतौ आ समानांतर विचार वला आधुनिक साहित्यकार सबहक उनटे बिरोध करतौ आ तै काज मे दू चारि टा पिछलगुआ होहकारी सब के सेहो गिरोह मे रखतौ जे बलू कहूना मुख्य धारा के साहित्य के कमजोर करै जाइ.
3. अगुआ पिछलगुआ होहकारी गिरोह:- अई गिरोह मे हारल बारल बाभन आ पिछलगुआ सोलकन सब रहलै जे सब दिने स ईलीट आ मानकी दलाल गिरोहक बंचलाहा खोंचलाहा आईंट खुंट खा एकरा दुनू के हँ मे हँ मिलबैत रहतौ आ मैथिली आयोजन मे खूब हो हो करै जेतौ जे मैथिली साहित्य त सबहक हई आ मैथिली समानांतर आयोजन के कमजोर करै मे बेमतलबो फेसबुकिया घोंघाउज करै जेतौ. ई पिछलगुआ सब सेहो उनटे मुख्य धारा के समानांतर साहित्यकार बिरोध करतौ. हँ ईलीट दलाल सबहक कुकृत्यक बिरोध बेर ई हेहरा सब कोठी दोग तर नुका जेतौ की. बिरोध करला पर त पुरूस्कार बेर नाम कट जेतै इहे डर ई सब सबदिस्सा दलाल बनल बाभन सोलकन सब दिस रहतौ की. जेम्हर लाभ तन्हरे हो हो. ई होहकारी दलाल सब त मैथिली नामे हुआ हुआ नढ़िया के फेल कर देतौ.
4. समानांतर विचार वला मुख्य धारा के साहित्यकार:- अई मे नव बिचार वला बाभन सोलकन दुनू साहित्यकार सब अप्पन स्वतंत्र रूपे मैथिली साहित्य के विकास मे काज क रहलै जे मैथिली आम लोक जन स जुड़ौ. एकरा सबहक कोनो गिरोह नै हँ सब अपना सामर्थे स्वतंत्र रूपे मैथिल ईलीट बोनबिलाड़ होहकारी दलाल सबहक कुकृत्यक देखार क रहलै. अहि दुआरे त मैथिली मुख्य धारा के साहित्यकार सब मैथिली मंच पुरूस्कार सब मे बारले रहल आ ईलीट सब सुनयोजित प्लान बना बर्चस्वक बले साहित्य अकादमी बले मुख्य धारा साहित्यकारक रस्ता अटकौनै फिरत. बिरोध करला पर त ईलीट ग्रूप सब उनटे अप्पन कुकृत्यक झांपै मे रहत आ मुख्य धारा साहित्यकार के कुंठित मंचलोभी कैह हो हो करत. मुदा तइयो नव बिचार वला साहित्यकार सब डिजिटल तकनीक रूपे साक्ष जुटा अई एलीट दलाल सबके नांगट क देखार चिन्हार क दै छै.
मैथिली साहित्य के असलियत तोरा अरू बुझ गेलहो. एतना बिरोध होला पर तभो ई एलीट बोनबिलाड़ सब अप्पन दाउ सुताइड़ लै छहो आ अभियो मैथिली साहित्य पर एकरे अरू के बपौती कब्जा हौ. तोंई अरू मुख्य धारा के साहित्यकार सब संगठन बना बैचारीक कानूनी आम जनता सब रूपे अई एलीट दलाल बोनबिलाड़ सबके खिहारहो बिरोध करहो रस्ता घेर हिसांब करहो तबे मैथिली साहित्य लोक जन सरोकार तक पहुँचतौ आ नै त ई सर्वनाशी दलाल ईलीट सब मैथिली साहित्य के सत्यानाश कर के रखलकौ आ रखने रहतौ. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.१०.लाल देव कामत- सुनैना बेटी- मैथिली सामाजिक उपन्यास (समीक्षा) लालदेव कामत सुनैना बेटी- मैथिली सामाजिक उपन्यास (समीक्षा) मैथिली साहित्य क' दीर्घ कथा केर आंशिक रूप थीक उपन्यास। उपन्यास विधा मेँ वरेण्य साहित्यकार श्री जगदीश प्रसाद मंडल जी अगूआयल छथि। हिनक दर्जनों उपन्यासमे ' पंगू' केँ मैथिली भाषा मूल पुरस्कार साहित्य अकादमी द्वारा भेट चुकल छन्हि। सद्यप्रकाशित "सुनैना बेटी" उपन्यास पढबाक सौभाग्य प्राप्त भेल अछि। पल्लवी प्रकाशन सँ बहराएल एहि 116 पृष्टक पोथीक किमत 250 टाका छैक। ई एकटा नव इतिहासिक सामाजिक उपन्यास थीक। ऐ तरहक अभिजात वर्गक वा कहू पैघौत परिवार क' व्यथा-कथा पर आधारित उपन्यास क' चलन मिथिलामे आबि रहल अछि। स्वयं मंडल जीक कतेको उपन्यासक कथ्य विम्व एके तरहक देखमे आयल अछि। ऐ उपन्यासमे नव बात देखयमे जे आएल अछि से मानसिक भिन्नता केँ मनोवैज्ञानिक रुपेँ देखाओल गेल अछि। कथानक आगू बढैत एक परिवारक' तीन पिढिधरि क' किस्सामे समाएल अछि। किर्तपुर गाममे एक रुपकांत बाबू आ हुनक पत्नी सरिता रहैत छथीन। रुपकांत जीक अपन शिक्षा- दीक्षा मातृकेएमे भेल रहनि। ओ लोअर प्राइमरी स्कूलक मास्टर रहथि। अपने किसानक बेटा मास्सेव गामसँ पाँवपैदले नीतरोज 5 किमी0 चलिकय आध घंटा पहिले जाथि आ पढौनीके आध घंटा वाद ओतय सँ प्रस्थान करथि। पेरामे हित अपेक्षित सँ सेहो तमाकुले लाथे सेहो कुशलक्षेममे समय ओझरानि। एहन स्फूर्ति जकाँ दैनिक दिनचर्या नइमआहऐत आभा रहल छथि। हुनका पुतरत्न रुपेँ रविशंकर जन्म लैत छन्हि। जे पढि-लिखकय उच्चतम शिक्षा पटना बीएन कॉलेज सँ सेकेण्ड क्लास एम ए करय छैक। एक नव कालेजमे प्रोफेसर क' नौकड़ी कमे वेतन पर करैत छैक। से प्रो०जीक वियाह विधिवत डाक्टरनी सुभद्रा सँ होइत छैन। डाक्टरनी केँ सरकारी नौकरी आ अपन प्राइवेट क्लीनिक सँ खुब चिकन आमदनी होइत छैक। डां०सुभद्रा केँ पुत्र भेलनि जकर नाम पड़ल भवनाथ। भवनाथ जीक पढाय - लिखाय आरम्भे सँ नीक स्कूलमे बाहर होअय लगलैक।ओतय अधलाह आदैत शराव पीबाक चसक लगलैक। माय बाबू डाक्टर बनेबाक अभिक्रम मेँ लागल। ताहि बीच शहरके देखा-देखी अपनों घर परिवारमे वर्थडे आ मैरेज डे नहिँ मनौने रहैक से एहिबेर विवाह केर पन्द्रहम् वर्षगांठ मनेबाक ओरियानमे जुटलीह। कारणों रहय , जिनकर भोज खायब तँ खुऐबाक सेहो चांकि राखय पड़ैत छैक। आब डाक्टर सुभद्रा चाहैत छथीन, पर्दाक भीतर सँ संकेत रूपेँ अपन असल विचार राखथि जै पति बैसल - बैसल डेरामे समय बितबैत छथि से ताहि समयक उपयोग विद्यार्थी गणकेँ ट्यूशन पढाकय वेतनों सँ बेशी कैंचा कमाबथि। मुदा प्रो० साहेब तुष्टिकरण के लेल ओ एक शिक्षक पुत्र आ अपना केँ एक अलग बेढप छाप छोड़यबाला साबित करयमे अपन संकल्प केँ तिरोहित नहिं करय चाहैथ । प्रतिष्ठित लोक प्राईवेट ट्यूशन पढौनाई केँ आखिर अपराध बुझैत छथि। ओना पत्नी सँ सम्मानों भेटनि , सुभद्रा हुनकामे अर्धनारीश्वर केर परतिरुप आंकने रहथिन। मुदा गाड़ी क' चालक आ नौकर सह कम्पाउन्डर केर पगार स्वंय दैत रहलीह। एक गरीब घरक सुनयना सँ भवनाथक वियाह घटकक विचारे समय सँ सम्पन्न भेल। सुनैनासन पुतोह पाबि सासु-श्वसुर नेहाल भेलैक। पति के थथमारैत घर - परिवार मे सुनयनाक लक्षण कर्तव्य बढ सुन्नर रहल। पाठक उपन्यास पढैत-पढैत जहन आठम पराव पर पहुँचता तहन सुनैना बेटी विषयमे जानबाक प्रसंग भेटत। एक दिन प्रोफेसर साहब मायके निछोह उदारता सँ बहकल बेटाक प्रति चिंतित होईत जे सोचलाह; शराब अफरजए पीबके बौआ भवनाथ बेसुध बाट- नालीमे खसल पड़ल देखाएत तँ लोकलाज सँ गड़ि जाएब,मुँह ककरो देखा पाएब! इयह सोचैत स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ैत छैन।पूतौह केँ सुनयना बेटी सम्बोधित करैत अपन व्यग्र मनक आकुलता धरि कहने रहथि। एक दिन बेटाक किरदानी पर सोचैत आ अलमीरा वो घरक तहस- नहस स्थिति पर नजर थिर नहिँ कय पौलीह डाक्टर साहिबा। आ मूर्छित परि गेलीह तँ पूतौह सम्हारलखिन। उपन्यासमे 55*60 साल पछुलका समाजक परिवेश कें एक आकलन मूल्यांकन रूपेँ कयल गेल अछि। एहिमे ग्रामीण क्षेत्रक रितिरेवाज क' चर्चा भेल छैक। कोशिकन्हाक टाँट माटिक खेतमे परल दड़ारि जाहिमे चोर आ हाथीके चलनाई बहुत कष्टप्रद वार्ता - दृश्य उपस्थित भेल अछि। खेत पटौनीक साधन देहातमे करीण आ तकर सब पाटपुर्जा के चर्च भेलैक अछि। ऐ शव्द सब सँ नव पिढिक लोक अपरिचित होइत जा रहलैक हन्। कारण आब सिँचाईक साधन बोरिंग पम्प सेट ,स्टेट बोरिंग आ चैनीज दमकल आ विद्युत मोटर सँ गाममे गाम उपलब्ध छैक। ऐ उपन्यासमे सुखान्त अध्याय सँ आरंभ कथा दुखान्त अध्यायमे जाकय समाप्त होईछ। देशमे अथवा मिथिला मे 50 साल सँ कम वयक्रम के 75% आवादी छैक। तकरा ई उपन्यास पढिकय किछ नैका संदेश नहिँ उत्प्रेरीत करैछ। शेष बाँचल 25% जे अधवयसू आ वृधजन छथि , हुनक निजी जीवन रुग्णावस्था मेँ छैन। आ ओहिमे साक्षरता दर लगधक 50% रहितो महिला तँ महिला जे पुरूष वर्ग सेहो पोथी, पत्र -पत्रिका सँ उबाऊपन मेँ रहैछ। अपवादमे सेवानिवृत्त लोक स्तरीय आओर विशेष कय हिन्दी -अंग्रेजी उपन्यास पढैमे रमल रहय छैक। तेँ सुनैना बेटी सन मैथिली उपन्यासक' बढ़ थोर पढ़ाकू पाठक पढैत गुनैत छथि। ओना पुस्तकालय केर शोभा बढाबय लेल एहि प्रभृतिक उपन्यासकार सभक पोथी जाक लागल अवश्य रहैछ। तेँ जगदीश बाबू क' प्रकाशित पोथी सभ "सगर राति दीप जरय" कथा गोष्ठीक अवसर पर हर तीन मासे मास आगन्तुक बीच बेन बिलहल जाईछ। एहि सँ पोथीक उपादेयता बढैछ , दलान दुरापर राखल पोथी देख परपाहुन मोबाइल राखि हुलैसके नवपोथी उत्सुकता सँ देखैत अछि। -मो०७६३१३९०७६१ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.११.कुन्दन कर्ण- मैथिली बीहनि कथा- न्यूटन्स लॉ कुन्दन कर्ण मैथिली बीहनि कथा- न्यूटन्स लॉ
कामना ३ बरखक बेटा शोभित के डेन पकड़ि निकलि गेल छल पति के घ'र सँ बिना कोनो अधिकार जतेने, कहियो कोनो प्रयास नहि कयलक अपन कानूनी अधिकार लेबाक। अपना दम पर नौकरी करैत शोभित के डॉक्टर बना देलकै। शोभित के समय समय पर ओकरा लेल कयल गेल त्याग परिश्रम के कथा सुनबैत रहलैक। संगहि पति द्वारा कयल गेल तिरस्कार आ अत्याचारके खिस्सा सेहो। शोभित के सफलता सँ कामना के बुझेलैक जे ओकर संघर्ष सार्थक भेलैक। कामना के खबरि लगलैक जे शोभित नुकाक' अपन पिता सँ भेंट करय जाइत रहैत छै। कामना के लगलैक जे ओकर तपस्या पर वज्रपात भय गेलैक अछि!! कामना अपन भायसँ पुछलकै - हमर तपस्यामे कोन कसरि रहि गेल? भाय बुझेलकै "अहाँ न्यूटन के थर्ड लॉ ऑफ़ मोशन बिसरि गेलियै!" अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ४.पद्य खण्ड ४.१.राज किशोर मिश्र-भोरहरबा ४.२.कामेश्वर चौधरी- प्रश्न रामसँ ४.१.राज किशोर मिश्र-भोरहरबा राज किशोर मिश्र, रिटायर्ड चीफ जेनरल मैनेजर (ई), बी.एस.एन.एल.(मुख्यालय), दिल्ली,गाम- अरेर डीह, पो. अरेर हाट, मधुबनी भोरहरबा गा ढ़ खूब हो इत गेल ति मि र, आ, हो इत गेल मो चण्ड, इजो तक रा ज -पा ट छी नि , दऽ रहल अछि ओकरे दण्ड।
परञ्च, एखनो सगर अका स मे, छि ड़ि आएल अछि इजो तक ला बा , पी बि रहल चा ननि क इजो त, गा छ पर लटकल अन्हा रक झा बा ।
सुनू भगजो गनी क सिं हध्वनि , तमस्वि नी क इला का मे, दऽ रहल अछि रण -चुनौ ती , धुधुआइत शतमख, रा का मे।
मुदा , टसमस ने भऽ रहल अछि , सा म्रा ज्य पसा रने या मि नी , को ना क' नि रभ्र वज्रपा त हो एत, आ चमकत दा मि नी ?
जा गत ,सूतल इजो त, तखने भा गत ई अन्हरि आ, नहि तऽ एहि ना हुआँ -हुआँ, करैत रहत सभ नढ़ि आ।
अन्हा र सँ की हा रि कऽ, असो थकि त अछि भेल इजो त? तमि स्त्रा -समुद्र मे उतरए तऽ, ना न्हि ओटा को नो प्रका स-पो त।
अन्हा रक जेना आएल अछि बा ढ़ि , दहा गेल सभटा ,प्रभा -पुञ्ज, तमक' प्रलय आब तऽ रुकअओ, उगअओ वट -वृक्ष पर त्वि षा -कुञ्ज।
देखि औ, गम्हा एल इजो त, रुखि अलग अछि पूरब भर, भकुआएल नि न मे वि भा -तेज, बढ़ल क्षि ति ज पर ,पहर -पहर।
अलसा एल वि हंग, खो ललक आँखि , नहूँ -नहूँ, फड़फड़ेलक पाँ खि ।
अन्हा रक धओना खसल जा इछ, गि द्ध सन आँखि , धसल जा इछ।
ता रा सभ बन्हलक मो टा -चो टा , प्रचण्डि नी नि शी थि नी भेलि मद्धि म, भो रहरबा का ल, पहुँचए बला , अन्हा र -इजो तक' सधि म- बधि म।
वि भा वरी क सा म्रा ज्य आब टूटल जा रहल अछि , समय -पा त्र मे, अन्हा र, जो ति सँ, कूटल जा रहल अछि ।
सि न्दूर सन ला ल आँखि लेने, पसरल जा इछ क्षि ति ज पर इजो त, आबि गेलहुँ हम ; सृष्टि केँ, दए रहल जो ति , हका र आ' न्योँ त।
आएल अवसर रक्ति म -कि रि नक, रेघा पड़ल क्षि ति जक कपा र, अहि बा ती सन सुभगा वसुधा , अछि गरा पहि रने जो ति क हा र।
कि रि नक बरछी सँ बेधल अन्हा र, नहि जा नि पड़ा गेल, को न पा र?
इजो त -तम के तुमुल युद्ध मे, भो रहरबा ,जो ति क शंखना द, कतबो घो र रण भेल मुदा , प्रका शक जय भेल, नि र्वि वा द।
सा त अश्वक रथ पर चढ़ि कऽ, आबि गेला ह अछि वि वस्वा न्,न् जो ति -सनेस लऽ भो रहरबा , ओ पहि ने सँ छल, कड़े कमा न।
ता मस- हा मस- इरखा क' अन्हा र, दै छो ड़ि मो न, चलि जा ए बहा र।
सगर मनस् अछि इजो त सँजगमग , पा प -ति मि र -तरि णी , करए डगमग।
जतए जो ति , अन्हा र नहि ठहरत, गि द्धा गुड़का न दैत ओ ससरत।
ज्यो ति र्मय हम बनी स्वयं, घमि जा एत जमल पा प के तम। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ४.२.कामेश्वर चौधरी- प्रश्न रामसँ कामेश्वर चौधरी प्रश्न रामसँ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह ३६९ म अंक ०१ मई २०२३ (वर्ष १६ मास १८५ अंक ३६९)|| 255 254 || http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA
{3 \ es Chey | oy
mi | ) |
Tera T HE वुन्दकौतउता निलाद Bt क्मनिनय के सरल गेल IGT SoA A ere जो BRAG M9 gat 38 ah चल foe SoS ASD ARS wih oie Pe STS कल्कि MAT aera, A विपरीत: सोरि cigs करन AIA HOV AES whe BOA “जनक GANS Bee | AVE AMPS Age eee TR SATS, Sse a wae HST OE Bea खतनिनयकरेत Sra Ble | उशीकक Ae OTR THe, 'जामक नाटक ERAT HISD et St, के TET ART, TERE पियास ME मिसकाइत लि: Sas | Seley *मीनाएी "ज्ाटकक Sreomer सेन ors Baabaabieed) 3, creme न बनना ian | ese — "कलाकार प्नीनितजनैनित S| “कलाकार SPT ji aa मर | SSIS Wath op ae. hg
क्र , », ‘a Ee 4 4 a Ee के.
हा ae ea ee त्वोकनिक oer td ee Gt omits, Reet ee LOR Gata eae मदि | ae Shae ae } — पल BA ele eet Sai ‘ae Farr gates sities नाटक ITT NERS || स्माफीसरा SSSI eo ss स्वथ्पावकर्प्रदर्शने || ran ee i LR AGHAST ge Pa rate Py oar! pi Mallat बा मा ey i : foe सराहा GH FAIL, Sat ee कर PE ES IRIS, करन AOE | ERT ] Meat जेकक ARES | सारी ABH COMO स्किल से MEAS लेने SET __ gratia कल छमलोग AOS Parise acne | eran 'दिन BARI SAL ACG ARH TT ATI के चल. erg oh ee: सकल सिल्योकामाल BAS, SMe PSR ET ATE ay सके OTe I Baer Se ea ae GAT aes मर aT टोल SIA TATE मंडनोलानि बिल जाग गई समाकल, (नर Sar मंडल Lear eae i } zag aie weer gee “a यागलक खूमिकामि न्यमनित eC ON _ ae @
सशिली - Sant ee cnt ae | SY STE see or Pr i is Roce ST ops agent ISS क जा A ee fans) BUTE ear See cao er Were AEs RST ast व , Sh aa Sap Serer Pat Seg a oe es - a ~~ es Sea A, 7“
5 — Fa » कर X ५ जाति... सी sé
हि... Ny कक सरल न Al % 5.3.
= . lc mee er पं Sane E Beet 2 po ata igrere : . ter sien va ie = so ed TRS uly, crash यु eee = a ised) Pa pues or ae ET SETA, पक ae GRO, Tegra se sere ions a | Fe ee 3 eee i SB eh os mw aig mee ie Fae o Poo समलील,कुपारीलात rr स्थरि aT ate ae Hees | Ts SPAN” ARISE: Sal [Pe Sam ome ot Tew seen हि 7an Br Jorg ae aa 2B Sip STS SEO ee a Is RET VE] Pc a ean eT a ee Or ea खाल Sreien geass nee | give: -Stoeas; मी कि सता sae Es SS 0 oie sora aaa AS MEST fe ee Apes isis Li जड़का ANE CAS ia st aig = ee वॉक a — भाग पाएं fir | aa ae |
उनकी नह जादूलबनिकार/चल लि eters gaa Gir यार ee LETS TUIEA seit omengies ae SER Saar SEAR देखनाक |डाइरेक्टरक een <i eae न्युकलाग ee | sone जाद FATT EERO wa oT SAT =a OT ,तकर Ha cane aer| इकर्सीयिर Ba ZAI eh] BSL ERAHD Bae समीप Bie पत्ता हिफरव मि EVO फर्जी eT ETT ART |e Aa eRT ots Dee ,तस्तन मर Bs 9 SORES cr || Say समाप्त भले Aeris Nes SIRT Seas प्योबणा करुल जेल el ee WE HI TET कम्डकल ANE | BAL HATE BASS AY AF OT GOT THE TW उपत्यिते BOOTS Wa: HOA, AIELLO | aa [| रण लगे Hass Saas Ba अप STR ACE | peal SRR mS | सम गिमाक सैर: नाते डोर नील aS pare | मर रन हर मकर Nr Ex खली प्यड़कि पके BOT Ret Be ee Raid मार ae अदा पा z a arate ete! E उक्त TAIT TEM, SIGS Reo eS : eae ee यानि पीधि Bien er "पारी छल | जीलिजयुकल erent | हे रसक SIRI, एक शत IRIS पूल > An ade als 'निशिचल BIT. Set ony eer are | uae riser न्यल सुझे eI BAX AA AR ui तु ate! arene: [ST सत्कण BART AT hae | Bae दर ESS Ie Te ea ES IAAT At Pg assets कस ae कलाकार व्नोकनिक 7 पल्काण as eae ar दियाव है झा ERS हाय (Aum MED 2S 2 2 aaa ं लक मेज caper यंडले रही | eT SA ONE aE
3 यारा! — 3. S era -_— पड “mk >ा sty A st4t sae है > सका एक बरी पपकिकद ip ates re ee 3 A असर आ TIES , ness OF जे ( tay ver ge yt es 2 OR gr जस्ं a2 ee, : ; pe Bah OT 7, sr y Leo 88 eA BN EEN Sadak tol B= मी 2m anh yar वी eee ५ er छेद & fen wear tle, advair espe ये थे at wae, ake par थे पोल sa TH, ee RE? Ye ace afte © of MAIS ui hee, fer - pire क बार ch yt 9 ¢ aa पुर जर 2 I gq
्ि) है
जि is
! om | ‘ie Cail था %
Era “पी oT, PI कहर Sar wi ye ea oe राय कक ee I) OR rae Se =e ci Tg ae st SIG ELT ‘oe vg a Page cam Se ARTO, | es oH tae ee Shee लिए डा, aha ay सत्य
3३
के : Fateh eh ae Ter si Wr गेम aT op = : +t, “go Soir as Freesat ae aT re See roe ae ae zk REE nr 7. उन tae eT = = steeieee fo See ph : Seg ee ¥ Too ste जा ETT eh om oS Ei mee oe OTe
| ag Pe SILI se रू सहन es ee “as <P Ths F a AS ay stat ae 0 Ps + Ey ee Zen Se sya, ET aA sai. ar कम ar za ; #3 Soe = A £ कु aly ee, ae She y —_ eT STK | Shere aE TE ams tar पर AT, PET, TT g आकिटाए, जाबत, GST cee ay 2 gee ae SRE _मत्कन्थ yy RC ST कया EE eT a Cee Sieh a | sar टिक BE Prk BSAA जाणत्रा BEAT
Sn, Se police ora —— = Hoge Te Teer” San ease गेल Se A ज्नजहूप apy ner ey eT जि ae SANT Be Tee ae ee IST et जे a बल्ब hs वन तन a प्यीनि, aE sos खा गदिजाओल = 5 लागात at ae Sore er ey जे tor Sere ee NM तन गया AEH "4 bi: es fan ee AN Te ag BA ae ge A a ie Te. caer ee गा Za Se T FAT एण
के i कं प् ~~ fe ' oe — Bi yey ~™ ) ma a f £ t ® (| ्ड Dh " [xe ” - ane 2 न लि s A“) 4 | | SD
ही | mee (| 4 x = a Fo erteie * Pia Le अल Ree iin ad a t ma | J raat eer 2 eer { wake 02 के fi: : a के . as १:०० ) aaa ee Eo ०... सिर |! टन व *केन्न्-क et poe y cere, eae” ie | Eee Peele aay tate aes a ey, Wee की ०५ न é Y Me i cs ee a eR avi ==
=| 5 कु Vey i! yi!
“न 4 va | कर! 4. के. के.
| कह f wy ll ७ j
~ | न : प्ले . | gs सा कर सबक करी — a Leis «oe = CF i) ५१७४ की) bate fh i M ४ क्र मे" pees ag ao ie : है हि रा : SAN Neth BS) ee EE \ 3 ; Zz कर कक Ne “8 ata te pees é Se \ —— ears
F “ort 5 ED ‘a “ors 2 शिवीकर औीतिवासा ‘ecard बा OE समय te ore aby | os मरुगधत अल | ene कमर Ser ay eae Herp (28 £04] oye" mg ee a arnt Ge rae Mar See 5 PTET AIA Fant) पल ras उच्छा दल ाल-सरिसक, fear “ee es aE Br? रदल eh, RE a5: ooo eLearn, Pere ror Sr ste टिक fear परी Gear जिन से ना eee रख RC रह oar Se hes, aa eure, aes aor भरत Ta sre Safes 25: मचा cower arr ay rake thee SORT se a =r अनुसा 8 TRE, gs Saar esd सार & । से अहॉकट: pau Fee raed Create) £6 amg oi रन ee te Sete Bar eres rae के जद, ota ooh janweree act Ee semen a: We eral SORE ee SEE eh “ila ug Se पर देर बे rth drs atthe, ai RY Sen f Oia ee age ee Prag REE rae oe ag & pak ieee) के STE | sue or wre दे हू खुरा ea ae a जै Svar ae on Rage SY oP Oe “at ae oe ARERR Teer i “Piss 3 OL Geter Sage Sea RT agri हैँ ही के गज ae | anh मम किमी a न लोग af लत Pe Lar ce map कि arog यु ear ns aE ES ae fier कत्पानडत Ln ‘ite Esa re गोल है में लि दी ला <i EM असल som z mr aya ator ord a SRR EP or
Bete a Sat atest; at - Se, |! a एप गए ससायुनणसी न zoey, ey eR स्वत रन 4 Tas wae : + ae fora att ऊाप्रतिग er _ लाकर, आन, अनोदि fg श्युणि: dee a eget a ee zi * द्जत कर Sot rN खाए a ae बात जन eens Ee ser Srey er a rca a कक y | Fa ere eS ५ “साल i aa
हद जौ hey जद BG DR Ll यम होगे saat ore eae ant eT Be ea ER te Rt fie ae ara sates tre Ib Be el Req Beat Sabi hs =e. Gat Se कस Sr Br Per a a Sy ae eer ate, Syl ea ayer “कया = (agg iy Hee eae i 72 _ Bey AE - Seer | (A) page CTS _ ees ; : ce at ce Lam Rea ON id Path मकर Ae ee paren GN उनशकमीक er ae ra iS, eR बल्या की lat a be a
के aa आदि aT थी. जग sear oF aa a Sei ite ea cl hrs कानों ता मर कक डी गए, Se ae के टला aT ue का ee Soke aie | ff he es. 2 a यु? sata तो | TEL, TK iy ae a न aut Ai asia aa al aa ae, Meo ht Dee e i ere SNE, = $e Bisa por <4 - pa eT = PLS = SLT, केस, cage Nea ee ee आधार अर दि _. ae ein 2 * Mg
aa ee न, Gi git पर Sy ot eg ee ee धि HE TET VET TIS = at ee ee Srey Bete eet Sa . ST के बाधक TR Hi. Sato aE ee q age aT e., 2] लक का er ae ys BAX प् Te = Spas apt ews f rT aa re के au Ets LT At को yet सी, बन as Sa ae Bi TT कु rH Cy i Fane — at नेप्कासड जीन
औजऊाइव = ooh svt, We बोनी रुपभे ote frat re अर - OPEC St GD rebar eta ae ar ane Aas gtk wear ary Pre se ae ee! रू], मोर a Pil eee ho are eae? SMG eke Corr AE se बना ani नाले ee ok oy str tig wre निक्य पुर" una डूब हो. atest ear oe az, siya att Sago ches ar कानों श्रमिक आग बस ari omar aft hea से oft थार athe ary aes ote ares मात SR aL Rie समास जे fret तरह fart ate गेल att जे sendin Stor पर ee ay ae 4s wide Gert स्पार्िव sche ace By Sa SON se SOP rea yee sar ote aes ; | ies बराला मोनिका garage सुन ater afr ee समन Par डी mae pe of ays pn cite ore fue" a डा निया ary See ecu Gant Bee ° fers weg व an «3b air oS aes Sear कानों SU मु भर पी दही चर मा mee afore, अपन, Ae TAT UT हज वन yas पर Pare Te ite se or ee + Sat or Se fen Sie ong gate i Romy poe ma काना ater तिर्मागसे' ay 7 स्वत, भर 40 ar? रन जे ca अस्त GT aa aay FR EG TRB sepa Apa ae aay airs arr ee ah, ord Pet Gr eaeera ties x ang; fear ae rae A
pie a 2 sar am sz, et arget ae er. eg om Bie a dere oes a pels i! ay oe ited ie aE ar lal a मिस Ae Se lI Oe eee | amas SER LIF RT आए raha नि टी रे रेत ‘ete उसमें ae freatr ay बम en a Bee ee oa ates (ind OAD Te ayy ORAS es fee aT कर रत age Oa ae ye Poe rec पा बन vee rea. vo ace eee pore srs srr x ae अडि , PR bei Boe नकद ar ote Ae a Brey Ae ree or eis Peso war oS weet sae roa | re ae ae se St get Terie | ira Pies ee eet ech ae eeteeey RU ae 0 Bw. Pas i ake te cero न रकम Pree eS Bog a oe a oo ae Seat amt soe at मी रस्म सर we a padi Son FOR Th 36, ry stay Berek pores eee ae Sepa oe Sa ae sana ae Pee peas om eee Reese) a et eee in उस phe Apes साय ना नल ore? oF pe #8 BER SAS freer get ey SE sae ae Bae away टिलष्पी er ae ore oT 2. जी
r cp) be) amet ome मर्ष थी 4मामार समझा अंगेत' « समाज शबाख्न ata रेस auras पहल मना दे आर्ट] 7 ta fear SPE का» | ae ars लाभ Res लिये AE, eT SA, Bs ak ge असभे Safe grav a रस, ah, Ay | Sire ott ane, ese सके अगैवाक लैस arya उस को" ae, सर sores कोने कभा chee afk जे, लागत ै -ओ दी बड़ eatery कैम STH अमापिथ सादे सा अन्दर बरअण agg Sha wel dtr ers ‘aur औवन अहम ota, See दे Seon मनन sre er att oe apg. ars, गला, Se Bam or, rae yaad pais fat alt se er सर grt fe < Sola! mag मर मिल ooh ay jalan xe gare Fe afte मित्र , दिनक महू 2 ae! की prs (20) zor कभाक Geet SET ge SAT ara wet परिशपित बेला कहल stk og arg आफ ATF 7 aah Riga era Apt Br ee See गा सन ae a tect gor pe te Be aie A है पर ar Re & ics EES “ert दर दाह “Pan ce 4, RO a Aare oe gat Balen अनसालक अर्थ pom fe, ate aang ो stir 4 “a Sages Bh सी a Seats, say eh , गा - Rene, § - €निस्था से ५! a sedrita Bae, FET Aye Ae _कारालना Foss अकिशील, ware ree Aare AAT होथत Tre अभाओ, तदिता Seger fiers aby Tar arsine शक गए पी agen) Waa अदारा aera नमन ay ger Hen oh ety eRe BS RS RC Tk edhe sate ee ear अं ० के TL EGG fee eraser oe at aah rar | RATT ager ora sf wale zaar ate etre i a? tha oy rar ze 'रगजीलरई हाय es ER, ee TT दिये की ६ eer Ger Ae Re कर Tre, ae eee Alar? vam Sar, area a टू. पे हि SUETO SST दुचाओ sft जो Oe cS मल पर acy लए: ar ae ae EY on are ee ear आप ar z ae i ey pel Pee eds ge sare en 4 UT प्रसंग x Sok ea é ck a era ete । mre मास, लाए Ret AT oe ine agar By fears Picci eA oy Sora fess te ee sats aa BT ae 3
पल ale Gre gure, स्नमैंन gore पिक मे समतम sro अगर IC SOWA TAT Ege ers HET मरा ET | here a onze rey ARETE = किए समर ats ake ee कक TF Ere area var दस SRR IS sora Fe ae omente कक Bee ANT AT | SETS are. Seger Ta पर ve eg alae Frida रण eT ger oo Shiner at फिर के a बटर अरे Sar ove sree FAY आला ater दाइण aver of सन xh © Fans Set oR, ete नो wera बेन arian 2a ee ote Ser Got eee BIER SUN Seno pietfiee hor es Gus ae aa re eA * ar Bs firs aT fama Ra As cigs ett Sk et लि gon ae are id eo are ro रन 5, किस मान्य जम Baa Ss pas nae rq or pt | बरीरे सवार 2सेर) ge op HE SET TATE raat Stree ara Fate Sa stuaty ay अपन ee ~Qbe SE araantr सो "ing after sare गुल ee gare ster Aha अन्न gun भर TE हैंड te ae की Stee stirs eget, Sema AREY oe acd EER shen sen alee सर्स etre % visite fora oars बलेविम: शेड निकला okt ofsohs पदक, ae नस मल ae vay Siege सर Sta ehh strat “sina? ange, ST serene Summ ares Maas BETS | लोक अलिड का oe ent sor gare Aner ef बेशक Afra 2 Lali रूस cM am cla नासिक om दि ss aha arr रत otic Se अन्न, Gre वि fee मे अनेमित TA ar ae, असबमानफी hte anh Eps सब्र ABC as, FA, ST RARE | areas Sa ser - Sor ae a aldara Ae aR) one ae oft oo arte eae yr sal wee oe TART oer गए भेडसेकक, ae i पीर मना ry, TERS मेहमैकक a स्वयं ae ST os eres CS ate सर, Se A are आगरा A eee, AR iad (Me हे Ser een SHEA FU भात Ha काकें | dae ay slab as मुसलमान अनत अधि , करण sie ओ। तप; ऊुसलभान ऊेलिगेट amare, मजबूरी ete | थी ae ae Ot, जे WES aT रस दल (Brae if sik डे, उप फू * दबाए ने, ae oy ee sr an gs a: FY peer पर <r ay ar ope er a SATS Ie ae 2 i pepo pre. जाइल aT on STA 3 | = sear ee he Sse
8 | | http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA ~ | a F bs as : a = ae \ ss : अशोकजी अपन पौत्री श्रेया केर संगे
विदेह ३६९ म अंक ०१ मई २०२३ (वर्ष १६ मास १८५ अंक ३६९) | | 67 कक... डी a a शिवसीडर करीलिकासा ‘Raney afta rts SHUG Her ऊभाठार why |, fens id FANT अल [eres ete ee lo Lo परत ae shrp- ue fo 3 जद Thre ae Sete ek 3 ae vat rT 2 ATE _ FGA Ras 2h स्वर a ey Be TS, fear pa ser * em ahs, झा Sea ze when teaver ara eee af poEbacie rs कद & ला पज्स्ा किट, a aa apne eel गा मा ae डी ae न or gen ee aes, Se Serr waa ओ ge satay coat me 4रुगहा; न ar रण अनुसार nies SOR as Pei 3 ares oe | से seta ‘Saat 4 ee te “er anata MRR हर ८ es) गा सु कर, सो aaa pact is Sek ie sie ard er 3 रे रित Ss हज ् ey as par <a Ee Pp PRE SR. —t Gar esr 2 poe sce ee Oe Seite SE oR Soh pe ee zal - bE ' रद Sat लक iat ee pg दिया a Pee Br ‘a. में aura sta ef जे ्ाथक, ues Sa mies: ae, SRT Ta ww FRE. ae EP AE Ges ac % fare अकरा, हद कु fs wee re 2 RHR A rears St जे ann deh oe " कि a, किए i STARE ay | ax eae a fara, STIG नी repre, Tee as शहरढ़ा गा पर कर गये ¥ ga ° & a saree ae, Fd ar ee aD) ! st, a mr ott ढाभ के अपना err BTS Sey मम ee) Rae fie | artes रु fray) 5 Bra एल न a+ ara aT TRS GF SIS aa eratst aire aT a ™ ‘ie Ee cas रुप yer Bi aor Ata ay (aaah Fs ors a? ae \-' ec — ator मे at gr Cnr, Sess Ne x जन्म
68 | | http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA FE seat (2) 7 s माय a 2 Sar कचा er Syl oy, aR: a So. get ¥ 7 DG) “EBS न eee a ie Fie ae Sige anti re aw HATS Gl सार a रस gp ear gore priate Sy आरूनीें “rae Ns = सन epee og Se get eNOS ar, Aes a4 82 & नरम WR | उनास व” pe कं वेश में epee mag age = aE sae cheer Saget — FTA aster | है टिका शब्न = Gaal ee ee ePTA | ara . ay or sll सु pee i Et ena -—_ मरियय दार्वित PER. sor maT PITA RE aay ON जम pape ort अनबन SH = शा aes दे eet ae कथा ae [| sure er सभसे glad ear ae aes =" Eel We? | असलजे ITA Sar ee कर कथा a | Baar मिस्िला सब्याजन्, न जज Get ar aka waar wer sti) cipal yt Pde easels ort a = नीच अपन # ee pea or GIS आनन्द सेबी ar care | मटका AE समाज के रा जो +नी-प्र्मक निमयका ava or te रख ort # ay eee st स्वाद SH. tar अभाऊ states es 77:30 Gala oe Bey Sat सर res rt git SECT ee aT bead poise लहरेजाड = Rares pin, Son is 33 4 i (oh Ary TT TT same से. ay aaa a: ee io pes sree नि rag अपना sat a % u rar ये: इस सर गुर 5 Pa eee Niece प = BS के Hee ra और ae ae ba ae “मर मै उनपर eee a ue pce arate BP fo Ay Fe Saree ot, Lear oar Aer oe istics a Reel see pa at At | sites, ४ Shears, ROT Le nee Pye उस i a eh i iy watts अधि Gen Bra सि Pe FOTTE «भा ar ar ae tree i aR Ker sates ae sty मर रकम a ae
विदेह ३६९ म अंक ०१ मई २०२३ (वर्ष १६ मास १८५ अंक ३६९) | | 69 (32 fa Foren Oe मैं IT oP eRe गोड are न कि सता AT सनयास, ्, aw SA) kere उन ert दाग age किट as sas OE Te amt SH GAC NT चित्र / ie “ae pi अभाव पर हर कान gaits | ad संस सुन mers a OE ' चिट ae ome ser eh Ore icy - “Riten Se SS ZF Be Sa Meads E ae Re, tt मा reve Ara wf axera FT, S55 or HS orat pal pata यू aay Paras ae Ee wh ot | 0 ‘set er वर Rta Geer लि am Are, uae Tae ae br Sige ets Cy ढक ant, priest ee Se eee ae Make a a are Gee eon ae. ene ee si अनजिजात्या आदि, =the सैह areantr Br shuts sy ate RIES ee bs at riety sf Grae. dour AS pebitaid Su 4 Bae shen अपन -ीवर्नेक बरस mae “hye erdaRs | sat मिकिलाक ont fast det, are co ae TAS Sear ae yor ata efi & strat समय TSK सामाजिक शमरसता: अपजल आस्कूुतिम = pel Mc aie ’ pee: ae में af dare, विभिगत ei iter कल ce wet tr S78" अरूललित अश्बाक Tae ~~ IF का डक ae pal ape 33 उनेमित्' aya or ee, Ape ले Pa ae Chae Tsar oe ae ate 7 peal लागल 4 te हि Anaya pita cig lad af) one Se bay ofr suo i} तौकसानन' Fuge Be , BETES AIRS ge ten test ae oS ae of rere, no she are eT ees, HE oer | श्र ही ane FEN MTA Ye pr | कोब ई vb ait te eae BAA AAAS, कारण औररा ओ। ae सलभान Fria aarare, अजबूी हतेंद । को दस ey LE ee ore Peck ee a dtc ee sy ढ़ ‘ peas se pee at ve ga 9 ITT | z! {a oe are er BAST 2४ sheaf ee T see
70 || http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA r ee) bad sper, = aT RTS . = cee er x ir - ere acy ota 'दिनव, SRT mip ‘amr? | amp 4am, ang Ree ah grrr «grav Aa रयि , ae gar en ear a लिन मेने Sate yer वाला उस दि इस smear सर ae amas ea si Gh Sora अगैवाक tat aaa sere” siqeu, सालैत at | Fer satay aT कभा erm att & लागत sr bof ert ae Ge TT aT, बाद सा अन्टार ers} arg द” tra भर आया, dar दिनक ‘aur औवना व्यय, amr दे gt Wee ig sore ae a असल; भूल्यक, a हल, SL % ee KEE आालोलक De fart मिश्रा 5 Rae in महत्वर्ड - Bar कर BA prs (200) सभा कमाक GT SET RE gay -धेश्नना बयां aReuftr बता कल ah 3) स्लाइस ‘oe अमर fon ern Ft are & a al war & Carta waar Pr व aaeer, कॉड , SETA ater cet अंजगिम av ट्द mer fetia! sh ear te gs “Ta ie i, <r. ao FB oh grees अनसानक Fare Re, मेल ae of / yoy a hm, sna we ae ली say oi MO a oA कला Ao aa eae on, प्र्गपिशील कि Og सैन्सश्गा aR fy ; tar Re gard, ater अच्दन्ता Sore दर्सन Tos सेखा Slawe eetere ae कप ने | 2? oe दर जप प्र wer ठग लए OTR FEC ara ot न ager Say =. निए ete sit, ere gi eee पे eal aE ey ere) -ीनल रथ xEa oe py poll foray CRT, (a fera कभाए कं . zaar Ae ade) oe. a? tha sar kar tay arr ts A a ee aT Rr &beewer yor ate हविक कर Fat rar Ami le नाए Sar सायके att Tt Sees, meant ge ; st oF rg s eae ace ie’ > ay oe. «qr मम खरा मरलक मैट 3h पा , Rr FL x ORT ANT SF ar a Bs oll Be “सेठ are ae लाश जीन Srp aqxr
विदेह ३६९ म अंक ०१ मई २०२३ (वर्ष १६ मास १८५ अंक ३६९) | | 77 as 5 Rape est i i Vath oe Sy | \ i . [ ‘ i a) % I | |
78 | | http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA ania nce r ge DVN प् ve rr N _ जि न जज ¥ 4 “a 7 - हि
विदेह ३६९ म अंक ०१ मई २०२३ (वर्ष १६ मास १८५ अंक ३६९) | | 79 £ कक 7% BE < |
80 | | http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA नर See hee 7 इक aie = a - Vat ae ats 5८ : a a r) e Ua tbe : Ps
विदेह ३६९ म अंक ०१ मई २०२३ (वर्ष १६ मास १८५ अंक ३६९) | | 84
82 | | http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA be: ; Pata $e ses पड a NT, FRR st UCR साकताई़ a= 3 ah E
विदेह ३६९ म अंक ०१ मई २०२३ (वर्ष १६ मास १८५ अंक ३६९) | | 83 Voit > Ip 4 ‘ . oh),
84 | | http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA
विदेह ३६९ म अंक ०१ मई २०२३ (वर्ष १६ मास १८५ अंक ३६९) | | 94 secs te @ leila: allies न sass SI. दम <- =a sal Bel [ssh qvasiy rer we , DS ere RUPE SOA Teh RAS, Baa P| ig ef les सनक & दल sie रासत्तीता atk दोरवन Teglealta~acy (रॉमलीलाकशुपारीलाल*करवन्तदेप्लसि 3 = ech a? “Hae sRs | a, लेनपनुक Ty प्स्सति कष्टियोन WH सनक SHU Sr VST SAAT F Sh Foe CRS SPST P= As. _ NES, SENT BE RO 5 ING RITE ATT ai ser ORE eg a a SG oo BR ARE, ERT |
92 || http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA | es WED
विदेह ३६९ A अंक ०१ मई २०२३ (वर्ष १६ मास १८५ अंक ३६९) | | 93