ISSN 2229-547X VIDEHA 𑒀 विदेह ३७५ म अंक ०१ अगस्त २०२३ (वर्ष १६ मास १८८ अंक ३७५) [विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। कॉपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- २०२३. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२३. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. It is a platform for scholars, researchers, writers and poets to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, and poetry in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@gmail.com. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Videha e-Journal: Issue No. 375 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अक्खर खम्भा (आखर खाम्ह) तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ (कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।) माने आखर रूपी खाम्ह निर्माण कऽ ओइपर (गद्य-पद्य रूपी) मंच जँ नै बान्हल जाय तँ ऐ त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लत्ती केना पसरत। शुक्ल यजुर्वेद (२६.२)-यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः। ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च।।हम सभ गोटेकें ई पवित्र वाणी (वेदवाणी) सुनाबी। ब्राह्मणकें, क्षत्रियकें, शूद्रकें आ आर्यकें; अपन लोककें आ अपरिचितकें सेहो (माने सभकें)। मुदा ऐ वेदवाक्यक विपरीत मनुस्मृति वेदवाणीक अध्ययन/ श्रवणकें समाजक किछु गोटे लेल निषेध करऽ चाहलक, मुदा स्मृति सेहो वेदवाक्यकें प्रमाण मानैत अछि (शब्द प्रमाण) तें तकर विरुद्ध देल ओकर निर्देश स्वयं अमान्य भऽ जाइत अछि। Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. -Robert Louis Stevenson ------------------------------------- Videha: Maithili Literature Movement 𑒀 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्ति: 𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱: अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.अंक ३७४ पर टिप्पणी २.गद्य खण्ड २.१.साक्षात्कार: योगानन्द झा सँ उमेश मण्डल द्वारा २.२.साक्षात्कार: कमला चौधरी सँ उमेश मण्डल द्वारा २.३.परमानन्द लाल कर्ण- गीता माहात्म्य (आगाँ) २.४.संतोष कुमार राय 'बटोही'-मंगरौना (धारावाहिक उपन्यास)- (चौदहम खेप) २.५.कुमार मनोज कश्यप-अपूर्व स्वाद २.६.आचार्य रामानन्द मण्डल-बाल्मीकि रामायण आ रामचरितमानस के तुलनात्मक अध्ययन २.७.लालदेव कामत-लालदेव कामत- आंचलिक उपन्यास "भोट" मादे/ सर्वश्री राजकिशोर मिश्र जीके - टेमी/ एक अध्यात्म पथके पथिक - स्वतंत्रता सेनानी/ जल अछि जा' धरि, जिनगी ता' धरि! / प्रक्रियाधीन सामाजिक परिवर्तन'क स्वर २.८.लालदेव कामत- नोतक बिझो! (बीहनि कथा)/ जेहन रोपब, तेहने काटब! (लघुकथा) २.९.डॉ कैलाश कुमार मिश्र- सवाक कुसुम कामिनी/ ककरा के दूसत २.१०.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (खेप-२४) २.११.नन्द विलास राय-जाबी २.१२.जगदीश प्रसाद मण्डल- सुचिता (धारावाहिक उपन्यास) २.१३.जगदीश प्रसाद मण्डल-धुरफन्ना लोक(लघुकथा) २.१४.रबीन्द्र नारायण मिश्र-बदलि रहल अछि सभकिछु (उपन्यास)- धारावाहिक २.१५.डॉ किशन कारीगर- मैथिली लेखनक शून्य बज़ार स्थिति? वेबसता कारण आ समाधान ३.पद्य खण्ड ३.१.कल्पना झा- साउन मास ३.२.प्रमोद झा 'गोकुल'- गामक बात ३.३.राज किशोर मिश्र-पराग ३.४.आचार्य रामानंद मंडल- चीरहरण/ सावन मे नारी 𑒀 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्तिः पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म 𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑓁 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒰𑒣: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒼𑒭𑒡𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹 𑒠𑒹𑒫𑒰: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧 ब्रह्मणसँ प्रार्थना जे द्युलोकमे, अंतरिक्षमे, पृथ्वीपर, जलमे, औषधमे, वनस्पतिमे, विश्वमे, सभ देवतागणमे आ ब्रह्ममे शांति हुअय। ॐ-ब्रह्मण, द्यौ-सूर्य-तरेगण, अंतरिक्ष- पृथ्वी आ द्यूलोकक बीच, आप:-जल, विश्वेदेवा- सभ देवता, ब्रह्म- सर्जक। 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝𑒮𑒿 𑒣𑓂𑒩𑒰𑒩𑓂𑒟𑒢𑒰 𑒖𑒹 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒧𑒹, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭𑒧𑒹, 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲𑒣𑒩, 𑒖𑒪𑒧𑒹, 𑒎𑒭𑒡𑒧𑒹, 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒱𑒧𑒹, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒧𑒹, 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰𑒑𑒝𑒧𑒹 𑒂 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒧𑒹 𑒬𑒰𑓀𑒞𑒱 𑒯𑒳𑒁𑒨। 𑓇-𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝, 𑒠𑓂𑒨𑒾-𑒮𑒴𑒩𑓂𑒨-𑒞𑒩𑒹𑒑𑒝, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭- 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒂 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒏 𑒥𑒲𑒔, 𑒂𑒣:-𑒖𑒪, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹𑒠𑒹𑒫𑒰- 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰, 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧- 𑒮𑒩𑓂𑒖𑒏। 𑒀 ॐ, स॒हस्र॑शीर्षा॒ पुरु॑षः। स॒ह॒स्रा॒क्षः स॒हस्र॑पात्। 𑓇, 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒬𑒲𑒩𑓂𑒭𑒰↓ 𑒣𑒳𑒩𑒳↑𑒭𑓁। 𑒮↓𑒯↓𑒮𑓂𑒩𑒰↓𑒏𑓂𑒭𑓁 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒣𑒰𑒞𑓂। स भूमिं॑ ग्वंग वि॒श्वतो॑ वृ॒त्वा। अत्य॑तिष्ठद् दशाङ्गु॒लम्॥ 𑒮 𑒦𑒴𑒧𑒱𑓀↑𑓅 𑒫𑒱↓𑒬𑓂𑒫𑒞𑒼↑ 𑒫𑒵↓𑒞𑓂𑒫𑒰। 𑒁𑒞𑓂𑒨↑𑒞𑒱𑒭𑓂𑒚𑒠𑓂 𑒠𑒬𑒰𑒓𑓂𑒑𑒳↓𑒪𑒧𑓂॥ हजार माथ, हजार आँखि, हजार पएर संग विश्वकेँ आच्छादित केने अछि, दस आंगुरक गनतीक वशमे नै अछि ओ। प॒द्भ्याग्ँ॑ शू॒द्रो अ॑जायत॥ 𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑒑𑓂𑒿↑ 𑒬𑒴↓𑒠𑓂𑒩𑒼 𑒁↑𑒖𑒰𑒨𑒞॥ पएरसँ शूद्रक उत्पत्ति भेल॥ प॒द्भ्यां भूमि॒र्दिशः॒ श्रोत्रा᳚त्। 𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑓀 𑒦𑒴𑒧𑒱↓𑒩𑓂𑒠𑒱𑒬𑓁↓ 𑒬𑓂𑒩𑒼𑒞𑓂𑒩𑒰↑↑𑒞𑓂। मुदा पएरेसँ भूमियोक उत्पत्ति। ❀ (White Florette- innocence and purity) ☸ (Wheel of Dharma) ࿕(Swastik) ꣼ (सिद्धिरस्तु, सिद्धम 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒱𑒩𑒮𑓂𑒞𑒳, 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒧 Devanagari Anji) 𑓅 (Gwang ग्वंग- two small circles connected by u and a dot placed over it, used in reference of Vedic texts) 𑒀 (Tirhuta Anji, Ankush of Ganeshji, placed at the beginning of something) 𑒀
ISSN 2229-547X VIDEHA 𑒀 विदेह ३७५ म अंक ०१ अगस्त २०२३ (वर्ष १६ मास १८८ अंक ३७५) [विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। कॉपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- २०२३. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२३. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. It is a platform for scholars, researchers, writers and poets to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, and poetry in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@gmail.com. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Videha e-Journal: Issue No. 375 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अक्खर खम्भा (आखर खाम्ह) तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ (कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।) माने आखर रूपी खाम्ह निर्माण कऽ ओइपर (गद्य-पद्य रूपी) मंच जँ नै बान्हल जाय तँ ऐ त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लत्ती केना पसरत। शुक्ल यजुर्वेद (२६.२)-यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः। ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च।।हम सभ गोटेकें ई पवित्र वाणी (वेदवाणी) सुनाबी। ब्राह्मणकें, क्षत्रियकें, शूद्रकें आ आर्यकें; अपन लोककें आ अपरिचितकें सेहो (माने सभकें)। मुदा ऐ वेदवाक्यक विपरीत मनुस्मृति वेदवाणीक अध्ययन/ श्रवणकें समाजक किछु गोटे लेल निषेध करऽ चाहलक, मुदा स्मृति सेहो वेदवाक्यकें प्रमाण मानैत अछि (शब्द प्रमाण) तें तकर विरुद्ध देल ओकर निर्देश स्वयं अमान्य भऽ जाइत अछि। Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. -Robert Louis Stevenson ------------------------------------- Videha: Maithili Literature Movement 𑒀 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्ति: 𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱: अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृ. २-५) १.२.अंक ३७४ पर टिप्पणी (पृ. ६-९) २.गद्य खण्ड २.१.साक्षात्कार: योगानन्द झा सँ उमेश मण्डल द्वारा (पृ. ११-१४) २.२.साक्षात्कार: कमला चौधरी सँ उमेश मण्डल द्वारा (पृ. १५-२३) २.३.परमानन्द लाल कर्ण- गीता माहात्म्य (आगाँ) (पृ. २४-२८) २.४.संतोष कुमार राय 'बटोही'-मंगरौना (धारावाहिक उपन्यास)- (चौदहम खेप) (पृ. २९-३१) २.५.कुमार मनोज कश्यप-अपूर्व स्वाद (पृ. ३२-३४) २.६.आचार्य रामानन्द मण्डल-बाल्मीकि रामायण आ रामचरितमानस के तुलनात्मक अध्ययन (पृ. ३५-४३) २.७.लालदेव कामत-लालदेव कामत- आंचलिक उपन्यास "भोट" मादे/ सर्वश्री राजकिशोर मिश्र जीके - टेमी/ एक अध्यात्म पथके पथिक - स्वतंत्रता सेनानी/ जल अछि जा' धरि, जिनगी ता' धरि! / प्रक्रियाधीन सामाजिक परिवर्तन'क स्वर (पृ. ४४-६७) २.८.लालदेव कामत- नोतक बिझो! (बीहनि कथा)/ जेहन रोपब, तेहने काटब! (लघुकथा) (पृ. ६८-७०) २.९.डॉ कैलाश कुमार मिश्र- सवाक कुसुम कामिनी/ ककरा के दूसत (पृ. ७१-९९) २.१०.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (खेप-२४) (पृ. १००-१०५) २.११.नन्द विलास राय-जाबी (पृ. १०६-१०६) २.१२.जगदीश प्रसाद मण्डल- सुचिता (धारावाहिक उपन्यास) (पृ. १०७-१२६) २.१३.जगदीश प्रसाद मण्डल-धुरफन्ना लोक(लघुकथा) (पृ. १२७-१३५) २.१४.रबीन्द्र नारायण मिश्र-बदलि रहल अछि सभकिछु (उपन्यास)- धारावाहिक (पृ. १३६-१५५) २.१५.डॉ किशन कारीगर- मैथिली लेखनक शून्य बज़ार स्थिति? वेबसता कारण आ समाधान (पृ. १५६-१६०) ३.पद्य खण्ड ३.१.कल्पना झा- साउन मास (पृ. १६२-१६३) ३.२.प्रमोद झा 'गोकुल'- गामक बात (पृ. १६४-१६५) ३.३.राज किशोर मिश्र-पराग (पृ. १६६-१६९) ३.४.आचार्य रामानंद मंडल- चीरहरण/ सावन मे नारी (पृ. १७०-१७४) 𑒀 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्तिः पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म 𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑓁 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒰𑒣: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒼𑒭𑒡𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹 𑒠𑒹𑒫𑒰: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧 ब्रह्मणसँ प्रार्थना जे द्युलोकमे, अंतरिक्षमे, पृथ्वीपर, जलमे, औषधमे, वनस्पतिमे, विश्वमे, सभ देवतागणमे आ ब्रह्ममे शांति हुअय। ॐ-ब्रह्मण, द्यौ-सूर्य-तरेगण, अंतरिक्ष- पृथ्वी आ द्यूलोकक बीच, आप:-जल, विश्वेदेवा- सभ देवता, ब्रह्म- सर्जक। 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝𑒮𑒿 𑒣𑓂𑒩𑒰𑒩𑓂𑒟𑒢𑒰 𑒖𑒹 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒧𑒹, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭𑒧𑒹, 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲𑒣𑒩, 𑒖𑒪𑒧𑒹, 𑒎𑒭𑒡𑒧𑒹, 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒱𑒧𑒹, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒧𑒹, 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰𑒑𑒝𑒧𑒹 𑒂 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒧𑒹 𑒬𑒰𑓀𑒞𑒱 𑒯𑒳𑒁𑒨। 𑓇-𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝, 𑒠𑓂𑒨𑒾-𑒮𑒴𑒩𑓂𑒨-𑒞𑒩𑒹𑒑𑒝, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭- 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒂 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒏 𑒥𑒲𑒔, 𑒂𑒣:-𑒖𑒪, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹𑒠𑒹𑒫𑒰- 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰, 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧- 𑒮𑒩𑓂𑒖𑒏। 𑒀 ॐ, स॒हस्र॑शीर्षा॒ पुरु॑षः। स॒ह॒स्रा॒क्षः स॒हस्र॑पात्। 𑓇, 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒬𑒲𑒩𑓂𑒭𑒰↓ 𑒣𑒳𑒩𑒳↑𑒭𑓁। 𑒮↓𑒯↓𑒮𑓂𑒩𑒰↓𑒏𑓂𑒭𑓁 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒣𑒰𑒞𑓂। स भूमिं॑ ग्वंग वि॒श्वतो॑ वृ॒त्वा। अत्य॑तिष्ठद् दशाङ्गु॒लम्॥ 𑒮 𑒦𑒴𑒧𑒱𑓀↑𑓅 𑒫𑒱↓𑒬𑓂𑒫𑒞𑒼↑ 𑒫𑒵↓𑒞𑓂𑒫𑒰। 𑒁𑒞𑓂𑒨↑𑒞𑒱𑒭𑓂𑒚𑒠𑓂 𑒠𑒬𑒰𑒓𑓂𑒑𑒳↓𑒪𑒧𑓂॥ हजार माथ, हजार आँखि, हजार पएर संग विश्वकेँ आच्छादित केने अछि, दस आंगुरक गनतीक वशमे नै अछि ओ। प॒द्भ्याग्ँ॑ शू॒द्रो अ॑जायत॥ 𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑒑𑓂𑒿↑ 𑒬𑒴↓𑒠𑓂𑒩𑒼 𑒁↑𑒖𑒰𑒨𑒞॥ पएरसँ शूद्रक उत्पत्ति भेल॥ प॒द्भ्यां भूमि॒र्दिशः॒ श्रोत्रा᳚त्। 𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑓀 𑒦𑒴𑒧𑒱↓𑒩𑓂𑒠𑒱𑒬𑓁↓ 𑒬𑓂𑒩𑒼𑒞𑓂𑒩𑒰↑↑𑒞𑓂। मुदा पएरेसँ भूमियोक उत्पत्ति। ❀ (White Florette- innocence and purity) ☸ (Wheel of Dharma) ࿕(Swastik) ꣼ (सिद्धिरस्तु, सिद्धम 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒱𑒩𑒮𑓂𑒞𑒳, 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒧 Devanagari Anji) 𑓅 (Gwang ग्वंग- two small circles connected by u and a dot placed over it, used in reference of Vedic texts) 𑒀 (Tirhuta Anji, Ankush of Ganeshji, placed at the beginning of something) 𑒀
१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.अंक ३७४ पर टिप्पणी १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय मैथिलीक पहिल पद्य उपन्यास- बगवार रामेश्वर प्रसाद मण्डल लऽ कऽ आयल छथि मैथिलीक पहिल पद्य उपन्यास 'बगवार'। ओना तँ खण्डकाव्य आदिमे सेहो औपन्यासिकता रहै छै, मुदा से अखन धरि मैथिलीमे ऐतिहासिक बा महाकाव्य आधारित मात्र रहल अछि। रंगपुरक जगू आ रोशनी केर खिस्सा अछि ई पद्य-उपन्यास। दुनू परानी रहै छला, माय-बाबूक सेवा करै छला। माटिक भीत, माटिक खाम्ह, माटियेक दुआर। बाँसक छड़ , बाँसक खिड़की , तिलै काठक आ बाँसक ठाठ। सुन्नर घर। आ माता-पिताक मृत्यु, मुदा सम्हरल जागू। खेती तर-तरकारीक, माछक बेपार। पहिल बच्चा बौआ 'वेद प्रकाश'। दोसर बच्चा भेल लड़की 'चन्दा', स्त्रीगणक मुँ बिधुआ गेल मुदा जगू कहलनि- बेटाकेँ स्कूल भेजै छी आ बेटीसँ बकड़ी चरबै छी, से मांगू माफी। आ ओकर छठियारीपर जगू बासमती चाउर गमगमा देलन्हि। फेर माछक चोरि भेलन्हि, पंच सभ चोरसँ मीलि गेल। जगू बेमार भेला, गरीबीसँ डेराए गेला। बाहर निकलता, किस्मत अजमेता। गुलाठी गेला, चूड़ी पैक्ट्रीमे नोकरी भेट गेलनि, मिड्ल पासक मांग छल ओतऽ, से नीक नम्बरमे पास छलाहे। फेर रोशनीक जौंआँ बच्चा 'देव' आ 'निलेश'। रंगपुर गामक फुसनी मड़र जगू केँ जमीन बढबैले कहलखिन्ह, पढ़ाइमे अनेरे पाइ दूरि नै करबाक सलाह देलखिन्ह। मुदा गाँधी बाबाक कहल करता जगू। अक्षर बेटीक गहना थिक। चन्दा आ वेद स्नातक केलकन्हि। चन्दाक बियाह भेल। रुसल जमायकेँ साइकिलो देलन्हि, दूटा घर आ शौचालयो बनबा देलन्हि। वेद प्रकाश सुजुकी कम्पनी आ देव कुमार टाटा कम्पनीमे नोकरी पकड़लकन्हि। दुनूक एक्के मड़बापर बियाह सम्पन्न भेल। फेर निलेश कुमार बी.डी.ओ. बनि गेला। आ ओम्हर फुसनी मड़रक बेटा नशेबाज बनि गेल, दिल्ली पड़ा गेल आ वेश्यासँ बियाह कऽ लेलक। फुसनी जगू लग कनैत एला। रोशनीक मोन खराप भऽ गेल। मुदा बेटा-पुतोहु सभ पाँचे लाखक मदति केलन्हि। पाँच लाखक कर्जा चढ़ि गेलन्हि, घर बन्हकीपर राखऽ पड़लन्हि। आ फेर नोकरीसँ जगूक अवकाश भऽ गेलन्हि। ने नोकरी, आ ने घर। से बेटा पुतोहु कथीले रहतन्हि। मदा फेरसँ दुनू परानी अपन काज आगाँ बढ़ेलन्हि। जगू खेती शुरू केलन्हि, आ रोशनी काठक जत्ता चलेलन्हि। वेदक पत्नी वीणा कुमारी मुदा शीलवती-गुणवती। एम्हर जगूक फेर विधाता वाम भेलन्हि, लोटन अपन मालिक जगूकेँ खून देलन्हि, लोटन कहलक जे हुनके सभक कृपासँ ओ शिक्षाक महत्व बुझलक आ दरोगा परीक्षा पास केलक। एम्हर देवक कम्पनी छुटि गेलै, घूस लैत निलेश सस्पेण्ड भऽ गेल। सभ वेदक अंगना घुसि गेल। जगू फेर बेमार भऽ गेल। एम्हर पेंशनक चिट्ठी एलै, जगूकेँ सोलह लाख टाका भेटलै। फेर सभ बच्चा लेल जगू पैरवी केलक, टाका देलक, निलेश फेर बी.डी.ओ. बनि गेल, देवकेँ फेर नोकरी लागि गेल। जगूकेँ संगी रघु मण्डल मोन पड़लन्हि, मुदा रघुक बेटा कहलखिन्ह जे ओ हुनका वृद्दाश्रम पठा देलन्हि। जगू रघुके वृद्धाश्रमसँ घुरा कऽ लऽ अनलन्हि। आ फेर रघु बनेलन्हि रोशनी सदाव्रत अस्पताल, रंगपुर। गरीब-लाचारक मुफ्त इलाज। रंगलाल मड़रक अत्याचारक खिलाप पंचैती। फेर बेइमानी। मुदा जगू एक लाख रुपैय्या दऽ धूर्त रंगलालसँ सतनाकेँ बचेलन्हि। फेर जगू मिडिल स्कूल बनबेलन्हि 'जगू जनता मिडिल स्कूल, रंगपुर'। आ ओइमे छल मनोरंजन विभाग। आ जेना व्यासजी लेखक रहितो अपन रचना महाभारतमे प्रवेश करै छथि तहिना रामेश्वर प्रसाद मण्डल ऐ पद्य-उपन्यासमे अबै छथि, ओ छथि डायरेक्टर ऐ मनोरंजन विभागक। फेर सदाव्रत आश्रम खुजल। आब जगूक धियान बेटी चन्दापर जाइ छन्हि। बेटी जमाय निःसन्तान रहनि, दुनूकेँ बजेलन्हि। अपने अस्पतालमे भर्ती भेल चन्दा, मासक बादे परिणाम। ओ गर्भवती भऽ गेल। फेर बीचमे छथि पाबनिक चर्चा, मधुबनी पेंटिंगक इतिहास। आ छठिये घाटपर एकटा छौड़ीकेँ दाँती लगलै। रोशनी अस्पताल, रंगपुरमे ओ भर्ती भेल, एनीमिया छलै। निलेशक ब्लडग्रुप मिललै। आ कहलनि जगू- निलेश बौआ/ आगाँक धर्म बताबह। आ निलेश बी.डी.ओ. क रोआब बिसरि खून देलक, जान बचेलक। ई उपन्यास पद्यमे अछि तेँ ई अछि पद्य उपन्यास। ई उपन्यास व्यास सन अपने महाभारतमे कविक प्रवेश करबैत अछि आ संदेश दैत अछि जे अपन खिस्सासँ पृथक भऽ लेखक रहिये नै सकैत अछि। -Gajendra Thakur, editor, Videha (be part of Videha www.videha.co.in -send your WhatsApp no to +919560960721 so that it can be added to the Videha WhatsApp Broadcast List.) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १.२.अंक ३७४ पर टिप्पणी कल्पना झा, पटना विदेहक नबका अंक पढ़लहुँ। "रामेश्वरम लिंग स्थापना" शीर्षक आलेख मे सामाजिक चिंतक आचार्य रामानंद मंडल जी द्वारा बाल्मीकि रामायण मे शिव लिंग स्थापना आ रामचरितमानस मे लिंग स्थापना वर्णन मे मतभिन्नताक चर्चा नीक लागल। डॉ दीपेश कुमार ठाकुरक "मिथिलाक इतिहासक वैज्ञानिक अध्ययन एवं ओकर समीक्षात्मक विश्लेषण" शीर्षक सँ शोध पत्र पढ़लहुँ, नीक लागल। ज्ञानवर्धक शोधपत्र छनि,निस्संदेह। मुदा शीर्षक देखि,एहि सँ नीक शोध पत्रक आस मे पढ़ब शुरु कएने छलहुँ। प्वाइंट वाइज तैयार कएल गेल शोध पत्र मे, मुगल शासन आ महेश ठाकुर,डॉ ग्रियर्सन आ मैथिली भाषा,मिथिलासँ बौद्धिक पलायन,स्वतंत्रता आंदोलनमे मिथिलाक योगदान,दहेज प्रथा,मिथिलाक विशिष्ट व्यंजन माछ,मैथिली भाषा आ मिथिलाक्षर सन महत्वपूर्ण बिन्दु पर लिखलनि अछि लेखक। किछु नब जनतब सेहो भेल। जेना साओन मासक कृष्ण पक्ष प्रतिपदा सँ मिथिला पंचांगक प्रारम्भ किएक होइत अछि,एहि बात सँ हम अनभिज्ञ छलहुँ,जे एहि शोध पत्र सँ बुझलहुँ। देखल जाए,"भारतमे शक संवत्,विक्रम संवत् आ ईस्वी सनक चलनसारि तँ अछिए मुदा विशाल भारत देशमे नववर्षक लेल भिन्न-भिन्न तिथि अछि। मिथिलाक पंचांगक अनुसार सालक प्रथम दिन अछि साओन मासक कृष्ण पक्षक प्रतिपदा। एकर कारण अछि मुगल सल्तनत तेसर बादशाह अकबर द्वारा महेश ठाकुर के मिथिलाक कर-प्रभार साओन मासमे देल गेल रहैन्ह। एकर ऐतिहासिकता केँ दर्शाबैत लेखक कहैत छथि जे भनहि अनजानहिमे, मिथिला-पंचांगक संबंध पैगंबर मोहम्मदक मक्कासँ मदीना जएबाक साल आ अकबर के राज्यारोहणक साल सँ जुड़ल अछि।" छोट मुह,पैघ बात क' रहल छी,मुदा जे हमरा बुझाएल से कहब आवश्यक ने! किछु बिन्दु छूटल सन लागल हमरा। मिथिलाक इतिहास मे,मिथिलाक लोककला,लोकगीत, लोकनृत्य,पाबनि-तिहार,बहुत किछु संलग्न कएल जेबाक चाही छल। कतहु कतहु विषय सँ भटकाव सेहो देखाएल।जेना- दहेज प्रथा बला प्वाइंट मे सत्यनारायण भगवानक पूजा आ छठि पूजाक चर्चा। दहेज प्रथाक प्रचलन कोना आ कहिया शुरु भेल,एकर दुष्प्रभाव समाज पर,तकर सभक चर्चे नहि। विवाह संबंधी आरो समस्या,जेना बाल विवाह, बहु विवाह,बिकौआ विवाह किंवा मुगल काल मे बालिका/स्त्रीक असुरक्षा बला स्थिति जे छलए, तकर सभक चर्चा छूटल छनि। नित नवल दिनेश कुमार मिश्र (लेखक गजेन्द्र ठाकुर) ओना तँ बाढ़ि स्पेशलिस्ट पोथी पर आधारित अछि,तथापि रोचक सेहो अछि। ज्ञानवर्धक तँ सहजहि। "कृषि एहन क्षेत्र अछि जइमे रोजगारक अधिकतम संभावना अछि। तेँ जँ कोनो तरहेँ खेती-बाड़ी ठीक भऽ जाय तँ कतेको लोक जमीनसँ जुड़ि जायत आ ट्रेनक छतपर भीड़ कनेक कम भऽ जायत।" पढ़ि भावुक भ' गेलहुँ। भगवान करथि,एहन दिन आबए। नित नवल सुशील (लेखक गजेन्द्र ठाकुर)पढ़ब शुरु केलहुँ, तँ खाएब पीअब छोड़ि पूरा पढ़िए क' उठलहुँ। अगिला अंकक प्रतीक्षा रहत। चोर पंकज झा पराशर के step by step देखार करब सेहो रोचक सहस्रबाढ़नि फिनिश केलहुँ दू दिन पहिनहि। नीक लागल। लक्ष्मण झा 'सागर' विदेहक ३७५ अंक। न भुतो ना भविष्यति! माधव कत तोर करब बड़ाइ? मित्रनाथ झा प्रियवर ठाकुरजी,सविनय नमस्कार। हम मित्रनाथ, दड़िभङ्गासँ।अपने मिथिला,मैथिल ओ मैथिलीक समग्र विकास,विशेषरूपेण भाषा-साहित्यक लेल जाहि रूप सँ दत्तचित्त भऽ कऽ विगत कतोक दशाब्द सँ समर्पण-भाव सँ बहुमूल्य कार्य करैत रहलहुँ अछि,ई हमरा दृष्टिएँ श्लाघनीय तँ अछिए, चिरस्मरणीये टा नहि,अविस्मरणीय अछि।हमरा बहुत पहिने एक बेर बहुत काल धरि अपनेक सान्निध्यक सौभाग्य प्राप्त भेल छल। अपनेक मातृभाषाक प्रति एहि प्रकारक उच्चस्तरीय समर्पण देखिकेँ कोन तरहेँ अभिभूत छी,तेकर समुचित अभिव्यक्तिक लेल तत्क्षण अपनाकेँ शब्दहीन पाबि रहल छी।माँ शारदा सँ प्रार्थना करैत छिऐन्हि जे अपनेक लेखनीकेँ उत्तरोत्तर आर अधिक गत्वरता प्रदान करैत मैथिलीक अक्षर-जगतक 'इतिहास-पुरुष 'क रूप मे सुप्रतिष्ठित करैत रहथि।असीम स्नेह ओ अशेष शुभकामनाक सङ्ग,मित्रनाथ, दड़िभङ्गा। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.गद्य खण्ड २.१.साक्षात्कार: योगानन्द झा सँ उमेश मण्डल द्वारा २.२.साक्षात्कार: कमला चौधरी सँ उमेश मण्डल द्वारा २.३.परमानन्द लाल कर्ण- गीता माहात्म्य (आगाँ) २.४.संतोष कुमार राय 'बटोही'-मंगरौना (धारावाहिक उपन्यास)- (चौदहम खेप) २.५.कुमार मनोज कश्यप-अपूर्व स्वाद २.६.आचार्य रामानन्द मण्डल-बाल्मीकि रामायण आ रामचरितमानस के तुलनात्मक अध्ययन २.७.लालदेव कामत-लालदेव कामत- आंचलिक उपन्यास "भोट" मादे/ सर्वश्री राजकिशोर मिश्र जीके - टेमी/ एक अध्यात्म पथके पथिक - स्वतंत्रता सेनानी/ जल अछि जा' धरि, जिनगी ता' धरि! / प्रक्रियाधीन सामाजिक परिवर्तन'क स्वर २.८.लालदेव कामत- नोतक बिझो! (बीहनि कथा)/ जेहन रोपब, तेहने काटब! (लघुकथा) २.९.डॉ कैलाश कुमार मिश्र- सवाक कुसुम कामिनी/ ककरा के दूसत २.१०.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (खेप-२४) २.११.नन्द विलास राय-जाबी २.१२.जगदीश प्रसाद मण्डल- सुचिता (धारावाहिक उपन्यास) २.१३.जगदीश प्रसाद मण्डल-धुरफन्ना लोक(लघुकथा) २.१४.रबीन्द्र नारायण मिश्र-बदलि रहल अछि सभकिछु (उपन्यास)- धारावाहिक २.१५.डॉ किशन कारीगर- मैथिली लेखनक शून्य बज़ार स्थिति? वेबसता कारण आ समाधान २.१.साक्षात्कार: योगानन्द झा सँ उमेश मण्डल द्वारा साक्षात्कार: योगानन्द झा सँ उमेश मण्डल द्वारा योगानन्द झा विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) http://www.videha.co.in/ लेल श्री योगानन्द झासँ उमेश मण्डल जीक साक्षात्कार।
(1) वर्तमान मैथिली साहित्य कोन दिशामे अछि? योगानन्द झा : वर्त्तमान मैथिली साहित्य निरन्तर प्रगति पथपर अछि। (2) ओना पुरस्कार तँ प्रोत्साहन लेल होइत छै मुदा मैथिलीमे पुरस्कार भेटिते साहित्यकारक गति प्राय: रुकि जाइत छै। एना किएक? योगानन्द झा : सर्वथा काल्पनिक अवधारणा। उदाहरणक हेतु पुरना पीढ़ीक आचार्य सुरेन्द्र झा 'सुमन', पं. चन्द्रनाथ मिश्र 'अमर', व्यसक चतुर्थ प्रहरमे लेखकीय आभासँ दीप्त श्री केदान नाथ चौधरी आ नेनपनहिसँ पत्रकारिता-साहित्यकारिताक प्रतिभा सम्पन्न युगपुरुष विभूति आनन्दकेँ प्रस्तुत कयल जा सकैत छनि। (3) वर्तमान समयमे मैथिली पत्र-पत्रिकाक की हाल अछि? योगानन्द झा : नीक नहि, अपन अस्तित्व रक्षाक हेतु बेकल। (4) चेतना समीति एवम् अन्यान्य मैथिली संगठनमे एखनो दलित वर्गक प्रवेश नगण्य छै। एकरा अहाँ कोन रूपमे देखै छिऐ? योगानन्द झा : दलित के? अर्थसत्तासँ विपन्न साहित्यकार वा जातीय जनगणनामे तथाकथित दलित? जँ पहिल, तँ प्रकाशन-प्रचारक एहि प्रतियोगी युगमे अर्थसत्तासँ विपन्न व्युत्पन्नो साहित्यकार सभा-समितिमे उपेक्षित रहबे करताह। जँ अपन, तँ समिति/संगठन बहुधा बाहुबली राजनीतिज्ञ लोकनिक वर्चस्वक संरक्षक होइछ जतऽ साहित्यकारिता महत्त्वपूर्ण नहि। ई मैथिलीओक दुर्भाग्य। (5) दरभंगे पीठ जकाँ आब सहरसा पीठ बनि रहल छै। ई मैथिलीक लेल नीक की खराप? योगानन्द झा : नीक, किएक तँ सभ दिनसँ समानान्तर जाग्रत सहरसा पीठ एम्हर स्तब्ध भऽ गेल छल, आब मुखरता ग्रहण कऽ रहल अछि। (6) अहाँक साहित्यिक यात्रामे कोन तत्त्व प्रेरक आ कोन तत्त्व बाधक रहल? योगानन्द झा : गुरुजनक प्रोत्साहन ओ निरपेक्ष निर्देशन आ साहित्यिक राजनीतिक दुर्गन्धमय वातावरण। (7) वर्तमान साहित्यकारक मूल्याकंन अहाँ केना करए चाहब? योगानन्द झा : हुनक रससिद्धता, वैचारिकता ओ जीवन मीमांसाक सामर्थ्यसँ। (8) अहाँक प्रिय साहित्यकारकेँ छैथ? योगानन्द झा : एकानेक, कतेक गनाबी? (9) साहित्यकारक लेखकीय विचार आ वास्तविक जीवनक विचार एक हेबाक चाही आकि अलग-अलग? जँ एक हेबाक चाही तँ 'वैद्यनाथ मिश्र यात्री'जीक वैचारिक विचलनकेँ अहाँ कोन रूपमे देखै छिऐन। आ जँ अलग-अलग हेबाक चाही तँ ओहन साहित्य ओ साहित्यकारक मूल्य की? योगानन्द झा : सर्वथा एक। यशसे अर्थकृतेपरक सारस्वत साधना। परोपदेशे पाण्डित्यं। (10) मैथिल साहित्यकार बहु विधावादी होइत छैथ। मुदा जँ अहाँ एक्के विधामे रहितौं तँ ओ कोन विधा होइत? योगानन्द झा : कविता। (11) युवासँ की आशा। ओइमे सँ के आगू जा सकै छैथ। : अनन्त विकासक। से समय निर्धारित करत। (12) अहाँ अपन साहित्यक यात्राक पड़ाव कतऽ आ कोन रूपेँ देखै छिऐ? योगानन्द झा : शास्त्रीय कालजयी कृतिक निर्मितिमे, चोला बदलवासँ पूर्व। (13) पारिवारिक परिचय जनबाक इच्छा अछि। योगानन्द झा : सामान्य निम्न मध्यवर्गीय कृषि आधारित परिवारमे जन्म भेल आ ओही वर्गीय वृत्तिकेँ निमाहबाक हेतु बाध्य रहलहुँ। (14) कोन-कोन पत्रिकाक अपने सम्पादक मण्डलमे छेलौं ओइमे के सभ योगदान देने छला? ओइ पत्रिका सभक विषयमे जनबाक इच्छा अछि। योगानन्द झा : 'संकल्प' वार्षिक पत्रिका। आब हमरा लग एक्केटा अंक उपलब्ध अछि जकर छाया-प्रति अपन सामर्थ्यसँ अगवत करा देत। (15) अपन रचना कर्मक सम्बन्धमे विस्तारसँ बताबी। कोन कोन रचना अहाँक नजैरमे अहाँक प्रिय रचना अछि, तेकरा सेहो विस्तारसँ बताबी। योगानन्द झा : स्मृतिशेष डॉ. रामदेव झाजीक प्रोत्साहन पाबि मैथिलीमे स्नातकोत्तर, पी.एच.डी. स्तरधरि शिक्षा ग्रहण कयल। ताहिसँ पूर्व उच्चतर माध्यमिक कक्षा धरि आधुनिक भारतीय भाषाक रूपमे मैथिली पढ़ने छलहुँ आ ताहि क्रममे अनुकरणात्मक रचना दिस प्रवृत्त भेल छलहुँ। परवर्ती कालमे क्षेत्रीय शोधकार्य कयल, डिग्रीक हेतु, मुदा से अतिरिक्त उत्पादक रूपमे साहित्यसँ परिचयो करौलक आ प्रवृत्तो। अनुवाद पुरस्कार भेटलाक बाद अनुवाद दिस प्रवृत्त भेलहुँ। तत:पर सम्पादक लोकनिक आग्रहपर सामग्री फुटबैत रहलहुँ आ लोकजगत हमरो साहित्यकारक परिचितिकेँ स्थापित करैत चल गेल। 'निज कवित्त केहि लाग न नीका'क आधार पर सभटा रचना विशेषे प्रिय। ताहूमे सभसँ उत्तम रचना अछि 'किछु नूतन करी हम।' शोध-प्रबन्धक प्रणयनक हमर सूत्रधार छलाह स्मृतिशेष बुच्चन रजकजी जे नागदेवताक भक्त (भगत) छलाह। ओ विभिन्न गाममे विभिन्न जातिक लोकक ओहिठाम लऽ जाथि आ हम अन्तर्वाता माध्यमे शब्द-संचयन कयल करी। (16) डॉ. कमला चौधरी-मैथिलीक वेश-भूषा-प्रसाधन सम्बन्धी शब्दावली २००८; डॉ योगानन्द झा- मैथिलीक पारम्परिक जातीय व्यवसायक शब्दावली २००९ आ डॉ. ललिता झा- मैथिलीक भोजन सम्बन्धी शब्दावली २०११ मैथिलीक समानान्तर धाराक नजैरमे मैथिलीक सुच्चा शब्दकोष अछि जे खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक अछि। एहि तीनमे एक अहूँ छी। मात्र यएह पोथी मैथिलीक समानान्तर धारामे अहाँक नाओं अमर करबा लेल पर्याप्त अछि। अहि पोथीक क्रममे कोन गामक कोन लोक सभक योगदान छन्हि, एकर रचना विधानक सम्पूर्ण इतिहास विस्ट्रुत रूपमे बताबी। : शिक्षाक माध्यमक रूपमे मैथिलीक स्वीकार्यता कतेक जायज कतेक नाजायज? अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.साक्षात्कार: कमला चौधरी सँ उमेश मण्डल द्वारा साक्षात्कार: कमला चौधरी सँ उमेश मण्डल द्वारा कमला चौधरी विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) http://www.videha.co.in/ लेल डॉ. कमला चौधरीसँ उमेश मण्डलक साक्षात्कार। (1) वर्तमान मैथिली साहित्य कोन दिशामे अछि? कमला चौधरी : निश्चित रूपसँ मैथिली साहित्य अवाध गतिएँ प्रगतिक बाटपर बढ़ि रहल अछि।
(2) ओना पुरस्कार तँ प्रोत्साहन लेल होइत छै मुदा मैथिलीमे पुरस्कार भेटिते साहित्यकारक गति प्राय: रुकि जाइत छै। एना किएक? कमला चौधरी : एहन कोनो बात नहि। बहुतो पुरस्कार प्राप्त साहित्यकार अपन जीवनक उत्तरार्द्धमे मैथिली साहित्य भण्डारकेँ श्री सम्पन्न कयने छथि। जेना, पं. चन्द्रनाथ मिश्र अमर, डॉ. भीमनाथ झा, विभूति आनन्द, प्रदीप बिहारी, पं. गोविन्द झा, जगदीश प्रसाद मण्डल इत्यादि।
(3) वर्तमान समयमे मैथिली पत्र-पत्रिकाक की हाल अछि? कमला चौधरी : संतोषजनक नहि, मुदा निरन्तर नव-नव पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन भऽ रहल अछि जे जीवन्तताक प्रतीक थिक। नियत-अनियतकालीन पत्र-पत्रिका तँ मैथिली पत्रकारिताक इतिहासकेँ बेस झमटगर बनौने जा रहल अछि।
(4) चेतना समीति एवम् अन्यान्य मैथिली संगठनमे एखनो दलित वर्गक प्रवेश नगण्य छै। एकरा अहाँ कोन रूपमे देखै छिऐ? कमला चौधरी : वर्त्तमान समयमे दलितक अर्थ जाति नहि, आर्थिक विपन्नता अछि। एखनुक संस्था ओ संगठन प्रभुत्व-सम्पन्न ओ राजनीतिज्ञ लोकनिक संरक्षणमे चलैत अछि, जतय एकटा सुच्चा साहित्यकार दुर्बल प्राणी सदृश होइत छथि। अत: हुनक उपेक्षा स्वाभाविक। समरथ को नहि दोष गोसाईं। ई रोग आनो भाषाक संस्था ओ संगठन सभमे पूर्वहिसँ व्याप्त अछि। मैथिली एहिसँ किएक वंचित रहतीह!
(5) दरभंगे पीठ जकाँ आब सहरसा पीठ बनि रहल छै। ई मैथिलीक लेल नीक की खराप? कमला चौधरी : बहुत नीक। हमरा विश्वास अछि जे पहिलुक पीठ सभसँ उत्तम परिणाम सोझाँ आयत।
(6) अहाँक साहित्यिक यात्रामे कोन तत्त्व प्रेरक आ कोन तत्त्व बाधक रहल? कमला चौधरी : गुरुजनक प्रोत्साहन आ निर्देशनसँ प्रेरित होइत रहलहुँ। विशेषतया स्कूली शिक्षाक समय पण्डित चन्द्रनाथ मिश्र अमर ओ विश्वविद्यालयी शिक्षणक समय डॉ. शैलेन्द्र मोहन झाजीसँ बेसी प्रभावित भेल रही। आगाँ चलि साहित्यिक गुटबाजी ओ तिकड़मसँ बहुत निरुत्साहित भेलहुँ।
(7) वर्तमान साहित्यकारक मूल्यांकन अहाँ केना करए चाहब? कमला चौधरी : वस्तुत: रचनाक मूल्यांकन ओहिमे निहित वैचारिकता, संवेदनशीलता, उपयोगिता ओ रस-माधुर्यसँ होयबाक चाही।
(8) अहाँक प्रिय साहित्यकारकेँ छैथ? कमला चौधरी : बहुत गोटा। कतेकक नाम कहू?
(9) साहित्यकारक लेखकीय विचार आ वास्तविक जीवनक विचार एक हेबाक चाही आकि अलग-अलग? जँ एक हेबाक चाही तँ वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' जीक वैचारिक विचलनकेँ अहाँ कोन रूपमे देखै छिऐन। आ जँ अलग-अलग हेबाक चाही तँ ओहन साहित्य ओ साहित्यकारक मूल्य की? कमला चौधरी : निश्चित रूपसँ एक होयवाक चाही मुदा से विरल होइत अछि। हम जखन महाविद्यालय सेवासँ जुडलहुँ तँ ओतय दू सहकर्मी साहित्यकारसँ परिचित भेलहुँ। एकटा रहथि जनवादी कवियित्री। भूख आ रोटी हुनक कविताक मुख्य विषय रहैत छल मुदा एकदिन हुनका आठ आना लेल बक-झक करैत, रिक्शावलाक देहपर पाई फेकैत देखने रहियनि तँ बहुत विचलित भऽ गेल रही। तहिना दोसर सहकर्मी जे स्त्रीक मान-सम्मानक समर्थनमे खूब कलम चलबैत रहथि, मुदा एकटा सेविकाक संग हुनक कटुवार्त्तालाप सुनि स्तब्ध भऽ गेल रही। कथनी आ करनीक विभेदकेँ प्रत्यक्ष दर्शन ओतहि भेल रहय, आगाँ किछु आओर अनुभव भेटैत गेल। तखन बुझलहुँ जे उपदेश दोसरा लेल होइत अछि मुदा से उचित नहि थिक।
(10) मैथिल साहित्यकार बहु विधावादी होइत छैथ। मुदा जँ अहाँ एक्के विधामे रहितौं तँ ओ कोन विधा होइत? कमला चौधरी : कथा ओ कविता।
(11) युवासँ की आशा। ओइमे सँ के आगू जा सकै छैथ। कमला चौधरी : आशावान छी मुदा से समय निर्णय करत।
(12) अहाँ अपन साहित्यक यात्राक पड़ाव कतऽ आ कोन रूपेँ देखै छिऐ? कमला चौधरी : हमर साहित्यिक अवदान कोनो विशेष नहि रहल अछि, तेँ एहिपर किछु कहब उचित नहि।
(13) पारिवारिक परिचय जनबाक इच्छा अछि। कमला चौधरी : अधिवक्ता पिताक (स्व. कृष्णकान्त झा, ग्राम- विरसायर, पण्डौल) ज्येष्ठ सन्तानक रूपमे जन्म भेल। पिता गांधीवादी विचारधाराक रहथि। स्वतंत्रता संग्राममे अंग्रेजक विरुद्ध कार्य कयलनि, तेँ स्वतंत्रता सेनानी सेहो रहथि। पिताक सानिध्यमे कर्पूरी ठाकुर, राममनोहर लोहिया, सूरज नारायण सिंह, जय प्रकाश नारायण आदि नामचीन व्यक्तित्व सभक दर्शनक सुअवसर प्राप्त भेल। हमर माता (स्व. श्यामला झा) पूर्ण शिक्षित आ सशक्त महिला रहथि। कोनो परिवारकेँ सुचारू रूपेँ चलयवामे ओहि परिवारक स्त्रीक मुख्य भूमिका रहैत अछि। हमर माता शिमला शहर स्थित कॉन्वेंट स्कूलसँ सातवीं कक्षा तक पढ़ल रहथि, से अंग्रेजीक ज्ञान बढ़ियॉं रहनि। हमर नाना स्व. अच्युतानन्द झा (ग्राम- भवानीपुर, पण्डौल) दरभंगा महाराजक शिमला स्थित कारोबारक मैनेजर रहथि। तेँ सपरिवार ओतहि रहैत छलाह। हमर मातासँ चारि वर्ष पैघ मामा (स्व. रामचन्द्र झा) रहथि जे आगॉं चलि अंग्रेजीक प्रध्यापक भेलाह। शिमलामे अंग्रेज सभहक सम्पर्कमे अयलासँ हुनकर सभहक रहन-सहन पर बहुत प्रभाव पड़ल रहनि। कहल जाइत अछि जे ओहि गाममे चाहक चलनि हमर नानेक घरसँ आरम्भ भेल छल। हमर माताक द्विरागमनमे हमर नाना एक बाकस विभिन्न विधाक पुस्तक सभ देने रहथि। एहिसँ हुनक साहित्यिक अभिरूचिक प्रमाण भेटैछ। ओहिमे प्रेमचन्द्र ओ शरदचन्द्रक किछु उपन्यास सभ बॉंचल छल जे हमरा स्कूली शिक्षाक समय पढ़वा लेल भेटल आ सम्भवत: ओहिसँ साहित्यक स्वाद भेटल जे आगॉं चलि रूचिमे रसि-बसि गेल। नानाक देल ग्रामोफोन सेहो बहुत दिन तक सुरक्षित रहल। ओहि समय ट्रांजिस्टरक चलन नहि रहैक। हम चारू भाई-बहिन रेकार्ड लगा कृष्ण-लीला सुनी आ नूरजहॉं, सहगलक फिल्मी गीत सेहो। एहि तरहेँ हमर व्यक्तित्व निर्माणमे हमर माता-पिता ओ नाना-नानी (स्व. दुर्गा झा)क बहुत सहयोग रहलनि। कठिनसँ कठिन समयमे ओ लोकनि हमर सम्बल बनल रहलाह। हुनकहि लोकनिक देल संस्कार ओ स्नेहसँ हम साहसी, कर्मठ आ स्वावलम्बी बनि सकलहुँ। संयोगवश सासुरोक परिवार वकालते पेशासँ जुड़ल छलाह। हमर ददिया ससुर स्व. सोनेलाल चौधरी (ग्राम- बसहा, माखनपुर) अपन इलाकाक पहिल ग्रेजुएट रहथि। ओ कलकत्तासँ कानूनक पढ़ाई कऽ स्व. गिरीन्द्र मोहन मिश्रक संग दरभंगामे वकालत करैत छलाह। ई दुनू गोटा दरभंगा महाराजाक केस-मोकादमाकेँ विशेष रूपेँ देखल करथि। मुदा दुर्भाग्य जे 1934 ई.क भूकम्पक विभिषिकासँ आहत भऽ अल्पे वयसमे दिवंगत भऽ गेलाह। एकर चर्चा स्व. गिरीन्द्र मोहन मिश्र अपन अकादमी पुरस्कृत पोथी 'किछु देखल किछु सुनल' मे कयने छथि। दुर्भाग्यवश वैवाहिक जीवन बहुत अल्प रहल। पति स्व. कन्हैया चौधरी रेल विभागमे रहथि। पुत्र अनुराग कमल (मुकुल चौधरी) सेहो वकालत पेशासँ जुड़ल छथि आ पुत्री जमाता अमेरिका प्रवासी थिकाह। पुत्रवधू मीनू कुमारी +2 विद्यालयमे शिक्षिका छथि। पौत्र सुमुख इंजीनियरींगक पढ़ाई कऽ रहल छथि। पाछाँमे (वामसँ दहिन)- ई. दुर्गानन्द झा (जमाय), अनुराग कमल (पुत्र) आगाँमे (वामसँ दहिन)- मीनू कुमारी (पुतोहु), अभिलाषा कमल (पुत्री), कमला चौधरी (स्वयं)
(14) कोन-कोन पत्रिकाक अपने सम्पादक मण्डलमे छेलौं ओइमे के सभ योगदान देने छला? ओइ पत्रिका सभक विषयमे जनबाक इच्छा अछि। कमला चौधरी : 1984 ई.मे 'स्वाती' नामक त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिकाक सम्पादन ओ प्रकाशन मुजफ्फरपुरसँ आरम्भ कैने रही, जे मात्र चारि अंक प्रकाशित भऽ सकल। ओ पत्रिका अपना समयक महत्वपूर्ण ओ उत्कृष्ट पत्रिका छल, जकर बन्द भऽ जयवाक क्लेष एखनहुँ तक अछि। ओकर बाद बी.आर.ए. बिहार विश्वविद्यालय, मुज.क मैथिली विभागसँ 2012 मे पहिल शोध पत्रिका 'तिरहुत'क प्रकाशन ओ सम्पादन कयने रही, जे कतेको दृष्टिएँ महत्वपूर्ण सिद्ध भेल।
(15) अपन रचना कर्मक सम्बन्धमे विस्तारसँ बताबी। कोन कोन रचना अहाँक नजैरमे अहाँक प्रिय रचना अछि, तेकरा सेहो विस्तारसँ बताबी। कमला चौधरी : डॉ. शैलेन्द्र मोहन झाजीक प्रोत्साहन पाबि मैथिलीमे स्नातकोत्तरक पश्चात् डॉ. रामदेव झाजीक निर्देशनमे पी.एच-डी. हेतु पंजीकृत भेलहुँ। विषय छल 'मैथिलीक वेश-भूषा-प्रसाधन सम्बन्धी शब्दावली'। वस्तुत: शोध-कार्य हेतु विषयक चयन उत्कृष्ट छल, मुदा कठिन सेहो। एहि लेल गहन अध्ययन आ लोक सम्पर्कक आवश्यकता छल। एहि सभ प्रक्रियाकेँ पूर्ण करैत बहुत समय लागि गेल आ अन्तत: 2008 ई.मे ई पुस्तकाकार प्रकाशित भऽ सकल, जे मैथिलीक एकटा मानक ग्रन्थक रूपमे जानल जाइछ। ओना, हृदयसँ हम कथाकार छी। अपन आगू-पाछू घटैत घटना बेसी प्रभावित करैत अछि। 'समय संकेत' नामक मात्र एकटा कथा संग्रह प्रकाशित अछि, जाहिमे काल-चक्र, गुलाब काकी, आकांक्षा, अपराजिता, धूरी हमर प्रिय कथा अछि। एहि कथा सभक नायिका जीवनक विविध झंझावातकेँ झेलैत अपन जीवनकेँ सार्थक स्वरूप देबामे सफल भेल छथि। 'मोनक पौती' सद्य: प्रकाशित बंगला उपन्यासक अनुवाद थिक। एहि उपन्यासक नायिकाक चरित्रसँ बहुत बेसी प्रभावित भेलहुँ। बंगला उपन्यास होइतहुँ मैथिलीक सांस्कृतिक परिवेशक अविकल चित्रण बुझना जाइत अछि। इहो हमर प्रिय रचना थिक।
(16) डॉ. कमला चौधरी-मैथिलीक वेश-भूषा-प्रसाधन सम्बन्धी शब्दावली २००८; डॉ योगानन्द झा- मैथिलीक पारम्परिक जातीय व्यवसायक शब्दावली २००९ आ डॉ. ललिता झा- मैथिलीक भोजन सम्बन्धी शब्दावली २०११ मैथिलीक समानान्तर धाराक नजैरमे मैथिलीक सुच्चा शब्दकोष अछि जे खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक अछि। एहि तीनमे एक अहूँ छी। मात्र यएह पोथी मैथिलीक समानान्तर धारामे अहाँक नाओं अमर करबा लेल पर्याप्त अछि। अहि पोथीक क्रममे कोन गामक कोन लोक सभक योगदान छन्हि, एकर रचना विधानक सम्पूर्ण इतिहास विस्तृत रूपमे बताबी। कमला चौधरी : वेश-भूषा-प्रसाधनक उपादान, पद्धति आ परम्परा कोनो समाजक सभ्यता ओ संस्कृतिक परिचायक मानल जाइत अछि। अत: विषय बहुत उत्तम छल। शोध-कार्यक क्रममे कतेको गाम-घरक भ्रमण कयलहुँ ओ विभिन्न वर्ग ओ जातिक लोक सभसँ सम्पर्क स्थापित कऽ शब्द-सम्पदाक संचय कयल आ विभिन्न क्षेत्रमे ओहि शब्दक पर्याय एवं उच्चारण वैशिष्ट्यकेँ परखवाक अवसर भेटल। रचना विधानक मूलमे विभिन्न प्रकृतिक लोक सभसँ परिधान ओ आभूषणक नामावलीक वैशिष्टयक सम्बन्धमे अन्तरंग वार्त्ता स्थापित कयलहुँ। परिधान ओ आभूषणक संज्ञान ओ चित्रावली हेतु कतेको बूढ-पुरान पण्डित परिवारसँ लऽ निरक्षर कृषि एवं अन्य कर्मसँ जुड़ल लोक सभसँ सम्पर्क साधि विशेष जानकारी लेवाक प्रयासमे लागल रहैत रही। एहि सम्बन्धमे जितवारपुर निवासी सच्चनजीक सहयोगकेँ नहि बिसरि सकैत छी। एहि सभ क्रिया-कलापक संगहि अनेक शास्त्रीय ग्रन्थावलीक अध्ययन द्वारा अनेक शब्दक प्राचीन ओ अर्वाचीन एवं वैकल्पिक स्वरूपक परिचय प्राप्त कयलहुँ। जाहि प्रमुख ग्रन्थक अध्ययन कयल ओहिमे सँ किछु नाओं स्मरण अछि, जेना- गृहस्थ रत्नाकर- चण्डेश्वर ठाकुर, अमरकोष- स. पं. चन्द्रधारी सिंह, फोकलोर मैजिक एण्ड लीजेण्ड ऑफ मिथिला- माखन झा। बिहार पीजेन्ट लाइफ- ग्रियर्सन, कृषक जीवन सम्बन्धी ब्रजभाषा शब्दावली- हिन्दुस्तान एकेडमी, इलाहाबाद। पतंजलि कालीन भारत- डॉ. प्रभुदयाल अग्निहोत्री, वैदिक साहित्य और धर्म- आचार्य बलदेव उपाध्याय, मैथिली संस्कृति ओ सभ्यता- डॉ. उमेश मिश्र, मैथिली व्याकरण मीमांशा- डॉ. सुभद्र झा, वृहत मैथिली शब्दकोष- डॉ. जयकान्त मिश्र इत्यादि। अपन शोध कार्यमे कयल गेल भ्रमण ओ विविध लोकसँ परिचय-पात आ वार्त्तालापक सुखद संस्मरण एखनो मानस-पटलपर अंकित अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.परमानन्द लाल कर्ण- गीता माहात्म्य (आगाँ) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.संतोष कुमार राय 'बटोही'-मंगरौना (धारावाहिक उपन्यास)- (चौदहम खेप) संतोष कुमार राय 'बटोही' मंगरौना (धारावाहिक उपन्यास)- (खेप १४)
मोन दुखी छल आइ । तकर कारण की भऽ सकैत अछि ? हमर मोन मे घुरघुरा जकाँ किछु घुरघुरा रहल अछि। घर मे राखल बरका रजिस्टर निकालहुँ। अइ रजिस्टर मे धान केर हिसाब लिखल छै। किनको कतेक हिसाब भेलैन्ह आओर किनका पर कतेक मोन धान छैन्ह इ लिखल छल ओई रजिस्टर मे। अइ रजिस्टर मे बड़का भैय्या केर लिखल एकटा दरख्वास्त सेहो पड़ल छै। ओ अपन बेरोजगारी केँ ओई मे हिसाब-किताब केने छथि। माय-बापक पहिल आओर जेठ संतान छलाथि रामकृष्ण। बाबूजीक कोंरियाठपनी केर कारणे हुनका कमे उमिर मे लोकक खेत-पथार मे बोइन कऽके परिवारक भरण-पोषण करऽ पड़लैन्ह अछि। किनको टाटानगर बैन्ह रहल छथि तँ किनको नारकीय टाल छैर रहल छथि। अइ प्रकारेण अपन जिनगी केर आगाँ बढ़ौलैन्ह। अही बीच रामकृष्ण केर शादी केर गप्प होमऽ लागल। शिवा पछबै टोल नागेश्वर जीक कठ बहिन केर नातिन मंजू जे खवासटोली, मधुबनी मे पलल-बढ़ल छलीह सँ कराल गेलैन्ह। 'व्यासजी' घटकैती करवा मे माहिर छलाह। मंजू केँ एके बेर मे देखि कऽ ओनऽ सँ दिन ठेकनेह एलाथि।
जाहि घर मे अभाव रहैत छै ओहि घर मे भाव खत्म भऽ जायत छै। इएहा भेल व्यासजी केर घर मे। कुक्कुर-बिलाड़ि जकाँ घर मे रामकृष्ण आओर ब्रहमदेव झगड़ा करऽ लागल। व्रहमदेव केर कारण घर बिखैर गेलैन्ह व्यासजीक।
रामकृष्ण रजिस्टर मे अपन आओर सातो भाई- बहिनक जनम तिथि लिखने छथि। वंशावली वाला रजिस्टर घर सँ कियो नेता कऽ देलकै। किछु-किछु हमरा याद छल आओर किछु बबाजी काका आओर प्रदीप काका केर सहयोग सँ लिखलहुँ अछि। विद्यानंद भैय्या आओर ब्रहमदेव भैय्या सँ सेहो पुछलियैन्ह। हम भिक्षुक खवास केर वंशज छी। दरिभंगा जिलाक भरौड़ा गाम सँ आबि कऽ पाँच भैय्यारी मंगरौना गामक नींब रखलैन्ह। ओ तऽ सात भाई छलाह, परञ्च दरिभंगा राजाक सेवा मे दू भाई अपन जिनगी केर आहुति दऽ देलाथि। अइ पर दरभंगा राजा खुश भऽकऽ ई मंगरौना गामक रकबा पॉचों भाई केँ दान मे देलथिन्ह। मंगरौना गाम दरिभंगा राजा सँ मांगल गेल छल ताहि दुआरे एकर नाम 'मंगरौना' राखल गेल।
भिक्षुक खवास केर बेटा नहि भेलैन्ह। एकेटा बेटी भेलैन्ह ओकर ब्याह नारायणपुर गाम केलैन्ह। बुढाड़ी मे मानसिक रूपे कमजोर पड़ि गेलाह। गामक बुधिया लोकनि ठैग फुसला कऽ हुनकर जमीन मांगी लेलाथि।
लोक कहैत छेलैन्ह, " बाबा, फलाँ केँ ब्याह भेलै। अहाँ कनिया केँ देखि लियौन्ह। बाबा मुँह देखना मे कनिया केँ अपन जमीन दऽ दैत छलथिन्ह। ओ कहैत छलथिन्ह , " रौ फलाँ , कनिया केँ मुँह देखना मे फलाँ जगह जमीन जोति ले। अई प्रकारेण भिक्षुक खवास अपन जमीन लुटौलन्हि। तकरे भुगतान हम भोगी रहल छी जे सड़क पर निकलवाक लेल अपन जमीन नहि अछि। दोसर लोक रास्ता बन्न कऽ रहल अछि।
आइ बढ़िया दादी नहि रहतिन्ह तँ जई घरारी पर अखन धरि छी ओहो किनको भिक्षुक खवास दान कऽ दैतिन्ह। अपने तँ ओ भिक्षुक बनि गेलाह संगैह अपन आबै वाला जेनरेशन केँ भिक्षुक वा भिकारी बना गेलाह अछि। अखन हम सभ हक्कन कानि रहल छी। अपन पूर्वज केँ करनी कतेक पीढ़ी धरि तबाह करैत छै से ओ की नहि बुझैत हेतिन्ह। बउजन राउत अइ करनी केँ रोकि सकैत छलाह, परञ्च हुनका के मति मारि लेने रहैन्ह से की जानि। ओ किनको प्रयास नहि केलथिन्ह। अथाह जमीन नहि रहैन्ह जे दान देल जाइ। ई ओ नीक काज नहि केलाह । अबै वाला पीढी केँ उन्नति केर रस्ता बन्न केलैथ।
बाबा नागेश्वर राय केर बाहर नहि कमेनैक कारणे उन्नति नहि भेलै । संग मे बाबूजी सेहो निकम्मे निकललाह । भैय्यारी सभहक मति सेहो मारल गेलैन्ह। आइ चिरंजीव राय 'व्यासजीक' नाम मिट गेलै।
संतोष कुमार राय 'बटोही'
-संतोष कुमार राय 'बटोही', ग्राम - मंगरौना अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.कुमार मनोज कश्यप-अपूर्व स्वाद कुमार मनोज कश्यप लघुकथा अपूर्व स्वाद महिना लगै मे एखन एक हफ़्ता आर छै। सभ खुदरा-खुदरी मिला कs गिनलक ..... चारि सय नब्बे रुपया! चाऊर, दालि, आँटा, तेल तs घर मे छैहे। बस घटल-बढ़ल सामान आ तरकारी, दूध - यैह सभ लेल ने पाई चाही! ओ अंदाज लगेलक ..... एतबा पाई सs कहुना महिना खिचा जेतै .... बशर्ते कोनो अप्रत्याशित खर्चा नहिं बजड़ै। आश्वस्त भs साईकिल लs ओ तरकारी लाबय बिदा भेल। कॉलोनी के गेटे पर रफीक भेटलै - 'की हौ रफीक भाई! कहाँ स' अबैत छह? ई भरल साँझ कs घोघना कियै लटकेने छह?' - 'नहिं भाई! कोनो बात नहिं। सभ ठीक छै।' रफीक सामान्य हेबाक प्रयास केलक। - ' तों कहबs तs हम पतिया लेबs? किछु बात तs जरूर छै जे तोरा असहज कs रहल छह। हौ हमहुँ तोहर भैयारिये छियह। फरिछा कs कहs कोनो बात छै तs।' साईकिल सs उतरि रफीक के आर लsग गेल ओ। - की कहियs भाई.... बात कोनो ने आ अखन बड़ी टा! अई महिना मे रिश्तेदारी मे कैक टा निकाह सभ रहै ताहि मे हाथ खाली भs गेल। आ तही पर कोइढ़ मे नोचनी जकाँ बड़का छौंड़ा के वजीफा के परीक्षा के फॉर्म भरै के काल्हिये लास्ट डेट छै। छौंड़ा चन्सगर छै; फॉर्म नहिंयो भरेबई तs ओहो नीक नहिं।' - 'कते पाई लगतै?' - ' साढ़े पाँच सय - साढ़े चारि सय के ड्राफ्ट आ सय रुपया के प्रॉस्पेक्टस।' - ' हमरा लsग मे एतबे बाँचल छह - ई राखि लैह ... आरो कोनो जोगाड़ कs कs काज चलाबह।' - 'आ तों?!' - ' धुर्र मर्दे! तों हमर चिंता जुनि करह। एके हफ़्ता रहलैयै आब! सभक जोगाड़ भगवान लग छनि। एखन तों जाह जल्दी बाकी के जोगाड़ कs कs ओकर फॉर्म भराबह।' दुहू के ठोर पर मुस्कान छलै। दुहू अपन घर के रस्ता धेलक। जल्दी घर जा कs बतबै के छै नहिं तs कनियाँ तरकारी लै बैसले रहतै। आई ओकरा नून-तेल संग रोटी खेबा मे अपूर्व स्वाद बुझा रहल छलै। -कुमार मनोज कश्यप, सम्प्रति: भारत सरकार के उप-सचिव, संपर्क: सी-11, टावर-4, टाइप-5, किदवई नगर पूर्व (दिल्ली हाट के सामने), नई दिल्ली-110023 मो. 9810811850 / 8178216239 ई-मेल : writetokmanoj@gmail.com अपन मंतव्य editorial.ऽtaff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.आचार्य रामानन्द मण्डल-बाल्मीकि रामायण आ रामचरितमानस के तुलनात्मक अध्ययन आचार्य रामानंद मंडल बाल्मीकि रामायण आ रामचरितमानस के तुलनात्मक अध्ययन श्री राम कथा के तीनटा प्रमुख घटना १. रानी सभ मे पुत्र प्राप्त लेल खीर वितरण २. सीता स्वयंवर वा धनुष यज्ञ आ ३ रावण बध के भेद के तुलनात्मक अध्ययन कैला पर मतभिन्नता पायल जाइ हय। राजा दशरथ के रानी सभ के गर्म धारण के लेल खीर वितरण के संबंध मे रामायण आ रामचरित मानस मे मतभिन्नता हैय। बाल्मीकि रामायण के अनुसार। कौशल्यायै नरपति:पायसार्धं ददौ तदा। अर्धादर्धं ददौ चापि सुमित्रायै नराधिप:।।२७ ।। कैकेय्ये चावशिष्टार्धं ददौ पुत्रार्थकारणात। प्रददौ चावशिष्टार्धं पायसस्यमृतोपमम्।।२८।। अनुचिन्त्य सुमित्रायै पुनरेव महामति:। एवं तासां ददौ राजा भार्याणां पायसं पृथक्।।२९।। समझे के लेल खीर=१६आना(१रु) कौशल्या- ८ आना सुमित्रा -४ आना+२ आना=६आना कैकेई-२ आना कुल-१६आना तबहिं रायं प्रिय नारी बोलाईं। कौशल्यादि तहां चलि आईं। अर्द्ध भाग कौशल्यहि दींहा।उभय भाग आधे कर कींहा। कैकेई कहं नृप सो दयऊ।रह्यो सो उभय भाग पुनि भयऊ कौशल्या कैकेई हाथ धरि।दींह सुमित्रिहि मन प्रसन्न करि। समझे के लेल खीर -१६आना(१रु) कौशल्या -८आना कैकेई -४आना सुमित्रा -२ आना+२आना=४ आना। कुल-१६आना। सभ रानी अपन अपन खीर के खैलन आ गर्भधारण कैलन।बाद मे कौशल्या राम के, कैकेई भरत के आ सुमित्रा लक्ष्मण आ शत्रुधन के जनम देलक। अइ प्रकार खीर बांटे के प्रक्रिया मे रामायण आ रामचरित मानस मे मतभिन्नता हैय स्वयंबर वा धनुष्य यज्ञ के वृत्तांत मे महर्षि बाल्मीकि आ संत तुलसीदास मे मत भिन्नता हय! महर्षि बाल्मीकि के अनुसार - वीर्यशुल्केति मे कन्या स्थापितेयमयोनिजा। भूतलादुत्थितां तां वर्धमानां ममात्मजाम्।।१५।। वरयामासुरागत्य राजानो मुनिपुंगव । तेषां वरयतां कन्यां सर्वेषां पृथिवीक्षिताम्।।१६। वीर्यशुल्केति भगवन् न ददामि सुतामहम्। तेषां जिज्ञासमाननां शैवं धनूरूपाहृतम्।।१८।। न शेकुर्ग्रहणे तस्य धनुषस्तोलनेअपि वा। यद्यस्य धनुषो राम:कुर्यादारोपणं मुने। सुतामयोनिजां सीतां दद्यां दशरथेरहम्।।२६।। तामादाय समंजुषामायसीं यत्र,तद्धनु:। सुरोपं ते जनकमूचुर्नृपतिमन्त्रिण:।।५।। इदं धनुर्वंरं राजन् पूजितं सर्वराजभि:। मिथिलाधिप राजेन्द्र दर्शनीयं यदीच्छसि।।६। इदं धनुर्वंरं ब्रह्मय्जनकैरभिपूजितम्। राजभिश्च महावीर्यैरशक्ते पूरितं तदा।।८।। महर्षेर्वचनाद् रामो यत्र तिष्ठति तद्वनु:। मंजुषां तामपावृत्य दृष्ट्वा धनुरथाब्रवीत्।।१३।। इदं धनुर्वंरं दिव्यं संस्पृशामीह पाणिना। यत्नवांश्च भविष्यामि तोलने पूरणेअपि वा।।१४।। बाढमित्यब्रवीद् राजा मुनिश्च समभाषत। लीलया स धनुर्मध्यै जग्राह वचनान्मुने:।।१५।। पश्यतां नृसहस्त्राणां बहूनां रघुनंदन:। आरोपयत् स धर्मात्मा सलीलमिव तद्धनु;।।१६।। आरोपयित्वा मऔवईं च पूरयामास थद्धनउ:। तद् बभन्च धनुर्मध्ये नरश्रेष्ठो महायशा:।।१७।। जनकानां खुले कीर्तिमाहरिष्यति मे सुता। सीता भर्तारमासाद्य रामं दशरथात्मजम् ।।२२।। मम सत्या प्रतिज्ञा सा वीर्यशुल्केति कौशिक। सीता प्राणैर्बहुमता देया रामाय मे सुता।।२३।। रामचरित मानस के अनुसार - सीय स्वयंबरु देखिअ जाइ।इसु काहि धौंस देइ बड़ाई। लखन कहा जस भाजनु सोई।नाथ कृपा तव जापर होई।।१।। रंगभूमि आए दोउ भाई।असि सुधि सब पुरबासिन्ह पाई।। चले सकल गृहिकाज बिसारी।बाल जुबान जरठ नर नारी।। लेत चढावत खैंचत गाढे।कहीं न लखा देख सबु ठाढ़ैं।। तेहि छन राम मध्य धनु तोरा,भरे भुवन धुनि घोर कठोरा।। गावहिं छवि अवलोकि सहेली।सिय जयमाल राम उर मेली।। रावण बध के भेद बताबे वाला मे रामायण आ रामचरित मानस मे मतभिन्नता हैय। बाल्मीकि रामायण के अनुसार इन्द्र के सारथि मातलि हैय। अथ संस्मारयामास मालति राघवं तदा। अजानन्वि किं वीर त्वमेनमनुवर्तसे।।१। विसृजास्मै वधाय त्वमस्त्रं पैतामहं प्रभो। विनाशकाल:कथितो य: सुरै:सोद्धं वर्त्तते।।२।। स विसृष्टो महावेग: शरीरान्तकर:पर:। बिभेद हृदयं तस्य रावणस्य दुरात्मनं।।१८।। रुधिराक्त: स वेगेन शरीरान्तकर:शर:। रावणस्य हरन् प्राणान् विवेश धरणीतलम्।।१९।। स शरो रावणं हत्या रुधिरार्द्रकृतच्छवि;। कृतकर्मा निभृतवत् स तूणिं पुनराविशत्।।२०।। रामचरित मानस के अनुसार रावण के भाई विभीषण भेद बताबे वाला हैय। नाभिकुंड पियुष बस याकें।नाथ जिअत रावनु बल ताकें।। सुनत विभिषण बचन कृपाला।हरषि गहे कर बान कराला।। सायक एक नाभि सर सोषा।अपर लगे भुज सिर करि रोषा। लै सिर बाहु चले नाराचा।सिर भुज हीन रूंड महि नाचा।। अइ प्रकार से रावण बध के भेद बताबे वाला मे रामायण आ रामचरित मानस मे मतभिन्नता हैय। -आचार्य रामानंद मंडल सामाजिक चिंतक सह साहित्यकार सीतामढ़ी। -आचार्य रामानंद मंडल सामाजिक चिंतक सीतामढ़ी,सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक, माता-चन्द्र देवी, पिता-स्व०राजेश्वर मंडल, पत्नी-प्रमिला देवी, जन्म तिथि-०१ जनवरी १९६० योग्यता- एम-एससी (रसायन शास्त्र), एम ए (हिन्दी)। रूचि- साहित्यिक, मैथिली-हिन्दी कविता -कहानी लेखन आ आलेख। प्रकाशित पोथी - मैथिली कविता संग्रह भासा के न बांटियो। २०२२ प्रकाशित रचना - सझिया कविता संग्रह पोथी - जनक नंदिनी जानकी आ शौर्य गान। २०२२ पत्रिका -मिथिला समाज, घर -बाहर आ अपूर्वा (मैसाम)। अखबार -दैनिक मैथिल पुनर्जागरण प्रकाश। सामाजिक-सामाजिक चिंतन, दायित्व- पूर्व जिला प्रतिनिधि, प्राथमिक शिक्षक संघ, डुमरा, सीतामढ़ी। स्थायी पत्ता- ग्राम-पिपरा विशनपुर थाना-परिहार जिला-सीतामढी। वर्तमान पता-पिपरा सदन,मुरलियाचक वार्ड-04 सीतामढ़ी पोस्ट-चकमहिला जिला-सीतामढी राज्य-बिहार पिन-843302 मो नं-9973641075 ईमेल-ramanandmandal001@gmail.com ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.लालदेव कामत-लालदेव कामत- आंचलिक उपन्यास "भोट" मादे/ सर्वश्री राजकिशोर मिश्र जीके - टेमी/ एक अध्यात्म पथके पथिक - स्वतंत्रता सेनानी/ जल अछि जा' धरि, जिनगी ता' धरि! / प्रक्रियाधीन सामाजिक परिवर्तन'क स्वर लालदेव कामत- आंचलिक उपन्यास "भोट" मादे/ सर्वश्री राजकिशोर मिश्र जीके - टेमी/ एक अध्यात्म पथके पथिक - स्वतंत्रता सेनानी/ जल अछि जा' धरि , जिनगी ता' धरि! / प्रक्रियाधीन सामाजिक परिवर्तन'क स्वर १ आंचलिक उपन्यास "भोट" मादे वरेण्य साहित्यकार डॉ०(प्रो०) सुभाष चंद्र यादव जीक सद्यप्रकाशित सामाजिक उपन्यास 'भोट' पढबाक अवसर भेटल। किसुन संकल्प लोक - सुपौल, बिहार सँ ६८ पृष्ठ 'क मैथिली भाषा मेँ पोथी २०२२ मेँ बहराएल अछि। एहि पोथीक कभर आकर्षक छैक,जाहिक मूल्य सय टाका निर्धारित कयल गेल अछि। उपन्यास विधा एकदिस कोनू व्यक्तिक चरित्र - चित्रण थीक तँ दोसर दिस समाज आओर समयके इतिहास रूपमे साक्षी थिकैक। मातृभाषा मैथिलीक विकास लेल वीहनिकथा, लघुकथा, दीर्घ कथा आओर उपन्यास लेखन कार्य सँ आन विधाक बनस्वत बेशी काज भेल अछि। तकर कारण छै ,लोक वा पाठक अपना - अपना बूढ़ मैयाँ - बाबा, नाना - नानी आ श्रेष्ठजन सँ खीस्सा बालपन सँ सुनबाक अभियासी छथि।आ जिनक पूर्वज पंडित,अध्यापक वा लोकगाथाक मूलगैन रहनि,से श्रोता - पाठक आनक अपेक्षा बेशी अध्ययनशील बालपने सँ भऽ जाई छथि। तेँ उपन्यास पढ़यमे अधिक समय देनिहार कम पाठक होय छथि। पढैक अभिरूचि आ नै पढ़ैक वा कम पढैक अबुहपन दृष्टिये ' भोट' सामाजिक उपन्यास केँ पाठक अपना दृष्टिकोण सँ आंकताह आ मनलगू बूझत। भोट उपन्यास'क सौन्दर्य जे होईक,एहिक कथ्य जे बुझाए मुदा एहिक वाणी-बोलीक जे टोन नायक यदुवंश , नायिका सफ़ीना , सहनायक उपन्यासकार स्वंय आ सहनायिका लक्ष्मी 'क मुहेँ जे शव्द बहराएल अछि से मिथिला 'क सिपौल- सहरसा आ मधेपुरा जिला 'क बोलवचन छी। मिथिलाक प्रायः हर गाममे दू तरहक मैथिली बाजल जाइत रहल अछि। वर्ण आ जातीय समीकरण केर आधारपर एहिक मानक तय करी तँ बुझाएत सवर्णक भाषामे तहन, तखन, अखन ,कखन ,जहन केर प्रयोग हरसठे होईछ। आ से वैश्य - सोल्हकन (रार रोहियार) केर मातृभाषा क' तखैन, तब ,तभी,अखैनि, जखैन शव्दक रूप दैत उच्चारण मिथिलांचलके ७०% लोकवाणी क' प्रतिनिधित्व प्रदर्शित करैछ। देखल जाए तँ जाहि गाममे अति पिछड़ा जातिके नोनिया समाज अछि,हुनकर बाजब एक पृथक बोली सुनाईए। ई गंगाकातक आन- आन समाजक बोली वाणी सँ मिलैत छैक। ओना इहो देखल जाए तँ मिथिलाक मुस्लिम समुदायमे जे मैथिली बाजल जाइत छै, ताहिमे उर्दू - हिंदीक' शव्द आ वाक्य अधिक प्रयुक्त होईछ। तेँ उपन्यासकार श्री सुभाष चन्द्र यादव जीक जे मैथिली लेखन छैन से निश्तुकिए वो श्री तारानंद वियोगी, जगदीश प्रसाद मंडल आ ऐ पंक्तिक लेखकक अपन धरोहर मैथिली थीक। ओना संस्कृत फेंटल पांडित्यपूर्ण ऐंठल- ऐंठल- भाषा ग्राह्य जेना दलित ,पिछरल, अधिक पछुआयल तबका केँ अनसोहान्त लगैछ, तहिना कम साक्षर ,निरक्षर शुद्रक भाषा (बाजब- भूकब) पैघ जातिके (सभ्रान्त लोकके) पसीन नहिँ पड़ैत छन्हि। इयह कारण थीक जे डाक्टर वियोगी जीक मादै कतहुं पं. गोविन्द झा जी कहने छथि हिनका व्याकरण - भाषा'क दृष्टिये पासमार्क भेट जाईन; सयह बहुत। अस्तित्वक लेल सामान्य लोकक संघर्ष प्रो० सुभाष चन्द्र बाबूक अभीष्ट रहलनि अछि ,जे हिनक कथा 'काठक बनल लोक' मेँ अभिव्यक्ति भेल हम छात्रहि अवस्थामे मैट्रिकमे पढ़ने छलहुँ। मिथिला 'क भावी पीढ़ी जब - जब सुभाष जी प्रभेत् वृहत अध्ययन करत तँ एक लेखकीय स्वतंत्रता बुझेतैक। से ओ अपन लोकक बोलचाल केँ मैथिली साहित्यमे स्थापित करबामे एक सुमार्ग देखने छथि। एहि रोमांचक पोथीक अध्ययन करैत घरी नाह सँ कोशी नदीक पटुआ लाधल दृश्य बढ़ मनोरम छैक। संगीक सासुर पैच मांगल सायकिल सँ लोड भऽ के गेनाई आ वेसी दिन रहला सँ साइकीलके तगेदा,से साइकिल बाटमे रात्रि विश्राम गद्दी मेँ केयला पर छहरदेबालीक भीतर सँ चोरीक घटना वर्णन हृदयस्पर्शी भेल छैक। सम्पूर्ण दृष्टांत ग्राम पंचायत राज चुनावके पुर्व उम्मीदवार, विधानसभा क्षेत्र सँ विधायक पदके अभ्यर्थी आ पूर्व सांसद प्रत्याशी बाबत गुणदोषक चर्चामे लागल नागरिकक आ दलीय राजनीति पर एक विमर्श देखायल गेलैक हन्। अपन नातेदार जदयू नेता कामता ओहिठाम करिहो गाम पहुँच कय उपन्यासकार यादवजी लालटेन छापक कन्डीडेट केर जे भातीज छथीन, अपन खर्चा सँ मदैत सदैत करयमे लागल चित्र उपस्थित केलनि अछि। चुनावी चटकार दैत किछ एहन नाम सब यथा - मोहरील विदु जे खानगी शिक्षक बनल छै। ई एकबेर खुद पंचायत समिति सदस्य बनल रहैक। मैट्रिक पास कृषक चन्देसरी राजद.सँ जुटल छै। पैकार मन्नू, परेमी, बिन्दुलिया हिनका सँ विदेसरके दोकान पर चाह पियैत छै,टिरन दोकान पर पान खुअबैत काल लखन महावीर सेहो पान खाइछ। भरि भोटमे चौक चौड़ाहा सजल गुलजार बुझाइछ। अड्डावाजीमे हरसठे यदुवंश यादव आ विश्व मोहन जी केँ समर्थक सह - सह करै छै। समाजवादी पार्टी के आ कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार केँ भोटकटबा बुझल जाइछ। शव्दरूप विभत्स (जुजिए,गैंर) लेखन सँ परहेज़ उपन्यासकार नहीं भेलाह हन् । नारी सशक्तिकरण पर जोर दैत गठबन्धन केर कार्यकर्ता केँ कहल जाईछ तीनू पार्टी एकता मेँ छै , तीर छाप नीतीश कुमार आ लालू जीक पार्टी,काँग्रेस सँ तालमेल बनौने छै से बात जनिजाइत सबके बुझबामे आबय! धरणा प्रदर्शन,जूलूस ,पर्चा- पोस्टर सँ पाटल दुर्गास्थानक चुनावी सभाक पंडालमे कुर्सी लागल आ प्रचार - प्रसारके कैसेट लाउडस्पीकर सँ गीत लोकतांत्रिक उत्सव मेँ उत्साह भरने छै। बीडीओ केर दोकान पर हारमुनियाँ बाजाक मास्टर नथु ,जमील , सूर्य नारायण,कमलदास,विनोद पटेल आ पाठक टोलक एक छौरा,अशोक भोट मादे गप्प दैत रहैत छै। मुखिया विक्रम केर चुनावक मुख्य प्रतिद्वंद्वी सफ़ीना प्रत्यक्ष रूप सँ आईकोन बनल छै। विंदुक मुँह सँ श्री यादव जी कहाबैत देखाई छथि सफ़ीना के आवाज जेहन रोवदार रहई ,तेहने आकर्षक ओकर रूप रहै । लोग ओकरा दिस ताइकते रैह जाइ। वृध्द नत्थूके ब्लाँकमेँ देवीक अवतार सँ कम नहिँ बुझाय - सफ़ीना। दीना पाठकके तँ मुखिया कन्डिडेट बावत् सफ़ीना करकरा देलकैक,बूझू पानि उतरि गेल होय। उपन्यासमे संवाद कौशल बढ़ सजीव बुझाएत। सफ़ीना दिल्लीमे राजमिस्त्रीक बीबी रहैत जमीन खरीद बिक्री काजमे मोईमके संग पुरैत छै। नीक आमदनीक बल पर नवटोलमे कोठा धरि पीटा लेने य। सफीनाक गात इज्जतदार बुझाइछ। ओकर लचकैत पातर डांड़ , डोका सनक चंचल आँखि गोल मटोल चेहरा,फूलल-फूलल लालटरेश गाल ,मुँह परहक पाइनके चमक खूब नीक लागैत छै। महमह करैत देह सँ अत्तर सुगन्ध मतेने जाएत होय चन्देसरी केँ। फुलसन बिहुंसैत सुरैत पर सँ नजैर नै हँटैबै छैक जेना। चन्देसरी सँ सफ़ीनाके नीक लगरपन छैक। से एकदिन अकस्मात देह छुआ गेलापर ओकरा बरफसन ठरल साँपे जंका लागलैक। चन्देसरीके जखनि सँ थाह चलैत छै सफ़ीना दिल्ली सँ फेर आबि गेल , तखनि सँ ओकर पैर ओनैहि बहकि जाईछ। सफ़ीना सुन्दरिक माया थिकैक,ओकर आंचर दिश कामुक दृष्टिये एकटक निहारत वासनाक आगिमे चन्देसरी तरैप रहलाह। से देखिगमि छगुनैत दीप्त भेल सफ़ीना भोटक गप्प दिस वातावरण क' मारलीह अछि। एहन लालित्यपूर्ण मैथिली साहित्य दिश नव पिढिक लोक जागरूक रहत; उपन्यास कार ई कथा ३५ साल पहिले लिखने रहितथि ,से पछुआ गेला। भोटर आब वोटमे नगद टाका लेमय चाहैत छै से कामता सन सहयोगी आ १० हजार दै बाला बहुतो मददगार लोक यादव जीक खेमामे छै। एक लाख एक दिनक खर्च एके गोटय उठा लेने होईक। तहिना विश्व मोहन केँ कियोट जाति सँ खुब सहयोगी छै। ओकर पत्नी सुजाता सेहो ऐ क्षेत्र सँ उपचुनावमे विधायक भेल छलैक। बापो कांग्रेस जमानामे उपमंत्री बिहार सरकार मेँ भेल छलैक। तेँ ओकर समर्थक तँ पाई सँ होरी खेलय सेहो कोनू विशेष बात नहि। ५६ इंची सीना बाला मोदीजी केँ बातकेँ गठबंधन बाला कहैत छै भोटक खातिर कहीं पाकिस्तान पर नै चढ़ाए कऽ देख । बिहार क' चुनावी दांव-पेंच केर अनाड़ी उपन्यासकार तँ प्रभावशाली रूपेँ सम्पूर्ण कथानकमे आयल छै। २ सर्वश्री राजकिशोर मिश्र जीके - टेमी
उन्नैश गोट मैथिली कविता'क १२५ पृष्ठक पोथी, प्रकाशन वर्ष २०२३ जाहिक किमत २५० टाका अछि। एहि मैथिली भाषा साहित्यके यशस्वी रचनाकार छथि कविवर राजकिशोर मिश्र। श्री मिश्र जीक अन्हारगुज कॅभर पर रंगील छवि 'दीप' केर टेमीमे आगि लेसल छैक ,जे खूब सनगर बरि रहलैक हन्। अन्हरिया सँ ईजोरिया दिस जीवनमे उल्लास आनैत ई प्रतीक महिमा मंडित बुझाइछ। मिथिलांचल 'क मधुश्रावणी पावनिमे नववियौहति कन्या लेल दगनियाँ विध मादे एहि ज्योत जरैत टेमी सँ आगन्तुक अतिथि (पत्नी केँ पति द्वारा) परम्परागत रूप सँ जाँचैत कष्ट दैत छथि। अहिवाती सोहाग अमरत्व ले पतिदेवक ऐ जटिल विध केँ अदऔ सँ सहाज करैत फोंका घाव धरि भोगय छथिन। एक घटनाक विशद् चर्चा अपना आत्मकथा " जीनगिक बाट पर " मेँ शम्भू नाथ बाबू कयलनि अछि। इयह दीप थीक जे सगर राति जागिकय वर्षोवर्ष धरि भामति टेमी उसकाबैत पतिक अध्ययनमे सहायक भेल छलीह। ताहि दिनमे विजली रोशनी, सौर ऊर्जा आ किराशनतेल सँ जरैत लालटेन केर अस्तित्व नहि रहैक, मशालो सर्वसाधारण जनके उपलब्ध नहि रहल हेतैक। ताहि जमाना सँ अद्य:पर्यन्त शुभकार्यमे घी-दिया बारल जाईछ! ई दिबारि जौं पाठक अपने स्वंय चौबटिया पर राखि राहिक अनभुआर पथ आलोकित कय दहोदिश प्रकाशवान बनाबी तँ धन्यवादक पात्र होयब! श्री मिश्र जी सहज कविता रचनाक आग्रही छथि। ओ प्रतिष्ठित मैथिली - हिन्दी साहित्य क्षेत्रमे कविता विधाक बहुतो पोथी अपनहि प्रकाशित कऽ चुकलाह अछि। सद्यप्रकाशित ई काव्य पोथी ' टेमी ' पढबाक अवसर भेटल हय। एहिमे संग्रहित कविताक सौंदर्य बढ़ वेसी आकर्षित करैत य। पोथीमे अक्षर-शव्दक शुद्धता मेँ टंकण कार्यमे लीन कवि महोदयक धर्मपत्नी श्रीमती अनीता मिश्रजी प्रशंसनीय रूपेँ अग्रणी भेल छथि। कविताक दौड़मे ई रचना जीनगिक विविध रंगक आधार मानल जा सकैछ। वर्तमान सामाजिक परिवेश जाहि तिब्रता सँ परिवर्तनशील छै, ताहि समय-चक्र क' प्रतिविंव छी ई अक्षर रुपी कविता। पोथी अक्समे समय सँ आएब ,से प्रकाशनक दायित्व हुनक सुपुत्री सुश्री शिक्षा मिश्रके सहयोगात्मक रूख सुस्पष्ट झलकैत देखाइछ। श्रीमान राजकिशोर मिश्र जीक कविता विविध आयाम - विस्तृत , सौन्दर्य छँटा नवीन आ नैका - नैका विचारक प्रतिमान गढ़ैत अछि। सब काव्यके भाव अत्यन्त चित्ताकर्षक आ गूढ़ रहस्य'क द्योतक छैक। टेमी पढ़लाक बाद हिनक आन मैथिली काव्य पोथी -: मेघपुष्प,चाननि, नवपात - नवबात, उपायन, सप्तवर्ण, नव घर उठय - पुरान घर खसय आ जिनगीक सोन सन पाँखि जिज्ञासु पूर्वक पढबाक उत्कण्ठा बढ़त। मिथिलाक माटि - पानि कविता मेँ एतुका भौगोलिक परिवेश आ इतिहासिक पुरान दस्तावेजी अंश ओ धार्मिक महिमा तथा आहार - विहारक रीति रेवाज सँदर्भित आख्यान केँ अखियाईसके कविजी वीजतत्व भरलनि अछि। मधुमास कवितामे ततेक सुन्नरसन गरहैन भेल छन्हि जे साश्वत सत्यक दर्शन कराबैछ, जेना - .......... रस सँ सिक्त मधुमासक रभस सँ , चारू दिसा मोद सँ मातल , फूलक गाछ पर उगल कनोजरि , डंटी कुसुम सँ कसि - कसि गांथल । ...................... आजुक नारी कवितामे महिला सशक्तीकरण केर सजीव चित्रण करैत उत्तरोत्तर विकासक प्रगति पथ पर निरंतर अग्रसर रहबाक दृश्य देखेबामे समर्थ भेलाह अछि। विज्ञान, कला , चिकित्सा, क्रीड़ा ,शिक्षण आ गृहणी सँ अफसर बेटिया धरिक पद प्रतिष्ठा पर अधिष्ठात्री नारी शक्ति 'क उत्थानक बखान कयलाह अछि जे ठमकल नहिं वरन् पुरूखोंके पछोर करैत आगू बढ़बाक अभिप्रेरणा जगाबैत छथीन। एहि पोथीक केन्द्रीय कविता थीक - 'दीप आ फनिगा' जाहिमे तिमिर केँ भगाबैत दीपकके लगीच कोना फतिंगा सभक हेंज धर्रोहि लागि जाइछ। एहि फनिगाके कियो नोत दऽ कऽ नहि ने बीझो कराबैत य। ओ एक चुम्बकीय शक्तिक कारणेँ अपनाके आबै सँ वा झरकै सँ नै रोकि पाबैत छै। एहिमे प्रकृतिक आभाक रश्मि देखेबाक कविवर यथेष्ट परियास केने छथि। शेष कविता - भीखमंगा, भूकम्प, अरण्यक फूल, गाम बनल जा रहल शहर,फगुआ, जिनगीक संघर्ष,बबिताक द्विरागमन,गामक राजनीति,परात, बड़दक गहांकि, उर्जाक महत्व, जिनगीक दर्शन,मनुख आ मशीन, वृध्दाश्रम आओर जँ जग जल नहि होइत! खूब अपील करैत छैक,जे अपनेआपमे सर्वश्री राजकिशोर मिश्र जीके सद्यप्रकाशित ई काव्य पोथी " टेमी " अत्यन्त सारगर्भित बुझाइछ। ओना देशज आ निशन्न मैथिली भाषा केर जगह बाहरी शव्द सँ ओझल किछ शिर्षक शव्द देल गेल छैन। तैयो एहि तरहक मर्मस्पर्शी काव्य रचबाक आ स्तरीय विषय चयन लेल हम श्री राजकिशोर बाबुक सुदीर्घ जीवनक सफल कामना करैत छियैन। हिन्दीए पुस्तक जहाँति मैथिली 'क पोथी सेहो विशिष्टता प्रमाणित होइत गिनीज बुक ऑफ इण्डिया रिकॉर्ड्स बना सकय
३ एक अध्यात्म पथके पथिक - स्वतंत्रता सेनानी जय - जय! मधुबनी जिला अन्तर्गत प्रसिद्ध ग्राम सुन्दर बिराजीत निवासी सर्वश्री चुमन शरण आ श्रीमती देवकी देवी जीके ओहिठाम दरसन् १९१२ केर लगधकमे एक विलक्षण बालक केँ जनम भेलनि। आनन्द'क एहि क्षणमे सरसमाज आ कैवर्त परिबारिक लोकनि हुनकर शुभ सँज्ञा रखलनि आनन्द शरण जी। आनन्द शरणजीक बाल-विवाह रेशमाक' सँग सहोरबा गाममे भेल रहनि।जाहि सँ हुनका दू पुत्र रत्न क्रमश: राम नारायण आ शिव नारायण भेलनि। हम हुनकर शक्तिस्थल पर प्रतिमा अनावरण समारोह आयोजनमे जाए, सर्वधर्म समभाव भजन, विनय - प्रार्थना धरि प्रस्तुत कयने रही। महान स्वाधिनता सेनानी स्व० आनन्द बाबू एक यशस्वी शिक्षक रहथि। ओ हुलासपट्टी - जागेश्वर स्थानमे १९७५ ई. केँ मिडिल स्कूल सँ सेवानिवृत्त भेलाह। ओतय पार्वती मंदिर निर्माण कय राजस्थान सँ संगमरमरके मुर्ति धरि स्थापित कयलन्हि। सामाजिक सर्वजातीय पंनचैतीमे लागल रहैत श्रधाक पात्र दसक नजैरमे छलाह। विद्यार्थी सबकेँ सांझ-प्रात पढैक प्रति जागरूक करैत पड़ोसी गामसबमे आ पहुनाईमे जाकय कुटुंब केर धीयापुताके सजग करैत रहलाह। प्रश्नावली पुछैथ आ समाधान सेहो बतबथिन। हिनक बहुतो शिष्य जीवनमे आगू बढलाह आ पद प्रतिष्ठा पौलनि। जाहिमे विधानसभा पूर्व अध्यक्ष स्व० राधानन्दन बाबु ,पटनामे पशुपालन विभाग केर निदेशक लक्ष्मी बाबू आदि छलखिन। शरणजी अपन जीवनक वेशी समय सर्वजातीय उत्थान लेल देलथिन। अ.भा.कैवर्त कल्याण समिति कोलकात्ता केँ एक बैसारमे प्रस्ताव दैत मधुबनी,लहेरियागंजमे छात्रावास लेल आधारशिला रखलैन।ओ महान स्वतंत्रता सेनानी गड़वा निवासी स्व. अनंत लाल कामत जीक संग खुब पुरलनि।जातीय महासभा आयोजनमे जन जागृति करैत गामे - गामे कतेक़ो जिलामे भ्रमण कयने रहथि। हुनकर लिखित भाषण आ मंचीय संभाषण केर हम कायल छी। एक उदाहरण द्रष्टव्य अछि-: हिंदीसँ मैथिली अनुवाद
बिहार प्रांतीय कृषिवर्त्त कैवर्त्त एवं केवट जातीय महासभाक १४ वां अधिवेशन सुपौल (सहर्षा) महासभाक संक्षिप्त कार्य विवरण दैत बाजल छलाह-:(दि १५-०५-१९६४ ईं केँ) श्रध्येय सभापति जी, आगत अतिथिगण, मित्रगण आओर बहिण लोकनि! सर्वशक्तिमान सृष्टिकर्ता परमात्मा केँ बेर-बेर नमन करैत छी। धन्य छथि ओ प्रभु जिनक असीम कृपा आ उत्साह प्रेरणा सँ एतय हम-सब एकत्रित भेलहुँ, जातिगत - गंगामे डुमकी लगाबैत बन्धू-बन्धू गारा सँ गारा जोड़कय, वैपारिक अदान प्रदान कय संगठन सूत्र केँ मजगूत करय, राष्ट्रके पिड़ित अंगके स्वस्थ्य क' राष्ट्रोत्थानमे सहयोग करबाक लेल तरह-तरहके अभिलाषा ल' केँ आयलहुँ अछि। एहन शुभ घरीमे चन्द शब्द सँ अपने सभक जे सेवा करबाक अहोभाग भेटल हेन, ताहि लेल अहाँक आभारी रहब, संगहि हमर हृदय आनन्द विह्वल भ' क' उमैर रहल य। बन्धूवर ! हम विगत कतेको साल सँ मंत्री पद पर रहै अहाँ सभक सेवा करैत आबि रहल छी। एहि सेवार्थ अवधिमे हमरा महासभाक कार्यक्रम आदि विषयमे जे अनुभव भेल, संक्षेपमे बुझा देनाइ अपन कर्त्तव्य बुझैत छी। ता आगूक लेल अपने लोकिन केँ मार्ग निर्धारणमे सहायक भ' सकय। उद्देश्य-:(१) जातिक अनेको दिवाना, जातिगत सभा कतेको ठाम कयलनि, परंच एहि जिलान्तर्गत भगवान श्री 108 शंकर लग सिंहेसर स्थान- महेश्वर लाल दास व्यासके सतत् परियास सँ 1941 ई मेँ दरिभंगा जिलाक देवनाथपट्टी नौआबाखर मे भेल रहय। अपने तँ महान दुरद्रष्टा छलहूँ। आन सुधरल जातिक तरहेँ अपना बन्धूगण केँ सांस्कृतिक, समाजिक, आर्थिक व राजनैतिक परिस्थितिमे सामानांतर देखय चाहैत रहथि। जातीय समाजक उत्थानक लेल हमरा वो आनो लोकके उत्प्रेरीत करैत अपेक्षित सामानताक पाठ देलनि। ताहिकेँ स्मरण करैत रग-रगमेँ जोश उमैर अबैत अछि। स्फूर्तिक संचार होइछ, परंच एखन परिवर्तित समयमे वो रहितथि तँ हमरा सभक क्रांति आरो तेज गति सँ आगू बढ़ैत' कियाक तँ जाहि समानताक पाठ ओ बहुत पहिले द' गेलाह, आई ओहि सामानताक आधार पर राष्ट्रक नव निर्माण हुअय जा रहल छैक। परंच एहि प्रगतिक दौड़मे हम सभ गुरैक रहल छी' एक दिश संचय, दोसर दिश समन्यवयक दौड़ छैक' तेँ महासभाक निहायत आवश्यकता अछि। एहि सँ अपन पिछरल बन्धूगण केँ चैतन्य बनाय, क्रांंतिक ज्योती बारैक काज सतत् होइत रहत। २) अनुभव-: सज्जनवृन्ध्द ! ई परिवर्तनकारी जुग थीक। आगु बढबाक उपाय ताकयमे सबके सब लागल य। एक राष्ट्र दोसर राष्ट्र केँ पछारि अगूएबाक चेष्टा मेँ छैक। ताहि तरहेँ अपनो देशमे एक जाति दोसर जाति केँ पछारि कय आगू बढि जेबाक कोशिश मेँ छैक। आ ई साँचक निकट गप्प य। अपना राष्ट्रक कर्णधार सब लोक संविधान निर्माण कय हमरो लेल राह प्रशस्त क' देलनि जे पिछरल केँ सुविधा दैत एकरंगक पतियानीमे घींच लाबय चाहलथि। हमरा सबके नँय कियो उपर घीचैवाला अछि,आ नै अपना सँ हम आगूए बढि रहल छी। तकर कारणों छैक, अपन सामाजिक स्थिति आ दृष्टिकोण ओतहि छैक,जतय सहस्रो बरख पहिले हम सामाजिक , धार्मिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक सब दृष्टिये पछुआयल तबकाक मेँ निकृष्ट स्थान पर जमल रही। सामाजिक दृष्टिये जौं हम कदाचित अपन विवेचना करैत छी तँ हम खिन्न भ' उठैत छी। इयह कृत हृदय केँ असीम वेदना सँ भरि कालछ कटै अछि। वैदिक युगक आगू जहन वर्णाश्रम धरमक प्रचार भेल तँ ताहि अनुकूल सामाजिक संघ बनल आ हमरा सभकेँ चतुर्थश्रेणी (शुद्र) मेँ राखल गेल। तहिया सँ हम आओर हमर समुदाय प्रदय पर्यन्त हेय दृष्टिय देखल जाऊ लागल। हम तँ प्रभूक दास छलहुँ। हमरा कमाय आ सेवा प्रभू लोकनिक हीत होईत रहय। बहुतो सदी सँ दासताक जीजीर मेँ जकरल देश तँ मुक्ती भ' गेलैक,परंच हमर दासता ,उत्प्रिड़न ,शोषण आइयो हमरा अपना चांगुरमे जकैर रखने अछि। धार्मिक दृष्टि बावत हमर अस्थान बढ बेशी खसल य। हमरा समाजक अगुआ,धरमक ठिकेदार सब तँ एहि आराधना मे हमरे उपर प्रतिबंध लगा रखलक हन्। जौं शास्त्रोक्त मंत्र ऋचाक प्रभाव संस्कार पर पड़ैत होय तँ हमरा ताहिक उच्चारण के कहय जे सूनयधरि केर अधिकार सँ वंचित कर हमरा तथा हमर भावी पीढिक संतान केँ संस्कारहीन कय तेजोमय आ सम्मुन्नत बनयके मार्ग अवरूद्ध क' देलक य। राजनैतिक क्षेत्रमे तँ हमर दशा आरो दयनीय-सोचनीय अछि।आजुक राजनीति तँ पाईवला आ बहुसंख्यक वर्गक पक्षमे छैक।तेँ एहि दूनु विन्दुक यादें अलग-अलग 'वाद' आ पार्टी सेहो चुनाव लड़ेबाक लेल प्रत्याशी केँ टिकश दैत य।हम-सब दूनू संदर्भमे पिछरल छीहे।हमरो वर्गमे एहन लोकक कमी नहिँ छैक ,जे देशक आजादी लेल सक्रिय सहयोग दैत सन् १९४२केर अगस्त क्रांतिक शिकार बनि शिकंजेमे अपन प्राण त्यागलैन।पछिला कतेको सालक अनुभव अए जे हमर बहादुर नौजवान आगू बढबाक लेल परियास करैत अछि आ पुनःपिछैर जाइछ।तकर एकमात्र कारण थीक मजगूत संगठनक अभाव।पर प्रदर्शकक हीनता आ हमर कमजोरी सेहो छी।अंत: जाधरि सत्तारूढ़ कांग्रेस संस्था हमरा बीचक योग्य क्रियाशील सदस्य केँ प्रपत्रक(फार्म ए आ बी )दैत ,जीतेबाट परियास नहिं करथि वा हमरा ले सुरक्षित क्षेत्र घोषित नँय करैथ,ताधरि हम पिछरलके पिछरले रहैत जायब। शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्रमे समाज सँ तिरस्कृत आ धार्मिक आचरण सँ हीन बालक कतय धरि ओहि उच्चवर्गीय विद्यार्थी'क संग प्रतिस्पर्धामे सफल भ' सकैछ? हँ! आधुनिक उदार शासन-व्यवस्था'क कारणेँ किछु सदस्यता अवश्ये प्राप्त भेल अछि।एहि दुवारे किछ छात्र शिक्षा पाबय लांगल अछि।तकर वादों स्नातकक संख्याँ औंगुरी पर गनय जोकर य।जौं सरकारी दिश सँ महाविद्यालय केर नि: शुल्क शिक्षाक तरहेँ विद्यालयोमे नि: शुल्क पढायके ओरियाउन होय आ पढयवाला छात्रगणकेँ अनुदान भेटय,तखने ऐ दिशामे प्रगति होयब संभव हेतैक। ३) कार्यकाल_ आब हम अपनेक धियान महासभाके कार्यक्रम क' दिन मोरैत छी-: आई सँ तीन शाल पहिले एहि महासभाक तेरहवां अधिवेशन दरिभंगा जिला अन्तर्गत झंझारपुर मेँ२८-२९-३० भी १९६१ मेँ सम्पन्न भेल रहय।ओतय प्रान्तक कोना-कोना सँ जातिक सदस्य ,,विद्वान एवं अनन्य महानुभाव पधारलनि तथा अनेकानेक महानुभाव अपन मधुर भाषण सँ हमर खशलाहाके उपर स्तर उठेबाक कोशिश कयलन्हि। अधिवेशन केर सुअवसर पर छात्र सम्मैलन,जुबक सम्मेलन आओर गायक सम्मैलन सेहो भेल रहय।ऐसी अवसर पर निश्तुकि पौने छलहुँ जे एक स्मृति-पत्र ल'के प्रतिनिधि मंडल राज्य सरकार तथा कांग्रेस सभापति सँ भेंट करी।से तहिना कयलो गेल ,परंच एंकर कोनू तरहक फलाफल नँय भेटल।कईकठाम कार्यकारिणी समितिक बैसार तथा सार्वजानिक बैसार सेहो होईत रहल ।तकर अलाबा जातिक अनेकों आपसी झगरा झंझैट केर फैसला -मिलान कयल गेल।महासभाक परियास सँ एकगोट महेश्वर कैवर्त्त माध्यमिक विद्यालय अंधराठाढ़ी मेँ १९४६ई० सँ चलि रहल छैक।जाहिमे सम्प्रति ..... आदेशपाल.150छात्र आ चारि शिक्षक ओ एक अछि।एकटा आओर उच्च माध्यमिक विद्यालय भूतपूर्व सभापति श्री राजकुमार कामति जी केर सद्परियास सँ सुनके ओतय किसान ऊच्चांगल विद्यालय-बथनाहा 'क नाओं सँ चलि रहल छैक।ओहिमे लगधक 15बिगहा जमीन तथा 30हजार टाका हुनका परिवार दिशसँ देल जा चुका छन्हि।आ 16 बिगहा जमीन ओहिठामक जनता सेहो देलनि अछि।अर्थात् कुल 31बिगहा भूमि विद्यालय केँ छैक।महासभाक परियास सँ सेहो उक्त विद्यालय केँ हजारो टाका सँ उपर दान भेटल छैक। आय-व्यय-: गत अधिवेशन केर कुल चन्दा 2205टाकापौने तेरह आना आयल आ 2318 टाका ||=- //आना पाई सर्वांगीण समिति दिशसँ खर्च कयल गेल।महासभा के उपर 112टाका |||०||आना करज चढि गेल।अधिवेशनक पश्चात आई तकमे स्मृति पत्र,गत अधिवेशन क' प्रस्ताव पत्राचार इत्यादिमे 108टाका //_,=आना खर्च कयल गेल।अर्थात् कुल रकम आई तारीख 24-5-1964ई०धरि 221टाका |=✓||आनाक देनदारी महासभाक जिम्मा रहल ह,ई टाका खुदे हम महासभाक कार्यक्रम केँ आगू बढ़ेबाक अभिप्राय सँ ऋण ल'केँ केलहुँ अछि।ऋणक एकमात्र कारण हम काजकर्ताक लापरवाही कहल जा सकैछ। उपसंहार_"जौं-जौं औषधि कमल गेल रोगों बढैत गेल।"अहानंक समक्ष बेकारी,बेगारी ,अशिक्षा ,बाल विवाह,अनमेल विवाह आदि अनेक लोग पसरल चलैत रहल।तारा हटेबाक एकमात्र उपाय अछि, शैक्षणिक कलाकेँ अपनायब,गरीब आ मेधावी छात्र केँ उच्च शिक्षा दियेबाक लेल छात्र कोष बनौनाई परम आवश्यक अछि।ताहि लेल विभिन्न वर्ग सँ आगन्तुक महानुभाव सँ आ नव युवावर्ग सँ हमर सादर अनुरोध रहत जै अहाँ व्रत ल'केँ एतय सँ जाई,जाहि सँ उपरोक्त कष्ट केँ दुर करैत हुअय चैन सँ बैस सकब।आब हम अपनेक विशेष समय नहिँ लैत प्रार्थना करैत छी जे हमरा सन अल्पज्ञ अजोग आ दीन-हीन व्यक्ति सँ जे गलती हेबाक रहय से भेवे कयल।अतएव अहाँ अपना हृदय में स्थान रतिभरि नहिँ राखैत क्षमा प्रदान करैत हुअय अधिवेशन'क प्रस्ताव केँ अमलमे अनबाक अनुकम्पा करब। जय हिन्द!
४ जल अछि जा' धरि , जिनगी ता' धरि!
वरेण्य साहित्यकार श्री राज किशोर मिश्र जीके टटका मैथिली भाषा काव्य पोथी " जँ जग जल नहीं होइत ... " २०२३ मेँ प्रकाशित भेल छन्हि। १३२ पृष्ठक एहि पोथीक दाम ३०० टाका छैक। भारतमे मुद्रित ऐ पोथीक आवरण कलेवर जगत दिव्य-चित्रांकन सँ सुसज्जित बुझाएल । घोर जल संकट अर्थात रौदी - अकाल भेलासन्ता बसुन्धरा छहोछीत दराड़ि फाटल बेमाए सन कष्ट उत्पन्न करैत छैक। उच्च आदर्श स्थापित करैत कवि जीक ठोस कल्पना महान लक्ष दिस जाइ छैन। वन्देमातरम् मेँ परमादरणीय विष्णु कान्त बाबु अमिट मिथिला राज्य आ ताहिके पुनः प्राप्ति लेल धरि कवित्व शक्ति उजागर करैत युवा वर्ग सँ अपील कयने छथि। मुदा राज किशोर बाबु मिथिला, बिहार , भारत तथा एशिया परिसीमन सँ उपर अर्थात जगत स्तर पर सोचलनि अछि। हिनका जे आखरी कविता फुरेलनि " टेमी" मेँ जे १९ क्रम पर ' जँ जग जल नहि होइत! ' शिर्षक पाठ पढ़लाक बादे बुझना गेल रहय ,आब ओ ' जँ जग जल नहि होइत.. ' पर व्यापक विमर्श लेल जुआएल कविताक रचना करताह! से पाठक बीच ई नव कविता वा अकविताक श्रेणीमे पोथी आयल अछि। आशु कवि श्री मिश्र जीके कियो प्रांजल कवि कहि धकिया नै सकैत छथि। एहि धराधाम पर आँखि सँ वा कल्पना सँ जतेक जे वौस्त देख रहल छी,परेख रहल छी से जल बिनु संभव नहि छैक। जलक महत्ता पर हुनक अखियास केँ अकानल जाए सकैछ। सद्यप्रकाशित ' जँ जग जल नहि होइत.. ' पोथीक विषय सूचीमे सम्पूर्ण पाठकेँ चारि भागमे विभक्त कयल गेल छैक। जलक महत्व पहिल भाग छी, जाहिमे तीन गोट कविता मीज्हर अछि। यथा- जँ जग जल नहि होइत -१, जँ जग जल नहि होइत -२, आ जँ जग जल नहि होइत -३ । दोसर भाग अछि - जलक स्रोत सभ; एहिमे आठ गोट कविता दे गेल छैक। यथा - जल - स्रोत सभक परिचय,बरखा - जल, नदी , झील , झरना, ईनार - पोखरि - खत्ता , आ भू-जल , महासागर। तेसर भाग थीक -: जल-संकटक कारण ओ ओकर दुष्प्रभाव, जाहिमे कुल आध दर्जन कविता सजाओल गेल हन्। जेना -: जल संकटक - कारण-१, जल संकटक कारण -२, जल संकटक दुष्प्रभाव -१, जल संकटक दुष्प्रभाव -२, जँ जग जल नहि बाँचत-१, जँ जग जल नहि बाँचत- २ l चारिम भाग थीक -: जल - संकट समाधान। एहिमे तीन गो पाठ सन्निहित छैक,जेनाकि - जल संरक्षण ओ बचत-१, जल संरक्षण ओ बचत-२ आओर उपसंहार। सबके प्रायः बूझल छन्हि मानव शरीरमे ७०% जल आ ३० प्रतिशत रक्त रहैत छैक। शोणिततोके दूभाग भेल छै - लाल रक्तकण आ स्वेत लहू। कदाचित स्वच्छ पेयजल आपूर्ति नहि रहलापर जीबैक लेल अशुद्ध जलो सँ तत्कालीन काज चलाओल जाइछ। जलमे आयरन, आर्सेनिक आ फ्लोराइड तत्वक मात्रा रहला सँ मानव रुग्न भऽ जाईछ।पीबय योग्य पानिके मीठगर जल आ समुद्री जलके खड़ा पाईन बुझल जाइछ। मेघ पाईन केँ जमाकरैत पीयल आ खेती तथा पशुपालन मेँ खपत कयल जा सकैछ छी। मृदुजल आ कठोर जलके लिटमस पेपर सँ जाँचि परेख सकैत छी। ओना जाहि जल सँ साबुन - अपमार्जक (सर्फ) फेनाएत नै से अलगे पहचानिमे अबैछ। कहल गेल छैक - ' जले जीवन थीक'! ऐ विशेष विषयके केन्द्रमे राखि कविता विधा मेँ वृहद मानसिक खोराक ले एकटा पृथक पोथी सीरजब से श्रीमान राज किशोरे बाबु सँ हुअय। आजुक प्रासांगिकता सँ भरल ई पोथी पढ़ैतकाल पाठकके अकक्ष नहिँ लागत। ई मनलगू कविता विधाक विविध रस यथा- वीर, श्रृंगार, हास्य,करुण,रौद्र, भक्ति, विभत्स, अद्भुत, शांत,वत्सल आ भक्तिमे नहियों रहैत आ बिनु छन्द केर उपन्यासे पाठकके सदृश्य पढय लागब तँ एक सुराहे हाथ सँ छुटत नहिं। ताहि सँ ऐ पोथीक पठनीयता'क आभा बुझबामे झट आबि जायत। हम खंड काव्य नेत्रदान आ बागवार पढ़ि चुकल छी। मुदा ई जे खंडकाव्य भयानक रसमे रचल गेल अछि से व्यक्तिवादी आ क्षेत्रीयता सँ उपर य। विश्वव्यापी जे समस्या जल संकट'क अहि, से समाधान ताकैत छई। जटिल समस्याक निदान एहि पृथ्वी पर कोन रुपेँ भेटैत अछि से वर्णन ऐ पोथीमे पाठक पाबि संतुष्ट भऽ सकैछ। ई विषय जल प्रबंधनक तकनीकी'क थीक, तकरा साहित्यिक चासनीमे सराबोर कऽ एक अभिनव प्रयोग सँ पहिले कविवर महोदय केँ साहित्य सेवी श्री दिलीप कुमार झा सँ मन्त्रणा धरि भेल रहनि। पर्यावरणविद् ई० दिनेश कुमार मिश्र जल पर आधारित मानव जीवन आ विभिन्न नदीक वाढ़ि सँ त्रस्त मानवीय चिन्तनके सोझा आनबाक भागीरथ परियासमे देखाइत रहलाह अछि,जे विभिन्न देश सँ बहैत आबि रहल नदीक अजस्र जलधारा आ एक राज्य वा एक देशमे जल बँटबारा धरि अखियासने छथि। मुदा कविक छवि जे आकार लैत सम्पूर्ण जल आधारित भ' सकैछ से एहि पोथीमे सांगोपांग चर्चा विविध रूपेँ भेल छैक। विश्वमे तीन मिलियन सँ बेसी नदी बहैत छै, जाहिमे भारतोमे दूसय मुख्य नदीमे लगधक जलस्रोत छैक। एक भाग पृथ्वी आ महासमुंदर तीन हिस्सा जल सँ लवालब ऐ ब्राहमांडमे अछि। तैयो पृथ्वी पर जल संकट उत्पन्न क्षेत्रवार रूपेँ होइते रहलैक अछि। भारत वर्षमे सन् २०१९ जूनक अंतिम धरि २२% जल भंडारण क्षमताके अपेक्षा मात्रे १२.५% भंडारण रहैक। देशमे सब साल करोड़ो लोकक समक्ष जल संकट उत्पन्न होइत रहलैन अछि। एहन अनुमान कयल गेल छैक जे २०२५ ई० धरि पेयजल सधि जाएत! अपना देशमे ८०% जल कृर्षि काजमे खरच होईछ।एक किलो धान उपज ले २५ सय लीटर जलक खगता होईछ। हमरे अमलदारीमे सन् १९८९,१९८२ आ १९८७ मेँ भीषण अकाल (रौदी) भेल रहय। पछाति १९८७ मेँ अधिक जलवृष्टि नेपालमे भेला सँ प्रलयकारी वाढ़ि आ १९८८ मे भयंकर भुकम्प ओहिना मोन पड़ैत अछि। जलके कम उपयोग आ पर्याप्त वचाउ करक सब मनुखक कर्तव्य थीक। एक बेर गांधी जी प्रयागराज पं० नेहरू जी सँ भेंटघांट करबाक लेल एलाह। नेहरू जी भरल लोटा जल चरण पखारे ले दैत पुनः दोसरो लोटा बढ़ा देलनि। कुशलक्षेम क' वार्तालाप मेँ आध लोटा जल सधलापर मोन पड़ैत,बजलखीन पश्चाताप करैत छी ।हमरा सँ जलक अपव्य भऽ गेल। ताहि प्रसंग नेहरू जी कहलथिन एतय गंगा जीक संगम य,झलक अलेल छै।ओ संदेश देलखिन कम जलके उपयोग केनाई सिखाऊ। ई देश आजादी काल जलके प्रति स्वयं सजगता आ जागरूकता बढ़ेबाक एक मिशन छलैक। राजकिशोर मिश्र जी जी आंगिगर लोक छथि ओ संत बिनोवा भावे जीक तरहेँ २०शाल आगूक सोचैत छथि। जल संकट सँ मानवीय त्रासदी कोना रोकल जा सकैछ आ पर्यावरण अक्ष्णण रहत , ताहि लेल अपन आरंभ सँ अन्तधरि एहि पोथीमे पाँति गढ़लनि अछि। यथा-: नीर जँ नहि होइत धरा पर, जिनगी बिनु होईतथि धरती, कंकर - पाथर ,पाषाण - शैल, रहैत पसरल सकैत, परती। ............... सुखल पोखरि मे कोना के' उगैत, सहस्त्रदल पंचमुखी कमल ? कोनो ने पुड़ैनिक पात कतहु, ने सेमार, ने जलकुम्भी जमल। ............................. मंगनी मे नहि भेटत पानी, आब तँ लागत कैंचा, बएनो नहि परसत कियो, दैत कियो नहि पैंचा। उपरोक्त पांतिमे जे ओज आ रोचकता भेटैछ से वर्णनीय अछि। हिनक आरो किछ किछु पाँति एहन भेलनि अछि -: वोलगा बहैत अछि रूसमे, आ' रुफीजी, तंजानिआ, सेवद्र व्रिटेनक जीवन- रेखा, जीव नदीक अछि,रिनिआ। ......... बागमती, कोसी,तँ कतहु कमला बलान, कतेको नदी पर बिजली - उत्पादनक प्लान। ................... महा समुद्र अछि अगम,अतल, विस्तृत अछि एकर, जलक संसार, मुदा जाहि पानि सँ मेटत त्रास नहि, ओकरा सँ कोन जग- उपकार ? .......... नहरि - केनाल भेल सभ नाला, पड़ल प्रदुषण सँ छैक पाला। ................... पानि ऊघि कते आनत भरिया ? तबधल, भूकत कुकुर - नढिआ। ........... सगर सहर कंक्रीट सँ पाटल , मांटि देखल भेल दुर्लभ, बरखा-पानि बहटि क' चलि गेल, जलभृत जल बिनु हतप्रभ। एहि तरहेँ एक यूनिक रूपेँ श्री राज किशोर जीक कविता झलकैत लौकैत रहलनि अछि। कविता विधा मेँ मैथिली सँ पहिले ओ हिन्दी भाषा मेँ अपन रचना गढ़ने छथि। उर्जा संदर्भमे आओर प्रदूषण प्रभृति पोथी एशिया महादेश आ संसार स्तर पर सराहल गेलनि ओ इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स धरि पहुंचयमे हुनक पत्नी जे शुद्ध टंकण कार्य आ विदुषी पुत्री जे प्रकाशनक काज गतिमान कयलीह से सराहनीय डेग कहल जाएत।आ आब मातृभाषामे (मैथिली) डेगाडेगी चलब सँ आगू दौड़ैत भाषायी प्रवाह दिस उन्मुक्त होइत जा रहलीह अछि। जे शुभ संकेत छी। पोथीमे नीक कागत लागल छैन,परंच अक्षर शव्द आ वाक्य संयोजन अधिक जगहके अतिक्रमण कयने छैक। ऐ केँ पुरापन्ना घोनगर रूपेँ अँटावेश होयब पर्यावरणीय दृष्टिकोण सँ वचाउ करनाई निहायत आवश्यक छैक। स्पष्ट अछि जे कागत निर्माणमे गाछ वृक्षक लुगदी सरल बांस आ साबे घास आदि संसाधन वोन सँ भेटैछ जे पर्यावरण संतुलन लेल अति अनिवार्य छैक। ५ प्रक्रियाधीन सामाजिक परिवर्तन'क स्वर
मैथिली साहित्यमे राजनीति शास्त्रीय आ मनोवैज्ञानिक साहित्य क' रचना कम देखल जाईत अछि। आजुक परिवेश मेँ एकछाहा नवकविता वा कहि सकैत छी अकविता लिखबाक बाढि आयल छैक। पद्दके बनशव्त गद्य लेखन काज कम भ' रहलैक हन्। एहि चलनसारिके ढिठियाबैत आत्मकथा, निवंध, यात्रा प्रसंग, कथा संग्रह आ प्रेरक संस्मरण दिश उन्मुख रहैत श्री रविन्द्र नारायण मिश्र जी एगारह गोट उपन्यास धरि प्रकाशित कय चुकल छथि।हालहिमे हुनक " बदलि रहल अछि सभ किछु " मैथिली उपन्यास पढलौंह। जेकर ओ स्वयं लेखक आ प्रकाशक छथि। एहि पोथी मेँ १३२ टा पन्ना अछि। निमन कागतमे छपल पोथीके सरकारी आईएसबी एन प्राप्त भेल छैक आ २५० टाका दामधरि निर्धारण कयने छथि। १४ अप्रैल २०२२ केँ ग्रेटर नोएडा (उ०प्र०) दिल्ली एनसीआर प्रक्षेत्र सँ छपल एहि पोथीके ओ अपन पितामह स्व० श्रीशरण मिश्र जीके स्मृतिमे समर्पण कयने छथि।पोथीक मादे पाठक केँ अपन रचना सभक विषयमे सेहो कहने छथिन जे "ई- पत्रिका विदेह" मेँ नियमित अभरैत रहलाह हन्। धरि आवरण रंगील गत्ताक विषयमे पृथक सँ जनतब देलनि,जे पौत्री काश्वी दिशसँ दिवाल पर उकेरल गेल चित्र थिकैनि।हिनकर पूर्व प्रकाशित उपन्यास विधामे यथा-: नमस्तस्यै,महराज,लजकोटर,सीमाक ओहिपार , मातृभूमि ,स्वप्नलोक, शंखनाद, ढहैत देबाल,हम आबि रहल छी,प्रलयक प्रात,बिति गेल समय, प्रतिबिम्व आओर सद्य:प्रकाशित नव उपन्यास ' बदलि रहल अछि सभ किछु ' छन्हि। हिन्दी आ अंग्रेजी मेँ सेहो पुस्तकक रचना कतेको भेल छन्हि, जे ईन्टरनेट पर उपलब्ध छैक। एहिमे पाठककेँ राजनीति दलक नेताक आन्तरिक चरित्र आ व्यवहारिक चरित्रमे जे अन्तर छैई तेकर ठेह भेटैत य। कुल ३४ टा पाठके एकेसुरमे गहींर अभिरुचि केर संग पढल जा सकैत छै।ओना मैथिलीमे पाठकक आब अकाल अछि। तेँ पत्र_ पत्रिकाक संगहि स्तरीय पोथीक किननिहार लोक आ संस्था कमशम देखाइ छथि। बहुत परिपक्व पाठक पोथी समीक्षा पढि - गमि नव पोथी किनैमे प्रकाशन आ दोकानधरि पहुँचैत छथि।एखन राजनीति जे बिहारक चलैत आछि से पुर्णत: राजनितिज्ञ क' आगू- पाछू घुमैत अछि।तै मेँ समाजक लोकके समय आ परिश्रम सेहो जाइत छैन्।संतोखक लेल भेटैत छन्हि संररक्षक सँ प्रत्यक्ष वा परोक्ष रूपेँ संरक्षण।रहस्यमय स्थितिक राज बनाकय उपयोग करैत जे नायक कार्यकर्ता ओ लठैत - समांग बनाकय पोसने रहैत ; अपना पाँछा टिकौने रहैत छथि, सयह पैघौत बनल देखाईछ। मुदा जहिना उदय भेलासन्ता सूरूजो कमतर होईछ,तहिना स्थापित नेताजी केँ समयक सँग परिस्थिति भोगय पड़ैत छैक। प्रस्तुत उपन्यासक कथ्य, भाव-भंगिमा क' नाप शिर्षस्थ उत्कर्ष धरि पहुँचल छैक।आखिर समकालीन उपन्यासकार हेतुकर झा जे "ककरा ले अरजब हे !" मेँ क्षेत्रीय निम्नता _पंचकोशी,दक्षिणाहा आ भदौसक प्रयोग कयने छथि,ओहिठाम रविन्द्र नारायण मिश्र फरीछ स्थान शक्तिपुरम आ विजयपुरम सन भारतमे प्रचलित दक्षिण ईलाकाक नाम मुन्दर्य कयलनि अछि।देहाती मयटुअर-बपटुअर अबोध बालिका'क भरण- पोषण ओकर मामाजी अपना गाममे करैत बी ए धरि पढबैत छैक।एक प्रतापी नेताजी केँ ओ बालिका केर मामूजी ओहिठामक अबरजात रहैत छैक। से हुनक गहिंकी नजैर अवश्ये पड़ल छलैक,तेँ सुझाव दैत छैक जे एकरा वियाहक चिन्ता एखन नँय करी। हमरा डेरा पर शहरमे लेने अबियौक।ओतय नीक जकाँ ओरियाउन क' संगहि नोकरी धरा देबैनि।ओहि सँ कथा-संबंध पैघ घर-बड़मे आसान सँ भ' जायत। मुदा हुनका हृदयमे किछ दोहरे भाव उमरैत रहैक।आने किछु लोकसन संदीपजी सेहो ओझरा गेलाह नेताजीक संग। उपन्यास'क पाठक पढैतकाल आरम्भे मेँ वास्तविक जीनगिक अनुभव करैत संभवत: स्व० रेलमंत्री ललीत नारायण मिश्र जीके बंम हत्याकांड आ स्व० प्रधानमंत्री राजीव गांधी जीके मृत्यु बंमविस्फोट कांड , मंच परहक दृश्य सँ भयाक्रान्त भ' उठैत होथि।ओना आगू जे दृष्टांत भेटैछ नेताजीक पत्नि महिमाक ' राज्यप्रमुख बनैत घरी स्वत: वास्तबिक जीवनमे बिहार'क एक मुख्यमंत्री जीके धर्मपत्नि मोन पड़तैन।जे हो परंच दीर्घ कथा क' विस्तार पबैत ई सामाजिक उपन्यास एक राजनीतिक षढयन्त्र क ' नजारा बड़ा जैमकेँ देखबैमे समर्थ भेल छैई। नवतुरिया लोकनीक राजनीतिक दल गठन होईछ-जनक्रांति दल। एहि दलक हम 'शव्द' सँ तात्पर्य अछि- लेखक स्वंय , जे कदाचित लेखकक हृदयमे बसैत अछि। शक्तिनाथ आ संदीप केँ संग पुरैत नारी निकेतन सँ भागि परायल शिखा प्रमुख पात्र रहैत छथीन।ओम्हर समग्र विकास दलक राज्यप्रमुख नेताजीक सब तरहेँ चलती रहैत छैन।एक तरहेँ अन्तरराष्ट्रीय तस्करी गिरोह 'क परोक्ष समर्थन रहैत छैन। नारी निकेतनक अपना ईच्छा सँ अनैतिक प्रयोग करैत छथि।पाँचटा मूशदण्ड निजी लठैत सदा हरदम अपने छाह जेकाँ काज आबै छैन।सरिया गाममे शीखा नहिँ भेटैत छैक मुसकदण्ड सबके।विकट स्थिति झेलैत जहन आजीवन कारावास भोगय छथि,तँ पत्नीक सहारे पार्टीक तागैत अपने लग राखै छथि।ओहि अपराधी मुशदण्डक दखलंदाजी सँ त्रस्त होइत,हृदय परिवर्तन होय छैन महिमा जीके।आ ओ संदीप सँ जे पहिले पूर्व परिचित कार्यकर्ता नेताजीक रहनि, एसकरे भेंट करय आबि जाई छथिन। ताहि सँ पुर्वधरि अपना पद सँ त्याग -पत्र देबाक जनतब मीडिया केँ सेहो द' देने रहै छथीन्ह।आब विपक्षीक तागैत शिखाजीक नेतृत्वकला सँ एतेक बढैत छन्हि जे विजियोत्सव मनाबैत योग्य होईछ।पाँचटा सीट मात्रे निर्दलीय उम्मीदवार जीतै छैक,सेहो वयह जे हिनका अपनहि पार्टीक असंतुष्ट टिकट वंचित क्रान्तिकारी छथि।राज शासनक सब प्रत्याशी हारि गेलै,कारण दू गुट बनल छलैक आ मतदाता'क बीच सेहो छवि धूमिल भेल रहैक।श्वेत वस्त्रधारी आब गुलाबि परिधान मेँ प्रतिनिधि सभाक बैसारमे आबि अपना जगह पर स्वयं नँय बनि श्री शक्तिनाथ केँ फूलमाला लाधैत राज्य प्रमुख मनोनीत करैत सत्ता सोंपलीह। एहि स्वेच्छाचारिता ले समर्थक जनता लोकनि जिन्दावाद नाराक जयघोष करैत रहल। चुनावी राजनीति समयमे महिमाजीक पार्टीक किछ असंतुष्ट नेता आ कार्यकर्ता जे अलग गुट बनाकय पार्टीक प्रतिष्ठा मलीन करैत भट्ठा बैसा देलकैक, ताहि गुटक नामधारी लेखक महोदय नै क' सकलाह।आओर नेताजीक शुभ संज्ञा सेहो किछ राइख सकै छलाह। श्री मिश्र जीक उपन्यास लेखन शैलीक हम कायल छी,किछु एहनसन पाँति द्रष्टव्य अछि-: सरकारी घोषणा सँ जनता बहुत खुश रहय।मासे-मासे पानि बिजलीक बिल नहिं देबय पड़ैक। मासमे दू बेर किलोक किलो मंगनीमे राशन भेटि जाइक। सभ अपन-अपन दरबाजा पर तास खेलाए,भोजन करए आ सांझ पड़तहि सुति रहए । पृष्ट-११० सँ उधृत। उपन्यासमे दू दलक उपरचढ़ , पुलिसिया कार्रवाई , हवाई जहाज यात्रा , अस्पतालक दृश्य, सीबीआई जांच , माननीय उच्च अदालत केर निष्कर्ष रोचक लागत।आब २० शाल सँ बेसिये राज्य करैत समै खपि गेलैक।समाजक अनुकूल वातावरण सृजन भेलैक, जाहि सँ बालिका सब डाक्टर, इंजिनियर बनि रहलैक। सर्व जातीय एकता बढल आ सामुहिक भोजमे- उत्सवमे समरसता देखल जाइक। खानपियन सबजाना हुअ लगलै आ शिखाक त्याग सँ हुनक स्वप्न साकार होईत गेलैक।एहि तरहेँ सामाजिक परिवर्तन सतत् साकारात्मक दिशन बढैत डेग सन बुझाय। सामाजिक सद्भावना सभा जखन-जखन कतौह करथि तँ आखरिमे एक निशन्न शव्द -चरैबेति - चरैबति अवश्ये शिखाजी कहथि।
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.८.लालदेव कामत- नोतक बिझो! (बीहनि कथा)/ जेहन रोपब, तेहने काटब! (लघुकथा) लालदेव कामत- नोतक बिझो! (बीहनि कथा)/ जेहन रोपब, तेहने काटब! (लघुकथा) १ वीहैन कथा - नोतक बिझो! अनिकेत केँ निकेतन छै, ओहिठाम सँ मैयाँक छाया निमित्त नोत भेटल छल। से दुपहरमे बिजहो नहिँ केलक! जहन बेर बितलई तँ मोन पड़लनि। सौंझका बजाहट सुड़ियाही बालीक समदिया सँ जाए पड़ल पूवारि टोल। मुनहारि सांझखन काठक दू महला पर बैठकी पर पिढिया नहिं रहैक। ओ पिड़ियाक उनटआ - सुनटा ओकर माय - बाप नहिं जानै छैक। तेँ आब ओ सभ काठके खुर्सी - मेज क' सेटिंग बुझैत छैक। धरि कम्मल आसनी बैस कऽ भरिपोख दही चुरा चीनी आ डलना जरे भोजन कयलहुँ ।से हाँ - हां करिते रहि कि छाल्हीदार दहीमे नोन द' देलक .... ताहिक ढेकार एखनधरि अलचुकारि भऽ रहल अछि। ओहि टोलमे कागजी नेबो नै रहैक ,आबो जमाईन एक चुटकी फाँकि ली? २ लघुकथा - जेहन रोपब, तेहने काटब! उमाकांत आ महाकान्त अपन बाबुजीक पछाति छोटचासके मनखप - बटैया लगेलाह। बाबूजी 'क निधन पैघ भायक आश्रममे रहैत भेलनि। समाजक कठियारी अन्त्येष्टि'क जगह लगक कलमे मेँ पृथक-पृथक समुहमे बैसकऽ नियारैत रहैक। आ एकटा अलगे विधान देखि सेहो अचरजमे सब कियो रहथि। चारू भाए- बहिण बेराबेरी मुखाग्नि दै लेल प्रस्तुत होइत आरती आ अछियाक परिक्रमा त्रिपेखन करैत गेलथि। लाउडस्पीकर सँ अवाज दुर-दुर धरिक बिनु हकारोक लोक गौर सँ सुनै। बाबाजी 'क स्मसान मेँ बिकनजी समदाउन मंडलिक सेहो जुटान भेल रहैक। स्वरर्गीय भेलासन्ता हुनक व्यक्तित्वक नेपाल प्रकरण कोना काटरमिल बोन्दभेला पर पहारि धानखेत सँ हिंसक बाघके नुरा सँ मारिके भगौने रहथिन, वादमे जुटमिलमे खैट कय पैतृक भू-सम्पत्ति केर कोशी वकाश्त केश घोघरडीहा अंचल अधिकारी सँ लऽकऽ पटना हाईकोर्ट धरि लड़लनि ; .... आदि गुणनवादन चर्चा माइक सँ प्रसारित भेल रहय। उमाकान्त आ महाकान्त जैवारी भोज कोना दू गाम बढिकय होय ले चिन्तित देखाए। उमाजी केँ सबा दू कठा चतरी परहक खेतपर लक्ष्मी पंडित आ डीह परक चरिकठबा धनहर खेतक बेचनामा जर्सिमन टाका बेमाक चुकता देलनि ओकर पितियौत भाय जनक प्रजापति। सत् लराएण आ भिखारी जी दूनू भाय सेहो एक-एक कट्ठा बाड़ी एक एक लाख मोबलग मेँ कबाला करेलनि। अनुजभाय महाकांत सेहो एक कठ्ठा भीठ पौने तीन लाख टकामे एक गौएँ मुसलमान हाथे बड़का कोलामे सँ दस्तावेज फुलपरास जाकय तामील केलक। आओर अपना श्वसुर जीक राय सँ साढ़े सात कठा उबजाऊ खेत रामरीत हाथे एवं दछिनबारि बाधक बोरीन बाला रकबा ०विगहा - १७ कटा - १८ धुर मेँ सँ बान्हेकात दिश सँ चारि कठा वयला कलामी जंगली आ सुरेश भैया हाथे नगदीमे बेच तँ देलक, मुदा महा घोलफचक्का करैत सभा सभैती मृतभोजक प्रतिरोध दूनू भाय उपस्थित केलक। जातीय मैनजनक उपस्थितिमे ग्रामीतके बैसारमे अग्रज भाय बाजलैन - हमरा गारामे उत्तरी पड़ल अछि,जँ इ दूनू भाए खोरीश फांट पर्यन्त तय भेलासन्ता हमरा अदाय नै कएलक तँ हमर दयनीय अवस्था रहितो असकरे ख़र्च करबै। गामभरिक लोकके पुरखे दफे दूदिन दही चुरा चीनी आम आ पूरी जीलेबी डलनाक महाभोज देल गेलै। दान - दक्षिणा आ व्रिखोस्त श्राद्धकर्म कर्मकांडके जगह घाट पर नै , अपनहि मकानपर चनमा टांगि मण्डपमे वैदिक रीति सँ संस्कृतके जिलास्तरीय आचार्य अनुष्ठान पूरा दू दिनमे कयलनि। मैक सँ सुखश्राधक श्लोक - मंत्र दहोदिश प्रशारण भ' रहल छलैक। सुननिहार-बझनिहारमे मात्रे तीन सहायक पंडितजी क्रमश: रसिक लाल चौधरी,सरवदेब वर्मा , जानकी नन्द कामत उपस्थित रहथिन। दशरथ बाबू इलाकामे एहन पध्तिक आरंभ ३० बरख पूर्व सँ कय चुकल छथि। मुदा किछ विन्दुपर हुनका अशराधपमान सहय पड़लैन। एहि गामक निराला जी अन्तय पंडिताई करैत छथि , मुदा अपन दियादि आ कैवर्त समाजकेँ नहिँ सुधारि सकलाह। देशी एतय कैब छंटयबाला जे महापात्रो सँ कमीशन आ पंचैतियो करैले तरपेशकी सुविधा शुल्क ओसुलैत य। एकटा मुफट समाँग सतमावोर्ड पास कै चुकल छलै ओ बाजल फिरै बाबाजी कक्का जे रोपलनि से पौलनि! सुनै छियै ओ अपनों बापक गैत तेरहा नैकाढंगे केने छलैथ आ हुनक जेठका भाय रामकिशुन सामाजिक प्रथा अनुसारे मासिक शराध ले तुलल रहि काज भिन्ने करने छलैक। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.९.डॉ कैलाश कुमार मिश्र- सवाक कुसुम कामिनी/ ककरा के दूसत डॉ कैलाश कुमार मिश्र सवाक कुसुम कामिनी/ ककरा के दूसत
१ पोथी चर्चा सवाक कुसुम कामिनी (मैथिली कविता संग्रह) कवि: विनोद कुमार झा
विनोद कुमार झा जे मैथिली साहित्य आ संस्कृति जगतक सँग अनेक तरहक सामाजिक सञ्जाल पर सरकार नामे प्रसिद्ध छथि केर दू पोथी (दुनू कविता संग्रह), ’महानगर मे कवि’ आ ’सवाक कुसुम कामिनी’ हमरा पठेने छथि। सरकार बजैत, लिखैत कम छथि मुदा मैथिली साहित्य आ संस्कृति हेतु सदैव साकांक्ष रहैत छथि। मधुबनी सँ कोलकाता, कोलकाता सँ पटना, पटना सँ दिल्ली आ अंततः दिल्ली सँ मुंबई जत’ कतहुँ सरकार रहैत छथि हुनका संग मैथिली साहित्य सँ जुड़ल लोक उत्साहित रहैत छथि। दिल्लीक अनुभव हम स्वयं केने छी। ई नव-नव लोक के साहित्य सृजन लेल, साहित्य मे सहयोग लेल प्रेरित करैत छथि, हिनक सरोकार पूर्णतः साहित्यिक सांस्कृतिक होइत छनि ताहिं लोक हिनक बात के सम्मान करैत छनि। जाहि तरहेँ दू बेर दिल्ली आ एक बेर मुंबई मे सरकार ’मैथिली लिटरेचर फेस्टिवल’ केर विपरीत अवस्था मे सफलतापूर्वक आयोजन केलनि से हिनक व्यक्तित्व केर प्रमाण अछि। कहबा मे कोनो असौकर्य नहि जे सरकार केर व्यक्तित्व सँ संस्था जानल जाइत अछि, संस्था सँ सरकार नहि।
सरकार केर पहिल पोथी पर सामाजिक संजाल मे लोकक अथवा ई कही जे पाठकक प्रतिक्रिया केर ढेर लागि गेल। जिनका पोथी भेटलनि से झटदनि प्रतिक्रिया देलनि। ई बात प्रमाणित करैत अछि जे सरकार कतेक पोपुलर थिकाह! किछु लोक गंभीर टिप्पणी सेहो केलनि। एक आध स्थापित साहित्यकार यद्यपि ई मानबा लेल तैयार नहि भेलाह जे सरकार कवि भ’ चुकल छथि। हुनकर टिप्पणी किछु एहने सन लागल। खैर! हम पद्य कोहुना पढ़ैत जरुर छी, ओहि पर लिखबा सँ परहेज करैत छी। मुदा हमर परहेज सरकार लग नहि संभव छल। सोचैत-सोचैत दोसर पोथी आबि गेल। आब भेल, अवश्य पढ़ब, लिखबा लेल पढ़ब। सएह कएल। पोथी नीक लागल। शुरू सँ अंत धरि सरकार अपन मार्क्सवादी विचारधारा संग उपस्थित छथि। सरकार मैथिली साहित्य केर प्रकाशन सँ जुड़ल रहल छथि। ई नाना तरहक पोथी पढ़ने छथि। अनेक साहित्यकार संग काज केने छथि। बामपंथी विचारधारा केर लोक छथि। बामपंथ संग हिनक प्रतिबद्धता स्पष्ट दृष्टिगोचर होइत रहैत छनि। ताहि हिनकर लगातार दू पोथी छपब कोनो विस्मय केर विषय नहि अछि। कविता हिनक ह्रदय मे बनैत रहलनि आ ई एकत्रित करैत गेलाह। सभ बात अपन कथ्य संग परिपक्व भ’ गेलनि तँ पोथी केर स्वरुप मे आनय लगलाह। ओहुना हम मैथिल सभ लौकिक आ मौखिक परम्परा केर लोक छी। सरकार मौखिक परम्परा केर अंतिम प्रतिनिधि बला जनरेशन सँ छथि। स्मरण राखब हिनका सँ संभव छलनि। हम अपन प्रतिक्रिया हिनक दोसर पोथी ’सवाक कुसुम कामिनी’ धरि केन्द्रित राखि रहल छी।
हमरा लागल जेना सरकार 1970 सँ आई धरिक बात करैत छथि। बातक क्रम मे साहित्य, इतिहास, राजनीती, सौन्दर्य, मानवाधिकार, संविधान सभ बातक ज्ञान रखैत छथि। मैथिली संग संस्कृत, हिंदी साहित्य केर ग्रन्थ सबहक मूल बात स्मरण छनि। पूरा विश्व संग भारत मे कोना मार्क्सवादी विचारधारा एक राजनैतिक दल अथवा सत्ताधारी दल केर रूप मे बढ़ल अछि, संकुचित भेल अछि, फेर कोना ओहू मे स्थान विशेष पर व्यक्ति अथवा आरो कुनो कारणे परिवर्तन आ विखंडन होइत गेलैक अछि तकर एक-एक सूत्र हिनका बुझल छनि। अपन सभ बात के रसे-रसे रखैत छथि। कथ्य कहबाक शैली मुदा कविता छनि। आँखि मैथिल अवलोकनकर्ता केर छनि: मैथिल आँखिसं कएल अवलोकन देखल, भोगल, भीजल यथार्थमे बासनक अंतिम चाउरक अर्थबोधमे जनसरोकारक पक्षधरतामे वैचारिक सोचक प्रतिबद्धतामे ज्ञान, विज्ञान, अध्यात्मक संज्ञानमे मनुखताक सापेक्ष विचारधारामे संवेदनाकें देल सहज अभिव्यक्ति। (पृष्ठ संख्या 5 ) बामपंथी विचारधाराक लोकक भ्रमजाल एखन धरि नहिये टूटल छैक। मार्क्स आब कुनो पार्टी, कुनो, दल, कुनो विचारधारा, कुनो देश सँ, भुगौलिक सीमा सँ बान्हल नहि छथि। मार्क्स सब ठाम समा गेल छथि। कार्ल मार्क्स के अहाँ इंग्लैंड, अमेरिका, भारत, जापान सब ठाम देखि सकैत छी। भारत केर सभ दल आ दलक नेता अपना भीतर आ बाहरी आवरण संग मार्क्स के लेने घुमैत छथि। गाँधी केर वैष्णव जन सर्वहारा भ’ गेल अछि, भारतीय जानता दलक नेता आ भारत केर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपना के पिछड़ा वर्गक प्रतिनिधि कहैत छथि, अनाज सभ लेल भेटैत छैक, झुग्गी मे लोक आब ए. सी. लगबैत अछि, अन्न तरकारी केर निमक जकाँ मार्क्स आ अम्बेडकर सब ठाम घुलल छथि। भारतक संविधान केर अनुच्छेद सभ मे मार्क्स समाहित छथि। आब एक संग किछु गलत होइत छैक तँ सब पार्टी लाइन के छोड़ैत ओकर विरोध करैत अछि। बल्कि मार्क्स, अम्बेडकर, बुद्ध केर नाम पर किछु लोक दोकान सेहो चला रहल छथि। तिरुपति देवस्थानम केर कार्यकारणी सर्व सम्मति सँ हरिजन पंडित केर नियुक्ति करैत छथि। उलटे sub altern, महिला आदि विषय पर जतय कुनो कारण सँ मार्क्स मौन छलाह ततय लोक काज क रहल छथि। मार्क्स संग कोना सोवियत संघ धोखा केलक आ अमेरिका सँ युद्धक शस्त्र बनबाक होड़ मे लागल, कोना शीत युद्ध मे विश्व के फसेने अछि से सभ जनैत छी; कहेन कम्युनिस्ट अछि चीन के तकर वर्णन की करी, के नहि जनैत अछि ? अर्थ ई जे भ’ गेल मार्क्सवाद एक दल, एक विचारधारा केर रूप मे यूटोपिया। मुदा मार्क्स केर बात तँ लोक मानिये रहल अछि क्रिया कलाप मे, व्यवहार मे, लोकोपकारी योजना मे। विज्ञान आब बहुत अर्थ मे सभक भेल जा रहल अछि। मोबाइल, सामाजिक संजाल, वोट सब किछु आनि रहल अछि वास्तविक मार्क्सवाद। मिडिया, धर्म, सामाजिक कार्य, शिक्षण संस्थान, सब ठाम त घुसल अछि मार्क्सवाद। मुदा विनोद जी अपन सवाक कुसुम कामिनी के ताकि रहल छथि अनेक ठाम: सवाक छथि हमर कुसुम कामिनी धरती पर स्वर्ग-सुन्दरी उर्वशीकें सापेक्षता आ निरपेक्षताक इजोतमे आइंस्टीन आ वेदक दर्शनसं कएल निरूपण कुण्डलिनी-चक्रक शक्ति सर्पिनी जिलेबीक रसमे, पसेनाक मधुर चासनी मार्क्सक साम्यवाद रूप-भूगोल बदलैत बनल भारतीय संस्करण समाजवादी लोकतंत्र लिखब बेछप अलअक्सा, कालिदासक मेघ तालीबानी सोचक ऐतिहासिक दृष्टिकोण। (पृष्ठ संख्या 6) कवि अपन बात कहि रहल छथि। सोच कोना प्रस्फुटित भ’ रहल छनि तकर पृष्ठभूमि बता रहल छथि। कोना सब ठाम साम्यवाद ताकि रहल छथि तकर उद्धरण द’ रहल छथि। ई बता रहल छथि जे कोना महानगर मे रहैत, कोलाहल सुनैत ई अतीत दिस जा रहल छथि। कोना अनुभव जे बहुत छनि से संक्षिप्त बनि पसरि रहल छनि। हिनकर एक-एक अवलोकन के समूहक प्रतिनिधि ओहिना बुइझ सकैत छी जेना पकैत भातक बर्तन सँ अंतिम चारि दाना चाउर देखि लोक बूझि जाईत अछि जे सभ भात पाकि गेल। ई बात हम नहि, सरकार कहैत छथि। अतेक अवश्य अछि जे हिनक भाषा सहज, सोझ आ बोधगम्य छनि: हमर भाषा, शिल्प, शैली बेढंग, बेछप, बिना मारल रंदा कम्मे भेटत अकादमिक कलाकारीक शब्दजाल कैच-फ्रेज वा फैंशी लिंगो आ ने रहस्यक चमत्कारिक वन-लाइनर आ ने अलंकार-श्रृंगारक कोनो उत्कर्ष। (पृष्ठ संख्या 6) भले कम लिखैत छथि, स्टेज सँ दूर रहैत छथि मुदा साहित्य लेखन मे जे क्षय भ’ रहल अछि ताहि लेल हिनकर चिंता देखि सकैत छी: खोजमे लागल छी जे कम भ’ रहल अछि साहित्यिक गुणवत्ता वा बहुत तेजीसं बदलि रहल अछि गुणवत्ताक प्रति मानक धारणा।- (पृष्ठ संख्या 7) ’सवाक कुसुम कामिनी’ नामक एक कविता एहि संग्रह मे छैक जकरा नामपर एहि संग्रहक नामकरण कएल गेल छैक। कविक मार्क्सवाद आ साम्यवाद सदैव जाग्रत रहैत छनि। ई भगवान सँ पैघ मनुख के मानैत छथि कारण मनुखे तँ निर्माण करैत अछि स्थूल अथवा सूक्ष्म देवताक। फेर ई कहैत छथि दुनू एकै अछि मनुख आ भगवान : मनुक्खेक बनाओल मनुक्ख आ भगवान दुनू के पैघ आ के छोट के नीक आ के बेजाए के सही आ के गलत हम मानैत छी एकहि अछि मनुक्ख आ भगवान- (पृष्ठ संख्या 24 )
जीवन, प्रकृति आ परिवेश सँ कवि बिम्ब लैत छथि। बिम्ब विज्ञान , योग, तंत्र, खेत, कतौ सँ मुखर भेल अबैत अछि। बाढ़नि , तुलसी चौड़ा, चुट्टी, जिलेबी, छत्ता, आदि हिनकर बिम्ब बनैत छनि। जिलेबी चाहे गाछक हो अथवा रस सँ बोरल गरम चुल्हा परक हो, अपन भव्य उपस्थिति, भाव आ बिम्ब बनैत अछि। जिलेबी कविता ई कथ्य कहय मे सफल रहल अछि जे मनुख के जिलेबी सँ ई सिखक चाही जे जिलेबी गाछक काँटक पीड़ा सहबाक गुण विकसित भेलाक बादे कियोक जिलेबी जकाँ मीठ भ’ सकैत अछि। चुल्हा बला गरम जिलेबी के बारे मे सरकार केर कहब छनि जे गरम चुल्हा के पाछू बैसल हलुआइ, इंजेक्शन सँ नहि, अपन चूबैत घाम सँ जिलेबी मे मिठास भरैत अछि ! जिलेबी गाछक विकट काँटक पीड़ा सहबाक कौशल कर’ पड़ैछ जाग्रत गरम चूल्हाक पाछू बैसल हलुआइ इंजेक्शनसँ नहि अपन चुबैत घामसँ भरैत अछि चासनीक मिठास जिलेबीमे पंचकर्मक बादे अबैछ जीवनमे मिठास ! (पृष्ठ संख्या 42 )
परिश्रमक मधुर सुआद केर कतेक नीक प्रमाण छनि जिलेबी कविता। कविता केर नामकरण तहिना बेछप! शेष अर्थ पाठक स्वतः निकालि सकैत छथि।
अगर बिम्ब देखक हो तँ ’हाथ’ कविता अवश्य पढ़ी। बेर-बेर पढ़ी। कविता स्वतः प्रमाणित अछि। अर्थ अपने आप स्पष्ट होइत जाइत छैक। किछु अंश देखल जाए: छेनी-हथौड़ी वा बुलडोजर नहि तोड़ैत अछि पहाड़-पाथर तोड़ैत अछि ओकरा चलबयबला हाथ दशरथ माँझीक हाथ तोड़ने छल पहाड़ आ बनौने रहय सरल-सुगम रस्ता हाथ लिखने अछि वेद-कुरान, संविधान जखन आदिम मनुखक हाथमे अएलैक हाथ अपन अस्तित्व बचाबक लेल मिलबय लागल हाथ विकास आ विज्ञान संग करय लागल आविष्कार आ चमत्कार श्रमसँ बनल हाथ कयलक अथक परिश्रम बनौलक अट्टालिका, रेल, पुल, जहाज आ प्रभुत्वक लेल विनाशकारी हथियार आ हाथो-हाथ उठा लेलक पृथ्वीकेँ अपना हाथपर- (पृष्ठ संख्या 49 )
अर्थ स्पष्ट अछि, कविता मे हाथ मानवीय सोच संग चलक चाही, साकारात्मक रहक चाही, अपन ज्ञान, सम्पदा, सोच सँ सभक कल्याण करक चाही, तकर शंखनाद क’ रहल अछि। कवि कहय चाहैत छथि, अगर सोच नीक हो तँ पद्मश्री दशरथ माँझी अपन हाथ मे फव्वारा लए पहाड़ के काटि सकैत छथि, अम्बेडकर सर्वसोची भ’ सकैत छथि - केवल मनुख केर भीतर जे राक्षसी प्रवृत्ति अछि तकरा बाहर करबाक दरकार छैक।
विनोद जीक बिम्ब आ ओकरा संग सन्देश देखय चाहैत छी तँ ’बाढ़नि’ कविता अवश्य पढ़ी। बाढ़नि कतेक उपयोगी अछि तथापि बुझल जाइत अछि अछोप, निकृष्ट, राखल जाइत अछि बाहर। कविक लेखनी सजग भ’ गेल अछि: हम बाढ़नि अछूत, अस्पृश्य राखल जेल अन्हारमे, रौदमे, शीतमे, बरखामे धूरामे, गर्दामे, कूड़ामे, कचड़ामे भद्र लोकक परिदृश्यसँ बारल कोनो उत्सव, शुभकाजसँ दूर घरक कोनो कोनमे पड़ल रहबाक लेल विवश- (पृष्ठ संख्या 29)
बाढ़नि बिम्ब संग कवि अपन इच्छा कोना व्यक्त करैत छथि तकर उदाहरण उल्लेखनीय अछि। बाढ़नि टूटि गेल छैक, तार-तार भेल छैक, लोक फेकबा लेल तैयार अछि, मुदा ओहि सँ पहिने ओकर अभिलाषा गज्जब:
हमर झड़ल फूलक एक-एकटा काठीक अछि इच्छा फेकबासँ पूर्व मनुक्खक संकुचित विचारकेँ पसरल व्यभिचार, भ्रष्टाचारकेँ अन्धविश्वासक जमीनकेँ साफ-सूथड़ा क’ सजा दैत स्वच्छ, संवेदनशील, सजग समाज!- (पृष्ठ संख्या 30 )
एहि कविता केर निचोड़ छैक जे बाढ़नि सँ सर्व समावेशी समाजक कप्लना कवि करैत छथि, बाढ़नि मे प्रगतिशीलता देखैत छथि :
हम सर्वसेवी प्रगतिशील बाढ़नि आगू बढ़ैत काज करब नेत आ नियति दुनू।- (पृष्ठ संख्या 30)
कवि मुदा सब बिम्ब सँ आ सब कविता सँ साम्यवाद तकैत छथि। ओकर परिधि सँ जेना बाहर नहि जेताह से सपथ खा लेने होथि। ’गमछा’ कविता अनेक तह खोलैत अछि। बदलैत परिवेश मे नाम परिवर्तन, राजनैतिक सांस्कृतिक फैलाव, गमछाक समयक संग बदलैत नाम, स्वरुप, गमछाक इतिहास सब किछु बतबैत साम्यवादी विचार जेना दरबज्जा पर ठक-ठक करैत हो! पुर्तगाली, तुर्कीसँ अनलनि तौलिया हमरा दुनूमे बुनियादी अन्तर हम वर्गहीन, गमार, सर्वहारा ओ पूँजीवादी, अभिजात्यक व्यवस्था दुनूक बीच कतेको दिनसँ चलि आबि रहल वर्ग-संघर्ष आधुनिकताक सुनामी झेलैत फैशन ट्रेंडकेँ धकियबैत वासमे, अधिवासमे आँचर, ओढ़नी, स्टॉल, रुमाल, कफनमे जन-सरोकार लेल अपन स्थानपर अडिग, सुरक्षित छी हम अंगपोछा- (पृष्ठ संख्या 36 ) बहुत लोकक मानब छनि, जाहि मे हम सेहो छी, जे आई हम सभ पोथी लिखैत छी मुदा पढ़ैत नहि छी। पढ़ितो छी तँ पोथी केर चयन दिस साकांक्ष नहि रहैत छी। अहि विषय पर विनोद जी अपन ’पोथी’ कविता मे लिखैत छथि: हमसभ संस्कारित छी पढ़बाक लेल कमोबेस गम्भीर रोमांस करी पोथीक संग मुदा चाही पोथी-चुनावक विवेक।- (पृष्ठ संख्या 39)
पोथी चुनाव आ पढ़बाक बात कहैत छथि आ स्वयं ओकर पालन सेहो करैत छथि। अर्थ ई भेल जे हिनक कथनी आ करनी मे अंतर नहि छनि। तकर प्रमाण हिनक चुट्टी न्यूटनक सेव, न्यूटनक गतिक नियम, कालिदासक मेघ, यूटोपिया, कार्ल मार्क्स आ समाजवादी सन कविता मे पोरे-पोर भेटत। चुट्टी कविता मे मजदूरक तुलना चुट्टी सँ भेल अछि। कहल गेल अछि जे सिर्फ रानी चुट्टी मे होइत छैक प्रजनन करबाक क्षमता शेष चुट्टी तँ बिना कुनो उचाबच केने खटैत रहैत अछि रानी लेल। तहिना मजदूर खटैत अछि मालिक लेल, व्यवस्था लेल। मुदा मजदूर के तँ स्वर होइत छैक! फेर एना कियैक? कहैत छथि: मुदा ओकर भाषा कहाँ बुझि सकलहुँ बुझबितहुँ परिश्रमी नहि होइछ नपुंसक पहिने ओकरे करिबतहुँ गुलामीसँ आजाद !- (पृष्ठ संख्या 52 )
परदेसिया बच्चा सभ अपन बूढ़ माय बाप के छोड़ि निकलि जाइत अछि भदेस। इम्हर माता पिता टक-टक तकैत रहैत अछि अपन संतान केर बाट – भ’ जाय भेट मृत्यु सँ पूर्व। एहि बातक आ भावक तुलना कुनो घर मे लागल ’केबाड़’ सँ करैत छथि साहित्यकार: जखन लागल रहैछ ताला देखैत रहत टकटकी लगौने अबैत-जाइत एक-एकटा लोककेँ जेना बूढ़ माय-बाप आँखि फाड़ि तकैत रहत बाट अपन परदेसी धिया-पुताक- (पृष्ठ संख्या 62)
’सवाक कुसुम कामिनी’ केर तुलना आइंस्टीनक सापेक्षतावादी सिद्धांत सँ करैत कवि निष्कर्ष दैत छथि: धरतीसँ ब्रह्मांड धरि शून्यसँ अनंत धरि छथिए एखनो जीवनक सापेक्षता आ निरपेक्षताक बनल पर्यवेक्षक समस्त सृष्टिक आधार शक्ति हमर सवाक कुसुम कामिनी।- (पृष्ठ संख्या 75 ) साम्यवादी विचारधारा केर बहुत लोक एहेन छथि जिनका आइयो भूख, अछूत आदिक दर्द देखाइत छनि, नहि भेटल तँ कल्पना क' लैत छथि। विनोद जीक अनेक कविता जेना 'भूख' एहि अवधारणा केर प्रमाण अछि। जतय आवश्यकता सँ अधिक होइक, जतय केर पॉपुलर सरकार स्कूल केर नेना के मुफ्त भोजन दैत होइक, जतय कोरोना काल मे आ एखनो मुफ्त अनाज पाई घरे-घरे भेतैट होइक, जतय संविधान मे प्रत्यक्ष रूप सँ साम्यवादी बात समाहित होइक आ जकरा सभ दल, समुदाय विचारधारा सम्मान करैत होइक, जतय एक आदिवासी महिला झारखण्ड केर सुदूर जिला सिमडेगा मे भातक बिना मरल होइक आ समस्त देश मे बात जंगल केर आगि जकाँ पजरि गेल होइक, ततय ई बात सभ आउट ऑफ़ कॉन्टेक्स्ट बुझना जाइत छैक। आब लोक महिला उत्थान संग सब अल्टरन पर गम्भीर भेल अछि। दलित लेखन आ नव बौद्ध विचारधारा दन-दन क’ रहल अछि, फेर केहन तान? ताहि समय लगैत अछि जेना कवि 1980 केर अन्तिम क्षण मे सुति रहल होथि आ एखने जागल छथि। इतिहास के वर्तमान मे देखब केर कला मे ओहुना बामपंथी माहिर होइत छथि। ई महारथ विनोद जी के सेहो छनि।
न्यूटनक सेव कविता एक ठाम तँ प्राचीन भारतीय ज्ञान केर महिमा मंडित करैत अछि तँ दोसर दिस विद्वान लोकनि मे जे सोचक उभय्वृतता छन्हि ताहि पर तंज कसैत अछि: "लटकल बुद्धिजीवीक अनुलोम-विलोममे निच्चाँ-ऊपर क' रहल अछि न्यूटनक सेव।" (पृष्ठ संख्या 83)
"तालिबानी सोच" कविता एक दिस धार्मिक उन्माद केर विरोध करैत अछि तं दोसर दिस युध सँ महिला कोना प्रभावित होइत छथि तकर वैश्विक आ काल खण्ड सँ इतर बात प्रेषित करैत छैक:
"युध्दक समय आ रूप जे कोनो हो आन्तरिक हो वा दू चारि देशक बीच माटिक बाद सभसँ बेसी रौंदल गेल बर्बरताक मारल महिला जँ रौदल नहियो गेल तखनो विधवा, बेसहारा रहबे करत" (पृष्ठ संख्या 96)
"कालिदासक मेघ" पढैत काल नीक लागल। भेल जेना बाबा यात्री "कालिदास सच सच बतलाना" केर पार्ट 2 संग आबि गेल छथि। मुदा विनोद जी सौंदर्य भंजक बनैत गरीबी आ बहुत बात सब करैत छथि। मेघ सँ पारिस्थितिकी केर चिंता, मनुख द्वारे प्रकृति दोहन आ नाना तरहक प्रश्न एक्सटेंशन मे करैत छथि, यात्रीक प्रश्न ओहिना छनि: "रौदिआयल धरती, फाटल दाराड़ि आब कोना चलत हर, कोदारि हकन्न नोर कानि रहल विरार बीयामे आब लागल कीड़ा-घुन अन्नपूर्णा कोना लेतीह अवतिर्ण जन-बोनिहारक छिना गेल रोजी-रोटी अहींपर निर्भर ओकर चूल्हा-चक्की कोना भरत सन्तानक भूखल पेट ओहो मर्महत भ' कानि रहल अछि मेघ" (पृष्ठ संख्या 119)
कवि सम्पुर्ण वातावरण , पर्यावरण लेल चिंतित छथि आ मेघदूत जकाँ आजुक स्थिति केर नजारा प्रस्तूत करैत छथि:
"पियासल जीव-जंतुक उदास आँखि गाछ-बिरिछ, खड़-खड़ पात सुखाएल डबरा, पोखरि-इनार क्षीणकाय नदी, ठमकल धार कोना भेटतैक पुण्य गंगालाभ कोना हेतैक सागर संग मधुर-मिलन एही बेथे कनैत पातर जमकल नदी" (पृष्ठ संख्या 119)
से जे हो, बहुत दिनक बाद एहेन कविताक पोथी पढल अछि जकरा पढला सँ आनन्दक अनुभव भेल। भेल, साहित्य पढि रहल छी। भेल, साहित्यकार स्वयं गहन अध्ययन केने छथि, भेल, साहित्यकार इन्फॉर्म्ड छथि। अगर अहां इन्फॉर्म्ड छी तँ बात कुनो वाद प्रतिवाद केर करु, बात गम्भीर हएत, प्रमाणिक हएत।
अपन बातक कथ्य हम पुन: विनोद कुमार झाक शब्द सँ करैत छी जे पोथी के पाठक लेल सार्थक बनबैत अछि: "हम रही वा नहि रही मुदा कविता हमर बाजत, करत संवाद सहेजिक' राखब हमर कविता।" (पृष्ठ संख्या 7)
सवाक कुसुम कामिनी (मैथिली कविता संग्रह) कवी: विनोद कुमार झा मूल्य: 200/ नवारम्भ: मधुबनी प्रथम संस्करण: 2023
२ ककरा के दूसत कविता संग्रह - मुन्नी मधु
मुन्नी मधुक दोसर कविता संग्रह प्राप्त भेल अछि -ककरा के दूसत। पोथी केर नामकरण कने बेछप छैक। ई पाठकक आकर्षण अपना दिस खिंचैत छैक। पोथी पढ़य लगलहुँ। ई पोथी पढ़ला सँ अतेक स्पष्ट जरूर भेल जे मुन्नी मधु मैथिली जगत मे समाज आ व्यवस्था केर सदैव अवलोकन करैत छथि। जे अनुभव होइत छनि, नीक, अधलाह, तकर त्वरित सम्प्रेषण पद्यक मादे करैत छथि। अर्थ ई भेल जे हिनक कविता हिनक साहित्य पाठन, अध्ययन, पुस्तकालय, आदि सँ कम प्रभावित छनि, व्यवस्था संग हिनक सहमति, असहमति, विचार आदिक अभिव्यक्ति छनि। हिनक साहित्य (पद्य) मे ई मिथिला, बिहार, भारत आ कतौ-कतौ अखण्ड विश्वक महिला केर प्रतिनिधित्व करैत छथि। आवश्यक नहि जे पाठक हिनक सभ बात, भाव आ अभिव्यक्ति संग सहमत होथि, मुदा हिनक कथन अपन छाप अवश्य छोड़ैत छनि। मुन्नी मधु, जेना जेना कविता लेखन दिस गंभीर भेल जेतीह, तेना - तेना हिनक साहित्य अपन ठोस स्थान लेतनि, तेहन भविष्य हिनक कवित्त मे अनेक ठाम भेटत। से कखन भेटत? जखन हम सभ गंभीरता सँ अपन साहित्यकार सभक रचना के पढ़ब, मनन करब। हमरा सभक समस्या ई अछि जे हम सभ साहित्य सेहो साहित्यकारक नाम, ख्याति देखि पढ़ैत छी, ई मानि लेत छी जे फलां-फलां साहित्यकार लिखने हेताह तँ नीक अन्यथा अधलाह। आब हमरा सभके अहि तरहक सोच सं बाहर अबैत रचना केंद्रित सोच रखैत पढ़क चाही नहि की व्यक्ति केंद्रित। मधु केर कविता वार्तालाप करैत छनि - स्वयं सँ , समाज सँ, पितृसत्ता सँ !
एहि पोथी मे कुल 54 कविता छैक। ओना विषय तँ बहुत छैक मुदा सभ कविता पढ़लाक बाद ई स्पष्ट भ’ जाइत छैक जे सभ कविता मे कने ने कने महिलाक स्वर प्रस्फुटित भ’ रहल छैक। ’अग्रगामिनी’ कविता मे जखन एक माय अपन सासुर बसैत बेटी सँ अपन पुतहु केर खिधांस करैत बेटाक बारे मे ई कहैत छथि जे बेटा सेहो माय दिस कम आ पत्नी दिस अधिक रहैत अछि तँ मधुक उत्तर समाज मे दहेज प्रथा केर प्रचलन आ बेटा आ बेटी मे अंतर पर प्रहार व्यंग्य रूपें करैत छनि:
"से हम कहलियनि - की करबें माय भौजीकेँ बाबू देने छथि दूधक मोल चुकाय फेर अनका सम्पत्तिपर लोभे की बिकायल बेटा पर क्षोभे की बिक्री-बट्टामे केहन हाय दैया दहेजक भेटल गानू रुपैया जुनि विवाद आब करू हे मैया तेँ अनुगामी बनल छथि भैया (पृष्ठ संख्या 14)
बेटी आ नारीक स्थिति पर विकल छथि साहित्यकार। सोनोग्राफी आ मेडिकल तंत्र संग कोना लोक डॉक्टर सँ मिलि एक दिस भ्रूण हत्या करैत छथि आ दोसर दिस दुर्गा पूजा आ अन्य उत्सव पर कन्या पूजन करैत छथि, ताहि पर सोझे कठोर प्रहार करैत छथि। ओना एहि विषय पर कतेक स्त्री आ पुरुष साहित्यकार कलम उठने छथि मुदा मुन्नी मधु केर कहबाक तेवर आ बिम्ब बेछप छनि। ’गर्भमे माय’ कविता केर किछु अंश देखि सकैत छी आ अनुभव क’ सकैत छी: एहि बीच नवरात्रि आबि गेल कन्या-पूजनमे सभ अग्रसर भेल मुदा कक्का करैत छथि दोसरे तैयारी नहि जनमय देथिन बेटी सन बेमारी
सोपारी द’ एलखिन कक्काजी आला बला कोनो कसैयाकेँ-(पृष्ठ संख्या 15)
कविता केर बिम्ब पर कने ध्यान देल जाय - बेटी लेल ’बेमारी’, जे डॉक्टर भ्रूण हत्या करताह तिनका लेल ’आला बला कसैया’ आ अंततः डॉक्टर केर मेहनताना के ’सोपारी’ शब्द सँ कहल गेल छैक। ई बात के कतेक गंभीर बनबैत छैक, कथ्य मे कतेक गति आ समाजक प्रति घृणा उत्पन्न करैत छैक ! मुन्नी मधु एहि बात के कतेक सहजता सँ कहैत छथि, समाजक दम्भ कोना तोड़ैत छथि ! अतय रुकैत कहाँ छथि! कथ्य के आगा बढ़बैत लोक, पुरुष आ समाज के दुत्कारैत कहैत छथि: अपन कन्याकेँ गर्भमे मारि पड़ोसिया कन्याक-पूजन करै छी भावी माइक भ्रूणकेँ नष्ट क’ अनेरे अहाँ मातृहंता बनै छी।- (पृष्ठ संख्या 16 )
साहित्यकार नारी समाजक प्रतिनिधित्व करैत प्रेमक इण्डिकेटर्स बतबैत छथि "अंतर" कविता मे,जे हिनका अथवा आजुक कोनो महिला के मान्य छनि: प्रेम करब गुलामी नहि मर्यादित रहब शोषित नहि अर्द्धांगिनी बनब खबासिनी नहि सहचरी रहब अनुचरी नहि सेवा करब नौरपन नहि भक्ति करब अंधभक्ति नहि सृष्टिक वरदान भेटल अछि माय बनब मशीन नहि।- (पृष्ठ संख्या 18 )
आब चाही तँ समाज मे कविताक उपर्युक्त सन्दर्भ के पर्ची बना गाइडलाइन्स केर रूप मे घरे-घर बाँटि दी। बदलैत समयक संग स्त्रीगण केर भूमिका की हो ताहि केर कोडिंग छैक ई कविता। साहित्यकार अपना संग समस्त नारी प्रजाति के देख रहलि छथि, परिभासित क’ रहलि छथि, पुरुष समाज के चेता रहल छथि, तन्द्रा सँ जगा रहलि छथि। उपरोक्त बात आ विचार के हजारो डेग आगा ल’ जाइत छैक ’दानक टंटा’, ई प्रश्न करैत छैक कन्यादान केर अवधरणा पर, ओकर परम्परा पर, नीति-अनीति पर, विज्ञान पर जे सभ तरहेँ स्त्रीगण लेल कालक माला बनैत छैक। ई प्रश्न करैत छैक आधुनिकता पर:
पुत्रक सेहो अहीं पिता छी, पुत्रोक दान करियौक ने बाबू कन्येदान टा पर कियैक जोर रहैए !- (पृष्ठ संख्या 24)
बात के फेरो कर्कश भेल अर्थ बतबैत साहित्यकार एक प्रतिनिधि पुत्रीक मादे प्रश्न करैत छथि: बेटीसँ पिंड छूटय ताहि लेल कखनो कने खेत बेचैत छी कखनो आलाबला, कसैया लग दौगैत छी छी दुनेती लिंगभेदसँ ग्रसित झूठे दानक टंटा करैत छी।- (पृष्ठ संख्या 24)
कविताक अर्थ स्वतः प्रमाणित छैक। एकर अलग व्याख्या की करी ! साहित्यकार स्वयं सँ व्यक्ति अर्थात पिता आ व्यक्ति सँ समाज तक प्रश्न करैत अछि। प्रश्न नारीक अधिकार, सम्मान लेल करैत अछि : हे यौ समाज, एकटा बात पूछै छी की सत्ते मात्र बेटीक कल्याण हेतु दहेजक विरोध करै छी अथवा बेटीकेँ, आंगी-नूआटामे तिलांजलि देबाक जोगार ताकै छी !- (पृष्ठ संख्या 24) एक बात जे पाठक हेतु प्राण संचार करैत छैक से ई जे एक महिला के रूप मे साहित्यकार महिला वर्गक समाज, संस्कृति, देश, शिक्षा आ विज्ञान लेल की कर्तव्य होबाक चाही तकर स्पष्ट रेखा खींच रहल छथि। बदलैत समय संग नूतन फूल जेना खिल रहल हो, आशा, नव उत्साह जेना संचार करबाक हेतु फड़फड़ा रहल हो, जेना नवजागरण केर मन्त्र समवेत स्वर मे वेद पाठ जकाँ झंकार बिखेर रहल हो! जेना इतिहास सँ प्रेरणा लेत उत्तम के पुछैत अछि, सर्वोत्तम भविष्यक फाउंडेशन तैयार भ’ रहल हो!
हम गार्गी-मैत्रेयीक कन्या छी हम ऋषि-मुनि केर तनया छी नहि थाकि-हारिक’ भागब हम नहि विपत्तिक मारल हारब हम- (पृष्ठ संख्या 32 )
छी लक्ष्य प्रेरित बाण प्रबल नहि करब व्यर्थे विश्राम हम अछि प्रगतिक नाम जीवन मूलमंत्र धैर्य-संघर्षक संगम- (पृष्ठ संख्या 32 )
आशावादी विचार एकाएक प्रबल भ’ उठैत छैक, एक नहि सभ लेल सजग भ’ जाइत छैक। कियोक छुटैत नहि छैक: तम सन कारी घोर निराशा मे हम नवल उत्साह जगा देबै"
कोनो ने कोनो दोगे प्रेम, विरह, माधुर्य सेहो अपन सनेस लेने बीच-बीच मे अबैत रहैत छैक। विरह आ विरहक वेदना थिरमति के चंचल आ भावुक क्षणमात्र लेल अवश्य बना दैत छैक। विरही नायिका के वसंत नहि सोहा रहल छैक : जो जो रे दुखदायी वसंत तोहर छौ भावट अनंत हमर वसंता आयत जहिया हृदय कमल फुलायत तहिया- (पृष्ठ संख्या 40 )
बिना कंत के की वसंत! आ जखन होथि कंत तँ सभ दिन सभ क्षण वसंत! किछु एहने भाव आबि रहल अछि कविता मे। विरह केर कविता स्त्री आ पुरुष दुनू लिखने छथि, एखनो लिखैत छथि, मुदा स्त्री लेखन केर भाव कनेक मर्यादित आ वास्तविक होइत छैक। पुरुषक भाव मे वेग, उत्साह, आ रोमांस अधिक रोमांचित करैत छैक। से देखि सकैत छी एहि कविता मे। पूरा कविता पढ़ला सँ अर्थक समग्रता बुइझ सकैत छी। जाहि तरहेँ आजुक मीडिया - अख़बार, टेलीविज़न, रेडियो, सामाजिक संजाल आदि नारी देहक प्रदर्शन क’ रहल अछि। समाज विचारहीन भेल जा रहल अछि , सभ कियोक जनैत छी। सभ अपन मान, पद, आयु आदिक मर्यादा बिसरि रहल अछि। एहि विषय पर ’नरलिंगी’ कविता पठनीय लगैत अछि। कविताक एक अंश देखल जा सकैत अछि जे रज्जु मे सर्प भाव बतबैत अछि :
काम भस्म छथि शिव नेत्रसँ कामुकता मचा रहल तबाही पत्र-पत्रिका रेडियो-टी.वी. मे व्याग्राक प्रचार द’ रहल अछि तकर गवाही पौरुष मरला युग बीतल बेसी नरलिंगीक अछि आबा-जाही- (पृष्ठ संख्या 47)
साहित्यकार एतबे सँ चुप नहि होइत छथि , नारी समाज के एकत्रित भ’ एकर निराकरण हेतु आह्वान करैत लिखैत छथि: अब किछु करहे पड़त मातृशक्तिकेँ जागहि पड़त हे जानकी, नरलिंगी नहि पुत्र देब पौरुषवान, तखने अपन भारत बनल रहत महान। (पृष्ठ संख्या 47)
’वरदान करू’ कविता के पढ़ैत काल एना लगैत छैक जेना साहित्यकार महिला वर्गक प्रतिनिधित्व करैत पितृसत्ता केर अनर्गल बेड़ी तोरबा हेतु व्यग्र होथि ! लड़की सभके पाँखि देमय चाहैत छथि मुन्नी मधु। निर्णय के, पढ़य के, बढ़य के सामान अवसर जाहि सँ हरेक लड़की प्रमाणित क’ सकथि अपना के सामर्थ्यशाली: बाबू, फूसिये पड़ल छी अथाह नेनपनेमे नहि करब हम बियाह पढ़ि-लिखि बनब हम ज्ञानी मनस्विनी, तेजस्विनी, विज्ञानी।
मनस्विनी, तेजस्विनी, विज्ञानी बनबाक मन्त्र भले स्कूलिया मास्टर बला लगैत छैक, मुदा ई बहुत पैघ आह्वान छैक।
भाषा भूमि आ संस्कृति अर्थात मिथिलाम संग हिनक संलग्नता सोहनगर छनि। भाषा अभियानक सहयात्री लगैत छथि। तीनूक ध्वज लेने आगा बढ़े चाहैत छथि: सुकृति ध्वजारोहण क’ जगमे माइक गरिमा सँ हुलसैत रही। भाषा-भूमिक हवन कुंडमे धधकैत आगि सन प्रज्ज्वलित रही।- (पृष्ठ संख्या 56 )
भविष्यक प्रति नारी शक्ति केर संकल्पना अनुकरणीय लगैत अछि एहि पोथी के पढ़लाक बाद। एहेन बात ’परमाणु बम’ शीर्षक कविता मे देखल जा सकैत अछि: बढ़य दिअ हमर शक्तिकेँ सृजने धरि नहि इतिहास हमर। छी हम कालजयी कलिंगक पद्मा विश्व विजयी अछि हमर समर।
धर्मराज केर हम छी सेवक दुष्ट अत्याचारी लेल जम छी सुरक्षा-संरक्षा आ विनाशेमे हँ , हम पूरे परमाणु बम छी- (पृष्ठ संख्या 60 )
पितृसत्ता अदौ सँ स्त्रीगण के देवी बनेबाक अपूर्व स्वांग रचने अछि। मुदा आब पर्दा फास भ’ चुकल छैक। स्त्रीगण जागि रहलि छथि। आब ई सभ अपना लेल पुरुषक देल देवीक ओढ़ना उघारि फेकय चाहैत छथि। अपना लेल नहि, एक लेल नहि, सभ लेल, नारी मात्र के मानवी स्वरुप मे देखय चाहैत छथि। शंखनाद करैत छथि: हे बनू अहीं सभ देव-पितर लिअ देवी-देवताक पदनाम हम मनुख छी बेबहारोमे मनुखे सन हमरो चाही स्थान।- (पृष्ठ संख्या 62 )
लोक आ स्थानीय परिवेशक वस्तु आ परिस्थिति केर बिम्ब के रूप मे व्यवहार करब बात अथवा कथ्य के लोकक मोहर लगाएब भेल। चूड़ी, ककबा, आमक अचार, फगुआ आ मनक रोग अर्थात प्रेम रोग आदि बिम्ब केर प्रयोग कोना एक विरहनी नायिका लेल होइत छैक से कविताक लालित्य बढ़ा रहल छैक। ’विरहक वेश’ केर अलप अंश एकरा प्रमाणित करैत अछि: टिकुला भए गेल अचार जोग अछि मनक रोग विचार जोग नहि चाही चूड़ी, नहि चाही ककबा अहाँ लेल पिया मोर मन चकबा।- (पृष्ठ संख्या 71)
अपन माटि सँ , लोक सँ, परम्परा, इतिहास आ मेटा इतिहास पर गर्व केना करी , अपन मिथिलाक लुप्तप्राय गौरव के कुन तरहेँ प्रतिष्ठापित करी, ताहू दिशा मे कविता बढ़ैत अछि: जाहि खेतक उपजा सीता जगतजननी परम पुनीता विश्व मानचित्रमे ओ मिथिला चमकैत सुरुज समान भेटत सत्ते कहैत छी मिथिलाकेँ फेरसँ उच्च स्थान भेटत।- (पृष्ठ संख्या 86 )
झंझावात कविता सच कही तँ आजुक स्त्री अर्थात 2023 स्त्री आ ओकर मायक मनोदशा केर झंझावात किंबा सोचक उभयवृतता बतबैत छैक। स्त्रीगण इ निर्णय कोना करी जे दुरागमन काल जाइत बेटी के पुरने बात सभ केर शिक्षा दी अथवा बदलैत समय केर संग अपन बेटी के परिवर्तन - सोच, व्यवहार आदि मे करैत रहबाक शिक्षा (सीख) दी! ओना बेटी माय सँ किछु आरो आशा रखैत छथि: पहिल बेर ससुर घर जाइत धियाकेँ की सभ सीखेती वैह सभ कहती जे हुनक माय कहने रहथिन जाउ सुग्गा! पतिकेँ परमेश्वर बूझब महफामे जाइत छी अर्थीए टामे बहरायब अथवा ओ एतबहि कहथिन जे नहि किनको शोषण करब नहि अपने शोषित रहब जाउ बेटी मनुख छी मनुख जकाँ रहब !- (पृष्ठ संख्या 88 )
कविताक अंतिम तीन पँक्ति तँ सम्पूर्ण सोच केर कायापलट क दैत छैक। एहि पर विशेष ध्यान देबाक दरकार छैक : जाउ बेटी मनुख छी मनुख जकाँ रहब !
बदलैत मानवी केर अपन स्वाभिमान सर्वोपरि छैक। सब किछु छोड़ि नैहर सँ सासुर अबैत छथि। मुदा सम्मान तँ चाही: माता-पिता सभ नाता अर्पित क’ देलहुँ निज धाम समर्पित अपन सभ सुख सेहो कयलहुँ दान हमरा लग रहय दी हमर स्वाभिमान।- (पृष्ठ संख्या 97)
अपन स्वाभिमान लेल साकांक्ष आ सावधान छथि साहित्यकार। अपना मे बहुबचन देखैत छथि, नारी केंद्रित बहुबचन। पुरुष अपना आपमे बहुबचन छथि, मुदा पुरुषक बहुबचन जेना नारी शोषण लेल बनल होनि ! मुन्नी मधु कविता कोना गढ़ैत छथि तकर उत्तर अपन कविता -कविता बनैत अछि- मे दैत कहैत छथि: वाचाल दृगक अनगिनत प्रश्नपर मुस्किए टा एक मात्र उत्तर बेकहल उलझन अनकहल अनुभव जखन विचलित करैत अछि तखने हमर कविता बनैत अछि।- (पृष्ठ संख्या 99 )
बात के थोड़े आरो स्पष्ट करैत लिखैत छथि: हृदयमे रहि –रहिक’ उठय भावनाक ज्वारि चंचल भ’ उठय अभिव्यक्तिक बाट नहि सूझय लग अबिते बोल नहि फूटय नैन मिलय नैन झूकय जखन मोन पड़ैत अछि तखने हमर कविता बनैत अछि।- (पृष्ठ संख्या 100 ) अपन आइडेंटिटी आ व्यक्तित्व केर भान छनि साहित्यकार केँ। ओ अपन सोच, व्यक्तित्व, व्यवहार, स्वतंत्र लेखन, अपन स्त्री होबाक गौरवबोध छनि। एकरा स्पष्ट करैत हुनकर लेखनी हुँकार करैत छनि: किएक तँ हम राधा नहि छी आ ने सूर्पनखे छी हम मुन्नी मधु छी अपना लेल गढ़ि सकैत छी अपन सिद्धांत।- (पृष्ठ संख्या 104 )
मुन्नी मधु स्वयं कामकाजी महिला छथि,अध्यापिका छथि। ताहिं घर मे स्कुल जाय सँ पहिने आ स्कूल सँ घर घुड़ला बाद , की स्थिति होइत छैक तकर अपन अनुभव संग जोड़ैत कविता रचैत छथि। बात मुदा रत्ती-रत्ती सही कहैत छथि। जे महिला नौकरी करैत छथि अथवा जिनकर घरक महिला नौकरी करैत छथि से एकरा संग अपना के जोड़ि सकैत छथि :
सखरी बासनक अंबार देखिक’ आँठि-कूठि क' पसार देखिक’ मोने-मोने रिसिया जाइत छी हम कुर्रा-आचमन कयने बिना माँजि-धोइ क’ भानस घरमे जुमि जाइत छी हम हँ, काजपरसँ घुरिक’ काजेपर आबि जाइत छी हम।- (पृष्ठ संख्या 102)
निम्न वर्गीय, निम्नमध्यम वर्गीय, आ मध्यम वर्गीय परिवार केर कामकाजी महिला सभक परेशानी आ जीवनक दिक्कत मुन्नी मधु लेल भोगल यथार्थ छनि। एहि यथार्थ केर वर्णन सिनेमा केर रील जकाँ हिनक कविताक शब्द पाठक केर माथ मे घुमैत छैक:
घरसँ कार्यालय धरि गाय-बड़द दुनू हमहीं ह’रो बहैत छी हम दूधो परसैत छी हम तहनो कहाँ कमासुत कहबैत छी हम हँ, काजपरसँ घुरिक’ काजेपर आबि जाइत छी हम। (पृष्ठ संख्या 103)
एहि कविता संग्रह केर पोथी मे नीक-अधलाह सब तरहक कविता भेटत। किछु कविता एहनो भेटत जे गंभीर नहिये जकाँ छैक मुदा सभ नीक भ जेतै तँ नवरस कोना हेतैक! विनती, सिया अवतार, ककरा के दूसत आदि कविता हमरा नीक नहि लागल। किछु कविता जेना अत्यधिक सामान्यीकरण केर शिकार भ’ गेल हो! किछु कविता एहेन अछि जे पाठक केर गंभीर चेतना केर बाट जोहैत अछि। -लोक की कहत,बान्हल बोझ, हँसी एक, रूप अनेक इत्यादि कविता साहित्यकार केर लेखन शैली केर हस्ताक्षर कहल जा सकैत अछि। कुल मिला क’ मुन्नी मधु केर रचना एक पठनीय पोथी छनि। नव साहित्यकार छथि, ताहि ज्ञाने हिनका अध्ययनशील रहैत खूब पढ़क चाही आ नूतन विषय वस्तु पर नूतन प्रयोग करैत भविष्यक डेग प्रशस्त करक चाही।
-ककरा के दूसत: मुन्नी मधु नवारम्भ: मधुबनी - 2023 मूल्य: 200 रु.. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१०.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (खेप-२४) निर्मला कर्ण (१९६०- ), शिक्षा - एम. ए., नैहर- खराजपुर, दरभङ्गा, सासुर- गोढ़ियारी (बलहा), वर्त्तमान निवास- राँची, झारखण्ड। झारखंड सरकार महिला एवं बाल विकास सामाजिक सुरक्षा विभागमे बाल विकास परियोजना पदाधिकारी पदसँ सेवानिवृत्ति उपरान्त स्वतंत्र लेखन। अग्नि शिखा (भाग- २३) (मूल हिन्दी- स्वर्गीय जितेन्द्र कुमार कर्ण, मैथिली अनुवाद- निर्मला कर्ण) कथा अखन धरि: उर्वशी के विरह में विचलित राजा पुरूरवा राजकीय काज सs उदासीन भs गेल छथि। ओ राज-काज सs मुँह मोड़ि सदिखन उर्वशी के ध्यान में निमग्न रहैत छथि। ओ राजमहल में रहथि अथवा वन-विहार करथि हुनका दृष्टि के समक्ष सदिखन उर्वशी घुमईत रहैत छथिन वन विहार के बहन्ने एकांत स्थान पर आबि उर्वशी के चित्र बनबैत रहैत छथि,उर्वशी के याद करैत रहैत रहैत छथि। आब आगू: राति के चारिम प्रहर छल । मृदु आ सुखद हवाक झोंक गवाक्ष के मार्ग सँs राजा पुरूरवाक शयन कक्ष मे प्रवेश करय लागल।राजाक आँखि धीरे-धीरे आराम करय लागल। निद्रादेवी धीरे-धीरे हुनका लग आबि रहल छलीह। निद्रा देवी राजा पुरूरवाक आँखि के अपना हाथे सोहरावैत झाँप लगलथि। तखनहि अचक्के प्रकाशक एक तीव्र झोंक झs घर के भीतर झमकि उठल। घुप्प अन्हार जे कक्ष में पसरल छल,कक्ष सs विलुप्त भय गेल,राजाकआँखि में बसल निन्न पर्यन्त ओहि तीव्र आलोक सs व्यथित भs विलुप्त भय गेल,राजा पुरूरवाक नेत्र पूर्णतया फुजि गेल। ओ आश्चर्यचकित भय एम्हर-ओम्हर देखs लगलाह। तीव्र प्रकाश में हुनक नेत्र चमत्कृत रहि गेल! आश्चर्य ! अलौकिक ! तीव्र प्रकाशक मध्य कोन अलौकिक दिव्य मूर्ति ठाढ़ अछि! राजा विस्फारित नेत्र सs एम्हर-ओम्हर तकैत रहलाह ओहि दिव्य मूर्तिक अनुसंधान के प्रयास में । तीव्र इजोत मे हुनकर आँखि आश्चर्य सँ भरल छलनि।ओ देखलनि जे हुनका सोझाँ ठाढ़ दिव्य सौन्दर्य मूर्ति आन कियो नहि हुनक उर्वशी छलनि! "उर्वशी! ओह उर्वशी!प्रिय उर्वशी! ई उर्वशी!आहाँ उर्वशी थिकहुँ! की आहाँ सत्ते आयल छी ! अथवा हम कुनों भ्र्म में थिकहुँ!" राजा अपन विशाल मजबूत आ उन्नत बाँहि मे ओहि सौन्दर्यक दृश्यमान मूर्ति केँ समेटि हृदय लगा लेलनि।राजा आलिंगित अलौकिक प्रेमिका असंख्य चुम्बन के बरसा देलनि।उर्वशी प्रेम-विह्वल भय प्रियतमक प्रेमक बौछार मे निश्चल स्नान करैत ठाढ़ भs गेलीह।उर्वशी किछु क्षण उपरान्त राजा के बंधन सँs अपना के मुक्त करs के प्रयास करs लगलीह तखन राजा हुनका अपना बाहु-बंधन सँs मुक्त कय हाथ पकरि अपन पर्यंक पर बईसवाक आग्रह केलथि। उर्वशी नि:संकोच हुनक पर्यंक पर बैसि किछु क्षण अपन प्रियतम दिस मौन तकैत रहलीह, तखन हुनकर ठोर में कंपन भेल।जेना असंख्य घन्टी एकहि संग घनघना उठल होय,ओहि शान्त वतावरणके निस्तब्धता भंग भs गेल। ओहि शांत वातावरण मे बाजि रहल मधुर घन्टी सन उर्वशी के मधुर स्वर बहरायल छल। "हम अपन बात पूरा केलौं ने हमर प्रिय"? "हँ प्रिये, आइ हम बहुत प्रसन्न छी,किएक तs तप्त मरुभूमि सन गर्मआ शुष्क हमर जीवन मे बसंत आबि गेल अछि,अहाँक आगमनक कारणेँ। अहाँ हमर अन्हार जीवन मे इजोतक किरण बनि अपन पदार्पण केलहुँ अछि । प्रिये!आब हमर नेत्र अहाँक सौन्दर्यक पूर्ण आनंद लs सकैत अछि। हमर हृदयक ताप अहाँक दर्शन रूपी बरखा सँs दूर भs गेल अछि प्रिये।" "हमर प्रियतम, अहाँ हमरा स्वर्ग मे प्रेम-सुधा मे स्नान करवा विरहाग्नि में जरय लेल छोड़ि स्वयं धरती पर आबि गेलहुँ। मुदा हम एतहु अहाँक पाछाँ पड़लहुँ,अहाँ केँ देल गेल वचन केँ पूरा करबाक लेल। आब हमरा विश्वास दिअ,अहाँ हमरा एतs छोड़ि आन ठाम पलायन नहि करब"?- प्रेम भरल नेत्र सँs राजा दिस तकैत उर्वशी पुछलखिन। "नहि प्रिय,भलहिं अहाँ हमरा छोड़ि कs चलि जायब,मुदा आब हम अहाँ केँ कहियो नहि छोड़ब। अहाँ केँ छोड़ि देबाक लेल हम बहुत पश्चाताप केने छी।अहाँक बिछोह में हमर समय कोना व्यतीत भेल ई कियो नहि बूझि सकैत अछि। हमरा तs एतबे बुझल अछि जे ई समय में हम श्वास लैत रही मुदा जीवित नहि रही। हमर दिवा रात्रि अहिँक स्मरण करैत कोनहुना बीति गेल। अहाँक विरह मे हमर रुचि कोनो बात मे,कोनो काज में नहि छल,सब समाप्त भs गेल। ताहि लेल हम आब अहाँ सँs दूर जेबाक सपनो में नहि सोचि सकैत छी" - राजा उर्वशी केँ आश्वस्त करैत छथि। "पृथ्वीपति संसार के सब मर्यादा के त्याग कs कs हमरा संग विवाह करब,हमरा अपन जीवन-साथी, अपन सह-धर्मिणी बना लेब"? "अवश्य प्रिय,ईहो कुनो पूछबाक बात थिक?" - प्रेमसँ भरल आँखि सँs उर्वशी दिस तकैत राजा बजलाह । "अहाँ अपन हृदयक प्यास समाप्त भेलाक बाद हमरा नकारब तs नहि" - उर्वशी पूर्णतः निश्चिंत होबय चाहैत छलीह । "केहन गप्प कs रहल छी,मनुष्य अपनहि देह सँ अपन आत्मा कतहु निकालि सकैत अछि? अहाँ हमर आत्मा छी,जकरा बिना हम निर्जीव रहब" - राजा प्रियतमा केँ पूर्ण आश्वासन देलथि । "तखन हमर किछु शर्त अछि प्रिय,अहाँ केँ सदिखन ओकर पालन करबाक वचन देमय पड़त" - उर्वशी अपन प्रेम केँ शर्त मे बान्हय लगलीह। "हम अहाँ के वचन दैत छी,हम अहाँक हर शर्त बिना सुनने स्वीकार करैत छी" - राजा प्रेम मे प्रत्येक शर्त स्वीकार करय लेल तैयार छलाह । "प्रियतम,ध्यान सँ सोचि कs शर्त सुनि कs वचन दिय । बड़ भावुक भs कs प्रेम में आबि कs हड़बड़ी मे काज नहि करू" - उर्वशी स्वर्ग पर पृथ्वी द्वारा आरोप लगाबय के अनैतिकता के आक्षेप करबाक कोनो अवसर नहि देबय चाहैत छलीह | "हम कहलहुँ एकबेर आब बदलब नहि,हम अहाँक सभ शर्त केँ बिना सुननहि स्वीकार करैत छी। हम ई बात पूर्णतः विचार केलाक बाद कहि रहल छी। अहाँ हमरा सँ हमर पूरा राज्य छोड़बाक वचन लैत छी,ऐश्वर्य आ विलासिता केँ त्याग करबाक वचन लैत छी वा एतवा धरि नहि जौं हमर प्राण लेबाक वचन सेहो ली,हम एकरा खुशी-खुशी छोड़बाक लेल तैयार छी" - राजा पुरूरव दृढ़तापूर्वक बजलाह। "तखन कोनो बात नहि। हमर मात्र दू टा शर्त अछि, ई शर्त सभ सदा के लेल मोन राखू,नहि तs अहाँ केँ पश्चाताप करैत नोर बहबैत रहs पड़त,ताहि सs हमर बात पहिले अहाँ सुनि लिय तखन वचन देब" - उर्वशी दृढ़ स्वर में बजलीह। "हँ - हँ! कहु कथि कहबाक अछि। हमरा सुनवाक आवश्यकता नहि,तथापि हम सुनि रहल छी"। "हमर पहिल शर्त अहाँ केँ वास्ते! हमर पुत्रवत् पालित ई दू गोट मेमना अछि।अहाँ केँ एहि दुनू मेमना केँ सदिखन रक्षा करs पड़त"! राजा पुरूरवा - "बस एतबहि बात? ई कोन पैघ बात अछि,जेकरा वास्ते आहाँ एतेक भूमिका देलहुँ!एतेक प्रकारक जीव-जन्तु हमर पशुशाला में पालित भs रहल अछि। हम ओकर रक्षा करैत छी,तखन अहाँ के एहि दू गोट मेमना सभक रक्षा किएक नहि करब"? एतेक आसान नहि अछि ई बात प्रियतम! अहाँक कर्मचारी सभ पालतू जानवरक रक्षा करैत अछि, जाहि मे कखनो काल किछु गलती भs सकैत अछि,जकर परिणाम स्वरूप ओहि पालतू जानवरक रक्षा नहि भs सके आ ओ मरि जाईत होय । अहि बात पर कहियो केओ ध्यान नहि दैत होयताह। अहुँ के ओम्हर ध्यान नहि गेल होयत। मुदा ई मेमना मामूली जीव जंतु नहि अछि, ई हमरा पुत्रवत प्रिय अछि। राजा पुरूरवा - "हम अहाँ के वचन देने छलहुँ प्रिय, हम हुनका सभक रक्षा अवश्य करब। आब अपन दोसर शर्त बताउ"। "हमर दोसर शर्त अछि,आनंदक समय अर्थात पति-पत्नी के आपसी विलासक संबंध के समय छोड़ि अहाँ हमरा कखनों नग्न नहि देखाई देब"। "ई तs आओर आसान शर्त अछि,एकर पालन करब कोनो कठिन काज नहि अछि।हम अहाँ के वचन दैत छी, हम अहाँक एहि दुनू शर्त केँ पूर्ण रूप सँ पालन करब" - राजा पुरूरवा एहि दुनू सहज शर्त केँ सुनलाक बाद कनेक हँसलाह। "जखनहि अहाँ एहि दुनू शर्त मे सँ कोनो एकहुटा शर्त पूरा करबा मे असफल रहब,हम अहाँ केँ छोड़ि स्वर्ग चलि जायब।" "नीक बात प्रिय, हम अपन जान स बेसी एहि देल गेल वचन के ध्यान राखब"। एतेक देरी सँ गंभीर उर्वशी आब प्रसन्न आ हर्षित भs गेल छलीह। हँसैत बजलीह - "पृथ्वी पर वर-वधू आगि केँ साक्षी बना सात टा शर्त पूरा करबाक वचन दैत छथि,मुदा हम केहेन वधु छी,जे अहाँ केँ एहि दुनू शर्त केँ एहि तरहे पूरा करबाक वचन करयलहुँ अछि। अहाँ केँ सेहो कोनो शर्त अछि - हमरा लेल"? पुरुरवा हँसैत बजलाह "नहि प्रिय, हमर कोनो शर्त नहि अछि"। क्रमशः अपन मंतव्य editorial.ऽtaff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.११.नन्द विलास राय-जाबी नन्द विलास राय जाबी रविकान्त भाइक सारक बिआह छिऐन। आइये दू बजे बेरूपहर बरियाती विदा हएत। रविकान्त भाइक सासुरमे चर्च अछि जे बेटी बला बरियातीकेँ पाँच तरहक छेनाक बनल मिठाइ खुएथिन। बरियाती जेबा लेल रविकान्त भाइ दाढ़ी बनबै छला तखने हुनकर सारि प्रिया आबि कऽ कहलकैन- -पाहुन, लगाउ मोंछमे घी, मारू जांघमे चाटी। तैपर रविकान्त भाय प्रियासँ पुछलखिन- एहेन कोन बात छै जे मोंछमे घी लगाएब आ जांघमे चाटी मारब। प्रिया कहलकैन- -सुनै छिऐ लड़कीबला बरियातीकेँ पाँच तरहक मिठाइ खुएथिन, तहूमे छेनाक मिठाइ। तैपर रविकान्त भाय बजला- पाँच तरहक मिठाइ खुआबैथ वा दस तरहक, छेनाक खुआबैथ आकि काजूक, हमरा ते मुँहमे जाबीए लागि गेल अछि। प्रिया पुछलकैन- से की पाहुन। रविकान्त भाय बजला- हमरा खूनमे चीनी बढ़ि गेल हेन तँए डॉक्टर मिठाइ खाइसँ मना कऽ देने छैथ।
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१२.जगदीश प्रसाद मण्डल- सुचिता (धारावाहिक उपन्यास) जगदीश प्रसाद मण्डल सुचिता (धारावाहिक उपन्यास) 'सुचिता' धारावाहिक रूपेँ छपब प्रारम्भ भेल 'मिथिला दर्शन'मे, जे पहिने प्रिंटमे छपब बन्द भेल आ मात्र पी.डी.एफ. मे ई-प्रकाशित हुअय लागल आ फेर सेहो बन्द भऽ गेल। आ तेँ 'सुचिता'क सेहो छपब/ ई-प्रकाशित हएब बन्द भऽ गेल। अही आलोकमे ई उपन्यास धारावाहिक रूपेँ ई-प्रकाशित कएल जा रहल अछि।- सम्पादक। सातम पड़ाव उड़ीसा राज्यक बीच राधारमणकेँ दस बर्ख भऽ गेलैन। पहिल बहाली भुवनेश्वरक पुरीमे भेल छेलैन, भुवनेश्वरसँ बालेश्वर आ पछाइत फुलवनीमे अखन पदस्थापित छैथ। छअ बजेक समय। ओना, माघमे छअ बजे साँझ भऽ जाइए आ जेठमे दिने रहैए मुदा से नहि, अखुनका समयमे सुर्यास्त तँ भऽ गेल छल मुदा रोशनी ओहिना प्रकाशित छल जेना सूर्य उगलापर रहैए...। राधारमण अपन दुनू पएरकेँ ओसारक पीलर लगा कुरसीपर ओङ्गैठ कऽ बैसल उड़ीसाक विषयमे सोचि रहल छला। मनमे रंग-बिरंगक विचार सभ उठि रहल छेलैन। उठैक कारण छेलैन जे जखन भुवनेश्वरक पुरीमे छला तखन समुद्रक संग जगरनाथ बाबाक स्थानसँ लऽ कऽ कोणार्कक सूर्यमन्दिरक संग समुद्रक कातमे गारल कबीरक खन्ती सेहो देखि चुकल छला, पछाइत वालेश्वरमे अगम-अथाह समुद्र सेहो देखि चुकल छला आ अखन फुलवनीमे बुद्धदेवक कर्मभूमि सेहो देखि रहल छैथ। तहीकाल सुवासिनी लगमे आबि दोसर कुरसीकेँ कनी सरका बैसैत बजली- -दस बरख भऽ गेल मुदा एठुनका बोली-भाषा एठुनका लोक जकाँति धुर-झाड़ बाजि नहि होइए। सुवासिनीक बात सुनि राधारमणक मनमे खौंझ उठलैन मुदा खौंझकेँ दबबैत पत्नीक विचारकेँ टाड़ैक परियास करैत बजला- -अहाँ डेरामे रहै छी, छोट आँट-पेट अछि तखन ऐठामक लोक जकाँ बजैक सिहन्ता करै छी। हम जे भरि दिन ओही समाजक बीच रहै छी से तँ नीक जकाँ बजले ने होइए, तेकर हमरा सिहन्ते ने अछि आ अहाँकेँ एहेन सिहन्ता किए होइए। अपना जनैत राधारमण सुवासिनीक बातकेँ बहटाड़ैक कोशिश केलैन। किए तँ मन किछु सोचै-विचारैक बनल छेलैन। मुदा सुवासिनीक मन गप-सप्प करैक बनल छेलैन। तहूमे पति-पत्नीक बीचक बात। कोनो कि दुनूमे सँ कियो प्रतिबन्धित थोड़े छैथ जे कोनो बात बजैक आकि कोनो विचार करैक रोक रहितैन। नहलापर दहला फेकैत सुवासिनी पुन: दोहरबैत बजली- -अपना दुनू गोरेसँ नीक सुचिता बजैए।
ओना, राधारमण बुझि रहल छला जे सुचिताक अखन बाल मन अछि तहूमे हाइ-स्कूलसँ निकैल कौलेजमे सेहो गेल अछि। एक तँ कौलेजक जीवन, दोसर जिनगीक चढ़न्त बेला, केकरा ने मन होइ छै जे हमहूँ बजन्ता बनी। जखन बजन्ता बनए चाहब तखने ने विषयक संग भाषाक मंजन सेहो करए पड़त। जखने से भेल तखने ने मज्जित जकाँ मज्जित भाषा सेहो हएत। तइ अनुकूल सुचिताक बोलीमे सुधार सोभाविक अछि। अपने तँ भरि दिन काजक पाछू बेहाल रहै छी एक्के बातकेँ भरि दिन सुग्गा जकाँ रटन्त धेने रहऽ पड़ैए, तैठाम भाषाक मज्जन करब साधारणक बात छी..! तखन तँ काजो ओही भाषाक माध्यमसँ करै छी तँए काज-जोकर भाषाक ज्ञान तँ अछिए। डेरामे पत्नीक संग मैथिलीमे गप-सप्प करू आकि उड़ियामे...। विचारकेँ चौपेतैत राधारमण बजला- -सुचिताकेँ जेते भाषाक खगता छै तेते हमरा थोड़े अछि। अहाँकेँ ते तहूसँ बेसी कम अछि, तखन अनेरे किए बोली-भाषाक विचार करै छी। अपना जनैत राधारमण एकाग्र भऽ किछु विचारए चाहै छला मुदा सुवासिनीक गप-सप्पक चाह हिनका चाहकेँ चलैये नहि दइ छेलैन। तैबीच सुवासिनी फेर बजली- -हमरा ममहर लग एकटा गाम अछि महथौर, मिथिलांचलक मध्य बसल ओइ गामक भाषा उड़िया अछि। सुवासिनीक बात राधारमणकेँ सेहो बुझल छैलैन। उड़िया सभ सौंसे गामक सम्पैत हथिया गाममे जमीन्दार सभ छला, हुनके सबहक संग भाषा सेहो आएल, जेकर चलैन सौंसे गाममे अछि। ओना, औझुका अपेक्षा पहिने जेतेक भाषा मजगूत छल से अखन नहि अछि। जिनको सबहक माता-पिता आ दादा-दादी बजैत रहैथ सेहो सभ आब बेसी मैथिलीए बजै छैथ। तेकर दोसरो कारण भेल, ओ भेल जेना पहिने विवाह-दान सीमित जगहमे छेलैन तेना आब नहि छैन, जइसँ भाषा सुधरबे केलैन अछि। सुवासिनीक गप-सप्प करैक इच्छा आ अपन अनिच्छा माने गप-सप्प नहि करैक, किछु सोच-विचार करबकेँ व्यक्त नहि करैत विचारेमे मोड़ दैत, मोड़ दइक कारण, सुवासिनीकेँ विचारमे ओझराएब रहैन...। राधारमण बजला- -जहिना अहाँ आइ.ए.मे पढ़ैत रही तहिना ने सुचिता सेहो भऽ गेल। ओना, राधारमण जीह दाबि कऽ बजला मुदा घुरछाबला सुतपुतिया भँट्टा जकाँ एकसंग अनेको विचारकेँ समेटि बाजल छला, जइसँ सुवासिनीक मन ओझरा गेलैन। ओझराइक अनेक कारण मनमे उठि गेलैन। पिताजीकेँ दुर्घटनामे मृत्यु भेल रहैन, परिवारमे एकाएक अन्हार पसैर गेल रहए...। मुदा ई बात सुवासिनीक मनमे एबे ने केलैन जे अही अन्हार-इजोतक बीच दुनियोँ चलैए आ अपनो चलै छी आ परिवारो चलैए। गामेक जे संगी सुकेशनी छल, माने लोअर प्राइमरी स्कूलसँ कौलेज धरिक संगी, सुभ्यस्त परिवार, सात लाख नगद गनि पिताजी विवाह केलखिन, हमरा के करैत? दोसर प्रश्न उठि गेलैन, माएकेँ अनुशंसापर नोकरी भऽ गेलैन, तँए ने अखनो तक परिवार ठाढ़ अछि नहि तँ आइ केतए रहितौं? -केतए रहितौं, सुवासिनीक मनमे अबिते पक्षीक एक वंश रहितो फुद्दी जकाँ सुवासिनीक मन फुदैक गेलैन। बजली- -जँए अहाँ तँए ने हमहूँ एकठाम बैस गप-सप्प करै छी, नहि तँ..! -नहि तँ..!पर सुवासिनीकेँ रूकिते दुनू हाथो आ मुहोँसँ चरियबैत राधारमण बजला- नहि तँ, की माने? एकाएक समुद्रक भवजालमे फँसिते भावुक जहिना भावना विहीन बनि जाइए तहिना सुवासिनीकेँ सेहो भेलैन। तैबीच बिहुसैत हिम्मतलाल पहुँच बाजल- -भाय साहैब, सम्मलिते गोड़ लगै छी। हिम्मतलालक गोड़ लागब सुनि राधारमण थकमकेला। थकमकाइक कारण भेलैन जे जँ अपनो असीरवाद दैत हिम्मतलालकेँ किछु कहिऐ आ पत्नियो किछु असीरवाद दिअ लगलखिन तखन असगरे हिम्मतलाल केमहर-केमहर मुँह घुमा शिरोधार्य करत, तइसँ नीक ने जे पहिने हुनके माने पत्नीएकेँ असीरवाद दिअ दिऐन। समाजोकेँ ते सएह देखै छी जे दीक्षा बँटनिहारक पथार लगले अछि। जे दिन-राति दीक्षे बाँटैए मुदा शिक्षा देनिहार केते छैथ। ओ तँ शिक्षाक स्तरमे अछिए। राधारमणकेँ से सुतरलैन नहि। अपनो परिवार आ हिम्मतोलालक परिवारक बीच जखन सुवासिनी दुनू घाट दिस तकली तखन जेते पवित्र (नीक) हिम्मतलालक परिवार देखि रहल छेली, माने विधवा माएकेँ, तेना अपन नहि देखा रहल छैन, जइसँ हिम्मतलाल लग बजैक अपन मुँह नहि देखि सुवासिनी चुपे रहब नीक बुझलैन। मनो गवाही देलकैन जे भाइये सहाएब लगा ने हमरो हिम्मतलाल गोड़ लगने छल, तोहूमे मुखौटी, जँ पएर छुबि लगने रहैत तँ एकटा बातो होइत, सेहो तँ ठरिये छल। मुहसँ बजैत हिम्मतलाल ओसारपरक एकटा कुरसीकेँ राधारमण लग सरकबैत बैसल। हिम्मतलालकेँ बैसिते राधारमण बजला- -बसमे, माने सवारी-गाड़ीमे अखन भीड़ केहेन चलैए? हिम्मतलाल बाजल- -भीड़ की भीड़ जकाँ चलैए। विवाह-मूड़नक तेहेन लगन चलैए, जे अन्हरो-डीठरा उठि जाएत। हिम्मतलालक विचार सुनि राधारमण अधखिल्लू हँसी हँसि बजला- -भने सबहक उद्धार भऽ जाएत। बजैक क्रममे राधारमण बाजि गेला, मुदा लगले मन रोकैत कहलकैन, --आजुक परिवेशमे उद्धार हएब! कोनो कि हँसी-ठठ्ठा छी। मुदा मुहसँ निकलल वाण तीर-धनुषक वाण थोड़े छी आकि बन्दूकक गोली थोड़े छी जे छुटि गेल ओ घाव करबे करत। मुँहक वाणमे एते तँ गुण अछिए जे ओकरा तोड़लो जा सकैए, मोड़लो जा सकैए आ छोड़लो तँ जाइये सकैए..! मनमे विचार अबैत-अबैत राधारमणक विचारमे ढीलपन एलैन। जइसँ मन बनि गेलैन जे अपन विचारकेँ सुधारि दोहरबैत बाजी। मुदा से भेलैन नहि। नइ होइक कारण भेलैन जे अखन तकक जे जीवन राधारमणक हिम्मतलालक बीच रहलैन, ओइ रूपेँ हिम्मतलाल अपनो विचार आ राधारमणोक विचारकेँ हँसी-मजाकक रूपमे बुझलक। हिम्मतलाल बाजल- -भाय साहैब, अन्हरो-डीठरा कि आब सस्ता रहल। विवाह बेरमे आन किछु हुअए वा नइ हुअए मुदा मोटर साइकिल चाहबे करी। ओना, हिम्मतलालक विचारक नहलापर दहला फेकैक मन राधारमणकेँ भेलैन। भेलैन ई जे केहेन बुड़िवान जकाँ बाजल अछि। मोटर साइकिल तीस हजारसँ ऊपरमे होइए, ओहन चढ़निहार जखन दस हजार बैंकक कर्ज स्वावलम्बनक जिनगी बना परिवार बसा सकैए, तखन गाड़ीक बदला नगदे किए ने लऽ कऽ आरो नमहर स्वावलम्बी बनि जीवन धारण करैए। मुदा अपने मन राधारमणकेँ रोकलकैन जे भाय जखन स्वतंत्र देशक सभ जन स्वतंत्र छी तखन सभ मन सेहो ने स्वतंत्र हएत, आ जखन सभ मन स्वतंत्र हएत तँ अहिना ने सभ धनो आ सभ कर्मोमे स्वतंत्र रूपेँ लगैत रहत। विचारकेँ मोड़ैत राधारमण बजला- -हिम्मतलाल, बहुत दिनक पछाइत दुनू भाँइ एकठाम बैसलौं हेन। शिकारी हिम्मतलाल गैंची माछ जकाँ गैंचियाइत बाजल- -भाय साहैब, उमरमे अहाँ किछु कम छी मुदा बिसराह हमरासँ बेसी छी। हिम्मतलालक बात सुनि राधारमण चौंकला। चौंकैत चारू दिस चकोना भेला जे कोन एहेन काजे आकि विचारे बिसरलौं जे हिम्मतलाल बाजल। अपने जखन भाँजपर राधारमणकेँ नहि चढ़लैन तखन मन कहलकैन जे किए ने राजा भरथरी जकाँ जोगी बनि हिम्मतेलालकेँ पुछिऐ। विचार परिपूर्ण होइते राधारमण बजला- -से की हिम्मत? नेयारल बात बजैमे जहिना मन फुहराम होइए तहिना हिम्मतलालक रहबे करइ। बाजल- -भाय साहैब, दिन आ तारीख थोड़े जीवन छी, जीवन छी ओकर क्रिया। से तँ बीचमे कोनो भेबे ने कएल। तहूमे पनरहम दिन तँ भेँट भेले रहौं। अखन एकटा काज अराधि लेलौं, तही अराधक बीचमे एलौं हेन। -काजक अराध सुनि राधारमण सुवासिनीकेँ कहलखिन- -अहाँ ने गामेक रहलौं आ ने शहरेक भेलौं। पहिने चाह पियाउ, तखन ने गप-सप्प करैमे मनो लागत आ नीको हएत। भोज ने भात, हर-हर गीतसँ काज चलत। ओना, हिम्मतलालकेँ चाह पीबैक मन नहि छल किए तँ आठ घन्टाक यात्राक पछाइत बससँ उतैरते बसे स्टेण्डमे चाहो आ बिस्कुटो खा-पीब नेने छल, मुदा राधारमण अपन नाओं लगा पत्नीकेँ आढ़ैत देने छला, तँए बीचमे किछु बाजब माने चाह पीब कि नहि पीबकेँ उचित नहि बुझि हिम्मतलाल चुपे रहल। सुवासिनी चाह बनबए गेली। हिम्मतलालकेँ असगरे देखि राधारमण बजला- -हिम्मत ऑफिसक की हाल-चाल अछि? हिम्मतलाल बाजल- -भाय साहैब, हाल-चाल की रहत जहिना हाल-बेहाल अछि तहिना चाल सेहो कुचाल भइये गेल अछि। -बेहाल आ कुचाल सुनि राधारमण चौंकला, मुदा तेकरा सम्हारि बजला- से की हिम्मत? हिम्मतलाल बाजल- भाय साहैब, अपना समैयक बात बिसैर जाउ, जे लोककेँ हाथक-हाथ काज होइ छल। आब काजक कागजक पन्नामे माने आवेदनमे अपन नोटक पन्ना नइ लगाएब तँ काज हएत। आब तँ सत्तैर सालसँ ऊपरे देशोकेँ आजाद भेना भेल, आबो जँ सार्वजनिक संस्थाकेँ अपन संस्था बुझि अपने हाथे काज नहि चलाएब तखन आजादीक फल की भेटल।
हिम्मतलालक बात सुनि राधारमण मुस्कियेबो करै छला आ मने-मन मसखरी सेहो ताकि रहल छला, किए तँ गप-सप्पमे रस भेटै छेलैन। चपरासी रहितो हिम्मतलाल अधिकारी सभ लग बजैत-बजैत निधोक बजनिहार बनियेँ गेल अछि। भलेँ अधिकारी चपरासी बुझि हिम्मतलालक बातक मोजर दिअए वा नहि दिअए। ओना, हिम्मतलालक अपन मन एते पीठ ठोकबे करै छै जे उचित बात अपना बापोकेँ कहबै। तोहूमे जहिना अपने नोकर छी तहिना ने अधिकारी लोकनि सेहो नोकरे छैथ। तखन बजैमे कोन संकोच। तही बीच सुवासिनी चाह नेने पहुँचली। तीनू गोरे माने राधारमण, हिम्मतलाल आ सुवासिनी चाह पीबिते रहैथ कि सुचिता अपन कोठरीसँ निकैल ओसारपर आबि बाजल- -हिम्मत चाचा, सुतीक्ष्णा बहीनक की समाचार? पहिने माने किछु साल पूर्व, ओना अखनो सार्वजनिक शिक्षण संस्थामे साल भरिक कोर्स होइए, जइसँ साले-साल विद्यार्थी क्लास आगू होइए, तइसँ अलग सेहो पढ़ाइक तरीका बदलबे कएल अछि जइसँ सालेमे दू-तीन-चारि क्लास विद्यार्थी बढ़बे करैए। सुचिता सेहो बारहमे सालमे मैट्रिक पास करि कौलेजमे पढ़ैए। तैसंग सुभ्यस्त जीवन स्तर माने खान-पान, रहन-सहन रहने फुटि कऽ जुआन तँ नहि, मुदा अस्फुटित अवस्थामे सेहो पहुँचिये गेल छल। ग्रामीण परिवेशक संस्कार लजपन सेहो सुचितामे दस्तक दइये देने छल, जे विचरित होइत ऐ सीमापर पहुँच गेल छल जे लजपनक वैचारिक रूप केहेन हेबा चाही। ओना, हाइये स्कूलसँ सुचितामे बजैक गुण आबि गेल छल। हिम्मतलाल बाजल- बुच्ची, आठम दिन ओकर विवाह हएत। सभ किछु ठीक-ठाक भऽ गेल। हिम्मतलालक मुहसँ सुतीक्ष्णाक विवाह खसिते ठनका जकाँ तँ नहि मुदा सघन बर्खाक बून जकाँ जरूर सबहक मनपर झहरलैन। ओना, सबहक अपन-अपन मन तँए अपन-अपन दशा-दिशा सेहो छैन्हे। राधारमण मात्र अपन वैवाहिक घटनाटा सँ परिचित छैथ तँए समाजक रूप-रंग नीक जकाँ नहि बुझै छला। माने सुवासिनीक संग राधारमणक विवाह केना भेल आ परिवारमे विग्रहसँ विद्रोह केना उठल, बस तेतबेसँ परिचित। तेकर कारणो स्पष्टे अछि जे राधारमणकेँ कौलेज जीवनमे परिवारक दुरबेवहार, दोबर श्रमिक बना देलकैन। बनाइये टा नहि देलकैन, फलो दैत रहलैन। जइसँ कौलेज जीवनक रिजल्टक संग एके तरपानमे आई.ए.एस. सेहो तरैप गेला। आत्मबलक संग आत्म-शक्ति सेहो दिनानुकूल मजगूत होइते गेलैन। जइसँ आन आई.ए.एस.सँ एते दूरी भइये गेल छैन जे पिताक आक्रोशकेँ राधारमण समन केलैन मुदा दोसराक छाती डोलाइमान रहिते छैन। ओना, अपन विवाहक भोगल घटनाकेँ राधारमण मनसँ उतारि बिसैर जकाँ गेले छैथ, जइसँ ने कहियो ओइ आक्रोश दिस मन बढ़लैन आ ने ओइपर किछु सोचि सकल छला। मुदा आइ हिम्मतलालक बेटीक विवाहक बात सुनि अपनो सुचिता नजैरपर चढ़लैन। तँए गुम्मे रहब नीक बुझि चुपे रहला। मुदा सुवासिनियो आ सुचितोक मनमे अनेको विचार माने अपन जीवनसँ सामाजिक जीवन धरिक, रंग-बिरंगक रूपमे उठए लगलैन। अपन मलीन होइत विचारकेँ सुवासिनी दबैत, बजली- -कएम बरस सुतीक्ष्णाक छी? हिम्मतलालकेँ जीहेपर सुतीक्ष्णाक जन्म दिन छल, लगले माने सुवासिनीक प्रश्नक तुरन्ते उत्तर दैत बाजल- -मेम सहाएब, ओना छी तँ अठारहम बर्ख मुदा सुचिता जकाँ जुआन नहि भेल अछि। सुभ्यस्त परिवारक खान-पानक संग रहन-सहन अनुकूल रहने सुचिताकेँ शारीरिक श्रम कम छल जइसँ शरीरक कद फौदा जुआनीक रंग जइ रूपेँ चढ़ौने छल तइ रूपेँ सुतीक्ष्णाक शरीरक कद नहि बनने ओहन रंग नहियेँ चढ़ल छल। एक तँ एकहरा देह तैपर शारीरिक श्रमक अनुकूल परिवारक स्तर खान-पान, रहन-सहन नहि रहने सुचिताक आगू सुतीक्ष्णा बचहन जकाँ छेलैहे। सुवासिनीक पुछैक कारण मनमे छेलैन जे बारहम-तेरहम बर्खक सुचिता जखन एहेन अछि, तखन सुतीक्ष्णाक उम्र केते हएत। पुरना जमानाक लोक कहै छला- अष्टवर्षे भवेत गौरी मुदा आब तँ से नहि रहल। अठारहम बर्खक पछाइत बेटीक विवाह करैक अधिकार माता-पिताकेँ अछि। कौलेजमे पढ़ैत सुचिताक नजैर विवाह पद्धति दिस बढ़ए लगल जइसँ एकसंग अनेको प्रश्न सामनेमे उठि कऽ ठाढ़ हुअ लगलै। पहिल, माइक इतिहास माने विवाह सम्बन्धी बुझल, किए तँ माइये मुहेँ सुचिता सुनि चुकल छल। दोसर कौलेजमे ओहन घटना सेहो देखि चुकल छल जे बी.ए.क लड़को आ लड़कियो, पढ़ाइ छोड़ि, गाम-घर छोड़ि कोलकातामे जा कऽ काली मन्दिरमे बिआहो केलक आ एक्के कारखनामे दुनू ऑफिसक किरानीक रूपमे नोकरियो करैए आ गाममे दुनूक माता-पिताक बीच गारि-गरौबलि, मारि-पीटक संग मुकदमाबाजी सेहो चलि रहल अछि आ लड़का पक्षक जहलो यात्रा भइये गेल अछि।
सुचिताक मन धारक बहैत धारा जकाँ आगू बढ़ल। आगू बढ़िते अपन परिचित, परिचित ऐ मानेमे जे सुचिताक देहमे कोनो रोग भेने एकटा डॉक्टरनी लग जाइए जैठाम गप-सप्पक क्रममे जानकारी भेलै जे एम.बी.बी.एस. पास लड़कीक विवाह जँ एम.बी.बी.एस. पास लड़कासँ कमसँ करब समाजमे हँसरात हएत। मर्द भलेँ महान वैज्ञानिके वा महान विचारके किए ने होथि मुदा विवाह साधारणो पढ़ल-लिखल वा नहियोँ पढ़ल-लिखल कन्याक संग हँसी-खुशीसँ मनौले जाइए। अपन हँसारत बुझि ओइ एम.बी.बी.एस.क विवाह पिता जखन करए लगला तखन अपन बेटीक पढ़ाइक खर्च मनमे नाचि उठलैन। मुदा उपाय की? तीन बीघा अपन बपौती सम्पैत बेचि बेटीक विवाह केलैन। यएह छी अपन समाजक उच्च पढ़ल-लिखल परिवारक आचार-विचार। सुचिताक मनमे विद्रोहक लहैर जगल। मुदा माता-पिताकेँ सोझामे बैसल देखि मनकेँ थतमारि चुपे रहल। राधारमण बजला- -हिम्मत, केहेन परिवारमे बेटीक विवाह कऽ रहल छह? हिम्मतलाल मनोनुकूल परिवारमे बेटीक विवाह ठीक केने छल जइसँ मनमे खुशी रहबे करइ। बाजल- -भाय साहैब, जहिना अपन परिवार अछि तहिना ओहो परिवार अछि। जातीय कुल-गोत्रक मिलान सेहो एक स्तरक भेने एकरंग मानल जाइते अछि, भलेँ ओइ बीच आर्थिक वा शैक्षणिक दूरी कोसो मील किए ने हुअए। यएह विचार राधारमणक मनमे जागि गेलैन जइसँ पुन: दोहरबैत बजला- -की अपना सन परिवार? राधारमणक विचारकेँ सोझ रखैत हिम्मतलाल बाजल- -भाय साहैब, जहिना अपन बेटी बी.ए.मे पढ़ैए तहिना लड़का सेहो बी.ए. पास कऽ एम.ए.मे नाओं लिखौलक अछि। आगू बजैक विचार हिम्मतलालक पेटेमे छल कि बिच्चेमे राधारमण बजला- -वाह..! राधारमणक -वाह सुनि हिम्मतलालक मनमे अपन काजक प्रति आरो बिसवास जगल। बिसवास जगिते बिहुसैत बाजल- -भाय साहैब, हमरे जकाँ लड़काक पिता सेहो अनुमण्डल कार्यालयमे चपरासीक नोकरी करै छैथ, दुनू गोरेक दरमाहा सेहो एकरंगाहे अछि। अपना जनैत हिम्मतलाल दुनू परिवारक अधिक-सँ-अधिक समरूपता देखबए चाहै छल मुदा राधारमणक पारखी नजैर दोसर दिस मुड़ि गेल छेलैन। बजला- -तोहर परिवार केतेटा छह आ हुनकर परिवार केतेटा छैन? राधारमणक भीतरिया समझ छेलैन जे बेटो-बेटी तँ परिवारक भारी समस्या छीहे। आजुक परिवेश एहेन बनियेँ गेल अछि माने दान-दहेजक, जे इमानदार किरानी-चपरासीक कोन बात जे इमानदार अफसरो जँ चारियोटा बेटी परिवारमे देखै छैथ तँ अपन जिनगियो भरिक दरमाहासँ ऊपरे खर्च मनमे चढ़ि जाइ छैन, तैठाम जिनगी भरि अपन परिवार चलब पहाड़ोक रस्तासँ बीहड़-दुर्गम भइये जाइए। तहिना जँ जेरगर बेटा रहल माने चारि- पाँच, छह-सात तँ चाहे खेत-पथार हुअ आ कि अपन नोकरीक दरमाहाक संग पेंशन हुअए, बन्दर-बाँटमे पड़ने परिवार चलबकेँ दुभर-दुर्गम सेहो बनैबते अछि। अपन मनक उठैत विचारधाराक बेगकेँ ऋृषि-मुनि जकाँ राधारमण अपना माथक केशक जटामे समेटि लेलैन, किए तँ अखन सोझामे हिम्मतलाल बेटी-विवाहक काजे आएल अछि। लोकक स्थिति जे रहौ मुदा परिवारक जीवनक जे ढाँचा अछि ओकरा पुरबैत चलबे ने जीवन भेल। आकि माया जकाँ पैछला पुरुखाक आ मोह जकाँ ऐगला पीढ़ीक एक्कैसम वंशक धिया-पुता केना रहत की खाए-पीअब तेकरो पुरबैक भार हमरे अछि। जइ स्तरसँ राधारमण बाजल छला, तइसँ ऊपरेक ऊपर माने भेल निम्न स्तरमे हिम्मतलालक विचारधारा अछि। अपन धाराक अनुकूल हिम्मतलाल बाजल- -भाय साहैब, अपन परिवार तँ बुझल-गमल अछि मुदा तेना भऽ कऽ हुनकर माने जिनकासँ कुटुमैती हएत, परिवार नहि बुझल अछि। विचारकेँ आगू बढ़बैत राधारमण बजला- -एते काल जे गप-सप्प भेल, ओ कुशल-क्षेममे गेल। दूरक सफरसँ एलह अछि, तहूमे काजे एलह अछि, तँए थोड़ेकाल निसचिन्त होइमे लगबे करतह। विवाह काज नहि परिवारक यज्ञ छी, तँए असथिरसँ गहन विचार करैक अछि। राधारमणक विचार हिम्मतलाल बुझि गेल। अपन जान हल्लुक बनबै पाछू लगबैत बाजल- -भाय साहैब, अनाड़ी-धुनारी ले एते दूरक बसक सफर जनमारा होइए। कोनो कर्म बाँकी नहि रहल। तेहेन भीर बसमे छल जे बुझि पड़ए जान निकैल जाएत। रातिक दस बजे। खेला-पीला पछाइत राधारमण हिम्मतलालकेँ कहलखिन- -हिम्मत, जइ काजे एलह, एक हरफी पहिने बाजि जाह। कचहरिया पीच्छड़ लोक हिम्मतलाल अछिए। बाजल- -भाय साहैब, अपन बात ने एकहरफी बाजि जाएब, मुदा माइयक समाद भिन्न छैन, घरवालीक फुट अछि, सुतीक्ष्णाक अलगे अछि। तँए एकहरफी केना बाजि सकै छी। जहिना कोनो पोथीक विचारकेँ पोथीक शीर्षकक रूपमे राखल जाइए जइसँ पढ़निहारक कान आँखिसँ देखिये कऽ ठाढ़ भऽ जाइए तहिना सुवासिनियोक आ सुचितोक कान ठाढ़ भेल। कानो किए ने ठाढ़ होएत, जखन दुनूक बीच पारिवारिक सम्बन्ध अछि तखन परिवारक सभक सम्बन्ध ने अपन-अपन भेल। राधारमण बजला- -चाहे नख-शिख वर्णन लिखह आकि शिख-नखक वर्णन लिखह, बात बरबरिये भेल, दुनू लिखिनिहार श्रेष्ठ सृष्टिकर्ता भेबे केला। जहिना तोहर विचार हुअ तहिना बाजह। हिम्मतलाल बाजल- -भाय साहैब, जहिना अपना मनमे अछि तहिना माइयोक इच्छा छै, जे अपने विवाहसँ चारि दिन पहिने सभ परिवार आबि कऽ मिथिलाक जे विवाहक बेवहार अछि ओइ बेवहारे अपन बेटीक विवाह करब। से तँ अपने सभ परिवार रहने ने सम्भव भऽ सकैए। ओना, चारि दिनक समय आ मिथिलाक बेवहार, केना सम्भव हएत। राधारमणक मनमे नाचि उठलैन। कहू जे चूड़ाक धान पहिने ताड़ल जाइए, पछाइत भाड़ल जाइए, तखन सुखौल जाइए पछाइत ने कुटोल जाइए, से केना चारि दिनमे सम्भव अछि। अदौरी कि बर-बरी बनबैमे कम मेठैन अछि से चारि दिनमे केना हएत। तहूमे अदौरीकेँ सुखैयेमे समयक हिसाबसँ दुइयो दिन लगैए आ पाँचो दिन नइ लगैए सेहो बात नहियेँ अछि। तैसंग घर-दुआरक लिखिया-पढ़िया माने चित्रकारीसँ शुभ सन्देश लिखै धरि, सेहो अछि। तहूमे आन काज छी नहि जे एको-दुइयोटा चित्रकारीसँ काज चलि सकैए। विवाह सन यज्ञ छी। कोहबरसँ राज-सिंहासन तकक चित्रकारी करैक काज अछि। मुदा मनकेँ मिथिलाक दृश्य हटा राधारमण मन मिथिलाक दिशा दिस मोड़ैत विचार करए लगला। मिथिलाक दृश्य की? वएह ने जे जे कोनो काज, चाहे साधारण जीवनसँ जुड़ल हुअए आ उच्चकोटिक यज्ञ स्वरूप हुअए, जेते मनसँ मथन-मथि करैत करब ओते ओ नीकसँ नीकतम होइते जाइए। यएह छी मिथिलाक दर्शनक दर्पण। जेना कोनो भोज्य वस्तु अछि, ओकर उपयोग साधारणो ढंगसँ होइए आ अधिक-सँ-अधिक नीक बना सेहो नइ भऽ सकैए, ईहो बात नहियेँ अछि। तहिना, आनो-आन जीवनसँ जुड़ल जे काज अछि तहूमे नीक हेबे करत। मुदा संजोग रहल जे हिम्मतलाल अपन विचारकेँ, सन्मुख धार जहिना अपन धाराकेँ प्रवाहित रखितो धारक अगल-बगलमे मुँह बनबैत दोसरो धाराक धार बना प्रवाहित करैत आगू बढ़ैए तहिना हिम्मतलाल अपन विचारकेँ यथास्थितिमे समेटि बाजल- -भाय साहैब, की कहब। बुढ़ियाक रंग-ढंग दोसरे छैन। हिम्मतलालक माइक रंग-ढंग दोसरे छैन सुनि जिज्ञासा करैत राधारमण बजला- -की दोसरे? हिम्मतलाल बाजल- -भाय साहैब, भोर होइते चरियाबए लगैए जे राधारमण बौआसँ भेँट भेना बहूदिन भऽ गेल। वेचारे केना रहैत हेता केना नहि से कनी बुझब। ओना, मोबाइलसँ गप-सप्प होइते छैन, मुदा तइसँ मन थोड़े भरै छैन। हिम्मतलालक मुहसँ माइयक बात सुनि राधारमणक मन जहिना निछोह दौड़ैत अपन माए लग पहुँचलैन तहिना सुवासिनीक मन सेहो अपना माएपर पहुँचलैन। तैसंग सुचिताक मन सेहो अपन माइयक जीवनक ओइ घटनापर पहुँचल, जखन राधारमण विवाह करैमे अपन परिवारसँ विद्रोह केलैन आ अखनो वागी बनल छथिए। देखू हे सखि दुनियाँक रीत एक घर कानै एक घर गीत..। कियो अपन जिनगीक कमाइ लुटाइत देखि कनैए तँ कियो ओही लूटलकेँ भोगि हँसबो करिते अछि। समाजो तँ समाज छीहे। अट्ठारह बर्खक पछाति लड़कीक आ तइसँ ऊपरे उमेरक लड़काक विवाह करब तँ तीन-चौथाइ समाज मानि चलैनमे आनि नेने छैथ मुदा अपन स्वेच्छासँ, वयस्क भेला पछातियो, लड़का-लड़कीक विवाहमे अपन विचारक कोनो मोल अछिए नहि। गाए-महींस जकाँ खरीद-बिक्री भऽ रहल अछि आ सभ मुँह देखि रहल अछिए। तहूमे युवा वर्गक जे खास समस्या छी तइ दिस कियो तकनिहार नहि। वाह रे आजुक पढ़ल-लिखल समाजक नव पीढ़ी। विवाह परिवारक ओहन महान कृत्त छी जे वैचारिक रूपमे फूलसँ हल्लुको, फलसँ मीठो अछि आ असान जीवनो बना सकैए, से कियो देखिये ने पेब रहल अछि।
ओना, सुचिताक चेहरा देखि राधारमणक मन सेहो व्यग्र भऽ रहल छेलैन, मुदा आलमारीमे पोथी रखनिहारक मनमे एते आशा तँ बनले रहैए जे समय एलापर वा लगलापर निकालि देखि लेब। तँए राधारमण अपन विचारकेँ प्रस्फुटित होइसँ रोकने छला आ मने-मन आँकि रहल छला जे हिम्मतलाल अपन मान-मरजादा रखैत अपन बेटीक विवाह ठीक केलक अछि। मुदा तैयो मनमे एकटा विचार घुरियाइये रहल छेलैन जे अनमेल विवाहकेँ सममेल केना बनौल जाए। अनमेलक कारण अखन नहि, किए तँ जे बाधा अनमेल ठाढ़ केने अछि ओ समाजकेँ विग्रह करबेकेँ नीक बुझैए...। राधारमणक मनमे घुरिया ईहो रहल छैन जे जखने लड़का-लड़कीक जीवनक मिलान, माने जहिना दूटा धार पाछूसँ बहैत आबि रहल अछि, ओइ दुनूक मिलान एक स्थानपर हएब अछि तैठाम दुनू प्रवाह माने पैछला जिनगीक प्रवाह आ सम्मिलित रूपमे एक दिशामे ऐगला जिनगी केना प्रवाहित हएत, एकरा बुझब तँ अछिए। मुदा अपनाकेँ बैसारक बीच, श्रेष्ठ बुझि अपन कोनो विचार बेठौर उपयोग नहि करए चाहि रहल छला। सुचिताक मुँहक रूखि देखि जहिना राधारमणक मन मथन करैत रहैन तहिना हिम्मतलालक मनमे सेहो उठि रहल छल, मुदा तेकरा दबा नहि हिम्मतलाल बाजल- -बौआ सुचित, तोरा संगे नेने अबैले सुतीक्ष्णा कहलक अछि, से...। ओना, सुचिताक मन दोसर दिस माने समाजक रीति-रिवाज दिस औना रहल छेलै मुदा हिम्मतलालक बात सुनि एकाएक मनकेँ जे सुचिता मोड़ि रहल छल ओ समुचित ढंगसँ नहि मुड़ि सकलै जइसँ मुहसँ निकललै- -चाचाजी, हमरो किछु..? -हमरो किछु सुनि हिम्मतलाल बाजल- -एना किए मुड़ी छोपि तम्मा जकाँ सुचित बजै छह, खुलि कऽ बाजह। अखन अपने सभ ने एकठाम बैसल छी, कियो आन थोड़े अछि जे बजने अपने वा परिवारेक तौहीन हएत। परिवार छी, परिवारक सभ जनक विचारक समावेश परिवारमे नहि होइत रहत तँ एक ने एक दिन गुड़ घाँव जकाँ सड़ि कऽ फुटबे करत, जइसँ नोकसान हेबे करत। ओना, सुचिताक मन तमतमाएल रहबे करै मुदा मनकेँ केना काबू कएल जाए तेकरो अभ्यास थोड़-थाड़ भइये गेल छेलइ। ओना, काबू करैक जगह अलग-अलग अछि, विचारकेँ विचरण भाव सुधारि, अभावक पूर्ति भऽ सकैए, मुदा क्रियाक दौड़मे तँ किछु ने किछु नोकसान, माने तमतमाएल मने काज केने, ओकर क्रियागत रूप जे अछि तेकर किछु-ने-किछु अंग बनियेँ गेल रहैए। ओना, रसे-रसे, सुचिताक मनमे जे तमतमी छल, ओ धीरे-धीरे थीर भऽ रहल छल। थीर होइक कारण भेल जे हिम्मतलालक मुहसँ एक परिवार सुनि चुकल छल। जखन परिवार छी, परिवारमे बच्चासँ वृद्ध धरि रहै छैथ, तखन सभ कियो बैस जँ कोनो विचार परिवारक करैक रहत तैठाम प्रजातंत्र जकाँ अनुभवी आ अनाड़ीक विचारक महत थोड़े एकरंग हएत। एक गोटा नमहर जिनगी बीता दुनियाँकेँ देखियो चुकल छैथ आ भोगियो चुकल छथिए, आ दोसर माने बच्चा, कम देखने-भोगने अछि, तैठाम तँ अपने ने विचार करए पड़ैए जे कोन विचारक केहेन महत अछि। एहने विचार सुचिताक मनक तमतमीकेँ नम-नमी दिस बढ़ौलक जइसँ पिताक विचार बुझैक जिज्ञासा मनमे जगि गेलइ। नम होइत सुचिता बाजल- -चाचाजी, अहाँ समाजमे बेटी-विदागरीक की रीति अछि? ओना, सुचिता अपन मैथिल रीतिकेँ नजैरमे रखि बाजल छल, किए तँ अपना ऐठामक पुरान चलैन छल विवाह आ दुरागमनक दुनू प्रक्रिया। अखनो किछु अंशमे अछिए, जे विवाह भेला पछातियो कन्या नैहरमे माने माता-पिताक ऐठाम रहै छैथ आ लड़का अपनो गाम आ सासुरोमे रहि सकैए। खाएर जे अछि, समयक हिसाबे जेते उपयोगी छल, ओते आजुक परिवेशमे नहियेँ रहल। समाजो बदलल अछि, व्यस्तता एते बढ़ि गेल अछि जे जइ विवाहक बरियाती तीन दिन रहि विवाह पद्धतिक पूर्ति करै छला, से अखन ओहन भऽ गेल अछि जे तीनदिना एकदिना भेल आ एकदिना खाइ भरि धरिक भेल जा रहल अछि। ओना, हिम्मतलाल ऐ बातकेँ बुझैत जे सुचिताक मन अखन साठियो हजारसँ बेसीक रफ्तारमे दौड़ैत हेतइ, हमरा-सभ जकाँ बन्होटा बरद जकाँ परिवारक कौल्हु नहियेँ भेल हेन मुदा जखन चाचा कहैए आ अपनो बी.ए. पास केनहि छी तखन तँ ओहन जवाब दिअ पड़त ने जे समतूल होइ। हिम्मतलाल बाजल- -बाउ, समाजोक जाल महजाल बनि विकराल अछि, तँए एक बेवहार चलब कठिन अछिए। ओ तँ मनुखक जिनगीक स्तरक हिसाबसँ बदैलते अछि मुदा किछु एहनो तँ अछिए जे रूढ़ बनि रूढ़िया रहले अछि। तँए किछु...। हिम्मतलालक विचार सुनि राधारमण, एतेकाल जे कनडेरिये नजैर देखियो रहल छला आ कनडेरिये काने सुनियो रहल छला तेकरा बदैल सोझ केलैन। तैबीच सुचिताक नजैर सेहो पितापर पड़ल। ओना, जखन राधारमण सोझ नजैर बना आगू तकलैन तँ पत्नी सुवासिनी, बेटी सुचिता आ मित्रवत हिम्मतलालकेँ सेहो देखलैन। तीन मुहाँनी रस्ता जकाँ लोकक बैसारक बीच राधारमण अपनाकेँ पेलैन, तँए मनमे एलैन जे किए ने विचारक ओहन प्रवाह प्रवाहित करी जे जहिना कोनो धारक बाढ़िक पानि खेत-पथार, पोखैर-इनारक पानिकेँ संग केने बाढ़िक रूपमे बनबैत आगू बढ़ैए तहिना सबहक विचारक बाढ़िमे होइ। विचार व्यक्त करैक चौरस-समतल भूमि देखि राधारमण बजला- -अखन बेसी पाछूक विचार दिस जाइ-के नहि अछि, जँ एतबो विचार सभक बीच समगम भऽ जाए, जेते गोरेक बीचक जीवनक अछि, मुदा से छुछुन बुझि पड़ैए। -छुछुन शब्दक माने हिम्मतलाल नीक जकाँ नहि बुझि पेलक, सुवासिनी देहक छुछुन आँगी जकाँ छुछुन शब्दक माने बुझली, मुदा सुचिता राधारमणक विचरण विचारक भावक शब्द रूपमे बुझि गेल। ओना, शब्द भावसँ जहिना मनक एक कोण बिहुसल तहिना दोसर कोण विह्वल सेहो भेल। तइसँ भावुक भऽ सुचिता बाजल- -की छुछुन, पिताजी? सुचिताक प्रश्न सुनि जेना हिम्मतलाल अकबकाएल तेना सुवासिनी तँ नहि अकबकेली मुदा चौंकली जरूर, जे की बुझि सुचिता एहेन प्रश्न उठौलक? ओना, राधारमण नजैर उठा-उठा हिम्मतोलालपर दैथ आ सुवासिनीयोँपर, किए तँ हिनका मनमे उठि रहल छेलैन जे जाबे कियो अपन विचार अपना मुहसँ नहि निकालत ताबे ओकर पेटक बात प्रवाहित केना हएत। मुदा तइसँ पहिलुके अवस्थामे सुवासिनियोक आ हिम्मतोलालक मन ओझराएल छल, जइसँ दुनूक मन अपन ओझरी सोझरबैमे लागल छेलइ। तँए विचरित मनकेँ मनक मोनियेँमे उगैत-डुमैत देखि राधारमणक मनमे उठलैन जे नीक हएत, वैवाहिक जीवनक महत बुझैले विवाह की छी, पहिने तइ दिस बढ़ी। बजला- -बाउ सुचित, आमक सुआद केहेन होइए, ओइमे पक्कल गुद्दा वा रसक की सुआद आ गुण अछि, डमहाएल-अधपक्कुक की अछि आ काँचक की अछि। काँचोमे खिच्चो काँच अछि आ अधखिच्चो अछि आ जुआएलो तँ अछिए। तँए नीक हएत जे जहिना तोरामे बुझैक जे जिज्ञासा छह, ओइ जिज्ञासा पाछू कोनो विचार विचरण मनमे करैए, जइ आधारपर प्रश्न उठैए तँए भाँग-बथुआ जे बुझैत हुअ से बाजह। हमरा लग नइ बजबह तँ दुनियाँक बीच केना बाजि पेबह। एक तँ नवसीन सुचिता, तहूमे कौलेजक संगी सबहक बीच बजन्ता सुचिता, माता-पिताक बीच सुचिता, एक परिवारसँ दोसर परिवारक बीच सुचिता, उमेरक हिसाबसँ सभसँ कम सुचिता, बाजल- -बाबूजी, एक तँ हमर उमेरे की अछि जे केते देखलौं हेन, मुदा जएह देखलौं हेन तइमे किछु-किछु समरूपतो अछि आ किछु-किछु विसमतो तँ अछिए। सुचिताक विचार सुनि राधारमण पत्नी दिस देखए लगला जे परिवारमे बच्चासँ ऊपर माए आ माएसँ ऊपर ने पिता होइ छैथ, जँ से नहि हएत तँ परिवारमे खाधि बनैक सम्भावना बनियेँ जाइए। एहनो तँ सम्भव अछिए जे पिताक विचारक पछाइत माए अपन विपरीत विचार दैथ, तखन? दुनियाँक सभ कथूक दू रूप अछि एक अन्हार पक्ष अछि दोसर इजोत पक्ष। अन्हारो इजोत बनैए आ इजोतो अन्हार नइ बनैए सेहो नहियेँ कहल जा सकैए...। राधारमण बजला- -बाउ सुचित, पद्धतिक हिसाबसँ विवाह अपन-अपन सुविधानुकूल परिवेशक हिसाबे चलिये रहल अछि। तही बीच नीक-बेजाए सेहो अछिए। मुदा बेवहारिक रूपमे जे विषमताक विकरालता माने जीवनक बीच बाधाक खाधि, बनि रहल अछि, ओ तँ जेकर समस्या छिऐ, मूल कर्ता वएह भेल। तँए ओकरा ई बात बुझैक छै जे जखन हम अठारह बर्खसँ ऊपर भऽ गेलौं तखन अपन जिनगी केना चलत सेहो बुझैक अवगैत तँ अपने ने बनबए पड़त। पिताक विचार सुनि सुचिता चकोना होइत चारू दिस उनैट-उनैट देखैत बाजल- -अगर, लड़की अपन जीवनक निर्णय स्वयं करै तँ पिताकेँ कोनो कलेश हेबा चाही? राधारमण- -नहि! नहि हेबा चाही। मुदा अनुभवी माता-पिताक बिसवासक संग जँ सम्बन्ध बनए। ऐसँ आगू अखन नहि। किए तँ हिम्मतलाल सेहो यज्ञक दौड़मे आएल अछि अपनो ने सुतबोक अछि जे काल्हि दिनक ड्यूटी सेहो करए पड़त। बसक यात्राक थाकल हिम्मतलाल रहबे करए तँए कखनो भकुआएलमे -हूँ तँ बाजि दिअए मुदा सुनए नहि। मुदा सुवासिनी अपन माइक संग अपन सुचिताकेँ एकधारा धारमे देखि रहल छेली। (समाप्त) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१३.जगदीश प्रसाद मण्डल-धुरफन्ना लोक(लघुकथा) जगदीश प्रसाद मण्डल धुरफन्ना लोक रातिमे एकटा घटना भेल, जइ कारणेँ भोरेसँ लोकक बीच चुलबुली शुरू भेल। जे-जे सुनै ओ कोनो-ने-कोनो रूपमे अप्पन पक्ष राखि पक्षपाती बनए लगल। जेठ मासमे जहिना कोनो साल सुखाएल धारमे बाढ़ि आबि माछक अमार लगबैए, तहिना गाममे भेल। गामक अधिकांश लोक घटनामे सम्मिलित भइये गेला। केतौ पाँचटा दसटा पुरुख एकठाम बैस तँ केतौ पाँचटा दसटा मौगी एकठाम बैस घटनाक समीक्षा करए लगलैथ। तहिना केतौ मौगी-पुरुख मिज्झर भऽ निराकरणमे लागल तँ केतौ लुल्हा-नेंगरा सेहो...। अपने दरबज्जापर बैस हिऐबते रही कि जे चाह पीबैले कोन चौक दिस जाएब नीक हएत। ऐठाम चाह पीबैक बहानासँ गामक समाचार जानब अछि। गाममे दस-पाँच दोकानक चौक-चौराहा बनियेँ गेल अछि। गामक लोकमे जे जेहेन शिकारी से तेहेन समाचार एकत्रित करिते छैथ। कहब जे समाचार तँ समाचार छी जे कोनो चौक-चौराहाक किए ने होउ तइमे फेड़-बदल की हएत.? हेबे करैए, किएक तँ अनेको रूपमे प्रमुख रूपसँ कोनो घटनाक तीन रूप चौक-चौराहापर अबैए। एक चौकक रूप घटनाक पक्षमे होइए तँ दोसर चौकक रूपक आवाज विपक्षमे होइते अछि। तहिना तेसर चौकक विचार मिलल-जुलल सेहो होइते अछि। माने, की गलती आ की सही। पत्नी चाह नेने दरबज्जापर पहुँचबे केलीह कि रस्तापर भोगीलालकेँ अबैत देखलिऐ। मनमे ठहैक गेल जे हालक सभ समाचारक भाँज नीक जकाँ लगि जाएत। ओना, भोगीलालक बेवहार अपना संग कहियो अधला नहि रहल अछि, जेना लोकक मुहसँ सुनै छी। तेकर कारणो अछि जे अप्पन जीवनक असारे-पसार कम अछि, तँए बेसी लोकक खगता नहियेँ होइए जइसँ लोककेँ चिन्हैक अवसर भेटत। मुदा एते तँ कानसँ सुनबे करै छी जे गाममे भोगीलाल सन धुरफन्ना लोक दोसर नहि अछि। की धुरफन्ना अछि आ लोक की धुरफन्ना बुझै छैथ से तँ गामक साढ़े पाँच हजार लोकक मन जनतैन मुदा अपना मनमे से सभ किछु ने अछि। लोको तँ लोक छीहे, केतौ कोनो घटनाक जँ पक्षकार होइ छैथ तँ सुन्नर-सुडौल शब्दमे बजै छैथ आ केतौ घटनाक विपक्षकार रहल तँ चिक्कन-चुनमुन शब्दमे बजिते छैथ। खाएर जे छैथ, ओ गाम-गामक लोक अप्पन-अप्पन गाम-समाजक बात बुझता। भोगीलालकेँ देखि पत्नीकेँ कहलयैन- "एक गिलास चाह आरो नेने आउ।" चाह आनए पत्नी आँगन दिस बढ़ली आ अपने भोगीलाल दिस देखैत बजलौं- "भोगीलाल, तूँ बहुत दिन जीबह।" जहिना कोनो रचनाकारक रचित विचार बेर-बेर दोसराक मुहसँ निकलने आयुमे वृद्धि होइ छैन तहिना ठिकियाकऽ भोगीलालकेँ देखि बाजल छेलौं। मुदा भोगीलाल तँ भोगीएलाल छी, कखन भोगीलाल बनल रहत आ कखन जोगीलाल बनि जाएत, तेकरो कोनो ठेकान नहियेँ अछि। ..जहिना बजलौं तहिना ठोराहि मौगी जकाँ, माने बिनु सोचने-विचारने कोनो प्रश्नक उत्तर दइबाली, जिनका दोसर रूपमे ठोरेपर बरी पकबैवाली सेहो कहल जाइ छैन, तहिना भोगीलाल बाजल- "काका, अहाँ सबहक आसीरवादसँ ने जीबो करै छी आ जीबो करब।" तैबीच पत्नियोँ चाह नेने आँगनसँ पहुँचली आ भोगीलाल सेहो दरबज्जापर आबि बैसल। पत्नीकेँ रौतुका घटनाक भनक लागि गेल रहैन। अँगने बाहरैकाल मनमोहनवाली भौजी कनफुसकी कहि देने छेलखिन जे केतौ बाजब नहि। तँए पत्नी हमरोसँ छिपाइये कऽ रखने छेली। बजली नहि। पति-पत्नीक बीच सेहो बिचौलिया प्रबल अछिए। जहिना कारोबार करैत एजेन्ट सभ करैए। सुधंग स्त्रीगणकेँ पोल्हा बजैए जे पाइ-कौड़ीक मामला छी, केतौ बाजब नहि, आ कनतोरीमे राखल गहना-जेबर ठकि लइए। पत्नीक हाथमे चाह देखिते भोगीलाल बाजल- "भाय साहैब, भरि राति जगले छी।" जहिना भोगीलाल बाजल तहिना अपनो बजलौं- "चाह पीब लएह, नीनक भक टुटि जेतह। तखन गाम-घरक गप-सप्प करब।" ओना, अनका लगमे भोगीलाल जेहेन सरपट मुँह खोलैए तेना अपना लगमे नहि खोलैए मुदा सरपट ढोलक बजौनिहारक हाथ जहिना कखनो-कखनो बहैक जाइ छै, तहिना सरपट बजनिहारक मुँह सेहो बहैक जेबे करै छइ। ..भोगीलाल बाजल- "भाय साहैब, गाम-घरक गप अथाह अछि। केकर मजाल छी जे गाम-घरक थाह पौत।" भोगीलालक विचार किछु सोहंतगर सेहो लगल आ किछु अनसोहंतगर सेहो लगबे कएल। पुछलिऐ- "से की भोगी?" आदरपूर्वक किनकोसँ कोनो विचार पुछलापर जहिना मान-अपमानक विचार मनमे जगिये जाइ छैन, तहिना भोगीलालकेँ सेहो भेल। तैबीच गिलासक आधासँ बेसी चाह पीब नेने छल। भोगीलाल बाजल- "भाय साहैब, अखन गाममे एकटा नव घटना घटि गेल अछि, तँए गामक जड़िक चर्च अखन नइ करब। मुदा संक्षेपमे तँ एते कहिये देब जे कोनो गाममे केते रंगक माटि अछि, केते रंगक पानि अछि, केते रंगक गाछ-बिरीछक संग अन्न-पानिक उपजो-बारी आ उपजौनिहारो केते रंगक छैथ से थाह लगाएब असान थोड़े अछि.!" भोगीलालक तथ्यपूर्ण विचार अपनो मनमे ठहकल। ठहैकते बजलौं- "अखन पुरना गप-सप्प छोड़ह। हालक जे हालत अछि तेतबे गप करह।" भोगीलाल बाजल- "भाय साहैब, काल्हिसँ आइ धरिक जे घटना अछि अखन तेतबे कहै छी।" अपनो नीक बुझि पड़ल। अनेरे अठारहो पुराणक चारि लाख मंत्रश्लोक पढ़ै पाछू जे अप्पन अस्सी बर्खक उमेर खपा लेब आ पाएब किछु ने, तइसँ नीक ने जे वेदक एक्के लाख मंत्रकेँ जपैत पाँच लाख मंत्रक भोग भोगि लेब। तेकर माने ई नइ बुझब जे वेदक मंत्र मनुक्खक वृद्धि विकासक संग-संग चलबो करैए, निरमैबतो अछि आ पैछलाकेँ छोड़ितो तँ अछिए। ..बजलौं- "अपना जे नीक बुझि पड़ह, सएह बाजह।" अपन दशा-दिशा व्यक्त करैत भोगीलाल बाजल- "भाय साहैब, की कहब। दिन-राति जइ समाजक पाछू, माने गामक समाजक पाछू, समय खपबै छी सएह समाज धुरफन्ना लोक बुझैए।" -धुरफन्ना शब्द तँ बहुत दिनसँ सुनैत आबि रहल छी मुदा गुनलौं कहियो ने, तँए धुरफन्नाक वास्तविक रूप अखन तक नहियेँ बुझिमे आबि सकल अछि। बजलौं- "की धुरफन्ना भोगी?" भोगीलाल बाजल- "भाय साहैब, पाणिनि व्याकरण तँ नहि पढ़ने छी जे ध्वनिक आधारपर बाजब, मुदा गामक लोक जेना बेवहारमे बजै छैथ तेना कहै छी।" बजलौं- "हँ, सएह कहह?" भोगीलाल बाजल- "धुरफन्ना लोकक माने भेल जे जहिना समाजमे किछु एहेन लोक होइ छैथ जे सामाजिक बन्धनक रास्ताक विचारकेँ नहि मानि, सीमाक उल्लंघन करै छैथ तहिना खेतक आड़ि-धुरकेँ माने खेतक सीमा-सरहदकेँ नहि मानि कुदिकऽ टपैबला सेहो छैथ, वएह ने भेला धुरफन्ना लोक।" भोगीलालक विचार मनमे नीक जकाँ जँचल कि नहि से धड़फड़मे विचार नहि कऽ सकलौं मुदा एते तँ मुहसँ निकैलिये गेल- "हँ, से तँ सएह ने भेल।" समर्थन पेब आकि मनक उदवेगमे भोगीलाल बाजल- "भाय साहैब, अखन बीतल दिनक घटनाकेँ बीर्तमान नहि बीतल मरल मानि छोड़ि दइ छी, कौल्हुका जे दिन-रातिक अछि तेतबे कहै छी।" भोगीलालक विचार अपनो नीक बुझि पड़ल। बजलौं- "कौल्हुके दिनपर ने औझुका दिन ठाढ़ हएत, तँए कल्हुके भरिक कहह।" भोगीलालक मन मानि गेल जे बेसी-दिनक ऐगला-पैछला विचारमे ने कम-बेसी होइए मुदा टटकामे तँ से नइ हएत। भोगीलाल बाजल- "भाय साहैब, काल्हि दूटा घटना भेल, दिनक घटना बेकतीगत रूपक छल तँए ई पाछू-के कहब मुदा रौतुका जे भेल से पहिने कहै छी।" बातकेँ बतंगर होइसँ रोकैत बजलौं- "हँ, सएह कहह।" भोगीलाल बाजल- "गाम-समाजमे आइये नहि, सभ दिनसँ उपद्रवी तत्त्व रहल अछि से तँ बुझिते छी, आ ईहो तँ बुझिते छी जे अप्पन गाम किसानक गाम छी।" बिच्चेमे बजा गेल- "हँ, से तँ छीहे.!" भोगीलाल बाजल- "उपद्रवी तत्त्व अनेको रंगक अछि।" अखन तक अपने साँढ़े-पाड़ाक उपद्रव जे खेत-पथारमे होइए, तेतबेकेँ उपद्रव बुझै छी मुदा भोगीलाल अनेको रंगक कहैए, तँए जिज्ञासा जगबे कएल। पुछलिऐ- "से केना भोगी?" भोगीलाल बाजल- "भाय साहैब, सोलहआना उपद्रवमे दूअना भगवानक छैन, बाँकीमे दसअना लोकक अछि आ चारिअना कीट-पतंग-सँ-जानवर धरिक अछि।" भोगीलालक विचार सुनि मने-मन विचारए लगलौं तँ बुझि पड़ए लगल जे भोगीलाल ठीके कहैए। बजलौं- "कनी बिकछा कऽ भोगी बाजह।" जेना कोनो गम्भीर विषयकेँ चिन्तक क्रमानुसार व्याख्या करै छैथ तहिना भोगीलाल बाजल- "भाय साहैब, भगवानक दोख दूअना ई छैन जे कहियो काल नमहर भुमकम कऽ दइ छैथ तँ कहियो मेघ फारि बेसी बरखा दइ छैथ, कहियो शीतक मासमे शीतलरीए कऽ दइ छैथ।" भोगीलालक विचार मनमे ठहकल। ठहैकते बजलौं- "हँ से तँ कइये दइ छैथ।" शतरंजक गोटी जकाँ भोगीलालकेँ जेना सह भेटल तहिना बाजल- "भाय साहैब, उपद्रवी रहितो भगवान इमानदार तँ छथिए। तँए अपन इमान बँचबैत कोनो काज करै छैथ। लोक जकाँ ने राति-के चोराकऽ केकरो घरक वौसे वस्तु चोरबै छैथ आ ने केकरो खेतमे लगल जजाते काटै छैथ।" भोगीलालक विचार सुनि मनमे हँसियो लगि रहल छल जे जइ भोगीलालकेँ समाजक लोक धुरफन्ना बुझै छैथ, माने जेकरा अप्पन कोनो ठेकान नै छै, सएह भगवानकेँ कठघरामे ठाढ़ कऽ दोख-निरदोख देखा रहल अछि। बजलौं- "भोगी, भगवानक लीला अपरमपार भेलै, तँए हुनकर गप छोड़ह।" भोगीलालक वौआइत मनमे जेना उगरास भेल, तहिना बाजल- "भाय साहैब, पैछला उपद्रवक चर्च अखन नइ करब किएक तँ ओ बीतल दिनक बीतल समाजक विषय भेल। अखन अखुनका सुनू। आइ अपने गामटा मे नहि, गाम-गाममे पोसुओ सुगर आ बोनैयो सुगरक बढ़वारि भेने किसान सभकेँ नमहर परेशानीक मुकाबला करए पड़ि रहल छैन।" भोगीलालक विचार सुनि अपनो मनमे अनुमानसँ ठहकल जे भरिसक रौतुको घटना एहने सन अछि। ..बजलौं- "की परेशानी भोगी?" भोगीलाल बाजल- "रातिमे एगारहटा सुगर कोबी खेतमे पड़ले रहि गेल।" बुझल रहैत तखन ने, से तँ बुझल छल नहि। पुछलिऐ- "की पड़ले रहि गेल?" भोगीलाल बाजल- "भाय साहैब, गम्भीर संकट, गम्भीर विषय बनि गाम-समाजमे ठाढ़ भऽ गेल अछि। खासकऽ किसानक संग तँ आरो गम्भीर स्थिति बनि गेल छैन।" बजलौं- "से एहेन संकट, माने नै बुझलौं जे केना भेल अछि?" भोगीलाल बाजल- "भाय साहैब, समय एहेन मोड़पर आबि गेल अछि जे लोक मने-मन केंकिया रहल अछि, मुदा डरे मुँह खोलि कियो बाजि नहि पेब रहल अछि।" भोगीलालक विचार सुनि मनमे भेल जँ भोगीलालकेँ सह दैत दोहराकऽ पुछब तँ गप-सप्पक क्षेत्रे बदैल जाएत। तँए पैछला विचारकेँ जगबैत बजलौं- "भोगी, अखन दोसर-तेसर विचार छोड़ह। जे गप-सप्प शुरू केने छेलौं, बस तेतबेक विचार करह।" भोगीलाल बाजल- "भाय साहैब, कौल्हुका काजक चिन्ताक सोगसँ रातिमे नीन नहि भेल, तँए तरगरे बिछान छोड़ि टहलए लगलौं। दच्छिनवारि टोलक मकशूदन काका चौराहापर भेटला। वएह कहलैन जे खेत-पथारसँ बाड़ी-झाड़ी धरिमे सुगरक तेते उपद्रव बढ़ि गेल अछि जे किसानी जीवने मरि रहल अछि। तँए एहेन परिस्थितिमे जँ अप्पन रक्षा अपने नइ करब, तखन जीवन केना बँचत। कोबीकेँ नाश करै दुआरे रक्षार्थ जहर छीट देलिऐ। सुतली रातिमे सुगर-सभ आबि खाए लगल। खाइते-खाइते एगारहो टा सुगर खेतेमे सुतल अछि।" बजलौं- "जे समाचार सुनैले अखन तक मन खोजि रहल छल से भेट गेल। आब अप्पन समाचार कहह?" भोगीलाल बाजल- "भाय साहैब, गामोक लोक जनैए आ अहूँ तँ जनिते छी जे गीत-भजन गबैसँ नीक हमर मन ठेकौती करैमे लगैए, तँए अखन तक ढोलक बजाएब छोड़ि दोसर साज-बाजपर हाथ नहि देलौं अछि। महीना दिनसँ रेडियो स्टेशनसँ प्रचार होइत आब रहल अछि जे ठेका बजौनिहारक बहाली हएत।" अपनो रेडियोमे महीना दिनसँ सुनिते आबि रहल छी जे ढोलक बजौनिहारक बहाली रेडियो स्टेशनमे हएत। तँए बजलौं- "कौल्हुके दिन ने बहालीक छल, से की भेल?" भोगीलाल बाजल- "की हएत, दैवक कपार.!" भोगीलालक विचार कोनो भाँजेपर ने चढ़ल। जिज्ञासा करैत बजलौं- "कनी फरिछा कऽ कहह।" भोगीलालक आशापर जेना पानि हेरा गेल होइ तहिना तुरैछ कऽ बाजल- "भाय साहैब, रेडियो स्टेशनमे मुँह देख मूँगबा परसल जाइए। अप्पन मुँह ओहन थोड़े अछि जे मूंगबा भेटत।" ओना, भोगीलालक चरित्रसँ, बेकतीगत आचरणसँ क्षुब्ध जरूर छी, किएक तँ कोनो ठेकनगर कर्मक लोक नहि अछि, मुदा एते तँ गुण छइहे जे सामाजिक कोनो काज किए ने हुअ, भोगीलालक भागीदारी ओइमे रहिते छै। ओना, जीवन सभक अप्पन-अप्पन छी, जे आगू बढ़ि, विकसित होइत समाजिक जीवनमे प्रवेश करैए, मुदा बनल-बनाएल जे अखन तकक समाज अछि ओहो बहुरूपिया भइये गेल अछि। ..बजलौं- "की मुँह देखि मूँगबा, भोगी?" भोगीलाल बाजल- "अपने गमैया लोक छी। अपना सबहक समाजमे फगुओ ने शास्त्रीय उत्सव छी। ओइ उत्सवकेँ मनबैमे महीना दिन समाजमे जोगिरा-फगुआ चलिते अछि आ चैतावर शुरू करैत विसर्जन होइए।" अखन तकक देखल बेवहार समाजक अछिए। सोझा-सोझी केना नठब । बजलौं- "हँ, से तँ अछिए।" भोगीलालकेँ जेना अप्पन गुण गौरवान्वित केलक तहिना बाजल- "भाय साहैब, अपना सभक समाजक शास्त्रीय धुन, रेडियो स्टेशनक शास्त्रीय धुन थोड़े छी। इन्टरभ्यूमे राग तोड़ी धुनमे ढोलक बजबए कहलक। तहीमे छँटनी भऽ गेल।" ओना, भोगीलालक विचार सुनि मने-मन हँसियो लगै छल, मुदा केकरो चूकपर जँ हँसि देब तँ ओ अचूक भइये जाइए, तँए किछु ने बजलौं। कनीकाल रहि भोगीलाले बाजल- "भाय साहैब, संगे-संग दुनू भाँइ चलू एकबेर गामोक हवा-पानि लगा आबी।" अपनो मन भेल जे एकबेर टहैल आबी मुदा भोगीलालक संग टहलब, मन नइ मानलक। बजलौं- "भोगी, टहलैक मन अपनो होइए मुदा एकटा काज तेहेन बनरफाँस लगा देने अछि जे मने बेचैन अछि, की टहलब।" अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१४.रबीन्द्र नारायण मिश्र-बदलि रहल अछि सभकिछु (उपन्यास)- धारावाहिक रबीन्द्र नारायण मिश्र बदलि रहल अछि सभकिछु (उपन्यास)- धारावाहिक खण्ड १६-२० बदलि रहल अछि सभकिछु
16 हमरासभक समयमे राजापुरमे हाइ इसकूल रहैक । ओहिमे लगपासक विद्यार्थीसभ मैट्रिक धरि पढ़ैत छल । इलाकाक मानल इसकूल छल ओ । इसकूलक प्रधानाध्यापककेँ राष्ट्रपति पुरस्कार भेटल रहनि । ओहि इसकूलकेँ चमकाबएमे हुनकर जबरदस्त योगदान छल । ओहि इसकूलक कतेको विद्यार्थीसभ एकसँ एक पद धरि पहुँचल छलाह। सलाहकार,अधिकारी,अभियंता,डाक्टर,बनि इलाकामे नाम केने छलाह। ओही इसकूलमे हम,संदीप आ शक्तिनाथ आठमामे नाम लिखओने रही । तकर बाद मैट्रिक धरि हमसभ संगे-संगे पढ़ल रही। तीनूगोटेक गाम लगे-पासमे छल । तेँ हमसभ संगे इसकूल जाइ,संगे वापस गाम आबी । गाम पहुँचबासँ पहिनहि हाटसँ तीन दिस रस्ता फुटैत छलैक । सरिआ,मदनपुर आ सतटोलक हेतु । ओहिठामसँ हमसभ अपन-अपन घरक रस्ता पकड़ी । इसकूलसँ मैट्रिक पास केलाक बाद हमसभ आनन्दपुर कालेजमे नाम लिखओलहुँ । ओहीठाम नेताजीसँ परिचय भेल । नेताजी समय-समयपर अबैत जाइत रहैत छलाह । हुनकर प्रयास रहैत छलनि जे अधिक सँ अधिक युवककेँ अपना संग जोड़ी । अपन वर्चस्व बनाबी । ताहि हेतु युवक लोकनिकेँ तरह-तरहक प्रलोभन सेहो देथि। संदीप हुनके चक्करमे फँसैत चलि गेल रहए आ कालांतरमे बहुत मोसकिलमे पड़ि गेल रहए । हमहुसभ नेताजीक संपर्कमे तँ अएबे केलहुँ आ परेसानीमे सेहो परबे केलहुँ । एक-दू दिनक बाद संदीपक हालतमे सुधार भेलैक । ओकरा संगे आएलि महिलाक हालत सेहो सुधरलैक । दुनूगोटे साँझमे बिदा भए गेल । जाइत-जाइत संदीप कहलक- "हम हिनका पहुँचओने अबैत छी । तकर बाद चैनसँ आगूक काजपर लागि जाएब ।" संदीपक गेलाक बाद हम आ शक्तिनाथ रातिभरि माथापच्चीमे लागल रहलहुँ । "कहीं एहन ने होअए जे संदीप नेताजी दिससँ काज करैत रहए, हमरसभक सभटा समाचार ओकरा दैत रहैक आ कहिओ हमसभ मोसकिलमे पड़ि जाइ ।" "बात तँ वाजिब छैक । हमसभ थोड़े दिन सतर्क रहब । ओकरापर नजरि राखब । तकर बादे ओकरा अपन बातसभक जानकारी होबए देबैक ।" "मुदा ई नहि बुझा रहल अछि जे ओ एकटा महिलाक संगे एना किएक घुमि रहल अछि? ओकरासभक आपसी की संबंध छैक?" "धैर्य राखह । समयसँ सभबात अपनहि स्पष्ट भए जाएत।" संदीप अपन बातक पक्का निकलल । दोसरे दिन वापस ओहीठाम आबि गेल । ओ महिला के छलथि,आ संदीप हुनका कतए पहुँचा देलकनि,से ने ओ किछु कहलक आ ने हमसभ किछु पुछलिऐक । संदीप घुरि आएल । गामसँ हमर गौंवा ताधरि नहि आएल छल । हमसभ आब ओतए कतेक दिन रहितहुँ,ओहो घरबैआ बिना। तेँ सभसँ पहिने शक्तिपुरममे एकटा डेरा लेलहुँ । शक्तिपुरममे रहनाइ एहि लेल जरूरी छल जे ओ राजनीतिक गतिविधिक केन्द्र अछि । ओतए तरह-तरहल जानकारी भेटैत रहैत अछि । बड़ीटा खाली प्लाटमे कोनटापर एकटा कोठरी चौकीदारक हेतु बनल छलैक । संप्रति ओतए कोनो काज नहि भए रहल छलैक। तेँ ओकर मालिक ओकरा मामुली किरायापर हमरासभकेँ दए देलक । कम सँ कम जगहक देख-रेख होइत रहतैक आ किछु किराया सेहो भेटैत रहतैक। ओह कोठरीमे हमसभ निचैनसँ रही । दिन-राति जतेक गप्प करबाक मोन होअए गप्प करी। केओ टोकनाहर नहि,केओ सुननाहर नहि । डेरा भेटि गेलाक बाद हमसभ दिन-राति अपन लक्ष्यपर ध्यान केन्द्रित केनाइ शुरु कए देलहुँ । संदीपक प्रतिए जे हमरासभकेँ सक शुरुमे रहए से कालान्तरमे समाप्त भए गेल । ओ मोनसँ हमरासभक संगे लागि गेल छल । एकदिन हमसभ सोझे जनक्रांति देलक मुख्यालय पहुँचलहुँ । ओतए सौंसे भम्ह पड़ि रहल छल । चुनाओ हारि गेलाक बाद जनक्रांति दलक संयोजकजी खाट धए लेने रहथि । स्वास्थ्य गड़बड़ा गेलनि । पार्टीक आमदनी घटैत गेल । कर्मचारीसभ काज छोड़ि-छोड़ि चल गेल । कैकटा सहयोगीसभ दल बदल कए लेलनि । जे केओ बाँचल रहथि सेहो अपन-अपन जोगारमे लागल रहथि जाहिसँ पार्टीकेँ कब्जा कए लेथि । संयोजकजीकेँ दुखित भए गेलासँ ओकरासभकेँ तदनुकूल अवसर सेहो भेटि गेलैक । एहन माहौलमे हमसभ ओतए पहुँचल रही । हमरासभकेँ देखि संयोजकजी बहुत प्रसन्न भेल रहथि । भरि मोन गप्प-सप्प भेल। ओहिदोन साँझ कोना पड़ि गेल से पता नहि लागल । शक्तिनाथ इसारासँ कहलक जे आब चलक चाही। हमसभ आब चलबाक हेतु तैयार होइत छी । हमरा सभकेँ जेबाक उपक्रममे देखि ओ बहुत उदास भए गेलाह । "अहाँ बहुत उदास लागि रहल छी?"-हम पुछलिअनि। "फेर असगर भए जाएब से चिंता सता रहल अछि ।" "कोनो बात नहि, हमसभ फेर काल्हि आबि जाएब ।" डेरा पहुँचि हमसभ राति भरि हुनके बारे मे चर्च करैत रहलहुँ । ओ बहुत परेसान बुझा रहल छलाह । हुनकर हार्दिक इच्छा रहनि जे हमसभ हुनकर दलमे सामिल भए जाइ । हमहु सभ तँ सएह सोचैत रही । एकर बाद बरोबरि हमसभ हुनकासँ भेंट करए अबैत -जाइत रहलहुँ । नित्य जखन वापस होबए लागी तँ ओ उदास भए जइतथि । बुझाइत जेना किछु कहए चाहैत छथि । 17 शक्तिपुरम सन सहरमे डेरा भेटि गेलाक बाद हमसभ कनी निचैन भए गेलहुँ । कम सँ कम रहबाक ठेकान तँ भेल । किराया सेहो मामुली,नहिए बुझू । मालिक बूझथि जे मगनीमे प्लाटक रखबारी भए रहल अछि ,सएह कोन कम । नहि तँ ओही लेल सभ मास खर्चा होइतनि । हमसभ दिन-भरि एमहर-ओमहर बौआइ आ साँझमे तीनूगोटे संगे भानसक ओरिआनमे लागि जाइ । संगे गप्प -सप्प तँ चलिते रहए । संदीपक खिस्सासभ तँ बेस रमनगर होइत छलैक । पहिने ओकर मान्यता जे किछु रहल होइक,मुदा आब ओ हमरासभक संग सभप्रकारें एक छल । जखन साँझमे हमसभ चाहपर बैसी आ आपसमे चर्च करी तँ संदीप शुरु भए जाइत । गप्प कतहुसँ शुरु होइत मुदा नेतेजीपर जा कए अटकि जाइत । नेताजी जेना ओकर मोनमे धसि गेल रहथि। बातो सही रहैक,कारण सालक-साल ओ नेताजीकेँ आदर्श मानि कए हुनका हेतु प्राण-प्रणसँ लागल रहल ,जहाँ-तहाँ बौआइत रहल । मुदा नेताजी तँ छलाह महाधूर्त । ओ सदिखन अपन काज सुतारबामे ओकर उपयोग करैत रहलाह। चलू,ओतबो बुझलहुँ । मुदा बादमे तँ ओकरासँ ओ गलत-गलत काज करबैत छलाह,एक हिसाबे ब्लैकमेल करैत छलाह। एकदिन अपन डेरापर हमसभ संचमंच बैसल रही । संदीप बजैत जाइत छल । ओ कहिते जा रहल छल - "नेताजी नीक आदमी कहिओ नहि छल । हमरासभकेँ ओकरा चिन्हबामे देरी भेल से तँ हमरे सभक दोष थिक ।" "से की?" "कोनो एकटा घटना भेलैक । होइते रहलैक । हम तँ ओकरा संगे पहिल बेर शक्तिपुरम गेलहुँ । तखने ओकरा डेरापर बहुत रास गड़बड़ बात सभ बुझाएल । मुदा ओ हमरा चुप्प कए दितए- "खबरदार! एहिठामक कोनो बात बाहर नहि जेबाक चाही। जँ से भेल तँ जानोसँ हाथ धोबए पड़ि सकैत अछि ।"-नेताजी हमरा कहने रहए । "ओतहि गामक बैसारमे बम फोड़बाक योजना बनल रहैक। हमरे हाथमे ओ झोरा धरा देने रहए । हम ओहि झोराकेँ मंच लग राखि घसकि गेल रही । तकर बाद तँ जे भेलैक से तँ देखबे केलहक ।" "मुदा ओहि कांडमे तँ हमरा फँसा देलक ।" "ओहो नेतेजीक काज रहैक । जे केओ ओकर लगीच अबैत छल तकरा संगे ओ एहिना विश्वासघात करैत छल, ओकरा कोनो-ने-कोनो तरहें फँसा दैत छल । तकरबाद ब्लैकमेल करैत छल, उल्टा-पुल्टा काज करबैत छल ।" ओहि घटनाक बाद हम भागल-भागल नेताजीक शक्तिपुरम डेरामे नुकाएल रही । नेताजी हमरा सुनबैत रहितथि- "पुलिस तोहर पाछू पड़ि गेल छह । बँचि कए रहिअह।" हम एहिसभसँ बहुत डराएल रही । जे नेताजी कहथि से करैत चलि जाइ । एहि तरहें हम एक सँ एक गलत काज करैत रहलहुँ । बुझिओ कए हुनकर विरोध नहि कएल होअए । बात एतबे रहितए तँ चलू । मुदा नेताजी तँ सभकर्मक आदमी छलाह। ओ हमरा नेपालक सीमापर पठबए लगलाह । ओहिठामसँ हम एकटा डिब्बा आनी आ ओकरा पंजाबमे कतहु पहुँचाबी । ओहि डिब्बामे की रहैक से हम आइ धरि नहि बूझि सकलिऐक । हमरा आगू-पाछू सदिखन ओकर आदमीसभ लागल रहैत छल । कखनो काल इसारासँ हमरा पेस्तौलो देखा दैत छल। हमरा तँ होअए जे बेहोस भए ओतहि खसि पड़ब । मुदा साहस करी । कखनो-कखनो अपनोपर तामस होइत छल । मुदा ओहि जंजालसँ निकलबाक कोनो रस्ता नहि देखाइत छल । जखन कखनहु नेताजी शक्तिपुरम डेरापर आबथि,हम हुनका लग जेबाक प्रयास करी । मुदा ओ से हिसाब केने रहितथि जे कहुना हुनकासँ भेंट नहि होइत छल। जखन ओ शक्तिपुरम डेरापर रहथि तँ हमरा कोनो-ने-कोनो काजे कतहु कोनो काजमे पठा दैत छलाह। हमहु की करितहुँ? जान बँचेबाक प्रयासमे सभटा सहि जाइ । एक राति तँ हद भए गेल । एक बजैत रहल हेतैक । हम निभेर सुतल रही की घंटी बाजल । फ्लैट खोलैत छी तँ देखैत छी नेताजी पीने बुत्त एकटा महिलाकेँ पँजिऔने ठाढ़ छथि। जाबे हम केबार खोली-खोली ताबे तँ कैकबेर घंटी बजा देलथि। धरफरा कए केबार खोलैत छी । ओहि महिलाक सामनेमे हमरा दस हजार फज्जति केलथि । ओतेक रातिमे फसाद करब हमरा उचित नहि बुझाएल । चुप्पे रहि गेलहुँ । । नेताजी ओहि महिलाक संगे अपन कोठरीमे चलि गेलथि । घंटा भरिक बाद हमर केबारपर हल्लुक अबाज बुझाएल । लागल जेना केओ केबार खटखटा रहल अछि। हम केबार लग अबैत छी । भुरकीसँ देखैत छी । ई तँ ओएह महिला अछि । हम ओकरा अंदर आबए दैत छिऐक । ओकर हालत कहबाक जोगर नहि छल । ओ निरंतर कानि रहल छलि। हमरा बुझेबे नहि करए जे की करी? कहीं नेताजी बुझलथि तँ गेल घर छी। "अहाँ एतेक परेसान किएक छी?" "हमरा तुरंत बाहर लए चलू, नहि तँ ..।" "मुदा नेताजी." "ओ तँ पीने बुत्त भेल पड़ल अछि । होसमे नहि अछि। ओकर कोठरीक केबार खुजले रहि गेल छलैक । तेँ मौका देखि हम ओकर चांगुरसँ घसकि गेलहुँ अछि । हमरा बाहर लए चलू, देरी नहि करू।" "मुदा एतेक रातिमे ..हम कतए लए जा सकब ।" "कतहु चलू । मुदा एहिठामसँ लए चलू ।" हम मोने-मोन हनुमानजीकेँ गोहरेलहुँ आ ओहि महिलाक संगे फ्लैटसँ बाहर निकलि गेलहुँ । ओहिठामसँ निकलि हमसभ जेना-तेना शक्तिपुरम टीसन पहुछ गेलहुँ । राति भरि ओतहि नुकाएल रहलहुँ । भोर भेलापर ओतहि नित्यकर्म केलहुँ । ओहिठामसँ कतए जाइ.की करी किछु फुरेबे नहि करए । हम ओहि महिलाकेँ किछु पुछिऐक तँ जबाबमे बस कानए लागए । हम तँ बहुत मोसकिलमे पड़ि गेल रही । कैकबेर ओकर नाम,गाम पुछलिऐक । बहुत मोसकिलसँ ओ अपन नाम कहलक-"शिखा" । तकर बादे हम ओकरा संगे घुमैत-फिरैत ओहि डेरापर पहुँचल रही । अहाँसभकेँ ओतए देखि बहुत आफियत बुझाएल रहए । भेल जे साइत आब जान बँचि जाएत । 18 कालक्रमे जनक्रान्तिदलक सभटा कार्यभार हमरापर बजड़ि गेल । तकर प्रमुख कारण छल जे तत्कालीन संयोजकजीकेँ हमरासभपर बहुत विश्वास भए गेल रहनि । पुरनका सहयोगीमे सँ अधिकांश तँ पार्टी बदलि लेने रहथि । किछुगोटे आब राजनीतिमे निष्कृय भए गेल रहथि । तेँ ओ सोचलथि जे युवकसभकेँ आगू आनबाक चाही । तखनहि जा कए परिवर्तनक उमीद कएल जा सकैत अछि । नहि तँ पार्टीक सत्यानाश तय अछि । एक हिसाबे ओ बहुत त्याग केलाह ,नहि तँ आइ-काल्हि नेताजीसभ मरलाक बादे अपन पदक त्याग करैत छथि । ने हुनका देश सँ कोनो मतलब रहैत छनि,ने पार्टीसँ । अपन स्वार्थ सिद्ध हेबाक चाही । ताहि लेल जे करए पड़नि,जतेक बेर पार्टी बदलए पड़नि । जे जायज,नाजायज करए पड़नि । एहने सोचक कारण नेताजी चुनाओसँ पहिने अपने चुनाओ सभामे बम विस्फोट करबा कए जनताक सहानुभूति अनबाक प्रयास केने छल । कतेको निर्दोष युवकसभकेँ बहका-बहका कए गलत-सलत काज करबैत रहैत छलाह। जखन बाहर कतहु निकलितथि तँ श्वेत वस्त्रमे चमकैत रहैत छलाह। जँ हुनकर भाषण सुनितहुँ तँ लागैत जेना एहन आदमी साइते केओ भेटत । मुदा कथनी-करनीमे कोनो समन्वय नहि रहैत छलनि । जेना हाथीक दूटा दाँत होइत अछि,तहिना नेतोजीक हाल रहनि । जनता लग नेताजी किछु रहैत छलाह आ असल जीवनमे किछु आओर । कतहुसँ नहि लगैत जे ई ओएह आदमी छथि । हमसभ ई निश्चय केलहुँ जे राजनीतिक वर्तमान स्वरुपकेँ बदलि कए रहब । ताहि ले जे करबाक होएत से करब । एकटा एहन व्यवस्थाक स्थापना करब जाहिमे संविधान आ कानून मात्र संपन्न लोकक वस्तु नहि रहि जाएत। सही मानमे समतामूलक आ जनकल्याणकारी समाजक स्थापना करबाक प्रयास करब जाहिमे जाति,धर्म,लिंग,वर्ण आदिक आधारपर कोनो भेदभाव नहि कएल जाएत। ओना तँ सभ एतबे करबाक गप्प करैत रहैत अछि ,मुदा ओकरसभक व्यवहार आ काजमे जमीन आसमानक अंतर रहैत छैक । तेँ हमसभ समाजक सामने एकटा उदाहरण प्रस्तुत करए चाहैत छलहुँ जाहिसँ गरीब सँ गरीब व्यक्तिकेँ लगैत जे ओहो एही देशक नागरिक अछि । ओकरो एहि देशमे रहबाक,इज्जतिसँ जीबाक ओतबे अधिकार छैक जतेक धनीक आ सुविधा संपन्न लोकसभकेँ । लोककेँ जाति,धर्मक आधारपर बाँटि कए किछुगोटे समाजकेँ असल लक्ष्यसँ फटकी लए जेबामे सफल भए जाइत छथि। भोटबैंकक राजनीति कए ओ सभ सत्ता हथिआ लैत छथि। तकर बाद अपन स्वार्थपूर्ति हेतु अपन अधिकारक दुरुपयोग करैत छथि । एहि स्थितिकेँ बदलबाक अछि। हमसभ आपसमे एहि तरहक दृढ़ निश्चय कएल आ ताहि हेतु दिन-राति लागि गेलहुँ । संयोगसँ हमरासभकेँ जनक्रान्तिदलक आधारभूत संरचना भेटि गेल अछि । तकर सदुपयोग करबाक अछि । हम,शक्तिनाथ आ संदीप एहि विषयसभपर एकमत रही आ निश्चय कए लेने रही जे दिन-राति एक कए एकर समर्थनमे जनतामे जागृति आनल जाए । जनक्रान्ति दलक काज आगू बढ़एबाक हेतु सभसँ बेसी जरूरी छल जे अधिक सँ अधिक लोककेँ खास कए युवक लोकनिकेँ एहिसँ जोड़ल जाए । ताहि हेतु गामक-गाम सदस्यता अभियान चलाबक निर्णय भेल । पार्टीक काज सुचारु रुपसँ चलेबाक हेतु एकर कार्यसमितिकेँ पनुर्गठित कएल गेल । ओहिमे एकछाहा युवकलोकनिकेँ राखल गेलनि । एहन लोकसभ चुनि-चुनि कए ताकल गेलाह जे राजनीतिकेँ अपन पेशा नहि अपितु सेवाक माध्यम बनाबए चाहैत छथि । मुदा किछु पुरान लोकसभ हमरसभक प्रयासकेँ अपन राजनीतिक आस्तित्वपर एकटा जबरदस्त आघात बूझलनि । ओ सभ जी-जानसँ हमरसभक प्रयासकेँ असफल करबाक हेतु लागि गेलाह । जे किछु हमसभ अंदरमे निर्णय करी तकरा तुरंते नेताजी लग पहुँचाबए लगलाह । नेताजी तँ छटल बदमास छलाह,संगहि षड़यंत्र करबामे सेहो माहिर छलाह। ओ हमरसभक प्रयासकेँ निष्फल करबामे लागिए नहि गेलाह,अपितु किछु हद धरि सफलो होबए लगलाह । हमसभ किछु करबाक प्रयास करी ताहिसँ पहिनहि अपने पार्टीमे हंगामा होबए लागए । एहिसभसँ हमसभ बहुत परेसान भए गेलहुँ । किछु बुझेबे नहि करए जे की करी? कोन रस्ता पकड़ी जाहिसँ बिना बेसी झंझटिकेँ लक्ष्य दिस बढ़ल जा सकए । 19 ओहि दिन हम, शक्तिनाथ आ संदीप राति भरि एही विषयसभपर चर्चा करैत रहि गेलहुँ । ककरो निन्न नहि होइत रहए। सभ चिंतासँ परेसान छल । कएल की जाए? नेताजीक आक्रमणसँ बचाओक की रस्ता होएत?हमसभ इएहसभ सोचि रहल छलहुँ की बुझाए जेना किछुगोटे हमरेसभक डेरा दिस बढ़ल चलि आबि रहल अछि । बीच- बीचमे टार्चसँ फोकसीन मारि रहल अछि । हमसभ सतर्क भए जाइत छी । संदीप,शक्तिनाथ लाठी लेने डेराक केबारसँ सटले ठाढ़ भए जाइत छथि । थोड़बे कालमे केबारपर केओ जोर-जोरसँ लात मारि रहल छल । आबाज क्रमशः बढ़िते जा रहल छल। हमसभ पूराशक्तिसँ केबारकेँ बँचेबाक प्रयासमे लागल रहलहुँ। मुदा ओ कतहु बाँचए । अंततोगत्वा, केबार टुटि कए खसि पड़ल। बदमाससभ घरमे घुसिते चिचिआए लागल- "कहाँ अछि शिखा? जल्दी निकाल ओकरा नहि तँ तोहरसभक वलिप्रदान तय छौक ।" डरसँ संदीप थर-थर काँपि रहल छल । बदमाससभ ओकरे दिस मुखातिब छल । ओहिमेसँ एकगोटे ओकरापर पिस्तौल तानि देने छल । दोसर ओकर गट्टा पकड़ने छल । तेसर हाथमे चाबुक भाँजि रहल छल । पाँचमक हाथमे दिआ सलाइ आ मटिआ तेलसँ भरल डिब्बा छल। "बाज-जल्दी बाज । की चाहैत छैं? जँ कनीको देरी केलैं वा छल करबाक प्रयास केलैं तँ नामो-निसान मिटा देबौक । सभ किछु तैयार अछि ।" संदीपक सीटीपीटी गुम्म छल । ओ किछु बाजि नहि पाबि रहल छल । जेना माथासँ सभकिछु बिला गेल रहैक । शक्तिनाथकेँ नहि रहल गेलैक । ओ किछु प्रतिरोध करबाक प्रयास केलक । किछु बजाबक प्रयास केलक । "तूँ सभ के छह आ एना किएक कए रहल छह?" "तोरासभकेँ एहिठाम के पठओलक?" -हम पुछलिऐक । एतबहिमे ओहि बदमासमेसँ एकगोटे बाजल- "एकरा दुनूक हाथ-पैर बान्ह । बहुत फटर-फटर कए रहल अछि ।" औ बाबू! देखिते-देखिते ओ सभ हमरा दुनूगोटेक हाथ-पैर बान्हि घरक कोनमे पाड़ि देलक । मुँहमे पट्टी सेहो साटि देलक । ऊपरसँ मटिआ तेलक डिब्बा तेनाक रखने छल जेना आब देहपर ढारिए कए रहत । बुझाएल जेना हमसभ आब क्षणे भरिक पाहुन छी । हमरा दुनूगोटे ई दुर्गति देखि संदीप चिचिआ उठल- "हिनकासभक किछु गलती नहि छनि । हिनकर जान बकसि दिअनु । किछु आफियत दिअ । हमसभटा बात कहैत छी।" फटर-फटर केनाइ बंद करह । जे पुछल गेलह अछि से जल्दी आ सही-सही बाजह । नहि तँ तोहरसभक पकिआ इलाज तैयार अछि । सामने पिस्तौल बला अपन हाथ ऊपर दिस केलक आ क्रमशः संदीप दिस बढ़ए लागल । "ठहरह, ठहरह । हम तोरासभकेँ शिखा लग लेने चलैत छी ।" "ओ अछि कतए से बाजह?" "नहि ताकि सकबहक । हमरा संगे चलह । हम शिखासँ तोरासभक भेंट करा देबह ।" "आ जँ किछु छल-प्रपंच करबह तखन?" "तखन जे मोन होअह से कए लिअह ।" "रे! एकर बातक कोन विश्वास? अखन जान बँचेबाक हेतु किछु बकि रहल अछि। की पता जे बादमे बात पलटि दिअए । किंवा कोनो षड़यंत्रे कए बैसए? " "सही कहि रहल छह । शत्रुपर कखनहु विश्वास नहि करी। ई साँप थिक, साँप । दिन-राति नेताजीक नून खेलक आ आब ओकरे जड़ि काटएपर लागल अछि ।" "हम की केलिअनि अछि हुनका?" "खबरदार! जे फटर-फटर केलह । नेताजी संगे तूँ विश्वासघात तँ केबे केलह अछि । एहिमे कोन सकक बात छैक। फिलहाल जाहि काजे हमसभ आएल छी ताहिपर ध्यान दी । बादक बात बादमे देखल जाएत । हमरासभकेँ शिखा चाही, सेहो तुरंत । जँ से नहि करबह तँ परिणाम भोगबाक हेतु तैयार भए जाह ।" "जाबे विश्वास नहि करब आ हमरा ओतए नहि लए जाएब ताबे शिखा हम कोना सुनझा सकैत छी । हमरा ओतए लए चलू । तखनहि शिखा भेटि सकतीह । ताबे हिनका दुनूगोटेकेँ तँ छोड़ि दिअनु ।" "हिनकरसभक चिंता तूँ छोड़ह । जे मूल काज अछि से पहिने करह । तकर बाद हिनकर सभक भविष्यपर निर्णय होएत।" "ठीक छैक । हमरा संगे चलह ।" संदीपकेँ एकटा कारमे बैसा देल जाइत अछि । किछुगोटे ओकर आगू-पाछू बैसि जाइत अछि । किछुगोटे हमरा दुनूगोटेकेँ घरेमे घेरने रहि जाइत अछि । संदीप ओकरासभक संगे बिदा होइत अछि । ओ रस्ता बतबैत चलि जाइत अछि । बीच-बीचमे बदमाससभ ओकरा चेतौनी दैत रहैत अछि । "खबरदार! जौँ किछु गड़बड़ केलह तँ गेल छह ।" से कहि पिस्तौल ओकरापर तानि देल जाइत छल । हमसभ राति भरि ओहिना पड़ल रहि जाइत छी । बीच-बीचमे लघुशंका लगैत अछि । मुदा ताहू हेतु ओ सभ मोहलति नहि दैत अछि । सभ किछु ठामहि करबाक हेतु विवश छी । आब फरीछ भए रहल छल । हमसभ ओही हालतमे पड़ल रही । बदमाससभ हमरा दुनूगोटेकेँ घेरने छल । ओहिमे सँ एकगोटेकेँ पोखरि दिस जेबाक भेलैक । शौचालय बाहर रहैक । ओ बाहर निकलैत अछि । सामनेमे दूधबला टकरा गेलैक । हमरासभकेँ भोरे-भोर चाह पीबाक आदति छल । तेँ भोरे दूध मंगबैत रही से आबि गेल रहए । मुदा हमरासभकेँ नहि देखि ओ वापस होइत रहए । ताबतेमे हमर कोठरीसँ ओहि आदमीकेँ निकलैत देखि दूधबलाक कान ठाढ़ भेलैक । "बात की छैक? ई आदमीक जेबीमे पिस्तौल किएक छैक? ई तँ बदमास लागि रहल अछि ।" इएह सभ सोचैत दूधबला कनी आओर फटकी चलि गेल। सामनेसँ एकटा पुलिसक जीप जाइत छल । ओ इसारा कए ओकरा रोकबेलक । पुलिस जीपसँ उतरि जाइत अछि- "की बात छैक?" "सऱ! सामनेबला कोठरीक शौचालयमे एकटा बदमास पिस्तौल लेने बैसल अछि ।" "से तूँ केना बुझलहक? हम ओकरा शौचालयमे जाइत देखलिऐक । ओकरा देखि चुपचाप घसकि गेलहुँ ।" "ठीक छैक । तूँ हमरा सभक संगे चलह ।" "नहि, नहि । हमरा नहि लए चलू । जँ हमरेपर पिस्तौल तानि देलक तखन?" "एतेक डरेबाक बात नहि छैक । हमसभ तोरा संगे छी ने।" "ओ बदमास शौचालयसँ निकलिए रहल छल की पुलिस ओकरा चारूकातसँ घेरि लेलक ।" अचानक पुलिसकेँ देखि ओ बहुत परेसान छल । एकटा पुलिसबला ओकरा पाछूसँ पकड़लक आ दोसर जेबीमेसँ पिस्तौल छिनि लेलक । "खबरदार! जँ बुधिआरी करबह तँ जानसँ हाथ धोबह। चुपचाप आत्मसमर्पण करह ।" ओ बदमास हाथ ऊपर उठा देलक । 20 पुलिस ओहि बदमासकेँ पकड़ि कए सड़क दिस बढ़ि रहल छल । हमरसभक कोठरीसँ ओकर संगीसभ ई दृश्य देखलक । ओहीमेसँ एकगोटे ककरो फोन लगओलक । तकरबाद तँ देखएबला दृश्य उत्पन्न भए गेल । पुलिस ओहि बदमासक पैरपर खसि पड़ल । घटी मांगि रहल छल । सड़कक लगपासमे ठाढ़ लोकसभ से देखि छगुन्तामे रहए । "कमालक बात छैक । पुलिसक ई हाल अछि जे बदमासक आगू नतमस्तक अछि । कहू केहन समय आबि गेल।" "कोनो सिपारसी हेतैक ।" "कोनो नेताक आदमी हेतैक ।" तरह-तरहक बात लोकसभ कए रहल छल । पुलिस पाछू-पाछू आ बदमास आगू-आगू चलि रहल छल। दुनूगोटे हमरसभक कोठरी लग पहुँचल । पुलिस हमर कोठरीक ओसारापर ठहरि गेल। हमसभ ओहिना कोठरीमे पड़ल रहलहुँ । हमर कोठरीक बाहर लोकसभ जमा भेल जा रहल छल । मामिला बढ़ैत देखि ओ बदमाससभ ककरोसँ फोनपर गप्प केलक । तकरबाद हमरासभकेँ छोड़ि देलक । हमसभ जाबे किछु बुझितहुँ ताबे ओ बदमाससभ पुलिसक जीपसँ चलि जाइत रहल । राति भरिक दुर्दशाक कारण हमसभ किछु बजबाक स्थितिमे नहि रही । अपनोसँ बेसी संदीपक चिंतामे रही । जाइत-जाइत बदमाससभ चेतौनी देने गेल रहए- "खबरदार! जँ किछु एमहर-ओमहर करबह तँ हमसभ फेर आबि जाएब आ तकर बाद की होएत तकर कल्पनो तूँ नहि केने हेबह।" सोचल जा सकैत अछि जे एहन माहौलमे हमसभ की प्रतिकार करितहुँ? जान बँचि गेल सएह उपलव्धि लगैत छल । मुदा एतबा तँ स्पष्टे छल जे एहि घटनाक पाछू राजनीति काज कए रहल अछि । हमरासभक राजनीतिक सक्रियताक जानकारी सरकारी पक्षकेँ भेटि गेल रहैक । तकरबादे ई फसादसभ शुरु भेल छल । पता नहि आगू की-की होएत? ई तँ अखन शुरुए भेल अछि। ओहीदिन साँझमे नेताजी शक्तिपुरममे संवाददाता सम्मेलन केलथि । नानाप्रकारक मीडिआ,समाचारपत्र,रेडिओक संवाददातासभक भीड़ जमा भए गेल छल । सभ एक-दोसरसँ प्रश्न कए रहल छल-बात की अछि? नेताजी एकाएक संवाददाता सम्मेलन किए कए रहल छथि? "लगैत अछि ओ अपन पार्टीसँ बहुत तमसाएल छथि।" "नहि, नहि । ई बात नहि भए सकैत अछि । अखने तँ हुनका राज्यप्रमुखजीक संगे सेटींग भेल छलनि । तकरबादसँ तँ ओ हुनकर गुणगाने कए रहल छथि ।" "जरूर किछु आओर बात अछि ।" "कनी काल हमसभ ठहरिए जाइत छी । अपने पता लागि जाएत जे बात की अछि ।" "सही कहलहुँ ।" संवाददातासभ अपनामे चर्चा करैत छलाह। ताबते पान खाइत,मुस्काइत नेताजीक प्रवेश होइत अछि। नेताजीकसगे दूगोटे आओर हुनकर लगपासमे बैसि जाइत अछि । नेताजी बजनाइ शुरु करैत छथि - "अहाँसभकेँ अचानक बजेबाक कारण ई भेल जे आइ रातिमे पुलिस एकटा अत्यन्त महत्वपूर्ण घटनाक रहस्योदघाटन केलक अछि। ताहि विषयमे जनताकेँ जानकारी देब बहुत जरूरी अछि । तेँ अपने सभकेँ बहुत कम समयक सूचनापर बजाओल गेल अछि । "बात की छैक, से स्पष्ट करू ।" "रातिमे पुलिसकेँ किछु गुप्त जानकारी भेटल जे नवोदित प्रतिपक्षी नेता अंकुर आ हुनकर संगीसभ नारी निकेतनक एकटा महिलाक संगे अनुचित काजमे लिप्त पाओल गेलाह । पुलिस छापामे ओ आ हुनकर संगीसभ पकड़ल गेलाह अछि । मुदा संदीप ओहि महिलाकेँ संगे कतहु भागि गेल । पुलिस ओकरा सभकेँ पकड़बाक पूरा प्रयास कए रहल अछि । आशा करैत छी जे ओहो जल्दीए पकड़ल जाएत ।" "मुदा ओ महिला के छथि?" "हुनका संदीप कतए नुकओने अछि ।" तरह-तरहक सबालसभ पत्रकारसभ पूछि रहल छल । मुदा नेताजी बिना किछु आओर कहने उठि गेलाह । हुनकर सचिव जरूर कहलखिन- "एहिसभ विषयपर कोनो जानकारी प्राप्त भेलापर फेर प्रेस कान्फ्रेंस कएल जाएत । संप्रति एतबे ।" -रबीन्द्र नारायण मिश्र, पिताक नाम: स्वर्गीय सूर्य नारायण मिश्र, माताक नाम: स्वर्गीया दयाकाशी देवी, बएस: ६९ वर्ष, पैतृक ग्राम: अड़ेर डीह, मातृक: सिन्घिआ ड्योढ़ी, वृति: भारत सरकारक उप सचिव (सेवानिवृत्त), स्पेशल मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, दिल्ली(सेवानिवृत्त), शिक्षा: चन्द्रधारी मिथिला महाविद्यालयसँ बी.एस-सी. भौतिक विज्ञानमे प्रतिष्ठा : दिल्ली विश्वविद्यालयसँ विधि स्नातक, प्रकाशित कृति: मैथिलीमे: प्रकाशन वर्षः२०१७ १.भोरसँ साँझ धरि (आत्म कथा),२. प्रसंगवश (निवंध), ३.स्वर्ग एतहि अछि (यात्रा प्रसंग); प्रकाशन वर्षः२०१८ ४. फसाद (कथा संग्रह) ५. नमस्तस्यै (उपन्यास) ६. विविध प्रसंग (निवंध) ७.महराज(उपन्यास) ८.लजकोटर(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०१९ ९.सीमाक ओहि पार(उपन्यास)१०.समाधान(निवंध संग्रह) ११.मातृभूमि(उपन्यास) १२.स्वप्नलोक(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२० १३.शंखनाद(उपन्यास) १४.इएह थिक जीवन(संस्मरण)१५.ढहैत देबाल(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२१ १६.पाथेय(संस्मरण) १७.हम आबि रहल छी(उपन्यास) १८.प्रलयक परात(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२२ १९.बीति गेल समय(उपन्यास) २०.प्रतिबिम्ब(उपन्यास) २१.बदलि रहल अछि सभकिछु(उपन्यास) २२.राष्ट्र मंदिर(उपन्यास) २३.संयोग(कथा संग्रह) २४.नाचि रहल छलि वसुधा(उपन्यास) २५.दीप जरैत रहए (उपन्यास)। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१५.डॉ किशन कारीगर- मैथिली लेखनक शून्य बज़ार स्थिति? वेबसता कारण आ समाधान डा. किशन कारीगर
मैथिली लेखनक शून्य बज़ार स्थिति? वेबसता कारण आ समाधान
मैथिली लेखन मे छैहे की? प्रशन रेखांकित करू यथार्थ देखू ताकू फरीचाएल जवाब अपनो भेट जाएत। ई कटु सत्य जे मैथिली लेखन गिरोहबादी कब्जा अकादमी पुरस्कारी चमचै, पेटपोसुआ आयोजनी, देखावटी कवि सम्मेलन, पुस्तक लोकार्पण, फ्री किताब बांट तक सिमित आ ओझराएल रहै. जेकर बज़ार मूल्य जीरो रहलै आ मैथिली लेखक के शून्य बज़ार स्थिति के वेबसता जकड़ने रहलै. लेखक सब अइ बिकट स्थिति स उबरै लै सामूहिक प्रयास तक नै केलक? तेकर फलाफल मैथिली लेखन अखनियो भोगि रहल जे दसो पचास टा किताबक बिक्री नै होई छै. दर्शक पाठक मैथिली लेखन के देखै पढ़ै मे कोने रूची नै रखै छै? शून्य बज़ारक वेबसता के कारण:- 1. मैथिली लेखक सब कोनो बुक सेलर प्रकाशक आ मार्केटिंग वेबस्था लै सामूहिक प्रयास चिंता कहियो नै केलकै? सब अपना गिरोह मे मगन फ्री किताब बंटलकै पुरूस्कारक जोगार मे रहलै आ हे लेखक हेबाक फुंसियाहिक फुफकार मे बमफलाट भेल रहलै.
2. मैथिली लेखक सिरिफ लेखकिय तगमा आ धुतहू लै दस पचास टा किताब छपा नेहाल भ गेल. पब्लिक देखौ आ पढ़ौ की ने? हे धैन सति लै? जोगारी पुरूस्बकार आगू बजार स्थिति पर कोनो चिंता नै?
3. मैथिली लेखक एकटा सामूहिक सर्वजन मंच नै तैयार केलक जे प्रकाशक लेखक बिक्रेता दर्शक पाठक के सामूहिक प्लेटफार्म के माध्यम स एकत्रित केने नीक बजारू वेवस्था बनैबतै? लेखक संघ बना दोसरा लै सदस्यता फॉर्म तक नै देलकै. सब लेखक गिरोह अप्पन ठेकेदारी मे अपसियांत रहलै.
4. मैथिली लेखक एक दोसराक लेखन मे की छै तेकर चर्च कहियो ने केलकै आ नै दर्शक तक बात पहुंचेलकै? आयोजन सब मे होहकारी भ गेल बस वरिष्ट लेखक हेबाक दाबिए चूर. अहाँ सबहक लिखल किताब कए प्रति बिकाइए से देखू ताकू ने.
5. कोनो एहेन मैथिली पत्र पत्रिका अखबार नै जे मैथिली रचना पर पारतोषिक मूल्य दैत होउ. कोनो तरहे घीच तीरके पत्रिका सब नाम लै छपै छै आ फेर बन्द. सर्कुलेशन बजार वेवस्था लै लेखक के कोनो चिंता नै जेकर रचना छपलै ले फूइल के तुम्मा?
6. वर्चस्वादी गिरोहबादी मैथिली लेखन मे दस टा लेखक के अपना मे मिलानी नै जे सामूहिक हेबाक उम्मीद करत. सब अपना गिरोह बले लेखक हेबाक भ्रम निशा मे मातल रहैए. कोई केकरो मोजर प्रोत्साहित नै करत? दर्शक पाठक जुड़लै कीने तेकर एक्को पाई चिंता नै?
7. मैथिली लेखक सपनो मे राॅयल्टी दिया ने सोचि सकत? रचना छपलै तबे पत्रिका कीनब देखब सेहो बड्ड बाधक बनल छै मैथिली बजार वेवस्था के बिकसित होई में.
8. मैथिली लेखक बजार व्यवस्था के महत्वहीन बुझैत गमैत अपना पैर पर अपने कुड़हैर मारैत रहल. खाली पुरूस्कार आयोजन होहकारी तक सिमटल रहल? तेकरे दुष्परिणाम आई मैथिली साहित्यकार भोगि रहल.
9. अप्पन लेखनि के अप्पने मार्केटिंग वला दुशचक्र के तोड़बाक प्रयासक संग एक दोसर लेखक लै सामूहिक मार्रकेटिंग के सुजोग अवसर ग्राउंड लेवल पर करै पड़त.
10. मैथिली लेखन मे ग्राउंड रिपोर्टिंग व्यवस्था के एकदम अभाव? अई शून्य के पाटै लै बज़ार व्यवस्थाक चलैन एकदमे नहि?
11. मैथिली लिखै बजै छपै काल सोतियामी मानक के अंधानुकरण एतेक जे बारहो बरण के बोली के संपादित क ओकरा मानके रूप मे छापब. अइ स मैथिली लेखन असंख्य बहुजन दूर होइत गेलै. लोक के पढ़ै मे बड्ड कैठनाह बुझेलै तइओ मैथिली लेखक बुधिआरी खेला मे लागल रहल.
12. मैथिली लेखन मे पाठकीय पठनीयता दर्शक प्रतिक्रिया के एकदमे अभाव रहलै. मैथिली आयोजन मे दर्शक स बेसी मंच पर उपस्थित कवि अइ बात के प्रमाण हइ क. दर्शक विचार जानै के होत तबे मैथिली लेखन मजगूत हेतै आ बज़ार मे रंगत पकड़तै.
समाधान:- 1. पुरस्कारी दाबि छोड़ि दर्शक स सोझहे संवाद क मैथिली लेखन के बज़ार बनबअ ताकअ आ सामूहिक भागिदारी मे खटै पड़त. एहि स मैथिली लेखक लै सामूहिक मंच निर्माण लै डेग आगू बढ़त.
2. मैथिली पत्र पत्रिका सबहक वितिय स्थिति मजगूत करै लै बजार वेबस्था स्थापित करै परत. सोझहे रचना छैप टा गेल आ निफिकिर तै स काज नै चलत.
3. कोनो तरहक मैथिली आयोजन मे विबिधता माने ई जे एकटा एहेन मंच वा सत्र जतए साहित्यकार, लेखक, प्रकाशक, बिक्रेता, फिल्मकार, कलाकार, मार्केटिंग स्टाफ सब एक दोसर के पूरक संगी बनि मैथिली बजा़र स्थापित क सकैए.
4. गिरोहबादी वेबस्था के ध्वस्त क सामूहिक भागीदारी वला मंच बनबै पड़त. दर्शक पाठक के सोझहे जोड़ै परत. मैथिली लेखन के बजार वेबस्था विस्तार लै चिंता क सार्थक प्रयास करै पड़त.
5. मैथिली लेखन मे बजार किए नै छै? केना हेतै? सामूहिक समाधान दिस नि:स्वार्थ डेग आगू बढ़बै पड़त. मार्केटिंग वेबस्था के छोट काज नै बूझि एकर दूरगामी लाभ आ दर्शक पाठक स सोझहे संवाद करबाक बेगरता बुझहू.
6. मैथिली लेखन मे ग्राउंड रिपोर्टिंग व्यवस्था के एकदम अभाव. अई शून्य के पाटै पड़त. खाली कथा कविता साहित्यक आयोजन वला ख़बैर पर भर देने रहब अविलंब बंद करै पड़त.
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.पद्य खण्ड ३.१.कल्पना झा- साउन मास ३.२.प्रमोद झा 'गोकुल'- गामक बात ३.३.राज किशोर मिश्र-पराग ३.४.आचार्य रामानंद मंडल- चीरहरण/ सावन मे नारी ३.१.कल्पना झा- साउन मास कल्पना झा साउन मास
मोन अचंभित छल, सेहनताक कोनो ठेकान नय, ने पुरबा ्ने पछबा तयौ मोन उड़ियाइत बसात सन बहैत छल, साउन क मास बडु दिप्तमास , नवविवाहिता संग सब सोहागनिक, मोन में बढैत हुल्लास, कुभलायल फूल आ हरियर चतरैत पात, खेत खरिहान में रचैत बसैत प्राण, मेघ सं झहरैत बुनि, बुनि क त्रास सं नहायल माटि, इह यौवनक संगम स गमगमायल माटि क स्नेह, वरदक बढैत डेंग जोन बनिहारक बढैत करेज, कोदारिक मारि ,माटि करैत गोहारी, भेल बिहनीक बेर चलु सब लोकनिक बढाबु एक डेग।
-कल्पना झा, बोकारो अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.प्रमोद झा 'गोकुल'- गामक बात प्रमोद झा 'गोकुल' गामक बात
घर आङन देहरि दलान गाछी बिरछी खेत खरिहान पोखैर डबड़ा ओ नदीक तान अर्रवाँ गाय महिंसीक बथान । देखब दुर्लभ दुर्खाक गुमान शान म्लान मेटल पहिचान गाम अलापय शहरुवा गान दरकि रहल सब आन मान। कतय गेलै ओ मेल जोल? खोज पुछारी टोल टोल उचित उपकार मधुर बोल डाँटो डपटमे मिसरीक घोल। दिन कुदिन बेर कुबेर चिंता नहिं ककरो कथू केर संपति हो कि बिपतीक फेर धैर्य सिनेहक बटय बेर बेर। एक दोसराक हितमे सब एक प्राण बैमनस्यताक नहिं कतौ नामो निसान धन कुवेर होथु कि मजदूर किसान मर्यादा सबहक सदिखन एक समान। परंच आइ बहय हा उनटा बयार शालीनता भै रहल अछि तार तार उकटा पैंचीक लागल घनगर पथार स्वार्थेटा मे सब संवंध आ सरोकार। उजरल फूस उपटल कूश महल मरैयाके मुहँ दूस ककरो सँ केओ कहाँ झूस लाचार देखि चूसय लवनचूस । परती परांँठ भेल पुरनका बात रस्तो पेड़ा पर जवर्दस्त घात सुनय कहाँ केओ ककरो बात कहू कते आर हम गामक बात।
-प्रमोद झा 'गोकुल', दीप,मधुबनी, (बिहार) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.राज किशोर मिश्र-पराग राज किशोर मिश्र, रिटायर्ड चीफ जेनरल मैनेजर (ई), बी.एस.एन.एल.(मुख्यालय), दिल्ली,गाम- अरेर डीह, पो. अरेर हाट, मधुबनी पराग कोँ ढ़ि आएल कुसुमक, मुह खि लल, भऽ गेल देखा र, आब मूनल किं जल।
झाँ पल सौं दर्य, भेल प्रगट, सुगंधि लेल , करैछ छट-पट।
परा ग अछि केसर पर लटकल, मकरंद, पुष्परज पर अछि ,अँटकल।
उपवन, सुगंधि सँ ,करैछ महमह, चा रू दि स, पुष्पक' ,भऽ रहल नमः ।
हि मा द्रि शृङ्ग सँ चलल पवन, नी लगि रि सँ ,आओत समी र, आओत पुरबा -पछबा ,थमि -थमि , परा ग -रज लेल अनि लक भी ड़।
वा यु -स्फुरण मो टा बन्हने, लऽ जा रहल अछि परा गक सनेस, उपवन स्वयं करैत अछि , मह -मह, बनल अछि एखन, सुगंधक धनेश।
घूमि रहल मधुमक्षि का , सूँघि पवन, प्रसून पर लुधकल, गऽहे -गऽहे ,समेटि रहल अछि , पुष्परज लेल अछि , बड़ बेकल।
खो लत सुगंधि त मुख ,प्रसून, बा ट तकैत रहैत अछि मधुकर, भि नभि ना इत चकभा उर दैत, ओगरैत रहैत अछि ,वृन्त ओकर।
ता कि रहल अछि पूर्व क्षि ति ज पर, अहुरि आ का टि रहल शतदल, अरुणो दय हो एत, तकर बा दे, देखा ओत अपन ललि त किं जल।
मधुमा छी के छत्ता मे, मधुरमधु बनि जा एत, परा ग के सि खअओलकै ई हुनर? भेटल केहन बि ढ़नी के भा ग?
पुष्परस केँ पि बय लेल, उड़ल अबैत अछि चि त्र -पतंग, जहि ना मधुकर, तहि ना ईहो , पा बि कुसुम रज ,अछि मतङ।
देखि मौ ला एल प्रसून ,मधुकर बौ आए रहल अछि , भेल नि रा स, नी क लगैत नहि छैक भमरा के, फूल सुखा ,जा इछ जा हि मा स।
पि अर, पनि टुट्टू पुष्पक' पा दप, ति तली ,अलि मे, एकरे गप-सप।
परा ग मे अछि कतेक अनुरा ग? बसैत अछि ओहि मे कुसुम -सो हा ग।
कखनो सुष्मि त को शस्थ की ट, बसा त कखनो लऽ दैछ छी ट। कखनो रस पि बय अबैछ मधुप, मधुसंचयक का ल मधुमा छी चुप।
मधुरस, मुसका इत ,बटैछ सुमन, पुष्पहि सँ ,उपवन अछि मधुवन।
फूल नचैछ, डो लैत अछि पा त, पवन केँ, संग देबक, छै बा त।
ति तली , भमरा , बि ढ़नी बूलय, फूलक गा छ पर, झूला झूलय। पुष्पक' लग ,रसक' सदा वर्त , ने मधु, ने रस लेल, को नो शर्त। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.४.आचार्य रामानंद मंडल- चीरहरण/ सावन मे नारी आचार्य रामानंद मंडल चीरहरण/ सावन मे नारी १ चीरहरण आइयो माछ लिखब। पान आ मखान लिखब। राजा रानी के गुनगान लिखब। आइयो गांजा लिखब। भांग आ मदिरा लिखब। बाभन आ सोलकन्ह के परिचय लिखब। आइयो धरम लिखब। छल कपट के मान लिखब। धूर्त आ बलतकारी के शान लिखब। आइयो धृतराष्ट्र बनब। भीष्म आ द्रोण के मान लिखब। दुर्योधन आ दु:शासन के गान लिखब। आइयो मणिपुर देखब। आदिवासी आ दलित के नग्न देखब। रामा द्रौपदी के चीरहरण आ बलतकार देखब। २ सावन मे नारी सावन मे प्रकृति। रुप धैलक नारी। सावन मे नारी। पेन्हले हरियरका सारी। लिलार मे चमकैत टिकुली हाथ में हरियरका चुरी। गोर मे पायल झुमकी। खोलले केश बदरकी। चलैत मस्त हथिनी। मोचरैत फूल यामिनी। बरखा में नारी। चुएत अंग-अंग पानी। निखरैत सौंदर्य नारी। जौवन भेल भारी। बनैत कामिनी नारी। रामा सावन न्यारी। -आचार्य रामानंद मंडल सामाजिक चिंतक सह साहित्यकार सीतामढ़ी। -आचार्य रामानंद मंडल सामाजिक चिंतक सीतामढ़ी,सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक, माता-चन्द्र देवी, पिता-स्व०राजेश्वर मंडल, पत्नी-प्रमिला देवी, जन्म तिथि-०१ जनवरी १९६० योग्यता- एम-एससी (रसायन शास्त्र), एम ए (हिन्दी)। रूचि- साहित्यिक, मैथिली-हिन्दी कविता -कहानी लेखन आ आलेख। प्रकाशित पोथी - मैथिली कविता संग्रह भासा के न बांटियो। २०२२ प्रकाशित रचना - सझिया कविता संग्रह पोथी - जनक नंदिनी जानकी आ शौर्य गान। २०२२ पत्रिका -मिथिला समाज, घर -बाहर आ अपूर्वा (मैसाम)। अखबार -दैनिक मैथिल पुनर्जागरण प्रकाश। सामाजिक-सामाजिक चिंतन, दायित्व- पूर्व जिला प्रतिनिधि, प्राथमिक शिक्षक संघ, डुमरा, सीतामढ़ी। स्थायी पत्ता- ग्राम-पिपरा विशनपुर थाना-परिहार जिला-सीतामढी। वर्तमान पता-पिपरा सदन,मुरलियाचक वार्ड-04 सीतामढ़ी पोस्ट-चकमहिला जिला-सीतामढी राज्य-बिहार पिन-843302 मो नं-9973641075 ईमेल-ramanandmandal001@gmail.com ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। 28 || http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA विदेह ३७५ म अंक ०१ अगस्त २०२३ (वर्ष १६ मास १८८ अंक ३७५)|| 29
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