ISSN 2229-547X VIDEHA 𑒀 विदेह ३७८ म अंक १५ सितम्बर २०२३ (वर्ष १६ मास १८९ अंक ३७८) [विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। कॉपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- २०२३. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२३. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. It is a platform for scholars, researchers, writers and poets to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, and poetry in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@gmail.com. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Videha e-Journal: Issue No. 378 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अक्खर खम्भा (आखर खाम्ह) तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ (कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।) माने आखर रूपी खाम्ह निर्माण कऽ ओइपर (गद्य-पद्य रूपी) मंच जँ नै बान्हल जाय तँ ऐ त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लत्ती केना पसरत। शुक्ल यजुर्वेद (२६.२)-यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः। ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च।।हम सभ गोटेकें ई पवित्र वाणी (वेदवाणी) सुनाबी। ब्राह्मणकें, क्षत्रियकें, शूद्रकें आ आर्यकें; अपन लोककें आ अपरिचितकें सेहो (माने सभकें)। मुदा ऐ वेदवाक्यक विपरीत मनुस्मृति वेदवाणीक अध्ययन/ श्रवणकें समाजक किछु गोटे लेल निषेध करऽ चाहलक, मुदा स्मृति सेहो वेदवाक्यकें प्रमाण मानैत अछि (शब्द प्रमाण) तें तकर विरुद्ध देल ओकर निर्देश स्वयं अमान्य भऽ जाइत अछि। Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. -Robert Louis Stevenson ------------------------------------- Videha: Maithili Literature Movement 𑒀 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्ति: 𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱: अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृ. २-५) १.२.अंक ३७७ पर टिप्पणी (पृ. ६-६) २.गद्य खण्ड २.१.परमानन्द लाल कर्ण- गीता माहात्म्य (आगाँ) (पृ. ८-१२) २.२.आचार्य रामानंद मंडल-शिक्षक दिवस आ वर्तमान विद्यालय निरीक्षण आदेश (पृ. १३-१६) २.३.लालदेव कामत-रिनियाँक चरित्र चित्रण करैत एक पोथी/ हमर आदर्श स्मृति शेष सूर्य नारायण चौधरी/ सर्वश्री रासविहारी दासजी: एक विषय किर्त्तन ज्ञाता/ स्व. हरिनंदन कामत जीक गाम मंगरौनी/ सब करैत छैक प्रणाम् (पृ. १७-३५) २.४.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (खेप-२७) (पृ. ३६-४२) २.५.नन्द विलास राय-घसवहिनी (पृ. ४३-४४) २.६.प्रमोद झा 'गोकुल'- हमर कि ओकर? (बीहैन कथा) (पृ. ४५-४६) २.७.रबीन्द्र नारायण मिश्र-बदलि रहल अछि सभकिछु (उपन्यास)- धारावाहिक (पृ. ४७-५९) २.८.किशन कारीगर- बुझक्करी दाबीए चूर तैं हमरा पाछुए घूर? (हास्य कटाक्ष) (पृ. ६०-६१) २.९.अरविन्द ठाकुर- झंझटिया बहु (लघुकथा) (पृ. ६२-६९) ३.पद्य खण्ड ३.१.पवन मिश्र 'गोनौली'-मिथिलाक संस्कृति आ परिवर्तनक स्वरूप (पृ. ७०-९२) ३.२.राज किशोर मिश्र-मातृभूमि (पृ. ९३-९६) ३.३.आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल (पृ. ९७-९८) ३.४.रामानन्द मण्डल- हम उदारवादी रे/ नदी/ डोमिन (पृ. ९९-१०५) 𑒀 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्तिः पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म 𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑓁 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒰𑒣: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒼𑒭𑒡𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹 𑒠𑒹𑒫𑒰: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧 ब्रह्मणसँ प्रार्थना जे द्युलोकमे, अंतरिक्षमे, पृथ्वीपर, जलमे, औषधमे, वनस्पतिमे, विश्वमे, सभ देवतागणमे आ ब्रह्ममे शांति हुअय। ॐ-ब्रह्मण, द्यौ-सूर्य-तरेगण, अंतरिक्ष- पृथ्वी आ द्यूलोकक बीच, आप:-जल, विश्वेदेवा- सभ देवता, ब्रह्म- सर्जक। 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝𑒮𑒿 𑒣𑓂𑒩𑒰𑒩𑓂𑒟𑒢𑒰 𑒖𑒹 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒧𑒹, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭𑒧𑒹, 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲𑒣𑒩, 𑒖𑒪𑒧𑒹, 𑒎𑒭𑒡𑒧𑒹, 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒱𑒧𑒹, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒧𑒹, 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰𑒑𑒝𑒧𑒹 𑒂 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒧𑒹 𑒬𑒰𑓀𑒞𑒱 𑒯𑒳𑒁𑒨। 𑓇-𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝, 𑒠𑓂𑒨𑒾-𑒮𑒴𑒩𑓂𑒨-𑒞𑒩𑒹𑒑𑒝, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭- 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒂 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒏 𑒥𑒲𑒔, 𑒂𑒣:-𑒖𑒪, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹𑒠𑒹𑒫𑒰- 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰, 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧- 𑒮𑒩𑓂𑒖𑒏। 𑒀 ॐ, स॒हस्र॑शीर्षा॒ पुरु॑षः। स॒ह॒स्रा॒क्षः स॒हस्र॑पात्। 𑓇, 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒬𑒲𑒩𑓂𑒭𑒰↓ 𑒣𑒳𑒩𑒳↑𑒭𑓁। 𑒮↓𑒯↓𑒮𑓂𑒩𑒰↓𑒏𑓂𑒭𑓁 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒣𑒰𑒞𑓂। स भूमिं॑ ग्वंग वि॒श्वतो॑ वृ॒त्वा। अत्य॑तिष्ठद् दशाङ्गु॒लम्॥ 𑒮 𑒦𑒴𑒧𑒱𑓀↑𑓅 𑒫𑒱↓𑒬𑓂𑒫𑒞𑒼↑ 𑒫𑒵↓𑒞𑓂𑒫𑒰। 𑒁𑒞𑓂𑒨↑𑒞𑒱𑒭𑓂𑒚𑒠𑓂 𑒠𑒬𑒰𑒓𑓂𑒑𑒳↓𑒪𑒧𑓂॥ हजार माथ, हजार आँखि, हजार पएर संग विश्वकेँ आच्छादित केने अछि, दस आंगुरक गनतीक वशमे नै अछि ओ। प॒द्भ्याग्ँ॑ शू॒द्रो अ॑जायत॥ 𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑒑𑓂𑒿↑ 𑒬𑒴↓𑒠𑓂𑒩𑒼 𑒁↑𑒖𑒰𑒨𑒞॥ पएरसँ शूद्रक उत्पत्ति भेल॥ प॒द्भ्यां भूमि॒र्दिशः॒ श्रोत्रा᳚त्। 𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑓀 𑒦𑒴𑒧𑒱↓𑒩𑓂𑒠𑒱𑒬𑓁↓ 𑒬𑓂𑒩𑒼𑒞𑓂𑒩𑒰↑↑𑒞𑓂। मुदा पएरेसँ भूमियोक उत्पत्ति। ❀ (White Florette- innocence and purity) ☸ (Wheel of Dharma) ࿕(Swastik) ꣼ (सिद्धिरस्तु, सिद्धम 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒱𑒩𑒮𑓂𑒞𑒳, 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒧 Devanagari Anji) 𑓅 (Gwang ग्वंग- two small circles connected by u and a dot placed over it, used in reference of Vedic texts) 𑒀 (Tirhuta Anji, Ankush of Ganeshji, placed at the beginning of something) 𑒀
१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.अंक ३७७ पर टिप्पणी १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय मैथिली लेल एकटा अनुवाद सिद्धान्त आ अनूदित साहित्यक समीक्षाशास्त्र गुणाढ्यक पैशाची भाषाक वृहत् कथाक क्षेमेन्द्रक कथा मंजरी वा सोमदेवक कथासरित्सागरक अनुवाद होएबाक कथा कथा कहबाक शैली सेहो भऽ सकैए मुदा ई अनुवादक कथाक प्रारम्भ तँ कहिते अछि। अनुवादक इतिहास बड्ड पुरान छै। कोनो प्राचीन भाषा जेना संस्कृत, अवेस्ता, ग्रीक आ लैटिनक कोनो कालजयी कृति जखन दुरूह हेबऽ लागल तँ ओइपर चाहे तँ भाष्य लिखबाक खगताक अनुभव भेल आ कनेक आर आगाँ ओकरा दोसर भाषामे अनुवाद कऽ बुझबाक खगताक अनुभव भेल। प्राचीन मौर्य साम्राज्यक सम्राट अशोकक पाथरपर कीलित शिलालेख सभ, कएकटा लिपि आ भाषामे, राज्यक आदेशकेँ विभिन्न प्रान्तमे प्रसारित केलक। भाष्य पहिने मूल भाषामे लिखल जाइत छल आ बादमे दोसर भाषामे लिखल जाए लागल। मैथिलीसँ दोसर भाषा आ दोसर भाषासँ मैथिलीमे अनुवाद लेल सिद्धान्त: मैथिलीसँ सोझे दोसर भाषामे अनुवाद अखन धरि संस्कृत, बांग्ला, नेपाली, हिन्दी आ अंग्रेजी धरि सीमित अछि। तहिना ऐ पाँचू भाषाक सोझ अनुवाद मैथिलीमे होइत अछि। ऐ पाँच भाषाक अतिरिक्त मराठी, मलयालम आदि भाषासँ सेहो सोझ मैथिली अनुवाद भेल अछि मुदा से नगण्य अछि। मैथिलीमे अनुवाद आ मैथिलीसँ अन्य भाषामे अनुवाद ऐ पाँचू भाषाकेँ मध्यस्थ भाषाक रूपमे लऽ कऽ होइत अछि। अहू पाँच भाषामे हिन्दी, नेपाली आ अंग्रेजीक अतिरिक्त आन दू भाषाक मध्यस्थ भाषाक रूपमे प्रयोग सीमित अछि। अनुवादसँ कने भिन्न अछि रूपान्तरण, जेना कथाक नाट्य रूपान्तरण वा गद्यक पद्यमे पद्यक गद्यमे रूपान्तरण। ऐ मे मैथिलीसँ मैथिलीमे विधाक रूपान्तरण होइत अछि आ अनुवाद सिद्धान्तक ज्ञान नै रहने रूपान्तरकार अर्थ आ भावक अनर्थ कऽ दैत अछि। मैथिलीमे आ मैथिलीसँ अनुवादमे तँ ई समस्या आर विकट अछि। उत्तम अनुवाद लेल किछु आवश्यक तत्त्व: शब्दशः अनुवाद करबा काल ध्यान राखू जे कहबी आ सन्दर्भक मूल भाव आबि रहल अछि आकि नै। श्ब्द, वाक्य आ भाषाक गढ़नि अक्षुण्ण रहए से ध्यानमे राखू। मूल भाषाक शब्द सभ जँ प्राचीन अछि तँ अनूदित भाषाक शब्द सभकेँ सेहो पुरान आ खाँटी राखू। मूल आ अनूदित भाषाक व्याकरण आ शब्द भण्डारक वृहत् ज्ञान एतए आवश्यक भऽ जाइत अछि। मूल भाषामे मुँह कोचिया कऽ बाजल रामनाथ, उमेशक प्रति सम्बोधनकेँ रामनाथो, उमेशोक बदलामे रामनाथहुँ, उमेशहुँ कऽ अनुवाद कएल जाएब उचित हएत मुदा सामान्य परिस्थितिमे से उचित नै हएत। से शब्द, भाव, प्रारूपमे सेहो आ मूल कृतिक देश-कालक भाषामे सेहो समानता चाही। अनुवादककेँ मूल आ अनूदित कएल जाएबला भाषाक ज्ञान तँ हेबाके चाही संगमे दुनू भाषा क्षेत्र इतिहास, भूगोल, लोककथा, कहबी आ ग्रम्य-वन्य आ नग्रक संस्कृतिक ज्ञान सेहो हेबाक चाही। ई मध्यस्थ भाषासँ अनुवाद करबा काल आर बेसी महत्वपूर्ण भऽ जाइत अछि। ऐ परिस्थितिमे “दुनू भाषा क्षेत्रक इतिहास, भूगोल, लोककथा, कहबी आ ग्रम्य-वन्य आ नग्रक संस्कृतिक ज्ञान” सँ तात्पर्य अनूदित आ मूल भाषा क्षेत्रसँ हएत मध्यस्थ भाषा क्षेत्रसँ नै। कखनो काल मूल भाषाक कोनो भाषासँ सम्बन्धित तत्त्व वा गएर भाषिक तत्व (सांस्कृतिक तत्त्व) क सही-सही उदाहरण अनूदित भाषामे नै भेटैत अछि आ तखन अनुवादक गपकेँ नमराबऽ लगैत छथि वा ओइ लेल एकटा सन्निकट शब्दावली (ओइ नै भेटल तत्त्वक) देमए लगैत छथि। ऐ परिस्थितिमे सन्निकट शब्दावली देबासँ नीक गपकेँ नमरा कऽ बुझाएब वा परिशिष्ट दऽ ओकरा स्पष्ट करब हएत। ऐ सँ मूल भाषासँ मध्यस्थ माषाक माध्यमसँ कएल अनुवादमे होइबला साहित्यिक घाटाकेँ न्यून कएल जा सकत। कथा, कविता, नाटक, उपन्यास, महाकाव्य (गीत-प्रबन्ध), निबन्ध, स्कूल-कॉलेजक पुस्तक, संगणक विज्ञान, समाजशास्त्र, समाज विज्ञान आ प्रकृति विज्ञानक पोथीक अनुवाद करबा काल किछु विशेष तकनीकक आवश्यकता पड़त। निबन्ध, स्कूल-कॉलेजक पुस्तक, संगणक विज्ञान, समाजशास्त्र, समाज विज्ञान आ प्रकृति विज्ञानक अनुवाद ऐ अर्थेँ सरल अछि जे ऐ सभमे विस्तारसँ विषयक चर्चा होइत अछि आ सर्जनात्मक साहित्य {कथा, कविता, नाटक, उपन्यास, महाकाव्य (गीत-प्रबन्ध)} क विपरीत भाव आ संस्कृतिक गुणांक नै रहैत अछि वा कम रहैत अछि। संगे एतए पाठक सेहो कक्षा/ विषयकक अनुसार सजाएल रहैत छथि। केमिकल नाम, बायोलोजिकल आ बोटेनिकल बाइनरी नाम आ आन सभ सिम्बल आदि जे विशिष्ट अन्तर्राष्ट्रीय संस्था सभ द्वारा स्वीकृत अछि तकर परिवर्तन वा अनुवाद अपेक्षित नै अछि। सर्जनात्मक साहित्यमे नाटक सभसँ कठिन अछि, फेर कविता अछि आ तखन कथा, जँ अनुवादकक दृष्टिकोणसँ देखी तखन। नाटकमे नाटकक पृष्ठभूमि आ परोक्ष निहितार्थकेँ चिन्हित करए पड़त संगहि पात्र सभक मनोविज्ञान बूझए पड़त। कवितामे कविताक विधासँ ओकर गढ़निसँ अनुवादकक परिचित भेनाइ आवश्यक, जेना हाइकूक मैथिलीसँ अंग्रेजी अनुवाद करै बेरमे मैथिलीक वार्णिक ५/७/५ क मेल जँ अंग्रेजीक अल्फाबेटसँ करेबै तँ अहाँक अनूदित हाइकू हास्यास्पद भऽ जाएत कारण अंग्रेजीमे ५/७/५ सिलेबलक हाइकू होइ छै आ मैथिलीमे जेना वर्ण आ सिलेबलक समानता होइ छै से अंग्रेजीमे नै होइ छै। ऐ सन्दर्भमे ज्योति सुनीत चौधरीक मैथिलीसँ अंग्रेजी अनुवाद एकटा प्रतिमान प्रस्तुत करैत अछि। कविताक लय, बिम्बपर विचार करए पड़त संगहि कविता खण्डक कविताक मुख्य शरीरसँ मिलान करए पड़त। कथामे कथाकारक आ कथाक पात्रक संग कथाक क्रम, बैकफ्लैशक समय-कालक ज्ञान आ वातावरणक ज्ञान आवश्यक भऽ जाइत अछि। आब महाकाव्यक अनुवाद देखू, रामलोचन शरणक मैथिली रामचरित मानस अवधीसँ मैथिलीमे अनुवाद अछि मुदा दोहा, चौपाइ, सोरठा सभ शास्त्रीय रूपेँ अनूदित भेल अछि। संस्कृत भाषाक अनुवादक माध्यमसँ पाठन आंग्ल शासक लोकनि द्वारा प्रारम्भ भेल। ऐ विधिसँ ने लैटिनक आ नहिये ग्रीकक अध्यापन कराओल गेल छल। ऐ विधिसँ जँ अहाँ संस्कत वा कोनो भाषा सीखब तँ आचार्य आ कोविद कऽ जाएब मुदा सम्भाषण नै कएल हएत। जँ कोनो भाषाकेँ अहाँ मातृभाषा रूपेँ सीखब तखने सम्भाषण कऽ सकब, संस्कृति आदिक परिचय पाठ्यक्रममे शब्दकोष; आ लोककथा आ इतिहास/ भूगोलक समावेश कऽ कएल जा सकैत अछि। संगणक द्वारा अनुवाद: सर्जनात्मक वा निबन्ध, स्कूल-कॉलेजक पुस्तक, संगणक विज्ञान, समाजशास्त्र, समाज विज्ञान आ प्रकृति विज्ञानक अनुवाद संगणक द्वारा प्रायोगिक रूपमे कएल जाइत अछि मुदा “कोल्ड ब्लडेड एनीमल” क अनुवाद हास्यास्पद रूपेँ “नृशंस जीव” कएल जाइत अछि। मुदा संगणकक द्वारा अनुवाद किछु क्षेत्रमे सफल रूपेँ भेल अछि, जेना विकीपीडियामे ५०० शब्दक एकटा “बेसी प्रयुक्त शब्दावली” आ २६०० शब्दक “शब्दावली”क अनुवाद केलासँ, गूगलक ट्रान्सलेशन अओजार आदिमे आधारभूत शब्दक अनुवाद केलासँ आ आन गवेषक जेना मोजिला फायरफॉक्स आदिमे अंग्रेजीक सभ पारिभाषिक संगणकीय शब्दक अनुवाद केलासँ त्रुटिविहीन स्वतः मैथिली अनुवाद भऽ जाइत अछि। १.२.अंक ३७७ पर टिप्पणी गौतमा नंद झा हमरा विदेहक माध्यम से जीबैत लोकक विशेषांक निकालब बड्ड निक लगैत अछि, आ संगहि एकर अपन नियम आ सिद्धांत पर ठाढ रहब एकरा सबसँ फराक करैत अछि। हमरा बुझाएल जे विदेह एखनधरि कोनो गोलौसी आ राजनीति के शिकार नहिं भेल अछि, हमरा एहि समूहक समस्त व्यक्तित्व पर गर्व होएत अछि। २.गद्य खण्ड २.१.परमानन्द लाल कर्ण- गीता माहात्म्य (आगाँ) २.२.आचार्य रामानंद मंडल-शिक्षक दिवस आ वर्तमान विद्यालय निरीक्षण आदेश २.३.लालदेव कामत-रिनियाँक चरित्र चित्रण करैत एक पोथी/ हमर आदर्श स्मृति शेष सूर्य नारायण चौधरी/ सर्वश्री रासविहारी दासजी: एक विषय किर्त्तन ज्ञाता/ स्व. हरिनंदन कामत जीक गाम मंगरौनी/ सब करैत छैक प्रणाम् २.४.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (खेप-२७) २.५.नन्द विलास राय-घसवहिनी २.६.प्रमोद झा 'गोकुल'- हमर कि ओकर? (बीहैन कथा) २.७.रबीन्द्र नारायण मिश्र-बदलि रहल अछि सभकिछु (उपन्यास)- धारावाहिक २.८.किशन कारीगर- बुझक्करी दाबीए चूर तैं हमरा पाछुए घूर? (हास्य कटाक्ष) २.९.अरविन्द ठाकुर- झंझटिया बहु (लघुकथा) २.१.परमानन्द लाल कर्ण- गीता माहात्म्य (आगाँ) परमानन्द लाल कर्ण- गीता माहात्म्य (आगाँ) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.आचार्य रामानंद मंडल-शिक्षक दिवस आ वर्तमान विद्यालय निरीक्षण आदेश आचार्य रामानंद मंडल-शिक्षक दिवस आ वर्तमान विद्यालय निरीक्षण आदेश शिक्षक दिवस आ वर्तमान विद्यालय निरीक्षण आदेश बंदउ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा। -संत तुलसीदास गुरु के महिमा के बखान कबीर के शब्द में - सात समद के मसि करौं,लेखन सब बनराई। धरती सब कागज करौं, गुरु गुन लिखा न जाई।। गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाय। बलिहारी गुरु आपने,गोविंद दियो बताय।। माने कि गुरु के महिमा अपरम्पार हय। गुरु पूर्णिमा महर्षि कृष्ण द्वैपायन अर्थात वेद व्यास के सम्मान में मनायल जाइत हय वो वेद के चार भाग में बंटलन यथा ऋगवेद, सामवेद, यजुर्वेद आ अथर्ववेद। अट्ठारह पुराणों के संगे वो चर्चित महाभारत काव्य ग्रंथ के रचयिता हतन। गुरु के महत्ता बनल रहय तैला आजादी के बाद पूर्व राष्ट्रपति डॉ राधाकृष्णन के जयंती पांच सितम्बर के शिक्षक दिवस के रूप में मनायल जाइत हय।आ शिक्षक के गुरु रूप मे श्रद्धा निवेदित कैल जाय हय। प्रारम्भिक शिक्षा के अंतर्गत महीना मे एक दिन प्रखंड स्तरीय गुरु गोष्ठी के आयोजन कैल जाइ हय।जैमे हर विद्यालय के प्रधानाध्यापक अप्पन विद्यालय के आवश्यक कागजात के जमा करैत हतन तथा सरकारी आदेश-निदेश से अवगत होइ हतन। गुरु गोष्ठी के अध्यक्षता प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी करैत हतन। प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी प्रखंड स्तरीय निरीक्षण पदाधिकारीयो छतन। हालांकि बिहार शिक्षा परियोजना के गठन के पहिले मध्य विद्यालय के निरीक्षी पदाधिकारी क्षेत्र शिक्षा पदाधिकारी आ प्राथमिक विद्यालय के निरीक्षी पदाधिकारी प्रखंड विकास पदाधिकारी होइत रहलन। जिला स्तर पर जिला शिक्षा अधीक्षक आ जिला शिक्षा पदाधिकारी निरीक्षी पदाधिकारी होइत रहलन। प्रारम्भिक शिक्षा के प्रशासनिक काज जिला शिक्षा अधीक्षक आ माध्यमिक शिक्षा के जिला शिक्षा पदाधिकारी करैत रहलन। हालांकि जिला शिक्षा उपाधीक्षक आअनुमंडल शिक्षा पदाधिकारीयो होइत रहलन परंच वो निष्क्रिय रहैत रहलन। आबि जिला शिक्षा अधीक्षक, उपाधीक्षक अनुमंडल शिक्षा पदाधिकारी आ क्षेत्र शिक्षा पदाधिकारी के पद समाप्त क देल गेल हय।आ आबि जिला शिक्षा पदाधिकारी,चार गो जिला कार्यक्रम पदाधिकारी, कार्यक्रम पदाधिकारी, सहायक कार्यक्रम पदाधिकारी काज क रहल हतन।सभ निरीक्षी पदाधिकारी होइत हतन। एतबे न, बल्कि विद्यालय शिक्षा समिति के अध्यक्ष (पंचायत वार्ड सदस्य), मुखिया, प्रखंड प्रमुख आ जिला परिषद के अध्यक्ष प्रारंभिक विद्यालय के निरीक्षी पदाधिकारी हतन। प्रारम्भिक शिक्षा से लेके उच्चतर माध्यमिक शिक्षा तक त्रिस्तरीय पंचायती राज के अधीन हय। इंहा तक कि शिक्षक नियोजन के अधिकार देल गेल हय।छठा चरण तक शिक्षक नियोजनो कैलक। परंतु सातम चरण मे नियम बदल गेल।आबि बीपीएससी से नियोजन कैल जायत आ सरकारी कर्मचारी के दर्जा देल जायत। परंतु नया निम्न स्केल के वेतनमान देल जायत।जौंकि बिहार के केन्द्रीय वेतनमान लागू हय। जे पहिले से नियोजित शिक्षक हतन वोकरो बीपीएससी के परीक्षा पास कैला के बाद सरकारी कर्मचारी के दर्जा आ लाभ पैतन। हाल मे डोमिसाइल नीति के समाप्त क देल गेल हय।अइके विरोध मे नियोजित शिक्षक आ अभ्यर्थी आवाज बुलंद क रहल हतन। आबि सरकारी नया आदेश के मुताबिक विद्यालय के जांच शिक्षा विभाग के जांच अधिकारी आ पंचायत राज के जांच अधिकारी के अलावा कोनो विभाग के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के छोड़ के चिन्हित कर्मचारी पदाधिकारी आ नियोजित कर्मचारी करत।अइ आदेश निदेश केयो शिक्षक विरोध क रहल हतन।अइसे पहिले सरकार जीविका दीदी के विद्यालय निरीक्षण के अधिकार देले रहय जेकरा माननीय उच्च न्यायालय निरस्त के देले रहय। आशा हय नयो आदेश उच्च न्यायालय से निरस्त हो जायत। अंततः शिक्षक के मानमर्दन से शिक्षा में गुणवत्ता न आ सकैय हय।अइ सभ तथ्य पर जनता आ सरकार के विचार करे के आवश्यकता हय। शिक्षक दिवस के शुभावसर पर बधाई संगे शुभकामना। -आचार्य रामानंद मंडल सामाजिक चिंतक सह साहित्यकार सीतामढ़ी।
-आचार्य रामानंद मंडल सामाजिक चिंतक सीतामढ़ी,सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक, माता-चन्द्र देवी, पिता-स्व०राजेश्वर मंडल, पत्नी-प्रमिला देवी, जन्म तिथि-०१ जनवरी १९६० योग्यता- एम-एससी (रसायन शास्त्र), एम ए (हिन्दी)। रूचि- साहित्यिक, मैथिली-हिन्दी कविता -कहानी लेखन आ आलेख। प्रकाशित पोथी - मैथिली कविता संग्रह भासा के न बांटियो। २०२२ प्रकाशित रचना - सझिया कविता संग्रह पोथी - जनक नंदिनी जानकी आ शौर्य गान। २०२२ पत्रिका -मिथिला समाज, घर -बाहर आ अपूर्वा (मैसाम)। अखबार -दैनिक मैथिल पुनर्जागरण प्रकाश। सामाजिक-सामाजिक चिंतन, दायित्व- पूर्व जिला प्रतिनिधि, प्राथमिक शिक्षक संघ, डुमरा, सीतामढ़ी। स्थायी पत्ता- ग्राम-पिपरा विशनपुर थाना-परिहार जिला-सीतामढी। वर्तमान पता-पिपरा सदन,मुरलियाचक वार्ड-04 सीतामढ़ी पोस्ट-चकमहिला जिला-सीतामढी राज्य-बिहार पिन-843302 मो नं-9973641075 ईमेल-ramanandmandal001@gmail.com ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.लालदेव कामत-रिनियाँक चरित्र चित्रण करैत एक पोथी/ हमर आदर्श स्मृति शेष सूर्य नारायण चौधरी/ सर्वश्री रासविहारी दासजी: एक विषय किर्त्तन ज्ञाता/ स्व. हरिनंदन कामत जीक गाम मंगरौनी/ सब करैत छैक प्रणाम् लालदेव कामत-रिनियाँक चरित्र चित्रण करैत एक पोथी/ हमर आदर्श स्मृति शेष सूर्य नारायण चौधरी/ सर्वश्री रासविहारी दासजी :एक विषय किर्त्तन ज्ञाता/ स्व. हरिनंदन कामत जीक गाम मंगरौनी/ सब करैत छैक प्रणाम् १ रिनियाँक चरित्र चित्रण करैत एक पोथी वरेण्य साहित्यकार तारानंद वियोगी- केदार कानन जीक सम्पादनमे गुलो : कला आ भाषा (विमर्श) २०२२ ई०मेँ २१५ पृष्टक 'मैथिली पोथी' किसुन संकल्प लोक सुपौल, प्रकाशित केलक। एहि गतगर साहित्य के दाम दू सय टाका छैक,जाहिमे आवरण अनुप्रिया'क आकर्षक छन्हि। पोथीमे आखरी एक पाठ मूल उपन्यास लेखक डाॅ० सुभाष चन्द्र यादव जीक ' पचपनिया मैथिली 'शिर्षक सेहो लागल पाठक केँ अभरत। ऐ पोथीमे गुलोक छोट बेटीक जे मूल उपन्यास कथाक केन्द्रीय पात्र अछि, ताहि के मादे विभिन्न विद्वान समालोचना केलनि ,से हुनके शव्दमे अपनेके दिग्दर्शन कराबैत छी। सुपौल गोठ केर रहबासी लगधक ५५ वर्षीय गुलो उर्फ गुलाब मंडल के बाबुजी सँ हुनक मसोमाति भेल बेटीक बालक चाह दोकानमे संग पूरैत गुजर बसर करैत रहै य। से नाति महिनदर एकदिन धोखा दैत बासडीह- घरारी कबाला करा लेने रहैक आ माम गुलो केँ एतय सँ भागिन सब तुरके भगा देलकैक। गरीब गुलो सरकारी डगरकात ब्रह्मस्थान टोला लग कच्चाघर बनाकय सपरिवार विस्थापित जीवन वितबैत चाहक दोकान करैत रहैछ। अपन जीवनक आखरी छ:मास पूर्व लेखक आ हुनक मित्र सँ परिचिति पाबैत छैक। कथा नायक गुलो जवानीमे गाँजा पिबैत रहथि,से आब ओ दम्मा रोग सँ ग्रसित छथि। हुनक पत्नी बेलाबाली दू बेटा- दू बेटीके जन्म दैत रोगाहि भऽ गेल छैक। डेढ़ दू सेर (लीटर) दुध सँ गँहकि चलबैत अछि,अदहा दुधक चाह अपने परिवार मे सधि जाईछ। जेठका बेटा अरजूनमा ऐ कसबामे रिक्शे चलबैत निशेवाजी संगहतमे रहैत छैक। ओ पैनजाब खटय गेल छलैक। अपना स्रीके टाका कमाके पठबैत छैक। ओकर तीन सालक बेटा सुजीत छै से दादा-दादी लग दीदी आ अनबर क्वैक लग खूब रीताएल छै। कोशी चौक पर जे पूर्वी कोसीबान्ह सँ पूरब बेरियामंच बाला नव उपनिवेश कायम भेल छैक; ओतय छोटछीन समाजिक बसावट ढ़ांचा ठाढ़ छैक। ताहिमे अनवर कठघारा राखि सूइया दवाई के ल'के ग्रामीण सँ नीक भाईचारा मे रहैत देखाईछ। परोसमे एक भला आदमी गुलो आ इनरा गान्ही सब समांग रहैत छैक। गुलो ऋण समझि अपन छोटकी बेटीक'' नाम रिनिया राखने अछि। से रिनिया कोनू गीत गबैत अपन आँगन द्वार नीपैमे निमग्न रहैत अछि,तिलासंकराइत छीयै। सद्यप्रकाशित ऐ पोथीमे सिद्दत सँ कुमार मनीष अरविंद " एहि युगक अवहट्ट उपन्यासमे" लिखैत छथि ' उपन्यासक प्रारम्भहि मे रिनिया निपिया क' रहल अछि।ओ ओढ़ना नहि ओढ़ने अछि। जाड़क मास छैक,तैयो। ओढ़ना नहि ओढैत अछि,जे निपिया करै मे ओढ़ना लेटा जेतैक। रिनिया चाहक दोकानक निपिया करैत अछि त' दोकानक आगू सड़क पर तीन गोटय ठाढ़ छै आ रिनिया दिस ताकि रहल छै। भरिसक फ्राक सए हुलकी मारैत जौवन निहारै छै। गुलो आ बेलाबाली ई बात बुझै छै।मुदा गुलोक बेबसी देखियौ जे ओ अपन बेटीकेँ बात कह' के अतिरिक्त ओहि तीनू कें किछु नहि कहि सकैत --_अछि। ओ अपन बेटी पर बमकैत अछि, ' गए छौड़ी! छोड़लिही? आकि दियौ झापर!' उपन्यास विन्यास आ ताहिके कथोपकथन ततेक सुस्पष्ट भेल छैन जे अपने पाठक हुनक ठेंठी मैथिली आ छोट वाक्य चयन देखि प्रफुल्लित भ' उठब। सुभाष चन्द्र बाबुक लेखन शैली एहि तरहेक होइछ-: रिनिया मनसुआयल- ए। आइ डोका के मौंस खायत। कंदाहावाली कहि कए गेल छै डोका लेने एतै। लेकिन डोका नै भेलै। ऊ घोंघा लेने एलै। घोंघा छोट होइ छै। बनबै मे भारी झंझट। आ खाइयो मे बेकार। घोंघा देख कए रिनियाक मन खसि पड़ल। ऊ रुसि रहल। ने घोंघा बनबै लए तैयार ने कोनो टहल करै लए तैयार। माय-बबा कतबो कहै छै-'पानि ला । झाड़ू लगा दही।' कोनो परवाह नै। ऊ गुमसुम बैठल-ए। माय परचारै छै-' जीबलाहि केहन! सब दिन माछे- मौंसै चाही।' रिनिया कठुआयल बैठल रहइ-ए। सुक्खल कैल केश हवा मे उड़िया रहल रहल छै। ऊ कहियो केश मे तेल नै लगबइ-ए। तेल रहिते ने छै जे लगायत। एहि तरहेक पाँति उठाकय कतेको विद्वतजन अपन आलेखमे सन्हियेने छथि। यथा-: रमण कुमार सिंह ' युगान्तकारी उपन्यास : गुलो ' मे लिखैत छथि- सर्व शिक्षा अभियान 'क सच्चाई एहि उपन्यास मे देखार पड़ैत अछि। रिनिया स्कूल पढ़ै लेल नहि बरू पोशाक राशि'क लोभ मे जाइत अछि। मैडम कहने रहैय जूता कि चप्पल किन लीहें, मुदा बाबुजी ओहि पाई सँ घरखर्चा मे सधा देने रहैक। पाँच टका मेला देखय जाई ले नहि द' सकलैक आ न कोनू बेगरता मे कनिकबो पाई। से रिनिया झूठा धरि कहैत बापके लुलकारि लै छै। अंगना दुआरि (दोकान) भोरे नीपै सँ छोटकी बेटीके मनाही करैत ओकर माय चिचिआइ छै- 'माय गे माय! छौड़ी हमरा जीअय नै देते! गे चद्दरि ओढ़ि ने ले।' नै ओढ़ै छी। भरि के लेटा जेतै!' रिनिया खौंझा कए कहै छै आ माटिक ढ़ेला गुड़ि- गुड़ि बाल्टिवाला पानि मे खसबैत जाई छै।' पृष्ठ सं० ४१ ,एक दिन गहुँम कटनी काए घुरैत- घुरैत राति के आठ बाजि गेलै। गुलो बजार गेल रहै। रिनिया कए बड़जोर भुख लागि गेलै। बबा रहितिए तऽ एक-दू टका मांगिकए कुइछ खाय लइत। गुलो आ उमेशबा के दोकान आमने-सामने छै। रिनिया देखलक उमेशबा के बेटी दोकान पर असकरे छै। लग गेल आ कहलकै- हे गे! कने पकौड़ी दे ने। बड़ भूख लागल-ए। रिनिया पच- पच थूक फेकै य, मुदा ओ जीबलाहि नै य।अनबर चालीक कैप्सुल दै ले गुलोकेँ कहैत छै,परंच दामधरि नै पुछारि करत। सरकारी अस्पताल मे दवाय भेटि सकैछ। सतीश वर्मा " मेहनतकश बहुजन समाज 'क महाकाव्य ' शिर्षक मेँ लिखैत छथि- गुलो पढ़लाक बाद हमरो एहि उपन्यासक पात्र गुलोक बेटी रिनिया सँ बेसी जुड़ाव भ' गेल। गुलो पढ़लाक बाद हमरा लागल जे ई उपन्यास गुलोक कथा सँ बेसी गुलोक बेटी रिनिया 'क कथा थिक। उपन्यासकार सुभाष सेहो गुलोक कथा कहैत कहैत (जाने- अनजाने) रिनियाक कथा कहय लागैत छथि आ ई अनायास नहि थिक जे उपन्यास रिनिया सँ शुरू होइत अछि आ रिनिये पर जा' के' ख़त्म होइत अछि। भरि उपन्यासमे बाप (गुलो) आ बेटी ( रिनिया) 'क बीच जे फटकार- दुलारबला ममता आ प्रेमक सम्बन्ध अछि ,से उपन्यासक प्राणवायु थिक। बाधमे आइसकिरीम आ दालमोठवला फेरी लगबैत रहै छै। रिनिया गुलो सँ पाँच गो टका मांगइ-ए-' बबा पाँच गो टका दएह। आइसक्रीम खेबै।' नै छै टका-' गुलो टिरीस कए कहइ- ए।' दाए ने हौ-' रिनिया खोसामद करै छै। ' नै देबहक-' रिनिया निराश भेल जाइ-ए। गुलो के तामस उठलै- ' हे गे छौड़ी, देखबिही,बड़ आइसक्रीमवाली भेली है। तेहन मारि मारबौ जे सब आइसकिरीम घुसड़ि जेतौ।' रिनिया उदास भाए गेल।ओकर मौलायल मुँह देख कए गुलो कए ममता लागलै। ओकरा लग दुइए गो टका रहै, दाय देलकै। रिनिया चेहरा पर मुस्की एलै। रिनिया घरो मे काज आ बाहरो काज करयमे अशकताइत नहि छैक। आशीष चमन ' बेछप उपन्यास गुलो' मे लिखैत छथि- कन्दाहाबाली अपन पाइ- कौड़ी कें घर मे खर्च- बर्च नहि करैत छैक। ओकर निजत्व तखन पराकाष्ठा पर चलि जाइत छै,जखन ओ अपन बेटा 'सुजीत' कें ओधबाध उठाबैत छैक तँ रिनिया ओकरा रोकैत छैक। ननदि- भाउज आ बादमे देओरक मध्य मारिपीट भ' जाइत छैक। ओ अपन पति 'अरजुनमा' कें फोन क' केँ सासु-ननदिक खिधांस करैत छैक आ पाँच हजार टाका अपना भायक मार्फत अरजुनमा ' सँ मंगा लैत छैक आ बजार सँ ड्राम आनि ओहि मे बोनिबला तीनों मन गहुँम ढारि ताला मारि नहिरा चलि जाइत छै,जहनकि ओहि बोनिमे रिनिया सेहो साझीदार छलैक । मन्त्रेश्वर झा ' एक विशिष्ट उपन्यास: गुलो' मेँ एकठाम लिखने छथि-" लेकिन रिनिया तँ जुलुम छै। हँसै छै त' बुझाइ छै फूल झड़ै छै...। रिनिया 'क हँसीमे जादू छै। चुम्मक जकाँ खींचै छै। निश्छल निर्मल हँसी। इजोरिया जकाँ छिटकैत। ओकर चलै के , बोलै के , ताकैत के ढंग लोक कें मोहि लै छै। जे देखलक देखते रहि गेल ।' एक बेर जखन रिनिया पाँच- सात टा छीमी एके बेर खा जाइ छै त' गुलो बरजै- ' ई छौंड़ी राछछनी जकाँ करै छै।एतेक कफ छै आ केला भकोसने जाइ छै। रामलोचन ठाकुर " गुलो : आजुक पराति" मे एकठाम लिखने छथि-: मिथिला दर्शन'क साहित्य विशेषांक लेल हम लिली रे, सुभाष चन्द्र यादव एवं केदारनाथ चौधरी कें आग्रह कएने छलियनि- उपन्यासक लेल । मुदा केओ नहिं द' सकला । विभूति आनन्द आ प्रदीप बिहारी 'क आभार। किन्तु दोसरो वर्ष हम सुभाष के चरियबैत रहलियनि आ अन्ततः ' गुलो ' हमरा प्राप्त भेल। एकटा नव ढँगक कांटी मैथिली उपन्यास । यात्रीक ' सत्य थिक संघर्ष' के साकार करैत विशुद्ध मैथिली उपन्यास । मिथिलाक , वंचित- अवहेलित मिथिलाक व्यथा- कथाक विलक्षण चित्रण । 'गुलो' मिथिला दर्शनक नवम्बर- दिसम्बर २०१४ मेँ प्रकाशित भेल रहय। रिनियोँ कें जखन लोक डिठिअबै छै त' ओकरा बापके तामस होई छै, ओ रिनिया केँदमसबैए। ओ आइसकिरीम ले पाई मँगै छै त� फेर तमसाइए। मुदा दू गो टाका बहार क' रिनिया कें दैत छै।ओकर अपन छोटकी बेटीकें संग करैत भागिनक वियाहमे जाइए। जेठ बेटी रूनिया ओतय सेहो लियाउन भ' के आयल रहैत छैक। से ओ जिद्द करैत छैक अपना संगे किशोरी रिनिया के सासुर ल' जाए ले ,तँ रिनियाक कहल वुध्दि वढ़ विशेष होईछ- ' हम नै जेबो गे बहिन। लोग कहत पेट पोसै लए आयल छै। बाप रोगाह भाए गेलै ;दिन टगि गेलै तैँ ने तू जाइ लए कहै छिही? नै जेबौ गे बहीन, नै जेबौ।' बैद्यनाथ झा- गुलो : एकटा पाठकीय अभिमत मेँ लिखैत छथि- गुलो उपन्यासमे जौं हमरा सँ पुछी तँ ध्यानाकर्षक चरित्र रिनिया 'क लगैत अछि- निधोख, सिध्दांतप्रिय, स्वाभिमानी , परिबारक हितमे अपन स'खक ठोंठि मोक निहारि रिनिया। रिनियाक 'अण्डरस्टैंडिग' देखियौक जे अपने स'ख मनोरथ व्यक्त करैत अछि,कोना पूरत,तकर थाह- पथाह लैत अछि, मुदा परिस्थिति देखि चुप भ' जाइत अछि। चरित्र एहन धवल जे जेठकी बहीनक देओर नेरहूक कुदृष्टि चीन्हि जाइत अछि आ माय सँ कहैत छैक- ' ओकरा कही चलि जेतौक।' अशोक " विकासक अनघोलमे गुलो" मे लिखैत छथि- मुदा गुलोक संसार मे जे सभ सँ देखनुक पात्र अछि से रिनिया अछि। बारह- तेरह बरखक छौंड़ी। मुदा 'जुलुम' छै।" जे देखलक से देखते रहि गेल। रिनिया ककरो किछ कहि दै छै।बात केहनो रहौ, खराब नहि लगै छै। एक टका मे दू गो बीड़ी दै छै। रिनिया के दू टा देलक त' कहै छै , ' इह बुढ़बा,दूइए गो।' बीड़ी बाला एकटा आर द' दै छै। पावरोटी बाला के कहलक, हो , तू बड़ा कंजूस छहक।' आ लहकलहा पावरोटी उठा लेलक। ककरो केरा खाइत देखलक त' बाजल, भैया,अपने टा खाइ छहक।' आ ओ एगो केरा द' देलक। मुदा रिनिया कोनो बातक रोख नहि रखैये। कोनो बात भेलापर फेर लगले काज मे भीड़ि जाइये। बूझू जे एतनीटा छौड़ी पुरा घर के सम्हारने अछि। मुदा छोट भाइ छोटुआ सँ ओकरा नहि पटै छै। सदिखन झझमझ चलिते रहैत छै। रिनिया कें घरक परिस्थितिक बोध छै। विद्यानन्द झा,लिखैत छथि- जखन रिनिया एकबेर पड़ोसक बनियाके छोट बेटी सँ किछ ल' अबैत अछि त' सब ओकरा दुरदुर क' उठैत छैक। खगलो रहला पर गुलो गाछी सँ खसल आम बिछि क' ल' जाय बला कें किछ नहि कहैत अछि। रिनिया अपना लगक गाछी बला कें अपन गाछीक आम बीछि लेला पर लोभी कहैत अछि। मुदा अपने अनकर गाछी सँ लिच्ची चोरबैत ओकरा कोनो लाज नहि ,मात्र भय होइत छै। कृष्ण मोहन झा 'मोहन' एहि पोथी मादे कहैत छथि- 'गुलो' अनुभूतिक गहनता मे लिखल गेल छोट आकारक पैघ उपन्यास थीक। गरीब जीनगिक नमरैत संघर्ष जकाँ ,धैर्य जकाँ आ दुख-व्याधि सहबाक अपरिमित शक्ति जकाँ ।एकर अन्तर यात्राक सूक्ष्मता गद्यमे काव्यक आस्वाद दैत अछि आ शिल्पक सचेतनता सहज , स्वाभाविक अभिव्यक्ति मे कथा कहैत चलि जाइत अछि।ओ छोट कथाक पैघ उपन्यास मे लिखैत,एतबे नहि एकटा आर प्रसंग मे रिनिया मालिक- मलिकाइनिक प्रशंसा करैत कहैत अछि जे- बंबई मे एक्के ठाढ़िमे दस बारह टा आमके घौदा छै। रिनिया सोचने-ए ई घौदे मालिक कए दाए देबै।मालिक बड़ खुश हेतै। एक बेर रिनिया गछपक्कू आम लाए कए गेल रहै त' मालिक पचास गो टाका देने रहै। मलिकाईन खाइ लए देने रहै। आओर गंगानाथ गंगेश ' उजरल- उपटल गुलोक गुलजार दुनियाँ ' मे लिखै छथि- एक राति नौ वजे मे दशरथ मंडल (पलाई मील मालिक) के मुंशी गुलो लग एलै। कहलकै-गुलो भाय, एगो बड़का पेट के बात कहे ले आएल छियह। हमरा कंपनी पठेलकै-ए। नेपाल मे एगो लड़का छै। कम्पनी के साढ़ु के बेटा छिऐ। जथा- जाल बला छिऐ। बियाह मे जते खरचा हेतइ- दस बीस हजार से कंपनीए देतह। घरक लड़की जाए। सब किछु देखल सुनल । तोहर की बिचार से कंपनी पुछलहक-ए ।' आ चारि मास सोचैक बेटा सँ विचारैक समय लैत एकदिन भुमकम सँ पहिने अपने सधि जाईछ। ताहि सँ पहिलुकवे गप्प-; गुलोक घर पछुआर मे दू टा कदम के गाछ छै। अनवर कहै छै- गुलो एकटा गाछ बेच लएह। चारि-पाँच हजार मे बिकिए जेतह ओहि सँ घर आ कल दूनू ठीक करा लिहह।' गुलो कहै छै- अनवर भाय, ई दुनू गाछ रिनियाक बियाह लए राखने छिऐ।' अनवर अबाक् भाए जाइ-ए । माय के मनो कयला पर धरि ५०० मे रिनिया पाठी आनि पोसलक ,ओकरा धारतै। दू दिन धरि बरखा होइते रहलै से आरा पर मुँग तिलकय लागल रहै, रिनिया करिया छीमी बिछलक। एक पौवा दाना निकललै। से पहिल तोड़ मे सँ सतलरेनमा के दालि खाय ले दाए एलै । ऊ बीश टका देने रहै। रिनिया जुगताकए टाका राखलक,ककरो नहि देत। एहि तरहेँ आरो संदर्भ सुनल जाए! रिनिया असकरे दू दिन मुँग(खेरही) तोड़लक। एक-एक छिट्टा। एक दिन दूनू मायधी छोड़कर। दू टा जनो तोड़लकै। रिनिया मूंग सुखेलक। डंगेलक। आठ- नौ किलो तैयार भेल हेतै। एक छोहन और टुटतै। ओइ मे जे निकलै। पानि जे नै भेलै से मुंग मुनही भाए गेलै। गुलो कहै छै-'मूंग तैयार भेल छै से सभटा गिरहत कए दाए एबै। बेलाबाली जोड़ई छै। हड़ लागलै,बीया लागलै,सबटा दाए एतै तऽ पूँजियो डूबि जेतै। कहइ छै- " एते जे खरचा भेलै से घर सए देबहक? एहन खेती लोग किए करतै? अरजुनमा गाम अबिते पहिले चाहक दोकानक मुंह अंगना दिशन घुमबैत टाट जे लगौलक से दम घुटैत गुलोके रूग्न अवस्थामे पुंगेलक। आ मुइल बाप रिनिया नहि जगा सकली। से सरकारी फीस हजार प्राप्त टाका भागिन गोठटोल सँ आबि रातिमे अपना ओहिठाम ल' गेल। प्रातभने रिनिया ओई ठकहरबा भाय सँ सब टाका डटियारी सँ धरि माँगि आनलक। कोशिकनहा क्षेत्र मे रिनिया सन अनेको अति पिछरल-गरीब मुदा बहादुर ललना अपन उत्कर्ष देखाबैछ।
२ हमर आदर्श स्मृति शेष सूर्य नारायण चौधरी
साहित्यकार-पत्रकार आ राजनेताक रूपमे प्रख्यात सूर्य नारायण चौधरी जीक जन्म 12 जनवरी 1933 केँ मधुबनी जिलाक मिर्जापुर (राजनगर) गाममे स्व� रामलखन चौधरी के घर भेल छलन्हि।1950-54 धरि ओ सी�एम� काॅलेजक क' स्नातक छात्र रहलाह। नित्य दिन गामे सँ नोकर खाईक पहुंचबैत रहैक। हिनका बाबाके राजघराना दरभंगा सँ संपर्क रहैक आ पिताजी बाद मे घरे लगक महंत जीक खजांची रहि अपनो दू मौजेक जगह जमीन सँ खेती पैदावार कराबथि। चौधरी जीक पहिल वर्षगांठ पर बिहारक बड़का भूमकम भेलैक जाहिमे हिनक पैतृक खपरैल भीतघर ध्वस्त भ' गेलैक। चौधरी जीक बाल-विवाह मरनैया गाममे वर्त्तन संग भेलनि,जाहिसँ दू पुत्री, एक पुत्र प्राप्त भेलनि। बड़की पुत्री रुग्न वीणाक बियाह ललमनियां भेलैक जे मलहनमा (नेपाल) मेँ रहैत छैक आ पुत्र रामबाबूक उर्फ विनोद कुमार चौधरी बियाह विराटनगर मेँ खड़ौआ निवासी डा� रामजी व्यासक बहिन लक्ष्मी सँ भेलनि, छोट पुत्री निलम प्रभाक बियाह डा� अखिलेश मंडल जीक (मेहंदीगाम) संग भेलनि जे वर्तमान कटिहार मेँ रहैत छथि वो गरभाइत कैवर्त्त समाज छथिन। चौधरी जी मगध विश्वविद्यालय सँ आगूक शिक्षा प्राप्त करैत रेलवे मेंँ नौकरी करय लगलाह आ कतेको ट्रेड यूनियन आंदोलन मेँ सक्रिय रहि समाजसेवाक अभिप्राय सँ नौकरी छोड़ि देलनि।बेटा केँ रेलवे मे नौकरी धरेलथि जे पटना जं� मेँ 10 वर्षक बाद नौकरी छोड़ि समता पार्टी मेंँ सक्रिय भेलैक आ दू बेर बाबूबरही तथा मधुबनी सँ निर्दलीय चुनाव विधानसभाक लड़लैक। पुत्रवधू सेहो जिला परिषदक चुनाव मेँ कम मतक अन्तर सँ हारि गेलिह। मुख्य विषय दिश अबैत छी आब:- समाजवादी नेता सूरज नारायण सिंह जीक नेतृत्व मे संचालित अनेक भूमि आन्दोलन मेँ ओ सक्रिय रहलाह। छात्र संगठन मे सेहो समितिक समाजवादी नेतृत्व स्थापित करैत प्रभावकारी भूमिका निभावथि। सोशलिस्ट पार्टीक प्रचारात्मक एवं आन्दोलनात्मक काज मे अगूवा रहथि। बिहार आन्दोलन मे सक्रिय रहि फणीश्वरनाथ रेणुक संग मिलकए नुक्कड़ कवि सम्मेलन, नाटक आ चित्र प्रदर्शनिक आयोजन पटना मे करथि। आपातकालमे गामक खेत बेचिकए प्रेस खोललनि आ गुप्त साहित्यक प्रकाशन,तकर वितरण सेहो करैत छलाह। जिविका निर्वहन लेल किछ दिन लेल फेरसँ दानापुर मे रेलवेक नौकरी धेलैथ। सूर्य नारायण बाबू बिहारक एक पैघ मेधावी, परिश्रमी आ दूरदृष्टी रखनिहार रचनाकार रहथि। बिहारक अतिपिछड़ी ऐनेक्सर-1 केवट जाति सँ रहथि, एहि पृष्ठभूमि सँ कोनो व्यक्ति लेखनमे एतेक नम्हर मूल्यक नहि भेल रहथि। 1969 ई�मे रेणुजीक सहयोगे रचना नामक साहित्यक संस्थाक स्थापना केलनि जकर ओ सचिव रहथि। 1981 मे कर्पूरी ठाकुर जीक प्रेरणासँ श्री लालू प्रसाद आ सच्चिदानंद जीक संग राजगृहमे साहित्यकार, बुद्धिजीवी आ राजनीतिज्ञ सभक एकटा मंच बनाय संपूर्ण क्रांति एवं कौमी एकता सम्मेलन केलनि। चौधरी जी भारतक सभटा राज्यक यात्रा करैत संबंधित क्षेत्रक लोक जीवनक वृहत अध्ययन केलनि। यात्रा संस्मरण "पूर्वांचल की यात्रा'' खूब लोकप्रिय हिन्दी पोथी भेलनि। ताहि सँ पूर्व समय की यात्रा-परिचय प्रकाशन हापुर सँ प्रकाशित भेल रहय जाहि पर पुस्तक समीक्षा पाटलिपुत्र टाइम्सक पृष्ठ 4 पर 12 जुलाई 1987 केँ डा� अमर कुमार सिंह छपबौने रहथि। चौधरी जी प्रमुख राजनीतिक पत्रिका 'दिनमान' मे स्थायी रूपे 5 धारावाहिक आलेख लिखने छथि,जे इंटरव्यू, यात्रावृत्तांत रूपे छपैत रहलैक। 1968 मेँ रेल हड़ताल मे जेहल गेलाह आ प्रेसविल विरोधी आंदोलन एवं मंडल आयोगक सिफारिश लागू करेबा लेल आयोजित प्रर्दशनी खातिर अपन गिरफ्तारी देलनि। 1985 मेँ मधुबनी विधानसभा सँ चुनाव लोकदल टिकट पर लड़लथि आ एहि दलक प्रांतिय कार्य समिति मे 1986मे सेहो मनोनीत कर्पूरी जी द्वारा 1989 मे भेलाह। आकाशवाणी आ दूरदर्शनक घेराव कार्यक्रम मे हुनका पुलिस बर्बर रुपे पिटने रहैक।वो बहुत वर्ष धरि काॅफी हाउसक अभिन्न हिस्सा बनल रहलाह; एहि बारे मे फेर कहियो विस्तार सँ बुझायब। 'बिहार की अस्मिता' पुस्तक शहदरा दिल्ली सँ 1991 मे साहित्य केन्द्र प्रकाशन सँ बहरायल छैक जे ओ अपन अधिकार लेल संघर्ष करय बाला तमाम बंचितके समर्पित कयने छथि। एहिक दोसरो प्रकाशक छपाई केलक ,हिनक प्रकाश्यकृति मे पूर्वांचल की यात्रा, समकालीन परिवेश की काली यादें व एकटा काव्य पुस्तिका छैक।7 मई 1990 के बिहार विधानसभा क्षेत्र सँ एमएलसी जनता दल बनेलकैन परंच 14 अप्रैल 1991 केँ अचानक दिल्लीक बत्तरा होस्पीटलमे हृदयगति सदा लेल रूकि गेलनि। हुनकर असामायिक निधन सँ दू दिन धरि पटना दिल्ली दलमलित उठि गेलै,कियाक तँ ओ सामाजिक न्याय केर लड़ाई लड़ैवाला एक समाजिक योद्धा रहथि। एक समय केर प्रतिबद्ध बौद्धिक चौधरी जीक परिवार मे अनुकंपा नहिं भेटलैक ,जखन कि ओहि समय मेँ बहुतो राजनेताक वंशज ई सुख पावैमे अगूएलैक। आई एकटा अदद स्मारक लेल हुनका चाहै बालाक बीच जबरदस्त अभाव खटकि रहलैक अछि। एहन प्रखर विद्वान मनिषि मिथिलांचलक एकटा आदर्श छलाह। शत्-शत् ३ सर्वश्री रासविहारी दासजी :एक विषय किर्त्तन ज्ञाता
मधुबनी जिलाक कोशीक्षेत्रक देवनथपट्टी गाममे कियोट कुलक बाबाजी कामत(मंडल) घर आई सँ करीब सयशाल पुर्व एक चंखार बालकक जन्म भेल रहनि।ओ नवजात शिशु रहय रासबिहारी जी।बाल्यकाल्यमे हुनकर माय गुजैर गेलीह तँ सरौती बाली(कुलाय चौधरीक बहिण) विमाता लालन -पालण केलकनि।हुनकर मातृक विशनपुर जि०सुपौल मेँ दू ममियौत भाय चतरी आ महादेव तथा बसुलीमे दू मसियौत भाय यदु एवं जोतीष रहथिन ।हिनक बाल विवाह सुरियाही जि०मधुबनी निवासी रामजी कामत जीक बेटी बरहनिया देवीक संग भेल रहनि।जाहि सँ हुनका तीन पुत्र आ तीन पुत्री भेलनि। जे क्रमश: चन्द्रकला (मुजियासी), त्यागी उर्फ रामनारायण,बैरागी, सुर्यकला (कुनौली), सत्येन्द्र आओर दुर्गेश (धावघाट) छन्हि।श्री दासजी रमौत वैष्णव रहथि आ गरीबीमे जीवन बितैत छलन्हि।ताहि समयमे कुम्हारक माटिक बासनमे सबकियो पाक आ भोजनलै बर्तन व्यवहार करथि।से बचपनमे ई कतेको घैल फोरि कनखा बाहर कय,ओहिमे कागत साटिके खजुरी बजबय लेल छारथि।ता गिन्न गिन्ना...धात् ता गीन.....सुपुट आबाज निकालथि।केराक थम सँ ढोलक आकार केर गरदैनमे लटका केँ डिमिक डिमिक डम डम्म....आ गपच्चि गपचि गम गम...खूब ताल बजाबैथ।कतौह गान बजान नेनामे देखथि तँ एकहाथ देवालेल कोनो धरानिये चकै के चकधुम ,चक्कै के चकधुम,मकई के बगीया ...... धरि बजाकय परा जाथि। से विवाह भेलासन्ता जे गाम सँ पड़ेलाह तँ धुन सीखैत(स्व०जगरनाथी कामत) गौआंके कलकत्तामे देखेलाह।ताधरि लोक हिनका मादें इयह बुझैक जे कतौह मरि- खैप गेल हेतैक। कोलकाता मेँ एक नामी रामलीला थियेटर कम्पनीमे ठेका बजेबाक काज मांगने रहथि,तँ मैनैजर साहेब जाँचमे अनारी मानि हटाबय चाहलक।हुनका सँ अनुनय विनय करैत चौंका केर काजक बहाने रहैत ,सब तरहक साज बाज बजौनाई सीख गेलाह।कतेको तरहक आधुनिक वाद्ययन्त्र केर मास्टर आ अभिनय कलामे पारंगत भेलाह।युवा भेलापर मारवाड़ी समाजके सहयोग सँ अपन खुदसर मण्डली बनौलनि।जखन मंडलीके बिहारक रूख करैत बंगाल सीमान सँ टपलाह आ कार्यक्रम प्रस्तुत करैत जे कैंचा पुष्कर जम्मा भेल छलनि से ५टा भोजपुरिया संगतिया ल'केँ राइतो राइत पार भ गेलैक।पोशाक आ पर्दा सेहो संगे ल'भागलनि।सात दिनधरि ओहि सोगे अन्न जल त्यागने छलाह।फेर सब घुमलैक कलकत्ता दिशन,ओतय फेर सँ मारवाड़ी समाज दिश सँ मंडली नीजी चलेबाक लेल आर्थिक मदैत लेलैन, भेटलनि।छोटछीन कार्यक्रम विषय कीर्त्त्तन मंडली बनाकय संचालित करयमे लागि गेलाह।धार्मिक सांस्कृतिक जागरूकता लेल हुनका संग ढोलक बादक जीतन कामैत(अलोला) राम गुलाम यादव- झाईल (निघमा)गामेक मोहनजी सिंह हारमोनियम।वादमे भागीन बसुआरिक सोमन जी,गंगापुरक दुखी ठाकुरजी ( कम्पाउण्डर)धरिसंग पुरैन।नेपालमे श्री लछमी बाबू क' (अलोला निवासी)गायन बजानमे ठकैता रहि ढोलक बजबैत अपना सँ दोबर उपर उछालि फेर लोकि ताल पकरेने रहथि रंगैली मेलामे।बहुतों शहरमे हिनक कार्यक्रम देखि पुरस्कार देल गेल छलन्हि।लखन शक्तिवाण खंड सुनैत एक प्रखर बुद्धिक लोक बाजल रहथि ई कहियो रामलीला अवश्य कयने हेताह।जाहि समयमे बिहार झारखंड एक राज्य रहैक आ १६टा जिला मात्रे रहैक, ओही समय दरभंगा जिला परिषद केर उपाध्यक्ष आ मधुबनी लोकल वोर्डक चेअरमैन बाबू खुशी लाल कामत हिनका संकिर्त्तन प्रतियोगितामे पुरस्कृत कयने छलनि।गाम देहात सँ लोक केँ एहेन गबैया जीके फेर सुनयमे दोसर नहिं उभरैक अछि,हुनकर दू घंटाक विषय किर्त्तन सुनैत देरी हमरा देहमे जेना अनुदैर्ध तरंग उठि जाय।हैरमुनियाँक मधुर आवाज केँबन्द करै लै जैकोटक चेनक जिंझीर जकाँ खींच दैतथि।कोशी तटबंधक बरका बान्ह बनि गेलापर गाममे नाट्यकलाक आरम्भ कयलनि।तकर संचालन में जगह परक मंडील हिनक आश्रय स्थल बनल आ संरक्षण दैन स्व० बालगोविंद सिंह जी।हिनक रातिके सीखाओल रीहलसल केँ धारटपि हटनी सँ जुबक लोकनि टाटफारि देखैत वादमे दुर्गापूजा मेँ प्रदर्शन करैत गेलैक।ओई सँ पूर्व हटनी भूतपूर्व अशेसर ललीत कामत पोखैर प्रांगण जे कोशीसँ कुदरती परिवर्तन भ' गेल रहैक,ततय मैनही गामक नाटककार लोकनिक साटापर प्रस्तुति होइत रहैक।गामक दूबेर सार्वजनिक काली पूजा देखकय अगहन १९९०ई०मेँ एहि पवित्र धरा धाम सँ पर्यावरणीय रास बिहारी दास जीक महाप्रयाण गामहिमे भेलनि।एहि लघु आलेख में बहुत आंकड़ा वह तथ्य समा नहिँ सकल । श्रद्धा सुमन अर्पित करैत छियैन हम। ४ स्व हरिनंदन कामत जीक गाम मंगरौनी मधुबनी जिला मुख्यालय सँ 3 किलोमीटर उत्तर भाग घना बस्ती अवस्थित छैक मंगरौनी। एही आदर्श ग्रामके खतियानमें 250 परिवार केवट (कउट) अमात 50,धानुक 145, मल्लाह 7, नाई 25, कुर्मी4, बड़ई100, कायस्थ एक घर, सोईत ब्राह्मण 5, ब्राह्मण 60(भलमानुष) केर अतिरिक 100 गृहस्थ ब्राह्मण बसिन्दा रहथि। एहिठाम तप करवाक उद्देश्यसँ आवि सघन गाम भेलैक आ किछु लोक अन्तय उपटिकए जा बसलाह। अध्यात्म क्षेत्र में स्वर्गीय मदन उपाध्याय तांत्रिक मछिंद्रनाथ जे बाबा गोरखनाथ केर समकालीन छलाह, हुनके काका पं� गोकुलनाथ उपाध्याय कर्मकांड धार्मिक दृष्टिकोण रखने मिथिला में प्रसिद्धि प्राप्त केने रहथि। वर्तमान में आधा गांव हुनके वंशज बसल छन्हि। एहि गामक दक्षिण मंगल बोनी रहैक जाहिठाम मौधक बहुतायत उपलब्धि होइत रहैक तेँ एहिगामक लोक कालांतर में मधुबनी नाम उच्चारण करय लगलैक। गामक सटले दक्षिण सँ एकादश शिवदर्शन लेल मुख्यतः दूर-दूर धरिक भक्त लोकानीक आगमन होइत रहैत छैक। 1957 ईस्वीमें पंडित श्री मुन्नीश्वर झा धर्माचार्य तांत्रिक द्वारा सेबैत पंडित श्री जय ना� झा ज्योतिषाचार्य कुटी स्थापित केलनि जे श्री श्री 108 गौरीशंकर राधेश्याम स्थान (देवसभा) कहाबैत छैक। धर्मानुरागी-यात्रीके गरमी में स्वर्गीय मेथरा राउत मधुबनी दाताक बिजली पंखा उपलब्ध छैक। एकादश रुद्र तीर्थ स्थल क्षेत्र में शुमार भ गेल छैक।चौक केर लग मुख्य दर्शनम पापनाशनाय पैघघंटा लागल दृष्टिगोचर भेल।दहिन भाग सँ बसहा आ बामकात सँ शेर पाथर केर बनल छैक जे बड़ मनमोहक दृश्य उपस्थित केने अछि। एहि सिंहद्वारक बगलमे आध्यात्म, चिंतन-पूजन विशाल भवन बीच सभाकक्ष केर प्रवेश मध्यमे त्रिशुल प्रतीक सेहो दर्शनार्थी के आकर्षित करैत य। एहि गामक दक्षिणबारि टोल मे बुढ़ी माय स्थान 700 बरस पुरान छैक, मंदिर पुर्ननिर्माण काज भेलैक। दुर्गाजी दर्शन लेल परोपट्टाक लोक एतय आबि आशीष मांगैत देखाइछ। 200 वर्ष सँ पूर्वारी टोल में दुर्गा पूजा दरभंगा महाराजा कालसँ होइत अबैत छैक। पश्चिम टोल में दुर्गा जीक पूजा प्रधान छैक, एतय खेल-तमाशा नहिं लागैत छैक। एहिक लग सटले पुरान मंडील 300 वर्षक छै जे 11 लाख टाका लागत सँ टोलबैयाक आर्थिक मदैत सँ काज सुसम्पन्न भेलैक। एतुका पाखरिक गाछ यात्री लेल आश्रय स्थल रुपे विख्यात भेल छैक। एहि मंडीलके कनेकबे उत्तर भाग माँ काली (श्यामा माय) मंडील आ पैघ पोखैर छैक, तकर पछबरिया मुहारमे महारानी काम सुंदरी के नाम सँ उत्कर्मित मध्य विद्यालय चलैत छैक। महार पर शानदार घाट आ गोल चबूतरा आजादी पुर्वहिक बनल छैक; जल चबूतराक निर्माण काज तत्कालीन महाराजा कामेश्वर सिंह दोसर बियाह एतय केलनि अपन मनमर्जी सँ एक गरीबक बेटी सँ। हुनके डीहक उत्कृष्टता आ भूमिके रमणीय बनेबाक परम उद्देश्य में केने रहथि।एहि स्थानके राज नगर सँ जोड़िकए विस्तृत अध्ययन करबाक खगौट बुझाइछ। एहि गामक नेयायिक संदर्भत: चर्चा दोसर खेप करब। एहि ग्रामक स्वनाम धन्य स्वर्गीय हरिनंदन कामत जी कोलकाता में खैटि 3 कट्ठा जमीन मधुबनी लहरियागंज बाधमे उपार्जन केलथि जे 1976ई�अखिल भारत कैवर्त कल्याण समिति के छात्रावास लेल संपूर्ण रकबा दान-पत्र दस्तावेज बनाके दैत अति पिछड़ल समाज के छात्र (केवट) के पहिल बेर मधुबनी जिला मुख्यालय में उपलब्ध केलनि, एहि छात्रावासक निर्माण 3 कमरा 1980 में भेल, जिर्णोद्वार लेल कतेको माननीय राजनेताक ऐच्छिक कोषक सहयोग भेटैत रहलैक। फेर दोसरो दाता कियो एहन अवदानक लेल एहि गाममे आगू आबि स्वर्गीय कामत जीक सहचर बनि अपन नाम जगजियार करथि से आश जगैतसन भ' रहल हन। एहि गामके अपन पैतृक एल�एन� झा सन विभूति कहैत छथिन, आ से 5 टा आई�ए�एस�-अई�पी�एस� आफिसर एतुका बेटा बनलाह । श्री विनोद कुमार बिहार राज्य प्रशासनिक सेवा सेहो एहिठामक रहबासी थिकाह। एहि गामक माँटिक हम चंदन बंदन आओर अभिनंदन करैत छी। ५ सब करैत छैक प्रणाम् स्वतंत्रताक अमर सेनानी स्व�अनन्त लाल कामत जीक पुण्य स्मरण होइत एकटा चित्र मानस पटल पर अबैत अछि। स्वाधिनताक गाँधी सन मुखाकृतिक आभा आ मोटगर रंगहीन खाधीक कमीज-धोती आ चेशमा पहिरने चरखाना गमछा कान्हपर सजल एक माहत्मा जी सँ गड़बा गाममे पहिलबेर भेंट करैत छी; तँ नाम-परिचय जनलाह आ पुछैत बजलाह कतेकमे पढैत छी बाऊ। हमरा मुँहसँ जे शब्द बहरायल तँ केर प्रश्न केलनि पीजी� डीआरडी� करैत ऐना पाहुन जगदीश कामत जीक संग कतय बौआ ढहना रहल छी। हमर उत्तर सुनि जे इग्नुसँ घरे बैसल पत्राचार कोर्स क' रहलहूँ अछि आ परीक्षालेल तीन बेरक अवसर देल गेलैक अछि से मुजफरपुर डॉ� अम्बेडकर यूनबरसिटीक लाइब्रेरी मेँ जा परीक्षा देलहूँ । ओ आजादीक संग्रामक आ रचनात्मक कार्यक्रमक संग-संग जातीय महासभाक काजक चर्च करैत भाव विभोर होइत रोदन करय लगलाह....। हुनक प्रश्न्नताक नोर सँ भसियाइत ई समाज मझधार सँ आखिर कहिया धरि कतबाह लागत........। हुनका बारे मे स्व� राम नारायण मण्डल जीक तर्क भेलनि जे दू अध्याय मेँ आजदीसँ पूर्व आ बादक समय काल खण्ड मे कार्यक लेखा जोखा होइत । प्रख्यात समाजवादी चिन्तक, विचारक, निरपेक्ष, समाजसेवी, शिक्षाप्रेमी, भारत सरकार,द्बारा ताम्रपत्रसँ सम्मानित स्वतंत्रता सेनानी बाबू अनन्त लाल कामत जीक जन्म श्री स्व� हरिनंदन कामत एवं श्रीमती खजनी देवी जीक घर 109 वर्ष पूर्व 19 जनवरी केँ घोघरडीहा प्रखंडके गड़वा गाममे अति पिछड़ा वर्ग केवट जातिमे भेल रहनि। हुनकर बाल विवाह सूर्यकला देवीक संग भेलनि ,जाहि सँ चारि पुत्र एक पुत्री भेलनि । वो सनातन हिन्दू धर्मके मानैत वैष्णव छलाह। केवट समाज अपन इतिहास जानबाक लालसा जरूर रखैत होयत। बिहार आ नेपालक मिथिला प्रक्षेत्र मेँ लगधक एक करोड़ आबादी बाला कियोट केर केवर्त आ केउट (केवट) जाति नाम सँ 1931 ई� मेँ ब्रिटिश हुकूमत सर्वेक्षण करेने रहैक । ताहीमेँ निषाद - मल्लाह केँ पृथक रूपे संख्याँबल देखायल गलैक जे वर्त्तमान काल में गोढ़ी सहनी समाज कहबैत अछि। ओ जलचर आ हमसभ थलचर (कृषिकार्य) रूपे अलगे-अलग शादी - विवाहक तत्कालिन सामाजिक संस्कृति सँ फजगज मेँ पड़ल छी। ओना मैथिली पंजी प्रथा अनुसारे कूर्मी जातिक अंगक रूपमे केवट धानुक आ अमातक गणना भेल अछि। मुदा वास्तविकता किछु औरे छैक। गेटे कहने छथि" राष्ट्रकवि वयह हेताह जे देशक सुच्चा अपन जातिक इतिहासक सब प्रमुख घटनाके पारस्परिक सम्बन्धक सन्धान पावि गेल होअय। जिनका इहो ज्ञात भ सकल होय जे हुनक जातिय इतिहासमे कोन - कोन नम्हर घटना घटित भेल छैक। "तकर परिणाम की बहरेलैक हन? हरेक जातिक अध्यातमिक विशेषता होइछ , कोनू संस्कृतिक वैशिष्ट्य होयछ संसार आ जीवनके देखबाक दिव्य दृष्टि होइत अछि। जे कवि एहि दृष्टि - बोधके अभिव्यक्ति द' सकय, सयह राष्ट्रक राष्ट्रकवि कहेबा जोकर होइत छैक' केवट जाति में आखिर राष्ट्रकविमें नामीत के भेलाह अछि? जखन कि बहुतो काव्य रचनाकारक किताब प्रकाशित भ रहल छैक। एहि लेल राष्ट्रीय राजधानी मेँ वृहद, विर्मशक आवश्यकता समय केर मांग छी'...आनन्त बाबू आ हुनक संगी मास्टर साहेब आनन्द शरण जी अपना जातिमेँ राष्ट्रकविक निखार परेखय सेहो चलल छलाह । स्व� शरण जीक स्टेचू बनिकै बिराजीतमे सेहो राजस्थान सँ आबि गेल छैक जे स्थापनाक बाट जोहैत अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (खेप-२७) निर्मला कर्ण (१९६०- ), शिक्षा - एम. ए., नैहर- खराजपुर, दरभङ्गा, सासुर- गोढ़ियारी (बलहा), वर्त्तमान निवास- राँची, झारखण्ड। झारखंड सरकार महिला एवं बाल विकास सामाजिक सुरक्षा विभागमे बाल विकास परियोजना पदाधिकारी पदसँ सेवानिवृत्ति उपरान्त स्वतंत्र लेखन। अग्नि शिखा (भाग- २७) (मूल हिन्दी- स्वर्गीय जितेन्द्र कुमार कर्ण, मैथिली अनुवाद- निर्मला कर्ण) कथा अखन धरि: उर्वशी आ राजा पुरूरवा अपन गृहस्थ जीवनक उपभोग करवा में दुनियाँक सब किछु बिसारि व्यस्त भs गेल छलाह।
आब आगू: राजा पुरूरवा आ उर्वशी विवाहित जीवन में अपन प्रण्य संबंध के प्रगाढ़ सँs प्रगाढ़तम करवा में बहुत व्यस्त भs गेल छलाह। राजा अपन राज्य संचालन आ प्रजा के समस्या सs दूर भs कs उर्वशी के सौंदर्य पाश में आबद्ध भs गेल छलाह।मुदा एक कार्य हेतु ओ सतत सजग रहैत छलाथि । शेष सब किछु बिसरि गेला के उपरान्तहु उर्वशीक शर्त ओ एको क्षण नहि बिसरलथि ।ओ अपन समस्त शक्ति सँs आ सदि खन सजग रहि मेमना सभक रक्षा मे लागल रहलाह। भले दुनू गोटे कोनो उपवन में रहितथि अथवा कुनू आश्रम में!मुदा उर्वशीक दुनू मेमना सेहो हुनका दुनू प्राणीक संगहि देखबा मे अबैत रहैत छल । राजमहल मे सेहो एकटा सुन्दर सन सजायल कक्ष मे दुनू मेमनाक निवासक व्यवस्था कएल गेल छल। दुनू मेमनाक रक्षाक लेल सदिखन दू टा पहरेदार ओहि दुनू जीवक संग रहैत छल। जेना आदमी संग परछाईं रहैत छैक,ओहिना दुनू मेमना संग दुनू पहरेदार रहैत छल। ओना परछाईं तs अन्हार में आदमी सँs विलग भs जाइत छैक,मुदा पहरेदार अन्हारहु में तत्पर रहैत छल मेमनाक सुरक्षा में। उर्वशी सेहो राजा पुरूरवा सँs अत्यंत प्रसन्न छलीह।राजा पुरूरवाक संगति में प्रसन्नता एवं चंचलता जेना हुनकर अविभाज्य सखि बनल छल, जे सदिखन हुनका संगहि रहैत छल। कखनो काल हुनकर चंचलता राजा केँ सेहो परेशान करैत छलनि, जाहि कारणेँ ओ परेशान भs जाइत छलाह।आ उर्वशी सs पिता जाइत छलाह,मुदा आपसी झगड़ा मात्र उनका सबहक मध्य मधुर तकरार छलन्हि। हुनका दुनू के मध्य होई बला तकरार कहियो कलह के रूप नहि लेलक। ओना तs पति-पत्नीक मध्य होई बला तकरार के एक अलग आनंद होइत छैक। जाहि घरमे जँ कोनो नोक-झोंक अथवा तकरार नहि होइत छैक तखन ओ केहन घर अछि। ई नोक-झोंक अथवा तकरार वैवाहिक जीवन के सुखक एकटा महत्वपूर्ण अंग थिक। रानीक चंचल व्यवहारक कारणेँ राजा में चंचलता आ चपलता सन गुण बहुत तीव्र गति सँs विकसित भs रहल छल,सदिखन शान्त आ गंभीर रहई बला राजा उर्वशीक सान्निध्य मे एहन चंचलता आ चपलता देखबैत छलाह जे देखि कतेको बेर उर्वशी सेहो आश्चर्यचकित भs जाइत छलीह आ हुनका सोझाँ मे ओ अपन पराजय स्वीकार कs लैत छलथि | एक दिन दुनू दंपति प्राकृतिक रूप सँ बनल एक सुन्दर झील लग बैसल प्रकृति केँ मनोरम दृश्यावलि देखि आनंद लs रहल छलथि। राजा एहि दृश्य मे बेसी डूबि गेल छलाह।एम्हर उर्वशी धीरे-धीरे उठि गेलथि आ हुनक दृष्टि सँ बचैत चुपचाप एकटा गाछक पाछू नुका गेलीह। पुनः ओ धीरे-धीरे जा कए ओहि वृक्ष केर डारिसँ झूलि गेलीह।आ फेर धीरे-धीरे एहि शाख सs ओहि शाख पर चढ़इत ओकर पात सभक बीच नुका कऽ बैसि गेलीह। अचक्के राजा किछु पुछलथि उर्वशी सs,जखन प्रत्युत्तर नहि भेटलन्हि,राजा घुमलथि उर्वशी के दिशा में,ओ विचलित भऽ गेलथि हुनकर स्थान रिक्त देखि।आश्चर्यचकित भऽ ओ एम्हर-ओम्हर अपन दृष्टि घुमाबय लगलाह ।ओ व्याकुल भय सभ दिशा मे एम्हर-ओम्हर तकलनि,अपन दृष्टि घुमा-घुमा कऽ उर्वशी के तलाश केलथि,मुदा कतहु नहि भेटलन्हि सुनकर प्रिया उर्वशी।आब राजा अत्यंत भयभीत भs गेलाह आ उर्वशी केँ तीव्र आवाज में बजाबय लगलाह,मुदा उर्वशी नहि एलीह। राजा हुनका नहि भेटला पर चिंतित भ गेल छलाह।मुदा ओ ओतय सँ उठि कs कतहु दूर चलि कs हुनकर तलाश मे एम्हर-ओम्हर सेहो नहि जा सकैत छलाह,कारण हुनकर दुनू मेमना के ओहि बियाबान में छोड़ि कतहु गेनाइ संभव नहि छलनि।एहन स्थिति मे हुनकर कुंठा आ तामस बढ़ि रहल छलनि। ओहि कुंठा में ओ "उर्वशी....उर्वशी....उर्वशी...."आवाज देलथि।ओ जोर-जोर सँ आवाज दऽ रहल छलथि आ अपन दृष्टि दूर-दूर धरि पसारि ताकि रहल छलथि उर्वशी केँ। झील के चारू कात आ ओहि पार अपन दृष्टि के सीमा तक देखबाक प्रयास कs रहल छलथि।उर्वशी केँ नहि भेटला पर अत्यंत दुखी भs कsओ घबरा कs और दूर तक हुनका देखबा हेतु एखन ठाढ़ भेल छलथि,तखनहि ऊपर गाछ पर सँs उर्वशी "धम्म" केर आवाज करैत नीचाँ धरती पर कूदि कs पुनः राजाक कान्ह पर बैसि गेलीह। राजाक घबराएल मुखमंडल देखि उर्वशी ठठा कs हँसय लगलीह।उर्वशीक ई शरारती चंचल व्यवहार देखि राजाक क्रोध क्षण भरि मे समाप्त भ' गेलनि,आ ओहो हँसय लगलाह। राजा उर्वशीक संगति में रहि कम चंचल आ शरारती नहि रहलाह। हुनक चंचल शरारती मोन में उर्वशीक एहि शरारत केँ आओर बेसी भारी शरारत सँ प्रतिउत्तर देबाक विचार उठलनि।एहि लेल ओ एकटा खतरनाक खेल करवाक विचार केलथि ।जखन उर्वशी मेमना सभक संग खेलाइत-खेलाइत ओकरा दुनू के दुलार करवा में व्यस्त छली,ओहि काल राजा पुरूरवा गहींर झील मे घुसि गेलथि आ झील मे दूर धरि हेलबाक नाटक करय लगलथि।कनि आगू बढ़लाक बाद,डूबबाक नाटक करैत,जोर सँs करुण स्वर में पुकार लगौलथि - "उर्वशी!हमरा बचाउ!हमरा बचाउ!उर्वशी! हम डूबि रहल छी!"हम डूबि रहल छी! पहिने हुनका सं गप्प करैत काल उर्वशी के ज्ञात भेल छलनि जे हुनका हेलब नहिं अबैत छनि,ताहि लेल उर्वशी के लागल जे राजा डूबि रहल हेताह, ताहि लेल ओ एतेक जोर सं चिचिया रहल छथि। उर्वशी सँs सहायता माँगि रहल छथि। ई सोचि ओ पलक झपकैत झील लग आबि गेलीह।ओ राजा के बचाबय लेल आयल छलीह,मुदा ओतय हुनका राजा के निर्जीव सन भेल शरीर धीरे-धीरे एकटा चट्टान के पाछु पानि में डूबैत भेटलनि।उर्वशी डरि गेलीह आ ओहो घबराहट में झील में कूदि गेलीह।आ पानि के शीघ्रता सs कटैत राजा के निकट पहुँचि गेली। ओ कोनो तरहेँ राजा के सहारा देने पानि मे खींचैत किनार दिस आबय लगलीह। बहुत कठिनाई सँs राजाक संग झीलक कात मे पहुँचि सकली उर्वशी! राजाक शरीर झीलक कछार पर पहुँचला उपरान्त उर्वशी हुनक नाड़ी आ साँसक परीक्षण केलथि। नाड़ी तऽ धीरे-धीरे चलैत छल मुदा साँस नहि चलि रहल छल। ई तऽ मृत्युक संकेत स्पष्ट रूपेँ देखबा मे आबि रहल छल।शोक-संतप्त उर्वशी आँखि मे नोर लs कs कानय लगलीह। ओ कानि रहल छलीह, आ आद्र स्वर में किछु -किछु बाजि रहल छलीह ।- "ओह प्रिय आब हम कोना क रहब ! आब हमर के सहाय होयत !हमरा छोड़ि कतय चलि गेलौं !आब हम केकर भरोसे अहि धरती पर रहब!" एहन तरहक विभिन्न बात कहैत उर्वशी बिलखि-बिलखि कs कानि रहल छलीह,आ दुनू आँखि सँs दहो-बहो नोर झहरा रहल छलीह। एतय हुनकर सहायता करय वास्ते किनको आबय के कोनो संभावना नहि छल।एहि जन-शून्य वन क्षेत्र मे हुनकर सहायता करय लेल कियो कोना कs अबैत। ओ सब किनको बिना जानकारी देने अतह आयल छलथि। तखन एहना स्थिति में रक्षक के हुईतथि! केओ भरोस देमय वला नहि छलनि। दुःख सs कातर उर्वशी अपना के नि:सहाय अनुभव करैत एहन स्थिति मे कष्टदायक करुण स्वर मे विलाप करैत रहलीह।हुनकर मेमना सेहो ओतय आबि गेल छल आ प्रेमपूर्वक राजाक देह पर चुम्बन लs रहल छल।ई देखि उर्वशी अपना के असहाय बूझि मेमना के अपन प्रियजन मानैत आर करुण स्वर में विलाप करs लगलीह। किछु काल धरि एहि तरहें विह्वल भय विलाप कएलाक बाद ओ उठि कs ठाढ़ होइत कहलथि - "ठीक छै प्रिय,अहाँ हमरा छोड़ि कs चलि गेलहुँ! आब हमहूँ जीबs नहि चाहैत छी। हमहूँ आब आत्महत्या कs लेब।" ई कहि ओहो झील मे उतरि गेलीह, आगू बढ़बा सँ पहिने एक बेर फेर पुरूरवा लग आबि राजाक कपार पर चुम्बन लs कs कानय लगलीह। राजाक एक-एक अंग केँ चुम्बन लैत कानैत रहलीह।किछु क्षणक बाद पुरूरवाक आँखि झपकs लागल छल । किछु काल धरि आँखि धीरे-धीरे फुजइत बंद होइत रहल ... आ फेर दुनू आँखि खुजि गेल। उर्वशी नोर भरल आँखि सँ अश्रुसिक्त स्वर में बजलीह - . "आब अहाँक केहन मोन अछि प्रिये!" राजा पुरूरवा तीव्र स्वर सँ ठहक्का लगबैत हँसैत बजलाह - "हमरा!हमरा तs किछु नहि भेल अछि!तखन हमर हालत के बारे मे किएक पूछैत छी?" उर्वशी � "लेकिन अहाँक ओ स्थिति जे अखनि किछु क्षण पहिले धरि छल! अहाँक श्वास बन्द छल!" राजा ठठा कs हँसैत बजलाह � "अच्छा!ओ! ओ तs प्रतिउत्तर छल अहाँक ठिठोली के। हम तs एक पहर तक श्वास रोकि कs रहि सकैत छी।" उर्वशी एहि बात पर तमसा गेलीह।ओ बजलीह - "की एहि तरहक हंसी ठिठोली करवाक चाही?कतहु आओर हम नहि सुनने रही एहेन दिल्लगी होइत छैक,एहेन सन बात अहाँ कतह सिखलहुँ ? अहाँ हमरा सँs एहन भयानक हंसी किएक केलहुँ!अहाँक हालत देखि हम मरs जाइत रही। हमरा एहन हँसी-दिल्लगी नीक नहि लगैत अछि,तेँ फेर कहियो अहाँ सँ हम गप्प नहि करब।" ई कहि उर्वशी तमसा कs आगू बढ़य लगलीह।राजा दुनू मेमना केँ पकड़ने हुनका पाछाँ-पाछाँ विदा भेलाह। राजा पुरूरवा एवं उर्वशी दुनू मौन धारण कएने रस्ता पर बढ़ल जाइत रहथि।दुनू में सs केओ मौन भंग करवाक प्रयास नहि कs रहल छलथि। किछु कालघरि अहिना चलवा के बाद राजा के नहि रहल गेलनि। ओ रूसल प्रिया के बंहुँसवाक प्रयास प्रारंभ केलथि,भांति-भांति के वार्ता एवं क्रियाकलाप के द्वारा। लेकिन उर्वशी मौन रहली। तखन राजा अनेक प्रकार के वार्ता एवं चुहलबाजी करैत फेर हुनकर चुप्पी तोड़बाक प्रयास केलनि, मृदा उर्वशी पर कोनहु असर नहि पड़ल। किछु काल उपरान्त राजा उर्वशी सँs हुनकर कोमलता के विषय में चर्चा करs लागलाह। अहि बेर ओ अपन प्रयास में सफल भेलथि उर्वशी के मौन तोड़ि देलथि। ओ कहलथि - "अहाँक कोमल पैर एहि वन प्रांतक कठोरता नहि सहत। अहाँ आराम करू,हम अहाँ केँ अपन कान्ह पर लs जायब।" ई कहि राजा उर्वशी केँ उठा कs कान्ह पर बैसा लेलथि । उर्वशी उछलि कs हुनकर कान्ह पर सँ उतरि गेली आ फेर सँs अपन पैर जमीन पर पटकैत आगू बढ़s लगलीह।आब राजा पुरूरवा फेर बजलाह - "अहाँ एतेक नहि तमसाऊ!हमरा सs रूसू नहि प्रिये! आबहु मान समाप्त करू,नहि तs हम जीवित नहि बचब! हमरा संग पहिले सन प्रेम करू प्रिये ,नहि तs सच में अहाँक ई प्रेम-पिपासु मरि जायत।" उर्वशी घुमि क' देखलथि । पुरूरवाक आँखि मे नोर भरि गेल छलैक।ओ अपना के नहि रोकि सकलथि आ पुरूरवा केँ अपन आलिंगन मे लs लेलथि । ओ भावावेश में कतेको बेर पुरूरवाक वक्षस्थल पर चुम्बन लेलथि।फेर ओ पुरूरवाक वक्षस्थल मैं अपन चेहरा केँ सटेने हुनका आलिंगनबद्ध कएने रहलीह। किछु काल के बाद ओ अपन मुख उठा पुरूरवा के आँखि में देखैत बजलीह - "अहाँ सदिखन मरय के बात किएक करैत छी! हमरा ई बात कनिको पसिन्न नहि अछि! अहाँ सदिखन मरय-जीबय के गप्प नहि करु। ई बात हमरा बहुत हरान करैत अछि प्रिय! हमरा वचन दिय,आब अहाँ एहेन गप्प नहि करब।" राजा पुरूरवा हुनकर मस्तक के प्रगाढ़ चुंबन लेलथि।उर्वशी हुनकर वक्षस्थल में फेर अपन मुख नुका लेलथि। किछु समयक बाद हुनकर छाती सँs मुख उठा कs हुनकर आँखि मे तकैत बजलीह - "हमअहाँ पर कोना तमसाएब!नहि प्रिय,हम अहाँ पर तमसाएल नहि छलहुँ,ने हम अहाँ सs रूसल छलहुँ!नहि प्रियतम,ई हमर मात्र अभिनय छल।" दुनूक बीचक सभटा तामस आ मान समाप्त भs गेल,तखन दुनू गोटे ओतहि एकटा गाछक छाँह में बैसि प्रेमालाप मे मगन भs गेलथि । क्रमशः अपन मंतव्य editorial.ऽtaff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.नन्द विलास राय-घसवहिनी नन्द विलास राय घसवहिनी छजना-मझौरा रानीगढ़ी परतीसँ पूब सड़कक कातमे एकटा बेस झमटगर कदमक गाछ अछि। बैशाख मासक भोरुका उखराहा। दिनक दस बजैत। टहटहौआ रौद। एकटा बीस-बाइस बर्खक घसवहिनी ओइ कदमक गाछ तर बैसल छेली। घसवहिनी बेस सुन्नरि छेली। गौर वर्ण, छड़हरा शरीर, गोल आ सुडौल मुँह, नमहर-नमहर आंठिया केश। कारी-कारी आ पैघ-पैघ दुनू आँखि। समतोलाक फाड़ासन ठोर। पूआ जकाँ फूलल-फूलल आ सेब सन लाल-लाल गाल। चारिटा कौलेजिया लड़का साइकिलसँ ओइ सड़कसँ जा रहल छल। जखन कदमक गाछसँ एक लग्गा पाछूए रहए तँ ओइमे सँ एकटा कौलेजिया लड़काक नजैर ओइ घसवहिनीपर पड़ल। कौलेजिया लड़का तँ कौलेजिये लड़का होइए। बेसी लफुआ आ उच्छृंखल। ओ लड़का जेकर नजैर घसवहिनीपर पड़ल रहए, बाजल- �रौ भाय, कनी अपनो सभ ऐ गाछतर जिरा ले।� ताबेतमे दोसर, तेसर आ चारिमो लड़काक नजैर घसवहिनीपर पड़ल। दोसर लड़का बाजल- �हँ, हँ, बड़ रौद छै, कनी गाछतर ठंढा ले।� चारू लड़का अपन-अपन साइकिल खड़ा केलक आ कदमक गाछतर आबि बैस गेल। तेसर लड़का घसवहिनी दिस तकैत बाजल- �मोस्ट ब्यूटीफूल गर्ल।� तैपर घसवहिनी बजली- �नइ यौ विद्यार्थी द मोस्ट ब्यूटीफूल गर्ल।� चारिम लड़का फुसफुसा कऽ बाजल- �भाग बहिं घसवहिनी बेस पढ़ल-लिखल बुझाइ छौ।� चारू लड़का साइकिलपर चढ़ल आ विदा भऽ गेल। लड़का सभकेँ जाइत देखि घसवहिनी मुस्किया लगली।
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.प्रमोद झा 'गोकुल'- हमर कि ओकर? (बीहैन कथा) प्रमोद झा 'गोकुल'
हमर कि ओकर? (बीहैन कथा)
तीन महीनासे बिन अन्न पानिके देह काँट काँट आ कनैत कनैत आँखि फूलिके अल्लू सन भै गेलौए तोरा दुनू गोटेके गै माय ! चल उठ ,लागि जो पहिनहिं जकाँ अपन दिन दुनियाँमे ! आ हँ ,तहूँ हौ बाबू ! घेंट उठाके आ सीना तानिके रहह !! तोहर बेटीक इज्जैत नै गेलह ।इज्जैत गेलै ओइ वलात्कारीके जे हमरा संग दिग्दानिस बलात्कार केलक । सेहो आन कोइ नै ,जकरा कैल तक हम चचाजी कहै छलियै से । तोरा आरूके चिंता होइ छह जे हमर माङमे सिंदूर के भरत ? ते सुनि लै जाइ जाह - हमर माङ सब दिन अहिना दप दप रहत । हमर कोखिमे बलजोरी जे बीज छिटलक से पलि रहल अछि । ओकरा हम जन्म देबै ।ओ जहिया हमरासँ पूछत जे हमर बाप के ? हम ओकरा देखा आ बुझा देबै जे तोहर बाप ऐ गामक नामी गिरामी सबसे पैघ लोक फल्लाँ बाबूक बेटा फल्लाँ छियौ ।तखन ककर इज्जत जेतै ? हमर कि ओकर ?? बेटीक बात सुनि दुनू परानी अबाक भै गेल।
-प्रमोद झा 'गोकुल', दीप,मधुवनी (विहार) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.रबीन्द्र नारायण मिश्र-बदलि रहल अछि सभकिछु (उपन्यास)- धारावाहिक रबीन्द्र नारायण मिश्र बदलि रहल अछि सभकिछु (उपन्यास)- धारावाहिक खण्ड ३१ सँ अन्त धरि बदलि रहल अछि सभकिछु 31
नारी निकेतन कांडक कोर्टमे फैसला आबक रहैक । साल भरिसँ बेसीसँ ई मामिला चलि रहल छल । कतेको गोटेक गबाही लेल गेल । साक्ष्यसभ नेताजी आ ओकर कुनबाक संलिप्तता साबित करबामे बहुत सहायक भेलैक । स्थानीय लोकसभ सेहो बहुत मदति केलखिन। नारी निकेतनमे पाओल गेल दस्ताबेजसभ सेहो मामिलाकेँ मजगूत केलक । जज साहेब एहि बातसँ बहुत कुपित रहथि जे सरकार एहि मामिलाकेँ झँपबाक कोनो प्रयास बाँकी नहि रखलक । जज साहेबकेँ व्यक्तिगत रूपसँ प्रभावित करबाक प्रयास सेहो कएल गेल । हुनका बदमाससभ डराबक प्रयास सेहो केलक । मुदा जज साहेब अड़ल रहि गेलाह । अंततः फैसला आएल । नेताजी समेत हुनकर तमाम संगीसभकेँ आजन्म कारावासक दंड देल गेल । अफसोचक बात जे संदीप सेहो फँसि गेल । ओकर संलिप्ततामे बहुत रास सबूत नेताजीक आदमी कोर्टकेँ उपलव्ध करबा देने रहैक । ओकर सभक प्रयास रहैक जे संदीपक नाम आगू केलासँ आओर लोकसभकेँ बँचाओल जाए । मुदा से नहि भेलैक । मुदा संदीपो नहि बँचि सकल । असलमे ओ बहुत दिन धरि एहिसभमे लागल रहए । जाबे होस अएलैक ताबे बहुत देरी भए गेल रहैक । जखन मामिला सीबीआइक हाथमे अएलैक तखनहु हमसभ प्रयास केने रही जे संदीपकेँ सरकारी गबाह बना देल जाए। मुदा से भेल नहि । आखिर एहि मामिलामे न्याय भेल । न्यायो एहन भेल जे सरकारकेँ हिला कए राखि देलक। दर्जन भरि सलाहकार सेहो नेताजीक संगे एहि मामिलामे आजन्म कारावाससँ दंडित भेलाह । असलमे ई मामिला भइए गेल छल भयावह । नारी निकेतनक लगपासमे कतेको नरकंकाल भेटल छल। कतेको लापता महिलासभक हड्डी ओहिमे भेटल जकरा डीएनए जाँचसँ पहिचान कएल गेल । कहबाक माने जे आओर अपराधक संग-संग हत्याक जघन्य अपराध सेहो भेल छल । परिणाम सामने छल । फैसला सुनेबाक बाद जज साहेब कहलनि जे ई फैसला अखन अपूर्ण अछि कारण बहुत रास अपराधी अखनहु कोर्टक सामने नहि आनल जा सकल अछि। तेँ मामिला बंद नहि कएल जा सकत,अपितु चलिते रहत । एक-एकटा दोषीखेँ दंड देलाक बादे ई मामिला बंद कएल जा सकत । जज साहेबक उपरोक्तिसँ कोर्टमे उपस्थित नेताजीक समर्थकसभ भीतरसँ हिलि गेलाह । सभक ठोरपर फिफरी पड़ि रहल छल । आब की होएत? के बाँचत,के जहल जाएत तकर कोन ठेकान? नारी निकेतन कांडक फैसला कोर्ट एहन समयमे केलक जखन चुनाओ माथपर छलैक । शासनक प्रमुख-प्रमुख आदमीकेँ जहल चलि गेलाक बाद महिमाक हाथ-पैर फुलि रहल छलनि । हुनका राजनीतिक कोनो अनुभव नहि रहनि। नेताजी जबरदस्ती हुनका आगू कए देने रहथि जाहिसँ कुर्सीसँ हटि गेलाक बादो असली शक्ति हुनके हाथमे रहनि। मुदा नेताजी समेत सभ प्रमुख आदमीसभ जहल पहुँचि गेलाह। पार्टीपर असामाजिक तत्वसभक कब्जा भए गेल । तकर बाद ओ सभ आपसमे बैसार केलक। "ई समय हमरासभक लेल स्वर्ण काल अछि । महिमाकेँ आगू रखने रही आ सभटा शक्ति हमरासभ लग रहए। पहिनहुसँ बेसी नीकसँ अपन सभक कारोबार चलैत रहत ।" "मुदा हमसभ चुनाओ कोना जिति सकब?" "महिमाकेँ के जनैत छैक?" "चुनाओ टाकासँ लड़ल जाइत छैक । जातिक नामपर लड़ल जाइत छैक । धर्मक नामपर एकमुस्त भोट पड़िते अछि, आगू सेहो पड़त । बस लोककेँ जगेबाक छैक । तकरबाद देखबैक की हाल रहैत छैक।" "से कोना होएत ।" "हेतैक ने । दू-चारिठाम दंगा करबा देल जेतैक । कोर्टसँ आरक्षणक खिलाफ फैसला करबा देल जेतैक । गरीब जनतासभकेँ टाकाक बले कीनि लेल जाएत । ट्रकक-ट्रक लोक प्रदर्शन करत । मीडिआमे अपन लोकसभ छथिहे । ओ सभ कहिआ काज अओताह? टाकामे बहुत शक्ति छैक । जतेक काज हेतैक लगा देल जेतैक । एक लगाउ,दस पाउ । फेर जखन अपन सरकार बनि जाएत,सभ सुदि-मुरक संगे ओसुल भए जाएत । कोनो चिंताक बात नहि ।" "एहिमे बहुत खतरा बुझा रहल अछि । जँ हमरसभक योजना सफल नहि भेल तखन?" "खतरा कथीमे नहि छैक? एतेक डरा कए जिनगी नहि चलि सकैत अछि । हमरा लोकनिक धंधामे तँ ई सभ चलिते रहल अछि। आगूओ चलत ।" "ठीक छैक । हमसभ सएह करी ।" एहि तरहें विचार-विमर्शक बाद ओ सभ महिमा लग पहुँचलाह । ओ एकरासभकेँ देखितहि तामसे लाल भए गेलीह। "तोरासभकेँ एहिठाम बिना सूचनाकेँ अएबाक प्रयोजन?" "हमसभ सभदिनसँ अहाँक परिवारक शुभचिंतक रहलहुँ अछि । नेताजीक लेल अहूँसँ बेसी हमसभ चिंतित छी। ओ जरूर छुटि कए अओताह । तखन कानूनी प्रक्रियामे किछु समय तँ लगिते छैक । ताबे हमरा लोकनिकेँ धैर्य रखबाक होएत ।" "हम ई सभ नहि जानी । आब बहुत भए गेल । हम एहिसभमे पड़ल नहि रहि सकैत छी । हम आइए राज्यप्रमुखक पदसँ इस्तिफा देबए जाए रहल छी । अहाँ लोकनि अपन दोसर नेता चुनि लेब । एहि काजमे लागल रहब हमरा वशक नहि अछि। हमर स्वभाव आ परिस्थिति ई सभ करबाक अनुमति नहि दए रहल अछि।" "अहाँ अगुताइ जुनि । चुनाओक घोषणा भए गेल अछि। नेताजी आ हुनकर सहयोगीलोकनि जहलमे छथि । एहन संक्रमण कालमे जँ अहूँ धैर्य नहि राखब तखन हमसभ कोना जितब?" "से अहाँ लोकनि जानू ।" "मुदा अहाँकेँ अपन धिआ-पुताक चिंता तँ होएत?" "से की?" "ओ सभ ताबते सुरक्षित अछि... ।" "खबरदार! जँ आगू किछु बजैत गेलहुँ तँ हमरासँ खराब केओ नहि होएत ।" मामिला बिगड़ैत देखि किछुगोटे आगू बढ़ि कए महिमाकेँ बुझेबाक हेतु एकांतमे लए गेलथि । आखिर चुनाओ धरि महिमा राज्यप्रमुखक काज करबाक हेतु तैयार भए गेलथि। सभगोटे निश्चिंत भए अपन-अपन घर वापस गेलथि ।
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सरकारक मुफ्त योजनासभसँ सरकारी खजाना खाली भए गेल छल । सेवानिवृत्त कर्मचारीक पेनसन देब मोसकिल भए रहल छल। कार्यालयसभक बिजली,पानिक बिल तँ कम भेल मुदा आओर जरूरी समानसभक घोर अभाव भए गेल । कैकटा कार्यालयसभमे कर्मचारी/ अधिकारीक दरमाहा भेटनाइ सेहो पराभव भए गेलनि । महगाइ ततेक बढ़ि गेल जे झोरा भरि कए टाका लए गेलाक बादो एकहु सप्ताहक हेतु समानसभ नहि भेटैत छल । कहबाक मतलब जे सौंसे घोर अराजकता पसरि गेल छल । चुनाओक माहौलमे हालति बिगड़िते गेल । महिमा लाख प्रयास करथि जे एहि दलदलसँ बाहर होइ मुदा से हेबे नहि करनि । "एहि समयमे अहाँ कोना हमरासभकेँ छोड़ि सकैत छी?" "मुदा हमरा वशकेँ ई सभ अछि नहि । जनतामे त्राहिमाम मचल अछि । लोक परेसान अछि । धिआ-पुताक भविष्य संकटमे अछि । एहन ठाम हम चुनाओ जँ जितिए जाएब तँ कोन फएदा होएत ।" मुदा ओकर तथाकथित समर्थकसभ नहि मानैक । पार्टीक किछु प्रमुख नेतासभ टिकट नहि भेटबाक कारण अलग गुट बना लेलक । पार्टीक हालत ओहुना नीक नहि छलैक । नारी निकेतन कांडक बाद पार्टीक प्रतिष्ठा बहुत घटि गेल छलैक । मुदा बदमाससभक घमंड कम नहि भेल रहैक । ओकरासभकेँ विश्वास रहैक जे ओ सभ जेना-तेना चुनाओ जिति लेत,सरकार फेरसँ ओकरेसभक बनतैक । मुदा महिमा एहि बातसभसँ आश्वस्त नहि रहथि । ओ चुनाओ नहि लड़बाक घोषणा कए देलथि । ऊपरसँ पार्टीमे फूट भइए गेल रहैक । एहिसभसँ आम कार्यकर्ताक मनोवल बहुत खसि गेलैक। आखिर महिमा अपनाकेँ राजनीतिसँ अलग करबाक दृढ़ निश्चय केलक आ ताहि दिशामे आगू बढ़ि गेलि। हम अपन कोठरीमे शक्तिनाथक संगे गप्प करैत रही। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्यमे भविष्यक योजना बनबएमे लागल रही कि महिमाकेँ अबैत देखलहुँ। "आउ, आउ ।" महिमा असगरे रहथि । ओ बहुत परेसान बुझा रहल छलीह । हम हुनका आश्वस्त करैत छी । शक्तिनाथ चाह अनैत छथि । हमसभ चाहक संगे गप्प करैत रहैत छी । शक्तिनाथ पुछलखिन- "एहि असमयमे अहाँक आगमनक कारण?" "कारण तँ बुझले होएत । सौंसे तबाही मचल अछि । लोक परेसान अछि । सरकारी तंत्रपर गलत लोकक नियंत्रण अछि । एहन परिस्थितिमे हम एहि फसादसभमे नहि रहए चाहैत छी । ओना हमरा एहिसभमे कहिओ रूचि रहबो नहि करए । मुदा हमरा एहिमे फँसा देल गेल । अहाँसभकेँ तँ सभबात बुझले अछि । मुदा हम आगू एहिमे लागल नहि रहि सकैत छी ।" "मुदा एहिमे अहाँकेँ रहबाक हेतु कोनो मजबूरी नहि अछि। अहाँ जखन चाही हटि सकैत छी ।" "बात एतेक आसान नहि छैक । हमर पार्टीपर असमाजिक तत्वक कब्जा छैक । ओ सभ हमरा घेरने अछि । लाख कहैत छिऐक छोड़िए नहि रहल अछि । मुदा हम आब तय कए लेने छी। हम एहिमे नहि पड़ब । हम अपन त्यागपत्र पठा देलिऐक अछि ।" "अहाँक निर्णय सही बुझाइत अछि । हमसभ सभ तरहें अहाँक मदति करब ।" "ताही आशासँ हम एतए आएल छी ।" एन मौकापर महिमाकेँ राजनीतिसँ सन्यास लेबाक घोषणासँ समग्र विकास दलमे निराशाक माहौल बनि गेल । बहुत रास नेतासभ पहिने पार्टी छोड़ि देने रहथि । किछु आओरगोटे ओएह रस्ता धेलनि । पार्टीमे हाहाकार मचि गेल । जनतामे एहि दलक छवि ओहुना खराब भए गेल छल । बदमाससभक कोनो प्रयास सफल नहि भए रहल छलैक । जतहि देखू,ओतहि शिखाक जयगान भए रहल छल । शिखाक बैसारमे लोकक हुजुम जमा भए जाइत छल । हम आ शक्तिनाथ दिन-राति शिखाकेँ संगे गामे-गाम घुमि रहल छलहुँ । शिखाकेँ ने भूख लागनि,ने प्यास । अर्जुन जकाँ लक्ष्यक अतिरिक्त किछु नहि सुझा रहल छलनि । "जाबे एहि दुष्टसभकेँ कुर्सीसँ हटा नहि देब ताबे चैन नहि लेब ।" ओ बस एतबे बजैत छलि । जनतामे तँ जेना क्रान्ति आबि गेल छल । लोक स्वेच्छासँ दिन-राति शिखाक समर्थनमे काज करैत छल । गामे-गाम प्रचार करैत छल । मतदातासभसँ संपर्क करैत छल । शिखाक समर्थनमे माहौल बनैत देखि विरोधी सभकेँ खास कए बदमास सभकेँ सीटीपीटी गुम्म रहैक । हालात काबूसँ बाहर जाइत देखि समग्र विकास दलक लोकसभ चुनाओ स्थगित करबाक प्रयास करए लागल । "देशक परिस्थिति चुनाओक हेतु उपयुक्त नहि अछि । पहिने हालति ठीक होअए देबाक चाही तखनहि चुनाओ करेबाक हेतु आगू बढ़ल जाए ।" ताहि उद्येश्यसँ ओ सभ चुनाओ आयोग पहुँचल । मुदा चुनाओ आयोग अड़ि गेल । "एहनो कहीं भेलैक अछि । चुनाओक घोषणा भए चुकल अछि । चुनाओ समयेपर होएत । सभकेँ एही दिशामे काज करबाक चाही ।" चुनाओ आयोगक एहि घोषणासँ बदमाससभकेँ बहुत निराशा भेलैक । मुदा कइए की सकैत छल? 33
समग्र विकास दलक तमाम विरोधक अछैत जनता जनार्दन शिखाक समर्थनमे एकजुट भए गेल छल । जतए कतहु ओकर कार्यक्रम बनैत छल,लोकसभक मेला लागि जाइत छल । लोक शिखाकेँ सुनितहि नहि छल,अपितु किछुटाकाक योगदान सेहो केने जाइत छल । एहि तरहें प्रचुरमात्रामे धन जमा भए गेल जे चुनाओक लेल तँ पर्याप्त तँ छलहे , तकर बादो बहुत बँचि जेबाक संभावना छलहे । शक्तिनाथ एक-एक पाइक हिसाब रखैत छलाह । संगहि अगिला कार्यक्रमक योजनाकेँ अन्तिम रूप देबाक काजो ओएह देखैत छलाह । जौँ जौँ चुनाओ लगीच अबैत गेल,ई स्पष्ट होइत गेल जे विजय तँ जनक्रान्तिदलेक होएत । जखने ओ श्वेतवस्त्र पहिरने जनताक समक्ष उपस्थित होइतए तँ बिना किछु कहनहि जनताक ओकरा प्रतिए सहानुभूति भए जाइत छलैक । सभ पुछितए- "एना किएक? बात की छैक? कोन एहन घटना भेल जे हिनका ई रूप धारण करए पड़लनि ।" लोकसभ आपसमे चर्च करितए। एहि तरहें शिखा संगे घटित घटनासभ काने-कान यत्र-तत्र-सर्वत्र प्रचारित होइत रहितए। शिखाक जादू जनतापर काज कए रहल छलैक। लोकसभ ओकरा अपन आदर्श मानि लेने छल । ओकरा हेतु किछु करबाक हेतु तैयार छल । एहन प्रवल जन समर्थन आखिर चुनाओक परिणाममे प्रदर्शित भेल । तीन सएमे सँ दू सए पंचानबेटा जन प्रतिनिधि जनक्रान्ति दलक जिति गेल । ओकर अतिरिक्त पाँचटा निर्दलीय चुनाओ जितलाह । ओहोसभ मूलतः जनक्रान्ति दलेक छलाह । मुदा टिकट नहि भेटबाक कारण निर्दलीय चुनाओ लड़लाह आ जिति गेलाह । समग्र विकास दलक एकहुटा उम्मीदबार चुनाओ नहि जिति सकल। पार्टीक ई हाल होएत,से साइत केओ नहो सोचने रहल होएत । मुदा सत्य सामने छल,डंकाक चोटपर दहाड़ि पारि रहल छल । शिखा आइ गुलाबी रंगक सारी पहिरने छलीह । ओहीसँ मेल खाइत रंगक आओर परिधानसभ पहिरने जखन ओ मंचपर अएलीह तँ लोक एक क्षणक हेतु चकित भए गेल । चारूकातसँ फूलक वर्षा भए रहल छल । सभ आनन्दमे छल । प्रायः एही क्षणक प्रतीक्षा लोक कहि ने कहिआसँ कए रहल छल । लोकसभ करतल ध्वनिसँ हुनकर स्वागत केलक । सत्यक विजय भेल । लोकमे बहुत उत्साह रहैक। सभकेँ ओहि क्षणक प्रतीक्षा रहैक जखन शिखा राज्यप्रमुखक पदपर शपथ लेतीह । ताहि लेल कार्यवाही शुरुओ भेल । जन प्रतिनिधिसभक बैसारमे हुनकर नाम नेताक रूपमे प्रस्तावित कएल गेल । सभगोटे सर्वसम्मतिसँ हुनका नेता चुनि लेलनि । तकर बाद शिखा उठलथि। लोकसभक अनुमान रहैक जे ओ धन्यवाद देबाक हेतु आगू बढ़ि रहल छथि । मुदा हुनकर मोनमे तँ किछु आओर छलनि । ओ माइक अपना हाथमे लैत छथि । लोकसभ हुनका सुनबाक हेतु एकटक भए गेल छथि । शिखा बजनाइ शुरु करैत छथि- "वंधुगण! एहि ऐतिहासिक विजयक अवसरपर अहाँलोकनिक संग विजयोत्सवमे भाग लए हम अतिशय अह्लादित छी । जाहि उत्साहसँ समाजक सभ वर्गक लोक एहि चुनाओमे अपना लोकनिक दलक संगे लागल रहल,दिन-राति काज करैत रहल,ताहिसँ विजय तँ निश्चित लागि रहल छल । मुदा विजय एहन होएत जे विरोधी दलक खाता धरि नहि खुजि सकत तकर अनुमान साइते ककरो रहल होएत । असलमे जनतामे अपार शक्ति अछि। बस ओकरा जगेबाक काज छैक । ई बात नहि छैक जे विपक्षी दलक लोक सुतल रहलाह। अपितु,अपना भरि सभ किछु करैत रहलाह । अंत-अंत धरि एहि प्रयासमे रहथि जे चुनाओ रूकि जाए। मुदा समय हुनकासभक संग नहि देलक । ओ सभ एहि हालमे पहुँचि गेलाह जे हुनकर एकहुटा जन प्रतिनिधि नहि चुनल जा सकल । शिखरसँ शून्य भए जाएब एकरे कहल जा सकैत अछि। हमरा लोकनिकेँ एहि विजयोल्लासमे अपन कर्तव्यकेँ बिसरि नहि जेबाक अछि । अपितु,जनताक विश्वासपर सही उतरबाक अछि । ताहि हेतु जे किछु त्याग,तपस्या करब जरूरी होएत से सभगोटेकेँ करबाक अछि । तखनहि समाजमे परिवर्तन आबि सकत । सही मानेमे जनतंत्र तखनि होएत । समाजक निम्नतम पायदानपर अड़कल लोकसभकेँ उठा कए ओकरासभकेँ गरिमामय जीवन-यापन करबाक व्यवस्था जाबे हमसभ नहि कए सकब ताबे ई विजय अपूर्ण अछि,अर्थहीन अछि, व्यर्थ अछि । अस्तु,हम राजनीतिसँ सन्यास लेबाक निर्णय केलहुँ अछि । ई निर्णय केलहुँ अछि जे कोनो राजनीतिक पद नहि लेब । अपितु, समाजक बीचमे जा कए दीन-दुखी व्यक्तिक हेतु काज करब । असल मानेमे परिवर्तन नीचाँसँ हेबाक छैक । सभकिछु सरकारेपर नहि छोड़ल जा सकैत अछि। ताहि हेत एहन समर्पित लोकक प्रयोजन अछि जे जमीनसँ जुड़ल होथि आ बिना कोनो लोभ-लालचकेँ जन कल्याणकेँ ध्यानमे राखि निस्वार्थ भावसँ काज करथि । तखनहि सरकारोक मदति कारगर होएत । अन्यथा फुटल डोलक पानि जकाँ सरकारी प्रयास ब्यर्थमे बहि जाएत । हमर इच्छा अछि जे राज्यप्रमुखक पदक हेतु शक्तिनाथकेँ चुनल जाए । ओ बहुत दृढ़ निश्चयी आ परिश्रमीक संगहि इमान्दार लोक छथि । हम सामाजिक क्षेत्रमे किछु आओर लोकक संगे काज करब । तकर माने ई नहि जे हुनका सहयोग नहि करबनि । जखन जे मदति हुनका चाही ताहि हेतु हमसभ तैयार छी आ रहब । एतेक बजलाक बाद शिखा आगू बढ़लीह आ शक्तिनाथकेँ मंचपर आगूक पाँतिमे लेने अएलीह । फूलक मालासँ शक्तिनाथकेँ लादि देल गेलनि । हम स्वयं शिखाक समर्थन करैत शक्तिनाथकेँ राज्यप्रमुखक पदक हेतु प्रस्तावित केलहुँ । ओहिठाम उपस्थित लोकसभ करतल ध्वनिसँ एहि प्रस्तावकेँ सहर्ष समर्थन केलनि । सर्वत्र खुसीक माहौल छल । लागि रहल छल जे एहि परिवर्तनक स्वरमे चिड़ै चुनमुन समेत समस्त प्रकृति अपन सहमति व्यक्त कए रहल छल । तखनहि कतहुसँ उमरैत-घुमरैत मेघ सेहो आबि गेल । झीसी पड़नाइ शुरु भए गेल । लागि रहल छल जेना प्रकृति हृदयसँ एहि युगान्तकारी परिवर्तनकेँ स्वागत कए रहल छल । सभ एकस्वरसँ कहि रहल छल- "इनकिलाब! जिंदाबाद!" "शिखा जिंदाबाद! शक्तिनाथ जिंदाबाद !" "जनक्रान्ति दल जिंदाबाद!"
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समाजमे भए रहल एहि तरहक सकारात्मक परिवर्तनसँ सभसँ बेसी परेसान नेतासभ छलाह । कारण आब हुनकासभक भोटबैंक खतम भए जेबाक संभावना देखा रहल छल । ओ सभ नव-नव समस्याक निर्माणकए समाजकेँ बँटबाक प्रयासमे रहिते छलाह । गाम-घरमे कोनो-ने-कोनो रूपमे अपन उपस्थिति बनओने रहबाक हेतु एकटा गुटक संग भए जइतथि ,भने ओ कतबो गलत किएक नहि होअए। परिणामतः बदमाससभ ढीठ भेल जा रहल छल । न्याय व्यवस्था बहुत महग आ उबाउ छल । तखन लोक जाए कतए? एहि परिस्थितिमे शिखा एकटा आशाक किरण बनि कए समाजक सामनेमे उपस्थित छलीह । ओ अपना भरि प्रयासो करिते छलीह । मुदा समाजक अंतरविरोध समस्या बनि कए सामनेमे मुखर भए जाइत छल । आब गामसभ सहरोसँ बेसी एकाकी भेल जा रहल छल । लोकसभ अपन दरबाजा धरि सिमटि कए रहि गेल छल । घर-घर टीभी,मोबाइल.पसरि गेल छल । फेसबुक,ह्वाट्सअपपर दुनिआ भरिक समाचारसँ लोक क्षणे भरिमे अवगत भए जाइत छल । मुदा लग-पासमे की भए रहल छल तकर कोनो जानकारी लेबाक सुधि नहि रहि जाइत छल । निश्चय ई परिस्थिति बहुत बिकट छल । मुदा शिखा अपन बातपर अड़ल छलि । शिखा एकटा सही काजमे लागल छलि । जान रहए की जाए ओ अपन लक्ष्यक प्रति बिना कोनो प्रतिदानक अपेक्षाकेँ पूर्ण समर्पित छलि । ओकरा एहि अभियानमे असगरि नहि छोड़ल जा सकैत छल । अस्तु,हम सभ किछु छोड़ि हुनकर कार्यक्रमकेँ आगू करबामे लागल रहलहुँ। दिन-राति शिखाक संग दैत रहलहुँ । जेठक दुपहरिआ होअए किंवा माघक ठाड़,शिखा पैरे-पैरे गामे-गाम भ्रमण करैत रहलीह। ई क्रम एक दिन,दू दिन , दू मास,तीन मास नहि अपितु, वर्षक-वर्ष अनवरत बिना रुकने चलैत रहलीह। गौरवर्णक तेजस्वी आभासँ परिपूर्ण जखन ओ ग्रामबासी लोकनिकेँ संबोधित करथि तँ लोक भाव विह्वल भए जाइत छल । हुनकर बातकेँ अनुसरण करबाक दृढ़ संकल्प करैत छल। बात ओ कोनो तेहन कहबे नहि करथि जकरा करब कठिन होइक । जेना कोनो प्रकारक निसाँ नहि करब। नेनासभसँ नौकरी नहि कराएब,अपितु ओकरा इसकूल पठाएब । बृद्धलोकनिकेँ सादर अपन-अपन परिवारमे राखल जाएत । बिआहमे दहेज नहि लेल जाएत । बालिकाकेँ बेटे जकाँ शिक्षा देल जाएत । पारिवारिक संपत्तिमे बेटा-बेटीकेँ बरोबरिक हक देल जाएत । जात-पाँति,धार्मिक विवादसँ समाजकेँ मुक्त कएल जाएत। ई सभ बात एहन छल जाहिपर कोनो तरहक प्रश्नचिन्हक प्रश्ने नहि उठि सकैत छल। मुदा ओकर कार्यान्वयनमे परेसानी जरूर छल । कारण लोक उपदेश तँ दए दैत छल ,मुदा जखन अपनापर पड़ैक तँ टारि दैत छल। एहि तरहें समाजमे परिवर्तनक प्रयास करैत-करैत बीस वर्षसँ बेसीए बीति गेल । हमसभ अपन सर्वस्व समाजक हेतु अर्पित कए देलहुँ। मुदा शिखा अखनहु थाकलि नहि छलीह । पूर्ण आशावान बनल रहथि । तकर अनुकूल परिणामो देखबामे आबि रहल छल । बालिकासभ डाक्टर,इंजीनियर बनि रहल छलि । गाममे सभ जातिक लोक संगे बैसि कए खाइत छलाह,उत्सव मनबैत छलाह । धर्म,जातिक विभेद समाप्त भए रहल छल । समाजमे समरसता बढ़ि रहल छल। लगैक जेना शिखाक स्वप्न साकार भए रहल अछि । बदलि रहल अछि सभकिछु । समाज नूतन स्वरुप सामने प्रकट भए रहल अछि जाहिमे सही मानमे समानताक अधिकारसभकेँ सुलभ होएत। समाजमे परिवर्तनक प्रक्रियाक पूर्णताक हेतु कोनो समय सीमा नहि राखल जा सकैत अछि,ई संभवो नहि अछि। कारण सामाजिक परिवर्तन एकटा सतत चलए बला प्रक्रिया अछि । जरूरी ई अछि जे हमसभ सकारात्मक दिशामे अपन डेग बढ़बैत रही ,सही बातकेँ सहर्ष स्वीकार करी । जकर जे हक छैक से दिऐक । "बहुत किछु भेलैक अछि आ आगुओ हेतैक । जाधरि सभ सुखी नहि भए जाएत, समाजसँ असमानता, गरीबी, शोषण हटि नहि जाएत ताधरि रुकबाक नहि अछि ।" से ओ कहैत रहैत छलीह। नित्य अपन कार्यक्रममे उद्घोषणा करैत रहैत छलीह-"चरैबेति! चरैबेति! (समाप्त)
-रबीन्द्र नारायण मिश्र, पिताक नाम: स्वर्गीय सूर्य नारायण मिश्र, माताक नाम: स्वर्गीया दयाकाशी देवी, बएस: ६९ वर्ष, पैतृक ग्राम: अड़ेर डीह, मातृक: सिन्घिआ ड्योढ़ी, वृति: भारत सरकारक उप सचिव (सेवानिवृत्त), स्पेशल मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, दिल्ली(सेवानिवृत्त), शिक्षा: चन्द्रधारी मिथिला महाविद्यालयसँ बी.एस-सी. भौतिक विज्ञानमे प्रतिष्ठा : दिल्ली विश्वविद्यालयसँ विधि स्नातक, प्रकाशित कृति: मैथिलीमे: प्रकाशन वर्षः२०१७ १.भोरसँ साँझ धरि (आत्म कथा),२. प्रसंगवश (निवंध), ३.स्वर्ग एतहि अछि (यात्रा प्रसंग); प्रकाशन वर्षः२०१८ ४. फसाद (कथा संग्रह) ५. नमस्तस्यै (उपन्यास) ६. विविध प्रसंग (निवंध) ७.महराज(उपन्यास) ८.लजकोटर(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०१९ ९.सीमाक ओहि पार(उपन्यास)१०.समाधान(निवंध संग्रह) ११.मातृभूमि(उपन्यास) १२.स्वप्नलोक(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२० १३.शंखनाद(उपन्यास) १४.इएह थिक जीवन(संस्मरण)१५.ढहैत देबाल(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२१ १६.पाथेय(संस्मरण) १७.हम आबि रहल छी(उपन्यास) १८.प्रलयक परात(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२२ १९.बीति गेल समय(उपन्यास) २०.प्रतिबिम्ब(उपन्यास) २१.बदलि रहल अछि सभकिछु(उपन्यास) २२.राष्ट्र मंदिर(उपन्यास) २३.संयोग(कथा संग्रह) २४.नाचि रहल छलि वसुधा(उपन्यास) २५.दीप जरैत रहए (उपन्यास)। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.८.किशन कारीगर- बुझक्करी दाबीए चूर तैं हमरा पाछुए घूर? (हास्य कटाक्ष) किशन कारीगर बुझक्करी दाबीए चूर तैं हमरा पाछुए घूर? (हास्य कटाक्ष)
बाबा बड़बड़ाइत बजलाह कहअ त एहनो कहीं बूझक्करी दाबी भेलैए? जे हमहिं टा बड्ड काबिल बुझक्कर आ दोसर कियो त तिछ बुझबे ने करैत होउ जेना? हमहिं टा शुद्ध लीखै छी आ महाब्यकर्णाचार्य वला दाबी जे आन अशुद्धे लिखैत हेतै ओकरा व्याकरण के समझ कतअ स हेतै? ज एक आध टा कवि सम्मेलन मे चल गेल होई आ कि अकादमी पुरस्कार सम्मानित भ गेल होउ धोखे स तब त आरो अनकर मोजर नै करै जाइ छै की?
हम बाबा स पुछलहुँ जे अहाँ खराब आ की नीक लीखै छियै से त जनता फैसला करतै कीने? अहाँ के मोजर नै करै जाइए त अंहू मोजर नै करू? एते मथापेची कैलेए? बाबा बजलै हौ कारीगर मैथिली मे अजबे ताल छै सब अपने दाबिए चूर रहतह जे हम बड्ड काबिल लेखक, दोसर त अदर बदर लिखैए?
दर्शक पाठक वर्ग सब एकरा सबहक किताब पढ़बे नै केलकै आ अपनेमने दाबीए चूर रहतह? कतेक जेकरा साहित्यक जानकारी नै उहो सब मिथिला मैथिली ठीकेदार क अपना के लाल बुझक्कर दाबीए गौरबे चूर रहतह. जहिया पब्लिक जागि गेल तहिया बुझहक एकरा सबहक अनेरूआ दाबी चूरमचूर भऽ जेतै की?
यथार्थ बजहक लिखहक त इ किछु भंगपीबा गजपीबा दलाल अंधभक्त सब हमरे तोरा बाबा बहटरबा, कारीगरबा कहि अवहेलना करतह? पुछबहक एना किए त फूइसबूक पर गलथोथरी करतह? ओतौह कुतर्क क बुझकरी दाबी देखा तोरा नीचा देखबै के फिराक मे रहतह की? आब लाजो धाख छै कहां अई निरलज्जा सब के?
हम बाबा के टोकलहुँ जे बड़बड़ाइते रहब की एकर समाधानो हेतै? बाबा हां हां क हँसैत बजलाह धूजी आब हमरा कोनो डर अछि की? आब हमहूँ एकरा सब लक बुझक्करी दाबीए रहब चूर आ उ सब हमरा पाछुए घूर? करतै बतकुट्टबैल त आब पब्लिक खिहारतै क देतै गलबज्जी मे चूरमचूर. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.९.अरविन्द ठाकुर- झंझटिया बहु (लघुकथा) अरविन्द ठाकुर झंझटिया बहु (लघुकथा) झंझटियाक मूल नाम झंझटिया नहि रहए। पिता अनूपलाल सुरुज बाबूक हरबाह रहथिन आ सुरुज बाबूक एकटा भगिनमानक नाम पर ओकर नाम राखने रहथिन कमल कुमार। किन्तु ई कमल कुमार देह-हाथ होइतहि एहन भारी खच्चर निकलल जे बात-बात पर जेकरा-तेकरा सं ढाही लेबाक लेल, लैत रहबाक लेल सदैव उद्धत। केकरो सं ओकर पटरी बैसबे नहि करए। रोजक लड़ाइ-झगड़ा, रोजक हाथापाइ, रोजक गल्लम-गल्ला। कहियो माथ फोड़बैने घुरए, कहियो ठेहुन फोड़बैने त कहितो दांत तोड़बैने। एकर अहि लक्षणसभक चलते एकर एकतुरियासभ एकरा झंझटिया कहए लागलए आ कालान्तर मे ओकर परिवार सेहो अहि नाम कें स्वीकार कए लेलक, मूल नाम हेराए गेलए आ कमल कुमार झंझटियाक नाम सं चिन्हल जाए लागल। समय अएलए। झंझटियाक बियाह भेलए। कनियां अएलए त ओकर टोलक जनानीसभक मुंह पर एकेटा कथा रहए' जेहने झंझटिया, तेहने बहु! हे भगवान! एहन करूप स्त्री आइ तक नहि देखल। विधाता एकरा खोंचहा करची सं बनैने छथि जेना!' अहि कनियांक नैहर मे जे नाम रहल हुअए, सासुर मे ओ 'झंझटिया बहु'क नाम सं प्रसिद्ध भेल। बियाह बादक किछु दिन, किछु हफ्ता, किछु महिना त ठीक-ठाक चललए, तेकर बाद रोजक उठौनाबला घोल-पचक्का शुरू भेल। कोनो एहन दिन नहि जाइ जे दुनू परानी मे झंझट नहि होइ। आ से झंझट एहन-ओहेन नहि, भिनभिन करैत कोनो एक पक्ष पहिने हल्लुक-सन गारि-बात पर उतरए आ तेकर बाद रांड़ी-बेटखौकी होइत झोंटा-झोंटी तक पहुंच जाइ। घरक लोकक कथे की, सौंसे टोल मे गर्दमगोल भए जाइ। एकर कोनो समय सेहो निर्धारित नहि रहए। कहियो भोर होइतहि शुरू, कहियो दुपहरियाक जोग देखैत, कहियो सांझक दिया-बाती पहर मे, कहियो रातिक प्रथम पहर, त कहियो मध्य रात्रीक स्तब्ध पहर कें चिर्रीचोथ करैत। कालान्तर मे झंझटिया त झंझटिए रहल, किन्तु झंझटिया-बहुक संग अनेकानेक विशेषणसभ जुड़ैत चलि गेलए कोढनी, अलबटाह, नट्टिन आदि-आदि। बियाहक चारि-पांच बरस बितलाक बादो जखनि ओकरा कोनो संतान नहि भेलए त ओकरा संग एकटा विशेषण और जुड़ि गेलए बांझ। एकदिन खेत पर कमठाउन करैत स्त्रीगणक गपक क्रम मे मेनहाबाली कहलकए 'अहि मौगीक छाती पर दूधक थैली छेबे नहि करए त एकरा बाल-बच्चा कतए सं बिऐतए!' झंझटिया आ झंझटिया-बहु दुनूक लेल जर-जमानाक एहेन-एहेन उखाहीसभ धनि-सन। झंझटिया कें जन-मजूरीक काज भेटब मुश्किल रहए। जेतहि जाइ, अपन संगी मजूरसभक संग कोनो ने कोनो झंझट कए लिअए, कोनो ने कोनो फसाद ठाढ कए दिअए, कतहु पोसिन्दहि सं भीड़ि जाइ। तें एना होइ जे धपचट मे दू-तीन दिनक काज भेटल आ महिनाक छब्बीस-सत्ताइस दिन बिना कोनो काजक। झंझटिया बहु ओकरहु सं सेस्सर। खेत-खरिहानक काज करबाक प्रति कोनो रूचि नहि। टोलक आन स्त्रीगण जकां बोनि कमाएब ओकर स्वभावे मे नहि। घर मे खेनाइ तक बनैनाइ ओकरा भारी बुझाबए। कोनो अड़ोसनी-पड़ोसनी सं ने कोनो गपक संबंध ने कोनो काम-काजक, तें अपन टुटली मढहियाक भुइयां पर पटिया बिछाए कए ओंघराइल रहैत रहए। आधा सं बेसी मास उपासे जाति रहए, तें खाइको बनैबाक झंझट कमे होइ। एक दिन बनल आ बचल रहल त ओएह बसिया दू दिन-तीन दिन चलए, नहि बचए त जै गोबर्धन। से झंझटिया-बहु एक दिन अचरजक काल कएलक। चारि-पांच बरस बितलाक बादो जखनि ओकरा बाल-बच्चा नहि भेलए त ओ अड़ोसनी-पड़ोसनी सं बतिआबए लागल। से बात की त झंझटियाक दोसर बियाहक लेल लड़की खोजबाक निहोरा। अड़ोसनी- पड़ोसनी सुनए आ सुनि कए मने-मन हंसए। मुंह पर किछि कहबाक साहस त रहए नहि किन्तु परोक्ष मे ओकर निहोराक गप कए ठहक्काबाजी करए, ठिठोली करए। एहन झंझटिया आ अकरब मनिसा, तहि पर सी नंबरक कोढनी एकटा बहु, तेकरा के पपिआहा अपन बेटी देतए? किछु दिन तक झंझटिया-बहु अहि भरोस मे रहल जे टोलक ई अड़ोसनी-पड़ोसनीसभ ओकर मदद करतए किन्तु जल्दिए ओकरा अहि बातक भान भए गेलए जे ओकरासभ सं कोनो आस राखब व्यर्थ छै। आ एक दिन, जहि दिन आनहि दिन जकां सुरुजदेव उगल रहथि, आनहि दिन जकां भोर आ दुपहर भेल रहए, तहि दिनक सांझ मे झंझटिया-बहुक अड़ोस-पड़ोस, टोलक लोग अपन आंखि चियारि-चियारि, पिपनी कें बेर-बेर रगड़ि-रगड़ि कए आश्चर्यचकित भेल झंझटियाक टूटल मढहिया मे एकटा नवकी कनियां कें आबैत, प्रवेश करैत देखलक। नवकी कनियांक अएबाक खबरि काने-कान सौंसे गाम मे ई बात पसरि गेलए। पुरुषलोकनि अपन-अपन गोल बनाए दुरहि सं प्राप्त अहि अचरजकारी घटना पर चर्चा करथि, चर्चा मे विस्मय व्यक्त करथि, विभिन्न तरहक अनुमान लगाबथि आ अहि अन्हेर पर टीका-टिप्पणी करैत श्लील-अश्लील हंसी-मजाक करथि। जनानीसभक अलगे ताल, अलगे भांज रहए। ओसभ झंझटिया घर पर मजमा लगाए देलक। ओकरासभ कें कोनो रोक-टोक त रहए नहि। आबए, मढहिया मे हुलि जाइ,कनियां कें देखए आ अपन फाटैत कोंढ कें फाटए सं बचैबाक लेल दुनू हाथ सं अपन छाती पकड़ने, देखौंस लेल अपन मुंह बिचकाबैत अपन-अपन घरक डगर धए लिअए। "हओ मालिक, अन्हेर छै! नबकी कनियां झंझटिया-बहुक ममिऔत बहिन छिअए। बच्चा मे मलेरिया-कालाजार भेल रहए, मरैत-मरैत बचल रहए। सुखए कए टटाएल छै सौंसे देह मे हड्डिए-हड्डी। छै त कनियां भक-भक गोर मुला बिमरिया देह छै। ई मौगी गाभ केना धरतए आ धरतए त ओकरा सम्हारि केना सकतए?" मरौनावाली कहलकए। किन्तु दुनियां अचरज सं भरल छै आ झंझटियाक टोल कि झंझटिया सेहो इएह दुनियांक हिस्सा मे रहए। से अचरज भेलए। साल बीतैत-बीतैत झंझटियाक नबकी कनियां, जे सौंसे टोल मे 'मरलहिया'क नाम सं प्रसिद्धि पएने छल, गाभहु धएलक, ओकरा सन्हारिओ लेलक आ एकटा पुत्रक रूप मे ओकरा धरा-धाम पर उतारिओ देलक। ई अचरज एतय खतम नहि होइ छै, एतय सं शुरू होइ छै। आ एकर बादबला अचरज एक दिन हमरा घर तक पहुंचल। एक दिन बरामदा पर सं बैसल-बैसल देखलिअए जे एकटा सपाट छाती बाली परम कुरुपा स्त्री हमर परिसल मे घुसल, हमरा देखि माथ परक साड़ीक छोर कें कनि निच्चा खिंचलक, हमरा लग आबैत-आबैत अपन तानल घोघ कें कनी और तानलक आ कनी-कनी हिचकिचाइत, कनी-कनी धखाइत हमर बगल सं होइत डेढिया दके हमर आंगन दिस पैसि गेल। बाद मे गृहस्वामिनी बतैलनि जे ओ झंझटिया-बहु रहए। काज खोजबाक लेल आएल रहए। हमर घरक काजबाली एमहर किछु दिन सं बहुत अगराएल-मगराएल जकां रहए। कोनो दिन आबए, कोनो दिन नहि आबए। कोनो दिन भोर मे आबए त सांझ मे नागा कए दिअए। गृहस्वामिनीक मन ओकरा पर लोहछाएल रहनि। ओहि लोहछल मनहिक परिणाम रहए जे ई जानितहु जे झंझटिया-बहु परम बेलुरि छै, ओ ओकरा काज पर राखब गछि लेने रहथिन। अचरजक संग संयोग सेहो आबए छै। एकर बादक किछु दिन गृहस्वामिनीक शिकायती-विलाप सुनैत बीतल झंझटिया-बहु परम अकरब छै, बासनसभ कें नीक सं नहि मांजए छै, खरकटलहि छोड़ि दए छै, बाढनि दए छै त कात-कोनटाक गरदा-माटि ओहिना छुटल रहि जाइ छै, पोछा दए छै त फर्श पर मटिआएल डिडिरसभ पड़ि जाइ छै, अनसोहांत लागैत रहए छै, एकरा काज पर राखब बड़का भारी भूल भेल, आदि-आदि। बासनक त नहि किन्तु अपन बहरुका स्टडी-रूमक झाड़ू-पोछाक झंझटिया-बहुक करतबसभ त देखितहि रही। देखी, देखिकए मनहि-मन कनी-मनी पिनपिनाइ आ ई सोचि चुप रहि जाइ जे ई हमर विभाग नहि थिक, अनेरे मगजपच्ची किऐ करी। किन्तु पनरहिया बीतैत-बीतैत गृहस्वामिनीक शिकायती बोल क्रमशः घटैत गेलनि आ मास बीतैत-बीतैत एकदम्मे बंद भए गेल। तेकर बाद हुनक श्रीमुख सं यदा-कदा झंझटिया-बहु लेल प्रशंसाक बोल सेहो आबए लागल। अहुना एतेक दिनक वैवाहिक जीवन मे अहि बातक अनुभव त हम कैए गेल छी जे जं कोनो बात, कोनो वस्तु सं गृहस्वामिनी कें शिकायत नहि छनि त एकर साफ-साफ अर्थ अछि जे ओ ओहि बात, ओहि वस्तु सं संतुष्ट छथि। गृहस्वामिनी गामक महिलालोकनिक लीडराइन छथि आ तें हमरा घर मे महिलालोकनिक अबरजात लागलहि रहैत अछि। भितरका मोहाल मे हुनकासभक लेल चायक पानि सदैव चढलहि रहैत अछि। जानकारी भेटल जे एहन प्रत्येक अवसर पर आब अपन नियत काजक अतिरिक्त झंझटिया-बहु झट दए चाय बनैबाक लेल अगुआए जाइत अछि आ तेकरा कप-प्लेट मे राखि सभ कें सादर परोसि सेहो आबैत अछि। हमर घर अएनिहारि महिलालोकनि घरक साफ-सफाइ देखथि, ओकर संज्ञान लेथि आ झंझटिया-बहुक बनाएल चाय पीबि आनंदित होथि। अहि सं झंझटिया-बहुक यश हमर घर सं होइत बाहरहु-बाहर पहुंचलए आ ओकरा और दू-तीन घरक काज भेट गेलए। ओ केकरहु निराश नहि कएलक आ तीनू-चारू घरक काज मन लगाए कए करए लागल। काज त ओकरा और भेटैत रहए किन्तु तेकरा लेल ओकरा समय नहि बचैत रहए। भरि दिन अहि घर सं ओहि घर आ ओहि घर सं अहि घर, एक क्षणक फुरसत नहि। हमर गृहस्वामिनी चकित भेल कहथिन जे कतेक पानि छै अहि मौगीक देह मे जे एतेक घरसभ मे खटनीक बादहु झंझटिया-बहु टन-टन करैत रहैत अछि, थकनीक नाम नहि आ जं थकनी छै त ओकरा देखार नहि हुअए दैत अछि। समय अहिना बीतैत गेलए। एक दिन देखलिअए जे झंझटिया-बहु स्कूल-ड्रेस मे सुसज्जित एकटा गोर-नार छौड़ाक स्कूल-बैग अपन कंधहा पर राखने ओकर हाथ पकड़ि हमर घरक सामनेक सड़क सं चलि जाइत रहए। स्वाभाविक रूप सं जिज्ञासा भेल, केलिअए। गृहस्वामिनी विहुंसैत कहलनि 'सभ चमत्कारक मूल मे वएह छौड़ा अछि'। हमरा जनाएल गेल जे ओ छौड़ा झंझटिया-बहुक सत-बेटा कहिऔ कि बहिन-बेटा छिऐ। अपन समस्त कमएलहा ओ ओकरहि पर खर्च करैत अछि। नीक-नुकुत कपड़ा-लत्ता, नीक आ पौष्टिक भोजन आ ओकरा एकदम साफ-सुथरा राखब एकर प्राथमिक कर्तव्य भेल छै। चारि-पांच घरक चौका-बासन, झाड़ू-पोछा करितहु ओ ओहि छौड़ाक कोनो काज नागा नहि हुअए दए छै। 'आ एकटा बात बुझलिऐ? ओ ओहि छौड़ाक नाम ओही स्कूल मे लिखबएने छै जहि मे अहांक पोता-पोती पढैत अछि।' कहैत गृहस्वामिनीक गप मे गर्वक भाव रहनि। दुनियां अचरज सं भरल छै आ अहि अचरजक कोनो अंत नहि। एक दिन मन मे अकस्मात एकटा प्रश्न जागल। गृहस्वामिनी कें हाक देलियनि। अएलीह त पुछलियनि 'झंझटियाक की हाल छै?' गृहस्वामिनी तेना कए हमरा दिस ताकलनि जेना हम कोनो प्रचण्ड बुड़ि होइ। ठोर कनी वक्र भेलनि आ ओलहनक स्वर मे कहलनि 'ई लिखए-पढैक चक्कर मे अहां कें किछु बुझलहु रहए ए जे अहि दुनियां मे की-की भए रहल छै? फेर बजलीह 'बेटा भेलाक बाद झंझटिया किछु दिन तक घरहि मे गुप्त-वास धए लेलक। ने किछु बाजए, ने भुकए। रहए-रहए आ उठि कए एक बेर-दू बेर-बेर-बेर बेटाक मुंह देखि आबए। बहुत दिनक बाद एक दिन घर सं बहराएल आ सड़क पर दौड़ए लागल। तेकर बाद ई दौड़ब ओकर नित्य-क्रिया भए गेलए। लोक जखनी ओकरा देखए, दौड़तहि देखए आ बुझए जे झंझटिया बताह हएबाक डगर धए लेलक अछि।' 'ठीके बताह भए गेलए की?' हमर व्याकुल उत्सुकता हुनका टोकलकनि। 'सुनिऔ त!' ओ बजलीह। फेर हुनक स्वभाव सं विपरीत हुनक ठोर पर एकटा खूब मीठगर, खूब आह्लादकर मुस्की अएलनि, कहलनि 'पुलिसक भर्ती निकलल रहए। झंझटिया ओहि मे जाए कए हिस्सा लेलक। दौड़ैक प्रतियोगिता मे ओ सौंसे जिलाक प्रतिभागीसभ मे औवल रहल। पहिनुक सेलेक्शन ओकरे भेलए। अखनि कोनो थाना नहि भेटलए ए। अखनि पुलिस-लाइन मे ड्यूटी भेटल छै। बुझलिऐ, कालिदास जी !' हमर अचरज सं बाबल मुंह देखैत आ देखि कए आनन्ददायी-बदमाशीक हंसी हंसैत हमर गृहस्वामिनी अंगना दिस चलि गेलीह। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.पद्य खण्ड ३.१.पवन मिश्र 'गोनौली'-मिथिलाक संस्कृति आ परिवर्तनक स्वरूप ३.२.राज किशोर मिश्र-मातृभूमि ३.३.आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल ३.४.रामानन्द मण्डल- हम उदारवादी रे/ नदी/ डोमिन ३.१.पवन मिश्र 'गोनौली'-मिथिलाक संस्कृति आ परिवर्तनक स्वरूप पवन मिश्र 'गोनौली' मिथिलाक संस्कृति आ परिवर्तनक स्वरूप (पद्यमय)
१. परिवर्तन सृष्टिक अछि आधार, पल- पल घटित होइत रहैछ | सृष्टिक कोनो अवयव एहिसँ नञ फराक परिवर्तनक बिना जीवन तथा प्रकृतिक कल्पना नञ भऽ सकैछ ||
ज्ञान, अनुभव, अनुभूति आ प्रयोजन भेल करैछ समयक सापेक्ष | परिवर्तन किछु सार्थक किछु निरर्थक, सार्थक परिवर्तन जीवनक प्राण होइछ ||
नजरि घुरा कऽ देखि तँ, मानव जीवनक परिवर्तन, पहिरन- ओढ़न, सभ्यताक आरंभहिसँ | खान- पीन, रहन- सहन आ मनोरंजन, सामूहिकतासँ निजताक दिश क्रमशः प्रारमभहिसँ||
सभ्यता आ संस्कृतिक सदति रहल अन्योन्याश्रित अछि सम्बन्ध | एकक परिवर्तन दोसरकें, व्यावहारिक क्रियाकलाप, सोच आ जीबाक बदलय ढंग ||
२.
सबसँ पहिने, लोक आस्था ओ विश्वासक करब बात | वेद- पुराण, सनातन धर्म, तांत्रिक मत आ लोकधर्मक विशेष प्रभाव ||
लोकधर्मक महत्व सबसँ अधिक, लोकवेदक मान्यता प्रबल थिक | पहिने लोक तखन वेद, एहि क्षेत्रमे समय- समय पर भेल परिवर्तन, आस्था आ विश्वासमे प्रभावित भेल जन-जन ||
वैदिकालमे छलाह जे देवतागण, पछाति भेल बढ़ोतरी अहुमे आ परिवर्तन | नव- नव देवी- देवता अबैत गेलाह, अवतारवादक मान्यता पबैत गेलाह ||
तंत्र में नव- नव प्रयोगक भेल चलनसारि, सिद्ध संतलोकनिक खास कए बढ़ल प्रभाव | एहि सभक भेल परिणाम, मिथिला आस्थाक क्षेत्र सेहो नहि रहल वाम ||
वाममार्गी तंत्रक चलनसारि, मिथिलामे रहल सीमित | तहिना लौकिक धर्म क्षेत्रमे, नित नव- नव लोकदेवता आ देवी भेलथि पूजित ||
एखनहु ग्रामदेवता डीहवार, यानी लोकदेवता कहबै छथि | कुलदेवता या कुलदेवी, सेहो तांत्रिके देवी भेल करै छथि ||
समय- समय पर, खास देवी-देवताक चला-चलती देखबामे अबैत- रहल | एहि श्रेणीमे, संतोषीमाता, वृहस्पतिदेव आ महुआगाछ पर्यन्त सम्मिलित होइत रहल ||
तहिना पंचदेवोपासक मिथिला शैव, वैष्णव आ शाक्तमे विभक्त भेल | वैष्णवमे मात्र छलाह सीतारामक पूजक, पछाति, राधाकृष्णक उपासनाक हेतु कैयेक सम्प्रदाय अपनाओल गेल ||
३.
मिथिलामे जैन धर्मक सेहो छल प्रभाव, कएक मुनि, साध्वी आ तीर्थंकरक भेल प्रादुर्भाव | जखन बौद्धक भेल चला-चलती, मिथिला सेहो नहि रहल अछूति ||
आइ मिथिलामे जैनक, रहल नहि कोनो अस्तित्व | बौद्धक प्रभावकें नगण्य केलनि, मिथिलेक विद्वान आ दार्शनिक व्यक्तित्व ||
एहिठाम, कबीर पंथकें माननिहार छथि पर्याप्त | हुनका लोकनिक आस्थामे मुदा, कबीरक संग आन देवी- देवता सेहो छथि व्याप्त ||
४.
मध्य कालमे भारतमे जखन, इस्लामक भेल छल आगमन | भेल मिथिला सेहो बेस प्रभावित, मारितेरास लोकक भेल धर्म परिवर्तन ||
हिनका लोकनिक, धर्म आ संस्कृतिमे भेल मौलिक परिवर्तन | मुदा, पूर्वक संस्कृतिसँ साफ भ' क' नहि कटि सकलाह, अपना जीवनमे कइएकटा पुरना वस्तु रखनहि रहलाह ||
जेना, स्त्रीगणक द्वारा नूआ, सेनूर आ चूड़ीक बेबहार | आँगी ई लोकनि भरि देहक पहिरथि, बुरकाक प्रयोग बिरलाएके देखार ||
पुरुख लोकनि, लूँगी आ पैजामाक संग किछु लोक धोतियो अपनौलनि | पहिरन- ओढ़नमे फराक अबस्से मुदा संस्कृतिसँ साफ नहि कटि पौलनि ||
मुसलमान शासक राज- काजमे, फारसीक कएल प्रयोग | रोजी- रोटीक भाषा भेल फारसी, मैथिलीकें बिगड़ल संजोग ||
मुसलमान लोकनिक दाहा, हिन्दूक लेल सेहो भेल पूज्य | दाहा दलाने- दलाने घूमय लागल, चढ़ौआ चढ़ए लागल, कबुलापाती होमय लागल, मुसलमानक मजार हिन्दू लोकनिक तीर्थ बनल ||
मुसलमानक आगमनससँ, पर्दा प्रथाक भेल आरम्भ | गोदना गोदेबाक परम्परा सेहो आएल, जे अंतिम साँस गनि रहल, ओना, गोदनाक आधुनिक रूपक चलन भेल प्रारम्भ ||
मिथिलामे पुत्रक जन्म पर, छल पमरिया नाचक परम्परा | ई सब मुसलमाने छल, ई प्रथा आइ भ' चुकल अधमरा ||
मिथिलाक खानपीन पर सेहो पड़ल मुसलमानक प्रभाव | सेबइके खीर आ पराठा, प्रमुख, भोजनक बनल स्वभाव ||
मुर्गा खेबाक चलनसारि, आस्ते- आस्ते आम भ' गेल | खस्सीक हलाली माउस अधिकांश हिन्दूक, घर- घर सरेआम भ' गेल ||
खानपीनमे अल्लू आ टमाटरके, मध्यकालमे भेल चलन | तमाकू सेहो एहि समयक, शुरू भेल हुक्का पीबक प्रचलन ||
मुसलमानक आगमनक एकटा पैघ प्रभाव, पहिरना पर सेहो पड़ल | सियाओल वस्त्रक उपयोग वर्जित छल, मुदा, मुसलमानक देखाँउसे- सियाकए कुर्ता पहिरबाक प्रथा चलल ||
मिथिलामे एखनो कपड़ा सीबाक उद्यममे, मुसलमाने छथि लागल | जोड़ल काठक उपयोग सेहो वर्जित छल, धरि, ताहि सब रेबाजकें लोकसब त्यागल ||
५.
औद्योगिक क्रांति, खोजी प्रवृत्तिक कारण, अंग्रेजक प्रभाव विश्व सहित मिथिलो पर पड़ल | भारतमे अंग्रेजी राजक फलस्वरूप, रेलवेक विकास आ पक्की सड़क सेहो बनल
अंग्रेजी लोक पढ़य लागल,अंग्रेजी बढ़य लागल, विश्वक नव-नव ज्ञान मिथिलामे आबय लागल | लोकक पहिरन- ओढ़न भेल अंग्रेजी अंग्रेजी शब्द सेहो मैथिली मे आबय लागल ||
अंग्रेजी नववर्ष बनल एक पावनि, केक काटि जन्मदिन मनावनि | पश्चिमी रेबाज आइ बनि गेल विधान, मिथिलोमे अंग्रेजियाकें बड्डे सम्मान ||
६.
मिथिलाक लोकविश्वासमे छल अंधविश्वास, जाहिसँ अवरुद्ध छल समाजक विकास | समयक संग बहुत रास मान्यता विस्मृत भ' गेल, जे एखनहु होइछ दृष्टिगोचर सेहो नामे लेल ||
छिक्के नहि निकलब, नहि भदबामे बहरायब, यात्राकाल टोकबकें मानब अधलाह | भूत- प्रेत, डाइन- योगिन आ भगताक, तंत्र- मंत्र आ झाड़- फूकक रहै छल खगता ||
हैजा, कोदबा आ चेचककें, मानल जाइ छल देवीक प्रकोप | धियापूताकें पाच दिअयबाक, रेबाज बनल छल बड़ अनमोल ||
ई सब बहुत हद धरि, आइ गेल बदलि | तहिना, जीवन विधवाक छल अति दयनीय, विधवाक विवाह बुझल जाइ छल अधलाह आइ ओकरो जीवन गेल सुधरि ||
बाल विवाह आ अनमेल विवाहक, बदलि गेल अछि पुरना कुरीति | बहुपत्नीक रेबाज सेहो उठल, बदलल काटर - दहेज आ छुआछूतक रीति ||
बदलि गेल समाजक लोकव्यवहार, सामाजिकताक भावना भेल कमजोर | नहि रहल श्रेष्ठ आ समाजक कोनो लेहाज, जेठकें पएर छुबि नवतुरिया नहि लागऽ चाहए गोड़ ||
अतिथिक सत्कार आ समस्त समाजक संग, बूढ़- बुढानुसक मोजर पूर्णतः घटिगेल | अपनैती घटल आ बढ़ल स्वार्थ अहंकार लोक- लोकमे आब ओ सलुकता नै रहि गेल ||
७.
आधुनिकता आ सुखक उजाहिमे, भेल पलायन गाम- गामसँ | जाति - जातिमे छल जे पारस्परिक सरोकार, से सामाजिकताक बेस ह्रास भेल धरामसँ ||
औद्योगीकरण ओ मशीनीकरणक युगमे, बहुत रास सुविधा ओ आराम भेटल | जिनगी जिनाइ सहज भए गेल, तैं बहुत चलनसारक विघटन घटल ||
कम लोक आ कम समयमे, काज अधिक होमए लागल | ताहि कारणे बहुत रास साबिकक आचार- विचार बदलए लागल ||
बड़दक दाउनी, करीन पटौनी, बिला गेल बटगमनी ओ लगनी गीत | चूड़ा कूटब, धान कूटब आ कोल्हुआड़क संग, पचनियाँ आ गोदनाक गीत ||
सब क्रियाक संग, जुड़ल अछि संस्कृतिक घनिष्ठता | महफा- खरखरिया ओ बैलगाड़ीमे ओहार, होइत छल द्विरागमन आ विदागरी, ई छल मिथिलाक व्यवहारिक संस्कार ||
नवकनियाँक विदागरीक दिन मनायब, आब भए गेल खिस्सा | दिन फेरब, लिआओन करायब, बेटीकें छओ मास नैहर राखब, आब सिर्फ अभिलाषा ||
माल- जाल नगण्य भए गेल, माल संदर्भित मारिते ज्ञान खतम भए गेल | ओकर उपयोगक वस्तु, आब सभ धरोहर रहि गेल ||
८.
लोक ओ पारम्परिक गीतमे, बहुत समृद्ध रहल मिथिला | कोनो सांस्कृतिक समाजक लेल, कठिन रहल मोकाबिला ||
चन्दा झा जतेक तरहक, लोकराग आ भासक केने छथि चर्चा | आस्ते- आस्ते बहुत रास अलोपित भऽ गेल, शेष बाँचल राग - भासक अछि अन्तिम अवस्था ||
किछु तऽ साफे खतम भए गेल, लगनी, बटगमनी ओ पचनियाँक गीत | निर्गुण आदि आब भेटब दुर्लभ, अलोपित भए गेल गोदनाक गीत ||
तहिना पमार, ग्वालरि आ तिरहुत आदि, खिस्सा त' एहिठामक कहल नहि जाए | के धियापूताकें मलार गाबि सुतबैथ, मिथिलानीक कंठसँ आब सुनल नहि जाए!!
९.
भरि सालक विभिन्न पावनि- तिहारक, आयुर्दा सेहो अछि लगिचिआएले | लोकगाथाक गायन मंचनक परम्परा टूटल, विभिन्न लोकनाट्य ग्रसित कालक गाले ||
पहिने टेप, टीवी, भिसीआर आ विडियो सिलेमा, आब आरकेस्ट्रा आ इंटरनेट पर परसाइत सामग्रीक चलनसार | गाम- गाम एके लेखा, सम्पूर्ण मिथिलाक इएह बेबहार ||
१०.
लोकक खानपीन आ पहिरन- ओढ़न सेहो बदलल, भात, दालि,तरकारी, चटनी आओर पापड़ अचार | तरुआ,दही, दूध, घी, साग, बड़- बड़ी आदि, ई मिथिलाक मुख्य भोजनक सचार ||
विशिष्ट रूपें- फुलकी, पूड़ी, सोहारी, मालपूआ, खीर, पोछुआ-पू, सकरौरी,मखानक खीर ओ खोआ | मड़ुआ, मकइ, चाउर आदिक रोटी, अल्हुआ, कोदो, भातक संग प्रिय माछमे पोठी ||
बलिप्रदान वला माउस लोक सब खाइ छल, परबा,पौरकी,सिल्ही, बगेरी,साही आदिक माउस सेहो साइत संजोगे खाएल जाइत छल | रातिक बाँचल भोरमे होइ छल बसिया जलखै, चूड़ा- दही, फुटहा, मुरही आदि सेहो प्रिय छलै ||
आब गहूमक रोटी, मुख्य भोजनमे सामिल भए गेल | बासि- बेरहटक सामग्रीमे सेहो बदलाउ आबि गेल ||
मुर्गा, अण्डा आब खुलि कऽ खाइ छथि, ताहि संग, देशक विभिन्न प्रांतक भोज्य वस्तु खेबाक प्रचलन शुरू अछि | इडली, डोसा, सांभर आ उतपम, हलुआ, पराठा, पापड़, सेबइ, नूडल्स, चाउमिन पोलाउ आदिक बेस होइछ संगम ||
मधुर खेबाक रेबाज अछि अनामति, नहि मिठाइ त' चीनियों चाहबे करी | मीठक लोभ तेजल नहि जाए, अंततः गुड़ोसॅ काज चलेबे करी ||
११.
मिथिलामे पहिरन- ओढ़न सेहो खूबे बदलल | मुसलमानक एलाक बाद, सियाओल वस्त्र पहिरबाक रेबाज बनल ||
पुरुख कुर्ता, मिरजइ, गोलगंजी पहिरय लगलाह, पछाति पैजामा, लूंगीसँ सेहो परहेज नहि रखलाह | अंग्रेजक बुस्सट,पेन्ट, कोट- सूट, टाइ चलल, सैंडो,टीशर्ट आर अनेक तरहक परिधान बनल ||
पाग,पगड़ी आ चादर- दोपटा, ई आब अवसर विशेषक मात्र शोभाटा | स्त्रीगण आँगी, कुर्ती आ समीज-सलवार, घघरी, लहँगा, पेन्ट- शर्ट सेहो पहिरथि भरमार ||
ओना स्त्रीगणक मुख्य पहिरना, एखनहु धरि अछि नूआ | हालाॅकि सुनटा आँचर कम, आ उनटा आँचरक प्रचलन बनल हउआ ||
आब पुरनका गहना सेहो उठि गेल, मंगलसूत्र, झुमका, हारक चलनसारि भऽ गेल | बुलकी,बाजूबन, सूति,पाइत आ काड़ा, उठल माकड़ी, डँड़कस, पहुँची, मोहरमाला ||
बाली, नथुनी, पायल, हार, छक, बिछिया, औंठी एखनहु चल | सिथीक विन्यास नव- नव भेल, पुरुखक कनौसी, कुंडल, मट्ठा, हलुमानी आ काँड़ा सेहो अलोपित भऽ गेल ||
पुरुख लोकनि बाबरी सीटै छथि मिथिलाक प्रसिद्ध त्रिपुंड छोड़ि देल | टीक, टीका कम्मे लोक राखथि, नव- नव फैसनक विन्यास आबि गेल ||
१२.
नव-नौतारमे फैसनक मोह तेहन बेसम्हार छुतिकोमे केस कटेबासँ छिटकय चाहथि | छुतिकामे तेल, साबुन, आ श्रृंगार वर्जित छल, केसक मोहमे नवतुरिया कठियारियो नहि जाए चाहथि ||
श्राद्धकर्म सोड़ह संस्कारमे, अंतिम संस्कार थिक | शास्त्रीय विधिसँ बेसी, प्रदर्शनक बढ़ल बेबहार थिक ||
भोज- भातमे खूब खर्च कएल जाइछ, एकरा सामाजिक सम्मानसँ जोड़ल जाइछ | छठिहार, विवाह आ श्राद्धकर्म आडम्बर भए गेल, मृत्युभोजक विरोध सेहो कतहु-कतहु शुरू भए गेल ||
देखाबा आनो संस्कार सभमे बढ़ि रहल, पारम्परिक बिधसँ बेसी प्रदर्शनक महत्व बढ़ल | वैवाहिक वर्षगाँठ आब लोकप्रिय भए रहल, एहिमे एखन खूब खर्च- बर्च कएल जा रहल ||
जे लोकनि रहैत छलाह अकछल, अपन प्रचलित बिध- बेभारसँ | सएह लोकनि करै छथि देखाँउस, आन संस्कृतिक आडम्बर अपना कऽ ||
सूट, शेरवानी पहिरि, होमय लागल विवाह | जयमालक परम्परा सेहो आरम्भ भेल, आजन- बाजनक चलनसारमे रहैछ भेल सब तबाह ||
कमी भेल विश्वास ओ आस्थाक, देव-पितर, पावनि- तिहारमे | घटि रहल पावनिक संख्या, साबिकक निष्ठा नहि रहल बेबहारमे ||
गाममे लोकक कमीक कारणे, गोसाउनि- कुलदेवताक पूजा नहि भए रहल | डीहबार किंबा ब्रह्म बाबाक पूजाक प्रति आब नहि पहिने सन उत्साह रहल ||
१३.
भार- चँगेरा साँठ- उसारक, साफे खतम भए गेल रेबाज | टोल- पड़ोस आ हित- अपेक्षितकें बएन पठेनाइ बन्ने भए गेल सकल समाज ||
पहिने दसगर्दा या सामाजिक काज करबामे, बुझै छल लोक अपन प्रतिष्ठा | परिश्रमसँ ल' धन तक करै छल अर्पित, दान दए समाजक प्रति रखै छल निष्ठा ||
भूमिहीनकें दऽ कऽ घराड़ी, सम्मान सहित जाइ छल बसाओल | मुदा आब सब अपनहिमे मस्त, कौओ- कुकूरकें एक मुठ्ठी अन्नक नहि ठौर ||
कोठी, ढक, बखारीक बदला, धातुक ड्रामक भए रहल उपयोग | माटि,बाँस, काठ, सिक्की आदिक कोहा, खापड़ि, घैल, अथरा, पथियाक नहि रहल दैनिक प्रयोग ||
चँगेरी, मौनी, कठौत, ढाकन, दाबि, सरबा आदि गेल बिलाय | सेज, गोनरि, पटिया, सितलपाटी निपत्ता धातु आ प्लास्टिकक वस्तुक भेल उपाय ||
१४.
पड़ैत अछि घर- आंगनमे एखनहु अरिपन मुदा, कोबर कागते पर बना साटल जाइत अछि | लिखिया लिखबाक परम्परा छल दिवाल पर, सेहो बिरलैके कतहु देखबामे अबैत अछि ||
मिथिला चित्रकलाक रूपमे, कपड़ा पर उतारि जरूर भए रहल व्यवसाय | मिथिला पेंटिंग पारम्परिक विषयक संगहि नित्य नव बनि रहल चित्रकलाक विषय ||
मिथिला आ बाहर सेहो, बहुत रास तैलीय रंगमे चित्रकारी भए रहल | मिथिलाक गौरवमयी मंजूषा चित्रकला, प्रोत्साहनक बेगरतामे अधमरा अछि पड़ल ||
आब नहि देखल जाइत अछि, मिथिलाक पारम्परिक लूड़ि- भास | कतऽ गेल सुजनी, कुरुसक सजावटी वस्तु, स्वेटर- गुलेबन्द, झोरा- झपना, डाली, चंगेरी, धुथरी जकर मूल छल- रारी, खढ़ आ खजूरक पात ||
मिथिलाक वास्तुकलाक छल अपन विशिष्टता, फूस, भीत, पक्का घर किंवा मकान | एतय नीकसँ अकानल जा सकैछ, कोठाघर आ मंदिरक निर्माण ||
आकार- प्रकारकें ठीकसँ बेकछायब, आब तँ नहि रहल फूस आ भीतक घर | नहि रहल ओ निर्माण शैली, मिथिलामे वास्तुकलाक विशिष्टता जे छल ||
१५.
बहुत रास खेलधूप, जे जोड़ैत छल संस्कृति आ व्यक्तित्वक विकाससँ | अटकन-मटकन, चोरानुक्की, रुमालचोरी, कबड्डी, टालगुल्ली आ पचीसीक आशसँ ||
छल मारिते प्रचलित, फकरा ओ शिशु गीत | मुदा पहिने क्रिकेट, पछाति मोबाईल सबकें केलक चीत ||
सुखराती दिन हूराहूरी, आ जूड़शीतलमे शिकार | ई संस्कृति उचिते समाप्त भेल, मुदा, कमि गेल फगुआक ओ रेबाज ||
तहिना कमि गेल जट- जटीन आ सामा- चकेबा, आर झिझिया खेलेनहार | बोलीक मधुरतामे सेहो ह्रास भेल, आब नहि फकरा- खिस्सा कहनिहार ||
१६.
मिथिलाक संस्कृतिमे कैल गेल अछि, अनेक सम्बन्ध आ अवसरक व्यवस्था | ननदि- भाउजि,सरहोजि-ननदोसि, सार आ सारि- बहनोईमे हँस्सी-ठट्ठा, पुरुख सासुरमे सहजहिं आनन्दित रहता ||
छठियार, मूड़न, विवाह, चतुर्थी, द्विरागमन, भरफोड़ी आ बरियातिक स्वागत | बरियातिक भोजन आ समधिक सौजनके अवसर पर अलोपित हास-परिहासक आदत ||
एहि सब अवसर पर हँसी- मजाकक लेल, डहकन आ अन्य गीतक छल रेबाज | मुदा समयक चोट एतहु पड़ल, पहिने जकाँ चौलक नहि रहल बेबहार ||
१७.
मिथिलामे कनबाक छल संस्कृति, बेटीक द्विरागमनक दिन मनाओल जेबासँ | द्विरागमन काल माए-बेटी ओ परिजनक कानब सुनि, धैर्य कियो नहि राखि सकथि बेटीक घानासँ ||
किन्तु, कनबाक ई परम्परा, क्षीण भए गेल आधुनिकताक प्रभावे | मेला- ठेलामे माए- पितियाइन भेंटि गेने, बन्न भेल घेंटा- जोड़ी कए कनबाक स्वभावे ||
बहुत रास मेला लगैछ एखनो मिथिलामे, एक दिनक मेलासँ मास दिनक मेला धरि | कमला मेला, मेला देवघरक, सिमरिया घाटक, बड़द- महींसक मेला साँपक मेला सिंघियाघाटक ||
१८.
ई विषय मात्र लेख या पद्यक नहि, संस्कृति परिचय होइछ मनुक्खक | एकर विशालकाय सरूप होइछ, समृद्ध संस्कृति प्राचीन मिथिला भूभागक ||
वर्तमान मिथिलाक संस्कृति, बहुत गेल अछि बदलि | एहि बदलल स्वरूपमे, अंधविश्वास, देखाँउस, बड़प्पनक लोभ आ अज्ञान अछि कारण बनल ||
कमी रहल गौरव बोधक, प्रदर्शनक प्रवृत्ति बढ़ल | परिवर्तन स्वभाविक छल मुदा, संस्कृतिक मूल तत्व अपमानित आर जड़ि उखड़ि रहल ||
- हाटगछिया, धारा, कोलकाता- 700105, 9433746295; सहायक शिक्षक, श्री उमापति विद्यामंदिर, पश्चिम बंगाल सरकार, कोलकाता| अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.राज किशोर मिश्र-मातृभूमि राज किशोर मिश्र, रिटायर्ड चीफ जेनरल मैनेजर (ई), बी.एस.एन.एल.(मुख्यालय), दिल्ली,गाम- अरेर डीह, पो. अरेर हाट, मधुबनी मातृभूमि जे भू-भा ग हृदय मे बसल, अछि मो न मे जे सदि खन सजल, जन्मभूमि भा रत हमर, सभ सँ नमहर इएह भा ग्य भेटल।
वसुधा पर जँ अछि स्वर्ग कतहु, ओ देश भा रतवर्ष अछि , को न वैभव अछि जगत् मे, एतए नहि जकर उत्कर्ष अछि ?
एहि देशक धरती पर जरल छल, सभ्यता क पहि ल बा ती , एहि ठा मक पूज्या संस्कृति , आदरणी या , जगत् मे, भा रती ।
जे सुकून अछि एहि मा टि मे, पा ओल ने जा इत अछि ,आन ठा म,
तेँ तऽ कए रहलहुँ, बेर-बेर, अछि , मा तृभूमि के हम प्रणा म।
ऊँच -ऊँच ,हि मनग सभ ठा ढ़, उच्छल सरि ता क उद्गम पहा ड़।
झी ल, तड़ा ग, सुन्दर का नन, गमकि रहल वन मे चा नन।
मरुभूमि सेहो अछि नेनुआगर, ती न दि स सँ ओगरने ,अछि सा गर।
शां ति -सुकून के प्रती क भा रत, भवि ष्य -जो ति , इएह मा टि , बा रत।
ज्ञा न ओ वि ज्ञा न, सभ मे आगू,गू एहि महा न रा ष्ट्र केँ, गो र ला गू।
जग जनैछ ,हि नक पौ रुषता -ज्वा ल, शत्रु के लेल, भा रत अछि का ल।
शां ति क सभ सँ पैघ पक्षधर, वि श्व करैत अछि तेँ तऽ आदर।
भू पर नहि अछि एहि सँ सुन्दर देश, जे, वि श्वक हटबैत अछि ,द्वन्द्व -कुहेस।
जे हवा अबैछ ,आन देश सँ, गलि जा इत अछि ओकर वि षा द, बनि उदा र ,बहैत अछि ओ पुनि , छलैक जा हि मे भरल फसा द।
धन -धा न्य सँ भरल -पूरल, भा रत सँ, मंगल -या न उड़ल।
सा मंजस, समता , सहजी बि ता , मूलमंत्र अछि ,सहि ष्णुता ।
ता कि आउ सगर धरती पर, जी वन मे ने कतहु, ई सुन्दरता , सर्वतो भद्र भा व सँ भरल, भा रतक हका र ,के नहि पुरता ?
नव -पुरा न, वि ज्ञा न -ज्ञा न, प्रगति ,शां ति लेल ,नि ष्ठा ,भक्ति , जय हो भा रतवर्ष हमर! वसुधा पर अछि ई महा शक्ति ।
लि प्सा नहि अछि स्वर्ग के, आ', ने चा ही अपवर्ग, हर जनम भा रत मा तृभूमि , जँ, घुरि -घुरि आबी सर्ग। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल 1
सजल नयन मिथिलेश हो मालिक कमल नयन अवधेश हो मालिक
हुनक कहब छनि जे ई सभ हमरे हमर बचल कुन देश हो मालिक
दशा दिशा के तय करत अहि ठाँ सड़ल गलल परिवेश हो मालिक
कनी मनी छनि आचरण हुनकर बहुत बहुत उपदेश हो मालिक
नवे नवे अफसर नवे भाषण सुनल सुनल संदेश हो मालिक
सभ पाँतिमे मात्राक्रम 12-1222-1222 अछि।
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हुलहुल हुलकै अगबे उधार तइमे बिकलै आँगन हमार
धोती कुरता बड़का टिक्का चमचम चमकै राँगल सियार
झुट्ठे के छै सभहँक जीवन झुट्ठे के छै खाँहिस हजार
हेबे करतै ई महामिलन कुमारि इच्छा हाटो कुमार
किछु आदति तेहने रहै जे हमहूँ लचार ओहो लचार
सभ पाँतिमे 22-22-22-22 मात्राक्रम अछि दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.४.रामानन्द मण्डल- हम उदारवादी रे/ नदी/ डोमिन आचार्य रामानंद मंडल- हम उदारवादी रे/ नदी/ डोमिन १.हम उदारवादी रे हम छी उदारवादी रे। हमरा दे सम्मान रे। तोरा देबौ मान रे। हमरा कह यौ रे। तोरा कहबौ रौ रे। हम रखैछी मूंछ रे। तूहो मूंछ राख रे। हमर मूंछ उठल रे । तोहर मूंछ खसल रे । हम धोती पहिने रे। तूहो धोती पहिन रे। हम पहिनव लाल रे। तू पियर पहिन रे। हम चनन कैली रे। तूहो चनन कर रे। हमर चनन लाल रे। तोहर चनन उज्जर रे। हम शिखा रखली रे। तूहो शिखा राखि रे। हमर शिखा मोट रे। तोहर शिखा पातर रे। हम रखली सिरत्रान रे। तुहो राखि सिरत्रान रे। हम पेन्हव पाग रे। तू बंधिए मुरेठा रे। हम तोहर पुरहित रे। तू हमर यजमान रे। हम तोरा कहबौ रे। वोहे तूही करिहे रे। रामा हम उदारवादी रे। २.नदी नदी हजारन बहैत, छल छल बहैत। पानी जेका दूध बहैत। धरती के पर्वत जेका, हजारन स्तन से। पानी जेका दूध पिबैत। हजारन पादप-अपादप । हजारन जीव -जंतु, पुत्र पुत्री जेका, माय धरती के। परिपूर्ण करैत। धन्य धान्य सं। शश्य श्यामला बनबैत। नदी नीर सं, माय धरती के। पानी जेका दूध बहैत। दूधमती बहैत। बागमती,अधबारा, लखनदेई, कोशी, कमला, जमुरा, माय धरती के। हजारन नदी बहैत। गंगा, जमुना सन। नीर सन दूध बहैत। हजारन स्तन सं, रामा धरती के। ३.डोमिन गहन के सिधा। गेट पर से आवाज आयल। के छी। हम डोमिन। खुब सुन्नर कारी युवती। उमर इहे पच्चीस। कान नाक सोन से अलंकृत। पैर में चानी के पायल। क देलक दिल के घायल। वोकर सुन्नरता न। जौं हम कहली। काहे मंगैत छी भीख। उ कहलक हम छी डोम। गहन के सिधा हमर अधिकार। हम कहली। कैला बनैय छी नीच। उ कहलक। भगवाने बनैले हय नीच। हम सोचे लगली। शास्त्र बनैले हय नीच। हम कहली। बिहार में बनलय हय। एगो दरोगा डोम। आबि न मांगू सिधा भीख। न लौटायब खाली हाथ। हम दे देली सिधा भीख। हमरा द्वारा से जाके। रामा मांगे लागल। डोमिन सिधा भीख। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह ३७८ म अंक १५ सितम्बर २०२३ (वर्ष १६ मास १८९ अंक ३७८)|| 21 20 || http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA
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