VIDEHA — Issue 380 / अंक ३८०

Publication: VIDEHA · Issue: 380
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ISSN 2229-547X VIDEHA 𑒀 विदेह ३८० म अंक १५ अक्टूबर २०२३ (वर्ष १६ मास १९० अंक ३८०) [विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। कॉपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति ‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२३. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२३. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. 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It is a platform for scholars, researchers, writers and poets to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, and poetry in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@gmail.com. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Videha e-Journal: Issue No. 380 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अक्खर खम्भा (आखर खाम्ह) तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ (कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।) माने आखर रूपी खाम्ह निर्माण कऽ ओइपर (गद्य-पद्य रूपी) मंच जँ नै बान्हल जाय तँ ऐ त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लत्ती केना पसरत। शुक्ल यजुर्वेद (२६.२)-यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः। ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च।।हम सभ गोटेकें ई पवित्र वाणी (वेदवाणी) सुनाबी। ब्राह्मणकें, क्षत्रियकें, शूद्रकें आ आर्यकें; अपन लोककें आ अपरिचितकें सेहो (माने सभकें)। मुदा ऐ वेदवाक्यक विपरीत मनुस्मृति वेदवाणीक अध्ययन/ श्रवणकें समाजक किछु गोटे लेल निषेध करऽ चाहलक, मुदा स्मृति सेहो वेदवाक्यकें प्रमाण मानैत अछि (शब्द प्रमाण) तें तकर विरुद्ध देल ओकर निर्देश स्वयं अमान्य भऽ जाइत अछि। Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. -Robert Louis Stevenson ------------------------------------- Videha: Maithili Literature Movement 𑒀 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्ति: 𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱: अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृ. २-११) १.२.अंक ३७९ पर टिप्पणी (पृ. १२-१२) २.गद्य खण्ड २.१.परमानन्द लाल कर्ण- गीता माहात्म्य (आगाँ) (पृ. १४-१६) २.२.आकांक्षा कर्ण-सुंदरता (पृ. १७-१८) २.३.लालदेव कामत-रुसल प्रकृति/ हमरा बिनु जगत सुन्ना छै: पाठकीय प्रतिक्रिया/ समकालीन मैथिली साहित्य कवि: कपिलेश्वर राउत/ नंद विलास जीक कथा यात्रा शुरू/ पोथी चर्चा मादें टिपण्णी: बेचन ठाकुर/ मणिपद्म जीक शताब्दीक बाद/ परिचय - प्रकाश : एक परिशीलन/ आकर्षण : ढ़ाई आखर प्रेम का (पृ. १९-४०) २.४.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (खेप-२९) (पृ. ४१-४५) २.५.कुन्दन कर्ण- बीहनि कथा- तर्पण (पृ. ४६-४६) ‍२.६.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा-ओ सत्ते बताह छल (पृ. ४७-४८) २.७.रबीन्द्र नारायण मिश्र-ठेहा परक मौलाएल गाछ (उपन्यास)- धारावाहिक (पृ. ४९-६८) २.८.किशन कारीगर-चोरनुकबा गोंसाई (हास्य कटाक्ष) (पृ. ६९-७१) ३.पद्य खण्ड ३.१.बद्रीनाथ राय- आठ टा पद्य (पृ. ७३-१००) ३.२.राज किशोर मिश्र-चान्हर (पृ. १०१-१०४) ३.३.रामानन्द मण्डल- हो बाबा गांधी!/ लाल बहादुर शास्त्री!/ हो काका जेपी (पृ. १०५-१०९) 𑒀 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्तिः पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म 𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑓁 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒰𑒣: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒼𑒭𑒡𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹 𑒠𑒹𑒫𑒰: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧 ब्रह्मणसँ प्रार्थना जे द्युलोकमे, अंतरिक्षमे, पृथ्वीपर, जलमे, औषधमे, वनस्पतिमे, विश्वमे, सभ देवतागणमे आ ब्रह्ममे शांति हुअय। ॐ-ब्रह्मण, द्यौ-सूर्य-तरेगण, अंतरिक्ष- पृथ्वी आ द्यूलोकक बीच, आप:-जल, विश्वेदेवा- सभ देवता, ब्रह्म- सर्जक। 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝𑒮𑒿 𑒣𑓂𑒩𑒰𑒩𑓂𑒟𑒢𑒰 𑒖𑒹 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒧𑒹, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭𑒧𑒹, 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲𑒣𑒩, 𑒖𑒪𑒧𑒹, 𑒎𑒭𑒡𑒧𑒹, 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒱𑒧𑒹, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒧𑒹, 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰𑒑𑒝𑒧𑒹 𑒂 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒧𑒹 𑒬𑒰𑓀𑒞𑒱 𑒯𑒳𑒁𑒨। 𑓇-𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝, 𑒠𑓂𑒨𑒾-𑒮𑒴𑒩𑓂𑒨-𑒞𑒩𑒹𑒑𑒝, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭- 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒂 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒏 𑒥𑒲𑒔, 𑒂𑒣:-𑒖𑒪, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹𑒠𑒹𑒫𑒰- 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰, 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧- 𑒮𑒩𑓂𑒖𑒏। 𑒀 ॐ, स॒हस्र॑शीर्षा॒ पुरु॑षः। स॒ह॒स्रा॒क्षः स॒हस्र॑पात्। 𑓇, 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒬𑒲𑒩𑓂𑒭𑒰↓ 𑒣𑒳𑒩𑒳↑𑒭𑓁। 𑒮↓𑒯↓𑒮𑓂𑒩𑒰↓𑒏𑓂𑒭𑓁 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒣𑒰𑒞𑓂। स भूमिं॑ ग्वंग वि॒श्वतो॑ वृ॒त्वा। अत्य॑तिष्ठद् दशाङ्गु॒लम्॥ 𑒮 𑒦𑒴𑒧𑒱𑓀↑𑓅 𑒫𑒱↓𑒬𑓂𑒫𑒞𑒼↑ 𑒫𑒵↓𑒞𑓂𑒫𑒰। 𑒁𑒞𑓂𑒨↑𑒞𑒱𑒭𑓂𑒚𑒠𑓂 𑒠𑒬𑒰𑒓𑓂𑒑𑒳↓𑒪𑒧𑓂॥ हजार माथ, हजार आँखि, हजार पएर संग विश्वकेँ आच्छादित केने अछि, दस आंगुरक गनतीक वशमे नै अछि ओ। प॒द्भ्याग्ँ॑ शू॒द्रो अ॑जायत॥ 𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑒑𑓂𑒿↑ 𑒬𑒴↓𑒠𑓂𑒩𑒼 𑒁↑𑒖𑒰𑒨𑒞॥ पएरसँ शूद्रक उत्पत्ति भेल॥ प॒द्भ्यां भूमि॒र्दिशः॒ श्रोत्रा᳚त्। 𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑓀 𑒦𑒴𑒧𑒱↓𑒩𑓂𑒠𑒱𑒬𑓁↓ 𑒬𑓂𑒩𑒼𑒞𑓂𑒩𑒰↑↑𑒞𑓂। मुदा पएरेसँ भूमियोक उत्पत्ति। ❀ (White Florette- innocence and purity) ☸ (Wheel of Dharma) ࿕(Swastik) ꣼ (सिद्धिरस्तु, सिद्धम 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒱𑒩𑒮𑓂𑒞𑒳, 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒧 Devanagari Anji) 𑓅 (Gwang ग्वंग- two small circles connected by u and a dot placed over it, used in reference of Vedic texts) 𑒀 (Tirhuta Anji, Ankush of Ganeshji, placed at the beginning of something) 𑒀

१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.अंक ३७९ पर टिप्पणी १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय गद्य साहित्य मध्य उपन्यासक स्थान आ उपन्यासक समीक्षाशास्त्र उपन्यासक आरम्भ: वाणभट्टक कादम्बरी राजा शूद्रकक विदिशानगरीक वर्णनसँ प्रारम्भ होइत अछि। एकटा चाण्डाल अतीव सुन्दरी कन्या वैशम्पायन नाम्ना ज्ञानी सुग्गाकेँ लेने दरबार अबैत अछि आ प्रारम्भ होइत अछि सुग्गाक खिस्सा। चांडालक बस्ती पक्कणमे कियो भिखमंगा नै, कियो चोर नै, ओतुक्का राजा व्याघ्रदेव स्वयं रस्सी बँटैत छथि। संस्कृतक एहि उपन्यास नामसँ मराठीमे उपन्यासकेँ कादम्बरी कहल जाइत अछि। उपन्यासक बुर्जुआ प्रारम्भक अछैत एहिमे एतेक जटिलता होइत अछि जे एहिमे प्रतिभाक नीक जकाँ परीक्षण होइत अछि। उपन्यास विधाक बुर्जुआ आरम्भक कारण सर्वांतीजक “डॉन क्विक्जोट”, जे सत्रहम शताब्दीक प्रारम्भमे आबि गेल रहए, केर अछैत उपन्यास विधा उन्नैसम शताब्दीक आगमनसँ मात्र किछु समय पूर्व गम्भीर स्वरूप प्राप्त कऽ सकल। उपन्यासमे वाद-विवाद-सम्वादसँ उत्पन्न होइत अछि निबन्ध, युवक-युवतीक चरित्र अनैत अछि प्रेमाख्यान, लोक आ भूगोल दैत अछि वर्णन इतिहासक, आ तखन नीक- खराप चरित्रक कथा सोझाँ अबैत अछि। कखनो पाठककेँ ई हँसबैत अछि, कखनो ओकरा उपदेश दैत अछि। मार्क्सवाद उपन्यासक सामाजिक यथार्थक ओकालति करैत अछि। फ्रायड सभ मनुक्खकेँ रहस्यमयी मानैत छथि। ओ साहित्यिक कृतिकेँ साहित्यकारक विश्लेषण लेल चुनैत छथि तँ नव फ्रायडवाद जैविकक बदला सांस्कृतिक तत्वक प्रधानतापर जोर दैत देखबामे अबैत छथि। नव-समीक्षावाद कृतिक विस्तृत विवरणपर आधारित अछि। एहि सभक संग जीवनानुभव सेहो एक पक्षक होइत अछि आ तखन एतए दबाएल इच्छाक तृप्तिक लेल लेखक एकटा संसारक रचना कएलन्हि जाहिमे पाठक यथार्थ आ काल्पनिकताक बीचक आड़ि-धूरपर चलैत अछि। उपन्यासक वाद: उत्तर आधुनिक, अस्तित्ववादी, मानवतावादी, ई सभ विचारधारा दर्शनशास्त्रक विचारधारा थिक। पहिने दर्शनमे विज्ञान, इतिहास, समाज-राजनीति, अर्थशास्त्र, कला-विज्ञान आ भाषा सम्मिलित रहैत छल। मुदा जेना-जेना विज्ञान आ कलाक शाखा सभ विशिष्टता प्राप्त करैत गेल, विशेष कए विज्ञान, तँ दर्शनमे गणित आ विज्ञान मैथेमेटिकल लॉजिक धरि सीमित रहि गेल। दार्शनिक आगमन आ निगमनक अध्ययन प्रणाली, विश्लेषणात्मक प्रणाली दिस बढ़ल। मार्क्स जे दुनिया भरिक गरीबक लेल एकटा दैवीय हस्तक्षेपक समान छलाह, द्वन्दात्मक प्रणालीकेँ अपन व्याख्याक आधार बनओलन्हि। उपन्यासक आरम्भ आ विकास: अंग्रेजी उपन्यास पिल्ग्रिम्स प्रोग्रेस- लेखक कथाक मुख्यपात्रक यात्राक आ ओइ यात्रा मध्य आओल संघर्ष आ उत्साहक वर्णन करैत छथि। डेनियल डिफ़ो अपन रॊबिन्सन क्रूसो उपन्यासमे मुख्यपात्रक साहसिक समुद्र यात्राक वर्णन करैत छथि। सैमुअल रिचर्डसनक पेमेला अंग्रेजी उपन्यासकेँ पारिभाषिक स्वरूप देलक। एफ़्रा बेनक ओरूनोको उपन्यासक नायक कारी रंगक दास अछि तँ हुनक ’लव लैटर्स बिटवीन ए नोबल मैन एंड हिज सिस्टर’ मे सामंतक प्रेम कथाक वर्णन अछि। हैनरी फ़िल्डिंग ’टॉम जोन्स’ मे सामंतवादक आलोचना केने छथि समाजक विकृतिक चित्रण केने छथि। हेनरी जेम्स “द पोट्रेट ऑफ ए लेडी” मे कलात्मक प्रस्तुति लेल जिनगीक उपेक्षा करै छथि। रिचर्डसन ’कलैरिस’ मे मनुष्यक मनोविज्ञानक तहमे जाइ छथि। जोजफ कोनरेडक ’द शैडोलाइन’ क पात्र समाज आ जीवनक प्रति दृष्टिकोणक एक्द पक्षीय होएबापर सोचै छथि। डी.एच.लॉरेन्स “लेडी चैटर्लीज लवर” क पात्र विकृति लेल संस्कृति आधारित सभ्यताकेँ दोषी कहै छथि। रुडयार्ड किपलिंगक उपन्यास “किम” यूरोपी साम्राज्यवादक लेल एकटा बहन्ना ताकि रहल अछि, यूरोपी सभ्यताकेँ ओ उच्च मानै छथि। ई.एम.फोर्स्टरक “ए पैसेज टू इंडिया”मुदा शासक आ शासितक सम्बन्धकेँ व्याख्यायित करैत अछि। मैथिली उपन्यासक आरम्भ आ विकास: हरिमोहन झाक कन्यादान आ द्विरागमन मिथिलाक बहुत रास सामाजिक व्यवस्थाकेँ सोझाँ अनैत अछि, महिला शिक्षा आ अंध-पाश्चात्यकरणक सेहो हास्य रसमे चित्रण आधुनिक अंग्रेजी उपन्यासक रीतिएँ करैत छथि। यात्रीक बलचनमा यादव जातिक बलचनमाक आत्मकथ्यक रूपमे अछि। आर्थिक समस्या एकर मूल विषए छैक। बलचनमा कोना एकटा टहल करैबलासँ आगू जाइत किसानक हक लेल जान दैत अछि ताधरिक कथा। कांग्रेस आदि पार्टीक विरुद्ध कम्यूनिस्ट पार्टीक प्रति स्पष्ट झुकाव यात्रीजीक रहल छन्हि। आ पारो बलचनमाक आर्थिक समस्याक विपरीत सामाजिक लक्ष्य तकैत अछि। किछु दिनुका बाद एहि उपन्यासकेँ लोक असली फिक्शनक रूपमे लेताह कारण अगिला पीढ़ीकेँ विश्वास नै हेतै जे एहनो कोनो क्रूर व्यवस्था सभ मानवजातिक मध्य होइत हेतै। आ तैँ एकर महत्व आर बढ़ि जाइत अछि- ओहि सभ व्यवस्था सभकेँ पेटारमे सुरक्षित रखबाक जिम्मेदारी। मुदा जहिया यात्रीजी ओहि समस्यापर लिखने छलाह तहियासँ ओ समस्या रहै आ ई उपन्यास ओहिमे सार्थक हस्तक्षेप कएने छल। रमानन्द रेणुक दूध-फूल उपन्यास समाजक उपेक्षित वर्गकेँ सोझाँमे रखैत अछि आ कलात्मक उपस्थापन करैत अछि। ललितक पृथ्वीपुत्र सेहो समाजक उपेक्षित वर्गकेँ सोझाँमे रखैत अछि। ई उपन्यास कृषक जीवनक आर्थिक समस्यापर सेहो आंगुर धरैत अछि। लिली रे क पटाक्षेप वामपंथक वर्ग-संघर्षक उत्थान आ फेर ओकर दमनक कथा कहैत अछि आ देशक समस्यासँ साहित्यकार द्वारा स्वयंकेँ तत्काल जोड़बाक मार्ग प्रशस्त करैत अछि। धूमकेतुक मोड़ पर सेहो वामपंथी विचारक आलोकमे सामाजिक-आर्थिक समस्याक कथा बैकफ्लैशमे कहैत अछि। साकेतानन्दक सर्वस्वान्त बाढ़िक आ सरकारी नीति आ राहतक कथा अछि। जगदीश प्रसाद मण्डलक मौलाइल गाछक फूल गामक, गामसँ पलायनक आ गलल व्यवस्थाक पुनर्जीवनक लेल समाधानक उपन्यास अछि। चतुरानन मिश्रक कला कलादाइक माध्यमेँ गलल सामाजिक व्यवस्थापर प्रहार अछि। साहित्यिक शब्दावली हिन्दी जै हिसाबे अपन भूगोल बढेलक अछि ओइ हिसाबे ओकर शब्दावली नै बढ़ल छैक,से हिन्दीसँ डरबाक कोनो प्रश्ने नै। हिन्दीक साम्राज्यवाद अंग्रीजीक साम्राज्यवादक स्थान लऽ लेने अछि आ से सभ हिन्दी दिवसपर छोट भाषाकेँ गिरबाक ओकर प्रवृत्तिपर बहस नै रोकल जा सकत। लैटिन/दक्षिण अमेरिकाक सभटा मूल भाषा खतम भऽ गेल आ ओकर स्थान स्पेनिश आ पोर्तूगीज लेलक। स्पेन अजटेक सभ्यताकेँ खतम केलक, ओकर सभ चेन्हासी मेटा देलक, मुदा मेक्सिको तकर पश्चातापमे विश्वकप फुटबॉलक आयोजन लेल जे स्टेडियम बनेलक तकर नाम अजटेक स्टेडियम रखलक। डेनमार्कक शब्दकोष बड विस्तृत छै, प्रायः २३ वोल्यूम सँ बेशीमे छै, आप्रवासी प्रायः ओकर नागरिकता लेल लै जाएबला परीक्षामे डेनिस भाषामे अनुत्तीर्ण भऽ जाइ छथि, एकटा महिला जे डेनिससँ विवाह केने रहथि हुनकर बच्चा डेनमार्कक नागरिक भऽ गेल मुदा ओ कहलन्हि जे भाषा पेपर बड्ड कठिन छै, डेनिस सेहो ओइमे अनुत्तीर्ण भऽ जाइ छथि, जनसंख्या वा क्षेत्रफलक छोट रहब डेनिस वोकाबुलेरी लेल हानिकारक नै भेलै। साहित्यकक मूल सरोकार अछि विषय-वस्तुसँ। मुदा शब्दक अकाल जँ साहित्यकारेक मध्य रहत तँ ओ की संप्रेषण करताह, विषय-वस्तुकेँ कोना फरिछा पेताह। जे हाल हिन्दी साहित्यक अछि सएह मैथिलीक भऽ जाएत। शब्दावलीक ग्राह्यता नेटिव स्पीकरक गाममे बाजल जाएबला शब्दावली निर्धारित करत, संस्कृतिसँ दूर प्रवासी द्वारा बाजल जाएबला शब्दावली नै। शब्दावलीक ग्राह्यता नेटिव स्पीकरक गाममे बाजल जाएबला शब्दावली निर्धारित करत, आ जँ संस्कृतिसँ कटल प्रवासी द्वारा बाजल शब्दावलीकेँ आधारभूत बनाएब तँ नीक साहित्य कोड़ि कऽ निकालल बुझाएत आ गोलैसी आधारित समीक्षकक समीक्षित साहित्य नेचुरल बुझाएत। शास्त्रीय अनुशासन लेखक लेल अछि, पाठक लेल नै। लेखक जँ गजल, रोला, दोहा, कुण्डलिया शास्त्रीय आधारपर लिखताह तखने पाठककेँ नीक लगतै, जँ लेखक मेहनतिसँ दूर भगताह तँ साहित्यिक पाठकीयता घटत। शास्त्रक बान्ह तोड़बाक विधि सेहो शास्त्रक मध्य छैक, सावित्री मंत्र जँ शास्त्रीय कट्टरतासँ देखी तँ ओ गायत्री छन्दमे नै छै, मुदा हम सभ ओकरा गायत्रीमे मानै छी कारण गणना पुरेबालेल स्वः केँ सुवः कएल गेलै। दरभंगाक मजहर इमामकेँ "पिछले मौसम का फूल"पर उर्दू लेल साहित्य अकादेमी पुरस्कार देल गेल। ऐ संग्रहमे गजल (बहरयुक्त) ५५ टा आ आजाद गजल (बे-बहर) ३ टा छै, मुदा पाठक हुनका गजल लेल मोन राखने छन्हि, ओकरा मतलब नै छै जे, जे गजल ओकरा नीक लगलै से बहरमे छै वा नै, ओकरा तँ नीक लगलै। आ की ई संयोग छी जे बहरयुक्त गजले ओकरा नीक लगलै? मजहर इमामकेँ उर्दू साहित्य आजाद गजलकेँ स्थापित केनिहारक रूपमे मोन रखने अछि। लेखकक आइडियोलोजी पानिमे नून सन हेबाक चाही, पानिमे तेल सन नै आ ऐपर हम पहिनहियो लिखने छी। यात्री आ धूमकेतुकेँ कम्यूनिस्ट पार्टीक सोंगरक आवश्यकता पड़लन्हि कारण वामपंथ “नीक सेन्ट” आ “डिजाइनर वीयर”क भाँति हिनका सभ लेल फैशन छल, से बलचनमा कांग्रेस आ समाजवादी पार्टीसँ हटलाक बाद कम्यूनिस्ट आ लालझंडामे सभ समस्याक समाधान तकैए, ओकरा यात्रीजी सभ समाधान ओइमे दै छथिन्ह। धूमकेतुक पात्र लेल सेहो लाल झंडा लक्षमण बूटी अछि। मुदा ई लोकनि कम्यूनिस्ट मूवमेन्टसँ -फैशनक अतिरिक्त- जुड़ल नै छथि तेँ हिनकर साहित्यमे आइडियोलोजी तेल सन सहसह करैए। आब आउ चतुरानन्द मिश्र आ जगदीश प्रसाद मण्डलक मैथिली साहित्यपर। चतुरानन्द मिश्रक उपन्यासमे वा जगदीश प्रसाद मण्डलक मैथिली साहित्यमे कतौ लालझंडा वा कम्यूनिस्ट पार्टीक चर्च अहाँ देखने छी? एतए जे भेटत से अछि असल वामपंथी द्वन्द्वात्मक पद्धति, जीवनपर विश्वास, माने आइडियोलोजी नूनसन मिलल। आ की ई मात्र संयोग अछि जे चतुरानन्द मिश्र जीवनक प्रारम्भमे साहित्य लिखै छथि आ जगदीश प्रसाद मण्डल जीवनक उत्तरार्धमे, अन्तिम केस खतम भेलाक बाद? जगदीश प्रसाद मण्डलक गाम बेरमाक जमीन्दार ठाकुर जी हमर पितयौत भाइकेँ कहलखिन्ह जे जगदीश प्रसाद मण्डल सत्य हरिश्चन्द्र छथि, हमर गामक गौरव छथि। आ से तखन, जखन जगदीश प्रसाद मण्डल कम्यूनिस्ट मूवमेन्टक नेतृत्व केलन्हि दसो बेर जेल गेलाह, केस हुनके सभसँ लड़लन्हि आ तकर परिणाम भेल जे बेरमामे आइ दस बीघासँ पैघ जोत ककरो नै छै। आइयो ओ तीन बजे उठि कऽ डिबिया लेस कऽ मैथिली साहित्य लिखै छथि आ हुनकर बेटा हुनका आइ धरि लिखैत नै देखने छथिन्ह, जे कखन ओ लिखै छथि, भोगेन्द्र झाक नेतृत्वमे ओ प्रण लेने रहथि जे जखन बाजब, सभ मैथिलीमे बाजब। से हुनकर बेटा हुनका मैथिलीक अतिरिक्त दोसर भाषा बजैत नै सुनने छथिन्ह। आ सएह कारण अछि जे हुनकर विषय-वस्तु नवीन होइत अछि, हुनकर शब्दावली नेटिव स्पीकरक शब्दावली अछि, जे ओइ विषय-वस्तुकेँ फरिछेबामे सफल होइत अछि आ आवश्यक अछि। हुनकर लोक, हुनकर गाछ-बृच्छ, हुनकर फूलपात, हुनकर खेत खलिहान असल अछि, जमीनी अछि, पतालसँ कोड़ि कऽ निकालल नै। आ हुनकासँ प्रेरणा लऽ प्रवासमे रहनिहार नव साहित्यकार मैथिली लिखबासँ पहिने मिथिलाक इतिहास-भूगोल आ संस्कृतिक ज्ञान प्राप्त करथु, तखने हुनकर साहित्य फराक भऽ सकतन्हि। बेरमाक ठाकुरजी सन लोकक विचार हमरा लेल बेशी महत्व राखैए,बनिस्पत गोलैसी केनिहार साहित्यकारक/ समीक्षकक जिनकर आयातित शब्दावलीबला साहित्य कोना मैथिली पाठक घटेलकै; आ खाँटी शब्दावली कोना मैथिली साहित्यक स्तर ऊँच केलकै, आ पाठक बढ़ेलकै, ई आब ककरोसँ नुकाएल नै अछि। उपन्यास लेल दू-दू बेर बूकर पुरस्कार आ साहित्यक लेल नोबल पुरस्कारसँ सम्मानित जॉन मैक्सवेल कुट्सी भाषाक सन्दर्भमे कहने रहथि जे अफ्रीकान्स आ अंग्रेजी भाषाक द्विभाषिया माहौलमे हुनकर अंग्रेजी लेखन हुनका लेल बहुत रास संप्रेषण सम्बन्धी समस्या सोझाँ अनैत छल। ओ अफ्रीकान्ससँ अंग्रेजीमे तकर प्रतिकार स्वरूप ढेर रास अनुवाद केलन्हि। मुदा मैथिलीक साहित्य अकादेमी पुरस्कार विजेता (आ किछु ऐ पुरस्कार लेल ललाइत आकांक्षी लोकनि), जे तथाकथित साहित्यकार लोकनि छथि, से जइ प्रकारेँ मैथिली आ हिन्दी दुनूक डोरी पकड़ि माहौल खराप करबामे लागल छथि, से जॉन मैक्सवेल कुट्सीसँ किछु शिक्षा ग्रहण करताह, से मात्र आशा कऽ सकै छी। अमेरिकामे ३५० शब्दक अंग्रेजीक "हाइ प्रेक्वेन्सी" आ ३५०० "बेसिक वर्ड लिस्ट" हाइ स्कूलक छात्र लेल छै जे क्रमशः कॉलेज आ ग्रेजुएट स्कूल (ओतए पोस्ट ग्रेजुएटकेँ ग्रेजुएट स्कूल कहल जाइ छै) धरि पहुँचलापर दुगुना (गएर भाषा फेकल्टीक छात्र लेल) भऽ जाइ छै। साहित्यक विद्यार्थी/ साहित्यकार लेल ऐ सँ दस गुणा अपेक्षित होइत अछि। हिन्दीमे -अपवाद स्वरूप आंचलिक पोथी छोड़ि- हिन्दीक कवि आ उपन्यासकार अठमा वर्गक २००० शब्दक शब्दावलीसँ साहित्य (पद्य, उपन्यास) रचै छथि आ मैथिलीक किछु साहित्यकार ऐ बेसिक २००० शब्दक वर्ड लिस्टकेँ मैथिलीमे आयात करए चाहै छथि, आ ओतबे धरि सीमित रहए चाहै छथि, जखन जापानी अल्फाबेटक चेन्ह ५०० धरि पहुँचि जाइ छै। छद्म मानकीकरण: एकटा खास जातिवादी स्कूलक विचारकेँ प्रश्रय देलाक परिणाम, जे एकाध किताब सी.आइ.आइ.एल. मैथिलीमे निकाललक अछि आ जइ तरहेँ ओकर मानकीकरण प्रोजेक्ट सालक सालसँ बिना परिणामक चलि रहल छै। असल मानकीकरण: मिथिलाक सभ क्षेत्रक सभ जातिक बाजल जाएबला मैथिलीक आधारपर गहन विचार विमर्शसँ बनाओल मानकीकृत मैथिली। बेनीपुरीक "अम्बापाली" नाटक हिन्दीमे छै, एन.सी.ई.आर.टी. ओकरा स्कूलक पाठ्यक्रममे लगेलक मुदा सम्पादक कहलन्हि जे "क्रिया ’है’ क अनुपस्थिति" जेना "वह जा रहा", बेनीपुरीपर स्थानीय क्षेत्रक प्रभावक परिणाम अछि आ तेँ सम्पादक मण्डल ओकर ऐतिहासिकताकेँ देखैत स्कूली पाठ्यक्रममे रहलाक बादो ओकरा सम्पादित नै कऽ रहल अछि। जगदीश प्रसाद मण्डलक दीर्घ कथा शम्भूदास आएल अछि, ओकर दोसर पारा देखल जाए:- “जहि‍ना बाध-वोनक ओहन परती जइपर कहि‍यो हर-कोदारि‍ नै चलल सुखि‍-सुखि‍ गाि‍छ-वि‍रि‍छ खसि‍ उसर भऽ जाइत, ओइ परतीपर या तँ चि‍ड़ै-चुनमुनीक माध्‍यमसँ वा हवा-पानि‍क माध्‍यमसँ अनेरूआ फूल-फड़क गाछ जनमि‍ रौद-वसात, पानि‍-पाथर, अन्‍हर-वि‍हाड़ि‍ सहि‍ अपन जुआनी पाबि‍ छाती खोलि‍ बाट-बटोहीकेँ अपन मीठ सुआदसँ तृप्‍ति‍ करैत तहि‍ना जमुना नदीक तटपर शंभूदासक जन्‍म बटाइ-कि‍सान परि‍वारमे भेलनि‍।” की एतए “जाइत” "करैत" क बाद अछि देब आवश्यक छैक? सिद्धान्त आ प्रयोग : से जौँ गहींर नजरिसँ देखब तँ लागत जे उपन्यासकारक कृति ओहि समएक वाद आ दृष्टिकोणकेँ संग लऽ कऽ चलबाक प्रयास अछि। मुदा सिद्धान्तसँ प्रयोगक क्रममे किछु विशेषता स्वयमेव आबि जाइ छै। तहिना मैथिली उपन्यासक सेहो स्थिति अछि। रमानन्द रेणुक उपन्यासमे ई तथ्य शिल्पमे स्पष्ट रूपसँ देखि सकै छी। लिली रे अपन कलमक धारसँ जेना अपन लग-पासक घटनाक, समाजक, राजनीतिक वर्णन करै छथि से अद्भुत तँ अछिये अंग्रेजी उपन्यास सभसँ एक डेग आगाँ जाइत अछि। ललित, यात्री आ धूमकेतु आर्थिक आ सामाजिक समस्याकेँ सोझाँ रखैत छथि, आ ओहि क्रममे कोनो तथ्यकेँ कोनो रूपेँ नुकबैत नै छथि। साकेतानन्द बाढ़िक समस्याकेँ सोझाँ रखै छथि। हरिमोहन झा अपन शैलीमे अंग्रेजी साहित्यक धारकेँ बहबैत छथि आ नायक द्वारा नायिकाकेँ देल पढाइक सिलेबसमे सेहो ई तथ्य सोझाँ अनैत छथि। चतुरानन मिश्र आ जगदीश प्रसाद मंडल कम्यूनिस्ट आन्दोलनसँ जुड़ल छथि, प्रायोगिक रूपमे, पार्टी स्तरपर, मुदा हिनकर दुनू गोटेक उपन्यास देखला उत्तर हमरा ई कहबामे कनेको कष्ट नै होइत अछि जे जाहि रूपमे यात्री आ धूमकेतु मार्क्सवादक बैशाखी लऽ उपन्यासकेँ ठाढ़ करै छथि तकर बेगरता एहि दुनू उपन्यासकारकेँ नै बुझना जाइत छन्हि। मार्क्सवादक असल अर्थ हिनके दुनूक रचनामे भेटत। कतौ पार्टीक नाम वा विचारधाराक चर्च नै मुदा जे असल डायलेक्टिकल मैटेरियलिज्म छैक तकर पहिचान, जिनगीक महत्वपर विश्वास, द्वन्दात्मक पद्धतिक प्रयोग आ ई तखने सम्भव होएत जखन लेखक दास कैपिटल सहित मार्क्सवादक गहन अध्ययन करत। सभ जीवित भाषामे सभसँ बेसी रचना उपन्यासक होइत छै मुदा मैथिलीमे सभसँ कम उपन्यास लिखल जाइत अछि। जाहि रूपमे अंग्रेजी शिक्षा आ साहित्यक अध्ययन कऽ मैथिली साहित्यमे आओल नव पीढ़ीक संख्या बढ़त, मैथिली साहित्य अपन सामाजिक- आर्थिक- राजनैतिक आ सांस्कृतिक अंतर्दृष्टिक विकास कऽ सकत। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १.२.अंक ३७९ पर टिप्पणी अंक ३७९ पर टिप्पणी आशीष अनचिन्हार

किशन कारीगर केर लगातार विदेहपर सक्रियता नीक अछि। कुमार मनोज काश्यपजीक लघुकथा नीक रहल। बटोहीजीसँ आर संस्मरण केर आस अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.गद्य खण्ड २.१.परमानन्द लाल कर्ण- गीता माहात्म्य (आगाँ) २.२.आकांक्षा कर्ण-सुंदरता २.३.लालदेव कामत-रुसल प्रकृति/ हमरा बिनु जगत सुन्ना छै: पाठकीय प्रतिक्रिया/ समकालीन मैथिली साहित्य कवि: कपिलेश्वर राउत/ नंद विलास जीक कथा यात्रा शुरू/ पोथी चर्चा मादें टिपण्णी: बेचन ठाकुर/ मणिपद्म जीक शताब्दीक बाद/ परिचय - प्रकाश : एक परिशीलन/ आकर्षण : ढ़ाई आखर प्रेम का २.४.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (खेप-२९) २.५.कुन्दन कर्ण- बीहनि कथा- तर्पण ‍२.६.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा-ओ सत्ते बताह छल २.७.रबीन्द्र नारायण मिश्र-ठेहा परक मौलाएल गाछ (उपन्यास)- धारावाहिक २.८.किशन कारीगर-चोरनुकबा गोंसाई (हास्य कटाक्ष) २.१.परमानन्द लाल कर्ण- गीता माहात्म्य (आगाँ) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.आकांक्षा कर्ण-सुंदरता आकांक्षा कर्ण सुंदरता

सुंदरता की छी?......की खाली बाहरी सौन्दर्य के खूबसूरती कहल जा सकैत अछि? की खाली देहक उज्जर रंग सुंदरता छी? यदि नारी अपन शरीर के किछु आभूषण सं सजा क अपन श्रृंगार करै छथिन, तं खाली यैह सुंदरता छी?

नै, सुंदरता केवल बाहरी साज सज्जा टा नै वरण मन आंतरिक विचार छी मन क सुंदरता असली सुंदरता छी सूरत नै सीरत नीक हेबाक चाही एहन कतेको बात सुनैत आएल छी अपना सब एहि समाज से

यैह समाज छी, जे सीखबैत अइछ लोक क कुचेष्टा नै करी लोक के देहक बदसूरती पर नै हंसी शरीरक अपंगता पर नै हंसी वरन ओहि मनुष्य सं सहानुभूति राखि जे शारीरिक रूप सं अपंग छैथ लाचार और बेबस छैथ, समाज सं सीखने छी एते नीक बात

तखन फेर यैह समाज कियाई बात के बिसैर जाइ छै जखन कियो केकरो अपंगता पर हंसैत छैथ, जखन कोनो लड़की के दैहिक शोषण होइत अछि ,जखन कोनो कन्या के विवाह होइत अछि बेर बेर देखने छी, इ समाज अपने बात बिसैर जाइत अइछ लड़की के रंग कम छै, कद छोट छै एहन कतेको नुस्ख निकालल जाइत छै ओहि लड़की के हीन भावना सं ग्रसित क देल जाइ छै ओकर कोनो हुनर के किछ मोल नै रहि जाइत अइछ

किया अछि एहन इ समाज ?

एतेक महान और दार्शनिक विचार राखै बला इ समाज किया अइछ एहन..?

एतेक क्रूर, एतेक निर्मम समाज क हिस्सा छी हम | वास्तव में समाजक विचारधारा अपंग अइछ केवल पैघ पैघ बात क सकै ये इ समाज

किया बिसैर जाइत अइछ इ समाज केकरो मनक सुंदरता देखनाइ,केकरो सीरत देखनाइ, रूप रंग सं बढी क बात क सकै अइछ तं ओहि सं ऊपर बढि काज किये नै समाजक एतेक क्रूर और अपंग मानसिकता इ सोचै पर मजबूर करैत अछि जे वास्तविक सुंदरता की छी?.. ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.लालदेव कामत-रुसल प्रकृति/ हमरा बिनु जगत सुन्ना छै: पाठकीय प्रतिक्रिया/ समकालीन मैथिली साहित्य कवि: कपिलेश्वर राउत/ नंद विलास जीक कथा यात्रा शुरू/ पोथी चर्चा मादें टिपण्णी: बेचन ठाकुर/ मणिपद्म जीक शताब्दीक बाद/ परिचय - प्रकाश : एक परिशीलन/ आकर्षण : ढ़ाई आखर प्रेम का लालदेव कामत-रुसल प्रकृति/ हमरा बिनु जगत सुन्ना छै: पाठकीय प्रतिक्रिया/ समकालीन मैथिली साहित्य कवि: कपिलेश्वर राउत/ नंद विलास जीक कथा यात्रा शुरू/ पोथी चर्चा मादें टिपण्णी: बेचन ठाकुर/ मणिपद्म जीक शताब्दीक बाद/ परिचय - प्रकाश : एक परिशीलन/ आकर्षण : ढ़ाई आखर प्रेम का १ रुसल प्रकृति पल्लवी प्रकाशन निर्मली सँ २०२२ ई० मे डाॅ० शुभ कुमार वर्णवाल जीक १५३ पृष्ठक काव्य संग्रहके पोथी " रुसल प्रकृति" बहराएल य। ऐहि मैथिली साहित्य पोथीमे ६१ कविता 'क समुह अछि, जाहिक किमत ३०० टाका निर्धारित छै। सद्यप्रकाशित ई पोथी श्री वर्णवाल जीक दोसर समुच्य छी। एहि सँ पहिलुका पोथी 'बदलैत गाम' मे जाहि महानुभावके मनोदगार छपल छलन्हि से ' रुसल प्रकृति ' पोथीमे सेहो फेर सँ जमल छथि। नवोदित कवि जीक कविता अध्ययन मनन करैत पाठक वर्गकेँ खूब नीक सुहाएत। हम तँ एहिमे सँ किछु कविताक विषयमे आ एहिक उपयोगिता संबंधी तथ्य केँ एक तटस्थ राजनीतिक हिस्सा बुझैत रस्सास्वादन केलहुँ। यथा -: विश्वकर्मा पूजा शुभ दिन आई जन्म 'मोदी' गुण बान यौ ; अद्भुत प्रतिभा भारती नंदन विश्वमे प्रथम स्थान यौ।......,. दोसर कविताक पाँति द्रष्टव्य -: ......... इचना पोठी चालि दिअय ओ रेहुक सिर विषाय; कहबी केँ चरितार्थ करैत मनरोगी बनल कसाय, फिरेशान सब भागय प्रवासी छोड़ि - छाड़ि आँखि नम। हिन्दू - मुस्लिम - सिख - ईसाई भाइ जगतमे सुन्दरतम।................. आरो किछ कविताक एहन पाँति रचल गेल छन्हि -: ....... कचरा ,गन्दगी ,दुषित हवा संग जल प्रदुषित ध्वनि सगर; लापरवाही छोड़ि समर्पण जन चेतना सभ स्तर स्वागत योग्य डेग सरकारक सबहक चाही ध्यान यौ। अटल मिशन अमृत सरकारी काया कल्प निदान यौ।.......... लगातार तीन तलाक़ कहिकय मुस्लिम समाज महिला केँ बराबरिक हक हिन्दुस्तानमे नै दैत रहय, से सुप्रीम कोर्ट 'क संवैधानिक फैसला सँ धर्मक ठेकेदार सभ भक्क दय अवाक् रहि गेलैक हन्। ऐतिहासिक निर्णय'क आब व्यापक असैर हिन्द वतनमे नव जागृति रूपमे जनमानस देखत। कवि जी कवितामे पांति गढ़लनि अछि -: महिला सशक्तिकरण देशमे सफल फैसला बनत मिसाल; तीन तलाक़ सँ मुक्त भारत मुस्लिम स्त्री सभ खुशहाल। ओना प्रस्तुत पोथीमे कतेको अन्य कविता यथा -: स्वागत आगत नव बरखक, आयल दिवस बिहार, मिथिलाक पावन शहर मधुबनी, जग जाहीर मिथिलाक दरभंगा, भारतीय संविधान दिवस, मतदाता जागरूकता दिवस, योग दिवस, शुभारम्भ शुभ खेल दिवस पर, तिलासंकाति पावनि अछि पावन, पावन भरदुतिया त्योहार, जल जीवन-हरियाली, समृध्द खेती बाट कल्याण, एक मई मजदूर दिवस, अडिग हिमालय, मौसमी विपदा, बहैत नदी अतुल्य निधि, आयल भूकम्प, रुसिगेल छथि प्रकृति रानी, हिन्द सबल गणतंत्र, पन्द्रह अगस्त शुभ आह्वान, माय भारती केँ वन्दन -चन्दन, कंदर्पि घाट, जलियांवाला बाग काण्ड, कारगिल विजय दिवस, इतिहासक पन्नामे समेटल, ओहिना नँय आजाद भेलहुँ हम, माइ भारती केर पुत्र अमर, नाम शहीद एक दीप जराबी, पीठमे छुरी भोंकल पाक, नरक धरा केर पाकिस्तान, दिल भारत वर्षक डोलल..... सूरज चांद रहत, सीमा लागल तनातनी ए, नंय जानि कोन रोग एलैए, घरे में रहियौ , वायरस कोरोना, सड़क कात जे नेना भुटका, बीज घृणा केर, अहां मीत छी हमर, नव बरख शुभ हो, मिथिला मखान पहिचान यौ: आदि मे सोतियामी शैलीमे कविता विधा बढ़ सौष्ठव भेल छन्हि। कविक परिचय सेहो काव्यात्मक अभिव्यक्ति हिनक रचना सराबोर कयने छै । यथा -: शुभ कुमार वर्णवाल हमर नाम ! मिथिलादिप मिथिला मध्य गाम मातु स्वर्गीया मुनचुन देवी तात साकेती लखन दास सुनाम । पाँच नवंबर ,संतावन जन्म बिहार प्रान्त मधुबनी मिथिला सुन्दर नगर प्रोफेसर्स कालोनी शुभ अंगना पावन विमला कालिदास विधापति साइंस कालेज उच्चैठ बेनीपट्टी पद प्रधानाचार्य सुशोभित उच्चैठ वासिनी माँ भगवती ।...... हिनक रचना हृदय केर गहींरपन कँ छुबैत छैक । कविताक भाव मानवके कल्याण मार्ग लेल एक नव संदेश दैत अछि । मैथिली साहित्यक अक्षय भंडार केँ आरो भरबामे हिनक योगदान स्मरणीय रहत । यद्यपि साहित्य तँ राजनीति सँ दुर समाजनीतिक लगपास रहैछ । पोथीमे भक्ति पक्षक आ अध्यात्मिक काव्य सेहो पढै़त मनके स्थितप्रज्ञ भ ॑ जेबा लेल बाध्य करैत अछि । द्रष्टव्य पाँति -: चण्डी, उमा, श्यामा, काली, रमा, राधिके, शेरा वाली मुंबा, पटना, दुर्गा,भापन भव्य, भवानी माई । जय अम्बे ब्रह्माणी माई जय अम्बे..... एहि तरहेँ शिर्षक - सभ साल मनाबथि क्रिसमस,काशी तीर्थ स्थान यौ , विजयादशमी भारत वर्षक, धन्य धन्य अयोध्या नगरी, पार्वती -शिव जीक आराध सलहेस छथि विद्यमानयौ ना,ई अराधना जल- फल सूर्यक, लोरीक गाथा पुरान यौ, हे पवन पुत्र हे 'अभिनन्दन' आओर नौ रूप आई दुर्गा के ! मे धार्मिक वातावरण अक्षुण्ण राखल गेल या मूलतः ई काव्य संग्रह अपना नामक असर प्रकृति में य।मुलत: ई काव्य संग्रह अपना नामक असर प्रकृति मे व्याप्त समस्या दिश संकेत करबामे समर्थ भेल बुझाइछ । एहि धराधाम मे प्राकृतिक रूप सँ जे पर्यावरणीय संकट उत्पन्न भेलैक, तकर दुष्परिणाम भोगय लेल सकल चराचर मे मानबक संग - संग पशु-पक्षी जलीय जीव - जन्तु आ पेड़ -पौध आई आक्रान्त भऽ उठल छैक । प्रकृतिक संग जे निर्वाध गतिये अनियमितता बरतल गेल आ दोहण - शोषण आरम्भ भेल से वैज्ञानिक वातावरण निर्माणमे अवरोधक सावित भेलैक अछि । कविजीक चिन्ता ताहि संदर्भमे अनेकानेक पहलू पर सम्यक रुपेँ भेलनि अछि । कविजीक चिन्ता ताहि संदर्भमे अनेकानेक पहलू पर सम्यक रुपेँ भेलनि अछि । एकटा अपील समाज लेल ऐ पोथी माध्यमसँ संदेश रूपेँ देल हन, जाहि सँ मानव सम्हरि जाई आ अनन्त सुगमता लेल अपना जनैत विशेष परियास सँ रूसल प्रकृति केँ बचा ली । कविवर वर्णवाला जी मगन भ ॑ रूसल प्रकृतिमे गबैत छथि- अछि जरूरी गाछ लगाबी प्रकृतिक अनुरूप विकास रूसल प्रकृति केँ सभ मनाबी बसुन्धरा प्राणिक आवास ।

२ हमरा बिनु जगत सुन्ना छै: पाठकीय प्रतिक्रिया

कमलाक कल-कल धारा आ शोकनदी 'कोसी'सँ ग्रसीत तिलयुगाक तट पर अवस्थित रसुआर(सुपौल)गाममे पहिलौ मैथिलीक लेखक विद्वान भेल रहथि जे दरभंगाक प्रवासी भ' गेलाह। ओहिठामक समरजीत कुमारके सेहो मैथिलिक रचना कोशी संदेश में देखने रही। मुद्दा ई नहि बुझल रहय जे महिसबारक हेंरमे आ किसानों बीच हेरायल श्रीराम देव मंडल 'झारुदार' छथि,जिनक काव्य रचनावलिक मैथिली पोथी"हमरा बिनु जगत सुन्ना छै" श्रुति प्रकाशन दिल्ली सँ२०१२मे प्रकाशित भेल छैक। सद्यप्रकाशित एहि पोथीमे१२८टा पन्ना,जकर दाम २५०टाका य।से पढबाक अवसर आई भेटल अछि।आठटा पाठ एहि संग्रहमे पाठक केँ भेटत। सुपरिचित झारु नव विधाक साहित्य सृजक श्री रामदेव झारुदार जीके एहि पोथीकेँ पढलासँ ई स्पष्ट होइछ ई एकटा संजीदा हस्ताक्षर छथि जे अपन भूमिका बढ़ चिकन जेकाँ निर्वाह केलाह हन्।अपना रचनावली केँ ओ दोहाक जगह झाड़ु कहलनि अछि। हुनके अनुसारे एहि बिहार आ मिथिला मेँ वर्तमान मेजे विकटता छैक,तकर सुधार समयसँ होय जाहिसँ सम्पूर्ण भारतमे संदेश जेतैक ।एक तरहेँ पुरान आख्यानके सम्यक सीमामे लोकभावना जागृत भए सुन्नर बनय आ जे समस्या सब जकरल छै तकर समाधान सेहो अपना मनोभाव केँ कलमक रफ्तार दए निखारलनि अछि। हुनका प्रति दुर्गानन्द मंडल कहैत छथि झारुदार जी आश्वस्त छथि जे ग्रामंचल सँ नगरधरि लोक सुसंस्कृत दंगे मानवीय पक्षधरता बनय, अपना झारू- खड़रा आ बारहनि सँ साहित्य में जमल गन्दगी के सेहो बहारिसुहारि स्वच्छ करयमें आगू अयलाह आ हिनक गेयात्मक मंचीय काव्यधारा मीठगर कंठ सँ बहरायल मिथिलाक आवाज छी। हिना किछु पांति द्रष्टव्य अछिः- जागु बाबु आबु आगु जीया पर करु विचार यौ केना जीयब की प्रदुषण में श्रृजनहार बेमार यौ। भू जल वायु ध्वनि प्रदुषण दुःख दुनियाँमे अपार यौ केना बांचब ऐ काल गाल सँ..... .दोसर एकटा पुरनका गीतक-ः लोभी लालची राज करै छै फुहर गाल बजाबै छै लुटि-लुटि बोली जनताकेँ अप्पन घर सजाबै छै। पग-पग पसरल हेरा-फेरी काम छै काला मुंह छै गोरी काला धन पर उतरा पालिसी..... ..दारू रामायण सँ-= पहिले वंदना गुरु चरण मे, दुजे चरण शंकर भगवान। दूनूठाम चरण कहीं केर नीचां, स्वीकारु शत् शत् प्रणाम।। झारूदारजीक रचनाशिलताक तेज आरो परिष्कार होयत से हमरा पूर्ण आश जगैत य।एहि पोथीक पछिला कमर पर साहित्यकार गजेन्द्र ठाकुर जीक हिनका मादें अभिमत छपल छैक।

३ समकालीन मैथिली साहित्य कवि: कपिलेश्वर राउत

लगधक एक दशक सँ कविता क्षेत्रमे सुनल चर्चित नाम अछि-श्री कपिलेश्वर राउत।हिना जन्म30 अप्रैल 1952केँस्व0रामस्वरूप रावत आ स्व0ज्ञानी देवीक घर ग्राम बेरमा प्रखंड लखनौर भाया तमुरिया जिला मधुबनीमे भेलनि।अन्तर स्नातक कला उत्तीर्ण श्री राउत जीकेँ दादाजी स्व0चौधरी राउत आ दादी झिंगुरी देवीसँ बहुत दुलार भेटलैन। पत्नी स्व0 लालदाई देवी आ पुत्र लालकुमार, रामानन्द प्रसाद आ श्याम प्रसाद सँ सतत् सिनेह रहलैन अछि।मूलत:कविजी कथाकार छैथ।हिनक मैथिलीमे "उलहन"आ पुनर्नवा'कथा-संग्रह' प्रकाशित भेल छैन।सद्मप्रकाशित"पंचदीप"कविता संग्रह २०१८ई०मे पल्लवी प्रकाशन,निर्मली सँ७८पृष्टक पोथी छपि चुकल छन्हि ,जाहिक किमत १५०टाका छैक।एहि मैथिली काव्य संग्रह मेँ २८ टा नव कविताके स्थान देल गेलैक। जाहिमे २३क्रम पर पंचदीप शिर्षक कविता छपल छैक। एहि पोथीक उपयोगिता पाठक बूझय आ प्रकाशन सँ मँगाकय पढय, ताहि लेल पोथिक रूपसज्जा पांच दियारि टेमी जरैत छवि आकर्षित करैत छैक।क्लिक बारे में समालोचक डा०शिवकुमार प्रसाद जी कहैत छथि-"मिथिलांचल के घर आंगन ,दुरा-दरवाजा, चुल्हि-चिनवाइर, बान्ह-आरि, कलम-गाछी, पोखरि-इनार आदि पर हँसैत-बसैत जिनगीक अन्हार-ईजोत, ज्ञात-अज्ञात, दाँव-पेंच के बीच कटैत जीनगीक छोट-छोट अंश सँ निश्चित रुपे हमरा अपना संगे-संग ल जेबामे सक्षम छैक। कविजी आशु कविताक धारा में रचना करैत अपना डगर केँ सुगम करबामे सक्षम छथि। कविजी केँ प्राथमिक स्तर के विधार्थी लेल सेहो बहुत किछ लीख शेष छैनि, ताही प्रसंग शिव कुमार झा जीक अभिमत छैन्हि नेना भुटका में देसिल वयनाक प्रति सिनेह जगायव आवश्यक अछि' ऐ लेल साहित्य के समकालीन कवि के सजग रहय पडंतैक। कपिलेश्वर राउत जी प्रथमदीप लेसिके आ बेराबेरी पाँचो दीप जरबैत एक-एकटा समर्पित करैत गबैत छथि-: प्रथमदीप पंच भौतिक... जीवक निर्मान कइ जलचर, थलचर नभचरक जे निर्माण केलनि एक दीप तिनका लेल। एहि तरहेँ दोसर दीप बीर बाँकुरा केँ जे अपन सिमापर उसरैग सर्दी,गर्मी,बरसात,झाँट-बिहाड़िक सामना कइ देशक रक्षा करै छथि। तेसर दीप ओइ महापुरुष केँ जे शीत-रौद,पानि-बिहाड़िके सहैत अन्नदाता किसान ले कियाकेँ तँ ओ अपन जिनगी धरि उसरगने छैक। चारीम दीप ओइ बलिदानी शहीद केँ जे अपन जान,आन-वान शानक चलैत देशक स्वाधिनता लेल हँसैत-हँसैत फाँसी पर चाढ़ि गेलाह आ पाँचम दीप ओइ ब्रह्मस्वरूप रचियिताके सृजनकर्ता, वैज्ञानिक केँ जे ब्रह्मा बनि दुँनियाक रचि-रचि हेरायल रास्ताके देखौलनि।हिनक पहिल कविताक (अपन भाषा) पाँति देखू:- माइक ओद्रमे जे भाषा सिखलक प्रदेश जा सभ बिसरलक। गाम आबि काहे-कुहे बजैए लोक कहैत आब बडु बुझैए। अप्पन भाषा मैथिलीकेँ बिसरुजुनि।

४ नंद विलास जीक कथा यात्रा शुरू

मिथिलांचलक कथा साहित्यमें एकटा ध्रुवतारा सन छठकैत नवकथाकारक नाम थीक नंद विलास राय, जे अपन मौलिक प्रथम लघु कथाक 'सखारी-पेटारी' संग्रह वर्ष 2013 ईस्वी में पाठकक बीच श्रुति प्रकाशन दिल्ली सँ आनलानि। हुनक दोसरों बिधामे डेग उठल अछि ; परंच कथाकारक रूपे सगर रातिदीप जरय मंच पर कतेको अपन कथाक पाठ केयने छथि। हिनक मैथिली पोथी - छठिकडाला 36 कविताक काव्य संग्रह पल्लवी प्रकाशनसँ 2018 मेँ छपल। तकरबाद ओहिसाल ओतयसँ भरदुतिया 9 टा कथाक संग्रह आ सद्य प्रकाशित मरजादक भोज' 13 कथाक संग्रह बहरेलैक हन।हिनक एकांकी संचयन 'बहिनपा' सेहो प्रकाशित भेल छैक। बहुचर्चित पोथी मरजादक भोज केर विषय में विमर्श कए रहल छी। श्री नन्द विलास जीक मादे वरेण्य साहित्यकार श्री गजेंद्र ठाकुर जी सेहो अपन मत प्रकट करैत कहने छथि-रायजीक कथ्य हुनक अड़ोस-पड़ोस छन्हि। बहुत रास संभावनाके नुकेने रहैत परसल गेल यर्थात कम रूचिगर नय। बेरमा+निर्मलीक पल्लवी प्रकाशन सँ वर्ष 2018 में बहरायल कथाक ई मैथिली पोथी पाठकके अपना कथा माध्यमसँ लगीचमे खिचैत य। सब कथा प्रेरणादायक छै। आधुनिक जीवनक विसंगति, कटुता आ गरीबीक नव फैशनके आँखियेने छैक। अमर-मदनक मैत्री कसौटी पर कसले छै तेँ कृष्ण सुदामाक मित्रता मोन पड़ि जाईछ। दहेज विरोधी कथा दिव्या समाजक मंशा उजागरर केने छैक। सबसं भीआईपी गेस्टक रूपमे पत्निक समक्ष जेठभायक प्रति उपजव अपनत्व सँ कथा श्रेष्ठता देखाइतछैक। अपन-जाती जातीव्यवस्थाक कोढ़ पर चोट करैत छैक। इनारक पनिमे कथाकार आदर्शवादी तथ्य परसने छथि। हमर पत्निक मनोरथ हमर लॉटरी निकलल आ टेट्राहीरो गंभीर हास्य व्यंग पर आधारित कॉलेज खेलनिहारक वंशजक पोल खोलैत छैक, जे पाठकके ओतप्रोत करत। चलितर काकाक ब्लड प्रेशर नपनामे कथाकार पूर्णरूपेण समर्थ भेलाह अछि।एहि तरहे कटही सायकिलमे सुखांत दर्शन होयत। पाठकके शिक्षाक अंतिम उद्देश्य हम पापी छी कथा पढैत आ मनन करैत काल पात्रक अहमन्यता प्रकट होयत रहत। ग्रामीण जीवनक बड़पनक कथा अछि-मरजादक भोज, जाहिमे भाषा प्रवाहमयी आ स्वाद जीवंत छैक जे कन्यादानक अवसर पर ग्रामीण संग बरातिक सामूहिक भोजनक व्युतपन ढ़ंगे दूनूठाम सारे - बहनोई आयोजित करैत मरजादित हेवाक चेष्टामे अहंग देखेलनि अछि। रामबाबूक तेसर बेटी भारतीक वियाहमे मरबा पर भोजनक विन्यासक चर्च तँ अछिये जे पोथीक आवरण पृष्ठ पर सचित्र छपल दृश्य तेँ भोजकें पाछु छोड़यमे अगूएलैक; हमरोमोन पनिछाय लागल । पृथक स्वाद सब अन्नपानिक संग-संग कथाक रसगर सुआद पेएबाक लेल अवश्य पढ़ल जय ई मैथिलीक पोथी। अपना दिशसँ इहो कहब होयत जे किमत 250 डूबत नहिँ। 125 पृष्टक एहि पोथिकै पढ़बाक जिबटपन केर चलते कौखन लगीचाय जायत से थाह नहि चलत। जाहि पृष्ठभूमि सँ कथाकार लेखकीय काजमे उतरलाह से अपन बातमे बिस्तर सँ कहि देने छथि , तेँ बेसी किछु कहबाक खगता नहिं बुझाइछ। ओना ई संस्कृति सँ जुटल भारत-नेपाल में धूम मचेने छथि । आगूओ हिनक मेहनत रंग आनत आ पाठक बन्धूवान्धव लेल कोनो नव पोथी लोकार्पित होयत।

५ पोथी चर्चा मादें टिपण्णी: बेचन ठाकुर

‌सुप्रसिद्ध नाटककार बेचन ठाकुर- चनौरागंज(मधुबनी)विगत ३५शालसँ अभिनय क्षेत्रमे चर्चित छथि।मिथिला के बाहरो परीचय धरिकेर किनको मुँहताज नहि।हिनक लिखल श्रुति प्रकाशन-दिल्लीक सद्यप्रकाशित मैथिली पोथी'बाप भेल पित्ती आ अधिकार'२०१२मेँ११९पृष्टक निकलल,जकर दाम दू सय टाका छै।ऐ मैथिली साहित्य पोथी मेँ दु बिधा अछि जे क्रमश:नाट्य आ एकांकी रुपे अछि।श्री बेचन ठाकुर जीक दर्जनों नाटक ग्रामीण समाज देखने छथि, पढ़ने छथि आ मोन रखने होयत। हम बेचन जीक बेचैनी केँ परेख सकैत छी,हुनक लेखन- रचना क्षमता अदभुत छैन। नाट्यशास्त्र मिथिला मेँ प्राचीन समय सँ आबि रहल विषय थीक। हमरादेशक भागमे जतेक पर समीक्षक गण लिखलनि, वास्तव में से ततेक नहि रहैक।परंच बाप भेल पित्तीमे बहुत किछ दर्शककेँ अपना दिस खिचैत छैक।बापके बाबूक जगह पापा कहब प्रयुक्त निठाहे भेल छैक जे समकालीन समाज में बोलचालक वाणी प्राय:भ'गेल हन ।तेँ कथावस्तु प्रभावित होइत हो से नहिँ।एहि सामाजिक नाटकमे सब अंकक सब दृश्य जिवंतता अपनामे भरने छैक तेँ ग्रामीण क्षेत्रक नव कलाकार एहि नाटककेँ पढि अपना कलामंच पर एहिक सफल मंचन करथि,जाहिसँ समाज सुधारक नव दृष्टिक बोध हेतैक। ‌सामाजिक एवं क्रांतिकारी मैथिली लघु नाटक"अधिकार"मेश्रीठाकुरजी आवास योजना मेँ नग्नलूट जे मचल छैक ताहि पर साधल प्रहार करैत कथ्यके नीक जेकां राखबामे पूर्ण समर्थ भेलाह अछि।गामक मुखिया आ तकर मुहलगुआ केर व्यवहारसंँ गरीब मंजूर सपरिवार कतेक दुःखी रहैछ आ हुनका बिनोद नेता जीक सलाह सँ निचांसँ उपर धरि सूचना अधिकार कानूनक प्रयोग कयला संता कतेक साहस बढैत छैक आ पत्रकार,टीवी०चैनलक मैनेजर श्री अखिलेश सँ हकक लराई लेल धन्यवाद पुरस्कार आ दिल्ली मंचसँ सम्बोधन होइत काल सबैप्राणिक रूइयां-रुइयां पुलकित भ'रहल छलै से बिजय गर्व छी। सूचना सह आयुक्त अनजार आ जगदीशपुरक श्यामानंद जीक स्नेह सँ अधिकारसँ वंचित रिक्शाचालक मंजूर २०००० केर जगह५०००टाका बेसि इंदिराअवास संदर्भ म चंदन आ अमरनाथसँ कैंचा पाबि जाइछ।एगारहम दृश्यमे संवादक धारावाहिकता एहन सन जे पटना क आयुक्त ब्रह्मदेब जीक ओतय जौं धन्यवाद नहि देल जैतैक तँ मंजुरके बड़को औपिस बकबास आ बेमतलव बुझाइतै,संगहि पैघो हाकिम पर सँ बिशवास हटि जैतै। सूचना अधिकार 'क जे कार्यकर्ता हेताह,हुनका अपना जीवनकालक अनुभव सँ एहि दृश्यमे भावबिह्वल होयब प्रासांगिक बुझाइछ।तेरहम दृश्यमे एकटा भाव मनोविनोदक अबैछ ,जहन खुशबुक माय नजीमा अपना पत्ति मंजूरसँ कहैत छथीन- तोहूं जा झारा-झपटासँ भ'आबह।तोरा खुच-खुच झरे लगैत रहै छह।एहि पोथीमादे विख्यात साहित्यकार गजेन्द्र ठाकुर जीक अभिमत पछिला कोभर पर अछि। ६ मणिपद्म जीक शताब्दीक बाद

लोकगाथाके लोकभाषा मैथिलीमे स्थापित करबाक काज लेल डॉक्टर ब्रजकिशोर वर्मा ' मणिपद्म' कें सदैव स्मरण कएल जाइत रहत। उपन्यास कथा, कविता, निबन्ध साहित्य आदि विधाक माध्यमसँ आधुनिक मैथिली साहित्यमे ओ जे डांरि पारलैन । से कइयो मिलकपाथर माफिक अडिग भेल अछि। सरस आ आम लोकके मैथिली साहित्यक सरोकारसँ बान्हलैन । यएह एकटा कारण रहलै जे केतेको शोध भेलाक बादो हुनकर सम्पूर्ण साहित्यक निचोर नहि निकैल पाउल अछि आ शोध प्रबन्धमे लागल शोधार्थी लेल चुनौती अक्षुण्ण छै। वर्तमान दरिभंगा जिलाक घनश्यामपुर प्रखण्डक बाउल ग्रामवासी डॉ. मणिपद्म जीके जीवन साहित्यकेँ समर्पित रहलैक । संगहि ओ सन् 1942 स्वाधिनता आन्दोलनके सेनानी सहित होम्योपैथिक चिकित्सक सेहो रहथि, तँए हुनका बहुमुखी प्रतिभा'क धनिक कहवामे कोनो अतिशयोक्ति नहि। 1973 इस्वीमे हुनका नयका बनिजारा' नोवेलपर साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटलैन । ओ बौद्ध लामा सभ संगे चीन, जपान आ तिब्बत केर पठारमे मानव जीवनक अनसुलझल रहस्यक तलाश केलैन । मूलतः हिन्दी लेखक डॉ. मणिपद्म आ सूर्य नारायण चौधरी मैथिली भाषामे यात्रा वृत्तान्त' क रचना कए मैथिली साहित्य केर अक्षय भण्डार भरलैन । तइले हमरा नाज अछि। मैथिली साहित्य केँ समृद्ध करबामे हुनक अतुलनीय योगदान मानल जाइ छैन। हुनक रचना -: अनल पथ , विद्यापति , कोब्रागर्ल , कनकी , अर्ध्दनारीश्वर , लोरिक विजय, राजा सलहेस , लवहरि कुशहरि, राय रणपाल, फुटपाथ आ भारतीक बिलाड़ि (उपन्यास), कण्ठहार आ झुमकी (नाटक) , अनेक कथा ,संस्मरणात्मक आलेख आदि अछि। उपन्यास सँ पूर्व ऐ शिर्षक सँ ' नैका बनिजारा ' नामक कथा लिखने छलाह। जाहिक गल्प गुच्छ " मैथिली प्रतिनिधि पोथी " हम प्रवेशिका कक्षामे आदरणीय प्रभारी प्रधानाध्यापक स्व० सीताराम कामतजी - सरौती सँ पढ़ने रही। ओहि कथाक बीच-बीचमे नौ गोट पाँति सेहो खूब सोहनगर लागैत छल। ओहि समय के ई पाँति बाला १३ टा साहित्यकार'क सझिया पोथीमे दूनू बापुत स्व० हरिमोहन झा आ भाय साहेब अर्थात् राजमोहन झा'क कथा बढ मनलगू सेहो रहैक। नैका (नवका) बनिजारा सँ पाँति द्रष्टव्य -: "रम्मा रौ,सुन्न भवनमे जेना एकटा दीप जरइ छैक ना। रम्मा रौ , कमल नयन सँ जेना झर- झर ओस झरइ छैक ना।" ' रम्मा रौ! देह काँपइ पिपरक पात जकाँ ना रम्मा रौ! मोन काँपइ पुरबा बसात जकाँ ना लाल पलंग नैका बैसल रहए ना धनि काँपइ माघ मासक प्रात जकाँ ना।'

रम्मा रौ... नह सँ धरतीकेँ खोध' लगलैक ना रम्मा रौ....... आँचर पकड़ि नैका बोधै लगलैक ना रातिमे फुलल कमल फूल मने ना चान सुरूज समतुल मने ना । रम्मा रौ ...... नैकाक मनमे पततीत भेलइ ना छने छन अधिक पिरीत भेलइ ना कि नैका आकाश ताकि झमान भेलइ ना कि राति अहीमे बीत गेलइ ना ।

रम्मा रौ...... चान सन मुँह देखि तिलेसरी पजरइ ना जहिना पुआरक धधरा होइ ना ।

धौलगिरि सन श्रृंग छइल ओकर उठल ना पाथर - कुनन सन पीठ गठल ना आध मोनक सोन घंटा गरदनि लटकल ना आध कोश आगूए चलय लोक होटल ना .......

७ परिचय - प्रकाश : एक परिशीलन

प्रकाशक - श्लोक प्रकाशन, दरभंगा वर्ष -२०२१ पृष्ठ संख्या २९५ मुल्य ३५० टाका एवं ISBN -९७८ ९३८०५५४ ९८३ मैथिली भाषा मेँ पोथी हमरा पंचायत 'क रहवासी रचनाकारके पढबाक सौभाग्य प्राप्त भेल हन। प्रस्तुत मैथिली पोथी 'परिचय प्रकाश' मेँ आकलन कर्ता लेखकीय काज अपन स्वयं केर रचना कयल गेल "परिचय" काव्य विधा'क निहितार्थ पाठक बीच रखबाक अनोखा रहस्योद्घाटन कयलाह अछि। सद्यप्रकाशित एहि गद्यांश लेखनमे ५१ शिर्षकके विविध विषयक दिग्दर्शन होईछ। एहि पोथीक गुणवत्ता आ उपयोगिता बावत वरेण्य साहित्यकार डॉ ० इन्द्र कान्त झा'क प्राकथन पृष्ठ संख्या ९ आ १० मेँ सुस्पष्ट वक्तव्य भेल छन्हि। पोथीक पाठक लेल ई कथन मूल पाठ ५१ गोटके आखरिमे लागल रहैत तँ यथेष्ट बुझाइत। मुदा से आने पोथीक तरहेँ एहू 'यूनीक' पोथीमे विशेषता नै भ' सकल। आब अबैत छी टीकाकार लेखक के आत्मानुभूति कयल गेल लेखन कार्यक समीक्ष्य दृष्टिकोण दिश। परिचय ' पोथीक ' काव्यालोकन आ तकर निचोड़ पर समीक्षा पोथी वा पाठकीय प्रतिक्रिया समय सँ पटल पर आबयमे देरी होईत रहने ई जीवटपन अपनहि कलम सँ लिखबाक धृष्टता करैत लेखन जगतमे एसकर ठाढ देखाएल य। जीवराज अपन काव्य क्षमताक बनसव्त गद्य लेखनमे प्रविणताक परिचय सेहो देलनि अछि। तेँ एहि मादे ' युगक यथार्थ एलवम' कहैत प्रो० इन्द्र कान्त बाबू एहिक सार्थकताकेँ उचित समालोचना कहलनि। पोथीक भीतर एकावनटा कविताक भावार्थ विस्तृत रूपेँ कविता'क पाँति सहित व्याख्यान उपस्थापित करब एक नव प्रतिमान गढ़ब कहल जाएत। एहिक किछ पाठकेर सौन्दर्य बोध पाठक ले पृष्ठभूमि केँ उकेरब कोनू विन्यास नहिँ अपितु एक स्वानुभुति छी। कियाक तँ एहि सँ हम अपनाकेँ सम्पृक्त नहिं रहि सकलहुँ। लेखकक दाबी छैन जे मनुष्य मात्रमे आत्म जागरूकता'क क्षमता छैक,आ तेँ मन ओ बुद्धिक दायरा सं परे होय; परम साँच केँ बुझा समैझ सकय। अध्यात्मिक उपचार नै, खाली रोगक निदान ले एकटा व्यापक अविधान आ जीवन मार्गक दिव्य दृष्टियो रखै य। अपन नव पोथी माध्यम सँ सबमे खामी ; ताहिके खासियत मेँ बदैल उपभोगक आवश्यकता दिस प्रकाश करैत ' परिचय प्रकाशमे परिस्थितिवश डुमकि लगाकय असंतुलन सँ सिंघल जा सकैछ। तेँ सम्पूर्ण जनतब लेल परिचय काव्य केँ परिचय प्रकाश केर आवश्यकता भेल। लेखक स्वयं अपन कविता संग्रह पोथीक आवरण तस्वीर सपरिवारक उपलब्ध कराबैत पाठकके 'हम दू हमर दू' केर संदेश दैत मूल पोथी पल्लवी प्रकाशन आ द्वितीय संस्करण नवारम्भ प्रकाशन के संग- संग समीक्ष्य पोथी परिचय प्रकाश के पछिला कभर पर अपन तस्वीर मे आजादी के दिवानाक प्रतीक सरदार भगतसिंह सन टोपी पहिर मिथिला पागके जगह मुरेठाके सेहो चुनौती दैत आंचलिकता उपर राष्ट्रव्यापी दृष्टिगोचर होयत। हिनक पोथीक प्रशंसामे मैथिलीक विज्ञान कथाकार श्री अर्धनारीश्वर, पूर्व भाजपा सांसद वीरेंद्र कुमार चौधरी , श्री रघुवीर मोची, दिव्यांशु आ अभिषेक आदि छथि। पाठकके आ स्रोताके नवोदित कवि जीक कविता यूट्यूब पर सुनि मनोरंजन होय छैन। हुनक आखरी कविता हमरा उत्प्रेरित करलक -: ............. नर मच्छर बड़ा खच्चर राखय जारी जेहाद आ दंगा मादा मच्छर बड़ी पिच्छर अंडहि पाड़ैत चंगा सभक शांति कएलनि भंग मच्छर ई दू- टंगा दुनियांक कोन-कोनमे पसरल आई नहिं छलाह पहिने ई बहुसंख्यक भाई हवाक विरुद्ध जे अपन रफ्तार साबित कऽ देखौलक ..!! भजनहु संध्यामे अपमहु मंजिल पर अपनहि रागमे नमाज सुनौलक हमरा मच्छरदानी धरि पहुँचौलक सीमहुमे नहिं सुरक्षित आब बुझाई छी । मनुक्खमे जनम लेलहुँ हम तेँ पछताई छी।...,..,................... (कोसी संदेश अंक-१२ सँ साभार) दीनानाथ प्रसाद ' जीवराज ' जीक लेखनशैली अद्भुत होई छैन, जाहिमे अधिकतर शव्द चयन पाठकके सुनकर नै अरघैत रहैत छैक। वानिकी द्रष्टव्य -: 'परिचय' पोथी मैथिली भाषा मेँ हमर पहिल आ अंतिम काव्य संग्रह छी। जकर किछ कारण तऽ हम कहियो नहि कहि सकब वा नहीं कहय चाहब। मुदा जे कियो साहित्यकार वा समीक्षक लोकनि कवि जीकेँ नाम पर मैथिलीमे एकहिटा काव्य संग्रहक बात उठबैत छथि,हुनका सँ हम कहय चाहैत छियन्हि जे- हुनक व किनकहु सैकड़हु सिहित्यिक पोथी अमावश्याक अन्हारमे आकासक टिमटिमाईत तारासन पियरगर जरूर लगैत जैन मुदा पुनमक चानक इजोरियामे भागैत अन्हरियाक संग वएह अनगिनत सभ ताराक आभा सेहो मद्धिम व मलीन भऽ जाइत अछि। तँ कि चानक संख्या एकहिटा रहलाक कारण समस्त तारागण ओकर प्रभावकें कम कहां कऽ पबैत अछि। तखन नभ नक्षत्रमे मात्रहि पूनमक चानहिटा सोहनगर लगैत अछि। 'परीचय: काव्य संग्रह सँ सेहो एहने दिव्य ईजोत बहराइत अछि। जीवराज जी दक्षणि मैथिली आ पचपनिया मैथिली सँ इतर अभिजात मैथिली मानक सँ कनेमने मिलैत- जुलैत शव्दक चयन करबामे निष्णात देखेला हन्। आश करैत छी हिनक मैथिली गीत पोथी सेहो यथाशीघ्र बहराएत।

८ आकर्षण : ढ़ाई आखर प्रेम का

'दो हंसो की जोड़ी बिछुरी गयो रे,गजब भयो रामा - जुलुम भयो रे' उपर्युक्त गीत - संगीत सुनि ककर मोन ने विभोर होएत होयत। कतेको बेर रेडियो - टीवी० पर आ ध्वनि विस्तारक यंत्र संचार सँ तथा भजन संध्यामे ई पाँति सुनि आनन्दित भेल छी। से हाँस दम्पतिक प्रेम कोनू कारणेँ खंडित होयबाक चित्र " ढ़ाई आखर प्रेम का " पोथीक आवरण कलेवर देखि मोनमे प्रेमक संदर्भमे अनेको चित्र सिनेमाक रील जेकाँ आयल अछि। ओना संकिर्तनमे राग पूर्वक गायन बालपनमे अपन छोट मामाजी सँ हरिणी - हरिणाक व्यथा सुनि जे संयुग्म जोड़ी पर व्याधाक समधानल वाण नर केँ लगतहि मादाक विलाप अटुट प्रेम संदेश पसारैत रहलैक। से बिलखि -बिलखि प्रसंगक जे प्रेमगाथा गाम - गाममे स्रोता सुनैत य, तँ प्रेमक रहस्यमय परिस्थिति सँ अनुभव बढ़बैत छै। आ दग्ध हृदयमे क्रौंच पंछिक शिकार करैत शातिर बाल्मिकी के तीर धनुष सँ घायल भेल पंछीक क्रन्दन सँ आत्मग्लानि हुनका होएतहि पहिल काव्य क' पाँति संस्कृतमे स्वत: प्रस्फुटित भेलनि,जे हुनक हृदय परिवर्तन भेलासन्ता ओ अध्यात्म मार्गक ब्रह्मज्ञानी कहेलाह। से ऐ हिन्दी साहित्य सृजन केँ काव्यपोथी'क आकर्षकता केँ भीतर ऋणात्मक संकेत परोक्षरुपेँ दृष्टिगोचर पाठकके होयत। दुनू पंछीक मुँहमिलानी बाला चित्र साझा कयल रहैत तँ धनात्मक ऊर्जा 'क स्थान बुझाइत। तेँ पोथीक आवरण साहित्यिक संकेत देवामे पछुआ गेल हन्। से अढ़ाई आखर (वर्ण सँ ) सँ बनल शव्द ' प्रेम' केँ बुझय ले रहिमन कवि केर पाँति सहजे मोन पैड़ जाएत -: रहिमन धागा प्रेम का......! आ संतप्रवर कबीर साहेब केर साखी,शवद ओ रमैनी मेँ विस्तार सँ मानव ,जीवन - जन्तु आ प्रकृतिक मादे प्रेमक निहितार्थ भावपुर्ण वर्णन लोक सुनैत बुझैत आयल अछि। हुनके पाँति सँ लेल गेल सद्यप्रकाशित एहि पोथीक' नाम 'ढ़ाई आखर प्रेम का' लेल गेल निठाहे छैक। नरहिया मे हालहिमे लोकार्पित ऐ पोथीक रचियिता नव युवती कवियत्री कु० पल्लवी मंडलके पहली सोपान देख पढि मोन जुड़ा गेल य। प्रथमत: गीत कविता के स्री हस्ताक्षर सरोजनी नायडू आ हिन्दी जगत केर सुविख्यात कवियत्री महादेवी वर्मा आ महास्वेता देवीक रचना सोझामे लौकैत य। कविता केँ साहित्यके सबसँ पैघ विधा कहल गेल छैक। से आजुक साहित्यिक परिदृश्य मेँ चन्द रस सँ सराबोर दोहा सोरठा जंका तुकबंदी कविताएमे कम अभरैत अछि। तहिना पल्लवी जीक सेहो ओई सँ सम्पृक्त नहिं बुझाइछ। ओ अपन अभिव्यक्ति केँ सोझे कविता भावमे गढ़ैत उनसैठ गोट रचना केलीह हन। 'भाषा' शिर्षक कविता कतेको मंच सँ आ विद्वतजनके बीच अपन हिन्दी कविता क' पाठ प्रस्तुति देलीह आ सराहल गेलीह अछि। वर्तमान समाजमे विशेष कय वंचित लोकमे जे चन्द तरहेक समस्या अछि,ताहिक समाधान दिश अपन कलमकेँ गतिमान करबामे समर्थ भेलीह अछि। जहिना प्रकृतिमे सात रंग (पनिसोखा) होईछ, तहिना प्रेमके सात तत्व होईछ। एक परिवार दोसर परिवार सँ अपन पड़ोसमे सद्भावना पूर्वक प्रेम राखय ,जेना बेटी माय सँ पिता - पुत्र सँ प्रेम रखैत अछि। हिन्दू मुस्लिम सँ सिनेह लिखैत छथि-तहिना बूढ़ पुरान सँ पौत्र नाती प्रेम रखैत छै , आ ई एक गामक लोक दोसर गामक लोक सँ खइल्लत- मिल्लत निमाहैत; सांस्कृतिक सौहार्द मेँ रहैछ। एक पंचायत दोसर पंचायत (जिला परिषद क्षेत्र),एक प्रखंड दोसर प्रखंड सँ (विधानसभा क्षेत्र) आ एक जिला दोसर जिलाक ( लोकसभा क्षेत्र) लोक सँ प्रेम राखि राज्य,देश,महादेव। आ विश्वमे मानवीय सरोकार बने रहैछ से प्रेमक निहितार्थ दर्शन थीक। इयह मानवीय सद् व्यवहार प्रेम रूपी कन्ट्रोल यूनिट छी। इयह ताना बाना जौं कदाचित टुटैत, भंग होय तँ अव्यवस्थित वातावरण जर्जर हालत में जाईछ। ऐहिके समन्वय आ हस्तक्षेप लेल बल , कन्ट्रोल आदि प्रवन्धन केर आवश्यकता पड़ैछ। मानवीय संवेदना आ प्रेम सँ उंच नीच, अश्यपृश्यता, घृणा,आदि भेदभाव समाज सं समाप्त कयल जा सकैछ। प्रेम तोड़क ने जोड़क विधान अछैत सामाजिक जीवन वितबैत जे अनुभव कयल , तकर वानिकी देखबाक एक झलक कोर्ट कचहरीमे मनुखक भीड़ सँ स्वत: आश्वस्त भऽ सकैत छी। भारतीय समाजमे व्यापक रूप सँ व्याप्त पीड़ा, विसंगति आ विद्रूपता 'क हलाहल केँ अन्तर्मन सँ अखियासैत काव्य सृष्टिमे कर्म कयलीह पल्लवी मंडल तेँ हिनका हम कविर्मणीषी परिभू स्वयंभू कहैत छीयैन। पहिले पहिल साहित्य रचना जगतमे श्रेष्ठ रसमय कविता पटल पर आनवाक ले कोटिश: बधायके संग मंगल कामना करैत छियैन। प्रेम बनल रहय तँ सब समुदाय मेँ सहिष्णुता कायम रहतैक आ झगरा फसाद केर जगह शांति बहाल रहतैक। जाहि सँ अदालत आ ग्राम कचहरीमे सेहो अमन चैन हेतैक। लोक तंगहाली सँ अनेरे बांचत। तेँ आवश्यक छै एहन स्तरीय कविता संग्रह पढ़ि अपनेआपकेँ प्रथमत: आदर्श नागरिक बनिके समाजमे एक उदाहरण बनी। पुस्तक सुधि पाठक पढि हृदयतल सँ ऐ कविताक भाव भंगिमा पर आत्मसात भऽ अपन सम्पूर्ण दृष्टि राखि 119 पृष्टक पल्लवी प्रकाशन 'क अभिनव कीर्ति केँ 200 टाका दाममे कीनकेँ सहेज सकैत छी। अपनी बात स्तम्भ लिखैत कुमारी पल्लवी हमरोसन अदना साहित्य सेवीकेँ सादर नमन केलीह ,से हुनक बड़प्पन थीक। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (खेप-२९) निर्मला कर्ण (१९६०- ), शिक्षा - एम. ए., नैहर- खराजपुर, दरभङ्गा, सासुर- गोढ़ियारी (बलहा), वर्त्तमान निवास- राँची, झारखण्ड। झारखंड सरकार महिला एवं बाल विकास सामाजिक सुरक्षा विभागमे बाल विकास परियोजना पदाधिकारी पदसँ सेवानिवृत्ति उपरान्त स्वतंत्र लेखन। अग्नि शिखा (भाग- २९) (मूल हिन्दी- स्वर्गीय जितेन्द्र कुमार कर्ण, मैथिली अनुवाद- निर्मला कर्ण) पूर्व कथा उर्वशी के आग्रह पर राजा पुरूरवा हुनकर जन्म के कथा कहय लगैत छथि । आब आगू

बर्फ सs भरल हिमालय केर ऊंचऽ शिखर स्वर्ग के दिशा में अहर्निश निर्निमेष देखइत निश्चल ठाढ़ छल।ओतहि बद्रिकाश्रम तीर्थ में,उज्ज्वल शुद्ध जल धारण करय वाली पवित्र गंगा के तट पर, नर अरू नारायण चिन्मयानंदमयी परब्रह्म के चिंतन करैत-करैत निरंतर तपस्या में लीन छलथि ।इन्द्र के सिंहासन सेहो हुनक तीव्र तपस्याक कारणेँ हिलs लगलनि । एहि सँs भयभीत इन्द्र हुनक तपस्या तोड़बा लेल कामदेव केँ हुनका लग पठौलनि।कामदेव अपन सखा ऋतुराज बसन्तक संग आश्रम प्रांत पहुँचलाह। नर आ नारायण वसन्तक एहि असामयिक आगमन केँ रहस्य बूझि गेलथि। ओ देखलथि हुनकर समक्ष अग्निशिखा सन कान्तिमय चमकैत पलाश!जे किछुए काल पूर्व पत्रहीन भेल छल,ओ सभ क्षण में लाल पुष्प सँs पुष्पित भय स्वयं तs सुन्दरतम आभामय होइतहि छल,संगहि धरतीक सौन्दर्य केँ दिव्य रूप दs रहल छल,ओहि वृक्ष सँs झ्रड़ल लाल-लाल पुष्प धरती पर मखमली कालीन सन अपन रूप बना! रंग-बिरंगक पुष्प एम्हर-ओम्हर पुष्पित भेल बिहुंसि रहल छल ! स्वर्ण आभूषण सँs सजल राजकुमार सन कचनार-अमलतासक जंगल फुलि रहल छल। एहि वनक पाछू कदम्ब वृक्ष राजकुमार सभक सेवक सम सुशोभित छल।अशोकक लाल फूल फूलि गेल छल।नदीक तटपर मंजरी सौं परिपूर्ण वेतस केर वृक्ष शोभायमान छल। घनघोर वन पीयर फूलसँ आच्छादित छल।अनेकों मृग एवं मृग शावक झुण्ड में एम्हर-ओम्हर, तीव्र गति सँs दौड़-भाग करैत, घुमैत देखाइत छल। अचक्के बद्रिकाश्रम में दिव्य सौन्दर्य सौं परिपूर्ण यौवनमयी बसंत-लक्ष्मी प्रकट भेलीह। बुझाइत छल बसंत-लक्ष्मीक रक्तवर्णी अशोक हाथ, पलाश चरण,नीलाशोक केश-पाश,विकसित कमल मुखमण्डल आ नील-कमल नेत्र होइन। बिल्व फल हुनक स्तन,कुंद पुष्प दन्त,मंजरी हाथ,पुंपहरिया फूल अधर,सिंदुवार नख,कोयलक काकली स्वर,अंकोल वस्त्र,मयूर-पँख आभूषण,सारस नूपुर स्वरूप एवं आश्रमक शिखर करधनी होइन। मत्त हंस हुनक गति व भ्रमर रोमावली रूप में विराजित होइन । नर आ नारायण एम्हर-ओम्हर तकलनि, आश्चर्यचकित भ' क' अपन तीक्ष्ण दृष्टि सँs अपन परिवेशक अवलोकन केलनि,वन्य पुष्पक झाड़ी में नुकायल कामदेव केँ ओ देख लेलथि । हुनका संग मेनका,रम्भा,तिलोत्तमा,प्रमलोचा एवं अन्य बहुत गोट सुन्दर अप्सरा छलखिन जे नर-नारायण के आकर्षित करबाक लेल अश्लील एवं कामोत्तेजक चेष्टा के संकेत करवा में व्यस्त छलीह ।ओहि संकेत सँs नर आ नारायणक चेहरा पर कनिको काम भावना सन निम्न स्तर कोनहु भाव नहि देखाइत छल । कामदेव आ अप्सरा सभ अपन अस्त्र-शस्त्र अप्रभावी देखि आश्चर्यचकित भ' गेल छलथि ।नर-नारायण प्रेमपूर्वक अपन लग मे कामदेव केँ बजौलनि।अप्सरा सभ सेहो विस्मय सँ नारायणक क्रिया कलाप देखय लगलीह। ओ हंसइत एकटा फूल सs भरल मंजरी लेलथि आ अपन अरु पर एक स्वर्णिम आभायुक्त सौंदर्यमयी तरुणी के चित्र लीखि कs ओकर सजीव रचना कs देलनि । ओहि सुंदरीक रति के समान सुंदर नेत्र ,कमान सन भौंह,कारी मेघ सन केश राशि,आभादीप्त मुखमंडल,सुंदर नासिका,पानक पत्ता सन पातर रक्ताभ अधरोष्ठ,मनोहर परस्पर सटल स्थूल स्तन-युगल,जिवलीमुक्त व कोमल रोमावली युक्त उदर,उदर पर नीचाँ सँs ऊपर स्तन-तट पर जाइत रोमावली,करधनी सs मंडित स्थूल जघन-प्रदेश,कदली स्तंभ के सम ऊर्ध्व-मूल उरु,कमल-केसर समान गौर वर्ण कांति मयी सुंदरी तरुणी छली ओ। हुनक दुनू ठेहुन गूढ़ गुल्फ,रोम रहित सुंदर जँघा व अलक्तक  के समान कांतिमय दुनू पैर अत्यंत सुशोभित भs रहल छल ल एहि सुंदरी के देखि स्वयं कामदेव कामातुर भs गेलाह। एहि सुंदरीक अद्वितीय सुंदरता के देखि उपस्थित अप्सरा सभ ईर्ष्या के वशीभूत भs हुनक प्रति ज्वलनशील भाव आनि विदग्ध हृदय भs उठलीह,संगहि ओहन दिव्य सौंदर्य देखि विस्मय विमुग्ध छलीह। नारायण कहलनि -"हमर अरु सँs जन्म लेबाक कारणे ई सौन्दर्यकमयी रमणीक नाम उर्वशी राखल जायत। जाहि सौन्दर्यक शक्ति सँ अहाँ हमरा जीतय लेल आयल छी,ई सब शक्ति एहि सौन्दर्यक सोझाँ आभाहीन भ' जाइत अछि। फेर कहियो कोनो तपस्वी केँ तंग करबाक प्रयास नहि करू कामदेव। आब जाउ!देवेन्द्र के कहबनि जे ओहो कहियो एहि तरहक प्रयास नहि करथि,कारण हम हुनका द्वारा पठाओल गेल सुन्दरी अप्सरा सभ सँs बेसी सुन्दर अप्सरा बना सकैत छी।तखन हम हुनका द्वारा पठाओल गेल अप्सरा पर कोना मोहित भ' सकब!एकर एकटा उदाहरण अछि ई अद्वितीय सौन्दर्यमयी उर्वशी! हम एहि अद्वितीय सौन्दर्यमयी अप्सरा केँ बनाओल,जाउ उर्वशी के हमरा द्वारा पठाओल गेल उपहार के रूप मे इन्द्र केँ द' दियौक ।" भयभीत कामदेव अपन संग आनल अप्सरा आ दिव्य शक्तिक सभटा शस्त्र जाल संग्रह करैत ऋषि द्वै नर आ नारायण के समक्ष झूकि प्रणाम कय उर्वशी समेत ओतह सs प्रस्थान केलथि । हुनका लऽ कऽ इन्द्र केँ सौंप देलथि । तँ प्रियतमे!ई अहाँक उत्पत्तिक कथा छल ,जे पुलस्त्य ऋषि सँs हम सुनने रही।" पूरा कथा कहला के बाद राजा पुरूरवा उर्वशी के संबोधित करैत बजलाह। हँसैत उर्वशी पुरूरवा केँ कहलखिन - ."इन्द्रो नर-नारायण सँs शापित होयबाक डर सँs कहियो हमरा छूबाक प्रयास नहि केलनि। जँ कहियो हुनका एहन इच्छा होयबो करनि त' हम हुनका नर-नारायण के स्मरण करा दैत छलहुँ। हम नर-नारायण के पुत्री थिकहुँ,हमरा सँग कोनो तरहक दुर्व्यवहार भेला पर हुनका नर-नारायण के श्राप अवश्य भेटतनि ई बात बात स्मरण करा दैत छलियनि।नर-नारायण के श्रापक स्मरण होइतहि हुनक सब अभिलाषा,सब कामेच्छा,सब उत्साह जरि क' राख भ' जाइत छल ।मुदा वैह उर्वशी स्वयं अहाँ लग आबि गेल,सच में अहाँ बहुत भाग्यशाली छी राजन्!" "मुदा एकटा बात कहू उर्वशी! अहाँ हमरा में एहेन कथि देखलहुँ जे हमरा अपन हृदय द' क' हमरा लेल स्वर्ग छोड़ि देलियैक ?" - पुरूरवा उर्वशी दिस प्रेमसँ देखैत पुछलथि । "अहाँक अपार पराक्रम आ महिमा सँ भरल पुरुषत्व हमरा अहाँक दिस आकर्षित केलक अछि,अहाँ में पुरुषोचित सौन्दर्य कोनो कम नहि अछि प्रियतम" - उर्वशी हँसैत बजलीह आ आवेश में पुरूरवाक बाँहि मे दाँत काटि लेलथि । "ओह प्रियतमे!ओह!अहाँ ई की केलहुँ " - राजा पुरूरवा सिसकय लगलाह आ उर्वशी खिल खिला उठलीह । क्षण भरिक बाद उर्वशी पुनः बजलीह - "हमरा सँs जुड़ल एकटा आओर कथा अछि जे हम कहब त' अहाँ केँ ईर्ष्या होयत प्रियतम ।" "एतेक दिन एक संग रहला के बाद हम अहाँ के नीक जकाँ चिन्हलौं प्रियतमे!ताहि सँs हम कोनो तरहक ईर्ष्या नहि करब। अहाँ जूनि घबराऊ,आ हमरा बिना कोनो संकोच के अहाँ सँs जुड़ल कोनो कथा सुना सकैत छी। हम अहाँ केँ विश्वास दियाबैत छी हम एकदम। हमरा कनेको ईर्ष्या नहि होयत" - राजा पुरुरवा उर्वशी के आश्वासन देलखिन। "कामदेव,इन्द्र आ मित्रावरुणक हृदय अहाँक उर्वशी के प्रति मोहित भ' गेल अछि,मुदा हम ककरो सोझाँ माथ नहि झुकौने छी। हम ककरो अपना के स्पर्श नहि कर' देलहुँ" - उर्वशी मुस्कुराइत बजलीह। "कामदेव आ इन्द्रक बात हम बुझि गेलहुँ, मुदा मित्रावरुण सन देवताक बात नहि बुझि सकैत छी" राजा पुरुरवा आश्चर्यचकित भ’ पुछलथि । "हँ! हम आब अहाँ केँ वैह कथा सुनबैत छी,सुनू प्रियतम हमर बात ।" उर्वशीक ठोर काँपय लागल छलनि,आ ओहि सँs कोयल सन मधुर स्वर-लहरि निकलय लागल,जकरा राजा पुरुरवा बहुत ध्यानशील भ' क' अपन कर्णमार्ग सँs मोन-मस्तिष्क में प्रवेश कराबय लगलाह । क्रमशः अपन मंतव्य editorial.ऽtaff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.कुन्दन कर्ण- बीहनि कथा- तर्पण कुन्दन कर्ण बीहनि कथा- तर्पण

भरि मुँह गुटखाक पीक भरने सोमन गामक चाह दोकान पर बागी नेतासन तेवर में भाषण दैत रहैक "हमको माँ बाप का जिटना सेवा करना ठा उटना जीटेजी कर डीए, मरने के बाड करने का कौन फैडा !! " मुँहमें गुटखा हेबाक कारण "त" वर्गक उच्चारण "ट" वर्गरूपें कय रहल छल। गीजल-महकल-घिनायल मानसिकताक गौआँसब पान गुटखाक खैंठी लागल दाँत निपोइर ओकर प्रवचन सुनि रहल छल।

पंडितजी के नहि रहि भेलैन, बाजि उठलखिन "पितृपक्ष में तर्पण आवश्यक छै, तैं जे जिबैत में खुअबैत छलही से मुइलो पर्यन्त खुआ अबही, जाक' सारा पर चारि लाठी मारि अबही, हुनका पैट हेतैन!!" अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ‍२.६.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा-ओ सत्ते बताह छल कुमार मनोज कश्यप ओ सत्ते बताह छल साहित्य के लेल अपन सर्वस्व उत्सर्ग कs देने छल ....  दिन-राति उठैत-बैसैत, सुतैत-जागैत कथा कविता-नाटक-उपन्यास-रिपोर्ताज-समालोचना .... यैह सभ! आर किछु नहिं! टोल-मोहल्ला, सsर-समाज ओकरा बताह बुझै। बेतरतीब बढ़ल केश-दाढ़ी, देह पर ने दsढ़ वस्र ने पैर मे साबुत चप्पल! जतs जे किछु आग्रह सs भेटल से खा लेलक नहिं तs कोनो बात नहिं!  ओकर दुनियाँ लेखन, गोष्ठी, चर्चा, परिचर्चा ......  एहि सभ के बीच खुटेसल जकाँ घुरिया कs रहि गेल रहै। वयस्क भेला पर लोक लाजे बियाहो माय-बाप करबाइये देलकै। मुदा कनियाँ बसलै नहिं से स्वभाविके! जे किछु पुस्तैनी जमीन-जाल छलै से अपन लिखल किताबक मुद्रण, प्रकाशन आ ओकर निःशुल्क वितरण मे बोहा गेलै। किताब कीनि कs पढ़नाहर प्राणी आब लुप्तप्राये तैं किताबक विक्रय सs किछु आमद हेबाक आश सभ दिन निराशे रहलै। हारि ओ तैयो नहिं मानलक आ बिनु फलक कामना के साहित्य साधना मे डटल रहल जाबत धरि साँस रूकि नहिं गेलै। साहित्यजगत मे चिन्हल आ ख्यात नाम छल तैं स्वभाविके साहित्यकार-पत्रकार सभ अंतिम दर्शन लेल अबैत रहलै .... ओकर व्यक्तित्व आ कृतित्व के बढ़ि-चढ़ि कs बखान करैत सभ अपन-अपन बाट नापैत रहल। मुदा अंतिम संस्कार के व्योंत पर केकरो मुँह नहिं खुजलै। चंदा सs दाह-संस्कार कोनादन बुझेलै तैं स्थानीय विधायक तक कोनो मद सँ आर्थिक सहायता के आग्रह पहुँचायल गेलै। ओ बी० डी० ओ ० के तत्काल फोन कs कs कबीर अंत्येष्टि योजना सs धन के व्यवस्था तs करा देलखिन मुदा अनुत्तरित प्रश्नक बरखाक संग - के छलै ओ?  सुनबा मे आयल कवित्त-तवित्त करै छल?  सत्ते बताह छलै?  काज ओ किछो करैत रहै कि नहिं? घर-परिवार मे केयो छैहो कि? कोन पार्टी के वोटर छलै? ........???? -कुमार मनोज कश्यप, सम्प्रति: भारत सरकारक उप-सचिव, संपर्क: सी-11, टावर-4, टाइप-5, किदवई नगर पूर्व (दिल्ली हाट के सामने), नई दिल्ली-110023, # 9810811850, ईमेल : writetokmanoj@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.रबीन्द्र नारायण मिश्र-ठेहा परक मौलाएल गाछ (उपन्यास)- धारावाहिक रबीन्द्र नारायण मिश्र ठेहा परक मौलाएल गाछ (उपन्यास)- धारावाहिक खण्ड ६ सँ १० ठेहा परक मौलाएल गाछ 6 समय-साल कतेक बदलि गेल । एकटा समय रहैक जखन कि बच्चासभ एक मिनट हटए नहि चाहए । सदरिकाल सटले रहए। हमहूँसभ घरसँ बहुत अछता-पछता कए काजपर जाइ। छुट्टी होइतहि डेरा वापस आबि जाइ । कैकदिन तँ रमा काजपर जेबे नहि करथि । कैकबेर मोन होनि जे नौकरी छोड़ि दी । जे हेतैक देखल जेतैक । मुदा हमही रोकि दिअनि । -भावावेशमे निर्णय नहि करी । हमरासभकेँ नौकरी अछि तेँ ने तीनू बच्चाकेँ पब्लिक इसकूलमे पढ़ा रहल छी। नहि तँ केना पार लगैत? कहाँसँ एतेक टाका अबैत । हमर बात सुनि कए ओ रुकि जाथि । -बात तँ सही कहि रहल छी। अपनासभकेँ तँ अखन बहुत किछु करबाक अछि । सभटा अपने करबाक अछि । हमसभ एहनो भाग्यवान नहि छी जे पुस्तैनी संपत्ति भेटत, अथवा केओ आन किछु देत। एहन उम्मीदो राखब व्यर्थ थिक । -हमसभ स्वतः सुयोग्य छी । अपन पैरपर ठाढ़ छी आ पूर्ण आत्मसम्मानक संग जीबि रहल छी । अखन धरि तँ सभकिछु ठीके-ठाक रहल अछि। आगू भगवान मालिक । हमर बातसँ रमा पूर्णतः सहमति रखैत छलीह । इएह तँ हमरालोकनिक सभसँ पैघ संपत्ति छल। आपसी सामंजस्य आ सिनेहेक बलेँ हमसभ एतेकटा जिनगी काटि लेलहुँ । आब तँ सेवानिवृत्तिक बादक समय चलि रहल अछि । एहि समयमे तँ सभकेँ कष्ट रहैत अछि । सभसँ पैघ समस्या तँ स्वास्थ्य लए कए भए जाइत छी । यदि स्वस्थ छी तँ बुझू राजा छी । यदि से नहि छी,तखन तँ जिनगी नरक भए जाइत अछि । कारण ककरो समय नहि छैक जे ककरो संगे कनीको काल अस्पतालमे रहत । ओना एहि मामिलामे हमरसभक पड़ोसी आ ओकर पत्नी अपवाद अछि । पता नहि कोन धातुक ओ सभ बनल अछि । बिना कोनो स्वार्थकेँ हमरासभक दिन-राति ध्यान रखैत अछि । सोचि नहि पाबि रहल छी जे यदि ओ नहि रहैत तखन केना की होइत? अखनहु मोन पड़ैत रहैत अछि हमर सेवानिवृत्तिक दिन । साल भरि पहिनहिसँ ओहिदिनक प्रतीक्षा कए रहल छलहुँ । मोनमे होअए जे सेवानिवृत्तिक बाद निश्चिन्तसँ जिअब । कोनो लफड़ा नहि रहत । जे मोन होएत से करब,जकरासँ मोन होअए गप्प करब,जतए जेबाक होएत जाएब। धिआ-पुतासभ अपन-अपन पैरपर ठाढ़ अछि । एकटा त्रुटि रहि गेल अछि । सहरमे अपन मकान नहि कीनि सकलहुँ । आइ-काल्हि करैत करैत एतेक विलंब भए गेल । मकानसभक दाम अगह-बिगह होइत गेल । आब तँ लगैत अछि जे सेवानिवृत्तिक बाद भेटल सभटा टाका लगा देबैक तइओ एकटा फ्लैट नहि कीनल जा सकैत अछि । मुदा किछुगोटे उत्साहवर्धक समाचारसभ दैत रहैत अछि । नोएडा एक्सटेंसनमे बहुत संभावना बनि रहल छैक । नव-नव कालोनीसभ कटि रहल छैक । सस्ता-सस्ता फ्लैट भेटि रहल छैक । देखा चाही। पहिने सेवानिवृत्ति तँ भए जाइ । टाका हाथमे तँ आबि जाए । तकरबादे काज आगू बढ़ि सकत । सोचबाक बात अछि जे जखन दुनू बेकती नौकरीमे छलहुँ तखन एकटा नीक घरो नहि बना सकलहुँ। सालभरिसँ जाहिदिनक प्रतीक्षा छल से आबि गेल । आइ हमरा सरकारी नौकरीसँ सेवानिवृत्त हेबाक छल । पेनसनक सभटा कागज बनि गेल अछि । आइए कार्यालयमे आयोजित समारोहमे हमरा चेक देल जाएत। पेनसनक किताब देल जाएत । संगे कार्यालयक हमर संगसभ पार्टी सेहो देत। कार्यालय दिससँ तँ सरकारी कार्यक्रम हेबे करत । हमरे संगे आइ तीनगोटे आओर सेवानिवृत्त भए रहल अछि । ओकरोसभमे आजुक दिनक बहुत उत्सुकता छैक । हमरा उम्मीद रहए जे हमर तीनू संतान आजुक दिन हमरा संगे कार्यालयमे रहत । हमरा अपना संगे घर वापस आनत। रमा तँ रहबे करतीह । मुदा से सभ किछु नहि भेल । तीनूगोटेमे सँ केओ नहि आबि सकल। सभकेँ किछु-ने-किछु बहन्ना भेटि गेलैक । तखन की कएल जाइत?रमाक संगे हम कार्यालय पहुँचलहुँ । चारि बजे सरकारी पार्टी शुरु होअएबला रहैक । हमरा संगे सेवानिवृत्त भए रहल आन लोकसभक परिवारक सदस्यसभक मेला लागल रहैक । सभसँ हंगामा तँ बसुरिआ चपरासीक परिवार केने रहए । दसे बजेसँ कार्यालयमे नगारा बजा रहल छल। गामसँ ओकरसभक गौंआ आ संबंधीसभ सेहो आएल रहैक । ओकरा बेस पैघ पगड़ी पहिरा देने रहैक । लाल-पियर  पहिरने लगैत छल जेना ओ बिआह करए जा रहल अछि । गौंआँसभ आ कार्यालयक ओकर सहकर्मीसभ ओकरा लेने-लेने सौंसे कार्यालय परिसरमे घुमैत रहल,नगारा बजबैत रहल । गजबक दृश्य छल ओ । हमहूँ ओकरेसभक संग भए गेल रही,ओकरे आनन्दमे प्रसन्नताक अनुभव करैत रही । कार्यालयमे सेवानिवृत्ति होमएबला सभ गोटे आबि गेल रही । अधिकारी लोकनि सेहो आबि गेल रहथि । बेराबेरी सभक बिदाइ कएल जेतैक । हमर दोसर नम्बर छल । हम कनीक उदास तँ रहबे करी । कारण रमाकेँ मोनमे प्रसन्नता नहि रहनि । संभवतः धिआ-पुताकेँ नहि अएबाक कारणसँ ओ दुखी रहथि । मुदा कएल की जा सकैत छल? एतबेमे हमर पड़ोसी पत्नीक संगे उपस्थित भए गेल । ओ सभ रमा लग आबि कए बैसि गेल । ओकरासभकेँ आबि गेलासँ हमसभ बहुत उत्साहित भेल रही । पड़ोसी होअए तँ एहन । हमरा चेक देल गेल,माला पहिराओल गेल । फोटो खिचाओल गेल । सभकालमे हमर पड़ोसी आ रमा हमर मनोबल बढ़बैत रहल । थपड़ी पिटैत रहल । कार्यालयक आयोजन समाप्तिक बाद हम रमा आ पड़ोसी दुनू बेकतीक संगे अपन घर वापस आबि गेलहुँ। 7 आइ कैकदिनसँ नीक निन्न नहि भेल । कारण? रमाक स्वास्थ्य कैकदिनसँ ठीक नहि चलि रहल छनि । राति भरि खों-खों करैत रहैत छथि। कहैत छिअनि जे डाक्टरसँ देखा लेथि । मुदा हुनकापर कोनो असरिए नहि होइत छनि। -हमरा की भए रहल अछि? हम तँ केहन बढ़िआँ छी। -एतेक उकासी भए रहल अछि आ कहैत छी जे किछु नहि भए रहल अछि। -एहि बएसमे ई सभ होइते रहैत छैक। एकर कोन हिसाब छैक। -बातो सही छैक । मुदा एना राति-राति भरि जगलासँ तँ कष्ट बढ़बे करत ने? -जाए दिअ । एहि तरहेँ रमा अपन बात कहैत रहि गेलीह । हम सुनैत रहि गेलहुँ। भोर भेल। मंदिरपर घड़ी-घंटा बजनाइ शुरु भए गेल । केओ पराती गाबि रहल छथि । केओ प्रातः स्नान करबाक हेतु पोखरि दिस जा रहल छथि। हमहूँ उठि गेल छी । संयोगसँ रमाकेँ आँखि लागि गेलनि । हुनका सुतले छोड़ि हम प्रातः भ्रमणपर निकलि गेलहुँ । कनीके दूर गेल रही कि बुझाएल जेना केओ सोर पारि रहल अछि। हम पाछू घुमैत छी । देखैत छी जे पड़ोसी चिकरि रहल अछि- -बूढ़ी -की भेलनि हुनका? -कहि नहि...। मुदा बहुत कुहरि रहल छथि । -हम झटकारि कए वापस अपन घर पहुँचैत छी । देखैत छी जे ओ बेहोस पड़ल छथि। ओकर चिकरब सुनितहि लागल जेना माथमे बिजलौका चमकि गेल। आँखिक आगू जेना अन्हार भए गेल । रस्ताक आगू जेना काँटसभ गारि देल गेल अछि । तथापि हम आँखि मुनि कए आगू बढ़ि रहल छी । अपन घर पहुँचैत छी । घरमे प्रवेशो करैत छी । हुनका बेहोस पड़ल देखि जेना लकबा मारि देलक । किछु बाजले नहि होअए । मुरली,श्याम,शालिनी एक-एक कए सभ ध्यानपर अबैत अछि । कहाँ अछि ओ सभ ? कतेक जतनसँ हमसभ ओकरासभक पालन-पोषण केलहुँ । नीक सँ नीक शिक्षा देलहुँ । मुदा आब जखन ओकरसभक जरुरति अछि तँ सभ नदारद । एकाएक भक्क टुटैत अछि। हमर पड़ोसी पाछूए ठाढ़ अछि । हम ओकरा किछु कहए चाहैत छी। मुदा बाजल नहि होइत अछि । ओ हमर मोनक भाव बूझि जाइत अछि। हम दुनूगोटे आगू बढ़ैत छी । -रमा! रमा!- हम हुनकर नाम लए कए कैक बेर  चिकरैत छी । ओ किएक किछु बजतीह । -हिनका जल्दीसँ अस्पताल लए चलू। हम बकर-बकर पड़ोसीक मुँह ताकि रहल छी। ओ अपन पत्नीकेँ अबाज दैत अछि । ओकर पत्नी भागले अबैत अछि । रमाक हालति देखि ओ बहुत परेसान भए जाइत अछि। हमर पड़ोसी आ ओकर पत्नी रमाकेँ  उठा-पुठा कए घरसँ बाहर अनैत अछि। पड़ोसी अपन कार निकालैत अछि । ओएह दुनूगोटे रमाकेँ कारमे पछिला सीटपर पाड़ि दैत अछि । तकर बाद हमरो हुनका लग बैसि जेबाक हेतु इसारा करैत अछि । हमरा किछु सुधि-बुधि नहि अछि । किछु नहि बुझि रहल छी । मुदा हुनकर संकेतक पालन करैत रमाक बगलमे बैसि जाइत छी । पड़ोसी बहुत तेजीसँ कार चला रहल अछि । ओकर पत्नीक ध्यान सदिखन रमाक साँसपर छै । ओ संभवतः एहि बातसँ आश्वस्त अछि जे रमा अखन धरि जीविते अछि । अस्पताल पहुँचितहि ओकर जानमे जान अबैत छैक । ताबे हमहूँ कने चेतन भए गेल छी । हम पड़ोसी आ ओकर पत्नीकेँ रमाकेँ कारसँ नीचाँ उतारबामे सहयोग करैत छी । ताबतेमे अस्पतालक प्रहरीसभ सेहो आबि जाइत अछि । ओ सभ रमाकेँ  स्ट्रेचरपर बैसा कए आपातकालीन विभागमे लेने चलि जाइत अछि । पाछू-पाछू हम तीनूगोटे चलि रहल छी । सहरक निजी अस्पताल अछि ई । आधुनिक सुविधासँ परिपूर्ण। अस्पतालमे पैसितहि स्वागत कक्ष । ओतए माइकपर भए रहल तरह-तरक उद्घोषणा । के जीबैत अछि,ककर मरीज मरि गेलैक,ककरा शल्यक्रियाक हेतु खून चाही,माने तरह-तरहक उद्घोषणा होइते रहैत अछि । लोकसभ एकटक अपन-अपन आदमीक जानकारी प्राप्त करबाक हेतु व्याकुल अछि । 8 अस्पतालक आपातकालीन विभागमे हमसभ पहुँचि गेल रही। ओहिठाम उपस्थित अस्पतालक कर्मचारी आ डाक्टरसभ हाँइ-हाँइ रमाक उपचारमे लागि जाइत छथि। हुनका तरातर सुइआसभ भोंकल जा रहल अछि । देहमे नस नहि भेंटि रहल छनि । जाँच हेतु खून निकालबाक छैक । एक बेर तँ सुइआ भोंकिओ देने रहए । नस नहि भेटलैक ।  सुइआ बाहर करए पड़लैक। बहुत मोसकिलसँ नस भेटलैक । तखन जाँच हेतु खून निकालल गेल । नाकपर आक्सीजनक टोंटी लगा देल गेलनि । तकरबाद बड़का डाक्टर अएलाह । ओ सभटा कागजसभ पढ़ैत छथि । डाक्टरसभ आपसमे चर्चा करैत छथि । फेर हमरा कानमे फुसफुसाइत छथि- -हिनकर हालति तँ बहुत चिंताजनक छनि । तथापि प्रयास कए रहल छी। हिनका तुरंत आइसीयूमे लए जा रहल छिअनि । भीतरी गड़बड़ी लागि रहल छनि । रिपोर्टसभ आबि गेलाक बाद आगूक कार्यक्रम बनाओल जाएत। डाक्टर से कहि आगू बढ़ि जाइत छथि । सिस्टर हमरा आगूमे किछु कागजसभ राखि दैत अछि । हम ओहि कागजसभपर दस्तखत कए दैत छी। ओएह हमरा भुगतान खिड़कीपर लए जाइत अछि । हम कहलिऐक- -हमरा तँ इन्स्योरंस अछि । -तकर हिसाब बादमे होएत । अहाँ अखन पचास हजार जमा कए दिऔक। इनस्योरंसक कागजसभ सेहो जमा कए दिऔक । इनस्योरंस कंपनीक अनुमति आबि गेलाक बाद अहाँक जमा कएल गेल टाकाक हिसाब भए जाएत । -ठीक छैक। -से कहि हम ओकरा अपन एटीएम कार्ड दए दैत छिऐक । रमा आइसीयूमे  पहुँचा देल गेलथि। हमसभ बाहरे प्रतीक्षा कए सकैत छी। भीतर ककरो जेबाक अनुमति नहि अछि। हम बाहर राखल कुर्सीपर बैसि जाइत छी । पड़ोसी आ ओकर पत्नी आब जेबाक अनुमति मागि रहल अछि । ओ सभ अपन-अपन काजपर जाएत । दुनू बेकती काज करैत अछि। समयसँ बान्हल जिनगी छैक । करत की? चाहिओ कए हमरा संगे नहि रहि सकैत छल । जाइत -जाइत कहैत अछि- -हमर मोबाइल फोन संख्या तँ अछि ने? हम ओकरा अपन  मोबाइल फोनसँ ओकर संख्या देखबैत छिऐक। -नहि, नहि ई तँ कहिआ ने बंद भए गेलैक । हम अहाँकेँ नवका मोबाइल फोन संख्या देने जाइत छी। कोनो विशेष बात होइ तँ सूचित करब। हम ओकर नवका  मोबाइल फोन संख्या लिखि लैत छी । ओ दुनू बेकती बहुत अछता-पछता कए अस्पतालसँ बहराइत अछि । आब हम असगर ओहिठाम राखल कुर्सीपर बैसल छी । प्रतीक्षा कए रहल छी जे डाक्टर आओत आ किछु शुभ समाद कहत । ओतए बैसले-बैसल किछु-किछु सोचि रहल छी। हम आइसीयूक सामनेमे  बाहर राखल कुर्सीपर बैसल छी । किछु आओर मरीजसभक तीमरदारसभ सेहो लगपासमे बैसल अछि । सभक मोनमे  चिंता,सभ परेसान लागि रहल अछि । सभकेँ किछु जिज्ञासा छैक । सभ एतबे सुनबाक हेतु व्याकुल बुझाइत अछि जे ओकर मरीज आब ठीक छैक । मुदा अस्पतालक कर्मचारी तँ अपन काजमे लागल अछि । जहाँ कोनो नव मरीज अबैत छैक सभ ओकरा दिस झपट्टा मारैत अछि । मरीजसभ अपन-अपन जानक लेल झकि रहल अछि,ओकर परिवारक लोकसभ  से परेसान अछि। मुदा अस्पतालक कर्मचारी,डाक्टर,सिस्टरसभक लेल ई सभ आम बात छैक। बातो सही छैक । कोनो एकदिनका तँ छैक नहि । अस्पतालमे नित्यप्रति सैकड़ो रोगी अबैत रहैत अछि । सभक समस्या जे रहौक,मुदा अस्पताल प्रबंधनकेँ ओहिमे लक्ष्मी देखाइत छैक। हरिअर-हरिहर नोटक गड्डी । सरकारी अस्पतालक भीड़ आ कुप्रबंधनसँ तंग भए लोकसभ निजी अस्पतालक शरणमे जेबाक हेतु वाध्य भेल अछि । निजी अस्पतालमे स्वच्छता तँ छैक,व्यवस्थो छैक,मुदा एहिठाम अस्पताल एकटा व्यापारिक केन्द्र बनि कए रहि गेल अछि । परिणाम सामने अछि । यदि अस्पतालबलासभकेँ पता लागि गेलैक जे मरीजकेँ इनस्योरेन्स छैक,अथवा कोनो आन सरकारी विभाग वा निजी कंपनीक सुविधा छैक तकर बाद तँ अस्पतालमे भर्ती भेलाक बाद मरीजक वापसी भगवानेक हाथमे रहैत अछि। मरीज जीबए-मरए मुदा ओकरासँ मोट धन ओसूल हेबाक व्योंत तँ हेबेक चाही । जे डाक्टर से नहि करत से निजी अस्पतालमे नौकरी नहि कए सकत। मुदा कोनो विकल्पो नहि छैक । लोक पहिने जान देखत की टाका? तेँ सभकिछु बुझितो निजी अस्पताल दौड़ैत अछि । सरकारी अस्पताल तँ आब ओएह जाइत अछि जकरा बहुत मजबूरी छैक । कुर्सीपर बैसल-बैसल आँखि लागि जाइत छल । जखनहि केओ बाहर अबैत एकटा उम्मीद जगैत जे साइत रमाक बारेमे किछु समाद कहत। मुदा ओ सभ तँ हमरा दिस तकितो नहि छल । हम थाकल-ठेहिआएल ओहिना कुर्सीपर औंघाइत रहलहुँ । जखन घंटा भरिसँ बेसी बीति गेल,तइओ कोनो समाद नहि भेटल तँ नहि रहल गेल। हम आइसीयूक द्वारि लग पहुँचि जोरसँ खटखटबैत छी । एतबेमे एकटा सिस्टर बेस तमसैल बाहर अबैत अछि- -अहाँकेँ कनीको विचार नहि अछि । एना हल्ला केलासँ मरीजसभक जानो जा सकैत अछि । -मुदा चुप्प रहलासँ कहाँ केओ सुनि रहल अछि । घंटाभरिसँ बैसल छी। हमर मरीज भीतर गेल से गेले अछि । केओ किछु नहि बता रहल अछि। अहीं कहू जे एहनमे हमर मोन व्याकुल होएत कि नहि? -से बात तँ बुझलहुँ । मुदा ई अस्पताल छैक । ताहूमे आइसीयू वार्ड। एहिठाम शांति बनओने रहब बहुत जरूरी छैक । -कम सँ कम आबो तँ हमर मरीजक जनतब दिअ जाहिसँ हमरा सुकुन होएत। -की नाम अछि अहाँक मरीजक? -रमा -ओकर इनस्योरेंसक कागज अखन धरि स्वीकार नहि भेलैक अछि। तेँ काज लटकल अछि। -मुदा ओकरा करबाक की छैक? ओ किछु बजितए ताहिसँ पहिने भीतरसँ डाक्टर अबाज देलकैक। ओ बिना किछु उत्तर देने चलि गेलि । हम ओहिना परेसान ओतए ठाढ़ रहि गेलहुँ । 9 आखिर इनस्योरेंस कंपनीक स्वीकृति आबि गेल । तकर बाद एकटा परिचारिका हमरा कहैत आएलि जे रमाकेँ स्टेंट लगतनि । हुनका तुरंत शल्यकृया हेतु शल्यचिकित्सा कक्षमे लए जाएल जेतनि । स्टेंटक कतेको प्रकार होइत छैक। बढ़िआँ विदेशी स्टेंट बेसी दिन चलतनि । बेर-बेर शल्यकृया नहि करबए पड़तनि । मुदा ताहि हेतु अपन जेबीसँ खरचा करए पड़तैक। कारण इनस्योरेंससँ ओतेक महग स्टेंट नहि देल जा सकैत अछि । हम ओकरा कहलिऐक- -एहिमे सोचबाक की बात छैक? जे सभसँ नीक स्टेंट होइक से लगा दिअनु। हम तकर भुगतान करब । -से तँ सही सोचलहुँ । मुदा ओकर भुगतान पहिने करए पड़त । तखनहि स्टेंट आबि सकत। -कोनो बात नहि । कतेक देबाक छैक से कहू। -एक लाख चालीस हजार। -एतेक...। -आर की? जखन नीक चीज लेबैक तखन दामो तँ तेहने देबए पड़त। हम तुरंत बैक जाइत छी । जरूरति भरि टाका निकालैत छी । भुगतान खिड़कीपर जा कए टाका जमा कए दैत छिऐक। तकर थोड़बे कालक बाद पता लागल जे रमाकेँ शल्यचिकित्सा कक्षमे लए गेलनि । हम शल्यचिकित्सा कक्षक बाहर ठाढ़ रही । सीसा बाटे रमाकेँ ह्वील चेयरपर  लए जाइत एक झलक देखलिअनि । तकर बाद किछु नहि  देखाएल। हम कुर्सीपर बैसल प्रतीक्षा करैत रहलहुँ । बैसले बैसल अपन तीनू संतानकेँ रमाक स्थितिक बारेमे जानकारी ह्वात्सपपर दए देलिअनि । प्रतीक्षामे रही जे ओहि समादसभमे हरिअर निसान लागत । ओ सभ समाचार बूझि व्याकुल भए जाएत। तुरंत फोन आएत। मुदा से सभ किछु नहि होइत देखाएल । एहिमे विलंब होइत रहल । हमर मोनक व्याकुलता बढ़िते गेल । मुदा कएल की जा सकैत छल । मुरली,श्याम,शालिनी केओ तँ फोन करैत । एकक्षण लेल हमरा बिसरा गेल जे मुरली,श्याम विदेशमे अछि आ शालिनी मुंबईमे अछि मुदा कंपनीक काजसँ कतहु बाहर गेल अछि । संभवतः ओ सभ हमर समाद नहि देखि सकल होअए । हम प्रतीक्षा करैत-करैत थाकि गेलहुँ,ओतहि औंघाए लगलहुँ । ओहनेमे बहुत डराओन सपना देखैत छी । जेना एकदम कारी मनुक्ख हाथमे बेसमोट लाठी लेने हमरे दिस आबि रहल अछि । ओकर आँखि लाल-लाल अछि,केस कारी घनगर । ओ रहि-रहि कए हमर मुँह दुसि दैत अछि । किछु बजैत नहि अछि । मुदा मुखाकृति तेहन बना लैत अछि जेना हमरा घोंटि जाएत । आब की करी किछु फुरेने बहि करैत अछि ।  ओ तँ हमरे दिस बढ़ल जा रहल अछि । हम गामे-पसीने भिजि जाइत छी । आब तँ ओ एकदम लगीच आबि गेल अछि। हम घिघिआ रहल छी । बहुत मोसकिलसँ ओकरा पुछैत छी- -तूँ के छह? -हम छी महाकाल। -माने? -माने-ताने एहिठाम नहि बुझाओल जाइत छैक । एहिठाम बस काज कएल जाइत छैक। -से की? -तोरा कतेक कहियह? पढ़ल-लिखल मूर्ख बुझाइत छह । -की चाहैत छह तूँ? हमरा किएक परेसान कए रहल छह। ओ आओर भयाओन भए जाइत अछि । जीह बाहर कए लैत अछि। -चिंता नहि करह । समय सभटा बुझा देतह । डरसँ हम बहुत जोरसँ  चिचिआइत छी । आँखि खुजैत अछि तँ लगपासमे कैकगोटेकेँ ठाढ़ देखैत छी। -की भेल? की भेल? सभ पुछि रहल अछि । हम बकर-बकर सभ दिस ताकि रहल छी। बड़बड़ाइत छी- -मुरली, श्याम, शालिनी .... । कतए जाइत गेलह? हमर एहन हालति अछि। तोहर माए अस्पतालमे भर्ती भेल छथि। भोरसँ हम असगर एतए पड़ल छी । रहल-सहल कसरि ओ भयाओन सपना पूरा कए देलक । इएहसभ सोचि रहल छी,हम ठोर पटपटा रहल छी । -की बड़बड़ाइत छी? -लगमे ठाढ़ प्रहरी पुछलक। हम किछु जबाब नहि दए सकलिऐक। ओकरा दिस देखैत रहि गेलहुँ । ताबतेमे शल्यचिकित्सा कक्षक पट्ट खुजल । रमा स्ट्रेचरपर शल्यचिकित्सा कक्षसँ निकालल जा रहल छथि । होसमे नहि छथि । -अखन हिनका निरीक्षण कक्षमे राखल जेतनि । घंटा भरिक बाद वार्डमे आनल जेतनि । -हुनकर हालति केहन छनि? -ठीक छथि। कोनो चिंताक बात नहि अछि । से सुनलाक बाद हमरा उसास भेल , जानमे-जान आएल । हम आइ पहिल बेर हल्लुक अनुभव कए रहल छलहुँ । ताबतेमे पड़ोसीक फोन आएल। -केना छथि? -अखने शल्यचिकित्सा कक्षसँ बाहर केलकनि अछि। घंटा भरि निरीक्षणमे रहतीह । तकरबाद वार्डमे राखल जेतनि । -चिंता नहि करब । हमसभ थोड़े कालमे आबि रहल छी। -आबह, आबह। 10 आधा घंटाक बाद पड़ोसी आ ओकर पत्नी कारसँ अस्पताल पहुँचि गेल । ओ सभ सोझे हमरा लग पहुँचैत अछि। हमओहि समयमे किछु सोचैत रही । ओकरासभपर ध्यान नहि गेल । ओ अबाज दैत अछि- -सुशील! सुशील! हमर भक टुटैत अछि । -कखन अएलह? -आबिए रहल छी। की हाल छनि? -की कहल जा सकैत अछि? ओना कहने रहए जे शल्यक्रिया ठीक रहलनि । घंटा भरिक बाद वार्डमे आबि जेतीह । ओकर पत्नी थरमसमे सँ चाह निकालैत अछि । हम तीनूगोटे ओतहि चाह पीबैत छी । -आइ तँ तोरा बहुत परेसानी भेलह? -की कएल जाए? समय-समयक बात होइत छैक। हुनकर मोन कैकदिनसँ गड़बड़ चलि रहल छलनि । हम कहबो करिअनि जे डाक्टरसँ देखा लिअ। मुदा ओ कान-बात नहि देलनि । टरका देथि । की कए सकैत छी? असगर की-की करू? अपनो तँ अस्वस्थे रहैत छी। -बच्चासभकेँ खबरि केलिऐक की नहि? -खबरि केलेसँ की होएत? सभ अपन-अपन दुनिआमे रमल अछि? हमरासभक लेल ककरा फुरसति छैक? हमर पड़ोसी हमर सामनेक फ्लैटमे किरायदेार अछि । किछुसाल पूर्व ओ फ्लैट खाली भेल रहैक । किछु दिन सुनलिऐक जे ओकर मालिक फ्लैटकेँ बेचत। हमरो मोन लुसफुसाएल । सामनेमे यदि एकटा आओर फ्लैट भए जाएत तँ बच्चासभकेँ सुविधा हेतैक। फेर होअए जे ओकरसभक कोन ठेकान? के रहत के नहि रहत कहिआ आएत? कोनो ठेकान नहि बुझाएल । ओना तँ हमर फ्लैट अछिए । तीनटा बेडरूम ऊपरसँ बाहरेसँ एकटा नौकरक कोठरी अछि। ढन-ढन करैत रहैत अछि। हम दुनूगोटे कतए-कतए रहब? की-की देखब? अपनाकेँ सम्हारब से पारे नहि लगैत अछि। गामक जमीन-जायदाद से फेकम-फेक भेल अछि। देआद-वादसभ वकोदृष्टि गड़ेने छथि।  कैकबेर बच्चासभकेँ कहलिअनि जे अबैत जाउ,गामक जे किछु चीज-वस्तु अछि तकर किछु हिसाब-किताब कए लिअ। मुदा कोनो परिवाह नहि छनि। मुरली लिखलाह- -एकरा कोनो नीक संस्थामे दान दए दिऔक। हमरासभकेँ एहिसभ लेल समय नहि अछि। खामखा झंझटि बढ़ओने छी। हुनकर विचार बुझलाक बात बहुत निराशा भेल । गाम-घरक कोनो महत्वे नहि बुझाइत छैक  ओकरासभकेँ । आब एहि बएसमे हम दुनूगोटे की की कए सकैत छी? अपन देह तँ वशेमे नहि रहैत अछि। रहैत छी रहैत छी कहिओ हम कहिओ ओ दुखित भए जाइत छी । सामनेक फ्लैटमे यदि नीक किरायेदार आबि गेल तँ कनी उसास भए जाइत अछि। एहिसँ पहिलुका किरायेदार युवक छल। असगरे रहैत छल । कहिओ काल कोनो महिलाकेँ संगे अनैत छल । केना-ने-केना मकान मालिककेँ पता लगलैक । ओकरा हटा देलक । तकर बाद किछुदिन फ्लैट खालीए रहैक । फेर ई सभ आएल । ई दुनू बेकती बहुत विचारवान लोक बुझाइत अछि । बरोबरि हमरासभक हाल-चाल लैत रहैत अछि। एकरेसभक कारण आइ रमाक जान बँचि गेलनि । नहि तँ गेल घर छलथि। हमरसभक चाह खतम भए गेल अछि । पड़ोसी आ ओकर पत्नी हमरा लेल किछु जलखैक ओरिआन सेहो केने अछि। हमरासँ आग्रहो करैत अछि । मुदा हम मना कए दैत छिऐक । -कनी काल ठहरि जाह। अखन मोन बहुत परेसान अछि । रमा वापस आबि जाथि। एकबेर देखि लिअनि । तकरबादे किछु सोचल जा सकैत अछि। -भोरेसँ भुखल छह। एनामे तँ तूँहू दुखित पड़ि जेबह । तखन के ककरा देखत? -आब देखबाक हेतु बाँचल की अछि? -एना केओ बाजए? अखन तोहर की बएस भेल अछि? -बूढ़ तँ भइए गेल छी । सेवानिवृतिक बाद बेसी परेसानी बुझा रहल अछि । -आब तँ हमहूँ सेवानिवृत्त होएब । मुदा ताहिसँ की? जीवन बहुत मुल्यवान अछि । जीवनमे उत्साह हेबाक चाही। असली बात सएह छैक । -मुदा देखलासँ तूँसभ पचासक लगैत छह। -से की लागब । मुदा यदि से बुझाइत अछि तँ तकर कारण हमरसभक सकारात्मक सोच अछि । जीवनक प्रति एकट सहज भाव। अखन धरि रमा वार्डमे नहि अएलीह अछि । हम पड़ोसी आ ओकर पत्नीसभक गप्पसँ किछु आराममे छी । पड़ोसीक पत्नी एक बेर फेर आग्रह करैत अछि- -कनिको जलखै कए लिअ । हम  एहि बेर स्वीकृतिमे मुरी हिला देलिऐक । ओ टिफिनमेसँ हलुआ आ पूरी निकालि कए हमरा लग राखि दैत अछि। एक गिलास पानि सेहो राखि दैत अछि । हम हलुआ पूरी खा लैत छी। पानि पीबैत छी । ताबतेमे एक बेर फेर चाहक  कप सेहो तैयार अछि । हमसभ चाह पिबैत छी ।  तकर बाद जेना जानमे-जान आबि गेल । भोरसँ पहिल बेर आश्वस्त लागि रहल छलहुँ । एतबेमे माइकपर रमाक नाम सुनाएल- -रमाक संगे जे आएल छी से वार्ड संख्या पाँचमे आबि जाउ । रमा वार्डमे पहुँचि गेल अछि। -रबीन्द्र नारायण मिश्र, पिताक नाम: स्वर्गीय सूर्य नारायण मिश्र, माताक नाम: स्वर्गीया दयाकाशी देवी, बएस: ६९ वर्ष, पैतृक ग्राम: अड़ेर डीह, मातृक: सिन्घिआ ड्योढ़ी, वृति: भारत सरकारक उप सचिव (सेवानिवृत्त), स्पेशल मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, दिल्ली(सेवानिवृत्त), शिक्षा: चन्द्रधारी मिथिला महाविद्यालयसँ बी.एस-सी. भौतिक विज्ञानमे प्रतिष्ठा : दिल्ली विश्वविद्यालयसँ विधि स्नातक, प्रकाशित कृति: मैथिलीमे: प्रकाशन वर्षः२०१७ १.भोरसँ साँझ धरि (आत्म कथा),२. प्रसंगवश (निवंध), ३.स्वर्ग एतहि अछि (यात्रा प्रसंग); प्रकाशन वर्षः२०१८ ४. फसाद (कथा संग्रह) ५. नमस्तस्यै (उपन्यास) ६. विविध प्रसंग (निवंध) ७.महराज(उपन्यास) ८.लजकोटर(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०१९ ९.सीमाक ओहि पार(उपन्यास)१०.समाधान(निवंध संग्रह) ११.मातृभूमि(उपन्यास) १२.स्वप्नलोक(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२० १३.शंखनाद(उपन्यास) १४.इएह थिक जीवन(संस्मरण)१५.ढहैत देबाल(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२१ १६.पाथेय(संस्मरण) १७.हम आबि रहल छी(उपन्यास) १८.प्रलयक परात(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२२ १९.बीति गेल समय(उपन्यास) २०.प्रतिबिम्ब(उपन्यास) २१.बदलि रहल अछि सभकिछु(उपन्यास) २२.राष्ट्र मंदिर(उपन्यास) २३.संयोग(कथा संग्रह) २४.नाचि रहल छलि वसुधा(उपन्यास) २५.दीप जरैत रहए (उपन्यास)। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.८.किशन कारीगर-चोरनुकबा गोंसाई (हास्य कटाक्ष) किशन कारीगर चोरनुकबा गोंसाई (हास्य कटाक्ष)

बाबा बड़बड़ाइत बजैत रहै हौ एहनो कहूं गोंसाई भेलैए? कहअ त कखैन स हल्ला क चाल पाड़ै छियै कथि लै कनिओ सुगबुगेतै? आंगन मे छै की बाध बोन गेल आकि लगले प्राण छुटि त नै गेलै से कोनो भांजे नै बुझना जा रहल? अई चोरनुकबा गोंसाई के भांज त ब्रह्मो विष्णु के नै लगलै त हमरा सन बघंबरी महेश बुते भांज लागत?

हम्मे बाबा स पुछलियै हो बाबा की होलौ जे एतना हल्ला मचनौ छहो? की भेलौ भागेसर पंडा कतौ हरा गेलौ की आई तोरा जल ने चढ़ेलकौ? बाबा खोंजाइत बोललकै हौ की चल आ फल चढ़ाउत? अई चोरनुकबा गोंसाई के कोनो भांजे नै बुझहा रहल यै? एं हौ अंदाज धियो पूतो के त नै सीखा देने छै जे बाबा के अवाज़ सुनिहें त किछो नै बजिहें? एकदम निबदी मारने रहिंए भने बुढ़बा छटपटा के मरौ की जरौ?

बाबा बोले लगलै कहअ त आदमी के कोनो तेहेन बेगरत होउ त एहेन चोरनुकबा गोंसाई सबहक भरोस करब त अपटी खेत मे प्राण चलि जाएत? हम्मे बाबा स फेर कहलियै हो बाबा होलौ की से फरिछा के कहू ने तभी से बड़बड़ कइले छहू? चोरनुकबा गोंसाई बलू कहेन होत होई? हमरा त कुछो बुझल य? हम्मर बात सुनके बाबा हां हां के हँसे लगलै बोललकै अईं हौ चेरनुकबा गोंसाई दिया नै बुझल छह? धू जी महराज पहिने एक जुम तमाकुल खुआबह फेर कहै छियह एक्सक्लूसिव ख़बैर.

हम्मे बाबा के खैनी चुना के देली ओकरा बाद बाबा खैनी खा हाथ पटपटा के बोले लगलै? हौ बच्चा मिथिला के गामे गाम मे चोरनुकबा गोंसाई सब भेटतह. ई सब देखावटी भवडाह तेहेन करतह जे यौ बाबा हम त संगे छी बाबा अहाँ काज शुरू करू ने? आ खटै बेर की मंदिरक जमीन अतिक्रमण के बिरोध बेर चेरनुकबा जेंका निबदी मारने रहतह की? तै बेर एक्को डेग आगू नै बढ़तह? आ माइर मे पाछू भोज मे आगू वला फार्मूला पर चोरनुकबा खेला मे हो हो करतह जे मंदिर जमीन अतिक्रमणकारी स मुक्त हेबाक चाही?

बाबा बोलैत रहै इ भागेसर पंडा हरदम हमरा बोली दै छेलए ज यौ बाबा मंदिरक जीर्णोद्धार हेबाक चाही. महादेव मंदिरक जमीन अतिक्रमणकारी स मुक्त हेबाक चाही? आ अखैन सी ओ बिडिओ पुलिस प्रशासन सब चेकिंग मे एलै त भागेसर निपत्ता भेल अछि की? अई चोरनुकबा गोंसाई के कोनो भांज नै लागि रहल? हौ अंगनो मे जाके भांज लगेलौंह त धिया पूता सब कहलक जे पप्पा पोखैर दिस गेल छथहिन? भागेसर त बाधहो बोन दिस नै लौक रहल? एहनो कहूं पोखैर दिस करब भेलैए? एतेक समय त रावणो के लघ्घी करैत काल नै लगलै? देखै छहक सीओ सहेब भागेसर दिया पुइछ रहल जे पंडा जी कहां है? कहअ त भागेसर पंडा मुख्य पुजारी छी आ अखैन बयान दै बेर मे चोरनुकबा गोंसाई बनल यै? त एना मे मंदिरक जमीन अतिक्रमणकारी कब्जा स मुक्त कहियो ने हएत आ नै मंदिरक जिर्णोद्धार?

हम्मे बाबा स पुछलियै हौ बाबा मिथिला मैथिली के चोरनुकबा सब दिआ कुछो बोलहू जे मैथिली के सुधार होतै? बाबा हां हां के हँसैत बोले लगलै, हौ ई मैथिली वला चोरनुकबा गोंसाई सब आरो कमाल सब यै? ई सब मिथिला मैथिली कुकृत्यक एक्को पाई बिरोध नै करतह? खाली देखावटी भवडाह करतह जे मैथिली समावेशी हेबाक चाही त मैथिली मानक बदलबाक चाही सबके मोजर हेबाक चाही? आ मैथिली लाॅबी स लड़ै बेर लिखित बिरोध बेर मे चोरनुकबा गोंसाई बनल निबदी मारने रहतह की. हंओ मे छी आ नैंहो मे छी वला चलकपनी खेलतह ई चोरनुकबा सब? आई तक ककरो बिरोध करैत देखलहक? की जे बिरोध करबै त मंच पर नै बजाउत त पुरूस्कारे मे नाम छंटा जाएत? हौ जी चोरनुकबा गोंसाई सब दुआरे मिथिला मैथिली के जिर्णोद्धार किनौ ने हेतै आ नै ई खेलरा सब मिथिला मैथिली मे सुधार करै जेतै? अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.पद्य खण्ड ३.१.बद्रीनाथ राय- आठ टा पद्य ३.२.राज किशोर मिश्र-चान्हर ३.३.रामानन्द मण्डल- हो बाबा गांधी!/ लाल बहादुर शास्त्री!/ हो काका जेपी ३.१.बद्रीनाथ राय- आठ टा पद्य बद्रीनाथ राय- आठ टा पद्य १ बहिना सावन बीति रहल अछि, एकसरि हम धनि विरहिन।

महुआ आम मजरिक' झरलै, तरसि रहल मन मीन। रूष्ट विधाता वामे बैसल, शशिमुख हमर मलीन। । बहिना...........

तन-मन प्राण घवाह सनक अछि, नियति भविष्य कटाह हमर अछि। प्रियतम परदेशी पहुँ दूरे, यौवन तेज विहीन। । बहिना...............

भूलुण्ठित गुम्फित अछि कुन्तल, करूणानिधि छथि निन। मधुमातलि मदमातलि प्यासलि, बाजै विरहक बीन।। बहिना..............

२ कान खोलि सुनू मैथिल जन, एकटा बात बुझाएब जरूरी। भ्रष्टाचारक बजइए डंका, हमरो बिगुल बजाएब जरूरी।।

राजनीति मे भ्रष्ट पात्र के, नैतिक बोध कराएब जरूरी। सेवा आऔर दायित्व बोध के, ओकरा पाठ पढ़ाएब जरूरी।।

मरल लोक आऔर निन्न सूतल के, अछि आब बहुत जगाएब जरूरी। वैचारिक क्रान्ति के घर घर, नगर नगर पहुँचाएब जरूरी। ।

अनहरिया के उपनिवेश मे, सूर्यक शासन लाएब जरुरी। जगबै जखने भोर हेतै आब, इच्छाशक्ति जगाएब जरूरी।।

घेंटकट्टा जेबी कट्टाके, ताड़ब आऔर भगाएब जरूरी। दिशाहीन रमकैत घोड़ीके, अछि लगाम लगाएब जरूरी।।

नञि देलक कहियो किछुओ जे, तेकरोसँ फरिछाएब जरूरी। देब देब कहि ठकबे केलक, ओकरो श्राद्ध कराएब जरूरी

सिंहासन के बुझए बपौती, दूष्ट के दिशा देखा॓एब जरूरी धर्म च्युत भेल निर्लज्जा, अछि निर्वास कराएब जरूरी। ।

कृष्ण पक्ष कहिया तक रहतै? अछि इजोरिया लाएब जरूरी। ई झगड़ा अनहार सङे अछि, अछि हथियार उठाएब जरूरी।

जातिवाद जे सुनगि रहल छै, आगिके आब बुताएब जरूरी। आब समाजक हित मे जल्दी, धधरा करब कराएब जरूरी। ।

लुप्त भेल रोजगारक अवसर, रोजगारो अछि लाएब जरूरी। अछि अन्हार मिथिला मे बहुते, चौमुख दीप जराएब जरूरी

सरकारो आइ सुस्त भेलि अछि, ओकरो अछि दौड़ाएब जरूरी। हमर निहोरा सुनियौ मैथिल, अछि आब डेग बढ़ाएब जरूरी।।

३ एखन की देखलहुँ अछि , दिन दिन उबाइन हाएत। साउस बहिकिरनी , पुतौह मलिकाइन हाएत। । अगहन के रान्हल भात, धिपले खाएब पुस मे। अपने रहब भारत मे, थारी रहत रुस मे।। पृथ्वी प्रदक्षिण मे, साझसँ नञि भोर हाएत। रुस आऔर अमेरिका त, डेगोसँ थोर हाएत। । फाटल के फाटल नञि, फैशन छै बुझियौ। जिंस बाली कनिञा के, बोली विषाइन हाएत। । साउस बहिकिरनी....... भोजक विधान जतए, ओन लाइन भोज हाएत। सरपंचे मुखिया आऔर, मेम्बर के खोज हाएत। । बरद वुद्धि वर के, बेसिये किछु दाम हाएत। चोरे डकैत सबके, मंचसँ सम्मान हाएत। । सत्य बात बजबै त, सबटा तिताइन हाएत। भादब मे रौदी रहत, फागुन मे पानि हाएत।। करबै बलण्ठै त, बेसी सम्मान हाएत । रोग शोक विपदा के, सहजँहि निदान हाएत। । साउस बहिकिरनी........... पुतौहुवे के डरसँ साउस सब, पराएल रहत। केकरो आब मोजर नञि, गौवाँ डेराएल रहत। । ससुरके असुर बूझि, अपने मोटाएल रहत। साउस सब टहलनी, आब लट्टल खियाएल रहत। ।

४ देश विकाशक;नगर समाजक, कथा मार्मिक सुनबै छी। केलहुँ अछि उपलब्धि हम जे, से सबटा हम गनबै छी।।

हेहर थेथर आँकड़ पाथर, भ्रष्टशिरोमणि मुखिया भेल। सुगरक खुँर के पूजा होइए, कुकड़क मुँह गमकौआ तेल।।

कनहा कुत्ता प्रतिनीधि अछि, गिद्ध बिलाइ विचारक। हरियर-हरियर फसिल चरइए, साँढ़ समाज सुधारक।।

नञि पौरूष नञि पाग माथ मे, ताञि राजनीति स्तरहीन। सत्ता सुन्नरि विलासिता मे, भाँङ खाय सूतलि अछि नीन।।

सोलह सिङार कुतिया मुखमंडल, आँखि मे काजर लाली ठोर। अंगप्रदर्शन करैत चलइए, ऐंठि नगर मे पहीरि पटोर।।

अनहरिया के जन्मल बालक, अनहरिया मे करइए खेल। अनहरिया के पूजा होइए, बिनु बाती दीपक ओ तेल।।

साँढ़ पहिरने खाधी कुर्ता, कुम्भकरण सन ढ़ेकरि रहल अछि। जिन्दा पर अधिकार ओकर छै, मुर्दा खाक'अकरि रहल अछि।।

कौआ मेना शिक्षक भेल अछि, गिद्ध सियार अधिकारी। शिक्षा क्षेत्र के करलक सभटा, भ्रष्ट साँढ़ सरकारी।।

अर्थे टा सँ छनि अपेक्षा, कहबै छथि अध्यापक। ज्ञान अधुरा बाँटि रहल छथि, नञि विचार छनि व्यापक।।

चोटी चानन हकन कनइए, दाढ़ी बैसल को कोड़ा मे। राम रहीमक राजनीति अछि, लागल लोक निहोरा मे।।

मुक्ताचारी गगन विहारी, वाहन व्योम विहार मे। भ्रष्टाशिरोमणि उँच्चासन पर, बैसल अछि सरकार मे।।

जाति धर्म आऔर भाषा क्षेत्रक, जन-जन पर अधिकार जमौने। चाटुकार हमहीं छी दोषी, प्रतिनिधि परिवेश घिनौने।।

प्रतिनीधि पतित बनि बैसल, आँखि मे हुनका मोतियाबिन्द। नैतिकता के बेचि खेने छथि, सूतल छथि कुंभकर्णक निन्द।।

चौंसठ आवरण अंगप्रदर्शन, विषवाला सन बनि घुमइए। प्रणय घड़ी मे प्रणय निमंत्रण, कुत्ता के ललकारैत दइए।।

मंदिर -मस्जिद के झगड़ा मे, विद्या-वैभव भेल समाप्त। भ्रष्टाचारक मेघ लगइए, सगरो अछि अनहारे व्याप्त।।

अर्थ प्रतिष्ठित अर्थक भूखल, पौरूष के ललकार दैत अछि। हम यदि किछु बाज' चाही, नञि बाजक अधिकार दैत अछि।।

जनम-जनम के भूखल प्यासल, प्रतिनीधि आऔर पंच बनइए। नंगा ओ भीखमंगा मिलिक' बाढ़ि मे व्योम विहार करइए।।

देह पेट जेकरे छै भूखल, बनल प्रमुख प्रखंडक। सतहन्ता सरपंच बनल अछि, ताञि विकाश अछि बन्धक।।

पाप पचाब' मे जे सक्षम, पंचैतिया अछि भेल महान। वुद्धिजीबी विद्वान कात छथि, पायबला परसइए ज्ञान।।

भ्रष्टाचारक भूसा खाक', भैंसा कागभुसुन्डी भेल। विधि विधान अछि विधवा बुढ़िया, नगरवधू सतवन्ती भेल।।

आय अन्हार इजोत के घेरने, माङि रहल रंङदारी। शिखर शीर्ष पर रावण बैसल, सीता विकल बेचारी।

लाठी पर अछि टिकल लोकतंत्र, जन-जन छथि लचरल लाचार। भारत भाग विधाता लिखलनि, ठुठ लेखनी हमर कपार।।

राजनीति मे भेड़चार अछि, पृष्ठक पोषक धूर्त सियार। ध्वजा के वाहक बेचि खेलक अछि, सत्ता के चुनरी सलबार।।

शिक्षा विभाग मे पात्र अशिक्षित, स्वास्थ्य विभाग बिमार पड़ल। चाटुकार आऔर चमचा चारण, चलबइए सरकार मरल।।

राजनीति अछि सुगरक झगड़ा, विष्ठा पर अधिकारक। अपन पेट आऔर विलासिता लेल, संरक्षक संहारक।।

जे पेटु अछि भरल प्रपंचे, उदरकुण्ड छै थाली। विष्ठा पर अछि घात लगौने ज्ञानक वैभवशाली।।

निर्लज नीच जीभ कुक्कुर सन, अछि ज्ञानक पपियाहा। वएह समाजक शिरोमणि अछि, भोज खौका जिबलाहा।।

हमर घर अनहारक राज मे, अछि इजोतक आशा। कहिया देखब पूर्ण चन्द्रमा, एतबे अछि अभिलाषा।।

५ नारी हम कोमल-कमल, मन मे बहुत दरारि। मारक मारि सहब दुष्कर अछि, कामक उठल बिहारि। तोयद् तोय विहिन पहुँ छथ तोयज् के नञि आशा। नोरे बोरल जीवन-यौवन, पूरल नञि अभिलाषा ।। बहिना वाम विधाता ना । पावस हमरो नयन समाएल, नेह मुदा अछि प्यासल। परुष पहुँ छथि बिसरल हमरो, हम धनि छी हरिवासल।। बहिना वाम विधाता ना रहल वसन्तो रुसले हमरो, पतझाड़क अछि आशा। पूजल देव पितरकें बहुतो, सभ केओ देलनि दिलाशा।। बहिना वाम विधाता ना।। यौवनसँ हम परिपूरीत छी, पहुँ छथि काठ कठोरे| निष्ठुर परूष पहूँ बनि बैसल, रखने धनि के दूरे|| बहिना वाम. ............ ...

बहिना वाम विधाता ना ।।। सावन प्यासल भादो प्यासल, हमहूँ धनि छी प्यासल। आब पहुँ जँ नञि घर औता, यौवन हमरो भासल ,बहिना वाम.।।........... कतेक सहब हम पूर्वा पछबा, पवन बहए उनचासे। सुखल नेहक गागर हमरो, यौवन मधुघट नासे।। बहिना वाम विधाता ना........। नारीक जीवन नरक हमर अछि , जरल हमर मधुमासे। पहुँ प्रेमक बन्धन मे बान्हल, हमर पहुँ छथि पाशे।। बहिना वाम विधाता ना...... सअ्ख सिहन्ता पुर भेल नञि, गेला विधाता गामे। हमर विरंची महाप्रपंची, भए बैसल छथि वामे।। बहिना वाम ..........

६ अर्थकहीन मनोरथ सभटा, छल सपना सपने रहि गेल। देखब कहिया दिन सुदिन हम, दग्ध हृदय जरिते रहि गेल।।

छल द्वेष दंभसँ दूषित समाज, उपहासे मात्र करइए। मन मारि अपमान सहै छी, झर्झर नोर बहइए।।

हम समाजक व्यंगात्मक , सम्बोधन सभ स्वीकार करै छी। केओ बुझइए पिलिया कुकुड़, तेकरो अंगीकार करै छी।।

छी समाजमे गौण-मौन हम, गुजर करै छी खखरीसँ। गाँधी वस्त्र बुरिबक बुझइए, डर लगइए बकरीसँ।।

पौरुष-पैर पाँखि अछि काटल, हाथ हथौड़ीसँ थुरल। दगाबाज सभ दर्दे दइए, स्वाभिमान सेहो चुरल।।

वस्त्रहीन छी देह उघार अछि, सच पूछी दरकारो नञि अछि। मंङलासँ के देत दयालु , हमरा लेल सरकारो नञि अछि।।

अपन नोर अपने पोछै छी, जे पोछत से माङत आँखि। बन्द करत पिंजड़ा मे पहिले, उड़लापर काटत ओ पाँखि।।

एहनो लोक भेटला समाज मे, महाप्रतिष्ठित आऔर महान। हमर आँखि हमरासँ छिनला, बाद मे देलनि चश्मा दान।।

शब्दक हम छी कृषक अनारी, नञि उपजइए मरुवा धान। छी विचारमे बारूद भरने, सुनक लेल नञि सक्षम कान।।

नञि पौरूष नञि पाग माथ मे, छी समाज मे स्तरहीन। हँसी हमर अछि बन्हकी लागल, लए छी साँस बसातो कीन।।

भूखल नञि हम धन सम्मानक, भूखल छी हम स्नेहक। पलटि क पबिरइ छी हम गुदरी, फाटल अपने देहक।।

जीवन भरि पतझड़ मे रहलहुँ, नञि वसन्तकेर दर्शन भेल। धरती आ आकाश सुखल अछि, मधुमासो सुखले रहि गेल।।

जेबी मे अछि स्वर्ण निष्क नञि, झोरी मे अपमान भरल अछि। ठार भेल हम कनगी पर छी, पैर मे कंकड़ काँट गरल अछि।।

होश -हबास नञि छी हताश हम, लोक जजातक खअर बुझइए। स्वार्थी सम्बन्धी सब रूसल, किछु माङत ताँइ पर बुझइए।।

साहस संङ संकल्प जुटाक', कोहुना जीबि रहल छी। भवन-भूमि नञि देलनि विधाता, फाटल सीबि रहल छी।।

सावन प्यासल भादो प्यासल, तरसै चान इजोरिया लेल। कृष्ण-कर्म कें व्यवसायीगण, कृष्णपक्षसँ रखने मेल।।

चुटकी भरि इजोतक कारण, हमर घर अन्हार रहइए। भेटल अछि उपहार गरीबी, जीवन हमर पहाड़ लगइए।।

अपन लहाश अपने कनहा पर , कोहुना उघि रहल छी। श्मशान आब कतेक दुर छै, से नञि बूझि रहल छी।।

के जराओत एहि लाश खासके, एहि बातक अछि चिन्ता। उगल चान नञि; रहल अन्हरिया, जेकरे छल सिहन्ता।।

हमर देह इ जरतै जहिया, के कनतै केकरा छै नोर। मरिते नाम निपत्ता हेतै, नञि देखबै हम सुन्दर भोर।।

बेटी हमर रूप के रानी , बापे हुनक रुपैया हीन। घटक मुँह पर थुकि दैत छल, देत कथी इ दुखिया दीन।।

देह आत्मा बेचिक' केलहुँ, जे छल एकटा कन्यादान। दशो दिशा अन्हार लगइए, कहिया होयत नवल विहान।।

बेटीके छनि उजरल नैहर, सासुर छनि लचरल लाचार। भाय एको नञि बहिन मे असगर, ब्रम्हा लिखलनि ब्रम्ह विचार।।

हम समाजक नजरि मे दोषी , दोषी हमर गरीबी। हम अभिशापित हाथ मलै छी, के छथि हमर करीबी।।

बुरिबक लोक बुरिबक बुझइए, कबिलाहा फेकइए थूक। साधनहीन गरीब बुझिक', सम्बन्धी लए जड़बए ऊक।।

रंग बीच बेरंग रहैछी, फगुआ आऔर दिवाली। दुनियाँ जखन भुलाएल रहइए, विषवाला मधु प्याली मे।।

महा भोज होइए समाज मे, हम रहै छी भूखले। रोटी पर नञि नोन जुरइए, हाथ रहइए सुखले।।

छी समाज के छोटकी भौजी, छेड़-छाड़ अपमान सहक लेल। हमहींट टा उपयुक्त मात्र छी, नोनगर करुगर बात सुनक लेल।।

जीवन दीप मिझाएल हमर अछि, कोयलीक बोली करुगर भेल। स्नेहक बाती खाक भेल अछि आब दीप मे नञि तेल।।

जे इजोत भेटल हिंस्सामे, छिनलक नगरक लोक उदार। नोरे निज आधार हमर अछि, तुच्छ लगइए ई संसार। ।

रौद जरै छी भूखल पेट मे, भेटल अछि सब दुख्खक सार। नयन तरैसते रहलै सब दिन, दैत जे केओ स्नेहक उपहार। ।

मन करइए त्यागि देबक लेल, रिस्ता एहि संसार सँ। महा सेज पर महा निन्द मे, शयन करी अधिकारसँ।।

७ लाशक जे व्यापार करै छल, मिथिलाके उद्धार करत ओ? राजक मुखिया बना देलापर, कहू केहेन व्यवहार करत ओ?

नञि बाँचल न्यायिक चरित्र छै, अगबे अत्याचार करत ओ। जिबिते पितृमेध ओ करतै, बेसी पापाचार करत ओ।।

नङटे नृत्य करत निर्लज्जा, देखक लेल लाचार करत ओ। अनकर रक्त बहाक' पापी, पेटक नैया पार करत ओ।।

मानव भेष मे अछि ओ दानव, नैतिक श्रेष्ठ विचार करत ओ? सत्य बात कहलापर पापी, हमरे पर ललकार भरत ओ।।

कुम्भकरण आदर्श जेकर छै, पेटु अछि संहार करत ओ। नोर रक्त के पेय बुझत ओ, क्रीड़ा आऔर विहार करत ओ ।।

श्वान गिद्ध सन संस्कार छै, छिनरा के जयकार करत ओ। ठंठ रंक के रक्तपान क, बाटे घाट खिचार करत ओ। ।

व्यवसायी अनुबंध बुझै छै, तखन कोना सम्बन्ध बुझत ओ? सड़ल मांस आहार जेकर छै कहू कोनाक' गंध बुझत ओ?

८ अर्थकहीन मनोरथ सभटा, छल सपना सपने रहि गेल। देखब कहिया दिन सुदिन हम, दग्ध हृदय जरिते रहि गेल।।

छल द्वेष दंभसँ दूषित समाज, उपहासे मात्र करइए। मन मारि अपमान सहै छी, झर्झर नोर बहइए।।

हम समाजक व्यंगात्मक , सम्बोधन सभ स्वीकार करै छी। केओ बुझइए पिलिया कुकुड़, तेकरो अंगीकार करै छी।।

छी समाजमे गौण-मौन हम, गुजर करै छी खखरीसँ। गाँधी वस्त्र बुरिबक बुझइए, डर लगइए बकरीसँ।।

पौरुष-पैर पाँखि अछि काटल, हाथ हथौड़ीसँ थुरल। दगाबाज सभ दर्दे दइए, स्वाभिमान सेहो चुरल।।

वस्त्रहीन छी देह उघार अछि, सच पूछी दरकारो नञि अछि। मंङलासँ के देत दयालु , हमरा लेल सरकारो नञि अछि।।

अपन नोर अपने पोछै छी, जे पोछत से माङत आँखि। बन्द करत पिंजड़ा मे पहिले, उड़लापर काटत ओ पाँखि।।

एहनो लोक भेटला समाज मे, महाप्रतिष्ठित आऔर महान। हमर आँखि हमरासँ छिनला, बाद मे देलनि चश्मा दान।।

शब्दक हम छी कृषक अनारी, नञि उपजइए मरुवा धान। छी विचारमे बारूद भरने, सुनक लेल नञि सक्षम कान।।

नञि पौरूष नञि पाग माथ मे, छी समाज मे स्तरहीन। हँसी हमर अछि बन्हकी लागल, लए छी साँस बसातो कीन।।

भूखल नञि हम धन सम्मानक, भूखल छी हम स्नेहक। पलटि क पबिरइ छी हम गुदरी, फाटल अपने देहक।।

जीवन भरि पतझड़ मे रहलहुँ, नञि वसन्तकेर दर्शन भेल। धरती आ आकाश सुखल अछि, मधुमासो सुखले रहि गेल।।

जेबी मे अछि स्वर्ण निष्क नञि, झोरी मे अपमान भरल अछि। ठार भेल हम कनगी पर छी, पैर मे कंकड़ काँट गरल अछि।।

होश -हबास नञि छी हताश हम, लोक जजातक खअर बुझइए। स्वार्थी सम्बन्धी सब रूसल, किछु माङत ताँइ पर बुझइए।।

साहस संङ संकल्प जुटाक', कोहुना जीबि रहल छी। भवन-भूमि नञि देलनि विधाता, फाटल सीबि रहल छी।।

सावन प्यासल भादो प्यासल, तरसै चान इजोरिया लेल। कृष्ण-कर्म कें व्यवसायीगण, कृष्णपक्षसँ रखने मेल।।

चुटकी भरि इजोतक कारण, हमर घर अन्हार रहइए। भेटल अछि उपहार गरीबी, जीवन हमर पहाड़ लगइए।।

अपन लहाश अपने कनहा पर , कोहुना उघि रहल छी। श्मशान आब कतेक दुर छै, से नञि बूझि रहल छी।।

के जराओत एहि लाश खासके, एहि बातक अछि चिन्ता। उगल चान नञि; रहल अन्हरिया, जेकरे छल सिहन्ता।।

हमर देह इ जरतै जहिया, के कनतै केकरा छै नोर। मरिते नाम निपत्ता हेतै, नञि देखबै हम सुन्दर भोर।।

बेटी हमर रूप के रानी , बापे हुनक रुपैया हीन। घटक मुँह पर थुकि दैत छल, देत कथी इ दुखिया दीन।।

देह आत्मा बेचिक' केलहुँ, जे छल एकटा कन्यादान। दशो दिशा अन्हार लगइए, कहिया होयत नवल विहान।।

बेटीके छनि उजरल नैहर, सासुर छनि लचरल लाचार। भाय एको नञि बहिन मे असगर, ब्रम्हा लिखलनि ब्रम्ह विचार।।

हम समाजक नजरि मे दोषी , दोषी हमर गरीबी। हम अभिशापित हाथ मलै छी, के छथि हमर करीबी।।

बुरिबक लोक बुरिबक बुझइए, कबिलाहा फेकइए थूक। साधनहीन गरीब बुझिक', सम्बन्धी लए जड़बए ऊक।।

रंग बीच बेरंग रहैछी, फगुआ आऔर दिवाली। दुनियाँ जखन भुलाएल रहइए, विषवाला मधु प्याली मे।।

महा भोज होइए समाज मे, हम रहै छी भूखले। रोटी पर नञि नोन जुरइए, हाथ रहइए सुखले।।

छी समाज के छोटकी भौजी, छेड़-छाड़ अपमान सहक लेल। हमहींट टा उपयुक्त मात्र छी, नोनगर करुगर बात सुनक लेल।।

जीवन दीप मिझाएल हमर अछि, कोयलीक बोली करुगर भेल। स्नेहक बाती खाक भेल अछि आब दीप मे नञि तेल।।

जे इजोत भेटल हिंस्सामे, छिनलक नगरक लोक उदार। नोरे निज आधार हमर अछि, तुच्छ लगइए ई संसार। ।

रौद जरै छी भूखल पेट मे, भेटल अछि सब दुख्खक सार। नयन तरैसते रहलै सब दिन, दैत जे केओ स्नेहक उपहार। ।

मन करइए त्यागि देबक लेल, रिस्ता एहि संसार सँ। महा सेज पर महा निन्द मे, शयन करी अधिकारसँ। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.राज किशोर मिश्र-चान्हर राज किशोर मिश्र, रिटायर्ड चीफ जेनरल मैनेजर (ई), बी.एस.एन.एल.(मुख्यालय), दिल्ली,गाम- अरेर डीह, पो. अरेर हाट, मधुबनी चान्हर जल प्रलय तऽ गेल मुदा , छो ड़ि गेल ई चा न्हर, चेन्ह ई, रहैक पा नि जखन उन्मा द मे भेल आन्हर।

शक्ति रहैक, तऽ करै तुमुल ध्वनि , आ रहैक ध्वंस के इच्छा , वि वेक हेरा लेलक पा नि , रहैक ओकरे तऽ परी क्षा ।

तो ड़ि देलक धा रक दुनु कूल, बहा देलक लो कक बस्ती , रा खैत बल, गति पर गौ रव, मुदा , रहै ने हो स, मदक मस्ती ।

फो ड़ि देलकै धरती के,

करए ला गल प्रलय तंड, जि नगी उजा ड़क नेत सँ, भऽ गेल ओ, भा री मो चण्ड।

सभ वि ध्वंसक हो इछ अंत, रहि गेल चा न्हर , गेल वि ना श, खा धि , जल लेने पेट मे, बनअऔलक शां ति सँ अपन समा स।

ओ शि शु तऽ अछि प्रलयक, मुदा धी र, थि र, आ अछि गम्भी र, कौ लि क गुण सँ रि क्त मुदा , दैत अछि मा ल-जा ल के क्षी र।

लो को दो षी नहि मा नैत छै, करैत अछि ओकर जलक उपयो ग, चा न्हर घटा रहल पा प ओ, एकर पुरखा पर ला गल अभि यो ग।

लहा लो ट भेल नेना -भुटका , मा रि रहल अछि मा रा मा छ, आ, धा र परहक लता म गा छ सँ, फेकि रहल अछि थुड़री -काँ च।

रञ्ज सबहक ओहि बा ढ़ि पर, मुदा , दुला रैछ प्रलय -पूत, वर्तमा न के देखि कऽ, बि सरि रहल लो क अछि , भूत।

वि ध्वंसक' चि न्ह, ओकर चि ल्हका , स्मरण करा बैत अछि कल्हुका ।

पनि टुट्टू दि न -दि न भेल जा इत अछि ,बा ढ़ि क' बच्चा , उड़ल जा इत छै पा नि ओकर, छै दो सरो खरचा ।

पाँ तर मे अछि पड़ल ध्वंस -शि शु , छा ड़ि देलकैक करमी क' लत्ती , ई तऽ अछि बड़ शां त, शि ष्ट, मुदा , पुरखा एकर तऽ रहैक अगत्ती ।

जल -प्रलय चलि गेल मुदा , ओकरे ई अछि खँडहर, मो न पा ड़ैत रहैछ, केहेन वि ना शक रहैक बवंडर।

समयक संग, भऽ सकैत अछि , मुना जा ए ई खा धि , नहि तऽ एहि ना पड़ल रहए, बनि वि ध्वंस -समा धि ।

किं वा , जल वि पदा के फेरो उठए एत्तहि भयंकर भमर, आ, फेर लड़ल जा इक एत्तहि , जी वन -मृत्युक महा समर। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.रामानन्द मण्डल- हो बाबा गांधी!/ लाल बहादुर शास्त्री!/ हो काका जेपी आचार्य रामानंद मंडल- अश्रद्धा/ हिंदू आ मुसलमान/ जै हे जगजननी सीता १.अश्रद्धा

बने आबि लरकी। श्रद्धा न अश्रद्धा। एगो हय कहल। शीलवंत मरदाबा भिखार। शीलवंत मौगी छिनार। श्रद्धा रहे अहिले। कहल गेल छिनार। आ काटल गेले। जौं रहिते अश्रद्धा। न कहल जैते छिनार। न काटल जैते अश्रद्धा। काटल जैते काटेवाला। न चाही श्रद्धा । चाही आइ अश्रद्धा। रामा चाही अश्रद्धा।

०२. हिंदू आ मुसलमान

सुरुज हिंदू के आ चान मुसलमान के

केसरिया हिंदू के आ हरियरका मुसलमान के।

पूरब हिंदू के आ पच्छिम मुसलमान के।

गंगा हिंदू के आ जमजम मुसलमान के।

काशी हिन्दू के आ कावा मुसलमान के ।

मंदिर हिंदू के आ मस्जिद मुसलमान के।

ईश्वर हिंदू के आ अल्लाह मुसलमान के।

समसान हिंदू के आ कब्रिस्तान मुसलमान के।

आबि बांटि सकबे आ धरती आकाश के।

आबि बांटि सकबे आ पानी हवा के।

आबि बांटि सकबे सुरुज के गरमी के।

आबि बांटि सकबे चान के चांदनी के।

आबि बांटि सकबे आगि के तपिस के।

आबि बांटि सकबे इंसान के इंसानियत के।

०३. जै हे जगजननी सीता

जै हे जगजननी माता। जै हे जगजननी सीता। जै हे मिथिला बहिना। जै हे मिथिला धिया। देखूं मिथिला नहिरा। बनल मैथिल सोलकन -बभना। बनल मैथिली अंगिका -बज्जिका। जै हे मिथिला बहिना। आउ संग राम पहुना। आउ मिथिला नहिरा। देखूं अपन भाई-भतिजा। मांगे आशीष मिथिला। मिटे भेद-भाव मिथिला। बोले मैथिली मिथिला। जै हे जगजननी सीता। बंदना करैय रामा भइया। जै हे मिथिला बहिना। जै हे मिथिला धिया। जै हे जगजननी सीता। जै हे जगजननी माता। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह ३८० म अंक १५ अक्टूबर २०२३ (वर्ष १६ मास १९० अंक ३८०)|| 21 20 || http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA

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