VIDEHA — Issue 381 / अंक ३८१

Publication: VIDEHA · Issue: 381
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ISSN 2229-547X VIDEHA 𑒀 विदेह ३८१ म अंक ०१ नवम्बर २०२३ (वर्ष १६ मास १९१ अंक ३८१) [विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। कॉपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति ‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२३. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२३. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. 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It is a platform for scholars, researchers, writers and poets to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, and poetry in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@gmail.com. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Videha e-Journal: Issue No. 381 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अक्खर खम्भा (आखर खाम्ह) तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ (कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।) माने आखर रूपी खाम्ह निर्माण कऽ ओइपर (गद्य-पद्य रूपी) मंच जँ नै बान्हल जाय तँ ऐ त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लत्ती केना पसरत। शुक्ल यजुर्वेद (२६.२)-यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः। ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च।।हम सभ गोटेकें ई पवित्र वाणी (वेदवाणी) सुनाबी। ब्राह्मणकें, क्षत्रियकें, शूद्रकें आ आर्यकें; अपन लोककें आ अपरिचितकें सेहो (माने सभकें)। मुदा ऐ वेदवाक्यक विपरीत मनुस्मृति वेदवाणीक अध्ययन/ श्रवणकें समाजक किछु गोटे लेल निषेध करऽ चाहलक, मुदा स्मृति सेहो वेदवाक्यकें प्रमाण मानैत अछि (शब्द प्रमाण) तें तकर विरुद्ध देल ओकर निर्देश स्वयं अमान्य भऽ जाइत अछि। Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. -Robert Louis Stevenson ------------------------------------- Videha: Maithili Literature Movement 𑒀 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्ति: 𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱: अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृ. २-५) १.२.अंक ३८० पर टिप्पणी (पृ. ६-६) २.गद्य खण्ड २.१.परमानन्द लाल कर्ण- गीता सार (पृ. ९-१२) २.२.योगानन्द झा- बदलि रहल अछि सभ किछुःपाठकीय प्रतिक्रिया (पृ. १३-२१) २.३.लालदेव कामत-जुवराजजीक 'परिचय' एक अनुशीलन, लघु कथा- चिकनठोपा, हमरा बिनु जगत सुन्ना छै: पाठकीय प्रतिक्रिया, स्वनाम धन्य शिरोमणी, पाठकीय प्रतिक्रिया, उपन्यास बनाम वायोग्राफी, दिनकर जीक उत्कर्ष, मिथिला विभूति : खुशी लाल बाबू (पृ. २२-४७) २.४.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (खेप-३०) (पृ. ४८-५४) ‍२.५.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा-संवेदना (पृ. ५५-५६) २.६.रबीन्द्र नारायण मिश्र-ठेहा परक मौलाएल गाछ (उपन्यास)- धारावाहिक (पृ. ५७-७७) २.७.किशन कारीगर-मिथिला मैथिली के नाम पर दललपनी आ चलकपनी (पृ. ७८-८२) २.८.कुंदन कर्ण- बीहनि कथा- निर्णय (पृ. ८३-८३) २.९.रामचन्द्र राय- नशामुक्त गाम (पृ. ८४-९२) २.१०.रामेश्वर प्रसाद मंडल- दिव्य दृष्टि 'क बहुचर्चित लेखक लालदेव कामत (पृ. ९३-९६) २.११.डा० गंगाधर कुँवर "हर्ष"- भावना आ प्रेरणा (पृ. ९७-९९) २.१२.नन्द विलास राय- मोंछमे घी उर्फ परिश्रम (पृ. १००-१००) ३.पद्य खण्ड ३.१.आशीष अनचिन्हार- दूटा गजल (पृ. १०२-१०४) ३.२.जगदानन्द झा 'मनु'- दू टा गजल (पृ. १०५-१०७) ३.३.राज किशोर मिश्र-जनसंख्या-विस्फोट (पृ. १०८-११०) ३.४.रामानन्द मण्डल-डोम के चान!/ धर्म युद्ध!/ हम बिहार छी/ हो भासा विग्यानी/ कि हम आजाद छी? (पृ. १११-१२१) ३.५.प्रमोद झा 'गोकुल'- आङ उघार छी हम (पृ. १२२-१२३) 𑒀 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्तिः पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म 𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑓁 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒰𑒣: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒼𑒭𑒡𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹 𑒠𑒹𑒫𑒰: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧 ब्रह्मणसँ प्रार्थना जे द्युलोकमे, अंतरिक्षमे, पृथ्वीपर, जलमे, औषधमे, वनस्पतिमे, विश्वमे, सभ देवतागणमे आ ब्रह्ममे शांति हुअय। ॐ-ब्रह्मण, द्यौ-सूर्य-तरेगण, अंतरिक्ष- पृथ्वी आ द्यूलोकक बीच, आप:-जल, विश्वेदेवा- सभ देवता, ब्रह्म- सर्जक। 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝𑒮𑒿 𑒣𑓂𑒩𑒰𑒩𑓂𑒟𑒢𑒰 𑒖𑒹 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒧𑒹, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭𑒧𑒹, 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲𑒣𑒩, 𑒖𑒪𑒧𑒹, 𑒎𑒭𑒡𑒧𑒹, 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒱𑒧𑒹, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒧𑒹, 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰𑒑𑒝𑒧𑒹 𑒂 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒧𑒹 𑒬𑒰𑓀𑒞𑒱 𑒯𑒳𑒁𑒨। 𑓇-𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝, 𑒠𑓂𑒨𑒾-𑒮𑒴𑒩𑓂𑒨-𑒞𑒩𑒹𑒑𑒝, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭- 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒂 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒏 𑒥𑒲𑒔, 𑒂𑒣:-𑒖𑒪, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹𑒠𑒹𑒫𑒰- 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰, 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧- 𑒮𑒩𑓂𑒖𑒏। 𑒀 ॐ, स॒हस्र॑शीर्षा॒ पुरु॑षः। स॒ह॒स्रा॒क्षः स॒हस्र॑पात्। 𑓇, 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒬𑒲𑒩𑓂𑒭𑒰↓ 𑒣𑒳𑒩𑒳↑𑒭𑓁। 𑒮↓𑒯↓𑒮𑓂𑒩𑒰↓𑒏𑓂𑒭𑓁 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒣𑒰𑒞𑓂। स भूमिं॑ ग्वंग वि॒श्वतो॑ वृ॒त्वा। अत्य॑तिष्ठद् दशाङ्गु॒लम्॥ 𑒮 𑒦𑒴𑒧𑒱𑓀↑𑓅 𑒫𑒱↓𑒬𑓂𑒫𑒞𑒼↑ 𑒫𑒵↓𑒞𑓂𑒫𑒰। 𑒁𑒞𑓂𑒨↑𑒞𑒱𑒭𑓂𑒚𑒠𑓂 𑒠𑒬𑒰𑒓𑓂𑒑𑒳↓𑒪𑒧𑓂॥ हजार माथ, हजार आँखि, हजार पएर संग विश्वकेँ आच्छादित केने अछि, दस आंगुरक गनतीक वशमे नै अछि ओ। प॒द्भ्याग्ँ॑ शू॒द्रो अ॑जायत॥ 𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑒑𑓂𑒿↑ 𑒬𑒴↓𑒠𑓂𑒩𑒼 𑒁↑𑒖𑒰𑒨𑒞॥ पएरसँ शूद्रक उत्पत्ति भेल॥ प॒द्भ्यां भूमि॒र्दिशः॒ श्रोत्रा᳚त्। 𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑓀 𑒦𑒴𑒧𑒱↓𑒩𑓂𑒠𑒱𑒬𑓁↓ 𑒬𑓂𑒩𑒼𑒞𑓂𑒩𑒰↑↑𑒞𑓂। मुदा पएरेसँ भूमियोक उत्पत्ति। ❀ (White Florette- innocence and purity) ☸ (Wheel of Dharma) ࿕(Swastik) ꣼ (सिद्धिरस्तु, सिद्धम 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒱𑒩𑒮𑓂𑒞𑒳, 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒧 Devanagari Anji) 𑓅 (Gwang ग्वंग- two small circles connected by u and a dot placed over it, used in reference of Vedic texts) 𑒀 (Tirhuta Anji, Ankush of Ganeshji, placed at the beginning of something) 𑒀

१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.अंक ३८० पर टिप्पणी १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय काव्यक भारतीय विचार: मोक्षक लेल कलाक अवधारणा, जेना नटराजक मुद्रा देखू। सृजन आ नाश दुनूक लय देखा पड़त। स्थायी भावक गाढ़ भऽ सीझि कऽ रस बनब- आ ऐ सन कतेक रसक सीता आ राम अनुभव केलन्हि (देखू वाल्मीकि रामायण)। कृष्ण भारतीय कर्मवादक शिक्षक छथि तँ संगमे रसिक सेहो। कलाक स्वाद लेल रस सिद्धांतक आवश्यकता भेल आ भरत नाट्यशास्त्र लिखलन्हि। अभिनवगुप्त आनन्दवर्धनक ध्यन्यालोकपर भाष्य लिखलन्हि। भामह ६अम शताब्दी, दण्डी सातम शताब्दी आ रुद्रट ९अम शताब्दीमे एकरा आगाँ बढ़ेलन्हि। रस सिद्धान्त: भरत:- नाटकक प्रभावसँ रस उत्पत्ति होइत अछि। नाटक कथी लेल? नाटक रसक अभिनय लेल आ संगे रसक उत्पत्ति लेल सेहो। रस कोना बहराइए? रस बहराइए कारण (विभाव), परिणाम (अनुभाव) आ संग लागल आन वस्तु (व्यभिचारी)सँ। स्थायीभाव गाढ़ भऽ सीझि कऽ रस बनैए, जकर स्वाद हम लऽ सकै छी। भट्ट लोलट:- स्थायीभाव कारण-परिणाम द्वारा गाढ़ भऽ रस बनैत अछि। अभिनेता-अभिनेत्री अनुसन्धान द्वारा आ कल्पना द्वारा रसक अनुभव करैत छथि। लोलट कविकेँ आ संगमे श्रोता-दर्शककेँ महत्व नै दै छथि। शौनक:- शौनक रसानुभूति लेल दर्शकक प्रदर्शनमे पैसि कऽ रस लेब आवश्यक बुझै छथि, घोड़ाक चित्रकेँ घोड़ा सन बूझि रस लेबा सन। भट्टनायक कहै छथि जे रसक प्रभाव दर्शकपर होइत अछि। कविक भाषाकेँ ओ भिन्न मानैत छथि। रससँ श्रोता-दर्शकक आत्मा परमात्मासँ मेल करैए। रसक आनन्द अछि स्वरूपानन्द। आ ऐसँ होइत अछि आत्म-साक्षात्कार। रस सिद्धान्त श्रोता-दर्शक-पाठक पर आधारित अछि। ई श्रोता-दर्शक-पाठकपर जोर दैत अछि। ध्वनि सिद्धान्त: आनन्दवर्धन ध्वन्यालोकमे साहित्यक उद्देश्य अर्थकेँ परोक्ष रूपेँ बुझाएब वा अर्थ उत्पन्न करब कहैत छथि। ई सिद्धान्त दैत अछि परोक्ष अर्थक संरचना आ कार्य, रस माने सौन्दर्यक अनुभव आ अलंकारक सिद्धान्त। आनन्दवर्धन काव्यक आत्मा ध्वनिकेँ मानैत छथि। ध्वनि द्वारा अर्थ तँ परोक्ष रूपेँ अबैत अछि मुदा ओ अबैत अछि सुसंगठित रूपमे। आ ऐसँ अर्थ आ प्रतीक दूटा सिद्धान्त बहार होइत अछि। ऐसँ रसक प्रभाव उत्पन्न होइत अछि। ऐसँ रस उत्पन्न होइत अछि। न्याय आ मीमांसा ऐ सिद्धान्तक विरोध केलक, ई दुनू दर्शन कहैत अछि जे ध्वनिक अस्तित्व कतौ नै अछि, ई परिणाम अछि अनुमानक आ से पहिनहियेसँ लक्षणक अन्तर्गत अछि। आ से सभ शब्द द्वारा वर्णित होएब सम्भव नै अछि। स्फोट सिद्धांत: भर्तृहरीक वाक्यपदीय कहैत अछि जे शब्द आकि वाक्यक अर्थ स्फोट द्वारा संवाहित अछि। वर्ण स्फोटसँ वर्ण, पद स्फोटसँ शब्द आ वाक्य स्फोटसँ वाक्यक निर्माण होइत अछि। कोनो ज्ञान बिनु शब्दक सम्बन्धक सम्भव नै अछि। ई भारतीय दर्शनक ज्ञान सिद्धान्तक एकटा भाग बनि गेल। अर्थक संप्रेषण अक्षर, शब्द आ वाक्यक उत्पत्ति बिन सम्भव अछि। स्फोट अछि शब्दब्रह्म आ से अछि सृजनक मूल कारण। अक्षर, शब्द आ वाक्य संग-संग नै रहैए। बाजल शब्दक फराक अक्षर अपनामे शब्दक अर्थ नै अछि, शब्द पूर्ण हेबा धरि एकर उत्पत्ति आ विनाश होइत रहै छै। स्फोटमे अर्थक संप्रेषण होइत अछि मुदा तखनो स्फोटमे प्राप्ति समए वा संचारक कालमे अक्षर, शब्द वा वाक्यक अस्तित्व नै भेल रहै छै। शब्दक पूर्णता धरि एक अक्षर आर नीक जकाँ क्रमसँ अर्थपूर्ण होइए आ वाक्य पूर्ण हेबा धरि शब्द क्रमसँ अर्थपूर्ण होइए। सांख्य, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा आ वेदान्त ई सभ दर्शन स्फोटकेँ नै मानैत अछि। ऐ सभ दर्शनक मानब अछि जे अक्षर आ ओकर ध्वनि अर्थकेँ नीक जेकाँ पूर्ण करैत अछि। फ्रांसक जैक्स डेरीडाक विखण्डन आ पसरबाक सिद्धान्त स्फोट सिद्धान्तक लग अछि। अलंकार सिद्धान्त: भामह अलंकारकेँ समासोक्ति कहै छथि जे आनन्दक कारण बनैए। दण्डी आ उद्भट सेहो अलंकारक सिद्धान्तकेँ आगाँ बढ़बै छथि। अलंकारक मूल रूपसँ दू प्रकार अछि, शब्द आ अर्थ आधारित आ आगाँ सादृश्य-विरोध, तर्कन्याय, लोकन्याय, काव्यन्याय आ गूढ़ार्थ प्रतीति आधारपर। मम्मट ६१ प्रकारक अलंकारकेँ ७ भागमे बाँटै छथि, उपमा माने उदाहरण, रूपक माने कहबी, अप्रस्तुत माने अप्रत्यक्ष प्रशंसा, दीपक माने विभाजित अलंकरण, व्यतिरेक माने असमानता प्रदर्शन, विरोध आ समुच्चय माने संगबे। औचित्य सिद्धान्त: क्षेमेन्द्र औचित्य-विचार-चर्चामे औचित्यकेँ साहित्यक मुख्य तत्व मानलन्हि। आ औचित्य कतऽ हेबाक चाही? ई हेबाक चाही पद, वाक्य, प्रबन्धक अर्थ, गुण, अलंकार, रस, कारक, क्रिया, लिंग, वचन, विशेषण, उपसर्ग, निपात माने फाजिल, काल, देश, कुल, व्रत, तत्व, सत्व माने आन्तरिक गुण, अभिप्राय, स्वभाव, सार-संग्रह, प्रतिभा, अवस्था, विचार, नाम आ आशीर्वादमे। कंपायमान अछि ई ब्रह्माण्ड आ ई अछि कंपन मात्र। कविता वाचनक बाद पसरैत अछि शान्ति, शान्ति सर्वत्र आ शान्ति पसरैत अछि मगजमे। अनुवाद समालोचना: सर्जनात्मक साहित्यमे नाटक सभसँ कठिन अछि, फेर कविता अछि आ तखन कथा, जँ अनुवादकक दृष्टिकोणसँ देखी तखन। नाटकमे नाटकक पृष्ठभूमि आ परोक्ष निहितार्थकेँ चिन्हित करए पड़त संगहि पात्र सभक मनोविज्ञान बूझए पड़त। कवितामे कविताक विधासँ ओकर गढ़निसँ अनुवादकक परिचित भेनाइ आवश्यक, जेना हाइकूक मैथिलीसँ अंग्रेजी अनुवाद करै बेरमे मैथिलीक वार्णिक ५/७/५ क मेल जँ अंग्रेजीक अल्फाबेटसँ करेबै तँ अहाँक अनूदित हाइकू हास्यास्पद भऽ जाएत कारण अंग्रेजीमे ५/७/५ सिलेबलक हाइकू होइ छै आ मैथिलीमे जेना वर्ण आ सिलेबलक समानता होइ छै से अंग्रेजीमे नै होइ छै। कविताक लय, बिम्बपर विचार करए पड़त संगहि कविता खण्डक कविताक मुख्य शरीरसँ मिलान करए पड़त। कथामे कथाकारक आ कथाक पात्रक संग कथाक क्रम, बैकफ्लैशक समय-कालक ज्ञान आ वातावरणक ज्ञान आवश्यक भऽ जाइत अछि। रामलोचन शरणक मैथिली रामचरित मानस अवधीसँ मैथिलीमे अनुवाद अछि मुदा दोहा, चौपाइ, सोरठा सभ शास्त्रीय रूपेँ अनूदित भेल अछि। सिद्धान्तक आवश्यकता की छै? १.२.अंक ३८० पर टिप्पणी लक्ष्मण झा ’सागर’ एहेन समयक पक्का विदेह! भारतीय भाषाक कोनो एहेन पत्रिका हमरा नजरिमे त नै आयल अछि। बहुत बहुत बधाइ! शुभकामना!!

श्यामानन्द चौधरी बहुत बहुत बधाई आ धन्यवाद अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.गद्य खण्ड २.१.परमानन्द लाल कर्ण- गीता सार २.२.योगानन्द झा- बदलि रहल अछि सभ किछुःपाठकीय प्रतिक्रिया २.३.लालदेव कामत-जुवराजजीक 'परिचय' एक अनुशीलन, लघु कथा- चिकनठोपा, हमरा बिनु जगत सुन्ना छै: पाठकीय प्रतिक्रिया, स्वनाम धन्य शिरोमणी, पाठकीय प्रतिक्रिया, उपन्यास बनाम वायोग्राफी, दिनकर जीक उत्कर्ष, मिथिला विभूति : खुशी लाल बाबू २.४.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (खेप-३०) ‍२.५.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा-संवेदना २.६.रबीन्द्र नारायण मिश्र-ठेहा परक मौलाएल गाछ (उपन्यास)- धारावाहिक २.७.किशन कारीगर-मिथिला मैथिली के नाम पर दललपनी आ चलकपनी २.८.कुंदन कर्ण- बीहनि कथा- निर्णय २.९.रामचन्द्र राय- नशामुक्त गाम २.१०.रामेश्वर प्रसाद मंडल- दिव्य दृष्टि 'क बहुचर्चित लेखक लालदेव कामत २.११.डा० गंगाधर कुँवर "हर्ष"- भावना आ प्रेरणा २.१२.नन्द विलास राय- मोंछमे घी उर्फ परिश्रम २.१.परमानन्द लाल कर्ण- गीता सार अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.योगानन्द झा- बदलि रहल अछि सभ किछुःपाठकीय प्रतिक्रिया योगानन्द झा बदलि रहल अछि सभ किछुःपाठकीय प्रतिक्रिया श्री रबीन्द्र नारायण मिश्र आधुनिक मैथिली साहित्यक वहुआयामी रचनाकार छथि। आत्मकथा,यात्रा वृतान्त,निबन्ध,संस्मरण,कथा-उपन्यास आदि विभिन्न विधामे रचना द्वारा ई मैथिली साहित्यक भंडारकेँ समृद्ध करैत अयलाह अछि । उपन्यास हिनक प्रिय विधा थिकनि। एहि विधामे दर्जनाधिक पोथीक प्रणयन-प्रकाशन करा चुकल छथि। 'बदलि रहल अछि सभकिछु' हिनक सद्यः प्रकाशित उपन्यास छनि जकरा विषयक आधारपर राजनीतिक उपन्यास कहल जा सकैछ। तत्वक प्रधानताक आधारपर ई उपन्यास घटना-प्रधान उपन्यास थिक तथा वस्तुक आधारपर एकरा आदर्शोन्मुख उपन्यास कहल जा सकैछ। किछु विद्वान उपन्यासकेँ मानवक वास्तविक जीवनक काल्पनिक कथा कहलनि अछि। साम्प्रतिक राजनीतिमे जे भ्रष्टाचार व्याप्त अछि आ जकर कारणे राष्ट्रीय जीवनमे जनसामान्यक स्थिति दिनानुदिन कष्टमय भेल जा रहल अछि,एहि उपन्यासमे एही तत्वकेँ विज्ञापित करैत रहब आदर्श नेतृवर्गक अन्वेषणक प्रयास भेल अछि जे समाजसेवाक मूल भावनासँ राजनीतिमे प्रवेश करथि। एहने नेतृवर्गक त्याग,तपस्या ओ  बलिदानसँ एकटा एहन समाजक निर्माण संभव भऽ सकैछ,जाहिमे राष्ट्रक प्रत्येक व्यक्तिक विस्तार संभव छैक । श्री मिश्रजी एहने नेतृवर्गक प्रतिनिधिकक रूपमे शिखाक अवतरण कयलनि अछि जे अपन सुख-सुविधापर ध्यान नहि दऽ समाजमे जनसामान्यक सुख-सुविधाक हेतु अग्रसर होइत छथि तथा असमानता,गरीबी,बेरोजगारी,शोषण आदिसँ  मुक्तिक हेतु संघर्ष करबाक हेतु तत्पर होइत छथि। उपन्यास विधाकेँ गद्यमय महाकाव्य सेहो बुझल जाइत रहल अछि। एहि दृष्टिए विचार कएला उत्तर उपन्यासक रूप पक्ष समक्ष नहि अबैत अछि। एकर कारण ई अछि जे महाकाव्यक रूप स्थिर भऽ गेल अछि जखन कि उपन्यासमे निरन्तर प्रयोग चलिये रहल अछि । अवश्ये एहिमे महाकाव्ये जकाँ विषयक व्यापकता ओ गंभीरताकेँ पूर्ण प्रश्रय देल जाइत रहलैक अछि । श्री मिश्रक ई उपन्यास हिनक राजनीतिक सुधार विषयकेँ अत्यन्त व्यापक रूपमे समाहित कयने अछि । एहिमे आधुनिक राजनीतिमे  व्याप्त जटिलता ओ अन्तर्विरोध तथा ओकर सामाजिक ओ राष्ट्रीय जीवनपर पड़ैत प्रभावक अत्यन्त सूक्ष्म चित्रण भेल अछि । स्वार्थपरता ओ भ्रष्टाचार आधुनिक राजनीतिक विशिष्ट अंग बनि गेल अछि । एकर परिणाम ई भेल अछि जे जाहि राजनेतालोकनिसँ राष्ट्रीय जीवनक उत्थानक परिकल्पना ओ अपेक्षा रहैत अछि,से अपन ओ अपन लगुआ-भगुआसभक सौविध्यक हेतु ततेक तत्पर रहऽ लागल छथि जे जनसामान्यक स्थिति अत्यन्त दयनीय होइत जा रहल अछि । धनीक आर धनीके भेल जा रहल अछि तँ निर्धन अपन आवश्यक आवश्यकतोक पूर्तिमे  असमर्थ भेल जा रहल छथि। यद्यपि प्रजातांत्रिक व्यवस्थामे मताधिकार जनताक हाथमे छैक,मुदा छल-बलसँ ओकरा जाति-वर्गमे तेना विभाजित कऽ देल जाइत रहलैक अछि जे  ओ अपन नेतृत्व एहन लोककेँ दऽ देबाक हेतु बाध्य भऽ जाइत अछि जे केवल अपने उत्थानक हेतु प्रयत्नशील भऽ जाइत अछि,जनकल्याणक दृष्टि ओकरामे रहिये नहि पबैत छैक । तेँ राजनीतिक व्यवस्थामे आमूल-चूल परिवर्तन युगक मांग छैक,तकरे उपन्यासकार एहि उपन्यासमे अभिव्यक्त करबाक प्रति दत्तचित्त भेल छथि । उपन्यासकारक स्पष्ट अभिमत छनि जे जा धरि भ्रष्टाचारी राजनेतासभकेँ एकात नहि कयल जा सकत आ समाजसेवी राजनेता लोकनिक हाथमे प्रशासनक चाभी नहि देल जायत,ताधरि जनकल्याण संभव नहि छैक । तेँ वर्तमान राजनीतिमे परिवर्तन आवश्यक छैक,तखने लोकजीवनमे सुधार भऽ सकैछ आ लोकक पीड़ाक हरण भऽ सकैछ । सभकेँ समानता,स्वतंत्रता आ न्याय तखने भेटि सकैत छैक । ई उपन्यास अपन मूल रूपमे यथार्थवादी अछि । एहिमे राजनीतिमे व्याप्त शोषण ओ भ्रष्टाचारकेँ अपन समस्त विसंगतिक संग उपस्थित कयल गेल अछि,मुदा अन्तमे एहिमे एकटा एहन चरित्रक विजय दर्शाओल गेल अछि जे समाजक हेतु सर्वस्व त्याग करैत ओकर उत्थानक हेतु आजीवन सक्रिय रहबाक हेतु प्रतिज्ञा करैत अछि। तेँ उपन्यास सुखान्त अछि आ निर्मल भविष्यक संकेत प्रदान करैत अछि। एहि उपन्यासक वस्तुविन्यास अत्यन्त सहज ओ रोचक अछि । लेखक तटस्थ दर्शक जकाँ ओकर वर्णन करैत जाइत छथि । एकर आधिकारिक कथा देबन नामक एकगोट नेताक परितः आघूर्णित अछि । ओ अत्यन्त गरीब परिवारक  बालक अछि । ओकर माय ओकर नेनपनहिमे  गत भऽ गेल छलथिन । तेँ पिता ओकर परिपालनमे लागल रहैत छथि । क्रमशः ओ बी.ए. धरि पढ़ि पबैत अछि कि ओकर पितोक देहान्त भऽ जाइत छनि। ततःपर ओ ट्यूशन करऽ लगैत अछि। ट्यूशनक क्रममे ओ समग्र विकास दलक अध्यक्षक बेटी महिमाकेँ सेहो ओ पढ़बऽ लगैत अछि । महिमाक संग ओकरा प्रेम भऽ जाइत छैक आ दुनूगोटे विवाह कऽ लैत अछि । समग्र विकास दलक अध्यक्ष सुमंतजी अपन बेटीक प्रेम विवाहसँ प्रसन्ने होइत छथि । एकर कारण ई रहैत अछि जे ओ अपन बेटीकेँ राजनीतिमे आनऽ चाहैत रहथि मुदा ओकरा राजनीतिमे रुचि नहि रहैक । सुमंतजीकेँ अपन राजनीतिक उत्तराधिकारीक रूपमे अपन जमाय देबन भेटि जाइत छनि। ओ ओकरा पार्टीक कार्यकारी अध्यक्ष बना दैत छथि । एहिसँ पार्टीमे विक्षोभ होइत छैक मुदा चुनावमे एही पार्टीक जीत होइत छैक आ देबन सेहो विधायक बनि जाइत अछि। नेता बनैत देरी देबन अनेक प्रकारक धुरफंदीमे लागि जाइत अछि । ओ अनेक युवकक माध्यमे विभिन्न प्रकारक आपराधिक काजमे संलग्न भऽ जाइत अछि । युवकसभकेँ सेहो आपराधिक काजमे संलग्न कऽ ओकरासभकेँ ब्लैकमेल करैत अपन कार्यसाधन करैत रहैत अछि । एहन तीनटा युवक छथि शक्तिनाथ,संदीप ओ अंकुर । अपना लेल भोटक प्रचारक क्रममे देबन अपन मंचपर बम विस्फोट करबा लैत अछि आ शक्तिनाथ तथा अंकुरकेँ जहल कटबा दैत अछि । एहिसँ ई दुनूगोटे देबनक विरोधी भऽ जाइत छथि आ अगिला चुनावमे देबनकेँ हरयबाक उद्योगमे लागि जाइत छथि । एहि हेतु ई दुनूगोटे विरोधी पार्टीक संपर्कमे चलि जाइत छथि । संदीपक आपराधिक चरित्रक प्रमाण देबन लग रहैत छैक,तैँ ओ देबनसँ अलग रहबामे भयक अनुभव करैत रहैत अछि । मुदा ओकर भक तखन टुटैत छैक जखन ओ नेताजीक खोलल विद्यालयक छात्रावासक महिला लोकनिक ताकछेमक हेतु नियुक्त कयल जाइत अछि। ई छात्रावास वस्तुतःनारी लोकनिक यौन शोषणक केन्द्रक रूपमे चलि रहल छलैक । देबन एहि छात्रावासमे शिखा नामक एकटा शिक्षिकाकेँ रहबाक व्यवस्था सहित विद्यालयमे नौकरी प्रदान कऽ दैत छैक । मुदा देबन ओकर यौन-शोषण करबाक प्रयास करैछ ,तैँ ओ ओतऽ सँ पड़ा जाइत अछि । ओकरा संदीप संग दैत छैक । संदीप सेहो देबनक विरोधमे शक्तिनाथ आ अंकुरक संग देमऽ लगैत छैक । नारीलोकनिक देह व्यापारक हेतु देबन एकटा नारीनिकेतन सेहो खोलने रहैछ । ओहि नारीनिकेतनक भंडाफोड़ भऽ जाइत छैक । सीबीआइ जाँचसँ पता लगैत छैक जे मुख्यमंत्री सेहो ओहि नारीनिकेतनसँ सम्बद्ध छलाह । तेँ हुनका त्यागपत्र देबऽ पड़ैत छनि आ देबन मुख्यमंत्री बनाओल जाइत अछि। शिखा एहि मुख्यमंत्रीक विरुद्ध धरना-प्रदर्शन शुरु करैत छथि । देबन हुनका जानसँ मारि देबाक प्रयास करैत अछि मुदा शिखा बाँचि जाइत छथि । एमहर संदीप नेताजी देबनपर आक्रमण करैत अछि आ हुनका घायल कऽ दैत अछि ,मुदा ओ अपने पकड़ा जाइत अछि । एहि समयमे देबन जाहि महिलाक संग ऐय्याशीमे लिप्त छलाह,सेहो पकड़ा जाइत अछि आ पुलिसकेँ अपन वक्तव्यक माध्यमे ओकर चरित्रकेँ उजागर कऽ दैत अछि । परिणामतः देबनक पार्टी ओकरा मुख्यमंत्रीक पदसँ इस्तीफा देबाक हेतु बाध्य कऽ दैत छैक । ओ अपन स्थानपर अपन पत्नी महिमाकेँ मुख्यमंत्रीक पद प्रदान कऽ दैत छैक । न्यायालयमे नारीनिकेतन काण्डक सुनबाइ भेलाक बाद देबन सहित ओकर कतोक सहायककेँ  आजन्म कारावासक दण्ड भेटैत छैक जाहिसँ ओकर पार्टीक प्रति जनतामे आक्रोश उत्पन्न होइत छैक । महिमा सेहो राजनीतिसँ सन्यास लऽ लैत अछि । परिणाम ई होइत छैक जे शिखाक नेतृत्वमे अंकुर ओ शक्तिनाथ आदिक सहयोगसँ प्रतिपक्षी पार्टीक जीत भऽ जाइत छैक । मुदा शिखा स्वयं मुख्यमंत्रित्व ग्रहण नहि कऽ शक्तिनाथकेँ ओहि पदपर बैसबैत छथि आ अपने जनकल्याणक मार्ग प्रशस्त करबाक हेतु निरन्तर सक्रिय रहऽ लगैत छथि जकर परिणामस्वरुप लोकजीवनमे समृद्धि ओ सुख बढ़ैत चलि जाइत अछि । कथावस्तुक आधारपर एहि उपन्यासमे एकटा आधिकारिक कथा अछि जे नेताजीक देबनक परितःआघूर्णित अछि । एकरा अतिरिक्त अनेक प्रासांगिक कथा सभ अछि जे घटनाक्रमक माध्यमे उपन्यासक उद्येश्यक प्राप्तिमे सहायक अछि  यथा शिखा,अंकुर,संदीप शक्तिनाथ आदिक जीवन कथा । ई कथा सभ उपन्यासक विषयवस्तुक उदय,विकास ओ अन्तमे सहायक भेल अछि । सभटा कथा शृंखला-बद्ध अछि जाहिमे घटना सभक औचित्यक निर्वाह कयल गेल अछि जाहिसँ पाठकीय मानसमे  विश्वसनीयता बनल रहैत छैक । उपन्यासक अधिकांश घटना राजनीतिक विसंगतिक प्रति जुगुप्साक भाव उत्पन्न करैत अछि तेँ ओकर सुधारक प्रति राग सेहो उत्पन्न करैत अछि । एहि उपन्यासमे यथार्थ अपन  प्रखरतम रूपमे प्रकट भेल अछि । राजनीतिन भ्रष्टाचार एहिमे अत्यन्त नग्नरूपमे चित्रित भेल अछि । राजनेतालोकनि कोना जनताकेँ लोभा कऽ,ओकरा झूठक आश्वासन दऽ कऽ भोट मङैत छथि,नेता लोकनिक हेतु भीड़ एकट्ठा करबाक हेतु कोना आकर्षक सामियाना,ध्वनियंत्र,नाच-गान, गीत-वाद्य ओ भोजनादिक व्यवस्थामे पर्याप्त धनक अपव्यय कयल जाइत अछि तकर वर्णन करैत उपन्यासकार लोकजीवनक ओहि लोभग्रस्तताक संकेत दैत छथि जकर वशीभूत भऽ क़ लोक नेतासभक जालमे ओझरा जाइत अछि आ तात्कालिक लोभमे,किंवा जाति-पाँति ओ धर्मक फेरमे पड़ि कऽ ई बिसरि जाइत अछि जे ओकरा अपना लेल केहन प्रतिनिधिक चयन करबाक चाही?प्रस्तुत नेताक चालि-प्रकृति ओ चरित्र केहन छैक? भोट पयबाक हेतु जखन सरकारी दल  बिजली मुफ्त,राशन मुफ्त,भानसक हेतु गैस मुफ्त,गृहणीसभकेँ पाँचहजार पेन्शन,जलखै,चाह आदिक संग निशाँक वस्तु सेहो मुफ्त देबाक आश्वासन दैत छैक तँ एहिमे एक दिस जँ सरकारी पक्षक भ्रष्टाचारक संकेत भेटैत छैक तँ दोसर दिस जनताक लोभ सेहो प्रगट होइत छैक जे सम्प्रतिक लोकजीवनक यथार्थ  थिकैक । तखन जँ विरोधमे भोट देनिहारकेँ अथवा अपन नेताक विरोधमे बजनिहारकेँ  नेता अपन गुण्डासभसँ प्रताड़ित करबैत छैक अथवा विभिन्न प्रकारक अपराधी काजसभमे निमग्न रहैत छैक ,तँ सेहो लोकजीवनक यथार्थे  थिकैक । तथापि यथार्थवादी दृष्टिकोण रखितहुँ उपन्यासकार शिखा सन पात्रक सृष्टि कऽ चरित्रवान नेताक परिकल्पना करैत छथि जकर दूर-दूर धरि कोनो सभावना नहि बनैत छैक। अवश्ये उपन्यासकार एकटा कल्पित आदर्शवादी परिवेश दिस लऽ जा कऽ लोककेँ स्वप्नमे विचरण कराय आनन्द प्रदान करऽ चाहैत छथि । तेँ एहि उपन्यासकेँ यथार्थोन्मुख आदर्शवादी उपन्यास कहल गेल अछि । एहि उपन्यासक कथा संसारक विश्लेषण कयला उत्तर एहिमे निम्नलिखित कथा-धारा स्पष्ट देखि पड़ैत अछि � (१) अंकुरक कथा (२) देबन नेताजीक कथा (३) शिखाक कथा एहि तीनू कथाक मूलमे अछि राजनीतिमे व्याप्त भ्रष्टाचार,शोषण  ओ तकर निदान । एहिमे देबन नेताजीक कथा केन्द्रमे अछि आ सुनियोजित,स्वाभाविक  एवं विश्वसनीय अछि जकरा भारतीय राजनीतिक भाग्यगाथा कहल जा सकैत छैक । शिखाक कथा भारतीय राजनितिक भ्रष्टाचारक उन्मूलनक कथा थिक तँ अंकुरक कथा समाजसेवाक हेतु उत्सुक युवावर्गक वंचनाक कथा थिक । अवश्ये शिखाक कथा राजनीतिक भ्रष्टाचारक मुख्यकथापर साटि देल गेल अछि जे यथार्थपरक नहि हेबाक कारणे मूलकथाक संगे एकीकृत नहि भऽ पाओल अछि आ तेँ लगैत अछि जे लेखक शिखाक बीस वर्षक तपस्याकेँ एके अनुच्छेदमे समेटैत हड़बड़ीमे उपन्यासकेँ समेटैत कहि उठैत छथि- एहि तरहेँ समाजमे परिवर्तन करैत-करैत बीस वर्ष बीति गेल । हमसभ  अपन सर्वस्व समाजकेँ अर्पित कऽ देलहुँ  । मुदा शिखा अखनहु नहि थाकल छलीह । पूर्ण आशावान बनल रहथि । तकर अनुकूल परिणामो देखबामे आबि रहल छल । बालिकासभ डाक्टर,इन्जीनियर बनि रहल छलि । गाममे सभ जातिक लोकक संगे बैसि कऽ खाइत छलाह । धर्म,जाति विभेद समाप्त भऽ गेल छल । समाजमे समरसता बढ़ि रहल छल । लगैक जेना शिखाक स्वप्न साकार भऽ रहल अछि ।� बदलि रहल अछि सभ किछु ।� चरित्र चित्रणक दृष्टिमे ई उपन्यास लोकजीवनक यथार्थक संवेदनशील ओ प्रभावपूर्ण अंकनमे सफल भेल अछि । एहिमे राजनीतिक यथार्थक विद्रूपताक आधारपर सम्भाव्य व्यवहारिक आदर्शक उपस्थापन भेल अछि । अवश्ये एहिमे लोकजगतमे व्याप्त विचार ओ व्यवहारक पुनरीक्षण करैत नैतिकताक एहन चित्र अंकित कयल गेल अछि जकर उपेक्षा नहि कयल जा सकैछ । एताबता ई उपन्यास मैथिली साहित्यमे श्री मिश्रजीक अनुपम देन छनि । सरल-सहज भाषामे रचित एहि उपन्यासक समस्त सुधि समाजमे आदर होयत से अपेक्षा कयल जा सकैछ । ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.लालदेव कामत-जुवराजजीक 'परिचय' एक अनुशीलन, लघु कथा- चिकनठोपा, हमरा बिनु जगत सुन्ना छै: पाठकीय प्रतिक्रिया, स्वनाम धन्य शिरोमणी, पाठकीय प्रतिक्रिया, उपन्यास बनाम वायोग्राफी, दिनकर जीक उत्कर्ष, मिथिला विभूति : खुशी लाल बाबू लालदेव कामत-जुवराजजीक 'परिचय' एक अनुशीलन, लघु कथा- चिकनठोपा, हमरा बिनु जगत सुन्ना छै: पाठकीय प्रतिक्रिया, स्वनाम धन्य शिरोमणी, पाठकीय प्रतिक्रिया, उपन्यास बनाम वायोग्राफी, दिनकर जीक उत्कर्ष, मिथिला विभूति : खुशी लाल बाबू १ जुवराजजीक 'परिचय' एक अनुशीलन

पेशासँ प्राथमिक शिक्षक आ मैथिलीक नवोदित कवि दीनानाथ प्रसाद'जुवराज' केर व्यक्तित्व आओर कृतित्व बहुआयामी अछि। हुनक व्यक्तित्वमे आओर सदाशयता, सहजता, आत्मीयता आ मिलनसारिताक संग विद्रोही स्वभावक चलते अधिकांश रचनामे व्यंगवाण आ कटाक्षसँ परिपूर्ण देखाइत अछि। पल्लवी प्रकाशन, निर्मलीसँ 2019 इस्वीमे सद्य प्रकाशित परिचय मैथिली काव्य संग्रहसँ मातृभाषाक साहित्य सेवामे हिनक फरिच्छ योगदान भेलइ । 'परिचय' मे संगृहीत सभ (51) कविताक आखिरीगे अर्थ विशेष सेहो देल गेल छइ, जइसँ पाठक आ विद्यार्थीगण सहजे विषयक गम्भीरता बुझबामे आबि जाइ छ। एहि पोथीमे पारिवारिक पृष्ठभूमिक परिचय सेहो भेटैत अछि। ऐ पोथीक स्वीकार्यता वृहद् स्तरपर होएत। एतबे कहब जे ओ मैथिलीमे अबैसँ पूर्व हिन्दीमे रचना गढ़े छला आ फेर अनुमान यएह जे ओ बाबा महर्षि मेंहीजीक आ जेना कि श्री रघुवीर मोचीजीक अभिमत आ अर्धनारीश्वर उर्फ श्री गिरजा नन्द झाजी सेहो लिखने छैथ। क्रम 26पर परिचय कवितामे प्रस्तुत रचनासँ कविजीक अन्तर आत्माक पुकार सेहो परिलक्षित। होइत अछि। तए एहि सन्दर्भमे कवि महोदय विशेष मेहनत कए फेर श्रमसाध्य मैथिली सेवामे लागि अपन एक पोथीक 'व्याख्याटीका' रूपें प्रकाशित करेबामे सफल भेलाह अछि। हिनक व्यक्तित्वक विशेषता थिक जे काव्य शिल्पकें प्रांजल, भाव प्रवण, ओजपूर्ण आ माधुर्यमय बनबैत अछि। हुनक शिल्पर्के भाव केर अभिव्यक्त सहज संप्रेषणीय भेला सन्ता स्वयं दैनिक जीवनमे सेहो अत्यन्त सरल व निश्चल आ वैष्णव छैथ।

परिचय पोथीक पछिला कवरपर हमर अभिमत एहि तरहँ छपल रहए, जे द्वितीय संस्करण नवारम्भसँ मुद्रित प्रकाशित भेलासन्ता हटा देलासँ आब एहि महत्वपूर्ण पोथीक चर्चा प्रायः नहि भऽ रहल अछि। जखन कि किछु कविता यू-टयूबपर दर्शक देखि सुनि सव्सक्राइव बढ़ा रहल छइ । प्रस्तुत समकालीन काव्य पोथी 'परिचय' केर रचनाकर श्रीमान् दीनानाथ प्रसाद, जिनक साहित्यिक नाम जुवराज' छिपेन; एक नवोदित प्रखर मैथिली कवि छैथ। हिन्दीमे ई हम्मर पुरान परिचित (1922-93 ई.) इथिए। हिनका बारेमे ई कहब जे निष्ठावान युवक आ निर्मल-सरल हृदय केर भावुकता प्रधान आ विद्रोही विचारधाराक व्यक्ति छैथ। तें हिनक काव्य सौष्टव पाठककै मुग्ध करैत अछि। अल्पायुक रहितो हिनक मौलिक लेखनी आध्यात्मिकतो दिस अवाह रूपें गेल अछि आ स्त्री-विमर्शक लेल हिनक बहुतोरास कवित्व धारा सामाजिक सरोकारसँ जुटल सेहो उठेबते डेगसँ थाही देखवे छइ । संगहि एकावन काव्य संख्यामे ई भरिगर पोथी विविध विषय (देशभक्ति, राजनैतिक, सामाजिक, आध्यात्मिक आदि) पर गेयात्मक-मंचीय कविता अछि जे बिनु मनन केले पाठक वर्ग परैख नहि सकता। एहि उत्तमकोटिक रचनाकै जे विभिन्न भाव आ रससँ सराबोर अछि अपने एकरा बिनु पढ़ने रहि नहि सकब

निक व्यक्तित्व एवं कृतित्व मादे निम्नांकित विद्वज्जन अपन विचार एहि तरहें व्यक्त केने छैथ- डॉ. कृष्ण चन्द्र झा 'मयंक' पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष सीएम कॉलेज दरभंगाक कथन 'हिनक काव्य रचना उच्चतम कोटिक छैन, आ तइमे भाषाक लयात्मक हम सेहो प्रशंसक छी। ग्राम गौरवक रचियता रामचंद्र मिश्र 'मधुकर' पूर्व मैथिली विभागाध्यक्ष ल.ना.मि.वि. विद्यालय दरभंगा क कहब छेलैन-जुवराजकें मैथिली कविता नवीनतम आ विविध विषयपर गहराई धरि गेल अछि, जइसँ सद्य: प्रेरणा प्रस्फुटित होइत अछि। मैथिली साहित्य अकादेमीसँ पुरस्कृत �पंगु' उपन्यासक लेखक जगदीश प्रसाद मण्डलजीक कथ्य छैन्हि' जुवराज केर मैथिली परिचय काव्य संग्रहक कविताक पाठ कर रसपान श्रीकृष्ण केर 'गीता' सदृश्य अछि। डॉ. शिव शंकर श्रीनिवास केर कहब भेलेन जुवराज केर कवितापर ध्यान देव व विचार करब आवश्यक छड़ा हिनक कविताकें नजर अन्दाजसँ काज नहि चलत। हिनक पोथीमे रघुवीर मोची आ डॉ. इन्द्रकान्त झाक अभिमत एवं अर्द्धनारीश्वरजीक स्वास्तिवाचन छपल पढ़े जोग अछि। पोथी पढ़ि पाठक हैसियतसँ एक कवि डॉ. आर बी कामत बजला, आई जज साहेब नामसँ भलहिं सहोरबाक नाम जानल जाइछ। मुदा जुवराजक नामसँ गामहि ने वरन कोसी क्षेत्रक नाम सेहो जानल जाएत।

२ लघु कथा- चिकनठोपा

बौकू केर नाउ समरथ धरि जानि नै सकल सबकियो। ओ ढ़ेरबा उमेर धरि मूक- बधिर रहय। अपन संगतिया आ सहमेलू लग तोतराइत बाजय। लखन मास्टर सँ सीखय गेल ढ़ोलक बजौनाई से अपने तन बाजय लागल बोल मुदा ढोलकेँ कयलक बौक। बालपने सँ मम्हरामे बैसि पचही परगाना बियाहो मोटगर कनियांक सँ भेलैन। बलेसर,नेबतिया जाए छलैक बनारस कटे ले। ओहो पछोर धरैत पहुंच गेल आ बेचूक डगरमे रिक्शा चलाबय। अपना गामक काजो कुजरा आ महीदिन मोमीन सँ आत्मीयता बढ़ाय,ओहि औरंगाबाद'क पानिटंकी बाला मालिकक डेरामे ओकरा सब संग रहय लागल। कैंचा कमाइत,निचेन सँ रहैत तन पर चुहचुही देखाय लगलैक। रातुक करनिनयां सँ जागि उठा बासन छउअय गेल तँ ढ़नमागेल हंडी-लोहिया। ता हिन्दू बौकू केँ देखैत य बड़ा मौसक तीमन का सुसुआईत। मोहम्मद साफी अपन केहुनी सं काजबा कें टुसकेलक। आ बाजल देखह हो बेरादर ई बौकू सुसुआईत की सुवादैत छैक! सब हिन्दू- मुस्लिम, रसे-रसे जागि गेल आ ओकरा डांटैत तमसाएल। तँ ओ घटि मानैत कहलक हौ हम तँ चिकेन गोस्त बुझि सब राति बचलाहा निचेन सँ पबैत रही। आब की हो! एहन जुलूम बात मिथिला गाममे नहिँ बजइहए कियो। नाक कान पकैड़ उठक बैसक धरि केलक। पंच सबके समक्षे चिकैन मांटिमे सर्दी बुकनी मिलाकय टाका लेलक आ लेलक माछ- मौस बारैके किरिया। ता आलापुर सँ फोन गेलै - बौकू 'क माय नारेदिगरमे मरि गेलै से गाम पठा दियौ ओकरा। बौकू अपन घर सँ बपहर ई कहिके रोज जाए जे गैत कर्म देखय सुनय जाई छी। ओतय परंच ओ कहियो नहि पहुंच,गामक पुब भंगी पिपर पर चढ़ि समय गुदश कय सांझमे घर आबि जाए। भोजभातो मेँ होटले रहल,करबे नै कयल। धरि मीता झा सँ कंठी पहिर चिकनठोपा बनि कीर्तन मेँ जाए।

३ हमरा बिनु जगत सुन्ना छै: पाठकीय प्रतिक्रिया

कमलाक कल-कल धारा आ शोकनदी 'कोसी'सँ ग्रसीत तिलयुगाक तट पर अवस्थित रसुआर(सुपौल)गाममे पहिलौ मैथिलीक लेखक विद्वान भेल रहथि जे दरभंगाक प्रवासी भ' गेलाह। ओहिठामक समरजीत कुमारके सेहो मैथिलिक रचना कोशी संदेश में देखने रही। मुद्दा ई नहि बुझल रहय जे महिसबारक हेंरमे आ किसानों बीच हेरायल श्रीराम देव मंडल 'झारुदार' छथि,जिनक काव्य रचनावलिक मैथिली पोथी"हमरा बिनु जगत सुन्ना छै" श्रुति प्रकाशन दिल्ली सँ२०१२मे प्रकाशित भेल छैक। सद्यप्रकाशित एहि पोथीमे१२८टा पन्ना,जकर दाम २५०टाका य।से पढबाक अवसर आई भेटल अछि।आठटा पाठ एहि संग्रहमे पाठक केँ भेटत। सुपरिचित झारु नव विधाक साहित्य सृजक श्री रामदेव झारुदार जीके एहि पोथीकेँ पढलासँ ई स्पष्ट होइछ ई एकटा संजीदा हस्ताक्षर छथि जे अपन भूमिका बढ़ चिकन जेकाँ निर्वाह केलाह हन्।अपना रचनावली केँ ओ दोहाक जगह झाड़ु कहलनि अछि। हुनके अनुसारे एहि बिहार आ मिथिला मेँ वर्तमान मेजे विकटता छैक,तकर सुधार समयसँ होय जाहिसँ सम्पूर्ण भारतमे संदेश जेतैक ।एक तरहेँ पुरान आख्यानके सम्यक सीमामे लोकभावना जागृत भए सुन्नर बनय आ जे समस्या सब जकरल छै तकर समाधान सेहो अपना मनोभाव केँ कलमक रफ्तार दए निखारलनि अछि। हुनका प्रति दुर्गानन्द मंडल कहैत छथि झारुदार जी आश्वस्त छथि जे ग्रामंचल सँ नगरधरि लोक सुसंस्कृत दंगे मानवीय पक्षधरता बनय, अपना झारू- खड़रा आ बारहनि सँ साहित्य में जमल गन्दगी के सेहो बहारिसुहारि स्वच्छ करयमें आगू अयलाह आ हिनक गेयात्मक मंचीय काव्यधारा मीठगर कंठ सँ बहरायल मिथिलाक आवाज छी। हिना किछु पांति द्रष्टव्य अछिः- जागु बाबु आबु आगु जीया पर करु विचार यौ केना जीयब की प्रदुषण में श्रृजनहार बेमार यौ। भू जल वायु ध्वनि प्रदुषण दुःख दुनियाँमे अपार यौ केना बांचब ऐ काल गाल सँ..... .दोसर एकटा पुरनका गीतक-ः लोभी लालची राज करै छै फुहर गाल बजाबै छै लुटि-लुटि बोली जनताकेँ अप्पन घर सजाबै छै। पग-पग पसरल हेरा-फेरी काम छै काला मुंह छै गोरी काला धन पर उतरा पालिसी..... ..दारू रामायण सँ-= पहिले वंदना गुरु चरण मे, दुजे चरण शंकर भगवान। दूनूठाम चरण कहीं केर नीचां, स्वीकारु शत् शत् प्रणाम।। झारूदारजीक रचनाशिलताक तेज आरो परिष्कार होयत से हमरा पूर्ण आश जगैत य।एहि पोथीक पछिला कमर पर साहित्यकार गजेन्द्र ठाकुर जीक हिनका मादें अभिमत छपल छैक।

४ स्वनाम धन्य शिरोमणी

प्रो० जगदीश नारायण चौधरी जीक जन्म मधुबनी जिलाक विक्रमशेर गाममे 10अक्टूबर 1928 ई० मे भेल छलनि। ई हिन्दी साहित्य आ संस्कृत - अंग्रेजी आओर मैथिलीक पैघ विद्वान छलाह । जे० एन० काॅलेज- मधुबनीक प्राचार्य रहथि ।संगहि अध्यात्मिक प्रवृतिक बैष्णव छलाह ।भोजन सँ पूर्व बहुतदेर धरि पूजा आ ध्यान करथि । सन् 1953 मेँ हिन्दी विषय सँ केवट जातिक पहिल एम० ए० भेलाह । हिनक जाहि परिवेश मे जनम भेल ताहिकाल सँ अद्यतन एहि समाजक विधार्थी जौ' द्वितीय श्रेणी सँ उत्तीर्ण होयत छैक तँ बूझू जे सम्पन्न अभिजात वर्गक विधार्थीक प्रथमश्रेणीक समान होईछ । से हिनको 1947 में मैट्रिक 51% सँ डिप०इन०एड० 1959 ई० 52% धरि सेकेन्ड डिविजन होइत रहलैक। आई ए० 1949 मे 51% बी०ए० आनर्स हिन्दी 1951 मे 56% अंक सब शिक्षा पटना विश्वविद्यालयक अधिन भेल रहैक। 1942 ई० केर भारत छोड़ो आन्दोलन मे सक्रिय भूमिका निभेलनि वर्षोवर्ष भूमिगत, स्वतन्त्रता सेनानी सम्मान पेंशन धारि भेलाह। 1946 से 52 धरि खजौली थाना कांग्रेस कमिटीक सदस्य रहलाह। 1947 में पण्डौल सत्याग्रह मे गिरफ्तार भेलासन्ता मांग पूर्ण भेलापर स्वाधिनता पर रिहा भेलाह। कांग्रेस आजादी प्राप्ति लेल गठित भेल रहय तेँ 1952 मे एहिसँ इस्तीफा दैत पीएसपी� केर सदस्यता ग्रहण कयल। 1953 सँ 17-06-1959 किसान उ�वि� बथनाहा (ससुराइर ग्राम) में प्रधानाध्यापक आ� 1959 में जगदीश नन्दन काॅलेजक हिंदी व्यख्याताक कार्य भार ग्रहण केलनि। 1971 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी सँ झंझारपुर, मधुबनी पूर्वी क्षेत्र सँ संसद केर चुनाव में 32 हजार सँबेसी वोट आनलनि। 1972 मे दरभंगा जिला संयुक्त समाजवादी पार्टी क' जिलाध्यक्ष निर्वाचित भेलाह जे मधुबनी जिला बनलापर कायम रहलाह। 1975 में मीसा�केर तहत भूमिगत भए प्रशिक्षक केर काज नव कार्यकर्त्ताक मार्गदर्शक रहलाह। 1977 में जनता पार्टी सँ झंझारपुर विधानसभा क्षेत्र सँ चुनाव डाॅ� जगरनाथ मिश्र तत्कालीन मुख्यमंत्री विरूद्ध लड़लाह आ 25 हजार के लगधक मत प्राप्त केलिन। व्यापक धांधली सँ चुनाव मेँ पराजक भेलैक। 1978 में जनता पार्टीक राज्य कार्यकारिणी डेलीगेट भेलाह जे जनता दल बनैत काल धरि सक्रिय कार्यपालक भूमिका निर्वहन मे लागल रहलाह। एहि साल वो ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालयक सीनेट सदस्य निर्वाचित सेहो भेलाह। 14 नवंबर 1980 के रीडर (उपाचार्य पद पर) मे प्रोन्नति भेलाह। 1 फरवरी 1985 केँ प्रिंसिपल (प्रोफेसर) केर पद पर प्रोन्नति पावलिथ ताहि सँ पूर्व 1 जनवरी 1984 सँ प्रधानाचार्य के रूप में कार्यरत रहथि। समाजिक असमानता आ आन कुरितिक खिलाफ हरदम सम्यक प्रयास अपना जनैत करैत छलाह। अपना गाम मे 1953 में मध्य विद्यालय स्थापना केलनि। बथनाहा मे हाईस्कूल खोलेबाक मुख्य भूमिका आ संचालन करैत रहलाह। जे�एन�कॉलेजक अतिरिक्त 10 साल बाद 1969 मे दोनबारीहाट (खुटौना) मे महाविद्यालय स्थापना संचालन में प्रमुख दायित्व निभेलथि। 1974 सँ राज्य सरकार द्वारा अधिग्रहण होयबा तक मुक्तेश्वर जनता उच्च विद्यालयक सचिव पद पर संचालन करैत रहलाह। क्रिमिलेयर परिवार मेँ कतोह झगड़ा बजरलैक तँ खूनी संघर्ष के फरियेवा में समय दैत शांति व्यवस्था स्थापित करना में सेहो यशकृर्ति बढलनि। झंझारपुर (बिहार) सँ 2000 में राजद के विधायक प्रो. चौधरी जी 90 के दशक में कांग्रेस पार्टी सँ झंझारपुर लोकसभा क्षेत्रक चुनाव लड़ि भारत में कांग्रेसक हारय वाला उम्मीदवार में सबसँ बेबी वोट पावियो दोसर खेप टिकट सँ वंचित रहि गेलाह। तकर बाद जार्ज फर्नांडिस केँ कहब पर समता पार्टी सँ पुनः लोकसभा झंझारपुर क्षेत्र सँ चुनाव लड़ि अढ़ाई लाखक लगधक निर्णायक वोट बटोरलनि। 2005 में समता पार्टीक टिकट लौटाबैत एहिपाँतिक लेखक प्रो�जगदीश बाबू लेल एहि क्षेत्र सँ हटि गेल। चौधरी जीके जीवन पर्यन्त अधिक पिछड़ल तनका अपन अभिभावक मानैत रहलैक। ओना समाजिक आकर्षण हुनका प्रति सब वर्गक रहैक। कॉलेजक कोनो साहित्य विषयक लिजर घंटी के ओ डे बथि छात्रगण केँ थथमारथि। ताहि विद्वता लेल छात्रगणक नजैर में श्रेष्ठता मेधा ग्रहण केने रहथि। एहन यशस्वी व्यक्तित्वक स्वर्गीय बुन्नीलाल कामति जीक चतुर्थ सुपुत्रक एहि धरा धाम सँ रूग्नावस्था में 3 जनवरी 2015 के सदाके लेल परलोक सिधारब अनचोकेमे सिरहा देलनि। विनम्र श्रद्धांजलि संग हुनका नामे शत्-शत् नमन। ( 1991 में श्रेध्य जगदीश बाबू हमरा सन अदना आदमीक बुलावा पर सहजे आबि जिला स्तरीय नेहरू युवा केंद्र वाॅलीवाल खेलकेर टुर्नामेंटक उद्घाटन कयने रहथि से हुनक महानता चिरस्मरणीय रहत )

५ पाठकीय प्रतिक्रिया

क्षुधा मेरीजननी "हिन्दी" कविता संग्रहमे ५४ वर्षीय प्रखर कवि दिनकर कुमार जी ८१टा काव्यक रचना कयलन्हि अछि।जाहिमे अनुक्रम ९पर एक शिर्षक भेटल 'क्षुधा मेरी जननी' । एहि कविताक नाम पर ९६ पृष्टक पोथीकेँ प्रकाशित २०११मेँ करबाक यश भेटलनि जयपुर'क सोंधी प्रकाशन केँ।कविजीक विशेष आग्रह पर मात्र ५० टकादाम सद्यप्रकाशित पोथीक राखल गेल छैक,जे अपन पत्नि ममता आ पुत्री सागरिका ओ जयश्री तथा पुत्र सिध्दार्थक लेल समर्पण पन्ना पर स्थान देने छथि। ISBN प्राप्त पोथीक रचैता श्री कुमार जीक गामसँ हमरा पुरान परीचय अछि।ब्रह्मपुरा, मनीगाछी ( दरभंगा) एहि गामक कानूनगो बद्री ठाकुरजी'क घरपर स्व० कर्पूरी ठाकुर जी आ स्व०रामफल चौधरीजी (भुतपूर्व राज्यमंत्री) गेल रहथि।चौधरी जीके पुत्र केशव जीक शादी सेहो मंडील लग भेल छैक। आओर कबीर विचारधारा'क शिवजी चौपाल घोघरडीहा केर पूर्व बिडीयो साहेवक पैतृक गाम सेहो छी। स्व० विपिन्न कुमार दत्त सन बहुतो चिन्हारे छथि।हम गप्प करय चाहैत रही प्रख्यात कवि दिनकर जी सँ,परंच ओ असाम गेल रहथि।आसामिया केर ओ ४०पुस्तकक अनुवाद केने छथि। हुनकर दू कविता संग्रह,एक उपन्यास आ दू जीवनी बहुचर्चित भेल छैक। दिनकर कुमार जी केँ बहुतो राश सम्मान आ पुरस्कार भेट चुकल छैन। तेँ कोनो नव परिचय केर मोहताज नहिँ छथि। कलमवीर कविजी समाजमे पछुआयल लोकक अभावके सेहो अपना काव्यमे चित्रण केने छथि।हुनक किछुपाँति एहि तरहेँक होईछ-: .,........,..सिखाया था बचपन ने मुझे जब साग उबालकर परोसा जाता था पड़ोस से भेजी गई जूठन पर टूट पड़ता था किसी भुखे पिल्लेकी तरह .............. ‌हुनक तीक्ष्ण नजैर कतेक गहींर छैक से एहि कविता केँ पढला पर पाठकके भेटि जाइत य। ७२ फिटक अंतरिमे भुखक दरद जे अन्न बिनु टिरूवाईत रहैत छैक, आ ताहि दिन सांझ समय आँगनमे अकाश दिश निहारैत ताराके देखि भरि राइत काटल जाइत हौ। दोसरो दिन लतामक ठुर्री आ चुलहिक पाकलमांटि चिबबैत बिस्कुटे जेकाँ खाइत समय खेपल गेल। परंच दाना उत्सव धनिके लेल पावैन मनाओल जाइत रहैक।तारा देखि जी स्वत: ठोर केँचाटबाक सतत् परिचालन सँ तृप्त कोना होऊ।कहियो-कहियो पाठशाला सँ टिपिनक छुट्टीमे जोगीन्दर जीक मोदी दोकान सँ हरिण मास्टर जेकाँ नून चुटकीभरि मांगि मुँहमे दैत लोटाभरि जल गटाघटि पीवल जाई। क्षुधाक कारणेँ पालन एवं पैघ वयस होइछ,इयह भीतर जठराग्नि उत्पन्न करैछ। तेँ फौलादी होयब;क्षुधाक संतानों में लोक आ क्षुधा लोकक ममतामयि माय सेहो कहबैछ। कतबो नीकनिकुत बौस्त होय ताहिसँ की! अघायल रहने खेयबाक क्षुधा नहिँ होइत छैक।बदहजमिक शंका सेहो न रहि जायत! हिनक एकटा दोसर कविताक किछु वानगी देखल जाऊ-: दयनीय नागरिक ज्यादा से ज्यादा कर ही क्या सकता है गालियां दे सकता है मौसम को महंगाई को वजट को कोस सकता है अपनी किस्मत को .......... पोथीक कलेवर आकर्षक छैक। पृष्ट ७पर 'फूलों की बारिश'सँ शुरू भेल आ पृष्ट९६पर"नए इलाके में"पर आखरी काव्य दृष्टिगोचर होयत। आवरण छायाचित्र थीक-मायामृग केँ। हम हिनक मैथिली भाषा ले काजक प्रति आशान्वित रहब।

६ उपन्यास बनाम वायोग्राफी

मिथिलांचल के जनता लेल सिनेमा कोनो नव वस्तु नहि अछि । भारत सहस्रो सालसँ नाटक परम्परा चलि अबै छड़ आनो देशमे भरि राति नाट्यसँ मनोरंजन करबाक देखबाक मण्डली रहइ । ग्रीस आ रोम नाटकक प्रसिद्ध रंगस्थली छल तेकर स्थान आधुनिक कालमे चलचित्र लेलक एकर अविष्कार अमेरिका निवासी मिस्टर एडिशन सन् 1890 इस्वीमे केलेथ दादा फाल्के भारतमे हरिश्चंद्र फिल्म 1912 इस्वीमे बनीलैन जे अवाक् अर्थात मूक चलचित्र छल। 1928 इस्वीमे बाजेबला चलचित्रक शुरूआत भेल जइमे मनुषे काँ बाजब, हुक्का पीयब देखि गरीबो - देहाती दर्शक नेहाल भेलइ प्रथम एहेन फिल्म 'आलम आरा' 1931 इस्वीमे मुम्बइ केर इम्पिरीयल फिल्म कम्पनी बनौलैथ । देशमे युवा पीढ़ी जइ गतिये सिनेमा दिस दर्शक बनबामे आगू बढ़ल, तइस एकर सर्वप्रियता स्पष्ट होइत अछि सिनेमा घरमे पौराणिक, ऐतिहासिक आ सामाजिक फिल्मसँ हिन्दू, मुस्लिम, सिख इसाइ, पारसी, बौद्ध आ धनिक- गरीबमे समरसता बढ़त गेलइ । अइसँ भाषाक प्रचार ओ विकास सेहो जन- जनमे होइत रहल। यह परेखि का मैथिली सेवा लेल मैथिलीमे पहिले फिल्म बनल' ममता गाबए गीत'; तेकर बड़ नमहर सफरनामा छइ ।

श्रीकेदारनाथ चौधरी कृत मैथिली पोथी 'क हिन्दी भाषान्तर' आवारा कहीं का' संस्मरणात्मक उपन्यास केर अनुवादक छैथ कुमार परिमल इंडि इन्फोमीडिया जनकपुरी नइ दिल्लीसँ 2013 इस्वीमे प्रकाशित 136 पर = पोथी' क दाम 125 टाका छइ । एकर प्रकाशनक सहयोगमे लहेरियासरायक आशुतोष कुमार छैथ। पोथीक मादे साहित्यकार श्री रामलोचन ठाकुरजी कहन छैथ- 'आवारा कहीं का एक आवारा की कथा- गाथा है। अद्भुत, अभिनव अविस्मरणीय कथा - गाथा ! अफसोस कि मिथिला- मैथिलीमे ऐसा आवारा दूसरा नहीं हुआ। यदि दस-बीस भी ऐसा आवारा हुआ होता तो निश्चित ही आज मिथिला मैथिली का दूसरा ही रूप होता ये आवारा हैं अपने प्रिय बन्धु महंथ मदन मोहन दासकें साथ केदारनाथ चौधरी' एहि पोथीक भूमिका रूपें मिथिला विभूति श्री महंथ मदन मोहन दासजीक सुपुत्र आशुतोष कुमार लिखने छैथ- 'मैथिलीक पहिले फिल्म' ममता गाबए गीत' के निर्माण कथा केर अन्दरुनी आ सम्पूर्ण कहानी मातृभाषा मैथिली पुस्तक रूपमे 'अवारा नहितन' शीर्षकसँ 2012 इस्वीमे बहराएल, जेकर हिन्दी अनुवादमे पितातुल्य चौथापनमे केदार बाबू हुकूम केलेन से एहेन बुजुर्ग मनोः नहि कऽ पबै छी । ओ पिताजी क अभिन्न मित्र छथिन आ हुनकेसँ जानि हम आब मिथिलाक गौरव बुझि सकलौं । बाबूजी एहि फिल्मक बारेमे हमरा कहियो किछु नहि कहने रथ ।

मैथिली फ़िल्म अकादमी - दरभंगा (बिहार) सिनेमाक 50म् वर्ष पूर्ण बाक उपलक्षमे 'माइफा सम्मान' लेल मञ्चपर हमरा हुनक पुत्र हेबाक नाते बजा कए सम्मान पत्र 'ममता गाबए गीत' लेल देलैन तँ गर्वसँ प्रफुल्लित भेलौं । मैथिली टो-टाकेँ पढ़ए बला खातिर हरहराकें हिन्दी पढ़ि सकए तइले पोथीक हिन्दी भाषाक उपयोगिता सम्पर्क हेतुए आओत । स्व. महन्थ मदन मोहनदासजीक सुपुत्र एहि पोथीलेल वरिष्ट पत्रकार विजय कुमार मिश्रक एहि लेल आभार केलैन । जे ओ सभक फोटो आ गीत उपलब्ध करौलकैन । प्रकाशक अरविन्द गुप्ता आ प्रूफ संशोधन केनिहार अनुवादक कुमार परिमलजीक प्रति कृतज्ञता धरि केने छैथ। एहि फिल्म केर पूर्वमे दुरदर्शनपर प्रसारण भेल अछि । फेरोसँ धारावाहिक रूपें टी.वी. पर प्रसारणक आवश्यकता भेल अछि।

गामक सभ कियो काका सहित हुनका केदार भैया कहै छैन । हुनका वार्तालाप आ दोसरो गोटेसँ अन्तरंग गप्प कएल, अनुभव प्राप्त करैत जे लेखन कार्य एहि प्रकाशित पोथीमे छड़ से बड़ रोचक ढंगे आ हास्य विनोद पूर्वक प्रस्तुति छ तँए उपन्यास पतकाल पाठक वर्ग 60 साल पहिलुका स्थितिमे सहजे चलि जाइत रहता । मिथिला राज्य बनइ, ताथैर मैथिली अष्टम अनुसूचीमे नहि शामिल भेल रहै; तइले जेतेक नीक परियास जे सभ केलैन । से कउली बाबू मादे पारंगत रूपें दृश्य सोझा उपस्थित होइत अछि । मैथिली पत्रिकासँ जन-जनमे प्रचार-प्रसार होइ आ मिथिलाक्षर सेहो सिखौल जाइत, एहि लेल स्कूल धरि खोलबाककें परिकल्पना लऽ कऽ, सोशलिस्ट नेता आ स्वयंभू, विदेश क पी-एच.डी. धारी अहर्निश मैथिली सेबक (लखन) सँ भेंट कएल जाइ। तइ विचार लऽ कऽ टने झा, टमाटर लाल आदिसँ सेहो सम्पर्क होड़ छड़ बोआ उर्फ बाबू नारायणजी चौधरी लग फेर सभ दास्तानक विस्तारसँ उल्लेख भेलइ । स्वाधीनता सेनानी चौधरीजी 15 अगस्त 1947 इस्वीकेँ भारत स्वतंत्र भेलापर जहलसँ बहरेला सन्ता गामे धेने छैथ। आओर राजनीतिसँ सन्यास लेने ग्राम बासिक मार्गदर्शक बनलटा छैथ। तँए गौआँ सभ निर्विरोध प्रथम मुखिया बना देने रहइ । मिथिला महिमामे पोखरिक घाटपर केर बैसार आ गामक बड़का दलानपर सांस्कृतिक कार्यक्रम' क चर्चा केना नहि होइ, सेहो अय पोथीक आभा थिक । केदार भैया मैट्रिकसँ एम ए. (अर्थशास्त्र) तक जे अध्ययन केलैन । तइ मध्य हलुके-हलुके रोग लगले जे कालान्तरमे बढ़त ई मैथिली प्रेम रोग गसिया कऽ पकड़ लेलकैन । जेकर चर्चा करैत ओ अपन मित्र महंथ मदनमोहन दासजीक डेरापर भेंट करेत गप्प खोललेन ओठाम मैथिलीमे एकटा फिल्म बनए आ भाषाक सुलभ प्रचार होअ से निठाहे योजना बनलै; जखन कि आर्थिक व्यय बेसी हेबाक डर रहइ । महन्थजीकें आत्मज्ञान रहेन ओ बुझलखिन अंगरेजी शासन तँ मठकें जमीन केए बरकरार ओइ तरहें राखल, जेना मुसलमान शासक जागीर दैत संरक्षण केने रहइ । परञ्च आब देश स्वराज भेलापर जमीन्दारी उन्मूलन भऽ रहले आ महंथाना सेहो कमतर होइत मिटत । एजयोक बोहाक मैथिली सेवा केनाइ अर्थात् फिल्म बनौनाइ महंथजीक अभिष्ट रहल । हुनकर मित्र केदार नाथ चौधरीजीकेँ गाममे चारू भाँ हिस्सदारी आ से पुतइ मोजाक जमीन बँटबारा आ पैघ नोकरी (केल = डायरेक्टरी) मिथिला कमिटि समिति आ मैथिली श्रेष्ठजनसँ मदेत केना भे कोन तरहैं फिल्म निर्माणक दतचित्त अनुभव हुअए; तइ सभ लेल बड़ पापड़ बेलैन । राजनगरमे समैयक लंबा अन्तरालपर दू सत्रमे फिल्माएल गेल दृश्य देखबाकाल जे वृतान्त सभ भेल रहे सएह लालित्यपूर्ण रूपें आ हास्य-व्यंग्य रूपें लेखक जेना अपना वायोग्राफी धरि लिख देलैन हेन । तँए उपन्यास' क विन्यास बड़ बेश भेल छइ । मुम्बइ आ कोलकातामे जे घटना सभ घटित भेल, तेकरा मोनपारि सभ तहेतह तथ्य आंकड़ावद्ध प्रस्तुति देखि एहि पोथीक उपादेयता आरो परिष्कार बेसी भेल छइ । फिल्मकें महन्थक रूप रौलमे निर्माता भानुबाबू (रहुआ संग्राम) स्वंयमे हीरोक रोल अधबेसूमे केलेन, जखन कि हीरोइन अजरा कोमलांगी अतिसुन्दरी नवयुवती होलीवुडक प्रसिद्ध अभिनेत्री जे हर तरहक सीन दैलेल तैयार; परञ्च मौसीक विचारमे एकमत । तखन कैमरामैन प्रसादजी अपन अनुभवक गप लेखककें अपनापनमे सभ बुझा देलकैन । कारण हिनका सभकें एक तरहेँ अनाड़ी देखलकैन । आ खर्च तँ डबल भेले जे बड़का हिन्दी सिनेमामे जेतेक होइत रहह । ॐ गंगा मइया तोहरे पीयरी चढेबी' जाँ मैथिलीमे सामाजिक फिल्म नहि पहिल धार्मिक फिल्म बनेत तँ खर्चा अदहा लगिते आ श्रद्धांश दर्शकोक कमी नइ रहिते जेतेक टाका खर्च रजि. 'नेहर भेल मोर सासुर' फिल्म जे पटना स्टीमरपर ममता गाबए गीत ' शीर्षक नाम ' कमल नाथ सिंह ठाकुर सुझेलैन। तेतेक टाकामे ओइ समय चारिटा फिल्म ई लोकनि आंचलिक ओ धार्मिक बना का कीर्तिमान स्थापित कऽ सके छला उमेरदराजक गप्पकै शिष्टाचार मानि आँखिमुना बनल रहलासँ मैथिलीक ठहराइ गेल, जखन कि उत्कर्ष पेयबाक समुचित प्रबन्धन रहइ । ओइ समय सोनाक भाव (1964) मे 163 टाका प्रतिभरी रहइ । तीनटा नाम-टंचजी, बिछूजी आ खगाजीकै चरित्र चित्रण पोथीमे सारगर्भित रूपें भेल छड़ गीतकार रवीन्द्र नाथ ठाकुर'क गीत एहि फिल्ममे प्रशंसा पएल, सेहो बतबै छी । पहिले ई सुनिश्चित जानि लिअ जे हिनके सद्पासँ बादमे पाइकौड़ीक ओरियान भेला सन्ता लसकल मैथिली फ़िल्म चलल- बनल; ई खूब एहि प्रसादे कैंचो कमेलैन । से आत्म सुखक बात भेल। आत्ममुग्ध महंथजीकें एहू लेल आखिरीमे भेलैन जे चौधरीजी विदेशमे नौकरी करए धरि गेला आ आब लेखकीय काजसँ मैथिली प्रेमीमे यश प्राप्त करे छैथ। आखिर सोलह आनामे दूआनाक शेयर भागीदार जे रथ । ममता गाबए गीत पहिले फिल्ममे पाँचटा गीत छै जे क्रमश: अर्र बकरी घास खो, छोर गठुल्ला बाहर जो.., भरि नगरिमे सोर बौआ मामी तोहर गोर.., चलल कहरिया से कोने नगरिया, तोहें जनु जाह विदेश से माधव, तोहें जनु जाह विदेश.., मिथिला केर ई माँटि उड़ल अछि, छुबए गगनक छाती..! गायक श्याम शर्मा तिसरी कसम फिल्ममे मैथिली टोनक अनुभवी रहैथ जे लतिकाजीक देल हारमोनियम बजयेत स्नावस्थामे रेणुजीकेँ सेहो सुनौने रहेथ; विशेष कए विद्यापति रचनावली आखिर त्रैमासिक रचना अक्टू-दिस. 2004 इस्वीमे मदनजी आ केदारजीकेँ फोटो सहित जे रपट पत्रकार विजय कुमार मिश्र लेख छापलैन । सेहो ई पता नहि लगा सकला जे ममता गाबए गीतमे खवाशिन आ महंथ तेकर बाद खबासीनक भतिजी आ महन्थक बेटाक प्रेम प्रसंग ओइकालक सामाजिक जीवन चित्रबला कथाक असली लेखक के रहेय, जखन कि मदनजीक देल कथा आर्यावर्तक मुम्बइ सम्वाददाता भानु झा जे दरभंगा महाराज केर मझिलाभाई राजकुमारजीक परम सहयोगी रहे ( आखिर अजरापर तंत्र मंत्रसँ प्रयोग तँ हेबाक खिस्सा परोक्ष रूपें अबिये गेल छै) नापसिन किएक रहे? मुम्बइमे नोकर रामलखन मोने मन खुश रहै किनै? अमेरिकाक सानफ्रांसिस्को जाइसँ पहिने केदार भैयाकेँ अबारा नहितन कहैत बिरलाक छोट भाए, बाबूसाहेब चौधरीक समक्षे दुर्गगंजन कऽ देने रहइ । पोथीमे अपना नानीसंग राजनगर दूबेर आएल सह अभिनेत्री लता वस्तुक फोटो खुजल दिलसँ सभकेँ स्वीकार्य भेल तेकर शोभायमान वातावरण समकालीन दर्शक वृन्दकें सहजे मोन पड़े छै..! ('वाची 'मे प्रकाशित )

७ दिनकर जीक उत्कर्ष

साहित्य अकादमी आ ज्ञानपीठ पुरस्कार सँ सम्मानीत आ पद्मभूषण उपाधिसँ अलंकृत भारतीय काव्य गगन केर अति देदीप्यमान नक्षत्र दिवंगत रामधारी सिंह दिनकर मिथिला'क सपुत छलाह।अपन वाणीक वाण सँआगिक बर्षा कयनिहार दिनकरजी ओहि महाकवि वर्गमे सँछथि जे प्राचीन भारतक गौरवमई अतीत पर मुग्ध भऽ उठैत रहलाह।हुनक जन्म बाबू रवि सिंह जीक घर 23सितम्बर1908ई0केँ बिहार राज्यक मुँगेर जिलान्तर्गत सिमरियाघाट ग्राममे भेल रहैन।ओ मुलत: हिन्दी भाषाक कवि रहथि।हुनक कवितामे देश प्रेम, राष्ट्रीयता आ मानवतावाद'क भावनाक प्राचुर्य रहैत य। शोषण-उत्पीड़न ,पतन आ विषम्य केर प्रति हुनक हृदय हुंकार कऽ विद्रोह करैत रहैक।वर्त्तमानमे विशेषतः काव्यमे शोषित समाजक प्रति करुण सहानुभूति आ पैघाउत देखबैय बालाक प्रति आक्रोशक भावना देखाईछ-: श्वानो को मिलता दुध-वस्त्र,भुखे बालक अकुलाते हैं! माँ की हड्डी से चिपक ,ठिठुर जाड़े की रात बिताते हैं!! तेँ दिनकर जीक काव्य केँ दलित मानवता आ सिसकैत करुणाक काव्य कहल गेल हन्।हुनक कविताके द्विवेदी युगीन आलोचनात्मक काव्यधाराक ओजस्वी, प्रगतिशील संस्करण मानव जाइछ। एहिमे विचार तत्व केर प्रधानता छैक।दिनकरजी आधुनिक कविगण'क पहिले पतियानीमे बैसबाक अधिकारी रहल छथि;ताहिपर कोनूटा अतिशयोक्ति नहिँ।परञ्च एकटा गद्यकारक रुपमे सेहो दिनकर जीक अतिशय ख्याति रहलनि अछि। सुनके गद्य साहित्य अत्यन्त प्रौढ़ आ विचारात्मक अहि।राम चन्द्र शुक्ल जीक अनुसारे --॓गद्य कविजन केँ कसौटी मानव जाइछ, दिनकर जी ताहि कसौटी पर पूर्णतः ठाढ़ उतरैत छथि ॔।आओ मुख्य रुपेँ विचारात्मक आ समीक्षात्मक निबंध लिखने छथि। संस्कृति के चार अध्याय नामक अपन पोथी मेँ ओ भारतीय संस्कृतिक विस्तृत विवरण प्रस्तुत केने छै। दिनकर जीक भाषा शैलीमे प्रवाह आ सौष्टव परिपूर्ण रहलैक।काव्य भाषाक तरहेँ हुनक गद्य साहित्य सेहो परिमार्जित छैक। वैचारिक संगे भावनात्मक अपूर्व संयोग दिनकर जीक गद्य शैली ॔क सबसँ पैघ विशेषता छी।हुनक निबंधमे यथाअवसर व्यंग्य -विनोदक चुटकी बुझाइछ। भारतीय सांस्कृतिक एकता शिर्षक आलेखमे देशक एकता पर गहन विचार कएल गेलैक।एहि देशक विभागमे रीति-रिवाज,खान॒-पीन,रहन-सहन अधिक दृष्टिसँ प्रर्याप्त अंतर छैक।तैयो ओही बाह्य अंतरक बालों अपना देशमे केहेन तरहक आंतरिक एकता कायम छैक,सयह बुझेबाक जी लेखकेर प्रतिपाद्य थिक। रामधारी सिंह द दिनकर जीक उत्कर्ष साहित्य अकादमी आ ज्ञानपीठ पुरस्कार सँ सम्मानीत आ पद्मभूषण उपाधिसँ अलंकृत भारतीय काव्य गगन केर अति देदीप्यमान नक्षत्र दिवंगत रामधारी सिंह दिनकर मिथिला'क सपुत छलाह।अपन वाणीक वाण सँआगिक बर्षा कयनिहार दिनकरजी आहि महाकवि वर्गमे सँछथि जे प्राचीन भारतक गौरवमई अतीत पर मुग्ध भऽ उठैत रहलाह।सुनके जन्म बाबू रवि सिंह जीक घर 23सितम्बर1908ई0केँ बिहार राज्यक मुँगेर जिलान्तर्गत सिमरियाघाट ग्राममे भेल रहैन।ओ मुलत: हिन्दी भाषाक कवि रहथि।हुनक कवितामे देश प्रेम, राष्ट्रीयता आ मानवतावाद'क भावनाक प्राचुर्य रहैत य। शोषण-उत्पीड़न ,पतन आ विषम्य केर प्रति हुनक हृदय हुंकार कऽ विद्रोह करैत रहैक।वर्त्तमानमे विशेषतः काव्यमे शोषित समाजक प्रति करुण सहानुभूति आ पैघाउत देखबैय बालाक प्रति आक्रोशक भावना देखाईछ-: श्वानो को मिलता दुध-वस्त्र,भुखे बालक अकुलाते हैं! माँ की हड्डी से चिपक ,ठिठुर जाड़े की रात बिताते हैं!! तेँ दिनकर जीक काव्य केँ दलित मानवता आ सिसकैत करुणाक काव्य कहल गेल हन्।सुनके कविताके द्विवेदी युगीन आलोचनात्मक काव्यधाराक ओजस्वी, प्रगतिशील संस्करण मानव जाइछ। एहिमे विचार तत्व केर प्रधानता छैक।दिनकरजी आधुनिक कविगण'क पहिले पतियानीमे बैसबाक अधिकारी रहल छथि;ताहिपर कोनूटा अतिशयोक्ति नहिँ।परञ्च एकटा गद्यकारक रुपमे सेहो दिनकर जीक अतिशय ख्याति रहलनि अछि। सुनके गद्य साहित्य अत्यन्त प्रौढ़ आ विचारात्मक अहि।राम चन्द्र शुक्ल जीक अनुसारे --॓गद्य कविजन केँ कसौटी मानव जाइछ, दिनकर जी ताहि कसौटी पर पूर्णतः ठाढ़ उतरैत छथि ॔।आओ मुख्य रुपेँ विचारात्मक आ समीक्षात्मक निबंध लिखने छथि। संस्कृति के चार अध्याय नामक अपन पोथी मेँ ओ भारतीय संस्कृतिक विस्तृत विवरण प्रस्तुत केने छै। दिनकर जीक भाषा शैलीमे प्रवाह आ सौष्टव परिपूर्ण रहलैक।काव्य भाषाक तरहेँ हुनक गद्य साहित्य सेहो परिमार्जित छैक। वैचारिक संगे भावनात्मक अपूर्व संयोग दिनकर जीक गद्य शैली ॔क सबसँ पैघ विशेषता छी।हुनक निबंधमे यथाअवसर व्यंग्य -विनोदक चुटकी बुझाइछ। भारतीय सांस्कृतिक एकता शिर्षक आलेखमे देशक एकता पर गहन विचार कएल गेलैक।एहि देशक विभागमे रीति-रिवाज,खान॒-पीन,रहन-सहन अधिक दृष्टिसँ प्रर्याप्त अंतर छैक।तैयो ओही बाह्य अंतरक बालों अपना देशमे केहेन तरहक आंतरिक एकता कायम छैक,सयह बुझेबाक जी लेखकेर प्रतिपाद्य थिक। रामधारी सिंह दिनकर जीक प्रतिभा 1932ई0मे देखल गेलैन ,जहन ओ पटना विश्वविद्यालय सँ बीए0आनर्सक (इतिहास) परीक्षा उत्तीर्ण करने छलैक।ओ स्वंय बरबिघा हायस्कूलमे प्रधानाध्यापक केर नोकरी केलनि। सब रजिस्ट्रार पद पर सेहो नियुक्त भेलाह। किछु दिनकर लेल आकाशवाणी मेँ काज केलैन आ किछु समय लेल हिन्दी विषयक प्रोफेसर सेहो लंगट सिंह कालेज मुज़फ्फरपुर मेँ बनल रहथि। राज्यसभामे 1952सँ1963धरि मनोनीत सदस्यो भेलाह।बादमें भागलपुर विश्वविद्यालय केर कुलपति पद केसुशोभित केलथि।हुनकर विद्यार्थी जीवन कालेमे प्रणभंग नामक काव्य 1929ई0मेमौलिक रचना प्रकाशित भेल रहैन।1965सँ1972धरि भारत सरकार केर गृह विभाग मेहिन्दी सलाहकार बनल छलाह । जीवन पर्यन्त ओ साहित्य सेवा में लांगल रहलाह।एहनो क्षण जीवन में अएलैक जे ज़बान बेटाक असामयिक मृत्यु सँ पैघ अघात केँ नहिँ सहित सकलाह आ 24अप्रील1974ई0केँ आन्ध्रप्रदेशक तिरुपति केर भगवान व्यंकटेश्वर देवविग्रहके अपन व्यथा कथा समर्पित करैत घुमैतकाल मद्रास शहरमे एहि नश्वर संसार सँ चलि बैसलाह ।सुनके काव्य रचनामे रेणुका ,रसवन्ती,द्वन्द्व गीत , हुंकार ,धुप-छाह ,सावधेनी,एकायन, इतिहास के आँसू,धुप और धुआँ आदि प्रसिध्द छन्हि।खण्ड काव्यमे प्रमुख रुप सँ कुरुक्षेत्र,रश्मिरथीकेँ जानल जाइछ।गद्य संग्रह मिट्टी की ओर , अर्द्धनारीश्वर आ लेती के फूल चर्चित रहनि।बाल साहित्यमे चित्तोर का साकार,मिर्च का मजा बढ़ लोकप्रिय भेलनि। अपन काव्यगत विशेषता सँ राष्ट्रीय असहयोग आंदोलन, गांधी जीक विचारधारा सँ प्रभावित रहथि।हुनका रवि बाबू, इकबाल आ नजरुल इस्लाम सँ प्रेरणा भेटलनि। भारतवर्षमे विविधतामे एकता देखब,इयह विशेषता थीक। प्रत्यक्ष एकता जतेक कसगर छैक तँ विविधता सेहो ततबे प्रकट छैक।देशक मानचित्रकेँ ध्यानसँ देखला पर स्प्ष्ट देखाईछ जे एहि देशक तीनकात प्राकृतिक दृष्टि सँ एकदम स्पष्ट य। सबसँ पहिले उत्तर भागमे लगधक हिमालय,तकर दक्षिण सँ विन्धाचल धरि उत्तरमे पसरल छैक आ एकरबाद विन्धय सँ ल'केँ कृष्णा नदीक उत्तरधरिके उ भाग जे हम सब दक्षिणी प्लेटो कहैत छी। से कृष्णानदीसँ कुमारी अन्तरीप धरिक भाग प्रायद्वीप जेहन य।उत्तर सँ दक्षिणके जोड़ैत रहबाक अतीतमे गौरवपूर्ण चर्चा छैक। ऋषि-महर्षि उत्तर सँ दक्षिण आबिकऽ एकताक संदेश देने रहैथि।जाहिमे प्रथमतःअगस्त्य ऋषिजीक नाम अबैत छैक।फेर भगवान श्रीराम चन्द्र तँ लंका पर चढायके क्रममे विन्ध्याचल पार केने रहथि। महाभारत केर जमानामे महाराज युधिष्ठिर क'राजसूय-यजज्ञमे दक्षिणक राजा धरि आयल छलथिन। कुरुक्षेत्र क'महायुध्द मैदानमे दक्षिणक बहुतों वीर हिस्सा लेने रहैक।एहि तरहेँ चन्द्रगुप्त,सम्राट अशोक, विक्रमादित्य आ बादमें मुगल शासनक अधिन समस्त देशक सफलता एकता लेल भेलैक।कालखण्डमे स्वार्थी,अदुरदर्शी आ कमजोर राजाक प्रार्दुभाव सँ देशक एकता टुटल;वैर भाव ततेक नै प्रवल भेलैक जे क्षेत्रीयबोध ,प्रान्तीय जोशधरि सुटैक गेलैक।एहिदेशमे जतय सालोभरि चेरापूंजीमे5इंच बरखा होइछ तँ कार मरुभूमि मे बूँदभरि पानि लेल तरसैत रहैत छैक। ‌वर्त्तमानके कोनो विशेष विधाक युग नहि कहल जा सकैछ, आ ने कोनो एहन प्रकान्ड लेखके छथि जे एहि कालपर अपन स्पष्ट छाप छोरमे होथि। मात्रे प्रेम सँ भड़ल छोट छीन कविता आ प्रेमी-प्रेमिका सँ भड़ल अश्लील कथा आओर छोट-छोट उपन्यास धरि रचल जा रहल अछि। वर्त्तमानक दाड़मे एखन कोनू निश्तुकी सम्मति नहिं देल जा सकैत छैक। निराला, महादेवी,पन्त आ गुप्त जीक काव्य निठाहे अपन ऐतिहासिक महौत रखने य, किन्तु ताहूँ के पढ़य वाला आई कतेक लोक छथि?

८ मिथिला विभूति : खुशी लाल बाबू बिहार प्रान्तके दरभंगा प्रमंडल अन्तर्गत मधुबनी जिलाक पूबारि छोरपर अवस्थित एक छोटेसन गाम अछि सरौती, जे घोघरडीहा प्रखंडके कोशी तटबंध'क पेटमे बसल छैक। ई सुपौल जिला सीमावर्ती क्षेत्र पुर्व विधान पार्षद परम आदरणीय कामेश्वर चौपाल जीक गाम कमरैल के पड़ोसमे सटल उत्तर भाग पड़ैछ। प्रसिद्ध सरौती गाम मधेपुर बजार सँ नरहिया बजार डिस्टीवोर्ड रोड नं० १०७ केर मध्य पड़ोसी गाम निघमा'क सटले दक्षिण कात छई। सरौती गामकेँ आब पंचायत'क दर्जा भेटल छैक। एहि पंचायतके पूरबमे अमही पंचायत आ पछिममे आदिवासी वाहुल्य बस्ती पचमनिया छै। निहमा गाममे हाथी राखैवला मरड़ परिबार सँ पटुआ सोनके कारोबार करय आयल नवानी विष्टौल लगक स्व० लक्षमण कामत जीक पूर्वज एतय अयलाह। सनय,चन्ना, चन्नी आ तोसा पटुआ सोन गोरैक ( सराबैक) जगह लग सुखैत सोन किनलनि। संगहि जुटक जमीन गरहा - मैन सेहो धरि किन लेलाह। ओहि समेयमे अपभ्रंश बोलीमे सरौती बोलचाल कयल जाइत रहैक। कालान्तरमे रायसुमारी भेलासन्ता एतुका बसाबट केँ सर्बेगाम नाम पड़ल- सरौती,जतयके भ' के' रहि गेलाह केवट (केयट) परिवार। स्व० लक्षमण कामत जीक पुत्र नेवालाल कामत'क ५ अगस्त १९१९ ई०केँ प्रथम पुत्र खुशी बाबूक जनम भेलनि। ओई समय कियो जनैत छल जे ई बालक एतेक होशियार आ बुझनुक हेताह। बाल्यावस्थामे खुशी लाल बाबू केँ घरे पर महताप सिंह जी सँ खानगी शिक्षा भेटलनि। वादमे अपने गामक पुबरिया टोल शत्रुपट्टी केर हलीम मौलवी साहेब सँ हिन्दी, उर्दू आ अंग्रेजी 'क शिक्षा प्राप्त भेलनि। खुशी बाबू रतिगर धरि जागैत पढै़त रहथि। छात्र जीवनमे उषाकाल ३ वजे भोरे उठि उँच्च स्वरे उच्चारण जे करथि तँ लोक सुनिकेँ गामक बुढ़ पुरनियामै चर्चा'क हुलि पैस जाए। लोक अनुमान करय ई मानसिक अवसाद सँ ग्रसित तँ नहि भऽ गेलैक हन्। परंच किछुए दिनमे हुनक लगनशील अध्ययन बावत सबके सब जानि गेल। कोरेशन हाईस्कूल मधेपुर ऐ ईलाकाके एकमेव शिक्षण केन्द्र रहय,जतय सँ होस्टलर रहि नियमित पढाय करथि। प्रवेशिकोत्तीर्ण कय ओ बाहर वाराणसी हिंदू विश्वविद्यालय सँ इन्टर आ पटना कालेजक स्नातक छात्र कोना भेलाह,से बड़ रोचक प्रसंग अछि। खुशी लाल बाबू जी केँ पटना मेँ पढबाक उत्कंठा छलनि से अन्ततः शख पुर भेलनि। डॉ० सुभद्र झा नामांकन मे मियां जी लग टुसकेलनि आ कहलखिन गेटपर्दा लग आबि अपन बात हमरा समक्षे राखब। ग्रेजुएशन केर आखरी खंडके परीक्षा सँ सोझहि ओ जिला परिषद क्षेत्र सँ चुनाव लड़ि जीत गेल रहथि। कांग्रेस संगठन सँ जुटैत ओ देश स्वाधीनता लेल लड़ायमे कूइद पड़लआह। हिनके एक रूमेट अपन क्रान्तिकारी संगी सबके बजाकय जक्शन छात्रावासमे मंत्रणा करैत गेलाह जे काल्हिखन पटनाक सचिवालय पर तिरंगा ध्वजा फहराएके रहब। आओर झण्डा फहराबैक क्रममे सात व्यक्ति शहीद भ' गेलथि, जाहिमे एक सहरसा जिला 'क हुनक रुमेट सेहो भारत माता जय कहैत अपन प्राण त्यागने छथि। खुशी बाबू देश आजादिक वाद भेटय बाला स्वतंत्रता सेनानी पेंशन केर सहुलत नहि लैत लिखित घोषणा कय गृहमंत्री केँ पत्र सँ सूचित कयलनि - हमर भारत देश कर्ज लऽकऽ विकास काज करैत य ,तेँ हम ओहिमे अपन ई राशि सहयोग बुझि देश के सँग ठाढ़ छी। एहन आर्थिक त्याग'क सद्भावना विरले मानवमे होईछ। १९३४ ई० के बिहार भुमकममे ओ राहत काज सेहो चलौलनि आ बढ़िचैढ़के अपना दिश सँ अपेक्षित योगदान केलनि। ओ ब्रिटिश जमानामे स्वजातीय पिछड़ापन दुर करय लेल जागरूकता अभियान 'क काजमे सेहो जुटल रहलाह। नेताजी सुभाषचंद्र बोस के परम मित्र केवट समाजक पहिल मैट्रिक पास पौनी निवासी स्व० महेश्वर लाल व्यासजी'क विचारे देवनाथपट्टी - नौआबाखर गाममे महासभा 'क आयोजन कयल। सामाजिक जागृति हेतु हिनका स्वजन सँ असीम भाईचारा आ विनम्र आहार व्यवहार रहलनि। केवट समाज केर पहिल एम.ए. प्रो० जगदीश नारायण चौधरी भुतपूर्व विधायक सँ स्नेहिल वार्ता होन्हि तँ घंटोभरि गप्प सरक्का होइते रहि जाए। कोसी विभिषिका संदर्भ मे गहन जनतब लेमय पर्यावरणविद् ई० दिनेश कुमार मिश्र जीके आगमन हिनका घर भेल रहनि, वाढ़ि विषय पर विशेष जनतब पाबै ले । गृहराज्य मंत्री जीक निजी सचिव स्व० कामेश्वर कामति (सीमरा) आ अति पिछड़ा वर्ग विमर्श लेल श्री रामबाबू चौधरी (राजनगर) ९० केर दशकमे हुनका ओतय अबैत रहथि। कोशी पीड़ित क्षेत्रके अनेको हस्तीगण समय - समय पर हिनका सँ गम्भीर विषय पर चर्चा करय अबैत रहैक। खुशी बाबू एक संत सौभावक खादीधारी वयोवृद्ध समाज सुधारक मानल जाइ छलाह। ओ धुनके पक्का समाजसेवी रहथि। सन् १९४१ सँ ४६ धरि जिला परिषद चुनावमे निर्वाचित घोषित होइतहि दरभंगा जिला परिषद के उपाध्यक्ष भेलाह आ मधुबनी सब-डिवीजन लोकल वोर्ड केर चेयरमैन पदके सुशोभित कयलनि। मुदा विशेष जश प्राप्तिक प्रश्चातो हटनी गामवासी पुकारू नाम लाल झा घोघरडीहा के राज मैनेजर भगवान बाबू सँ शिकायत क' देने रहनि जे रिलिफक साबुरदाना,मिश्री, मोमबत्ती आ बिलेती दूध वितरण मेँ तत्काल रोक लागलनि,फलत: दिव्यांग सरदारी मिश्र ओहिठाम सब वस्तुजात ओरियाकय राखल गेल। खुशी बाबू केँ पर्दाक पांछा राखि जाँच निवारण हाकिम लालबाबू सँ सब हालसुरति सुनलनि आ एकाएक (पर्दाफाश) देखार करैत समक्षमे मुहाँमुँही कराओल तँ ओ लज्जित होईत चेअरमेन साहेब सँ माफी मँगैत गाम गेला आ भगवान केँ भोग लगाबय ले सब सामान गाएब बताएल। ऐ प्रकरण केर बावत नैतिकता आधार पर अपन इस्तीफा देवाके पेशकश करैत देखि सभ सदस्य राजीनामा दै ले धर्मडिहा सिंहजी लग अध्यक्ष निवास ऐलाह आ कहलखिन कलक्टर साहेब केँ विस्तृत प्रतिवेदन दियौन। तत्काल तँ खुशी बाबु मानि गेलाह मुदा दोहराकय फेर जिला परिषद चुनावमे नहि उतलाह। १९५० ई०मेँ दत्ता साहेब खुश भएकय हुनका कुशेश्वर स्थान क्षेत्रक कोसी रिलीफ़ काजमे बतौर सप्लाई इन्स्पेक्टर पद केर दायित्व देलकनि। जलयात्रा ले बोट सेहो साधन मुहैया भेल रहनि। तमुरिया क्षेत्रक राहतकाज ले हिनका दोसर बेर प्रभारी बनाकय अपना इलाका पठाओल गेलाह। हिनक ईमानदारीक चर्चा मुख्यत: दुर-दुर धरि पसरल रहय। १९५४ ई०मे कोशी कल्याण -निरमली मे इन्स्पेक्टर पद पर कार्यरत भ' जखन ओ विभाग केँ पुनर्वास योजना रूपेँ परिवर्तित भेलासन्ता ओ स्वेच्छा सँ १९६६ मेँ नौकड़ी सँ त्याग पत्र दैत गाम आबि गेलाह। भोला उच्चांगल विद्यालय डेवढ केर प्रधानाध्यापक पर गमनके चार्य अयलापर ओ निगरानी समिति क ' हैसियत सँ सहायक शिक्षक पं० जगरनाथ मिशर (सुदै) केँ १९५५ ई० प्रधानाध्यापक केर प्रभार सौपेलनि। वादमे हुनका झंझारपुर लोकसभा चुनावमे कांग्रेस पार्टी सँ सांसद बनबाक अवसर भेटलनि। विधायक हरिनाथ मिश्र जहन बाढ़ सहाय्य मंत्री बनलाह तँ खुशी बाबू सँ राय मश्विरामे सहमति पाबि कोशी प्राधिकार लेल पहल भेल रहैक। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जीकेँ नाम सं यात्रा क' दु:लीला तस्वीर देखौलनि ,संगहि कोशी तटबंध क' भीतर फँसल ३८८ राजस्व गामक लोकक कल्याण ले अनेको सुझाऊ बिहारी मंत्रीजी द्वारा पठौने रहथि। राजनीतिक पहुंच हुनक स्व० ललित नारायण मिश्र धरि लगीच छलनि। ओ हुनका फुलपरास विधानसभा क्षेत्र सँ परियासक बादो १९६२ आ १९६७ मेँ गाय बछरू छापक टिकट नहि दिया सकलनि,मुदा १९७२ मे कांग्रेस केर सिम्बल पर ३७ हजार सँ अधिक वोट आनि १४ हजार मत सँ संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उत्तीम लाल यादव सं पछुयेबाक कल्पना धरि नहि कयने छलाह। ओहि बेर मुस्लिम समुदाय कांग्रेस सं बदैक गेल रहैक। परिवार नियोजन आ बंग्लादेश प्रकरण बेसी सुर्खीमे छलैक। ओ पटना दौड़धुप एम एल सी बनय खातीर सेहो करैत रहलाह। खुशी बाबूके रचनात्मक कार्य आ सामाजिक कार्यक संदर्भ मे एक पैग लेख लिखल जा सकैत छैक। ऐ विराट व्यक्तित्वक व्यक्तिक प्रति हम नमन करैत छी। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (खेप-३०) निर्मला कर्ण (१९६०- ), शिक्षा - एम. ए., नैहर- खराजपुर, दरभङ्गा, सासुर- गोढ़ियारी (बलहा), वर्त्तमान निवास- राँची, झारखण्ड। झारखंड सरकार महिला एवं बाल विकास सामाजिक सुरक्षा विभागमे बाल विकास परियोजना पदाधिकारी पदसँ सेवानिवृत्ति उपरान्त स्वतंत्र लेखन। अग्नि शिखा (भाग- ३०) (मूल हिन्दी- स्वर्गीय जितेन्द्र कुमार कर्ण, मैथिली अनुवाद- निर्मला कर्ण) पूर्व कथा उर्वशी मित्रावरुणक हुनका प्रति मोहक कथा राजा पुरूरवा केँ कहय लगैत छथि | आब आगू

मंद-मंद सुगन्धित मलयनिल मंद गति सँs बहैत छल। शीत ऋतु चरम पर छल । भुवन भास्कर गगन मंडल के गवाक्ष सँs वसुंधरा के देखइत बिहुँसि रहल छलाह । ओ अपन कोमल-किरण कर सौं पृथ्वी के आंचरक मधुर स्नेहिल स्पर्श कs रहल छलाह। एहि समय सुन्दर आ सुरम्य कुरुक्षेत्र तीर्थ में कारी मृगचर्मक चीर धारण कएने वरुण अपन मित्र "मित्र" के संग तपस्या कs रहल छलाथि । हुनक तपस्या स्थल सँ किछु दूर पोंड्रिक नामक पोखरि शुद्ध पानि सs भरल छल।एकर कछार अनेक झाड़ी आ लतागुल्म सौं सजल छल । पानि मे कतेको प्रकारक रंग-बिरंगक,सुन्दर माछ आ कछुआ क्रीड़ा कs रहल छल ।ओ झील बहुत गहींर छल, आ ओहि मे अनेक रंगक कमल फूल देखबा मे आबि रहल छल।तपस्या मे रत दुनू देवताक ध्यान अचक्के टूटि गेल छलनि ।एक सुर मे गाओल जा रहल मधुर गीतक मधुर लहरि हुनका लोकनि केँ अपना दिस आकर्षित कएने छल।एहि सुनसान जंगल मे एकजुट एहन मधुर स्वर लहरि सँs दुनू देवता विस्मयविमुग्ध भs गेलाह । आश्चर्यित भs अपन कमंडलु लs कs झील लग पहुँचि गेलाह ओ दुनू गोटे। ओहि स्थानक दृश्य देखि दुनू गोटे चकित भs गेल छलाह। सर्व श्रेष्ठ अद्वितीय सौंदर्यमयी अप्सरा उर्वशी अपन संगी सभ सँग स्नान कय रहल छलीह । हुनकर सौन्दर्य अंग-अंग सौं प्रस्फुटित भय रहल छलनि ।हुनकर शरीरक जाहि कोनो अंग पर मित्र आ वरुणक दृष्टि जानि ओ ओतहि केन्द्रित भेल रहि जाईत छल । गौर वर्णक कांति, कमल के भीतरी भाग सन सुकोमल कारी केश!कमल-दल के समान विशाल नेत्र ! पाकल बिम्ब फल सन रक्ताभ अधरोष्ठ!चंद्रमा सन श्वेत दंत पंक्ति ! सिंह सन पातर कटि-प्रदेश !उन्नत पीन पयोधर ! कदली स्तम्भ सम उरु आ जघन प्रांत! कमलनाल सन सुंदर कोमल हाथ!पूर्णचंद्र सन मुख-मंडल! मत्त गजराज सन मंद गति!ओह!सब किछु अत्यन्त विलक्षण,आकर्षक,मनोहर छल! एहि निर्जन वन में आन केओ उपस्थित नहि होयताह ई सुनिश्चित मानैत ओ सभ झील में जल-क्रीड़ा करैत मधुर-स्वर में गीत गाबि रहल छलीह। मित्र आ वरुण, एहि दुनू देवताक हृदय उर्वशीक दिव्य सौन्दर्य सँ s विमोहित भय गेल छल। हुनका दुनू गोटेक हृदय उर्वशीक प्रति आसक्त भय गेल। ओहि विनीताक प्रेम,हास्य,सुकोमल भाव सौं मिश्रित मृदु मुस्कान आ सुमधुर गायन में हुनका लोकनिक हृदय जेना डूबि गेल छल।उर्वशीक तिर्यक दृष्टि हुनक देह कें काम-वासना सँs संतप्त कय देलक ।ओहि पर मत्त भ्रमर के गुंजन सन संगीत आ कोकिल के स्वर सन मधुर कलरव गान हुनक काम-संतप्त हृदय के प्रज्वलित अग्नि में घृताहुति देबय के काज केलक। ओहि दिव्य अलौकिक सौन्दर्यक अतुलनीय सौन्दर्य सँs मोहित देवता लोकनि स्खलन क' देलनि ओतय। उर्वशी आ हुनकर सभ संगी अप्सरा हुनका दुनू के ओतय देखि अत्यंत भयभीत भs गेल छलीह। उर्वशी अपन संगी सभक संग भयभीत भs कs तुरन्त ओतह सँs विदा भs स्वर्ग मे पहुँचि गेलीह। किछु दिनक बाद ज्ञात भेलनि जे मित्रावरुणक स्खलित वीर्य सँs ऋषि वशिष्ठ,अगस्त्य आ एकटा दिव्य माछक जन्म भेलनि। उर्वशी के कथा समाप्त केलाक बाद पुरूरवा बहुत काल धरि जोर-जोर सँ हँसैत रहलाह, तखन कठिनाई सँ अपन हँसी रोकैत बजलाह - "मित्र आ वरुणक वीर्य एतेक शक्तिशाली छल जे एकसरे जीवनक उत्पत्ति भेल! तखन जौं ई अहाँक वीर्य में मिश्रण भs गेल रहैत तs नहि जानि जे आर की होइत!" राजा के अपन एहन अश्लील हास्य के मूल्य दू दिन तक लगातार उर्वशी के मिनती नेहोरा करैत मनबैत देबय पड़लनि। उर्वशी पूरा दू दिन हुनका सँs गप्प नहि केलखिन । ओ अपन क्रोधित प्रियतमा के प्रेम प्राप्त करबाक प्रयास करैत रहलाह।दू दिन के बाद, ओ कोनो तरहे ओकर मान समाप्त करवा में सफल भेलथि । उर्वशीक तामस समाप्त भs गेल आ ओ फेर राजा केँ प्रेम सँ आलिंगनबद्ध कय लेलथि ।

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उर्वशी एवं पुरूरवा के वैवाहिक जीवन सुखपूर्वक व्यतीत होमय लागल। बहुत काल तक राजा रानी के मधुमास चलल छलनि। धीरे-धीरे राजा गृहस्थ जीवन के संग राज्यकार्य में समायोजन करय लगलथि। ओ अपन दांपत्य एवं राजकीय कर्तव्य के अलग-अलग कय दुनू पर समान रुप सँs ध्यान देवs लागलाह। ओ जतेक अधिक उर्वशी में आसक्ति देखाबथि ,हुनक प्रेम में अपना के समर्पित राखथि,ओहि अनुपात में राज्य संचालन में रूचि देखाबथि। राजा पुरूरवा राज्य व्यवस्था पर ध्यान दैत राज्य के शासन व्यवस्था मे रुचि देखबैथ आ धर्मक मार्ग पर निष्ठापूर्वक चलैत छलाह। अपन जीवन मे ओ धर्म,अर्थ, काम आ मोक्ष के बीच संतुलन बना नेने छलाह। आब पुरूरवाक सफलता के यशोगान दिग्दिगंत् में होमय लागल छल। स्वर्गक शासन छोड़लाक बाद हुनक यश आओर बेसी पसरि गेल छलनि। ओ धर्म अर्थ आ काम केँ समान रूप सँ पालन करैत छलथि। एकर चर्चा त्रिलोक भरि में होमय लागल। हुनक कीर्तिगाथा धर्म,अर्थ आ कामक देवता लग पहुंचल । हुनक कीर्तिगाथा सुनि कs धर्म अर्थ आ काम के देवता लोकनि के कौतूहल भेलनि। ओ राजा के परीक्षा लेमय के हेतु पुरूरवा के राज प्रासाद में आबि गेलथि। हुनका उत्सुकता छलनि जे राजा हमरा सभ केँ समान रूप सँs कोना देख सकैत छथि,अथवा अंतर संभवतs भs जयतन्हि। पुरूरवा हुनक आगमनक खबरि सँs अत्यंत प्रसन्न भेलाह । तुरन्त अपन सिंहासन सँ उठि हुनका सोझाँ आबि गेलाह आ हुनका लोकनि केँ स्वागत कय अपना संग अतिथि कक्ष मे आनलथि। पुनः भक्ति पूर्वक अर्घ्य,पाद्य आदि प्रदान कयलथि l तत्पश्चात स्वर्ण जड़ित तीन दिव्य आसन मंगवा ओहि पर हुनका तीनू देवता के बैसौलथि। हुनकर विधि विधान सौं पूजा अर्चना कयलथि। एहि क्रम में हुनका सँs धर्म के कनेक बेसी पूजा भय गेलनि। एहि कारण अर्थ एवं काम राजा पर अत्यंत क्रुद्ध भs गेलथि। अर्थ राजा के श्राप दैत कहलथि   -  "तों लोभक कारण नष्ट भs जयबह।" काम हुनका श्राप दैत कहलथि - "राजन,गंधमादन पर्वत पर अवस्थित कुमार वन में,उर्वशी सँs विरह के कारण अहाँ अर्ध विक्षिप्त सन भs उन्माद के अवस्था में आबि जायब ।" राजाक अतिरिक्त पूजा सँ अत्यंत प्रसन्न धर्म राजा केँ आशीर्वाद दैत कहलथि - "राजेन्द्र,अहाँ दीर्घ जीवी होयब आ अत्यंत धार्मिक रहब। अहाँक संतान अपार समृद्धि प्राप्त करत,आ ओ दुनियाँ में कतेको तरहक लोकक लेल अलभ्य सुख समृद्धि प्राप्त करत। जा धरि सूर्य,चन्द्रमा आ तारामण्डल केर शक्ति रहत,ता धरि हुनकर भूतल पर विनाश नहि होयत ।" ई कहि तीनू देवता अन्तर्धान भs गेलाह,राजा श्राप आ आशीर्वाद दुनू केँ सम्मान पूर्वक समभाव सँs स्वीकार कयलथि। नहि अर्थ आ कामक अभिशाप सँs हुनकर मुख पर कनिको उदासी के निशान उभरलनि,आ ने धर्म के आशीर्वाद सँs कोनो बेसी उछाह हुनकर मुख पर प्रगट भेलनि । ओ सामान्य रहलथि आ पहिने जकाँ अपन काज मे लागल रहलाह। धर्म,अर्थ काम केँ समान रूप सँ ध्यान मे राखि काज करैत रहलाह । कखनो काल भरतमुनि के अभिशाप आ संगहि धन आ काम के अभिशाप राजा के चिंतित क दैत छल जाहि के कारण ओ विचलित भs जाइत छलाह। मुदा ई थोड़बहि काल लेल होईत छल,किएक तs हुनका कनिको विचलितव अथवा उदास देखितहि हुनकर धर्म परायण पत्नी उर्वशी अपन मधुर स्पर्श आ प्रचुर प्रेम सs हुनक सब शोक उदासी बिलगा दइत छलीह। ओ पुन: पहिले सन प्रसन्न भs जाएत छलाह। उर्वशीक प्रेम पूर्ण व्यवहार अपन सब दुख विस्मृत करवाक लेल हुनका विवश कs दैत छल। उर्वशी के प्रत्येक क्षण स्मरण रहैत छल - हुनक आ राजाक दांपत्य जीवन मात्र सीमित अवधिक अछि। एही लेल ओ राजाकेँ अपन संग रहैत पूर्ण सुख देबऽ चाहैत छलीह। हुनकर प्रयास होइत छलनि � ओ राजा के कहियो दु:खी एवं उदास नहि होमय देथि। उर्वशीक जीवनक लक्ष्य राजा केँ सुखी राखब छलनि। हुनका बुझल छलनि जे हुनकर स्वर्ग आपस गेलाक पश्चात् राजाक जीवन सँs सुख आ आनन्द समाप्त भs जयतनि । राजा भलहि आन किछु बिसरि जाईथ,मुदा उर्वशीक देल दुनू शर्त हुनका निश्चित रूप सँs स्मरण रहैत छलनि। ओ अपन बेटहु सँs बेसी स्नेह आ संरक्षण हुनकर दुनू मेमना केँ दैत छलथि l ओ कहियो नहि बिसारि सकैत छलाह जे ओहि मेमना सभक रक्षा हुनकर जीवनक एकमात्र आस छलनि।ओहि क्षण धरि उर्वशी हुनकर संग रहथिन जा धरि ओ दुनू मेमना सुरक्षित छैक। ओ दुनू मेमना हुनक आ उर्वशी के साथ के माध्यम थिक। अपन दांपत्य सुखक प्रत्येक क्षण के उपभोग करैत राजा उर्वशी के देल दुनू शर्त स्मरण रखैत छलथि । हुनके नहि उर्वशी के पर्यन्त अपन स्वर्गारोहन के समय स्मरण रहनि,संगहि भरतमुनि केर श्रापक स्मरण सदैव रहनि। यैह कारण छल जे दुनू प्राणी अपन-अपन कर्तव्य के प्रति सदिखन सचेत रहथि। दुनू गोटे सुखी जीवन जीबैत,एक दोसराक संगति मे वैवाहिक जीवनक पूर्ण आनंद लs रहल छलाह।कखनो काल आगत हुनका सभ केँ किछु क्षण लेल आशंकित कs दैत छलनि,मुदा ओ सभ एकरा अपना धरि सीमित राखि लैत छलाह।ओ सभ कहियो एहि डर केँ अपन कोनो मित्रक संग नहि बाँटि सकैत छलाह। एहि बातक ओ सभ आपसहु में चर्चा नहि कs सकैत छलथि । ओ दुनू नहि चाहैत छलथि जे हुनकर कोनहु बात सs हुनकर साथी के कोनो तरहक लेश मात्र दुख पहुंचनि। यैह कारण छल जे ओ सभ अपन भावना के अभिव्यक्ति नहि होबय दैत छलथि। हृदय तल के अतल गहराई में अपन आशंका के दबा कs राखि ओ दुनू सामान्य जीवन व्यतीत कs रहल छलथि। जाहि सौं हुनकर साथी,हुनकर प्रियजन एक क्षणहु लेल भी दुखी नहि भय सकथि । क्रमशः अपन मंतव्य editorial.ऽtaff.videha@gmail.com पर पठाउ। ‍२.५.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा-संवेदना कुमार मनोज कश्यप संवेदना

भोरुका पहर सेहो अगहन के � तैं रोड लगभग सुनसाने जकाँ। इक्का-दुक्का लोक कखनो-कखनो ओहि बाटे गुजड़ैत। कि ताबते धड़ाम���!!!! के आवाज भेलै। एकटा तेज गति कार एकटा साईकिल सवार के तेहन जोड़दार टक्कर मारने छलै जे साईकिल सवार हवा मे उछलि कs रोडक दोसर कात जा खसल। लोक जुटs लगलै आ बिना कोनो बिलम्ब केने लागल अपन-अपन मोबाइल सs रील बनाबs। ताबत केम्हरो सs एकटा आदमी दौड़ल आयल आ ओहि घायल व्यक्ति के पॉकेट झोरि पड़ा गेल। एहनो नहिं जे सभ विडियोग्राफिये मे तल्लीन छल; किछु सहृदय लोक ओहि बाटे गुजरैत वाहन सभ के हाथ दs रोकबाक निष्फल प्रयास सेहो करैत रहल जे कहुना घायल के ससमय कोनो हॉस्पीटल पहुँचा चिकित्सा सुविधा देल जाय। पुलिस जखन आधा घंटा के बाद ओतs पहुँचलै; ताहि सs पहिने ओकर प्राण-पखेरू उड़ि गेल छलै।

ओहि दिनक समाचार चैनल सभ पर ओ विडियो खुब चललै आ बेस लोकप्रिय भेलै। -कुमार मनोज कश्यप, सम्प्रति: भारत सरकारक उप-सचिव, संपर्क: सी-11, टावर-4, टाइप-5, किदवई नगर पूर्व (दिल्ली हाट के सामने), नई दिल्ली-110023, # 9810811850, ईमेल : writetokmanoj@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.रबीन्द्र नारायण मिश्र-ठेहा परक मौलाएल गाछ (उपन्यास)- धारावाहिक रबीन्द्र नारायण मिश्र ठेहा परक मौलाएल गाछ (उपन्यास)- धारावाहिक खण्ड ११ सँ १५ ठेहा परक मौलाएल गाछ 11 रमा अस्पतालक निजी वार्डमे आबि गेल छथि। हम,पड़ोसी आ ओकर पत्नी सेहो ओतहि बैसल छी । रमाकेँ होस आबि गेल छनि । ओ हमरा दिस जिज्ञासाक भावसँ देखैत छथि । किछु पुछए चाहैत छथि। ताबतेमे उकासी भए जाइत छनि । सिस्टर हुनका उकासी करैत सुनि दौरि कए अबैत छथि । जल्दीसँ दबाइ दैत छथि । हमरासभकेँ चेतौनी दैत छथि- "अखन हिनका बेसी टोक-टाक नहि करिअनु। चौबीस घंटा आराम करए दिअनु । तकर बाद यदि सभकिछु ठीक रहि गेल तखन घर वापस चलि जा सकैत छथि ।" हमसभ स्वीकृतिमे मुरी हिला दैत छी । सिस्टर बाहर चलि जाइत अछि । हमर पड़ोसी इसारासँ जेबाक अनुमति मंगैत छथि । हम हुनका दुनूगोटेकेँ बिदा करैत छी । जाइत-जाइत ओ कहि रहल छथि- "कोनो दिक्कति होअए तँ निःसंकोच फोन कए दिअह।" "तोरा नहि करबह तँ ककरा कहबै? आर अछि के हमरासभक संगे?" पड़ोसी अपन पत्नीक संगे चलि जाइत अछि । हम वापस वार्डमे आबि जाइत छी । रमाकेँ आँखि लागि गेलनि अछि । संभवतः ओ गोटी खेलाक बाद निन्न आबि रहल छनि । हम ओहि कोठरीमे बामा कात राखल आराम कुर्सीपर बैसि जाइत छी । कुर्सीपर बैसले-बैसल हमरो आँखि लागि जाइत अछि । सपनामे फेर ओएह  कारी सन भयाओन आदमी लाठी लेने हमरा दिस अबैत देखाइत अछि । हम ओकरा पुछैत छी- "की बात छैक? तूँ हमरा बेर-बेर किएक डरा रहल छह? तोरा की चाहिअह?" ओ बहुत जोरसँ ठहाका पारि रहल अछि। ओकर ठहाका सुनि कए हम आओर डरा जाइत छी । सपनेमे केंकिआए लगैत छी । हमर अबाज सुनि कए सिस्टर दौरि कए अबैत अछि- "की भेल?" "किछु नहि? बस सपनाइत रही।" "ओ! हम तँ डरा गेलहुँ । रच्छ भेल जे रमाक निन्न नहि टुटलनि । प्रायः निन्नक गोटीक असरि रहल होएत ।" सिस्टर बाहर चलि जाइत अछि । आब भोर होमहि बला अछि । सामनेक सड़कपर लोकक आवागमन शुरु भए गेल अछि। अस्पतालक  भीतर सभतरि सफाइ भए रहल अछि । रमा सेहो उठि गेल छथि । हुनका जागल देखि सिस्टर सेहो आबि जाइत अछि । हुनका दबाइसभ दैत छनि । ओहिठाम राखल कागजपर किछु-किछु लिखैत अछि। हम ओकरा दिस बहुत उत्सुकतासँ देखि रहल छी । ओ हमर मनोभाव बुझि कहैत अछि- "आइ साँझ धरि हिनका अस्पतालसँ छोड़ि देल जेतनि । सभकिछु ठीके बुझा रहल अछि ।" उत्सुकतावश ओ हमरो दिस देखैत  अछि - "अहाँक मोन ठीक तँ अछि?" "माथ भारी लागि रहल अछि । रातिभरि जगले छी । भए सकैत अछि तकरे परिणाम होअए।" सिस्टर हमर रक्तचाप नपैत अछि । ओ मसीन दिस ताकि रहल अछि आ हम ओकरा दिस । गजबके आत्मविश्वास छैक ओकरामे । बएस तीसक आसपास रहल हेतैक । गोरनार,भरल देह,सौंसे देह फुरतीसँ चमचम करैत छैक। एक मोन भेल जे किछु पुछिऐक । मुदा ओकरा व्यस्त देखि चुप रहि गेलहुँ । ओ मसीनक दिस देखैत अछि । फेर बाजि उठैत अछि- "अहाँक रक्तचाप तँ बहुत बढ़ल अछि । दबाइ लेलहुँ अछि की नहि?" "कहाँ लए सकलहुँ। भोरसँ तँ हिनकेमे लागल छी । दबाइ खेबाक होसे नहि रहल।" "एना नहि कएल करू । रक्तचापक दबाइ नियमित लेल करू नहि तँ परेसानीमे पड़ि सकैत छी ।" ओ तुरंत बाहर जाइत अछि । हमरा लेल दबाइ लेने अबैत अछि । हम ओहि दबाइकेँ खाइत छी । क्रमशः हमर मोन शांत भेल जाइत अछि । दस बजेक आसपास डाक्टरसभक हुजुम अबैत अछि । ओ सभ रमाक हालचाल पुछैत छनि । कागज पत्तर देखैत अछि । फेर हमरा दिस ताकि कए  कहैत अछि- "हिनका आब अहाँ घर लए जा सकैत छी । एक सप्ताहक बाद बाह्य रोगी विभागमे देखा लेबनि । यदि कोनो दिक्कति होमए तँ पहिनहु आबि जाएब ।" डाक्टरक बात सुनि कए हम बहुत प्रसन्न छी । चलू अस्पतालसँ छुट्टी भेल । काल्हिसँ आइधरि चौबीस घंटासँ बेसी भए गेल । अस्पतालमे यदि पड़ोसी आ ओकर पत्नी नहि आएल रहैत तँ साइत भुखले रहि गेल रहितहुँ । केओ हाल-चाल पुछनाहर नहि । हमर तीनूसंतान अपना-आपमे व्यस्त अछि। असलमे ओ सभ कैकबेर बेर ह्वात्सअपपर समाद लिखने रहए । मुदा हमरा से सभ देखबाक होस नहि रहल । बादमे हमर फोनो बंद भए गेल रहए । भए सकैत अछि जे ओ सभ फोन केनो होअए आ हमर फोन नहि लागल होइक। मुदा एहिसभसँ की होमए बला अछि? जाहि ठाम देहसँ सेवा चाही ततए बातसँ की होइत? चारि बाजल । हम अस्पतालसँ रमाक संगे अपन घर वापस जा रहल छी । रमा किछु चिंतित बुझा रहल छथि । हम हुनका पुछैत छिअनि- "की बात छैक? चिंतित बुझा रहल छी?" "चिंता होइत अछि जे यदि हमरा किछु भए गेल तँ अहाँ कोना रहब?" "ईहो केओ सोचए । अहाँ तँ आब एकदम ठीक छी ।" ओ हँसि दैत छथि । हमसभ अपन फ्लैटपर पहुँचि जाइत छी । हमरासभक घरमे अबैत देखि पड़ोसीक पत्नी आबि जाइत अछि । हमरसभक हालचाल पुछैत अछि । संगे ईहो सूचित करैत अछि जे ओकर पति किछु काजसँ बाहर गेल छथि,आब अबिते हेताह । 12 रमाक अस्पतालसँ छुटला एकसप्ताह भए गेलनि । एहि बीच हुनकर हालतिमे बहुत सुधार भेलनि। आब ओ घरक काज अपनेसँ कए लेथि । भोर-साँझ हमरा संगे टहलिओ लेथि । जखन पड़ोसीक पत्नी  आबए तँ ओकरा संगे चाहो-पान कए लेथि। ओहि बीच हमर बेटी शालिनीक कैक बेर फोन आएल । ओ बेर-बेर मुम्बई अएबाक आग्रह करैत रहल । फोन हमर बेटोसभ केलक । मुदा ओ सभ बेसी अपनेमे परेसान बुझाए । सदिखन कैफियत देबामे लागल रहथि । मुरली हमरा बुझाबक प्रयासमे रहए जे किएक ने कोनो वृद्धाश्रममे चलि जाइत छी। ओहिठाम सभ तरहक सुविधा एकहिठाम भए जाएत । आखिर टाका राखिए कए की होएत?श्यामक विचार कनीक दोसर रंग रहैक। ओ बेर-बेर कहितए जे किएक ने हमसभ किछु एहन काज करी जाहिसँ हमर एफडीबला टाकाक सदुपयोग  भए सकए। कोनो कारखाना लगा ली,अथवा कोनो व्यापारे शुरु करी । ओहो एहिमे सहयोग करत । हमरासभकेँ व्यस्ततो रहत आ आर्थिक स्मृद्धियो होएत । ओकर कहब रहैक जे बैसल रहबाक कारणसँ हमरसभक हालति खराप भेल जाइत अछि। यदि काजमे लागि जाएब तँ सभदुख स्वतः खतम भए जाएत। हम तँ ओकर वुद्धिपर हँसी । "केहन मूर्ख अछि ई । कनीको दया-मया नहि छैक जे वयोवृद्ध माता-पिता एहि बएसमे कोना व्यापार करत अथवा कोनो कारबार शुरु करत? साइत ओकरा हमरसभक वास्तविक परिस्थितिक किछु अनुमान नहि छैक । की छैक की नहि छैक से नहि कहल जा सकैत अछि,मुदा ई तँ तय अछि जे हमरासभक प्रतिए ओ एकहिसाबे भावनाशून्य भए गेल अछि । ओहिदिन हम आ रमा ओसारापर चाह पीबैत रही कि घंटी बाजल। हम धरफरा कए केबार खोलबाक हेतु उठैत छी कि माथ घुमि गेल। ठामहि माथे भरे खसलहुँ । माथ फुटि गेल । खून बलबला कए निकलि रहल छल । रमा चिकरि उठलीह � "दौड़ैत जाउ! दौड़ैत जाउ...!" हुनकर चिकरब सुनि कए बाहरसँ पड़ोसी बजलाह- "की भेलैक?" रमा किछु उत्तर नहि दए सकलथि । ओ हमरा उठाबएमे लागि गेल रहथि । जेना-तेना हम कुर्सीपर बैसि गेलहुँ । रमा भीतर जा कए मलहम अनैत छथि । हमरा माथपर पट्टी करैत छथि । ताबे पड़ोसी बाहरे ठाढ़ अछि । बेर-बेर चिकरि रहल अछि- "केबार खोलू।" केबार खोलबामे विलंब होइत देखि आ हमर कुहरब सुनि कए पड़ोसी केबारकेँ धकिअबैत अछि कि छिटकिनी अपने सड़कि कए नीचाँ आबि जाइत अछि । केबार खुजि जाइत अछि । पड़ोसी  फ्लैटक भीतर अबैत अछि। हमर माथपर चोट देखि दुखी भए जाइत अछि। "ई केना भेलैक?" "घंटी सुनि कए केबार खोलबाक हेतु बिदा भेल रहथि कि माथमे चक्कर आबि गेलनि । ठामहि खसि पड़लाह ।" "एना हड़बड़ा कए नहि उठबाक चाही । बएस बढ़लापर सभकिछु ढील भए जाइत अछि ।" ओ तुरंत अपन फ्लैट जाइत अछि आ किछु दबाइ लेने वापस होइत अछि। "एकरा माथमे लगा दिअनु। रक्तश्राव तुरंत बंद भए जेतनि ।" एकटा गोटी आगू बढ़बैत कहैत अछि- "ई गोटी सेहो खुआ दिअनु । दर्द नहि हेतनि ।" "असलमे हम तँ आएल रही जे सभगोटे कतहु घुमबाक हेतु जाएब। कतहु गेला बहुत दिन भए गेल । घरमे पड़ल-पड़ल मोनमे उचाट भए रहल अछि । मुदा आब अखन तँ नहिए भेल । पहिने ई ठीक भए जाथि ।" पड़ोसी रमा दिस ताकि कए बाजल । फेर हमरा कहैत अछि- "बेसी चिंता नहि कएल करह । एहिसँ किछु फएदा नहि होमएबला अछि । उनटे जेहो समय नीकसँ कटैत से नव-नव लफड़ामे बीति जाइत अछि।" पड़ोसी बड़ीकाल धरि बैसल रहल । किछु-किछु गप्प-सप्प करैत रहल । ओकरा रहलासँ मोनमे उसास भेल । माथक दर्दो कम भेल । हम रमाकेँ कहैत छिअनि- "एतेककालसँ पड़ोसी बैसल अछि, चाहो पान तँ पुछिऔ ।" सही कहलहुँ । हमसभ तँ एकर किछु स्वागत नहि कए पबैत छिऐक। "स्वागतक कोन गप्प भेलैक । ईहो तँ अपने घर छैक । यदि हमसभ एक-दोसरक दुख-सुखमे नहि सामिल होएब तँ के होएत?" रमा चाह बनबए जाइत छथि । एतबेमे मुम्बईसँ शालिनीक फोन अबैत अछि। "गोर लगै छी ।" "नीके रहह।" "आर की समाचार?" "समाचार की कहिअह?" "से की?" "तोहर माए आब कनी ठीक भेल छलीह कि किछु काल पहिने हम माथ भरे तेहन ने खसलहुँ जे की कहिअह?" "आब की हाल अछि?" "हाल की रहत? पड़ोसी किछु दबाइक ओरिआन केलक जाहिसँ खून टपकब बंद भेल,दर्दो आराम अछि ।" "ओह! हमर बात मानि लिअ। अहाँसभ किछुओ दिनक हेतु हमरा ओहिठाम चलि आउ ।" "देखैत छिऐक।" "इएह तँ गड़बड़ी अछि। अहाँसभ ककरो बात सुनिते नहि छिऐक। चाहैत छिऐक जे लोके ओतए आबि कए रहए, मुदा से संभव छैक? नहि छैक।" "तूँ अनेरे परेसान नहि रहह। हमसभ जेना छी, ठीक छी। तूँ सभ सुखी रहह । हमरसभक चिंता नहि करह ।"-से कहि हम फोन काटि देलिऐक। फोन आएल गेल । सभ अपन-अपन छुतिका छोड़ओलक । मुरली आ श्याम विदेशमे अछि तेँ नहि आबि सकैत अछि। शालिनी मुम्बईमे अछि तैओ नहि आबि सकैत अछि । दिल्लीसँ मुम्बई कोनो लगो नहि छैक । फेर कतबो किछु भेलैक अछि,बेटीसँ बेसी अपेक्षा करब अखनहु अपन समाजमे नीक नहि मानल जाइत अछि । तथापि ओएह हालोचाल लैत रहैत अछि । कहिओ काल मुम्बईसँ दिल्ली कोनो काजे अबैत अछि तँ हमरोसभक भेंट कए लैत अछि । 13 कखनहु काल एकांतमे जखन हम अपन पारिवारिक स्थितिक बारेमे सोची तँ सोचिते रहि जाइ । कतेक प्रेमसँ हमसभ अपन तीनू संतानक पालन केने रही । नीक सँ नीक शिक्षाक व्यवस्था केने रही । सभकिछु मनोनुकूले होइत गेल । मुदा जखन ओ सभ पैघ होइत गेल,जखन   जखन ओकरासभक समय अएलैक तँ सभकिछु प्रतिकूले होइत चलि गेल । मुरली आ श्याम विदेशी नागरिक भए गेल । मुरलीक लिभ-इन-पार्टनर बिआहक झञ्झटिमे पड़ए नहि चाहैक । ओहो ओकरेमे रमल रहए। समय-समयपर फोन कए हमरा बोल-भरोस दैत रहल। "आब अपने देश आबि जाएब, जखन एकबेर वापस आबि जाएब तँ वापस विदेश थोड़े जाएब । अपन सीगिनीकेँ सेहो लेने अएबनि ।" मुदा ओ सभ बात हबेमे रहि गेल । ओ किएक किछु करत? आब तँ ओकरा बारेमे किछु निजगुत नहि बूझल अछि । मानि कए चलैत छी जे ओ ओही सीगिनीक संगे रहैत होएत। कोनो संतान नहि भेलैक अछि । पता ने हेबो करतैक कि अहिना एहि दुनिआसँ चलि जाएत? हमरासँ बेसी चिंता रमा केँ होनि । हुनकर स्वास्थ्य खराप हेबाक एकटा प्रमुख कारण ईहो छल । ओ दिन-राति अपन बेटासभक चिंता करैत रहथि । बहुत दिनक बाद केना-ने-केना श्याम फोन केलक । कहैत अछि - "एकटा सुखद समाचार अछि?" "की?" "हम अमेरिकाक नागरिक भए गेलहुँ ।" एहिसँ की फएदा होएत? " "लएह। ईहो कहबाक काज। आब हमरा एहिठामक सभटा अधिकार भेटि गेल अछि। मासिक दरमाहामे टैक्स बहुत कम लागत। चिकित्सा सुविधा सेहो बहुत नीक भेटत, ओहो कम खर्चमे । एहिठामक चिकित्सा सुविधा बहुत नीक होइत छैक । फोनपर कतेक कहू। आब अहाँसभ अपने आएब तखन देखबैक। एकटा बात तँ कहनाइए बिसरा गेल। आब अहाँसभ एहिठाम हमरासभक संगे निश्चिंत भए रहि सकैत छी । अहूँसभकेँ ग्रीनकार्ड भेटि जाएत । श्याम कैकबेर फोनपर एहि तरहक चर्च करैत रहल । आखिर एकदिन रमा कहलीह- "हमसभ असगरे एहिठाम तंग भेल रहैत छी । श्याम बेर-बेर आग्रह कए रहल अछि । किएक ने हमसभ एकबेर ओतहु देखि ली । मोन लागत तँ रहब नहि तँ वापस भए जाएब ।" "पासपोर्टसभ बनबए पड़त ।" "ओ सभ तँ भइए जेतैक । पहिने मोन तँ मनाउ ।" "जखन अहाँ तैयार छी तखन हमहूँ तैयारे बुझू ।" "आब जहिआ श्यामक फोन आएत तखन ओकरा फरिछा कए कहि देबैक ।" "ठीक छैक ।" अगिला बेर जखन श्यामक फोन आएल तखन ओ फेर ओएह बातसभ शुरु केलक। ओकरा तँ ई साइत अनुमान नहि रहल हेतैक जे एहि बेर यदि ओ आग्रह करत तँ किछु दोसर रंगक बात सुनबामे अएतैक । भेबो केलैक सएह। जहाँ ओ रमाकेँ अमेरिका अएबाक कहलक कि ओ बात मानि गेलथि । हमहूँ समर्थन कए देलिऐक। श्याम सचमुचकेँ बहुत प्रसन्न भेल रहए। ओ तुरंत वीजाक व्यवस्थामे लागि गेल । टिकट कटबा देलक । केना की करबाक छैक से सभटा बता देलक । हमरसभक अमेरिका जेबाक कार्यक्रम शालिनीकेँ पता चललैक । ओ एहि बातसँ बहुत प्रसन्न भेल रहए । ओ तुरंत फोन केलक- "ई काज अहाँसभकेँ पहिने करबाक छल । घुमैत-फिरैत रहब तँ समय नीकसँ कटि जाएत । स्वास्थो ठीक रहत। ओना एकठाम रहैत-रहैत अहाँसभ बहुत परेसान भए गेल छी ।" "बात से की रहतैक। अपन घर अपने होइत छैक । हमसभ तँ एहिठाम केहन बढ़िआँ छी । मुदा संतानक मोह तँ भइए जाइत छैक । तोहर माएकेँ बेटासभक चिंता तंग केने रहैत छनि । तेँ हमहूँ मानि गेलहुँ । भेल जे एक बेर स्वयं जा कए देखिऐक जे बात की छैक?" "हम तँ कहब जे मुम्बईए बाटे जाउ । एतहु किछुदिन रहि जाएब । हमरोसभसँ भेंट भए जाएत ।" "आब तँ श्याम टिकट बना कए पठा देलक अछि।" "कतएसँ हबाइ जहाज पकड़बाक अछि?" "दिल्लीसँ सोझे अमेरिका।" "कोनो बात नहि । ओहिठाम पहुँचलाक बाद फोनपर गप्प करैत रहब।" 14 हम आ रमा ओहिदिन चारिबजे भोरे उठि गेल रही । दुनूगोटे जल्दीसँ स्नान-ध्यान केलहुँ । रमा चाह बनओलथि । हमसभ चाह पीलहुँ। चाह पीबिए रहल छलहुँ कि मुम्बईसँ शालिनीक फोन आएल । ओकरा अबाजमे ओ दम नहि बुझाएल। पुछलिऐक- "बात की छैक? तूँ ठीक तँ छह? " "कुकुर काटि लेने छलए । अस्पतालसँ सुइआ लगबा कए आबिए रहल छी । फेर ध्यानमे आएल जे आइ तँ अहाँसभकेँ जेबाक अछि।" "कुकुर केना काटि लेलकह?" "की कहू? भोरमे दुनू बेकती टहलए निकलल रही। द्वारिएपर एकटा झबड़ी कुकुर खिहारलक । हम डरा कए भगलहुँ । मुदा ओ छोड़लक नहि,काटिए कए मानलक।" "मुदा ओ की करैत रहथि?" "हुनका केओ भेटि गेल रहनि । गप्पमे लागि गेलाह । जाबे हमरापर ध्यान गेलनि ताबे तँ कुकुर काटि चुकल छल।" "आब की हाल छह?" "बड़ीजोरसँ दाँत गड़ा देने छल । बहुत खून खसल । ओना तँ ठीक छी। मुदा सुइआ तँ लेबहि पड़त ।" "संयोग । जाइत-जाइत ई समाचार सुनबाक छल ।" "अहाँसभ चिंता नहि करब । ओहिठाम पहुँचलाक बाद फोन करब। हमरा ध्यान लागल रहत।" आजुक यात्राक कहिआसँ  तैयारी चलि रहल छल । हम अपना लेल खादी भंडारसँ सिल्कक कुरता कीनने रही ।  खूब पातर सूतक दूटा धोती सेहो पहिनेसँ रखने रही । धोती कुरतामे सजल-धजल हम ओसारामे बैसल रही । रमा सेहो तैयार भए गेल रहथि । एकदम साधारण वस्त्र पहिरने रहथि। लागैत जेना कतहु लगेपासमे जा रहल छथि । हम टोकबो केलिअनि। मुदा हुनका लेल धनसन। ओ हँसि देलथि। कहैत छथि- "हमसभ कोनो धिआ-पुता तँ छी नहि जे सजब । जे छी, जेना छी, ठीक छी ।" हमरसभक तैयारी पूरा भए गेल छल । आब बिदा हेबाक छल कि श्यामक फोन आबि गेल। "की हाल अछि?" "हमसभ आब हबाइ अड्डा हेतु बिदा होएब ।" "पासपोर्ट, टिकट, पहिचानपत्र, टाका आ जरूरी दबाइसभ नीकसँ राखि लेलहुँ ने?" "हँ, हँ । सभ ठेकानल अछि । रमा सभटा भोरेसँ सम्हारि रहल छलथि ।" फेर ओ रमासँ सेहो बतिआइत छथि । कहैत छथि- "किछु जरूरी काजसँ हमरा अचानक बाहर जाए पड़ि रहल अछि । बेसी नहि, एकसप्ताहक हेतु । तकरबाद हम लौटि जाएब । अहाँसभकेँ कोनो असुविधा नहि होएत। हम अपन संगीकेँ सभटा जानकारी दए देलिऐक अछि। ओ हबाइअड्ढापर उपस्थित रहत आ ओतहिसँ अहाँसभकेँ हमर घर लेने आएत ।" हम की कहितिऐक? सुनि लेलहुँ । कहलिऐक- "ठीक छैक।" आखिर हमसभ टिकटक हिसाबसँ नियत समयपर हबाइअड्डा बिदा भेलहुँ । रमाक आँखिसँ नोर टपकि रहल छलनि । "अहाँ तँ कानि रहल छी?" "अपन माटि-पानि छोड़ि जाएब नीक नहि लागि रहल अछि । भरि जिनगी एहि सहरमे रहलहुँ । आब एहि बएसमे बौआ रहल छी।" "हमसभ कोनो अमरिकामे बसए थोड़े जा रहल छी । ओहिठाम श्यामक हाल-चाल लेनाइओ तँ जरूरी अछि । एतेक दिन भए गेलनि किछु निजगुत नहि पता लागि रहल अछि । फेर कनी परिवर्तन होएत । मोन बदलि जाएत। नव-नव स्थान देखब।" हमर बातसँ ओ किछु आश्वस्त भेलीह ।  हमसभ समयसँ बिदा भए गेलहुँ । हबाइ अड्डा पहुँचि गेलहुँ । अपन टिकट देलिऐक । फेर परिचयपत्र निकालबाक प्रयास केलहुँ । मुदा ओ तँ रमा संगमे रहनि । हुनका इसारा करैत छिअनि। ओ हमरा लग अबैत छथि। परिचयपत्रक नाम सुनितहि बाजि उठैत छथि "जा...। जुलुम भए गेल। हमर छोटकी झोरा तँ घरेमे छुटि गेल । सभकिछु ओहीमे अछि।" आब की कहल जाए? हमसभ द्वारिसँ सहटि कए ठाढ़ भए जाइत छी। घड़ी देखैत छी । एतेक समय नहि बाँचल अछि जे घर जाइ आ छुटल झोरा लए कए समयपर वापस होइ । मुदा ओकरा बिना आगू बढ़लो नहि जा सकैत छल । एक क्षण लेल तँ मोन निराशासँ भरि गेल । भेल जे आब आगू नहि जा सकब । यात्रा एतहि शुरु,एतहि खतम भए जाएत। हम आ रमा लगेमे बेंचपर बैसि जाइत छी । सोचि नहि पाबि रहल छी जे की करी? ताबतेमे देखैत छी जे पड़ोसी टैक्सीसँ उतरि रहल अछि। हम बूझि गलिऐक जे काज भए गेल । बातो सएह रहैक । हमरासभकेँ बिदा भए गेलाक बाद ओ सभ अपन डेरापर पहुँचल रहए। हमरासभ ताबे बिदा भए गेल रही । ओ हमरसभक फ्लैटक आगूएमे झोरा देखलक । ओहिमे राखल महत्वपूर्ण कागजातसभकेँ देखि बहुत चिंतामे पड़ि गेल । हमरा कैकबेर फोनो केलक । मुदा फोन लगलैक नहि । आखिर टैक्सी केलक आ हबाइ अड्डा समयसँ आबि गेल । हमरा देखितहि भभा कए हँसि देलक- "सभटा कागज छुटले जाइत छलह?" "सएह तँ । तोरासँ भेंट लिखल छल ।" "हम तँ अबिते रही । मुदा�टहलए काल एकगोटे बेहोस भए गेल।" "से कोना?" "ओकर सुगर कम भए गेल रहैक । हाँइ-हाँइ लबनचूस खुआओल गेल । तखन ओकरा होस अएलैक । ओकरा घर पहुँचओलहुँ। ताबे देरी भए गेल छल । तूँसभ बिदा भए गेल छलह।" बड़का काज केलह,नहि तँ आइ हमरसभक यात्रा-एतहि शुरु एतहि समाप्त भए जाइत ।" पड़ोसीकेँ धन्यवाद दैत हमसभ हबाइ अड्डामे भीतर प्रवेश केलहुँ । सभटा कागज-पत्र जाँच करओलहुँ । हबाइ जहाजक छुटबाक समय लगीच छल । हमसभ जल्दीसँ आगू बढ़ैत गेलहुँ । अंदरक द्वारिसँ भीतर जेबासँ पूर्ब पाछू देखलहुँ। पड़ोसी अखन धरि ओहिना ठाढ़ छल । हमरा देखि कए हाथ हिला देलक । हमहूँ ओकरा नमस्कार करैत छी आ आगू बढ़ि जाइत छी । 15 हम दुनू बेकती जीवन भरि संघर्ष केलहुँ । रमाक पारिवारिक परिस्थिति हमरासँ नीक रहनि । हुनके पिताक सहयोगसँ हमर उच्च शिक्षा भए सकल । कालक्रमे हमरा नौकरी भए गेल । रमासँ बिआह भेल । दुनू बेकतीक आपसी संबंध सभदिन नीक रहल । घरक माहौल सुखद रहैत छल । धिआ-पुतासभकेँ नीक सँ नीक शिक्षाक प्रबंध केलहुँ । दिल्ली सन सहरमे अपन तीन कोठरीक फ्लैटो कीनलहुँ । दुनूगोटेकेँ पेनसन भेटैत अछि । सभकिछुक अछैत हमसभ असगर छी । जखन लोकक काज अछि तँ केओ लगमे नहि अछि । तीनू संतान बाहर चलि गेल छथि ।  ई कोनो हमरे संगे भेल अछि से बात नहि अछि । घर-घर एके खिस्सा अछि । की गाम,की सहर ? बूढ़सभ  व्यथित ,प्रताड़ित ,असहाय भेल अछि । जकरे देखू सएह परदेशमे रहैत अपन संतानक बाट ताकि रहल अछि । हारि कए एहि बएसमे जखन कि लोककेँ अपन माटि-पानिसँ जुड़ल रहबाक इच्छा रहैत छैक,विदेश जा रहल अछि जाहिसँ बेटा-बेटीक दर्शन भए सकैक। पुतहु,पोता,पोतीक मुँह देखि सकए। केहन कठिन भए गेल छैक बूढ़क जीवन? रमाकेँ स्टंट लागल छनि । हमरो दस तरहक बिमारी अछिए । दिन-राति अस्पतालक चक्कर लगैत रहैत अछि । धन कही पड़ोसीकेँ जे बेर-कुबेर हमरसभक मदति कए दैत अछि,नहि तँ कहि नहि की हाल होइत? मुदा अनका बले कतेक दिन काज चलत? ओहो किरायेदार अछि? कहिआ अछि,कहिआ चलि जाएत तकर कोन ठेकान । किछुदिन पूर्व सुनने रहिऐक जे मकान मालिक ओकरासभकेँ किछु-किछु कहि रहल छलैक ।  जे भावी । अखन तँ पहिने अमेरिका चली । देखिऐक केहन छैक ओहिठामक समाज । अमेरिका बिदा हेबासँ पहिने श्यामक फोन आबि गेल छल जे ओ नहि रहत। ओकर एबजमे ओकर केओ संगी हमरासभकेँ  देखत । चलू जे हेतैक,से देखल जेतैक । आब जखन बिदा भइए गेल छी तखन बेसी सोच-विचारक कोन प्रयोजन? हम आ रमा हबाइ जहाज दिस बढ़ि रहल छी । एयर इंडिआक बेस पैघ विमान थिक ई । यात्रीसभ बसमे बेराबेरी बैसि रहल अछि । हमहूँसभ पाँतिमे छी। एकटा बस भरि गेल । दोसर बस आएल । हमसभ ओहि बसमे आगूए दिस बैसि जाइत छी । सौंसे बसमे धोती-कुरता पहिरनहार हम असगरे छी । यात्रीसभ हमरा दिस घुरैत रहैत अछि । जखन कि बसमे अधिकांश यात्री अपने देशक बुझाइत छथि । थोड़बे कालमे बस हबाइ जहाज लग पहुँचि जाइत अछि । हम दुनूगोटे हबाइ जहाजक सीढ़ीपर चढ़ैत छी । हबाइ जहाजक कर्मचारी हमरासभकेँ पकड़ि कए भीतर पहुँचा दैत अछि । टिकट देखि कए हमरासभक सीट धरि पहुँचा दैत अछि । हमदुनूगोटे आगूसँ तेसर पाँतिमे बामा कातक सीटपर बैसि जाइत छी । रमाकेँ खिड़की कातक जगह भेटल छनि । हम हुनकर बगलमे छी । बाहरक दृश्य देखि ओ प्रसन्न होइत अछि । यात्रीसभसँ जहाज भरि जाइत अछि । तकर बाद घोषणापर -घोषणा होमए लगैत अछि । ई करू,ओ करू । सीट बेल्ट बान्हि लिअ । मोबाइल फोन बंद कए लिअ । परिचारिकासभ सीट बेल्ट लगेबाक,आपातकालीन द्वारि खोलबाक प्रशिक्षण दैत अछि । फेर घुर्रक अबाज होइत अछि । हबाइ जहाज घुसकए लगैत अछि । घुसकैत-घुसकैत ओ ऊपर दिस उठए लगैत अछि आ देखिते-देखिते हबामे उड़िआ जाइत अछि । हमसभ आब अकासमे लटकि गेल छी । रमा नीचाँ देखैत छथि। सहरक घरसभ छोट-छोट भेल जा रहल अछि । जहिना-जहिना हबाइ जहाज ऊपर उड़ैत अछि तहिना-तहिना सहर छोटसँ-छोट भेल जा रहल अछि । जा�! आब तँ किछु नहि देखा रहल अछि। हमसभ बहुत ऊपर चलि गेल छी । आब जहाजमे चाह-जलखैसभ परसल जा रहल अछि । हमहुँसभ चाह पीबैत छी । जलखै करबाक मोन नहि होइत अछि । सामनेमे अखबार खोसल छल । ओकरा निकालैत छी । अपना देशक समाचार पढ़ि बहुत नीक लगैत अछि । पता नहि आब ई अखबार कहिआ भेटि सकत? हबाइ जहाज चालीस हजार फूटपर उड़ि रहल छल । आब नीचाँक किछु नहि देखा रहल छल । रमाकेँ आँखि लागि गेल छलि । हम अखबार पड़ब खतम कए चुकल रही । अचानक हबाइ जहाज हिलए लागल । तुरंत उद्घोषणा होइत अछि- "यात्री लोकनि अपन-अपन सीटबेल्ट बान्हि लेथि । हमसभ खराप मौसमसँ गुजरि रहल छी । बाहर अन्हड़-वर्षा भए रहल अछि । देखा चाही केना की होइत अछि?" रमाकेँ आँखि खुजि जाइत छनि । ओ बहुत डराएल बुझाइत छथि। हबाइ जहाजक हिलडोल भइए रहल अछि । "आब की कएल जाए?"- ओ पुछैत छथि। "किछु नहि? एहिमे हमरासभक करबाक हेतु अछिए की? पाइलटसभ लागले अछि। मौसमक गड़बड़ीकेँ तँ भगवाने ठीक करताह। जे सभक गति होएत सएह हमरोसभक होएत। हमसभ कोनो सभसँ फराक थोड़बे छी।" "बात तँ सही कहि रहल छी।" दिस मिनट धरि उठा-पटक चलिते रहल । तकर बाद मौसम बदलि गेल । उद्घोषक घोषणा केलक- "हमसभ आधा घंटामे अमेरिकाक सिएटल सहर पहुँचि रहल छी । अहाँसभ अपन-अपन समानसभ सरिआ लिअ।" बाहरक मौसम बहुत नीक बुझा रहल छल । हबाइ जहाजक यात्रीसभ अपन-अपन चश्मा,मोबाइल फोन हैंडबैग सरिआ लैत छथि । ठीक आधा घंटाक बाद हमरसभक जहाज नीचाँ उतरब शुरु करैत अछि । यात्रीसभक भीड़केँ छटैत हमदुनू बेकती हबाइ अड्डाक निकासी द्वारिपर पहुँचि जाइत छी । चारूकात आँखि पारि-पारि कए ताकि रहल छी । "कहाँ अछि ओ?" कतहु केओ नहि देखाइत अछि। आब की होएत? -रबीन्द्र नारायण मिश्र, पिताक नाम: स्वर्गीय सूर्य नारायण मिश्र, माताक नाम: स्वर्गीया दयाकाशी देवी, बएस: ६९ वर्ष, पैतृक ग्राम: अड़ेर डीह, मातृक: सिन्घिआ ड्योढ़ी, वृति: भारत सरकारक उप सचिव (सेवानिवृत्त), स्पेशल मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, दिल्ली(सेवानिवृत्त), शिक्षा: चन्द्रधारी मिथिला महाविद्यालयसँ बी.एस-सी. भौतिक विज्ञानमे प्रतिष्ठा : दिल्ली विश्वविद्यालयसँ विधि स्नातक, प्रकाशित कृति: मैथिलीमे: प्रकाशन वर्षः२०१७ १.भोरसँ साँझ धरि (आत्म कथा),२. प्रसंगवश (निवंध), ३.स्वर्ग एतहि अछि (यात्रा प्रसंग); प्रकाशन वर्षः२०१८ ४. फसाद (कथा संग्रह) ५. नमस्तस्यै (उपन्यास) ६. विविध प्रसंग (निवंध) ७.महराज(उपन्यास) ८.लजकोटर(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०१९ ९.सीमाक ओहि पार(उपन्यास)१०.समाधान(निवंध संग्रह) ११.मातृभूमि(उपन्यास) १२.स्वप्नलोक(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२० १३.शंखनाद(उपन्यास) १४.इएह थिक जीवन(संस्मरण)१५.ढहैत देबाल(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२१ १६.पाथेय(संस्मरण) १७.हम आबि रहल छी(उपन्यास) १८.प्रलयक परात(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२२ १९.बीति गेल समय(उपन्यास) २०.प्रतिबिम्ब(उपन्यास) २१.बदलि रहल अछि सभकिछु(उपन्यास) २२.राष्ट्र मंदिर(उपन्यास) २३.संयोग(कथा संग्रह) २४.नाचि रहल छलि वसुधा(उपन्यास) २५.दीप जरैत रहए (उपन्यास)। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.किशन कारीगर-मिथिला मैथिली के नाम पर दललपनी आ चलकपनी किशन कारीगर मिथिला मैथिली के नाम पर दललपनी आ चलकपनी

मिथिला मैथिली के कटु यथार्थ यै मैथिली नामे दललपनी करब पेट पोसब आ चलतपनी फिराक जे मैथिली सबहक छियैअ? की जे बारहो बरण के भरमौने रहब आ अप्पन सुआर्थ सिद्ध करैत रहब आ लोको के अप्पन कुकृत्य नै बुझह देबै. मिथिला मैथिली नाम पर कतेको दलाल आ तेकर गिरोह सक्रिय रहल आ मैथिली नामे लाभ ओकरे टा भेटैत रहलै.

अहाँ कनियो जागरूक ही क बलू त ओई दलाल सब से पूछहू जे मैथिली बारहो बरण के लिखब बाजब के माोजर हुअ देलकै की? तोरा माई के बोल के संपादित कर जबरदस्ती मानकीकरण कर देल जाई होऊ कैले? की ऊ सब अपन माएक बोल छोड़लकै? त फेर तोरा किए अप्पन बोली छोड़ा देल जाई होऊ? तोरा अरू पिछलग्गू बनि अकरा मान लै छहू? तोरो अरू त अप्पन माईके बोली गिरबी राख दललपनी करले फिरै छहि. मानकी दलाल के त अप्पन माएक बोली छै ओकरा लाभे लाभ. तोरा अरू के की भेटलौ घरिघंटा?

मिथिला मैथिली नाम पर दललपनी के आरंभ:

1. जहिए मैथिली महासभा गठित भेल तहिये से मैथिली दरबारी दलाल सबहक कब्जा मे आबि गेलै. ऊ सब सुनियोजित रूपे मैथिली अमैथिल आ मानक के डांइर खीच अप्पन आधिपत्य प्रभाव जमौनै शुरू केलक.

2. लोकभाषा मैथिली के मानकी बना ततेक ओझरा देल गेलै जे आम जन मैथिली स दूर होइत गेलै. यैह त मैथिल दलाल सब चाहैत रहै जे बारहो बरण के मैथिली नै रहू आ गिरोह महासभा वला सब सबटा फायदा लूटैत रहब.

3. बारहो बरण के मैथिली लिखब बाजब के मोजर नै केलकै आ नै हुए देलकै? तकरा राड़ कोसिकन्हा ठेठी, मधेसी दैछणाहा पैछमाहा बोली बना कहा प्रसारित केलकै? खाली मानक टा के मोजर हुअ देलकै आ ई सब अप्पन दललपनी दाउ सुतारैत रहल.

4. साहित्य अकादमी मे मैथिली के मान्यता के बाद त अई पेटपोसुआ दलाल सबके दुनू हाथे लड्डू. अकादमी पुरस्कारक दलाली गिरोहबादी होहकारी केकरो स छुपित नै रहलै. यैह सबटा साहित्य सेवी आ अनका ककरो साहित्य लिखबाक लूइड़ भास नै छै. यैह बात प्रचारित करबा इ सब अप्पन साहित्यिक रोटी सेकैत रहल.

5. मिथिला मैथिली के नाम पर कुकुरमुत्ता जेकां संस्था सब बनलै. छमाही तिमाही दूमासिक पत्रिका छापब शुरू कएल गेलै. आ तेकर पहुँच पब्लिक तक कोनो पहुँच नै रहलै. हं गिरोहक लोक सब एक दोसर के कवि कथाकार उपन्यासकार समीक्षक लेखक के तगमा बँटैत रहलै आ मैथिली नामे लाभ लूटैत रहलै.

6. मैथिली मे पछुआएल लोक, बिना चिन्हा परिचे वला, सोलकन, दलित लेखक सबके कोनो मोजर नै देल गेलै? नै इ सब आंदोलन क अप्पन मोजर लै गेल? उनटे मैथिल दलाल सबहक हं मे हं मिला मानक मानैत गेल आ मंच लोभे अप्पन मौलिक बोली के संपादित करा मानक बजैत गबैत भजैत गेल.

7. वाजपेयी जी के शासनकाल मे बभनौती खेला स मैथिली के अष्टम सूची मे जोड़ा देल गेलै. अइ के बाद त ई दलाल सब बेलगाम होइत गेलै. मिथिला मैथिली नामे मनमाना करैत गेल. के रोकतै के टोकतै एकदम मनमाना. फेर मिथिलाक्षर खेला सक्रिय रूपे चालू भेल आ हो हो शुरू छै.

8. मिथिला राज के बहन्ना बना हो हो क फेर स दलाली के नवका पटकथा लिखा गेल छै. जंतर मंतर पर अभिनय संवाद ढोंग सब चालू छै. लोक सब सेहो असलियत बुझहै लगलै जे दलाली के नबका नाम मिथिला राज.

9. साहित्य अकादमी, मैथिली भोजपुरी अकादमी, मैथिली अकादमी पटना, समिति, लेखक संघ सब वरचस्ववादी दलाल सबहक अड्डा बना देल गेलै. आ फेर मैथिली नामे एकाधिकार बना लाभे लाभ. मैथिली के गिरोहबादी दलाल सबहक हाथ सौंप देल गेलै.

मिथिला मैथिली नामे चलकपनी:-

1. आम जन लोक समाज के हरदम भ्रम मे राखल गेलै जे मिथिला मैथिली सबहक हइ छै. आ मैथिली स लाभ ई दलाल सब टा कमाइत रहल. आम जन के मिथिला मैथिली स कहियो ने जोरल गेलै.

2. छूटल बारल लोक आ पछुआएल, दलित वर्गक सुनियोजित रूपे हरदम रस्ता रोकबाक प्रयास केलक. तइयो चलकपनी जे हम कोनो रस्ता रोकने छियै?

3. मिथिला मैथिली नामे बारल हारल झमारल लोक सब नै अई पेटपोसुआ दलाल सबके बिरोध कैलकै? आ नै करतौ? मंच लोभे लेखक तगमा लोभे ओहि दलाल सबहक संस्था मे शामिल हो जेतौ. औरी पाग पहिरले छिछिअले फिरतौ.

4. मिथिला मैथिली नामे विद्यापति के धो पका के खाएब बेचब आ सलहेश लोड़ीक दिना भद्री आदी के कोनो चर्च नै करत. तइयो होहकारी जे मैथिली सबहक छियै. सोलकन सब अपना महापुरूष के आयोजन नै करतौ हं अनकर आयोजन मे माला पहिर पिछलगुआ होहकारी बनतौ.

5. मिथिला रत्न/मैथिली पुरूस्कार, किदैन कहाँ पुरूस्कार बंटबाक खेल चंदा के धंधा केकरो स आब छुपित नै रहलै. तइयो निर्लज्ज बनल सबके भरमाबै जेतै जे मैथिली सबहक? आ चलकपनी क लाभ ले तूंही सब टा.

6. मैथिली बारहो बरण के नै हुअ देल गेलै आ चलकपनी केहेन जे हम केकरो कोनो रस्ता रोकने छियै? तोरा अरू के रस्ता रोक देल गेलौ त बिरोध कैले करबिही तोरो अरू दलाले संग भ जो आ गबैत रह मैथिली मे अहिना होइत एलैइए?

अई दललपनी चलकपनी दुआरे मिथिला मैथिली खंड बिखंड होइत रहलै. यथार्थ बुझैतो सब निबदी मारने रहू. मिथिला के जनता जागरूक भ गेल तहिया त अई धूर्त सबहक दललपनी चलकपनी बंद भ जेतै. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.८.कुंदन कर्ण- बीहनि कथा- निर्णय कुंदन कर्ण बीहनि कथा- निर्णय

कुसो बेर बेर कोनो ने कोनो बहन्ने दलान परसँ आँगन चलि जा रहल छै ! ओकर नाना अयोध्या बाबू बड़ पुरखाह छथिन, हुनका हिसाबे पुरुख पातर के दलान पर रहबाक चाही। एक-दू बेर अखियास करबाक बाद ओ अपन भातिजसँ पुछलखिन जे कुसो के कोनो कनिया-मनिया संग कोनो चक्कर त' नहि छै, भोर में जखनसँ आयल अछि कोनो ने कोनो बहन्ने आँगन जा रहल अछि। भातिज अनभिज्ञता जतेलकैन्ह त स्वयं कुसो स' पुछि बैसलखिन। एकाध बेर रेबारलाक बाद कुसो हिम्मत क'क बाजल , "आँगन टीभी देखय गेल छलहुँ, आई निर्णय आबय वाला छैक सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिक विवाह पर, हम माधोसँ विवाह करय चाहैत छी!!

नानाजी के दाँती लागि गेलैन !! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.९.रामचन्द्र राय- नशामुक्त गाम रामचन्द्र राय नशामुक्त गाम राजू सर अपने गामक मध्य विद्यालयमे प्रभारी प्रधानाध्यापक रूपमे कार्यरत छैथ। चटिया सभकेँ पढ़बै-लिखबैमे सभदिन सँ मनलग्गू आ तेज-तर्रार रहला अछि। अपने, अनुशासनक पालन करैत राजू सर विद्यालयक विद्यार्थी सभकेँ सेहो सदिखन अनुशासनक पाठ पढ़बैत रहै छैथ आ अपना गामक विकासक लेल सेहो सदिखन तत्पर रहिते छैथ। हालक किछु बर्खसँ सामाजिक वातावरणमे जे परिवर्तन भऽ रहल अछि, किशोर आ युवाक दिशा जे बदैल रहल अछि तइसँ राजू सरजी खिन्न रहै छैथ। पहिले गामक बच्चा सभ साँझ पड़ैत-पड़ैत लालटेन नेसिकऽ दलान वा ओसरापर पढ़ैले बैस रहैत छल, मुदा आब ओ मोबाइलमे व्यस्त भऽ जाइत अछि। राजू सर पनखौक आदमी छैथ। माने हुनका पान खेबाक हिस्सक छैन। मुदा विद्यालयक समयमे ओ कखनो आ कहियो ने पान खाइ छैथ। हुनकर मानब छैन जे पान-गुटखा खा कऽ चटिया सभक बीचमे नहि जेबाक चाही। राजू सर अपन अइ धारणापर सभ दिनसँ अडिग रहला अछि। हँ, तखन विद्यालयक कार्यसँ निवृत्त होइते हुनका मुँहमे पान चाहबे करिऐन। ओ कहै छैथ जे पेटमे अन्न रहए वा नहि मुदा मुँहमे पान रहलासँ मुहोँ लाल आ मनो लाल रहैत अछि। एक दिन साँझुपहर चौकपर सँ पान खा कऽ राजू सर आबि रहल छला। रस्तामे महाकान्त आओर भोला भाय हुनका भेट गेलैन। हिनका देखिते ओ दुनू गोरे एक्के स्वरमे बजला- �सर, अहींक इंतजार हम सभ कए रहल छेलौं।� राजू सर बजला- �किए? कोनो विशेष गप अछि की?� दुनू गोरे बजला- �सर, की कहूँ.. गामक स्थिति तँ बड़ खराप भेल चल जा रहल अछि। आब तँ ननकियो छौड़ा सभ देशी दारू पीब रहल अछि। गाममे तीन-तीन आदमी देशी दारू बेचि रहल अछि। तीनू दोकानदार तीन उमेरक अछि। जे जेहेन उमेरक अछि तेकरा लग तेहने उमेरसँ मिलैत-जुलैत गहिंकी दारू पीबाक लेल पहुँचैत अछि। पहिले बिहारमे दारू बन्न नहि छेलै तँ अइ इलाकामे एक्केटा गाममे बनौआ दारू भेटै छेलइ। ओतए गिनल-चुनल लोक पहुँचैत छल। मुदा आब दारू बन्न भेने सभ गामक गली-गलीमे चोरी-छिपे दारू भेटि जाइत अछि। तइमे अप्पन गाम तँ आब नाम कए रहल अछि। एना जे रहतै तँ गाम की विकास करत। से सर.. अहाँ सँ निवेदन अछि जे थानामे खबर दऽ कऽ गामसँ दारू बेचनाइ बन्द करबा दितिऐ।� राजू सर सभ बात सुनिकऽ गम्भीरतासँ बजला- �लेकिन एकर उठौनाबला गाहैंक तँ अहूँ दुनू गोरे छी। संग-संग गामक किछु मुँहपुरुख सभ बेचबै छथिन। आओर ओ सभ तँ रोजे ओइ अड्डापर जाइत रहै छैथ। हिनके सभक देखा-देखी ने आब नवतुरियो सभ पीनाइ शुरू कऽ देलक अछि।� परदेशी नवयुवक सभ जखन गाम अबैत अछि तँ गुट बनाकऽ रोजे माछ-मासु आ मदिरा इत्यादिक पार्टी करैत अछि। जगह-जगहपर जूआक अड्डा बनल रहै छइ। गाछी-बिरछीमे दिन-राति पार्टी चलैत रहै छइ। ओ सभ तँ सोचैत अछि जे हम सभ तँ जे छी से छीहे, हमरासँ छोट सभ सेहो हमरासँ नीक नहि बनि जाए। एकरे नकल ई नवतुरिया सभ ने कऽ रहल अछि। गामक अधिकांश बच्चाक पिता परदेश खटैत अछि आ माए गामपर रहै छइ। माएकेँ ई बच्चा सभ नहि गुदानै छै। आसानीसँ ठकि लइ छै। कहै छिऐ जे माए-बाप बच्चाकेँ जेहेन संस्कार देतै बच्चा तेहने ने बनतै। मुदा कोन माए-बाप चाहैत अछि जे हमर धिया-पुता नीक नहि बनए। आइ ई नवतुरिया सभ गलत रस्तापर जा रहल अछि तँ एकर सभसँ पैघ दोखी समाजेक किछु दुष्ट प्रवृतिक लोक ने छैथ। महाकान्त आ भोला भाय, दुनू गोरे सुनैत रहला। किछु कालक बाद भोला भाय बजला- �हँ सर, से तँ ठीके कहै छिऐ अपने। मुदा एकर समाधान केना हएत?� एकर समाधान थाना आ पुलिसकेँ कहने नहि हएत। किएक तँ ओ सभ सेहो एकरा सभसँ मिलल रहै छै। जे दोकानदार समयसँ सप्ताहिक नहि पहुँचाबै छै तकरे टा पकड़ैत अछि आ तेकरो लेन-देन भेलाक बाद छोड़ि दइ छइ। दारू बेचनाइ बन्द करेबाक सभसँ नीक तरीका अछि जे गामक सभकियो दारू पीनाइ छोड़ि दिऐ। ने गाँहैक जेतै आ ने ओ बेचत। तेकर बादो ओ धन्धा बन्न नहि करत तँ ओकरापर सामाजिक दबाव देल जेतइ। मुदा ई एतेक आसान काज नहि अछि। हँ, सर हम सभ साफ कऽ छोड़ि देब। जे सप्पत खुआ लिअ, कहियो नहि पीयब। गामक स्थिति देखिकऽ हमहूँ सभ आजीज भऽ गेल छी। सर, अहाँ कनी धियानसँ सोचियौ, कोनो ने कोनो रस्ता जरूर निकलतै। राजू सर समाजक सुबेवस्था आओर कुबेवस्थापर चिन्तन-मनन करैत घर एला। हाथ-पएर धो कऽ एकटा पत्रिका लऽ पढ़ए लगला मुदा मने ने लागैन। पत्नी पुछलकैन- �मुँह किए लटकल अछि यौ, की सोचि रहल छी.? चाह पीयब, बनाबी?� �हँ.. हँ.., जरूर.. जरूर.. बनाउ।� राजू सर सोचए लगला। समाजक विकास लेल अर्थ जरूरी अछि, गाम घरमे रोजगारक घोर अभाव छै तँए लोक शहर धेने अछि। निचला तबका आ निम्न-मध्यवर्गीय परिवारक लोक घर-परिवारकेँ छोड़िकऽ शहर चलि जाइत अछि। तइमे किछु गिनल-चुनल लोककेँ नीक नोकरी भेट जाइ छै आ ओ अपना परिवारकेँ लऽ कऽ बाहरे रहए लगैत अछि आ ओतहि धिया-पुताकेँ पढ़ाबए लगैत अछि। ओतइ सभ किछु उपलब्ध रहने ओ परिवार आगू बढ़ि जाइत अछि। तहूमे सभ नहि, किछु भुतियेबो करैत अछि। एमहर गाममे नवतुरिया आ नवयुवा सभ स्कूल आ कौलेजमे नाओं लिखबैत अछि तँ माए ओकरा होशियार बुझए लगैत अछि। आब बड़का मोबाइल सभकेँ चाहबे करी... गारजन जँ नहि कीनि देतै तँ ओ घरमे अठबज्जर कऽ देत। आब मोबाइल जीवनक अंग बनि गेल अछि। ई बच्चा सभ एकर सदुपयोग कम आ दुरुपयोग बेसी करैत अछि तइ कारणेँ अधिकांश युवा राहसँ बेराह भऽ रहल अछि। ज्ञान-विज्ञान आ टेक्नोलॉजीकेँ आगू बढ़ने विकास वा विनाश, शिक्षा-संस्कृतिक उन्नैत वा अवनैत दुनू भऽ रहल अछि। एहि चकाचौंधमे ई नवजेनरेशन जेना भुतिया रहल अछि। खाएर जे.. से..। ओही दिन-रातिमे सुतैसँ पहिने राजू सर गामकेँ नशामुक्त करबाक संकल्प लेलैन। ऐगला दिन भने गामक किछु एहेन बेकतीसँ भेँट केलाह, जे नशा नहि करै छैथ, हुनका सभ लग अपन विचार रखलैन। ओ सभ कहलकैन- �विचार तँ बड़ नीक अछि। मुदा अछि बड़ असम्भव।� राजू सर बजला- �अहाँ सभ सिरिफ साथ दिअ, असम्भवकेँ सम्भव कएल जा सकैत अछि।� सभ कहलकैन- �ठीक छै, हम सभ अहाँक संग छी। ऐगला योजना बनाउ जे ई केना भऽ सकैत अछि।� दू साए घरक बस्तीमे मात्र पाँच बेकती संग देबाक आश्वासन देलकैन। मुदा ई बुझि रहल छला जे ईहो सभ ऊपरे-ऊपरे कहला हेन। तथापि राजू सर खुशीए रहैथ जे किछुओ लोक तँ संग दइले तैयार भेला किने। ऐगला दिन भने गामक मध्य सामुदायिक भवनपर सौंसे गामक बैसार करौलैन। बैसारमे राजू सर अपन विचार विस्तारसँ रखलैन। नशापानक कुप्रभावपर प्रभावी चर्चा केलैन। ग्रामीणसँ आग्रह आओर निवेदन केलैन जे ई काज छोड़ाएल जाए। अइसँ गामक नव जेनरेशन बिगैड़ रहल अछि। बैसारमे चारू तरफ लोक कानाफुसी करए लागल। हिनका विचारकेँ जोरदार विरोध कएल गेल। एकटा पियक्कर पीबकऽ आएले रहए। ओ हिनकापर उनैट गेल- �हे यौ मास्टर साहैब, अहाँक काज छी धिया-पुताकेँ पढ़ौनाइ-लिखौनाइ। गामपर हुकुम चलौनाइ नइ। के दारू पीबैत अछि आ के नहि पीबैत अछि, के बेचैत अछि आ के नै बेचैत अछि, अइसँ अहाँकेँ कोन मतलब..?� दोसर बेकती बजला- �देश स्वतंत्र छै, जेकरा जे मन हेतै से से करत। केकरो खाइ-पीबैपर, बिजनीस-बेपारपर अहाँ रोक लगबैबला के..? बलौसँ अहाँ अपन बनल बनौल प्रतिष्ठाकेँ किए धुमिल करए चाहै छी।� तेसर बेकती बाजल- �अहाँ तँ पीबै छी नहि, तँए अहाँ की बुझबै एकर आनन्द। अपने जेकाँ सभकेँ नहि बुझियौ। अहाँकेँ सुधारलासँ समाज नहि सुधैर जेतइ।� जेकरो किछु बजबाक अवगैत नहि, सेहो अपन दबल आवाजमे राजू सर पर टोन्ट कसए लागल। सभ उठिकऽ विदा भऽ गेल। बिना किछु निर्णय भेने चिन्तित मुद्रामे राजू सर घर आपस एला। घरमे पत्नी सेहो झिड़की देलकैन- �सौंसे गामकेँ सुधारैक ठीका अहीं नेने छी। किछु नै फुराइत अछि तँ नबावी करए लगै छी। छोड़ि दियौ गाम-समाजकेँ। जेतए जाइ छै, जाए दियौ। अनेरे दुनियाँ-संसारक टेंशन अपना ऊपर कथीले लइ छी।� ओइ दिन राजू सरकेँ रातिमे नीन नहि होइन। अधरतियामे पत्नीकेँ बुझेबाक मन भेलैन। मुदा अपने मनमे भेलैन जे गामक सभकियो अइ विचारक विरूद्ध छैथ। कोनो पंचायत प्रतिनिधिकेँ कहबैन तँ सेहो संग नहियेँ देता। सभ तँ ओहन कुकृत्यमे डुमले रहै छैथ। पुन: मोन पड़लैन जे वर्तमान मुखिया तँ दारू नहि पीबै छैथ। काल्हि हुनका समक्ष प्रस्ताव राखब। ओ जरूर संग देता। जँ संकल्प लेलौं तँ हमरा चुप नहि बैसबाक चाही। अपन परियास अन्तिम-अन्तिम तक करैत रहक चाही। राजू सर ऐगला दिन मुखियाजी लग जा कऽ प्रस्ताव रखलैन। ओ भरपूर सहयोगक आश्वासन देलकैन। तेकर बाद प्रखण्ड शिक्षा पदाधिकारी लग सेहो गेला। हुनका लग अपन बात रखैत राजू सर बजला- �श्रीमान्, हम अपना विद्यालयक छात्र-छात्राक द्वारा विशेष नशामुक्ति अभियान चलाबए चाहि रहल छी। हम छात्र-छात्राकेँ जागरूक कए नशामुक्तिसँ जुड़ल �गीत� आ �नारा�क संग सप्ताहमे एक दिन प्रभातफेरी निकालए चाहै छी, से हमरा कार्यालयी आदेश देल जाउ।� प्रखण्ड शिक्षा पदाधिकारी हिनक प्रस्तावसँ खूब प्रसन्न भेला। आओर विद्यालयक पठन-पाठन प्रभावित केने बिना ई काज करबाक आदेश देलखिन। संगहि एकटा लिखित आवेदन सेहो जमा करबाक लेल राजू सर केँ कहलकैन। राजू सर अपना विद्यालयमे गुणवतापूर्ण शिक्षाक संग नशमुक्ति अभियानसँ जुड़ल गीत, नारा आओर नुक्कर नाटकक तैयारी जोर-शोरसँ कराबए लगला। छात्र-छात्रा सभ सेहो बड़ उत्साहित छल। ऐगले मास नशामुक्ति दिवस रहए। राजू सरकेँ मन कहलकैन जे किए ने ई अभियान शुरू करबाक लेल ओही दिनक चुनाव कएल जाए। नशामुक्ति दिवसक भिनसरे पूर्ण तैयारीक संग प्रभातफेरी निकालल गेल। जे देखलक से दंग रहि गेल। ई कार्यक्रम तेतेक ने सफल भेल से गामे भरिमे नहि, पंचायतसँ प्रखण्ड तक चर्चाक विषय बनि गेल। गामक युवक सभ विडियो बना-बना कऽ सोशल मिडियापर वायरल केलक। उत्साहित भऽ कऽ राजू सर आब सभ प्रत्येक सप्ताहक सोम दिन प्रभात-फेरी निकालए लगला। संग-संग नशामुक्तिपर नुक्कर नाटकक आयोजन सेहो करए लगला। अभिभावक लोकनि अपना बच्चाकेँ प्रतिभाक प्रदर्शन देखि खुशीसँ झुमि उठला। कल्पनासँ बाहर छेलैन ई बच्चा सभ एहनो प्रदर्शन कऽ सकैए। राजू सरकेँ खूब जश भेटए लगलैन। मुदा राजू सर तँ एहेन जाहुरी छैथ जे कोयलाक खानसँ हीरा तलाशनाइ जनै छैथ। ठीक एक मासक बाद आस्ते-आस्ते गामक माहौल बदलए लगल। दारू पियाकमे किछु कमी हुअ लगल। ऐगला मास अभिभावक, शिक्षक मासिक गोष्ठीमे राजू सर छात्र-छात्राक माताक उपस्थितिपर सेहो बल दिअ लगला। परिणामस्वरूप शत-प्रतिशत माता उपस्थित भेली। एहि गोष्ठीमे विद्यार्थी सभक पठन-पाठन आ अनुशासनसँ लऽ कऽ नशामुक्ति अभियान तक पर जोरदार चर्चा कएल। राजू सर अभिभावक सभकेँ समझा रहल छला जे बिहार सरकारकेँ दारू बन्द करेबाक पाछू की उद्देश्य छल आओर लोक एकरा कोन तरहेँ लऽ रहल अछि। दारू पीने हानियेँ-हानि होइ छै, लाभ किछु ने। तेकर बादो लोक चोरा-नुका कऽ पीब रहल अछि। सालमे सैंकड़ो लोक जहरीला दारू पीब कऽ मरैत अछि। ई दारू देहमे अनेक तरहक बीमारीकेँ जन्म दैत अछि। दारू पीलासँ मोनमे नीक विचार तँ कखनौं नहि उत्पन्न होइ छै। अनेरे घरसँ लऽ कऽ टोल-पड़ोस तक हो-हल्ला, गारि-गरौऐल आओर मारि-पीट तक भऽ जाइ छइ। अइसँ असामाजिक वातावरणकेँ सेहो बढ़ावा भेटै छै आओर समाज उन्नतिक बदला अवनतिकक तरफ चलि जाइत अछि। आ सभसँ पैघ बात नव जेनरेशन बिगैड़ रहल अछि। सुनै छिऐ जेतेकमे एक गिलास देसी दारू भेटै छै तेतबेमे एक लीटर दूध भेटै छै। तखन बताउ, एक गिलास दारू नीक आकि एक लीटर दूध नीक..?� सभ कियो एक्के स्वरमे बजली- �सर, दूधे ने नीक।� �तँए, हम अहाँ सभसँ हाथ जोड़िकऽ निवेदन करै छी जे हमरा एहि अभियानमे सहयोग करी। हमरा बिसवास अछि जे एक दिन सफलता जरूर भेटत।� सभ महिला एक्के स्वरमे बजली- �सर, हम सभ कियो अहाँक संग छी। अहाँ जे कहब, हम सभ करबाक लेल तैयार छी।� बीचमे गामक जीविका दीदी सेहो छेली। ओ उठि कऽ बजली- �आब हमहूँ सभ चुप नहि बैसब। काल्हियेसँ गाममे दारू बिकेनाइ बन्द भऽ जाएत।� सभ कियो आपसमे विचार केलीह जे काल्हि की करबाक अछि। ऐगला दिन सभ महिला एक जगह जमा भेली। जइमे गामक किछु आओर लोक शामिल भेला। सभ मिलिकऽ दारूक दोकानपर पहुँचली। गाममे तीन गोरे दारू बेचैए। तीनू दारूबेच्चाकेँ खूब बेइज्जत करैत महिला सभ चेतबैत कहलकैन- �ई काज आइसँ बन्द भऽ जेबाक चाही, नहि तँ हम सभ मिलिकऽ अहाँ सबहक विरुद्ध बहुत आगाँ तक लड़ाइ लड़ब। अहाँ सभकेँ जहल भेजबा देब।� दोकानदारक घरमे जेतेक दारू रहै, सभकेँ फोरि-भाँगि कऽ माटिक निच्चाँ गाड़ि देल गेल। गाममे अलगे माहौल बनि गेल। हिनका सभक उग्र रूप देख दारू पीबएबला सभकेँ सेहो सीटी-पीटी गुम्म भऽ गेलइ। जीविका दीदीक नाम सुलोचना छिऐन। ओ बड़ हिम्मतवाली स्त्री छैथ। सभ कियो अइ काजकेँ सम्पन्न कए गामक सामुदायिक भवनपर बैसली। पंजीपर नशामुक्ति अभियान�क नामसँ एकटा समूह बनौली। अइमे गामक लगभग सभ परिवारसँ एक-एकटा महिला सदस्या बनली। आओर सर्वसम्मतिसँ ई निर्णय लेल गेल जे आइसँ गामक जइ परिवारक जे बेकती दारू पीने नजैर औता तिनका केश कटा, कारीख-चून लगा गाममे घुमाओल जाएत। सभ कियो अइ प्रस्तावकेँ समर्थन केलीह आ अपना संकल्पपर अडिग रहली। आस्ते-आस्ते ऐ तरहेँ गाम नशामुक्त भऽ गेल। ऐगला बैसारमे समूहक सभ सदस्यक द्वारा ई निर्णय लेल गेल जे राजू सरजीक मेहनत आ अथक प्रयाससँ गाम नशामुक्त भेल अछि, तँए समूहक तरफसँ हिनका सम्मानित कएल जाए। राजू सर लग ई खबर गेल तँ ओ अइ सम्मानक आनाकानी करए लगला। मुदा सबहक जोरपर हुनका तैयार हुअ पड़लैन। ऐगला रवि दिन ओही जगहपर जैठाम राजू सर पहिल बैसार केने छला, हुनका पुष्प मालाक संग पाँचो टुक कपड़ासँ सम्मानित कएल गेलैन। अइ कार्यक्रममे गामक अधिकाधिक लोक आओर छात्र-छात्रा सभ उपस्थित रहैथ। राजू सरजीक मनमे उठलैन, वास्तवमे नीक काजक परिणाम नीक होइ छइ। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१०.रामेश्वर प्रसाद मंडल- दिव्य दृष्टि 'क बहुचर्चित लेखक लालदेव कामत रामेश्वर प्रसाद मंडल दिव्य दृष्टि 'क बहुचर्चित लेखक लालदेव कामत

नियमित चर्चित समीक्षक आ लेखक श्री लाल देव कामत जीक मैथिली पोथी " दिव्य दृष्टि" नामके अनुकूल सारगर्भित अछि। रचित ' दिव्य दृष्टि ' व्याकरण शास्त्र केँ दृष्टि सँ बा समासक विभेद अनुसारे कर्मधारय समास छी। जइमे विशेषणके संग- संग विशेष्य रहैत अछि,जेना नीलकमल मे नील विशेषण आ कमल विशेष्य भेल। तहिना दिव्यदृष्टि मे दृष्टि विशेष्य भेल आ दिव्य विशेषण। तात्पर्य दृष्टि केहन! उत्तर - दिव्य। दृष्टि 'क शाव्दिक अर्थ भेल खोजी नेत्र। दिव्यक साधारणतः मतलब भेल चमत्कार करय बाला । आ सम्मिलित आशय भेल - जुटल,नुकाएल,झआंपल वा अद्भुत चीज बौसकेँ सामनेमे लाबैबला। दिव्य दृष्टि 'क कुशल लेखक लाल देव जी शत् प्रतिशत सैह काज ऐ उपयुक्त पोथीमे केने छैथ। जेना कस्तुरी बढ़दिव होईछ,एहिक गमक तँ आरो दिव्य होइत अछि,तँई मृगा एकरा ताकैत औनाईत रहैछ। मुदा ई भेटत केना? ई तँ स्वंय मृगेक नाभि (ढ़ोढ़ी) मेँ छिपल रहैछ-: कस्तुरी तँ ढ़ोढ़ीमे बसैत अछि जेकरा ढ़ुढ़त मृग तहिना राम दिलमे बसैत अछि दिव्य बनाबू अपन दृग। प्रस्तुत पुस्तक मे अमर शहीद सँ लऽ कऽ साहित्यकार, रचनाकार,कवि, अनुवादक, यशस्वी नेता आ भारतके सपुत आदि सबटा लेख जोड़िकय लालदेव जी 50 सँ अधिक व्यक्तिक सफल काज ओ क्रांति दृष्टि पटल पर दोनों छथि। जे हिनक अद्भुत लेखन शैली छीयैन।जेना 1934 ईस्वीमे अनन्त बाबू अर्थात अनन्त लाल कामत जी डाक्टर राजेन्द्र बाबू 'क संग भूकम्प पीड़ितक सहायतार्थ काज केलनि। जैन एकबेर आजादी 'क यहां संग्राम मेँ गिरफ्तार भेलाह कि हिनक दादीमाँ अधामोन चांदिक गहना कोतबाल केँ दैत छथिन ऐ लेल की पोताक गिरफ्तारी नँए होईक। ई समाजक आ देशक सेवामे लागल रहलाह, एवम ताम्रपत्रधारी बनला। ई देशक सपुत देश सेवा मे संलग्न छलाह। वरेण्य साहित्यकार मिथिला विभूति मैथिली शिल्पी आदरणीय जगदीश प्रसाद मंडल जीके अए पोथीमे पुरजोर उल्लेख केनअ छैथ आ शए से अधिक पोथी लिखलापर हिनक गुणगान सेहो केनए छैथ जिनकर प्रसिद्ध कृति पंगु उपन्यासकेँ मैथिली साहित्य अकादमी पुरस्कार दिल्ली सम्मानित केलैन जइ सँ इ अनमोल पोथी अमरत्व प्राप्त केलैन। पुरस्कारक लिस्टमे पोथी एगारह नम्बर पर रहय' प्रोफेसर रामेश्वर प्रसाद मंडल जी अय अलंकृत पंगु उपन्यास केँ हिन्दीमे एकरंगा बानकी रुपान्तरण केलखिन आ प्रथम अनुवादक सौभाग्य प्राप्त केलनि जाहि सँ हिनका पैघ यश भेटलनि ई बात दिव्य दृष्टिमे लालदेव जी नीक जेकाँ लिखने छथि। पंगु किसानी उपन्यास छी आ किसानक व्यथा कथा पर आधारित अछि। प्रिय कामतजी दिव्य दृष्टिमे एकटा युक्त कवि दीनानाथ प्रसाद जुवराजक परिचय पोथी सँ कराबैत छैथ। जइ में युवा कवि जुवराजजी समाजक गीरैत सामाजिकता,मर्यादा आ लोकक मरैत मानवताक चित्रण केने छैथ। अए में बद्रीनाथ रायजी जँका प्रसिद्ध कवि आ हेरायल कविके पहिचान देलैक अछि। कवियत्री मुन्नी कामत सँ परीचय करौने छथि की मुन्नी केना एक मजबुत कवियत्री भेलीह, मुन्नी स्वयं बेटीक दर्द बुझैत छथइन- 'जहिया एंकर जनमभेल तहिये डिबिया मिझा गेल सब कहलक कलंक एलौह छठिहारो सँ गीत हेरा गेल।" तहिना सम्मानित लेखक लालदेव जी मिथिला महानमे युवा कवि उमेश पासवानक सुन्दर भावना देखबैत छथि। चर्चित साहित्यकार रामबिलास साहजीक उपन्यास दुधबेचनी में हिनक आदर्श चरित्र देखौने छथि। नव चर्चित कथाकार आ बेबाक बजनिहार नन्द विलास राय जीक सुहनगर आ रसगर कथा पोथी म भेटैत अछि। जोशीला सम्मानित उपन्यासकार राजदेव मंडल जीक स्थापित उपन्यास हमर टोल केँ व्यंग्यात्मक आ अंध विश्वासक चरित्रक दर्शन सेहो करबैत छैथ। मित्रवर स्मृति शेष जय प्रकाश मंडल- गीतकार और गायक,लेखक, अधिवक्ता 'क संकलन मैथिली पुस्तिका ' गीत नव दिश' केँ एहि पोथीमे सेहो झलकौने छथि- हम दए छी उपराग तो समाजक लोक जाइत धरम कियक बनौलियै.....�.! ऐ पोथीमे बिहैन ओ लघुकथाकार लालदेव जी अन्य कतेको व्यक्तिक झांपल कृतित्व केँ उजागर कएने छथि। जेन साहित्य रत्न अनुप लाल मंडल, विज्ञान साहित्यकार आ प्रसिद्ध सम्पादक विदेह ई पत्रीकाक सम्मानित गजेन्द्र ठाकुर, कथाकार नारायण यादवजी, मैथिली सेवी ललन बाबू, आधुनिक कवि कपलेश्वर राउत, पूर्व प्राचार्य जगदीश बाबू, डॉ सदानंद पाल, पं� गोविंद झाक - विद्यापतिक आत्मकथा, नाटककार बेचन ठाकुर आ पैघ-पैघ विज्ञानक कृति समक्ष आनने छथि। सद्यप्रकाशित निबंध समालोचना प्रवन्ध पोथी दिव्यदृष्टि केर समीक्षा करनाई गागरमे सागर भरैत जकाँ तथ्य अछि। मुदा सेहो नँय अछि, अतबेक हएत की क्षेत्रफल नम्हर भ' जाएत। कियाक तँ पहिने कहने छी एहि चर्चित पोथीमे लगधक पचास गोट व्यक्तिके आलेख रुपे पाठकक सामने लाबने छथि। आ सबहक कीर्तिक पताखा शीर्षस्थ रुपेँ फहरौनै छथि, तेकर समतुल्य उल्लेख केनाई बढ़टठिण छैक।एहन सुंदर पोथीमे रचनाकार लालदेव कामत जी मिथिला राजकलेल संघर्ष लेल जे संदर्भ देखलनि से स्पष्ट नहीं होईछ जे एहिक पक्षमे छथि कि विपक्षमे ठाढ़ छै। हिनक ममता गाबय गीत, पहिल मैथिली फिल्मक बाबत बिक छाकए आ मिथिला चित्रकला पर अपन पक्षधरता काबिले तारीफ बुझाएल हन। पोथीके सुधि पाठक खूब पढ़य आ मनन करत बेसी सँ बेसी पुस्तकालयमे संग्रहीत होय ई वृहद पोथी से कामना रहत। आखरि पाठ कजरी विशेषमे हमहूं दू पाँति हिनका समर्थमे कहैत छी- आरे रमा लालदेव जीक ई पोथी गुलरी'क फुलबे ऐ हरी।। -रामेश्वर प्रसाद मंडल, दार्शनिक अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.११.डा० गंगाधर कुँवर "हर्ष"- भावना आ प्रेरणा डा० गंगाधर कुँवर "हर्ष" भावना आ प्रेरणा

मैथिली भाषा मेँ पोथी दिव्यदृष्टि बावत् आब हम अपन विचार 'क अभिव्यक्ति प्रथमत: राष्ट्रकवि स्व० मैथिली शरण गुप्त क' एहि उद्धरण सँ क' रहल छी - " हम कौन थे , क्या हो गये हैं, ओर क्या होंगे अभी? आओ विचारें आज मिल कर,ये समस्यायें सभी।।" प्रिय लाल देवजीक एहि पोथीक हम पूर्ण अध्ययन क' क्षेत्रीय भाषा ( गाम घरक भाषामे लिखल गेल) मे मिथिलांचल'क कवि - लेखक'क समीक्षक केर बहुत छिड़िआयल वस्तु केँ बटोरने छथि जे प्रशंसनीय अछि। जतेक उत्साह लाल देव जीमे मिथिला आ मैथिलीक प्रति छैन्ह,तकर हम मुक्त कंठे श्लाघा करै छी। प्रिय लालदेव'क मोनमे वेदना छैन्ह,टीश छैन्ह, पीड़ा छैन्ह तेँए हुनका लेल हम अपन पद्यांंशक माध्यमे कहब - " कोना सहब हम दुख अपार! देखि मैथिलीक प्रवल व्यथा केँ चित्त धधकइ छैन्ह मनक कथा मे, इयह थिक मैथिलीक सेवा धधकैत व्यथा , पूर्व मिथिलाक लावण्य देखि केँ - एखन कोना नहि कहब मोनक - कथा! अछि कुटिल नीति सँ जरक समाज। बिनु बजने नहि तँ चलत काज। बजितो होइत अछि परम लाज। बाजब तँ उनटे बहत बसात। अधलाह नीक मे नहिं रहल भेद अछि बिसरि गेल,बहि उनटे वेद। ऊपर सँ बनि कऽ नीक लोक सन्तप्त हृदय भऽ रहल शोक। की मिथिला छै 'विधवा' ई विधिक विधान l. नहिं 'लाल देवक' केँ कहब हम आन ! अत्याचारक अड्डा हम बनले छी । अँकुश समाजक सहिते छी! कुदि जाऊ समय मे लालदेव मैथिलीक' वेदी पर! अमर रहब,मायक लेल जँ मरब मातृभाषा मान पर!! जाति - पांतिक भावना सँ उपर उठि भाषाक सेवा करू। ईश्वर, ऋषि - मुनि , भक्त,संत आ कवि लोकनि मे कोनो जाति नहि। बगुरक गाछक डारि पर जँ गुलाब फुलेतै तँ मूल दिशि नहि देखि गुलाबक सौंदर्य पर मुग्ध हेबाक चाही, यथा - मनुज पथभ्रांत धरती पर रुधिर के बीज है बोता, जहाँ 'बक' की चरण रज को विवेकी हँस है धोता। जहाँ धन के खुले बाजार में नीलाम है विद्या! वहाँ कुछ भी 'हया ' से तु झुकी नारी, झुके नर दे ।" - 'हर्ष ' कोनु क्रांतिकारी होथि, सेनानी होथि - तिनकर ने कोनो धर्म ने सम्प्रदाय आ नियम नहि होइत अछि। अहाँक पोथीमे कैठाम एहि बंधन आ लक्ष्मण रेखा केँ देखलौं अछि, ताहि सँ दूर रहब,एकटा गुरूक नाते ई सनेश दऽ रहल छी। तुलसी चौरा सभक घर -आंगन मे एके रहै छै आ सभ नीपि - पोति पूजा करै छथि, कोनो भेद नहि। एकटा आर प्रेरणा - एहि पोथीमे आन - आन कवि- लेखक आ समीक्षक केर संबंध मे चर्चा कैने छी, ओ ठीक मुदा अपन लेख ,कविता, समीक्षाक वृहत् पोथी लिखू। सुच्चा जे 'कवि' होई छथि ओ पागल(आएव नाॅर्मल) ओ अपना लेल नहि जीबै छथि, हुनक कविता (रचना) ओ स्वयं देश आ समाजक वेदी पर समर्पित होइत छथि। अहाँ मिथिला आ मैथिलीक ' लाल' बनूं लालदेव! शुभ कामना! -डा० गंगाधर कुँवर "हर्ष " मो० ८०८४११२४७१ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१२.नन्द विलास राय- मोंछमे घी उर्फ परिश्रम नन्द विलास राय मोंछमे घी उर्फ परिश्रम

गोविन्द आ मुरारी दूनू बचपनक संगी। दूनूमे दोस्तियारे। गोविन्द परिश्रमी मुदा मुरारी आलसी आ निकम्मा। भरि - भरी दिन तासक पांछा बेहाल। कलश अस्थापन सँ तीन दिन पहिने गोविंद मुरारी सँ कहलनि - चलू दोस एमकी दुर्गा पूजा देखऽ लेल कलकत्ता। कलकत्ता 'क दुर्गापूजाक बड्ड नाओं सुनै छियै। गोविन्दके बात सुनि मुरारी बजलाह - यौ दोस अहाँ जे मोंछमे घी लगबै छियै किने तँए अहांके कलकत्ताक' दुर्गा पूजा सुझैए, हमरा लेल तं निरमलियोक दुर्गापूजा दुरे अछि। तैपर गोविंद पुछलकनि - की मोछमे घी कहलियै, कनेक फरिछाकऽ कहू ने। मुरारी बजलाह - अहाँ सुखी छी। दुटा महिंसोक दुधसँ पाइक आमदनी अछि। एकरे मोछमे घी लगाएब कहै छै। हमरा तँ से नहि अछि। तैपर गोविंद बजलाह - यौ दोस मोंछमे घी लगबए लेल मेहनत करए पड़ै छैक। भरि-भरि दिन तासक खेल पांछा जे अपस्यांत रहत ओकरा मोंछमे लगबए लेल घीकेँ के कहए जे मटियो तेल नइ भेटतै। गोविन्द'क बात सुनि मुरारी चुप्पे रहला।

-नन्द विलास राय (सखुआ) छजना अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.पद्य खण्ड ३.१.आशीष अनचिन्हार- दूटा गजल ३.२.जगदानन्द झा 'मनु'- दू टा गजल ३.३.राज किशोर मिश्र-जनसंख्या-विस्फोट ३.४.रामानन्द मण्डल-डोम के चान!/ धर्म युद्ध!/ हम बिहार छी/ हो भासा विग्यानी/ कि हम आजाद छी? ३.५.प्रमोद झा 'गोकुल'- आङ उघार छी हम ३.१.आशीष अनचिन्हार- दूटा गजल आशीष अनचिन्हार दू टा गजल

जनबल धनबल छलबल मोन कत्ते सहतै निर्बल मोन

सदिखन चाहै पापक ओट सुंदर निश्छल निर्मल मोन

गर्जन तर्जन वर्जन सूनि चुप्पे रहलै कलबल मोन

हमरे हिस्सा थाकल देह हमरे हिस्सा चनकल मोन

अनका खातिर अनचिन्हार हमरा खातिर दगधल मोन

सभ पाँतिमे 22-22-22-21 मात्राक्रम अछि।

छनमे छै सुल्तान सखी छनमे छै दरबान सखी

पंडित पुरहित असगर छथि असगर छथि भगवान सखी

साँचो हेतै किछु ने किछु बाँकी छै अनुमान सखी

भूखक आगू जीवन छै नै दे हमरा ज्ञान सखी

कत्ते सीबै तोंही कह फाटल छै असमान सखी

सभ पाँतिमे 22-22-22-2 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.जगदानन्द झा 'मनु'- दू टा गजल जगदानन्द झा ‘मनु’ दू टा गजल १ चलू देखब हे बहीना शिवकेँ अपन गौरीकेँ सजनमा शिवकेँ सभक ई खाली भरै छथि झोली सरण आइब जे सुमरला शिवकेँ गरीबोकेँ छथि इहे सुननाहर दियौ जल भरि एक लोटा शिवकेँ मनुख दानव देव भूत प्रेतो सगर दुनिया मिल मनेला शिवकेँ सिया रामोकृष्ण हुनके पुजलनि बनेलनि सगरो अराध्या शिवकेँ कृपानिधि कैलाशवासी जय भव चरण वंदन जग रचैता शिवकेँ मनोरथ सब पूर्ण करता शम्भू कहल ‘मनु’ जे मनसँ भजता शिवकेँ (मात्राक्रम  12222-12222, सभ पाँतिमे) २ भगवती जकर माए ओ टुगर रहल कोना हाथ छै दुनू भेटल रंक ओ कहल कोना माथ पर हमर सदिखन जखन हाथ मैयाकेँ एहिठाम रहलै कोनो  कठिन टहल कोना लेब छोरि कखनो देबाक बात कनि सोचू सगर गाम देखू सुख शांति नहि बहल कोना शेरकेँ घरे बैसल  नहि शिकार भेटै छै घरसँ जे निकलबै नहि घर बनत महल कोना काज नहि अपन हिस्सा केर ‘मनु’ करी हम सब ई सहज सगर दुनिया नहि  बनत जहल कोना (मात्राक्रम 212-1222-212-1222, सभ पाँतिमे) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.राज किशोर मिश्र-जनसंख्या-विस्फोट राज किशोर मिश्र, रिटायर्ड चीफ जेनरल मैनेजर (ई), बी.एस.एन.एल.(मुख्यालय), दिल्ली,गाम- अरेर डीह, पो. अरेर हाट, मधुबनी जनसंख्या-विस्फोट झुण्डक झुण्ड, मनुक्ख तुंड , दौ ड़ि रहल, भरए उदरकुंड।

नहि छै अन्न, नहि छै पा नि , जि नगी को ना चलतै ,ने जा नि ,

जम्हरे तकबै, ओम्हरे भी ड़, भेलि जा इछ पृथ्वी बही र।

मनुक्खक एतेक भा र, ने उठा पबैत छथि धरती , कतेक मँगबैन अन्न -जल ? भा र सँ दबि ओ मरती ।

सभटा लूटि लेलकै पृथ्वी के, ओकर जे सभ छलैक, संपदा , जे करैत अछि पा लन -पो षण, ओकरो प्रति नहि को नो ममता ।

अस्थि ली बि गेलैक अछि धरणी क, पचकि गेलैक अछि पी ठ,

सी मा छै ,भा र उठा बऽ के, दुनि आ केहेन भेल अछि ढी ठ?

संसा धन आओर आवश्यकता , असंतुलन मे डो लैछ तरा जू,जू भुखमरी , दुः ख, फि री सा नी तेँ तऽ, बढ़ल जा इत अछि ,आकि ने?ने बा जू ।

की सभ रहतै आगूक पी ढ़ी लेल? भूख, बेमा री , कष्ट, लचा री ? ककरा हि स्सा , कते हवा , पा नि ? बँटि ते चलि गेल खेत -पथा री ।

छै असा न चला एब ,छो ट परि वा र, सरलता सँ उठा सकैत अछि भा र।

अनि वा र्य आब, जनसंख्या -नि यंत्रण, सुखमय जि नगी लेल, लेथि सभ प्रण। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.४.रामानन्द मण्डल-डोम के चान!/ धर्म युद्ध!/ हम बिहार छी/ हो भासा विग्यानी/ कि हम आजाद छी? आचार्य रामानंद मंडल-डोम के चान!/ धर्म युद्ध!/ हम बिहार छी/ हो भासा विग्यानी/ कि हम आजाद छी? १. डोम के चान! आजादी छिहत्तर साल बाद! डोम बच्चा खेलत हय ! सुगर के खोभार पर। घर सड़क के किनार पर। आजादी छिहत्तर साल बाद! धनिक बच्चा खेलत हय! मोबाइल के मचान पर। घर के पिलान हय चान पर! आजादी छिहत्तर साल बाद! डोम गरीबी उच्च सूचकांक पर! सुगर चराबे लेल अभिशप्त! निरक्षरता के लेल अभिशप्त! आजादी छिहत्तर साल बाद! धनिक धनी उच्च सूचकांक पर! गरीब के ग़रीबी लेल युद्धरत! बन गेलन असमानता अभ्यस्त! आजादी छिहत्तर साल बाद! आर्थिक आज़ादी किला बंद! सामाजिक न्याय किला बंद। राजनीतिक आजादी किला बंद! आजादी छिहत्तर साल बाद! डोम के रोटी बनल हय चान! रामा अमीरी -गरीब बनल खाल! आजादी छिहत्तर साल बाद! २. धर्म युद्ध ! आदिकाल से जारी हय धर्म युद्ध! आइयो जारी हय धर्म युद्ध! देव आ दानव में भेल धर्म युद्ध! सुर आ असुर में भेल धर्म युद्ध! आर्य आ अनार्य में भेल धर्म युद्ध! सभ्यता आ संस्कृति लेल धर्म युद्ध! धर्म आ अधर्म में भेल धर्म युद्ध! धर्म आ धर्म में हो रहल धर्म युद्ध! आइयो रामा हो रहल धर्म युद्ध! मानवता विनाश के लेल धर्म युद्ध। ३. हम बिहार छी हम बिहार छी। बुद्ध के मठ छी। हम बौद्धविहार छी। हम मगध छी। मगध साम्राज्य छी। सम्राट अशोक के साम्राज्य छी। नालंदा के ज्ञान छी। विक्रमशिला के शान छी। चाणक्य के बखान छी। वैशाली गणराज्य छी। प्रजातंत्र के जन्मस्थान छी। हमही बज्जि महाजनपद छी। सीता के जन्मभूमि छी। राम के ससुरार छी। मिथिलांचल कहाबय छी। कालिदास के डीह छी। विद्यापति के गीत छी। मांगैन के राग छी। रामफल के आन छी। रेणु के बान छी। दिनकर के शान छी। राजेन्द्र के मान छी। जेपी के मूल्य छी। कर्पूरी के सुगंध छी। मैथिली मगही भोजपुरी रामा हमर भासा छी। हं हम बिहार छी। ४. हो भासा विग्यानी हो भासा विग्यानी। अबहट्ट बनल मैथिली। मैथिली बनल दच्छनी मैथिली। आ बनल पच्छमी मैथिली। हो भासा विग्यानी। अंगिका बनल मैथिली। आ बज्जिका मैथिली। सुरजापुरी बनल मैथिली। हो भासा विग्यानी। मैथिली बंटल भासा आ बोली। मैथिली रहे हिंदी के बोली। अंगिका -बज्जिका मैथिली के बोली। हो भासा विग्यानी। गिरियर्सन - सांस्कृत्यायन भासा विग्यानी। गिरियर्सन कैलन मैथिली के बोली। सांस्कृत्यायन कैलन बोली के भासी। हो भासा विग्यानी। रहय मैथिल महासभा विग्यानी। भासा के कैलन भाषा। संस्कृतनिस्ठ अबहट्ट बनल मैथिली भाषा। हो भासा विग्यानी। राजभासा बनल शिस्टसाहिती जनभासा बनल अशिस्ट साहिती। बनल रामा मैथिली भाषा आ बोली। ५. कि हम आजाद छी? हम आजाद छी। राजनीतिक आजाद छी। धार्मिक आजाद छी। अभिव्यक्तिक आजाद छी। कि हम आजाद छी? कि सामाजिक आजाद छी? कि आर्थिक आजाद छी? कि हम आजाद छी? कि जातीय विसमता सं आजाद छी? कि आर्थिक विसमता सं आजाद छी? कि हम आजाद छी? कि उच्च -नीच सं आजाद छी? कि छूआ -छूत सं आजाद छी? कि हम आजाद छी? कि धनी -गरीब सं आजाद छी? कि घर -बेघर सं आजाद छी? कि हम आजाद छी? कि भूमिपति -भूमिहीन सं आजाद छी? कि शिक्षा -अशिक्षा सं आजाद छी? कि हम आजाद छी? कि रोजगारी -बेरोजगारी सं आजाद छी? कि पोसन -कुपोसन सं आजाद छी? हम आजाद छी। कि हम आजाद छी? रामा कि हम आजाद छी? अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.५.प्रमोद झा 'गोकुल'- आङ उघार छी हम प्रमोद झा 'गोकुल' आङ उघार छी हम

झर झर झहरय जेना फूल सिंहार टप टप टपकय जेना ओसक फुहार तहिना नोरक टघार छी हम मौलल फूल बेकार छी हम । बात बात मे अभहेला डेग डेग पर ठेलमठेला गुड़ गुरु चिन्नी चेला जत'तत' रेलमपेला खिन्न मन लाचार छी हम मानू एक विचार छी हम । चौदिस तम,तम तम करय प्राण अवग्रह जतय ततय ज्ञान इजोतक मन्त्र जपय अज्ञान मुक्का मुकियाबय दुर्दिनक मारल अभिशाप छी हम सप्त रथीक धरि अनुचक्र छी हम । भूखल पेट तृषित कण्ठ आहो भर रे केओ चण्ठ ! छुछ्छ डीङ हाँकय लण्ठ सब सुखी वसन आकण्ठ रुदन मे घोर चीत्कार छी हम वसन बिनु आङ उघार छी हम ।

-प्रमोद झा 'गोकुल', दीप मधुवनी (विहार) फोन-९८७१७७९८५१ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह ३८१ म अंक ०१ नवम्बर २०२३ (वर्ष १६ मास १९१ अंक ३८१)|| 121 122 || http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA

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