VIDEHA — Issue 382 / अंक ३८२

Publication: VIDEHA · Issue: 382
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ISSN 2229-547X VIDEHA 𑒀 विदेह ३८२ म अंक १५ नवम्बर २०२३ (वर्ष १६ मास १९१ अंक ३८२) [विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। कॉपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति ‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२३. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२३. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. 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It is a platform for scholars, researchers, writers and poets to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, and poetry in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@gmail.com. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover designed by AUM GAJENDRA THAKUR Videha e-Journal: Issue No. 382 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अक्खर खम्भा (आखर खाम्ह) तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ (कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।) माने आखर रूपी खाम्ह निर्माण कऽ ओइपर (गद्य-पद्य रूपी) मंच जँ नै बान्हल जाय तँ ऐ त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लत्ती केना पसरत। शुक्ल यजुर्वेद (२६.२)-यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः। ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च।।हम सभ गोटेकें ई पवित्र वाणी (वेदवाणी) सुनाबी। ब्राह्मणकें, क्षत्रियकें, शूद्रकें आ आर्यकें; अपन लोककें आ अपरिचितकें सेहो (माने सभकें)। मुदा ऐ वेदवाक्यक विपरीत मनुस्मृति वेदवाणीक अध्ययन/ श्रवणकें समाजक किछु गोटे लेल निषेध करऽ चाहलक, मुदा स्मृति सेहो वेदवाक्यकें प्रमाण मानैत अछि (शब्द प्रमाण) तें तकर विरुद्ध देल ओकर निर्देश स्वयं अमान्य भऽ जाइत अछि। Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. -Robert Louis Stevenson ------------------------------------- Videha: Maithili Literature Movement 𑒀 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्ति: 𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱: अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृ. २-५) १.२.अंक ३८२ पर टिप्पणी (पृ. ६-६) लक्ष्मण झा 'सागर' विशेषांक २.१.प्रस्तुत विशेषांकक संदर्भमे (पृ. ९-२४) २.२.लक्ष्मण झा 'सागर' जी केर संक्षिप्त परिचय (पृ. २५-३८) २.३.श्रीमती शैल झा 'सागर'जीक किछु रचना (पृ. ३९-४७) २.४.हितनाथ झा- लक्ष्मण झा 'सागर' (पृ. ४८-४९) ‍२.५.लक्ष्मण झा 'सागर'- अपन आत्मकथ्य (पृ. ५०-५६) २.६.चंदना दत्त- आदरणीय लक्ष्मण झा 'सागर' (पृ. ५७-५९) २.७.विभा रानी-संपर्क-तेलौंस देह पर ज्यों बिछलैत पानि (पृ. ६०-६४) २.८.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'- 'सागर'सँ महासागर धरि (पृ. ६५-६९) २.९.वीरेन्द्र झा- लक्ष्मण झा 'सागर' स्पष्टवादी साहित्यकार (पृ. ७०-७१) २.१०.नबोनारायण मिश्र- सर्वगुण सम्पन्न सागरजी (पृ. ७२-७७) २.११.हितनाथ झा- जेना ओ कहलनि (पृ. ७८-८१) २.१२.विरेन्द्र कुमार झा- लक्ष्मण झा 'सागर' (पृ. ८२-८५) २.१३.चंद्रेश- पाथरपर दूभि उपजाबैत राग-भावक अन्वेषक लक्ष्मण झा 'सागर' (पृ. ८६-९९) २.१४.कामेश्वर झा 'कमल'- श्री सागरजीसँ पहिल भेंट, तकर बाद आइ धरि (पृ. १००-१०५) २.१५.रमेश- सुकाव्यमय सामाजिक व्याख्या: 'उचरि बैसू कौआ' (पृ. १०६-११४) २.१६.अजित कुमार झा- सागर जी: यथा नाम, तथा काम (पृ. ११५-११८) २.१७.सुरेन्द्र ठाकुर- सागरजी (पृ. ११९-१२६) २.१८.प्रेमकांत चौधरी- अतुलनीय व्यक्तित्व: लक्ष्मण झा 'सागर' (पृ. १२७-१३२) २.१९.आशीष अनचिन्हार- लक्ष्मण झा 'सागर' हमरा नजरिमे (पृ. १३३-१३७) 𑒀 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्तिः पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म 𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑓁 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒰𑒣: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒼𑒭𑒡𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹 𑒠𑒹𑒫𑒰: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧 ब्रह्मणसँ प्रार्थना जे द्युलोकमे, अंतरिक्षमे, पृथ्वीपर, जलमे, औषधमे, वनस्पतिमे, विश्वमे, सभ देवतागणमे आ ब्रह्ममे शांति हुअय। ॐ-ब्रह्मण, द्यौ-सूर्य-तरेगण, अंतरिक्ष- पृथ्वी आ द्यूलोकक बीच, आप:-जल, विश्वेदेवा- सभ देवता, ब्रह्म- सर्जक। 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝𑒮𑒿 𑒣𑓂𑒩𑒰𑒩𑓂𑒟𑒢𑒰 𑒖𑒹 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒧𑒹, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭𑒧𑒹, 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲𑒣𑒩, 𑒖𑒪𑒧𑒹, 𑒎𑒭𑒡𑒧𑒹, 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒱𑒧𑒹, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒧𑒹, 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰𑒑𑒝𑒧𑒹 𑒂 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒧𑒹 𑒬𑒰𑓀𑒞𑒱 𑒯𑒳𑒁𑒨। 𑓇-𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝, 𑒠𑓂𑒨𑒾-𑒮𑒴𑒩𑓂𑒨-𑒞𑒩𑒹𑒑𑒝, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭- 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒂 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒏 𑒥𑒲𑒔, 𑒂𑒣:-𑒖𑒪, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹𑒠𑒹𑒫𑒰- 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰, 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧- 𑒮𑒩𑓂𑒖𑒏। 𑒀 ॐ, स॒हस्र॑शीर्षा॒ पुरु॑षः। स॒ह॒स्रा॒क्षः स॒हस्र॑पात्। 𑓇, 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒬𑒲𑒩𑓂𑒭𑒰↓ 𑒣𑒳𑒩𑒳↑𑒭𑓁। 𑒮↓𑒯↓𑒮𑓂𑒩𑒰↓𑒏𑓂𑒭𑓁 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒣𑒰𑒞𑓂। स भूमिं॑ ग्वंग वि॒श्वतो॑ वृ॒त्वा। अत्य॑तिष्ठद् दशाङ्गु॒लम्॥ 𑒮 𑒦𑒴𑒧𑒱𑓀↑𑓅 𑒫𑒱↓𑒬𑓂𑒫𑒞𑒼↑ 𑒫𑒵↓𑒞𑓂𑒫𑒰। 𑒁𑒞𑓂𑒨↑𑒞𑒱𑒭𑓂𑒚𑒠𑓂 𑒠𑒬𑒰𑒓𑓂𑒑𑒳↓𑒪𑒧𑓂॥ हजार माथ, हजार आँखि, हजार पएर संग विश्वकेँ आच्छादित केने अछि, दस आंगुरक गनतीक वशमे नै अछि ओ। प॒द्भ्याग्ँ॑ शू॒द्रो अ॑जायत॥ 𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑒑𑓂𑒿↑ 𑒬𑒴↓𑒠𑓂𑒩𑒼 𑒁↑𑒖𑒰𑒨𑒞॥ पएरसँ शूद्रक उत्पत्ति भेल॥ प॒द्भ्यां भूमि॒र्दिशः॒ श्रोत्रा᳚त्। 𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑓀 𑒦𑒴𑒧𑒱↓𑒩𑓂𑒠𑒱𑒬𑓁↓ 𑒬𑓂𑒩𑒼𑒞𑓂𑒩𑒰↑↑𑒞𑓂। मुदा पएरेसँ भूमियोक उत्पत्ति। ❀ (White Florette- innocence and purity) ☸ (Wheel of Dharma) ࿕(Swastik) ꣼ (सिद्धिरस्तु, सिद्धम 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒱𑒩𑒮𑓂𑒞𑒳, 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒧 Devanagari Anji) 𑓅 (Gwang ग्वंग- two small circles connected by u and a dot placed over it, used in reference of Vedic texts) 𑒀 (Tirhuta Anji, Ankush of Ganeshji, placed at the beginning of something) 𑒀

१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.अंक ३८२ पर टिप्पणी १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय शैल झा "सागर" "एकटा पत्र एकटा समीक्षा- किस्त किस्त जीवन" मे लिखैत छथि- "किस्त किस्त जीवन" अहाँ तँ सागर जी के पठोलिऐ मुदा घरुआरी नारी हेवाक कारणे ई लाभ हम उठेलों हुनकासँ पहिने हमही पढ़ी गेलों ६-६ किस्त मे !..." (विदेह-सदेह ३६)। सिमोन डी. बेवोइर नारीक नारीक प्रति प्रतिबद्धतामे वर्ग आ जातिकेँ (जकर बादक नारीवादी सिद्धांत विरोध केलक) बाधक मानै छथि। वर्जीनिया वुल्फ नारी लेखक लेल आर्थिक स्वतंत्रता आ निजताकेँ आवश्यक मानै छथि। हिनकर विचारकेँ क्रान्तिकारी नै मानल गेल। मेरी वोल्स्टोनक्राफ्ट नारी शिक्षामे क्रान्ति आ औचित्यक शिक्षाकेँ सम्मिलित करबापर जोर देलनि।उत्तर आधुनिकता नारीवादक आ मार्क्सवादक विरोधमे अछि आ एकर नारीवाद आ मार्क्सवाद विरोध केलक अछि। नारीवादी दृष्टिकोण सेहो उत्तर आधुनिकतावादक यथास्थिवादक विरोध केलक अछि कारण यावत से खतम नै हएत ताधरि नारीक स्थितिमे सुधार नै आओत। नारीक प्रश्नकेँ उत्तर-आधुनिकता सोझाँ अनलक। विचारधारा आ सार्वभौमिक लक्ष्यक विरोध कएलक मुदा कोनो उत्तर नै दऽ सकल। लिंग एकटा जैव वैज्ञानिक तथ्य अछि मुदा महिला/ पुरुषक सिद्धान्त सामाजिकताक प्रतिफल अछि। महिला सापेक्ष साहित्य कला पुरुष द्वारा निर्मित अछि आ पुरुखक नजरिसँ महिलाकेँ देखैत अछि। अनामिका राजक कविता नवका बाट मे ई पाँती देखू- बोनिहार आकि नारी!/ दुनू सामन्त कि पूँजीवादी द्वारा/ भोगबाक चीज बनि रहि जाइछ/ आ/ भोगनिहार एकर/ मर्दन करैत/ अपन पुरुषारथ देखेबाक माउग प्रयास करैए। (विदेह-सदेह ७) आ एहने एकटा फोटो विदेहकेँ पठेने रहथि वीनू भाइ, अपन कथाक संग, आ संगहि ई अनुरोध सेहो जे हुनकर फोटो आइ धरि कत्तौ बिनु पत्नीक संग नै छपल छन्हि से... आ वीनू भाइ सन लक्ष्मण झा 'सागर' सेहो सपत्नीके बहराइ छथि। कामेश्वर झा 'कमल'- "मैथिलीक कार्यक्रममे हम उपस्थित होइत छी आ सागरजी तऽ सभ ठाम उपस्थित रहिते छथि, संगमे हिनक पत्नी श्रीमती शैल झा 'सागर' सेहो उपस्थित होइत छथिन।" नबोनारायण मिश्र- "इतिहास साक्षी रहल अछि जे कोनो सफल व्यक्तिक सफलतामे स्त्रीक योगदान सेहो महत्वपूर्ण रहल अछि। ई स्वीकार करबामे हमरा कोनो दुविधा नहि होइत अछि जे सागरजीक सफलतामे हिनक धर्मपत्नी श्रीमती शैल झा 'सागर' जीक प्रमुख योगदान रहलनि अछि। श्रीमती शैल झा 'सागर' सेहो मैथिलीमे रचना करैत छथि संगहि मैथिली साहित्य केर सजग पाठिका सेहो छथि।" साहित्यक नारीवादी सिद्धान्त ऐ समस्याक तहमे जाइए। मिथिलाक सन्दर्भमे महिलाक स्थिति ओतेक खराप नै छै मुदा मैथिली साहित्यक एकभगाह प्रवृत्तिक कारण उच्च वर्गक नारीक खराप स्थिति साहित्यमे आएल। आधुनिकीकरण तथाकथित सामाजिक रूपसँ निचुलका जाति सभमे सेहो नारीक स्थितिमे अवनति अनलक अछि। दोसर एकटा आर गप अछि जे जाति आ धर्म नारीक अधिकारकेँ कएक हीसमे बाँटि देने अछि। नारीवादी दृष्टिकोण सेहो कहैए जे सभटा सिद्धांत पुरुष द्वारा बनाओल गेल से ओ सिद्धांत पूर्ण व्याख्या नै कऽ सकैए। नारीक लेल वएह सिद्धान्त, किए ने ओ काव्येक सिद्धान्त हुअए, जे पुरुष केन्द्रित समाजमे पुरुष लोकनि द्वारा बनाओल गेल अछि, समीचीन नै अछि। लक्ष्मण झा 'सागर' जीक ई पक्ष मैथिली साहित्य लेल एकटा नारीवादी सिद्धांतक प्रारम्भिक अध्याय तेँ बनल अछि। -Gajendra Thakur, editor, Videha (be part of Videha www.videha.co.in -send your WhatsApp no to +919560960721 so that it can be added to the Videha WhatsApp Broadcast List.) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १.२.अंक ३८२ पर टिप्पणी उदय चन्द्र झा ’विनोद’ ऐ काजक असीम आवश्यकता छल। एखन धरिक तमाम विशेषांक खाली स्थानक पूर्ति कयलक अछि। सागर जी वर्तनी सँ निरपेक्ष जतबा सक्रियताक संग मैथिली मे काज करैत छथि तकर नोटिस लेल जायब आवश्यक छल। लक्ष्मण झा 'सागर' विशेषांक २.१.प्रस्तुत विशेषांकक संदर्भमे २.२.लक्ष्मण झा 'सागर' जी केर संक्षिप्त परिचय २.३.श्रीमती शैल झा 'सागर'जीक किछु रचना २.४.हितनाथ झा- लक्ष्मण झा 'सागर' ‍२.५.लक्ष्मण झा 'सागर'- अपन आत्मकथ्य २.६.चंदना दत्त- आदरणीय लक्ष्मण झा 'सागर' २.७.विभा रानी-संपर्क-तेलौंस देह पर ज्यों बिछलैत पानि २.८.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'- 'सागर'सँ महासागर धरि २.९.वीरेन्द्र झा- लक्ष्मण झा 'सागर' स्पष्टवादी साहित्यकार २.१०.नबोनारायण मिश्र- सर्वगुण सम्पन्न सागरजी २.११.हितनाथ झा- जेना ओ कहलनि २.१२.विरेन्द्र कुमार झा- लक्ष्मण झा 'सागर' २.१३.चंद्रेश- पाथरपर दूभि उपजाबैत राग-भावक अन्वेषक लक्ष्मण झा 'सागर' २.१४.कामेश्वर झा 'कमल'- श्री सागरजीसँ पहिल भेंट, तकर बाद आइ धरि २.१५.रमेश- सुकाव्यमय सामाजिक व्याख्या: 'उचरि बैसू कौआ' २.१६.अजित कुमार झा- सागर जी: यथा नाम, तथा काम २.१७.सुरेन्द्र ठाकुर- सागरजी २.१८.प्रेमकांत चौधरी- अतुलनीय व्यक्तित्व: लक्ष्मण झा 'सागर' २.१९.आशीष अनचिन्हार- लक्ष्मण झा 'सागर' हमरा नजरिमे २.१.प्रस्तुत विशेषांकक संदर्भमे 1 2008 सँ एखन धरि  विदेह http://videha.co.in/ द्वारा जे विशेषांक सभ आएल अछि तकरा तीन चरणमे बाँटि सकैत छी। पहिल चरण 2008सँ जनवरी 2015 धरि जाहिमे विषय आधारित विशेषांक सभ प्रकाशित भेल आ मधुपजीपर सेहो विशेषांक प्रकाशित भेल। एकदम प्रारंभिक विशेषांक सभमे "विशेषांक" नाम नहि लीखल गेल छै मुदा ओहिमे ओहन रचनाक बेसी स्थान देल गेल छै सायास रूपें (क्रम-1 सँ 12)। दोसर चरण भेल 2015 सँ लऽ कऽ एखन धरि जाहिमे मात्र जीवित लेखकपर विशेषांक प्रकाशित करबाक निर्णय लेल गेल आ इम्हर पछिला बर्ख एहिमे संस्था आ पत्र-पत्रिकापर विशेषांक प्रकाशित करबाक सेहो निर्णय लेल गेल क्रम- 13 एवं 14, 20 सँ 29)। तेसर चरण भेल पछिला सालमे विदेहक संपादक द्वारा "नित नवल सिरीज" प्रकाशित करबाक (एकर विवरण अलगसँ देल गेल अछि)। विदेह द्वारा लेखकपर विशेषांक 'जीबैत मुदा उपेक्षित' शृखंला रूपमे कएल गेल छल 2015 सँ जकरा आब "विदेहक जीवित मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशकपर विशेषांक शृंखला" नामसँ जानल जाइत अछि। मैथिलकर्मीसँ हमर सभहक आशय जिनकर काज मिथिला-मैथिली-मैथिली लेल कोनो माध्यमसँ भेल हो। ओ संगठनकर्ता सेहो भऽ सकै छथि, आन भाषाक लेखक सेहो। तहिना संगीतकर्मी मने गीत-संगीतसँ जुड़ल लोक।  निच्चा एहि सभ चरण केर विस्तृत सूचना क्रमबद्ध रूपें देल जाएत। विदेहक विशेषांक सभ लेल हम ओहनो लोक सभ लग आलेख लेल जाइत छी, हुनका सूचना दैत छी जे कि हमर, विदेह या गजेन्द्र ठाकुरक धुर विरोधी छथि। दू-चारि लोक कहि सकै छथि जे हमरा सूचना नहि भेटल, तऽ हुनकासँ हमर आग्रह जे कमसँ कम ओ अपन ह्वाटसएप आ फेसबुक केर मैसेज बॅाक्स (इनबॅाक्स) देखथि। हमर एहि प्रयासक प्रतिफल विदेहक आन विशेषांक संगे एहूमे देखाइ पड़त से उम्मेद अछि। 25 जुलाई 2023 केँ विदेह लक्ष्मण झा 'सागर' जीक ऊपर एकटा संस्मरणक अंक प्रकाशित करबाक सार्वजनिक घोषणा केलक। एहि सूचनाकेँ एहि लिंकपर देखि सकैत छी-घोषणा।  चूँकि संस्मरण अंकक घोषणा भेल छलै तँइ एहिमे पाठकक सुझाव बला बाध्यता हमरा लग नहि छल। मुदा जखन हम एकर स्वरूप निर्धारण करऽ लगलहुँ तऽ कतहुँ ने कतहुँ ई विशेषांके सन भऽ गेल। पाठक चाहथि तऽ एकरा नकारि सकै छथि मुदा हम एकरा विशेषांके मानि लेबाक लोभ कऽ रहल छी। श्रीमती शैल झा 'सागर' लेखिका छथि आ श्री लक्ष्मण झा 'सागर'जीक पत्नी सेहो। मैथिलीमे दंपति लेखक केर जे अवधारणा छै ताहिमे ईहो एकटा छथि। तऽ अइ विशेषांक केर अवसरपर हमरा लोकनि श्रीमती शैलजीक किछु रचनाकेँ सेहो राखि रहल छी। उद्येश्य अतबे जे विदेहक पाठक एहि अंकक संग हुनक रचना पढ़ि सकथि। एहि विशेषांकसँ पहिने विदेह 29 टा विशेषांक प्रकाशित कऽ चुकल अछि आ एहिठाम आब हम कहि सकैत छी जे ई एकटा चुनौतीपूर्ण काज छै। अनेक संकट केर सामना करए पड़ैत अछि लेख एकट्ठा करएमे। मुदा संगहि ईहो हम कहब जे संकटसँ बेसी हमरा लग समर्थन अछि। हँ, ई मानएमे हमरा कोनो दिक्कत नहि जे जतेक लेख केर उम्मेद केने रहैत छी हम ततेक नै आबैए, जतेक लोक लिखबाक लेल गछैत छथि से सभ अंत- अंत धरि आबि चुप्प भऽ जाइत छथि। आ एकर कारणो छै, किनको ई लागै छनि जे आनपर लिखब से हम अपने रचना किए ने लीखि लेब, किनको लग पोथिए नै रहै छनि, जखन कि हम सभ यथासंभव पाठककेँ विकल्प रूपमे पोथीक पी.डी.एफ फाइल सेहो देबाक लेल तैयार रहैत छी।  कियो विदेहक समावेशी रूपसँ दुखी छथि, तँ किनको मित्रकेँ विदेहसँ दिक्कत छनि तँइ ओ नहि देता। एकरो हम संकटे बुझै छियै जे सभ फेसबुकपर लंबा-लंबा लेख वा कमेंट टाइप कऽ लै छथि सेहो सभ विदेह लेल हाथसँ लिखल पठाबैत छथि। जे सभ कहियो काल फेसबुकपर टाइप कऽ लीखै छथि तिनकर आलेख हम सभ टाइप करिते छी। खएर पहिने कहलहुँ जे संकटसँ बेसी समर्थन अछि तँइ आइ पहिलसँ लऽ कऽ तीसम (संस्था सहित) विशेषांक धरि पहुँचलहुँ हम। आन विशेषांक लेल इएह बात मानू। 2008 सँ लऽ कऽ 2023 धरि 30 टा विशेषांक प्रकाशित भेल मने बर्खमे चारि टासँ कनी कम। निश्चिते समर्थन बेसी भेटल हमरा। जखन कि विदेहक ई तीसो विशेषांक केर अलावे आन अंक हरेक पंद्रह दिनपर (मासमे दू बेर) लगातार प्रकाशित भइए रहल अछि। एकर अतिरिक्त ईहो बात संतोषदायक अछि जे विदेहक हरेक विशेषांक अभिनंदनग्रंथ हेबासँ बाँचि गेल अछि। मुख्यधारा जकाँ विदेहकेँ अभिनंदनग्रंथ नहि चाही। अभिनंदनग्रंथ अहू दुआरे नै चाही जे ओहिसँ लेखक वा जिनकापर निकालल गेल छनि तिनकामे सुधारक गुंजाइश खत्म भऽ जाइत छै। तँइ विदेहक विशेषांकमे आलोचना-प्रसंशा सभ भेटत। सागरजीक रचना वा हुनकर अवदानक ऊपर कतहुँ किछु प्रकाशित भेल हो तकर संख्या बहुत कम हएत कारण कमसँ कम हम ओकरा अवलोकन करबासँ वंचित छी। बहुत संभव सागरजीक ऊपर लिखल गेल हो मुदा हमहीं नै देख सकल होइ, एहन स्थितिमे पाठक-आलोचक हमरा सूचित करथि हम अपन सूचनाकेँ सुधारि लेब। एहि संदर्भमे हम कहि सकै छी जे विदेहक ई प्रस्तुत विशेषांक एहन पहिल प्रयास अछि जाहिमे ई बुझबाक प्रयास कएल अछि जे सागरजीक रचना केहन छनि। ई अलग बात जे हम सभ कतेक सफल वा असफल भेलहुँ से पाठक कहता। एहि विशेषांक केर शुरूआत विदेहक आने विशेषांक जकाँ अछि। संगे-संग ई क्रम ने तँ उम्रक वरिष्ठता केर पालन करैए आ ने रचनाक गुणवत्ताक। हँ, एतेक धेआन जरूर राखल गेल छै जे पाठकक रसभंग नहि होइन आ से विश्वास अछि जे रसभंग नै हेतनि। पहिने विदेहक सभ अंक नागरी, तिरहुता आ ब्रेल लिपिमे प्रकाशित होइत छल आब एहिमे कैथी, नेवाड़ी, एवं आइ.पी.ए. लिपि सेहो जोड़ल गेल अछि, मने एखन विदेह कुल छह लिपिमे प्रकाशित होइए। एकर अतिरिक्त विदेहक किछु अंक रंजना (नेवारी केर एक आर रूप), ब्राह्मी, खरोष्ठी, उर्दू, तिब्बती एवं तिब्बती-उमे लिपिमे सेहो छपल अछि। कुल मिला कऽ देखी तँ विदेह बारह लिपि अपना लेल रखने अछि जाहिमेसँ कुल छह टा लिपिमे विदेह लगातार प्रकाशित भऽ रहल अछि। 2 पाठक जखन एहि विशेषांककेँ पढ़ताह तँ हुनका वर्तनी ओ मानकताक अभाव लगतनि। वर्तनीक गलती जे थिक से सोझे-सोझ हमर सभहक गलती थिक जे हम सभ संशोधन नै कऽ सकलहुँ मुदा ई धेआन रखबाक बात जे विदेह शुरुएसँ हरेक वर्तनी बला लेखककेँ स्वीकार करैत एलैए। तँइ मानकता अभाव स्वाभाविक। एकर बादो बहुत वर्तनीक गलती रहल गेल अछि जे कि हमरे सभहक गलती अछि।  मैथिलीमे किछुए एहन पत्रिका अछि जकर वर्तनी एकरंगक रहैत अछि आ ई हुनक खूबी छनि मुदा जखन ओहो सभ कोनो विशेषांक निकालै छथि तखन वर्तनी तँ ठीक रहैत छनि मुदा सामग्री अधिकांशतः बसिये रहैत छनि। ऐतिहासिकताक दृष्टिसँ कोनो पुरान सामग्रीक उपयोग वर्जित नै छै मुदा सोचियौ जे 72-80 पन्नाक कोनो प्रिंट पत्रिका होइत छै ताहिमे लगभग आधा सामग्री साभार रहैत छनि, तेसर भागमे लेखक केर किछु रचना रहैत छनि आ चारिम भागमे किछु नव सामग्री रहैत छनि। मुदा हमरा लोकनि नव सामग्रीपर बेसी जोर दैत छियै। एकर मतलब ई नहि जे वर्तनीमे गलती होइत रहै। हमर कहबाक मतलब ई जे संपादक-संयोजककेँ कोनो ने कोनो स्तरपर समझौता करहे पड़ैत छै से चाहे वर्तनीक हो कि, मुद्राक हो कि विचारधारक हो कि सामग्रीक हो। हमरा लोकनि वर्तनीक स्तरपर समझौता कऽ रहल छी मुदा कारण सहित। प्रिंट पत्रिका एक बेर प्रकाशित भऽ गेलाक बाद दोबारा नै भऽ सकैए (भऽ तँ सकैए मुदा फेर पाइ लागि जेतै) तँइ ओकर वर्तनी यथाशक्ति सही रहैत छै। इंटरनेटपर सुविधा छै जे बीचमे (इंटरनेटसँ प्रिंट हेबाक अवधि) ओकरा सही कऽ सकैत छी मुदा सामग्रिए बसिया रहत तँ सही वर्तनी रहितो नव अध्याय नै खुजि सकत तँइ हमरा लोकनि वर्तनी बला मुद्दापर समझौता केलहुँ।  हमरा लोकनि कएलनि, कयलनि ओ केलनि तीनू शुद्ध मानैत छी, एतेक शुद्ध मानैत छी एकै रचनामे तीनू रूप भेटि जाएत। आन शब्दक लेल एहने बूझू। उम्मेद अछि जे पाठक विदेहक आने विशेषांक जकाँ एकरा पढ़ताह आ पढ़ि एकर नीक-बेजाएपर अपन सुझाव देताह। जँ अहाँ अइ विशेषांक केर PDF पढ़ि रहल छी तँ कोनो शब्द वा पाँति अंडरलाइनमे वा बिना अंडरलाइनकेँ नीला वा कोनो रंगक देखाए तँ बुझि लिअ जे ओहिमे लिंक देल गेल छै रेफरेंस लेल आ तकरा क्लिक करबै तँ ओ लिंक खुजि जाएत। कोनो-कोनो फोटोमे सेहो लिंक देल गेल छै। पाठक एहि माध्यमसँ कम समयमे रेफरेंस सभहक अध्य्यन कऽ सकै छथि। मुदा प्रिंटमे प्रकाशित पोथीमे ई सुविधा नै रहत। अइ कारणसँ भऽ सकैए जे पाठककेँ एहि पोथीक किछु पाँति प्रचलित नै बुझेतनि। जाहि ठाम लिंक देल गेल छै ताहि ठामक पाँतिक किछु शब्दक बीच बेसी स्थान छूटल छै। ओकरा एक पाँति बना पढ़ी से आग्रह। हम चाहितहुँ तँ सभ लिंक वा चित्रकेँ एकठाम दऽ सकै छलहुँ मुदा हमर सोच अछि जे पाठककेँ एकै ठाम तर्क आ सबूत भेटनि। विदेहक द्वारा जीवैत लेखक ओ संस्थाक विशेषांक शृखंलामे प्रकाशित भेल आन विशेषांक सभहक लिस्ट एना अछि (एहिठाम जे अंकक लिस्ट देल गेल अछि ताहि अंकपर क्लिक करबै तँ ओ अंक खुजि जाएत)। जे विशेषांक केर विदेहक लिंक छै ठीक तकर निच्चा एहि किछु विशेषांकक पोथी.कॅम केर प्रिंट आॉन डिमांड लिंक अछि जाहि ठाम पाठक एकरा आॉनलाइन कीनि सकै छथि- 1) हाइकू विशेषांक 12 म अंक, 15 जून 2008 2) गजल विशेषांक 21 म अंक,  1 नवम्बर 2008 3) विहनि कथा विशेषांक 67 म अंक, 1 अक्टूबर 2010 4) बाल साहित्य विशेषांक 70 म अंक, 15 नवम्बर 2010 5) नाटक विशेषांक 72 म अंक 15 दिसम्बर2010 6) समीक्षा विशेषांक 7) नारी विशेषांक 77म अंक 01 मार्च 2011 8) अनुवाद विशेषांक (गद्य-पद्य भारती) 97म अंक 9) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक 111 म अंक, 1 अगस्त 2012 10) भक्ति गजल विशेषांक 126 म अंक, 15 मार्च 2013 11) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक 142 म, अंक 15 नवम्बर 2013 12) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक 169 म अंक 1 जनवरी 2015 13) अरविन्द ठाकुर विशेषांक 01 नवम्बर 2015 अंक 189 https://store.pothi.com/book/गजेन्द्र-ठाकुर-सम्पादक-विदेह-अरविन्द-ठाकुर-विशेषांक/ विदेहक अरविन्द ठाकुर विशेषांक केर पोथी रूप "स्वतंत्रचेता- अरविन्द ठाकुर: व्यक्तित्व-कृतित्व" केर नामसँ प्रकाशित भेल। 14) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक 01 दिसम्बर 2015 अंक 191 https://store.pothi.com/search/?q=गजेन्द्र%20ठाकुर 15) विदेह सम्मान विशेषा‍क- 200म, भाग-1, 15 अप्रैल 2016 16) विदेह सम्मान विशेषा‍क- 205म, भाग-2, 1 जुलाई 2016 17) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- 217 म अंक 01 जनवरी 2017 18) मैथिली वेब पत्रकारिता विशेषांक-313म अंक 1 जनवरी 2021 19) मैथिली बीहनि कथा विशेषांक-2, 317 म अंक 1 मार्च 2021 20) रामलोचन ठाकुर विशेषांक 01 अप्रैल 2021 अंक 319 https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-editor-विदेह-रामलोचन-ठाकुर-विशेषांक/ 21) राजनन्दन लाल दास विशेषांक 01 नवम्बर 2021 अंक 333 https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-विदेह-राजनन्दन-लाल-दास-विशेषांक/ 22) रवीन्द्र नाथ ठाकुर विशेषांक 15 जून 2022 अंक 348 https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-विदेह-रवीन्द्रनाथ-ठाकुर-विशेषांक/ 23) केदारनाथ चौधरी विशेषांक 15 अगस्त 2022 अंक 352 https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-editor-विदेह-केदार-नाथ-चौधरी-विशेषांक/ 24) प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' विशेषांक 01 नवम्बर 2022 अंक 357 https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-editor-विदेह-प्रेमलता-मिश्र-प्रेम-विशेषांक/ 25) शरदिन्दु चौधरी विशेषांक 15 नवम्बर 2022 अंक 358 https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-editor-विदेह-शरदिन्दु-चौधरी-विशेषांक/ 26) कला-विमर्श विशेषांक (सन्दर्भ- संजू दास, कृष्ण कुमार कश्यप, शशिबाला, एस.सी.सुमन आ श्वेता झा चौधरी) 15 अप्रैल 2023 अंक 368 https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-editor-विदेह-कला-विमर्श-विशेषांक-सन्दर्भ-संजू-दास-कृष्ण-कुमार-कश्यप-शशिबाला-एस-/ 27) अशोक विशेषांक 1 मइ 2023 अंक 369 https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-editor-विदेह-रचनाकार-अशोक-विशेषांक/ 28) रामभरोस कापड़ि 'भ्रमर' विशेषांक 15 मइ 2023 अंक 370 https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-editor-विदेह-राम-भरोस-कापड़ि-भ्रमर-विशेषांक/ 29) मिथिला स्टूडेंट यूनियन (MSU) विशेषांक 1 जून 2023 अंक 371 https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-editor-विदेह-मिथिला-स्टूडेण्ट-यूनियन-एम-एस-यू-विशेषांक/ ई तँ भेल जे काज हम सभ कऽ सकलहुँ तकर विवरण मुदा किछु एहनो घोषणा छै जे कि हम सभ नै कऽ सकलहुँ जेना 2016 मे हम सभ परमेश्वर कापड़ि, कमला चौधरी आ वीरेन्द्र मल्लिक विशेषांक केर घोषणा कइयो कऽ नहि प्रकाशित कऽ सकलहुँ। पाठक एहि घोषणाकेँ एहि लिंकपर देखि सकै छथि- सूचना बादमे विदेहक "वीरेन्द्र मल्लिक विशेषांक" (जे कि प्रकाशित नै भऽ सकल) लेल वीरेन्द्र मल्लिक जीक साक्षात्कार जे नबोनारायण मिश्रजी से विदेहक 337म अंकमे प्रकाशित भेल पाठक एकरा एहि लिंकपर पढ़ि सकै छथि- 1 जनवरी 2022 अंक 337 तेनाहिते विदेहक "साहित्यिक भ्रष्टाचार विशेषांक" हमरा लोकनि एखन धरि नै प्रकाशित कऽ सकलहुँ अछि। एकर घोषणा हम 2019 मे केने रही। एहि घोषणाक फेसबुक लिंक देखू। तेनाहिते विदेहक 'मिथिला विकास परिषद्" विशेषांक केर घोषणा कइयो कऽ नहि प्रकाशित कऽ सकलहुँ अछि। एकर घोषणा हम जुलाई 2023 मे केने रही। एहि घोषणाक फेसबुक लिंक देखू। 3 विदेहक जीवित विशेषांक शृंखलामे किनकर चयन हो ताहि लेल मोटा-मोटी निच्चाक किछु बिंदुक पालन कएल जाइत अछि- 1) लगभग पाँच-छह मास पहिनेसँ विदेह अपन पाठककेँ सुझाव देबा लेल लेल सूचना दैत अछि। 2) आएल सुझावमेसँ विदेह मात्र जीबित लेखककेँ चयन करैत अछि। संस्था सेहो वर्तामनमे जीवंत हेबाक चाही। 3) सभ जीवित मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशकक बीचमे हुनकर लेखन/ काज एवं आचरणक साम्यता देखल जाइत अछि। जाहि लेखकक लेखन/ काज ओ आचरणमे बेसी साम्यता (कम फाँक) भेटैए तेहन छह टा नाम चयनित होइत अछि। 4) छह नाम एलापर ई तुलना कएल जाइत छै जे ई छहो मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशक अथवा संस्थाकेँ रचना लिखबाक वा समाजिक काज केलाक एवजमे समाजसँ की भेटलनि। 5) जिनका सभसँ कम भेटल बुझाइत अछि ताहि तीन मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशक,-संस्थाकेँ अगिला चरण लेल राखि लैत छी। 6) एहि तीन चयनित जीबित मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशकक वा संस्थाक रचना, काज, हुनक उद्येश्य आदिक बीचमे परस्पर तुलना कएल जाइत अछि आ, 7) अंतिम रूपसँ विदेह द्वारा एकटा नाम चुनि सालक अंतमे घोषणा कएल जाइत अछि आ नियत समयपर ई विशेषांक निकालबाक प्रयास करैत छी। प्रश्न उठि सकैए जे कि उपरक नियम एहन छै जाहिमे अंतिम रूपसँ सभ सुयोग्य जीवित लेखक केर चयन समयपर भ़ऽ जेतनि? तऽ एकर उत्तर छै नै। विदेहक पाठक लग सेहो अपन सीमा छनि। मुदा अही सीमाक संगे हमरा सभकेँ अपन यथासाध्य श्रेष्ठ देबाक छै आ मैथिली लेल एकटा एहन रस्ता बना देबाक छै जाहिसँ आबए बला 500-600 बर्खक साहित्य विदेहक लीकसँ प्रेरणा पाबए। अही विचारक संग विदेह ओहन जीवित लेखकपर अपन धेआन सेहो केंद्रित कऽ रहल अछि जे कि सुयोग्य छथि मुदा जिनकापर विदेहक विशेषांक कोनो कारणवश नहि प्रकाशित भऽ सकल। एकर नाम भेल विदेहक "नित नवल सिरीज"। एहि नव विचारक मुख्य बिंदु एना अछि- 1) विदेहक संपादक गजेन्द्र ठाकुर एकटा कोनो जीवित लेखक वा कलाकारपर एकाग्र आलोचना करता मने ओहि लेखक केर उपल्बध सभ साहित्यपर। एहि पोथीक भाषा मैथिली अथवा अंग्रेजी कोनो एक भाषामे रहत। एहि पोथीक पहिल रूप ई-बुक केर रूपमे आएत आ प्रयास रहत जे एकर प्रिंट सेहो आबए जे कि परिस्थितिपर निर्भर करतै। 2) लेखक वा कलाकार केर चुनाव संपादक अपन रुचि वा विदेह टीमक रुचि केर हिसाबें करता। 3) एहिमे ओहने लेखक वा कलाकार केर चयन संभव हएत जिनकर उपल्बध हरेक पोथीक PDF रूपमे विदेहक माध्यमसँ सार्वजनिक भेल छनि। कलाकार लेल यूट्यूब एवं आन साइट सेहो मान्य हेतै। 4) एहि परियोजनाक लेल चयनित लेखक वा कलाकारपर काज संपादक केर समय केर अनुसारे हेतै। तँइ एकर समय सीमा कहब संभव नहि। नित नवल सिरीजमे एखन धरि प्रकाशित पोथीक सूची एना अछि- 1) Rajdeo Mandal- Maithili Writer (ई प्रिंट रूपमे सेहो प्रकाशित भेल अछि) 2) नित नवल सुभाष चन्द्र यादव (ई प्रिंट रूपमे सेहो प्रकाशित भेल अछि, संगे-संग ई प्रिंट आॉन डिमांड रूपमे सेहो अछि) https://store.pothi.com/book/गजेन्द्र-ठाकुर-नित-नवल-सुभाष-चन्द्र-यादव/ एकर अतिरिक्त विदेहक वर्तमान अंक सभमे धारावाहिक रूपें "नित नवल सुशील" आ "नित नवल दिनेश मिश्र" सेहो प्रकाशित भऽ रहल अछि आ दूनूक पोथी रूप जल्दिये आएत। 4 परिशिष्ट-1 परिशिष्ट-2 परिशिष्ट-3 विदेह अपन कोनो अंकमे "साहित्यिक भ्रष्टाचार विशेषांक" निकालत (लिंक कमेंटमे) ताहि लेल अपने सभसँ निम्नलिखित विषयपर आलेख आदि चाही। 1.साहित्य, कला एवं सरकारी अकादमीः- (क) पुरस्कारक राजनीति (ख) सरकारी अकादेमीमे पैसबाक गैर-लोकतांत्रिक विधान (ग) सत्तागुट आ अकादमी केर काजक तौर-तरीका घ) सरकारी सत्ताक छद्म विरोधमे उपजल तात्कालिक समानांतर सत्ताक कार्यपद्धति (1985सँ एखन धरि) ङ) अकादेमी पुरस्कारमे पाइ फैक्टरः मिथक वा यथार्थ 2.व्यक्तिगत साहित्य संस्थान आ पुरस्कारक राजनीति 3.प्रकाशन जगतमे पसरल भ्रष्टाचार आ लेखक 4. मैथिलीक छद्म लेखक संगठन आ ओकर पदाधिकारी सभहँक आचरण 5.मैथिली विभागमे पसरल साहित्यिक भ्रष्टाचारक विविध रूपः- (क) पाठ्यक्रम (ख) अध्ययन-अध्यापन (ग) नियुक्ति 6. साहित्यिक पत्रकारिता, रिव्यू, मंच, माला, माइक आ लोकार्पणक खेल-तमाशा 7.लेखक सभहँक जन्म-मरण शताब्दी केर चुनाव, कैलेंडरवाद आ तकरा पाछूक राजनीति 8.दलित एवं लेखिका सभहँक संगे भेद-भाव आ ओकर शोषणक विविध तरीका उपरक विषयक अतिरिक्त जँ कियो साहित्यिक भ्रष्टाचारक कोनो नव विषयपर लिखए चाहथि तँ ओकरो स्वागत रहत। परिशिष्ट-4 २.२.लक्ष्मण झा 'सागर' जी केर संक्षिप्त परिचय एहिठाम प्रस्तुत अछि लक्ष्मण झा 'सागर' जी केर संक्षिप्त परिचय। एहि परिचय केर अधिकांश तथ्य पहिनेसँ सार्वजनिक छै। किछु तथ्य जुटाओल गेल अछि आ पुरान पारिवारिक फोटो सभ स्वयं 'सागर' जीक सौजन्यसँ भेटल अछि। निच्चा हिनकर नामपर क्लिक केलापर हिनकर विकीपीडियाक पन्ना खुजि जाएत। दोसर फोटोमे तात्कालीन गृहमंत्री राजनाथ सिंहसँ सम्मानित होइत लक्ष्मण झा 'सागर', संगमे हुकुकदेव नारायण यादव, राजनाथ सिंहजीक पाछूमे विजयचंद्र झा (अवसर-बाबू साहेब चौधरी सम्मान, अखिल भारतीय मिथिला संघ, दिल्ली, 2017, फोटो संस्थाक फेसबुकसँ साभार)। नाम- लक्ष्मण झा 'सागर' जन्म तिथि :  1/4/1953 माता : स्व. गंगादेवी पिता : श्री तारकेश्वर झा उर्फ श्री भोला झा जन्मस्थान : ठढ़बितिया, घोघरडीहा, मधुबनी (बिहार) स्थायी पता: 3बी, तिस्ता अपार्टमेंट 94, एवेन्यू साउथ रोड संतोषपुर,कोलकाता-65 (पश्चिम बंगाल) शिक्षा : CA (इंटर), पहिल ग्रुप, 1976 वृत्ति- रूपा एण्ड कंपनीक इस्पात संयन्त्र इकाइमे वरिष्ठ क्रय प्रबन्धकक पद पर कार्यरत 'सागर'जी केर परिवारक अन्य सदस्य : पत्नी : शैल झा 'सागर' (कवयित्री) पुत्री-श्रीमती कंचन ठाकुर एवं श्रीमती प्रतिभा झा पुत्र-विवेक आनन्द झा बाबा-स्व. भगीरथ झा दादी-स्व. गुंजेश्वरी ओझाइन नाना-स्व. राजेश्वर झा नानी-स्व. सीता देवी श्वसुर-स्व. दुर्गानन्द ठाकुर सासु-स्व. रामपुकार देवी पहिल रचना (हिंदी भाषामे) 1968 आर्यावर्तमे प्रकाशित तकर बाद ओही साल (1968)मे मैथिलीक पहिल रचना सेहो मिथिला मिहिरमे प्रकाशित भेल। प्रकाशित कृति मौलिक: 1) उचरि बैसू कौआ (काव्य संग्रह, 2010) 2) एहि गदह बेरमे (काव्य संग्रह, 2020) 3) जेना ओ कहलनि (साक्षात्कार, 2021) 4) कनसोह (वार्ता कथा, 2021) अप्रकाशित कृति (मौलिक) 1) मिथिलाम (निबन्ध संग्रह) 2) अक्षत चानन (विभूति गाथा) 3) जखन जे जेना (टिप्पणी) 4) घुंघरू मट्ठा श्याम (कथा संग्रह) 5) उचिती (संस्मरण) 6) पत्राचार (पत्र साहित्य) 7) आलोचनाक एक संग्रह 8) जीवनीक एक संग्रह एहि पोथीक अतिरिक्त विदेहपर प्रकाशित सागरजीक किछु रचनाक सूची एना अछि (एहिठाम जे रचना देल गेल अछि ताहि क्लिक करबै तँ ओ विदेहक ओ अंक खुजि जाएत) 1) राजनंदन लाल दास: एक उदारचेता संपादक 2) मिथिलाक मुकुटमणि रवीन्द्र 3) अबारा नहि...तन! 4) प्रेमलता बहिन 5) खाँटी मैथिलीस्ट-शरदूजी 6) मिथिला स्टूडेंट यूनियन संपादनः 1) अतिथि संपादक रूपमे "कोलकाता परिसर मे मैथिली" नामक अंक केर संपादन (विद्यापति चेतना समिति, गौहाटी केर पूर्वोत्तर मैथिल समाज नामक पत्रिका, अंक-अक्टूबर-दिसम्बर-2011)। 2) अतिथि संपादक रूपमे "कोलकाता विशेषांक" नामक अंक केर संपादन (मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति, गौहाटी केर पूर्वोत्तर मैथिल नामक पत्रिका, अंक-अप्रिल-सितंबर-2021) 3) वर्तमानमे स्व. बाबू साहबे चौधरी जीक  स्मृति ग्रंथक संपादनमे जुटल छथि आ ई जल्दिए प्रकाशित हेबाक संभावना अछि। संस्थागत सेवा- कलकत्ता (कोलकाता), गौहाटी, दरभंगा, अहमदाबाद, बेंगलौर (बेंगलुरु), बंबइ (मुंबइ) आ दिल्लीक संस्था सभ संगे जुड़ल। सम्मान आ पुरस्कार किछु सम्मानमे ओहिसँ संबंधित सूचना केर लिंक देल गेल अछि, ताहिपर क्लिक कऽ पाठक सूचना धरि पहुँचि सकै छथि- 1) साहित्यकार सम्मान (मैथिली साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समिति, मधुबनी, 2017) 2) मातृभाषा संवर्धन सम्मान (डा. अशर्फी झा 'अमरेश' रिसर्च फाउन्डेशन, कोलकाता, 2017) 3) बाबू साहेब चौधरी सम्मान (अखिल भारतीय मिथिला संघ, दिल्ली, 2017) 4) डा. इन्द्रकांत झा सम्मान (विद्यापति सेवा संस्थान, दरभंगा, 2018) 5) मुंशी रघुनंदन झा सम्मान (मिथिला विकास परिषद, कोलकाता, 2019) 6)  बाबू साहेब चौधरी सम्मान (मिथिला सेवा ट्रस्ट, कोलकाता, 2020, कोरोना केर कारणे संभवतः बर्खमे फर्क अछि) 7) मिथिला शिरोमणि सम्मान (शाश्वत मिथिला फाउन्डेशन, अहमदाबाद, 2021) 8) मिथिला मुकुटमणि सम्मान (मैथिल सामाजिक युवा विकास मंच, कोलकाता, 2022) 9) मिथिला विभूति सम्मान (कर्णाटक मिथिला सांस्कृतिक मंच, बेंगुलुरु, 2022) 10) माला झा मैथिली सृजन सम्मान (मैथिली सृजन, दरभंगा, 2023) 11) मिथिला शिखर सम्मान (मिथिलांचल सर्वांगीण विकास संस्थान, बेनीपट्टी, 2023) 12) मिथिला विभूति सम्मान (विद्यापति सेवा संस्थान, दरभंगा, 2023) चित्र-1 एवं 2- श्री तारकेश्वर झा उर्फ श्री भोला झा एवं स्व. गंगादेवी। चित्र-3 एवं 4- श्री तारकेश्वर झा उर्फ श्री भोला झा एवं स्व. गंगादेवी एक संगे, लक्ष्मण झा 'सागर' युवावस्थामे। चित्र-5 एवं 6- श्री लक्ष्मण झा 'सागर' एवं श्रीमती शैल झा 'सागर', विभिन्न समयकालमे। चित्र-7 एवं 8- श्रीमती शैल झा 'सागर'। श्री लक्ष्मण झा 'सागर' चित्र-9- श्री लक्ष्मण झा 'सागर', श्रीमती शैल झा 'सागर' अपन तीनू संतान (पुत्र-विवेक आनन्द झा, पुत्री-श्रीमती कंचन ठाकुर एवं श्रीमती प्रतिभा झा) केर संगे, फोटो-समयकाल संदर्भित। चित्र-10- श्री लक्ष्मण झा 'सागर', श्रीमती शैल झा 'सागर' अपन तीनू संतान आ स्व. रामपुकार देवी (लक्ष्मणजीक सासु आ शैलजीक माए) केर संगे, फोटो-समयकाल संदर्भित। चित्र-11 एवं 12- श्री लक्ष्मण झा 'सागर', श्रीमती शैल झा 'सागर' एवं प्रतिभा झा, विवेक आनन्द झा अपन पत्नीक संग। चित्र-13- श्री लक्ष्मण झा 'सागर' एवं श्रीमती शैल झा 'सागर' चित्र-14- तात्कालीन लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महानजसँ सम्मानित होइत लक्ष्मण झा 'सागर', संगमे तात्कालीन गृहमंत्री राजनाथ सिंह, हुकुकदेव नारायण यादव, राजनाथ सिंहजीक पाछूमे विजयचंद्र झा (अवसर-बाबू साहेब चौधरी सम्मान, अखिल भारतीय मिथिला संघ, दिल्ली, 2017, फोटो संस्थाक फेसबुकसँ साभार)। २.३.श्रीमती शैल झा 'सागर'जीक किछु रचना जेना कि सूचित केने छी जे "श्रीमती शैल झा 'सागर' लेखिका छथि आ श्री लक्ष्मण झा 'सागर'जीक पत्नी सेहो। मैथिलीमे दंपति लेखक केर जे अवधारणा छै ताहिमे ईहो एकटा छथि। तऽ अइ विशेषांक केर अवसरपर हमरा लोकनि श्रीमती शैलजीक किछु रचनाकेँ सेहो राखि रहल छी। उद्येश्य अतबे जे विदेहक पाठक एहि अंकक संग हुनक रचना पढ़ि सकथि।" तऽ अइ क्रममे हम हुनक तीन रचना प्रस्तुत कऽ रहल छी, पहिल कथा, दोसर पाठकीय प्रतिक्रिया आ तेसर कविता। ई तीनू रचना जे कि तीन अलग-अलग विधाक अछि, पाठक तकरा लेखिकाक प्रतिनिधि रचनामेसँ मानथि आ कमसँ कम एहिठाम देल गेल कथाकेँ आन स्थापित कथाकारक कथासँ तुलना कऽ देखथि आ पाठके अपन निर्णय देथि। बहुत संभव जे ई रचना सभ पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित रहल हएत मुदा एहि रचना सभकेँ सर्वथा नव ढंगसँ आ नव युक्तिसँ रखलहुँ अछि, जकरा मैथिलीक स्थापित रचनाकार सभ देखथि। शैलजीक रचना एहिठाम देबाक हमर एकटा ईहो छल जे जखन सौ-सकैड़ा पन्ना लक्ष्मण झाजीपर खर्च कएल जा सकैए तँ हुनका घर-सँ बाहर धरिमे जे-जे महिला स्थापित कलखिन ताहिमे शैलजी सेहो छथि तऽ हिनकापर दू-चारि पन्ना खर्च करबामे हर्जे की? तेसर आ असल कारण हमरा लग ईहो छल जे श्री लक्ष्मण झा 'सागर' अपन नियम बनेने छथि जे जँ ओ कोनो साहित्यिक कार्यक्रममे जाइ तऽ बिना शैलजीक नै जाइ आ अधिकांशतः एहि नियमक ओ पालन करैत छथि, तखन बिना शैलजीक रचना वा हुनक चर्चा केने ई अंक आधे रहैत। -प्रस्तुति विदेह टीम 1 पति परमेश्वर

 -कनियाँ, फुर्सति भेलासँ साँझमे कनी आउ ने भेंट करय। काल्हि हम सभ गाम चलि जायब। पता नहि एहि जनममे फेर भेंट हएत कि नहि। काकीक फोन छल। काकी मने तिलाठवाली काकी। गामक पड़ोसिया छथि मुदा एतय दुनू गोटे कोलकाता महानगरक दू छोड़ पर रहैत छी। अपन सासु माय नहि रहने काकिये हमर सासु आ माय बनलि छथि। ओहने स्नेह आ वैह आवेश। घरमे किछु नीक निकुत बनितनि त' हलसल फुलसल हमर बखरा लेने अबितथि। अपने सामने हमरा बैसि क' खुअबितथि। सत्ते, हमरा बड़ मानैत छथि काकी। मुदा, जहियासँ पैर अबाह भ' गेलनि काकी हमरा ओतय आबि नहि पबैत छथि। काकी घरक काज लए कहियो झी-दैया नहि रखलनि। अपने सबटा काज करैत रहलीह। झाडू-पोछासँ ल' क' बर्तन-बासन मँजनाइ सबटा अपने हाथें करैत छलीह। एक घरक सीढ़ी पर पिछड़ि क' खसि पड़लीह। ठेहुनमे बड़ चोट लगलनि। दबाइ-बिरो भेलनि मुदा ठीक नहि भेलनि। चलय-फिरयमे कष्ट होइत रहनि ते कत्तहु निकलि नहि पबैत छलीह। मोन जहन औनाय लगनि तँ हमरे बजा लैत छलीह। हमरा संगे मोनक सबटा बात करै छली, अपने बेटी-पुतोहु जकाँ। एक दिन अहिना कहलनि जे- 'कनियाँ। बेटा एक्केटा रहने नीक होइत छैक। बेटी सभ तँ अपन-अपन घर चल जाइत छै। परक बेटीके मानियो ओ अप्पन कखनो नहि बनि पबैत छैक। बेटा भ' जाइए बहुक गुलाम। ओकरा लेल दूध-माछ दुनू बाँतर भ' जाइत छैक। माय-बापकेँ चाही बुढ़ारीमे बेटा-पुतोहुक मीठ बोल!।।। से कनियाँ भागमंते लोककें ई पइर लगैत छैक।' काकीकेँ दू टा बेटा आ तीन टा बेटी छनि। काका ट्राम कंपनीमे काज करैत छलाह। नोकरी करैत दुनू बेटा नीक जेकाँ पढ़ौलनि। दुनू बेटा नौकरी करैत छथिन। जेठका दिल्ली आ छोटका बंगलोरमे। दुनू अपन परिवार अपने लग रखने छथिन। बेटी सभ बेरा-बेरी उठि गेलनि। सब नाति-पोता वाली भ' गेलनि। ककरो अपनासँ फुर्सति नहि। काकी जहिया सीढ़ी पर पिछड़ि खसि पड़लीह सभ गोटे फोने पर जिज्ञासा केने रहनि। नाना तरहक हिदाइत देने रहनि। काकी सबटा सुनैत रहलीह। ककरो ई कहबाक साधंस नहि भेलनि जे आबिक' देख जो जे बूढ़ बापक निमेरा हम कोना नेंगराय के करैत छियौक। काकी अपन कष्ट कहुना क' अंगेजि लेने छलीह। एकदिन अकस्मात काकाकेँ चक्कर आबि गेलनि आ ओ धड़ामसँ खसि पड़लाह। माथमे चोट लगलनि। बेहोश भ' गेलाह। अस्पतालमे भर्ती कयल गेलनि। उपचार भेलनि। एक सप्ताहक बाद डाक्टर अस्पतालसँ छुट्टी द' देलकनि आ कहलकनि जे तनावमुक्त भ' क' रहथि। तनाव हेतनि त' माथक नस पर जखम पड़तनि आ क्षति भ' सकैत छनि। काकी आब अपन दुख बिसरि काकाक लेल चिंतित रहय लगलीह। हमरा बजौलनि आ कहलनि जे कहलक दिल्ली मे डेरा सिकस्त अछि। एतय तोरो सभकेँ असुविधा हेतौक आ हमरो दिक्कत हएत। बाबूकें ल' क' ठोकले बंगलोर चल जो। ओकर डेरा ऐल-फैल छैक आ हमरा सँ चिक्कन पाइयो कमाइत अछि। काकी छोटका बेटासँ गप केलनि। ओ बंगलोर अबै लेल कहि देलकनि। मोबाइल पर टिकटो पठाय देलकनि। आ काकी काकाक संग मास दिन पहिने बंगलोर चल गेलाह। हमरा हुनक विछोह किछु दिन बड़ अखरल मुदा संतोष केलहुँ। जे खैर काकी आब काकाक संग बेटा-पुतोहु लग आराम से रहतीह। से, काकीक फोन हमरा चिन्ता मे डालि देलक। ओ बंगलोरसँ मासे दिन पर किएक आबि गेलीह आ कहैत छथि जे काल्हि गाम चल जेतीह। मोन छओ-पाँच करय लागल हुनका फोनसँ। ।।।आ हम काकी सँ भेंट करय चल गेलहुँ। काका आ काकी के देखि क' लागल जेना सभ बड़ थाकल-झमारल छथि। जेना बाबाधाम कमरिया सन देवघर आबि क' भ' जाइत अछि। हमरा देखि काकीकेँ लगलनि जेना अपन धी-बेटी आयल होइन। कहय लगलीह जे कनियाँ ओहि जनम हम बड़ पाप केने रही आ हाकरोस पाड़िकें कानय लगलीह। काका कत्तहु टहलय निकलि गेल रहथिन तें काकी भरि पोख हमरा लग कानि अपन मोन हल्लुक केलनि। काकी कहय लगलीह जे कनियाँ की कहू? ओकरा दुनू बेकतिकेँ देखि क' बड़ दया लागल। दुनू गोटे आठे बजे भोर काज पर निकलि जाइत अछि आ राति आठ बजे मारल-मोचड़ल डेरा घुरैत अछि। एकटा फूल सन ननकिरबा छैक तकरा एकटा ’क्रेच' मे राखि जाइत छैक। ओ नेना माय-बापक स्नेह आ दादा-दादीक दुलार की जानय गेलैक। घरमे एकटा काजवाली रखने अछि। ओ भोरका जलखै आ रतुका खेनाइ बनाय क' चल जाइत छैक। बर्तन-बासन आ झाडू-पोछा सेहो क' दैत छैक। ओहि दिन रवि रहैक। ओ मौगी काज करय नहि एलैक। हिनका भोरे निन्न टुटि जाइत छनि। बाथरूम सँ एलाक बाद दूटा बिस्कुट आ चाह हिनका चाहबे करी। हमरा ओतुक्का भनसाघरक किछु बुझल-गमल नहि छल। डेराक सामने कोनो चाहक दोकानो नहि छलैक। ओ दुनू बेकति दस बजे धरि सुतले रहल। हिनका तामससँ मुँह लाल भ' गेलनि। हमरा कहलनि जे आइ सँ ओ चाह पिनाइ छोड़ि देताह। जँइ चाहक अमल छनि तँइ ने समय पर चाह नहि भेटने तामस भेलनि। डाक्टर तामस करै लए मना केने छनि। हुनका एखन आर कैक बर्ख जीबाक सेहन्ता छनि। कहलनि जे आयल छलहुँ इलाज कराबय एतय त' आरो कोनो तेहन बिमारी ने भ' जाय तकर चिन्ता भ' रहल अछि। ओकरा दुनू बेकतिक तेहन ने नोकरी छैक जे सरि भ' के एखन धरि कुशलो समाचार नहि पुछलक अछि, इलाज की करायत कपार। तें ओतयसँ चल एलहुँ कनियाँ, बुझलहुँ। आब कहै छथिन जे गामे पर बुढ़ारी काटब। गाममे एखनो समाजिकता बाँचल छैक। बीमार पड़ब त' लोक डाक्टरकेँ बजाय देत। एतय त' अपटीक खेतमे प्राण चल जाएत। काकीक सबटा बात सुनि हमरा अपन नैहरक बाल्यकाल मोन पड़ि गेल। बाबाक एकटा जन रहनि परमेश्वर। सब ओकरा परमेसरा कहिके सोर पाड़ैक। ओ कुनू काज उद्यममे अपना घरवालीक संगे अबितय। संगे सबटा काज करितय। खेत-पथारमे से रोपनी, कमठाइन आ धनकटनी पर्यन्त घरवालीक संगे करितय। हमरे ओतय पनपियाइ आ कल्लौ करितय। मुनहारि साँझ दुनू परानी एके संगे अपन घर जइतय। काकीक बंगलोर वला बेटा-पुतोहु एखन जेना काज करैत छनि से त' परमेसरा पचास बर्ख पहिने करैत छल। तखन परमेसराक जातिकेँ पिछड़ा जाति किएक कहल जाइत छैक ?। एही गुनधुन मे हम कखन घर आबि गेलहुँ सेहो नहि बुझि सकलौं। घर आबि अपन पति परमेश्वरक आनल रतुका खेनाइक पैकेट खोलय लगैत छी। 2 एकटा पत्र: एकटा समीक्षा परम आदरणीया शेफालिका जी, सादर प्रणाम,

'किस्त-किस्त जीवन' अहाँ सागर जीकेँ पठौलियनि मुदा, घरुआरी नारी हेवाक कारणे ई लाभ हम उठेलहुँ, हुनका सँ पहिने हमहीं पढ़ि गेलहुँ 6-6 किस्त मे! हमरा बुझबा मे नहि आबि रहल अछि कतऽ सँ शुरू करी? की लिखी ? की कही ? हँ, एतेक जरूर कहब एहि किताबकेँ हाथ मे लैत आ किताब दिस तकैत अनेरो आँखि सँ दहो-बहो नोर झड़य लागल, किए? एकर कारण हम अपनो नहि जनैत छी। एहि बेर महाकुम्भक मेला लागल अछि। हमरो बहुत परिचित लोकनि सब महाकुम्भ करय जाय गेलीह अछि। हमरो कहलनि, हम हिनका सँ पूछल, मुदा, हिनकर नहिये सन जबाब पाबि हम चुप भ गेलहुँ किएक त' हिनका एहि सब मे विश्वास कनी कम्मे छनि। लेकिन किस्त किस्त पढ़ि गेला सँ मोन मे हिलकोर उठल जे कोनो टा कुम्भ स्नान सँ बेसी सुखमय लागल। एकटा बात आर जे मोनक कोनो दोग मे अहाँक दर्शन करबाक प्रबल इच्छा जागि गेल अछि। जखन अहाँक दर्शन करब त' हाथ सँ छूबि क' देखब, आँगुर सँ दाबि क' देखब, चरण मे झुकि क' देखब। की सरिपों अहाँ वैह शेफालिका छी जे हमर माथ पर एखन हाथ रोपने छी। सत्ते विधाताक पैघ डाँग अहाँक रंगीन जीवन पर पडल, अहाँ लोकनिक अंतरंगता हुनको अखरि गेलैन्ह। अहाँ एकटा सफल बेटी, निश्छल प्रेयसी, सर्वस्व समर्पिता पत्नी, कुशल गृहिणी, ममतामयी माय, निष्णात लेखिका-समाजसेविका, राजनयिक आ My Dear बांधवी आर-आर की की नै छी। से नहि जनितहुँ जँ ई पोथी नहि पढितहुँ। अहाँ अतुलनीय छी 'तोहर सरिस एक तोंहे माधव, मोन होइछ अनुमाने..' (ई बात हम एहि लेल लिखलहुँ जे सागर जी अहाँक तुलना महादेवी वर्मा, महाश्वेता देवी वगैरह सँ करैत छथि), जे हो मुदा, मैथिली साहित्य के एकटा अनमोल वस्तु भेटलैक अहाँक ई पोथी रूपमे। हमरा बुझने एहि पोथीक उचित मूल्यांकन नहि भेलैक अछि। हमरा सन घरेलू महिला के अरबधि क' पढ़बाक चाहियानि पोथी। भाषा आ शैली मे गति छैक। एक दू पेज पढ़लाक बाद हैत नहि जे पढ़ब छोड़ी। एहि कृतिक इएह सफलता भेलैक। 1972 मे जखन हमर बियाह भेल छल तखन सँ मैथिली पोथी-पत्रिका पढ़ैत आबि रहल छी। तहिया मिथिला मिहिर मे अहाँक दू जुटिया गुहल केश वाला फोटो संग अहाँक कविता कथा सब पढ़ैत रही। किस्त-किस्त जीवन एकटा विरल रचना छैक, आ अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवसक वर्षगाँठ पर हम आग्रह करबनि मैथिलीक भाग्यविधाता लोकनि सँ जे एहन उपाय करथि जे एहि पोथीक अंतर्राष्ट्रीय भाषा सब में अनुवाद होइक। आब हम अपन लेखनी के विराम देबऽ चाहैत छी एहि एक पाँतीक संग--

"पढ़ि गेलहुँ ई आत्मकथा मोन मे उठल उसाँस एक कतेक व्यथित ई बारहो मास कतेक व्यथित ई बारहो मास.." अहींक अप्पन -शैल 3 बेटी

हम बेटी छी हम बेटी छी हम अही समाजक बेटी छी बाबा नाम देने छथि दुलरी बाबू लेखें हम छी भुलरी भैया संग करी भरदुतिया भौजी के हम छोटकी बुचिया बाबीक स्नेह सेहंता सँ साँठल विरहारा पौती छी हम बेटी छी हम बेटी छी हम अही समाजक बेटी छी।

चम्पा गुलाब सन गमकै छी छारा पहीरि हम छमकै छी टोकटी जकाँ हरदम नाची टोलो भरि बेन परोसै छी जुगता कऽ राखल पलंग तर बड़का दू ताला पेटी छी हम बेटी छी हम बेटी छी हम अही समाजक बेटी छी।

जतऽ ऊँच नीच के ज्ञान भेटल बिनु मँगने अमृतदान भेटल सोना चानीक चन्द्रहार मे साटल हीरा मोती छी हम बेटी छी हम बेटी छी हम अही समाजक बेटी छी।

आँगन के तुलसी चौरा छी चुल्हा के चिनवारो छी हमरे सँ परिचय अहाँक अछि हमरे सँ चिन्हारो छी बिनु हमरे भेटत नहि बेटा फेर स्वर्गलोक मे जाएब कोना जे कर्म करब से फल भोगब सब नीक बेजाय एतहि रहि जाएत नून तेल अचारक संग सुन्दर हथठोकुआ रोटी छी हम बेटी छी हम बेटी छी हम अही समाजक बेटी छी । २.४.हितनाथ झा- लक्ष्मण झा 'सागर' हितनाथ झा-संपर्क-09430743070 लक्ष्मण झा 'सागर'

मैथिलीक हितमे लक्ष्मण छथि ज्ञान सागरक महानगर कोलकाता वासी स्व-भाषाक प्रचारक उचित बात आगाँ रखबामे छथि पारंगत सेवा करब धर्म मानै छथि आगत अभ्यागत

बाबू साहेब चौधरीक अनुयायी छथि ई हुनके कहल मार्गपर आगाँ चलइत छथि ई एहिना सभ दिन तनल रहथु मैथिलीक सेवामे एखनहुँ धरि हम मन छियनि ,परिचय छल नेनामे

रहै छलै 'मिथिला मिहिर'मे नेना भुटका-चौपाड़ि हिनकर रचना खूब छपै छल संग हमरो दू-चारि नामक संग छपै छल तहिया उपनाम हमर 'हितेश' लक्ष्मणजी ओ याद करौलनि लीखब करी न शेष

जहिना संस्था, तहिना लोको, सभसँ छनि आवेस पोथी पाठक धरि पहुँचय से राखथि ध्यान विशेष अपन पाइसँ डाक टिकट ल' पाठककेँ देल सनेस धन्य भाइ लक्ष्मण सागरजी, छनि न घमंडक लेस

लक्ष्मण झा सागर विशेषांक, विदेह पत्रिका लाबय स्वस्थ संग सानन्द रहथि नवल सृजन नित आबय एखन बचल छनि बहुतो काजे हाथ हिनक करबाबय जनक सुता माँ मैथिलीक आशिषक फल चिखबाबय ‍२.५.लक्ष्मण झा 'सागर'- अपन आत्मकथ्य लक्ष्मण झा 'सागर' अपन आत्मकथ्य हमरा जहिया ई बोध भेल जे हम संसारक चौरासी लाख योंनिसँ मनुष्य रूपी जीवमे जन्म लेल, हम अपन जन्म दिनक शुरुआत तहियेसँ मानैत छी। आ एहि प्रयासमे लागल छी जे मनुष्य भेने की भेल? हमरा मनुक्ख बनबाक अछि। आने लोक जकाँ हमरो कियो माय भेल। कियो बाप भेलाह। से जरूर हम अपन जन्मदाताक प्रति कृतज्ञ छी। उमेर होइत गेल। हमरा जीवनकेँ संस्कारित कैल जाइत रहल। छठिहार स्वाभाविक तौरपर मोन नै अछि तऽ संगहि मूड़न मोन नै अछि। उपनयन मोन अछि से मात्र एतबे जे आँखिमे धुआँ लागय। बियाह सेहो अपना मोनसँ नै भेल। हमर बियाहसँ एकटा विश्वास मोनमे जागल जे व्यक्ति एसगर किछु नै कय सकैत अछि। ओकरा परिवार आ समाजक संरक्षण चाही। जीवन जीबाक लेल सुरक्षा चाही। कालक्रमे हम जे कोनो परिवारक ललबबुआ रही से एकटा परिवारक कर्ता स्वयं भऽ गेल रही। हमरा लेल हमर पत्नी,वहमर बाल-बच्चा अपन परिवार जकाँ लागय लागल। मुदा, से हमर आत्मा गछैत नै रहय। एखनो नै गछैत अछि। जे परिवार आ समाजक लोक हमरा नेनपनमे हमर भरण-पोषण केलक। हमरा दुलार-मलार केलक। हमरा चेतनगर बनौलक से सब लोक हमरा नजरिसँ दूर होइत गेल। हमरा तकर विषाद मोनमे सब दिन कचोटैत रहल अछि। एखनो से मोनमे आब टीस मारैत रहैत अछि। बाल-बच्चाकेँ पालि-पोसिके सभक अपन घर बसाय देल अछि। ई काज करैत हम कोनो बड़ पैघ उत्कीर्णा कैल से अनुभव कखनो नै भेल। ई काज तऽ सब करैत अछि। हमर मोन हमरासँ सदिखन सवाल करैत अछि जे हम की विशेष काज कैल? की हमर मनुक्ख बनबाक यैह परिकल्पना छल? अपनेसँ पुछल ई सवाल सब हमरा हमेशा उद्वेलित करैत रहल अछि। मोनकेँ मथैत रहल अछि। हमरा साकांक्ष रहबाक लेल प्रेरित करेत रहल अछि। हमरा गाम पर लाइब्रेरी रहय (आब से नै अछि)। हमर बाबा जे तमुरिया हाई स्कूलक हेडमास्टर रहथि से मिथिला मिहिर, आर्यावर्त आ इन्डियन नेशन अखबार मँगबैत छलाह। हम मिथिला मिहिर पढ़ल करी। नेहरू जी, गांधी जी, लोहिया जीक आत्मकथा पढ़ल करी। हरिमोहन झाजीक पोथी सभ पढ़ल करी। नाना हमर जमींदार छलाह। हुनका ओतय राधाकृष्णक मंदिर रहनि। हमरा भगवानक प्रति भक्ति-भाव ममहरमे जागल। समाज सेवाक प्रति लगाव अपना गाममे जागल। हम जहन बालबोध रही माने चौथा वर्गमे रही तखने हमर पिताजी अपन सरकारी नोकरी छोड़ि देलनि। हमरा मादे लोक पुछनि जे ओकर भविष्य की हेतै तऽ हुनकर जवाब होनि जे ओ अपन भविष्य अपने बनाय लेत। हमर मिथिला मिहिरमे छपैत रचना सभ देखि हमर बाबा बाजल करथि जे ई हमर कुल दीपक हैत। हमरा पूजा-पाठ करैत देखि हमर नाना कहल करथि जे ई आर जे किछु हुअय वा नै हुअय संस्कारी जरूर हैत। हमरा बालपनमे ई ज्ञान भऽ गेल रहय जे हमरा जे किछु बनबाक अछि से अपने बदौलत। तकर एकमात्र रस्ता रहय जे हम खूब मोन लगा कऽ अध्ययन करी। से करैत रहल रही। नीक रिजल्ट होइत रहल। छात्रवृतिक पाइसँ कालेज धरि पढ़ल। नीक विद्यार्थीकेँ लोक नीक नजरिसँ  देखैत अछि से अनुभव कैल करी। कालेज जीवनमे सब गोटे अपना आपमे गप करथि जे ई लड़का सी.ए जरूर बनत। बड़ नीक बात सुनल करी। आबि गेल रही कलकत्ता 1.1.1974 के ससूरक डेरा राजा बाजार। सी.ए कम्पनीमे पंजियन भऽ गेल रहय। ट्यूशन कैल करी। ससुर मेसक खर्चा लैत छलाह। 19.9.1974 (चौरचन दिन) ससुर जवाब दय देलनि डेरा तकै लेल। राति भरि भुखले जागल रही। अनुभव कैल जे नींद पड़बाक लेल पेटमे अन्न चाही। ओना अन्न, वस्त्र आ आवासक असुविधामे जिनगी काटबाक अभ्यास गामेसँ लागल छल। माथ पर गामसँ आनल टिनही पेटी उघने पैरे-पैर भूखल-पियासल आबि गेल रही राजेन्द्र छात्र निवास ससुरक डेरा त्यागि। हमर कोनो खोज-पुछारी नै कैल गेल। हम लगेमे ठनठनियाँ कालीक शरणमे हबोधकार भऽ कानय लागल रही। पिता तुल्य बाबूसाहेब चौधरीकें खबरि लगलनि। ओ अपन किछु कार्यकर्ता सभक संग आबि गेल रहथि हमर समुचित व्यबस्था करबाक लेल। होस्टल प्रभारी सत्यनारायण लाल दास (जे हमर बाबाक शिष्य रहल छलाह) कें हमरा मादे विस्तारसँ कहलखिन जे हम मैथिलीक नव हस्ताक्षर छी। सत्यनारायण बाबू हमर रेंट तीन महिनाक लेल उधारी कय देलनि। सुधीर (मेस मालिक) के सेहो तीन महिना उधारी दुनू साँझ भोजन कराबय कहि देलखिन। हम कने सुभ्यस्त जकाँ भऽ गेल रही। औडिटसँ घूरी तऽ दू टा ट्यूशन बड़ाबजारमे कैल करी। 60 टाका ठाकुर एंड कम्पनी देल करय। 80 टाका ट्युशनसँ भेटि जाय।हम सी.एक परीक्षाक तैयारीमे लागि गेल रही। हमरा लेल 24 घण्टाक समय कम पड़ि जाय। पढबाक पलखति कम भेटल करय। राति कऽ शान्त वातावरणमे टेबुल लैंपक इजोतमे पढ़ल करी। अपनो विषय केर अध्ययन करी आ छात्रावासक दोसरो सी.एक स्टूडेंटके सेहो गाइड करी। औडिटमे देशक आन-आन शहरमे हावा जहाजसँ जाय आबय लागल रही। स्टार होटल सभमे रुकल करी। सुखक अनुभुति हुअय लागल रहय। संगमे कोर्सक किताब सब लय जाइ। मुदा, देखबाक ने समय भेटय आ ने अभिरुचि जागय। खाली समय मैथिल सभक खोज कैल करी। मैथिल सभ बहुत अभरि जाइत रहथि। मुदा,मैथिली नै भेटय। तकर मोनमे बड़ कचोट हुअय। दुख हुअय। बेसी काल तै पर सोचल करी। साहित्य लिखब बेसी सोहाय। एक परतार खूब लिखल। कविता, कथा, निबंध तऽ लिखबे करी। पत्रिका सभमे प्रकाशित भेल करय। परिचिति बढ़य लागल रहय। बेसी हम आलेख लिखल करी। प्राय: सभ रचनाक थीम मिथिला-मैथिली पर आधारित रहय। पोथी छपेबाक ने ऊहि रहल कहियो आ ने सामर्थ्य। साहित्यमे सीनियर-जूनियरक बोध नै रहय। पुरस्कार आ सम्मान नै बुझियै। औडिटमे आसामक प्राय: सब शहर जाइ। बैंक, चाय बगान मुख्य रूपसँ जाइ। मैथिल सभ जे असंगठित रहथि। शोषित रहथि। भयभीत रहथि। तिनका सभकेँ संगठित करबाक प्रयास कैल। स्व. सत्यानंद पाठक आ श्री प्रेमकांत चौधरीजीक अगुआइमे एकटा मैथिल संस्थाक स्थापना कैल गेल। पुर्वोत्तर मैथिल नामसँ मैथिलीक पहिल रंगीन तिमाही पत्रिका निकलय लागल। संस्थाक कार्यक्रम हाइ प्रोफाइलमे हुअय लागल। देश दुनियाँमे गुवाहाटीक मैथिलक सोरहा पसरय लागल। हमरा मोनमे संतोष भेल जे छमाही सी.एक परीक्षा भले ही नै पास कैल भेल मुदा, पूर्वोत्तर प्रदेशमे मैथिलीक खुट्टा गड़ा गेल। एम्हर हमर गाम पर परिवारक सब सदस्य (पत्नी आ तीनू ठोह भरिक बच्चा) एहि आसमे दिन खेपैत छल जे जल्दी सी.ए बनि कऽ हम ओकरा सभ के शहर लऽ अनबैक। ओकरा सभक कष्टपूर्ण जिनगीमे थोड़-बहुत सुख आनि कऽ त्राण दियेतैक। मुदा, हमरा पर तऽ मैथिलीक जिन्न सवार छल। ने कोनो अभिभावकक डर, ने गाम-समाजक रोच। कारण हमरा आगू बढ़बयमे किनको आर्थिक सहयोग नै छलनि। हम दुख आ कष्टक भोग भोगैत अपना हिसाबसँ जीवन जीबैत रही। हमरा किनकोसँ ने कोनो शिकाइत छल ने कोनो झगड़ा-दान। हम अपन अभाव लेल अपन भाग्यके कोसैत रही। हमर समाजक परिधि विस्तार लैत रहल। हमर जुड़ाव अपन लोक सभसँ रहय लागल। कलकत्ता आबी तऽ लोक सभक देनी सधाबी। बाबूसाहेब चौधरी जीक खबरि पर खबरि आबय लागय। हुनकासँ भेंट करय जाइ। माथा-हाथ देने बैसल रहैत देखियनि। कुशल-समाचार पुछियनि तऽ कहय लागथि जे अहू बेरका लोक सभा सेशनमे मैथिलीकेँ नै भेटल आठम अनुसूचीमे स्थान। दिमाग काज नै करैत अछि। हे सुनू, अगिला मास मिथिलाक माटि परहक लोककेँ जगेबाक लेल अहूँके चलय पड़त हमरा संग। हे, ई अछि मैथिली दर्शनक प्रूफ। काल्हि देखि कऽ लेने आयब। अंक देरी भऽ रहल अछि। प्रात भेने जहन जाइ तऽ कहथि जे सुनू एकटा कसगर सम्पादकीय लिखू ने जे बिहार सरकार कियैक ने मैथिली अकादेमीक स्थापना कऽ रहल अछि पटनामे? कहियो अखिल भारतीय मिथिला संघक विद्यापति पर्व लेल कवि सम्मेलनक संयोजक बनैक भार दऽ देथि। कहियो बजबज तऽ कहियो नैहाटीक मैथिलक सम्पर्क अभियानमे लगा देल करथि। हमरा नीको लागय जखन हुनका लग रही। मुदा,जखन होस्टल आबी तऽ मोन पड़ि जाय मायक बापक दैन्य हालत। पत्नी आ बच्चा सभक सुरता मोन घीचि लिअय। हम चिन्ताक अथाह सागरमे भसियाय लागी। अपन भविष्यक प्रति घोर निराशा हुअय लागय। एक दिन हमर ससुर आ हमर मामाक लाटमे लगैत भोला झा, चौधरीजीक प्रेस पहुँचि कऽ बहुत बात-कथा कहि आयल रहथिन जे हमरा जीवनक संग ओ खेलबार करैत रहथि। प्रात भेने चौधरी जी हमरा होस्टल आबि गेल रहथि। कहलनि हमरा जे अहाँ आब छोड़ू ई सी.ए, ती.ए। बड़ समय मङ्गैत छैक ई सब विद्या। गाम जाउ। बाल बच्चाकेँ लऽ आनू। अहाँक नोकरी भऽ गेल अछि। यद्यपि हमर तऽ हाथ पैर हेड़ा जायत। मुदा, अहाँक नोकरी गौहाटी लेल भऽ गेल अछि। हम सैह कैल। हम 1983 ई सँ 1997 ई धरि माँ कामाख्याक शरणमे नोकरीमे जी जानसँ लागि गेल रही। मैथिलीक सेवा मे अनवरत लागल रही। खूब साहित्य लिखल। से सब पत्रिका सभमे छपैत रहय। मैथिलीक साहित्यकारमे मिनहा हुअय लागल। चौधरी जी खूब मोन पड़थि। पत्राचार होइत रहैत छल। हुनक मैथिलीक प्रति त्याग आ तपस्यासँ बड़ बेसी प्रभावित भेल रही। डा. जयकांत मिश्र जीसँ औडिटे केर क्रममे 1975 ई.मे साक्षात्कार लेने रही। मिथिला मिहिरमे छपल रहय। बेस चर्चित भेल छल। उल्फाक अदंकसँ आरिज भऽ 1997 ईमे कोलकाता आपस आबि गेल रही सपरिवार। मुदा, ता चौधरी जी वैकुण्ठ वासी भऽ गेल रहथि। जयकांत बाबू, पिताम्बर पाठक आ हुनका लोकनिक समकालीन मैथिली अभियानी लोकनि सभ बेराबेरी उपर चल जाइ गेलाह। हम सोचल जे कथा, कविता, उपन्यास लिखनिहार तऽ बहुतो गोटे साहित्यकार सभ छथि। आ से बेस लीखि रहल छथि। मैथिलीक लेल मिथिलाक लोक लेल आब के लिखत? मैथिलीक हितक चिन्ता केनिहार आब कतेक गोटे छथि? हम तेँ ओहि नावक पतवार अपना हाथमे लेल अछि। जे बुझैत छी वा जतबा हुनका सभसँ सिखल सैह काज एखन सोशल मीडियाक माध्यमसँ करैत संतेाषक अनुभव करैत रहैत छी। जय मैथिली!! संपादकीय टिप्पणी- एहि आत्मकथ्यक संग-संग पाठक श्री लक्ष्मण झा 'सागर'जी केर एहि साक्षात्कारकेँ देखथि-सुनथि जकर लिंक अछि- साक्षात्कार। २.६.चंदना दत्त- आदरणीय लक्ष्मण झा 'सागर' चंदना दत्त आदरणीय लक्ष्मण झा 'सागर' हम 2011 मे साहित्य अकादमीक अनुवाद कार्यशालामे गुआहाटी गेल रही। कार्यक्रम बड्ड नीक रहल, बड्ड बेसी तथ्यपरक बात सभ सिखबाक अवसर भेटल। कार्यक्रमक पश्चात आदरणीय सत्यानंद पाठक हमरा सभकेँ गुआहाटी दर्शन करबाऽ लऽ गेलाह आ ओही क्रममे अपन कार्यालय लऽ गेलाह आ अपन पोथीक संग आदरणीय लक्ष्मण झा 'सागर'जीक काव्यसंग्रह "उचरि बैसू कौआ" उपहार स्वरूप देलनि। आवरण आ नाम बेस रुचिगर। जतऽ कवि हृदयकेँ कोइली, मोर-पपीहा केर नाम बेसी सेहन्तगर लगैत छनि ततऽ कौआक चर्चसँ आश्चर्य भेल मुदा काव्यसंग्रह पढ़ि मोन मुदित भेल। पुनः कर्णामृतक संग अनेक मैथिली पत्रिका सभमे हुनक प्रकाशित रचना पढ़बाक सौभाग्य भेटल। निर्भीक, स्पष्ट आ ईमानदार लेखनी प्रभावित केलक। तखन हम हुनकर विषयमे विशेष जनतब प्राप्त कएल। आदरणीय सागरजीक जन्म मिथिलाक गाम ठढ़बितिया, घोघरडीहामे 1 अप्रैल 1953 ई. मे भेलनि। पिता आदरणीय तारकेश्वर झा एवं माता आदरणीया गंगा देवीक कुलदीपक लक्ष्मण झा सी.ए बनबाक स्वप्न देखने छलाह मुदा बाबू साहेब चौधरीक अनुप्रेरणासँ मिथिला-मैथिलीक सेवामे लागि गेलाह। मैथिली दर्शन संपादन करैत सामान्य मैथिल सन पूरब माने कलकत्तामे रोजी-रोजगारक उपक्रममे लागल रहलाह। संगहि मिथिला-मैथिलीक सेवामे कोलकातामे अलख जगौने रहलाह। मैथिलीक विभिन्न विधामे हिनक लेखनी सक्रिय रहल अछि। कविता संग्रह, कथा संग्रह, साक्षात्कार संग्रह, वार्ता संग्रह, निबंध संग्रह, टिप्पणी संग्रह आदि सन एतेक विधामे हिनक रचनावली संग्रहणीय अछि। हुनक कनसोह वार्ता संग्रह बड्ड रोचक लागल। अनेक रंगक व्यंग्य एतेक सरलतासँ कहैत छथि जे पाठक चमत्कृत भऽ जाइत छथि। "जेना ओ कहलनि" मैथिली साक्षात्कार संग्रह मैथिलीक नव पीढ़ी लेल अभूतपूर्व काज करत। एकठाम मैथिलीक सारस्वत सेवक लोकनिक विचार पढ़ब, हुनकर कार्य-पद्धति जानब बड्ड ज्ञानवर्धक अछि। बाबू साहेब चौधरी, जयकांत मिश्र, पीताम्बर पाठक, राजनंदन लालदास, डा. वीरेन्द्र मल्लिक, महेन्द्र मलंगिया, अशोक झा आदि एकसँ एक मैथिलीसेवीकेँ पढ़ि कऽ बुझब आ गुणब ई श्री सागरजीक लेखनीसँ संभव भेल अछि। हिनक स्वप्न छनि जे मिथिलामे कक्षा एकसँ मैथिलीमे पढ़ौनीक व्यवस्था प्रारंभ भऽ जाए। हमरा जनैत एहि स्वप्नक पाछाँ हिनक कोलकाता प्रवास आ अपन मैथिलीक विकास हएत से सोच छनि। कोलकातामे बंगालीक एतेक प्रचार-प्रसार अछि जे कोनो प्रवासीकेँ बंगला सिखने बिना कल्याण नहि। दू टा बंगाली विश्वक कोनो कोनमे भेटथि तऽ हुनकर वार्तालाप निश्चितरूपेण बंगलामे हएत मुदा मैथिल जँ घरसँ बहराइ छथि तऽ अपन भाषाकेँ ओरिया कऽ सिरागुमे राखि दैत छथिन आ जतऽ जाइ छथि सभसँ पहिने ओतुक्का भाषा आ संस्कारकेँ ओढ़ि लैत छथि। इएह कारण छै जे एतेक प्राचीन आ विश्वक मधुरतम भाषा जाहिमे चंदा झा एवं लालदासक लिखल रामायण हो, अनेकानेक महाकाव्य हो आ विद्वतजनक अनगिणत कतार हो ओ मैथिली आइ धरि प्राथमिक पाठशाला लेल निर्वासन भोगि रहल छथि। आदरणीय सागरजीक लेखन शैली निर्भीक रहैत छनि आ व्यंग्यक शैली पाठककेँ आदिसँ अंत धरि पढ़बाक लेल बाध्य करैत अछि। आजुक युगमे पाठककेँ रुचि कम समयमे विशिष्ट रचना पढ़बाक भऽ गेल अछि मुदा हिनक विशिष्ट शैलीक काव्य हो कथा हो वा कि साक्षात्कार सभटा पाठककेँ बान्हि लैत अछि। कोलकाता अदौसँ मैथिलीक दीर्घजीवी पत्रिका एवं आन्दोलनक यशस्वी अभियानी सभहक परिश्रमक परिणाम अछि। आइ मैथिली अनेक विश्वविद्यालयमे अपन स्थान गर्वसँ रखने अछि आ माननीय अटलजीक समयमे आठम अनुसूचीमे सम्मिलित भेलीह। हमर अपन अनुभव अछि जे मिथिलामे प्राथमिक पाठशालामे मैथिलीक पढ़ौनी अवश्य प्रारंभ हएत आ सागरजीक स्वप्न साकार हेतनि। अपन कार्यक्षेत्रमे एतेक व्यस्तताक अछैत मैथिली साहित्य लेल हिनक योगदान अभूतपूर्व अछि। २.७.विभा रानी-संपर्क-तेलौंस देह पर ज्यों बिछलैत पानि विभा रानी-संपर्क-मुंबई तेलौंस देह पर ज्यों बिछलैत पानि 1984-86 धरि हम कलकत्ता मे छलहुँ। ओहि समय मैथिलीक अनेक संस्था सभ आ हुनक किछु प्रोग्राम मे जेबाक अवसर भेटल छल। ओ समय हमर संक्रमण कालक छल। तुरंते अपना मर्ज़ी सँ विवाह आ ताहि लेल सदिखन पानि सँ भीजल पाखी जकाँ ठिठुरैत हम अपना सासुर मे। सासुर त' गोदानि नेने छल। नैहरक कोनो भरोस नहि छल। चारि मासक बेटी के सासु लग गाम मे छोडि कलकत्ता आएल छलहुँ नौकरी कर' लेल। ओही ठाँ पंचानन जी, राजनंद लाल दास जी आदि सँ भेंट भेल। हमरा किंतु मोन नहि अछि जे ओहि समय मे हमर भेंट लक्ष्मण झा ’सागर' जी सँ भेल छल। हमर मन:स्थिति एतेक मोन राखबाक छेबो नहि छल। एक त' पहिल बेर बिहारक गह्वर सँ निकलि क' कोलकाता सन महानगर मे गेल छलहुँ। एक गोट ससुरारी घर मे रहै छलहुँ, चारू पहर साडी आ घोघ मे। जेना सभ स्त्री के अपन एक- एक श्वासक हिसाब देब' पडै छै, हमरो दै पड़ै छल जे ऑफिसक बाद हम कत' गेलहुँ, की केलहुँ? बाहरक संसार मे विचरब आरम्भ भेल मल्लिक बाजार सँ निकलि क' अपन डेरा टॉलीगंज मे एलाक बाद। यद्यपि असगर स्त्री लेल सभ किओ अघोषित पहरुआ भ' जाइत छै, अहू ठाँ छलै। मुदा, तैयो ठीक छलै। 1986क अंतिम अक्तूबर मे हमर दिल्ली तबादला भ' गेल। कलकत्ता छूटि गेल। मुदा शहर आ लोक सभ मोन पड़ैत रहल। अहि बीच भरिसक 2016-17 मे कोलकाता गेलहुँ, बांग्लाक सुप्रसिद्ध लेखक, कवि आ सोई मेलाक प्रधान नबानीता देवसेनक आमंत्रण पर। ओ हमरा अपना ’सोइ मेला' मे डहकन आ ’खिस्सा कहे खिसनी' क प्रस्तुति लेल बजौने छलीह। बड्ड मानै छलीह हमरा। ओहि प्रस्तुति मे रुपेश त्योंथ, किरण झा आदि सभ आएल छलन्हि। ओहू समय मे हमर भेंट लक्ष्मण झा ’सागर' जी सँ नहि भेल। हमर भेंट लक्ष्मण झा ’सागर' जी सँ 2021 मे भेल, जहन हम अपन जैधीक विवाह लेल कोलकाता गेलहुँ। दू दिन बेसी रुकलहुँ। हमर आदति अछि जे जाहि जगह गेलहुँ, ओहि ठाँक लोक सँ भेंट- घांट करबाक प्रयास केलहुँ। हमरा लग जतेक गोटाक नम्बर छल, सभ के एक टा मेसेज क' देलियै। रत्नेश्वर झा जीक तुरंत प्रतिसाद आएल- ’दीदी, हम त' अहि ठाँ नहि छी, मुदा कएक गोटे के कहि देलियन्हिए। ओ सभ भेंट करताह।' किरण झा, हमर बंगाली दोस्त ऊर्मिमाला बनर्जी आ पामी साहा एलीह। ओ हमरा संगे वर्कशॉप क' चुकल छथि। बड़ी बिंदीक कार्यक्रम मे सेहो आएल छथि। अहि बेर हमर भेंट लक्ष्मण झा ’सागर' जी सँ भेल। ओ हमरा फोन केलन्हि आ साँझ मे हमर गेस्ट हाउस एलन्हि, मधुर ल' क'। अचानक एक्कहि समय मे एतेक लोग सभ आबि गेलखिन्ह कि हम नर्वस भ' गेलहुँ। हमरा मोने सभ किओ हमरा सँ भेंट कर' आएल छथि, त' सभ के हम समुचित समय दी। सागर जी हमर स्थिति बूझि गेलन्हि। कहलन्हि- ’कोनो गप्प नहि। हम बूझि सकै छी जे कम समय मे बेसी लोक आओर सँ भेंट करब कठिन होइत छै। मुदा अहाँ सभ के कहल, ई बड़का बात, अन्यथा लोक सभ अबैत छथि, बिनु खबर केने चलि जाइत छथि।' हम सभ तैयो बहुत देर धरि बैसलहुँ। गप्प-सप्प भेल। ओ कहलन्हि- ’हम अहाँ के बहुत पहिने सँ चीन्है छी अहाँक ’कौआहंकनी' आ तकरा बाद आन-आन कथा सभक माध्यमे। एक गोट वरिष्ठ जनक मूँह सँ ई सुनि हम संकोचे कठुआ गेलहुँ। ओ कहलन्हि- ’फेर कहियो आबी, त' कनेक समय ल' क' आबी।' हमहू मुस्काइत कहलियन्हि- ’अपने सभ जहिया बजाबी, हम एकदम आबि जाएब। आब हमरा ऊपर नौकरीक दवाब नहि अछि ने!' सागर जी सँ दोसर भेंट भेल विनोद कुमार झा ’सरकार' जी द्वारा 7-9 अप्रैल, 2023 मे आयोजित ’मैथिली लिटरेचर फेस्टिवल, मुंबई मे। हमरा ओ कहलन्हि- ’हम मुंबई आबि रहल छी।' संयोग जे हमर ओहि समय मे शूट नहि छल आ 7 आ 9 अप्रैल के ई फेस्टिवल अटेंड क' सकलहुँ। गप्प-सप्प भेल। बड्ड नीक लागल। व्हाट्सप पर अनेक रास ग्रुप मे ओहो छथि, हमहू छी। फेसबुक पर ओहो छथि, हमहू छी। सभ ठाँ हुनक खूब सक्रियता छनि। मैथिलीक प्रति हिनक प्रेम अतीव छनि। मैथिली मे आ मैथिल जन द्वारा मैथिली लेल कएल गेल काज हिनका बड्ड सोहाओन लागै छनि। एखन ओ मैथिलीक असली सेवादार सभक गप्प लिखि रहल छथि। हिनका लग अनुभवक खान छै। भाँति- भाँतिक लोक सभ सँ भेंट-मुलाकात छन्हि, बहुत रास संस्था सभ द्वारा बजाओल जाइत छथि। ओ जाइत छथि- ट्रेन सँ सेहो दूर- सुदूर धरि यात्रा करै छथि। हिनक ई सक्रियता हमरा बड्ड नीक लागैये, अन्यथा उम्रक एक मोड़ पर आबि क' सभ किओ बाबा- बाबी कहि क' घर मे सुमिरनी फेरबाक मुफतिया परामर्श देब' लेल अनेरे तत्पर रहैत छै। सागर जी एहन परामर्श सँ दूर अपन निरन्तर सक्रियता बनेने छथि। कोनो वरिष्ठ जनक ई डेग हमरा लेल अनुकरणीय भ' जाइत अछि। अशोक जीक अपन ’डैडीगाम' कथा संग्रह मे संकलित कथा ’लाथ'क माध्यमे हिनक एक गोट आओर विशिष्टताक उल्लेख कर' चाहब। हमरा समाज मे एक उम्र पर आबि क' सभ किओ बुजुर्ग लोकक पहिरब-ओढ़ब पर अनेरे टीका-टिप्पणी कर' लागै छथि। मुम्बई मे हम देखल जे ओ खूब चहटगर रंगक कुर्ता पहिरने छथि। हमरा ई खूब नीक लागल। अपन कॉर्पोरेट कल्चर मे रहबाक कारणे अथवा ठाम-ठाम एला-गेलाक कारणे व्यक्तिक आंतरिक व्यक्तित्वक संगे- संग हुनक बाहरी प्रेजेंटिबिलिटि पर हमर बहुत आस्था अछि। तैं अपना के सँवारि क' राखयवाला व्यक्ति सभ, चाहे ओ स्त्री होथु वा पुरुष हमरा बहुत नीक लगै छथि आ हम दुनू लग जा क' हुनक तारीफ क' अबै छियै। सागर जीक मैथिली प्रेम अद्भुत छै। आग्रह सँ बढ़ि क' दुराग्रहक सीमा धरि। एक हद धरि ई नीक लगै छै, कियैक त' एक ओर हम सभ अपन भाषाक प्रति प्रेम आ सम्वेदना जतबै छी आ दोसर दिस अपने भाषा सँ अलग भ' रहल छी। मिथिलो मे लोक कमे मैथिली बजै छथि। शहर मे त' बाल- बच्चा सभ मोटा-मोटी नहिए बजै छै। जेना लोक सभ ’मुझे हिंदी नहीं आती' अथवा ’मुझे हिंदी अच्छे से नहीं आती' कह' मे शान बुझै छै, तहिना ’आब कत' मैथिली?' कह' मे लोक अपना के आधुनिक बुझै छथि। हमरा बुझने सागर जी अही प्रवृत्तिक खिलाफ छथि। ओ कहै छथि- ’जाहि समाजके अपन भाषाक प्रति स्नेह नै अछि। समर्पण नै अछि। चेतना जागृत नै अछि। सेंटीमेंट नै उभरैत अछि। ताहि समाजक तुलना मनुक्खसँ कोना कैल जायत। जाहि समाजक लोक उचित बात कहनिहारक पानि उतारय पर उतारू रहत ताहि समाजसँ उत्थानक आशा राखब पानि डेंगायब सन हैत।’ हुनक अहि गप्प पर लोकक बहुत रास टीका- टिप्पणी भेंटै छै, मुदा ओ अपने तेल लागल देह पर छहलल पानि जकाँ छथि। लोकक कहबीक पानि हुनक अपन धारणाक तेल सँ चिकनाएल देह सँ बिछलि जाइत छै आ अहि पानि सँ स्नान करैत मैथिलीक मादे ओ बनल रहैत छथि आओर मजगूत, आओर अडिग। २.८.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'- 'सागर'सँ महासागर धरि जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'-संपर्क-8789616115 'सागर'सँ महासागर धरि मैथिली भाषा आ साहित्य एखन धरि जे किछु उपलब्धि प्राप्त केने अछि, ताहिमे बहुत लोक सभक त्याग आ तपस्याक बल लागल अछि। किछु लोक मिथिलाक विभिन्न क्षेत्रमे रहिक' योगदान द' रहल छलाह आ किछु लोक रोजी-रोटीक प्रबन्ध लेल देशक विभिन्न भागमे रहिक' विभिन्न रुपें अपन योगदान द' रहल छलाह। अधिक लोक अपन रोजी-रोटीक प्रबन्धमे एतेक परेशान रहैत छथि जे हुनका लेल परिवारक सुख-सुविधाक ध्यान राखब मात्र जीवनक उद्देश्य बनि जाइत छनि। ओ अपन नोकरी, नोकरीमे पदोन्नति, धिया-पूताक भविष्य लेल  नीक व्यवस्था,मकान आ आरामक सुविधा एकत्र करब मात्र अपन कर्त्तव्य बुझैत छथि, ओ मातृभाषा, साहित्य आदिक चक्करमे नहि  पड़ैत छथि। किछु लोक एहेन होइत छथि जे अपन परिवारक लेल भोजन, वस्त्र,आवास,शिक्षा आदिक लेल समुचित व्यवस्थाक ध्यान रखैत पत्र-पत्रिका सेहो किनैत छथि, पढैत छथि, दुनियामे कत' की भ' रह्लइए तकर चिन्तन सेहो करैत छथि,नीक-अधलाहक विचार करैत छथि आ ओहिपर कोनहु रूपें अपन प्रतिक्रिया सेहो व्यक्त करैत छथि। किछु लोक एहेन होइत छथि जे साहित्य, संगीत अथवा कोनो तरहक कलाकें जीवनक अनिवार्य विषय मानैत छथि आ तदनुरूप अपन आचरण रखैत आनो लोक सभकें प्रभावित करैत अपना संग क' लैत छथि। एहि तरहक लोकमे किछु लोक एहनो होइत छथि जे अपन मातृभाषाक सेवामे तेना संलग्न भ' जाइत छथि जे अपन सुख-सुविधाक सेहो ध्यान नहि रखैत छथि आ जाधरि जिबैत छथि सदिखन अपन धुनमे लागल रहैत छथि। मिथिलामे सेहो एहि सभ तरहक लोक छथि जे अपन-अपन ढंगसँ मैथिलीक सेवा करैत आबि रहल छथि। किछु लोक आब सदेह उपस्थित नहि छथि मुदा हुनक सेवाक गाथा सभ दिन लेल हमरा सबहक मध्य रहत। मैथिली साहित्य अकादमीक मान्यता प्राप्त केलक, संविधानक अष्टम अनुसूचीमे स्थान पौलक, संघ लोक सेवा आयोगक परीक्षामे मैथिलीक स्थान अछि, राज्य लोक सेवा आयोगक परीक्षामे स्थान भेटलै, कालान्तरमे हटाओल गेल, समय बदलल त फेर आएल एहि सभ घटनाक मध्य कतेक लोक सभ कोन-कोन रूपें मैथिलीक सेवा क' रहल छलाह से जानब बहुत रोचक आ सभ मैथिल लेल आवश्यक सेहो अछि। किछु  लोक मिथिलाक माटिपर काज क' रहल छलाह, किछु लोक पटना,बनारस,प्रयाग,कोलकाता,जयपुर,दिल्ली,मुंबइ,नेपाल  आदि ठाम अपन जीविकोपार्जनक संग मैथिलीक सेवा क' रहल छलाह। दिल्लीमे तत्कालीन प्रधानमंत्री पं.जवाहर लाल नेहरुजीकें कोना मैथिली साहित्यक वैभवसँ परिचय कराओल  गेलनि, ओ के छलाह जे कलकत्ताक  मैथिल सभमे सांस्कृतिक आ साहित्यिक चेतना जगौलनि आ मैथिलत्वक बोध सेहो करौलनि, कलकत्ताक मैथिल सभकें कोना संगठित कयल गेल, कलकत्ता विश्वविद्यालयमे मैथिलीक पढ़ाइ कहिया आ किनका-किनका प्रयाससँ शुरू भेल, कलकत्तामे ओ के सभ छलाह जे अपन व्यापार आ व्यवसायकें समृद्ध करैत बहुतो मैथिलकें आजीविकाक अवसर उपलब्ध करौलनि, पटनाक चेतना समिति की सभ केलक कलकत्ताक  मिथिला लोक संघ,अखिल भारतीय मिथिला संघक की भूमिका रहलैक अछि, एकर सबहक पाछाँ के-के सभ महत्वपूर्ण भूमिकाक निर्वाह केलनि,साहित्य अकादमीमे मैथिलीक मान्यता कोना भेटलै,पटनामे अकादमीक स्थापना कोना भेल,दरभंगामे मिथिला विश्वविद्यालयक स्थापना कोना भेल,बिहार लोक सेवा आयोगमे मैथिलीक मान्यता कोना भेटल,मिथिला एक्सप्रेसक नामकरण कोना भेल, विद्यापति डाक-टिकटक प्रकाशन कोना आ कत'सँ भेल,जनगणनामे मैथिलीकें हिन्दीसँ पृथक रूपमे कोना स्वीकार कयल गेल आदि महत्वपूर्ण जानकारीक लेल हमरा सभ लग एकटा सुन्दर पोथी उपलब्ध अछि जकर नाम थिक ’जेना ओ कहलनि'। एहि पोथीक लेखक छथि मैथिलीक सुपरिचित रचनाकार श्री लक्ष्मण झा ’सागर'  जे मैथिलीक प्रतिष्ठित छओटा विद्वान्-मनीषी-रचनाकार-तपस्वी लोकनिसँ साक्षात्कारक संग्रहक  रूपमे एहि अनुपम कृतिकें प्रकाशित कराक' अपने खर्चसँ  साहित्यकार सभकें उपलब्ध करौलनि अछि। मिथिलाक जाहि सपूत लोकनिसँ साक्षात्कार लेल गेल अछि से छथि परम श्रद्धेय  बाबू साहेब चौधरी, डा. जयकांत मिश्र,श्री पीताम्बर पाठक,श्री राजनन्दन लाल दास,डा.वीरेंद्र मल्लिक, श्री महेंद्र मलंगिया  आ श्री अशोक झा। ई साक्षात्कार सभ क्रमशः 31.12.1976, 21.07.1979, 7.10.2001, 2016, 10.12.2016, 23.07.2017 आ दीयाबाती 2017 क' कलकत्ता, प्रयाग और दिल्लीमे लेल गेल अछि, स्पष्ट अछि जे एहिमे 2017 के बाद जे किछु मैथिलीक संसारमे भेल अछि तकर विवरणक एहि पोथीमे अभाव अछि, मुदा ओहिसँ पूर्वक सभटा घटनाक वर्णन उपलब्ध अछि। जे कियो मैथिली आन्दोलनक विषयमे बहुत किछु जनैत छथि हुनको बहुत नव-नव जानकारी सभ भेटतनि एहि पोथीमे। पोथी पढैत काल एना लगैत अछि जेना वक्ता स्वयं हमरा सोझाँ उपस्थित होथि आ अपन आत्मकथा कहि रहल होथि अथवा मैथिलीक आत्मकथा सुना रहल होथि। जयकांत बाबूसँ सुनू बाबू साहेब चौधरीकें प्रो. प्रबोध नारायण सिंहसँ किएक मतान्तर भेलनि ,1963 मे दिल्लीक आजाद भवनमे लागल पुस्तक प्रदर्शनीमे मैथिलीक ग्रन्थ सबहक अम्बार देखि तत्कालीन प्रधान मंत्रिजीक की प्रतिक्रिया रहनि,के छलाह ’ए गढ़ ऑफ़ मैथिली', मैथिलीक लेल सभसँ बेसी महत्वपूर्ण की अछि आ कहिया-कहिया की भेलै जे हुनक छाती जुड़ा गेलनि। चौधरीजीसँ सुनू  जन-साधारणक मोनकें आकर्षित करबाक श्रेय किनका  छनि,   प्राथमिक कक्षामे मैथिलीक माध्यमसँ पढ़ाईकें सभसँ बेसी  आवश्यक किएक बुझैत छथि, कलकत्ताक मैथिल सभक ध्यान  मैथिली दिस आकृष्ट करबाक श्रेय किनका दैत छथि। आदरणीय दासजीसँ सुनू राति 9 बजेसँ भोर धरि एक बैसकीमे चर्चित नाटक ’संतो' लिखयबाक कथा, प्रबोध बाबूपर विनिबंध आ  मैथिलीक ज्वलंत समस्या सभपर हुनक मंतव्य। मल्लिकजीसँ सुनू कोलकाताक मल्लिकजीक  आ दिल्लीक मल्लिकजीक आत्मकथाक रूपमे कोलकाताक मैथिलीक कथा। मिथिलाक माटिपर, दिल्लीमे, कोलकातामे, नेपालमे आ भारतक अन्य भागमे मैथिली नाटकक विषयमे अ सँ ज्ञ धरि सुनू मलंगियाजीसँ। कलकत्ताक मिथिला विकास परिषद आ मिथिला महिला मंचक जीवनी मैथिलीक योद्धा अशोक झा जी कहैत छथि। मिथिलाक विभिन्न विभूति लोकनिसँ लेल गेल साक्षात्कारक विधि सेहो बहुत रोचक अछि। एहिमे तत्काल कोनो कागत-कलम अथवा टेप-रिकॉर्डरक उपयोग नहि भेल अछि, वक्ता बजैत जाइत छथि आ प्रश्नकर्ताक मस्तिष्कमे सभटा जहिनाक तहिना अंकित  होइत जाइत अछि। बाजल आ सूनल  शब्द सभ बादमे कागतपर उतरैत अछि, कालान्तरमे विभिन्न पत्रिकामे स्थान पबैत अछि और आब पोथीक रूपमे सर्वत्र  उपलब्ध अछि। ई सातटा साक्षात्कार हमरा मैथिली- प्रेमक सातटा सागर जकाँ लगैत अछि आ साक्षात्कारक ई अनुपम संग्रह  महासागर जकाँ। २.९.वीरेन्द्र झा- लक्ष्मण झा 'सागर' स्पष्टवादी साहित्यकार वीरेन्द्र झा, संपर्क-9470669886 लक्ष्मण झा 'सागर' स्पष्टवादी साहित्यकार लक्ष्मण झा 'सागर' मैथिलीक एक चर्चित, निर्भीक साहित्यकारक नाम अछि जे अपन टीका-टिप्पणी लेल विख्यात छथि। कोलकातामे रहि चाकरीमे लगातार रहलाक बादो अपन समाज आ साहित्य लेल समर्पित रहलाह अछि। सत्तरिक दशकसँ हिनकर लेखनी चलैत रहल अछि। यद्यपि हमरा हिनकासँ एखन धरि भेंट नहि अछि मुदा हम हिनकर सृजनसँ थोड़-बहुत परिचित अवश्य छी। सागरजी अपना संग अपन समकालीन लेखकक लेखनीक मादे बरोबरि साकांक्ष रहल छथि। ओ समर्पित-प्रतिबद्ध लेखन आ लेखक केर पाछा बेहाल रहैत छथि। हमरा हिनकर संस्मरण खूब नीक आ रोचक प्रतीत होइत अछि। संस्मरण सभ यथार्थसँ परिपूर्ण रहैत अछि आ सरल-सरस रोचक भाषामे प्रस्तुति एकर मूल आकर्षक विषय होइत अछि। संस्मरण सभ पढ़लासँ पुरना समयक समाज, गाम-घरक सजीव चित्रण जेना सोझामे ठाढ़ भऽ जाइत अछि। हिनकर लेखनी बहुत समाजशास्त्र अछि। प्राचीन एवं आधुनिक समाज-परिवार, बात विचार, संयुक्त परिवारक विघटन, वृद्धजनक उपेक्षा अपनैतीक कमी, उच्छखृंलता, अनुशासनहीनता, सामाजिक आ जातीय कुरीति, सामाजिक परिवर्तन आदि हिनकर लेखनक हमरा जनैत मूल विषय रहैत अछि। मैथिली नवयुवा साहित्यकारकेँ प्रेरित-प्रोत्साहित करबामे सतत लागल रहैत छथि मुदा एकरा संग-संग अपन पुरान दिवंगत साहित्यकारगणक प्रति श्रद्धा आ सम्मान अर्पित करबामे सेहो कोनो कसरि बाँकी नहि रखैत छथि। प्रगतिशीलताक पक्षधर होइतो प्राचीनताक प्रति मोह अवस्स छनि। सागरजीक जन्म कतहुँ भेलनि, पचपन कतहुँ बितलनि, चाकरी कतहुँ केलनि मुदा सभ ठाम ओ अपन भाषा आ समाजक चिन्तामे लागल रहलाह। आसाम हो  कि बंगाल लक्ष्मण झा सागरकेँ अपना स्तरसँ जतेक भऽ पेलनि ताहिमे कोनो कसरि बाँकी नहि रखलनि अछि। बाबू साहेब चौधरी सन दधीचिक अभिनंनदन ग्रंथ हुनकर महत्वपूर्ण योजना अछि। प्रवासी अनमोल रत्नपर हुनकर फेसबुक सिरीज खूब लोकप्रिय रहल अछि। सागरजीक कविता सेहो खूब मारुख होइए। एहि संक्षिप्त टिप्पणीमे सागरजीक सभ काज वा एक काजक हम विस्तार नै कऽ सकल छी मुदा विश्वास अछि जे पाठक लग हमर भावना पहुँचि सकतनि। २.१०.नबोनारायण मिश्र- सर्वगुण सम्पन्न सागरजी नबोनारायण मिश्र- संपर्क-9330173348 सर्वगुण सम्पन्न सागरजी सारस्वत साहित्यकार, मैथिली अभियानी श्री लक्ष्मण झा 'सागर' जीसँ कहिया प्रथम बेर भेंट भेल छल से तारीख स्मरण नहि अछि। हम 1983 ई. मे कलकत्ता आएल रही। जीवीकोपार्जनमे रहैत "कोकिल मंच" मैथिली नाट्य संस्थासँ 1990 ई. मे जुड़ि गेल रही। एहि अवधि सभमे मैथिली पत्र-पत्रिकामे रचनाकार लक्ष्मण झा 'सागर' नाम देखि प्रसन्नता होइत छल मुदा भेंट-घाँट नहि भेल छल तकर कारण जे 1983 ई. मे हम कलकत्ता एलहुँ आ सागरजी चाकरीक क्रममे स्थानान्तरित भऽ कलकत्तासँ आसाम चलि गेल छलाह। पुनः हुनका कलकत्ता एलापर प्रायः विद्यापति स्मारक मंच केर कार्यक्रममे सागरजीसँ प्रथम बेर परिचय 1998 ई. मे भेल छल। साहित्यिक रुचिक कारणे क्रमशः हमरा लोकनिक भेंट विभिन्न कार्यक्रम सभमे होइत रहल। किछुए दिनमे हमरा ई बुझबामे आएल जे सागरजी मात्र साहित्यकारे टा नहि छथि एकर अतिरिक्त मिथिला-मैथिलीक हेतु हिनका हृदयमे बहुत आदर-भाव सेहो छनि। हिनकर संपूर्ण परिवार मैथिलीमय छनि। अधिकांश साहित्यकार मात्र मंचपर मैथिलीक प्रयोग करैत छथि आ घरमे अन्य भाषाक मुदा सागरजीक घरक भाषा मात्र मैथिली छनि से अनुकरणीय। हिनका यशस्वी हेबाक अनेक कारणमे प्रमुख हिनकर व्यक्तित्व छनि। हमरा लोकनिक समान विचारधारा हेबाक कारणे कहिया मित्रताक बंधनमे हम सभ बन्हा गेल रही सेहो स्मरण नहि भऽ रहल अछि। ओना एकटा बात स्पष्ट करऽ चाहैत छी जे मित्रता तऽ समान लोकमे शोभनीय होइत छै ताहि दृष्टिसँ हम हुनका समक्ष अपना आपकेँ कतहुँ नहि पाबि रहल छी। मात्र विचारधाराक कारणे ई सखा-भाव एखन धरि कायम अछि, आशा करैत छी जे सदा-सर्वदा बनल रहत। रामकृष्ण महाविद्यालय, मधुबनीमे स्नातक कक्षामे एकहि साल हम दूनू गोटे अध्ययनमे लागल रही। ओ कामर्समे हम सांइसमे मुदा तहिया परिचय नहि छल। ई बात पाछा बुझलहुँ। इतिहास साक्षी रहल अछि जे कोनो सफल व्यक्तिक सफलतामे स्त्रीक योगदान सेहो महत्वपूर्ण रहल अछि। ई स्वीकार करबामे हमरा कोनो दुविधा नहि होइत अछि जे सागरजीक सफलतामे हिनक धर्मपत्नी श्रीमती शैल झा 'सागर' जीक प्रमुख योगदान रहलनि अछि। श्रीमती शैल झा 'सागर' सेहो मैथिलीमे रचना करैत छथि संगहि मैथिली साहित्य केर सजग पाठिका सेहो छथि। सागरजी परंपराक संग आधुनिक सोच राखैत छथि एकर प्रमाणमे मिथिला-मैथिलीक प्रत्येक कार्यक्रममे ई युगलजोड़ी अवश्य सम्मलित होइत छथि से प्रशंसनीय। नारी शक्तिकेँ डेगसँ डेग मिला कऽ चलेनाइ हिनक दूरदृष्टिक परिचायक अछि। मिथिला-मैथिलीक युगपुरुष गोलोकवासी बाबू साहेब चौधरीजीक अनुप्रेरणासँ सागरजी मैथिली सेवा क्षेत्रमे पदार्पण केलनि। ताहि अवधिमे चौधरीजीक कार्यक्षेत्रमे अनेक रूपसँ सागरजी योगदान दैत रहलाह।साहित्य-संस्कृतिसँ अथाह प्रेमक कारणे आसाम प्रवासमे रहैत गौहाटी स्थित मैथिल संस्था "मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति" केर निर्माणमे सेहो हिनक महत्वपूर्ण योगदान रहल छनि। ओहि अवधि केर प्रमुख कर्ता-धर्ता स्व. सत्यानंद पाठक आब हमरा लोकनिक बीच नहि छथि मुदा श्री प्रेमकांत चौधरीजी एखनहुँ एहि सभ बातक साक्षी छथि। सागरजी सत्तरिक दशकसँ लेखन प्रारंभ केलनि आ अस्सीक दशकसँ तात्कालीन मैथिली साप्ताहिक पत्रिका मिथिला मिहिरमे अनिक रचना प्रकाशित होइत छलनि। अनेको पत्र-पत्रिकामे आलेख सभ छिड़िआएल छनि मुदा पोथी एकहुटा प्रकाशित नहि रहबाक कारणे हिनकर समग्र मूल्याकंनमे बिलंब भऽ रहल छल से जानि हम पोथी प्रकाशन हेतु सेहो चड़िअबैत रहलहुँ। कतेको दिनक पश्चात गौहाटीसँ हिनक प्रथम काव्यसंग्रह "उचरि बैसू कौआ" प्रकाशित भेल ताहिमे सागरजीकेँ जतेक प्रसन्नता भेल छलनि ताहिसँ मिसियो भरि कम हमरा नहि भेल छल। ओहि काव्यसंग्रहसँ सागरजीकेँ मैथिली साहित्य जगतमे नीकसँ मूल्याकंन प्रारंभ भेल। सागरजी बहुविधावादी रचनाकार छथि। कविता, कथा, निबंध, समीक्षा, साक्षात्कार आदि सभ विधामे हाथ अजमौने छथि आ लोकप्रियता भेटल छनि। किछुए दिन पूर्व हिनक सद्यः प्रकाशित तीन टा महत्वपूर्ण पोथी प्रकाशित भेल छल जे एना अछि- "एहि गदहबेरमे" (काव्यसंग्रह), "कनसोह" (मैथिली वार्ता कथा), आ "जेना ओ कहलनि" (मैथिली साक्षात्कार संग्रह)। एहि पोथीक प्रकाशनसँ सागरजीकेँ सुयश प्राप्त भेलनि अछि। हिनक लेखनी अबाधगतिसँ चलि रहल छनि तकर प्रमाणमे आधा दर्जन पोथीक पांडुलिपि प्रेसमे प्रकाशन हेतु देल छनि से यथाशीघ्र पाठकक हाथमे आएत आ तकर स्वागत हेबाक चाही। सागरजी गौहाटीसँ प्रकाशित "पूर्वोत्तर मैथिल" त्रैमासिक पत्रिकाक कोलकाता विशेषांकक दू बेर अतिथि संपादक रहल छथि। संप्रति बाबू साहेब चौधरीपर केंद्रित स्मृति ग्रंथक संपादन हेतु तत्पर भेल छथि। ई स्मृति ग्रंथ जखन प्रकाशित हएत तखन हिनक सुयश आकाश चढ़ि बाजत आ कोलकाता हेतु एकटा महत्वपूर्ण काज हएत। आइयो कतेको पत्र-पत्रिकाक नियमित ग्राहक छथि। मधुबनीसँ प्रकाशित मैथिलीक दैनिक पत्र "मैथिल पुनर्जागरण प्रकाश"केँ आर्थिक सहायतार्थ 'संजीवनी मैथिली कोष' मे सर्वप्रथम बारह हजार टका देलनि। सागरजी सर्वगुण सम्पन्न छथि जे हिनका भीड़सँ फराक करैत अछि। कोकिल मंच प्रत्येक वर्ष मैथिली नाटकक मंचन करैत छल आ तत्पश्चात स्मारिका सेहो प्रकाशित करैत छल। नाटक देखबाक हमर आग्रह स्वीकार करैत प्रत्येक वर्ष सपत्नीक प्रेक्षागृहमे उपस्थित होइत रहलाह आ तहिना स्मारिका हेतु प्रत्येक अंकमे अपन रचना निश्चित रूपे दैत रहलाह। प्रत्येक वर्ष फगुआक अवसरपर कोकिल मंच "फगुआ ठहक्का" केर नामसँ आयोजन करैत छल जाहिमे सामयिक गीत-संगीतक अतिरिक्त कवि सम्मेलन सेहो रहैत छल। उक्त कवि सम्मेलनमे सागरजीक सामाजिक रचनाक सस्वर पाठ करैत छलाह जे बेस चर्चित होइत छल।कोकिल मंच गैर राजनीतिक मंच छल अस्तु कोनो नेता-अभिनेतासँ नहि अपितु कोनो साहित्यकार वा मैथिली सेवीसँ कार्यक्रमक उद्घाटन प्रत्येक वर्ष करबैत छल ताहिमे किछु बिलंबहिसँ हम ईहो दायित्वपूर्ण कार्य हुनके कर-कमलसँ करबौने रही। 2015 मे कोकिल मंच दू दिवसीय रजत जयंती वर्ष मना रहल छल। पहिल दिन गीत नादक कार्यक्रममे बैंगलोरसँ सुपरिचित गायिका रजनी पल्लवी तथा दरभंगासँ चर्चित गायक माधव रायक गीत प्रस्तुत भेल आ दोसर दिन श्री योगेन्द्र पाठक वियोगीजीक नाटक "बूढ़ भेल बलाय" केर मंचन भेल छल। ज्ञातव्य जे वियोगीजीक ई प्रथम नाटक कृति छल से प्रथम बेर अही मंचपर दर्शक द्वारा बेस प्रशंसित भेल छल। ज्ञातव्य जे उक्त अवसरपर लगभग दू दर्जनसँ बेसिये मैथिली सेवी आ साहित्यकार लोकनिक सम्मान कएल गेल छल। दू दशक धरि कोकिल मंचक सचिव रहबाक कारणे ई हमर अंतिम कार्यकाल छल से हम पूर्वहि घोषित कऽ चुकल रही। सागरजीसँ मधुर संबंध रहितो एकटा खास बातसँ रुष्ट भऽ कलकत्तामे रहियो कऽ ओ ओहि दू दिवसीय कार्यक्रममे अनुपस्थित छलाह। यद्यपि अपन अनुपस्थिति रहबाक बात हमरा पूर्वहिमे कहि देने छलाह जे नितांत व्यक्तिगत बात छलैक मुदा हमरा आइयो एहि बातक कचोट होइते अछि। सागरजी केहन संवदेनशील व्यक्ति छथि तकर एकटा बानगी जे हमर व्यक्तिगत जीवनसँ संबंधित अछि तकर उल्लेख करब हमर नैतिक कर्तव्य अछि। कार्यावधिमे 2003 ई. मे हमरा अपन कम्पनीक मालिकसँ मतांतर भऽ गेल छल आ हम कार्य छोड़ि कऽ गाम चलि गेल रही। मोन बना लेने रही जे आब गामेपर रहि कऽ खेती करब मुदा कोकिल मंचक सचिव पदपर रहैत कलकत्ताक मोह सेहो ग्रसित केने छल। कोकिल मंचक वार्षिक कार्यक्रमसँ किछु दिन पहिने हमर परम शुभचिंतक नाट्य निर्देशक गंगा बाबूक फोन गामपर पहुँचल छल। गंगा बाबूक कहब छलनि जे कलकत्ता आबि जाउ एतऽ पार्ट टाइममे तात्काल कार्य भऽ जाएत आ किछु दिनक बाद फुलटाइम कार्य सेहो भऽ जेतै। हम गामसँ आबि पार्ट टाइम कार्यमे लागि गेल रही मुदा फुलटाइम कार्यमे विलंब भऽ रहल छलैक। एहि बातसँ सागरजी चिंतित छलाह आ हमरा बिनु कहने अपन सत्प्रयाससँ फुलटाइम कार्यमे हमरा लगबा देलाह। वस्तुतः एहि कार्यसँ हमरा आर्थिक रूपे जीवनदान भेटल। मनुष्यकेँ कृतज्ञ हेबाक चाही कृतघ्न नहि। हमरा जनैत सागरजी बहुतो लोककेँ समयपर टका दऽ मदति करैत आएल छथि। साहित्यसँ इतर एकटा महत्वपूर्ण बातक उल्लेख एहिठाम आवश्यक बुझाइत अछि जे सागरजीकेँ रामलोचन ठाकुरजीसँ छत्तीस केर आँकड़ा छलनि। ई बात सागरजी प्रसंग गप्पक क्रममे रामलोचनजीसँ ज्ञात भेल आ पुनः सागरजी सेहो तकर पुष्टि करैत बहुत पुरान बात सभ कहलनि जे हमरा कलकत्ता एबासँ पहिने ओ घटित भेल छलैक। हम दूनू गोटे अतिप्रिय रहबाक कारणे हमरा ई बात अनसोहाँत लगैत छल। दूनू गोटेकेँ मेल-मिलाप करेबाक लेल दृढ़ संकल्पित भऽ मोनमे ठानि लेलहुँ। बहुत पापड़ बेललाक पश्चात हमर सत्प्रयाससँ दूनू गोटे संबंध छत्तीससँ बदलि कऽ तिरसठि रूपमे भऽ गेलनि ताहि बातक स्मरण केलासँ हमर मोन आइयो प्रसन्न भऽ जाइत अछि। फगुआक अवसरपर प्रत्येक वर्ष साहित्यकार आ मैथिली सेवी हेतु हम प्रेमोपहारक दू शब्द लिखैत छलहुँ मुदा ताहिसँ भिन्न आजुक शब्द मित्रवर सागरजीक लेल प्रेषित करैत आह्लादित छी। समानधर्मा रचनाकार मध्य, जे पौलन्हि सदिखन आदर से मिथिला-मैथिलीक वरदपुत्र श्री लक्ष्मण झा 'सागर' २.११.हितनाथ झा- जेना ओ कहलनि हितनाथ झा-संपर्क-09430743070 जेना ओ कहलनि मैथिलीमे साक्षात्कार विषयक पोथी, बहुत बेसी नहि तँ आब बहुत कमो नहि अछि। 1971मे प्रकाशित हंसराजक 'ओ जे कहलनि'मे दस साहित्यकारक साक्षात्कार अछि, 1998मे प्रकाशित डा. रमानन्द झा रमणक 'भेँटघाट 'मे सोलह टा साक्षात्कार अछि, 2001मे प्रकाशित विश्वनाथक 'अक्षर-अक्षर अमृत' तथा 'युगान्तर' दुनू पोथी मिला सोलह टा साक्षात्कार अछि, 2021मे प्रकाशित लक्ष्मण झा 'सागर'क  जेना ओ कहलनि मे सात टा साक्षात्कार अछि, एक टा आर साक्षात्कारक पोथी अछि जे हमरा लग उपलब्ध नहि अछि एवं एक डा. जयकान्त मिश्रसँ लेल गेल साक्षात्कारक पोथी अछि, जकर सम्पादक पंचानन मिश्र छथि जे 2020मे प्रकाशित छनि, जाहिमे एगारह साहित्यकार द्वारा लेल गेल डा. जयकान्त मिश्रक साक्षात्कार छनि। एकर अतिरिक्त विभिन्न पत्र-पत्रिका, स्मारिका, पोथीमे लेल गेल सयसँ ऊपरे साक्षात्कार सभ प्रकाशित अछि। लक्ष्मण झा सागर साहित्यकारक संग-संग कोलकाता, गुआहाटी, दरभंगा, दिल्ली आ आनो संस्था सभसँ जुड़ल छथि। निर्भीक आ स्पष्टवादी छथि। मैथिली भाषाक सरकारी मान्यता, साहित्यक भंडार भरबाक हेतु साहित्यकारक अवदान आ मैथिली संस्था, संगठनक कार्य-कलापपर हिनक ध्यान सदैव रहलनि अछि आ एखनो सक्रिय आ साकांक्ष छथि। साक्षात्कार करब साधारणतया ओतेक सरल नहि अछि, जतेक लोक बुझैत छैक। हमरा जनैत  सागर जीक लेल गेल साक्षात्कार सफल, उपयोगी जे इतिहास-पुराणक काज करत, जे भूगोलक निर्धारणमे सहायक हैत, अनेक विद्वानक उक्ति संदर्भमे लेल जैत, हुनका लोकनिक कैल जाय वला कार्य आ तत्कालीन साहित्य, राजनीतिसँ लोक परिचित भय सकत। "वृथा न होइ देव-ऋषि वाणी" केँ मानि विभिन्न क्षेत्रक ऋषिसँ साक्षात्कार लेल गेल ई पुस्तक महत्वपूर्ण सिद्ध होयत, से हमरा पूर्णतः विश्वास अछि। बाबू साहेब चौधरी सन आन्दोलनीक 1976 मे लेल गेल साक्षात्कार, ओहि समय कलकत्ता मैथिलीक अनेक गतिविधिक मुख्य केन्द्र छल, बहुत सूचनाप्रद अछि, मैथिली लेल कैल गेल कार्यक दस्तावेज अछि। बाबू साहेब चौधरी संस्थाकेँ इंगित करैत कहैत छथिन "जे संस्था ने आन्दोलन करैत अछि आ ने साहित्य-सृजन करैत अछि, तकरा हम मात्र "कीर्तनियाँ-मंडली बुझैत छियैक।" कोलकाताक मैथिली संस्थाक एकीकरणपर सेहो बेबाक टिप्पणी छनि। डॉ0 जयकान्त मिश्रसँ 1979मे लेल गेल साक्षात्कार, मैथिलीकेँ साहित्य अकादेमीमे मान्यता, साहित्य अकादेमीक कार्य-कलाप, हिस्ट्री ऑफ मैथिली लिटरेचरक अनुवाद प्रसंग, संस्थाक गुटबन्दीक बात सभ आ अनेक प्रसंग अछि, जे महत्वपूर्ण अछि। दिसम्बर1963क पुस्तक प्रदर्शनीक विषयमे सविस्तार अछि। प. नेहरूक प्रसंग सेहो आयल अछि जे ओ पहिने मैथिलीकेँ कोन रूपमे लैत छलाह आ जखन पुस्तक प्रदर्शनी मे अयलाह, तखन कोना धारणा बदललनि। पीताम्बर पाठक 1952मे कलकत्ता अयलाह आ मैथिली आंदोलन सँ कोना जुड़लाह, एहि विषयक एक साक्षात्कार कर्णमृतमे छपल देखि किछु छूटल बातक जिज्ञासा हेतु ओहि समय अस्वस्थ चलि रहल पाठक जी लग पहुँचलाह। कोलकाताक प्रारम्भिक आन्दोलनीमे छलाह पाठकजी, देवनारायण बाबू, बाबू साहेब चौधरी, राजनन्दन लाल दास, प्रबोध बाबू, सत्यनारायण बाबू, उदित बाबू, मिथिलेन्दुजी प्रभृति मैथिलीक झंडा उठौनिहार लोक जे अपन अस्मितक लेल कहथि --"यस वी आर मैथिल ...।" अखिल भारतीय मिथिला संघक लक्ष्यक विषयमे सविस्तार अपन साक्षात्कारमे कहलथिन। पटनो रहलाह, ओतय सेहो मैथिली आन्दोलनमे सक्रिय रहलाह। कोलकाताक सांगठनिक जनतब हेतु हिनक ई साक्षात्कार लाभकारी अछि। साक्षात्कार 2001मे लेल गेल अछि। कर्णमृत आओर राजनन्दन लाल दास एक दोसरक पूरक रहथि। हिनकर संपादकीयमे करीब 150 अंक प्रकाशित छनि। ई पत्रिका एक जाति विशेष नामपर अछि, तैं कहियो अभियोग सेहो लगलनि, लेखकक निम्नस्तरीय रचनाक प्रकाशनक बात सेहो लगलनि। सीताराम झाक एक कविताक पाँती पढ़ि मैथिली साहित्य व भाषा दिस आकृष्ट जे भेलाह से आजीवन रहलाह, से सम्पूर्ण समर्पणक संग। दासजीक पारवारिक पृष्ठिभूमि, कलकत्ताक सांगठनिक क्रियाकलाप, साहित्यिक यात्रा, सहयोग, असहयोग आदिक विषयमे सागरजी जे स्वयं साक्षी रहि चुकल छथि द्वारा पूछल गेल प्रश्न आ उत्तर निश्चित रूपसँ मैथिली साहित्यक, पत्रकारिताक, आन्दोलनक दस्तावेज अछि, इएह तँ साक्षात्कारकर्ताक मुख्य ध्येय रहैत छैक। वरिष्ठ साहित्यकार वीरेन्द्र मल्लिक एवं सुप्रसिद्ध नाटककार महेन्द्र मलंगियासँ लेल गेल साक्षात्कार दूनूक साहित्यिक अवदानक विषयमे तँ अछिए, समकालीन साहित्य एवं नाटकक विषयमे बहुत नव जानकारी अछि। आंदोलन, रंगमंच, कलाकार, कोलकातासँ सरोकार आदि विषयपर प्रश्न पूछि सागरजी द्वारा लेल गेल साक्षात्कार विविधतामे समग्रता समेटने अछि। अशोक झाक नेतृत्वमे 1983 मे कोलकातामे मिथिला विकास परिषदक स्थापना भेल, तँ अशोक झा चर्चामे अयलाह। मैथिलीक हितमे, राजनीतिक जीवन रहितहु, समर्पणमे कतौ कमी नहि अयलनि आ से सागरजी 36 पृष्ठक साक्षात्कारमे अशोक झा जीक पृष्ठभूमि सहित हुनक पूर्ण परिचय वा ई कही जे हुनक जीवन चरितक समग्र जनतब साक्षात्कारक रूपमे पाठक तक अनलनि से आधुनिक कोलकाताक गतिविधिक स्वरूपसँ सेहो परिचय करयलनि। साहित्य अकादेमीक सलाहकार समितिक सदस्य सेहो भेलाह। नाटक लिखलाह। कविता रचलनि आ सर्वोपरि मैथिलीक गतिविथिमे निरन्तरताक संग अपनाकेँ  सक्रिय रखलनि। चूँकि सागरजी स्वयं अपनहुँ मिथिला-मैथिलीक आन्दोलनसँ जुड़ल रहलाह अछि, से उपर्युक्त साक्षात्कारमे कोनो ने कोनो रूपमे सभक साक्षात्कारमे प्रश्न आबिये गेल छनि, से उचिते। साक्षात्कारकर्ताक मूल उद्देश्यो वैह, पाठकोक पढ़बाक लक्ष्यो सैह। एहि साक्षात्कारक पोथीमे कोलकाताक अधिकांश गतिविधिक पूर्ण परिचय भेटि जायत, ई सगरजीक पैघ सफलता छनि। जेना ओ कहलनि, पाठकक ज्ञानवर्धन करतनि, से विश्वास अछि। २.१२.विरेन्द्र कुमार झा- लक्ष्मण झा 'सागर' विरेन्द्र कुमार झा, संपर्क-9934727073 लक्ष्मण झा 'सागर' आँगनक दक्षिण भर पाँच कोठलिक कोठाक घर, ओइ समय गाम मे जकरा कोठाक घर रहैक , सुखी संपन्न मानल जाइत छल। हमर बाबा जमानाक (अंगरेजक समयक) ग्रैजुएट छलाह, रमौली (तमुरिया) उच्च विद्यालय मे प्रधानाध्यापक रहथि, नामी विद्वान, हुनके बनाओल घर छल। घरक सबसँ पुबरिया घर मे एकटा कुर्सी, टेबुल आ चौकी पर बिछौना लागल छल। हमर पितियौत आदरणीय भैया, लक्षमण झा 'सागर' टेबुल कुर्सी पर किछु किछु लिखैत रहैत छलथि। हम ओइ समय नेना रही,शायद 1973-74 क गप थिक, बेर-बेर हम घर जाइ आ हुनका पढ़ैत-लिखैत देखियैन्ह, पत्र-पत्रिका, पोथी टेबुल आ बाकस मे राखल रहैत छल। हुनका सँ ल' हमहूँ पढ़ल करी। एक दिन हम कहलियैन्ह, भैया हमर कोनो रचना 'मिथिला मिहिर' नै छपतैक? कहलथि, हँ-हँ किएक नहि, अवश्य छपतैक, अहाँ नीक जकाँ लिखू मुन्ना (हमर गाम घरक नाम मुन्ना छी)। हम लिखल, मोन नहि अछि की लिखल, भैयाक देलियैन्ह, पत्रिका मे पठा देलखिन्ह, हमर रचना छपल मिथिला मिहिर मे। समाराजी आश्रम रहैक, भैया पढ़ाइ संग घर-गृहस्थीक काज मे लागल रहैत छलथि। खरिहान मे करजान धानक बोझ राखल रहैत छल, ताहि हेतु भैया बेसी काल खरिहान जाइथ, कहियो कहियो भैया ओइठाम चौकी गेटि संगी सब संगे नाटक खेलाइत छलथि। हिनका कान्ह पर हर देखियैन्ह, कतेक लोक कहैक लछुमन बौआ बड़ दिब नाटक खेलाइत अछि। हमरा सबहक समाराजी आश्रम मे एकटा महिंस सेहो छल, चरबाहाक अबै मे विलम्ब भेला पर भैया अपने महिंस दूहि लैथ। ओना खेत पथार सँ कमे मतलब रहनि, मुदा गाम पर रहैत तऽ जौन हरबाहा सँ काज अढ़ाबैथ। भोला उच्च विद्यालय डेबढ़, घोघरडीहा सँ भैया मैट्रिक केलथि, प्रथम श्रेणी सँ पास केलनि, ओ समय मे भैया गामक पहिल व्यक्ति छथि जे प्रथम श्रेणी मे मट्रिक पास केलथि, बी.कॉम के जखन परिणाम आएल, तऽ हिनका संगे हमर दू गोट पित्ती से पास कयलथि, हमरा कने अनसोहात लागल छल जे तीनू गोटेक एक्के श्रेणी कोना भ' गेल। कारण भैया पढ़ऽ मे चंसगर रहथि। एहि खुशी मे दलान पर कीर्तन भेल, प्रसाद मे घरक बनाओल पेड़ा छल। एक दिन भैया पोखरि मे बंशी खेलाइ हेतु भोरहि सँ सुरसार करति छलथि, बेरिया पहर बंशी ल' पोखरिक दक्षिण बरिया महार पर गेलाह, बंशी पथलैथ, हमहूँ महार पर ठाड़ छलहुँ। कने कालक बाद देखल, भैया बंशी छिपलथि आ बड़की टा गागर माछ निकलल, हमरा बड़ खुशी भेल। एक दिन अनचोके सुनल जे भैयाक आइ विवाह छियैन्ह, मोन गदगद भेल जे बरियाती जाएब, मुदा ई की भैया निपत्ता, बाद मे बुझल जे भैया एहि विवाहक विरुद्ध छथि, तेँ गाम सँ पड़ा गेलाह, साँझ मे भैया गाम पर अयलाह, तखन कतेक कहि सुनि विवाह भेलनि, विवाह मे बरियाति क्यो नहि गेल, हमरा सबके बरियाति हुसि गेल। विवाह बेलौचा गाम भेल जे भैयाक मामा गाम सेहो छैन्ह। भैयाक कोजगरा मामा गाम मे भेलनि, हमहूँ छलहुँ बेलौचा मे। ओइ टोल सँ अइ टोल हाथे-पाथे भार आएल, मधुर, मिष्ठान खूब रहैक, हमहूँ सब कैक दिन खाइत रहलहुँ। एक दिन हम सब बेलौचाक चौबट्टी पर गेलहुँ, लगे मे एकटा पुस्तकालय छल, तत' हम सब गेलहुँ। रंग विरंगक पोथी ओ पत्रिका सब छल, 'भैया सँ पूछल गेलनि,' अपनेक की चाही? भैया कहलथि " मिथिला मिहिर' पत्रिका ल' भैया कनिकाल देखलनि, पढ़ले रहैन, अपने डाक सँ मंगबैत छलथि। पत्रिका हमरा हाथ आएल, कनिकाल हमहूँ पढ़ल। मुनहारि साँझ मे हम सब घुरलहुँ, भैया अपना सासुर गेलाह आ हम दीदी-पिसा एहिठाम, कारण भैयाक एकटा मामा सँ हमरा सबहक दीदीक विवाह रहैन्ह, कहि सकैत छी जे गोलट भेल छल। भैयाक दुरागमन भेल, समाराजी आश्रम मे कोबर घरक अभाव छल, मुदा बर-कनियाँ लेल कोबर घर तऽ चाही छल, क्यो अपन घर छोड़ैक लेल तैयार नहि छल, कतेक विवाद भेल, अंत मे भैया-भौजी के बाबाक बानाओल घर मे कोबर नहि भ' सकल। तखन आँगन मे एकटा फरीक सँ घर मँगनी कएल गेल से कोबर घर भेल। हमरा बड़ अनसोहाँत लागल जे कोबर अनका घर मे भेल । किछुए दिनक बाद भैया कोलकता चलि गेलाह सी.ए करैक हेतु। भौजी गामे मे रहि गेलिह। किछुए दिनक बाद बाबाक बनाओल घर मे गेलीह। भौजी जावत धरि गाम मे रहलीह, भैयाक गाम अबरजात बनल रहनि। गाम अबैथ त हमरा हुनका सँ घर, परिवार आ समाजक नीक बेजा गप सब हुअए। भौजी जखन भैया संगे कोलकता गेलीह तऽ भैयाक गाम अबरजात कम भ' गेलनि आ कोलकताक साहित्य समाज सँ ओत-प्रोत भ' गेलाह। फोनक जुग आएल त भैया सँ मिथिला, मैथिल आ साहित्यिक खूब गप-सब होइत छल आ एखनो होइत अछि। 2017 ई मे भैयाके मिथिला साहित्यिक सांस्कृतिक संस्था मधुबनी सम्मानित केने रहनि, ताहि कार्यक्रम मे हमहूँ रही, भैया जाहि होटल मे रूकल रहथि, हमरो ओही होटल मे ठहरबाक लेल बजा लेलथि। कवि, उपन्यासकार, समीक्षक दिलीपजी खूब आगत सत्कार केलथि अपना खर्च सँ। कार्यक्रम मे खूब आनद आएल। ओइठाम आदरणीय उदय चन्द्र झा 'विनोद' जी भेंट भेलाह, हुनको सँ गप-सप भेल। स्मारिका हमरो भेटल। भोर मे हम दुनू भाइक जलपान आदरणीय स्व हेमचंद्र झाक आवास पर व्यवस्था छल आ भोजन आदरणीय दिलीपजीक ओत'। भैया सँझुका गाड़ी सँ कोलकता विदाह भेलाह, हम सकरी तक हुनक संग रही, ओइठाम सँ हमरा दोसर गाड़ी फेरि कऽ गाम जेबाक छल। भैया कोलकता चलि गेलाह। आब हमरो दुनू भाइ केर आँगन फराक भ' गेल अछि। भैया जखन गाम अबैत छथि हमरा बड़ आवेश करैत छथि, कखनो हम हुनका आँगन चलि जाइत छी, कखनो ओ हमरा आँगन आबि जाइत छथि। खूब गप-सब होइत अछि। गामक चौक पर आ गाम मे संगे संग बुलैत छी। एखनो भैयाके गाम घर सँ, समाज सँ बड़ लगाव रहैत छैन्ह। २.१३.चंद्रेश- पाथरपर दूभि उपजाबैत राग-भावक अन्वेषक लक्ष्मण झा 'सागर' चंद्रेश-संपर्क-9430640883 पाथरपर दूभि उपजाबैत राग-भावक अन्वेषक लक्ष्मण झा 'सागर' लक्ष्मण झा 'सागर' चिर-परिचित रचनाकार छथि। ओ कोनो परिचयक मोहताज नहि छथि। ओ जे लिखैत छथि से जमि कऽ लिखैत छथि। फेसबुक होअए वा कि पोथी। पत्र-पत्रिका सभमे हिनक रचना 1968 ई. सँ प्रकाशित होइत अछि। ओ मिथिला मिहिरसँ अपन रचना प्रकाशित भेनाइ प्रारंभ केलनि। कविता, कथा, संस्मरण, भेंट-वार्ता, टिप्पणी इत्यादि ओ लिखलनि। युगक अनुकूलें समयकेँ देखैत टटका-टटकी विभिन्न विषयादिपर हिनक रचना आएल अछि। ओ चिंतन-मनन कऽ सचेत ढंगे कागतपर रचनाकेँ उतारैत छथि। ज्वलंत मुद्दापर कलम चलाएब हिनक लेखनीक विशेषता कहल जाएत। हिनक जीवन पारदर्शी अछि। स्वच्छ अयनामे अंकित होइत छवि जकाँ झलकैत। मुदा रचनामे गतिमयता अछि आ जीवनक स्पन्दन हिनक रचनाकारकेँ ऊर्जस्वित करैत अछि। जँ हिनक रचनाकेँ पढ़ैत जाएब तँ अनायासे हिनक व्यक्तित्व ओ कृतित्व संबंधी विषय-वस्तु सभ झलकिये उठत। ओ घटित घटनाकेँ आधार बना कऽ लोकक सोझाँ प्रस्तुत करैत छथि। सामान्य लोकक अभिव्यक्ति हिनक रचनामे प्रस्फुटित होइत अछि। लोक व्यवहारक भाषाकेँ उठा कऽ लोक माध्यमे जन-समर्थन देब हिनक विशेषता छनि। तँइ जन सामान्यक प्रति हिनक लोक व्यवहारपरकतामे साकारात्मक आ भावनात्मक रहल अछि। कही तऽ योग्य पिताक प्रभाव योग्य पुत्रपर पड़बे कएल अछि। हिनक नाम लक्ष्मण झा थिकनि। 'सागर' तऽ ओ लेखक-बंधु लोकनिक देखा-देखी वा कही तऽ श्रद्धेय साहित्यकार जीवकांतजीसँ प्रेरित भऽ रखलनि। भेल ई जे मिथिला मिहिरमे कतिपय लेखक जनकेँ अपन नामक संग उपाधि रखबाक चलन बेस भऽ आएल छल। ओहो अपन उपाधि रखबाक हेतु लुसफुसेलाह। जीवकांतजीक साफ कहब रहनि जे अहाँ ऊर्जस्व रचनाकार, अपन पहिचान बोध करेबाक लेल एकटा स्वतंत्र उपाधि राखू। ओ 1969 ई. मे रमानंद सागर"सँ प्रभावित भऽ कऽ अपन उपाधि 'सागर' रखलनि। दोसर ईहो प्रमाणिक तर्क छलनि जे एक गाममे एक नामक आनो लोक रहैत छथि। तँइ लोक नै धोखाए एहि हेतु ओ लक्ष्मण झा 'सागर' नाम राखि रचनारत भऽ गेलाह। ई नाम लेखनमे जगजियार होइत चर्चित भऽ गेल अछि। हिनक गाम ठढ़बितिया छनि जे घोघरडीहा प्रखंडमे मधुबनी (बिहार) जिलान्तर्गत अछि। एहि गाम चौहद्दी अछि-उत्तर सांगी, दक्षिण-पिरोजगढ़, पूब-तिलाठ, आ पश्चिममे सुदइ। हिनक जन्म मामा गाम बेलौंचा जे मधेपुर, मधुबनी अंतर्गत अछि ताहि ठाम 1 अप्रैल 1953 ई. केँ भेल छलनि। ओ अपन मामाक ओहिठाम रहि कऽ बेलौंचासँ प्राथमिक शिक्षा- दीक्षा ग्रहण केलनि आ पिरोजगढ़ मध्यविद्यालयसँ होइत भोला उच्च विद्यालय ड्योढ़सँ 1969 ई. मे मैट्रिक उतीर्ण भेलाह। 1962 ई. जखन ओ पाँचम वर्ग छात्र रहथि तही समयमे भारत-चीन युद्ध भेल छल। मारवाड़ी समाजक धीया-पूता सेहो पिरोजगढ़ मध्यविद्यालयक छात्र छल। ओ सभ अपन फोटो खिचबौलक। बालक लक्ष्मण झा मोन सेहो फोटो घिचएबाक लेल ललचा गेल। ओ अपन माएसँ चारि आना कैंचाक माँग केलनि। हिनक माए गंगा देवी अपन पति तारकेश्वर झाकेँ पाइ लेल कहलखिन। हिनक बाबूजीक स्पष्ट उत्तर छलनि-"फोटो घिचएबाक एहन सौख छैक तऽ एहन कूबत हासिल करए जे लोक अनायासे फोटो घिचबाक लेल उद्धत होअए। तँइ हिनका पहिने किछु बनबाक छनि से बात सुनिते लक्ष्मण झाक जीवनमे एकटा नव मोड़ एलनि जे ओ आब फोटो नहि घिचेताह। ओ तेहन बनताह जे आने लोक हिनक फोटो घीचत। हिनक जीवनमे घटित ई अविस्मरणीय घटना आइयो हुनका मोन छनि आ अरबधि कऽ अपन फोटो समान्यतः घिचएबासँ परहेज रखैत छथि। ओ लकीरक फकीर नहि बनलाह आ पठन-मननमे अपन ध्यान केंद्रित कऽ लेलनि। ओ अपन बाबू जीक कहल बातकेँ गेंठ बान्हि लेलनि जे जीवन भरिमे आठ-दस टा सिनेमा देखने होथि तऽ सएह बहुत। 2017 ई. मे जखन अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा "बाबू साहेब चौधरी सम्मान" देल गेलनि तऽ हुनका अपन बाबू जीक कहल बात मोन पड़िते आँखि नोरा गेलनि से बाबू जीक स्वाभवक चलते। जीवनमे केखनो कोनो एहन घटना भऽ जाइत छैक जे अविस्मरणीय होइत छैक। लोक चाहियो कऽ नहि बिसरि सकैत अछि। एक समयक कचोट हिनका चोट की पहुँचेलकनि जे यदा-कदा आइयो मनोमस्तिष्कमे झंकृत भऽ जाइत छनि। हिनका तँइ कहियो तेना भऽ कऽ अपन फोटो घिचएबाक तेहन सौख-मनोरथ नहि रहलनि एवं आइयो ओहि सभमे समय नहि गमबैत छथि। एक तऽ नौकरीक व्यस्तता दोसर पठन-मनन, लेखनमे समय व्यतीत करबाक धुन माथपर सवार छनि। ओ फेसबुक धड़ा-धड़ चलबैत छथि, मोबाइलक भरपूर उपयोग करैत छथि मुदा हृदयक संवेदनशीलता आ तरलता जे प्रवाहित भऽ रचनाक माध्यमे उभारैत छथि से सौख ओ अबस्से पोसने छथि। लक्ष्मण झा जखन भोला उच्चविद्यालय, ड्योढ़क छात्र छलाह 1967 ई. मे तखन 'वनभोज' शीर्षकपर निबंध लिखबाक प्रतियोगिता भेल। आध घंटाक समय छल। ओ सहर्ष भाग लेलनि। लोचन बाबू (महरैल, मधुबनी) आ पशुपति बाबू (माँउबेहट, मनीगाछी) शिक्षक छलाह। लोचन बाबू लग मूल्याकंन हेतु कॉपी जमा भेल। हिनक कॉपी देखबाक भार पशुपति बाबूकेँ भेटलनि। ओ गदगद भऽ 92 अंक दऽ हिनक निबंधकेँ सर्वप्रथम घोषित केलनि। बात ई भेलैक जे लोचन बाबू हिनक कॉपी एहि द्वारे पशुपति बाबूकेँ देने रहथिन जे ओ सत्य-सहज आ सुबोध भाषामे लिखने रहथि। गमैया बोली-चालीक भरपूर प्रयोग केने रहथि। लोचन बाबू साहित्यिक भाषाकेँ महत्व देथि आ पशुपति बाबू ठेठ मैथिलीक पक्षपाती रहथि। जे किछु गुरुक आशीर्वाद कही तऽ हिनक प्रतिभाक लोहा मानि ओ नीक अंक देने छलथि। हिनकामे सहयोगक भाव बेस प्रबल अछि। से केतेको स्तरपर। ओ लेखन कार्यमे नीकसँ नीक लिखबाक हेतु प्रकाशित करबाक हेतु यदा-कदा नव लेखक-लेखिकाकेँ मार्ग प्रदर्शन करैत छथि तऽ नौकरी किनको नौकरी धरेबामे सेहो सहयोग करैत छथि। ओ जनैत छथि जे पेटक समस्या पहिने लोककेँ कूटैत छै। तँइ हिनक सहयोग भाव ओहन साहित्यिक लोकक लेल प्रबल भऽ जाइत छनि। श्री नबोनारायण मिश्र एवं आजित आजाद आदि तऽ उदाहरणे बनल छथि जे ओ अपन लेखनिमे व्यक्त केने छथि। तहिना अपन सहयोगी छात्र शिव चंद्र झा 'शिव'केँ क्रांतिकारी कविता पढ़बाक उकसौने की छलाह जे सभाकक्षमे थपड़ीक गड़गड़ाहटि गूँजि उठल। ओ भावुक हृदयक लोक छथि तँइ भावनाक उधियानमे उधियाइत छथि। एहि क्षण ओ जीवन यथार्थक वास्तविकतासँ दूर चल जाइत छथि। कखनो कऽ विद्रोही उफान सेहो जोर मारैत छनि। आवेश आ भावुकतामे लेल गेल निर्णय हिनक जीवनक अंत कऽ देत सेहो ओ बिसरि जाइत छथि। ओ जानि-बूझि कऽ पाथरपर दूभि उपजाबऽ चाहैत छथि कारण 1969 ई. मैट्रिकक परीक्षा समयमे हिनका मात्र एकल पैजामा पहिरबाक लेल छलनि। तमोरिया हाइ स्कूल परीक्षाक केंद्र रहनि। ओ दोसरो पैजामा चाहैत छलाह मुदा आर्थिक विवशता जे दोसर पैजामा नहि भेटि सकलनि तऽ आत्मनिर्णय लेलनि। भागल-पड़ाएल निछोहे बाते ओ ट्रेनमे कटबाक लेल ओ दौगल जाइत छलाह। बाट बीच हिनक संगी अली हुसैनक बाप खट्टर हिनका हकासल-पियासल धड़फड़ाइते देखलकनि तऽ पूछि बैसलनि-"कतऽ पड़ाएल जाइत छह?" बाल-सुलभ छात्र जीवनक अवस्था। ओ चोट्टहि बाजि उठलाह "कटै लेल ट्रेनमे जकर एबाक समय भऽ गेल छैक" आ ओ पैजामाक बारेमे सेहो कहलखिन। ई सुनिते खट्टर अवाक रहि गेल आ हिनक डेन धरैत  कहलक- एही लेल कटबह? चल हम दोसर दैत छियौक। खट्टर दर्जी रहए। ओ परबोधि कऽ अपन घर आनि कऽ दोसर पैजामा देलकनि तऽ हिनको नव उमेरक भूत उतरलनि। हिनक पिता V.L.W केर नौकरी छोड़ि कऽ संयुक्त सोशलिस्ट पार्टीक सक्रिय अभिकर्ता रहथि। ओ नेपालक जहलमे माननीय कर्पूरी ठाकुर, धनिक लाल मंडल, मधुलिमये , रमानंद तिवारी, रामनारायण तिवारी आदिक संग रहथि। स्वाभिमानी पिताक स्वाभिमानी पुत्र लक्ष्मण झा 'सागर' आइयो इमानदारीक पथपर अग्रसारित छथि। कथनी-करनीमे हद धरि समानता छनि। ओ नेनपनमे चंसगर छात्रमे परिगणित होथि। मैट्रिकमे ओ पैंतीसम स्थान पेलनि जखन कि विद्यालयमे sent up exam मे प्रथम स्थान पेने रहथि। आइ.ए मे द्वितीय श्रेणी भेल छलनि। तकर कारण जे ओ ट्यूशन ओहि प्राध्यापकसँ नहि पढ़लनि। प्रो. सत्यनारायण सिन्हाजीक ट्यूशन केर धंधा रहनि आ विद्यार्थीकेँ नीक अंक दिएबामे महारत हासिल छलनि। हम पूर्वहि कहि चुकल छी जे हिनक आर्थिक स्थिति नीक नहि रहनि। बेरोजगार पिता से आन्दोलनी। राष्ट्रभक्तिक खातिर अपन भविष्यकेँ देश-प्रेमक पीड़ीपर चढ़ौलनि। जान-मालक परवाह नहि केनिहार। ई गौरव बोध जइँ रहलनि तँइ हुनके प्रसादात् किछु बनबाक जोर मारैत रहलनि। मैट्रिकमे ओ छात्रावासमे रहैत छलाह। तकर कारण छल जे छात्रावासक शुल्क आ भोजनक समस्या हिनका छात्रवृतिक कारणे माफ कऽ देल गेल रहनि। कॉलेज जीवनमे सेहो अपन छात्रवृतिक भरोसे पढ़ि सकलाह। 1973 ई. मे रामकृष्ण महाविद्यालय, मधुबनीसँ बी.कॉम प्रतिष्ठा उतीर्ण कऽ कलकत्ता गेलाह जे ओतऽ चार्टर एकाउंटेंट बनब। ओ 1 जनवरी 1974 केँ कलकत्ता एलाह। समस्या नाम लिखेबाक रहनि। सिफारशी पत्र जीवकांतक रहनि। ओ बाबू साहबे चौधरीक नामे सहयोग करबाक हेतु पत्र देने रहथिन। जीवकांतजीक कृपापात्र एहि हेतुएँ छलाह जे एक तऽ ओ मेधावी छात्र रहथि, दोसर गामक पड़ोसिया आ तेसर ड्योढ़ अर्थात जीवकांतक गामक हाइस्कूलक छात्र। सर्वोपरि इएह भाव मोनमे एलनि जे ओ साहित्यकार रहथि। स्थापित साहित्यकार जीवकांतजीक ई पत्र हिनक संबल छलनि। ओना ए.सी.दीपक (नेहरा)क "मातृवाणी" पत्रिकामे प्रकाशित होइत छलनि ताहिमे हिनको आ बाबू साहेब चौधरीक रचना प्रकाशित भेल छलनि। हिनका तऽ चौधरीजीक नाम सुनल छलनि मुदा भेंट-घाँट नहि। ओना ओ अपन श्वसुरक डेरापर राजा बजारमे रहथि। हिनक विवाह जे बेलौंचा गाममे भेल छलनि माने मामे गाममे। मामा सभ जमींदार रहथिन आ श्वसुर सभ दबंग रहथिन गामक। विवाह हेबाक कारण जे मामा सभ अपन स्वार्थ आ सुरक्षा हेतु भागिनक विवाह करौलनि जे सागरजी अनिच्छापूर्वक कएल। दोसर, ओ विवाहसँ भागले रहथि। मुदा पढ़ाइक खर्च वहन करबाक भार श्वसुर गछने रहथिन। 10 मार्च 1972केँ हिनक विवाह भेलनि। जे किछु हिनक ससुर बाबू साहेबकेँ चिन्हैत रहथिन। चौधरीजी ततेक लोकप्रिय रहथि जे कलकत्ताक मैथिल समाज हिनका तरहत्थीपर रखैत छलनि। कारण छल जे ओ दस-उपकारी रहथि। दसगर्दा लोककेँ नौकरी रखबौलनि। मिथिला-मैथिलीक आन्दोलनी रहथि आ समर्पित संगठनकर्ता। हिनक ससुर जिला निरीक्षक रहथि से अंग्रेज जमानाक। वएह हुनका चौधरीजीसँ खेलात घोष लेन, कलकत्तामे भेंट करबौलखिन। जीवकांतजीक पत्र छलनि- हिनका मदति करबनि तऽ से हमर मदति होयत। एकटा बात ईहो कहि देब आवश्यक अछि जे सागरजीक पहिल मैथिली रचना 'कोयलाबाली' अछि। 1969 मे मिथिला मिहिर रचना 'बुढ़िया' प्रकाशित भेलनि। हिंदीमे कविता 'चाय के बाद' 1968क आर्यावर्तक रविवारीय अंकमे प्रकाशित भेलनि। जें कि लक्ष्मण झा 'सागर' सचर साहित्यकार रहथि तँइ चौधरीजीकेँ ई नाम सुनल-बुझल छलनि। चौधरीजी हिनका ठाकुर एंड कंपनीमे नाम लिखबा देने रहथिन बाँकी खर्च हिनक ससुर वहन करैत छलखिन। हिनक ससुरक डेरा राजा बाजारमे रहनि। हिनका बाबू साहेब चौधरीजीसँ संपर्क की भेलनि जे चुम्बकीय पदार्थकेँ जेना कोनो चुम्बक अपना दिस आकर्षित कऽ लैत अछि तहिना चौधरीजी हिनका अपना दिस आकर्षित कऽ लेलखिन। फेर की छल, ओ मिथिला-मैथिलीमे निःस्वार्थ भावें लागि गेलाह। मिथिला दर्शनमे ओ अप्रैल 1974सँ सहयोग करऽ लगलखिन। 1975 ई. केर घटना थिक जे हिनक नाम सह-संपादक रूपमे चौधरीजी प्रकाशित करऽ चाहैत छलखिन मुदा आरो दोसर नाम जेना शुकदेव ठाकुर, रामलोचन ठाकुरक पक्षमे छलाह। दूनू गोटेक बीच मत पड़ल। सागरजीकेँ 44 आ ठाकुरजीकेँ 30 टा मत भेटलनि। बाबू साहेब चौधरीकेँ रामलोचन ठाकुरसँ कनारि रहनि। ओना तऽ चौधरीजी कोनो खास पंथी नहि छलाह मुदा ठाकुरजी वामपंथी रहथि से विचार आ दृष्टि दूनूमे। जे किछु, सागरजी पढ़ेबो करथि। सी.ए इंटर केर एकटा ग्रुप उतीर्ण भेलथि आ किछु ट्यूशन कऽ धनोपार्जन करथि। छात्रवृतिमे मात्र 60 टाका भेटनि। आर्थिक अभावकेँ देखैत बाबू साहेब चौधरी, हनुमान झा (Vice president, Hindustan Development Corporation) मे नौकरी धरा देलखिन। हनुमान झा गंगाद्वार गामक रहथिन। ओ नौकरी पकड़लनि। 1983 सँ 1997 धरि ओ आसाममे सेहो वएह नौकरी केलनि। ओहि समयावधिमे उल्फा उग्रवादी चरमसीमापर छल। जँइ कि लक्ष्मण झा 'सागर' ओहि कम्पनीमे नीक पदपर छलाह, भव्य वक्तित्व रहनि तँइ उच्च ओहदाक व्यक्ति बूझि उग्रवादी लोकनि कथन जे कंपनीसँ बेसी धन दियाउ नहि तऽ सपरिवार काटि देब। हिनका धमकाओल-डेराओल गेलनि। ओहना आसामक दुःस्थिति इएह जे उग्रवादी चरमविन्दुपर नृशंस काज करैत नहि हिचकैत छल। सागरजीक सशंकित परिवार। संयोगवश 2006 मे हिनक कंपनी बंद भऽ गेल मुदा हिनक कर्मनिष्ठ आ इमानदार हेबाक गुणकेँ देखि-परेखि रामगोपाल रमगड़िया मारवाड़ी हिनका एही कम्पनीक सिस्टर कंसर्नमे रखबा देल कलकत्तामे। ई नव कंपनी छल Neo Metaliks (रूपा होजियरी एकरे छै)। एहि कंपनीसँ 2012 ई. मे सेवानिवृत होइतो आइ धरि सागरजी सलाहकार रूपमे कार्यरत छथि। ईहो कहब अतिश्योक्ति नहि हएत जे ओ सी.ए केर पढ़ाइ-लिखाइसँ बेसी बाबू साहेब चौधरीक प्रश्रयमे पत्रिका एवं अन्य गतिविधिमे विशेष समय देबऽ लागल रहथि। स्वाभाविक छैक जे पठन-पाठनमे कमी बोध भेलनि आ समयाभाव कारणे सी.ए पूरा नहि कऽ सकलथि। तें कि, जाहि लेल जे पार्ट सी.ए केर केलनि ततबेमे नीक यश, प्रतिष्ठा आ ओहदा भेटलनि। हिनक मूँह केखनो मलिन नहि भेलनि आ ने पछताइते रहलथि। मिथिला-मैथिलीक अखंड ज्योति जे हृदयमे धधकैत छलनि से आइयो छनि। हिनका संतोष रहनि जे मिथिला-मैथिलीक लेल ओ किछु कऽ रहलाह अछि आ से करबे केलनि। रहरहाँ देखल जाइत अछि जे नीक पद आ नीक पाइ लोककेँ गौरवान्ध बना दैत अछि। ओहन लोक मदान्ध भऽ अपनोकेँ बिसरि जाइत अछि। मुदा, लक्ष्मण झा 'सागर'केँ कहियो कोनो घमंड नहि भेलनि। सरल हृदयक लोक। ओना प्रशासनिक क्षमता अबस्से गुरू-गंभीर बनौने रहलनि। ओ जहिना मिथिला-मैथिलीक लेल अपन शोणित सुखौलनि तहिना दक्ष भऽ कंपनीक काज सुतारैत छथि। ओ बहुभाषी छथि। हिनका बंगला, अंग्रजी, हिंदी, संस्कृतक सेहो नीक ज्ञान छनि। ओ कोनो आन भाषासँ परहेज नहि रखैत छथि मुदा मातृभाषा मैथिलीक मूल्यपर कोनो समझौतावादी गप्प पसिन्न नहि छनि। इएह अटूट प्रेम हिनका आन भाषाक प्रति उदासीन बना दैत छनि। तें मैथिलीमे बाजब, पढ़ब-लिखब आ उन्नतिक बाट प्रशस्त करबामे अपनाकेँ झोंकि देने छथि। खास कऽ गमैया ठेठ शब्द आइयो पियरगर छनि। ओ गाम-घरकेँ नहि बिसरल छथि। ओ अपन रचनामे कतिपय हेराएल-भुतिआएल शब्दकेँ मोन पाड़ि कऽ प्रयोग करैत छथि जाहिसँ अर्थ-ध्वनिमे, छवि-छटा आरो सुरभित भऽ अबैत छनि। ईहो कहबामे हमरा परहेज नहि अछि जे मैथिलीमे जतेक शब्दकोश अछि से प्रायः हिन्दी शब्दकोशक उल्टा अछि। ओना डा. रामदेव झा अबस्से ठेठ मैथिलीक किछु शब्दकेँ संजोगने छथि। आइयो जे मोनमे साबिकक शब्द उचरत तऽ से साइते शब्दकोशमे भेटत। मैथिलीक अपन शब्दकोश हेबाक खगता अछिए। एहि लेल हिनके सन-सन आरो रचनाकारक ठेठ मैथिली शब्दक ताक-हेर करऽ पड़त। गाम-घरक साक्षर-निरक्षरक मुँहसँ बहराइत ठेठ शब्दकेँ लोढ़ए-बीछए पड़त। ई श्रमसाध्य काज थिक। जा धरि सुच्चा मैथिलीक शब्दकोश नहि होएत ता धरि बहुतो बिलाइत शब्दसँ लेखक-पाठकगण अनभिज्ञ रहबे करत। ईहो गछैत छी जे शहरुआ भाषा मिश्रित संस्कृति थिक। शहरमे विभिन्न भाषाक फेंट-फाँट भऽ गेलासँ अपन मैथिली भाषा दुर्बल भेल अछि। कहब जे भाषामे गतिमयता हेबाक चाही, से अबस्से हेबाक चाही मुदा जखन अपन भाषामे नीकसँ नीक शब्द अछि से नहि छोड़बाक अछि। अपन भाषाक मूल्यपर आन भाषा वा शब्दकेँ अपनाएब गलत हएत। लेखक-साहित्यकारक दायित्व थिक जे ओ अपन भाषाक शब्दकेँ ताकि-हेरि कऽ आनथि तखने रचनात्मक सौन्दर्य आ महत्ता बढ़त। हिनका आन भाषाक भाषिक आ सांस्कृतिक गुलाम होएब से मैथिलीक मुद्दापर कहियो पसिन्न नहि छनि। लोक भाषक प्रयोग हेबाक चाही। इएह कारण थिक जे हिनक व्यावहारिक भाषा सामान्यो जन बुझैत अछि। हिनक भाषा अपन शब्द विन्यासक फलस्वरूप अर्थवाही आ जनबोधक अछि तँइ सर्वमान्यो अछि। जँ आनो भाषाक शब्द अछि तऽ सेहो रचि-पचि कऽ आएल अछि। तँइ ओ मैथिली भाषाकेँ उच्च स्थानपर प्रतिष्ठापित करैत अछि, नहि कि दोयमपर। नव मूल्य आ नव दृष्टिक स्थापनामे हिनक निष्ठा आ प्रतिबद्धता झलकैत अछि। ओ स्वयं अपन पोथी आ पत्र-पत्रिकादि कीनैत छथि आ दोसरोसँ एहन अपेक्षा रखैत छथि। ओ संस्था आ संगठनादिक आकांक्षी छथि जे मिथिला-मैथिलीक हितमे होअए। ओ एहन कर्मठ लोककेँ धन-बलसँ सहायतो करैत छथि मुदा जखन धनकेँ ऐंठबाक वा अपव्यय हेबाक होइत अछि, अपन घर भरबाक बात होइत अछि तऽ ओ फाँड़ बान्हि कऽ कलमसँ ललकारितो छथिन। प्रायः देखल जाइत अछि जे गलत बात हिनका नहि सोहाइत छनि। तँइ लल्लो-चप्पो पसिन्न नहि पड़ैत छनि। ओ स्वार्थमे आकंठ डूबल लोकसँ घृणा करैत छथि। प्रायः देखल जाइत अछि जे लोक तिकड़म बलें सम्मान आ पाइ केर उगाही करैत छथि। चमचागिरीमे एहन लोक जी-हजूरी करैत अछि। जें कि ई सभ हिनका पसिन्न नहि छनि तँइ ओहि सभसँ कन्नी काटि अपने धुनमे मस्त रहैत छथि। एहन कतिपय दुर्जन लोकक आँखिमे फुटलियो नहि सोहाइत छथि। सुच्चा साहित्य, साहित्यकार एवं आन्दोलनकारीक प्रति हिनक हृदयमे शुद्ध प्रेम अछि तऽ नकलचीक प्रति घृणा-भाव अपार। ओ जनैत छथि जे मिथिला-मैथिलीक लेल जे केओ काज करैत अछि से किछु ने खिछु खेबे करत। पेटमे जुन्ना बान्हि कऽ काज नहि करत। मुदा सभटा भकोसि लेत अर्थात धनदास वा दासी बनि भोगवादी बनत तऽ एहन लोकसँ ओ घृणा करैत छथि। खास कऽ हिनक मोन आरो दुखी भऽ जाइत छनि जखन ओ देखैत छथि आ अनुभूतिक स्वरें कहि उठैत छथि- "साहित्यिक ठीकेदार जहन जोंक भऽ जाइ छै तँ बड़ दुख होइ छै छपायल पोथी जखन फोंक भऽ जाइ छै तँ बड़ दुख होइ छै "बड़ दुख होइ छै" नामक कवितांश (एहि गदहबेरमे) हिनक एखन धरि चारि गोट पोथी प्रकाशित छनि- उचरि बैसू कौआ (2010), एहि गदहबेरमे (2020) ई दूनू कविता संग्रह, कनसोह (2021, मैथिली कथावार्ता) आ चारिम छनि जेना ओ कहलनि (2021, साक्षात्कार संग्रह)। प्रकाशन पथपर प्रेसमे छनि- मिथिलाम (निबंध संग्रह), अक्षत चानन (संस्मरण), जखन जे जेना (टिप्पणी संग्रह), घुघरू मट्ठा श्याम (कथा संग्रह) आ पत्राचार (पत्र संग्रह) आदि। जे ओ लिखैत छथि से गद्य आ पद्य दूनू। हिनक लिखल बेसिए गद्य अछि आ से गद्य हिनकर रुचिगर छनि। पद्यमे ओ तुकांत पसिन्न करैत छथि। ओ स्वयं कहैत छथि जे अरुचिमे हम अतुकांत लिखै छी। हमरा जनैत ओ बात-बातमे बखलोइया छोड़बैत, बातक बतलोलामे तेना कऽ सामान्यो बातकेँ रखै छथि ओ असामान्य भऽ जाइत छै। तँइ ओ किछु नहि कहितो बहुत बेसी कहि दैत छथि। ओ विशिष्ट कवि छथि जे सामाजिक विसंगतिकेँ उठबैत सामान्यो भाषामे सपाट ढंगे आम जनक पीड़ा आ छटपटाहटिकेँ उधेसि कऽ राखि दैत छथि। खास कऽ संघर्ष आ जिजीविषा अबस्से प्रकट होइत अछि। आर जे-से भखरैत आपसी संबंध, टूटैत परिवार, आ अपन सभ्यता-संस्कृतिकेँ जड़िसँ उखड़बाक बोध संगहि सत्ता आ पूँजीक आपसी गठजोड़ आदि उभरि कऽ हिनक समकालीन रचनाक क्षमताकेँ आरो मारक बना दैत अछि। ओ कुव्यवस्थाकेँ चिर्रीचोंत करबाक उद्येश्यें लिखैत छथि- हम काठी खड़रब, दीपशिखा लेसबाक लेल, अगरबत्तीक सुगंधि लेल, आ मोमबत्ती जरेबाक लेल, अपन समस्त समानधर्माक अर्धशताब्दीपर (अपन अर्धशताब्दीपर, उचरि बैसू कौआ)। प्रतिरोधी साहित्यिक-सांस्कृतिक परंपराकेँ ओ आधुनिकतामे राखि कऽ वैचारिकताक माध्यमे ओ कविताक स्वर बुलंद करैत छथि। सहज भावें कविताक सपाटताकेँ लेबाक थिक। जँ मात्र कथनक रूपमे हएत तऽ ओ कविता ठीक नहि थिक। ओ बतकहीमे छोट-छोट बतकथनकेँ लऽ कऽ छोट-छोट कथा लिखैत छथि। एहिमे दैनिन्दिन जीवानाभूतिपरक घटना अबस्से देखल-भोगल यथार्थानुभूति परक अछि। कथाकारक ई विशेषता जे ओ समसामान्यपरक घटनाकेँ जनानुभूतिक बना दैत छथि। जँइ जनसमूह अपन जीवनक कथा बुझैत अछि तँइ जनसंवेदना मानवीय मोनकेँ छुबैत अतल गहराइ धरि पहुँचि पबैत अछि। कही तऽ पहिचान बनबैत अछि संगहि पाठकीयतामे अपन उपस्थितिबोध करबैत अछि। हिनका जखन जे मौका भेटैत छनि तकरा अपन कथासूत्र बना कऽ ताहि ढंगे प्रस्तुत करैत छथि जे सामान्य लोकक चित्तमे बैसि जाइत अछि। हिनक व्यग्रता तखन आरो बढ़ि जाइत छनि जखन "अपन भाषा आ संस्कार तऽ अलोपित भऽ रहल अछि" (कनसोह-59)। वस्तुतः ओ साहित्यकेँ साधना बुझैत छथि, साधन नहि। तँइ हिनक विचार बुझबाक योग्य थिक। ओ साक्षात्कार लेल मिथिला-मैथिलीक विभिन्न विभूति, विद्वतजन, लेखकगण आ नव भविष्यक नवीन डेग उठौनिहार सभसँ विचार लऽ ओकरा कागतपर उतारैत रहै छथि। नव समाज, नव राष्ट्र आ खास कऽ मिथिला-मैथिलीक उत्थानमे सहायक हुअए। कैक ठाम ओ कैकटा कटु सत्य सेहो उभारैत छथि जे ओहि साक्षात्कर्ताक आत्ममुविमुग्धताकेँ सेहो प्रदर्शित होइत अछि। तात्पर्य जे हिनक रचना बहुत किछु कहि दैत अछि। जँइ ओ जनसरोकारसँ संबंध रखैत छथि तँइ आइयो हिनक रचनाकार सक्रिय छनि। ओ तऽ स्वयं एहन राजनेता चाहैत छथि जनिक एक स्वरमे संपूर्ण मिथिलावासी फाँड़ बान्हि कऽ समरमे कूदि पड़ए। ओ केकरो किछु बिगाड़ै नहि छथि। मुदा ठाँहि-पठाँहि कटु सत्य बजबाक कारणे अपन कतिपय दुश्मनकेँ पोसि लेने छथि। भावुक हृदयक ओ लोक कतबो विवेकशीलताक संग संयममे रहऽ चाहैत छथि, रहितो छथि तैयो हिनकासँ कतिपय जन नफा उठा कऽ पीठ पाछाँ अवहेलित करैत छथि। मुदा सागरजी अपन काजमे मग्न-मस्त रहैत छथि। ज्ञानीजनक आगाँ धनबल, बाँहिबल अर्थात मुँहगर-कनगरकेँ के पूछए? धन-विभव आ वैभव सेहो फीका भऽ जाइत अछि। तँइ सागरजी उफनितो सागर सदृश शान्त भऽ जाइत छथि। हिनक मनमे रंचमात्रो लेश नहि रहि जाइत छनि आ दुश्मनोकेँ गरा लगा लेबाक लेल आतुर रहैत छथि। एकटा बात ईहो कहि देब आवश्यक अछि जे ओ सामाजिक लोक छथि। समाजक लोककेँ नीक जकाँ चिन्हैत-बुझैत छथि। समाजक, देशक सीदित-पीड़ित लोकक मानसिकताकेँ अपन रचनामे उभारैत छथि। बात-बातमे दुख भेलापर जँ ओ व्यथित होइत छथि तऽ से स्वाभाविके। कारण अपन बाबूजीक किछु कहल-सुनल बातपर सेहो गेंठ बान्हि कऽ भागि पड़एबाक हेतु विवश भेल रहथि। तँइ की, हुनकहि प्रेरणा स्रोत पाबि ओ कहियो अपन स्वाभिमानकेँ बन्हकी नहि धेलनि आ ने सत्यपथक बाट छोड़लनि। ओ जनकल्याणक भाव लेने संपूर्ण परिवेश आ वातावरणकेँ गमगमाबऽ चाहैत छथि। ओ अपनाकेँ साहित्यकार मानथु वा कि नहि मुदा ओ सुच्चा रचनाकार छथि। कोनो रचनाकारक रचना जखन अपन बुत्तापर प्रकाशित होइत छै तऽ रचनाकारक पतक्खा ऊँच होइत अछि। कही तऽ अपन पहिचान बनबैत अछि। रचनाकारक बीच समादृत लक्ष्मण झा 'सागर' अपन रचनात्मक क्षमतासँ उपस्थिति बोध करौने छथि। मिथिला-मैथिलीक एहि ध्वजवाहककेँ के नहि समादृत करत? खास कऽ हुनक यश, कीर्ति, लोकप्रियता, यथाशक्ति तथाभाव बेस प्रबल आ असीम अछि जखन कि हुनक सोझाँ हमर कलम आ बुद्धि ससीम अछि। एहिना ज्येष्ठ-श्रेष्ठ पाथेय बनथि से अभिलाषा बनल रहिते अछि। हिनक किछु इच्छा एना छनि- मिथिला, रहए, मैथिली पढ़ए, कृषि-प्रधान रहए, आ सर्वोपरि प्राथमिक शिक्षासँ लऽ कऽ उच्च शिक्षा धरि मैथिली हो। २.१४.कामेश्वर झा 'कमल'- श्री सागरजीसँ पहिल भेंट, तकर बाद आइ धरि कामेश्वर झा 'कमल', संपर्क-9434485762 श्री सागरजीसँ पहिल भेंट, तकर बाद आइ धरि प्रत्येक व्यक्ति के अपन व्यवस्थित जिनगी जीबाक लेल एकटा निश्चित उद्येश्य होइत छैक। एकर प्रेरणा ओकरा अपन घर-परिवारक बात-विचार, गाम-समाजक परिवेश, आचार-विचार आ संस्कारसँ स्वतः भेटि जाइत छैक। नीक-बेजाएसँ प्रेरित कतेको लोक बगुलाक अनुशरण कऽ लैत अछि। कपटी बनि नदी कात घात लगा कऽ बैसि जल-जीवकेँ आजीवन धोखा दऽ अपन काज सुतारि लैत अछि। इएह ओकर जिनगीक ध्येय बनि जाइत छै। अपन माटि-पानि रीति-रेवाज, अपन मातृभाषासँ ओकरा कोनो सरोकार नहि रहैत छैक। ओ आजीवन अवसरवादी बनि अपन स्वार्थसिद्धि टासँ मतलब रखैत अछि। दोसर दिस कतेको लोककेँ अपन खानदानक एहनो संस्कार भेटैत छैक जे ओ हंस बनि जाइत अछि। हंसमे एकटा बड़का गुण होइत छैक जे ओ दूध-पानिकेँ फराक कऽ दैत छैक। ओ सरोवरसँ मोती चुनि लैत छैक जे ओकर जातिक विशिष्टताक पहिचान होइत छैक। ओ अपन पहिचान आ प्रतिष्ठा बचेबाक लेल आजीवन साकांक्ष रहैत अछि। समाजक रीति-रेवाज, संस्कारक रक्षा करैत अपन माटि-पानि, भाषाक प्रति समर्पणभाव, सम्मान रखैत सदैव सेवा भावनासँ ओतप्रोत रहैत अछि। एहने सन हंस अपन मिथिलामे बहुतो जन्म लेलाह आ कतेको एखनो छथि जे अपन मन-क्रम-वचन, तम-मन-धनसँ मिथिलाक पेटारमे सिंधु-सरोवरसँ मोती चुनि भरैत गेलाह आ एखनो भरि रहल छथि ताहिमे एकटा नाम श्री लक्ष्मण झा 'सागर'जीक सेहो छनि। श्री सागरजीक पुरखा सनातनी खानदानी धार्मिक प्रकृतिक परिवार, अपन मिथिलाक माटि-पानि, जाति-भाषाक प्रति सम्मान आ समर्पणक भाव रखनिहार छलाह। जिनका दलानपर भोर-साँझ ठढ़बितिया गामक लोक केर जुटान होइत छल आ गामक समस्यासँ लऽ कऽ पौराणिक-धार्मिक कथाक चर्चा होइत छल। श्री सागरजी अपन पुरखाक उच्च विचार, संयमित जीवनसँ नेनपनहिमे प्रभावित भऽ गामक उत्तम परिवेशमे पलि-बढ़ि अपन एकटा फराक परिचिति बनौलनि। ओना हिनकर नेनपनक बेसी भाग मातृक बेलौंचामे बितलनि। मुदा पैत्रिक संस्कारमे कोनो फराक असरि नै पड़लनि। अपन पुरखाक आदर्शकेँ सम्मान करैत आ ध्यान रखैत, अपन आत्मबलकेँ सबल बनौने जिनगीक बाटमे कतेको तरहक झंझावातकेँ सहैत, मिथिलाक माटि-पानि-भाषाक प्रति अगाध नेह रखैत अनवरत आगू बढ़ैत गेलाह। बढ़िते जाइत छथि, बढ़िते रहताह ताधरि जा धरि हिनक स्वास्थ्य संग दैत रहतनि। मैथिली लेखनमे लेखनीक नोक भोथ नहि हुअए देलनि। संकल्पित छथि, साकांक्ष छथि। एखन हिनक ७१ बर्ख छनि। सन् 1968 सँ जे ई मिथिलाक लेल मैथिलीक पेटारमे सरोवरसँ मोती चुनि-चुनि भरैत रहलाह अछि आ एखनो धरि भरिए रहल छथि आ भविष्योमे भरिते रहताह से आशा अछि। श्री सागरजीसँ हमरा पहिल भेंट कोलकाता स्थित मिथिला सांस्कृतिक परिषद् केर कार्यालयमे 2001 मे भेल छल, एहिसँ पहिने हिनक नाम सुनैत अवश्य छलियनि। मुदा सदेह, अपना समक्ष हिनका संगे ओही बरख भेल। हिनक सहमिल्लूपन, मधुरवाणीसँ हम बहुत प्रभावित भेलहुँ, करा बादसँ हिनका संग हमरा बरोबरि भेंट-घाँट होइत रहल। प्रायः मासक दोसर रविक संपर्क कार्यक्रममे आ कोलकाताक कोनो मैथिल संस्थाक कार्यक्रममे। हिनका कोलकाता वा कि कोलकातासँ बाहर सभ संस्था आमंत्रित करैत रहैत छनि आ ई मिथिला-मैथिलीक कार्यक्रम बुझि सदति ओहि कार्यक्रममे उपस्थित हेबाक लेल अपन नैतिक कर्तव्य बुझैत छथि। संगहि हमरो सभकेँ अग्रिम सूचित कऽ कार्यक्रमे उपस्थित हेबाक लेल कर्तव्यबोध करबैत रहलाह अछि। एक बेर हम कोलकातासँ बाहर मैथिली कार्यक्रममे नहि जेबाक अपन असमर्थता कहलियनि, ओ हमरा फोनपर अपन अनुज बूझि आदेश स्वरूप कर्तव्यबोध करबैत बजलाह- कमलजी, कोनो तरहें किछु घंटा लेल समय निकालबाक चेष्टा करू, किएक तऽ ई अपन माटि-पानिसँ जुड़ल कार्यक्रमक आयोजन कएल गेल छै, हमहीं-अहाँ नै पहुँचबै तँ के पहुँचतै? हिनक ई आदेश हमरा आइयो धरि मोन अछि, ताजिनगी मोन पड़ैत रहत। मैथिलीक कार्यक्रममे हम उपस्थित होइत छी आ सागरजी तऽ सभ ठाम उपस्थित रहिते छथि, संगमे हिनक पत्नी श्रीमती शैल झा 'सागर' सेहो उपस्थित होइत छथिन। शैलजी सेहो अपन मैथिली रचनाधर्मक पालन करैत मैथिली साहित्यमे अलग पहिचान बनौने छथि। समय-समयपर हमरा हिनका दूनू गोटेक मैथिली लेखन लेल सहयोग भेटैत रहल अछि। सदति ई दूनू लेखन धर्मक पाठ पढ़बैत, उत्साहित करैत रहलाह अछि जे हमरा लेल एकटा उचित परामर्शदाता आ पथप्रदर्शकक रूपमे अबैत रहलाह अछि। हिनक एकटा काव्यसंग्रह "उचरि बैसू कौआ" जे 2010 मे प्रकाशित भेलनि। हम एहि पोथीक सभ कविता पढ़ि एकटा पाँतिक माध्यमे धन्यवाद रूपमे हिनक कवितापर हम अपन यथोचित मंतव्य लीखि पढ़ौने छलियनि, संयोगसँ कोलकाता स्थित साहित्य अकादमीमे दूनू प्राणी भेंट भेलाह आ कहलाह जे अहीं एकमात्र व्यक्ति छी जे हमर कविता संग्रहपर अपन मंतव्य पढ़ेलहुँ अछि। निश्चित रूपसँ हमरा ई वाक्य हमर लेखनक्रम गतिकेँ आगू बढ़ाएत। ओहि दिन हमरो बहुत प्रसन्नता भेल मोनमे जे ओ हमर पाँतिकेँ एतेक महत्व देलनि। पान खेबाक सौखीन श्री सागरजी जहिया-जहिया जतऽ कतहुँ भेंट होइत छथि हिनका मूँहमे पान रहबे करैत छनि। ओ पुछलापर सदित कहैत रहता- मैथिल छी ने, पान आ मखान हमर मिथिलाक पहिचान थिक। कॉलेजमे पढ़ैत कालसँ खाइत आबि रहल छी, कोना छोड़ि दियैक। सहृदय, सहमिल्लू, हास्य-व्यंग्य पसंदक लोक श्री सागरजी मिथिलाक उत्थान लेल सतत समर्पित लोक कतहुँ जँ मैथिलीक अनादर होइत देखैत छथि तऽ अपन नाम अनुरूपें तखन ओ शेषावतार लक्ष्मणक असल अवतार धारण कऽ लैत छथि। ठाँहिपर ठाँहि उत्तर देबाक साहस हिनकामे देखल जा सकैत अछि। व्यक्तिगत अपमान जँ कियो हिनका कऽ दौन, ई कान नहि देताह मुदा मैथिली भाषा, संस्कृतिक अनादर ई बरदास्त नहि कऽ सकताह, खाहे ओ महान नेता हो वा कि संस्था। ई आशीर्वाद हिनका श्रद्धेय स्व. बाबू साहेब चौधरीजीसँ भेटल छनि। हम साल 2011 सँ 2016 धरि प्रत्येक सालक गंगासागर मेलामे अपन संस्थासँ कार्य दातित्व पाबि मेला प्रांगणमे कार्यरत रही। प्रसंग अछि 2015 केर। हमरा मोबाइलपर श्रीमती शैलजीक फोन आएल, कहलनि- हम सभ चारि गोटेसँ गंगासागर स्नान करऽ आबऽ चाहैत छी मुदा अहाँक भाइ (श्री सागरजी) डेराइ छथि, हमरो सभकेँ डेरा रहलाह अछि। से की सत्ते बहुत कष्ट हेतै? हम सभ की विचार करू, आबी कि नै आबी? हम हँसि कऽ कहलियनि- जा, सागरजी सागरसँ डेराइत छथि, ई कोना भऽ सकैत छै। कहियौन हुनका जे जिनगीमे कहियो कतहुँ केकरोसँ डेरेबे नै केलाह से गंगासागर आबऽमे किए डेराइत छथि। तखन हम हिनकासँ बात कएल, कहलियनि- डेराउ जुनि, जेना-जेना हम कहैत छी जेना हम कहैत छी तहिना-तहिना आबि जाउ, कोनो कष्ट नहि हएत। हमरा कहलासँ ओ चारि गोटासँ एलाह, एकटा धर्मशालामे हाॅल बुक कऽ जे प्रत्येक वर्ष रखैत छलहुँ से एहू बेर रखने रही। सभटा सुविधाक इंतिजाम रहनि। तीन दिन रहलाह। हम संस्थाक दायित्वक कारणे बेसी सत्कार नहि कऽ सकलियनि तैयो ओ सभ हमरा अतिशय आशीर्वाद दऽ कृतार्थ केलनि। श्री सागरजीक मोनमे सागरे जकाँ केखनो-केखनो हिलकोर सेहो मारैत रहै छनि, प्रसंग अछि श्रद्धेय स्व. रामलोचन ठाकुरजीक अवसान दिनक। ओ विगत दू-तीन मास पहिने हेरा गेल छलाह, हमरा हिनका संग-संग आरो कतेको लोकनि द्वारा दिवा-राति कतेको ठाम ताकल गेलनि, मुदा नहि भेटलाह। हठात् एक दिन खबरि भेटल रामलोचनजीक मृत देहक। भरि दिन पुलिस आ डाक्टरक प्रक्रियासँ हुनक मृत देहक छुटकारा साँझक छः बजे भेटल, आब ई रहैक जे हुनक अंतिम संस्कारक तात्काल व्यवस्था हो आ लोक सभहक आवश्यकता रहैक जे अंतिम संस्कारमे सम्मिलित हेबाक लेल। हम फोनपर सागरजीकेँ कहलियनि- हम नहि जा सकब संस्कारमे। सागरजी हमर बात सुनि बजलाह- कमलजी, अइ ठाम देखल जाइत छै असल समाजिकता, समाजक प्रति उचित कर्तव्य। हम अहाँक मोनक व्यथा बुझि सकैत छी, हमरो अवस्था अहीं सन अछि, बुझू तऽ अहाँसँ बेसिए अछि मुदा हम जा रहल छी, आ अहूँ आउ, अपन कर्तव्य निमाहू, केकरो संकटक घड़ीमे विमुख जुनि होइ। से हम सभ पहुँचलहुँ श्मसान घाट। कोलकाताक गण्यमान लोक सभ सम्मिलित भेलाह। तऽ कहबाक अछि जे समाजक प्रति एकटा जे उत्तरदायित्व होइत छैक तकरो निमाहैत चलैत छथि सागरजी। बहुत एहन बात होइ छै कहलो ने जाइत छै बहुत एहन बात होइ छै सहलो ने जाइत छै मिथिलाक माटि-पानि, भाषा-संस्कृतिसँ जुड़ल, सतत समर्पित श्री सागरजीक संग बहुतो एहन संस्मरण सभ अछि जे तात्काल मानस पटलसँ विस्मृत अछि। संक्षिप्तमे किछु जनतब देल आ आर किछु भविष्यमे देबाक चेष्टा करब। उपरोक्त जे सभ हिनका प्रसंगमे हम देखल-सुनल आ लिखल तकरा पश्चात हिनक फराक हार्दिक आकांक्षा आ अपेक्षा छनि, ओ एकटा महत्वपूर्ण चश्मासँ मिथिलाक समस्त प्राथमिक विद्यालयसँ लऽ कऽ महाविद्यालय धरि मैथिली भाषाक अपन लिपिमे पढ़ाइ-लिखाइ देखऽ चाहैत छथि। हिनक आकांक्षाक पूर्ति कएल जाइत से आशा अछि हमरा। प्रयास चलि रहल छै, सफलता भेटबे करतै। प्रवासक जिनगी आ निजी संस्थामे चाकरी करैत श्री सागरजी अपन रचनाकर्मसँ विमुख नहि भेलाह अछि, आरो बेसिए अग्रसर छथि। एखन धरि 4 टा कविता,कथा, निबंध संग्रह सभ प्रकाशित छनि एवं 8 टा पोथी प्रकाशानाधीन छनि। हिनक कृतित्वक सम्मान हिनका समय-समयपर भेटैत रहलनि अछि। काज आ सम्मानक बीच श्री सागरजीक उत्तम स्वास्थ्य, आ उत्तम काजक लेल मंगलकामना करैत आशावादी छी जे हिनक टटका नव रचना, नव पोथी जल्दी आ लगातार भेटत। संपादकीय टिप्पणी- एहि लेखमे आएल समस्त सम्मानक सूचीकेँ सागरजीक परिचय बला खंडमे जोड़ि देल गेल अछि। २.१५.रमेश- सुकाव्यमय सामाजिक व्याख्या: 'उचरि बैसू कौआ' रमेश-संपर्क-7352997069 सुकाव्यमय सामाजिक व्याख्या: 'उचरि बैसू कौआ' वरीय कवि लक्ष्मण झा 'सागर'क पहिल काव्य-संग्रह 'उचरि बैसू कौआ', जे 2010 ई.मे छपल छल, तकर आलोचक आ विद्वत्वर्ग द्वारा, उचित आ गंभीर संज्ञान अतेक वर्ष धरि प्राय:, नहिए लेल गेल। आब आइ एक-एक रचना के इकाइ मानि, विस्तृत समीक्षा भ' रहल अछि, से मैथिली समीक्षा-आलोचनाक जड़ताक भयावह आ दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितिकेँ प्रमाणित करबाक लेल, एकटा तथ्य थिक। स्व.सत्यानन्द पाठक द्वारा 'मंजू पाठक मेमोरियल ट्रस्ट' केर सौजन्य सँ प्रकाशित, साठि टा कविताक संग्रह मे, लेखकक व्यय नहि भेल छलनि,..आ से संग्रह कोनो टा नामवर समीक्षक द्वारा अ-मूल्यांकित रहि गेल, जखन कि कविक अपेक्षा छल, जे 'पोथी छपलाक बाद ओ वस्तुतः कवि बनि सकताह'। से 'अपेक्षा-पूर' कतेक भेलनि, आ कि पोथीक संग कवियो उपेक्षित आ अचर्चित रहलाह ? मुदा एहन ओ मैथिली मे असगर नहि छथि। आइयो अपन वित्त-व्यय सँ, लेखकगण एक-सँ-एक पोथी छपबैत छथि आ तकर गंभीर समीक्षा-समालोचना नहि लिखा पबैत अछि, अपितु साहित्यो- क्षेत्रक सभ व्यक्ति पढ़ैत नहि छथि। एना सागरजीक 'गुट-निरपेक्ष' रहलाक कारणे भरिसक, भेल अछि। कारण, कविता-संग्रहक कविता सभक आधार पर, सागरजी नव, आधुनिक आ प्रगतिशील विचारधाराक कवि प्रमाणित भेलाह अछि। त' की, अल्प-सक्रिय वा 'गुटबन्दी-क्रियाकलापहीन कविक' मूल्यांकन नहि हो? ई केहन परंपरा विकसित भ' रहल अछि मैथिली मे? पुरातनपंथी जीर्ण-काव्यक समीक्षा, अतिशयोक्तिक संग, यत्र-तत्र छपि जाइत अछि, आ अपन युगक, समकालीन युग-सत्यक व्याख्या करैत कविता-संग्रह उपेक्षित रहि जाय, त' सक्षम समीक्षकगण आ समकालीन साहित्यिक पत्रकारिता पर प्रश्नचिह्न लागब, स्वाभाविके अछि। कारण, विमर्श त' अनेक कारणे, भइये नहि पबैत अछि। पोथीक अपन सारगर्भित 'अनुशंसा' मे, डॉ.वीरेन्द्र मल्लिक एहि ’प्रखर चेतना-सम्पन्न, समकालीन, बेछप नाम' बला कविक पोथीक, 'हुलसि क' स्वागत करबाक अपेक्षा' केलनि, से त' 'अपेक्षे' रहि गेल। एहना स्थिति मे, स्व.सत्यानन्द पाठक (गुवाहाटी) सन आन प्रकाशक, दोबारा कोना 'साधंस' करताह? तखन कविक पोथी-'समर्पण' मुदा, ध्यातव्य जरुर अछि। ओ 'अक्षर-बोध करा, सक्षम कवि' बनौनिहार, ’सम्पूर्ण समाज आ परिवार' के, पोथी समर्पित करैत छथि। आ अपन 'आहे-माहे' मे, 'लेखनक रणनीति'क सुस्पष्ट खुलासा करैत छथि, जे ओ 'स्वान्तः सुखाय नहि लिखि, झोंकियल लेखन' सँ परहेज करैत, एकटा 'अक्षर-पुरुषक धर्म जकाँ, लिखैत छथि। हुनका कवि बनबाक रहनि, तँ पत्नीक प्रेरणा सँ, 'पोथी-प्रकाशन-ब्योंत' धरौलनि अछि। आ तेहन साहित्यिक प्रतिबद्धता बला कविक पोथीक, आलोचना-संवर्ग द्वारा संज्ञाने नहि लेल जायब, मैथिली साहित्यक नैराश्यपूर्ण परिस्थितिकेँ साबित करैत अछि, जखन कि कविगण कोनो आर्थिक- अपेक्षा नहिए रखैत छथि। मैथिली मे अप्पन पाइ सँ पोथी छपाब' बला जतेक लेखक छथि, ताहि सँ कम क्रेता-विक्रेता आ प्रकाशक छथि। पाठक त' घटले जा रहल छथि, आ 'स्वर्गारोहित लेखक' बढ़ले जा रहल छथि। तखन समीक्षक कतेक हेताह? आ हेबो करताह, त' अपना गुटक लेखकक समीक्षा लिखताह। ककरो कर्जा थोड़े खेने छथिन, जे...? समीक्ष्य काव्य-संग्रह मे, पोथीक शीर्षकक नाम सँ कोनो कविता संकलित नहि अछि। तें पोथीक शीर्षकक नामकरण, रचना-आधारित नहि अछि। शीर्षक के, 'कुचरि, बैसू कौआ' हेबाक चाहैत छल, जे मिथिला-समाज मे, 'विद्यापति गीत' अथवा 'परदेसी पिया'क माध्यमें, जनमानस मे पूर्व-स्थापित अछि। 'उचरनाइ वा उचारनाइ' त', 'खड़ी उचारि भविष्यवाणी करबाक परंपराक, अवशिष्ट'- शब्द थिक। तखन बंगाल-असम मे,एहन वैकल्पिक शब्द, भइयो सकैछ। मुदा पैघ बात ई थिक जे, सागरजीक 'कौआ', काकभुशुण्डी जकाँ, मिथिलांगन मे काव्य कुचरैत अछि, रंग-विरंगक सामाजिक व्याख्या प्रस्तुत करैत अछि। सागरजीक कौआक काव्यमय सामाजिक सरोकार, संग्रहक मोटा-मोटी सभ कविता मे व्यक्त भेल अछि। संग्रहक आरम्भहि मे, काव्य-सम्बन्धी अपन अवधारणा के, पहिले कविता मे व्यक्त करैत, अपन काव्य- लेखनारंभक, अनेक प्रारूपक व्याख्या करैत छथि। किशोर-वय मे सौन्दर्य-शृंगार सँ उद्भूत कविता, सम्पूर्ण जीवनक रंग-विरंगी 'कोलाज' बनबैत, 'कैंची-बला कतरनी-भूमिका' के खारिज करैत, 'माला गँथबाक सुइया' बनि जाइत अछि। ई सृजनात्मक दृष्टि, हिनक कविता-संग्रहक 'प्रस्तावना' थिक। कोनो औसत व्यक्ति आ कवि जकाँ, हिनको जीवन मे, मायक महत्वपूर्ण स्थान भेलनि अछि। आ तें तत्सम्बन्धी तीन टा कविता (माय, माय हमर गंगा, सिरमा लग टाँगल मायक फोटो) संकलित अछि, जे पाठक के झकझोड़ि क' राखि दैत छै। तीनू कविता मे, मायक पारिवारिक हैसियतिक आ विविध प्रारूपक यंत्रणा-भोगक कारूणिक चित्रण आ संवेदनाक घनीभूत अभिव्यक्ति भेल अछि। मिथिला समाजक माय- संवर्गक, पिता द्वारा आ परिवारक सभ सदस्य द्वारा शोषण होयब, जीवनक विविध चरणक कारुणिक चित्र अंकित करैत अछि। 'मातृरूपेण संस्थिता' बाली मिथिलाक माय त', गंगे होइते छै, जकर कचोटैत स्मृति सँ, बेटा नजरि नहि मिला सकैत अछि। मैक्सिम गोर्कीक 'माय' हो वा अशोकजी (आलोचक- कथाकार) के, रूस-प्रवास मे भेटल 'माय' (धरती गोल छै), वा होथि सागरजीक माय, माय संवर्गेक विश्वजनीन रूप, एहने होइत रहलैए। तें यंत्रणा भोगैत पारंपरिक मायक वात्सल्य-स्वरूप, 'नीक' त' अछि, मुदा, 'नव' नहि। एहेन अनेक लेखक/लेखिका अपन 'महान मायक' एहने 'त्यागी आ यंत्रणा-भोगी मायक छवि' अपना कविता-कथा मे, स्थापित केलनि अछि। से 'वात्सल्य-स्वरूपा' होइतहिं छै 'माय', अपना संतान लेल, बरु अनका लेल जेहेन हो। तखन 'आजुक मिथिलाक मायक संवर्ग' मे, 'खलनायकीक घुसपैठ' भेल अछि, सेहो एकटा तथ्य थिक। भाय-भाय, बेटा-बेटा आ पुतोह-पुतोहु मे विभेद करैत 'माय', पौत्र-पौत्री, पुत्र-पुत्री आ नाति-नातिन मे 'विभेद करैत' 'माय'/मैयाँ केर संज्ञान, के लेत? मैथिली काव्य-साहित्य सँ, अनुपस्थिते जकाँ अछि, से यथार्थ। तखन जिबैत मायक, विविध सृजनात्मक स्वरूप सँ ल' क', 'मुइल मायक सकारात्मक आ जीवंत स्मृति'क उद्घाटन, मार्मिक आत्म-स्वीकृतिक संग, जखन कोनो 'सागर-हृदय' कवि करत, त' ओकर अनुभूति वैयक्तिक नहि रहि, सामूहिक भइये जाइत छै। मुदा पिताक चरित्र-चित्रण मे, एकभगाह नहि रहलाह अछि कवि। पिताक जीवनक विविध प्रारूप आ चरणक वा विरोधाभासी क्रियाकलापक, संक्षिप्त आ शब्द-विन्यासी काव्य-शिल्प ('बाप') मे, पिताक 'पीड़ित' आ 'पीड़क', दुनू यथार्थ स्वरूपक काव्य-चित्रक संयोजन केलनि अछि कवि। 'चाण्डाल-स्वरूप, तसफेंट्टा आ थाड़ी फेकैत बाप, किंवा पति', रहरहाँ अछि, गाम- गाम मे। से ताहि पुरुष-संवर्गक काव्यमय उपस्थापन, 'बेसी इमानदारीक संग', भेल अछि-'सागर-काव्य' मे। ताही पुरूष-संवर्गक अभगदशा जखन, वृद्धावस्था मे बेटा-पुतोहु द्वारा, 'निरसू काकाक सुखरात्रि' के, 'भुक्खल दुःखरात्रि' मे बदलि क' होइत अछि दियाबातीक राति मे, त' जीवनक चारिमपन मे व्यंग्य आ करूणा मिझहर भ' जाइत अछि। आ मेंही शोषण सँ, 'दुर्दशा-काव्यक' जन्म होइत अछि, मिथिला समाज आ मैथिली साहित्य मे, एक संग। वैह पुरुष-संवर्ग, पचासो विरोधाभासी स्वरूप मे, 'भाइ' बनि क' प्रवहमान तुकबन्दी काव्य-शिल्प मे, सक्षम शब्द-संयोजन मे, काव्य-रूपायित होइत छथि, त' पुरुष-संवर्गक खलनायकी सँ, निर्मल-पाठक परिचित भ' जाइत छथि। सम्बन्ध-बन्धक कड़ी मे, अग्रिम काव्य-लक्ष्य बनैत अछि पति-पत्नी सम्बन्ध, जकरा काव्य-वस्तु बनायब कोनो कविक लेल अत्यधिक साधंस के बात थिक। बहुत कवि 'प्रेम-व्यथा' भोगितो, अइ विषय के अस्पृष्य मानैत रहैत छथि, त' कएटा कवि 'नाढ़र' भ' क' 'प्रेम' के 'सेक्स' बना क', ताजीवन भोगैत छथि। आ ताहि विषय के गोपन बना क' रखबाक रणनीतिक अन्तर्गत, विमर्श करबाक लेल, 'नाक पर माँछी' नहि बैस' दैत छथि। नाढ़र' नामक कविता, 'स्त्री-पुरुष सम्बन्ध' मे, व्यभिचारक सुन्दर काव्य-व्याख्या करैत अछि, त' 'अहाँ, हमरा आब नहि सोहाइत छी' मे, नैहरक वासंती-कोमलांगी 'चन्द्रमुखी', जे सासुर (पतिक गाम) मे आबि क' 'सूर्यमुखी', हन-हन-पट-पट करैत, नाक सुकरैत, '63' स' '36' बनैत, बढ़ैत अद-पद-दायित्व सँ, करुणा सिरजैत अछि। विभिन्न चरण मे, प्रेमक पतझड़क सनगर काव्य-वर्षा, 'धूआँ मूआँ' लग आबि क', प्रेमक अतीत-वर्तमानक सौन्दर्य-बोधक व्याख्या लग आबि, हारि मानि लैत अछि। प्रेम-वर्णन मे, हिनकर कविता मे वीभत्स-रसक प्रयोग, विरल भेल अछि। 'नाक पर माँछी', नामक कविता मे, 'पति-पत्नी सम्बन्ध' मे, विभिन्न चरण मे, वयस्क-प्रभावक आकलन करैत, एक-सँ-एक झाँपल आ गोपन रहस्यक, काव्यमय अभिव्यक्ति भेल अछि, जे पति-पत्नीक पैघ रसगर/नीरस जीवनक, सप्रसंग व्याख्या प्रस्तुत केलक अछि। 'औजी महाराज' मे, 'जीवनक सौन्दर्य-बोध' मे 'काव्यक सौन्दर्य-बोध' आ 'स्त्री-पुरुष सम्बन्धक सौन्दर्य-बोध' मे, आस्थाक गुंफन एना उतरल अछि, जेना जनवादी- काव्य मे शृंगार- रसक परिपाक भेल हो। तहिना, सासुरक परिवर्तित होइत स्नेह-समीकरण, ’होटल मे रहैत', पारिवारिक जीवनक स्नेह-सूत्रक स्मृति, 'सेहेन्ता' मे पतिक सेहेन्ताक सार्वजनीन दर्द, 'आह। आह।' क' उठैत अछि। एतावता, दाम्पत्यक संग, सम्पूर्ण पारिवारिक जीवनक टूट, परिवारक सभ सदस्यक पीड़ा- भोग, सम्पूर्ण सम्बन्ध-बंधक समकालीन यथार्थ, विरोधाभासी विडंबनापूर्ण परिस्थितिक करुण काव्यमय अभिव्यक्ति, अनेक कविता मे, जमि क' भेल अछि। 'बेवस्था' आ 'कहबौ त' लगतौ छक् द', दुनू गजल थिक, जकर एहि संग्रह मे स्थान नहि हेबाक चाहैत छल। तहिना 'बरखा' 'हथचिट्ठी' आ 'बकरीक आत्मालाप', विशुद्ध गीत हेबाक कारणें,अइ संग्रह मे उकड़ू अछि, तें एतय विवेच्य नहि अछि। नवकविताक दृष्टिएँ, ई कविता-संग्रह अपना-आप मे, परिपूर्ण अछि। मैथिली आन्दोलनक पोखरि मे, मरसम्पय माँछ रहलाक बावजूदो, बिनु बोरेक बन्सी पाथल जेबाक कारणे, बेर-बेर मछहरि विफल भ' जाइत अछि। ताहि पाखण्डक दोसरो कविताक, दुनू लजकोटरि कुमारि-कन्या, सम्पुष्टि करैत अछि, जकर आपसी प्रेमक कोनो परिणाम (समलैंगिक हेबाक कारणें) असम्भव अछि। एहि पाखण्ड के पुनः 'नहि चाही पाखण्ड' केर पाँचो कविता, प्रकारान्तर सँ, देखार करैत अछि, जे मिथिला समाज मे विद्यमान अछि। आकंठ मोह-ग्रस्त सासुक अध्यात्म-पाखण्ड हो, वा मैथिलानीक व्रत-उपवास आ सोमालियाक भूखमरी वा 'अहिंसा-भावें' भरिपेट्टा माँछ खेनाइ,वा महींस आ गायक दूहब मे अन्तर करबाक पाखंड हो, बात एक्कहि थिक। तहिना पुरुषक पाखण्डग्रस्त मानसिकता, जे,घर मे जकरा 'सरभेंटनी' कहैत अछि, तकरे सड़क पर 'कोमलांगी' बुझैत अछि, कें, देखार करैत अछि कविता- 'काजक लोक'। समाज मे बहसल लोकक विभिन्न प्रकारक भ्रष्ट आ व्यभिचारी प्रवृत्ति पर, रंडी-प्रवृत्ति पर(रंडी) कविता लिखय मे कमाल के कथ्य-चयन भेल अछि। जानवरो सँ गेल-गुजरल प्रवृत्ति, मनुक्खक भ' गेल अछि। तहिना भरुआ-प्रवृत्ति (हाँजी- हाँजीबला मानसिकता)पर, आक्रामक चोट अछि, 'भरुआ' नामक कविता मे। पंचसाला राजनीति-तंत्रक खलनायकी-हिजरापनकेँ धरगर आ गहींर व्यंग्य सँ नाथल गेल अछि, 'हिजरा' नामक कविता कें। 'अपन अर्द्ध-शताब्दी पर' कवि कें, कोनो औसत परिवार-प्रधाने जकाँ अनुभव होइ छनि छिन्नमूल हेबाक, जिनगीक कटु यथार्थक परिभाषा बुझबाक, सन्तानरूपी टटका दहीक अम्मत भ' जेबाक। तें मरीचिका भगेबाक लेल वा समानधर्माक अर्द्ध-शती मनेबाक ब्योंत मे मोमबत्ती जरेबाक लेल, सलाइक-काठी खरड़ब, सृजनात्मताक प्रतीक थिक। जिनगीक 'एक लग्गा सुरुज' ऊपर उठि गेला पर, जखन झलफल मे आँखि चील्ह कें हवाइ जहाज बूझ' लगैए, उदास प्रिया के खड़खड़ तरहत्थी सँ, पीठक घम्हौड़ी कुड़िएबाक आह्वान, सकारात्मक आ आशावादी आह्लादक प्रतिपादन थिक। 'पन्द्रह अगस्त'क दर्द, आम जनजीवन मे, न' अगस्त (नागासाकीक विध्वंस)क दर्द ल' क' अबैत अछि आ लोक, निवासी मनुक्खक बदला 'खरबन्ना डीह' केर भाग्य देखैत अछि। 'महाप्रयाण', पूर्ण ध्वंसक भयावह विस्तारित यथार्थक परिकल्पना थिक। 'सन्तति' मे, गागर मे सागर भरल गेल अछि। सेहो, बेटीक पक्ष मे। 'प्रदूषण' सामाजिक विकृति के प्रमाणित क' दैत अछि, त' बाध पर बाढ़िक 'बलात्कार', पाठक कें चौंका दैत अछि। 'साती' मे, निम्नवर्गीय कनियाँक ग्रामीण औद्योगीकरणक सेहन्ता व्यक्त भेल अछि, जाहि सँ पियाक पलायन परदेस मे नहि हो। 'चिन्ताक कोनो बात नहि' मे, समाज मे होइत नकारात्मक आ सकारात्मक, दुनू प्रकारक परिवर्तनक संज्ञान लैत, समाज पर सार्थक व्यंग्य भेल अछि। 'त्यागक' शब्द-विन्यास, 'बेंत'क विम्ब-विन्यास, 'जिज्ञासाक' ग्राम-नगर-विरोधाभास मे सेराइत नव पीढ़ीक उत्साह आ 'मातमपुर्सीक' भयावह यथार्थ, पाठकीय आनन्दप्रदाता भेल अछि। कवि 'परम्परा' पर प्रहारो करैत छथि आ 'प्रगतिक' छद्म- आवरण मे नुकायल सामन्ती मानसिकताक अवशेष पर, व्यंग्यो करैत छथि । 'हम अहाँ कें नहि चिन्हैत छी' मे, वर्ग-विभेदक यथार्थक समर्थन भेल अछि, त' किछु पाँती, 'कवि नारायणजीक नाम' मे, ग्रामीण जीवनक सौन्दर्यक पक्ष लैत, कविक शहरी जीवनक सन्ताप व्यक्त भेल अछि। कविता कोनो समस्याक तुरंत समाधान, राजनीति आ शासन जकाँ करबाक लेल सक्षम नहि अछि, आ समस्याक कारणों समाजेक लोक अछि। तें 'कविक आत्मसमर्पण', उचिते अछि। खाँटी मैथिली मे मार्मिक 'समस्या'-काव्य, वैयाकरणी-शैली मे,एकवचन सँ बहुवचन' भ' जाइत अछि। तामस मे भोजन 'सानी' बनि जाइत छै, आ यथार्थक जमीन सँ कटल 'नागुल परहक गाछ', ऑक्टोपसी उपभोक्तावाद पसारैत अछि। कवि सागरजीक शुभ सकारात्मक 'दृष्टि', प्राचीन कवित्त मे नवीन कथ्यक गुंफन थिक, त' 'नेंत' आवरण फाड़ि क' देखार भइये जाइत अछि। 'चुट्टीधारी' मे मनुक्खक हीन आ जीव-जन्तुक उच्च संस्कार, काव्यमय वर्णन पौलक अछि, त' 'सड़कक कतबहि मे कटैत जिनगी', अभिजात आ सर्वहारा वर्गक विरोधाभासी जीवन- यथार्थक मार्क्सवादी सौन्दर्य- शास्त्रीय व्याख्या, सामाजिक थाड़ी मे साँठल भातक डिजाइन जकाँ, प्रस्तुत भेल अछि। 'एना किए होइए?' मे, पुरुष समाजक व्यभिचार आ भ्रष्ट मनोवृत्ति, कोनो पतिक तिमनचक्खा प्रवृत्ति आ बोनहुल्लुक-संस्कार, बेपर्द भेल अछि। सम्पूर्ण काव्य-संग्रहक काव्य- कथ्यक परीक्षण सँ, कथ्य तथ्यात्मक आ यथार्थवादीए नहि, वर्ग-संघर्षो के आधार दैत, उपस्थापित भेल अछि। सागरजीक 'दृष्टि-कैमराक कैनवास' चकित करैत अछि। हिनक जीवनानुभवक क्षेत्र-विस्तार पैघ छनि, आ शब्द-संचयक बखारी पैघ आ भरल-पुरल शब्द-सामर्थ्य सँ ल' क', शब्द-विन्यास धरि, चमत्कारिक आ खाँटी तृणमूलीय अछि। हिनक काव्य-भाषा, अपन अभिव्यक्ति मे टनाटन अछि, मुदा सहज अछि। किछु कविता मे, सहज-प्रवाह मे, तुकबन्दी स्वयमेव आबि गेल अछि। मुदा सेहो कवित्त आ शब्द-विन्यासक क्रम मे, आयल अछि। हिनकर कविता के सर्वरस-परिपुष्ट मान' पड़त। सौन्दर्य-शृंगार आ वीभत्स रसक जनवादी-वर्गवादी कविता मे, एहन पचल समावेश केनाइ, कोनो परिपक्वे कवि सँ संभव अछि, जखन कि ई कविक पहिल संग्रह थिकनि। सामाजिक मूल्यक प्रति आबद्ध लेखनक, कएटा मैथिली काव्य- प्रतिमान मे सँ, एकटा ईहो संग्रह थिक, जकर काव्य-तथ्य, कथ्यक अयना मे, मिथिला समाजक विम्ब-प्रतिबिम्ब-उपविम्ब,द्रष्टव्य अछि। उपमा-उपमान सँ सजल पुष्प-गुच्छ त' थीके ई पोथी, सम्पूर्ण संग्रहक मूलभाव, कविक हाथ मे एकटा धरगर हथियार जकाँ अछि, जाहि सँ कवि वस्तुतः अपन स्वभावक अनुकूल, 'अनर्गल आ अनसोहाँत क्रियाकलाप'क निरंतर काव्य-विरोध करैत जाइत छथि। से हिनकर 'मिथिला-वास आ कलकत्ता-निवासक जनवादी संस्कारक उपलब्धि' नहि, त' आर की थिक? २.१६.अजित कुमार झा- सागर जी: यथा नाम, तथा काम अजित कुमार झा- संपर्क-9472834926 सागर जी: यथा नाम, तथा काम विद्यार्थी जीवन मे कलकत्ता (हँ कोलकाता नाम त' पहिल जनवरी 2001 सँ पड़ल छलै) प्रवास केर समय हिनका सँ परिचय नहि छल आ हिनका विषय मे ओतेक नीक जँका बूझल सेहो नहि छल। मैथिली पत्रिका सब मे हिनकर किछु रचना पढ़बाक अवसर अवश्य भेटल तथापि गप्प करबाक सौभाग्य प्राप्त नहि भ' सकल छल। गौहाटी सँ प्रकाशित होबय वाला पत्रिका "पूर्वोत्तर मैथिल" केर दोसर अंक मे हमर एकटा कथा छपल ओहि के उपरांत ई कोलकाता मे हमर बाबूजी सँ भेँट कय हमरा विषय मे जानकारी लेने छलथि आ ओहि केर बाद हिनका सँ गप्प करबाक सौभाग्य प्राप्त भेल। हमरा लेल ई बहुत बड़का बात छल किएक त' पहिल बेर हमर कथा कोनो पत्रिका मे छपल छल आ हमर उत्साहवर्धन करबा मे ई जे तत्परता देखौलनि से निस्संदेह हमरा लेल पैघ गप्प छल। गप्प-सप्प फोने धरि सीमित छल मुदा लगातार किछु नीक लिखबा लेल प्रोत्साहित करैत रहैत छलथि। सन् 2004 केर सितम्बर-अक्टूबर मे हम अपन जीवन केर सब सँ कठिन समय बिता रहल छलहुँ आ हमर पुत्र अस्पताल मे भर्ती छल। ओत्तऽ सँ हिनकर घर पासे मे छलनि आ हम हिनका सँ फोन पर गप्प कय हिनकर घर पहुँचलहुँ। पहिल भेँट छल मुदा हम मानसिक रुप सँ ओहि स्थिति मे नहि छलहुँ जे ओहि क्षण केर आनन्द उठा सकी मुदा ओ हमरा लगातार प्रेरित करैत रहलाह। संकट के घड़ी मे माँ भगवतीक निरंतर ध्यान करय लेल कहलनि। दोसर दिन स्वयं अस्पताल मे आबि भेँट केने छलथि। हमर पुत्र केँ मोन सँ आशीष देने छलथि आ पुनः निराशाकेँ दूर भगाबय लेल हमरा प्रेरित केने छलथि। ई कहबा मे हमरा कोनो दुविधा नहि अछि जे हमर हौसला बढ़ाबय मे हुनकर बहुत योगदान छन्हि। ओहि के बाद फेर भेँट करबाक अवसर नहि भेटल मुदा फोन पर कहियो काल गप्प भ' जाइत छल। सोशल मीडिया केर युग मे हिनकर निरंतर सक्रियता सँ बहुत किछु जानकारी भेटय लागल तँइ फोन पर गप्प सेहो ओतेक नहि भ' पबैत छल। विभिन्न पत्रिका एवं सोशल मीडिया केर माध्यम सँ हम सब निरंतर जुड़ल रहलौं। समय अपन रफ्तार सँ बढ़ैत रहल आ नहि जानि कोना अठारह बरख बीति गेल। सन् 2022 केर 27 फरवरी क' अखबार मे पढ़लहुँ जे मुजफ्फरपुर स्थित ललित नारायण तिरहुत महाविद्यालय केर प्रांगण मे साहित्य अकादमी द्वारा सुधांशु शेखर चौधरीक मैथिली वर्तनी पर कैल काजकेँ ल' क' दू दिनक कार्यक्रम आयोजित भ' रहल छल जाहि मे मुख्य अतिथि/वक्ता छलथि श्री लक्ष्मण झा 'सागर'। जानकारी केर अभाव मे हम पहिल दिनक कार्यक्रम नहि देखि सकल छलहुँ तँइ खबरि पढ़लाक उपरांत हम झटपट तैयार भ' ललित नारायण तिरहुत महाविद्यालय पहुँचलहु। लगभग 18 बरखक बाद भेँट करबाक उत्सुकता सँ हम महाविद्यालय कैम्पस मे तेजी सँ प्रवेश क' रहल छलहुँ आ संयोग सँ सागर जी अपन वक्तृता सभा केँ समक्ष द' रहल छलथि। मंच पर अपन वक्तृता दैत सागर जी केर दृष्टि हमरा पर पड़लनि आ ओत्तहि सँ ओ सभागार मे उपस्थित दर्शक वृन्द सँ हमर परिचय करबौलनि। हमरा लेल निस्संदेह ई एक अभूतपूर्व क्षण छल। ई हुनकर हमरा प्रति सिनेह छलनि से हमरा बुझा रहल अछि। उपर्युक्त दुनू घटना सँ हिनक व्यक्तित्वक परिचय सहजहि भेटैत अछि। मिथिला-मैथिली केर अति साधारण कार्यकर्ता लेल सेहो हिनक हृदय अथाह सागर छन्हि। अपन कृतित्व केर माध्यम सँ त' निरंतर माँ मैथिली केर सेवा मे लागले रहैत छथि। हमरा पास हिनकर प्रकाशित चारि टा पोथी उपलब्ध अछि। सन् 2010 मे मंजू पाठक मेमोरियल ट्रस्ट, गुवाहाटी सँ हिनकर पहिल काव्य संकलन "उचरि बैसू कौआ" प्रकाशित भेल छलनि जाहि मे चारि दशक धरि मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिका ओ स्मारिका लेल लिखल गेल कुल 60 टा कविता केँ संग्रहित कैल गेल अछि। एक बेर पढ़नाइ शुरु करबै त' बिनु समाप्त कयने उठबाक मोन नहि होएत। एकर प्रकाशन मे स्व. सत्यानन्द पाठक जी केर भूमिका सराहनीय छलनि। अपन धीया पुताक गुल्लक केर योगदान सँ सन् 2020 मे कोलकाताक नीलम प्रकाशन सँ हिनक दोसर काव्य संकलन "एहि गदह बेर मे" प्रकाशित भेल जाहि मे कुल 61 टा कविता अछि। हिनक कहब छन्हि जे ई कहियो स्वान्तः सुखाय लेल नहि मुदा विभिन्न मैथिली पत्रिकाक ओ स्मारिकाक संपादक महोदय केर आग्रह पर लिखैत रहलाह। प्राइवेट नौकरी आ विभिन्न संस्था सबहक हेतु कार्य केर मध्य किछु लिखबाक लेल समय निकालि लेनाइ कोनो आसान बात नहि छैक। ई मात्र कविते नहि कथा कहानी, साक्षात्कार, रिपोर्ताज आ अन्य विधा मे सेहो धुड़झार लिखलनि आ लिखिए रहल छथि। हिनकर तेसर प्रकाशित कृति छन्हि "जेना ओ कहलनि" आ अहि मे बाबू साहेब चौधरी, जयकान्त बाबू, पीताम्बर पाठक, राज नन्दन लाल दास, डा० वीरेन्द्र मल्लिक, महेन्द्र मलंगियाक अलावे मिथिला विकास परिषद्क अशोक झा केर साक्षात्कार बहुत बढ़िया ढंग सँ प्रस्तुत केने छथि। ओना साक्षात्कार पढ़बा मे हमर विशेष रुचि अछि मुदा तैयो हिनक चारिम प्रकाशित कृति मैथिली वार्ता कथा केर संकलन "कनसोह" हमरा बेसी रुचिगर लागल अछि। अहि मे कुल 23 टा वार्ता कथा केर समायोजन भेल अछि आ सब एक सँ बढ़ि एक। पढ़बा काल निस्संदेह सम्मोहित क' लेत। हिनकर अन्य बहुत रास पोथीक पांडुलिपि प्रकाशनक बाट जोहि रहल छन्हि। ओना वर्तमान मे सोशल मीडिया पर विशेष रूप सँ सक्रिय छथि आ बेबाकी सँ अपन बात रखैत छथि। ठाँहि-पठाँहि लिखैत छथि। युगक अनुरुप अपना आपकेँ ढालि लैत छथि तखने त' सोशल मीडिया पर सेहो अतेक सक्रिय छथि। माँ मैथिली केर सेवा मे हिनक योगदान निस्संदेह सागर समान अछि। मिथिला मैथिली केर छोट सँ छोट सिपाही लेल हिनक हृदय अथाह सागर बनि जाइत अछि आ हमरा कहबा मे कनिको दुविधा नहि भ' रहल अछि जे हिनकर यथा नाम तथा काम। २.१७.सुरेन्द्र ठाकुर- सागरजी सुरेन्द्र ठाकुर- संपर्क-9903398512 सागरजी हम अखिल भारतीय संघ, कोलकाताक एकटा अमंचीय सक्रिय कार्यकर्ता छी। हम 1975 क 26 जनवरीक दिन कोलकाता पहुँचल रही। तत्काल हम अपन ट्यूशनिञा काज मे लागि गेल रही। हम, महामना परम श्रद्धेय स्व. बाबू साहेब चौधरी जीक संपर्कमे आबि उक्त ‘संघ’ मे प्रवेश कयलहुँ। आ, अमंचीय सक्रिय कार्यकर्ता सदस्यक रूप मे काज काज करय लगलहुँ। उक्त ‘संघ’मे काज करैत हम दू टा ‘सागर' जीक नाम सुनियन्हि। एकटा जे ‘सागर' जी रहथि से कोलकाताक जैकशन लेन स्थित कैलेण्डर मार्केट मे काज कयल करथि। ओ सामान्य शिक्षित लोक रहथि। ओ मैथिलीक साहित्यकार नै रहथि। मुदा, मिथिला-मैथिली प्रेमी जरूर रहथि। हमरा सभ कें मिथिला-मैथिलीक सभ काज मे सदा मदति करथि। दोसर जे ‘सागर' जी छथि से मैथिलीक साहित्यकार छथि। समय-2 पर हिनक नाम ‘संघ’क नव-पुरान सदस्यक श्रीमुख सँ सुनल करियन्हि। विशेष चर्च कयल करथि श्रद्धेय स्व. बाबू साहेब चौधरी जी। तैं, उपरोक्त कथ्यक आलोक मे हम साहित्यकार ‘सागर' जीक विषय मे लीखि रहल छी। हिनकर पूरा नाम छन्हि- श्री लक्षमण झा ‘सागर'। ई घोघरडीहा परिसर स्थित ठढ़बितिया गामक निवासी छथि। ई ‘असम’ सँ पुन: कोलकाता अयलाह 1997 मे। हिनक आगमनक सूचना हमरा सभ कें भेटैत रहल। ओकर बाद सँ ई वैयक्तिक रुपेण हमरा सँ कोलकाताक मिथिला-मैथिलीक विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम मे भेंट होइत रहलाह। पहिल दिनक परिचय-पात भेलाक बाद सँ उतरोत्तर हिनका सँ हमरा प्रगाढ़ संबंध बनैत गेल। ई ‘संघ'क सभ सदस्य जकाँ हमरा सेहो आदर कयल करथि। हम सेहो हिनका यथोचित आदर करैत रहलियन्हि। स्व. श्रद्धेय बाबू साहेब कें ई विशेष आदर कयल करथि। एखनो करैत छथि। हँ, हम एकटा बात स्पष्ट क’ दैत छी जे ‘सागर' जी हमर सभक उक्त ‘संघ'क कहियो नामजद सदस्य नै रहलाह। मुदा ‘संघ', आ स्व. बाबू साहेब चौधरी जी सहित एकर सभ सदस्य कें यथोचित आदर करैत रहलाह। ई संघक अधिकांश सदस्यक नाम-गाम सहित वैयक्तिक रुपेण जनैत छथि। ‘सागर' जी उचितवक्ता आ स्पष्टवादी लोक छथि। संगहि ई प्रयोजनीय लोक वा कार्यकर्ता सभ के चाकरी दिअएबा मे आ आर्थिक सहयोग देबाक संग लेखकीय वा वैचारिक परामर्श सेहो दैत रहैत छथि। मुदा, ई जिनका-2 सहयोग देने छथि वा दैत रहैत छथि वैह सभ बाद मे समय-समय पर हिनक विरोधी भ’ खिद्धांश सेहो करय लगैत छन्हि। हम कलकत्ताक कतेको संस्थासँ जुड़ल कार्यकर्ता वा लेखक सभक मूँह सँ प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष रुपेण हिनक निन्दा सभ सुनने छी। सागर जीक प्रवासी चाकरी जीवन-यापनक संबंध मे हमरा बहुत रास बात स्व. चौधरी जी सेहो कहने छथि। स्व.चौधरी जीक उपरोक्त बात सभकें सही साबित करैत सागर जी अपन प्रकाशित पुस्तक सभमे केने छथि। स्व. चौधरी जी हमरा ईहो कहने रहथि:- सुरेन्द्र जी! सागर जी ‘असम’ प्रवास मे रहितो हमरा सँ पत्राचार करैत रहलाह। कुशलक्षेम पूछैत रहलाह। आ, असम अयबाक लेल आग्रह कयल करथि। हमरा विचार होइत अछि जे हुनका ओतय हम जाइ। आ, अपन अपूर्ण आत्मकथा कें ओत्तहिं पूर्ण करी। ओ एकरा ओत्तहि छपबा देताह। मुदा, हम जाएब तखन ने! की कहल जाए! अपना जिनगी मे अपन आत्म कथा छपयबाक सपना स्व. चौधरी जीक लेल अधूरे रहि गेलन्हि। मुदा, ज्ञातव्य हो की हुनक आत्मकथा- "जीवनक रंग: मैथिलीक संग" हुनक पुत्र श्री विद्यापति चौधरीक अथक सत्प्रयास सँ छपि चुकल अछि। सागर जी असम प्रवास मे रहितो अपन कंपनीक काजक अतिरिक्त गुवाहाटीक मैथिल सभ सँ नियमित सम्पर्क मे रहि आग्रह कयल करथि जे अपने सभ मिथिला-मैथिलीक लेल संगठन बना काज कयल करी। ओही क्रम मे हिनका ओत्तुका मैथिल सभ मे जे भेट भेल रहथि ओहि मे प्रमुख रहथि- सर्वश्री सत्यानन्द पाठक आ प्रेमकान्त चौधरी। सत्यानन्द पाठक सीतामढ़ी जिलाक चोरौत गामक निवासी रहथि। गुवाहाटी मे ओ एकटा हिन्दी दैनिक ‘पूर्वोदय' केर उप-सम्पादक रहथि। दोसर जे प्रमुख लोक रहथि वा एखनो छथि, से छथि-श्री प्रेमकान्त चौधरी। ई दरभंगा जिलाक बहेड़ा परिसर अंतर्गत बिठौली गामक निवासी छथि। ओम्हर उपरोक्त दुनू महानुभाव गुवाहाटी मे मैथिली भाषीक संघटन मे लागल रहथि आ इम्हर पुन: कोलकाता मे रहितो सागर जी हुनका सभ कें सम्पर्क मे रहि यथोचित सलाह दैत रहलाह। एहि तरहें ओतय सागर जीक प्रयास रंग अनलक। आ, बाद मे ओ दुनू महानुभाव सभ मैथिल सभक एकटा संगठन बनौलन्हि:- "मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति"। उक्त समिति ‘पूर्वोत्तर मैथिल’ नाम सँ एकटा त्रैमासिक पत्रिकाक प्रकाशन शुरू केलक। सम्पादक रहथि स्व. सत्यानन्द पाठक। मुदा, गुवाहाटी मे सेहो मैथिल चरित्र उजागर भेल। सत्यानन्द पाठक आ प्रेम कान्त चौधरी मे मतभेद उत्पन्न भ’ गेल। सत्यानन्द पाठक अलग सँ एकटा मैथिली संगठन बनौलन्हि। नाम छलैक- "विद्यापति चेतना समिति"। जकर अध्यक्ष छलाह- मनोज वर्मा। उक्त समिति सेहो एकटा मैथिली पत्रिकाक प्रकाशन शुरू केलक। ओहि त्रैमासिक पत्रिकाक संपादक रहथि- स्व. सत्यानंद पाठक। उक्त पत्रिका कोलकाताक मिथिला-मैथिली आन्दोलन सँ संबंधित सेहो एकटा विशेषांक (अक्टूबर-दिसम्बर-2011) प्रकाशित कयलक। शीर्षक रहैक-"कोलकाता परिसर मे मैथिली"। एकर अतिथि सम्पादक भेल रहथि-श्री लक्षमण झा ‘सागर’। एहि तरहें हम देखैत छी जे ‘सागर' जी कोलकाता मे पुन: रहितो असामक मैथिल समाज सभक संपर्क मे निरन्तर रहलाह। जकर परिणाम ई भेल जे असम मे नब्बे दशक सँ अद्यावधि मिथिला-मैथिलीक गतिविधि चलि रहल अछि। एखन ओत्तुका बागडोर सत्यानन्द पाठक जीक निधनक बाद सम्हारने छथि- श्री प्रेमकान्त चौधरी। हँ, एहि संबंध मे हम आर कहब जे स्व. बाबू साहेब चौधरी जीक भविष्यवाणी सत्य साबित भेल जे-'सागर' जी भविष्य मे एकटा नीक सम्पादक बनताह। से सागर जी अतिथि संपादक बनि स्व. चौधरी जीक सपना कें चरितार्थ कयलन्हि। संगहि, हमरा ईहो पूर्ण आशा अछि जे स्व. चौधरी जीक पुण्य-स्मृति मे प्रकाश्य स्मृति ग्रंथक सेहो सफल संपादक हेताह। सागरजी समय-2 पर मैथिली जगतक महान हस्ती सभक इन्टरभ्यू सेहो लेने छथि जेना- 1) बाबू साहेब चौधरी, 2) डा. जयकान्तमिश्र, 3) पीताम्वर पाठक, 4) राज नन्दन लाल दास, 5) डा. श्री वीरेन्द्र मल्लिक, 6) श्री महेंद्र मलंगिया, एहि छहो लोकमे पहिल 4 आब स्वर्गीय छथि। सागर जी कें जे सातम व्यक्ति इन्टरभ्यू देने छथि से छथि कोलकाताक संस्था मिथिला विकास परिषदक अध्यक्ष अशोक झा। सागर जी हिनका सँ बहुत प्रभावित भ’ बड़ शौख सँ हिनक इन्टरभ्यू हिनकहि कार्यालय मे लेने रहथि जे पुस्तक छपलाक बाद पाठक वर्गक लेल अतिशय उपयोगी सिद्ध हैत। मुदा, मक्षिकापात भ’ गेलैक। कलकत्ताक मैथिली जगत मे एकटा आंतरिक भू-चाल आबि गेलैक। ई भू-चाल अंग्रेजीक प्रसिद्ध कहावत: "स्टौर्म इन ए कप ऑफ टी" के़ँ सत्यापित कैलक। सागर जीक इन्टरभ्यू बला पुस्तक ‘जेना ओ कहलन्हि' केर बहुत खिद्धांश होबऽ लागल। संबंधित लोक सभ ईहो कहय लागल रहै-"कहाँ राजा भोज आ कहाँ गंगुआ तेली"। ई बात सभ जानि-सुनि क' सागर जीक मोन बहुत छोट भ' गेलन्हि। सागर जी कें मिथिला-मैथिली आ मैथिली साहित्यक सेवार्थ जे सभ सम्मान भेटल छन्हि तकर नमहर सूची अछि। मातृभाषा संवर्द्धन सम्मान प्रदान करबाक समय हम कोलकाताक बड़ा बजार लाइब्रेरी मे उपस्थित रही। ओहि अवसर पर हम सागर जीक सम्मान मे आयोजित कवि सम्मेलन मे निम्नांकित कविता पढ़ने रही। संगहि, बाबू साहेब चौधरी सम्मान दिल्ली, द्वारा जे प्रदान कयल गेल छल ताहि अवसर पर हम सेहो ताल कटोरा स्टेडियम, दिल्ली मे उपस्थित रही। उक्त 'मातृभाषा संवर्द्धन सम्मान 'प्रदानक अवसर पर पढ़ल गेल हमर कविता- आइ लघु मिथिला आयल अछि अहिठाम मरकतमणि सम साजल अछि मिथिला मंडप। रजत पटल पर अछि मैथिलीक छवि शोभित सम्मुख सकल मैथिल समाज एखन उपस्थित।। एहि मे अछि एकटा विशेष स्वर्णिम सिंहासन छथि विराजित मैथिलीक एकटा पैघ साहित्यकार। ई धीर-वीर-गंभीर, शांत-सौम्य कलमक धनीक छथि ई मिहिरक युग सँ खूब परिचित जानकार।। सरिपहुँ हिनक नाम छन्हि पैघ परम मनोहर छथि ई सुनाम धन्य श्रीमान लक्षमण झा ‘सागर’। भरने छथि मैथिली साहित्य के तन मन धन सँ छथि ओहिना जहिना भरल हो गागर मे सागर।। मिथिला, असम कोलकाता जतहि ई रहलाह नै छोड़ला, संघ संगठन आ साहित्यिक कर्म। लिखैत रहलाह आलेख कविता कथा कहानी मूलत: नै छोड़लाह अपन सारस्वत कवि कर्म।। पाण्डुलिपि, पुस्तकाकार मे मैथिली के देलन्हि पुस्तक सभ छन्हि पहिल 'उचरि बैसू कौआ'। समस्त प्रसून साहित्यक छन्हि हिनकर जाहि मे प्रकाशनार्थ लगौने छथि ई अपन अर्जल ढौआ।। मैथिली सेवार्थ हिनका आइ सम्मान प्रदान अछि मान्यवर डा. अशर्फी झा 'अमरेश'क शुभ नामे। ई सदा सर्वदा युग-युग जीबथि फुलथि-फरथि अहिना लागल रहथि सदा मैथिलीक शुभ कामे।। हम सभ एतय मैथिली साहित्यक प्रेमी पाठकगण सेहो करैत छियन्हि हिनका हार्दिक अभिनन्दन। मोन रहत सदा सर्वदा ई अनुपम स्वर्णिम साँझ सुरेन्द्रक हृदय करैत रहत सदा खुशीसँ स्पन्दन।। संपादकीय टिप्पणी- एहि लेखमे आएल समस्त सम्मान आ पोथीकक सूचीकेँ सागरजीक परिचय बला खंडमे जोड़ि देल गेल अछि। २.१८.प्रेमकांत चौधरी- अतुलनीय व्यक्तित्व: लक्ष्मण झा 'सागर' प्रेमकांत चौधरी -संपर्क-7002605261 अतुलनीय व्यक्तित्व: लक्ष्मण झा 'सागर' 'सागर' सँ सीधा सम्बन्ध अहि भूमंडल पर सत्तरि प्रतिशत भाग सँ होइत अछि । जेना शरीर में सत्तरि प्रतिशत पानि तहिना पृथ्वी पर। मनुखक जीवन पानि केँ बिना असम्भव। तहिना पानिक बिना पृथ्वीक कल्पना केनाइ असम्भव अहि पृथ्वी पर अनेक तरहक सागर अछि- प्रशांत महासाग, हिन्द महासागर, अटलांटिक महासागर, आर्कटिक महासागर आओर अंटार्कटिक महासागर वा दक्षिणी महासागर। अपन देश सेहो तीन दिस 'सागर' सँ घेरायल अछि। पूर्वमे बंगालक खाड़ी, दक्षिणमे हिन्द महासागर आ पच्छिममे अरब सागर। मैथिली साहित्यमे पूर्वी छोड़ पर साहित्यिक कमान धेने छथि लक्ष्मण झा 'सागर' जिनकर स्नेह हमरा प्रति अनुज सन छैन्ह। जूलियन कैलेण्डरक हिसाब सँ बरखक शुरुआत एक अप्रैल सँ होइत अछि । कहल जायत अछि जे राजा रिर्चड द्वितीयक एगो मनोरंजन सन कथा भेल । हुनका सगाई भेलैन्ह। जनता सभ खुश आओर लोक सभ आनन्द- मनोरंजन खुशी मनाबैत रहला । समय बीतैत गेल, मुदा हनका सभ कें पता नहि चलल जे एक्कतीस मार्चक बाद बत्तीस मार्च नहि अबैत छैक बल्कि एक अप्रैल आबि जायत छैक । जेना कि भेल, जनता बुझला जे बत्तीस मार्च जखन हैबै ने करैत छै तँ एक मतलब भेल हमरा सभकेँ मूर्ख बनेला । ताहि दिन सँ एक अप्रैल केँ मूर्खक दिन मानल गेल। अहि विशेष दिन पर विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय सँ लऽ कऽ दोसक बीच सेहो बाजी लागैत रहल छै जे के ककरा मूर्ख बनाबैत अछि । मनुखक जीवनमे बहुत काल एहन छन अबैत छै जे अपने - आपके मूर्ख बनबामे आनन्दक अनुभूति होइत छैक। कहल गेल छै जे मनुख वैह संतुलित जीवन जीबैत अछि जे स्वयं पर हँसैत अछि आ लोक केँ हँसबैत अछि । अहि एक अप्रैल 1953 ई. क भारतमे मिथिलाक सुदूर गाम-ठढ़ाबितिया, पोस्ट - तिलाठ, वाया - घोघरडीहा, जिला - मधुबनी मे बुध दिन आदरणीय ताकेश्वर झा आ माय गंगा देवीक घर बुधियार बच्चाक जन्म भेल । नाम राखल गेल लक्ष्मण। बालकाल सँ लऽ कऽ नवतुरिया बला प्राथमिक शिक्षा आ माध्यमिक सह उच्चत्तर माध्यमिक शिक्षा भोल उच्च विद्यालय सँ आगू बढ़त उन्नीस सय उनहत्तर इस्वीमे मैट्रिक पास केलाक बाद आर. के. कॉलेज, मधुबनी सँ बी. कॉम पास केला । अप्पन तीव्र इच्छा छलैन्ह जे चार्टड एकाउंटेंट (सी.ए.) पास करी । मुदा नियति मे नै छलैन्ह । ओहि पढ़ाई के क्रममे एकटा सी.ए. फर्म कलकत्तामे ज्वाईन केने छलाह। फर्मक काज सँ विभिन्न स्थान पर ऑडिट करबाक लेल जायत छलाह । सी. ए. इन्टर केलाक बाद आगू कें पढ़ाई सँ पहिने स्वनामधन्य बाबू साहेबर चौधरीजीक अनुप्रेरणा सँ मैथिली आन्दोलन आ मैथिली दर्शनक सम्पादनमे लागि गेलाह। सागर जी के कहब अनुसार- सी. ए. बनवाक सपना मेथिलीक लेल बलि पर चढ़ि गेला, मुदा एकटा पैघ कम्पनीमे कार्यरत भऽ गेल छलाह । सागर जी जखन बी. कॉम तेसर बरखमे छलाह ताहि समयमे दस मार्च उन्नीस सय बहत्तरमे शैल झा जीवन संगीनी के रूपमे आबि गेल रहथिन । मामा जी के आदेशानुसार विवाह मामा गाममे सम्पन्न भेल छल। दू कन्याक आएक पुत्रक पिता सागर जी के पाछु 'सागर' के सेहो एकटा कथा छै । लक्ष्मी झा नाम सँ जखन मिथिला मिहिरमे लिखैत छलाह। छियासैठ-सरसैठ इस्वीमे तखन लक्ष्मण झा केँ नाउ सँ कियो आओर लिखैत छलाह। ताहि कारण श्रीमान जीवकान्त जी केँ परामर्श सै उन्नीस सय अरसैठ इस्वीमे 'सागर' धारण केलाह। ताहि दिन सँ लक्ष्मण झा 'सागर' भऽ गेलाह। साहित्यिक सेवा उन्नीस सय छियासठ -सरसैठ सँ आरम्भ केने छलाह। मैथिली आमतौर पर मैथिलीमे वा हिन्दीमे रचनाक आरम्भ करैत छथि । सागरजी सेहो अपन रचना हिन्दीमे लिखलाह। उन्नीस सय अरसैठ सँ मैथिलीमे लिखनाई शुरू केला जे मिथिला मिहिरमे प्रकाशित होइत रहैत छल। सागरजी उन्नीस सय चौरासी सँ लऽ कऽ उन्नीस सय सनतानवे धरि गुवाहाटी आ बोंगाईगाँवमे कम्पीक काजक मादे रहैत छलाह । तकर बाद पुन: कलकत्ता चलि गेलाह। मुदा बीच-बीचमे अबैत छलाह । सन् दू हजार एक इस्वी सँ पूर्वोत्तर मैथिल पत्रिका केँ प्रकाशन आरम्भ भेल छल। हमर मित्र सत्यनन्द पाठक जे एकटा दैनिक समाचार पत्रक सम्पादक छलाह सँ भेंट भेल छलैन्ह । पूर्वोत्तर मैथिलमे छपल सागरजी केँ आलेख हम पढ़त रहैत छलहुँ । मुदर पहिल बेर भेंट कलकत्तामे सर कामेश्वर सिंह के ऊपर एकटा पैघ सेमिनारक दू हजार दू वा तीनमे भेल छल । बहुत ठाम सँ मैथिली (कलकत्ता) आ सागर जी, मनीष झा, छत्तीसगढ़ आ मालदा सँ बहुत मैथिल (जे कालान्तरमे मैथिली छोड़ि बंगाली भाषी भऽ गेल छलाह) सभ सँ भेंट भेल छल। परिचय-पात्र भेल। पछिला दू दशक सँ हम सागर जी सँ जुड़ल छी । मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समितिक वार्षिक बैसारमे सागर जी मंच पर सेहो संग छलैथ। दू हजार चारिमे विवेकानन्द झा, महासचिव विद्यापति स्मारक, कलकत्ता समितिक विद्यापति स्मृति पर्व समारोहमे विशेष अतिथिक रूपमे मंच पर विराजमान भेल छलाह। अपन उद्बोधनमे ओ समितिक अध्यक्ष रूपमे हमरा आ पाठकजी केँ कलकत्ता आमंत्रित केने छलाह। दस मार्च दू हजार पाँचमे हम आ पाठकजी दूनू गोटे कलकत्ता पहुँचल रही । हम पटना सँ आ पाठकजी गुवाहाटी सँ। पहिल बेर कोनो संस्था द्वारा मिसांसस के अध्यक्षक रूपमे हमरा विद्यापति स्मारक मंच के अध्यक्ष आदरणीय शारदा बाबू अभिनन्दन पत्र सँ आ मिथिलाक परम्परा अनुसारे पाग- दोपटा-चादर सँ सम्मान केने छलाह । कार्यक्रम एकटा धर्मशालामे शायद भेल छलैक। पाठक जी दस मार्च के रातिमे ट्रेन सँ समस्तीपुर गेलाह, जतय हुनका एकटा सम्मान भेटबाक रहैन्ह आ हमरा कलकत्ताक रिसड़ा हुबलीक संस्था 'मिथिला युवा परिषद' सँ सेहो सम्मानित होबाक छल। दस मार्चक दिन आराम करबाक लेल व्यवस्था देख सागरजी कनि क्षोभ व्यक्त करैत बजलाह- चौधरी जी, हम सभ कार्यक्रमक बाद भोजन कऽ कऽ अपने कें अपना डेरा लय जायब । हमरा बहुत कहला के बादो 'सागर जी' आ भौजी शैलजी नहि मान ली । रातिमे दूनू गोटे संगे हम संतोषपुर स्थित निवास स्थान (फ्लैट) पर पहुँच कऽ गप्प-शप्प करैत रहलौँ । कखन नीन आबि गेल पता नहि चलल । दोसर दिनक कार्यक्रम लेल राति अहिठाम रहबाक छल । हम परिषदक अध्यक्ष संग-संग सागर जीक आ स्व. रामलोचन ठाकुर जी, श्रीमती शैल झाक आओर बहुत रास गणमान्य मैथिल व्यक्तित्व सँ परिचय भेल छल । ऑल इण्डिया रेडियो, दरभंगा केँ मणिकान्त झा जी सँ सेहो पहिल बेर रिसड़ा भेंट भेल छल। रिसड़ाक आयोजनमे भाग लेबाक लेल हम सभ गोटे संतोषपुर सँ भोजनोपरान्त विदा भऽ गेल रही । स्टेशन सँ लोकल ट्रेन पकड़ि कऽ रिसड़ा पहुँचल रहि । विवेकानन्द झा जी पहिने सँ सभ व्यवस्थामे लागल छलाह। मंचस्थ ओ सम्मानित भेलाक बाद दू शब्द हमरो बाजबाक लेल समय भेटल छल । कार्यक्रम सफल रहल। हम वापस पटना आदि गेल रही । समय बितैत रहल, हमर आपसी सम्बन्ध प्रागढ़ होइत रहल । बीच-बीचमे पूर्वोत्तर मैथिलमे हुनकर कविता - आलेख छपैत रहैत छल । एकटा पैघ भायक मार्गदर्शन भेटैत रहल | 2009 ई. मे हमरा आ मित्र पाठक जी केँ बीच संस्थाक लऽ कऽ सम्बन्धमे खटास आबि गेल छल जकर परिणति एकटा दोसर संस्था खोलि कऽ केलाह । ओहि विकट समयमे सागरजी हमरा हर तरह सँ सहयोग आ सहायता केलाह। संगहि पाठक जी संग सेहो अपन सम्बन्ध बनने रहला । हमरा बुझने पहिल कविता संग्रह 'उचरि बैसू कौआ' 2010 ई. मे गुवाहाटी सँ प्रकाशित छल। तकर बाद पुन: 2020 ई मे 'एहि गदह बेर मे' कविता-गजल संग्रह आ 2021 ई मे 'जेना ओ कहलनि' साक्षात्कार संग्रह प्रकाशित भेल । वर्तमान समयमे बहुत राय पोथी जेना 'कनसोह (वार्ता कथा ), मिथिलाम (निबन्ध संग्रह), अक्षत चानन (संस्मरण संग्रह) जखन जे जेना (टिप्पणी संग्रह), पत्राचार ( पत्र साहित्य) सभ प्रेसमे अछि। सागर जी मिथिलाक भीतर आ बाहर बहुतो साहित्यिक-सांस्कृतिक, सामाजिक संस्था सभ सँ सम्मानित भेलाह अछि साहित्यकार सम्मान, मधुबनी ( 2017 ), मातृभाषा संवर्धन सम्मान, कोलकत्ता (2017), बाबू साहेब चौधरी सम्मान, दिल्ली (2017), डॉ. इन्द्रकान्त झा सम्मान, दरभंगा ( 2018 ), मुंशी रघुनन्दन दास सम्मान, कोलकता (2019)। अपन मातृभाषाक प्रति अगाढ़ प्रेम, सम्मान कें कारण कोलकाता, गुवाहाटी, दरभंगा आ दिल्लीक संस्था सँ जुड़ल छथि। मैथिलीक उन्नयनतक लेल सदैव चिंतन आ प्रयास करैत रहैत छथि । अपन लेखकीय धर्मक पालन निडर, निर्भीक स्पष्टवादिताक संग ईमानदारी हिनक पूँजी अछि । शाश्वत मिथिलाक भूमि पूजन कार्यक्रममे पुनः हम सभ एकबेर अहमाबाद गाँधीनगर गुजरात मे भेटल रही। बहुत अह्लादित आ प्रसन्न छलाह । अहि बीच सागरजी फेसबुक पर किछु व्यक्ति विशेष (अपन नजरि सँ ) के बारे मे लिखलाह । एखनो क्रम जारी अछि जाहि मे ओ अपन मंतव्य दैत रहैत छथि । जीबै तँ बहुत मनुख अछि मुदा ओ जीबैत छथि संवेदनशील छथि । जखन कखनो कोनो समस्या बुझना जायत अछि तँ श्रेष्ठ भ्राताक स्नेह आ परामर्श भेटैत अछि। ईश्वर सँ प्रार्थना जे स्वस्थ या दीर्घायु रहैथ। संपादकीय टिप्पणी- एहि आलेख संग किछु फोटो सेहो छल जे कि टेक्स्टमे बदलबाक समयमे हटि गेल। २.१९.आशीष अनचिन्हार- लक्ष्मण झा 'सागर' हमरा नजरिमे आशीष अनचिन्हार, संपर्क-8876162759 लक्ष्मण झा 'सागर' हमरा नजरिमे हमरा लग सागरजीक जे किछु अनुभव अछि से नीक बेजाए दूनू तरहक अछि आ से एकपक्षीय नै, सागरोजी लग हमरासँ संबंधित अनुभव नीक-बेजाए दूनू तरहक छनि। एकरा बराबरीक मामिला कहि सकैत छी। मुदा हमर आ विदेह दूनूक मानब अछि जे साहित्यमे दुइए चीज कारक छै पहिल रचनाकारक चरित्र आ दोसर ओकर साहित्यिक काज। आ ताहि स्तरपर सागरजी ठीक छथि। तँइ बहुत मुद्दापर दूनू आदमीक बीच असहमति रहितो संवाद बंद नै भेल। शुरू-शुरूमे हम बहुत आहत भेल रही सागरजीसँ से दू कारणसँ पहिल कारण छल हुनकर एक आलेख छपल छलनि भारती-मंडनमे जाहिमे कलकत्ताक उपर आलेख छल आ हमरे नाम गाएब। जखन कि मानसा-वाचा-कर्मणा हम सभ दिन हम कलकत्ते केर रहलहुँ। दोसर कारण छल, सागरजीक फेसबुकपर पोस्ट जे कि रामलोचन ठाकुरजीक खराप मानसिक हालतमे गाएब भेलाक बाद लिखल गेल छल। एहू पोस्टसँ आहत भेल रही हम। मुदा जेना कि पहिने कहलहुँ असहमति केर बीचोमे संवाद बंद नै भेल। आखिर संवाद बंदो किएक हेबाक चाही? साहित्यमे ने ओ हमर घर दखल केने छथि आ ने हम हुनकर आरि छाँटि लेने छियनि। ई अलग बात जे अधिकांश साहित्यकार साहित्यिक लड़ाइकेँ घरक लड़ाइ मानि गबदी मारि लै छथि। एहि आलेखमे हम किछु एहन बिंदुक उल्लेख करब जे कि सागरजीक श्वेत-श्याम छवि राखत समाजक बीचमे। आ एहि लेल हिनकर समग्र काजकेँ चारि खंडमे बाँटि रहल छी- 1) लेखक-संपादक रूपमे 2) फेसबुकपर हुनकर उपस्थितिक रूपमे 3) पत्र-पत्रिका लेल सहयोगक रूपमे 4) मैथिली साहित्य लेल नव लेखककेँ प्रोत्साहित करबाक रूपमे आब विस्तारसँ एक-एक बिंदुपर आबि चार्चा करब। 1) लेखक रूपमे किछु रचना हम सागरजीक पढ़ने छी मुदा पोथी नै पढ़ि सकल छी तँइ हुनकर समग्र साहित्य केर चर्चा हम एहि ठाम नहि कऽ सकब। मुदा संपादन केर क्षेत्रमे हिनक कलकत्ता विशेषांक केर अंक सभ देखबाक भेटल अछि। हिनकर संपादनमे दू बेर कलकत्ता विशेषांक प्रकाशित भेल अछि आ से कलकत्तापर अध्ययन करबाक लेल सहायक अछि। ई दूनू अंक गौहाटीसँ प्रकाशित भेल अछि। 2) फेसबुकपर सागरजीक उपस्थिति सभ लेल एक रंग नहि अछि। जेना कि हमहूँ सूचित केने छी हुनक एक पोस्टसँ हम आहत भेल छी तेनाहितो आनो कियो आहत भेल हेता वा भविष्योमे हेताह। मुदा ई सागरजीक विचार छनि जाहिसँ कियो सहमत वा असहमत भऽ सकैए। आ असहमति केर ई मतलब नै छै जे सागरजी वा कि आन कियो विचार राखब छोड़ि देताह। फेसबुकपर हिनकर विचार अतेक उत्कट भऽ जाइत छनि जे हिनकर प्रसंशको हिनकासँ मूँह मोड़ि लैत अछि। मुदा तकर बादो एहि विचार सभहक एकटा सकारात्मक पक्ष ई जरूर छै जे ओ संवाद लेल पुल बनि जाइत छै से संवाद चाहे सहमति केर हो वा कि असहमति केर हो। अधिकांश मैथिल लेखक सभहक एकटा खास विशेषता अछि जे ओ खुलि कऽ असहमति नै व्यक्त करत मुदा आपसी गप्प-सप्पमे ओहि लोकक चरित्र हनन करत जकरा ओ पसंद नै करै छथि। ई चरित्र हनन करए बला सभ खुलि कऽ एहि दुआरे नै बाजि पाबै छथि कहीं किनकोसँ लाभ ने छुटि जाए। आ एहने लोक सभ चरित्र हनन बेर-बेर करैत भेटि जाएत। सागरोजीक लेल इएह नियम छै। कियो अपवाद नै। हमरा तऽ सागरजीसँ असहमति भेल अछि आ तकरा हम सार्वजनिको कऽ रहल छी। आनोकेँ करबाक चाही। 3) आइ धरि जे हम देखलहुँ ताहिमे हमरा बुझाएल जे मैथिलीक अधिकांश नव-पुरान पत्र-पत्रिका (प्रिंट बला)केँ यथाशक्ति आर्थिक सहायता करैत छथिन सागरजी। जाहि भाषामे पत्रिका बंद हेबाक पहिल कारण आर्थिक ताहि भाषामे सागरजीक ई सहायता कतेक महत्वपूर्ण हेतै तकर आकलन पाठक कऽ सकै छथि। 4) सागरजी नव लोककेँ मैथिली साहित्य लेल सेहो प्रोत्साहित करै छथिन। कलकत्ता केर बहुत लोक आॉफलाइन रूपें कहै छथि जे योगेन्द्र पाठक 'वियोगी' जीकेँ मैथिलीमे प्रोत्साहित करबाक श्रेय सागरजीकेँ जाइत छनि। कलकत्तासँ जुड़ल लेखक एवं पाठक सभ कहै छथि जे बेशक वियोगीजी किछु संस्थाक कार्यक्रममे पहिनेसँ जाइत छलाह मुदा हुनकर परिचिति एकटा वैज्ञानिकक छलनि, साहित्यकारक नहि। हुनकर साहित्य केर प्रारंभ सागरजीक संरक्षणमे भेल, जाहिमे वियोगीजीक प्रारंभिक रचनाक परिमार्जनसँ लऽ कऽ ओकरा विभिन्न पत्रिकामे प्रकाशित हेबाक संपर्क-सूत्र धरि छल। आ तकर बाद धीरे-धीरे रामलोचन ठाकुरजीसँ वियोगीजीक परिचय भेलनि। ई हमर व्यक्तिगत अनुभव अछि जे कोनो नव लेखक सीधे रामलोचनजी लग नै पहुँचि सकै छलाह। कलकत्तामे रहलाक बाद ओहिठामक साहित्यकारसँ हमरा कोना परिचय भेल से हम सार्वजनिक केने छियै। बजाप्ते हम अपन पोथी "मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास" धरिमे दर्ज केने छियै। पाठक लेल हम अपन फेसबुक पोस्ट केर स्क्रीन शाट राखि रहल छी। एहिसँ दू बातक पता चलत पहिल जे हम अपन प्रारंभिक मदति केनिहारक कृतज्ञता भाव रखने छी आ दोसर बात ई जे कियो अचानके रामलोचनजी लग नै पहुँचि सकै छलाह। एहि संक्षिप्त आलेखमे संपूर्णता नै आबि सकैए मुदा हम जे देखलहुँ एवं आॉफलाइन चर्चा सुनलहुँ ताहि आधारपर अपन विचार रखबाक प्रयास केलहुँ अछि। 20 || http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA लक्ष्मण झा ’सागर’ विशेषांक विदेह ३८२ म अंक १५ नवम्बर २०२३ (वर्ष १६ मास १९१ अंक ३८२)|| 21

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