VIDEHA — Issue 383 / अंक ३८३

Publication: VIDEHA · Issue: 383
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ISSN 2229-547X VIDEHA 𑒀 विदेह ३८३ म अंक ०१ दिसम्बर २०२३ (वर्ष १६ मास १९२ अंक ३८३) [विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। कॉपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति ‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२३. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२३. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. 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It is a platform for scholars, researchers, writers and poets to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, and poetry in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@gmail.com. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover designed by AUM GAJENDRA THAKUR Videha e-Journal: Issue No. 383 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अक्खर खम्भा (आखर खाम्ह) तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ (कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।) माने आखर रूपी खाम्ह निर्माण कऽ ओइपर (गद्य-पद्य रूपी) मंच जँ नै बान्हल जाय तँ ऐ त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लत्ती केना पसरत। शुक्ल यजुर्वेद (२६.२)-यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः। ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च।।हम सभ गोटेकें ई पवित्र वाणी (वेदवाणी) सुनाबी। ब्राह्मणकें, क्षत्रियकें, शूद्रकें आ आर्यकें; अपन लोककें आ अपरिचितकें सेहो (माने सभकें)। मुदा ऐ वेदवाक्यक विपरीत मनुस्मृति वेदवाणीक अध्ययन/ श्रवणकें समाजक किछु गोटे लेल निषेध करऽ चाहलक, मुदा स्मृति सेहो वेदवाक्यकें प्रमाण मानैत अछि (शब्द प्रमाण) तें तकर विरुद्ध देल ओकर निर्देश स्वयं अमान्य भऽ जाइत अछि। Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. -Robert Louis Stevenson ------------------------------------- Videha: Maithili Literature Movement 𑒀 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्ति: 𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱: अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृ. २-११) १.२.अंक ३८२ पर टिप्पणी (पृ. १२-१२) गद्य २.१.आशीष अनचिन्हार- की अप्रमाणिक आलोचना एवं इतिहास केर लेखन करै छथि तारानंद वियोगी? (पृ. १५-४६) २.२.परमानन्द लाल कर्ण- कातिक मासक माहात्म्य (पृ. ४७-५०) २.३.निर्मला कर्ण- अग्निशिखा खेप ३१ (पृ. ५१-५६) २.४.सूर्य नारायण कामत- भवितव्य (पृ. ५७-५९) २.५.'गणित डायरी'- सदानन्द पाल/ बिहैन कथा - दुर्घटनाक पछोर/ मैथिली लघुकथा- बत्तीस गामाक सर्रे/ पोथी चर्चा- स्पेशल परमिट (पृ. ६०-७१) २.६.नन्दविलास राय- संस्कार (पृ. ७२-७३) २.७.रबीन्द्र नारायण मिश्र- हमर साहित्यिक यात्रा (पृ. ७४-९१) २.८.डा. किशन कारीगर-मिथिला मैथिली के नाम पर दललपनी आ चलकपन/ चोरनुकबा गोंसाई (हास्य कटाक्ष) (पृ. ९२-९८) २.९.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा- समयक चक्र/ संवेदना/ ओ सत्ते बताह छल (पृ. ९९-१०२) २.१०.रबीन्द्र नारायण मिश्र- ठेहा परक मौलाएल गाछ (धारावाहिक) (पृ. १०३-१२२) पद्य ३.१.आचार्य रामानंद मंडल-आदिकवि सरहपा/ मिथिला धरती/ कपूत!/ राम!/ गीत लिखूं (पृ. १२४-१३३) ३.२.लालदेव कामत- तानल घोघ (पृ. १३४-१३६) ३.३.पवन मिश्र "गोनौली"-अगहन मास/ संस्कारक चूकल (पृ. १३७-१४२) ३.४.जगदानन्द झा 'मनु'- ४ टा गजल (पृ. १४३-१४७) ३.५.प्रमोद झा 'गोकुल'- आङ उघार छी हम/ पुरना पाजी (पृ. १४८-१५०) 𑒀 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्तिः पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म 𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑓁 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒰𑒣: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒼𑒭𑒡𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹 𑒠𑒹𑒫𑒰: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧 ब्रह्मणसँ प्रार्थना जे द्युलोकमे, अंतरिक्षमे, पृथ्वीपर, जलमे, औषधमे, वनस्पतिमे, विश्वमे, सभ देवतागणमे आ ब्रह्ममे शांति हुअय। ॐ-ब्रह्मण, द्यौ-सूर्य-तरेगण, अंतरिक्ष- पृथ्वी आ द्यूलोकक बीच, आप:-जल, विश्वेदेवा- सभ देवता, ब्रह्म- सर्जक। 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝𑒮𑒿 𑒣𑓂𑒩𑒰𑒩𑓂𑒟𑒢𑒰 𑒖𑒹 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒧𑒹, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭𑒧𑒹, 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲𑒣𑒩, 𑒖𑒪𑒧𑒹, 𑒎𑒭𑒡𑒧𑒹, 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒱𑒧𑒹, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒧𑒹, 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰𑒑𑒝𑒧𑒹 𑒂 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒧𑒹 𑒬𑒰𑓀𑒞𑒱 𑒯𑒳𑒁𑒨। 𑓇-𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝, 𑒠𑓂𑒨𑒾-𑒮𑒴𑒩𑓂𑒨-𑒞𑒩𑒹𑒑𑒝, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭- 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒂 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒏 𑒥𑒲𑒔, 𑒂𑒣:-𑒖𑒪, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹𑒠𑒹𑒫𑒰- 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰, 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧- 𑒮𑒩𑓂𑒖𑒏। 𑒀 ॐ, स॒हस्र॑शीर्षा॒ पुरु॑षः। स॒ह॒स्रा॒क्षः स॒हस्र॑पात्। 𑓇, 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒬𑒲𑒩𑓂𑒭𑒰↓ 𑒣𑒳𑒩𑒳↑𑒭𑓁। 𑒮↓𑒯↓𑒮𑓂𑒩𑒰↓𑒏𑓂𑒭𑓁 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒣𑒰𑒞𑓂। स भूमिं॑ ग्वंग वि॒श्वतो॑ वृ॒त्वा। अत्य॑तिष्ठद् दशाङ्गु॒लम्॥ 𑒮 𑒦𑒴𑒧𑒱𑓀↑𑓅 𑒫𑒱↓𑒬𑓂𑒫𑒞𑒼↑ 𑒫𑒵↓𑒞𑓂𑒫𑒰। 𑒁𑒞𑓂𑒨↑𑒞𑒱𑒭𑓂𑒚𑒠𑓂 𑒠𑒬𑒰𑒓𑓂𑒑𑒳↓𑒪𑒧𑓂॥ हजार माथ, हजार आँखि, हजार पएर संग विश्वकेँ आच्छादित केने अछि, दस आंगुरक गनतीक वशमे नै अछि ओ। प॒द्भ्याग्ँ॑ शू॒द्रो अ॑जायत॥ 𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑒑𑓂𑒿↑ 𑒬𑒴↓𑒠𑓂𑒩𑒼 𑒁↑𑒖𑒰𑒨𑒞॥ पएरसँ शूद्रक उत्पत्ति भेल॥ प॒द्भ्यां भूमि॒र्दिशः॒ श्रोत्रा᳚त्। 𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑓀 𑒦𑒴𑒧𑒱↓𑒩𑓂𑒠𑒱𑒬𑓁↓ 𑒬𑓂𑒩𑒼𑒞𑓂𑒩𑒰↑↑𑒞𑓂। मुदा पएरेसँ भूमियोक उत्पत्ति। ❀ (White Florette- innocence and purity) ☸ (Wheel of Dharma) ࿕(Swastik) 𑓅 (Gwang ग्वंग- two small circles connected by u and a dot placed over it, used in reference of Vedic texts) ꣼ (सिद्धिरस्तु, सिद्धम 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒱𑒩𑒮𑓂𑒞𑒳, 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒧 Devanagari Anji) ঀ (Bengali Anji, Siddham) 𑒀 (Tirhuta Anji, Ankush of Ganeshji, placed at the beginning of something) 𑒀

१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.अंक ३८२ पर टिप्पणी १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय दोहा/ रोला/ कुण्डलिया/ छन्द विचार दोहा दोहा मात्रिक छन्द अछि। दोहामे दू पाँती आ चारि चरण होइत अछि। पहिल चरणमे १३,दोसर चरणमे ११,तेसर चरणमे १३आ चारिम चरणमे ११ मात्रा होइत अछि। पहिल आ तेसर चरणक आरम्भ जगणसँ (जगण U। U) नै हएत आ दोसर आ चारिम चरण अन्त हएत दीर्घ-ह्रस्वसँ। रोला रोला सेहो मात्रिक छन्द अछि। रोलामे चारि पाँती आ आठ चरण होइत अछि। पहिल चरणमे ११, दोसर चरणमे १३, तेसर चरणमे ११ आ चारिम चरणमे १३ मात्रा, पाँचम चरणमे ११, छअम चरणमे १३ मात्रा होइत अछि। सभ पाँतीक पहिल चरणक अन्तमे दीर्घ-ह्रस्व, वा ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व होइत अछि। सभ पाँतीक दोसर चरणक अन्तमे चारिटा ह्रस्व, वा दूटा दीर्घ, वा दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व (भगण । U U), वा ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ (सगण U U ।) होइत अछि। रोलाक प्रारम्भ ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्वसँ नै करू। कुण्डलिया दोहा आ रोलाक कुण्डली (मिश्रण) भेल कुण्डलिया। दोहा लिख दियौ, फेर दोहाक अन्तिम चरणकेँ (११ मात्रा बला) रोलाक पहिल चरण बना दियौ (पुनरावृत्ति) आ फेर रोला जोड़ू। खाली ई ध्यान राखू जे दोहाक पहिल चरणक पहिल शब्द आ रोलाक अन्तिम चरणक अन्तिम शब्द एक्के रहए। कुण्डलियाक पहिल शब्द आ अन्तिम शब्द एक्के होइए। कुण्डलियाक चारिम आ पाँचम चरण सेहो एक्के होइए। छन्द विचार साहित्यक दू विधा अछि गद्य आ पद्य।छन्दोबद्ध रचना पद्य कहबैत अछि-अन्यथा ओ गद्य थीक। छन्द माने भेल-एहन रचना जे आनन्द प्रदान करए। छन्द दू प्रकारक अछि।मात्रिक आ वार्णिक। मात्रिक गणना मैथिलीक उच्चारण निर्देश आ ह्रस्व-दीर्घ विचारपर आउ। शास्त्रमे प्रयुक्त ‘गुरु’ आ ‘लघु’ छंदक परिचय प्राप्त करू। तेरह टा स्वर वर्णमे अ,इ,उ,ऋ,लृ - ह्र्स्व आर आ,ई,ऊ,ऋ,ए.ऐ,ओ,औ- दीर्घ स्वर अछि। ई स्वर वर्ण जखन व्यंजन वर्णक संग जुड़ि जाइत अछि तँ ओकरासँ ‘गुणिताक्षर’ बनैत अछि। क्+अ= क, क्+आ=का । एक स्वर मात्रा आकि एक गुणिताक्षरकेँ एक ‘अक्षर’ कहल जाइत अछि। कोनो व्यंजन मात्रकेँ अक्षर नहि मानल जाइत अछि- जेना ‘अवाक्’ शब्दमे दू टा अक्षर अछि, अ, वा । १. सभटा ह्रस्व स्वर आ ह्रस्व युक्त गुणिताक्षर ‘लघु’ मानल जाइत अछि। एकरा ऊपर U लिखि एकर संकेत देल जाइत अछि। २. सभटा दीर्घ स्वर आर दीर्घ स्वर युक्त गुणिताक्षर ‘गुरु’ मानल जाइत अछि, आ एकर संकेत अछि, ऊपरमे एकटा छोट -। ३. अनुस्वार किंवा विसर्गयुक्त सभ अक्षर गुरू मानल जाइत अछि। ४. कोनो अक्षरक बाद संयुक्ताक्षर किंवा व्यंजन मात्र रहलासँ ओहि अक्षरकेँ गुरु मानल जाइत अछि। जेना- अच्, सत्य। एहिमे अ आ स दुनू गुरु अछि। जेना कहल गेल अछि जे अनुस्वार आ विसर्गयुक्त भेलासँ दीर्घ होएत तहिना आब कहल जा रहल अछि जे चन्द्रबिन्दु आ ह्रस्वक मेल ह्रस्व होएत। माने चन्द्रबिन्दु+ह्रस्व स्वर= एक मात्रा संयुक्ताक्षर: एतए मात्रा गानल जाएत एहि तरहेँ:- क्ति= क् + त् + इ = ०+०+१= १ क्ती= क् + त् + ई = ०+०+२= २ क्ष= क् + ष= ०+१ त्र= त् + र= ०+१ ज्ञ= ज् + ञ= ०+१ श्र= श् + र= ०+१ स्र= स् +र= ०+१ शृ =श् +ऋ= ०+१ त्व= त् +व= ०+१ त्त्व= त् + त् + व= ० + ० + १ ह्रस्व + ऽ = १ + ० अ वा दीर्घक बाद बिकारीक प्रयोग नहि होइत अछि जेना दिअऽ आऽ ओऽ (दोषपूर्ण प्रयोग)। हँ व्यंजन+अ गुणिताक्षरक बाद बिकारी दऽ सकै छी। ह्रस्व + चन्द्रबिन्दु= १+० दीर्घ+ चन्द्रबिन्दु= २+० जेना हँसल= १+१+१ साँस= २+१ बिकारी आ चन्द्रबिन्दुक गणना शून्य होएत। जा कऽ = २+१ क् =० क= क् +अ= ०+१ किएक तँ क केँ क् पढ़बाक प्रवृत्ति मैथिलीमे आबि गेल तेँ बिकारी देबाक आवश्यकता पड़ल, दीर्घ स्वरमे एहन आवश्यकता नहि अछि। U- ह्रस्वक चेन्ह ।- दीर्घक चेन्ह एक दीर्घ । =दूटा ह्रस्व U वार्णिक गणना संयुक्त्ताक्षरकेँ  एक गानू आ  हलन्तक/ बिकारीक/ इकार आकार आदिक गणना नहि करू। वार्णिक छन्दक परिचय लिअ। एहिमे अक्षर गणना मात्र होइत अछि। हलंतयुक्त अक्षरकेँ नहि गानल जाइत अछि। एकार उकार इत्यादि युक्त अक्षरकेँ ओहिना एक गानल जाइत अछि जेना संयुक्ताक्षरकेँ। संगहि अ सँ ह केँ सेहो एक गानल जाइत अछि।द्विमानक कोनो अक्षर नहि होइछ।मुख्य तीनटा बिन्दु यादि राखू- 1.हलंतयुक्त्त अक्षर-0 2.संयुक्त अक्षर-1 3.अक्षर अ सँ ह -1 प्रत्येक। आब पहिल उदाहरण देखू ई अरदराक मेघ नहि मानत रहत बरसि के=1+5+2+2+3+3+3+1=20 मात्रा आब दोसर उदाहरण देखू पश्चात्=2 मात्रा आब तेसर उदाहरण देखू आब=2 मात्रा आब चारिम उदाहरण देखू स्क्रिप्ट=2 मात्रा मुख्य वैदिक छन्द सात अछि-गायत्री,उष्णिक् ,अनुष्टुप् ,बृहती,पङ् क्त्ति,त्रिष्टुप् आ  जगती। शेष ओकर भेद अछि अतिछन्द आ  विच्छन्द। छन्दकेँ अक्षरसँ चिन्हल जाइत अछि। यदि अक्षर पूरा नहि भेलतँ एक आकि दू अक्षर प्रत्येक पादमे बढ़ा लेल जाइत अछि।य आ व केर संयुक्ताक्षरकेँ क्रमशः इ आ  उ लगा कय अलग केल जाइत अछि।जेना- वरेण्यम्=वरेणियम् स्वः= सुवः गुण आ वृद्धिकेँ अलग कयकेँ सेहो अक्षर पूर कय सकैत छी। ए= अ + इ ओ= अ + उ ऐ= अ/आ + ए औ= अ/आ + ओ सरल वार्णिक छन्दमे ह्रस्व आ दीर्घक विचार नै राखल जाइए। मुदा वार्णिक छन्दमे ह्रस्व आ दीर्घक विचार राखल जा सकैत अछि, कारण वैदिक वर्णवृत्तमे बादमे वार्णिक छन्दमे ई विचार शुरू भऽ गेल छल:- जेना तकैत रहैत छी ऐ मेघ दिस तकैत (ह्रस्व+दीर्घ+दीर्घ)- वर्णक संख्या-तीन रहैत (ह्रस्व+दीर्घ+ह्रस्व)- वर्णक संख्या-तीन छी (दीर्घ) वर्णक संख्या-एक ऐ (दीर्घ) वर्णक संख्या-एक मेघ (दीर्घ+ह्रस्व) वर्णक संख्या-दू दिस (ह्रस्व+ह्रस्व) वर्णक संख्या-दू मात्रिक छन्दमे द्विकल, त्रिकल, चतुष्कल, पञ्चकल आ षटकल अन्तर्गत एक वर्ण (एकटा दीर्घ) सँ छह वर्ण (छहटा ह्रस्व) धरि भऽ सकैए। द्विकलमे- कुल मात्रा दू हएत, से एकटा दीर्घ वा दूटा ह्रस्व हएत। त्रिकलमे कुल मात्रा तीन हएत- ह्रस्व+दीर्घ, दीर्घ+ह्रस्व आ ह्रस्व+ह्रस्व+ह्रस्व; ऐ तीन क्रममे। चतुष्कलमे कुल मात्रा चारि; पञ्चकलमे पाँच; षटकलमे छह मात्रा हएत। वार्णिक छन्द तीन-तीन वर्णक आठ प्रकारक होइत अछि जे “यमाताराजसलगम्” सूत्रसँ मोन राखि सकै छी। आब कतेक पाद आ कतऽ यति,अन्त्यानुप्रास देबाक अछि; कोन तरहेँ क्रम बनेबाक अछि से अहाँ स्वयं वार्णिक/ मात्रिक आधारपर कऽ सकै छी, आ विविधता आनि सकै छी। वर्ण छन्दमे तीन-तीन अक्षरक समूहकेँ एक गण कहल जाइत अछि। ई आठ टा अछि- यगण  U।। रगण ।U। तगण ।। U भगण । U U जगण U। U सगण U U । मगण ।।। नगण U U U एहि आठक अतिरिक्त दूटा आर गण अछि- ग / ल ग- गण एकल दीर्घ । ल- गण एकल ह्रस्व U एक सूत्र- आठो गणकेँ मोन रखबा लेल:- यमाताराजभानसलगम् आब एहि सूत्रकेँ तोड़ू- यमाता U।। = यगण मातारा  ।।। = मगण ताराज ।। U = तगण राजभा ।U। = रगण जभान U। U = जगण भानस । U U = भगण नसल U U U = नगण सलगम् U U । = सगण अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १.२.अंक ३८२ पर टिप्पणी प्रेमकान्त चौधरी

आदरणीय गजेंद्र बाबू नमस्कार। सागर जी पर विदेहक विशेषांक के लेल हार्दिक स्वागत बधाई आ आभार संग प्रशंसनीय काज। साकेत ठाकुर आदरणीय 'सागर जी' सँ संबंधित सब लेख अखने पढ़लौं,नीक लागल, आदरणीय के बारे मे अलग-अलग लेखकक नजरिये अलग-अलग यथा व्यक्तिगत, साहित्यिक,समाजिक दृष्टि सँ अवगत भेलौं हिनकर मिथिला मैथिल क' प्रति सक्रियता सँ विस्तार स' परिचित भेलौं...विदेह पत्रिकाक संपादक समूह के आभार। उदय चन्द्र झा 'विनोद' ऐ काजक असीम आवश्यकता छल। एखन धरिक तमाम विशेषांक खाली स्थानक पूर्ति कयलक अछि। सागर जी वर्तनी सँ निरपेक्ष जतबा सक्रियताक संग मैथिली मे काज करैत छथि तकर नोटिस लेल जायब आवश्यक छल। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.गद्य २.१.आशीष अनचिन्हार- की अप्रमाणिक आलोचना एवं इतिहास केर लेखन करै छथि तारानंद वियोगी? २.२.परमानन्द लाल कर्ण- कातिक मासक माहात्म्य २.३.निर्मला कर्ण- अग्निशिखा खेप ३१ २.४.सूर्य नारायण कामत- भवितव्य २.५.'गणित डायरी'- सदानन्द पाल/ बिहैन कथा - दुर्घटनाक पछोर/ मैथिली लघुकथा- बत्तीस गामाक सर्रे/ पोथी चर्चा- स्पेशल परमिट २.६.नन्दविलास राय- संस्कार २.७.रबीन्द्र नारायण मिश्र- हमर साहित्यिक यात्रा २.८.डाॅ. किशन कारीगर-मिथिला मैथिली के नाम पर दललपनी आ चलकपन/ चोरनुकबा गोंसाई (हास्य कटाक्ष) २.९.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा- समयक चक्र/ संवेदना/ ओ सत्ते बताह छल २.१०.रबीन्द्र नारायण मिश्र- ठेहा परक मौलाएल गाछ (धारावाहिक) २.१.आशीष अनचिन्हार- की अप्रमाणिक आलोचना एवं इतिहास केर लेखन करै छथि तारानंद वियोगी? आशीष अनचिन्हार, संपर्क-8876162759 की अप्रमाणिक आलोचना एवं इतिहास केर लेखन करै छथि तारानंद वियोगी? 1 एहि आलेखकेँ चारि भागमे बाँटल गेल अछि, पहिल- मैथिली मुख्यधाराक आलोचना एवं इतिहास केर विसंगति, दोसर- तारानंद वियोगीजीक लिखल "मैथिली कविताक हजार वर्ष"क भूमिकामे बिना कोनो प्रमाणक कथन आ तकर हमरा द्वारा प्रमाण सहित खंडन, तेसर- प्राचीन मैथिली पद्यमे छन्द निर्धारणमे आएल सुविधा-असुविधा एवं छन्दपर आन-आन विद्वानक विचार, आ चारिम- तारानंद वियोगीजीक पुरान लेखनमे अप्रमाणिक कथनक सूची, उपसंहार ओ हमर अपन निष्कर्ष। वियोगीजीक कथन केर खंडन करबाक लेल हम जे उदाहरण देब से नवसँ पुरान क्रममे देब। मने वियोगीजीक देल अवधिसँ तुरंत पहिनेक अवधि हम देब आ तकर बाद ओहिसँ पुरान उदाहरण सभ दैत चलि जाएब हम। हम उदाहरण पुरानसँ नव क्रममे सेहो दऽ सकैत छलहुँ (मने सभसँ पुरान तथ्य पहिने) मुदा ताहिसँ पाठकक उत्सुकता खत्म भऽ जेतनि आ उदाहरणक संख्या सेहो कम हेतै तँइ हम नवसँ पुरान बला क्रम चुनलहुँ। मुदा संत कवि सभहक उदाहरण सभसँ पहिने देल गेल अछि चाहे ओ कोनो समयक किएक ने होथि। ईहो बात पाठक लग पहुँचनि जे यथासंभव हम कम उदाहरण देबाक प्रयास केलहुँ अछि। बेसी उदाहरण देब तखने संभव जखन हम एहि विषयपर अलग पोथी लीखब। ईहो सूचना देब उचित जे छन्दक नाम हम जाति आधारित लिखलहुँ अछि। एक जातिक छन्द केर बहुत रास उपभाग सेहो संभव छै। जेना विपुला छन्दमे यति केर स्थान परिवर्तनम मात्रसँ ओकर उपभागक नामाकरण भऽ जाइत छै। यति-गति केर विचार करैत हरेक भाग-उपभागक चर्चा अलग पोथीमे संभव हएत। एकटा महत्वपूर्ण सूचना हम अहीठाम हम दऽ दी जे उदाहरण सभमे हम विद्यापति गीतक छन्दक वर्णन नहि केने छी आ तकर कारण अही आलेखमे एक ठाम पाठककेँ पढ़बाक लेल भेटि जेतनि। जेना कि शीर्षकसँ स्पष्ट होइत अछि जे हम तारानंद वियोगी द्वारा लिखल आलोचना / इतिहासपर बात करबाक लेल आएल छी मुदा ताहिसँ पहिने हम मैथिली साहित्य केर मुख्यधाराक आलोचना / इतिहास / समीक्षा / पाठकीय केर विसंगतिपर बात करब कारण इएह विसंगति सभ ओकर विशिष्टता छै- 1) उदाहरण-प्रमाण नै देब, अपन मतक स्थापनासँ पहिनेक लिखल पक्षकेँ नै देब- मैथिली मुख्यधाराक आलोचक / इतिहासकार सभ अपना द्वारा देल तर्कक समर्थनमे कोनो उदाहरण, कोनो प्रमाण नै दऽ पाबै छथि। से चाहे कोनो रचना, कोनो विधा, कोनो आलोचना / इतिहास / समीक्षा / पाठकीय किएक ने हो। किछु बर्खसँ हम देखि रहल छी जे मुख्यधारासँ जुड़ल आलोचक ई बेर-बेर कहैत छथि जे गजलमे बहर (गजलमे प्रयुक्त छंद) एलासँ भाव कमि जाइत छै अथवा हुनकर गजलमे व्याकरण तऽ छनि मुदा भाव नहि....आदि। मुदा अपन एहि सभ बात लेल ओ कोनो एहन शेर अथवा गजलक उदाहरण नै देने छथि, आ दैतो नै छथि। अहिना आनो तथ्य लेल बूझू। आ से स्वाभाविक छै कारण हुनको बूझल छनि जे जखने उदाहरण देबै तखने हमर गलती पकड़ा जाएत। अही बिंदुसँ जुड़ल एकटा आर बिंदु अछि- विरोधी पक्ष के उद्धृत नै करब, तुलनात्मक अध्ययन नै देब। जखन कि कोनो मतक स्थापना करबाक लेल ई अनिवार्य तौरपर करबाक चाही आलोचक / इतिहासकारकेँ। तऽ मैथिली मुख्यधाराक आलोचनाक / इतिहासक ई पहिल लक्षण अछि आ किएक अछि तकर कारण निच्चा दोसर बिंदुमे भेटत।

2) अपन पूर्वाग्रहकेँ, अपन कमजोरीकेँ, पूरा साहित्य, पूरा विधापर थोपि देब- जेना लोक अपन बच्चाक सुंदर नाम राखै छै तेनाहिते मैथिलीक मठाधीश सभ अपन किछु भक्तक नाम आलोचक / इतिहासकार राखै छै मुदा मैथिलीक विरले आलोचक / इतिहासकार साहित्यिक विधामे पारंगत होइत छथि। ई कथित आलोचक / इतिहासकार सभ ज्ञानक अभावमे ई मानि लै छथि जे जँ हमरा लग कोनो ज्ञान नै अछि अथवा हमरासँ कोनो काज नै भऽ सकल तँ ओ ज्ञान, ओ काज ने मैथिलीक भूतकालमे रहल हेतै, ने वर्तमान कालमे छै आ ने भविष्यमे हेतै। अपन पूर्वाग्रहकेँ, अपन कमजोरीकेँ थोपबाक चक्करमे बहुत बेर ई कथित आलोचक / इतिहासकार सभ अपन निष्कर्ष पहिने बना लै छथि तकर बाद आलोचना / इतिहास / समीक्षा / पाठकीय लीखै छथि। संगहि पूर्वाग्रहकेँ, अपन कमजोरीक कारणे ओ आलोचक / इतिहासकार "पौराणिक आलोचना / इतिहास / समीक्षा / पाठकीय लिखबा लेल बाध्य भऽ जाइत छथि। आब ई पौराणिक आलोचना / इतिहास / समीक्षा / पाठकीय की भेलै से निच्चाक तेसर बिंदुसँ जानू।

3) पौराणिक आलोचना / इतिहास / समीक्षा / पाठकीय लीखब- पौराणिक शब्दसँ ई नहि बूझू जे आलोचना / इतिहास / समीक्षा / पाठकीय देवी-देवतासँ संबंधित भेने पौराणिक भेल। पौराणिक आलोचना / इतिहास / समीक्षा / पाठकीय माने "मंच-सापेक्ष" भेनाइ, मने तोरा लग तोरा सन मोरा लग मोरा सन। इएह कारण छै जे पाठक बेर-बेर कहै छथि जे मैथिलीमे गदगदी आलोचना छै। आ अही कारणसँ मैथिली आलोचना / इतिहासमे सार्थक निष्कर्ष केर घोर अभाव भेटत। आ एहि पौराणिक आलोचना केर बहुत रास बच्चा छै जाहिमेसँ एक बच्चाक नाम "गोधियाँवाद" छै। गोधियाँवादी आलोचनामे पहिल भाव रहैत छै- जे हमर पक्षमे छथि हम तिनकेपर लिखब आ हुनक गलतीकेँ झाँपि कऽ लिखब। आ अही कारणसँ हिनक लिखल आलोचना इतिहास केर भाषा अबूझ भऽ जाइत अछि जकर विवरण निच्चाक चारिम बिंदुसँ जानू।

4) गोल-मटोल भाषाक प्रयोग करब- देखल जाइए जे आलोचक आलोचनामे कोनो दोष वा कोनो गलत प्रवृति लीखै छथि तखन ओ "अन्य पुरुष" बला भाषामे आलोचना लिखै छथि मने बातकेँ एतेक घुमा-फिरा कऽ जइसँ ई पता नै चलै जे किनकर दोषक विवरण छै। ई खराप लक्षण। एहन भाषामे आलोचना करए बला या तँ साहसी नै छथि या कोनो लोभ-लाभसँ ग्रस्त छथि तँइ खुलि कऽ नाम सहित नै लीखि पाबै छथि। हमरा हिसाबें ई गलत परंपरा अछि। जँ कोनो रचनामे दोष छै तँ रचनाकारक नाम सहित ओइपर बहस हेबाक चाही। जँ नै तखन आलोचना-समीक्षा लिखबे नै करू। आजुक रचना तँ अपन कथ्यमे सपाट भेल जाइए मुदा आलोचना घुमावदार। जखन रचनाक भाषाकेँ घुमादावर हेबाक चाही आ आलोचनाक भाषा सपाट। कोनो आलोचक गोल-मटोल भाषाक किएक प्रयोग करैत छथि से निच्चाक बिंदुसँ जानू।

5) आलोचना इतिहासमे लिस्ट-लिस्ट (सूची-सूची) केर खेल खेलब- मठाधीश परंपराक आलोचक / इतिहासकार जिनकासँ असहमति छनि रहै छनि तकर नाम काटि अपन सुविधाजनक नाम सभ दै छथि। मठाधीश परंपराक कोनो आलोचना, कोनो इतिहास मे देल सूची-लिस्ट हाथमे लिअ ओ अपूर्ण एवं पूर्वाग्रहसँ भरल भेटत। एहन-एहन आलोचक / इतिहासकार सभहक मोनमे धारणा रहैत छनि जे जँ हम नाम नै लेबै तऽ कियो ओकरा बारेमे बुझबे नै करतै। ओकर नाम इतिहासेसँ कटि जेतै.... आदि। मुदा ई कहाँ संभव छै? अइ सूची सभकेँ जस्टीफाइ करबाक चक्करमे ओ सभ गोल-मटोल भाषाक प्रयोग करै छथि। दोसर कारण जे जखन कोनो आलोचक / इतिहासकार पहिने निष्कर्ष बना कऽ आलोचना / इतिहास / समीक्षा / पाठकीय लीखै तकरो जस्टीफाइ करबाक चक्करमे अबूझ भाषाक प्रयोग करै छथि। जखन एहने आलोचक / इतिहासकार सभहक गलत तथ्यकेँ उजागर कएल जाइत छै तखन, हिनकर गलत तथ्य केर संज्ञान लैत कियो लिखैत अछि तऽ हुनका ई भाव रहैत छनि जे हम नमहर हम एकरा नोटिसे नै लेबै। आब ई नोटिस लेनाइ की भेल तकर विवरण निच्चाक बिंदुमे भेटत।

6) इग्नोर करब / नोटिस नै लेब- जखन कोनो गलत तथ्य बला आलोचना / इतिहास / समीक्षा / पाठकीय केर आलोचना होइत छै तखन ओकर मूल लेखक, ओकर समर्थक गबदी मारि दैत छथि, आ कहै छथि जे एहन बात सभकेँ इग्नोर करू। आ तकर एक मात्र कारण रहैत छै जे हुनका लग वा हुनक समर्थक लग तर्क नहि रहैत छनि। हुनका बूझल रहैत छनि जे बिना तर्कक गेने फेर खतरा भऽ सकैए तँइ उपसँ चुप भला। जइ समाजमे नव-नव लोक आप्त वाक्य बनेलाह अछि "इग्नोरम परम् सुखम्" ठीक ओही समाजमे बहुत पहिनेसँ आप्त छै जे- "मौनं स्वीकृति: लक्षणम्"। लोक-वेद दूनू पारमे मौनं स्वीकृति: लक्षणम् बेसी मानल जाइत छै। तँइ जे कियो ई मानि बैसल छथि जे गबदी मारब, इग्नोर करब बुधियारी छै वस्तुतः बुधियारी नै बल्कि हुनका लग तर्कक अभाव रहैत छनि, तँइ चुप रहैत छथि। एहिसँ अलग कदाचित् जँ कोनो कथित आलोचक / इतिहासकार नोटिस लैतो छथि तऽ भिक्टिम कार्ड खेला कऽ। ई भिक्टिम कार्ड की थिक तकर विवरण निच्चाक बिंदुमे देल गेल अछि।

7) भिक्टिम कार्ड खेलब- जखन मठाधीशी परंपराक आलोचक / इतिहासकार केर आलोचना होइत छनि, हुनकर गलतीकेँ सार्वजनिक कएल जाइत छनि तखन ओ सभ भिक्टिम कार्ड खेलाइत छथि आ अपन समर्थकक सहानुभूति लेबाक प्रयास करैत छथि। भिक्टिम कार्ड बहुत प्रकारक होइत छै मुदा ताहिमे सभसँ बेसी चलन छै, 'ओहन आलोचना जाहिमे किनको गलती पकड़ाएल होइन' ताहि आलोचनाकेँ गारि कहि देब आ जे गलती पकड़ने छनि तिनका बारेमे ई प्रचार करब जे अमुक गारि पढ़ैत छै। मुदा सभसँ बेसी मजा अइ बातमे भेटत जे वएह भिक्टिम कार्ड खेलऽ बला, वएह आलोचनाकेँ गारि कहऽ बला मठाधीशी परंपराक आलोचक / इतिहासकार सभ किनको लेल "अनपढ़" तऽ किनको लेल "पोन पर लौंगिया मेरचाइ घसा गेलनि" सन शब्द, वाक्यांश अथवा वाक्य केर सार्वजनिक प्रयोग करैत रहैत छथि। यदि कोनो आलोचनामे हुनका वा हुनकर कोनो परिवारक लोककेँ वास्तविक गारि देल गेल हो तऽ ओहि आलोचक / इतिहासकारकेँ सबूतक संग एबाक चाही, हमहूँ हुनका संग देबनि हुनकर समर्थनमे रहबनि। बस मात्र एहि कारण कोनो आलोचनाकेँ गारि कहि देब जे ओहिमे हुनकर गलतीकेँ पकड़ल गेल छै से तऽ ने उचित छै आ ने स्वीकार्य। जे कियो एहि प्रचलनकेँ शुरू केलाह अथवा कऽ रहल छथि हुनका लेल साहित्य समुचित स्थान नै छनि।

ऊपरमे जतेक विसंगति छै से मात्र मैथिली आलोचना / इतिहासक विसंगति छै एहि संगे मैथिली आलोचना / इतिहासमे "मैथिली साहित्य केर विसंगति" सेहो जुड़ि जाइत छै। आ से स्वाभाविक छै, कारण मैथिली आलोचना / इतिहास / समीक्षा / पाठकीय सेहो मैथिली साहित्य केर एकटा अंग छै, प्रभाव तऽ पड़बे करतै। आब मैथिली साहित्य केर कोन-कोन विसंगति छै ताहिपर कोनो आन आलेखमे हम चर्चा करब। जतेक बात हम लिखलहुँ से साहित्यमे धतकर्म छै आ एहने धतकर्म सभ करैत आलोचक / इतिहासकार सभ कहै छथि जे संवाद होइत रहबाक चाही। हुनक ईहो आरोप रहैत छनि जे संवाद बंद भऽ रहल छै। यदि ऊपरमे देल कोनो विसंगति कोनो आलोचना / इतिहासमे घटित हो तऽ बूझि जाउ जे ओ आलोचना / इतिहास / समीक्षा / पाठकीय एकांगी अछि आ अप्रमाणिक हेबाक दिस जा रहल अछि।

2 आब हम आबी तारानंद वियोगीजीक लेखनपर। मैथिली साहित्यमे तारानंद वियोगी पहिल आ एकमात्र लेखक छथि जे अपन पोथीमे अपने पहिल विचारसँ अपने लिखल दोसर विचारकेँ खंडन कऽ दैत छथि आ इएह क्रम हुनकर संपूर्ण लेख वा पोथीमे चलैए। एवं क्रमे अपन संपूर्ण पोथीकेँ ओ अपने अप्रमाणिक बना लै छथि। हिनकर एहि प्रवृतिकेँ हम बर्ख 2006 मे अकानने रही जे पाठकीय रूपमे अंतिकाक एकटा अंकमे छपल रहै। कोनो लेखक संगे एहन परिस्थिति तखन अबैत छै जखन ओ कम अध्ययन, एकपक्षीय एवं पूर्वाग्रहग्रस्त अध्ययनक भरोसे बहुत रास बात कहऽ चाहै छै। एकर टटका उदाहरण वियोगिए जीक सद्यः प्रकाशित पोथी "मैथिली कविताक हजार वर्ष" अछि। दू खंडमे ई पोथी अछि। पहिल खंडमे जे भूमिका ( पृष्ठ-12) अछि ताहिमे वियोगीजीक उक्ति छनि- "छन्द मिथिलाक जातीय कविताक वस्तु नहि थिक, ई बात अलग सँ कहबाक बेगरतो हम नहि बुझैत छी। मिथिलाक वस्तु थिक राग, ताल, लय। छन्द मे मैथिली कविता लिखबाक प्रथम प्रयास मनबोध केलनि आ चन्दा झा तँ मानू एकर झड़ी लगा देलनि। हुनकर मिथिलाभाषा रामायण मे अस्सी प्रकारक छन्दक प्रयोग भेल अछि। एहि तरहें मैथिली कविता मे छन्दक प्रयोग आधुनिक काल मे आबि क' तखन शुरू भेल अछि जखन परजीवी पंडितवर्ग के मैथिली कें संस्कृतक पिछलग्गू बनायब अपन वर्चस्व लेल परम जरूरी बुझना गेलनि। आइ स्थिति ई अछि जे छन्दहीन कविते कें विजातीय आ आधुनिक मानि ओकर अवहेलना करबाक उपदेश लिखल भेटैत अछि। सगरो यैह सुनबै जे छन्द थिक मिथिलाक जातीय वस्तु, अप्पन परंपरा जखन कि छन्दमुक्त कविता भेल विजातीय वस्तु। अन्हेर कहल जायत एकरा, मुदा सैह पंडितगोष्ठीमान्य छैक"

एहि कथनमे मनबोधकेँ छन्दमे लिखऽ बला पहिल मानलाह अछि वियोगीजी। जँ मनबोधक उम्र सौ बर्खक मानल जाए तऽ मनबोध केर जन्म 1688 अनुमानित अछि, कारण 1788 मे हुनक मृत्यु हेबाक बात लिखलनि अछि विभिन्न विद्वान। अर्थात वियोगीजीक अनुसारे मैथिलीमे लगभग 1700 ई. सँ छन्द लिखब शुरू भेल मने अट्ठारहम शताब्दीसँ। वियोगीजीकेँ अपन निष्कर्ष देबाक छलनि से दऽ देलाह मुदा एहि लेल कतहुँ प्रमाण नै देलाह। आन-आन बात सभ बहुत भेटल हमरा। खएर मनबोधसँ पहिनेक मैथिली काव्यमे छंद छै तकर किछु उदाहरण हम राखऽ जा रहल छी। शास्त्रीय कवि सभहक उदाहरण देबासँ पहिने हम किछु संत कविक उदाहरण देब आ तकर बाद अपन निर्धारित उदाहरण सभ देब। संत कविमे पहिल उदाहरण अछि साहेब रामदास केर जिनकर एक गीत जे कि गीति छन्द आ पद शैलीमे अछि-

भज राम सरन सीता राम नाम गुन कहत भागवत भगति दिढ़ावत है गीता अछि युगादि निगम गुन गावन घोरि घोरि अमिअ संत पीता

तहिना संत अपूछ दास केर एक गीत जे कि गीति छन्द आ पद शैलीमे अछि-

चित चेतहु दिन चल जाता मातु पिता सुनु संपति नारी, अंत काल छूटिहै नाता

संत कविक चर्चा हो आ लक्ष्मीनाथ गोसाँइ छूटि जाथि से संभव नहि। हुनक एक गीत जे कि दुबई (सार) छन्दमे अछि-

भरि भरि आवत नयना जब जब सुरति पड़े मनमोहन, मूरति श्याम सलोना पीताम्बर की कछनी काछै, कटि किंकणि के बोल सुहाना

आब आबि जाइ शास्त्रीय कवि सभपर। सत्रहम शताब्दीमे भेल नेपालक मल्ल राजा द्वारा रचित गीतमे छन्दक विधान छल आ से प्रो. रामावातार यादव अपन आलेखमे देने छथि से देखू-

निरधनि कर सञो खसल सुहीर मोहि लग साजनि नहि भेल थीर

एहि गीतमे 16 मात्रा प्रति पाद अछि। गीतक आन अंश लेल उक्त आलेख देखल जा सकैए। सोलहम शताब्दीमे गोविन्द दास अपन पदमे छन्दक खूब प्रयोग केने छथि। मात्र एकटा उदाहरण देखू जे कि चौपाई छन्द अछि-

नव अनुरागिनि नव अनुरागी। मिलल दुहू तन गल-गल लागी।। तहिँ एक रङ्गिनि परम रसाला। दुहु गल देल एक फुलमाला।।

उमापतिक समय जे निर्धारित हो मुदा हुनक नाटक केर पारिजात हरण नाटक केर दोसर गीत देखू जे कि गीति छन्द आ पद शैलीमे अछि-

सुरतरु घन उपवन करु मण्डप, वेदि रचल भल हिम अचला अपनहि आनन दान वचन भल, पुनि पुनि पाउनि भवानि भला परमेसरा परमेसरा, जय जय सभ रस पेसरा

हेबाक लेल तऽ एहि नाटक केर पहिल गीत (मंगलगीत सेहो दुबई (सार) छंदमे छै मुदा वियोगीजी अपन प्रगतिशीलताक चक्करमे कहि सकैत छलाह जे धार्मिक गीतमे छंद होइते छै। विदयापतिक समकालीन अमियकरक पद देखू जे कि दुबई (सार) छन्दमे अछि-

सुरत समापि सुतल वर नागर पानि पयोधर आपी कनक-सम्भु जनि पूजि पुजारए धएल सरोरुह झाँपी। बदन मेराए धएल मुखमण्डल कमले मिलल जनि चन्दा भमर चकोर दुअओ अलसाएल पीबि अमिअ मकरन्दा।

मैथिली - धूर्त्त समागम केर एक गोट पदमे दुबई (सार) छन्द देखू-

न लइ पथिक तरुण व (ओ' ) सु रे एखने हमर गमन नहि दूरे दिवस क X X (1ल्याण) अतिथि (1म)ञे तोरा चिन्तहि धनिक स (सं) भोयण (ल) मोरा भगव देखि [13ख] अलङ्कार बुझावे कविशेषर जोतिक एहु गावे

मैथिली - धूर्त्त समागम केर दोसर पदमे गीति छन्द देखू (30 मात्रा)-

भिखिया मोरि करब रे। सुवदनि भिखिया मोरि करब रे आ ॥ ध्रुवं ।

मासु माछ बल बटिका सांजवि सद्य (?) सुनि साग परोले आ । मुद्ग दितले परकार करव सबे सङ्गिनि कहञ थोले आ ।

तहि दिन जनमाओल दधि सुनु सत्वर सोन्ध दूध बड़ घीवे । केरा सङ्गि रस वेद्य (?) युगुताओव कविशे[15क]षर जोतिक एह गावे ॥

ऊपरक उदाहरण देखलाक बाद आब फेर पोथी "मैथिली कविताक हजार वर्ष" लग घुरि आबी। भूमिकाक बाद एहि पोथीक पहिल अध्याय अछि "मैथिली सिद्धसाहित्य" जाहिमे ओ दोहाकोश, चर्यापद, डाकार्णव सभकेँ समेटने छथि मुदा विशेष चर्चा केने छथि चर्यापदपर (पृष्ठ-19-60)। ओहि पोथीमे चर्यापदक भाषाकेँ मैथिली कहल गेल अछि मुदा जाहि तर्कपर कहल गेल अछि ओहि तर्कपर तऽ दोहाकोश सेहो मैथिली थिक। भीमनाथ झाजीक एकटा लेख केर उद्धरित केने छथि जाहिमे लिखल छै जे चर्यापदक अधिकांश सिद्ध विदेह एवं विदेहक नजदीकक छलाह जकर भाषा मैथिली रहल हेतै तँइ चर्यापद मैथिलीक भेल। चर्यापदमे सरहपाद केर पद छनि आ जँ ओ मैथिली भेल तखन ओही सरहपाद केर लिखल दोहा कोश मैथिली किएक ने मानलनि तारानंदजी? आ ई सामान्य ज्ञानक बात छै एहि लेल भाषावैज्ञानिक बनबाक कोनो जरूरति नै छै। ओनाहुतो चर्यापदक भाषा अपभ्रंशे छै, मैथिली नै अछि। ओहिपर जतेक अधिकार मैथिली कऽ रहल छै ततबे बंगला, असमिया, उड़िया एवं आन सेहो कऽ रहल छै। अही पोथीमे वियोगीजीकेँ तामस छनि जे सवर्ण लेखक सभ सिद्ध काव्यकेँ मैथिलीक नहि मानलनि आ अपन एहि पोथीक शुरूआत सिद्ध काव्यसँ केलनि अछि। मुदा सिद्ध साहित्य तऽ संपूर्णे छन्द छै। विभिन्न छन्दक प्रयोग छै ओहिमे। जखन वियोगीजी दोहा-चौपाई एहन अतिप्रचलित छन्दकेँ `नै चीन्हि पाबै छथि तखन कालक्रमे विलुप्त भेल छन्दकेँ चिन्हबाक कोन कथा। खएर एक मिनट लेल जँ हम वियोगीजीक स्थापना मानि ली जे मात्र चर्येपद मैथिली थिक तैयो वियोगीजीक निष्कर्ष गलत अछि कारण चर्यापदमे सेहो छन्दक प्रयोग भेल छै। निच्चा किछु उदाहरण अछि, जाहिमे पहिल उदाहरण सरहपा रचित अछि-

अपणे रचि रचि भवनिर्वाणा । मिछेँ लोअ बन्धाबए अपणा ।। अम्हे ण जाणहुँ अचिन्तजोइ । जाम मरण भव कइसण होइ ।।

सरल चौपाई छन्द छै। 16-16 केर मात्रा। फेर इएह 16-16 मात्रामे भुसुक पादजीक ई रचना- करुणा मेह निरन्तर फरिआ भावाभाव द्वन्दल दलिआ

तहिना डोम्बीपाद केर एक रचना देखू जे कि दुबई (सार) नामक छन्द (28 मात्रा) आ पद शैलीमे अछि -

गंगा जउना माँझे रे बहइ नाइ तँहि बुड़ली मातग्ङीपोइआ लीले पार करेइ

बादमे इएह पद शैली अतेक लोकप्रिय बनलै जे हरेक भाषाक कवि प्रयोग केलाह। संगहि एहि शैलीक विभिन्न भाग-उपभाग सेहो बनलै। कबीर केर पद "माया महा ठगिनि हम जानी" मे इएह पद शैली छै। विद्यापति सेहो एकर प्रयोग केने छथि। आ संत कवि सभ तऽ केनहे छथि।

आब जखन कि हम चर्यापदमे सेहो छन्दक विवरण दऽ चुकल छी हमरा विश्वास अछि जे वियोगीजी कहताह "पूरा चर्यापद मैथिली नै छै, ओकर किछुए पद मैथिलीमे अछि"। मुदा हम अहू बात लेल तैयार रहब आ जे पद ओ कहताह तकर छन्दक विवरण देबाक प्रयास करब। कमसँ कम हमरो ज्ञानमे वृद्धि तऽ हेबे करत। संक्षिप्तमे अतबे बूझू जे या तँ मैथिली काव्यमे एकदम शुरुआतेसँ छन्द छै एवं वियोगीजीक उक्ति गलत छनि अथवा सिद्ध साहित्यकेँ मैथिली साहित्ये मानब अनुचित। ओना हमरा लगैए जे पद वा गीति केर नाम सुनि वियोगीजीकेँ लागल हेतनि जे एहिमे छन्द भइए ने सकैए। जखन कि गीति सेहो छंदे छै जेना दोहा वा कि चौपाई छै। एहि गीति छन्दक आनो प्रभाग छै जेना उपगीति, उद्गीति आदि। तेनाहिते पद एकटा शैली छै जाहिमे पहिल पाँति ध्रुव (टेक) मानल जाइत छै, से छोट रहैत छै आ सम-मात्राक रहैत छै आ तकर बादक पाँति सभ कोनो विशेष छन्दमे लिखल रहैत छै। पदक एकटा आर शैली छै जाहिमे पहिल दू पाँति एक विशेष छन्दपर लिखल जाइत छै आ तेसर पाँति ध्रुव रहैत छै आ फेर तकर बादक पाँति सभ ऊपरक दू पाँतिक छन्दक अनुगमन करैत छै। गोविन्ददास अपन पद लेल दोसर शैलीक बहुत प्रयोग केने छथि। बादमे एकटा अंतर एलै जे विषय विस्तार लेल एक पदमे अलग-अलग छन्दकेँ जोड़ि कऽ कवि अपन बात कहलाह। आ एहि तरीकासँ नव-नव छन्दक विकास सेहो भेल अछि जाहिमे एकटा कुंडलिया सेहो अछि। ओना चर्यापदक अतिरिक्त हम पाठक लग दोहाकोश केर किछु उदाहरण देबऽ चाहैत छी आ पाठकक निर्णय चाहैत छी जे ई मैथिलीक कतेक लग छै आ कतेक दूर, संगे-संग ओहिमे प्रयुक्त छन्द सेहो दऽ रहल छी। दोहाकोशमे आएल ई पाँति सभ देखू (एहि पाँति सभमे आएल छन्दकेँ जानि लऽ नै देल गेल अछि, कारण वियोगीजी ई मानै छथि जे दोहाकोशमे छन्द छै)-

एत्थु से सुरसरि जमुणा । एत्थु से गंगा साअरु।। एत्थु पआग वणारसि । एत्थु से चंद दिवाअरु।।

जीवन्तह जो नउ जरइ, सो अजरामर होइ। गुरु उवएसे विमल मइ, सो पर धरणा कोई ॥

पंडिअ सबल सत्य बक्खाणइ। देहहि बुद्ध बसन्त ण जाणइ॥ गमणागमण न तेन विखण्डिअ। तो वि णिलज्ज भणहि हउ पण्डिअ॥

घरे-घरें कहिअअ सोज्झु कहाणो। णउ परिआणिअ महासुह ठाणो।। सरह भइ जग चित्तं वाहिउ। सोवि अचिन्त ण केणवि गाहिउ||

ऊपरमे देल दोहाकोश आ चर्यापदक जे हम उदाहरण देने छी तकरा मिलाउ आ विचारू जे दोहाकोशक भाषा तारानंद जी लेल मैथिली किएक ने भेल? हमरा समझसँ तारानंदजी दोहाकोश केर भाषा मैथिली छै से अहू कारणसँ नहि मानताह जे ओ पहिनेसँ अपन निष्कर्ष बना लेने छथि जे छन्द मैथिलीक चीज नै छै तँइ दोहाकोशमे कतबो मैथिली किए ने रहै ओ ओकरा मैथिली नहि मानताह। एहि भागमे हम जे उदाहरण लेने छी से मैथिली - धूर्त्त समागम (जयकांत मिश्र), बौद्धगानमे तान्त्रिक सिद्धान्त (जयधारी सिंह), हजारी प्रसाद द्विवेदी ग्रंथावली, पारिजात हरण (उमापति), दोहाकोश (सं. राहुल सांकृत्यायन), मात्रिक छंदो का विकास (डा. शिवनंदन प्रसाद), मैथिली छन्द शास्त्र (पं. गोविन्द झा), पारिजात मञ्जरी (डा. रमण झा) आ मिथिला भारती (भाग-10, 2023) नामक पोथी ओ पत्रिका सभसँ लेने छी। जखन कि छन्द सभ लेल सहायता पिंगल कृत छन्दः सूत्रम् (संपादक-डा. कपिलदेव द्विवेदी एवं डा. श्यामलाल सिंह), छन्दो रत्नमाला (आचार्य श्रीमद् विजय सुशील सूरि), मात्रिक छंदो का विकास (डा. शिवनंदन प्रसाद), एवं मैथिली छन्द शास्त्र (पं. गोविन्द झा) नामक पोथीसँ लेने छी। जेना कि ऊपरेमे हम सूचना देने छी जे उदाहरण लेल हम विद्यापति गीतक छन्दक नहि लेलहुँ कारण हम एकटा अलग आलेखमे ओकरा देब। ओहि आलेख केर शीर्षक रहत- "की तारानंद वियोगीजी मंचपर अप्रमाणिक वाचन करै छथि?" ई आलेख किछु मासमे संभव हएत।

प्राकृत-अपभ्रश-अवहट्ट आदिक उदाहरण सभमे किछु ए,ऐ,ओ एवं औ आदिकेँ ह्रस्व आ गुरू मानल गेल छै छंदानुरोधे आ से हम अपना मोने नहि कहि रहल छी। ई बात प्राकृत-अपभ्रंश आदि भाषा लेल मानक छन्द ग्रंथ "प्राकृत-पैंगलम्" कहि रहल अछि जे कि हेमचंद्र कृत अछि। तारानंदजी अवश्य पढ़ने हेताह एहि पोथीकेँ से हमरा एहि कारणे विश्वास अछि जे हुनकर पोथीमे नमहर पोथीक सूची अछि। छंदानुरोधे दू स्वर अक्षरकेँ मिला कऽ सेहो छन्द गनबाक प्रचलन बहुत पहिनेसँ छै। एहि संबंधमे पं. गोविन्द झाजीक विचार देखू- " ---परन्तु तथापि आशंका अछि जे कतोक समान्य पाठककेँ एहू संग्रहमे छन्द टूटल सन लगतनि ओ गनलापर मात्राक वा अक्षरक न्यूनाधिक सेहो भासित होयतनि। तकर कारण कहल जा सकैत अछि विद्यापतिकालीन उच्चारणक अज्ञान। प्राचीन मैथिलीमे दीर्घो स्वरक लघु ओ ह्रस्वो स्वरक गुरू उच्चारण ठाम-ठाम कयल जाइत छल, कतहुँ-कतहुँ दुइ स्वर अक्षरकेँ मिला कऽ एक अक्षर जेकाँ उच्चारण कयल जाइत छल।..." विद्यापति गीतावली (संपादक-पं गोविन्द झा, प्रकाशक- मैथिली अकादमी, पटना, तृतीय संस्करण-2008), भूमिका, पृष्ठ-13 आब कने विषयसँ अलग हटि हम आबी गजलपर, ऊपरमे जे पं. गोविन्द झा दू स्वर अक्षरकेँ मिला कऽ एक अक्षरक उच्चारण लिखने छथि तकरे गजलक भाषामे अलिफ-वस्ल नामक छूट कहल जाइत छै। आब जँ तारानंद वियोगीजीकेँ ई नियम जनबाक छनि तँ हमर पोथी "मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास" पढ़थि। संस्कृतक छंदग्रंथमे सेहो नियमशैथिल्य छै जकर वर्णन छंदशास्त्री सभ केने छथि।

किछु उदाहरण सभमे छंदोभंग सेहो भेटैत छै तकर कारण वर्तमानमे जे कोनो प्राचीन पद भेटैत अछि ताहिमे छंदोभंग भेटैत अछि। चर्यापदमे सेहो छंदोभंग केर उदाहरण अछि। ई छंदोभंग मूलतः दू कारणसँ अछि- पहिल ओहि समयक तात्कालीन उच्चारण पद्धति आ दोसर प्रतिलिपिमे गलती हेबाक कारण। प्रतिलिपि गलत हेबाक कारणसँ एकै रचनाक पाठ भेद भेटै छै। ओहि समयक उच्चारण ध्वनि शास्त्र केर अंतर्गत अबैत अछि जकर चर्चा हम एहि लेखकेँ विस्तार कालमे करब। जहाँ धरि पाठ भेद केर बात छै तऽ ओहि लेल हम एकटा उदाहरण देब जे संयोगसँ तारेनंदजीसँ जुड़ल छनि। पं.जीवन झा रचनावली (संपादक- चंद्रनाथ मिश्र'अमर' एवं डा. रामदेव झा, संस्करण-1989)मे जीवन झा जीक एक गोट गजलक एक शेर एहि तरहें अछि-

बाजी तँ हम बताहि कहाबी वियोग मे चुपचाप ताहि लेल तोहर ध्यान धरै छी

मैथिलीक एकटा कथित गजल संग्रह अछि "लोक वेद आ लालकिला"(1990)। ई संपादित पोथी अछि। संपादक छथि सियाराम झा 'सरस' आ संपादन सहयोगमे तारानंद वियोगी सेहो छथि (रमेश ओ देवशंकर नवीन सेहो छथि सहयोगमे)। एहि पोथीक भूमिकामे वियोगीजीक जे आलेख छनि ताहिमे ओ पं. जीवन झा जीक उक्त गजलक उक्त शेर एना देने छथि-

बाजी हम बताहि कहाबी वियोग मे चुपचाप ताहि लेल तोहर ध्यान करै छी

जखन आधुनिक कालमे अपनाकेँ विद्वान मानऽ बला तारानंद वियोगी सन लोक दू पाँतिक उद्धरण दैत ओकरा गलत कऽ दैत छथि तखन जाहि समयमे लिखबाक असुविधा रहै, जाहि समयमे अधिकांश लोक मात्र सुनि कऽ रचना मोन राखै ताहि समयमे जँ कोनो प्रतिलिपिकारसँ गलती होइत हो तऽ ई स्वाभाविक छै। ओना एहि गजलक वर्तनीमे आरो बेसी समस्या सभ कएल गेल छै आन-आन पाठमे जकरा हम अपन पोथी "मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास" मे विस्तारसँ लिखने छी।  एकटा बात आरो स्पष्ट होइए जे प्राचीन कालक रहितो सिद्ध सभ आधुनिक कालक वियोगीजीसँ बेसी उदार छलाह। सिद्ध सभ कर्मकांड केर विरोध करितो छन्दक विरोध नै केलाह मुदा वियोगीजी छन्दक विरोध कऽ रहल छथि।

एहि पाँति धरि अबैत-अबैत वियोगीजी लग एकटा बात कहबाक लेल आबि गेल हेतनि आ दोसर बात वियोगीजीक समर्थक सभ लग आबि गेल हेतनि। पहिने समर्थकक बात सुनि ली- वियोगीजीक समर्थक कहताह जे साहित्यमे सहमति-असहमति चलै छै तँइ कियो जँ वियोगीजीक आलेख या पोथीसँ असहमत भऽ जाथि से संभव। तऽ एहन समर्थक जाहिर छै जे वियोगिएजीक स्तरक हेता तिनका हम सूचित करबनि जे सहमति-असहमति केर गुंजाइश वियोगीजी अपन कथनमे खत्म कऽ देने छथि। उदाहरण लेल जँ कियो ई कहथि जे "आलू मनुख लेल हानिकारक छै" तऽ एहि कथनक सहमति एवं असहमतिमे तर्क सभ देल जा सकैए मुदा जखन कोनो रोगी जिनका आलू नहि पचैत होइन अथवा जिनका आलूक सुआद नहि नीक लगैत हो से आँखि मूनि कहथि जे एहि संसारमे आलू नामक कोनो चीजे नै होइत छै, तखन ओहिमे सहमति वा असहमति केर संभावना नहि रहैत छै बस ओहन कुतर्की लग आलूक ढेर लगा देल जाइत छै। तँइ हम कहलहुँ जे वियोगी जी अपन कथनमे ओहने काज केने छथि। तारानंद वियोगीजीकेँ छन्दक ज्ञान नै छनि तऽ तामसमे आबि कहि देलाह जे मैथिली काव्यमे कहियो छन्द नहि रहलै।

आब वियोगीजीक बात सुनि लेल जाए। बहुत संभव जे एहि आलोचनाकेँ पढ़ि वियोगीजी कहता जे हम अपन कथन मैथिलीक जातीय कविताक संबंधमे कहने छी आ ओहि पोथीमे एहिपर अध्याय सेहो छै मुदा हमरा जनैत सिद्ध साहित्यमे छन्द आबिए गेलै, संत साहित्यमे छन्द आबिए गेलै तखन कोन जातीय कविता बाँचल छनि वियोगी जी लग। ओ एखनो आन कोनो नव जातीय कविताक स्वरूप दऽ सकै छथि मुदा आब एतेक निश्चित भऽ गेल जे मैथिलीक शुरुआती काव्य "सिद्ध काव्य" सहित मैथिलीक सभ प्राचीन काव्य वियोगीजीक कथित जातीय कविताक परिधिसँ बाहर भऽ गेल अछि कारण ओहिमे छन्द छै।

3 तारानंद वियोगी अध्ययन नै करै छथि, जँ करितथि तऽ वर्ण-रत्नाकरक भाट वर्णनामे छंदशास्त्रक नाम लिखल अवश्य भेटल रहितनि। यदि वर्ण-रत्नाकर विश्वकोश छै आ एहिमे वर्णित तथ्यसँ तात्कालीन मिथिलाक जीवन ओ समाजकेँ जानल जा सकैए तखन वर्ण-रत्नाकरमे वर्णित छंदशास्त्रक नामसँ ई किए ने जानल जा सकैए जे ओहि समयक मैथिली काव्यमे सेहो छन्द रहै? बहुत संभव जे तारानंद वियोगीजी ई मानैत हेता जे वर्ण-रत्नाकर विश्वकोश नै छै अथवा आन तथ्य लेल वर्ण रत्नाकर उपयोगी तऽ हेतै मुदा छंद लेल नै छै।

तारानंद वियोगी निश्चिते अध्ययन नै करै छथि, जँ करितथि तऽ हुनका छन्द एवं राग-लय-तालमे अंतर अवश्य बुझना गेल रहितनि। संगहि-संग जँ वियोगीजीकेँ आनक लिखल पढ़बाक, ओकरा उद्धृत करबाक अभ्यास रहितनि तऽ ओ पं. गोविन्द झाजीक लिखल एहि पाँति सभसँ ओ अवश्य परिचित रहितथि-

"प्राचीन मैथिली साहित्यमे गीतक चालि ततेक ने बढ़ि गेल छल जे छन्दहुँक नामक स्थान रागहिक नाम लए लेने छल। लोचन कवि अपन 'रागतरङ्गिणी'मे प्रत्येक रागक प्रकरणमे स्पष्ट कए-कए कहने छथि जे "तन्नामकमेव च्छन्दः " अर्थात् जएह एहि रागक नाम सएह एहि रागक गेयपदक छन्दहुक नाम। तँ की लोचन कविक अनुसार 'जयकरी' क स्थानम' 'पर्वतीय बराड़ी' नाम देब उचित छल? अवश्य से उचित होइत यदि 'जयकरी' छन्द पर एकमात्र 'पर्वतीय बराड़ी' सएह राग गाओल जाइत। से तँ अछि नहि, प्रत्युत एकहि 'जयकरी' पर पचीसो राग गाओल जाए सकैत अछि ओ अनेक रागक नाम उल्लिखितो भेटैत अछि। तखन यदि रागक नाम छन्दक नाम रहए, जेना कतहु-कतहु चन्दाझा अपन रामायणमे कएने छथि, तँ एक माथ पर पचीस पाग जेकाँ एक छन्दक पचीस नाम भए जाएत" मैथिली छन्दशास्त्र, पृष्ठ-7-8, (लेखक- पं गोविन्द झा, प्रकाशक, मिथिला पुस्तक केन्द्र, दरभंगा, द्वि.संस्करण- 1987)

तहिना विद्यापतिक गीतमे छन्दक प्रसंगमे पं. गोविन्द झाजीक लिखल ई पाँति सभ सेहो वियोगीजी नै पढ़ने छथि-

"छन्दक दुर्दशा जहिना स्रोत-ग्रन्थसभमे अछि तहिना वा ताहूसँ बेसी आजुक सम्पादित संस्करणसभमे दृष्टिगत होइत अछि। खेदक संग कहय पड़ैत अछि जे विद्यापतिक छन्दकेँ बुझनिहार लोक उत्तरोत्तर दुर्लभ होइत गेलाह अछि। विद्यापतिक कालमे छन्दक दू धारा छल- वर्गवृत्त ओ मात्रावृत्त। मैथिल जे मात्रावृत्तक ज्ञान रहैत छनि तँ वर्णवृत्तक नहि, कारण जे मिथिलामे वर्णवृत्त बहुत दिन पूर्वहि अप्रचलित भ' गेल। बंगाली लोकनिकेँ जँ वर्णवृत्तक ज्ञान छनि तँ मात्रावृत्तक नहि, क़ारण जे बङलामे बहुत दिन पूर्वहि मात्रावृत्त लुप्त भ' गेल। परिणाम ई भेल अछि जे अधिकतर स्रोतग्रन्थमे छन्दक जे दुर्दशा अछि से तँ अछिए, आजुक सम्पादकोलोकनि अपनेसँ छन्द बैसयबाक प्रयासमे बहुधा शुद्धो छन्दके, खास क' वर्णवृत्तके, बिगाड़ैत गेलाह अछि। एहि बातक परीक्षणार्थ बिहार राष्ट्रभाषा-परिषद् संस्करणक पहिल गीत लेल जाय जे एहि संस्करणक गीत सं0 294 थिक। ई वर्णवृत्त थिक। एकर प्रत्येक चरणमे एगारह एगारह गोट अक्षर होइत छैक, जे केओ पाठक आडुरपर गनि सकैत छथि। एकर नेपाल-पाठमे तीन चरणमे छन्दोभंग अछि, किन्तु रामभद्रपुरक पाठ शुद्ध अछि। यथा-

ने- हृदय तोहर जानि नहि भेला (12 अक्षर)। राम- हृदय तोहर जानि न भेला (11,,)। ने- कापए घनहन सबे सरीरे (12,,)। राम- काम्प घनहन सबे सरीरे (11,,)। ने- न गुनह माधव मोहि कलङ्का (12,,)। राम- लओलह माधव मोहि कलङ्का (11,,)। एहि ठाम सम्पादक नेपालक टूटल पाठकें स्वाभिमत मानलनि अछि, किन्तु रामभद्रपुरक शुद्ध पाठके नहि। एहिसँ प्रतीत होइत अछि जे सम्पादक एहि छन्दक लक्षण नहि जनैत छलाह। एकर तेरहम पाँती रामभद्रपुर ओ नेपाल दुनूमे एहि रूपें अछि- घर गुरुजन दुजन सङ्का - (11 अक्षर) । किन्तु एहिमे सम्पादक दुजनके अशुद्ध बूझि दुरजन बना देने छथि जाहिसँ स्पष्टतः छन्दोभंग होइत अछि" विद्यापति गीतावली (संपादक-पं गोविन्द झा, प्रकाशक- मैथिली अकादमी, पटना, तृतीय संस्करण-2008), भूमिका, पृष्ठ-12 एवं 13

प्रतिलिपि करबामे जे समस्या छै से वियोगियोजीसँ भेल छनि से हम दोसर भागमे देने छी। तहिना वियोगीजीकेँ डा. रामदेव झा द्वारा लिखल विनिवंध जगत्प्रकाशमल्ल (1990) नहि पढ़ल छनि जाहिमे डा. रामदेव झा लिखैत छथि- "धूर्तसमागमक गीत सब राग-ताल-निर्देश पूर्वक अछि। छन्द मात्रा पर आधृत तथा अन्त्यानुप्रासक निर्वाह सर्वत्र अछि।" (पृ्ष्ठ-11)

एहिठाम प्रसंगवश ईहो जोड़ब उचित हएत जे डा. रामावतार यादव सत्रहम शताब्दीक कवि जगत्प्रपकाशमल्लक रचनामे छन्द तकबापर लागल छथि आ हुनक शोध मिथिला भारती केर नवीनतम अंक (भाग-10, 2023) मे "नेपाल राष्ट्रिय अभिलेखालय काठमाण्डूमे अनुरक्षित एवम् नेवार नरेश - विरचित मध्य- मैथिली गीति-काव्यमे छन्दोलक्षणगुम्फित गीतक छन्दशास्त्रीय विवेचन" नामक शीर्षकसँ प्रकाशित भेलन्हि अछि। प्रसंगवश ईहो मोन पाड़ि दी जे जखन वियोगीजी लग पुरान पोथी-पत्रिकामे लिखल तथ्य नजरि नहि एलनि तखन तऽ डा. रामावतार यादवजीक उक्त आलेख एकदम टटका छै, तँइ हमरा विश्वास अछि जे वियोगीजी ई आलेख नहि पढ़ने हेताह।

गोविन्ददास-भजनावली (संपादक-गोविन्द झा,2007) केर पृष्ठ 11 सेहो वियोगीजी नहि पढ़ने हेताह जाहिमे पं गोविन्द झा जी गोविन्ददासक लिखल वर्तनीपर विचार केने छथि-

"शृङ्गार-भजन-गीतावली मे चन्दा झा बहुत शब्दक वर्तनीकें आधुनिक रूप द' देने छथि, जे हमरा जनैत गोविन्ददासक समयमे ओ तत्पश्चातो बहुत दिन धरि शिष्ट गृहीत नहि भेल छल। पहिने एके टा उदाहरण लेल जाय। निषेधार्थक अव्यय 'न' प्राचीन मैथिलीमे तत्सम रूपमे लिखल जाइत छल, किन्तु प्राचीन बङलामे 'ना' लिखाइत छल। चन्दा झा एहन स्थलमे बङलासँ प्रतिलिपि करबाक काल 'ना' के 'नै' क' देलनि अछि जे स्पष्टत: 'नहि' शब्दक आजुक विकृत उच्चारण थिक आ तें साहित्यिक मैथिली लेखमे ग्राह्य नहि भेल अछि। मानि लिअ, पदकल्पतरुमे पाठ अछि- भाल करि पेखल ना भेल, एकर रूपान्तर चन्दा झा करताह भल के पेखल नै भेल जखन कि हमरा विचारँ होयबाक चाही-भल कए पेखल न भेल'। एहिना भेल। ऐछन-अइसन, भै गेल- भए गेल, कहै नै पारिय- कहए न, पारिअ, बिछुरल- बिसरल इत्यादि रूपक वर्तनी-संशोधन हम यथासंभव सर्वत्र क' देल अछि।"

जे सजग पाठक छथि से बूझि सकै छथि जे वर्तनी बदलि गेलासँ कोना छन्द परिवर्तन वा छंदोभंग होइत छै, तँइ एकरा हम उद्धृत केलहुँ। एहि भागमे हम उद्धरण सभ दू कारणसँ देलहुँ- पहिल, जँ कोनो पाठक लग प्राचीन रचना आबनि तऽ ओहि रचनाक छन्द निर्धारण लेल कोन-कोन सावधानी रखबाक चाही तकर जानकारी भेटतनि आ दोसर कारण ई जे पाठक बूझि सकथि जे वियोगीजी पाठक आ साहित्यिक समाजकेँ कोना भ्रमित करै छथि आ मात्र फतवा देबामे विश्वास रखैत छथि।

4 पाठक जखन एहि पाँति धरि आबि गेल हेता तखन हुनका एक बातक जिज्ञासा बेसी हेतनि जे एहि लेखक शीर्षकसँ लागै छै जे तारानंदजीक संपूर्ण आलोचना / इतिहास / समीक्षा / पाठकीय अप्रमाणिक हेतै मुदा एखन धरि उदाहरणमे मात्र "मैथिली कविताक हजार वर्ष" केर भूमिकाक चर्चा भेलैए। तऽ हुनक जिज्ञासा शांत करैत हम कही जे ऊपरेमे 2006  मे जे हुनक आलोचनाक विसंगति छलनि ताहिपर हम टिप्पणी केने छलहुँ जकर फोटो परिशिष्टमे भेटत। तकर बादक आनो आलोचना / इतिहासमे जे अप्रमाणिकता छनि ताहिमेसँ हम किछु मुख्य-मुख्यकेँ सूचीबद्ध कऽ रहल छी आ यथासंभव परिशिष्टमे ओकर फोटो सेहो दऽ रहल छी-

1) तारानंद वियोगी बिना पढ़ने आलोचना / समीक्षा / इतिहास / पाठकीय लिखै छथि तकर प्रमाण अछि हुनक पोथी कर्मधारयमे "मैथिली कथा-यात्रा" नामक लेख जाहिमे ओ धूमकेतुक कथा 'नमाजे शुकराना'पर विचार रखने छथि। जे पाठक धूमकेतुक कथा 'नमाजे शुकराना' पढ़ने हेताह से जनैत हेताह जे कथाकार अपन कथाक माध्यमसँ मिथिलामे पसरैत साम्प्रदायिक कट्टरताकेँ रेखांकित केने छथि मुदा जखन वियोगीजी बिना पढ़ने ओहिपर लिखला तऽ ओ ओहि कथाकेँ "साम्प्रदायिक सौहार्द" केर कथा बना देलाह। एहि प्रसंगकेँ सभसँ पहिने गजेन्द्र ठाकुर अपन संपादकीयमे उठेलाह आ बादमे ओ आलेख हुनक मैथिली समीक्षाशास्त्र नामक पोथीमे प्रकाशित भेल। तारानंद वियोगीजीक धूमकेतुक कथाक गलत निष्कर्षक संबंधमे गजेन्द्र ठाकुर जी अपन पोथी "मैथिली समीक्षाशास्त्र" केर पृष्ठ- 138 पर जे लिखने छथि से द्रष्टव्य अछि-

"पोथीक बिना पढ़ने समीक्षा अनैतिक अछि। उदाहरणस्वरूप कर्मधारयमे धूमकेतुक विषयमे तारानन्द वियोगी लिखै छथि- मिथिलाक संस्कृतिमे युग-युगसँ प्रतिष्ठापित साम्प्रदायिक सौहार्द रेखांकित करैत हिनक कथा "नमाजे शुकराना " बहुत महत्वपूर्ण थिक । (कर्मधारय, पृ. 127 ) (!) कथाक शीर्ष देखि कऽ ऐ तरहक समीक्षा भेल अछि कारण ऐ कथामे हाजी सैहेबक नमाजक समएमे पिंजराक सुग्गा " सीता... राम ... ।" बजैए आ सुग्गाक पिंजराकेँ हाजी सैहेब ताधरि महजिदक देबालपर पटकै छथि जाधरि सूगा मरि नै जाइए। सईदा कानऽ लगैए आ कथा खतम भऽ जाइए। आ ई कथा समीक्षकक मत साम्प्रदायिक सौहार्द रेखांकित करैए !"

बिना पढ़ने लिखल गेल आलोचना इतिहास अप्रमाणिके होइत छै, से तारानंद वियोगी जीक लिखल अप्रमाणिक अछिए।

2) तारानंद वियोगीजी 26 September 2018 केँ मिथिला मिहिर नामक ब्लागमे अपन एकटा लेख प्रकाशित केलाह "मैथिली कविताक वर्तमान परिदृश्य" शीर्षकसँ। पाठक एहि आलेखकेँ ऊपरमे देल शीर्षकपर क्लिक कऽ पढ़ि सकै छथि। एहि आलेखमे ओ गजल केर चर्चा सेहो केलाह, हमरा जनैत कविता ओ गजल अलग विधा भेल जेना कि कथा, लघुकथा, उपन्यास आदि कथा विधामे रहितो अलग-अलग अछि तहिना काव्य विधामे गीत, गजल, आदिक संग कविता सेहो अलग विधा अछि। गजलकेँ कविताक संग रखबाक जिद्द हुनक अज्ञानतासँ बेसी कुंठा बुझना जाइत अछि। खएर ओही आलेखमे ओ "भक्ति गजल" केर चर्चा सेहो करैत छथि मुदा ई जानि पाठककेँ आश्चर्य लगतनि जे ओ तमाम बातक वर्णन करैत मैथिलीमे भक्ति गजलक स्रोत नै देने छथि। ई बात निर्विवाद छै जे मैथिलीमे 'बाल गजल' हो वा कि 'भक्ति गजल' ने तऽ ओ तारानंद वियोगीजीक कोरासँ उतरल छनि आ ने हुनक भक्त संप्रदायक कोरासँ। तऽ आखिर स्रोत कतऽसँ छै? एहि आलेखकेँ पाठक एहि लिंकपर पढ़ि सकै छथि- https://mithila-mihir.blogspot.com/2018/09/blog-post.html?m=1

बिना स्रोत, बिना उद्गम केर जानकारी अप्रमाणिके कहल जेतै ने? से तारानंद वियोगी जीक लिखल अप्रमाणिक अछिए।

3) मिथिला सांस्कृतिक परिषदक संबंधमे गलतबयानी- गुलोः कला आ भाषा (संपादक- तारानंद वियोगी एवं केदार कानन) नामक पोथी केर भूमिकामे यात्रीजीक बलचनमा नामक उपन्यासक भाषापर विचार करैत तारानंद वियोगी बिना कोनो प्रमाणकेँ एहि बलचनमा उपन्यासक प्रकाशक मिथिला सांस्कृतिक परिषदपर ओकर पांडुलिपिकेँ नष्ट कऽ देबाक आरोप लगेलाह। ई एकटा गंभीर आरोप छलै सेहो बिना कोनो प्रमाणक। वियोगीजीक एहि अप्रमाणिकताकेँ एक बेर फेर देखार करैत गजेन्द्र ठाकुर 2022 मे प्रकाशित अपन पोथी "नित नवल सुभाष चंद्र यादव"मे लिखलाह (पृष्ठ-102) से द्रष्टव्य अछि- "तारानन्द वियोगी लग मिथिला सांस्कृतिक परिषदपर यात्रीक कोनो तरहक आरोपक प्रमाण नै छन्हि...................बलचनमाक लेखक नागार्जुनकेँ ओइ पोथीसँ कोनो समस्या नै रहन्हि नहिये हुनकर पुत्र शोभाकान्त (जकरा यात्रीजी शोभा मिसर कहैत छला) ओइ पोथीकेँ मैथिली पोथी मानै छथि आ तें 'यात्री समग्र' (राजकमल प्रकाशन) मे ओ संकलित नै अछि। मिथिला सांस्कृतिक परिषद चेतना समिति सन पाइबला संस्था नै अछि, चन्दा भेटै छै तखने ओ पोथी छापै छै, कोनो कंस्पिरेसी थ्योरी लेल कोनो स्थान नै।"

गजेन्द्रजीक पोथी प्रकाशित भेलाक बाद दयाशंकर मिश्र अपन एक आलेख "बलचनमा प्रकाशनक प्रसंग श्री तारानंद वियोगी जीक अनर्गल प्रलापक संदर्भमे" जे कि 'मैथिली पुनर्जागरण प्रकाश' नामक दैनिक पत्रमे प्रकाशित भेल (अंक-31 जुलाई 2023) ताहिमे दयाशंकरजी बहुत रास प्रमाणक संग तारानंद वियोगीजीक आरोपक खंडन केने छथि।

जेना कि ऊपरेमे सूचना देने छी जे हम मात्र मुख्य-मुख्य तारानंदजीक मुख्य-मुख्य अप्रमाणिकताक उदाहरण देब तऽ एकर ई अर्थ नहि जे अतबे अप्रमाणिक कथन सभ छनि। वस्तुतः तारानंद वियोगीजीक अधिकांश आलोचना / इतिहास / समीक्षा / पाठकीय अप्रमाणिक छनि। जरूरति छै ओकरा पाठकक सामने अनबाक। से नव पाठक वा आलोचक सेहो कऽ सकै छथि आ जखन-जेहन हमरा समय भेटत हमहूँ हुनक अप्रमाणिकताकेँ भविष्यमे पाठकक सामने आनब। हुनकर रचनात्मक विधा सभकेँ देखी तऽ हुनक गजल आइसँ पंद्रह बर्ख पहिनेहे अप्रमाणिक साबित भऽ गेल छल। बाँचल हुनक कविता ओ कथा तऽ एकर भार हम कविता ओ कथा विधाक अगुआ सभपर दैत छियनि।

एहि आलेख केर शीर्षक जकरा हम प्रश्नवाचक चिह्नक संग रखने छलहुँ तकरा हम एहि पाँतिक संग हटा रहल छी आ ऊपरमे देल अनेक उदाहरणक संग कहैत छी जे " निश्चित तौरपर अप्रमाणिक आलोचना एवं इतिहास केर लेखन करै छथि तारानंद वियोगी"।

इति-विदा पुनर्मिलनाय परिशिष्ट 1-अंतिका मे प्रकाशित हमर पाठकीय 2-तारानंदजीक कर्मधारय नामक पोथीमे प्रकाशित "मैथिली कथा यात्रा"मे धूमकेतु कथापर विचार 3- गुलोः कला आ भाषा नामक पोथीमे मिथिला सांस्कृतिक परिषदक संबंधमे तारानंद जीक विचार 4- दयाशंकर मिश्र केर लेख 5-मैथिली कविताक हजार वर्ष केर पहिल खंडक भूमिकाक पृष्ठ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.परमानन्द लाल कर्ण- कातिक मासक माहात्म्य ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.निर्मला कर्ण- अग्निशिखा खेप ३१ निर्मला कर्ण (१९६०- ), शिक्षा - एम. ए., नैहर- खराजपुर, दरभङ्गा, सासुर- गोढ़ियारी (बलहा), वर्त्तमान निवास- राँची, झारखण्ड। झारखंड सरकार महिला एवं बाल विकास सामाजिक सुरक्षा विभागमे बाल विकास परियोजना पदाधिकारी पदसँ सेवानिवृत्ति उपरान्त स्वतंत्र लेखन। (अग्नि शिखा मूल हिन्दी- स्वर्गीय जितेन्द्र कुमार कर्ण, मैथिली अनुवाद- निर्मला कर्ण) अग्निशिखा खेप -३१

पूर्वकथा

राजा पुरुरवा आ उर्वशी दुनू एक दोसराक सङ्ग प्रसन्नता पूर्वक अपन वैवाहिक जीवनक आनन्द लऽ रहल छलथि । दुनू गोटे हरदम एक दोसराकेँ प्रसन्न रखबाक प्रयास में रहैत छलथि।

आब आगाँ

अमरावती! इन्द्र अपन सिंहासन पर विराजमान छलाह ! सभ देवी-देवता सेहो अपन-अपन आसन पर बैसल छलथि। इन्द्रक माथ पर गम्भीरता देखि सभ देवता सेहो मुँह पर गम्भीरताक आवरण लऽ कऽ चुपचाप बैसल छलाथि। देवेन्द्रक गम्भीरताक कारण किनको नहि बुझल छलन्हि,मुदा मुदा ओ सभ देवेन्द्रक गम्भीरताक कारण जानवा हेतु व्यग्र छलथि। हुनकर गहन गंभीरता के कारण देवगण विशेष चिंतित छलथि। दू दिन बाद, वराह कल्पक सहस्राब्दी वर्षगाँठक उत्सव के आयोजन कएल जा रहल अछि । एहि समारोहक लेल एकटा पैघ आयोजन होबय जा रहल छल,जकर तैयारी महीना भरि सँs चलि रहल अछि । एहि उत्सव में अप्सरा सभकेँ विशेष उत्तरदायित्व देल गेल छल। ओही क्रममे उर्वशीक स्मृति इन्द्र के आबि गेलनि । सभ मुख्य कार्य-क्रम में स्वर्ग लोकक सर्वश्रेष्ठ अप्सरा होमय के कारण मुख्य भूमिका के उत्तरदायित्व उर्वशी के रहैत छल। ताहि कारण एहि अवसर पर उर्वशी केँ तलाश कएल गेल। आ तखन इन्द्रकेँ स्वर्गसँ हुनक अनुपस्थितिक जानकारी भेटलनि। इन्द्रकेँ आब ज्ञात भेल जे ओ बहुत दिन सs स्वर्ग सँs दूर छथि । इन्द्रकेँ स्मरण भेलनि जे ओ उर्वशीकेँ पाँच वर्षक लेल स्वर्ग सँs निष्कासित कऽ देने छलथि!मुदा ई अवधि तs कतेको दिन पूर्व समाप्त भऽ गेल छल! एहन स्थितिमे उर्वशीकेँ आब स्वर्गमे रहबाक चाही, मुदा ओ नहि छथि!तखन ओ कतऽ छथि,ओ एखन धरि किएक नहि आयल छथि? इन्द्रक विचार अनुसार ओ सम्भवतः स्वर्गक द्वार के बाहरी प्राङ्गण में एकटा गाछक नीचाँ अपन दण्ड-अवधि के समाप्ति लेल पाँच वर्ष धरि प्रतीक्षा करतीह,आ पाँच वर्ष पूरा भेलाक बाद ओ स्वर्गक द्वारसँ भीतर प्रवेश कs जयतीह। मुदा ई किएक नहि भेल ! एकरा इन्द्र अपन अवहेलना बुझलथि।       इन्द्र उर्वशीक अनुपस्थिति के विषय में आन अप्सरा सभ सँs जानकारी लेमय चाहलथि। एहि समयावधि में ओ कतऽ छलीह,सम्भवतः एकर जानकारी हुनका सभ के होइन्ह,मुदा सभ कियो अनभिज्ञता प्रकट केलथि । किनको कोनो जानकारी नहि छल।किनको ज्ञात नहि छल जे ओ कतऽ छथि,ई कहि सभगोटे उर्वशी के विषय में कनेको जानकारी सँs अपन अनभिज्ञता देखौलनि। आब इन्द्र चिन्तित भऽ गेलाह। एहि समारोह में उर्वशीक बहुत आवश्यकता छलनि हुनका। आब कथि करथि से नहि बुझाईत छलनि इन्द्र के। ओ उर्वशीक तलाश कतऽ करथि यैह सोचि-सोचि ओ व्याकुल चलाथि । हुनक अनुसार,उर्वशीकेँ पाँच वर्ष पूरा भेलाक बाद स्वर्गमे प्रवेश करबाक अनुमति माँगय लेल आबय के चाहैक छलनि इन्द्र के निकट । मुदा ई की भेल अछि - ओ स्वर्ग तs नहि आयल छलीह,अपन विषय में कौनहु सूचना तक नहि देलथि । स्वर्ग सs निष्कासन उपरांत को कतs गेलथि ई जानकारी पर्यंत किनको नहि छल। आब इन्द्र अत्यंत चिंतित भs गेलाह।ओ सोचि रहल छलाह जे एहि समारोह मे उर्वशी के रहनाई बहुत आवश्यक अछि,मुदा उर्वशी कतय छथि एहि विषय में किनको किछु जानकारी नहि भेनाई !ई त एकटा संकेत छल स्वर्गक शासन व्यवस्था में गंभीर कुप्रबंधनक!ई बात ककरो नहि कहल जा सकैत छल,कारण जँ ई खबरि पसरि जायत तs सब कियो स्वर्गक शासन व्यवस्था पर आंगुर उठायत! एखन धरि ई बात स्वर्ग केँ बाहर किनको नहि बुझल छल।ओ एतहि सीमित अछि! ई समाचार कोनो अन्य लोक में जयवाक बाद हुनक कर्तव्य हीनता देखइत हुनका पदच्युत कएल जा सकैत अछि।ओ स्वयं असुरक्षित भs जयताह। ओ अपना के अधिकार च्युत एवं असुरक्षित नहि करs चाहैत छलथि। एहि करण ओ विशेष चिंतित छलाह आ येन-केन-प्रकारेण उर्वशी के जानकारी प्राप्त करवा हेतु व्यग्र छलाह। हठत् देवसभा में व्याप्त गहन मौन केँ भंग करैत इन्द्रक आवाज गूँजि उठल - "गंधर्वराज विश्ववसु! हम अहाँ केँ एकटा महत्वपूर्ण काज सौंपय चाहैत छी!मुदा ई बात गुप्त रहबाक चाही! एहि विषय मे कनिको जानकारी स्वर्ग लोक के बाहर कोनो आन दिस नहि जयवाक चाही!" अपन आसन पर ठाढ़ भs विश्ववसु स्वीकृति पूर्ण दृष्टि सँs इन्द्र दिस तकैत काज लेल अपन मौन सहमति देलथि । इन्द्र आगू कहs लगलथि - "उर्वशी बहुत दिन सँs स्वर्ग सs अनुपस्थित छथि। स्वर्ग सँs निष्कासित होयबाक मात्र पाँच वर्षक दण्ड हुनका भेटल छलनि। आब ओ अवधि सेहो समाप्त भs गेल अछि। ओहि कालखंड में सेहो हुनका स्वर्गक आसपास रहबाक छलनि,मुदा ओ कतय चलि गेल छथि,एकर ककरो लग कोनो जानकारी नहि अछि । ओ पृथ्वीलोक मे छथि वा पाताल लोक में अथवा स्वर्गलोक में कतहु नुकायल छथि,ओ कोन रूप में आ कोन लोक में छथि,ई जानकारी सेहो उपलब्ध नहि अछि। ई कोना भs सकैत अछि?ई संभव अछि कि हमरा लोकनि एतेक रास देवता के रहैत उर्वशी हमरा सभ सौं नुकायल कतहु रहथि आ हुनकर आवास के ठेकान हमरा सभ के ज्ञात नहि होय ? ई हमरा सबहक लेल अत्यंत लज्जा के बात होयत।ओ कोना कs हमरा सबहक आँखि मे धूर फेंकि कतहु आन ठाम पलायन कs सकैत छथि! ओ कतय आ कोन स्थान पर छथि ई जानब जरूरी अछि।हुनकर भेटब अत्यंत आवश्यक अछि ।" पवन देव बजलाह - "ओ स्वर्ग मे नहि छथि, एतेक बात तय अछि। हँs ! कोनो आन लोक मे भs सकैत छथि।" इन्द्र बजलाह - "हमरो इएह विचार अछि, तेँ हम चाहैत छी जे विश्ववसु अहाँ आइ सँs स्वयं हुनक संधान कार्य के प्रारम्भ आन लोक में जा क' करु । मुदा ई काज अत्यंत गुप्त रूप सँs कर' पड़त। एहि काज मे गोपनीयता आवश्यक अछि।" “हम सब किछु बुझि गेलहुँ देवेन्द्र, हम आइये सँs काज प्रारम्भ करब”- विश्वावसु उत्तर देलनि । इन्द्र बजलाह - "एकटा बात आओर ध्यान मे राखू,ई काज असगरे करय पड़त,कारण जँs बेसी भीड़ होयत तखन लोकक ध्यान आकर्षित होयत,आ त्रिलोक में ई बात पसरत जे उर्वशी स्वर्ग छोड़ि कतहु आन ठाम पलायन कs गेल छथि। हमर सबहक सम्मान हेतु ई उचित नहि होयत। जँs अहाँ केँ सहायक के अत्यंत जरूरी बुझाइत अछि तखन अहाँ एकटा सहायक केँ संग लs जा सकैत छी।" "अनावश्यक चिन्ता जुनि करू देवेन्द्र, हम असगरे ई काज करब" - विश्ववसु गंभीर स्वर मे बजलाह । " हुनक संधान केलाक बाद एतह अनबाक उत्तरदायित्व सेहो अहाँ पर अछि" - देवेन्द्र विश्ववसु केँ बुझेलनि । "हँ हम बुझैत छी देवेन्द्र"। “हम अहाँकेँ स्मरण दिएलहुँ एहन नहि होय जे अहाँ हुनका बिनु लेनहि मात्र हुनक सूचना लऽकऽ घुरि आबी - इन्द्र उर्वशीक घुरबाक विषयमे पूर्णतः निश्चिंत रहय चाहैत छलाह । "ई नहि होयत देवेन्द्र! हम उर्वशी के ल' क' आपस आबि जायब। अहाँ हमरा पर विश्वास कs सकैत छी" - विश्वावसु हुनका आश्वासन देलखिन। "ठीक छै! अहाँ एखनहि अपन काज पर चलि जाउ, किएक त' हमरा सभ लग समय बहुत कम अछि। दू दिन बाद जे वर्षगाँठक उत्सव होयत,ओहि मे हमरा सभ केँ उर्वशी'क आवश्यकता पड़त।" गंधर्वराज सभा आ इन्द्र सँ अनुमति लs सभाकक्ष सँs बाहर निकलि गेलाह, इन्द्र निश्चचिंतताक साँस लेलथि । हुनका विश्वास छलनि जे विश्ववासु शीघ्र उर्वशी केँ स्वर्ग में आपस आनि देताह।सब देवता सोमरस के पान करय लगलाह आ इन्द्र अपन सिंहासन छोड़ि उठि गेलाह। ओ ओतय सँ निकसि अपन आवास के लेल प्रस्थान कs गेलथि । सम्पूर्ण सभाकक्ष मे हास्य के वातावरण छल,मात्र अप्सरा सभ अत्यंत गंभीर छलथि । ओ सभ चिंतित छलथि उर्वशी केँ लेल। विशेषत : दू गोट अप्सरा भयपूर्ण दृष्टि सौं एक दूसर दिस तकैत छलथि,जेना दृष्टि रेखा सँs एक दूसर सँs गप्प कs रहल होथि । ओ छलीह उर्वशीक प्रिय सखी रम्भा आ चित्रलेखा! हँ! ईहो बात सत्य छल! कारण ओ दुनू आँखिक सहायता सँ एक दोसरा सँ पूछि रहल छलथि - 'विश्ववसु केँ ई जानकारी अवश्य भेटत जे उर्वशी कतय छथि।मुदा हुनका अनला सौं ओ दुनू प्रेमी-प्रेमिकाक ह्रदय में जे विरहाग्नि के ज्वाला धधकि उठत,ओकर परिष्कार कोना होयत! उर्वशी कोनो तरहेँ अपनाकेँ सम्हारि लेतीह,मुदा राजा पुरूरवा ! ओ सम्हारि नहि सकताह अपना के! विरहक अग्नि में झुलसि ओ राख भs जयताह! बिरह में उन्मत्त भय ओ मृत्युक ग्रास नहि बनि जाइथ! ओहि स्थिति में भूमंडल के शासन-व्यवस्था अव्यवस्थित भs जायत! की इन्द्र दू प्रेमी हृदय केँ व्यथित करबा उपरान्त स्वयं सुरक्षित रहि सकताह ?की ओहि प्रेमी हृदयक आह स्वर्गलोक केँ विनाश नहि करत? संभवतः नहि! स्वर्ग पर कोनो प्रतिकूल प्रभाव नहि परवाक चाही! कारण!देवताक निवास हेबाक कारणे त्रिमूर्तिक प्रेमपूर्ण दृष्टि सदिखन स्वर्ग पर रहैत छैक!मुदा पृथ्वीक दशा की होयत!राजा पुरूरवा के की होयत ? ओ सभ व्यथित छलीह राजा पुरूरवा एवं उर्वशीक दांपत्य के समाप्तिक आशंका सौं।

क्रमशः अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.सूर्य नारायण कामत- भवितव्य सूर्य नारायण कामत भवितव्य

प्रसिद्ध समाजकर्मी श्री लाल देव कामत जी बड़ जतनसँ आजादीक अमृत महोत्सव वर्षमे अमर स्वाधीनता सेनानी सभकेँ स्मरण केलाह अछि। समाजसेवी आ स्वतंत्रता सेनानी बाबू अनन्त लाल कामतजी, समाजवादी जगदीशबाबू आओर भूतपूर्व राज्यपाल धनिक लाल मण्डलजी आदिक जीवनी लिखकय, राष्ट्रकवि दिनकरजी, कथा शिल्पी फणीश्वरनाथ रेणु आदि लेखक - कविगणक बिसरल भुलल कृर्तिकें उजागर करैत अनेको आधुनिक लेखकीय कलम वीरक आ मौध आ समकालीन लेखकक विषयमे हुनकर रचनाक मादे 'दिव्य दृष्टि' पोथी माध्यमसँ पाठकक समक्ष अनलैन अछि। हिनक वृहद् मैथिली पोथीमे पान, माछ, मखानक उत्पादन सन्दर्भमे विशेष जनतब पाबि मिथिला धन्य-धन्य भेल अछि । आनो आन सारगर्भित तथ्य पढ़ेत ऐ पुस्तकमे हजारो व्यक्तिक नाओं, स्थानक नाओं आ वस्तुक शुभसंज्ञा देखएमे आएल हन । एहिक उपयोगिता विद्यार्थीगणकँ अध्ययन लेल वेश सहायक हेतैन । खाश कय शोधकर्त्ता शोधार्थी, अन्वेषक, गवेषक आ गवेषिका लोकनिकेँ। एहि तरहें प्रबन्ध- निबन्ध समालोचनाक पोथी श्री लाल देव कामतजी आरो अहिना अनवरत लिखेत रहता से आश अछि। हिनक लेखन क्रम चारि दशक पूर्वसँ चलैत आबि रहल छैन । फेसबुक पेज आ वाइट्सएप ग्रूपमे सेहो अपन मौलिक साहित्यिक रचना दैत रहै छथि, कए बेर हमरो पढ़क मौका भेटि जाइत अछि । पढ़ि हमरा खूब नीक लगैत रहैए । कतेको पत्र-पत्रिकामे आर्टिकल्स छपैत रहै छैन । हम करवट पत्रिकामे 'कोसीक त्रासदी' आ स्व. रामफल चौधरीजीक बारेमे आलेख लिखने छेलौं । पूर्वमे हम मैथिली कार्यक्रममे दरभंगा रेडियोसँ वार्ता ’संयुक्त राष्ट्र संघ' सन्दर्भमे केने रही। सरौती कालेजक प्रिंसिपलसँ ओकालत पेशामे एलापर मातृभाषा लिखब पढ़ब पाछू छुटि गेल । निर्मलीमे डॉ. उमेश मण्डलजी अपन आ अपन पिताजीक लिखल मैथिली भाषाक पोथी देने रहेछ, से कहियोकाल अवकाश पानि पर्छत रहे छी। लालदेवजीकै चारि- पाँच तरहक मैथिली पुस्तिका वेश अहगरसँ पाबि अपना डेरापर आएल बहुतरास मुव्वकिल आ सर-कुटुमक बीच बिलहल । माइयक भाषाक प्रति हमरो अनुराग कम नहि अछि।

निर्मलीक पावन धरतीपर भारतक प्रधानमंत्री आ कविवर श्रीमान् अटल बिहारी वाजपेयीजीक आगमन भेल रहेन । ओ समृद्धशाली मैथिलीकेँ संविधानक अष्टम अनुसूचीमे शामिल करबाक हमरा सभक चीरप्रतिक्षित माँग-पत्रपर सहानुभूति पूर्वक विचार करबाक सद्इच्छा पुर्वक घोषणा धरि केने छलाह। मैथिली आब बोली वाणी नहि, एकटा स्थापित भाषा आ साहित्यक लेल जानल जाइत अछि। एहि भाषामे लालदेव कामतजी प्रायः अनेको पुस्तक, अनेको विधामे लिखि चुकल छैथ से जानि अति प्रसन्नत हएब स्वभाविक । हिनक विलक्षण पोथी सभ पल्लवी प्रकाशन, निर्मली, सुपोलरसँ होइत रहलेन अछि से आरो आह्लादकारी बात थिक । मंगल कामनाक संग हम हृदयसँ बधाइ दइ छिऐन ।

- सूर्य नारायण कामत, पूर्व सदस्य- बिहार राज्य अति पिछड़ा वर्ग आयोग, पटना । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.'गणित डायरी'- सदानन्द पाल/ बिहैन कथा - दुर्घटनाक पछोर/ मैथिली लघुकथा- बत्तीस गामाक सर्रे/ पोथी चर्चा- स्पेशल परमिट लालदेव कामत 'गणित डायरी'- सदानन्द पाल/ बिहैन कथा - दुर्घटनाक पछोर/ मैथिली लघुकथा- बत्तीस गामाक सर्रे/ पोथी चर्चा- स्पेशल परमिट १ 'गणित डायरी'- सदानन्द पाल

'गणित डायरी' (1998)क युवा लेखक श्री सदानन्द पाल दू दशक धरि अहर्निस भs 67 टा पोथी पत्रिकाक अध्ययन कए हिंदी साहित्य संसारक अक्षय भण्डारके अपन नव पोषी पूर्वांचल की लोकगाथा गोपीचन्द अनमोल कृतिसं भरला अछि । लोक आस्थाक प्रतीक सारंगि केर उन्नायक गोपीचन्दपर लेखककें परिवारीक सदस्य से सेहो खूब खुराक भेटलेन, पोथीमे पूर्वी क्षेत्र, साहित्य आकादमीक क्षेत्रिय सचिव डॉ. देवेन्द्र कुमार देवेशजीक लिखत भूमिकामे प्रेमार्पण झलकै छै आ पोथीमे शामिल 8 टा पाठमे पाठक लेल नीक उर्जा स्रोत भेटै छै, बावजूद पालजी आग्रह वश लेखकीय निवेदनमे पाठक लेल अपन गप कहैत समीक्षाक हेतू सेहो एकटा उदगार व्यक्त करैत भारतरत्न अटल बिहारी वाजपेयीजीक पातींस- डॉ. सदानन्द पॉल शिक्षक आहुति बाँकी, यज्ञ अधूरा

सपनों के विघ्नों ने घेरा

अन्तिम जय का वज्र बनाने

नव दधीचि हड्डियां गलाए

आओ फिर से दीया जलाएं।'

भाव धारा प्रवाहित केलाह अछि। गोपीचन ऊर्फ गोपीचन्दपर विस्तृत शोध लेखन हेतु संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार लेखककेँ फेलोशिप (2007-08) प्रदान केने छ । आओर गोपीचन्द पर नव प्रतिमान लैत पैघ कविताक पांडुलिपि प्रकाशन अनुदान स्वीकृति (वर्ष 2015) इस्वीमे मन्त्रीमण्डल सचिवालय (राजभाषा विभाग) बिहार सरकार धरि उद्यत भेल रहैए प्रस्तुत पोथीक पाठ पाठककें 152 टा दोहा तुकबन्दी भेटत संगहि डेढ़ साए शब्दक अर्थ पन्नाक (कविताक) क्रमांक 152 गोट बुझाएल गेल छै, जेकर मिलान करैत सुलभ ढंगे पाठक वर्ग असहज होइसँ बाँचत । किताबमे नव आयाम जे जोड़ल गेल ओ गीतांजलि प्रणेता विश्वकवि रवीन्द्रनाथ नाथ ठाकुरजीक दृष्टिमे (बाउल गान) जेवर गीतांजलि प्रकाशित हिन्दी अनुदित गीतक भाव देल गेल छ। टिशनभासी लोकसभ लग जे सारंगी तान केर महत्व छ । पूर्वोत्तर राज्यमे, सएह नेपालमे धुन्ना आ बंगालमे बाउल गान पूर्वांचल पट्टीमे अभिहित अछि।

अइ पोथीक लेखक अपन बाबा स्मृतिशेष योगेश्वर प्रसादजीकें सादर समर्पित केने छैथ जे महर्षि मेहीँ बाबाक शिष्य छला आ स्वाधीनता सेनानी सेहो रहल छला। लेखक श्री पाल साहब नव युवाकें वहिक्रममे सत्संग-योग (चारिभाग) मे महर्षि मेहीँ पदावलीक समीक्षा लिख चुकल छैथ, जे पद उक्त पोथीमे द्रष्टव्य भेटत संगहि लोकगीतकार रामश्रेष्ठ दिवानाक फक्कड़ योगी 'गोपीचन्द क मादे पूर्वांचली 17 गोट पद पंक्तिबद्ध भेल छै, आओर दोसर कवयित्री स्वर्णलता 'विश्वफूल' लेल अड़ तर पाँति आदि-

" शायर की बिहार सौंपकर तुझे

तान छेड़ेगी उल्फ़त की गलीमे तेरी अपने दर्द बयाँ को धुन-धुनकर मेरी सजनी की अटरियामे छुम छुमकर ।'

अड़ तर पदमें लेखक बहिन सुप्रसिद्ध कवयित्री स्वर्णलता 'विश्वफूल' केर तँ तीन गोट लोकगाथा -काव्य अवलोकन करबामे आओत । दोसर बहिन अर्चना कुमारी जो केंद्रीय सूचना आयोगमे बाद दायर करएवाली पहिल महिला विकीह,

सेहो अइ पोथी लेल काज केने छैथ।

गद्यमे पूर्व डाककर्मी श्रुति लेखक काली प्रसाद पालजीक रचना धार्मिकताक सेहो दर्शन पाएब जे लेखक केर अनुवांशिक पिता हैं इविए जे लिम्का बुक ऑफ रिकार्ड होल्डर सेहो छैथ। हुनका अहमदाबादमे किशोरी गोस्वामीजी आ सुखसागर गोस्वामीजी गाथा सुनने रहैन ।

भारतक प्राचीन सभ्यता आ विविध संस्कृतिक 5000 बरख पुरान इतिहास रहलै । जाहिमे मानए पड़त जे कतेको धर्मक सम्प्रदाय आ जाति-उपजाति एक संग समाजमे अइ समन्यवय करैत ऋतु मौसम मिज़ाज आ जलवायु विविधार्के जीबेत भौगैत 21वीं सदीमे एकताबद्ध छइ । तेकर मूलतः कारण छै मिथिलांचलक लोकजीवन विशेष कऽ कोशी नदी कातक निवासी जे लोकगाथा संयोगने अछि, से छी माँ शारदे वीणासँ समकक्ष वाद्य यंत्र शारंगी जे धोना बजाबय वाला जोगी अपना घरसँ त्रिया लटारहमसँ फरक भए गुरु गोरखनाथ आ भरथरी हरि आओर गोपीचन्द केर कर्म योगक दर्शन गामेगाम प्रदर्शन करैत जनभाषाक लोक गाथा गाबि जीयाकेँ रखने छइ । अइपर वृहत गवेषणात्मक अध्ययन आगू हुअए तइले जीनियस सदानन्दजी अपन अभिक्रम सँ डेग आगू बढ़ा देलैन अछि।

मधुबनी पेंटिंगसँ गुदरी बाबाजीक कलाकृति देखेत बनत आ सरहवादक जन्मभूमि सहरसाक माटि-पानि जे रसल बसल गोपीचन्द नाच, गोपीचन्द गाथा, लोकगीत आ गोपीचन नाथ उर्फ राजा गोविन्द चन्द्र पाल केर लोक कथा सुनल जाइछ से मैथिली आ अंगिका मिश्रित अपभ्रंश वाणी छ । पूर्वांचल केर मानचित्र बनल अइ पोथीमे अछि, जेतए पूर्वांचली लोकभाषा कतेको राज्यक मिजहरसँ बनैत बाजल जाइ छै, तेकर प्रमाणिकता तँ ताकए पड़त । अइ पोथीमे समस्त हिंदीक स्थापित साहित्यकारक सरोकारकै चिन्हेबामे लेखक सफल भेला अछि। तँ ई पोथी पुस्तकालय हेतु संग्रहणीय थिक । बहुत रास राज्य केर परिभ्रमण करत लेखक परिपक्व छैथ आ अपन अनुभव केर सहकार परोसलैन अछि । पोथीक

अनेको संस्करण सालेसाल हुअए से आशा करैत मंगल कामना करैत छी। २ बिहैन कथा - दुर्घटनाक पछोर हमरा गामक रामुन आ जामून दूनू आपसमे मित्र रहय। जामू उर्दू सँ फोकनिया पास अईबेर केने रहय। रामू सेहो संस्कृतसँ माध्यमा उत्तीर्ण भेल रहय। एकहि मोटरसाइकिल सँ दूनू गोटेय रातिके सीमराहा चौक आर्केस्ट्रा देखय गेल छल। भोरबामे अबैतकाल दुर्गा पूजाक अष्टमी तिथि केँ कुहेश धुईन बढ़ कसगर लागल रहैक। तीव्रगतिक कारणेँ सड़कक कतबाहि सँ गाड़ी नीचा ढ़उलऐक गेने पाछू सीट पर बैसल जामू ठामहि इन्तकाल भ' गेलैक। मासदिन पछाति काली पूजामे मोटरसाइकिले सँ रामू भरदुतिया 'क सनेश एकदिन पहिले दै ले सीमराही बिदा भेल। संगमे पाछु बैसल निहमाके एक नवजुबक मित्र सेहो रहैक। लौकही लग एक कुटमक गाम रहैक से ओतय सँ बहरायल शुभ-शुभके। बांटते एक खूब रफ्तार सँ अबैत पिकप भानमे जोरदार टक्कर भ' गेने ठामहि मौतके चपेटमे चलि बैसल। संगी बेहोशी सँ छटल तखन मोबाइल सँ दुखत समाद पठेलक। खबेर सुनतहि बाबा केँ बकौर लागि गेल आ लगक सब बेसुधभ' स्तभ्ध रहल। जानि नै काल पछोर केने छैक। ३ मैथिली लघुकथा -: बत्तीस गामाक सर्रे हमरा गामक बारहो वर्ण केर समाजक सामाजिक बैठार भेल। सुरज केँ अपना जातिक मैनजनी बंशमे अदऔ सँ आबि रहलैक। तहिना बालेसर केँ सेहो ई पद अपना पिताजीक संत बनितेहि हाथ लागि गेल छलैक। सुकन सेहो अपन जातिक मान्यजन रहथि। लखन मल्लिक तँ सब पितियौत भैयारी मिलाकय जेठ स्वयं अछिये। बेचन ठाकुरके तँ बाबूओ अपना समस्त भैयारीमे श्रेष्ट रहैक। तहिना बरही, चौपाल आ कुजरा,धुनियाँ ,धोवी, मोमीन, तेली,सूड़ी आ हलवाई मेँ जेठौंस मुख्य पूरूष बनैत आबि रहल छैक। बैसकके विचारणीय विन्दु केँ प्रवेश कराबैत कतेको प्रस्ताव प्रस्तुत कयलनि चौधरी जी। पारित विषयक समर्थन करैत पंडितजी सब दिस एक नजैर घुमाबैत ब्याख्यान संक्षिप्ते सँ रखबाक अपील करैत अपनधरि कथन राखि कलमच बैस गेल। अयुब रैन,सकुर साफी , इदरीश अंसारी आ ईनुश मंसुरी एक संग बाजि गेलैक हौ सकल समाजके एकता टुटि गेलह। खूशीलाल खतबे बाजल अपन बत्तीस गामक संचालन काज आब निजी समयक अभावे छोरय पड़तै। नै तँ अलापुर सँ नारेदिगरमे वा पचही चाहे दोसरे परगाना ई जगह छोड़ि पराए पड़त। आब जातिमे ढ़ाठ- बान्ह ढ़िल पैर गेलै। हमर कोनूटा मोजर नहीं होइए। नबका उमेरिया सब अपन अभिभावक केर जुईत मेँ आब कहाँ छैक। मिश्रीलाल शरमा टोईन देलकैक - हौ मान्यजन मात्रे भोज ले रहि गेलहक। ककरो बात नबका पिढ़िक जुबक लोक नै मानि मनमानी पर उतारू भ' गेलैक हन्। तैमे तँ अभिभावकों केर शासन कमतर होइत जा रहल छह ने। सूरज चौधरी कहलनि देखह! सब जातिके अपन -अपन चारूभर मिलाकय बत्तीस गामक प्रभार छह। हमरा जातिक सघनता तँ एके दू विधानसभा क्षेत्र सँ ३२ गाम पुरने देखभाल सुलभ रहैय। मुदा कयल संकल्प तँ आब सब कियो बिसरि रहल छहक। बिनु दहेजक वियाह, गरीब केँ सब तरहेक मदैत जे होय छल से आब निमहैत कहाँ छैक। हमर क्षेत्र घोघरडीहा प्रखंडके आ मरौना के सीमा सटल रहला सँ एकठाम एकता कायम छलैक ‌। से की जे मधुबनी आ सुपौल जिला सीमावर्ती इलाका रहलाक कारणेँ कुटमैती मेँ सौहार्द रहय। आब तँ दूर सँ बेशी लगेमे बूझह जे गाममे आ टोलेमे वियाह - निकाह केर नैका चरनसारि खूब बढ़ि गेलह अछि। देखह असल झंझटि पहिले सँ आबि रहल छह, तेँ एकताक कमी छैक। एकटा बात कहय दाए तँ! जातिमे जे पैघोत आ बोनिहारा बाला अन्तरद्वेष पनैप गेल य से कोना समानता होयतैक? धनिक जँ गरीब वर्गमे कुटमैती जोरय तँ असली समाज सुधारक काज मानल जाएत। अपना सबक देखौंस कय आन जाति बड़का भ' गेल आ हम पचमनिया लोक अति पिछरल बनिके पछुआएल रहि जाईछी। चेतना रहैत , सजगता नहिं छह तेँ फेर सँ प्रतिज्ञा आई सभहामे करह जे जागरूकता बढ़ाबैत मैनजन बनल रहब‍। जतेक नियम टुटलह ऐ बीच ,तै ले सर्रे भुकबै छीअ। हरे - हरे केँ आयोजन उसरि गेल। ४ पोथी चर्चा- स्पेशल परमिट

हालहिमे नरहिया (मधुबनी) मेँ सगर राति दीप जरय'क कार्यक्रम कथा गोष्ठीमे लोकार्पित मैथिली पोथीक रचियता छथि श्री ओमप्रकाश झाजी। एहि 113 पृष्टक मैथिली भाषा मेँ साहित्यिक पोथी स्पेशल परमिट केर दाम 200 टाका छैक जे निर्मली 'क पल्लवी प्रकाशन सँ बहराएल एहि साल 2023 ई० मेँ। श्री ओमप्रकाश झा कृत मैथिली साहित्य क' पोथीमे 32 गोट शिर्षक बिहैन कथाक आ शेष 12 टा लघुकथा 'क विषय-सूचिमे मिज्झर छैक। अंग्रेजी क' शव्द मैथिलीमे ' स्पेशल परमिट ' बिहैन कथा छी,जे कथाकार महोदय 80म् सगर राति दीप जरय'क कार्यक्रम -निरमली वजाज धर्मशाला मेँ दि0 30-11-2013 ई० केँ हमरा समक्षे गोष्ठीमे पाठ कयने रहथि। पहिलेहुँ लिखलौंह अछि सद्यप्रकाशित एहि पोथीक' लोकार्पण 30 सितम्बर केँ भेल रहय,ताहि सँ पुर्व एहिक सीडी कैसेट्स रूपमे बेरमा गाममे दि० 21-12-2014 केँ सेहो आदरणीय जगदीश प्रसाद मंडल,कल्पकवि उमेश नारायण कर्ण आ राम विलास साह जी द्वारा लोकार्पण भेल रहैक। महज पुस्तकाकार रुपेँ ई छपिकय पाठक बीच हुनक धर्मपत्नी श्रीमती रेखा झा केर कोशिलिया कैंचा सँ भेल अछि,जे अधिक प्रशन्नताक बात भेल। साहित्यकारक संवेदना अपना रचनाक प्रति व्याकरण केर दृष्टि सँ मजगूत छन्हि। एहि दूनू स्तंभमे सँ कोनू विधा कमजोर नहि भेल छन्हि। ई मैथिली पोथी एतेक रास रोचकता सँ भरल छैक जे पाठक वर्गकेँ पढि सतत् मोने रहतैन। ओना बहुतो कथा अनेको कथाकारके पढ़ि लेब मुदा मोन रहि पबैछ बढ़ कमे साहित्यकार'क । से पहिलहुँ कहलौं ओम प्रकाश झाजी अपन पहिलुक लघुकथा आ बिहैन कथाक संग्रहमे खुब जमलाह अछि। श्री झा जीक पिताजी सेहो साहित्य अनुरागी छथि आ बाबाक सहोदर भाय स्व० जीवकांत प्रसिद्ध कथाकार डेवढ़ - घोघरडीहा जि० मधुबनी सँ साहित्यकिए वातावरण बाल्यकाल सँ हिनका बिरासतमे भेटल छन्हि। तैयो ओ आदरणीय जगदीश प्रसाद मंडल जीक कथालेखन सँ बढ़बेसी आबेश हेबाक गछैत छथि। मूलत: झा जी कवि ओ गजलकार छथि। हिनक मौलिक रचना सभ इन्टरनेट पर सदा अभरैत रहल हन। सन् 2012 मेँ 'कियो बुझि नहि सकल हमरा ' आ 2023 ई०मेँ " कोन रंगक ई तान- खन अपन खन आन" गजल संग्रह प्रकाशित भेल रहनि। हिनक बिहनि कथामे किछ लघुकथा, तँ लघुकथा मेँ पूर्ण कथा शव्द आ वाक्यके परिमाप अनुसारे सूचीमे पैसल आवश्य छन्हि। एहि सँ आगू आबयबला समयमे एक पूर्ण कथाकार रूपेँ हिनक दीर्घ कथा पाठकक समक्ष आओत से संभवत: स्पष्ट दृष्टिगोचर होईछ। उप आयकर पद पर दिल्लीमे कार्यरत रहि श्री झाजी दि० 15-9-2023 केँ अपन पोथी बावत 5 पृष्टक" अपन कथा " लिखैत एहि मैथिली भाषा केर साहित्य केँ माता श्रीमती रामकुमारी झा आ पिता श्री पीताम्बर झा जीकेँ समर्पित करैत पहिल खिस्सा " स्पेशल परमिट " लिखबाक अभिप्राय सँ एहि पोथीक शुभ संज्ञा ' स्पेशल परमिट ' रखबा पर सम्यक दृष्टिकोण रखलनि अछि। सद्यप्रकाशित एहि पोथीक'पृष्ठ संख्या 72 पर शिर्षक डिहक जमीन साढ़े छह पन्नामे दीर्घकथा सन बुझाएत। नरेश नामक नायक भोपालमे शिक्षा अधिकारी रहैत छैक। आरंभमे ओकर पारिवारिक अवस्था अत्यंत विपणतामे रहैछ। बालपनमे ओकर माय मरौनाबाली पढ़ाबैक विमर्श अपन पति फेकन मरड़ सँ कयने छलीहे। जहनकि चारिये सालक बालकके चरबाही धराबैले हुनक गिरहत भुटकून बाबू कहैत रहनि। विशेसर मास्टर केँ चटिया भर्ती करैक रहनि तेँ नरेशक पलिबारमे हुनकर नामक चर्चा आगू बढ़ैत बटिया खेतक मालिक आ पशुपालक भुटकुन बाबू लग भ' गेल छलैक। मालिकके तर्कसंगत बात रहैक जे तोहर बापो तँ हरवाही चरवाही हमरा ऐठाम करैत तोरा चारिमे बरखक वहिक्रम मे संग लगौने रहौक। ताहि पर मरड़ जीक युक्तिसंगत उक्ति होईछ आब पुरना जमाना नै ने छै! से बेटाकेँ पढ़ाबैत मैट्रिक 80 प्रतिशत अंक सँ बोर्ड परीक्षामे पास करबैत छैथ । तत्पश्चात दरभंगा कालेजमे पढ़य जाईछ। जहन टियूशन पढ़ाबैत अपन प्रतियोगिता परीक्षाक तैयारी सेहो करैत ओ कुशल व्यवहारक रहने सहपाठी आ अध्यापकक नजैरमे प्रिय बनैत छै नरेश। आओर नरेश'क वियाह भ' जाईछ, कालेक्रमे ओकर कनियाँ संग धरैत मध्यप्रदेश ओकरा लग रहैत शहरी बनै छथिन। गाममे माय बाबूक सुधि लैत रहैत एकबेर आग्रहो कैलनि नरेश जे दूनू गोटे शहरे हमरा लग रहय चलू। मुदा आठ धुर घर-घरारी छोड़ि हुनक बाबू किन्नौ ने जाए चाहैत य। धरि नरेश अपन बाबूजी केँ हरबाही छोरा देलकैक। बालबच्चा 'क पढाय लिखाइमे आ सरकारी सर्विस मे लटपटाएल कतेको साल ओतहि गिरहबासु होइत पिताक मोबाइल वार्ता सँ गाममे घरक सटल जमीन नहीं किनबाक आ जे पुश्तैनी डीह छै सेहो बेचयके निधोख गप्प राखि देला सँ पिता मायुस भ' जाई छन्हि। जहन कि चालीस हजार टाका जरसेमनके दू कट्ठा परति बाड़ी मात्रे हिनका पच्चीस हजार रुपए मेँ भुटकून बाबू द'दैतैन। गामसँ पिण्ड छोड़ेबाक नियार केँ एकाएक अधात पुहुँचैत छैक नान्हिटा छोटकी बेटीक गप्पसँ नरेश जीकेँ। चौथा वर्गक पढै़त बेटी सुनन्दा'क अकिल जेहन ने उत्प्रेरित केलकैन जे नरेश बाबू के मरल विचारमे प्रेरणा जगलैन। से पाठक अपने ओहि बुच्चीक स्नेहिल गप्पसप जानै ले ऐ पोथीक केन्द्रीय कथा 'स्पेशल परमिट' कें नहिं,रेलयात्रा सँ चिकना स्टेशन आबि अपन- माय केँ दस शालपर सजल नयन सँ एकाएक दिठादर्शनक संगहि डीह किनैत गामक लोकके अपना छोट मरैयामे खूशी सँ चाह पर चाह पियबैक प्रसंग नीक लागत डिस्क जमीन मेँ। भुटकून बाबा केर आशिर्वाद धरि सदा बनल रहैक। स्पेशल परमिटमे सिनेमा हॉल केर मैनेजर साहेबक दिस सँ बहुत राश स्वागत आ विनम्र वार्ता सुनि छोटकी बेटी प्रशुन्न दिए कहैत छैक अपन बाबूकेँ। ओ स्कूलक गेटक भीतर अपन गाड़ी सँ उतरैत छै आ हमरा आने विद्यार्थी जेकाँ गेटक बाहरे उतारि देल जाईछ। से अहां केँ जहन स्पेशल परमिटक कारणेँ एतेक बेसी धाक अछि तँ आब सँ हमरा अपने गाड़ी सँ गेटक भीतरमे आबि उतारल करू! बेटीक बाप ई कोना ओहि ललनाके बुझा पाओत जे प्रसुन्न तँ कलक्टर केर पुत्र थीक,से ओकरा हमरा सँ पैघ परमिट छैक। आखिर बालबोधकेँ स्तरक थाह नहिँ लगैत छै। ऐ बिहैन कथामे डेढ़ पन्ना अजबारल गेलैक हन्। ओम जीक बिहैन कथा पढ़ैत पाठककेँ अतिशय आनन्दक अनुमति निठाहे होयत। गरम मसाल्ला शिर्षकमे अपने निहारब सोनू - मोनू दूनू कालेजक संगी रहैछ। एकदिन सोनूकेँ नव परिधानमे सजल आ इतर फुलेल सँ गमागैम पाबि ओकर सब संगी घेरकय ऐ तरहक अचरज सन तैयारी 'क रहस्य जानबाक तीव्र जिज्ञासा करैछ। सोनू अपना महल्लामे नव आगन्तुक परिवार जे भाड़ापर डेरामे बसय ऐलैक हन,तकर अति सुन्नरि छौड़ी बावत रूपक प्रशंसा मादे रसगर वार्ता करैत छैक। ताहि पर मोनू कहैत छै,तोड़ा मुहल्लामे तँ इयहटा यार बडसुन्नरि नवयुवती थोड़े छौक! हमर तँ तिक्ष्ण नजैर रहय से एकटा टेबि लेने छी। तैपर ओ बजैत छै चल देखा तँ ,आखिर हमरा पैनी निगाह सँ आईधरि कोना बाँचल रहि गेल? जहन दूनू आगू बढ़ैत गेलैक तँ एक छात्रा टियूशन पढैय अबैत छली से देखते मातर ओ ओकरा दिश संकेत करैत बताबैत छै। कहलकै देख ले हमर गरम मसाला कोना छमकैत चलि रहलैक अछि। सोनूक माथ सन्न रहि मोनू केँ तराक झापड़ गालपर मारैत चेतौनी दैत बाजलै ई हमर छोट बहिन छी। आब तँ दूनूक कल्पित सुआद उखड़ैत तीत भेल जाइत रहलैक। ई सब उमेरक दोख छी आ विज्ञान कहैत छै विपरीत ध्रुव लिंगक आकर्षण सहजे रहैछ। आश करैत छी ओमजीक नीक कथा पोथी मैथिली साहित्य आन्दोलनमे शिघ्र दोसर आओत,इयह कामना अछि। -लाल देव कामत मो० ७६३१३८०७६१ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.नन्दविलास राय- संस्कार नन्दविलास राय संस्कार

राम आ लखन दू भाय। राम जेठ आ लखन छोट। दूनू भायमे बड्ड़ मेधा। रामूकें एकटा बेटा आ एकटा बेटी,तहिना लखनकेँ सेहो एकटा बेटा आ एकटा बेटी। रामक बेटाक नाओं अजय आ लखनक बेटाक नाओं विजय। तहिना रामक बेटीक नाओं गीता आ लखनक बेटीक नाओं पुनीता। रामक बेटा - बेटी कौलेजमे पढ़ैत आ लखनक बेटा आठवाँ क्लासमे आ बेटी ६ठा क्लासमे पढ़ैत। लखन अपना धियापुताकेँ हरसमैत सिखबैत अपना सँ पैघ केँ आदर आ सम्मान करबाक चाही। अपना सँ पैघ व्यक्ति क' नाओं आदर आ सम्मान पूर्वक लेबाक चाही। झूठ नहिं बजबाक चाही। लखनक बेटा विजय आ बेटी पुनीता पित्ती रामकेँ बड़का बाबू आ पितिआइन यानी रामक पतृनीकें बड़की माए कहि कए बजबै छल। आमक महिना रहय। एक दिन राम आ लखन दूनू भायमे रखलाहा आम खातिर रक्का- टोकी भ' गेल। बात बढ़ैत - बढ़ैत गारि - गरौबलि धरि पहुँच गेल। गारि - गरौबलि धरि नहि रहल,राम तीन - चारि थापर लखनकेँ मारलक मुदा लखन जेठ भायपर हाथ नहि उठौलक। जखन राम आ लखनक बीच झगरा होइत रहय लखनक बेटा विजय सेहो ओतै छलैक। जई दिन दूनू भैयारीमे झगड़ा भेल तइके प्रात भने रामक बेटा अजय गाम पहुँचल । बेरूपहर अजय लखनक गुलाबखास आमक गाछमे सँ चारि गोट पकलहा आम तोड़लक। जहन अजय आम तोड़ैत रहय तैखन विजय सेहो गाछीयेमे रहय। ओ अजयकेँ अपना गाछमे सँ आम तोड़ैत देखलक। मुदा किछ नहि बाजल। ऐगला दिन विजय अपन पिताजी लखन सँ कहलक - पिताजी काल्हिखन बेरूपहर अजयया अपना गुलाबखास आमक गाछ सँ चारिटा पकलाहा आम तोड़ि लेलक। तैपर लखन बाजल - की कहलेँ? फेर सँ कह त! विजय फेर बाजल - काल्हि बेरु पहर अजयया अपना गाछ सँ चारिटा पकलाहा आम तोड़ी लेलक। विजयक बाजब खतमो नहिं भेल रहए कि लखन तड़ातड़ चारि - पाँच चाट विजयक गालपर मारलथि आ बजलथि- तोरा एतेक दिन सँ इयह संस्कार सिखौलियो हेँ। अपना सँ पैघ केर अहिना अनादर पूर्वक नाओं लेबाक चाही। विजय कनैत बाजल - आ काल्हि जे बड़का बाबू अहांकेँ मारलथि से? तैपर लखन बजलाह - हमरा ने मारलक तइ सँ तोरा की? केओ अपन बेवहार खराप क' लेत त तों कि अपन संस्कार बिसैर जेमै आ अशिष्ट भ' जेमै। इ त तोहर अशिष्टता भेलौ। पाँच बेर कान पकैड़क' उठ- बैठ आ गिरह बान्हि ले- अपना सँ पैघ केर आदर आ सम्मान करब। अपना सँ पैघ केर आदरपूर्वक सम्बोधित करब। बाज त अजयकेँ की कहबीही? विजय बाजल - अजय भाइजी कहबै। तैपर लखन बजलाह - हँss..अपन संस्कार कखनो नहि खराप कर आ नहिं अशिष्ट बन। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.रबीन्द्र नारायण मिश्र- हमर साहित्यिक यात्रा रबीन्द्र नारायण मिश्र हमर साहित्यिक यात्रा सन् २०१६मे हमर माएक चौरानबे सालक बएसमे देहान्त भए गेलनि। हुनकर देहावसानक बाद मोन ततेक दुखी ओ अशान्त भए गेल जकर वर्णन असम्भव। लगभग चारि मास धरि राति-राति भरि निन्न नहि भेल। कहिओ काल भोरुपहरमे आँखि लगैत छल, ओहो थोड़बे कालक लेल। सगर राति ओहिना माने टकटकीए-मे...। सम्पूर्ण दिनचर्या अस्तव्यस्त भए गेल। निःशव्द रातिमे जागल माथमे बितल बात सभ सिनेमाक रील जकाँ उभरैत रहैत छल। एहन मानसिक स्थितिसँ उबरबामे एहि आलेख सबहक आश्रय भेटल। मोनक बात सभ लिखैत गेलहुँ। सालक साल मोनमे गरल बात सभकें निकलबाक रस्ता भेटलैक। मोनमे । शुरुमे हम हिन्दी,अंग्रेजी  आ मैथिली, तीनू भाषामे लिखलहुँ। फेर एकदिन हमर एकटा मित्र कहलनि "आन भाषामे लिखनाहरक कोनो कमी नहि अछि। अहाँ मैथिलीमे लिखू । ई अपनसभक मातृभाषा थिक । एहि भाषामे जे परेसानी होअए,मुदा अछि तँ अपन । बातो सही बुझाएल । तकर बाद हम झुरझार मैथिलीएमे लिखि रहल छी। मैथिलीमे अखन धरि हमर छब्बीसटा  पोथी प्रकाशित अछि जाहिमे सतरहटा उपन्यास अछि। एकटा आत्मकथा, दूटा संस्मरण,तीनटा निवंध संग्रह,एकटा यात्रा प्रसंग आ दूटा कथा संग्रह अछि। हमर प्रकाशित पुस्तकसभक प्रकाशनवर्ष सहित विवरण निम्नलिखित अछिः प्रकाशन वर्ष: प्रकाशित पोथी २०१७ १. भोरसँ साँझ धरि (आत्म कथा)   २. प्रसंगवश (निवंध) ३. स्वर्ग एतहि अछि (यात्रा प्रसंग) २०१८ ४.फसाद (कथा संग्रह) ५. नमस्तस्यै (उपन्यास) ६. विविध प्रसंग (निवंध संग्रह ) ७.महराज(उपन्यास) ८.लजकोटर(उपन्यास) २०१९ ९.सीमाक ओहि    पार(उपन्यास)१०.समाधान(निवंध संग्रह) ११.मातृभूमि(उपन्यास) १२.स्वप्नलोक(उपन्यास) २०२० १३.शंखनाद(उपन्यास) १४.इएह थिक जीवन(संस्मरण) १५.ढहैत देबाल(उपन्यास) २०२१ १६.पाथेय(संस्मरण) १७.हम आबि रहल छी(उपन्यास) १८.प्रलयक परात(उपन्यास) २०२२ १९.बीति गेल समय(उपन्यास)  २०.प्रतिबिम्ब(उपन्यास) २१. बदलि रहल अछि सभकिछु(उपन्यास)२२.राष्ट्र मंदिर(उपन्यास) २३.संयोग(कथा संग्रह) २४.नाचि रहल छलि वसुधा(उपन्यास) २०२३ २५.दीप जरैत रहए(उपन्यास) २६.ठेहा परक मौलायल गाछ(उपन्यास) एकर अतिरिक्त हिन्दीमे हमर उपन्यास,न्याय की गुहार प्रकाशित अछि। हिन्दीमे लिखल दूटा उपन्यास अप्रकाशित अछि। अंग्रेजीमे हमर दूटा किताब(Life is an Art आ The Lost House )प्रकाशित अछि। हिन्दी आ अंग्रेजीमे हमर बहुत रास रचना प्रतिलिपि वेवसाइटपर उपलव्ध अछि । https://hindi.pratilipi.com/user/rabindra-narayan-mishra-ed20wz4500 संप्रति १०५ विभिन्न प्रकारक हिन्दी आ अंग्रेजीमे हमर रचना एतए पढ़ल जा सकैत अछि जाहिमे कविता,कथा,उपन्यास,आ आलेख सामिल अछि। समय-समयपर अपन ब्लाग स्वान्तः सुखायपर हम लिखैत रहलहुँ अछि। हिन्दी,अंग्रेजी आ मैथिलीमे हमर अनेक रचना एतए पढ़ल जा सकैत अछि । https://mishrarn.blogspot.com/ मैथिलीमे हमर बहुत रास मौलिक रचनासभ मिथिला मिहिरमे छपैत रहैत छल। मिथिला मिहिरक संदर्भित प्रतिमे सँ किछु हमरा लगमे  बाँचल रहि गेल अछि । एकटा कविता(जीवन संघर्ष)२५ जुलाइ १९८२क छपल छल। प्रसंगवश ओहि कविताकेँ उद्धृत कए रहल छी- जीवन संघर्ष (१) सूर्य जे प्रातः उगल से विदा छल, चिड़ै चुनमुन उतरि कऽ आकाशसँ, निश्चिंत भावे गवै  छल- "जे करी विश्राम दिन आवशेषपर अछि।" (२) मुदा ओ हाथसँ पाथर फोड़ै छल, भोरेसँ संघर्षरत जीविका हित, सोनितक विक्री करैछल, कुहरितहुँ साँझो पड़ल ,धरि ओतहि छल। (३) पेट,अँतरी,पीठमे अंतर खतम छल, दाँत झड़ि कए मुँहकेँ खधिआ केने छल, आँखिमे धसना धसल छल,आहार बिनु, हाड़ोक हड्डी गलि रहल छल। (४) से कहि रहल छल, बातमे पीढ़ा भरल छल, अतिशय तृषित मनदग्ध,देहक दुर्गति छल, जे हमर जीवन कुटिल ओ क्लिष्ट केहन, यद्यपि करी श्रम अनवरत धरि हाल एहन, (५) हे मनुज़ तोँ उठह आबो आँखि खोलह, देखह ने कोनो भेद अछि,प्रकृतिक कोनो आयाममे, तद्यपि सुखक मारिचिकामे,विसरि जे तोँ मनुक्ख छह, अपने सोनित मोहवश गट-गट पीवै छह। १४ अगस्त १९८३क मिथिला मिहिरमे हमर आलेख `मिथिलाक संस्कृति’ छपल छल। २२ मइ १९८३क हमर रचना बरियाती(व्यंग) छपल छल । (एहि रचनासभसँ संवंधित मिथिला मिहिरक पृष्ठ सहित रचना हमर ब्लाग पर उपलव्ध अछि।)दरभंगासँ प्रकाशित,मिथिला टाइम्समे हमर कथा ,क्रान्ति विसर्जन,ओही समयमे छपल छल। कहबाक तात्पर्य जे बहुत पहिने माने तैतालीस-चौआलिस साल पहिने हम लिखैत रहैत छलहुँ आ छपितो छलहुँ तकर प्रमाण उपलव्ध अछि। जनवरी १९७८मे हमर पदस्थापना इलाहाबादमे भेल । हम मार्च १९८७ धरि ओतए रहलहुँ । तकर बाद वापस दिल्ली आबि गेलहुँ । ओही बीच इलाहाबाद मे डाक्टर जयकान्त मिश्रजीसँ आ हुनकर समस्त परिवारसँ बहुत नीक संपर्क छल । हुनके प्रेरणासँ हम बीसटा कथा आ एकटा उपन्यास सन् १९८२सँ ८५क बीचमे लिखने रही। मुदा ओ सभ कतेको साल धरि पुस्तकाकारमे नहि छपि सकल । मार्च १९८७मे  हम बदली भए दिल्ली आबि गेलहुँ। घरसँ कार्यालय आवागमनमे बहुत समय लागि जाइत छल। एहि ठाम जीवन-संघर्ष बढ़ि गेल। मिथिला मिहिर बन्द भए गेल। अस्तु, ई कथा/ उपन्यास सभ जस-के-तस पड़ल रहि गेल । एमहर पुरनका पन्ना सभ पलटलहुँ तँ एकरा सभकेँ फेरसँ देखबाक अवसर भेटल। श्री उमेश मण्डलजी बहुत परिश्रमसँ पुरान भेल पान्डुलिपि सभकेँ स्वच्छ प्रति टंकित केलाह जाहिसँ ई कथा सभ इजोत देखलक। आखिर, डाक्टर उमेश मण्डलजी एकर पाण्डुलिपिकेँ टंकित केलाह । तकर बादे ई पोथी प्रकाशित भए सकल । एतेक पुरान कागजपर हाथसँ लिखल पाण्डुलिपिक फोटो ह्वाट्सअपपर निर्मली पठाएब आ तकरा टंकित करब बहुत मोसकिल काज छल । हाथ रखितहि कागज लसकि जाइत छल। कतेको ठाम पेनसँ लिखलाहा ढबकि गेल छल। किछु पन्ना तँ फाटिओ गेल छल । डाक्टर उमेश मंडलजी एहि कठिन काजकेँ अत्यन्त परिश्रमपूर्वक आ उत्कृष्ट निष्ठासँ संपन्न केलनि । तकर बादे सन् २०१८मे फसाद (कथा संग्रह) आ २०२२मे प्रतिबिम्ब(उपन्यास) क्रमशः छपि सकल। सन् १९८७मे दिल्ली आबि गेलाक बाद हमर दैनिक दिनचर्या तेहन भेल जे लिखनाइ बला काज बहुत दिन धरि बंद रहि गेल। कहिओ काल गाहे-बगाहे यदि लिखबो केलहुँ तँ ओ फाइलेमे अप्रकाशिते रहि गेल। एमहर सेवानिवृत्तिक बाद सन् २०१६मे माएक देहान्तक बाद हमरा मोनमे भेल जे फेरसँ मैथिलीमे लिखी। तहिआसँ हम नियमित लिखि रहल छी। लिखि लेलाक बाद ओकरा टंकित करब,पुस्तकक आकार देब आ प्रकाशित कराएब बड़का समस्या छल। ओही समयमे डाक्टर उमेश मंडलक जनतब भेटल । हुनकासँ संपर्क कएल । नित्य लिखलाक बाद हुनका मोबाइलपर फोटो पठबैत छलिअनि। ओ तकरा टंकत करैत छलाह। तकरा हम फेर पढ़ैत छलहुँ । ओहिमे जरूरी संशोधन करैत छलहुँ । तकर बाद ओ किताबक प्रूफ पठबैत छलाह ,से हम कैकबेर पढ़ैत छलहुँ । ओहिमे बीच-बीचमे युनीनागरीपर ओहिमे सुधारो करैत छलहुँ । एहि तहरेँ लगातार पाँचटा किताब उमेशजीक सहयोगसँ छपि सकल। ओहि बीच हमरा युनीनागरीपर टंकण करबाक नीक अभ्यास भए गेल। ओना हमरा अंग्रेजी टाइप करए पहिनेसँ अबैत छल। मुदा देवनागरी टाइएिंग करबामे युनीनागरी साफ्टवेयरक बहुत योगदान अछि। असलमे ई साफ्टवेयर हमरा २००९मे श्री गजेन्द्र ठाकुरजी पठओने रहथि। हम डाक्टर जयकान्त मिश्रजीपर एकटा स्मरण लिखने रही। हाथसँ लिखल ओहि संस्मरणक फोटोकाँपी हुनका पठओने रहिअनि। तखने ओ हमरा युनीनागरीक साफ्टवेयर पठओने रहथि । हम हुनके देल युनीनागरीक साफ्टवेयरमे काज करबाक नीक अनुभव प्राप्त कए लेलहुँ । कालान्तरमे तकरे उपयोग कए हम  मैथिलीक बीसटा किताब लिखलहुँ । एहिठाम ई कहब युक्तिसंगत रहत जे हम पहिने कगजपर लिखैत छलहुँ । बादमे युनीनागरीसँ टाइप करबामे अभ्यास भए गेलाक बाद सोझे लैपटापपर काज करैत रहलहुँ जाहिसँ कागज आ समय दुनूक बचति भेल । काजक गुणवत्ता सेहो बढ़ल। पछिला सात सालमे हमर रचनासभ श्री गजेन्द्र ठाकुर द्वारा संपादित ई पत्रिका विदेहमे निरंतर छपैत रहल अछि। हमर आत्मकथा(भोरसँ साँझ धरि),आ उपन्यास नमस्तस्यै,महराज,लजकोटर ,मातृभूमि,बदलि रहल अछि सभ किछु विदेह पत्रिकामे धारावाहिक पुनर्प्रकाशित होइत रहल अछि। अखनहु हमर उपन्यास,ठेहापरक मौआएल गाछक धारावाहिक पुनर्प्रकाशन विदेह पत्रिकामे भए रहल अछि। एकर अतिरिक्त हमर अनेक आलेख सेहो एहि पत्रिकामे छपल अछि। हमर सभटा पुस्तकक डिजिटल संस्करण विदेहक पेटारमे राखल अछि आ निःशुल्क डाउनलोड कएल जा सकैत अछि । हैदराबादसँ श्री सी.एम.कर्णजी आ हुनकर सहयोगीलोकनि द्वारा प्रकाशित पत्रिका `देसिल बयना’ मे हमर अनेक रचनासभ छपल अछि । मिथिलादर्शन कोलकातामे हमर यात्रा प्रसंग(युरोप यात्रा आ कालापानी छपल छल। चेतना समितिक पत्रिका घर-बाहरमे सेहो हमर यात्रा प्रसंग(त्रिपुर सुंदरीक दरबारमे आ डाक्टर योगानन्द वियोगीजीक वाल उपन्यास "ऊड़न छू गोलाक पुस्तक समीक्षा-ई रहस्यमय संसार) छपल छल। एमहर मैथिली पुनर्जागणप्रकाशमे सेहो हमर किछु कथासभ छपल अछि । समय-समयपर  खास कए नवीन पुस्तकक प्रकाशनक बाद फेसबुक/व्हाट्सएपपर चर्चा होइत रहल अछि। तकर किछु महत्वपूर्ण अंश संदर्भक हेतु पुनःप्रेषित कए जा रहल अछि । प्रकाशित पुस्तकःबदलि रहल अछि सभ किछु प्रसिद्ध विद्वान एवम् मैथिलीक महाकवि माननीय श्री बुद्धिनाथ झाजीक टिप्पणी (व्हाट्सएपक अरुणिमा साहत्यिक गोष्ठीसँ उद्धृत):- "मैथिली साहित्यक एहेन 'एकांत सेवक' इएह टा। हिनक पोथी सब‌ मात्र गनतीक लेल नहि, ओकर गुणवत्ताक संग आवरण, छपाइ, सफाइ, सब किछु उपरि-जुपरि। सभ कीर्ति संग्रहणीय/ पठनीय अछि। जय मैथिली" प्रोफेसर डाक्टर भीमनाथ झा:"नव उपहारक स्वागत ।" श्री लक्षमण झा सागर:"दू दर्जन सं बेसी मैथिलीक पोथी प्रकाशित छनि जकर कियो गोटे नोटिस नै लैत छथि। मैथिली साहित्य के अभगदशा लिखल छैक।जे समाज अपन साहित्य आ साहित्यकारक सुधि बुधि नै लेत। चर्चा धरि करबा मे कन्छी काटत तकर भगवाने मालिक।" डाक्टर रमण झा: "रवीन्द्र नारायण मिश्रपर ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालयसँ शोधकार्य भऽ रहल अछि। सूचनार्थ।" डाक्टर उमेश मंडल : "मैथिली साहित्यक उपन्यास विधा, जेकर भण्डार बहुत पैघ नहि अछि, ताहिमे अपनेक अनवरण लेखन बहुत किछु अछि। की अछि, केहेन अछि ओ तँ समीक्षक लोकनि कहता मुदा असाधारण ओ ह्लादकारी अछि, से तँ सबहक मुहसँ निकलिए सकैए। सादर हार्दिक बधाइ..." https://www.facebook.com/photo/?fbid=3022436554698002&set=a.1388340294774311 प्रकाशित पुस्तकःबीति गेल समय https://www.facebook.com/photo/?fbid=2932602210348104&set=a.1388340294774311 प्रोफेसर डाक्टर भीमनाथ झा: "हम तँ एकरा उपन्यासक 'उपन्यासे' बुझै छी। कथा जा पूर्णताकेँ नहि प्राप्त क' लिऐ ताधरि बढैत रहय, अर्थात् वार्ता सय राउंड तँ चलबेक चाही । समर्थन आ शुभकामना अपनेक संग अछि ।" प्रोफेसर डाक्टर बिभूति आनन्द : "एहि ऊर्जा कें नमन" प्रोफेसर डाक्टर रमण झा: "बहुत-बहुत शुभकामना आ बधाइ !" डाक्टर उमेश मंडल:' बीति गेल समय' बहुत नीक शीर्षक! हार्दिक बधाइ..! ------------------------------------------------------------ प्रकाशित पुस्तकःप्रलयक परात https://www.facebook.com/photo/?fbid=2831911753750484&set=a.1388340294774311 प्रोफेसर (डाक्टर) भीमनाथ झा: "अहाँक लेखन ऊर्जाक अभिनन्दन..." श्री हितनाथ झा: "संख्यात्मक दृष्टिएँ तँ हिनक पोथी डेढ़ दर्जन अछिये , गुणात्मक दृष्टिसँ सेहो हिनक लेखनी महत्वपूर्ण अछि । एकान्त साधक श्री रवीन्द्र नारायण मिश्रजी संप्रति लिखिए रहल छथि से अनवरत । स्वागत ।" केदार कानन : "हिनक रचनाशीलता मोहित आ प्रेरित करैत अछि ।" प्रकाशित पुस्तकः'ढहैत देबाल' प्रोफेसर डा. भीमनाथ झा: 'ढहैत देबाल' भने नाम राखि लियौ अपने, हम तँ जोड़ाइत देबाल सैह मानब । तीन-चारि मासपर एक पोथी--- मैथिली साहित्यक देबाल अपने जोड़ि रहलहुँ अछि । बधाइ! प्रोफेसर डा.रमण झा:गद्यमे उपन्यास आ पद्यमे महाकाव्य जँ केओ एकहुटा लिखि लैत छथि तऽ ओ यशस्वी साहित्यकार कहबैत छथि आ जे जतेक अधिक संख्या बढ़बैत छथि से ततेक----। मैथिलीमे हमरा जनैत विदितजी उपन्यासक संख्यामे सभसँ आगाँ छथि आ लगैए जेना अहीँ हुनका पकड़ि सकबनि। बहुत बहुत बधाई आ शुभकामना। प्रोफेसर डाक्टर बिभूति आनन्द : "मैथिलीक सौभाग्य जे अहाँ सन ऊर्जावान लेखक प्राप्त भेलै.." https://www.facebook.com/photo?fbid=2615244298750565&set=a.1388340294774311 मैथिलीक वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय श्री लक्ष्मण झाजी लिखैत छथि(ह्वाट्सअपसँ उद्धृत):- 22/3/2022 "बरका काज क रहल छी। असली मैथिलीक सेवा इएह छी। हमरा जानकारी अनुसार मैथिली साहित्यक उपन्यास विधाक एतेक पोथी आर किनको नै छनि। से एक पर एक। भगवती अहाँ के असीम उर्जा देथि आ हमरा साहित्य के अहाँ आर अपन अनुपम कृत सब दैत रही। हमर असीम मंगल कामना!" 24/07/2022(ह्वाट्सअप) प्रोफेसर(डा.) विजयेन्द्र झा: "मैथिली  साहित्य अपनेक एहि 19 गोट पोथीसॅ समृद्ध  भेल आ' जहिआ कहियो मैथिली  साहित्यक इतिहास  लिखल जाएत, तॅ  मैथिली- साहित्यकारक श्रेणीमे अपनेक नामकें अवश्य अमरत्व प्रदान करत।  किओ एकटा उपन्यास  लिखि साहित्य  मध्य अपन स्थान सुरक्षित  करबा लैत छथि। ई तॅ संख्यामे  चौदह गोट अछि। एहि सुकृतिक लेल सदा मैथिली  साहित्य अपनेक ऋणी रहत।बहुत-बहुत शुभकामना। प्रणाम!" मैथिलीक विद्वानलोकनिक हमर पुस्तकसभपर समीक्षा सेहो सेहो समय-समयपर छपैत रहल अछि। डा. योगानन्द झाजीक हमर मैथिली उपन्यास मातृभूमिक समीक्षा छपल छल जकर किछु अंश प्रस्तुत कए रहल छी- "स्वनामधन्य श्री रबीन्द्र नारायण मिश्र बहुआयामी लेखक छथि । हिन्दी,मैथिली, ओ अंग्रेजीमे समानाधिकार रखनिहार एहि एकान्तसेवी रचनाकारक दर्जनाधिक पोथी प्रकाशित छनि जाहिमे अधिकांश प्रणयन ई मातृभाषा मैथिलीमे कयने छथि । विभिन्न विधामे सिद्धहस्त श्रीमिश्र आत्मकथा,यात्रा-वृतान्त,निबन्ध-प्रबन्ध,कथा ओ उपन्यास आदि अनेक विधामे रचना कयने छथि। खास कऽ हिनक रुचि उपन्यास विधाक प्रणयनमे छनि आ एहि विधामे ई मैथिलीक उपवनमे क्रमशः नमस्तस्यै,महराज, लजकोटर,सीमाक ओहि पार,मातृभूमि,स्वप्नलोक ,शंखनाद, ढहैत देबाल, हम आबि रहल छी,प्रलयक परात,बीति गेल समय आ प्रतिबिम्ब अभिदानसँ रंग-विरंगक पुष्प-पादप लऽ कऽ प्रस्तुत भेल छथि आ आधुनिक मैथिली उपन्यास विधाकेँ समपुष्ट कयलनि अछि । हिनक उपन्यास सभ समाज ओ राष्ट्रक अभ्युत्थानक प्रति हिनक चिन्तनक विराट आयाम केँ प्रस्तुत कयने अछि । मातृभूमि उपन्यासक माध्यमे ई मातृभाषा ओ मातृभूमिक प्रति प्रवासी लोकनिक कर्त्तव्य बुद्धिक परिष्कार दिस उन्मुख देखि पड़ैत छथि । उपन्यासक भाषा प्रसादगुण सम्पन्न,सहज ओ रोचक अछि । पात्र सभक मनोभावक विश्लेषणमे उपन्यासकार सफल भेल छथि। वस्तु विन्यास युग जीवनक यथार्थपर आधारित अछि। मातृभूमिक प्रति प्रवासी लोकनिक दायित्वक उद्बोधन उपन्यासकारक जीवन-दर्शन ओ जननी-जन्मभूमिक प्रति सहज सिनेहकेँ पल्लवित करैत अछि।" हम आबि रहल छी(उपन्यास) पढ़लाक बाद मैथिलीक मूर्धन्य विद्वान प्रोफेसर(डाक्टर)भीमनाथ झा लिखैत छथि- "अपनेक नव्यतम उपन्यास 'हम आबि  रहल छी' हमरा लग आबि गेल अछि । पढ़बामे ततेक मन लागि गेल अछि जे आन बेगरता भागि गेल अछि । ठीके, रोचकता तँ अपनेक लेखनीक प्रमुख विशेषता थीके, जे एहूमे विद्यमान अछि-- एक तँ ई कारण । दोसर ई जे एहिमे बूढ़ लोकक गूढ़ व्यथाक आख्यानक उत्थान, प्रस्थान आ अवसान अत्यन्त आत्मीयता आ मार्मिकताक संग कयल गेल अछि । आजुक शिक्षित समाजक बहुलांश कोना अपसंस्कृतिक मोहजालमे फँसि नाग जकाँ अपन प्रतिपालकोकेँ डँसि लैत अछि आ अपनहुँ अन्तमे निराशाक नरकमे खसि आजीवन सिसकी भरैत रहैत अछि । परिवर्तनक एहि बिरड़ोक अछैतो सनातन कर्त्तव्यबोध (यथा-- मातृपितृभक्ति, स्वावलंबन, अपकारक बदला उपकार, तिरस्कारक उत्तर सत्कार प्रभृति)क ध्वजा उधिया नहि गेलैक अछि, अपितु फहरा रहलैके अछि । संयोग आ आकस्मिकता एकर कथानकक प्राण थिक । एक दिस पुत्र जत' प्रेमिकाक लौलमे अमेरिका धरि दौड़ मारैत छथि तैयो ओ हाथसँ पिछड़ि जाइत छनि आ ई हकन्न कनैत छथि तँ दोसर दिस मायक गंगोत्रीमे जलसमाधि लेलाक कारणे पितो सायास हुनक अनुसरण करैत छथि आ अटूट प्रेमक दृष्टान्त बनैत छथि । नाटकीयताकेँ सामान्य पाठकमे उत्सुकता जगयबाक लेखकक कौशल रूपमे देखबाक थिक । अपनेक साहित्य-सभाक ई औपन्यासिक नवरत्न मैथिली पाठकक चारू कात अपन चमक पसारैत रहय-- ताही शुभकामनाक संग हार्दिक अभिनन्दन ।" भीमनाथ झा 25.6.2021 हमर पोथी,हम आबि रहल छी पढ़लाक बाद प्रोफेसर डा.कीर्तिनाथ झाजी लिखैत छथिः "सोझ कथानक। सरल भाषा। अनेक नाटकीय मोड़, आ स्पष्ट संदेश। एकहि बैसाड़ मे एहि पोथीक परायण कयल। विषयानुकूल  कैनवास  आ नितान्त समसामयिक सामाजिक समस्या पर लिखल ई उपन्यास अंत धरि अहाँक जिज्ञासा  जगओने रहत। उपन्यास लेखन मे सिद्धहस्त, आ  निरंतर नव-नव उपन्यासक संग उपस्थित होइत श्री मिश्रजीकें अनेक बधाई /साधुवाद।" https://www.facebook.com/photo/?fbid=10227405720502325&set=a.10200225774380659%20%20Kirtinath%20Jha एहीसाल प्रकाशित हमर  उपन्यास,ठेहापरक मौलाएल गाछपर श्री हितनाथ झाजीक समीक्षाक किछु अंश सेहो उद्धृत करैत प्रसन्नता भए रहल अछि । "हम एहि उपन्यासक विषय--वस्तु दिस मात्र क्षेपक रूपमे लेलहुँ अछि, किन्तु जँ अपने एहि उपन्यासकेँ पढ़बैक, तँ हिनक लेखनीक बिना प्रशंसा कयने नहि रहि सकैत छी, जेना हमरा स्वयं हिनक एक उपन्यास पढ़लाक बाद दोसर पढ़बाक व्यग्रता बढ़ि गेल । एतय हम उपन्यासमे की छैक , की होयबाक चाही ,की नहि होयबाक चाही ,ओहि दिस हम नहि जाय चाहब ,मुदा ई धरि अवश्य कहब  आ से प्रो. भीमनाथ झाक शब्दमे जे एक पोथीक प्रसंग लिखने छथि  - " साहित्यकार जे होयत , से चुप नहि रहत , मुँह खोलबे करत ,साहसपूर्वक अपन भावना कागतपर उतारबे करत । बाजि तँ सकैत अछि सभ , मुदा कहय थोड़केँ अबैत छैक । जकरा कहबाक लूरि छैक ,ओकर बात फोंक नहि जाइत छैक ,लोक बिच्चेमे छोड़ि क' उठि नहि सकैत छैक । से जँ उठि गेल तँ बुझू कह' नहि अयलैक । ....!जँ पढ़ब शुरू करब तँ बिच्चेमे उठि जायब । नहि उठि सकब । आ , सम्पन्न कयलाक बाद मनमे किछु अबस्से घुरघुराय लागत। से भेल तँ भ ' गेलाह लेखक सफल । " आ ,से " ठेहा परक मौलाएल गाछ " पढ़लाक बाद अपने लोकनि सेहो मानबैक जे एकर लेखक पूर्ण सफल भेल छथि।" (https://www.facebook.com/photo/?fbid=6682323201824391&set=a.415366251853482 ) आरो अनेक विद्वान लोकनिक समीक्षा,पाठकीय प्रतिक्रिया हमरा समय-समयपर भेटैत रहल अछि। स्थान सीमित रहबाक कारणे ओसभ उद्धृत नहि कए पाबि रहल छी। मुदा एतबा तँ कहब निश्चय जे हमर मैथिली उपन्याससभपर अनेक विद्वान लोकनिक बहुत सकारात्मक प्रतिक्रिया रहल अछि जाहिसँ हम आओर लिखबाक हेतु प्रेरित होइत रहलहुँ अछि । एहीक्रममे आदरणीय प्रोफेसर डाक्टर इन्द्रकान्त झाजीक चर्च करब अत्यावश्यक अछि। ओ हमर सभटा किताब बहुत मनोयोगपूर्वक पढ़ैत रहलाह अछि आ पढ़ि कए अपन सकारात्मक प्रतिक्रिया सँ हमरा उत्साहित करैत रहलाह अछि। आदरणीय प्रोफेसर(डाक्टर)भीमनाथ झाजी सेहो हमर अधिकांश किताब पढ़ि फोन कए वा लिखि कए अपन उद्गार व्यक्त करैत रहलाह अछि। आदरणीय प्रोफेसर डाक्टर रमण झाजीक उत्साहवर्धक शुभकामना तँ अबिते रहल अछि। मैथिलीक प्रतिष्ठित साहित्यकार आ.श्री जगदीश प्रसाद मंडलजी निरंतर हमर साहित्यिक प्रगतिक हेतु उत्सुकता व्यक्त करैत रहलाह अछि । आदरणीय बुद्धिनाथ झाजी तँ कथे कोन । ओ तँ निरंतर एहि प्रयासमे रहैत छथि जे हमर साहित्यकेँ उचित स्थान प्राप्त होअए। हिनके लोकनिक आशीर्वादेक परिणाम थिक जे हम निरंतर लिखि पाबि रहल छी। आशा अछि जे हिनका लोकनिक आशीर्वाद एहिना बनल रहत आ हम आर नीक-नीक पोथी लिखि सकब। ई बात सर्वविदित अछि जे मैथिलीमे पाठकक निरंतर ह्रास भेल जा रहल अछि। लोक पोथी कीनि कए पढ़ए नहि चाहैत अछि। साहित्योमे राजनीति भरल जा रहल अछि। तखन लेखक करताह की?यात्रीजीसँ पटनामे केओ पुछलकनि- "बाबा मैथिलीमे आब नहि लिखैत छिऐक?" ओ उत्तरमे कहलखिन-"मैथिलीमे लिखब तँ कैकगोटे पढ़त ।" आ.मंत्रेश्वरजाजी अपन एकटा किताबक भूमिकामे लिखने छथि-"मैथिलीमे लिखब लौल थिक ।" एही क्रममे स्वर्गीय राम लोचनठाकुरजी मिथिला दर्शनक एकटा संपादकीयमे लिखने छलाह- " लोक आब मैथिलीमे लिखबासँ हटि रहल अछि। अपितु,एकाधटा किताब मैथिलीमे छपि गेलाक बादे हिन्दी वा अंग्रेजीमे लिखनाइ शुरु कए दैत छथि।" ई सभ पढ़लाक बाद मोनमे चिंता होएब स्वाभाविक । आखिर, ओ सभ तँ बहुत अनुभवक बादे ई बातसभ बजलाह/लिखलाह । एहन बात नहि छैक जे किछुगोटे हमरो उच्छन्नर नहि केलनि । अपितु,करिते रहैत छथि। कैकबेर बिना पोथी पढ़ने प्रतिक्रिया दैत छथि, कैकबेर पूर्वाग्रहित भए एहन-एहन वस्तु लिखि जाइत छथि जे उपन्यासमे कतहु अछिए नहि । मुदा तेँ की? रचनात्मकता सदिखन विध्वंशक शक्तिसँ जीतैत रहल अछि। आखिर तुलसीदासो तँ कहबे केलनि-"बंदौ संत असंतन चरना ।" रमाचरितमानसक शुरुमे बेर-बेर  असंतक प्रार्थान संतक संगे करैत रहलाह । अंतमे हम अपन उपन्यास बिति गेल समयक पछिला पृष्ठपर उद्धृत पाँतिकेँ पाठक लोकनिक सम्मुख राखि रहल छी जे संभवतः जीवनक अंतिम सत्य थिक- "मनुक्ख एहि संसारमे एसगरे आएल अछि आ एसगरे जाएत । ताहि बातकेँ बुझबाक अछि। समय बीति गेल, घटनासभ पाछू छुटि गेल, आब ओकरा मोनमे रखलासँ की फएदा? कष्ट छोड़ि किछु नहि भेटि सकैत अछि । । शांति तँ भइए नहि सकैत अछि । आब तँ ओहि बातसभकेँ बिसरनाइए उचित अछि। सुख-दुख जे किछु हमर भाग्यमे छल से आएल,गेल । हम आब नीकसँ बूझि गेल छी जे ई संसार माया अछि । केओ ककरो नहि अछि एहिठाम । बस जेना नाटकक पात्र होअए। नाटक खतम,पात्र खतम।  जेना नाटकक नीक दृश्यसँ दर्शकगण प्रसन्न भए जाइत छथि,कोनो कष्टप्रद दृश्यसँ दुखसँ नोर बहबए लगैत छथि आ अंतमे सभकिछु ठामहि छोड़ि अपन-अपन घर वापस चलि जाइत छथि, तेहने थिक ई जीवन । आब चली। नाटक खतम अछि । आब बहुत हँसलहुँ,बहुत कनलहुँ । आब समय अछि शांत भए जेबाक । हम मंदिरक चौकीपर बैसल सएहसभ सोचैत रहि गेलहुँ ।" -रबीन्द्र नारायण मिश्र m-9968502767 ईमेल:mishrarn@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.८.डा. किशन कारीगर-मिथिला मैथिली के नाम पर दललपनी आ चलकपन/ चोरनुकबा गोंसाई (हास्य कटाक्ष) डाॅ. किशन कारीगर मिथिला मैथिली के नाम पर दललपनी आ चलकपनी/ चोरनुकबा गोंसाई (हास्य कटाक्ष) १ मिथिला मैथिली के नाम पर दललपनी आ चलकपनी

मिथिला मैथिली के कटु यथार्थ यै मैथिली नामे दललपनी करब पेट पोसब आ चलतपनी फिराक जे मैथिली सबहक छियैअ? की जे बारहो बरण के भरमौने रहब आ अप्पन सुआर्थ सिद्ध करैत रहब आ लोको के अप्पन कुकृत्य नै बुझह देबै. मिथिला मैथिली नाम पर कतेको दलाल आ तेकर गिरोह सक्रिय रहल आ मैथिली नामे लाभ ओकरे टा भेटैत रहलै.

अहाँ कनियो जागरूक ही क बलू त ओई दलाल सब से पूछहू जे मैथिली बारहो बरण के लिखब बाजब के माोजर हुअ देलकै की? तोरा माई के बोल के संपादित कर जबरदस्ती मानकीकरण कर देल जाई होऊ कैले? की ऊ सब अपन माएक बोल छोड़लकै? त फेर तोरा किए अप्पन बोली छोड़ा देल जाई होऊ? तोरा अरू पिछलग्गू बनि अकरा मान लै छहू? तोरो अरू त अप्पन माईके बोली गिरबी राख दललपनी करले फिरै छहि. मानकी दलाल के त अप्पन माएक बोली छै ओकरा लाभे लाभ. तोरा अरू के की भेटलौ घरिघंटा?

मिथिला मैथिली नाम पर दललपनी के आरंभ:

1. जहिए मैथिली महासभा गठित भेल तहिये से मैथिली दरबारी दलाल सबहक कब्जा मे आबि गेलै. ऊ सब सुनियोजित रूपे मैथिली अमैथिल आ मानक के डांइर खीच अप्पन आधिपत्य प्रभाव जमौनै शुरू केलक.

2. लोकभाषा मैथिली के मानकी बना ततेक ओझरा देल गेलै जे आम जन मैथिली स दूर होइत गेलै. यैह त मैथिल दलाल सब चाहैत रहै जे बारहो बरण के मैथिली नै रहू आ गिरोह महासभा वला सब सबटा फायदा लूटैत रहब.

3. बारहो बरण के मैथिली लिखब बाजब के मोजर नै केलकै आ नै हुए देलकै? तकरा राड़ कोसिकन्हा ठेठी, मधेसी दैछणाहा पैछमाहा बोली बना कहा प्रसारित केलकै? खाली मानक टा के मोजर हुअ देलकै आ ई सब अप्पन दललपनी दाउ सुतारैत रहल.

4. साहित्य अकादमी मे मैथिली के मान्यता के बाद त अई पेटपोसुआ दलाल सबके दुनू हाथे लड्डू. अकादमी पुरस्कारक दलाली गिरोहबादी होहकारी केकरो स छुपित नै रहलै. यैह सबटा साहित्य सेवी आ अनका ककरो साहित्य लिखबाक लूइड़ भास नै छै. यैह बात प्रचारित करबा इ सब अप्पन साहित्यिक रोटी सेकैत रहल.

5. मिथिला मैथिली के नाम पर कुकुरमुत्ता जेकां संस्था सब बनलै. छमाही तिमाही दूमासिक पत्रिका छापब शुरू कएल गेलै. आ तेकर पहुँच पब्लिक तक कोनो पहुँच नै रहलै. हं गिरोहक लोक सब एक दोसर के कवि कथाकार उपन्यासकार समीक्षक लेखक के तगमा बँटैत रहलै आ मैथिली नामे लाभ लूटैत रहलै.

6. मैथिली मे पछुआएल लोक, बिना चिन्हा परिचे वला, सोलकन, दलित लेखक सबके कोनो मोजर नै देल गेलै? नै इ सब आंदोलन क अप्पन मोजर लै गेल? उनटे मैथिल दलाल सबहक हं मे हं मिला मानक मानैत गेल आ मंच लोभे अप्पन मौलिक बोली के संपादित करा मानक बजैत गबैत भजैत गेल.

7. वाजपेयी जी के शासनकाल मे बभनौती खेला स मैथिली के अष्टम सूची मे जोड़ा देल गेलै. अइ के बाद त ई दलाल सब बेलगाम होइत गेलै. मिथिला मैथिली नामे मनमाना करैत गेल. के रोकतै के टोकतै एकदम मनमाना. फेर मिथिलाक्षर खेला सक्रिय रूपे चालू भेल आ हो हो शुरू छै.

8. मिथिला राज के बहन्ना बना हो हो क फेर स दलाली के नवका पटकथा लिखा गेल छै. जंतर मंतर पर अभिनय संवाद ढोंग सब चालू छै. लोक सब सेहो असलियत बुझहै लगलै जे दलाली के नबका नाम मिथिला राज.

9. साहित्य अकादमी, मैथिली भोजपुरी अकादमी, मैथिली अकादमी पटना, समिति, लेखक संघ सब वरचस्ववादी दलाल सबहक अड्डा बना देल गेलै. आ फेर मैथिली नामे एकाधिकार बना लाभे लाभ. मैथिली के गिरोहबादी दलाल सबहक हाथ सौंप देल गेलै.

मिथिला मैथिली नामे चलकपनी:-

1. आम जन लोक समाज के हरदम भ्रम मे राखल गेलै जे मिथिला मैथिली सबहक हइ छै. आ मैथिली स लाभ ई दलाल सब टा कमाइत रहल. आम जन के मिथिला मैथिली स कहियो ने जोरल गेलै.

2. छूटल बारल लोक आ पछुआएल, दलित वर्गक सुनियोजित रूपे हरदम रस्ता रोकबाक प्रयास केलक. तइयो चलकपनी जे हम कोनो रस्ता रोकने छियै?

3. मिथिला मैथिली नामे बारल हारल झमारल लोक सब नै अई पेटपोसुआ दलाल सबके बिरोध कैलकै? आ नै करतौ? मंच लोभे लेखक तगमा लोभे ओहि दलाल सबहक संस्था मे शामिल हो जेतौ. औरी पाग पहिरले छिछिअले फिरतौ.

4. मिथिला मैथिली नामे विद्यापति के धो पका के खाएब बेचब आ सलहेश लोड़ीक दिना भद्री आदी के कोनो चर्च नै करत. तइयो होहकारी जे मैथिली सबहक छियै. सोलकन सब अपना महापुरूष के आयोजन नै करतौ हं अनकर आयोजन मे माला पहिर पिछलगुआ होहकारी बनतौ.

5. मिथिला रत्न/मैथिली पुरूस्कार, किदैन कहाँ पुरूस्कार बंटबाक खेल चंदा के धंधा केकरो स आब छुपित नै रहलै. तइयो निर्लज्ज बनल सबके भरमाबै जेतै जे मैथिली सबहक? आ चलकपनी क लाभ ले तूंही सब टा.

6. मैथिली बारहो बरण के नै हुअ देल गेलै आ चलकपनी केहेन जे हम केकरो कोनो रस्ता रोकने छियै? तोरा अरू के रस्ता रोक देल गेलौ त बिरोध कैले करबिही तोरो अरू दलाले संग भ जो आ गबैत रह मैथिली मे अहिना होइत एलैइए?

अई दललपनी चलकपनी दुआरे मिथिला मैथिली खंड बिखंड होइत रहलै. यथार्थ बुझैतो सब निबदी मारने रहू. मिथिला के जनता जागरूक भ गेल तहिया त अई धूर्त सबहक दललपनी चलकपनी बंद भ जेतै. २ चोरनुकबा गोंसाई (हास्य कटाक्ष)

बाबा बड़बड़ाइत बजैत रहै हौ एहनो कहूं गोंसाई भेलैए? कहअ त कखैन स हल्ला क चाल पाड़ै छियै कथि लै कनिओ सुगबुगेतै? आंगन मे छै की बाध बोन गेल आकि लगले प्राण छुटि त नै गेलै से कोनो भांजे नै बुझना जा रहल? अई चोरनुकबा गोंसाई के भांज त ब्रह्मो विष्णु के नै लगलै त हमरा सन बघंबरी महेश बुते भांज लागत?

हम्मे बाबा स पुछलियै हो बाबा की होलौ जे एतना हल्ला मचनौ छहो? की भेलौ भागेसर पंडा कतौ हरा गेलौ की आई तोरा जल ने चढ़ेलकौ? बाबा खोंजाइत बोललकै हौ की चल आ फल चढ़ाउत? अई चोरनुकबा गोंसाई के कोनो भांजे नै बुझहा रहल यै? एं हौ अंदाज धियो पूतो के त नै सीखा देने छै जे बाबा के अवाज़ सुनिहें त किछो नै बजिहें? एकदम निबदी मारने रहिंए भने बुढ़बा छटपटा के मरौ की जरौ?

बाबा बोले लगलै कहअ त आदमी के कोनो तेहेन बेगरत होउ त एहेन चोरनुकबा गोंसाई सबहक भरोस करब त अपटी खेत मे प्राण चलि जाएत? हम्मे बाबा स फेर कहलियै हो बाबा होलौ की से फरिछा के कहू ने तभी से बड़बड़ कइले छहू? चोरनुकबा गोंसाई बलू कहेन होत होई? हमरा त कुछो बुझल य? हम्मर बात सुनके बाबा हां हां के हँसे लगलै बोललकै अईं हौ चेरनुकबा गोंसाई दिया नै बुझल छह? धू जी महराज पहिने एक जुम तमाकुल खुआबह फेर कहै छियह एक्सक्लूसिव ख़बैर.

हम्मे बाबा के खैनी चुना के देली ओकरा बाद बाबा खैनी खा हाथ पटपटा के बोले लगलै? हौ बच्चा मिथिला के गामे गाम मे चोरनुकबा गोंसाई सब भेटतह. ई सब देखावटी भवडाह तेहेन करतह जे यौ बाबा हम त संगे छी बाबा अहाँ काज शुरू करू ने? आ खटै बेर की मंदिरक जमीन अतिक्रमण के बिरोध बेर चेरनुकबा जेंका निबदी मारने रहतह की? तै बेर एक्को डेग आगू नै बढ़तह? आ माइर मे पाछू भोज मे आगू वला फार्मूला पर चोरनुकबा खेला मे हो हो करतह जे मंदिर जमीन अतिक्रमणकारी स मुक्त हेबाक चाही?

बाबा बोलैत रहै इ भागेसर पंडा हरदम हमरा बोली दै छेलए ज यौ बाबा मंदिरक जीर्णोद्धार हेबाक चाही. महादेव मंदिरक जमीन अतिक्रमणकारी स मुक्त हेबाक चाही? आ अखैन सी ओ बिडिओ पुलिस प्रशासन सब चेकिंग मे एलै त भागेसर निपत्ता भेल अछि की? अई चोरनुकबा गोंसाई के कोनो भांज नै लागि रहल? हौ अंगनो मे जाके भांज लगेलौंह त धिया पूता सब कहलक जे पप्पा पोखैर दिस गेल छथहिन? भागेसर त बाधहो बोन दिस नै लौक रहल? एहनो कहूं पोखैर दिस करब भेलैए? एतेक समय त रावणो के लघ्घी करैत काल नै लगलै? देखै छहक सीओ सहेब भागेसर दिया पुइछ रहल जे पंडा जी कहां है? कहअ त भागेसर पंडा मुख्य पुजारी छी आ अखैन बयान दै बेर मे चोरनुकबा गोंसाई बनल यै? त एना मे मंदिरक जमीन अतिक्रमणकारी कब्जा स मुक्त कहियो ने हएत आ नै मंदिरक जिर्णोद्धार?

हम्मे बाबा स पुछलियै हौ बाबा मिथिला मैथिली के चोरनुकबा सब दिआ कुछो बोलहू जे मैथिली के सुधार होतै? बाबा हां हां के हँसैत बोले लगलै, हौ ई मैथिली वला चोरनुकबा गोंसाई सब आरो कमाल सब यै? ई सब मिथिला मैथिली कुकृत्यक एक्को पाई बिरोध नै करतह? खाली देखावटी भवडाह करतह जे मैथिली समावेशी हेबाक चाही त मैथिली मानक बदलबाक चाही सबके मोजर हेबाक चाही? आ मैथिली लाॅबी स लड़ै बेर लिखित बिरोध बेर मे चोरनुकबा गोंसाई बनल निबदी मारने रहतह की. हंओ मे छी आ नैंहो मे छी वला चलकपनी खेलतह ई चोरनुकबा सब? आई तक ककरो बिरोध करैत देखलहक? की जे बिरोध करबै त मंच पर नै बजाउत त पुरूस्कारे मे नाम छंटा जाएत? हौ जी चोरनुकबा गोंसाई सब दुआरे मिथिला मैथिली के जिर्णोद्धार किनौ ने हेतै आ नै ई खेलरा सब मिथिला मैथिली मे सुधार करै जेतै? अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.९.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा- समयक चक्र/ संवेदना/ ओ सत्ते बताह छल कुमार मनोज कश्यप ३ टा लघुकथा-समयक चक्र/ संवेदना/ ओ सत्ते बताह छल १ समयक चक्र 'हे एकटा बात बुझैत छहक; ई दुनियाँ सरिपहुँ गोल छै ....  घूमि-फीरि कs फेर ओतहि आबि बिलमैत छै जतs सs शुरू भेल रहै! देखहक; पहिने लोक पैदल चलैत रहै।  फेर साईकिल के आविष्कार भेलै तs लोक साईकिल सs सफर करs लागल। तकरा बाद स्कूटर-मोटरसाईकिल आ कार एलै….। आब देखहक जे घुरि कs लोक फेर सs साईकिल आ पैदल चलब शुरू कs देलक अछि कि नहिं?  कारण चाहे जे होई ...... पहिने गाड़ी-घोड़ा नहिं छलै वा एतेक सामर्थ नहिं छलै तैं पैदल चलब मजबूरी छलै; आब सभ किछु अछैतो स्वास्थ्य कारणे पैदल चलब मजबूरी छै!' - कहि कs बैजूकका तमाकूल झाड़ि ठोर तर दबेला आ हमरा दिस विजयी भावें स्वीकृतिक्षा मे तकलनि। हम गुम्म भेल बैजूकका के मुँह निहारैत रहि गेलहुँ। तर्क तs अकाट्य छलनिहें। २ संवेदना भोरुका पहर सेहो अगहन के  तैं  रोड लगभग सुनसाने जकाँ। इक्का-दुक्का लोक कखनो-कखनो ओहि बाटे गुजड़ैत। कि ताबते  धड़ाम…!!!! के आवाज भेलै। एकटा तेज गति कार एकटा साईकिल सवार के तेहन जोड़दार टक्कर मारने छलै जे साईकिल सवार हवा मे उछलि कs रोडक दोसर कात जा खसल। लोक जुटs लगलै आ बिना कोनो बिलम्ब केने  लागल अपन-अपन मोबाइल सs रील बनाबs। ताबत केम्हरो सs एकटा आदमी दौड़ल आयल आ ओहि घायल व्यक्ति के पॉकेट झोरि पड़ा गेल। एहनो नहिं जे सभ विडियोग्राफिये  मे तल्लीन छल;  किछु सहृदय लोक ओहि बाटे गुजरैत वाहन  सभ के हाथ दs  रोकबाक निष्फल प्रयास सेहो करैत रहल जे कहुना घायल के ससमय कोनो हॉस्पीटल पहुँचा चिकित्सा सुविधा देल जाय।  पुलिस जखन आधा घंटा के बाद ओतs पहुँचलै; ताहि सs पहिने ओकर प्राण-पखेरू उड़ि गेल छलै। ओहि दिनक समाचार चैनल सभ पर ओ विडियो खुब चललै आ बेस लोकप्रिय भेलै। ३ ओ सत्ते बताह छल साहित्य के लेल अपन सर्वस्व उत्सर्ग कs देने छल ....  दिन-राति उठैत-बैसैत, सुतैत-जागैत कथा कविता-नाटक-उपन्यास-रिपोर्ताज-समालोचना .... यैह सभ! आर किछु नहिं! टोल-मोहल्ला, सsर-समाज ओकरा बताह बुझै। बेतरतीब बढ़ल केश-दाढ़ी, देह पर ने दsढ़ वस्र ने पैर मे साबुत चप्पल! जतs जे किछु आग्रह सs भेटल से खा लेलक नहिं तs कोनो बात नहिं!  ओकर दुनियाँ लेखन, गोष्ठी, चर्चा, परिचर्चा ......  एहि सभ के बीच खुटेसल जकाँ घुरिया कs रहि गेल रहै। वयस्क भेला पर लोक लाजे बियाहो माय-बाप करबाइये देलकै। मुदा कनियाँ बसलै नहिं से स्वभाविके! जे किछु पुस्तैनी जमीन-जाल छलै से अपन लिखल किताबक मुद्रण, प्रकाशन आ ओकर निःशुल्क वितरण मे बोहा गेलै। किताब कीनि कs पढ़नाहर प्राणी आब लुप्तप्राये तैं किताबक विक्रय सs किछु आमद हेबाक आश सभ दिन निराशे रहलै। हारि ओ तैयो नहिं मानलक आ बिनु फलक कामना के साहित्य साधना मे डटल रहल जाबत धरि साँस रूकि नहिं गेलै। साहित्यजगत मे चिन्हल आ ख्यात नाम छल तैं स्वभाविके साहित्यकार-पत्रकार सभ अंतिम दर्शन लेल अबैत रहलै .... ओकर व्यक्तित्व आ कृतित्व के बढ़ि-चढ़ि कs बखान करैत सभ अपन-अपन बाट नापैत रहल। मुदा अंतिम संस्कार के व्योंत पर केकरो मुँह नहिं खुजलै। चंदा सs दाह-संस्कार कोनादन बुझेलै तैं स्थानीय विधायक तक कोनो मद सँ आर्थिक सहायता के आग्रह पहुँचायल गेलै। ओ बी० डी० ओ ० के तत्काल फोन कs कs कबीर अंत्येष्टि योजना सs धन के व्यवस्था तs करा देलखिन मुदा अनुत्तरित प्रश्नक बरखाक संग - के छलै ओ?  सुनबा मे आयल कवित्त-तवित्त करै छल?  सत्ते बताह छलै?  काज ओ किछो करैत रहै कि नहिं? घर-परिवार मे केयो छैहो कि? कोन पार्टी के वोटर छलै? ........???? -कुमार मनोज कश्यप, सम्प्रति: भारत सरकारक उप-सचिव, संपर्क: सी-11, टावर-4, टाइप-5, किदवई नगर पूर्व (दिल्ली हाट के सामने), नई दिल्ली-110023, # 9810811850, ईमेल : writetokmanoj@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१०.रबीन्द्र नारायण मिश्र- ठेहा परक मौलाएल गाछ (धारावाहिक) रबीन्द्र नारायण मिश्र ठेहा परक मौलाएल गाछ (धारावाहिक) 16 हमसभ सिएटल हबाइ अड्डा पहुँचि गेल रही। ओहिठामक स्वच्छता देखि अभिभूत रही । लगबे नहि करए जे ईहो स्थान एही पृथ्वीपर अछि । आकाश एकदम स्वच्छ। हबामे अद्भुत सुगंध छल। हबाइ जहाजसँ उतरलाक बाद कनीकाल तँ लोकसभ देखाएल । जखन ओ सभ अपन-अपन गंतव्य दिस बिदा भए गेल तखन साइते केओ देखाइत । आवश्यक खानापुरीक बाद सामानक संगे  हम आ रमा हबाइ अड्डाक वहिर्गमन द्वारिसँ बाहर भए गेल रही । ओहिठाम हमरासभक स्वागत हेतु केओ नहि देखाएल । हमसभ आब की करितहुँ,कतए जइतहुँ? किछु फुरेबे नहि करए । श्यामक फोन लगिते नहि रहैक। अपन संगीक फोन संख्या जे देने रहए से लगातार व्यस्त आबि रहल छल । भेल जे भए सकैत अछि लगेपासमे कतहु होएत । ताबे प्रतीक्षा करी । हमसभ थोड़ेकाल ठामहि बैसल रहि गेलहुँ । थोड़ेकालक बाद हमर फोनक घंटी बाजल । "अहाँसभ कतए छिऐक?"-फोनपर श्याम छल। "हमसभ हबाइ अड्डाक बाहर बेंचपर बैसल छी।" "कोनठाम?" "से की जाने गेलिऐक?" "सामने देखिऔक ने लिखल हेतैक।" "द्वारि संख्या तीन लिखल छैक।" "ओह! इएह तँ गड़बड़ी भए गेल अछि। हमर संगी द्वारि संख्या एकपर अहाँक प्रतीक्षा कए रहल अछि।" "तखन?" "आब ओतहि बैसल रहू। हम ओकरा कहैत छिऐक जे अहाँ लग पहुँचए।" "ओकर किछु पहिचान?" "हद भए गेल । ओहो मनुक्खे छैक।" "से तँ बुझलहु। ओकर किछु नाम हेतैक, किछु हुलिआ हेतैक ।" "ओकर नाम छैक डेबिड । देखबामे कारी, बेस नमगर । लाल रंगक सर्ट पहिरने छैक । ओकरा हाथमे अहाँक नाम लिखल पट्टिका छैक । तेँ कोनो परेसानी नहि हेबाक चाही । हम ओकरा फोन कए देलिऐक अछि । ओ अहाँक विचित्र परिधान देखितहि चिन्हि जाएत ।"- से कहि श्याम भभा कए हँसि देलक । रमा हमर बात ध्यानसँ सुनि रहल छलीह। "की कहैत छल?" "ओकर संगी दोसर द्वारिपर ठाढ़ अछि । तेँ ई दिक्कति भए गेल । आब आबिए रहल अछि। हमसभ एहीठाम रहब। "सएह तँ । हम तँ आश्चर्यमे रही जे ने अपने अछि, ने ओकर संगी आएल । तखन हमरासभकेँ एहिठाम बजओलक किएक?" "देखैत रहिऔक ने अखन की की होइत अछि।" हम ओतहि बैसल रही कि लाल रंगक एकटा  बड़काटा कार हमरासभक सामने ठाढ़ भेल । कारसँ कारी,बेस नमगर व्यक्ति बाहर होइत अछि। हम सोचैत छी-संभवतः इएह अछि डेबिड । कारसँ निकलितहि ओ हमर नाम लिखल पट्टिका अपन हाथमे राखि लैत अछि । हमरासभक बगए देखि ओ कनीक मुस्काइत अछि । ओकरो अनुमान लागि रहल छैक जे ओ हमही छी। हमहूँ ओकरा चिन्हि जाइत छी। ओ फुरतीसँ हमरा दिस बढ़ैत अछि- "हेलो सर! डेबिड हेयर ।" "ओहो! हम तँ अहींक बाट ताकि रहल छलहुँ ।" "कनी देरी भए गेल । ताहि हेतु क्षमाप्रार्थी छी।" "कोनो बात नहि ।" ओ तरातर आगू बढ़ि चाहक खोलीसँ तीनकप चाह अनैत अछि । हमरा दुनू बेकतीकेँ एक-एक कए चाह पकड़ा दैत अछि । एककप चाह अपनो पीबैत अछि । हमसभ चाहक आनन्द लैत छी । ओकर अंग्रेजीक उच्चारण बुझबामे किछु दिक्कति तँ होइत अछि,मुदा भाओ तँ बुझिए जाइत छी । चाह खतम होइतहि हमसभ कारमे बैसि जाइत छी । डेबिड स्वयं कार चला रहल छल । संगहि किछु गप्पो करबाक उपक्रम कए रहल छल । कारमे  बैसलाक बाद बड़ीकाल धरि हम डेबिडकेँ एकटक देखैत रहि गेलहुँ । बुझेबे नहि करए जे ओ पुरुष अछि  कि मौगी । माथपर बेस नमगर केस,हाथमे चुरीनुमा सोनाक दू-दूटा करा पहिरने । ततबे नहि कानमे भूरमे कुंडल लटकि रहल छल । आर तँ आर ओकर अबाजो महिले जकाँ लगैत छल । एकक्षणक हेतु हम चिंतित भए गेलहुँ । हमर मोन मलिन देखि रमा टोकलथि- "की बात? एना गुमसुम किएक छी?" हम हुनका इसारासँ किछु कहबाक प्रयास केलहुँ । मुदा ओ बुझि नहि पाबि रहल छलीह । ओमहर डेबिड रहि-रहि कए किछु बजैत रहैत छल। हमहूँ ओकरा दिस देखैत तँ छलिऐक मुदा किछु उत्तर नहि दिऐक । माने एक प्रकारक संबादहीनताक स्थिति उत्पन्न भए गेल छल । कार तेजीसँ आगू बढ़ैत रहल । चारूकातक दृश्य अनुपम लागि रहल छल । सुंदर-सुंदर घर,रंग-विरंगक फल-फूलसँ सजल लोकसभक दनान,सड़क एकदम स्वच्छ। पैरे चलएबलासभक हेतु फराक बनल रस्ता । साइकिलसबारसभक हेतु सेहो फराके जोगार । कहबाक माने जे अद्भुत व्यवस्था छल । हमसभ बैसल रहलहुँ । कार दौड़ैत रहल । दस मिनटक भीतरे हमरसभक कार एकटा भवन लग आबि कए रुकि गेल । 17 हम सिएटलमे रही मुदा हमर ध्यान चौबीसो घंटा दिल्लीक फ्लैटेपर लटकल रहए । यद्यपि हमर पड़ोसी बहुत सचेष्ट आ शुभचिंतक अछि मुदा ओहो कतेक की कए सकत तकर तँ सीमान छैक ने । ओ अपनहु कोनो जबान तँ अछि ने । ओकरामे उपकार करबाक प्रबृत्ति छैक,हमरासभक प्रति सद्बावना छैक मुदा अपनो समस्यासभ तँ ओकरो छैहे । दिल्लीसँ बिदा हेबा काल ओएह हमरसभक छुटल झोरा लेने हबाइ अड्डा पहुँचि गेल रहए जाहिसँ हमसभ हबाइ जहाज पकड़ि सकलहुँ,नहि तँ सभ चौपट भेल रहैत । तथापि श्यामक डेरापर पहुँचितहि सभसँ पहिने ओकरे फोन केलहुँ । मुदा फोनक घंटी बजैत रहि गेल । ई ध्यान नहि रहि सकल जे दिल्लीमे अखन दूपहर राति हेतैक । पड़ोसी सुतल होएत। हमरा परेसान देखि रमा पुछलथि- "की भेल? अबिते-अबिते कथीक चिंतामे पड़ि गेलहुँ?" "सोचने रही जे पड़ोसीसँ अपन घरक हाल-चाल ली। मुदा ओ तँ अखन सुतले होएत ।" "अहाँकेँ अखन फोन करबैक नहि चाहैत छल ।" "से ध्यानमे नहि रहल ।" श्यामक मकान बहुत नीक स्थानपर बनल छल । चारूकात पहाड़ीसभ देखा रहल छल। लगेमे पार्क छलैक । ओहिमे  रंग-विरंगक  फूलसभ माहौलकेँ आनंदमय बनओने छल । सभ सुविधासँ परिपूर्ण छल ओ। ओहिमे सभटा आधुनिक सुविधा रहैक । मकानक भूतलपर श्याम रहैत छल । ओहिसँ ऊपरका तलपर हमसभ ठहराओल गेल रही । तेसर आ चारिम तल किराया लागल छल । बातो सही छैक । ओतेकटा मकान खाली राखिए कए की होइत? भने किछु आमदनी भए जाइत हेतनि। मुदा जकरा ओहिठाम गेल रही सएह नहि रहए । ओकरा बदलामे डेबिड छल जकरासँ ने जान ने पहिचान । ओना अपना भरि ओ बहुत प्रयास करैत छल जे हमरासभकेँ दिक्कति नहि होअए । मुदा ओकरा चाहलासँ की होमएबला रहैक। जतए भावात्मक समस्या छैक ताहिठाम डेबिड की करैत?ओ बेटा नेने भए सकैत छल । हमसभ डेरा पहुँचि गेलहुँ । डेबिड हमरासभकेँ पहुँचा कए अपन काजपर चलि गेल । हमदुनू गोटे स्नान-ध्यान केलहुँ। रमा चाह बनओलथि । फ्रिजमे राखल सामानसभकेँ गरमा कए जलखै बनओलथि । तकर बाद हमसभ जलखै केलहुँ,चाह पीलहुँ । आब की करब? एतबेमे श्यामक फोन आएल? "कोना छी?" "कोना की रहब। हमसभ एतेक दूरसँ अएलहुँ जे तोरासँ भरि मोन गप्प करब । भेंट-घांट होएत । मुदा तूँही कतहु चलि गेलह ।" "परेसान नहि होउ । काल्हि भोरे हम पहुँचि रहल छी । ताबे डेबिड तँ अछिए।" हम की बजितहुँ? फोन रमाकेँ पकड़ा देलिअनि । ओ फोनेपर कानए लगलीह । लएह आब की होएत? हुनकर मोन ठीक नहि लागि रहल छलनि। यात्राक थकानो भए सकैत अछि । हम हुनका इसारासँ बुझेबाक प्रयास करैत छी । ओ फोन राखि दैत छथि । रमा आराम करैत छथि । हमहूँ सोफेपर  पड़ि जाइत छी । कनीके कालमे हमरो आँखि लागि जाइत अछि । सपनामे आइ बहुत दिनपर सासु-ससुरकेँ देखैत छिअनि । सभकिछु केहन प्रियगर लागि रहल छल । सपनेमे आश्चर्य लगैत अछि जे एतेकदिन धरि ई सभ कतए छलाह आ अचानक जखन हम अमेरिका मे छी तँ ओ सभ हमर पछोड़ केने एतहु आबि गेल छथि। असलमे हमर सास-ससुरक रमाक चिंता अंत-अंत धरि लागले रहि गेलनि । हमर ससुर कैक बेर कहथि- "रमाक चिंता हटबे नहि करैत अछि । पता नहि ओकर की भविष्य अछि? असलमे रमा रहि-रहि कए दुखित पड़ि जाथि । बादमे हमरासँ बिआह भेलनि। हमर हालति कोनो नीक नहि छल । हमरो सरकारी काज भेटि गेल। तीन-तीनटा बच्चा भेल । मुदा से सभ देखबाक हेतु हमर सासु-ससुर नहि रहलाह । बाबा बैद्यनाथक दर्शनक हेतु जीपसँ जा रहल छलाह । अचानक जीपक भयानक दुर्घटना भए गेल । ओ सभ ठामहि रहि गेलाह । एहि दुर्घटनाक बाद रमा बहुत दिन धरि गुम पड़ि गेलीह । किछु बजबे नहि करथि। कतबो किछु कहिअनि ओ दिन-राति कनैत रहथि । एतबे बजितथि- "हुनकासभक किछु सेवा नहि कए सकलहुँ ।" हम हुनका की कहितिअनि? बात तँ उचित कहथि । मुदा कएल की जा सकैत छल । भावीप्रबल। सपनामे ओ सभ कहि रहल छलाह- "अमेरिका की करए आबि गेलहुँ? भने दिल्लीमे छलहुँ। अपन घरमे तँ रही। एहिठाम पता नहि की की देखए पड़ए?"- से कहि ओ सभ निपत्ता भए गेलाह। 18 अमेरिकाक धरतीपर हमरालोकनिक ई पहिल राति छल । अपना ओहिठाम आ सिएटलक समयान्तरक कारण सुतबा-उठबाक समयमे अचानक परिवर्तन भए गेल छल । एहि टाइम लैगक कारण चाहिओ कए ओतेक थाकल-झमारल रहबाक अछैतो हमसभ राति भरि करोट बदलैत रहि गेलहुँ । दुनू बेकती आपसमे गप्प-सप्प करैत रहि गेलहुँ। पुरान-पुरान बातसभ मोन पड़ैत रहल । रमाक मनोदशा तँ बहुत खराप बुझाइत छल । हुनका चुपचाप कैकबेर अपन आँखिसँ नोर पोछैत देखिअनि । मुदा हम टोकारा नहि दिअनि । कहीं आर कष्टमे ने पड़ि जाथि । जेना-तेना राति बितल । हमसभ उठि कए अपन कोठरीक ओसारापर बैसल रही कि देखलिऐक जे एकटा मध्य बएसक व्यक्ति कारसँ उतरि रहल अछि। रमा धर दए कहैत छथि- "शयाम आबि गेल की? "हमरो सएह बुझाइत अछि ।" हमरा लोकनिक अनुमान सही छल। हमरसभक घंटी बाजल । हम आ रमा केबार दिस लपकि कए जाइत छी। रमा केबार खोलैत छथि। सचमुचकेँ श्याम आबि गेल छल । ओ हमरासभक सामने छल । हमसभ ओकरा देखि अतिशय प्रसन्न होइत छी । श्याम घरक भीतर अबैत अछि। हमरासभकेँ गोर लगैत अछि । झोरासँ एकटा पैकेट निकालि कए हमरासभ लग राखि दैत अछि। हम पुछलिऐक- "ई की अछि?" "ई थिक अपना ओहिठामक बंबइ आम।" "ऐँ! बंबइ आब एतहु भेटैत छै?" एतए की ने भेटैत छै? अपना गामक हाटोपर जे चीज नहि भेटत से एहि ठाम उपलव्ध छैक । बस टाका चाही । "ई तँ बहुत उत्तम बात भेल । दिल्लीमे सेहो एहन दोकानसभ खुजलैक अछि । मुदा ओहिठामक वस्तुसभक गुणवेत्ता नीक नहि कहल जा सकैत अछि।" "से सही कहि रहल छी। एकबेर हम कुम्हरौरी मंगओलहुँ । सभटा दाम पहिने दिऔक । तकर बादे ओ सामान पठओताह । मुदा जखन सामान आएल तँ माथ पकड़ि लेलहुँ।" "से की?" "सभटा सरल छल ।" "एहिठाम से बात नहि छैक। अधलाह वस्तु राखब, बेचब तँ सोझे जहल जाएब ।" "ई तँ बहुत नीक बात भेलैक ।" हमसभ श्यामक आगमनसँ बहुत आराममे रही । भेल जे आब एतए निचैनसँ रहि सकब । जतबे दिन रहब किछु सुख कए सकब । कतहु-कतहु घुमिओ लेब । रमाक प्रसन्नताक तँ अंते नहि छल । दुनू माए-बेटाक बीचमे हम नहि पड़ए चाहैत रही । हम चुपचाप देखैत रहि गेलहुँ । मुदा श्यामक बगए बहुत बदलि गेल छल । नमगर-नमगर केस,घनगर कारी मोंछ। लगैक जेना कोनो थानेदारसँ भेंट भए रहल अछि । आर तँ आर । दहिना हाथमे किछु टिपलो बुझाए । हँ,हँ गोदना  गोदाएल गेल छैक । हम ध्यानसँ पढ़बाक प्रयास करैत छी। अंग्रेजीमे लिखल अछि-"डेबिड" ।  हम एक क्षण हेतु चिंतित भए जाइत छी। "बात की अछि? एकरा हाथपर डेबिडक नाम किएक दागल अछि?" हमरा एना एकटक तकैत देखि श्याम कनी असहज भए जाइत अछि । संभवतः हमर जिज्ञासा बुझि रहल अछि । मुदा किछु बजैत नहि अछि। अपितु,चुपचाप द्वारि दिस सहटि जाइत अछि । जाइत-जाइत कहैत अछि- "हम कनीकालमे नहा-सोना कए अबैत छी । ताबे अहूँसभ तैयार भए जाउ । फेर हमसभ कतहु घुमए चलब ।" "ठीक छैक।" -हम कहलिऐक । एकघंटाक बात श्याम फेर हमरासभ लग अबैत अछि। हमरासँ पैंट पहिरबाक आग्रह करैत अछि। "हम एहिना ठीक छी ।" "लोकसभ हँसत। पैंट नहि तँ कुरता-पाएजामा पहिरि लिअ।" माएकेँ कहैत अछि- "तूहूँ अपन वस्त्र बदलि ले । हम सभ लेल नव वस्त्र अनने छी । जतहि रही ओहीठाम जकाँ रही ।" "हमसभ एकदम ठीक छी। तूँ अपन चिंता करह।"- रमा कहलखिन। "इएह ने तोरासभक समस्या छौक। जखन एहिठामक हाल-चाल नहि बूझल छौ तखन हमर बात सुनबो तँ कर।" रमा किछु नहि बजलीह । हमहूँ चुप्पे रहि गेलहुँ । आब श्याम की करैत ? बाजल- "असलमे तोरासभकेँ एहिठामक प्रमुख स्थानसभपर घुमबए चाहैत रही । तेँ वस्त्र बदलि लेबाक हेतु कहने रहिऔक।" "हमरासभकेँ कतहु नहि जेबाक अछि। हमसभ बहुत घुमि लेलहुँ । हमसभ जल्दी सँ जल्दी दिल्ली वापस भए जाइ तकर ओरिआन करह ।" "तेँ तँ तोरासभकेँ कहिओ हम किछु नहि कहिऔक ।" "कथी कहबह? तोरा अपन होस छह? चललह अछि हमरेसभकेँ सुधारह।" रमा बहुत तमसा गेल रहथि । हम हुनका मोसकिलसँ शांत केलहुँ । हमरासभकेँ तमसाएल देखि श्याम सेहो बात बदललक । "कोनो बात नहि । जहिना नीक लागए तहिना रहू।" हमसभ श्यामक संगे बिदा होइत छी । नीचाँ कारमे डेबिड पहिनेसँ वाहन चालकक स्थानपर कारमे बैसल छल । हमहूँसभ कारमे बैसि जाइत छी । श्याम डेबिडक बगलमे बैसि जाइत अछि । 19 हमसभ कारसँ बिदा भेलहुँ । हम आ रमा पछिला सीटपर  रही। आगूमे श्याम आ डेबिड छल । डेबिड कार चला रहल छल । हमसभ सीटबेल्ट नहि लगओने रही। कारसँ चूँ,चूँक अबाज आबि रहल छल। श्याम पाछू घुमैत अछि- "सीट बेल्ट लगा लिअ ।" हमसभ सीटबेल्ट लगबैत छी । कार तेजीसँ आगू बढ़ि रहल छल । हमसभ कारक दुनू दिस देखि रहल छलहुँ । एक सँ एक दृश्य मकान-दोकान,चीज-वस्तु,लोक-वेद, आबि रहल छल,जा रहल छल । वातावरण अत्यंत मनोहारी लागि रहल छल । बीच-बीचमे हमसभ आपसमे किछु-किछु गप्पो करैत रहैत छलहुँ । एही बीचमे फुस्सक अबाज भेल । कारक पछिला पहिआसँ हबा निकलि रहल छल । कार क्रमशः सड़कक मध्यमे ठाढ़ भए गेल । डेबिड कारक पहिआ बदलबाक उपक्रम करैत अछि । हमसभ बाहर  भए जाइत छी । हम कारसँ कनीके हटि कए ठाढ़ छी। हमरासँ सटले रमा ठाढ़ि छथि । जाबे हम किछु बुझबै-बुझबै ताबे पाछूसँ आबि रहल एकटा कार रमासँ टकराइत अछि । ओ ठामहि खसि पड़ैत छथि । ओ कार दस डेग आगू जा कए ठाढ़ भए जाइत अछि । रमाकेँ बहुत चोट लागि गेलनि अछि । ओ दर्दसँ बफारि तोड़ि रहल छथि । हम हुनकर हालति देखि कए व्याकुल भए जाइत छी। किछु फुरेबे नहि करए जे की करू,ककरा कहिऔक?हुनका चिचिआइत देखि श्याम आ डेबिड सेहो हमरा लग अबैत अछि। रमाकेँ टक्कर देनिहार कारक वाहन चालक बहुत अफसोचमे अछि। घटी सेहो मांगि रहल अछि। तेँ ओकरा की कहल जाए? ओहो कोनो जानि कए तँ किछु केलक नहि। फेर अखन तँ रमाकेँ चिकित्सा सुविधा उपलव्ध कराएब हमरालोकनिक प्राथमिकता छल । श्याम  तुरंत फोन करैत अछि। थोड़बे कालमे एकटा एम्बुलेंस पहुँचि जाइत अछि । हमसभ रमाकेँ ओहिमे पाड़ि दैत छिअनि । संगे हम आ श्याम बिदा होइत छी। डेबिड कार लग रहि जाइत अछि । हमसभ अस्पताल पहुँचैत छी। आपातकालीन विभागक डाक्टरसभ रमाकेँ देखैत छनि। हुनकर बामा पैरक हड्डीक एक्सरे कएल जाइत छनि। एक्सरे रिपोर्टक अनुसार हुनकर हड्डी साफे टूटि गेल छनि। तुरंत शल्यक्रिया करए पड़तनि। अस्पतालक कर्मचारी ई बात श्यामकेँ कहैत छनि । हुनकर मुँह पिअर भए जाइत छनि। हम ओकर हालति देखि पुछैत छी- "की बात?" "शल्यक्रिया करए पड़तनि। दू लाख टका तत्काल जमा करबाक छैक।" संयोग छल जे हम अपन विजा डेबिट कार्ड अनने रही। ओ कार्ड दुनिआँमे कतहु चलि सकैत अछि। ओहिमे पर्याप्त टाका सेहो कए लेने रही। हम अपन कार्ड श्यामकेँ बढ़बैत छी। ओ कार्ड भेटलासँ आश्वस्त बुझाइत छथि। अस्पतालकेँ दू लाख टाकाक अगाउ देल जाइत अछि । तकर बादे रमाक शल्यक्रिया शुरु होइत छनि । हमसभ ताबे बाहरे प्रतीक्षा करैत छी। श्यामकेँ बीच-बीचमे फोन अबैत रहैत छनि । ओही बीचमे शालिनीक फोन सेहो अबैत छनि। "कोना छी?" "की रहब?" "से की?" "तोहर माएक पैरक हड्डी टूटि गेलनि अछि।" "से केना की भेलैक?" हम ओकरासभ बात कहैत छी। हमर मोन कष्टसँ भरल अछि । आर बेसी गप्प करबाक स्थितिमे हम नहि छी। ओ ई बात बुझैत अछि। "अहाँसभ अनेरे अमेरिका चलि गेलहुँ। हम कहैत रही जे मुम्बई चलि आउ। हमरेसभक संगे रहू। मुदा अहाँसभ हमर बात नहि मानलहुँ । आब ओहिठाम कइए की सकैत छी? पहिने ठीक होअए दिऔक । तकर बाद चलि अबैत रहू हमरा लग।" हम की कहितिऐक? ओकर बात सुनैत रहि गेलहुँ । ताबतेमे अस्पतालक माइकपर उद्घोषणा होइत अछि। रमाक शल्यक्रिया सफलतापूर्वक संपन्न भए गेलनि। हुनका वार्डमे पठेबासँ पूर्व किछु काल निरीक्षणमे राखल जेतनि । तकर बादे हमसभ हुनका देखि सकबनि। हम बहुत थाकि गेल रही। कहि नहि कोन समयमे बिदा भेलहुँ? खैर! जे हेबाक छल से भेल । आब जे संभव छैक से भइए रहल अछि । पहिने ओ ठीक भए जाथि तकर बादे ने किछु । हमसभ अस्पतालक  स्वागत कक्षमे  रमाक प्रतीक्षा कइए रहल छलहुँ कि एकटा  गोर-नार बेस तेजगर युवक हमरासभ लग पहुँचल । हमरा देखितहि कहए लागल- "माफ करब । हमरा चलते अपनेलोकनिकेँ एतेक कष्ट उठाबए पड़ि रहल अछि। हुनका तँ हड्डी टूटि गेलनि। हम नहि बूझि सकलहुँ जे ई सभ कोना भेलैक । हम तँ कार चलबएमे व्यस्त रही। असलमे हमर पत्नीक मोन खराप भए गेल छनि । हुनके देखबाक हेतु जा रहल छलहुँ । परेसानीमे रहबाक कारण ओतेक ध्यान नहि रहल। हुनका चोट लागि गेलनि। हुनकर इलाजमे जे खर्चा हेतनि से हम देबैक । अस्पतालसँ छुटलाक बादो जे मदति कहब से हम करब।" ओकर भावुकता आ इमान्दारी देखि हम बहुत प्रभावित रही। "अहाँ एतेक परेसान नहि रहू। आब तँ जे हेबाक छलैक से भइए गेलैक। हम अस्पतालक खर्चा वहन करबामे सक्षम छी आ कइओ रहल छी।" "तेँ की? किछु हमरो तँ कर्तव्य अछि ने? हमरे चलते हुनका ई कष्ट भेलनि। हमर बात मानि लिअ।" से कहि ओ पाँच लाख टकाक चेक हमरा हाथमे पकड़ा देलक। श्यामक इच्छा देखि हम ई चेक हुनका दए देलिअनि। ओ युवक एकबेर फेर क्षमा याचना करैत अछि। हमरा प्रणाम करैत अछि आ जएबासँ पहिने अपन  मोबाइल फोन संख्या सेहो लिखा दैत अछि। संगे कहैत अछि- "आगूओ जे खर्चा लगतैक से हम देबैक । अस्पतालसँ ठीक भेलाक बादो हम अपनेसभक संपर्कमे रहब ।" ओ युवक चलि गेल । तकर तोड़बे कालक बाद रमा वार्डमे आनल जाइत छथि। हमसभ ओतए पहुँचि जाइत छी। रमाकेँ होस आबि गेल छनि। ओ हमरा दिस एकटक देखैत रहि जाइत छथि। 20 एक सप्ताहक बाद रमा अस्पतालसँ घर वापस आबि गेलीह । डाक्टरसभ तँ तीनदिनक बादे हुनका छोड़ि देबए चाहैत रहए । मुदा अचानक हुनकर रक्तचाप असंतुलित भए गेलनि । सांस लेबामे सहो किछु दिक्कति होमए लगलनि। ताहि परिस्थितिमे अस्पताल छोड़ब ठीक नहि बुझाएल । श्यामोक सएह इच्छा रहनि। डाक्टरसभकेँ सेहो ई बात पसिंद पड़लैक । एकसप्ताहक बाद रमाकेँ अस्पतालसँ  छुटबाक समयमे अस्पतालक बिलक भुगतानक समस्या आएल । मुदा ओ युवक बातक पक्का निकलल । केना-ने-केना ओ सभ जानकारी लैत रहल छल आ अस्पतालक बाँकी भुगतान आनलाइन कए देलक । ओना हमहूँ तैयार रही। "टाका राखिए कए की होएत? सभटा धएले रहि जाएत । ककरो कोनो परिबाह नहि छैक,जरुरतिओ नहि छैक। हमसभ अनेरे बचत करबामे लागल रहैत छी। बैंकक पासबुक देखैत रहैत छी। एफडी करबैत रहैत छी। मुदा ककरा लेल?"- मोनमे सोचाइत रहैत छल। अस्पतालसँ छुटि कए हमसभ रमाक संगे घर पहुँचलहुँ । डेबिड छाँह जकाँ श्यामक पाछू-पाछू लागल रहलनि । श्याम बाजए तँ डेबिड समर्थन करैत। तहिना डेबिडक बातकेँ श्याम कखनहु नहि काटैत । दुनूगोटेक जुगलबंदी देखएबला रहैत अछि । हम तँ छगुन्तामे रहबे करी। कखनहु कए रमा सेहो चकित रहैत छलीह। अपितु,चिंता सेहो करथि। कहतथि- "बात की छैक? एकरासभकेँ कखनहु फराक होइत नहि देखैत छिऐक?" "अनेरे सभबातक चिंता अहीं किएक करैत रहैत छी? भगवान सभकेँ माथ देने छथिन । अपन-अपन नीक-बेजाए सोचत।" घर अएलाक बाद महिना दिन रमाक भौतिक चिकित्सा चलैत रहलनि। ओ अस्पताल जेबाक स्थितिमे नहि रहथि।  डाक्टरे घर अबैत छल। ओकर फीस बहुत मोट होइत छलैक । हम कैकबेर चिंतामे रही। पता नहि कतेक खर्चा होएत?श्यामकेँ तँ उम्मीद रहनि जे हमसभटा सम्हारि लेब। तेँ निश्चिंत रहैत छलाह । धन्य कही ओहि युवककेँ। ओ चाहैत तँ जान बचा कए घसकि सकैत छल । हमसभ ओकर के रहिऐक? मुदा ओकरामे मनुष्यता बाँचल रहैक। मानलहुँ जे ओकरे कारसँ टक्कर लागि रमा आहत भेल रहथि। मुदा तेँ की? ओ तँ मदति हेतु बहुत आगू बढ़ि गेल। ओ निरंतर संपर्कमे रहल। भौतिक चिकित्साक सभटा खरचा सेहो ओएह देलक । हम कहबो केलिऐक " ई खरचा हमरा करए दिअ । अहाँ बहुत केलहुँ ।" मुदा ओ नहि मानलक,अड़ि गेल । हमहूँ छोड़ि देलिऐक। मोने-मोन होइत छल जे एहनो लोक होइत अछि। अपना ओहिठाम तँ ठोकर मारि कए कारबाला लंक लागि कए भागि जाइत अछि। यदि ओहोसभ एहिना जिम्मेबारीसँ काज करैत तँ कतेको लोकक जान बचि सकैत छैक। श्यामक घरक प्रथमतलक ओसारापर एकांतमे हम सोचैत रहैत छी। "बेकारे एहिठाम अएलहुँ । दिल्लीएमे रहबाक छल । अपन हाथ-पैर चलबैत रहैत छलहुँ । एहिठामक तँ किछु हिसाबे नहि बुझा रहल अछि। केओ ककरोसँ गप्पो करबाक हेतु तैयार नहि अछि । एहि मामिलामे दिल्लीओ कोनो बहुत नीक नहि अछि। मुदा ओतए बहुत दिनसँ रहि रहल छी। सभकिछु देखल-सुनल अछि । पुरान परिचितसभ अछि। एहिठाम जिनका बले अएलहुँ तिनका समये नहि छनि। जीवनक्रम सेहो विचित्र छनि। डेबिड संगे दिन-राति एक केने रहैत छथि। दूपहर रातिमे दुनूगोटे दारू पीबि कए हंगामा करैत छथि । कैकबेर ततेक हल्ला होइत अछि जे पुलिस पर्यंत आबि जाइत अछि। हमसभ तँ सभ किछु सहिए रहल छी। अखन आर कोनो रस्तो नहि बाँचल अछि। रमा ठीक होथि तखन किछु सोची। बीच-बीचमे शालिनीक फोन जरूर अबैत रहैत अछि। ओ मुंबई अएबाक आग्रह करिते रहैत अछि। मुदा ओतहु गेलाक बाद की हाल रहत तकर कोन ठेकान अछि। हमरा तँ लगैत अछि जे सभकिछु छोड़ि अपन दिल्ली घर वापस भए जाइ । आइ-काल्हि हमर दिनचर्या बहुत कठिन भए गेल अछि। भोरसँ साँझ धरि रमामे लागल रहैत छी। दिक्कति अछि जे ओ ओछाओनपर पड़ले रहैत छथि । ओतहिसभ किछु करेबाक रहैत अछि। ओनासभ किछुक मसीन बनि गेल छैक,हमसभ लेनहुँ छी,मुदा ओहूमे तँ हाथ लगबेक रहैत छैक? से आर के करत? हमही कए सकैत छी आ करितो छी। श्याम अबैत अछि,हाल-चाल पुछैत अछि आ काजपर चलि जाइत अछि। ओकरे संगे डेबिड अबैत अछि आ ओकरे संगे चलि जाइत अछि। तकर बाद एकटा चिड़ैओक दर्शन नहि होइत अछि। बीचमे भौतिक चिकित्साक हेतु डाक्टर अबैत अछि। एक घंटा ओकर फरमाइससभ सुनैत छी। जेना-जेना कहैत अछि से करैत रहैत छी। जखन ओहो चलि गेल तखन बस हम आ रमा रहि जाइत छी। क्रमशःरमाक हालतिमे सुधार भेलनि। आब ओ ठेंगा पकड़ि कए घरक भीतरे एमहर-ओमहर घुमि लैत छथि। अपन दिनचर्यामे सेहो बेसी मदतिक काज नह होइत छनि। मुदा एकटा लोक तँ लगीचमे सदरिकाल चाहबे करी। एहन हालति नहि भेलनि अछि जे घंटो भरि छोड़ि कए कतहु चलि जाइ। फेर जेबो कतए करब?ई अमेरिका थिकैक। दिल्ली नहि छैक। पन्द्रह दिन एहिना बीति गेल। आब ओ कनी होसगर भेलथि । हुनकर हालतिमे भेल एहि सुधारसँ रमाक प्रसन्नताक अंते नहि अछि। कखनहु कए ओ भभा कए हँसि दैत छथि। कहतीह-"हमरा तँ भेल जे गेलहुँ । आब जन्म भरिक हेतु अथबल भए गेलहुँ। मुदा अहाँ हमरा बचा लेलहुँ।" "हम की केलहुँ? ईश्वरकेँ धन्यवाद दिअनु आ धन्यवाद दिऔक ओहि युवककेँ जे कष्टो देलक आ समाधानोमे सहयोगी भेल । कष्ट तँ दुर्घटनावश भेल मुदा ओकर सहयोग तँ सुचिंतित छल। ओकर सही संस्कारक परिचायक छल ।" हुनका गप्प-सप्पमे मोन लागि जाइत छनि। शालिनी संगे फोन-फान सेहो होइत रहैत छनि। रहि गेलहुँ हम। से ककरा फुरसति छैक?ने ककरो जरुरति छैक । एकटा बूढ़ बाप माएक संगे हजारक-हजार कोस घरसँ फटकी पड़ल अछि। के करत तकर पुछारी? अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.पद्य ३.१.आचार्य रामानंद मंडल-आदिकवि सरहपा/ मिथिला धरती/ कपूत!/ राम!/ गीत लिखूं ३.२.लालदेव कामत- तानल घोघ ३.३.पवन मिश्र "गोनौली"-अगहन मास/ संस्कारक चूकल ३.४.जगदानन्द झा 'मनु'- ४ टा गजल ३.५.प्रमोद झा 'गोकुल'- आङ उघार छी हम/ पुरना पाजी ३.१.आचार्य रामानंद मंडल-आदिकवि सरहपा/ मिथिला धरती/ कपूत!/ राम!/ गीत लिखूं आचार्य रामानंद मंडल आदिकवि सरहपा/ मिथिला धरती/ कपूत!/ राम!/ गीत लिखूं १ आदिकवि सरहपा मैथिली के आदिकवि सरहपा। हो गेल मैथिली से गायब। अंगिका रखले हय जिंदा। अंगिका के आदिकवि सरहपा। मिटल न आदिकवि सरहपा। सनातन -बौद्ध के संघर्ष में। सरहपा हो गेल गायब। मैथिली के अतीत। मिथिला से हो गेल गायब। मिथिला भे गेल अभागल । बौद्ध हो गेलय। लाइट आफ एशिया। सनातन रह गेल। संकुचित होके भारत। रामा मैथिली हो गेल घायल। २ मिथिला धरती मिथिला रहे पून्य के धरती। भरल रहे संत आ तपसी।१। मिथिला रहे ज्ञान के धरती। भरल रहे रिसी आ ज्ञानी।२। मिथिला रहे राजा आ रानी। भरल रहे कवि आ दरबारी।३। मिथिला रहे राज दरबार अंहकारी। भरल रहे माछ भात खनिहारी।४। मिथिला रहे  प्रजा दीन अज्ञानी। भरल रहे प्रजा बन नौकरानी।५। मिथिला रहे उच्च -नीच के धरती। भरल रहे सम्मान -अपमान के करनी।६। मिथिला रहे बाभन-सोलकन के धरती। भरल रहे शोसक -शोसित से धरती।७। मिथिला रहे सीता के धरती। भरल रहे उगना चाकर से धरती।८। मिथिला रहे सनातन कुल धरमी। रामा भरल रहे शोसक अधरमी।९। ३ कपूत! हो धर्म के ठेकेदार! तू धर्म के नाश कैला हो! हो हिंदू के ठेकेदार! तूं हिंदू के मुंह पर मूतला हो! हो मनु के संतान! तू मनुष्यता के नाश कैला हो! हो ‌‌ऋषि के संतान! तू राक्षस पैदा भेला हो! हो हिंदू के रक्षक! तू हिंदू के भक्षक बनला हो! हो जजमान के पूरहित! तू जजमान के बेइजैत कैला हो! हो भारत के पुत! तू कपूत कहबायबा हो! हो भारत के कपूत! रामा तोहर निंदा करैत हय हो! ४ राम! हे राम कहु! श्री राम कहु! कि जयश्री राम कहु! सीताराम कहु! सीयाराम कहु! कि जयसियाराम कहु! रामजानकी कहु! जानकीराम कहु! कि राम कहु! अयोध्यावासी राम कहु! घटघटवासी राम कहु! कि मानुस राम कहु! ईश्वर राम कहु! पिता राम कहु! कि पाहुन राम कहु! हे राम कहु! जय श्रीराम कहु! रामा अपन राम कहु! ५ गीत लिखूं गीत लिखूं। गारी लिखूं। मिथिला के गान लिखूं। मिथिला के मान लिखूं। गीत लिखूं। गारी लिखूं। मिथिला के आन लिखूं। मिथिला के वान लिखूं। गीत लिखूं। गारी लिखूं। मिथिला के शान लिखूं। मिथिला के महान लिखूं। गीत लिखूं। गारी लिखूं। मिथिला के उच्च लिखूं। मिथिला के नीच लिखूं। गीत लिखूं। गारी लिखूं। मिथिला के प्रेम लिखूं। मिथिला के घृणा लिखूं। गीत लिखूं। गारी लिखूं। मिथिला के संस्कृति लिखूं। मिथिला के अपसंस्कृति लिखूं। गीत लिखूं। रामा मित लिखूं। अपन मंतव्य editorial.ऽtaff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.लालदेव कामत- तानल घोघ लालदेव कामत तानल घोघ

जे होथि अ-हिल्या , से छथि अहिल्या! परित्यक्त स्त्री कोना भेलीह आदर्श भार्या।। से जानबाक लेल लोकक उत्कृष्ट आकांक्षा मोनक पिपासा कियो जनाबौ पण्डा!

प्रातः स्मरणीया श्रध्येय पाँचो नारी नहिं छथि शास्त्रक ज्ञानी ले अनाड़ी ई स्वयं राम लखन लेल छै अचरजे जे अरण्य प्रान्तर मेँ बाट जोहैत

प्रातः स्मरणीया दासिन अहिल्या सँ जिगेसा कयलनि मर्यादा पुरुषोत्तम देखलौंह ओहिठाम छल पाथरक भीड़ छगुन्ता भेल चरणक धुरा उड़ैत पड़ैत

शिलोटसन चटान कोना भेल मोम अजगूत जे बनि गेलीह मनुखक रूप पुछि बैसलाह श्रीराम चन्द्र जी हे! अहाँ कोनू मयावी रचल - प्रपंच

अहाँ नारी मात्रे श्रधा धरि नहि घोघौली बनि हमर परीक्षा किये लै छी हम अहाँक अपरूप आ महिमा जनितहुँ की अहाँ सनातन देवी आदिवासी छी?

एतेक बेशी वहिक्रम मे ई पुरान घोघट अहाँक परिचय जानबाक अपस्यांत मोनके हौंरने पौरने चलि जा रहल अछि दिगदिगन्त सभ्य नारीसन अहिंक संकोचपन कहीं

हमरा औनौने छी विचरण करैत दग्ध हृदयकेँ की अहाँ इतिहास पुराणके कोनू पात्र छी? ब्रह्मा जीक मानसपुत्री वा प्रचेता जीक तँ पतौह नहिं! आकि भृगु जीक पुत्रवधू वा दीर्घतमा ओ परद्वेषीक के?

भरद्वास गौतम अंगिराबंशी के तँ नहीं अपने दू डेग आगू बढ़ियौ आधुनिकता ले बालप्रथा क' घोघ सँ समकालीनता दिश आऊ हमर अन्त:करण महर्षि गौतम केर

अर्धांगिनी रुपेँ चिन्हपहिचीन्ह केलक अछि आओर अहां हुनके संशय सँ शापित रही सरिपहुँ हुनका छलिया इन्द्रजी सँ करैक चाहियैन तकरार आ प्रतिशोध ।

जुग-जुग सँ अहाँक पवित्र कुटिया निहारै ले आतुर अछि आ अहाँक पिता वृध्दाश्व केँ नहिँ रहतनि ग्लानि ने जन जनकेँ क्लेश कियाक तँ द्रोपति तारा कुन्ती मन्दोदरी 'क समान पवित्रता ओ पतिव्रता छीहे अहाँ! हे! अहिल्ये अहाँ!!

-लाल देव कामत मो० ७६३१३८०७६१ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.पवन मिश्र "गोनौली"-अगहन मास/ संस्कारक चूकल पवन मिश्र "गोनौली" १ अगहन मास अगहन मास होइछल खास,

धान पकै छल खेत कटाई छल |

लोढ़हा लोढ़ाइ छल मोन मुस्काइ छल,

खेतहिमे लाइ- मुढ़ी पान भेटै छल ||

मुइठ लेल जाइ छल, लगै छल ठाकुरजी के भोग,

अरोस परोस सेहो बँटाइ छल, तखनहि होइछल अन्नयोग |

होइत छल नवान्न अग्निदेव पर सेहो चढ़ै छल,

ब्राह्मण भोजनक बादे नव अन्न खैएल जाइछल ||

धान कैइट अबैछल बोझक लगै छल काँर,

अगहनमे मूसोके दूटा बौह, करैछल बील फोड़ैछल मोकाँर |

जाड़ मास थरथर कपैत गिरहस्थ रहैछल बेचैन,

धनकटनी, नारबननी, कहिया गहूम बाग हेतैन ||

मेह गारक दिन तकाय छल,

गिरहस्तक मोन हरखित रहैछल |

भोरबे राइत सँ होइछल दाउन,

जन बोनिहार हरदम कहैछल-

गिरहस्तक थैर अबाद रहौन ||

पाँचटा छटा बरद लगैछल,

माध फागुन तक दाउन होइछल |

मेहक बरद कम चलैछल,

पाइटक बरद छुबिते नाँगरि उड़ान भरैछल ||

जाबल बरद दाउन हाँकब अनिवार्य रहैछल,

झारैन देब' काल बरदक मूँह पर ठाढ़ रहब अनिवार्य रहैछल |

पुआरहि सँ धान बहारब अनिवार्य रहैछल,

धानक खो पर बारहैन वर्जित अनिवार्य रहैछल ||

सिल्ली ढारब धान ओसायब,

अगँह राखब एक प्रथा बनल छल |

बरद' गोबरक बनल महादेव मे फूल गोदल,

रामहि हो राम कहि, मोनी जोखब एक कथा कहैछल ||

आंगन आंगन अगहनी पथार नामी छल,

दाउन हाँकब मे बरदक लथार कामी छल |

नार- पात पतलो सँ उसीनिया केनाय दामी छल,

ढेकीमे कुटिया, जाँतमे पिसिया केनाय स्वाभिमानी छल||

खेत बचले अछि, अगहन अबिते अछि,

बिलागेल बरद आ खरिहान |

नहि रहल आब ओ युग- जमाना,

नहि रहल गृहस्तक ओ शान ||

केलौ किछु बिलाइत शब्दक प्रयोग,

जकर नहि आब चलन अछि नहि अछि कोनो योग |

भाषा सेहो ओहिना बिला रहल, जहिना ई सभ प्रथा,

"पवन" चेतना जगा लिअ, भाषा बचाउ लाउ कोनो नव प्रभा || २ संस्कारक चूकल

टीक छोड़लौ, टीका (चन्दन) छोड़लौ, छोड़लौ पूजापाठ | खानपानक परहेज छोड़लौ, आब नहि कोनो लाजधाक ||

धोती- कुर्ता छल जे पहचान हमर, माय -बापक आदर कर्तव्य प्रधान हमर ई सभ आब नै रहल, नै ककरो कियो सुनि रहल ||

संस्कार- संस्कृतिक परिभाषा बदलल, जे मानथि से छथि पिछड़ल | आधुनिकताक होड़ अछि सहजोड़ , अपन सभ निखिद, देखौसक धरथि पछोर ||

खानपान- वेशभूषा, रहन सहन - आचार विचार, सभ किछु अछि बदलि रहल | सामाजिक बंधन निष्क्रिय अछि, अन्तर्जातीय वियाह जोर पकरि रहल ||

अपन संस्कार आ संस्कृति सँ, हम भ' रहल छी दूर | आत्मचिंतन अतिआवश्यक, गहन चिंतन करू भरपूर ||

पश्चिमि देश मे, हमरा संस्कृतिक खुबजोड़ चलन भेल, वेदपाठ, गीतापाठ, उपनिषद पर सेहो खोज भेल | चमक दमक आ चालि चलन ओकर अपनाकय, अपन अपनहि पर आब बोझ भेल ||

एकादशी, चतुर्दशी आ एकसंझाक बदला, आयल, डाइटिंग- फास्टिंग, करवाचौथ आ तीज | विधि बेभार,ई सभ पछुआयलक निशानी, पावनितिहार सभ तेजलौ, छोड़लौ सामा- चकेवा गीत |

अपन पावनि, अपन रीति, अपनासँ करी सदिखन प्रीत, संस्कार अपन, राखी आदि- अनन्त | जे जन अपनहि जड़ि सँ कटता, ओ जीवन भरि कुहरता आ पछतेता, सुखद नै हुनकर अंत ||

-पवन कुमार मिश्र "गोनौली", हाटगछिया, धापा, कोलकाता- 700105, मो. 9433746295, सहायक शिक्षक, श्री उमापति विद्यामंदिर, पश्चिम बंगाल सरकार, कोलकाता अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.४.जगदानन्द झा 'मनु'- ४ टा गजल जगदानन्द झा ’मनु’ ४ टा गजल १ चलू देखब हे बहीना शिवकेँ अपन गौरीकेँ सजनमा शिवकेँ सभक ई खाली भरै छथि झोली सरण आइब जे सुमरला शिवकेँ गरीबोकेँ छथि इहे सुननाहर दियौ जल भरि एक लोटा शिवकेँ मनुख दानव देव भूत प्रेतो सगर दुनिया मिल मनेला शिवकेँ सिया रामोकृष्ण हुनके पुजलनि बनेलनि सगरो अराध्या शिवकेँ कृपानिधि कैलाशवासी जय भव चरण वंदन जग रचैता शिवकेँ मनोरथ सब पूर्ण करता शम्भू कहल ’मनु’ जे मनसँ भजता शिवकेँ (मात्राक्रम  12222-12222, सभ पाँतिमे) २ भगवती जकर माए ओ टुगर रहल कोना हाथ छै दुनू भेटल रंक ओ कहल कोना माथ पर हमर सदिखन जखन हाथ मैयाकेँ एहिठाम रहलै कोनो  कठिन टहल कोना लेब छोरि कखनो देबाक बात कनि सोचू सगर गाम देखू सुख शांति नहि बहल कोना शेरकेँ घरे बैसल  नहि शिकार भेटै छै घरसँ जे निकलबै नहि घर बनत महल कोना काज नहि अपन हिस्सा केर ’मनु’ करी हम सब ई सहज सगर दुनिया नहि  बनत जहल कोना (मात्राक्रम 212-1222-212-1222, सभ पाँतिमे) ३ जखन मोन कानल गजल कहलौं रहल कोंढ़ छानल गजल कहलौं जमाना सुतल छल जखन नींदसँ तहन राति जानल गजल कहलौं लगन भेल तीसम बरख धरि नहि पड़ोसनसँ गानल गजल कहलौं जुआ छल लदल कांहपर लोकक पसीनासँ सानल गजल कहलौं उमर ’मनु’ बितल आर की करबै अपन मोन ठानल गजल कहलौं (मात्राक्रम 122-122-1222, सभ पाँतिमे) ४ भहरल भीत नै उठाउ यौ पाहुन  जर्जर टाट  नै सटाउ यौ पाहुन    खाली छाड़बै  उछेहबै भरि दिन  चार चुबैत  नै बचाउ यौ पाहुन    पाकल काँच जेहने धरे भरिमे  बाहर नाक नै कटाउ यौ पाहुन    धधकै आगि खड़ खड़ेल पजरल छै पाइन ढारि नै जराउ यौ पाहुन सगरो खाम   गेल सड़ि  हबेलीके  ’मनु’केँ हँसि क  नै बजाउ यौ पाहुन  (मात्राक्रम 2221-212-1222, सभ पाँतिमे। दोसर शेरकेँ, दोसर पाँतिमे दू टा लघुकेँ दिर्घ मानक छूट लेल गेल अछि) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.५.प्रमोद झा 'गोकुल'- आङ उघार छी हम/ पुरना पाजी प्रमोद झा 'गोकुल' आङ उघार छी हम/ पुरना पाजी १ आङ उघार छी हम

झर झर झहरय जेना फूल सिंहार टप टप टपकय जेना ओसक फुहार तहिना नोरक टघार छी हम मौलल फूल बेकार छी हम । बात बात मे अभहेला डेग डेग पर ठेलमठेला गुड़ गुरु चिन्नी चेला जत'तत' रेलमपेला खिन्न मन लाचार छी हम मानू एक विचार छी हम । चौदिस तम,तम तम करय प्राण अवग्रह जतय ततय ज्ञान इजोतक मन्त्र जपय अज्ञान मुक्का मुकियाबय दुर्दिनक मारल अभिशाप छी हम सप्त रथीक धरि अनुचक्र छी हम । भूखल पेट तृषित कण्ठ आहो भर रे केओ चण्ठ ! छुछ्छ डीङ हाँकय लण्ठ सब सुखी वसन आकण्ठ रुदन मे घोर चीत्कार छी हम वसन बिनु आङ उघार छी हम । २ पुरना पाजी

सुन रे चोट्टा! उखारिके खुट्टा मारब सटका धैके पोने पर। कनडेरियो तकलेँ सीमा दिस ठाढ़े छौ रे! वलरामक हर !! चक्र सुदर्शन चकभौर कटै छौ चाक चौबन्द चारु, चारू कात तीर धनुष संधानित श्री रामक तैयारे रह खाइले हनुमानक लात।। रण चंडी बनिके दुर्गा अनेको कालीक खर्ग करै छैन चमचम खप्पर भरि अरि रक्त पियैले लप लप जीहक लाली अनुपम ।। कहा सुनीक बात नै आब सीधे मारबौ छाती पर मुक्का । मुहंँ कान भसकाइयेके छोड़बौ गुरगुरबैत रहियेँ तखन तों हुक्का।। सत्य अहिंसाक पथ अनुगामी हम तेँ बूझ नै हमरा कखनो बाबाजी। बूझल हमरो बलधिङरो करैमे अदौक छेँ तोँ रे पुरना पाजी !! -प्रमोद झा 'गोकुल', दीप मधुवनी (विहार), फोन-९८७१७७९८५१ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह ३८३ म अंक ०१ दिसम्बर २०२३ (वर्ष १६ मास १९२ अंक ३८३)|| 149 148 || http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA लक्ष्मण झा ’सागर’ विशेषांक

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मिथिला wea) अपन समुच्चा अस्मिता मे जे आदर्श ओ अपन GEE जीवन सैं अर्जित कयने रहथि, जे मैथिली हुनका प्राण मे सुवास set विराजित छली, ई से छल । अन्ततः जखन ई उपन्यास हुनका परिकल्पनाक waa मुताबिक कागज पर उतरि अयलै, i5 फरवरी i955 के sit हरिनारायण मिश्र कें लिखलनि : “ही हरि, मैथिली बलचनमा हिन्दी बला सैं निःसन्देह सुंदर भ' गेलैक अछि । अनावश्यक विस्तार आ बन्धुरतों एतय नहि Se | ओकर धड़कन कैक गुना अइ मे ale Tees अछि, की कहियह !' मुदा, दुर्भाग्य देखू जे ई उपन्यास छपबाक aa sit एकटा मैथिली संस्था मिथिला सांस्कृतिक परिषद्‌, कलकत्ता के देलखिन, जखन कि हुनका लग तहियो प्रकाशकक कोनो कमी नहि रहनि । मैथिली-संस्था सब, से चाहे सोसाइटी esa fe सरकारी, oe tas बरखक at, art ब्राह्मणजातीय-संगठन & अलग fee किनसाइते होइत अछि, भने नाम संग संस्कृति जोड़ल wea कि चेतना । तहिया केहन परिस्थिति रहल Ba तकर अनुमान क' सकै छी । जखन कि “बलचनमा' की छल? एक Ges संघर्षक कथा छल । एतबे नहि ने। ओ बलचनमेक भाषा मे लिखलो गेल छल, जकर नाम यात्री जी देने रहथिन-'शूद्र मैथिली” । आब कह, ई चीज कतह मैथिली संस्था छापय? खेखनी f at छलनि एहि लेल जे बड़ te लेखक छी तँँ fee मैथिली det पर दया करियौ। ई के aA छल जे sit ae मैथिली fafa a ver देता? i2 बरस af जखन संस्था एकरा afe छापलक तखन यात्री जी उग्र Fear मुदा ताधरि पांडुलिपि पूर्णतः नष्ट भ चुकल % | यात्री जीक अपन देशव्यापी प्रतिष्ठा रहनि, तें संस्था पर carat चारूभर & बनि गेलै। हिन्दी बलचनमा ताधरि हिन्दीक प्रथम श्रेणीक उपन्यास-रूप मे मान्यता प्राप्त क' लेने रहय | लाचार संस्था कोनो अज्ञात TST सै एकर अनुवाद करौलक आ Strat: 967 मे प्रकाशित क' देलक | मूल कृति मुदा विलुप्ते भ' गेलै। मोहन ae मानव छलनि जे ag किताब पर जे “मूल लेखक नागार्जुन' छपल छै, से संस्थावला सभक खचरपनी छल, मुदा हमर मानव अछि जे खचरपनी नहि, ई हुनका लोकनिक ईमानदारी रहनि । सत्य के ओ लोकनि लिखित रूप मे स्वीकार क' लेने रहथि । ZB

कथा समक मूल प्रतिपाध निश्चये ओहि समस्याक निवारण करब थिक, जें दाम्पत्य सन सम्बन्धहु कें शुष्क बना रहल अछि। 'कालरेत', ' हैंसीक बजट', 'सलंदेवक कथा, emer सुखी लोकक डायरी' A प्रकारक कथा Fras । ओ रिटायर्ड 'जीवनक एकाकीपन आ डुःस्थिति पर सेहो अनेक कथा लिखलनि अछि। अनेक वर्ष घरि लेखन-विरामक wera जखन मायानन्द मिश्र फेर सैं लिखब शुरू कयलनि तैँ ओ अपने पूर्वस्थापित a 'छविकें तोड़वाक प्रयास कयलनि आ अनेक राजनीतिक दुष्कृतिक कथा लिखलनि। fect में अप्रचलित ऐतिहासिक कथा सेहो ओ लिखलनि। 4 हिनका अतिरिक्त जे रचनाकार अपन स्पष्ट सोच आ क्रांतिकारी तेवरक कारणे हू. सर्वाधिक ध्यान आकृष्ट कयलनि, ताहि मे सोमदेव, धीरेन्द, बलराम, लिली रे आ धूमकेतु / प्रमुख छथि। सोमदेव so-si सैं लिखब शुरू कयलनि on अपन समकालीन सैं ane बेसी |... | प्रखर-चेतनाक संग ओ अपन कथा-यात्रा शुरू कयलनि । ओ अपेक्षाकृत अधिक सहज i | आ स्वाभाविक कथा-क्षेत्र तकलनि आ मर्मभेदी-संवेदनाक कथा केँ रूपायित करवा मे | | बेसी रुचि लेलनि। सोमदेवक कथा मे राजनीतिक मोहमंगक पीड़ा के तकबा सैं बेसी | | सार्थक ओहिं व्यवस्थाक अन्वेषण aa होयत जे आर्थिक, सामाजिक या नैतिक कारणे . fal उपजल on जे मनुक्ख के निरन्तर दूटैत चल जयवाक लेल बाध्य कयलक। “माता, | r अंगा', 'द्रीपदी : वीसम शताब्दी', *आगि ताम्बूल वन में ।' हुनक Peg aa राखय जोग कथा थिक । | divas पहिल कथा i953 के छपलनि आ तहिया सैं a निरन्तर सृजनशील हे ofa ot मार्मिक ययार्थक उपस्थापन के अधिक महत्त्व देलनि, अतः हुनक कथा. अधिकांशतः करुणाक sea ata अछि। कुलानन्द मिश्र ई ठीक कहलनि अछि जे यथार्थक भावुकतापूर्ण स्वीकार era कथा-संवेदनाक निजी विशिष्टता थिक। मामी, A सुगरक बाप, कुबेर यक्ष आ यक्षिणी Ew किछु विशिष्ट कथा थिक। सर्वया नव भावबोध आ आक्रामक तेवरक संग 958 मे घूमकेतु मैथिली aS ज प्रवेश कयलनि आ fe तेवरक कारणे ओ चर्चित आ प्रशंसितो भेलाह । सर्वया त्याज्य मनोभाव तथा प्रकृत सम्बेदना के पकड़ि क' ओ अनेक स्मरणयोग्य कथा लिखलनि। अपन पीढ़ीक ओ एकसर एहन कथाकार छलाह, जनिका में परम्पराजर्जर मूल्यक लेल थोड़बो सहानुभूति नहिं छल । *अगुरवान' हुनक सर्वाधिक प्रसिद्ध कथा चिक। feferer’, ae, 'छहोछि्त-'हुनक' अन्य विशिष्ट कथारचना थिक। एम्टर आवि घूमकेलु अपन te 2 eee 'बदलबाक चेप्टामे अनेक दोसरों विशिष्ट क्षेत्र पर अनेक कथा लिखलनि j न

| 8 AR A al CD 'सलनगर, विरोधाभास अप्रिल-सितंबर, 06क अंक रामलोचन ठाकुर & प्राप्त कयल | Gaps | संपादकीय वचन निमाहबाक प्रयास करब, से आशा । रचना चयन सर्वोपरि लक्ष्य दिस ध्यान दिआबैछ । रमानाथ्थ झा पर are sr तारानंद वियोगीक we पढ़त्न । श्रीधरम sites लेख मे एक टा नीक at साफ चिंतन अख्डि-शुरू & अंत of हिनका सँ सहमत छी sar वियोजी जीक sea रास बात सँ सहमत Bisa असहमत | वियोगी जीक ई ara मानै st जे रमानाथ्थ बाबू अन्तर्विरोध्य & ग्रसित ware, सुदा स्वयं वियोगी ज़ी Ser अन्तर्विरोध्वक शिकार wie | जखन नवीन are चलने वस्तु परंपरागत Req आ परंपरागतो बाट चलने Se, तखन one डदुनू बार मे अंतर की रहि जाइ छै? वियोगी जी कँ अथ-उथ मे नहि aS साफ-साफ विचारि लेवाक चाही जे इनका की काम्य छनि-नवीन ae & नवीन वस्तु आकि नवीन ae & पारंपरिके ae? anita अनचिन्हार, डुगाचिरण fren स्ट्रीट, व्लोलव्काता =

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लिन देखावटी दाँत बला दे eaters अधिक ins जीव थिका मैथिलीकं पर्यावरण एहन अपकारी जीव सब से भरल रहल अछि। cafe किताब में प्राय: पहिल बेर मैथिली लोकसाहित्यक अध्ययन मिथिलाक जातीय साहित्यक रूप में करबाक प्रयास कयल गेल अछि स्वयं रमानाथ झा एहिं बात कें कहियो स्वीकार कयने छला जे मिथिलाक निजी जातीय साहित्य मौखिक रहल अछि आ प्राचीनकालक परिवेश मे राज्याश्रय प्राप्त नहिं हेबाक कारण लिखित साहित्यक परंपरा मिथिला मे बहुत बाद मे जा क' शुरू भ' सकल अछि। कते आश्चर्यक बात थिक जे प्रियर्सन कें विद्यापति आ दीनाभद्री दुनूक गीत लॉककंठ सँ एक्कहि समय मे प्राप्त भेल छल जकरा ओ उद्यमपूर्वक प्रकाशित करेलनि। विद्यापति तँँ मिथिलाक संस्कृतिक सिरमौर बनि गेला मुदा दीनाभद्रीक सेहों कोनों सौन्दर्यशास्त्रीय मूल्य छैक वा एहिं सँ मिथिलाक जातीय साहित्यशैलीक एक प्ररूप विशेषक कोना विलक्षण अभिव्यक्ति भेल अछि, एहि दिस विद्वान लोकनिक sia सदा मूनल रहलनि। मानू ई सोचब एक पातक करबाक तुल्य हो। — नहि aga छी | मिधिलाक वस्तु धिक राग, ताल, लय । छंद मे मैथिली कविता लिखबाक प्रथम प्रयास मनबोध केलनि आ चन्दा झा तँँ मानू एकर झड़ी लगा देलनि। हुनकर मिथिलाभाषा रामायण मे अस्सी प्रकारक छंदक प्रयोग भेल अछि। ue me मैथिली कविता मे छंदक प्रयोग आधुनिक काल मे आबि क' तखन शुरू भेल अछि जखन परजीवी पंडितवर्ग कें मैथिली कें संस्कृतक पिछलग्गू बनायब 7 अपन वर्चस्व लेल परम जरूरी बुझना गेलनि | आइ स्थिति ई अछि जे छंदहीन कविते कें विजातीय आ आधुनिक मानि ओकर अवहेलना करबाक उपदेश लिखल भेटैत अछि। सगरो यैह सुनबै जे छंद थिक मिथिलाक जातीय वस्तु, अप्पन परंपरा जखन कि छंदमुक्त कविता भेल विजातीय वस्तु। अन्हेर कहल जायत एकरा, मुदा सैह पंडितगोष्ठीमान्य छैक | किताबक प्रथम खंड मुख्यत: जातीय साहित्य पर केन्द्रित अछि। मिथिलाक जातीय साहित्यक प्राय: समस्त शैली सब कें बुझबाक प्रयास एतय कयल गेल अछि। आ, सिद्धसाहित्य an वर्णरत्नाकर कें मिधिलाक जातीय साहित्यक प्रथम लिखित अभिलेखक रूप मे बुझबाक कोशिश भेल अछि। तहिना, ई किताब मैथिली आलोचनाक प्राय: पहिल किताब छी जतय मुख्यधाराक ait bin ae कें देखबाक लेल कबीरक मैथिली कविताक अध्ययन ne | सतरहम शताब्दीक बाद कबीरक मैथिली पद ठीक तहिना = त रहल अछि जेना मैथिली संस्कारगीत वा मैथिली लोकगाथा। Xi

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