ISSN 2229-547X VIDEHA 𑒀 विदेह ३८४ म अंक १५ दिसम्बर २०२३ (वर्ष १६ मास १९२ अंक ३८४) [विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। कॉपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- २०२३. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२३. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. It is a platform for scholars, researchers, writers and poets to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, and poetry in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@gmail.com. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover designed by AUM GAJENDRA THAKUR Videha e-Journal: Issue No. 384 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अक्खर खम्भा (आखर खाम्ह) तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ (कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।) माने आखर रूपी खाम्ह निर्माण कऽ ओइपर (गद्य-पद्य रूपी) मंच जँ नै बान्हल जाय तँ ऐ त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लत्ती केना पसरत। शुक्ल यजुर्वेद (२६.२)-यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः। ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च।।हम सभ गोटेकें ई पवित्र वाणी (वेदवाणी) सुनाबी। ब्राह्मणकें, क्षत्रियकें, शूद्रकें आ आर्यकें; अपन लोककें आ अपरिचितकें सेहो (माने सभकें)। मुदा ऐ वेदवाक्यक विपरीत मनुस्मृति वेदवाणीक अध्ययन/ श्रवणकें समाजक किछु गोटे लेल निषेध करऽ चाहलक, मुदा स्मृति सेहो वेदवाक्यकें प्रमाण मानैत अछि (शब्द प्रमाण) तें तकर विरुद्ध देल ओकर निर्देश स्वयं अमान्य भऽ जाइत अछि। Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. -Robert Louis Stevenson ------------------------------------- Videha: Maithili Literature Movement 𑒀 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्ति: 𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱: अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृ. २-६) १.२.अंक ३८३ पर टिप्पणी (पृ. ७-१०) २.गद्य २.१.रबीन्द्र नारायण मिश्र-जय सोमनाथ! (पृ. १३-४१) २.२.परमानन्द लाल कर्ण- कातिक मासक माहात्म्य (पृ. ४२-४५) २.३.निर्मला कर्ण- अग्निशिखा खेप ३२ (पृ. ४६-५२) २.४.नन्दविलास राय-शिष्टाचार (पृ. ५३-५७) २.५.सुभाष कुमार कामत- दिव्यदृष्टि चर्चित पोथीमे गजपट: एक समेकित (पृ. ५८-६२) २.६.लालदेव कामत- डोकहर/ सपना साकार/ पोथी समीक्षा/ दिनकर जीक उत्कर्ष/ श्रीमान मोन पड़ैत छथि/ सरौती सपुत : खुशी बाबूक उपलवधि (पृ. ६३-८९) २.७.प्रणव झा- पुस्तक समीक्षा : मैथिली वेब पत्रकारिताक इतिहास (लेखक : आशीष अनचिन्हार) (पृ. ९०-९३) २.८.आशीष अनचिन्हार-अछांदिक कविताक दरबारमे 'छंदोबद्ध सुशील दोहावली' (पृ. ९४-१०१) २.९.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा-यज्ञ (पृ. १०२-१०३) २.१०.रबीन्द्र नारायण मिश्र- ठेहा परक मौलाएल गाछ (धारावाहिक) (पृ. १०४-१२३) २.११.सुरेन्द्र लाभ- कथा-सँयोगसँ बाँचल जिनगी (पृ. १२४-१२९) २.१२.प्रमोद झा 'गोकुल'- भोज (बीहैन कथा) (पृ. १३०-१३०) ३.पद्य ३.१.डॉ. जियाउर रहमान जाफरी-दू टा प्रेम कविता-अहाँक फोटो/ की कयल जाइत अछि (पृ. १३२-१३३) ३.२.आचार्य रामानन्द मण्डल- झाझा मेल/ बुद्ध/ राज करै छी बिनु सरकार/ मिथिला राज/ वो विधवा छै (पृ. १३४-१४१) ३.३.प्रमोद झा 'गोकुल'-स्वयं केर धरातल (पृ. १४२-१४४) ३.४.डॉ. किशन कारीगर- पंडा आ दलाल (हास्य कविता) (पृ. १४५-१४७) 𑒀 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्तिः पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म 𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑓁 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒰𑒣: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒼𑒭𑒡𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹 𑒠𑒹𑒫𑒰: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧 ब्रह्मणसँ प्रार्थना जे द्युलोकमे, अंतरिक्षमे, पृथ्वीपर, जलमे, औषधमे, वनस्पतिमे, विश्वमे, सभ देवतागणमे आ ब्रह्ममे शांति हुअय। ॐ-ब्रह्मण, द्यौ-सूर्य-तरेगण, अंतरिक्ष- पृथ्वी आ द्यूलोकक बीच, आप:-जल, विश्वेदेवा- सभ देवता, ब्रह्म- सर्जक। 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝𑒮𑒿 𑒣𑓂𑒩𑒰𑒩𑓂𑒟𑒢𑒰 𑒖𑒹 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒧𑒹, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭𑒧𑒹, 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲𑒣𑒩, 𑒖𑒪𑒧𑒹, 𑒎𑒭𑒡𑒧𑒹, 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒱𑒧𑒹, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒧𑒹, 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰𑒑𑒝𑒧𑒹 𑒂 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒧𑒹 𑒬𑒰𑓀𑒞𑒱 𑒯𑒳𑒁𑒨। 𑓇-𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝, 𑒠𑓂𑒨𑒾-𑒮𑒴𑒩𑓂𑒨-𑒞𑒩𑒹𑒑𑒝, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭- 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒂 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒏 𑒥𑒲𑒔, 𑒂𑒣:-𑒖𑒪, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹𑒠𑒹𑒫𑒰- 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰, 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧- 𑒮𑒩𑓂𑒖𑒏। 𑒀 ॐ, स॒हस्र॑शीर्षा॒ पुरु॑षः। स॒ह॒स्रा॒क्षः स॒हस्र॑पात्। 𑓇, 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒬𑒲𑒩𑓂𑒭𑒰↓ 𑒣𑒳𑒩𑒳↑𑒭𑓁। 𑒮↓𑒯↓𑒮𑓂𑒩𑒰↓𑒏𑓂𑒭𑓁 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒣𑒰𑒞𑓂। स भूमिं॑ ग्वंग वि॒श्वतो॑ वृ॒त्वा। अत्य॑तिष्ठद् दशाङ्गु॒लम्॥ 𑒮 𑒦𑒴𑒧𑒱𑓀↑𑓅 𑒫𑒱↓𑒬𑓂𑒫𑒞𑒼↑ 𑒫𑒵↓𑒞𑓂𑒫𑒰। 𑒁𑒞𑓂𑒨↑𑒞𑒱𑒭𑓂𑒚𑒠𑓂 𑒠𑒬𑒰𑒓𑓂𑒑𑒳↓𑒪𑒧𑓂॥ हजार माथ, हजार आँखि, हजार पएर संग विश्वकेँ आच्छादित केने अछि, दस आंगुरक गनतीक वशमे नै अछि ओ। प॒द्भ्याग्ँ॑ शू॒द्रो अ॑जायत॥ 𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑒑𑓂𑒿↑ 𑒬𑒴↓𑒠𑓂𑒩𑒼 𑒁↑𑒖𑒰𑒨𑒞॥ पएरसँ शूद्रक उत्पत्ति भेल॥ प॒द्भ्यां भूमि॒र्दिशः॒ श्रोत्रा᳚त्। 𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑓀 𑒦𑒴𑒧𑒱↓𑒩𑓂𑒠𑒱𑒬𑓁↓ 𑒬𑓂𑒩𑒼𑒞𑓂𑒩𑒰↑↑𑒞𑓂। मुदा पएरेसँ भूमियोक उत्पत्ति। ❀ (White Florette- innocence and purity) ☸ (Wheel of Dharma) ࿕(Swastik) 𑓅 (Gwang ग्वंग- two small circles connected by u and a dot placed over it, used in reference of Vedic texts) ꣼ (सिद्धिरस्तु, सिद्धम 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒱𑒩𑒮𑓂𑒞𑒳, 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒧 Devanagari Anji) ঀ (Bengali Anji, Siddham) 𑒀 (Tirhuta Anji, Ankush of Ganeshji, placed at the beginning of something) 𑒀
१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.अंक ३८३ पर टिप्पणी १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय भरतक नाट्यशास्त्र: १९५६ ई. संगीत-नाटक अकादेमी द्वारा प्रथम राष्ट्रीय नाट्य उत्सव- कालिदासक अभिज्ञान शाकुन्तलम् (संस्कृत) सँ उत्सवक प्रारम्भ (गोवा ब्राह्मण सभा द्वारा) भेल, नाटकक कालखण्डक अनुरूप मंच आ पहिराबाक अध्ययन हेबाक चाही। पारसी नाटकक किछु प्रसिद्ध नाटक जेना इन्दर सभा, आलम आरा आ खोन्ने नहाक (सेक्सपियरक हेमलेट आधारित) सिनेमा बनि सेहो प्रस्तुत भेल। नाटक दू प्रकारक लोकधर्मी आ नाट्यधर्मी, लोकधर्मी भेल ग्राम्य आ नाट्यधर्मी भेल शास्त्रीय उक्ति। नाट्यधर्मक आधार अछि लोकधर्म। लोकधर्मीकेँ परिष्कृत करू आ ओ नाट्यधर्मी भऽ जाएत। लोकधर्मीक दू प्रकार- चित्तवृत्यर्पिका (आन्तरिक सुख-दुख) आ बाह्यवस्त्वनुकारिणी (बाह्य- पोखरि, कमलदह)। नाट्यधर्मी-सेहो दू प्रकारक कैशिकी शोभा (अंगक प्रदर्शन- विलासिता गीत-नृत्य-संगीत) आ अंशोपजीवनी (पुष्पक विमान, पहाड़ बोन आदिक सांकेतिक प्रदर्शन)। सम्पूर्ण अभिनय- आंगिक (अंगसँ), वाचिक(वाणीसँ), सात्विक(मोनक भावसँ) आ आहार्य (दृश्य आदिक कल्पना साज-सज्जा आधारित)। आंगिक अभिनय- शरीर, मुख आ चेष्टासँ; वाचिक अभिनय- देव, भूपाल, अनार्य आ जन्तु-चिड़ैक भाषामे; सात्विक- स्तम्भ (हर्ष, भय, शोक), स्वेद (स्तम्भक भाव दबबैले माथ नोचऽ लागब आदि), रोमांच (सात्विकक कारण देह भुकुटनाइ आदि), स्वरभंग (वाणीक भारी भेनाइ, आँखिमे नोर एनाइ), वेपथु (देह थरथरेनाइ आदि), वैवर्ण्य (मुँह पीअर पड़नाइ), अश्रु (नोर ढब-ढब खसनाइ, बेर-बेर आदि), प्रलय (शवासन आदि द्वारा); आ आहार्य- पुस्त (हाथी, बाघ, पहाड़ आदिक मंचपर स्थापन), अलंकार (वस्त्र-अलंकरण), अंग-रचना (रंग, मोंछ, वेश आ केश), संजीव (बिना पएर-साँप, दू पएर-मनुक्ख आ चिड़ै आ चारि पएरबला-जन्तु जीव-जन्तुक प्रस्तुति) द्वारा होइत अछि। दूटा आर अभिनय प्रकार- सामान्य (नाट्यशास्त्र २२म अध्याय) आ चित्राभिनय (नाट्यशास्त्र २२म अध्याय): चतुर्विध अभिनयक बाद सामान्य अभिनयक वर्णन, ई आंगिक, वाचिक आ सात्विक अभिनयक समन्वित रूप अछि आ ऐ मे सात्विक अभिनयक प्रधानता रहैत अछि। चित्राभिनय आंगिकसँ सम्बद्ध- अंगक माध्यसँ चित्र बना कऽ पहाड़, पोखरि चिड़ै आदिक अभिनय विधान। नाट्य-मंचन आ अभिनय: कालिदासक अभिज्ञान शाकुन्तलम् नाट्य निर्देशकक लेल पठनीय नाटक अछि। रंगमंच निर्देश, जेना, रथ वेगं निरूप्य, सूत पश्यैनं व्यापाद्यमानं, इति शरसंधानम् नाटयति, वृक्ष सेचनम् रुपयति, कलशम् अवरजायति, मुखमस्याः समुन्नमयितुमिच्छति, शकुन्तला परिहरति नाट्येन, नाट्येन प्रसाधयतः, कहि कऽ वास्तविकतामे नै वरन् अभिनयसँ ई कएल जाइत अछि। नाट्येन प्रसाधयतः, एतए अनसूया आ प्रियम्वदा मुद्रासँ अपन सखी शकुन्तलाक प्रसाधन करै छथि कारण से चाहे तँ उपलब्ध नै अछि, चाहे तँ ओतेक पलखति नै अछि। तहिना वृक्ष सेचनम् रुपयति सँ गाछमे पानि पटेबाक अभिनय, कलशम् अवरजायति सँ कलश खाली करबाक काल्पनिक निर्देश, रथ वेगं निरूप्य सँ तेज गतिसँ रथमे यात्राक अभिनय, इति शरसंधानम् नाटयति सँ तीरकेँ धनुषपर चढ़ेबाक निर्णय, सूत पश्यैनं व्यापाद्यमानं सँ हरिणकेँ मारि खसेबाक दृश्य देखबाक निर्देश, मुखमस्याः समुन्नमयितुमिच्छति सँ दुश्यन्तक शकुन्तलाक मुँहकेँ उठेबाक इच्छा, शकुन्तला परिहरति नाट्येन सँ शकुन्तला द्वारा दुश्यन्तक ऐ प्रयासकेँ रोकबाक अभिनयक निर्देश होइत अछि। भरतक रंगमंच: ऐ मे होइत अछि- पाछाँक पर्दा, नेपथ्य (मेकप रूम बुझू), आगमन आ निर्गमनक दरबज्जा, विशेष पर्दा जे आगमन आ निर्गमन स्थलकेँ झाँपैत अछि, वेदिका- रंगमंचक बीचमे वादन-दल लेल बनाओल जाइत अछि, रंगशीर्ष- पाछाँक रंगमंच स्थल; मत्तवर्णी- आगाँ दिस दुनू कोणपर अभिनय लेल होइत अछि आ रंगपीठ अछि सोझाँक मुख्य अभिनय स्थल। अभिनय मूल्यांकन माने नाट्य समीक्षा: अध्याय २७ मे भरत सफलताकेँ लक्ष्य बतबै छथि, मंचन सफलतासँ पूर्ण हुअए। दर्शक कहैए, हँ, बाह, कतेक दुखद अन्त, तँ तेहने दर्शक भेलाह सहृदय, भरतक शब्दमे, से ओ नाटककार आ ओकर पात्रक संग एक भऽ जाइत छथि। नाट्य प्रतियोगिता होइत छल आ ओतए निर्णायक लोकनि पुरस्कार सेहो दै छलाह। भरत निर्णायक लोकनि द्वारा धनात्मक आ ऋणात्मक अंक देबाक मानदण्डक निर्धारण करैत कहै छथि जे- १.ध्यानमे कमी, २.दोसर पात्रक सम्वाद बाजब, ३.पात्रक अनुरूप व्यक्तित्व नै हएब, ४.स्मरणमे कमी, ५.पात्रक अभिनयसँ हटि कऽ दोसर रूप धऽ लेब, ६.कोनो वस्तु, पदार्थ खसि पड़ब, ७.बजबा काल लटपटाएब, ८.व्याकरण वा आन दोष, ९.निष्पादनमे कमी, १०.संगीतमे दोष, ११.वाक् मे दोष, १२.दूरदर्शितामे कमी, १३.सामिग्रीमे कमी, १४.मेकप मे कमी, १५. नाटककार वा निर्देशक द्वारा कोनो दोसर नाटकक अंश घोसियाएब, १६.नाटकक भाषा सरल आ साफ नै हएब, ई सभ अभिनय आ मंचनक दोष भेल। निर्णायक सभ क्षेत्रसँ होथि, निरपेक्ष होथि। नाटकक सम्पूर्ण प्रभाव, तारतम्य, विभिन्न गुणक अनुपात, आ भावनात्मक निरूपण ध्यानमे राखल जाए। स्टेजक मैनेजर- सूत्रधार- आ ओकर सहायक -परिपार्श्वक- नाटकक सभ क्षेत्रक ज्ञाता होथि। मुख्य अभिनेत्री संगीत आ नाटकमे निपुण होथि, मुख्य अभिनेता- नायक- अपन क्षमतासँ नाटककेँ सफल बनबै छथि। अभिनेता- नट- क चयन एना करू, जँ छोट कदकाठीक छथि तँ वाणवीर लेल, पातर-दुब्बर होथि तँ नोकर, बकथोथीमे माहिर होथि तँ बिपटा, ऐ तरहेँ पात्रक अभिनेताक निर्धारण करू। संगीत-दलक मुखिया- तौरिक- केँ संगीतक सभ पक्षक ज्ञान हेबाक चाही जइसँ ओ बाजा बजेनिहार- कुशीलव- केँ निर्देशित कऽ सकथि। -Gajendra Thakur, editor, Videha (be part of Videha www.videha.co.in -send your WhatsApp no to +919560960721 so that it can be added to the Videha WhatsApp Broadcast List.) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १.२.अंक ३८३ पर टिप्पणी कल्पना झा, पटना
आशीष अनचिन्हार जीक आलेख "की अप्रमाणिक आलोचना एवं इतिहास केर लेखन करै छथि तारानंद वियोगी?"बहुत नीक, सार्थक, पाठककेँ जागरूक करएबला अछि। आशीष अनचिन्हार जीक 7th October क' पहिल पोस्ट आएल छलनि,तारानन्द वियोगी जीक पोथी "मैथिली कविताक हजार वर्ष" पर प्रतिक्रिया स्वरूप आ एक दिसम्बर क' एतेक विस्तृत, एकहक टा प्वाइंट पर प्रमाणक संग फड़िछाएल आलेख आबि गेलनि। एतेक कम समयमे एतेक नमहर आलेख लेल कतेक समर्पित भ' लागल हेताह,से अनुमान लगाओल जा सकैछ। Hats off to him...
अक्षरशः सत्य कहलनि अछि,"आजुक रचना तँ अपन कथ्यमे सपाट भेल जाइए मुदा आलोचना घुमावदार। जखन कि रचनाक भाषाकेँ घुमादावर हेबाक चाही आ आलोचनाक भाषा सपाट।"
"तारानंद वियोगी निश्चिते अध्ययन नै करै छथि,जँ करितथि तऽ हुनका छन्द एवं राग-लय-तालमे अंतर अवश्य बुझना गेल रहितनि। संगहि-संग जँ वियोगीजीकेँ आनक लिखल पढ़बाक, ओकरा उद्धृत करबाक अभ्यास रहितनि तऽ ओ पं. गोविन्द झाजीक लिखल एहि पाँति सभसँ ओ अवश्य परिचित रहितथि।" एना बिनु कोनो लाग-लपेटकेँ सत्य बाजबाकलेल आशीष जीक जतेक सराहना कएल जाए,से कम होएत। अपन बातसँ पाठककेँ सेहो कनेक्ट करैत तथ्य सभ राखल गेल अछि,सेहो विशेष बात लागल एहि आलेखक।मात्र अपन मत थोपल नहि गेल अछि पाठकक सोझाँ।पाठक अपनहुँ एकरा वेरिफाइ क' सकैत छथि,सेहो ऑप्शन सुझाएल गेल अछि। उदाहरण स्वरूप देखल जाए--"जे सजग पाठक छथि से बूझि सकै छथि जे वर्तनी बदलि गेलासँ कोना छन्द परिवर्तन वा छंदोभंग होइत छै, तँइ एकरा हम उद्धृत केलहुँ। एहि भागमे हम उद्धरण सभ दू कारणसँ देलहुँ- पहिल, जँ कोनो पाठक लग प्राचीन रचना आबनि तऽ ओहि रचनाक छन्द निर्धारण लेल कोन-कोन सावधानी रखबाक चाही तकर जानकारी भेटतनि आ दोसर कारण ई जे पाठक बूझि सकथि जे वियोगीजी पाठक आ साहित्यिक समाजकेँ कोना भ्रमित करै छथि आ मात्र फतवा देबामे विश्वास रखैत छथि।" "वस्तुतः तारानंद वियोगीजीक अधिकांश आलोचना / इतिहास / समीक्षा / पाठकीय अप्रमाणिक छनि। जरूरति छै ओकरा पाठकक सामने अनबाक। से नव पाठक वा आलोचक सेहो कऽ सकै छथि आ जखन-जेहन हमरा समय भेटत हमहूँ हुनक अप्रमाणिकताकेँ भविष्यमे पाठकक सामने आनब।" ई काज आशीषे जी कऽ सकैत छथि। आ ई बहुत आवश्यक काज अछि।नहि तँ एहिना बेधड़क किछुओ लिखल जाइत रहत।अप्रमाणिक आलोचना / इतिहास / समीक्षा सभ।आ लोक मूक-वधिर बनल रहत। अगिला आलेखक चर्चा करैत लिखने छथि आशीष जी,"ओहि आलेख केर शीर्षक रहत- "की तारानंद वियोगीजी मंचपर अप्रमाणिक वाचन करै छथि?" ई आलेख किछु मासमे संभव हएत।"एहि दोसर आलेखक प्रतीक्षा रहत। विदेह ३८३ म अंक ०१ दिसम्बर २०२३ मे प्रकाशित आलेख "की अप्रमाणिक आलोचना एवं इतिहास केर लेखन करै छथि तारानंद वियोगी?" पर आयल आन टिप्पणी
अपने सटीक विश्लेषण कैल अछि। -सुरेन्द्र ठाकुर
श्रीमान वियोगी जीक एतबै कहबनि जे पढ़बाक कोनो उम्र नै होइत छैक एखनो पढ़ल जा सकैए, अपन अप्रमाणिक आलोचनासँ सीखथि आ आगू बढ़थि। -अभिलाष ठाकुर
बिद्वतजन एहि विश्लेषण पर अपन अपन मत प्रकट करताह से अपेक्षा अछि मुदा एतय बिलाइ के गर मे घंटी के ....? संगहि दयाशंकरजीक एहि पत्रक उत्तर श्री तारा नंद वियोगी जी के देबाक चाही जं ओ अपना बात पर कायम छथि अन्यथा इतिहास के कलंकित जुनि कारथि। -नबोनारायण मिश्र
अद्भुत आलेख।विलक्षण। -सत्यनारायण झा
हम नि:शब्द छी। एतेक अध्ययन सेहो गहन अध्ययन। वाह। अद्भुत। दृषटांत दैत अपने वियोगी जीक सोच के विद्वतापूर्ण आलेखसँ खंडित कएल अछि। आलोचना/ समालोचना/समीक्षा कोना लिखल जएबाक चाही से नवांकुर समीक्षक सभ केँ अपनेक आलेख मार्गदर्शन करतनि से विश्वास अछि। बधाइ। -सुशील लाल दास हम एहि विषयपर अहाँसँ सहमत छी। कतबो हल्ला करबै,ओ बड़का लोक छथि,नमहर समर्थक, सभसँ पैघ गुटक नेता छथि।ओ जैह कहैत छथिन सैह सही मानल जाइत छै। तेँ खाहे तऽ हुनका वाह-वाह कहियनु वा हमरा जेकाँ अनठियौने चुपचाप अपना पसिन्दक पोथी पढ़ू आ आनन्द लिय । नहि पलखति हो तऽ जेना फुराय से करू। -हीरेन्द्र झा
पढ़लहुं अछि।फेर नीक सं पढ़ब। आश्चर्यजनक जनतब सं भरल अछि अपनेक आलेख। हार्दिक बधाइ आ शुभकामना! -रबीन्द्रनारायण मिश्र
हम पूरा पढलहुं,हम एतबे कहब जे अहांक ज्ञान आ लेखनी अद्भुत अछि। -विनय कुमार
सार्थक विश्लेषण । तार्किक प्रमाण सहित आलेख । वियोगीजीके दृष्टिकोण के खण्डन कहबै त नीक हेतै । साहित्य मे वहसके निरन्तरता सदैव रहै छै । -संजय कर्ण अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.गद्य २.१.रबीन्द्र नारायण मिश्र-जय सोमनाथ! २.२.परमानन्द लाल कर्ण- कातिक मासक माहात्म्य २.३.निर्मला कर्ण- अग्निशिखा खेप ३२ २.४.नन्दविलास राय-शिष्टाचार २.५.सुभाष कुमार कामत- दिव्यदृष्टि चर्चित पोथीमे गजपट: एक समेकित २.६.लालदेव कामत- डोकहर/ सपना साकार/ पोथी समीक्षा/ दिनकर जीक उत्कर्ष/ श्रीमान मोन पड़ैत छथि/ सरौती सपुत : खुशी बाबूक उपलवधि २.७.प्रणव झा- पुस्तक समीक्षा : मैथिली वेब पत्रकारिता के इतिहास (लेखक : आशीष अनचिन्हार) २.८.आशीष अनचिन्हार-अछांदिक कविताक दरबारमे 'छंदोबद्ध सुशील दोहावली' २.९.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा-यज्ञ २.१०.रबीन्द्र नारायण मिश्र- ठेहा परक मौलाएल गाछ (धारावाहिक) २.११.सुरेन्द्र लाभ- कथा-सँयोगसँ बाँचल जिनगी २.१२.प्रमोद झा 'गोकुल'- भोज (बीहैन कथा) २.१.रबीन्द्र नारायण मिश्र-जय सोमनाथ! रबीन्द्र नारायण मिश्र जय सोमनाथ! बहुत दिनसँ सोमनाथ महादेवक दर्शन करबाक इच्छा छल। द्वारकाधीश जेबाक सेहो इच्छा छल। सन्२०१२मे हम सरकारी यात्रापर अहमदाबाद गेलो रही। हम गुजरात सरकारक राजकीय अतिथि छलहुँ । बहुत स्वागत भेल रहए। गुजरात सरकारक अधिकारीलोकनि अहमदाबाद आ लगपासक प्रमुख स्थानसभ देखओने रहथि। ओहि समयमे स्टैच्यू ऑफ यूनिटी बनल नहि रहैक। ओकर स्थान जरूर निर्धारित कएल गेल रहैक। नर्मदानदीपर बनल बांध हम देखने रही। मुदा सोमनाथ आ द्वारकाधीश नहि जा सकल रही। कारण ओ स्थानसभ अहमदाबादसँ बेसी फटकी अछि। श्रीमतीजी से संगमे नहि रहथि। भेल जे बादमे दुनूगोटे संगे ओहि स्थानसभपर जाएब । ई बात सन् २०१२क थिक। तकर एगारह सालक बाद १८अक्टुबर २०२३क हमदुनूगोटे हबाइ जहाजसँ अहमदाबाद बिदा भेलहुँ। ताहि हेतु दूमास पहिनेसँ सभटा योजना बनओने रही। गुगलपर बहुत जानकारी उपलव्ध भेल । अहमदाबादमे रहि रहल हमर एकटा मित्र सेहो किछु जानकारी देलनि। हमरासभकेँ सोमनाथ आ द्वारकाधीश जेबाक मूल कार्यक्रम छल। से कोना जाइ? दिल्लीसँ द्वारकाक हेतु सप्ताहमे मात्र एकटा रेलगाड़ी अछि। ओ ट्रेन पहिनेसँ भरल छल। बहुत दिन आगूओक टिकट नहि भेटि रहल छल। सोमनाथ वा द्वारकाधीशसँ सटले हबाइ अड्डा नहि अछि। जामनगर,राजकोट वा अहमदाबाद तीनू हबाइ अड्डा द्वारकासँ क्रमशः १४० किलोमीटर,२२५किलोमीटर,३८६किलोमीटर फटकी अछि। तकर बाद ट्रेन,बस वा टैक्सीसँ जाए पड़त । बहुत सोच-विचारक बाद हमसभ अहमदाबाद होइत जेबाक निर्णय केलहुँ। तकर एकटा कारण ईहो छल जे अहमदाबादमे केन्द्र सरकारक अतिथिगृहमे रहबाक हेतु कोठरी भेटि जेबाक संभावना छल। हमसभ दिल्लीसँ अहमदाबाद जेबाक १८ अक्टुबर २०२३क टिकट लए लेलहुँ। वापसी सेहो अहमदाबादेसँ २८अक्टुबर २०२३क टिकट लए लेलहुँ । अहमदाबादसँ सोमनाथ आ सोमनाथसँ द्वारकाधीश जेबाक योजना छल। तदनुसर हमसभ ओहिसभठाम पहुँचबाक हेतु रेलक टिकट लेलहुँ । अहमदाबादसँ सोमनाथ जेबाक हेतु बहुत नीक ट्रेन ( सोमनाथ एक्सप्रेस ) छैक । अहमदाबादमे मे ट्रेनमे चढ़लाक बाद भोरे हमसभ सोमनाथ पहुँचि सकैत छलहुँ । तहिना सोमनाथसँ द्वारकाधीशक हेतु ट्रेनक टिकट भेटि गेल। द्वारकाधीशसँ अहमदाबाद जेबाक हेतु सेहो रेलमे आरक्षण करबा लेलहुँ । बस वा टैक्सी यात्रा करब हमरा लोकनिकेँ पसिंद नहि भेल । ट्रेन बेसी सुविधाजनक बुझाएल । रेल ,हबाइ जहाजक टिकटक ओरिआन भए गेलाक बाद हमसभ ओहि स्थानसभपर रहबाक व्यवस्थामे लागि गेलहुँ। अहमदाबादमे केन्द्र सरकारक होलीडे होम छैक। हमरा उम्मीद रहए जे ओहिमे जगह भेटि जाएत। नियमानुसार सेवानिवृत्त लोकनि ४५दिन पहिने ओहिमे आनलाइन आरक्षण करबा सकैत छथि। मुदा से भेल नहि। जहिए ओ खुजल ताहिसँ पहिने ओ भरि चुकल छल। आब की कएल जाए? होटलसभ महग बुझाएल। बारह साल पहिने सन्२०१२मे जे हम अहमदाबाद गेल रही तखन गुजरात सरकारक एकटा वरिष्ठ अधिकारीसँ परिचय भेल रहए। हुनके अपन समस्या कहलिअनि। यद्यपि ओ पछिला साल सेवानिवृत्त भए गेल छथि तथापि अहमदाबादक राजकीय अतिथिगृहमे हमरासभक रहबाक जोगार करबा देलनि। अस्तु,अहमदाबादमे रहबाक समस्याक समाधान तँ भए गेल। आब सोमनाथ आ द्वारकाधीशक व्यवस्था करबाक छल। गुगलपर बहुत खोज केलहुँ । ताहि आधारपर सोमनाथमे सोमनाथ मंदिर ट्रस्टक वेब साइटक जनतब भेल । ओतहिसँ ट्रस्ट द्वारा संचालित धर्मशालाक आनलाइन आरक्षणक जानकारी सेहो भेटल। हम तुरंत माहेश्वरी धर्मशालामे तीनदिनक हेतु एकटा सूट ६००० रुपया भुगतान कए आरक्षित करबा लेलहुँ। एहिमेसँ लगभग तेरहसँ रुपया बादमे वापसी काल हमरा वापस कए देल गेल । आब रहि गेल द्वारकाधीशमे रहबाक समस्या। ओहिठामक मंदिर ट्रस्टक धर्मशालामे आनलाइन आरक्षण नहि होइत छैक। ओतए पहुँचलाक बादे खाली रहलापर डेरा भेटि सकैत अछि। आर धर्मशालासभ आनलाइन देखाएल। मुदा हमर एकटा मित्र इस्कान मंदिरक आवासमे जोगार करबाक परामर्श देलनि। गुगलक माध्यमसँ ओहिठामक मोबाइल नंबर भेटल । मोबाइल नंबरपर फोन केलहुँ । फोन लागि गेल । ओ जेना-जेना कहलाह से सभ करैत आनलाइन तीनदिनक ४५०० टाका जमा करा देलिऐक। तकर बाद तीनदिनक हेतु एकटा कोठरी हमरासभक हेतु आरक्षित करबा देलनि आ ह्वाट्सप तकर पुष्टिओ केलनि । एहि तरहेँ अहमदाबाद,सोमनाथ आ द्वारका तीनूठाम रहबाक व्योंत सेहो भए गेल । आब ईश्वरसँ एतबे प्रार्थना रहए जे हमसभ शुभ-शुभ कए यात्रा संपन्न कए ली,कोनो विघ्न-वाधा नहि होअए। समय नीकसँ कटि जाए । १८ अक्टुबर २०२३क भोरे पाँच बजे हम दुनू बेकती टैक्सीसँ दिल्ली हबाइ अड्डाक टर्मिनल तीन हेतु बिदा भेलहुँ । एकदिन पहिने आनलाइन चेक इन करा चुकल रही। तकर प्रिंट आउट संगमे राखि लेने रही। आधार कार्ड सेहो संगमे छलहे । भोरुका समय ,रोड एकदम खालीए रहैक। हमसभ छओ बजे हबाइ अड्डा पहुँचि गेल रही। तकर बाद जल्दीए आवश्यक जाँच-पड़तालक बाद हमरासभकेँ बत्तीस नंबर द्वारि लग जेबाक अनुमति भेटि गेल। हबाइ जहाजकेँ उड़बामे अखन बहुत समय बाँचल रहैक। हमसभ चैनसँ ओतए चाह पीलहुँ आ प्रतीक्षा करए लगलहुँ हबाइ जहाजमे बैसबाक । करीब घंटा भरि बैसलाक बाद लोकसभकेँ पाँतिमे आगू ससरैत देखि हमहूँसभ ठाढ़ भए गेलहुँ । थोड़बे कालमे हम दुनू बेकती हबाइ जहाजमे अपन-अपन सीटपर बैसि गेल रही। देखिते-देखिते जहाज भरि गेलैक। थोड़े कालक बाद ओ गुड़गुड़ाए लगलैक। क्रमशः हबाइ जहाजक पहिआसभ पहिने अस्थिरे,फेर तेजीसँ आगू बढ़ि रहल छल। हम बाहर देखैत रही कि ताबतेमे जहाज जमीन छोड़ि देलक,हुर्र दए अकासमे उड़ए लागल। दू सँ तीन मिनटक भीतरे ओ ततेक ऊपर चलि गेल जे नीचाँक सभ किछु बहुत छोट-छोट देखाए लागल। यात्रीसभ अपना-अपनामे मगन छलाह। हमहूँसभ आपसमे किछु-किछु बतिआइत रहलहुँ। थोड़बे कालक बाद जलखै परसल गेल,पानिक बोतल देल गेल। जलखै खतम कए हमसभ पानि पीबिए रहल छलहुँ कि उद्घोषणा होमए लागल- -हमसभ दस मिनटमे अहमदाबाद पहुँचि रहल छी। ओहिठामक मौसम सामान्य अछि। आश्चर्यो भेल जे कनीके काल पहिने तँ दिल्लीमे हबाइ जहाजपर चढ़ल रही । आब अहमदाबाद पहुँचिओ रहल छी। इएह छैक हबाइ जहाजमे यात्रा करबाक फएदा। अहमदाबाद दिल्लीक तुलनामे बहुत छोट हबाइ अड्डा छैक। हबाइ जहाजसँ उतरि हमसभ बसमे चढ़ि कनीके कालमे बेल्ट संख्या छओ लग पहुँचि अपन-अपन बैग लेलहुँ आ हबाइ अड्डासँ शुभ-शुभ बाहर भए गेलहुँ । ओहिठामसँ ओलाक टैक्सी आरक्षित केलहुँ आ आधा घंटासँ पहिने राजकीय अतिथि गृह पहुँचि गेलहुँ । हमरासभ लेल कोठरी संख्या २०५ आरक्षित छल। ओहि कोठरीमे पहुँचि हमसभ बहुत आश्वस्त छलहुँ ,निश्चिन्तो । कारण यात्राक पहिल चरण सफलतापूर्वक पूर्ण भेल आ हमसभ दिल्लीसँ अहमदाबाद अतिथिगृह पहुँचि गेल रही। अतिथिगृहमे पहुँचितहि चारिकप चाहक आदेश फोनपर देलिऐक। ओ दोबारा पुछलक- -चारि कप। हम कहलिऐक- -हँ,हँ चारि कप। बात ई छैक जे हमसभ दिनभरिमे एक्के बेर चाह पीबैत छी,भोरमे ,मुदा सामान्य चाहक कपक तुलनामे कैकगुणा बेसी चाह रहैत अछि। तेँ हम चारि कप चाहक आदेश देलिऐक जाहिसँ कम सँ कम दोबर चाह तँ रहबे करत । अतिथिगृहमे चाह,जलखै आ भोजनक उत्तम प्रबंध छल। बस समयपर आदेश दए दिऔक। से यदि नहि देबैक तखन चुकि जाएब । बड़काटा छिपलीमे चाहसँ भरल चाहक केतली आ चारिटा खाली कप संगमे फराकसँ राखल चिन्नी। ईश्वरक कृपासँ हमसभ चिन्नी सहित चाह पीबैत छी। तेँ आगूसँ चिन्नी पहिने मिला कए आनबाक हेतु कहलिऐक । तेहन चाहक स्वाद बेसी नीक रहैत छैक । चाह पीलाक बाद हमसभ जलखैओ केलहुँ। भोजनक आदेश सेहो दए देलिऐक आ निचेन भए शायिकापर पड़ि गेलहुँ , थोड़े काल विश्राम केलहुँ । एकबजेक आसपास भोजन बनि जेबाक सूचना भेटल। ओ पुछलक- -अपनेक आज्ञा होअए तँ कोठरीएमे लेने आबी। -ठीक छैक। थोड़बे कालमे बड़का-बड़का थारमे भोजन लेने एकगोटे आबि गेल। थारीक आकार आ प्रकार तँ देखैत बनैत छल। पर्याप्त मात्रामे भात,सोहारी ,कैकटा तरकारी राखल छल। संगमे छाछ तँ छलहे। सौंसे गुजरातमे भोजनमे दूटा बात देखबामे आएल-एक तँ सभकिछुमे कनीमनी मिठ्ठ अबस्स मिलाएल भेटत,दोसर छाछ अबस्स परसल जाएत । हमसभ कहबो केलिऐक | -एतेक तँ नहि खा सकब। -कोनो बात नहि। जतबे खाएल होअए ततबे खाएब । भोजन कए हमसभ थोड़े काल विश्रामो केलहुँ । बाहर रौद बहुत करगर बुझाएल । -आब की करी? अजुका दिन केमहर घुमी? -थोड़े काल आर ठहरि जाइत छी। रौद कनी आर कमि जाइक।-ओ कहलनि। -ठीके कहलहुँ। कनी कालक बाद ओलाक टैक्सी आरक्षित कए हमसभ साबरमती आश्रम पहुँचलहुँ । साबरमती आश्रम हम एकबेर पहिनहुँ गेल छी। तकर बहुत दिन भए गेलैक। तथापि बहुत किछु मोने छल। मुदा आश्रमक भितर किछु-किछु बदलिओ गेल छल। मुख्यद्वारिसँ भितर होइते करीब पचास गोटे एक्केठाम ठाढ़ छलाह। एकटा गाइड हुनकासभकेँ अंग्रेजीमे किछु-किछु बता रहल छल। हम पता करबाक प्रयास केलहुँ जे आखिर ओ छथि के? आश्रम परिसरमे पुलिस से पर्याप्त मात्रामे छल । बादमे पता लागल जे अहमदाबादमे जी ट्वेन्टी देशक प्रतिनिधिसभक बैसार आयोजित छैक। ओहीमेसँ कोनो देशक प्रतिनिधि गांधी आश्रम देखबाक हेतु आएल छथि। हुनका संगे बहुत रास ताम-झाम छलनि । हमसभ ताबे दोसर दिस घुमबाक प्रयास केलहुँ । महात्मा गांधीक जीवनपर आधारित म्युजिअम देखलहुँ । तरह-तरहक फोटोसभ बहुत व्यवस्थापूर्वक राखल छल। महात्मा गांधीक कोठरी,हुनकर पत्नीक कोठरी आ अतिथिलोकनिक हेतु एकटा कोठरी अगले-बगल अछि। बहुत साधारण सुविधा ओहिमे छल। कनीके फटकी नान्हिटा कोठरी अछि जाहिमे संत विनोबा भावे दू साल धरि रहैत छलाह । ई आश्रम साबरमती नदीसँ सटले अछि। आब तँ बीचमे देबाल बना देल गेल अछि। अन्यथा पहिने ओहि नदीमे नीचाँ धरि गेल जा सकैत छल। आश्रम परिसरमे कान,मुँह,आ आँखि मुनने महात्मा गांधीक प्रसिद्ध बानरक तीनटा मूर्ति से राखल छल। करीब एकघंटा धरि हमसभ ओतए रहलहुँ । विदेशी अतिथिसभ आब ऊपर आबि गेल रहथि आ हमसभ बाहर द्वारि लग । साबरमती आश्रमसँ हमसभ साबरमती रीभर फ्रान्टपर बनल अटल ब्रिज देखबाक हेतु बिदा भेलहुँ । साबरमती आश्रमक हातासँ साबरमती नदीक हरिअर कंचन पानि देखैत बनैत अछि। पानिक हिलकोरसँ नदीक सुदंरता अनुपम भए जाइत छल। हम बड़ीकाल धरि सोचैत रहि गेलहुँ जे किएक ने आर नदीसभक जल एहने पवित्र आ स्वच्छ रहि पबैत अछि?जखन की सरकार एहि हेतु निरंतर प्रयत्नशील अछि। गंगा नदीक जे हालति अछि से सभ जनैत छी। जमुना नदीक हालति सेहो तेहने अछि। सहरसभक सभटा नाला नदीएमे मिलैत अछि। लोकसभ लास नदीमे फेकि दैत अछि। दुर्गापूजा,काली पूजा ,गणेश पूजाक बाद लाखोंक संख्यामे मूर्तिसभ नदीमे भसा देल जाइत अछि। परिणाम सामने अछि। नदीसभक पानि विषाक्त भए गेल अछि। अहमदाबादक साबरमती नदीपर कतेको पुल बनल अछि जाहिमे अटल ब्रिज नामसँ प्रख्यात पुल वस्तुतः बहुत मनोरम आ आकर्षक अछि। तीन सए मीटर नमगर ई पुल सहरक पूब आ पश्चिमी भागकेँ जोड़ैत अछि। पुलक बीचमे भोजनक खोका बनल अछि। पुलक बीच-बीचमे बैसबाक प्रबंध अछि। ओतए बैसलाक बाद मधुर संगीत सुनाइत रहैत अछि। नीचाँ नदीक कलकल बहैत जल आ चारूकात पसरल नदीक विस्तार देखि मोन होइत रहैत अछि जे ओतहि रहि जाइ। ओहिठाम फोटो खिचओलहुँ,अमुलक दोकानसँ कीनल गेल लस्सी पीलहुँ । थोड़े काल ओहिपर घुमैत रहलहुँ । कैकटा नवविवाहित जोड़ासभ ओतए आबि रहल छलाह। क्रमशः भीड़ बढ़िते जा रहल छल। आब हमसभ ओहिठामसँ निकलि पुलक पश्चिमी भागमे फ्लावर पार्क पहुँचलहुँ । नदीक काते-काते बहुत दूर धरि बनल फ्लावर पार्कमे हजारों तरहक फूल देखबामे आएल । जतबा घुमि सकलहुँ आगू बढ़ैत गेलहुँ । फेर ओही रस्ता बाटे वापसो भेलहुँ । फ्लावर पार्कसँ निकलि हमसभ थोड़े काल सुस्तेलहुँ । तकर बाद टैक्सीसँ वापस अपन डेरा आबि गेलहुँ । काल्हि ओलासँ टैक्सी आरक्षित कए हमसभ रिभरफ्रान्ट जाइत रही । टैक्सी बला लोकेसन देखि कए हमरासभकेँ उतारि देलक। हम कहबो केलिऐक जे हमरासभकेँ तँ रिभर फ्रान्ट जेबाक छल। -मुदा अहाँक लोकेसन तँ एतुके आबि रहल अछि। कनीके फटकी रिभर फ्रान्ट छैक।- हाथसँ इसारा कए देखओलक। हम ओकरा कहबो केलिऐक जे हमरासभकेँ ओहिठाम धरि छोड़ि दिअए। मुदा ओ नहि मानलक। हमसभ की करितहुँ?टैक्सीसँ उतरि गेलहुँ। भेल जे कनीके दूर छैक तँ पैरे-पैरे चलि जाइत छी। रिभर फ्रान्ट तँ नदीक काते-काते बड़ी दूर धरि पसरल अछि। ओहिमे थोड़ेक-थोड़ेक दूरपर कैकटा पुल छैक। ओहीमे सँ एकटा अटल ब्रिजक नामसँ जानल जाइत अछि। ओहिठाम जेबाक हेतु टिकट लेबए पड़ैत छैक। लगेमे फ्लाबर पार्क सेहो छैक। तकरो टिकट लेबए पड़ैत छैक। टिकट घर धरि पैरे-पैरे जाइत-जाइत हमसभ नीकसँ थाकि गेलहुँ। टिकट लेला बाद हमसभ जखन अटल ब्रिजपर पहुँचि गेलहुँ तखन तँ सभ दुख बिला गेल। ओहिठामसँ हटबाक मोने नहि होअए। साँझ पड़ि रहल छलैक। हमरासभकेँ फ्लाबर पार्क सेहो घुमबाक छल। तेँ अछता-पछता कए अटल ब्रिजसँ ससरलहुँ । थोड़े काल फ्लाबर पार्कमे घुमलहुँ । तकर बाद फेर ओलाक मारफत टैक्सी आरक्षित करओलहुँ । मुदा ओहिमे बहुत समय लागि गेल। अस्तु,निर्णय केलहुँ जे काल्हि भरिदिना टैक्सी राखब जाहिसँ बीच-बीचमे स्थान परिवर्तनमे सुविधा रहत आ बेर-बेर टैक्सी आरक्षित करबाक आ तकर आगमनक प्रतीक्षा नहि करए पड़त। आइ अहमदाबादमे हमरसभक दोसर दिन छल। हम आठ घंटाक हेतु उबेरक टैक्सी आरक्षित केने रही। लगभग नओ बजे ओ आबि गेल। हमहूँसभ जलखै कए तैयारे रही। सभसँ पहिने गांधी नगर स्थित स्वामी नारायण मंदिर जेबाक विचार बनल। अहमदाबादसँ गांधी नगार पचीस किलोमीटर फटकी अछि। रस्तामे तरह-तरहक चीज-वस्तुसभ देखबामे आएल। अदानी समूहक मुख्यालय सेहो ओही मार्गमे देखाइत छल। ओना अहमदाबाद सहरमे कोनो बहुत आकर्षक स्थिति नहि बुझाएल। ओएह पुरान-पुरान मकान आ दोकान,चारूकात गंदगी भरल । हमरा मोनमे रहए जे एतेक दिनक बाद अहमदाबाद दोबारा जा रहल छी। बहुत किछु परिवर्तन भए गेल होएत। मुदा से सभ किछु नहि बुझाएल। गांधी नगर पहुँचलाक बाद जरूर किछु बदललसन बुझाएल। साफ,स्वच्छ आ चाकर रस्तासभ देखाएल। स्वामी नारायण मंदिर हमसभ पहुँचलहुँ तखन ओ बाहरसँ बंदे छल। थोड़े काल प्रतीक्षा केलाक बाद मोबाइल जमा करबाक हेतु गेलहुँ । संबंधित खिड़कीपर कैमरा दिस ताकू आ अहाँक आकृतिकेँ कैमरामे सुरक्षित कए लेल जाएत। तकर बाद अहाँकेँ एकटा टोकन देल जाएत। टोकन लए कए ओएह आदमी वापसीमे जाएत जाहिसँ कैमरा ओकरा चिन्हतैक आ तखने मोबाइल वापस कएल जाएत। एवम् प्रकारेण मोबाइल बहुत सुरक्षित तरीकसँ राखल जाइत छल। आनो कैकठाम मोबाइल जमा करए पड़ल छल.मुदा ककरो व्यवस्था एतेक नीक नहि रहैक। स्वामी नारायण मंदिर गेलाक बाद हमसभ बहुत नीक जकाँ मंदिरमे आरती होइत देखलहुँ । मंदिरक परिक्रमा केलहुँ ,लगीचेमे मंदिर द्वारा संचालित दोकानमे किछु-किछु कीनलहुँ आ वापस फेर ओही खिड़कीपर आबि गेलहुँ जतए मोबाइल जमा केने रही। बिना कोनो परेसानीकेँ मोबाइल वापस भेटि गेल। ओहिठामक स्वामी नारायण मंदिर दिल्लीक अक्षरधाम मंदिरसँ बहुत मिलैत अछि। अपितु,दिल्लीक अक्षरधाम बेसीए पैघ अछि। तेँ हमरा लोकनिकेँ एहिठाम कोनो ततेक नबीनता नहि बुझाएल । हँ, दर्शन जरूर बहुत सुविधासँ भए गेल। माहौल एकदम शांतिपूर्ण छल। कोनो प्रकारक असौकर्य नहि छल। स्वामी नारायण मंदिरसँ निकलि हमसभ वैष्णव देबीक प्रतिकृत मंदिर पहुँचलहुँ । पता लागल जे बारह बजेसँ दर्शन प्रारंभ होएत। हमसभ थोड़ेकाल ओतहि प्रतीक्षा केलहुँ । ओहिठाम कार्यरत प्रहरी तरह-तरहक कबाइत करैत रहैत छल। हमरा लग आब कए कहैत अछि- -कहने छलहुँ जे पैताबा निकालि लिअ। एनामे अहाँ भितर नहि जा सकब। निकालू पैताबा ।- ककरो किछु ककरो किछु ओ बजिते रहैत छल। कैकगोटेसँ तँ झगड़ा सेहो करैत रहल। लगैत छलैक जे सौंसे मंदिरक छार-भार ओकरे कप्पारपर छैक। बारह बजे लोकसभ पाँतिमे लागि गेल। देखिते-देखिते लोक कतएसँ कतए पहुँचि गेल। हमसभ देखिते रहि गेलहुँ । ताबे बेगुसरायक एकटा महिला मैथिलीमे बजैत देखेलीह। ओएह हमरा दुनू बेकतीकेँ अपना आगू ठाढ़ होमए देलनि जाहिसँ हमसभ जल्दीए मंदिर लग पहुँचि सकलहुँ । मंदिरमे तँ ततेक सुरंग बनल छल जे भेल जे जाने चलि जाएत। मुदा आब तँ ओहिमे पैसि गेल रही। वापसो नहि भए सकैत छलहुँ। हमर श्रीमतीजी हमरासँ आगूए रहथि। जेना-तेना दर्शन कए हमसभ बाहर निकललहुँ तखन जानमे जान आएल। केओ कहलक जे बूढ़सभक हेतु फराक रस्ता छैक। मुदा से हमसभ नहि देखि सकलहुँ । ओहि सुरंगेमे गेलाक बाद हमर श्रीमतीजीक ठेहुन कचकि गेलनि,की भेलनि की नहि जे पछिला एक माससँ परेसानीमे छथि। अखनो इलाज चलिए रहल छनि। एहिठामसँ निकलि हमसभ पहुँचलहुँ कांकरिया ताल। ई अहमदाबादक दोसर सभसँ पैघ ताल मानल जाइत अछि। एकर चारूकात मनोरंजनक तरह-तरहक साधनसभ उपलव्ध अछि। एहिसँ सटले चिड़याखाना सेहो अछि। एकटा आटोरिक्सामे हमसभ चिड़िया घर घुमलहुँ । संगे-संग तालक चारूकात सेहो घुमा देलक। धिआ-पुतासभक हेतु तरह-तरहक खेलक सामग्रीसभ सेहो ओतए उपलव्ध अछि। एहिठामसँ हमसभ रुड़ाबाइक बाबरी पहुँचलहुँ । कहल जाइत अछि जे बाघेला वंशक राजाराणा वीर सिंह छोटसन हिंदू देश दंडई देश पर शासन करैत छलाह । ओ जनताक सुविधाक हेतु एकटा बाबरीक निर्माण शुरु केलथि। मुदा किछु दिनक बाद हुनकर पड़ोसी मुसलमान राजा मोहम्मद बेगदा हुनकापर आक्रमण कए देलक। ओ युद्धमे मारल गेलाह। हुनकर पत्नी रुडाबाइ बहुत सुंदर छलीह । मुसलमान राजा मोहम्मद बेगदा हुनकर सुंदरतासँ मोहित भए बिआहक प्रस्ताव देलक । रानी रुडाबाइ कहलखिन जे यदि मोहम्मद बेगदा बाबरीक काज पूरा करबा देथि तखन ओ हुनकासँ बिआह कए लेतीह। मोहम्मद बेगदा तुरंत हुनकर बात मानि लेलनि । मुदा जखन ओ बाबरी तैयार भए गेल तँ रुडाबाइ ओकर परिक्रमा केलनि आ ओहीमे कुदि कए प्राण दए देलथि। आब तँ ओ स्थान एकदम उजरल लगैत अछि। भितरमे बहुत गंध करैत रहैत अछि । तेँ हमसभ बाहरे-बाहर देखलहुँ ,थोड़ेकाल ओकर सीढ़ीपर बैसलहुँ आ बिदा भए गेलहुँ । अहमदाबादक स्थानीय भ्रमण करबाक क्रममे हमसभ साइंस सीटी सेहो गेलहुँ । ओहिठाम फराक-फराक मंडपमे वैज्ञानिक विषय वस्तुसभपर कार्यक्रम देखाएल जाइत अछि। द्वारिएपर टिकट भेटैत अछि। टिकट लेलाक बाद ओ कार्यक्रम देखल जा सकैत अछि। साइंस सीटीमे भितरमे घुमबाक हेतु वाहनक व्यवस्था अछि। ताहि हेतु फराकसँ टिकट लेबाक होइत अछि। अहमदाबाद प्रवासक दौरान हमसभ इसकानक मंदिर सेहो गेलहुँ । ओतए छोटसन परिसरमे बहुत किछु देखल जा सकैत अछि। जलखै,भोजनक उत्तम किंतु महग व्यवस्था अछि। भितरमे प्रसाद कीनल जा सकैत अछि । बाहरसँ दुन्नासँ बेसी दामपर मधुर ओतए बेचल जाइत अछि। बच्चाक लेल छोटसन खेलौना सेहो कीनलहुँ । भगवान कृष्णक वालरुपक छोटसन मूर्ति कीनलहुँ । ओतए विदेशी भक्तसभ निरंतर कीर्तन करैत छलाह । एकदम भारतीय परिधान पहिरने ,पैरमे खराउँ धेने ओ सभ बहुत नीक लगैत छलाह। हमसभ ओतहि भोजन केलहुँ । बहुत स्वादिष्ट मुदा महग भोजन छल । ओहिठामसँ हमसभ वापस अपन आवास आबि गेलहुँ । साँझमे हमरालोकनि सोमनाथ एक्सप्रेससँ अहमदाबादसँ सोमनाथ बिदा भेलहुँ । हमसभ वेरावल टीसनपर भोरे पहुँचि गेल रही। ओहिठाम उतरितहि हमरासभकेँ एकटा कुली भेटि गेल। ओ बहुत आत्मीय व्यवहार केलक । ओ लोको तेहने नीक छल। समान लए कए जखन ओ जा रहल छल तखन ओकर प्रसन्नताक अन्ते नहि छल। जे केओ बीचमे भेटैत गेलैक,सभकेँ कहैत गेल जे भगवान ओकर चाह-पानक जोगार कए देलनि। हमसभ ओकर प्रसन्नता आ संतोष देखि अभिभूत छलहुँ । ओ अद्भुत आदमी छल, निरंतर प्रसन्न। उचित किराया लेलक आ आरामसँ हमरासभकेँ आटो/टैक्सी स्टैंड धरि पहुँचा देलक । वेरावल टीसनसँ बाहर होइतहि एकटा आटो ठीक भए गेल। दू सए टाकामे हमरासभकेँ सोमनाथ मंदिर ट्रष्टक धर्मशाला पहुँचा देलक। बीचमे माछक दुर्गन्धसँ हुनका बहुत परेसानी भेलनि। वेरावलमे माछक बहुत रास कारखाना अछि। समुद्रसँ पकड़ल गेल माछसभकेँ बाहर पठेबाक हेतु ओतहि तैयार कएल जाइत अछि। नाक मुनैत-मुनैत आफद भए गेल छल। रस्तामे यत्र-तत्र तरह-तरहक नाओसभ देखाइत रहल,अधिकांश टुटल-फुटल छल। सात बजे भोरे हमसभ माहेश्वरी धर्मशाला पहुँचि गेल रही। स्वागत खिड़कीपर बैसल एकगोटे आगन्तुकसभक कागज-पत्तर देखैत छलाह। बहीमे नाम लिखैत छलाह। तकर बाद प्रतीक्षा करबाक हेतु कहि दैत छलाह । ई बुझा गेल जे दस बजेसँ पहिने कोठरी नहि भेटत। ताबे प्रतीक्षा करबाक हेतु आस-पासमे सोफासभ राखल छल। शौचालयक सुविधा सेहो छल। नीचाँ भोजनालयसँ चाह आनि कए हमसभ चाह पीलहुँ। थोड़े काल ओतहि बैसल रहलहुँ । लोकसभ निरंतर अबैत-जाइत रहैत छल। करीब एकघंटाक बाद हमरासभकेँ एकटा पुरजी भेटल। से लए कए मुख्यस्वागतकक्ष जेबाक छल। ओहिठाम आवश्यक खानापुरीक बाद हमसभ वापस माहेश्वरी धर्मशालाक स्वागत कक्ष पहुँचलहुँ । हमरासभकेँ कोठरी संख्या २०१ देल गेल। ओ स्वागत कक्षसँ सटले भूतलपर अवस्थित छल। हमसभ ओहि कोठरीमे पहुँचि नित्यकर्मसँ निवृत्त भए सोमनाथ महादेवक दर्शन हेतु बिदा भेलहुँ । माहेश्वरी धर्मशालासँ सोमनाथ मंदिर लगीचे अछि। पैरे जा सकैत छलहुँ । मुदा धर्मशालाक सामने आटो लागल छल। हमसभ ओहीसँ मंदिर दिस बिदा भेलहुँ । अहिल्याबाइ द्वारा निर्मित महादेवक मंदिर पहिने आएल। हमसभ ओहिठाम बहुत आरामसँ दर्शन केलहुँ । महादेवपर दूध चढ़ओलहुँ । ओहि परिसरक बीचमे अहिल्याबाइक मूर्ति स्थापित अछि। मुख्य सोमनाथ मंदिरकेँ ध्वस्त केलाक बहुत सालक बाद अहिल्याबाइ एहि मंदिरक निर्माण करओने छलीह। एहिठाम नीकसँ महादेवक दर्शन भए गेलाक बाद हमसभ सोमनाथक मुख्य मंदिर दिस बिदा भेलहुँ । सोमनाथ मंदिरमे दर्शनक ई विशेषता अछि जे ओ भोरे छओ बजे शुरु भए जाइत अछि आ रातिमे साढ़े नओबजे धरि अनवरत चलैत रहैत अछि। सामान्यतः मंदिरसभ दुपहरिआमे बंद भए जाइत अछि तँ साँझमे पाँच बजेक लगपासमे खुजैत अछि। मुदा से एहिठाम नहि होइत अछि। भोरे सात बजे,दुपहरिआमे बारह बजे आ साँझमे सात बजे सोमनाथ महादेवक आरती होइत अछि। रातिमे पौने आठ बजे प्रकाश एवम् ध्वनि कार्यक्रम सोमनाथ मंदिर परिसरमे होइत अछि। सोमनाथ मंदिरक परिसर बहुत पैघ अछि। बाहर सुरक्षाक बहुत उत्तम प्रबंध कएल गेल अछि। परिसरमे प्रवेश करितहि फोटोग्राफरसभ घुमैत रहैत छथि। हमहूँसभ अपन फोटो घिचओलहुँ । तकर बाद मंदिर दिस बढ़लहुँ । भितर जाइतहि जूता रखबाक उत्तम व्यवस्था कएल गेल अछि। जूता-चप्पल दिऔक,एकटा टोकन भेटत । ओकरा सम्हारि कए राखि लिअ। वापसीमे टोकन देलापर तुरंत ओ झोरा भेटि जाएत जाहिमे अहाँक जूता-चप्पल राखल गेल छल। ई सेवा पूर्णतः निःशुल्क अछि। मुदा अहाँ स्वेच्छासँ चाही तँ किछु दैओ सकैत छिअनि,से ओहिठाम कार्यरत कर्मचारी बेर-बेर बजितो रहैत अछि। ओहि दिन मंदिरमे बेसी भीड़ नहि छल। भितर जेबासँ पूर्व पुरुष आ महिलाक फराक-फराक पाँति लगैत अछि। हम तँ भितर गेलहुँ ,दर्शन केलहुँ आ तुरंते बाहर भए गेलहुँ । मुदा ओ कतहु देखेबे नहि करथि। थोड़े काल एमहर-ओमहर तकैत रहलहुँ । कतहु नहि देखाथि । मंदिरक देबालसँ सटले समुद्र अछि। थोड़े काल सएह देखैत रहलहुँ । तखनो ओ नहि भेटलथि। आब कनी चिंतो होमए लागल। की करी? किछु फुरेबे नहि करए। कनी जोरसँ अबाज देलिऐक- -केमहर छी ऐ! ओ हमर अबाज सुनलथि। असलमे ओ मंदिरेमे बैसि गेल रहथि। हमर अबाज सुनि बाहर अएलीह। हुनका देखि बहुत निचेन भेलहुँ । प्रसाद खिड़कीसँ पर्याप्त मात्रामे प्रसाद लेलहुँ आ हमसभ वापस आबि गेलहुँ । ताबे फोटोबला हमरसभक फोटो बना लेने छल। ओकरासँ फोटो लए हमसभ वापस अपन डेरा दिस बिदा भेलहुँ। एतेक आरामसँ आ एतेक नीकसँ महादेवक दर्शन भए सकत से कल्पनो नहि केने छलहुँ । मुदा से भेल। ताहि हेतु महादेवकेँ वारंवार धन्यवाद दैत रहलिअनि। मंदिर परिसरसँ सटले समुद्र आ ओहिमे उठैत पानिक तरंग दर्शनीय दृश्य उत्पन्न करैत छल। दूर-दूर धरि कतहु किछु नहि देखाइत छल। बस पानिए-पानि। एकदिस समुद्रक विशालताक स्वाभाविक दर्शन आ दोसर दिस हर हर महादेव! सँ निरंतर गुंजित भए रहल सोमनाथ महादेवक मंदिर। एहिसँ नीक स्वर्ग की भए सकैत अछि? सोमनाथ मंदिर ट्रष्ट द्वारा संचालित माहेश्वरी धर्मशालामे कोठरी भेटि गेलाक बाद हमसभ बहुत आश्वस्थ भेलहुँ । लगीचेमे बनल तहखानामे भोजनालय छल । ओहिठाम चाह,जलखै,आ भोजनक उत्तम प्रबंध छल। टाका दिऔ,चाह पीबु। तहिना जलखै आ भोजनोक व्यवस्था छल। सोमनाथ महादेवक दर्शन भए गेलाक बाद हमसभ जलखै केलहुँ। तकर बाद थोड़े काल आराम केलहुँ । बड़ीकालधरि सोमनाथक वारंबार भेल विध्वंश आ पुनर्निर्माणक गाथा मोनमे अबैत रहल । माहेश्वरी धर्मशालाक सामनेमे मंदिर ट्रष्ट द्वारा स्थापित कएल गेल म्युजिअम अछि। ओहिमे पुरना सोमनाथ मंदिरक भग्नावशेषसभ राखल अछि। किछु भग्नावशेष ओहि भवनक बाहर चहरदिबारीक संगे राखल अछि। एहि भग्नावशेषकेँ देखि कए केओ दुखी भए सकैत अछि। कतेक निर्ममतासँ अनेक बेर सोमनाथ मंदिरकेँ आक्रान्तासभ द्वारा तोड़ल गेल। तकर बाद फेर नव मंदिर बनाओल गेल। एहि शृंखलामे ई सातम सोमनाथ मंदिर थिक । १२ नबंबर १९४७क दिन भारतक तत्कालीन गृह मंत्री लौहपुरुष वल्लभभाइ पटेल अनेक गणमान्यलोकसभक संगे समुद्रजल हाथमे लए संकल्प केलनि जे सोमनाथ मंदिरक पुनर्निर्माण कराओल जाएत । ताहि हेतु सोमनाथ ट्रष्टक स्थापना कएल गेल। ८ मइ १९५०क महाराजा जामसाहेब श्री दिग्विजय संहजी नव मंदिरक शिलान्यास केलथि। भारतक तत्कालीन राष्ट्रपति स्वर्गीय राजेन्द्र प्रसाद ११ मइ १९५१क सोमनाथ महादेवक शिवलिंगक प्राणप्रतिष्ठा कएल गेल । जखन स्वर्गीय मोरारजी भाइ देसाइ भारतक भूतपूर्वप्रधानमंत्री एहि ट्र्ष्टक अध्यक्ष रहथि तखन सोमनाथ मंदिरक सभामंडप लग एकटा नृत्यमंदिरक निर्माण करेबाक निर्णय कएल गेल। आखिर नृत्यमंडप बनि गेल। एहिमे १५५ फीट ऊँच सप्तभौम शिखर अछि। ओहिपर ३१फी१ ऊँच ध्वजदंड अछि जाहिमे ५२ गजक कौशयध्वज फहराइत रहैत अछि। स्वर्गीय राजेन्द्र प्रसादजी शिवलिंगक प्राणप्रतिष्ठा करैत काल कहने रहथि- सोमनाथ मंदिर डंकाक चोटपर कहैत अछि - जकरा लेल लोककक हृदयमे प्रेम भरल अछि तकरा दुनिआक कोनो शक्ति नष्ट नहि कए सकैत अछि। ई मंदिर स्पष्ट संदेश दैत अछि जे संहार शक्तिसँ सर्जनात्मक शक्ति अधिक वलवान होइत अछि। कहल जाइत अछि जे १०२५ई.मे जखन महमुद गजनी सोमनाथ मंदिरपर आक्रमण केलक आ एकरा नीकसँ ध्वस्त कए देलक तखन भगवान सोमनाथ सौराठबासी भगीरथ दत्त शर्मा आ गंगादत्तशर्माकेँ सपना देलथि जे ओसभ सोमनाथक लिंगकेँ लए जाथि। तकर बाद दुनू भाइ सोमनाथ गेलाह आ सोमनाथ महादेवक लिंगकेँ उठा अनलनि । बहुत दिन धरि ओ सभ ओकरा नुका कए रखने रहलथि। बादमे ओकरा स्थापित कएल गेल आ ओहिठाम आइ-काल्हि भव्य मंदिर बनल अछि। दुपहरिआमे भोजनक बाद चारि बजेसँ स्थानीय प्रमुख स्थानसभ घुमबाक इच्छा भेल । संयोगसँ बाहर निकलितहि बाबूभाइ नामक आटोबला भेटि गेल। ओकरा संगे साढ़े सातसएपर लगपासक प्रमुख स्थानसभ घुमबाक बात तय भेल। ओकरा लगमे एकटा स्थानसभक सूची रहैक । से देखओलक आ ओसभटा स्थानसभ घुमाओत ,से कहलक। हमसभ ओकर बात मानि बिदा भेलहुँ । बाबूभाइ बहुत नीक व्यक्ति छल। ओकरा स्थानीय वस्तुसभक बहुत जनतब छलैक। हमरासभकेँ एहिसँ बहुत मदति भेल। ओ एकटा गाइड जकाँ काज केलक । कतहु पहुँचतहि हमरासभकेँ ओहिठामक इतिहास आ महत्वक बारेमे बतबैत। तकर बादे हमसभ आगू बढ़ितहुँ। भगवान कृष्ण आ महाभारतसँ जुड़ल बहुत रास घटनासभ सोमनाथ आ आसपासक स्थानमे देखबाक अवसर भेटैत अछि। भगवान कृष्णकेँ जतए व्याधाक तीर लगलनि,जाहिठाम हुनकर अंतिम संस्कार भेलनि,जतएसँ व्याधा हुनका तीर मारलक सभ ओहीठाम अछि। बलरामक गुफा सेहो दर्शनीय अछि। कहल जाइत अछि जे बलराम एतहि शरीर त्याग केलथि। सोमनाथ मंदिरसँ चारि किलोमिटर फटकी वेरावलमे भालका तीर्थ नामसँ प्रख्यात मंदिर अछि। जरा नामक व्याधा हुनका हरिण बुझि कए पैरमे तीर मारि देने छल। ओही तीरसँ हुनकर मृत्यु भए गेलनि। भगवान कृष्ण व्याधाक तीर लगलाक बाद थोड़ेक फटकी जा कए अपन देह त्याग केलनि। कहल जाइत अछि जे भगवान कृष्ण एतहि अंतिम साँस लेलथि।हिरण्या नदीक कातमे स्थित ओहि स्थानपर अर्जुन भगवान कृष्णक अंतिम संस्कार केने रहथि। भगवान कृष्णक चरणपादुका ओतए राखल अछि। ओ स्थान गोलोक धामक नामसँ जानल जाइत अछि। समुद्रक कछारपर भालका तीर्थसँ दू-तीन किलोमिटर फटकी वाणगंगा अछि। ओहिठाम महादेवक दूटा लिंग स्थापित अछि। समुद्रमे जखन कम पानि रहैत अछि तखन लोकसभ ओहि लिंग धरि जा सकैत अछि। अन्यथा फटकीएसँ महादेवकेँ गोर लागि लैत अछि। कहल जाइत अछि जे जरा नामक व्याधा एहीठामसँ भगवान कृष्णक पैरक अंगुठाकेँ मृग बुझि कए तीर चला देने छल। बादमे जखन ओ देखलक जे तीर भगवान कृष्णकेँ लागि गेलनि अछि तखन तँ ओ बहुत अफसोच केलक,भगवानसँ क्षमा मांगलक। भगवान कहलखिन- ई सभ हमर इच्छानुसारे भेल अछि। तेँ तूँ व्यर्थ परेसान नहि रहह। सोमनाथ मंदिरसँ चारि-पाँच किलोमीटर फटकी हिरन,कपिला आ सरस्वती नदीक संगम अछि। ई तीनू नदी ओहिठाम अरब सागरमे मिलि जाइत अछि। ओ स्थान बहुत पवित्र मानल जाइत अछि। हमसभ जखन ओहिठाम पहुँचलहुँ तखन एकटा बहुत पुरान सहकर्मी देखेलथि। हमरा होअए जे हुनका देखने छिअनि। ओहो सएह सोचैत रहथि। आखिर ओएह टोकलथि -मिश्रा सर ।- हुनकर पति सेहो संगे रहथिन। ओ सभ मूलतः केरलक बासी छथि। गृह मंत्रालयमे हमरासभक डेस्कमे काज केने रहथि। हम जखन ओहिठाम पदस्थापित भेल रही तखन हुनकर बदली भए गेल रहनि । मुदा बीच-बीचमे हुनका जरूरी काजसँ बजाओल जानि। हमसभ चारूगोटे संगे फोटो घिचओलहुँ । ओ सभ एकटा समूहमे घुमि रहल छलाह । कैकठामसँ घुमैत-फिरैत सोमनाथो आएल रहथि। हम दुनू बेकती हुनकासभसँ बिदा लए आगू बढ़लहुँ । तकर बाद राम मंदिर,गीता मंदिर,शारदा मठ,जगदगुरु शंकराचार्यक गद्दी,सूर्य मंदिर,हिंगलाज माताक गुफा,भिडभंजन महादेवक दर्शन सेहो बेरा-बेरी केलहुँ । रातिक शाढ़े सात बाजि रहल छलैक। हमसभ थाकि गेल रही । आजुक घुमनाइओ पूर्ण भए चुकल छल। हमसभ वापस अपन डेरा आबि गेलहुँ । आइ हमरसभक सोमनाथमे तेसर दिन छल। रातिमे ट्रेनसँ द्वारकाक हेतु प्रस्थान करबाक छल। हमसभ बाबूभाइ आटोबलासँ काल्हिए गप्प कए लेने रही । ओ हमरासभकेँ प्राची तीर्थस्थान लए जेबाक हेतु नओ बजे आबि गेल। ओहिसँ पहिने हमसभ अहिल्याबाइक स्थापित शिवलिंगक फेर दर्शन बहुत नीकसँ कए लेने रही। नित्य महादेवक दर्शनसँ हमसभ बहुत संतुष्ट रही । हमरासभ लग समय छल। तेँ सोचलहुँ जे प्राचीतीर्थ घुमि आबि। कहल जाइत अछि जे एक बेर प्राची सए बेर काशीक बरोबरि होइत अछि। सोमनाथसँ प्राची पचीस किलोमीटर अछि। आटोसँ जेबामे घंटा भरि समय लागल होएत। रस्तामे कोनो एहन विशेष वस्तु नहि देखाएल। हमसभ प्राची पहुँचि कए पिंडदान केलहुँ । पंडासभ बहुत नीक लोक बुझेलथि। जतबे देबनि से लए लेताह। कोनो झंझटि नहि करताह। सरस्वती नदीक तीरपर अवस्थित प्राची तीर्थमे लगपासक लोकसभ अपन पूर्वजक पिंडदान करैत छथि। कहल जाइत अछि जे भगवान कृष्ण सेहो अपन यदुवंशीसभक पिंडदान एतहि केने रहथि। एहिठाम पूजा केलाक बाद लगीचेमे पीपड़ गाछलग बनल द्वारकाधीशक प्रतिमाक दर्शन केलहुँ । तकर बाद ओहिठामसँ कनीक फटकी लक्ष्मीनारायण मंदिर गेलहुँ । वापसी यात्रामे थोड़ेकालक बाद नाथ संप्रदायक मंदिर आ धर्मशाला देखाएल। ओकर हालति बहुत दयनीय छल। मकानसभ ढहि रहल छल। ओहिठाम रहि रहल मठाधीश जरूर अपना लेल बहुत नीक पक्का घर बना लेने छलाह । ओहिठाम गेलाक बाद मोनमे कष्टे भए जाइत छैक जे एहन ऐतिहासिक स्थानक एहन दुर्गति किएक भेल अछि? हमसभ ओहिठामसँ बिदा भेलहुँ । फेर ओएह रस्ता ,ओएह खेत पथार। घंटा भरिक बाद भोजनक समयमे हमसभ सोमनाथ मंदिरक माहेश्वरी धर्मशाला पहुँचि गेलहुँ । रातिमे एगारह बजे वेरावल टीसनसँ हमरासभकेँ द्वारकाक हेतु प्रस्थान करबाक छल। साँझमे हमसभ अपन चीज-वस्तुसभकेँ सरिआ लेलहुँ । धर्मशालाक भोजनालयमे भोजन कए लेलहुँ । धर्मशालाक स्वागतीसँ एकटा टैक्सीबलाक फोन नंबर लेलहुँ । ओना बाबूभाइ आटोबला कहने रहए जे हमरा फोन कए देब। हम वेरावल लए चलब। मुदा आटोसँ हमसभ जाए नहि चाही। कारण आटोमे माछक दुर्गंध लगैत। ओ दर्गंध कैकबेर ततेक तीक्ष्ण होइत अछि जे रद्द भए सकैत अछि। ताहिसँ बचबाक हेतु टैक्सीसँ जेबाक निर्णय केलहुँ। टैक्सीबला चारिसएमे टीसन पहुँचा देत । धर्मशालाक कोठरीक कुंजी स्वागतीकेँ सुंझा कए हमसभ दस बजेक आसपास टैक्सीसँ वेरावल बिदा भेलहुँ। आधाघंटा बाद साढ़ेदस बजे हमसभ वेरावल टीसनपर पहुँचलहुँ। तुरंत एकटा कुलीसँ दू सएमे बात ठीक भए गेल। हम सभ आब टीसन जेबाक हेतु तैयार रही कि देखैत छी सामान ओएह कुली उठा रहल अछि जे हमरासभकेँ आबए काल भेटल रहए। असलमे हमरासभसँ जे बात केलक से मात्र दलाल छल। ओ बादमे कुलीकेँ बजा अनलक। ओएह कुली हमरासभकेँ चिन्हलक। मुदा एहिबेर पैसा केओ आर ठीक केने रहए। हमसभ ट्रेनमे पहुँचि कुलीकेँ दूसए टाका देलिऐक । ओ बहुत नीकसँ हमरासभकेँ अभिवादन केलक, टाका लेलक आ चलि गेल । हमसभ अपन स्थानपर बैसि गेल रही। थोड़बे कालमे ट्रेन खुजि गेल। भोरे सात बजे हमसभ द्वारका टीसन पहुँचि गेल रही। टीसनपर ट्रेनसँ उतरैत काल एकटा बच्चा बड़ी जोर-जोरसँ चिकरि रहल छल-छुटि गेलथि,छुटि गेलथि।- सभक ध्यान ओकरा दिस गेलैक। असलमे ओकर पिताजी ट्रेनेमे रहि गेल रहथि। ताबे ट्रेन खुजि गेलैक। मुदा लोकसभ ट्रेनक गार्डकेँ इसारा केलक। ट्रेन प्लेटफार्मेपर रहए। गार्डक आदेशपर ट्रेन रोकि देल गेल। ओकर पिताजी सामानसभक संगे उतरि सकलाह। हमहूँसभ निश्चिन्त भए आगू बढ़लहुँ । द्वारका टीसनसँ बाहर भेलाक बाद आटो /टैक्सी बलासभकेँ ताकि रहल छलहुँ । सभटा आटो धराधर भरि गेल। थोड़े कालक बाद एकटा आटो बला आएल। हम ओकरा इसकान मंदिर चलबाक हेतु कहलिऐक। ओ तीनसए रुपया मंगलक। हम तुरंत हँ कहि देलिऐक । हमरा ओहिठामक आटोक किरायाक सही अनुमान नहि रहए। बादमे पता लागल जे टीसनसँ इसकान मंदिर किराया पचास टाका मात्र हेबाक चाही,बहुत तँ एकसए। हमसभ इसकान मंदिर पहुँचि गेल रही। ओहीठाम हमरसभक रहबाक आरक्षण रहए। बहुत कम जगहमे ओ मंदिर परिसर अछि। मुदा ओहिठामसँ द्वारकाधीशक मंदिर मोसकिलसँ पाँच मिनटक रस्ता होएत। आर-आर प्रमुख स्थानसभ सेहो लगीचे अछि। बजार सेहो लगीचेमे अछि। ताहि हिसाबे ओ स्थान उत्तम अछि। हमसभ इसकानक स्वागत कक्ष लग गेलहुँ । अपन परिचय देलिऐक आ कोठरीक आरक्षणक विवरण देलिऐक। तुरंत हमरा प्रथम तलपर कोठरी भेटि गेल। अपेक्षाकृत छोटसन कोठरीमे एसी लागल छल,आर सुविधासभ सेहो छल। मुदा ओ कोठरी आ मंदिरक देबाल एक्के छल। चारिबजे भोरे मंदिरमे आरती होइत छल,घड़ी-घंटा बजैत छल। ताहि कारण हमरोसभक निन्न वाधित भए जाइत छल। तथापि हमसभ अनठा कए पड़ल रही। ओतेक जल्दी उठिए कए की करितहुँ?थोड़बे कालक बाद केओ केबार खटखटा रहल छल। आखिर केबार खोललहुँ। हमरा देखिते ओ बाजल- -अहाँ उड़िआ नहि छी? -नहि, नहि। -गलती भए गेल। एहिना दोसरो राति भेल। असलमे बहुत रास उड़िआ तीर्थयात्रीसभ समूहमे आएल रहथि। ओ सभ भोरे उठि-सुठि एक संगे कतहु बिदा होइत रहथि। हमरो ओ सभ उड़िआ बुझबाक गलती करथि। बगलमे एकटा बड़ीटा धर्मशालामे लोकक हुजुम छल। महिलासभक हाथमे छोटसन झोरा आ पुरुखसभकेँ पट्टी बान्हल छल। दुपहरिआमे ओ सभ भोजन कए रहल छल। हम पुछलिऐक- -भंडारा भए रहल छैक की? -नहि, नहि। ई तँ समूहमे घुमि रहल तीर्थयात्रीसभक हेतु अछि। -तकर की पहिचान छैक? -देखैत नहि छिऐक? महिलासभक हाथमे झोरा आ पुरुषसभकेँ पट्टी बान्हल छैक। इएह ओकरसभक पासपोर्ट बुझू । हमरा बड़ी जोरसँ हँसा गेल। बातो सही रहैक । सएसँ बेसीए पुरुष-महिला ओहिठाम एहि पहिचानक संगे भोजन कए रहल छलाह। जाबे हमसभ इसकान मंदिर परिसरमे रहलहुँ ताबे ई दृश्य देखबाक मौका भेटल। ओकरासभक रहबाक आ भोजनादिक व्यवस्था पहिनेसँ इसकानक माध्यमसँ कएल गेल रहैक। एहि तरहेँ बहुत कम खर्चमे सएसँ बेसीए तीर्थयात्रीसभ घुमि रहल छल। हमसभ नित्यकर्मसँ निवृत्त भए द्वारकाधीश मंदिर बिदा भेलहुँ । जकरे पुछिऐक सभ इएह कहए जे मंदिर सटले अछि। एनाक जाउ,ओतए घुमि जाउ,तकर बाद कनीक बामा फेर दहिना दिस मुड़ि जाएब ,बस मंदिरे लग पहुँचि जाएब। मुदा हमरा ई जिलेबी बला रस्ताक अनुमान नहि लागए। कनीकाल चललाक बाद एकटा आटो भेटि गेल। ओ मंदिरक सामने धरि पहुँचा देलक। मंदिर रहैक लगीचेमे । मुदा रस्ता टेढ़-मेढ़ । तेँ अनभुआरक हेतु मोसकिल छल। मंदिर पहुँचलाक बाद हमसभ अपन जूता-चप्पल जमा केलहुँ । दर्शन नीकसँ आ जल्दी भए जाए ताहि हेतु प्रयासरत रही कि एकटा बूढ़ पंडितजी भेटलाह । हम पुछलिअनि- -अपने कतेक लेबैक? -ओना पाँच सए होइत छैक। मुदा अहाँ जे दए दी। -ठीक छैक। हमसभ हुनका पाछू-पाछू बिदा भेलहुँ । कनी काल आगू गेलाक बाद पुरुष आ महिलाक पाँति फराक-फराक भए जाइत अछि। पंडितजी हमरा एकठाम ठाढ़ कए देलाह आ हमर श्रीमतीजीकेँ लेने गेलखिन। ओ अपन जोगारसँ थोड़बे कालमे हुनका बहुत नीकसँ दर्शन करा देलखिन। तकर बाद ओ एकठाम बैसि गेलीह। हम पंडितजीक संगे बिदा भेलहुँ । ओ पुलिसकेँ इसारा देलथि। बस काज भए गेल। हमरा केओ नहि टोकलक आ तुरंत गर्भगृहक आगूमे पहुँचि गेलहुँ । बहुत नीकसँ दर्शन केलहुँ । कोनो असुविधा नहि भेल। थोड़ेकालक बाद हम बाहर भेलहुँ। पंडितजी हमर प्रतीक्षा कए रहल छलाह। तकर बाद हम दुनू बेकती एकठाम बैसलहुँ आ पंडितजी ओहि मंदिरसँ जुड़ल बहुत रास खिस्सासभ सुनबैत रहलाह। चारूकात बनल छोट-छोट अनेक मंदिरसभमे घुमओलाह। हुनकर व्यवहारसँ हमसभ बहुत प्रसन्न रही। हुनकर संगे रहलासँ हमसभ द्वारकाधीशक दर्शन तँ केबे केलहुँ,ओहिठामसँ जुड़ल बहुत रास जानकारी सेहो भेटल। मंदिरक ऊपर ध्वाजा दिनमे सात बेर बदलल जाइत अछि,तकरा हेतु लोकसभ मनता केने रहैत अछि,ओसभ ताहि हेतु लाखो टाका खर्चा करैत अछि। असलमे हमसभ जखन ओहि परिसरेमे रही तखने मंदिरक धाजा बदलल जा रहल छल। नीचाँ बहुत रास लोकसभ एक्के रंगक वस्त्र पहिरने ठाढ़ छलाह । ढोल-पिपही बाजि रहल छल। भितरसँ पुजारीजी चिकरैत अएलाह- -अहाँसभ भितर चलू। समय भए गेल अछि। सभकेँ हकारि कए ओ मंदिरमे लए गेलाह। कहाँ गेल पाँति आ लोकक भीड़?पंडितजीक अनुसार द्वारकाधीशक मंदिर कृष्णक वंशज बनबओने रहथि। एहि बातक सत्यताक बारेमे तँ किछु नहि कहल जा सकैत अछि मुदा ई तय अछि जे ई मंदिर बहुत पुरान अछि। चारूधाममेसँ एकटा द्वारकाधीश सेहो मानल जाइत अछि। अनन्त कालसँ लोकक श्रद्धाक केन्द्र रहल ई मंदिर निश्चित रूपसँ दर्शनीय अछि। मुदा एहिठाम बहुत भीड़ रहैत अछि। विशेष दर्शनक किछु व्यवस्था अछि जरूर । मुदा ओ कतेक प्रभावी अछि से नहि कहल जा सकैत अछि। मुदा हमरा पंडितजीक सहयोगसँ बहुत नीकसँ दर्शनो भेल आ मंदिरसँ जुड़ल बहुत रास जनतब सेहो भेटल। हमसभ बिदा होइत काल हुनका पाँचसएक स्थानपर एक हजार टाका देलिअनि। कहलिअनि-ब्राह्मण भोजनोक हेतु दए रहल छी।- ओ बहुत प्रसन्न भेलथि। फेर कहैत छथि- -एहिमेसँ दू सए टाका प्रहरीक हिस्सा देबए पड़त। हमरासभकेँ तँ नित्य ओकरासभसँ काज लेबाक रहैत अछि। हम हुनका दूसए टाका आर देलिअनि। हुनकर प्रसन्नताक अंते नहि छल। ओ हमरासभकेँ बाहर धरि अरिआति देलाह। बीचमे हमसभ फोटो सेहो खिचओलहुँ। थोड़बे कालमे फोटो बनि कए आबि गेल। तकर बाद हमसभ अपन डेरा वापस आबि गेलहुँ । डेरा वापस अएलाक बाद पता लागल जे हमरसभ जे फोटो घिचओने छलहुँ से कतहु खसि पड़ल। आब की करितहुँ? अछता-पछता कए रहि गेलहुँ । दुपहर बाद हमसभ एकटा टैक्सी केलहुँ जे हमरासभकेँ बेटद्वारका आ बीच-बीचमे पड़ैत महत्वपूर्ण स्थानसभ लए जाएत । द्वारकासभ बेटद्वारका पचीस किलोमीटर फटकी अछि। बीचमे हमसभ नागेन्द्र महादेव(जे द्वादश ज्योतिर्लिंगमे मानल जाइत छथि) दर्शन केलहुँ। हमसभ मंदिरक गर्भगृहमे जा कए पूजा-पाठ कए सकलहुँ। ताहि हेतु धोती पहिरब अनिवार्य अछि। ओतहि बगलमे बहुत रास धोती राखल रहैत अछि। हमहूँ ओतहि धोती पहिरलहुँ । तकर बाद ओहिठाम उपस्थित पंडितजीक सहयोगसँ पूजा केलहुँ । मंदिरमे भितरेमे प्रसाद बिकाइत रहैत अछि। सेहो कीनलहुँ । थोड़े कालक बाद हमसभ गोपी तलाव पहुँचलहुँ। द्वारकासँ बीस किलोमीटर दूर बेटद्वारकासँ पहिने गोपी तलाव अबैत अछि। कहल जाइत अछि जे भगवानक कृष्णक वृंदावनसँ द्वारका आबि गेलाक बाद गोपीसभ एकबेर एतहि भगवानक दर्शन केलथि आ एतुके माटिमे समाहित भए गेलथि। तेँ एहिठामक माटि बहुत पवित्र मानल जाइत अछि आ गोपी चंदनक नामसँ जानल जाइत अछि। गोपी तलावसँ जल्दीए निकलि कए हमसभ बेट द्वारका दिस आगू बढ़लहुँ । बेटद्वारका समुद्रमे एकटा छोटसन टापू अछि। कहल जाइत अछि जे द्वारकाधीशक राजधानी एतहि छल जे बादमे समुद्रमे मिलि गेल। बेटद्वारका जेबाक हेतु लगभग बीस मिनट अरब सागरमे जहाजपर जेबाक होइत छैक। हमसभ वापसी टिकट सेहो लए लेने रही। जहाजपर बैसले छलहुँ कि ओ खुजि गेल। समुद्रक मनोरम दृश्य देखैत,ओकर मोबाइलसँ फोटो घिचैत हमसभ थोड़बे कालमे बेटद्वारका पहुँचि गेलहुँ। पुल पार होइतहि एकटा आटोबलासँ भेंट भेल। ओ हमरासभकेँ बेट द्वारकाक प्रमुख स्थानसभ घुमा देत। से तय भेलाक बाद सभसँ पहिने हमसभ बेटद्वारका मंदिर गेलहुँ । ओहिठाम एकटा पंडितजीक सहयोग लेलहुँ जाहिसँ बहुत आसानीसँ दर्शन भए गेल। संगे मंदिरसँ जुड़ल बहुत रास जानकारी ओ हमरा देलाह। सुदामा मंदिरमे दर्शन केलाक बाद खुद्दी प्रसादक रुपमे भेटैत छैक। कृष्ण-सुदामाक भेंट कहाँदनि ओतहि भेल रहनि। द्वारकाधीशक मंदिरसँ निकलि हमसभ आटोसँ ओहि टापूपर बहुत दूर धरि गेलहुँ । तखन किछु मंदिरसभ भेटल। हनुमानजीक पुत्र मकरध्वजक नामपर ओतए मंदिर अछि,ताहिमे दर्शन केलहुँ। एकटा आर मंदिरमे गेलहुँ । तकर बाद साँझ पड़ल जा रहल छल। हमसभ जल्दीए वापस भए गेलहुँ । बेटद्वारकामे जहाज लागले छल। जल्दीए जहाजपर चढ़ि गेलहुँ जाहिसँ बहुत समय बाँचि गेल। बीस मिनटक बाद हमसभ जहाजसँ ओहिपार पहुँचि गेल रही । फेर टैक्सीसँ वापस द्वारका बिदा भेलहुँ । बीचमे रुक्मिणी मंदिरमे सेहो दस मिनट ठहरलहुँ । ओतए आरती भए रहल छल। कनीके आर देरी होइत तखन ओहिठाम दर्शन नहि भए पबैत। मंदिर बहुत भव्य अछि। ओहिठामसँ सोझे अपन डेरापर पहुँचि गेलहुँ । हमसभ लगभग दू बजे द्वारकासँ टैक्सीसँ बेटद्वारका बिदा भेल रही। साढ़े छओ घंटाक बाद ई यात्रा पूर्ण कए हमसभ वापस अपन डेरा आएल रही। भरिदिनक दौरा-दौरीमे हमसभ नीकसँ थाकि गेल रही। तेँ शीघ्र भोजन कए विश्राममे चलि गेलहुँ। आइ हमरसभक द्वारकामे दोसर दिन छल। काल्हि हमसभ बेटद्वारका आ अन्य प्रमुख स्थानसभ देखि आएल रही। प्रातभेने हमसभ जल्दीसँ तैयार भए आटोसँ स्थानीय प्रमुख स्थानसभ देखबाक हेतु बिदा भेलहुँ । लगपासमे प्रमुख स्थानसभ देखबाक हेतु एकटा आटो ठीक केलहुँ । घुमैत-घुमैत हमसभ नर्मदा घाट पहुँचलहुँ। एतहि नर्मदा नदी आरब सागरमे मिलैत छथि। नर्मदा नदीक छप्पनटा घाट टपलाक बाद द्वारकाधीश मंदिर पड़ैत अछि । एतए स्नान केलाक बाद तीर्थयात्री द्वारकाधीश मंदिरमे दर्शन करैत छथि । एहि नदीमे नहाएब बहुत पुण्यक बात मानल जाइत अछि । बिरला परिवार द्वारा निर्मित गीता मंदिर हालति बहुत खराप बुझाएल। एतबा धरि जे ओकर बीचमे एकटा कुकुर सुतल रहए। केओ देखनाहर नहि। ओहिठाम यात्री रहबाक हेतु धर्मशाला सेहो बनल अछि। धर्मशालामे तँ लोकसभ बुझाएल। मुदा गीतामंदिरक एहन हालति किएक अछि से नहि कहि सकैत छी? आटो चालक कहैत रहए जे किछुसाल पूर्वधरि एहिठामक स्थिति बहुत नीक छल। हमसभ एहिठामसँ निकलि ब्रह्मकुमारीक मंदिर गेलहुँ । बहुत नीक व्यवस्था बुझाएल । रहबाक हेतु धर्मशाला सेहो छल। एहिठामसँ निकलि हमसभ आटोमे बैसए जा रहल छलहुँ । हमर श्रीमतीजी आगू छलीह। ओ आगू बढ़लीह कि माथ आटोक लोहाक छरसँ टकरा गेलनि। अनचोकेमे बहुत जोर चोट लागि गेलनि। हम पाछूए रही। मुदा किछु नहि कए सकलहुँ। सोचिए नहि सकलिऐक जे एहनो भए जेतैक। थोड़े काल धरि एहीबातपर अफसोच करैत रहलहुँ । क्रमशः हुनकर चोटक दर्द कम होइत गेलनि। तकर बाद हमसभ पहुँचलहुँ बड़केश्वर महादेव। समुद्रक कातमे स्थापित विशालकाय शिवलिंगक दर्शन केलहुँ । समुद्रमे पानि बढ़ि गेलाक बाद ई शिवलिंग डुबि जाइत अछि। कहल जाइत अछि जे समुद्रेक पानिसँ हुनकर जलाभिषेक होइत छनि। तकर बाद हमसभ गायत्री मंदिर पहुँचलहुँ। समुद्रक कातमे स्थापित ई मंदिर बहुत स्वच्छ बुझाएल। लगीचेमे गायत्री ट्रष्ट द्वारा संचालित धर्मशाला सेहो अछि। हमसभ भद्रकालीमाता मंदिर,स्वामी नारायण मंदिर आ सिद्धेश्वर महादेव मंदिर सेहो गेलहुँ आ बहुत नीकसँ दर्शन कए सकलहुँ। एहि तरहेँ लगपासक प्रमुख मंदिरसभमे दर्शन केलाक बाद हमसभ अपन बासापर इसकान मंदिर परिसरमे पहुँचि गेलहुँ । भोजनक बाद थोड़े काल विश्राम केलहुँ । हमरासभ लग किछु समय बाँचल छल। विचार भेल जे एकबेर फेर द्वारकाधीशक दर्शन कएल जाए। हमसभ पंडितजीकेँ फोन केलिअनि। ओ साढ़ेपाँच बजे अएबाक हेतु कहलाह। हमसभ किछु एहिने ओतए पहुँचि गेल रही। मोन भेल जे किएक ने फोटोक खोज कएल जाए। कनीके फटकी एकटा दोकानमे हमसभ अपन सामानसभ सरिऔने रही। ओहिठाम पहुँचि जहाँ फोटोक चर्चा केलहुँ कि ओ धर दए फोटो आगूमे राखि देलक। कहलक-हम काल्हिएसँ अहाँक बाट ताकि रहल छलहुँ। फोटो एतहि नीचाँमे खसि गेल रहए।- कहि नहि सकैत छी जे हमसभ फोटो पाबि कतेक प्रसन्न भेल रही। लागल रहए जेना बहुत मूल्यवान वस्तु वापस भेटि गेल होअए। पंडितजी आबि गेल रहथि। फेर हुनके जोगारसँ हमसभ जल्दीए दर्शन कए लेलहुँ । हुनका पाँचसए टाका देलिअनि। ओ सहर्ष टाका राखि लेलाह । हमरासभकेँ बहुत आशीर्वाद देलाह। हमसभ दर्शनक बाद वापस अपन डेरापर आबि गेलहुँ । मोनमे बहुत संतुष्टिक भाव छल। सभसँ नीक बात ई भेल जे हमसभ बहुत नीकसँ द्वारकाधीश भगवानक दर्शन दू-दू बेर कए सकलहुँ । एहि हेतु भगवान द्वारकाधीशकेँ असीम कृपा कहबाक चाही। अगिला दिन एगारह बजे हमरासभकेँ वापसी ट्रेन अहमदाबादक हेतु पकड़बाक छल। तदनुसार हमसभ अपन सामानसभ व्यवस्थित कए लेलहुँ । प्रातभेने लगभग दसबजे हमसभ इस्कान मंदिर अतिथिगृहकेँ छोड़ि आटोसँ द्वारका टीसन बिदा भए गेलहुँ । ओहिठामसँ टीसन लगीचे अछि । तेँ थोड़बे कालमे हमसभ टीसन पहुँचि गेलहुँ । सही समयपर ट्रेन आबि गेल आ हमसभ मोने-मोन भगवान द्वारकाधीशकेँ गोहरबैत अहमदाबादक वापसी यात्रापर बिदा भेलहुँ । दिनक यात्रा छलैक। तेँ ट्रेनक बाहरक दृश्य देखैत रहलहुँ,ट्रेन आगू बढ़ैत रहल। आखिर साढ़े आठ बजे रातिमे हमसभ अहमदाबाद वापस आबि गेलहुँ । हमसभ एकबेर फेर सरकारी अतिथिगृह पहुँचि गेलहुँ । ओहिठाम एकदिन पूर्ण विश्रामक बाद दोसरदिन भोरे पाँचबजे हबाइ अड्डा बिदा भेलहुँ । दस बजैत-बजैत तँ हमसभ दिल्ली हबाइ हड्डापर जहाजसँ उतरैत रही। एवम् प्रकारेँ अहमदाबाद,सोमनाथ आ द्वारकाधीशक दस दिनक हमरासभक यात्रा नीकसँ संपन्न भेल। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.परमानन्द लाल कर्ण- कातिक मासक माहात्म्य अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.निर्मला कर्ण- अग्निशिखा खेप ३२ निर्मला कर्ण (१९६०- ), शिक्षा - एम. ए., नैहर- खराजपुर, दरभङ्गा, सासुर- गोढ़ियारी (बलहा), वर्त्तमान निवास- राँची, झारखण्ड। झारखंड सरकार महिला एवं बाल विकास सामाजिक सुरक्षा विभागमे बाल विकास परियोजना पदाधिकारी पदसँ सेवानिवृत्ति उपरान्त स्वतंत्र लेखन। (अग्नि शिखा मूल हिन्दी- स्वर्गीय जितेन्द्र कुमार कर्ण, मैथिली अनुवाद- निर्मला कर्ण) अग्निशिखा खेप -३२
पूर्वकथा
इन्द्र विश्ववासु के उर्वशी के खोज में भेजै छथि, उर्वशी के आपस अनवाक निर्देश के संग,एहि कारण सब अप्सरा उर्वशी अरू राजा पुरूरवा के विवाह के भविष्य के प्रति अत्यंत चिंतित भय जाइत छथि।
आब आगाँ
पताल लोक में राक्षस राज केशि के मृत्यु उपरान्त ओकर पुत्र वक्रासुर प्रशासन चला रहल छल। राक्षस गुरु शुक्राचार्य के संरक्षण में ओ राज्य के कुशलता सs संचालन कs रहल छल,मुदा हृदय में पिता के शत्रु सs प्रतिशोध लेबाक भाव दृढ़ छल। दिन प्रतिदिन प्रतिशोध के अग्नि के वक्रासुर अपन हृदय में तीव्र सौं तीव्रतर केने जा रहल छल। राक्षस गुरु शुक्राचार्य ओकर आन्तरिक भावना के बुझि गेल छलथि। ओ वक्रासुर केँ उचित समय के प्रतीक्षा करबा के निर्देश देलथि। एहि समय के उपयोगअपन विशाल सेना के युद्ध के तैयारी लेल प्रशिक्षण देबा में करय के निर्देश ओ देलथि वक्रासुर केँ। ओ गुरुक सलाह स्वीकार कएने छल,एवं गुरु शुक्राचार्यक निर्देशन मे असुर सेना युद्धक प्रशिक्षण ल's रहल छल । मुदा राक्षस राज केशि के एकटा अविवाहिता पुत्री छलनि - चित्र सेना।अपन पिता के मृत्यु के बाद ओ एकदम असगर आ अनाथ भs गेलीह। ओ अपन शैशव काल सौं मातृ-प्रेम सँs वंचित भs गेल छलीह,आब हुनका सँs पिता के स्नेह-तरु तक छिना गेलनि। भैया वक्रासुर दिन-राति प्रशासन के व्यवस्था में व्यस्त रहैत छल। ओकरा बहिन पर ध्यान देवाक कनेको समय नहि छल। आब संगी-साथी के छोड़ि,हुनकर पीड़ा-दुख सुनय लेल ओतय कियो नहि छल। ओ सत्ताइस वर्ष के उम्र पार कs गेल छलीह, मुदा एखनो कौमार्य व्रत लय एसगर अविवाहित हेबाक दुख भोगि रहल छलीह।केशि हुनकर विवाहक प्रस्ताव कतेको राजा केँ पठा देने छलनि, किछु गोटे प्रस्ताव स्वीकार कs लेने छलखिन,मुदा चित्रसेना ओहि प्रस्ताव के अस्वीकृत कs देने छलीह,कारण जे ओ अपन हृदय राजा पुरूरवा केँ पहिने दs देने छलथि।ओ प्रण लेने छलीह जे - 'विवाह करब तँ राजा पुरूरवा संग अन्यथा जीवन भरि राजा पुरूरवाक नाम पर कुमारि रहब'। केशि एहि वचन के कारण बहुत दुखी भs गेल छल। हारि थाकि ओ चित्रसेनाक विवाह के लेल प्रयास छोड़ि देने छल। प्रारम्भ में पुरूरवा के दिग्विजय केला के उपरान्त राजा पुरूरवा संग पुत्री के विवाह कराबय के अथक प्रयास केने छल,मुदा राजा पुरूरवा के अस्वीकृति के कारण ओ निराश भs गेल छल।अन्य कुनो राजा सौं विवाह के प्रति अपन पुत्री के उदासीनता देखि राक्षस राज केशि अपन पुत्रीक विवाह करबाक प्रयास छोड़ि देल । कालांतर में ओ अपन पुत्रीक विवाह बिनु केनहि परलोक गमन कएल। आब चित्रसेना दिन-राति विरह वेदना में संतप्त भs रहल छलीह। आब ओ कोनो तरहेँ एक बेर पुरूरवा सँs भेंट करबाक अवसर ताकि रहल छलीह। हुनक प्रयास छलनि कोनहुना एक बेर राजा पुरूरवा सँs भेंट करवाक अवसर भेटनि ।
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-उर्वशी.....उर..व...शी.....उ...र....व...शी... उ...र....व...शी......उ...र....व...शीsss ss sheessssss ""पुरूरवा.....पु..रू..र..वा..... पु...रु...र....वा.... पु रूsरsवाs पुss रूss रss..वाssssssssss दूर तक पसरल तीन विशाल पर्वत के मध्य तीन योजन विस्तृत उपत्यका के मध्य एहि ध्वनि के गूँज कतेको बेर गूँजि रहल छल। विशाल पर्वत के घाटी में एहि छोर सs ओहि दूसर छोर तक लगातार यैह आवाज जाइत छल,पुनः पर्वत सौं टकरा कs ओ आपस आइब जाइत छल। अपन साँस रोकने उर्वशी आ राजा पुरूरवा अपन-अपन उच्चरित स्वरक प्रतिध्वनि सुनवा में मगन छलथि हुनक ओ स्वर जे पहाड़ सौं टकरा कs गुंजित भय पुनः आपस आबि हुनक कर्ण-रन्ध्र सौं टकरा जाइत छलनि। पुरूरवा बजलथि - "सूनि रहल छी प्रिये! हम कहने छलहुँ अहाँ के! एतय व्याप्त गहन निस्तब्धता केँ हम सभ विच्छिन्न कs सकैत छी। पहिने जतेक शान्ति छल ताहि सँs बेसी अपन सभक ध्वनिक प्रतिध्वनि केँ सुनू। एक बेर उच्चरित कएल गेल ध्वनि के बेर-बेर गुंजित प्रतिध्वनि सुनू।" -हँ ! वास्तविकता अछि ! अहाँक एहि बात में!ई स्थान सत्ते बहुत मनोरंजक अछि प्रिय- उर्वशी बजलथि । पहाड़क शांत परिवेश मे जतय पूर्ण मौन छल, पुरूरवा कहने छलाह - . "एतह तीव्र स्वर में कोनो एक शब्द जँs बाजल जाय तखनि ओ एतय बेर-बेर प्रतिध्वनिक रूप मे सुनबा मे अबैत अछि।" कौतूहल वश उर्वशी तीव्र स्वर में "पुरूरवा" कहलथि,तखनहि पुरूरवा जोर सँs "उर्वशी" कहि कs आवाज लगाओल । ओकर बाद जे भेल ताहि घटना पर उर्वशी आश्चर्यचकित रहि गेलथि। तेकर बाद सँs ओहि घाटी मे दुनू आवाज बेर-बेर गूँजि रहल छल। आब उर्वशी एवं राजा पुरूरवा दुनू प्राणी बेर-बेर आवाज देबय लगलथि,एवं बेर-बेर वैह आवाज जे घाटी में गूँजि रहल छल,ओकरा सुनि-सुनि उल्लासित भs रहल छलथि । प्रतिध्वनि धीरे-धीरे क्षीण होमय लागल,परंतु उ..र..व..शी आ पु..रू..र..वा..... बनि कs। एहि टूटल-फुटल, बिगड़ल शब्द पर दुनू गोटे उच्च स्वर में ठहक्का मारि कs हंसs लगलथि । हुनकर हंसी ओहि शान्त सौम्य वतावरण में शहद सन घुलि -मिलि कs घाटी में दूर-दूर धरि पसरि गेल । ई आवाज आ ओकर प्रतिध्वनि सुनि एकटा सुन्दर रमणी आश्चर्यचकित भs गेलीह,आ ओ अपन संगी सभ दिस प्रश्नवाचक दृष्टि सँs ताकs लगलीह। ओहि में सँs एक गोटे बजलीह | "की देखैत छी चित्रसेना!लगैत अछि एतय हमरा सभक अतिरिक्त दू टा आओर केओ प्राणी अछि।" "हम सभ किएक नहि ओकरा सभ केँ नुका कs देखल जाय"- दोसर सखी प्रस्ताव देलक,जकर प्रत्युत्तर में चित्रसेना कहलथि - "हँ, देखबाक चाही जे एहि घाटी मे हमरा सभक अतिरिक्त के अछि ।" फेर धीरे-धीरे डेग बढ़बैत ओ सभ घाटी में आगू बढ़य लगलीह । बहुत दूर धरि चललथि ओ सभ , मुदा हुनका लोकनिक दृष्टि में कियो नहि आयल। थाकि-हारि ओ सभ एकटा सुन्दर पुष्करिणीक कात मे बैसि गेलथि ।चित्रसेना आ हुनकर सभ सखी चुपचाप बैसल प्रकृतिक सुषमा के आनंद लs रहल छलथि । चित्रसेनाक मुख पर गहन उदासीनता भरल छलनि। हुनका ई सुन्दर परिवेश कनिको प्रभावित नहि कs रहल छल। हुनकर हृदय में बेर-बेर उठैत पीड़ाक लहरि हुनकर चेहरा सँs स्पष्ट दृष्टिगोचर होइत छल। ओ अत्यंत गंभीर मुख मुद्रा में बैसल छलीह। ठीक एहि क्षण अत्यंत निकट सौं फेर हँसीक मधुर आवाज हुनका सभ के सुनबा मे आबि गेल। एकटा सखी बजलथि - "देखू, एहि पुष्करिणीक आगू जे झाड़ी अछि ओकर पाछू कियो अछि। ई आवाज ओतहि सँs आबि रहल अछि।" चित्रसेना - "चलू झाड़ी के पार जा कs देखू जे के अछि।" चित्रसेना आगू बढ़s लगलीह आ हुनकर सभ संगी सेहो हुनका संग चलय लगलथि। झाड़ीक ओट धय एहि कात सँs देखलनि जे झाड़ीक दोसर कात रंग-बिरंगक पुष्प के सुन्दर बाग अछि,जाहि में एकटा सुन्दर युवक आ ओतबहि सुन्दर युवती बैसल छल। हुनका सँs किछुए दूर दू टा सुंदर मनमोहक मेमना छल । एकटा सखी बजलीह - "हे देखू ने ,ई आदमी बड्ड सुन्दर अछि।एकर सुंदरता अद्वितीय अप्रतिम अछि,एहेन सुंदर पुरुष हम आई धरि नहि देखने छलहुँ।" "अरे, ई तs राजा पुरूरवा छथि!सम्राट पुरूरवा! जिनका हम पहिल बेर वसंतोत्सव में देखने छलहुँ!" चित्रसेना आश्चर्यचकित होइत बजलथि,स्वर मद्धिम छल जेना ओ अपनहि के सुनबई लेल बाजल होथि। मुदा निकटस्थ हुनक सखी सभ ई बात सुनि गेल। ई बात सुनि हुनक एक सखी आश्चर्यचकित होइत बाजल - "ओ! ई ओ छथि!अहाँक मोन मंदिरक देवता! ई बहुत आश्चर्यक बात अछि जे आइ अहाँक तपस्या साकार भs गेल अछि।" ई सुनि दोसर सखी पुछलकै - "मुदा ओ लड़की के अछि,सौन्दर्य में ओ अपना सभ सँs बड्ड नीक अछि!अत्यंत सुन्दर अछि ! ओकर सौन्दर्य अतुलनीय अछि!" -हँ ! ई सोचबाक बात छैक|- चित्रसेना गंभीर होइत बजलीह,पुनः गहन उदासी हुनकर मुखमंडल पर पसरि गेलनि। ओ सभ एतेक मंद स्वर मे बाजि रहल छलीह जेना चोरी कs रहल होथि। हँ s गुप्त रूपेँ कोनो दंपतिकेँ देखब आ ओकर गप्प सुनब चोरी थिक,ई सभ संगी बैसल आँखिक मौन गुप्त भाषा में एक दोसरा सँs गप्प करैत ओतहि बैसि गेल छलथि । ओ सभ चुपचाप बैसल उर्वशी आ राजा पुरूरवा के गप्प सुनबा में तल्लीन भs गेलथि। बहुत काल धरि उर्वशी आ राजा पुरूरवा प्रेममगन भय एक दूसर संग गप्प में डूबल रहलथि । एम्हर विह्वल हृदय के थामि,आतुरता सs ओतय के दिव्य प्राकृतिक दृश्य के देखवाक अभिनय करैत चित्रसेना आ हुनकर सब सखी के दृष्टि मात्र उर्वशी आ पुरूरवा पर छलैक। चित्रसेनाक सखी लोकनि उर्वशी एवं राजा पुरूरवा के देखइत प्रकृतिक अतुलनीय सौन्दर्यक आनन्द सेहो संगहि लs रहल छलीह,मुदा उर्वशी आ पुरूरवा केँ एक संग देखि चित्रसेनाक हृदय व्यथित भs गेलनि।क्रोधक अग्नि तीव्र ज्वाला बनि प्रज्वलित भेल छलनि हुनका भीतर।एहि क्रोधक आग्नि के कारण देह में कंपन होमय लागल छल। -उर्वशी,आब एतह सँs आपस भs जाउ,कारण आइ अपन कुल-गुरु वशिष्ठ आबि रहल छथि,ओ अपना सभक प्रतीक्षा करथि ई बात उचित नहि होयत। राजा पुरूरवा ओतह सँs विदा हेबाक प्रस्ताव रखलथि,संगहि ओ प्रस्थान करवा हेतु उद्यत भेलथि। "हँ प्रियतम! चलू,प्रणय के वास्ते एखन बहुत समय अछि।" दुनू गोटे एक-एकटा मेमना अपन एक हाथ में उठा लेलथि आ एक दोसराक हाथ पकड़ि किछु गुनगुनाइत आगू प्रस्थान कs गेलथि। चित्रसेना आ हुनक संगी सभक उपस्थितिक कनेको भान हुनका सभ के नहि भेल छलनि,हुनकर उपस्थिति सँs दुनू गोटे नितांत अनभिज्ञ छलाथि। चित्रसेन एकटा दीर्घ साँस लैत बजलथि -"सखी! लगैत अछि जे ओ उर्वशी छलथि,स्वर्गक अप्सरा!मुदा उर्वशी आ पुरूरवाक प्रेम आश्चर्यजनक अछि। एहि सौतिन के कारण पुरूरवा हमरा नकारैत आबि रहल छथि।मुदा हम हुनका छोड़ब नहि।" एक सखी पुछलथि-"की करबह सखी?" "हमरा-हमरा पुरूरवा अवश्य भेटताह,हमर लक्ष्य अछि पुरूरवा के प्राप्त केनाई ! भले हम अपन लक्ष्य छल-कपट के सहायता सँs प्राप्त करी। जँs हुनक हृदय नहि भेटत तs हुनक शरीर हम अवश्य प्राप्त करब ।" मुदा ओ उर्वशी ? ओ जे अहाँक बाट मे पाथर जकाँ पड़ल अछि,ओकर की हेतैक? तोंs सभ एहि बात पर सोचह । तोहरा सबहक काज छह जे ओकरा संग कोन व्यवहार करबह आ ओकरा हमर बाट सs कोना हटय बह ।"
क्रमशः अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.नन्दविलास राय-शिष्टाचार नन्दविलास राय शिष्टाचार
अनीत भाय आ विनीत भाय दूनू एके गामक वासी। अनीत भायक घर उतरबारि टोलमे आ विनीत भायक घर दक्षिणबारि टोलमे,धरि दूनू गोटामे बड्ड प्रेम । अनीत भाय विनीत भाय सँ दू वर्खक जेठ। पढ़ैयोमे अनीत भाय विनीत भाय सँ दू किलास आगू। जखन विनीत भाय आठवाँ किलासमे नाओं लिखौलनि तखन अनीत भाय दसवां किलासमे पढ़ै छलाह। जखन सरकार शिक्षा मित्रक बहाली केलक तँ अनीत भाय ई सोचिकऽ आवेदन नहि केलाह जे पनरहे साए टका दरमाहा आ एगारहे मासक नौकरी छै। एगारह मासक पछाति मुखियाके खुशामद करू तँ फेर ऐगला एगारह मासक लेल सेवा विस्तार हएत। जँ मुखिया नहि चाहत त सेवा विस्तार नहि हएत। हरदम मुखियाके पमौजी करैत रहू। अनीत भाय स्वाभिमानी लोक छथि-ओ सोचलनि हमरा बुते मुखियाक पमौजी कयल नहि हएत। तँए ऐ नौकरीक लेल नहि परियास करी सयह नीक। मुदा विनीत भाए सोचलाह - बैसल सँ बेगार भला। कम सँ कम पनरह साए टका तँ आउत। नहि किछु त परिबारक नूने तेल चलत। बहुत गोटा आवेदन कऽ रहल छैक। बहुत गोटाक बहाली हेतै। जे सबहक गति हेतै से हमरो हएत। एखन जे भरि दिन वौआइत रहैत छी तै सँ तो नीक हएत जे शिक्षा मित्र पद पर बहाल भऽ कोनो स्कूलमे चटिया सभकेँ पढाएब। यएह सभ सोचैत विनीत भाय शिक्षा मित्र पदक लेल आवेदन केलाह आ पनरह साए टका मानदेय पर बहाल भ' आई चौवालीस हजार टका उठबैत छथि। अनीत भाय सरकारी नोकरीक लेल बड्ड प्रयास केलथि मुदा नौकरी नहि भेटलैन्ह। ओ खेती गृहस्थी कय अपन पारिवारिक गाड़ीकेँ खींचए लगलाह। अनीत शनिदिन बेरूपहर जमीनक ऑन लाइन रसीद कटवए गेलाह। जइ आन लाइन केन्द्र पर गेलाह ओकर संचालक अनीत भायक जमाबंदी देखकय आ नेट खोलिकय ओई जमावन्दीक लगान देखलक। अनीत भायक जमीनक जे मालगुजारी आन लाइन केन्द्रक संचालक बतौलकनि से सुनिकय अमित भाई छगुन्तामे पड़ि गेलथि। पहिने जे जमीनक मालगुजारी लगै छलैन्ह तईसँ कएक गुणा बेसी मालगुजारी आन लाइन'क संचालक बता रहल छलनि। संचालक अनीत भायसँ कहलकनि सरकार जे दारू बन्न केलक आ दारू सँ जे सरकार केँ राजस्व आमदनी होई छलै से त बन्द भ' गेलैक। ऊं राजस्व पुरा करै ले सरकार जमीनक मालगुजारी बढौलक हेन। तँए अहाँक जमीनक एतेक मालगुजारी भेल। नहि होईय तँ कोनो दोसर ओ आनलाईन केन्द्र पर जाकय पता करियो ग अपने स्थिति स्पष्ट भ' जाएत। अनीत भाय बजलाह - अहाँ गलत थोड़े कहब। मुदा हमरा लग एखन ढ़ौआ कम अछि। तेँए ढ़ौआक बेवस्था कऽ दोसर दिन रसीद कटबय आएब। आनलाईन 'क संचालन कहलखिन - बड्ड बढ़िया। दोसर दिन रबिकेँ भोरमे अनीत भाय चौकपर चाहक दोकानपर चाह पीबय गेलाह। उत्तरबारि टोल आ दक्षिण बारि टोलक बीचमे चौक अछि। चाहक दोकानपर विनीत भाय , रंजीत भाय आ मुन्नाजी सेहो बैसल छलाह। अनीत भाय केँ देखते विनीत भाय बजलाह - आऊ भाय आऊ। अनीत भाय विनीत भायक। बगलमे जाकऽ ब्रेंच पर बैसला। चौके छी त बात कोन। रंग- विरंगक गप चलिते रहैए। बात उठल दारूपर। विनीत भाय बजला - नीतीश जी दारू बन्न कऽ बड़्ड़ पैघ काज केलथि। तैपर अनीत भाय बजलाह - दारू बन्न केए कऽ नीतीश कुमार ठीक्के बड्ड नीक काज केलथि मुदा दारू सँ जे बिहार सरकारके राजस्वक आमदनी होई छलै से बन्न भऽ गेल। आ ओई राजस्वक क्षतिपूर्ति नीतीश कुमारक सरकार जमीनक मालगुजारी बढाकय कऽ रहला हेन। अनीत भायक बात सुनि विनीत भाय थोड़ेक आक्रोशमे बजलाह - दारू बन्न केलासँ जे बिहार सरकारकेँ राजस्वक क्षति भेलै तेकर पूर्तिक लेल त कोनो उपाय करए ने पड़ितै कि नीतीश जी अपना बापक खेत बेचकय क्षतिपूर्ति करतै। तैपर अनीत भाय बजलाह - मुँह दुबरा बहु सबहक भौजाइ। सबसँ बुड़िबक दीनानाथ । सरकार केँ किसानटा सुझलै। एक तरफ कर्मचारी सभहक दरमाहा दोबर- तेबर कऽ रहल अछि। आब मास्टरे सबहक दरमाहा देखियौ चारि हजार सँ चौवालीस हजार भऽ गेल। ओहूमे त कमी कय सकैत छल। आरो वैकल्पिक बेवस्था क' सकैत छल। जेना विधायक आ विधान पार्षद सभक बेतन भत्तामे कटौती कए कय। विनीत भाय सेहो शिक्षक छथिये। मास्टरक दरमाहाक नाओं सुनि हुनका नेस देलकनि, ओ बजलाह- मास्टरक दरमाहा त एखनो कम्मे छैक। हमरा सभहक लड़ाई तँ सरकार सँग अछिये । हमरा सभके नियमित शिक्षक बाला वेतनमान चाही। अहाँ चौवालिसे हजार देखकय जरै छी,जखन शिक्षकक दरमाहा साठि हजार टका भ' जेतै त अहांके आओर जलन हएत। तैपर अनीत भाय बजलाह - मास्टर सभ स्कूलमे चटिया सभकेँ की पढ़बै छै से त चटिया सभक माइये - बाप बुझै छै आ दरमाहा चाही साठि हजार। हूँअ..ऽऽऽ.....l अहिना बात बढ़ैत - बढ़ैत दूनू गोटामे तू - तू , मै- मैं होमए लागल। अहाँपरसँ दूनू गोटा तोरापर आबि गेलाह।बिनीत भाय कहलकनि - तोरा देख लेबौ,तोरा बूत्ते की हेतौ। तों नीतीश जीकेँ की उखारि लेमही। तैपर अनीत भाय उत्तर देलखिन - हमरा बुते त ठीके किछ नइ हएत आ तोरे बुते की हेतौ। तों हमरे की उखारि लेमै। रहलै बात नीतीश कुमार 'क त आबय दही चुनाव ,सब बुझा जेत्तै । एतेक धरि भऽ गेलै जे दूनू गोटा माने अनीत भाय आ बिनीत भाय ब्रेंचपर जे बैसल छलाह ,ठाढ़ भ' जाए गेलाह। मुदा रच्छ रहल रंजीत भाय आ मुन्नाजी । दूनू गोटेय केँ डेन पकैड़ कऽ अलग केलखिन। आ समझा - बुझाकऽ चुप करौलखिन। नहि ते पकड़ा - पकड़ी आ मारि - पीट होईमे कोनो कसरि बांकी नहिं छलै। पंडित काकाक बेटीक बियाह छियनि। पांचम दिन बरियाति आऊत। तही संदर्भमे पंडित काका अपना दलानपर गौंआक बैसार केने छलाह। बहुत लोक सभ पहुँचल छलाह आ बहुत पहुँचियो रहल छलाह। गौंआक बैसबाक लेल चौकी,ब्रेंच आ कुर्सी केर बेवस्था छल। विनीत भाय सेहो बैसारमे पहुंचल गेल छलाह। ओ एकटा कुर्सी पर बैसल छलाह। हुनके बगलमे रंजीत भाय आ मुन्नाजी सेहो बैसल छलाह। तखने अनीत भाय पहुँचलाह। तखन एकोटा कुर्सी खाली नहि छलए। हँ विनीत भाय जतय बैठल छला तहीक बगलमे एकटा ब्रेंच खाली छल। अनीत भाय केँ देखते बिनीत भाय कुर्सी पर सँ उठिकय ठाढ़ होइत बजलाह,आऊ बैसू! तैपर अनीत भाय कहलकनि - नइ नइ अहाँ बैसू! अहाँ कहुना छी त एकटा शिक्षक छी जे सम्मानक पद अछि। अनीत भायक बात सुनि विनीत भाय बजला - शिक्षक नइ प्रोफेसर किएक ने छी मुदा अहाँ सँ उमेरमे त छोट छी। पैघो छोट त देखए पड़ैत छैक। ई कहैत विनीत भाय अनीत भायक डेन पकैड़कय कुर्सीपर बैसा देलखिन आ अपना जाकय ब्रेंचपर बैसला। रंजीत भाय मुन्ना जी सँ असथिर सँ कहलकनि - देखियौ दूनू गोटाकेँ केओ कहतै जे भोरमे दूनू गोटाक बीच झगड़ा भेल छलै। तैपर मुन्नाजी बजला- यएह त पढ़ल-लिखल लोकक पहचान छी। आ यएह संस्कार सेहो छी। एकरे शिष्टाचार कहल जाइ छैक। जँ पढ़ल-लिखल लोक अशिष्ट भ' जाएत त बिनु पढ़ल-लिखल लोक की करत ? लड़ाइ - झगड़ा अपन जगह छै आ शिष्टाचार अपन जगह। अनीत जी किछो छथिन मुदा बिनीत जी सँ तँ उमेरमे दू वर्खक जेठ छथिन, पैघो - छोटक खियाल त करय पड़ै छै किने। रंजीत भाय मूड़ी डोलबैत बजलाह -हँ से त करइये पड़ै छै। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.सुभाष कुमार कामत- दिव्यदृष्टि चर्चित पोथीमे गजपट: एक समेकित सुभाष कुमार कामत दिव्यदृष्टि चर्चित पोथीमे गजपट : एक समेकित
मैथिली भाषा मेँ साहित्यिक पोथी ' दिव्य दृष्टि ' मादे आदरणीय श्री गंगाधर कुँवर "हर्ष " आ प्रो० रामेश्वर प्रसाद मंडल जीक तथा एड० सूर्य नारायण कामत जीक सम्यक विमर्श पढबाक अवसर भेटल रहय। मूल संस्करण मेँ लेखक श्रीलाल देव कामत जी एहि पोथीमे पहिल संस्करण २०२१ पृष्ठ सं० १४८ जकर दाम ३०० टाका राखि पल्लवी प्रकाशन निर्मली सँ आकर्षक पोथी छपेलनि। ताहि मेँ आने समीक्षक जेकाँ पंगुक उपन्यासकार श्री जगदीश प्रसाद मंडल जीके स्थापित करबामे विशेष ध्यान देलनि अछि। चक्षु केर लेखक श्री दुर्गा नंद मंडल अपन पोथीक विषय सूची क्र० १ सँ २३ धरिमे १. मौलाइल गाछक फूल - उपन्यास विधा आ एहिमे क्र० २ जीवन - मरण , क्र० ४ जीवन संघर्ष, क्र० ११ - जीनगीक जीत एवम् कथा विधामे क्र० १६. त्रिकाल दर्शी ,क्र०. १७ पर अर्ध्दागिनी समीक्षा लिखने रहथि। तहिना अंशु केर लेखक श्री शिव कुमार झा ' टिल्लू' अपन पोथीक अध्याय क्रम १ सँ ३४ धरिमे श्री मंडल जीक प्रकाशित पाँच पोथी पर विमर्श कयने रहथि। यथा-: क्र० ५. मौलाइल गाछक फूल -उपन्यास, क्र०.१० पर छैक नाटक - मिथिलाक बेटी , क्र० १३. तरेगन -बाल प्रेरक कथा संग्रह, क्र० २४. मैथिली कथाक विकासमे गामक जिनगीक योगदान आ क्र० २६. इन्द्रधनुषी अकासमे सामाजिक विमर्श ताहि पथगामी रुपेँ श्री कामतजी- श्री जगदीश बाबू केर रचना संसार सँ अपन पोथी दिव्यदृष्टि मेँ क्रम १ सँ ४९ केर मध्य अध्याय क्र० १० पर शिर्षक - साहित्य अकादमी पुरस्कार , भोलूम -२ देवाश्रमक मुद्रांक मेँ खुब जमलाह अछि। हुनक लिखल मैथिली भाषा मेँ साहित्यिक पोथी समय सँ पहिने चेत किसान पर पुस्तक समीक्षा आओर जगदीश प्रसाद मंडल जीक- संचरण पर सारगर्भित तथ्य केर विश्लेषण कयल गेलैक हन। दिव्य दृष्टि पोथीमे प्रायः २० वर्षक भीतर बहरायल बिछल पोथीपर चर्चा कयल गेल छैक। पोथीक २५ गोट पृष्ट पर आधगोकेँ पन्ना रिक्त राखला सँ कुल साढ़े १२ पृष्ट अर्थात आध दर्जन पन्ना केर उपयोग नोट रुपेँ पाछु आरो जोरिकय लगौला सँ पाठकेर लिखयमे सादा कागतके उपयोगिता बढ़ि सकैत छैक। ओना पर्यावरणके दृष्टिकोण सँ अनुपयुक्त भेलासन्ता एक चिन्ताक फराक विषय छी। अवलोकन करब तँ पायब पृष्ट सं०११,२०,२७, २९,३५, ३८,४४,५७,६५,६७,७२,७४,९०,९२,९५,१०३,१०७,११३,११६,११८,१२२,१२५,१३१,१३३, आ १३५ आध पृष्ट रिक्त बनि गेला सँ ऐ मंहगाई जमानामे अतिरिक्त आर्थिक भार प्रकाशन केँ पड़ैत छैक,जे संभवतः लेखककेँ कैंचा भुगतान करय पड़ैत होय! पुनः पुनः प्रतिके छपायमे जौँ जगहके खाली नहि राखि पाठ शिर्षक सतबेधल संधान कयल जाए तंँ निश्चित रूपेँ छह गोट सँ बेशीये पन्ना उगैर सकैत छै। पोथीमे शव्द अशुद्धि सेहो दुर करय सँ रहि गेलापर प्रकाशन 'क सेहत पर गंभीर धव्बा छी। ओना शुद्ध मैथिली लेखन वा पचमनिया शैलीमे वर्तनी संबंधित बात हम नहिँ कहैत छी,मुदा तैयो जे शाव्दिक विद्रूपता छैक ताहि सँ पाठक उबि जायत,अर्थोंके अनर्थ बुझाएत। लेखक महोदय तीन सर्ग वा अध्याय यथा १. जीवनी,२. निवन्ध आ ३. मेँ - पोथीक समीक्षा रखलनि , जे गजपट रूपेँ पोथीमे देखाइत अछि। एहि केँ पाठ विषय - सूची निम्न तरहेँ सजाबैत अगिला संस्करण मेँ प्रकाशित हुअय तँ उत्कृष्ट कार्य मानल जायत। ओना प्रस्तुत विषयक रोचक तथ्य पाठकेँ आकर्षित करैत य। सर्ग १. जीवनी (९) १. अनन्त बाबू अमर रहै २.दिनकर जीक उत्कर्ष ३. मैनेजर स्व० मखसुदन भण्डारी जीक पुण्य स्मरण ४. मैथिली सेवी ललन बाबू : एक परिचय ५. सकल समाजके चहेता रामसकल ६. स्वाधीनता सेनानी केँ शत् - शत् नमन ७. साहित्य रत्न अनुप लाल मंडल ८. स्वनाम धन्य शिरोमणी ९. हमर आदर्श स्मृति शेष सूर्य नारायण चौधरी
सर्ग २. निबन्ध (१५) १. अनन्त बाबू केँ सभ करै छैन प्रणाम २. उपन्यास वनाम वायोग्राफी ३. एहि जगमे के कतेक मदतगार? ४. कविवर बद्रीनाथ रायजीक ५७म् जन्मदिन ५. कवि लालित्य ६. बहिर्मुखी कामैत कौम ७. कजरी विशेष ८. मिथिलाक रोहित यादव ९. मिथिला राज्य'क औचित्य : एक विमर्श १०.. युक्ति संगत बनाम तर्क संगत ११. विद्यापतिक आत्मकथा केर दृष्टि बोध १२. वेदव्यास पूर्णिमा १३. स्वदेशमे आश्रमक स्थापना १४. स्व. हरिनन्दन कामत जीक ग्राम मंगरौनी १५. श्रीमान् शंकर बाबू ओहिठामक जिलेबी!
सर्ग ३. पोथीक समीक्षा - (२३) १. अक्षर - अक्षर अमृत : पाठकीय टिप्पणी २. आतंकित नेपथ्य डॉ० (प्रो०) ब्रह्मदेव प्रसाद ३. उपेक्षित समाज केँ बाट देखाबैत ' वर्णित रस' ४. कथा एक पोथीक : हमर टोल ५. जुवराज जी'क ' परिचय ' एक अनुशीलन ६. जय प्रकाश मंडल-जीक ' गीत नव दिस' ७. जगदीश प्रसाद मंडल जीक ' संचरण' ८. टीकापट्टी संग्राम ९. नारायण यादव जीक कथा संग्रह 'नवकी पुतौह ' १० . नन्दविलास जीक था यात्रा शुरू ११. पाठकीय प्रतिक्रिया १२. पोथी समीक्षा १३. पुस्तक समीक्षा १४. भोलूम - २ देवाश्रमक मूल्यांकन १५. मैथिली भाषा मेँ एकटा दीर्घ कविताक पोथी १६. रामबिलास साहजीक कथा संग्रह -: दूध बेचनी १७. लाल ओसक सुन्न मादे टिप्पणी १८. सामाजिक सरोकार केँ नव दिशा दैत उपन्यास १९. समकालीन मैथिली साहित्यक कवि कपलेश्वर राउत २०. संस्कृतके विद्वान डॉ ० रविन्द्र ना०चौरसियाके पोथी २१. सुप्रसिद्ध नाटककार बेचन ठाकुर २२. साहित्य अकादमी पुरस्कार -२०२१ २३. सुखल मन तरसल आँखि २४. हमरा बिनु जगत सुन्ना छै : पाठकीय प्रतिक्रिया । अस्तु! उपरोक्त सभ पाठ्यक्रम निश्तुकी रूपेँ अहाँ केँ अपन आभा दिश चुम्बकीय शक्ति जेकाँ घीचत, धरि सागर सँ कतेक गागर अपने भड़ि पबैत छी ; से अहाँक उपर निर्भर करैत अछि। एहिमे बहुतों विषयके अखबार'क आ पत्र - पत्रिका केर पाठक तथा ५०० दिव्यदृष्टि केँ निहारैबला सुधिजन अबडेरने हेताह, जेना कि सोशल मीडिया पर अभरल हन। एहिक किछ पाठकेर संवर्द्धन आ संशोधन केर परम आवश्यकता जानि पड़ैछ। -सुभाष कुमार कामत, एम.ए,बी.एड., ग्राम+पंचायत - नौआबाखर (मधुबनी) ८४७४०२ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.लालदेव कामत- डोकहर/ सपना साकार/ पोथी समीक्षा/ दिनकर जीक उत्कर्ष/ श्रीमान मोन पड़ैत छथि/ सरौती सपुत : खुशी बाबूक उपलवधि लालदेव कामत डोकहर/ सपना साकार/ पोथी समीक्षा/ दिनकर जीक उत्कर्ष/ श्रीमान मोन पड़ैत छथि/ सरौती सपुत : खुशी बाबूक उपलवधि १ डोकहर प्रो० रामचन्द्र राय प्रगतिवादी काव्यान्दोलन'क शिखर कविक रूपें रचना जगतमे समादृत छथि। हिनक आदर्श रहथि - रविन्द्र टाइगोर,इयह कारण थीक जे हुनक कविता 'क फलक व्यापक अछि आओर हुनके सदृश्य हिनक चिन्तनके केन्द्रमे देश आ विश्व'क मानवके शौषण मुक्ति छैक। उत्तर छायावादके श्लाघा कवि , तुलनात्मक गद्यकार आ अप्रतिम अनुवादक प्रोफेसर राम चन्द्र बाबूक व्यक्तित्व आ कृतित्व हिमाचल पर्वत जेकाँ श्रेष्ठता आ धवलता संयोगने छथि। हिनक जनम बिहार - मिथिलांचलके मधुबनी जिला अन्तर्गत भगवतीपुर (नाहर) ग्राममे २ अगस्त १९४९ ई० केँ भेलनि। आरंभ म पैतृक स्थानमे अध्ययन भेलासन्ता बादमे उच्च शिक्षाधरि शांतिनिकेतन (प०बंगाल) गेलथि। एतहि सँ ओ निष्णात भेलाह स्नातकमे आ पीएचडी. केर उपाधि प्राप्त कयलनि। बंगालक बाउल केर साहित्य आ संगीत,जीवन दर्शन सँ प्रभावित भऽ ,एहि क्षेत्रमे प्रायः अनेको विधा पर लेखनकाज कयलाह अछि। सन् १९८२ मेँ शाँतिनिकेतन , १९८८ मे सहित्य आ बंगला साहित्य पर हिन्दीमे शोधपरक निबंधक संकलन आ १९८९ मेँ तन्हाई बंग्लाभाषाक प्रतिनिधि कथाक संग्रह तथा शांतिनिकेतन एक परिचय एवं बंगालके बाउल पोथी प्रकाशित भेल छन्हि। प्रस्तुत डोकहर हिन्दी कविता संग्रह (२0०८) सँ पूर्व हिनक रजनीगंधा आ आशा देता है लेकिन केर प्रकाशन भ' चुकल रहनि। हिनक कविता 'क पाठ विविध मंच सँ आ आकाशवाणी सँ प्रसारित ओ पत्र - पत्रिकामे प्रकाशित भेल य। हिनका कविता गढ़बाक ओ क्षण होईछ जाहिके अपना आँखिये घटना घटित होइत अपना उपर वा अनका पर होय। ओ विषण्ण भ' उठैत छथि। ऐहि तरहक " डओकहर" मेँ अपने पाठक देखैत स्वयं मूल्यांकन सेहो क' सकब। डोकहर कें जे सारस प्रजातिक पंछी छी, कोना एक विधुर कविहृदय नर डकहर रूपेँ चिन्हैत; एसकर अपन घरक समक्ष मैदानमे चराउर करैत देखैत छथि। भरिसक एकर मादा बहेलिया हाथे आखेट भेल होय! तेँ करूणा - ममता सहजे जगि अबैत छन्हि मोनमे आ एहन मुक्ताभिलाषी डकहरकेँ कोना ओ पकैड़ पैघ खोता बनाकय देताह। कियाक तँ ओ विहंग अछि आ ओ विकलांगता अपनाके बूझय लागतैक। से आओर बेसिए विधुरता एकांगीपन भ' जेतैक। जेना कि भाषा रूपेँ संस्कृत शास्त्रविद्गणके महाजालमे आई बिकलांग भेल कुहैर रहलैक अछि। बहैत नदीक धारसन स्वच्छन्द बहैत रहैत तँ ई दशा नहिं रहितैक मानवीय बोलचालक सामाजिक वाणी सतत् बनल रहैत। तहिना स्वच्छन्द जीवन जीबय चाहैत होइक बिधुर बृध्द डोकहर। जेना कि कविवर महोदय'क अपन मनोदशा काव्य रचैत काल भ' गेल होईन। ओ स्वयं मेँ मिथिलाक बेटी अर्थात अपन स्त्रीक परित्याग कयला पर द्विजत हासिल कयलाह बंगालमे आ बंगालिन सँ द्वितीय वियाह करैत एक ललनाके पिता भेलाह तँ ,मुदा कालान्तरमे सहधर्मिणी पत्नी आक्रांत भऽ गुजैर गेलीह। से जनिजातक बैधव तँ अनुभव करत सँ रहि गेलैन आ पुरूष विधुरताक स्वयं अनुभव कऽ समय भोगैत रहलाह अछि। साहित्य क्षेत्रमे अनेक कल्पना आ चिन्तन मनन एहि विषय पर विशद् रूपेँ कयलनि। इयह अनुभव कवितधारा रुपेँ अजस्रत भाव सहेजने 'डोकहर' हिन्दी काव्य पोथीक केन्द्रीय कविता पाठ - ७ पर विषय सूचिमे स्थान पौने छैक। ओना एहि चर्चित पोथीमे ४२ गोट कविता विविध विषयपर अनेकों रस मे अछि। कवितामे छन्द आ तुकबंदी नहि रहने एक स्वच्छन्द परपराक पथगामी बुझाइछ। एहि पोथीकेँ कविन्द्र रविन्द्र'क कर्मभूमि केँ समर्पण कयने छथि,जतय डॉ० रामचन्द्र राय जीके द्विजत्व भेटलनि अछि। वर्ष २००८ मेँ प्रो० रायजीक 'डोकहर ' हिन्दी कविताक ८० पृष्टक पोथीक दाम ८० टाका छैक। पोथीक आवरण एवम् रेखांकन थीक - सुहास राय जीक, आ एहिक प्रकाशक - शांति निकेतन हिन्दी प्रसार सभा रतनपल्ली (नार्थ) शांतिनिकेतन बीरभूम ,पछिम बंगाल (भारत) छी। उपर्युक्त पोथीक सब कविता उपरा- उपरी आ जाज्वलमान छैक। अपने पाठक एहिक पांति पढ़ि पुलकित होयब।
२ सपना साकार मैथिली कथा पोथीक ISBN नं० ९७८९३९३१३५३९१ पृष्ठ सँख्या १२३ पल्लवी प्रकाशन निर्मली सँ सन् २०२३ ई० मेँ प्रकाशित भेल अछि, जाहिके दाम २०० टाका छैक। कथाकार श्री राम चन्द्र रायजी'क पहिल मैथिली साहित्यिक पोथी छी , जाहिमे ९ गोट लघु आ दीर्घ कथा मिज्झर भेल अछि। कथा पोथीक कलेवर देखि सुधि पाठक सहजे अनुमान लगा सकैत छथि जे आगू आबयबला समयमे शिघ्रहि श्री रामचन्द्र जीक मैथिलीमे उपन्यास विधा सेहो आओत। हिनक लगनशीलता केँ परेख प्रसिद्ध साहित्यकार श्री गजेन्द्र ठाकुर जी सेहो परिकल्पना कयलनि जे सिद्धहस्त कथाकारके रुपेँ रामचन्द्र बाबूक लेखन शैली आ वाक् पटुता केँ देखैत ई आश जगैत अछि जे आब हिनकर लेखनी वृहत् उपन्यास दिशन अवश्य बढ़त। हिनक रचनाधर्मिता कोना प्रगतिक पथ पकड़ल से श्री रायजी स्वयं " अपन बात" मेँ असपष्ट कयने छथि। दर्जनभरि पोथीक वरेन्य रचनाकार श्री नन्दविलास रायजी सपना साकार 'पोथी' के आमुख लिख बहुत बात पाठकोपयोगी बावत देलाह अछि। तथापि एहि पोथीक न्याय लेल अपना सँ मनन कयल पाठ सन्दर्भ पाठकके सुविधा खातीर अति संक्षेप मे किछु बात लिखबाक धृष्टता करब मानवोचित हमर अभिष्ट थिक। एहि पोथीके केन्द्रीय कथा थीक सपना साकार जे पाठ २. मेँ ३० पृष्ठ पर पाठकके अभरत। एहि मादे कथाकार बढ़ उम्दा सँ खिस्सा गढ़ैत समाजक बीच अभिनव प्रयोग करैत देखेलाह अछि,जे नव संदेश क' संचार करबामे पूर्ण समर्थ भेल छैक। पाठकके ई आत्मकथा जेकाँ बुझाएत,परंच से सरिपहुँ नहि। ई ठोकल ठेठाएल स्व अनुभुति सँ भिजल आ कल्पना सँ फराक बुझिमे आओत। मुदा रामूसर ऐ ले स्वंगे स्पष्टीकरण दैत एहि कथाके आने कथा सदृश्य मोनक उपज बतौलनि हन्। कथाधरि सजीवताके अपना आभामे खूब चिकन सँ समेटने रहैत , परिपक्व रूपेँ औंटल- पौरल दूधक दहीसन परिवर्तित रुपक एक छँटा देखाइत छै ! कथा नायक रामेश्वर भाय शिक्षक रहैत पूर्णतः सामाजिक कार्यकर्ता छथि। चूंकि बालपनमे ओ पढ़ैत- लिखैत संगतुरिया सभके पढ़ौनी करबाक खेल धूप करैत छैक। आ माय बाबु केँ आश्वस्त करय जे पैघ होयब तँ मास्टर साहेब बनब। से पंचायत 'क मुखियाजी पहला सँ स्नातक धरि प्रथम श्रेणी आनय बाला रामेश्वर जीके प्रखंड शिक्षक नियुक्ति करैत अपन बेटी लेल वियाह वर रुपेँ सेहो हूनके चुनि लै छथि। समृद्धशाली मुखियाजी 'क पुत्री रमा विदुषी भऽ जाइ छैक जे मास्टर जीक मैथिली'क सब रचनानाक पहिल स्रोता आ पाठक थिकीह आ साहित्य विमर्शमे सहायिका सेहो। उपन्यास रचबाक लेल चिन्तन - मनन चलैतकाल इहो दृश्य हुनका सोझा अबैत छैक जे कोना गामक वर्तमान परिदृश्यमे आजुक छौड़ा - छौड़ी कोन तरहेँ सोशल मीडियाक दुरुपयोग बेसी करैत प्रेममे उढ़हैर रहल छैक। एहि सं बेटीक बाप शोकमे डुबि जाईछ। फेर विषय सँ भसियाइत दोसर समस्या बिहारमे शरावबंदीक उपरान्तो टोलमे देशी शराब बिक्री सँ किशोर वयशमे बच्चा लोकनि पर केहन प्रतिकुल असैर पड़तऐक? प्रशासन जनैतो छैक जे होम डिलीवरी भ' रहलैक य,तै दिस घिचाइत छै। श्री रामेश्वर प्रसाद मंडल जीक " बगवार " मेँ जहिना माय- बाबूक एके संग अंतिम संस्कार भेलैक,तहिना एहू कथामे देख पड़ैछ। गरीब गुरबा पर गामक सामन्त द्वारा कोना शोषण होइत रहैक; सेहो बचपनके दृश्य चलचित्रके रीलसन आगां सोझमे देखा पड़ैत छै। ई एहि पटकथाक आधार बनाए माय -बाबूजी नामक उपन्यास लिखबाक छटपटाहट के आहट पाठककें सुनाबैत छथि,से अकानबाक विषय छी। मृत्यु भोज आ कर्मकाण्ड केँ तिलांजलि दैत उतरिक उसरगा अपन पोथीक लोकार्पण सँ करताह आ ताहि लेल साहित्यिक सहयोगी साथी उमा जी आयोजनक जिम्मा लैत छैक। रामेश्वर मास्टर साहेब प्रथमत: रजिस्टार औफिसमे जाकय ट्रस्ट लेल जमीन लिखलैन आ नगदी राशि सबा लाख टाका जमा करैत छैक। माध्यमिक आ उच्चतर माध्यमिक शिक्षा बोर्ड परीक्षामे प्रथम श्रेणी सँ पास विद्यार्थिगण केँ आर्थिक मदैत समारोह पूर्वक करैत शिक्षा 'क महौत केँ जन- जनमे प्रचार प्रसार करत। बारहमदिन लेल ग्रमीतके बैसार कराबैत छै। बैठकमे अचरज भरल नजैर सँ सब हिनक नैका कानून सँ हतभ्रभ होइत ओकर क्रियाशीलता देख कौतूहलमे रहैक। सुभेश्वर काका , लाल काका , जोगी काका ,बच्चे काका आदि छगुन्तामे रहैछ। कथाकार एहिमे अविस्मरणीय बनेबामेँ सामाजिक विद्रूपता , रूढ़िवादिता आ अन्धविश्वास 'क विरूद्ध जागरूकता बढेबामे सफल भेलाह अछि। ओना मौजूदा व्यवहारमे नेतानुमा लोक ओ धनिक लोक १२ मोन चाउर सँ बेसिये एक सांझक भोजमे सीदहा रान्हि कार्डधारी सँ परोक्षरूपेँ चन्दा ओसुली करैत अछि,तकरा सोचके संकल्प केँ की कहि सकैत छी। पुरनका छरीदार - मान्यजनी आ मुख्य पुरूषके तँ भोजभातमे चलती आबि जाईछ। रामचन्द्र जीकेँ बहुतों कथाक पाठ करैत आ अद्भुत वाचन शैली ' सगर राति दीप जरय'क कथा गोष्ठीमे अनेकों ठाम देखने- सुनने छी। दोसरो कथा सब उपरा- उपरी बुझाइत अछि जे पाठक स्वयं अनुभव करब। पहिल कथा ' तोंही जीतलेँ हमहीं हारलौं ' एहिमे समसामयिकता केर बोध होईछ। आब नगर - शहर आ आन प्रान्त जेकाँ मिथिलामे सेहो प्रेम वियाहक चलैन सेहो अन्तरजातीय सीमामे सम्पन्न होईत वियाहमे होईछ। ई पढल- लिखल समाजमे नवयूवा पिढ़ि दहेजकेँ चुनौती दैत,मुंह दुसैत स्वच्छन्दता आनैत कूल मूल डीह गोत्र रंगभेद आदि सँ इत्तर एक पृथक पहिचान बनाबैत समाजमे पकठोस बनैत जा रहलैक हन्। मिथिला समाज पौराणिक पद्धति पर अबलंबित रहल छैक,मुदा परिस्थिति आब भिन्न छैक। ताहिक जीबैत जागैत उदाहरण रूपेँ ई कथा ओरियाके गढ़ल गेल देखाईछ। एखनो समाजमे पर्याप्त रूपें नेहाक पितियौत भाय नूनू जँका मर्यादित लोक ऐ नव रीतिकेँ समाजक प्रथा सँ नहिं जुटय देबै चाहैत छैक। पुरूषकेँ आत्म सोभिमान कुलक कन्याक प्रति रहैछ जे कुबाट नहिँ चलय। मुदा एक नारी'क हृदयके हुनक स्री स्वंगे जानि ननैद केँ नवीन सँ भेंट कराबय लए गाम सँ टपा दैत छै,जे नवीन जी सँगे दिल्ली पहुँच जेठ बहीण बहनोए लग आबि जाईछ। ओहि राति नेहा कुमारीकेँ मारि देबाक आ गठूलामे धरहरा गारि देबाक नियारल केँ जहन ग्रहण लगैत छैक तँ दोसर उपाए अपहरण 'क नालीश कयल जाइत छै । पैघोत जाति आ छोटका जातिक जे भेदभाव अदौ सँ मिथिलांचलमे छैक से टुटैत नवीनके माय बाबू नोकड़िक पहील पगार सँ कबूला मनौती पुरा करैत सवर्ण - गैरसवर्ण क' बीच ऐ रक्त संवंधी मान्यता धरि दैत उज्जवल भविष्यक ताउम्र ले कामना केलथि। फेकाएल जीनगी कथा स्त्री जीवनक नैहरमे आ सासुरमे अलग -अलग परिस्थिति सँ सामना करैत एक मानसिक रोगी के भेटत। ओ पगली ,पगली नहिं घरक भागमंत बुझल जाईत रहलीह। मुदा वियाहैल भेलासन्ता सासुरमे केहन मोजर देल गेलैक से पाठकक सोझा य । निर्वासित जीवन कथामे मनुखक व्यंग्यात्मक शैली सँ ओतप्रोत बात उठबैत कथाकार स्त्री -पुरूषक लेल बान्ह कछेरमे मलमुत्र त्यागक जगह शौचालय निर्माण दिश आवश्यकता देखेबामे एक झलक मारै छथि। भरामबालीक घरमे चोर नहि उच्छनैर देबाक अनघोल मचेलहाके बुझेबामे संकेत केने छै। बुधनी मायक बेथा पाठ शिर्षकमे पंचायत केर बैसारमे जनिजातक बहुत उपस्थिति नारी शसक्तिकरण केँ उजागर करैत इन्दिरा आवास ढनमनाएल'क संगे जगत केर पोल खोलैत छैक। ओना थाना गेलापर ओतह ओकर प्रभावकें बुझल जा सकैछ। तेँ कि भ्रुणहत्या जगतके कलंक मेटबय लेल चारू युवक मानतैक? ई सवाल औनाईत छोड़ि औपन्यासीक विधा दिश रामूसर बढलाह अछि! नशामुक्त गाम कथा पर तँ रामूजी केँ अपन वियाहकालहि सँ विषय पर अधिकार छैन,जे रेडियो वार्ता प्रसारण सँ स्रोता आकाशवाणी कार्यक्रम मे गमने रहैथ। राजूसरके अथक परियास सँ नशामुक्त ग्राम म जीविका समुह हुनका पुरस्कृत करैत छैन। बहिनक बियाह कथामे तेसर छोट बहिनक बियाह लेल सुजीत दिल्ली सं सुरक्षित आबि दरिभंगा लग एन एच ५७ पर दुर्घटनाग्रस्त भ' अकाल मृत्युके प्राप्त करै छै जे ओकर बहिन रेखा आ सब कियो शोसल मीडिया पर बाइरल भेल खबेर सँ जनैत दुखी होईछ। समाजक पिसांच कथामे मानसी शासुरमे सौस- ननैद सँ प्रताड़ित आ श्वसुर 'क बेंतक मारि सँ त्रस्त भऽ नैहर चलि जाईछ। ओतय टिशन पढौनी कराबैत अपन प्रतियोगिता परीक्षाक तैयारी सेहो करैत छैक। से बीडीओ. बनि जाईछ,ई प्रेरक कथा क' श्रेणीमे अबैत य। आखरी कथा ' कुलदीपक' मेँ एक परिवारमे पाँचगोट बेटिये जनमला सँ बेटाक चाहतमे रहय बाली दूनू पूतौह आ सासुमायके घोर निराशमे देखौएल गेल छै,जे सोभाबिक छैहो। कथाकारके साकारात्मक सोच ऐ कथामे फरिच्छ लौकैत य। राकेश शर्माक घर दोसरो बेर धिया जनमली,से परिवारमे चूल्हिधरि नहि पजरैत छैक। राकेशकेर माय पड़ोसनी बलाटबाली केँ कानि-कानि वार्तालाप करैत छथिन-देखियौ कनियाँ जेठकी पुतौह केँ तँ तीनटा छौड़ी रहबे करय,आई तँ छोटकीकेँ सेहो दोसरो बेरमे बचिये भेलैन हन्। से भगवान- भगवती हमरा डीह पर पुतक आँखि कहिया धरि देखेताह! एम्हर विज्ञान पढल- युवक परिवार नियोजन लेल तैयार पत्नी सँ कहैत रहल मुदा ओ आपरेशन लेल तैयार नै भेलीह। ओ स्वयं अपन नशबंदी कराकेँ आत्मसंतुष्टिमे रहय। रूबीके जेठ बेटी डाक्टरी पढ़ाय केलक,जमाय डॉ० सुबोध शर्मा मिलकय रूबी-राकेश नामक पैघ होस्पीटल फोलैत छैन आ छोटकी बेटी अनुप्रिया आ ओकर पति अनुपम राय सेहो दूनू जिला पदाधिकारी पद पर बहाल होइत राकेश -रूबी नाम पर गरीब कल्याण विद्यालयके स्थापना करैत परोपट्टामे नाम बजौलकै। ऐ कथा सँ ' बेटी पढाऊ- बेटी बचाऊ' केन्द्रीय नारा केँ मजबुति भेटैछ ,जे समसामयिक घटनाचक्र छी। रामचन्द्र जी केँ कथाक जे लालित्य आ गरहैन सौष्ठव भेल अछि से कथा पढ़ि पाठकगण अभिभूत अवश्ये होयब । हम तँ खूब प्रशन्नता पूर्वक आशिर्वाद दैत छीयैन। बेरमाक कथा गोष्ठीमे एहने स्तरीय कथा गैढ़केँ आनथि। एखन एतबे! ३ पोथी समीक्षा हारि नहि मानव मूलहिंदी लेखक अटल बिहारी वाजपेयी, मैथिली पद अनुवाद- डॉक्टर चंद्रमणि झा सौजन्य प्रकाशक- ललित कुमार झा- पौहद्दी (दरभंगा) प्रकाशक- नवारम्भ-मधुबनी वार्ड नंबर 2 विवेकपुरम (अजीत आजाद) प्रकाशन वर्ष 2018 रंगील कोभर कूटगता पोथीक मूल्य 2सय भारतीय राजनीतिक आदर्श पुरुष भूतपूर्व प्रधानमंत्री, अतुलनीय समन्यवादी , प्रखर राष्ट्रवादी, अपराजित कवि, धुरंधर वक्ता, उत्तमचरित्र महानायक, अजातशत्रु , मैथिलीके संवैधानिक दर्जा देनिहार , दूभागमे बँटल मिथिला कोशी महासेतु संँ जोड़निहार ब्रह्मलीन अजर- अमर भारतरत्न अटल बिहारी वाजपेयी जीके हुनकहि कविताक मैथिलीमे पद्यानुवाद कए एकटा लघु काव्यांजलिकेँ श्रधांजलि रुपे समपर्ण भेल एहि 88 पृष्टक पोथी में 88 कविताक संगे हमर अटलजी शीर्षकसँ माननीय नरेंद्र दामोदर दास मोदीक व्लाॅग सँ एकटा पाठ आ डॉक्टर चंद्रमणि झा स्वयं साभार रुपे अटल बिहारी वाजपेयी ( एक परिचय) आलेख देने छथि । डॉक्टर चंद्रमणि झांक जन्म नबादा ( बहेड़ा) जि० दरभंगा में स्व० राममुर्ति झा आ स्व० सीता देवीक घर भेलनि'। अंग्रेजीसँ एम ए रहलाक बादों ओ मैथिलीमे गीत संग्रह ' रहि जो हमारे गाम' आ गीताम्बुज रचलनि संगहि निधि निवंधमे बहुतों लेख लिखने छथि । मैथिलीमे हुनक काव्य संग्रह अनामिका आ मुक्त- उन्मुक्तक अतिरिक्त कतेको विधामे दोसर तरहक पोधी मैथिली- हिन्दी आ इंग्लिशमे प्रकाशित भेल छन्हि। डाक्टर मिश्र दरभंगा समाहरणालय संं सेवा निवृत्त छथि आ वहुतो तरहक पुरस्कार अपना नामे अर्जित कयने छथि। संगीत प्रभाकर केर आब लाभ हिनका वेसारिमे भ' रहलनि से जिनगी हिनको संगीतमय भ गलैक अछि। हिनका प्रतिभाक उपादेय वाजपेयी जी के कविता के सौष्टव आ लालित्यके हूबहू अपन मातृभाषामे उतारि, जेना जल जाहि बासन मेँ रहत; तेहने चरित्र ग्रहण करत तेनाहि पाँतिक पतियानि ओरियेलनि से अपन मोन गछैत य। कविता ससमय पाठक वर्ग लग अननाई सहजे अनुमान कए लेब जे ई केहन जीवटगर छथि। कविताक गेयात्मक भाषान्तर एहि तरहे अछि:- आई सिन्धमे ज्वार उठल अछि नगपति पुनि ललकारि उठल अछि फेरो कण-कण कुरुक्षेत्र के पाच्यजन्य हुँकारि रहल अछि सयके-सय आधात सहनकए जीवित हिन्दुस्तान हमर अछि जगतक मस्तक पर रोली सन शोभित हिन्दुस्तान हमर अछि दुनियाँकेँ इतिहास पुछै अछि रोम कतय यूनान कतए अछि?............ दोसर देखु:- मनाली नहि जइहेँ गोरी राजाके राजमे। जइहेँ तँ जइहेँ उड़िकए नहि जइहेँ अधरमे लटकबेँ वायुद्तक जहादमे। जइहेँ तँ इइहेँ सनेसा ने पइहेँ टेलीफोन बिगड़ल छै मिर्धा महाराजमे। एहि तरहे फेर दोसर कविता यादिकरी हुनका देखू:- जे बरिसों सड़लाह जेलमे यादिकरि हुनका जे फांसी चढ़लाह खेलमे यादिकरी हुनका' याद करी काला पानी केँ अंग्रेजक ओहि मनमानी केँ केल्हूमे जुटि तेल पेरैते यादिकरी बहिरा शासनकेँ बमसँ थर्राइत आसन केँ भगत सिंह, सुख देव-राजगुरु केर आत्मोत्सर्ग पावन केँ अन्यायी सँ लड़ी दयाके बिनय नै करि नै अनका' यादिकरी हुनका.............. मैथिली पाठक वर्ग केँ सब कविता उपरा उपरी रसगर लागत यद्यपि एही कवित्वमे तातस छन्द सहित मन्दाक्रान्ता, जयकारी, शार्दूलविक्रिड़िता, सवैया, रोला, षटपद, सोरठा आ दोहा-चौपाई आओर वसन्ततिलका नहिंयो रहैत मंगल कामना सँ अनुदित ई पाठ निक लागत :- आऊ पुनः हम दिया जराबी हिन्दू तन-मन हिन्दू जीवन कथी गमएलौं- पओलौं जगमे जिनगीक ढ़रय लागल साँझ गीत नवल गाबै छी दुधमे दरारि पड़ल झुकि नहि सकैत छी बाट कोन अपनाबी हम गीत नही गबैत छी देखू हम बढ़ले जाइत छी सपना टुटि गेलै आऊ मर्द नामर्द बनू आऊ, मोनके गीरह खोली नव गीरह लगैय स्वतंत्रता दिवसक पुकार अमर आगि अछि अमर अछि गणतंत्र जम्मूक -पुकार कोटी चरण बढ़ि रहल भगवा हमर गगनमे लहराइत छै कण्ठ-कण्ठमे एक राग अछि आबए जकर-जकर साहस हो आदि। पोथी 'हारि नहि मानव' केर उपयोगिता रसिकजनमे तँ अछिये परंच नव पीढ़ि में सेहो एहि सरोकार सँ जुटबाक प्रेरणा अद्यप्रकाशित एहि मैथिली पोथी सँ होइछ । पोथी क कलेवर आकर्षक बुझाएत आ एक बेर प्रणाम करबाक मोन फेरसँ सहजे भ' जायत से मनोवैज्ञानिक सिहरन मानस पटल पर आओत। मालाधारी हारमंस सँ बनल एहि प्रतिक पर एक पुष्प हमरो दिस सँ । एहि काव्य कृति लेल पृथक सँ परमादरणीय डॉक्टर झाजी के सेहो साधुबाद करय सँ अपना के नहि रोकि सकब । हम स्वयं शब्द विन्यासक निहितार्थ एहिमे खुब डुबकि लगेलौंह, तेँ कहब होइछ अटल जीक पवित्रनामके किछु निछाबर करैत अपना घरेलू पुस्तकालय में ई पोथी सहेजके राखब। ४ दिनकर जीक उत्कर्ष साहित्य अकादमी आ ज्ञानपीठ पुरस्कार सँ सम्मानीत आ पद्मभूषण उपाधिसँ अलंकृत भारतीय काव्य गगन केर अति देदीप्यमान नक्षत्र दिवंगत रामधारी सिंह दिनकर मिथिला'क सपुत छलाह।अपन वाणीक वाण सँआगिक बर्षा कयनिहार दिनकरजी ओहि महाकवि वर्गमे सँछथि जे प्राचीन भारतक गौरवमई अतीत पर मुग्ध भऽ उठैत रहलाह।हुनक जन्म बाबू रवि सिंह जीक घर 23सितम्बर1908ई0केँ बिहार राज्यक मुँगेर जिलान्तर्गत सिमरियाघाट ग्राममे भेल रहैन।ओ मुलत: हिन्दी भाषाक कवि रहथि।हुनक कवितामे देश प्रेम, राष्ट्रीयता आ मानवतावाद'क भावनाक प्राचुर्य रहैत य। शोषण-उत्पीड़न ,पतन आ विषम्य केर प्रति हुनक हृदय हुंकार कऽ विद्रोह करैत रहैक।वर्त्तमानमे विशेषतः काव्यमे शोषित समाजक प्रति करुण सहानुभूति आ पैघाउत देखबैय बालाक प्रति आक्रोशक भावना देखाईछ-: श्वानो को मिलता दुध-वस्त्र,भुखे बालक अकुलाते हैं! माँ की हड्डी से चिपक ,ठिठुर जाड़े की रात बिताते हैं!! तेँ दिनकर जीक काव्य केँ दलित मानवता आ सिसकैत करुणाक काव्य कहल गेल हन्।हुनक कविताके द्विवेदी युगीन आलोचनात्मक काव्यधाराक ओजस्वी, प्रगतिशील संस्करण मानव जाइछ। एहिमे विचार तत्व केर प्रधानता छैक।दिनकरजी आधुनिक कविगण'क पहिले पतियानीमे बैसबाक अधिकारी रहल छथि;ताहिपर कोनूटा अतिशयोक्ति नहिँ।परञ्च एकटा गद्यकारक रुपमे सेहो दिनकर जीक अतिशय ख्याति रहलनि अछि। सुनके गद्य साहित्य अत्यन्त प्रौढ़ आ विचारात्मक अहि।राम चन्द्र शुक्ल जीक अनुसारे --॓गद्य कविजन केँ कसौटी मानव जाइछ, दिनकर जी ताहि कसौटी पर पूर्णतः ठाढ़ उतरैत छथि ॔।आओ मुख्य रुपेँ विचारात्मक आ समीक्षात्मक निबंध लिखने छथि। संस्कृति के चार अध्याय नामक अपन पोथी मेँ ओ भारतीय संस्कृतिक विस्तृत विवरण प्रस्तुत केने छै। दिनकर जीक भाषा शैलीमे प्रवाह आ सौष्टव परिपूर्ण रहलैक।काव्य भाषाक तरहेँ हुनक गद्य साहित्य सेहो परिमार्जित छैक। वैचारिक संगे भावनात्मक अपूर्व संयोग दिनकर जीक गद्य शैली ॔क सबसँ पैघ विशेषता छी।हुनक निबंधमे यथाअवसर व्यंग्य -विनोदक चुटकी बुझाइछ। भारतीय सांस्कृतिक एकता शिर्षक आलेखमे देशक एकता पर गहन विचार कएल गेलैक।एहि देशक विभागमे रीति-रिवाज,खान॒-पीन,रहन-सहन अधिक दृष्टिसँ प्रर्याप्त अंतर छैक।तैयो ओही बाह्य अंतरक बालों अपना देशमे केहेन तरहक आंतरिक एकता कायम छैक,सयह बुझेबाक जी लेखकेर प्रतिपाद्य थिक। रामधारी सिंह द दिनकर जीक उत्कर्ष साहित्य अकादमी आ ज्ञानपीठ पुरस्कार सँ सम्मानीत आ पद्मभूषण उपाधिसँ अलंकृत भारतीय काव्य गगन केर अति देदीप्यमान नक्षत्र दिवंगत रामधारी सिंह दिनकर मिथिला'क सपुत छलाह।अपन वाणीक वाण सँआगिक बर्षा कयनिहार दिनकरजी आहि महाकवि वर्गमे सँछथि जे प्राचीन भारतक गौरवमई अतीत पर मुग्ध भऽ उठैत रहलाह।सुनके जन्म बाबू रवि सिंह जीक घर 23सितम्बर1908ई0केँ बिहार राज्यक मुँगेर जिलान्तर्गत सिमरियाघाट ग्राममे भेल रहैन।ओ मुलत: हिन्दी भाषाक कवि रहथि।हुनक कवितामे देश प्रेम, राष्ट्रीयता आ मानवतावाद'क भावनाक प्राचुर्य रहैत य। शोषण-उत्पीड़न ,पतन आ विषम्य केर प्रति हुनक हृदय हुंकार कऽ विद्रोह करैत रहैक।वर्त्तमानमे विशेषतः काव्यमे शोषित समाजक प्रति करुण सहानुभूति आ पैघाउत देखबैय बालाक प्रति आक्रोशक भावना देखाईछ-: श्वानो को मिलता दुध-वस्त्र,भुखे बालक अकुलाते हैं! माँ की हड्डी से चिपक ,ठिठुर जाड़े की रात बिताते हैं!! तेँ दिनकर जीक काव्य केँ दलित मानवता आ सिसकैत करुणाक काव्य कहल गेल हन्।सुनके कविताके द्विवेदी युगीन आलोचनात्मक काव्यधाराक ओजस्वी, प्रगतिशील संस्करण मानव जाइछ। एहिमे विचार तत्व केर प्रधानता छैक।दिनकरजी आधुनिक कविगण'क पहिले पतियानीमे बैसबाक अधिकारी रहल छथि;ताहिपर कोनूटा अतिशयोक्ति नहिँ।परञ्च एकटा गद्यकारक रुपमे सेहो दिनकर जीक अतिशय ख्याति रहलनि अछि। सुनके गद्य साहित्य अत्यन्त प्रौढ़ आ विचारात्मक अहि।राम चन्द्र शुक्ल जीक अनुसारे --॓गद्य कविजन केँ कसौटी मानव जाइछ, दिनकर जी ताहि कसौटी पर पूर्णतः ठाढ़ उतरैत छथि ॔।आओ मुख्य रुपेँ विचारात्मक आ समीक्षात्मक निबंध लिखने छथि। संस्कृति के चार अध्याय नामक अपन पोथी मेँ ओ भारतीय संस्कृतिक विस्तृत विवरण प्रस्तुत केने छै। दिनकर जीक भाषा शैलीमे प्रवाह आ सौष्टव परिपूर्ण रहलैक।काव्य भाषाक तरहेँ हुनक गद्य साहित्य सेहो परिमार्जित छैक। वैचारिक संगे भावनात्मक अपूर्व संयोग दिनकर जीक गद्य शैली ॔क सबसँ पैघ विशेषता छी।हुनक निबंधमे यथाअवसर व्यंग्य -विनोदक चुटकी बुझाइछ। भारतीय सांस्कृतिक एकता शिर्षक आलेखमे देशक एकता पर गहन विचार कएल गेलैक।एहि देशक विभागमे रीति-रिवाज,खान॒-पीन,रहन-सहन अधिक दृष्टिसँ प्रर्याप्त अंतर छैक।तैयो ओही बाह्य अंतरक बालों अपना देशमे केहेन तरहक आंतरिक एकता कायम छैक,सयह बुझेबाक जी लेखकेर प्रतिपाद्य थिक। रामधारी सिंह दिनकर जीक प्रतिभा 1932ई0मे देखल गेलैन ,जहन ओ पटना विश्वविद्यालय सँ बीए0आनर्सक (इतिहास) परीक्षा उत्तीर्ण करने छलैक।ओ स्वंय बरबिघा हायस्कूलमे प्रधानाध्यापक केर नोकरी केलनि। सब रजिस्ट्रार पद पर सेहो नियुक्त भेलाह। किछु दिनकर लेल आकाशवाणी मेँ काज केलैन आ किछु समय लेल हिन्दी विषयक प्रोफेसर सेहो लंगट सिंह कालेज मुज़फ्फरपुर मेँ बनल रहथि। राज्यसभामे 1952सँ1963धरि मनोनीत सदस्यो भेलाह।बादमें भागलपुर विश्वविद्यालय केर कुलपति पद केसुशोभित केलथि।हुनकर विद्यार्थी जीवन कालेमे प्रणभंग नामक काव्य 1929ई0मेमौलिक रचना प्रकाशित भेल रहैन।1965सँ1972धरि भारत सरकार केर गृह विभाग मेहिन्दी सलाहकार बनल छलाह । जीवन पर्यन्त ओ साहित्य सेवा में लांगल रहलाह।एहनो क्षण जीवन में अएलैक जे ज़बान बेटाक असामयिक मृत्यु सँ पैघ अघात केँ नहिँ सहित सकलाह आ 24अप्रील1974ई0केँ आन्ध्रप्रदेशक तिरुपति केर भगवान व्यंकटेश्वर देवविग्रहके अपन व्यथा कथा समर्पित करैत घुमैतकाल मद्रास शहरमे एहि नश्वर संसार सँ चलि बैसलाह ।सुनके काव्य रचनामे रेणुका ,रसवन्ती,द्वन्द्व गीत , हुंकार ,धुप-छाह ,सावधेनी,एकायन, इतिहास के आँसू,धुप और धुआँ आदि प्रसिध्द छन्हि।खण्ड काव्यमे प्रमुख रुप सँ कुरुक्षेत्र,रश्मिरथीकेँ जानल जाइछ।गद्य संग्रह मिट्टी की ओर , अर्द्धनारीश्वर आ लेती के फूल चर्चित रहनि।बाल साहित्यमे चित्तोर का साकार,मिर्च का मजा बढ़ लोकप्रिय भेलनि। अपन काव्यगत विशेषता सँ राष्ट्रीय असहयोग आंदोलन, गांधी जीक विचारधारा सँ प्रभावित रहथि।हुनका रवि बाबू, इकबाल आ नजरुल इस्लाम सँ प्रेरणा भेटलनि। भारतवर्षमे विविधतामे एकता देखब,इयह विशेषता थीक। प्रत्यक्ष एकता जतेक कसगर छैक तँ विविधता सेहो ततबे प्रकट छैक।देशक मानचित्रकेँ ध्यानसँ देखला पर स्प्ष्ट देखाईछ जे एहि देशक तीनकात प्राकृतिक दृष्टि सँ एकदम स्पष्ट य। सबसँ पहिले उत्तर भागमे लगधक हिमालय,तकर दक्षिण सँ विन्धाचल धरि उत्तरमे पसरल छैक आ एकरबाद विन्धय सँ ल'केँ कृष्णा नदीक उत्तरधरिके उ भाग जे हम सब दक्षिणी प्लेटो कहैत छी। से कृष्णानदीसँ कुमारी अन्तरीप धरिक भाग प्रायद्वीप जेहन य।उत्तर सँ दक्षिणके जोड़ैत रहबाक अतीतमे गौरवपूर्ण चर्चा छैक। ऋषि-महर्षि उत्तर सँ दक्षिण आबिकऽ एकताक संदेश देने रहैथि।जाहिमे प्रथमतःअगस्त्य ऋषिजीक नाम अबैत छैक।फेर भगवान श्रीराम चन्द्र तँ लंका पर चढायके क्रममे विन्ध्याचल पार केने रहथि। महाभारत केर जमानामे महाराज युधिष्ठिर क'राजसूय-यजज्ञमे दक्षिणक राजा धरि आयल छलथिन। कुरुक्षेत्र क'महायुध्द मैदानमे दक्षिणक बहुतों वीर हिस्सा लेने रहैक।एहि तरहेँ चन्द्रगुप्त,सम्राट अशोक, विक्रमादित्य आ बादमें मुगल शासनक अधिन समस्त देशक सफलता एकता लेल भेलैक।कालखण्डमे स्वार्थी,अदुरदर्शी आ कमजोर राजाक प्रार्दुभाव सँ देशक एकता टुटल;वैर भाव ततेक नै प्रवल भेलैक जे क्षेत्रीयबोध ,प्रान्तीय जोशधरि सुटैक गेलैक।एहिदेशमे जतय सालोभरि चेरापूंजीमे5इंच बरखा होइछ तँ कार मरुभूमि मे बूँदभरि पानि लेल तरसैत रहैत छैक। वर्त्तमानके कोनो विशेष विधाक युग नहि कहल जा सकैछ, आ ने कोनो एहन प्रकान्ड लेखके छथि जे एहि कालपर अपन स्पष्ट छाप छोरमे होथि। मात्रे प्रेम सँ भड़ल छोट छीन कविता आ प्रेमी-प्रेमिका सँ भड़ल अश्लील कथा आओर छोट-छोट उपन्यास धरि रचल जा रहल अछि। वर्त्तमानक दाड़मे एखन कोनू निश्तुकी सम्मति नहिं देल जा सकैत छैक। निराला, महादेवी,पन्त आ गुप्त जीक काव्य निठाहे अपन ऐतिहासिक महौत रखने य, किन्तु ताहूँ के पढ़य वाला आई कतेक लोक छथि?
५ श्रीमान मोन पड़ैत छथि
झंझारपुर'क माँटिपानि पर श्रीमती नागेसरी देवीक (गरबावाली) कोइख सँ ५अगस्त१९४०मेँ जनमल बालक'क नाम पड़ल रामदेव बाबू। श्रीमान रामदेव भंडारी जीक शिक्षा दिक्षा गामेक केजरीवाल हायस्कूल सँ मैट्रिक धरि भेलैक। दरिभंगा क' सी एम् साइन्स कॉलेज सँ बी एससी आ पोस्टग्रेजूएट १९६६मेँ पटना विश्वविद्यालय सँ केलनि, जतय सेकेंड टापर 'क संगहि गणित विषय मेँ गोल्डमेडलिस्ट भेलाह। किछु दिन समस्तीपुर कालेजमे प्राध्यापक केर काज कयलन्हि। भैयारीमे एसगर रहलाक कारणेँ ओतय सँ गाम आबि पैघ भूस्वामी'क नाते घरे पर रहलाह। ल०ना० जनता महाविद्यालय मेँ ओही समय एतेक योग्यतम व्यक्ति नहिँ भेटने ,हिनके व्याख्याता रुपेँ राखल गेलैक। झंझारपुर'क एहि कालेजमे ओ विभागाध्यक्ष आ प्रोफेसर भ' केँ सेवा दैत रहलाह। स्थानीय व्यापार मंडल आ सहकारी समिति मेँ सेहो चुनेलाह। हुनकर मामाजी स्वाधिनता सेनानी स्व० अनन्त लाल कामत अपन सभापति हेबाक नाते सुजातीय महासभाक प्रान्तिय अध्यक्ष धरि हिनका सुपौल महाअधिवेशनमे बनावल। सन् १९७९ई०मेँ जननायक कर्पूरी ठाकुर जीक सानिध्यमे राजनीति सीखय लगलाह आ ८०ईं०मेँ विधायक पद लेल झंझारपुर विधानसभा क्षेत्र सँ दमकिपा सँचुनाव लरलाह। एहि चुनाव मेँ डाॅ०जग्रनाथ मिश्र (कांग्रेस) भूतपूर्व मुख्यमंत्री सँ पछुवा गेलाह। सामाजिक-राजनीतिक जन आन्दोलनक ' हिस्सा बनैत ओ डी आई आर मेँ जहलधरि गेलाह। आपतकालके समय बहुतो शोसलिष्ट नेता आ कार्यकर्तागण केँ हिनका सँ सब तरहक सबके सहयोग भेटैत रहलैक बिहारक तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव जी हिनका १९९२सँ २००८ धरि लगातारे राज्य सभामे तीनखेप बतौर माननीय सदस्य चुनैत राष्ट्रीय जनता दलके प्रधान महासचिव मनोनीत कयल। राजभाषा हिंदी विभाग'क समिति में सदस्य रहथि आ मैथिली लोकगीत गायन रेडियो पर आ बहिणक गाम परसामे जन-जनके बीच सुनाबथि, से हुनकर मीठ गलाके कैंसरक नजैर लागि गेलैक। आओर वो २१सितम्वर २०१८केँ मध्यरात्रि एहि धराधाम पर अपन व्यक्तित्व आ कृतित्व छोड़िकए हमरा सबसँ दुर चलि गेलाह, बहुत दुर अनन्त यात्रा पर..। विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करैत छी हम।
६ सरौती सपुत : खुशी बाबूक उपलवधि कोनो एहन व्यक्ति नहिँ एहि धराधाममे जिनक कोनू इतिहास नहिँ होय। किनको कम तँ किनको बेसी ख्यायित। एहनेमे मोन पड़ैत छथि बाबू खुशी लाल कामत। हिनक जीवनी पाठकगण पढि अवश्ये अभिभूत भेल होयत। किछ विशेष जनतब संक्षेपमे राखि रहल छी। ओ वैष्णव छलाह आ प्रगतिवादी विचारधाक एक कोसी क्षेत्रिय स्तंभ रहथि। तेँ घोघरडीहा बाँध सँ दक्षिण आबय बला अनेक समाजशास्त्री, पर्यावरणविद् आ राजनेता सबसँ पहिले सरौती गाम आबि खुशी बाबू सँ भेंट करथि आ विमर्श। शिक्षाक अलख जगेबामे हुनकर छोट सतभाय नागे बाबू सेहो खूब यशस्वी भेलाह, मुदा ताहि पाछु हिनके हाथ रहनि। अपन गामक नवटोलिया ( दक्षिण ) मेँ प्रथमत: लूअर प्राइमरी स्कूल खोलबेलनि। जामुन गाछतर पठन-पाठन कार्य आरम्भ भेलैक। वादमे ओहि स्कूल केँ अपर प्राइमरी'क दर्जा सरकार सँ दियेलनि। ओहिमे शिक्षक पद पर ड्यौढ़ निबासी शिबाकान्त झा चटिया सभके पढ़ौनी करय। हुनका आ आरो अनेको लोकके ओ गुरूजीक सरकारी नौकड़ी धरेने रहथि। निघमा पंचायत केर तत्तकालीन मुखियाजी कमल नारायण यादव ग्राम पंचायत चुनावमे ओहि सरौती विद्यालयके बूथ दक्षिण सँ उत्तर अपना गाम निहमा आनय लेल तैयार भेल छलाह। विद्यालय केर आलय नहिँ रहला सँ ओ अपन गौशालामे मतदान केंद्रक उद्देश्य सँ जगह देने रहथि। कमल बाबूक आवेदनक जाँच डिप्टी अधिकारी केँ झक्खी सोभावक मास्टर साहेब बतेलकनि हम खुशी बाबूक नीजी बैलघरमे विद्यार्थीगणकेँ पढ़ाबैत आबि रहल छी। एहि जाँचक प्रतिवेदन अनुसारे बूथके स्थानान्तरण होएब निठाहे रहैक। तखन खुशी लाल बाबू घर सँ कनेकबे पुबभर अपन सात कठा अठारह धुर जमीन स्कूल लेल दान - पत्र लिखकय गामक बूथ कायम राखि गौआँक नाक बचेलनि। एतबे नहिँ मुजलिया कैम्प पर सँ अपन हिस्साक घर उठाकय विद्यालयके घर बनौलनि। जमीनक खाधिकेँ ग्रामीण जन सँ माइट धर्छन आ छिटा - कोदारि सँ भराएल गेलैक। ओहि बे्रक मुखिया जी पद पर चुनाव लेल गौंवारी बैठारमे काशी बाबूकेँ अपन पिताजी हजारी बाबूक जगह पर ठाढ़ हेबाक बात पक्की भेलैक। मुदा सुड़ियाही कामैत पर खुशीबाबू सँ आशिर्वाद लैत राजकुमार बाबु सोझे दरभंगा कालेज सँ घोघरडीहा आबि नवनेशन करैते गाम अयलाह आ निर्वाचित भेलाह। से दोसर बेरक चुनाव इन्जेकशन सुट लगला सँ रूकि गेलैक आ ३१ शालधरि लगातार हजारी बाबूक जेष्ठ पुत्र मुखिया बनल रहलैथ। खुशी बाबू अपन माय स्व० शंकरवती देवी नैहर पचगछिया आ धर्मपत्नी स्व० घुरनी देवी नैहर मुसहरनियाके निधन पर घाटबाट (कर्मकाण्ड) भोजभात क' जैकार करा देलनि। ओ आयुर्वेद चिकित्सा केर परम्परागत उपचार लेल स्वयं सर्टिफिकेट कोर्स करैत जीवन पर्यन्त लोकक भलाय करैत रहलाह। किछ दवाई बाढ़िक समय वैद्यनाथ आ डावर कम्पनी'क सेहो राखैत राति विराति रोगी लेल बाँटथि। करनिनयां रातिके कारणीकेँ आगमन पर औषथिक पूर्जी लिखयमे नहिं असकताथि। काका कालेलकर आयोग केर संग अतिपिछड़ा वर्ग सुचिमे हिनके कहब पर केबट ( कियोट) के पक्षमे तर्कसंगत आधार धरि बनि सकलै। हिनक साक्षात्कार वादे कर्पूरी ठाकुर जीक अभिक्रम रहनि तेँ खुशी बाबू सँ पुछिके जानिकेँ तखन ओ नाई समाजके दृष्टिकोण सँ समस्या मुजफ्फरपुर म उठेलथि। फुलपरास विधानसभा क्षेत्र सँ विधायक पदके उपचुनावमे (१९७८ ई०) जहन बिहार 'क मुख्यमंत्री मा० कर्पुरी ठाकुर जी उम्मीदवार रूपेँ अयलाह तँ कोशीवेल्टमे सरौतीक भुतपूर्व मुखिया हजारी बाबू ओहिठाम रात्रि प्रवासके रूटीन बनल। ताहि लेल हुनक हाथी पर नौआबाखर केर नदीमे नवनिर्मित चचेरी पुल लग सँ सभा कचहरी पर करैत ओ सरौती गेलथि। ओहाठाम खुशी बाबुके बजाकय स्व० ठाकुर जी कहलथिन - ऐ इलाकामे अपनेक रहैत सोझ सड़क आ सरकारी हाईस्कूल नहिं! एहि ले जगह -जगह पर व्यक्ति अपन - अपन सामुहिक माँग इयह दूनू समस्या क' समाधान ले नारा बुलन्दधरि कयने रहैक। तोरण द्वार आ मेहराउ लग खुशीलाले बाबु लोकके उत्प्रेरित कय मुस्तैद रखने छलाह। से सरौती गाममे सार्वजनिक हाईस्कूल आ सरौती सँ घोघरडीहा बजारधरि पक्की सड़क बनलै। प्रथमत: कोशीक्षेत्रीय आठ सर्कल केर आम जनता श्रमदान करैत मिट्टी कार्य कयलनि। एक जगह बिचलाखेत सँ डगर घीचैले भूमिक मालिक अर्चन ठाढ़ केलाह तँ खशीबाबू केँ हटनीक मनमोहन बाबुक छोटपुत्र श्री लखन झा जी अपन भगिनमानके बुझाबैत माँटिक बदला माँटि तेरह कठा जमीन साइकिल मिस्त्री केँ लिखदेलनि। ऐ काजकेँ सफल बनेबामे खुशीबाबू केँ लक्ष्मी कांत ज्योतखिजीक खुब साहचर्य भेटलनि। आइयो एहि २७ नम्बर टेढ़ सड़क पर चलैत एहिक निर्माणके संघर्ष पथिक मोन पाड़ैत छैक। कौमरैड जटाशंकर मिश्र जीके सँग अनेकों लालपाटीक लोक जे सरौती सँ घोघरडीहा तकके रोड लेल सब महिना उजराइतके समय अंचल कार्यालय केर घेराव करैत छलैक। तहिना सरौती हाईस्कूल खातिर इलाकाक लोक बाँस खर सहयोग करैत खुशीबाबू केँ आगुबढ़ि समर्थन दैन। ओ तिनू भाय ५.एकड़ जमीन आ पाँच हजार टाका दान देलथिन। एहि स्कूलके खड़ौआ लालदास हाईस्कूल केर सँगे कर्पुरी जी मंजूरी देलखिन। खुशी लाल बाबू अपन इलाकामे जल जमाव समस्या निदान लेल बुढ़ अवस्था धरि पटना दौड़धूप करैत रहलाह। कोशी तटबंध'क भीतर पड़री - मैनही सँ नौआबाखर होईत धावघाट आ विशनपुर धरि लगधक २० किलोमीटर पुब सँ सोझे पछिम मुहेँ धार बहैत छै। इयह विहूल बलान (भुतही) नदी नरहिया सँ चतराटोल सखुआ होइत छजना धरि पछिम सँ पुब मुहें जलधारा बहैत छै। ओना सोभाविक रुपेँ सब नदी मिथिलामे उत्तर सँ दछिन दिशन बहाऊ केने अछि। आपसी झंगरआ- झंझटि ऐ क्षेत्रमे जाहि कोनू विषय वाबत होय तँ पँच आ झमेलिया लोक हुनका लग कानूनन तर्कसंगत बात बुझय,एहन सलाह लेल आखिर वकीलके फीस देबय पढ़ैत- रहैछ। से एहन उपकारी व्यक्ति रहथि सौभाग्यशाली खुशी बाबू। कहय चाहैत रही जे कोशी बाढ़िक वाद जे कुदरती परिवर्तन सँ इलाकाक अमही देवनाथपट्टी निघमा सरौती राजस्व मोजेक खेतीभुमिमे जलजमाव ९ मासधरि ठहराउ रहैछ ,जाहि कारणें रव्वि,खरीफ आ गरमा खाद्यान्न नहिं उपजैत छैक। तकर लघु सिंचाई विभाग सँ परसा अलोला सँ हड़री मौजा आ नौआबाखर अमही देवनाथपट्टी निघमा सरौती मोजेक जल अधिग्रहित क्षेत्र सँ निकासी लेल छोट नहरी बनेबाक सतत् प्रयास तत्कालीन मंत्री श्री मंगनीलाल मंडल जी सँ नक्शा ट्रेशींग आ आमजनता केर हस्ताक्षरित आवेदन दैत गुहार लगेलनि। संयोगवश एखनो जल संसाधन विभाग क' मंत्री अररियाक सोहनजी परिवार सँ मा० संजय झाजी छथि। मुदा विभागीय उदासीनता सँ आजादिक अमृत काल वर्ष धरि हुनक सपना अधुरा बनल एतुका किसान केँ मुँह दूईस रहलैक अछि। एहि क्षेत्रक लोक कतेको बेर सरकारी स्तरके सर्वेक्षण होईत देख आश बनौने रहल,मुदा सब बेर ऐ कठिण मुद्दा पर चुप लगौने हाथ पर हाथ धऽ बैसल राज्य सरकार केर उपेक्षापुर्ण रबैया सँ छगुन्ता बढले चला जाईछ। ऐ बातक मलाल हुनकर दिवंगत आत्मा केँ सेहो सालैत हेतनि।बसन्त पंचमी सरस्वती पूजा दिन हुनक अबसान भेल रहनि। ताहि दिन सभ साल हुनक स्टेचू पर माल्यार्पण श्रद्धांजलि कार्यक्रम हुनक एकमेव श्रवणपुत समान सरौती होस्पीटल केँ किनकेँ जमीन दाता श्री हरिनाथ बाबू लगैत छथि। हुनका नामे हमरो दिशसँ शत् शत् नमन। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.प्रणव झा- पुस्तक समीक्षा : मैथिली वेब पत्रकारिताक इतिहास (लेखक : आशीष अनचिन्हार) प्रणव झा पुस्तक समीक्षा : मैथिली वेब पत्रकारिताक इतिहास (लेखक- आशीष अनचिन्हार)
हरेक भाषाक विकास और ओकर साहित्यक अपन एकटा इतिहास होइत छैक। इतिहास लेखनक परंपरा मनुष्य अपन विकासयात्राक अवलोकन आ अभिलेखन लेल शुरू केने हेतै। वर्तमान युग डिजिटल युग छैक। यद्यपि डिजिटल युग के शुरुआत तऽ दुनिया मे 80क दशके सँ शुरू भऽ गेल रहैक मुदा भारत मे वेब आधारित डिजिटल क्रांतिक वास्तविक विकास यात्रा 21म शताब्दीक शुरुआत सँ मानल जा सकैत अछि। भारतक विभिन्न भाषाक संग मैथिली सेहो ऐ यात्रा मे 21म सदीक शुरुआती दशके मे सहयात्री बनल। और गोटा-गोटी प्रयास आ प्रयोग सब के बले बढि कऽ आइ इंटरनेटक दुनिया मे खूब पल्लवित-पुष्पित भऽ रहल अछि। आइ डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम सँ जतs कतेको मैथिल युवा सब गीत-नाद, ब्लोगिंग, इंस्टा-रील मेकिंग, यूट्यूब ब्लोगिंग आदि के नै खाली मनोरंजन दृष्टिए अपितु करियर आ जीविकोपार्जनक रूप मे सेहो उपयोग कऽ रहल छथि, तऽ किछु मैथिल उद्यमी सब अपन उद्यमक प्रचार-प्रसार आ वाणिज्यिक गतिविधि लेल सेहो उपयोग कऽ रहल छथि। डिजिटल माध्यम गाँव गाँव के दाइ-माइ के गीत-खिस्सा सब के सेहो डोकुमेंटेड करबाक आ दुनिया के समक्ष रखबाक अवसर देलक अछि। आइ मैथिलीक स्थापित यूट्यूब मनोरंजन आ समाचार चैनल उपलब्ध अछि। मुदा ई सब एक-दू दिन मे भs गेल होइ एहन बात नै छैक। एत्तऽ तक पहुँचबाक विकास यात्रा निश्चिते शून्य सँ शुरू भेल छैक।
एहि यात्राकेँ अभिलेखित करबाक एकटा फलित यत्न छैक मैथिली साहित्यकार आ गजल विशेषज्ञ आशीष अनचीनहारक पुस्तक ‘मैथिली वेब पत्रकारिताक इतिहास’। जेना कि लेखक ऐ पुस्तकक प्रारंभे मे पत्रकारिता के परिभाषित केलाह अछि जे पत्रकारिताक अर्थ भेल जे सूचना के अन्वेषन आ प्रसारण। आ किए कि सूचना के माध्यम समाचार के अतिरिक्त साहित्य, विज्ञापन, गीत-सिनेमा, सोशल-मीडिया, फॉन्ट-लिपि आदि सब होइत छैक अतएव ऐ विषय पर लिखल गेल ऐ पुस्तक मे डिजिटल माध्यम द्वारा मैथिली आ मैथिल समाज के प्रचार-प्रसार के विकास यात्रा के चैप्टर बाई चैप्टर व्याख्या कैल गेल अछि।
अलग-अलग चैप्टर मे अलग-अलग विधा यथा ब्लोगिंग, डिजिटल पत्रिका, फॉन्ट, सोशल मीडिया, यूट्यूब, फेसबुक, ई-कॉमर्स, धर्म-संस्कृति आदि आदि माध्यम के प्रारम्भ खोजबाक आ आगूक विकास क्रम के खोजबाक प्रयास लेखक द्वारा कैल गेल अछि। पुस्तकक अध्ययन के आधार पर ई कहल जा सकैत अछि जे लेखक अइ पुस्तक के केवल अपन अंदाजी व अपन विचारधारा के आधार पर नै लीखि देने छथि अपितु एकटा श्रमसाध्य शोध के आधार पर ई डेटा आ विवरण संकलित कैल गेल अछि। पुस्तक मे लेखक द्वारा प्रस्तुत कैल गेल संदर्भ, चर्चा आर व्याख्या एकरा अनुमोदित करैत अछि। संगहि हमर निजी गवाही सेहो ऐ बात के लऽ कऽ अछि किए तऽ कइएक बेर लेखक हमरो से ऐ पुस्तक मे प्रस्तुत विभिन्न आयाम के लऽ कऽ विस्तृत चर्चा आ क्वेश्चनेयर केने छलाह। निश्चिते हमरा सन-सन बहुतो लोक सब सँ क्वेश्चनेयर आ डाटा कलेक्शन के बादे ऐ पुस्तक के ढाँचागत रूप देल गेल आ तकरा बाद के परिशोधन आ समीक्षा के परिणामस्वरूप एकर वर्तमान रूप थिक।
पुस्तक मे नै खाली मैथिली वेब पत्रकारिताक विकास यात्रा के चरण के डेटा सहित विवेचन देल गेल अछि अपितु हर विधा मे शुरुआती आ प्रमुख पेज के सूचीबद्ध कैल गेल छैक जे बहुत मायने मे विभिन्न लोक/अभ्यर्थी/शोधार्थी आदि लेल उपयोगी भ सकैत अछि। लेखक कहै छथि जे अपना भरि हुनक प्रयास रहल अछि जे पुस्तक मे देल तथ्य मे त्रुटि नै होइ आ तै लेल संग मे साक्ष्य सेहो देने छैथ, मुदा तथापि कोनो संशोधन के गुंजाइश होइक तऽ तथ्य आ साक्ष्य के संग चर्चा कैल जा सकैत अछि। ऐ पुस्तकक अध्ययन के दौरान हमरा मोन मे विचार चलि रहल छल जे ई पुस्तक के एकटा योग्य शोधपत्र के रूप मे देखल जा सकैत अछि आ लेखक चाहितथि तऽ ऐ शोधपत्र के माध्यम से पीएचडी कऽ सकै छलाह। हा..हा..हा...। तथापि मैथिली सँ पीएचडी के लेल ई एकटा नीक विषय आ नीक शोधपत्र भऽ सकैत अछि।
लेखक पुस्तक के विभिन्न विषय के लऽ कऽ सोशल मीडिया पर चर्चा-परिचर्चा, साक्ष्य आदि के किछ स्क्रीनशॉट सेहो देने छैथ। ऐ विषय मे एकटा टिप्पणी देब’ चाहैत छी जे डिजिटल कॉपी मे तऽ ठीक छै मुदा प्रिंट वर्जन मे स्क्रीनशॉट के फोटो सब के कनी क्रॉप कऽ एनलार्ज करबाक दरकार छल जै सँ कि पाठक के काज के चीज ज्यादा स्पष्ट दृष्टिगोचर भ सकैत छल।
लेखक के डिजिटल माध्यम मे मैथिली आ मैथिल समाज के विकासयात्रा के विकासक्रम के डोक्यूमेंट करबाक लेल पुनः साधुवाद आ शुभकामना।
जय जानकी। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.८.आशीष अनचिन्हार-अछांदिक कविताक दरबारमे 'छंदोबद्ध सुशील दोहावली' आशीष अनचिन्हार, संपर्क-8876162759 अछांदिक कविताक दरबारमे 'छंदोबद्ध सुशील दोहावली'
चिन्हार केर उल्टा अनचिन्हार भेल, तहिना 'दुअवह' केर उल्टा 'अवदुअवह' भेल। 'दुअवह' केर एकटा समांगे छै 'अवदुअवह' मुदा एहन समांग जकर चालि-प्रकृति अलग-अलग हो। 'दुअवह' अपन रूप-रंग बदलैत रहल कहियो 'दोहअ' बनि गेल, कहियो 'दोहक' बनि गेल, कहियो दूहा बनि गेल अंतमे आ बहुत रास उपभेदक संगे दोहा नामसँ प्रसिद्ध भेल। 'अवदुअवह' सेहो नाम बदलैत रहल। जेना मिथिला पेंटिंगकेँ मधुबनी जिलाक किछु गाम तेना ने चित्रकलाक संसारमे प्रस्तुत केलकै जे ओकर दोसर नाम 'मधुबनी पेंटिग' भऽ गेलै तेनाहिते बहुत विद्वान ई मानै छथि जे सौराष्ट्र देशक कवि सभ 'अवदुअवह' केर ततेक विलक्षण प्रयोग केलाह जे बादमे ओकर नाम सोरठा भऽ गेलै। एहिसँ ईहो स्पष्ट भेल जे दोहा केर उल्टा सोरठा होइत छै। दोहा एवं सोरठा दूनू दू-दू पाँतिक होइत छै जाहिमे कुल चारि पाद (चरण) हेबाक चाही। दोहा एवं सोरठा दूनू लेल हरेक पाँतिमे 24 मात्रा चाही मुदा यति विधानक कारणे दोहा एवं सोरठा अलग-अलग बाट पकड़ि लैत अछि। दोहा लेल ओकर दूनू पाँतिक 13 एवं 11 मात्रापर यति चाही। तेनाहिते सोरठाक दूनू पाँतिमे 11 एवं 13 मात्रापर यति चाही। समय-समयपर दोहाक रूप बदलैत रहल (मात्रा चौबीसे रहलै) मुदा आवृतिक हिसाबें एकर संरचना 6+4+3 एवं 6+4+1 बेसी नीक मानल गेल आ अंतमे गणविधानक अनुसार 2-1 (ऽ। अर्थात गुरू-लघु) रहब अनिवार्य सेहो मानल गेल। संगहि दोहाक दूनू पाँतिक अंतमे तुकांत रहब अनिवार्य छै मने दोहाक दोसर ओ चारिम चरणमे तुकांत हेतै। लय बेसी हो ताहि दृष्टिकोणसँ दोहाक आरो बहुत नियम छै जकरा पाठक छंदशास्त्रसँ सीखि सकै छथि। सोरठा एक ठीक उल्टा एकर दूनू पाँतिक प्रारंभिक चरणमे तुकांत अनिवार्य छै माने पहिल आ तेसर चरणमे तुकांत हेतै। वर्तमान समयमे किछु लोक गणविधान (21)क पालन नै करै छथि। ओना नियमक पूरा पालन करैत तुलसीदासजी जे सोरठा लिखने छथि तकर चारू चरण अपन-अपन तुकांत बनबै छै जेना-
जो सुमिरत सिधि होय, गननायक करिबर बदन करहु अनुग्रह सोय, बुद्धि रासि सुभ गुन सदन
दोहाक पहिल प्रयोग इतिहासक गर्तमे अछि मुदा उपल्बध साक्ष्य केर आधारपर विभिन्न विद्वान कालिदासक विक्रमोर्वशीयम् त्रोटकमे लिखल निम्न 'उवदुअवह'केँ दोहा वर्गक प्राचीनतम रचना मानै छथि-
मइ जाणिअ मिलओअणि, णिसिअरु कोइ हरेइ जाव णु णवतडिसामलि, धाराहरु बरिसेइ
पाठक लेल एक बेर ईहो हम सूचित करब जे 'उवदुअवह' आ 'अवदुअवह' दूनू अलग नाम छै। नजरि इम्हर-उम्हर भेलासँ एकसमान लागि सकैए दूनू तँइ हम सूचित केलहुँ। कालिदासक समय एवं तकर बादक समयमे दोहा वर्गक रचना होइत रहल एवं बौद्ध सिद्धक समयमे ई अपन उत्कर्षपर पहुँचल। सरहपाद सन तेजस्वी रचनाकार एहि दोहा विधाकेँ भेटलै आ ई तकर बाद लगभग 800 बर्ख धरि कवि हृदयपर राज केलक। तकर बाद एकर प्रचलन कम भेलै मुदा टुकटाक लिखाइत रहल आ से दोहा आइयो लिखा रहल अछि। आ अही क्रममे हमरा भेटल श्री सुशील लाल दास रचित "सुशील दोहावली, भाइ-1"। एहि पोथीपर हम बादमे चर्चा करब ताहिसँ पहिने ई चर्चा कऽ ली जे किए छंदोबद्ध रचना अपन तमाम आकर्षण बादो समकालीन जनता लग किएक नै पहुँचि सकल। चूँकि हम मूलतः गजलपर काज केने छी आ गजल सेहो छंदोबद्ध रहैत छै तँइ अहू सभ बातपर विचार केने छी जकरा एहिठाम दोहरा रहल छी। हमरा जनैत छंदोबद्ध रचना दू कारणसँ जनतासँ कटि गेल पहिल- समकालीन भाषाक प्रयोग नहि करब आ दोसर समकालीन भावकेँ छोड़ि देब। आब विस्तारसँ चर्चा करी। एकटा पाठकक रूपमे जखन हम कोनो छंदोबद्ध रचनाकेँ पढ़ैत छी तऽ हम निराश भऽ जाइत छी ई पढ़ि जे ओहिमे सौ बर्ख पुरान शब्दावलीक प्रयोग सेहो कएल गेल रहैत छै। किछु छंदोबद्ध रचनाकारसँ बात केलापर ई पता लागल जे छंदक कारणे भाषाक पुरान स्वरूप लेल जाइत छै आ एना करब मजबूरी छै। मुदा हमरा जनैत ई वाजिब नै भेल। एकर निदान लेल या तऽ लेखक समकालीन भाषापर पकड़ि बनाबथि वा छंदहिमे प्रयोग कऽ आन छंदक प्रचलन करथि। आखिर हरेक समयक भाषा ओ कवि अपना अनुकूल छंदक चुनाव केने छै। वैदिक कालमे गायत्री छंदक प्रचलन बेसी रहै मुदा पौराणिक कालमे अनुष्टुप् प्रधान भेल। तऽ फेर आइ कोन समस्या छै जे नव छंद नै बनि सकैए। ई अलग बात जे कविकेँ पुरने बाटपर चलब सुभितगर लागनि। मुदा एहि सुभीताक कारणे नोकसान भऽ रहल छै छंदोबद्ध काव्यकेँ। दोसर मुख्य समस्या छै समकालीन भाव ओ विचारकेँ छोड़ि वएह पुरना नीति, धर्म आदिपर रचना लिखब। एहन नै छै जे नीति, धर्मपर रचना लिखब खराप छै मुदा ताहि केर संदर्भ, बिंब, उपमा आदि समकालीन हेबाक चाही। विविध विषयपर छंदक रचनाकार नहि लीखि पाबै छथि तँइ हुनकर रचनाक पाठको नहि छनि। हमरा जनैत छंदोबद्ध रचनाकार जतेक मेहनति छंदपर करै छथि ताहि संगे जँ ओ अपन समकालीन समय एवं घटनापर मेहनति करथि तऽ एक बेर फेर भारतक काव्य जगतमे छंदोबद्ध काव्यक सौरभ पसरि सकत। मुदा ई भार के लेत? जहाँ धरि मैथिलीक प्रश्न अछि एहि भाषामे ई भार गजल विधा अपना कान्हपर लेने अछि एवं अपना भरि प्रयास कऽ रहल अछि। छंदोबद्ध काव्य लीखब नीक बात मुदा ओकरा जनताक अनूकल बनाएब आरो नीक बात। आ ताहि दिशामे हमरे लोकनिकेँ काज करऽ पड़त। अछांदिक काव्य तऽ बैसि कऽ मजा रहल अछि। मैथिलीक आसनपर बैसल अछि, मात्र दुइए कारणसँ पहिल ओकरा लग समाकलीन भाषा छै दोसर समकालीन घटना छै। समकालीन घटनासँ मोन पड़ल जे कवि समाकालीनक नामपर रचनामे मात्र व्यंग्यक पुट दै छथि। व्यंग्य समकालीनताक एकटा तत्व भेल संपूर्ण नै। व्यंग्यक अतिरिक्त समकालीनताक आरो तत्व सभ छै। एहिठाम पहुँचि एकटा बात फेर हम कहब जे कि गजलपर विचार करैत कहने छी जे मैथिलीमे मात्र तुकांत देखि कऽ ओकरा छंदोबद्ध मानि लेल जाइत छै से गलत अछि। तुकांत हएब अलग बात छै आ छंदोबद्ध हएत दोसर बात। मात्रिक छंदमे, छंदक अतिरिक्त तुकांत सेहो चाही मुदा पहिले छंद चाही। ऊपरक संक्षिप्त चर्चाक बाद हम आबि जाइ "सुशील दोहावली, भाग-1"पर। आ ताहिसँ पहिने कविपर। एहि पोथीक कवि डा. सुशील लाल दास Mechanical Engineering विषयमे PHD केने छथि आ Jeppiaar Engineering College सँ प्रिंसिपलक पोस्टसँ रिटायर्ड भेल छथि। एहि पोथीमे 113 विषय केर 1006 टा दोहा संकलित अछि। हमरा जनैत मैथिलीमे एखन धरिक पहिल एहन संग्रह अछि जाहिमे एतेक संख्यामे दोहा विधाक रचना प्रकाशित भेल अछि। ओना एहनो रचनाकार सभ छथि जे अहूसँ बेसी दोहाक रचना केने छथि मुदा एहिठाम हम प्रकाशित पोथीक हिसाबें लिखलहुँ अछि। पाठक-आलोचक लग जँ एहि पहिने केर सूचना होइन तऽ हमरा सूचित करथि हम एकरा सुधारि लेब। हमरा लगैए जे ई 113 विषय एकै विषय केर अलग-अलग नाम छै। जेना धर्म, गुरू, संत, शिक्षा, ज्ञानी, अंधविश्वास, क्षमा, दया आ प्रेम आदिकेँ एकै विषय "नीति" केने बेसी नीक होइतै। तहिना आनो लेल बूझू। त्रयी शतकमे भृतहरि तीने टा विषय देने छथिन, नीति, शृंगार एवं वैराग्य। तँइ विषयकेँ संक्षिप्त केने पाठक लग बेसी सुविधा रहतनि। एहि पोथीक भाषा समकालीन अछि मुदा बीच-बीचमे एक अपवाद सेहो छै। अपवादोमे बहुलांश "केँ" विभक्तिसँ संबंधित अछि। एकटा उदाहरण दैत छी- "बरखै धारा प्रेमकेँ" ई पाँति हमरा जनैत दू रूपमे सही भऽ सकैए, "बरखै धारा प्रेमक" मुदा एहिमे मात्रा घटि जेतै। दोसर "बरखै धारा प्रेम के" एहिमे मात्रा नहि घटतै। जाहि वाक्यमे हिंदी बला "को" अबैत हो ताहि ठाम "केँ" लगतै आ ई शब्दमे सटि कऽ लिखेतै मुदा जाहि वाक्यमे हिंदी बला "का" अबैत हो ताहि ठाम "के" लगतै आ ई शब्दसँ अलग लिखेतै। "होय" शब्दक प्रयोग हम अपवादेमे गनैत छी आ एकरा बदलामे कवि "होइ" केर प्रयोग कऽ सकैत छलाह। साधारण बोलचालक भाषामे जतऽ-जतऽ "कऽ" एबाक चाही ताहि-ताहि ठाम "केँ" प्रयोग भेल अछि जे कि अर्थकेँ बाधित करैत छै जेना- "भाषा अप्पन छोड़िकेँ" घरक जे बोलचालक भाषा छै ताहिमे ई पाँति एना हेतै-"भाषा अप्पन छोड़ि कऽ" एवं एना केलासँ अर्थ बाधित नै हेतै। गजलमे लघु-गुरूपर विचार करैत काल हम विकारी (वा वर्णलोपक चिह्न)केँ हम आवश्यकतानुसार लघु वा दीर्घ दूनू मानबाक अनुसंशा केने छियै। छंदक आनो विधाक रचनाकारकेँ एहिपर सोचबाक चाही। कारण अंततः हरेक कवि एवं रचनाकेँ जेबाक छै साधरणे पाठक लग तखन ओकर भाषा वर्जित किएक हो? ओना कविकेँ समकालीन भाषाक महत्व पता छनि तँइ प्रस्तुत पोथीमे 'बोधगम्य भाषा' केर शीर्षकसँ अपन चारि गोट दोहा रखने छथि-
लीखी बाजी सोचि जे, बूझै मे आसान बोधगम्य जँ भाव तँ, बूझि देत सभ मान
आब आबी एहि पोथीक रचनामे आएल विषय सभपर। जेना कि ऊपरमे हम संकेत देने छी जे एहि पोथीक विषय अधिकांशतः पुरने अछि मुदा बीच-बीचमे समकालीन दोहा सभ सेहो अछि। खास कऽ पर्यावरण ओ प्रकृतिपर रचल दोहाकेँ हम एहि संग्रहक केंद्रबिंदु कहब (पृष्ठ,100-102-)। समकालीन विषय जे अछि ताहि किछुमे नव उपमा, नव बिंब सेहो अछि मुदा कम रचनामे। तथापि रचना प्रभावी छनि। जाहि बातकेँ कहबाक लेल अछांदिक कवि दू पन्नाक कविता लिखता, आलोचक चारि पन्नाक आलेख लिखता तकरा कवि छंदोबद्ध रूपमे मात्र दू पाँतिमे लिखैत छथि- सुविधा जँ पाबय कृषक, मनसँ जोतत खेत अपन भरन पोषण करत, राज कोष भरि देत।
एहि दू पाँतिमे कृषक केर समस्याक संकेत छै तँ ओकर समाधान सेहो। ई भेलै प्रभावशाली काव्य। भारत अपन आजादीक बादसँ मिश्रित अर्थव्यवस्था बला देश रहल अछि। आब एहि व्यवस्थाक जे लाभ-हानि हो मुदा एहि पोथीक कवि मिश्रित व्यवस्थाकेँ नीक नहि मानै छथि- चीन बनू वा अमरिका, मिलय न धारक तीर मिलबैसँ खिच्चरि बनत, खाय सकब नहि खीर
ओना एहि विषयपर अछांदिको कवि सभ नहि लिखने छथि तँइ सुशील जीक एहि दोहाक स्वागत। पोथीमे कुल छह टा दोहा कोरोना महामारीपर अछि जे कि ओहि विकारल समयकेँ रेखांकित करैत अछि। आ संपूर्ण जगतक शक्ति कोना असहाय बनि गेल छल सेहो देखबैत अछि-
अणुबमसँ सज्जित जगत, शिखर चढ़ल विज्ञान कोरोना तोड़ल सभक, अकड़ दर्प अभिमान
मुदा एहन-एहन उदाहरण कम अछि। एकटा सजग पाठक एवं छंदोबद्ध काव्यक हितैषीक तौरपर हम अछांदिक कवि आर कविताकेँ दोष दऽ कऽ बचि नहि सकैत छी। हम ई नहि कहि सकैत छी जे अछांदिक कवि सभ मेहनति नै करै छथि, बिना छंद बला कविता खराप होइत छै। हम ईहो नै कहि सकैत छी जे आधुनिक आलोचक छंदोबद्ध काव्यक दुश्मन छथि। छंदोबद्ध काव्यकेँ सभसँ पहिने अपन दोष देखऽ पड़तै, समयानुकूल परिवर्तन करऽ पड़तै, लगातार निर्मम आत्मालोचना करऽ पड़तै। ओना हमरा अपना बुझाइत अछि जे एहि पोथीक कवि संभवतः अपन दोसर-तेसर पोथीमे उपरोक्त बात सभ समावेश करताह कारण ई पोथी भाग-1 अछि। एकर आन भाग जल्दिए आएत से संभावना। ओना कतौ ने कतौ कविकेँ ई सभ बात पता छनि तँइ अपन मजबूरी, अपन अनुभवकेँ निम्न दोहामे व्यक्त कऽ सकलाह अछि।
रोकऽ चाहथि समयकेँ, कऽ रहला संघर्ष पजिऔने छथि रूढ़िकेँ, बिला रहल छनि हर्ष
हरेक पोथीमे किछु ने किछु विशेषता ओ कमी रहिते छै मुदा एहि दोहावलीक सभसँ बड़का विशेषता भेल एकर प्रकाशन समय। जाहि समयमे अछांदिक कविता अपन मेहनतिसँ काव्य जगतक सिंहासनपर बैसल हो आ तकर दरबारमे ई दोहावली अपन क्षमता बलपर ठाढ़ भऽ गेल हो से कम सुखद नहि। एकर सभटा श्रेय जाइत छनि पं. दयानंद झाजीकेँ जे कि डा. सुशील लाल दासजीकेँ एहि छंदोबद्ध काव्यक आँगनमे अनलाह। आब हमरा लोकनिक काज अछि जे छंदोबद्ध काव्यक रचना करी, ओकर प्रासंगिकता एवं उपयोगितापर आलोचना करी एवं एक बेर फेरसँ मैथिली काव्यकेँ छंदोबद्ध रूपें सुरभित करी। संगहि अंतमे कविक ओ दोहा पढ़ाबी जे हमरे सन-सन आलोचक लेल लिखने छथि आ से मात्र अइ कारणसँ लिखने छथि जे प्रस्तुत कविकेँ ने साहित्य केर कोनो राजनीतिसँ मतलब छनि आ ने पुरस्कारसँ। आ ई बात हुनक व्यक्तित्वकेँ आर बेसी नीक बनबैत अछि। आ तकर बादो हमरा सन आलोचक पोथीमे कमी ताकै तखन तऽ लिखहे पड़तै -
रहथि कमीकेँ ताकमे, अपन कमीक न थाह आनक दपदप उज्जरो, हुनका लागनि स्याह अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.९.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा-यज्ञ कुमार मनोज कश्यप लघुकथा- यज्ञ बुधिया के घरवला यक्ष्मा सs लड़ैत-लड़ैत जखन हारि गेलै तs सासुरक लोक एकरा घरो सs बेदखल कs देलकै। तीन टा लेध-गेध लs कs ओ नैहरि आबि गेल मुदा मायो-बाप तs सक्षम नहिंये छलै ओकरा सभक पालन-पोषण मे! अखरकटटू तs छलैहे; कोनो आर लुड़ि-वितपनि सेहो नहिं अबैत छलै जे गुजर करितै। एक्के टा काज छलै ...चौका-चिनबार जे ओ कs सकैत छल आ करबो केलक। एहि बदौलति बाल-बच्चा के देह झाँपल आ पेट मे अन्न छलै। आब सभ बच्चा नियमित स्कूलो जाईत छै। तेहन यत्न सs चिक्कन काज करै जे लोक उपरौंझ करै ओकरा सs काज करेबा लेल। जकर घर ओ धेलक से धेनहे रहल। उग्रेशबाबू के बेटी व्याहक चर्चा जखन बुधिया सुनलक तs ओकर खुशी आसमान छुअs लगलै......नव नुआँ-वस्त्र, निछौर-पिछौर, भोज-भात सभ भेटतै। खटनी तs हेतै मुदा तकर कोनो परवाह नहिं! ओहि दिन साँझ मे उग्रेशबाबू ओतs बरतन माजैत ओकरा सभ किछु सामान्य जकाँ नहिं लगलै। ओ हाथक गति कने कम केलक आ कान पाथि कs गप्प सुनबाक प्रयास करs लागल। ओकरा एतबा तs भनक लागि गेलै जे लड़काबला दहेज मे किछु बेसिये माँगि रहल छै जे उग्रेशबाबू के सामर्थ्य सs बाहर छै आ तकरे घमर्थन चलि रहल छै। ओ अपन काज खतम कs कs बिनु किछु बजने धपड़ल अपन घर गेल आ पुनः कनिये काल मे एकटा झोड़ा आँचर मे नुकेने उग्रेशबाबू के कनियाँ लsग आयल - 'मलिकिनी! हिनके सभ के देल मजूरी मे सs जोगा कs ई हम तीस हजार टका रखले रही जे बुढ़ारी मे तीर्थ-बर्त कs लेब। बेटी-वियाह सs बढ़ि कोन तीर्थ-बर्त? से ई राखि लौथ हमरा दिस सs वियाह मे लगा दिहs थिन। अपन सप्पत, ई मना नहिं करिहथि।' उग्रेशबाबू के कनियाँ जाबे किछु बात बुझि पबितथि ताबे बुधिया ओ झोड़ा हुनका हाथ मे दैत ओत सs निपत्ता भs गेल। 'बुन्ने-बुन्ने ने घैल भड़ै छै' यैह सोचैत ओ एहि मुनिहारि साँझ मे झटकल अपन घर जा रहल छल जेना ओकर पैर मे पाँखि लागि गेल होई। कातिक मास छै; तुलसी-चौड़ा पर दीप जड़बै के समय बीतल जाई छै। -कुमार मनोज कश्यप, सम्प्रति: भारत सरकारक उप-सचिव, संपर्क: सी-11, टावर-4, टाइप-5, किदवई नगर पूर्व (दिल्ली हाट के सामने), नई दिल्ली-110023, # 9810811850, ईमेल : writetokmanoj@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१०.रबीन्द्र नारायण मिश्र- ठेहा परक मौलाएल गाछ (धारावाहिक) रबीन्द्र नारायण मिश्र ठेहा परक मौलाएल गाछ (धारावाहिक) 21 रमाक हालतिमे निरंतर सुधार होइत गेलनि। आब फिजिओथिरेपीक डाक्टर नहि अबैत अछि। ओ किछु व्यायामसभ सिखा देलकनि अछि। ओकरा किछुदिन नियमित करबाक छनि। ओ आब बिना वाकरोकेँ चलि लैत छथि,मुदा झखाइत छथि। डाक्टरक कहलक - "हुनकर बामा पैरक हड्डी किछु छोट भए गेलनि। तेँ आब ओ एहिना चलतीह । हाथमे निरंतर बेंत रखने रहथि जाहिसँ संतुलन बनल रहतनि। नहि तँ लटपटा कए खसि सकैत छथि। फेर-फेर खसब ठीक नहि। बूढ़क हड्डी जुड़ब आसान नहि होइत अछि ।" डाक्टरक चेतौनीसभ रमाकेँ बूझल छनि। अपना भरि प्रयास करितो छथि। हम हुनका लेल एकटा विशेष प्रकारक बेंत आनि देलिअनि अछि। देखा चाही जे ओ तकर उपयोग कए पबैत छथि की नहि? कहतीह - "दुर्र जाए दिअ। हमर बेंत लेने बहुत लाज होइत अछि। हम कोनो ओतेक बूढ़ थोड़े भेल छी।" "एहिमे लाजक कोन बात भेलैक? डाक्टरक दबाइ बूझि करैत रहू। यदि से नहि करब आ कहिओ फेर खसि पड़लहुँ तखन के काज देत?" "बात तँ अहाँ सही कहि रहल छी।" भोरुका बेसी समय दिनचर्या,पूजा-पाठमे बीति जाइत अछि । फेर रमाक हेतु जलखै,चाहक ओरिआन सेहो हमही करैत छलहुँ । कारण डर होइत रहैत छल जे यदि ओ बेसी चलतीह आ कहीं झखा कए खसि पढ़तीह तखन?" दूपहरिआक समय काटब बहुत मोसकिल होइत छल। हमरा दिनमे सुतबाक कहिओ आदति नहि अछि। रमा तँ तइओ कनी काल सुति लेथि। हम ओहिना ओसारामे बैसल अबैत-जाइत लोककेँ देखैत रहैत छलहुँ । हमर कोठरीक सामने एकसए मीटरपर पार्क अछि। ओतए भोरमे आठे बजेसँ बूढ़सभ जमा भए जाइत छथि। दिनभरि हुनकालोकनिक बैसार चलिते रहैत अछि। केओ अबैत अछि,केओ जाइत अछि। ओतहि जलखै-चाहक सेहो ओरिआन अछि। भोजन सेहो आबि जाइत अछि। किछुगोटे संगे लेने अबैत छथि। कहि नहि हुनकालोकनिक पारिवारिक स्थिति की छनि? की एहिठाम अहिना बूढ़सभकेँ भगवानक भरोसे छोड़ि देल जाइत अछि? हम अपन घरेसँ हुनका लोकनिक धमाचौकरी देखैत रहैत छी। कखनो काल किछु-किछु पढ़ितो छलहुँ । मुदा पसिंदक किताब नहि भेटि पाबए । तेँ समय बिताएब पराभव भए जाइत छल। ओहिदिन दूपहरिआमे हम दुनू बेकती ओसारापर बैसल रही। आइ कैकटादिनसँ श्याम कंपनीक काजसँ बाहर गेल अछि। डेबिड सेहो ओकरे संगे गेल अछि। रमाकेँ अस्पतालसँ छुटबाक समयमे हमहीटा रही। श्याम नहि आबि सकल रहए। फोनोसँ संपर्क नहि केने रहए। ओहि समयमे फोन आएल छल शालिनीक । ओ प्रायः नित्य भोरमे फोन करैत छलि। हमरसभक विशेष कए रमाक हाल-चाल लैत छलि। हमहूँसभ किछु नीक-बेजाए बतिआइ। मोन हल्लुक कए ली। एहिसँ बेसी ओ किछु नहि कए पाबए,कइओ कि सकैत छलि? ओहि युवकक उदारतासँ आर्थिक कष्ट अस्पतालमे नहि भेल । मुदा घर आबि गेलाक बाद हमसभ लोकक बिना बिलबिलाइत रहैत छी। एहिठाम ककरा की कहबैक? सभ अपने मतबाला छैक। अपनेमे लागल छैक। ककरो-ककरोसँ कोनो मतलब नहि। मनुष्यता सेहो जेना देबालसँ सीमित कए देल गेल छैक। एकाएक सामनेक पार्कमे हल्ला भेल । बूढ़सभ आपसमे गप्प करैत-करैत ठहाका पाड़ि रहल छल। किछु-किछु खाइतो छल,पीबितो छल आ रहि-रहि कए ठहाका पाड़ए लगैत छल। बात की छैक?- रमाकेँ उत्सुकता भेलनि भेलनि। "एहिठाम ईसभ होइते रहैत छैक। ओ सभ जीवनकेँ उत्सव जकाँ बिताबएमे विश्वास करैत अछि । दिन-राति बेटा-पोताक भविष्य बनबएमे नहि लागल रहैत अछि।" "अहाँ तँ जखन-तखन भाषण देबए लगैत छी। जहाँ किछु पुछलहुँ कि शुरु भए जाइत छी ।" "अहाँ तँ तमसा गेलहुँ।" -ओ हमर मुँह देखए लगैत छथि। "चलू ने देखी आखिर ओ सभ कए की रहल अछि?"-रमा बजलीह। "अहाँ ओतेक फटकी चलि सकब?" "किएक ने? हम तँ आब केहन बढ़िआँ छी।" "ठीक छैक। मुदा बेंत लए लिअ।" हमसभ घरमे ताला मारि कए नीचाँ उतरि जाइत छी। बाहर अबैत छी। हम ई देखि कए दंग रहि गेलहुँ जे एकटा कार ठामहि रुकि गेल। ओ हमरासभक सामनेसँ दोसर दिशामे जा रहल छल । हमरा दुनूगोटेकेँ सड़कपर पैरे चलैत देखि ओ कार रोकि देलक। कारसँ उतरल आ हमरा अपन गंतव्य पुछलक- "अहाँसभ कतए जेबैक?" "अही ठाम, पार्कमे।" "हम अपने सभकेँ ओतए पहुँचा दी की?" "मुदा अहाँकेँ देरी नहि होएत की?" "अहाँ तकर चिंता छोड़ू। अपन निर्णय कहूँ।" "हमसभ तैयार छी।" बस ओ हमरासभकेँ बेरा-बेरी कारमे बैसा लैत अछि आ पार्कक मुख्यद्वारिपर कारसँ उतारि दैत अछि। हमसभ ओकरा मोने-मोन एक पथिआ आशीर्वाद दैत छी। हम आ रमा पार्कमे प्रवेश करैत छी। ओहिठाम बूढ़सभ नंग-धरंग पड़ल अछि। केओ दारू पीबि रहल छल,केओ चाट खा रहल छल । किछुगोटे मिलि कए गीत गाबि रहल छल। ककरो पूरा होस नहि रहैक । हमरासभकेँ अबैत देखि एकटा बूढ़ आगू बढ़ि कए स्वागत करैत अछि- "आउ, आउ। एहि वृद्धजन कल्बमे अपने लोकनिक स्वागत अछि।" "अपने कतएसँ आबि रहल छी?" "हमसभ भारत(इन्डिआ)सँ आएल छी। अपन बेटाक ओहिठाम ठहरल छी।" "बहुत बढ़िआँ। ऐहिठाम आएल करू। घरपर तँ अहाँसभ उबि जाइत होएब।" "सही कहलहुँ । हमसभ गप्प कइए रहल छलहुँ कि ओहीमेसँ केओ एक गिलास दारू आ किछु चिखना हमरा दिस बढ़ा दैत अछि।" "नहि, नहि । हमरा ई सभ नहि चाही।" आर ओ सभ ठहाका पारए लगैत अछि। रमा लजा जाइत छथि। 22 पार्कक माहौल विचित्र छल। मुदा ओकरासभकेँ तकर कोनो परिबाह नहि रहैक । जकरा जे बजबाक होइक से बाजओ,जे करबाक होइक से करओ । ओ सभ अपन चालिमे मस्त छल । ततबे नहि,हमरोसभकेँ ओहिना मस्त कए देबाक हेतु आतुर छल । हमरासभकेँ मन्हुआएल देखि ओहीमे सँ एकगोटे आएल आ भरिपाँज पकड़ि लेलक । "अहाँ किछु परेसान बुझाइत छी।" "सही कहलहुँ।" "से की?" "हमसभ एतए अपन पुत्रक डेरापर रहैत छी। अबिते-अबिते हमर पत्नीक दुर्घटनामे पैरक हड्डी टूटि गेलनि।" "आब ओ केना छथि?" "सुधार दिस छनि। मुदा सभदिन हेतु नाङर भए गेलीह।" "ओह बहुत दुखक बात। मुदा अहाँसभ बेसी परेसान नहि रहू। जाबे एहिठाम छी, एतए आएल करू। हमसभ अहाँकेँ उदास नहि होमए देब।" "किएक ने। अबस्स आएब। मुदा हमसभ आब एतए रहबे कतेक दिन करब तकर कोनो ठेकान नहि अछि।" "कोनो बात नहि। जाबत छी ताबे तँ आउ ।" तकरबाद हमसभ ओहि पार्कमे जाइत रहलहुँ । ओना तँ ओतए जएबाक कोनो समय सीमा नहि रहैक ,मुदा भोर-साँझ बेसी लोक जमा होइत छल । दुपहरिआमे सेहो किछुगोटे रहितथि मुदा ओ सभ बेसी काल सुतले बुझाथि। ई सभ एहन लोकसभ रहथि जिनका कोनो कमी नहि छलनि। सभकेँ सामान्यतः भरल-पुरल परिवार रहैक । प्रचूर धन-संपत्ति रहैक । रहबाक हेतु बड़का-बड़का महल रहैक । तथापि ओ सभ दिन भरि पार्कमे पेटकुनिआ देने रहैत छल । कारण? ओकरसभक घरमे केओ नहि रहैक। घरसभ भम्ह पड़ैत छलैक । लोक बिना लगैक जे सनकि जाएत । कैकगोटे तँ मनोरोगी भए गेल छल ,अवसादग्रस्त भए चुकल छल। दबाइपर माथा चलि रहल छलैक । आखिर एहन-एहन वृद्धसभ आपसमे मिलि कए एकटा स्वतःसहायता समूह बनओने छल । ओहिमे सभगोटे किछु-ने-किछु योगदान करैत छल। एक-दोसरक दुख-सुख बतिआइत छल । एहि तरहेँ कतेको गोटेक मनोरोग ठीक भए गेलैक । ओकरासभक जीवनमे फेरसँ ऊर्जा अएलैक,नवीन उत्साहक सृजन भेलैक । आब ओकरासभकेँ कथुक परिबाह नहि छैक। संतानसभ हाल-चाल लेथि चाहे नहि लेथि ,ओ सभ अपन विकल्प ताकि लेने अछि। एक हिसाबे हमरो एहिठाम शिक्षा भेटि रहल छल। मुदा हम सोची जे एहि छोटसन जीवनमे की की करैत फिरब, कतए-कतए रहब?कतए-कतए जाएब? इज्जतिसँ अपन घरमे रही,एहिसँ नीक किछु नहि। तेँ तँ हमसभ दिल्लीक अपन फ्लैटमे पड़ल रही। मुदा ओतहु तँ हमर संतानसभ चैनसँ नहि रहए दैत छथि। झूठ-मूठकेँ अपनत्व देखबैक क्रममे हमरासभकेँ अमेरिका आनि लेलथि आ आब फज्जतिमे पड़ल छी। समय नहि कटि रहल अछि। रमाक दुर्घटना तँ रहल-सहल बातपूरा कए देलक। आब तँ जखन आबिए गेल छी तँ एहिठामसँ वापस हेबोक हेतु किछु-किछु करए पड़त । टिकटक ओरिआन करहि पड़त । श्यामकेँ तँ कोनो चिंते नहि छनि। ओ तँ निश्चिंत छथि। जेना कोनो मोटा घरक कोनो कोठरीमे राखि देल गेल होइक । हमरोसभक किछु दिक्कति अछि,किछु अपेक्षा अछि,से के सोचत?एहिठामक समाजमे तँ बूढ़लोकसभ पहिनेसँ एहिसभ परिस्थितिक हेतु तैयार रहैत अछि। कोनो बेसी उम्मीद रखिते नहि अछि । मुदा अछि तँ ओहोसभ मनुक्खे। बूढ़ भेलापर ओकरोसभक देह कमजोर होइते छैक,मोनो टूटिते छैक। मुदा उपाय की छैक? माल-जाल जकाँ जीबैत अछि आ तहिना मरि जाइत अछि। जखन कखनहु हमसभ पार्कमे जाइ ,दुखी भए जाइ। ओकरसभक विक्षिप्त मानसिक अवस्था भने ओकरा सभकेँ स्वीकार्य होइक,मुदा हमसभ तँ ओतए आर बेचैन भए जाइ। जीवन भरि जाहि संस्कारमे जीलहुँ,जे आदति रहल तकरा फेकल नहि जा सकैत अछि। असलमे ओकरसभक खेनाइ-पीनाइ,गप्प-सप्प,मनोरंजनक तरीकासभटा फराक बुझाएल। हमरासभकेँ से सभ स्वीकार्य नहि भेल । तेँ ओतहु गेनाइ कम करैत गेलहुँ । जखन कैकदिन पार्क नहि गेलिऐक तँ एकदिन साँझमे ओहिठामसँ एकटा बूढ़ फोन केलक । "की बात छैक? अहाँसभ एनाइ बंद कए देलिऐक?" "हमसभ ओतए जाइए कए की करब? हमरसभक खान-पान,रहब-सहब सभकिछु फराक अछि। अहाँसभक क्रिया-कलाप फराक अछि। अहीं कहू जे हम ओहिठाम की करब?" "हम अहाँकेँ कोनो तरहक दबाव नहि दैत छी। ओ तँ स्थाने एहन छैक जतए लोक स्वतंत्र जीबि सकए। अहूँ अपना हिसाबे रहि सकैत छी। ककरो सँ अपन दुख-सुख बतिआ सकैत छी। कम सँ कम अपन बात ककरो कहि तँ सकैत छी । की पता किछु सही समाधान निकलि सकए? गुमसुम असगर घरमे रहलासँ की होएत? ओना तँ अहाँसभ असगर रहैत-रहैत घरेमे सनकि जाएब ।" "ठीक छैक। हमसभ मौका भेटत तँ आएल करब।" "अबस्स आउ। अबस्स आउ। हमरासभकेँ प्रतीक्षा रहत।" 23 ओहिदिन फेर हमसभ पार्क गेलहुँ। साँझक उखरामे ओहिठाम बेसी लोक रहिते अछि,से आइओ लोकसभ जमा छल । हमरासभकेँ देखिते ओ सभ प्रसन्न भए गेल । आइ रमा घरसँ किछु-किछु बना कए लए गेल रहथि। अपना ओहिठामक टिकरी,ठकुआ,अल्लूक भुजिआ ,आर किछु-किछु। से देखितहि ओ सभ ओहिपर टूटि पड़ल, कही तँ लूझि लेलक। देखिते-देखिते सभटा सामान खतम भए गेल । बुझेबे नहि करए जे ओ सभ हमर घरक बनाओल सामानसभकेँ एतेक पसिंद किएक कए रहल छथि? गप्प-सप्पक क्रममे पता लागल जे ईहोसभ अपने ओहिठामसँ आबि-आबि एतए बसि गेल छथि। केओ अपने आएल छथि,ककरो पिता तँ ककरो पितामह । ओ सभ आब एहिठामक नागरिक भए गेल छथि। बिआह-दानसभ एतहि करैत छथि। सभकेँ अपन-अपन घर छनि,कारखाना छनि,व्यापार छनि। समाजमे एकटा स्थान छनि। मुदा एहिसभक अछैतो ओ सभ अखनहु अपन मूलदेशकेँ नहि बिसरि सकलथि। जखने अवसर भेटैत छनि,ओ अपन पूर्वजक भूमिकेँ मोन पारि लैत छथि,ओहिसँ जुड़बाक प्रयास करैत छथि। इएह कारण छल जे हमरासभकेँ देखितहि ओ सभ एतेक प्रसन्न भेल रहथि। हमरासभकेँ आठ-दस गोटे घेरि कए बैसि गेलाह । अपन गाम घरक बारेमे पुछए लगलाह। मुदा जखन हम कहलिअनि जे हमसभ तँ अपन गाम-घरकेँ छोड़ि दिल्लीएमे बसि गेल छी। गाम गेला कतेक दिन भेल सेहो आब मोन नहि अछि। कनी काल तँ ओ सभ गुम्म पड़ि गेलाह। फेर कहैत छथि- "कोनो बात नहि। दिल्लीएक समाचार कहू।" "की कहू? ओतहु पारिवारिक जीवनमे आब कोनो लसि नहि रहि गेल अछि। लोकसभ अपन-अपन फ्लैटमे बंद अछि। परिवारसभ अपन माता-पितासँ भागि रहल अछि। बूढ़ लोकनि जीवनक उत्तरार्द्धमे ओहिना फराक-फराक रहि रहल छथि जेना कि पोखरिक बेंग होथि। टर्र-टर्र करैत रहथु। केओ सुननाहर नहि। जकरा कोनो तरहक पेनसन छैक से सभ तँ तइओ गुजर कए लैत अछि। यदि केओ अपन धिआ-पुतापर आश्रित छथि तखन तँ हुनकर भगवाने मालिक। "ऐँ ई हाल छैक?" "तँ अहाँकेँ की बुझाइत छल?" "हमरासभकेँ तँ होइत छल जे ओ देश तँ सभदिन अपन संस्कारक हेतु दुनिआमे जानल-मानल गेल । आबो ओहिना होएत।" "जएह दिअ। आब ओ सभ किछु बाँचल नहि अछि। हमरे परिवारक बात बूझब तँ हँसी लागि जाएत। "से की?" "देखि नहि रहल छी जे हमसभ केना छी? एतेक दूर अज्ञात सहरमे बेटाक मोहमे आएल रही। जहिआसँ हमसभ एतए अएलहुँ ओ निपत्ता अछि। संगमे डेबिड रहैत छैक। कहि नहि ओ सभ आपसमे केना की रखने अछि? " "डेबिड हुनका संगे अछि?" "आर की?" "ओ तँ हमर पुत्र अछि। दस सालसँ हमरासभक संपर्कमे नहि अछि। हम तँ सुनिऐक जे ओ ..." एहिसँ आगू ओ नहि बाजि सकलाह। गुम रहि गेलाह। हम हुनकर मुँह देखैत रहि गेलहुँ । ओहिदिनक बाद डेबिडक पिता फेर दोबारा नहि देखेलाह । हुनकासभक बारेमे ,डेबिडक बारेमे आर जानबाक उत्सुकता बनले रहि गेल। आइ कतेको दिनक बाद श्याम वापस आएल। ओकरा संगे डेबिड सेहो छल । दुनूगोटे हमरा देखितहि जेना चिंतामे पड़ि गेल। हमरा सामनेमे तँ श्याम किछु नहि बाजल,मुदा रातिमे दुनूगोटेकेँ बेस झंझटि भेलैक। संयोगसँ ओकर केबार खुजले रहि गेल छलैक। हल्ला बढ़ैत सुनि कए हम नीचाँ दौड़लहुँ। डेबिड जोर-जोरसँ हाँफि रहल छल। बीच-बीचमे बाजिओ रहल छल। सारांश एतबे बुझाएल जे हमरासभक एतए रहलासँ ओ बहुत परेसान भए गेल अछि। मोटा-चोटा बान्हि लेलक अछि। काल्हि भोरे कतहु चलि जाएत। मुदा हमरासभक संगे नहि रहत। हम सभ बात सुनि सन्न रहि गेलहुँ। मुदा किछु बजलहुँ नहि। ताहि जोकर माहौलो नहि छल। श्याम हाथ-पैर जोरि रहल छल। ओकर खुसामद कए रहल छल। "किछु दिन धैर्य राखह। आब ओ सभ चलि जेताह। हम काल्हिए टिकटक ओरिआन कए दैत छिअनि।" "से सभ हम नहि जानी। जे करबाक होअ से कए लएह। काल्हि भरिक समय दैत छिअ। यदि से नहि भेल तँ हमही कतहु चलि जाएब। मुदा एकरासभक मुँह नहि देखब।" श्यामकेँ बुझेबे नहि करैक जे आखिर डेबिड अचानक एना किएक कए रहल अछि? थोड़ेकाल हम ओकरसभक झगड़ा देखैत रहलहुँ । जे देखी,जे सुनी तकर कोनो अनुमानो नहि छल। मुदा हम कइए की सकैत छलहुँ? अस्तु,दबले पैरे वापस अपन कोठरीमे आबि गेलहुँ । रच्छ छल जे रमा सुति गेल रहथि, तेँ एहि घटनाक घात-प्रतिघातसँ बँचि गेलथि,तात्कालिके सही। 24 भेलैक ई जे ओहिदिन हमरासँ गप्प केलाक बाद डेबिडक पिता ओकर खोजमे लागि गेल। एहि काजमे ओकरा बेसी दिन नहि लगलैक । संयोग एहन भेलैक जे ओकर प्रयास दोसरे दिन सफल भेलैक । डेबिड आ श्याम वापस अपन घरपर अबैत रहए। ओतहि डेबिडकेँ ओकर पिता पकड़ि लेलकैक । कहि नहि कतेक दिनक बाद ओकरासभक भेंट भेल रहैक । तथापि,डेबिड एहि बातसँ प्रसन्न नहि रहए। अपितु ओकरा फज्झति करए लगलैक । ओकर एहन कठोर व्यवहारसँ आहत भए डेबिडक पिता ओतहि खसल आ खसले रहि गेल । कहि नहि ओकरासभक संबंधक आपसी कटुताक की कारण रहैक? मुदा ओकर एहन दुखद अंत तँ हृदयविदारक छलहे। डेबिड तकर बाद ओहि राति खूब दारू पीबि लेने रहए आ श्यामक संग धमाचौकरी करैत रहए। भोरे भेने रमा कहलीह- "आब की देखब बाँकी अछि जे हमसभ एहिठाम बैसल छी।" "बात तँ सही कहि रहल छी। आब हमसभ एहिठामसँ चली। एहीमे सभक कल्याण अछि। आब बुझा रहल अछि जे ई नङटा बिआहक नामेसँ किएक हंगामा करए लगैत छल। हमरासभकेँ सभदिन ठकैत रहल। अपनो तँ बरबादे भेल। की लसि रहि गेल छैक ओकर जीवनमे? किछु जान बुझा रहल अछि? हमरा हिसाबे तँ एहन-एहन लोक पृथ्वीक भारे थिक। जे अपन हित-अहित नहि बूझि सकैत अछि, से अनकर की ध्यान राखत? हमरासभकेँ की सुख देत?" "कहुना वापसी टिकटक ओरिआन करू आ एहिठामसँ घसकू।" रमासँ गप्प केलाक बाद वापसी यात्राक टिकटक ओरिआनमे लागि जाइत छी। अपना संगमे पर्याप्त टाका रहए । मुदा समस्या रहए जे जाएब कतए? वापस दिल्लीए अपन फ्लैटमे चलि जाइ। ई सभसँ सुलभ समाधान बुझाइत छल । मुदा एहिमे सभसँ भाङट हमर बेटी शालिनी कए रहल छलि। ओ जतेक बेर फोन करैत बस एतबे कहैत-"बेटा ओहिठाम कोना ने जइतहुँ। बेटी तँ भेल गाछसँ खसल फूल। ओकरा के देखत? किएक देखत? समाज कतबो बदलि जाउक,कानून किछु बनि जाउक,मुदा जखन कखनहु बेटी अपन अधिकारक प्रतिए सचेष्ट होमए चाहैत अछि ओकर अपने लोक तरुआरि लए कए ठाढ़ देखाइत छैक। तकर मूल कारण छैक-स्वार्थ। भने बेटीकेँ बेटाक बरोबरिक कानूनी अधिकार भेटि गेल अछि मुदा अखनहु माए-बाप ,भाए आ समाज सभ एतबेमे लागल रहैत अछि जे ओ कहुना आँखिसँ फटकी रहए। बिआह भए गेलैक ओकर जिम्मेबारी खतम।" एहन परिस्थितिमे हमसभ मोसकिलमे रही। की मुम्बई शालिनी लग जाइ? की वापस दिल्लीए चलि जाइ? हमसभ एही गुनधुनमे रही कि अचानक मुरलीक फोन आऐल । ओना ओ संपर्क नहिए जकाँ रखैत छल। एतेकदिनसँ हमसभ श्यामक ओहिठाम अमेरिकामे परेसान छलहुँ तखन कहिओ ओ हाल-चाल नहि लेलक । आब की भेल? ओ किएक फोन केलक? मोनमे चिंता भए गेल । हम तुरंत फोन उठबैत छी। रमा सेहो हमरा लगेमे छथि। "पता लागल जे अहाँसभ श्याम लग अमेरिका आएल छी । हमसभ अगिला मास ओतहि किछु काजसँ आबि सकैत छी। अहाँसभसँ भेंटो भए जाएत ।" "मुदा हम तँ वापसी टिकट लेबए आएल छी।" "से किएक? एतेक जल्दी?" "आब की की कहिअह? समय नहि कटि रहल अछि। सभ अपना-अपना हिसाबसँ जीबि रहल अछि। हमसभ अनेरुआ जकाँ बौआ रहल छी।" "थोड़ेदिन रुकि जाउ। अहाँसभक विचार होएत तँ हमरासभक संगे लंदन चलि आएब। किछुदिन एतहु रहि जाएब।" "आब हिम्मति नहि रहि गेल अछि जे अखन कतहु आनठाम जाइ।" "हम पहिने दिल्ली जाएब। तकरबादे सोचबैक जे की कएल जाए?" "एतेक किएक परेसान भेल छी? किछु भेलैक की? " "से सभ तोरा कहिओ कए की होएत? एतेक दिनक बाद आइ तोरा फोन करबाक होस भेलह अछि जखन कि हमसभ वापसी यात्राक तैयारीमे लागि गेल छी।" एतबे पर फोन कटि गेल । हम दिल्लीक वापसी टिकट लए कए घर बिदा भेलहुँ । आब घर पहुँचहिबला छलहुँ । मोन भेल जे पार्क होइते चली। डेरा जाइओ कए की करितहुँ?ओतए के हमरसभक स्वागत हेतु बैसल अछि? हम पार्क लग टैक्सीसँ उतरि जाइत छी। रमा सेहो हमरा संगे छथि। हमरासभकेँ पार्कमे आएल देखि ओकरासभक प्रसन्नताक अंते नहि छल। ओहिमेसँ किछुगोटे तँ ठाढ़ भए खुसीसँ नाचए लागल। "आइ बहुत दिनपर अएलहुँ?"-ओहीमे सँ केओ पुछैत अछि। "हमसभ आब वापस जाएब। तकरे तैयारीमे लागल छी। टिकट कटबए गेल रही।" "एतेक जल्दी किएक वापस होइत छी। अखन तँ अहाँ कतहु घुमिओ नहि सकलहुँ।" "के घुमाओत? जकरा बले अएलहुँ से अपने अपसिआँत अछि। ओ हमर की सेवा करत? " "ई अमेरिका छैक। एहिठाम ककरो भरोसे काज नहि चलि सकैत अछि। अपने आगू बढ़ितहुँ तँ काज होइत ।" "छोड़ू ओकरसभक चर्चा। आब तँ टिकटो लए लेलहुँ।" "हमरासभकेँ कहितहुँ ने। हमसभ टिकट अहाँक घरेमेमे पठबा दितहुँ।" "कोनो बात नहि। आब तँ लइए लेलहुँ।" हमरासभक जेबाक समाचार सुनि ओ सभ उदास रहए। फेर आपसमे चर्चा करैत गेल आ निर्णय केलक जे हमरासभकेँ दिल्ली बिदा होएबासँ पूर्व विदाइ समारोह ओही पार्कमे आयोजित कएल जाएत । 25 हमरा काल्हि अमेरिकाक धरतीकेँ छोड़ि देबाक अछि। केओ किछु करह आब की लेना-देना? ओना श्याम काल्हि आबि कए भेंट केने रहए। अफसोच करैत रहए जे ई आ ओ । मुदा एहि टाटकसभसँ की होमएबला अछि। हम तँ ई बात नीकसँ बुझि गेलिऐक जे आब ओ समय नहि अछि जे ककरोपर निर्भर रही,अपने संतानोपर नहि। घोर कलियुग आबि गेल अछि। एकटा समय रहैक जखन बिआह एकटा जन्म-जन्मक संबंध होइत छल। आत्माक आत्मासँ मिलान होइत छल। कहाँ देखल जाइत छल बायोडाटा? कहाँ नापल जाइत छल ऊँचाइ आ चौड़ाइ। मुदा आब तँ बिआह एकटा तमासा बनि कए रहि गेल अछि। वर होथि वा कनिआँ,सभ एकटा बेस नमगर फिरिस्त लेने घुमि रहल अछि। परिणाम ई अछि जे ककरो बिआह होइते नहि छैक? हेबो कोना करतैक? मनुक्ख तँ मनुक्खे जकाँ हेतैक? कोनो परीलोकक कन्या कतएसँ आनल जाएत? ततबे नहि,लोकमे संयमक जेना प्रयोजने खतम भेल जा रहल छैक। भोगवादी जीवनपद्धतिक कारण ,ॠणं कृत्वा घृतं पीबेत, बला हाल भए गेल अछि। संगे रहत ,सभ किछु करत,साल होइत-होइत जखन मोन उबिआ जेतैक तँ दसटा गारि पढ़ि कए एक-दोसरसँ पृथिक भए जाएत। ई तँ हाल भेल जा रहल अछि। तेहन माहौलमे जे संतान पालल जाएत से केहन निकलत? सोचल जा सकैत अछि। पाश्चात्य संस्कृतिक अंधाधुंद अनुकरणक दुष्परिणाम स्पष्ट दृष्टिगोचर भए रहल अछि। हाल तँ ई अछि जे वर-कनिआ यदि आपसोमे नीकसँ रहि लेथि तँ बड़का उपकार बुझू। माए-बाप,सासु-ससुरक तँ बाते छोड़ू। श्यामक जे हालति छैक,जाहि तरहेँ ओ जीबि रहल अछि,आब हमरासभकेँ बुझबामे कोनो भाङट नहि रहि गेल अछि। हमसभ किछु कइओ नहि सकैत छी। ओ अपन जीवनसँ सुखी होअए,दुखी होअए,जे होअए मुदा केओ तेहल्ला ओहिमे हस्तक्षेप नहि कए सकैत अछि। दिनमे तँ ओसभ तेहन सजल-धजल,शुभ्र-शाभ्र रहैत अछि जे लागत की अछि की नहि। मुदा रातिक दृश्य यदि देखब-सुनब तँ होएत जे कतए आबि गेलहुँ ? अस्तु बहुत सोचि-विचारि कए हमसभ वापस दिल्ली जेबाक टिकट लेलहुँ आ आब ओहिसँ पाछू हेबाक तँ प्रश्ने नहि अछि। हमसभ ई बात बहुत स्पष्टतासँ मुरलीकेँ कहि देने रहिऐक आ श्यामोकेँ बुझा देलिऐक। आइ पार्ककेँ बहुत नीक जकाँ सजाओल गेल छल। पार्कमे विभिन्न समयपर आएनिहार लोकसभ आबि गेल अछि। सभ नीक-नीक परिधान पहिरने सजल-धजल अछि । आगूक स्टेजपर स्वागत गान गेनिहार कलाकारसब विराजमान अछि । ओहिठामक माहौल देखि कए लगैक जेना कोनो अति महत्वपूर्ण व्यक्तिक आगमन होमएबला अछि। हमरा दुनू बेकतीकेँ घरसँ आनबाक हेतु दूगोटे कारसँ पहुँचि गेल अछि। हमसभ सेहो समयपर तैयार भए गेल छी। यद्यपि श्यामकेँ एहि कार्यक्रमक जनतब रहनि,मुदा ओ तकर कोनो परिबाह नहि केलक । अपन काजपर चलि जाइत रहल। हमरो ओकरासँ तेहने किछुक अनुमान छल । एक हिसाबे उसासे लागल। भने चलि गेल। आब चैनसँ किछु काल नीकसँ समय कटत। पार्कक बिदा होइत काल रमा अपना संगे चारिटा झोरामे किछु-किछु लेने जाइत छथि। पता नहि ई सभ की अछि? तत्काल किछु पुछब उचित नहि बुझाएल । पार्कक द्वारिएपर हमरालोकनिक फूलमालासँ नहा देल गेल। ऊपरसँ पुष्पवर्षा कएल गेल। लगैक जेना हमसभ एकबेर फेर वर-कनिआ बनि बिआहमंडप दिस बढ़ि रहल छी। हमसभ स्वागत मंच दिस बढ़ैत छी। ओहिठाम उपस्थित सैकड़ों लोकक ध्यान हमरेसभपर छैक। किछुगोटेकेँ हमरासभक बारेमे जनतब छैक। किछुगोटे उत्सुकतामे अछि जे बात की छैक? ओ सभ सभकिछु बूझि जाए चाहैत अछि। उचकि-उचकि कए हमरासभ दिस देखैत अछि। ककरो-ककरोसँ प्रश्न-प्रतिप्रश्न कए रहल अछि । ततबेमे माइकपर घोषणा होइत अछि- "भाइ लोकनि, आइ हमसभ एहिठाम एक विशेष अवसरपर उपस्थित भेल छी। ओना तँ हमसभ एतए उत्सव मनबिते रहैत छी,मुदा आजुक दिन हमसभ अपन पूर्वजक भूमिसँ आएल एकटा वृद्ध दंपत्तिक स्वागत करए आएल छी। स्वागत संगे बिदाइक सेहो अवसर अछि। कहल जा सकैत अछि जे ई कोन स्वागत भेल जकर पछोड़ बिदाइ करैत होअए । मुदा परिस्थितिए तेहने अछि। जहिआ सुशील आ रमा एहि पार्कमे आएल रहथि ओ सब नितांत अपरिचित रहथि। केओ हुनका संगे नहि रहनि। अपन बेटाक फ्लैटमे ओ सभ असगर रहैत-रहैत जखन उबिआ गेलाह तखन अचानक हुनकर सभक दृष्टि एहि पार्कमे भए रहल धमाचौकरी दिस गेलनि। जेबाके छलनि,कारण एहिठाम तँ हमसभ अबिते छलहुँ प्रसन्नताक आदान-प्रदान करबाक हेतु। चिंता करबाक हेतु तँ सौंसे दुनिआ छैक। हमसभ एतए अबैत छी,निश्चिन्त भए किछु समय बिताबैत छी आ चलि जाइत छी। ने अएबाक,ने जएबाक,ने आर कोनो तरहक एहिठाम प्रतिबंध अछि । तेँ लोकसभ एतए अबितो अछि आ आबि कए मोनमे हल्लुको होइत अछि। एहन बात नहि छैक जे एहिठाम आबि गेलाक बाद सभटा कष्ट बिला जाइत अछि। मुदा एतबा तँ होइते अछि जे लोक अपन जीवनक समस्या दोसर संगे बतिआ लिअए,ताहीक्रममे किछु समाधानो ताकि लिअए। एहीबातसभसँ प्रभावित भए ईहोसभ एतए अएलाह आ अबिते रहलाह। बीचमे जखन हिनकालोकनिकेँ किछु समस्यासभ भेलनि तँ हमसभ संपर्को केने रहिअनि। ताहि बातसँ ओ सभ बहुत प्रभावित भेल रहथि। तकरबाद निरंतर एहि पार्कमे अबैत रहलाह,कार्यक्रमसभमे सामिल होइत रहलाह। मुदा आब हिनका वापस अपन दिल्ली स्थित घरपर जेबाक छनि। हमसभ हिनकासँ बहुत मिलि गेल छी। हिनके माध्यमसँ अपन पूर्वजक भूमिसँ जुड़ि गेल छी। आब जखन ई सभ जाइए रहल छथि तखन हमसभ हिनकासभकेँ आनन्दपूर्वक बिदा करबे उचित बुझलहुँ। अस्तु,एहि बिदाइ कार्यक्रमक आयोजन कएल गेल अछि। एहि बिदाइ समारोहमे हम दुनू बेकतीक स्वागत करैत छी। आशा करैत छी जे ओसभ एतए जे किछु सुख-दुख भेलनि तकरा अपन लोकक देल बूझि बिसरि जेताह । हमसभ बादोमे संपर्कमे रहब आ नीक-नीक काजमे सहभागी भए सकब।" पार्कमे उपस्थित लोकसभ करतलध्वनिसँ उपरोक्त भाषणक समर्थन केलनि। कैकगोटे तँ आनन्द मनाबैत ठामहि नाचए लगलाह। देखिते-देखिते गजब दृश्य देखबामे आबि रहल छल। कहुना कए हुनकासभकेँ शांत कएल गेल। फेर कार्यक्रम आगू बढ़ल । पार्कमे उपस्थित लोकसभ द्वारा हमरासभक हेतु आनल गेल उपहारक करमान लागि गेल । हम तँ आश्चर्यचकित रही जे एतेक कम समयमे एकरासभकेँ हमरासँ एतेक बेसी अनुराग कोना भए गेलैक? बादमे पता लागल जे ओ सभ तँ एहन-एहन अवसर तकैत रहैत अछि । समस्या छल जे एतेक सामानसभ होएत की? हमतँ अपना संगे लइए नहि जा सकैत छी। बादमे ओएहसभ कहलक जे एहि विषयमे अहाँ चिंता नहि करू। अहाँ दिल्ली पहुँचब तकर थोड़बे दिनक बाद सभटा सामान पहुँचि जाएत । तकर व्यवस्था ओ सभ अपने कए लेत। बस हमर पता चाही। हम अपन पता ओकरासभकेँ लिखा देलिऐक । कार्यक्रममे बड़ीकाल धरि गीत-नाद भेल,बिदाइ भाषण भेल। अंतमे हम अपन बात कहलिऐक। बहुत संक्षेपमे । हमरा एतबे चिंता रहए जे आगूक जीवन कोना चलत? केना समय कटत? फेर आर-आर बूढ़सभ की-केना होइत होएत? ओसभ एहिबातकेँ बहुत ध्यान केलक। ओकरसभक अगुआ बाजल- "हमसभ चाहब जे दिल्ली जा कए अहाँ कोनो एहन संस्था बनाउ, अथवा एहन कोनो संस्थासँ जुड़ि जाउ जे वृद्धलोकनिक कल्याण काज करैत होअए। हमसभ ओहि संस्थाकेँ यथासंभव मदति करबैक । मौका-कुमौका हमसभ अपनहु आएब।" सभा समाप्त भेल । हमरासभकेँ लागल जे अमेरिका यात्रा सफल भेल । किछु एहन नीक लोकसभसँ परिचय भेल जे अखन तँ सुख देबे केलक आगूओक आश्वासन देलक। ई कोनो मामुली बात नहि कहल जा सकैत अछि। ओहिठामसँ बिदा भए हमसभ अपन डेरा पहुँचलहुँ । साँझक समय छल । श्यामक कोनो अता-पता नहि छल। हमसभ अपन-अपन सामानसभक हिसाब-किताब केलहुँ,मोटा-चोटा बन्हलहुँ आ कनी-मनी भोजन कए जल्दीए सुति रहलहुँ। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.११.सुरेन्द्र लाभ- कथा-सँयोगसँ बाँचल जिनगी सुरेन्द्र लाभ कथा-सँयोगसँ बाँचल जिनगी 'ओह, बाँचि गेलहुँ ' बुढबाक मुँहसँ निकलल छलैक आ' ओ देखलकै मोटर साईकिलवला फर्रसँ आगाँ भागि गेलै।मोने मोन ओ सोचए लगल जे आब ई नगर रहए जोगर नहि रहि गेलैक। कतेक भीड बढि गेलै ? कतेक गाडी भ' गेलै शहरमे ? आ' मोटर साईकिल त' एना नै घरे घर बढलै जेना कहियो साईकिलो नै रहै ।छौंडासब चलएबो करैछै तेना ने जेना जानक कोनो परवाहे नहि होइक । -रे बौवा अप्पन जानक परवाह नै छाै त' नै छौ, कमसँ कम माय बापक त' खयाल कर । ओहो नै त' कम्तीमे हमरा सन सन बाटपर चलएवला बुढ बटोही पर त' दया कर’-कहए चाहलकै । मुदा ककरा कहतै ? के सुनतै ? बजारमे निकललाक बाद प्रत्येक दिन ओकरा इएह लगैत छलैक जे ' आई सँयोगसँ बाँचि गेलहुँ ।' मोनमे क्षोभ नेने ओ घर घुरल छल।बेटा पुछलकै -'की भेल बाबूजी?'बुढबा जबाब देलकै-'की कहियऊ,आईकाल्हिकेँ छौंडासब तेना ने मोटर साइकल चलबै छै जे कखन अपन जान जएतै आ' कखन दोसरके ल' लेतै तकर ठेकान नहि । आई त' बुझ संयोगेसँ हम बाँचि गेलहुँ।' पुत्र बिनु किछु प्रतिक्रिया देनहि भितर चलि गेलै । भितर पुत्र आ' पुत्रवधु बीच संवाद प्रारंभ भ' गेलै,जे ओकर कानमे परए लगलै - पुत्रवधु - फेर बाबूजी केँ की भेलै? पुत्र - की हएतै ? ओएह पुरने रटान, आई संयोगसँ बाँचि गेलहुँ ।बजार दिस पठा दै छियनि जे कहुना मोन लगतै, मुदा सब दिन कनैत अएता जे आई सँयोगसँ बाँचि गेलहुँ । पुत्रवधु - आई त' पैदल गेल छलाह ने ? पुत्र - आई पैदल छलाह त' कहै छथिन मोटर साइकिल बला मार' लागल छल,मुदा संयोगसँ बाँचि गेलहुँ। ओहि दिन रिक्साक' देने रहियै तखनो ईएह शिकायत रहै ने 'बाप रे कोना रिक्सावला हाँई हाँई चलबै छल , हम त' संयोगेसँ बाँचि गेलहुँ।' पुत्रवधु - आ' ओहि बेरूका बात बिसैर गेलियै ? पुत्र - कोन बेरुका ? पुत्रवधु - ओहिबेर ने तीर्थ यात्रा कराब' दुर्गा स्थान अपने गाडीसँ ल' गेल रहियै, तहन कतेक बात ड्राइभरकेँ सुनौने रहथिन ? पुत्र - मोन परल । बाप रे दु घण्टाक बाटमे कमसँ कम दू सय बेर ड्राइभरकेँ बात कहने हेथिन ,' रे हमर जान लेबे की ? आई हमर जान ई लैए क' रहत । रे स्थिरसँ चलो, कने आर स्थिरसँ चलो।' सब केँ अक्छा देने रहथिन । बुढबा चुपचाप सब सम्वाद सुनैत रहल । ने कोनो बाद ने प्रतिवाद । दुनू आँखि बन्द छलैक।कहिने कखन अपन चौकिपर आबि पडि गेल छल।ओ जागल अछि कि सुतल, अपनो ने ठीकसँ बुझबामे आबि रहल छलैक । बिच बिचमे बेटा पुतहु मध्य चलैत संवाद कानमे पडि जाइत छलैक। - एना किया बाबूजी नौटंकी करैत छैथ ? - कहियासँ एना छै ? एमहर बुढबा मोन पारए लगैछ - कहियासँ ओकरा एना भ' रहल छै? किछु सूत्र ने हाथ लागि रहल छै । मुदा जबाब त' खोजए पड़तै, नहि त' धियापुता सब एकरा नौटंकीए कहैत रहि जएतै।विद्यार्थी जीवनमे सब किछु ठीकठाक रहैक।खुब निकसँ पढैत लिखैत छल,अतिरिक्त क्रियाकलापमे सेहो भाग लैत छल । एतबे नै विद्यार्थी राजनीतिमे सेहो निडरतापूर्वक भाग लैत छल ।तहिया देशमे निरंकुश व्यवस्था रहैक तथापि ओकरा व्यवस्था विरोधी नारा जुलुश जायमे कोनो डर नै होई छलैक।मुदा आब की भ' गेलैक? कोना भ' गेलैक? किया प्रत्येक पल ओ भयाक्रान्त रहए लागल ? छात्र जीवनमे जे एकटा क्रान्तिकारीक छवि बनौने छल से आई एतेक डरपोक कोना भ' गेल ? बुढबा अन्हार घरमे जेना हथोरिया क रहल होइक , मुदा किछु हाथ नै लागि रहल छलैक ।ओम्हरुका सम्वाद कखनो काल एमहर चलिए अबैत छलैक। - सुनै छलियैक जे बाबूजी नीक शिक्षक छलाह - से त' ठीके - तखन एना कोना भ' गेलाह ? बुढबा सोचैत अछि - की हम ओएह मनुक्ख छी जे अपन पढाई समाप्त होइते गामक विद्यालयमे शिक्षक बनि गेल छल आ' जकर ख्याति दू चारिए मासमे चारु दिस पसैर गेल छलैक ।जेहने विद्यार्थीकेँ पढाब' लिखाब' मे ओस्ताद तेहने अनुशासन प्रिय शिक्षकके रूपमे ओकर पहिचान बनल रहलैक आजीवन । बुढबाकेँ आइयो मोन छै जे कोना विद्यालयकेँ शिक्षकसब अपन वाजिव मांग राखि हड़ताल कएने छलैक आ' एक दिन एकटा नेताकेँ बेटा छूरा ल' क' अफिसमे घुसिक' शिक्षक सबकेँ धमकी देबए लगलै-' आई देखै छी कोन मास्टर क्लाशमे नै जाईय ?' सब शिक्षक सकपका गेलै ।सब उठबाक उपक्रम करए लागल । ओकरा बुझ्एलै ई अनर्थ छैक । कोनो गुण्डाक छूराक डरसँ हड़ताल तोरब कायरता हएत आ' ओ गरजए लागल-' हिम्मत छौ त' आगा बढ ,मुदा तोरा धमकी देलासँ हडताल नै टूटतै ।' ओकर आवाजमे ततेक बेसी ने दृढता रहैक जे गुण्डा माथ झुकाक' घुरि गेल रहैक।एहि आश्चर्यजनक घटनाक बाद एकटा साहसी नेताक रूपमे सम्पूर्ण शिक्षक समुदायक सर्वमान्य भ' गेल छलैक ओ। मुदा आब ओ साहस कत्त' गेलै? कत्त' गेलै ओ निडरता ,जकर प्रसंशासब करै ? ओकर दिमाग जेना काजे ने क' रहल होइक । फेर दिमाग भितरसँ अबैत सम्वाद दिस जाइत छैक । - कि माय जहियासँ खतम भेलखिन तहिएसँ त' नै बाबूजीकेँ एहन समस्या भ' गेलै? - भ' सकैए , ओना किछु कहल नै जा' सकैए ! - मुदा बुढ सबहोई छै आ' एक दिन सब मरै छै । - ई त' शाश्वत सत्य छै । 'छै त' ई शाश्वत सत्य' बुढबाक मोन भेलै जे ओ जबाब दै ' तथापि असीम पीडा होई छै बाऊ।' मुदा ओ पूर्ववत गुम्मे रहल ।अन्तरमनमे चक्रवात चल' लागल रहै।बुढिया मन परए लगलै। खेले खेलमे ओकर विवाह भ' गेल रहै ।तै ने पत्नीक महत्त्व बुझल रहै,ने महिलाक महत्ता।मुदा पहिल सन्तानक जन्म कालमे जेना ओकर सम्पूर्ण कठोरता पिघैल गेल रहैक।प्रसब पीडासँ छटपटाईत पत्नीक क्रन्दन जखन कोठलीसँ बाहर आबए लगलै तखन ओकर धैर्य जबाब द' देलकै आ' ओ केबार ठेलक' भितर पहुँच गेल छल ।प्रसव कार्यमे संलग्न महिलासब एक्कहि बेर चिचिया उठल रहै-'जा' जा'अँहा किएक भितर अएलहुँ?'मुदा ओकर ध्यान ओहि कोरस पर नै जा' सीधा अपन पत्नीक चेहरा पर गेल रहैक।पत्नीक चेहरा पर उठैत पिडाक ज्वारभाटाकेँ देखि ओकर करेज दरकि गेल रहैक।पत्नीक पीडा ओकर अपन पीडा बनि गेल छलैक। ओहने क्षणमे अनुभूति भेलैक जे महिला मात्र बच्चाक जन्म नै दै छै, प्रत्येक बच्चाक जन्मक संग ओकरो पुनर्जन्म होइत छैक ।तत्पश्चात् पत्नी ओकरा नजरिमे महान भ' गेल रहै । शनै: शनै: समय ब्यतित होइत गेलै आ' कहि ने कहिया पत्नी मायके भूमिकामे चलि अएलै ? भोजन कखन करब ,की करब, कतेक करब सब बुढिएकेँ बुझल रहै ।की पहिरब, कत्त' जाएब सब निर्णय बुढिए करै आ' से ओकरा नीक लगै ।ओ पूर्णत:पत्नी पर अबलम्बित प्राणी भ' गेल छल ।बात बातमे बहुत बेर पत्नीकेँ कहि दैत छलैक-' हे अँहा पहिने एहि दुनियासँ नै जाएब नहि त' हमर दुर्दशा भ' जाएत।' पत्नीक जबाब रहैत छलैक-' आब ई ककरा हाथमे छै ?छोरु ने एहन बात । बाल बच्चाकेँ योग्य बना देलियै ने , सब समझदार छै, बस आब की चाही ?ओना हम त' साथ नहिए छोडब,अँहा जे करी ? ' ठीके मृत्यु ककरो हाथमे नै छै।के ककरा साथ छोडिदेतै तकर ठेकान नहि । झुठ्ठी बुढिया एकदिन ओकरा छोडि चुपचाप एहि दुनियासँ चैल गेलैक।ओ जेना टुगर भ' गेल छल ।आईयो पुरना बातसब सोचि बुढबाक करेजमे टीस ऊठए लगलै । ओम्हरसँ अबैत सम्वादक किछु अंश पुन: कानधरि पहुँचिए जाइत रहैक- - कोनहु मानसिक समस्या त' नै छै बाबूजीकेँ? - भ' सकैए - तखन त' ईलाज कराब' पड़तै - ईलाजमे दूटा समस्या छै - कोन कोन ? - पहिल ई जे बाबूजीकेँ कहबै कोना जे अँहाके मानसिक समस्या भ' सकैए - आ' दोसर ? - दोसर ई जे इलाज कराब' के ल' जएतै ? अँहूके नोकरी आ' हमरो नोकरी ।फुरसति कहाँ अछि? भितर चुप्पी सधा गेल छल । एमहर बुढबाके बुझाए लगलै जे ओकरा ठीके मानसिक समस्या भ' सकैए ।एहि नगरमे ओकरा सब चोर उचक्का आ' ठग बुझाई छै आ' प्रत्येक दिन लगैछै जे आई 'संयोगसँ बाँचि गेलहुँ।' संसारमे चाहे कतहु भुकम्प अबौक, तुफान अबौक अथवा कोनहु घटना घटित होउक ओकरा सदैव बुझाइत रहैत छै जे ओ संयोगसँ बाँचि गेल।ओहो त' एहि घटनामे पैर सकैत छल । एतेक धरि जे ओकरा सब डाक्टर महाठग बुझाई छै । दलाल आ' यम आरके भरोसे चलए बला जन्तुकेँ डाक्टर कोना कहबै ? भरोसा कोना करबै ओकरा पर ? एत्त' लोक डाक्टर भरोसे नै सँयोगसँ बाँचि रहल अछि ।तथापि ओकरो त' ओही डाक्टर लग जएबाक छै ।मुदा कहिया ? बुढबा सोचैत सोचैत निचोड निकालैत अछि - ' बेटा पुतहुकेँ जहिया फुरसति हएतै तहिया ल' जाएत ने , एहिमे चिन्ताक कोन बात ? पढा लिखाक' योग्य बनाईए देने छियई। स्वयं बुझनुक आब भ' गेल अछि ।' कखनो ओकरा होइत छै गामे चल जाइत छी ।एहिठाम रहने बच्चासबकेँ बड तकलिफ छै।फेर होइत छै नहि यदि गामपर एसगरे रहब तखन बौआसबकेँ बदनामी हएतै।हँ, ओकर दिमाग खराब भ' गेल छै| तैं ने ई बेकारके बातसब दिमागमे अनैत रहैत अछि । बुढबा ईएह सब सोचि रहल छल आ' आँखिसँ नोर सेहो बहैत जा' रहल छलैक, अनेरे टुग्गर जकाँ। - सुरेन्द्र लाभ, जनकपुधाम, नेपाल
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१२.प्रमोद झा 'गोकुल'- भोज (बीहैन कथा) प्रमोद झा 'गोकुल' भोज (बीहैन कथा) जखन भात दालि छ: तरकारी बड़ी पापड़ दही सकरौड़ी खाके पंच लोकैन टन्न भै गेलाह तखन गृह स्वामी वयोवृद्ध चतुरी बाबू सँ कल जोड़ैत पुछलखीन्ह - अन्न तीमन खाइ जोकर भेलैने चतुरी काका! असल गप्पते अहीं कहब। - जुनि पुछू मटकूड़ी बाबू! सब उपर्युपरि। अङुरी चाटिके खाइबला सब वस्तुजात बनल छल। मनते होइये जे बनौनिहारक गट्टा काटिके चलि दी।तैपरसे दही सकरौड़ी पर जर्दालू आ बम्मै आम धमाल मचा देलकै। हँ तखन साग कच कच आ ओइमे बनौनिहारिक माथक लम्बा केश मनके खिन्न कय देलक।आर सब बड़ दिब। - एकरे कहै छै अँकुरीमे अँकुड़ा टेढ़। बूढ़ मेलों । आबो अपन भाभट समहारू बाबा! आ चलू हाथ धोइले !! हुनक बगलमे बैसल एकटा पंच टिपलैन। -प्रमोद झा 'गोकुल', दीप मधुवनी (विहार), फोन-९८७१७७९८५१ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.पद्य ३.१.डॉ. जियाउर रहमान जाफरी-दू टा प्रेम कविता-अहाँक फोटो/ की कयल जाइत अछि ३.२.आचार्य रामानन्द मण्डल- झाझा मेल/ बुद्ध/ राज करै छी बिनु सरकार/ मिथिला राज/ वो विधवा छै ३.३.प्रमोद झा 'गोकुल'-स्वयं केर धरातल ३.४.डॉ. किशन कारीगर- पंडा आ दलाल (हास्य कविता) ३.१.डॉ. जियाउर रहमान जाफरी-दू टा प्रेम कविता-अहाँक फोटो/ की कयल जाइत अछि डॉ. जियाउर रहमान जाफरी
दू टा प्रेम कविता-अहाँक फोटो/ की कयल जाइत अछि
१ अहाँक फोटो
चानसँ कनि चानक इजोत लऽ लेलौं रौदसँ कनि गर्मी इत्र स कनि गंध जुगनूसँ कनि इजोत कनि गुलाबक रंग मेघसँ कनि कोमलता आ झरना, पहाड़ आ तारासँ मुट्ठी भरि सौन्दर्य... हम देखलहूँ जे ई सब सँ अहाँक एकटा सुन्दर चित्र बनि गेल अछि...
२
की कयल जाइत अछि
जाहि दिन अहाँ उदास छलहुँ हमर मोन सेहो उदास छल जखन अहाँ खुश छलहुँ हमर मोन फुलि गेल अहाँक हँसी हमरा सभकेँ सांत्वना देलक आ अहाँक दुख हमरा सभकेँ जीबय नहि देलक एक दिन जखन अहाँ बीमार छलहुँ भरि राति बिता देलियैक अहाँक संग संसार मे आब अहाँ हमरा कहू आर की करत जाइत अछि पियार मे....
-डॉ. जियाउर रहमान जाफरी, ग्राम +पोस्ट माफ़ी, वाया-अस्थावां, जिला-नालंदा, बिहार 803107 मो.9934847941 अपन मंतव्य editorial.ऽtaff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.आचार्य रामानन्द मण्डल- झाझा मेल/ बुद्ध/ राज करै छी बिनु सरकार/ मिथिला राज/ वो विधवा छै आचार्य रामानन्द मण्डल झाझा मेल/ बुद्ध/ राज करै छी बिनु सरकार/ मिथिला राज/ वो विधवा छै १. झाझा मेल मिथिला राज के लेल, झाझा मेल खुलैत हैय। जय काली कलकत्ते वाली, छुक छुक करके बोलै हैय। कुछ पिछलगुआ खलासी बनके, बज्जिका अंगिका के, कोयला पानी झोंकत हैय। मैथिली बनके भाप, झाझा मेल के चलबैत हैय। झाझा मेल बिन पैसैंजर के, दरभंगा राजक स्टेशन आबैत हैय। मैथिल सभ स्टेशन पर, झाझा मेल के राह जोहत हैय। मिथिला राज के लेल, रामा झाझा मेल आबैत हैय। २. बुद्ध बुद्ध मिथिला के रहे। लुम्बीनी मिथिला में रहे। ज्ञान आइ के बिहार में पाये रहे। तहिया आइ के बिहार न रहे। बुद्ध के ज्ञान दुनिया में फैलल रहे। मिथिला बुद्ध के ज्ञान से अंजान रहे। मगध के बुद्ध कहिके मिथिला सनातन रहे। अपना बुद्ध के न पहचान के मिथिला अभागल रहे। बुद्ध के दुनिया मानैत रहे। बुद्ध के मिथिला भगावैत रहे। बुद्ध मिथिला में ज्ञान बांटैत रहे। बुद्ध के वैशाली स्थापित करैत रहे। मिथिला में बुद्ध के ज्ञान बढैत रहे। मिथिला में मानवता मानैत रहे। मिथिला में शांति बनैल रहे। मिथिला रामा विकास करैत रहे। ३. राज करै छी बिनु सरकार नाभि कुंड मे, बसै छै अमृतक संविधान। हथियार छै, लोकतांत्रिक अधिकार। शास्त्रक शस्त्र, हो जाइए बेकाम। धरमक बाण, नै पावै निदान। प्रयोग करै छी, जातक उच्च-नीच के बाण। सोख लिइय छी अमृतक संविधान। मारे फूट नीति के वाण, हो जाइत छथि , सामाजिक रण क्षेत्र में निष्प्रान। हड़प लेयि छी अधिकार। रामा राज करै छी बिनु सरकार। ४. मिथिला राज हमरा मिथिला राज चाही। राजा रानी के गुणगान चाही। हमरा मिथिला राज चाही। दरभंगा वाला राज चाही। हमरा मिथिला राज चाही। भेदभाव के राज चाही। हमरा मिथिला राज चाही। उच्च-नीच के राज चाही। हमरा मिथिला राज चाही। छूत अछूत के राज चाही। हमरा मिथिला राज चाही। बाभन सोलकन बाला राज चाही। हमरा मिथिला राज चाही। घृणा के संस्कृति चाही। हमरा मिथिला राज चाही। तंत्र-मंत्र के ढोंग चाही। हमरा मिथिला राज चाही। भक्ता भक्ति के राज चाही। हमरा मिथिला राज चाही। अंध भक्ति के राज चाही। हमरा मिथिला राज चाही। ढोंग पाखंड के राज चाही। हमरा मिथिला राज चाही। विषमता के न्याय व्यवस्था चाही। हमरा मिथिला राज चाही। स्पृश्यता के जाति व्यवस्था चाही। हमरा मिथिला राज चाही। मनु बाबा के संविधान चाही। रामा मिथिला राज चाही। ५. वो विधवा छै वो युवती छै। मन में हुलसा छै। श्रृंगार करे कै। गले में हार पहिने के। पैरों में पाजेब पहिने के। हाथों में मेंहदी रचावे के। पैरों में महाबर लगावे के। वो विधवा छै। वो युवती छै। देह में कामना छै। मन में भावना छै। युवक से प्यार करे के। मनक बात इजहार करे के। समाज के बंदी तोड़ के। नया पैगाम देवे के। रामा नया पैगाम देवे । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.प्रमोद झा 'गोकुल'-स्वयं केर धरातल प्रमोद झा 'गोकुल' स्वयं केर धरातल चिन्ताक आगि मे मनोरथक इंधन पजरि रहल सख सेहन्ताक धधरा धधकि रहल धू' धू' धू' अनन्त आवश्यकताक पेट्रोल और लहका रहल ओकरा लह लह धह धह लपलपैत लपट मे लपेटल हमर अन्तर्मन भय जाइये लाल टुह टुह आगिये जकाँ लाचार विचार बिसरि आचार बकय लगैछ अन्ट सन्ट एन मेन बताह प्रचंड मस्तिष्क रूपी आकाश मे तैखन मनो मेघ चेतना स्वरूपा वायुक सिहकी पाबि वर्षय लगैये भय उठैये पुनि शीतल हीतल देखय लगै छी हम स्वयं केर धरातल -प्रमोद झा 'गोकुल', दीप मधुवनी (विहार), फोन-९८७१७७९८५१ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.४.डॉ. किशन कारीगर- पंडा आ दलाल (हास्य कविता) डॉ. किशन कारीगर
पंडा आ दलाल (हास्य कविता)
एकटा गप साफे बुझहू त ई दुनू ममिऔते पिसिऔते छि एकटा अछि जं पंडा त दोसर अछि दलाल.
साहित्यों आब एकरा दुनू सँ अछूत नहि रहि गेल पंडा बैसल अछि पटना में त दिल्ली में बैसल अछि दलाल.
सभटा साहितिय्क आयोजन में रहबे करत एककर सझिया-साझ हँ ओ में छि नहियों में छि सभटा लकरपेंच लगाबै तिकडमबाज.
की दरभंगा आ की कलकत्ता? सभ ठाम बैसल अछि तिकडमबाज अपना-अपना ओझरी में ओझरौत आ सुढ़िये नहि देत कोनो काज.
पहिने ई काज हमही शुरू केलौहं बड़-बड़ बाजै भाषाई पंडा धू जी एककर श्रेय त हमरा ताहि दुआरे अपस्यांत भेल दलाल.
खेमेबाजी आ गुटबाजी केलक सत्य बजनिहार के धमकी देलक अपना स्वार्थ दुआरे ई सभ भाषा साहित्यक सर्वनाश करेलक.
अपने मने बड्ड नीक लगइए मुदा आई "कारीगर" किछु बाजत कहू औ पंडा आ दलाल एहेन साहित्य समाज लेल कोन काजक?
साहित्य समाज जाए भांड में एकटा दुनू के कोन काज साहित्यक ठेकेदारी शुरू केलक ई दुनूटा भ गेल मालामाल. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह ३८४ म अंक १५ दिसम्बर २०२३ (वर्ष १६ मास १९२ अंक ३८४)|| 147 146 || http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X VIDEHA लक्ष्मण झा ’सागर’ विशेषांक
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हज विशेषांक २०२४ नरेन्द्र झा एवं प्रा. रामावतार यादव पर विदेह www.videha.co.in विशेषांक २०२४ नरेन्द्र झा एवं प्रा. रामावतार यादव चयनित भेला २०२४ क विदेह विशेषांक लेल। जि भर नरेन्द्र झा पर विदेहक विशेषांक १ जून २०२४ आ प्रा. रामावतार यादव पर १५ जून २०२४ अंकमे धो लि SD प्रकाशित CCA) eee: | | लेखक-पाठक clad आग्रह जे नरेन्द्र झा एवं प्रा. रामावतार यादव जीक काजपर आलोचना, . | = 'समालोचना, समीक्षा आदि वर्ड फाइलमे editorial.staff.videha@gmail.com पर | — in 0p Se i eam पाबधि। लि कि & नरेन्द्र झाजीक अधिकांश पौथी २००८ सें विदेह www.videha.co.in पर उपलब्ध ofS! Wy face fastuign Roly % cf जद = = == = SG WWW. HES हैंए। Pe — Yn, facie ICTR 3928 re ae facre factais २०२8 .... प्र } AERA सा अन्न था. वामाब्रछाव AAA शव FACE www. videha.co.in FACT २०२8. AA YA सा IH शा. वामाब्रजाव AAA BUS एछता २०२8 क fA FACT CAL ATT सा शव FACES FACTS ५ OT २०२४ शा था. वामाब्रछाव TIAA शव 90 जून २०२४ कर्म geht =. 7 east a a एलथक-नाठक एलाकनिें AS OH THT सा IH था. वामाब्रठाव ATA जीक BIA AAT, HATA, i” RE» ater शनि aS काजतएय editorial. staff.videha@gmail.com शव शठाब्िणि। x AES साजीक अविकीने co २००० मैं बिएनठ www.videha.co.in शव Gorn अडि।
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