VIDEHA — Issue 386 / अंक ३८६

Publication: VIDEHA · Issue: 386
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ISSN 2229-547X VIDEHA 𑒀 विदेह ३८६ म अंक १५ जनवरी २०२४ (वर्ष १७ मास १९३ अंक ३८६) [विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। कॉपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति ‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२४. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२४. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. It is a platform for scholars, researchers, writers and poets to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, and poetry in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@gmail.com. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover designed by AUM GAJENDRA THAKUR Videha e-Journal: Issue No. 386 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अक्खर खम्भा (आखर खाम्ह) तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ (कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।) माने आखर रूपी खाम्ह निर्माण कऽ ओइपर (गद्य-पद्य रूपी) मंच जँ नै बान्हल जाय तँ ऐ त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लत्ती केना पसरत। शुक्ल यजुर्वेद (२६.२)-यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः। ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च।।हम सभ गोटेकें ई पवित्र वाणी (वेदवाणी) सुनाबी। ब्राह्मणकें, क्षत्रियकें, शूद्रकें आ आर्यकें; अपन लोककें आ अपरिचितकें सेहो (माने सभकें)। मुदा ऐ वेदवाक्यक विपरीत मनुस्मृति वेदवाणीक अध्ययन/ श्रवणकें समाजक किछु गोटे लेल निषेध करऽ चाहलक, मुदा स्मृति सेहो वेदवाक्यकें प्रमाण मानैत अछि (शब्द प्रमाण) तें तकर विरुद्ध देल ओकर निर्देश स्वयं अमान्य भऽ जाइत अछि। Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. -Robert Louis Stevenson ------------------------------------- Videha: Maithili Literature Movement 𑒀 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्ति: 𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱: अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.अंक ३८५ पर टिप्पणी २.गद्य २.१.सियाराम झा 'सरस'-करोट फेरैत गामक निदर्शक: केएनटी २.२.परमानन्द लाल कर्ण-एकादशीक उद्भव २.३.निर्मला कर्ण- अग्निशिखा खेप ३४ २.४.रबीन्द्र नारायण मिश्र-चित्रकुटकेँ घाट पर २.५.किशन कारीगर- मानकीकृत तराजू पर जोखाइत लोकभाषा मैथिली २.६.लालदेव कामत- पुस्तक समीक्षा/ उषा किरण खाँ/ श्री चन्द्र-चकोरी जय-जय हो (सीता-राम विवाह संकीर्तन)/ हमर आदर्श स्मृति शेष सूर्य नारायण चौधरी/ पोथी समीक्षा: कोनो टुटल अछि तन्तु/ आजुक जीवन-आजुक साहित्य/ मैथिली कविता भीमभाय सँ सुनल अछि २.७.रबीन्द्र नारायण मिश्र- ठेहा परक मौलाएल गाछ (धारावाहिक) २.८.कुमार मनोज कश्यप-वेदना २.९.प्रमोद झा 'गोकुल'-भल गप/ प्रेमक चीछ ३.पद्य ३.१.आचार्य रामानन्द मण्डल- झक झोरैय है!/ मिथिला महात्म्य/ केवल मानव मानैय छी ईश्वर/ कोयल आ काग ३.२.संतोष कुमार राय 'बटोही'- दूटा कविता-बेर-बेर/ पिया हेरायल ३.३.राज किशोर मिश्र- सभ्यताक भ्रम ३.४.डॉ सुमंगला झा- एखनो ई हाल अछि ३.५.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'-गजल (बिना रदीफक) ३.६.आशीष अनचिन्हार- दूटा गजल ३.७.प्रमोद झा 'गोकुल'-दीन स्वर/ पिट्ठा मर्द 𑒀 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्तिः पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म 𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑓁 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒰𑒣: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒼𑒭𑒡𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹 𑒠𑒹𑒫𑒰: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧 ब्रह्मणसँ प्रार्थना जे द्युलोकमे, अंतरिक्षमे, पृथ्वीपर, जलमे, औषधमे, वनस्पतिमे, विश्वमे, सभ देवतागणमे आ ब्रह्ममे शांति हुअय। ॐ-ब्रह्मण, द्यौ-सूर्य-तरेगण, अंतरिक्ष- पृथ्वी आ द्यूलोकक बीच, आप:-जल, विश्वेदेवा- सभ देवता, ब्रह्म- सर्जक। 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝𑒮𑒿 𑒣𑓂𑒩𑒰𑒩𑓂𑒟𑒢𑒰 𑒖𑒹 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒧𑒹, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭𑒧𑒹, 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲𑒣𑒩, 𑒖𑒪𑒧𑒹, 𑒎𑒭𑒡𑒧𑒹, 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒱𑒧𑒹, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒧𑒹, 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰𑒑𑒝𑒧𑒹 𑒂 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒧𑒹 𑒬𑒰𑓀𑒞𑒱 𑒯𑒳𑒁𑒨। 𑓇-𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝, 𑒠𑓂𑒨𑒾-𑒮𑒴𑒩𑓂𑒨-𑒞𑒩𑒹𑒑𑒝, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭- 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒂 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒏 𑒥𑒲𑒔, 𑒂𑒣:-𑒖𑒪, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹𑒠𑒹𑒫𑒰- 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰, 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧- 𑒮𑒩𑓂𑒖𑒏। 𑒀 ॐ, स॒हस्र॑शीर्षा॒ पुरु॑षः। स॒ह॒स्रा॒क्षः स॒हस्र॑पात्। 𑓇, 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒬𑒲𑒩𑓂𑒭𑒰↓ 𑒣𑒳𑒩𑒳↑𑒭𑓁। 𑒮↓𑒯↓𑒮𑓂𑒩𑒰↓𑒏𑓂𑒭𑓁 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒣𑒰𑒞𑓂। स भूमिं॑ ग्वंग वि॒श्वतो॑ वृ॒त्वा। अत्य॑तिष्ठद् दशाङ्गु॒लम्॥ 𑒮 𑒦𑒴𑒧𑒱𑓀↑𑓅 𑒫𑒱↓𑒬𑓂𑒫𑒞𑒼↑ 𑒫𑒵↓𑒞𑓂𑒫𑒰। 𑒁𑒞𑓂𑒨↑𑒞𑒱𑒭𑓂𑒚𑒠𑓂 𑒠𑒬𑒰𑒓𑓂𑒑𑒳↓𑒪𑒧𑓂॥ हजार माथ, हजार आँखि, हजार पएर संग विश्वकेँ आच्छादित केने अछि, दस आंगुरक गनतीक वशमे नै अछि ओ। प॒द्भ्याग्ँ॑ शू॒द्रो अ॑जायत॥ 𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑒑𑓂𑒿↑ 𑒬𑒴↓𑒠𑓂𑒩𑒼 𑒁↑𑒖𑒰𑒨𑒞॥ पएरसँ शूद्रक उत्पत्ति भेल॥ प॒द्भ्यां भूमि॒र्दिशः॒ श्रोत्रा᳚त्। 𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑓀 𑒦𑒴𑒧𑒱↓𑒩𑓂𑒠𑒱𑒬𑓁↓ 𑒬𑓂𑒩𑒼𑒞𑓂𑒩𑒰↑↑𑒞𑓂। मुदा पएरेसँ भूमियोक उत्पत्ति। ❀ (White Florette- innocence and purity) ☸ (Wheel of Dharma) ࿕(Swastik) 𑓅 (Gwang ग्वंग- two small circles connected by u and a dot placed over it, used in reference of Vedic texts) ꣼ (सिद्धिरस्तु, सिद्धम 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒱𑒩𑒮𑓂𑒞𑒳, 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒧 Devanagari Anji) ঀ (Bengali Anji, Siddham) 𑒀 (Tirhuta Anji, Ankush of Ganeshji, placed at the beginning of something) 𑒀

ISSN 2229-547X VIDEHA 𑒀 विदेह ३८६ म अंक १५ जनवरी २०२४ (वर्ष १७ मास १९३ अंक ३८६) [विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। कॉपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति ‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२४. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२४. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. It is a platform for scholars, researchers, writers and poets to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, and poetry in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@gmail.com. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. 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People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover designed by AUM GAJENDRA THAKUR Videha e-Journal: Issue No. 386 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अक्खर खम्भा (आखर खाम्ह) तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ (कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।) माने आखर रूपी खाम्ह निर्माण कऽ ओइपर (गद्य-पद्य रूपी) मंच जँ नै बान्हल जाय तँ ऐ त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लत्ती केना पसरत। शुक्ल यजुर्वेद (२६.२)-यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः। ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च।।हम सभ गोटेकें ई पवित्र वाणी (वेदवाणी) सुनाबी। ब्राह्मणकें, क्षत्रियकें, शूद्रकें आ आर्यकें; अपन लोककें आ अपरिचितकें सेहो (माने सभकें)। मुदा ऐ वेदवाक्यक विपरीत मनुस्मृति वेदवाणीक अध्ययन/ श्रवणकें समाजक किछु गोटे लेल निषेध करऽ चाहलक, मुदा स्मृति सेहो वेदवाक्यकें प्रमाण मानैत अछि (शब्द प्रमाण) तें तकर विरुद्ध देल ओकर निर्देश स्वयं अमान्य भऽ जाइत अछि। Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. -Robert Louis Stevenson ------------------------------------- Videha: Maithili Literature Movement 𑒀 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्ति: 𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱: अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृ. २-४) १.२.अंक ३८५ पर टिप्पणी (पृ. ५-५) २.गद्य २.१.सियाराम झा 'सरस'-करोट फेरैत गामक निदर्शक: केएनटी (पृ. ७-३३) २.२.परमानन्द लाल कर्ण-एकादशीक उद्भव (पृ. ३४-३७) २.३.निर्मला कर्ण- अग्निशिखा खेप ३४ (पृ. ३८-४५) २.४.रबीन्द्र नारायण मिश्र-चित्रकुटकेँ घाट पर (पृ. ४६-५९) २.५.किशन कारीगर- मानकीकृत तराजू पर जोखाइत लोकभाषा मैथिली (पृ. ६०-६२) २.६.लालदेव कामत- पुस्तक समीक्षा/ उषा किरण खाँ/ श्री चन्द्र-चकोरी जय-जय हो (सीता-राम विवाह संकीर्तन)/ हमर आदर्श स्मृति शेष सूर्य नारायण चौधरी/ पोथी समीक्षा: कोनो टुटल अछि तन्तु/ आजुक जीवन-आजुक साहित्य/ मैथिली कविता भीमभाय सँ सुनल अछि (पृ. ६३-८०) २.७.रबीन्द्र नारायण मिश्र- ठेहा परक मौलाएल गाछ (धारावाहिक) (पृ. ८१-९८) २.८.कुमार मनोज कश्यप-वेदना (पृ. ९९-१००) २.९.प्रमोद झा 'गोकुल'-भल गप/ प्रेमक चीछ (पृ. १०१-१०३) ३.पद्य ३.१.आचार्य रामानन्द मण्डल- झक झोरैय है!/ मिथिला महात्म्य/ केवल मानव मानैय छी ईश्वर/ कोयल आ काग (पृ. १०५-११५) ३.२.संतोष कुमार राय 'बटोही'- दूटा कविता-बेर-बेर/ पिया हेरायल (पृ. ११६-११८) ३.३.राज किशोर मिश्र- सभ्यताक भ्रम (पृ. ११९-१२३) ३.४.डॉ सुमंगला झा- एखनो ई हाल अछि (पृ. १२४-१२५) ३.५.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'-गजल (बिना रदीफक) (पृ. १२६-१२८) ३.६.आशीष अनचिन्हार- दूटा गजल (पृ. १२९-१३१) ३.७.प्रमोद झा 'गोकुल'-दीन स्वर/ पिट्ठा मर्द (पृ. १३२-१३४) 𑒀 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्तिः पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म 𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑓁 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒰𑒣: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒼𑒭𑒡𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹 𑒠𑒹𑒫𑒰: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧 ब्रह्मणसँ प्रार्थना जे द्युलोकमे, अंतरिक्षमे, पृथ्वीपर, जलमे, औषधमे, वनस्पतिमे, विश्वमे, सभ देवतागणमे आ ब्रह्ममे शांति हुअय। ॐ-ब्रह्मण, द्यौ-सूर्य-तरेगण, अंतरिक्ष- पृथ्वी आ द्यूलोकक बीच, आप:-जल, विश्वेदेवा- सभ देवता, ब्रह्म- सर्जक। 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝𑒮𑒿 𑒣𑓂𑒩𑒰𑒩𑓂𑒟𑒢𑒰 𑒖𑒹 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒧𑒹, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭𑒧𑒹, 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲𑒣𑒩, 𑒖𑒪𑒧𑒹, 𑒎𑒭𑒡𑒧𑒹, 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒱𑒧𑒹, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒧𑒹, 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰𑒑𑒝𑒧𑒹 𑒂 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒧𑒹 𑒬𑒰𑓀𑒞𑒱 𑒯𑒳𑒁𑒨। 𑓇-𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝, 𑒠𑓂𑒨𑒾-𑒮𑒴𑒩𑓂𑒨-𑒞𑒩𑒹𑒑𑒝, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭- 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒂 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒏 𑒥𑒲𑒔, 𑒂𑒣:-𑒖𑒪, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹𑒠𑒹𑒫𑒰- 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰, 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧- 𑒮𑒩𑓂𑒖𑒏। 𑒀 ॐ, स॒हस्र॑शीर्षा॒ पुरु॑षः। स॒ह॒स्रा॒क्षः स॒हस्र॑पात्। 𑓇, 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒬𑒲𑒩𑓂𑒭𑒰↓ 𑒣𑒳𑒩𑒳↑𑒭𑓁। 𑒮↓𑒯↓𑒮𑓂𑒩𑒰↓𑒏𑓂𑒭𑓁 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒣𑒰𑒞𑓂। स भूमिं॑ ग्वंग वि॒श्वतो॑ वृ॒त्वा। अत्य॑तिष्ठद् दशाङ्गु॒लम्॥ 𑒮 𑒦𑒴𑒧𑒱𑓀↑𑓅 𑒫𑒱↓𑒬𑓂𑒫𑒞𑒼↑ 𑒫𑒵↓𑒞𑓂𑒫𑒰। 𑒁𑒞𑓂𑒨↑𑒞𑒱𑒭𑓂𑒚𑒠𑓂 𑒠𑒬𑒰𑒓𑓂𑒑𑒳↓𑒪𑒧𑓂॥ हजार माथ, हजार आँखि, हजार पएर संग विश्वकेँ आच्छादित केने अछि, दस आंगुरक गनतीक वशमे नै अछि ओ। प॒द्भ्याग्ँ॑ शू॒द्रो अ॑जायत॥ 𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑒑𑓂𑒿↑ 𑒬𑒴↓𑒠𑓂𑒩𑒼 𑒁↑𑒖𑒰𑒨𑒞॥ पएरसँ शूद्रक उत्पत्ति भेल॥ प॒द्भ्यां भूमि॒र्दिशः॒ श्रोत्रा᳚त्। 𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑓀 𑒦𑒴𑒧𑒱↓𑒩𑓂𑒠𑒱𑒬𑓁↓ 𑒬𑓂𑒩𑒼𑒞𑓂𑒩𑒰↑↑𑒞𑓂। मुदा पएरेसँ भूमियोक उत्पत्ति। ❀ (White Florette- innocence and purity) ☸ (Wheel of Dharma) ࿕(Swastik) 𑓅 (Gwang ग्वंग- two small circles connected by u and a dot placed over it, used in reference of Vedic texts) ꣼ (सिद्धिरस्तु, सिद्धम 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒱𑒩𑒮𑓂𑒞𑒳, 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒧 Devanagari Anji) ঀ (Bengali Anji, Siddham) 𑒀 (Tirhuta Anji, Ankush of Ganeshji, placed at the beginning of something) 𑒀

१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.अंक ३८५ पर टिप्पणी १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय जे आर्य छथि से भारतक पच्छिम भागसँ मिथिलामे एलाह, आ हुनका सभक एबासँ पूर्व वेदक किछु अंश विद्यमान छल, तेँ ने बहुत रास शब्द जे मैथिलीमे अछि, बहुत रास उच्चारण जे मैथिलीमे अछि ओ वैदिक संस्कृतमे अछि, मुदा लौकिक संस्कृतमे नै अछि। अविद्या, कर्मसिद्धान्त, जन्म आ पुनर्जन्मक आवाजाही आ मोक्ष ई सभ अनार्यसँ आर्यकेँ भेटलै। तेँ ने उपनिषदमे मोक्ष प्राप्तिक मार्ग छै, स्वर्ग प्राप्तिक नै। मोक्ष भेटत कोना? यज्ञ केलासँ? नै, ई भेटत ज्ञानसँ आ मनन-चिन्तन आ समाधिसँ। राजा जनकक संरक्षणमे याज्ञवल्क्य बृहदारण्यक उपनिषदक तिरहुतक अनार्य क्षेत्रमे रचना केलन्हि। वाचस्पति मिश्र सांख्यकारिकाक सन्तावनम सूत्रक व्याख्या करैत कहै छथि जे की ई कहि सकै छी जे अचेतन दूध केर पोषणसँ परु पोसाइए आ अचेतन प्रकृतिक संचालनसँ जीवकेँ मुक्तिक ज्ञान भेटैए? ईश्वर तँ स्वयंमे पूर्ण छथि तँ ओ कोन उद्देश्ये विश्वक सृष्टि करताह आ जीव लेल जँ ओ सृष्टि करताह तँ सृष्टिक बादे तँ जीव बन्हाइए आ सृष्टिसँ पूर्व तँ बन्हेबाक प्रश्ने नै अछि, तखन जीवक प्रति कथीक दया? से प्रकृति द्वारा सृष्टि होइए आ जीव अपन प्रयाससँ अपवर्गक प्राप्ति करै छथि। आ विवेकसँ होइए प्रलय। से ईश्वरवाद नै निरीश्वरवाद अछि वाचस्पतिक व्याख्या। प्रकृति संचालनमे जँ ईश्वर भाग लै छथि तँ ओ चेतन प्रक्रिया हएत जे कोनो उद्देश्येसँ हएत आ तकर कोनो खगता ईश्वरकेँ छन्हिये नै। न्यायसूत्रक रचना केनिहार मिथिलाक गौतम सोलह पदार्थक ज्ञानसँ जीवक निःश्रेयस प्राप्त करबाक चर्च करै छथि, मुदा ऐ सभमे ईश्वरक कतौ चर्च नै अछि जे हुनको द्वारा मुक्ति सम्भव अछि। वैशेषिक सूत्र कहैए जे वेद विद्वान लोकनि द्वारा रचल गेल अछि नै कि ईश्वर द्वारा। कुमारिल भट्ट कहै छथि जे सृष्टिक पूर्व ईश्वरक विषयमे कोनो विश्वसनीय चर्चा असम्भव अछि।

शतपथ ब्राह्मणक तथाकथित मुख्य धारा, आ तकर समानान्तर मुख्यधारा: ब्राह्मण आ गएर ब्राह्मणवाद मिथिलामे शुरुएसँ रहल अछि। ज्योतिरीश्वर लिखै छथि- बौध पक्ष अइसन- आपात भीषण। अगतिशील शतपथ ब्राह्मणक परम्परा नामक साम्यताक कारण संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिकेँ पूज्य बनबैपर बिर्त अछि। ऋक् आ नाराशंसी, महाकवि विद्यापति आ पागबला विद्यापति, मोक्ष आ स्वर्ग-नर्क ई दुनू परस्पर विरोधी विचारधारा मिथिलामे रहल। शतपथ ब्राह्मणक विदेघमाथव आ पुराणक निमि दुनू गोटेक पुरोहित गौतम छथि से दुनू एके छथि आ एतएसँ विदेह राज्यक प्रारम्भ। माथवक पुरहित गौतम मित्रविन्द यज्ञक/ बलिक प्रारम्भ कएलन्हि आ पुनः एकर पुनःस्थापना भेल महाजनक-२ क समयमे याज्ञवल्क्य द्वारा। मैत्रेयी, याज्ञवल्क्य, सीता, जनककेँ रटैत-रटैत ई परम्परा विद्यापतिक यज्ञोपवीत संस्कार आ पाग प्रतिष्ठापन जइ तीव्र गतिये केलक से ओकर शतपथ ब्राह्मणक तथाकथित मुख्य धाराक अनुकूल छल।

१७६० ई.क माधव सिंहक शाखा पञ्जीक आदेशक बाद मिथिलामे ब्राह्मण आ कायस्थ मध्य नव-कुलीनवादक प्रसार भेल आ भलमानुस (बत्तेसगमिया) उपजातिक कर्ण कायस्थमे आ स्रोत्रिय उपजातिक मैथिल ब्राह्मणमे उत्पत्ति भेल, ओइसँ शारीरिक आ मानसिक बीमारी ऐ दुनू उपजाति मध्य भयंकर रूपसँ बढ़ल, संगे बहुविवाह, बाल-विवाहक आ विधवाक संख्यामे अत्यधिक वृद्धि भेल। आ ईहो जइ शान्तिपूर्ण रूपसँ आ तीव्रगतिसँ भेल से शतपथ ब्राह्मणक तथाकथित मुख्य धाराक अनुकूल छल। -Gajendra Thakur, editor, Videha (be part of Videha www.videha.co.in -send your WhatsApp no to +919560960721 so that it can be added to the Videha WhatsApp Broadcast List.) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १.२.अंक ३८५ पर टिप्पणी अंक ३८५ पर टिप्पणी राज किशोर मिश्र अहाँक मैथिली लेल अनवरत काज, आ सेहो चुपचाप प्रशंसनीय अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.गद्य २.१.सियाराम झा 'सरस'-करोट फेरैत गामक निदर्शक: केएनटी २.२.परमानन्द लाल कर्ण-एकादशीक उद्भव २.३.निर्मला कर्ण- अग्निशिखा खेप ३४ २.४.रबीन्द्र नारायण मिश्र-चित्रकुटकेँ घाट पर २.५.किशन कारीगर- मानकीकृत तराजू पर जोखाइत लोकभाषा मैथिली २.६.लालदेव कामत- पुस्तक समीक्षा/ उषा किरण खाँ/ श्री चन्द्र-चकोरी जय-जय हो (सीता-राम विवाह संकीर्तन)/ हमर आदर्श स्मृति शेष सूर्य नारायण चौधरी/ पोथी समीक्षा: कोनो टुटल अछि तन्तु/ आजुक जीवन-आजुक साहित्य/ मैथिली कविता भीमभाय सँ सुनल अछि २.७.रबीन्द्र नारायण मिश्र- ठेहा परक मौलाएल गाछ (धारावाहिक) २.८.कुमार मनोज कश्यप-वेदना २.९.प्रमोद झा 'गोकुल'-भल गप/ प्रेमक चीछ २.१.सियाराम झा 'सरस'-करोट फेरैत गामक निदर्शक: केएनटी सियाराम झा 'सरस' करोट फेरैत गामक निदर्शक: केएनटी नाम रहनि कृपानन्द ठाकुर। आशय लगबैत छी- किनकर कृपा? किनका ऊपर कृपा? आनन्द- तँ से कोन तरहक वा कोन बातक आनन्द? स्वयं आनन्दक अनुभूतिमे डूबैत आकि अनकहु ताहिमे डुबबैत? एहन-एहन बहुतो प्रश्नक कछमछीकेँ शान्त करबाक चेष्टा थिक ई व्यक्तिवाची निबन्ध! परिसर ओ परिवेश: बात छठम-सातम दसक, गत सदीक थिक। बात आजुक मधुबनी जिलाक थिक जे ताहि दिनमे जिला नहि, अनुमण्डले छल आ रूप तकर, बाकलम मलंगिया- 'एकटा ठिठुरल शहर- मधुबनी' सैह छलैक। ठिठुरल किएक, तकर खीसा बड़कीटा छैक मुदा अति संक्षेपहिमे कही तँ एक साल बाढ़ि, तँ दोसरमे अकाल! फेर उगडुब-उगडुब, तँ फेर सुखाड़े-सुखाड़! तैठाम गाम-घर, लोकवेद, जीव-जन्तु-बनस्पतिकेँ जेहेन हेबाक चाही- गरमीमे नंग-धरंग तँ जाड़मे कठुआइत-सिमसिमाइत! देह झाँपए, तँ टाङ उघार आ टाङ झाँपए तँ आङ उघार! ताही  जिलाक मध्यवर्ती क्षेत्रान्तर्गत कमला-बलानक पछबारिए पारमे अवस्थित अछि- एकटा गाम। नाम तकर मेंहथ। की से, तँ मेँहमे कहियो हाथी जोतल जाइत छलै- तेँ मेंहथ! बात से फुसियो नहि थिक। १९५०-५५ क आसपासहु मे चारिटा हाथी रहैक, से आँखिक देखल साँच थिक। परिसरक आरो ग्रामांचलक चर्च करी, तँ कमलाक पुबारि पारमे महरैल-कन्हौली-झंझारपुर बजार-टीशन प्रभृति, तँ पच्छिम दिस कोठिया-पट्टी-रैमा, भराम-विजइ, कोइलख आदि। उत्तर दिस गोपलखा-रामखेतारी-शंकरपुर तँ दच्छिनमे महिनाथपुर-नरुआर-हैंठीबाली, भैरब-थान, विदेश्वर-थान, लोहना-कथना आदि। एहि दसकोसी प्रक्षेत्रक रहन-सहन साधारण-गृहस्थौ सैह! हँ, किछु सोति-योगक कारणें लोहना-रुपौली-कथना, भराम-ओ कोइलखक मान-मर्यादा कनेक झाँपल-तोपल; हमरा गाममे छौ-नौ, तऽ ओइ गामसबमे नौ-तेरह होइक। एमहर 'हौ-रौ-यौ' चलैक, तऽ ओमहर अगबे 'यौ-यौ-यौ'। एमहर रोटी माने-मडुआ-खेसारी-चाउर-बदाम-मकइ पर्यंते, तऽ ओमहर शुद्ध गोरकी सोहारी- खाहेँ से चाउरक हो किंवा गहूमक! कहबाक आशय जे एतबहि दूरमे अकाश-पतालक अन्तर रहैक- रहन-सहन, खान-पीन आ सोच-विचारमे। शिक्षा: मूलभूत सुविधाक अकाल: गाममे छल एकटा लोअर प्राइमरी इसकूल। इसकूलक बगलमे कनेकटा शिव-मन्दिर आ आगाँमे गामक जीवन-रेखा- बड़का पोखरि। ओना छल तऽ आरो बड़का-बड़का पोखरि- समिया-पोखरि, डकही पोखरि मुदा से सब गामसँ बाहर; बाबू-बबुआनक दफानल-काँट लऽ कऽ बेढ़ल जकाँ! मिडिल इसकूलक पढ़ाइ करत क्यो, तऽ डेढ़ किलोमीटर दूर, गाम टपिकऽ कोठिया-इसकूल। ई बोर्ड मिडिल स्कूल छल (औखन तहिनाक तहिना अछि)। एतय चारू दिशक पाँच गामक छौँड़ा अबैत छल चौथा किलासमे, तै मेसँ मोटे ५०% सातमा पास कए बहराइत छल, बाँकी ५०% हरबाही-चरवाही, खेती-किसानीमे लागि जाइत छल आ से नै, तँ सोझे कलकत्ता! हाइ इसकूल सातम दसकमे आबिकए दू-दूटा खूजल छल- भराम आ भैरब-थानमे। दुनू खाँटी टटघर, गाम-गामसँ बाँस-खढ़-खुट्टा-बड़ेरी मांगि-चांगिकए बनल। तकर तेहने शिक्षको-स्टाफो! तेहनाठाम जकरा व्यवस्थित शिक्षा चाही, जे किछु खास करए-बनए चाहए- से जाथु झंझारपुर- केजरीवाल उच्चाङल विद्यालय अथवा सरिसब हाइ इसकूल अथवा टेँटमे दम होनि, तऽ देखथु मधुबनी-दड़िभंगा! एतबा शिकस्ते आ संघर्षक अछैतो १९६० ईस्वीक आसपास अबैत-अबैत गाममे दू गोटे एम.ए. पी.च.डी. कलकत्तामे प्राध्यापक, गोट छबेक स्नातकोत्तर एवं पाँचे-छवटा स्नातक डिग्रीधारी भए गेल रहथि, जे सबके-सब गामसँ बाहरे प्रवासमे छलाह। दुर्गा-पूजा, दीया-बाती-छठि, फगुआ तथा गरमी-तातिलमे ई लोकनि अवकाश पाबि गाम अबैत छलाह, तेँ ताहि समयमे गामक प्रायः सबहु टोलमे छहर-महर जकाँ रहैत छल। तेँ दीया-बाती-छठि लगाति अथवा सरस्वती-पूजासँ फगुआक बीच 'युवा नाट्य-कला-परिषद' द्वारा दूटा नाटकक मंचन होइत छल। से, जे कहैत रही शिक्षा-दीक्षाक मादे, से एकटा असाधारण समस्या छल ताहि दिनमे। ९५% धरि ब्राह्मणोक परिवार खेतिए-गृहस्थी आ माले-जाल पर निर्भर छल। शेष जातिमे थोड़े-थोड़े यादव, मलाह, धोबि, हजाम, पासमान, राम, मण्डल, कमार-सोनार आदिक हाल आर बेहाल रहैक! जकरा घर बुतातो पर आफद, तेँ घरक छओंरा-माड़र इसकूलक सपना की देखत, कोना देखत! भरिगामक दस-बारहटा परिवार जे सुभ्यस्त (झाँपले-तोपले) कहबैत छल, तिनके लोकनिक बालक मिडिल ओ हाइ इसकूल देखैत छलनि! धी-बेटीक तऽ प्रश्ने उठाएब व्यर्थ छलै। चर्चितो दस-बारह परिवारक कन्यालोकनि, गाममे लोअर प्राइमरी इसकूलक अछैतो नीक जकाँ साक्षर नहि भऽ पबैत छलि। कहबी रहरहाँ छलै 'चिट्ठी-पुरजी लीखए आबि गेलै, तऽ बहुत भेलै!' मुदा ताहू विषम परिस्थिति मे १९६१-६२ ईस्वीक आसपास गामक दूटा बेटी- उर्मिला आ सोनदाइ- झंझारपुर-स्कूलसँ जेना-तेना प्रवेशिका परीक्षा पास कएने छलि (ई दुनू उपरोक्त कलकतिया प्राध्यापक लोकनिक सहोदरा छलीह, तेँ एतबा अदम्य साहसक परिचय दए सकल छलीह)। एहेन अकादारुण समयमे, जँ ठकुरटोलीक एकटा सामान्य मध्य-वित्त परिवार (स्व. जयकलित तथा अनकलित ठाकुरक) मे सँ एक उच्च मेधा-प्रतिभाक धनीक बालक- कृपानन्द (जन्म १९३९ ई.) बहरेलाह आ केजरीवाल उच्च विद्यालय, झंझारपुरसँ प्रथम श्रेणीमे (१९५७) प्रवेशिका परीक्षा पास कएलनि, तँ से सहजहिं गामक लेल गौरवक एवं इलाकाक लेल अचम्भोक विषय छलैक। एतय उल्लेखनीय थिक जे उक्त विद्यालयक ट्रैक-रेकार्डे जिला स्तरपर ताहि तरहक नामी-गामी छलैक। लगातार कएक वर्ष पहिनेसँ लगातार कएक वर्ष बादहु धरि ई स्कूल वाट्सन उ.वि. मधुबनी; जिला स्कूल दरभंगा एवं एम.एल. एकेडमी (सरस्वती स्कूल) लहेरियासराय केँ टक्कर दैत रहल छलैक। तीनूमे क्रमशः ठाकुर प्रसाद सिंह, एम.ए. द्वय, डिप.एड. (झंझारपुर); चन्द्रनाथ मिश्र (पोखरौनी), एम.ए. द्वय, डिप.एड. (मधुबनी); झिंगुर कुँवर, एम.ए. द्वय, डिप.एड. (लहेरियासराय) राज्यभरिमे सुख्यात विद्वान शिक्षकेटा नहि, कठोर प्रशासक रूपेँ ततबे कुख्यातो बूझल जाइत छलाह। ततबे नहि, झंझारपुरक उक्त विद्यालयमे जहिना लत्तीबाबू सन कठोर अंग्रेजीक विद्वान, दुखहरणबाबू ओ पीताम्बर लाल दास सन-सन स्ट्रीक्ट विज्ञान-शिक्षक, श्यामबाबू-विष्णुदेव बाबू सन-सन हिन्दी आ सामाजिक विज्ञानक स्वर्ण-पदक प्राप्त शिक्षकादिक मार्गदर्शन उपलब्ध छलैक; तहिना वाट्सन (मधुबनी) क चर्च करी तँ डा. श्यामचन्द्र झा (भवानीपुर, पंडौलक) हिन्दी-अंग्रेजीक स्नातकोत्तर, डा. देवनारायण झा (शरहद-शाहपुरक) एम.कौम, स्वर्ण-पदक प्राप्त (वाणिज्य), विज्ञान-मैथ्स शिक्षक (घोंघरडीहा-वासी) तेहने भौतिकी-रसायन ओ गणितक धुरंधर, कुलाबाबू-मदनबाबू दुनू भाइ तेहने अंग्रेजीक टॉपर स्नातकोत्तर विद्वत् जनसँ सुसज्जित छलैक ओ विद्यालय। प्राचार्यक अनुशासन केहन, तँ दू-दू बेर अपन बालककेँ टेस्ट-परीक्षा (प्री-बोर्ड) मे सेन्ट-अप नहि होबए देने छलाह किएक तँ हुनका कलमसँ अंग्रेजी विषयमे ३० नम्बर नहि आनि सकल छलनि। तखन-तेहेन होइत छलैक राष्ट्रपति-सम्मानसँ सम्मानित शिक्षक ताहि दिन मे! आ एम.एल. एकेडमी (दरभंगा) मे ताहू सबसँ 'वज्रादपि कठोराणि' प्रशासक-सुयोग्य प्राचार्य (राष्ट्रपति-पुरस्कृत) छलाह- गंगापट्टी (लहेरियासराय) बासी झिंगुर कुँवरजी। पं श्री चन्द्रनाथ मिश्र 'अमर' (संस्कृत-हिन्दी शिक्षक) सहित सभ विषयक शिक्षक मात्र तहिना एकसँ बढ़ि एक उद्भट्ट विद्वान! तेँ, तत्कालीन अविभाजित बिहारक बोर्ड परीक्षामे क्रमांक एकसँ १० धरिक मेधा-सूचीमे पाँच-पाँच, छव-छवटा जगह यैह स्कूल सब छेकि लैत छलैक। एतबा खुशफैलसँ ई विवरण दए रहल छी, किएक तँ हम स्वयं केजरीवाल स्कूल, झंझारपुर एवं वाट्सन स्कूल, मधुबनीक छात्र रहि, हायर सेकेण्ड्री कयलहुँ तथा झिंगुर कुँवरजी मेंहथक समधिए छलाह। कृपाबाबूक प्रायः सङतुरिये रहल हेथिन- एक आर ओहने तेजस्वी छात्र- रामबहादुरजी जिनकर हाथ पकड़ि लए गेल रहथि अपन जमाए बनएबा लेल (किन्तु से विद्यार्थीक इच्छाक विरुद्ध)! फलतः विवाहक दुइए-चारिए दिनक भीतर ओ असामान्य रूपेँ कालक गालमे समा गेल छलाह। एहि घटना अथवा दुर्घटनासँ सम्पूर्ण बस्ती दिन नै, मास नै, कएक वर्ष धरि शोकाकुल रहल छल तथा तकरे प्रतिफलेँ तीन-चारि बरखक अभ्यंतरे परोपट्टाक नामी वा अपना सन एकमात्रे लाइब्रेरी- 'श्री रामबहादुर सार्वजनिक पुस्तकालय'क स्थापना सम्भव भेल छल। ओहि होनहार युवककेँ भावांजलि अर्पित करैत एहि अवन्तर कथाकेँ ठामहिं विराम दैत छी। से, कहैत जे रही- १९५७ ई मे मैट्रिक आ १९५९ मे आर. के. कॉलेजसँ आइ.एस.सी. उच्चांक सहित करैत कृपानन्द जी एम.आइ.टी., मुजफ्फरपुर सिविल अभियांत्रिकीमे (१९५९-६३) रॉल नम्बर १ सहित नामांकन लेलन्हि आ अभियन्ता बनि गेल छलाह। हमरा मोन पड़ैछ, हिनका माथपरसँ पिताक छत्र-छाया अकालहि उठि गेल छलनि मुदा अग्रज श्री नित्यानन्दजी पर ताहि अन्हर-बिहाड़िक कोनोटा प्रभाव नै पड़ल छलनि। ओ अडिग अभिभावकत्वक निर्वहन कएने छलाह। हिलकोर जे लहरि बनि गेल: ढोलिया-बजनियाँ बजबाकए पूजा-प्रसाद जे भरो गाम बँटायल छल- कृपानन्दजीक सफलता ओ बिहार सरकारक सहायक अभियन्ता रूपेँ योगदान (१९६३) देलापर, तकर हिलकोर गौएँ-समाज धरि सीमित नहि रहल छल। प्रायः गोटेक  सालक आगाँ-पाछाँ नरुआरसँ स्व. बिकल झा (मेंहथक भागिन) केर जेठ बालक श्री हरेकान्त झा (बोर्ड-टॉपर, ओही केजरीवाल विद्यालयसँ) सेहो, कोठिया तथा महरैल गामसँ दू-दू अभियन्ता (कोठियाक श्री हरिबल्लभ झा, डीडीए दिल्ली सँ विख्यात); फेर १९६५-६६ मे, हमरे बैचक बोर्ड-मेरिट-लिस्टक नारायण झा (नरुआर) अभियन्ता एवं ओही अवधिमे पुनः हमर मित्र-द्वय श्री नरेश झा (आब स्व.) एवं श्री दुर्गानन्द झा लोकनिक इंजीनियरिंग डिप्लोमा प्राप्त करब- महत्त्वपूर्ण परिवर्तनक दौर छल, से कहि सकैत छी। ओही बीचें, कथनासँ सेहो एक जे.ई. (नाम प्रायः वेदानन्द मिश्र छलनि, आब स्व.) भेल छलाह। हमर एक सहपाठी- मेंहथ- लक्ष्मणजी सेहो अभियन्ता बनल छलाह। शिक्षाक आन-आन क्षेत्र वा विद्यामे सेहो एकटा द्रुत बदलाओ ओहि अवधिमे आयल छल, तकरो अकानल जा सकैछ; यथा गोटेक सालक आगाँ-पाछाँ इन्द्रकान्तजी एम.ए. राजनीतिशास्त्र, सचीन्द्र कुमार झा (फूलबाबू) एम.ए., रामनारायण झा, बी.कॉम/ एम.कॉम, पीताम्बर झा (भुटकुन) क आइ.एस.सी. करैत नेभी ब्वाइजमे भरती, तृप्तिनारायणजीक ओ जयनारायणजीक स्नातकीय डिग्री एवं सत्यनारायण ठाकुरक बी.एस.सी. प्रतिष्ठा तथा भराम उच्चविद्यालयमे विज्ञान शिक्षकक नोकरी-प्राप्ति प्रभृति किछु एहेन-एहेन दृष्टांत थिक जे तत्कालीन शैक्षिक संक्रमण-कालक जागृतिकेँ रेखांकित करैत अछि; जे 'लठिधर-महिंसबार आ पहलमान' मेंहथकेँ पढ़ैत-लिखैत, आगू बढ़ैत तथा सुशिक्षित होइत मेंहथक रूपेँ चिन्हारए देने छल। एही नेओँपर परवर्ती पीढ़ीमे हम, कृष्ण कुमार झा, केन्द्रीय उत्पाद आयुक्त, दिल्ली; मोहन झा डॉक्टर (एम.बी.बी.एस.) आ विजय कुमार ठाकुर (मुख्य अभियन्ता, कोल इण्डिया, कृपाबाबुएक कृपा-उत्पाद) एवं आजुक ई-पत्रिका- विदेह सहित अनेक प्रकारक ई-क्रान्तिक मैथिली-साहित्यमे प्रथम सूत्रपातकर्त्ता श्री गजेन्द्र ठाकुरोक नामोल्लेख जरूरी बुझैत छी। अ थ च सातम दशकमे उठल ओ हिलकोर आइयो लहरि बनि-बनि आयुष्मती प्रीति ठाकुर धरिक तटकेँ स्पर्श करैत देखल-अकानल जा सकैछ। गौँआ-घरुआक बीच के.एन.टी.: कृपानन्दजी जखन अपन एवं अपना परिवारक उत्थान केर सोपानपर पैर टिका रहल छलाह, ठीक ताही अवधि (सातम दशकक आरम्भिक काल) मे यथा-पूर्वोक्त रामबहादुरजीवला शोक-प्रसंग सेहो गौआँकेँ व्यथित आ मथित कएने रहैक। ई कहब कठिन अछि जे हमर अड़ोस-पड़ोसक गाम-समाज एहेन दुर्घट प्रसंगपर कोन रूपक प्रतिक्रिया दितए, किन्तु हमर गौआँ समाज कोना रिऐक्ट कएलक, से तँ हमरा आँखिक सोझाँ झलकैत अछि मुदा से प्रसंग कनेक थम्हिकऽ। विद्यार्थीक सहायता: १९६१ ई. मे हमर नामांकन भराम आ कोठिया हाइ स्कूल (जे सम्प्रति भैरबथानमे अवस्थित अछि) के अबडेरैत, झंझारपुर-केजरीवाल स्कूलक आठम वर्गमे, हमर इच्छाक तथा जिद्दक मान रखैत पिताजी करबओने छलाह। जड़िमे तकर कारण यैह कृपानन्देजी छलाह। से बात साल-दू-सालक बाद तखन बुझबामे आयल जखन एकबेर गरमीक तातिलमे 'एवरी-डे-साइन्स'क पोथी लए कृपानन्दजी लग पढ़बा लेल पहुँचल रही। पोखरिक दछनबरिया भीर पर पच्छिम दिस घर-आंगन आ पूब दिसक पूबे मुहक बड़का दलान छलनि। ओहि समय धरि पितियौत लोकनि- सीताराम बाबू (खादी बोर्ड मधुबनीक प्रधान सहायक) एवं पं बच्चा ठाकुर, कुलदीप बाबू- सभक बैसाड़ संगहि छलनि। तेँ दलान सदिखन भरले-पूरल रहैत छलनि। कय-कय जोड़ी तास चलैत रहैत छलैक। दू-तीनटा चौकी पर सैह खेलबाड़ीसभ छेकने रहनि मुदा उत्तर-पूबक कोन पर एक कात लगाकऽ पटियापर एकटा सतरंजी देल आ तैपर चुपचाप बैसल, कोनो मोटगर-गतगर अंग्रेजी किताबमे डूबल कृपा बाबू। कृपाबाबू एहि समय धरि अपन संगी सभक बीच के.एन.टी. क नामे ख्यात भऽ गेल छला। हमरा देखिकऽ सभ खेलाड़ीकेँ जेना अचम्भा किं वा अनसोहाँत लागल सन बुझना गेल छल। कदाचित ई जे आन टोलाक ई कोना...? ई किएक...? मुदा ओ नै अकचकाएल रहथि, किएक तऽ हम एक दिन पहिनहि पोखरिमे नहाइत काल निवेदन कएने रहियनि जे मदति चाही आ ओ सहर्ष तकरा स्वीकारैत 'आबि जाउ' कहने छलाह। ओना, ई एकटा दीगर बात छल जे हमरा गीतहारक रूपेँ किं वा सज्जन-साँहठुल छात्रक रूपेँ सगरो गामक सभ वर्णक लोक चीन्हैत अथवा नहभरि आदरो दैत छल। -हँ विद्यार्थी। की पढ़बाक अछि? -एवरी-डे-साइन्स मे 'प्रयोगशालामे ऑक्सीजन गैसक निर्माण'। ओ हमर पुस्तक देखलनि उनटा-पुनटा कय आ एकहि सूरे तीनटा अध्याय पढ़ा देलनि आ काल्हि अहीबेरमे तीनू चैप्टरक प्रश्नोत्तर लीखि अनबाले कहलनि। बीच-बीचमे बारम्बार 'विद्यार्थी' कहि सम्बोधित कएने रहथि। अगिला दिन हमर होमवर्क देखि प्रसन्नता व्यक्त कएलनि आ लगातार दू घण्टा समय दए लगभग पूरे किताबक शंका-समाधान कए देलनि। हम धन्य-धन्य भए गेल रही! आ तखन फेर इसकूलक चर्चा, एक-एक शिक्षकक हाल-चाल सहित, हमरा पढ़ाइक एवं प्रत्येक विषयक लिखित तैयारीक मंत्र देने रहथि; अंग्रेजी भाषा तथा समाज अध्ययनक गम्भीरतासँ, रटिकए नहि, अपन भाषामे अभिव्यक्त करबाक बोध देने छलाह। यद्यपि हम सम्बन्धित विषयक कॉपी-किताब लए-लए डा. परशुरामजी  (अंग्रेजी विषय), देवनारायण ठाकुरजी (वाणिज्य- बुक कीपिंग) आ राजेन्द्र झा जी लग अर्थशास्त्र विषयक यदा-कदा मदति लैत रहलहुँ- बादहुमे, स्नातको स्तर धरि मुदा प्रथम 'पथ-प्रदर्शक तारा' तँ वैह कृपानन्देजी छलाह! हँ, एहि सभ सीनियर्स केर मदति लेल हमर पिताजी पहिने आरि-पाठि बान्हि अबैत छलाह। हुनकर उठब-बैसब चारू टोलमे छलनि आ हुनकर खिसक्करयनक खूब आदर रहनि (अपन दियादक घराइन छोड़िकए बाँकी भरो गाममे)। पुस्तकालय-प्रसंग: आब सर्वाधिक महत्वक बात समाजक दृष्टिकोणें! वैह १९६०-६२ केर समय छलै जखन स्व. रामबहादुरजीक नाम पर सार्वजनिक पुस्तकालय फोलबाक निर्णयक बात ऊठल छल। उपर्युक्त प्रत्येक सीनियर लोकनिक पुनः नामोल्लेख जरूरी नहि बुझैत, संक्षेपमे कहब जे चारू टोलक न्यूनतम दू-दू वा तीनियों-चारियो गोटेकेँ मिलाए एकटा अस्थायी कार्यसमिति जकाँ बनल छल, सर्वप्रथम प्रायः दीयाबाती-छठिक अवकाशमे। एहिमे ठकुरटोलीक प्रतिनिधि कृपेबाबू छलाह। नीक बात ई जे ओ जखन नहियों रहथि, कोनो अवकाशमे नहियों आबि पाबथि, तैयो नित्यानन्द ठाकुरजी भार टेकि लेथिन आ काज बिधुत नहि होइक। सभसँ पहिने तय भेलैक जे एहि प्रस्ताव पर रामबहादुरजीक परिजनक स्वीकृति लेल जाए। हुनक गारजन- कमलूबाबू, गौरीबाबू (मास्टर साहेब) आ राधाकान्त बाबू शोकाकुल होइतो, सहर्ष स्वीकृति देलखिन! तत्पश्चात् गारजनक स्वीकृतिसँ चारि-पाँच कनीय सदस्य लोकनि आंगन जाए आदरणीयाँ भौजीक सहमति एवं प्रथम चन्दा/ सहयोग-राशि प्राप्त करैत गेलाह। ताहि नवतूरमे एहि पाँतीक लेखक सेहो रहथि। एहि योजनाकेँ कार्य-रूप देवामे कृपानन्देजीक प्रभावशाली व्यक्तित्व सटीक कुन्जीक काज कएने छल किएक तँ ई निकटस्थ पड़ोसियेटा नै, सङतुरियो रहथिन। तखन, दोसर प्राथमिकता छलैक स्थान-चयनक। कैकटा जगह केर प्रस्ताव आयल छलै विमर्शक क्रममे- दछिनबारि टोलमे लालबच्चाक पोखरिक उतरबारि भीर पर, तत्कालीन प्राइमरी स्कूल लग, कृष्णदेवजी (बच्चनजी, मुखिया)क मिसरटोली लगक कलममे, वर्तमान समयक दुर्गास्थान लग आदि...आदि। लालबच्चा लग मुह छानल जाए, से फूलबाबूक सहमतिक अछैतो गामक बेसी युवककेँ नहि अरघलैक, किएक तँ बल्ली-पोखरि लगक फुटबॉल-मैदान पर जबरदस्ती टेक्टर चलबाकए दखल-दिहानी वा कब्जा कए लेब सौँसे गामकेँ असाधारण पीड़ा देने छलैक; से एतेक जल्दी बिसरबाले क्यो तैयार नै छल। सर्वानुमति प्राथमिक विद्यालये लगक स्थानपर छलैक। ओतए प्रायः ७ कट्ठा जमीन इसकूलक नामे कहियोक दान-पत्रमे दर्ज रहैक। बाँकी ताहिसँ दच्छिन शिव-मन्दिरकेँ बाड़ैत, बड़का-पोखरिक मोहारे रहैक। ताहिपर पूरा सरिसबे-खांगुर (आठ आनाक मालिक गाम परहक पटीदार आ आठ आना कचहरी टोल) लोकनिक स्वामित्व छल। तखन फेर कचहरी टोलक गोपेशजी (बिहार हिन्दी राष्ट्रभाषा परिषद, पटना) एवं गणपतिजी (कलकत्ता) लोकनिक पत्रानुमति लैत गाम परहक पट्टीमे राजेन्द्रजी, इन्द्र (पछाति मुखिया) इत्यादिक सहमतिएँ यैह स्थान फाइनल भेल छलैक। तखन शुरू भेल बाँस-काठ, खढ़ आ ईंटाक लेल बैठकी। चारू टोलक लोक बढ़ियाँ मदति कएने छल- आन- टाका, बाँस-काठ-खढ़ सब लएकऽ। तेँ, प्रारम्भिक योजनाक टटघरकेर बदलामे पजेबेक देबाल पर बंगला छबा गेल छलै- तीन दिस बरंडा सहित। जतए धरि मोन पड़ैछ, १९६२ ई. मे एहि पुस्तकालयक पंजियन तथा ओही वर्षसँ सरकारी अनुदान (पुस्तक क्रयार्थ) तथा १९६३ मे केन्द्र सरकारसँ रेडियो-सेट-स्पीकर आदि प्राप्त भए गेल छलैक। पक्का रसीद छपल रहैक आ तैपर कलकत्ता-पटना पर्यतों सँ चन्दा-नगदी अबैत छलैक, ताहिसँ बिजली कनेक्सन, पटिया-सतरंजी आ दूटा कठही अलमारी प्रभृतिक व्यवस्था भेल छलैक। सारांशमे कही तँ एहि सकल अभियानक साफल्य सर्वश्री इन्द्रकान्तजी, सत्यनारायण ठाकुरजी, कृपानन्दजी, मधुबनजी, कृष्णदेवजी (बचनी मुखिया), तृप्तिनारायणजी ओ कृष्णदेवजी (मास्टर साहैब) तथा इन्द्र (मुखिया) केर अनवरत प्रयत्ने भेटल छलैक मेंहथकेँ। तेँ, पहिल पुस्तकालयाध्यक्ष इन्द्रकान्तेजी केँ चूनल गेल छलनि। हुनक सहयोगमे (१९६३ सँ १९७० धरि) लगातार यैह सरसजी (जे १९६९-७० मे सी.एम. कॉलेजक छात्र रहैत 'सरस' पदवी सुमन-किरण-मधुप जी लोकनिक मुहसँ पओने छलाह) रहिकए संचालन-भार सम्हारने छलाह। नाट्य-परिषद प्रसंग: गत सदीक छठम दसकमे मेंहथ-महिनाथपुर (दुनू गामक एकहि पंचायत) केर किछु उत्साही युवक- प्रौढ़ कलाकार लोकनि मीलिकए नौटंकी-पाटी लगभग ८-९ सालधरि चलौने छलाह। दछिनबारि टोलक रमाकान्तजी (४० वर्ष पूर्वहि स्व.) मुहगर-कनगर आ किछु पढ़लो-लिखल छलाह। बहिंगा सन-सन मोंछ आ किछु-किछु धौनी टाइपक झोँटो राखथि। वैह छलाह दलपति आ सुलताना डाकूक भूमिकामे ओ असाधारण अभिनय करथि। गामक आओर किछु चूनल-बीछल कलाकारमे ओही टोलक विशेस्वर उर्फ बिसाइ झा नामी जोकर आ विलक्षण ढोलक-नगाड़ा-वादक छलाह। तहिना छलाह मिसरटोलीक रघुवंशजी जिनका मौगियाही छवि-छटाक संग-संग फिल्मी गीत गायनक लूरि-भास सेहो छलनि। गामे-गाम उपनयन, वियाह, कोजगरा वा अन्य अवसर पर ई पाटी साइ-साटा कएकऽ दू-दू, तीन-तीन सय प्रति राति, भोजन-भार सहित पबैत छल। ओहि दिनमे जँ खा-पी कऽ ५०-६० टाका कए हिस्सा पाबए कलाकार, तँ से पैघ बात होइक।अस्तु। ओहि पाटीक टुटला-बिखरलापर एकटा शून्यताक अनुभव भरि गामक लोककेँ होइत छलैक, तकरे पूर्ति हेतु महिनाथपुरमे हर्षनारायणक नेतृत्वमे एकटा रामलीला पाटी शुरु भेल छलै आ मेंहथमे पढ़ुआ-गुनुला बहुत, तेँ नाट्य-परिषदक सूत्रपात भेल छलै (१९६०-६१क आसपास)। जेनाकि ऊपर कहि आयल छी, सार्वजनिक पुस्तकालयक सफलतासँ सबहु टोलाक शिक्षिते लोकनिटा नहि, अशिक्षितो-अल्प शिक्षितो युवा-वर्ग एक सूत्रमे बन्हा गेल छल आ खूब भव्य तरहेँ शारदा पूजनोत्सव आरम्भ भेल छल ओही प्राथमिक विद्यालयक प्रांगणमे। एहि अवसरपर दू राति नाटक खेलेबाक निर्णय भेल रहैक (प्रायः ६१-६२ मे)। एक राति सरदार भगत सिंह (हिन्दी खेला) आ दोसर राति पं. गोविन्द झा (हालहिं स्व.) द्वारा लिखित आ बहुचर्चित मैथिली नाटक बसात तय भेल छलैक। हमरा नीक जकाँ मोन अछि जे सरदार-भगत, जनरल डायर, कर्नल (वा मेजर) सान्डर्स, लाला लाजपत राय, असफाक-उल्ला, राजगुरु आ बटुकेश्वर दत्तक संग-संग चन्द्रशेखर आजादक भूमिका लेल नयके तैयार एकताक चद्दरि मसकैत-मसकैत बाँचल छल। आ से, धन्न गोपेशजी एवं मधुबनजी! अंततः यैह दुनू गोटे मुख्य-मुख्य पात्रक भूमिका लेल जे औपबंधिक सूची प्रस्तुत केलनि, तकरा तत्कालीन दूटा वरीय गारजन श्यामबाबू (इन्द्रकान्तजीक काका) आ कचहरी टोलक लालबाबू (जे प्रतिष्ठित डाकबाबू छलाह) केर सक्रियतासँ सलटाओल गेल छल। पहिल राति किछु महत्त्वपूर्ण अंग्रेजी-हिन्दीक कथोपकथनकेँ बजबाकए (इण्टरव्यू जकाँ) देखल-परेखल गेल आ तखन भगत सिंह मधुबनजी तथा अंग्रेजीक शानदार उच्चारण तथा प्रवाहकेँ देखैत, व्यक्तित्व आकलन करैत, कृपानन्दजीकेँ सान्डर्स ओ डायर- दुनू भूमिकाक लेल फिट पाओल गेल छलनि मुदा दुनूक निर्वहन एक संग सम्भव नहि छलैक, से ई देखैत सान्डर्स साहेबक भूमिका कएने रहथि ई। असाधारण रूपेँ यशस्वी भेल छलाह ठाकुरजी! जनरल डायरक क्रूर छविक ओ स्वयं परित्याग कएने रहथि। ओ फ्रेंच-कट मोंछ-दाढ़ी, फूलल-फूलल गालपर ललछौंह फाउन्डेशन आ तैपर मुर्दाशंखक रोगन आ माथापर अंगरेजिया हैट...! दुनू अंगरेजक डायलॉग जतऽ-जतऽ बेसी लमगर रहैक आ शब्द कठिनाह, ततऽ-ततऽ बहुत कारीगरीसँ एकटा-दूटा कए हिन्दीक वाक्य सेहो ओही तेबरक, घोंसिया देल गेल छलैक जाहिसँ ग्रामीण-तमशगीरक लेल बोधगम्यता सहज भए गेल छलैक। नाटकक सफलताक 'ग्राफ' कतबा आ केहन दिव्य छल, से एहिसँ बूझल जा सकैछ जे दुनू अंग्रेजबा खलनायककेँ दर्शक दीर्घासँ जुत्ता-चप्पल आ ढेपा पर्यन्त देखाओल गेल छलैक तथा 'मार ने रौ- अइ बनरमूहाँ के पटकिकऽ ओध-बाढ कर ने रौ'- तेहन-तेहन टिप्पणी सभ बेर-बेर उछलल छलै। ताहूसँ आगूक बात ई भेल छलै जे चारिटा मेडल (रजत) लाल-भाइ (लाल बाबू, कचहरी टोल) तथा दूटा मेडल श्याम-भाइ दए-दए सम्मानित-प्रोत्साहित कएने छलाह कलाकार लोकनिकेँ। आ कृपा-बाबू दुनू गोटेक सूचीमे एक नम्मर पर रहथि। आ ताहूसँ आगाँक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि ई भेल रहैक जे ठीक साल-डेढ़ सालक भीतरे कोनो शुभ अवसर पर एहि नाटकक मंचन फेर करए पड़ल छलैक नाट्य-परिषदकेँ आ ताहि लेल लाल-भाइ अन्य खर्चा संग-संग ५००/- टाका देने रहथिन- एक सेट परदा एवं शाही-ड्रेस कीनबा लेल। से सभ यथासमय दरभंगासँ किना गेल रहैक। लग-पासक गाम-कोठिया, पट्टी, महिनाथपुर, भराम-गोपलखा आदिक लोक उनटिकए अबैत छल खेला देखबा लेल। वरिष्ठ गारजन लोकनि अनुशासन आ स्त्रीगण-पुरुषादिक बैसबाक समुचित व्यवस्था-भार टेकैत छलाह। कएक बेर बी.डि.यो, सी.ओ. तथा डिप्टी-इन्सपेक्टर (स्कूल) आयल रहथि आ भरि-भरि राति इसकूलक बरंदा पर दसेक कुरसी लगाए, लालबच्चा (पूर्व विधायक झंझारपुर विधान सभा), लालबाबू, कमलाबाबू, गौरीबाबू, श्यामबाबू, बाबूजीझा (पंचायत-मुखिया), फुसियाहा बच्चा (कोठिया) सन-सन सम्भ्रान्त लोकनि बैसैत छलाह। ई लोकनि बिना निवेदन अपना मोने सय-पचास टाकाक मदति देल करथि परिषदकेँ। ई क्रम एकटा परम्परा बनैत १९६०-६१ सँ १९८०-८१ धरि चलैत रहल छल जाहिमे क्रमशः दिनेशजी, नरेशजी, दुर्गानन्दजी, रवीन्द्र, उदयचन्द्रजी, ताराकान्त, हीरालाल, लक्ष्मणजी (अभियन्ता), आदि जुड़ैत चल गेल छलाह। एकरे कहैत छैक- 'हमनवा आते गए और कारबाँ बढ़ता गया'! सरस्वती पूजाक संग-संग नाटको देखबाक हँकार जाइत छलैक लगपासक सभ गामकेँ। पुस्तकालय-प्रसंग: बहुत बात पहिनहुँ चर्च भेल अछि, तकरा दोहरेबाक प्रयोजन नहि। एतबा कहब मुदा जरूरी अछि जे ओहि रामबहादुर सार्वजनिक पुस्तकालय (मेंहथ) केर भाग्य १९६१ सँ १९८१ धरि दनदनाइत-सनसनाइत उच्च सँ उच्चतर होइत रहल छलैक। पुस्तकक संख्या १३०० लगभग गौँआक सहयोगेँ आ १८०० लगभग सरकारी अनुदानसँ, कुल ३१०० सँ बेसीए (दू अलमारी भरि) जमा भए गेल छलैक। अनुदानसँ पूर्व दू-दू खेप एस.डी.ओ. एवं जिला शिक्षा पदाधिकारीक निरीक्षण भेल छलैक, तिनकर स्वागत-सत्कारक व्यवस्था उत्तम रीतिएँ सकल समाजक सहयोगेँ भेल रहैक। माछ-भात, दही-चीनी-रसगुल्ला ओ पाँच चङेरा आमक व्यवस्था भेल रहैक। चाह-जलखै आ भोजनादिक व्यवस्था-बात नित्यानन्दजी एवं तकरा क्रियारूप देब हमरे पर छल। ई पुस्तकालय केवल रामबहादुरजीकेँ श्रद्धांजलिएक लेल नहि स्थापित भेल छल, वरंच वास्तविक रूपेँ ई एकटा सामाजिक परिवर्तनक माध्यम छल आ से, प्रायः ४-५ वर्षक अभ्यंतरे बहुत रास बदलाओ निखरि-कए सोझाँ आबय लागल छल। यथा प्राथमिक इस्कूल 'लोअर' सँ 'अपर' प्राइमरी भए गेल छलैक। बातकेँ एना बूझल जाए जे हमर नाम चारिम वर्गमे (१९५७ ई) कोठिया बोर्ड मिड्ल स्कूलमे लिखाओल गेल छल मुदा हमरे छोट भाय रमेशजी (मैथिलीक लेखक, अवकाश-प्राप्त उप-समाहर्त्ता) केर नामांकन कोठिया इसकूलमे छठम वर्गमे भेल छलनि। ततबे किएक? आन गाम किं वा कर-कुटुमक गाम बूझि मेंहथक अधिकांश धी-बेटी तेसर किलासक बाद जे पढ़ाइ छोड़ि देबालेल अभिशप्ते जकाँ छल, से सब आब कम सँ कम पाँचम वर्ग धरि तँ गामहिंसँ करए लागल छलि। हमर अपने तीन-तीनटा बहिन, परशुरामजीक पुत्री, देवनारायणजीक पुत्री सहित गोट दसेक बेटी-डाँटी छठा-सातबाँक पढ़ाइ कोठिया इसकूलसँ कए आगू बढ़लि छलि। बिजलीक लाइन गाममे आबए, ताहि लेल जे विद्युत-अनुमण्डलीय अभियन्ताकेँ आवेदन पड़ल छ्ल, सेहो एही पुस्तकालयमे बैसिकय सर्वश्री इन्द्रकान्तजी, तृप्तिनारायणजी आ लालबाबू लोकनि तैयार कएने छलाह। तहिना मधुबनीसँ कमलाक पश्चिमी तटबन्ध (कचहरी ढड़ान) धरिकेँ डिस्टीक्ट बोर्डक सड़क केर पक्कीकरणक लेल यत्न भेल छल। जखन मधुबनी अनुमंडल कार्यालय एवं दरभंगा जिला मुख्यालयमे जा-जाकए धक्का पड़लैक, तँ द्वितीय पंचवर्षीय योजनाक ई काज सब तृतीय पंचवर्षीय योजना कालमे (शुरुहेमे) निष्पादित भेल छलै, तहिया महिनाथपुर-कोठिया-पट्टी सन-सन बहुतो पड़ोसिया गामकेँ डाह-ईर्ष्या भेल छलैक; तकर उपराग ओ गाम सब तत्कालीन विधायक (हमर गौआँ) केँ जहिं-तहिं बाट चलैत दैत रहै छलनि, सेहो देखल अछि। पुस्तकालयकेँ भारत सरकारसँ बेस पैघ 'आयरन-चेस्ट' सनक रेडियो-सेट भेटल छलैक (१९६२- जनवरी-मार्चमे), ताहिपर भरो गामक लोक भोर-८ आ राति-८ बजेसँ ९ बजे धरिक हिन्दी-अंग्रेजीक समाचार सुनैत छल। समय पर रेडियो-फोलब-बन्द करब हमरे (सहायक पुस्तकालयाध्यक्षक) काज रहैत छल। खास बात ई रहैक जे ई रेडियो बिना स्पीकरे नै बजैत छलैक (इन-बिल्ट-स्पीकर नै रहैक सेटमे)। तैँ एकरा, कम्यूनिटी (सामुदायिक) रेडियो कहल जाइक। एहि स्थितिमे पुस्तकालय-बंगलाक एक कोन पर एकटा तीस-फिट्टा मोटकर बाँसमे रेडियोक भोम्हाकेँ बान्हि टाँगल गेल छलै आ भरि गाम आवाज पहुँचैक, ताहि लेल ओहि बाँसकेँ आध-आध घण्टापर घुमाबए पड़ैत छलैक; नै तँ दोसरे दिन कोनो टोलक उपराग सूनय पड़ैत छल (विशेषकए १९६२ केर चीन-भारतक युद्धक समयमे)। कहि सकैत छी जे ७०-७५% अनपढ़-किसान वा मजदूर-बोनिहार-महिंसबारक बीचहुमे समाचार ओ रेडियो पर पटना केन्द्रसँ चौपाल कार्यक्रम सूनब एकटा सुखद अनुभूति बनि रहल छलै। एही पुस्तकालय-कक्षमे १९६४ सँ १९७०-७२ ई. क बीच भवानीपुर गामक गमैया-डाकदर (जे निष्णात कम्पाउण्डर मात्र रहथि) साहेब तथा बिजली मिस्त्री अनिरुद्ध बाबू (भवानीएँपुरक) सेहो रहल छलाह- गौआँक सहमति सँ। ई दुनू गोटे आस-पड़ोसक सभ गाममे साइकिल सँ भ्रमण कएल करथि आ मोटामोटी सर्वप्रिय भए गेल रहथि। आ हिनके दुनूक सूत्रसँ हम भवानीपुरक जमाए (समय-पूर्वे) बनि गेल रही। हम गामसँ बहरेलहुँ (१९७० जुलाइ), तकरा बाद ३-४ वर्ष धरि नरेशजी, दुर्गानन्दजी, रबीन्द्र, गौरीझा, जुगेशर भाइ (हमर दियाद लोकनि) घीचि-घाचिकए चलौलनि मुद प्रगति थकमका गेलैक। एही अवधिमे गाममे दोपाटी भए गेल रहैक, भरि गामक पढ़ुआ-गुनुआ आ कलकतिया लोकनि एक दिस आ पूर्व विधायक- गामक जबर्दस्तीक जमीन्दार पाँच-दसटा जी-हजूरी एवं लाठीवलाक संग दोसर दिस। फुटबॉलक प्रसंग: मेंहथहुमे एकटा टीम रहैक, तै मे ३० टा सँ बेसी समर्थ खेलाड़ी रहैक; निछड़ल-छाँटल छहछह करैत- १६ सँ ३०-३२ बरखक बयसवला; मैट्रिकसँ स्नातकोत्तर धरिक शिक्षावला आ किछु अल्प-शिक्षितो। कृपानन्दजी आ सत्यनारायण ठाकुर उच्च श्रेणीक 'बैक-पोजीसन' (फुल-बैक वा हाफ बैक दुनू) वला प्लेयर छलाह। नारायण चौधरी, पीताम्बर (इण्डियन नेभीमे जॉइन- जॉइनक बादो जखन-तखन), तृप्तिनारायणजी आ नागेश्वरजी (हमर पितियौत) आदि नीक कोटिक (तेजस्वी दौड़निहार आ बामा-दहिना दुनू पैर चलैत) 'सेंटर फारवर्ड' छलाह। गणपतिजी तथा कृष्णदेवजी (दछिनबारि टोल, पछाति मास्टर साहैब) नीक गोली रहथि। भन्नू मण्डल, गौरी झा (पुबारि टोल), सीतम्बर, बेदानन्द (सब पुबारि टोल) लोकनि पढ़ाइमे पछड़ल किन्तु खेलमे बेस टिकाउ आ विश्वसनीय छलाह। एकबेर गरमी तातिलमे तीनटा 'कपवला' (ट्रॉफी) चैम्पियनशिप मैच राखल गेल छलै। घोँघरडीहा बनाम मेंहथ, खड़ौआ बनाम मेंहथ आ रैमा बनाम मेंहथ। रैमाक टीम मे कोठिया-पट्टीक 'बोड़ो' तँ मेंहथहुमे भरामक रामचन्द्र सिंह (सेन्टर फॉरवर्ड) बोड़ो कएल गेल छलाह। कृपानन्दजी प्रायः सेवामे आबि गेल रहथि (१९६४-६५), तेँ केवल दुइए मैच मे खेलाएल रहथि। से दुनू मैच क्रमशः खड़ौआ तथा रैमासँ मेंहथ जीतल छल मुदा तेसर मे हिनका नहि रहने तथा घोंघरडीहाक टीम २० नहि, २१ छलै, ताहू कारणे तीन-एक सँ हमर गाम हारल छल। ई सबटा मैच आ चैम्पियनशिप झंझारपुरक टिबड़ेबाल स्कूल-ग्राउण्डमे भेल रहैक। एहि दुनू ठाकुरजी (के.एन.टी/ एस.एन.टी.) केर ब्यूह-भेदन केहनो भारी टीमक लेल असम्भवे जकाँ रहैत छलैक, से हमरा आँखिक देखल अछि। अस्तु। एहेन विलक्षण टीमक फुटबॉल-ग्राउन्ड (बल्ली-पोखरिक कात मे- उत्तरी भागमे) अकस्माते, अजराजोड़ी बन्दुकक नोंक पर हड़पि लेल गेल छलैक मेंहथमे। तेँ गाम दोपाटी! तेँ विभेद पराकाष्ठापर। ९९% धरि कलकतिया-नोकरिहारा समेत भरो गामक पढ़ुआ लोकनि प्रो. धनेश्वर झा, प्रो. परशुराम झा, प्रो. राजेन्द्र झा, प्रो. देवनारायण ठाकुर, लालबाबू, मधुबनजी, इन्द्रकान्तजी प्रभृतिक सक्षम नेतृत्व पाबि संगठित भेल छला आ यएह दल धनेश्वरजीक अपमानक बदलामे जमीन्दारक जेठ सपूत (जे बन्दूक भँजैत फुटबॉल ग्राउन्ड पहुँचल रहथि पिताक बाँहि पूरैत) केँ अंततः बनिसार (जहल) मे हप्ता भरिक लेल बन्हबा देने छलनि। ई छलैक एकताक बल! मुदा से बड़े महग ओलि छल। गामसँ फुटबॉल केर बीजधरि उपटिए गेल! तहिना, पुस्तकालयो श्रीहीन होइत चल गेल! गुरु-शिष्य ओ सेवा-व्रत: श्रीमान् भवानन्द झा असाधारण सूझ-बूझ ओ मेधा-प्रतिभाबला अभियन्ता छलाह। ढंगा-हरिपुर बासी, एहि बी.एन. झाक जोति बड़ैत रहनि- सातम-आठम-नवम दशक (१९६५-९५) मे। सहायक अभियन्तासँ अविभाजित बिहारक चीफ-इंजिनियर (इंजिनियर-इन-चीफ सहित) होइत 'बिहारक विश्वेश्वरैया' पर्यंत कहओनिहार एहि महामानव लग प्रत्येक विभूषण झुझुआने लगैछ। के करत विश्वास ५० वर्षक बाद जे हमरा लोकनिक एकटा एहनो ऋषिकल्प समाङ भेल छलाह जे प्रत्यक्ष आ परोक्षरूपेँ सोन-कमांड, कोयल-कारो, डी.भी.सी., तेनूघाट, बराकर-बाँध, राँचीक आसपासक कएक जलापूर्ति योजना (डैम निर्माण) सहिते गंगा नदी पर गांधी-सेतु (पटना) क आरेखक स्वप्नदर्शी रहथि? जे एहेन-एहेन हजारो-लाखो करोड़क योजना-परियोजनाक सूत्रधार-संचालक- महा-पर्यवेक्षक होइतो, जीवन-पर्यंत एकटा मड़ौसी खपड़पोश (ढंगाक ओ स्थायी निवास हमरा बेर-बेर देखल अछि)मे बितौलनि। बड़का-बड़का करोड़पति-अरबपति ठीकेदारकेँ सेहन्ते रहि गेलैक जे एक कप चाहो हुनका पियबतनि किं वा एक खिल्ली पानो खुअबितनि। ताही महामनाक सहोदर, ओही लोक निर्माण विभागमे कार्यपालक अभियन्ता (अनुज- श्री सूर्यानन्द झा) सेहो छलथिन मुदा से सर्वथा दोसर लोक रहथिन। .. आ ताही गुरुक पट्ट-शिष्य (कार्यक्षेत्रमे) रहथि हमरालोकनिक मार्गदर्शी कृपाबाबू। भेलैक एना जे संसारक सभसँ नम्मा नदी पुल (५.७५० किलोमीटर प्रायः) गाँधी सेतुक निर्माण हेतु जखन भारत सरकारक स्वीकृति (१९७०-७१: पंचम पंचवर्षीय योजनान्तर्गत) भेटलैक, तखनेसँ-तहियेसँ एकदिस ग्लोबल-टेण्डर द्वारा विश्व-स्तरीय निर्माण एजेन्सीक चयन प्रक्रिया चलल छलैक आ से 'गेमन इण्डिया' केर चयन होइते, दोसर दिस कार्य-गुणवत्ताक निरीक्षण-परीक्षण हेतु सुयोग्य नहि, सुयोग्यतम अभियांत्रिक कार्य-दलक खोज-बीन सेहो चलल छलैक। ई पूरा निर्माण कार्य १९७२ सँ १९८२ ई. धरि चलल छलैक आ मई-१९८२ मे तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी एकर उद्घाटन कएने छलीह। से, ओहि वृहदाकार परियोजनाक सम्पूर्ण देखभालक भार जखन भवानन्द बाबूक हाथ सौंपल गेल छलनि, तँ (हमरा मोन अछि- हमरो पदस्थापन पटने छल) ओ दू टूक भाषामे तत्कालीन मुख्यमंत्री (डा. जगन्नाथ मिश्र) केँ कहने छलथिन एकटा शर्तेक रूपेँ जे निरीक्षण-परीक्षण हेतु अभियांत्रिक कार्य-दल हम अपना हिसाबेँ बनाएब आ तकर कार्य-प्रक्रियामे कोनो तरहक हस्तक्षेप कोनो मंत्री-संत्री नहि करताह। आ से यथावत् मानलो गेल छलनि। ई बड्ड पैघ बात (कहू जे आश्चर्य आ अजबे जकाँ) बूझल गेल रहैक ताहि समय मे, असाधारण रूपेँ प्रिंट-मीडिया मे चर्चित सेहो। आ हम मैथिल लोकनि विशिष्ट गौरव-बोधक अधिकारी छी जे एहि विश्व-विश्रुत परियोजनाक संचालन-परिचालन-निरीक्षण एवं सावधिक परीक्षण मे मुखियाजी भवानन्द बाबूक संग उप-मुखिया वा सरपंचक भूमिकामे हमरा सभक अप्पन कृपानन्देजी छलाह (यद्यपि अभियन्ता आओरो कएक छलाह दलमे किन्तु काबिलियत एवं इमानदारीक प्रतिमूर्ति यैहटा! अपना सन एकमात्र अपने! हमरा सनक बहुतो लोक छुट्टीक दिनमे निर्माण देखए जाइत छल। एहि इमानदारी तथा कर्मठताक एकटा एहेन सत्य घटनाक विवरण रखैत एहि निबन्धक इतिश्री करए चाहब जे सिनेमाक रील जकाँ हमरा मानस-पटल पर विगत ४० वर्ष सँ यथावत अंकित अछि। एहेन-एहेन साँचमे की, कहियो आँच आबि सकैए! (प्रायः) समय १९८०-८१ क एक राति। स्थान-गांधी सेतु (निर्माणाधीन)क हाजीपुर-मुहाना परहक राजकीय निरीक्षण-भवन परिसर। अस्थायी बिजलीक खुट्टामे जत्र-कुत्र टांगल तार आ छोट-छोट पीयर-पीयर क्वाटरमे टिमटिमाइत लट्टू बॉल। तकरा छपने-झँपने अबैत सन गंगा कातक कुहेसी अन्हारक महजाल! शान्त शिविरमे अशांत वा उद्विग्न-मना बइसल एक अयाचीक वरद् हस्त संतान, ओछाइन आ टेबुलपर मारते रास कागत-पत्र-फाइल पसरल। साइट पर, बीच बालुका-राशि पर (गंगाक उतरबरिया कछेर दिस) दूर-दूर धरि पसरल लोहा-लक्कड़, छोट-पैघ रौटी-तम्मुक आ गैंता-बेलचाक संग सिक्कड़ झुलबैत गजराजक सूँढ़ सन अनेक साँवल-क्रेन-हिटाची-टाटा-कैटरपीलरक भारवाही मशीनक धर्रोहि आ तै बीच-बीचमे सिमेण्ट-लोहा-कंक्रीटक जमौआ बड़े-बड़े चट्टान (खण्डांश) जहत्तरि-बहत्तरि ढंगड़ि आयल। तै सिमिटिया चट्टान सभकेँ हथौंड़ा मारि-मारि कोण-किनारकेँ झाड़ि-झाड़ि देखैत आ 'टेम्पर' जँचैत एक विशेषज्ञ। 'यहाँ से तोड़ो'- 'यहाँ से फोड़ो'- 'रॉड निकालकर दिखाओ', 'रॉड की मोटाई १६ एम.एम. क्योँ?', 'रॉड टाटा-ब्रैण्ड क्यों नहीं?', 'बालू क्लासिक सोन-सैण्ड क्यों नहीं?', 'स्टोन-चिप्स अण्डर-साइज क्यों?' एहेन एहेन पचासनि सवाल गेमन इण्डियाक मुख्य अभियन्तासँ होइए, से आइयो, फेर काल्हियो आ फेर परसुओ! ओकर प्रोजेक्ट डायरेक्टर तंग-तंग होइए। ओ अपन मातहतक लघु संवेदक सभक बैसार करैए। उप्पर के बाँस अपनासँ नीचाँ, तै सँ नीचाँ, तहूसँ नीचाँ... होइत-होइत सभसँ नीचाँ धरि खोँचाड़ल जाइए मुदा सही जवाब नै पबैए। अंततः निम्न स्तरीय वा स्तरहीन-निर्माण प्रमाणित करैत बीसोसँ अधिक खण्डांश [जकरा अंग्रेजीमे 'सेग्मेण्ट' (segment) कहल जाइछ] केँ खारिज वा रद्दी घोषित करबा देल गेलैक। तकरा सभ प्रक्रियाक पालन करैत, राज्य सरकार आ केन्द्र सरकारहुकेँ प्रतिवेदित हेबाक छलैक- ठीक अगिला दिन। ओहि कम्पनीमे तँ हड़कम्प मचबे कएलैक, संगहिं (ओही कालखण्ड मे नया-नया बनल) टेक्निकल सचिवालय पर्यन्तो प्रकम्पित छल, किएक तँ ओहि कम्पनीक चयन ग्लोबल-टेण्डर सँ आ दिल्लीक सहभागितासँ भेल रहैक। दोसर महत्त्वक बात छलैक जे एहि 'सेगमेण्टेशन-बीज' क वैचारिकी एकदम्मे अभिनव रहैक जकर व्यावहारिक ज्ञान अधिकांश अभियन्तोकेँ नै छलैक ताहि दिनमे। तेसर बात जे खास रहैक से छलैक- एक-एकटा ढलाइ कएल खण्डांशक लागत लाखहु रुपैया पड़ैत छलैक, तेँ कम्पनीकेँ करोड़क नोकसान सम्भावित छलैक। गुरुदेव (बी.एन. झा) साहेब चरणबद्ध रूपेँ उक्त प्रतिवेदनक प्रक्रियासँ अवगतेटा नहि, ओहिमे शामिलो छलखिन, स्थल-निरीक्षण कए स्वयं निम्न-स्तरीय निर्णयसँ आश्वस्तो भेल छलखिन। ओहि दिनमे फोनपर भारते सरकारक एकाधिकार छलैक तथापि छत्तासँ उड़ल मधुमाछी जकाँ फोन सब तीनू दिन अनवरत घनघनाइते रहल छलै। चोङा हाथसँ रखलौं नहि कि फेर घनर-घनर...। ओहि बिध-पुराओने सनक निरीक्षण भवनमे नाम मात्रेक दू टा प्रहरी छलै जे बहरी मे बैसल तमाकुल लटा रहल छलै। भीतरमे एकटा आदेशपाल साहेब लेल रोटी-दालि-तरकारी बना रहल छलै आ साहेब अपन शयन-कक्षेमे, टेबुल-कुरसी लगौने रिपोर्ट-रीटर्नमे लागल छलाह। एहि शिविरसँ थोड़े हँटिकए हाथीक देखौआ दाँत सन एकटा पुलिस-पोस्टो छलैक जाहिमे कखनो दूटा लाठी-पाटी सिपाही रहैत छलै आ कखनो सेहो नदारद! राति, घड़ीक हिसाबेँ बहुत नै भेल रहैक मुदा आबादी सँ दूर गंगा-तटक एहि टोलबा पर एकदम सन्नाटा पसरल रहैक। कि तैखन एकटा गार्ड बरंदा परक खिड़की लग लाठी पटकैत, ओही खिड़की लगाकए भीतरी बैसल हाकिमकेँ आवाज दैत बाजल- साहेब-साहेब! कोई जीप आई है फाटक पर। दो-तीन आदमी उतरा है जो फाटक खोलने बोलता है। का, तो हाकिम से मिलना है। साहेब ठामहिं बैसले-बैसल खिड़कीक एकटा पल्ला कनिएँ फोलैत, गार्डकेँ कहलखिन- अभी ई कौन है जी? बोलो कल सुबह मे आएगा- जो भी है.. कल आठ बजे आएगा! किन्तु ताबत काल धरि दूटा भारी-भरकम मोछेला सनसनाएल बरन्दा पर चढ़ि गेल छलैक। आ गार्डकेँ धकिअबिते जकाँ कोठलीक ओठङाओल केबाड़केँ धक्का दैत, भीतर पैसि गेल छलै। ई गौरसँ चेहरा देखलनि- एकटाक मूऽ-कान चिन्हार सन लगलनि, प्रायः साइट परहक मुंशी-तुंशी छल हैत। दोसर गोटे साफे अनचिन्हार... देखबामे एकदम्मे सुलताना डाकूक सहोदर। डाँड़मे चमौटी आ चमौटीमे ओजनगर पेस्तौल लटकल। दुनूक हाथमे एक-एकटा ब्रीफ-केस। चेहरा पर गलौधी बन्हने। -आपलोग...? क्या बात है? इस समय कोई काम है मुझसे? -जी सर! घबराइएगा नहीं! साहेब भी आए हैं, गाड़ियेमे बइठल हैं। ये (हाथक ब्रीफ-केस देखबैत) सर, आपके लिए कुछ लाए हैं! -अच्छा-अच्छा! क्या है इनमें? मैंने तो किसी को कुछ लाने के लिए नहीं कहा था! -सरजी! सरजी! इसमें (अपन दुनू हाथक थापड़ जकाँ देखबैत, प्रायः संकेत सँ पाँच-पाँच दस-दस केर) इतना अभी है। और जो हुकुम होगा, कल-परसू फिन आ जायेगा- साहब बोले हैं...। -ऐ। चलो, ये उठाओ और यहाँ से भागो! चलो, भागो!... से एतबा कहैत साहेब कोठलीक दोसर कोनमे टेबुल पर राखल फोन दिस डेग बढ़ौलनि किन्तु ततबेमे एकटा तेसरो प्रवेश केलक कोठलीमे। -सर, सर! सुनिये न! फोन-ओन किसको कीजिएगा? इतना जो दिन-रात खटते हैं सो का मिलना है? ई नोकरी से आजकल गुजारा चलना है का? ओ तेसर आगन्तुक समुझाबैत जकाँ कहलकनि। -सुनिए-सुनिए! नौकरी हम करते हैं, क्या मिलता है, कितना मिलता है- उससे आपको क्या मतलब? चलिए, आइए, ये सब लीजिए और चलते बनिए यहाँ से! हमारा गुजारा कैसे चलेगा, वो मुझे सोचना है न, आप उसमें टाङ मत अड़ाइए! -सर-सर! बाल है, बच्चा है! परिवार का राजी-खुशी सब्बे चाहता है सर! इसलिए घर आइल लछमी का अपमान तो नहीं न होना चाहिए सर! -सुनो-सुनो बाबू! कितनी उमर है तुम्हारी? और वजन कितना है? -सर! ५८ बरिस हो चला है! आउ ओजन तो.. ८० किलो तक...! -और बाल-बच्चे कितने हैं? -सर, पाँच हैं! तीनठो बेटी और दो ठो लड़का है! काहे सर! ई सब काहे पूछते हैं? -देखो तुमको वेतन मिलता होगा पाँच-दस हजार। और फैमिली होगा, माता-पिता होंगे, तो नौ आदमी, है कि नहीं? -जी सर! सो तो है! ओ तीनू मुह ताकऽ लागल साहेबक। -हाँ, तो तुमको चोरी-डकैती करना पड़ेगा, हो सकता है। और तुम जब ये सब बेइमानी-शैतानी करोगे तो बाल-बच्चे तुमसे भी बड़े शैतान-गुण्डे -मवाली होंगे। समझे? तुम्हें नमक-रोटी के साथ दारू-मुरगा भी चाहिए। तुम्हारा वजन यही हराम का खा-खा कर ८० किलो हुआ है! और बी.पी.- सूगर भी बढ़ा होगा, जाँच कराया है? -नहीं सर! एकबार चक्कर आ गया था, तो डाक्टर बोला था ऊ दोनों जाँच कराने, नहीं करा पायें! -बस-बस! यही समझने की बात है! मैं खुद भी स्वस्थ हूँ और बाल-बच्चों को भी तन और मन से स्वस्थ रखना चाहता हूँ। सभी परिश्रमी हैं। मन लगाकर पढ़ते-लिखते हैं। घर में न नाजायज आमद, न फालतू खर्च! न चोरी-डकैती का कोई डर! और ये मूँछबाला जो पेस्तौल लटकाके घूमता है न, कहीं सिपाही-हवलदार से रिटायर हुआ होगा और कम्पनी के जी.एम. का बॉडीगार्ड है! है न जी? तुम्हारा नाम रामेश्वर सिंह और घर बिहटा है न? पेस्तौलवला अपन नाम-गाम सुनिते मूड़ी झुकौने तत्काले कोठलीसँ बाहर भऽ गेल। ओकर घाड़ ओतेक नै झुकल रहैक, जतेक टेरल-टेरल कर्ड़ल-कर्ड़ल मोंछ। -हाँ तो अब आपलोग भी ये माल-असबाब उठाइए और जाकर अपने बॉस को बोल दीजिए कि यह पण्डित दो क्या, बीस ब्रीफकेस में भी बिकाउ नहीं है। और यह भी बोलिएगा कि अभी कम से कम डेढ़ दसक तक मृत्यु-योग नहीं है हमारा! दृढ़ स्वरेँ एतबा कहैत, ओकरा सभकेँ बाहर बरंदा परहक सीढ़ी धरि अरिआइत देलखिन। ओ दुनू बरंदा सँ उतरि एकबेर पाछाँ घूमि हिनका भरि आँखि देखलक, कल जोड़ैत आ माफी मँगैत फाटक लगक इस्टाट भेल गाड़ी मे जा घोंसिआएल-फुर्र! ई असाधारण हाकिम आर क्यो नहि, हमरा गामक अथवा हमरालोकनिक गौरवशाली 'अयाची-परम्परा' केर प्रायः आखरी स्तम्भ भवानन्दे जी ओ कृपानन्द ठाकुरेजी छलाह। आ एहि घटनाक अनुगुंज पहिले-पहिल चेतना समितिक एक बैसार मे मैथिल-गौरव भवानन्दे बाबूक मुहेँ (संक्षेपमे) आ पछाति स्वयं ठाकुरेजीक मुहेँ दरभंगा-प्रवास (१९८९-९० क हमर गृह-प्रवेश, लक्ष्मीसागर कॉलोनी) कालमे सुनने छलहुँ। तहिया ठाकुरजीक मुहसँ बहराएल ओ (बाल-बच्चाक मादे भविष्यवाणी वला) बात सभ आ आजुक मैथिली साहित्यांगनक 'कुरुक्षेत्र विजयी गजेन्द्र' आकि 'पञ्जी-प्रबन्धक नब व्यवस्थापक गजेन्द्र' किं वा 'ई-पत्रिका विदेहक संस्थापक-सम्पादक गजेन्द्र' अथवा कतेको 'अवडेरल-अभेलित मैथिलीक साहित्यकारकेँ प्रतिष्ठापित करैत गजेन्द्र'  केँ निंघारैत-हियासैत हम साँचे दंग भेल छी! संगहिं कुल-वधू प्रीतिक बिकास-उजास से, भिन्ने तरहक सुख-संतोष प्रदान करैत अछि। यैह थिक बाढ़हि पूत पिताके धर्मे! यैह थिक - माता-पिताक श्रेष्ठ गुण-सूत्रक तथा सुलक्षण संस्कारक विलक्षण प्रमाण! हँ, मुदा कचोटक बात इहो मोन रखबाक छी जे एहि चर्चित गुरु-शिष्यकेँ सामाजिक रूपेँ जेहन मान-सम्मान भेटब वांछित छलनि, जकर ई लोकनि सभ तरहेँ अधिकारी छलाह; से भेटि नहि सकलनि। देखैत छी, सामान्यों धन्धा-पेशाक लोककेँ अथवा झूठ-साँच भाँजिकए, खादीक बदला हैण्डलूमो चमकाकए, एक-दू बेर विधायक-सांसद वा मंत्री-संत्री भऽ जाइए, सेहो तिकड़म आ जोगाड़क बलेँ पद्म-पुरस्कारक तमगा पाबि लैए। तेहनाठाम गांधी सेतु सन-सन कालजयी कृतिकेँ जमीनपर उतारि देखओनिहार आ सेहो जीवनकेँ दाओ पर लगाकए निर्लिप्त सेवा देनिहार युग-पुरुषक नाम पर दरभंगो-मधुबनी मे एकटा पथ-पार्क-पुल वा चौक-चौराहो पर्यंतक नहि होयब साबित करैछ मैथिलक अकर्मण्यताकेँ! करौट फेड़ैत अपना गाम, अपन जिला-जवार आ देश-कोसकेँ मजगूत खाम्ह-खम्हेली सँ युक्त कैनिहार कीर्ति-पुरुष-कृपानन्द जीक पुण्य-स्मृतिकेँ शतशः नमन्। -सम्पर्क- सियाराम झा 'सरस', फ्लैट सं- बी/ १, सम्भव अपार्टमेण्ट, डाक बंगला रोड, डिप्टीपाड़ा, राँची (झारखण्ड)-८३४००१. मोबाइल: ९९३१३४६३३४ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.परमानन्द लाल कर्ण-एकादशीक उद्भव ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.निर्मला कर्ण- अग्निशिखा खेप ३४ निर्मला कर्ण (१९६०- ), शिक्षा - एम. ए., नैहर- खराजपुर, दरभङ्गा, सासुर- गोढ़ियारी (बलहा), वर्त्तमान निवास- राँची, झारखण्ड। झारखंड सरकार महिला एवं बाल विकास सामाजिक सुरक्षा विभागमे बाल विकास परियोजना पदाधिकारी पदसँ सेवानिवृत्ति उपरान्त स्वतंत्र लेखन। (अग्नि शिखा मूल हिन्दी- स्वर्गीय जितेन्द्र कुमार कर्ण, मैथिली अनुवाद- निर्मला कर्ण) अग्निशिखा खेप -३४

पूर्वकथा

दिन मे उर्वशी मधुबन जाइत छथि आ राजा पुरुरवा केँ हुनका सँ भेंट करबा लेल बजबैत छथि,राजा उर्वशी सँs असमय भेंटक संदेश पाबि आश्चर्यचकित भs जाइत छथि,मुदा हुनका सँ भेंट करय लेल जाइत छथि।

आब आगाँ  "प्रिये! कतs छी अहाँ! अहाँ कतय छी प्रिये?" राजा व्यग्रता सँs आवाज दैत मधुबन में बहुत भीतर धरि चलि गेलाह- "अहाँ कतय छी प्रिये?" "एतय!हम एतय छी प्रियतम !" सुरम्य वातावरण में एकटा मधुर हँसी गूँजि उठल, जेना सहस्त्र घंटी एक संग बाजि गेल हो वा कोनो कोमालांगीक पायलक झंकार गूँजि गेल हो। राजा घुमि कऽ आवाजक दिशा मे चलनाई शुरू कऽ देलथि। हुनकर दृष्टि एकटा सौंदर्यमयी युवती पर पड़लनि।ओ एक गोट विशाल प्रस्तर खंड सँs नीचाँ उतरि गेल छलीह आ धीरे-धीरे एहि दिशा मे बढ़ि रहल छलीह। युवतीक आधा मुखड़ा घूंघट सँs झाँपल छल।पुरुरवा युवती दिस तकलथि,उर्वशी के ई किछु अप्रकट सौन्दर्य हुनकर हृदय के छू लेलक।एहेन रूप सज्जा देखि हुनकर ह्रदय प्रेम सँs उद्वेलित भय गेल। प्रेमोत्साह सs भरल ओ दौड़लाह आ उर्वशी के आलिंगनबद्ध कय लेलथि ।ओ किछु क्षण ओहि स्थिति में ठाढ़ रहलथि,आ फेर हुनका अपन कान्ह पर लs कs प्रस्तर खंड दिस बढ़ि गेलथि ।ओ हुनका लs कs प्रस्तर खंड लग पहुँचि गेलथि,अपन कान्ह पर सौं ओ हुनका नीचाँ उतारि प्रस्तर खंड पर बैसा देलथि । एतेक दूर तक एकटा संपूर्ण युवा स्त्री के कान्ह पर अनवाक कारण हुनकर साँस किछु अव्यवस्थित भय गेल छलनि,ओ जोर सँs किछु साँस लय अपना के व्यवस्थित कयलथि। आब हुनक सम्मुख बैसल राजा हुनका प्रेम भरल नेत्र सँs देखय लगलाह।ओ एखनो अपन आधा मुखड़ा के घूंघट सँs झाँपने छलीह। राजा हुनकर गाल पर चमकैत तिल दिस बहुत ध्यान सँ देखलथि । तिल देखि राजा चौंकि गेलथि "अहाँ...अहाँ... उर्वशी... छी"! राजा आश्चर्यचकित भs पुछलखिन। "कियैक!अहाँ हमरा पर शंका किएक करs लगलहुँ प्रियतम ?"- सौंदर्यमयी युवती जवाब देबाक बदला उलटि कs गंभीरता सs एकटा सवाल पूछि लेलथि । "तखन अहाँक गाल पर ई तिल कतय सँ आयल ! काल्हि धरि अहाँक गाल पर तिल नहि छल"- राजा अपन शंका व्यक्त केलनि । "ओह ईs बात! हम सोचलहुँ जे काजर सs गाल पर कृत्रिम कारी तिल बनाबी,तखन हम अहाँ सँs पूछब जे हम केहन लगैत छी" - युवती हँसय लागल। राजा पुरूरवा सेहो हँसय लगलाह। "अहाँक बहुत बहुत नीक विचार! मुदा अहाँ तs पहिनहि सँs अतीव सुन्नरि छी,तखन अहाँ केँ कृत्रिमताक आवश्यकता किएक भेल" राजा हँसैत प्रेमपूर्ण स्वर मे पुछलनि। "रोज नव-नव रूप में बदलि कs अपन प्रियतम सँs भेंट करबा मे एकटा अतुल्य आनंद प्राप्त होइत छैक। सुखी दांपत्य जीवन सुनिश्चित करवा हेतु अपना सभ केँ अहिना बदलैत रहबाक चाही प्रियतम।" "ओह, हँ! अहाँ ठीके कहैत छी,मुदा पहिने ई बात किएक नहि सोचलहुँ ! तखन आइ असगरे एतs किएक आबि गेलहुँ?" " हम की करितहुँ!अहाँ शासन मे व्यस्त रहैत छी, आ हम ओतह पलंग पर एकसरे बैसल अकुलाइत रहैत छी।सोचैत छी अहाँ कनेको! ई केहन न्याय अछि?" "ओहो!अहाँ के हमर कनियों कालक बिछोह सहन नहि भs रहल अछि! हा sss हा sss हाsss!' "अच्छा! ई सभ बात आब छोड़ू..." उर्वशी के बात के बीच में कटैत राजा अचानक बाजि उठलथि- "अरे!अहाँक मेमना किएक नहि आयल अछि,कतहु नहि देखाइत अछि?" "ओ तs....." दुनू मेमनाक उपस्थिति के अभ्यस्त राजा कतहु निकट नहि देखि एम्हर-ओम्हर तकलाक बाद पुनः उर्वशी के बात कटैत कहलनि - "हमरा दुनू मेमना कतहु नहि देखवा में आबि रहल अछि!" "मेमना के बात छोड़ू,हम ओकरा कतय-कतय लs जायब? अहाँ हमरा लेल सहस्त्र मेमना आनि सकैत छी,तखन ओकर चिंता किएक?" राजा पुरूरवा आश्चर्यचकित भs गेलाह।ओ सोचय लगलथि - 'आइ हिनका की भेलनि!ओ हमरा सँ बेसी अपन दुनू मेमना केँ प्रेम करैत छलीह।ओ हुनका सभ केँ एक क्षणक लेल अपना सँ दूर नहि होमय दैत छलीह।तखन आइ अचानक ई केहन परिवर्तन आबि गेल अछि।' राजा के गंभीर विचार में निमग्न आ अन्यमनस्क सन देखि ओ बजलीह - "अहाँ एतेक गंभीर किएक भs गेल छी राजन् ! हम पुछैत छी,ओहि मेमना सभ में एहेन कोन विशेषता अछि ! जे ओकरा वास्ते एतेक चिंतित भs गेलहुँ अहाँ ! हमरा बताऊ ने कथि सोचि रहल छी प्रियतम ?" "नहि! नहि ! किछु नहि" - विचार में डूबल राजा ई बात सुनि आश्चर्यचकित भs सचेत भय गेलाह। ओ हड़बड़ा कs समीप स्थित सुंदरी के ध्यान सौं देखलथि। पुनः पुरूरवाक हाथ हुनक सुकोमल कारी केश पर धीरे-धीरे फिरय लगलनि। केश सोहरावैत ओ पुनः विस्मित भय अचक्के बाजि उठलथि - " अरे ई कीभेल!अहाँक ओतेक नमहर कारी केश छल,एतेक छोट कोना भ’ गेल?" "ओह,हम ओकरा काटि देलियैक। कहाँ ओ व्यर्थ के भार अपन माथ पर किएक उठेने घुमितहुँ ताहि सौं काटि कs छोट कएल!" - युवती क्नेक घबड़ाइत बजलथि। हुनक हाथ राजा पुरूरवाक अधोवस्त्र में ओझरा गेल छलैक।पुरुरवा विशेष ध्यान सँs युवतीक मुखमंडल दिस देखलथि - कामातुरा अभिसारिका के अंग-प्रत्यंग अभिसार हेतु पुरूरवा के आमंत्रण दय रहल छल। काम बाण सँs आबद्ध ठोढ़ काँपि रहल छलैक,आँखि लाल भय पिपासा छलका रहल छल। "अहाँ एतेक अधीर किएक भेल छी प्रिये! हम भागि नहि रहल छी,पहिने एहि सुरम्य प्रकृति सुंदरी के मनोहर दृश्यक आनन्द ली"- राजा हुनकर व्यग्रता केँ शान्त करबाक प्रयास करैत बजलाह। "ओह!नहि प्रियतम ! पहिने हमर इच्छा पूर्ण करू, तखन आन किछु बात करब।प्रकृति सुंदरी के मनोहर दृश्य कहाँ भागत!" हुनक व्यग्रता के अनुभव करैत राजा आश्चर्यचकित भऽ बजलाह- "आइ अहाँ के की भेल प्रिय?"- "हमरा की होयत! ई कोनो नव बात नहि अछि! मुदा अहाँ अवश्य अज्ञानी बनि रहल छी! हमर भावना कनेको नहि बुझि रहल छी अहाँ,मात्र अपन बात कs रहल छी!" "शांत रहू हमर प्रियतमे आ धैर्य राखू। देखू एहि ठामक प्राकृतिक सौन्दर्य कतेक सुन्दर अछि। किछु क्षण जंगल मे टहलब आ फेर अपन प्रत्येक अभिलाषा पूर्ण करब। शनै:-शनै: बढ़ब अभिसारक दिशा में,तखन जे संतुष्टि भेटत से अलग तरहक होयत। अथाहआनंद प्राप्त करब " - राजा अपन बात स्पष्ट करैत कहलथि । "ओह!अं...ठीक अछि! अहाँक जे विचार होय" - अभिसारिका बजलथि।एहि मध्य ओ पुरूरवा के अधोवस्त्र के बंधन खोलि देने रहथि। एहि बात सँs अनभिज्ञ पुरूरवा सम्मुख एकटा लता पर उगल अत्यंत सुन्दर पुष्प केँ देखि ठाढ़ भs गेलथि । सम्भवतः ओ पुष्प तोड़ि कs प्रियतमा के सज्जा हेतु आनs चाहैत छलथि। मुदा ई की भेल! ठाढ़ होइतहि हुनकर अधोवस्त्र हरहरा कs भू-लुंठित भय गेलनि!ओ सम्पूर्ण नग्न छलाह!अपना केँ एना नग्न देखि राजा घबड़ा गेलथि,आ झट सs झुकि अपन अधोवस्त्र धरती पर सs उठा लेलनि। अभिसारिका जोर-जोर सँ हँसलीह - "अहा!अहाँ बड्ड सुन्दर लगैत छी"। पहिने राजा भयभीत भs गेलाह फेर आश्चर्यचकित भय हुनका दिस घुमि कs बजलथि - "अहाँ हमरा सौं ई शर्त करौने छलहुँ जे अहाँ हमरा यौन-संभोगक समय छोड़ि कखनो नग्न नहि देखब। तखन अहाँ के हम आइ, हमर एहि नग्न अवस्था में कोना सुन्दर लगलहुँ! अहाँक एहि विरोधाभासी व्यवहार केँ बुझबा मे असमर्थ छी हम। अचक्के अहाँ के व्यवहार में एतेक विरोधाभास किएकआबि गेल ?" ​ "अरे! ओहि शर्त के बात आब छोड़ू!कखनो काल शर्त टूटि जाइत छैक " - राजा के जिज्ञासाक लापरवाही सँ उत्तर देलनि।एहि सँ राजाक आश्चर्य आओर बढ़ि गेल! "अहाँ ई बात कहि रहल छी! तखन हमरा छोड़ि कs अहाँ चलि तs नहि जायब?" घबड़ाएल आ भयभीत पुरूरवा बजलाह। "नहि प्रियतम! नहि! हम अहाँ केँ किएक छोड़ि देब! आऊ प्रियतम!हमरा आलिंगनबद्ध करु!ओह!आब दूर नहि रहु! हमर अभिलाषा पूर्ण करु" - अभिसारिका व्यग्र भs कs बजलथि। "अरे!..... ओह!आब हम बुझि गेलहुँ! अहाँ... अहाँ... उर्वशी नहि भs सकैत छी! अहाँ कोनो आन होयब! कहू जे अहाँ के छी..." -क्रोध सँs विदग्ध भय राजा तीव्र स्वर में बाजि उठलथि । "हम छी...उर्वशी...हमर प्रिय..." डराएल युवती बाजल। "तखन एतेक डराएल सन अहाँक मुख कोना भेल ?" पुरूरवा निकट आबि बजलाह ।ओ एखन धरि अपन अधोवस्त्र पहिर नेने छलाह । राजा हुनका लग आबि हुनकर मुखड़ा के पूर्ण रूप सँs आवरण हीन कय देलथि - "अहाँ के छी, ई कहु!उर्वशी तs अहाँ निश्चित रूप सs नहि छी! अहाँ हुनकर रूप धारण करबाक प्रयास केलहुँ अछि। मुदा अहाँ पूर्णतः सफल नहि भs सकलहुँ, ताहि लेल अहाँक आधा मुखमंडल पर घूंघट राखल छल आ अहाँ उर्वशीक अभिनय करय लगलहुँ! मुदा अहाँ अपन प्रयास में असफल भs गेलहुँ!नहि अहाँ हमर उर्वशी नहि छी! "नहि - नहि - हम _त'" - लड़की डरि गेल। "चटाक"... "चटाक"... के आवाज सs वातावरण गूँजि उठल।राजा लड़की के गाल पर थप्पड़ मारलथि,आ हुनक आँगुर के निशान ओकर दुनू गाल पर आबि गेलै। युवती के आँखि में नोर भरि गेल छल,राजा पुरूरवा व्यथित अवस्था में लड़की दिस पीठ कs ठाढ़ छलाह | किछु क्षणक बाद ओहि कामातुरा युवतीक क्रोध में डूबल नागिन सन फुफकार राजाक कर्ण रन्ध्र में गूँजि उठल - "उर्वशी सँs विरह मे अहुँ अहिना कष्ट भोगैत रहब जेना हम भोगि रहल छी" - ई कहैत लड़की पाताल लोक मे प्रवेश केलक । पुरूरवा घुमि कs युवती दिस तकलनि,मुदा ओ ओतय नहि छलीह। एकटा छोट सन पाथरक टुकड़ी सs एकटा पत्र दबाओल छल।भयभीत राजा ओकरा उठा कs पढ़s लगलथि - "हम अहाँक विरह सँs व्यथित छी,राजन् ! हम अहाँ सँs प्रेम करैत छी,मुदा अहाँ हमरा अस्वीकृत कय हमर अपमान कs देलहुँ! अहाँ हमरा सँs प्रेम नहि करैत छी। हम अहाँ केँ कोनो तरहेँ प्राप्त करय चाहैत छलहुँ,भलहि छल सँs। मुदा हमर ई अभिलाषा सेहो पूरा नहि भेल। हम अतृप्त रहि गेलहुँ।अहाँ हमर अपमान कएल जकर प्रेमक लेल, जकर सौंदर्य पिपासु बनि अहाँ बौरायल छी।जकर प्रेमक लेल हमरा नहि स्वीकार केलहुँ!आ हमरा विरह ओ अपमानक अग्नि में जरय लेल छोड़ि देलहुँ,ओ प्रेयसी अहाँ केँ छोड़ि देत। हँ! याद राखब ओ अहाँ के छोड़ि देत आ अहाँ सेहो हमरे सन विरहाग्नि में जरब! ओकर विरह में बौरा जायब! अहाँ भटकैत रहब! भटकैत रहब!जहिना हम दिन-राति कष्ट भोगैत छी,अहाँ ओहिना कष्ट भोगैत रहब!ओहि समय में सेहो जँ अहाँ हमरा मोन राखब तऽ हम अहाँक मददि अवश्य करब।

प्रियतम,हम छी अहाँक प्रेममें बौरायल ! दानवासुर केशि के पुत्री - चित्रसेना! "हँ, आब बुझि गेलहुँ" - राजा पुरूरवा क्रोध में पैर पटकैइत ओहि पत्र केँ टुकड़ा-टुकड़ा कs कs फेकि देलनि,फेर अपन रथ दिस विदा भs गेलाह।आब हुनका जल्दिये राजमहल पहुँचबाक इच्छा छलनि, कारण उर्वशी हुनकर प्रतीक्षा में हेतीह। संभवत हुनका राजदरबार छोड़ि मधुबन एबाक खबरि भेटि गेल होयतनि।राजा उर्वशी के जतेक संभव होय शीघ्र!अति शीघ्र!अपना संग भेल छल के सूचना देबाक हेतु व्यग्र छलाह। एहि व्यग्रता के भाव दबवैत आ अपना संग घटल घटना पर मोनहि मोन में विचार करैत किछु सोचैत राजा चलैत गेलाह। क्रमशः अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.रबीन्द्र नारायण मिश्र-चित्रकुटकेँ घाट पर रबीन्द्र नारायण मिश्र चित्रकुटकेँ घाट पर नवंबर २०२२मे प्रयागराजमे आयोजित डाक्टर जयकान्त मिश्र जन्म शताव्दी समारोहमे भाग लेलाक बाद हमसभ प्रयागराजसँ करीब चालीस किलोमीटर फटकी मेजा तहसीलेमे अवस्थित एनटीपीसीमे कार्यरत हमर शाढूक ज्येष्ट पुत्र चिoआदित्य एजीएमक ओहिठाम पहुँचलहुँ । हमर मित्र आदरणीय संजीव सिन्हाजी,जिनका ओहिठाम हम प्रयागराज प्रवासक दौरान ठहरल रही,हमरासभकेँ ओहिठाम धरि अपन कारसँ अरिआति देलनि। एहन स्नेह,एहन अपनत्व कतए पाबी? कनीकाल आदित्यजीक डेरापर रुकलाक बाद सिन्हाजी वापस प्रयागराज चलि गेलाह। तकर बाद हमसभ ओहिठाम बच्चासभक संगे  हिलिमिलि गेलहुँ । हमर पेट प्रयागेसँ गड़बड़ चलि रहल छल। हमरश्रीमतीजीक पेट सेहो एहिठाम पहुँचलाक बाद गड़बड़ा गेलनि। धुआनि ढेकार दए रहल छलनि। रद्द हेबाक प्रवृत्ति सेहो छलनि। आदित्य एनटीपीसीक चिकित्सालयसँ किछु दबाइ अनलनि। किछु दबाइ हमरा लग छलहो। ओएहसभ काज आएल। क्रमशः हुनकर मोन ठीक भेलनि। दोसर दिन जखन उठलहुँ तँ ओ आगूक यात्रा हेतु स्वस्थ बुझेलीह। सभगोटेकेँ चित्रकुट जेबाक कार्यक्रम बनलनि। आदित्य एकटा बड़का कार ठीक केने रहथि। हमसभ जलखै चाह केलाक बाद करीब दसबजे ओहिगाड़ीसँ चित्रकुट बिदा भेलहुँ । हमसभ छओ गोटे रही,दूटा बच्चा सेहो रहए। कुल मिला कए आठगोटे भेलहुँ आ गाड़ी एक्केटा,निसस्न्देह बड़का गाड़ी रहैक । तथापि,ओते गोटेक समावेश करब बहुत मोसकिल छलैक,मुदा कएल गेलैक। वाहनचालक लगक सीटपर हम बैसलहुँ , मुदा हमर दुनूकात दूटा बैग राखल रहए जाहिसँ हम अपन टांग कनीको हिला नहि सकैत छलहुँ । पछिलका  सीटपर बैसल लोकसभक हालति तँ सोचल जा सकैत अछि।  आखिर दस बजे ओ गाड़ी बिदा भेल। रस्ता भरि गप्प-सप्प चलैत रहल। सभ तरह-तरहक अनुभवसभक वर्णन होइत रहल। एहिसभसँ यात्रा बहुत मनोरंजक भए गेल। समय कोना बितल आ चित्रकुट कोना आबि गेल से पतो नहि चलि सकल। चित्रकुट बहुत पवित्र आ प्रमुख धार्मिक स्थान मानल जाइत अछि । भगवान राम,तुलसीदास आ आधुनिक कालमे जगद्गुरु रामभाद्राचार्यजी चित्रकूटसँ जुड़ल बहुत स्मरणीय नामसभ छथि। ओना हिनकासभक बारेमे के नहि जनैत अछि? तथापि प्रसंगवश हिनकालोकनिकेँ उद्धृत करैत छी। तखन  चित्रकूटक आगूक यात्रावृतान्तक चर्च करब। भगवान राम अपन चौदह वर्षक वनबासक अवधिमे सँ साढ़े एगारह वर्ष एहीठाम बितओने छलाह। हुनकर वनबास गमनक बाद हुनकर पिता दसरथक मृत्युक सूचना एहीठाम हुनकर अनुज भरत द्वारा देल गेल रहनि। एतहि ओ अपन स्वर्गीय पिताक श्राद्ध केलनि। यद्यपि भरत हुनका वापस अयोध्या जा कए राज काज सम्हारबाक बहुत आग्रह केलनि ,परंतु भगवान राम वनबास अवधि धरि वापस अयोध्या नहि जेबाक निर्णयपर अड़ल रहि गेलाह। तकर बाद हुनकर चरणपादुका लए भरत वापस अयोध्या आबि गेलाह। हुनका संग चित्रकुट गेल गणमान्यलोकनि सेहो वापस आबि गेलथि। भगवान राम सीता आ लक्षमणक संगे चित्रकुटेमे रहि गेलाह । काशीमे तुलसीदासकेँ एकदिन एकटा प्रेत भेटलनि। ओ हुनका हनुमानजीक पता देलकनि। हनुमानजीसँ भेंटक बाद तुलसीदास  भगवान रामक दर्शन करेबाक जनतब भेटलनि। हुनकर परामर्शक अनुसार ओ चित्रकुट आबि गेलाह। ओतए ओ रामघाटपर रहथि। एकदिन प्रदक्षिणाक क्रममे हुनका दूटा राजकुमार धनुषवाण लेने घोड़ापर सबार देखेलनि। ओ हुनका देखि मंत्रमुग्ध भए गेलथि। मुदा चिन्हि नहि सकलथि जे ओ भगवान राम आ लक्षम्ण छलाह । बादमे हनुमानजी हुनका सभ बात कहलखिन । से जानि कए तुलसीदास बहुत दुखी भए गेलथि। हुनका हनुमानजी सांत्वना दैत कहलखिन  जे हुनका फेर भगवानक दर्शन हेतनि। संवत सोलह सए सात मौनी अमावस्याक दिन बालकरूपमे हुनका फेर भगवानक दर्शन भेलनि। ओ बालक हुनकासँ चानन मागलथि। हनुमानजीकेँ भेलनि जे तुलसीदास कहीं फेर ने हुसि जाथि। ओ सुग्गा बनि कहलथि- चित्रकूट के घाट पै, भई संतन के भीर। तुलसीदास चंदन घिसै, तिलक देत रघुबीर।। तुलसीदास तुरंत चौंकि गेलाह,सतर्क भेलथि आ भगवानकेँ चिन्हि गेलथि। ओ बालकरूपमे भगवानक सद्यः दर्शन कए मंत्रमुग्ध भए गेलथि। भगवान अपने हाथे हुनक माथपर चानन लगओलथि आ ओहिठामसँ बिला गेलथि । आधुनिक कालमे जगद्गुरु रामभद्राचार्यजी आ हुनका द्वारा स्थापित जगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय चित्रकुटमे चर्चाक विषय अछि। ओ चित्रकुटमे तुलसीपीठक स्थापना केने छथि। जगद्गुरु रामभद्राचार्यजीक कथा बहुत रोमांचकारी अछि। ओ शुरुएसँ बहुत प्रतिभाशाली रहथि। तीने वर्षक आयुमे ओ पहिल कविता लिखने रहथि- मेरे गिरिधारी जी से काहे लरी। तुम तरुणी मेरो गिरिधर बालक काहे भुजा पकरी॥ सुसुकि सुसुकि मेरो गिरिधर रोवत तू मुसुकात खरी॥ तू अहिरिन अतिसय झगराऊ बरबस आय खरी॥ गिरिधर कर गहि कहत जसोदा आँचर ओट करी॥ हुनका द्वारा रचित पहिल संस्कृत श्लोक अछिः महाघोरशोकाग्निनाऽऽतप्यमानं पतन्तं निरासारसंसारसिन्धौ । अनाथं जडं मोहपाशेन बद्धं प्रभो पाहि मां सेवकक्लेशहर्त्तः ॥ ओ बाइस भाषाक ज्ञाता छथि। जगद्गुरु रामभद्राचार्यक पारिवारिक नाम गिरधर मिश्र छलनि। हिनकर जन्म जौनपुर जिलाक शांदिखुर्द नामक गाममे १४जनबरी सन् १९५०क भेल रहनि । हिनकर पिताक नाम पंडित राजदेव मिश्र आ माताक नाम सच्ची देवी छलनि। ओ जखन एगारह वर्षक रहथि तखन परिवारक लोकसभ हुनका एकटा बरिआतीमे आन्हर हेबाक कारण नहि लए गेल रहनि। लोकक धारणा छल जे आन्हर अशुभ होइत अछि। ओ एहि घटनासँ बहुत आहत भेल रहथि। बादमे ओ कहलथि जे अखनहु हम आन्हरे छी,मुदा लोकसभ शुभ कार्यमे हमर उपस्थितिक हेतु लालायित रहैत छथि। श्रीरामभद्राचार्यजी अद्भुत प्रतिभाशाली छथि। ओ जे किछु सुनैत छथि से एक्के बेरमे कंठस्थ कए लैत छथि। हुनका कतेको विषयमे आचार्यक उपाधि भेटल छनि। ओ पीएचडी आ डिलिट उपाधि सेहो प्राप्त केने छथि। मानव कल्याण आ विकलांगक सेवा हुनकर प्रमुख लक्ष्य छनि। चित्रकूट पहुँचितहि सभसँ पहिने हमसभ एकटा नीक होटलक जोगारमे लगलहुँ । कामदागिरिसँ सटले एकटा होटल लग हमसभ पहुँचलहुँ। हमसभ दूटा पुरुष ,चारिटा महिला आ दूटा बच्चा संगे छलहुँ । कमसँ कम तीनटा कोठरी तँ चाहबे करी। ओ दुनू बेकती आगू बढ़लाह आ मनेजरसँ गप्प कए रहल छलाह । गप्प कनी तिराइत बुझाएल। हमहूँ ओहिठाम पहुँचलहुँ । कारण चिंता भेल जे पता नहि केना की भए रहल अछि। होटल मनेजर कहलकैक- "एक हजार रुपया प्रति कोठरी लागत। काल्हि दस बजे खाली करए पड़त।" "डिसकाउन्ट कतेक?" ओ हँसए लागल। फेर बजैत अछि- "एतनी तँ किराया अछि। एहिमे की डिसकाउन्ट भेटत। खाली करबाक समय कनी आगू कए सकैत छी।" "हमरासभकेँ काल्हि साँझमे वापस जेबाक अछि।" "कोनो बात नहि। कनी देरीएसँ खाली कए देब, एतबा समावेश हम कए देब।" "कखन धरि खाली करबाक होएत?" "बेसी सँ बेसी एक बजे धरि।" "ठीक छैक।" हमसभ कोठरी देखए लगलहुँ । तीनू कोठरी एक्के तलपर भेटि जाए । ताहि हेतु हमसभ ऊपर,नीचाँ करैत रहलहुँ। आखिर भूतलेपर तीनू कोठरी भेटि गेल। हमसभ आवश्यक कागज-पत्र जमा कए अपन-अपन कोठरीमे चलि गेलहुँ । थोड़ेकालक बाद हमसभ ओतहि भोजन केलहुँ ,कनीकाल विश्राम केलहुँ । तखन चित्रकूट भ्रमण हेतु बिदा भेलहुँ । सभसँ पहिने हमसभ मन्दाकिनी नदीक रामघाटपर पहुँचलहुँ । ओहिठाम एकटा नाओ ठीक केलहुँ जे हमरासभकेँ मन्दाकिनी नदीमे घुमओलक। अखन आरती शुरु हेबामे समय रहैक तेँ नाओसँ नदीक ओहिपार पहुँचि हमसभ लगपासक कैकटा मंदिरसभमे दर्शन केलहुँ । तुलसीदास जतए पूजापाठ करैत छलाह आ भगवान रामकेँ चानन लगओने छलाह ततहु गेलहुँ । चारूकात बानरसभ घुमि रहल छल। ओकरासभसँ बचबाक हेतु एकटा स्थानीय लोकक मदति लेलहुँ । भगवान राम एहीस्थानपर तुलसीदासकेँ दर्शन देने रहथि। साँझमे एतए मन्दाकिनीक आरती देखलहुँ । आरतीमे अनेक तरहसँ प्रज्वलित दीपसभकेँ विशेष रूपसँ सुसज्जित पुजारी लोकनि बहुत आकर्षक दृश्य उत्पन्न करैत छथि। हमर इच्छा रहए जे नाओपर बैसिए कए आरती देखी। मुदा नाविक तैयार नहि भेल। आखिर हमसभ सामनेमे बैसि कए आरतीक आनंद लेलहुँ । मुदा किछूगोटे नाओमे बैसिए कए आरती देखि रहल छलाह। ई बात हम ओकरा कहबो केलिऐक। मुदा ओ तरह-तरहक कबाइत करैत रहल। आरती समाप्तिक बाद नाओपर बैसि हमसभ नदीक ओहि कात गेलहुँ । तकर बाद वापस अपन डेरा बिदा भेलहुँ । डेरा वापस हेबा क्रममे एकटा नीक भोजनालय देखाएल । हमरासभकेँ बहुत भूख लागि गेल छल। अस्तु, सभ काज छोड़िकए ओहिठाम भोजन केलहुँ । संयोगसँ हमर झोरा ओतहि छुटि गेल छल। ओहीमे सभटा महत्वपूर्ण वस्तुसभ राखल छल। हम तुरंत वापस ओहि भोजनालय पहुँचलहुँ । झोरा सुरक्षित राखल छल। ओहिमे सभकिछु(टाका, डेबिट कार्ड आ आधार कार्ड) बाँचि गेल छल। हम झोरा सुरक्षित भेटि गेलासँ बहुत प्रसन्न भेलहुँ आ सभगोटे अपन डेरा दिस कारसँ बिदा भेलहुँ । प्रात भेने हमसभ रामघाट बिदा भेलहुँ । किछुगोटे ओतहि स्नान करितथि आ तकर बाद मंदिरसभमे दर्शन करैत आगू बढ़ितथि। मुदा हम दुनू बेकती मंदाकिनीमे स्नान करबाक हेतु इच्छुक नहि रही। कारण काल्हि ओकर पानिक हालति देखि लेने रही । ओहि पानिमे नहएबासँ नीक जे  एक पथिआ थाल-कादो अपना माथपर ढारि ली। चारूकात दुर्गंध से करैत रहए। तेँ हमसभ काल्हिए सोचि लेने रही जे डेरासँ स्नान कइए कए बिदा होएब आ सएह केबो केलहुँ । हमरासभक संगे जे नवयुवक दंपति रहथि से अपन दुनू बच्चाक संगे  आ दूटा बृद्ध महिलाक संगे आगू बढ़लाह। वाहनचालक कहलक- "अहाँसभ चाही तँ कामदागिरिक दर्शन केनहि चलि सकैत छी। ओ एकदम सटले अछि।" "नहि, नहि। पहिने मंदाकिनीमे स्नान करब तकर बादे किछु आओर।" ओना हमर इच्छा रहए जे कतहु जलखै कए ली। भोरुका चाहो नहि पीने रही। मुदा अधिकांश लोकक इच्छा देखैत चुप रहि गेलहुँ। आखिर सभगोटे रामघाट बिदा भेलहुँ । हम दुनू बेकती मंत्रस्नान केलहुँ । ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥ -तीन बेर पढ़ि मंदाकिनीक पानि आंजुरमे लए अपनाकेँ शुद्ध केलहुँ। मुदा ओ सभ तँ बहुत नीकसँ स्नान केलथि। आरो बहुत लोकसभ ओतए नहाइत देखाएल । असलमे आस्था आनसभ वस्तुपर भारी पड़ि जाइत अछि । अन्यथा ओहन घोरल-घारल ,दुर्गंधयुक्त पानिक लगोमे नहि जाइत केओ। स्नानक बाद लगीचेक मंदिरमे दर्शन कए हमसभ अनसूया आश्रम बिदा भेलहुँ । जंगलक बीचमे कलकल बहैत मंदाकिनी नदीक जलधाराक सौंदर्य देखैत बनैत अछि। एहिठामक पानि बहुत स्वच्छ अछि। पानिमे नीचाँ धरि  स्पष्ट देखाइत रहैत अछि। पानिमे चलैत-फिरैत बहुत रास माछसभ देखाइत रहैत अछि। लोकसभ माछकेँ खेबाक हेतु अन्न फेकैत रहैत छथि। एहिठाम अनसूया-अत्री मुनिक आश्रम छल। अनसूया एतहि सीताजीकेँ बहुत रास गहनासभ देने रहथिन । संगे उपदेश सेहो देने रहथिन।  वर्तमानमे एहिठाम श्री परमहंस आश्रम,अनसुइआ,चित्रकूट बनल अछि। ओहिमे अनेक संतलोकनिक समाधिस्थल अछि। यात्रीलोकनि ओहि समाधिसभक दर्शन करैत छथि आ श्रद्धानुकूल दान सेहो दैत छथि। अनसूया आश्रमक बाद हमसभ गुप्त गोदावरी बिदा भेलहुँ । चित्रकूटसँ लगभग अठारह किलोमीटर फटकी अछि गुप्तगोदावरी। कहल जाइत अछि जे भगवान राम वनबासक समयमे ऐहिठाम किछुदिन रुकल रहथि। हुनके दर्शनक हेतु गोदावरी गुप्त रुपसँ एतए प्रकट भेल रहथि। गुप्त गोदावरीमे दूटा गुफा अछि। एकटा पैघ आ दोसर छोट। पैघु गुफामे पानि नहि अछि। एकर अंतमे छोटसन पोखरि अछि। छोट गुफामे पानि देखाइत अछि। आगू बढ़लाक बाद ओहिमे ठेहुन भरि पानि भेटैत अछि। गुफाक निर्माण प्रकृतिक दुर्लभतम कृति कहल जाइत अछि। गुप्तगोदावरीक दर्शनक बाद हमसभ वापस अपन डेरा बिदा भेलहुँ । ओहिठाम पहुँचैत-पहुँचैत सभगोटेकेँ बहुत भूख लागि गेल छल। ओतहि होटलमे भोजन केलहुँ । आब दू बाजए बला छल। हमसभ वापसी यात्राक तैयारीमे लागि गेलहुँ । अपन-अपन सामानसभ सरिएलहुँ । स्वागतीकेँ कोठरीके कुंजी देबाक हेतु स्वागतकक्ष लग पहुँचलहुँ । हम अपन कोठरीक कुंजी सुंझा देलिऐक। दोसर कोठरीक कुंजी सेहो वापस देल गेल। मुदा तेसर कोठरीक कुंजी नहि भेटि रहल छल। कोठरीक कुंजी हरा जेबाक कारण ओहिठाम माहौलमे थोड़ेकालक हेतु तनाओ पसरि गेल । "हम तँ कुंजी अहींक हाथमे देने रही।" "हमरा लग रहितए तँ रहबे करितए। अहाँ जरूर कुँजी बच्चाकेँ सुंझा देलिऐक ।" "हम तँ अपन कोठरीमे रही।" एहि तरहेँ आरोप-प्रत्यारोप होइत रहल। कुंजी सौंसे  ताकल गेल। समानसभ उकटल गेल। मुदा कुंजी नहि भेटल। एहि प्रक्रियामे आधाघंटासँ बेसी समय लागि गेल। असलमे ओ कुंजी बच्चासभक हाथमे पड़ि गेल रहए। ओएहसभ कतहु एमहर-ओमहर कए देलक। आब तँ बेस मोसकिल भए गेल। स्वागत कक्षमे मौजूद स्वागती दू सए टाका हरजाना लेलक तखने अपन कुंजीसँ ओहि कोठरीकेँ खोललक। ओहिमे राखल सामानसभ निकालल गेल। होटलक हिसाब-किताब केलाक बाद हमसभ वापस प्रयागराज बिदा भेलहुँ । हमसभ गोटे प्रयागराज जेबाक हेतु कारपर बैसि गेल रही। कार कनी दूर चलबो कएल कि वाहन चालक बाजल- "इएह थिक कामदागिरि । अहाँसभ चाही तँ एहिठाम उतरि कए दर्शन कए सकैत छी।" "कतेक दूर हेतैक?" "इएह सामनेमे देखा रहल अछि।" मुदा ओहिठाम कार नहि जा सकत। एतहि उतरि कए पैरे जेबाक होएत।" चित्रकुटक एकटा प्रमुख स्थान अछि कामतानाथ । कहल जाइत अछि जे भगवान राम कामतानाथ पहाड़पर साढ़े एगारह साल रहल रहथि। ओ एहि पहाड़क परिक्रमा सेहो करथि । एहिठामसँ जाइत काल भगवान राम वरदान देने गेलाह जे जे केओ एहि पहाड़क परिक्रमा करत तकर सभटा मनोकामना कामतानाथ पूरा करथिन। ई परिक्रमा लगभग पाँच किलोमीटरक होइत अछि आ श्रद्धालुलोकनि बहुत भक्तिभावसँ एकर परिक्रमा करैत छथि। परिक्रमाक क्रममे कैकटा छोट-छोट मंदिरसभ पड़ैत अछि। तीर्थयात्रीलोकनि सभ मौसममे एतए परिक्रमा करैत देखल जाइत छथि । हमसभ आपसमे  विमर्श केलहुँ । असलमे हमरा प्रयागराजमे दिल्लीक हेतु ट्रेन पकड़बाक छल। तकर ध्यानमे राखि आब बेसी काल समय नहि बाँचलछल। हमसभ ओतहिसँ कामदागिरिकेँ प्रणाम कए आगू बढ़ि गेलहुँ । चित्रकूटमे भरतकूपक बहुत महत्व अछि। कहल जाइत अछि जे जखन भगवान राम वनबासमे चित्रकूट आबि गेल रहथि तखन भरत ओहिठाम सपरिवार आबि भगवान रामसँ वापस अयोध्या चलबाक आग्रह केलथि। ओ अपना संगे अनेक नदीसभक जल अनने रहथि जाहिसँ भगवान रामक राज्याभिषेक होइत। परंतु ओ ताहि हेतु जखन सहमति नहि भेलाह तखन भरत हुनके परामर्शसँ भरत अत्री ॠषिसँ भेंट केलनि । हुनके आज्ञानुसार ओ सभटा जलकेँ ओहिठाम स्थित इनारमे खसा देलनि।  ओएह इनार आब भरतकूपक नामसँ जानल जाइत अछि। भरतकूपक जल बहुत पवित्र मानल जाइत अछि। एकर जल बहुत शीतल होइत अछि। गर्मीक समयमे लोकसभ एहि पानिसँ स्नान कए बहुत आनंदित होइत छथि। एकर अतिरिक्त स्फटिक शिला,सीताक रसोई सन-सन अनेक स्थान अछि जे एहिठाम देखल जा सकैत अछि। स्वर्गीय नानाजी देशमुखजी द्वारा स्थापित महात्मागांधी चित्रकूट ग्रामीण विश्वविद्यालय सेहो दर्शनीय स्थान अछि। सरबतमे जतेक चिन्नी देबैक ततेक मिठ्ठ होएत। घुमबाक हेतु समय,टाका आ स्वास्थ्य सभकिछु चाही। तथापि उपलव्ध समयमे जतेक हमसभ घुमि सकलहुँ से घुमलहुँ,जतेक देखि सकलहुँ से देखलहुँ , आनन्दित तँ भेबे केलहुँ । असलमे चित्रकूटक कण-कण राममय अछि । हुनकासन महापुरुष जतए साढ़े एगारह वर्ष रहल होथि ताहिठामक महात्म्यक वर्णन की कएल जा सकैत अछि? ओ तँ साक्षाते स्वर्ग थिक , भक्तलोकनिक हेतु प्रातःस्मरणीय थिक। चित्रकूटक रामघाटसँ  तीन किलोमीटर फटकी हनुमानधारा अछि। हमसभ वापसी यात्रामे सड़केपरसँ पहाड़ीपर अवस्थित ओहिस्थानकेँ देखलहुँ । ओतहिसँ हनुमानजीकेँ प्रणाम करबाक करैत आगू बढ़ि गेलहुँ । रस्तामे वाहनचालककेँ अगुतबैत रहलिऐक जाहिसँ ट्रेनक समय धरि हमसभ प्रयागराज पहुँचि जाइ। से संभव भए सकल। प्रयागराजमे हमसभ अपन मित्र श्री संजीव सिन्हाजीक ओहिठाम पहुँचलहुँ । ओहिठाम भोजन केलहुँ । कनीकाल विश्रमाक बाद हुनके संगे प्रयागराज टीसन बिदा भेलहुँ । संजीव सिन्हाजीक पुत्र कार चला रहल छलाह। दस मिनटक भितरे हमसभ टीसनपर पहुँचि गेल रही। हुनकासभकेँ प्रयागराजक रस्ताक सही जनतब रहनि जाहिसँ से संभव भेल। प्रयागराज एक्सप्रेस लागल छल। हमसभ तुरंत ओहिमे अपन निर्धारित शायिकापर  पहुँचि आश्वस्त भेलहुँ । सिन्हाजी आ हुनकर पुत्र थोड़ेकाल हमरा सभ लग बैसल रहलाह । आब ट्रेन खुजि जाएत। से जानि ओसभ ट्रेनसँ उतरि गेलाह । एहि बेरक हमरसभक प्रयागराज  प्रवासक दौरान आदरणीय श्री संजीव सिन्हाजीक स्वयं आ हुनकर समस्त परिवारक आतिथ्य,हुनकरसभक प्रेम बिसरल नहि जा सकैत अछि। हमसभ प्रयागराजमे हुनकालोकनिक आतिथ्यसँ अभिभूत रही। आइओ काल एहन लोकसभ होइत अछि,से सोचि हमसभ बहुत आनन्दमे रही । निश्चितरूपसँ एहन लोकसभ  पृथ्वीपर ईश्वरक वरदान थिकाह । ट्रेन खुजि गेल छल,प्रयागराज टीसन आब पाछू छुटि गेल छल। हमसभ निश्चिन्त भए सुति रहलहुँ । भोरे उठलहुँ तँ देखैत छी जे नईदिल्ली टीसनपर ट्रेन अड़कि चुकल अछि। -रबीन्द्र नारायण मिश्र, Email:mishrarn@gmail.com , m-9968502767 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.किशन कारीगर- मानकीकृत तराजू पर जोखाइत लोकभाषा मैथिली किशन कारीगर मानकीकृत तराजू पर जोखाइत लोकभाषा मैथिली

झूठो डंका पिटा रहलै जे मैथिली सबहक छियै आ तों जेना बजै लिखै छहो सैहे हो गेलै मैथिली? हइ झूठा दलाल सब नैह तन? लोक कनाहितो लिखौ तकरा तोरा अरू संपादित क मानक मैथिली मे छपै जाइ छहो से कैले? मैथिली मानक माने ई जे बाभन कायस्थ जइ टोन शैली मे बजताह लिखताह सैह भेल मैथिली मानक आ शुद्ध मैथिली? आ बाद बांकी जे सोलकन सब, कोसिकन्हा वला, बेगूसराय वला सब जे लिखलकै बजला उ सब राड़ बोली, ठेठी बोली, कोसिकन्हा बोली हई. मानकी तराजू हिसाबे अशुद्ध मैथिली से कैले? मानकी दलाल सब कहतै जे बोली के व्याकरण मैं होइ छै. केना ने होइ छै से तोरा अरू साबित करबहो की ने. मान लहो जे कोई बरगांही भाई, पदनी भाई, आईं,असगर, हइ, ओइह, छैल ग, बजलकै ग, चाल पारै हइ कते एहेन लोक मैथिली हइ जेकरा तोरा अरब अशुद्ध मैथिली कैहके मानकी दलाली करै जाइ छहो. लिख बोल के देखब जे बोली मे सेहो व्याकरण हइ आ मौलिक ता ओहने रहतै. लोक भाषा मैथिली के मानकीकृत बना खूब वर्गभेद हो रहलै आ शुद्ध मैथिली बहन्ने पुरूस्कारी खेल हो रहलै.

मानता मैथिली वला तराजू:- 1 लोकभाषा मैथिली के मानकी तराजू बना शुद्ध अशुद्ध मैथिली के फेर लगा खूब वर्गभेद केल गेलै. 2. बाभन कायस्थ टा के लिखब बाजब शैली के मानक रूपे मोजर देल गेलै आ मैथिली पत्रिका सब मे छापल गेलै. 3. सोलकन आ आम जन के लिखब बाजब के अशुद्ध मैथिली कहबा ओकरा मानता तराजू पर मोजर नै देलकै. 4. मैथिलीक पत्र पत्रिका सबहक संपादन शैली मानकीकृत रहलै. 5. मानकी चाबुक डरे लेलकनि सब मानता मैथिली लिख बाइज खूब डकैती कमेलै. 6. पिछलगुआ सोलकन सब अपना मूल शैली लिखब बाजब के मोजर लै कहियो मानता दलाल सबके ब्रेक नै केलकै. 7. मानकी चटकपनी क हरदम मैथिली के लोक स्वरूप के शुद्ध अशुद्ध मैथिली के फेर मे राखल गेलै. 8. समावेशी मैथिली समावेशी सहभागिता लै लोक बिरोध नै हुअ देल गेलै. 9. मानक मैथिली बहन्ने मैथिली मठाधीश सब लोकभाषा मैथिली पर कब्जा केने रहल. 10. एकसर, थीक, औ, ऐं, सरिपहुँ, फूजल, भाखा, नहू नहू आदी कते एहेन मानता शब्द छै जे लोक मैथिली स अलग आ मानकी कृत छै. 11. लोक मैथिली मे असगर, अइछ, यौ, आंई, तइओ, खूजल, भाषा, आस्ते आस्ते, ई शब्द सब लोक वेवहार के लिखब बाजब हइ जेकरा मैथिली मानक अशुद्ध कहबा दै छै. अरू संपादित कैरके मानकी मैथिली बना दै जाइ हइ क. मैथिली मानकी तराजू लोकभाषा मैथिली के सत्यानाश कर देलकै तइयो लोक सचेत नै भेलै. मैथिली भाषा बाभन टा के बनि के रह गेल छै आ ओकरे टा मानकी लाभ जेना अकादमी पुरस्कार, मैथिली विभागीय नौकरी, मंच समारोह, मिल रहलै. मैथिली मानक दलाल सब कहियो बारहो बरण के ल के न चललै आ नै ओकरा मोजर देलकै. पिछलगुआ सोलकन सब कहियो बिरोध ने केलकै आ मैथिली मानकी होहकारी सबके हं में हं मिलबैत रहलै. अइ स मानता मैथिली वला सब के जाउ खूब सुतरैत रहलै. आ मैथिली भाषा पर एकछाहा राज बना लेलकै. मैथिली मानक खचरपनी दुआरे मैथिली भाषा मे जन सहभागिता आ जन समर्थन नै हो रहलै. लेकिन निर्लज्ज मैथिल मठाधीश के लाजे कथी? मिथिला मैथिली नामे मानकी दललपनी स अपन फायदा टा होइत रहौ. मानता तराजू मे जोखाइत देखाइत मैथिली भाषा अधमरू किए न भ जाउ. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.लालदेव कामत- पुस्तक समीक्षा/ उषा किरण खाँ/ श्री चन्द्र-चकोरी जय-जय हो (सीता-राम विवाह संकीर्तन)/ हमर आदर्श स्मृति शेष सूर्य नारायण चौधरी/ पोथी समीक्षा: कोनो टुटल अछि तन्तु/ आजुक जीवन-आजुक साहित्य/ मैथिली कविता भीमभाय सँ सुनल अछि लालदेव कामत पुस्तक समीक्षा/ उषा किरण खाँ/ श्री चन्द्र-चकोरी जय-जय हो (सीता-राम विवाह संकीर्तन)/ हमर आदर्श स्मृति शेष सूर्य नारायण चौधरी/ पोथी समीक्षा: कोनो टुटल अछि तन्तु/ आजुक जीवन-आजुक साहित्य/ मैथिली कविता भीमभाय सँ सुनल अछि १ पुस्तक समीक्षा साहित्य शिरोमणी श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक जन्म मधुबनी जिलाक बेरमा नामक गाममे 1947 ई० स्व० दल्लू मंडल व स्व० मकोबती देवी घर मेँ भेल छनि। ई मैथिली जगत केर एकमात्र रविन्द्र नाथ टैगोर लिटरेचर एवार्ड सँ सम्मानित रचनाकार छथि। मात्र 2004 सँ एखन धरिक कम समयमे सबसँ बेशी पोथी लगधक सैकड़ा सँ फाजिल हिनक कृति प्रकाशित विभिन्न बिधा मेँ भेल छैक। हिनक सर्वाधिक लोकप्रिय "गामक जिनगी" लघु कथा संग्रह 2009 मेँ छपल रहैक। हिनका बारे में प्रसिद्ध साहित्यकार गजेन्द्र ठाकुर जीक कहब छनि जे मण्डल जी शिल्पी छथि, कथ्य के तेना समेटि लै छथि जे पाठक विस्मित रहि जाइए। साहित्याकाशमे एकटा चेनहासी मोटगर पड़ैत छैक , जगदीशजी सँ पूर्व आ जगदीशजी सँ एनय, एहि दू खण्डमे मैथिली पाठित होयत । हालहिने हुनक 14 कथाक संग्रह "समय सँ पहिने चेत किसान " पढ़लहुँ अछि। एहि पोथीक पहिल संकरण 2019 में पल्लवी प्रकाशन सँ बहरायल । जकर किमत 251 टाका आ पृष्ट सं 104 कार्ड वोर्ड गत्ता लागल एहि पोथीक पछिला कभर पर रचनाकारक फोटो सहित परीचय छपल छैक आ पोथीक अंशतः बानगी । ISBN प्राप्त एहि पोथीकँ पाठक निर्मली बजार (सुपौल) सँ किनि कए पढ़ि सकैत छथि आ सहेज केँ रखबाक योग्य छैक।कथाक-सत्तैरमे 7वाँ क्रम पर टाइटिल कथा ''समय सँ पहिने चेत' किसान" सजावल गेलैक। फिरंगी बी.ए.पास केने गाममे रहि अर्थ उपार्जन बाबत काश्तकारी करय चाहैत अछि, जे उद्यान मे किछु अनुभवी सँ केराक खेती बारे मे तरीका बुझय चाहैत छैक। ताहि अभिप्राय सँ ओ गामेक लाल मोहन भाय बजन्ता ओहिठाम पहुँचैत अछि। एहिमादे कथाकार लिखने छथि- "किसान परिवार मे जनम आ पालन- पोषण भेने किसानी संस्कृतियो रग-रगमे रहने किसानी वृत्तियों सँ जुड़िकए कारोबार करबाक दिशा मे मन उमर लैक।" से इशारा सँ बैसाय वक्तव्य दैत ओ अपन अनुभव सुनबय लगलैक। बैंक सँ ऋण ल'केँ केराक बगान लगोलकेँ। 2 बीघा खेत 5 सालक लेल लीजपर लेलकै आ ताहिमे बोरिंग केलकैक। दमकल किन कए सिंचाई आ सब तरदुत करैत रहलैक परंच नफा किछुटा नहिं,लोन सधबैय हेतु गामसँ पलायन केलक आ मुम्बई जा 10 बरख खटेय पड़लैक । तेँ देख बुझि लेने सँ जल जमाव वाला खेत केरा नहिं केल जाय, जाड़ा मौसम मे नाटा किस्मक केरा रहैक जे घोघे मे अटकि गेलैक। फिरंगी कहलकैक धरफरी मेँ नहिं छी,बुझि गमि केँ डेग उठायब।तेँ सार्थक भेल ई कथा जे नव खेतिहरकेँ सब तरहेँ मार्गदर्शन करैत छैक,आउरो दोसर सब खीस्सा उपरा-उपरी छैक पाठक केँ नीक लागत से पूर्ण विश्वास अछि।

२ उषा किरण खाँ साहित्याकाशमें उषा किरण खाँ सन् 2010 मेँ भामति उपन्यास पर हिनका साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटलनि।हिनक चर्चित कथा दुब धान,नीलकंठ आ मातृ भारती आदि छन्हि। कथाकार सँ ई बढैत उपन्यास दिश उन्मुख भेलीह। हिन्दीमे हिनक 'गयी झुलनी टूट', फागुन के वाद आ सृजनहार,बात भक्षा,सीमान्त कथा आदि बेशी चर्चीत भेलनि। 2015 मेँ ई "आयाम साहित्य का स्त्री स्वर " नामक संस्था बनाकय साहित्य प्रेमी स्त्रीगण केँ एकटा राष्ट्रीय स्तरके मंच दैत मनक भीतुरका साहित्य प्रतिभाके निखारयमे अहम भूमिका निभेने चलि आबि रहल छथीन। हुनका सभक नव लेखनके पोथीक प्रकाशनमे सदैत मदैत दै छथिन।नवारम्भ सँ सेहो मैथिली भाषा मेँ पोथी हिनक छपैत रहलनि अछि।अजीत आजाद जीके गाममे पछिला दिन महाअष्टमी केँ हुनक स्व० पति महोदयके जयन्ती 3 अक्टूबर केँ हटनीमे उप स्वास्थ्य केन्द्र केँ विधिवत उदघाटन रहैक।से समारोह पूर्वक गामेक वयोवृद्ध सेवा निवृत्त प्रधानाध्यापक पं० महेश झा जीक कर कमल सँ मिथिलांचल कोसी विकास समिति-हटनी केर अध्यक्ष शंभू नाथ मिश्र जीके गरिमामयी उपस्थितिमे भेल रहैन। परसूखन फेर सँ ओहि होस्पिटलक उद्घाटित करैत फुलपरास क्षेत्रक माननीया विधायक ओ परिवहन मंत्री शिला मंडलजी एतय हेल्थ एण्ड वेलनेश सेन्टरमे अपग्रेड भेलाक वाद दू सहायक नर्सक संगहि सप्ताहमे एक दिन चिकित्सक अएबाक आश द' गेलीह। जहनकि कोशी क्षेत्रीय जनता घोघरडीहा पीएचसी सँ बेल्हा २५ बेडक सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र ल ' जेबाक विरूध्द हटनी गाममे स्थापित करबाक लिखित माँग पहिने सँ रखने छथि। निवंधित पत्र सँ विभागीय अधिकारी सहित उप मुख्यमंत्री सह स्वास्थ्य मंत्रीजी केँ जनतब देल गेलैन। एहि पांतिक लेखक सन् 1992 मेँ प्रसिध्द सर्वोदयी ओ भूदानके जीवनदानी स्व0 कारी कामत जीक संग राजगीर केर सरस्वती मंडीलपर आयोजित अ0 भा0 रचनात्मक समाज क' एक प्रादेशिक कार्यक्रममे भाग लिअ गेल रहथि। ओतयके गरमकुण्डमे स्नान करैत आ पाँच पहाड़ी सँ घेरल पौराणिक राजगृहके गृध्दकूट केर रत्नागिरी पर्वत पर जापानी विहार देखल।सिलाव दोकानक खाजा मिठाई धरि हम जेत्थगरके किनने रही।पाथरक सिढिनुमा चढाय सँ अदहा वाटमे जिराईत अगूआएल किछ बूजूर्ग भेटेलाह। जाहिमे हमरा प्रखंडक राम कुमार मंडल जी सेहो देखेलाह। हमहूं सब बैसैत सबगोटे केँ दु-दूटा दामधर खाजा मिठाय अपना दिशसँ खुएलियैन।शितल जल पीबैत सबकियो आगूक चढाय नापय लगलौंह। किछु लोक दम फुलैक बात कहैत फेर बैठला। सबकेँ टानैत आगू-आगु हम बढ़ल जाय छलुँह,चढाय सं तँ बेदम होइत हमरो जांघ चढि गेल रहय।ओतय शिर्ष पर पहुंच कय निचा ताकी, तँ गाछ पशु मानव सब छोटहने बुझाए। ओहिठामक मनोरम दृश्य देखैत बनै छैक। दूगोट बड़का टा ढोल आकर्षणक' केन्द्र बनल रहल। मंडीलके दिवारमे चारूभर महात्मा गौतम बुद्ध जीके पीतैर धातुक पैघ मूर्त्ति दृष्टिगोचर भेल।अबैत घरी उतरैमे बड आसान बुझाएल।दोसर खेप बहुत सालक बाद मलेमास मेलामे राजगीर अयलौंह तँ जरासंघ अखाड़ा लग रात्रि बितेने रही।भीड़ममे सँ नीचे से ओई जापानी मंडील केँ निहारलौं। अईबेर छोटसन देखाईत ओ पसार परहक मंदिर पर जयबा ले टिकस दर पर बोकोनुमा विद्युत रोप वे चालु देख प्रशन्नता बढल।बेणुवन नामक होटल बोर्ड देख पढि सहजे उषा जीक हुनक संस्मरणक बात मोन परि गेल - " संदेश होटलक मारवाड़ी भोजनालय केर थारी आ एक किशोर-किशोरी सँ अपन हनीमूनसन रामचंद्र बाबू आ ओ अपने स्त्री-पुरूषक जागल भाव सँ जुबक-जुवति भ' उठल छलीह।" कारण मैट्रिक परीक्षार्थी रहैत बाल विवाह पिताजीक निधन उपराँत हुनक आत्मप्रिय मित्र बहादूर बाबूक पुत्र रामबाबू सँ जे इण्टरके छात्र छलखिन ,सँ भेल रहनि।आओर द्विरागमन सँ पूर्व कालेज हास्टलमे सुपरिटेडेंट प्रो० भागवती सिंह जीक अनुमति सँ शिष्टाचार भेंट करय खाँ साहेब आबि गेल रहथिन।शखी सब कहय लगलैन अहाँ दूनू गोटे चारि दिनक होरिक छुट्टीमे राजगीर क' यात्रा कय आबू। सयह ओ नव दम्पति कयनो छलैक।एखन एहि प्रसंग केँ अपना संगे स्मरण करैत जीवनक अनुभव अपन स्वयं अकानि रहल छथीन। पटना कालेजमे रामचन्द्र खाँ (स्व०आई जी साहेब) आ मगध महिला कॉलेज मेँ उषा किरण जी विज्ञान विषय पढैत रहथीन।परंच अलगे-अलगे छात्रावास रहितो अइतवार दिनके लाभ ओ लोकनि एक विजिटर रुपेँ उठबैत रहथि।जखन अष्टमे वर्गमे उषाजी रहथिन तँ दशमाक टापर प्रभाष जी एक कहानी हुनका सँ शंसोधन कराबय अयलथिन से अद्भुत हिंदी प्रतिभा हिनका छात्र जीवनमे देकर गेलैन। आ मातृभाषा सँ बेनी राजभाषामे जमलीह हन्। एहनो घटना हिनका भेल छन्हि जे जहन अविवाहित रामचंद्र खाँ जीके फोटो एक सखिक बहिना क' किताबक तहमे सहेज कय राखल देखलनि ;आओर ओ एक प्रेम पत्र धरि हुनके हाथे रामचंद्र जी केँ पठाबय चाहलकैक। मायक मारिक डरे ओ खाँ साहेब केँ नहिँ पहुँचा सकैत छलीह। सयह तँ जहन सरस्वती स्कूलमे पढबैत छलीह तँ क्लासमेट धरि चिट्ठी पहुचाबय ,प्रभाष कुमार चौधरीक पत्रवाहक बनलीह,जे रोमांटिक पत्र रहनि। पटना सँ लहेरियासराय राजपूत टोला गर्लस्कूलक पाँछाबला डेरा जब-जब आबथि आ ओतय सँ गाम कोशीबेल्ट आबयके होईक तँ घोघरडीहा रेलगाड़ी सँ अबथिन। ओहिठामक गाम सँ बैलगाड़ी बहलमान सहित बाबूजी वा कोनू बेर दोसरो समांग गाड़ीमान संगे औथिन।एकबेर एहनो भेलैक जे रजुआहीक लगमे रातिबीच समय काटै पड़लनि।गाड़ी पर खिंचरि बनेबाकधरि सब सरमजान ओरियान भेल रहनि ,से नीक जंका ईजोरियामे खगोलीय ज्ञान पं० राम नन्दन मिश्र पिताजी सँ प्राप्त केलीह। नाह आयल रहनि गाम सँ ,बाढिक समयमे नाव केर मलाही कयनिहारकेँ बबुरक गजार काँट पैरमे गड़ि गेने कठिणता भेल रहनि। गाममे रातिके प्रलंयकारी बाढ़ि उठने कोठी-भरली भीजके अर्थात् खसलैन आ टटघरमे पलंग तक पानि लुकपिछ करैत कतेको साँप केँ सहशह करैत देख डरेलीह।साशुरमे सेहो कोशीक बाढि उफान पर,धन्य मुशहरिया!भारत आजादीक पूर्व क्रांतिकारी साहित्य केर छापाखाना हिनका बाबूजी केँ रहनि आ सरोकार सहो स्वाधिनता सेनानी सब सँ रहैन। तेँ देश प्रेम विरासतमे उषा किरण खाँ जी भेटलनि अछि। फणीश्वरनाथ रेणु जीक आ मुंशी प्रेमचंद जीके साहित्य धाराकेँ गरहैन हिनकर लेखनीमे आकार पबैत रहल छैक। जन्मदिन क' शुभकामना आ बधाय दैत शुभ दीया बाती कहबैन।

३ श्री चन्द्र-चकोरी जय-जय हो (सीता-राम विवाह संकीर्तन) मिथिलांचल मेँ चोटिक मंच उदघोषक अनेकों सम्मान सँ सम्मानीत महुली,बेलौंचा(मधुबनी) निवासी आ मिथिलांचल कोसी विकास समिति-हटनीके सांस्कृतिक मंत्री श्रीमान स्वनामधन्य रामसेवक ठाकुरजी कृत ई मंचीय गायन लेल १८५पृष्टक मैथिली भाषा पोथीमे २९४ गीतक संग्रह थीक।नवारम्म मधुबनी सँ२०२१मेँ प्रकाशित एहि पोथीक दाम २००टाका भारू अछि।ई पोथी अपन श्रधेय माय-बाबूजी आ गुरूश्रेष्ट स्व०पं०कुशेश्वर ठाकुर जीक श्रीचरण-कमलमे समर्पित कयने छथि।एहि पुस्तक प्रकाशनमे विश्वभंर फाउंडेशन,राँचीके श्री नवीन कुमार झा जीके योगदान भेल छन्हि। isbn प्राप्त एहि पोथीक छपाय आर के आफसेट प्रोसेस नविन शाहदरा-दिल्ली सँ भेल छैक। सुन्दर मुद्रण आ शुद्धता सँ भरल सद्यप्रकाशित हिनक पहिल सोपान पर साहित्यकार अजीत आजाद जी'क अनुराग देखमे आयल।ओ लिखैत छथि-"मिथिला मेँ प्रचलित भक्तिगीत सभमे शैव, शक्ति आ वैष्णव तीनू कोटिक देवी-देवताक उल्लेख होइत आबि रहल अछि।ऐ मँ शिवक गीत अछि तँ कालीक गीत आ सिया-रामक गीत तँ अछिये।लोक देवता सँ ल'के' लोकमान्यतामे स्थापित जीव-जन्तु'गाछ,नदी,सुर्य आदिक चर्चा सेहो गीत सभमे खुबे भेल अछि।" एहिमे एकल आ समुह गीत एहन रचल गेल छैक जे स्त्री ,पुरूख कियो कीर्तन गावि जमबैत अपन नीक छाप छोरि सकत। संगीत विधाकेँ गीत, वन्दना, मिथिला वर्णन,सोहर,छंद,कविता, बारहमासा,समदाउन आ भजन सँ पुष्कर भरल छैक।हिनक रचनाधर्मिता'क स्वागत। गीतक पाँति द्रष्टव्य-: मंगल सुदिन महान हे$$,पाहुन छथि आयल धन्य भाग्य दियमान हे$$,आनंद हि छायल भावलता लतरय सजायल,चहुँमुख दीप बारि हम आयल भरि दुर्वादल धान हेऽऽ,से डाला साजल।मंगल ..... एहि तरहेँ दोहा रचने छथि-: पुष्पा सुभगा लक्ष्मणा,हेमा डाला साजि। छेमा गंधा सुगंधा , चन्द्रकला सखि गावि।। मंगल लग्न देखू-: आगे माइ कोन बाबा, पंडित बजाओलना। आगे कोन बाबा,दिनमा गुनाओल ना।। आगे माइ हरियर-हरियर बांस कटाओल ना। आगे माइ खरही सओं मरबा छराऔलना।। वियाहक सभ तरहक बीध पर आधारित रचल गीत सँ मैथिलीक अक्षय भंडार केँ भरयमे सेवक जी समर्थवान भेलाह अछि।धरि वरक लोकनियोक संदर्भमे गीत लिखल ....बाबाकेँ जमैया रंग रसिया छै गै सखिया। गै नैनमा मिलैत जिया धरकै छै गै सखिया ।। चाननो लिलरवा भालहि चमकै छै गै सखिया। गै झलझल कुडंल कानों झलकै छै गै सखिया।। जाहि तरहेँ कविवर चन्दा झाक तुलना वाबत महाकवि लाल दास जनक नन्दनी सीता पर बेसी प्रकाश मैथिली रामायण मेँ देने छथि,तहिना सोभाविक अछि जे वियाह स्थल मिथिला थीकैक तेँ सीता सुकमारिक चर्चा राम सँ अधिक सेवकजी कयने छथि।पोथीक नामक सार्थकता एहि पाँतिक रहस्य जानि पाठक स्वयं करैत ,आरो शेष पाँति देखबाक अभिलाषा मनमे जगेताह ,से आश जगैत य। रामसेवक जी दोसरो रचनाक पोथी मैथिली साहित्य में दैथि से कामना रहत। छवि न्यारी प्यारी मनुहारि ,शोभा नयनाभिराम हे। नयनावाली नजरि न लागय,जोड़िया सीताराम से।। चन्द्र वदनि जस चान चकोरी,मुसकि लजावथि अली किशोरी। कमल नयन संग शोभीत सीते, धन मंडल मुँह चान हे।। एहि महत्त्वपूर्ण पुस्तकक रचनामे कतौह-कतौह असंसदीय शव्दक निठाहे अर्थ"बहिया"लिखला सँ ओतय सहयोगी शव्द जोड़ै सँ भाय राम सेवक जी चुकि गेल छथि,तेँ आर के परारर्थीक पोथीक समकक्ष रहियोके ई पोथी बेसी ईजोत करै सँ वा मिथिलांचल केँ९०प्रतिशत जनसामान्य केँ बीच अपन बेढप छाप छोरयमे पछुआ गेलैक अछि।

४ हमर आदर्श स्मृति शेष सूर्य नारायण चौधरी

साहित्यकार-पत्रकार आ राजनेताक रूपमे प्रख्यात सूर्य नारायण चौधरी जीक जन्म 12 जनवरी 1933 केँ मधुबनी जिलाक मिर्जापुर (राजनगर) गाममे स्व रामलखन चौधरी के घर भेल छलन्हि।1950-54 धरि ओ सी.एम. काॅलेजक क' स्नातक छात्र रहलाह। नित्य दिन गामे सँ नोकर खाईक पहुंचबैत रहैक। हिनका बाबाके राजघराना दरभंगा सँ संपर्क रहैक आ पिताजी बाद मे घरे लगक महंत जीक खजांची रहि अपनो दू मौजेक जगह जमीन सँ खेती पैदावार कराबथि। चौधरी जीक पहिल वर्षगांठ पर बिहारक बड़का भूमकम भेलैक जाहिमे हिनक पैतृक खपरैल भीतघर ध्वस्त भ' गेलैक। चौधरी जीक बाल-विवाह मरनैया गाममे वर्त्तन संग भेलनि,जाहिसँ दू पुत्री, एक पुत्र प्राप्त भेलनि। बड़की पुत्री रुग्न वीणाक बियाह ललमनियां भेलैक जे मलहनमा (नेपाल) मेँ रहैत छैक आ पुत्र रामबाबूक उर्फ विनोद कुमार चौधरी बियाह विराटनगर मेँ खड़ौआ निवासी डा. रामजी व्यासक बहिन लक्ष्मी सँ भेलनि, छोट पुत्री निलम प्रभाक बियाह डा. अखिलेश मंडल जीक (मेहंदीगाम) संग भेलनि जे वर्तमान कटिहार मेँ रहैत छथि वो गरभाइत कैवर्त्त समाज छथिन। चौधरी जी मगध विश्वविद्यालय सँ आगूक शिक्षा प्राप्त करैत रेलवे मेंँ नौकरी करय लगलाह आ कतेको ट्रेड यूनियन आंदोलन मेँ सक्रिय रहि समाजसेवाक अभिप्राय सँ नौकरी छोड़ि देलनि।बेटा केँ रेलवे मे नौकरी धरेलथि जे पटना जं. मेँ 10 वर्षक बाद नौकरी छोड़ि समता पार्टी मेंँ सक्रिय भेलैक आ दू बेर बाबूबरही तथा मधुबनी सँ निर्दलीय चुनाव विधानसभाक लड़लैक। पुत्रवधू सेहो जिला परिषदक चुनाव मेँ कम मतक अन्तर सँ हारि गेलिह। मुख्य विषय दिश अबैत छी आब:- समाजवादी नेता सूरज नारायण सिंह जीक नेतृत्व मे संचालित अनेक भूमि आन्दोलन मेँ ओ सक्रिय रहलाह। छात्र संगठन मे सेहो समितिक समाजवादी नेतृत्व स्थापित करैत प्रभावकारी भूमिका निभावथि। सोशलिस्ट पार्टीक प्रचारात्मक एवं आन्दोलनात्मक काज मे अगूवा रहथि। बिहार आन्दोलन मे सक्रिय रहि फणीश्वरनाथ रेणुक संग मिलकए नुक्कड़ कवि सम्मेलन, नाटक आ चित्र प्रदर्शनिक आयोजन पटना मे करथि। आपातकालमे गामक खेत बेचिकए प्रेस खोललनि आ गुप्त साहित्यक प्रकाशन,तकर वितरण सेहो करैत छलाह। जिविका निर्वहन लेल किछ दिन लेल फेरसँ दानापुर मे रेलवेक नौकरी धेलैथ। सूर्य नारायण बाबू बिहारक एक पैघ मेधावी, परिश्रमी आ दूरदृष्टी रखनिहार रचनाकार रहथि। बिहारक अतिपिछड़ी ऐनेक्सर-1 केवट जाति सँ रहथि, एहि पृष्ठभूमि सँ कोनो व्यक्ति लेखनमे एतेक नम्हर मूल्यक नहि भेल रहथि। 1969 ई मे रेणुजीक सहयोगे रचना नामक साहित्यक संस्थाक स्थापना केलनि जकर ओ सचिव रहथि। 1981 मे कर्पूरी ठाकुर जीक प्रेरणासँ श्री लालू प्रसाद आ सच्चिदानंद जीक संग राजगृहमे साहित्यकार, बुद्धिजीवी आ राजनीतिज्ञ सभक एकटा मंच बनाय संपूर्ण क्रांति एवं कौमी एकता सम्मेलन केलनि। चौधरी जी भारतक सभटा राज्यक यात्रा करैत संबंधित क्षेत्रक लोक जीवनक वृहत अध्ययन केलनि। यात्रा संस्मरण "पूर्वांचल की यात्रा'' खूब लोकप्रिय हिन्दी पोथी भेलनि। ताहि सँ पूर्व समय की यात्रा-परिचय प्रकाशन हापुर सँ प्रकाशित भेल रहय जाहि पर पुस्तक समीक्षा पाटलिपुत्र टाइम्सक पृष्ठ 4 पर 12 जुलाई 1987 केँ डा. अमर कुमार सिंह छपबौने रहथि। चौधरी जी प्रमुख राजनीतिक पत्रिका 'दिनमान' मे स्थायी रूपे 5 धारावाहिक आलेख लिखने छथि,जे इंटरव्यू, यात्रावृत्तांत रूपे छपैत रहलैक। 1968 मेँ रेल हड़ताल मे जेहल गेलाह आ प्रेसविल विरोधी आंदोलन एवं मंडल आयोगक सिफारिश लागू करेबा लेल आयोजित प्रर्दशनी खातिर अपन गिरफ्तारी देलनि। 1985 मेँ मधुबनी विधानसभा सँ चुनाव लोकदल टिकट पर लड़लथि आ एहि दलक प्रांतिय कार्य समिति मे 1986मे सेहो मनोनीत कर्पूरी जी द्वारा 1989 मे भेलाह। आकाशवाणी आ दूरदर्शनक घेराव कार्यक्रम मे हुनका पुलिस बर्बर रुपे पिटने रहैक।वो बहुत वर्ष धरि काॅफी हाउसक अभिन्न हिस्सा बनल रहलाह; एहि बारे मे फेर कहियो विस्तार सँ बुझायब। 'बिहार की अस्मिता' पुस्तक शहदरा दिल्ली सँ 1991 मे साहित्य केन्द्र प्रकाशन सँ बहरायल छैक जे ओ अपन अधिकार लेल संघर्ष करय बाला तमाम बंचितके समर्पित कयने छथि। एहिक दोसरो प्रकाशक छपाई केलक ,हिनक प्रकाश्यकृति मे पूर्वांचल की यात्रा, समकालीन परिवेश की काली यादें व एकटा काव्य पुस्तिका छैक।7 मई 1990 के बिहार विधानसभा क्षेत्र सँ एमएलसी जनता दल बनेलकैन परंच 14 अप्रैल 1991 केँ अचानक दिल्लीक बत्तरा होस्पीटलमे हृदयगति सदा लेल रूकि गेलनि। हुनकर असामायिक निधन सँ दू दिन धरि पटना दिल्ली दलमलित उठि गेलै,कियाक तँ ओ सामाजिक न्याय केर लड़ाई लड़ैवाला एक समाजिक योद्धा रहथि। एक समय केर प्रतिबद्ध बौद्धिक चौधरी जीक परिवार मे अनुकंपा नहिं भेटलैक ,जखन कि ओहि समय मेँ बहुतो राजनेताक वंशज ई सुख पावैमे अगूएलैक। आई एकटा अदद स्मारक लेल हुनका चाहै बालाक बीच जबरदस्त अभाव खटकि रहलैक अछि। एहन प्रखर विद्वान मनिषि मिथिलांचलक एकटा आदर्श छलाह।

५ पोथी समीक्षा: कोनो टुटल अछि तन्तु

मैथिली भाषा केँ महत्वपूर्ण कवि श्री नारायण जी क' सद्य: प्रकाशित मैथिली साहित्य कविता क'पोथी "कोनो टुटल अछि तन्तु"केर किमत १६५टाका अछि।१२८पृष्टक एहि पोथीक प्रकाशक दीपनारायण विद्यार्थी,मधुबनी अनुप्रास प्रकाशन वर्ष २०२१मेँ बहार कयलनि अछि। दक्षिण भागक टोल घोघरडीहा निवासी नारायण जीक ई पांचम काव्य संग्रह थीक। बालपनमे हम अपन माईक मुहेँ सुनल पाँति-: पूँजीपति धनवान, मजदूर किसान भाइ, छिट्टा -कोदारि ले,चल-चल,चल...। कोशी बांध तटबंध बनैत कारक ई समवेत प्रयाण गीत बनि चुकल रहैक,से कोसी पीड़ितक श्रमदानक महत्ता आ भारत समाज सेवक संस्थाक स्व०ललित बाबूक भूमिका सहजे स्मरण भ'उठैछ।कविताक अतिरिक्त नारायण जीक कलम आनो विधा पर चलल छन्हि। अनुवाद आ कथा तथा बालकथाक अतिरिक्त स्वयं नारायण जी समीक्षक छथि। ई प्रसिध्द साहित्यकार जीबकान्त जीके मैनटर मानल जाइ छथि।पाठकके हिनक काव्यमे वर्ग संघर्ष,आम जनक उत्कर्ष आ सामाजिक विमर्श लेल खुराक भेटत, जेनाकि एहि बातक सम्पुष्टी उदय चन्द्र झा'विनोद'जी सेहो कभर पर लिख करने छथि।हिनक सिध्दहस्त लेखन एहन होईछ जे सबटा पोथी पुरस्कृत भ'जाइछ।तै सँ कोनू नव पोथीक रचनाकार केँ जरनी कियाक? उन्नैसटा क्षरण कवितामे काठक घोड़ा बढ़ चर्चित भेलनि।उनतीस टा क्षोभ कवितामे पृष्ट ४७ पर छपल शिर्षक "दराड़ि"मेँ एहि तरहक पाँति पायब-: .......भरिसक, कोनो टुटल अछि तन्तु विश्वासक देवाले कतहु पड़ल अछि दराड़ि। २०१४मेँ"धरती पर देखू"हिनक मैथिली साहित्य कविता संग्रह सेहो निकैल चुकल छैन्हि, जे एकटा काव्य केर पाँति केँ पोथीक नाम देने छथि।सयह निरुपण करैत एहू पोथीक शुभ संज्ञा कविताक शिर्षक पर नहिँ,अपितु पाँतिक नाम सँ किताब लिख मातृभाषा मैथिलीक अक्षय भंडार केँ भरयमे लागल होथि।ई नव प्रयोग करैत छथिजे अध्येता आ शोधार्थी गणके अन्वेषण करैक लेल एकटा विषय उपस्थापित कयलनि अछि।प्रस्तुत पोथीमे अठारह टा उद्गम स्तर केँ कविताक संग-संग पाँचटा कविता'प्रवाह' छैक जलविशेष विषयक।यथा-:पाँची,तिलयुगा,बागमति,स्त्रिगण -जे शिवपूजन लेल जाइत छथि आओर कोसी-कथा।हिनक कावयधाराक पाँति देखल जाउ-: हम कोसी छी प्रार्थित नहिं एकटा शापित नदी छी, प्रतिशोधमे जिबैत आक्रोशमे बहैत। एहि पोथिक आवरण राजेन्द्र नेगी आ वितरक फरीदाबाद-पोथी अहाँ दुआरि धरि थिकाह।हम ऐ पोथीमे ग्रामीण जीवन पोलहुँ,एकरा सजीवताक संग रचनाकार जनशुलभ कयलैथ।जखन-तखन दरिभंगाक टीमक समक्ष कवि नारायण जी सँ भेंटवार्ता पर हमरो प्रश्नक गम्भीर उत्तर दैत ई पोथी पढबाक लेल देने रहथि। सम्पूर्ण पढलाक वादे पाठकीय प्रतिक्रिया व्यक्त करैत छी।अन्यथा पोथीक संग न्याय नहिं होयतैक।तेँ क्रमश:केँवाद हम शेषांश धरि लिखलौह ,जे फेर शोशल साइट पर अपने सब पढब।कवि महोदय श्रधान्वित भ'स्व०अपन पिताजी केँ ई पोथी अर्पित समर्पण कयलनि अछि।आश करैत छी आब दोसर पोथी काव्य रसास्वादन(पाठक) लेल यथाशिघ्र निकालताह। अशेष बधायके पात्र छथि नारायण जी।

६ आजुक जीवन-आजुक साहित्य वरेण्य साहित्यकार श्री नन्दविलास राय कृत"पईत" एकांकी संचयन मैथिली भाषा क' पोथीक हालहिमे मधुरा गाममे "सगर राति दीप जरय'कथा गोष्ठीमे लोकार्पण भेल रहय। प्रसिद्ध पल्लवि प्रकाशन-निरमली बेरमा सँ ९४पृष्टक एहि सामाजिक लघु नाटिका केँ प्रकाशित कयल गेल अछि,जकर १५० टाका किमत राखल गेल छैक।एहि चर्चित पोथीके ISBN प्राप्त भेल छैक।पोथीक मादें लेखक श्री रायजी बढैत दहेज प्रथा केर समस्या पर पाठकके ध्यान आकृष्ट करैत कण्या भ्रुणहत्या पर चिंता व्यक्त कयलाह अछि। अनेकों विधामे हिनक लेखनिक हम कायल छी,ग्राहक पोथी समीक्षा पढि बजार सँ किनैत छथि से एहू पोथीके खूब बिकेबाक आश जगैत अछि।छुहक्का उड़ैत एहि पैथीमे दूगोट एकांकी"पइत"आ लाजवाब संग्रहित छैक।क्रम०८सँ३६धरिमे पोथीक नामकरण क'शिर्षक"पइत" आ पृष्ट सं० ३८सँ ९४मेँ "लाजवाब"पाठ छपल छैक।एहिमे पात्र २२टा रखला सँ कनेक दुरूह सन लागैत छैक।पइत मेँ १३केर जगह मात्र छ:टा दृश्य देल गेला सँ हलुकसन बुझाइछ।तैयो पाठक एक सुर सँ सद्यप्रकाशित एकांकी केँ पढि सकैछ; कियाक तँ मनलग्गू छैक। ग्रामीण क्षेत्रमे एहि एकांकी के़ँ नुक्कड़ नाटक रुपेँ सेहो देखेबाक काज भविष्यमे भारत सरकार , युवा कार्यक्रम एवं संस्कृति मंत्रालय आ दृश्य निदेशालय करथि ते़ँ जन जागरूता बढ़तैक । 'पईत 'केर आखरी दृश्यक अंतिम वाक्य एहि तरहेँ छैक....हमर सभ केलहा-धेलहा पानिमे चलि जाएत। मोहन बाबू:(लाल बाबू सँ आवेशमे)अहाँ चुप रहूं।अहाँक पैत हम राखब।(मोहन बाबू शोभाकान्तक पैर पर सँ पगरी उठा लालबाबुक माथ पर रखैत छथि।)प्रकाश अछिने,हमर बेटा प्रकाश ।ओकर बियाह अहाँक बेटी सँ अखन हएत -अखन।थोपरी दर्शक दिश सँ बजैत पर्दा खसैत छैक,तकर समीक्षा पाठकके बीच पछिला मास हम कयने रही,जे देसील वयनामे मुलरुप सँ पइत बहराइल रहय।तेँ आब लाजबाव पर सोझे संक्षिप्त मेँ आबय चाहैत छी। अतिपिछड़ल वर्गक विवेक कुमार २७वर्षीय जुबक गरीबीमे रहैत मेधावी छथि जे आई ए एस बनि पहिल बेर रामनगरक अनुमंडलीय पदाधिकारी रहैत मामा मुरारी लाल संग हुनकर समैध रिलाइंस केर इंजिनियर मैलाम गामवाशी सँ हुनकबेटी जे एम ए०,जे एन यू सँ छन्हि,जिनक वियाहक चर्चा टारैत अछि।फेर एकटा विरौलक अनुमंडल पदाधिकारी अंजली कुमारी सँ सेहो वियाहक चर्च केँ अनठबैत छैक।आ फेरो प्रस्ताव रामपुर केर कलक्टर बनिते अबैछ ,एहिक ले विवेकजी अपना विवेक सँ काज लैत देखेलाह अछि।भेलैक ओना जे ५०लाख टाका नगद दिल्ली मेँ फ्लैट आ चारि चकिया मोटरगाड़ीक आफर ल'केँ पी ए० साहेब वार्ता करैत छथि जे अपने अवश्य वियाह कयल जाय,कन्यागत खूद सवर्ण गृहमंत्री छथि,से जौं बात नहिँ मानबै तँ नक्शली इलाकामे तबादला कर देल जायत।धमकी सँ विवेक सर केर मन विचलित नहिँ होई छथि।ललीत दुल्हा अपन काका अच्छेलाल जीके मध्यस्थामे अनुचारी दीनाक दिव्यांग बहीण जे, बीए०मेँ अंजली पढल छैक ;केर संग वियाहक घरदुआरी लगलापर बराती आ सरातीक बीच बरमालाकाल हरमाज करैत विनु कारण फसाद करैत छैक।विवेक जीके समझेला पर हुनके खुद लंगरी कन्या करय कहैत छन्हि। मनुष्यता समाप्त होइत देख ओ दुखी भेल ,दीनाके ठोस आश्वासन देलैन आ अही मंच पर स्वयं डीएम साहेब तिरस्कार भेल परीवारक पइत राखि मय टुअर-बप टुअर दिव्यांग कनियां अंगिकार करै छथि।कलान्तरमे एक बेटीक जन्मक पछाति अपन नशबंदी धरि कराय ,एक आदर्श समाज बीच उपस्थित करयमेँ पत्रकारक बीच लाजबाव मिशाल पेश करैत छथि। आरंभ मेँ मीडिया कर्मिगण केँ अपन आचरण संभाषण अनुकूल समय पर देखबाक संकेत केने रहथि,कन्या भ्रूणहत्या पर विस्तार सँ बाजल रहथिन।अपन बहिणक बिनु वियाहले आत्महत्या आ सदमा सँ माय'क निधन व बादमे बाबूजीक कहब ,जे गरीबक बेटीक उध्दार निशतुकी करीहह,सेज्ञनिकटी पर खड़ा उतरैत एहि एकांकी नाटक मेँ दृश्य भव्यताक संग प्रर्दशित करयमे लेखक दक्षता प्राप्त केलाह अछि।समाज आ सरकारमे लालची लोकक पोल फोलैत ई एकांकी संग्रह एक नव संदेश प्रसारित करबामे मैथिली भाषा साहित्य केर अक्षय भंडार केँ भरयमे एक डेग आरो आगू बढल।अनेकों एकांकी संग्रह रहैत एहि एकांकी केँ पठनीयता सब सँ भिन्न बुझाइत अछि।सजीबता पाठकके अंगेजने रहैत छैक, आखरी-आखरी धरि,इयह परिस्थिति क'विशेषता थीक।

७ मैथिली कविता भीमभाय सँ सुनल अछि

जखन तखन-लक्ष्मीसागर, दरिभंगा (मिथिला)सँ भीमनाथ झा कृत वीणा "कविता संग्रह "१९७१ केर द्वितीय संस्करण (२००६) हाथमे अछि।एहि मैथिली साहित्यक ७६ पृष्ठक पोथीक मूल्य ४० टाका छैक,जे प्रकाशक टावर स्थित प्रिंटवेल सँ मुद्रण करौलनि अछि।पोथिक शुभ संज्ञा अपन बाबी स्मृतिशेष वीणा जीक नामे राखि समर्पण काव्यधारामे कयने छथि।लेखकीय जगतमे प्राय: सभतुरक सबकेओ स्वनामधन्य श्री भीमनाथ झा जी केँ आह्लाद सँ भीमभाय कहैत छन्हि।से हमहूँ वयोवृद्ध श्री झाजीक कतेको मँच पर सम्बोधन आ वक्तव्य क'अतिरिक्त मातृभाषा मेँ स्वरचित कविता धरि सुनने छी।ओना तँ हिनक पहिल कविता संग्रह १९६८मेँ त्रिधारा ,१९७२मेँ धुरी ,१९७७मेँ की फुरैए की ने,१९९७मेँ नाम तँ थिक वैह आ १९९९मेँ बहरायल छन्हि भावांजलि।आनो विधामे एकशोरे सँ बेशिये पोथी प्रकाशित भेल छन्हि।परंच से हमरा पढल नँय य।हालहिमे हम वीणा केँ मनोयोग पूर्वक पढलौंह अछि। पाठकके ई पोथी रुचिगर लागतनि,से हम गच्छै छी। सद्यप्रकाशित" वीणा" पहिल झंकारमे कुल १२,दोसर झंकार मेँ सेहो एक दर्जन आओर तेसर झंकारमे मात्र तीन पाठ लागल भेटत।जुड़शीतल ६२पृष्ट पढैत काल ग्राम्य जीवन मेँ विशेष शिकार खेलब आ थाल-कादो आजुक परिवेशमे ठिके स्मृति शेष बुझाइछ।ई बंबई आम शिर्षक कवितामे ओ बाबा क' रोपल आ घैल सँ पटाओल गाछक फरकेर गुणके सर्वाधिक चर्चा कयलनि। जौं शालधरि अपनो दूनू उखराहा पानि उघि-उघि पटबैत जौं मरिखैपि जेताह तँ कोनू हानि नहिँ,कारण अगिला पिढिक लेल कलम लगेबाक जे प्रशन्नता होई छन्हि,से अभिव्यक्ति धरि करने छथि। डोमनि जे आमक आंठी ल'जाइय,ताहिके सुअरके आगू ओगारैत छैक।किछु नीक आंठी अपनो खाय ले इनिराआवासक छत पर सुखबैत य।पकुआ कोइली तँ अल्सर- कैसरक पहिल अवस्थाक उपचारोमे सुजोग देखल जाइछ।ललीचगर पीपही जे जनमलैक से कोनू उकठिया लोक साफ कयल गेल जगहमे जुमाकय फेंकने होयत।वा भुखंडमे तर दवि गेल हेतैक जे पेंपी छोड़लकै।जन्म तँ प्रजन्नक प्राकृतिक नियम थीक।पाँति द्रष्टव अछि-: एहि बेर पेपच पड़ि गेल रहै आम। डिक्क लागि गेल रहै आँठी बाड़ीमे रंग- विरंगक, सुपरिया सँ सजमनियाँ धरिक। आब की होइतै ओ आँठी? बाड़ीकेँ भरने छलै अनेरे, आबिकय ल' गेल रहै गामेक डोमनियाँ, एक्को टा नै छुटलै भरिसक , निहारि-निहारिकय समेट लेलकै। ओकर तँ ईहो आहार थिकै ने!..... .एहि कवितामे डोम परिवारके मेहतनामा नहिँ भेटैत छैक,से एक तरहक शोषण दिश कवि महोदय परोक्षरुपेँ संकेत कयलन्हि अछि। शहर आ सब गामक हिन्नू निवासी सत नारायण भगवान केर पूजा परोहीत राखि उपास कय आयोजन करैत छथि।प्रस्तुत पाँतिमे सेहो व्यंग करैत कवि महोदय अपन रचनाक माध्यम सँ समाज सुधारक बाट सुगम करय लेल व्योंत धरेलनि अछि,यथा-: आइ भ' रहल अछि सत्यनारायण क' पूजा फल्लाँ बाबूक ओहि ठाम, काल्हिए सात लाखक सरकारी कंट्रैक्ट भेटलनि अछि ताही उपलक्षमे। हकार भेल छनि गोट छsबेक ओभरसीयरके , इलाकाक बीडीओ० ,एस डी ओ केँ एसिस्टेन्ट-एग्जिक्यूटिव - सुपरिटेंडिंग आ चीफ इंजीनियर केँ, डिपार्टमेंटल हायर अफसर लोकनिकेँ,आदि-आदि..,,. मंत्रमे सेंट स्नानीयम,स्वर्ण माल्यानि सपत्निक मंत्रीप्रवराय नमः:!इदं व्हिस्की पेयम् आ ओम् नानाविध अमलेट-कटलेटादि सँ आगूक आरो शव्द आ संस्कृतक वाक्य सुनि-सुनि तँ चनौरागंजक कार्यक्रम मेँ हँसी सँ पेटमे बगहा लागल रहय।पाठक केँ समुचा कविता पढैत काल पंडित जी स्वयं नेताजी आ यजमान ठीकेदार जीक प्रसंग व्यवस्था पर करगर चोट करैत कविजीक लेखनी निठाहे देखाएत।प्रथारूपे सतनारायण पूजामे शाकाहारी रहि नियम निष्ठा आ व्रत उपास केर विपरीत रीत अपना एहिठाम सामर्थ्यवान लोक चलाबथि तँ कोनू हर्ज नहिँ।पैघाउत लोकक झांपल बात केँ एहि कटाक्ष सँ जगजियार करबामे कवि भीमबाबू समर्थ भेलाह अछि। तुलसीदास जीके एकटा पाँति चरितार्थ होईछ:- सामरथ के दोष नाहिँ गोसाईं।।क्रिमिलेयर केँ सब छजन्ता छैक। सामाजिक जीवन मेँ अदौ सँ मजगुति करय ल' सिध्द पाँतिक आगू आलोचना कयनाइ रामायण के"पाँतिक अपमान मानल जाइछ।भीमभाय शतायु हौथु,हमरा सबकेँ एहिना चिक्कन-चिक्कन कविता सुनाबथि आ माय मैथिलीक अक्षय भंडार केँ भरयमे लागल रहैथ।कोनू नव पोथी फेर बाहर करथि से आश जगैत य। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.रबीन्द्र नारायण मिश्र- ठेहा परक मौलाएल गाछ (धारावाहिक) रबीन्द्र नारायण मिश्र ठेहा परक मौलाएल गाछ (धारावाहिक) 31 शालिनीकेँ फोन अबिते रहल। ओकरा हमरसभक परेसानी देखि रहल नहि गेलैक। आखिर ओ हबाइ जहाजक टिकट लेलक आ भोरे दिल्ली प्रस्थान कए गेल। हमसभ उठि-सुठि ओसारापर बैसल रही कि एकटा टैक्सीकेँ अपन फ्लैट दिस अबैत देखलिऐक? हमरा भेल जे एहिमे शालिनी भए सकैत अछि। हमरसभक अनुमान सही छल। हमर फ्लैटक सामने शालिनी कारसँ उतरैत अछि। ओकरा संगे ओकर बेटी नम्रता सेहो छैक । देखबामे अनमन अपन माए सन अछि। नम्रताकेँ शालिनीक संगे अपन फ्लैटमे देखि हम दुनू बेकती बहुत प्रसन्न भेलहुँ। चलू एहि संकटक समयमे कम सँ कम केओ तँ हमरा संगे अछि। शालिनी रमा लग बैसि जाइत अछि। हम नम्रताक संगे गप्प-सप्प कए रहल छी। ओकरासँ गप्प करैत लागल जेना सभटा दुख हरा गेल। शालिनी संग नम्रताकेँ देखि ओकर जन्मक वृतान्त मोन पड़ि गेल । नम्रताक जन्म दिल्लीएमे भेल रहैक । दिल्लीक प्रसिद्ध अस्पताल,लेडी हार्डिंग मेडिकल कालेजमे शालिनीकेँ एकमास रहए पड़ल रहैक। डाक्टरसभक कहब रहैक जे बच्चाक स्थिति चिंताजनक अछि । शालिनीक रक्तचाप बेसी रहैत छलैक। डाक्टरक परामर्शक अनुसार ओकरा  निजी वार्डमे मास दिन राखल गेल रहए। हमसभ दिन-राति ओहिमे लागल रही। कैकटा डाक्टरसभ परिचित निकलि गेलाह। ओसभ बहुत मदति केलखिन। एकमासक बाद शल्यचिकित्सा द्वारा नम्रताक जन्म भेल रहैक । बच्चा बहुत रोगियाह छल। ओकर वजन कम छलैक। जन्मितहि पिलिया बिमारी भए गेलैक । दसदिन ओकरा अस्पतालेमे विशेष परिवेशमे राखल गेलैक। तकरबादे ओकरासभकेँ अस्पतालसँ मुक्ति संभव भेलैक। अस्पताल सँ छुटलाक एकमास धरि ओकर इलाज चलैत रहल। क्रमशः बच्चा स्वस्थ होइत गेल। हमदुनू बेकती दिनराति एक कए देने रही। तरह-तरहक देशी-विदेशी इलाज करैत रहलहुँ । पूजा-पाठ तँ होइते रहल। बाबाबैद्यनाथ धामक कबुला सेहो केलहुँ । एहि तरहेँ शालिनी आ नम्रता,दुनूक जान बाँचल । नम्रताक जन्मक बाद हमरसभक जीवन एकबेर फेर हरिआ गेल रहए । हमसभ कखनहु शालिनीक संगे, कखनहुँ ओकर  टेल्हक संगे, आनन्दपूर्वक समय बितबैत रही। अपने गौशाला जा कए शुद्ध गायक दूधक ओरिआन करी, टेल्हकहेतु बकड़ीक दूधक उठौना केने रही, भोजन-पथ्यक हेतु जे किछु जरूरी छल सभकिछु  कएल गेल रहए। हमरा अखनहु मोन पड़ैत अछि जे छठिहारक दिन कतेक धूमधामसँ उत्सव कएल गेल छल । हमसभ बहुत नीक आयोजन केने रही। तकरबाद बच्चाक नामकरणक हेतु रमाकेँ भार देल गेलनि। ओ एकहि बेरमे बच्चाक नाम कहलखिन-"नम्रता"। सभकेँ ई नाम बहुत पसिंद पड़ल रहनि। एहि तरहँ समय बितैत रहल। नम्रताक जन्मक मास दिनक बाद ओकर पिता विदेशसँ लौटि सोझे दिल्ली हमरा लोकनिक ओहिठाम आएल रहथि। शालिनीक प्रसन्नता देखैत बनैत छल। रमा रहि-रहि कए भनसा घर जैतथि आ तरह-तरहक जलखै,भोजनक प्रबंध करितथि । हमहूँ खने घरमे ,खने बाहर अबैत-जाइत रही ।  कखनो किछु अनबाक अछि तँ कखनहु किछु। हमरा तँ काज करैत गजबकेँ फुरती लगैत रहए । कखन भोर होअए आ कखन साँझ से नहि बुझाए । नम्रताक पिताक आगमनक बाद एकबेर फेर छठिहारोसँ पैघ उत्सव मनाओल गेल छल । सभकेँ किछु-ने-किछु उपहार अबस्स देल गेल छल। दिल्लीक नामी होटलमे पार्टीक आयोजन कएल गेल छल । एतेक तरहक आयोजन भेल,उत्सव भेल,लोकसभ आएल गेल मुदा ने मुरली आएल ने श्याम । ओ सभ किछु-ने-किछु बहन्ना बना गेल। हमरा लागल जेना ओकरासभकेँ एहिसभसँ कोनो प्रसन्नता नहि भेलैक। ओसभ अपन-अपन दुनिआमे मस्त छल। "सभ ततेक व्यस्त भए गेल रही जे एहि बातसभकेँ सोचबाक कोनो मौके नहि भेटल। जे सामने अछि पहिने तकर ध्यान कएल जेबाक चाही।" -रमा बेर-बेर इएह बात कहितथि। नम्रताक पिता माने हमर जमाए शालिनी आ नम्रताकेँ अपना संगे मुम्बई लए जाए चाहैत रहथि । एहि बातसँ रमा बहुत दुखी भए गेलथि। नीक तँ हमरो नहि लागल। "कोनो बात नहि अखन किछुदिन शालिनी एतहि रहि जेतीह। मुदा हमरा तँ जाए पड़त। बहुत रास काजसभ जमा भए गेलैक अछि।" हमसभ एहि बातसँ बहुत प्रसन्न भेल रही। आखिर जमाए असगरे वापस भए गेलाह । शालिनी आ नम्रता हमरेसभक संगे छओ मासधरि रहि गेल रहए। ओ समय हमरासभक जीवनक सुन्दरतम क्षण छल। मुदा सभ कथाक अन्त होइत अछि। सएह एतहु भेल । आखिर ओ असगर कतेक दिन मुम्बईमे रहितथि। शालिनीक मातृत्व अवकाश सेहो समाप्त भए रहल छलैक। नम्रता सेहो आब होसगरि भए गेल छलि । किछु दिनक बाद  जमाए बाबूक फोन आएल। एहिबेर हमसभ हुनका मना नहि कए सकलिअनि। अगिला सप्ताह ओ निर्धारित कार्यक्रमक अनुसार अएलथि। दोसरदिन हबाइ जहाजसँ हुनकर वापसी टिकट रहनि। नम्रता,शालिनी आ जमाए बाबू जाहि दिन चलि गेल रहथि तहिआ हमसभ दिन भरि किछु खा नहि सकल रही। भूखे नहि लागए । रमा तँ ओछाओनपर पड़लीह से साँझ कए देलीह। "एना केना काज चलत। बेटी छैक शालिनी । ओकरा तँ अपन घर जेबेक छलैक। जतबे दिन रहि गेल सएह बहुत भेल ।" "बात तँ सही छैक। मुदा मोहवश मोन से मानबाक हेतु तैयार नहि होइत अछि ।" "चलू दुनूगोटे हनुमान मंदिर चलैत छी।" साँझमे हमसभ हनुमान मंदिर कनाट प्लेस पहुँचलहुँ । हनुमानजीक दर्शन केलहुँ । तकर बाद ओतहि बिकानेरबालामे भोजन केलहुँ  । रमाक मोन कनी आश्वस्त लागि रहल छलनि। हमसभ आठ बजे धरि वापस अपन फ्लैटपर आबि गेलहुँ । तकरबाद नम्रता कैक बेर शालिनीक संगे अबैत-जाइत रहलि। जाधरि ओ हमरासभक संगे रहितए हमसभ बहुत प्रसन्न रहितहुँ । जखनहि ओ सभ चलि जाइत,हमसभ दुखी भए जइतहु। जेना-जेना नम्रता पैघ होइत गेल,ओकरा सेहो हमरासभक संगे भावात्मक लगाओ बढ़ैत रहलैक । 32 नम्रताक इसकूल रहैक मुम्बईमे,माता-पिता रहैक  मुम्बईमे,संगी-साथी सेहो रहैक  मुम्बईमे । खाली हमसभ रही दिल्लीमे। स्वाभाविक छल जे ओ मुम्बई दिस बेसी आकर्षित छलि। मुदा जखन कखनहु हमरासभ लग रहैत सभकिछु बिसरि हमरेसभक भए जाइत । ततेक सुखी रहैत,हमरासभकेँ ततेक आनन्दित करैत जकर वर्णन नहि कएल जा सकैत अछि। भोरेसँ हमसभ नम्रता,नम्रता शुरु करितहुँ आ दिनभरि ओतबे रटैत रहि जइतहुँ । अफसोच होअए जे राति किएक बनलैक,अनेरे हमसभ सुति रहल छी । भने नम्रता संगे लागल रहैत छी। नम्रताक बएस बढ़ैत गेलैक। ओकर इसकूलमे किलास बढ़ैत गेलैक। ओ आब मैट्रिकक परीक्षा देत। ई परीक्षा बहुत महत्वपूर्ण छैक। सालक शुरुएमे  ओकर माता-पिता ट्युशन लगा देलकैक । ओ मुम्बईमे दिन-राति पढ़ाइमे व्यस्त भए गेलि। आब ओकरा हमरासभकेँ फोनो करबाक समय नहि रहैक। हमसभ बाट तकिते रहि जाइ। मुदा कोनो  समाधान नहि छल । लोकसभक माध्यमसँ ओकरसभक समाचार बुझाइत। शालिनी सेहो संपर्क कम कए देने रहए । प्रायः ओसभ नम्रताक पढ़ाइ हेतु बेसी चिंतित भए गेल रहए । नम्रताक मैट्रिकक परीक्षाफल बहराएल। इंटरनेटपर परीक्षाफल देखल गेल। सभसँ पहिने ई समाचार भेटलैक शालिनीकेँ । नम्रताक संगी फोन कए सूचित केने रहैक । नम्रता बोर्डक परीक्षामे प्रथम स्थान प्राप्त केलक अछि । आब तँ परिवारमे सभ प्रसन्नतासँ नाचि रहल छल । नम्रता तेजगरि छलि। मुदा एतेक नीक करत से तँ केओ नहि सोचने रहए होएत। हमरा सेहो शालिनी फोन कए ई सूचना देलक। संयोगसँ रमा सेहो हमरे लग छलीह। दुनूगोटेकेँ लागल जेना की भेटि गेल अछि कि नहि?एकक्षणक हेतु हमरसभक सभटा दुख बिला गेल। हमसभ जेना राजा भए गेलहुँ । लागल जेना हमरसभक अभिलाषा भगवान पूर्ण कए देलनि। परीक्षाफल आबि गेलाक बाद आब ओकर नाम लिखाओल जाएत। मुम्बईक नामी कालेजमे ओकर नाम आइकममे लिखाओल गेल। ओना ओकर माता-पिताक इच्छा रहैक जे ओ विज्ञान पढ़ए,मुदा ओ स्वयं वाणिज्य राखए चाहैत छलि। आगू एमबीए करति । सएह ओकर योजना रहैक। सभ ओकर समर्थन केलक । आब तँ ओकर पढ़ाइ आर गंभीर भए गेल रहैक। एको क्षण फुरसति नहि भेटैक। हमसभ ओहिना एसगरमे समय बिताबी। रमाक स्वास्थ्य एहिसभसँ आर तेजीसँ खराप भए गेलनि। एतेकदिनक बाद एकबेर फेर नम्रता अपन माएक संगे दिल्ली हमरसभक डेरापर आएलि अछि। ओ आब आइकम पास कए चुकल अछि। आइकममे सेहो ओ बहुत नीक परिणाम अनलक । आगूक पढ़ाइ हेतु नामांकन भए गेल छैक। एकमासक बाद किलास शुरु हेतैक। एही बीच ओ शालिनीक संगे हमरासभक हाल-चाल लेबए आबि गेल अछि। निश्चय ई बहुत नीक समाचार अछि। शालिनी आ नम्रताक एकठाम अपना घरमे देखि कए हमरसभक दुख बिला गेल । शालिनी माएक सेवामे लागि गेलि। नम्रता हमरा संगे गप्प करए लागलि से उठबे नहि करए । अमेरिकाक हमरसभक प्रवासक प्रतिए ओकर जिज्ञासाक अंते नहि रहैक। तरह-तरहक प्रश्न करैत रहलि । मुदा सभ बात तँ ओकरा कहल नहि जा सकैत छल। जे कहि सकैत छलहुँ,जाहिसँ ओकर ज्ञान बढ़ितैक,से सभ कहलिऐक । 33 साइबर अपराधी द्वारा हमर बैंक खातासँ टाका उड़ा लेबाक समाचार शालिनीकेँ भेटलैक। ओ तँ तकर बाद फोन पर फोन करैत रहि गेलि। ओकरा सभ बात रमा कहलखिन। ओहीक्रममे ईहो पता लागि गेलैक जे एहि कांडमे मुरलीक नाम सेहो आबि रहल अछि। एहि बातसँ ओ बहुत आश्चर्यचकित रहए ,दुखी रहए । मुदा कइए की सकैत छलि? एमहर हमरालोकनि बहुत सोच-विचारमे पड़ि गेल रही। बुझेबे नहि करए जे की कएल जाए? मामिलामे मुरलीक नाम आबि जेतैक से सोचलो नहि जा सकैत छल। मुरली अछि लंदनमे ,घटना भए रहल अछि दिल्लीमे आ टाका पहुँचि गेल कतहु तेसर ठाम। एक हिसाबे सौंसे दुनिआँ एहि कांडमे सामिल छल। ई भेल विज्ञानक दुरुपयोग । जहिना विज्ञानक सहायतासँ सौंसे पृथ्वी एक आङन भए गेल अछि,तहिना ओकर दोसरो पक्ष अछि जे कम स्याह नहि अछि। आधुनिक तकनीकीसँ अपराधक सेहो वैश्वीकरण भए गेल अछि। शालिनी फोन उठओलक आ मुरलीक घंटी बजा देलक। मुरली फोने नहि उठाबए। मुदा शालिनी प्रयास करैत रहलि। आखिर ओ फोन उठओलक- "बाहर निकलि गेल रही। लौटलापर तोहर कैकटाटा मिसकाल देखलिअह।" "हँ, हँ हम भोरेसँ फोन करैत रही।" "की बात?" "से तोरा नहि बूझल छह?" "नहि, नहि । हमरा किछु नहि बूझल अछि। साफ कहह जे बात की छैक?" "हद भए गेल। बाबूक बैंकक खातासँ तूँ टाका उड़ा ललेहुन आ कहैत छह जे की बात?" "एना नहि बाजह? असल बात छैक जे हमर संगिनीसँ गलती भए गेलैक। हमरा फोनसँ हुनकरसभक फोन संख्या ओ देखि लेने छलि।" "जकर ककरो गलती होइक, मुदा ई अक्षम्य थिक। तोरा एकर फल भोगहि पड़तह।" "बेसी फदका नहि पढ़ह। ओ टाका हमरो अछि। हमरो ओहिमे हिस्सा अछिए। तखन यदि गलतीसँ निकलिए गेलैक तँ एहन कोन बात भए गेलैक।" "ओ टाका ओ सभ अपन नौकरीमे अर्जित केने छथि आ जाबे जीबैत छथि हुनकर सभक छनि।" "से तोरा कहलासँ हेतैक। हुनका एतेक संपत्ति रखबाक काजे की छनि?"-एतेक बाजि कए फोन राखि देलक । शालिनी तामसे आगि छलि। फोनपर चिकरा-भोकरी सुनि हमहूँ ओतए पहुँचलहुँ । नम्रता आ रमा कोनो काजसँ बाहर चलि गेल रहए। हम पुछलिऐक- "के हल्ला करैत छल?" "आर के रहत? "माने?" "मुरली भाइ छल।" "की कहैत छलह?" "की कहू? ओकर तँ जेना माथे गड़बड़ा गेल छैक।" "जेहने संगति रहतैक तेहने बुद्धि हेतैक ने।" "तूँ बेसी परेसान नहि रहह। जे जेहन अछि से भोगत। आब केओ बच्चा नहि अछि जे हमसभ ओकरा लेल सोचैत रही, परेसान रही।" शालिनी की बजितए? चुप रहि गेलि। प्रात भेने शालिनी फेर मुरलीकेँ फोन केलक आ ओकरा चेतओलकैक। ईहो कहलकैक जे मामिलाक जाँच साइबर अपराध शाखा कए रहल छैक। "जे चाहए जाँच करए। हम एहिमे की कए सकैत छी?" "मुदा तोहर फोटो आ नाम पुलिस लग कोना गेल?" "आइ-काल्हि ई सभ कोनो बात छैक। जखन कहू, जकर कहू ओकर फोटो, फोन संख्या सभकिछु अहाँकेँ मिनटोमे भेटि जाएत।" "मुदा तोरा एहि घटनाक बारेमे जानकारी छलह कि नहि?" "हम तोरा कतबो किछु कहबौ, मुदा विश्वास नहि हेतौक? कारण तोरा माथामे पहिनेसँ पुलिस अपन बात भरि देने छौक। तथापि हम अपना स्तरसँ पता लगबैत छी आ प्रयास करैत छी जाहिसँ हुनकर दस लाख टाका वापस भए जानि।" तकर बाद मुरली अपन संगिनीसँ गप्प करैत अछि - "ओ! तँ ई अहाँक पिताक मोबाइल फोन संख्या रहनि।" "आर की?" "अहाँकेँ आगू बढ़बासँ पहिने हमरासँ पुछबाक चाहैक छल।" "आब की कएल जाए से कहू?" हुनकर दस लाख टका वापस कए दिअनु।" "बेस कए दैत छिअनि। मुदा तैओ यदि पुलिस पाछू पड़ले रहि गेल, तखन?" "तखन देखल जेतैक? हमसभ कोनो दिल्लीमे तँ छी नहि जे जखन चाहत पुलिस हाजतिमे बंद कए देत। हमरासभ लग पहुँचबामे पुलिसकेँ बहुत प्रयास करए पड़तैक।" तकर बाद की भेल कि नहि दस लाख टाका हमर बैंक खातामे वापस आबि गेल। हमरा ई जनतब एसएमएससँ भेटल। हम ओ एसएमएस रमाकेँ देखबैत छिअनि। हुनका जान मे जान अबैत छनि । तुरंत उठि कए शालिनी लग पहुँचि जाइत छथि। शालिनी ओ एसएमएस देखैत अछि आ दौड़ि कए हमरा लग पहुँचि जाइत अछि। एहि तरहेँ परिवारमे बहुत दिनक बाद खुसीक माहौल अछि। हमर बेटी आ नातिन  सेहो ओहिमे सामिल अछि। हमर दुनू पुत्र ओहिमे उपस्थित नहि अछि तथापि हमसभ बहुत आनन्दमे छी। अपन हराएल धन वापस आबि गेल, सेहो एतेक जल्दी । ई तँ ईश्वरेक कृपा अछि। हमसभगोटे कनाटप्लेसक हनुमान मंदिर जाइत छी। हनुमानजीक दर्शन करैत छी। सबा किलो लड्डू हुनका चढ़बैत छी। तकर बादसभगोटे वापस अपन घरपर आबि जाइत छी। हमरासभकेँ घर वापस अएबासँ पहिनेसँ पुलिस ओहिठाम ठाढ़ छल। ओ सभ हमरासभकेँ  एतेक प्रसन्न देखि छगुन्तामे अछि। "की बात? अहाँसभ  बहुत प्रसन्न बुझा रहल छी?" "हमरसभटा टाका वापस आबि गेल? "से कोना भेल? "से नहि कहि सकैत छी, मुदा टाका तँ वापस आबिए गेल। "बड़का झंझटिसँ बँचि गेलहुँ।" "सही कहलहुँ।" "मुदा आब ऐहि केसकेँ की कएल जाए?" "से अहाँसभ जानी। हमरा आब एहि लफड़ासँ कोनो मतलब नहि रहि गेल अछि।" "मुदा जखन केस भइए गेलैक अछि तखन तँ न्यायालये एकरा बंदो कए सकैत अछि ।" "कोनो बात नहि । जहिआ न्यायालय बजाओत हमसभ ओतए पहुँचि जाएब।" हमर बात सुनि कए पुलिसकेँ निराशा भेलैक। मुदा ओ कइए की सकैत छल? हमरासँ  किछु टाका झिटलक आ वापस चलि गेल । 34 एक हिसाबे हमसभ दिल्लीक सुखी परिवारमेसँ गनल जाइत छलहुँ। अपने दुनू बेकती नीक सरकारी नौकरीसँ सेवानिवृत्तिक बाद बढ़िआँ पेनसन लैत छलहुँ । तीनू संतान उच्च शिक्षा प्राप्त केने छल ।  दुनू बेटा उज्ज्वल भविष्यक कामनामे विदेश चलि गेल छल आ ओतहि अपना-अपना पसिंदक जीवनसंगी बना लेने छल जकर कि हमसभ कल्पनो नहि केने रहल होएब । अनुमानो नहि कए सकैत छलहुँ । ओ तँ जखन अमेरिका गेलहुँ,किछु दिन ओकरसभक डेरापर रहलहुँ तखन ओकरसभक असली रूप देखलहुँ । तकर बाद तँ ओहिठामसँ जान लए कए भागलहुँ । जहिआसँ ओतएसँ वापस अएलहुँ रहि-रहि कए ओ विचित्र दृश्यसभ मोनमे खटकैत रहैत अछि।  आइ जखन ओहिठामसँ ढाकीक-ढाकी उपहारसभ एहिठाम पहुँचल तँ ओतुका दृश्यसभ फेर मोनमे हरिआ गेल। पार्कमे कएल गेल हमर बिदाइ समारोह। कतेक हृदयस्पर्शी छल ओ क्षण। कहाँसँ एहन अपनत्व आबि गेलैक ओहि विदेशीसभमे। एकरे कहल जा सकैत छैक हृदयक विशालता। वसुधैव कुटुम्वकम् । ओकरसभक वश चलितैक तँ हमरासभकेँ ओतहि रोकि लैत,कदापि वापस नहि आबए दैत। कारण ओहिठाम तँ सभ एहने लोकसभ छल। एही परिस्थितिसँ लड़बाक हेतु,एहनोमे सुखी जीवन जीबाक हेतु समाधान ताकि लेने छल। केहन बुधिआर अछि ओ सभ। इमानदार एहन जे सभटा उपहार हमरा घर धरि जाबत नहि पहुँचओलक ताबे निचैन नहि भेल। सामानसभसँ हमर फ्लैट भरि गेल अछि। नम्रता ओकरासभकेँ देखि-देखि प्रसन्न भए रहल अछि। शालिनी तँ आश्चर्यचकित रहए। जेना-तेना कए ओकरासभकेँ फ्लैटमे राखल गेल। तैओ किछु सामान बाँचिए गेल छल । आब की कएल जाए? पड़ोसीक ओसारापर रखबा देलिऐक । अखन तँ खालीए अछि,जखन केओ रहए आओत तँ देखल जएतैक। सामान पहुँचाएक ओ सभ चैन नहि भए गेल। अपितु ओकरा बाद फोन कएलक- "हमसभ अहाँकेँ बारेमे चर्च करैत रहैत छी। यदि कोनो तरहक परेसानी होअए तँ अबस्स सूचित करब। हँ, एकटा बात आर। हमसभ चाहैत छी जे दिल्लीमे अहाँक सहयोगसँ एकटा संस्था स्थापित करी जे बूढ़सभक कल्याण हेतु काज करए।" "एहिसँ नीक की भए सकैत अछि। हमरो ई विचार अछि ।   समय पाबि हम अपने लोकनिक संपर्क करब।" "जरूर करब। बिसरब नहि।" हमरा फोनपर व्यस्त देखि शालिनी सहटि कए हमरा लग आबि गेल। ओ फोनपर हमरसभक वार्तालाप सुनैत रहल। फेर स्थिरे कहैत अछि- "श्यामक समाचार पुछिऔक ने?" हम ओकरासभसँ श्यामक विषयमे गप्प नहि करए चाहैत छलहुँ । पता नहि की समाचार भेटए? भने नहि बूझल अछि। मुदा जखन शालिनी जोर देलक तँ हम पहुछलिऐक- "श्यामक की समाचार अछि?" "ओना तँ ओसभ हमरासभक संपर्कमे नहि रहैत छलाह। मुदा अखबारमे पढ़लिऐकजे ओ अखन जहलमे अछि?" "जहलमे?" "सही सुनलिऐक, जहलमे छथि।" "से कोना?" "हुनकापर डेबिडक हत्याक आरोप अछि। कहाँ दनि हुनका खिलाफ बहुत मजगूत साक्ष्य पुलिसकेँ हाथ लागि गेलैक अछि। बचनाइ मोसकिल छनि।" "तखन?" "तखन की करबैक? जे हेबाक छैक से हेतैक।" ई समाचार सुनि हमसभ बेकल भए गेलहुँ । हम शालिनीकेँ कहलिऐक- "कहैत छलिअह ने जे एहिसभ चक्करमे नहि पड़ह। आब भोगह।" शालिनी अपन माए लग पहुँचि गेल। रमाक मोन तँ पहिनेसँ खराप छलनि। एहि समाचार सुनलाक बाद तँ ओ खाटपर धराम दए खसलीह आ ठामहि बेहोस भए गेलीह। 35 "डेबिडक हत्याक आरोपमे श्याम आजन्म कारावास काटि रहल अछि।"- हमसभ ई समाचार सुनि हतप्रभ छी। मुदा कइए की सकैत छी? ने ओ कहिओ हमरासभसँ कोनो  विमर्श कएलक,ने कहिओ कोनो बात मानलक। जे अपन मोन भेलैक से करैत रहल। खाली पढ़ाइमे नीक भेलासँ जीवनो नीक भए जाएत तकर कोनो ठेकान नहि । एहि बातक प्रत्यक्ष उदाहरण सामने अछि। रमा रहि-रहि कए व्याकुल भए जाइत छथि। "श्याम कोना होएत? कोनो उपाय करिऔक। कहुना जहलसँ बाहर भए जाइक से व्योंत करिऔक।" "अहाँक मोह कमे नहि होइत अछि। जखन कि स्वयं जा कए ओकर हाल देखि चुकल छी। अहींक दुराग्रहपर हम अमेरिका जा कए फँसि गेल रही। आब दोबारा एहन गलती तँ नहि कए सकैत छी। फेर ओ तँ कानूनी प्रक्रियासँ जहलमे अछि, जघन्य अपराध केलक अछि, एहिमे हमसभ की कए सकैत छी?" "अहाँ बहुत कठोर छी। माए-बापकेँ एहन निर्मोही नहि हेबाक चाही।" "मुदा एहि बएसमे बेसी मोहो ठीक नहि। अपितु कष्टक कारण भए सकैत अछि।" हमरा लोकनिकेँ आपसमे चर्च करैत देखि शालिनी बीचमे आबि गेलीह। पाछू लागल नम्रता सेहो आबि गेलि । ओ सभ थोड़-थाम लगओलक। हमसभ शांत भए गेलहुँ। मुदा रमाक आँखि लाल भेल छनि। नोरसँ डबडबाएल छनि। हमसभ किछु देखि रहल छी,बूझिओ रहल छी,परंतु विवश छी। समय बहुत बलवान होइत अछि। जे ने कराबए,जे ने देखाबए। हम,रमा,शालिनी आ नम्रता ओसारापर बैसि जाइत छी। माहौल बदलबाक हेतु नम्रता अपन आगूक योजनाक बारेमे चर्च करैत अछि। शालिनी ओकर बातकेँ समर्थन करैत बातकेँ आगू बढ़बैत अछि। हमसभ आपसमे गप्प कइए रहल छलहुँ कि अचानक मुरली सामनेक सड़कपर कारसँ उतरैत देखाइत अछि। हम ओकर बिना कोनो पूर्व सूचनाकेँ एहि तरहेँ आबि गेलासँ आश्चर्यचकित छी। जाबे किछु सोचितहुँ,ककरो किछु कहितिऐक ताबे घरक घंटी बाजल। हम रमाकेँ इसारासँ केबार खोलबाक हेतु कहैत छिअनि। ओ आगू बढ़ैत छथि। केबार खोलितहि सामनेमे मुरलीकेँ देखैत छथि। "मुरली...तूँ...एना अचानक?" ओ हमरा आ रमाकेँ प्रणाम करैत अछि। शालिनी आ नम्रता ओकरा प्रणाम करैत अछि। हमसभ आश्वस्त होइत छी। विश्वासे नहि भए रहल छल जे मुरली सामने बैसल अछि। शालिनीक तामस अखनहु स्पष्ट देखा रहल छैक। मुदा ओहो किछु बाजि नहि रहल अछि। एहि मौनकेँ मुरली स्वयं तोड़ैत अछि- "असलमे हमरा कंपनीक काजसँ बेंगलुरु जेबाक छल तँ भेल जे अहाँसभक भेंट करिते चली।" "बढ़िआँ बात।" "हम आब बेंगलुरुएमे रहब। ओतहि एकटा कंपनी बना रहल छी। ओही काजमे दिन-राति लागल छी। काज बहुत आगू बढ़ि गेल अछि। मुदा आब|" "से की?"-शालिनी पुछलकैक। "हमरा किछु आर्थिक मदति चाही। एहिठामक कानूनेसभ तेहने छैक जे बिना अपन पूँजीक कोनो कारोबार चलिए नहि सकैत अछि। सभमे चाही ऊपरीखर्चा, से तँ बैंक देत नहि। यदि से सभ नहि करब तँ काज लटकले रहि जाएत, कहिओ आगू हेबे नहि करत।" मुरली मुँहे ई बात सुनितहि शालिनीक देहमे जेना आगि लागि गेलैक। ओ चिचिआ उठलि- "निर्लज्ज कहींकेँ । बूढ़ माए-बाप कोना जीबि रहल अछि तकर कोनो विचार नहि । उनटे टाका मांगि रहल छह। हद भए गेल। सही मानेमे कलियुग आबि गेल अछि।" "एना नहि तमसो। बुझलिऔक जे तूँ सभटा संपत्ति असगरे हथिआबक जोगारमे छैं। मुदा से हेतौक नहि। हम अखन मरि नहि गेलहुँ अछि। हम वापस आबि गेलहुँ अछि। हमरा सभ किछु पता चलि गेल अछि। तेँ लंदन छोड़ि बेंगलुरुएमे काज शुरु करब आ माता-पिताक सेवा सेहो करब।" "बड़ चललाह अछि सेवा करए। यदि से मोनमे रहितह तँ हुनकर बैंक खातासँ टाका किएक लुटितह?" "खबरदार! यदि आब एकहु शब्द बजबह तँ हमरासँ खराप केओ नहि होअत। बहुत सुनि लेलहुँ तोहर भाषण। हम अपन बापक धन लेब ताहिमे तोरा की दिक्कति छौ? स्पष्ट अछि जे तोरा मोनमे बैमानी भरल छौ। मुदा कान खोलि कए सुनि लएह। किछु चलतह नहि। आब हम सतर्क छी। लगेमे आबि गेल छी।" दुनू भाए-बहिनक वार्तालापसँ हम दुनू बेकती क्षुब्ध रही। बुझेबे नहि करए जे की करी? ओ सभ से चुप हेबाक नामे नहि लिअए। हारि कए हमहीसभ हटि गेलहुँ । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.८.कुमार मनोज कश्यप-वेदना कुमार मनोज कश्यप वेदना दलान पर लैपटॉप मे किछु काज करैत रही कि बड़का बाबा सहटि कs लsग आबि  बैसि गेलाह।  'सत्ये आजुक युग चन्द्रमा पर जा रहल अछि।  जे काल्हुक अजगुत छल से आजुक साक्षात्...।' बाबा लैपटॉप मे गहिंकी नजरि गड़ेने बजला। - 'हँ बाबा! से सत्ये! ई सूचना क्रांति के युग छै...... सकल संसार अड़ोस-पड़ोस जकाँ।  जखन जतs जकरा सs चाहू संपर्क कs सकैत छी.. मुँहाँ-मुँहि बतिया सकैत छी।  फेसबुक तs बुझियौ भोतियैल यार-दोस्त के भेटा रहल छै।’ - 'हे फेसबुक के नाम लेलs तs भने मोन पड़ल ...... एकटा फेसबुक हमरो मोबाइल मे खोलि दैह। ' - 'बाबा आहाँ कि करबै फेसबुक के?!' - 'बेसी खोद-बेद नहिं करह ...... एकटा खोलि ने दैह।' - 'मुदा........???' - 'हौ तोरा सs कि नुकाऊ ....... निखिल आब गाम-घर ऐब कि फोनो-फान छोड़ि देलनि।  फोन तs उठबितो ने छैथ। सुनै छियै लोक सभ अपन घरक फोटो फेसबुक पर भरने रहैत छै....... साक्षात् नहिं सही; फोटोए देखि  दुनू प्राणी के नयन जुड़ा जैत!' हम निर्विकार शून्य मे ऊब-डूब करय लगलहुँ।  बाबा दलानक कोरो गिनि रहल छलाह। -सम्प्रति: भारत सरकार के उप-सचिव, संपर्क: सी-11, टावर-4, टाइप-5, किदवई नगर पूर्व (दिल्ली हाट के सामने), नई दिल्ली-110023, # 9810811850 ईमेल: writetokmanoj@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.९.प्रमोद झा 'गोकुल'-भल गप/ प्रेमक चीछ प्रमोद झा 'गोकुल' भल गप/ प्रेमक चीछ १ भल गप -गै अगरधत्त! कनि सुन !! - कह की कहै छेँ गै बुढ़िया! - देहके ओढ़नीसे झाँपिके चल! आर की कहबौ? - तोरा की होइ छौ से? - हमरा की हैत? देखै ने छिही जे छौंड़ा मारैड़ सब केहेन तिख आँखिये घूरैत रहै छौ आ बुढ़वा सबते आर विखाह आँखिये । - तहूंजे छेँ ने नानी ! - दाइ!भल गप कहै छियौ, मानिले! दिन दुनियाँमे अगराही लागल छै। २ प्रेमक चीछ

- एकटा बात कहियौ कनहैया! - हँ ,कह ने! -तोरासे असली प्रेम हमहींटा करै छियौ! - से कोना गै रधिया? -देखिही ने! हम अपन सबटा लोक लाज -लिहाज‌ छोड़ि छाड़ि बताहि जकाँ गाछिये बिरछी तोरा सङेबौवैल भेल फिरै छी! -तै से की? -ऐ मे हमर अनन्य प्रेम तोरा नै देखाइ छौ? - हमराते ऐ मे तोहर अहंकार देखाइये! -अहंकारे मे ते प्रेमक चरम परिणिति होइ छै -भ्रम छियौ तोहर! -बेस ते हम प्रेमक चीछ पाड़ै छी ,आ बजा तूं मुरली!जँ मुरली धुनि सुनिके तोहर कोनो प्रेमिका एकरा नांघिके तोरा लग आबि जेतौ तँ हम हारि मानि लेब! - बेसते देखही हमर मुरलीक प्रेम धुनक असैर … कनहैयाक मधुर मुरलीक प्रेम धुनि सुनितहिं असंख्य गोपी कान्हा कन्हा करैत प्रेमक चीछ पार कय कनहैया लग पहुँच गेलि आ राधाक प्रेमाश्रुमे भिजैत कृष्ण बाजि उठलाह -ई की राधे? +हम हरि गेलौं रे कान्हा! - नै ,तोहर प्रेम जीत गेलौ गै रधिया! साँच ? -हँ अहंकारक नोर जे बहि गेलौ ! -प्रमोद झा 'गोकुल', दीप,मधुवनी (विहार), फोन-9871779851 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.पद्य ३.१.आचार्य रामानन्द मण्डल- झक झोरैय है!/ मिथिला महात्म्य/ केवल मानव मानैय छी ईश्वर/ कोयल आ काग ३.२.संतोष कुमार राय 'बटोही'- दूटा कविता-बेर-बेर/ पिया हेरायल ३.३.राज किशोर मिश्र- सभ्यताक भ्रम ३.४.डॉ सुमंगला झा- एखनो ई हाल अछि ३.५.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'-गजल (बिना रदीफक) ३.६.आशीष अनचिन्हार- दूटा गजल ३.७.प्रमोद झा 'गोकुल'-दीन स्वर/ पिट्ठा मर्द ३.१.आचार्य रामानन्द मण्डल- झक झोरैय है!/ मिथिला महात्म्य/ केवल मानव मानैय छी ईश्वर/ कोयल आ काग आचार्य रामानन्द मण्डल झक झोरैय है!/ मिथिला महात्म्य/ केवल मानव मानैय छी ईश्वर/ कोयल आ काग १. झक झोरैय है! कुछ बात मन के झक झोरैय हैय! भगवान कोई वर्ण के झक झोरैय हैय! बेटा राम दशरथ के झक झोरैय हैय! बेटी सीता धरती के झक झोरैय हैय! बेटा मंगल धरती के झक झोरैय हैय! भगवान खास वर्ण के मन तोड़ैत हैय! संतान सभ धरती के बुझनै पड़ैत हैय! कोना भगवान सभवर्ण के बुझनै पड़ैत हैय! सगुण खास वर्ण के बुझना अबैय हैय! निर्गुण सभ वर्ण के रामा बुझना अबैय हैय! २. मिथिला महात्म्य केहन हमर मिथिला रहे! दादा हमर जमींदार रहे!! केहन हमर मिथिला रहे! बड़का घर लोरिन रहे!! केहन हमर मिथिला रहे! बड़का घर  खवास रहे!! केहन हमर मिथिला रहे! बड़का घर खवासिन रहे!! केहन हमर मिथिला रहे! दूरा पर हजामत बने!! केहन हमर मिथिला रहे! दूरा घोड़ा हाथी रहे!! केहन हमर मिथिला रहे! हजारों बिघा खेत रहे!! केहन हमर मिथिला रहे। बैल आ हरवाह रहे!! केहन हमर मिथिला रहे! डोली आ कहार रहे!! केहन हमर मिथिला रहे! पान आ पिकदान रहै!! केहन हमर मिथिला रहे! चालू पैखाना सफाईवाला रहे!! केहन हमर मिथिला रहे! बाभन आ सोलकन रहे!! केहन हमर मिथिला रहे! हमर मिथिला राज रहे!! केहन मिथिला राज रहे! दरबारी कवि गान रहे!! केहन मिथिला राज रहे! अपन दंड विधान रहे!! केहन मिथिला राज रहे! रामा मिथिला महात्म्य रहे!! ३. केवल मानव मानैय छी ईश्वर केवल मानव मानैय छी ईश्वर विभिन्न प्राणी बनैलै हैय। सुग्गा मैना कौआ विभिन्न रुप बनैलै हैय। गाय भैंस बकरी विभिन्न रुप बनैलै हैय। मानव जानवर चिड़िया विभिन्न रुप बनैलै हैय। जलचर थलचर नभचर विभिन्न रुप बनैलै हैय। सुग्गा मैना कौआ देखते पहिचाने हैय। गाय भैंस बकरी देखते पहिचाने हैय मानव जानवर चिड़िया देखते पहिचाने हैय। जलचर थलचर नभचर देखते पहिचाने हैय। बाभन क्षत्रिय सोलकन देखतेनै पहिचाने हैय। बाभन क्षत्रिय सोलकन देखते मानव लागैय हैय। जानैय छी ईश्वर रामा केवल मानव बनैलै हैय। ४. कोयल आ काग कोयल कारी बोलइ मीठा। काग कारी  बोलइ खारा। कोयल कुहुकइ विरही विथा। काग बोली विरही संदेशा। कोयल कारी बड़ा चातुरा। काग कारी बडा चेष्टना। काग रुप बड़ा भाग्यवाना। खेलत राम बड़ा बचकाना। काग भुसुंडी बनइ कागा। गियान देत मानव कएं कागा। परेमी करइत प्रार्थना कागा। दू नयन नइ खाइयो कागा। शुभ अशुभ संवदिया कागा दुध भात खिलावइ जनाना। परकिरति साफ करई कागा। किरसक के सहयोगी कागा। अंतिम किरिया पूरनाहुति कागा। दोसर जनम करावइ कागा। मीठा सएं  निक बोली खारा। रामा कोयल सएं निक कारी कागा। अपन मंतव्य editorial.ऽtaff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.संतोष कुमार राय 'बटोही'- दूटा कविता-बेर-बेर/ पिया हेरायल संतोष कुमार राय 'बटोही' दूटा कविता-बेर-बेर/ पिया हेरायल १. बेर-बेर

आँखिक नोर बनि कऽ फिरिशान करैत छथि ओ करेजा फाटि जायत अछि जखन हमरा दिस तकैत छथि ओ !

मिलन बेरी ई की भेलै ? एक चुटकी सिनूर केर मान छै जिनगी फाँसि भेल छन्हि इएहा राधा केर श्याम छै ।

अनहरिया भेलै सभतैर हिया मे इजोरिया कोना हेतै ? मोन आब टुटि गेल छन्हि प्रीतम बिनु जिनगी सोना हेतै ?

बेर-बेर भगजोगनी बनि कऽ छुका-छिप्पी केर खेल खेलाति छथि हड्डी बाँचल छन्हि आब सिर्फ अपन ठठरी अपने बनाबति छथि ।

२. पिया हेरायल

टोना-टापर सँ नहि हेतै अइ बेर नहि बाँचब मने साँए हरायल मेला मे भगत केँ जाँचल हेतै ?

सून पड़ल अछि वृंदावन मुरलीधर कतऽ गेल नुकाय राधा तड़पैत अछि श्याम बिनु उद्धव बाँचति निरगुन निर्जन ।

जग हेरलहुँ पिया भेटताह कदम्ब गाछ तरि जमुना तीरे दर्शन देल जाऊ हमर प्रीतम बहि रहल माघक पवन धीरे ।

-संतोष कुमार राय 'बटोही', ग्राम- मंगरौना अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.राज किशोर मिश्र- सभ्यताक भ्रम राज किशोर मिश्र सभ्यताक भ्रम

सभ्यता के डेग बढ़ल, खो ह सँ, पा षा ण सँ, सिं धु नदी के ती र सँ, का शी क महा मसा न सँ।

बनवा सी के पर्णकुटी सँ, कुम्हा रक चा क, बा सन सँ, बाँ सक कनसुपती , पथि आ सँ, रा जा के सिं हा सन सँ।

शां ति -मर्या दा सृजन मे, चण्डि का , दुर्गा सप्तशती , अर्गला स्तो त्र, देवी कवच, 'असुर भया उनि 'भगवती ।

सुर-असुरक संग्रा म सँ, पंचवटी ,आ' लंका सँ, कुरुक्षेत्रक चक्रव्यूह सँ, रण मे बजैत डंका सँ।

तक्षशि ला क आचा र्य सँ, 'अर्थशा स्त्र' के पन्ना सँ, रा ज-चौ हद्दी -वि स्ता र लेल, षड्यंत्र-व्यूह-बहन्ना सँ।

वेद-ऋचा सँ, त्रि पि टक सँ, वरा हमि हि रक खगो ल-ज्ञा न सँ, आर्यभट्टक दशमलव-खो ज सँ, वि ज्ञा नक शो ध, अनुसंधा न सँ।

को न हा बा कतय सँ आएल ? पूब भर सँ कि पछि म सँ, मि जहर भऽ कऽ घमल सभ्यता , जमल जे बड़ छल हि म सँ।

जी वनशैली क नव-नव सि द्धा न्त, सभ ला गल अपन पसा र मे, लूझि -लूझौ अलि बा त-वि चा रक, नहि ककरो कि ओ सम्हा र मे।

कैक्टस-धा धर सँ भा लरि काँ पल, डि स्को रेबा ड़ल , सो हर , खेत छो ड़ि चाँ चरि पड़ा एल, अरि पन पर अङरेजी मो हर।

चलैत रहल चि तकबड़ा सभ्यता , एकपेड़ि आ ,कखनो रा ज-पथ, बनवा सी , महा नगर मे कखनो , कखनो भी ष्म ,कखनो जयद्रथ।

हमरा ला गि रहल अछि ओ तँ चौ बटि आ पर ठा ढ़ अछि , ला ल-हरि अर भेल सि ग्नल, भ्रम-सा न्द्रता बड़ गा ढ़ अछि ।

सी रध्वज जनक सनक ओ बनि गेल अछि वि देह , आ' शेयर बजा रक सेहो ओकरा अछि नरे छैक सि नेह।

सि रा उर पा ड़ैत, हरबा हक चुबैत घा म मे, कुल-गो त्र सँ ,पैरबी सँ पा ओल ना म मे।

सूगरक खो भा ड़ सँ कि कि एबा क गर्द-अनघो ल मे, का र-शो रूमक भी तर मे,मर्सि डी ज-क्रयक मो ल मे।

मो हा बरा , लो को क्ति मे, गढ़ल जनजी वनक सि द्धां त, हो टल मे तऽ रि लाॅ क्स-टा इम, आ' खो पड़ी मे मा सां त।

रा मली ला -मंडली क बि लौ की मे, सि ने-जगतक आभा -भौ की मे।

पसा हनि कएने अर्थतंत्र, मो हा एल ओहि पर सभ्यता , रा जतंत्रक ऐश्वर्य-वैभव, आ' प्रजा तंत्रक भव्यता ।

धर्मदण्ड , आब संवि धा न, जनता अछि सभ सँ महा न।

धनुख-वा ण सँ ल' क' परमा णवि क अस्त्र, गा छक छा ल सँ ल' क' आधुनि क वस्त्र।

पुष्पक सँ मंगल आ' चंद्रया न, सभ्यता क गरुड़वा हन, वि ज्ञा न।

अनुष्टुप् किं वा मुक्तछंद, सभ्यता -मन मे बड़-बड़ द्वन्द्व। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.४.डॉ सुमंगला झा- एखनो ई हाल अछि डॉ सुमंगला झा एखनो ई हाल अछि

बद्रीनाथ राय के 'तीन टा गीत' पढ़लहुँ, बात-विचार, काव्यबद्ध अतिश्रेष्ठ पएलहुँ ।

सोचलौं! एहिठाम एखनो ई हाल अछि! मिथिला! घरे-घर पाय-लोभी बाप अछि।

पढ़ाय कहउ! कि व्यवसाय कुशलता, प्रतिक्षेत्र में धिया के पहुँच आब हेता।

बहुधा क्षेत्र में गुणवंती आगाँ अएत गेल। पुरुषत्व के घमण्ड फुस-फुस भइत गेल।

लेकिन बेटा आ बेटा वाला के ऐंठनी एहन की जारल डोर जकाँ एखनो ततए रहलैन।

लोभ! पैसा ऐंठे के, साम-दाम दण्ड सौं ढोल जना बड़बोली, गप्प-भुस्सा ढेर सौं।

बेटा नालायक रहल, एहि स उदण्ड अछि, हम भइलों बेटावाला, तहि स घमण्ड अछि।

उम्मीद कनेक बेसिये कनियाँ स करइ अछि, बहुओ कमाऊ भेलनि, तखनों न मान अछि।

नारी के पारिश्रमिक बहुता विधि निचोड़े अछि। नारियो क अधिकार भेल,ई सुनि चिड़ैत अछि।

देश-काल बदैल रहल, बुधि-व्यवहार जड़ रहल। धी-पूत विषम जॉनअ, मिथिला के मान कॉनअ ?. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.५.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'-गजल (बिना रदीफक) जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल' गजल (बिना रदीफक) ओझा लेखें गाँ बताह अछि गामक लेखें ओझाजी अपन महींस कुड़हरिए नाथू तैसँ मतलब अनका की बबुरक मारल गेलौं बेलतर बेलक मारल जाउ कत' अप्पन हारल बौहक मारल ककरा कहता मिसराजी नाके सूते पानि पियाक' छोडलक ई मनसा हमरा हाथी चढ़ि-चढि गौरी पुजि-पुजि हमहूँ ई वर पौने छी जकरे खातिर चोरि करै छी सैह कहय चोरा हमरा भगवाने जनइत छथि सभटा की गलती की भेल सही जाही खातिर भीन भेल छी सैह पडल अछि बखरामे जे ऊखरिमे मूँह देने अछि तकरा डर समाठक की तमसयलासँ किछु नै होइ छै अपन मोनकें थीर करू जे दुख आयल अछि सोझाँमे अपनहि कर्मक बदला छी जे लीखल छै हेबे करतै तै लय चिन्ता कते करू यैह सिखौलनि नाना-नानी यैह सिखौलनि दादाजी भोज बेरमे कुमहर रोपब थीक हमर ई परम्परा गप्प लेल हमरा लग बैसू टाका देता काकाजी जे भवसागर पार उतारथि हुनकहु हरि लेलनि सभ दुख आइ अयोध्या नाचय-गाबय 'जुग-जुग जीबथु मोदीजी' (मात्रा-क्रम : 2222 2222 2222 222) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.६.आशीष अनचिन्हार- दूटा गजल आशीष अनचिन्हार दू टा गजल

अखबारे सरकार छै सरकारे अखबार छै

ई बुझलहुँ केनाहुतो उपकारे अपकार छै

राजा मंत्री आ प्रजा दरबारे दरबार छै

एलहुँ हम सुख दुख भुजा संसारे कंसार छै

अइ धनिकक जनतंत्र लेल रखबारे रखबार छै

सभ पाँतिमे मात्राक्रम 22-22-212 अछि। अंतिम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु छूटक तौरपर लेल गेल अछि।

बनि ठनि रचि रचि कऽ सिंगार केलक ओ हमर सारापर पिकनिक मनेलक ओ

गरीबक हिस्सा खेलक पचेलक ओ तकर बादे धारे झा कहेलक ओ

चलब नियति छै जीवन केर ई कहि कऽ बाटे घाटे अनवरत घुमेलक ओ

पहिने बनेने छल बम गोली मुदा अइ बेर हमरा पायल बनेलक ओ

अनचिन्हारे सन कठकरेज बुझलक तँइ उदास खिस्सा हँसि कऽ सुनेलक ओ

सभ पाँतिमे 22-22-22-22-22 मात्राक्रम अछि। दू अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.७.प्रमोद झा 'गोकुल'-दीन स्वर/ पिट्ठा मर्द प्रमोद झा 'गोकुल' दीन स्वर/ पिट्ठा मर्द १ दीन स्वर

आङ उघार पेट लाचार । बसन पहिरना तार तार ।। दाँत किट किट देह थर थर । पेट खलपट समीर सर सर ।। भूखक मिस्र ज्वाल बनल काल । असहज शीतक बजय कठताल ।। घरमे मुसरी दण्ड पेलि रहल छै । नेनाक रुदन स्वर और मुखर छै ।। भूख भूख सुनि घरनी घहरि रहल छै । दैवक मारल घैहरि काटि रहल छै ।। बाँचब लाज आज कठिन भेलछै ।। सभ्य समाज पाज कए रहल छै ।। हे हर घैहर कतेक कटब हम। थेथर पाथर अहूँके कहब हम।। दर दर घुमलौं अदिष्ट अजमौलौं । थकलौं झखलौं अपमानो चखलौं ।। पौलौं पाथेय हेय निठ्ठाह फूसि । आनन अपन अपने रहल दूसि ।। २ पिट्ठा मर्द

एमहर ओमहर आब की तकै छेँ । ककर आश केर तूँ भरोस धरै छेँ ?।। चल बढ़ि चल रे ,नहिं छौ दिल्ली दूर । हौसले मे सभतरि ताकत भरि पूर ।। पसरल केहन दूभि पर दूर दूर तक ओस । पियास मिझा पाओत की दौड़ियोके कोस ।। फूसिमे दौड़ने फूटय कपार । सधने लक्ष्य संभावना अपार ।। बैसल जिनगी आगिक चिनगी । कुंठा संत्रासक भरिपोख दिलग्गी।‌। दुख दर्द आसमर्द भुखे पियासे भेल बेपर्द । उठ बढ़ि चल सर्द नहिं ,बनिके पिट्ठा मर्द ।। झंडा थाम हाथमे आस ठेका आकाश । हारिक पाछाँ जीत छै सबके ई आभास ।

-प्रमोद झा 'गोकुल', दीप,मधुवनी (विहार), फोन-9871779851 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह ३८६ म अंक १५ जनवरी २०२४ (वर्ष १७ मास १९३ अंक ३८६)|| 133 132 || विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in

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हज विशेषांक २०२४ नरेन्द्र झा एवं प्रा. रामावतार यादव पर विदेह www.videha.co.in विशेषांक २०२४ नरेन्द्र झा एवं प्रा. रामावतार यादव चयनित भेला २०२४ क विदेह विशेषांक लेल। जि भर नरेन्द्र झा पर विदेहक विशेषांक १ जून २०२४ आ प्रा. रामावतार यादव पर १५ जून २०२४ अंकमे धो लि SD प्रकाशित CCA) eee: | | लेखक-पाठक clad आग्रह जे नरेन्द्र झा एवं प्रा. रामावतार यादव जीक काजपर आलोचना, . | = 'समालोचना, समीक्षा आदि वर्ड फाइलमे editorial.staff.videha@gmail.com पर | — in 0p Se i eam पाबधि। लि कि & नरेन्द्र झाजीक अधिकांश पौथी २००८ सें विदेह www.videha.co.in पर उपलब्ध ofS! Wy face fastuign Roly % cf जद = = == = SG WWW. HES हैंए। Pe — Yn, facie ICTR 3928 re ae facre factais २०२8 .... प्र } AERA सा अन्न था. वामाब्रछाव AAA शव FACE www. videha.co.in FACT २०२8. AA YA सा IH शा. वामाब्रजाव AAA BUS एछता २०२8 क fA FACT CAL ATT सा शव FACES FACTS ५ OT २०२४ शा था. वामाब्रछाव TIAA शव 90 जून २०२४ कर्म geht =. 7 east a a एलथक-नाठक एलाकनिें AS OH THT सा IH था. वामाब्रठाव ATA जीक BIA AAT, HATA, i” RE» ater शनि aS काजतएय editorial. staff.videha@gmail.com शव शठाब्िणि। x AES साजीक अविकीने co २००० मैं बिएनठ www.videha.co.in शव Gorn अडि।

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