VIDEHA — Issue 389 / अंक ३८९

Publication: VIDEHA · Issue: 389
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ISSN 2229-547X VIDEHA 𑒀 विदेह ३८९ म अंक ०१ मार्च २०२४ (वर्ष १७ मास १९५ अंक ३८९) [विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। कॉपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति ‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२४. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२४. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. It is a platform for scholars, researchers, writers and poets to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, and poetry in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@gmail.com. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover designed by AUM GAJENDRA THAKUR Videha e-Journal: Issue No. 389 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अक्खर खम्भा (आखर खाम्ह) तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ (कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।) माने आखर रूपी खाम्ह निर्माण कऽ ओइपर (गद्य-पद्य रूपी) मंच जँ नै बान्हल जाय तँ ऐ त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लत्ती केना पसरत। शुक्ल यजुर्वेद (२६.२)-यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः। ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च।।हम सभ गोटेकें ई पवित्र वाणी (वेदवाणी) सुनाबी। ब्राह्मणकें, क्षत्रियकें, शूद्रकें आ आर्यकें; अपन लोककें आ अपरिचितकें सेहो (माने सभकें)। मुदा ऐ वेदवाक्यक विपरीत मनुस्मृति वेदवाणीक अध्ययन/ श्रवणकें समाजक किछु गोटे लेल निषेध करऽ चाहलक, मुदा स्मृति सेहो वेदवाक्यकें प्रमाण मानैत अछि (शब्द प्रमाण) तें तकर विरुद्ध देल ओकर निर्देश स्वयं अमान्य भऽ जाइत अछि। Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. -Robert Louis Stevenson ------------------------------------- Videha: Maithili Literature Movement 𑒀 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्ति: 𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱: अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.अंक ३८८ पर टिप्पणी २.गद्य २.१.आशीष अनचिन्हार- की तारानंद वियोगीजी मंचपर अप्रमाणिक वाचन करै छथि? २.२.परमानन्द लाल कर्ण-फागुन मासक एकादशीक माहात्म्य २.३.प्रवीण नारायण चौधरी- मैथिली भाषा जिबैत रहत लेकिन केना? २.४.लालदेव कामत- पोथी चर्चा : सभ्यताक भ्रम/ अष्टदल/ श्रमिक हितक उपाय होय/ जीवनी अनुवाद 'क एक पोथी/ हमरा गामक पहिलुक बाईसकिल (लघुकथा) २.५.रबीन्द्र नारायण मिश्र- ठेहा परक मौलाएल गाछ (धारावाहिक) २.६.कुमार मनोज कश्यप-संवेदना २.७.प्रमोद झा 'गोकुल'-जिन्दाबाद ३.पद्य ३.१.संतोष कुमार राय 'बटोही'-दूटा कविता/ काल्हि आओर आई/हमरा मुइलाक बाद ३.२.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'-गजल ३.३.राज किशोर मिश्र-प्रदूषणक सराप ३.४.प्रमोद झा 'गोकुल'-इहो कवि शान से तखन गौतै 𑒀 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्तिः पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म 𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑓁 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒰𑒣: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒼𑒭𑒡𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹 𑒠𑒹𑒫𑒰: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧 ब्रह्मणसँ प्रार्थना जे द्युलोकमे, अंतरिक्षमे, पृथ्वीपर, जलमे, औषधमे, वनस्पतिमे, विश्वमे, सभ देवतागणमे आ ब्रह्ममे शांति हुअय। ॐ-ब्रह्मण, द्यौ-सूर्य-तरेगण, अंतरिक्ष- पृथ्वी आ द्यूलोकक बीच, आप:-जल, विश्वेदेवा- सभ देवता, ब्रह्म- सर्जक। 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝𑒮𑒿 𑒣𑓂𑒩𑒰𑒩𑓂𑒟𑒢𑒰 𑒖𑒹 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒧𑒹, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭𑒧𑒹, 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲𑒣𑒩, 𑒖𑒪𑒧𑒹, 𑒎𑒭𑒡𑒧𑒹, 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒱𑒧𑒹, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒧𑒹, 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰𑒑𑒝𑒧𑒹 𑒂 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒧𑒹 𑒬𑒰𑓀𑒞𑒱 𑒯𑒳𑒁𑒨। 𑓇-𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝, 𑒠𑓂𑒨𑒾-𑒮𑒴𑒩𑓂𑒨-𑒞𑒩𑒹𑒑𑒝, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭- 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒂 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒏 𑒥𑒲𑒔, 𑒂𑒣:-𑒖𑒪, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹𑒠𑒹𑒫𑒰- 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰, 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧- 𑒮𑒩𑓂𑒖𑒏। 𑒀 ॐ, स॒हस्र॑शीर्षा॒ पुरु॑षः। स॒ह॒स्रा॒क्षः स॒हस्र॑पात्। 𑓇, 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒬𑒲𑒩𑓂𑒭𑒰↓ 𑒣𑒳𑒩𑒳↑𑒭𑓁। 𑒮↓𑒯↓𑒮𑓂𑒩𑒰↓𑒏𑓂𑒭𑓁 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒣𑒰𑒞𑓂। स भूमिं॑ ग्वंग वि॒श्वतो॑ वृ॒त्वा। अत्य॑तिष्ठद् दशाङ्गु॒लम्॥ 𑒮 𑒦𑒴𑒧𑒱𑓀↑𑓅 𑒫𑒱↓𑒬𑓂𑒫𑒞𑒼↑ 𑒫𑒵↓𑒞𑓂𑒫𑒰। 𑒁𑒞𑓂𑒨↑𑒞𑒱𑒭𑓂𑒚𑒠𑓂 𑒠𑒬𑒰𑒓𑓂𑒑𑒳↓𑒪𑒧𑓂॥ हजार माथ, हजार आँखि, हजार पएर संग विश्वकेँ आच्छादित केने अछि, दस आंगुरक गनतीक वशमे नै अछि ओ। प॒द्भ्याग्ँ॑ शू॒द्रो अ॑जायत॥ 𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑒑𑓂𑒿↑ 𑒬𑒴↓𑒠𑓂𑒩𑒼 𑒁↑𑒖𑒰𑒨𑒞॥ पएरसँ शूद्रक उत्पत्ति भेल॥ प॒द्भ्यां भूमि॒र्दिशः॒ श्रोत्रा᳚त्। 𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑓀 𑒦𑒴𑒧𑒱↓𑒩𑓂𑒠𑒱𑒬𑓁↓ 𑒬𑓂𑒩𑒼𑒞𑓂𑒩𑒰↑↑𑒞𑓂। मुदा पएरेसँ भूमियोक उत्पत्ति। ❀ (White Florette- innocence and purity) ☸ (Wheel of Dharma) ࿕(Swastik) 𑓅 (Gwang ग्वंग- two small circles connected by u and a dot placed over it, used in reference of Vedic texts) ꣼ (सिद्धिरस्तु, सिद्धम 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒱𑒩𑒮𑓂𑒞𑒳, 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒧 Devanagari Anji) ঀ (Bengali Anji, Siddham) 𑒀 (Tirhuta Anji, Ankush of Ganeshji, placed at the beginning of something) 𑒀

ISSN 2229-547X VIDEHA 𑒀 विदेह ३८९ म अंक ०१ मार्च २०२४ (वर्ष १७ मास १९५ अंक ३८९) [विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। कॉपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति ‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२४. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२४. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. It is a platform for scholars, researchers, writers and poets to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, and poetry in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@gmail.com. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover designed by AUM GAJENDRA THAKUR Videha e-Journal: Issue No. 389 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अक्खर खम्भा (आखर खाम्ह) तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ (कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।) माने आखर रूपी खाम्ह निर्माण कऽ ओइपर (गद्य-पद्य रूपी) मंच जँ नै बान्हल जाय तँ ऐ त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लत्ती केना पसरत। शुक्ल यजुर्वेद (२६.२)-यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः। ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च।।हम सभ गोटेकें ई पवित्र वाणी (वेदवाणी) सुनाबी। ब्राह्मणकें, क्षत्रियकें, शूद्रकें आ आर्यकें; अपन लोककें आ अपरिचितकें सेहो (माने सभकें)। मुदा ऐ वेदवाक्यक विपरीत मनुस्मृति वेदवाणीक अध्ययन/ श्रवणकें समाजक किछु गोटे लेल निषेध करऽ चाहलक, मुदा स्मृति सेहो वेदवाक्यकें प्रमाण मानैत अछि (शब्द प्रमाण) तें तकर विरुद्ध देल ओकर निर्देश स्वयं अमान्य भऽ जाइत अछि। Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. -Robert Louis Stevenson ------------------------------------- Videha: Maithili Literature Movement 𑒀 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्ति: 𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱: अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृ. २-५) १.२.अंक ३८८ पर टिप्पणी (पृ. ६-६) २.गद्य २.१.आशीष अनचिन्हार- की तारानंद वियोगीजी मंचपर अप्रमाणिक वाचन करै छथि? (पृ. ८-१४) २.२.परमानन्द लाल कर्ण-फागुन मासक एकादशीक माहात्म्य (पृ. १५-२१) २.३.प्रवीण नारायण चौधरी- मैथिली भाषा जिबैत रहत लेकिन केना? (पृ. २२-२४) २.४.लालदेव कामत- पोथी चर्चा : सभ्यताक भ्रम/ अष्टदल/ श्रमिक हितक उपाय होय/ जीवनी अनुवाद 'क एक पोथी/ हमरा गामक पहिलुक बाईसकिल (लघुकथा) (पृ. २५-४२) २.५.रबीन्द्र नारायण मिश्र- ठेहा परक मौलाएल गाछ (धारावाहिक) (पृ. ४३-६१) २.६.कुमार मनोज कश्यप-संवेदना (पृ. ६२-६३) २.७.प्रमोद झा 'गोकुल'-जिन्दाबाद (पृ. ६४-६५) ३.पद्य ३.१.संतोष कुमार राय 'बटोही'-दूटा कविता/ काल्हि आओर आई/हमरा मुइलाक बाद (पृ. ६७-६८) ३.२.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'-गजल (पृ. ६९-७०) ३.३.राज किशोर मिश्र-प्रदूषणक सराप (पृ. ७१-७४) ३.४.प्रमोद झा 'गोकुल'-इहो कवि शान से तखन गौतै (पृ. ७५-७६) 𑒀 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्तिः पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म 𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑓁 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒰𑒣: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒼𑒭𑒡𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹 𑒠𑒹𑒫𑒰: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧 ब्रह्मणसँ प्रार्थना जे द्युलोकमे, अंतरिक्षमे, पृथ्वीपर, जलमे, औषधमे, वनस्पतिमे, विश्वमे, सभ देवतागणमे आ ब्रह्ममे शांति हुअय। ॐ-ब्रह्मण, द्यौ-सूर्य-तरेगण, अंतरिक्ष- पृथ्वी आ द्यूलोकक बीच, आप:-जल, विश्वेदेवा- सभ देवता, ब्रह्म- सर्जक। 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝𑒮𑒿 𑒣𑓂𑒩𑒰𑒩𑓂𑒟𑒢𑒰 𑒖𑒹 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒧𑒹, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭𑒧𑒹, 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲𑒣𑒩, 𑒖𑒪𑒧𑒹, 𑒎𑒭𑒡𑒧𑒹, 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒱𑒧𑒹, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒧𑒹, 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰𑒑𑒝𑒧𑒹 𑒂 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒧𑒹 𑒬𑒰𑓀𑒞𑒱 𑒯𑒳𑒁𑒨। 𑓇-𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝, 𑒠𑓂𑒨𑒾-𑒮𑒴𑒩𑓂𑒨-𑒞𑒩𑒹𑒑𑒝, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭- 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒂 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒏 𑒥𑒲𑒔, 𑒂𑒣:-𑒖𑒪, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹𑒠𑒹𑒫𑒰- 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰, 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧- 𑒮𑒩𑓂𑒖𑒏। 𑒀 ॐ, स॒हस्र॑शीर्षा॒ पुरु॑षः। स॒ह॒स्रा॒क्षः स॒हस्र॑पात्। 𑓇, 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒬𑒲𑒩𑓂𑒭𑒰↓ 𑒣𑒳𑒩𑒳↑𑒭𑓁। 𑒮↓𑒯↓𑒮𑓂𑒩𑒰↓𑒏𑓂𑒭𑓁 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒣𑒰𑒞𑓂। स भूमिं॑ ग्वंग वि॒श्वतो॑ वृ॒त्वा। अत्य॑तिष्ठद् दशाङ्गु॒लम्॥ 𑒮 𑒦𑒴𑒧𑒱𑓀↑𑓅 𑒫𑒱↓𑒬𑓂𑒫𑒞𑒼↑ 𑒫𑒵↓𑒞𑓂𑒫𑒰। 𑒁𑒞𑓂𑒨↑𑒞𑒱𑒭𑓂𑒚𑒠𑓂 𑒠𑒬𑒰𑒓𑓂𑒑𑒳↓𑒪𑒧𑓂॥ हजार माथ, हजार आँखि, हजार पएर संग विश्वकेँ आच्छादित केने अछि, दस आंगुरक गनतीक वशमे नै अछि ओ। प॒द्भ्याग्ँ॑ शू॒द्रो अ॑जायत॥ 𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑒑𑓂𑒿↑ 𑒬𑒴↓𑒠𑓂𑒩𑒼 𑒁↑𑒖𑒰𑒨𑒞॥ पएरसँ शूद्रक उत्पत्ति भेल॥ प॒द्भ्यां भूमि॒र्दिशः॒ श्रोत्रा᳚त्। 𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑓀 𑒦𑒴𑒧𑒱↓𑒩𑓂𑒠𑒱𑒬𑓁↓ 𑒬𑓂𑒩𑒼𑒞𑓂𑒩𑒰↑↑𑒞𑓂। मुदा पएरेसँ भूमियोक उत्पत्ति। ❀ (White Florette- innocence and purity) ☸ (Wheel of Dharma) ࿕(Swastik) 𑓅 (Gwang ग्वंग- two small circles connected by u and a dot placed over it, used in reference of Vedic texts) ꣼ (सिद्धिरस्तु, सिद्धम 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒱𑒩𑒮𑓂𑒞𑒳, 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒧 Devanagari Anji) ঀ (Bengali Anji, Siddham) 𑒀 (Tirhuta Anji, Ankush of Ganeshji, placed at the beginning of something) 𑒀

१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.अंक ३८८ पर टिप्पणी १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय "स्वप्नसुन्दरी एण्ड द मैजिकल बर्ड्स ऑफ मिथिला" (गीता धर्मराजन, कथा, १९९६) मिथिलाक टुनमुनिया राजकुमारी स्वप्नसुन्दरीकेँ गाबैबला चिड़ै सभ बड्ड पसिन्न छलै। मुदा ओ माछ, बकड़ी आ गाय सभकेँ सेहो चिड़ै बना दैत छली। प्रजा सभ राजकुमारीकेँ उपराग देलक, राजकुमारी रूसि गेली आ चिड़ै बनेनाइ बन्न कऽ देलनि। ओ महलसँ बाहरो नै अबै छली। जादूबला देश मिथिलासँ जे बाँचल चिड़ै छल सेहो निपत्ता भऽ गेल। जनीजाति खेतमे अखनो गबैत छली, मुदा बिनु रङ-बिरङक चिड़ैक ई मिथिला आब ओ मिथिला नै लगैत छल। आ फेर आयल गाछक पैकार सभ, बिनु चिड़ै गाछक कोन काज, ई गप लोक सभकेँ बुझा, ठकि कऽ ओ सभ मिथिलाक सभटा गाछकेँ काटि कऽ लऽ गेल। जनीजाति सभ, सभटा जुगति भिड़ेलनि जे किछु गाछ बचि जाय, मुदा से भऽ नै सकल। बिनु गाछक सभटा धार सुखा गेल। बिनु गाछक लोक सभ होइत गेल गरीब आ पैकार सभ होइत गेल धनीक। जनीजाति सभ गेलीह राजकुमारी लग, कनैत, कहैत जे राजकुमारी, मदति करू, हम सभ गलत छलौं। स्वप्नसुन्दरी बैसल छली अपन कोठलीमे, जतऽ चारूकात देबालपर छल रङ बिरङक चिड़ै सभक चित्र। ओइ चिड़ैक चित्र सभकेँ देखैत मिथिलाक राजकुमारी स्वप्नसुन्दरी उदास भऽ बजली- नै, अहीं सभ ठीक छलौं। खाली चिड़ै हमरा सभकेँ प्रसन्न नै राखि सकैए। मुदा जनीजाति सभ बजली- बिनु चिड़ै सेहो हम सभ प्रसन्न नै रहि सकब, ओ चिड़ै सभ घुरा कऽ आनि दिअ राजकुमारी। मुदा राजकुमारी ततेक उदास छली जे ओ जादू नै कऽ सकली। तखन जनी-जाति सभ कहलन्हि- चिन्ता नै, हम सभ गाछ रोपब आ गाबैबला चिड़ै सभ घुरि आओत। आ ऐबेर ककरो बेइमानी सेहो हमरा सभ नै करऽ देबै। आ बताह सन खटऽ लागल सम्पूर्ण मिथिला। ककरो कोनो पलखति नै, आ ओ सभ गाबि कऽ नाचि कऽ रोपऽ लागल आ पटबऽ लागल गाछ। आ गाछ जेना-जेना बढ़ऽ लागल आ चकरगर होइत गेल सभ हँसऽ लगला, आ थोपड़ी पारऽ लगला। संग मिलि कऽ काज केलासँ हुनका सभकेँ खुशी होइन। आ ऐ सँ गाछो सभ नीकसँ आ जल्दीसँ बढ़ऽ लागल। आ स्वप्नसुन्दरीक देश मिथिलामे छोट-पैघ गाछ सभ मुस्की देमऽ लागल चारू कात। जादूबला संगीत चारू दिस पसरि गेल।  लाल रङक, जोमक रङक, अकासी, पीअर, गुलाबी आ पनिसोखा सन सात रङक चिड़ै सभक डेरा बनत ई। राजकुमारी कहलनि जनीजाति सभसँ- हमर देशक बचियासभ पाठशाला जाथि, ई हमर सभ दिन सँ सपना अछि। जनीजाति सभ बजली- हँ राजकुमारी, जँ हम सभ पढ़ल लिखल रहितौं तँ कोनो पैकार हमरा सभकेँ ठकि नै सकितय। मुदा आयल एकटा झमेल। जनीजातिमे सँ किछु कहलनि- मुदा तखन घरक काज के करत? तखन मिथिलाक राजकुमारी आदेश देलनि- बालक सभ बालिकाक काज सीखत आ बालिका सभ बालकक काज। मिलिये-जुलि कऽ आगाँ बढ़ैमे सभकेँ नीक लागत। आ स्वप्न सुन्दरी सभ पढ़ैबाली बालिकाकेँ देलन्हि एकटा साइकिल। स्वप्न सुन्दरी बुझेलखिन्ह- संसार भरिमे ओ सभ प्रसन्न छथि जे एक-ठामसँ दोसर ठाम जल्दी पहुँचि जाइ छथि, कारण तइसँ ओ सभ सभटा काज जल्दी-जल्दी पूरा कऽ लै छथि। जनीजाति सभ पुछलन्हि- की हम सभ साइकिल नै चला सकै छी? राजकुमारी कहलन्हि- किए नै? महिलाकेँ ओ सभ काज करबाक चाही जे ओकरा नीक लगै छै। किछु गोटे राजकुमारीसँ पुछलन्हि- मुदा टाका कतऽ सँ आओत? मुदा सभ ओकरा दबाड़ि देलक। सभटा काज राजकुमारिये करती? आ लगेलक सभ एकटा बड़का मेला। पाइ जमा भेल, आ बनल राजकुमारी स्वप्नसुन्दरीक पाठशाला। पाठशाला करैए जादू, ओतऽ बच्चा सभ जा कऽ बनि जाइत अछि जेना होथि रङ-बिरङक चिड़ै । अहूँ किए नै अबै छी पाठशाला राजकुमारी? राजकुमारी एक दिन पाठशाला एली, दोसर दिन एली आ सभ दिन आबय लगली। आ फेर ओ कहलनि जे बच्चा सभक माय बाबू सेहो आबथु पाठशाला। आ फेर राजकुमारी फेरसँ करऽ लगली जादू। मुद ऐबेर ओ खाली बेकार चीज सभकेँ बनबऽ लगली चिड़ै। आ बहुत रास  कएक रङक पाँखिबला चिड़ै सभ सेहो घुरि आयल अछि मिथिलामे, बिनु जादू कयने।  सभ अपना लोलमे एक-एक हजार पोथी लेने, उल्लास आनैबला पोथी सभ, लाल, गुलाबी आ अकासी रङक। लाल,  जोमक रङक, पीअर, गुलाबी आ पनिसोखा सन सात रङक, कारण रेतक स्थान लऽ लेलक अछि हरियर कचोर गाछ सभ। आ चिड़ै सभ गाबि रहल अछि- बिनु ज्ञान सुन्दरता अछि सुखायल धार सन। आ ओइ टुनमुनिया राजकुमारीक मिथिला बनि गेल विश्वक सभसँ बेशी हरियर आ प्रफुल्लित देश। लोक सभ तँ ईहो कहैत छथि जे अही चिड़ै सभक कारण मिथिलाक हबामे रहैत अछि जादू सदिखन। आ जँ कहियो हमरो सभकेँ भेटि जाय एकटा एहेन स्थान, जतय महिला आ पुरुख सोचि सकथि पैघ-पैघ गप! ई जादूबला स्थान हमरा सभक लगे-पासमे तँ नै? ई स्थान जतऽ जादूबला बौस्तु सभ अछि, हमरे सन साधारण लोकक भितरे तँ नै अछि? जँ अहाँकेँ भेटय ई स्थान, जतऽ कतौऽ, तँ सूचित करू हमरा हमर ई-पत्र सङ्केत editorial.staff.videha@gmail.com पर। -Gajendra Thakur, editor, Videha (be part of Videha www.videha.co.in -send your WhatsApp no to +919560960721 so that it can be added to the Videha WhatsApp Broadcast List.) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १.२.अंक ३८८ पर टिप्पणी लक्ष्मण झा सागर बहुत नीक अंक भेल अछि।शुभकामना!! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.गद्य २.१.आशीष अनचिन्हार- की तारानंद वियोगीजी मंचपर अप्रमाणिक वाचन करै छथि? २.२.परमानन्द लाल कर्ण-फागुन मासक एकादशीक माहात्म्य २.३.प्रवीण नारायण चौधरी- मैथिली भाषा जिबैत रहत लेकिन केना? २.४.लालदेव कामत- पोथी चर्चा : सभ्यताक भ्रम/ अष्टदल/ श्रमिक हितक उपाय होय/ जीवनी अनुवाद 'क एक पोथी/ हमरा गामक पहिलुक बाईसकिल (लघुकथा) २.५.रबीन्द्र नारायण मिश्र- ठेहा परक मौलाएल गाछ (धारावाहिक) २.६.कुमार मनोज कश्यप-संवेदना २.७.प्रमोद झा 'गोकुल'-जिन्दाबाद २.१.आशीष अनचिन्हार- की तारानंद वियोगीजी मंचपर अप्रमाणिक वाचन करै छथि? आशीष अनचिन्हार, संपर्क-8876162759 की तारानंद वियोगीजी मंचपर अप्रमाणिक वाचन करै छथि?

तारानंद वियोगी द्वारा लिखित पोथी "मैथिली कविताक हजार वर्ष" केर आलोचना हम 'की अप्रमाणिक आलोचना एवं इतिहास केर लेखन करै छथि तारानंद वियोगी?' केर शीर्षकसँ केने रही जे कि विदेहक अंक 383, 1 दिसम्बर 2023 केँ प्रकाशित भेल रहै। एहि आलेखमे वियोगीजीक लेखनकेँ अप्रमाणिक सिद्ध कएल गेल रहै आ ओहीमे हम लिखने रही जे वियोगीजी यत्र-कुत्र मंचपर अप्रमाणिक वाचन करै छथि ताहूपर हम कलम चलाएब। एवं ओहि आलेखमे जतेक हम प्रमाण देने रही ताहिमे हम विद्यापतिक गीतमे जे छंद छै तकरा हम आगूक आलेख लेल छोड़ने रही। से हम एहि आलेखमे विद्यापतिक गीतमे छंदक प्रमाण दैत वियोगीजीक वाचनकेँ अप्रमाणिक सिद्ध करब। 1 अक्टूबर 2023 केँ कोलकातामे एकटा स्वचालित गोष्ठी (अकास तर बैसकी)मे तारानंद वियोगी बाजल रहथि जे "विद्यापतिक गीतमे छंद नहि छै" माने विद्यापति सेहो अपन मैथिली रचना लेल छंदकेँ तोड़ि देलनि। हुनक ई अतथ्यात्मक भाषण ओहि लाइभ भेल रहए जकरा ओहि गोष्ठीमे शामिल अशोक कुमार झा 'भोली' (फेसबुकपर भोली बाबा केर नामसँ) लाइभ केने रहथि। मुदा बादमे ओ लाइभ भीडियो तकनीकी कारणसँ हटि गेलै। से जे किछु ओहि गोष्ठीमे ओकर संयोजक कामेश्वर झा 'कमल' सेहो उपस्थित रहथि। ओ लाइभ आन लोकक संगे हमहूँ देखने-सुनने रही मुदा हम ओकरा सेभ नहि कऽ सकलहुँ। ओना हमरा लग विद्यापतिक गीतक लगभग 12-13 टा संपादित (अलग-अलग संपादक द्वारा) पोथी अछि। मुदा तारानंदजीक कथनकेँ अप्रमाणिक सिद्ध करबाक लेल हम जाहि पोथीक चयन केलहुँ अछि से डा. रामदेव झा एवं मोहन भारद्वाज द्वारा संपादित ओ "साहित्य अकादमी" द्वारा प्रकाशित 'विद्यापति गीत संचय'। अही पोथीकेँ चुनबाक लेल हमरा लग दू गोट तर्क अछि- 1) विद्यापतिक गीतमे छंद परक काज अधिकांशतः पं. गोविन्द झा केने छथि। आ हुनक एहि काज लेल तारानंद वियोगी जी जे-जे कहने छथिन से सभ वियोगीजीक विद्यापतिक प्रसंगक आन सभ लेखमे देखल जा सकैए। एहन स्थितिमे हम जानि-बूझि कऽ गोविन्द झा जी बला पोथी कात केलहुँ जाहिसँ वियोगी जी लग कोनो बात कहबाक अवसर नहि रहनि। 2) दोसर कारण ई जे सौभाग्यवश जाहि पोथीक प्रकाशन साहित्य अकादमी केने अछि ठीक ताही अकादमीक मंडलीमे अकादमीक दुर्भाग्यवश एखन वियोगीजी सेहो सदस्य छथि। हमरा लग ई अवसर अछि जे एक लोक जाहि संस्थाक सदस्य छथि सएह संस्था विद्यापतिक गीतकेँ की बूझि प्रकाशित केने छै से हम पाठक लग राखी। ऊपरक दू कारणसँ हम "साहित्य अकादमी" द्वारा प्रकाशित 'विद्यापति गीत संचय' (प्रथम संस्करण-1999) चुनलहुँ। आ एहि आलेखक सभ उदाहरण अही पोथीसँ लेलहुँ अछि। आब हम पाठक लग कतिपय उदाहरण राखब। प्राचीन रचना एवं विद्यापतिक गीतक प्रतिलिपि करबामे जे दिक्कत छै, खंडित पांडुलिपिक जे दिक्कत छै, एवं ओहि समयक छंदक जे नियमवाली छै से हम वियोगीजीसँ संबंधित पहिने केर आलेखमे देने छी से पाठक ओकरा देखि सकै छथि। दिक्कत तऽ ईहो छै जे ओहि समयमे प्रचलित बहुत रास छंदक विवरण आब नहि भेटैत छै आ तकरो अनेक कारण छै। मुदा नै भेटै छै विवरण तँइ ई मानि लेब जे छंद छहिये नहि अथवा अमुक रचनाकारक रचनामे छंद नै छै से कतहुँसँ उचित नै। ई बहुत रास कथित प्रगतिशील रचनाकारक धारणा छनि जे अमुक छंद तोड़ि देलकै। ई कथित प्रगतिशील सभ बिना पढ़ने बयानबाजी करैत रहैत छथि। वास्तविकता तऽ ई छै जे छंदक परिवर्तन होइत रहलै सभ समयमे। पुरान छंद सभ जीहन अनुकूल नहि भेलासँ ओकरे परिवर्धन कऽ नवका छंद बनलै। गायत्री, अनुष्टुप, जगती आदि केर बदला हरिगीतिका ओ चामर आदि एलै आ बादमे हरिगीतिका वा चामर केर बदला मात्रिक छंदक दोहा-रोला-चौपाई। आब किछु रचनाक उदाहरण देखल जाए- गीति छन्द (30 मात्रा)क विभिन्न उपभाग अछि जाहिमेसँ एकटामे रचल विद्यापति गीत संचयक पहिल गीत देखू (पाठककेँ हम सूचित करी जे गीति छंदक गणविधान 12-18 अछि) तँइ ई गीति छंदक उपभाग अछि- अगमने पेम गमने कुल जाएत चिन्ता पङ्क लागलि करिनी। मोञे अबला दह दिस भमि झाखञो जनि बेआध डरेँ भिरु हरिणी।। पूरा गीत पाठक पोथीमे पढ़ि सकै छथि। पहिल गीत देबाक हमर अभिप्राय अतबे जे वियोगीजी ई नै मानथि जे बीच-बीचक कोनो एकटा गीतमे छंद छै आ बाँकीमे नै। ओनाहुतो पहिल प्रतीक रूपमे लेलहुँ आब हम बीचक गीत सभ दैत चलब। पाठककेँ जाहि ठाम शंका बुझेतनि ओ अइ संचयक कोनो गीत हमरा पठा सकै छथि। एहि संचयक छठम गीत 24 मात्राक हिसाबें अछि। 24 मात्रा बला बहुत रास छंद छै जेना ललिता, चंद्रलेखा, सालभंजिका, उत्साह, करभक, रोला, इंद्रगोप आदि। मुदा सभहक गणविधान एवं यति-गति अलग छै। एहि छठम गीतक हरेक पाँतिमे 15-9 केर संयोगसँ 24 मात्राक पाँति अछि। शायद ई गणविधान दीर्घकाल धरि नै चलि सकल हएत। आ तँइ एकर सटीक नाम हमरो लेल कठिन अछि। तथापि गीत देखी- अपत विपत तरु पाओल रे पुन नव नव पात। विरहिन नयन बिहल बिहि रे अविरल बरिसात। पूरा गीत पाठक पोथीमे पढ़ि सकै छथि। एही संचयक 7म गीत गीति छन्द (30 मात्रा)क विभिन्न उपभाग अछि जाहिमेसँ एकटामे अछि- अपनेहिँ पेमक तरुअर बाढ़ल कारन किछु नहि भेला। साखा पल्लव कुसुमेँ बेआपल सउरभ दह दिसि गेला।। पूरा गीत पाठक पोथीमे पढ़ि सकै छथि। एहि संचयक 26म गीत गीति छन्द (30 मात्रा)क उपभाग अछि- आकुल चिकुरेँ बेढ़ल मुख सोभ राहुल कएल ससिमण्डल लोभ। पूरा गीत पाठक पोथीमे पढ़ि सकै छथि। 33म गीत सेहो गीति छंदक उपभाग अछि- आदरे अधिक काज नहि बन्ध माधव बुझल तोहर अनुबन्ध पूरा गीत पाठक पोथीमे पढ़ि सकै छथि। 52 म गीत सेहो गीति छंदक उपभाग अछि- कण्टक माझ कुसुम परगास भमर विकल नहि पाबए पास। पूरा गीत पाठक पोथीमे पढ़ि सकै छथि। 70 म गीत आर्या छन्द (12-18-12-15) क उदाहरण अछि- कामिनि करए सनाने हेरतहिँ हृदय हनए पँचबाने। चिकुर गरए जलधारा जनि मुखससि डरेँ रोअए अन्धारा।। पूरा गीत पाठक पोथीमे पढ़ि सकै छथि। 122 म गीत आर्या छन्दकेँ उन्टा कऽ बनल अछि आ एकर नाम ताकब हमरा लेल कठिन अछि, एकर गणविधान अछि (15-12-18-12) आ गीत अति प्रसिद्ध अछि- जय जय भैरवि असुर भयाञुनि पशुपति भामिनि माया। सहज सुमति वर दिअ हे गोसाञुनि अनुगत गति तुअ पाया।। पूरा गीत पाठक पोथीमे पढ़ि सकै छथि। 208 म गीत अभिराम (अहीर) छंदमे छै- मधु ॠतु मधुकर पाँति मधुर कुसुम मधुमाति। पूरा गीत पाठक पोथीमे पढ़ि सकै छथि। विदित हो जे भारतीय शास्त्रीय संगीतमे एक राग केर नाम सेहो अहीर राग छै। बेसी उदाहरण देब हमरा अभीष्ट नै। एहि लेखमे संक्षिप्त रूपेँ हम देखेलहुँ जे विद्यापतिक गीत सेहो छंदयुक्त अछि। ईहो बात हम स्पष्ट रूपसँ गछैत छी जे एहिपर बहुत रास काज हेबाक चाही। तखने जा कऽ बात पाठक लग स्पष्ट हेतनि। हम जतेक एहि पोथीक गीतकेँ देखलहुँ अछि ताहिमे हमरा 30 मात्राक आधिक्य बुझना गेल अछि। अनुसंधानकर्ता लोकनि लेल ई एकटा नीक सूचना भऽ सकैए आ ओ गीति छंदक विभिन्न उपभाग केर छान-बीन कऽ सकै छथि। पहिने हम वियोगीजीक लेखन अप्रमाणिक सिद्ध केने रही आ एहिठाम हम हुनक वाचनकेँ सेहो अप्रमाणिक सिद्ध केलहुँ। एहि प्रकारे ई सिद्ध भेल जे तारानंद वियोगीजीक संपूर्ण साहित्य अप्रमाणिक अछि। आ एहन अप्रमाणिक साहित्य जा धरि मैथिलीमे रहत ता धरि मैथिलीकेँ नोकसान पहुँचाबैत रहत। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.परमानन्द लाल कर्ण-फागुन मासक एकादशीक माहात्म्य ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.प्रवीण नारायण चौधरी- मैथिली भाषा जिबैत रहत लेकिन केना? प्रवीण नारायण चौधरी मैथिली भाषा जिबैत रहत लेकिन केना?

भाषा मे राजनीति घुसेबाक काज करैत अछि लोक। से मैथिली केँ राज्यविहीन बुझि आर बेसी करैत अछि। पहिने भारत मे कयलक। आब नेपाल मे भ रहल अछि। तैयो मैथिली भाषा अपन प्राचीनता आ परिपूर्णता सँ बाँचल अछि। कनी निम्न बात पर गर करय जाउ: *नेपाल के जनगणना तथ्यांक आ भाषाक स्थिति देखू। 2068 के जनगणना पूर्व शासकवर्ग के कुटिचाइल सँ रौतहट-सर्लाही-बारा-परसा आदिक जिला मे बज्जिका के हवा बहल। आइ ई कथित बज्जिका भाषाभाषी लगभग 8 लाख छथि। *2078 के जनगणना सँ पूर्व शासकवर्ग एकलभाषा नेपाली के वर्चस्व कायम रखबाक लेल मैथिली के दावेदारी केँ आर खण्डित करबाक बदनीयत सँ एकटा नवका हल्ला चलेलनि 'मगही' भाषा के। सुनबे कयल जे ई मगही भाषी के भेलाह, कोना भेलाह आ कियैक भेलाह। बस भ गेलाह। करीब 30 हजार के संख्या पुरा लेलाह। भाषण भ रहल अछि, संरक्षण चाहियनि, बजट उठा अभियान चला रहल छथि। बेसीकाल मगही के म तक सँ अपरिचित एकलभाषा के साहूजी लेखक-कवि सभक संग संवर्धन मे आ सत्तालोलुप राजनीतिक अगुआ सभक गोल गोल गप सँ मगही सेहो जल्दिये लाख कि करोड़ पहुँचय के सम्भावना अछि। *एक गोट तथाकथित वैज्ञानिक आ लंका के सबसँ छोट उनचास हाथ वला नेताजी मधेश अलग देश बनबैत जेल-नेल भोग सँ बचलाह त सीधे मैथिली केँ अनाथ भाषा बुझि पूरे घपच करय लेल फेर एकटा नवका बहस 'मधेशी भाषा' के चला देलनि। कतेको थोपड़ी बजेनिहार एहि झुनझुना केँ झुनुक मे 'आय-हाय' गबैत झुमिते छथि। तर्क चलिये रहल अछि। *राष्ट्रीय भाषा आयोग द्वारा 5 वर्ष के कार्यकाल पछाति देल गेल सिफारिश मे सब बात खोनिचा छोड़ा कहले गेल अछि, केकर दावी, कोन भाषा, केहेन स्थिति आ केना केना बनय सरकारी कामकाज के भाषा। *हिन्दी मोह बड़का बड़का नेताजी केँ केना घेरने छन्हि से देखबे कयलहुँ जनकपुर मे, उद्घाटन समारोह मे। आब मैथिली जियय केना? बस, अपने सब जेहेन अभियानी आ अनेकों सर्जक संग सृजनक श्रृंगार सँ जियेने रहबै। किछु बात आर देखू - *आइ एकलभाषा वर्चस्व सँ नेपाली भाषाभाषी समाज मालिक बनल अछि, तथाकथित मुक्तिगामी राजनीति कयनिहार नेता आ जनता ओहि भाषा मे अलर मलर करैत सम्मान ताकि रहल छथि। गुलामी के आदत वला लोक मुक्ति आ संघीयतावादी हेबाक झूठक नारा लगबैत छथि, नेपाली राष्ट्रीयता मे अपन खोखला स्वामित्व तकैत छथि। *नेपाली सँ मुक्ति आ हिन्दी केँ समर्पण वला दोसर दुर्नीति के बात करनिहार मुक्तिगामी आ संघीयतावादी हेबाक ढकोसला स्पष्ट अछि। *बज्जिका त 2068 सँ 8 लाख के भाषा बनि गेल, उपलब्धि कि सब हासिल कयलक से तथ्यात्मक विश्लेषण करबय त हाथ लागल शून्य मात्र भेटत। हँ, गोटेक लोक केँ एहि नाम पर कुकुर-हड्डी-चखना भेटब त चमचागिरी वला लेल होइते छय। ताहि सँ बेसी की? पाठ्यक्रम नहि, व्याकरण नहि, शब्दकोश नहि, साहित्य नहि, सचेतनता नहि, समग्रता नहि, त सभ्यता सेहो नहि, बस बज्जिका के बजाओ झुनझुना ततबी। त निष्कर्ष यैह जे मैथिली भाषा अपन मार्ग पर अपने चलत, सृजनक बल जिबैत रहत। ॐ तत्सत! हरि: हर:!! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.लालदेव कामत- पोथी चर्चा : सभ्यताक भ्रम/ अष्टदल/ श्रमिक हितक उपाय होय/ जीवनी अनुवाद 'क एक पोथी/ हमरा गामक पहिलुक बाईसकिल (लघुकथा) लालदेव कामत पोथी चर्चा : सभ्यताक भ्रम/ अष्टदल/ श्रमिक हितक उपाय होय/ जीवनी अनुवाद 'क एक पोथी/ हमरा गामक पहिलुक बाईसकिल (लघुकथा) १ पोथी चर्चा : सभ्यताक भ्रम कविवर श्री राज किशोर मिश्र जी स्वयंम अपन रचल २२ गोट नव कविता 'क पोथीके प्रकाशक छथि,जे २०२३ मेँ सभ्यताक भ्रम " कविता संग्रह " भारतमे छपेलनि अछि। ऐ पोथीक ३०० टाका दाम रखने छथि,जाहिमे १२० पृष्ठ छैक। कवि श्री मिश्रजी अनेकों विधामे रचना करैत आबि रहल छथि। मैथिली साहित्यक समकालीन आशु कवि श्री मिश्रजी 'क विषयमे पाठकगण केँ किछ जनतब पोथीक अंतिम पन्नापर भेटैत अछि। आओर कवि पोथी मादे स्वंय पुरोवाक् लिखैत संक्षिप्त जनतब देबाक काज सेहो सुधी पाठक लेल सुलभ कयलनि अछि। आई एस बी एन प्राप्त हिनक काव्य पढैतकाल मोन अपन सभ्यता 'क प्रति उछलऽ लगैत छैक। अर्थात ई बूझल जाए जे मनेमोन आनन्द विह्वल भ' जाईत छैक। से एहन रूचिकर कविता पाठ शूरू करैत आखरी पाठधरि कोना लगले पहुँच जायब- से थाहे नै चलत । आरो एहने कविता परायण करबाक मोन लगले छटपटाईत रहत। कविताक निहितार्थ भाव सौन्दर्य बढ़ सौष्ठव भेल छन्हि। मानव सभ्यता पाषाण युगक खोंह सँ आरंभ होइत ,डेगाडेगी सिन्धु नदीक तट सँ बढ़ैत काशीक महामसान धरि पहुँचैत छैक। अध्यात्मिक मार्ग सँ नापू तँ पहिले वनबासिक पर्णकुटी सँ ग्रामीण शिल्पकार- दस्तकार'क माँटिक बासन आ बाँसक पथिया धरि प्रगति पथ पर अग्रसर होइत राजाक सिंहासन धरि पहुंच बनेबाक उत्कर्ष यात्रा करैत अछि। धार्मिक जनचेतना'क अनुसारे ई मानवीय वौध्दिक प्रगति शाँतिक मर्यादा लेल चण्डिका , दुर्गा सप्तशती केर देवी कवच अर्रगला कुण्डल असुर भयाउनि भगबतीक परिकल्पना करैत भक्तिक गाथाधरि गबैत बढ़ैत अछि। अधिकतर मिथिलावासी वा कहू भारतवंशी अपन अराध्य देवताके सामाजिक कन्ट्रोलक बटन रूपमेँ उपयोग करैत रहैत छैक। ओना सब धर्म- मज़हबमे ईश्वरीय क्षमताक पराकाष्ठाक महौत दैत सब जीव- जन्तुमे मानवकेँ सर्वोपरि स्थान देलक अछि। तेँ मानवके जाइज - नजाइज बुझबाक एकटा सामूहिक ताना-बाना ' समाज' शव्द सँ अभिहित कयल गेलैक। शास्त्रीय वर्णन आ संस्कृतिक अंग रूपेँ मानवके स्वम् चेतना कायम रहय आ तक्षशिलाक आचार्य सँ अर्थ शास्त्रक अभिज्ञान बढ़लनि जे खगोलीय ज्ञान आ विज्ञानक शोध तथा आर्यभट्टक गणितीय दशमलव धरिक अनुसंधान कयल गेल अछि। सभ्यतामे हवाक दिशा आ अर्थतंत्रक मोहाएल राजतंत्रक वैभव सँ प्रजातंत्रक भव्यता दिश उन्मुख भेल, मानव अपना विशिष्ट सभ्यता मेँ सकुशल रहल। आब ओ कुशलता विश्व मानवके रूममे देश- देशान्तरक सीमा सं उपर उठि शीर्षस्थ भेल देखाईछ। तेँ पहिरबमे अन्तर ; पीताम्बर सँ जींसक बीच , संयमित मोन; रभसल मोनमे परिणित होईत गेल। पछमि सभ्यताक देखौंस एतय आबि अपना चपेटमे लेलक अछि। वेद - ऋचा सँ ओभरटेक करैत जीवन शैली'क नवधव सिध्दांत पकरलक हन्। कवि पाँति देलनि अछि :- ....... कैक्टस- धाधर सँ भालरि काँपल डिस्को रेबारल,सोहर खेत छोड़ि , चाँचर पड़ाएल अरिपन पर अंग्रेजी मोहर । ,...... एहि तरहेँ मानव सभ्यताक' भ्रममे निश्चय पूर्वक जकड़ल जा रहल अछि। मूल डीह ,कुल- गोत्र सँ अछिनरे सिनेह रहैक ; मुदा आब संसारके आशाक जे ढंकी छै ,ताहिठाम भारी अंतर देख कवि चित्कार कऽ उठलाह अछि -: .....सूगरक खोभाड़ सँ किकयेबाक गर्द अनघोलमे , कार- शोरूमक भीतरमे मर्सिडीज - क्रयक मोलमे ।..... जल - थल- नभ आ अंतरिक्षमे जगह बनौने मानव आब केम्हर चौवटिया सँ निकैल भरमाएल सभ्यताक जानि नै कोनय पहिया घुमौत ? कवि जीक कलम विविध विषय पर चलल छैन, महानगर ' कविता ' मेँ एक ठाम ओ कहैत छथिन -: हेराइत, बौआइत, ढहनाइत लोक सभ सं सभ अछि अनचिन्हार गोत्र कुल आ गाम नहिं एत्त एत' पाई पव, जोगार - रोजगार। गाम सँ पलायन करैत लोक शहर पकड़ैत ,नोकड़ी - चाकड़ी आ कोरोबार वेपारक अवसर पाबैत ओ औतहिके बनि रहि जाइछ। शहर सँ बेर -बेर देहात गाम आओत से समय कहाँ छैक? समयेक अभावे परिबारिक आन सदस्य पढैत - लिखैत के कतय दिनभरि आ अर्ध रात्रि धरि रहैछ ; तकर पत्ता मोवाईले सँ चलैत छैक। पढुआ बबुआन अपन सहपाठी कहियौ अथवा गर्लफ्रेंड सँग बेसी समय बितबैत छैक। एक एकटा परिवारक गार्जन जेकाँ छह -छ: मास सँ अधिक समय धरि लड़की ओहिठाम बिनु व्याहल लड़का अड्डा जमाबैत रहैछ। आ से माता- पिता अनजान बनल रहैछ। वैवाहिक सुत्रमे ५०% तँ युवक - युवती बन्हायत छैक, मुदा ५०% टेबैते - देखैते बायफ्रेंड कतेको बेर बदलैत छैक। एहन चिन्ताजनक स्थिति पर परोक्षरूपेँ प्रहार करैत कवि पाँति गढ़लनि अछि -: महानगर के कौओ होइत छैक बढ़ चलाक, छोटो बात पर भऽ जाईत छै एतय तलाक। दोसर पाँतिक गरहैन द्रष्टव्य -: पानि बिकाइत अछि ,कोखि बिकाइत अछि बिका रहल अछि रौद- बसात अपनो लेल नहि समय छै लोकके गाड़ीक स्टेरिंग पर भोजन - भात। महानगरके बनाबट देखब तँ बुझाएत एहिमे कतेको नगर समाएल छैक। कंक्रीटसन गाछ सँ सघन छैक सगरो। ई व्यापरक बिराट डीह आ रोजगारक अति सुन्दर नन्दन वन थीक। इहो कहि सकैत छी जे नोकड़ीक स्वप्नलोक आ अलकापुरीमे कुबेरक धन प्रयाप्त रहने लोकक धरोहि मेट्रो टीशन पर संगहि सड़क पर ट्रक - टेम्पूक जाम लागल देखाईछ। अति व्यस्त शहरके जीवन-यापन सँ भिन्न भारतके गाम अछि। आब ताहूठाम नगर जेकाँ अन्तरजातीय वियाह पुनैग रहल छैक। ओना ग्राम्य समृद्धि दिश उन्नति केलक हन। मुदा दलिदर शिर्षक सँ कविता मेँ कवि जे पाँति देलनि से मोनककेँ औंटैत - पौरैत रहत। यथा -: जीर्ण कुरता पर चेफरी कतेको, गाम - ठाम ओकर धोती फाटल, दरिद्रताक अछि चित्र बनाओल, खोपड़िक चार पर पन्नी साटल। अपवाद छोड़ि आब गामो - घरक समान्य लोकक भेष - भुषा आधुनिकता दिन बढ़ैत संभ्रांत बुझाइत अछि। मुदा श्रमिक वर्गके देह पर पैनजाबी परिधान स्त्री-पुरुषमे आबि गेल छैक। मिथिलामे गोल गलाक जगह टीसर्ट -बुसर्ट आ पैजामा फुलपेन्ट ओ जिन्स- जैकेट अलैक । उमरदराजो लोकनिके शहरी वृद्ध सन हाफपेन्ट पहिरने बुलैत- घुमैत देख आब अचरज नहि लागत। स्वच्छ सादगी परिधानक जगह रंगीला छींट आ नव डिजाइन वस्त्र पहिरन देखल जाईछ। घरे पर कुरीयर सँ आर्डर पर जात- बरात जाए ले बा मेलाठेलामे किछ चिन्हलो लोक भकचका जाईछ। अन्न आ वस्त्र क' अभाव जे एहि पोथिक प्राणवायु बना पाठक बीच विद्रुपताक वइन्दउ दिश आकर्षित करत तँ सहजे मोन नै मानत! कारण आब अन्न बेतरे कियो नहिँ मरैत य आ लता - कपड़ाके अभावे कियो नै कठुआइत अछि। मोइल कुचल केँ जगह पर साफ ओ आयरन कयल वस्त्र एक बोनिहारोक धियापुता परिबारक लेल ताना उतार केने रहैछ। शहरमे तँ मृतकक पोशाक सस्त वजारमे बिका जाईछ,मुदा गामघरमे मूईल लोकक पहिरल डेबल नीक आ मजगूतो वस्त्र केँ पौनी पसारीन धरि नै लेत। एहन परिवर्तन केर अख्यास विगत दू दशक सँ अनुभव कर रहल छी। ओना हिनक कविता मनोयोग पूर्वक पढय लायक छैन। अपना बीच समाजमे स्थापित ओ प्रमाणिक जे विचार अदौ सँ चलैनसारिमे रहय से आब नव पढ़ल - लिखल जागरूक जनताक बीच रीति-रेवाजमे शिष्टाचारक' आचारमे ,टुटल आस्था आ महिमाक भंगिमाक विरुद्ध वातावरण बनि गेल छैक। तेँ कविजीकेँ फुराईत छैन -: गाम - सहर सभ भ' गेल ग्लोबल एकहि रंग बात सब ठाम परबोधब ककरा ? सुनत के? अछि उखड़ि रहल पुर्वक सब खाम्ह । 'सभ्यताक भ्रम' मैथिली भाषा मेँ पोथी साहित्य सेवी लोक बीच अपन तेबरके संग विमर्श लेल आगू आबि गेल अछि। हम आशु कवि श्री राजकिशोर मिश्र जी सँ आग्रह करबनि, अपन अनुभवके विषयकेँ आनों विधा माध्यम सँ पटल पर आनि, मैथिली साहित्य केर श्रीवृद्धिमे अपन सेवा एक अभियानिके हैसियत सँ सतत् दैथि।

२ अष्टदल वरेण्य साहित्यकार श्री राजकिशोर मिश्र कृत अष्टदल सन् २०२२ मेँ प्रकाशित गल्प'क संग्रह छी। ऐ मैथिली कथा'क पोथीमे १०९ पृष्ठ छै , जेकर किमत २५० टाका अछि। नीक कागतमे भारतमे छपल एहि आकर्षक पोथीक स्वयं कथाकार श्री राजकिशोर मिश्र जी प्रकाशक छथि। आई एस बी एन. प्राप्त प्रस्तुत 'अष्टदल' मे आठ गोट खिस्सा मिजहर छैक। अपना रचना मादे आमुखमे श्री मिश्र जी जनतब दैत पाठक केँ कहैत छथिन - " समाजमे पसरल किछु गलत रेवाज , अंधविश्वास,नव संस्कृति मे सन्हिआएल विसंगति ओ विद्रुपता , वृद्ध लोकनिक अवहेलना ओ उपेक्षा एहि तरहक विषय सभके केन्द्र मे राखि गल्प गुच्छ लिखल गेल अछि।" कथाकार पहिल कथामे 'उतरी ' शिर्षक सँ पेंशनभोगी विधुर मधुरी बाबूक मृत्यु उपरांत हुनका जेष्ठ पुत्र महिकान्त केर गारा सँ कोना उत्तरी टुटल, ताहिक विशद् कर्मकाण्ड आ सामाजिक व्यवस्था विषयक रोचक चर्चा बढ़ शिद्दत सँ राखलाह अछि। महापात्र आ पण्डित जीक पुरौना सँ हकमैत शशिकांत दूनूभाय आ बहिण सहित बहिकरणी (कार्यकर्ती) अजगुतमे पड़ल छै। जीबैतमे बहिकरणी छोड़ि कियो नहिं देखैक आ मुइला पर जुईत फरमेबाले सबके सब उपस्थित रहैक। जयबारक पक्की भोज ले गौआँ महाजन गोकूल बाबू स्टाम्प पेपर पर जत्था घँसा लैत छैक। प्रेत आत्मा 'क योनि सँ पितर कोना बनि गेलथि मधुरी बाबू स्मृति शेष ,से समाजक बीच चलैन सँ कर्जा तर मे पड़ल महिकान्त दूनू भायक वर्तमान आ भविष्य सेहो उतरीक संगहि टुटैत, निर्भूमिए धरि भ' जाईछ। ई मर्मस्पर्शी कथा एकटा संदेश दैत समाजक बीच श्रधान्वित रूपेँ चल- अचल सम्पैत बोहाबैक चेतौनी समक्ष्य आनलक हन। भूत 'कथा' मे भूतही आमगाछी केर पुश्तैनी आदंक कोना धुरहिया गामसँ एक जकरल अंधविश्वास खत्म भेल , से नैका डाकदर चौकपर क्लिनिक खोलि सबहक आंखिधरि फोलैत छैक। झारफुँक ,जन्तरके जगह वैद्याई आ उपचार औषधिके प्रचार बढ़बैत डाकनी - पिशाचनीसँ भयाक्रांत लोकक बीच जागरूकता अबैछ। आम गाछीमे भरिगामक सभ गोटेय अपन -अपन मचान बना ओगरैत बसंतमे नव उत्साह सँ राति बिराति जमल रहल। भगताक तिकड़म के जगह मनोवैज्ञानिक रूपेँ साइकिएट्रिस्ट विभाग सँ जिला अस्पतालमे मरीज पठाकय भूत भगेबाक सफल परियास कथामे देखौल गेल अछि। तेसर कथा ' भिन्न- भिनाउज ' मेँ गामक कुटिचालि सँ एक मधुमय संयुक्त परिवारक कोन तरहेँ छिरियाहट होई छैक, से चन्देसर जीक कण्टिरबा जयनाथ आ जेठ पुत्र भवनाथके बीच देखाएल गेल छैक। दूनू भैयारिक कनियाँ पढल- लिखल आ नीक कुलशीलक रहैत छथिन। मुदा चलल बनल घरमे कोना कनफुसकी सँ दूनू भायके बीच सौहार्दपूर्ण वातावरण मे माहुर फेंटल गेलैक से बाबुओ केँ असहजता सँ पार लगाकय भोजन दैत समय बीतलैक य। जोड़ा बरद सँ नीक खेती बारी चलैक,कपड़ा दोकानक आमदनी आ धानक लहना सँ भेल नफाक चलते गाम आ चहुंदिशनक पड़ोसी गामोमे जाहि परिबारक धाक रहैत छै ,से मान्य पंच आब कतौह के नहिं रहलाह ! वृद्धावस्थामे रूग्ण रहैत बात विवाद आ फसाद सँ दुःखी रहैत छै। भात आ भातृत्व बँटल , भैयारिक फटेदारीमे पिसाईत चन्देसर बाबूके छोट बेटा - पूतौह दुर्गति धरि करैत रहैत छैन,आ फज्हति तँ तखन बुझाइछ ,जखन कियो टोइक दैक - कोन घरक तीमन नीमन बुझाइत अछि! आओर मरय सँ एक मास पूर्वहि पिछरला सँ डांरक हड्डी टुटि गेने डाकदर प्लास्टर करैत छैक से गिंजन ततेक भोगय पड़लैक जे बेटो सभके मल-मूत्र उठबैत घिनाह लागैक। बरिआत ' शिर्षक ' कथामे शाकाहारी दिवाकर जीक बेटी बियाहक वृतांत झलैक रहल छैक। वरजात्री लोकनि दू सय खमखमकेँ पहुंचैत छै। परम्परागत परिछन - घरदुआरी गीतनाद प्रभावित होय छैक- छौरामारहैरक डांस सँ। से स्वागतकर्ता - बारिक सब पर हुकुम चलाबैत प्रायः छोटोसन त्रुटि निकालि दुसैक आ बेर - बेर डँटबो करैक। कोल्डड्रिंक रंगविरंक फल,नमकीन आ मधुरके अछैत पाँतमे माछ आ छागर मौसक खोज सबटा करै। कन्यागत केँ व्यंग्य - कटाक्ष आ फज्फतिओ सहय पड़ैन। सराति पक्षकेँ बढ़ अखड़ैक आगन्तुक अतिथिगणके व्यवहार ओ मनोवृत्ति सँ, मुदा गामक जेठरैयत श्रेष्ठताक कारणेँ करजोड़ि माफी मँगैत निरामिष भोजन करबाक आग्रह करनि। तैयो बरातिक आक्रोश आकाश छुने जाइक। बाजैक महादरिद्रक ओतय आबि गेलहुँ,इयह कहैत भोजन करय सँ कुर्सी टेबुल पर सब हाथ बारने रहलैक; वियाह रोकबा देबाक धमकी धरि दैत देखाएल। युगे बाबूक " अतिथि देवो भव: " केर वाक्य प्रभाव सँ चेतना जगैत छैक। मिथिलामे बरियाति ऐबाक इतिहास मोन पाड़ल गेला सँ सब गोटेय संयमित होईछ,उत्सवक आनन्द बढ़ेलकै। मर्यादा परम्परा एनामे टुटैत सीनेहक अपनापन घटैत जा रहलैक ताहि पर नि:शव्द चेतनाक संदेश जाग्रत भेल अछि। कन्यापक्ष सँ माफीधरि ओ लोकनि मांगैत लज्जित होइत छैक,जे वास्तविकता सँ वर्तमानमे एहेन बुधिगर बात कम होईछ। कतौह- कतौह तँ समाजमे गारि- फज्हैत केर संग माइरपीट तकके दृश्य गाम- गाममे उपस्थित होईत नव कुटमैतीमे दरारि पड़ि जाईछ। करजा 'शिर्षक' कथामे सिंघौली गामक किराना दोकनदार सुन्दर जी समान्य अवस्थाक लोक रहैछ। गामेक स्कूलमे बेटा-बेटी पढ़ैत रहैछ। से एक दिन बेटाक पेटमे दरद उपकैत छै, डाकदर बच्चाक पेटक अपलेसन कराबै कहैत छैन। जाहिमे गोटेक लाख टाका तत्काले कर्ज महाजन कुमर जी सँ उठबय पड़ैत छै। मुदा षड्यंत्रकारी बलवान -धनवान गामक कुमरजीक तुति बजैक समाज मे। से ओकर तीन कठा बाड़ीक मजमुन लिखा लैत , सुइद मासेदिन पर जमा नहिँ भेलासन्ता मूलधन सँ मिश्रधन बनैत चक्रवृद्धि ब्याज चलैत रहैछ। एम्हर दोकानक आमदनी सँ सुईद बेमाक नहिं भ' सकने लठैतक घर डंगेला सँ बाड़ी आ मकान सहित एक कोन छोड़ि सब जमीन सोहा जाईछ। संतोष ई जे बेटा दन्दुरुस्त होई छै। देह - पेट जारिके कहुना खोपरिमे गुजर काटैत सकुन बुझैत य जे माथ पर तँ कर्ज़ा आब नहिं ने रहल। नव संस्कृति 'कथामे' मेँ रामानाथ बाबू शिक्षा विभाग सँ अवकाश प्राप्त कयने रहैत छै । स्नातक पुत्री सपनाक वियाह भ' गेल छैक। जमाय हैदराबाद'क प्राईवेट कंपनीमे एक जक्यूटिव पद पर रहनि। पुत्र मोहन शिमलामे कार्यरत,पुतोह एम ए. पास उच्च पद सँ सेवानिवृत्त बापक बेटी छथीन। शिमलामे बेटा पुतोह हिनका दूनी बुढ़ा- बुढ़ियाके रेलगाड़ी सँ आबि जेबाक आग्रह करैत य। गामक पंचायतीराज चुनाव'क ओलझोल सँ किनारा रहैत रमानाथ बाबू अतिरिक्त स्वास्थ्य लाभ ले बेटा लग जाईत छैक। मुदा ओतय बेटे जहाँति पुतौह सेहो महिला किटी पार्टी सँ हरसमेत व्यस्त रहैछ। डेरा पर दूनू गोटय एसकर उबि जाईत रहथि। रमाकेँ बेटा पूतौहक नबका विचार आब पसीने नै पड़ैन। बेसीकाल बाहरेक भोजन डोसा आ पिज्जा नीक नहि लगैन। पुतोहके कहियो नुआँ पहिरने ने देखलनि तँ माथ पर आँचर कोना रहितैन। मिथिला 'क रीति-रिवाज बिलाएल देखि मैथिली'क प्रति अतिशय अनुराग जगैत छैन,आ सोझे गाम चलि अबैत रहलाह। धरि बेटा एक हाथे ठेहुन छुबि आ पुतौह दुरे सँ प्रणाम कहि अरियातने रहनि। आफिसमे प्रमोशन भेलाक कारणेँ बेटाके गाम आयब कठिनाह बुझाइछ। माय बेमार पड़लो पर बेटा गाम नहिं आबि सकलनि । घरमे ए सी आ फ़िल्टर नहि रहने पूतौह नहि आबय चाहैत छै। नोरे- झोरे दूनू प्राणी गामोमे शहरे जकाँ जीवन जीयैत खेपैत बाप- ददाक जिनगिक मोन पाड़थिन आ एनय सबसँ नाउम्मीद स्वंय परिचर्चा मे लागल रहैछ। बुढ़हीके अस्पताल मे भर्ती करावय बेटा-बेटीकेँ फोन सँ जनतब देलथि। मुदा कियो लग नहि अयलनि । नव अर्थव्यवस्था आ नव सोच - संस्कृतिमे सबके सब ओझराएल देखाईछ। भावना आ संवेदना क' स्तर बहुत नीचाँ खसल अछि। स्वर्गवासी भेलापर रामानाथ बाबू क' अश्रूधारा सँ बुढिक पार्थिव शरीर भीजैत जा रहलैक। रोजगार 'कथा' मे लालचनके ग्रामीण जीवनक' चित्र खिंचल गेल छैक।बाँसबतीक कच्ची घरमे गुजर बसर करैत पाँचकठा खेतीक कास्तकार केँ कोना दू बेटा एक बेटी एक महींस देखभाल करैत जीवन गामेमे वितैत रहलैक। चौक परहक दोकान सबपर कहियोकाल सहायक उठाकाज करैत किछु कैंचा अरजन नगदी रूपेँ सेहो क' लेबाक घरैया लुरि रहैछ। घरवाली सेहो गृहस्थीमे पिच्छर रहनि। धियापुता केँ गामक स्कूल सेहो पढ़य पठाबैक। दिल्ली लुधियाना सँ फल्लानमा - चिल्लाँ जे नीक - नीक कपड़ा लता पहिर अबैत तँ देखकय मोन गुनधुन करय लागैक। लालचनो ट्रेन पकैड़ अनुभव करैत ओतय गौआँ सब लग पहुंचैत य। मैट्रिक पास रहने फैक्टरी म काजो अनसृकिल्ड लेबरक भेटि जाई छै। सब टेक्नीकल काज सीख सुपरवाइजर सँ मिल्लत राखि अपन जीवन स्तर उन्नति पर आनि लैत छैक। गाम आयल तँ ओकर मिश्रित भाषा लोककेँ अनसोहान्त लागैक। किछु पाई संचयन भेलापर मोनमे आबय जे एतय ज़मीन थोड़ेक किन लिअ, अथवा गामेमे पजेबाक मकान सिन्हा ली। गुनधून करैत पत्नी सँ फोन पर विचार सेहो लैत छै। निजगूत ई होईछ भावना सँ जीवन नै चलत । तेँ गामक मोह माया छोड़ि शहरेमे रोजगार क' जड़ि पकैर मिथिला सँ पलायन केलक हन। पत्नी सुशीला पतिक बातक समर्थनमे रहैत सामंजस्य बैसेबाक काज कलीह अछि। दीया पुताके सेहो नीक स्कूलमे नाऊ लिखा देलक। अपने सुपरवाइजर बना जाईछ। एकटा पलाट ल' के' घर बना लेते छै।मुदा गामक मोन पड़ैत यथार्थ दिस तिरोहित भ' जाइक। रुसनी ' कथा' मेँ शेखर आ मालती पर गाम आ शहरके समेकित संस्कृति देखाईछ। ओ पटनामे सरकारी सर्विस करैत पैघ पद पर रहैत ओतय जेठ दूनू पुत्रक आ बेटी अनामिका ग्रेजुएशन केलीह तँ ओकर बियाह करेबाक पिता चर्चा रखैत छैक। बेटी एम ए करय चाहैत छैन । एक प्राईवेट कंपनीमे नीक पद पर नौकड़ी करैत वर सँ पटनाक सितारायुक्त होटलमे वैवाहिक लग्न सम्पन्न होईछ। नव परम्परानुसारे चतुर्थीक प्रात द्विरागमन भऽ पतिक संग सहरसा बिदागरी होईत छै। रमणके माय - बाबू आ छोट बहिण रहथिन,से चेन्नई मे पदस्थापित भेल रहैछ। मात्रे १२ दिनक छुट्टी ल'के' गाम आयल रहैक। कनायांके नैहरक अल्हरपन, अनौपचारिक वेवहार छलै । एतय सब बदल लागनि ,सासुरमे रहय ने चाहैक; पत्तिक संग शहर जाए चाहय। ओ बुझाबनि नीक ढंगके डेरा ताकि लेव आ व्यवस्थित भेलापर जल्दिये आपस आबि ल' जाएब। मुदा ओ आधुनिक विचारक नवयौवना रहय से सासु - ननैद सँ कयटा बात पर मतांतर भ' जाईन। पतिकेँ फोन पर कहथिन - हमरा जेहने व्यवस्था य तेहनेमे संग राखू,नहिं तँ नैहर हम चलि जाएब। आ एकेदिन सआसउ- ससुरके मनाहियो कयलान्तर गाड़ी ओरियान कय पटना जुमि जाए छैक। एकाएक आयल देखि माय बाबू किंकर्तव्यविमुढ़ भ' बेटीक सँग समधियाना अबैछ।आ एहन नम्हर गलती नँय करबाक सीख दैत सहन सँ सहजीवन सीखबाक आदर्श बुझबैय छै। पड़ाएव समाधान नहि थीक, से अपनों बुझयमे था आबि गेल छलैक। विचार आ कार्यशैली मे आमूलचूल परिवर्तन देखि सआसउ- श्वसुर बेटी सँ बढ़िकय मानय लगलनि आ घरक वातावरण आनन्दमय भ' जाय छैक। पतिक संग जहन शहर जाए लगलीह तँ वयह सासु - श्वसुर दूनू कानैत विदा केलनि ।सब कहैथ - " एहन पूतौह बड़ भाग्य सँ भेटैत छैक। एहि आदर्श कथा सबके कमो पन्नामे समेटल जा सकैत रहय,ओना मोट अक्षर सँ पोथी सुलेख लौकैत अए।

३ श्रमिक हितक उपाय होय आँखि पसारिकय देखू तँ सकरीसँ निर्मली धरि आ झंझारपुर सँ लौकहा टीशन तक सभटा रेलवे माल गोदाम चौपट छैक। एहि छोटकी रेल लाइनक पुरान माल गोदाम परित्यक्त रहने, जकरा जीर्ण-शीर्ण अवस्थाके सुधारबाक जगह तोड़बाक काज भऽ गेलैक। निर्मली स्टेशन सँ सरायगढ़ तक रेल अमान परिवर्तनक काज अर्थात् बड़का रेल लाईन आ कोशी महासेतुक दूनू भाग काज मन्दगति सँ चलैत छैक। कोशी रेलवे भीमनगर आ चतरा तक मालगोदामक की कहू जे रेल पटरीयों उखारि लेल छैक। फारबिसगंज से जोगबनी आओर ललितग्राम सँ कर्पूरीग्राम, जतय जाऊ रेलवे मालगोदाम केर मजदूरक विस्थापन देखमे आओत। रेलवे मार्ग कमतौल-सीतामढ़ी मे दरभंगा आ कतेको जंक्शन पर मालगोदाम केर मजदूरक विपन्न स्थिति सँ सहृदय पाठक के कनेक दरेग तँ अवश्ये लगतैन। कोशी क्षेत्रक अधिकांश मजदूर रेलवे मालगोदाम मे दैनिक श्रमिक रूप सँ लागल रहैत अछि। आजादीक पूर्व जे हालत एहिमे लागल मजदूरक छल, वैह परिस्थिति आई आजादीक 76 साल बादों छैक। एहि मजदूरक बाल-बच्चा बेसीरास अनपढ़ बनल अछि। खुबबेशी परिश्रम कयलाक कारण आ स्वच्छता सेवाक सुविधाक अभावक वजह सँ ई श्रमिक वर्ग अस्वस्थ रहैत अछि। एकरा लेल चिकित्साक समुचित औरियाओन नहि छैक। परतन्त्रताक समय अंग्रेज जे व्यवस्था एकरा उचित हकेँ लूटय-शोषण करैक लेल शुरू केने रहैक, सैह इंतजाम आइयो स्वतन्त्र भारतमे रेलवे मालगोदाम श्रमिकजन पर लागू छैक। असंगठित श्रमिक अपन बहुमूल्य योगदान कए देश आ रेलक सर्वांगीण विकास म अहम भूमिका निमाहैत अछि ; तकरा बादो रेलवे मालगोदाम श्रमिक केर बेबसी-लाचारी, भूख-अभाव. अशिक्षा आ दरिद्रताक जिनगी जीयै परैत छै। अपन स्वराज भेटलाक 76 वर्षक बादो एकरा संग एना कियाक भ' रहल छैक ?

एकटा सर्वेक्षणक मोताबिक रेलवेक सवसँ नमहर आमदनीक हिस्सा 100 टकामे 63 टाका माल भाड़ा सँ अबैत छैक। नित्यदिन 1200 मालगाड़ीक द्वारा 25 लाखटन माल गन्तव्य स्थान पर देशक कोना-कोना मेँ पठावल जाइत छैक। एहि मादे मालगोदामक जन 25 लाखटन मटेरियल केँ लोड-अनलोड कए रेलवेक लाभ (मुनाफा) मे बढ़ोतरीक कार्य कए रहल छैक।

श्रम मन्त्रालय दिशसँ हरेक बोरा सामग्री (मालके) रेल बोगीमे उतारिकए ट्रक पर चढ़ेबाक मजदूरी 5.70 पैसा तय भेल छै, सेहो आई नहिं, 2003 वर्ष मे देशके लगभग 6 लाख 85 हजार रेलवे मालगोदाम श्रमिक भाय बन्धु, माय बहिनक जत्थाके तथाकथित ठिकेदार वर्ग आर्थिक शोषण कए तय मजुरी नहिं दै छैक। इहो बात बुझबामे भांगठ नहिं जे एकटा मजदुर औसतन दिन भरि में 500 स 600 बोरा माल उतारैत आ चढ़ाबैत छैक, जकर मेहनताना एक मासमे जौड़िकए लगभग 80,000 सँ 1,02,600 टाका होयत छैक। परंच हमरा लोकनिक रेल बोनिहारके न्याय नहिं देलक अछि। मजदुरके रेलवेक चतुर्थ वर्गीय कर्मचारीक बरोबरी 15,000 सँ 20,000 टाका मासिक दरमाहा दय कय एकटा मजदूर सँ रेलवे केँ शेष राशि 60,000 सँ 80,000 रुपया धरि मुनाफा हरेक मास होयत , जे कि चन्द् नीहित स्वार्थी आ असमाजिक तत्वके लाभ होईत जाइत छैक। एहिमे ब्रिटिश हुकूमत कालमे जे ठिकेदारी प्रथा चलि आबि रहल छैक, ताहिसं त्राण दियेवाक काज लोककल्याणकारी केन्द्र सरकारक पहिल प्राथमिकता हेबाक चाहि छल। जेनाकि भारत सरकार पूर्वमे खाद्य निगम आ फिल्ड कोयला खदानक श्रमिक केँ नियमित करबाक काज केने छल। इहो स्मरणीय अछि जे स्वयं रेल मन्त्रालय सेहो गैंगमैन, पार्सल पोर्टर, सफाई कर्मचारी, टी.पी.टी. गड़हारा, मालगोदामक श्रमिक आओर कुली सभके चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी रुपमे समायोजित कयल अछि।

एहि तरहक माँगके ल'के' पछिला दू दशक सँ रेलवे मालगोदाम श्रमिक संघक बैनर तर प्रमुख समाजसेवी अरुण कुमार पासवान, मनोरंजन बाबू, दिगम्बर प्र० मेहता जी , भीषण चौधरी आदि संघर्षशील पदाधिकारीगणके कुशल नेतृत्व आ जागरुक श्रमिकके सतत् प्रयास सँ एकटा संगठित प्रयासे जे जनउभार भेल अछि, जाहिमे सब जोनमे ग्रुप डी0 आ रेलवे बोर्डमे ग्रुप सी० के लेल सब्सिच्युटक रुपमे समायोजित कए मजदूर के स्थायी करावल जाय तँ जनहितमे एकटा चिरप्रतीक्षित आंकाक्षाक पूर्ति भऽ जायत। एहि महासंघक राष्ट्रीय महामन्त्री आ अध्यक्ष महोदय एकटा अपीलक जरिये सामाजिक-धार्मिक आ आध्यात्मिक संगठन आ राजनीतिक दलमे शामील देशभक्त एवम् इमानदार लोक सँ आग्रह केलक अछि। ज्वलंत समस्याक स्थाई समाधान होयबाक चाहिऐक। ४ जीवनी अनुवाद 'क एक पोथी ई- विदेह केर सम्पादक श्री गजेन्द्र ठाकुर कृत 'जगदीश प्रसाद मंडल - एकटा बायोग्राफी ' मैथिली पोथीक हिन्दी भाषा मेँ अनुवादक छथि सर्वश्री रामेश्वर प्रसाद मंडल। पोथीक आखरिमे गजेन्द्र ठाकुर : एक संक्षिप्त परिचय आ आरंभ मे "अपनी बात" श्री मंडलजी दि० २०-९-२०२२ मेँ रोचकता सँ भरल लिखलनि अछि। समकालीन मैथिलीक यशस्वी आ अभूतपूर्व रचनाकार श्री ठाकुर जीक द्रुतगामी लेखन सँ समक्ष्यमे अयलाह वरेण्य साहित्यकार श्री जगदीश बाबू। जेना कवि रविन्द्र नाथ टैगोर बंगला भाषा मेँ कविता संग्रह ' गीतांजलि ' केर रचना कयने रहथि। ओहिक अंग्रेजी अनुवाद कयलथि तँ डव्लू बी एट्स पाणडुलिपि पढिकय प्रस्तावना खुशी-खुशी लिखलनि। तेँ चर्चित भेला आ सालेभरिक बाद विश्व स्तर पर नोवेल पुरस्कार (१९१३ई०) प्राप्त कयने रहथि। तहिना मैथिली सँ हिन्दी रुपान्तर करैत श्री रामेश्वर बाबू पंगू'क उपन्यासकार कें एक विराट फलक पर आनि अध्येताक विस्तार देलनि अछि। वायोग्राफीमे आरंभ सँ अन्तधरि तिथिवार ईस्वी सँ। जन्म परिचय, १९६० ईस्वीक पछाति...... , १९६७ ईस्वीक पछाति ...... , जातिक बनाबट, बेरमामे दुर्गा स्थान बने सँ पूर्व ..... , बिनु डायरी 'क जिनगिमे...... , भूदानी आन्दोलन ...... , रामपट्टी क' जहल ....... आ हाइ स्कूलक एकटा स्मृति ..... , पाठ शिर्षक पढैत पाठकके हुनक जीवनक सक्रियताक थाह चलैत अछि। समग्रता सँ मुल्याकंनमे मिथिलाक एकटा गाम ...बेरमा'क गेठरी झा केँ परोपट्टाक लोक जनैक, हुनका राज दरभंगा सँ सात साए बिगहा जमीन गाम सँ दू कोसक दुरी पर बरमोतर - लखराज रूपेँ भेटल रहै। ओना बेरमामे चारि गोटय प्रकांड पण्डित रहैक, तीन बाहरे आ एक गामेमे मोदी दोकान कय अकूत धन कमेला। ताहूक प्रसंगवश चर्चा पोथीक पठनीयता बढौलक हन्। ...आओर जन्म भेल रहनि एकटा बच्चाक दि० ५-७-१९४७ केँ ,ओहि बरख १५-८-१९४७ ई० शुक्रवार केँ भारत देश आजाद भेल रहय। से कुसाग्र बालक जगदीश बाबू दू विषय सँ एम ए पास करैत ओकील सहाब गाममे कहेलनि। राजनीति जागरण सँ कम्युनिस्ट सभक नजैरमे ओइ स्वतंत्र वा स्वतंत्र नै भेल भारतमे.... किछु बुधियारक राजपाट चलल। मिथिलांचल बा बिहार मे कोनू खास परिवर्तन ८५% कृषक लेल नै भेल छलैक। पिताक मृत्युके १९५०ई०मे गाछीक अछिया टा स्मरण अबैत रहलैक। ग़रीबी बढैक कारण भेलै केश -मोकदमा,जे वर्ग संघर्ष आ राजनीतिक दलमे कांग्रेस के विरोधके कारण रहैक। ओना तेसरो खेमा सब समाजमे सोसलिष्ट केर चलैत रहलैक। सुविधा वंचित लेल संघर्षमे पारितोषिक भेटलैन स्वतंत्र भारत वा स्वतंत्र नै भेल भारत'क जेल। अनका खातिर अनेको नालिसमे अभियुक्त बनाओल गेलाह। एकरा लेल १८ दिन कारावास काटलैन से हुनके खिलाफ मुखिया चुनावमे बतौर मुखिया पद सँ ठाढ़ छलैन। जिला परिषद बैठारमे चुनावी प्रस्ताव अनलनि तँ आठो पंचायत सँ प्रतिरोधक ठाढ़ अपने पार्टीक छिपल लोक। से बिपरीत भ' गेलाह। आई शोषणमुक्त बेरमामे पांच - दश बीघा सँ पैघ जोतसीम ककरो नहि छै। तुने बरखक उमेरमे बाल-विवाह भेल रहनि ,५-६ जगदीश प्रसाद मंडल जी भेलाह तँ अपन भैया गूरूकुल मरड़ संग गामेक लोअर प्राईमरी स्कूल पढय - लिखय जाथि। से ओइ गाममे जीवित अछि आईयो किसानी आत्मनिर्भर संस्कृति ..l नवानी - दीप जेकाँ तार- खजुरक गाछ नहि रहने तारी पियाक नशेरी नै भेने लोक सब खेती-बाड़ी करय। परंपरागत पुरहीतवाद पर ब्राह्मणवादक एकछत्र राज एतहि भेल समापन। .... बचनू मिश्र स्पष्टवक्ता पुरूष जे लेवानी संस्कृत पाठशाला मे भनसियाक काज करैत तीन मासधरि बिनु नूनेक बैंगन भांटा उसिन खाइथ आ देश भक्तिक आजादीके लड़ाय लड़ैथ। सब विषयवस्तु जे समाजक सरोकार सँ जुरल रहैक,ताहिपर मनोयोग पूर्वक चर्चा भेल अछि। यथा - बकास्त! ई कोसी बाढ़ग्रस्त त्रासदी सँ ब्रिटिश हुकूमत केँ बिनु उपजले धरतीक मालगुजारी वसुली,आ नै बेमाक कयला पर राज दरभंगा सं पूरे जमाबंदी'क रकबा निलाम होय। से अपन सुराजमे गणतंत्र लागु भेला पर दिनांक १ जनवरी दरसन् १९३९सँ ३१ दिसम्बर १९५० ई० केर बीच रैयत के जमीन वापसीक' बकास्त अधिनियम १९५१धारा ३ बनलैक। मुदा नीलाम खरीददार सँ केश टाइटील लड़ैयमे खतियानी असामीक वारिश कें आर्थिक तंगि बढ़लैक। रिस्टोर करयबला अंचल अधिकारी घुसखोरी बैमानी पर उतरल रहैक। संघर्षक समाप्तिक पछाति जगदीश बाबू अपन कान्हा पर सँ भार पटकि लेखन क्षेत्रमे आबि मैथिली साहित्यमे आना देलक पुनर्जागरण. l मुदा एक सशक्त मांजल रचनाकार बनै सँ पूर्व बासोपट्टीमे भाकपा० केर राज्य सम्मेलन भेल रहैक। ओहिमे पार्टीक महासचिव ए बी बर्ध्दन साहेब ,बिहारक सब जिलाक अलावे किछ बंगाल 'क काउमरेड सब सेहो रहैक, ताहिमे साहित्य प्रेमी सबके जगदीश प्रसाद जी कहलथिन - आब अहीं सबहक संग आबि रहल छी। एतहि धरिक वृतांत कलमवध्द करैत गजेन्द्र ठाकुर जीक पोथी २०१९में संयोग सँ दोसरो संस्करण पल्लवी प्रकाशन निर्मली सँ प्रकाशित भेल रहय। जाहि पोथीक सर्वाधिकार (c) छन्हि श्रीमती प्रीति ठाकुर केँ। भ' सकैय लिखित अनुमति सँ आदरणीय रामेश्वर प्रसाद जी एहिक हिन्दी अनुवाद कर पल्लवी प्रकाशन निर्मली सँ सन् २०२३ मेँ छपेलनि अछि। ऐ मेँ १४७ पृष्ठ आ दाम २५१ टाका छैक। एहि पोथिक विषयमे लेखक श्री मंडल जी कहैत छथि- " यह केवल पुस्तक ही नहीं है, विचार विम्ब है। एक विशिष्ट मानव के अनुभवों का दर्पण है।" अनेको दर्शनीय स्थानक झरोखा, संघर्ष,साहस आओर त्यागक छी मंजुषा ई पोथी। एहिमे काव्य केर दर्शन पाठकके सेहो कतौह- कतौह मंडलजी करेलाह अछि। हम अनुवाद विधामे हिनका सँ दोसरो लेखकके रचना चाहैत धन्य - धन्य कहैत छियैन।

५ हमरा गामक पहिलुक बाईसकिल (लघुकथा) कोसी नदी'क त्रासदीके छह मास बाद गाममे बाढ़ि कमलैक। सबकियो अपन - अपन खेत पथार , बाड़ी झारी पर नजैर देलक । किछु भुदान भुमिक पर्चाधारी भूधारी बनय ले चन्दा - बेहरी केलक। बेहरी सहयोग देमयमे थोड़ेक एहनो भुमिहीन लोक छलै जे शेष अवितरीत जमीनक प्रमाणपत्र सभापति सँ पेयबाक आश जोहने रहय। दाखिल - खारिज आ मलगुजारी रसीद कटाबय लेल ढौआ जम्मा भेल। तैमेसँ जीबछ मास्टर साहेब अपन बाबूजी केँ कहि दरिभंगा गेला। आ १९६२ ई०मे २६२ टकामे सेब्रो बिनु केरियल क' साइकिल बेसाहि रेलगाड़ी सँ घोघरडीहा टीशन उतरला। तीन बड़का धार पार होइत अपना गाम ऐलाह। सोंसे गामक लोक साईकिल देखय भीड़ लगा देलक। आ चलाकेँ देखेबाक आग्रह करैन। से चेन्ह खसि पड़ने कोना चलैत! ककरो साइकिल मेँ चेन चढेबाक बुझल नै रहय। मास्टर साहेब कसबैत घरी उलटल साईकिलमे चेन लगबैत मिस्त्रीके देखने छल। तेँ साइकिल केँ खुदे उनटेलक। कुतूहलवस तमशगीर सब अचरज सँ देखैत रहल। ओहि साइकिल केँ देख मुक्ति ठाकुरके बाबूजी काठक साइकिल धरि बना कऽ चला लेलक। ई खिस्सा बनि चर्चित बनि गेल अछि। नमन् एहन साईकिल केँ! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.रबीन्द्र नारायण मिश्र- ठेहा परक मौलाएल गाछ (धारावाहिक) रबीन्द्र नारायण मिश्र ठेहा परक मौलाएल गाछ (धारावाहिक) 46 दोसर दिन भेने हमही पड़ोसीकेँ फोन केलिऐक । ओकर फोनक घंटी बजैत रहि गेलैक,ओ फोन नहि उठओलक। हारि कए हमहूँ दोसर काजमे लागि गेलहुँ। साँझमे पाँच बजे पड़ोसी फोन करैत अछि। "तोहर मिसकाल देखलिअह । ओहि समय हमसभ किछु काजमे लागल रही। असलमे वृद्धाश्रम एकटा परिष्कृत जहले थिक। एहिठाम सुविधाक नामपर दुनिआ भरिक नियंत्रण छैक। हमसभ कइए की सकैत छी? एतए तँ एहने लोकसभ भरल अछि जकर केओ देखनाहर नहि छैक। जकरा लोक-वेद छैहो,जे संपन्नो अछि,तकरो परिवार हाथ ठाढ़ कए देने छैक। फेर आइ-काल्हि लोक बहुत-बहुत दिन जीबैत अछि । तरह-तरहक चिकित्सा आबि गेल छैक,दबाइ बनि गेल छैक। एहिसभसँ लोकक आयु बढ़ि गेल छैक। मुदा समस्या छैक जे एहन-एहन वयोवृद्ध लोकसभ करए की?कतए जाए?" वृद्धाश्रम कहक लेल वृद्धलोकनिक आश्रय छैक। मुदा एहिठाम रहिनिहारे जनैत अछि जे ओकरसभक की हालति छैक। केओ हाल-चाल पुछनिहार नहि छैक। घरक लोक बिसरि गेल छैक। सरकारी व्यवस्था चेतनाशून्य भेल छैक। ओ सभ करबो की करतैक? नित्य दू-चारिटा बूढ़केँ ओकर निकट संबंधी ओतए पटकि जाइत छैक। कैकबेर तँ ओ सभ अपने वृद्धाश्रम अबितो नहि अछि। लगपासमे बूढ़केँ छोड़ि देल जाइत छैक। जाहिसँ ओकरा वृद्धाश्रमकेँ कोनो जानकारी नहि देबए पड़ैक। एहन-एहन लोककेँ केओ आनसभ वृद्धाश्रमक भीतर पहुँचा दैत छैक। वृद्धाश्रमक व्यवस्थापक माथ पटकि कए रहि जाइत अछि। एहि तरहेँ वृद्धाश्रम ठसाठस भरि गेल छैक। एक-एकटा कोठरीमे चारि-चारि गोटे ठुसल रहैत अछि । जखन कि नियमानुसार एक कोठरीमे दू गोटेसँ बेसी नहि रहि सकैत अछि । सुभ्यस्त लोकसभ टाका बले अपना लेल अलग कोठरीक जोगार कए लैत अछि,मुदा जकर केओ नहि छैक,जकर जेबी खाली छैक ओ सभ जानबरोसँ खराप जनगी जीबाक हेतु विवश अछि। निरंतर निराशाक माहौलमे रहैत-रहैत वृद्धसभक स्वास्थो  खराप भए जाइत छैक। कैकगोटे अवसादग्रस्त भए जाइत अछि। एहने हालमे हमर पड़ोसी सेहो पहुँचि गेल अछि । मुदा ओकरा पासमे कोनो विकल्पो नहि छैक। संभवतः ई ओकर अंतिम आश्रय छैक। हम पड़ोसीसँ गप्प कइए रहल छलहुँ कि लागल जेना कोनो आर फोन आबि रहल अछि। मुरली बेर-बेर फोन कए रहल छल। आखिर पड़ोसीकेँ कहि कए ओकर फोन बीचेमे काटि दैत छी। मुरलीक फोन फेर अबैत अछि- "की समाचार?" "हमर कारखाना तँ निठ्ठाह बैसि गेल। बैंकबालासभ तंग केने अछि। अपन सभटा टाका ओहिमे लागि गेल अछि। की करी किछु फुरा नहि रहल अछि।" "हम तँ तोरा शुरुएमे कहने रहियह। मुदा तोरा हमरसभक बात पसिंद नहि भेलह। हमरसभक टाका तँ गेबे कएल, लगैत अछि जे घरो नहि बाँचत।" "तेँ तँ फोन केलहुँ अछि। यदि किछु प्रयास करी तँ घरक कागज बैंक घुरा देत। कारखानाक जे किछु संपत्ति छैक से हम बैंकक नामे लिखि देबैक। तकर बाद थोड़ बहुत टाका यदि बँचतेक तँ से अहाँसभ दए देबैक तँ कम सँ कम अहाँक मकान बाँचि जाइत।" मोन तँ होअए जे ओकर मुँह नोचि ली। मुदा ओकरासँ विवाद केलोसँ किछु फएदा होमएबला नहि छल। अस्तु,हम चुप्प रहि गेलहुँ । ओहो आगू किछु नहि बाजल। फोन कटि गेल। थोड़ेकालक बाद मुरलीक फेर फोन आएल । हम फोन नहि उठओलिऐक। भेल जे बेर-बेर  ओएह बातसभ दोहराओल जाएत। मुदा मुरलीओ मानएबला नहि छल । ओ फोन करिते रहि गेल। आखिर रमा कहलीह- "फरिछा कए अपन बात कहि किएक ने दैत छिऐक?" "आब कहबाक हेतु रहिए की गेल अछि? कहि नहि  ओ चाहैत की अछि? टाका लेलक,मकान लेलक आब की जानो लए लेत? सेहो कए लिऐ तँ नीके रहत। एहि लफड़ासभसँ मुक्ति भेटि जाएत।" "अहाँ एतेक उदास नहि होउ। सभक जीवनमे समस्या अबिते छैक। हमसभ कोनो अपवाद नहि भए सकैत छी। फरक एहि बातक छैक जे अहाँ ओकरा कोना लैत छी। लगैत अछि जे हमरोसभ सँ किछु त्रुटि भए रहल अछि। अन्यथा एहि बएसमे हमसभ एहि झूठ-मूठमे एतेक अनुरक्त किएक रहितहुँ?" "बात तँ सही कहि रहल छी। मुदा कएल की जाए? संतानक मोहमे पड़ि जाइत छी।" "आब बजलहुँ ने असली बात। कष्टक कारणे मोह थिक । अन्यथा आब केओ नेना नहि अछि । सभकेँ यथोचित शिक्षा देने छिऐक । सभ कमा-खटा रहल अछि। आब जे जेना करत से तँ भोगहि पड़तैक । हमसभ तँ अनेरे ओकरासभक संगे कष्ट भोगि रहल छी।" "कहनाइ आसान छैक। अपन संतानक कष्ट कोना देखल जाइत? जाबे जीबैत छी ताबे तँ बहहि पड़त ।" "तखन भोगैत रहू।" "तँ की करी? जंगल चलि जाइ? बाबाजी भए जाइ? ई संभव छैक?" हम आगू नहि बजलहुँ । भेल जे अनेरेक विवाद बढ़ि रहल अछि। एहिसभसँ किछु होमएबला नहि अछि। अखन तँ सभसँ जरूरी शालिनी आ नम्रताकेँ देखब थिक। तकरबादे किछु आओर। 47 सेवानिवृत्तिक बाद हमदुनू बेकती निचैन रहि सकैत छलहुँ । ताहि हेतु जरूरी व्यवस्था केने रही। दिल्ली सहरमे अपन तीनकोठरीक फ्लैट रहए। दुनू बेकतीकेँ पर्याप्त पेनसन भेटि रहल अछि। धिआ-पुतासभ सुशिक्षित अछि। तकर बाद ओ सभ अपन योग्यता आ रुचि अनुसार अपन-अपन जिनगीमे आगू बढ़ल । मुदा कतए की गलती भेल जे हमसभ ओकरासभमे ओझराएले रहि गेलहुँ । समस्या कम हेबाक जगह बढ़िते गेल। आब तँ ओहिसभसँ उबरब मोसकिल लागि रहल  अछि। हमर घर बचब संभव नहि अछि। मुरलीक नवप्रस्तावक चक्करमे पड़बाक परिणाम होएत जे बचलहो टाकासभ चलि जाएत। की पता तकर बादो फ्लैट वापस भए सकत कि नहि? कहीं कोनो नव फसाद शुरु भए गेल तखन? श्यामक जिनगी तँ बरबाद भइए गेल अछि। अपने चालिए अमेरिकाक जहलमे सड़ि रहल अछि। शालिनी ठीक-ठाक जिनगी जीबि रहल छलि। मुदा ओकरो दैवक तेहन डांग लागल जे ने एमहरक रहलि ने ओमहरक। कोरोनाक आक्रमणमे ओकर पति चलि जाइत रहलैक। अपनो स्वास्थ्य गड़बड़ा गेल छैक। बेटी सेहो दुखित पड़ि गेल रहैक,मुदा संयोगसँ ओ बचि गेलि। हमसभ अखन ओकरे ओहिठाम छी जाहिसँ ओकरासभकेँ किछुओ मदति कए सकी। जाहिसँ ओ सभ संकटसँ उबरि सकए। अपना बारेमे तँ आब किछु सोचाइते नहि छी । मुरलीक नव आग्रहक विषयमे हम दुनू बेकती आपसमे चर्चा केलहुँ। आब ओकरा चक्करमे पड़ब कतहुसँ ठीक नहि बुझाइत छल । हम आ रमा आब पकिआ निर्णय कए लेलहुँ जे अपन स्वतंत्र व्यवस्था करब । आब जे समय बाँचल अछि से शांतिसँ भगवानक शरणमे बिताएब । आर किछु नहि तँ पेनसन तँ अछिए ने। रहल स्वास्थ्यक समस्या । से केओ अमर हेबाक हेतु तँ आएल नहि अछि। जे आएल अछि से जाएत। मुदा जाधरि अपन हाथ-पैर चलैत अछि ताबे तँ स्वाभिमानसँ जीबि ली। आगूक भगवान मालिक। "से सभ तँ ठीक छैक। मुदा शालिनीकेँ एना कोना छोड़ि देबैक?"-रमा बजलीह। "बात तँ अहाँ सही कहि रहल छी। अखन तँ हमसभ छीहे। मुदा कतेक दिन रहि सकब?" "जखन जे हेतैक से हेतैक। अखन एकर देख-रेख जरूरी अछि। हमसब से करी। नम्रताक पढ़ाइ पूरा भए जाइक से प्रयास करी। तकर बाद जे मोन होएत से करब।" "इएह तँ चिंताक बात छैक। समस्याक कतहु अंत छैक? नहि छैक। किछु-ने-किछु लागले रहतैक। उचित तँ ई अछि जे जकर समस्या छैक से तकर समाधान करए। सभकेँ भगवान माथ देने छथिन । हाथ-पैर देने छथिन। तखन अनकर समस्याके ओढ़ि लेबाक कोनो औचित्य नहि थिक।" "पहिने आइ हमसभ अस्पताल चली। शालिनीक डाक्टर बजओने छैक।" "ठीक छैक। तैयार भए जाउ।" हमसभ अस्पताल जेबाक हेतु तैयार होइत छी। शालिनी सेहो तैयार भए जाइत अछि। नम्रता कालेज गेल अछि। ओकर बी.काम प्रथम वर्षक परीक्षाक फार्म भरबाक छैक। हमसभ शालिनीक संगे अस्पताल बिदा भए जाइत छी। थोड़ेकालक बाद हमसभ शालिनीक संगे अस्पताल पहुँचैत छी। रमा नीकसँ चलि नहि पाबि रहल छथि। हम हुनका कहने रहिअनि जे अहाँ चाही तँ डेरेपर रहि जाउ। मुदा ओतहु केओ नहि छल। असगरि की करितथि? यदि किछु समस्या भइए गेलनि तँ आर मोसकिल भए जेतनि। तेँ हुनको संगे लेने अएलिअनि। मुदा अस्पतालमे चलबामे दिक्कति भए रहल छनि । डाक्टरक बाह्य रोगी विभाग बहुत फटकी कोनमे जा कए अछि। आइ ओतए भीड़ो बहुत बुझा रहल अछि। हमसभ बाहरे ठाढ़ भए गेलहुँ । संयोगसँ डाक्टर साहेब भीतर जएबा काल शालिनीकेँ देखि लेलनि । इसारासँ हमरासभकेँ संगे चलबाक हेतु कहलनि। बाहर आन मरीजसभ पाँतिमे ठाढ़ छल। ओ सब डाक्टरक रुखि देखि किछु नहि बाजल। डाक्टर साहेब शालिनीक जाँच करैत छथि। ओकरा किछु-किछु पुछितो छथि। फेर कहैत छथि- "हिनकर हृदयक शल्यक्रिया करए पड़तनि। बेसी समय नहि अछि। देरी प्राणघातक भए सकैत अछि। तेँ अहाँसभ सोचि कए बताउ। यदि कहब तँ हिनका आइए अस्पतालमे भर्ती करबा देबनि। दूसँ-तीन दिनक भीतरे शल्यक्रिया भए जेतनि।" डाक्टरक बात सुनि लागल जेना लकबा मारि देलक। किछु बजले नहि होअए। आखिर शालिनी अपने कहलकैक- "जे अहाँकेँ उचित बुझाए से करू। हम शल्यक्रियाक हेतु तैयार छी।" तकरबाद डाक्टर शालिनीकेँ अस्पतालमे भर्ती कए लेल गेलैक। हमसभ की करी? भेल जे नम्रताकेँ फोन कए सभबात कहि दिऐक । तकर बाद देखल जेतैक। नम्रताकेँ हम फोन करैत छी। ओकर फोन व्यस्त आबि रहल अछि। हम कैक बेर ओकरा फोन लगाबक प्रयास करैत छी। मुदा सफल नहि होइत छी। आखिर हमसभ निर्णय केलहुँ जे रमा एतहि रहि जाथि। हम डेरा जाएब आ नम्रताक संगे साँझमे वापस अस्पताल आबि जाएब । साँझमे नम्रताक संगे जखन  अस्पताल पहुँचलहुँ तँ डाक्टर साहेब द्वारिएपर भेटि गेलाह। ओ हमरासभकेँ अपन कोठरी लेने अएलाह। ओतए कहैत छथि- "शालिनीक मामिला जटिल छनि । शल्यक्रिया तँ करहि पड़तनि मुदा तकर बादो की होएत से किछु निजगुत नहि कहल जा सकैत अछि।" "अपनेक कहाबक माने?" "आधा-आधी बुझू । तखन जे कही।" "आब हम की कहब? जे अहाँक निर्णय होएत से हमसभ मानब।" "तँ ठीक छैक। काल्हि दस बजे हिनकर शल्यक्रया हेतनि। अहाँसभ भोरे आठ बजेसँ पहिने आबि जाएब जाहिसँ जरूरी दबाइ आ अन्य सामानसभ आनि लेब।" "ठीक छैक।" तकर बाद हमसभ शालिनीसँ भेंट करबाक हेतु ओकर कोठरी दिस बिदा भए गेलहुँ । 48 शालिनीक हृदयक शल्यक्रिया भए रहल अछि। हम आ रमा बाहर बैसल माइकसँ शुभसंवादक प्रतीक्षा कए रहल छी। नम्रता सेहो आबि रहल अछि। ओकरा रस्तामे जाम लागि जेबाक कारण किछु विलंब भए रहल छैक। ओ फोन केने छलि। हाल-चाल लेलाक बाद ओ अस्पताल दिस बिदा भए गेल अछि। देखा चाही केना की होइत अछि। रहि-रहि कए माइकपर उद्घोषणा होइत अछि। हमसभ कान ठाढ़ कए लैत छी। साइत एहि बेर शालिनीक बारेमे सूचना देल जाए। मुदा से नहि भए रहल अछि। कहि ने ककर-ककर नाम लेल गेल? शालिनीक नाम लेबामे एतेक देरी किएक भए रहल अछि? एहि बातसँ चिंता भए रहल अछि । डाक्टरक हिसाबे तँ आब ओकरा बाहर आबि जेबाक चाही। मुदा से किएक नहि भए रहल अछि?घंटा विलंबसँ ओकर शल्यक्रिया संपन्न हेबाक सूचना प्रसारित भेल । हमरा सभकेँ जानमे-जान आएल । आखिर शालिनी शल्यचिकित्सा कक्षसँ बाहर आएलि। हमसभ बहुत प्रसन्न रही । शल्यक्रिया सफल भेल छल। मुदा डाक्टरक अनुसार ओकरापर अखन विशेष ध्यान रखबाक जरूरी छैक। कारण ओकर लंग्समे सेहो समस्या भए गेल छैक। तीनदिन अस्पतालमे रहबाक बाद हमसभ शालिनीक संगे वापस ओकर डेरापर आबि गेलहुँ । नम्रता बहुत प्रसन्न छलि। हमहूँसभ बहुत प्रसन्न रही। डाक्टरक परामर्शक अनुसार दबाइसभ देल जा रहल छैक। जरूरी परहेज सेहो कएल जा रहल अछि। मुदा शालिनीक स्वास्थ्यमे अपेक्षित सुधार नहि भए रहल छैक । ओकरा साँस लेबामे बेसी दिक्कति भए रहल छैक। हृदयक गति सेहो सामान्य नहि भए पाबि रहल छैक। हमसभ एहि बीच कैकबेर डाक्टरसँ भेंट केलिऐक । ओकरा सदिखन दुविधामे देखिऐक । मुदा किछु स्पष्ट नहि बाजए। एकदिन संयोगसँ ओकर कनिष्ठ डाक्टरसँ भेंट भेल । ओ अपने ओहिठामक छल। ओकरा शालिनीक मामिलाक सभकिछु जानकारी रहैक। ओ कहलक- "शालिनीक मामिला सुधरि नहि रहल छैक। ओकर शल्यक्रिया नहि करबाक चाहैक छल। डाक्टरसभ लोभवश कए देलक। कारण एहन मामिलामे शल्यक्रिया करबेक छलैक तँ दोसरठाम लए जेबाक छल। आब तँ जे हेबाक छल से भेल।" हम दुनू बेकती मास दिन शालिनीक सेवा करैत रहलहुँ । डाक्टर लग आबाजाही तँ लागले रहैत छल । एकदिन भोजनक बाद अचानक ओकरा बड़ी जोरसँ उकासी भेलैक। तकर बाद छातीमे भयाओन दर्द उठलैक। जाबे केओ किछु बुझैत,ओ ठामहि खसलि आ खसले रहि गेलि। हम आ रमा ओहि समयमे दोकानसँ किछु सामान आनए गेल रही। नम्रता घरेमे रहए। ओ शालिनीकेँ खसैत देखलक। ओतए तुरंत पहुँचिओ गेलि। मुदा ओकरामे जान नहि छलैक। साँस बंद भए गेल रहैक। नम्रता भोकारि पारि कए कानए लागल। ताबे हमसभ फ्लैट लग पहुँचि गेल रही। नम्रताक कानब सुनि कए तुरंत भीतर भेलहुँ । शालिनीक निःप्राण शरीर देखि  रमा जोर-जोरसँ कानए लगलीह। हमहूँ बहुत व्यथित रही। लागए जेना सौंसे पृथ्वी डोलि रहल अछि। जेना सभकिछु नष्ट भए गेल अछि। हमरासभक करुण क्रन्दन सुनि कए लगपासक फ्लैटसँ लोकसभ जमा भए गेल। सभ दुखी छल। परेसान छल। मुदा ककरो वशमे किछु नहि छलैक। शालिनी असमयमे एहि संसारकेँ छोड़ि चुकल छलि। शालिनीक मृत्यु हमरासभपर जबरदस्त वज्रपात छल। ओएहटा हमरासभक प्रतिए अनुराग रखैत छलि, हमरासभक आशाक केन्द्र छलि। मुरली आ श्यामक तँ चर्चे करब व्यर्थ थिक । ओ सभ तँ जाने छोड़ि दिअए तँ बड़का उपकार । मुदा शालिनी सभदिन हमरासभ लेल चिंतित रहल। ओकर बात मानितहुँ तँ हमरसभक घरो बाँचि गेल रहति आ श्यामक चाङुरसँ हमसभ अपनाकेँ बचा लितहुँ । मुदा भावी प्रबल। ई बात अलग अछि जे पारिवारिक कारणसँ आ फटकी रहबाक कारणसँ ओ बहुत किछु नहि कए पबैत छलि। असलमे बूढ़केँ तँ चाही शारिरिक मदति। लगपासमे केओ दिनराति रहए जे ओकर सुधि लैत रहैक। ओकर  भवनाकेँ बुझैक । खाली माल-जाल जकाँ पेट भरि गेलासँ तँ मनुक्खक जीवन नहि चलि सकैत अछि। लोकक जरुरति तँ लोकेसँ मेटा सकैत अछि। मुदा ई सभ के बूझत? शालिनीक देहान्तक बाद ओकर डेरापर रहब हमरासभक हेतु एकटा अभिशापे छल। मुदा कएल की जाए? एतेक जल्दी नम्रता मातृ-पितृ विहीन भए जाएत से के सोचि सकैत छल? ओकर कालेजक पढ़ाइ चलिए रहल अछि। ओकरा कोनो आर्थिक समस्या नहि हेतैक कारण ओकरा नामे पर्याप्त धन ओकर माता-पिता छोड़ि गेलैक अछि। फेर ओकर मकान आ अन्य अचल संपत्तिक मालिक सेहो ओएह होएत। मुदा तेँ की? भए तँ गेल ओ एसगरि? हमरासभ ओकरा कतेक मदति कए सकबेक से तँ भविष्ये बताओत? 49 थोड़बे दिनक बीचमे परिस्थिति एना बदलि जेतैक से के सोचि सकैत छल? शालिनी,ओकर पति आ नम्रता सभगोटे दुखित पड़ि गेल । नम्रताक पिताक देहान्त भए गेलनि। ओकर माए मोसकिलसँ कोरोनासँ बाँचलि। बाँचि तँ गेलि मुदा बादमे कैकटा स्वास्थ्य संबंधी समस्यासभ भए गेलैक । अंततोगत्वा,ओहो हृदयाघातसँ चलि गेलि । नम्रता सेहो लटकि गेलि रहए । मुदा ओ जल्दीए सम्हरि गेलि। माता-पिताक आचानक देहावसानसँ नम्रता घोर संकटमे पड़ि गेलि। एहन परिस्थितिमे हमसभ की करितहुँ? नम्रताकेँ असगरि छोड़ि देबए जोकर हालति नहि रहए । ओकर पढ़ाइ चलैत रहैक आ ओ एहि संकटसँ उबरि सकए ,ताहि हेतु हमसभ किछुदिन ओतहि रहि जेबाक मोन बनओलहुँ। "हमसभ नहि देखबैक तँ नम्रताक रक्षा के करत?"- रमा बजलीह । क्रमशः ओ कालेज जाए लागलि। अपन संगीसभक संगे सुख-दुख बतिआइत रहलि। हमसभ तँ रहबे करी। अपना भरि ओकरा चिंतामुक्त रखबाक प्रयास करैत रहलहुँ । एहीसभक प्रभाव भेल जे एहि बेरक वार्षिक परीक्षामे ओ प्रथमस्थान प्राप्त केलक । आब एकसाल आर पढ़ाइ केलाक बाद ओकर बीकाम पूरा भए जेतैक । तकर बाद ओ एमबीए करए चाहैत अछि। यदि ओकर योजना सफल रहलैक तखन ओ अपन छात्रावासमे रहए लागत। हमसभ एक हिसाबे मुक्त भए जाएब । मुदा एकसाल तँ अखन ओकरा देख-रेख चाहबे करी। अस्तु,हमसभ ओकरे संगे रहि गेलहुँ । आर जेबो कतए करितहुँ । दिल्लीक अपन फ्लैट बन्हक पड़ि गेल अछि। ओकरा आब वापस हेबाक कोनो उम्मीद नहि बुझा रहल अछि। मुरलीक कारण सभ किछु बरबाद भए गेल। अफसोचक बात तँ ई अछि जे एतेक बादो ओ जान नहि छोड़ि रहल अछि। अखनहु तरह-तरहक मांग करिते रहैत अछि। अपन-अपन भाग्य होइत छैक। सएह सोचि-सोचि हमसभ शांत रहैत छी। हमहूँसभ कोनो अमर तँ छी नहि। कतेक दिन जिअब? समय काटैत रही। जे नीक-बेजाए भगवान देथि से भोगैत चली। इएह थिक सर्वोत्तम समाधान। एहि संसारमे ने केओ किछु अनलक,ने किछु संगे लए गेल। तखन अनेरे हाय-हाय केलासँ की फएदा? मुदा सभ किछु बुझितहुँ मनुक्ख एहीसभमे लागल रहि जाइत अछि आ एकदिन सभकिछु एतहि छोड़ि कए चलि जाइत रहैत अछि। ओहिदिन प्रातःकालक समयमे हमदुनू बेकती ओसारापर बैसल आपसमे गप्प करैत रही। नम्रताकेँ कालेज जेबाक रहैक । ओकर कालेजसँ विद्यार्थीसभ बाहर पर्यटनपर जा रहल छैक । दक्षिण भारतक विभिन्न एतिहासिक महत्वक स्थानसभ देखबाक कार्यक्रम छैक। नम्रताक लेबाक हेतु ओकर कालेजक संगीसभ बाहर कारमे प्रतीक्षा कए रहल छैक। नम्रता सेहो तैयार भए आबि गेल । ओकरामे गजबकेँ स्फूर्ति छलैक। आइ बहुतदिनक बाद ओ प्रसन्न देखा रहल छलि। हमरासभकेँ प्रणाम कए ओ संगीसभक संगे कारमे बिदा भए जाइत अछि। ओकरा प्रसन्न देखि हमहूँसभ जुराइत छी। आनन्दित होइत छी। तकर बाद हम स्नान करबाक हेतु स्नानगृहमे चलि जाइत छी। रमा हमरा हेतु जलखैक जोगारमे लागि जाइत छथि। एतबहिमे घंटी बजैत अछि। "एखन के आबि गेल?"-हम मोने-मोन सोचैत छी। अंगोछा पहिरने स्नानगृहसँ बहराइत छी। केबार खोलैत छी। एकटा अधबएसूकेँ ठाढ़ देखैत छी। ओकर दाढ़ी बढ़ल छैक । देह भरल छैक। हम ओकरा चिन्हि नहि पाबि रहल छी। आखिर ओएह बजैत अछि- "हम छी श्याम।" "ऐँ! तूँ अचानक एहिठाम?" "हमरा अमेरिकाक जहलसँ छोड़ि देल गेल।" "से कोना की भेलैक?" "ऊपरका न्यायालयमे दोष सिद्ध नहि भेलैक। मुदा सरकार अड़ल रहैक । जे ई आदमी अमेरिकामे तँ बाहर नहि रहि सकैत अछि । आखिर न्यायालय सर्तक संगे हमरा छोड़ि देलक।" "कोन सर्त?" "जे हम अमेरिका छोड़ि अपन मूल देश वापस भए जाएब । तेँ हमरा वापस एतए आबए पड़ल।" "मुदा हमरसभक पता कोना लगलह?" "अहाँक फोन लगेबाक प्रयास करी, मुदा गप्प नहि भए सकल। तखन मुरलीसँ सभटा जानकारी भेल ।" ताबे रमा सेहो आबि गेलथि। "ई श्याम अछि।" "एकरा तँ चिन्हिओ नहि पाबि रहल छी।" "जहलसँ छुटि कए सोझे एतहि आबि रहल अछि।" माए तँ माए होइत छैक। ओ श्यामकेँ देखि आत्मविभोर भए गेलीह। हम आ श्याम सोफापर बैसले रही ताबे रमा चाह बना कए लए अनलीह। जलखै सेहो बना लेने छलीह। हमसभ संगे-संगे जलखै करैत छी आ गप्पो करैत छी। जहलमे रहैत-रहैत श्यामक स्वरुप एतेक बदलि जाएत से हमसभ नहि सोचि सकलहुँ। हमसभ अपनो आश्चर्यचकित रही जे ओकरा चिन्हिओ नहि सकलहुँ । मुदा हमसभ एहि बातसँ प्रसन्न रही जे ओ जहलसँ छुटि गेल। ओकर अपराध गलत साबित भेलैक। मुदा समस्या आब छैक जे ओकरा अपना देशमे शुरुसँ स्थापित करए पड़तैक। जे हेतैक आब ई तँ ओकर समस्या छैक ,समाधानो ओएह करत। मुरली आ श्याम दुनू भाइ आब अपने देशमे अछि। मुदा दुनूगोटे आर्थिक समस्यासँ परेसान अछि। मुरलीक चलते तँ हम बरबाद भए गेलहुँ। घरो हाथसँ निकलि गेल। बहुत रास टाका से चलि गेल। आब थोड़ बहुत एहि लेल बाँचि गेल अछि जे ओकर जनतब ककरो नहि छैक,रमोकेँ नहि। अन्यथा ओहो गेल रहैत। पेनसन लगातार भेटि रहल अछि। इएह बड़का शक्ति अछि। मुरली आ श्यामक समस्या तँ ओकरसभक स्वनिर्मित छैक। एतबा तँ तय बुझाइत अछि जे ओकरासभक संगे जतेक सटल रहब ततेक दुख भोगब। मुदा मोनो मानए तखन ने। हम यदि किछु सोचितहुँ छी तँ रमा ओकरा उलटि दैत छथि। ओहो की करतीह? आखिर माए छथि। जाबे जीबैत छथि,ई समस्या रहबे करतनि। हमरा जरूर सोचबाक अछि जे आगू की करी? कोना जीवनकेँ चलाबी जे बाँकी समय शांतिसँ बीति जाए। 50 पड़ोसी वृद्धाश्रममे पहुँचि तँ गेल मुदा ओतए सुखी नहि रहए। बेर-कुबेर ओकर फोन अबैत रहैत छल। कखनहु किछु समस्या तँ कखनहु किछु लागले रहैत छलैक । निराकरण एतबे रहैक जे ओहिठामसँ निकलि जाए । मुदा निकलि कए जाएत कतए? जैँ कतहु व्यवस्था नहि भए सकलैक तेँ ने ओतए गेल । वृद्धाश्रममे अधिकांश वृद्धसभ कुंठित छल,दुखी छल। अपन घर-परिवार द्वारा तिरस्कृत कए देल गेल छल। किछुगोटे अपाहिजो छल। किछु आर्थिक रूपसँ लचार छल। एहन लोकसभ करबे की करितए?सभ किछु सहि जेबाक अतिरिक्त कोनो विकल्प नहि रहैक । आपसमे कैकबेर बहुत झंझटि होइक। कैकबेर तँ पुलिस बजाबए पड़ैक । व्यवस्थापकसभ घोटालामे लागल रहैत छलैक। वृद्धाश्रममे रहनिहार सभक हेतु सरकार द्वारा देल गेल धनक दुरुपयोग होइत छल। केओ देखनाहर नहि। परिस्थितिसँ तंग भए किछु वृद्ध ऊपर सिकाइत कए देलकैक। मामिलाक जाँच हेतु उच्चअधिकारी सभ आएल रहथि। ओकरासभकेँ पड़ोसी सभबात सही-सही कहि देलकैक। स्थानीय व्यवस्थापकसभ एहि बातसँ बहुत तमसा गेलैक आ अधिकारीसभकेँ गेलाक बाद ओकरा गुंडासभसँ पिटबा देलकैक । पड़ोसी बाप-बाप करैत रहि गेल। केओ ओकरा बचबए नहि अएलैक। मारि खा कए ओ ठामहि बेहोस भए गेल। वृद्धाश्रमक स्थानीय व्यवस्थापकसभ ओकर हालति देखि घबड़ा गेल । ओकरा अस्पताल लए गेल। कैकदिन धरि ओकर इलाज चलैत रहल। बहुत मोसकिलसँ ओकर जान बाँचल। जान तँ बाँचि गेलैक,मुदा ओकर दहिना आँखि सभदिन लेल खराप भए गेलैक। ओहिमे बहुत चोट लागि गेल रहैक। ई सभटा समाचार पड़ोसी हमरा फोनपर कहलक। मुदा हम तँ स्वयं लाचार रही। की कए सकैत छलहुँ? हमहूँ ओकरा अपन परिस्थितिक जनतब दैत रहलिऐक आ कहलिऐक- "धैर्य राखह । आइ ने काल्हि समय पलटत । हमहूँ एही आशासँ जीबि रहल छी।" एमहर श्यामक अबाइ सुनि कए मुरली सेहो मुम्बई आबि गेल ।  रमा श्याम आ मुरलीकेँ एकठाम देखि बहुत प्रसन्न रहथि। मुदा ओ दुनू भाइ आपसमे सदिखन झगड़े करैत रहैत छल। कहि नहि ओ सभ चाहैक की छल? संभवतः हमसभ जे नम्रताक संगे रहिऐक से ओकरासभकेँ नीक नहि लगैक। मुदा हम ओकरासभकेँ साफ-साफ कहि देलिऐक- "तूँसभ उच्च शिक्षा प्राप्त केने छह। अपन योज्ञताक अनुसार बहुत दिनसँ कमा सेहो रहल छह। अपन-अपन जिनगी जेना भेलह तेना चलबैत रहलह। तोरासभकेँ आगूओक व्यवस्था स्वयं करए पड़तह। उचित समाधान करह जाहिसँ स्वाभिमानपूर्वक जीबि सकह । ताहि लेल जरूरी अछि जे स्वाबलंबी बनैत जाह। अपन-अपन योग्यताक सही उपयोग करबह तँ से कोनो कठिन काज नहि अछि। अनका भरोसे जीवन नहि चलि सकैत अछि। हमसभ आब एहि स्थितिमे नहि छी जे किछु नव धंधा शुरु करी। ने हम आब तोरासभक भार उठा सकैत छी।" मुरली आ श्यामकेँ हमर बात नीक तँ नहिए लगलैक,मुदा स्पष्ट कहि देनाइ जरूरी छल। हम आब एहि घमरथनसँ हटब जरूरी बुझैत छी।  फेर हमसभ कइओ की सकैत छी? तमसा कए ओहि फ्लैटकेँ छोड़ि देलक। जाइत काल भेंटो नहि केलक। रमा कहबो करथि- "अहाँकेँ ओकरासभकेँ एना ठाँइ-पठाँइ नहि कहबाक चाहैत छल। आब ओ सभ कोनो नेना नहि अछि।" "सएह तँ अफसोचक बात अछि। एतेक नीक शिक्षाक बादो हमरासभकेँ रहि-रहि कए परेसानीमे देने रहैत अछि। हमसभ ईसभ कहिआ धरि करैत रहब? तेँ ओकरासभकेँ कहब जरूरी छल,से कहलिऐक।" "मुदा ओसभ तँ तमसा कए चलि गेल।" "से की कए सकैत छी? जे लिखल हेतैक से हेतैक।" ओ सभ मुम्बई छोड़ि देलक। कतए गेल,की केलक तकर कोनो जनतब हमरासभकेँ नहि देलक । हम आ रमा साल भरि ओतहि रहि गेलहुँ। नम्रताक बी काममे बहुत नीक परिणाम भेलैक। तकर बाद ओ आइआइएममे नाम लिखेबाक प्रयास केलक आ सफलो रहलि। हमसभ बहुत प्रसन्न भेलहुँ । ईश्वरकेँ एहि लेल बहुत धन्यवाद देलिअनि। नम्रता अपन लगन आ परिश्रमसँ बहुत नीक रस्ता बना लेलक। ओ आइआइएम अहमदाबाद चलि गेलि। नम्रताके अहमदाबाद चलि गेलाक बाद हम ओहि फ्लैटमे  असहज भए जाइ । रहि-रहि कए शालिनी मोन पड़ैत रहैत छलि। अखन धरि तँ नम्रतामे लागल रहैत छलहुँ । मोनमे सदिखन ई भाओ रहैत छल जे हमसभ शालिनीक स्वप्नकेँ साकार कए रहल छी। आब जखन नम्रता अपन लक्ष्य दिस आगू बढ़ि गेल,तखन  एकटा संतुष्टिबोध तँ होइते छल,मुदा शालिनीक संग बिताओल गेल समय सदिखन स्मृतिमे पछोड़ केने रहैत छल । हमरासभक प्रतिए ओकर अनुरागक वर्णन नहि कएल जा सकैत अछि। ओ सदिखन हमरसभकेँ देख-रेख करैत रहलि। ओकर वश चलितैक तँ हमर फ्लैट कखनहु नहि चलि जाइत। मुदा आब तँ जे हेबाक छल से भेल । आब हमरासभकेँ मुम्बईक फ्लैटपर रहबाक कोनो औचित्य नहि छल। ने हमरासभकेँ ओतए मोन लगैत छल। एतेक दिन तँ नम्रताक कारणसँ रहब जरूरी छल। आब ओहो अपन लाइन पकड़ि लेलक।  मुदा जइतहुँ कतए? कोनो वैकल्पिक व्यवस्था जाबे नहि भए जाइत अछि ताबे ओतहि रहब ठीक बुझाइत छल। नम्रतोक सएह विचार रहैक। अहमदाबाद गेलाक बादो ओ निरंतर फोन करैत रहलि। हमरसभक हाल-चाल लैत रहलि। एकदिन ऐहिना भोरे ओसारापर बैसल अखबार पढ़ैत रही कि बैंकक निलामीक विज्ञापन देखलिऐक । उत्सुकता भेल। ओकरा नीकसँ पढ़लहुँ । ओहिमे दिल्लीक हमर फ्लैटक निलामीक सूचना सेहो सामिल छल। फ्लैटक आरक्षित मूल्य पचीस लाख छलैक। एतेक टाका तँ हमरा लग छल। मुदा एकर बाद हाथ खाली भए जाइत। हमसभटा बात रमाकेँ कहलिअनि। ओ एहिबातसँ आश्चर्यचकित रहथि जे अखनहु हमरा लग एतेक टाका अछि। "सएह कहू अहाँ हमरोसँ ई बात नुकओने रहलहुँ ।" "तेँ ने एतबो बाँचल अछि। हम बुझिऐक जे अहाँक पुत्रसभक मोह कहि नहि कतए लए जा कए हमरासभकेँ ठाढ़ कए देत। तेँ एकरा बचओने रहलहुँ। आब अहाँ चाही तँ ओ फ्लैट वापस कीनि ली।" "प्रयास करू । यदि से भए जाइत अछि तँ एहिसँ नीक किछु नहि।" अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.कुमार मनोज कश्यप-संवेदना कुमार मनोज कश्यप संवेदना भोरुका पहर सेहो अगहन के  सगरो पसरल कुहेश आ ताहि पर पछबा के कनकनी; तैं  रोड लगभग सुनसाने सन! इक्का-दुक्का लोक सेहो मजबूरिये कखनो-कखनो ओहि बाटे जाईत! कि ताबते  धड़ाsssम..!!!! के जोरदार आवाज भेलै! एकटा तेज गति कार एकटा साईकिल सवार के तेहन जोड़दार टक्कर मारने छलै जे साईकिल सवार हवा मे उछलि कs रोडक दोसर कात जा  खसल। लोक जुटs लगलै आ बिना कोनो बिलम्ब केने  लागल अपन-अपन मोबाइल सs रील बनाबs। ताबत केम्हरो सs एकटा आदमी दौड़ल- दौड़ल आयल आ ओहि घायल व्यक्ति के पॉकेट झोरि निपत्ता भs गेल। एहनो नहिं जे सभ विडियोग्राफिये  मे तल्लीन छल;  किछु सहृदय लोक ओहि बाटे गुजरैत वाहन  सभ के हाथ दs  रोकबाक निष्फल प्रयास सेहो करैत रहल जे कहुना घायल के ससमय कोनो हॉस्पीटल सs चिकित्सा सुविधा भेटि जाय। केयो सय नंबर पर पुलिस के सेहो सूचना देलकै। मुदा  पुलिस जखन ओतs अपन समय पर पहुँचल ओहि सs पहिने ओकर ईहलीला समाप्त भs गेल गेल छलै। ओहि दिनक समाचार चैनल सभ पर ओ विडियो खुब चललै आ बेस लोकप्रिय सेहो भेलै। -सम्प्रति: भारत सरकार के उप-सचिव, संपर्क: सी-11, टावर-4, टाइप-5, किदवई नगर पूर्व (दिल्ली हाट के सामने), नई दिल्ली-110023, # 9810811850 ईमेल: writetokmanoj@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.प्रमोद झा 'गोकुल'-जिन्दाबाद प्रमोद झा 'गोकुल' जिन्दाबाद

वर्षा मेघक सङ वसातक हिलरा पर झुलैत झमकौवा मल्हार गाबि रहल छलि। प्रकृति अपन रसिका बेटीक मनोरम अभिसार पर निरवताक एहसास करबैत सुखद भविष्यक कल्पनामे हेरायल सन लागि रहल छलीह। तखने चुप्पीके भंग करैत जेरक जेर ढेररास पीयर ढाबुस बेङ सानुचर हरियर कारी चितकबरा सजातीय आ बिजातीय एक दोसराक परम शत्रु साँप बिज्जी आ बिच्छू झिंगूरक सङ निर्लज्ज जकाँ कोंकाँक नारा लगबैत पहुँचल । असहज होइत वर्षा ओकरा सबसँ सादर पुछलखीन - एना तूँ सब अनघोल किए मचा रहल छैँ ? - आइसे हम सब विपक्षी एक छी। ऐबेरका चुनावमे हम सब अहाँक जुमलाबाजी सरकारके उखरि फेकब ‌। हम सब दृढ़ प्रतिज्ञ छी! एहि बात पर मेघ अट्टहास कय प्रजाक सम्मुख गम्भीर भैके बजलाह - सब एक दोसराक प्राणक शत्रु ज़ँ राजाके गद्दी सँ उतारैक लेल एक भै जाय तँ प्रजाके बूझक चाही जे हमर राजा हदसँ बेसी इमानदार अछि। एहि बातक अनुमोदन करैत प्रजा जोर सँ चिचियायल - विपक्षी एकता मुर्दाबाद! हम्मर सुशासन जिन्दाबाद!!!!

-प्रमोद झा 'गोकुल', दीप, मधुवनी (विहार); फोन -9871779851 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.पद्य ३.१.संतोष कुमार राय 'बटोही'-दूटा कविता/ काल्हि आओर आई/हमरा मुइलाक बाद ३.२.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'-गजल ३.३.राज किशोर मिश्र-प्रदूषणक सराप ३.४.प्रमोद झा 'गोकुल'-इहो कवि शान से तखन गौतै ३.१.संतोष कुमार राय 'बटोही'-दूटा कविता/ काल्हि आओर आई/हमरा मुइलाक बाद संतोष कुमार राय 'बटोही' दूटा कविता/ काल्हि आओर आई/हमरा मुइलाक बाद १ काल्हि आओर आई

काल्हि पढऽ पड़त हमरा वक्त केर दहलीज पर लिखल ऊ हमर गप्प झूठ केर पहरेदारी केँ आगि लगौत सचक घुर ।

बदलतै देशक हवा-पानि सत्ता केर गुमान, सभ किछु अमरित नहि पीने छथि कियो थरथरी हुनको औतैन्ह एक बेर धुकधुकी अछि , नहि होयत हानि ।

टिकल रहल साँचक माटि मूर्त देह धरै सँ पहिने सभ ओहिना रहैत छै दिनक फेरि होयत छै झूठक मकान छौर भ जायत छै। २ हमरा मुइलाक बाद

झूठक आओर साँचक हृदय पिघलत मनुक्ख उघार होयत जखन अशमशान में , बटखारा सँ जोखल जायत हमरा तखन तराजू पर माथा नीचा आओर पैर ऊपर ।

हमर धिया आओर पुता टुकुर-टुकुर देखतै, केलाह हमर किरतानी छाँटल जेतै सोझा मे हम किछु नहि चलतै छल-प्रपंच तखन धरि तखन हमर इतिहास पकिया मानल जेतै ।

चील आओर गिद्ध लहासक फैसला करतै समाज हमर करमक लेखन करतीन्ह तखन तेसर आँखि न्याय लेल विधान करतीन्ह मने हमरा मुइलाक बाद 'आत्मा' केँ परीक्खा हेतै।

- संतोष कुमार राय 'साँच', ग्राम - मंगरौना अपन मंतव्य editorial.ऽtaff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'-गजल जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल' गजल प्रेम करैछी त निरमल बेबहार करू जहिना छी तहिना हमरा स्वीकार करू जे देलक पौरुष ताहीमे मगन रहू जे नहि अछि तैपर जुनि सोच-विचार करू दुनिञा मोहित हैत अहँक सुन्दरतासँ क्षमा दया करुणासँ नित श्रृंगार करू संग्रह ततबे करू जते आवश्यक हो कथमपि नहि लछुमन रेखा ई पार करू एकेटा अछि वस्तु जगतमे जितबालय अपन मोनपर अपन पूर्ण अधिकार करू शान्तिक धन अनमोल थीक ऐ दुनिञामे से बुझबालय अपनाकें तैयार करू ( मात्रा क्रम : 2222 2222 222 ) दूटा लघुकें एक दीर्घ मानल गेल अछि | अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.राज किशोर मिश्र-प्रदूषणक सराप राज किशोर मिश्र प्रदूषणक सराप

काँ पि रहल अछि मो न हमर, धड़कि रहल अछि हमर छा ती , बुझा रहल अछि , मि झा रहल अछि , रा ति मे चमकैत अम्बर-बा ती ।

सतत् झरल जा रहल जेना , क्षि ति ज पर भो रहरबा क ला ली , दि नकरक अग्नि -वृत्त सँ मा नू ,

ऊर्जा क्रमश: भऽ रहल खा ली ।

ला गि रहल अछि , प्रभा ही न भऽ रहल अछि वि धुक मा ड़रि , फूलक केसर सूखा रहल अछि , सुखला ही अछि भेल काँ ड़रि ।

वि षम भऽ रहल तरुक जौ बन, ठूट्ठ देह आ को कड़ल पा त, सो नि त नहु-नहु सूखि रहल छै, झुत्थुर, अछि भऽ रहल नि पा त।

सर मे सरसि ज सूखि रहल अछि , देखि बता ह सन भेल अछि षट्पद, काँ ट -कुश आ' डा भ उगल छै, अहुरि आ का टि रहल नि र्जल नद।

ई नहि हमर कथमपि अछि भ्रम, बुझा रहल सद्यः यथा र्थ, जि नगी क सत्य ,प्रदूषण मे, हम ता कि रहलहुँ ,बनि सि द्धा र्थ।

धुआँ मे का र्बनडा इआॕक्सा इड, सूँघि रहल अछि गा छ-बि री छ, फेँटल फेकटरी क वि षा क्त पा नि , सर सँ पी बि रहल अछि री छ।

प्रदूषण ना पि लेलक अछि पृथ्वी , छूटल ने अछि को नो गा म, ओकरहि अङरा ग सँ रा ङल, वसुन्धरा भऽ रहली ह झा म।

हुनकहि कपा र बथा एल अछि , प्रदूषणक सभटा पा प, अन्दर मे बरकैत ज्वा ला मुखी , ऊपर सँ भो अङ्गर ता प।

झी लक जहर सन पा नि मे, झलहेरि क ककरा सऽख? सुखल चा ननि -कि रि न-थो का , शुक्ल सेहो जनि कृष्णे पऽख।

सुधङ चि ड़ैआ, शा ल्मलि तरु पर, पड़ल धा धि मे, उजड़त खोँ ता , कंक्री ट-बन जनु असुर-आक्रमण, हरि त-यज्ञक बनत के हो ता ?

गम्हरा एल धा न केँ पठा ओल जा इछ, महकल जलक सधो रि , महुरा एल मा टि केँ देखि भटपुरैनि , ठा ढ़ भेल करजो ड़ि ।

पशुक आँखि सँ,क्षो भ मे, नि कसल नो रक नमहर पला र, ककर पा प बथा एल ककरा सि र, धरणी सभ केँ करैछ दुला र।

पश्चा त्ता प, तखन प्रा यश्चि त्त, कहू के नहि बुझत अप्पन हि त?

उड़ल जा इत अछि एहि दुनि आ केँ, सभटा रङ्ग-रभस, प्रदूषणक सहस्र पा णि मे, वि ध्वंसक अङ्गो र ,अबस।

कनक बि रहि ,सभ बी छत झि टका , सत्य ने भऽ जा ए कहुँ ई खटका ? अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.४.प्रमोद झा 'गोकुल'-इहो कवि शान से तखन गौतै प्रमोद झा 'गोकुल' इहो कवि शान से तखन गौतै हम कवि छी कि कवि काठी छी कि वाँसक टूटल फराठी छी कि तेल पियाबन लाठी छी जे छी से छी ,हमहूँ कवि छी । हम कविता लिखैत छी खिस्सा पिहानी सेहो कहैत छी अहां जे बुझै छी से बुझै छी बुड़िबक छी कि काबिल छी आमिल सन खट्टा छी कि नीम सन अकत तीत छी जे छी से छी ,बुझैत रहू शान से ,हमरा लेखें धैन सन आ ने कोनो मतलब ,ने चाही मनतब । नोत पिहान मे निमंत्रित भए अहाँ धन्य होइत रहू घी मलीदाक संग रसगुल्ला चोभैत रहू ,चपैत रहू कविताक अलंकर जकाँ बहु ब्यंजनक बीयैन सँ स्वोदर व्यंजन निधोख करैत रहू,ढेकरैत रहू ,पसरैत रहू हमरा नै कोनो मतलब अछि । पाग दोपटा मे मठो माठ भेल सजल मंच पर हाथ हिला हिला के बचैत रहू कविता होइत रहू सम्मानित ,करैत रहू दोसरो के हमरा नै कोनो मतलब । हम ते पझैत धुँवैत अपन चिनगीनुमा जिनगीक गवाक्ष सँ झाँकि रहल छी निहारि रहल छी नीलाकाशक उन्नत ललाट केँ जै पर हमरो भाग्यक सुरूज एक ने एक दिन अवस्से भुक्क द उगतै तमसो मा ज्योतिर्गमयक नव छन्द इहो कवि शान से तखन गौतै ।

-प्रमोद झा 'गोकुल', दीप, मधुवनी (विहार); फोन -9871779851 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। 74 || विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in विदेह ३८९ म अंक ०१ मार्च २०२४ (वर्ष १७ मास १९५ अंक ३८९)|| 75

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हज विशेषांक २०२४ नरेन्द्र झा एवं प्रा. रामावतार यादव पर विदेह www.videha.co.in विशेषांक २०२४ नरेन्द्र झा एवं प्रा. रामावतार यादव चयनित भेला २०२४ क विदेह विशेषांक लेल। जि भर नरेन्द्र झा पर विदेहक विशेषांक १ जून २०२४ आ प्रा. रामावतार यादव पर १५ जून २०२४ अंकमे धो लि SD प्रकाशित CCA) eee: | | लेखक-पाठक clad आग्रह जे नरेन्द्र झा एवं प्रा. रामावतार यादव जीक काजपर आलोचना, . | = 'समालोचना, समीक्षा आदि वर्ड फाइलमे editorial.staff.videha@gmail.com पर | — in 0p Se i eam पाबधि। लि कि & नरेन्द्र झाजीक अधिकांश पौथी २००८ सें विदेह www.videha.co.in पर उपलब्ध ofS! Wy face fastuign Roly % cf जद = = == = SG WWW. HES हैंए। Pe — Yn, facie ICTR 3928 re ae facre factais २०२8 .... प्र } AERA सा अन्न था. वामाब्रछाव AAA शव FACE www. videha.co.in FACT २०२8. AA YA सा IH शा. वामाब्रजाव AAA BUS एछता २०२8 क fA FACT CAL ATT सा शव FACES FACTS ५ OT २०२४ शा था. वामाब्रछाव TIAA शव 90 जून २०२४ कर्म geht =. 7 east a a एलथक-नाठक एलाकनिें AS OH THT सा IH था. वामाब्रठाव ATA जीक BIA AAT, HATA, i” RE» ater शनि aS काजतएय editorial. staff.videha@gmail.com शव शठाब्िणि। x AES साजीक अविकीने co २००० मैं बिएनठ www.videha.co.in शव Gorn अडि।

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