VIDEHA — Issue 391 / अंक ३९१

Publication: VIDEHA · Issue: 391
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ISSN 2229-547X VIDEHA 𑒀 विदेह ३९१ म अंक ०१ अप्रैल २०२४ (वर्ष १७ मास १९६ अंक ३९१) [विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। कॉपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति ‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२४. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२४. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. 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It is a platform for scholars, researchers, writers and poets to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, and poetry in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@gmail.com. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover designed by AUM GAJENDRA THAKUR Videha e-Journal: Issue No. 391 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अक्खर खम्भा (आखर खाम्ह) तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ (कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।) माने आखर रूपी खाम्ह निर्माण कऽ ओइपर (गद्य-पद्य रूपी) मंच जँ नै बान्हल जाय तँ ऐ त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लत्ती केना पसरत। शुक्ल यजुर्वेद (२६.२)-यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः। ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च।।हम सभ गोटेकें ई पवित्र वाणी (वेदवाणी) सुनाबी। ब्राह्मणकें, क्षत्रियकें, शूद्रकें आ आर्यकें; अपन लोककें आ अपरिचितकें सेहो (माने सभकें)। मुदा ऐ वेदवाक्यक विपरीत मनुस्मृति वेदवाणीक अध्ययन/ श्रवणकें समाजक किछु गोटे लेल निषेध करऽ चाहलक, मुदा स्मृति सेहो वेदवाक्यकें प्रमाण मानैत अछि (शब्द प्रमाण) तें तकर विरुद्ध देल ओकर निर्देश स्वयं अमान्य भऽ जाइत अछि। 𑒀 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्तिः पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म 𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑓁 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒰𑒣: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒼𑒭𑒡𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹 𑒠𑒹𑒫𑒰: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧 ब्रह्मणसँ प्रार्थना जे द्युलोकमे, अंतरिक्षमे, पृथ्वीपर, जलमे, औषधमे, वनस्पतिमे, विश्वमे, सभ देवतागणमे आ ब्रह्ममे शांति हुअय। ॐ-ब्रह्मण, द्यौ-सूर्य-तरेगण, अंतरिक्ष- पृथ्वी आ द्यूलोकक बीच, आप:-जल, विश्वेदेवा- सभ देवता, ब्रह्म- सर्जक। 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝𑒮𑒿 𑒣𑓂𑒩𑒰𑒩𑓂𑒟𑒢𑒰 𑒖𑒹 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒧𑒹, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭𑒧𑒹, 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲𑒣𑒩, 𑒖𑒪𑒧𑒹, 𑒎𑒭𑒡𑒧𑒹, 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒱𑒧𑒹, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒧𑒹, 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰𑒑𑒝𑒧𑒹 𑒂 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒧𑒹 𑒬𑒰𑓀𑒞𑒱 𑒯𑒳𑒁𑒨। 𑓇-𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝, 𑒠𑓂𑒨𑒾-𑒮𑒴𑒩𑓂𑒨-𑒞𑒩𑒹𑒑𑒝, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭- 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒂 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒏 𑒥𑒲𑒔, 𑒂𑒣:-𑒖𑒪, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹𑒠𑒹𑒫𑒰- 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰, 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧- 𑒮𑒩𑓂𑒖𑒏। 𑒀 ॐ, स॒हस्र॑शीर्षा॒ पुरु॑षः। स॒ह॒स्रा॒क्षः स॒हस्र॑पात्। 𑓇, 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒬𑒲𑒩𑓂𑒭𑒰↓ 𑒣𑒳𑒩𑒳↑𑒭𑓁। 𑒮↓𑒯↓𑒮𑓂𑒩𑒰↓𑒏𑓂𑒭𑓁 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒣𑒰𑒞𑓂। स भूमिं॑ ग्वंग वि॒श्वतो॑ वृ॒त्वा। अत्य॑तिष्ठद् दशाङ्गु॒लम्॥ 𑒮 𑒦𑒴𑒧𑒱𑓀↑𑓅 𑒫𑒱↓𑒬𑓂𑒫𑒞𑒼↑ 𑒫𑒵↓𑒞𑓂𑒫𑒰। 𑒁𑒞𑓂𑒨↑𑒞𑒱𑒭𑓂𑒚𑒠𑓂 𑒠𑒬𑒰𑒓𑓂𑒑𑒳↓𑒪𑒧𑓂॥ हजार माथ, हजार आँखि, हजार पएर संग विश्वकेँ आच्छादित केने अछि, दस आंगुरक गनतीक वशमे नै अछि ओ। प॒द्भ्याग्ँ॑ शू॒द्रो अ॑जायत॥ 𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑒑𑓂𑒿↑ 𑒬𑒴↓𑒠𑓂𑒩𑒼 𑒁↑𑒖𑒰𑒨𑒞॥ पएरसँ शूद्रक उत्पत्ति भेल॥ प॒द्भ्यां भूमि॒र्दिशः॒ श्रोत्रा᳚त्। 𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑓀 𑒦𑒴𑒧𑒱↓𑒩𑓂𑒠𑒱𑒬𑓁↓ 𑒬𑓂𑒩𑒼𑒞𑓂𑒩𑒰↑↑𑒞𑓂। मुदा पएरेसँ भूमियोक उत्पत्ति। ❀ (White Florette- innocence and purity) ☸ (Wheel of Dharma) ࿕(Swastik) 𑓅 (Gwang ग्वंग- two small circles connected by u and a dot placed over it, used in reference of Vedic texts) ꣼ (सिद्धिरस्तु, सिद्धम 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒱𑒩𑒮𑓂𑒞𑒳, 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒧 Devanagari Anji) ঀ (Bengali Anji, Siddham) 𑒀 (Tirhuta Anji, Ankush of Ganeshji, placed at the beginning of something) सोशल मीडिया, अन्तर्जाल आ दूरदर्शनक कार्यक्रम सभमे वेदमे ई लिखल अछि, ई वर्णित अछि, शूद्रक प्रति, स्त्रीक प्रति, शूद्रक स्त्रीक प्रति अपमान जनक गप लिखल अछि; ई सभ सूनि कऽ कियो विकीपीडिया आ आन आन ठाम अन्तर्जालपर लेख सभमे परिवर्तन कऽ देने रहथि। एक गोटे अंग्रेजीमे लिखलनि- “अथर्ववेदमे शूद्रक पत्नीकेँ बिना स्वीकृतिक कियो हाथ पकड़ि लऽ जा सकय, बला वक्तव्य अछि।” हम कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक, खण्ड-८; प्रबन्ध निबन्ध समालोचना भाग-२, २०१४ मे अपन आलेख “विद्यापति: किछु प्रचलित कुप्रचारक निवारण” मे लिखने रही- “.. ई ओहिना भेल जेना अथर्ववेदमे शूद्रक पत्नीकेँ बिना स्वीकृतिक कियो हाथ पकड़ि लऽ जा सकए बला वक्तव्य।” मुदा अथर्ववेद बा कोनो वेदमे ओइ तरहक वक्तव्य कत्तौ नै आयल अछि। तकर विपरीत शुक्ल यजुर्वेद ई कहैत अछि:- शुक्ल यजुर्वेद (२६.२)-यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः। ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च।।हम सभ गोटेकें ई पवित्र वाणी (वेदवाणी) सुनाबी। ब्राह्मणकें, क्षत्रियकें, शूद्रकें आ आर्यकें; अपन लोककें आ अपरिचितकें सेहो (माने सभकें)। मुदा ऐ वेदवाक्यक विपरीत मनुस्मृति वेदवाणीक अध्ययन/ श्रवणकें समाजक किछु गोटे लेल निषेध करऽ चाहलक, मुदा स्मृति सेहो वेदवाक्यकें प्रमाण मानैत अछि (शब्द प्रमाण) तें तकर विरुद्ध देल ओकर निर्देश स्वयं अमान्य भऽ जाइत अछि। वेद मे उपलब्ध शूद्र शब्दक उल्लेखित अंशक संग्रह नीचाँ देल जा रहल अछि। शूद्रक अपमानजनक उल्लेख तँ नहिये अछि, वरन् पएरसँ पवित्र पृथ्वीक जन्मक उल्लेख अछि आ तही उत्पत्तिक सादृश्यताक कारणसँ मानव समुदायक पालक शूद्र कहल गेल छथि। प॒द्भ्याग्ँ॑ शू॒द्रो अ॑जायत॥ पएरसँ शूद्रक उत्पत्ति भेल॥ प॒द्भ्यां भूमि॒र्दिशः॒ श्रोत्रा᳚त्। मुदा पएरेसँ भूमियोक उत्पत्ति। REFERENCE OF SHUDRAS IN VEDAS [Dr Tulsi Ram, 2013, Atharveda: Samaveda: Yajurveda: Rigveda; English Translations] ATHARVA VEDA (3 references) KANDA-14 (MARRIAGE AND FAMILY) Kanda 14/Sukta 1 (Surya’s Wedding) Devata: Dampati; Rshi: Surya Savitri 60. Bhagastataksha caturah padanbhagastataksha catvaryuspalani. Tvasta pipesa madhyatonu vardhrantsa no astu sumangali. Bhaga, lord sustainer and ordainer of life, has framed the value orders of life: Dharma, Artha, Kama and Moksha; four social orders: Brahmana, Kshatriya, Vaishya and Shudra; four stages of personal life: Brahmacharya, Grhastha, Vanaprastha and Sanyasa. Tvashta, lord maker and organiser of life, has placed the woman as partner of man in matrimony in this order and organisation. May the bride be good and auspicious for us. भाग- पालनकर्ता आ जीवनक अधिष्ठाता- जीवनक मूल्य क्रम तैयार केने छथिः धर्म, अर्थ, काम आ मोक्ष; चारि सामाजिक क्रम- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आ शूद्र; व्यक्तिगत जीवनक चारि चरण- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ आ सन्यास।त्वष्टा- स्वामी निर्माता आ जीवनक आयोजक- एहि क्रममे आ सङ्गठनमे स्त्रीकेँ विवाहमे पुरुषक साथीक रूपमे रखने छथि। से वधू हमर सभक लेल नीक आ शुभ होथि। Kanda 19/Sukta 6 (Purusha, the Cosmic Seed) Purusha Devata, Narayana Rshi 6. Brahmano sya mukhamasid bahu rajanyo bhavat. Madhyam tadasya yadvaishyah padbhyam sudro ajayata. Brahmana, (man of knowledge, divine vision and the Vedic Word in the human community) is the mouth of the Samrat Purusha. Kshatriya, man of justice and polity, is the arms of defence and organisation. The middle part is the Vaishya who produces and provides food and energy. And the ancillary services that provide sustenance and support with auxiliary labour are the feet, the Shudra that bears the burden of society. ब्राह्मण (ज्ञानी, दिव्य दृष्टि आ मानव समुदाय लेल वैदिक शब्द) सम्राट पुरुषक मुख अछि। क्षत्रिय -न्याय आ राजनीतिक लोक- रक्षा आ सङ्गठनक हाथ छथि। मध्य भाग वैश्य छथि जे भोजन आ ऊर्जाक उत्पादन आ आपूर्ति करैत छथि। आ सहायक सेवा जे सहायक श्रमक सङ्ग निर्वाह आ सहायता प्रदान करैत अछि, ओ अछि पैर, शूद्र जे समाजक भार वहन करैत छथि। Kanda 19/Sukta 32 (Darbha) Darbha Devata, Bhrgu Ayushkama Rshi 8. Priyam ma darbha krunu brahmarajanyabhyam sudraya charyaya cha. Yasmai ca kamayamahe sarvasmai cha vipasyate. O Darbha, destroyer and preserver, eternal sanative, render me dear and loving to and loved by all Brahmanas, Kshatriyas, Vaishyas, Shudras, whoever we love and desire, and all those who have the eye to see (and discriminate right and wrong). हे दर्भा, विनाशक आ संरक्षक, शाश्वत विवेकशील; हमरा सभकेँ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, सभक प्रिय आ प्रेमी बना दिअ। संगे ओ सभ हमरा सभसँ प्रेम् करथि जिनका सँ हम प्रेम करी बा जिनकर कामना करी; आ ओ सभ जिनका लग देखबाक दृष्टि अछि (आ सही आ गलतमे भेद बुझैत छथि)। SAMAVEDA (o reference) YAJURVEDA (7 references) CHAPTER- VIII 30. (Dampati Devata, Atri Rshi) Purudasmo visuruupa indurantarmahimanamanaja dhirah. Ekapadim dvipadim tripadim chatupadimastapadim bhuvananu prathantam svaha. The man of mighty deeds, who eliminates suffering and creates joy, of versatile attainments, bright and honourable, constant and resolute, should wait for the great new arrival. Men of the household, cultivate the vaidic culture of one, two, three, four and eight steps of attainment: one: Aum; two: worldly fulfilment and the freedom of moksha; three: the joy of the truth of word and the health of body and mind; four: the attainment of Dharma, wealth, fulfilment of desire, and moksha; eight: the joy of all the four classes and all the four stages of life (Brahmana, Kshatriya, Vaishya and Shudra, Brahmacharya, Grihastha, Vanaprastha and Sanyasa). Build homes for the people and advance in life. शक्तिशाली कर्मक पुरुष, जे दुःखकेँ समाप्त करैत अछि आ आनन्द उत्पन्न करैत अछि, बहुमुखी उपलब्धिक, उज्ज्वल आ सम्मानजनक, स्थिर आ दृढ़ संकल्पित, ओकरा महान नव आगमनक प्रतीक्षा करबाक चाही। घरक लोक, उपलब्धिक एक, दू, तीन, चारि आ आठ चरणक वैदिक संस्कृति विकसित करैत छथिः एकः ओम; दुइः सांसारिक पूर्ति आ मोक्ष रूपी स्वतन्त्रता; तीनः वचनक सत्यक आनन्द आ शरीर आ मस्तिष्कक स्वास्थ्य; चारिः धर्मक प्राप्ति, धन, इच्छाक पूर्ति, आ मोक्ष; आठः जीवनक चारि वर्ग आ चारि चरणक आनन्द (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आ शूद्र, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वनप्रस्थ आ सन्यास)। लोकक लेल घर बनाउ आ जीवन मे प्रगति करू। CHAPTER- XVIII 48. (Brihaspati Devata, Shunah-shepa Rshi) Rucham no dhehi brahmanesu rucham rajasu naskrudhi. Rucha vishyesu shudreshu mayi dhehi rucha rucham. Brihaspati, lord of the universe, eminent teacher and master of vast knowledge, inspire our Brahma section of the community—scholars, scientists, teachers and researchers with brilliance and love. Infuse brilliance, love and justice into our Kshatrias, defence, administration and justice section of the community. Bless with light, love and generosity our Vaishyas, producers and distributors among the community. And bless our Shudras, the ancillary services, with light, love and loyalty. Bless me with light and love toward us all. बृहस्पति- ब्रह्माण्डक स्वामी, प्रख्यात शिक्षक आ विशाल ज्ञानक स्वामी- समुदायक ब्रह्म वर्ग- विद्वान, वैज्ञानिक, शिक्षक आ शोधकर्ता- केँ प्रतिभा आ प्रेम सँ प्रेरित करू। हमर क्षत्रिय-रक्षा, प्रशासन आ न्याय- समुदायक वर्गमे प्रतिभा, प्रेम आ न्यायक संचार करू। हमर वैश्य-समुदायक निर्माता आ वितरक- सभकेँ प्रकाश, प्रेम आ उदारतासँ आशीर्वाद दियौ। आ हमर सभक शूद्र -समुदायक सहायक सेवी- केँ प्रकाश, प्रेम आ निष्ठा सँ आशीर्वाद दियौ। हमरा सभ केँ प्रकाश आ प्रेम सँ आशीर्वाद दियौ। CHAPTER- XXV 23. (Dyau etc. Devata, Prajapati Rshi) Aditirdyauraditirantarikshamaditirmata sa pita sa putrah. Vishve deva aditih pancha jana aditirjatamaditirjanitvam. In the essence: Light is indestructible; sky is indestructible; mother Prakriti (matter-energy-thought) is indestructible; Father, the Cosmic Spirit is indestructible; Son, the soul (jiva), is indestructible; all the divinities of nature and humanity are indestructible; five people, Brahmana, Kshatriya, Vaishya, Shudra, others, are indestructible; whatever is born is indestructible; whatever will be born is indestructible. (All that was, is and shall be is indestructible in the essence.) सारमे: प्रकाश अविनाशी अछि; आकाश अविनाशी अछि; माता प्रकृति (पदार्थ-ऊर्जा-विचार) अविनाशी अछि; पिता, ब्रह्मांडीय आत्मा अविनाशी अछि; पुत्र, आत्मा (जीव) अविनाशी अछि; प्रकृति आ मानवताक सभ देवत्व अविनाशी अछि; पाँच व्यक्ति, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आ आन अविनाशी अछि; जे किछु जन्मल अछि से अविनाशी अछि; जे किछु जन्मत से अविनाशी अछि। (जे किछु छल, अछि बा रहत/ आओत से सार मे अविनाशी अछि।) CHAPTER- XXVI 2. (Ishvara Devata, Laugakshi Rshi) Yathemam vacham kalyanimavadani janebhyah. Brahmarajanyabhyam Shudraya charyaya cha svaya charayaya cha. Priyo devanam dakshinayai daturiha bhuyasamayam me kamah samrudhyatamupa mado namatu. Just as this blessed Word of the Veda I speak for the people, all without exception, Brahmana, Kshatriya, Shudra, Vaishya, master and servant, one’s own and others, so do you too. May I be dear and favourite with the noble divinities and the generous people for the gift of the sacred speech. May this noble aim of mine be fulfilled here in this life. May the others too follow and come my way beyond this life. जेना वेदक ई धन्य वचन हम बिना कोनो अपवादक, ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र, वैश्य, स्वामी आ सेवक, अपन आ अन्य लोकक लेल कहैत छी, तहिना अहाँ सेहो करैत छी। पवित्र भाषणक ऐ उपहारक लेल हम महान देवत्व आ उदार लोक सभक प्रिय आ मनभावन रही। हमर ई महान उद्देश्य ऐ जीवन मे पूर हुअय। आन सभ सेहो हमर मार्गक अनुसरण करैत बढ़ैत जाय आ से ऐ जीवनसँ आगाँ धरि बढ़य। CHAPTER- XXX 5. (Parameshvara Devata, Narayana Rshi) Brahmane brahmanam kshatraya rajanyam marudbhyo vaishyam tapase Shudram tamase taskaram narakaya virahanam papmane klibamakrayayaayogum kamaya punshchalumatikrustaya magadham. Give us, we pray, the Brahmanas for education and research, culture and human values; the Kshatriyas for governance, defence and administration; the Vaishyas for economic development, and the Shudras for assistance and labour in the ancillary services. Remove, we pray, the thief roaming in the dark, the murderer bent on lawlessness, the coward disposed to sin, the armed terrorist bent on destruction, the harlot out for pleasure of flesh, and the bastard fond of scandal. Note: In mantras 5-22 in which various aspects of organised life are listed, there is repetition of ‘asuva’ and ‘parasuva’ from mantra 3, which means: ‘Give us, we pray, what is good’, and, ‘Remove, we pray, what is evil’. This is the prayer. Also, there are echoes of ‘havamahe’ from mantra 4, which means: ‘We invoke and develop’, and, ‘we challenge and fight out’. This is the call for action under the divine eye. शिक्षा आ शोध, संस्कृति आ मानवीय मूल्यक लेल ब्राह्मण; शासन, रक्षा आ प्रशासनक लेल क्षत्रिय; आर्थिक विकासक लेल वैश्य; आ सहायक सेवामे सहायता आ श्रम लेल शूद्र हमरा दिअ से हम प्रार्थना करैत छी। हम प्रार्थना करैत छी जे अन्हारमे घुमैत चोर, अराजकता पर बिर्त खूनी, पाप पर बिर्त कायर, विनाश पर बिर्त सशस्त्र आतंकवादी, दैहिक सुख लेल बाहर गेल वेश्या, आ कलंकक शौकीन नाजायजकेँ हटा दियौ। नोटः मंत्र 5-22 मे, जइमे संगठित जीवनक विभिन्न पक्ष सूचीबद्ध अछि, मंत्र 3 सँ 'आशुवा' आ 'परशुवा' क पुनरावृत्ति होइत अछि, जकर अर्थः 'हमरा सभ केँ दिअ, हम प्रार्थना करैत छी, जे नीक अछि', आ, 'हटाउ, हम प्रार्थना करैत छी, जे अधलाह अछि'। ई प्रार्थना अछि। सङ्गहि, मंत्र 4 सँ 'हवामाहे' क प्रतिध्वनि अछि, जकर अर्थः 'हम आह्वान करैत छी आ आगू बढ़बै छी', आ, 'हम माँटि दइ छी आ लड़ै छी'। ई दिव्य दृष्टिक अन्तर्गत काज करबाक आह्वान अछि। CHAPTER- XXX 22. (Rajeshvarau Devate, Narayana Rshi) Athaitanastauau virupanalabhateitidirgham chatihrasvam chatisthulam chatikrusham chatishuklam chatikrushnam chatikulvam chatilomasham cha. Ashudra abrahmanaste prajapatyah. Magadhah punshchali kitavah kliboshudra abrahmanaste prajapatyah. The good human being accepts and works with these eight classes of people of different forms and colours: too tall, too short, too fat, too thin, too white, too dark, too hairless, too hairy. Also they are neither Brahmanas nor Shudras (nor the others). They too, all of them, are children of God, Prajapati. Even the bastard and the ‘despicable’, the wanton, the gambler, and the coward and the eunuch, neither Shudras nor Brahmanas (nor the others), they too are children of God, Prajapati, father of all. नीक लोक विभिन्न रूप आ रङ्गक ऐ आठ वर्गक लोकक संग स्वीकार करैत अछि आ काज करैत अछिः खूब लम्बा, बड्ड छोट, बड्ड मोट, खूब पातर, बड्ड गोर, बड्ड कारी, बहुत कम केशबला, खूब केशबला। ओ सभ ने ब्राह्मण छथि, नहिये शूद्र (आ नहिये आन कियो)। ओ सभ सेहो भगवान प्रजापतिक सन्तान छथि। एतऽ धरि जे नाजायज बा 'घृणित', ऊधमी, जुआरी, आ कायर आ नपुंसक, ने शूद्र, नहिये ब्राह्मण (नहिये आन कियो), ओ सभ सेहो भगवान प्रजापतिक सन्तान छथि, प्रजापति- सभक पिता। CHAPTER- XXXI 11. (Purusha Devata, Narayana Rshi) Brahmanosya mukhamashid bahu rajanyah krutah. Uru tadasya yadvaishyah padbhyam Shuudro ajayata. The Brahmana, man of divine vision and Vedic Word, is the mouth of the Samrat Purusha, the human community. The Kshatriya, man of justice and polity, is created as the arms of defence. The Vaishya, who produces food and wealth for the society, is the thighs. And the man of sustenance and support with labour is the Shudra who bears the burden of the human family. दिव्य दृष्टि आ वैदिक वचनक लोक ब्राह्मण, सम्राट पुरुष-मानव समुदाय-क मुख छथि। न्याय आ शिष्टताक लोक क्षत्रियकेँ रक्षाक हथियारक रूपमे बनाओल गेल अछि। वैश्य, जे समाजक लेल भोजन आ धन उत्पन्न करैत छथि, जांघ छथि। आ श्रमक सङ्ग निर्वाह आ सहारा देबऽबला व्यक्ति शूद्र छथि जे मानव परिवार सभकक भार वहन करैत छथि। RIG VEDA (2 references) Mandala 10/Sukta 90 Purusha Devata, Narayana Rshi 12. Brahmano sya mukhamasidbahu rajanyah kritah. Uru tadasya yadvaisyah padbhyam sudro ajayata. The Brahmana, man of divine vision and the Vedic Word, is the mouth of the Samrat Purusha, the human community. Kshatriya, man of justice and polity, is created as the arms of defence. The Vaishya, who produces food and wealth for the society, is the thighs. And the man of sustenance and ancillary support with labour is the Shudra who bears the burden of the human family as the legs bear the burden of the body. दिव्य दृष्टि आ वैदिक वचन बला ब्राह्मण, सम्राट पुरुष-मानव समुदाय- क मुख छथि। क्षत्रिय- न्याय आ राजनीतिक लोक- केँ रक्षाक हथियारक रूपमे बनाओल गेल अछि। वैश्य, जे समाजक लेल भोजन आ धन उत्पन्न करैत छथि, जांघ छथि। आ जीविकोपार्जन आ श्रमक सङ्ग सहायक व्यक्ति शूद्र छथि जे मानव परिवारक भार वहन करैत छथि जेना पैर शरीरक भार वहन करैत अछि। Mandala 10/Sukta 124 Devata: Agni (1); Rshi: Agni, Varuna, Soma 1. Imam no agna upa yajnamehi panchayamam trivritam saptatantum. Aso havyavaluta nah puroga jyogeva dirgham tama ashayishthah. Agni, yajnic light of life, come to this life yajna of ours: which has five divisions, i.e., Brahma-yajna, Deva-yajna, Pitr-yajna, Atithi-yajna, and Balivaishvadeva-yajna; conducted by five people, i.e, four socioeconomic classes of Brahmans, Kshatriyas, Vaishyas and Shudras and others like chance visitors from other groups there might be; which is threefold, i.e., paka yajna, haviryajna and somayajna; and which has seven extensions, i.e., Agnishtoma, Atyagnishtoma, Ukthya, Shodashi,Vajapeya, Atiratra and Aptoyami. You are our leader and pioneer, Agni, and you are the carrier of our yajna to the divinities as well as harbinger of the fruits of yajna to us. Pray come and be our all-time dispeller of the cavern of deep darkness from life. (Yajna is a creative process of development in life from the individual to the social, national, global and environmental level of life. The explanation above is related to the social level. Swami Brahmamuni explains the yajna at the individual level, and that is also suggested in Rgveda 10, 7, 6: ‘Svayam yajasva’, and yajurveda 4, 13: “Iyam te yajniya tanu”, which means: Develop yourself by yajna according to the seasons of your growth, and remember your life in body, mind and soul is worthy of yajnic service for your personal development, your body being the first instrument of your wider yajna of life. This personal yajna is fivefold, for the elemental balance of earth, water, heat, air and ether; threefold for the balance of vata, pitta and kaf, and also for balanced growth of body, mind and soul; sevenfold for the growth of rasa, rakta, mansa, meda, asthi, majja and virya. Thus yajna is the process of growth beginning with the individual, accomplished at the cosmic level.) अग्नि -जीवनक यज्ञक प्रकाश- हमर सभक ऐ जीवन-यज्ञमे आउ, जइमे पाँच विभाग छै, अर्थात, ब्रह्म-यज्ञ, देव-यज्ञ, पितृ-यज्ञ, अतिथि-यज्ञ, आ बलिवैश्वदेव-यज्ञ; पाँच लोक द्वारा संचालित, अर्थात, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आ शूद्र क चारि सामाजिक-आर्थिक वर्ग आ पाँचम आन समूह कखनो काल आयल आगंतुक। आ से तीनटा छै- अर्थात, पाक यज्ञ, हविर्यज्ञ आ सोमयज्ञ; आ जकर सात विस्तार छै, अर्थात, अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्त्या, षोडषी, वाजपेय, अतिरात्र आ अप्तोयमी। अग्नि, अहाँ हमरा सभक नेता आ अग्रगामी छी, आ अहाँ देवत्व लेल हमर यज्ञक वाहक छी आ सङ्गहि हमरा सभक लेल यज्ञक फलक अग्रदूत छी। प्रार्थना अछि जे आउ आ हमरा सभक जीवन तरहरि सन अन्हार सदाक लेल दूर करैबला बनू। (यज्ञ व्यक्तिगतसँ जीवनक सामाजिक, राष्ट्रीय, वैश्विक आ पर्यावरणीय स्तर धरि जीवनक विकासक एकटा रचनात्मक प्रक्रिया अछि। उपरोक्त व्याख्या सामाजिक स्तरसँ सम्बन्धित अछि। स्वामी ब्रह्ममुनी व्यक्तिगत स्तर पर यज्ञक व्याख्या करैत छथि, आ ई ऋग्वेद 10,7,6 मे सेहो सुझाओल गेल अछिः 'स्वयं यज्ञ'; आ यजुर्वेद 4,13: 'इयम ते यज्ञीय तनू', जकर अर्थ अछि- अपन विकासक ऋतुक अनुसार यज्ञ द्वारा अपना केँ विकसित करू, आ मोन राखू जे शरीर, मन आ आत्मा युक्त अहाँक जीवन यज्ञक सेवाक लेल अछि, आ तइसँ अहाँक व्यक्तिगत विकास हएत; अहाँक शरीर अहाँक जीवनक व्यापक यज्ञक पहिल साधन अछि। ई व्यक्तिगत यज्ञ पाँच प्रकारक अछि, पृथ्वी, जल, ऊष्मा, वायु आ आकाशक मौलिक संतुलनक लेल; तीन प्रकारक- वात, पित्त आ कफक संतुलनक लेल; आ शरीर, मन आ आत्माक संतुलित विकासक लेल सेहो; सात प्रकारक माने रस, रक्त, मानस, मेधा, अस्थि, मज्जा आ विर्यक विकासक लेल। ऐ तरहेँ यज्ञ व्यक्तिसँ शुरू होइत विकासक प्रक्रिया अछि, जे ब्रह्मांडीय स्तर पर सम्पन्न होइत अछि।) आब आउ यूरोपक विद्वान लोकनि द्वारा वेदक गलत अनुवादक किछु उदाहरण देखू:- EXAMPLES OF SOME MISTRANSLATIONS OF VEDAS BY WESTERN SCHOLARS I W.D. Whitney’s translation of the Atharvaveda (7, 107, 1) edited and revised by K.L. Joshi, published by Parimal Publications, Delhi, 2004: Namaskrutya dyavapruthivibhyamantarikshaya mrutyave. Mekshamyurdhvastisthaan ma ma hinsishurishvarah. “Having paid homage to heaven and earth, to the atmosphere, to Death, I will urinate standing erect; let not the Lords (Ishvara) harm me.” I give below an English rendering of the same mantra translated by Pundit Satavalekara in Hindi: “Having done homage to heaven and earth and to the middle regions and Death (Yama), I stand high and watch (the world of life). Let not my masters hurt me.” An English rendering of the same mantra translated by Pundit Jai Dev Sharma in Hindi is the following: “Having done homage to heaven and earth (i.e. father and mother) and to the immanent God and Yama (all Dissolver), standing high and alert, I move forward in life. These masters of mine, pray, may not hurt me.” I would like to quote my own translation of the mantra now under print: “Having done homage to heaven and earth, and to the middle regions, and having acknowledged the fact of death as inevitable counterpart of life under God’s dispensation, now standing high, I watch the world and go forward with showers of the cloud. Let no powers of earthly nature hurt and violate me.” ‘Showers of the cloud’ is a metaphor, as in Shelley’s poem ‘the Cloud’: “I bring fresh showers for the thirsting flowers”, which suggests a lovely rendering. The problem here arises from the verb ‘mekshami’ from the root ‘mih’ which means ‘to shower’ (sechane). It depends on the translator’s sense and attitude to sacred writing how the message is received and communicated in an interfaith context with no strings attached (or unattached). [Dr Tulsi Ram, 2013, Atharveda: English Translation; Page xxvi] II The idea that there was slavery in the Vedic Society originated with the Western Indologists with their intentional or careless translation of a Sanskrit word into “slave”. For example, in the Taittiriya Samhita (Krishna Yajurveda), [7.5.10] [kanda 7,prapathaka 5, verse 10], a part of translation by Keith reads “slave girls dance around the fire”. But in a footnote in the same page [pg., 628, Vol. 2] the author Keith says that the verse describes the dance of maidens. Suddenly the maidens have become “slave girls”. Both Paranjape and Avinash Bose point to the mistranslation of the word ‘yosha’ as courtesan by the indologist Pischel [Bose, Hymns from the Veda, p. 36]. [Veda Books,SRI AUROBINDO KAPALI SHASTRY INSTITUTE OF VEDIC CULTURE, page 240] III In 1795, H.T. Colebrooke, then a young scholar, wrote his maiden paper, “On the Duties of a Faithful Hindu Widow,” for the Asiatic Society (Asiatic Researches IV 1795: 205-15). He cited the hymn from the Rig Veda as sanctioning widow burning, which William Jones immediately contested (Canon 1993 I:lxx). Colebrooke translated the end of the hymn as “let them pass into fire, whose original element is water.” A quarter of a century later, the Orientalist, H.H. Wilson pointed out that the hymn had been distorted (Wilson 1854: 201-14; Cassels 2010: 89). Wilson translated the verse as per the reading corroborated by Sayana, the authoritative medieval commentator on the Vedas, and demonstrated that it did not refer to widow burning (Rocher and Rocher 2012: 24-25). [Meenakshi Jain,2016; Sati: Evangelicals, Baptist Missionaries; and the Changing Colonial Discourse, Page 5) 𑒀 Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. -Robert Louis Stevenson ------------------------------------- Videha: Maithili Literature Movement 𑒀 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्ति: 𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱: अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.अंक ३९० पर टिप्पणी २.गद्य २.१.मानेश्वर मनुज- अभिराम नयनाभिराम २.२.परमानन्द लाल कर्ण-वैशाख मासक एकादशीक माहात्म्य-१ २.३.अम्बालिका कुमारी- स्वातंत्र्योत्तर मैथिली कथाक विकास २.४.लाल देब कामत- अपटी खेत लऽ (लघुकथा)/ राज किशोर मिश्र जीक उगरास २.५.रबीन्द्र नारायण मिश्र-सीमाक ओहि पार (धारावाहिक उपन्यास) २.६.कुमार मनोज कश्यप-वट-वृक्ष २.७.प्रमोद झा 'गोकुल'-फोने पर फगुवा (लघु कथा) २.८.प्रणव झा- ऑडियोलॉजी आ स्पीच लेंग्वेज पैथोलॉजी: बारहमा के बाद जीवविज्ञान केर विद्यार्थी लेल करियर विकल्प २.९.आचार्य रामानंद मंडल-कथाकार/ पिया मोर बालक: महाकवि विद्यापति ३.पद्य ३.१.मुन्ना जी- गजल ३.२.राज किशोर मिश्र-सोनित

ISSN 2229-547X VIDEHA 𑒀 विदेह ३९१ म अंक ०१ अप्रैल २०२४ (वर्ष १७ मास १९६ अंक ३९१) [विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। कॉपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति ‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२४. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२४. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. 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The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover designed by AUM GAJENDRA THAKUR Videha e-Journal: Issue No. 391 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अक्खर खम्भा (आखर खाम्ह) तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ (कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।) माने आखर रूपी खाम्ह निर्माण कऽ ओइपर (गद्य-पद्य रूपी) मंच जँ नै बान्हल जाय तँ ऐ त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लत्ती केना पसरत। शुक्ल यजुर्वेद (२६.२)-यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः। ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च।।हम सभ गोटेकें ई पवित्र वाणी (वेदवाणी) सुनाबी। ब्राह्मणकें, क्षत्रियकें, शूद्रकें आ आर्यकें; अपन लोककें आ अपरिचितकें सेहो (माने सभकें)। मुदा ऐ वेदवाक्यक विपरीत मनुस्मृति वेदवाणीक अध्ययन/ श्रवणकें समाजक किछु गोटे लेल निषेध करऽ चाहलक, मुदा स्मृति सेहो वेदवाक्यकें प्रमाण मानैत अछि (शब्द प्रमाण) तें तकर विरुद्ध देल ओकर निर्देश स्वयं अमान्य भऽ जाइत अछि। 𑒀 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्तिः पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म 𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑓁 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒰𑒣: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒼𑒭𑒡𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹 𑒠𑒹𑒫𑒰: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧 ब्रह्मणसँ प्रार्थना जे द्युलोकमे, अंतरिक्षमे, पृथ्वीपर, जलमे, औषधमे, वनस्पतिमे, विश्वमे, सभ देवतागणमे आ ब्रह्ममे शांति हुअय। ॐ-ब्रह्मण, द्यौ-सूर्य-तरेगण, अंतरिक्ष- पृथ्वी आ द्यूलोकक बीच, आप:-जल, विश्वेदेवा- सभ देवता, ब्रह्म- सर्जक। 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝𑒮𑒿 𑒣𑓂𑒩𑒰𑒩𑓂𑒟𑒢𑒰 𑒖𑒹 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒧𑒹, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭𑒧𑒹, 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲𑒣𑒩, 𑒖𑒪𑒧𑒹, 𑒎𑒭𑒡𑒧𑒹, 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒱𑒧𑒹, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒧𑒹, 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰𑒑𑒝𑒧𑒹 𑒂 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒧𑒹 𑒬𑒰𑓀𑒞𑒱 𑒯𑒳𑒁𑒨। 𑓇-𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝, 𑒠𑓂𑒨𑒾-𑒮𑒴𑒩𑓂𑒨-𑒞𑒩𑒹𑒑𑒝, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭- 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒂 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒏 𑒥𑒲𑒔, 𑒂𑒣:-𑒖𑒪, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹𑒠𑒹𑒫𑒰- 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰, 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧- 𑒮𑒩𑓂𑒖𑒏। 𑒀 ॐ, स॒हस्र॑शीर्षा॒ पुरु॑षः। स॒ह॒स्रा॒क्षः स॒हस्र॑पात्। 𑓇, 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒬𑒲𑒩𑓂𑒭𑒰↓ 𑒣𑒳𑒩𑒳↑𑒭𑓁। 𑒮↓𑒯↓𑒮𑓂𑒩𑒰↓𑒏𑓂𑒭𑓁 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒣𑒰𑒞𑓂। स भूमिं॑ ग्वंग वि॒श्वतो॑ वृ॒त्वा। अत्य॑तिष्ठद् दशाङ्गु॒लम्॥ 𑒮 𑒦𑒴𑒧𑒱𑓀↑𑓅 𑒫𑒱↓𑒬𑓂𑒫𑒞𑒼↑ 𑒫𑒵↓𑒞𑓂𑒫𑒰। 𑒁𑒞𑓂𑒨↑𑒞𑒱𑒭𑓂𑒚𑒠𑓂 𑒠𑒬𑒰𑒓𑓂𑒑𑒳↓𑒪𑒧𑓂॥ हजार माथ, हजार आँखि, हजार पएर संग विश्वकेँ आच्छादित केने अछि, दस आंगुरक गनतीक वशमे नै अछि ओ। प॒द्भ्याग्ँ॑ शू॒द्रो अ॑जायत॥ 𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑒑𑓂𑒿↑ 𑒬𑒴↓𑒠𑓂𑒩𑒼 𑒁↑𑒖𑒰𑒨𑒞॥ पएरसँ शूद्रक उत्पत्ति भेल॥ प॒द्भ्यां भूमि॒र्दिशः॒ श्रोत्रा᳚त्। 𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑓀 𑒦𑒴𑒧𑒱↓𑒩𑓂𑒠𑒱𑒬𑓁↓ 𑒬𑓂𑒩𑒼𑒞𑓂𑒩𑒰↑↑𑒞𑓂। मुदा पएरेसँ भूमियोक उत्पत्ति। ❀ (White Florette- innocence and purity) ☸ (Wheel of Dharma) ࿕(Swastik) 𑓅 (Gwang ग्वंग- two small circles connected by u and a dot placed over it, used in reference of Vedic texts) ꣼ (सिद्धिरस्तु, सिद्धम 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒱𑒩𑒮𑓂𑒞𑒳, 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒧 Devanagari Anji) ঀ (Bengali Anji, Siddham) 𑒀 (Tirhuta Anji, Ankush of Ganeshji, placed at the beginning of something) सोशल मीडिया, अन्तर्जाल आ दूरदर्शनक कार्यक्रम सभमे वेदमे ई लिखल अछि, ई वर्णित अछि, शूद्रक प्रति, स्त्रीक प्रति, शूद्रक स्त्रीक प्रति अपमान जनक गप लिखल अछि; ई सभ सूनि कऽ कियो विकीपीडिया आ आन आन ठाम अन्तर्जालपर लेख सभमे परिवर्तन कऽ देने रहथि। एक गोटे अंग्रेजीमे लिखलनि- “अथर्ववेदमे शूद्रक पत्नीकेँ बिना स्वीकृतिक कियो हाथ पकड़ि लऽ जा सकय, बला वक्तव्य अछि।” हम कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक, खण्ड-८; प्रबन्ध निबन्ध समालोचना भाग-२, २०१४ मे अपन आलेख “विद्यापति: किछु प्रचलित कुप्रचारक निवारण” मे लिखने रही- “.. ई ओहिना भेल जेना अथर्ववेदमे शूद्रक पत्नीकेँ बिना स्वीकृतिक कियो हाथ पकड़ि लऽ जा सकए बला वक्तव्य।” मुदा अथर्ववेद बा कोनो वेदमे ओइ तरहक वक्तव्य कत्तौ नै आयल अछि। तकर विपरीत शुक्ल यजुर्वेद ई कहैत अछि:- शुक्ल यजुर्वेद (२६.२)-यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः। ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च।।हम सभ गोटेकें ई पवित्र वाणी (वेदवाणी) सुनाबी। ब्राह्मणकें, क्षत्रियकें, शूद्रकें आ आर्यकें; अपन लोककें आ अपरिचितकें सेहो (माने सभकें)। मुदा ऐ वेदवाक्यक विपरीत मनुस्मृति वेदवाणीक अध्ययन/ श्रवणकें समाजक किछु गोटे लेल निषेध करऽ चाहलक, मुदा स्मृति सेहो वेदवाक्यकें प्रमाण मानैत अछि (शब्द प्रमाण) तें तकर विरुद्ध देल ओकर निर्देश स्वयं अमान्य भऽ जाइत अछि। वेद मे उपलब्ध शूद्र शब्दक उल्लेखित अंशक संग्रह नीचाँ देल जा रहल अछि। शूद्रक अपमानजनक उल्लेख तँ नहिये अछि, वरन् पएरसँ पवित्र पृथ्वीक जन्मक उल्लेख अछि आ तही उत्पत्तिक सादृश्यताक कारणसँ मानव समुदायक पालक शूद्र कहल गेल छथि। प॒द्भ्याग्ँ॑ शू॒द्रो अ॑जायत॥ पएरसँ शूद्रक उत्पत्ति भेल॥ प॒द्भ्यां भूमि॒र्दिशः॒ श्रोत्रा᳚त्। मुदा पएरेसँ भूमियोक उत्पत्ति। REFERENCE OF SHUDRAS IN VEDAS [Dr Tulsi Ram, 2013, Atharveda: Samaveda: Yajurveda: Rigveda; English Translations] ATHARVA VEDA (3 references) KANDA-14 (MARRIAGE AND FAMILY) Kanda 14/Sukta 1 (Surya’s Wedding) Devata: Dampati; Rshi: Surya Savitri 60. Bhagastataksha caturah padanbhagastataksha catvaryuspalani. Tvasta pipesa madhyatonu vardhrantsa no astu sumangali. Bhaga, lord sustainer and ordainer of life, has framed the value orders of life: Dharma, Artha, Kama and Moksha; four social orders: Brahmana, Kshatriya, Vaishya and Shudra; four stages of personal life: Brahmacharya, Grhastha, Vanaprastha and Sanyasa. Tvashta, lord maker and organiser of life, has placed the woman as partner of man in matrimony in this order and organisation. May the bride be good and auspicious for us. भाग- पालनकर्ता आ जीवनक अधिष्ठाता- जीवनक मूल्य क्रम तैयार केने छथिः धर्म, अर्थ, काम आ मोक्ष; चारि सामाजिक क्रम- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आ शूद्र; व्यक्तिगत जीवनक चारि चरण- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ आ सन्यास।त्वष्टा- स्वामी निर्माता आ जीवनक आयोजक- एहि क्रममे आ सङ्गठनमे स्त्रीकेँ विवाहमे पुरुषक साथीक रूपमे रखने छथि। से वधू हमर सभक लेल नीक आ शुभ होथि। Kanda 19/Sukta 6 (Purusha, the Cosmic Seed) Purusha Devata, Narayana Rshi 6. Brahmano sya mukhamasid bahu rajanyo bhavat. Madhyam tadasya yadvaishyah padbhyam sudro ajayata. Brahmana, (man of knowledge, divine vision and the Vedic Word in the human community) is the mouth of the Samrat Purusha. Kshatriya, man of justice and polity, is the arms of defence and organisation. The middle part is the Vaishya who produces and provides food and energy. And the ancillary services that provide sustenance and support with auxiliary labour are the feet, the Shudra that bears the burden of society. ब्राह्मण (ज्ञानी, दिव्य दृष्टि आ मानव समुदाय लेल वैदिक शब्द) सम्राट पुरुषक मुख अछि। क्षत्रिय -न्याय आ राजनीतिक लोक- रक्षा आ सङ्गठनक हाथ छथि। मध्य भाग वैश्य छथि जे भोजन आ ऊर्जाक उत्पादन आ आपूर्ति करैत छथि। आ सहायक सेवा जे सहायक श्रमक सङ्ग निर्वाह आ सहायता प्रदान करैत अछि, ओ अछि पैर, शूद्र जे समाजक भार वहन करैत छथि। Kanda 19/Sukta 32 (Darbha) Darbha Devata, Bhrgu Ayushkama Rshi 8. Priyam ma darbha krunu brahmarajanyabhyam sudraya charyaya cha. Yasmai ca kamayamahe sarvasmai cha vipasyate. O Darbha, destroyer and preserver, eternal sanative, render me dear and loving to and loved by all Brahmanas, Kshatriyas, Vaishyas, Shudras, whoever we love and desire, and all those who have the eye to see (and discriminate right and wrong). हे दर्भा, विनाशक आ संरक्षक, शाश्वत विवेकशील; हमरा सभकेँ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, सभक प्रिय आ प्रेमी बना दिअ। संगे ओ सभ हमरा सभसँ प्रेम् करथि जिनका सँ हम प्रेम करी बा जिनकर कामना करी; आ ओ सभ जिनका लग देखबाक दृष्टि अछि (आ सही आ गलतमे भेद बुझैत छथि)। SAMAVEDA (o reference) YAJURVEDA (7 references) CHAPTER- VIII 30. (Dampati Devata, Atri Rshi) Purudasmo visuruupa indurantarmahimanamanaja dhirah. Ekapadim dvipadim tripadim chatupadimastapadim bhuvananu prathantam svaha. The man of mighty deeds, who eliminates suffering and creates joy, of versatile attainments, bright and honourable, constant and resolute, should wait for the great new arrival. Men of the household, cultivate the vaidic culture of one, two, three, four and eight steps of attainment: one: Aum; two: worldly fulfilment and the freedom of moksha; three: the joy of the truth of word and the health of body and mind; four: the attainment of Dharma, wealth, fulfilment of desire, and moksha; eight: the joy of all the four classes and all the four stages of life (Brahmana, Kshatriya, Vaishya and Shudra, Brahmacharya, Grihastha, Vanaprastha and Sanyasa). Build homes for the people and advance in life. शक्तिशाली कर्मक पुरुष, जे दुःखकेँ समाप्त करैत अछि आ आनन्द उत्पन्न करैत अछि, बहुमुखी उपलब्धिक, उज्ज्वल आ सम्मानजनक, स्थिर आ दृढ़ संकल्पित, ओकरा महान नव आगमनक प्रतीक्षा करबाक चाही। घरक लोक, उपलब्धिक एक, दू, तीन, चारि आ आठ चरणक वैदिक संस्कृति विकसित करैत छथिः एकः ओम; दुइः सांसारिक पूर्ति आ मोक्ष रूपी स्वतन्त्रता; तीनः वचनक सत्यक आनन्द आ शरीर आ मस्तिष्कक स्वास्थ्य; चारिः धर्मक प्राप्ति, धन, इच्छाक पूर्ति, आ मोक्ष; आठः जीवनक चारि वर्ग आ चारि चरणक आनन्द (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आ शूद्र, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वनप्रस्थ आ सन्यास)। लोकक लेल घर बनाउ आ जीवन मे प्रगति करू। CHAPTER- XVIII 48. (Brihaspati Devata, Shunah-shepa Rshi) Rucham no dhehi brahmanesu rucham rajasu naskrudhi. Rucha vishyesu shudreshu mayi dhehi rucha rucham. Brihaspati, lord of the universe, eminent teacher and master of vast knowledge, inspire our Brahma section of the community—scholars, scientists, teachers and researchers with brilliance and love. Infuse brilliance, love and justice into our Kshatrias, defence, administration and justice section of the community. Bless with light, love and generosity our Vaishyas, producers and distributors among the community. And bless our Shudras, the ancillary services, with light, love and loyalty. Bless me with light and love toward us all. बृहस्पति- ब्रह्माण्डक स्वामी, प्रख्यात शिक्षक आ विशाल ज्ञानक स्वामी- समुदायक ब्रह्म वर्ग- विद्वान, वैज्ञानिक, शिक्षक आ शोधकर्ता- केँ प्रतिभा आ प्रेम सँ प्रेरित करू। हमर क्षत्रिय-रक्षा, प्रशासन आ न्याय- समुदायक वर्गमे प्रतिभा, प्रेम आ न्यायक संचार करू। हमर वैश्य-समुदायक निर्माता आ वितरक- सभकेँ प्रकाश, प्रेम आ उदारतासँ आशीर्वाद दियौ। आ हमर सभक शूद्र -समुदायक सहायक सेवी- केँ प्रकाश, प्रेम आ निष्ठा सँ आशीर्वाद दियौ। हमरा सभ केँ प्रकाश आ प्रेम सँ आशीर्वाद दियौ। CHAPTER- XXV 23. (Dyau etc. Devata, Prajapati Rshi) Aditirdyauraditirantarikshamaditirmata sa pita sa putrah. Vishve deva aditih pancha jana aditirjatamaditirjanitvam. In the essence: Light is indestructible; sky is indestructible; mother Prakriti (matter-energy-thought) is indestructible; Father, the Cosmic Spirit is indestructible; Son, the soul (jiva), is indestructible; all the divinities of nature and humanity are indestructible; five people, Brahmana, Kshatriya, Vaishya, Shudra, others, are indestructible; whatever is born is indestructible; whatever will be born is indestructible. (All that was, is and shall be is indestructible in the essence.) सारमे: प्रकाश अविनाशी अछि; आकाश अविनाशी अछि; माता प्रकृति (पदार्थ-ऊर्जा-विचार) अविनाशी अछि; पिता, ब्रह्मांडीय आत्मा अविनाशी अछि; पुत्र, आत्मा (जीव) अविनाशी अछि; प्रकृति आ मानवताक सभ देवत्व अविनाशी अछि; पाँच व्यक्ति, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आ आन अविनाशी अछि; जे किछु जन्मल अछि से अविनाशी अछि; जे किछु जन्मत से अविनाशी अछि। (जे किछु छल, अछि बा रहत/ आओत से सार मे अविनाशी अछि।) CHAPTER- XXVI 2. (Ishvara Devata, Laugakshi Rshi) Yathemam vacham kalyanimavadani janebhyah. Brahmarajanyabhyam Shudraya charyaya cha svaya charayaya cha. Priyo devanam dakshinayai daturiha bhuyasamayam me kamah samrudhyatamupa mado namatu. Just as this blessed Word of the Veda I speak for the people, all without exception, Brahmana, Kshatriya, Shudra, Vaishya, master and servant, one’s own and others, so do you too. May I be dear and favourite with the noble divinities and the generous people for the gift of the sacred speech. May this noble aim of mine be fulfilled here in this life. May the others too follow and come my way beyond this life. जेना वेदक ई धन्य वचन हम बिना कोनो अपवादक, ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र, वैश्य, स्वामी आ सेवक, अपन आ अन्य लोकक लेल कहैत छी, तहिना अहाँ सेहो करैत छी। पवित्र भाषणक ऐ उपहारक लेल हम महान देवत्व आ उदार लोक सभक प्रिय आ मनभावन रही। हमर ई महान उद्देश्य ऐ जीवन मे पूर हुअय। आन सभ सेहो हमर मार्गक अनुसरण करैत बढ़ैत जाय आ से ऐ जीवनसँ आगाँ धरि बढ़य। CHAPTER- XXX 5. (Parameshvara Devata, Narayana Rshi) Brahmane brahmanam kshatraya rajanyam marudbhyo vaishyam tapase Shudram tamase taskaram narakaya virahanam papmane klibamakrayayaayogum kamaya punshchalumatikrustaya magadham. Give us, we pray, the Brahmanas for education and research, culture and human values; the Kshatriyas for governance, defence and administration; the Vaishyas for economic development, and the Shudras for assistance and labour in the ancillary services. Remove, we pray, the thief roaming in the dark, the murderer bent on lawlessness, the coward disposed to sin, the armed terrorist bent on destruction, the harlot out for pleasure of flesh, and the bastard fond of scandal. Note: In mantras 5-22 in which various aspects of organised life are listed, there is repetition of ‘asuva’ and ‘parasuva’ from mantra 3, which means: ‘Give us, we pray, what is good’, and, ‘Remove, we pray, what is evil’. This is the prayer. Also, there are echoes of ‘havamahe’ from mantra 4, which means: ‘We invoke and develop’, and, ‘we challenge and fight out’. This is the call for action under the divine eye. शिक्षा आ शोध, संस्कृति आ मानवीय मूल्यक लेल ब्राह्मण; शासन, रक्षा आ प्रशासनक लेल क्षत्रिय; आर्थिक विकासक लेल वैश्य; आ सहायक सेवामे सहायता आ श्रम लेल शूद्र हमरा दिअ से हम प्रार्थना करैत छी। हम प्रार्थना करैत छी जे अन्हारमे घुमैत चोर, अराजकता पर बिर्त खूनी, पाप पर बिर्त कायर, विनाश पर बिर्त सशस्त्र आतंकवादी, दैहिक सुख लेल बाहर गेल वेश्या, आ कलंकक शौकीन नाजायजकेँ हटा दियौ। नोटः मंत्र 5-22 मे, जइमे संगठित जीवनक विभिन्न पक्ष सूचीबद्ध अछि, मंत्र 3 सँ 'आशुवा' आ 'परशुवा' क पुनरावृत्ति होइत अछि, जकर अर्थः 'हमरा सभ केँ दिअ, हम प्रार्थना करैत छी, जे नीक अछि', आ, 'हटाउ, हम प्रार्थना करैत छी, जे अधलाह अछि'। ई प्रार्थना अछि। सङ्गहि, मंत्र 4 सँ 'हवामाहे' क प्रतिध्वनि अछि, जकर अर्थः 'हम आह्वान करैत छी आ आगू बढ़बै छी', आ, 'हम माँटि दइ छी आ लड़ै छी'। ई दिव्य दृष्टिक अन्तर्गत काज करबाक आह्वान अछि। CHAPTER- XXX 22. (Rajeshvarau Devate, Narayana Rshi) Athaitanastauau virupanalabhateitidirgham chatihrasvam chatisthulam chatikrusham chatishuklam chatikrushnam chatikulvam chatilomasham cha. Ashudra abrahmanaste prajapatyah. Magadhah punshchali kitavah kliboshudra abrahmanaste prajapatyah. The good human being accepts and works with these eight classes of people of different forms and colours: too tall, too short, too fat, too thin, too white, too dark, too hairless, too hairy. Also they are neither Brahmanas nor Shudras (nor the others). They too, all of them, are children of God, Prajapati. Even the bastard and the ‘despicable’, the wanton, the gambler, and the coward and the eunuch, neither Shudras nor Brahmanas (nor the others), they too are children of God, Prajapati, father of all. नीक लोक विभिन्न रूप आ रङ्गक ऐ आठ वर्गक लोकक संग स्वीकार करैत अछि आ काज करैत अछिः खूब लम्बा, बड्ड छोट, बड्ड मोट, खूब पातर, बड्ड गोर, बड्ड कारी, बहुत कम केशबला, खूब केशबला। ओ सभ ने ब्राह्मण छथि, नहिये शूद्र (आ नहिये आन कियो)। ओ सभ सेहो भगवान प्रजापतिक सन्तान छथि। एतऽ धरि जे नाजायज बा 'घृणित', ऊधमी, जुआरी, आ कायर आ नपुंसक, ने शूद्र, नहिये ब्राह्मण (नहिये आन कियो), ओ सभ सेहो भगवान प्रजापतिक सन्तान छथि, प्रजापति- सभक पिता। CHAPTER- XXXI 11. (Purusha Devata, Narayana Rshi) Brahmanosya mukhamashid bahu rajanyah krutah. Uru tadasya yadvaishyah padbhyam Shuudro ajayata. The Brahmana, man of divine vision and Vedic Word, is the mouth of the Samrat Purusha, the human community. The Kshatriya, man of justice and polity, is created as the arms of defence. The Vaishya, who produces food and wealth for the society, is the thighs. And the man of sustenance and support with labour is the Shudra who bears the burden of the human family. दिव्य दृष्टि आ वैदिक वचनक लोक ब्राह्मण, सम्राट पुरुष-मानव समुदाय-क मुख छथि। न्याय आ शिष्टताक लोक क्षत्रियकेँ रक्षाक हथियारक रूपमे बनाओल गेल अछि। वैश्य, जे समाजक लेल भोजन आ धन उत्पन्न करैत छथि, जांघ छथि। आ श्रमक सङ्ग निर्वाह आ सहारा देबऽबला व्यक्ति शूद्र छथि जे मानव परिवार सभकक भार वहन करैत छथि। RIG VEDA (2 references) Mandala 10/Sukta 90 Purusha Devata, Narayana Rshi 12. Brahmano sya mukhamasidbahu rajanyah kritah. Uru tadasya yadvaisyah padbhyam sudro ajayata. The Brahmana, man of divine vision and the Vedic Word, is the mouth of the Samrat Purusha, the human community. Kshatriya, man of justice and polity, is created as the arms of defence. The Vaishya, who produces food and wealth for the society, is the thighs. And the man of sustenance and ancillary support with labour is the Shudra who bears the burden of the human family as the legs bear the burden of the body. दिव्य दृष्टि आ वैदिक वचन बला ब्राह्मण, सम्राट पुरुष-मानव समुदाय- क मुख छथि। क्षत्रिय- न्याय आ राजनीतिक लोक- केँ रक्षाक हथियारक रूपमे बनाओल गेल अछि। वैश्य, जे समाजक लेल भोजन आ धन उत्पन्न करैत छथि, जांघ छथि। आ जीविकोपार्जन आ श्रमक सङ्ग सहायक व्यक्ति शूद्र छथि जे मानव परिवारक भार वहन करैत छथि जेना पैर शरीरक भार वहन करैत अछि। Mandala 10/Sukta 124 Devata: Agni (1); Rshi: Agni, Varuna, Soma 1. Imam no agna upa yajnamehi panchayamam trivritam saptatantum. Aso havyavaluta nah puroga jyogeva dirgham tama ashayishthah. Agni, yajnic light of life, come to this life yajna of ours: which has five divisions, i.e., Brahma-yajna, Deva-yajna, Pitr-yajna, Atithi-yajna, and Balivaishvadeva-yajna; conducted by five people, i.e, four socioeconomic classes of Brahmans, Kshatriyas, Vaishyas and Shudras and others like chance visitors from other groups there might be; which is threefold, i.e., paka yajna, haviryajna and somayajna; and which has seven extensions, i.e., Agnishtoma, Atyagnishtoma, Ukthya, Shodashi,Vajapeya, Atiratra and Aptoyami. You are our leader and pioneer, Agni, and you are the carrier of our yajna to the divinities as well as harbinger of the fruits of yajna to us. Pray come and be our all-time dispeller of the cavern of deep darkness from life. (Yajna is a creative process of development in life from the individual to the social, national, global and environmental level of life. The explanation above is related to the social level. Swami Brahmamuni explains the yajna at the individual level, and that is also suggested in Rgveda 10, 7, 6: ‘Svayam yajasva’, and yajurveda 4, 13: “Iyam te yajniya tanu”, which means: Develop yourself by yajna according to the seasons of your growth, and remember your life in body, mind and soul is worthy of yajnic service for your personal development, your body being the first instrument of your wider yajna of life. This personal yajna is fivefold, for the elemental balance of earth, water, heat, air and ether; threefold for the balance of vata, pitta and kaf, and also for balanced growth of body, mind and soul; sevenfold for the growth of rasa, rakta, mansa, meda, asthi, majja and virya. Thus yajna is the process of growth beginning with the individual, accomplished at the cosmic level.) अग्नि -जीवनक यज्ञक प्रकाश- हमर सभक ऐ जीवन-यज्ञमे आउ, जइमे पाँच विभाग छै, अर्थात, ब्रह्म-यज्ञ, देव-यज्ञ, पितृ-यज्ञ, अतिथि-यज्ञ, आ बलिवैश्वदेव-यज्ञ; पाँच लोक द्वारा संचालित, अर्थात, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आ शूद्र क चारि सामाजिक-आर्थिक वर्ग आ पाँचम आन समूह कखनो काल आयल आगंतुक। आ से तीनटा छै- अर्थात, पाक यज्ञ, हविर्यज्ञ आ सोमयज्ञ; आ जकर सात विस्तार छै, अर्थात, अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्त्या, षोडषी, वाजपेय, अतिरात्र आ अप्तोयमी। अग्नि, अहाँ हमरा सभक नेता आ अग्रगामी छी, आ अहाँ देवत्व लेल हमर यज्ञक वाहक छी आ सङ्गहि हमरा सभक लेल यज्ञक फलक अग्रदूत छी। प्रार्थना अछि जे आउ आ हमरा सभक जीवन तरहरि सन अन्हार सदाक लेल दूर करैबला बनू। (यज्ञ व्यक्तिगतसँ जीवनक सामाजिक, राष्ट्रीय, वैश्विक आ पर्यावरणीय स्तर धरि जीवनक विकासक एकटा रचनात्मक प्रक्रिया अछि। उपरोक्त व्याख्या सामाजिक स्तरसँ सम्बन्धित अछि। स्वामी ब्रह्ममुनी व्यक्तिगत स्तर पर यज्ञक व्याख्या करैत छथि, आ ई ऋग्वेद 10,7,6 मे सेहो सुझाओल गेल अछिः 'स्वयं यज्ञ'; आ यजुर्वेद 4,13: 'इयम ते यज्ञीय तनू', जकर अर्थ अछि- अपन विकासक ऋतुक अनुसार यज्ञ द्वारा अपना केँ विकसित करू, आ मोन राखू जे शरीर, मन आ आत्मा युक्त अहाँक जीवन यज्ञक सेवाक लेल अछि, आ तइसँ अहाँक व्यक्तिगत विकास हएत; अहाँक शरीर अहाँक जीवनक व्यापक यज्ञक पहिल साधन अछि। ई व्यक्तिगत यज्ञ पाँच प्रकारक अछि, पृथ्वी, जल, ऊष्मा, वायु आ आकाशक मौलिक संतुलनक लेल; तीन प्रकारक- वात, पित्त आ कफक संतुलनक लेल; आ शरीर, मन आ आत्माक संतुलित विकासक लेल सेहो; सात प्रकारक माने रस, रक्त, मानस, मेधा, अस्थि, मज्जा आ विर्यक विकासक लेल। ऐ तरहेँ यज्ञ व्यक्तिसँ शुरू होइत विकासक प्रक्रिया अछि, जे ब्रह्मांडीय स्तर पर सम्पन्न होइत अछि।) आब आउ यूरोपक विद्वान लोकनि द्वारा वेदक गलत अनुवादक किछु उदाहरण देखू:- EXAMPLES OF SOME MISTRANSLATIONS OF VEDAS BY WESTERN SCHOLARS I W.D. Whitney’s translation of the Atharvaveda (7, 107, 1) edited and revised by K.L. Joshi, published by Parimal Publications, Delhi, 2004: Namaskrutya dyavapruthivibhyamantarikshaya mrutyave. Mekshamyurdhvastisthaan ma ma hinsishurishvarah. “Having paid homage to heaven and earth, to the atmosphere, to Death, I will urinate standing erect; let not the Lords (Ishvara) harm me.” I give below an English rendering of the same mantra translated by Pundit Satavalekara in Hindi: “Having done homage to heaven and earth and to the middle regions and Death (Yama), I stand high and watch (the world of life). Let not my masters hurt me.” An English rendering of the same mantra translated by Pundit Jai Dev Sharma in Hindi is the following: “Having done homage to heaven and earth (i.e. father and mother) and to the immanent God and Yama (all Dissolver), standing high and alert, I move forward in life. These masters of mine, pray, may not hurt me.” I would like to quote my own translation of the mantra now under print: “Having done homage to heaven and earth, and to the middle regions, and having acknowledged the fact of death as inevitable counterpart of life under God’s dispensation, now standing high, I watch the world and go forward with showers of the cloud. Let no powers of earthly nature hurt and violate me.” ‘Showers of the cloud’ is a metaphor, as in Shelley’s poem ‘the Cloud’: “I bring fresh showers for the thirsting flowers”, which suggests a lovely rendering. The problem here arises from the verb ‘mekshami’ from the root ‘mih’ which means ‘to shower’ (sechane). It depends on the translator’s sense and attitude to sacred writing how the message is received and communicated in an interfaith context with no strings attached (or unattached). [Dr Tulsi Ram, 2013, Atharveda: English Translation; Page xxvi] II The idea that there was slavery in the Vedic Society originated with the Western Indologists with their intentional or careless translation of a Sanskrit word into “slave”. For example, in the Taittiriya Samhita (Krishna Yajurveda), [7.5.10] [kanda 7,prapathaka 5, verse 10], a part of translation by Keith reads “slave girls dance around the fire”. But in a footnote in the same page [pg., 628, Vol. 2] the author Keith says that the verse describes the dance of maidens. Suddenly the maidens have become “slave girls”. Both Paranjape and Avinash Bose point to the mistranslation of the word ‘yosha’ as courtesan by the indologist Pischel [Bose, Hymns from the Veda, p. 36]. [Veda Books,SRI AUROBINDO KAPALI SHASTRY INSTITUTE OF VEDIC CULTURE, page 240] III In 1795, H.T. Colebrooke, then a young scholar, wrote his maiden paper, “On the Duties of a Faithful Hindu Widow,” for the Asiatic Society (Asiatic Researches IV 1795: 205-15). He cited the hymn from the Rig Veda as sanctioning widow burning, which William Jones immediately contested (Canon 1993 I:lxx). Colebrooke translated the end of the hymn as “let them pass into fire, whose original element is water.” A quarter of a century later, the Orientalist, H.H. Wilson pointed out that the hymn had been distorted (Wilson 1854: 201-14; Cassels 2010: 89). Wilson translated the verse as per the reading corroborated by Sayana, the authoritative medieval commentator on the Vedas, and demonstrated that it did not refer to widow burning (Rocher and Rocher 2012: 24-25). [Meenakshi Jain,2016; Sati: Evangelicals, Baptist Missionaries; and the Changing Colonial Discourse, Page 5) 𑒀 Do not judge each day by the harvest you reap but by the seeds that you plant. -Robert Louis Stevenson ------------------------------------- Videha: Maithili Literature Movement 𑒀 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्ति: 𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱: अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृ. २-१२) १.२.अंक ३९० पर टिप्पणी (पृ. १३-१३) २.गद्य २.१.मानेश्वर मनुज- अभिराम नयनाभिराम (पृ. १५-२३) २.२.परमानन्द लाल कर्ण-वैशाख मासक एकादशीक माहात्म्य-१ (पृ. २४-२७) २.३.अम्बालिका कुमारी- स्वातंत्र्योत्तर मैथिली कथाक विकास (पृ. २८-३३) २.४.लाल देब कामत- अपटी खेत लऽ (लघुकथा)/ राज किशोर मिश्र जीक उगरास (पृ. ३४-४०) २.५.रबीन्द्र नारायण मिश्र-सीमाक ओहि पार (धारावाहिक उपन्यास) (पृ. ४१-५४) २.६.कुमार मनोज कश्यप-वट-वृक्ष (पृ. ५५-५६) २.७.प्रमोद झा 'गोकुल'-फोने पर फगुवा (लघु कथा) (पृ. ५७-५८) २.८.प्रणव झा- ऑडियोलॉजी आ स्पीच लेंग्वेज पैथोलॉजी: बारहमा के बाद जीवविज्ञान केर विद्यार्थी लेल करियर विकल्प (पृ. ५९-६४) २.९.आचार्य रामानंद मंडल-कथाकार/ पिया मोर बालक: महाकवि विद्यापति (पृ. ६५-७०) ३.पद्य ३.१.मुन्ना जी- गजल (पृ. ७२-७३) ३.२.राज किशोर मिश्र-सोनित (पृ. ७४-७६)

१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.अंक ३९० पर टिप्पणी १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय गंगेश उपाध्यायक तत्त्वचिन्तामणि गंगेश उपाध्यायक तत्त्वचिन्तामणि चारि गोट खण्डमे विभाजित अछि- १. प्रत्यक्ष (सोझाँ-सोझी), (२) अनुमान, (३) उपमान (तुअलना केनाइ) आ (४) शब्द (मौखिक गवाही), जे वैध ज्ञान प्राप्त करबाक ई चारिटा साधन चारि खण्डमे अछि। १. प्रत्यक्ष

खण्ड एकः गङ्गेशक आह्वान काज त्रिमूर्ति शिवक आह्वानसँ शुरू होइत अछि।आ तेँ आह्वानक विषयपर चर्चा शुरू होइत अछि। ई मानल जाइत अछि जे कोनो परियोजनाक प्रारम्भमे भगवानक आह्वानसँ ई कार्य पूर्ण होइत अछि।

आपत्तिः जे कोनो आह्वान कोनो काज पूरा करबाक कारण अछि, से सकारात्मक बा नकारात्मक संगतिक माध्यम सँ स्थापित नै कएल जा सकैत अछि, किएक तँ एहनो भेल अछि जे कोनो आह्वानक बिना सेहो कोनो काज पूरा कएल गेल। आपत्तिक उत्तर: एकर कारण ई अछि जे ई आह्वान पूर्व जन्ममे कयल गेल छल।

आपत्तिः नै, ई तँ घुमघुमौआ तर्क अछि, आ ओनाहितो कोनो काज पूरा केना होइत अछि से अनुभवजन्य कारण सभ आह्वानकेँ अनावश्यक सिद्ध करैत अछि। आपत्तिक उत्तर: ई प्रमाण जे आह्वान पूरा होबय के कारण छैक, तइमे दू चरणक अनुमान शामिल छै। पहिल, ई जे ई शिष्ट लोक द्वारा निन्दित नै अछि वरन हुनका सभ द्वारा कएल जाइत अछि। तखन ई अनुमान लगाओल जा सकैत अछि जे काज पूरा भेनाइ फल अछि किएक तँ ई नियमित रूप सँ इच्छित अछि, आ आन कोनो फल उपलब्ध नै अछि।

आपत्तिः ई तर्क काज नै करत कारण ई पहिनेसँ ज्ञात अछि जे आह्वानक अछैतो काज पूर्ण भऽ सकैत अछि, कारण-सम्बन्ध कोनाहुतो तर्कसँ स्थापित नै कएल जा सकैत अछि। आपत्तिक उत्तर: हम सभ ऐ तर्कक समर्थन लेल वैदिक आदेशक आह्वान करैत छी जे आह्वान कार्य पूर्ण करबैत अछि। मुदा कोनो एहन वैदिक कथन नै भेटैत अछि, से अनुमान कएल जा सकैत अछि जे आह्वान सुसंस्कृत लोक सभ द्वारा कएल जाइत अछि। ऐ तरहक तर्कसँ प्रारम्भ भेल ग्रन्थ ७-८ सय बर्ख पहिने! (सन्दर्भ: कार्ल एच पॉटर: एनसाइक्लोपीडिया ऑफ इण्डियन फिलोसोफी, सतीश चन्द्र विद्याभूषण: अ हिस्ट्री ऑफ इण्डियन लॉजिक) HONOUR KILLING OF GANGESH UPADHYAYA (FIRST BY RAMANATH JHA, THEN BY UDAYANATH JHA 'ASHOK' (A PARALLEL HISTORY OF MITHILA AND MAITHILI LITERATURE, WHY TODAY ITS NEED BEING FELT MORE INTENSELY?) I was not surprised, though I must have been when I saw a monograph on Gangesh Upadhyaya, whose copyright is being held by Sahitya Akademi, the author of the monograph is Udayanath Jha ' Ashok'. I thought that Udayanath Jha ' Ashok', who has been given Bhasha Samman also, by the same Sahitya Akademi, would do some justice. But truth and research seem elusive in Sahitya Akademi monographs, at least that I found in this monograph. I searched and searched through chapters, that now the author will show courage. But the author like Ramanath Jha seems ashamed of the roots and offspring of Gangesh Upadhyaya. He tries to confuse the issue, but there is no confusion now at least since 2009. But in 2016 Sahitya Akademi seems to carry out the casteist agenda. Udayanath Jha mockingly pretends to search his name, lineage etc, where nothing is there to search for, yet he could not muster the courage, to tell the truth, and ends up just repeating the facts in 2016 that Dineshchandra Bhattacharya already has published way back in 1958. The honour killing of Gangesh Upadhyaya by Prof. Ramanath Jha is being taken forward by Sahitya Akademi, Delhi in a most hypocritical way. Ramanath Jha's obscurantism vis-a-vis Panji is evident from one example. The inter-caste marriage in Panji was well known to him (but he chose to keep the Dooshan Panji secret- which has been released by us in 2009), and it was apparent that the great navya-nyaya philosopher Gangesh Upadhyaya married a "Charmkarini" and was born five years after the death of his father (see our Panji Books Vol I & II available at http://videha.co.in/pothi.htm ). Sh. Dinesh Chandra Bhattacharya writes in the "History of Navya-Nyaya in Mithila". (1958) "The family which was inferior in social status is now extinct in Mithila----- Gangesha's family is completely ignored and we are not expected to know even his father's name-----...As there is no other reference to Gangesa we can assume that the family dwindled into insignificance again and became extinct soon after his son's death." [1958, Chapter III pages 96-99), which is a total falsehood. He writes further that all this information was given to him by Prof. R. Jha, and he seemed thankful to him. The following excerpt from Our Panji Prabandh (parts I&II) is being reproduced below for ready reference: - महाराज हरसिंहदेव- मिथिलाक कर्णाट वंशक। ज्योतिरीश्वर ठाकुरक वर्ण-रत्नाकरमे हरसिंहदेव नायक आकि राजा छलाह। 1294 ई. मे जन्म आ 1307 ई. मे राजसिंहासन। घियासुद्दीन तुगलकसँ 1324-25 ई. मे हारिक बाद नेपाल पलायन। मिथिलाक पञ्जी-प्रबन्धक ब्राह्मण, कायस्थ आ क्षत्रिय मध्य आधिकारिक स्थापक, मैथिल ब्राह्मणक हेतु गुणाकर झा, कर्ण कायस्थक लेल शंकरदत्त, आ क्षत्रियक हेतु विजयदत्त एहि हेतु प्रथमतया नियुक्त्त भेलाह। हरसिंहदेवक प्रेरणासँ- आ ई हरसिंहदेव नान्यदेवक वंशज छलाह, जे नान्यदेव कार्णाट वंशक १००९ शाकेमे स्थापना केने रहथि- नन्दैद शुन्यं शशि शाक वर्षे (१०१९ शाके)... मिथिलाक पण्डित लोकनि शाके १२४८ तदनुसार १३२६ ई. मे पञ्जी-प्रबन्धक वर्तमान स्वरूपक प्रारम्भक निर्णय कएलन्हि। पुनः वर्तमान स्वरूपमे थोडे बुद्धि विलासी लोकनि मिथिलेश महाराज माधव सिंहसँ १७६० ई. मे आदेश करबाए पञ्जीकारसँ शाखा पुस्तकक प्रणयन करबओलन्हि। ओकर बाद पाँजिमे (कखनो काल वर्णित १६०० शाके माने १६७८ ई. वास्तवमे माधव सिंहक बादमे १८०० ई.क आसपास) श्रोत्रिय नामक एकटा नव ब्राह्मण उपजातिक मिथिलामे उत्पत्ति भेल। So, the Srotriyas as a sub-caste arose around 1800 CE as per authentic panji files. Sh. Anshuman Pandey [Gajendra Thakur of New Delhi provided me with digitized copies of the genealogical records of the Maithil Brahmins. The panjikara-s whose families have maintained these records for generations are often reluctant to allow others to pursue their records. It is a matter of 'intellectual property' to them. I was fortunate enough to receive a complete digitized set of panji records from Gajendra Thakur of New Delhi in 2007. [Recasting the Brahmin in Medieval Mithila: Origins of Caste Identity among the Maithil Brahmins of North Bihar by Anshuman Pandey, A dissertation submitted in partial fulfilment of the requirements for the degree of Doctor of Philosophy (History) in the University of Michigan 2014]. Later these Panji Manuscripts were uploaded to Videha Pothi at www.videha.co.in and google books in 2009). The so-called Maharajas of Darbhanga were permanent settlement zamindars of Cornwallis, and there were so many in British India, but in Nepal there were none. In the annexure of our book (Panji Prabandh vol I&II), we have attached copies of genealogy-based upgradation orders (proof of upgradation for cash). So, before 1800   CE, there was no srotriya sub-caste in British India and there is no such sub-caste within Maithil Brahmins in Nepal part of Mithila even today. Srotriya before that referred to following some education stream in British India, in Nepal it still has that meaning. ORIGINAL PANJI REFERENCES ARE PLACED BELOW: DOOSHAN PANJI- THE BLACKBOOK ४९. १८८/२ चर्मकारिणी माण्डर वभनियाम छादन तत्त्वचिंतामणि कारकगंगेश छादनगंगेशक नाँई रत्नाकरक-मातृक (अज्ञात) गंगेश वल्लभा भवाइ माहेश्वर जीवे २१//१० छादनसँ तत्व चिन्तामणि कारक जगद्गुरु गंगेश छादनसँ तत्‍व चिन्‍तामणि कारक गंगेशक वल्‍लभा चर्मकारिणी पितृ परोक्षे पञ्च वर्ष व्‍यतीते तत्‍व चिन्‍तामणि कारक गंगेशोत्‍पत्ति- चर्मकारिणी मेधाक सन्‍तानक लागिमे छलन्हि छादन सँ तत्व चिन्तामणि कारक मōमō गंगेश "तत्व चिन्तामणि कारक म. म. पा. गंगेशक विषयक लेख प्राचीन पञ्जीसँ उपलब्ध"।। पितृ परोक्षे पंच वर्ष व्यतीते गंगेशोत्पत्तिः इति प्राचीन लेखनीय: कुत्रापि देवानन्द पञ्जी ३९-२ छादनसँ जगदगुरू गुंरू गंगेश सुताय वभनियामसँ जयादित्य सुत साधुकर पत्नी देवानन्द पञ्जी ३३९-३ जगदगुरू गंगेश सुत सुपन दौ भण्डारिसमसँ हरादित्य दौ.।। पुत्र सुताच गोरा जजिवाल सँ जीवे पत्नी ए सुत सन्दगहि भवेश्वर। अत्रस्थाने सुपनभ्रातृ हरिशर्म्म दारिति क्वचित् जजिवाल ग्राम देवानन्द पञ्जी ३०=५ छादनसँ उपायकारक म.म. पा. वर्द्धमान सुताच खण्डवलासँ विश्वनाथ सुत शिवनाथ पत्नी गंगेश- म.म. वर्द्वमान/ सुपन/ हरिशर्म्म Gangesh, the author of the Tattvachintamani, wrote one text equivalent to 12,000 texts. Now come to the fact mentioned in the Panji- it clearly states that Gangesh of Tattvachintamani was born five years after the death of his father and he married a tanner, so why did Ramanath Jha hide this from Dinesh Chandra Bhattacharya? Vardhamana, son of Gangesh, calls Gangesh sukavikairavakananenduh. But the conspiracy under which the poems of a famous scholar like Gangesh are not available today is clear from the example given above. Vasudev of Bengal was a classmate of Pakshadhar Mishra of Mithila, he came to study in Mithila, passed the shalaka examination and received the title of sarvabhaum. Vasudeva memorised the tattvachintamani of Gangesh and the nyayakusumanjali karika of Udayana. Pakshadhar and other Mithila teachers did not allow writing (copying) tattvachintamani. Raghunath Shiromani, a disciple of Vasudeva, took the right of certification after he defeated his guru Pakshadhar Mishra in a scriptural debate (shastrartha). The Navya Nyaya school was founded in Navadvipa by Vasudeva-Raghunath. Pakshadhar Mishra was a contemporary of Vidyapati (distinct from the Padavali writer who was of the pre-Jyotirishwar period) who wrote in Sanskrit and Avahatta. And the arrival of Mithila students of Bengal from Bengal stopped after Raghunath Shiromani. Gangesh Upadhyaya enjoyed 'param guru' as well as 'jagad guru' titles, the highest titles of the time and as per Panji only Vacaspati Mishra II was the other person who enjoyed the title of 'param guru'. The extinction of Navya-Nyaya School from Mithila, as described above, was a revenge of nature against the honour killing of Gangesh Upadhyaya and his family. [Translation of the Maithili Short Story, 'Shabdashastram' (based on the true Panji records of Gangesh Upadhyaya) was done by the author Gajendra Thakur himself: published as 'The Science of Words'  Indian Literature Vol. 58, No. 2 (280) (March/April 2014), pp. 78-93 (16 pages) Published By: Sahitya Akademi] -Gajendra Thakur, editor, Videha (be part of Videha www.videha.co.in -send your WhatsApp no to +919560960721 so that it can be added to the Videha WhatsApp Broadcast List.) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १.२.अंक ३९० पर टिप्पणी लक्ष्मण झा सागर वाह! ईहो अंक नीक भेल अछि।बहुत बहुत बधाइ! हार्दिक शुभकामना!! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.गद्य २.१.मानेश्वर मनुज- अभिराम नयनाभिराम २.२.परमानन्द लाल कर्ण-वैशाख मासक एकादशीक माहात्म्य-१ २.३.अम्बालिका कुमारी- स्वातंत्र्योत्तर मैथिली कथाक विकास २.४.लाल देब कामत- अपटी खेत लऽ (लघुकथा)/ राज किशोर मिश्र जीक उगरास २.५.रबीन्द्र नारायण मिश्र-सीमाक ओहि पार (धारावाहिक उपन्यास) २.६.कुमार मनोज कश्यप-वट-वृक्ष २.७.प्रमोद झा 'गोकुल'-फोने पर फगुवा (लघु कथा) २.८.प्रणव झा- ऑडियोलॉजी आ स्पीच लेंग्वेज पैथोलॉजी: बारहमा के बाद जीवविज्ञान केर विद्यार्थी लेल करियर विकल्प २.९.आचार्य रामानंद मंडल-कथाकार/ पिया मोर बालक: महाकवि विद्यापति २.१.मानेश्वर मनुज- अभिराम नयनाभिराम मानेश्वर मनुज अभिराम नयनाभिराम ओइ राति अन्हार आ प्रकाशक नुक्का-छिप्पीमे जे आंखिक खेल भेल ओ खेलक रूपमे हृदय पर एक स्थायी रूप धारण कऽ लेलक आ आंखि बेर-बेर ओहिना खेलाय लागल। वेदना हृदय पर पड़ल,  खेल-खेलक लत आंखि पर पड़ल आ मस्तिष्क पर पड़ि गेल एक प्रश्न-सूचक चिह्न- आखिर किरण खिड़की पर ठाढ़ किअय छल? ओ किअय अविराम ताकि रहल छल? कुन बेगरताक निदानक हेतु ओ कारी भयावह रातिमे जागि रहल छल, जखन कि निश्चित भू-भागक लोक निद्रादेवीक शयन कक्षमे कऽर दऽ रहल छल। आई नमिताक गाड़ी फुजक समय छलै, साढ़े छ बजे आ ओकर क्लास आठ बजेसऽ छलै। साढ़े छ बजेवला गाड़ी बुझल छलै, कारण सबदिन सुरपुर ओही गाड़ीसऽ जाइ छल। सोचने छल जे अहिसऽ पहिनहो कुनो गाड़ी हेतैतऽ ओही सऽ चलि जायब, तैं किच्छ पहिलहे स्टेशन पर चलि आयल छल। सोचने छल जे सुरपुर स्टेशन पर जल्दी पहुंच जायत तऽ ओतऽ सऽ आगाक लेल बऽस नैइ पकड़ि आइ पाएरे चलि जायब। बऽस सऽ जायब एक दूरी तय करब छै, मुदा पैरे जायब प्रकृति आ भौगोलिक छटाक दर्शन करब छै। ओना आन दिन स्टेशन पर ओ गाड़ी फुजऽ सऽ सिर्फ पांच मिनट पहिने अबै छल। आइ आधा घंटा पहिनहे आबि गेल छल। समय निकालऽ लाय इमहर-उमहर ताकऽ लागल। देखलक बगलवला बेंच पर एक पुरूष बैसल छलैय बर्ख बीसेक। माथ, केश, कपार सब आकर्षक। कान एक ज्योति पूंज सदृश झलकैत छलै। हरियर-हरियर दाढ़ी, खेतक फसल सन मनोरम लागि रहल छलै। प्रकृति सन सुन्दर शोभा पुरूखक मुंह पर ओ पहिले बेर देखने छल। ओ साकांक्ष भऽ गेल। आंखिमे एक भावुकता पसरि गेलै आ ठोर पर लालित्य समाय गेलै आ आंखि एक शक्तिशाली दीप्ति संग चमकि उठलै। मोनसऽ एकाएक एकाकीपन समाप्त भऽ गेलै आ मुखमंडल कमलक फूल जकां तुरत्ते खिलखिला उठलै। लगलै जेना एकबेर वातावरणमे महमही आबि गेलै। ओइ महमहीमे ओ स्वयं डूबि गेल, यानी नमिता स्वयं प्रकृति बनि गेल। प्रकृति पुरूखके देखलक। गोर झलकैत देह। ओकरा लगलै ओइ पुरखक मुंहमे पान हेतै तैं ठोर लाल-गूलाब भऽ गेल हेतै। पुरूख कनिए गरदनि घुमौलक, मुखमंडल नमिता दिस भऽ गेलै। मुंहमे पान नैइ छलै। ठोर पर प्रकृतिक लालित्य छलै। गालक त्वचासऽ अहिना रक्तक लाली झलकि रहल छलै। नाक, आंखि आ सबसऽ बढ़िकऽ भृकुटि अत्यन्त सुशोभित छलै। सूर्योदय भेले छलै। सबतैर स्वच्छ वातावरण छलै। स्वच्छ हवा बहैत छलै। साइत सितम्बरक महीना छलै। नमिताक एको पल निच्चा नैइ खसि रहल छलै आ लगातार ओ ओकरा दिस ताकि रहल छल। पुरूखक केश, मेघ सन कारी कपार सूर्य सदृश झलकैत आ आंखिमे विजलौका दूर-दूर धरि चमकि उठै छलै। ओकरा बुझा रहल छलै ... जेना ओ पुरखक चेहराक अधे भाग देख रहल छै। ओ पूरा-पूरा गरदनि ओकरा दिस कखनो घुमेबे नैइ केलकै। नमिताक नजरि शिकारीक तीर जकां ओकरा बेधऽ हेतु तत्पर छलै। ओ पुरूख के भऽ सकै छल? हम छलौं या हमर कुनो पात्र छल। तत्काल मानि लै छी जे ओ हमही छलौं। हम स्टेशन पर अबैत-जाइत आ आन-आन ठामक टे’नमे चढ़ैत-उतरैत लोक के देख रहल छलौं। गेटसऽ अबैत एक नवयुवतीके देखने छलौं। चौड़गर वक्षस्थल कुनो योद्धाक कवच सन छातीसऽ सटने छल। ठोर पर अड़हुल खिलखिलाइत छलै आ गाल आ नाकक ऊपर दू भ्रमर-नयन इमहर-उमहर नाचि रहल छलै। की नाम छलै की जानि, के पुछितै आ किआक पुछितै?  हम ओकरा एक काल्पनिक नाम राखि देलिऐ-शशि। यैह नाम ठीक छलै। शशि एक दोसरो हमर परिचित छल। हमरा सऽ एक क्लास आगा छल। चमकैत-दमकैत चलैत छल। हमरा घरो कहिओ-काल अबै छल। भलेही हमरासऽ एक क्लास आगा छल, मुदा बेशी बहिक्रम नैइ छलै। पढ़ाई समाप्त भऽ गेलाक बादो ओ गाछी ओगरऽ जाइ छल आ गाछी सऽ अबै-जाइत हमरा दिस टुकुर-टुकुर तकैत जाइत छल। ओकरा नजरिमे कुनो प्रश्न झलकै छलै। किच्छ कहऽ चाहै छल, मुदा कहि नैइ पबै छल, हम नैइ टोकने छलिऐ कहिओ? ओ नऽत देबऽ अबै छल। नऽत देबऽ ककरो जाइ छल, मुदा सोह विसरि जाइ छल। ओ ककरा नऽत देवऽ जाइत छल, ओकरा याद नैइ रहै छलै आ हमरे नऽत दऽ चलि जाइ छल ! सैह भेलै एक बेर। नऽत तऽ दऽ गेल, मुदा थोड़बे कालक बाद फेर कोनटामे आबि ठाढ़ भऽ गेल, अप्पन गलती सुधारऽ लाय। नऽत वापस लेवऽ लाय। ओ की बाजल हम किच्छ नैइ बुझलिऐ। बजवहो आयल तैओ नैइ बुझलिऐ। ओकर माय हमरे घरक एक अपन सदस्यके नऽत देबऽ लाय कहने छलै, मुदा ओ हमर नाम  नऽत दऽ गेल छल। बजबऽ आयल तऽ बुझलौं - हमरे नऽत देने अइ तऽ हमरे बजवऽ आयल हायत। हम चलि देलौं। आंगन गेलौं, मुदा ओकर माय किच्छ भिन-भिना रहल छलै। हम से नैइ किच्छ बुझलिऐ। आंगन जा हमरा कोना लौटऽबैत, हम अपनेसऽ पीढ़ी पर जा बैस गेलौं। सामग्रीतऽ आवहेक छलै। पवित्र भोजन कऽ ओकरा आंगन सऽ चललौं। शशिक वियाह भऽ गेलै। वियाहक किछुए दिनक बाद ओ गर्भवती भऽ गेल। भरि पेट बच्चा झलकै छलै। ओ बड़का पेट लेने इमहर-उमहर घरक बेगरता पूरा करऽ लाय घुमै छल। के कहने छलै ... जो भी करती प्रेम महीपर  उसे माता बनना ही होता है !- ओ जहां-तहां हमरा सामने आबि जाइ छल ... आंखि, आंखिसऽ टकराइ छलै। ओकर मूड़ी निच्चा कखनो नैइ होइ छलै, मुदा सामना-सामने ओ हंसितो नैइ छल। मोने-मोन जे किच्छ सोचैते होबए, हम सोचैत छलौं - तोहर तऽ विआहो भऽ गेलौ। पेटमे बच्चो छौ, सिर्फ आंखिक नजरि टकरौने की तोरा भेटतौ आ की भेटत हमरा, जखन सामने अबैछांह ठोर पर कनी मुस्किओतऽ आबऽ दही। लोक देखो लेतौतऽ की हेतै, की बिगाड़ि सकतौ ओ, हम नैइ टोकै छिऔ तोरा। एतेक दिन नैइ टोकलिऔ तऽ आब की टोकिऔ, टोकैतऽ मंजुलोके नैइ छिऐ। घरक बगलसऽ अबैत आ जाइत अइ। सब गोटेसब देखैत रहै छै, जे के ओकरा टोकै छै आ ककरा ओ टोकै छै? नजरिओ पर ध्यान देने कहै छै जे-ओ ककरा दिस तकैआय आ के ओकरा दिस तकै छै? बूढ़-सूढ़ तऽ अइ विद्यामे आरो प्रवीण। एक बूढ़ भाऊज हमरा लग आबि पुछैत अइय- हमरा लग सूतब?- हम ओकरा बातके हंसी मानि ठहक्का दै छी, मुदा ओ मजाक नैइ छलै। ओकर छत्तीस इंचक अंतड़ी तऽर सऽ ओ बात निकलल छलै। ओकरा बातमे सात तऽह छुपल छलै आ आठम तहक अविष्कार करै छलै। ओकर तात्पर्य छलै, जे ’हम मंजूला संग सूतऽ चाहै छिऐ।’ सूतक अर्थतऽ हम बुझै छलिऐ, मुदा शब्दक तऽहवला अर्थ नैइ बुझै छलिऐ। ओकर पूछक अर्थ छलै, जे मंजूलाक पाछा हम किआक पड़ल छिऐ? मंजूला सुन्दर अइ तऽ ओहो सुन्दर अइ। मंजूला गोर अइतऽ ओहो गोर अइ। मंजुला जुआन अइ, मुदा ओ जुआन नैइ। ओकरा बात पर जखन हम जोर-जोरसऽ हंसऽ लगै छी तऽ ओ ककरो शोर पाड़ऽ कहैआय। हम शोर पाड़ि बजा दै छिऐ। मुदा मंजूलासऽ किच्छ कहऽ सऽ पहिनहे हमर बत्ती बन्द भऽ जाइआ। शशिओके नैइ टोकै छिऐ। डोमनवाली हमरा कहि चुकल छल, जे-हम मंजूलाक डेग गनै छिऐ। एको बेर ओकरा डेग परसऽ नजरि नैइ हटबै छिऐ। हमरा की पता सब हमरे पर ध्यान गड़ौने रहैआ? ओ मूड़ी निच्चा केने जाइत अइ। बूढ़ सधुआ नैइ होइ छै। ओ जनैत अइ। हम नैइ जनै छी। ओ हमर बचाव करैआय। हमरा पर कुनो आघात नैइ आबऽ देबऽ चाहैआ। अही सब करणे कल्पनामे जीवि रहल छलौं। रिया कहितो छल - अहांतऽ पोइट्रिक लाईफ जी रहल छी। पोइट्रिक लाईफ सन आनन्द वास्तविको लाईफमे नैइ छै। हम ककरो नैइ देखै छलिऐ। हम सिर्फ प्रकृतक सौन्दर्य देख रहल छलिऐ। प्रकृतक सम्पूर्ण सौन्दर्य स्त्री-देहमे समायल रहै छै। ई सौन्दर्य तरूणावस्थे सऽ शुरू भऽ जाइ छै। अठाहरम तकतऽ पूर्णरूपेण आकर्षक भऽ जाइ छै। एक अनजान चेहरा शशि ! अनजानतऽ नैइ छल कारण ओकरा आइसऽ पहिनहो कतेक बेर देखने छलिऐ। ओकर देह-आकृतिक अलावे ओकरा विषय हम किच्छ नैइ जनै छलिऐ, तैओ ओकरा अपरिचित कोना कहिऔ, ओकर सौन्दर्यके तऽ देखिते छलिऐ। शशिक देहमे लाल रंगक साड़ी छलै, ओ बड़ खुलै छलै। श्याम वर्ण शरीर पर लाल साड़ी हमरा उत्तेजित कऽ रहल छल। आनो दिन ओकरा देखने छलिऐ, स्टेशन पर, मुदा एतेक आकर्षित ओकरासऽ कहिओ नैइ भेल छलौं। मस्तिष्क पर एक विद्युत आवेश चढ़ि रहल छल। आइ तक कुनो परिचितोके नैइ टोकलिऐ, तऽ अइ अनजान चेहराके की टोकिऔ, शरीर पर जे एक स्पन्दन आबि गेल छल, ओकरा मस्तिष्क पर लऽ जा सोचऽ लगलौं। एतेक सुन्दरताक कारण माता-पिताक सुखद संयोग, ध्वनि आ दृश्य, प्रकृतिक सहयोग आ स्वयं कृत्रिम प्रयास हेतै। गाछ-वृक्ष आ सूर्यक लालीक समक्ष जेना माथ झुका दैत छलौं, तहिना ओकरा समक्ष अप्पन माथ झुका देलौं। हरियर बत्ती बरलै। प्लेटफर्म पर सब तत्पर भऽ गेल। पेसेन्जर गाड़ी प्लेटफर्म पर प्रवेश कऽ गेलै। उतरऽवला कूदि-कूदिकऽ उतरि रहल छल। चढ़ऽवला तत्पर छल, चढ़क लेल। टे’न मात्र दू मिनट रूकै छलै। हम एक नजरि उमहर दौड़ेलौं। शशि आनो दिन डिब्बामे चढ़ैत छल। आइ हमहूं ओही डिब्बामे चढ़ितौं। एतेक आकर्षित ओ कहिओ नैइ केने छल। आइतऽ लगै छल जेना ओकरा शरीरमे साक्षात सौन्दर्यक देवी प्रवेश कऽ गेल छै। ओ एखन डिब्बामे चढ़ल नैइ छल। ओ हमरा पछेमे ठाढ़ छल। एक आत्म संतोष भेल,:- ’जेहि के जेहि पर सत्य सनेहू सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू’। मुदा सामनेवला डिब्बामे भीड़ बेशी देख ओ आगा बढ़ि गेल। हमहूं कोशिश कएलौं ओकर पाछा-पाछा जायक’। ओ एक डिब्बामे चढ़ल। हमहूं ओही डिब्बामे झटसऽ चढ़ऽमे सफल भेलौं। ओकरासऽ दू-चारि सीट दूर हमरो जगह भेट गेल। शशि चकुआइत छल। इमहर-उमहर नजरि दौड़ऽवैत छल, जेना किच्छ हेराय गेल होइ। मोन आऊल-बाऊल भऽ रहल छलै। करेजा सुखा रहल छलै। - एखने देखलिऐ। उठलै तऽ बुझायल चारू कात प्रकाश छिटकि उठलै आ एखने ओ पुरूख कतऽ चलि गेलै, हां, वैह ओइ सीट पर। ओ हम नैइ किओ आन छलै। ओकरा देखऽमे ओकरा कुनो असोकर्य नैइ होइ छलै। हमर उत्सुकता कुनो विशेष नाम संज्ञासऽ नैइ छल। हमर आकर्षण सौन्दर्यसऽ छल। हमरा आश्यर्च लागल ... हीराक प्रकाश ओकरा देहसऽ छिटकि रहल छलै, तकर एहसास हमरा तखन भेल जखन सबकिओ ओकरे दिस ताकि रहल छलै। एक कॉलेजमे देखने छलिऐ ... फिल्डमे कुनो लड़की ठाढ़ छलै आ ओइ कॉलेजमे पढ़ऽवला सात सौ लड़का ओकरे दिस तकै छलै। ओ तऽ खिच्चा उम्रक बात छलै। एतऽ तऽ सब वयसक स्त्री-पुरूष छै, तैओ ओकरे दिस किआयक’ देख रहल छै? ... ओहो तऽ कुनो मूर्ति नैइ जे जेना स्थापित कऽ देबै तहिना ताही मुद्रामे रहत, ओहो इमहर-उमहर तकै छल, जकरा दिस तकै छल, कृपा-वर्षा होइ छलै। हम शशिक सामने नैइ छलौं। हम एहन जगह पर बैसल छलौं जतऽसऽ मात्र ओकर पछिलुका भाग देख रहल छलिऐ। कान, कनपट्टी, गरदनि, केश आ खोपा की कम आकर्षक छलै -की फुरलै की ने मूड़ी कनिऐ घुमौलक। शरतचन्द्र एहने सन सुन्दरीके चन्द्रमुखी कहने हायत। हमरा बुझायल जे-सम्पूर्ण चन्द्रमा के देखलौं। कंठ सुखा गेल। आह ! शीतलताक बदला उष्माक एहसास किआ कऽ भेल, संगमे पानि रहैत तऽ समुच्चा बोतल पी जैतौं। हम मूड़ी दोसर दिस घुमा लेलौं आ आँखि मूनि लेलौं-जाहिसऽ त्रास किच्छ कम होबाय। आश्चर्य लागल अइमे कुन वैज्ञानिक सत्य छै वा मनोवैज्ञानिक - ककरो दिस देखने पिआस कोना लागि जेतै , कारण तऽ किच्छ बुझल नैइ छल, मुदा परिणाम साक्षात सामने छल। सत्यक परीक्षणक हेतु नहूं-नहूं अप्पन मूड़ी एक बेर आरो उमहर घुमौलौं। जेना-जेना चन्द्रमुखी देखाई दै जाइ छल, ओहिना एहसास होइ छल। एक दोसरे तरहक सनसनी देहमे समायल जाइ छल। कखनो काल जखन ओ पूरा मूड़ी कुनो कारणवश घुमबै छल आ ओकरा पूर्णरूपेण देखै छलिऐ तऽ बुझाइ छल जेना किच्छ गरम चीज हृदयके जगा रहल अइ। की ओ लोकोक्ति- ’करेजा जरब तैं तऽ ने बनल छै?’ फेर पानिक जरूरत बुझायल सेहो एक गिलास वा एक लोटाक नैइ समुच्चा घैलक। मोन होइ छल अनवतर देखिते रहितौं, मुदा से सम्भव नैइ छल। आहिरो वा, ई कुन खेल विधाता खेला रहलायऽ? हम अप्पन मूड़ी घुमोलौं तऽ देखलौं नमिता हमरे जकां आऊल-बाऊल मोन केने व्याकुल। सोचलौं ओ किआक हमरा देखैत हायत? हम की ओतेक सुन्दर छी? ओ एक पुरूख के देख रहल छल। माटिक तऽरमे महादेव नहिओ होउक तैओतऽ लोक माटिक महादेव पूजैत अइ। ओ सोचैत हायत-जे हम रूपक धनी छी। विद्या आ विनय सेहो ओकरा हमरामे देखाई दैत हेतै। बुद्धि-विवेकशील स्वभाव सब नीक लगैत हेतै। छड़गर शरीर, हृष्ट-पुष्ट छीहे, कोना कहत जे हम नीक घरक नैइ छी? बयस ओतनी छल जतेक ओकर। ओकरा बुझाइ हेतै जे हमरा रोम-रोमसऽ प्रकाश निकलि रहलाय। एक आकस्मिक चारूता देख गद-गद होइत हायत। ओ अप्पन शरीरक सौन्दर्य आ हमरा शरीरक सौन्दर्यक तुलना कऽ रहल हायत। ओकरा हमरे जकां अप्पन सुन्दरता तुच्छ लगैत हेतै। ओकर सुन्दरताक मुख्य ओकर मुखमंडल यानी आंखि, कान, नाक, गाल, केश, कपार, भौं आ दाढ़ी छलै। ओइमे यदि एको खराप होइ तऽ सब गुड़ गोवर भऽ जेतै, मुदा हमर सुन्दरता निच्चासऽ ऊपर रोम-रोममे ओकरा झलकैत हेतै। हमरा अंग-अंगसऽ ओकरा एक शक्तिक आभास होइत हेतै। हमरा हृदय पर ओकरा वीरताक आभास होइत हेतै। किओ कतबो आभूषणसऽ सुसज्जित होबाय खूनक डगडगीक परतर कऽ सकै छै की? ओकरा मोनसऽ मायाक भ्रम समाप्त भऽ गेल हेतै। सबहक जीवनमे किओ ने किओ प्रथम पुरूख होइ छै। भऽ सकै छै ताहि रूपमे सबसऽ पहिने ओ हमरे देखने होबाय आ देखिते रहऽ चाहने होबाय। जेना-जेना सुरपुर नजदीक अबैत गेलै ओ मलीन होइत गेल। स्टेशन पर गाड़ी थम्हलै। ओ पलासक फूल जकां मौला गेल। गाड़ीसऽ उतरिते ऋतु परिवर्तन भऽ गेलै। कहां वसंतक चंचलता आ कहां पतझड़क उदासी। अप्पन जीवन एक पत्रहीन नग्न गाछ बुझेलै। यात्रियोजीक मोनमे एहने सन किच्छ देख पत्रहीन नग्न गाछ आयल हेतै, ने तऽ गाछ सऽ कुन मतलब झांपल रहाय वा नग्न?  झांपन सदा सुहागन। मुदा वाह रे हम। हमतऽ अपने सुखमे मगन छलौं। हम चन्द्रमुखी के सिर निच्चाकऽ प्रणाम केलौ – हे सौन्दर्य मूर्ति, अहां अहिना अबैत-जाइत, बाट-घाट हमरा दर्शन दैत रहब, हम धन्य-धन्य होइत रहब। देवी आ देवताक दर्शनमे एहने किच्छ पूर्णता हेतै। गाड़ी फूजि गेलै। अछताइत, पछताइत नमिता आगा बढ़ल जा रहल छल, नहुए-नहुए डेग बढ़ा रहल छल। सुखी राजकुमार सन ओकरा नजरि पर एक पुरूख बैसल छलै। हमरा संग अपने एक अलग समस्या छल। हम अपने प्रेयसीके देखऽमे बेहाल छलौं। शशिमे चन्द्रमाक सोलहो कला विराजमान छलै आ हम ओकरा पर अभिभूत छलौं। हमर दोसर मोन स्वयं हमरासऽ कहलक जे – ’अहां एको बेर ओकरा दिस तकबो नैइ केलिऐ? कतेक कचोट भेल हेतै ओकर मोनमे, अहांतऽ ओकर सब साज-सज्जा आ आभूषण बेकार कऽ देलिऐ। ओकरामे की शशिसऽ कम लावण्य छलै? ओकरामे अहांके कुन गुण देखाई देलक, जे ओकरा पर मोहित भऽ गेलिऐ?  विआह भेल रहितै तऽ पतिसऽ पुछितै – ”की हम सुन्दर छी?’ तऽ पति सानत्वना दऽ कहितै- ’अहां संसारमे सबसऽ सुन्दर छी’, तऽ ओकरा संतोष होइतै आ जऽ कुरूपो पति रहितै तऽ ओकरा प्रेमसऽ चूमि लितैय मुदा नैइ आब ओ स्वयं अपना आपके कहत- हम अपना आंखिमे सम्पूर्ण संसारक सुन्दरता भरने छी, हमर आंखि सुन्दर अइ। हम सुन्दर छी। ई संसार सुन्दर अइ। संसारक सबकिच्छ सुन्दर अइ। संसारक सब जीव सुन्दर अइ। यैह हमरा जीवनक सार अइ। बस। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.परमानन्द लाल कर्ण-वैशाख मासक एकादशीक माहात्म्य-१ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.अम्बालिका कुमारी- स्वातंत्र्योत्तर मैथिली कथाक विकास अम्बालिका कुमारी स्वातंत्र्योत्तर मैथिली कथाक विकास मैथिलीमे मौलिक कथाक रचना बीसम शताब्दीक उत्तरार्द्धमे प्रारंभ भेल।स्वतंत्राक पश्चात् जाहि कथाकार लोकनिक महत्वपूर्ण योगदान अछि ओ लोकनि छथि --- पंडित गोविन्द झा, कुमार गंगानन्द सिँह,स्व. मनमोहन झा, उपेन्द्रनाथ झा व्यास, प्रो उमानाथ झा, हरिमोहन झा, मणिपद्‌म, डॉ.कांचीनाथ झा किरण आदि । डा. शैलेन्द्र मोहन झा, स्व. योगानन्द झा, सुधांशु शेखर चौधरी , विवेच्य कथाकार सभक बादक पीढ़ी में प्रो. मायानंद मिश्र, हंसराज, ललित, राजकमल, राधाकृष्ण 'बहेड़ प्रभास कुमार चौधरी जीवकांत, डा. धीरेश्वर झा धीरेन्द्र, सोमदेव डा. रामदेव झा, श्रीमती लीली रे, गंगेश गुजन, रामकृष्ण झा किसुन, छत्रानन्द, उग्रानन्द, रामानन्द रेणु, नीरजा रेणु, शेफालिका वर्मा, श्रीमती आद्या झा, बलराम, राजमोहन झा, सुभाषचन्द्र यादव, मन्त्रेश्वर झा, रमेश, नारायणजी , गौरीकान्त चौधरी कान्त शिवशंकर झा 'कान्त' श्रीमती गौरी मिश्र आदिक नाम उल्लेखनीय अछि। स्वतंत्रता - प्राप्तिसँ पूर्व आ पश्चात दुनू समयमे समस्यामूलक कथाक प्रणयन भेल। परंच स्वतंत्रता - प्राप्तिक पश्चताक रचनामे भोगल यथार्थक व्यापक चित्रण भेटेछ । सम्प्रति मानवक जीवनमे जे किछु नीक वा अधलाह बीति रहलैक अछि लोकक मनोवृत्ति किंवा दृष्टि, परिस्थितिक विवशता अथवा युग-परिवर्तनक कारणे जेना जेना बद‌लाव आबि रहलैक अछि, ताहि सभक यर्थाथ ओ प्रभावोत्पादक चित्रण आजुक कथा सभमे भेटैछ । आजुक कथाकार मात्र 'विवाहक परिधि में घेराएल नहि छथि। अपितु हिनका लोकनिमे परम्परावादी दृष्टिकोणक अछैत बदलैत युगक संग बदलेत मनोवृति तथा लोकक भिन्न-भिन्न अवस्थामे परिवर्तनक विभिन्न रुपक चित्रण देखबा मे अबैछ। प्रो. हरिमोहन झाक विभिन्न कथामे पाँच पत्र' कन्याक जीवन, निकट पाहुन, ग्रामसेविका, मर्यादाक भंग ग्रेजुएट पुतोहु अलंकार- शिक्षा आदिक प्रमुख स्थान अछि, जाहिमे सुधारवादी दृष्टिकोण परिलक्षित होइछ । अन्धविश्वास, ओ रुढिवाद एवं अशिक्षाजन्य रोगक स्थायी निदानक दिशामे हिनक एहि कथा सभक महत्त्वपूर्ण स्थान अछि । हिनक पाँच-पत्र सम्पूर्ण जीवनक दुख-सुखक चित्र प्रस्तुत करैत जीवन-दर्शन पर आधारित ई सर्वोत्कृष्ट' कथामे परिगणित अछि । "किरणजीक' मधुरमनि "आ 'कोन महल नाम रखबै एकर "मैथिलीक अनुपम निधि मानल जाइत अछि । मधुरमनि निम्नवर्गक एकटा महिला आ ओकर रूग्न पतिक प्रति प्रेमक आदर्श स्थापित करैत अछि । नागेन्द्र कुमरक कथा संग्रह - दृष्टिकोण (1954), शिकार (1955)आ फलेना जामुन (1985) मे भेटैत अछि । हास्य व्यंग्यक माध्यसं सामाजिक कुरीति पर प्रहार करब हिनक विशिष्टता रहल अछि। व्यासजीक बिडम्बना (1952) कथा-संग्रहमे उत्कृष्ट कथा सभ अछि। सामाजिक समस्यासँ प्रभावित व्यक्तिक जीवन ओकर द्वंद तथा संघर्ष दिशि ध्यान दिएबाक श्रेय सर्वप्रथम बंगाल ओ अंग्रेजी कथा साहित्यक छै। एकर प्रभाव व्यासजीक कथा सभ मे देखल जा सकैत अछि। स्व. मनमोहन झाक रचना मूलतः 'करुणा सं भरल रहैत छनि। हिनक अश्रुकण 1949 ई. मे प्रकाशित भेलनि। तकर बाद वीरभोग्या, गंगापुत्र संग्रह प्रकाशित भेलनि। गंगापुत्र पर हिनका साहित्य अकादेमी पुरस्कार सेहो प्रदान कयल गेलनि। हिनक किछु प्रमुख कथा अछि -- 'रुना', झगड़ा, खिड़‌कीक गप्प, आहत, चन्द्रहार, राजगीर- यात्रा आदि जे मैथिली साहित्यक अद्वितीय रचना थिक । हिनक अधिकांश कथामे पारिवारिक कलह, अकस्मात दुर्घटना, प्रकृतिक मानवीकरण, प्रेमक पावन स्वरुप आदि कें सहजता सँ देखल जा सकैत अछि। पाश्चात्य कथाक विन्यासकें मैथिलीमे अनबाक श्रेय प्रो. उमानाथ झाकेँ जाइत छनि । हिनक रचनामे शिल्पक नवीन प्रयोग एवं मनोदशाक विश्लेषण विशेष रूपसँ परिलक्षित होइछ। हिनक रेखाचित्र ' 1951 ई. मे प्रकाशित भेल, जकर 'आध घंटा', माधवजी, ओहि दिनक यात्रा, नीलाम्बर, आदि कथा समस्या मूलक अछि, जे लोकक दैनन्दिनी संबन्ध पर आधारित उत्सुकता सं भरल आ प्रेरणादायक सन्देश प्रेषित करबाक सामर्थ्य अछि । सिद्धहस्त कथाकार योगानन्द झाक 'आम खाएबाक मुँह' सामाजिक जीवनपर आधारित अमर कथा थीक, जे घटना - संयोजनके रोचक बनबैत दू प्रेमी- हृदयकेँ मिलयबाक स्तुत्य काज करैछ । सुधांशु शेखर चौधरीक 'एक सिंघाड़ा एक चाय' नितान्त वैयक्तिक ओ अर्थाभावक प्रतीकात्मक रूप प्रस्तुत करबामे सफल भेल अछि, जे परिस्थितिक प्रतिकुलता दिशि संकेत करैछ। स्वतंत्र्योतर मैथिली कथाकार लोकनिकमे ललितक स्थान अग्रगण्य अछि। हिनक कथा 1950 ई. सं प्रकाशित होमए लागल जाहिमे विविध प्रकारक सामाजिक समस्याक सटीक चित्रण भेटैछ। हिनक कथा सभमे मध्य एवं निम्नवर्गीय जीवनक घूसखोरी आ भ्रष्टाचार चित्र भेटैछ। प्रतिनिधि कथाक रूपमे हिनक ओवरलोड कें देखल जा सकैछ। "कथा - नायक दीनानाथ दरोगा छथि, जे अपराधके रोकबाक लेल प्रतिनियुक्त छथि। मुदा ओ स्वयं ओहि अपराधमे लिप्त भ जाइत छथि।' ललितक अन्य कथामे मुक्ति, रमजानी, कंचनिया, प्रश्नचिह्न आदि प्रमुख स्थान रखैत अछि। अनमेल विवाहक परिप्रेक्ष्यमे लिखिल हिनक कथा 'जयगणेश' हृद‌यविदारक अछि । प्रो. मायानन्दक मिश्रक प्रतिनिधि कथा अछि -- गाड़ीक पहिया, चन्द्र‌विन्दु, मिझाइत दीप आदि जे मनोवैज्ञानिक विश्लेषण, फ्लैशबैक आदि शिल्पगत आधुनिक प्रयोग पर आधारित अछि। मध्यवर्गक नेह-प्रेम, ओकर टूटैत सामाजिक मर्यादा, अभिजात्य तथा संघर्षशील जीवनक विविध पक्षकेँ अपन कथाक केंद्रमे रखलनि अछि, जे हिनक विशेषता कहल जा सकैत अछि। स्वातंत्र्योत्तर विभिन्न काल खंडक कथापर बिहंगम दृष्टि देला उत्तर कतेको चित्र समक्ष अबैछ, जे समाजक हेतु यक्ष-प्रश्न बनल अछि । एहि दृष्टिमे पूँजीपति ओ सामान्य वर्गक मध्य दूरी, बेरोजगारी, जमाखोरी, कालाबजारी, महगी, भ्रष्टाचार, दहेज- प्रथा, भूमि-विवाद, सीमा-विवाद, क्षेत्रीयवाद, जातिवाद आरक्षण, साम्यवाद, अस्पृश्यता निवारण, वर्ग- संघर्ष प्रति स्पर्धा भौतिकवादी मानसिकता, विरक्ति, आक्रोश, आत्महत्या, राजनीतिक उथल -पुथल, नक्सलवादी, माओवादी प्रभृति संगठनक आतंक समानान्तर सरकार स्वरूप नैतिकवाद ह्रास, मानव- -मूल्यक अवमूल्यन,अन्तर्जातीय विवाह सम्बन्धक टूटन, पारिवारिक कलह, आपसी वैमनस्य, ईर्ष्या द्वेष , राग विराग, जनसंख्या- दृष्टि, आर्थिक संकट, मनोवैज्ञानिक दवाव, प्रतिभाशाली युवा पीढ़ीक हताश जन्य वेदना, विज्ञानक चमत्कार, बेईमानी आ घुसखोरी बढैत ग्राफ, ईमान्दारक शोषण आ पारिवारिक ओ सामाजिक दबावजन्य ओकर मानसिक असंतुलन, कुंठा, त्रासदी बाह्याडम्बर, ढोंग पाखंड, चोरी-डकैती, अपहरण, बलात्कार खूनीखेल, शिक्षा- जगतक प्रति विभिन्न स्तरपर उदासीनता वा अन्यथा भाव, श्रमिक समस्या, बाल- मजदूरी देहातसं शहर दिशि पलायन, नारी- उत्पीडन, नशा-पान, उदासीनता का अन्यथाभाव आधुनिकताक चाकचिक्य मांग आ पूर्तिक मध्य खींचातानी, अपसंस्कृति प्रति आकर्षण, चिर- संचित मर्यादा-प्रतिष्ठ कें तिलांजलि , पाश्चात्य संस्कृति आ भारतीय संस्कृति,मिथिलाक संस्कृतिमे प्रवेश आ तज्जन्य विकृत्क आविर्भाव, अफसरशाही ममिला - मोकदमा, हल-प्रपंच, धोखाधड़ी, जालसाजी, महत्वाकांक्षा, देखादेखी, प्राकृतिक आपदा , महामारी? महामारी एड्स एन्सी फैलाइटीस आ स्वाइन फ्लू सदृश संक्रामक बीमारीक प्रकोप भूखमरी, आ एही प्रकारे अनन्त समस्याक चक्रव्यूही धेरल-बेढ़ल मानव-समुदाय, त्राहि कृष्ण करैत दृष्टिगत होइत अछि ।" सन्दर्भ ग्रन्थ सूची:- 1. श्रीश, डा. दुर्गानाथ झा- मैथिली साहित्यक इतिहास-भारती पुस्तक केन्द्र दरभंगा, 1986ई , पृष्ठ -187 2. झा, डा. वासुकीनाथ- संपादक - मैथिली कथाक विकास - साहित्य अकादमी नई दिल्ली,2003ई , पृ०-46,47. 3. झा, डा. रमानन्द झा रमण-संपादक - मैथिली कथाक समाज- चेतना समिति, पटना, 2016ई . पृ०-38,39. 4. मिश्र, डा. धीरेन्द्र नाथ - मैथिली कथाक सामाजिक परिवर्तनक प्रभाव, पृ०-179, 180. - अम्बालिका कुमारी, शोधप्रज्ञ(JRF), विश्वविद्यालय मैथिली विभाग, ल० ना० मिथिला विश्वविद्यालय कामेश्वरनगर, दरभंगा। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.लाल देब कामत- अपटी खेत लऽ (लघुकथा)/ राज किशोर मिश्र जीक उगरास लाल देब कामत अपटी खेत लऽ (लघुकथा)/ राज किशोर मिश्र जीक उगरास १ अपटी खेत लऽ (लघुकथा)

मिथिलांचल केर एक गाममे गरीब सलमा बेगमकेँ बछौनीबाली अपन एकटा खनदानी बकरी पोसिया देने रहय। ओ सीखौने रहैक जे तोरा घर लग जे हमर दियादक नौलखा खेत छैक, ताहिमे लागल जजात उपटबैत रहिहेँ। से एकदिन बिदत होईत अपना कयल खेती सँ बकरी रोमि सलमाके उपराग देलकै लालचन। आई फेरो मरूआ ढेंसर चरि लेबाक बात चलेलनि गामपर आबि बाध सँ। लालचनक' फ़ौजी भाय सेहो कोनू सँ घुमैत ओहि खेतक आड़िपर कड़ीमे दूनू कुत्ता लेने गेल । ओकरा सोझेमे हाँकिके बकरी मरूआ खेतमे हुलेलक सलमा। आब की होए! एतेक ठेसी - ढिठगरी देखि पशु केँ हँकैत ,डँटैत नवटोलिया'क दू - चारि स्त्रीगणके टटका चराउर कयल मरूआ गाछ देखौल। आकि नियार-भाष अनुसारे जत्थामे अनेको नवजुबक लोकनि आ दू-चारि गोट मौगि मेहेर लागल गारि सँ होरियाबय। प्रतिकूल महौल देखि-गमि लालचनके फौजी भाय चोटेय घरमुहान भेल। ता टाईटिल मेँ पड़ल प्रधानमंत्री सड़क कातक बाभनक खेतमे क्रिकेट खेलाइत लग बेदरा क्रिड़ाकर्मी सब सेहो पछोर करयबाला हूजूममे मिज्झर होईत गेल। जहन निबास गेटक भीतर धरि पहुंच गेला पछाईतो हंसेरी लोक सब नहिँ घुमल आ बिकेट सँ लोहाक गेट पिटय लागलैक तँ कतेको बटोही तमशगीर बनल रहल। दू गोटेय क्रिकेट बौल जुमाकेँ तीन मंजिला पर निशाना साधैत जंगलाक काँच झौहरा देलक। ओम्हर एक आदमी लाठी लेने दौडैत आयल आ दोकानके एस्बेस्टस फोड़ि पराएल। ताहिघरि कियो देखलक एक पुलिस आ चौकीदार मटरसाईकिल सँ एम्हरे आबि रहल छलैक। हाथेपाथे सबकियो औजके टाइरगाड़ी सँ आयल पजेबा लैत भागल। पुलिसकेँ पनडुमि घटना देखय बनरझूला जेबाक छलै। जुमाक' दिन रहने एक घंटाक वाद फेर आगू - आगु मोसलीम साफी ,तै पाछु मोहम्मद इस्लाम ,सतार मंसुरी, अठासी अंसारी, करबेला बाला आ ईदगह टोल बला जलील मामू सब अंटसंट बजैत ओहि द'के' गेलैक। नवटोलिया पर महजीतमे बैसकय बुईधबिचरी करैत गेल। जमीरूद्दीन केर टेम्पूमे चिलकौर सलमाकेँ बैसबैत चारिगो युबक पंच संग होईत आगू बढ़ल। घोघरडीहा अस्पताल म भभटपन करैत भर्ती भेल। ओतहि थानाके दारोगाजी बियान लिखलकै। नालीश दर्ज़ होय सँ पूर्व एक जिप्सी चितकबड़ा सिपाहीक संग एकता चौक सँ कहचरी रस्ता होईत बड़ाबाबू बनरझूला धरि गस्ती पर जाईत रहथि। फौजिक फोन भेला सँ थानाध्यक्ष महोदय ने गाड़ी दौड़ेलनि। दू दिनमे सामाजिक फैसला पंचायत सँ करैत सोलहनामा लगेबाक निर्देश देलनि। ताहि गामक कालीजी स्थान सँ बजरंग दलक नवजुबक लोकनिके हटनी हाट पर प्रदर्शन सेहो भऽ गेलैक। हिन्नू - मुसलमान दंगाक रूप ने भ'जाय,तेँ तत्काले घटना स्थलके निरिक्षणमे आयल छोटाबाबू आ हबलदार साहेब अपना रहैत दाहारण पर बैठारमे ममिलाक तसफीहा कयलनि। उमेरदराज समाजक पँच लोकनि बुझि गेलाह ई एकटा चिन्नीलालक' षड्यंत्रक' चाल छी। परिघटना केँ सम्हारैले रमजानक इफ्तार पार्टी लेल फौजी साहेबकेँ कहल गेल साढ़े पांच हजार टकाक सब पाकल फल अना देल जाए। लालचनके छोटभायकेँ खेतीबाड़ीमे अबूह लागनि ,मास्टरी करैतो पाँच कट्ठा हिस्सा बड़का कोलामे लेने रहय। से मनखप बटैया पिपरावाली हाथे लगौनै छलैक। ओहि दिनक घटनाक मोन पड़िते देह शीहरि उठनि। सोझेसालमे खेतकेँ भरना लगेबाक विचार ठानने अपन विचारी सँ मन्त्रणा कयल। निठाही जरियाएल गप्प भेलै जे ओतुका अरियाकेँ बसयले छोटका कोला चालीस लाखमे बेचनामा कयल जाए। सयह कलेक आ प्राप्त जरसेमन सँ भिन्ने महल बनाबी। मोजे मजकुरमे शोर भ' गेल जमीन बिक्री छैक। धरि अपटी खेत सँ त्राण भेलैक,मुदा दू भाय प्राण गमबय लऽ अपन- अपन हिस्सा बकुटने रहल।

२ राज किशोर मिश्र जीक उगरास मैथिली साहित्यक समकालीन आशु कवि श्री राजकिशोर मिश्र जीक कविता संग्रह -: मेघपुष्प, चाननि,नवपात- नव बात, उपायन ,सप्तपर्ण ,नव घर उठय,- पुरान घर खसय,प्रलय -पाश, टेमी, जिनगीक सोन सन पाँखि,उबेर , कनक कदली आ खंड काव्य -: जँ जग जल नहि होइत' केर वाद आब 'उगरास' पाठकगण बीच आयल अछि। कविवर राजकिशोर जी हिन्दी साहित्य मेँ सेहो अपन रचना माध्यम सँ एक दर्जन पोथीक संग धाख जमेलाह अछि। हम एतय " उगरास" केर चर्चा करय चाहैत छी। एहि पोथीमे पृष्ठ संख्या ११७ आ दाम तीन सय टाका छैक। पहिल संस्करण २०२३मेँ भारतमे मुद्रित छैक जाहिक आई एस बी एन ९७८- ९३- ५९८०- १६३- ६ छैक, जे रचियता अपन गाम अड़ेर डीह पता सँ प्रकाशित करेबामे अपन बाइस गोट नव कविता विधा केँ पाठकवृन्द बीच रखलाह हन। सामाजिक समस्या आ परिवेशक चित्रण करैत श्री मिश्रजी मनुष्यक सोच ओ दृष्टिकोण केँ समक्ष आनलनि अछि। पोथीमे भिन्न-भिन्न विषय सभके समष्टिगत नीक प्रस्तुति भेल छन्हि। पाठकके पाठ- नव भारत, हम बेटी छलहुँ.. , आदि मनुखक संसार, चन्द्रायण -३, हम मैथिली छी, अपैत मोन, साम्प्रतिक सप्तपदी, नव क्षितिज, अर्थ ग्रहण, मेघाच्छन्न अकास, तामस, श्रमजीवी, प्रौद्योगिकी -जुगक जिनगी, जीवन वृत, की भऽ गेलै एहि गाम के? , मनस्- क्षेत्र, गोबरपथनी, बनौआ, अनचिन्हार होइत गाम, अहांग, दृष्टिकोण आ की बनबीही बौआ रौ' खुब विमर्श करय लायक बुझाइत रहत। कविजीक ई विशेषता प्रथमत: बुझाएत जे ओ कविता माध्ययमे नव- नव विषयके पकड़ैत छथि। ऐ दशकमे भारत अपन विकास पथ पर अग्रसर रहि विश्वमे नाम बजेलक अछि। काव्य हिनक बढ़ सौष्ठव भेल छन्हि। नव भारत मेँ पाँति देलनि अछि -: विश्व -पटल पर भऽ रहल अछि, नवल - भारतक अभ्युदय, पृथ्वी, मंगल , चन्द्रमा पर , गूँजि रहल हिंदक ' जय - जय।

अंतरिक्ष मे भारतवर्षक, बाजि रहल अछि डंका, सगर जगत् केँ रहल न कनिको, हिंदक सामर्थ्य पर शंका। शहरके अपेक्षा गामक रहन - सहन , रीति-रिवाज आ नव उन्मुखीकरण शुद्ध परिमल आ शांतिक प्रभृति बुझल जाईछ। मुदा आब एहूठाम सभ्य लोक सशंकित रहय लागल छैक। नीक लोक कात लागल रहैछ आ नवतुरिया तुर्क लोक अपन दलवन्दीक बले बलय - बलैमे अगुआगिरी करैत छैक। कविक हृदय ई दृश्य देखि दुःखी भेल छन्हि। से एहि तरहेँ पाँति गढ़लनि अछि -: गामक बगदल छौड़ा सबहक, बनि गेलैक अछि गोल, जतेक फसाद होइत अछि एत्तऽ , ओकरे सबहक रोल।

साँझू भरली अओढ़ मे, मुरगाक मासु , आ चाही ताड़ी, सभ मोचण्डक इएह किरदानी, कपचइ लैछ गरीबक बाड़ी। एक कविता 'क भाव छैक अभाबीत स्रिगण गोइठा चिपरी आ गोबरपथनिक काज करैत ईंधन केर काज लैत रहैछ। मथल गोबर सँ ओहिमे भुसा संठईक मेरूदण्ड बनाए सुखबैछ। गोरहा पर अग्नि देवताक प्रकटीकरण सँ ओहि आगि सँ अन्न सिध्द करैछ, अन्न ब्रह्म सँ जीनगी डेबैत छैक। हिन्दू गैस सिलेंडर केँ एहि आगू चुनौतीपूर्ण उपयोग करैछ। से ई काज मजहबी आधार पर मुस्लिम समुदाय मेँ पशुविष्टा सँ तैयार ईंधन केँ निषेध मानल गेलैक अछि। तैयो दिक्कतदारीमे सब घरमे जरना रूपें प्रयुक्त होईछ। कवि के पाँति द्रष्टव्य अछि,यथा-: अति शीत काल मे धुनी रमाबय, गोड़हनी पर उगैत अछि आगि, गोबरपथनीक हाथ सँ गोबरक देखिऔ,भाग जाइत अछि जागि।

गो- विष्ठा मथैत गोबरपथनी, ओहि मे मिजहर ओकर घाम, जेठ- दुपहरिया , सुक्खल देह, घोकचल जाइत छै ओकर चाम। सामजक अंतिम पांति ठाढ़ अकुशल श्रमिक वा मालिका जोन जे पत्थलतोर मेहनति कय अपन जीनगी खपा दैत रहल,मुदा ओ आधुनिक सुख-सुविधा सँ सर्वथा वर्जित रहल। तेहन निर्धन स्रीक जीवनक कठिनाए केँ कविक हृदय देख लैत छैक। ई जे स्वरोजगार गाम-गाममे अदौ सँ पसरल अछि,से गोबर बिछनीक वा अपन पोसिया पशुक काँच गोबर सँ जे गोबर गैस प्लांट सँ एनर्जी उत्पादन केर प्रवन्धन होईत वा ई सरकारी ओरीयाओन भेल रहैत जे काँच गोबर बा गोव सँ आर्गेनिक खाद बनेबाक घरेलू कुटीर उद्योग होईत तँ लोकल फार भोकल सफल कहाबैत। एखनो गोबरपथनी 'क इंधन , सौर ऊर्जा आ गैस सिलेंडर पर देहातमे भारी पड़ैत छै -: गिरहथनी ,चूल्हि मे गोड़हा सँ पजारि पकाबथि पूआ - खीर , जे पथलक, से पात बिछैत अछि, दुखा रहल छै बाँहिक सिर। ऐ तरहेँ चेफरी जोड़ल नुआँ आ टिनही कारा- हंसुली पहिर पौनी पसाहीन केँ कोनू चारा नै छै। स्वयंसहायता समुह के नाम पर फर्जी बैंक राशि निकासी सं किछ बैंकक दलाल अवश्ये मालामाल भेल। आ कर्ज़ा सधेबाक नोटिस सँ बीपीएल के ग्रूपमे पड़ल गरीब अकारण फेदरैतमे पड़ल। एहन जे विद्रूपता समाजमे छै, ताहि प्रसंग सूर्यक किरण जतय नहि जुमैत य,ततय धरि कविक जिगेसा देखल गेल हन। कविजी समाजमे बनाबटी देखौंस आ पतियेनाई पर सं सेहो परदा उठेबाक काज अपन रचनामे केलाह अछि। यथा-: कोंढ़ - करेज तोड़ऽ पर लागल छै बुधना के देआद - बाद, सोझाँ मे तँ नोरे-झोरे, मोन छै , 'भऽ जाए बरबाद' । राज किशोर मिश्र जीक काव्य रचना बढ़ सौष्टव भेल छन्हि। एक दिश अपन पोथी "उगरास" मे चन्द्रायण -३ , प्रौद्योगिकी -जुगक जिनगी सन कविता प्रगतिशील रचना आयल अछि त दोसर दिस विविध समस्या आ निदान दिस सेहो कलम चलौने छथि। गत २३ मार्च २०२४ केँ सगर राति दीप जरय मैथिली भाषा आ साहित्य कथा गोष्ठी निरमलीमे ऐ पोथीक लोकार्पण समारोह पूर्वक भेल रहय। दर्शक दीर्घा मे बैसल हमहूँ ओहि क्षणकेँ साक्षी रही। श्रीमान मिश्र जी मातृभाषाक सेवामे सतत् अभियानी बनल रहथि,से कामना रहत।

-लाल देब कामत मो० ७६३१३९०७६१ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.रबीन्द्र नारायण मिश्र-सीमाक ओहि पार (धारावाहिक उपन्यास) रबीन्द्र नारायण मिश्र सीमाक ओहि पार (धारावाहिक उपन्यास) हमर ससुर स्वर्गीय गणेश झा (पण्डौल डीहटोल)क स्मृतिमे, सादर ससिनेह समर्पित! सीमाक ओहि पार

चारूकात मनोरम दृश्य छल । हरिअर कंचन नाना प्रकारक फूल-फलसँ सजल-धजल। पैर धरिते लागल जेना सभ दुख हेरा गेल । आश्चर्य लागए जे एतए कोना आबि गेलहुँ? सभकिछु नव लागि रहल छल । सभसँ विचित्र बात तँ ई रहैक जे जएह सोचिऐक सएह होमए लागैक । मोन भेल जे केओ परिचित भेटि जाइत जाहिसँ एहिठामक हिसाब-किताब बुझबामे मदति होइत । मोन लगैत। एकबेर व्यवस्थित हेबाक बात छैक। तकर बाद कोनो चिंता नहि । एतेक सुख-सुविधा एहिठाम स्वतः सुलभ अछि । नीकसँ समय कटतैक। से सभ सोचिते रही कि देखैत छी जे केओ हमरे दिस आबि रहल छथि । नमगर-पोरगर, देखबामे बेस भव्य । हमर समवयस्के बुझाइत छलाह । लग अबिते कहैत छथि- -मनोज! मनोज ! केओ हमर नाम लए चिकरि रहल छलाह । अकस्मात ओमहर ध्यान गेल । ताबे ओ लगमे आबि गेल रहथि । कहैत छथि- "हमरा चिन्हलहुँ? हमछी अहाँक इसकुलिआ दोस्त-शरद।" "सएह कहू । चिन्हब किएक नहि । " " एकटा समय रहैक जे हम-अहाँ दिन-राति संगे रही। संगे खेलाइ, संगे खाइ । समय-समयक बात होइत छैक । एहिठाम कहिआ अएलहुँ?” "आबिए रहल छी । सोचिते रही जे केओ अपन लोक भेटि जइतथि तँ कनी मदति भए जाइत ।" "भाइ! एहिठाम ककरो, कोनो मदतिक काज नहि पड़त । सभटा अपने भए जाएत ।"-हम हुनकर बात सुनि कए आश्वस्त भेलहुँ । हमरा दुनूगोटेक गप्प चलिए रहल छल कि कानमे मधुर संगीत सुनाएल । विद्यापतिक गीत आ एहिठाम? हम तँ आश्चर्यमे पड़ि गेलहुँ । ताबे गीतक स्वर आओर फरिछा गेल छल- " के पतिआ लए जाएत रे मोरा प्रियतम पास..." गेनिहारसभक सौंदर्य देखैत बनैत छल । एहन मनोरम दृश्य साइते देखाइत अछि । हमर मोनमे उठैत शङ्काकेँ शरद तारि गेलाह । कहैत छथि - " भाइ! अहाँ अपसिआँत किएक छी? अखन की देखलिऐक अछि। आगू बहुत किछु देखबैक । एहिठाम आएब सभक वशक नहि आछि,मुदा जे आबि गेल तकरा सुखे-सुख छैक। जे चाही,जतेक चाही,जखन चाही सभ सुलभ छैक । एतए सुख-सुविधाक अंबार छैक ।" ताबतेमे देखैत छी जे एकझुंड एक सँ एक सुंदर कन्यासभ नाचि-गाबि रहल छथि । सामनेमे बड़ीटा सामिआना ओछाओल अछि । ओहिपर बहुत रास गणमान्य लोकसभ बैसल आनंदित भए रहल छथि। गीत गबैत-गबैत कन्यासभ बेसुधि छथि । सामिआनामे बैसल श्रोतागण बीच-बीचमे थपड़ी पीटि रहल छथि। कैकबेर कैकगोटे गीतक मधुरध्वनि सुनि कए आवेगमे उठि जाइत छथि आ बिना कोनो रोक-टोककेँ कन्यासभक संगे नृत्य करए लगैत छथि। हम तँ ओहि लोकमे नवागन्तुक रही । हमरा लेल सभ किछु अप्रत्याशिते छल । एहन रमनगर गीत,एहन सुंदर-सुंदर कन्या लोकनि आ मदमस्त श्रोतागण, संपूर्ण वातावरणकेँ जीवंत केने छल। " ई तँ अद्भुत स्थान लागि रहल अछि । हमसभ छी कतए? एकर की नाम छैक?-हम पुछलिअनि। "ई थिक दिव्यलोक ।"-शरद बजलाह । "से की?" " देखिए रहल छिऐक । किछु दिनमे अपने सभटा बुझि जेबैक । अहिठाम मृत्युक बाद पुण्यात्मासभकेँ स्थान भेटैत अछि।" "मुदा एहिठाम सभकेँ तीनटा आँखि देखि रहल छी।" "तेसर आँखि छैक अन्तर्दृष्टि । मृत्युलोकमे से सामान्यतः बंद रहैत छैक। एहिठाम ओ स्वतः सक्रिय भए जाइत अछि ।" "तेसर आँखि तँ महादेवकेँ होइत छनि।" "हुनकर तेसर आँखि खुजब तँ विनाशकारी होइत अछि । जखन संहार करबाक होइत छनि तँ ओकरा खोलैत छथि । मुदा एहिलोकक तेसर आँखि तँ अद्भुत अछि । एकरा रहलासँ सभ भेद-विभेद समाप्त भए जाइत अछि । देखैत नहि छिऐक, केना सभ अपनेमे मगन अछि।" "ओ! ई तँ बहुत नीक बात अछि ।" गप्पक क्रममे हमर ध्यान रागिनीपर चलि गेल । "हमरा किछु कहलहुँ?-रागिनी बजलीह। औ बाबू! हम की बजितहुँ । हम तँ चकित रहि गेलहुँ । सोचनो ने रहिऐक जे एना मोनमे अबिते देरी ओ उपस्थित भए जेतीह । हम तँ दंग रही । "हम तँ अहींक बारेमे सोचैत रही ।" " तैँ ने हम आबि गेलहुँ ।" "मुदा अहाँ रही कतए?" ओ हमर मुँह बकर-बकर ताकए लगलीह । कहबी छैक जे जीबी तँ की-की ने देखी । मुदा एहिठाम तँ उल्टे बात देखि रहल छी । मरी तँ की-की ने देखी से चरितार्थ भए रहल अछि। रागिनीसँ फेरो कहिओ भेंट होएत से तँ सपनोमे नहि सोचने रही । मुदा हुनकर स्मृति ओहिना बनल रहए। आश्चर्यक गप्प ई अछि जे दिव्यलोकमे अएलाक बाद मृत्युलोकक बातसभ ओहिना मोन अछि । एकटा समय छल जे रागिनी आओर हम एकहु क्षण लेल फराक नहि होइ। इसकुल जेबाक लाथे घरसँ विदा होइ । रस्तामे कहिओ गामक बाहर इनारपर,कहिओ कलममे आ कहिओ धारक कातमे हमसभ बैसल गप्प मारैत रहैत छलहुँ । ने भूख, ने पिआस। बस रागिनीक संगे रमल रही । कैकदिन ओ आबएमे विलंब कए देथि । बाट तकैत-तकैत हालति खराप रहैत छल । रागिनी छोड़ि किछु आओर नीक नहि लगैत छल । हुनकर पैघ-पैघ आँखि,चाकर ललाट,गोर-नार,नमगर हाड़-काठ देखैत बनैत छल । हुनका देखितहि पढ़ाइ-लिखाइ सभ बिसरा जाइत छल। ई बात कतेक दिन जाँतल रहितैक? इसकुलक मास्टरसभकेँ पता लगलैक । काने-कान गामक लोकसभकेँ सेहो पता लगलैक । आ शुरु भेल हमरसभक विपत्तिक शृंखला। बहुतरास बितलाहा बातसभ मोन पड़ए लागल । केना एकदिन हम आ रागिनी कानमे मोबाइल लगओने गीत सुनैत रेलवे फाटक पार करैत काल तेजसँ चलैत ट्रेनक चपेटमे आबि गेल रही। अपनो आश्चर्य होअए जे एतेक दिन बितलाक बादो ओ घटनासभ ओहिना तहदर्ज अछि ,लगैत अछि जेना काल्हिएक गप्प छैक । फेर भेल जे बीतल बातसभमे की राखल छैक? जखन एहिठाम आनंदक एतेक सामग्री स्वतः सुलभ अछि तँ किएक नहि ओहीमे रमि जाइ । -2-

दिव्यलोकमे दिन-राति नहि होइत छल । सभ समय एकहि रंग, जकरा जखन मोन भेल जागि गेल,जखन मोन भेल सुति रहल। जे मोन होअए से खाउ,चीज-वस्तुक अंबार लागल रहैत छल । आम,दारिम,समतोला, सेव ,अंगुर चारुकात पथार लागल रहैत छल । खेनहारे नहि । मधुरक तरह-तरहक व्यंजनसभ यत्र-तत्र राखल छल । एतेक रास चीज-वस्तु कतएसँ आबैक,के बनाबइ किछु पता नहि चलि रहल छल । ई हमरा नहि बुझएमे आबए जे एहिठामक लोकसभ कोन एहन नीक काज केलाह जे एहन सुख-सुविधा भोगि रहल छथि? हम सएह सोचि रहल छलहुँ कि रागिनी सामनेमे ठाढ़ि भेल हँसि रहल छलीह - "सएह कहू, अहाँक आदति कनीको सुधरल नहि । ऐहूठाम अहाँ माथापच्चीमे लागल रहैत छी । ककरो एना देखैत छिएक?- से कहि ओ जोरसँ हमर हाथ झिकलथि आ हमरा लेने आगू बढ़ि गेलीह । हमसभ गप्प करिते रही कि एकटा जहाज उतरलैक । रागिनी ओहि जहाज दिस बढ़ि गेलीह । जहाजक फाटक खुजल आ ओहिमे सँ शरद बहरेलाह । शरद रागिनीकेँ देखिते हँसैत छथि आ इसारासँ अपना दिस बजबै छथि । दुनूगोटे ओहि जहाजमे बैसि जाइत छथि आ जहाज उड़ि जाइत अछि। ई सभ घटना ततेक जल्दीमे भेलैक जे हम ठामहि सभकिछु देखैत रहि गेलहुँ । हमरा तँ ठकविदोर लागि गेल । किछु फुरेबे नहि करए। एसगरे ओहिठाम जस-के-तस ठाढ़ रही कि अंतरिक्षमे बड़ी जोर अबाज भेलैक । -जरुर कोनो नव घटना घटल अछि"- चारुकात बौआ रहल आत्मासभ सोचि रहल छल। एहि आत्मासभक खुबी छलैक जे ओकरासभकेँ ककरो समाद देबाक हेतु कोनो फोनक काज नहि पड़ैत छलैक। इच्छा करु आ ओहि आत्मासँ सोझे संपर्क भए जाएत। ततबे नहि, जखन जतए चाहथि उड़ि जाथि । कोनो सबारीक काज नहि पड़ैत छलनि । थोड़बे कालमे आकाशवाणी भेल- "तोरा अखन धरि पुरनका आदतिसभ नहि छुटलह अछि। तेँ परेसानीमे पड़ि जाइत छह।" "एहिमे हमर कोन दोष? हमर मोनमे ओएह बातसभ घुमि रहल अछि । रागिनी तँ हमरा बहुत मानैत छलीह, बहुत आवेशसँ हमरा लग अएबो केलीह आ बिना किछु कहने चलि गेलीह। कहि नहि कतए गेलीह?" “ऊपर दिस देखहक ।” "हमरा तँ किछु नहि देखा रहल अछि।" "एना तँ नहि हेबाक चाही। अहाँक तेसर नेत्र लगैत अछि सक्रिय नहि भए रहल अछि नहि तँ एहन प्रश्न नहि पुछए पड़ैत ।"- -से कहि ओ अबाज लुप्त भए गेल । कतहु किछु नहि देखा रहल छल । ऊपर, नीचा, सौंसे देखबाक प्रयास केलहुँ । हम ऊपर तकैत रही, किछु-किछु सोचैत रही आ चलितो रही। परिणाम भेल जे हमर पैर कोनो पिच्छड़ स्थानपर पड़ि गेल आ हम पिछड़ि कए खसि गेलहुँ । किछु नहि बुझि सकलिऐक जे केमहर जा रहल छी । चारूकात अन्हार गुज्ज रहैक । बीच-बीचमे कैठाम किछु-किछु अबाज सुनबामे आबए। संभवतः मृतात्माक आवागमन भए रहल छल । खसैत-खसैत हम एकटा पहाड़क टीलापर अड़कि गेलहुँ । ओतए किछुगोटे पहिने सँ हमर प्रतीक्षा कए रहल छलाह । किछु- किछु कहए चाहलाह। हुनकर भाषा हमरा किछु बुझएमे नहि आबए । हम ओकरा दिस तकैत रही आ ओ सभ हमरा दिस। ओ सभ आपसमे किछु गप्प केलक। ओहिमे सँ एकगोटे मैथिलीमे बाजल- " अहाँ बहुत थाकल लगैत छी । किछु जलखै कए लिअ ने । फेर घुमैत रहब । " "ठीक छैक ।" ओ हमरा एकटा बड़का भोजनालयमे लए गेलाह जतए तरह-तरहक जलखै राखल छल । जे खाउ,जते खाउ कोनो रोक-टोक नहि । ओहिठाम बहुत रास लोकसभ रहैक मुदा ककरो भाषा बुझबे नहि करिऐक । सभ अपन-अपन पसिनक जलखै करबामे मस्त छल। जलखै केलाक बाद हमरा औंघी लागए। ई बात ओ बुझि गेलाह आ हमरा लेने-लेने एकटा कोठरीमे पहुँचा देलाह । ओहिठाम सुतबाकसभ व्यवस्था छलैक । हम ततेक थाकल रही जे ओतए जाइते निन्न पड़ि गेल ।

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निन्न टुटतहि बीतल बातसभ मोन पड़ए लागल । हमर गाम छल मौजपुर । मौजपुर गाम के नहि जनैत छल । किएक? एहि लेल नहि जे ओहि गाममे बहुत पढ़ल-लिखल लोक छल,एहि लेल नहि जे ओतए कोनो बहुत धनीक लोकसभ छलाह । असलमे ओ गाम इलाकामे आपसी सौहार्द्यक हेतु प्रसिद्ध छल । गाममे सभ जातिक लोक बसैत छलाह मुदा कखनो लगबे नहि करैत जे एतेक जातिक लोक एकहिठाम एतेक नीकसँ रहि रहल छथि । सभ मिलल रहैत छल जेना नून पानिमे मिलि जाइत अछि । जहिआक दाहा होइत तहिआक सौंसे गाम दाहापर अपन कबुलाक बद्धी चढ़ाबैत,हाटपर साँझमे दाहासभक मिलान देखैत,लाठी भजैत युवकसभक मनोरंजन देखैत । की हिन्दू,की मुसलमान सभ अपन जोर अजमाइस करैत। लगबे नहि करैत जे ई कोनो तरहेँ दोसर धर्मक पाबनि अछि । तहिना कृष्णाष्टमी,रामनवमी आ दुर्गापूजामे मुसलमानो पाछू नहि रहैत । जकरा जे काज देल जाइत से सहर्ष करैत । गाममे एक सँ एक लोक रहैत छलाह । ओहिमे तिरपितक अलग पहिचान छलनि। नेनामे बहुत कष्ट सहलनि। हुनकर पिताकेँ जथा-पात नहि छलनि । बहुत मोसकिलसँ गुजर होइत छलनि । मुदा तिरपित बहुत संस्कारी आ परिश्रमी छलाह । दिन-राति मेहनति कए आइए धरि पढ़लाह । तकरबाद गामेक इसकुलमे मास्टरी करए लगलाह । इसकुल बाद जे समय बचि जाइत छलनि ताहिमे गामक गरीब बच्चासभकेँ पढ़बैत छलाह,ततबे नहि ओकरासभकेँ किताब,काँपीक व्यवस्था धरि ओएह कए दैत छलाह। कैकबेर घरनी टोकथिन- "एना तँ अहाँ हमरासभकेँ भिखमंगा बना देब ।" " एहि प्रतिभाशाली नेनासभकेँ आश्रय देबासँ बढ़ि कए कोनो पुण्य नहि भए सकैत अछि । धन होइत छैक कथी लेल?" "एहिना कबाइत पढ़ैत रहू । जखन दिक्कति होएत तँ केओ काज नहि आओत । ई ओएह गाम छैक जतए हमसभ कतेको राति पानि पीबि सुति जाइत छलहुँ आ लाजे ककरो किछु नहि कहि पबैत छलहुँ । ताहिठाम अहाँ सदाबर्त बाँटि रहल छी।" आओर तिरपित हँसि कए बातकेँ टारि दैत छलखिन। ओ बजैत-बजैत अपने चुप भए जइतथि । तिरपितपर कोनो असर नहि होइत छलनि । हम,शरद आ रागिनी नियमित ओहि इसकुल जाइत छलहुँ। गामक पछबरिआ कात एकटा पैघ पाकड़िक गाछ छलैक। ओकरे औढ़मे इसकुल चलैत छल । एकमात्र शिक्षक तिरपित भोरसँ साँझ धरि लागल रहैत छलाह । इसकुलकेँ क्रमशः इलाकामे प्रचार होइत गेलैक। गाम-गामसँ विद्यार्थीसभ जुटए लागल । मुदा ओतए साधनक नामपर किछु नहि छलैक ,एकटा चारो नहि । एतेक संघर्ष कए नेनासभक भविष्य निर्माण हेतु तिरपितकेँ कहिओ चिंतित नहि देखलिअनि,निरंतर प्रसन्न रहितथि । के की कए रहल अछि,के की कहि रहल अछि ताहिसभसँ किछु लेना-देना नहि रहैत छलनि । अपन काज सँ मतलब रखैत छलाह,अपना आपमे मगन रहैत छलाह । हुनकर प्रयाससँ कतेको नेनासभ गामक इसकुलसँ जुड़ल। जीवनमे आगू बढ़ल । नौकरी करबाक हेतुगाम छोड़ि-छोड़ि सहर दिस चलि गेल । गाममे झर सभ रहि गेल जे नित्य नाना प्रकारक झञ्झटि करैत रहैत छल । ओहीक्रममे तिरपितपर ओ सभ आक्रामक भए गेल छल। ओना तिरपित ततेक सम्हारि कए चलए बला लोक छलाह जे ककरो हाथ नहि लागथि । मुदा रागिनीक प्रसंग हुनका बेबस कए देने छल। तिरपित एहि इसकुलकेँ स्थापित करबाक हेतु दिन-राति लागल रहलाह । सरकारी अधिकारीसभकैँ कतेको दर्खास्त देलाह। मुदा किछु नहि भेल । हारि कए पाँच कट्ठा खेत बेचि कए ओ इसकुल भवनक निर्माण केलाह । शुरुमे तीनटा कोठरी बनल। दू टा पक्का आ एकटा फूसक । तकरबादो बहुत रास विद्यार्थीसभ गाछक छाहरिमे पढ़थि । इसकुलमे आस-पासक तीनटा आओर शिक्षक स्वेच्छासँ योगदान देबए लगलाह ,एहि उम्मीदमे जे आइ-ने-काल्हि हुनकासभकेँ सरकारी नौकरी भए जेतनि । कालक्रमे सेहो भेलैक । इसकुलकेँ सरकारी मान्यता भेटलैक । ओहिमे स्थानीय नेता श्यामक बहुत योगदान रहनि । ओ आ तिरपित कतेको दिन लागि कए एहिकाजकेँ करओलाह । इसकुलक काज आगू बढ़िते गेल । क्रमशः ओतए आओर कोठरीसभ बनल । माध्यमिक विद्यालयसँ बढ़ि कए ओ उच्च विद्यालय भए गेल। इलाकामे ओहि इसकुलक नाम पसरि गेल । नीक-नीक विद्यार्थीसभ ओहि इसकुलमे नाम लिखाबक हेतु प्रयत्नशील रहैत छलाह । जखन नीक विद्यार्थी रहतैक तँ परीक्षाफलो नीक हेतैक। सएह होमए लागल । एहि प्रयासक सफलतासँ तिरपितकेँ समाजमे बहुत यश भेल । रागिनीक पिता तिरपित बहुत यत्नसँ अपन एकमात्र संतानक पालन-पोषण करैत छलाह। हमर पिता प्रभु हुनके ओहिठाम हर जोतैत छलाह । कतेको दिन हम हुनकासंगे खेतपर चलि जाइ । कैकदिन तिरपितक ओहिठाम सेहो बाबूकसंगे चलि जाइ। मुदा हम ई बात नहि बुझिऐक जे रागिनीक संग गप्प-सप्प एतेक गहींर आ रसगर भए जाएत । मुदा से भेल । क्रमशः नेन्नेसँ रागिनीक हमरासँ आकर्षण रहैक जे बढ़िते गेल । जखन तिरपित इसकुल चलबए लगलाह आ गामघरक नेना सभकेँ पकड़ि-पकड़ि कए ओहिमे लए जाए लगलाह,तँ हमहूँ इसकुलक मुँह देखलहुँ । ओहिसँ पहिने इसकुल की होइत छैक से सुननो नहि रहऐक । इसकुलमे पहिले दिन रागिनी हमरा देखिते पाछू पड़ि गेलि। हमहूँ तँ नेन्ने रही । ओकरासंगे खेलाइत-खेलाइत दिन बीति गेल । दोसर दिन जखन अहिना समय बितैत रहए तँ तिरपितक ध्यान ओमहर गेलनि । रागिनी आ हमरा दुनू गोटेकेँ बैसा कए किछु पढ़बए लगलाह। हुनका एहि बातसँ प्रसन्नता रहनि जे रागिनीकेँ इसकुलमे मोन लगैत छनि । कैकबेर रागिनी हमर सभसबक बना देथि जाहिसँ हम मारिसँ बचि जाइ । कैक बेर हम हुनकर काज कए दिअनि । एहि तरहेँ हमरसभक पढाइ चलैत रहल । इसकुलमे हमरसभक दोस्तीपर सभसँ पहिने शरदक ध्यान गेलैक । भेलैक ई जे टिफिनक समयमे हम दुनूगोटे गाछतर बैसल गप्प करैत रही कि शरदकेँ किछु विद्यार्थीसभसँ झगड़ा होमए लगलैक। किछुगोटे ओकरा पीटि रहल छल तँ किछु गोटे बचा रहल छल । मुदा बदमाससभ ओतहि नहि रूकल । ओ सभ रागिनीकेँ देखितहि अड़-बड़ बाजए लागल । ताहिपर हमरा बहुत तामस भेल। हम ओकर गट्टा पकड़ि कए पटकि देलिऐक । ताबतेमे आओर बच्चासभ दौड़ल । हल्ला सुनि तिरपित सेहो अएलथि । कहुना कए मामला शांत भेल । तकरबाद सभक ध्यान एमहर-ओमहर भए गेल । मुदा शरद तकरबादसँ नित्य टिफिनकालमे हमरासभक लगीचमे आबि जाइत। अपनाभरि रागिनीक ध्यान आकर्षित करबाक प्रयास करैत,मुदा ओ सुनबे नहि करैक । एहि बातसँ शरदक मोनमे बहुत तामस भेलैक आओर ओ तहिएसँ रागिनीसँ बदला लेबाक जोगारमे पड़ि गेल । -4-

शरदक पिता श्याम ठीकेदार छलाह । सरकारी व्यवस्थाकेँ अपना हितसाधन हेतु उपयोग करबामे ओ माहिर छलाह । क्रमशः हुनकर प्रभाव बढ़ैत गेल । ओ क्रमशः बड़का नेता बनि गेलाह। अपन गाम लखनपुरमे कमे काल रहैत छलाह मुदा जखन कखनो अबितथि तँ ओहिठाम लोकक करमान लागल रहैत छल । लखनपुर आओर मौजपुर आसेपास छल । बहुत लोकक काज ओ करबा दैत छलखिन,जकर नहि होइत छलैक तकरो बोल-भरोस दए पोटने रहैत छलाह । तैँ हमरो गामक बहुत रास लोकसभ हुनकर प्रशंसक छल । कहब जे कोनो निःशुल्क किछु करैत छलखिन से बात नहि । तैओ लोक हुनकर व्यवहारसँ खुश छलाह । कोनो परेसानी भेलापर हुनके लग जाइत छल । जँ काज नहि होएत तँ टाका बुड़त नहि । वापस कए दैत छलखिन। एहि बातसँ हुनकर गणना इमान्दार लोकमे होइत छल । फेर घी हेराएल तँ कतए? मौजपुरमे इसकुलक स्थापनाक बाद कतेको युवककेँ सरकारी,निजी काज ओ धरबैत रहलाह । शरद अपन पिताक एकमात्र संतान छलाह । श्यामक इच्छा रहनि जे ओ पढ़ि लिखि पैघ आदमी बनथि जाहिसँ हुनकर यश बढ़नि । मुदा शरदक लक्षण तेहन नहि रहनि । इसकुल जेबे नहि करथि आओर जँ जेबो केलाह तँ किछु-ने-किछु झञ्झटि बेसाहि लेथि । शिक्षकोसभ बेसी किछु नहि कए पाबथि । एकदिन शरद इसकुलमे खेलक घंटीमे रागिनीक बाँहि पकड़ि लेलक । किछु-किछु ओकर कानमे फुसफुसेबो कएल । रागिनीक तामस देखैत बनैत छल । " तूँ दोबारा एहन गलती करबैँ तँ ठीक नहि हेतौक ।" -रागिनी बाजल । " दिनभरि मनोजसंगे हँसी ठट्ठा करैत रहैत छैँ से किछु नहि आ हम कनीक टोकि देलिऔक तँ कोन जुलुम भए गेलैक? "-शरद बाजल । "बेसी तंग करबैँ तँ हम मास्टर साहेबकेँ कहि देबैक ।" "कहि दही । ओ हमरा की कए लेताह? " रागिनी कनैत मास्टर साहेब लग पहुँचि गेलि । मास्टर केओ आन नहि तिरपित छलाह। ओ सभ बात बुझिओ कए शरदकेँ किछु कहए नहि चाहथि । मुदा चुपो नहि रहल भेलनि। आखिर ओ शरद केँ बजओलथि । तिरपित किछु कहथिन ताहिसँ पहिनहि ओएह बाजए लागल- " हम तँ ओकरा बुझेबाक प्रयास कए रहल छलहुँ जे ओकर दिन-राति मनोज संगे रहब उचित नहि अछि । एहिसँ ओकर छवि खराप भए रहल छैक । तँ उल्टे हमरे सिकाइत करए आबि गेलि।" आसपास ठाढ़ कैकटा विद्यार्थी ओकर बातक समर्थन केलक। बात बढ़ैत गेल आओर श्याम सेहो एहि विवादमे कुदि पड़लाह । श्याम प्रभावशाली व्यक्ति छलाह । हमर पिताक हुनका आगू की औकात छलनि । ओ हुनका अपना ओहिठाम बजा कए कहलखिन- "अपन बेटाक समाचारसभ बूझल छौ कि नहि?" "इसकुल जाइत छैक । दिन-राति पढ़ाइमे लागल रहैत छैक । मुदा हम तँ कितोबो नहि जुटा पबैत छिऐक, सभटा तिरपित बाबू करैत छथिन ।" "चुप रह । पढ़ाइ करैत छैक । ओ नमरी गुण्डा भेल जाइत छौक ।" "ऐँ!” "तेहन भगल कए रहल अछि जेना एकरा किछु बूझले नहि होइक ।" "हमरा सहीमे किछु नहि बूझल अछि।" "इसकुलसँ अपन बेटाकेँ निकालि ले नहि तँ बरबाद भए जेतौक । सौंसे गाममे बात पसरि गेल अछि । असगर हम कतेक बचा सकबौ?" श्यामक बाद सुनितहि हमर बाबू बहुत परेसान भए गेलथि। हुनका हमरा खिलाफ कहल गेल एक-एक शव्द वज्र जकाँ लगलनि । छातीमे दर्द उठल । हुनका जोरसँ हृदयाघात भेल । ओ धराम दए खसलाह । जाबे केओ किछु बुझैत,किछु करैत ओ गुजरि गेलाह । कनीके कालक बाद हुनकर लहास आङनमे पड़ल छल ।

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ब्रह्मस्थानमे सौंसे गामक लोकसभ आएल रहथि । एकदिस लखनपुरक लोकसभ बैसल छलाह तँ दोसर दिस मौजपुरक । दुनूगाम इलाकाक सुभ्यस्त गाममे मानल जाइत छल। बेसीलोकसभ नौकरी करैत छलाह । बाहरे रहैत छलाह। कहिओ-काल,पाबनिए-तिहारे गाम आबथि नहि तँ नहिओ आबथि । गामसभमे बेसी बूढ़ आ बच्चासभ देखाइत। गामक युवकसभ बहरिआ भए गेल छल । तेहन परिस्थितिमे तिरपित अपन परिवारकेँ संगे गामेमे रहैत छलाह । गुजर जोकर खेत -पथार रहनि। शांतिपूर्वक समय बिता रहल छलाह । मुदा ई कांड हुनकर जीवनकेँ हिला कए राखि देलक । सभटा व्यवस्था गड़बड़ा गेल । ओहिदिनक बैसारमे दुनूगामक लोक एकस्वरसँ बजलाह- "रागिनीकेँ मनोजक संग एहि तरहेँ मेल-जोल गामक प्रतिष्ठाक खिलाफ अछि । हिनकासभकेँ गाममे रहक होनि तँ सुधरथि, नहि तँ गामसँ बाहर कएल जाथि ।" तकरबाद जे भेल से फेरसँ बाजक मोन नहि करैत अछि। सुनबै तँ बहुत दुख होएत । चलू,कहिए दैत छी । देखलहुँ जे रागिनीक पिता तिरपित ओकर झोटा पकड़ने घिचने जा रहल छथि। "नाक कटा देलैं। " " बाबू! हमर किछु अपराध नहि अछि । " "चुप रह कुलटा नहितन।" "हम किछु गलत नहि कए रहल छी । लोकसभ अनेरे हमर पाछू पड़ि गेल अछि ।" " तोरा तँ लाज-धाख छौक नहि । पीबि गेलैं धो कए सभटा। मुदा हमसभ एहि समाजमे छी आ रहब । बुझलही कि नहि? नीकसँ सुनि ले । नहि तँ...।" तिरपित रागिनीकेँ कोठरीमे पटकि बाहरसँ तालाबंद कए अड़बड़ बजैत खुरपी लेने खेतपर चलि जाइत छथि। रागिनी असगर घरमे चिकरि रहल छथि । केबारक पाछू हुनकर माए ठाढ़ि छथि । ओहो कानि रहल छथि मुदा लाचार छथि । तिरपित किछु नहि सुनि रहल छथिन। ओ एहिपार-ओहिपार करए हेतु तैयार छथि। माएक एहि व्यथाकेँ केओ बुझनाहर नहि अछि । रागिनीक करुण क्रंदन करैत रहि गेलि । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.कुमार मनोज कश्यप-वट-वृक्ष कुमार मनोज कश्यप वट-वृक्ष साईकिल रेंग कs चलेनाई तs घर सs बाहर-भीतर करैत-करैत सीख लेने रही; मुदा बाहर सड़क पर चलेबाक अवसर कहियो भेटिते ने छल। बाबूजीक प्रकट-अप्रकट डsर एहन जे साइकिल चलबै लै माँगबाक  साधंस कहाँ? बाबूजी ओहि दिन तेज ज्वरक कारण बिछान पर बेसुध आ यैह सुअवसर छल हमरा लेल! नहुएँ-नहुएँ साईकिल घर सs निकाललहुँ आ ताबड़-तोड़ पैडल मारब शुरू। थोड़ समय के अधिकतम सदुपयोग करै के धुन मे ईहो बिसरि गेलहुँ जे ढ़लान पर पैडल नहिं मारल जाईत छै; अपितु ब्रेक के उपयोग कैल जाईत छै गति नियंत्रण खातिर! परिणाम भेल जे साईकिल समेत ओंघड़ा कs खसलहुँ खत्ता मे ....... साईकिल के पुरान रिम वक्राकार भs  गेल से भेबे कैल; छाबा सs छड़-छड़ शोणित बहs लागल! हम जोर-जोर सs कानय लागल रही ..... एहि दुआरे नहिं जे चोट लागल रहै; एहि दुआरे जे बाबूजीक  क्रोध सs आई केयो बचा नहिं सकत। लोक सभ दौड़ल।  उठा-पुठा कs घर लs गेल ..... हमरो आ साईकिलो के! हो-हल्ला सुनि  बाबूजी तलमलाईत कहुना बाहर एला।  दाँत पिसैत  की सभ बजला से सुनबाक होश तs हमरा नहिं रहल;  मुदा होश भेल तखन जखन गामक बुच्चो डाकडर घाव मे कोनो छनछनहा दवाई लगा उजरा पट्टी बन्हने रहथि।  माय जाँघ पर सुतेने भरि माथ नारियल तेल मलैत छलीह। आँखि डबडबायल छलनि। 'जो रे चंडलबा! कथी लै अपन प्राण हsतs गेल छलैहैं। केहन सिद्दति  भेलौ!'  कहैत ओ  हमर कपाड़ पर सs टघरैत तेल अपन तरहत्थी सs पोछs लागल रहथि। बाबूजी आब पायरे ऑफिस जाई लै सकाले घर सs बहराईत छथि आ रतिगर आपस घुरैत छथि। ओ टुटलाहा साईकिल गठुल्ला घर मे यथावत पड़ल अछि। -सम्प्रति: भारत सरकार के उप-सचिव, संपर्क: सी-11, टावर-4, टाइप-5, किदवई नगर पूर्व (दिल्ली हाट के सामने), नई दिल्ली-110023, # 9810811850 ईमेल: writetokmanoj@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.प्रमोद झा 'गोकुल'-फोने पर फगुवा (लघु कथा) प्रमोद झा 'गोकुल' फोने पर फगुवा (लघु कथा)

माझ आङनमे भोरे भोर कौवाके कुचरैत देखिके प्रिया दूधमे भिजाके एकटा रोटीक टुकड़ा कौवाक आगाँमे फेकैत बजलीह- 'उच्चैर बैसह' आ कौवा ओकरा लपसे लोलमे भरि उड़ि गेल ।उड़ैत कौवाके ओ ताधैर देखैत रहलीह जाधैर ओ आँखि सँ अलोपित नै भ'गेलनि ।जेना ओ हुनके सनेस ल'के बुच्चीक पप्पा लग ल'गेल होइन । तखने फोनक घंटी घनघना उठलै आ ओ लपकिके बजलीह- हेल्लो ! के .. बुच्चीक पप्पा !!! -- हँ यै ! कोना छी !! -- अहांँ बिना जेना रहकक चाही !ताहूमे पाबैन तिहारके बड्ड अखरैये ! --से हम की करब ? अच्छे कहूते आइ की छिऐ ? - किए ,फगुवा !!! --त'खेलाने लिअ फोने पर ! - गे मैया ! से कोना ? - अपन दुनू समतोला सनक रसगर गाल आगाँ बढ़ाउते ! -- हैया लिअ बढ़ा देलौं ! - आल रङसे हम पोति रहल रहल छी आ सगर देह पर लाल पीयर हरियर अबीर छिड़िया रहल छी ! --हमहूँ --कने साबधाने रहब उचकबा दियर सबसे ! - धत्त, ओ सब हमरा की करता ? अपने डरे सब सुटकल रहै छथि ! -हँ से ते अहाँ खेलक्कैर छीहे! - तकर माने? - माने ताने किछ नै ।कने अहाँ अपन ‌ओ पियरगर गीत सुना दिअ ते ! - कोन गीत ? -कसमसके आङी मसैक गेलै ना ,पिया डाँरे पर घैला भसैक गेलै ना ! -आ धुर जो !!! हिनको रभसी अजगूते ! --हहा.. आब जाइ छी दोस सभक सङे खेलाइले ! -- जाउ ,फोन रखै छी !! --राखि दिऔ ! प्रिया हलसैत कड़ाही गैस पर चढ़ाके मालपूवा ‌छानय लगलीह।

-प्रमोद झा 'गोकुल', दीप, मधुवनी (विहार); फोन -9871779851 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.८.प्रणव झा- ऑडियोलॉजी आ स्पीच लेंग्वेज पैथोलॉजी: बारहमा के बाद जीवविज्ञान केर विद्यार्थी लेल करियर विकल्प प्रणव झा ऑडियोलॉजी आ स्पीच लेंग्वेज पैथोलॉजी: बारहमा के बाद जीवविज्ञान केर विद्यार्थी लेल करियर विकल्प सब गोटे के प्रणाम। आई हम जीवविज्ञानक विद्यार्थी के लेल 12मा के बाद एकटा एहन करियर विकल्प केर बात क रहल छी जे बड्ड असंतृप्त(अनसेचुरेटेड) छैक आ जै मे रोजगार भेटबाक संभावना सौ प्रतिशत छैक। एकटा एहन कोर्स जकरा बाद अहाँ पच्चीस हजार से अढ़ाई लाख टाका महीना तक कमा सकै छी। एकटा एहन कोर्स जकरा बाद अहाँ नौकड़ी क सकै छी, अपन क्लिनिक चला सकै छी आ कोनो मेडिकल कॉलेज में प्रोफ़ेसर/कंसल्टेंट सेहो बनि सकै छी। हम बात क रहल छी ऑडियोलॉजी आ स्पीच लैंग्वेज पैथलॉजी के. जै विद्यार्थी सबहक चयन नीट के मार्फत एमबीबीएस कोर्स में नै भ पाबि रहल छैन, या जिनकर चयन एमबीबीएस के लेल प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में भ रहल छैन जेकर महरग फ़ीस देबा मे ओ सक्षम नै छैथ, आकि जे छात्र, मूक-वधिर रोगी सबहक सेवा आ इलाज के लेल बहुत उत्साहित छैथ आ ऐ क्षेत्र में करियर बनाब चाहैत छैथ हुनका लेल ई  एकटा बहुत नीक करियर विकल्प भ सकै अछि। ऑडियोलॉजी आ स्पीच लैंग्वेज पैथोलॉजी के पढ़ाई स्नातक स्तर पर संगे-संग होइत छैक आ स्नातकोत्तर/ पीएचडी लेवल पर अहाँ कोनो  एकटा क्षेत्र में शोध करैत छियई। स्नातक आ स्नातकोत्तर स्तर पर ई बीएएसएलपी आ एमएएसएलपी के नाम से जानल जाइत अछि। बीएएसएलपी/एमएएसएलपी कोर्स के बाद अहाँ श्रवण आ बाजाय से  सम्बंधित समस्या से ग्रसित रोगी सबहक जांच/इलाज क सकय छी। यद्यपि कानूनी रुपे ऐ कोर्स के बाद अहाँ अपन नाम के आगा डॉक्टर नै लगा सकै छी। मुदा यदि अहाँ मे एकरा ल क  बड्ड सेहंता अछि त अहाँ पीएचडी क के डॉक्टर सेलुटेशन सेहो लगा सकै छी। ऑडियोलॉजिस्ट की करय छैथ: -         ऑडियोलॉजिस्ट स्वास्थ्य प्रोफेशनल्स होइत छैथ जे तकनीक आ अपन कौशल केर उपयोग क के  श्रवण(हियरिंग) सम्बन्धीत समस्या टिनिटस आ अन्य वधिरता समबन्धीत समस्या केर निदान में रोगी के सहायता करई छैथ। -         स्पीच लेंग्वेज पैथोलॉजिस्ट बाजाय से समबन्धीत समस्या में रोगी के परामर्श दैत छैथ आ इलाज के मार्फत हुनकर समस्या केर निदान करई छैथ।    -    रोगी सब के श्रवण आ वाक सम्बन्धीत स्वास्थ्य समस्या आ ओकर उचित निदान लेल परापर्श दैत छैथ। -         मरीज के श्रवण सम्बन्धीत उपकरण केर आवश्यकता के जांच करय छैथ आ उचित श्रवण उपकरण केर प्रयोग लेल सुझाव दैत छैथ आ ई  उपकरण सब के फिट एवं प्रोग्राम करबाक काज करय छैथ ।

-         एनआईसीयू में  नवजात केर श्रवण आ बाजाय के क्षमता क मॉनिटर करय मे आ उचित सहायता देबाक काज करय छैथ। -         नाना प्रकार केर श्रवण सम्बन्धीत टेस्ट जेना Pure-Tone Testing,Speech Testing,Tests of the Middle Ear,Auditory Brainstem Response (ABR),Otoacoustic Emissions (OAEs),brainstem evoked response audiometry (BERA) आदि। ऐ तरहें हम देखय छी जे ऑडिओलॉजी आ स्पीच लैंग्वेज पैथोलॉजी कोर्स क के कोनो विद्यार्थी रोगी सबहक सेवा करबाक अपन सपना के पूरा क सकय छैथ। रोजगार केर अवसर: बीएएसएलपी/एमएएसएलपी कोर्स करबाक बाद अहाँ नाना तरहक सरकारी आ गैसरकारी संस्थान, रिहैबिलिटेशन सेंटर, यूनिसेफ, स्कुल-कॉलेज  आदि जगह पर काउंसेलर के रूप में नौकड़ी पाबि सकय छी। एकरा अलावा अहाँ मेडिकल कॉलेज, कॉर्पोरेट अस्पताल, ईएनटी, नवजात अस्पताल/क्लिनिक में काज पाबि सकय छी जत एकर खूब आवश्यकता होईत छैक। आ नै त ऐ सब ठाम फ्रीलांसर सलाहकार के रूप में सेहो अपन सेवा द सकय छी। बहुते रास फार्मास्युटिकल कंपनी जे श्रवण-बाजाय सम्बन्धीत यत्र बनबै छैथ सेहो  ऑडियोलॉजिस्ट पेशेवर सब के हायर करय छैथ। अहाँ उपर बतैल  जांच आ सलाह के लेल अप्पन स्वयं के क्लिनिक सेहो फ़ोलि सकय छी। अहाँ  1-2 लाखक छोट निवेश से सेहो अप्पन क्लिनिक फ़ोलि सकय छी। एमएएसएलपी/पीएचडी के बाद अहाँ के कोनो मेडिकल कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के काज सेहो भेंट सकय अछि आ अहाँ मेडिकल कॉलेज में पढ़ेबा क सपना सेहो पूरा क सकय छी । भारत केर मुकाबला मे यूरोप आ  अमेरिकन देश सब में ऑडियोलॉजिस्ट आ स्पीच लेंग्वेज पैथोलॉजिस्ट के कमाई बहुत बेसी छै, अतः महत्वाकांक्षी छात्र ऐ कोर्स के क क रोजगार लेल यूके,यूएस आदि देश जाक नीक कमा सकय छैथ । बीएएसएलपी/एमएएसएलपी प्रोग्राम कहाँ से करी आ ऐ मे प्रवेश केर प्रक्रिया: बीएएसएलपी चारि वर्षक पाठ्यक्रम छैक जै मे चारिम वर्ष में आहाक इंटर्नशिप करबाक होइत छैक आ जै मे अहाँ के स्टाइपेंड भेंटनाई सेहो चालू भ जाइत छैक।  एमएसी(ऑडियोलॉजी/स्पीच लैंग्वेज पैथोलॉजी) या एमएएसएलपी २ वर्षक पाठ्यक्रम छैक जकरा  बाद अहाँ 3 वर्षक  पीएचडी (ऑडियोलॉजी/स्पीच लैंग्वेज पैथोलॉजी)क सकय छी। ऑडियोलॉजी आ स्पीच लैंग्वेज पैथोलॉजी पाठ्यक्रम में प्रवेश के लेल नाना संस्थान द्वारा प्रवेश परीक्षा केर आयोजन होइत छैक।  जागरूकता केर कमी दुआरे ऐ परीक्षा सब में चयनित भेनाई नीट के मुकाबले मे बड्ड हल्लुक छैक, बस अहाँ अपन एगारहमा-बारहमा के पढ़ाई नीक से करी। किछु संस्थान बारहमा के मार्क्स के आधार पर सेहो प्रवेश दैत छैक। बीएएसएलपी/एमएएसएलपी के लेल किछु प्रमुख संस्थानक सूचि निच्चा देल जा रहल अछि जत से 700 से 5000 रु वार्षिक तक फ़ीस द क ई कोर्स कैल जा सकय अछि: ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ स्पीच एन्ड हियरिंग मैसूर: ऑडियोलॉजी आ स्पीच लैंवेज पैथोलॉजी में ई भारतक नंबर एक संस्थान छैक आ विश्व में सेहो ई सातम स्थान रखय छैक। एतय ऑडियोलॉजी आ स्पीच लैंवेज पैथोलॉजी के सभटा पाठ्यक्रम उपलब्ध छैक अली यावर जंग नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ स्पीच, हियरिंग एंड डिसएब्लिटीज मुंबई: ई देश केर दोसार बड़का सरकारी संस्थान छैक जतय से अहाँ कम फ़ीस में ऑडियोलॉजी आ स्पीच लैंवेज पैथोलॉजी के कोर्स सकय छी। एकर क्षेत्रीय संस्थान कलकत्ता आ सिकंदराबाद में सेहो ई पाठ्यक्रम उपलब्ध छैक। पीजीआईएमआईर चंडीगढ़: स्वास्थ्य सेवा एवं शोध के लेल देश के उत्कृष्टम संस्थान में से एक ऐ संस्थान में 700 रु वार्षिक के बड्ड सस्ता फ़ीस में अहाँ बीएएसएलपी कोर्स क सकय छी। जवाहरलाल नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च जबलपुर मेडिकल कॉलेज जेएनएम स्पीच एन्ड हियरिंग सेंटर, रायपुर नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ स्पीच एन्ड हियरिंग सीएमसी वेल्लोर बंधुगन आशा करय छी जे ई जानकारी अपने के लेल उपयोगी हैत।  अहाँ के कोनो प्रश्न पुछबाक होय अथवा टिपण्णी करबाक होय त  संपर्क क सकय छी। इहो बताउ जे अपनेक ई लेख कहन लागल। आ की एकन लेख मैथिली पत्रिका मे एबाक चाहिए? नमस्कार। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.९.आचार्य रामानंद मंडल-कथाकार/ पिया मोर बालक: महाकवि विद्यापति आचार्य रामानंद मंडल कथाकार/ पिया मोर बालक: महाकवि विद्यापति १ कथाकार -हे कथि करय छी. -एगो कथा लिख रहल छी. -हे अंहा के कोनो दोसर काज न हबे. जहिया से रिटायर कैली हय. तहिया से कविता -कथा लिख रहल छी. -त हम कोन काज करू. -दू -चार लैइका के टीउशन कैला न पढबै छी.तिमनो तरकारी के दाम त निकल जैतै. -हे हमरा ज्यादा देर बैठल न जाइ हय. कमर दर्द बढ जाई हय. पैसा लेबै त पढाबे के न होतैय. -त कौपी किताबे के दोकान क लू. -उ त आउर भारी काज हय. बैठ के बेचू. कौपी किताब खतम हो जैला पर फेर खरीद के लाउ. इ सभ काज हमरा से न होतैय. -हं. इ सभ काज अंहा से न होइ अ .खाली कवि गोष्ठी आ कथा गोष्ठी में जायल होइ अ. -अइमे त बराबर न जाय के होइ छैय. तीन चार महीना पर जाइ छी. -अंहा खाली खर्चे करै पर रहय छी.एक बार कविता संग्रह छपाबै पर तीस हजार रुपैया खर्च कैले रही. कहले रही कि सभ बिका जतैय. एको टा न बिकायल. सभ बांट रहल छी. आ पोथी दैइत के फोटो खींच के फेसबुक पर पोस्ट करैत रहय छी. आ बडका कवि बनैत फिरै छी. पहिले कहि रिटायर होय दूं।सोन से देह भरि देव।खरिकैट के रह गेली एगो सोन के सिकड़ी न देल पार लागल। आबि कहय छी कि कथा लिख रहल छी. -हं. इ कथा लिखला से कि होतैय. कि मिलतैय. -कथा से समाज आ देश के  दशा आ दिशा बतबैत हय.अपना देश मे वेद, पुराण, स्मृति -त कथा से भरल पुरल हय.  अइसे सभ्यता आ संस्कृति के निर्माण होइ छैय. अंहा त अप्पन दादी -नानी से खिस्सा माने कथा त सुनले होबैय. -हं. खुब सुनले छी. राजा रानी के खिस्सा. परी आ राक्षस के खिस्सा. राम -रावण के खिस्सा. -हं. ठीके कहली. राम -रावण के खिस्सा. जनय छियै. इ खिस्सा पहिले पहल ऋषि बाल्मिकी अप्पन  रामायण मे लिखलै रहय. बाद मे संत तुलसी दास रामचरित मानस मे. वोहे खिस्सा अंहा अप्पन नानी -दादी से सुनली. -हं. से बात हय. ऐते त हम सोचबै न कैली हय. -देखू. महर्षि वाल्मीकि आ संत तुलसी दास न लिखले रहथिन त आइ हम सभ राम -रावण के कथा -त  न जैनती. अयोध्या मे राम जन्म भूमि पर बालक भगवान  राम के मंदिर न बनतैय. -हं.से त होइ छैय. -हे! कथा  -कविता पोथी से लोग पैसो कमाय छैय. जौ अंहा के पोथी लोगसभ के पढै मे  मन लगैय माने कि पसंद होय . हमहू  कथा संग्रह लायक कथा सभ लिख लेली हय. संग्रह के नामो सोच लेली  रनिया भिखारिन . छापे लेल प्रकाशन से बातो चल रहल हय. ऐहु मे लगभग तीस हजार रुपैया लागत. -त छपा लू. -हं. बिचार कैले छी. मार्च -2024 के सगर राति दीप जरैय कार्यक्रम मे पोथी के लोकार्पण हो जाए. -हे! तब त अंहा कथाकार  कहायब. -हे एगो बात आउर कहूं। -कहूं। -हे! फेसबुक पर हमरो हाथ मे पोथी धैलवाला फोटो पोस्ट क देबय। २ पिया मोर बालक: महाकवि विद्यापति पिया मोर बालक,हम तरूणि गे! कौन तप चुकलौं भेलौ जननि गे ! पिया मोर बालक.. पहिरि लेल सखी दछिन चीर पिया के देखैत मोरा दगध शरीर पिया लेल गोद कै चलली बाजार हटिया के लोग पूछे के लागै तोहार पिया मोर बालक.. नहीं मोरा देवर की नहीं छोट भाई पूरब लिखल छल बलमु हमार वाट के बटोहिया के तुहु मोरा भाई हमरो समाद नैहर लेने जाय पिया मोर बालक... कही हुन बाबा के कीनै धेनु गाय दुधवा पिआई के पोसत जमाई भनही विद्यापति सुनहु बृजनारि धयरज धैरहुं मिलत मुरारी पिया मोर बालक... ई लोकप्रिय रचना मैथिली महाकवि विद्यापति के हय। भले ई भगवान कृष्ण के बाल रूप आ हुनकर जवान गोपिका के प्रेम के व्यक्त गेल हय।  परंच कहल जाय हय कि अइ रचना मे महाकवि समाज में व्याप्त तत्कालीन स्त्री के दुर्दशा के व्यक्त कैलन हय।अइ रचना के भक्ति रचना न मानल जाइत हय बल्कि सामाजिक रचना कहल जाइत हय। महाकवि विद्यापति के काल १३५०ई से १४५० ई हय। महाकवि से पहिले से लेके वर्तमान तक के साहित्यिक इतिहास मे कोनो एहन घटना के उल्लेख न मिलय हय कि कोनो बालक के बिआह कोनो युवती से भेल होय।जौकि बुढ वर से बालिका बिआह के बहुत दृष्टांत मिलय हय। साहित्यिक इतिहास अइसे भरल हय।  शिव आ पार्वती वोकरे स्वरूप  कहल जा सकैय हय।बाल बिधवा के दुर्दशा से त मैथिली साहित्य नोर झोर हय। मिथिला के संस्कृति में बालिका बधु बिआह आ बहु पत्नी बिआह  प्रथा रहल हय।तब केना पिया मोर बालक,हम तरूणि गे रचल गेल होयत। ‌ वास्तव मे महाकवि विद्यापति के उक्त रचना विशुद्ध रूप से भक्ति रचना हय। महाकवि के सामाजिक रचना न हय। जौं रहैत त - पिया मोर बुढ़वा हम बालिका गे होइत,न कि पिया मोर बालक हम तरूणि गे। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.पद्य ३.१.मुन्ना जी- गजल ३.२.राज किशोर मिश्र-सोनित ३.१.मुन्ना जी- गजल मुन्ना जी गजल आबक फागुन चैत लगैए लोकक चालि भगैत लगैए

ककरा पर मे करू भरोसा विश्वासी सब ठकैत लगैए

छक्का बनि नर नारी नाचय जोकर ऐ सं बचैत लगैए

मुद्दा किछु नै देशक बांचल मुर्दो सनक लठैत लगैए

वोटक बेर आंखि मुन्नी धेने सज्जन लाजे कठौत लगैए

महंगाइक झटहे मारल जी डी पी कहां घटैत लगैए

मुरखाहा केर चुनवा बेर पढ़लहो त' सटैत लगैए अपन मंतव्य editorial.ऽtaff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.राज किशोर मिश्र-सोनित राज किशोर मिश्र सोनित

को नो मनुक्खक शि रा , धमनी केँ फो ड़ि कऽ बहा ओल गेल रक्त, मा टि पर ला गल ला ल दा ग, नृशंसता लेल जे अछि अनुरक्त।

ई तँ देहक संजी वनी , एहि तरलक रचना कएल देवता , प्रा णक पुण्य -जल प्रवा हमा न, सर्जत ने मनुज, एता वता ।

एहि सँ रङल भूमि अशो भि त, भो अङ्गर रा क्षसक क्रूरता , क्रो धा ग्नि सँ नि कसल स्फुलि ङ्ग, से देखि कुपि त छथि देवता ।

मत्त इरखा क मुह सँ बहरा इत, बि करा ड़ अग्नि केर ज्वा ला , मनुजता क ई बहल सो नि त, सज्जि त असुर-शस्त्र सँ डा ला ।

भा ङ्गल बन्धुत्वक ला ल खण्ड, ई दा ग मनुजता पर प्रचण्ड।

सभ्यता क कतरल मा उस -पिं ड, अंति म अन्या य केहेन भि सि ण्ड।

को नो भा एक खून, को नो मा एक खून, जे सि न्दूर सन ,कएल मा ङ को नो सून।

क्षि ति ज सँ मेटा ओल ला लि मा , ई ,छि टल पि शा चि नी -का लि मा ।

लो भक तरुआरि सँ बहल लि धुर, टूटल सम्बन्ध को नो चूर -चूर।

महा पा प-सि मा नक ला ल परि धि , सृष्टि पर क्रूरता , देखलनि वि धि ।

मा या -ममता क ला ल लहा स, कऽ रहल बर्बरता अट्टहा स।

वि ना शक पा ड़ल भूमि -पुंड, सृजनक कटल रुंड -मुंड।

मनुख लेल नहि उचि त अछि को नो तरहक हिं सा , कथमपि नहि कर्मणा -वा चा , नहि हो अए मनसा ।

बा घ-सिं ह तँ बुझि ने सकैत अछि , ने वि वेक, ने ओकरा लो क ला ज, देवता बा द तँ मनुक्खे हो इत अछि , को ना क' ओ कऽ सकैछ ई का ज?

खसय ने सो नि त एक्कहु ठो प, हिं सा सँ मनुजता हो यत लो प।

स्वर्गक सुख भूगो ल मे , ई भऽ सकैत अछि संभव, हिं सा -मुक्त भऽ जा य अगर, ई, क्षणभंगुर ,नश्वर भव। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। 24 || विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in विदेह ३९१ म अंक ०१ अप्रैल २०२४ (वर्ष १७ मास १९६ अंक ३९१)|| 23

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हज विशेषांक २०२४ नरेन्द्र झा एवं प्रा. रामावतार यादव पर विदेह www.videha.co.in विशेषांक २०२४ नरेन्द्र झा एवं प्रा. रामावतार यादव चयनित भेला २०२४ क विदेह विशेषांक लेल। जि भर नरेन्द्र झा पर विदेहक विशेषांक १ जून २०२४ आ प्रा. रामावतार यादव पर १५ जून २०२४ अंकमे धो लि SD प्रकाशित CCA) eee: | | लेखक-पाठक clad आग्रह जे नरेन्द्र झा एवं प्रा. रामावतार यादव जीक काजपर आलोचना, . | = 'समालोचना, समीक्षा आदि वर्ड फाइलमे editorial.staff.videha@gmail.com पर | — in 0p Se i eam पाबधि। लि कि & नरेन्द्र झाजीक अधिकांश पौथी २००८ सें विदेह www.videha.co.in पर उपलब्ध ofS! Wy face fastuign Roly % cf जद = = == = SG WWW. HES हैंए। Pe — Yn, facie ICTR 3928 re ae facre factais २०२8 .... प्र } AERA सा अन्न था. वामाब्रछाव AAA शव FACE www. videha.co.in FACT २०२8. AA YA सा IH शा. वामाब्रजाव AAA BUS एछता २०२8 क fA FACT CAL ATT सा शव FACES FACTS ५ OT २०२४ शा था. वामाब्रछाव TIAA शव 90 जून २०२४ कर्म geht =. 7 east a a एलथक-नाठक एलाकनिें AS OH THT सा IH था. वामाब्रठाव ATA जीक BIA AAT, HATA, i” RE» ater शनि aS काजतएय editorial. staff.videha@gmail.com शव शठाब्िणि। x AES साजीक अविकीने co २००० मैं बिएनठ www.videha.co.in शव Gorn अडि।

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