ISBN 978-93-340-4935-0 (Book) ISSN 2229-547X (online) 𑒀 विदेह ३९२ म अंक १५ अप्रैल २०२४ (वर्ष १७ मास १९६ अंक ३९२) [विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ISBN 978-93-340-4935-0 (Book) ISSN 2229-547X (online) ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। कॉपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- २०२४. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२४. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. It is a platform for scholars, researchers, writers and poets to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, and poetry in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@gmail.com. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. 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People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover designed by AUM GAJENDRA THAKUR Videha e-Journal: Issue No. 392 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृ. २-१६) १.२.अंक ३९१ पर टिप्पणी (पृ. १७-१८) २.गद्य २.१.प्रो दमन कुमार झा- नेपालमे मैथिली नाटकक विकास आ परिणाम (पृ. २१-३४) २.२.परमानन्द लाल कर्ण-जेठ मासक एकादशीक माहात्म्य (पृ. ३५-३९) २.३.अजित कुमार झा- विकास समिति (पृ. ४०-५४) २.४.लाल देब कामत-लघुकथा- पंचबेदीमे धनियां/ नन्द विलास राय जीक पहिल कृति: सखारी-पेटारी (पृ. ५५-६२) २.५.रबीन्द्र नारायण मिश्र-सीमाक ओहि पार (धारावाहिक उपन्यास) (पृ. ६३-८६) २.६.कुमार मनोज कश्यप-अधः पतन (पृ. ८७-८८) २.७.प्रमोद झा 'गोकुल'- अप्रैल फूल (बीहनि कथा), लिक लिक (लघु कथा) (पृ. ८९-९२) २.८.प्रणव कुमार झा- पोथी चर्चा: "प्रीति कारण सेतु बान्हल": सम्पादक - श्री आशीष अनचिन्हार (पृ. ९३-९८) २.९.अरविन्द गुप्ता- केदार बाबूः दीर्घ जीवन यात्रा, महान उपलब्धि (पृ. ९९-१०५) २.१०.रबीन्द्र नारायण मिश्र- माटि बजा रहल अछि (पृ. १०६-१३९) २.११.निर्मला कर्ण- अग्निशिखा खेप -३८ (पृ. १४०-१४७) २.१२.ग्रुप कैप्ट (डा.) वि एन झा- अंतरिक्ष पर्यटन के वैज्ञानिक दृष्टिकोण (पृ. १४८-१७२) ३.पद्य ३.१.प्रमोद झा 'गोकुल' श्रीमैथिली चरणमे (पृ. १७४-१७५) ३.२.राज किशोर मिश्र-नव-पुरान (पृ. १७६-१८०) ३.३.आचार्य रामानंद मंडल-माय/ मेघ/ छठ परब (पृ. १८१-१८७) ३.४.प्रणव कुमार झा- नब युग छै (पृ. १८८-१९२)
१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.अंक ३९१ पर टिप्पणी १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय गंगेश उपाध्यायक तत्त्वचिन्तामणि गंगेश उपाध्यायक तत्त्वचिन्तामणि चारि खण्डमे विभाजित अछि- १. प्रत्यक्ष (सोझाँ-सोझी), (२) अनुमान, (३) उपमान (तुलना केनाइ) आ (४) शब्द (मौखिक गवाही)। वैध ज्ञान प्राप्त करबाक ई चारिटा साधन ऐ चारि खण्डमे अछि। खण्ड एक प्रत्यक्ष
गङ्गेशक आह्वान: त्रिमूर्ति शिवक आह्वानसँ ई खण्ड शुरू होइत अछि।आ तेँ आह्वानक विषयपर चर्चा शुरू होइत अछि। ई मानल जाइत अछि जे कोनो परियोजनाक प्रारम्भमे भगवानक आह्वानसँ ई कार्य पूर्ण होइत अछि।
आपत्तिः जे कोनो आह्वान कोनो काज पूरा करबाक कारण अछि, से सकारात्मक बा नकारात्मक संगतिक माध्यम सँ स्थापित नै कएल जा सकैत अछि, किएक तँ एहनो भेल अछि जे कोनो आह्वानक बिना सेहो कोनो काज पूरा कएल गेल। आपत्तिक उत्तर: एकर कारण ई अछि जे ई आह्वान पूर्व जन्ममे कयल गेल छल/ हएत।
आपत्तिः नै, ई तँ घुमघुमौआ तर्क अछि, आ ओनाहितो कोनो काज पूरा केना होइत अछि तकर अनुभवजन्य कारण सभ आह्वानकेँ अनावश्यक सिद्ध करैत अछि। आपत्तिक उत्तर: ई प्रमाण जे आह्वान कार्य पूर्ण हेबाक कारण छै, तइमे दू चरणक अनुमान शामिल अछि। पहिल, ई जे ई शिष्ट लोक द्वारा निन्दित नै अछि वरन हुनका सभ द्वारा सेहो आह्वानसँ कार्य प्रारम्भ कएल जाइत अछि। तखन ई अनुमान लगाओल जा सकैत अछि जे काज पूरा भेनाइ फल अछि किएक तँ ई नियमित रूप सँ इच्छित अछि, आ आन कोनो फल उपलब्ध नै अछि।
आपत्तिः ई तर्क काज नै करत कारण ई पहिनेसँ ज्ञात अछि जे आह्वानक अछैतो काज पूर्ण भऽ सकैत अछि, कारण-सम्बन्ध कोनो तर्कसँ स्थापित नै कएल जा सकैत अछि। आपत्तिक उत्तर: हम सभ ऐ तर्क (जे आह्वान कार्य पूर्ण करबैत अछि) क समर्थन लेल वैदिक आदेशक आह्वान करैत छी। मुदा कोनो एहन वैदिक कथन नै भेटैत अछि। से अनुमान कएल जा सकैत अछि जे ऐ तरहक आह्वान सुसंस्कृत लोक सभ द्वारा शुरू कएल गेल आ कएल जाइत अछि। प्रार्थना देह (जेना प्रणाम), वाणी (गायन) आ मस्तिष्क (ध्यान) सँ होइत अछि। मुदा कोनो ईश्वरमे विश्वास केनिहार सेहो कार्य सम्पन्न कऽ लैत अछि, तँ की ओ पूर्व जन्ममे आह्वान/ प्रार्थना केने हएत? आ आह्वानक बादो कखनो काल कार्य सम्पन्न नै होइत अछि, से की ढेर रास बाधा ओइ साधारण आह्वानसँ दूर नै भेल हएत? ऐ तरहक तर्कसँ प्रारम्भ भेल छल ई ग्रन्थ, ७-८ सय बर्ख पहिने! (सन्दर्भ: कार्ल एच पॉटर: एनसाइक्लोपीडिया ऑफ इण्डियन फिलोसोफी, १९९३; सतीश चन्द्र विद्याभूषण: अ हिस्ट्री ऑफ इण्डियन लॉजिक, १९२१) स्टीफन एच. फिलिप्स लिखै छथि: मिथिलामे राखल गेल पञ्जी वंशावली अभिलेखसँ पता चलैत अछि जे हुनक पत्नी आ तीनटा बेटा आ एकटा बेटी छल। एकटा बेटा छलन्हि प्रसिद्ध न्याय लेखक, वर्धमान। गङ्गेश स्पष्ट रूपसँ अपन जीवनकालमे प्रसिद्धि प्राप्त कयलनि, जकरा "जगद-गुरु" कहल जाइत अछि, जे हुनक समयक शैक्षणिक संस्थानक लेल "प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय प्रोफेसर" क लगभग समकक्ष हएत। Genealogical records kept in Mithila suggest that he had a wife and three sons and a daughter. One child was the famous Nyaya author, Vardhamana. Gangesa apparently achieved quite some fame during his lifetime, referred to as "jagad-guru," which would be the rough equivalent of "Distinguished University Professor" for the educational institutions of his time. [Phillips, Stephen, "Gangesa", The Stanford Encyclopedia of Philosophy (Summer 2020 Edition), Edward N. Zalta (ed.), URL = https://plato.stanford.edu/archives/sum2020/entries/gangesa/ ] गंगेश जगदगुरु तँ रहथि परमगुरु सेहो रहथि आ परमगुरुक उपाधि हिनका अतिरिक्त मात्र नूतन वाचस्पति (वृद्ध वाचस्पतिक परवर्ती) केँ पछाति जा कऽ प्राप्त भेलन्हि। मुदा गंगेशक संगे जे अन्याय रमानाथ झा आ उदयनाथ झा अशोक केलन्हि से बीसम आ एक्कैसम शताब्दीमे भेल आ तकर दुष्परिणाम स्टीफन फिलिप्स सन नैय्यायिक उठेबा लेल अभिशप्त भेला। एतऽ अहाँकेँ सूचित करी जे स्टीफन फिलिप्स तत्त्वचिन्तामणिक चारू खण्डक सम्पूर्ण अंग्रेजी अनुवाद केनिहार पहिल व्यक्ति छथि [Jewel of Reflection on the Truth about Epistemology: A Complete and Annotated Translation of the Tattva-cinta-mani, Bloomsbury Academic (2020)]। हुनका अलाबी वी.पी. भट्ट सेहो तत्त्व चिन्तामणिक चारिमेसँ ३ खण्डक सम्पूर्ण अनुवाद २०२१ धरि कऽ लेने छथि [१. प्रत्यक्ष (सोझाँ-सोझी), (२) अनुमान, आ (४) शब्द (मौखिक गवाही); (३) उपमान (तुलना केनाइ)बाँकी छन्हि [Word The Sabdakhanda of Tattvacintamani- With Introduction, Sanskrit Text, Translation And Explanation (2 Vols Set) 2005; Perception The Pratyaksa Khanda of The Tattvacintamani 2012 (2 Vols Set); Inference the Anumana Khanda of the Tattva Chintamani ( With Introduction, Sanskrit text, Translation & Explanation ) (2 Vols Set) 2021 Published by Eastern Book Linkers, Delhi]। HONOUR KILLING OF GANGESH UPADHYAYA (FIRST BY RAMANATH JHA, THEN BY UDAYANATH JHA 'ASHOK' (A PARALLEL HISTORY OF MITHILA AND MAITHILI LITERATURE, WHY TODAY ITS NEED BEING FELT MORE INTENSELY?) I was not surprised, though I must have been when I saw a monograph on Gangesh Upadhyaya, whose copyright is being held by Sahitya Akademi, the author of the monograph is Udayanath Jha ' Ashok'. I thought that Udayanath Jha ' Ashok', who has been given Bhasha Samman also, by the same Sahitya Akademi, would do some justice. But truth and research seem elusive in Sahitya Akademi monographs, at least that I found in this monograph. I searched and searched through chapters, that now the author will show courage. But the author like Ramanath Jha seems ashamed of the roots and offspring of Gangesh Upadhyaya. He tries to confuse the issue, but there is no confusion now at least since 2009. But in 2016 Sahitya Akademi seems to carry out the casteist agenda. Udayanath Jha mockingly pretends to search his name, lineage etc, where nothing is there to search for, yet he could not muster the courage, to tell the truth, and ends up just repeating the facts in 2016 that Dineshchandra Bhattacharya already has published way back in 1958. The honour killing of Gangesh Upadhyaya by Prof. Ramanath Jha is being taken forward by Sahitya Akademi, Delhi in a most hypocritical way. Ramanath Jha's obscurantism vis-a-vis Panji is evident from one example. The inter-caste marriage in Panji was well known to him (but he chose to keep the Dooshan Panji secret- which has been released by us in 2009), and it was apparent that the great navya-nyaya philosopher Gangesh Upadhyaya married a "Charmkarini" and was born five years after the death of his father (see our Panji Books Vol I & II available at http://videha.co.in/pothi.htm ). Sh. Dinesh Chandra Bhattacharya writes in the "History of Navya-Nyaya in Mithila". (1958) "The family which was inferior in social status is now extinct in Mithila----- Gangesha's family is completely ignored and we are not expected to know even his father's name-----...As there is no other reference to Gangesa we can assume that the family dwindled into insignificance again and became extinct soon after his son's death." [1958, Chapter III pages 96-99), which is a total falsehood. He writes further that all this information was given to him by Prof. R. Jha, and he seemed thankful to him. The following excerpt from Our Panji Prabandh (parts I&II) is being reproduced below for ready reference: - महाराज हरसिंहदेव- मिथिलाक कर्णाट वंशक। ज्योतिरीश्वर ठाकुरक वर्ण-रत्नाकरमे हरसिंहदेव नायक आकि राजा छलाह। 1294 ई. मे जन्म आ 1307 ई. मे राजसिंहासन। घियासुद्दीन तुगलकसँ 1324-25 ई. मे हारिक बाद नेपाल पलायन। मिथिलाक पञ्जी-प्रबन्धक ब्राह्मण, कायस्थ आ क्षत्रिय मध्य आधिकारिक स्थापक, मैथिल ब्राह्मणक हेतु गुणाकर झा, कर्ण कायस्थक लेल शंकरदत्त, आ क्षत्रियक हेतु विजयदत्त एहि हेतु प्रथमतया नियुक्त्त भेलाह। हरसिंहदेवक प्रेरणासँ- आ ई हरसिंहदेव नान्यदेवक वंशज छलाह, जे नान्यदेव कार्णाट वंशक १००९ शाकेमे स्थापना केने रहथि- नन्दैद शुन्यं शशि शाक वर्षे (१०१९ शाके)... मिथिलाक पण्डित लोकनि शाके १२४८ तदनुसार १३२६ ई. मे पञ्जी-प्रबन्धक वर्तमान स्वरूपक प्रारम्भक निर्णय कएलन्हि। पुनः वर्तमान स्वरूपमे थोडे बुद्धि विलासी लोकनि मिथिलेश महाराज माधव सिंहसँ १७६० ई. मे आदेश करबाए पञ्जीकारसँ शाखा पुस्तकक प्रणयन करबओलन्हि। ओकर बाद पाँजिमे (कखनो काल वर्णित १६०० शाके माने १६७८ ई. वास्तवमे माधव सिंहक बादमे १८०० ई.क आसपास) श्रोत्रिय नामक एकटा नव ब्राह्मण उपजातिक मिथिलामे उत्पत्ति भेल। So, the Srotriyas as a sub-caste arose around 1800 CE as per authentic panji files. Sh. Anshuman Pandey [Gajendra Thakur of New Delhi provided me with digitized copies of the genealogical records of the Maithil Brahmins. The panjikara-s whose families have maintained these records for generations are often reluctant to allow others to pursue their records. It is a matter of 'intellectual property' to them. I was fortunate enough to receive a complete digitized set of panji records from Gajendra Thakur of New Delhi in 2007. [Recasting the Brahmin in Medieval Mithila: Origins of Caste Identity among the Maithil Brahmins of North Bihar by Anshuman Pandey, A dissertation submitted in partial fulfilment of the requirements for the degree of Doctor of Philosophy (History) in the University of Michigan 2014]. Later these Panji Manuscripts were uploaded to Videha Pothi at www.videha.co.in and google books in 2009). The so-called Maharajas of Darbhanga were permanent settlement zamindars of Cornwallis, and there were so many in British India, but in Nepal there were none. In the annexure of our book (Panji Prabandh vol I&II), we have attached copies of genealogy-based upgradation orders (proof of upgradation for cash). So, before 1800 CE, there was no srotriya sub-caste in British India and there is no such sub-caste within Maithil Brahmins in Nepal part of Mithila even today. Srotriya before that referred to following some education stream in British India, in Nepal it still has that meaning. ORIGINAL PANJI REFERENCES ARE PLACED BELOW: DOOSHAN PANJI- THE BLACKBOOK ४९. १८८/२ चर्मकारिणी माण्डर वभनियाम छादन तत्त्वचिंतामणि कारकगंगेश छादनगंगेशक नाँई रत्नाकरक-मातृक (अज्ञात) गंगेश वल्लभा भवाइ माहेश्वर जीवे २१//१० छादनसँ तत्व चिन्तामणि कारक जगद्गुरु गंगेश छादनसँ तत्व चिन्तामणि कारक गंगेशक वल्लभा चर्मकारिणी पितृ परोक्षे पञ्च वर्ष व्यतीते तत्व चिन्तामणि कारक गंगेशोत्पत्ति- चर्मकारिणी मेधाक सन्तानक लागिमे छलन्हि छादन सँ तत्व चिन्तामणि कारक मōमō गंगेश "तत्व चिन्तामणि कारक म. म. पा. गंगेशक विषयक लेख प्राचीन पञ्जीसँ उपलब्ध"।। पितृ परोक्षे पंच वर्ष व्यतीते गंगेशोत्पत्तिः इति प्राचीन लेखनीय: कुत्रापि देवानन्द पञ्जी ३९-२ छादनसँ जगदगुरू गुंरू गंगेश सुताय वभनियामसँ जयादित्य सुत साधुकर पत्नी देवानन्द पञ्जी ३३९-३ जगदगुरू गंगेश सुत सुपन दौ भण्डारिसमसँ हरादित्य दौ.।। पुत्र सुताच गोरा जजिवाल सँ जीवे पत्नी ए सुत सन्दगहि भवेश्वर। अत्रस्थाने सुपनभ्रातृ हरिशर्म्म दारिति क्वचित् जजिवाल ग्राम देवानन्द पञ्जी ३०=५ छादनसँ उपायकारक म.म. पा. वर्द्धमान सुताच खण्डवलासँ विश्वनाथ सुत शिवनाथ पत्नी गंगेश- म.म. वर्द्वमान/ सुपन/ हरिशर्म्म Gangesh, the author of the Tattvachintamani, wrote one text equivalent to 12,000 texts. Now come to the fact mentioned in the Panji- it clearly states that Gangesh of Tattvachintamani was born five years after the death of his father and he married a tanner, so why did Ramanath Jha hide this from Dinesh Chandra Bhattacharya? Vardhamana, son of Gangesh, calls Gangesh sukavikairavakananenduh. But the conspiracy under which the poems of a famous scholar like Gangesh are not available today is clear from the example given above. Vasudev of Bengal was a classmate of Pakshadhar Mishra of Mithila, he came to study in Mithila, passed the shalaka examination and received the title of sarvabhaum. Vasudeva memorised the tattvachintamani of Gangesh and the nyayakusumanjali karika of Udayana. Pakshadhar and other Mithila teachers did not allow writing (copying) tattvachintamani. Raghunath Shiromani, a disciple of Vasudeva, took the right of certification after he defeated his guru Pakshadhar Mishra in a scriptural debate (shastrartha). The Navya Nyaya school was founded in Navadvipa by Vasudeva-Raghunath. Pakshadhar Mishra was a contemporary of Vidyapati (distinct from the Padavali writer who was of the pre-Jyotirishwar period) who wrote in Sanskrit and Avahatta. And the arrival of Mithila students of Bengal from Bengal stopped after Raghunath Shiromani. Gangesh Upadhyaya enjoyed 'param guru' as well as 'jagad guru' titles, the highest titles of the time and as per Panji only Vacaspati Mishra II was the other person who enjoyed the title of 'param guru'. The extinction of Navya-Nyaya School from Mithila, as described above, was a revenge of nature against the honour killing of Gangesh Upadhyaya and his family. [Translation of the Maithili Short Story, 'Shabdashastram' (based on the true Panji records of Gangesh Upadhyaya) was done by the author Gajendra Thakur himself: published as 'The Science of Words' Indian Literature Vol. 58, No. 2 (280) (March/April 2014), pp. 78-93 (16 pages) Published By: Sahitya Akademi] -Gajendra Thakur, editor, Videha (be part of Videha www.videha.co.in -send your WhatsApp no to +919560960721 so that it can be added to the Videha WhatsApp Broadcast List.) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १.२.अंक ३९१ पर टिप्पणी मुन्ना जी
पेपरमेशी कलाक पर्याय ऐछ-' मैथिली आलोचना '- साहित्यिक रचना - सामाजिक विडंवनाक व्याख्या थिक।जाहि मे समाधाक संभावना सेहो निहितार्थ । आलोचना-रचनाक शिथिलताक दिग्दर्शनक पर्याय बुझू। विगत १दशक मे प्रकाशित मैथिली आलोचनाक पोथी पढ़लोपरान्त इ विश्वस्त क' सकै छी जे- एक भगाह ऐछ। मैथिलीक बेसी आलोचना प्राय: चाटुकारिता मे लिप्त वा ओलि सधेबाक सूत्र सन लागत। तीन दशक सं धुरझार विश्लेषित/व्याख्यायित होइत मैथिलीक अपन एक मात्र विधा- " बीहनि कथा " पूर्णत: व्यवस्थित भ' स्थापित भ' चुकल ऐछ।मुदा आलोचकक दृष्टि फरीछ नै,एकरा प्रति दृष्टिहीन सन! माने आलोचक लिखै त' छथि 21म सदी मे मुदा सोच आ विषय वस्तु 19म सदीक। जहन कि साहित्यिक रचना सदति किछु दशक/सदीक आगां धरि प्रासंगिकताक संग स्थापित करबाक मानदण्ड रखैछ। मैथिलीक एहेन एकभगाह आलोचक/कृति कें आलोचनाक श्रेणी मे जगह देल जा सकैछ ? आकि एहेन लेखन कें उठल्लू बुझि ढ़ठिया/कतिया राखब कोनो बेजए? विदेह पेटार: गजेन्द्र ठाकुरक सहस्रबाढ़नि (पहिल मैथिली ग्राफिक उपन्यास) पर टिप्पणी लक्ष्मण झा सागर ई त तहलका मचा देत मैथिली साहित्यक इतिहासमे यौ गजेन्द्र बाबू! एहेन व्यस्त जीवनमे कखन आ कोना एत्ते लीखि लैत छी सेहो कंप्यूटर पर? अहाँक ई कृति अहाँक साहित्यिक यात्राक अवधिक सर्वोत्तम आ अनुपम काज अछि! हमर बधाइक संग अनन्त शुभकामना!!
श्यामानन्द चौधरी ऐ नूतन सनेस लेल आभार।
दीपक गुप्ता, सम्पादक, नेशनल बुक ट्रस्ट नब प्रयोग, स्वागत।
निर्मला कर्ण बहुत नीक उपन्यास बनल अछि हार्दिक बधाई अपने के। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.गद्य २.१.प्रो दमन कुमार झा- नेपालमे मैथिली नाटकक विकास आ परिणाम २.२.परमानन्द लाल कर्ण-जेठ मासक एकादशीक माहात्म्य २.३.अजित कुमार झा- विकास समिति २.४.लाल देब कामत-लघुकथा- पंचबेदीमे धनियां/ नन्द विलास राय जीक पहिल कृति: सखारी-पेटारी २.५.रबीन्द्र नारायण मिश्र-सीमाक ओहि पार (धारावाहिक उपन्यास) २.६.कुमार मनोज कश्यप-अधः पतन २.७.प्रमोद झा 'गोकुल'- अप्रैल फूल (बीहनि कथा), लिक लिक (लघु कथा) २.८.प्रणव कुमार झा- पोथी चर्चा: "प्रीति कारण सेतु बान्हल": सम्पादक - श्री आशीष अनचिन्हार २.९.अरविन्द गुप्ता- केदार बाबूः दीर्घ जीवन यात्रा, महान उपलब्धि २.१०.रबीन्द्र नारायण मिश्र- माटि बजा रहल अछि २.११.निर्मला कर्ण- अग्निशिखा खेप -३८ २.१२.ग्रुप कैप्ट (डा.) वि एन झा- अंतरिक्ष पर्यटन के वैज्ञानिक दृष्टिकोण २.१.प्रो दमन कुमार झा- नेपालमे मैथिली नाटकक विकास आ परिणाम प्रो दमन कुमार झा नेपालमे मैथिली नाटकक विकास आ परिणाम
भारतमे जखन मुसलमानक आक्रमण भेलै तँ एहि ठामक लोक अपन संस्कृति एवं साहित्य केँ रक्षार्थ ठाम ठाम भाग' लगलाह , जाहिमे नेपाल , मिथिलासँ लग रहलाक कारणे प्रमुख स्थान छल। सुरक्षाक दृष्टिऐं ओ हिंदू राष्ट्र छल। एहिठाम पहिनहुँ सँ अबरजात छल।रक्त सम्बन्धक डोर छल।मिथिलाक लेल तीर्थ छल। एहिपर- ओहिपर जायब टोल टपब सन छल। ने बोली वाणी मे कोनो अन्तर , आ ने रहन सहनेमे कोनो भिन्नता। सभ अपने सन बुझाइत लोक ओतहु अपने सन अनुभव करैत छल। ने ओत कोनो आक्रमणक डर ,आ ने ओत हिन्दू संस्कृतिक क्षतिक कोनो भय छलै। ओहिठामक राजा कला - संस्कृति - साहित्य अनुरागी छलाह। ओ एहिठामक विद्वान लोकनिकेँ खूब आदर करैत छलाह। एहिठामक विद्वान लोकनि ओत अपना केँ ग्लानिक अनुभव नहि करैत छलाह। अपितु हुनका लोकनि केँ राज दरबारमे स्थान देल जाइत छलनि। आर की चाहियनि ? ओत हिनकालोकनिकेँ अपन संस्कृतिक रक्षा, साहित्यक सम्मान आ ओहिठामक समाजक स्वीकार्यता भेटलनि। जखन ई तीनू भेटि गेलनि ,तँ हुनक प्रतिभा ओहू ठाम पल्लवित पुष्पित हुअ लगलनि।
ओहिठाम हिनका लोकनि केँ तेहन ने उचित परिवेश भेटलनि जे ई लोकनि अपन ज्ञानसँ साहित्यक बखारी केँ भरबामे लागि गेलाह। ओ लोकनि तते ने लिखलनि जे बक्सा पेटी के कहय सन्दूक सन्दूकचीमे अम्बार लगा देलथिन। जँ आइयो ओहिमे कियो हाथ देथिन तँ एक सँ एक साहित्यिक मणि पड़ि लागि जेतनि। जे मैथिली साहित्यक इतिहासक एक नव पन्ना केँ उघारि देत।
नेपालमे मैथिली भाषाक प्रचार- प्रसारक मुख्य कारण छल मिथिलाक विद्वान लोकनिक ओहिठाम प्रवेश। एहि क्रममे 1324 ई मे यवन सँ पराजित भ पञ्जिक प्रसिद्ध बीजी पुरुष म.म. हरिसिंह देव नेपालक जंगल मे शरणागत भेलाह। हुनका संग हुनक आश्रित पण्डित विद्वान लोकनि सेहो पांडुलिपिक संग नेपाल आबि गेलाह। आ ओतय भातगाँवक समीप अपन राज्यक स्थापना कयलनि आ मैथिली भाषाकेँ तीव्र गति सँ आगू बढ़ेलनि। एहिठामक अनुकूल परिस्थिति पाबि ओ लोकनिक साहित्य सृजन मे लागि गेलाह। मल्लवंशीय शासक लोकनि स्वयं साहित्य प्रेमी छलाह। ओ लोकनि मिथिलासँ विद्वान सभ केँ आमंत्रण कय आश्रय सेहो दैत छलाह। तकर मुख्य कारण छल विद्यापतिक गीतक माधुर्यता। हुनक गीतक माधुर्यतासँ बंगाल आ असम सेहो ओहिना प्रभावित छल। नेपालक राजालोकनि जे स्वयं संगीत मर्मज्ञ छलाह , मैथिली भाषाकेँ माधुर्यताक कारणे पूर्ण सत्कार कयलनि।विद्यापतिक काव्य प्रतिभाक प्रेरणा स्वरूप स्वतंत्र रूपसँ मैथिली कविता ओ संगीतक विकास भेल। अभिनयप्रिय नरपति लोकनि नाटकक रचना तथा ओकर विभिन्न अवसर पर अभिनयक व्यवस्था सेहो करबाओल। जकर सम्पूर्ण श्रेय नेपाल उपत्यकाक मल्लवंशीय शासक लोकनिकेँ जाइत छनि। एहिठाम मैथिल विद्वान कवि - साहित्यकार अपन कला एवं प्रतिभाक खूब प्रदर्शन कयलनि। "मैथिली भाषाकेँ राजकीय प्रश्रय भेटि गेलासँ विकासमे आओर तीव्रता आयल। पाछू अभिनय प्रिय नरपति लोकनि नाटकक रचना तथा विभिन्न अवसर पर तकर प्रदर्शनक व्यवस्था सेहो कराओल। एहि दृष्टिऐं काठमांडू उपत्यका - भातगांव , पाटन ओ कान्तिपुर शाखाक राजा लोकनिक दरबार मैथिली नाटकक केंद्र बनि गेल।"
( मल्ल कालीन मैथिली नाटक ,डॉ चन्देश्वर शाह, प्रकाशन - नेपाल राजकीय प्रज्ञा प्रतिष्ठान , कमलादी, काठमांडू। पृष्ठ - 29-30)
एहिप्रसंग डॉ रामदेव झा जगज्ज्योतिर्मल नामक विनिबंधक पूर्व पीठिका मे लिखैत छथि ---"मिथिलाक सारस्वत धारा नेपालोन्मुख भ क अनवरत प्रवहमान होम लागल आ ओही संग आयल मैथिली भाषा, मैथिलीगीत- काव्य आ नाटक।मिथिलाक साहित्य ओ संगीत सँ मल्लवंशीय नेपाल उपत्यका जेना गुंजायमान भ उठल । मैथिलीक विद्यापति, विष्णुपुरी , अमृतकर, गोविन्द, कंसनारायन इत्यादि कविगणक कोमलकान्त पदावलीक गाने मात्र नहि होइत रहल, मिथिलामे रचित नाटकक अभिनये नहि होइत रहल अपितु गीत ओ नाटकक रूपमे मैथिलीक अजस्र साहित्यक सर्जना सेहो अठारहम शताब्दीक तृतीय चरण धरि अविराम गतिसँ होइत रहल।"
( जगगज्योतिर्मल , विनिब न्ध , रामदेव झा, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, 1995,पृ 10. )
म.म. हरिसिंह देवक मृत्युक बाद हुनक दू बालक मानसिंह देव आओर श्यामसिंह देव लगभग सताइस वर्ष धरि राज्य कयलनि। हुनका लोकनिक राज्य कालमे मैथिल विद्वान सभक सम्पर्क बनल रहल। श्यामसिंह देवक पुत्र नहि छलनि ओ अपन पुत्रीक विवाह नेपालक प्राचीन राज परिवारक एक सम्बन्धी जयभद्र मल्ल सँ करौलनि आ हुनका अपन उत्तराधिकारी सेहो बनौलनि।जयभद्रमल्लक पूर्वज नान्यदेवक आक्रमणक समय भागिक मिथिलामे बसि गेलाह। नान्यदेवक समयसँ श्यामसिंह देवक समय धरि मिथिलामे रहल जयभद्र मल्लक परिवार स्वाभाविक रूपसँ मैथिली भाषी भ गेल छल।एकदिस स्वयं मैथिली भाषी , दोसर दिस मैथिल महाराजक उत्तराधिकारी ,एहनमे मैथिली भाषाक प्रति अनुराग स्वाभाविक छल। एहि अनुरागक कारणे नेपालक राजदरबारमे मैथिलीक प्रतिष्ठा बढ़ैत गेलै।
नेपाल उपत्यकाक तीनू शाखा भक्तपुर, पाटन आ काठमांडू , संगहि हिमालय तराइक तिरहुत क्षेत्र मोरंग, मकमानी, भगवतीपुर , सप्तरी आदि क्षेत्र में सोलहम, सत्रहम आ अठारहम शताब्दी धरि मैथिली साहित्यक खूब सर्जन भेल।खासक खूब नाटक लिखल गेल। संगहि मिथिला मे रचित नाटकक अभिनयसँ ओत मनोरंजनक अवसर प्रदान कयल गेल। नेपाल - भारतक ई सम्बन्ध मात्र कलाक क्षेत्रमे नहि भाषाक क्षेत्र मे सेहो एक भ गेल छल।
मल्लवंशीय राजा लोकनि स्वयं नाटकक रचना करैत छलाह।आ हुनक शासन कालमे सेहो विपुल मात्रा मे नाटक रचल गेल , जे मैथिलाक्षर आ नेवारी भाषामे उपलब्ध अछि। लगभग डेढ़ सय वर्ष धरि नेपालमे मैथिली नाटकक लेखन आ मंचन होइत रहल। नाटकक कथानक पौराणिक रहैत छल । मंचन विशेष अवसर पर नियमित रूपसँ कयल जाइत छल। एहि नाटक सभमे सम्वाद आ गीत मैथिलीमे रहैत छल ,आ मंचीय निर्देश नेवारीमे कहल जाइत छल।
नाटक मे गीत ,नृत्य आ संगीतक प्रधानता रहैत छल। अधिकांश नाटकमे ई देखल गेल अछि जे नाटककार कियो आ गीतकार कियो आन होइत छलाह। एकर प्रदर्शन दरबार मे होइत छल। जत राजा लोकनि सेहो अभिनय करैत छलाह। नाटक मात्र मनोरंजनक उद्देश्य सँ खेलाएल जाइत छल।
मल्ल नरेशक समयमे नेपाल मैथिली नाटकक स्वर्णिम काल छल। मुख्य रूपसँ तीन राज्य ( भक्तपुर वा भातगांव , कान्तिपुर वा काठमांडू आ ललितपुर आ पाटन) मे जे एकर विकास भेल ताहिपर संक्षेपमे प्रमुख नाटकक स्मरण क ली --
भक्तपुर वा भातगांव ^^^^^^^^^^^^^^^^ मैथिली साहित्य ओ साहित्यकार केँ संरक्षण देनिहार नेपालक ई प्रमुख राज्य थिक। एहिठाम पहिल मैथिली नाटक विद्याविलाप विश्वमल्ल क आदेश सँ रचल गेल ,जकर अभिनय राजसभाक समक्ष भेल छल। एहि समय धरि संस्कृत - प्राकृति भाषा आमजन सँ दूर भ रहल छल। संस्कृत- प्राकृति लोक केँ बुझय मे कठिन भ गेल छलैक।आन जनभाषा केँ साहित्यिक मर्यादा प्राप्त नहि भेल छलैक। परिणामतः मैथिली निर्बाध रूपेँ बढ़ैत गेल। ओकर बाद मैथिलीक महान उन्नायक भेलाह राजा जगज्ज्योतिर्मल। हिनक लिखल आ समयक प्रमुख नाटक थिक - हरगौरीविवाह नाटक, मुदितकुवलयाश्व नाटक, कुंजविहार नाटक। एकर बाद हिनक पौत्र मैथिलीक सर्वाधिक सेवा कयलनि। हिनक लिखल छओ गोट नाटक प्रभावतीहरण नाटक, नलीय नाटक, मलयगंधिनी नाटक, उषाहरण नाटक ,पारिजातहरण नाटक, मूलदेव शशिदेवोपाख्यान नाटक नेपालक राष्ट्रीय अभिलेखागार मे सुरक्षित अछि। हिनक पश्चात जितामित्र मल्लक समयमे छओ गोट नाटक लिखल गेल। मदालसाहरण नाटक, बरूथिनीहरण नाटक, कालीय मथनोपाख्यान नाटक, महाभारत नाटक, रामायण नाटक, आ जैमिनि भारत नाटकम। हिनक पश्चात भूपतीन्द्र मल्ल मैथिलीक पूर्ण अनुरागी छलाह।हिनक लिखल भाषा नाटक, गौरीविवाह नाटक, माधवानल नाटक, रूक्मिणीहरण नाटक, उषाहरण नाटक, कंसवध वा कृष्णचरित नाटक, गोपिचन्द्रोपाख्यान नाटक, सम्बरासुरवधोपाख्यान नाटक, जालंधरोपाख्यान नाटक, मूलदेव शशिदेवोपाख्यान नाटक, जैमिनी भारत नाटकम , मुदावतीहरण नाटक, विक्रमचरित नाटक, श्रीखण्डचरित नाटक, पद्मावती नाटक, पशुपति प्रादुर्भाव नाटक, विद्याविलाप नाटक, उपलब्ध होइत अछि। एहि राज्यक अन्तिम राजा रंजिनमल्लक लिखल अनेक नाटक प्राप्त होइत अछि । हिनक प्रमुख नाटक थिक - उषाहरण नाटक, इन्द्रविजय नाटक, मानधान्यूपाख्यान नाटक, कोलासुरवधोपाख्यान नाटक, अन्धकासुरवधोपाख्यान नाटक, जलशायिविश्नवादी सृष्ट्युपाख्यान वा मच्छावतार नाटक, खटवासुरवधोपाख्यान नाटक, वाल्मीकि रामायण नाटक, रुक्मिणीहरण नाटक, कृष्णचरित नाटक, रामायण नाटक, कृष्णकैलासत्रोपाख्यान नाटक, । एकर अतिरिक्त नओ गोट आओर नाटकक चर्चा अछि। ई नाटक सभ राष्ट्रीय अभिलेखागार , काठमांडू मे राखल पुस्तक सूचीक प्रथम भागमे भेटैत अछि। अतः कहल जा सकैत अछि जे भातगांवक राजा लोकनिक मैथिली नाटकक विकासमे अविस्मरणीय योगदान अछि।
कान्तिपुर वा काठमांडू ^^^^^^^^^^^^^^^^^^^ नरेंद्रमल्लक समयमे रामायण नाटक ओ महाभारत नाटक लिखल गेल। प्रतापमल्लक कालमे नलचरित एवं जगज्जयमल्लक समयमे अभिनय प्रबोध चन्द्रोदयनाटकक रचना भेल। हिनके समयमे लिखल वंशमणिक गीत दिगम्बर नाटक खूब ख्याति पौलक।
ललितपुर वा पाटन ^^^^^^^^^^^^^^^^ एहिठाम हरिश्चंद्रनृत्यम नाटक लिखल गेल, जकर प्रकाशन सन्त अगस्टस कोनरेडी जर्मनिसँ 1891 ई मे प्रकाशित करबाओल।
एहितरहेँ कहि सकैत छी जे नेपालमे मैथिली नाटक ओ गीतक अजस्र भण्डार राष्ट्रीय अभिलेखागार , काठमांडू मे सुरक्षित अछि।
जखन मल्लवंशक पतन भेलैक आ राजा पृथ्वीनारायण शाह विजयी भेलाह तँ स्थिति प्रतिकूल भ गेलै। मिथिलासँ सम्पर्क टुटि गेलै। एहिठामक नाटक आ नाटककार केँ नेपाल जायब बंद क देल गेलैक। "वर्तमान राजा शाह एलान क देलनि जे मोगलान अर्थात ( मुगल वंशक शासन रहबाक कारणे भारत केँ मोगलान कहैत छल। मिथिलाक अधिकाँश भाग मोगलानमे पड़ैत छलैक बाँकी नेपालमे) शेष मिथिला सँ जे नटुआ अबैत अछि ओकरा बंद कयल जाय। किएक तँ ओ एहिठामसँ अर्थ आ देशक भेद दुनू ल जाइत अछि। संगहि ओ इहो कहलनि जे नेपालक नेवारी नाचके देखल जाय।ओकरा लोकनि के जे हम देबै ओ देशेमे रहत।"
(मैथिली लोकनाट्यक विस्तृत अध्ययन एवं विश्लेषण , महेंद्र मलंगिया पृ 57।)
हुनक एहि कृत्य सँ दुनू देशक सम्बन्ध केँ जोरगर झटका लगलैक। जे दूध पानि संग मीलि गेल छल , से एकाएक फाटि गेल। एकर बाद वीर शमशेर राणाक शासन आयल।हिनक शासन कालमे पुनः सांस्कृतिक छटा छिटक' लगल। हिनक दरबारमे भरतीय नाटक आ नृत्यक प्रभाव बढ़ लागल। गीत, संगीत ,नृत्य आ नाटकक विकास भेल।हिनक समयमे नेपालमे पैघ संगीत सम्मेलन भेल, जे संगीतक संग संग नाटकक क्षेत्रमे पैघ हलचल उत्पन्न कयलक। लगभग सभ दरबार नाच गान आ नाटकक अभिनय स्थल भ गेल।बड़ी हसीना आ छोटी हसीना ,जे भारतीय छलीह से ओहिठाम खूब यश प्रतिष्ठा अर्जित कयलनि।
हिनके समयमे भरतीय रंगकर्मी केँ प्रशिक्षण देबाक काज सेहो शुरूह भेल। जनरल डम्बर शमशेर राणा ,जे जनरलक पद त्यागि प्रशिक्षण प्राप्त कयलनि, से पश्चात रंगमंचक विकासमे लागि गेलाह।तहिना माणिकमणि तुलाधर कलकत्ता मे नाट्य प्रशिक्षण पाबि डबली ( आकाशतर) नाटक करबाक श्रीगणेश कयलनि। बादमे गोपी शमशेर सेहो भारतमे प्रशिक्षित भेलाह। किछु और प्रशिक्षक लोकनि छलाह , जेना - नानक मिश्र, नूरुद्दीन, बाला प्रसाद आदि , जे नेपालमे अभिनयक प्रशिक्षण देलनि , आ कालांतरमे राजा आ राणा दरबारक थियेटर इंचार्ज सेहो बनाओल गेलाह।
राणा कालक बाद नेपालमे पंचायती व्यवस्था आयल। एहि कालमे एकटा आर समस्या उत्पन्न भ गेलै। नाटक प्रदर्शन एवं प्रकाशन सँ पूर्व सरकारी अनुमति लेब आवश्यक भ गेलै। प्रदर्शन सँ पूर्व सरकारी तंत्र केँ सूचित कयल जाइत छलै । अभिनय स्थल पर पुलिस चौकी सँ पुलिस पठाओल जाइत छलै। कहल जाइत छलै जे ई शान्ति सुरक्षाक लेल पठाओल जा रहल अछि । मुदा ओकर तहमे किछु और बात रहैत छलैक। ओकर मुख्य काज छलैक नाटकक सम्वाद केँ निरीक्षण करब , जाहिसँ राजा आ व्यवस्था पर कोनो अनर्गल बात नहि कहल जाय। जाहिसँ नाटकक विस्तारमे कमी अयलैक। भारतसँ जे नाटकक दल जाइत छल , से कम भ गेलै। महिला कलाकार सेहो अपना केँ असुरक्षित अनुभव कर लागल। एहिसँ पुनः एकबेर भारत- नेपालक बीच नाटकक सम्बन्ध विच्छेद भ गेलै। एहितरहेँ कहि सकैत छी जे नेपालक सत्ताक संग मैथिली साहित्य-संस्कृतिक उत्थान पतन होइत रहल।
स्थिति सुधरलै आ नेपालमे सत्ता जखन जनताक हाथमे आयल , तँ रंगमंच अपन रंगमे आबि गेल। जीवनाथ झा एहन कवि भेलाह जे सम्पूर्ण नेपाल केँ अपन समसामयिक काव्य धारा संग जोड़लनि। ई कहू जे ओत ई केवल स्वयं साहित्यक प्रणयन नहि कयलनि अपितु आनो आन विद्वान केँ एहि दिस अग्रसर करबामे लागि गेलाह।तकरे परिणाम थिक जे वर्तमान कालमे डॉ धीरेश्वर झा धीरेन्द , प्रो भोलानाथ झा धूमकेतु, प्रो प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन , श्री महेंद्र मलंगिया आदि अपन कर्मक्षेत्र नेपाले के बनओलनि। आ पुनः मैथिली साहित्यिक गतिविधि जोड़ पकड़लक। एकरे परिणाम भेल जे नेपालीय साहित्यकार लोकनि जेना- श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, प्रो राजेन्द्र विमल, रमेश रंजन, पमेश्वर कापड़ि आदि मैथिली दिस प्रवृति भेलाह जे आइ मैथिलीक प्रतिष्ठित साहित्यकारमे परिगणित छथि।
भारत आ नेपाल मे एकटा अनिवार्य नाम थिक महेंद्र मलंगियाक, जिनकर प्रचुर नाट्यकृति केँ देखला उत्तर सहजे विश्वास करब कठिन भ जाइत अछि जे ओ एतेक नाटक कोना लिखलनि । हुनक अधिकांश नाट्यकृतिक रचना-स्थल नेपाले थिक ।ओ लिखबे टा नहि कयलनि लिखबयबो कयलनि , मंचनो कयलनि आ करबेबो कयलनि एवं निर्देशनो कयलनि। हुनक किछु प्रमुख नाट्य कृति थिक-- ओकरा आँगनक बारहमासा, जुआयल कंकनी, गाम नञि सुतय, काठक लोक, ओरिजनल काम, राजा सलहेस, कमला कातक राम, लक्ष्मण आ सीता, लक्ष्मण रेखा खण्डित, एक कमल नोरमे, पूष जाड़ कि माघ जाड़, खिच्चड़ि, छुतहा घैल, ओ खाली मुँह देखै छै। ई सभटा कैक बेर आ कैक ठाम खेलाएल गेल अछि। एकाङ्की: टूटल तागक एकटा ओर, लेवराह आन्हरमे एकटा इजोत, गोनूक गबाह, हमरो जे साम्ब भैया, "बिरजू, बिलटू आओर बाबू", मामा सावधान, देहपर कोठी खसा दिअ, नसबन्दी, आलूक बोरी, भूतहा घर, प्रेत चाहे असौच, फोनक करामात, एकटा बताहि आयल छलय, मालिक सभ चल गेलाह, भाषणक दोकान, फगुआ आयोजन आ भाषण, भूत, एक टुकड़ा पाप, मुहक कात, प्राण बचाबह सीता राम, ओ खाली घैल फोड़य छै। ई सभटा मंचित भऽ चुकल अछि। २५ टा चौबटिया नाटक: चक्रव्युह, लटर पटर अहाँ बन्द करू, बाढ़ि फेर औतय, एक घर कानन एक घर गीत, सेर पर सवा सेर, ई गुर खेने कान छेदेने, आब कहू मन केहेन लगैए, नव घर, हमर बौआ स्कूल जेतए, बेचना गेलए बीतमोहना गबए गीत, मोड़ पर, ककर लाल आदि। ई सभटा चौबटिया वीथीपर खेलायल गेल अछि। ११ टा रेडियो नाटक: आलूक बोरी, ई जनम हम व्यर्थ गमाओल, नाकक पूरा, फटफटिया काका आदि। ई सभटा टा पटना, दरभंगा आ नेपालक रेडियो स्टेशनसँ प्रसारित भेल छनि। एकर बाद एहि क्षेत्रमे अपन किछु नाट्यकृति ल क उपस्थित भेलाह रामभरोस कापड़ि भ्रमर , हिनक रानी चन्द्रावती , एकटा आओर बसन्त , महिषासुर मुर्दाबाद आदि प्रसिद्ध नाटक प्रकाशित अछि। रमेश रंजनक नाटक थिक - मुर्दा, डोमकच्छ आदि तँ परमेश्वर कापड़िक टटकाल दर्शन आ बाल नाटक चौआरि बेस ख्यात पौलक। एहि नाटकक सभक प्रदर्शन विभिन्न अवसर पर विभिन्न संस्था द्वारा समय समय पर कयल जाइत रहल। ई जे झमटगर गाछ अछि तकर सीर नेपालेमे अछि।
एतबे नहि , नेपाल राजकीय प्रज्ञा प्रतिष्ठानक स्थापनाक बाद नियमित रूपेँ नाट्य समारोह होइत रहैत छल।जाहिमे मैथिलीओ क नाटक होइत छल। महेन्द्र मलंगिया सेहो मिथिला नाट्यकला परिषद, जनकपुरधाम सँ अपन टीमक संगे बराबरि जाइत रहलाह अछि।आ वाह वाही लूटैत रहलाह।
जखन भारतमे अरिपन , पटना द्वारा अंतरराष्ट्रीय नाट्य प्रतियोगिता , आयोजित भेल तँ एहू ठाम नेपालक प्रतिनिधित्व देखल गेल। छठम- सातम अंतरराष्ट्रीय नाट्य प्रतियोगितामे सेहो दुनू देशक नाट्य संस्था भाग लेलक।
2000 ई मे एन. आइ. बी. ( नेपाल, इण्डिया, बंग्लादेश) संयुक्त रूपेँ आइ.टी. आइ. ( इंटरनेशनल थियेटर इंस्टीट्यूट ) क स्थापना कयलक। UNESCO द्वारा सम्पोषित एहि संस्थाक काज छैक थियेटर सँ संबंधित विभिन्न देशसँ संवाद स्थापित करब,आ सेमिनार एवं नाट्य समारोह आयोजित कराएब आ नाटकक विकास करब। एही क्रममे पहिलबेर ई संस्था भारत - नेपालमे समान रूपेँ सक्रिय मैथिली नाटकक स्तम्भ महेन्द्र मलंगिया केँ सम्मानित कयलक, जे दुनू देशक हेतु गरिमाक बात थिक। ई संस्था रंगकर्मक माध्यमे दुनू देशकेँ एक सूत्रमे बंधने अछि। तहिना 2004 मे रमानंद युवा क्लब , जनकपुर नाट्य समारोहक आयोजन कयलक, जाहिमे कलकत्ता, दिल्लीक संग मिथिलाक नाट्य संस्था सभ भाग लेने छल।एहन कतेको उदाहरण अछि ,जेना युनाप ( नेपाल) जमघट, (मधुबनी) ,जाहिमे दुनू देशक नाट्य दल सम्मलित भेल।
2012 ई मे मैथिली लोकरंग ( मैलोरंग) , दिल्ली मे महेंद्र मलंगिया नाट्य महोत्सव कयने छल ,ताहूमे नेपालक नाट्य दल भाग लेने छल। एहि महोत्सवक विशिष्ट अतिथि नेपालक राष्ट्रपति डॉ रामवरण यादव छलाह जे अपन वक्तव्यमे कहने छलाह जे भारत - नेपालक जे सम्बन्ध अछि तकर केन्द्रमे दुनू देशक रंगकर्मे अछि।
एहितरहें कहि सकैत छी जे नेपालमे मध्य कालमे जे नाटकक न्यों पड़ल से वर्तमान काल धरि ओहि पर नाटकक महल बनाओल जा रहल अछि। एखनो कतोक विद्वान नाटक लेखन मे सक्रिय छथि। दुनू ठामक लेखक अपन लेखन सक्रियतासँ नाटकक विकासक पाथेय बनल छथि। एकर परिणाम संतोषप्रद अछि से तँ कहले जा सकैत अछि।
-प्रो दमन कुमार झा, प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, विश्वविद्यालय मैथिली विभाग, ल. ना. मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा। मो.-- 7004760408. E-mail:- jhadaman32@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.परमानन्द लाल कर्ण-जेठ मासक एकादशीक माहात्म्य अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.अजित कुमार झा- विकास समिति अजित कुमार झा विकास समिति
आदर्श लोक कॉलोनी मे पहिल बेर एहन घटना घटल छल जकर केओ कल्पना धरि नहि केने छलथि एखन धरि। आदर्श लोक कॉलोनीक सौहार्दपूर्ण वातावरण सेहो अहि कॉलोनी केर नामक अनुरुप छल। लगभग बीस-बाईस बरख पूर्व एत्तह मात्र तारक गाछ आ एकटा विशाल पोखरि छल। अहि शहर केर अधिकांश धोबी कपड़ा धोबय लेल एत्तहि जुटैत छल। हँ किछु लोग माछ मारय लेल सेहो एत्तह जुटैत छलथि। सुनसान रहबाक कारण लोग साँझ के कहय दिन देखार सेहो इम्हर सँ निकलनाई सुरक्षित नहि बुझैत छलथि। पसीबा सब तारक गाछ पर सँ भरल डाबा उतारय आ दोकान सजि जाइत छल। माछ मारनाहर सब सेहो एकर आनन्द उठाबय आ फेर तासक दौड़ चलै। किछु पुरान लोग सबहक कहनाम छन्हि जे एत्तह मरघटियो छल। अहि सँ सटले एत्तह केर औद्योगिक क्षेत्र सेहो छैक जे कि एखन 'बियाडा' केर नियंत्रण मे छैक। एत्तह जमीन ओहि समय माटिक मोल बिकाइत छल मुदा केओ खरीदनाहर नहि । केओ नहि चाहैत छलथि जे हुनकर मेहनत केर कमाई पानि मे चलि जाइक। अहि वीरान जलमग्न इलाका मे किनको भविष्यक कोनो संभावना नहि नजर आबि रहल छलनि। समय परिवर्तनशील छैक आ परिवर्तन प्रकृति केर नियम छैक आ जे समय केर गति केँ समझि जाइत अछि वैह सिकन्दर कहाइत अछि।
धीया पुता रही त' पढ़ाओल जाइत छल जे अपन सबहक देश गामक देश अछि अथवा कहू जे किसानक देश अछि। कृषि एत्तह केर प्रमुख पेशा रहल अछि आ सत्य पुछू त' देशक आत्मा गामे मे बसैत अछि। एहन बात नहि छैक जे रोजी रोटी के तलाश मे अथवा चाकरी लेल लोग प्रवासी नहि बनैत छलथि। ओहि समय त' साझी आश्रम होइत छलै तैँ तेहन सन चिन्ता नहि रहैत छलनि आ सबहक परिवार गामे मे रहैत छलनि। पाबनि तिहार मे एहन परदेसी सब गाम त' अबिते छलथि। अहि केँ अलावे कोनो भी काज प्रयोजन मे सेहो अपन उपस्थिति सुनिश्चित करैत छलथि। एक बात त' तय छलै जे रोजगारक अवधि पूर्ण भेला पर अर्थात् रिटायर भेला पर लोग अपन गाम घुरि अबैत छल। मुदा काल चक्र केँ के थामि सकैत अछि? समय के साथ-साथ लोग सबहक सोच सेहो बदलैत गेलै। साझी आश्रम टूटय लागल आ धीरे-धीरे जिनका जेना सामर्थ्य भेलनि अपन परिवार केँ सेहो संग ल' जाय लगलनि। गामक स्थिति सेहो बदललै आ मात्र खेती बारी पर निर्भर रहनाइ कठिन भ' गेल। कखनो रौदी, त' कखनो दाही सँ बुझु जे किसान सबहक कमर टूटय लागल। धीरे-धीरे किसान सब मजदूर बनय लेल मजबूर भ' गेलाह आ बहुत तेजी सँ गाम छोड़ि शहर केर तरफ पलायन करय लगलाह। पूरा गामक व्यवस्था चौपट होबय लागल। सच पुछू त' बुझाय लागल जेना गामक गाम वीरान भ' गेल अछि। सब सँ पैघ गप्प त' ई छल जे आब रिटायरमेन्ट केँ बाद लोग गाम आबय सँ परहेज करय लगलाह आ ओत्तहि बसय लगलाह। जे सक्षम नहि छलथि सेहो कहुना कर्ज साधि क' आसपास केर शहर ओगरय लगलनि। एकर प्रमुख कारण छल धीया पुताक पढ़ाई लिखाई संग ओकर उज्ज्वल भविष्यक चिन्ता। एहन सन परिस्थिति कोनो आपदा सँ कम नहि छल।
समय केँ गति बूझय वाला लोग सब आपदा केँ अवसर मे कोनो परिवर्तित कैल जाइत छैक ताहि कला मे निपुण होइत छथि आ ओ सब जाग्रत भेलाह। शहरी करण केर दौड़ शुरु भेल आ गाछ वृक्ष सब बेधड़क कटाय लागल। डबरा आ खत्ता सब केँ के पूछय बड़का बड़का पोखरि सब मे सेहो माटि भराय लागल। देखिते देखिते महानगर वाला खेला सब अहि ठाम सेहो शुरु भ' गेल। शहर मे जमीन खरीदबाक बेगरता लोग सब केँ बुझाय लगलनि। कागज पर प्लाटक नक्शा बनय लागल आ सगरो प्रॉपर्टी डीलर सब कुकुरमुत्ता जँका उगि आयल। जाहि जमीन केँ लोग माटिक मोल नहि लेबय चाहैत छलथि तकर दाम सेहो देखित देखिते आकाश ठेकय लागल। एक तरहें गामक जमीन बेचि शहर मे जमीन खरीदबाक जेना उजाहि उठि गेलै।
हम जाहि आदर्श लोक कॉलोनी केर कथा कहि रहल छलहुँ ओहो अही दौड़ मे आकार लेबय लागल छल। ओहि समय एकर नामकरण नहि भेल छलै मुदा किछु त' नाम रहले हेतैक जे हमरा नीँक जँका नहि बूझल अछि। खैर ओकर कोन प्रयोजन जे लोग एकरा खजुरबन्नी कहैत छलै आ कि धोबिया घाट? तारक गाछ सब कटाय लागल आ कहुना ट्रेलरे ट्रेलर माटि भराय लागल। चारि गोटे मिलि क' साझी कारोबार शुरु कैलनि आ जमीन बिकाय लागल। माटि भराइक एवं लगले जमीन बिका जाइक। आई एक रेट मे त' काल्हि दोसर रेट मे। जेना जेना बिकाइक जमीनक रेट और बढ़ि जाइक। एहन तेजी त' हर्षद मेहता केँ समय मे शेयर मार्केट केँ सेहो नहि छलै। हम जखन जमीन रजिस्ट्री सँ पहिने एत्तह जमीन देखय आयल छलहुँ तखन हमरा जमीनक दर्शन नहि भेल छल। बुझु जे पानि मे चारिटा खुट्टा गाड़ल छल जे कि ओकर चौहद्दी छलै कहाँदन। हम माटि भराय केर प्रतीक्षा नहि क' सकैत छलहुँ कारण जाहि तेजी सँ रेट भागि रहल छल हमर बजट गड़बड़यबाक पूर्ण संभावना छल। प्राॅविडेन्ड फंडक लोन केर सेहो एकटा सीमा छल। हम धड़फड़ायल छलहुँ आ बुझु जे भगवान भरोसे जमीनक नहि पानि केर रजिस्ट्री करा क' एकलेखे गंगा नहा लेने छलहुँ। छुट्टी सेहो खत्म छल तैँ ट्रेन पकड़ि अपन गंतव्य केर लेल रवाना भेलहुँ।
लगभग छ: बरख बाद नौकरी सँ अवकाश प्राप्त कयलाक उपरांत हम अपन शहर मे घुरि अयलहुँ। एहन नहि जे छ: बरखक बाद घुरल रही। साल मे दू बेर त' निश्चित रूप सँ अबैत छलहुँ आ कखनो काल समय निकालि अपन रजिस्ट्री करायल पानिकेँ भीतर गाड़ल चारु खाम्ह देखय लेल अबैत छलहुँ । हँ आब ओत्तह माटि भरा गेल छलै। एक बेर छुट्टी मे प्रयास कय बाउण्ड्री वाला काज कहुना करबा लेने छलहुँ। हमर बाउण्ड्री केँ पच्छिम तरफ एखनहु विशाल पोखरि मौजूद छल। किराया पर एक ठाम समय नीँक जँका बीति रहल छल मुदा एक राति साओन मे बरखा वाला पानि घर मे घुसि गेल आ बहुत रास नोकसान भेल। ओहि केँ बाद अपन एकटा छोट छिन बसेरा ठाढ़ करबाक विचार मोन मे जोर मारय लागल। अहि विचार केँ मूर्तरूप देबाक उपक्रम मे लागि गेलहुँ। संयोग सँ होम लोन सेहो भेटि गेल त' गृह निर्माण केर कार्य जोर पकड़ि लेलक आ एक दिन अपन घर मे प्रवेश करबाक शुभ मुहूर्त सेहो आयल। आब एकरा माया कहियौ अथवा किछु आओर मुदा ई त' सत्य छैक जे अपना सँ निर्माण कराओल घर मे प्रवेश करबाक अनुभूति निस्संदेह सुखद होइत छैक। अहि कॉलोनी केर नामकरण हमरा आबय सँ लगभग दू बरख पहिनहे भ' चुकल छल। हँ आदर्श लोक कॉलोनी एकर नाम पड़ल छल। लगभग आधा सँ बेसी कॉलोनी बसि चुकल छल। जे सब शुरु मे आयल छलथि हुनका सब केँ बड्ड तपस्या करय पड़ल छलनि। सड़क कच्ची छलै आ बरसात मे लगभग डाँड़ भरि पानि लागल रहैत छलै। धीरे धीरे लोग सब माटि आ छाउर भरबा क' कहुना चलय लायक रास्ता बनाबय मे सफल भेल छलाह। बिजली केँ पोल नहि छलै त' कहुना बाँस बल्लाक सहारा सँ तार घीचि क' आनल गेल छल। एत्तह महानगर वाला प्लान कैल प्लाटिंग थोड़बे होइत छैक। एत्तह त' बस कहुना माटि भरि क' जमीन बेचल गेल छल। बिजली, पानी एवं सड़क सन बुनियादी सुविधाक हेतु लोग दौड़ैत रहय। जेना जेना लोग गृह निर्माण करैत गेलाह अहि कॉलोनीक क्रमिक विकास होइत गेल। हमर गृह प्रवेश सँ पूर्व एत्तह सड़क पर खरंजा भ' गेल छल। गृह प्रवेशक उपरांत पहिल राति हमरा मोन मे डर पैसि गेल जे कहीं हमर मकानक पछबरिया हिस्सा पोखरि मे नहि भासि जाय। पछबरिया खिड़की सँ हमर सबहक चौक पर अवस्थित अहि शहरक नामी गिरामी विद्यालय सोझे देखाई पड़ैत छल। बुझु जे पोखरि केँ एक किनार पर हमर घर आ दोसर किनार पर ओ विद्यालय छल। एखनहु धोबी सब जुटैत छल आ नाव पर चढ़ि मलहा जाल सेहो फेकैत छल माछ मारय लेल। छठि सेहो किछु गोटे ओत्तह घाट बना क' केने छलथि। सरस्वती पूजाक विसर्जन सेहो अहि मे देखबाक सौभाग्य भेटल। जाहि पछबरिया देवाल केँ पानि मे भासि जयबाक भय भेल छल से भय साल भरि बाद निपत्ता भ' गेल।
अपन नौकरी के दौरान ट्रान्सफर पोस्टिंग केँ चक्कर मे लगभग पूरा भारत भ्रमण भ' गेल छल। हमर अन्तिम पोस्टिंग पुणे मे छल आ ओ शहर तेहन छैक जे एकबेर जे ओत्तह जाइत अछि तिनका लेल ओत्तह सँ घुरि क' एनाइ मुश्किल । हमर सौभाग्य जे हमरा अपना जिला मुख्यालय मे आबय केर अवसर भेटल आ हम पुणे सन शहर केर माया जाल सँ निकलि एत्तह आबय मे सफल भेलहुँ। मित्र वर्ग ई कहि डेराबय लगलाह जे लोग आगू दिस बढ़ैत अछि आ हम कहाँ दन पाछू दिस घुसकुनिया काटय लेल बेहाल छलहुँ। हमहूँ दृढ़ प्रतिज्ञ छलहुँ तैँ किनको कोनो बातक प्रभाव हमरा पर नहि पड़ल आ एकदिन हम अपने शहर मे अन्चिन्हार जँका ठाढ़ छलहुँ। निस्संदेह मोन मे बहुत रास शंका सेहो छल मुदा समय केर साथ सब शंका दूर होइत चलि गेल। अहिठाम आबि हमरा कोनो तेहन सन कष्ट नहि बुझायल से कहब कनिक झूठ होएत मुदा तैयो हमरा कोनो पश्चाताप नहि भेल किएक त' हम अपन शहर केर वास्तविकता सँ पूर्णतया परिचित छलहुँ। ओनाहुतो हम कोनो भ्रम कहियो नहि पोसैत छी जे मोने मोन अपन शहर केर तुलना कोनो महानगर सँ करी। हँ न'ब परिवेश मे सामंजस्य बैसाबय मे कनिक समय लगनाइ स्वाभाविक बात छैक से हमरो लागल। निस्संदेह अहि लेल कनिक बेसी परिश्रम धीया पुता केँ करय पड़लै। खैर आब त' हमहूँ आनन्द लोक कॉलोनी केर अधिकृत बाशिन्दा भ' गेल छलहुँ। अहिठाम आबि धीरे धीरे लोग सब सँ परिचय भेल आ मेल जोल बढ़ल। सब गोटे बड्ड मिलन सार आ पाबनि तेहार मे त' एकदम घरैया माहौल। पहिल होली हमरा लेल यादगार रहल। पुरना गाम घरक माहौल सन बुझायल। पुरुख सबहक एक टोली, महिला सबहक सेहो अपन टोली आ धीया पुता सबहक उमर केँ हिसाब सँ अनेक टोली पूरा कॉलोनी मे घूमि घूमि क' होली खेलाय मे मातल। साँझखन एकठाम खानपान संग सांस्कृतिक आयोजन सेहो छल। दीया बाती मे सेहो बड्ड मेल जोल देखि मोन अभिभूत भ' उठल। छठि मे त' हम सब गाम चलि जाइत छी अन्यथा एत्तहु बड्ड नीँक आयोजन रहैत छैक। विवाह शादी केर अवसर पर पूरा काॅलोनी एक परिवार जँका बुझाइत अछि। सुख दुःख मे सब एक दोसर केँ लेल सहोदर जँका ठाढ़ भेटत। आब त' गामो घर पर एहन परिवेश भेटनाइ मुश्किल । एकटा कहबी छैक जे सब दिन होत न' एक समाना।अहि सदीक सब सँ पैघ त्रासदी कोरोना केँ रुप मे आयल। लोग स्वप्नों मे कहियो एहन भयावह क्षण केर कल्पना नहि केने छल। संपूर्ण लाॅक डाउन सँ जे परिस्थिति बनल से कि कहियो बिसरल जा सकैत अछि? घर सँ निकलनाइ मुश्किल छल। हमरो सबहक काॅलोनीक सड़क एकदम सूनसान छल। केओ ककरो घर नहि जाइत छल आ एहन मे मात्र मोबाइले फोन सब केँ एक दोसर सँ जोड़ि क' रखने छल।
मीडिया त' कोनो चीज केँ ततेक न' भयावह रुप मे देखबैत अछि जे लोग सब डेरायल छल आ सबहक मनोबल टूटि रहल छलै। नित्य एहन अनेको घटना केर वर्णन भेटैत छल जाहि सँ बुझि ओड़ैत छल जे मानवता कलंकित भ' रहल अछि। अहि बात केँ पूर्णरूपेण नकारल त' नहि जा सकैत छल मुदा पूर्णतया स्वीकार करबा योग्य सेहो नहि छल। अहि बातक अनुभूति हमरा तखन भेल जखन हम स्वयं कोरोनाक चपेट मे अयलहुँ। हमर सबहक अहि आदर्श लोक कॉलोनी मे संभवतः हमहीं प्रथम व्यक्ति छलहुँ जे कि कोरोना पाॅजिटीव घोषित भेल छलहुँ । हम अपन समस्त परिचित केँ अहि बातक सूचना अति शीघ्र व्हाट्स एप्प पर शेयर क' देलहुँ ताकि जे भी हमरा संपर्क मे छलथि से अपन जाँच करबा सकथि। रिपोर्ट अबिते हम अपन जरुरत केँ किछु सामान आ लेखन सामग्री ल' क' अपन एकटा कमरा मे कैद भ' गेलहुँ। हँ अपन मोबाइल आओर चार्जर लेनाइ आखिर कोना बिसरि सकैत छलहुँ? लगभग पन्द्रह दिन हम एकान्त वास मे रहलहुँ मुदा परिवारक सब सदस्य आ काॅलोनी वासी हमरा एक पल केँ लेल एकान्त मे नहि रहय देलनि। लगातार फोनक मार्फत सब हमर हौसला बढ़बैत रहलनि। जे बाजार केँ तरफ जाइथ से एक बेर हमरा सब सँ पूछि लैत छलथि जे कोनो समान मंगाबय के अछि कि नहि? आखिर हम कोना कहू जे मानवता खत्म भ' रहल अछि। हमर कॉलोनी मे बहुत गोटा कोरोना सँ पीड़ित भेलाह मुदा सब एक दोसर केर सहारा बनल रहलाह। कहबा मे हमरा कनिको दुविधा नहि भ' रहल अछि जे विपत्तिक अहि क्षण मे सेहो हमरा सुखद अनुभूति होइत रहल। समय चाहे सुख केर होउक अथवा दुःख केर सबहक एकटा समय सीमा होइत छैक। आम जन जीवन धीरे धीरे पटरी पर आबय लागल। जान माल केँ जे क्षति भेलैक तकर सही जानकारी भेटनाइ त' मुश्किल अछि मुदा एकटा बात यथार्थ छैक जे मानव समाज केँ बहुत किछु सिखा क' गेल कोरोना।लाॅक डाउन त' खत्म भेल मुदा बहुत ठाम खास क' आइ टी सेक्टर मे वर्क फ्रॉम होम केर कल्चर जे चालू भेल छल से एखनहु चलि रहल अछि। सरकार केँ तरफ सँ हर संभव प्रयास भेलै मुदा अपन देश मे एहन बयान विवादित बनि जाय त' कोनो पैघ गप्प नहि। थाड़ी पिटला सँ किछु भेलै से त' नहि कहब तखन लाॅक डाउन एवं टीकाकरण केर असर निश्चित रूप सँ पड़लै एकरा कन्ट्रोल करय मे। भले ही धीरे धीरे सब किछु सुचारु ढ़ंग सँ चलय लगलै मुदा एकटा पैघ परिवर्तन स्पष्ट रूप सँ देखय मे आयल जे लोग सब भीड़ सँ बाँचय केर प्रयास मे फराक फराक रहय केर अभ्यस्त भ' गेल छथि। एहन मे ओ पहिने जँका होली, दीपावली आ छठि सन पर्व त्यौहार मे उत्साह नहि रहैत अछि। हमर सबहक आदर्श लोक कॉलोनी मे फेर कहियो पहिने सन डम्फा,ढोल आ झाल-मजीरा वाला होली नहि भेल। बस हैप्पी होली मे सिमित भ' क' रहि गेलाह सब। दीपावली आ छठि सेहो आब फीका भ' गेल अछि।
अहि कॉलोनीक किछु बुजुर्ग लोकनि आपस मे विचार कयलनि जे कोनो छुट्टी केँ दिन एकटा सामूहिक बैसार कैल जाय। अगिला रवि दिन प्रात: काल आठ बजे प्रोफेसर साहेब केर आवास पर ई बैसार होयब तय भेल। कॉलोनी केर सदस्य सब काफी उत्साहित छलथि आ तकर प्रमुख कारण छल जे कोरोनाक प्रादुर्भाव केँ समय सँ कोनो तरहक सामूहिक आयोजन नहि भेल छल। नियत तिथि एवं समय पर सब गोटे जमा भेलनि। आजुक सभा केर अध्यक्षता एक वयोवृद्ध व्यक्ति कयलनि। हुनक आदेश पाबि प्रोफेसर साहेब सभा केँ संबोधित करैत कहलनि: " आदर्श लोक कॉलोनी केर उपस्थित सब सदस्य केँ हार्दिक अभिनन्दन। आजुक बैसार किएक से जानय केर उत्सुकता होयब स्वाभाविक । अहि बीच अखिल विश्व जाहि त्रासदी केर सामना कयलक से किनको सँ छुपल नहि अछि। कमोबेश सब गोटे अहि सँ प्रभावित भेलहुँ। ईश्वर केर कृपा सँ अपन सबहक कॉलोनी मे कोनो तेहन सन दुखद घटना नहि घटल। अहि भीषण त्रासदी सँ शिक्षा लेब बहुत जरुरी अछि, विशेष रुप सँ स्वच्छता केँ ल' क'। एहन मे कॉलोनीक विकास सँ जुड़ल कार्यक निष्पादन हेतु एकटा विकास समिति बनबाक चाही।" अतेक सुनिते उपस्थित जन समूह कर्तल ध्वनि सँ अपन सहमति जनौलनि। दू चारि गोटे और अहि सभा केँ संबोधित कयलनि आ प्रोफेसर साहेब केँ सुझाव पर अपन सहमति जनौलनि। पहिने त' एकटा समिति केर गठन भेल जाहि मे अध्यक्ष, सचिव, कोषाध्यक्ष एवं अन्य पाँच गोट नवतुरिया अहि समिति मे रहय ताहि पर सहमति बनल। सर्वसम्मति सँ कॉलोनीक एक वरिष्ठ सदस्य प्रोफेसर साहेब केँ अध्यक्ष, एकटा नवयुवक केँ सचिव आ बैंक मे कार्यरत शर्मा जी केँ कोषाध्यक्ष बनाओल गेल आ संगहि पाँच टा नवयुवक केँ सेहो सहयोगक हेतु ओहि समिति मे राखल गेल। उपस्थित लोकनि आ नवगठित समिति केर सहयोग सँ समितिक क्रिया कलापक विषय मे विस्तृत चर्चाक उपरान्त निम्न बिन्दु पर सहमति बनल :- 1. घरक कूड़ा कचरा पोलिथिन मे भरि क' कोनो भी खाली प्लाॅट, नाली अथवा यत्र-तत्र-सर्वत्र नहि फेकल जाय। नगर निगम सँ कचरा उठाबय वाला जे गाड़ी अबैत अछि ताहि मे राखल जाय। 2. पानी टंकी केर पाईप , छत एवं बरामदा सँ पानी सड़क पर नहि खसाओल जाय। 3. परमानेन्ट वाहन पार्किंग सड़क पर नहि कैल जाय। बेर कुबेर गली सँ निकलय मे काफी कष्ट केर सामना करय पड़ैत छैक। कोनों तरहें सड़क केर अतिक्रमण नहि होएबाक चाही। 4. बिजली केर पोल एवं ओहि पर स्ट्रीट लाइट केर व्यवस्था कैल जाय। अन्हार आ लटकल तार सँ कखनो दुर्घटना केर संभावना छल। 5. प्रतिमाह प्रत्येक घर सँ ₹ 100/- क' फंडमे जमा होयबाक चाही ताकि साफ सफाई वाला काज करबाबय मे दिक्कत नहि होइक। 6. कॉलोनीक सड़क केर ढलयबाक हेतु सबहक सहयोग सँ समिति वार्ड पार्षद, नगर निगम, विधायक एवं सांसद महोदय लग ज्ञापन दैत निरन्तर प्रयास कैल जाय। समितिक क्रिया कलापक जे प्रारुप तैयार भेल ताहि पर सब गोटेक पूर्णरूपेण सहमति छलनि। अगिला बैसार एक महीना केर बाद होएत से तय भेल। कॉलोनीक जे व्हाट्स एप्प ग्रुप छल वैह ई समिति उपयोग करत ताहू पर सहमति बनि गेल छल तैँ आजुक बैसारक विस्तृत रिपोर्ट सचिव महोदय अहि ग्रुप पर पोस्ट कयलनि।
आदर्श लोक कॉलोनी केर विकास समिति अपन कार्य मे पूर्ण उत्साह सँ लागि गेलाह। मासिक शुल्क जमा होबय लागल। घरे घरे जा क' सबकेँ जागरुक करबाक अभियान शुरु भेल। वार्ड पार्षद केर सहयोग सँ नगर निगम केर कर्मचारी सँ संपर्क कैल गेल आ कचरा उठाव वाला गाड़ी अपन कॉलोनी मे नियमित रूप सँ आबय लागल। नाली सबहक सफाई करबाओल गेल आ ब्लीचिंग पावडर केर छिड़काव भेल। नवयुवक सबहक मेहनत रंग लाबि रहल छल मुदा अगिला बैसार सँ दू दिन पूर्व प्रोफेसर साहेब व्हाट्स एप्प ग्रुप पर समितिक अध्यक्ष पद सँ त्याग पत्र पोस्ट कय सब केँ अचंभित कय देलनि। किनको किछु समझ मे नहि अयलनि जे आखिर किएक ओ त्याग पत्र पोस्ट कयलनि? अपन पोस्ट मे ओ कोनो कारण केर खुलासा नहि केने छलथि। लोग सब फोन पर संपर्क करबाक प्रयास केलकनि मुदा ओ फोन नहि उठौलनि। बैसारक दिन लोग सब जमा भेल मुदा ओ नहि अयलाह। निर्णय भेल जे किछु गोटे हुनकर घर जा क' बैसार मे उपस्थित होबय लेल मना क' लाबथि। बहुत प्रयासक उपरान्त ओ अयलाह मुदा ओ किछु नहि बाजि रहल छलथि। किछु बुजुर्ग लोकनि जखन समझेलखिन त' ओ सचिव महोदय केँ प्रति अपन नाराजगी जाहिर करैत कहलनि जे सचिव महोदय केँ रहला सँ ओ अहि समिति मे नहि रहताह। लोग सब असमंजस मे छलथि। आखिर एहन कोन कारण छलै जे सचिव महोदय सँ अतेक नाराज छलथि? प्रोफेसर साहेब केँ बात सुनि जवाबी फायर करैत सचिव महोदय जे कहलनि ताहि सँ प्रोफेसर साहेब केर नाराजगी केर कारण सबकेँ बूझय मे अयलनि। प्रोफेसर साहेब केर किराया दार नित्य अपन गाड़ी सड़क पर पार्क करैत छलाह एवं राति बिराति लोग सब केँ परेशानी सेहो होइत छलनि। अहि बात केँ ल' क' सचिव महोदय टोकि देलखिन आ प्रोफेसर साहेब केँ रोख लागि गेलन। उपस्थित सदस्य लोकनि सचिव महोदय केर काज सँ संतुष्ट छलथि तैँ सब सचिव महोदय केँ हटाबय लेल तैयार नहि। सब बाजय लगलाह जे नियम त' सबहक लेल बनल छलै त' अहि मे सचिव महोदय केर कोन गलती? प्रोफेसर साहेब केँ प्रतिष्ठा पर पड़लनि त' ओ ओत्तह सँ उठि विदा भेलाह। आब कि कैल जाय? कालोनी मे एकटा सेवानिवृत्त मास्टर साहेब छलथि त' लोग सब आग्रह कय हुनका अध्यक्ष नियुक्त कयलाह आ सभा केर कार्यवाही आगू बढ़ल। मास भरि मे जे काज सब भेल छल तकर चर्चा भेल आ कोषाध्यक्ष महोदय आमद खर्च केर ब्यौरा पढ़ि क' सुनौलनि। अहि केर उपरान्त बैसार खत्म भेल मुदा व्हाट्स एप्प ग्रुप पर घोंघाउज शुरु भ' गेल आ साँझ होइत होइत प्रोफेसर साहेब आ अन्य चारि गोटे अहि ग्रुप सँ विदा लेलनि। कहबाक प्रयोजन नहि जे ओ सब गोटे जातीयता केर आधार पर भेद भाव केर आरोप लगा क' अपना आप केँ अलग थलग क' लेलनि। नबका अध्यक्ष महोदय अर्थात् मास्टर साहेब सब गोटे सँ भेँट कय समझाबय केर प्रयास त' कयलनि मुदा सफलता नहि भेटलनि। आदर्श लोक कॉलोनी मे भेदभाव केर बीज अंकुरित होबय लागल। फेर किछु गोटे ग्रुप छोड़लनि। अहि बेर ओ व्यक्ति लोकनि छलथि जिनका घरक छत, बरामदा अथवा पानी टंकी सँ पानि सड़क पर खसैत छल। एक तरहें दूगोला भ' गेलै। जिनका सुधार कार्य हेतु टोकल जाइत छल वैह ग्रुप छोड़ि दैत छलथि। गजब तमासा चलि रहल छल। दिन राति उकटा पैंची होइत रहैत छल मुदा समितिक नवयुवक सब दृढ़तापूर्वक परिस्थितिक सामना करैत अपन लक्ष्य प्राप्ति लेल सतत् प्रयास करैत रहलाह। सबहक सोच एक समान त' भ' नहि सकैत छैक। किछु गोटे अपन पाइप सड़क पर सँ हटबा लेने छलथि। साल भरि मे विकास समिति द्वारा बहुत रास काज भेल। बिजली विभाग सँ पोलक आवंटन त' भ' गेल मुदा आपसी तनातनी केर कारण एकरा लगबाबय मे तीन डिबिया तेल जड़ल। एक गोटा अपन घरक दीवाल के सामने पोल गाड़य पर आत्म दाह केर धमकी तक द' देलनि। अन्त मे एकटा पोल बिजली विभाग वापस ल' जाय लेल मजबूर भेल। पग पग पर बाधा छल मुदा समिति संघर्ष करैत रहल आ समझबूझ केँ साथ सतत् आगू बढ़ैत रहल। कॉलोनी मे नबका ट्रान्सफार्मर सेहो लागल आ संगहि पोल पर वैपर लाइट लागि गेल। समितिक सदस्य सब केँ अहि सँ न'ब ऊर्जा भेटलनि आ हुनकर सबहक अथक प्रयास सँ कॉलोनीक सड़क पास भ' गेल मुदा सड़क ढ़लाई केर समय एकटा अलगे समस्या ठाढ़ भ' गेल। नाला निर्माण लेल गड्ढा केर कोन तरफ सँ काज शुरु कैल जाय ताहि पर विवाद भेल आ विभागीय जाँच केर आदेश आबि जाय केर कारण काज शुरु होबय मे विलम्ब भेल मुदा खुशी केर गप्प जे कहुना काज शुरु भेल। आब प्रकृति अपन रूप देखौलक आ सप्ताह भरि जमि क' बरखा होइत रहल। खरंजा उखड़ल छल। नाला लेल गड्ढा खोदल छल आ गली सब मे भरि ठेहुन पानि जमा भ' गेल छल। काज बाधित भेल से अलग स्थिति कुल मिला क' नारकीय भ' गेल छल। लगभग एक महीना बाद पुन: कार्य शुरू भेल। नाला निर्माण केर बाद सड़क पर माटि भराई केर काज भेल। सड़क ढ़लाई लेल आब सोलिंग वाला काज शुरू भेल आ ठिकेदार मैटेरियल खसायब शुरु कैलक। एक दिन मजूर आ मसीन ल' क' ढ़लाई केर काज शुरू करबाक लेल ठिकेदार उपस्थित भेल मुदा दोसर गुट अड़ंगा लगा देलक आ ओहि दिन काज शुरू नहि भ' सकल। दोसर दिन सेहो वैह स्थिति बनल आ काज शुरू नहि भ' सकल। विकास समिति बैसार कैलक आ भारी संख्या मे लोग सब जुटल आ नगर निगम वाला जुनियर इंजीनियर आ ठेकेदार सँ कहल गेल जे या त' काज शुरु करु अन्यथा मैटेरियल आ अपन तामझाम हटा क' हमर सबहक सड़क खाली करु। ई धमकी कारगर रहलै एवं अगिला दिन समिति ओ मोहल्ला वासी केर उपस्थिति मे ई शुभ कार्य शुरु भेल। धीरे धीरे काज अपन रफ्तार पकड़लक। आरोप प्रत्यारोप सेहो चलैत रहलै। मनुक्खक स्वभाव होइत छैक जा ओकर मोन लायक बात करैत रहियौ त' अहाँ सँ नीँक केओ नहि आ जौँ ठाँहि पठाँहि सत्य बाजि दियौ त' फेर अहाँ सन अधलाह केओ आन नहि। सुधारक काज होउक मुदा से आन लेल किएक त' अपन टेटर लोग केँ नहि सूझैत छैक मुदा ओकर निदान सेहो बहुत जरुरी छैक। आन जे करय से गलत आ हम जे करी सैह मात्र सही आ टोकला पर जातिगत समीकरण देखब कहाँ धरि उचित? विकास समिति बनलाक उपरान्त आदर्श लोक कॉलोनी मे विकासक काज त' खूब भेल मुदा अहि केँ लेल भारी मूल्य चुकाबय पड़लै। जाहि सुख सुविधा केर कमी छलै से त' पूर भेल मुदा अहि कॉलोनी केर निवासी केँ अपन सामाजिक समरसता एवं सौहार्दपूर्ण वातावरण के ल' क' जे गर्व छलनि से चकनाचूर भ' गेल। सुख दुःख मे सदैव एकजुट रहय वाला आदर्श लोक कॉलोनी मे पहिल बेर एहन घटना घटल छल जे किनको बेटी केर विवाहक शुभ अवसर पर समितिक सचिव केँ आमंत्रण नहि भेटल छलनि। कोनो भी समाज मे आपस मे मतभेद भेनाइ कोनो बड़का बात नहि छैक मुदा मनभेद किन्नहु उचित नहि। बेटी विवाहक शुभ अवसर पर अपन आशीष देबय वाला लोगक भीड़ त' छल आ उच्च स्वर मे शहनाई सेहो बाजि रहल छल मुदा आदर्श लोक कॉलोनी वाला ओ पुरना उल्लास नदारद छल।
-अजित कुमार झा, मो० नं० 9472834926 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.लाल देब कामत-लघुकथा- पंचबेदीमे धनियां/ नन्द विलास राय जीक पहिल कृति: सखारी-पेटारी लाल देब कामत लघुकथा- पंचबेदीमे धनियां/ नन्द विलास राय जीक पहिल कृति: सखारी-पेटारी १ लघुकथा- पंचबेदीमे धनियां कोसी नदी तट पर बसल एक बरबरना गाम रहय। ओहि गामक सामाजिक संचालन लेल एक कमिटी बनल छल । ताहि कमिटीक सप्ताहिक नियमित बैसारमे विविध विषय पर नजैर राखल जाए। इयह बैसकी ओहि गामक आन गाम लेल सामूहिक पूजी रहैक। दक्षिण भागक गाममे मरड़ आ उतर कातके गाममे दरबार बालाके चलती रहैय। ग्राम विकास कमिटीके मुखिया दस विगहा अस्थापात बाला लोक आओर ओकर भगिनमान बौकू बाबू केँ १५ बिगहा खेत जोतसीम रहैक। आरो श्रीमन्त ५ बिगहा सँ ऊपरके असामी पंचैतीके नियमित स्रोता बनल रहैत छला। पंचपरमेश्वर लग दण्ड जरिवानाके कैंचा सुरक्षित राखल जाइक। बैंक मेँ खाता खुजेलाक बादो सालभरिमे ई जरदगव लोकनि दशनामा टाका जम्मे नहि करैय। धनाई आ गरेश विचालक आब जे कोनो पनचैतीमे दण्डित व्यक्ति हेतई तँ ओकर जामनी बनि पंचपरमेश्वर के छक्का छोड़ाएब। से रविदिन कचहरी पर धनियां मशाला जजात रातिमे पूबारि बाध सँ उखड़ि जेबाक बुझारत भेल। सीताराम कहलकै यौ पंच लोकनि हमरा खेत सँ मामा टोलक लोक एक पुरूख आ डिहबार टोलक एक स्त्री मिलके रातिखिन धनिगाछ उखाड़ि अनलक हन। तकर प्रमाण देब जे ललबा आ बालगोविन के आंगनबाली केँ अपना धनि खेती नै रहैत ओकरा आंगनमे गमागम सुगन्ध धनिके अबैत छैक। रखबार संग दूगोटय जांच लेल पठाओल गेल। बात ध्रूब साँच निकलल। आब सफ़ेद फुसि बजबाक कोनो लाथ नहिं रहने लालवा कहलकै हम गरीब लोक छी से जे दण्ड सुनाबै जाएब ,से अदा करैक लेल तैयार छी। हुकुम भेल २५१ टाका हाजिर कर! ओ आदेशकेँ पालन केलक। दोसर तँ धनिक घरके बौकू जीक जनिजात भऽ कऽ एहन जघन अपराध केलक,रातिमे घर सं बाहर निकलल आ चोरी केलक; तेँ डबल सँ जुर्माना आर्थिक मारि पड़लैक । ओकरा नगद हाथमे नहि रहने समय ७ दिनक मोहल्लत चाहैत रहय। एक - एक व्यक्ति ऐ शर्मनाक विषयके पकड़ैत कोनू ओकर अपेक्षित केँ पाँचसय एकावन टाकाके जामिनी बनय देखय चाहैत रहय। से गरेश गछौटी भेला आ धनाईजी सीताराम केँ अपना दिस सँ अढाई सय टाका क्षतिपुर्ति दैत अपन विचारधारा केर मजरौटी बढेलक। बालगोविन फेर समय सँ ढौआ नहि दैत १५ दिनक ओरो समयके मोहल्लत मांगलक। आब तँ पँचके मुख्य लोक पर ग्रामीण सब दवाब बनौलक जे कोनू सार्वजनिक काज दण्ड के पाय सँ हुअय ,से जिनका लग जतेक पाउना अछि से ततेक राशि अबिलम्ब बैंक कोषमे जम्मा करी। आब धनियाँक सुवादक संग गाममे सर्वहारा चेतना जागि गेलैक। २ नन्द विलास राय जीक पहिल कृति : सखारी-पेटारी
नव लेखनक नाम पर एम्हर किछु काज हुअय लागल अछि। किछु एहन-रहन रचनाकार लोकनि प्रगट भेलाह अछि जे अपन लिखल अपनेटा बुझैत छथि, आनों बुझय तकर परवाह नहि करैत रजनी सजनी करैछ। ताहिके विपरीत एकटा एहन हस्ताक्षर जे सौभाग्यवस विविध अनछुअल विषय पर अपन कलम चलौलनि अछि। एकटा नव मैथिली पोथी रचना जगतमे " सखारी-पेटारी" केर धमक सुनल गेल हन्। एहिबीच साहित्यसेवी श्री नन्द विलास जीक मैथिली भाषा मेँ पोथी 'कथा संग्रह ' केर सगर राति दीप जरय निर्मली कार्यक्रममे पोथी लोकार्पण भेल य। ऐ पोथीक पहिल प्रकाशन २०१३ ई०मे भेल रहय,जकर पुन: संस्करण पल्लवी प्रकाशन सँ २०२४ मे भेल अछि। एहि पोथीमे १२१ गोट पृष्ठ छै, जकर किमत भारू० दूसय टाका छै। शव्दक परिधि अनुसारे एहिमे किछु लघुकथा आ वेसी दीर्घ कथा देखल जाईछ,मुदा प्रकाशक बिहैन कथा कहि रहलाह अछि। बिहैन कथाके एक गरिमा कम शव्दक होईछ से नहि बुझाइछ। सब कथा समाजमे अपन आभा अनुसारे संदेश दैत देखाएल गेल छैक। ग्रामीण क्षेत्रमे बेटी'क वियाह-द्विरागमनमे विदाएकाल किछु संचयन कयल बौस्त सखारीमे सांठल जाइत छैक। ई सखारी-पेटारी ग्रामीण लघु कलाके सेहो प्रतीक छी, जे सिकी - मूइज सँ बनैत छैक। एहिके बीनयमे तरह- तरहके पीढ़ी दर पीढ़ी सँ चित्रकारी सीखैत मिथिलामे धरोहर रूपेँ सहेजने अछि ललना सब। से आजुक वालिका लोकनि लुरि बिसरल चलि जा रहल छैक। मिथिला पेंटिंग आ हस्त शिल्प कला रूपें एहि पौराणिक पैघ पौतीकेँ बिनबाक लुरि अक्षुण्ण राखल आ सहेजबाक आवश्यकता अछि। जीवनोपयोगी वस्तुजात ओरियाउन करैत धीयाक माय अपन मनोरथ पूर करय ले ई एकटा खुशीक प्रतीक सेहो प्रदर्शित करैछ। ताहि सखारी-पेटारी मेँ प्रो० हरिमोहन झा 'क चर्चित कृति कन्यादान ओ द्विरागमन "पोथी सवर्ण समाज सांठैत रहय,सयह प्रवृत्ति केँ सर्वहारा समाजक बेटी वियाहमे आब सखारी-पेटारी 'क जगह ट्रंक वा बड़का काठक बाकसमे सांठ- उसार कयल जाईछ *सखारी-पेटारी मेँ। एहि पोथीके कथाकार अपना परिवेशमे आ जीवनमे भोगल व्यथा केँ खिस्सा बनाकय पाठकगण बीच परसलनि हन। हिनक भाषा शैली सेहो निछछ देहाती य ,जाहिमे देशज शब्दक नीक विन्यास कयल देखाईत अछि। बिहैन कथा -, लघुकथा सँ बढ़ैत अनेको कथा स्तरीय लिख चुकल छथि-रायजी। आओर कतेको विधामे मैथिली पोथी सेहो हिनक पल्लवी प्रकाशन निर्मली सँ छपि चुकल छन्हि, यथा -: मरजादक भोज आ भरदुतिया (२०१८), सरस्वती पूजाक परसाद (२०२१), असल पूजा (२०२२) आ काव्य संग्रह मे छठिक डाला ओ हमर चारू धाम (२०१८) एवं एकांकी संग्रह -बहिनपा (२०२१) तथा पइत (२०२२) ओ एकटा संस्मरण -अपन भीतर (२०२१) मे , जाहिमे सँ किछु पन्ना खातिर कतेको पुस्तिकाक दर्जामे पड़ल छैक। सद्यप्रकाशित एहि पोथीमे कोनू कथाक केन्द्रीय शुभ संज्ञा 'सखारी-पेटारी' नै छैक। मुदा पाठककेँ असल बेटा, डॉक्टर बेटा, प्रोफेसर बेटा आ निपुतराहा शिर्षक पाठ पढ़ैत संवेदनशील लागत। आनों शिर्षक सँ कथाके गरहैन बढ़ रोचक आ अपील करैत बुझाइत अछि। रायजी अपन नव रचनाक तीनगोट पोथी मैथिली भाषा मेँ आरो लिख रहलाह छथि। एक हिन्दीमे सेहो पुस्तक निर्माण केर योजना बना रहलाह हन। साहित्य अकादमी धरि हिनक पोथीक पहुँच भेल रहय। शुभ कामना रहत।नन्द विलास राय जीक पहिल कृति : सखारी-पेटारी
नव लेखनक नाम पर एम्हर किछु काज हुअय लागल अछि। किछु एहन-रहन रचनाकार लोकनि प्रगट भेलाह अछि जे अपन लिखल अपनेटा बुझैत छथि, आनों बुझय तकर परवाह नहि करैत रजनी सजनी करैछ। ताहिके विपरीत एकटा एहन हस्ताक्षर जे सौभाग्यवस विविध अनछुअल विषय पर अपन कलम चलौलनि अछि। एकटा नव मैथिली पोथी रचना जगतमे " सखारी-पेटारी" केर धमक सुनल गेल हन्। एहिबीच साहित्यसेवी श्री नन्द विलास जीक मैथिली भाषा मेँ पोथी 'कथा संग्रह ' केर सगर राति दीप जरय निर्मली कार्यक्रममे पोथी लोकार्पण भेल य। ऐ पोथीक पहिल प्रकाशन २०१३ ई०मे भेल रहय,जकर पुन: संस्करण पल्लवी प्रकाशन सँ २०२४ मे भेल अछि। एहि पोथीमे १२१ गोट पृष्ठ छै, जकर किमत भारू० दूसय टाका छै। शव्दक परिधि अनुसारे एहिमे किछु लघुकथा आ वेसी दीर्घ कथा देखल जाईछ,मुदा प्रकाशक बिहैन कथा कहि रहलाह अछि। बिहैन कथाके एक गरिमा कम शव्दक होईछ से नहि बुझाइछ। सब कथा समाजमे अपन आभा अनुसारे संदेश दैत देखाएल गेल छैक। ग्रामीण क्षेत्रमे बेटी'क वियाह-द्विरागमनमे विदाएकाल किछु संचयन कयल बौस्त सखारीमे सांठल जाइत छैक। ई सखारी-पेटारी ग्रामीण लघु कलाके सेहो प्रतीक छी, जे सिकी - मूइज सँ बनैत छैक। एहिके बीनयमे तरह- तरहके पीढ़ी दर पीढ़ी सँ चित्रकारी सीखैत मिथिलामे धरोहर रूपेँ सहेजने अछि ललना सब। से आजुक वालिका लोकनि लुरि बिसरल चलि जा रहल छैक। मिथिला पेंटिंग आ हस्त शिल्प कला रूपें एहि पौराणिक पैघ पौतीकेँ बिनबाक लुरि अक्षुण्ण राखल आ सहेजबाक आवश्यकता अछि। जीवनोपयोगी वस्तुजात ओरियाउन करैत धीयाक माय अपन मनोरथ पूर करय ले ई एकटा खुशीक प्रतीक सेहो प्रदर्शित करैछ। ताहि सखारी-पेटारी मेँ प्रो० हरिमोहन झा 'क चर्चित कृति कन्यादान ओ द्विरागमन "पोथी सवर्ण समाज सांठैत रहय,सयह प्रवृत्ति केँ सर्वहारा समाजक बेटी वियाहमे आब सखारी-पेटारी 'क जगह ट्रंक वा बड़का काठक बाकसमे सांठ- उसार कयल जाईछ *सखारी-पेटारी मेँ। एहि पोथीके कथाकार अपना परिवेशमे आ जीवनमे भोगल व्यथा केँ खिस्सा बनाकय पाठकगण बीच परसलनि हन। हिनक भाषा शैली सेहो निछछ देहाती य ,जाहिमे देशज शब्दक नीक विन्यास कयल देखाईत अछि। बिहैन कथा -, लघुकथा सँ बढ़ैत अनेको कथा स्तरीय लिख चुकल छथि-रायजी। आओर कतेको विधामे मैथिली पोथी सेहो हिनक पल्लवी प्रकाशन निर्मली सँ छपि चुकल छन्हि, यथा -: मरजादक भोज आ भरदुतिया (२०१८), सरस्वती पूजाक परसाद (२०२१), असल पूजा (२०२२) आ काव्य संग्रह मे छठिक डाला ओ हमर चारू धाम (२०१८) एवं एकांकी संग्रह -बहिनपा (२०२१) तथा पइत (२०२२) ओ एकटा संस्मरण -अपन भीतर (२०२१) मे , जाहिमे सँ किछु पन्ना खातिर कतेको पुस्तिकाक दर्जामे पड़ल छैक। सद्यप्रकाशित एहि पोथीमे कोनू कथाक केन्द्रीय शुभ संज्ञा 'सखारी-पेटारी' नै छैक। मुदा पाठककेँ असल बेटा, डॉक्टर बेटा, प्रोफेसर बेटा आ निपुतराहा शिर्षक पाठ पढ़ैत संवेदनशील लागत। आनों शिर्षक सँ कथाके गरहैन बढ़ रोचक आ अपील करैत बुझाइत अछि। असल बेटा कथामे -निरमलीक पछबरिया गाम छजनाके जीतन मुखियक सफल जीवनक आदर्श कथा छी। ओ मल्लाह जातिक रहैत मात मारबाक जगह नीकचाह बनौनाई जनैत य। से गाम सँ नितरोज अनरोखे निर्मली टीशन लग चाहक दोकान चलाबैत गैंहकीक जश बटोरने रहैत कैंचा सँ रमना परहक एक कठा जंगलाएल जमीन बसय ले एकलाख टाकामे अरजैत छै। चटर्जी साहेबक कहल मानि छीनूं धियापुता केँ कन्भेन्ट इसकुलमे पढाबैत एकचारीके तीनमंजीला भवनमे परिणत कय लैत छैक। जीतने दूनूटा बेटा धरि इंजीनियर आ बेटी हाईस्कूलक शिक्षिका बना जाईछ,मुदा चाहक दोकानदारी छोरा दैछ। तीनू संतानक व्यवस्थित घरमे वियाहदान होईत छैक आ जमाए ओकर दरभंगा केर बैंकमे कार्यरत रहैछ,जे घर जमैया जँका जाता आबत केने रहैछ। जीतनक पत्निक मृत्युक तीन मास बाद अपनो हुनका लकबारोग सँ ग्रसित आर बी मेमोरियल मेँ जमायके सौजन्य सँ भर्ती हुअय पड़ैत छै। होस्पीटल सँ बेटी जमाय निरमली आनलखिन तँ तीनेदिनक वाद दम तोईड़ दैत छै। गोपाल मास्टर जी ,जे तानु भाय बहिनके ट्युशनो पढ़ेने रहथिन ;जीतन जीक आकस्मिक निधनके खबेर सबके दैत तीलयुगा नदीक कछेरमे अंतिम संस्कार वादमे पक्की भोजक आयोजन थे तो भेलैक। मास्टर जीक कहबके प्रत्युत्तरमे सुकल हाथजोड़ि कहलकैन -" नै गुरूदेव,हम दूनू भाँई बाबूजीक असल बेटा नै छी। हम सब बाबूजीक सेवा टहल कहाँ केलिऐन। हमरा सभक हाथक एक गिलास पानियोँ कहाँ भेटलनि बाबूजीकेँ । असल बेटा तँ हमर बहिन सुकनी आ बहनोई शंकरजी छथिन। जे बाबूजीकेँ सेवा सुश्रुषा केलखिन।" रायजी अपन नव रचनाक तीनगोट पोथी मैथिली भाषा मेँ आरो लिख रहलाह छथि। एक हिन्दीमे सेहो पुस्तक निर्माण केर योजना बना रहलाह हन। साहित्य अकादमी धरि हिनक पोथीक पहुँच भेल रहय। शुभ कामना रहत। -लाल देब कामत मो० ७६३१३९०७६१ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.रबीन्द्र नारायण मिश्र-सीमाक ओहि पार (धारावाहिक उपन्यास) रबीन्द्र नारायण मिश्र सीमाक ओहि पार (धारावाहिक उपन्यास) हमर ससुर स्वर्गीय गणेश झा (पण्डौल डीहटोल)क स्मृतिमे, सादर ससिनेह समर्पित! -6- दिव्यलोक सर्व संपन्न छल । एतए सभकिछु स्वचालित छल । नवागन्तुककेँ अबितहि परिचयपत्रसँ लए कए समस्त सुख-सुविधाक व्यवस्था स्वतः भए जाइत छल । मुदा हमर अहिलोकमे अएला कैक दिन भए गेलाक बादो ने परिचयपत्र बनल,ने रहबाक कोनो ठेकान छल । ई बात अलग छैक जे हमरा कोनो कष्ट नहि भए रहल छल । कारण दिव्यलोकमे ठाम-ठाम चौबटिआ सभपर बहुत रास चीज-वस्तु सुलभ रहैत छल ,ओहिना जेना कोनो नीक क्लबमे होइत अछि । तकर ऊपरो व्यवस्था रहैत छलैक जकर तुलना मृत्युलोकमे रहनिहार नहि कए सकैत छथि,ओ सोचिओ नहि सकैत छथि जे एहनो होइत छैक। इएह थिक मृत्युलोक आ दिव्यलोकक अंतर । मुदा दिव्यलोकमे लोक अबैत अछि कोना? की ओ सभ पुण्यात्मा छथि? की ओ सभ ककरो कृपापात्र छथि ? की एतहु हेराफेरी चलैत छैक? किछु नहि कहि सकैत छी कारण हम स्वयं एतए नव छी । एहिठामक तालपातरा बुझबामे किछु समय तँ लगबे करत । हम से सभ सोचिते छलहुँ कि आगूमे एकटा चिट्ठी आ एकटा छोटसन पिपही राखल देखाएल । चिट्ठी पढ़ए लगैत छी। " तोहर मृत्युलोकक फाइल हरा गेल अछि, तेँ तोहर विषयमे निर्णय लेबामे विलंब भए रहल अछि । जाबे किछु फैसला नहि होइत अछि ताबे एहि पिपहीकेँ सम्हारि कए राखह। एकर बटन दबेलासँ समस्याक समाधान होइत रहतह।" "मुदा हमरा बारेमे कहिआ धरि अंतिम निर्णय होएत आ से के करत?" "तूँ बड़ मूर्ख छह । व्यर्थक पचड़ामे पड़ल रहबाक हेतु तँ मृत्युलोके पर्याप्त अछि । तूँ अखन दिव्यलोकमे छह । मानलहुँ जे तोरा अखन दिव्यदृष्टि नहि भेटलह अछि । तथापि विचार करहक, अपने अंतर बुझेतह।" "मुदा तोँ छह के? सामने किएक नहि आबि रहल छह?" "फेर ओएह बात? एहिठाम आगू-पाछू किछु नहि छैक। जखने तोहर दिव्यदृष्टि जागि जेतह ,सभ भ्रम अपने हटि जेतह ।" "ओ!" हम उत्सुकतासँ ओहि पिपहीक बिचला बटन दबओलहुँ । मोनमे सोचिते रही कि कैक दिन सँ रागिनीक किछु समाचार नहि भेटल कि बटन दबबतहि रागिनीकेँ बहुत दूर ककरोसंगे रंग- रभसमे मस्त देखैत छी । "ओ के अछि? -हम मोने मोन सोचि रहल छी । ताबते ओ दृश्य फरिछाइत गेल । रागिनी आ शरद हमरा सामनेमे ठाढ़ हँसि रहल छल । " की बात छैक, मनोज?"-शरद बाजल । "बात की रहतैक । हमरा तँ एहिठामक ताल-पातरा किछु नहि बुझा रहल अछि । तूँ सभ एतेक मौजमे छह आ हमरा अखनो ओएह हाल अछि, से किएक?"-हम बजलहुँ । से सुनितहि रागिनी जोरसँ हँसि देलीह आ शरदकेँ संगे नचैत- गबैत अदृश्य भए गेलीह। "पहिने तँ एकरासभकेँ एतेक झञ्झटि रहैक । आब दुनूकेँ एतेक घेटजोड़ी केना भए गेलैक? शरदसन फसादी दिव्यलोकमे कोना पहुँचि गेल ?"- ई बातसभ हमर मोनमे उठैत रहल । मुदा ई सभ फरिआएत के? मोन व्याकुल भए रहल छल । हम फेरसँ बिचला बटन दबओलहुँ । एहिबेर बटन दबबतहि एकटा बिकराल रूपधारी पुरुष उपस्थित भेलाह। हम हुनका देखितहि सकपका गेलहुँ । हमर माथा जोरसँ घुमए लागल । एहन भयावह लोकक कल्पना हमरा नहि छल । ई पिपही तँ आफदक जड़ि बनि गेल । आब की करी? "अहाँ के छी?" " एहिठाम प्रश्न -उत्तर करबाक परंपरा नहि छैक । सभ किछु अपनहि होइछ, किछु करए नहि पड़ैछ ।" "मुदा हमरा संगे एना किएक भए रहल अछि?" " हम छी महाकाल । हमर आदि-अंत केओ नहि देखलक। अहाँ बेसी बुझबाक जोगारमे नहि पड़ू नहि तँ कष्टमे पड़ि जाएब ।" सामनेमे किछु राखल देखलिऐक । नान्हिटा पुड़िआमे किछु छलैक । हम ओकरा हाथमे राखबाक प्रयास केलहुँ कि ओ अदृश्य भए गेल। हम अवाक् ओहीठाम बैसि गेलहुँ । सामने चौकपर तरह-तरहक चीज-वस्तु राखल छल । मोन भेल जे मालपुआ खइतहुँ । तुरंते मालपुआ एकटा थारीमे राखल छल । भरिमोन मालपुआ खेलहुँ। चाह पिलहुँ। ताबे बुझाएल जेना केओ हमरा देखि हँसि रहल अछि । ओकरासभक हाथमे मादक गंधयुक्त हरिअर कंचन कोनो तरल वस्तु सँ भरल गिलास छलैक । एहन मादक गंध कथीक भए सकैत अछि?- मोने-मोन सोचाए । ताबते कतहुसँ अबाज आएल - "ई थिक दिव्यरस। " "ओ! हमरो भेटि सकैत अछि की?" "अहाँ तँ अपने चाह पीबए लगलहुँ ।" देखिते-देखिते ओ सभ दिव्यरसक भरि सीसी पीबि गेल। तकरबादक दृश्य तँ देखैत बनैत छल । मदमस्त, एक-दोसरसँ एककार भेल सभ नाचि रहल छल । "ई तँ रागिनी लागि रहल अछि ।" शरदकसंग ओकरा एतेक अंतरंग देखि हमर मोन जरि गेल। हम चिचिआ उठलहुँ- "रागिनी बस करू तमासा ।" औ बाबू हम एतबे बजले छलहुँ की केओ जोरसँ हमर गट्टा धेलक । कतबो कहिऐक ओ नहि छोड़लक । " अहाँ के छी आ हमरा एना किएक धेने छी?" "हम महाकालक दूत छी ।" "मुदा हमरा तँ किछु नहि देखा रहल अछि ।" "तकर समाधान अहाँक हाथक पिपही कए सकैत अछि।" हम ओहि पिपहीक बीचक बटन नहि दबा कए कतका बटन दबा देलिऐक । लएह ,ई तँ आओर गड़बड़ भए गेल । हम कतए आबि गेलहुँ? उलटैत-पलटैत कतहु अपने रूकि गेलहुँ । ओहिठाम कतहु किछु नहि देखा रहल छल । चारूकात अन्हार गुप्प। हमर पिपही से कतहु खसि पड़ल । ऊपर-नीचा कतहु किछु नहि छल । सामने एकटा पोखरि सन बुझाएल । बहुत जोर पिआस लागल छल । हम पानि पिबाक हेतु आगू बढ़ैत छी । ताबतेमे भयाओन अबाज सुनाएल- "खबरदार! जौँ आगू बढ़ब तँ रौरब नर्कमे धसि जाएब।" "हमरा तँ ई पोखरि बुझाएल, तैँ ओमहर जा रहल छलहुँ।" "ई अंधलोक थिक । एहिठाम किछु स्पष्ट नहि देखाइत छैक, ने बुझाइत छैक ।" "अहाँ के छी? अहाँक नाम की अछि आ हमरा एना किएक पकड़ने जा रहल छी?" "हम छी, प्रभु ।" "अहाँ तँ हमर पिता छी।“ "रहल होएब कहिओ । मुदा आइ-काल्हि हम महाकालक चाकरीमे छी । ओ अहाँकेँ बजओलथि अछि।" "अहाँ कहिआ एमहर आबि गेलहुँ ।" "अहाँ हमरासभकेँ असमयेमे छोड़ि गेलहुँ । हम ई दुख बरदास नहि कए सकलहुँ । थोड़बे दिनक बाद हमहूँ गुजरि गेलहुँ।" "हम तँ अहाँक पिण्डदानो नहि कए सकलहुँ?" "आब तकर की माने छैक? जखन अहाँ रहबे नहि केलहुँ तँ पिण्डदानक कोन सबाल उठैत छैक? फेर पिण्डदानसँ होइते की छैक? एतेक गोटे जे अंधलोकमे बौआ रहल अछि से किएक? एहिमे कतेकोकेँ ओकर संतान सभ मरला पर जबार केने रहैक,बैदिकी श्राद्ध आ पता नहि की,की केने रहैक। आ ढ़ाकक तीन पात । ओहोसभ ओहिना बफारि तोड़ि रहल अछि । असलमे मोन शुद्ध रहितैक तखन ने? अंत-अंत धरि हेराफेरी मे लागल रहलैक । निर्दोष लोककेँ सतबैत रहलैक। एहन लोकक आओर भइए की सकैत छलैक ? गीतामे भगवान तैँ ने कहने छथिन जे अंतिम कालमे जे जेहन सोचैत रहत तेहने ओकर गति होएत ।" " मुदा हमर तँ किछु करू । अहाँ तँ अपन लोक छी । अहाँ नहि मदति करब तँ के करत? पितासँ बढ़ि कए के भए सकैत अछि?" । " " एहिठाम मृत्युलोकक हिसाब नहि चलैत छैक । " "ई कोन न्याय छी?" "न्याय-अन्यायक हिसाब करए बला हम के?" " तँ के करत?" "महाकाल! "ऐँ!" "आओर के करत?" किछुकालमे हम महाकालक दरबारमे उपस्थित कएल गेलहुँ। -7- "सरकार! हमरासँ गलती भए गेल ।" "तोरासँ वारंबार एना किएक भए रहल छह? ई कोनो मृत्यु लोक नहि थिकैक जे हेराफेरीमे लागल रहबह । एहिठाम सभकिछु स्वचालित छैक । एमहर-ओमहर करबह तँ तुरंते पकड़ल जेबह ।" "मुदा हमरे संगे एना किएक भए रहल अछि?" "ई तोहर भ्रम छह । जे केओ एहन करत तकरा ओहिना हेतैक । " "मुदा कैक गोटाकेँ तँ बहुत सुखी देखैत छी ।" "इएह ने गड़बड़ी करैत छह । सदिखन अनके प्रति सोचैत रहैत छह ।" "एहिसभसँ बचबाक किछु व्योंत करिऔक कारण हमरा तँ अपने से सभ होमए लगैत अछि ।" "कहलिअह से तूँ बुझलह नहि । एतेक ककरा समय छैक जे तोरामे लागल रहत। तोरा पिपही देलिअह । ओहीमे समाधान छलैक । तूँ ओकर गलत-सलत बटन दबा दैत छलहक । ओ निष्क्रिय भए गेल आ तोरा अंधलोकमे पटकि देलकह ।" "आब की हेतैक? किछु तँ रस्ता निकालबै नहि तँ हम तँ बौआइते रहि जाएब ।" "से हम की करबह? जेहन तोहर कर्म हेतह,तेहने ने भेटतह। एहिठाम तँ पूर्वजन्मक कर्मक हिसाबे सभकिछु फलाफल होइत अछि ।" ""हमर कल्याण करू । कोनो ऊपाय करू जाहिसँ हमरा नीकठाम जोगार लागि जाए।" "जोगार...? कहलिअह से बुझलहक नहि?एहिठाम जोगारक गुंजाइस नहि छैक । जे हेतैक से अपने हेतैक ।' "मुदा कहिआधरि हेतैक?" "तोहार फाइल हरा गेल अछि । तेँ निर्णयमे देरी भए रहल अछि । धैर्य राखह । ताबे ई पिपही राखह । एहिमे कोड लागल छैक । ध्यानसँ एकरा चलबिअह । जँ फेर किछु गड़बड़ केलह तँ तूँ जानह आ तोहर काज जानए ।" हम पिपही संगे बान्हल कागजमे सँ कोड पढ़ैत छी आ कोड संख्या एक दबा दैत छी। औ बाबू ! भक दए इजोत भए गेल। चारूकात देखाए लागल । महाकाल चाकर समेतं बिला गेल छलाह। आब बुझलिऐक जे ई पिपही केहन उपयोगी अछि । जरूर महाभारत कालमे इएह वा एहने कोनो यंत्र व्यास संजयकेँ देने गेल रहथिन ,नहि तँ घरे बैसल ओ सभटा खिस्सा धृतराष्ट्रकेँ कोना सुनाबति? आइ-काल्हिक टेलीवीजन भए सकैत अछि ओकरे प्रतिकृति होइक किंवा ओहीमे सँ किछु-किछु गुण जेना-ने तेना हासिल कए लेने होथि । जे होइ मुदा ई अछि अजूबा यंत्र , एहिमे कोनो सक नहि। सभसँ कठिन छल एकर कोडकेँ मोन राखब । ओना पुर्चीमे सभकिछु लिखल छलैक मुदा जौँ ओ हरा गेल किंबा फाटि गेल तँ फेर ओएह लफड़ासभ शुरु भए सकैत अछि । इजोत होइतहि हमरा लखनपुर आ मौजपुरक बीचमे बनल पुल देखाएल । ओतए किछुगोटे श्यामकेँ घेरि जोर-जोरसँ नारा लगा रहल अछि । "तिरपित बाबू जिंदाबाद । तिरपित बाबू अमर होथि ।" तिरपितक लहास लेने किछुगोटे घुमि रहल छलाह । श्याम हुनकासभकेँ हाथ-पैर जोरि रहल छथि । मुदा केओ हुनकर सुनि नहि रहल अछि । पुलक दुनूभाग पुलिस घेरने अछि । लगैत अछि जेना कोनो जबरदस्त कांड भए गेल अछि। हमरा नहि रहल गेल । यद्यपि महाकालक चेतौनी हमरा मोने छल तथापि गामक बात छलैक,नहि मोन मानलक ,भेल जे जँ एक बेर अपने जा कए देखि सकी तँ बढ़िआँ रहत ,सही समाचार भेटत आ जिज्ञासा सेहो कए लेबैक । ई बुझेबे नहि करए जे तिरपित केँ एना किएक भेलनि । जरूर श्याम किछु झञ्झटि केने होएत । असली बात तँ ओतहि पता लागत । मुदा जाएब कोना? हमरा ई बात नीकसँ बूझल छल जे आब हम ओ मनोज नहि थिकहु जे रागिनीसंगे इसकुलक रस्तामे खेलाइत रहैत छल । जकर हाथ-पैरमे दम छल,जे जखन जतए चाहए चलि जाइत छल । आब तँ हम की छी से अपनो नहि बुझाइत अछि । महाकालक देल पिपही आ तकर गुप्त कोडक बले कतेक कुदब ? अपन हालपर अपने हँसी लागि रहल अछि। एक मोन कहैत अछि- "जखन अहाँक ई हाल अछि तँ कथीक लौलमे पड़ल छी?" दोसर मोन कहैत -" जा धरि स्मृति काज कए रहल अछि,आ मोनमे भावनाक संचार भए रहल अछि ताधरि अहाँ कोना बँचि सकैत छी ? बँचिओ कए कतए जाएब?संसारसँ बँचिओ जाएब मुदा अपने-आपसँ? कोनो उपाय नहि छैक अपनासँ बँचबाक । " फेर मोन होइत-"अहाँ तँ स्वयं समस्या ठाढ़ केने छी? ने अहाँकेँ देह अछि ने माथ । लोकसभ ई बात बुझिओ रहल अछि । तखन अहाँक कोन दायित्व शेष रहि गेल जे एतेक व्यग्र छी?" फेर दोसर मोन कहैत-"सबाल दायित्वक नहि छैक?" "तँ कथीक छैक?" "हमर अपने मोनमे एहि तरहेँ अन्तर्द्वन्द होइत रहल, ताधरि जाधरि ओ लहास अदृश्य नहि भए गेल । की भेल, कोना भेल तकर जिज्ञासा बनले रहि गेल । एना दृश्य-अदृश्य होइत घटनाक्रमसँ हम अचंभित छलहुँ। सभसँ बेसी चिंता महाकालक देल पिपही रक्षा लए होइत छल । हमरा लगमे तँ जे छल से ओएह छल आ जँ ओ फेर गुम भेल तँ भगवाने मालिक । पिपही कोड मोन रखबाक जतेक चेष्टा करितहुँ ततेक जल्दी ओ बिसरा जाइत छल । तेँ पिपहीसंगे कोड बला कागजकेँ सम्हारि कए राखब बहुत जरूरी छल । निश्चय ई पिपही किछु विशेष छल । कीसभ एकर विशेषता छलैक से केओ कहलक नहि ,ने ओकरा संगे कोनो सूची छलैक जे पढ़ि कए सभबात शुरुएमे बुझि लितहुँ । इएहसभ सोचैत रही कि कोड संख्या एक फेरसँ दबा गेल । फेर ओएह पूल देखा रहल छल मुदा ओतए लोकक भीड़ छटि गेल छल। तिरपितक लहास लेने किछुगोटे "रामनाम सत्य है" कहैत बहुत आगू चलि गेल छलाह मुदा श्याम अखनो पूलक कातमे पुलिस बला सभसँ गप्प कए रहल छलाह । मुदा ई की? ओ तँ बूढ़ लागि रहल छलाह । केसो पाकि गेल छलनि । समयक गतिक ताल-पातरा नहि बुझा रहल छल । हमरा तँ लागए जेना हम किछुए कालपूर्व अपन गामसँ अएलहुँ अछि। मुदा एतबे कालमे एतेक परिवर्तन कोना संभव भए सकैत अछि ? फेर भेल जे जरूर ओहूमे किछु रहस्य हेतैक । सोच-विचारक क्रममे पिपही कोड संख्या नौ दबा गेलैक। औ बाबू! लगलैक जेना पुलिसक सायरन बाजि रहल अछि । रहि- रहि कए अबाज आबए लागल- "की बात? हमरा किएक बजओलहुँ ?" "हम कहाँ ककरो बजओलिऐक?" "बेकारक बहस नहि करू। की पुछबाक अछि से बाजू नहि तँ फेर ई मौका नहि भेटत?" "श्याम एतेक जल्दी बूढ़ कोना लागि रहल अछि?" "लागि नहि रहल अछि, भए गेल अछि । मृत्युलोकक समयक गणना बहुत छोट छैक । दिव्यलोककक एकपलमे एतए कतेको बर्ख बीति जाइत अछि ।" "ओ़! ई तँ अद्भुत अछि ।" "जे अछि, से अछि, मुदा अहाँ कान खोलि कए सूनि लिअ। पिपहीक कोड सावधानीसँ प्रयोग करू । आब अहाँ लग मात्र दूटा अवसर अछि । तकरबाद की होएत से हमहूँ नहि जनैत छी ।"-से कहि ओ अबाज लुप्त भए गेल । -8- पिपही आ कोड बला कागजकेँ नीकसँ रखलाकबाद सामने राखल बेंचपर सुस्ताइत छलहुँ। ओहिठाम करेटक -करेट दिव्यरस राखल छल । केओ चौकीदारो नहि छलैक । जे जेमहर सँ आएल एकटा सीसी उठओलक आ गटकि गेल । फेर दोसर सीसी गटकि गेल । एहि तरहेँ सीसीपर सीसी ढ़ाड़ि रहल छल । दिव्यरसक प्रभावसँ ओ सभ मस्तीमे नचैत-गबैत आगू बढ़ि जाइत छल । चारूदिस मनमोहक ओ मादक दृश्य छल । हमरा नहि रहल गेल। हम तर्र दए हाथ बढ़ओलहुँ आ सीसीकेँ अंदर केलहुँ। औ बाबू! जहाँ एकघोंट भीतर भेल हेतैक कि सौंसे देहमे जेना करेंट लागि गेल। आब होमए लागल जे रागिनी कहुना लगमे रहैत । हमहूँ नचैत-गबैत आगू बढ़ि जइतहुँ । एतबा सोचिए रहल छलहुँ कि सुनैत छी- "की रागिनी, रागिनीक रट लगेने छी। एहिठाम कोनो लोकक कमी छैक जे अहाँ मृत्युलोक जकाँ भोकारि पारि रहल छी।" किछु सोचितहुँ,किछु बुझितिऐक ताहिसँ पहिने एकटा अद्भुत सुंदर तरुणी हमरा देखाइत छथि । ओ देखैत सौंदर्यक पराकाष्ठा छलीह । सौंसे देहसँ जेना इजोत निकलि रहल छलैक। कहि नहि विधाता कोन क्षणमे हुनका गढ़ने हेताह? सुगंधसँ संपूर्ण वातावरण महमह करैत छल । "अहाँ के छी?" "हम छी दिव्यपुरक प्रसिद्ध राजनर्तकी मंजुषा।" "ओ! अहाँक स्वागत अछि ।" मंजुषा दिव्यरसक दूटा सीसी अपने हाथे निकालैत छथि । एकटा सीसी अपने गट-गट अंदर कए लैत छथि आ दोसर हमरा दैत छथि। "हम तँ कैकटा सीसी पहिनहि पीबि चुकल छी" "कोनो बात नहि एकटा आओर सही ।" दिव्यरसक असर ततेक जोरदार भेल जे पिपही किछु सोह नहि रहल । मंजुषाक संग रंग -रभस करैत काल ओकर कोनो बटन दबि गेलैक । बटन की दबेलैक,जुलुम भए गेलैक। आब तँ हमरा किछु नहि बुझाइत छल,किछु नहि देखाइत छल। "आब की सोचि रहल छह । एतेक बुझा कए कहने रहिअह मुदा सीसीपर सीसी ढ़ारने जाइत छलह । पिपही तँ सम्हारि कए रखितह ।" "अहाँ के छी?" " तिरपित, तोहर मास्टर ।" "एहिठाम की कए रहल छी? अहाँक तँ लहास देखने रही। ओहिदिन पुल लग लोकक मेला लागल छल । सभ श्यामकेँ गरिआ रहल छल । " " ओ तँ बहुत पुरान बात अछि ।" " हमरा तँ किछुए काल पूर्व ई देखाएल छल ।" "छोड़ह ई गप्प-सप्प । केओ सुनि लेतह तँ मोसकिलमे पड़ि जेबह ।" "से किएक? ' " ई अंधलोक थिक । एहिठाम हम तोरासँ गप्प करबाक हेतु अधिकृत नहि छी ।" "से किएक?" "बेसी कबाइत नहि पढ़ह । भागह ......" -9- अंधलोकमे चारूकात अन्हारे-अन्हार छल । एहिठाम सौंसे दुनिआँक लोकसभ फँसल छथि । हुनका लोकनिक आत्मा एहिठाम बौआइत रहैत अछि । ककरो शांति नहि,कोनो सुख नहि,सभ परेसान,व्यग्र ,अभावग्रस्त । मृत्युलोकसँ देह तँ छुटि गेलैक तथापि ओकरसभक मोन ओतहि अटकल छल । एहन ठाम तिरपित कोना पहुँचि गेलाह? असलमे भेलैक ई जे अपने ओहिठामक केओ किरानी अंधलोकक हिसाब-किताब करैत छल। ओ बहुत दिनसँ एहि काज केँ करैत-करैत काजमे माहिर भए गेल छल । सभकेँ ओकरापर विश्वास रहैक । तकरे ओ फएदा उठओलक आ घोटाला कए देलक । जाबे-जाबे बात खुजलैक ताबे तँ बहुत किछु भए गेल छल। तखन की कएल जाए । ओकरा तँ हटा देल गेल मुदा काज कोना चलत? ताबते तिरपित ओतए पहुँचलाह । जेबाक तँ हुनका दिव्यपुरम रहनि मुदा महाकाल हुनकर इमान्दार छवि देखि अंधलोकक तहसीलदार बना देलाह । ईहो एक तरहें हुनकर नियति छल अन्यथा ओ दिव्यलोक छोड़ि अंधलोक किएक जइतथि? पिपही बटन कनिको एमहर-ओमहर होइक आ हम कतएसँ कतए फेका जाइत छलहुँ। एहन तँ कहिओ नहि देखने रहिऐक । कतहु-ने-कतहु हमरा बुझबामे दिक्कति भए जाइत अछि आ अछैते पिपहीकेँ हम बौआ रहल छी"- हम सएह सभ सोचैत अंधलोकक चौकपर ठाढ़ रही कि कोनो परिचितक अबाज सुनबामे आएल । "अहाँ के छी?" " ई तँ अहाँकेँ स्वयं बुझबाक चाही।" "बुझौअलि नहि बुझाउ । साफ-साफ कहू ।" "इएह तँ अहाँक दिक्कति अछि । " "जखन से बुझि रहल छी तँ हमर रस्ता सोझरा किएक नहि दैत छी?" "ई हमर काज थोड़े थिक ।" "मुदा अहाँ छी के?" "अन्तर्दृष्टि" "से की भेलैक।" "लएह । हम कहैत रही जे हम अहाँक प्रश्नक जबाब नहि छी कारण अहाँक लगमे हम छीहे नहि ।" "कारण?" " एहि प्रश्नक उत्तर तँ नियतिए दए सकैत छथि ।"-एतबा कहि ओ ओहिठामसँ लुप्त भए गेलाह । हुनका जाइत-जाइत ततेक प्रकाश भेल जे तकरे इजोतमे पिपही देखाएल । हम ओकरा लपकि लेलहुँ । एहिबेर हम पक्का निर्णय केलहुँ जे पिपहीकेँ आब एमहर-ओमहर नहि होमए देब। "मुदा अहाँक चाहने की होएत?" " अहाँ छी के?" " अहाँक नियति ।" "ओ तँ अहीँक द्वारे हमरा ई सभ परेसानी अछि ।" "हमरा द्वारे किएक होएत?" "तखन?" "तखन की?" "किछु तँ स्पष्ट करिऔक जाहिसँ हमर आगूक रस्ता साफ होअए । हम बुझि सकी जे आब हमर गंतव्य की अछि । हम कतहु चैनसँ रहि सकैत छी कि एहिना बौआइत रहब ।" "सभटा जखन अहीँ बुझि जेबैक तखन नियति की भेलैक?" "मुदा नियतिओक पाछू तँ कथुक हाथ हेतैक ।" "छैक किएक नहिॅ? " " एना बुझौअलि नहि बुझाउ ।" "मानि लिअ जे हम अहाँकेँ बुझाए देब तँ अहाँकेँ चैन होएत? नहि होएत? अहाँ फेर एकटा नव प्रश्नक संग ठाढ़ रहब।" " से किएक?" "कारण अहाँक इएह नियति अछि ।" ओकर सबाल- जबाब सुनि हम निरुत्तर भए गेलहुँ । हमरा छगुन्तामे देखि ओकरा दया आबि गेलैक । फेर अपने बजैत अछि- "नियति किछु नहि, अहीँक पूर्व कर्मक प्रतिबिम्ब अछि । एकरा अहाँ किछु नहि कए सकैत छी । जे अहाँ कए सकैत छलहुँ से कए चुकल छी । आब तँ ओ अपन काज कए रहल अछि ।" "मुदा हमरा अहिसभ सँ मुक्ति कोना भेटत? कोनो रस्ता होइक तँ कहू।" "रस्ता तँ अन्तर्दृष्टिएसँ भए सकैत अछि।" "मुदा से हमरा कहिआ आ कोना भेटत?" "प्रतीक्षा करू ।" से कहि ओ अबाज लुप्त भए गेल । कतबो प्रयास केलहुँ ओ वापस नहि आएल, दोबारा ओकरा नहि सुनि सकलहुँ । चारूकात एमहर-ओमहर बौआइत रही । भेल जे जाबे हमर हिसाब नहि फरिछा रहल अछि,जाबे नियति हमर दिसा स्वयं नहि तय कए दैत छथि ताबे एहि पिपहीकेँ सम्हारि कए राखी। एहीमे कल्याण अछि । "सेहो तखने होएत जखन नियतिकेँ से मंजूर होइक ।" से सुनितहि मोन भेल जे ठोहि पारि कए कानी । कहिअनि- "हे विधाता! हमरापर दया करू । " मुदा हम असमर्थ भेल ओहिना अंधलोक चौराहापर ठाढ़ रहि गेलहुँ । संभवतः हमर इएह निएति होअए-?" -10- हम पिपहीकेँ सम्हारि कए रखबाक प्रण कए लेने रही मुदा ओकरा रखितहुँ कतए? ने अंगा छल ,ने जेबी,ने बटुआ । एहनो समय हेतैक से नहि सोचने रही । हमही एतेक दुबिधामे छी की आओरो लोकसभ अहिना परेसान अछि?किछु कहल नहि जा सकैत अछि । सुनने रहिऐक जे मृत्युसँ जीवनक अंत भए जाइत अछि । जीवनक जे होइत होइक मुदा समस्याक अंत तँ नहिऐ होइत बुझा रहल अछि । मौजपुर हो वा लखनपुर सभगामक लोकसभ गाहे-बगाहे एतहि पहुँचि गेलाह । बात ओतबे रहितैक तँ कोनो बात नहि । देश-विदेशक लोकसभ एहिठाम विद्यमान छथि,समयक घात-प्रतिघात सहि रहल छथि । किछुगोटे एहनो छथि जे एखनो मृत्युलोकमे अपन अर्जित अकूत संपत्तिकक हेतु बेचैन छथि । एहने एकटा व्यक्ति छलाह श्याम । कहि नहि कहिआ आ कोना अंधलोकक द्वारिपर पड़ल छथि । रौद,बसातसभ लागि रहल छनि । कोनो प्रकारक सुविधा नहि भेटि रहल छनि। चाही सभटा,भेटि किछु नहि रहल छनि । पिआस,भूखसँ छटपटा रहल छथि । समाधान किछु नहि । तिरपित कैक बेर अबैत-जाइत हुनका देखैत छथि । हुनकर बास अंधलोकेमे छनि । श्यामक दशापर हमरो दया अबैत रहैत अछि। पिपहीकेँ बेर-बेर उलटि-पुलटि कए किछु करबाक प्रयासमे रही । हमरा बसमे आओर किछु छलहो नहि । तिरपित जँ देखेबो करितथि तँ बेसीकाल टरका दैत छलाह । असलमे ओ अपने काजसँ बहुत व्यस्त छलाह । महाकालक विश्वस्त हेबाक कारण सभटा संवेदनशील फाइल हुनके जिम्मा छल । किछुदिन पहिने भेल धांधलीमे बहुतरास फाइलसभ एमहर-ओमहर भए गेल रहैक। तकर जाँच-पड़ताल चलिए रहल छल मुदा एखन धरि किछु निजगुत पता नहि चलि सकल । तिरपिते एहन व्यक्ति छलाह जिनका हम जनैत छलिअनि,जे महाकालक कृपापात्र छलाह । मुदा ओ तँ सदिखन अपन काजमे लागल रहितथि । ककरोसँ,कथुसँ, किछु लेना-देना नहि । जखन कखनो गप्प करबाक प्रयास करी हुनकर संग चलि रहल अंगरक्षकसभ भयावह रूप धए लैत । हम सकपका जाइत छलहुँ । तिरपित काका हँसि दितथि आ आगू बढ़ि जइतथि। मोने-मोन सोची जे तिरपित तँ एहन निसोख नहि छलाह । कैक बेर इसारासँ ओ किछु बुझेबाक प्रयास करितथि मुदा हम बुझितिऐक तखन ने? हमर ने कोनो बगए छल ने कोनो ठेकान । कालक वशीभूत भए चारूकात बौआ रहल छलहुँ । एहिना एकदिन एकटा चौक लग बैसल छलहुँ । ओहिठाम एकटा मार्गदर्शक लागल छलैक जाहिमे तीनटा दिशासूचक पट्टिका छल । सभसँ ऊपर दिस दिशा निर्देश करैत उज्जर रंगक पट्टिका छल जाहिमे लिखल छल-दिव्यलोक । बीचमे एकटा कारी रंगक पट्टिका छल जाहिमे नीचा दिस जेबाक संकेत बनल छल आ ओहिमे लिखल छल अंधलोक। सभसँ नीचा छल हरिअर आ पिअर रंगक पट्टिका जाहिपर लिखल छल मृत्युलोक । मृत्युलोकक दिशा सोझे सामने देखा रहल छल । कहक माने जे ओहिठामसँ एहि तीनूलोकमे गेनिहार लोकसभ गुजरैत छलाह । हम मोने-मोन सोचलहुँ जे ई तँ अद्भुत चौक अछि। किएक ने एतहि किछु काल बैसल रही । भए सकैत अछि जे किछु चमत्कारे भए जाए, हमरो कोनो ठेकान लागि जाए । ओहिठाम चुक्कीमाली बैसि गेलहुँ । बैसबाक क्रममे पिपही नौ नम्बरक बटन दबि गेलेक। औ बाबू तकरबाद तँ निरंतर अबाज आबए लागल-"महाकालक दरबारमे अहाँक स्वागत अछि । आ से ततेक तरहक भाषामे दोहराओल जाइक जे मैथिलीमे घोषणा सुनबाक हेतु कतेको काल धरि प्रतीक्षा करए पड़ि रहल छल । सोचलहुँ जे अगुताइ नहि । हम चुपचाप सुनैत रहलहुँ । जहाँ मैथिलीमे घोषणा भेलैक की तर्र दए बजलहुँ॒- "हमरा ई कहू जे हमर हाथक पिपहीमे की-की सुविधा अछि आ एकरा नीकसँ केना चलाओल जा सकैत अछि जाहिसँ एकर व्यापक उपयोग होइक ।" " एतेक दिनसँ ई पिपही अहाँक हाथमे अछि आ अहाँ आब ई प्रश्न कए रहल छी ।" "हमरा माफ करू । हम बहुत परेसानीमे समय काटि रहल छी । कखनो किछु, कखनो किछु भए जाइत अछि ।" "सभक जड़ि अछि अहाँक नियति । एकरासँ पछोड़ छुटब असंभव थिक । ई पिपही अहाँक बहुत मदति कए सकैत छल । नियतिवश अहाँ सेहो ठीकसँ नहि कए पाबि रहल छी ।" "एकर समाधान किछु छैक कि नहि?" "एहिठाम मौजपुर आ लखनपुर बला गप्प तँ छैक नहि जे लोक दोसरक मामिलामे टांग अड़बैत रहए। अहाँ इएह करबाक अभ्यस्त रहबाक कारण लगातार परेसानीमे पड़ि जाइत छी।" "तखन की करी?" " ध्यानसँ सुनू । अहाँक पिपही एही लेल देल गेल अछि जे अंतरदृष्टि सक्रिय हेबा धरि अपन समय सुखपूर्वक बिता सकी । एहिमे सभ साधन छैक । एकर कोड हम बजैत जाइत छी, अहाँ ध्यानसँ सभटा सुनैत जाउ । अहाँक सभ समस्याक समाधान अपने होइत रहत ।" तकरबाद ओ पिपहीमे देल गेल तरह-तरहक सुविधा आओर तकरा प्राप्त करबाक हेतु कोडक जानकारी देबए लगलाह। शुरुएमे कहैत छथि- " अहाँ तँ एकबेर हेल्पलाइनक उपयोग कए चुकल छी। आब मात्र दूटा अवसर अहाँक लग अछि । तकरबाद ई पिपही निष्क्रिय भए सकैत अछि । एहि बातसँ सावधान रहब। " तकरबाद ओ धराधर कोड बजैत गेलाह । मुदा हमरा तँ किछु मोन नहि रहल "-हम कहलिअनि। " अहाँ एहन डपोरसंख कहिआसँ भए गेलहुँ । हम फेरसँ सभ किछु दोहरा रहल छी जँ अहाँ एहूबेर ध्यान नहि रखलहुँ तँ अहाँक भगवाने मालिक । हमरा आनोठामक काज देखबाक अछि। दरबारमे बहुत लोकक जिज्ञासा आबि रहल अछि । हम अहींमे लटकल नहि रहि सकैत छी ।" तकरबाद फेर ओ कोडसभ आ तकर काज कहि गेलाह । हम सतर्क रही । मुदा भेल ओएह । जतेक प्रयास केलहुँ सभ व्यर्थ चलि गेल । तीनटा कोड मात्र ध्यानमे रहल , शेष सभ फुर्र भए गेल। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.कुमार मनोज कश्यप-अधः पतन कुमार मनोज कश्यप अधः पतन
आई अखबारक सुर्खी मे आयल खबरि जे - -विदेश मे कमऊआ बेटा के माय-बाप के मरबाक जनतब भेटलै लहाश के सड़ि-गलि गेलाक बाद- सभ चौक-चौड़ाहा पर गर्मा-गरम बहस के मुद्दा छलै। माय-बाप अपन पेट काटि एकमात्र बेटा के पढ़ा-लिखा कs सुयोग्य बनेलकै। बेटा नौकरी करय अमेरिका की गेलै; ओतहि के भs कs रहि गेलै। बेटा-पुतोहू आजाद ख्याल के आ विदेशी संस्कृतिक रंग सs रंगल ..... बूढ़ माय-बाप के अपना संग राखब अपन स्वतंत्रता मे बाधक लगलै। परिणामतः बूढ़हा-बूढ़ही अपन फ्लैट मे बाँचल जीवन काटैत छलै। दुर्भाग्य एतबे नहिं, बूड़ही के तेहन लकबा मारलकै जे हाथ-पैर के संग-संग बोलियो बन्न भs गेलै। बूड़हा ओकर सभ परिचर्या करैत छलै। बेटा के कर्तव्य बस एतबा धरि छलै जे मास-दू मास पर फोन कs कs हाल-चाल पूछि लै। दुर्भाग्य के अततः तखन भेलै जखन एक राति बूड़हा जे सूतलै से फेर उठलै नहिं। बूड़ही अथबल आ बौक ..... चाहियो कs साईत किछु कs नहिं पाओल हेतै आ अहुँछिया काटि कs अंततः ओहो प्राण त्यागि देने हेतै। फ्लैट सs सड़ाईन दुर्गन्ध पसरलै तखन पड़ोसी पुलिस के बजेलकै आ पुलिस केबाड़ तोड़ि दुनू नर-कंकाल बहार केलकै।
अखबारक एहि खबरि पर खसैत मानवियता, लोपित होईत मानवीय संवेदना, पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण, शहरीकरण सs अधः पतन होईत संस्कृति आदि नहिं जानी कतेको मुद्दा उठलै बहस मे लोक अपन-अपन सुनल-देखल खिस्सा सभ सेहो सुनेलकै, किछु लोक के भावना नोर बनि कs सेहो टघरलै। तकरा बाद सभ किछु सामान्य सन भs गेलै। अखबार के ओ बसिया पन्नो साईत कोनो आर काज मे आबि गेल हेतै। -सम्प्रति: भारत सरकार के उप-सचिव, संपर्क: सी-11, टावर-4, टाइप-5, किदवई नगर पूर्व (दिल्ली हाट के सामने), नई दिल्ली-110023, # 9810811850 ईमेल: writetokmanoj@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.प्रमोद झा 'गोकुल'- अप्रैल फूल (बीहनि कथा), लिक लिक (लघु कथा) प्रमोद झा 'गोकुल' १ अप्रैल फूल (बीहनि कथा)
कनडेरिये हमरा दिस ताकि नूनू अपना घर दिसका बाट पकड़लक ते हम अकचकाके खूब जोरसे टोकार मारलियै - सिताहल नढ़िया जकाँ मूहँ छुपाके किए भागल जाइ छेँ रे नुनुवाँ ! ओहो तुरुछिके खूब जोरसे गारि पढ़ैत कहलक -गाँ ..मा .. स्स ा.. सब के ! रखै जाइ जो अपन दोस्ती यारी !! ने नाढ़ो बेल तर जेती,ने बेलक मारि भटा भट खेती ! -आखिर भेलौए की से ते कह ! -भोरे भोर बजा के कतौ लाल मिरचाइक बुकनी मिलौल शरवत पियौल गेल ए ते कतौ नोनगरहा चाह ! तहू से ही नै भरलै भोलवा कनियाँके ते भैरियो गिलास झौवा नेवो गारिके पिया देलक ।उपरे परान रहि गेल ।एमहर नाभिसे ल के लोल तकक लहैर आ ओमहर बकरिक किदैन जकाँ मुहँ केने केने प्रान आच्छन्न भ' गेल ।आब तूँ की करै ले बजबै छेँ ? - ओह.. ! ओ सब आइ अप्रैल फूल बनौलकौ तोरा ,हम माछ भात खुएबौ ! जे सप्पत खुवालेँ । हँसैत बाजल गोनू । २ लिक लिक (लघुकथा)
थाकल ठहियायल रामधन रिक्साक घंटी टुन टुनवैत अपन झुग्गी मे पहुँचल.घन्टीक आबाज सुनि घरबाली रानी आ बेटा मगन दौड़ि के बाहर अयलै.बेटाक हाथ मे मधूरक डिब्बा पकड़बैत रामधन कहलकै- रे मगना ! ले ई महावीरजीक परसाद छियौ, सब बैँट खोटि के खा लिहें . कथीक खुशी मे महावीरजी के भोग लगौलकैये मिठाइ ? घरबाली ऐँठैत पुछलकै . -पिरितियाक परिच्छा नीक नहैंत खुशी खुशी समापत भ' गेलै तेँ, कबुलने छलियै. - बड्ड दिब केलकै.महावीरजी कौहना नीक नहैंत पास करादैतथीन छौंड़ी के .दीन रैत एकठाँड़ क' देने छलै पढ़ै खातिर. -अच्छे ई ते कहौ प्रीतो छै कत ? देखै नै छियै ओकरा ! - जैन नै की भ' गेलैये छन मे ओकरा ! अखने फन पर किओ किछ कहलकै कि तखन से मुरघोस लगौने छै.कतबो किछ पूछै छियै त' बजबे नै करै छै .ईहे जा के पूछौ ने तनी ! रामधन गुन्धुन मे परिगेल. कहूँ ई छौंड़ा त'ने किछ कहलकै !ई बात ध्यान मे ऐबते मगन से कड़क अबाज मे पुछलकै- -तूँ किछ ते नै कहलहीहे रे मगना ! - हम नै किछ कहलियैहे दिदिया के हौ बाबू ! -तहन की भेलैहे जे एना केने छै ? -ओकरे से पुछहक! साइत परिच्छा मे किछ भेलैये . -एँ..!परिच्छा मे की भेलै रौ ? किछ अकैन..हँ..आइ मारकिट मे धियापुताक भारी जलूस देखने छलियै.सब नारा लगबै छलै सिबिएस्सी मुर्दाबाद !आरो किदैन किदैन कहै छलै ..हँ पेपर लिक लिक बन्न करो! चोरों को सजा दो आरो किदैन किदैन . -एकर मतलब दिदियाक पेपर केन्सिल भ' गेलैहे हौ बाबू ! - शुभ शुभ बाज तहूँ ! - तहन दिदिये पूछि लहक ! -हँ चलै जल्दी ! मुरघोस लगौने प्रीतो भुइयाँ भुइयाँ पर चीछ फैर रहल छलि आ मूड़ी डोला डोला के अपने हाथें ओकरा मेटैबतो जैत छलि. बेटीक हाल देखि रामधनक कोंढ़ फैटि गेलै. ओ दौड़ के बेटी लग पहुँचल आ ओकर मूहँ उठवैत व्यग्रता सँ पूछ' लागल- -की भेलौ तोरा जे भेख एना बनौने छें बेटू ! जत्ते दूर तक पढ़बें से हम पढ़ेबौ दुन्नू भाइ बहीन के .तोरा बाप के आर किछ ने छौ हँ तहन ई रिक्सा छौ ! देखै छिहीन ने.. कोनो चिन्ता नै कर, कह की भेलौ ? एतबा सुनैत देरी प्रीतोक धैर्यक बान्ह टूटि गेलै.ओ फफैक फफैक के बापक गरा पकैर कनैत बाजय लागलि - -हँ हम सबटा बुझै छियै बाबू ! कोन धरानी तों हमरा आरू के पढ़बै छ' से ककरो से छिपल नै छै .तखन.. -तखन की गै ? पेपर लीक भ' गेलाक कारने केन्सिल भ' गेलै परिक्षा . -ऐ ले तुँ किए चिन्ता करै छेँ ?फेनो पढ़ जैम के आ देखा दहीन दुनियाँ के जे गरीबक बच्चा मे कतेक दम होइ छै!हँ एगो बात ते बुझा ई लिक लिक की होइ छै गै ! - लिक लिक नै हौ बाबू ! -तहन की ? -पेपर लीक भ' गेलैये.बिहुँसैत बाजलि प्रीतो -तैयो नै बुझलियौ ई अंरेजी बंरेजी . -ओह !नै बुझलहक ? प्राइवेट स्कूल बला अपन अपन खास बच्चा लग तीन घंटा पैहनै पहुँचा देलकै पेपर . बस्स एक कान दू कान वाट्सप पर पूरा अपन स्कुलक बच्टा लग पहुँचा देलकै. आब बुझलहक ! - ओ!ऐँ गै आ सरकार कुच्छो नै कहलकै ओकरा आरू के ! -हँ जाँच भ' रहल छै जे पकरेतै से जहल जेतै -बच्चा आरुक जीवन से खेलनिहार के इस्सर माफ नै करथीन. चल लैग जो बेटू फेनो अपन तैयारी मे. निसाँस छोड़ैत रामधन बाजल।
-प्रमोद झा 'गोकुल', दीप, मधुवनी (विहार); फोन -9871779851 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.८.प्रणव कुमार झा- पोथी चर्चा: "प्रीति कारण सेतु बान्हल": सम्पादक - श्री आशीष अनचिन्हार प्रणव कुमार झा पोथी चर्चा : "प्रीति कारण सेतु बान्हल": सम्पादक - श्री आशीष अनचिन्हार "प्रीति कारण सेतु बान्हल" पोथी श्री आशीष अनचिन्हार के संपादन मे प्रकाशित पोथी छैक जै मे वर्तमान मैथिली साहित्य जगत के दीप्तिमान स्तम्भ दंपत्ति श्री गजेन्द्र ठाकुर आ श्रीमती प्रीति ठाकुर केर मैथिली साहित्य जगत के लेल कैल गेल योगदान आ पुरातन मैथिली विवाह आ पंजी पद्धति के संरक्षण एवं संवर्धन लेल कैल गेल प्रयास आ योगदान पर प्रकाश देल गेल अछि। कुल 478 पृष्ठ के एहि पुस्तक मे 32 टा सहयोगी लेखक सबहक आलेख, संस्मरण, साक्षात्कार, आलोचना आदि छैक जे संप्रति साहित्य, इतिहास, पत्रकारिता एवं अन्य विधा सँ जुड़ल छैथ। जेना छोट-पैघ बहुते रास नदी सभ मिलि कय समुद्रक निर्माण केने होय। ऐ मे से कै टा त संप्रति मैथिली साहित्य जगत के जनल मनल हस्ताक्षर छैथ। पोथी केर विषय-वस्तु के मोट मोट तीन वर्ग मे हम वर्गीकृत करय चाहब : - i) श्री गजेन्द्र आ श्रीमती प्रीति ठाकुर केर पारिवारिक जीवन के गाथा आ ओय सब से जुड़ल संस्मरण आदि। ii) ऐ साहित्यकार द्वय के द्वारा मैथिली साहित्य एवं मैथिल संस्कृति के द्योतक कागजात सबहक अनुवाद आ डिजिटाईजेशन के अति महत्वपूर्ण काज मे योगदान आ ओकर यात्रा केर गाथा आ iii) साहित्यकार द्वय द्वारा कैल गेल काज सबहक विषय जेना पंजी प्रणाली आदि संबन्धित विषय सब पर आलेख आ चर्चा । ऐ पुस्तक के विभिन्न खंड एवं विषय सूची के शीर्षक केर रूप मे विभिन्न पारंपरिक लोकगीत सबहक पंक्ति देल गेल अछि जेना "आजु जनकपुर मंगल भुप सभ आओल हे.."। संप्रति हिंदी कथा लेखन विधा मे सत्य व्यास के लेखन मे सेहो एहन प्रयोग भेटईत छैक। ऐ तरहक प्रयोग पाठक मे विषय-वस्तु आ पोथी के ल क जिज्ञासा बढ़ाबै छैक। अलग अलग सहयोगी लेखक द्वारा अपन-अपन शैली में उपरोक्त तीन टा मे से कोनो एक वा एक से बेसी वर्ग मे आलेख लिखल गेल अछि जे साहित्यकार द्वय के सम्पूर्ण बेक्तिगत आ साहित्यक जीवन के विभिन्न पहलू के समावेशित करय अछि। लेख पढ़ई काल पाठक के रूप मे कतेक रास नव-पुरान संदर्भ सभ मस्तिष्क के सोझा उपस्थित भ जाइत छैक। संगहि मैथिल ब्राह्मण पंजी प्रथा जेहन विषय के प्रति जिज्ञासा आ कम से कम ऐ विषय पर सतही ज्ञान के संचार सेहो। आशीष अनचिनहार आ मुन्ना जी आदि द्वारा साहित्यकार द्वय के साक्षात्कार हुनक मनोवृति आ हुनक काज मे बेक्तिगत रुचि आदि मे जानय के अवसर दैत छैक। किछू लेखक अपन संस्मरण द्वारा श्री गजेन्द्र ठाकुर के पारिवारिक जीवन के सेहो निक चित्र झीकने छैथ आ पाठक के ओहि संबंध मे रोचक जानकारी प्राप्त करबा मे सक्षम बनाबै छैथ। आन आन आलेख, संस्मरण आ साक्षात्कार के अतिरिक्त श्री जगदीश चंद्र ठाकुर ’अनिल’ आ डॉ० कैलाश कुमार मिश्र द्वारा मिथिला पंजी प्रबंध पर लिखल आलेख पाठक केर रूप मे हमरा लेल बेक्तिगत रूप से खूब रुचिगर आ उपयोगी लागल। सुश्री कल्पना झा के आलेख सेहो मोन के छुलक आ गुदगुदेलक। एकठाम ओ कहय छैथ जे एकटा उमैर भेला पर किताब कीनैत डर होई छैन्ह जे नव पीढ़ी कहाँ कहियो ओय पोथी के उल्टेतै पलटतै। उल्टे दुनियाँ से बिदा भेला पर भ सकय अछि जे हुनका उपराग दैन जे ई की जमा क के ध गेलिह अछि। मुदा हमर ऐ विषय मे सोचनाइ अलग अछि आ जे कि हमर अपन अनुभव के आधार पर अछि। हमर बाबा जे की संस्कृत के विद्वान छलाह आ एकटा ठाकुरबारी मे पुरोहित। हम जखन नेने छलहु 9-10 वर्ष के तखने स्वर्गवासी भ गेल छलाह। हमरा याद अछि हुनक पेटारा मे बोरा के बोरा भरि भरि के आध्यात्म आ धर्म-संस्कृत केर पोथी सभ छलईन्ह। सभ किताब के हमर कक्का कबाड़ी मे बेच देलखिन मुदा किछु कल्याण विशेषांक, गीता आ पुराण हम छाँटि नेने रही (ओहि समय मे पुस्तक मे देल गेल फोटो सबहक लोभे) । बाद मे नहु नहु ओई पोथी सभ के पढ़ईत गेलहु त ओई सब मे हमरा रुचि आबय लागल। ओई समय मे हमर विचार-व्यवहार आ धर्म-कर्म मे हमर रुचि के आकार देबय मे ओय पुस्तक सबहक हम महत्वपूर्ण योगदान देखय छी। पितिया लगा के हम 7 भाई बहिन मे हमरे टा ओई पोथी सभ पर मोन गेल छल। अर्थात प्रोबेबलिटी त ओत्तौ 1/7ते छलई। ताहि लेल हमर ई विचार अछि जे जखन हम कथा या कथेतर के रूप मे किछु विचार-संस्कार अथवा किछु सूचना पोथी के आकार मे संरक्षित करय छी, त कम्मे प्रोबेबलिटी सही मुदा किछ न किछ चांस रहय छै जे अगिला पीढ़ी तक ओ विचार-संस्कार आ सूचना पहुंचय। ई पोथी सेहो एकटा कथेतर साहित्य छैक जै मे विषय पर किछु रोचक लेख त छैक तथापि विषक के गूढ़ता के कारण सब प्रकार के पाठक लेल मनोरंजक होय ई आवश्यक नहि। मुदा पुस्तक मे देल सूचना मैथिली साहित्य जगत एवं मैथिल संस्कृति दुनु के लेल संरक्षणीय छैक। ताहि लेल ऐ प्रकार के पोथी के संकल्पना संयोजन एवं सम्पादन लेल श्री आशीष अनचिन्हार जी बधाई, प्रशंसा आ साधुवाद के पात्र छईथ। मिथिला आ मैथिली से संबन्धित संस्था, कॉलेज आदि के पुस्तकालय मे ऐ तरहक पुस्तक के संग्रह हेबाक चाहिए। भौतिक रूप से सेहो पोथी नीक बनल अछि। पोथी केर कवर पेज, एकर कागत केर क्वालिटी, फॉण्ट, फॉण्ट साइज़, मुख्य आवरण आ पृष्ठ पेज केर रंग संयोजन, डिज़ाइन, फॉरमेट आदि नीक गुणवत्ता के बनल अछि जे पाठक के हाथ मे ल क पढ़े मे एकटा सुखदगर अनुभव कराबय छैक। पोथी डॉट कॉम के एकरा लेल सराहना कैल जा सकय अछि। पुनः ऐ पोथी लेल श्री आशीष अनचिन्हार जी, श्री गजेन्द्र ठाकुर जी आ श्रीमती प्रीति ठाकुर जी के खूब रास बधाई। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.९.अरविन्द गुप्ता- केदार बाबूः दीर्घ जीवन यात्रा, महान उपलब्धि अरविन्द गुप्ता केदार बाबूः दीर्घ जीवन यात्रा, महान उपलब्धि निश्चित रूपें दीर्घ जीवन यात्रा, महान उपलब्धि। प्रभात फाउंडेशनक मुकेश जी हमरा फोन कयलनि आ दुखद समाचार देलनि जे हमर प्रिय मैथिली लेखक केदार बाबू नहि रहलाह। ई खबरि अप्रत्याशित नहि छल, किएक तँ ओ विगत किछु बर्खसँ दमासँ पीड़ित छलाह, जाहि कारणे हुनका लेल घरसँ बाहर निकलब मुश्किल भऽ गेल छलनि। मुदा हमरा लेल ई समाचार विनाशकारी छल। दरभंगा जिलाक नेहरा गाममे 3 अप्रैल, 1936 केँ जन्मल श्री केदार नाथ चौधरी 2 अप्रैल, 2024क साँझ 88 वर्षक आयुमे अपन शरीर छोड़ि देलनि। ई घटना कोनो साहित्य प्रेमीक लेल दुखद अछि। हुनका बाद हुनक परिवारमे वृद्ध पत्नी श्रीमती कुमुद चौधरी आ दूटा बेटी क्रमशः किरण आ अर्चना छथिन। ममता गाबय गीत मैथिली भाषाक पहिल चलचित्र थिक। संगे ६ टा उपन्यास सेहो ओ लिखलनि। हमर परिचय श्री केदार नाथ चौधरी जी सँ भेल जखन हम लहरियासरायमे रहि रहल छलहुँ। जखन ओ अपन पहिल उपन्यास चमेलीरानीक सृजन कयलनि, ओ 2004मे एकरा प्रकाशित करबाक लेल दिल्ली आबि गेलाह। एहि पुस्तकमे राज्यक राजनीतिमे नैतिक पतनक चर्चा कयल गेल अछि। हमर छोट भाय दीपक नेशनल बुक ट्रस्टमे हिन्दी सम्पादक छथि; तेँ ओ सभ हुनका सँ भेँट करबाक लेल हमर घर अयलाह। दीपक हुनका कहलकनि जे ई पुस्तक एन. बी. टी. द्वारा प्रकाशित नहि होयत। हँ, यदि ओ चाहैत छथि तँ राष्ट्रीय पत्रिका 'साक्षी भारत' क प्रकाशक आ प्रधान सम्पादक बड़ भाइ साहिब अरविन्द गुप्ताजी अपन पुस्तक प्रकाशित कऽ सकैत छथि। हुनका ई 'प्रस्ताव' पसिन्न पड़ल। जखन हमरा कहल गेल तँ हमरा सेहो एकटा कुलीन व्यक्तिक सेवा करबामे खुशी भेल आ हम राजी भऽ गेलहुँ। पुस्तक तैयार कयल गेल आ अन्तमे प्रकाशित भेल। हमरा सभ लग तखन आइएसबीएन सेहो नहि छल, तेँ ई पुस्तक बिना आइएसबीएनके छपायल गेल छल। लोकसभ किताब लऽ लेलनि आ तेँ संयोगसँ हम प्रकाशक सेहो बनि गेलहुँ। दू साल बाद 2006 मे हुनकर दोसर किताब करार आयल। ई एकटा अलग भावसँ लिखल गेल पुस्तक छल। उपन्यास, जे जीवनक दार्शनिक पक्षकेँ उजागर करैत अछि, सामान्य पाठकक लेल दिलचस्प नहि भऽ सकैत अछि, मुदा गंभीर पाठकसभ एकर सराहना केलनि। अगिला साल 2007 मे चमेलीरानीक दोसर संस्करण निकालय पड़लनि। चमेलीरानी एते लोकप्रिय आ प्रसिद्ध भs गेल जे केदार बाबूकेँ पुस्तकक दोसर संस्करण प्रकाशित करबाक लेल पाठक सभक दबावक सामना करय पड़लनि। आ पाठक सभक भारी माँग पर हुनका एकर दोसर भाग 'माहुर' लिखऽ पड़लनि। ई पुस्तक 2008 मे प्रकाशित भेल छल। 2011 धरि हुनक पुस्तक करारकेँ पुनः प्रकाशित करय पड़लनि। एहि बेर पुस्तकक आवरण बदलि देल गेल छल। जखन हम लेखकक घर जाइत छलहुँ हम हुनका सँ भेँट करैत छलहुँ। ओ हमरा अपन जीवनक घटना आ अनुभव बड्ड रोचक ढंगसँ सुनाबैत छलाह। हम कहि सकैत छी जे हुनक कथोपकथन शैली बड्ड अद्वितीय छलनि। ओ अपन युवावस्थामे महन्त मदन मोहन दासजीक सङ्ग बम्बइमे मैथिलीक पहिल चलचित्र 'ममता गाबय गीत' क निर्माणक कथा सुनाबैत छलाह आ दोसर अमेरिका पलायन सहित दुनिया भरिमे हुनक यात्राक जे अनुभव छल सेहो सुनाबैत छलाह। फिल्मक कहानी लोक सभ लेल बड्ड रोचक अछि, तेँ हम हुनका फिल्म 'ममता गाबय गीत' के निर्माणक कहानी पर उपन्यास लिखबाक आग्रह कयलहुँ। ओ कहलनि जे हुनक किछु अन्य मित्र सेहो एहन अनुरोध कयने छलाह। लेखन गम्भीरतासँ शुरू भेल आ ई हमरा लग संस्मरण 'अबारा नाहितन' क रूपमे आयल। ई 2012 मे प्रकाशित भेल छल। एहि पुस्तकक प्रकाशनक सङ्ग केदार बाबू मैथिली साहित्यिक जगतमे आरो बेसी लोकप्रियता प्राप्त करय लगलाह। आब हुनकर किताबक माँग देशक सीमासँ बाहर नेपालक मैथिली धरि छल। सम्भवतः फिल्मक कहानीसँ बेसी एहि पुस्तकमे वर्णित फिल्मक निर्माणक कहानी लोक सभकेँ पसिन्न पड़लै। मैथिली भाषा आ मिथिला दुनियाक सेवाक भावनासँ चलचित्र बनेबाक लेल युवा सभक संघर्षक कथा एहि पुस्तकमे बड्ड रोचक रूपसँ अंकित अछि। एहि पुस्तकक कथा ई अछि जे एक दिन मैथिली-मिथिलाक सेवा करैत काल एहि युवक सभकेँ कोना 'अबारा' घोषित कयल गेल छल। एहि उपन्यासक अन्त धरि किछु तथाकथित मैथिली सेवकक दोहरा चरित्र पर अहाँ व्यंग्यात्मक भावसँ भरि जायब। केदार बाबूक लेखनक जादू आब साधारण पाठक वर्गकेँ पार कऽ शिक्षित लेखक आ सम्पादक सभ धरि पहुँचल। कोलकातासँ प्रकाशित पत्रिका मिथिला दर्शनक सम्पादक श्री रामलोचन ठाकुर हुनका अपन पत्रिका लेल एकटा धारावाहिक उपन्यास लिखबाक आग्रह कयलनि। केदार बाबूक धारावाहिक उपन्यास 'हीना' आब हुनक पत्रिका मे प्रकाशित होबऽ लागल। ई पुस्तक हुनक प्रवासक अनुभव पर आधारित अछि जखन उपन्यासक नायिका सैन फ्रांसिस्कोसँ बिहारक एकटा छोट गाममे अबैत छथि। जखन एहि पुस्तकक प्रकाशनक बात आयल तखन लेखक हमरा स्मरण कयलनि। हीनाक पहिल संस्करण 2013 मे प्रकाशित भेल छल। दोसर दिस 'अबारा नहितन' लोकप्रियताक सभ सीमा पार कऽ रहल छल। दरभंगा के हुनकर बहुत रास डॉक्टर दोस्त, जे मैथिली किताब पढ़िकऽ थकि गेल छलाह, हुनका ई किताब हिन्दी मे उपलब्ध कराबय के आग्रह केलनि। जखन ई खबरि हमरा लग आयल तखन हम तुरन्त अनुजवत कुमार परिमल द्वारा एकर हिन्दीमे अनुवाद करौने छलहुँ आ 2013मे ई पुस्तक सेहो प्रकाशित कयलहुँ आ एहि तरहेँ हिन्दी पाठकसभक जिज्ञासा शांत भेल। पुस्तक 'अबारा नहितन' क मैथिली संस्करण छपायल गेल आ दोसर संस्करण सेहो ओही साल प्रकाशित भेल। एहि बीच, मैथिली भाषाक लेल राष्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा गठित एकटा समिति पटनामे आयोजित अपन एकटा बैठकमे कतेको पुस्तक प्रकाशित करबाक निर्णय लेलक, जाहिमे अबारा नहितन सेहो एकटा छल। आ अन्ततः ई पुस्तक एनबीटीसँ 2016मे प्रकाशित भेल छल। आब कोलकाता स्थित पत्रिका मिथिला दर्शनकेँ फेरसँ केदार बाबूक नव उपन्यासक आवश्यकता पड़लै। तखन 'अयना' प्रकाशमे आयल; उपन्यासकेँ पत्रिकामे धारावाहिक रूप देल गेलै। एहि उपन्यासमे लेखक दिल्ली स्थित देशक सबसँ पैघ प्रकाशन गृहक मैथिली प्रकाशन गृहक प्रति अपन कथित द्विधा भावकेँ स्पर्श करैत छथि। 2018मे ई पुस्तकक रूपमे प्रकाशित भेल छल। ई लेखकक अन्तिम पुस्तक साबित भेल। एकर बाद केदार बाबू अस्वस्थ अनुभव करय लगलाह, कारण ओ दमासँ पीड़ित छलाह। हुनका लेल लेखन आब संभव नहि छल। अमेरिका, यूरोप, ईरान, जापान आ हांगकांग सन देशक यात्रा संस्मरणपर पुस्तक लिखबाक हुनक इच्छा ओहिना रहि गेलनि। एहि बीच बहुत रास किताब आउट ऑफ प्रिंट भऽ गेल। "चमेलीरानी" क तेसर संस्करण 2019 मे प्रकाशित भेल छल, जखन कि चारिम संस्करण 2020 मे प्रकाशित भेल छल। माहुर 2019मे न्यू कलेवरमे (दोसर संस्करण) प्रकाशित भेल छल। "हीना" क दोसर संस्करण 2020 मे प्रकाशित भेल छल। ई चक्र लगातार चलैत रहैत अछि। ई सभ पुस्तक हमर दिल्ली स्थित प्रकाशन गृह इंडिका इन्फोमीडिया द्वारा प्रकाशित कयल गेल छल। हुनक प्रारम्भिक पुस्तक सभ बहुधा उमाकांत झा जी द्वारा संपादित कयल गेल छल, जखन कि पुस्तक सभक प्रस्तावना भीमनाथ झा जी सन प्रख्यात विद्वान आ रामलोचन ठाकुर सन गंभीर सम्पादक द्वारा लिखल गेल छल। एहि पुस्तकक ब्लर्बमे पद्मश्री डॉ. मानस बिहारी वर्मा, प्रख्यात पत्रकार अरविंद मोहन आ सुजीत कुमार झा (आज तक फेम), पूर्व वरिष्ठ भारतीय रेलवे अधिकारी कामेश्वर चौधरीक लेखन सेहो शामिल अछि। प्रभात फाउंडेशनक अधिकारी मुकेश झा जी अपन पुस्तकक प्रचारमे बहुत सहयोग देलनि। स्वर्गीय महन्त मदन मोहन दास जी के जेठ बेटा आशुतोष कुमार जी, आर कमलेश झा जी सेहो हुनकर किताब के प्रचार केने छथि। समय-समय पर मिथिला दुनियाँक लोक हुनक साहित्यिक योगदान लेल सम्मान करैत रहलनि। 2013मे झारखण्ड मैथिली मंच, राँची द्वारा हुनका 'विदेह साहित्य सम्मान', 2016मे 'प्रबोध साहित्य सम्मान' आ 2016मे 'अबारा नहितन' पुस्तकक लेल 'केदार सम्मान' सँ सम्मानित कयल गेल छलनि। समय-समय पर केदार बाबूक जीवन आ लेखनपर पत्रिका सभमे चर्चा होइत रहल। हालहिमे श्री गजेन्द्र ठाकुर द्वारा सञ्चालित आ संपादित मैथिली केर सबसँ प्रतिष्ठित ऑनलाइन पत्रिका 'विदेह' हुनका पर केन्द्रित एकटा विशेषांक प्रकाशित केलक। ई अंक बाद मे प्रिंट रूपमे सेहो आबि गेल जे ओहि पर शोध करय बला छात्रक लेल सेहो उपयोगी अछि। बहुतो छात्र हुनकर साहित्य पर शोध सेहो कऽ रहल छनि। ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय सहित बिहारक अन्य विश्वविद्यालयमे स्नातकोत्तरमे हुनक पुस्तक सभक अध्ययन कयल जा रहल अछि। केदार बाबू, जे अपन जीवनक तेसर चरणमे लिखनाइ शुरू कयलनि, मैथिली पाठक सभक बीच एहन लोकप्रियता प्राप्त कयलनि जे विरले लोक प्राप्त करैत अछि। हुनकर लोकप्रियता एहन अछि जे पत्रिका मे या चर्चा के दौरान विद्वान अक्सर हुनकर तुलना हास्य सम्राट हरिमोहन झाक कृतिसँ करैत छथि। एहन महान साहित्यकारक दूटा इच्छा हुनक जीवनकालमे पूरा नहि भऽ सकल आ ओ छल 'चमेलीरानी' आ 'माहुर' पर एकटा फिल्म या टीवी धारावाहिक बनयबाक, जाहि सँ दर्शक आ पाठकक बीच व्यापक पहुँच बनै आ एहि दूटा उपन्यासक हिन्दी आ अंग्रेजी भाषामे अनुवाद होय। जीवनकालमे नहि, मुदा निकट भविष्यमे हुनक ई इच्छा शीघ्रहि पूरा हएत से उम्मेद अछि। निष्कर्षमे हम ई कहैत चाहैत छी जे हमरा एकटा पत्रिका सम्पादकसँ किताबक प्रकाशक बनेबाक श्रेय हुनका जाइत छनि। प्रणाम। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१०.रबीन्द्र नारायण मिश्र- माटि बजा रहल अछि रबीन्द्र नारायण मिश्र माटि बजा रहल अछि पछिला छओ सालसँ गाम नहि गेल रही। एहिसँ पूर्व भातिजक बिआहमे ओतए सन् २०१८मे गेल रही। जाबे माए जीबैत छलीह ताबे तँ ओहिठाम जेबाक अर्थ बुझाइत छल। माएसँ भेंट होइतहि सभ दुख बिसरा जाइत छल। ओहि समयमे दिल्लीसँ गाम जाएब कोनो मामुली बात नहि रहैत छलैक। कैकमास पहिनेसँ तकर योजना बनैत छल। यात्राक तिथि निर्धारणक बाद सभसँ पहिने रेलवे टिकट हेतु टीसनपर जा कए पाँतिमे घंटो ठाढ़ भए टिकट लेल जाइत छल। बहुत बादमे जा कए टिकट लेबाक प्रक्रियामे बहुत सुधार भेल। आब तँ घरे बैसल आनलाइन टिकट बनि जाइत अछि। टिकट लेलाक बाद जेबाक, ओहिठाम जा कए रहबाक आ सकुशल दिल्ली वापस हेबाक हेतु पर्याप्त टाकाक जोगार कएल जाइत छल। सामान्यतः ओतए परिवार सहित गेलापर ओ सभ मास-दू मास हमर सासुरमे वा ससुरजीक डेरापर रहि जाथि। हुनका सभकेँ ओतए छोड़ि हम जल्दीए वापस भए जइतहुँ। मास-दू मासक बाद परिवार आनबाक हेतु फेर ओमहर जाइ। वापसीमे सभगोटे संगे लौटी। हमर ससुर सन् १९९७मे स्वर्गबासी भए गेलथि। हमर मित्र लालबच्चा(स्वर्गीय विष्णुकान्त मिश्र) सन् २००९मे चलि जाइत रहलाह। सन् २०१५मे हुनकर पिता(स्वर्गीय चन्द्रधर मिश्र) सेहो चलि जाइत रहलाह। हमर माएक सन् २०१६मे देहावसान भए गेलनि। सन् २०२०मे हमर सासु सेहो चलि जाइत रहलीह। एहि तरहेँ कालक्रमे गाम-घरसँ लगाओक सूत्रसभ टूटैत चलि गेल। आब गाम जा कए ककरासँ भेंट करब? ओना गाम कोनो खाली भए गेलैक से बात नहि छैक। नव-नव कोठासभ बनि गेल अछि। बहुत रास लोकसभ सेवानिवृत्तिक बाद गाम वापस आबि गेल छथि। मुदा तेँ की? एही गुन-धुनमे बहुत दिनसँ रही। एमहर मुम्बईमे बसि गेल हमर मित्र शल्लुजी (शैलेन्द्र झा)क फोन आएल। ओहि समयमे हम अपन श्रीमतीजीक फिजियोथेरेपीक हेतु अस्पताल गेल रही। ओ मार्चमे गाममे अपन पौत्रक उपनयनमे भाग लेबाक हेतु आमंत्रित केलनि। तकर बाद दू-तीन बेर फेर आग्रह केलनि, पुछैत रहलाह जे हम टिकट लेलहुँ कि नहि। हमरा लागल जे ओ नहि अपन माटि बजा रहल अछि, जाए पड़त। आखिर हम दरभंगा जेबाक हेतु १७ मार्च २०२४क प्रथम श्रेणी एसीक टिकट लए लेलहुँ। वापसी यात्राक टिकट अखन नहि लेने रही। सोच-विचार करैत रही जे केना की करी? दरभंगासँ गाम वापस हेबाक टिकट कहिआक ली? गाममे उपनयन छलैक। एकादशी यज्ञ छलैक। प्रात भेने भोज होइतैक। दरभंगामे किछुगोटेसँ भेंट करबाक छल। संयोगसँ निर्मलीमे ओही लगपासमे २३ मार्च कए 'सगर राति दीप जरय' साहित्य-कथागोष्ठी आयोजित हेबाक छल। ई एकटा दुर्लभ अवसर छल। कैकसालसँ एहि कार्यक्रममे भाग लेबाक इच्छा छल। सगर राति दीप जरय कार्यक्रम निर्मलीमे होएत आ डाक्टर श्री उमेश मंडलजी एकर संयोजक रहताह से स्वयंमे पैघ बात छलहे। सगर राति दीप जरय शनिदिनक रातिमे होइत आ शोमदिन फगुआ छल। फगुआमे ग्रेटर नोएडाक अपन घरपर परिवार संगे रहबाक इच्छा छल। अस्तु, सभकिछुकेँ विचार करैत वापसी यात्राक हेतु २४ मार्च २०२४क वायुयानसँ टिकट लेलहुँ। दिनमे ११.४० बजे स्पाइस जेटक विमान दरभंगासँ खुजबाक रहैक। ताहि हेतु दू-घंटा पहिनहि हबाइ हड्डापर पहुँचबाक हेतैक। निर्मलीसँ दरभंगा भोरे सात बजे बिदा भए दरभंगा समयपर पहुँची ताहि हेतु बहुत माथापच्ची केलहुँ। २३ मार्च २०२४ कए दरभंगासँ निर्मलीक हेतु दानापुर-जोगबनी इन्टरसीटी एक्सप्रेसमे टिकट बनि गेल। मुदा निर्मली-सँ-दरभंगा वापसीमे एहन कोनो ट्रेनक पता नहि चलल जे हमरा दरभंगामे हबाइ जहाज पकड़ा सकए। तेँ निर्मलीसँ दरभंगा टैक्सीसँ पहुँचबाक मोन बनओलहुँ। ओही बीचमे डाक्टर कमलाकान्तजीक फोन आएल। ओहो निर्मलीक सगर 'राति दीप जरय'क कार्यक्रममे भाग लेबाक हेतु उत्सुक बुझेलाह। मुदा हुनकर समस्या छलनि जे ओ रातिमे बेसी काल नहि रहि सकताह, निर्मलीसँ जल्दीए लौटि जेताह। तेँ हुनका संगे जेबाक विकल्प ठीक नहि बुझाएल। अंततोगत्वा, उमेशजी निर्मलीसँ दरभंगाक हेतु टैक्सीक जोगार कए देबाक हेतु आश्वस्त केलनि। एहि तरहेँ दुनू दिसक टिकटक ओरिआन भए गेल। आब रहल रहबाक जोगार। संयोगसँ पोस्टल प्रशिक्षण केन्द्र बेला पैलेस, दरभंगाक अतिथि गृहमे मे हमरा रहबाक जोगार भए गेल। तकर लिखित संपुष्टि सेहो आबि गेल। आब तँ हम बहुत निचेन छलहुँ। १७ मार्च २०२४क नियत समयपर, माने लगभग सबा बारह बजे हम नई दिल्ली टीसनक प्लेटफार्म नंबर पाँचपर पहुँचि गेल रही। हमरा लग तीनटा सामान छल। ट्रेनकेँ लगितहि हम तीनू सामानक संगे एसी प्रथम श्रेणीक डिब्बा संख्या एच एकमे प्रवेश केलहुँ। ओहि डिब्बाक शुरुएमे हमर स्थान छल। थोड़बे कालमे ओहिमे एकटा परिवार अएलथि। ओ सभ दुनू बेकती आ दूटा बच्चा रहथि। तीनू शायिका हुनके छलनि। हम निश्चिन्त भए अपन जगहपर ओलरि गेल रही, फोनमे लागल रही कि ट्रेन खुजि गेल। पहिने प्रथम श्रेणी एसी डिब्बामे विक्रेतासभ नहि देखाइत छल। मुदा एहि बेर तँ रहि-रहि कए तरह-तरहक सामानसभ अबैत-जाइत रहल। हमहूँ अपन पसिंदक चीज वस्तु लैत रहलहुँ। सामान्यतः हम भोरुका पहरक बाद चाह नहि पीबैत छी। मुदा ट्रेनमे तीन बेर चाह पीलहुँ। आर किछु-किछु खाइत रहलहुँ। बड़ी काल धरि हमर सहयात्री सभसँ गप्प-सप्प नहि भेल। ओहो सभ अपनामे मगन रहथि। हमहूँ किछु-किछुमे लागल रही। ओ दुनू बेकती आपसमे बहुत नीक मैथिलीमे गप्प-सप्प करथि। एहि बातसँ हम बहुत प्रभावित भेलहुँ। असलमे ओ सभ झंझारपुरक लगीचक गामक रहथि, मुदा कैक सालसँ दिल्लीमे रहैत छथि। गाममे बहुत पैघ घर बनओने छथि। तकरा हेतु रखबार रखने छथि। गामपर बाबू रहैत छथिन एसगरे। माए किछु साल पूर्व पचपन सालक बएसमे मरि गेलखिन। हुनका बेर-बेर एहि बातक हेतु दुख प्रकट सुनिअनि जे ओ अपन माएकेँ नहि बचा सकलथि। कुल-मिला कए हमरा ओ सभ बहुत नीक लोक बुझेलथि। हम हुनकर प्रशंसा केलिअनि। तकर बाद तँ ओ सहटि कए हमरे लग बैसि गेलथि। हमरा ट्रेनमे बहुत कम निन्न भेल। आखिर जेना-तेना राति बितल, भोर भेल। हमर सहयात्री हमर सदिखन ध्यान रखने रहथि। बेर-बेर पुछथि- "कोनो काज होअए तँ कहब।" दोसर दिन साढ़े नओ बजे हमसभ दरभंगा टीसनपर पहुँचि गेल रही। ओहिठामसँ आटोसँ थोड़बे कालमे पीटीसी अतिथिगृह पहुँचलहुँ । अतिथिगृहक रखबार बीरुकेँ फोन केलहुँ। ओ तुरंत उपस्थित भए गेल। सूट नंबर तीनकेँ खोलि देलक। हम अपन सामानसभ ओहिमे रखबेलहुँ। यद्यपि ओ कोठरी पुरान सन लगैत छल, मुदा ओहिमे सभ सुविधा छल। एसी, टीभी, मच्छरदानी लागल सुसज्जित पलंग, कुर्सी टेबुल, सोफा। मोन गद-गद छल। बीरुकेँ ओहिठामक भोजनादिक व्यवस्थाक बारेमे पुछलिऐक। ओ कहलक-"हमरा एहिसभक जनतब नहि अछि। अपने संजयजीसँ वा सहायक निदेशकजीसँ गप्प कए लिअ। ओएहसभ किछु कहताह।"हम संजयजीसँ गप्प केलहुँ। तकर बाद सहायक निदेशकजी सेहो भेटलाह। हुनकासँ जानकारी भेटल जे ओहिठाम प्रशिक्षुलोकनि हेतु मेस चलैत अछि जाहिमे चारू टाइम भोजन, जलखै, चाहक ओरिआन छैक। अतिथिलोकनि सेहो प्रतिदिन २६० रुपया भुगतान कए ओहि सुविधाक लाभ उठा सकैत छथि। भोरे सात बजे चाह, नओ बजे जलखै, एकबजे दिनुका भोजन, साँझमे चाह आ रातिमे नओ बजे भोजन। सभकिछुक हेतु २६० रुपया मात्र सस्ते छैक। मुदा फूट-फूट रेट नहि छैक। कहबाक माने जे यदि एक्को बेर खाएब तँ २६० टाका लगबे करत। तेँ हम ओहिठाम मात्र एकदिन २२ मार्च २०२४क भोरक चाहसँ लए कए रतुका भोजन धरि केलहुँ । आन दिन एमहर-ओमहर घुमैत-फिरैत काज चलल। अतिथिगृहमे व्यवस्थित भेलाक बाद डाक्टर योगानन्द झाजीकेँ फोन केलिअनि- "हम दरभंगा आएल छी। अपनेसँ भेंट करए चाहैत छी।" "ओ! बहुत हर्षक बात। अपने कतए ठहरल छी?" "पीटीसी अतिथिगृहमे।" "हम तँ अखने अबितहुँ, मुदा हमर अंङनेमे एकगोटेक मृत्यु भए गेलनि अछि। हम कठियारी जा रह छी। काल्हि भेंट भए सकैत अछि। भोरे मोन पाड़ि देब।" "ठीक छैक।" तकर बाद भीम बाबूकेँ फोन केलिअनि। "हम दरभंगा आएल छी। अपनेसँ भेंट करए चाहैत छी।" "ओ! रबीन्द्र बाबू। बहुत भाग्यक बात। अपने जखन आबी, हम तँ घरेपर छी।" "हम आध-पौन घंटामे आबि रहल छी।" "आएल जाओ।" फोन कटि गेल। हम तैयार रहबे करी। बिदा भेलहुँ। पीटीसीसँ बाहर निकलि एकटा आटो १३० रुपयामे ठीक भेल जे हमरा भीम बाबूक ओहिठाम पहुँचा दैत। करीब आधा घंटाक बाद आटो लक्षमी सागार, पंचायत भवन लग पहुँचि गेल। आब ओहिठामसँ दक्षिन जेबाक रहैक, मुदा ओ दक्षिन दिस छोड़ि सगतरि बौआएल आ तमसाइओ गेल। बहुत मोसकिलसँ अगल-बगल लोकसभकेँ पुछि कए ओ पंचायत भवनसँ दक्षिन भीमबाबूक घरपर पहुँचल। आटोबला टाका लेलक आ बड़बड़ाइत चलि गेल। हम भीमबाबूक ओहिठाम पहुँचि गेल रही। भीतर होइतहि ओ स्वयं भेटलाह। हुनकर छोटपुत्र सेहो ओतहि रहथि। थोड़बे कालमे हुनकर श्रीमतीजी सेहो आबि गेलथि। भीम बाबू आ हुनकर परिवारक लोकसभसँ भेंट कए बहुत आनन्द भेल। लगभग एकघंटा हम ओहिठाम रहलहुँ। ओहिक्रममे तरह-तरहक गप्प-सप्प होइत रहल। ओ पुछलाह- "कतए रुकल छी?" "पीटीसीमे।" "से किएक? एतहि रहितहुँ।" हम की कहितिअनि? चुप रहि गेलहुँ। घंटा भरिक बाद हम हुनकासभसँ बिदा लेलहुँ। दरभंगा टाबरक रिक्सा केलहुँ। दरभंगा टाबरक हालति पहिनोसँ बेसी खराप बुझाएल। चारूकातक जगह अतिक्रमण भए चुकल अछि। तरह-तरहक दोकानसभ खुजल अछि। प्रात भेने सुनलिऐक जे ओहि अतिक्रमणसभकेँ हटाओल जा रहल छैक। दरभंगा टाबर पहुँचि सभसँ पहिने एक गिलास लस्सी पीलहुँ। तकर बाद दयाल भंडार पहुँचलहुँ। हमसभ जखन विद्यार्थी रही तखन दयाल भंडारक चुरा-दही बहुत नामी छल। हमसभ ओहिठाम बरोबरि खाइ। ओहि स्मृतिकेँ फेरसँ जगओलहुँ। मुदा दयाल भंडारक आब ओ हालति नहि बुझाएल। आब ओहिठाम अथराक अथरा दही राखल नहि देखाएल। सामान्य भात-दालि-तरकारीक भोजन बेसी गोटे करैत देखेलाह। हमहूँ सएह खेलहुँ। तकर बाद घुमैत-फिरैत अपन डेरा वापस पहुँचि गेलहुँ। पीटीसी स्थित अपन डेरापर पहुँचलाक बाद डाक्टर रमण झाजीकेँ फोन केलिअनि। ओ पटनामे छलाह आ २२ मार्च कए दरभंगा अओताह। ओही दिन हुनकासँ भेंट करबाक मोन बनओलहुँ। दोसर दिन भोरे पीटीसीक परिसरमे घुमए बिदा भेलहुँ। ओहि परिसरमे बहुत रास विभागीय कर्मचारी अधिकारी लोकनि प्रशिक्षण हेतु अबैत छथि। मास-दू मास ओतए रहैत छथि, प्रशिक्षण समाप्तिक बाद वापस अपन कार्यस्थानपर चलि जाइत छथि। ओहि परिसरमे प्रशिक्षणक सभटा सरंजाम अछि। चारूकात तरह-तरहक फूल लागल अछि। भोरे-भोर प्रशिक्षु-लोकनिकेँ अपने हाथ बाढ़नि लेने स्वच्छता अभियानमे लागल देखलहुँ। बहुत रास प्रशिक्षुसभ व्यायाम करैत देखेलाह। भोरे सात बजे चाह पीलाक बाद ओ सभ अपन-अपन किलासमे चलि जाइत छलाह। नओ बजे जलखै होइत छल। तकर बाद फेर तरह-तरहक किलास सभ चलैत रहैत छल। हमर डेराक लगीचेमे प्रशीक्षुलोकनिक किलास होइत छलनि। तेँ प्रार्थनाक सस्वर गायन घरे बैसल सुनैत छलहुँ। परिसरमे टहलैत काल एकटा हनुमान मंदिर देखाएल। ओ मंदिर प्रायः बंद पड़ल अछि। कतहु केओ नहि छल। मंदिरमे ताला लागल छल। कहि नहि ओहिमे पूजा होइतो अछि कि नहि? कनीके फटकी छोटसन शिव मंदिर सेहो देखाएल। ई मंदिर सभ कहिआ बनल, के बनओलथि, वर्तमानमे एना उजरल-उपटल किएक अछि से नहि बुझि सकलहुँ। भोरे चाह पीबाक हेतु पीटीसी परिसरसँ बाहर निकलि रेलवे गुमतीक आसपास बनल दोकानमे गेलहुँ। ओतए नान्हिटा कपमे चाह देल जाइत छल। "एतनीटा कपसँ की होएत?" -मोने-मोन सोचलहुँ। कहलिऐक-"तीन कप चाह दएह।" तकर बाद ओ बेरा-बेरी तीन कप चाह देलक। तकर बाद लागल जे चाह पीलहुँ। ओतए कचौरी छना रहल छल। तरकारीक सुगंध चारूकात पसरि रहल चल। हम दोकान बलाकेँ पुछलिएक- "जलखै तैयार अछि की?" "अबस्स।" "तखन परसिए दिअ।" एकटा छिपलीमे छओटा कचौरी तरकारी हमरा आगूमे राखि देलक। जे खा सकलहुँ से खेलहुँ। तकर बाद निश्चिन्त भए वापस अपन डेरापर आबि गेलहुँ। योगानन्द बाबूकेँ फोन लगओलहुँ। घंटी बजैत रहि गेल, मुदा ओ फोन नहि उठाबथि। थोड़े कालक बाद फेर फोन केलहुँ। तखनहु सएह भेल। आब की करी? आजुक समयक की उपयोग कएल जाए? सोचलहुँ जे चली आकाशवाणी। साइत किछुगोटेसँ संपर्क भए जाए। ई-रिक्शा पकड़ि दस मिनटक बाद आकाशवाणी भवन पहुँचि गेलहुँ। ओहिठामक हाल तँ बेहाल छल। अधिकांश अधिकारी गायब छलाह। कोठरीसभ खुजल छल। कुर्सीसभ राखल छल। मुदा ओहिपर बैसनाहरक कतहु अता-पता नहि। एकटा महिला कर्मचारीकेँ पुछलिअनि- "ई सभ कतए रहैत छथि?" "एही परिसरमे अवस्थित स्टाफ क्वार्टरमे।" ओहिठामक परिस्थिति देखि मोनमे बहुत आश्चर्य आ दुख भेल। ओहीठामसँ फेर योगानन्द बाबूकेँ फोन केलिअनि। एहि बेर ओ तुरंत फोन उठओलथि आ कहलथि- "हमरा तँ साफे बिसरा गेल छल, नहि तँ भोरे प्रातः भ्रमण कालमे ओमहरे आबि जइतहुँ। अहाँ छी कतए?" "आकाशवाणी भवनमे। मुदा एतए केओ अछि नहि। हम जल्दीए एतएसँ अहाँसँ भेंट करए बिदा होएब।" "ठीक छैक। अहाँ लहेरिआसराय टावरपर चलि आउ। हम ओतहि भेटि जाएब।" ओहिठाम पाँच मिनट आर रुकि गेलाक बाद हम लहेरिआसराय बिदा भेलहुँ। ओतए बिदा हेबा सँ पूर्व योगाबाबूकेँ फोन कए देलिअनि। तकर बाद ई-रिक्शा पकड़लहुँ । लहेरासराय टावरपर पहुँचले छलहुँ कि योगाबाबूक फेर फोन आएल। "कतए पहुँचि गेलहुँ?" "हम लहेरासराय टाबरपर ठाढ़ छी।" "लगेमे हनुमान मंदिर छैक। ओतए चलि जाउ। आराम रहत। हम ओतहि पहुँचि रहल छी।" हम हनुमान मंदिरमे जा कए दर्शन केलहुँ आ ओतहि आरामसँ बैसि गेलहुँ। कनीके कालक बाद योगाबाबूकेँ हुलकैत देखलहँ। एहन सहज, सरल आ सौम्य व्यक्ति छथि योगाबाबू से तँ अनुमान छलहे। तुरंत हमसभ रिक्सासँ हुनका ओहिठाम बिदा भए गेलहुँ। हम आ योगाबाबू रिक्सापर बैसल रही, आपसमे मैथिलीक दशा आ दिशापर बतिआइत रही। "मैथिली पोथी छपैत तँ बहुत अछि मुदा केओ ओकरा कीनि कए पढ़ए नहि चाहैत अछि। पोथीसभ मोफतमे उपहारस्वरुप बाँटल जाइत अछि। ई कोनो नीक लक्षण नहि अछि। एना कतेक दिन चलत?" मैथिलीक कतेक चिंता करैत छलाह योगाबाबू। थोड़बे कालमे हम हुनका संगे कबिलपुर स्थित हुनकर घर पहुँचि गेल रही। हमरा तुरंत कुर्सीपर बैसओलथि। कोलड्रिंक अनलथि। होनि जे कतेक आग्रह करिअनि, की की ने खुअबिअनि। मुदा हमरा तँ मंगलक व्रत रहए। किछु खा नहि सकैत छलहुँ। योगाबाबूक घरेलु पुस्तकालयमे तरह-तरहक पुस्तकसभ भरल छल। ओ ओहिमे सँ ताकि-ताकि हमरा अनेक मूल्यवान पोथीसभ देलनि। करीब घंटा भरि हम ओहिठाम रहलहुँ। बहुत आनन्द भेल। हुनकर सहजरता, सरलता आ आत्मीयताक जतेक प्रशंसा कएल जाए से कमे होएत। तकर बाद हम ओहिठामसँ बिदा लेलहुँ। योगाबाबू बहुत दूर धरि हमरा अरिआति देलनि। ततबे नहि, दरभंगा टावर जा रहल एकटा युवकक मोटर साइकिलपर बैसा देलनि जाहिसँ हम आरामसँ दरभंगा वापस जा सकी। मोटर साइकिलसँ थोड़बे दूर गेलाक बाद हम उतरि गेलहुँ। रिक्सा केलहुँ आ बलभद्रपुर बिदा भेलहुँ। ओतए हमर ससुरकक पिसिऔत भाए रहैत छथिन। ओ पंडौल कालेजमे अंग्रेजीक प्राध्यापक रहथि। बहुत पहिनेसँ बलभद्रपुरमे दूमहला मकान बनओने छथि। मुदा हमरा ओहि मकानक अखिआस नहि भए रहल छल। बहुत दिन समय बीति गेलैक ओतए गेला। हमर श्रीमतीजीक इच्छा रहनि जे हुनकर सभक हाल-चाल लेल जाए। हमरा एतबा अनुमान रहए जे हुनकर घर डाक्टर एन.पी. मिश्रक घरसँ आगू जा कए कोनपर छनि। लोकसभसँ पुछैत जेना-तेना हम हुनकर घर ताकि सकलहुँ। घरक आगूमे ठाढ़ छलहुँ। घरमे ओ चुहचुही नहि बुझाएल। "पता नहि की हाल छनि?" अगल-बगलक लोक कहलक जे हुनकर पत्नीक देहान्त भए गेलनि। मुदा अपने जीबैत छथि। हम घरक घंटी बजओलहुँ तँ एकटा बूढ़ बाहर भेलाह। कहैत छथि- "हम किरायेदार छी।" "ओ अपने छथि कि नहि?" "ओ अपने बच्चासभक संगे दिल्लीमे रहैत छथि।" आब की करितहुँ? श्रीमतीजीकेँ सभटा समाचार देलिअनि आ ओहिठामसँ तुरंत वापस भए गेलहुँ। वापसीमे लगीचेमे कांग्रेस आफिस देखाएल। मोन पड़ि गेल विद्यार्थी अवस्थाक सन् १९६८क ओ घटना। हमर गामक प्रसिद्ध आ यशस्वी समाजसेवी स्वर्गीय विश्वंभर झाजी हमरा तत्कालीन बिहार सकरकारक शिक्षा मंत्री स्वर्गीय नागेन्द्र झाजी हेतु एकटा चिठ्ठी देने रहथि। ओ ओहि पत्रमे हमरा किछु मदति करबाक अनुशंसा केने रहथिन। हम कांग्रेस आफिसमे दस बजे राति धरि मंत्रीजीक प्रतीक्षा करैत रहलहुँ। तखन जा कए ओ अएलाह। हम हुनका लग गेलहुँ आ चिठ्ठी देलिअनि। ओ चिठ्ठी खोलि कए पढ़लनि, किछु-किछु कहबो केलनि। साइत किछु आश्वासन देलनि। तकर बाद ओ किछु नहि केलाह। हम बाटे तकैत रहि गेलहुँ। कहि नहि कोना हम एतेक राति कए गाम वापस जा सकलहुँ। २० मार्च २०२२क अनुज सुरेन्द्रजीक संगे साढ़े दस बजे टैक्सीसँ गाम बिदा भेलहुँ। गाम जेबासँ पहिने हम दुनूगोटे सतलखामे अपन बहिनसँ भेंट केलिअनि। ओ हमरा लोकनिक स्वागतमे जान लगा देलनि। भोजनमे सचार लगा देलनि। ततेक सामग्री छल जे हम दसो दिनमे खा सकितहुँ कि नहि। बहुत मोसकिलसँ ओकरा कम कएल। हमर बहिनक बेटी, नाति सेहो रहथि। सभगोटेसँ नीकसँ गप्प-सप्प भेल। जाइत काल ओ एकमोटा उपहार पकड़ा देलनि। कतबो कहलिअनि जे वापसीमे हबाइ जहाजसँ जेबाक अछि। एतेक सामान कोना जाएत? मुदा ओ नहि मानलनि। ओकरा हमरा दैए कए मानलनि। तकर बाद हमसभ गाम बिदा भेलहुँ। हमर बहिन हमरासभकेँ बड़ीकाल धरि रस्तापर ठाढ़ भए जाइत देखैत रहि गेलथि। गाम पहुँचि अपन दरबाजापर जाइते उदास भए गेलहुँ। आइ जौँ माए रहितथि तँ की आनंद रहैत। अखन धरि दौड़ि गेल रहितथि। हुनका गोर लगने रहितहुँ। हुनकर आशीर्वाद प्राप्त कए कतेक आनंदित भेल रहितहुँ? मुदा आब ओ कतए भेटतीह? इएह तँ एहि दुनिआक विचित्रता छैक। जे गेल से फेर घुरि नहि आओल। दुनिआ चलैत रहल। इएहसभ सोचैत रहलहुँ। थोड़ेकाल अपना ओहिठाम बैसलाक बाद हमसभ शल्लुजीक ओहिठाम गेलहुँ। दरबज्जेपर बरुआसभक मरबा बनल छल। पाँचटा बरुआक उपनयन संगे हेबाक छलैक। पहिने दियादीमे जे सभसँ जेठ से सभसँ पैघ बरुआक गुरु होइत छलाह। हमरो गुरु ताही नियमसँ हमर पितिऔत बाबा स्वर्गीय शक्तिनाथ मिश्र भेल रहथि। हमरासँ छोट भाए (सुरेन्द्रजी)क गुरु हमर बाबा (स्वर्गीय श्री शरण मिश्र) भेल रहथि। मुदा पता लागल जे एहिठाम अपन-अपन पोताक हुनकर अपन बाबा गुरु बनल छथिन। साइत आब इएह परंपरा भए गेल होइक, किंबा आब लोकक सोचक परिधि संकुचित भेल जाइत होइक। ई कोनो एक्के-ठामक बात नहि अछि। समाज बदलि रहल अछि। सभठाम परिवर्तन देखाएत, नीको-अधलाहो। ओहिठाम थोड़े काल बैसलहुँ। शल्लूजी व्यस्तताक अछैत फोनोसँ हाल-चाल लेलनि। हमसभ थोड़ेकालक बाद सिनुआरा टोल स्थित कमलाकान्तजीक ओहिठाम हेतु बिदा भेलहुँ। गामक रस्तामे, चौकपर आ आगूओ सौंसे पक्काक घर बनि गेल अछि। अड़ेर चौकपर तँ दोकान भरि गेल अछि। लगभग तीन सए दोकान सड़कक काते-काते चलि रहल अछि। सुनबामे आएल जे अड़ेर हाट आब पुरने जगहपर लागत। बीचमे विष्णुपुरक मरचरामे लगैत छल। कमलाकान्तजीक ओहिठाम गजबकेँ स्वागत भेल। हुनकर आवास बहुत सुखद आ आकर्षक अछि। मकानक मुख्यद्वारिपर कमलाकान्तजीक नाम मोट-मोट अक्षरमे लिखल अछि। मकानमे अंग्रेजी आ देशी दुनू तरहक शौचालयक व्यवस्था अछि। अतिथिक रहबाक हेतु फराक कोठरी छनि। अपन निजी पुस्तकालयमे बहुत रास मैथिलीक पोथीसभ रखने छथि। स्वर्गीय सुभद्र झाजीक बहुत रास किताबसभ ओहिठाम देखाएल। कमलाकान्तजीक संगे गप्प-सप्पमे बहुत नीक लागि रहल छल। बीच-बिचमे तरह-तरहक जलखैसभ से चलिए रहल छल। चाह-पान सेहो भेबे केलैक। आब सुरेन्द्रजी अगुता रहल छलाह । यद्यपि ओहिठामसँ उठबाक मोन नहि कए रहल छल, तथापि मोन मारि कए बिदा भेलहुँ। वापस शल्लूजीक ओहिठाम उपनयन देखलहुँ। बीच-बीचमे पानि सेहो भए रहल छल। मौसम खराप भेल जा रहल छल। तथापि गाममे किछुगोटेसँ भेंट केलहुँ। तकर बाद हमसभ वापस दरभंगा हेतु प्रस्थान केलहुँ। रस्ता भरि पानि होइत रहल। हमसभ दरभंगा पहुँचए बला रही कि शल्लुजीक फोन आएल। "भोजनक बिझो करा रहल छिअ।" "हमसभ तँ दरभंगा पहुँचि रहल छी।" "एहिठाम आब भोजन हेतैक।" "कोनो बात नहि। काल्हि फेर आएब।" से जानि हुनका प्रसन्नता भेलनि। दिलीमोड़सँ पहिने फलसभ बिका रहल छलैक। बेस जुआएल केरासभ दोकानमे देखाएल। छओटा केरा कीनि लेलहुँ। बाहर पानि झमाझम बरसि रहल छल। एहनमे रातिमे भोजन करबाक हेतु कतहु जाएब संभव नहि छल। रातिमे ओएह केरासभ काज आएल। थोड़बे कालमे हमसभ दरभंगा अपन डेरापर पहुँचि गेलहुँ। रातिभरिक विश्रामक बाद आइ फेर गाम दिस जेबाक तैयारीमे लागि गेलहुँ। साढ़े दस बजेक आस-पास हमसभ गाम बिदा भेलहुँ। कपिलेश्वर पहुँचि सुरेन्द्रजीकेँ महादेवक दर्शनक इच्छा भेलनि। हमहूँ दर्शन करबाक हेतु कारसँ उतरलहुँ। वाहन चालक सेहो उतरि गेलाह। सभगोटे फूल-बेलपात लए महादेवक दर्शन करए संगे बिदा भेलहुँ। हम आ वाहन चालक तँ थोड़बे कालक बाद बाहर भए गेलहुँ। मुदा सुरेन्द्रजी तँ जे मंदिरमे पैसलाह से निकलबाक नामे नहि लेथि। थोड़े काल तँ शांतिपूर्वक हुनकर बाट तकैत रहलहुँ। तकर बाद हुनका ताकए लगलहुँ। आखिर ओ गेलाह कतए? तकैत-तकैत चारूकात घुमि गेलहुँ। वाहन चालक कारमे वापस जाए लगलाह। तखन हुनका बामा कात एकटा छोटकी मंदिरमे पूजा करैत देखलहुँ। हुनका देखितहि हम चिकरलहुँ। ओ हमरा दिस नहि तकलाह। तकर बादो ओ आन-आन मंदिरसभमे पूजा करैत रहलाह। तखन कएले की जा सकैत छल? कारमे जा कए बैसि गेलहुँ आ धैर्यपूर्वक हुनकर प्रतीक्षा करए लगलहुँ। पन्द्रह बीस मिनट आर ओहिना रहलहुँ कि हहाइत-फुफाइत तमसाएल सुरेन्द्रजीकेँ अबैत देखलहुँ- "एही लेल हम ककरो संगे महादेवक पूजा हेतु नहि जाइत छी। पूजामे तँ समय लगिते छैक।" कपिलेश्वरसँ निकलि थोड़बे कालक बाद गाम पहुँचलहुँ। पता लागल जे शल्लुजीक ओहिठाम ब्राह्मण भोजन शुरु भए गेल अछि। तुरंत ओहिठामसँ भोजन हेतु गेलहुँ। दरबाजापर टेबुल-कुर्सी लागल छल। लोकसभ सुविधानुसार भोजन करैत छलाह। हमहूँसभ भोजन हेतु टेबुल-कुर्सीपर बैसलहुँ। चूरा-दही, तरकारी, रसगुल्ला, गुलाबजामुन खाइत-खाइत थाकि गेलहुँ। तइओ सभ किछु नहि सठा सकलहुँ। पातपर बहुत किछू छुटि गेल। भोजन समाप्तिक बाद तामक लोटा, डोपटा बिदाइमे भेटल। ओहीक्रममे सालों बाद कैक तरहक गप्प-सप्प भेल, कैकगोटेसँ भेंट भेल। फेर अपना ओहिठाम आबि पारिवारिक चर्चामे भाग लेलहुँ। आब साँझ परितए। वापस बिदा भेलहुँ दरभंगा। बिदा हेबासँ पूर्व भगवतीकेँ प्रणाम केलहुँ आ सात बजे अपन डेरापर थाकल-झमारल पहुँचि गेलहुँ। २२ मार्च २०२४। आइ हमर यात्राक पाँचम दिन छल। आइ दरभंगे रहबाक छल। अजुका प्रमुख कार्यक्रममे डाक्टर रमण झा जीसँ भेंट करबाक छल। आकाशवाणी भवन से जेबाक छल। अतिथिगृहक हिसाब-किताब करबाक छल। भोरे स्नान-पूजा केलाक बाद चाह पीबाक हेतु पीटीसीक मेसमे गेलहुँ। सात बजेसँ चाह प्रारंभ भेल। प्रशिक्षु लोकनि गिलास लैत छलाह, टपसँ चाह ढारि लैत छलाह। एकटा टपमे सामान्य चाह छल, दोसरमे कनी कम चिन्नी बला। जकरा जे पसिंद होइ। हमहूँ सामान्य चिन्नी बला टपसँ चाह ढारलहुँ। चाह संगे बिस्कुटक प्रबंध सेहो रहैक। चाह पीलाक बाद वापस अपन डेरा आबि गेलहुँ। नओ बजे फेर ओतए जलखै करए गेलहुँ। जलखैमे पोहा, समतोला भेटि रहल छलैक। चाहो पीबि सकैत छी। प्रशिक्षुसभक संगे पाँतिमे लागि गेलहुँ। सभगोटे अपना-अपना हाथमे थारी, कटोरी लेने ठाढ़ रहैत छल। मेसक बारिक बेरा-बेरी सभक थारीमे पोहा ढारैत जा रहल छलाह। लोकसभ आगू बढ़ैत जा रहल छल। एही तरहेँ कारोबार चलि रहल छल। हमहूँ अपन थारीमे पोहा लेलहुँ, एकटा छोटसन समतोला लेलहुँ आ टेबुलपर बैसि कए जलखै केलहुँ। तकर बाद वापस अपन कोठरी आबि गेलहुँ। ताबे पीटीसीक कार्यालय खुजि गेल छल। हम आजुक चारू टाइम चाह, जलखै, भोजनक २६० रुपया जमा कए देलिऐक। पाँचदिन रहबाक किराया ८५० रुपया सेहो जमा करा देलिऐक। तकर बाद सहायक निदेशक (प्रशासन) श्री जय प्रकाशजीसँ भेंट केलिअनि आ ओहिठाम हमर सुखद रहबाक ओरिआन करबाक हेतु धन्यवाद देलिअनि। अपन उपन्यास, 'ठेहा परक मौलायल गाछ'क एक प्रति सेहो देलिअनि। ओकर बाद पीटीसी परिसरसँ बाहर निकलि गेलहुँ। डाक्टर रमण झाजीसँ फोनपर बात भए गेल रहए। ओ दिल्लीसँ पटना होइत दरभंगा पहुँचि गेल रहथि। आब हुनकासँ भेंट भए सकैत अछि । से जानि हुनकर डेरा दिस बिदा भेलहुँ। मोसकिलसँ दस मिनटमे हुनकर डेरा लग ई-रिक्शा उतारि देलक। ओहिठामसँ राजकुमारगंज स्थित हुनकर बीणा कमल अपार्टमेंट देखा रहल छल। हम आगू बढ़लहुँ। फ्लैटक घंटी बजबितहि ओ तुरंत अपने बाहर आबि गेलाह आ बहुत आत्मीयताक संग भीतर लए गेलाह। ओहिठाम अनेक साहित्यिक विषयपर चर्चा भेल। अपन लिखल अनेक पोथीसभ देलनि। बहुत नीक जलखै भलैक। हुनकर पुत्रसँ सेहो परिचय भेल। घंटा भरि ओहिठाम रहि बहुत आनन्दित भेलहुँ। आब ओहिठामसँ चलबाक छल। ओ बहुत दूर धरि अरिआति देलनि। तकर बाद वापस बिदा भेलहुँ अपन डेरा पर। काल्हि निर्मली जेबाक छल। डेरापर पहुँचि सामानसभ सरिओलहुँ। तकर बाद दूरदर्शन खोललहुँ। थोड़े काल निश्चिन्तसँ समय बितओलहुँ। बहुत नीक लागि रहल छल। एहि बेर यात्राक दू भाग संपन्न कए आब निर्मली 'सगर राति दीप जरय' कार्यक्रममे भाग लेबाक हेतु काल्हि ट्रेनसँ जेबाक छल। परिसरमे नीचाँ प्रशिक्षुसभक बिदाइ समारोहक अवसरपर सांस्कृतिक कार्यक्रम भए रहल छल। ओहिठाम भए रहल नृत्य-संगीत कार्यक्रमक प्रतिध्वनि हमर कोठरी धरि स्पष्ट आबि रहल छल। २३ मार्च २०२४। आइ निर्मली जेबाक छल। भोरे स्नान-ध्यान कए गुमती लगक दोकानपर चाह पीबाक हेतु बाहर निकललहुँ। ओतए पहुँचैत छी कि दोकान बला कहैत अछि- "दू दिनसँ कतए चलि गेल रहिऐक, बाबा?" "गाम।" "ओ।" "तीन कप चाह दएह। तकर बाद जलखैओ दइए दिह।" "ठीक छैक बाबा।" ओ गिलासमे तीन कप चाह देलक। ओ कप की छल बुझू जे चुकरी छल। तेँ ने तीन कप चाह लिऐक। निश्चित समयपर हम दरभंगा टीसन पहुँचि गेल रही। दरभंगासँ निर्मली जेबाक हेतु ट्रेन दरभंगा टीसनसँ एगारह बाजि कए दस मिनटपर खुजितैक। मुदा ट्रेन कोन प्लेटपार्मपर लागत तकर उद्घोषणा हेबे नहि करैक। हम अपन सामानक संग प्लेटफार्म संख्या एकपर पहुँचि गेल रही। मुदा परेसान रही जे ट्रेन कतए लागत, कहीं छुटिए ने जाए। कुलीसँ सेहो गप्प केलहुँ। ओ कहलक- "एतहि रहू। ट्रेन अएलाक बाद हम अपने आबि जाएब आ अहाँकेँ ट्रेनमे चढ़ा देब।" तकर बाद ओ निपत्ता भए गेल। "पता नहि ओ समयपर आबि सकत कि नहि?" -एही गुनधुनमे रही कि हमर ग्रामीण अशोकजी भेटलाह। हुनकासँ दुटप्पी केलहुँ। हुनकर भाए हैदराबाद जेथिन, मुदा ट्रेन छओ घंटा विलंबसँ अएबाक सूचना रहैक। हम सभ आसपासमे रही कि ट्रेन आबि गेल। सामानसभक संगे हम आगू चलि गेल रही। फेर वापस इंजिन दिस अएलहुँ। दू डिब्बाक बाद हमर डिब्बा बी एक लागल छल। ओहिमे धरादर पैसि गेलहुँ। जान-मे-जान आएल। पाँचे मिनटक बाद ट्रेन खुजि गेल। हमर शायिकापर केओ आर सुतल छल। ओकरा उठओलहुँ। ओ अपन स्थानपर चलि गेल आ हम अपन शायिकपर बैसि गेलहुँ। सामने एकटा सहयात्रीसँ गप्प-सप्प होमए लागल। ओ रेलवेमे अभियंता रहथि, काजसँ घोघरडीहा जा रहल छलाह। हुनकासँ बहुत रास जानकारी भेटल। ओहि इलाकामे केना गामक-गाम बड़का-बड़का मकान खाली पड़ल अछि, मालिकसभ बाहर रहैत छथि। मकानक रक्षाक हेतु रखबारसभकेँ दस-बारह हजार महिना दरमाहा दैत छथि। हम पुछलिअनि- "अपने कतए रहैत छी?" "गया।" "अहाँकेँ गाममे घर अछि कि नहि?" "अछि किएक ने। अपने बनओने छी। मुदा छोटसन जाहिसँ गाममे जा कए अधिकारपूर्वक ससम्मान अपन घरमे रहैत छी।" "मकान बनबएमे कतेक खर्च भेल? "अढ़ाइ लाख।" "कहिआ बनओने रही?" "पाँच वर्ष पूर्व। आब यदि ओहन मकान बनाओल जाएत तखन पाँच लाख लागि सकैत अछि। ओहिसँ कम नहि।" हम हुनकर बातसँ बहुत प्रभावित रही। प्रवासीक हेतु गामक घरक हुनकर उदाहरण नीक बुझाएल। थोड़े कालक बाद हुनकर टीसन आबि गेल रहनि। ओ घोघरडीहामे उतरि गेलाह। हम उमेशजीकेँ फोन लगओलहुँ। ओ पुछैत छथि- "कतए पहुँचलहुँ?" "घोघरडीहा।" "ठीक छैक। हम निर्मली टीसन पहुँचि रहल छी" कनीके कालमे ट्रेन निर्मली पहुँचि गेल। हम सामान सहित उतरि गेलहुँ। हम ठामहि छलहुँ कि देखैत छी उमेशजी एकगोटेक संगे दे-दनादन दे-दनादन निर्मली टीसनपर पहुँचि रहल छथि। हुनकर प्रसन्नता देखैत बनैत छल। एहि बेरक यात्रामे कतेकोगोटे भेटलाह, कतेको ठाम स्वागत भेल, मुदा ककरो आननपर एहन प्रसन्नता नहि देखने रही। हमसभ सामानक संगे टीसनसँ बाहर भेलहुँ। ओ दूगोटे दूटा मोटर साइकिलसँ आएल रहथि। एकटापर हमर सामान राखल गेल। दोसरपर हम उमेशजीक संगे बैसलहुँ। मोसकिलसँ दस मिनटमे हम निर्मली स्थित हुनकर घर पहुँचि गेल रही। उमेशजीक घरमे पहुँचि लागल जेना अपन घर पहुँचि गेल छी। चौकीपर नीकसँ ओछाओल गेल साफ चमचम करैत तोसक, चदरि। हम ओतए बैसि आश्वस्त होइत छी कि ऊपरसँ आदरणीय श्री जगदीश प्रसाद मंडलजी अबैत छथि। हुनकर कृषकाय परंतु तेजोमय आनन देखैत बनैत छल। हुनकर सहज, सरल आ भावुक व्यवहारसँ बहुत प्रभावित भेलहुँ। बड़ीकाल धरि आपसमे गप्प-सप्प होइत रहल। कहि नहि सकैत छी जे हुनकासँ भेंट केलाक बाद कतेक आत्मीयताक अनुभव भेल। हमर यात्रा सफल भेल। जगदीश बाबूक समस्त परिवार 'सगर राति दीप जरय' कार्यक्रमक तैयारीमे लागल छल। अद्भुत दृश्य छल ओ। साइते कोनो एहन परिवार होएत, जतए बच्चासँ बूढ़ धरि एहि तरहेँ मैथिलीक सेवामे लागल होअए। हमरा लोकनि थोड़ेकाल विश्राम केलहुँ। आब कार्यक्रमस्थलपर जेबाक छल। "की पहिरी? धोती कुरता कि सर्ट-पैंट।" "धोती-कुरता बढ़िआँ रहत।" -जगदीश बाबू कहलथि। "आ से जे मोन होनि, जाहिमे आराम बुझानि।" -उमेशजी बजलाह। हम धोथी कुरता लइए गेल रही। सएह पहिरबाक विचार कएल। तकर बाद हमसभ लगभग चारि बजे कार्यक्रमस्थल हेतु बिदा भए गेलहुँ। 'सगर राति दीप जरय'क कथागोष्ठी 'श्यामा कंपलेक्स सह विवाह हॉल- निर्मली'मे आयोजित छल। ओ परिसर बहुत नीकसँ सजल-धजल छल। सुसज्जित मंच, तकर सामने सएसँ बेसीए कुर्सी लागल छल। रातिमे विश्रामक हेतु सेहो उचित व्यवस्था कएल गेल छल। बेरा-बेरी लोकसभ आबि रहल छलाह। हमर ग्रामीण आ मित्र आदरणीय डाक्टर कमलाकान्त भंडारीजी आबि गेल रहथि। तकर थोड़बे कालक बाद आदरणीय श्री कामेश्वर चौधरीजी आइ.इ.एस. (सेवानिवृत्त) सेहो आबि गेलथि। हुनकासँ ट्रेनेमे गप्प भेल छल। ताबे हम सकड़ी टीसन टपि गेल रही। आब ओ बहुत अफसोच करए लगलाह। हुनका सेहो कार्यक्रममे भाग लेबाक मोन रहनि। ओ गामेमे रहबो करथि। हम हुनका अपन कार्यक्रमक पूर्वसूचना नहि दए सकल रहिअनि। मुदा ओ जेना तेना पहुँचिए गेलाह। असलमे ओ सुच्चा मैथिली प्रेमी छथिए, ताहिपर अपन इलाकामे सेहो होइत छल, से जानि ओ अपनाकेँ नहि रोकि सकलाह। लगभग सात बजे दीपप्रज्ज्वलनसँ कार्यक्रमक प्रारंभ भेल। तकर बाद भगवती गीत गाओल गेल। फेर प्रारंभ भेल अथितिलोकनिक स्वागतक कार्यक्रम। फेर एक्कैसटा पुस्कक विमोचन भेल। ओहिमे कार्यक्रममे हमरो दूटा उपन्यास (ठेहा परक मौलायल गाछ आ पटाक्षेप)क विमोचन भेल। हम अपन कथा, गाछ,क पाठ सेहो केलहॅँ। कार्यक्रमक क्रममे स्थानीय झंझारपुर कालेजक प्राचार्य आदरणीय डाक्टर नारायणजी आदरणीय श्रीजगदीश प्रसाद मंडलजीकेँ हुनकर पोथी कीनि कालेजक दिससँ हुनका साढ़े चौबीस हजारक चेक मंचपर प्रदान केलनि। निश्चितरूपसँ ई बहुत प्रशंसनीय काज भेल। कार्यक्रमक अंतमे आदरणीय डाक्टर श्री अशोक अविचलजी अपन बात बहुत मार्मिक ढंगसँ रखलथि। कार्यक्रममे भाग लेनिहार सभ कथाकारकेँ उत्साहित केलनि। आयोजक सहित संयोजककेँ सेहो धन्यवाद देलनि। असलमे उमेशजीक सतत प्रयाससँ कार्यक्रम भेबो कएल बहुत नीक। कोनो तरहक दिक्कति नहि भेल। जलखै, चाह, भोजन सभक उत्तम ओरिआन छल। सभ रचनाकार, समीक्षक, आगन्तुक विद्वानलोकनिकेँ यथोचित अवसर देल गेलनि, सम्मानित कएल गेलनि। सगर राति दीप जरय कार्यक्रममे अनेक मूर्धन्य साहित्यकार लोकनिसँ भेंट भेल। राति भरि चलए बला एहि ओहिठाम बिताओल गेल आनन्दपूर्ण क्षण सदिखन मोन पड़ैत रहत। हमर सुख-सुविधा आ यथोचित सम्मान हेतु जे किछु संभव छल से उमेशजी केलनि। आदरणीय डाक्टर श्री उमेश मंडलजी एवम् हुनकर समस्त सहयोगी लोकनिकेँ एहि हेतु हार्दिक आभार, धन्यवाद। आब भोर भए गेल छल। कार्यक्रम समाप्त भए गेल। हमरा वापस जेबाक छल। दरभंगा जा कए दिल्लीक हेतु हबाइ जहाज पकड़बाक छल। उमेशजी पहिनेसँ हमरा लेल टैक्सी ठीक कए देने रहथि। हम साढ़े आठ बजे दरभंगा हबाइ अड्ढा पहुँचि गेलहुँ। ओतए पहुँचि बहुत आश्वस्त भेलहुँ। सही समयपर जहाज उड़ि गेल। हम निश्चित समयसँ आध घंटा पहिने डेढ़ बजे दिल्ली हबाइ हड्डापर उतरि गेलहॅँ। एहि तरहेँ दरभंगा, अड़ेर डीह, निर्मलीक यात्रा बहुत सफलतापूर्वक संपन्न भेल। -रबीन्द्र नारायण मिश्र, ग्रेटर नोएडा, 01 अप्रैल 2024 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.११.निर्मला कर्ण- अग्निशिखा खेप -३८ निर्मला कर्ण (१९६०- ), शिक्षा - एम. ए., नैहर- खराजपुर, दरभङ्गा, सासुर- गोढ़ियारी (बलहा), वर्त्तमान निवास- राँची, झारखण्ड। झारखंड सरकार महिला एवं बाल विकास सामाजिक सुरक्षा विभागमे बाल विकास परियोजना पदाधिकारी पदसँ सेवानिवृत्ति उपरान्त स्वतंत्र लेखन। (अग्नि शिखा मूल हिन्दी- स्वर्गीय जितेन्द्र कुमार कर्ण, मैथिली अनुवाद- निर्मला कर्ण)
अग्निशिखा खेप -३८
पूर्वकथा
राजा पुरूरवा के विक्षिप्त अवस्था में सेनापति वन सौं लs कs आपस अबैत छथि, आ हुनक चिकित्सा प्रारंभ होइत अछि l आब आगू
किछु दिन धरि महामात्य एहि आशा में शासन करैत रहलाह जे हुनकर सम्राट ठीक भs जयथिन्ह, मुदा हुनकर आस चकनाचूर भs गेलनि। राजा ठीक नहि भेलाह, ओ ओहिना विक्षिप्त सन रहलथि। अंततः थाकि हारि गेलाक बाद ओ महान विद्वान, ऋषि लोकनि सँ पुछलथि आ कुलपति वशिष्ठ केँ आमंत्रित कs अपन समस्या हुनक सोझाँ राखि राजाक स्थितिक विस्तृत विवरण देलखिन्ह हुनका । पुनः हुनका सँs उचित परामर्श मंगलथि । कारण राज्य चलाबय लेल राजा रहब आवश्यक अछि, सब गोटे आपस में चर्चा कय सर्वसम्मति सँs निर्णय लेलथि जे पुरूरवाक ज्येष्ठ पुत्र आयु के राज्याभिषेक कयल जाय। आयु केँ कुलपति वशिष्ठ द्वारा श्रेष्ठ ऋषि लोकनिक मार्गदर्शन में राज्याभिषेक कयल गेलनि।ओ राज्यक सिंहासन पर बैसलथि। राज्य केँ राजा भेटलन्हि, मुदा ओ अनुभवहीन आ युवा छलाह । कतय छलाह अनुभवी चक्रवर्ती सम्राट पुरूरवा! आ कतय छथि हुनक युवा आ अनुभवहीन पुत्र आयु ?की ओ सम्पूर्ण धरती पर शासन कs सकैत छथि ?मुदा एतय महामात्य जे राज्यक अनन्य भक्त आ पूर्ण अनुभवी छलाह हुनका सहयोग केलथि । ओ राजा पुरूरवाक शासन काल में हुनक प्रशासन देखने छलथि! एतबहि नहि ओ सहयोगी रहल छलाह ओहि शासन-प्रशासन के।ओ अपन सम्पूर्ण अनुभव लगा देलथि नवयुवक राजा आयु के द्वारा शासन व्यवस्था सुचारू ढंग सौं संचालन करवयवा में। ओ आयु के सुरक्षा देलथि,आ ओहि मात्रि-पितृहीन बालक के एकटा सक्षम सम्राट बनबाक प्रशिक्षण देमय लगलाह।
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राजा पुरूरवा किछु दिन राजमहल मे रहलाह, मुदा ओतहु ओ अजबे-अजब काज करैत छलथि। कखनो जोर-जोर सँ हँसs लगैथ, कखनो कानs लगैथ! कखनो कपड़ा फाड़s लागथि, तs कखनो उर्वशीक चित्र सँ प्रेम-व्यवहार करs लागैत छलाह। कखनो काल उपदान के सेहो छूबैत छलाह।ओ अपन प्रियतमा बुझि अश्लील काज करैत रहैत छलाह। एहि के अलावा ओ सदिखन महल सs बाहर निकलबाक प्रयास करैत छलथि । एक दिन हुनका अवसर भेटि गेल छलनि ।ओ चोरा-नुका कs महल सौं बाहर आबि गेलाह आ... कोनो अज्ञात लक्ष्य दिस विदा भs गेलथि । जखनहि राजभवन में हुनकर अनुपस्थितिक बोध भेलनि, अति शीघ्र राजपुरुष आ सभ कर्मचारीगण हुनकर संधान में जुटि गेलथि। ओहि सब ठाम हुनकर तलाश में अन्वेषक पहुँचि गेल जतय कनिको संभावना हुनका सब केँ लागल जे महाराजा भेटि सकैत छथि मुदा ओ नहि भेटलाह। नहि जानि धरती के कोन छोर पर ओ बिला गेलथि। नहि जानि ओ पृथ्वी पर छथि वा नहि , की जानि कोन काज लेल ओ कतः चलि गेलथि। की जानि उर्वशी केँ तकबाक लेल स्वर्ग तs नहि चलि गेलथि ? थाकि हारि कs सभ राज्य कर्मचारी आ अधिकारीगण हुनक अन्वेषण बंद कय ईश्वर पर हुनकर रक्षा के दायित्व सौंपि राजकार्य के संचालन में लिप्त भय गेलथि। एक दिन सेनापति अपन सिपाही सभक संग कुमार वन मे क्षेत्र-भ्रमण पर गेल छलाह, तखन हुनकर दृष्टि पूर्व सम्राट राजा पुरूरवा पर अचक्के पड़ल।हुनका देखि ओ सब आश्चर्यचकित भs गेलाथि । हुनकर स्थिति एतेक करुण छल जे सेनापति करुणाद्र भs गेलथि ।एकटा चक्रवर्ती सम्राट आ हुनकर ई स्थिति ! ओ राजा केँ अपना संग राजधानी अनबाक बहुत प्रयास केलथि , मुदा ओ आबय लेल तैयार नहि छलाह, एतेक धरि जे चलैत रथ सँs कूदि गेलाह आ सरपट दौड़य लगलाह। एहि क्रम मे हुनकर देह सेहो घायल भ' गेलनि। ठाम-ठाम सs शोणित के धार छल-छला आयल छलनि।आब सेनापति विवश भय गेलथि। ओ असहाय छलथि! करथि तs कथि करथि ! ओह भगवान ! सेनापति चिंतित ! आब की करबाक चाही ! पूर्व सम्राट केँ बान्हि कs सेहो नहि आनि सकैत छलथि, आखिर हुनकर कोन अपराध छलैन्ह जे बान्हि कs हुनका दण्ड देल जाय! आ ओ बान्हलाक उपरान्त कतेक दिन राजमहल में रहताह तेकर कोन भरोस! कतेक दिन हुनका बान्हि कs राखल जा सकत! हा दैव! ई केहेन दण्ड देलीयन्हि! चक्रवर्ती सम्राट छलाह आ आई हुनक ई दुर्गति! ओ अपराधी नहि छथि जे हुनका बान्हि कऽ आपस लs गेल जाय । जखन ओ सभ राजा पुरूरवा के राजधानी लs जयबा में सफल नहि भेलाह तखन ओ अपन सैनिक के राजमहल पठा कs राजसी परिधान मंगवा लेलथि आ कोनो तरहे बल प्रयोग कs राजा के ओ वस्त्र पहिरा देलथि । राजा ओ वस्त्र पहिरबा में कनेको रूचि नहि देखाओल, कारण हुनका ओ वस्त्र पहिरवा में कनिको अभिरुचि नहि छलन्हि। किएक तs ओ अपनहु के बिसरि गेल छलथि । तखन आब हुनका वास्ते वस्त्रक कोन महत्व छलैक ! हुनका वास्ते राजसी परिधान अथवा राजमहलक कोनहु महत्व नहि छल। हुनका लेल वनक कठोर पाथरक भूमि आ राजमहलक कोमल आ गदगर आरामदायक पर्यंक में कोनहु अंतर नहि छलैक। वास्तव मे कहल जा सकैत छलैक जे वन प्रांतक प्रस्तर भूमि हुनका लेल बेसी अनुकूल छल कारण ओतय उर्वशीक आगमनक संभावना छल। एकर बाद राजपुरुष लोकनि एकटा नियम बनौलनि जे ओ सभ दू-चारि गोट सैनिक केँ गुप्त रूपें हुनकर देखभाल हेतु वन में छोड़ि देलथि। ओ सभ राजाक दृष्टि में बिनु अयनहि गुप्त रूप सँs हुनकर रक्षा में तत्पर रहथि, आ बीच-बीच मे हुनकर आवश्यक सेवा ओ लोकनि करथि, आ स्वच्छ वस्त्र पहिरा दैत छलाथि ।ओ हुनकर समय पर भोजनक नियमित व्यवस्था कs दैत छलथि । मुदा राजा केँ एहि सब में कोनो रूचि नहि छलन्हि । हुनका नहि भोजन में कोनो रूचि छलन्हि आ ने वस्त्र में ।हुनका भोजन आ वस्त्र मे रूचि कम भs गेल छलन्हि। ताहि कारण हुनका कनिको रूचि नहि छलन्हि राज कर्मचारी गणक एहि सेवा सत्कार में । अपन दैनिक कर्म में राज कर्मचारीक हस्तक्षेप हुनका रुचइत नहि छलन्हि ।आ एक दिन एहि सेवा सँ तंग आबि ओ ओहि वन केँ सेहो छोड़ि देलथि ।ओ एम्हर-ओम्हर भटकय लगलथि । कखनहु कोनो वन में चलि जाइत छलथि, आ कखनहु काल कोनो पोखरि मे हेलैत रहैत छलाह। कखनहु कोनो नगरक राजमार्ग पर दृष्टिगोचर होइत छलाह । कखनहु उम्मत्त सन दौड़ लगबैत ओ देखाइ पड़ैत छलथि तs कखनहु कोनो नदीक कात मे भटकैत भेटैत छलथि ।एहि तरहेँ एक साल बीति गेल। एम्हर उर्वशी सँ विरह भेलाक बाद हुनकर पहिल भेंट सरस्वती नदीक कात मे भेलनि, उर्वशी हुनका दोसर साल में सेहो भेंट करबाक समय देने छलाथि, मुदा कतय ? - हँ कुरुक्षेत्र में मोन पड़लन्हि ।
***** अतीतक बिम्ब आब राजाक मोन सँ विलुप्त भs गेल छलन्हि ।आब हुनकर हालत एहन भs गेल छल जेना एखनहि आकाश सँs खींच कs धरती पर खसा देल गेल होथि।हुनकर मोन एकदम शून्य भs गेल छलन्हि। मात्र उर्वशीक छवि के स्मरण एखनहु ओहि में अवस्थित छल। एकर अतरिक्त ओ सभ किछु बिसरि गेल छलथि। जखन ओ अपन हृदय केँ अतीतक गर्भ सँs खींच कs अपन हृदय केँ वर्तमान क्रम में एहि वन प्रांत में अनलथि तखन सूर्यक भीषण तप्त किरण अपन तीव्रतम आभा सौं पृथ्वी पर पसरि ओकर आँचर के तप्त कs रहल छल। आकाश में चिड़इ सभ वृक्षक शिखर सौं उड़ि-उड़ि गगन मंडल में एहि वृक्षक शिखर सौं ओहि वृक्षक शिखर पर भागि रहल छल। बुझाइत छल जेना ओ सभ आकाश में कोनहु दौड़ प्रतियोगिता में भाग लs रहल होय,प्रतियोगिता स्थल बनल छल एहि वृक्षक शिखर सौं ओहि वृक्षक शिखर!ओहिना आकाश में सब उड़ि रहल छल । पुरूरवा उठि कs बैसि गेलाह।तखन ओ एकटा अनजान लक्ष्य विहीन बाट पर उद्देश्यहीन चलय लगलथि । कियो अचक्के हुनका रोकि देलकैन । ओ व्यक्ति आश्चर्यचकित भs कs हुनका दिस ताकि रहल छल। कनि काल धरि हुनका दिस तकलाक बाद ओ पूछि देलक- " राजेन्द्र अहाँ ? एतय की कs रहल छी? अहाँ हमरा संग आबि जाउ हमर सभहक दरबार में । हमर महाराज अहाँ सँ भेंट कs कs अत्यंत प्रसन्न होयताह।" पुरूरवा ओहि व्यक्ति दिस ध्यान सँ तकलथि मुदा चिन्हलथि नहि। आ ओ जखन कनिको स्मरण नहि पाइब सकलथि तखन हुनका नहि चिन्हैत पुछलथि - "अहाँ के थिकहुँ, आ हमरा कतs लs जेबाक अछि?" "अरे, अहाँ हमरा नहि चिन्हैत छी? हम कश्मीर के राजाक महामात्य छी। हम अहाँ केँ हुनका सँ भेंट कराबs हेतु लs जाय चाहैत छी। अहाँ केँ देखि ओ अत्यंत प्रसन्न होयताह।" राजा फेर ओहि आदमी दिस ध्यान सँ देखैत पुछलनि, -की अहाँ हमरा कहि सकैत छी जे हम के छी? "हँ!- हँ! किएक नहि, अहाँ केँ के नहि चिन्हैत अछि? अहाँ महान चक्रवर्ती सम्राट पुरूरवा छी" - ओ सम्मानपूर्वक उत्तर देलनि | "हा हा हा हा हा हा...हम...हम...सम्राट छी!...सम्राट पुरूरवा ! महामात्य! एतेक असत्य नहि बाजह!नहि बाजह! पथिक ! हम तs मात्र उर्वशीक प्रेमी छी! उर्वशी...उर्वशी.." स्वर्गक ..... अप्सरा"...त्रिलोक सुन्दरी..."उर्वशी" बुझलह पथिक ! हमरा ओकर प्रेमी, भक्त कहब, आकि हमरा ओकर पुरोहित कहब! ई सभ सत्य होयत! हम ओकर प्रेम मे आकंठ डूबल एकटा सामान्य मनुक्ख थिकहुँ! हम पुरूरवा नहि छी। हमरा कहियो कोनो पुरूरवा सँs कोनो परिचय नहि भेल अछि! हमरा पुरूरवा फूसियो नहि कहब। हा....हा....हा..." पुरूरवा उन्मत्त सन हँसैत आगू बढ़लाथि । सम्राट पुरूरवा!...जे... छलथि चक्रवर्ती, जिनका सोझाँ पृथ्वी की स्वर्ग पर्यंत नतमस्तक भेल छल ? ओहि सम्राट पुरूरवा के आइ एहेन स्थिति भेल छलनि। हुनका एहि दशा में देखि कश्मीर के राजाक महामात्य अत्यंत उदास भs गेल छलथि। दु:खी मोन सँs ओ अपन लक्ष्य दिस बढ़लथि । पहिने सुनने छलाह आ आइ ओहो अपन नेत्र सs देखलथि राजा पुरूरवक दुर्दशा! अगिला अंक मे कथा आगू बढ़ैत अछि। क्रमशः अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१२.ग्रुप कैप्ट (डा.) वि एन झा- अंतरिक्ष पर्यटन के वैज्ञानिक दृष्टिकोण ग्रुप कैप्ट (डा.) वि एन झा अंतरिक्ष पर्यटन के वैज्ञानिक दृष्टिकोण भूमिका: मैथिली में अंतरिक्ष विज्ञान के तकनिकी परिसीमन विदेह में विज्ञान विषय-वस्तु पर एक नवीन प्रयोग शुरू कए रहल छी। ओहना तँ विदेह पत्रिका मैथिली साहित्य में एक विशेष प्रतिष्ठा राखैय अछि, मुदा कोनों भाषा के, ख़ास केँ प्राचीन सांस्कृतिक भाषा के विकास आओर सामूहिक ग्रहण-विग्रहण तावत समुचित नहिं होएत यावत् ओहि में आधुनिकता, समकालीन ज्ञान-विज्ञान व तकनिकी के समावेश नहिं होएत I तावत ओहि भाषा केँ देश विदेश में समुचित स्थान नहिं भेटत। जाहि समय सॅ आधुनिक शिक्षा प्रणाली में मैथिलि के समावेश भेल अछि, अधिकतम विद्यालय व महाविद्यालय में मैथिलि प्रायः अपन साहित्यिक गद्य व पद्य में प्रगति अवश्य कएलक किन्तु आधुनिक विज्ञान व तकनीकी के समावेश व प्रगति समीक्षा व चर्चा के विषय अवश्य रहैछ, जाहि में मैथिलि भाषाविद के विश्लेषण विशेष महत्त्व राखताह। हम मैथिलि भाषा के एक अदना छात्र छलहुँ आओर गत ५० वर्ष सं मैथिलि-भाषी के संपर्क सँ विहीन छी। ओहु सँ विशेष जे वायुसेना समाज में ३० वर्ष रहि प्रायः अंगरेजी माध्यम में ही बातचीत व लिखल-पढ़ल रहल। गत ४० वर्ष में वातांक्षरिक्ष विज्ञान के पठन-पाठन में रत छी। बारम्बार मन में आएल जे मैथिलि में वैज्ञानिक विषय-वस्तु पर किछु लिखल जाए। अंतरिक्ष विज्ञान के विषय में लिखैक हमर ई अथक प्रयास जारी रहत । अतः भाषा व्याकरण आदि त्रुटि हेतु क्षमाप्रार्थी छी। अंतरिक्ष पर्यटन के विकास रूस, अमेरिका, फ़्रांस, चीन व भारत विगत के समयांतराल में अंतरिक्ष में अपन-अपन वैज्ञानिक अन्वेषण, परीक्षण व पर्यवेक्षण गतिविधि में गतिशील रहथिन्ह I अंतरिक्ष में मानव के समावेश व अभियान वैज्ञानिक व सैन्य गतिविधि के उद्देश्य सँ रूस व अमेरिका के बीच में मुख्यतया प्रतिस्पर्धात्मक होएत छलैक I गत ४ दशक में चीन सेहो अंतरिक्ष में अपन वर्चस्व स्थापित करए लेल जी तोड़ प्रयत्न क रहल अछि I मुदा अंतरिक्ष में पर्यटन एक एहन नवीनतम परन्तु अत्यंत महग गतिविधि शुरू भ गेल अछि I महग तँ एहन जे विगत में विश्व के किछु अतिसमृद्ध जन डेढ़ सँ दू अरब टाका खर्च कए नजदीकी अंतरिक्ष के भ्रमण कएल रहथिन I सुदूर अंतरिक्ष के भ्रमण मानव लेल एखनहुँ स्वप्न मात्र अछि I मानल जाइछ जे अमेरिकी चाँद तक गेल रहनि I अंतरिक्ष यात्रा करय में अंतरिक्ष यात्री लेल अपार तकनीकी आ स्वास्थ्य संबंधी चुनौती अछि I अंतरिक्ष यात्राक विश्व मानस पटल पर अपार सम्मोहक प्रभाव पड़ैत छैक अतः अंतरिक्ष दिस बढ़ैत प्रत्येक यात्री एक सिनेमाक हीरो सँ कम नहि देखल जाइत छैक । अंतरिक्ष यात्रा करब बहुत लोकक सपना बनि जाइत अछि । गत दशक में अंतरिक्ष यात्रा के एक अलग स्वरुप आएल अछि जेकरा "अंतरिक्ष पर्यटन" के संज्ञा देल छन्हि I आई-काल्हि ई एक अत्यधिक महग रोजगार के रूप में प्रचलित आगाँ आबि रहल अछि I अंतरिक्ष पर्यटन के आम जोखिम अन्तरिक्ष पर्यटन यान में तकनिकी खराबी के अलावे किछु अन्य जोखिम सेहो अछि I सभु पाठक गण केँ अंतरिक्ष पर्यटन के जोखिम सँ अवगत होवए सोहो आवश्यक अछि I अंतरिक्ष में वायुमंडल नहिं होएछ अतः स्पेसक्राफ्ट में अपेक्षित दवाब पर ऑक्सीजन युक्त एतैक हवा रहे छैक जे यात्री व चालक दल लए पर्याप्त होए I वायुमंडल सँ ऊपर सूर्य के किरण एतैक तेज व घातक होए छैक जे त्वचा जरि जाए I वायुमंडल सँ ऊपर छोट या बड़ उल्का या पृथ्वी के कक्षा सँ विलग उपग्रह सँ सम्बद्ध कल-पुर्जा / कूड़ा-कर्कट / मालवा एतैक अधिक ऊर्जावान होएत छैक जे पर्यटनयान केँ आसानी सँ क्षतिग्रस्त कए सकैछ जेहि सँ सभु पर्यटक के जीवन जोखिम में पड़ि जाएत I अंतरिक्ष पर्यटन के गुरुत्वाकर्षण विहीन या भार विहीन शुरुआत के क्षण में अलग अलग तरहक दुरासर होए छैक जाहि में ओकाई या उल्टी होएब, 'स्पासियल डिसोरिएन्टेशन', ऊपर-नीचाँ के दिशा भ्रम आदि सम्मिलित अछि I भार विहीन क्षण में खाए-पिय, प्रसाधन आदि के उपयोग अत्यधिक क्लिष्ट होए छैक I अतः प्रत्येक पर्यटक केँ 'वयस्क डायपर' पहिरा देल जाए छैक जे यदि ककरो आकस्मिक लघु या दीर्घ शंका भेल तँ ओ डायपर में ही सिमित रहत I अंतरिक्ष यान में लाइफ सपोर्ट सिस्टम (LSS) रहे छैक जे ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड, जलवाष्प, तापमान, हवा के दुर्गंध आदि केँ नियंत्रण में रखे छैक I यदि LSS ख़राब भेल तँ प्रक्षेपण केँ स्थगन आवश्यक भ जाए छैक अन्यथा सभु जन के जीवन जोखिम में पड़ि जाएत I अंतरिक्ष उड़ान के सभु जोखिम के वर्णन एहि लेख में असंभव अछि किए कि एहि विषय पर इंजीनियरिंग व मेडिकल ब्रांच में M Tech/MD/PhD आदि विषय वस्तु अछि I अत्यंत खर्चीला अंतरिक्ष पर्यटन के आकर्षण व मांग अंतरिक्ष पर्यटन के अत्यधिक आकर्षण दुनिया भर के अमीर लोग लेली छैक आरू रूसी रोस्कोस्मोस एकरा प॑ आंशिक रूपेण कैश सेहो क चुकल छन्हि जेना कि निम्नलिखित तालिका में देल छै । 2001 स॑ ही रूस के आकर्षक अंतरिक्ष पर्यटन कार्यक्रम बहुतों "निजी अंतरिक्ष उड़ान प्रतिभागी" क॑ अपन अंतरिक्ष यात्रा करै म॑ उत्प्रेरिक करलकै । वर्जीनिया स्थित स्पेस एडवेंचर्स के दलाल रूसी सोयुज में उड़ान के लेल सवारी सँ दू करोड़ डॉलर सं बेसी के भुगतान करेलक तथा अंतिम पर्यटक अपन यात्रा के लेल 3.5 करोड़ डॉलर तक के भुगतान केलक I ओ सब यात्रा अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन के छल आ यात्री केँ लगभग ओहिनें प्रशिक्षण प्रक्रिया सँ जाएल पैदल जे चालक दल, तकनिकी व मिशन विशेषज्ञ अथवा अंतरिक्ष यात्री...सभु लें समान संहिता छलैक I एही प्रक्रिया में छह मॉस तक के प्रशिक्षण अवधि अछि I किछु मिशन में तँ अमीर यात्री केँ अंतरिक्ष में लए जेबा में हुनका नाम मात्र के कोनों काज दए अंतरिक्ष स्टेशन पर शामिल करय के जायज ठहराएल गेल I एहन किछु यात्री के वर्णन निम्नांकित तालिका में अछि I रूस केऽ वाणिज्यिक अंतरिक्ष पर्यटन उद्यम (ऊपर केरऽ तालिका म॑ दिखालऽ गेलऽ छै) स॑ ई स्पष्ट छै कि अंतरिक्ष पर्यटन स॑ काफी राजस्व प्राप्त होय छै । एहन यात्राक लेल बहुत बड़ राशि संभावित पर्यटक केँ खर्च कराए पडत I 'अंतरिक्ष पर्यटन उद्यम' खर्चीला सही, उद्योग के रूप लए रहल अछि I ज्यों ज्यों एकर प्रसार होएत, खर्च लगातार कम भेल जाएत I अधिकांश पर्यटक अंतरिक्ष क रोमांच के अनुभव करबा लेल उत्सुक होइछ । चूँकि अंतरिक्ष पर्यटन में किछु बेशी जानलेवा दुर्घटना के संभावना होइछ, एही में किछु विशेष प्रकार के जीवन रक्षक प्रणाली व उपकरण होएछ जकर व्यवहार आपातकाल में अएबाक चाही I तकर प्रशिक्षण आवश्यक छैक I किन्तु बहुत कम अवधि के अंतरिक्ष पर्यटन में न्यूनतम प्रशिक्षण व्यवहारिक होएत, तीन सँ छह मास के नहिं । अंतरिक्ष पर्यटन केँ रोमांचक खेल के सेहो संज्ञा दियल जा सकैत अछि I एहि तरह के अंतरिक्ष पर्यटन के विभिन्न प्रकार के भ्रमण अछि जे किछु मिनटक 'उप-कक्षीय' उड़ान सँ ला केँ पृथ्वी कक्षा के परिक्रमा करबाक उद्देश्य तक भ सकैछ I अंतरिक्ष पर्यटक के उद्यमी सँ अपेक्षा स्पेस एडवेंचर/टूरिज्म पर्यटक वा ग्राहकक के किछु न्यूनतम अपेक्षा होए छैक जे ओकर जीवनपर्यन्त कमाई के तुल्य भ सकए I दोसर दिस, अंतरिक्ष एजेंसी प्रतिस्पर्धी रूप सं लगभग सुरक्षित वापसी के गारंटी, बेहतर पैकेज / विकल्प प्रदान क सकय छै, जेहि मे निम्नलिखित मे सं एक या अधिक अनुभव होयत छै :-- *माइक्रोग्रेविटी या गुरुत्व-विहीन अवस्था के अनुभव...बिना बाधा तैराकी ।- * पृथ्वीक नीलाम्बर वायुमंडल देखब ।- * सूर्योदय या सूर्यास्त देखय मे सक्षम होयब जे एकदम अलग अनुभव होए छन्हि |- *दिन आ रात्रि के बदलैत परिपेक्ष I- *सौर या चंद्रग्रहण या ब्रह्मांड के नैसर्गिक कोनो अन्य घटना; पृथ्वी के बदलैत परिप्रेक्ष्य के देखै के परिस्थितिजन्य तत्सामयिक मांग |- अंतरिक्ष में विशेष अवसर आ उत्सव मनाएब... जेहना प्रपोज, विवाह, हनीमून आदि।- *अल्पकालीन गुरुत्व विहीन क्षण में विशेष वैज्ञानिक अनुसंधान व परीक्षण | - *भविष्य में अंतरिक्ष भ्रमण मनोरंजन के लेल ढेरों अन्यान्य विचार निश्चित रूप स आबि जाएत । "अंतरिक्ष पर्यटन" के नाम पर किछु अमीर के कल्पना आ मनसा के हड़पबाक लेल महान प्रतिस्पर्धा चलि रहल अछि | अपनऽ कंपनी 'वर्जिन गैलेक्टिक' के स्थापना क क॑ रिचर्ड ब्रैन्सन आरू 'ब्लू ओरिजिन' केरऽ जेफ बेजोस अपन-अपन अंतरिक्ष यान के साथ वाणिज्यिक अंतरिक्ष पर्यटन के पेशकश करै लेली तैयार कए केँ अंतरिक्ष पर्यटन के व्यवसाय शुरू क देल छन्हि । वर्जिन गैलेक्टिक म॑ अपनऽ विमान व'र्जिन मदर शिप (वीएमएस) ईवा' केऽ दोहरी पंख के भीतर लागल "वर्जिन स्पेस शिप (वीएसएस) यूनिटी" नाम केऽ पुन: उपयोग करलऽ जाय वाला अंतरिक्ष यान छै । वीएमएस ईवा स॑ लगभग ४५-५० हजार फुट ऊंचाई पर छूटे पश्चात वीएसएस यूनिटी क॑ रॉकेट द्वारा अंतरिक्ष में लए जाएत छैक । दोसरऽ दिश "ब्लू ओरिजिन" स्पेसक्राफ्ट पूर्ण रूप स॑ पुनः उपयोग करलऽ जाय वाला रॉकेट छै जे २-चरण म॑ चलै छै । विरदीन गैलेक्टिक पृथ्वी सतह सँ लगभग 100 किमी ऊपर जाएत छैक मुदा "ब्लू ओरिजिन" पृथ्वी स॑ १५० किमी ऊपर जाय सकै छै । ई दुनू के वास्तविक गुरुत्व विहीन क्षण मात्र किछु मिनटक लेल प्रदान करैत अछि । ई दुनू में सँ कोनो पर्यटक के उपरोक्त सभु अपेक्षा के पूर्ति नहिं क सकैछ I कमर्शियल स्पेस एडवेंचर मे किछु आओर उद्यमी सेहो छथिन्ह जाहि मे बोइंग कंपनी केऽ 'सीएसटी-१००' स्टारलाइनर अंतरिक्ष यान सँ इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (आईएसएस) केऽ यात्रा सेहो शामिल छै, जेकर परिचालन सम्प्रति शुरू नै भ सकल छै । चीनी, रूसी आरू भारतीय कंपनी सेहो वाणिज्यिक अंतरिक्ष पर्यटन लेली अपन अपन योजना अकेले या संयुक्त रूप सँ बनाबै म॑ व्यस्त छथि जाहि में बहुत समय नै लगतै । एकरा लेल हुनका सभु लग पहिने सँ प्रमाणित तकनीक छन्हि । ओ सभु के अंतरिक्ष वाहन या एकरा वास्ते बनाओल स्पेस स्टेशन केँ कोनो संज्ञा दऽ सकै छी जेना कि स्पेस-इन, स्पेस-रिसॉर्ट, स्पेस शेरेटन, 'अंतरिक्ष-वास, 'उड़नखटोला' वा आओर कोनो आन नाम । आगामी वर्ष व दशक में ई महा खर्चीला व्यापार अन्यान्य देश में अवश्य शुरू हएत यद्यपि सम्प्रति पर्यटक के अपेक्षा आंशिक रूपेण ही पूर्ण होए छैक I 'वर्जिन गैलेक्टिक" अंतरिक्ष पर्यटन (ब्रिटिश अमेरिकन) वर्जिन गैलेक्टिक अंतरिक्ष पर्यटन के संस्थापक रिचर्ड ब्रैंसन छथिन्ह I 11 जुलाई 21 क॑ 'वर्जिन गैलेक्टिक' अपन प्रथम उड़ान में ई प्रदर्शित करै के कोशिश करलकै कि ई सब अंतरिक्ष म॑ रोमांचकारी पर्यटन लेली एक सक्षम संभावना प्रदान करै छै । एकर संस्थापक रिचर्ड ब्रैन्सन अपन तीन कर्मचारी संग वीएसएस यूनिटी केऽ 22वीं उड़ान म॑ यात्री छलाह । हुनका सब क॑ बहुत धूमधाम सँ आरू वैश्विक प्रचार के साथ क्राफ्ट केरऽ यात्री डिब्बा म॑ मिशन स्पेशलिस्ट (?) के रूप म॑ यात्रा करैलन्हि । हुनकऽ रॉकेट संचालित अंतरिक्ष यान वीएसएस यूनिटी क॑ विमान वीएमएस ईवा केरऽ पंखऽ के नीचाँ स॑ ४६३९३ फीट ऊंचाई सँ छोड़लऽ गेलऽ, जेकरऽ गति ३८९ मील प्रति घंटा छेलै । अलग होय के एक सेकंड उपरान्त वीएसएस यूनिटी के रॉकेट प्रज्वलित भऽ, यान क॑ लगभग १०० किमी ऊपर अंतरिक्ष ला गेल जेहि में ऊपर जाए वाला किछु सेकेण्ड ओ ओहि ऊंचाई सँ नीचा खसए वाला किछु आओर सेकंड गुरुत्व विहीन छल । 'VSS Unity' के अधिकतम गति अलग होय के 57 सेकंड बाद १२५ हजार फुट AMSL पर 3.1 Mach छू गेलै । रॉकेट 60 सेकंड बाद मिझा गेलै मुदा क्राफ्ट केऽ ऊंचाई बढ़त॑ रहलै । एही दौरान अलगाव के १ मिनट १० सेकंड पश्चात् सभु यात्री सब केँ आगाह कएल गेल जे आबै वाला सेकेंड में गुरुत्व विहीनता के सु-अनुभव लिए लए अपन अपन सीट के पट्टा खोलय I क्राफ्ट केरऽ बैक फ्लिपिंग लगभग २१३ हजार फुट AMSL ऊंचाई पर अलगाव के १'३३" बाद कएल गेल ताकि यात्रीगण अपन बगल आरू छत में उपलब्ध छोट-छोट खिड़की स॑ पृथ्वी क॑ देखै सकए । फ्लिपिंग के कारण इहो छल किंचित मात्रा मे ही सही, एयरोडायनामिक कंट्रोल पायलट के हाथ रहे I VSS यूनिटी केऽ अधिकतम ऊंचाई अलग होय स॑ २ मिनट ३७ सेकंड पश्चात अधिकतम ऊंचाई २,८२,७७३ फीट AMSL छेलै, जखन गति १.१ Mach तलक कम भऽ गेलऽ। एकर बाद वायुमंडलीय अभाव में VSS Unity क्राफ्ट निर्मुक्त रूपेण नीचा खसए लागल I धरती सतह सँ 200 हज़ार फुट AMSL ऊंचाई पर ३ मिनट ४० सेकंड पश्चात क्राफ्ट पायलट आगामी किछु सेकंड में वायुमंडल म॑ तथाकथित 'पुनः प्रवेश' के घोषणा करलकै जखन सब यात्री अपन-अपन स्थान पर वापस भ सीट बेल्ट बान्हि लेलन्हि I एहि तरहें गुरुत्व विहीन अवधि मात्र 2 मिनट सं किछु बेसी' अनुभव भेल जेहि में क्षण भरि लेल यात्री लोकनि कें संकीर्ण केबिन में तैरैत देखल जा सकैत छल I ठाढ़ सीट हुनका लोकनिक फ्री-फ्लोट मे बाधा बुझाइत छल I गुरुत्व विहीनता या भार विहीनता के ई अनुभव हुनका लोकनिक जीवन भरिक अनुभव रहल भेलन्हि । अंतरिक्ष यात्री केऽ पहिलऽ उप-कक्षीय उड़ान अल्पावधि ही सही, प्रशंसनीय छल आरू निश्चित रूप स॑ भविष्य में अंतरिक्ष-पर्यटन के नया रास्ता प्रशस्त करत । यद्यपि अंतरिक्ष में जएबाक ओ गुरुत्व विहीन क्षण के रोमांच के अनुभव कए चारो अपना आप केँ Astronaut कहल लगलन्हि मुदा ओ सब यात्री मात्र छलाह I वायुमंडल में पुनः प्रवेश (Re-Entry) के बाद इंजन-रहित VSS Unity क्राफ्ट के ओहि हवाई पट्टी पर उतारल गेल जतय सं ओ उड़ान भरने छल I लैंडिंग सफल छल I "ब्लू ओरिजिन" अंतरिक्ष पर्यटन (अमेरिकन) निजी व्यावसायिक अंतरिक्ष उद्यम के दोसर उद्यमी "ब्लू ओरिजिन" छथि जेकर संस्थापक जेफ़ बेजोस छथिन्ह I ब्लू ओरिजिन २० जुलाई क॑ २० जुलाई क॑ अपनऽ पहिल सब-ऑर्बिटल पर्यटन उड़ान सँ दुनिया केऽ ध्यान आकर्षित करलकै I अपनऽ पुनरुपयोग करऽ वाला 'न्यू शेफर्ड' नामक रॉकेट बनौलन्हि जे अपन मानव कैप्सूल क॑ अंतरिक्ष म॑ प्रक्षेपण कए स्वयं वापस आवि लिफ्ट-ऑफ सं करीब 2 मील दूर एकटा निर्धारित प्लेटफार्म पर धरती पर सुरक्षित सॉफ्ट लैंडिंग करैत छैक I मानव कैप्सूल में पर्यटक समेत छह लोकनि समाहित भ सकैत अछि I ई कैप्सूल वॉन कर्मन लाइन (धरती सँ १०० किमी ऊपर) स॑ ऊपर जाय छै आरू ओकर बाद सुरक्षित रूप स॑ उतरी क॑ जमीन स॑ ६ फीट ऊपर नाइट्रोजन गैस के जेट फायरिंग स॑ सक्षम सॉफ्ट टच-डाउन कराइ छै । ई अलग-अलग रॉकेट आरू मानव कैप्सूल दूनू के प्रक्षेपण स॑ ल॑ क॑ वापस उतरै तलक के पूर्ण रूप स॑ स्वचालित उड़ान छै । न्यू शेफर्ड क॑ टेक्सास, वैन हॉर्न के बाहर स॑ "ब्लू ओरिजिन" प्रक्षेपण स्थल सँ लॉन्च करलऽ गेलऽ जाहि में चार यात्री छेलै । ई एकदम सही व सटीक प्रक्षेपण छल जे लगभग सीध में ऊपर चढ़ल गेल। एकर अधिकतम गति 3 Mach छल। रॉकेट बर्न-आउट T+ 2'21" पर 183 हज़ार फुट AMSL ऊंचाई पर पूरा भेल आ किछु सेकेंड में कैप्सूल सँ पृथक भ गेल । मानव कैप्सूल बिना इंजन के ऊपर चढ़ैत रहल आ ~230 हज़ार फुट AMSL पर T+ 2'35" पर गुरुत्व विहीन, भार विहीन 0-G में प्रवेश केलक । कैप्सूल T+ 4'03" तक ~351 हज़ार फुट के शिखर ऊंचाई पर चढ़ैत रहल यावत् ओकर गति शून्य नहिं भ गेल आ तखन निर्मुक्त रूपेण (free fall) नीचाँ गिरय लागल । गुरुत्व वा भार विहीन 0-G अवधि T+5'32" पर 225 हज़ार फुट AMSL के ऊंचाई पर समाप्त भेल जाहि पश्चात् कैप्सूल वायुमंडल में पुनः प्रवेश (Re-Entry) कएलक | एहि तरहेँ पर्यटक लोकनि केँ कुल लगभग 3 मिनटक गुरुत्व विहीन या भर विहीन 0-G के अनुभव भेल। वायुमंडल में पुनर्प्रवेश (Re-Entry) लगभग 1880 MPH गति पर 225 हज़ार फुट AMSL पर छल जे कोनों आकस्मिक घटना-रहित छल I वायुमंडलीय पुनर्प्रवेश के दौरान नहिं तँ कोनो घर्षण-आगि देखल गेल ने अत्यधिक गति ह्रास I ड्रोग आरू मुख्य पैराशूट क्रमशः T + 8'21" आरू T+ 8'35" प॑ क्रमशः 6400 फुट AMSL तथा 3200 फुट AMSL ऊंचाई पर खुलल I सुरक्षा के दृष्टिकोण सँ पैराशूट खुले के ई ऊंचाई गंभीर रूप स॑ कम छेलै I मुदा पर्यटक मॉड्यूल लगभग 14 MPH के ऊर्ध्वाधर गति सँ एक "नॉट-सो-सॉफ्ट टचडाउन" या यूं कहु कि कनैं डरावै वाला कठोर लैंडिंग करलक । कठोर जमीनी स्पर्श पश्चात् भी कैप्सूल संतुलित व स्थिर रहल आओर तीनों पैराशूट कैप्सूल के डोर सँ जुड़ल स्वाभाविक रूप सँ बगल मे नीचा खसि पड़ल यद्यपि 'पर्यटक कैप्सूल' के लैंडिंग पर कोनों नियंत्रण नहिं छलैक I लैंडिंग स्थल 'ब्लू ओरिजिन' के सीमा परिधि क्षेत्र के दीवार स॑ लगभग सटल छल जेकरा देखि चालक दल में अत्यधिक चिंता अवश्य भेल होएत । ओ लोकनि सुरक्षित लैंडिंग सँ सर्वशक्तिमान परमेश्वर कें धन्यवाद देने हेताह I ग्राउंड क्रू क॑ टचडाउन स्पॉट प॑ पहुँचै म॑ कई मिनट लगलै जे अनअपेक्षित छल । Drogue Parachute Main Parachute Capsule too close to perimeter wall Capsule harsh Touchdown "न्यू शेफर्ड" कैप्सूल केरऽ ऊँचऽ आरू चौड़ा खिड़की स॑ 'टूरिस्ट व्यूअरशिप' या बाहरी दृश्य नीक जकाँ दिखए अछि I पृथ्वी केरऽ वक्रता, ओकरऽ चारो तरफ के पतला वायुमंडलीय नीला आवरण के साथ-साथ अंतरिक्ष के घुप्प अन्धकार सभु पर्यटक नीक जकाँ देखलन्हि हएब । वीएसएस यूनिटी मे केबिन के भीतर सूर्य के तीव्रता चिंताजनक बुझाएल I उपरोक्त दूनू अलग-अलग उद्यमी के अलग अलग उड़ान मे यात्रीगण केँ कतेक रोमांच महसूस भेल, ओकर जवाब तँ ओ सभु पर्यटक ही द सकैछ मुदा कंपनीक कर्मचारी आ ओकर मालिक तँ कोनों एहन शब्द बाजताह जे पर्यटक कें आकर्षित कराए में बाधक होए I बेशी मुद्रा कमाओक उद्देश्य सँ बनाएल अरबों डॉलर के उद्यम में ई सब विषमता तँ अपेक्षित अछि I हालाँकि अंतरिक्ष पर्यटन के एखन बाल्यकाल अछि, दोनों उद्यमी केँ पर्यटक के अपेक्षा पूर्ति कराए में किछु अतिरिक्त कार्य अवश्य करएक पड़त जेहि सँ ओहि लोकनि के आकर्षण बढ़ि सकए I अन्यान्य अंतरिक्ष पर्यटन उद्यमी उपरोक्त अंतरिक्ष पर्यटन उद्यमी छोड़ि किछु अन्य उद्यमी सेहो अपन-अपन पर्यटन शुरू कराए में कार्यरत छथि I अमेरिका के बोइंग कंपनी अपन टेस्ट परीक्षण के निकट छथि I अमेरिकन स्पेस एक्स सेहो अपन फाल्कन-९ पर स्थापित "क्रू ड्रैगन" स्पेसक्राफ्ट में ५ दिनुक ISS के पर्यटन करौलक अछि जे पर्यटक लेल किछु असुविधाजनक छलैक I अमेरिका के ही "ओरियन स्पान" पर्यटन लेलि अपन अलग स्पेस स्टेशन बना रहल छथि I रूस के स्पेस एडवेंचर कंपनी सेहो अपन अलग पर्यटन उद्यम लगा रहल अछि I अनुमान लगा सकै छी जे चीन सेहो पाछू नहि रहत I भारत में सेहो किछु स्टार्ट अप (बैंगलोर के 'हाइप लक्सरी') अंतरिक्ष पर्यटन में कार्यरत छथि I एहन उम्मीद क सकै छी जे आगामी वर्ष व दशक में अंतरिक्ष पर्यटन में महत्वाकांक्षी बढ़ोतरी हएत I लेखक के ओ सभु अंतरिक्ष पर्यटन उद्यमी केँ शुभकामना अछि I अंतरिक्ष पर्यटन के प्रतिस्पर्धात्मक विश्लेषण वीएसएस यूनिटी मे प्रत्येक सीट सँ लागल पैघ खिड़की बेसी आकर्षक भ सकैत अछि जे ओहि किछु अनमोल क्षणक बेहतर व संतोषजनक अनुभव सँ पर्यटक कें बेशी आकर्षित करत I एहि में किछु डिजाइन समीक्षा व परिवर्तन अपेक्षित होएत जेहि सँ पर्यटक केँ बेशी संतोषजनक आनंद भेटए, बेशी फायदेमंद भ सकैत अछि I अंतरिक्ष पर्यटन में अग्रसर दूनू एजेंसी केरऽ तुलनात्मक वर्णन निम्नलिखित तालिका में देलऽ गेलऽ अछि: सम्प्रति अंतरिक्ष पर्यटन में चिंता के विषय दोनों उद्यमी के स्पेसक्राफ्ट में जीवन सुरक्षा के किछु छोट-मोट चिंता सेहो बुझाइत अछि I कि पर्यटक लोकनि केँ सामान्य ओवरआल/आउटफिट/कैजुअल मे अन्तरिक्ष के यात्रा करबाक चाही ? बिना स्पेस-सूट कें, बिना पर्सनल लाइफ सपोर्ट सिस्टम के पृथ्वी के वायुमंडलीय चादर सँ ऊपर यात्रा करनाय खतरनाक होए छैक I उल्कापिंड ओहि ऊंचाई पर बहुत बड़ खतरा पैदा क सकैछ आरू कोनो भी कारन यदि यात्रीगण के केबिन स॑ हवा के दबाव कम भेल तँ सभु यात्री के जीवन दांव पर लागि जाएत I बिना पूरा दबाव वाला स्पेस सूट के अभाव में सब यात्री आरू चालक दल के क्षणिक मृत्यु भ सकै अछि । केबिन प्रेशर रिलीफ वाल्व के अप्रत्याशित विफलता भयावह भ सकैत अछि I रिवर्स ऑक्सीजनेशन रक्त सँ ऑक्सीजन के चूसि क बाहर निकालय लेल सक्षम अछि जे मुश्किल सं 7 सेकेंड मृत्यु के समक्ष क देत I अंतरिक्ष उड़ान में केबिन के दबाव कम होए सँ मृत्यु एक कटु वास्तविकता व संभावना अछि । अतः, सब के पास अप्रत्याशित आपातकालीन स्थिति के लेल स्पेस सूट या फुल प्रेशर गारमेंट होबाक चाही, जे किछु मिनट तक जीवन के महत्वपूर्ण समय द सकय जखन कि चालाक तेजी सँ नीचाँ उतरब शुरू क सकय I मानल जाएत छै कि पहिनें दूनू उद्यमी यात्री सुरक्षा लेली स्पेस सूट उपलब्ध करै के योजना बनयने छेलै लेकिन बाद म॑ पर्यटक के असुविधा देखि अपन-अपन विचार बदलि लेलकै । यद्द्यपि, हवा दबाव केरऽ आपातकालीन नुकसान के तहत जान बचाबै बेशी आवश्यक छै । उम्मीद अछि कि अंतरिक्ष पर्यटकऽ के जीवन व स्वास्थ्य-सुरक्षा लेली सब अंतरिक्ष यान के डिजाइन म॑ कोनों तरह के महत्वपूर्ण विफलता के विश्लेषण करलऽ गेलऽ होतै । ई विफलता भिन्न-भिन्न प्रणाली में भ सकैत अछि...जेना कि रॉकेट के प्रज्वलित नै होबय; ओकर नोजल फाटि जाए; यात्री या चालक केबिन में हवा दबाव के ह्रास भ जाए; माइक्रोउल्कापिंड के चोट सँ यान के क्षतिग्रस्त होए आदि.. आदि.. I वैज्ञानिक मंतव्य प्रायः प्रत्येक अंतरिक्ष उद्यम मे किछु अंतर्निहित जोखिम जरूर होइत छैक I मुदा ककरो जीवन केँ जोखिम पर नहि लगा सकैत छी I कोनो भी स्पेस टूरिस्ट या अंतरिक्ष पर्यटक क॑ अमुक उड़ान स॑ किछु न्यूनतम उम्मीद व उपरोक्त अपेक्षा अवश्य होएत I वर्तमान समय में अंतरिक्ष पर्यटन के खर्च-राशि लगभग निषेधात्मक अछि I एतैक बेशी लागत पर स्पेस टूरिज्म के पेशकश करय वाला कंपनी के प्रत्येक पर्यटक के सुरक्षित वापसी व अपेक्षा के पूरा करय के प्रयत्न करबाक चाही I 'वर्जिन गैलेक्टिक' आरू 'ब्लू ओरिजिन' सब उद्देश्य क॑ पूरा करै छै कि नै, ई फैसला ओकर यात्री करतन्हि मुदा प्रक्षेपण के विश्लेषण तँ देखा रहल अछि जे पर्यटक के अपेक्षा पूर्ण नहिं भ रहल अछि I आवै वाला समय में अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा बढ़ए के संभावना अछि जाहि में अधिकाधिक अपेक्षित तत्व समाहित करए के प्रयास अवश्य होएत I एहि लेख के उद्देश्य मात्र वैज्ञानिक दृष्टिकोण के सामने लाबय के अछि I अंतरिक्ष पर्यटन के लेल ई एकटा नीक शुरुआत अछि I लेखक परिचय- ग्रुप कैप्ट (डा.) वी. एन. झा (MBBS, AMD, MD, FeISAM) पूर्व वायुसेना अधिकारी व चिकित्सा अनुसंधान प्रमुख; बैंगलूर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर व स्नातकोत्तर परीक्षक तथा DRDO सँ सेवानिवृत्त वरिष्ठ वैज्ञानिक (Sc 'F') व सह निदेशक छथिन I अंतरिक्ष विज्ञान में हिनकर लिखल पुस्तक "Design Concepts in Human Space Missions) देश विदेश में प्रचलित छन्हि I अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.पद्य ३.१.प्रमोद झा 'गोकुल' श्रीमैथिली चरणमे ३.२.राज किशोर मिश्र-नव-पुरान ३.३.आचार्य रामानंद मंडल-माय/ मेघ/ छठ परब ३.४.प्रणव कुमार झा- नब युग छै ३.१.प्रमोद झा 'गोकुल' श्रीमैथिली चरणमे प्रमोद झा 'गोकुल' श्रीमैथिली चरणमे
चलू एम्स एम्स खेलाइ मुरही कचरी खूब खाइ ।। सूतल रहू ओढ़ि रजाइ । भेले बियाह बूझू यौ भाइ! ।। राजक लेल जे तनलौं तान । सेहो लगैए भै गेल म्लान।। चुड़ा दहीमे ओठङल जान। पान मखानमे सटि गेल प्रान।। माछक मूड़ा लखि पलै पूरा। माथक पाग लटा गेल धूरा।। गुटबन्दी गोलैसी गुलछर्रा । काज हमर यैह रोजमर्रा ।। भाङ पीबि सुतलहुँ बहुते । आगांँ पाछाँ केलहुँ बहुते ।। भेटल की सब कहू सते। मर्दित मान आन छल जते।। उठू उठू जागू सब मैथिल। ने मोजर गुजर भेने शैथिल ।। जाति पाति पाटा पाटी छोड़ू। मिथिला हित अपनाके जोड़ू।। भेद भाव सब वलपूर्वक तोड़ू। श्रीमैथिली चरणमे मनके मोड़ू।।
-प्रमोद झा 'गोकुल', दीप, मधुवनी (विहार); फोन -9871779851 अपन मंतव्य editorial.ऽtaff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.राज किशोर मिश्र-नव-पुरान राज किशोर मिश्र नव-पुरान बा ह रे नि खि ध मड़ुआ ! जगलै ओकर भा ग, अन्तर्रा ष्ट्री य भो ज मे, पहि रा ओल गेलै पा ग।
ता मक था री -बा टी सभ, सजल डा इनिं ग-टेबुल पर, महा भा रतक पुनः प्रसा रण, देखि रहल लो क केबुल पर।
सद्यः देवता वरेण्य सवि तुः , प्रा तः का ल सूर्य-नमस्का र, संगे -संग वि ज्ञा नक उदय, नवका -नवका आवि ष्का र।
नव पी ढ़ी केँ पुरा न पी ढ़ी सँ छै की को नो अरा रि ? बा त के, हो इत अछि बतङ्ङड़ , बा त लेल कि ए मा रि ?
हो न्हि स्वा गत मो न सँ, नव शि ल्पी केँ ,नव सा हि त्यका र, न्या य हो अए ,ने कि जुग-जुग सँ बस हो न्हि अहि ल्या केॅं उद्धा र।
पहि नो शां ति क छलैक खगता , ओहि ना तँ अछि एखनो , असभ्यता मे छलैक हिं सा , जे बा त एखन, सएह तखनो ।
नव्यता वर्चस्व लेल, अछि बड़ भेल अपसि आँत, पुरना चा उरक इडली कहि आ लगलै ककरो , अनसो हाँ त?
धर्म स्था पना बेर-बेर , मुक्ति क नव -नव पंथ, पुरा न बा टक जी र्णो द्धा र, उगला ह नबका महंथ।
फूलो मा ए छलथि न बुधि आरि , पिं की मा ए छथि न बुधि आरि , कुरुक्षेत्र मे भेल महा भा रत, खेत-पथा र लेल एखनो मा रि ।
लो भ, क्रो ध सभटा जी बि ते अछि , बदलि गेलैक बा ना , सा सु-पुतो हु मे एखनो ओहि ना , एक दो सर के ता ना ।
धर्महि सँ हर तथ्यक व्या ख्या , वि ज्ञा न तो ड़लक रूढ़ि वा द, परञ्च मनुक्ख आ प्रकृति बी च मे, बढ़ि रहल अछि कटु संवा द।
जुग अछि अपन जो गा ड़ मे, लऽ ली सभटा श्रेय, अती तक प्रेत घूमैछ बनि 'उपमा न' ने कि 'उपमेय'।
पूर्व मे जनमल अर्थ-तंत्र, पूर्वहिँ सभ्यता जनमल, जो ड़ल गेल, कि छु तो ड़ल गेल, का ल ने बैसल कलबल।
कतेक पुरा न ब्रह्मां ड अछि ? अछि की एखनो नऽव? बूढ़ भेला ह आब सूर्य की ? ता रा गण भेलथि दऽब ?
बयस भ' गेलै चन्द्रमा के ? कि चमकत एखनो पुरनके चा न? आकि आओत, नव पी ढ़ी क लेल नवका वि धु जे हो एत जुआन?
बूढ़बा ठूट्ठा गा छ रहत, कि ओकरे सा रा पर तरुण तरु ? ओ ठहुरी भ' जा रनि बनि जा एत , आ' द्रुम नवतुरि आ , सएह बरु ?
भूमि -उर्वरता नूतन अछि , की प्रकृति जा इत छथि झखरल ? कि छु बा त तँ अछि ओहन, जे मा नव जा ति केँ अखड़ल ।
पुरा न नचैत अछि अपन परि धि मे, नवका के अछि अपने ता ल, ककर महत्व ककरा सँ कम अछि ? महा पञ्च छथि एक्कर का ल।
ओहो नी क, कि छु नी क इहो , दूनू मि लि कऽ महो -महो । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.आचार्य रामानंद मंडल-माय/ मेघ/ छठ परब आचार्य रामानंद मंडल माय/ मेघ/ छठ परब १ माय माय तोहर प्रेम प्रेम पीड़ बनैत हैय। माय माय तोहर प्रेम प्रेम सपना बनैत हैय। माय माय तोहर प्रेम प्रेम आंसू बनैत हैय। माय माय तोहर प्रेम प्रेम भय बनैत हैय। माय माय तोहर प्रेम प्रेम मुक्त करैत हैय। माय माय तोहर प्रेम प्रेम चान तारो में दिखैत हैय। माय माय तोहर प्रेम रामा प्रेम सपना में दिखैत हैय। २ मेघ मेघ तोहर केतेक रूप ? तुलसी के घोड़ा, कालिदास के दूत, शास्त्री के नेता, जे उपरे उपरे पी जाइत छे ! मेघ तोहर केतेक रूप ? मेघ छे कि बादल ! मेघ बईन के बरसईयत, बादल बईन के गरजईत, मोर के नचऔले, श्याम स वनसी बजबऔलए। मेघ तोहर कतेक रूप ? पागल परेमी तूं बईन के, धरती के पिआसल देइख कए, परबत जेना उरोजो के छूइ कए। अपन बरसा बून्न से, कएं दय छी , धरती के सस्य सामला ! मेघ रामा कतेक रूप। ३ छठ परब प्रकृति परब हैय। सूर्य के आराधना हैय। छठ परब नदी आ तालाब संग सूर्य के आराधना हैय। छठ परब जल सूर्य के संबंध बरखा चक्र बतबै हैय। छठ परब मंत्र पुजारी बिन सूर्य के आराधना हैय। छठ परब सूर्य मंदिर में सूर्य के पूजा हैय। छठ परब प्रकृति परब न आराधना न पूजा हैय। छठ परब ठेकुआ भोग लागैय प्रसादी में छूत मानैय। छठ परब प्रकृति परब के रामा गरिमा बचनाइ हैय। -आचार्य रामानंद मंडल, सीतामढ़ी। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.४.प्रणव कुमार झा- नब युग छै प्रणव कुमार झा नब युग छै फेक न्यूज़ के चलती छै, नब युग छै असल ख़बर आब गलती छै, नब युग छै। हिंन्नू -मियाँ खूब चलय छै, नब युग छै। आर्थिक मुद्दा आह भरय छै, नब युग छै। की एंकर, की नेता, की धर्मsक व्यापारी अमृतकाल में विष उगलय छै, नव युग छै। मूर्खता केर गाल बजय सभटा डिबेट में समझदारी के कंठ सुखय छै, नव युग छै। नीक शिक्षा के मुद्दा गेल आब कोठी कान्ह पर सदिखन मोबाईल पर रील चलय छै, नब युग छै। महंगाई के डाइन कहब पुरान गप्प भेल महंगाई आब सास कहबय छै, नव युग छै। बेरोजगार भs क दिन भरि टंडैली करता तै पर से बकवास करय छै, नव युग छै। भरल जवानी जे अंकिल सब देह चोरौला व्हाट्सप्प पर दुष्प्रचार करय छै, नब युग छै की नेता अपराधी आ की भ्रष्टाचारी वशिंग मशीन में सब धुलई छै, नब युग छै। कियौ करय उपवास आंदोलन परवाह की मिडिया नंगटे नाच करय छै, नब युग छै। देश में कोनो अनाचार होय कान किए दी सेलिब्रेटी सब मुँह सीने छै, नब युग छै। एंकर बैसल कोरा में सब बेरा बेरी नै कोनो सवाल करय छै, नव युग छै। लागल छैथ सब करय में बस चरण वंदना चाटब सब दरबार करय छै, नव युग छै। नेने छलाह भार कान्ह पर ज्ञान - योग के से झूठsक व्यापार करय छै, नव युग छै। खेल देखाबय छै सब के दिन राति मदारी बताह सगरो देश बनल छै, नव युग छै। सोशल मिडिया पर पसरल छै गारि-गरौअल सभ्य आचरण झाम गुड़ई छै, नव युग छै। भीड़तंत्र छै भारी सबपर तानाशही लोकतंत्र आब आह भरय छै, नब युग छै। उदारवाद आ लोकतंत्र के चेहरा एखनो पुरान गली में खूब लिखय छै, नब युग छै। - प्रणव कुमार झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड नई दिल्ली अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह ३९२ म अंक १५ अप्रैल २०२४ (वर्ष १७ मास १९६ अंक ३९२)|| 191 192 || विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in
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हज विशेषांक २०२४ नरेन्द्र झा एवं प्रा. रामावतार यादव पर विदेह www.videha.co.in विशेषांक २०२४ नरेन्द्र झा एवं प्रा. रामावतार यादव चयनित भेला २०२४ क विदेह विशेषांक लेल। जि भर नरेन्द्र झा पर विदेहक विशेषांक १ जून २०२४ आ प्रा. रामावतार यादव पर १५ जून २०२४ अंकमे धो लि SD प्रकाशित CCA) eee: | | लेखक-पाठक clad आग्रह जे नरेन्द्र झा एवं प्रा. रामावतार यादव जीक काजपर आलोचना, . | = 'समालोचना, समीक्षा आदि वर्ड फाइलमे editorial.staff.videha@gmail.com पर | — in 0p Se i eam पाबधि। लि कि & नरेन्द्र झाजीक अधिकांश पौथी २००८ सें विदेह www.videha.co.in पर उपलब्ध ofS! Wy face fastuign Roly % cf जद = = == = SG WWW. HES हैंए। Pe — Yn, facie ICTR 3928 re ae facre factais २०२8 .... प्र } AERA सा अन्न था. वामाब्रछाव AAA शव FACE www. videha.co.in FACT २०२8. AA YA सा IH शा. वामाब्रजाव AAA BUS एछता २०२8 क fA FACT CAL ATT सा शव FACES FACTS ५ OT २०२४ शा था. वामाब्रछाव TIAA शव 90 जून २०२४ कर्म geht =. 7 east a a एलथक-नाठक एलाकनिें AS OH THT सा IH था. वामाब्रठाव ATA जीक BIA AAT, HATA, i” RE» ater शनि aS काजतएय editorial. staff.videha@gmail.com शव शठाब्िणि। x AES साजीक अविकीने co २००० मैं बिएनठ www.videha.co.in शव Gorn अडि।
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