VIDEHA — Issue 393 / अंक ३९३

Publication: VIDEHA · Issue: 393
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ISBN 978-93-340-6426-1 (Book) ISSN 2229-547X (online) 𑒀 विदेह ३९३ म अंक ०१ मई २०२४ (वर्ष १७ मास १९७ अंक ३९३) [विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। कॉपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति ‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२४. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२४. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. 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It is a platform for scholars, researchers, writers and poets to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, and poetry in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@gmail.com. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover designed by AUM GAJENDRA THAKUR Videha e-Journal: Issue No. 393 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृ. २-१५) १.२.अंक ३९२ पर टिप्पणी (पृ. १६-१६) २.गद्य २.१.कुन्दन कर्ण- बीहनि कथा-पंच-परमेश्वर (पृ. १८-१८) २.२.परमानन्द लाल कर्ण-आषाढ़ मासक एकादशीक माहात्म्य (पृ. १९-२२) २.३.संतोष कुमार राय 'बटोही' केर डायरी 'लव यू टू' (पृ. २३-२४) २.४.लाल देब कामत-पारो बनाम प्रमिला/ घर-घुसरा/ ग्यारेन्टी: बिहैन कथा (पृ. २५-३३) २.५.रबीन्द्र नारायण मिश्र-सीमाक ओहि पार (धारावाहिक उपन्यास) (पृ. ३४-५५) २.६.संतोष कुमार राय 'बटोही'- लघुकथा- सहोदर बहिन (पृ. ५६-५७) २.७.रबीन्द्र नारायण मिश्र-मातृशरणम् (पृ. ५८-१०१) २.८.निर्मला कर्ण- अग्निशिखा खेप -३९ (पृ. १०२-१०६) ३.पद्य ३.१.मुन्ना जी- किछु हाइकू (पृ. १०८-१०९) ३.२.राज किशोर मिश्र-नदीक धार (पृ. ११०-११२) ३.३.आचार्य रामानंद मंडल-अवीर सीता/ भावार्थ/ केवल मानव (पृ. ११३-११७) ३.४.डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफरी- जखन पिता छलाह (पृ. ११८-११९)

१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.अंक ३९२ पर टिप्पणी १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय कामेश्वर चौधरी जीक सनेस कामेश्वर चौधरी जीक सनेस मैथिलीक नव पद्य संग्रह अछि। ऐ मे १.भक्ति गायन (हे गणपति, माँ शारदे!, हे दिनकर दीनानाथ!, हे कृष्ण!, हे गङ्गे!, हे काशी!, राम अवधमे, हे जानकी!, हे साँई!, हर हर महादेव; २.लोकगीत (आह्वान; हाथी अगत आ घोड़ा अगत; माए-बेटाक झगड़ा; गीत; मुञ्चेश्वर-गाथा; अयोध्या मे राम; प्रश्न रामसँ; सोहर; मधु-जननी; आएल बसन्त; अहाँ कतऽ नुकाएल छी राधा; गीत सँ भरि दी गगनकेँ); आ ३.काव्यधारा (सनेस; पप्पा, पूरी गोल किए’?; इराके; आगाँ नाथ, ने पाछाँ पगहा; हम घूमि रहल छी बिकानेर; हे समय; सिनेह; सम्वाद; विचार; माए, जाइ छियौ’; बड़की-बाड़ी; टेंडरक महिमा; टेलिफोन डायरी; भामती; कारी रंगक महिमा; हेरा गेल गाम हमर; कतेक दूर; हमहीं सभटा; चुनावक शंखनाद; आजुक दिन; प्रथम यात्रा; पदार्पण- बम्बई शहर; व्यापारवाद; नवतुरिया मैथिल; हम आब लिखब की? ; मिझा गेल डिबिया; अनसोहाँत बरखा; जलवायु परिवर्तन; विदेशरक मेला; आत्माक खोज) ऐ तीनू (१.भक्ति गायन, २.लोकगीत आ ३.काव्यधारा) क सङोर अछि। बाल पद्य सेहो अछि आ पर्यावरणक चिन्ता सेहो। विदेशरक मेला मोन पड़ै छन्हि आ अनसोहाँत बरखा सेहो आ से ओ लिखै छथि- “माघ बरिसबे करए/ भाए बँटबे करए/ बाँस कटबे करए”- कहैत छलाह हमर दादा। नवतुरिया मैथिलक उकटा-पैंची हुनका नै सोहाइत छन्हि। वाद सभमे बँटैत देश, असमर्थ होइत लोक आ व्यापारवादक प्रकोप कविकेँ एकटा ट्रेण्ड नै वरन् व्यापारवादक एकटा प्लान सन बूझि पड़ै छन्हि आ ओ क्षुब्ध छथि। आजुक दिन बितैत छन्हि अगिला यात्रा लेल पेटी सैंतैत। कतेक दूर आबि गेल छथि जतऽ स्वर मुना गेल छन्हि। डिबियाकेँ ओ दइ छथि दीपक शिखाक बिम्ब। मुदा धरतीकेँ सोधि रहल मानव, जे सौंसे विज्ञापन छापि रहल अछि, से देखि ओ क्षुब्ध छथि, से आब ओ लिखता की? आ ’आत्माक खोज’ मे ओ दार्शनिक सन तटस्थ बनि जाइत छथि- ’तटस्थ भऽ गेल छी/ समुद्रक पानि जकाँ/ पहाड़क आकृति जकाँ/ नदीक प्रकृति जकाँ/ सूर्यक अभिव्यक्ति जकाँ/ चन्द्रक मौलिकता जकाँ/ तरेगनक दृष्टि जकाँ/ गाछ-वृक्षक स्वभाव जकाँ।’ कामेश्वर चौधरी जीक सबल पक्ष छन्हि यएह दार्शनिकता। जे ’अगिला यात्रा लेल पेटी सैंतैत’ दिन बितबाक आ ’तरेगनक दृष्टि जकाँ’ तटस्थ बनबाक कथा बनि जाइत अछि। श्वेताश्वतार उपनिषद मे ईश्वरक तुलना जादूगरसँ कएल गेल अछि, आ शंकराचार्य कहै छथि जे जकरा जादूक भेद नै बुझल छै से जादूगरक करतबसँ आश्चर्यित होइत छथि। मुदा कामेश्वर चौधरी जीक आत्माक खोज स्पष्ट करैत अछि जे ओ जादूक करतब सँ आश्चर्यित नै होइ छथि। आब आशा करब जे ओ तटस्थ हेबाक बिम्बकेँ अगिला संग्रहमे आर आगाँ बढ़ाबथि, कारण हुनकर सबल पक्षकेँ चीन्हि लेल गेल छन्हि। गंगेश उपाध्यायक तत्त्वचिन्तामणि गंगेश उपाध्यायक तत्त्वचिन्तामणि चारि खण्डमे विभाजित अछि- १. प्रत्यक्ष (सोझाँ-सोझी), (२) अनुमान, (३) उपमान (तुलना केनाइ) आ (४) शब्द (मौखिक गवाही)। वैध ज्ञान प्राप्त करबाक ई चारिटा साधन ऐ चारि खण्डमे अछि। खण्ड एक प्रत्यक्ष

गङ्गेशक आह्वान: त्रिमूर्ति शिवक आह्वानसँ ई खण्ड शुरू होइत अछि।आ तेँ आह्वानक विषयपर चर्चा शुरू होइत अछि। ई मानल जाइत अछि जे कोनो परियोजनाक प्रारम्भमे भगवानक आह्वानसँ ई कार्य पूर्ण होइत अछि।

आपत्तिः जे कोनो आह्वान कोनो काज पूरा करबाक कारण अछि, से सकारात्मक बा नकारात्मक संगतिक माध्यम सँ स्थापित नै कएल जा सकैत अछि, किएक तँ एहनो भेल अछि जे कोनो आह्वानक बिना सेहो कोनो काज पूरा कएल गेल। आपत्तिक उत्तर: एकर कारण ई अछि जे ई आह्वान पूर्व जन्ममे कयल गेल छल/ हएत।

आपत्तिः नै, ई तँ घुमघुमौआ तर्क अछि, आ ओनाहितो कोनो काज पूरा केना होइत अछि तकर अनुभवजन्य कारण सभ आह्वानकेँ अनावश्यक सिद्ध करैत अछि। आपत्तिक उत्तर: ई प्रमाण जे आह्वान कार्य पूर्ण हेबाक कारण छै, तइमे दू चरणक अनुमान शामिल अछि। पहिल, ई जे ई शिष्ट लोक द्वारा निन्दित नै अछि वरन हुनका सभ द्वारा सेहो आह्वानसँ कार्य प्रारम्भ कएल जाइत अछि। तखन ई अनुमान लगाओल जा सकैत अछि जे काज पूरा भेनाइ फल अछि किएक तँ ई नियमित रूप सँ इच्छित अछि, आ आन कोनो फल उपलब्ध नै अछि।

आपत्तिः ई तर्क काज नै करत कारण ई पहिनेसँ ज्ञात अछि जे आह्वानक अछैतो काज पूर्ण भऽ सकैत अछि, कारण-सम्बन्ध कोनो तर्कसँ स्थापित नै कएल जा सकैत अछि। आपत्तिक उत्तर: हम सभ ऐ तर्क (जे आह्वान कार्य पूर्ण करबैत अछि) क समर्थन लेल वैदिक आदेशक आह्वान करैत छी। मुदा कोनो एहन वैदिक कथन नै भेटैत अछि। से अनुमान कएल जा सकैत अछि जे ऐ तरहक आह्वान सुसंस्कृत लोक सभ द्वारा शुरू कएल गेल आ कएल जाइत अछि। प्रार्थना देह (जेना प्रणाम), वाणी (गायन) आ मस्तिष्क (ध्यान) सँ होइत अछि। मुदा कोनो ईश्वरमे विश्वास केनिहार सेहो कार्य सम्पन्न कऽ लैत अछि, तँ की ओ पूर्व जन्ममे आह्वान/ प्रार्थना  केने हएत? आ आह्वानक बादो कखनो काल कार्य सम्पन्न नै होइत अछि, से की ढेर रास बाधा ओइ साधारण आह्वानसँ दूर नै भेल हएत? ऐ तरहक तर्कसँ प्रारम्भ भेल छल ई ग्रन्थ, ७-८ सय बर्ख पहिने! (सन्दर्भ: कार्ल एच पॉटर: एनसाइक्लोपीडिया ऑफ इण्डियन फिलोसोफी, १९९३; सतीश चन्द्र विद्याभूषण: अ हिस्ट्री ऑफ इण्डियन लॉजिक, १९२१) स्टीफन एच. फिलिप्स लिखै छथि: मिथिलामे राखल गेल पञ्जी वंशावली अभिलेखसँ पता चलैत अछि जे हुनक पत्नी आ तीनटा बेटा आ एकटा बेटी छल। एकटा बेटा छलन्हि प्रसिद्ध न्याय लेखक, वर्धमान। गङ्गेश स्पष्ट रूपसँ अपन जीवनकालमे प्रसिद्धि प्राप्त कयलनि, जकरा "जगद-गुरु" कहल जाइत अछि, जे हुनक समयक शैक्षणिक संस्थानक लेल "प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय प्रोफेसर" क लगभग समकक्ष हएत। Genealogical records kept in Mithila suggest that he had a wife and three sons and a daughter. One child was the famous Nyaya author, Vardhamana. Gangesa apparently achieved quite some fame during his lifetime, referred to as "jagad-guru," which would be the rough equivalent of "Distinguished University Professor" for the educational institutions of his time. [Phillips, Stephen, "Gangesa", The Stanford Encyclopedia of Philosophy (Summer 2020 Edition), Edward N. Zalta (ed.), URL = https://plato.stanford.edu/archives/sum2020/entries/gangesa/ ] गंगेश जगदगुरु तँ रहथि परमगुरु सेहो रहथि आ परमगुरुक उपाधि हिनका अतिरिक्त मात्र नूतन वाचस्पति (वृद्ध वाचस्पतिक परवर्ती) केँ पछाति जा कऽ प्राप्त भेलन्हि। मुदा गंगेशक संगे जे अन्याय रमानाथ झा आ उदयनाथ झा अशोक केलन्हि से बीसम आ एक्कैसम शताब्दीमे भेल आ तकर दुष्परिणाम स्टीफन फिलिप्स सन नैय्यायिक उठेबा लेल अभिशप्त भेला। एतऽ अहाँकेँ सूचित करी जे स्टीफन फिलिप्स तत्त्वचिन्तामणिक चारू खण्डक सम्पूर्ण अंग्रेजी अनुवाद केनिहार पहिल व्यक्ति छथि [Jewel of Reflection on the Truth about Epistemology: A Complete and Annotated Translation of the Tattva-cinta-mani, Bloomsbury Academic (2020)]। हुनका अलाबी वी.पी. भट्ट सेहो तत्त्व चिन्तामणिक चारिमेसँ ३ खण्डक सम्पूर्ण अनुवाद २०२१ धरि कऽ लेने छथि [१. प्रत्यक्ष (सोझाँ-सोझी), (२) अनुमान, आ (४) शब्द (मौखिक गवाही); (३) उपमान (तुलना केनाइ)बाँकी छन्हि [Word The Sabdakhanda of Tattvacintamani- With Introduction, Sanskrit Text, Translation And Explanation (2 Vols Set) 2005; Perception The Pratyaksa Khanda of The Tattvacintamani 2012 (2 Vols Set); Inference the Anumana Khanda of the Tattva Chintamani ( With Introduction, Sanskrit text, Translation & Explanation ) (2 Vols Set) 2021 Published by Eastern Book Linkers, Delhi]। HONOUR KILLING OF GANGESH UPADHYAYA (FIRST BY RAMANATH JHA, THEN BY UDAYANATH JHA 'ASHOK' (A PARALLEL HISTORY OF MITHILA AND MAITHILI LITERATURE, WHY TODAY ITS NEED BEING FELT MORE INTENSELY?) I was not surprised, though I must have been when I saw a monograph on Gangesh Upadhyaya, whose copyright is being held by Sahitya Akademi, the author of the monograph is Udayanath Jha ' Ashok'. I thought that Udayanath Jha ' Ashok', who has been given Bhasha Samman also, by the same Sahitya Akademi, would do some justice. But truth and research seem elusive in Sahitya Akademi monographs, at least that I found in this monograph. I searched and searched through chapters, that now the author will show courage. But the author like Ramanath Jha seems ashamed of the roots and offspring of Gangesh Upadhyaya. He tries to confuse the issue, but there is no confusion now at least since 2009. But in 2016 Sahitya Akademi seems to carry out the casteist agenda. Udayanath Jha mockingly pretends to search his name, lineage etc, where nothing is there to search for, yet he could not muster the courage, to tell the truth, and ends up just repeating the facts in 2016 that Dineshchandra Bhattacharya already has published way back in 1958. The honour killing of Gangesh Upadhyaya by Prof. Ramanath Jha is being taken forward by Sahitya Akademi, Delhi in a most hypocritical way. Ramanath Jha's obscurantism vis-a-vis Panji is evident from one example. The inter-caste marriage in Panji was well known to him (but he chose to keep the Dooshan Panji secret- which has been released by us in 2009), and it was apparent that the great navya-nyaya philosopher Gangesh Upadhyaya married a "Charmkarini" and was born five years after the death of his father (see our Panji Books Vol I & II available at http://videha.co.in/pothi.htm ). Sh. Dinesh Chandra Bhattacharya writes in the "History of Navya-Nyaya in Mithila". (1958) "The family which was inferior in social status is now extinct in Mithila----- Gangesha's family is completely ignored and we are not expected to know even his father's name-----...As there is no other reference to Gangesa we can assume that the family dwindled into insignificance again and became extinct soon after his son's death." [1958, Chapter III pages 96-99), which is a total falsehood. He writes further that all this information was given to him by Prof. R. Jha, and he seemed thankful to him. The following excerpt from Our Panji Prabandh (parts I&II) is being reproduced below for ready reference: - महाराज हरसिंहदेव- मिथिलाक कर्णाट वंशक। ज्योतिरीश्वर ठाकुरक वर्ण-रत्नाकरमे हरसिंहदेव नायक आकि राजा छलाह। 1294 ई. मे जन्म आ 1307 ई. मे राजसिंहासन। घियासुद्दीन तुगलकसँ 1324-25 ई. मे हारिक बाद नेपाल पलायन। मिथिलाक पञ्जी-प्रबन्धक ब्राह्मण, कायस्थ आ क्षत्रिय मध्य आधिकारिक स्थापक, मैथिल ब्राह्मणक हेतु गुणाकर झा, कर्ण कायस्थक लेल शंकरदत्त, आ क्षत्रियक हेतु विजयदत्त एहि हेतु प्रथमतया नियुक्त्त भेलाह। हरसिंहदेवक प्रेरणासँ- आ ई हरसिंहदेव नान्यदेवक वंशज छलाह, जे नान्यदेव कार्णाट वंशक १००९ शाकेमे स्थापना केने रहथि- नन्दैद शुन्यं शशि शाक वर्षे (१०१९ शाके)... मिथिलाक पण्डित लोकनि शाके १२४८ तदनुसार १३२६ ई. मे पञ्जी-प्रबन्धक वर्तमान स्वरूपक प्रारम्भक निर्णय कएलन्हि। पुनः वर्तमान स्वरूपमे थोडे बुद्धि विलासी लोकनि मिथिलेश महाराज माधव सिंहसँ १७६० ई. मे आदेश करबाए पञ्जीकारसँ शाखा पुस्तकक प्रणयन करबओलन्हि। ओकर बाद पाँजिमे (कखनो काल वर्णित १६०० शाके माने १६७८ ई. वास्तवमे माधव सिंहक बादमे १८०० ई.क आसपास) श्रोत्रिय नामक एकटा नव ब्राह्मण उपजातिक मिथिलामे उत्पत्ति भेल। So, the Srotriyas as a sub-caste arose around 1800 CE as per authentic panji files. Sh. Anshuman Pandey [Gajendra Thakur of New Delhi provided me with digitized copies of the genealogical records of the Maithil Brahmins. The panjikara-s whose families have maintained these records for generations are often reluctant to allow others to pursue their records. It is a matter of 'intellectual property' to them. I was fortunate enough to receive a complete digitized set of panji records from Gajendra Thakur of New Delhi in 2007. [Recasting the Brahmin in Medieval Mithila: Origins of Caste Identity among the Maithil Brahmins of North Bihar by Anshuman Pandey, A dissertation submitted in partial fulfilment of the requirements for the degree of Doctor of Philosophy (History) in the University of Michigan 2014]. Later these Panji Manuscripts were uploaded to Videha Pothi at www.videha.co.in and google books in 2009). The so-called Maharajas of Darbhanga were permanent settlement zamindars of Cornwallis, and there were so many in British India, but in Nepal there were none. In the annexure of our book (Panji Prabandh vol I&II), we have attached copies of genealogy-based upgradation orders (proof of upgradation for cash). So, before 1800   CE, there was no srotriya sub-caste in British India and there is no such sub-caste within Maithil Brahmins in Nepal part of Mithila even today. Srotriya before that referred to following some education stream in British India, in Nepal it still has that meaning. ORIGINAL PANJI REFERENCES ARE PLACED BELOW: DOOSHAN PANJI- THE BLACKBOOK ४९. १८८/२ चर्मकारिणी माण्डर वभनियाम छादन तत्त्वचिंतामणि कारकगंगेश छादनगंगेशक नाँई रत्नाकरक-मातृक (अज्ञात) गंगेश वल्लभा भवाइ माहेश्वर जीवे २१//१० छादनसँ तत्व चिन्तामणि कारक जगद्गुरु गंगेश छादनसँ तत्‍व चिन्‍तामणि कारक गंगेशक वल्‍लभा चर्मकारिणी पितृ परोक्षे पञ्च वर्ष व्‍यतीते तत्‍व चिन्‍तामणि कारक गंगेशोत्‍पत्ति- चर्मकारिणी मेधाक सन्‍तानक लागिमे छलन्हि छादन सँ तत्व चिन्तामणि कारक मōमō गंगेश "तत्व चिन्तामणि कारक म. म. पा. गंगेशक विषयक लेख प्राचीन पञ्जीसँ उपलब्ध"।। पितृ परोक्षे पंच वर्ष व्यतीते गंगेशोत्पत्तिः इति प्राचीन लेखनीय: कुत्रापि देवानन्द पञ्जी ३९-२ छादनसँ जगदगुरू गुंरू गंगेश सुताय वभनियामसँ जयादित्य सुत साधुकर पत्नी देवानन्द पञ्जी ३३९-३ जगदगुरू गंगेश सुत सुपन दौ भण्डारिसमसँ हरादित्य दौ.।। पुत्र सुताच गोरा जजिवाल सँ जीवे पत्नी ए सुत सन्दगहि भवेश्वर। अत्रस्थाने सुपनभ्रातृ हरिशर्म्म दारिति क्वचित् जजिवाल ग्राम देवानन्द पञ्जी ३०=५ छादनसँ उपायकारक म.म. पा. वर्द्धमान सुताच खण्डवलासँ विश्वनाथ सुत शिवनाथ पत्नी गंगेश- म.म. वर्द्वमान/ सुपन/ हरिशर्म्म Gangesh, the author of the Tattvachintamani, wrote one text equivalent to 12,000 texts. Now come to the fact mentioned in the Panji- it clearly states that Gangesh of Tattvachintamani was born five years after the death of his father and he married a tanner, so why did Ramanath Jha hide this from Dinesh Chandra Bhattacharya? Vardhamana, son of Gangesh, calls Gangesh sukavikairavakananenduh. But the conspiracy under which the poems of a famous scholar like Gangesh are not available today is clear from the example given above. Vasudev of Bengal was a classmate of Pakshadhar Mishra of Mithila, he came to study in Mithila, passed the shalaka examination and received the title of sarvabhaum. Vasudeva memorised the tattvachintamani of Gangesh and the nyayakusumanjali karika of Udayana. Pakshadhar and other Mithila teachers did not allow writing (copying) tattvachintamani. Raghunath Shiromani, a disciple of Vasudeva, took the right of certification after he defeated his guru Pakshadhar Mishra in a scriptural debate (shastrartha). The Navya Nyaya school was founded in Navadvipa by Vasudeva-Raghunath. Pakshadhar Mishra was a contemporary of Vidyapati (distinct from the Padavali writer who was of the pre-Jyotirishwar period) who wrote in Sanskrit and Avahatta. And the arrival of Mithila students of Bengal from Bengal stopped after Raghunath Shiromani. Gangesh Upadhyaya enjoyed 'param guru' as well as 'jagad guru' titles, the highest titles of the time and as per Panji only Vacaspati Mishra II was the other person who enjoyed the title of 'param guru'. The extinction of Navya-Nyaya School from Mithila, as described above, was a revenge of nature against the honour killing of Gangesh Upadhyaya and his family. [Translation of the Maithili Short Story, 'Shabdashastram' (based on the true Panji records of Gangesh Upadhyaya) was done by the author Gajendra Thakur himself: published as 'The Science of Words'  Indian Literature Vol. 58, No. 2 (280) (March/April 2014), pp. 78-93 (16 pages) Published By: Sahitya Akademi] -Gajendra Thakur, editor, Videha (be part of Videha www.videha.co.in -send your WhatsApp no to +919560960721 so that it can be added to the Videha WhatsApp Broadcast List.) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १.२.अंक ३९२ पर टिप्पणी प्रणव झा आदरणीय संपादकमण्डल, विदेहक ३९२म अंक पढ़ल। ग्रुप कैप्ट (डा.) वि एन झा क "अंतरिक्ष पर्यटन के वैज्ञानिक दृष्टिकोण" सन विषय पर मैथिली मे लेख देख प्रसन्नत भेल। ऐ तरहक विषय पर विशेषज्ञ द्वारा प्रामाणिक मैथिली लेख केर लेल डा० झा आ विदेह दुनु बधाई के पात्र छैथ। प्रमोद झा 'गोकुल' के लघुकथा लिकलिक वर्तमान मे परीक्षा के पर्चा लीक के मामला आ ओकर गरीब आ सीमित साधन बला छात्र सब पर परय बला दुष्प्रभाव के गंभीरता के संजीदगी से उठाबै अछि। अजित कुमार झा क 'विकास समिति' वर्तमान परिप्रेक्ष्य मे शहर, कस्बा सब मे विकसित होइत कालोनी के विकासगाथा आ ओई संगे मानव समाज के बदलईत मिजाज के चित्रण क्रबाक निक प्रयास रहल। प्रो दमन कुमार झा क 'नेपालमे मैथिली नाटकक विकास आ परिणाम' जानकारिपूर्ण लेख। कुल मिला के अंक मे छपल रचना सब खूब विविधता नेने रहल, विषयवस्तु आ लेखन शैली दुनु रूप मे। सादर। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.गद्य २.१.कुन्दन कर्ण- बीहनि कथा-पंच-परमेश्वर २.२.परमानन्द लाल कर्ण-आषाढ़ मासक एकादशीक माहात्म्य २.३.संतोष कुमार राय 'बटोही' केर डायरी 'लव यू टू' २.४.लाल देब कामत-पारो बनाम प्रमिला/ घर-घुसरा/ ग्यारेन्टी: बिहैन कथा २.५.रबीन्द्र नारायण मिश्र-सीमाक ओहि पार (धारावाहिक उपन्यास) २.६.संतोष कुमार राय 'बटोही'- लघुकथा- सहोदर बहिन २.७.रबीन्द्र नारायण मिश्र-मातृशरणम् २.८.निर्मला कर्ण- अग्निशिखा खेप -३९ २.१.कुन्दन कर्ण- बीहनि कथा-पंच-परमेश्वर कुन्दन कर्ण बीहनि कथा-पंच-परमेश्वर

परमेसराक कान तक ओकर बेटा साहिल के अबण्डपनाक खिस्सा सब पहुँचय लगलैक , मुदा बेटा पांजसँ फ़ाज़िल छलैक। परमेसरा के हिम्मत नहि छलैक जे बेटा के परतारि सकितैक। परमेसरा के आभास होमय लगलैक जे शीघ्रहि ओकरा पंचैतीक सामना करय पड़तैक। एहि प्रकोपसँ बचबाक लेल परमेसरा के एकटा उपाय सुझलैक। गामक पंचैती केनिहार नेतासन लोकसबसँ मित्रता बढ़ा उहो अनका घ'रक पंचैती करय लागल। आब ककरो बुत्ता नहि छै ओकरा पर पंचैती बैसेबाक- परमेसरा आब "पंच-परमेश्वर" बनि गेल अछि!! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.परमानन्द लाल कर्ण-आषाढ़ मासक एकादशीक माहात्म्य अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.संतोष कुमार राय 'बटोही' केर डायरी 'लव यू टू' संतोष कुमार राय 'बटोही' केर डायरी 'लव यू टू'

8-11-2016

नोटबंदी : कारी दिन

भारतक इतिहास मे नोटबंदी 'ब्लैक मनी' आओर 'नोट जालसाजी' केँ रोकवा मे कतेक सक्सेस भेल तकर मूल्यांकन अबै वाला इतिहास करतै। आठ नवम्बर केँ आठ बजे बेगैर पहिने बतौने प्रधानमंत्री टीवी चैनल सँ इ कहलैन्ह जे 500 आओर 1000 नोट चलन मे आब नहि रहतै। इ ब्लैक मनी , नोट जालसाजी आओर आतंकवाद केँ रोकवाक लेल जरूरी अछि। पूरा देश अवाक् रहि गेलै। ब्याह-उपनयनक समय छेलै। 23 मई सँ 30 दिसम्बर केँ बीच नोट बदलै लेल समय देल गेलै। हम टीवी खोलि कऽ बैठले रहि। साँस बन्न जेना भऽ गेल क्याक तँ हमरा लग 500 सौवक किछु हजार नोट घर मे पडड़ल छल। मायक मु इला बाद गाम मे रह अ लगलहुँ अछि। भरि राति नीन्न नहि भेल। योजना बनौलहुँ कि कोना अइ संकट सँ पार पाबि। अगिला दिन बैंक पहुँलहुँ ।बैंक खुलै सँ पहिने बैंक केँ गेट पर किछु हजार लोकनि जमा छलाथि। पता चलल जे सौ टाका वाला नोट भेटत, परञ्च ऊ सभको किछु-किछु दैके छै। ताहि दुआरे दोसरो- तेसरो दिन आबऽ पड़त।हमरा तँ आँखि उनैट गेल इ जमघट देखि कऽ। कोनहुँ धरानी रेलम-पेल केँ बीच एक-दोसर केँ धकलैत एक-दू दिन मे नोट बदलवेलहुँ अछि। नवका नो छपा रहल छै आओर दिन समय लगतै।

500 आओर 1000 केर पुरनका नोट बदला मे नवका नोट , जमा-निकासी मे ततेक कम टाका निकालै केँ आदेश देल गेलै से बड़ लोकनि ब्याह-उपनयनक शुभ-मुहूर्त कैन्सिल केलाह । बहुते काँच-कुमार केँ ब्याह रूकि गेलैन्ह। ब्याह रूकला सँ अरबो-खरबो केँ बिजनेस चौपट भ गेलै। ब्याहक दिन- ठेकायल दुल्हा-दुल्हन माथा पीटलक। किछु लरिका-लरिकी संग भागि कऽ मंदिर मे ब्याह गेलाथि। बैंक लाइन मे लागि कऽ कतेक लोकनि पूरा देश मे जान गमौलक। छोट धंधा करै वाला केँ धंधा चौपट भ गेलै ,देहारी मजदूर केँ देहारी बन्न भ गेलै, छोट-मोट काम करै वाला मजदूर केँ काज छुटि गेलै। कम्पनी सभ बन्न भ गेलै। नवका नोट चलन मे अबै सँ पहिनहि साउथ इंडिया मे एकमुश्त एकटा लोकनि जमा केने पकड़ेलाह।

हमरा मोने 'ब्लैक मनी' बन्न नहि भेलै। नोट जालसाजी किछु कम भेल हेतै। परञ्च देशक अर्थ बेवस्था बेपटरी भ गेलै। लोक मानसिक, शारीरिक आओर आर्थिक रूपे फीरिशान भेलाह। बेरोजगारी केँ आलम बढि गेलै। क्रा इम केँ ग्राफ बढि गेलै। कतेक मास धरि लोक बैंक-बैंक खेलैत रहलाह। जिनगी उस्सर खेत जकाँ भ गेलै सभहक। लाभ कम आओर हानि बेसी भेलै नोटबंदी सँ। एहेन संकट काल मे जिनगी केँ बाँचब कठिन भ गेल छल। भूखमरी बढि गेल छल देश मे। सिया सुकुमारी बिन ब्याहले रहि गेलीह। इ दिन भारतक इतिहास मे कारी दिन थिक। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.लाल देब कामत-पारो बनाम प्रमिला/ घर-घुसरा/ ग्यारेन्टी: बिहैन कथा लाल देब कामत पारो बनाम प्रमिला/ घर-घुसरा/ ग्यारेन्टी: बिहैन कथा १ पारो बनाम प्रमिला मीमांसा 'उपन्यास ' आ बहुरानी 'फिल्म' एकटा पैघ समयके अन्तराल सँ प्रकाशन ओ प्रसारणमे नहिं रहय। जखनकि मीमांसा 'हिन्दी' पोथी मिथिलांचलके साहित्य रत्न अनुपलाल मंडल जीक नामक एक पर्याय बना गेल छैक। अतिशय प्रशन्नताक गप्प जे पछिला बरख हुनक अप्रकाशित आत्मकथा "मंजिल और कितनी दूर" 512 पृष्ठक छपलाक वाद आब मीमांसा उपन्यास हुनकर नाती श्रीमान आदित्य कुमार दास(भा.प्र.से.) आओर साहित्य संसद केर आर. श्याम क' संयोगे सुविज्ञ पाठक बीच आबि सकल अछि। नव दिल्ली सँ सन् 2023 मे 143 पृष्टक प्रथम संस्करण'क दाम 395 टाका निर्धारित कयल गेलैक। एहिके ISBN 9788195994939 प्राप्त भेल छैक। सन् 1931 मेँ पहिल बेर मीमांसा बहराएल छल,जाहिके सिनेमाक चलचित्र परदा पर फिल्माएल ' बहुरानी' रूपेँ निर्देशक किशोर साहू 40 केर दशकमे समक्ष आनलनि। आई ओ दूनू गोटय ऐ धराधाम पर नहिं छथि। दर्जनों उपन्यास आ कथा संग्रह , जीवनी आ अनुवादित पोथीक रचनाकार स्व० मंडल जीक लेखन शैली हमरा अद्भुत लागैत अछि। मनुखक संभालके दउबरपन, परिवारिक जीवनक आदर्श आ समाजमे स्वंय रहैक महत्ताकेँ ओपन्यासिक पात्रक माध्यम सँ बढ़ सूक्ष्मता पूर्वक चित्रण कयने छथि। नायक रुपेँ विजय ,नायिका - मल्लिका ओ अरूणा आ ओकर माय मुख्य चरित्र थिकैक, जाहिक मादे ओहि परिवेशक जीवन्त चर्चा सदिखन दर्शक आ पाठकवृन्दके मानस पटलकेँ झखझोरैत रहत। उनन्यासक कथानक केँ अकानबाक चेष्टा कयला पर अहाँ पाएब जे मार्क एकमात्र पोसुआ संतान अरूणा रहैत छैक, जिनकर पिता आ काका कंबल दिवंगत भेल रहैछ। मुदा अरूणा मेधावी छात्रा रहने जमिन्दार पृष्ठभूमि क' विजय संग बियाहल जाईछ। सेठ विजय शिक्षित आ उदारवादी जुबक रहैत गाम समाजमे सुधार आनबाक लेल ग्रामोत्थान,नवका खूब उंचगर बान्हक निर्माण आ शिक्षाक अलख जगेबाक लेल बनारस सँ ब्रह्मचर्य धरमक विदुशी मल्लिका राय कें आश्रममे राखि आनन्द सँ विकासक काज करैत छैक। मुदा ब्रह्मचर्य पालनमे अकस्मात् व्यवधान होय छन्हि।, से अंतरंग दृश्य युवा पाठकके विशेष आकर्षण करैत बुझाइछ। एहि पटकथामे सेठ विजय जीक स्त्री रुपवती अरूणा एक अलग रूपमे समक्ष देखाईछ। ग्राम सुधारके वार्षिक कार्यक्रमके पश्चात बहुतों ग्रामीण सँ अरूजीके परिचय बढ़ैत छन्हि। पड़सके एक 15-16 वयक्रमकए गरीब तरूणी जकर नाऊ पार्वती रहैत ,सँ आत्मीयता बढ़ैत छैन। एकदिन एकटा अबला नारी हुनका बोझ अबैछ आ अपनाके पारू केर माय बताबैत ओकरा बिराम पड़ि जेबाक गप्प करैत छथिन। अरूणा जी ओकरा जेष्ट बहीनदियादनी सदृश्य आदर मानि बहुरानी सँ पारू केँ दरदक बेचैनीक समाद दैत इहो कहैत छै ओकर बाबू डाकदर साहेबके बजाबे गेलथिन अछि। परंच फीस आ औखधि ले कैंचा हाथमे नहिं रहने पांच पेंच चाहैत य। खुजरा नहिं रहने दस दैत छथिन आ बिना संकोचे आरो आवश्यकता पड़ला पर मांगबाक बात सेहो बुझाबैत विदाह केलकनि। ओहि पार्वती केँ शिशु पुत्र जनमलैत य। जहन डेढ़ सालक ओ बच्चा "आनन्द" पारो संग बहुरानी ओहिठाम दररोज आबऐक तँ रूग्णावस्था मे अरूणा जीके बाललीला देखबैत आ बालक दूलार सिनेह करैत अपन कष्ट बिसरी जाइक। आ ओ बच्चा हुनका मा-माँ सम्बोधन करै। सुन्न गोदीमे की बच्चा सँ परितृप्त हुनका होय आ अपन छाती पर सटाएके दुलारथि-मलारथि। बच्चा अपना माय सँ बेसी मालकिन अरूणाकेँ मा-मा कहैत परस्पर मानैत रहैक। वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' जीक पारो आ समाजमे एक पारो मावशी'क जीवन चर्या गमि देख ओहि नामे अधिक सहानुभूति उमैर जाईत अछि। दोसर एक पारो वहीण दायके वियाह भेलासन्ता ओकर खुटौना बाला दूल्हा जी हँसैत सासुर अयलापर वोटरलिस्ट देखबैत कहलनि - अधिक पिछरल तबकाक बाहुल्य प्रभावे नीक नाम वैश्यो समाजमे ने राखने रही, हम अपना सँ छठिहारी नाम बदलैत पारो संग प्रमिला कर देलौं। पारो तो अभावक पर्याय बुझल जाईछ।

२ घर - घुसरा घर - घुसरा मैथिली उपन्यास बीटी. भास्कर जीक अनुपम रचना अछि। शेखर प्रकाशन पटना सँ 2019 मे प्रकाशित एहि पोथीमे 157 पृष्ठ छैक, जाहिक दाम 200 टाका छैक। ऐ पोथीक उपन्यासकार अपन बाबू स्व० बासुदेव ठाकुर आ माय- फुलों देवी आ ज्येष्ठ भाय लक्ष्मी ठाकुर जीके स्मरण करैत समर्पण कयलाह अछि। समाजसेवी श्री बी.टी.भास्करजी गामघरमे रहैत एकटा स्वास्थ्यकर्मिक रूपेँ अपन सेवा दैत , साहित्यसेवी सेहो छथि। हिनक रचना हिन्दी जगतमे - तिरंगे की सौगन्ध, तिरंगा चीख उठा, दहेज का दुश्मन आ अहिल्या उद्धार नाटक खूब चर्चा मे आयल रहनि। गूरू महिमा,अनेको अध्यात्मिक पत्रिकामे निबन्ध सेहो प्रकाशित भेल छन्हि। कबीर चरित मानस (सातो कान्ड ) आ काव्य कृति ओ संस्मरण , उपन्यास प्रकाश्य कृति छन्हि। श्री भास्कर जी बिहार विश्वविद्यालय - मुजफ्फरपुर सँ हिन्दी विषयमे स्नातकोत्तर छथि। महज एकटा कचोट व्यक्तिगत जीवनमे रहलनि जे प्रशिक्षित रहैत धरि शिक्षक नहि बना सकलाह हन्। हिनक कविता बढ़ सौष्टव होई छन्हि , से दरभंगा रेडियो स्टेशन सँ बहुत पहिने प्रसारण भेल छलन्हि। ओहि उर्जावान लेखकके जनम फुलपरास (मधुबनी) मे 15 मई 1957 केँ स्व0 फूलो देवी आ बासुदेव ठाकुर जीक घर भेल रहनि। हालहिमे हिनक दूगोट पोथीक लोकार्पण - सुगापट्टी केर भव्य कार्यक्रममे वरेण्य साहित्यकार श्री नारायण यादव जीक उपस्थितिमे भेलनि अछि। सद्यप्रकाशित एहि घर - घुसरा मैथिली भाषा मेँ पोथीक' प्रकाशकीय लिखैत शरविन्दु चौधरी जी कहैत छथि- " हिनक प्रस्तुत उपन्यास ' घर- घुसरा ' ग्रामीण अंचलक एकटा एहन कथा प्रस्तुत करैत अछि जे बरमहल घटित होईछ मुदा ओकरा उद्घाटित नहिं कयल जाईछ। एहिमे प्रेम , करूणा, स्नेह , वात्सल्य, त्याग आदिक झलक तँ भेटते अछि, मिथिला'क माटिक सहजता,सुलभता ओ सोंधी सुगन्ध सेहो अदभुत रूपें दृष्टिगोचर होईत अछि। श्री भास्कर जीक उपन्यास'क शुभसंज्ञा एहन आइन- पिड़ा बला बदनाम शव्द 'घर-घुसरा' राखल गेल अछि,जे एहि शव्दक उच्चारण जौं नवदम्पत्ति केर बीच होंसियो -चौलमे अर्धांगिनी बाजी दैछ तँ धर्मपति अपन धरमक रक्षा नहि कय परिवार मोह त्यागैत गुदरीबबाजी धरि गोरखपुर जाए बना जाईछ। से घर-घुसरा उपन्यास पढ़ैत पाठकवर्गके कथ्य, रोचकता आ विलक्षण प्रस्तुतिक प्रवाह अन्तधरि अपन आभामे घीचने रहल अछि। खूब मनलगू ई देहाती कथा सामाजके चित्र 1980 के दशकमे लऽ जाईछ।मुदा आब ओ 45 सालमे ग्रामीण क्षेत्र सेहो शहरी सभ्यताक गिरफ्तमे आबि गेल छैक। एहि पोथीमे जे निठाही देशज शब्द सबक प्रयोग भेल अछि से मैथिली केँ जियाकेँ लागत लेल प्रयाप्त छैक। किछु मुद्रण त्रुटि सँ वास्तविक शव्दक अर्थ बोझिल अवश्य भऽ गेलैक। आ प्रकाशक प्रूफ देखयमे चुकल अछि। ओना उपन्यासकार अपना जनैत गाम-घरमे प्रयुक्त होबय बाला लोकोक्ति(मुहावरा) आ पौराणिक गीत सँ सम्पुर्ण कथामे सघन रूपेँ घोंसिएने मातृभाषाक शव्द आ वाक्यकेँ संरक्षण करेबामे पूर्ण समर्थ भेलाह अछि। यथा-: अन्हरा के जगने की आ धधरा के तपने की ।" अप ना मन के मौजी- बौह के कहलकै भौजी।" ईतरक पानी भीतर गेल - चुमा लै म छुबल गेल।" सौतीन शाल- मइरतो काल।" मुनरा हेरै बाट- कखन हेतै भोज-भात ‌" हाय रे पुरख ढ़ौह!" तू धोईब हम मलाह - तोरा हमरा कून सलाह।" गेल माघ उनतीस दिन बांकी।" भेल बियाह मोर करबह की!" ई अंगुरी काटबइ तइयो अपने घाह...! गेलाह जऽ काटऽ - तहन सतुआईन कइए के एलाह।" "हरबा जोतइते रामा फरबा हेरायल - कथि ल' के जोतबई हर आब यौ।" रबरल बटिया आइ देलकइ पलटनियाँ ..... । चलइ मलनियाँ छौड़ी - धरती धयकाबइ य...! भौजी गै मानि लियौ हमरो बचनियाँ से ना" । देवरा हे नहि मानब तोहरो बचनियाँ से ना " । दुलहा कियाक रूसल छी आबिके ससुरारिमे - खीर पड़ोसल थारीमे ना।" आहे कौने निरमोहिया से दिनमा गुनेलकै से दिनमा गुनौलकै , कौने निरमोहिया लेने जाए। बड़ी रे जतन सँ हम धीया जीके पोसली से सियाजीके पोसली -तकरो बैइमनमा लेने जाय।" .. हौ जाति जुलाहा ,नाम कबीरा ,वन-वन फिरै उदासी- जीव चेतावन बसुधा आए प्रगट भये आ कासी - हो साहेब वन-वन फिरै उदासी।" तोरा गाम नञि जेलउ सुपरिया हमरा गाम चैल अइबते रे - जगदीश बनियाँके बहिनोइ बनैबते कतेक सुपरिया लइतें रे......!" सरल सुपारी नञि लेबऊ रे , छिरिया देबऊ रे बितिया देबऊ रे ....! " एलई शुभके लगनमा शुभे रे शुभे । .... दुल्हा धीरे-धीरे चलियऊ ससुर गलिया। ....बाउ लाबा छिरिआउ - दाई बिछि-बिछि खाऊ....। एक -निरंजन,दुतिया -चान,तीन कोन मेदनी, चारू - चक्कर, पाँचो-पाण्डव, छठम- छठिहार,सातम-पुर पताल, आठम -रतन, नवम-ग्रह, दशम- अवतार , एगारहम- हनुमान, बारह-विदिया, तेरह- निधान, चौदह - जनऊ, पन्दरह - राजा पांव रोपे, सोलह-करे श्रृंगार, सत्रह - राजा सत्त करे, अठारहम्- राजा भोज, उनीसम - कन्या, बीसम -बर हट गई छौरी - जाए दे घर।" मन लागो मोर राम - फकिरी मे.. जो मन लागे राम भजन में सो मन नहीं अमीरी में... मोन.... कथि रोपे कोना-कोनी कथि तिनकोनमा - कथा बाटे कथि गेल - कथि सकुचुनमा।" माछी नचनइयआं बेंग बजनियाँ ... चुटी साजल बरियात है... । साम चको -साम चको अबिहे है... ढ़ेला फोड़ि -फोड़ि खइहे है....! " बिनु सत्संग विवेक न होई? बिनु हरिकृपा सुलभ नहीं सोई।।" उपन्यासकार ऐ कथाक नायिका रुपें एक दुखियारी नीलम केँ कपारक लोक ताकि चरित्र चित्रण कयलनि अछि जे जीवन पर्यन्त कष्ट भोगैले अभिषप्त छैक। मुदा ओकरा जीवनमे अनैतिक प्रशन्नता होई छैक जे तत्कालीन समाजिक व्यवस्थाके पोल फोलैत छैक। हम विशेष रूपें भास्कर जीक शैलीक कायल छी। पाँति ऐ तरहक द्रष्टव्य -: 'नीलम' केँ मोन पड़ि रहल छलैक सबटा। डरे देह शरद भेल जाइत रहैक, ताबत कने दूरहिं सँ मोटर साइकिलक आवाज ओकरा कान मे पड़लैक। मोन मे कनि हिमैत बढ़ि गेलैक। भूतक डर भागि रहल छलैक। आवाज लग आबि गेलैक त नीलम कनि घुरि के पाछू देखलकैक। 'हेमकान्त ' बाबू आबि रहल छलैक। नीलम के भेलैक जे कतौ बीमारी देखय जा रहल छैक ओ रास्ता छोइड़ के बगल सँ जाय लगलैक। मुरी झुकेने, डबडबायल आंखि आर ओहिना झखाइत। हेमकांत बाबू मोटर साइकिल के ' नीलमक' आगु आनि ठाढ़ कय देलकैक। नीलम सेहो ठाढ़ भय गेलैक मुदा मुरी उठा केँ देखबाक साहस नहि भेलइ ओकरा।' हेमकांत बाबू देख रहल छलैक। नीलम के ठोर सियाह भ' गेल रहैक। आँखि स नोर भभा - भभा खसि रहल छलैक नीलम के। हेमकान्तो बाबू'क आँखि डबडबा गेलैक। कहुनाहिं नोर के रोकि सकलाह। दुनू माइटक मुरूत जेका ठाढ़ भेल रहैक। किछु कहबाक हिम्मत नहि होन्हि। उपन्यासकार लोकनिक जे कृति हम पढ़ने छी,ताहिमे देखल जे कियो सुखान्त तो कियो दुखान्त कथा गढ़ने छथि। मुदा ओ कथामे सबसँ भिन्न जे बात बुझना गेल से छई- दुखी जीवन आरम्भ आ अन्त सेहो दुखद। जहनकि उपन्यास विधामे आरम्भ पात्रके सुखद वर्णन सँ भेल तँ आखरिमे दुखद स्थिति देखौल जाईछ। आओर कदाचित दुखद कथा आरंभ हुअय तो समापन सुखमय फरिच्छ बुझाई पड़ैछ। ऐ कथामे ब्राह्मण सरकारी डॉक्टर हेम जीक आ सवर्ण भूस्वामी सुदेशर सोलकिन रूपवती निलमके शोषण करैत देखल गेलैक। नेहराबाली ,बगहाबाली,शिवाबाली, धत्तावाली विदाह करैतकाल अपन भुमिका आ दुल्हाके गोरलगी कराबैत सखी -बहिनफा सब सीता, फेकनी,पुनम, करियाही , सनेचरी आ मधुआ सब अपन -अपन दायित्व निमाहैत देखल गेल य। ऐ गाममे मधुआ तँ ओहू गाममे एहिनामक मयटुअर ननैद आ ऐ गाममे हरेन छै तँ ओहू गाममे ऐनामक पुरुख छऐथइ,जे नवोदित दुल्हा थिकाह। खजुरी बजबैत नीलम के बाबूजी दनमा पोखैर पर कुटी बना लेने रहैछ,जिनका साकठ रमचेलवा बढ़ मजाक उड़बैत रहै छन्हि। सरौती बाली बाजल रहैक लीलम मादे- कहु त बेचारीके नौरीन बतरनी जेकां दशा भ' गेल छै। गीरहत केर परती खेत तमनी सोनमा चौड़ीक ठुठीबा पीपर लग जे घटना लूहलगई सँ भेलै से चारि घंटा पूर्वहि पूर्व पति हेरन गोरकी लेल सरमजानक संग आयल छलैक; जौं तुरत खेतमे कियो जेतैक तँ एहन मूर्छित घटनाके टालल जा सकैत रहय। से घर-घुसरा बतहाके आगमन सँ सब केओ तीन सालधरि निपत्ता रहवाक आ ताहि बीच नीलमाक चुमौन नवटोलिया कमलाकात हेबाक प्रसंगवश चर्चा जे पति बठेसर केर टीवी रोग सँ अस्पताल मे आकस्मिक निधन कबल भेल रहैक सन गप्प सरक्कामे लागल समय गुदश भेल हन्। पैनजाव सँ ईट-भट्ठा पर आतंकी हमलामे बचल हेरन तँ कपारमे बिजली खाम्हक टक्कर सँ विक्षिप्तता अवस्था मे चाह दोकानदार देबन केर कृपापात्र बनल रहल। याददाश्त अबिते ओ गरीब रथ सँ दरिभंगा घरमुहान भ' गेल रहैक। से पान काकी अपन रीतु केँ खड़ौआ हायस्कुलमे पढ़ैक चर्चा धरि केने रहथिन। भास्कर जी पिछरल तबकामे बच्चीके पढ़ौनी आ कमे उमेरमे बाल-विवाह करेबाक जमानाक खिस्सा कहने छथि। ताहि समय घरदेखिया सांझमे आबैथि आ भोरमे लड़की ठेंगा सँ परछल जाए।वियाहमे बराति आबै तँ दोसर दिन मरजाद रहैक। आजुक समयमे ई ऐतिहासिक कथा भ' गेल अछि।

३ ग्यारेन्टी: बिहैन कथा रामपुर गाममे बूदुल वार्ड सदस्य चुनाएल रहय। सीतापुर पंचायत'क ई गाम आखरी वाड नं० 14 पोषक क्षेत्र कहाबय। संयोगवश दूबेर सँ अतिपिछड़ा आरक्षणमे अपने सोजातीक मुखियाजी पदपर अभ्यर्थी जीतैत रहलैक। से महत्वाकांक्षी 'जल नल योजना ' केँ सफल बनेबाक ग्यारेन्टी सरकारक मुख्य एजेंडामे रहैक। सुबे प्रदेशमे खूब ऐ लेल विज्ञापनवाजी प्रखंडसँ जिलाधरि भेलैक। सकल राजस्वक पचास प्रतिशत राशि अखबार -पत्रिका, रेडियो -टीवी० पर ग्यारेन्टी पूरबक ख़र्च भेल। नल सँ शुद्ध पेजल एक बूनो नै बहराएल! परँच करोड़ों टाका ग्यारेन्टी केर सँग अपव्यय भ' गेलैक। ऐ प्रकल्प केर घोटाला- घपला पर चिंता करैत कोशी क्षेत्रीय सामाजिक कार्यकर्ता एक दरखास्त पटना-दिल्ली ठेका देलक। ले बलैया आब की हो! उल्टे पुलिस कोतबाल जाँचमे आयल आ पकरिकय जहलमे ढुका देलकै। आवेदक पर सरकारी काजमे अरंगाक आरोप जे ग्यारेन्टीक संग लागि गेल छलैक। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.रबीन्द्र नारायण मिश्र-सीमाक ओहि पार (धारावाहिक उपन्यास) रबीन्द्र नारायण मिश्र सीमाक ओहि पार (धारावाहिक उपन्यास) हमर ससुर स्वर्गीय गणेश झा (पण्डौल डीहटोल)क स्मृतिमे, सादर ससिनेह समर्पित! -6- दिव्यलोक सर्व संपन्न छल  । एतए सभकिछु स्वचालित छल । नवागन्तुककेँ अबितहि परिचयपत्रसँ लए कए समस्त सुख-सुविधाक व्यवस्था स्वतः भए जाइत छल । मुदा हमर अहिलोकमे अएला कैक दिन भए गेलाक बादो ने परिचयपत्र बनल,ने रहबाक  कोनो ठेकान छल । ई बात अलग छैक जे हमरा कोनो कष्ट नहि भए रहल छल । कारण दिव्यलोकमे ठाम-ठाम चौबटिआ सभपर बहुत रास चीज-वस्तु सुलभ रहैत छल ,ओहिना जेना कोनो नीक क्लबमे होइत अछि । तकर ऊपरो व्यवस्था रहैत छलैक जकर तुलना मृत्युलोकमे रहनिहार नहि कए सकैत छथि,ओ सोचिओ नहि सकैत छथि जे एहनो होइत छैक। इएह थिक मृत्युलोक आ दिव्यलोकक अंतर । मुदा दिव्यलोकमे लोक अबैत अछि कोना? की ओ सभ पुण्यात्मा छथि? की ओ सभ ककरो कृपापात्र छथि ? की एतहु हेराफेरी चलैत छैक? किछु नहि कहि सकैत छी कारण हम स्वयं एतए नव छी । एहिठामक तालपातरा बुझबामे किछु समय तँ लगबे करत । हम से सभ सोचिते छलहुँ कि आगूमे एकटा चिट्ठी आ एकटा छोटसन पिपही राखल देखाएल । चिट्ठी पढ़ए लगैत छी। " तोहर मृत्युलोकक फाइल हरा गेल अछि, तेँ तोहर विषयमे निर्णय लेबामे विलंब भए रहल अछि । जाबे किछु फैसला नहि होइत अछि ताबे एहि पिपहीकेँ सम्हारि कए राखह। एकर बटन दबेलासँ समस्याक समाधान होइत रहतह।" "मुदा हमरा बारेमे कहिआ धरि अंतिम निर्णय होएत आ से के करत?" "तूँ बड़ मूर्ख छह । व्यर्थक पचड़ामे पड़ल रहबाक हेतु तँ मृत्युलोके पर्याप्त अछि । तूँ अखन दिव्यलोकमे छह । मानलहुँ जे तोरा अखन दिव्यदृष्टि नहि भेटलह अछि । तथापि विचार करहक, अपने अंतर बुझेतह।" "मुदा तोँ छह के? सामने किएक नहि आबि रहल छह?" "फेर ओएह बात? एहिठाम आगू-पाछू किछु नहि छैक। जखने तोहर दिव्यदृष्टि जागि जेतह ,सभ भ्रम अपने हटि जेतह ।" "ओ!" हम उत्सुकतासँ ओहि पिपहीक बिचला बटन दबओलहुँ । मोनमे सोचिते रही कि कैक दिन सँ रागिनीक किछु समाचार नहि भेटल कि बटन दबबतहि रागिनीकेँ बहुत दूर ककरोसंगे रंग- रभसमे मस्त देखैत छी । "ओ के अछि? -हम मोने मोन सोचि रहल छी । ताबते ओ दृश्य फरिछाइत गेल । रागिनी आ शरद हमरा सामनेमे ठाढ़ हँसि रहल छल । " की बात छैक, मनोज?"-शरद बाजल । "बात की रहतैक । हमरा तँ एहिठामक ताल-पातरा किछु नहि बुझा रहल अछि । तूँ सभ एतेक मौजमे छह आ हमरा अखनो ओएह हाल अछि, से किएक?"-हम बजलहुँ । से सुनितहि रागिनी जोरसँ हँसि देलीह आ शरदकेँ संगे नचैत- गबैत अदृश्य भए गेलीह। "पहिने तँ एकरासभकेँ एतेक झञ्झटि रहैक । आब दुनूकेँ एतेक घेटजोड़ी केना भए गेलैक? शरदसन फसादी दिव्यलोकमे कोना पहुँचि गेल ?"- ई बातसभ हमर मोनमे उठैत रहल । मुदा ई सभ फरिआएत के? मोन व्याकुल भए रहल छल । हम फेरसँ बिचला बटन दबओलहुँ । एहिबेर बटन दबबतहि एकटा बिकराल रूपधारी पुरुष उपस्थित भेलाह। हम हुनका देखितहि सकपका गेलहुँ । हमर माथा जोरसँ घुमए लागल । एहन भयावह लोकक कल्पना हमरा नहि छल । ई पिपही तँ आफदक जड़ि बनि गेल । आब की करी? "अहाँ के छी?" " एहिठाम प्रश्न -उत्तर करबाक परंपरा नहि छैक । सभ किछु अपनहि होइछ, किछु करए नहि पड़ैछ ।" "मुदा हमरा संगे एना किएक भए रहल अछि?" " हम छी महाकाल । हमर आदि-अंत केओ नहि देखलक। अहाँ बेसी बुझबाक जोगारमे नहि पड़ू नहि तँ कष्टमे पड़ि जाएब ।" सामनेमे किछु राखल देखलिऐक । नान्हिटा पुड़िआमे किछु छलैक । हम ओकरा हाथमे राखबाक प्रयास केलहुँ कि ओ अदृश्य भए गेल। हम अवाक् ओहीठाम बैसि गेलहुँ । सामने चौकपर  तरह-तरहक चीज-वस्तु राखल छल । मोन भेल जे मालपुआ खइतहुँ । तुरंते मालपुआ एकटा थारीमे राखल छल । भरिमोन मालपुआ खेलहुँ। चाह पिलहुँ। ताबे बुझाएल जेना केओ  हमरा देखि हँसि रहल अछि । ओकरासभक हाथमे मादक गंधयुक्त हरिअर कंचन कोनो तरल वस्तु सँ भरल गिलास छलैक । एहन मादक गंध  कथीक भए सकैत अछि?- मोने-मोन सोचाए । ताबते कतहुसँ अबाज आएल - "ई थिक दिव्यरस। " "ओ! हमरो भेटि सकैत अछि की?" "अहाँ तँ अपने चाह पीबए लगलहुँ ।" देखिते-देखिते ओ सभ दिव्यरसक भरि सीसी  पीबि गेल। तकरबादक दृश्य तँ देखैत बनैत छल । मदमस्त, एक-दोसरसँ एककार भेल सभ नाचि रहल छल । "ई तँ रागिनी लागि रहल अछि ।" शरदकसंग ओकरा एतेक अंतरंग देखि हमर मोन जरि गेल। हम चिचिआ उठलहुँ- "रागिनी बस करू तमासा ।" औ बाबू हम एतबे बजले छलहुँ की केओ जोरसँ हमर गट्टा धेलक । कतबो कहिऐक ओ नहि छोड़लक । " अहाँ के छी आ हमरा एना किएक धेने छी?" "हम महाकालक दूत छी ।" "मुदा हमरा तँ किछु नहि देखा रहल अछि ।" "तकर समाधान अहाँक हाथक पिपही कए सकैत अछि।" हम ओहि पिपहीक बीचक बटन नहि दबा कए कतका बटन दबा देलिऐक । लएह ,ई तँ आओर गड़बड़ भए गेल । हम कतए आबि गेलहुँ? उलटैत-पलटैत कतहु अपने रूकि गेलहुँ । ओहिठाम कतहु किछु नहि देखा रहल छल । चारूकात अन्हार गुप्प। हमर पिपही से कतहु खसि पड़ल । ऊपर-नीचा  कतहु किछु नहि छल । सामने एकटा पोखरि सन बुझाएल । बहुत जोर पिआस लागल छल । हम पानि पिबाक हेतु आगू बढ़ैत छी । ताबतेमे भयाओन अबाज सुनाएल- "खबरदार! जौँ आगू बढ़ब तँ रौरब नर्कमे धसि जाएब।" "हमरा तँ ई पोखरि बुझाएल, तैँ ओमहर जा रहल छलहुँ।" "ई अंधलोक थिक । एहिठाम किछु स्पष्ट नहि देखाइत छैक, ने बुझाइत छैक ।" "अहाँ के छी? अहाँक नाम की अछि आ हमरा एना किएक पकड़ने जा रहल छी?" "हम छी, प्रभु ।" "अहाँ तँ हमर पिता छी।“ "रहल होएब कहिओ । मुदा आइ-काल्हि हम महाकालक चाकरीमे छी । ओ अहाँकेँ बजओलथि अछि।" "अहाँ कहिआ एमहर आबि गेलहुँ ।" "अहाँ हमरासभकेँ असमयेमे छोड़ि गेलहुँ । हम ई दुख बरदास नहि कए सकलहुँ । थोड़बे दिनक बाद हमहूँ गुजरि गेलहुँ।" "हम तँ अहाँक पिण्डदानो नहि कए सकलहुँ?" "आब तकर की माने छैक? जखन अहाँ रहबे नहि केलहुँ तँ पिण्डदानक कोन सबाल उठैत छैक? फेर पिण्डदानसँ होइते की छैक? एतेक गोटे जे अंधलोकमे बौआ रहल अछि से किएक? एहिमे कतेकोकेँ ओकर संतान सभ मरला पर जबार केने रहैक,बैदिकी श्राद्ध आ पता नहि की,की केने रहैक। आ ढ़ाकक तीन पात । ओहोसभ ओहिना बफारि तोड़ि रहल अछि । असलमे मोन शुद्ध रहितैक तखन ने? अंत-अंत धरि हेराफेरी मे लागल रहलैक ।  निर्दोष लोककेँ सतबैत रहलैक। एहन लोकक आओर भइए की सकैत छलैक ? गीतामे भगवान तैँ ने कहने छथिन जे अंतिम कालमे जे जेहन सोचैत रहत तेहने ओकर गति होएत ।" " मुदा हमर तँ किछु करू । अहाँ तँ अपन लोक छी । अहाँ नहि मदति करब तँ के करत? पितासँ बढ़ि कए के भए सकैत अछि?" । " " एहिठाम मृत्युलोकक हिसाब नहि चलैत छैक । " "ई कोन न्याय छी?" "न्याय-अन्यायक हिसाब करए बला हम के?" " तँ के करत?" "महाकाल! "ऐँ!" "आओर के करत?" किछुकालमे हम महाकालक दरबारमे उपस्थित कएल गेलहुँ। -7- "सरकार! हमरासँ गलती भए गेल ।" "तोरासँ वारंबार एना किएक भए रहल छह? ई कोनो मृत्यु लोक नहि थिकैक जे हेराफेरीमे लागल रहबह । एहिठाम सभकिछु स्वचालित छैक । एमहर-ओमहर करबह तँ तुरंते पकड़ल जेबह ।" "मुदा हमरे संगे एना किएक भए रहल अछि?" "ई तोहर भ्रम छह । जे केओ एहन करत तकरा ओहिना हेतैक । " "मुदा कैक गोटाकेँ तँ बहुत सुखी देखैत छी ।" "इएह ने गड़बड़ी करैत छह । सदिखन अनके प्रति सोचैत रहैत छह ।" "एहिसभसँ बचबाक किछु व्योंत करिऔक कारण हमरा तँ अपने से सभ होमए लगैत अछि ।" "कहलिअह से तूँ बुझलह नहि । एतेक ककरा समय छैक जे तोरामे लागल रहत। तोरा पिपही देलिअह । ओहीमे समाधान छलैक । तूँ ओकर गलत-सलत बटन दबा दैत छलहक । ओ निष्क्रिय भए गेल आ तोरा अंधलोकमे पटकि देलकह ।" "आब की हेतैक? किछु तँ रस्ता निकालबै नहि तँ हम तँ बौआइते रहि जाएब ।" "से हम की करबह? जेहन तोहर कर्म हेतह,तेहने ने भेटतह। एहिठाम तँ पूर्वजन्मक कर्मक हिसाबे सभकिछु फलाफल होइत अछि ।" ""हमर कल्याण करू । कोनो ऊपाय करू जाहिसँ हमरा नीकठाम जोगार लागि जाए।" "जोगार...? कहलिअह से बुझलहक नहि?एहिठाम जोगारक गुंजाइस नहि छैक । जे हेतैक से अपने हेतैक ।' "मुदा कहिआधरि हेतैक?" "तोहार फाइल हरा गेल अछि । तेँ निर्णयमे देरी भए रहल अछि । धैर्य राखह । ताबे ई पिपही राखह । एहिमे कोड लागल छैक । ध्यानसँ एकरा चलबिअह । जँ फेर किछु गड़बड़ केलह तँ तूँ जानह आ तोहर काज जानए ।" हम पिपही  संगे बान्हल कागजमे सँ  कोड पढ़ैत छी आ कोड संख्या एक दबा दैत छी। औ बाबू ! भक दए इजोत भए गेल। चारूकात देखाए लागल । महाकाल चाकर समेतं बिला गेल छलाह। आब बुझलिऐक जे ई पिपही केहन उपयोगी अछि । जरूर महाभारत कालमे इएह वा एहने कोनो यंत्र व्यास संजयकेँ देने गेल रहथिन ,नहि तँ घरे बैसल ओ सभटा खिस्सा धृतराष्ट्रकेँ कोना सुनाबति? आइ-काल्हिक टेलीवीजन भए सकैत अछि ओकरे प्रतिकृति होइक किंवा ओहीमे सँ  किछु-किछु गुण जेना-ने तेना हासिल कए लेने होथि । जे होइ मुदा ई अछि अजूबा यंत्र , एहिमे कोनो सक नहि। सभसँ कठिन छल एकर कोडकेँ मोन राखब । ओना पुर्चीमे सभकिछु लिखल छलैक मुदा जौँ ओ हरा गेल किंबा फाटि गेल तँ फेर ओएह लफड़ासभ शुरु भए सकैत अछि । इजोत होइतहि हमरा लखनपुर आ मौजपुरक बीचमे बनल पुल देखाएल  । ओतए किछुगोटे श्यामकेँ घेरि जोर-जोरसँ नारा लगा रहल अछि । "तिरपित बाबू जिंदाबाद । तिरपित बाबू अमर होथि ।" तिरपितक लहास लेने किछुगोटे घुमि रहल छलाह । श्याम हुनकासभकेँ हाथ-पैर जोरि रहल छथि । मुदा केओ हुनकर सुनि नहि रहल अछि । पुलक दुनूभाग पुलिस घेरने अछि । लगैत अछि जेना कोनो जबरदस्त कांड भए गेल अछि। हमरा नहि रहल गेल । यद्यपि महाकालक चेतौनी हमरा मोने छल तथापि गामक बात छलैक,नहि मोन मानलक ,भेल जे जँ एक बेर अपने जा कए देखि सकी तँ बढ़िआँ रहत ,सही समाचार भेटत आ जिज्ञासा सेहो कए लेबैक । ई बुझेबे नहि करए जे तिरपित केँ एना किएक भेलनि । जरूर श्याम किछु झञ्झटि केने होएत । असली बात तँ ओतहि पता लागत । मुदा जाएब कोना? हमरा ई बात नीकसँ बूझल छल जे आब हम ओ मनोज नहि थिकहु जे रागिनीसंगे इसकुलक रस्तामे खेलाइत रहैत छल । जकर हाथ-पैरमे दम छल,जे जखन जतए चाहए चलि जाइत छल । आब तँ हम की छी से अपनो नहि बुझाइत अछि । महाकालक देल पिपही आ तकर गुप्त कोडक बले कतेक कुदब ? अपन हालपर अपने हँसी लागि रहल अछि। एक मोन कहैत अछि- "जखन अहाँक ई हाल अछि तँ कथीक लौलमे पड़ल छी?" दोसर मोन कहैत -" जा धरि स्मृति काज कए रहल अछि,आ मोनमे भावनाक  संचार भए रहल अछि ताधरि अहाँ कोना बँचि सकैत छी ? बँचिओ कए कतए जाएब?संसारसँ बँचिओ जाएब मुदा अपने-आपसँ? कोनो उपाय नहि छैक अपनासँ बँचबाक । " फेर मोन होइत-"अहाँ तँ स्वयं समस्या ठाढ़ केने छी? ने अहाँकेँ देह अछि ने माथ । लोकसभ ई बात बुझिओ रहल अछि । तखन अहाँक कोन दायित्व शेष रहि गेल जे एतेक व्यग्र छी?" फेर दोसर मोन कहैत-"सबाल दायित्वक नहि छैक?" "तँ कथीक छैक?" "हमर अपने मोनमे एहि तरहेँ अन्तर्द्वन्द होइत रहल, ताधरि जाधरि ओ लहास अदृश्य नहि भए गेल । की भेल, कोना भेल तकर जिज्ञासा बनले रहि गेल । एना दृश्य-अदृश्य होइत घटनाक्रमसँ हम अचंभित छलहुँ। सभसँ बेसी चिंता महाकालक देल पिपही  रक्षा लए होइत छल । हमरा लगमे तँ जे छल से ओएह छल आ जँ ओ फेर गुम भेल तँ भगवाने मालिक । पिपही  कोड मोन रखबाक जतेक चेष्टा करितहुँ ततेक जल्दी ओ बिसरा जाइत छल । तेँ पिपहीसंगे  कोड बला कागजकेँ सम्हारि कए राखब बहुत जरूरी छल । निश्चय ई पिपही किछु विशेष छल । कीसभ एकर विशेषता छलैक से केओ  कहलक नहि ,ने ओकरा संगे कोनो सूची छलैक जे पढ़ि कए सभबात शुरुएमे बुझि लितहुँ । इएहसभ सोचैत रही कि कोड संख्या एक फेरसँ दबा गेल । फेर ओएह पूल देखा रहल छल मुदा ओतए लोकक भीड़ छटि गेल छल। तिरपितक लहास लेने किछुगोटे "रामनाम सत्य है" कहैत बहुत आगू चलि गेल छलाह मुदा श्याम अखनो पूलक कातमे पुलिस बला सभसँ गप्प कए रहल छलाह ।  मुदा ई की? ओ तँ बूढ़ लागि रहल छलाह । केसो पाकि गेल छलनि । समयक गतिक ताल-पातरा नहि बुझा रहल छल । हमरा तँ लागए जेना हम किछुए कालपूर्व अपन गामसँ अएलहुँ अछि। मुदा एतबे कालमे एतेक परिवर्तन कोना संभव भए सकैत अछि ? फेर भेल जे जरूर ओहूमे किछु रहस्य हेतैक । सोच-विचारक क्रममे पिपही  कोड संख्या नौ दबा गेलैक। औ बाबू! लगलैक जेना पुलिसक सायरन बाजि रहल अछि । रहि- रहि कए अबाज आबए लागल- "की बात? हमरा किएक बजओलहुँ ?" "हम कहाँ ककरो बजओलिऐक?" "बेकारक बहस नहि करू। की पुछबाक अछि से बाजू नहि तँ फेर ई मौका नहि भेटत?" "श्याम एतेक जल्दी बूढ़ कोना लागि रहल अछि?" "लागि नहि रहल अछि, भए गेल अछि । मृत्युलोकक समयक गणना बहुत छोट छैक । दिव्यलोककक एकपलमे एतए कतेको बर्ख बीति जाइत अछि ।" "ओ़! ई तँ अद्भुत अछि ।" "जे अछि, से अछि, मुदा अहाँ कान खोलि कए सूनि लिअ। पिपहीक कोड सावधानीसँ प्रयोग करू । आब अहाँ लग मात्र दूटा अवसर अछि । तकरबाद की होएत से हमहूँ नहि जनैत छी ।"-से कहि ओ अबाज लुप्त भए गेल । -8- पिपही आ कोड बला कागजकेँ नीकसँ रखलाकबाद सामने राखल बेंचपर सुस्ताइत छलहुँ। ओहिठाम करेटक -करेट दिव्यरस राखल छल । केओ  चौकीदारो नहि छलैक । जे जेमहर सँ आएल एकटा सीसी उठओलक आ गटकि गेल । फेर दोसर सीसी गटकि गेल । एहि तरहेँ सीसीपर सीसी ढ़ाड़ि रहल छल । दिव्यरसक प्रभावसँ  ओ सभ मस्तीमे नचैत-गबैत आगू बढ़ि जाइत छल । चारूदिस मनमोहक ओ मादक दृश्य छल । हमरा नहि रहल गेल। हम तर्र दए हाथ बढ़ओलहुँ आ सीसीकेँ अंदर केलहुँ। औ बाबू! जहाँ एकघोंट भीतर भेल हेतैक कि सौंसे देहमे जेना करेंट लागि गेल। आब होमए लागल जे रागिनी कहुना लगमे रहैत । हमहूँ नचैत-गबैत आगू बढ़ि जइतहुँ । एतबा सोचिए रहल छलहुँ कि सुनैत छी- "की रागिनी, रागिनीक रट लगेने छी। एहिठाम कोनो लोकक कमी छैक जे अहाँ मृत्युलोक जकाँ भोकारि पारि रहल छी।" किछु सोचितहुँ,किछु बुझितिऐक ताहिसँ पहिने एकटा अद्भुत सुंदर तरुणी हमरा देखाइत छथि । ओ देखैत सौंदर्यक पराकाष्ठा छलीह । सौंसे देहसँ जेना इजोत निकलि रहल छलैक। कहि नहि विधाता कोन क्षणमे हुनका गढ़ने हेताह? सुगंधसँ संपूर्ण वातावरण महमह करैत छल । "अहाँ के छी?" "हम छी दिव्यपुरक प्रसिद्ध राजनर्तकी मंजुषा।" "ओ! अहाँक स्वागत अछि  ।" मंजुषा दिव्यरसक दूटा सीसी अपने हाथे निकालैत छथि । एकटा सीसी अपने गट-गट अंदर कए लैत छथि आ दोसर हमरा दैत छथि। "हम तँ कैकटा सीसी पहिनहि पीबि चुकल छी" "कोनो बात नहि एकटा आओर सही ।" दिव्यरसक असर ततेक जोरदार भेल जे पिपही किछु सोह नहि रहल । मंजुषाक संग रंग -रभस करैत काल ओकर कोनो बटन दबि गेलैक । बटन की दबेलैक,जुलुम भए गेलैक। आब तँ हमरा किछु नहि बुझाइत छल,किछु नहि देखाइत छल। "आब की सोचि रहल छह । एतेक बुझा कए कहने रहिअह मुदा सीसीपर सीसी ढ़ारने जाइत छलह । पिपही तँ सम्हारि कए रखितह ।" "अहाँ के छी?" " तिरपित, तोहर मास्टर ।" "एहिठाम की कए रहल छी? अहाँक तँ लहास देखने रही। ओहिदिन पुल लग लोकक मेला लागल छल । सभ श्यामकेँ गरिआ रहल छल । " " ओ तँ बहुत पुरान बात अछि ।" " हमरा तँ किछुए काल पूर्व ई देखाएल छल ।" "छोड़ह ई गप्प-सप्प । केओ सुनि लेतह तँ मोसकिलमे पड़ि जेबह ।" "से किएक? ' " ई अंधलोक थिक । एहिठाम हम तोरासँ गप्प करबाक हेतु अधिकृत नहि छी ।" "से किएक?" "बेसी कबाइत नहि पढ़ह । भागह ......" -9- अंधलोकमे चारूकात अन्हारे-अन्हार छल । एहिठाम सौंसे दुनिआँक लोकसभ फँसल छथि । हुनका लोकनिक आत्मा एहिठाम बौआइत रहैत अछि । ककरो शांति नहि,कोनो सुख नहि,सभ परेसान,व्यग्र ,अभावग्रस्त । मृत्युलोकसँ देह तँ छुटि गेलैक तथापि ओकरसभक मोन ओतहि अटकल छल । एहन ठाम तिरपित कोना पहुँचि गेलाह? असलमे भेलैक ई जे अपने ओहिठामक केओ  किरानी अंधलोकक हिसाब-किताब करैत छल। ओ बहुत दिनसँ एहि काज केँ करैत-करैत काजमे माहिर भए गेल छल । सभकेँ ओकरापर विश्वास रहैक । तकरे ओ फएदा उठओलक आ घोटाला कए देलक । जाबे-जाबे बात खुजलैक ताबे तँ बहुत किछु भए गेल छल। तखन की कएल जाए । ओकरा तँ हटा देल गेल मुदा काज कोना चलत? ताबते तिरपित ओतए पहुँचलाह । जेबाक तँ हुनका दिव्यपुरम रहनि मुदा महाकाल हुनकर इमान्दार छवि देखि अंधलोकक तहसीलदार बना देलाह । ईहो  एक तरहें  हुनकर नियति छल अन्यथा ओ दिव्यलोक छोड़ि अंधलोक किएक जइतथि? पिपही  बटन कनिको एमहर-ओमहर होइक आ हम कतएसँ कतए फेका जाइत छलहुँ। एहन तँ कहिओ नहि देखने रहिऐक । कतहु-ने-कतहु हमरा बुझबामे दिक्कति भए जाइत अछि आ अछैते पिपहीकेँ  हम बौआ रहल छी"- हम सएह सभ सोचैत अंधलोकक चौकपर ठाढ़ रही कि कोनो परिचितक अबाज सुनबामे आएल । "अहाँ के छी?" " ई तँ अहाँकेँ स्वयं बुझबाक चाही।" "बुझौअलि नहि बुझाउ । साफ-साफ कहू ।" "इएह तँ अहाँक दिक्कति अछि । " "जखन से बुझि रहल छी तँ हमर रस्ता सोझरा किएक नहि दैत छी?" "ई हमर काज थोड़े थिक ।" "मुदा अहाँ छी के?" "अन्तर्दृष्टि" "से की भेलैक।" "लएह । हम कहैत रही जे हम अहाँक प्रश्नक जबाब नहि छी कारण अहाँक लगमे हम छीहे नहि ।" "कारण?" " एहि प्रश्नक उत्तर तँ नियतिए दए सकैत छथि ।"-एतबा कहि ओ ओहिठामसँ लुप्त भए गेलाह । हुनका जाइत-जाइत ततेक प्रकाश भेल जे तकरे इजोतमे पिपही देखाएल । हम ओकरा लपकि लेलहुँ । एहिबेर हम पक्का निर्णय केलहुँ जे पिपहीकेँ आब एमहर-ओमहर नहि होमए देब। "मुदा अहाँक चाहने की होएत?" " अहाँ छी के?" " अहाँक नियति ।" "ओ तँ अहीँक द्वारे हमरा ई सभ परेसानी अछि ।" "हमरा द्वारे किएक होएत?" "तखन?" "तखन की?" "किछु तँ स्पष्ट करिऔक जाहिसँ हमर आगूक रस्ता साफ होअए । हम बुझि सकी जे आब हमर गंतव्य की अछि । हम कतहु चैनसँ रहि सकैत छी कि एहिना बौआइत रहब ।" "सभटा जखन अहीँ बुझि जेबैक तखन नियति की भेलैक?" "मुदा नियतिओक पाछू तँ कथुक हाथ हेतैक ।" "छैक किएक नहिॅ? " " एना बुझौअलि नहि बुझाउ ।" "मानि लिअ जे हम अहाँकेँ बुझाए देब तँ अहाँकेँ चैन होएत? नहि होएत? अहाँ फेर एकटा नव प्रश्नक संग ठाढ़ रहब।" " से किएक?" "कारण अहाँक इएह नियति अछि ।" ओकर सबाल- जबाब सुनि हम निरुत्तर भए गेलहुँ । हमरा छगुन्तामे देखि ओकरा दया आबि गेलैक । फेर अपने बजैत अछि- "नियति किछु नहि, अहीँक पूर्व कर्मक प्रतिबिम्ब अछि । एकरा अहाँ किछु नहि कए सकैत छी । जे अहाँ कए सकैत छलहुँ से कए चुकल छी । आब तँ ओ अपन काज कए रहल अछि ।" "मुदा हमरा अहिसभ सँ मुक्ति कोना भेटत? कोनो रस्ता होइक तँ कहू।" "रस्ता तँ अन्तर्दृष्टिएसँ भए सकैत अछि।" "मुदा से हमरा कहिआ आ कोना भेटत?" "प्रतीक्षा करू ।" से कहि ओ अबाज लुप्त भए गेल । कतबो प्रयास केलहुँ ओ वापस नहि आएल, दोबारा ओकरा नहि सुनि सकलहुँ । चारूकात एमहर-ओमहर  बौआइत रही । भेल जे जाबे हमर हिसाब नहि फरिछा रहल अछि,जाबे नियति हमर दिसा स्वयं नहि तय कए दैत छथि ताबे एहि पिपहीकेँ  सम्हारि कए राखी। एहीमे कल्याण अछि । "सेहो तखने होएत जखन नियतिकेँ से मंजूर होइक ।" से सुनितहि मोन भेल जे ठोहि पारि कए कानी । कहिअनि- "हे विधाता!  हमरापर दया करू । " मुदा हम असमर्थ भेल ओहिना अंधलोक चौराहापर ठाढ़ रहि गेलहुँ । संभवतः हमर इएह निएति होअए-?" -10- हम पिपहीकेँ  सम्हारि कए रखबाक प्रण कए लेने रही मुदा ओकरा रखितहुँ कतए? ने अंगा छल ,ने जेबी,ने बटुआ । एहनो समय हेतैक से नहि सोचने रही । हमही एतेक दुबिधामे छी की आओरो लोकसभ अहिना परेसान अछि?किछु कहल नहि जा सकैत अछि । सुनने रहिऐक जे मृत्युसँ जीवनक अंत भए जाइत अछि । जीवनक जे होइत होइक मुदा समस्याक अंत तँ नहिऐ होइत बुझा रहल अछि । मौजपुर हो वा लखनपुर सभगामक लोकसभ गाहे-बगाहे एतहि पहुँचि गेलाह । बात ओतबे रहितैक तँ कोनो बात नहि । देश-विदेशक लोकसभ एहिठाम विद्यमान छथि,समयक घात-प्रतिघात सहि रहल छथि । किछुगोटे एहनो छथि जे एखनो मृत्युलोकमे अपन अर्जित अकूत संपत्तिकक हेतु बेचैन छथि । एहने एकटा व्यक्ति छलाह  श्याम । कहि नहि कहिआ आ कोना अंधलोकक द्वारिपर पड़ल छथि । रौद,बसातसभ लागि रहल छनि । कोनो प्रकारक सुविधा नहि भेटि रहल छनि। चाही सभटा,भेटि किछु नहि रहल छनि । पिआस,भूखसँ छटपटा रहल छथि । समाधान किछु नहि । तिरपित कैक बेर अबैत-जाइत हुनका देखैत छथि । हुनकर बास अंधलोकेमे छनि । श्यामक दशापर हमरो दया अबैत रहैत अछि। पिपहीकेँ  बेर-बेर उलटि-पुलटि कए किछु करबाक प्रयासमे रही । हमरा बसमे आओर किछु छलहो नहि । तिरपित जँ देखेबो करितथि तँ बेसीकाल टरका दैत छलाह । असलमे ओ अपने काजसँ बहुत व्यस्त छलाह । महाकालक विश्वस्त हेबाक कारण सभटा संवेदनशील फाइल हुनके जिम्मा छल । किछुदिन पहिने भेल धांधलीमे बहुतरास फाइलसभ एमहर-ओमहर भए गेल रहैक। तकर जाँच-पड़ताल चलिए रहल छल मुदा एखन धरि किछु निजगुत पता नहि चलि सकल । तिरपिते एहन व्यक्ति छलाह जिनका हम जनैत छलिअनि,जे महाकालक कृपापात्र छलाह । मुदा ओ तँ सदिखन अपन काजमे लागल रहितथि । ककरोसँ,कथुसँ, किछु लेना-देना नहि । जखन कखनो गप्प करबाक प्रयास करी हुनकर संग चलि रहल अंगरक्षकसभ भयावह रूप धए लैत ।  हम सकपका जाइत छलहुँ । तिरपित काका हँसि दितथि आ आगू बढ़ि जइतथि। मोने-मोन सोची जे तिरपित तँ एहन निसोख नहि छलाह । कैक बेर इसारासँ ओ किछु बुझेबाक प्रयास करितथि मुदा हम बुझितिऐक तखन ने? हमर ने कोनो बगए छल ने कोनो ठेकान । कालक वशीभूत भए चारूकात बौआ रहल छलहुँ । एहिना एकदिन  एकटा चौक लग बैसल छलहुँ । ओहिठाम एकटा मार्गदर्शक लागल छलैक जाहिमे तीनटा दिशासूचक पट्टिका छल । सभसँ ऊपर दिस दिशा निर्देश करैत उज्जर रंगक पट्टिका छल जाहिमे लिखल छल-दिव्यलोक  । बीचमे एकटा कारी रंगक पट्टिका छल जाहिमे नीचा दिस जेबाक संकेत बनल छल आ ओहिमे लिखल छल अंधलोक। सभसँ नीचा छल हरिअर आ पिअर रंगक पट्टिका जाहिपर लिखल छल मृत्युलोक । मृत्युलोकक दिशा सोझे सामने देखा रहल छल । कहक माने जे ओहिठामसँ एहि तीनूलोकमे गेनिहार लोकसभ गुजरैत छलाह । हम मोने-मोन सोचलहुँ जे ई तँ अद्भुत चौक अछि। किएक ने एतहि किछु काल बैसल रही । भए सकैत अछि जे किछु चमत्कारे भए जाए, हमरो कोनो ठेकान लागि जाए । ओहिठाम चुक्कीमाली बैसि गेलहुँ । बैसबाक क्रममे  पिपही  नौ नम्बरक बटन दबि गेलेक। औ बाबू तकरबाद तँ निरंतर  अबाज आबए लागल-"महाकालक दरबारमे अहाँक स्वागत अछि । आ से ततेक तरहक भाषामे  दोहराओल जाइक जे मैथिलीमे घोषणा सुनबाक हेतु कतेको काल धरि प्रतीक्षा करए पड़ि रहल छल । सोचलहुँ जे अगुताइ नहि । हम चुपचाप सुनैत रहलहुँ । जहाँ मैथिलीमे घोषणा भेलैक की तर्र दए बजलहुँ॒- "हमरा ई कहू जे हमर हाथक पिपहीमे   की-की सुविधा अछि आ एकरा नीकसँ केना चलाओल जा सकैत अछि जाहिसँ एकर व्यापक उपयोग होइक ।" " एतेक दिनसँ ई पिपही अहाँक हाथमे अछि आ अहाँ आब ई प्रश्न कए रहल छी ।" "हमरा माफ करू । हम बहुत परेसानीमे समय काटि रहल छी । कखनो किछु, कखनो किछु भए जाइत अछि ।" "सभक जड़ि अछि अहाँक नियति । एकरासँ पछोड़ छुटब असंभव थिक । ई पिपही अहाँक बहुत मदति कए सकैत छल । नियतिवश अहाँ सेहो ठीकसँ नहि कए पाबि रहल छी ।" "एकर समाधान किछु छैक कि नहि?" "एहिठाम मौजपुर आ लखनपुर बला गप्प तँ छैक नहि जे लोक दोसरक मामिलामे टांग अड़बैत रहए। अहाँ इएह करबाक अभ्यस्त रहबाक कारण लगातार परेसानीमे पड़ि जाइत छी।" "तखन की करी?" " ध्यानसँ सुनू । अहाँक पिपही एही लेल देल गेल अछि जे अंतरदृष्टि सक्रिय हेबा धरि अपन समय सुखपूर्वक बिता सकी । एहिमे सभ साधन छैक । एकर कोड हम बजैत जाइत छी, अहाँ ध्यानसँ सभटा सुनैत जाउ । अहाँक सभ समस्याक समाधान अपने होइत रहत ।" तकरबाद ओ पिपहीमे देल गेल तरह-तरहक सुविधा आओर तकरा प्राप्त करबाक हेतु कोडक जानकारी देबए लगलाह। शुरुएमे कहैत छथि- " अहाँ तँ एकबेर हेल्पलाइनक उपयोग कए चुकल छी। आब मात्र दूटा अवसर अहाँक लग अछि । तकरबाद ई पिपही निष्क्रिय भए सकैत अछि । एहि बातसँ सावधान रहब। " तकरबाद ओ धराधर कोड बजैत गेलाह । मुदा हमरा तँ किछु मोन नहि रहल "-हम कहलिअनि। " अहाँ एहन डपोरसंख कहिआसँ भए गेलहुँ । हम फेरसँ सभ किछु दोहरा रहल छी जँ अहाँ एहूबेर ध्यान नहि रखलहुँ तँ अहाँक भगवाने मालिक । हमरा आनोठामक काज देखबाक अछि। दरबारमे बहुत लोकक जिज्ञासा आबि रहल अछि । हम अहींमे लटकल नहि रहि सकैत छी ।" तकरबाद फेर ओ कोडसभ आ तकर काज कहि गेलाह । हम सतर्क रही । मुदा भेल ओएह । जतेक प्रयास केलहुँ सभ व्यर्थ चलि गेल । तीनटा कोड मात्र ध्यानमे रहल , शेष सभ फुर्र भए गेल। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.संतोष कुमार राय 'बटोही'- लघुकथा- सहोदर बहिन संतोष कुमार राय 'बटोही' लघुकथा- सहोदर बहिन

आजु बरियाती आयल छै दालान पर । अस्सी-पच्चासी के लमसम बतियाती हेतै। गीत-नाद भ रहल छै। छोटकी बहिन केर आजु ब्याह हेतै। ब्याह भऽ गेलै। माय टाकाक डरे गरीब घर मे छोटकी केँ ब्याह केलकीन्ह। ब्याह मे आयल नीक-सँ-नीक सामान बड़की बरोबर बाँटलैथ। इ पहिल भदवा केर गप्प छेलैक। बहिनक ब्याहक आयल सिंगार-पेटार केँ बाँटनै इ उचित नहि छल। परिवार आओर समाज केर सोझा मे एहेन इ पहिल घटना छलैक। इ अनर्थ भेल छेलै अनुष्का संग।

"हम खाना नहि बनेबौ । ओकरो कही । हम असगरे नहि बनेबौ ।" सावित्री माय केँ इ कहैत बजलीह। अनुष्का टीचर ट्रेनिंग केर इंटर्नल परीक्खा दऽके सात बजे शाम मे आयल छलीह। थाकल हारल छलीह। अगिला दिन सेहो परीक्खा छलैन्ह अनुष्का केर , परञ्च सहोदर बहिन केर इ बेवहार केर कारणे आराम नहि भेटलैन्ह।

हेबाक इ चाही छेलैक जे सावित्री आय भनसा बना कऽ राखि सकैत छलीह। अनुष्का चुल्हा पजारलीह। खाना बनि कऽ तैयार भेल। सावित्री भरि थारी कैढ़ कऽ खेलीह। सावित्रीबाई अनुष्काबाई सँ जलैत छलथिन्ह। सहोदर बहिन सँ जलनै उचित नहि कहल जा सकैत अछि।

सावित्रीबाई इ सोचलाथि जे नैहर सँ अनुष्काबाई केँ कोना भगाबी । ओ अपन षड्यंत्र मे सफल भेलीह । परञ्च बेसी दिन धरि हुनकर नहि चललैन्ह। सावित्रीबाई अगिला बरख सँ टीचर ट्रेनिंग करऽ लगलीह। ओ कालिज सँ थाकल हारल ऐलीह। अनुष्काबाई ओहीना हुनका संग बेवहार केलकैन्ह। आब ओ उपदेश देमऽ लगलीह जे छोट बहिन केँ ओना नहि करक चाही। बड़ बहिन बड़ होयत छै। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.रबीन्द्र नारायण मिश्र-मातृशरणम् रबीन्द्र नारायण मिश्र मातृशरणम् बहुतदिनसँ कामाख्या भगवतीक दर्शन करबाक इच्छा छल। सोमनाथ यात्राक समयमे हमर श्रीमतीजीक ठेहुनमे समस्या भए गेल रहनि । तकरा ठीक हेबामे कैकमास लागि गेलनि। समय लगलनि,मुदा उपचारसँ बहुत सुधार भेलनि। जखन ओ फेरसँ टहलनाइ शुरू कए देलनि तँ एकदिन कहैत छथि- “आब हमसभ कामाख्या जेबाक कार्यक्रम बना सकैत छी।” ”ठीक छैक। आब जखन अहाँ सहमति दए देलिऐक तँ चलबे करब।” तकर बाद सरकारक इसंपदा वेबसाइटपर जा कए गुवाहाटीमे रहबाक हेतु घरक उपलब्धता जँचैत रहलहुँ। एकदिन संयोगसँ नओ अप्रैलसँ चौदह अप्रैल धरिक रहबाक जोगार बुझाएल। बीचमे एगारह अप्रैल कए खाली नहि रहैक। नओसँ चौदह अप्रैलक बीचमे अलग-अलग तारिखक हेतु चारिबेर आरक्षण करबए पड़ल। कारण एक्के कोठरी सभदिनक हेतु उपलब्ध नहि रहैक। जे भेटल,जेना भेटल ओकरा तुरंत आनलाइन आरक्षित करबा लेलहुँ। तकर बाद गुवाहाटी जेबाक आ वापसीक हबाइ जहाजक टिकट सेहो बनबा लेलहुँ। तकर बादे हुनका कहलिअनि- “हेयै! सुनैत छी।” “की बात?” “एमहर आउ। देखिऔ ने की छैक।” हुनको उत्सुकता भेलनि। हमर लैपटाप लग पहुँचलथि। हम हुनका गुवाहाटीमे सीपीडब्लुडी अतिथिगृहमे कएल गेल रहबाक व्यवस्थाक जानकारी देलिअनि। ओ आश्चर्यचकित रहथि जे एतेक जल्दी ई सभ कोना भए गेल। एगाराह अप्रैलक रहबाक व्यबस्था अखन करबाक छल। कैकटा विकल्प मोनमे अबैत छल। जेना कि ओहिदिन कामाख्यामे रहि जाइ,चीरोभाइ ओहिठाम चलि जाइ,किंवा शिलांगमे रहबाक जोगार करी। एहीक्रममे नेटपर देखैत रही कि शिलांगमे आयकर विभागक अतिथिगृह हेबाक जनतब भेटल। संबंधित अधिकारीक फोन नंबर सेहो भेटि गेल। हम हुनका अपन जरुरतिक बारेमे लिखलिअनि। आश्चर्य तखन भेल जे थोड़बे कालक बाद हुनकर सहमति भेटि गेल। एहि तरहेँ एगारह अप्रैल कए शिलांगमे रहबाक जोगार सेहो भए गेल। गुवाहाटी आ शिलांगमे रहबाक जोगार भए गेल छल। दुनूदिसका हबाइक जहाजक टिकट सेहो भए गेल छल। आब कामाख्या भगवतीक दर्शनक जोगार करबाक छल। नओ अप्रैल कए गुवाहाटी हबाइ जहाज साढ़े एगारह बजे पहुँचैत। तकरबाद सभसँ पहिने डेरा जेबाक होएत। ओहिठाम व्यबस्थित हेबाक बादे किछु आओर कएल जाएत। तेँ ओहिदिन कामाख्या भगवतीक दर्शनमे दिक्कति भए सकैत अछि। से सोचि हम दस अप्रैल कए कामाख्या भगवतीक दर्शन करबाक विचार केलहुँ। ओहिठाम दर्शन करबाक हेतु विशेष दर्शनपर्ची आनलाइन सात दिन पहिने कटनाइ शुरू होइत छैक। अस्तु, चारि अप्रैल कए हम कामाख्या भगवतीक विशेषदर्शनक हेतु आनलाइन टिकट कटओलहुँ। ताहि हेतु प्रति यात्री पाँचसए एक रुपया देबाक होइत छैक। दुनूगोटेमे एक हजार दू रुपया आनलाइन भुगतान केलाक बाद हमरसभक विशेष दर्शन टिकट सेहो कटि गेल। से तँ भेल,मुदा दूदिनक बाद हमर श्रीमतीजीक मोन खराप भए गेलनि। बोखार,खाँसी,आँखि लाल कतेको तरहक सिकाइतसभ भए गेलनि। आब की करी? हम तँ परेसान भए गेलहुँ। हबाइ जहाजक टिकट रद्द कराएब तँ भारी घाटामे पड़ब। एही समयमे बुझाएल जे हबाइ जहाजक टिकट लेबा काल रिफंडेबल टिकट लेबाक चाही जाहिसँ किछु गड़बड़ भेलापर रुपया वापस भए जाए। मुदा एहि बेर तँ हम फँसि गेल रही। मोने-मोन माताकेँ गोहरेलहुँ। आब जानह तूँ हे माता! तुरंत हुनका डाक्टर लग लए गेलहुँ। हुनका आँखि उठि गेल रहनि,देहमे बोखार रहनि,सर्दी-खाँसी तँ रहबे करनि। डाक्टरसभ दबाइ लिखलक। तुरंत दबाइ कीनलहुँ। संयोग एहन भेल जे दोसरेदिनसँ हुनकामे बहुत सुधार होमए लगलनि। दूदिनक बाद तँ बारह आना ठीक भए गेलथि। “आब कोनो चिंता नहि।“-हम मोने-मोन सोचलहुँ। तेसरदिन भेने हुनकर हालति बहुत सुधरि गेल रहनि,बोखार उतरि गेल रहनि,सर्दी-खाँसी से कम भए गेल रहनि। आँखि सेहो आब लाल नहि छलनि। आब लागल जे बचि गेलहुँ। हमसभ प्रसन्न रही। माताकेँ वारंबार धन्यवाद देलिअनि । आखिर नओ अप्रैल आबि गेल। भोरे सातबजे हबाइअड्डा पहुँचबाक हेतु छओ बजे हमसभ अपन घरसँ बिदा भए गेलहुँ। सातबजे हबाइ अड्डा पहुँचि गेलहुँ। धराधर सभटा काज संपन्न भए गेल। सामानसभ चेकइन भए गेल। दुनूगोटे सुरक्षाजाँचक बाद हबाइ जहाजमे चढ़बाक हेतु संबंधित द्वारि लग पहुँचि गेलहुँ। आब हमसभ निचेन छलहुँ। हबाइ जहाजकेँ उड़बामे घंटा भरिक समय रहैक। ताबे विश्राम केलहु,फोनपर गप्प-सप्प केलहुँ। से सभमे लागले रही कि हबाइ जहाजमे बोर्डिंग करबाक घोषणा भेलैक। हमसभ तुरंत अपन पाँतिमे आगूए लागि गेल रही। देखिते-देखिते हमसभ अपन-अपन सीटपर बैसि गेलहुँ। थोड़बे कालक बाद हबाइ जहाज सैकड़ों यात्रीक संग उड़ि गेल। जहाजक उड़ैत काल खिड़की बाटे बाहर देखैत रहलहुँ। क्रमशः धरती दूर भेल जाइत छल। चीज-वस्तुसभ बिला रहल छल। थोड़बेकालमे तँ हमसभ चिरैओसँ बेसी भए गेल रही। मस्त गगनमे हबाइ जहाजमे बैसल विचरण करैत रही। मुदा नीचाँ देखलासँ किछु नहि देखि पाबी। सभकिछु जेना शून्यमे विलीन भए गेल छल। साकारसँ निराकारक रुप्यान्तरणक विहंगम दृश्य सद्यः उपस्थित छल। ‍९ अप्रैल २०२४क नओ बाजि कए दस मिनटपर दिल्लीसँ उड़ल हबाइ जहाज ठीक साढ़े एगारह बजे गुवाहाटी हबाइ अड्डापर उतड़ल। हमसभ सामान लए बाहर होइते काल उबेरक टैक्सी आरक्षित करा लेलहुँ आ बहुत आसानीसँ एक घंटामे सीपीडब्लुडीक अतिथिगृह पहुँचि गेलहुँ। ओहिठामक मनेजरकेँ अपन आरक्षणक कागज देखओलिअनि। ओहिठाम पाँच दिन रहबाक हेतु हमरा लग चारिटा आरक्षण पुरजी छल,अलग-अलग दिनमे अलग-अलग कोठरी। से देखि कए मनेजर बजैत अछि- “अहाँ आरक्षण रातिमे केने रही की?” हम ओकरा इसारा बुझि नहि सकलिऐक। “नहि,नहि। आरक्षण तँ दिनेमे केने रही।” ओ ओहिमेसँ एकटा कागज राखि लेलक । “आर कागजसभ बादमे दए देब।“ बादमे मनेजरक बातपर ध्यान गेल। असलमे जे अपने जेहन होइत अछि तकरा सदिखन तेहने सोचाइत छैक। ओ तँ स्वयं पीबाक छल। बादमे ओकरा कैकबेर हम अन्यकर्मचारीक संग ओतहि पीबैत देखिऐक। गुवाहाटी हबाइ अड्डासँ डेरा अबैत काल टैक्सीबलासँ गप्प-सप्प केलाक बाद लागल जेना एकरा संगे आगिलो यात्राक जोगार लागि सकैत अछि। हम ओकरा कहलिऐक- “हमरासभकेँ कामाख्या भगवतीक दर्शन करबाक अछि। आनो मंदिरसभ जेबाक अछि। तकर बाद काल्हि गुवाहाटी सहर घुमबाक अछि। बादमे शिलांग आ चेरापुंजी सेहो जा सकैत छी। की तूँ हमरासभकेँ घुमा सकैत छह? ” “किएक ने? हमर तँ काजे इएह थिक। ” “कतेक खर्चा लागत?” “आइ कामाख्या भगवतीक दर्शन कराएब। तकर बाद भुवनेश्वरी भगवती आ आर जतेक पार लागत घुमा देब।” “खर्चा?” “अठारह सए लागत।” “ठीक छैक। तूँ एतहि रूकि जाह। हमहूँसभ तैयार भए जाइत छी। फेर बिदा होएब।” मंगल दिन रहबाक कारण हमरालोकनिक उपास छल। तेँ भोजन तँ करबेक नहि छल। अस्तु,थोड़बे कालक बाद हमसभ तैयार भए गेलहुँ। ओना माता कामाख्या मंदिरमे विशेष दर्शन पुरजी काल्हुक बनल छल,माने दस अप्रैलक भोरुका पहरक। मुदा हमसभ आइए कामाख्या मंदिर बिदा भए गेलहुँ। “सभसँ पहिने माताकेँ हाजिरी लगाओल जाए।“-हमसभ सोचलहुँ। लगभग आधाघंटाक बाद हमसभ कामाख्या मंदिर लग पहुँचि गेल रही। मंदिरक बाहरे एकटा पंडितजीसँ भेंट भेल। हम हुनका कहलिअनि- “दर्शनक जोगार भए सकैत छैक की?” “भए जाएत ,मुदा एकहजार रुपया लागत।” “कोनो बात नहि। नीकसँ दर्शन करा देबैक ने?” “निश्चिन्त रहू। हमर नित्यप्रतिक इएह काजे अछि।” हम दुनूगोटे पंडितजीक पाछू-पाछू बिदा भेलहुँ। ओ केना-केना घुमबैत हमरासभकेँ कामाख्या मंदिरक मूल भागमे लेने चलि गेलथि जे गर्भगृहक ठीक सामने छल। गर्भगृहमे पाँति लागल जाइत लोकसभकेँ हम देखि रहल छलहुँ। हमरासभकेँ पंडितजी ओतहिसँ माताक पूजा करबओलथि। तकर बाद हमरासभकेँ प्रसाद आ फूलक संग एकटा दोसर पंडितजीकेँ सुनझा देलनि। ओहिसँ पहिने हुनका पाँचसए रुपया आर देल गेलनि। दोसर पंडितजी हमरासभकेँ कात बाटे लेने-लेने एकठाम ठाढ़ कए देलाह आ अपने प्रसाद लए कए माताक गर्भगृहमे चलि गेलाह। “अहाँसभ एतहि प्रतीक्षा करू। हम प्रसाद चढ़ा कए आबि रहल छी। “ जेबासँ पहिने ओ हमरासभकेँ मंदिरक देबालपर नारियल फोड़बाक हेतु कहलनि। हम जोरसँ ओकरा पटकि देलिऐक। असलमे नारियलक पानि सामनेक देबालपर ढारबाक रहैक। मुदा ओकर पानि तँ पहिने खसि चुकल छल। एकटा बृद्धा अपन नारियल फोड़बाक हेतु हमरा कहलनि। हम एहि बेर ओकर तर्क बुझि गेल रहिऐक। ओकरा हिसाबेसँ पटकलिऐक जाहिसँ ओ फुटि तँ गेलैक,मुदा ओकर पानि बाहर नहि खसलैक,बाँचल रहि गेलैक। ओ बहुत प्रसन्न भेलीह आ अपने हाथे ओहि नारियलक पानि देबालपर ढारि देलनि। हमसभ पंडितजीक बाट ताकि रहल छलहुँ। मुदा ओ कतहु देखेबे नहि करथि। मोन औना गेल। ताबे हम पहिलुका पंडितजीकेँ देखलिअनि। ओ हमरासभकेँ आश्वस्त केलनि। बादमे ओएह किछु-किछु आर पूजा करओलनि। कन्याभोजन हेतु किछु दान करबाक हेतु उत्साहित केलनि। श्रीमतीजीक इच्छा देखैत हम छओसए रुपया आर एहि हेतु हुनका देलिअनि। आब हुनका हाथक पूजा समाप्त भए गेल छल। दोसरो पंडितजी प्रसाद चढ़ा कए आबि गेल छलाह। हमसभ हुनकासँ प्रसाद लए बाहर दिस बढ़लहुँ। मंदिरक बाहर बाघ लग दुनू बेकती फोटो घिचओलहुँआ माताकेँ फेरसँ प्रणामक कए हमसभ बाहर बिदा भए गेलहुँ। पंडितजीक सहयोगसँ कामाख्यामंदिरमे भयाओन भीड़क अछैत हमरा लोकनि आसानीसँ गर्भगृहक बहुत लगीच(मुदा बाहरे) सँ भगवतीक पूजा केलहुँ, बड़ीकाल धरि ओहि परिसरमे रहि आओर पूजा-पाठसभ केलहुँ,माताकेँ गोहरेलहुँ। हमर श्रीमतीजी एहिसँ बहुत संतुष्ट रहथि। नवरात्राक समय छल। ओहिठाम भक्तलोकनिक बहुत भीड़ छल। कैकगोटे बाजथि जे हुनका दर्शनमे भरिदिन लागि गेलनि। कहाँदनि विशेषदर्शनक टिकटक अछैत चारि-पाँच घंटा समय लागि रहल छल। हुनकर स्वास्थ्य से गड़बड़ेबाक डर छल। तेँ हमसभ विशेष दर्शनक टिकटक संग दस अप्रैलक फेरसँ दर्शन करबाक प्रयास नहि केलहुँ। मंदिरमे बाहर आ भीतर सभक ध्यान आगन्तुकसँ अधिक सँ अधिक रुपैया झिटब छल। जकरे देखू सएह ताहि लेल किछु ने किछु व्योंत केने छल। मंदिरमे भीतर जाइत काल पंडितजी वलिप्रदानक स्थान देखओलथि। अखनहु ओ स्थान रक्तरंजित छल,चारूकात दुर्गंध कए रहल छल। कनीके फटकी निर्दोष छागरसभ अपन जीवनक अंतिम क्षणक प्रतीक्षा कए रहल छल। हमरा मोनमे भेल जे धर्मक नामपर भए रहल एहि अत्याचारकेँ प्रश्रय देब बहुत अन्यायपूर्ण आ अमानवीय थिक। ई सभ अबस्स बंद हेबाक चाही। तखने जगन्नमाता प्रसन्न भए सकैत छथि। इएहसभ सोचैत हमसभ भुवनेश्वरी मंदिर दिस बढ़ि गेलहुँ। थोड़बे कालमे हमसभ भुवनेश्वरी मंदिर पहुँचि गेल रही। ई मंदिर कामाख्या भगवतीक मंदिरसँ मोसकिलसँ एक किलोमीटर फटकी नीलांचल पर्वतक आर ऊँच भागमे अवस्थित अछि। एहिठाम चारूकातक वातावरण बहुत सुरम्य अछि। माता दुर्गाकेँ समर्पित ई मंदिर गुवाहाटीक प्रमुख आध्यात्मिक स्थानमे सँ एक मानल जाइत अछि। एतए अंबुबाची मेला बहुत भव्य तरीकासँ मनाओल जाइत अछि। मंदिरक वातावरण बहुत शांत छल। हमसभ बहुत नीक जकाँ दर्शन केलहु,थोड़ेकाल ओतए बैसि माताक आराधना केलहुँ। सामनेमे एक व्यक्ति मंदिरेमे माताक मूर्ति दिस माथ राखि सुतल रहथि। मुदा ककरो ध्यान ओहिपर नहि रहैक। लोक आएल,लोक गेल मुदा ओ ओहिना सुतल पड़ल रहल। भुवनेश्वरीमंदिरमे दर्शनक बाद हमसभ नवग्रह मंदिर गेलहुँ । टैक्सीबला तँ आरो ठाम लए जेबाक हेतु तैयार छल। मुदा हमही सभ तैयार नहि भेलहुँ। बहुत थाकि गेल रही। भोरे चारिए बजेसँ गुआहाटी जेबाक हेतु तैयारीमे लागल रही। तकर बादसँ किछु ने किछु भइए रहल छल। “आब सोझे डेरा चलू।“-ओ कहलथि। हमसभ थाकल-ठेहिआएल अपन डेरा पहुँचि गेल रही। आजुक उपलब्धिसँ बहुत संतुष्ट रही,प्रसन्न रही। जतबा सोचने रही ताहिसँ बेसीए पाबि गेल रही। दस अप्रैल २०२४क भोरे हमसभ तैयार भए गेल रही। भोरुका चाहक प्रतीक्षामे रही। अतिथिगृहक कर्मचारीसभ सुतले रहए। कतहु ककरो कोनो अता-पता नहि छल। चाहकेँ तकैत हमसभ बाहर निकललहुँ। मुदा चारूकात ओएह माहौल छल। जेना सहरे सुतल होअए। बादमे आदरणीय श्री प्रेमकान्त चौधरीजी कहलनि जे एहिठामक जीवन पद्धतिक बारेमे कहबी छैक-लाहे,लाहे,माने जे सभकिछु हेतैक मुदा इतमिनानसँ,कोनो धरफरी नहि,कोनो तनाओ नहि। थोड़े कालक बाद टैक्सीबला आबि गेल रहए। तेँ बिना चाह पीने हमसभ बिदा भए गेलहुँ। आइ सभसँ पहिने उमानंद महादेवक दर्शन करबाक योजना छल। उमानन्द ब्रह्मपुत्र नदीक बीचोबीच मोर द्वीप पर स्थित प्रसिद्ध शिव मंदिर अछि । कहल जाइत अछि जे उमानंद कोनो नदीक बीचमे अवस्थित दुनिआक सभसँ छोट द्वीप थिक। एहि मंदिरकेँ ‍१६९४ ई. मे राजा गदाधर सिंहक आदेश पर बनाओल गेल छल, मुदा ‍१८६७ मे भूकंप सँ ई क्षतिग्रस्त भए गेल रहए। एहि मंदिरमे किछु चट्टान कटल आकृति अछि, जे असमिया कारीगरक निपुण कौशलक परिचायक थिक। ब्रह्मपुत्रमे पानि कम भए गेल छल। टैक्सीबला टैक्सीकेँ बाउलेमे चला कए हमरासभकेँ आगू धरि पहुँचा देलक। तकर बाद ओ उमानंद जाए बला स्टीमरक पता लगओलक। हमसभ ओहि स्टीमर पर पहुँचैत छी। दूटा बृद्ध यात्री पहिनेसँ ओहिपर बैसल रहथि। ओ एकटा निजी स्टीमर छल। प्रतिव्यक्ति एक दिसक दूसए टिकट छलैक। मुदा ओकर व्यवस्थापक चारू यात्रीकेँ दू हजारमे उमानंद लए जाएत आ वापसो आनत। आर यात्रीक प्रतीक्षा नहि करए पड़त। हमसभ एहि लेल तैयार भए गेलहुँ। ओहो दुनूगोटे अपन सहमति देलखिन। तकरबाद स्टीमर खुजि गेल। ब्रह्मपुत्र नदीमे चलैत स्टीमरक बहुत आनन्दमय दृश्य छल। चारूकात शांत आ मनोरम वातावरणमे आगू बढ़ैत स्टीमरक दृश्य देखैत बनैत छल। हमसभ मोसकिलसँ पन्द्रह मिनटमे उमानन्द मंदिर लग पहुँचि गेल रही। स्टीमर रूकि गेल छल। ओहिपरसँ उतरब आ तकर बाद करीब साठिटा सीढ़ी चढ़ब कनी कष्टकर काज छल। हमरोसँ बेसी बएसक छलाह ओ दुनू यात्री। बंगालक कोनो गामसँ आएल छलाह। पत्नी हृदयरोगी छलखिन। तथापि उत्साहपूर्वक सीढ़ी चढ़ि रहल छलाह। हमहूँसभ हुनके संगे आगू बढ़ि रहल छलहुँ। बीच-बीचमे सुस्ताइतो छलहुँ। मंदिर परिसरमे पहुँचि हमसभ बहुत प्रसन्न रही,आनन्दमे रही। ओहिठाम कैकटा मंदिर अछि। बेरा-बेरीसभमे दर्शन केलहुँ। पंडितजी हमरालोकनिकेँ किछु-किछु मंत्र पढ़ओलनि,पूजा करबओलनि। हमसभ यथासाध्य दक्षिणा देलिअनि। तकर बाद बाहर निकलि थोड़ेकाल बैसलहुँ। कहि नहि सकैत छी जे ओ क्षण कतेक आनन्ददायक छल। ओहिठामसँ उठबाक मोन नहि भए रहल छल। मुदा स्टीमरसँ वापसी छल। बहुत काल नहि रहि सकैत छलहुँ। अस्तु,हमसभ थोड़ेकालक बाद वापस भए गेलहुँ। स्टीमरपर उतरब आ चढ़ब दुनू मोसकिल काज छल। कारण तकर कोनो नीक ओरिआन नहि छल। स्टीमर जेना-तेना खुटेसल छल। लगपासमे राखल पाथरसभकेँ पकड़ि ओहिपर पहुँचबाक छल। जेना-तेना हमसभ वापस स्टीमरपर पहुँचि गेल रही। ओ आब फेर ब्रह्मपुत्र नदीमे वापसी यात्रापर चलि रहल छल। हमसभ एही पृथ्वीपर स्वर्गक आनन्द लए रहल छलहुँ ,मंत्रमुग्ध छलहुँ । ताबतमे स्टीमर बला अबाज देलक- “उतरैत जाउ ।“ घाट आबि गेल छल। हमसभ स्टीमरसँ उतरलहुँ। टैक्सी बला हमरसभक प्रतीक्षा कए रहल छल। हमसभ टैक्सीपर बैसि आगू बढ़ि गेलहुँ। ‍आब हमरासभकेँ भूख लागि गेल छल। जलखै करब जरूरी छल। तकर बादे आगू बढ़ब। से बात टैक्सीबलाकेँ हम कहि देने रहिऐक। अस्तु,थोड़ेकालक बाद एकटा जलपानगृह लग टैक्सी रुकल। हमसभ ओतए नीकसँ जलखै केलहु,चाह पीलहुँ। टैक्सीबला हमरसभक आग्रहपर अपन पसिंदक जलखै-रसगुल्ला संगे चाह पीलक। हमसभ ओकर पसिंदसँ चकित रही। मुदा बादमे पता लागल जे ओहिठाम इएह चलैत छैक। जलखै केलाक बाद हमरासभकेँ आब फुरती आबि गेल छल। हमसभ टैक्सीपर बैसलहुँ आ बिदा भेलहुँ ब्रह्मपुत्र नदीक ओहिपार बनल डौल गोबिंद मंदिरमे दर्शनक हेतु। एहि मंदिरक निर्माण करीब एकसए पचास साल पुर्व कएल गेल छल। सन् ‍१९६०मे एकर पुनर्निमाण कएल गेल। मंदिरमे फगुआ आ जन्माष्टमीक समय विशिष्ट आयोजन कएल जाइत अछि। एहिठाम पाँचदिन धरि फगुआक आयोजन होइत अछि। भगवान कृष्णक मंदिर हेबाक कारणसँ एहिठाम जन्माष्टमी तँ बहुत नीकसँ मनाओले जाइत अछि। एहि मंदिरमे प्रसादक रूपमे बहुत नीक खीर खेबाक अवसर भेटल। एहन नीक खीर हमरा गामक कुट्टीपर झूलामे बनैत छल,से मोन पड़ि गेल। खीर खेबाक लालचमे हम दोबारा प्रसाद लेलहुँ। तकर बाद ओहिठामसँ बिदा भेलहुँ। उमानंद मंदिरमे सीढ़ी चढ़बाक कारणसँ हमर श्रीमतीजी थाकि गेल रहथि,माथ से दुखेनाइ शुरू भए गेल रहनि। हुनकर दिक्कति बुझा रहल छल। तेँ आब बेसी नहि घुमि सकैत छलहुँ। तथापि घुरतीमे वशिष्ठ मंदिर गेलहुँ । बीचमे बालाजी मंदिर सेहो आएल। मुदा हमसभ एहिठाम नहि रुकलहुँ। कहल जाइत अछि जे वशिष्ठ मंदिरक स्थापना वशिष्ठ मुनि केने छलाह। एहिठाम हुनकर आश्रम छलनि। एहिठाम कैकटा जलधारा बहैत अछि जे आगू जा कए वशिष्ठ नदी आ वाहिनी नदीक रुपमे सहर दिस बढ़ि जाइत अछि। हमसभ एहिठाम दर्शन केलहुँ, थोड़े काल सुस्तेलहुँ आ वापस अपन डेरा दिस बिदा भए गेलहुँ। मंदिरसभमे अबैत-जाइत काल गुवाहाटी सहरक विभिन्न स्थानसभ सेहो देखैत गेलहुँ। पुरान आकार-प्रकारक एहि सहरक लोकसभ अपने ओहिठाम जकाँ लगैत छल। आसामी भाषाकक प्रति बेस अनुराग ओहिठामक लोकसभमे देखाएल। हिन्दी अखबार तकलोपर नहि भेटल। सभठाम नामपट्टपर असमिआ भाषामे विवरण लिखल छल। स्थानीय लोकसभ आसामी भाषामे गप्प केलासँ बेसी सहज देखाइत छल। की मधुबनी,दरभंगामे मैथिलीक वर्चस्व एहिना देखाइत अछि?उत्तर हमसभ जनैत छी। शिलांग चेरापुंजीक यात्रा पछिला दू दिनसँ ओ टैक्सीबला हमरा संगे काज कए रहल छल। कुलमिला कए हमरा ओ ठीक आदमी बुझाएल । ओकर कार छोट जरूर छलैक,मुदा ओ ठीक हालतिमे रहैक आ ओ चलबितो नीक रहए। पहाड़पर छोट वाहन बेसी बढ़िआँ होइत छैक। से सभ सोचि कए हम टैक्सीबलासँ शिलांग आ चेरापुंजी जेबाक बारेमे ओकर मंतव्य पुछलिऐक। ओ तँ जेना बाटे ताकि रहल छल। “किएक ने जाएब।“- ओ छुटले बाजल। “कतेक खर्चा हेतैक?” “यदि भोरे पाँच बजे बिदा होइ तँ ओहीदिन राति धरि हमसभ गुवाहाटी लौटि सकैत छी। कतहु रहबाक प्रयोजन नहि होएत। यदि से करी तँ छओ हजार लागत।” “हमसभ बूढ़ थिकहुँ। एक्के दिनमे चेरापुंजी गेनाइ ,भरिदिन ओतए घुमनाइ ,फेर रातिएमे गुवाहाटी लौटि गेनाइ संभव नहि अछि। मोन खराप भए जाएत तखन? फेर हमरासभकेँ शिलांगमे रहबाक ओरिआन अछि। ओहिठाम रूकि गेलासँ सुस्ता लेब,शिलांग से घुमि लेब। दोसर दिन साँझ धरि गुवाहाटी लौटि जाएब।” “तखन दू हजार आर लागत,माने दुनू दिनका भाड़ा आठ हजार।” “कोनो हरजा नहि।” तकर बादो ओ हमरासभकेँ मनेबाक प्रयास करैत रहल जे हमसभ एक्केदिनमे वापस भए जाइ। कहैत रहल-“शिलांगमे बहुत दिक्कति छैक,ओहिठामक पुलिस बहुत खच्चर होइत छैक। लोकोसभ कोना दनि,लगबे नहि करत जे अपने देश मे छी। हमरा तँ ओ जगह एकदम नीक नहि लगैत अछि। ओहिठाम खेबाक से बहुत दिक्कति छैक।“ जखन ओ अपने बात दोहरबैत रहल तँ हमसभ कहलिऐक- “कोनो बात नहि। जखन तोरा नहि जेबाक मोन छह तँ हमसभ दोसर टैक्सी कए लेब।” बात गड़बड़ाइत देखि ओ तुरंत तैयार भए गेल। मुदा पाँचसए रात्रि शुल्क अतिरिक्त लेत। हमसभ सेहो मानि गेलिऐक। तकर कारण ई जे ओ हमरा लोक ठीक बुझाएल। जाइत-जाइत ओ कहलक- “हम भोरे पाँच बजे आबि जाएब। अहाँसभ तैयार रहब।” “ठीक छैक।” ओ चलि गेल। हमहूँसभ अपन डेरा वापस आबि गेलहुँ। मुदा डेरापर लौटलाक बाद हमर श्रीमतीजीक मोन बहुत खराप भए गेलनि। माथ दर्द,आर किछु,किछु समस्यासभ भए गेलनि। दबाइ केलथि आ सूति रहलथि। मुदा हम चिंतामे पड़ि गेलहुँ। “एहन हालतिमे एतेक दूर कोना जा सकब?यदि मोन बेसी खराप भए गेलनि तखन?” हम टैक्सीबलाकेँ फोन कए सभबात कहलिऐक। ईहो कहलिऐक जे काल्हि भोरे अपन घरसँ बिदा होमएसँ पूर्व एकबेर हमरा फोन कए लेत। भोरे चारिबजे हम उठि गेलहुँ। हमर श्रीमतीजे सेहो जगले रहथि। स्वास्थ्यक बारेमे पुछलिअनि। कहलथि-“आब हम ठीक छी,चलि सकैत छी।”हुनकर बात सुनि मोनमे बहुत उसास भेल। हम तुरंत टैक्सीबलाकेँ फोन केलिऐक-“समयपर आबि जइअह।” “ठीक छैक।” हमसभ पाँच बजे भोरे तैयार भए गेल रही। एहि समयमे ओतए चाह भेटबाक कोनो जोगार नहि छल। अस्तु,हमसभ डेरासँ निकलि गेलहुँ। बाहर टैक्सीबला प्रतीक्षा कए रहल छल। हमसभ टैक्सीमे बैसलहुँ आ शिलांग होइत चेरापुंजीक यात्रापर आगू बढ़ि गेलहुँ। सौंसे सहर शांत छल। जेना सभ सुतले होअए। ई तँ बुझाइए गेल छल जे भोरुका पहरमे एहिठाम देरीसँ कारबार शुरू होइत अछि। तेँ आब ओही हिसाबसँ कार्यक्रम बनाबी। थोड़बे कालक बाद हमसभ मेघालयक सीमा लग आबि गेल रही। सड़कक एक दिस आसाम आ दोसर दिस मेघालय। मेघालय मूलतः पहाड़ीपर बसल अछि। एहिठाम क्रिश्चन जनसंख्या बेसी अछि। तेँ सौंसे चर्च देखाएल। एकाधटा मस्जिद सेहो देखाएल,मुदा मंदिर एकटा नहि देखाएल। यदि कतहु रहबो कएल होएत तँ हमर सभक यात्रामार्गमे तँ नहिए छल। जेना-जेना हमसभ आगू बढ़ैत गेलहुँ तेना-तेना जंगल-पहाड़सभ देखा रहल छल। चारूकात हरिअर कंचन दृश्य लगैत छल। मौसम से बहुत नीक छल। क्रमशः बेसी ठंढ बुझा रहल छल। टैक्सीबला तेजीसँ अपन वाहन चला रहल छल। ओ हमरासभकेँ रस्तामे प्रमुख स्थानसभक बारेमे बतबैत जा रहल छल। लगभग साढ़े सात बजे भोरे हमसभ शिलांग स्थित आयकर विभागक अतिथिगृह पहुँचि गेल रही। ओहिठाम पहिने फोन कए देने रहिऐक। जाइते देरी चाह बनि गेल। हमसभ चाह पीलहुँ। थोड़े काल सुस्तेलहुँ आ चेरापुंजीक लेल बिदा भए गेलहुँ। शिलांगसँ चेरापुंजीक सड़कमार्गसँ ५७ किलोमीटर फटकी अछि। ई यात्रा अत्यंत मनोरम अछि। सड़कक दुनूकात अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्यसँ भरल अछि। थोड़े-थोड़े फटकी जलप्रपातसभ देखाइत अछि। असलमे गुवाहाटीसँ शिलांगक यात्रा अद्भुत प्राकृतिक दृश्य सभसँ भरल अछि। एक सँ एक दृश्य सामने अबैत रहल,ओकरा हमसभ देखैत रहलहुँ,किछुकेँ अपन मोबाइल कैमरामे सुरक्षित रखैत गेलहुँ। ओहि मनोरम दृश्यसभमे किछुक वारेमे एतहु चर्च करैत छी। शिलांग सहरसँ लगभग दसमिनटक बाद जमीनक सतहसँ ‍१९६६ मीटर ऊँचपर अवस्थित अछि शिलांग पिक भ्यु प्वाइंट । ई स्थान बेसीकाल मेघसँ आच्छादित रहैत अछि। ओना मेघ तँ सामान्यतः एहि इलाकामे रहिते अछि। तेँ तँ एहि प्रान्तक नाम मेघालय राखल गेल अछि। एहिठामसँ शिलांग सहरकेँ संपूर्णतासँ देखल जा सकैत अछि। एहिठामसँ बंगलादेशक सीमा सेहो देखल जा सकैत अछि। नोहशंगथियांग जलप्रपात मेघालयक पूर्वी खासी पहाड़ी जिलाक मावसई गाममे अवस्थित अछि, तेँ एकरा मावसई जलप्रपात सेहो कहल जाइत अछि। नोहशंगथियांग जलप्रपातक पानि लगभग ‍१०३३ फीटक ऊंचाईसँ खसैत अछि जे सात भागमे विभाजित भए जाइत अछि। अस्तु,एहि जलप्रपातकेँ सेवन सिस्टर फॉल्स सेहो कहल जाइत अछि। सोहरा सर्किटक शुरुएमे चेरापूंजी सहर सँ करीब ‍१५ किलोमीटर दूर अवस्थित मॉकडोक डिम्पेप वैली व्यू सड़कसँ कनीके फटकी घाटीक मनोरम दृश्य देखाइत अछि । मॉकडोक डिम्पेप वैली व्यू चेरापूंजी के मौसिनराम जिलामे स्थित अछि। हमसभ एहिठाम थोड़े काल रुकलहुँ। सड़कक कातमे मकइक भुट्टा बिका रहल छल। भूख लगले रहए। हमदुनू बेकती दूटा मकइक भुट्टा कीनलहुँ। बड़ीकाल धरि ओकरा खाइत रहलहुँ आ ओहिठामक अद्भुत सेहो दृश्यो देखैत रहलहुँ। किनरेम जलप्रपात मेघालयक पूर्वी खासी हिल्स जिलेमे चेरापूंजीसँ बारह किलोमीटर फटकी अवस्थित एकटा आश्चर्यजनक जलप्रपात थिक। ई मेघालयक पूर्वी खासी हिल्स जिलामे चेरापूंजीक लोकप्रिय आकर्षण थांगखरंग पार्कक नामसँ प्रसिद्ध सुंदर पार्कक भीतर स्थित अछि। एकर ऊंचाई ‍१००१ फीट अछि। ई भारतक सातम सभसँ ऊंच जलप्रपात थिक। किनरेम जलप्रपात तीन स्तरीय जलप्रपात छैक। ई जलप्रपात दू अलग-अलग धारामे पसरल छैक जे नीचाँ खसैत काल एक-दोसरमे मिलि कए आर तेजीसँ आगू बढ़ि जाइत अछि। एकबजे धरि हमसभ चेरापुंजीक आसपासक महत्वपूर्ण स्थानसभ घुमैत रहलहुँ। टैक्सीबला बेर-बेर बंगलादेशक क्षेत्रकेँ देखेबाक प्रयास करैत- “ओएह देखू। बंगला देशमे लाइट जरि रहल अछि। आइ ओकरसभक पावनि छैक। तेँ उत्सव कए रहल होएत।” आबसभकेँ बहुत भूख लागि गेल रहैक। टैक्सीबला हमरासभकेँ पूर्ण शाकाहारी भोजनालय आरेंज रूट्स लए गेल। ओहिठाम बहुत भीड़ छल,मुदा व्यवस्थो गजब छल। लगबे नहि करैक जे एतेक लोक एक्केठाम भोजन कए रहल अछि। सभसँ पहिने पसिंदक भोजनक पुरजी कटाबक छल। हम ओहि खिड़की लग गेलहुँ। पुरजी काटएसँ पहिने ओ महिला पुछलक-“आधा घंटा प्रतीक्षा करए पड़त।” “कोनो बात नहि।” “हम ओकरा अपन पसिंद बतलिऐक,लोकक संख्या कहलिऐक,आ ओ तकर मूल्य बता देलक। हम तुरंत आनलाइन भुगतान कए देलिऐक। ओ हमरा पुरजी दए देलक। तकर बाद ओहि पुरजीकेँ एकटा महिलाकेँ दखए देलिऐक। ओ हमर नाम लिखि लेलक आ कहलक- “अहाँसभ बैसि जाउ। हम आधाघंटामे बजा लेब। ठीक आधाघंटाक बाद ओ महिला हमर नाम लेलक। हमसभ तुरंत ओकरा लग पहुँचैत छी। ओ हमरासभकेँ बैसबाक स्थान दिस इसारा करैत अछि। हमसभ अपन सीटपर जा कए बैसि गेलहुँ। तकर बाद तँ एक सँ एक महिला बारिकसभ घुमए लागल। तरह-तरहक भोजनक सामग्री प्लेटमे देने जाए। जे खाइ,जतेक खाइ। सभ बारिक महिले छलि आ से अभूतपूर्व व्यवस्थाक संग भोजन करा रहल छलीह। हमसभ भरिपेट भोजन केलहुँ आ बहुत आश्वस्त भाओसँ ओहिठामसँ बिदा भेलहुँ। ओतहिसँ रामकृष्ण आश्रमक भवन सेहो देखा रहल छल। मुदा हमसभ ओतए जा नहि सकलहुँ। आब वापस शिलांग बिदा हेबाक छल। हमसभ टैक्सीपर बैसलहुँ। टैक्सीबला सेहो भोजन कए चुकल छल। जल्दीए टैक्सी तेजीसँ वापसी यात्रा शुरू कए चुकल छल। फेर ओएह रमनगर दृश्यसभ देखैत-सुनैत लगभग चारिबजे हमसभ शिलांग स्थित अपन अतिथिगृह पहुँचि चुकल छलहुँ। रातिभरि शिलांग अतिथिगृहमे विश्रमाक बाद हमसभ भोरे चाह-जलखैक बाद लगभग नओ बजे शिलांगक हेतु टैक्सीसँ बिदा भेलहुँ। काल्हि शिलांगसँ चरापुंजी जेबाक क्रममे शिलांग आ ओकर आसपासक अधिकांश प्रमुख स्थानसभ देखिए लेने रही। आइ जाइत-जाइत सेहो हमसभ वार्ड झील पहुँचलहुँ। एहि झीलमे वरिष्ठ नागरिकक प्रवेश हेतु मात्र दस रुपया लगैत अछि। हमसभ बीस रुपयामे दूटा टिकट लए कए एहिमे प्रवेश केलहुँ। तत्कालीन आयुक्त सर विलियम वार्डक आदेशपर कर्नल हॉपकिंस द्वारा एहि झीलक निर्माण वर्ष ‍१८९४ मे कएल गेल छल। एहि झीलक चारूकात बहुत सुंदर-सुंदर फूलसभ लागल अछि। झीलक बीचमे काठक पूल अछि जाहि ठामसँ लोक अपने हाथे पानिमे हेलैत माछसभकेँ खुआ सकैत अछि। झीलमे नौकायनक सुविधा सेहो अछि। अनेक पर्यटकसभ ओहिठाम घुमैत रहथि। हमहूँसभ थोड़ेकाल ओतए बैसलहुँ। किछु फोटो घिचलहुँ। तकर बाद हमसभ शिलांगसँ पन्द्रह किलोमीटर फटकी शिलांग-गुवाहाटी सड़कपर अवस्थित उमियम झील लग रुकलहुँ। २२० किलोमीटरमे पसरल ई शिलांगक सभसँ पैघ कृतिम झील थिक। एहि कृतिम झीलक निर्माण जलविद्युत उतपन्न करबाक लेल कएल गेल छल। चारू दिस पसरल सिल्वन पहाड़ी आर हरियर खासी चीड़ वृक्ष एहि विशाल झीलक वैभवकेँ कैक गुणा बढ़ा देने अछि। फोटोमे उमियम झीलक पानि हरिअर रंगक देखाइत अछि। तकर कारण अछि उमियम झीलक चारूकात पसरल बृक्षसभ,जकर छाया पानिमे पड़ैत रहैत छैक । टैक्सीबलाक इच्छा रहैक जे हमसभ कनी नीचाँ उतरी,झीलक पानिमे अथवा ओहिसँ सटले ठाढ़ होइ । तखन ओकर वीडियो बनाओल जाए। मुदा ओहिठाम नीचाँ दिस बहुत ढलान रहैक,हिनकर ठेहुनमे समस्या रहिते छन्हि। कनीको संतुलन बिगड़लापर दुर्घटना भए सकैत छल। ई बात ओ बुझि नहि रहल छल। हमसभ थोड़े कालक बाद ओहिठामसँ बिदा भए गेलहुँ। आब सोझे गुआहाटी जेबाक छल। टैक्सी तेजीसँ आगू बढ़ि रहल छल। ओएह रस्ता,ओएह दृश्यसभ फेरसँ सामने आबि रहल छल। हमसभ तकर आनंद लैत आगू बढ़ैत रहलहुँ। रस्तामे हम टैक्सीबलाकेँ पुछलिऐक- “तोरा मेघालय पुलिससँ एतेक डर किएक होइत छह?तोरा संगे ओहिठामक पुलिस संगे कोनो विशेष घटना घटित भेल अछि की?” “की कहू? कोरोना बंदीक समयमे एकटा बिहारक यात्रीकेँ शिलांग जाएब जरूरी रहैक। हमर एकटा मित्र आग्रह केलक। हम ओकरा शिलांग पहुँचाबक हेतु तैयार भए गेलहुँ। ” “तखन?” “ओकरा संगे जखन शिलांग सहरक लगीच पहुँचलहुँ तखन पुलिस चारूकात घेरने रहए। तथापि किछु बहन्ना बना कए आगू बढ़लहुँ,मुदा कनीके आगू गेलाक बाद पुलिस पकड़ि लेलक। तीन सए रुपया देलाक बाद मोसकिलसँ छोड़लक। मुदा बात एतहि समाप्त नहि भेल। ओ पुलिस खच्चर रहए। दोसर पुलिसकेँ मोबाइलपर फोन कए देलकैक। थोड़बे आगू गेल रही कि दोसर पुलिस हमरा फेर पकड़ि लेलक। ओहो तीनसए रुपया माँगलक। हम से देबाक हेतु तैयार नहि रही। ओकरा पछिला पुलिसक बात सेहो कहलिऐक। कतबो बुझेबाक प्रयास केलिऐक ओ अड़ि गेल। हारि कए ओकरो दूसए रुपया देलिऐक। मुदा ओ बढ़िआँ आदमी निकलल। हमरा अपन मोबाइल नंबर लिखा देलक आ कहलक-“आब कोनो समस्या नहि हेतह। यदि से होइत अछि तँ हमरा फोन कए दिअह।” ओकर बात सही निकलल। तकर बाद हमरा कोनो परेसानी नहि भेल। लाक डाउन अछैत हम ओहि यात्रीकेँ अपन गंतव्य धरि पहुँचा देलिअनि।” आब बुझाएल जे टैक्सीबला शिलांगमे किएक डराइत छल। एहि तरहेँ गप्प-सप्प करैत हमसभ एक बजे अपन अतिथिगृह पहुँचि गेल रही। तकर बाद हमसभ ओतए भोजन केलहुँ आ मोनमे सफल यात्राक संतुष्टि भाओक संग भरिदिन विश्राम केलहुँ। चीरोभाइ(पंडित श्री रत्नेश्वर मिश्र) एहि बेरक कामाख्या यात्राक दूटा अविस्मरणीय प्रसंग छल हमर पितिऔत चीरो भाइसँ सपरिवार भेंट आ आदरणीय श्री प्रेम कान्त चौधरीजी हुनकर मित्र सहयोगी लोकनिसभसँ भेंट-घाँट। हम अपनयात्राक अंतिम दू दिन एही सभ हेतु बचा कए रखने रही। हम गुवाहाटी जेबाक कार्यक्रम बनएसँ पहिने चीरो भाइ(पंडित श्री रत्नेश्वर मिश्र) केँ फोन केने रहिअनि। ओ पचासो सालसँ गुवाहाटीमे रहैत छथि। ईहो बुझल छल जे ओ ओहिठाम कामाख्या मंदिरसँ जुड़ल छथि। तेँ ओ माताक दर्शनमे मदति कए सकैत छथि। कार्यक्रम जखन बनि गेल,टिकट कटि गेल,गुवाहाटीमे पाँच दिन रहबाक जोगार ओहिठामक सीपीडब्लुडी अतिथिगृहमे भए गेल तखनो चीरोभाइकेँ फोन नहि केलिअनि। कारण श्रीमतीजी कहलनि जे माताक दरबारमे जा रहल छी,ओ स्वयं देखथिन।ककरो किछु कहबाक काज नहि। ओना हमर एकटा मित्र स्थानीय एक्साइज कमिश्नरकेँ हमरासभकेँ मदति करबाक हेतु फोन कए देलखिन। हमरा हुनकर मोबाइल नंबर सेहो देलनि। हम हुनकासँ गप्पो केलहुँ । मुदा हुनकर पैरबीमे कोनो जान नहि बुझाएल। तकर बाद हम छोड़लहुँ हुनकर चक्कर। हम सत्तरह मार्च २०२४ कए जखन गाम जाइत रही तखन चीरो भाइक फोन आएल। “अहाँक गुवाहाटी यात्राक कार्यक्रम केना की भेल? हमसभ उत्सुकतासँ बाट ताकि रहल छी।“ “नओ अप्रैलक टिकट कटा लेने छी।अखन गाम जा रहल छॅ ओहिठामसँ लौटि कए हम फोन करब।” तकर बाद हम गाम गेलहुँ,वापसो आबि गेलहुँ,किछु समयो बीति गेल मुदा हम हुनका फोन नहि कए सकलिअनि। तकर कारण तँ ऊपर लिखिए चुकल छी। ठीक नओ अप्रैल कए जखन हम कामाख्या मंदिरमे रही हुनकर फोन आएल। मुदा हम मिसकाल बादमे देखलिऐक। कारण मंदिरमे ततेक हल्ला होइत रहैक जे फोनक घंटी सुनबाक सबाले नहि होइत अछि। मंदिरसँ पूजा केलाक बाद जखन बाहर निकललहुँ तखन फेर हुनकर फोन आएल। एहिबेर फोनसँ गप्प भेल- “हमसभ गुवाहाटी आबि गेल छी। माताक दर्शन करैत रही। तेँ फोन नहि देखि सकलहुँ।” “हम अहाँकेँ लेबाक हेतु कखन आउ। आनठाम किएक ठहरल छी? हमरे ओहिठाम रहू। अपन घर अछि।कष्टे सही, संगे रहब,गप्प-सप्प करब।” “ से तँ सत्ते। मुदा हमरा रहबाक नीक जोगार भए गेल अछि। तेँ तकर चिंताक बात नहि अछि। ओना हम अहाँक ओहिठाम अबस्स आएब। हमरो अहाँसँ भेंट करबाक हेतु बहुत मोन लागल अछि। ” “ठीक छैक। हमरा फोन कए देब। हम अपन गाड़ीसँ अहाँकेँ लए आनब।” चीरो भाइक आग्रहसँ हम चकित रही। ओना ओ हमर पितिऔत भाइ छथि,नेनेसँ संगी सेहो छथिहे। मुदा एतेक साल बीति गेलैक,कतेक तरहक बात भेलैक,तैओ ओ ओहिना भाओ रखने छथि,अपितु बेसी घनिष्टता बुझा रहल अछि,से सोचि अभीभूत रही। नओसाल पहिने भतीजीक बिआहमे गामपर हुनकासँ भेंट भेल रहए सेहो कतेको सालक बाद से नहि मोन पड़ि रहल अछि। ओ हमरा गामक संस्कृत पाठशालासँ उत्तरमध्यमाक परीक्षा पास केने रहथि। थोड़ेक दिन गामेमे किछु-किछु केलथि। एकदिन अपन दोकानपर बैसल रहथि कि हुनकर पित्ती कहलखिन- “पढ़ो फारसी बेचो तेल,देखो भाइ किस्मत के खेल।” बस ई बात हुनकर मोनमे गड़ि गेलनि। ओही समयमे गुवाहाटीमे रहैत हुनकर सार किछु काजसँ हुनका ओतए बजओलखिन। बस ओहि अवसरकेँ फएदा उठबैत ओ गामसँ गुवाहाटी बिदा भए गेलाह।तकरबाद जे ओ गुवाहाटी गेलाह से पचास वर्षसँ ओतहि छथि। आब तँ हुनका गुवाहाटीमे दूमहला मकान छनि,एकटा विकसित परिवार छनि। मधुबनीमे सेहो ओ मकान बनओने छथि। सालमे एक-दू बेर मधुबनी ,गाम जाइते रहैत छथि। चीरो भाइक संघर्षक गाथा रोमांचक अछि। यद्यपि ओ संस्कृत पढ़ने रहथि,तथापि मेहनति कए अंग्रेजी सिखि कए सातमा धरिक अंग्रेजी माध्यमक बच्चासभकेँ सभ विषय ट्युशन पढ़बैत रहथि। ई काज ओ सोलह साल धरि केलथि। मनुष्यक जीवनमे कखनो काल एहन घटना घटित भए जाइत अछि जे ओकर दशा आ दिशा बदलि दैत छैक। गुवाहाटीमे एकबेर कोनो जाग होइत रहैक। ओहिमे हुनको पंडितक काज हेतु आमंत्रित केलकनि। ओ ओहिठाम गेबो केलाह। ओहिमे हुनका एकावन टाका भेटितनि। मुदा ओहिठाम गेलाक बाद हुनका काज नहि देलकनि। केओ षड़यंत्र कए हुनकर नाम कटबा देलकनि। एहि बातसँ हुनका बहुत कष्ट भेलनि। कारण ओ हुनकर संघर्षक समय छल। एकावन टाका बहुत माने रखैत छल। हुनकर नाम एहि लेल काटि देलकनि जे ओ शिक्षकक काज करैत छथि,पंडिताइ नहि करैत छथि। चीरो भाइ तुरंत ओहिठाम उपस्थित पंडितसभकेँ चुनौती देलखिन। बात बहुत गरमा गेलैक। दोसर दिन भेने फेर ओहीठाम हुनका एकटा विद्वानसँ भेंट भेलनि। ओ संस्कृतमे हुनकासँ कैकटा प्रश्न पुछलखिन। चीरोभाइ सभटा प्रश्नक उत्तर सही-सही दए देलखिन। हुनकर संस्कृतक ज्ञान आ वुद्धिमत्तासँ ओ बहुत प्रभावित भेलाह हुनका पंडिताइ करबाक हेतु प्रेरित केलाह। तकर बादे ओ पंडिताइ शुरू केलनि जे अखन धरि चलिए रहल छनि। अखनहु अपनो पंडिताइक काज कइए रहल छथि। ओहिसँ हुनका बहुत नीक आमदनी भए जाइत छनि। गुवाहाटीमे रहैत चीरोभाइ अपन कैकटा भाएसभकेँ नौकरी धरबओलनि। ओ सभ अपन-अपन क्षेत्रमे बहुत विकास केलाह। अखनहु ओ अपन एकटा विधवा बेटी सहित हुनकर तीनटा संतानक पालन-पोषण कए रहल छथि। ओ सभ बहुत नीक शिक्षा प्राप्त कए रहल छथि। एक व्यक्ति संघर्ष कए अपन जीवनकेँ कोना पलटि सकैत अछि तकर एकटा जीवंत उदाहरण छथि चीरो भाइ। नओ अप्रैल २०२४ कए गुवाहाटी पहुँचलाक बाद चीरो भाइक फोन कैक बेर अबैत रहल। ओ आग्रहपर आग्रह करैत रहलाह जे हमरे ओतए रहू,एहिठाम एसी बला कोठरी अहाँक प्रतीक्षा कए रहल अछि। नवरात्रा चलि रहल छलैक। हुनका अपना घरमे तँ पाठ करबेक रहनि,आनोठाम भरि दिनका व्यस्तता चलि रहल छलनि। हम कहलिअनि जे गुवाहाटी घुमलाक बाद शिलांग जाएब,चेरापुंजी जाएब । तकर बाद गुवाहाटी लौटब। तखन अहाँसभसँ अबस्स भेंट करब। हम १२ अप्रैलक एक बजे शिलांगसँ वापस आबि गेल रही। तकर बाद भोजन कए विश्राम करैत रही कि चीरो भाइक फेर फोन आएल। ओ कहलाह- “हम साँझमे आबि रहल छी। वापसीमे अहाँसभ संगे चलब। ” “अखन हमसभ बहुत थाकल छी। आइ कतहु गेनाइ संभव नहि बुझाइत अछि। ओना अहाँ आबी तँ स्वागत अछि।” “कोनो बात नहि। हम काल्हि भोरे आठ बजे फोन करब।” “ठीक छैक।” भोरे फेर हुनकर फोन आएल। ओ नओ बजे वाहनक संगे अओताह। हमसभ ठीक नओ बजे तैयार रही। मुदा चीरोभाइकेँ अएबामे देरी भए गेलनि। टैक्सीबला विलंभसँ आएल छल। तकर बाद करीब साढ़े दस बजे ओ हमरसभक अतिथिगृह पहुँचलाह। गेलहुँ। बेस पैघ गाड़ी छल। हमसभ बाहरे प्रतीक्षा करैत रही। तुरंत गाड़ीमे बैसि हमसभ गप्प-सप्प करैत आधा घंटामे हुनकर आवासपर पहुँचि गेलहुँ। हमरासभकेँ देखितहि चीरो भाइक समस्त परिवार हमरासभक स्वागतमे लागि गेलाह। हुनकर दुनू नातिन,नाति, पुतहु,बेटी,पत्नी सभगोटे ततेक प्रसन्न रहथि जकर वर्णन करब मोसकिल। चीरोभाइ करीब घंटा भरि अपन संस्मरण,जीवनक संघर्ष गाथा सभ सुनबैत रहलथि। कहि नहि सकैत छी जे कतेक अपनत्वक भाओ छलनि हुनकर गप्प-सप्पमे । आब भोजन तैयार भए गेल छल। हमसभ भोजनपर बैसलहुँ। अनेक प्रकारक व्यंजनसँ परिपूर्ण भोजनक आनन्द लेलहुँ। थहि-थहि भए गेल। पान-सुपारी सेहो भेलैक। आब चलबाक उपक्रम शुरू भेल। एकटा बात लिखब तँ छुटिए गेल। चीरो भाइक कुकुरक अपनत्व सेहो वर्णनीय अछि। ओकरा भोजनमे विलंब भए गेल रहैक । तेँ ओ रुसि गेल छल। बिज नहि रहल छल,भुकि नहि रहल छल। चुपचाप पड़ल छल। ओकरा चीरोभाइ बहुत दुलार-मलार कए बऔसलनि। तकर बाद ओकरा अपने हाथे खुओलनि। भोजन केलाक बाद ओकरामे तेजी आएल। ओ एमहर-ओमहर घुमए लागल। सभसँ आश्चर्य तखन लागल जखन बिदा होइत काल ओ हमरासभसँ पहिने टैक्सीबलाक बगलमे जा कए बैसि गेल। ओ किन्नहु गाड़ी छोड़बाक हेतु तैयार नहि छल। बहुत मोसकिलसँ ओकरा गाड़ीसँ बाहर कएल गेल। तकर बादो ओ स्कूटीपर जा कए बैसि गेल। हमसभ चीरो भाइक गाड़ीपर बैसि गेल रही। कतबो कहलिअनि जे हमसभ ओला कए चलि जाएब। मुदा ओ नहि मानलाह। हमरासभकेँ अपने गाड़ीसँ बिदा कइए कए मानलथि। बिदा होअएसँ पहिने समस्त परिवारक संग फोटो घिचल गेल। हमरासभकेँ विदाइ सेहो देल गेल। तकर बादे हमसभ ओहिठामसँ हुनके गाड़ीसँ अपन डेरा दिस आगू बढ़लहुँ। चीरो भाइ  हुनकर परिवारक सदस्यलोकनिक संग बिताओल गेल समय हमर सभक गुवाहाटी यात्राक अविस्मरणीय क्षण छल। एहन अपनत्व,स्वागत हेतु एतेक आतुरता आ  व्यवहारक ओ माधुर्य आजुक समयमे बहुत दुर्लभ अछि। हमसभ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक हुनका ओहिठाम रहलहुँ।  ओहिठामसँ वापस अएलाक बादो कतेक काल धरि हुनके लोकनिक चर्चा करैत रहलहुँ। असलमे चीरो भाइ एकटा सफल संघर्षक नायक छथि। जीवनमे सभ तरहक उठा-पटक देखि-भोगि एकटा सुंदर आ प्रशंसनीय ठेकानपर पहुँचि गेल छथि,प्रशंसनीय उपलव्धि प्राप्त केने छथि। से तँ जे छनि से छनि,ओ हृदयक बहुत उदार आ भावुक व्यक्ति छथि। ईश्वर हुनका लोकनिकेँ एहिना सतत सुखी आ संपन्न राखथि सएह मनोकामना। श्री आशीष अनचिन्हार ओहि समयमे हम भुवनेश्वरी मंदिरमे दर्शन कए निकलि रहल छलहुँ। करीब साढ़े चारि बाजि रहल छलहुँ। हमर फेसबुकपर पोस्ट कएल गेल कामाख्या भगवती मंदिर लगक फोटो देखि श्री आशीष अनचिन्हारजी फोन केलथि- “फेसबुकपर देखलहुँ जे अपनेसभ कामाख्यामे छी।” “आइए गुवाहाटी पहुँचलहुँ। कामाख्या भगवतीक दर्शनक बाद भुवनेश्वरी मंदिरमे दर्शन कए बाहर निकलि रहल छी।” “बहुत प्रसन्नताक बात। कतए रुकल छी।” “गुवाहाटी स्थित सीपीडब्लुडी अतिथिगृहमे।” गप्प-सप्प भइए रहल छल कि फोन कटि-कटि जाइ। पहाड़ी सभक कारण नेटवर्क वाधित भए जाइत छल। “बेर-बेर फोन कटि रहल अछि। डेरा पहुँचैत छी। फेर गप्प करब।” गप्पेक क्रममे ओ कहलनि जे भुवनेश्वरी मंदिर दरभंगा महराजक बनाओल छनि। साँझमे डेरा पहुँचलाक बाद हम अपन पता हुनका ह्वात्सएपपर पठा देलिअनि। ओ तुरंत लिखैत छथि- “हम अस्सी किलोमीटर फटकी रंगियामे रहैत छी। तथापि अपनेसँ भेंट करबाक हेतु उत्सुक छी। की पता फेर एहन अवसर कहिआ भेटत ?” “हमरो अपनेसँ भेंट करबाक बहुत इच्छा अछि। हम चौदह तारिख भेंट-घाँटेक हेतु खाली रखने छी।ओहिसँ पूर्व चेरापुंजी,शिलांग जेबाक अछि।” “अच्छा अहाँ ओमहरसँ वापस होउ। प्रयास करब जे हमसभ बीचमे कतहु भेंट करी। ” तकर बाद फोन कटि गेल। हम चेरापुंजीसँ लौटलाक बाद तेरह अप्रैल कए अनचिन्हारजीसँ भेंट करबाक हेतु हम मोने-मोन कार्यक्रम बनबिते रही कि हुनकर फोन आएल- “हमरासभक भेंट नहि भए सकत। कार्यालयमे किछु जरूरी काज आबि गेलैक अछि। ताहिमे रविओ दिन व्यस्त रहब।” की कहितिअनि? तकर बाद बड़ी काल धरि मैथिलीसँ जुड़ल विषयसभपर हमसभ चर्च करैत रहलहुँ। विदेह पत्रिकामे हुनकर अनेक सालसँ कएल जा रहल योगदानक चर्च तँ भेबे कएल। निश्चित रूपसँ अनचिन्हारजी कतेको सालसँ विदेह पत्रिकाक माध्यमसँ आदरणीय श्री गजेन्द्र ठाकुरजी आ हुनकर अन्य सहयोगी लोकनिक संग बहुत महत्वपूर्ण काज कए रहल छथि। मैथिली गजलक क्षेत्रमे हुनकर योगदानक चर्च होइते रहैत अछि। एमहर आदरणीय गजेन्द्रजी आ हुनकर श्रीमतीजीसँ जुड़ल साहित्यिक विषयपर ,प्रीति कारण सेतु बान्हल, नामसँ पुस्तक संपादित केलनि अछि। एहन सृजनशील आ मैथिलीप्रेमीसँ भेंट कए बहुत नीक लगैत। मुदा कोनो बात नहि। ओ स्वस्थ रहथु,एहिना सक्रिय आ सृजनशील बनल रहथु। आइ ने काल्हि भेंट हेबे करतैक। ओहुना विदेहक माध्यमसँ तँ हमसभ निरंतर संपर्कमे रहिते छी। मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति, गुवाहाटी ‍१० मार्च २०२४ कए हमसभ गुवाहाटी स्थित अपन डेरापर वापस जाइत रही कि आदरणीय श्री कामेस्वर चौधरीजीक फोन आएल। गप्प-सप्पक क्रममे हम कहलिअनि जे गुवाहाटीमे छी। ओ तुरंत कहैत छथि- “प्रेमकान्त चौधरीजीसँ संपर्क केलिअनि कि नहि?” हुनकर नाम हमरो सुनल रहए। गुवाहाटीमे मैथिलीक पुरान खाम्ह छथि ओ। मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति, गुवाहाटीक स्थापक अध्यक्ष रहथि आ एक्कैस वर्ष धरि ओहि पदपर रहलथि। अखनहु पूर्वोत्तर मैथिल पत्रिकाक संपादक छथि। फोनपर सेहो एकाध बेर हुनकासँ गप्प भेल अछि। तेँ हुनकासँ भेंट तँ करबाक छलहे। मुदा सोचने रही जे पहिने चेरापुंजीसँ घुमि आबी। तकर बाद ई सभ कएल जेतैक। ताहि हेतु ‍१३,‍१४ अप्रैलक समय हम रखनो रही। फेर भेल जे अपन कार्यक्रमक जनतब पहिनेसँ दए देबनि तँ बढ़िआँ रहत। हम ह्वात्सअपपर अपन कार्यक्रमक जनतब हुनका देलिअनि। ओ तुरंत उत्तरो देलनि। तेरह अप्रैलक भोरे सबाआठ बजेक आसपास आदरणीय श्री प्रेमकान्त चौधरीजीक फोन आएल- “अपनेक कोना की कार्यक्रम अछि?” “अखन तँ हम अपन ग्रामीणक ओहिठाम जाएब। ओहिठामसँ लौटलाक बाद   खाली रहब। काल्हि सेहो भरिदिन खालीए छी।” “अपनेक ग्रामीणक की नाम छनि?” “रत्नेश्वर मिश्र” “ओ हमरा जनैत छथि कि नहि?” “जनिते हेताह।”आ से बात सही निकलल। प्रेमकान्त चऔधरीजीकेँ ओ नीकसँ जनैत छथिन। ओएह नहि,अपितु गुवाहाटीमे रहनाहर साइते केओ मैथिल हेताह जे हुनकर नाम नहि सुनने होअए। तकर कारण हुनकर मैथिली-मिथिलासँ प्रेम थिक । हुनकर स्वभावसे बहुत मिलनसार अछि। ई सभ बात हमरा तखन बेसी नीक जकाँ बुझाएल जखन ‍१४ अप्रैलक दुपहर बारह बजेक आसपास हमरासँ भेंट करए ओ हमर सीपीडब्लुडी अतिथिगृह अएलाह। बेस नमगर-पोरगर धुआ ,गोर वर्ण  आ आकर्षक छवि। देखितहि लागल जेना कतेक दिनसँ परिचित होथि। हमसभ सोझे अपन कोठरी संख्या तीनमे चलि जाइत छी। प्रेमकान्तजी अपन विजिटिंग कार्ड देलनि। ओहिमे वर्णित हुनकर योग्यता ,अनुभव देखि चकित रही। सम्मान  आ पुरस्कारक  तँ जेना हुनकापर वर्षा भेल छनि। अतिथिगृहमे चाहक हेतु पहिनेसँ कहने रहिऐक।  ओ सभ चाह अनबो केलक ,मुदा मीठ आ दुध बला चाह प्रेमकान्तजी  पिबैत नहि छथि। ओकरा हुनका हेतु   बिना दूधक चाह अनबाक हेतु कहलिऐक। प्रेमकान्तजी  ओकरा स्वयं असमिआमे नीकसँ बुझा देलखिन जे केहन चाह बनेबाक छैक। से सभ सुनि कए जे ओ गेल से गेल। आधा घंटासँ बेसीए समय बीति गेल। हमरा बहुत संकोच भए रहल छल। मुदा कएले की जाइत? ताबेमे ओकरा चाह अनैत देखलिऐक। प्रेमकान्तजी  चौल करैत कहलखिन- “पत्ती आनए चाह बगान चलि गेल छलह की?” ओ लजा गेल,किछु उत्तर नहि दए सकलनि, चाह राखि कए चलि जाइत रहल। एहि बीच हमसभ अनेक विषयपर गप्प-सप्प करैत रहलहुँ। प्रेमकान्तजीक चाह सठि गेल छलनि। हमसभ तँ  चाह पहिने पिबि लेने रही। आब भोजनक समय भए रहल छलैक। अतिथिगृहक भोजनालयसँ भोजन करबाक आग्रह कएल जा चुकल छल। हम प्रेमकान्तजी केँ सेहो भोजन करबाक निवेदन केलिअनि। बहुत मोसकिलसँ ओ ताहि हेतु तैयार भेलाह। हमसभ संगे-संगे भोजन केलहुँ। आब करीब दू बाजि रहल छल। प्रेमकान्तजीकेँ कार्यालय जेबाक छलनि। हमसभ हुनकासँ गप्प-सप्पमे ततेक आनन्दित रही जे फराक हेबाक मोन नहि होअए। मुदा हुनका तँ जेबाक छलनिहे। आखिर हुनका बिदा केलिअनि। जाइत-जाइत ओ कहैत गेलाह जे साँझमे हुनकर कार्यालयमे मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति, गुवाहाटीक बैसार हेतैक। ओहिमे अपने दुनूगोटेकेँ अएबाक अछि। हमसभ बहुत आतुरतासँ साँझक प्रतीक्षा कए रहल छलहुँ। अपन माटिसँ एतेक फटकी रहिओ कए गुवाहाटीमे प्रेमकान्तजी आ  हुनकर मैथिल मित्रलोकनि मैथिली-मिथिलाक झंडा फहरओने छथि से बहुत महत्वपूर्ण बात थिक। साँझमे छओ बजे हमसभ जीएस रोडपर एबीसी पुलिस प्वाइंट लग प्रेमकान्तजीक कार्यालय पहुँचलहुँ। प्रेमकान्तजी  पहिनेसँ ओतए छलाहे। मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति, गुवाहाटीक वर्तमान अध्यक्ष आदरणीय श्री सत्य नारायण साहुजी सेहो उपस्थित रहथि। सत्य नारायणजी बहुत योग्य व्यक्ति छथि। ओ पंजाब नेशनल बैकमे महाप्रबंधक( जीएम) क पदसँ सेवानिवृत्त भेल छथि। अपन सेवाकालमे ओ कतेको महत्वपूर्ण पदसभपर रहल छथि। आसाम ग्रामीण विकास बैकक अध्यक्ष सेहो रहल छथि। एहन सुयोग्य व्यक्तिसँ भेंट होएब निश्चित रूपसँ बहुत भाग्यक बात छल। ओहिठाम आठ-दसगोटे मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति, गुवाहाटीक वर्तमान आ भूतपूर्व अधिकारी लोकनि कार्यक्रममे भाग लेबाक हेतु आएल रहथि । हुनकासभसँ सेहो परिचय भेल। असलमे ‍१४ अप्रैलक चौबीस सालपूर्व मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति, गुवाहाटीक स्थापना भेल छल। आइए ओकर स्थापना दिवस छल। एतेक दिनसँ बहुत रास परेसानीक अछैत ई संस्था निर्वाद रूपसँ चलि रहल अछि से गौरवक बात थिक। संस्थाक गतिविधिपर आदरणीय प्रेमकान्तजी आ   आदरणीय सत्यनारायणजी अपन-अपन बात रखलनि। आनो गोटे सेहो अपन विचार देलनि। ओही बीचमे ओ सभ हमरा दुनू बेकतीक पाग आ दोपट्टा पहिरा कए हार्दिक स्वागत केलनि। स्मृति चेन्ह सेहो देलनि। कार्यक्रममे हमहूँ अपन साहित्यिक यात्राक बारेमे बजलहुँ। चाह-पान भेलैक। फोटो घिचल गेलैक। तकर बाद सभगोटे बेरा-बेरी ओहिठामसँ बिदा भेलहुँ। प्रेमकान्तजी हमरा अतिथिगृह धरि छोड़ि देलनि। जाइत-जाइत कहलथि- “हम भोरे फेर आएब। अपनेक हेतु किछु उपहार रखने छी। आबए काल बिसरा गेल।” हम बहुत मना केलिअनि । मुदा भोरे साते बजे ओ फोन केलथि- “हम दस मिनटमे आबि रहल छी। कनी रूकि जाएब।” हमसभ हबाइ अड्डा जेबाक हेतु तैयार रही। मुदा हुनकर आग्रह टारब संभव नहि बुझाएल। कनीके कालक बाद ओ हाथमे एकटा झोरा लेने आबि गेलथि। हुनकर स्नेहपूर्ण उपहारकेँ सम्हारि कए रखलहुँ।कनी काल हमसभ गप्पो केलहुँ।आब समय समाप्त भए रहल छल। हुनकासँ बिदा लेब अनिवार्य भए गेल छल। अस्तु,हमसभ टैक्सीपर बैसि गेलहुँ। प्रेमकान्तजी हमरासभकेँ प्रणाम केलनि। कहि नहि सकैत छी कतेक आत्मीय आ भावपूर्ण छल हुनकर व्यवहार। किछु तँ विशेषता हुनकामे छनिहे जे एतेक लोकप्रिय छथि,सेहो एतेक दिनसँ। अंत-अंत धरि ओ हमरासभक लगीचमे रहलथि। टैक्सीपर बहुत दूर धरि बढ़ि गेल रही। मुदा प्रेमकान्तजीक प्रेमपूर्ण व्यवहारसँ अभिभूत रही,आनन्दित रही। मोनमे एकटा संतुष्टि भाओ छल जे हमरसभक ई यात्रा माता कामाख्याक असीम अनुकंपासँ बहुत सफल आ आनन्ददायक रहल। २३।०४।२०२४ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.८.निर्मला कर्ण- अग्निशिखा खेप -३९ निर्मला कर्ण (१९६०- ), शिक्षा - एम. ए., नैहर- खराजपुर, दरभङ्गा, सासुर- गोढ़ियारी (बलहा), वर्त्तमान निवास- राँची, झारखण्ड। झारखंड सरकार महिला एवं बाल विकास सामाजिक सुरक्षा विभागमे बाल विकास परियोजना पदाधिकारी पदसँ सेवानिवृत्ति उपरान्त स्वतंत्र लेखन। (अग्नि शिखा मूल हिन्दी- स्वर्गीय जितेन्द्र कुमार कर्ण, मैथिली अनुवाद- निर्मला कर्ण)

अग्निशिखा खेप -३९

पूर्वकथा

राजा पुरूरवा राजभवन सँ पलायन कs गेल छथि आ जंगल-जंगल भटकि रहल छथि ओ । उर्वशी सँs भेंट करबाक प्रतीक्षा मे छथि, जिनका सँs पूर्णिमा के दिन एक साल बाद कुरुक्षेत्र मे भेंट करबाक वचन भेटल छनि।                 आब आगू

समयक पक्षी अपन पाँखि फड़फड़ाबैत उड़ैत रहल राजाक उन्मत्तता में कनेको सुधार नहि भेलैन्ह, अपितु हुनक प्रमत्तता धीरे-धीरे बढ़िते चलि गेलन्हि। एम्हर ओ कतेको बेर आत्मघात करबाक अनेकानेक प्रयास केलथि। एक बेर ओ एकटा पहाड़क ऊँच शिखर पर चढ़ि गेलथि आ ओहि ऊपर सs ओ छलांग लगा देलथि मुदा आश्चर्य ओ एकटा खूब विशाल नदी में खसि पड़लथि। ओ नदी संभवतः गिरि के चरण प्रक्षालन करैत बहि रहल छल। पानि में खसवाक कारण हुनका पर कोनो प्रतिकूल प्रभाव नहि पड़लन्हि, ओ नदीक बहाव में बहैत रहलथि। नदीक बहाव संग बहैत ओ अचेत भs गेल रहथि। जखन हुनक चेतना वापस अयलन्हि अपनाकेँ नदीक तट पर पाबि ओ बहुत दुखित भय गेलथि। हृदय में मृत्यु केँ चुनबाक विचार पुनः जागृत भेलैन्हि। आब ओ नदीक गहराई में चलि गेलाह आ अपन हाथ-पैर निष्क्रिय छोड़ि देलथि,मुदा विधना के बुझलक ! नदीक तीव्र प्रवाह सँ बहि गेलाह आ पुनः कछार पर पहुँचि गेलाह | एक-दू नहि अनेको बेर ओ मृत्यु के वरण करवाक एहन प्रयास केलथि,मुदा मृत्यु हुनका लग नहि आबि सकल। उर्वशी के विरह में ओ जीबय नहि चाहैत छलाह, मुदा विधना हुनका विरहक ज्वाला में विदग्ध कs जीवित राखs चाहैत छल। ताहि कारण ओ जीवित छलथि, उर्वशी के वियोग में विदग्ध ओ जीबि रहल छलथि, उर्वशीक प्रेमक स्मरण करैत हुनक विरहाग्नि में जड़इत ओ अपन जीवन व्यतीत कs रहल छलथि - विक्षिप्त सन! समय ओहिना व्यतीत होइत रहल आ अगिला सालक ओ पूर्णिमा राति सेहो आबि गेल जखन हुनका कुरुक्षेत्र में उर्वशी सँs भेंट करबाक छलनि। ई वैह पूर्णिमा के राति छल ! गगन मंडल सँs ज्योत्स्ना केर पीयूष पृथ्वीक आँचर केँ अनवरत सिंचित कs रहल छला। नर्मदा-सरस्वतीक ओ संगम स्थल विशाल सलिल के रूप धयने छल। दृष्टि सीमा पर्यंत नीर के अतुल भंडार! चाँद सs प्रस्फुटित भेल चाँदनी नदीक जल पर प्रतिबिंबित भय रजत के विशाल भंडारक भ्रांति प्रस्तुत कs रहल छल। वातावरण नीरव छलैक, नदी के जल सौं शीतल भेल हवा सेहो मंद गति सँ चलैत रहि-रहि कs ओतहि कछार पर बैसल पुरूरवाक देह केँ छूबि जाइत छलैक आ हुनक सम्पूर्ण शरीर सिहरन सँs भरि जाइत छलैन्हि। मुदा हुनका एहि पर कनेको ध्यान नहि छलन्हि। ओ एहि वातावरण! आ वातावरण के संग स्वयं अपना के विस्मृत कs चुकल छलाह। ओ अपना केँ चिन्हबा मे सेहो सक्षम नहि छलाह।जिनकर अतीत उज्ज्वल छलनि, हुनकर वर्तमान पूर्णतः अन्हार में डूबल छलनि। ओ मात्र अपन भविष्यक प्रति आश्वस्त छलाह। अहिना निर्जन वन में भटकैत कोनो सुकाल में कुनो निर्जन अंधकार भरल मार्ग अथवा कुनो अन्य स्थान वा नदी तट पर विरह में जरि -जरि कs भस्मीभूत भेनाई छनि हुनक लेख में! यैह तs छनि हुनक भविष्य! अतीत एक पराक्रमी सम्राट के रूप में इतिहास में स्वर्णाक्षर में अंकित भय चुकल छनि! वर्तमान उर्वशी के संग अटूट प्रेम-कथा कहि रहल छैक - जे जन-मानस के प्रत्येक वर्ग के जीह पर अंकित छैक! मुदा भविष्य! संभवत: ओ हुनक अंधकारमय जीवन के कुनो निर्जन सियाह गुफा में धकेलवा हेतु लिए आतुर छैक ! पुरूरवा संगमक कात मे बैसल यैह सब बात के सोचि उर्वशी के कल्पना में निमग्ण छलाह। मुदा अचक्के हुनक विचार श्रृंखला भूकंप में टूटैत मीनार सदृश ध्वस्त भs गेलन्हि। हठात् हुनक दृष्टि नदी में बहैत एक मानव आकृति पर केंद्रित भs गेल छलन्हि। अपन हृदय में अचक्के उपजि आयल कुनो अदृश्य विचार के वशीभूत भय ओ नदी में कूदि गेलथि। जकर भविष्य अंधकारमय होय भला ओकरा की अपन मृत्युक भय होइत छैक । पुरूरवा तs मात्र एकटा शरीर छलथि ! एहन शरीर जे आत्माहीन अछि ! शव मात्र! हँ! हुनकर मात्र शरीर छलधरातल पर! जे आत्मा ओहि शरीर के सुचारू रूप सँs देखैत छल आ ओकरा अपन प्रेम सँs, मेधा सँs थपकि-थपकि गतिमान कएने छल! ओ तs उर्वशीक संग गमन केलक स्वर्ग के दिशा में ! उर्वशी के विचार में निमग्न ओ फुसफुसाहट भरल स्वर में मुख सौं किछु अस्पष्ट सन ध्वनि निकालैत अपन हाथों में एक निश्चल मानव शरीर उठौने तट पर आबि गेलथि l ध्यान सs आब ओकरा ओ देखलथि ! "अरे! ई त एकटा कुनो सुंदर युवती छथि ......" चकित भय पुरूरवा ध्यान सs ओकर मुख देखs लगलथि। ओ एकटा सुन्दर युवती छलीह, किछु परिचित सन बुझेलनि, मुदा ई स्पष्ट नहि भेलनि जे ई के छथि। हुनका अपन जीवन मे मात्र दू टा स्त्रीक निकटता भेटल छलनि - एकटा उर्वशी जिनका लेल हुनकर हृदय में एखनहु अपार प्रेम छनि, आ दोसर जे छल के माध्यम सौं पुरूरवाक प्रेम प्राप्त करवा के प्रयास कएने रहथि -दानव राज केशि के पुत्री! संभवतः हुनकर नाम चित्रसेना छलनि! हँs ....वैह... वैह... वैह....त... छथि ... ई.... युवती ... मुदा ओ जीवित छथि कि नहि? जिज्ञासावश अपन हाथ सँs हुनकर नारीक स्पर्श केलथि। स्पर्श सs नाड़ीक स्पंदन के अनुभूति भेलनि,अरे! ई एखनहुँ जीवित छथि ! आब ओ किछु आश्वस्त भेलथि। मुदा तखन एकटा दोसर सोच हुनका धs लेलकनि! एहि सुंदरीक प्राणरक्षा करवाक प्रयास ओ करथि अथवा नहि! किंवा हम हिनकर प्राणरक्षा करी!मुदा जँ ओ फेर सँs प्रेमालाप प्रारम्भ करय लागथि तखन की होयत! नहि-नहि! ई संभव नहि अछि! जे वस्तु आब हमरा लग बचल नहि अछि, ओ कतबहु प्रयास करवा सs की हम हुनका दs सकैत छियन्हि! भला कोना सम्भव होयत ई! नहि! हम नहि बचाएब! हिनकर मरब नीक! मुदा जँs ककरो जीवन देब संभव अछि, तखन एकटा मनुक्खक रूपमे हमरा सभकेँ प्रयास अवश्य करबाक चाही- जीवन बचेवाक ! हिनकर जीवन हिनका सs दूर जा रहल छन्हि,ओकरा लग अनबाक प्रयास करबाक चाही! हँs हिनकर चेतना आपस अनबाक प्रयास करबाक चाही! ई सोचि पुरूरवा ओहि युवतीक फूलल पेट केँ जोर सँs दबा देलथि । पेट पर जोर परितहि नाक-मुंह स s पानिक अजश्र श्रोत फूटि गेल। क्रमशः अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.पद्य ३.१.मुन्ना जी- किछु हाइकू ३.२.राज किशोर मिश्र-नदीक धार ३.३.आचार्य रामानंद मंडल-अवीर सीता/ भावार्थ/ केवल मानव ३.४.डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफरी- जखन पिता छलाह ३.१.मुन्ना जी- किछु हाइकू मुन्ना जी किछु हाइकू १ बनू रक्षक बचाउ ने मैथिली नाओं रहत

२ काज करू ने उपहास केनिहार भागि जायत

३ सक्रिय रहू सबहक सुनू ने अपन करू

४ विश्वक बात मैथिली मे लिखू सिनेही बनू

५ जन हित मे हुअए सब काज प्रसन्नहोउ

(अन्तर राष्ट्रीय हाइकु दिवस पर प्रस्तुत।) अपन मंतव्य editorial.ऽtaff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.राज किशोर मिश्र-नदीक धार राज किशोर मिश्र नदीक धार ऊपर सँ जखन खसबा क रहैक, तँ कतेक उत्सा ह छलैक नदी मे ? लगैइए नहि जे गति क लेल कि ओ एतेक उता हुल भेल छल सदी मे।

पा थर सँ लड़ैत, मा टि केँ फो ड़ैत, नी चाँ पड़ा एल बढ़ैति गेलि , दुनु का त सा क्षी गा छ-पा त, गर्तक अनुरा ग मे आन्हर भेलि ।

जौ बनक जो श, सर्पि नी चा लि , लेने आँखि मे चि त्र समुद्रक, चि त्त चेहा एल, मो न औना एल, सुनैत बा त नहि को नो मि त्रक।

नी र नहि , उन्मा दक रस ओ, जे पि बि -पि बि छलि मद-मा तल, नैहर छो ड़ि प्री तम घर जा एति , मो न पि री ति बड़ जाँ तल।

का नन-पथ पर नेहक गी त, थम्हि -थम्हि गा बि रहल बसा त, सुर-मे-सुर अछि मि ला रहल, बा टे-बा टे गा छक पा त।

अँटकल नहि , नहि भटकल कत्तहु, लहा लो ट अछि भेलि तरङ्गि णी , पा नि क तृष्णा भेलैक नहि ति रपि त, भेटलैक आगाँ कतेको संगि नी ।

नहूँ-नहूँ थि र हो इत गेलि , पहुँचलि जखन धरा तल पर, यथा र्थ-रूप देखल जखन ,तँ उत्तरदा यि त्व आएल नद पर।

हि मक्षेत्र सँ आएलि बस्ती दि स, उदेम-फेक्टरी , गा म-नगर, गरी बी , बेमा री , पि आस ,पी ड़ा , जि नगी क असल समस्या अहगर।

चि ड़ैअक लो ल केँ ठंढा जलक भेटलैक सुकून, घड़ि आरक मुह मे फँसल हरि णक टा ङक खून।

नदी क मस्ति ष्क मे गेलै ई बा त, पा ओल पशु-गोँ त , कचरा -करकट , मृतकक मा टि क अस्थि -कुंभ, जजा ति लेल आ' पि आसल मर्कट।

ती र्थक शंखना द,फेक्टरी क सा यरन, आ' सुखल गरी बक खेत, पा नि ओकर मुदा चा ही सभ केँ , उपयो गक अपन-अपन छै नेत।

ओ अपन मो क्षक तैआरी मे, कि एक त' समुद्र छलै आब थो ड़बे दूर, उमंग,दा यि त्व ,नि र्वा ण-पद, ओकर जि नगी क अरुदा ओत्तहि पूर। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.आचार्य रामानंद मंडल-अवीर सीता/ भावार्थ/ केवल मानव आचार्य रामानंद मंडल अवीर सीता/ भावार्थ/ केवल मानव

१. अवीर सीता

हम भूमिजा सीता। बनलहुं जानकी सीता। जनकनंदिनी सीता। राम दुलारी सीता। मैथिली सीता। सीता गुमनाम सीता। हम रही वीर सीता। वाये हाथ उठैली धनु सीता। रचल स्वयंबर लेल सीता। भेलहुं राम संग सीता। वीर राम संग वीर सीता। सीताराम से राम जानकी सीता। लक्ष्मण करै रखवारि वीर सीता। केना रावण लड़े अवीर सीता। सतीत्व परीक्षा दे अवीर सीता। निर्वासित भेल अवीर सीता। वीर सीता बनल अवीर सीता। आइओ दागल जाइ अ सीता। रामा आइओ बनय अवीर सीता।

२. भावार्थ

हम शास्त्रार्थ नै भावार्थ बुझै छी। हम सीता मइया नै बहिना बुझै छी। हम शास्त्रार्थ नै भावार्थ बुझै छी। हम मिथिला राज नै माइट बुझै छी। हम शास्त्रार्थ नै भावार्थ बुझै छी। हम बज्जिका अंगिका नै स्थान खोजै छी। हम शास्त्रार्थ नै भावार्थ बुझै छी। हम बाभन शोल्हकन नै सम्मान खोजै छी। हम शास्त्रार्थ नै भावार्थ बुझै छी। हम शब्दार्थ नै रामा भावार्थ कहै छी। हम शास्त्रार्थ नै भावार्थ बुझै छी।

३. केवल मानव

मानैय छी ईश्वर विभिन्न प्राणी बनैलै हैय।

सुग्गा मैना कौआ विभिन्न रुप बनैलै हैय।

गाय भैंस बकरी विभिन्न रुप बनैलै हैय।

मानव जानवर चिड़िया विभिन्न रुप बनैलै हैय।

जलचर थलचर नभचर विभिन्न रुप बनैलै हैय।

सुग्गा मैना कौआ देखते पहिचाने हैय।

गाय भैंस बकरी देखते पहिचाने हैय

मानव जानवर चिड़िया देखते पहिचाने हैय।

जलचर थलचर नभचर देखते पहिचाने हैय।

बाभन क्षत्रिय सोलकन देखतेनै पहिचाने हैय।

बाभन क्षत्रिय सोलकन देखते मानव लागैय हैय।

जानैय छी ईश्वर रामा केवल मानव बनैलै हैय।

रचनाकार-आचार्य रामानंद मंडल , सीतामढ़ी। मो-9973641075. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.४.डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफरी- जखन पिता छलाह डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफरी जखन पिता छलाह

जखन पिता दुनियाँ मे छलाह तेँ हमरा अपन पिताजी मोन नहि पड़ल कहियो समय नहि भेटल जाहिसँ हम हुनकर पलंगक कातमे बैसि सकब हुनकर दुख आ सुख जानि सकैत.... पिता आइ नहि छथि तें भाव उमड़ि रहल अछि आँखि मे नोर नहि रोकि सकैत छी फेसबुक पर बहुत रास कविता पोस्ट कयल गेल अछि एतेक पाइ अंतिम संस्कारक भोज मे खर्च भेल कि ओकर छटाॅंक तक पिता के जान बचवाक लेल नहि भेल छल... सच बाजौं जखन मनुख सामने रहैत छथि तखन ओकर प्रेम मरि जाइत छैक जेना मरि जाइत छथि मजबूत हृदय स शोक आ संवेदना... -डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफरी, ग्राम पोस्ट माफी, वाया -अस्थावां, जिला नालंदा बिहार 803107, मोबाइल नं 9934847941 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। 100 || विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in विदेह ३९३ म अंक ०१ मई २०२४ (वर्ष १७ मास १९७ अंक ३९३)|| 101

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हज विशेषांक २०२४ नरेन्द्र झा एवं प्रा. रामावतार यादव पर विदेह www.videha.co.in विशेषांक २०२४ नरेन्द्र झा एवं प्रा. रामावतार यादव चयनित भेला २०२४ क विदेह विशेषांक लेल। जि भर नरेन्द्र झा पर विदेहक विशेषांक १ जून २०२४ आ प्रा. रामावतार यादव पर १५ जून २०२४ अंकमे धो लि SD प्रकाशित CCA) eee: | | लेखक-पाठक clad आग्रह जे नरेन्द्र झा एवं प्रा. रामावतार यादव जीक काजपर आलोचना, . | = 'समालोचना, समीक्षा आदि वर्ड फाइलमे editorial.staff.videha@gmail.com पर | — in 0p Se i eam पाबधि। लि कि & नरेन्द्र झाजीक अधिकांश पौथी २००८ सें विदेह www.videha.co.in पर उपलब्ध ofS! Wy face fastuign Roly % cf जद = = == = SG WWW. HES हैंए। Pe — Yn, facie ICTR 3928 re ae facre factais २०२8 .... प्र } AERA सा अन्न था. वामाब्रछाव AAA शव FACE www. videha.co.in FACT २०२8. AA YA सा IH शा. वामाब्रजाव AAA BUS एछता २०२8 क fA FACT CAL ATT सा शव FACES FACTS ५ OT २०२४ शा था. वामाब्रछाव TIAA शव 90 जून २०२४ कर्म geht =. 7 east a a एलथक-नाठक एलाकनिें AS OH THT सा IH था. वामाब्रठाव ATA जीक BIA AAT, HATA, i” RE» ater शनि aS काजतएय editorial. staff.videha@gmail.com शव शठाब्िणि। x AES साजीक अविकीने co २००० मैं बिएनठ www.videha.co.in शव Gorn अडि।

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