ISBN 978-93-340-6969-3 (Book) ISSN 2229-547X (online) 𑒀 विदेह ३९४ म अंक १५ मई २०२४ (वर्ष १७ मास १९७ अंक ३९४) [विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। कॉपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- २०२४. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२४. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. 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People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover designed by AUM GAJENDRA THAKUR Videha e-Journal: Issue No. 394 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृ. २-१२) १.२.अंक ३९२ पर टिप्पणी (पृ. १३-१३) २.गद्य २.१.मानेश्वर मनुज- लेख-मैथिली कथा मे विभूति आनन्द (पृ. १५-२४) २.२.परमानन्द लाल कर्ण-सावन मासक एकादशीक माहात्म्य (पृ. २५-२९) २.३.प्रणव झा- एआईआईएसएच मैसूरक यात्रा (A tour to AIISH Mysore) (पृ. ३०-४०) २.४.लाल देब कामत-नरेन्द्र झा जीक स्मरण (पृ. ४१-६८) २.५.रबीन्द्र नारायण मिश्र-सीमाक ओहि पार (धारावाहिक उपन्यास) (पृ. ६९-१३) २.६.सुमन मिश्र- प्रेम (पृ. ४५-७७) २.७.प्रमोद झा 'गोकुल'-मजदूरक व्यथा (बीहैन कथा) (पृ. ७८-७९) २.८.निर्मला कर्ण- अग्निशिखा खेप -४० (पृ. ८०-८४) ३.पद्य ३.१.प्रमोद झा 'गोकुल'-सत्त की फूसि (पृ. ८६-८७) ३.२.राज किशोर मिश्र-कौआ (पृ. ८८-९१) ३.३.आचार्य रामानंद मंडल-रुपवती/ अंगिका बज्जिका/ भासा के न बांटियो (पृ. ९२-९९) ३.४.कल्पना झा-अनुचित (पृ. १००-१०१) ३.५.अखिलेश ठाकुर- भारत हम्मर देश (पृ. १०२-१०३)
१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय गंगेश उपाध्यायक तत्त्वचिन्तामणि गंगेश उपाध्यायक तत्त्वचिन्तामणि चारि खण्डमे विभाजित अछि- १. प्रत्यक्ष (सोझाँ-सोझी), (२) अनुमान, (३) उपमान (तुलना केनाइ) आ (४) शब्द (मौखिक गवाही)। वैध ज्ञान प्राप्त करबाक ई चारिटा साधन ऐ चारि खण्डमे अछि। खण्ड एक प्रत्यक्ष
गङ्गेशक आह्वान: त्रिमूर्ति शिवक आह्वानसँ ई खण्ड शुरू होइत अछि।आ तेँ आह्वानक विषयपर चर्चा शुरू होइत अछि। ई मानल जाइत अछि जे कोनो परियोजनाक प्रारम्भमे भगवानक आह्वानसँ ई कार्य पूर्ण होइत अछि।
आपत्तिः जे कोनो आह्वान कोनो काज पूरा करबाक कारण अछि, से सकारात्मक बा नकारात्मक संगतिक माध्यम सँ स्थापित नै कएल जा सकैत अछि, किएक तँ एहनो भेल अछि जे कोनो आह्वानक बिना सेहो कोनो काज पूरा कएल गेल। आपत्तिक उत्तर: एकर कारण ई अछि जे ई आह्वान पूर्व जन्ममे कयल गेल छल/ हएत।
आपत्तिः नै, ई तँ घुमघुमौआ तर्क अछि, आ ओनाहितो कोनो काज पूरा केना होइत अछि तकर अनुभवजन्य कारण सभ आह्वानकेँ अनावश्यक सिद्ध करैत अछि। आपत्तिक उत्तर: ई प्रमाण जे आह्वान कार्य पूर्ण हेबाक कारण छै, तइमे दू चरणक अनुमान शामिल अछि। पहिल, ई जे ई शिष्ट लोक द्वारा निन्दित नै अछि वरन हुनका सभ द्वारा सेहो आह्वानसँ कार्य प्रारम्भ कएल जाइत अछि। तखन ई अनुमान लगाओल जा सकैत अछि जे काज पूरा भेनाइ फल अछि किएक तँ ई नियमित रूप सँ इच्छित अछि, आ आन कोनो फल उपलब्ध नै अछि।
आपत्ति: ई तर्क काज नै करत कारण ई पहिनेसँ ज्ञात अछि जे आह्वानक अछैतो काज पूर्ण भऽ सकैत अछि, कारण-सम्बन्ध कोनो तर्कसँ स्थापित नै कएल जा सकैत अछि। आपत्तिक उत्तर: हम सभ ऐ तर्क (जे आह्वान कार्य पूर्ण करबैत अछि) क समर्थन लेल वैदिक आदेशक आह्वान करैत छी। मुदा कोनो एहन वैदिक कथन नै भेटैत अछि। से अनुमान कएल जा सकैत अछि जे ऐ तरहक आह्वान सुसंस्कृत लोक सभ द्वारा शुरू कएल गेल आ कएल जाइत अछि। प्रार्थना देह (जेना प्रणाम), वाणी (गायन) आ मस्तिष्क (ध्यान) सँ होइत अछि। मुदा कोनो ईश्वरमे विश्वास केनिहार सेहो कार्य सम्पन्न कऽ लैत अछि, तँ की ओ पूर्व जन्ममे आह्वान/ प्रार्थना केने हएत? आ आह्वानक बादो कखनो काल कार्य सम्पन्न नै होइत अछि, से की ढेर रास बाधा ओइ साधारण आह्वानसँ दूर नै भेल हएत? ऐ तरहक तर्कसँ प्रारम्भ भेल छल ई ग्रन्थ, ७-८ सय बर्ख पहिने! (सन्दर्भ: कार्ल एच पॉटर: एनसाइक्लोपीडिया ऑफ इण्डियन फिलोसोफी, १९९३; सतीश चन्द्र विद्याभूषण: अ हिस्ट्री ऑफ इण्डियन लॉजिक, १९२१) स्टीफन एच. फिलिप्स लिखै छथि: मिथिलामे राखल गेल पञ्जी वंशावली अभिलेखसँ पता चलैत अछि जे हुनक पत्नी आ तीनटा बेटा आ एकटा बेटी छल। एकटा बेटा छलन्हि प्रसिद्ध न्याय लेखक, वर्धमान। गङ्गेश स्पष्ट रूपसँ अपन जीवनकालमे प्रसिद्धि प्राप्त कयलनि, जकरा "जगद-गुरु" कहल जाइत अछि, जे हुनक समयक शैक्षणिक संस्थानक लेल "प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय प्रोफेसर" क लगभग समकक्ष हएत। Genealogical records kept in Mithila suggest that he had a wife and three sons and a daughter. One child was the famous Nyaya author, Vardhamana. Gangesa apparently achieved quite some fame during his lifetime, referred to as "jagad-guru," which would be the rough equivalent of "Distinguished University Professor" for the educational institutions of his time. [Phillips, Stephen, "Gangesa", The Stanford Encyclopedia of Philosophy (Summer 2020 Edition), Edward N. Zalta (ed.), URL = https://plato.stanford.edu/archives/sum2020/entries/gangesa/ ] गंगेश जगदगुरु तँ रहथि परमगुरु सेहो रहथि आ परमगुरुक उपाधि हिनका अतिरिक्त मात्र नूतन वाचस्पति (वृद्ध वाचस्पतिक परवर्ती) केँ पछाति जा कऽ प्राप्त भेलन्हि। मुदा गंगेशक संगे जे अन्याय रमानाथ झा आ उदयनाथ झा अशोक केलन्हि से बीसम आ एक्कैसम शताब्दीमे भेल आ तकर दुष्परिणाम स्टीफन फिलिप्स सन नैय्यायिक उठेबा लेल अभिशप्त भेला। एतऽ अहाँकेँ सूचित करी जे स्टीफन फिलिप्स तत्त्वचिन्तामणिक चारू खण्डक सम्पूर्ण अंग्रेजी अनुवाद केनिहार पहिल व्यक्ति छथि [Jewel of Reflection on the Truth about Epistemology: A Complete and Annotated Translation of the Tattva-cinta-mani, Bloomsbury Academic (2020)]। हुनका अलाबी वी.पी. भट्ट सेहो तत्त्व चिन्तामणिक चारिमेसँ ३ खण्डक सम्पूर्ण अनुवाद २०२१ धरि कऽ लेने छथि [१. प्रत्यक्ष (सोझाँ-सोझी), (२) अनुमान, आ (४) शब्द (मौखिक गवाही); (३) उपमान (तुलना केनाइ)बाँकी छन्हि [Word The Sabdakhanda of Tattvacintamani- With Introduction, Sanskrit Text, Translation And Explanation (2 Vols Set) 2005; Perception The Pratyaksa Khanda of The Tattvacintamani 2012 (2 Vols Set); Inference the Anumana Khanda of the Tattva Chintamani ( With Introduction, Sanskrit text, Translation & Explanation ) (2 Vols Set) 2021 Published by Eastern Book Linkers, Delhi]। HONOUR KILLING OF GANGESH UPADHYAYA (FIRST BY RAMANATH JHA, THEN BY UDAYANATH JHA 'ASHOK' (A PARALLEL HISTORY OF MITHILA AND MAITHILI LITERATURE, WHY TODAY ITS NEED BEING FELT MORE INTENSELY?) I was not surprised, though I must have been when I saw a monograph on Gangesh Upadhyaya, whose copyright is being held by Sahitya Akademi, the author of the monograph is Udayanath Jha ' Ashok'. I thought that Udayanath Jha ' Ashok', who has been given Bhasha Samman also, by the same Sahitya Akademi, would do some justice. But truth and research seem elusive in Sahitya Akademi monographs, at least that I found in this monograph. I searched and searched through chapters, that now the author will show courage. But the author like Ramanath Jha seems ashamed of the roots and offspring of Gangesh Upadhyaya. He tries to confuse the issue, but there is no confusion now at least since 2009. But in 2016 Sahitya Akademi seems to carry out the casteist agenda. Udayanath Jha mockingly pretends to search his name, lineage etc, where nothing is there to search for, yet he could not muster the courage, to tell the truth, and ends up just repeating the facts in 2016 that Dineshchandra Bhattacharya already has published way back in 1958. The honour killing of Gangesh Upadhyaya by Prof. Ramanath Jha is being taken forward by Sahitya Akademi, Delhi in a most hypocritical way. Ramanath Jha's obscurantism vis-a-vis Panji is evident from one example. The inter-caste marriage in Panji was well known to him (but he chose to keep the Dooshan Panji secret- which has been released by us in 2009), and it was apparent that the great navya-nyaya philosopher Gangesh Upadhyaya married a "Charmkarini" and was born five years after the death of his father (see our Panji Books Vol I & II available at http://videha.co.in/pothi.htm ). Sh. Dinesh Chandra Bhattacharya writes in the "History of Navya-Nyaya in Mithila". (1958) "The family which was inferior in social status is now extinct in Mithila----- Gangesha's family is completely ignored and we are not expected to know even his father's name-----...As there is no other reference to Gangesa we can assume that the family dwindled into insignificance again and became extinct soon after his son's death." [1958, Chapter III pages 96-99), which is a total falsehood. He writes further that all this information was given to him by Prof. R. Jha, and he seemed thankful to him. The following excerpt from Our Panji Prabandh (parts I&II) is being reproduced below for ready reference: - महाराज हरसिंहदेव- मिथिलाक कर्णाट वंशक। ज्योतिरीश्वर ठाकुरक वर्ण-रत्नाकरमे हरसिंहदेव नायक आकि राजा छलाह। 1294 ई. मे जन्म आ 1307 ई. मे राजसिंहासन। घियासुद्दीन तुगलकसँ 1324-25 ई. मे हारिक बाद नेपाल पलायन। मिथिलाक पञ्जी-प्रबन्धक ब्राह्मण, कायस्थ आ क्षत्रिय मध्य आधिकारिक स्थापक, मैथिल ब्राह्मणक हेतु गुणाकर झा, कर्ण कायस्थक लेल शंकरदत्त, आ क्षत्रियक हेतु विजयदत्त एहि हेतु प्रथमतया नियुक्त्त भेलाह। हरसिंहदेवक प्रेरणासँ- आ ई हरसिंहदेव नान्यदेवक वंशज छलाह, जे नान्यदेव कार्णाट वंशक १००९ शाकेमे स्थापना केने रहथि- नन्दैद शुन्यं शशि शाक वर्षे (१०१९ शाके)... मिथिलाक पण्डित लोकनि शाके १२४८ तदनुसार १३२६ ई. मे पञ्जी-प्रबन्धक वर्तमान स्वरूपक प्रारम्भक निर्णय कएलन्हि। पुनः वर्तमान स्वरूपमे थोडे बुद्धि विलासी लोकनि मिथिलेश महाराज माधव सिंहसँ १७६० ई. मे आदेश करबाए पञ्जीकारसँ शाखा पुस्तकक प्रणयन करबओलन्हि। ओकर बाद पाँजिमे (कखनो काल वर्णित १६०० शाके माने १६७८ ई. वास्तवमे माधव सिंहक बादमे १८०० ई.क आसपास) श्रोत्रिय नामक एकटा नव ब्राह्मण उपजातिक मिथिलामे उत्पत्ति भेल। So, the Srotriyas as a sub-caste arose around 1800 CE as per authentic panji files. Sh. Anshuman Pandey [Gajendra Thakur of New Delhi provided me with digitized copies of the genealogical records of the Maithil Brahmins. The panjikara-s whose families have maintained these records for generations are often reluctant to allow others to pursue their records. It is a matter of 'intellectual property' to them. I was fortunate enough to receive a complete digitized set of panji records from Gajendra Thakur of New Delhi in 2007. [Recasting the Brahmin in Medieval Mithila: Origins of Caste Identity among the Maithil Brahmins of North Bihar by Anshuman Pandey, A dissertation submitted in partial fulfilment of the requirements for the degree of Doctor of Philosophy (History) in the University of Michigan 2014]. Later these Panji Manuscripts were uploaded to Videha Pothi at www.videha.co.in and google books in 2009). The so-called Maharajas of Darbhanga were permanent settlement zamindars of Cornwallis, and there were so many in British India, but in Nepal there were none. In the annexure of our book (Panji Prabandh vol I&II), we have attached copies of genealogy-based upgradation orders (proof of upgradation for cash). So, before 1800 CE, there was no srotriya sub-caste in British India and there is no such sub-caste within Maithil Brahmins in Nepal part of Mithila even today. Srotriya before that referred to following some education stream in British India, in Nepal it still has that meaning. ORIGINAL PANJI REFERENCES ARE PLACED BELOW: DOOSHAN PANJI- THE BLACKBOOK ४९. १८८/२ चर्मकारिणी माण्डर वभनियाम छादन तत्त्वचिंतामणि कारकगंगेश छादनगंगेशक नाँई रत्नाकरक-मातृक (अज्ञात) गंगेश वल्लभा भवाइ माहेश्वर जीवे २१//१० छादनसँ तत्व चिन्तामणि कारक जगद्गुरु गंगेश छादनसँ तत्व चिन्तामणि कारक गंगेशक वल्लभा चर्मकारिणी पितृ परोक्षे पञ्च वर्ष व्यतीते तत्व चिन्तामणि कारक गंगेशोत्पत्ति- चर्मकारिणी मेधाक सन्तानक लागिमे छलन्हि छादन सँ तत्व चिन्तामणि कारक मōमō गंगेश "तत्व चिन्तामणि कारक म. म. पा. गंगेशक विषयक लेख प्राचीन पञ्जीसँ उपलब्ध"।। पितृ परोक्षे पंच वर्ष व्यतीते गंगेशोत्पत्तिः इति प्राचीन लेखनीय: कुत्रापि देवानन्द पञ्जी ३९-२ छादनसँ जगदगुरू गुंरू गंगेश सुताय वभनियामसँ जयादित्य सुत साधुकर पत्नी देवानन्द पञ्जी ३३९-३ जगदगुरू गंगेश सुत सुपन दौ भण्डारिसमसँ हरादित्य दौ.।। पुत्र सुताच गोरा जजिवाल सँ जीवे पत्नी ए सुत सन्दगहि भवेश्वर। अत्रस्थाने सुपनभ्रातृ हरिशर्म्म दारिति क्वचित् जजिवाल ग्राम देवानन्द पञ्जी ३०=५ छादनसँ उपायकारक म.म. पा. वर्द्धमान सुताच खण्डवलासँ विश्वनाथ सुत शिवनाथ पत्नी गंगेश- म.म. वर्द्वमान/ सुपन/ हरिशर्म्म Gangesh, the author of the Tattvachintamani, wrote one text equivalent to 12,000 texts. Now come to the fact mentioned in the Panji- it clearly states that Gangesh of Tattvachintamani was born five years after the death of his father and he married a tanner, so why did Ramanath Jha hide this from Dinesh Chandra Bhattacharya? Vardhamana, son of Gangesh, calls Gangesh sukavikairavakananenduh. But the conspiracy under which the poems of a famous scholar like Gangesh are not available today is clear from the example given above. Vasudev of Bengal was a classmate of Pakshadhar Mishra of Mithila, he came to study in Mithila, passed the shalaka examination and received the title of sarvabhaum. Vasudeva memorised the tattvachintamani of Gangesh and the nyayakusumanjali karika of Udayana. Pakshadhar and other Mithila teachers did not allow writing (copying) tattvachintamani. Raghunath Shiromani, a disciple of Vasudeva, took the right of certification after he defeated his guru Pakshadhar Mishra in a scriptural debate (shastrartha). The Navya Nyaya school was founded in Navadvipa by Vasudeva-Raghunath. Pakshadhar Mishra was a contemporary of Vidyapati (distinct from the Padavali writer who was of the pre-Jyotirishwar period) who wrote in Sanskrit and Avahatta. And the arrival of Mithila students of Bengal from Bengal stopped after Raghunath Shiromani. Gangesh Upadhyaya enjoyed 'param guru' as well as 'jagad guru' titles, the highest titles of the time and as per Panji only Vacaspati Mishra II was the other person who enjoyed the title of 'param guru'. The extinction of Navya-Nyaya School from Mithila, as described above, was a revenge of nature against the honour killing of Gangesh Upadhyaya and his family. [Translation of the Maithili Short Story, 'Shabdashastram' (based on the true Panji records of Gangesh Upadhyaya) was done by the author Gajendra Thakur himself: published as 'The Science of Words' Indian Literature Vol. 58, No. 2 (280) (March/April 2014), pp. 78-93 (16 pages) Published By: Sahitya Akademi] -Gajendra Thakur, editor, Videha (be part of Videha www.videha.co.in -send your WhatsApp no to +919560960721 so that it can be added to the Videha WhatsApp Broadcast List.) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १.२.अंक ३९२ पर टिप्पणी लक्ष्मण झा ’सागर’ वाह, बहुत नीक अंक। सादर आभार!! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.गद्य २.१.मानेश्वर मनुज- लेख-मैथिली कथा मे विभूति आनन्द २.२.परमानन्द लाल कर्ण-सावन मासक एकादशीक माहात्म्य २.३.प्रणव झा- एआईआईएसएच मैसूरक यात्रा (A tour to AIISH Mysore) २.४.लाल देब कामत-नरेन्द्र झा जीक स्मरण २.५.रबीन्द्र नारायण मिश्र-सीमाक ओहि पार (धारावाहिक उपन्यास) २.६.सुमन मिश्र- प्रेम २.७.प्रमोद झा 'गोकुल'-मजदूरक व्यथा (बीहैन कथा) २.८.निर्मला कर्ण- अग्निशिखा खेप -४० २.१.मानेश्वर मनुज- लेख-मैथिली कथा मे विभूति आनन्द मानेश्वर मनुज लेख-मैथिली कथा मे विभूति आनन्द
एहि विशाल भारत वर्ष मे संस्कृतक उत्तराधिकारी हिन्दीय जकरा संग सतत उर्दू रहल, छोड़ि आन कोनो भाषा नहि बनल। संस्कृत ब्राह्मण आ कर्मकांडी पंडितक भाषा छल, जाहि राह पर एखनो मैथिली ठाढ़ अछिय तैं ई ब्राह्मण आ कर्मकांडी पंडितक रीति रेवाज, रहन- सहन, बोली-बानी पर अटकल आ ठहरल अछि, आ ई सामंतक भाषा बनि गेल अछि। मैथिली भाषा मे राजकलम चौधरी, धूमकेतु राजमोहन झा आ जीवकान्तक बाद कथा लेखन मे जाहि चारि लेखकक नाम प्रमुखता सँ लेल जाइत अछि ओ नाम, अशोक, शिवशंकर श्रीनिवास, विभूति आनन्द आ रमेशक छनि। ई एक संयोग मात्र अछि जे एहि चारू कथाकार मे सब ब्राह्मण वर्णक छथि, जकरा ऊँच्च वर्ग कहल जाइत छैक। आन वर्ग आ मजदूर वर्ण मे सेहो अनेक कथाकार छथि, जे अनेक जातिक छथि। ओ सब एकसंग आपस मे जुटल नहि छथि। हुनका सबहक रहन - सहन आ चित्तवृत मे समानता थोड़ मुदा विभिन्नता अनेक छनि। एहि भाषाक बीच ओ लोकनि अप्पन अलग पहचान नहि बना सकलथि अछिय प्रयत्नरत अवश्ये छथि मुदा ओहि विन्दु पर नहि पहुँच पौलनि अछि, जाहि विन्दु पर ब्राह्मण लोकनि पहिने सँ स्थापित छथि। किछुगोटे एहि भाषाक सहारा सँ विभिन्न क्षेत्र मे ऊँच्च पद पर स्थापित भऽ चुकल छथि, यथा लेक्चरर, प्रोफेसर आ राज्य ओ केन्द्र सरकारक विभिन्न विभाग मे अधिकारिक रूप मे। विश्वविद्यालय मे प्राचार्यक अनुशासनिक पद पर सेहो बहुतगोटे स्थापित भऽ गेल छथि। मुदा ओ सब ओहि पद पर डेरायल - डेरायल रहैत छथि आ अपना आप केँ घुसपैठिया बुझैत छथि। ओ अपना शब्द आ वाक्य केँ हथियार बना लड़ऽ तँ चाहैत छथि, मुदा जाहि स्थान पर पहुँचक चाही ताहि स्थान पर पहुँचऽ सँ रहि जाईत छथि। राजकमल चौधरी, धूमकेतु, राजमोहन झा आ जीवकान्तक वादक वृत्त मे जे चारि गोट नव लेखक आबि गेलाह अछिय ओहो ब्राह्मण वर्णक छथि आ कर्मकांडी पंडितक सहारा सँ ठाढ़ छथि। सहारा देवऽवला छलनि आ छथि सर्वश्री सुरेन्द्र झा सुमन, पंडित चन्द्रनाथ मिश्र अमर, डॉक्टर रामदेव झा आ प्रोफेसर भीमनाथ झा। ई लोकनि तत्सम् शब्दक माजल खेलाड़ी छलथि आ छथिय यैह हुनका लोकनिक मैथिली भाषा मे विशिष्टताक हथियार छलनि आ छनि। कनटेन्ट हिनका लोकनिक कमजोर छलनि आ छनिय मुदा शब्दरूपी हथियारक धार तेज छलनि आ छनि। प्रारम्भ मे विभूति आनन्द अपना विचार पंथक आधार अलग रखने छलथि, मुदा बाद मे दरभंगा मे रहि हुनके लोकनि सँ समझौता कऽ लेलनि। उपर्युक्त व्यक्ति सँ अलग विभूति आनन्दक भाषाक जे विशेषता अछि ओ भाषा बेनीपट्टी, विस्फी, मधवापुर, क्यऊटी, हरिलाखी, बासोपट्टी आ जयनगर पुरिसकक जनभाषा अछि, जाहि परिसर सँ विद्यापति, चन्दा झा, राजकमल चौधरी, मायानन्द मिश्र आ ललित अपना समय मे कोनो ने कोनो रूपे जुड़ल छलथि, आ ओहि लिस्ट मे एक नव नाम निःसंदेह विभूति आनन्दक जूटि जाईत छनि। मायानन्द मिश्र आ राजकमल चौधरीक सासुरक गाम ओही परिसर मे छलनि। विभूति आनन्द कोनो राजघराना मे नहि बल्कि एक सामान्य मध्यवर्गीय कृषक परिवार मे जन्म लेने छथि। मारकण्डे प्रवासीक परिवार मे सम्बन्ध स्थापित भेलाक बाद मिथिला मिहिर साप्ताहिक, पटन मे छाएल रहलथि। ताहि समय ओहि पत्रिका केँ लोक बड़ गम्भीरताक संग पढ़ैत छलैक। मैथिली कथाक आन्दोलन सगरि राति दीप जरय केँ कमजोर पड़ैत देखि ष्जखन - तखनष् पत्रिका लऽ कऽ ठाढ़ भेलथि। सहयोगी भेलनि ज्योत्सना चंद्रम्, दमन कुमार झा आ हीरेन्द्र कुमार झा। पूर्वहुँ पत्रिकाक संचालन ओ संपादनक काजक अनुभव छलनि मुदा ष्जखन - तखनष् आन्दोलन ताहि रूपे चलि नहि सकलनि। जेना मैथिलीक असफल आन्दोलन मे राजमोहन झाक आरम्भ केँ राखल जा सकैत छथि, तहिना हिनकर ष्जखन - तखनष् आन्दोलन केँ। आन्दोलनक सबसँ बड़का असफलताक कारण, स्वेच्छा सँ जुड़ैत लोक केँ ओ स्थान नहि दऽ सकलथि आ छपैत महत्वपूर्ण पुस्तकक जाँच - पड़ताल कऽ, ओकर खंडन, विखंडन, समीक्षा आ आलोचना करऽ सँ रहि गेलथि। कोनो नव विचार ओ दृष्टिक संग ने ककरो ठाढ़ कयलथि वा स्वयं ठाढ़ भेलथि। जे कार्य विविध क्षेत्र मे कवीन्द्र रवीन्द्र केलनि ओ कार्य कि केओ मिथिला मे कऽ सकलथि । एखनुका परिस्थिति मे रोजगारक लेल जाहि संख्या मे लोक दोसर राज्य मे जा अपमानित होईत छथि ताहि दृष्टिएँ मिथिला केँ मर्यादित करऽ सँ पहिने बिहारक विषय सोचक प्रयोजन छै। बिहार केँ मर्यादित करक दृष्टिएँ भोजपुरी भाषी, मैथिली भाषी सँ एक डेग आगू बढ़ि गेल छथि। मीडिया क्षेत्र खीश कुमार आ राजकमल झा एक आशाक ज्योति जगवैत छथि। विभूति आनन्दक कथा मे दूरादरवज्जा, घर - आँगन, नौरिन - खवासनी सँ लऽकऽ चिड़ै - चुनमुन तक दृष्टिगत होई अछि। रिंग बान्ह आ बाढ़ि सेहो छनि आ काम - क्रीड़ाक तँ सहजे प्रचूरता छनि, मुदा कथा आ कविता दुनू विधा हिनक लेखन श्रेष्ठ छनि। हिनका नीक कहक अभिप्राय ई नहि जे आनक लेखन खराप छनि, मुदा हिनका लेखन मे ओ सब तत्व छनि जे कोनो रचना केँ न्यून होबऽ सँ बचबैत छैक। लौकिक भाषा मे शास्त्रीयता भरऽ मे हिनक कथा सफल भेल अछि। एहि सँ आगाँ सेहो सोचैत छी जे हुनका विषय किछु सोची। याद अबैत अछि हिनकर ओ चेहरा जखन, एक बेर दरभंगा स्टेशनक प्लेटफॅर्म पर भेँट भऽ गेल छलथि। हम मुम्बई यात्रा मे दरभंगा मे पवन एक्सप्रेस पकड़क प्रतीक्षा मे छलहुँ। रेलक नोकरी मे छलहुँ, अपने पर रेल - यात्री केँ सुरक्षित यात्रा करावक भार छल, मुदा ओतऽ स्वयं यात्री बनि ठाढ़ छलहुँ। मोन मे मैथिली, मैथिलीक लेखक आ मैथिलीक किताब सब छल। एहि भूमि सँ यैह लोभ, शब्दक आकर्षण आ नव साहित्यक ऊपज। जीवन पर्यन्त बाहरे - बाहर रहलहुँय कलकत्ता, सूरत। घुरि - फिरि मुजफ्फरपुर अएलहुँ जतँ सँ नौसेना मे बहाली भऽ गेल। आन्ध्रप्रदेशक विशाखापट्टनम् होईत गुजरातक जामनगर पहुँचलहुँ आ तकर बाद केरलक कोचिन। टे’निंग खतम भेलाक बाद कोचिन, गोवा आ मुम्बईक यात्रा होईत रहल आ भ्रमणक प्रयाप्त अवसर भेटैत रहल। सदिखन अपना भाषा - बोलिक तुलना ओहि सब भाषा - बोली सँ करैत रहलहुँ। मोन मे सदिखन मैथिलिए रहैत छल, मैथिली भाषा, मैथिलीक पत्रिका, मैथिलीक लेखक आ मैथिलीक किताब। दरभंगा स्टेशन पर हुनका सँ एकतरफा अपन व्यथा कहैत रहलियनि आ ओ चूपचाप सुनैत रहलथि। जाहि समय विभूति आनन्द मिथिला मिहिर मे धुरझार छपैत छलथि ताहि समय उपर्युक्त लेल नाम, अशोक, शिवशंकर श्रीनिवास आ रमेशक कतौ अता - पता नहि छलनि। एक आध रचना कतौ छपियो जाईत छल हेतनि तँ तकर केओ नोटिस नहि लैत छलनि। ओ पटना मे रहैत रहथि आ मिथिला मिहिर ओतै सँ छपैत छलैक। हिनकर वियाहक प्रसंगक आ अन्य निजी बातसब सेहो समाचार रूप मे मिथिला मिहिर मे अबैत छलै। ई मैथिली अकादमी, पटना मे काज कयलथि, तकर बाद मास्टरी मुगेरक कोनो स्कूल मे, आ अंत मे प्रोफेसरी पंडौल मे। पंडौल मे कार्यरत रहितो दरभंगा केँ गहि कऽ पकड़ने रहलथि। दरभंगा मे आचार्य सुरेन्द्र झा सुमन, पंडित चन्द्रनाथ मिश्र अमरक संग भीमनाथ झा आ रामदेव झाक बोलवाला छलनि। बोलवालाक तात्पर्य साहित्य अकादेमी, दिल्ली, मैथिली अकादमी, पटना आ चेतना समिति, पटनाक संग मैथिलीक अन्य मान्यताप्राप्त संस्था ओ मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा मे ! पत्रकारिता आ सहित्य मे केओ छोट होथि वा पैघ, भाई शब्द सँ एक दोसरा केँ सम्बोधित करैत गौरवक अनुभव कयल जाईत छैक, तैँ भीमनाथ झा, मिथिला मिहिर मे सबहक भाई यानी भीमभाई भऽ गेल छलथि। ओना तँ विश्वविद्यालय मे एलाक बादो ओ हुनका भाइए कहैत छलनि, मुदा संगतुरिया बनौलनि हुनकर बेटा - भातिज केँ। अमरजीक आ रामदेव झाक आवास किछु दूर रहक कारण, हुनकर संतान सब सँ सेहो अपेक्षाकृत दूर रहलथि। ताहि समय दरभंगा मे साहित्यकारक दू स्कूल चलैत रहैकय एक सुरेन्द्र झा सुमन स्कूल आ दोसर कृष्णकांत मिश्र स्कूल। कृष्णकान्त मिश्रक वैदेही समिति आ वैदेही पत्रिका पर हुनकर पूर्वज बलदेव मिश्र आ उमेश मिश्रक संग अग्रज जयकान्त मिश्रक छाप छलनि। वैदेही सँ अलग - अलग समय मे सुरेन्द्र झा सुमन, चन्द्रनाथ मिश्र अमर संग सोमदेव, रमानन्द रेणु आ हंसराज जुटल छलथि। ओ समय मैथिली केँ साहित्य अकादेमी मे प्रदेशक हर्षगान आ अष्टम अनुसूची मे प्रवेशक अभियानक छलै। हिन्दी मे मात्र धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान आ सारिका पत्रिका बहार होईत छलैकय जाहि मे छपब आसान नहि छलैकय तैँ मिथिला क्षेत्रक रचनाकार वैदेही दिस मुड़ैत छलथि। वैदेही एक मासिक पत्रिका आ स्थापित मंच छलैक। बैदेही समिति छोड़ि, बैदेही पत्रिकाक बोलवाला अन्यत्रो छलैक, कारण रचानाक चयन ओहि पत्रिका मे बड़ गम्भीरताक संग होईत छलैक। मिथिला मिहिर मे छपला सँ लेखक के जतेक लोक नहि जनैत छलैक ताहि सँ बेसी वैदेही, मासिक मे छपला सँ जनैत छलैक। मित्र लोकनि सँ जखन - तखन अनायासे भेंट घाँट करैत विभूति आनन्द ष्जखन - तखनष्ए गृह पत्रिकाक शुरूआत कयलनि। समय पर मासिक तनख्वाह नहि भेटलाक कारण प्राध्यापक लोकनिक हाल बेहाल रहैत छलनि, तैँ ष्जखन - तखनष् केँ अनियमित कालीन होयब स्वभाविक छलैक, तैओ एहि पत्रिका मे पिरीओडिकल होवक कोनो गुण नहि छलैक आ ई एक संग्रहक रूप मे छपैत रहलैक। ष्जखन - तखनष् आन्दोलन तँ किन्नहु नहि कहि सकैत छलियैक। स्मृति मे अबैत अछि, एक बेर हम हुनकर दरभंगाक डेरा पर गेल छलहुँ। एक बेर आरो दमन कुमार झा अप्पन स्कूटर पर बैसा कऽ हुनका डेरा पर लऽ गेल छलथि। चाह पियौलाक बाद ज्योत्सना चन्द्रम, कनियाँ जकाँ धोकचि कऽ सामने रूमक द्वारि पर बैस गेलथि। कोनो साहित्कार सँ प्रत्यक्ष रूप सँ हमरा गप्प - सप्प नहि होईत छल। किनको विषय ओतनी बात जनैत छलहुँ जतेक बात कतौ - कतौ छपल पबैत छलहुँ। अपना मोने हुनका कथाकार मानऽ सँ असमंजस मे छलहुँ। काठ संग्रहक पक्ष आ विपक्ष मे कतौ - कतौ पुरस्कार प्राप्त सँ पहिनहों आ बादो वार्तालाप होईत छलैक। जेना सब बेर पुरस्कृत पोथी पर विवाद ठाढ़ होईत छैकय ओहिओ पर भऽ रहल छलै। किओ कहैत छलथि जे सहानुभूतिक आधार पर हिनका पुरस्कार देल गेलनि अछि तँ केओ कहैत छलनि जे सानत्वनाक आधार पर। जाहि व्यक्तिक प्रचार होईत छैक ताहि व्यक्तिक दुष्प्रचार सेहो ओही अनुपात मे होईत छैक। जीव केँ भ्रुण रूप मे स्थापित होयब आकि श्रृष्टिक निर्माण, एक घटनाक आ संयोग मात्र छैक। तहिना लेखनक सफलता आ विफलता एक घटनेक रूप मे आकस्मिक ढंग सँ होईत छैक आ तहिना पुरस्कार इत्यादि। कहल जाईत छैक जे पुरस्कारक लेल पैरवी करब वर्जित छैक, मुदा पैरवी तँ प्रचूरता सँ काएल जाईत छैक। जे जीतल सैह सिकन्दर, बड़ पुरान मोहावरा छैक। साहित्य आ पुरस्कार सेहो राजनीति सँ बंचित नहि अछि। छलक नामे छैक राजनीति। जे छल करब नेहि जनैत अछि ओ राजनीति करब नहि जनैत अछि। एहि सब विवादक बीच हम ष्काठष् संग्रह पढ़लहुँ। ओ कोनो विन्दु पर हमरा दऽब नहि लागल। मूल्यांकनक आधार तँ हिन्दी कहानी सब छल। ओहि बटखरा पर ष्काठष् तँ खरा उतरबे काएलय संगहि अन्य लेखकक पड़ताल करक प्रेरणा सेहो ओहि संग्रह सँ भेटल आ प्रायः सब कथा लेखक केँ पढ़ैत - गुनैत मोन हिनका संग आन आरो तीन नाम पर आबि अटकि गेल। किछु ख्याति नाम जे हिन्दीओ मे अपन डंका बजा लेने छथि ओ हिनका सबहक नामक संग कतौ ठाढ़ नहि होईत छथि। किछु गोटेक कहब छनि जे, जैह मैथिली मे नीक रचना करैत छथि वैह हिन्दी मे सेहो नीक रचना कऽ सकैत छथि, आ किछुक कहब छनि जे दू भाषा मे रचना करब असम्भव छैक, कारण कुम्हार जे वर्तन बनबैत छैक ओकर सुन्दरता मथल माटि पर निर्भर करैत छैक। तैँ कोनो कथाकार भाषा रूप, दू माटि पर महारत हासिल नहि कऽ सकैत अछि। दोसर दिस कतौ - कतौ भाषा मे तँ लचर रहैत छैक मुदा कन्टेन्ट एहन विलक्षण रहैत छैक जे सफलता मे चारि चान्द लागि जाइत छैक। मैथिली कथा पर नाटकियता, गप्प आ व्यंग्य ;खिधांस कथा केँ कथा बनऽ सँ बंचित राखि दैत छैक आ शिल्प - शैलीक अछैतो कथा असफल भऽ जाईत छैक।
धूमकेतुक कथा मे दर्शन आ राजमोहन झाक कथा मे मनोवैज्ञानिक मनोभावना भरल रहैत छनि। जीवकान्तक कथा मे मजल भाषा आ लौकिक पक्ष प्रवल होईत छनि। हरिमोहन झाक संग एखनो कतेको कथाकार कथा मे गप्प एना आबि जाईत छनि, जे ओ गप्पे रहि जाईत छैक, कथा नहि बनि पबैत छैक। कथा मे बात होईत छैक, मुदा सिर्फ बाते नहि होईत छैक। किछु दोष विभूति आनन्दक कथा मे सेहो अबैत छनि, जेना कोनो कथा मे दादी - नानीक खिस्सा जकाँ ठाढ़ करैत छथि, मुदा ओहि दोष केँ नकारल जा सकैत छैक। ओना तँ मोपाशां आ चेखवक बाद मौलिकता आ श्रेष्ठताक दृष्टि सँ सब कथा केँ खारिज कायल जाईत छैक। तहिना कविताक एक अलग क्षेत्र छैक। फिक्सन तँ मन गढ़ंत होईत छैकय असल क्लासिक्क तँ कविता होईत छैक। बहुत दिन सँ हम देख रहल छी जे मैथिलीक संग आन कतेको भाषा मे कविता रामायण आ महाभारत या पुराण आओर आन ग्रन्थक पात्र सँ जोड़ि कऽ कहल जायत, जे आधुनिक कविताक क्लासिक्स केँ भंग करैत छैक। एक मंचीय कविता पाठ एहने सन किछु कविता पढ़ैत हिनका हम देखलियनि। एक कवि कहैत छथि जे हम भारतीय कविता केँ आँखि मूनि कऽ पहिचानि लैत छी। भारतीय कविता मे कूटि - कूटि कऽ कायरता भरल रहैत छैक। जे पुरूष सीता केँ एहन कठोर प्रताड़ना देलथि ओ पुरूष मर्यादा पुरूषोत्तम भऽ गेलथि। जे वर्तमान जीवनक भावभूमि पर मानव जीवनक जीवक भावना ऊर्जा भरैत छैक वैह क्लासिक्स छैक। कविता एक कठिनतक विधा छैकय एकरा सिर्फ शब्दक ज्ञान सँ नहि अकानल जा सकैत छैक। यात्री नागार्जुनक मैथिली कविता सेहो शब्दक ओझरहैट अर्थ पर झांप ;अवरोध लगा दैत छनि, मुदा वैह बात हिन्दी कविता अप्पन प्रखरता ;अर्थ तरूआरिक धार जकाँ मानव मस्तिष्क पर प्रहार करैत छैक। मैथिली कविता विभूति आनन्द की । यात्री नागार्जुनक प्रतिनिधि, एखन तक केओ ठाढ़ नहि भेल छथि। अभिव्यक्ति आ वक्तव्यक नाम पर फकड़ा पढ़ल जाईत अछि। कतेको तँ कौआली जकां वाक्यु ठाढ कऽ दैत छथि। हिनकर कविता कथा सदृश प्रखरता लक्षित नहि होईत छनि, मुदा लौकिक भावभूमि आ बोलचाल सँ उठैत शब्द केँ ई चुम्वक जकां पकड़ि लैत छथि। गद्य आ पद्य दू अलग क्षेत्रक विधा छैक। कोनो व्यक्ति दुनू क्षेत्र महारत प्राप्त कऽ लेथिय ई असम्भव नहि तँ आसानो नहि छैक, मुदा जीवकान्तजी एकर अपवाद छथि। ओना ओ तँ छलथि मैथिलीक कथाकार आ कवि, मुदा हिन्दी संग आनो भाषा घटित छोट सँ छोट घटना आ छोट सँ छोट कवि वा लेखकक विषय सूचना अपना पास सुरक्षित रखैत छलथि। रामधारी सिंह दिनकर कतौ कहने छथि जे केम्पस ;महाविद्यालयय विश्वविद्यालय साहित्यक हत्या भऽ जाईत छैक। ओतऽ डिग्री आ डिपलौमा बटाईत छैक। ढाकी - ढाकी नम्बर आ मार्क्सशीट बटाईत छैक, जे रोजगार दियावक काज करैत छैक। आचार्य आ प्राचार्य सरिपहुँ अपना आप केँ महान् मानऽ लगैत छथि। हुनकर नजरि सदिखन अपना पीएचडी आ डीलिट पर रहैत छनि। ओ ओही नजरि सँ साहित्यों आ साहित्यिको केँ देखैत छथि। जेना मुर्ख चालवाज प्रतिनिधिक हाथ देश आबि जाईत छैक, तहिना विवेकहीन व्यक्तिक हाथ न्यायालय सेहो कखनो काल आबि जाईत छैक आ ओ सांड़ जकां एमहर ओमहर ढाही मारैत चलैत छैक। एहि क्रम भीमनाथ झा एक लेख अत्यन्त अशोभनीय बात, ई कहि गेल छथि जे साहित्यकार बनऽ सऽ कठिन प्रोफेसर बनब छैक। साहित्कार बनक मापदंड, कतौ डिग्री आ डिपलोमा नहि बटाईत छैक। मार्क्सक सेहो कतौ जरूरत नहि पड़ैत छैक। साहित्यकार बनक मापदंड कोनो संस्था फोलि अध्यक्ष आ सचिव बनब आ पुरस्कार बांटव सेहो नहि छैक। साहित्यकार एक निरपेक्ष ईकाई छैक, जकरा लेल एक कठोर मुदा अलिखित सम्विधान छैक। ओ एतेक सूक्ष्म छैक, जे एखन तक ओकरा कतौ बाजल आ लिखल नहि गेलैक अछि। लेखकक कठिन परिश्रम आ अनुभव, जखन उत्कर्ष पर पहुंचैत छैक, तखन लेखक केँ स्वतः ओहि नियम आ सिद्धान्तक अनुभूति होईत छैक। किछु गोटे ई गुण शुरूए सँ आबि जाईत छैक, जकरा जन्मना कहैत छैक। ई मैथिली साहित्यक दुर्भाग्य अछि, जे सब पीएचडी, डिलीटधारी आ प्राध्यापक अपना - आप केँ साहित्यकार सेहो कहऽ लगैत छथि, आ हुनकर सगा - सम्बन्धी हुनकर प्रचार तक करऽ लगैत छनि। पाश्चात्य साहित्यिक एक संग सम्पूर्ण भारतीय साहित्य केँ खारिज करैत छथि, मुदा किछु रचना जकर किछु अर्थो बुझऽ सँ हम वा हमसव असमर्थ छीय बुकर प्राईज भेट जाईत छैक। शब्द संचयन आ भाषा सेहो गुण होईत छैक, मुदा असल चीज होईत छैक कन्टेन्ट। एक नीक लेखक लेल सिर्फ लिखनाईए आवश्यक नहि छैक। नीक लेखकक लेल भ्रमण सेहो बड़ आवश्यक छैक। भारत एक विशाल देश छैक। बड़ भारी विविधता एहि देश छैक... सांस्कृतिक सँ लऽ कऽ व्यवहारिक रीति - रेवाज तक। तहिना समानता सेहो छैक। विश्वक भौगोलिक ज्ञान तँ किछु गोटे केँ छनि, मुदा अनुभूति, बिना विश्वभ्रमण केने नहि भऽ सकैत छनि। बड्ड आसानी सँ विभूति आनन्द सेहो कतौ कहि दैत छथि जे अपसांस्कृति बाहर सँ अबैत छैक आ ई कहऽ सँ रहि जाईत छथि, जे ओ सब दिन घरे घुरमुरिया खेलाईत रहलथि। हुनकर कथा नान्हिटा चिड़ै आकाश क्रीड़ा वा काम - क्रीड़ा करऽ चलि जाईत छनिय मुदा पीरामीडक देश नहि जाईत छनि कारण ओ स्वयं ओतऽ नहि गेल छथि। एक पुस्तक ;उपन्यास चेखव छोट - छोट जीवजन्तुक स्वभावक वर्णन कऽ एक विलक्षण रचना तैयार कऽ देने छथि। डॉक्टर छलथि, मुदा जीवन पर्यन्त बिना फीस के रोगी केँ देखैत रहलथि आ छः सौ कथा लिखि देलथि। आचार - विचार आ रहन - सहनक हिसाब सँ मिथिला बनारसे सँ शुरू कऽ जाईत छैक। बनारस नहि ईलाहाबादे सँ ! प्रेमचन्दक गोदान पढ़ऽ लागब तँ शब्द सँ वाक्य सँ आ कन्टेन्ट सँ कखनो मोन नहि भरत, सदिखन पढ़िते रहक मोन होयत आ एतँ पाखंडी स्तुतिगान मे लागल छथि। ई बात नहि छैक जे हरिमोहन झाक गप्पक प्रभाव विभूति आनन्दक लेखन मे नहि छनि। गप्पक प्रभाव हुनके पुत्र राजमोहन झा मे कनिको नहि छनि आ ओ जन्मना लेखक छथि। अनका छाया या छत्रछाया मे रहि केओ साहित्यिक ;साहित्यकार नहि भऽ सकैत छथि। एक मित्र कतौ चलैत - चलैत कहैत छलथि जे विभूति आनन्द कतौ - कतौ अपना लेखन एना समझावऽ लगैत छथि, जेना पाठक मुर्ख होईक आ ओ महाविद्वान। लेखक अप्पन पक्ष रखैत छैक। ओकरा विद्वताक घमंड नहि होईत छैक। केम्पसक ज्ञान साहित्य हँता होईत छैक। शिक्षक साक्षर करैत छैक साहित्यक ज्ञान नहि दैत छैक। कतौ पढ़लहुँ अछि जे बंगाल बच्चे सँ साहित्यक संस्कार भरि देल जाईत छैक। ई बात सिर्फ बंगालक विषय कियाक कहल जाईत छैक । उपर्युक्त बात सब हमरा अप्पन मोनक बात अछि।
-मानेश्वर मनुज, आदर्श नगर कॉलोनी, गोशाला रोड, मधुबनी- 847211
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.परमानन्द लाल कर्ण-सावन मासक एकादशीक माहात्म्य अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.प्रणव झा- एआईआईएसएच मैसूरक यात्रा (A tour to AIISH Mysore) एआईआईएसएच मैसूरक यात्रा (A tour to AIISH Mysore) प्रणाम सभ गोटे के। की अहाँ सब के बुझल अछि जे डबल्यूएचओ के द्वारा सन 2018 मे जारी कैल गेल एकटा रिपोर्ट के अनुसार भारत मे मोटामोटी 6.3% लोक श्रवण संबंधी अक्षमता सब सं ग्रसित छैथ। पछुलका जनगणना केर अनुसार देश मे श्रवण अक्षमता(हियरिंग डिसेबिलिटी) मे 5.8% के दर से आ वाक अक्षमता (स्पीच डिसेबिलिटी) मे 7.5% के दर से वृद्धि भ रहल अछि। देश के अलग अलग क्षेत्र सभ मे जै तरहें से ध्वनि प्रदूषण केर स्तर बढईत जा रहल अछि, आ जै तरहक जीवनचर्या(लाइफ स्टाइल) लोक सभ अपना रहल छैथ (ज़ोर के हल्ला-गुल्ला बला संगीत सुननई, ईयर फोन केर अत्यधिक उपयोग आदि), निकट भविष्य मे श्रवण संबंधी समस्या के आर बेसी बढ़बाक संभावना सेहो छैक। उपरोक्त आँकड़ा ई इंगित करय अछि जे देश मे वर्तमान आ भविष्य मे औडियोलोजिस्ट आ स्पीच लैंगवेज़ पैथोलोजिस्ट केर आवश्यकता ठीक ठाक रहतैक, स्वाइत अय क्षेत्र मे करियर केर निक संभावना देखाइत छैक। खास क के ओय विद्यार्थी सबहक लेल जिनका सभ मे मानव सेवा के करियर केर रूप मे चुनबाक प्रबल इच्छा होइन आ जे कोनो कारण वश मॉडर्न मेडिसिन अथवा आल्टर्नेट मेडिसिन के कोनो’ अन्य विधा मे प्रवेश नहीं पाबि सकने होइथ। यद्यपि वर्तमान मे लोक सभ मे ऐ तरहक विकार सभ के ल क बेसी जागरूकता नहि छैक, मुदा किएकि मामिला लोकक संवाद कौशल सं जुड़ल छैक, ऐ पर जागरूकता केर दरकार त छैहे । ऐ विषय पर हमार पहिलुका लेख के सेहो संदर्भ लेल जा सकय अछि जे ‘विदेह’ के 391म अंक मे छपल अछि। आई हम एआईआईएसएच मैसूर के विषय मे किछ चर्चा करब, जे वाक आ श्रवण संबंधी विकार सबहक निदान के लेल दक्षिण एशिया के नंबर 1 आ विश्व के शीर्षस्थ 10 टा संस्थान मे शामिल छैक। भारत सरकारक ई संस्थान, सांसकृतिक महत्ता बला शहर मैसूर मे अवस्थित छैक। संचार विकार सबहक क्षेत्र में प्रमुखता राखय बला ऐ संस्थान केर स्थापना 9 अगस्त, 1965 के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के अंग केर रूप में कैल गेल छल। डॉ. मार्टिन एफ. पामर, निदेशक, इंस्टीट्यूट ऑफ लोगोपेडिक्स, विचिटा, कंसास, यूएसए 1963 में भारतक दौरा केने छलाह आ मैसूर में लॉगोपेडिक्स केर एकटा संस्थान स्थापित करबाक पैरवी केने छलाह। ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ लोगोपेडिक्स के शुरुआत 9 अगस्त, 1965 के भेल छल आ ई एकर पहिल कर्मचारी केर रूप में डॉ एन रथना के संगे राम मंदिर (एकटा भारा परहक इमारत) में काज केनाइ शुरू केने छल। डॉ. बी.एम. राव के बाद में एकर पहिल निर्देशक केर रूप में नियुक्त कैल गेल छलइन । भारतक तखुनका राष्ट्रपति डॉ० एस० राधाकृष्णन 25 जुलाई, 1966 के मैसूरक महाराजा द्वारा दान मे लेल गेल 22 एकड़ भूमि पर संस्थान केर भवन के शिलान्यास केने छलाह। मैसूर विश्वविद्यालय से संबद्धता प्राप्त करबाक पश्चात, संस्थान एम.एससी (वाक एवं श्रवण) पाठ्यक्रम 2 अक्टूबर, 1966 के शुरू केने छल जे देश में अपन तरहक पहिल पाठ्यक्रम छल। ऐ संस्थान के 10 अक्टूबर, 1966 के "ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ स्पीच एंड हियरिंग" नाम से पंजीकृत कैल गेल छल। संस्थान मे डिप्लोमा, स्नातक, स्नातकोत्तर आ पीएचडी स्तर के सब मिला क 16 टा पाठ्यक्रम संचालित कैल जाइत अछि जे वाक(स्पीच), श्रवण(हियरिंग) आ विशिष्ट शिक्षा (स्पेशल एडुकेशन) के डोमैन के पाठ्यक्रम छैक। भारत मे वाक आ श्रवण संबंधी रोगी सबहक पुनर्वास मे ऐ संस्थान के योगदान अग्रणी रहल अछि। एत्त सं प्रशिक्षित विशेषज्ञ (अलूमनाई) आई देश के अलग-अलग भाग मे क्लीनिक आ अस्पताल सभ मे अपन सेवा द रहल छैथ। । देश के भिन्न भिन्न भाग मे बाजब आ श्रवण संबंधी निदान के लेल कै टा ने शिक्षण आ चिकित्सा संस्थान एत्त सं प्रशिक्षित छत्र सभ द्वारा स्थापित कैल गेल छैक आ ओतय एतुक्का अलूमनाई प्रशिक्षण आ चिकित्सा के काज क रहल छैथ। संस्थान मे अकादमिक विंग आ नैदानिक(क्लीनिकल) विंग दू टा अलग अलग खंड, क्रमश: नैमिषम खंड आ जयचामराजा खंड मे स्थापित छैक। समूचा कैंपस साफ़सुथरा, आ गाछ-वृक्ष से भरल छैक जे एतय आबय बला आगंतुक सभ के एकता सुखदगर वातावरण केर अनुभूति दैत छैक। लाल लेटेराइट माटि पर संस्थान के माली सब निक प्रयोग केने छैथ आ सुंदर सुंदर फूल आओर सजावटी गाछ के अलावा अहाँ के एत्त नाना प्रकारक फल आ औषधीय गुण बला गाछ-वृक्ष जेना कटहर, नेमो, डाभ, चीकू, मरीच, अपराजिता आदि देखय लेल भेंट जायत। कलम विधि से कटहर आ चीकू के छोट-छोट गाछ मे सेहो फर देखय लेल भेंट जयत । क्लीनिकल विंग बड्ड बेहतर तरीका से स्थापित कैल छैक आ रोगी सब, खस क के छोट बच्चा सभ के सुविधा आ हुनका सभ के रमनगर वातावरण दै के ध्यान मे राखि के बनाओल गेल छैक। क्लीनिकल वार्ड मे एकटा बोर्ड पर नजैर पडला पर हमर ध्यान अटकि गेल छल जै मे बेस्ट मदर केर नाम अंकित छल। डॉ० प्रवीण हमर सबहक जिज्ञासा के शांत करैत बतेलाह जे बच्चा सभ मे वाक आ श्रवण संबंधीत विकार के दूर करबा के लेल एकटा लंबा ट्रीटमेंट देनाई रहय छै, जै मे चिकित्सक आ अभिभावक दुनु के धैर्य, बुधियारी आ आत्मविश्वास देखाबय केर आवश्यकता होइत छैक। रोगी के ठीक हेबा मे हुनकर अभिभावक सबहक भूमिका महत्वपूर्ण होइत छैक। स्वाइत संस्थान सब साल अपन बच्चा के सबसे नीक जेका परिचर्या करय वाली माय के बेस्ट मदर के इनाम दैत छैक जै से अभिभावक सभ मे रोगी के देखभाल के ल क प्रेरणा आ सकारात्मकता जागय। ई प्रयोग हमरा सभ के बहुत अजगुत आ नीक लागल छल। औडियोलोजी विभाग मे विचरण करैत हमरा सभ के कै टा अनुभव भेल। श्रवण संबंधीत दिक्कत के डायगनोज करय लेल कै टा ने टेस्ट आ मशीन सबहक जनतब भेंटल संगे संग ऐ विकार सभ के दूर करबा के लेल लगाबय जाय बला छोट छोट यंत्र सभ सेहो देखs लेल भेंटल। प्रो० नागरकर सर बतेलैथ जे ई डिवाइस सब बड्ड महरग छैक आ ताहि दुआरे बहुत रास गरीब रोगी सब एकरा नै कीनि पाबय छैथ । स्वाइत किछ सरकार(उदाहरण के लेल केरल सरकार) गरीब मरीज सभ के ई उपलब्ध करवा रहल अछि, मुदा तैयो दिक्कत ई छैक जे एहन रोगी सब से यदि ई अनचोका मे हेरा जाय, या ऐ मे किछु खराबी आबि जाय त फेर रोगी एकर उपयोग छोड़ि दैत छैक आ हुनक समस्या पुनः यथावत भ जाय छैन। सर इहो बतेने छलाह जे डीआरडीओ सेहो ऐ तरहक डिवाइस केर सस्त विकल्प बनौलक अछि मुदा हुनक तकनीक पुरान होई के चलते ओ एतेक रेलेवेंट नई भ सकल अछि । स्पीच पैथोलॉजी विभाग मे कै टा ने चिकित्सक और रोगी सभ से भेंट भेल। डॉक्टर सब प्रो० नागरकर सर के ट्रीटमेंट मैथोडोलोजी आ रोगी सब मे होन बला सुधार के संबंध मे ब्रीफ़ केलइथ। संस्थान मे छोट छिन ईएनटी विभाग सेहो छैक जाहि से कि ईएनटी विशेषज्ञ से रोगी सभ लेल संबन्धित परामर्श लेल जा सकय। यद्यपि एत्त सर्जरी केर व्यवस्था नै छैक आ एत्त के ईएनटी विशेषज्ञ के ओटी के लेल मैसूर मेडिकल कॉलेज से एमओयू भेल छैक। स्पेशल एजुकेशन वार्ड मे जा क हमरा सभ के एकटा सुखदगर आओर खुशनुमा अनुभव भेंटल। पूरे वार्ड केर फर्श पर यत्र तत्र अङ्ग्रेज़ी हिन्दी आ कन्नड भाषा के अक्षर आ शब्द सभ के उकेड़ल गेल छल, जै से बच्चा सभ ओय अक्षर सभ के बाजनाय आ चिन्हनाई सीख सकय । बुतरु सभ के खेलय कूदय लेल खेलौना आ झूला आदि केर निक व्यवस्था छल।
ओतुक्का शिक्षिका हमरा सभ के बतेलैथ जे बुतरु सभ के संगे संग हुनक अभिभावक सभ के सेहो एत्त छोट छोट हस्तकला बला काज सिखाओल जाय अछि आ हुनका सभ के एत्त प्रवास के दौरान ई काज कराओल जाय अछि । ऐ तरहक साकारात्मक प्रयोग सबहक खूब प्रभाव बुतरु सबहक सुधार मे पड़ई छैक। ओ इहो बतेलीह जे हमरा सभ के भेंट मे देल गेल नोटबुक, कागज के पेन, कागज के गुलदस्ता आदि येह बुतरु आ हुनक अभिभावक द्वारा बनाओल गेल छल। ओ इहो बतेलीह जे संस्थान पर्यावरण आ प्रदूषण के ल क गंभीर अछि आ एक बेर प्रयोग मे आबय बला प्लास्टिक केर वस्तु सबहक प्रयोग एत्त नै के बराबर होइत छैक। संस्थान मे एकटा पैघ सन लाइब्रेरी सेहो छैक जै मे वाक आ श्रवण विज्ञान सहित ईएनटी सर्जरी, मनोविज्ञान आदि विषय सबहक बहुत रास पोथी, पत्रिका आ जरनल आदि उपलब्ध छैक। बताओल गेल जे ऐ लाइब्रेरी के शुरुआत अमेरिकन प्रोफेसर डॉ. मार्टिन एफ. पामर द्वारा दान मे देल पोथी सभ से कैल गेल छल। संस्थान मे प्रवास के दौरान कर्नाटक केर कतेक रास पारंपरिक भोजन के खेबाक अवसर भेंटले छल संग मे खेला के बाद देल जाय बला पान-खजूर त अद्भुते छल। ऐ संस्थान केर विषय मे थोड़े-बहुत लिखबाक हमार मूल उद्देश्य वाक आ श्रवण संबंधी दिक्कत सबहक विषय मे थोड़े-बहुत जागरूकता पसारब आ जीवविज्ञान पढ़s बला बच्चा जे मानव सेवा/चिकित्सा केर क्षेत्र मे अपन करियर बनब चाहई छैथ, हुनका करियर विकल्प केर रूप मे ऐ विधा के विषय मे जनताब देनाई अछि। ताहि दुआरे जौं अहांक आस-पास यदि वाक या श्रवण संबधित व्याधि से ग्रसित बुतरु होय जिनकर कतौ इलाज चलि रहल होइन त हुनका ऐहन संस्थान (आरो कै टा छैक) से इलाज के लेल प्रेरित क सकय छी, संगे संगजै बच्चा सभ के एडमिशन एमबीबीएस सन कोर्स मे कोनो कारण से नै भ पाबि रहल छईन्ह हुनका करियर के ऐ सभ विकल्प के विषय मे बता सकय छी। ओना ई बतेने चलय छी जे ऐ संस्थान मे विभिन्न पाठ्यक्रम सभ मे प्रवेश, प्रवेश परीक्षा के आधार पर होइत छैक जकरा लेल आवेदन फरवरी-मार्च के महीना मे कैल जाय छैक। एखन बस एतबे। आशा करय छी जे अहाँ सभ के ई विवरण रोचक आ उपयोगी लगल होय। धन्यवाद! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.लाल देब कामत-नरेन्द्र झा जीक स्मरण लाल देब कामत नरेन्द्र झा जीक स्मरण भद्रकाली भगवती'क कृपा सँ कोइलख गाममे माय स्व० सुशीला झा आ बाबू स्व० शुभ नारायण झा जीक घर २ सितम्बर १९६२ केँ एक नवजात शिशु केर जन्म भेल छलन्हि। ओहि बच्चाक छठिहारी नाम राखल गेल रहैक नरेन्द्र झा । नरेन्द्र पढबा - लिखबामे मेधाबी रहथि। हुनकर भाय योग नारायण झा, प्रो० शेष नारायण झा, डां0 अमरेन्द्र नारायण झाक सदैत मदैत भेटैत रहलनि। गुण सँ भरल एहि मिथिला लाल केर विचार रहनि जे मैथिली फिल्म निर्माण कय मिथिलांचलमे एकटा एक्टिंग इन्सट्युच्यूट खोली। मुदा घरक लोक हुनका भारतीय प्रशासनिक सेवामे देखय चाहैत छलैन। दिल्ली जवाहर लाल यूनवरसिटी सँ हिस्ट्री विषयमे पोस्ट ग्रेज्यूएशन कयलान्तर ओ ग्रामीण क्षेत्रक नाट्य कलाकार आ मैथिली भाषामे मीठकण्ठके गीतगायक नरेन्द्र २००२ मे बम्बई आबि फन्टुस फ़िल्ममे काज कयल। नरेन्द्र झा एक्टिंगमे डिप्लोमा कोर्स करय एस आर सी सी. में सेहो १९९२ मे नाम लिखौने रहथि। नम्हर देहगर-दसगर रहने माँडलिंगमे औफर भेटतहि खूब चमकलाह। तकरवाद टीवी. के २० टा सँ बेसीये शो मे नीक स्थान बनेबाक काज सर्वविदित भेलैक। ऐ उपलब्धि केँ देखैत आ स्वामी स्रधानन्द जीक हिन्दी फ़िल्म मे कन्या भ्रूणहत्या केर विरूध्द अहम भूमिका लेल कपड़ा'क मानल मानल कम्पनी एमरल्ड इन्टरनेशनल हुनका ब्रान्ड एम्बेसडर सेहो बनौने छलन्हि। वालीवुड आओर टेलीवीजन 'क क्षेत्रमे मानल मानल कलाकार नरेन्द्र मस्तमौला फितरतके शक्स, अत्यन्त मृदुभाषी रहैथ,जे हिन्दीए टा नहि वरन् तमिल, तेलुगू आदि दक्षिण भारतीय भाषामे सिनेमा जगतके अन्चिनहार नै छलाह। हैदर - रईस केर टीवी० सिरियलमे रावणके अति प्रभावी किरदार निभेला सँ खूब यश कृर्ति पसरल छलन्हि। विशाल भारद्वाजके फिल्म ' हैदर' आ शाहरूख खानके 'रईस' एहन चर्चित भेलैक,जाहिमे ओ खुब अपन नाह बजौलनि। ओना तँ ओ ' हमारी अधुरी कहानी ' मोहनजोदड़ो, शोरगुल आओर फोर्स -२ मे प्रभावशाली अभिनय दर्शकके देखौने छलाह। हुनकर रावणवला आ टीवी चैनल लाइफ ओके पर ' हवण' सिरियलमे बाप जीक अभिनेता रूपेँ घर-घरमे विशेष पहिचान खासकय स्त्री वर्गमे आ धियापुता सभक बीच अलग चिन्हपहिचीन भेल रहैक। जीबी अय्यैर केर हिन्दी चलचित्र ' सांतला' इम्तीयाज पंजाबीके 'फंटुश' श्याम बनेगलक' नेताजी सुभाषचन्द्र बोस,संजय सिंहक' कच्ची सड़क , शेखर झाक - इक दस्तक आ राज माउली केर तेलगू फिल्म - छत्रपति आ यमडौलाके अतिरिक्त टीवी धारावाहिक -इतिहास, केप्टन हाउस,सी आई डी आफिसर,क्योंकि सास भी बहू थी, रावण,छूना है आशमान,चीफ आफ बगदाद,ली है हमने शपथ, आन दोसरो धारावाहिकमे शसक्त भूमिका निभेने रहथि। सेंसरवोर्ड केर सीओ २००७ मे हुनका वियाहक लेल प्रपोज कयने छलीह, जे २०१५ मेँ पंकजा ठाकुर सँ ५२ सालक वयसमे विवाह भेल छलन्हि। तीने सालक वाद हुनकर हार्ट अटैक सँ अपन फिल्म हाउस मुम्बईमे निधन भऽ गेलन्हि। श्रीदेवी थिक निधनके वोकर सँ वालीवुड उबरलो नहि रहय ता एकायक खबैर छिरियाएल जे मधुबनी जिलाक एक नायब सितारा गुजैर गेलाह। बिहारी कलाकार सुशान्त सिंह राजपुतके निधन दिन स्व० नरेन्द्र झा'क मोन पड़ि गेल रहय। शत् शत् नमन! नरेन्द्र झा जीक स्मरण भद्रकाली भगवती'क कृपा सँ कोइलख गाममे माय स्व० सुशीला झा आ बाबू स्व० शुभ नारायण झा जीक घर २ सितम्बर १९६२ केँ एक नवजात शिशु केर जन्म भेल छलन्हि। ओहि बच्चाक छठिहारी नाम राखल गेल रहैक नरेन्द्र झा । नरेन्द्र पढबा - लिखबामे मेधाबी रहथि। हुनकर भाय योग नारायण झा, प्रो० शेष नारायण झा, डां0 अमरेन्द्र नारायण झाक सदैत मदैत भेटैत रहलनि। गुण सँ भरल एहि मिथिला लाल केर विचार रहनि जे मैथिली फिल्म निर्माण कय मिथिलांचलमे एकटा एक्टिंग इन्सट्युच्यूट खोली। मुदा घरक लोक हुनका भारतीय प्रशासनिक सेवामे देखय चाहैत छलैन। दिल्ली जवाहर लाल यूनवरसिटी सँ हिस्ट्री विषयमे पोस्ट ग्रेज्यूएशन कयलान्तर ओ ग्रामीण क्षेत्रक नाट्य कलाकार आ मैथिली भाषामे मीठकण्ठके गीतगायक नरेन्द्र २००२ मे बम्बई आबि फन्टुस फ़िल्ममे काज कयल। नरेन्द्र झा एक्टिंगमे डिप्लोमा कोर्स करय एस आर सी सी. मे सेहो १९९२ मे नाम लिखौने रहथि। नम्हर देहगर-दसगर रहने माँडलिंगमे औफर भेटतहि खूब चमकलाह। तकरवाद टीवी. के २० टा सँ बेसीये शो मे नीक स्थान बनेबाक काज सर्वविदित भेलैन। ऐ उपलब्धि केँ देखैत आ स्वामी स्रधानन्द जीक हिन्दी फ़िल्म मे कन्या भ्रूणहत्या केर विरूध्द अहम भूमिका लेल वस्त्र'क जानल मानल कम्पनी एमरल्ड इन्टरनेशनल हुनका ब्रान्ड एम्बेसडर सेहो बनौने छलन्हि। वालीवुड आओर टेलीवीजन 'क क्षेत्रमे जानल - मानल कलाकार नरेन्द्र मस्तमौला फितरतके शक्स, अत्यन्त मृदुभाषी रहैथ,जे हिन्दीए टा नहि वरन् तमिल, तेलुगू आदि दक्षिण भारतीय भाषामे सिनेमा जगतके अन्चिनहार नै छलाह। हैदर - रईस सन टीवी० सिरियलमे रावणके अति प्रभावी किरदार निभेला सँ खूब यश कृर्ति पसरल छलन्हि। विशाल भारद्वाजके फिल्म ' हैदर' आ शाहरूख खानके 'रईस' एहन चर्चित भेलैक,जाहिमे ओ खुब अपन नाह बजौलनि। ओना तँ ओ ' हमारी अधुरी कहानी ' मोहनजोदड़ो, शोरगुल आओर फोर्स -२ मे प्रभावशाली अभिनय दर्शकके देखौनहि छलाह। हुनकर रावणवला आ टीवी चैनल लाइफ ओके पर ' हवण' सिरियलमे बाप जीक अभिनेता रूपेँ घर-घरमे विशेष पहिचान खासकय स्त्री वर्गमे आ धियापुता सभक बीच अलग चिन्हपहिचीन भेल रहैक। जीबी अय्यैर केर हिन्दी चलचित्र ' सांतला' इम्तीयाज पंजाबीके 'फंटुश' श्याम बनेगलक' नेताजी सुभाषचन्द्र बोस,संजय सिंहक' कच्ची सड़क , शेखर झाक - इक दस्तक आ राज माउली केर तेलगू फिल्म - छत्रपति आ यमडौलाके अतिरिक्त टीवी धारावाहिक -इतिहास, केप्टन हाउस,सी आई डी आफिसर,क्योंकि सास भी बहू थी, रावण,छूना है आशमान,चीफ आफ बगदाद,ली है हमने शपथ, आन दोसरो धारावाहिकमे शसक्त भूमिका निभेने रहथि। हुनकर केप्टन हाउस, छय हनुमान, आम्रपाली धारावाहिक फेर सं देखबाक मोन होइत अछि। सेंसरवोर्ड केर सीओ २००७ मे हुनका वियाहक लेल प्रपोज कयने छलीह, जे २०१५ मेँ पंकजा ठाकुर सँ ५२ सालक वयसमे विवाह भेल छलन्हि। तीने सालक वाद हुनकर हार्ट अटैक सँ अपन फार्म हाउस मुम्बईमे निधन भऽ गेलन्हि। श्रीदेवी जीक निधनके शोक सँ वालीवुड उबरलो नहि रहय ता एकायक खबैर छिरियाएल जे मधुबनी जिलाक एक नायब सितारा गुजैर गेलाह। बिहारी कलाकार सुशान्त सिंह राजपुतके निधन दिन स्व० नरेन्द्र झा'क मोन हरसठे पड़ि गेल रहय। शत् शत् नमन! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.रबीन्द्र नारायण मिश्र-सीमाक ओहि पार (धारावाहिक उपन्यास) रबीन्द्र नारायण मिश्र सीमाक ओहि पार (धारावाहिक उपन्यास) हमर ससुर स्वर्गीय गणेश झा (पण्डौल डीहटोल)क स्मृतिमे, सादर ससिनेह समर्पित! -11- हम पिपही कोड नंबर दू दबा देलिऐक। गजब भए गेल। हम तुरंते दिव्यपुरक चौकपर ठाढ़ रही । राजनर्तकी दिव्यरसक सीसी लए स्वागत कए रहल छलीह । हमरा दिस दिव्यरसक सीसी बढ़बैत कहि रहल छथि- "अहाँ कतए चलि गेलहुँ? ओहि दिन अचक्के अहाँकेँ देखलहुँ । सोचैत रही जे अहाँ संगे कतहु चली कि ताबते अहाँ बिनु कहने -सुनने चंपत भए गेलहुँ ।" " व्योमरस असर कए गेल रहए ।" " अहाँ फुसि बजैत छी । ई कोनो लखनपुरक ताड़ी नहि छैक जे पिबतहि माथा बेकाबू भए जाए । " "हम तँ अहींकेँ तकैत रही कि पिपही बटन एमहर-ओमहर भए गेल ।" "चलू जे भेलैक, से भेलैक । अहाँ थाकलो लगैत छी । आब चैनसँ दिव्यरस पिबू। फेर अपन महल लए चलब ।" हम राजनर्तकीक बातसँ बेस प्रभावित भए जाइत छी। जतेक सोमरस पिबैत गेलहुँ,ततेक जोस अबैत गेल । तकरबाद की भेल से की कहू? हम राजनर्तकी मंजुषासँ गप्प कए रहल छी । नव-नव अनुभव भए रहल अछि । जे चीज खेबाक इच्छा होइत अछि से स्वतः उपस्थित भए जाइत अछि । दिव्यरस पीबि हमसभ पलंग दिस बढ़ैत छी । ताबतेमे गलतीसँ पिपहीक बटन नंबर एक दबि जाइत छैक । आ हमर सपना सपने रहि जाइत अछि। लएह ,ई कतए आबि गेलहुँ । मंजुषा कतए चलि गेलीह। हमरा मोनमे एतेक भय किएक लागि रहल अछि ? चारूकात एतेक अन्हार किएक छैक ? ककरासँ पुछबैक। टीसनपर ठाढ़ रेलगाड़ीक डिब्बा जकाँ एहिठाम सभक ध्यान गंतव्यपर अछि । जकरे देखू सएह परेसान लगैत अछि। मुदा ई स्थान अछि कोन ? बेर-बेर भ्रम भए रहल अछि । लागल जेना पहिनहुँ हम एतए आबि चुकल छी । एतहि कतहुँ तिरपित देखाएल रहथि । चारूकात ततेक अन्हार रहैक जे ककरो अखिआसब बहुत मोसकिल छल । आखिर एना अछि किएक? अंधलोकमे सोचलोपर,कहलोपर मनोवांछित वस्तुजात प्राप्त करबाक व्योंत नहि बुझाइत अछि । तेँ एतुका रहनिहारसभ निरंतर हाहाकार करैत देखल जा सकैत छथि । हम सहायता हेतु पिपहीक बटन दबबै बला छलहुँ कि कतहु कनी इजोत देखाएल,ओहिना जेना अन्हरिआ रातिमे भगजोगनी होइक । ध्यान दए देखैत छी तँ तिरपित हँसैत देखेलाह । " तूँ फेर एतहि आबि गेलह?" "की कहू, किछु-ने-किछु गड़बड़ी भइए जाइत छैक जाहिसँ हम यत्र-तत्र बौआ रहल छी।" " ई सभ नियतिक खेल छैक ।" "अहाँ किछु मदति नहि कए सकैत छी?" "ई सभ क्षेत्र महाकालक अधीन अछि । ककरा कखन की होएत, नहि होएत, केओ आओर नहि तय कए सकैत अछि। हमहूँ किछु नहि कए सकैत छी ।" हम तिरपित केँ गोर लगबाक हेतु आगू बढ़ैत छी कि हमरा हुनका बीचमे एकटा देबाल बनि जाइत अछि । हम आब हुनका नहि देखि पबैत छी । ऊपर दिस देखैत छी तँ केओ जोरसँ ठहाका लगबैत देखेलाह । "अहाँ के?" "हम महाकाल ।" हम सकपका गेलहुँ । हुनकर रौद्र रूप अखन धरि नहि देखने रही । दिव्यलोक,अंधलोक,मृत्युलोक सभ हुनकर जीहसँ लह-लह करैत बहरा रहल छल । आ हम ? हम तँ लगैत छल जेना आस्तित्वहीन भेल हुनकेमे समाहित छी । "किछु बुझि रहल छहक?" "दिन-राति अपने आस्तित्वक फिकिर करैत -करैत कतहुँ पहुँचलह? पहुँचबो नहि करबह।" हम किछु कहबाक प्रयास करैत छी मुदा बकारे नहि फुटि रहल अछि । गुम्म पड़ि जाइत छी । ओ अपने कहैत छथि- "इएह ने कहए चाहैत छह जे तोहर अन्तर्दृष्टि किएक नहि सक्रिय भए रहल अछि?" "से अहाँ कोना बुझलिऐक?" हमर प्रश्न सुनितहि ओ बिना किछु कहने अदृश्य भए गेलाह। धन्य कही एहि पिपहीकेँ जे हमरा किछुओ बुझाइत अछि,देखाइत अछि । जँ ई पिपही नहि रहैत तखन की होइत। कतहु ढ़ेप जकाँ पड़ल रहितहुँ । अपना भरि पिपहीकेँ सम्हारि कए राखी मुदा हालते तेहन छल जे किछु-ने-किछु अनट भइए जाइत छल । केना-ने-केना ओकर बटन नंबर तीन दबि गेलैक। लएह हम तँ लखनपुर आओर मौजपुरक बीचमे स्थित चौकपर ठाढ़ छी। चौकक बीचेमे एकटा बड़काटा पट्टिकापर लिखल अछि-"तिरपित चौक।“ हमरा बड़ी जोरकेँ हँसी लागि गेल । हँसी ततेक जोरक छल जे चौकक आसपास गेनिहार लोकसभ थकमका गेलाह । साइकिल सबारसभ साइकिलसँ उतरि गेलाह । बसचालक बसमे ब्रेक लगा देलक । चारूकात जेना अफरा-तफरीक माहौल भए गेल । जे भेल से भेल मुदा एतबा आब बुझि गेलिऐक जे एहि पिपहीक तीनटा बटन बेस काजक अछि । नंबरएकसँ अंधलोक,नंबर दूसँ दिव्यलोक आओर तीनसँ मृत्युलोकमे पहुँचल जा सकैत अछि । चौकक दृश्य देखि दंग भए गेलहुँ । लगबे नहि करए जे ओएह गाम अछि । चौक लग एकटा इनार छलैक जतए हमसभ पानि पिबाक हेतु ठाढ़ होइत छलहुँ । सटले एकटा पाकड़िक गाछ छलैक । ओकर छाहड़िमे हमसभ बैसि कए सुस्ताइत छलहुँ । हम की देखलहुँ आ आब की देखि रहल छी। पूरा परिदृश्य बदलि चुकल अछि । हम चौकपर ठाढ़ तिपहिआपर चढ़ैत छी। ओकरा कहलिऐक जे मौजपुर चलह। हम लाख कहिऐक ओ किन्नहुँ तैयार नहि भेल । रिक्सा बला डरा कए भागि गेल । पैरे-पैरे हमसौंसे मौजपुर घुमि गेलहुँ । एकहुटा चिन्हार लोक नहि भेटल। आश्चर्य होअए जे ई ओएह गाम अछि की? ई ओएह जगह अछि जतए हम बाबूसंगे अपन मालिकक खेतपर जाइत छलहुँ? कनीक आओर आगू बढ़लहुँ तँ इसकुलक स्थानपर विशालकाय भवन छल । ई की अछि ? मोनमे उत्सुकता भेल । ककरासँ की पुछितहुँ? आगू बढ़ि गेलहुँ । लखनपुरक सीमामे चलि रहल छलहुँ। ऐहिगाममे तँ मौजपुरोसँ बेसी परिवर्तन लगैत छल । महले-महल देखाइत छल । मुदा एकटा परिचित लोक नहि । ई की भए गेल एहिगाम सभकेँ ? सौंसे इलाकामे मात्र पाकड़िक गाछेटा भेटल जे ओतहि,ओहिना ठाढ़ छल। परिवर्तन ओकरोमे भेलैक । ओकर असार-पसार बढ़ि गेल छल , तथापि पहिचानमे आबि जाइत छल। -12- थाकल-हारल हम पाकड़ि गाछ तर सुस्ता रहल छलहुँ कि एकटा स्नेहमिश्रित अबाज सुनैत छी- "मनोज कोना छी? बहुत दिन बाद वापस अएलहुँ ।" “सही कहि रहल छी भाइ! हम तँ एमहर बड़ उम्मीद लगा कए अएलहुँ जे अपन गाम दिस जा रहल छी, सभसँ भेंट-घाँट होएत । पुरना दोस्त सभ भेटताह। काका, काकी, बाबा, मास्टर साहेब सभ भेटताह, मुदा एहिठाम तँ दृष्ये बदलि गेल अछि। एकहुटा पुरना लोक नहि देखा रहल अछि । अहाँकेँ ठामहि देखि बहुत संतोष भेल । अहाँ चिन्हिओ गेलहुँ । हमर अएनाइ सार्थक भेल । आओर हाल-चाल कहू ।" "भाइ! हम की कहू? हम कोनो गति-मति मे छी ।" "से की?" बेसी दिन जिनाइओ ठीक नहि । अहाँ तँ जल्दीए चलि गेलहुँ । क्रमशः आओरो लोकसभ चलि गेलाह । हमही खुट्टा जकाँ ठामहि ठाढ़ छी । लगैछ जेना भगवानकेँ हमर खाता बिसरा गेलनि। मुक्तिक कोनो रस्ते नहि देखा रहल अछि । चाहे-अनचाहे जे -से सहि रहल छी,समाधान किछु नहि कए सकैत छी ।"-से बजैत-बजैत हुनकर आँखिसँ नोर ढ़बर-ढ़बर खसए लागल । गाछक पातसभ जोर-जोरसँ हिलए लागल । लागल जेना अन्हड़ उठि गेल। हुनकर दुख देखि मोनमे बहुत कष्ट भेल । सोच-विचारमे पड़ि गेलहुँ। ई गाछ सरिपहुँ ओहिना अछि । कतेको लोक आएल, कतेको लोक गेल मुदा ई एसगरे सभकिछु सहि रहल अछि । रौद,बसात,अन्हड़,वर्षा सभमे छाती तनने ठाढ़ अछि । गामक सीमापर गामक पहिचान बचओने अछि । मुदा एकर दुख बुझनाहर केओ नहि अछि। इएह सभ सोचैत रही कि पाछूसँ केओ बाजल - " तूँ व्यर्थ कानि रहल छह । के-के ने एहिठामसँ चलि गेल। तूँ की छह? तुहूँ जेबह । समय आबए दहक ।" "अहाँ के छी? " "हम छी महाकाल । " "जहन अहाँकेँ सभ किछु बुझल अछि तँ हमर कष्ट किएक नहि हरि लैत छी ।" " हम ककरो किछु नहि करैत छी । सभ किछु स्वयं भए रहल अछि । समय सभपर भारी पड़ैत अछि ।" "तखन की करू?" "समयक प्रतीक्षा ।" महाकालक बात सुनि पाकड़िक गाछ शांत भए गेल । ओकर छाहरि गहींर भए गेलैक । ओकर डारिसभ नहूँ-नहूँ हिलए लागल । पातसभक हिलब-डोलब फेर शुरु भए गेल । हम ओहिठामसँ चलबाक उपक्रम करए लगलहुँ । "कतए चललहुँ । एतेक दिनपर अपन गाम अएलहुँ आ बिना किछु खेने - पीने जा रहल छी । कनिको काल बैसू । गप्प-सप्प करू । बहुत रास बातसभ पेटमे फुलि रहल अछि । ककरा कहबैक? संयोगसँ अहाँ भेंट भेलहुँ ।" " से तँ सही कहि रहल छी । मुदा एहिठामक हाल देखि, अहाँक स्थिति देखि मोन उदास भए गेल अछि ।" "एकहि दिनमे अहाँक ई हाल अछि । हमर सोचू । केना सालक-साल सभ देखैत रहलहुँ, सुनैत रहलहुँ । आ सेहो बिना कोनो अवलंबकेँ ।“ पाकड़िक गाछक आवेश देखि हम ठमकि गेलहुँ । डेग आगू नहि बढ़ल । एहिगाममे केओ तँ बाँचल अछि जकरा हमरा लेल दरेग अछि । जकरा हमरा देखि कए किछु कहबाक,मोनक कष्ट बटबाक इच्छा भेलैक,नहि तँ सौंसे गाम घुमि अएलहुँ ,कतहुँ कोनो अपनत्व नहि । ककरो कोनो मतलब नहि । एकटा आओर विचित्र बात देखलिऐक जे लोकसभ अपन-अपन ओसारापर हाथ बारि कए बैसल अछि,की घरमे नुकाएल अछि । एहन तँ नहि छल अपन गाम? "ठीक छैक । हम आब तखने जाएब जखन अहाँ कहब।" से सुनि पाकड़िक गाछ बहुत प्रसन्न भेलाह । कहलाह- "अहाँ हमरे डारिपर आबि जाउ । दुनूगोटे चैनसँ गप्प करब।" हम पाकड़िक गाछक डारिपर बैसि गेलहुँ । नीचा रहबाक कोनो फएदो नहि छल । गामक हृदय पथरा गेल छल। कम सँ कम एहि गाछमे हरिअरी बाँचल छल । काठ-कठोर भेल मनुक्खसँ ई पाकड़िक गाछ बेसी जीवंत लागि रहल छल। दुनूगोटेकँ गप्प करैत देखि एकटा सुग्गा सेहो लगीचेमे आबि कए बैसि गेल । "भाइ! श्यामक घरक की हाल छैक?"-हम पुछलिऐक। "हाल की रहतैक। अपना समयमे ओकर जे प्रताप छल से तँ अहाँ देखनहि रहिऐक । अहाँसभ तँ कनी जल्दीए चलि गेलहुँ । तकर बाद श्याम बहुत किछु केलक। नवका सरकारमे ओकर नेतागिरी चमकि गेलैक। बड़का,बड़का लोकसभकेँ अपना गाममे अड्डा लागल रहैत छल। किछु-किछु दिनपर बैसार सेहो होइत रहैत छल । गीत-नाद आ कहि नहि की-की होइत छल । श्याम एहिसभक खूब फएदा उठओलक आ अकूत धन-संपत्ति संग्रह केलक। मुदा अन्याय ओ अनीति बेसी दिन कतहु फबैक? सएह ओकरो मामलामे भेलैक । कतबो प्रयास केलक,बेटा नहि उजिएलैक । दिन-राति दारू पीने बुत रहैत छलैक । इलाकाक कन्यासभकेँ तंग केने रहैत छलैक । नेतासभक डरे पुलिस,थाना सभ असहाय रहैक। लोकमे त्राहिमाम,त्राहिमाम मचि गेल।" "फेर की भेलैक?" " की होइतैक । लोकसभ मौकाक ताकमे रहए । एकराति श्याम घरमे सुतल रहए । ओकर दूटा चाकर सेहो लगक कोठरीमे रहैत छलैक । कोना-ने-कोना ओ सभ बदमास सभसँ मिलि गेलैक।" "आओर की भेलैक?" "की होइतेक । एकराति सुतलेमे दुनू चाकर किछु बदमाससंगे ओकर नरेठी दाबि बहुत रास संपत्ति लए चंपत भए गेल।" " ई तँ बड़ खराप भेलैक ।" "अखन की सुनलह । अखन तँ बहुत किछु सुनब बाँकिए छह ।" "तखन की भेलैक पाकड़ि भाइ?" हमरा दुनू गोटेकेँ गप्पमे टोकारा दैत सुग्गा बाजल -"पाकड़ि भाइ! बदमाससभ चाकरसंगे मिलि कए श्यामकेँ किएक मारलकै से तँ अहाँ कहबे नहि केलिऐक । -तोरा बुझल छह तँ बजैत किएक नहि छह? - पाकड़िक गाछ बाजल । ठीक छैक । हमरा जे बुझल अछि से कहैत छी ।-सुग्गा बाजल । "लूट-पाट करब तँ एकटा संयोग छलैक । असलमे एहि षड़यंत्रमे केओ आओर नहि, शरद स्वयं सामिल छल।" "छी! छी! की कहि रहल छी?"- पाकड़िक गाछ बाजल । "जहन नहि बुझल अछि तँ सुनू तँ सही ।"-सुग्गा कहलकैक । "ठीक छैक बाजह ।"- पाकड़िक गाछ बाजल । "श्यामक बेटा शरद कतहुँ बिआह करए चाहैत छल । ओ कन्या दोसर जातिक रहैक । मुदा रहैक बहुत सुंदिर, पढ़ल-लिखल। शरद बहुत प्रयास केलक जे श्याम मानि जाथि । ओकर बिआह पसिनक कनिआँ सँ करए देथि मुदा श्यामकेँ तँ गिरगिटिआ सबार रहैक । ओ अड़ि गेल ।" "तखन की भेलैक?"-हम बजलहुँ । "ओ कनिआ के छल जकरासँ शरद बिआह करए चाहए?"-हम कहलिऐक । "रागिनी?" -सुग्गा बाजल । “रागिनी शरदकेँ नहि पसिन्द करैक । तैओ शरद ओकर पाछू पड़ल रहैक । रागिनीक पिता तिरपितकेँ श्याम बहुत फज्जति कए देने रहैक जाहिसँ दुखी भए ओ रागिनीकेँ इसकुल गेनाइ छोड़ा देलकैक, आ घरमे नजरवंद कए देलकैक ।"-सुग्गा बाजल। "तोरा एतेक बात केना बूझल छह? -हम पुछलिऐक । "अहाँक ताहिसँ की मतलब? -सुग्गा कहलकैक । "तकर बाद की भेलैक? "शरद तँ एहि प्रयासमे रहए जे रागिनीकेँ ओकरे घरसँ अपहरण करबा ली, मुदा श्याम ताहि हेतु तैयार नहि होइक । लठैतसभकेँ शरदपर नजरि राखए हेतु लगा देने रहैक । एहि बातसँ कुपित भए शरद श्यामकेँ बदमास लगा देलकैक जाहिसँ ओ डरा जाथि । रातिमे जखन बदमाससभ पहुँचल तँ ओकरसभक इच्छा श्यामकेँ मारबाक नहि रहैक, मात्र ओकरा डरा देबए चाहैत रहए आ एकटा सादा कागजपर औंठा निसान लेबए चाहए । श्याम तकर बहुत बिरोध केलकैक आ उचिते केलकैक । एहि तरहेँ सादा कागजपर औंठा निसान लए की पता ओकरसभटा धन-संपत्ति हरपि लैत? ताहि अंदेसासँ ओ अपन लाइसेंसी बंदूक निकालए लागल। बदमाससभ ई देखितहि ओकर माथपर लगीचेमे राखल समाठ पटकि देलकैक आ ओ ओतहि धम्मसँ खसल से खसले रहि गेल,उठि नहि सकल । माथपरहक चोट छलैक। नश फाटि गेलैक। जाबे अस्पताल पहुँचल ताबे तँ सभ खतम छल । श्यामक एहि तरहेँ अकाल मृत्य भए गेलैक । मुदा पाप कहीं छिपलैए। शरद पकड़ल गेल । कैक दिन पुलिसक हाजतिमे बंद रहए । तकरबाद सुनबामे आएल जे ओतहि ओकरा पुलिस बड्ड मारि मारलकै । मारि भितरिआ रहैक । अस्पताल जाइत-जाइत ओ दम तोरि देलक ।" एतबा बाजि सुग्गा फुर्र दए उड़ि गेल । हमहूँ औंघा गेल रही । ओतहि सुता गेल । हमरा एतेक बात मोन नहि छल । बहुत दिन भेलैक आ फेर आब स्मृतिओ ठीक नहि रहि गेल अछि । मोन विभ्रमित भए जाइत अछि । समयक दोष । पाकड़िक गाछक आँखिमे नोर फेर डबडबा गेल छल । हमरा दुखी होइत देखि ओ बजलाह- " अहाँ दुखी जुनि होइ । ई तँ हमर प्रारब्ध अछि । केओ की करत? जे केने छी से तँ भोगबे ने करबैक ।" "अहाँ तँ सभदिन सभकेँ उपकारे केलहुँ । थाकल-पिआसल लोकसभकेँ विश्राम करबाक हेतु छाहरि करैत रहलहुँ । तैओ अहाँ कर्मक फलक बात करैत छी । 'कोनो एक्के जन्म थोड़े होइत छैक । ई तँ जन्म-जन्मान्तरक निरंतर चलैत कालचक्र थिक। कहि नहि कखन के कतए पटका जाएत?" मुदा एकरसभक हिसाब के करैत अछि?" "कहि नहि, हम कोनो पंडित छी जे से सभ बुझबैक । एहिसभक गणना तँ महाकाले लग हेतनि ।" हमरसभक गप्प चलिए रहल छल कि हमर पिपही घंटी बाजए लागल । एना तँ कहिओ नहि भेल छल । आनदिन हम डराइत-दराइत एकर बटन दबबैत छलहुँ आ कतए-सँ-कतए पहुँचि जाइत छलहुँ । आइ ई अपने बाजए लागल । मनुक्खक मोन जकाँ ई पिपही बहुत रहस्यात्मक बुझा रहल अछि । हम अकबकाएल गाछक डारिसँ नीचा उतरए लगलहुँ कि पिपहीसँ अबाज आबए लागल-" "महाकालक ओहिठाम अहाँकेँ बजाहटि अछि । शीघ्र पहुँचू ।" हम पाकड़िक गाछकेँ प्रणाम कए आगू बढ़लहुँ । हमरा लागल जेना पाकड़ि भाइ हाथ हिला-हिला कए विदा कए रहल छथि । किछु कहिओ रहल छथि,संभवतः फेर अएबाक हकार दए रहल छथि । कनीके कालमे हम अंतरिक्षमे विलीन भए गेलहुँ । हम महाकालक नामेसँ डराइत छलहुँ । आब तँ प्रत्यक्ष सामना होमए बला छल से सोचिएक मोनमे बोखार लगैत छल। मोने-मोन हनुमान चालीसा पढ़ए लगलहुँ । हमर ई हाल देखि महाकाल जोरसँ हँसि देलाह । हुनका एना हँसैत देखि हम थकमका गेलहुँ । "एतेकटा सृष्टिमे सदिखन किछु-ने-किछु होइते रहैत छैक। ई कोनो आइ शुरु भेलैक अछि से बात नहि । एकर कथा अनादि-अनंत कालसँ चलि रहल अछि आ चलिते रहतैक। तूँ एहिसभपर बेसी नहि सोचह ।" “हमरा अहाँ बजओने रही ।" "हम किएक ककरो बजेबैक । लोक स्वयं अपने बनाओल मकरजालमे फँसल रहैत अछि।" " हम से नहि बुझि सकलिऐक।" "बुझिए जेबहक तँ कोन तीर मारि लेबह । ई समय छैक। स्वयं अपन समाधान करतैक ।"-से कहि महाकाल अंतरध्यान भए गेलाह -13- हमर मृत्युलोक छोड़ला कतेक दिन भेल से आब अपनो मोन नहि अछि । तथापि हम एखनधरि बौआ रहल छी। बौआ हमहीटा रहल छी से बात नहि छैक । श्याम,रागिनी,शरद,तिरपित आ कहि नहि कतेको गोटे एहने हालमे छथि वा हमरोसँ खराप हालमे छथि । हम बच्चा रही तँ माए खिस्सा कहैत काल उल्कासभक रहस्य बतबैत छलीह जे ओ सभ पितर छथि जे अपन वंशजक हाल-चाल जानबाक हेतु पृथ्वीपर अबैत छथि । से आब सद्यः देखि- सुनि रहल छी। समय ओ स्थानक सीमाक ओहिपार बहुत रास अदृश्य ओ दृश्य वस्तुसभ अछि जकरा जानबाक साधन ने हमरा लोकनिक पास अछि ने बैज्ञानिकसभकेँ । ओहोसभ एहिना अटकारैत रहैत छथि। कखनो किछु,कखनो किछु समाचार लए उपस्थित भए जाइत छथि । मुदा एहि सृष्टिक रहस्य जहिनाक तहिना अछि । औ बाबू! जखन से सोचैत छी तँ चिंतामे पड़ि जाइत छी । हम की बुझबैक आ जँ किछु बुझिए जाएब तँ से जानबाक हेतु के बैसल अछि? सभ तँ महाकालक चक्करमे फँसि यत्र-तत्र बौआ रहल अछि। आ पृथ्वीपर लोकसभ श्राद्ध भोज खेबामे मस्त रहैत छथि । सृष्टिमे सभ किछु महाकालक अधीन अछि । मनुक्खक जीवन तँ जेना एकटा जरैत आगिक लुत्ती होअए। क्षणेमे क्षणाक। आ एतनी काल लेल हमसभ कहि ने की -की झञ्झटि केने घुमैत रहैत छी। केओ महल बनबएमे लागल छी तँ केओ मंत्री बनए हेतु परेसान छी । ककरो डकैती करैत देखैत छी तँ केओ हत्यासन जघन्य अपराध करैत छथि । छै ने विचित्र बात? कतेक ओरिआनसँ हमसभ अपना आपकेँ रखैत छलहुँ । सुख-सुविधाक कतेक चीज-वस्तुक जोगार करबाक हेतु एंड़ी-चोटी एक केने रहैत छलहुँ । सभ ठामहि रहि गेल । आब किछु अपना संगे नहि अछि,जे अछि से नियति मात्र कहि सकैत छी । सभ महाकालक प्रभावक अधीन छथि । ओहि राति झमाझम गीत-नाद होइत रहल । पाकड़िक गाछ,सुग्गा संगहि कतेको लोक नाना प्रकारक भेष-भूषा पहिरने-ओढ़ने नृत्य करैत मस्त छलाह । की माहौल छल? जखन जेहन रूप-रंग चाहए बना लैत छल । गौआँसभ तँ सोचिओ नहि सकैत छल जे एहनो होइत छैक। मौजपुर आ लखनपुर गामक लोकसभ ओहि समय एकटा श्राद्धक भोज खा रहल छलाह कि पृथ्वीक भीतर भयाओन विस्फोट भेल । पृथ्वी जोर-जोरसँ हिलए लागल । चारूकातसँ अबाज आबि रहल छल-भूकंप,भूकंप । लोकसभ खेनाइ छोड़-छोड़ि भागल। केओ किछु नहि बुझि रहल छल जे ई आकस्मिक संकट कोना भेल आ एकर समाधान की कएल जाए? पाकड़िक गाछ,सुग्गा आ आओरसभ गीत-नाद छोड़ि ठमकि गेलाह। सभ चकुआएल एक-दोसर दिस देखि रहल छलाह। संयोगे जे भोज अंतिम चरणमे छल । भोज छोड़ि भागैत लोकसभ पाकड़िक गाछ लग पहुँचले छल कि श्याम पाकड़िक गाछसँ नीचा उतरलाह। कनी कालक बाद शरदक संग रागिनी सेहो उतरलीह। एकटा आओर केओ उतरल जे चिन्हा नहि रहल छल। गौआँ सभ एकरासभकेँ देखि परेसान छल । ओ सभ भागि रहल छलाह आ श्याम अबाज दए हुनका सभकेँ बजा रहल छलाह। -औ अहाँसभ अनेरे परेसान भए रहल छी । हम एही गामक श्याम छी।" " अहाँ हमरासभकेँ मूर्ख बना रहल छी । श्यामकेँ मरला एकयुग भए गेलेक।-केओ गौआँ बाजल । "पहिने हमर बात सुनि तँ लिअ । फेर जे ठीक बुझाए से करब ।" श्याम कहिए रहल छलाह कि शरद आ रागिनी सेहो तखन ओतए ठाढ़ भए हुनकर बात सुनए लगलाह । गामक लोक किछु नहि बुझि रहल छल । मुदा पाकड़िक गाछ पर बैसल सुग्गा सभटा बुझि गेल । "हम एकरासभकेँ नीकसँ चीन्हि रहल छी।"-सुग्गा बाजल। "तू लाल बुझक्कर छह ।"-पाकड़िक गाछ बाजल । " एहिमे कोन बुधिआरीक बात भेलैक । हमरा देखाइत अछि तँ देखैत छी, सुनाइत अछि तँ सुनैत छी । गौआँसभकेँ से किएक देखल-सुनल नहि होइत छनि, से ओ जानथि ।"-सुग्गा बाजल । "मुदा ई सभ एतेक दिनक बाद एमहर किएक आएल अछि? -पाकड़िक गाछ पुछलक । "आएल थोड़े छैक । बौआ रहल छैक ।"-सुग्गा बाजल। अपना गाममे एहि तरहक उठापटक होइत हमरो नहि रहल गेल । महाकालकेँ मोनहि मोन प्रणाम कए उम्हरे विदा भेलहुँ । ओहिठाम अखनो ओहिना त्राहिमाम मचल छल । पाकड़िक गाछसँ सटले श्मशान छल । सभक सारा जसके तस छल । कतहुँ कोनो गड़बड़ीक निसान नहि बुझा रहल छल । सभक मरलापर भोज-भात सेहो भेल छल । कैक-कैक दिन धरि मंत्र सभ फुकाइत रहल छल । तैओ ढ़ाकक तीन पात । ककरो चैन नहि अछि । ककरो कोनो ठौर नहि भेटल अछि । हे! श्याम तँ फसादी छलाह मुदा तिरपित तँ तेहन नहि रहथि । ओ किएक बौआ रहल छथि ? हुनकर सदगति किएक नहि भेल? ककर की गति होएत किछु नहि कहल जा सकैत अछि। "मनोज! फेर तूँ सोच-विचारमे पड़ि गेलह ।" हम अपन नाम सुनि अकचका गेलहुँ । "के?" “महाकाल!” फेर कहैत छथि-“ घबड़ा नहि । जे देखा रहल छह से देखि लएह । जे नहि बुझाइत छह सेहो बुझिए जेबहक ।" “आब कहिआ बुझबैक?” "से हम की कहिअह? हमरा लगमे आइ-काल्हि-परसू किछु नहि होइत अछि, सभ अनादि-अनंत अछि । प्रारब्धसँ वशीभूत भए स्वतः घटित भए रहल अछि ।" से कहि जोरसँ ठहाका पाड़ैत ओ लुप्त भए गेलाह । ताबे हम पाकड़ि गाछक आओर लगीच पहुँचि गेल रही । ओहिठाम बेस गहमा-गहमी छल । मौजपुर,लखनपुर सहित आन -आन गामक लोकसभ एकत्रित भए आपसमे चर्च कए रहल छलाह। सभकेँ महासंकटक आभास होइत छलनि । पाकड़ि गाछ अपने ततेक दुखी छलाह जे किछु टोकार देबाक स्थितिमे नहि रहथि। गाम-गामसँ उपस्थित लोकसभ निर्णय केलाह जे ज्योतिषीजीसँ परामर्श कएल जाए। ओ किछु तँ कहताह । " सत्य कहि रहल छी । हुनकेसँ परामर्श कएल जाए।“-गौआँसभ एकस्वरसँ बाजल । -14- ज्योतिषीजी गामक प्रतिष्ठित विद्वान छलाह । काशीसँ संस्कृतमे बहुत रास पढ़ाइ केने रहथि । ज्योतिषमे तँ हुनका महारत छल । इलाका भरिक लोकसभ अपन भविष्य जानबाक हेतु हुनका ओतहि अबैत छल । हुनकर परिवार मूलतः काशीक बासी छलाह। कहि नहि कैक पुस्त पहिने ओ सभ मौजपुरमे आबि कए बसि गेलाह। मौजपुरबासीसभ हुनकर परिवारक पालन-पोषण करैत छलाह । ताहीसँ हुनकर गुजर होइत रहल अछि । कोनो वच्चाक जन्म भेलापर टिप्पनि ओएह बनबैत छलाह । ककरो कोनो ग्रह शांत करबाक होइक तँ अनुष्ठान ओएह करबैत छलाह । एहि तरहसँ ओ गामक हेतु अनिवार्य भए गेल छलाह । गाममे सभ किछु ठीक रहए ताहि हेतु ओ समय-समयपर अनुष्ठानो करैत रहैत छलाह जाहिमे गाम-गामसँ लोक आबि कए यथासाध्य योगदान करथि । ज्योतिषीजीक असली नाम साइते केओ जानैत रहल होएत । सभ हुनका ज्योतिषीजी कहि कए जानैत छल,बजबैत छल । इलाकाभरिक लोकक भविष्य तँ ओ तय करैत छलाह मुदा अफसोचक बात ई छल जे हुनकर अपन भविष्य डमाडोल रहनि । जखन वर्तमाने नहि तखन भविष्य कतए सँ अबैत? एकदिन हुनका सिलौटपर भांग पिसैत देखि महाकालकेँ बड़ी जोरसँ हँसी लागि गेलनि । ओ कहैत छथि- " ज्योतिषीजी की बात छैक? आइ दुपहरिएसँ भाँग घोटए लगलहुँ ।" "अहाँ के छी? आइ व्यंग्य करबाक हेतु हमही भेटलहुँ?" "हमर परिचय पुछबाक काज नहि अछि । अपने बुझा जाएत जे हम की छी ।"-से कहि महाकाल ठहाका पाड़ैत आगू बढ़ि गेलाह । ज्योतिषीजीक परिवारमे केओ नहि छल । कहब से किएक? तकर चर्चा फेर करब । असगर रहैत -रहैत कखनहु काल हुनकर मोन उद्विग्न भए जाइ छलनि तँ ओ पाकड़िक गाछ तरमे सुस्ताइत छलाह । ओतहि घंटो बैसल रहितथि । फेर केओ भेट जइतनि तँ ओकरा संगे वापस चलि अवितथि । ओहिदिन सौंसे गामक लोकसभ पाकड़िक गाछलग बैसल ज्योतिषीजीकेँ घेरि लेलक । सभक एक्के प्रश्न जे एना किएक भए रहल अछि । आन बेर तँ ओ किछु-ने-किछु समाधान कए लोककेँ संतुष्ट कए विदा कए दैत छलाह मुदा एहिबेर हुनका किछु नहि फुरा रहल छल । एहन विचित्र दृश्य ओ ने कहिओ सुनने छलाह ने देखने। सभसँ विचित्र बात तँ ई रहैक जे कतहु केओ देखा नहि रहल छलैक । तखन ई सभ कोना भेल आ किएक भेल ? ज्योतिषीजीकेँ चिंतित देखि पाकड़िक गाछकेँ नहि रहल गेलैक । ओ बाजि उठल- "की बात छैक ज्योतिषीजी? आइ बहुत परेसान बुझा रहल छी ।" " की कहू? कहि कए हेबे की करत? "बेसी गुम्म-सुम्म नहि रहू । अहाँ तँ हमरासँ सभबात करैत छलहुँ । गप्प-सप्प करैत रहलासँ आओर किछु होइक नहि होइक किछुकाल लेल मोन तँ हल्लुक भइए जाइत अछि।" "बात तँ अहाँ लाखटकाक कहि रहल छी । मुदा आजुक समस्याक समाधान किछु फुरा नहि रहल अछि । जौँ किछु नहि कहबै तँ गौँवासभक हमरापरसँ विश्वास टुटि जेतेक।" “जे हेबाक छैक से हेबे करतैक । भावी केओ रोकि सकल अछि जे अहाँ एतेक चिंतित छी । जे बुझाइए से कहिऔ, जे नहि बुझाइए से महाकालपर छोड़ि दिऔ ।" “ई गौआँसभ बुझैक तखन ने । " " बुझबे करतैक, नहि बुझतैक तँ समय तकर इलाज करतैक । अहाँ बेचैन नहि रहू ।" हमरासभकेँ एहि तरहेँ गप्प करैत सुनि कए सुग्गाकेँ नहि रहल गेलैक । ओ बाजि उठल- "श्याम, रागिनी, शरद, तिरपित आओर के- के कहि नहि सभ तँ एहीठाम ठाढ़ अछि । से ज्योतिषीजीकेँ नहि देखा रहल छनि?" "देखैतनि तँ एहिना बेचैन रहितथि ।" "तखन कथीक ज्योतिष जनैत छथि?" "बेसी फटर-फटर नहि करह । कोनो उपाय होइ तँ कहक, नहि तँ कमसँ कम आगिमे घी देबाक काज नहि करह। ई ज्योतिष जनैत छथि कोनो ब्रह्मपिशाच नहि पोसने छथि जे बीतल बातसभ बुझथिन।" "लएह, अहाँ तँ तमसा गेल लगैत छी । हम तँ साफे सभ किछु देखि रहल छी । ओ नहि किछु बुझि रहल छथि ताहिमे हमर कोन दोष?" पाकड़ि गाछसँ सटले श्मशान छल । ओतहि शरद,तिरपित,रागिनी,श्याम,प्रभुसभ अपन-अपन सारासँ प्रकट भए रहल छथि । संगे एकटा बृद्धा सेहो देखा रहल छथि। सुग्गाकेँ सभटा देखा रहल छलैक । ओ पाकड़िक गाछसँ पुछलक-"भाइ! सभकेँ तँ चीन्हि रहल छी मुदा ओकरासभक संगे ई बुढ़ी के छथि? हिनका तँ कहिओ नहि देखने छिअनि ।" "हिनका कोना चिन्हबहुन । ई तँ एहिगाममे कहिओ रहबे नहि केलीह?" "मुदा छथिन के?" "ज्योतिषीजीक पत्नी छथिन । बहुत पहिने नैहरेमे मरि गेलखिन । बिआह भेले रहनि । गाममे हैजा फैलि गेलैक । सौंसे गाम घरहंज भए गेलैक । ज्योतिषीजी बिआह कए गाम आएले छलाह कि हुनका समाचार भेटलनि । जाबे -जाबे ओतए पहुँचलाह ताबे कनिआक प्राण छुटि गेल छलनि । तहिआसँ बेचारे एहिना छथि । लोक बहुत बुझओलकनि जे बिआह कए लिअ । मुदा ओ नहि मानलखिन, अड़ि गेलखिन ।" "असली बात आइ बुझलहुँ । ज्योतिषीजीकेँ पता लगतैक जे ओकर घरबाली एतहि मरड़ा रहल अछि तँ ओकर की हाल हेतैक?" "तूँ कहिओ नहि सुधरबह । हमसभ कोनो ओकर ठीका लेने छिऐक? जे होइत छैक से देखैत रहह । निमित्त मात्रं भव सव्यसाचिन । गीतामे ई बात भगवान ओहिना नेने कहि देलखिन। हमरे-तोरे लेल कहने हेथिन । व्यर्थ बात सभसँ जँ माथाकेँ ओझरओने रहबह तँ कहिओ शांति नहि हेतह ।" " भाइ! हमरा नहि बूझल छल जे अहाँकेँ गीताक एतेक गहींर ज्ञान अछि ।" " तूँ अपन सोचह । हमर चिंता छोड़ह ।" "से की?" " सभटा कहिए देबह तँ तूँ करबह की ? समय आबह दहक सभटा बात अपने फरिछा जाएत।" “पाकड़ि भाइ! आश्चर्यक बात अछि जे अखन धरि अहाँ हमरा नहि चीन्हि सकलहुँ । " " जाए दएह । हम अपनेकेँ नहि चीन्हि सकलहुँ तँ तोहर कोन बात?" पाकड़िक गाछक बात सुनि सुग्गा जोरसँ ठहाका पाड़लक। ज्योतिषीजी एहि ठहाका सुनि ठकबिदरो लागि गेल। " सुग्गा आ एहन ठहाका । ई तँ बड़ रहस्यात्मक बुझा रहल अछि । “-ओ माथ पकड़ि कए बैसि गेलाह । -15- सुग्गा छल बड़ गुनकारी । ओकरामे पता नहि कतएसँ एतेक बुद्धि रहैक । भूत,वर्तमान,भविष्य सभ किछु देखबाक,बुझबाक सामर्थ्य रहैक । कहि नहि कतेक दिनसँ ओ ओहि पाकड़ि गाछपर बैसैत छल । पाकड़ि गाछ सेहो विशेष छल, मुदा सुग्गा जकाँ नहि । सुग्गा तँ कमाल छल । ओकरा सभहक खिस्सा बूझल छलैक,मोनो छलैक । मुदा एहि बातक जानकारी लोककेँ नहि रहैक । मात्र ज्योतिषीजी ई बात जनैत छलाह । असलमे ओकरेसँ परामर्श हेतु ओ पाकड़ि गाछतर अबैत रहल छलाह । पाकड़ि गाछ सेहो किछु-किछु सुनैत छल। मुदा कैक बेर सुग्गा तेहन भाषाक उपयोग करैत जे ओकरा किछु नहि बुझाइक। ओ सोचए जे सुग्गे थिक,एहिना टर्र,टर्र करैत होएत । मुदा बात से नहि रहैक । रहस्यसँ भरल ई सुग्गा आखिर अछि की? ज्योतिषीजीकेँ ई बात कैक बेर मोनमे खटकनि । मुदा समाधान किछु नहि फुराइन । के करैत समाधान ? रहस्यमयी एहि संसारक गप्प तँ लोक बुझिए नहि पबैत अछि आ ई सुग्गा तँ पता नहि के अछि आ किएक एही गाछपर बैसल रहैत अछि? ज्योतिषी जी ई बात सोचैत रहैत छलाह । चिंतन करैत रहैत छलाह। गामक लोकसभ हुनका एहि हालतिमे देखि सोचैत जे ओ बौराएल छथि । हुनकर उपयोगिता तँ लोककेँ तखने बुझाइत छलैक जखन ओ सभ किछु परेसानीमे पड़ैत छल ,नहि तँ हुनका केओ देखनाहरो नहि रहैत छल । ज्योतिषीजी किछु खेलाह कि रातिमे भुखले सुति रहलाह सेहो ककरो अखिआस नहि रहैत छलैक । बाह रे गाम ! लोक सोचैक जे ओ सुग्गा अछि । ज्योतिषजी सेहो सएह सोचथि से बात नहि छैक मुदा ओकर असलियत हुनको नहि बूझल रहनि । रहबो कोना करैत? ओ कखन सुग्गाक रूपमे रहैत आ कखन दोसर रूपमे से के देखलक? ओएह हाल पाकड़िक गाछक रहैक । ओ गाछ तँ कहिआ कतए सुखा गेलैक । कोनो ठीकेदार जारनि हेतु सौंसे गाछकेँ क्रमशः पांगि देने रहैक । टाकाक लोभ जे नहि करा दैक । एहन उपकारी छल पाकड़िक गाछ जतए सौंसे गाम कि इलाकाक लोक आबि कए विश्राम करैत छल । तकरो लोभी ठीकेदार नहि छोड़ने छल । परिणाम भेल जे ओ गाछ निठ्ठाह सुखा गेल । मुदा किछुए दिनमे चमत्कार भेलैक । की भेलैक? ओहिगाछमे नव-नव पातसभ निकलि गेलैक । देखिते-देखिते गाछक डारिसभ ओहिना बक्तिआर भए गेल,चारूकात पसरि गेल। किछुगोटेकेँ ई अनसोहात लगलैक ,बजबो करैक जे एना कोना भेलैक जे सुखाएल गाछ एकदमसँ हरिआ गेल । मुदा आएल पानि,गेल पानि बाटे बिलाएल पानि बला गप्प भेलैक । ककरा फुरसति रहैक जे एतेक अन्वेषण करैत रहत । लोक सभ बात बिसरि जेबाक अभ्यस्त होइत अछि । सएह भेलैक। सभ मानि लेलक जे ई गाछ बँचि गेल । चलू,नीके भेल । फेरसँ ओकर छाहरिक आनंद लेब । मुदा भेलैक तँ किछु आओर । ने ओ सुग्गा छल आ ने ओ गाछ । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.सुमन मिश्र- प्रेम सुमन मिश्र प्रेम हमर नाम थिक अच्युत । विवाहक उपरान्त आइ पहिल बेर हम आ हमर पत्नी मुंबईक नबका घर मे प्रवेश क’ रहल छी । विवाह सँ दू मास पहिने हम ई घर किराया पर लेने रही, ताकि दुनू गोटेक ऑफिस लग पड़य । हम अपने कार्यरत रही एकटा जर्मन-मूलक कम्पनी मे जेकर ऑटोमोबाइल पार्ट सभक बिक्रीक काज रहै । मुदा ई नोकरी लेबाक पाछू उद्देश्य रहय मायानगरी मे सिनेमाक पटकथा लेखक बनबाक । बूंद-बूंद सँ सागर बनैत अछि, सैह मानसिकता सँ नोकरी पकड़बाक पश्चात छिट-फुट नाटक लिखैत रहलहुँ छुट्टी सभक दिन । हर्ष सँ कहैत छी जे हमर संगिनी तारा सेहो एकटा लेखक आ पत्रकार छथि । हुनका सँ हमर पहिल भेट भेल छल पछिला बरखक राष्ट्रीय पुस्तक मेला मे, जत’ हुनकर पहिल कविता संग्रहक विमोचन हेबाक छल । हम त’ छलहुँ साहित्यप्रेमी, से हम पहिने हुनकर किछु कविता राष्ट्रीय-स्तरक पत्रिका सभ मे पढ़ने रही त’ बुझल छल जे बहुत क्रांतिकारी लेखिका छथि । मुंबई विश्वविद्यालय सँ भाषा साहित्य सँ स्नातकोत्तर क’ अखैन एकटा पैघ पत्रिका मे सह-सम्पादक छलथि । हुनकर कविता सभमे हमरा रुचि त’ बेस छल मुदा जखन हुनका पुस्तक विमोचनक मंच पर कविता धुरझार पाठ करैत देखलहुँ त’ थपरी बजबैत-बजबैत कखैन हमरक हृदय मे हिलकोर सेहो उठि गेल, से हमरा एहि आधा घण्टाक क्रम मे पता नहि चलल । एहि घटना सँ पहिने हम विवाह करबाक कखनो सोचने नहि रही, किएक त’ हमरा सँ जेठ भाइ अरविन्द अखन तक बियाह नहि कयने छलाह । मुदा तारा सँ भेट क’ हमर एहि ब्रह्मचर्यक प्रतिज्ञा छिन्न-भिन्न भ’ गेल । हुनका सँ गप्प भेल । हमर नाटक सभ जे हमरा एतेक दिन व्यर्थे बुझाइत छल, से तारा पढने रहथि पत्रिका सभ मे । हुनका नाटकक किरदार सभ सेहो मोन छलनि ! हुनकर फोन नम्बर प्राप्त भेल त’ दैनिक दिनचर्या मे धीरे-धीरे हुनका सँ गप्प-शप्प सेहो जुडि गेल । किछु दिनुक पश्चात पिताजी के कहलियैन पूरा घटना । पिताजी बेरा-बेरी कहलथि, "धुर ! पत्नी सँ किओ काजक प्रेरणा लैत अछि ? केहन नपुंसक सन्तान सभ भेल हमर.. तकर बादो, जओं अहाँ ई बजितहुँ जे कन्या सुन्नरि छै आ हमर पौत्र चकचक गोरनार हैत त’ बियाह करबै मे हमरा कोनो दिक्कत-परेशानी नहि होएत । मुदा साहित्यक धारा पर जओं ल’ जाएत ई लडिकी अहाँके आ अहाँ अपन नोकरी छोडि देलहुँ त’ हम एकटा आर संतान घर मे नहि राखब- साहित्य सँ अहाँक घर नहि चलत, आ अहाँक कनिया के हम बियाहक पश्चात ई पत्रकार बला काज नहि कर देबैन- कहने रही जे नाटक सभ लिखब बन्द करू, किछु ठोस काज पर ध्यान दियौ !" हुनकर गप्प सँ हमरा मोन पड़ल कि हमरा एहि सँ पहिने विवाहक इच्छा किएक नहि भेल । हमर मुँहक स्वाद बिगड़ि गेल ई सभ गप्प सुनि के, मुदा हमरा सुखी वैवाहिक जीवनक विषय सभ मे पिताजीक दृष्टिकोण कखनो उचित नहि बुझाइत छल । कारण जे हम तीनू भाय छोटे सँ बहुत घरेलू हिंसा देखैत-देखैत पैघ भेल रही । हमरासँ चारि बरख पैघ छथि राजीव आ दू बरख पैघ छथि अरविन्द । हम तीनू गोटेक समक्ष पिताजी हमर माँ के बहुत मारथिन्ह । पहिने मारबाक कारण पूछैत छलहुँ भाइ सभ सँ, फेर पैघ होइत-होइत मारबाक बहन्ना । भोर मे चाह नहि भेटै सँ ल’ क’ तरकारी मे नून कम-बेसी, सभ दिन हमर माँ के हाथ-पैर-माथ सभटा लहुलूहान रहैत छल। आतंक एतबे जे पिताजी के घर पर उपस्थित रहैत राजीव आ अरविन्द भाइसभ कखनो माँ के घाओ सभ पर मलहम सेहो नहि लगेलखिन्ह । हम तखनो माँ से बेसी प्रेम करैत रही, त’ गरम पानि सँ हुनकर हाथ-पैर सभ सेदि दियैन । माँ बहुत कष्ट मे रहैत छलीह, दहेज अपेक्षा सँ कम भेटइक कारण हमर बाबा-दाइ सभ कखनो हमर माँ के प्रेम-दुलार नहि देलखिन्ह । हमरा त’ आश्चर्य होइत छल जे तीनू सन्तान पुत्र कोना भ’ गेलनि - हमरे पडोसी गाम मे दूटा बेटी होइते कनियाँ के जरा देलकै ! एहि सँ हमरा लगैत छल जे माँ जेना-तेना बचि गेलथि ! जखन हम पन्द्रह बरखक रहहुँ त’ एक बेर रोटी गरम नहि भेटला सँ पिताजी माँ के बहुत बजलखिन्ह । पूरा मोहल्ला ठाढ़ छलै तमाशा देखै लेल, मुदा मध्यस्थता करबाक हेतु कियो आगू नहि आयल रहय । कारण जे पिताजी केतबो निर्दयी छलखिन्ह, मुदा पिताजी के पुलिस मे हेबाक कारणे केकरो माँ के ई कष्ट कोनो अनावश्यक कष्ट नहि बुझाइत छलनि । एहि मे मोहल्ला के महिला मंडली सेहो परिस्तिथिक अनुरूप गांधारी बनि गेल छलीह । ई घटना सँ हमरा बेस तामस चढ़ल, आ सभक सामने हम पिताजी के कहलियैन जे जओं हुनका बुते हमर माँ नहि सम्भरैत छथिन त’ हम हुनका ल’ क’ मातृक बिदा भ’ जायब । पिताजी जे एतेक तमसाएल छलथि से हमरा क्रोध मे बजैत देखि सन्न रहि गेल छलाह । एकर बाद सँ घर मे मारिपीट आ झगडा- झपटी मे कमी अवश्य भेल । मुदा माँ केँ जत’ एक ठाम गर्व होयत छैलन, ततै हमरा कहैत रहलथि, "पिताजी सँ फेर कखनो एना ऊँच आबाज मे गप्प नहि करब ! क्रोध घर-परिवार किछु नहि देखैत छै, वनक आगि जेकाँ सभटा नाश कय दैत छै..." हम हुनका आश्चर्य सँ देखलहुँ आ पुछलियैन, "बाबूजी अपन पुलिसक नोकरी आ बाबा-दाइ सभ के एतेक नीक सँ देखलखिन्ह, अहाँ संग एना किएक करैत छथि ?" माँ हमर माथक चंपी करैत बजलथि, "अपन माए के प्रति सभक बहुत प्रेम रहैत छै, बौआ ! अहाँक पिताजी के सेहो रहनि आ हुनकर बाबूजी के सेहो । मुदा अपन माए आ बांकी स्त्रीसभ संग दू प्रकारक व्यवहार होएत छै ! एकटा पुरुख आदर्श सन्तान, आदर्श पिता के संग-संग जखन-तखन हाथ उठबै वला पति सेहो भ’ सकैत अछि ! समाज स्त्रीक ई स्थिति होएबा मे बहुत योगदान देने अछि । पुरुख अपन परिवार के कोना रखैत अछि से जओं समाज मे इज्जतिक मापदंड हुअय, त’ रामराज्य मे जनक पुत्री सीता के लव-कुशक पालन-पोषण जंगल मे करबाक स्तिथि नहि होयतनि..." "...से जओं अहाँक हमर चिन्ता भेल त’ मोन राखब ई दिन कि कोना अहाँक इच्छा होएत अछि जे हमर माँ के नीक सँ रखबाक चाही । सम्बन्ध के हिसाब सँ महिला सभ संग व्यवहार मे अंतर नहि करब ।" परिणामस्वरूप ई भेलै जे राजीव भाइ जे एतेक दिन पिताजीक तरफदार रहलाह, तिनकर बियाह मे पिताजी पंद्रह लाख नगद, एकटा फोर्ड के चरपहिया आ नोएडा मे एकटा दू बेडरूमक फ्लैट लेलखिन्ह । सेहो तखन, जखन भौजी अपनो काज करैत छलथि ! पढ़लि-लिखलि नोकरी करैत पुत्री तकर बादो प्रायः कन्यागत के बोझे बुझाइत छलखिन्ह । सभटा डिमांड कर्जा ल’ क’ पूरा भेल आ विवाह सेहो सम्पन्न भेल ! पिताजी आ राजीव भाइ दुनू गोटेक मुँह चपचप करैत छलनि ! राजीव भाइ तेकर बाद पिताजीक कार्बन कॉपी बनि गेलाह । पहिने छओ मासक बाद भौजीक सरकारी नोकरी बंद करौलथि । फेर जखन भौजीक हाथ मे अपन कमायल पाइ समाप्त भ’ गेलनि त’ फेर वैह दुर्दशा ! मुदा भौजी आ माँ मे एतेक अन्तर अवश्य छलनि जे नोकरी छोडबाक तीन मास के भीतर राजीव भाइक ई अवस्था देखि भौजी अपन पिताक दहेज़ मे देल अपार्टमेंट सँ राजीव भाइ के निकालि देलखिन्ह आ पुनः नोकरी चालू क’ लेलथि । तेकर बाद राजीव भाइ हमर सभक घर मे उपहासक पात्र बनि गेलाह जे अपने पत्नी पर हिनकर कोनो जुइत नहि चलैत छनि । तेकर जवाब मे भाइ पिताजीक यैह कहलखिन्ह जे भौजी माँ जेकाँ सहनशील नहि छथि, अलग खाढी सँ छथि ! अरविंद भाइ के सेहो घरक माहौल सँ असरि पड़लनि । पिताजीक भय सँ कखनो माँ-पिताजीक झगडा मे मध्यस्थता नहि करैत छलथि, मुदा हुनकर पढाइ बेस प्रभावित भेलनि । एहि हिंसक माहौल मे भविष्य मे जीवन बेस कठिन होएत से सोचि क’ अरविंद भाइ इन्टर सँ कखनो घर लगहक कोनो डिग्री लेबाक इच्छा नहि रखलथि । की होली आ की दिवाली, कखनो अरविंद भाइ घर नहि एलाह । एक बेर फोन पर गप्प भेल त’ कहलथि, "अच्युत ! मोन बड्ड पडैत अछि घर मुदा कॉलेज मे शांति बुझाइत अछि । विवाह करबाक सेहो इच्छा नहि अछि, बहुत तनाव छै एहि मे !" कद-काठी मे अरविंद भाइ बेस नम्मा-चौडा भ’ गेल छलाह, से पिताजी सेहो आब हुनका सँ कने डेराइत छलखिन्ह । अरविंद भाइ पर कखनो पिताजी विवाह हेतु विशेष दबाव नहि देलखिन्ह । अरविंद भाइजी एकांतता मे जिबैत रहलाह । आ एहने रहतहुँ हम, जओं तारा सँ भेट नहि भेल रहितय ! अखैन तारा संग नबका घर मे प्रवेश केलहुँ त’ पाछू दिस भोतियाएल ध्यान पुनः केन्द्रित भेल वर्तमान पर । तारा अपसिआँत छलथि सामान सभ केँ गर लगबै मे, मुदा हमर मोन कनेक बेचैन छल । हम हुनका हाथ पकडि सोझे सोफा पर ल’ गेलहुँ आ सँगे बैस रहलहुँ । तारा केँ एहि सँ किछु आनंद भेटलनि, हमरा दिस मुस्किआइत बजलथि, " किछु गप्प करबाक मोन अछि ?" हम हुनका दिसि तकैत जवाब देलियैन, " हँ, सुनू ने ! अहाँ हमरा सँग रहब आब, ई नहि बूझब जे प्रसन्न रखबाक काज छुच्छे अहींक अछि । अहाँ के सेहो प्रसन्न राखब हमर दायित्व भेल- जओं नीक नहि लागत हमर कहल, त’ अवश्य बाजब । हमरा सँ अहाँक किछु अभिलाषा-अपेक्षा बुझै मे कमी हुअय त’ हमरा अहाँ सोझे बताएब । हम अहाँक भावना के जओं कखनो ठेस पहुंचायब त’ हमरा सुधारबाक अवसर देब, ठीक ने ?" तारा ध्यान सँ हमरा दिसि देखि केँ हमर गप्प सुनैत छलथि । माथ उपर-निच्चां डोला केँ सहमति दैत रहथि मुदा हमरा टोकलथि नहि, एकटक देखैत रहलथि । हम आगू बजलहुँ, "अहाँ हमरा कहने रही जे अहाँ के खेनाइ बनबय अबैत अछि, मुदा अहाँ सेहो काज करैत छी । सप्ताह मे छओ दिन औफिसक काज कयलाक बाद मोन नहि लागत भनसाघर मे । अबूह बुझाएत । अहाँक पता अछि कि हमरा खेनाइ बनबय नहि अबैत रहय, मुदा एहि बेर घर गेलहुँ त’ माँ सँ सीख लेलहुँ दालि, रोटी, भात, भुजिया आ किछु तरकारी बनायब । पहिने जेकाँ मैगी बनेबाक स्थिति नहि रहत । अपना दुनू गोटा संगे खेनाइ बनाएब, बर्तन माजब, घर सजाएब । गप्प-शप्प सेहो भ’ जाएत आ अहाँ संग कनेक बोनस समय भेटत सभ दिन ।" तारा आब हमर हाथ पकडैत ल’ गेलथि हमर बियाह कालक परिवार सभ केँ फोटो फ्रेम लग । हमर दिस पुनः तकैत आब तारा बजलथि, "अहाँक माँ हमरा कहलथि बियाह काल मे जे हमर बेटा जेकाँ नोकरी बहुतो लोक करैत अछि, पढ़ाइ मे सेहो ठीक-ठाक छल, मुदा एकरा सँ बढिया हृदय नहि हैत कोनो पुरूख के । यदि प्रेम व्यवहार मे नहि उतरैत अछि त’ से प्रेम नहि ! अच्युत केँ हमरा बाजय नहि पडल कि किछु भनसाघरक कला सेहो सीखि लेथि, अपने आबि के सीखलथि । अपन बाबूजी सँ झगड़ि केँ अहाँक परिवार सँ बियाह मे कोनो दहेज नहि लेल जाएत से सुनिश्चित केलथि । से हमर आशा अछि जे अच्युत अहाँक विशेष ध्यान रखतथि आ अहाँ सेहो हुनकर नीक सँ ध्यान राखब ।" हम फोटो फ्रेम देखैत छी इ गप्प सुनैत । फोटो मे माँ पिताजी सटल छलथि, संग-संग हंसैत सेहो छलथि, मुदा हुनकर बीच मे कोनो प्रेम नहि बुझाइत छल । हम अनायासे तारा केँ दिस फेर सँ देखैत छियैन, त’ हुनकर आँखि मे जे प्रेम बुझाइत छल से ने हम पहिने कखनो अपन घर मे देखने रही माँ-पिताजीक बीच, ने एहि सँ पहिने कहियो ताराक आँखि मे । अन्दर सँ बेसी पौरुष सेहो बुझाएल । आनन्दित भ’ हम हुनका अपना दिसि घीचैत बजलहुँ, " चलू, अपना सभ खेनाइ बनबैत छी आब !" -सुमन मिश्र, सीनियर रिसर्च फ़ेलो (आणविक जैवभौतिकी), इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc), बेंगलुरु।संपर्क- 9100810651 E-mail- snmishra8320@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.प्रमोद झा 'गोकुल'-मजदूरक व्यथा (बीहैन कथा) प्रमोद झा 'गोकुल' मजदूरक व्यथा (बीहैन कथा)
- आहिरेबा! बैसले छै? जेतै नै काम पर!!उठौ झपसिना आ नहा धोइ आबौ । गरचुन्नीक चटनी आ मड़ुवाक रोटी राखल छै! -रौदा केहन छै से ने देखै छै! - मतलब काम पर नै जेतै! -नै जेबै ते पाँच परानीक पेट कोनाके भरतै! -त' जाउ! - हँ जाइ छियै! - एना भाड़ी मोन से किए बोलै छै ? -कामे छै बड उकड़ू! - से की करतै! भागे मे जहन घून लागल छै तहन.. - ठीके कहै छै ई। कैलखिना टनटनमा कामे करैत करैत बीचे छहर पर लुढ़ैक गेलै। उठा पुठाके डागदर लग ल'गेलै ते कहलकै 'जियादा लू लैग गिया है ' आ किछुए काल मे दम तोड़ि देलकै । - गै माइ !तहन नै जाउ! परान बचे ते लाख उपाय । - से कहूँ भेलैए। वाल बच्चाक पेटक सवाल छै । जेबीमे दूगो पियौज राखि दौ। - जाउ तहन ,मुदा सम्हैरिये के रहतै । -अपना जनैत ते.. तहन..
-प्रमोद झा 'गोकुल', दीप,मधुवनी (विहार), फोन-9871779851 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.८.निर्मला कर्ण- अग्निशिखा खेप -४० निर्मला कर्ण (१९६०- ), शिक्षा - एम. ए., नैहर- खराजपुर, दरभङ्गा, सासुर- गोढ़ियारी (बलहा), वर्त्तमान निवास- राँची, झारखण्ड। झारखंड सरकार महिला एवं बाल विकास सामाजिक सुरक्षा विभागमे बाल विकास परियोजना पदाधिकारी पदसँ सेवानिवृत्ति उपरान्त स्वतंत्र लेखन। (अग्नि शिखा मूल हिन्दी- स्वर्गीय जितेन्द्र कुमार कर्ण, मैथिली अनुवाद- निर्मला कर्ण)
अग्निशिखा खेप -४०
पूर्वकथा
राजा पुरूरवा नदी मे बहल जाइत चित्रसेना के निकालि बाहर अनलथि, आ हुनकर पेट के पानि बाहर निकालवाक प्रयास करs लगलथि। आब आगू
पेट पर जोर परितहि नाक-मुंह स s पानिक अजश्र श्रोत फूटि गेल। ओ देखलनि जे आब पेट सामान्य भs गेल अछि मुदा साँस? ओ किएक नहि चलैत अछि! ओ बहुत प्रयत्न सँs हुनकर मुख खोलि अपन मुख हुनकर मुख पर राखि देलथि आ फेर जोर-जोर सँ फुकय लागलथि। किछु प्रयासक बाद श्वसन क्रिया प्रारम्भ भs गेल मुदा आँखि? ओ संभवत: बन्न रहबाक शपथ लेने छल।ओ धीरे-धीरे हुनकर केश,ललाट आ संपूर्ण शरीर पर कपड़ा केँ ऊपर सs अपन हाथ के स्पर्श सs गरमाहट देवाक प्रयास करय लगलाह। किछु समयक बाद हुनकर आँखि सेहो खुजि गेलनि । "हम...हम कतय छी...के...अहाँ......के... थिकहुँ..."- ओहि युवतीक मुख सँs क्षीण स्वर प्रस्फुटित भेल। "अहाँ एहि धरती पर सरस्वती आ नर्मदा के संगम पर छी! आ हम?...हम छी एक अभिशप्त प्रेमी!" - पुरूरवा हुनकर प्रश्नक उत्तर देलथि | ओ आवाज चिन्हलथि आ ओहि व्यक्ति दिस ध्यान सँs ताकय लगलीह जे हुनकर जीवन दाता बनि आओल छल, फेर हर्ष सँs पुलकित भs गेलीह । "अहाँ... अहाँ... पुरूरवा ... थिकहुँ ! ... उर्वशीक प्रेमी!" "हँ! अहाँ सत्य चिन्हलहुँ" - पुरूरवा खिन्न भाव सँs उदास होइत प्रत्युत्तर देलथि । "ओह हम कतेक सौभाग्यशाली छी जे अपन अंतिम क्षण मे अपन प्रियतम के दर्शन प्राप्त कs रहल छी " - युवतीक मुखमण्डल प्रसन्नता सँs चमकि गेल । "नहि-नहि, हम...हम अहाँ सs प्रेम नहि करैत छी! तखन हम अहाँक प्रेमी कोना बनि सकब"! - पुरूरवा घबराइत बजलाह। "हम तs करैत छी! नहि!नहि! चिंता जूनि करु! आब हमरा अहाँक प्रति कोनो ग्लानि, आक्षेप अथवा आपत्ति नहि अछि। हम अहाँ केँ कोनो उपालंभ नहि दs रहल छी, हम आब अहाँ सँs प्रणय -याचना नहि करैत छी। मुदा आब हमरा अपन जीवनक लक्ष्य प्राप्त भs गेल अछि । हम आब जीवित रहब! आ हम अपन जीवनक अंत धरि! जा धरि जीवित रहब ता धरि हम अपन एहि शरीर केँ अहाँक धरोहर मानि कs राखब आ एकर देखभाल करब" - युवती दृढ़ स्वर मे बजलीह । "ई अहाँ कथि कहि रहल छी! नहि!नहि! एहेन बात सब हमरा सँs नहि कहू" - पुरूरवाक मुँह सँs घबड़ाहट भरल भयभीत आवाज निकलल । "अहाँ जौं सुनs नहि चाहैत छी तs नहि सुनू, मुदा आब हम छाया जकाँ अहाँक पाछू रहब, हर संभव सेवा करब! हमरा अहाँक प्रेम एहि जनम में प्राप्त नहि भेल कुनो बात नहि, मुदा अगिला जनम में अहाँक प्रेम अवश्य प्राप्त करब। जँs एहि जीवन में मिलन नहि भेल ओकर पश्चाताप नहि, मुदा अगिला जनम में होयत अपन मिलन!" - चित्रसेना हँसय लगलीह । "चित्रसेना, हम...हम अहाँ सँ कहियो प्रेम नहि कs सकैत छी। हम...हम अपन जान सँs बेसी उर्वशी सँs प्रेम करैत छी, ओ हमर प्रियतमा छथि। हमर प्रियतमा! हमर जीवन सहारा!...हा..!हा...! हम... उर्वशी के... प्रेमी... हम उर्वशी के प्रेमी छी...." पुरूरवा एक उछाल मारि कs ओतह सs भागि गेलथि।चित्रसेना हुनका दिशि विस्मय सँs देखैत रहलीह। हुनकर एहेन दशा देखि दु:ख सs कातर भेल चित्रसेनाक आँखि सँs नोर टपकय लागल। अपन आँखि सँ s नीर वर्षा करैत चित्रसेना ओहि दिशा में प्रस्थान केलथि जाहि दिशा मे पुरूरवा किछु क्षण पहिने विदा भेल छलाह। किछुए दूर गेला उपरान्त चित्रसेना के दृष्टि पथ में पुरूरवा आबि गेलथि। हुनकर स्थिति देखि चित्रसेना के हृदय पीड़ा सौं विह्वल भs गेल। हुनक समक्ष किछु दूरी पर एकटा पैघ पीपरक गाछ छल।ओकर डाढ़ि नदी के पानि के छूबैत छल।ओहि गाछ के निकट ओ चेतनाहीन भs कs भूमि पर पड़ल छलथि । हुनकर अचेतन शरीर मृत शरीर जकाँ भूमि पर पड़ल छल। वातावरण एकदम नीरव शान्त आ कुनो तरहक स्वर सौंs मुक्त छल।पूर्णिमा के राति हेबाक कारणे वातावरण शुभ्र पूर्ण चन्द्र के चन्द्र-ज्योत्सना के धवल प्रकाश सs प्रकाशित भs रहल छल।रात्रि के प्रथम प्रहर व्यतीत भs गेल छल।एहि कारणे कतहु कोनो जीव के गतिमानताक वा हलचल के कुनो चिन्ह नहि छल। पक्षी गण के कलरव गान तक मौन छल। चिड़ै-चुनमुनी पर्यन्त अपन नीड़ में निद्रा-निमग्न छल ।ओ सभ अपन-अपन नीड़ में निद्रा निमग्न भय स्वप्नलोक में विचरण कs रहल छल। कतहु आन जागृत कुनो मानव के किछुओ चिन्ह नहि छल, कतहु कोनो वन्य प्राणिक हलचल नहि देखाइत अथवा सुनाइत छल।त्रिवेणीक कछाड़ पर पूर्ण नीरवता व्याप्त छल। प्रथम चित्रसेना के ह्रदय में विचार ऐलनि पुरूरवा के निकट जा कs हुनकर किछु सेवा सुश्रुषा करथि। हुनक मस्तक के अपन अंक में भरि कोड़ के तकिया बनाबथि जाहि सs पुरूरवा निद्रा देवी के सुखद आनंद लs सकथि। ओ अपन ह्रदय के इच्छापूर्ति हेतु आगू जयवाक प्रयास करिते रहथि कि एतबहि में अपने नेत्र के समक्ष उज्जवल चमकदार रोशनी के झमकार देखि थमकि गेलीह। अचक्के ओहि मौन परिवेश मे चण्द्र-ज्योत्सना केँ चुनौती दैत प्रकाशक तीव्र किरण पुंज क्षण भरि लेल दसो दिशा केँ रोशन कs देलक। तखन ओ प्रकाशक किरण धीरे-धीरे सिकुड़ि कs आश्चर्यजनक रूप सँs अद्भुत सौंदर्य मयी रमणी में परिणत भs गेल। ओ धीरे-धीरे आगू बढ़s लगलीह। ओ रमणी धीरे-धीरे आगू बढ़ैत रहलीह....बढ़ैत रहलीह आ आबि गेलीह पुरूरवा के निकट! हुनकर अत्यंत निकट! निकट आबि ओ दिव्य सुंदरी पुरूरवा के भूमि पर निश्चेष्ट अवस्था में पड़ल देखि अपन कोमल हाथ सs हुनकर मष्तक, उन्नत ललाट, कपोल आ ओझरायल जटाजूट बनल केश के स्नेह पूर्वक मंद-मंद सोहराबैत रहलीह।हुनकर हाथ पुरूरवा के शरीर के अंग-अंग पर सरकैत रहल, आ दुनू आँखि सs दहो-बहो नोर बहैत रहल। .ओहि मौन परिवेश मे करुण रस सँ भरल ध्वनि तरंग गुंजायमान होबय लागल । ओ करुण स्वर में विरह गीत गाबि रहल छलीह। किछु क्षणक उपरान्त पुरूरवाक नेत्र स्वयमेव फुजि गेलनि, किछु क्षण धरि आश्चर्यचकित भs ओहि सुन्दरी दिस तकैत रहलाह, फेर बहुत प्रसन्न भs हुनकर मुँह सँ चित्कार निकलि गेलनि-
"उर्वशी... अहाँ... अहाँ... आबि गेलहुँ... प्रियतमे!... अहाँ चलि एलहुँ... ओह प्रियतमा..... अहाँ हमर समक्ष छी!.....प्रियतमा अहाँ हमर समक्ष छी! की हम अहाँ केँ देखि रहल छी! हम अहीं केँ देखि रहल छी! अथवा की ई हमर मात्र स्वप्न अछि ! अहाँ सत्ते हमरा निकट छी? अहाँ किछु तs बाजू प्रियतमा!" उर्वशी उदासी भरल करुण हँसी हँसैत गंभीर भs बजलीह - . "हँ प्रिय, हम कहने रही जे अगिला साल कुरूक्षेत्र मे अवश्य भेंट करब ! आइ ओ दिन अछि, हम अपन वचन अनुरूप एतय आबि गेल छी। हम वचन भंग नहि केलहुँ।" कनिक दूर पर एकटा घनगर वृक्ष के पाछू नुकायल चित्रसेना हुनक मिलन के प्रत्यक्षदर्शी छलीह। क्रमशः अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.पद्य ३.१.प्रमोद झा 'गोकुल'-सत्त की फूसि ३.२.राज किशोर मिश्र-कौआ ३.३.आचार्य रामानंद मंडल-रुपवती/ अंगिका बज्जिका/ भासा के न बांटियो ३.४.कल्पना झा-अनुचित ३.५.अखिलेश ठाकुर- भारत हम्मर देश ३.१.प्रमोद झा 'गोकुल'-सत्त की फूसि प्रमोद झा 'गोकुल' सत्त की फूसि
सत्त की फूसि लड़ैत रहलै ढूसि आब डर होइछै कहूँ डेग ने जाइ हूसि। डगमग डगमग टाङ करै छै रहि रहिके पयर भरै छै देह कपै छै जग हसै छै तदपि ने भय ,मात्र एतबे कहुँ डेग ने जाइ हूसि। सत्त की.. श्रम स्वेद बहि टघरै छै टिकासन सँ एँड़ी हारि मानत नै इहो बड़का रगरी दिनमान दिस ताकि ताकि गिरहत करै छै काना फुस्सी। सत्त कि.. तार तार वसन सँ भेल अनचिन्हार पेट खलपट पीठके पार नोनछरैन घाम पीबि पियास मिझाबय बुढ़बा खस्सी। सत्त की.. आँखिक सोझाँ कखनो धसल आँखि घरनीक आर्त स्वर धिया पुताक दूध दूध भूख भूख करै हृदय छलनीक बुत्ता जगा उघय ईंटा उड़ियबैत भाग्यभुस्सी। सत्त कि.. देव पितर गोहरा के थाकल श्रीसूक्तक पाठ से पाकल भाग्यक भाग सड़क पूल तर चाखल यतन कयलो उत्तर थाले माखल थाकल आब पीबि पीबिके श्रम लस्सी।सत्त की ..
-प्रमोद झा 'गोकुल', दीप,मधुवनी (विहार), फोन-9871779851अपन मंतव्य editorial.ऽtaff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.राज किशोर मिश्र-कौआ राज किशोर मिश्र कौआ कौ आ तो हर का उँ-का उँ, आब नी क लगैत अछि ,
तो हर सो चब -सो च , बड़ सटी क लगैत अछि ।
तोँ तँ ने हो इ छेँ हि न्नू, आ' ने तोँ मुसलमा न,
दहेज लेल ने का टर ,ने को जगरा क भा र-चुमा न।
दक्षि ण-पथ नहि वा म- मा र्ग, तोँ ने ब्रा ह्मण, तोँ ने शूद्र , एक्कहि ग्रहक वा सी भऽ कऽ, धेलकहु ने पक्षपा ती -क्षुद्र।
का री भेलेँ तँ नी ग्रो नहि , गरदनि गो र ,तँ तोँ नहि अङरेज, तो रा मे ने को नो रङ्ग-भेद , बढ़ि आँ छौ नस्लवा द-परहेज।
का ग -का ग मे कहाँ देखलि औ, इरखा -द्वेष? मा रि -मरौ अलि ,खून-खूना मय, फौ दा री -केश।
जेहने अफ्री का , तेहने युरो प, का गत्वक नहि मि सि ओ भरि लो प।
जुग-जुग सँ छौ एक्कहि स्वभा व, केहनो हबा क नहि को नो प्रभा व।
नहि छेँ गरी ब , नहि छेँ अमी र, अर्थशा स्त्रक तोँ तँ छेँ मा ही र।
वा यस, नहि तो हर प्रजा ति मे, भेलैक संख्या क वि स्फो ट, प्रकृति क अनुकूल गा मी तोँ , ने नमहर , ने तोँ छो ट।
गंगा गेलेँ असना न करय, तँ तोँ पी लेँ महकल पा नि , अनुभव तो हर कहलकौ ,नी र पी बी नी क सँ छा नि ।
रे कौ आ! प्रकृति क असली बौ आ ! चतुरो छेँ आ' छेँ बुधि आर, मा दा का ग डा इनि ने जो गि नि , ने ओकर सा मा जि क बहि ष्का र।
मर्त्य लो क केँ नी क सँ बुझलेँ, तोँ असंग्रही , तोँ वी तरा ग, का गभुसुण्डी क वंशज! तो रा , भेटअओ खी र कि मड़ुआ-सा ग।
कंचन- पिं जर -बंधन केँ, कौ आ तोँ ने छेँ गुला म , स्वा धी नता के सा धक तोँ , स्वच्छन्दता क चा ही ने दा म।
ने चा ही तो रा भी ख-दा न, ने नुका -छि पी , बस का उँ -का उँ, ने कौ ड़ि आ-का दर ,ने देखल तो रा करैत कखनो डा उँ -डा उँ।
ने गुटबन्दी , ने रा जनी ति , ने पूरब-पछि म के लड़ा इ, ने हा हुति ने स्वा र्थी प्रवृत्ति , ने बैसि करब अपनहि बड़ा इ।
ने प्रकृति -संसा धन पर कुठा रा घा त, कएलेँ ने प्रदूषि त जल-मा टि -बसा त।
तोँ तँ प्रकृति क छेँ सपूत, मुदा स्वा र्थ-सि द्धि मे के अछि पा गल? प्रदूषण-धुंध मे ग्रह केँ धकेलि , तो रो बना देलकौ क अभा गल। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.आचार्य रामानंद मंडल-रुपवती/ अंगिका बज्जिका/ भासा के न बांटियो आचार्य रामानंद मंडल रुपवती/ अंगिका बज्जिका/ भासा के न बांटियो १ रुपवती रुपवती तोहर रुप बेमिसाल छौ। रुपवती तोहर मुखरा पूनम चान छौ। रुपवती तोहर केश कारी नागिन छौ। रुपवती तोहर भौं तीर कमान छौ। रुपवती तोहर आंख खंजनक आंख छौ। रुपवती तोहर नाक सुग्गाक चोंच छौ। रुपवती तोहर दांत अनारक दाना छौ। रुपवती तोहर यौवन इलाहाबादी लताम छौ। रुपवती तोहर मेरू सिंह समान छौ। रुपवती तोहर पांव गुलाबक पंखुरी छौ। रुपवती तोहर चाल हिरणीक चाल छौ। रुपवतीक रुप पर रामा निहाल छौ। २. अंगिका बज्जिका अंगिका बज्जिका मैथिली से हो गेल गायब। मिठगर बोली मैथिली के हो गेल गायब। अंगिका आदि कवि रहे सरहपा भे गेल गायब। बज्जिका आदि कवि रहे गयाधर भे गेल गायब। मैथिली बोली जनगणना में हो गेल गायब। मानक देलक मैथिली के बोली के गायब। भाषा राजनीतिक तीर से मैथिली हो गेल घायल। कालिदास बनल मैथिली के विद्वान काटइत बइठल डालक। संबरधन लेल मैथिली के रामा बोली के बलबरधन। ३. भासा के न बांटियो भासा के, सरहद मे न बांटियो। मैथिली के, बज्जिका अंगिका मे न बांटियो। मैथिली के, संसकृत -असंसकृत मे न बांटियो। मैथिली के, रार मानक मे न बांटियो। मैथिल के, ऊंच -नीच मे न बांटियो। मैथिल के, बाभन सोलकन मे न बांटियो। मैथिल के, छूत अछूत मे न बांटियो। मिथिला के, बज्जिकांचल अंगिकांचल मे न बांटियो। भासा के, रामा सरहद मे न बांटियो। रचनाकार-आचार्य रामानंद मंडल , सीतामढ़ी। मो-9973641075. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.४.कल्पना झा-अनुचित कल्पना झा अनुचित
घऽर ,घरारी खेत बेच क जुनि करु कन्यादान यव, हम धीया अहिक अंश छी जुनि बुझु अपनाक आन यव, बाबु, कक्का, भैया हमर दियौ अहि बात पर धियान यव, शिक्षित भ हम नाम केलुं राखु एकर मान यव, डेग डेग पर लक्षमिनियां कहलेवं, जुनि करु आबो अपमान यव, संस्कारक हऽम छी गिरह धेने राखु मिथिला क मान यव, टका क कोन इ रीत बलन अछि तोरु अहि दुकान के तहने हेतय समाधान यव,
-कल्पना झा, बोकारो, झारखंड अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.५.अखिलेश ठाकुर- भारत हम्मर देश अखिलेश ठाकुर भारत हम्मर देश भारत हम्मर देश महान, सुनावई छी ओक्कर गुणगान। जेक्कर माटी में हम खेल्लौं , करईछी ओक्कर महिमा के बखान।। गंगा माय जेक्कर चरणन के पखारत, सीमाक रक्षा करैत हिमालयराज। विश्वगुरु ब नय भारत अप्पन , करब ऐहन काज।। अल्लग - अल्लग बाजब हम्मर, अल्लग - अल्लग राजक बासी छी। तैयो हम सब एक छी , मां भारतीक सपूत कहाअई छी।। जत्त ईद क्रिसमस दिवाली , सब मिलक मनाबई छी। होली आ लोहरी में सेहो, खूब हुरदंग मचाबई छी।। राम रहीम बुद्ध ईसा आ नानक, सबहक हम सम्मान करब। ऊंच नीच जाति पात बीसरिक,रहब संगे हम सब मिलिजुली क।। ऐहन छथि माय भारती, धन - धान्य से भरई छथ सबहक घर। हमहूँ अहांक शान में माय, कटाय देब अप्पन सर।। -अखिलेश ठाकुर (एम ए शिक्षा शास्त्र), हेडमास्टर (एम एस गंगापुर), समस्तीपुर , बिहार , भारत । मोबाइल नंबर-9934241820, ईमेल आईडी athakurrcm@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। 102 || विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in विदेह ३९४ म अंक १५ मई २०२४ (वर्ष १७ मास १९७ अंक ३९४)|| 103
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३.४.कल्पना झा-अनुचित (पृ. १००-१०१) ३.५.अखिलेश ठाकुर- भारत हम्मर देश (पृ. १०२-१०३) । i
26 | | विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in BITS WAT pious , की, Rave Sale = md RET Jaret wa मोड Site | Bie S alt Ag UT TRSTHYSY TH रआपियियी TH जिन HAST TT les Fa PAG Aas QUE HA Siar ASE Th TST HITT WH PAT | IS Wiss थी TT YRS TE a एके पान BIS BET OT Sy SVEY YSYEMT 3 DE SMS BY. ७ FA Vay ay Was Dist TAG BF) एऊ विगाउत ser Ae INA FSS पान FEU vile BAD HOSA सिट्तिजतन CO Wa WAY VHT PS Hd AIA TH ras AB | रू ee SATAY A रूअवान <Alyas AST Da EASY AE syed AT Visio TOI AST Dz SNA AB TS NaS MST TS FANG DVDS THT धीठक्कि घन HID DISH रद MASA sb अँ SI WF Wise VW SRBd BAD] SPS तल IPT DS ay Se pa) | LOY, AIT एकैंएऊ गत TUS Te Wis H MT Wd DIAS pos Oy में Ags ahs! DAISY DUS DAT कब 'ज्लोति TAN DLT TSN IPS व्य IIT FAS BY, CSL IDL AMS G3 AHS TMT (AS le SN नेडिं, BITS (HAG Pot Oya APY, Lane ere Se watt, I Sarl fe vros seat 73 AS Bf जाउक कि Seine wah ore SH उतजीक Awd TMS TON DATA BY BAS HMDS ONT UDT VI Ds SAU lb) हक VMN WA HAS AAS AVM क३ TS छथिन | EAT off MAA SH GHB Bat. SA SIA Fass FAI BAS BRA, Lod TRAY या AAAS एक A DITA SAAS BAT ATANIT DIN OF HIT MEF AT AF HAS pees & DEAT Of NB SAT. हा DS z Sa Gat HH WAN OAS GTS Brana tir ae पिन EUS iG) ,ऊनकव oor pied Oa ATS SAT सका प्रीक hal रूअवानधीर OIA तय जिनके घोल Se 2S. weld HOT मर्ज ठोक TH YS Sa OO माँ एन SAO BAT TT ितक TOA H GR SA (4 SNAP OAT TA AHO
विदेह ३९४ म अंक १५ मई २०२४ (वर्ष १७ मास १९७ अंक ३९४) | | 27 BTA, THs AHS oo raat उकॉटी lor जे धर 3 Asta A SAS BF | जवान Gras कठतनि- WAR | oF उस SVT. ere ASN उन्पाक AV INAS, SiN DTH TT Tot एके SHE BEY: TS TAS तक छा DOL SF's DISTT FSGS OAT AE AE गा aa osP SHA BE ये ATA MTS BY OT MR D3 SNE TANS SAO BF MPMI HSA नि - AH LA| NIT VS 4 Ber TA NOTRE ZEST ? कमरों HI SK ACIS) Sst SEE PIA - SST eA IB are=iit FIST YN GHA WAT Ba, VT BCIAT A AY THF. बाज ARS BATS. AW BAY CHA ALT AIS BaP, [3G AKG EASY MALAS ANY BAYS Balt err aay aot it Tal ATEN TS pallies) Ses TATSET TAY करे SY कठतनि -oHHT । 93 Wal TH उयया TRC ono ATS Da ate St OA, PETIT TH WIA ये कंयउित धन ऊना ATT DVAS Ale) DAT aT CHOY Oro aro ताकनिकक FTCA PANTS (ae ATG | TSH, loeb nat ATO TEAS NS) TPL OT ae aI BAA Jas 2b | He (ताकनि एकें घर LAS lS. ७ DOI AS AL A AA PRIS TL Teorey ee एताकनिं एक Tih AAT SE कर ते ATG ON HH RBA ATS DAN in HC | TT THAT काउन mae एऊ SAT TA Yo Ald Wels जन्म ATS 50 safe ozey Md Talat ITS sid BDI SP ; WHS of यफन अनि शत «बत्वठिंजक अंज जोक TAVIS RNA EOS िकाव क३ घनत्व Shans as उप Figg ova दे d al ; pike 3734 FL TATA TMT TIA Strae TITAS SST See HAS STD Fated विजन, TA Sa STAY wt | eed “did TAT VY Sad BA) 3 PAST अन TOS BAYS | Naey aor APA old SPST
28 | | विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in vad एलन RIL व UY & Brew va, aH AA TATAM Soa 3 WAT ISAT BAYS) EASY Thal सत्र त्तकिनि एके तठ नद्धि (वलतनि। HPT तन ALAA Tata TAIT जी कठतनि - WaT जब TSA NTE OF Tat Siar जँ a हो | यों Wash TAA CH रिउजकय (DAG. TY BA AY Fd] SPFTAISA कठतनि -_ aby Rca canted जसकरटी जाज़ा BV. RABY THTAY री ATE TOA | ST जब ByiSd SOY BG BLY SAT BAY Dd एक ong SRO VT | HAST AT HA HIM, झलक SA जे APO D3 TA WA TE_PIMVA D3 US HAS TAT HS ST NAT Bl) TPT! NONS DIST HAT SHAS TMT Ld Vo | AVALIS TAY FH NAVs WT DVT DIP 53 जायज PB | खनियय ang saa HPT awe TITCATT SAH पिया SITS WIGS OF 2f 3 Te नि । Me on कु नि Aa raven Exim: 3) pee pe Rh ~ SE उन ही 3 = । खन्न =H oA A aah ay ia ee Isa पिन Pa Qh Spar MAT. ie g AST Rhy अर किक UR 43d ba रउन DaNSIA LAS -TAG GS अपयक (BS लव TS SAE at _STRD ATS! NIT जयंत HAMA Tha vay Ne Sa’ tad Onoats | उध्यन उकटी GNABSL जन सर TS AA ATI SOT aces SRS ।४ ऊताशथय गा SATS AAS Carl ae figs DE SSS Ss BINT उपतयिन AN SRL, INTE SERA SY उ अमन ATE लत BL! TAIL GVH oT RAS et ib ee Tatar ail" SO Ear E रे सनिवत | aT AIT WIAs TS, PALMS HA FT F AH TY) TAS ANB; TS APO SAMAK Tad SNSOHNS IH VN WW Tz TT | TATA, ST HSA - HST IDLY | NAAT