ISBN 978-93-340-7344-7 (Book) ISSN 2229-547X (online) 𑒀 विदेह ३९५ म अंक ०१ जून २०२४ (वर्ष १७ मास १९८ अंक ३९५) [विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। कॉपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- २०२४. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२४. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. It is a platform for scholars, researchers, writers and poets to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, and poetry in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@gmail.com. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover designed by AUM GAJENDRA THAKUR Videha e-Journal: Issue No. 395 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- नरेन्द्र झा विशेषांक १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय- नरेन्द्र झा- चपल चरन चित चंचल भान (पृ. २-६) २.१.प्रस्तुत विशेषांकक संदर्भमे (पृ. १०-२८) २.२.नरेन्द्र झाजीक संक्षिप्त परिचय (पृ. २९-३४) २.३.कल्पना झा- "अनुशीलन"क अनुशीलन आवश्यक (पृ. ३५-४३) २.४.मुन्नी कामत- मिथिला-मैथिल केर चहुविकासक शुभचिंतक श्री नरेन्द्र झा (पृ. ४४-५०) २.५.हितनाथ झा- आत्मविश्वासक प्रेरणास्रोत डा. प्रो. पन्ना झा (पृ. ५१-५८) २.६.अजित कुमार झा- मिथिलाक अर्थशास्त्री: श्री नरेन्द्र झा (पृ. ५९-६४) २.७.डॉ. धनाकर ठाकुर- श्री नरेन्द्र झा-मिथिलाक आर्थिक पक्ष रखनिहार किन्तु ऐतिहासिक विभ्रम उत्पन्न केनिहार लेखक (पृ. ६५-७२) २.८.अशोक- मिथिला मैथिली आ नरेन्द्र बाबू (पृ. ७३-७८) २.९.लक्ष्मण झा सागर- श्री नरेन्द्र झाजी: हमरा नजरिमे (पृ. ७९-८४) २.१०.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'- की थिक मिथिला की छथि मैथिल (पृ. ८५-८८) २.११.जीवन मिश्र- अद्भुत देश मिथिला (मिथिला राइजिंग: प्रकाशनसँ एखन धरि, हमरा नजरिसँ हमर सूचना सहित) (पृ. ८९-१४८) २.१२.प्रणव झा- नरेंद्र झा: सीए, मैथिल आर्थिक-सामाजिक लेखक आ मिथिला अभियानी (पृ. १४९-१५६) २.१३.रमेश- मिथिलाक अर्थव्यवस्थाक विरल व्याख्या करैत लेखक: नरेन्द्र झा, सी.ए. (पृ. १५७-१६८) २.१४.मधुकांत झा- नरेन्द्र झा लिखित मिथिलाक आर्थिक संरचनापर प्रकाशित पुस्तक-एक ऐतिहासिक दस्तावेज (पृ. १६९-१७३) २.१५.शैलेन्द्र मिश्र- श्री नरेन्द्र झा : मिथिलाक अर्थतंत्रक जानकारी रखनिहार एकटा विशेषज्ञ अर्थशास्त्री (पृ. १७४-१८०) २.१६.डॉ कैलाश कुमार मिश्र- अर्थतंत्र ओ भ्रष्टाचार: नरेन्द्र झा केर पोथी सँ विषय वस्तु आ व्यक्ति केर व्यक्तित्व पर चिंतन (पृ. १८१-१९४) २.१७.आशीष अनचिन्हार- कुपोषित मैथिली भाषा-साहित्य लेल एकटा अनिवार्य पौष्टिक तत्व: नरेन्द्र झा (पृ. १९५-२०१)
१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय नरेन्द्र झा चपल चरन चित चंचल भान सैसव जौवन दरसन भेल। दुहु दल-बलहि दन्द-परि गेल।। कबहुँ बाँधए कच कबहुँ बिथार। कबहुँ झाँपए अँग कबहुँ उघार।। थीर नयान अथिर किछु भेल। उरज उदय-थल लालिम देल।। चपल चरन, चित चंचल भान। जागल मनसिज मुदित नयान।। विद्यापति कह करु अवधान। बाला अंग लागल पंचवान।। [सैसव आ जौवनक भेंट भेल। दुनूक दल-बलमे द्वन्द्व बजरि गेल॥ कखनो ओ अपन कच (केश) बान्है छथि, कखनो फलका (बिथार) दइ छथि। कखनो अपन अंगकेँ झाँपै छथि, कखनो उघारि दइ छथि॥ थीर नयन आब अथिर भऽ गेलन्हि। उरोजक उदय-स्थल ललौन भऽ गेल छन्हि॥ चरण चपल छन्हि; आ चित्त चंचल सन भान भऽ रहल अछि। मनसिज (कामदेव) मुदित नयन (नयान) मे जागल छथि। विद्यापति कहै छथि- संयम (अवधान- रोकटोक) राखू। बालाक अंगमे पाँचू वाण (मनसिज माने कामदेवक) लागल छन्हि।] (ज्योतिरीश्वर पूर्व महाकवि विद्यापति) नरेन्द्र झा अपन आत्मकथ्य ’चपल चरन चित चंचल भान’ (अंतिका, जनवरी-जून २००९) नामसँ लिखने छथि। सन् १९३४, भूकम्प भेलै मिथिलामे, सहस्रबाढ़नि देखाइ पड़ल रहै किछु बर्ख पहिने, किछु अनहोनी हेतै, से लोक अनदाजने रहै। आ तही भूकम्पमे नरेन्द्र झा केर बाबाक घर धराशायी भऽ गेलन्हि आ ओ सभ अपन नव-घराड़ी बनेलन्हि, पुरखाक खुनायल पोखड़िक दछिनबाड़ी भीड़पर। आ ओही नव घराड़ीपर जन्म भेलन्हि नरेन्द्र झा केर २२ सितम्बर १९३४ केँ। गाम तरौनी। फेर शिव सिंहक समयमे करमहे मूलक श्रोत्रिय ब्राह्मणक ओ चर्च करै छथि जे तथ्यात्मक रूपेँ गलत अछि जँ ब्राह्मणक उपजातिक रूपमे स्रोत्रिय केँ देखी। हँ वेदपाठीकेँ श्रोत्रिय कहल जाइ छै, आ से सम्पूर्ण भारत/ नेपालमे आ से अखनो। महाराज हरसिंहदेव- मिथिलाक कर्णाट वंशक। ज्योतिरीश्वर ठाकुरक वर्ण-रत्नाकरमे हरसिंहदेव नायक आकि राजा छलाह। १२९४ ई. मे जन्म आ १३०७ ई. मे राजसिंहासन। घियासुद्दीन तुगलकसँ १३२४-२५ ई. मे हारिक बाद नेपाल पलायन। मिथिलाक पञ्जी-प्रबन्धक ब्राह्मण, कायस्थ आ क्षत्रिय मध्य आधिकारिक स्थापक, मैथिल ब्राह्मणक हेतु गुणाकर झा, कर्ण कायस्थक लेल शंकरदत्त, आ क्षत्रियक हेतु विजयदत्त ऐ हेतु प्रथमतया नियुक्त्त भेलाह। हरसिंहदेवक प्रेरणासँ- आ ई हरसिंहदेव नान्यदेवक वंशज छलाह, जे नान्यदेव कार्णाट वंशक १००९ शाकेमे स्थापना केने रहथि- नन्दैद शुन्यं शशि शाक वर्षे (१०१९ शाके)... मिथिलाक पण्डित लोकनि शाके १२४८ तदनुसार १३२६ ई. मे पञ्जी-प्रबन्धक वर्तमान स्वरूपक प्रारम्भक निर्णय केलन्हि। पुनः वर्तमान स्वरूपमे थोडे बुद्धि विलासी लोकनि मिथिलेश महाराज माधव सिंहसँ १७६० ई. मे आदेश करबाय पञ्जीकारसँ शाखा पुस्तकक प्रणयन करबओलन्हि। ओकर बाद पाँजिमे (कखनो काल वर्णित १६०० शाके माने १६७८ ई. वास्तवमे माधव सिंहक बादमे १८०० ई.क आसपास) श्रोत्रिय नामक एकटा नव ब्राह्मण उपजातिक मिथिलामे उत्पत्ति भेल। [मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध खण्ड १ आ २ द्रष्टव्य (जीनोम मैपिंग आ जीनियोलोजिकल मैपिंग, २००९, २०१२, गजेन्द्र ठाकुर, पञ्जीकार विद्यानन्द झा, नागेन्द्र कुमार झा)] फेर राधाकृष्णक भक्त हिनकर बाबा पोखरिक भीड़पर मन्दिर बनाबऽ चहै छला, मुदा राघोपुरक पछवारि ड्योढ़ी (कार्नवालिसक स्थायी बन्दोबस्त दरभंगा राजकेँ भेटल रहै, जे वास्तवमे जमीन्दार छलाह, जिनका लोक अज्ञानतावश राजा, महराजा इत्यादि कहै छन्हि; आ स्थायी बन्दोबस्तक जमीन्दारक अन्तर्गत मारिते रास वसूली एजेण्ट/ गुमाश्ता सभ बहाल छल जकरा ड्योढ़ी इत्यादि कहल जाइत अछि।) रोक लगेलकन्हि से केस-फौदारी भेल जइमे हिनकर जेठ पित्ती भगीरथ झा आ बहिया गनौरा लड़ाइमे अगुआ रहथि। आ हिनकर वैष्णव गुरुबाबा ककरो पोखरिमे माछ नै मारऽ द इ छलखिन्ह, कियो मलाह चोरा-नुका कऽ पैसि गेल तँ ईहो पानिमे पैसि कऽ ओकरा भगबैत छलाह। नरेन्द्र झा दरभंगासँ १९५४ ई. मे आई कॉम केलन्हि, फेर बी.कॉम केलन्हि। दरभंगामे किछु दिन लक्ष्मण झा (प्रसिद्ध लखन झा) संगे मिथिला-मैथिलीक काज केलन्हि। तही बीच सुनीति कुमार चटर्जी आ मिथिला रिसर्च इन्स्टीट्यूटक चर्चा अबैत अछि, आ मिथिलाक संस्कृत पण्डित लोकनि संग सुनीति कुमार चटर्जीक अशोभनीय व्यवहार, लक्ष्मण झा केर उलहन आ सुनीति कुमार चटर्जीक स्पष्टीकरणक चर्च होइत अछि। आ फेर कलकत्ता (आब कोलकाता) मे रहि, अगस्त १९५६ सँ सी.ए. केर तैयारी शुरू केलन्हि आ १९६६ क जनवरीमे चार्टर्ड अकाउण्टेण्ट (सी.ए.) भऽ गेला, फेर कलकत्ता दिल्ली होइत १९७५ ई सँ स्थायी रूपेँ पटनावासी भऽ गेला। तही बीच ३ जुलाई १९५९ केँ पन्ना झा संगे विवाह भेलन्हि। १९६४ ई. मे पत्नी बिहार विश्वविद्यालयसँ मनोविज्ञानमे बी.ए. (ऑनर्स) केलखिन्ह। १९६५ ई. मे पत्नी सेहो कलकत्ता आबि गेलखिन्ह। १९९७-९८ मे हृदय रोगक ऑपरेशन भेलन्हि आ मिथिला मैथिली लेल सक्रिय काज नै कएल हेतन्हि से बुझना गेलन्हि। से लेख लिखब शुरू केलन्हि आ आकाशवाणी पटनाक मैथिली कार्यक्रम ’भारती’ मे भाग लेब शुरू केलन्हि। अखन धरि हिनकर आ हिनकर पत्नीक निम्न पोथी सभ छपि गेल छन्हि, जे हिनकर अनुमतिसँ विदेह पेटारमे पी.डी.एफ. फार्मेटमे http://www.videha.co.in/pothi.htm लिंक पर उपलब्ध अछि (Psycho Social Stress and Schizophrenia 2003 केँ छोड़ि कऽ जे उपलब्ध नै भऽ सकल।) नरेन्द्र झा मिथिलाक आर्थिक विकास (२०००), मिथिलाक जनपदीय विकास (२००५), मिथिला मे जल-संसाधन ओ प्रबन्धन (२००६), विकास ओ अर्थतंत्र (२००८), परिभ्रमण (२०१२), अर्थतंत्र ओ भ्रष्टाचार (२०१२), स्मृति (२०१३); Mithila Rising (2014); चपल चरन चित चंचल भान (२०२१)। पन्ना झा Psycho Social Stress and Schizophrenia 2003; अनुभूति (लघुकथा संग्रह) २००९, अनुशीलन (निबन्ध संग्रह) २०१२, अभिलाषा (लघुकथा संग्रह) (२०२१)। पटनाक मैथिली संस्था ’चेतना समिति’ केँ ओ ’अचेतना समिति’ कहै छथि, ऐ संस्थाक काजे सभ तेहने छै। हुनका कलकत्ता, जकरा ओ मिथिला-मैथिलीक कर्मभूमि कहै छथि, छुटबाक दुख छन्हि, ओ प्रबोध बाबू, बाबू साहेब चौधरी, सुखदेव ठाकुर, श्रीकान्त मण्डलकेँ मोन पाड़ै छथि, ओ सभ आब नै छथि। वीरेन्द्र मल्लिक अपन प्रज्वलित मैथिली साहित्यक रचना छोड़ि कर्मकाण्डमे ओझरायल छथि। असगरे रामलोचन ठाकुर की-की करताह (चपल चरन चित चंचल भान २००९ मे लिखल गेल आब रामलोचन ठाकुर सेहो स्वर्गीय भऽ गेल छथि।)। पत्नी पन्ना झा आ अनुज अग्निपुष्प आ कुणालकेँ कलकत्ता सँ पटना लऽ अनलन्हि जतऽ मैथिलीक काज नहिये सन होइत अछि। पन्ना झा संघक काज मे लागल रहै छथि (आब ओहो स्वर्गीय), अग्निपुष्प पत्रिका ’संवाद’ कुहरि कऽ निकालि रहल छथि, कुणाल मैथिली नाटक सीरियल निकालैमे लागल रहै छथि। जिबैत जी मिथिला राज्य नहिये बनि सकतनि। टिप्पणी: नरेन्द्र झा जी केर पोथीमे देल परिचयमे हुनकर मायक नाम नै भेटल तेँ परिचयमे नै देल जा सकल। पुनश्च: विदेहक नरेन्द्र झा विशेषांक ई-प्रकाशित भेलाक बाद श्री कुणाल जी नरेन्द्र झा जी केँ विशेषांक मुद्रित करा कऽ देलखिन्ह। केदारनाथ चौधरी विशेषांक बेरमे सेहो श्री अरविन्द गुप्ता जी विदेह ई-पत्रिकाक लिंक केदारनाथ चौधरी जी केँ देने रहथिन्ह, आ ई-पत्रिकाक विशेषांक मुद्रित करा कऽ सेहो। सभ गोटेक आभार। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। नरेन्द्र झा विशेषांक २.१.प्रस्तुत विशेषांकक संदर्भमे २.२.नरेन्द्र झाजीक संक्षिप्त परिचय २.३.कल्पना झा- "अनुशीलन"क अनुशीलन आवश्यक २.४.मुन्नी कामत- मिथिला-मैथिल केर चहुविकासक शुभचिंतक श्री नरेन्द्र झा २.५.हितनाथ झा- आत्मविश्वासक प्रेरणास्रोत डा. प्रो. पन्ना झा २.६.अजित कुमार झा- मिथिलाक अर्थशास्त्री: श्री नरेन्द्र झा २.७.डॉ. धनाकर ठाकुर- श्री नरेन्द्र झा-मिथिलाक आर्थिक पक्ष रखनिहार किन्तु ऐतिहासिक विभ्रम उत्पन्न केनिहार लेखक २.८.अशोक- मिथिला मैथिली आ नरेन्द्र बाबू २.९.लक्ष्मण झा सागर- श्री नरेन्द्र झाजी: हमरा नजरिमे २.१०.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'- की थिक मिथिला की छथि मैथिल २.११.जीवन मिश्र- अद्भुत देश मिथिला (मिथिला राइजिंग: प्रकाशनसँ एखन धरि, हमरा नजरिसँ हमर सूचना सहित) २.१२.प्रणव झा- नरेंद्र झा: सीए, मैथिल आर्थिक-सामाजिक लेखक आ मिथिला अभियानी २.१३.रमेश- मिथिलाक अर्थव्यवस्थाक विरल व्याख्या करैत लेखक: नरेन्द्र झा, सी.ए. २.१४.मधुकांत झा- नरेन्द्र झा लिखित मिथिलाक आर्थिक संरचनापर प्रकाशित पुस्तक-एक ऐतिहासिक दस्तावेज २.१५.शैलेन्द्र मिश्र- श्री नरेन्द्र झा : मिथिलाक अर्थतंत्रक जानकारी रखनिहार एकटा विशेषज्ञ अर्थशास्त्री २.१६.डॉ कैलाश कुमार मिश्र- अर्थतंत्र ओ भ्रष्टाचार: नरेन्द्र झा केर पोथी सँ विषय वस्तु आ व्यक्ति केर व्यक्तित्व पर चिंतन २.१७.आशीष अनचिन्हार- कुपोषित मैथिली भाषा-साहित्य लेल एकटा अनिवार्य पौष्टिक तत्व: नरेन्द्र झा नरेन्द्र झा विशेषांक २.१.प्रस्तुत विशेषांकक संदर्भमे प्रस्तुत विशेषांकक संदर्भमे 1 2008 सँ एखन धरि विदेह http://videha.co.in/ द्वारा जे विशेषांक सभ आएल अछि तकरा तीन चरणमे बाँटि सकैत छी। पहिल चरण 2008सँ जनवरी 2015 धरि जाहिमे विषय आधारित विषेषांक सभ प्रकाशित भेल आ मधुपजीपर सेहो विषेषांक प्रकाशित भेल। एकदम प्रारंभिक विषेषांक सभमे "विशेषांक" नाम नहि लीखल गेल छै मुदा ओहिमे ओहन रचनाक बेसी स्थान देल गेल छै सायास रूपें (क्रम-1 सँ 12)। दोसर चरण भेल 2015 सँ लऽ कऽ एखन धरि जाहिमे मात्र जीवित लेखकपर विशेषांक प्रकाशित करबाक निर्णय लेल गेल आ इम्हर पछिला बर्ख एहिमे संस्था आ पत्र-पत्रिकापर विशेषांक प्रकाशित करबाक सेहो निर्णय लेल गेल क्रम- 13 एवं 14, 20 सँ 30)। तेसर चरण भेल पछिला सालमे विदेहक संपादक द्वारा "नित नवल सिरीज" प्रकाशित करबाक (एकर विवरण अलगसँ देल गेल अछि)। विदेह द्वारा 'जीवैत लेखकपर विशेषांक शुरू कएल गेल छल 2015 सँ जे विभिन्न नामसँ होइत आब "विदेहक जीवित मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशकपर विशेषांक शृंखला" नामसँ जानल जाइत अछि। मैथिलकर्मीसँ हमर सभहक आशय जिनकर काज मिथिला-मैथिली-मैथिली लेल कोनो माध्यमसँ भेल हो। ओ संगठनकर्ता सेहो भऽ सकै छथि, आन भाषाक लेखक सेहो। तहिना संगीतकर्मी मने गीत-संगीतसँ जुड़ल लोक। निच्चा एहि सभ चरण केर विस्तृत सूचना क्रमबद्ध रूपें देल जाएत। विदेहक विशेषांक सभ लेल हम ओहनो लोक सभ लग आलेख लेल जाइत छी, हुनका सूचना दैत छी जे कि हमर, विदेह या गजेन्द्र ठाकुरक धुर विरोधी छथि। दू-चारि लोक कहि सकै छथि जे हमरा सूचना नहि भेटल, तऽ हुनकासँ हमर आग्रह जे कमसँ कम ओ अपन ह्वाटसएप आ फेसबुक केर मैसेज बॅाक्स (इनबॅाक्स) देखथि। हमर एहि प्रयासक प्रतिफल विदेहक आन विशेषांक संगे एहूमे देखाइ पड़त से उम्मेद अछि। 20 दिसंबर 2023 केँ विदेह नरेन्द्र झा जीक ऊपर विशेषांक प्रकाशित करबाक सार्वजनिक घोषणा केलक आ प्रस्तुत अछि ई विशेषांक। एहि सूचनाकेँ एहि लिंकपर देखि सकैत छी-घोषणा। श्रीमती पन्ना झा लेखिका छथि आ श्री नरेन्द्र झा जीक पत्नी सेहो। मैथिलीमे दंपति लेखक केर जे अवधारणा छै ताहिमे ईहो एकटा छथि। तऽ अइ विशेषांक केर अवसरपर हमरा लोकनि श्रीमती पन्ना जीक किछु रचनापर चर्चा सेहो राखि रहल छी। उद्येश्य अतबे जे विदेहक पाठक एहि अंकमे नरेन्द्रजीक संग पन्नोजीकेँ जानि सकथि। एहि विशेषांकसँ पहिने विदेह 30 टा विशेषांक प्रकाशित कऽ चुकल अछि आ एहिठाम आब हम कहि सकैत छी जे ई एकटा चुनौतीपूर्ण काज छै। अनेक संकट केर सामना करए पड़ैत अछि लेख एकट्ठा करएमे। मुदा संगहि ईहो हम कहब जे संकटसँ बेसी हमरा लग समर्थन अछि। हँ, ई मानएमे हमरा कोनो दिक्कत नहि जे जतेक लेख केर उम्मेद केने रहैत छी हम ततेक नै आबैए, जतेक लोक लिखबाक लेल गछैत छथि से सभ अंत- अंत धरि आबि चुप्प भऽ जाइत छथि। आ एकर कारणो छै, किनको ई लागै छनि जे आनपर लिखब से हम अपने रचना किए ने लीखि लेब, किनको लग पोथिए नै रहै छनि, जखन कि हम सभ यथासंभव पाठककेँ विकल्प रूपमे पोथीक पी.डी.एफ फाइल सेहो देबाक लेल तैयार रहैत छी। कियो विदेहक समावेशी रूपसँ दुखी छथि, तँ किनको मित्रकेँ विदेहसँ दिक्कत छनि तँइ ओ नहि देता। एकरो हम संकटे बुझै छियै जे सभ फेसबुकपर लंबा-लंबा लेख वा कमेंट टाइप कऽ लै छथि सेहो सभ विदेह लेल हाथसँ लिखल पठाबैत छथि। जे सभ कहियो काल फेसबुकपर टाइप कऽ लीखै छथि तिनकर आलेख हम सभ टाइप करिते छी। खएर पहिने कहलहुँ जे संकटसँ बेसी समर्थन अछि तँइ आइ पहिलसँ लऽ कऽ तीसम (संस्था सहित) विशेषांक धरि पहुँचलहुँ हम। आन विशेषांक लेल इएह बात मानू। 2008 सँ लऽ कऽ 2024 क एखन धरि 31 टा विशेषांक प्रकाशित भेल मने बर्खमे दू टासँ कनी कम। निश्चिते समर्थन बेसी भेटल हमरा। जखन कि विदेहक ई एकतीसो विशेषांक केर अलावे आन अंक हरेक पंद्रह दिनपर (मासमे दू बेर) लगातार प्रकाशित भइए रहल अछि। एकर अतिरिक्त ईहो बात संतोषदायक अछि जे विदेहक हरेक व्यक्तिपरक विशेषांक अभिनंदनग्रंथ हेबासँ बाँचि गेल अछि। मुख्यधारा जकाँ विदेहकेँ अभिनंदनग्रंथ नहि चाही। अभिनंदनग्रंथ अहू दुआरे नै चाही जे ओहिसँ लेखक वा जिनकापर निकालल गेल छनि तिनकामे सुधारक गुंजाइश खत्म भऽ जाइत छै। तँइ विदेहक विशेषांकमे आलोचना-प्रसंशा सभ भेटत। नरेन्द्र झाजीक रचना वा हुनकर अवदानक ऊपर कतहुँ किछु प्रकाशित भेल हो तकर संख्या बहुत कम हएत कारण कमसँ कम हम ओकरा अवलोकन करबासँ वंचित छी। बहुत संभव नरेन्द्र झाजीक ऊपर लिखल गेल हो मुदा हमहीं नै देख सकल होइ, एहन स्थितिमे पाठक-आलोचक हमरा सूचित करथि हम अपन सूचनाकेँ सुधारि लेब। एहि संदर्भमे हम कहि सकै छी जे विदेहक ई प्रस्तुत विशेषांक एहन पहिल प्रयास अछि जाहिमे ई बुझबाक प्रयास कएल अछि जे नरेन्द्र झाजीक रचना केहन छनि। ई अलग बात जे हम सभ कतेक सफल वा असफल भेलहुँ से पाठक कहता। एहि विशेषांक केर शुरूआत विदेहक आने विशेषांक जकाँ अछि। संगे-संग ई क्रम ने तँ उम्रक वरिष्ठता केर पालन करैए आ ने रचनाक गुणवत्ताक। हँ, एतेक धेआन जरूर राखल गेल छै जे पाठकक रसभंग नहि होइन आ से विश्वास अछि जे रसभंग नै हेतनि। पहिने विदेहक सभ अंक नागरी, तिरहुता आ ब्रेल लिपिमे प्रकाशित होइत छल आब एहिमे कैथी, नेवाड़ी, एवं आइ.पी.ए. लिपि सेहो जोड़ल गेल अछि, मने एखन विदेह कुल छह लिपिमे प्रकाशित होइए। एकर अतिरिक्त विदेहक किछु अंक रंजना (नेवारी केर एक आर रूप), ब्राह्मी, खरोष्ठी, उर्दू, तिब्बती एवं तिब्बती-उमे लिपिमे सेहो छपल अछि। कुल मिला कऽ देखी तँ विदेह बारह लिपि अपना लेल रखने अछि जाहिमेसँ कुल छह टा लिपिमे विदेह लगातार प्रकाशित भऽ रहल अछि। 2 पाठक जखन एहि विशेषांककेँ पढ़ताह तँ हुनका वर्तनी ओ मानकताक अभाव लगतनि। वर्तनीक गलती जे थिक से सोझे-सोझ हमर सभहक गलती थिक जे हम सभ संशोधन नै कऽ सकलहुँ मुदा ई धेआन रखबाक बात जे विदेह शुरुएसँ हरेक वर्तनी बला लेखककेँ स्वीकार करैत एलैए। तँइ मानकता अभाव स्वाभाविक। एकर बादो बहुत वर्तनीक गलती रहल गेल अछि जे कि हमरे सभहक गलती अछि। मैथिलीमे किछुए एहन पत्रिका अछि जकर वर्तनी एकरंगक रहैत अछि आ ई हुनक खूबी छनि मुदा जखन ओहो सभ कोनो विशेषांक निकालै छथि तखन वर्तनी तँ ठीक रहैत छनि मुदा सामग्री अधिकांशतः बसिये रहैत छनि। ऐतिहासिकताक दृष्टिसँ कोनो पुरान सामग्रीक उपयोग वर्जित नै छै मुदा सोचियौ जे 72-80 पन्नाक कोनो प्रिंट पत्रिका होइत छै ताहिमे लगभग आधा सामग्री साभार रहैत छनि, तेसर भागमे लेखक केर किछु रचना रहैत छनि आ चारिम भागमे किछु नव सामग्री रहैत छनि। मुदा हमरा लोकनि नव सामग्रीपर बेसी जोर दैत छियै। एकर मतलब ई नहि जे वर्तनीमे गलती होइत रहै। हमर कहबाक मतलब ई जे संपादक-संयोजककेँ कोनो ने कोनो स्तरपर समझौता करहे पड़ैत छै से चाहे वर्तनीक हो कि, मुद्राक हो कि विचारधारक हो कि सामग्रीक हो। हमरा लोकनि वर्तनीक स्तरपर समझौता कऽ रहल छी मुदा कारण सहित। प्रिंट पत्रिका एक बेर प्रकाशित भऽ गेलाक बाद दोबारा नै भऽ सकैए (भऽ तँ सकैए मुदा फेर पाइ लागि जेतै) तँइ ओकर वर्तनी यथाशक्ति सही रहैत छै। इंटरनेटपर सुविधा छै जे बीचमे (इंटरनेटसँ प्रिंट हेबाक अवधि) ओकरा सही कऽ सकैत छी मुदा सामग्रिए बसिया रहत तँ सही वर्तनी रहितो नव अध्याय नै खुजि सकत तँइ हमरा लोकनि वर्तनी बला मुद्दापर समझौता केलहुँ। हमरा लोकनि कएलनि, कयलनि ओ केलनि तीनू शुद्ध मानैत छी, एतेक शुद्ध मानैत छी एकै रचनामे तीनू रूप भेटि जाएत। आन शब्दक लेल एहने बूझू। उम्मेद अछि जे पाठक विदेहक आने विशेषांक जकाँ एकरा पढ़ताह आ पढ़ि एकर नीक-बेजाएपर अपन सुझाव देताह। जँ अहाँ अइ विशेषांक केर PDF पढ़ि रहल छी तँ कोनो शब्द वा पाँति अंडरलाइनमे वा बिना अंडरलाइनकेँ नीला वा कोनो रंगक देखाए तँ बुझि लिअ जे ओहिमे लिंक देल गेल छै रेफरेंस लेल आ तकरा क्लिक करबै तँ ओ लिंक खुजि जाएत। कोनो-कोनो फोटोमे सेहो लिंक देल गेल छै। पाठक एहि माध्यमसँ कम समयमे रेफरेंस सभहक अध्य्यन कऽ सकै छथि। मुदा प्रिंटमे प्रकाशित पोथीमे ई सुविधा नै रहत। अइ कारणसँ भऽ सकैए जे पाठककेँ एहि पोथीक किछु पाँति प्रचलित नै बुझेतनि। जाहि ठाम लिंक देल गेल छै ताहि ठामक पाँतिक किछु शब्दक बीच बेसी स्थान छूटल छै। ओकरा एक पाँति बना पढ़ी से आग्रह। हम चाहितहुँ तँ सभ लिंक वा चित्रकेँ एकठाम दऽ सकै छलहुँ मुदा हमर सोच अछि जे पाठककेँ एकै ठाम तर्क आ सबूत भेटनि। विदेहक द्वारा जीवैत लेखक ओ संस्थाक विशेषांक शृखंलामे प्रकाशित भेल आन विशेषांक सभहक लिस्ट एना अछि (एहिठाम जे अंकक लिस्ट देल गेल अछि ताहि अंकपर क्लिक करबै तँ ओ अंक खुजि जाएत)। जे विशेषांक केर विदेहक लिंक छै ठीक तकर निच्चा एहि किछु विशेषांकक पोथी.कॅम केर प्रिंट आॉन डिमांड लिंक अछि जाहि ठाम पाठक एकरा आॉनलाइन कीनि सकै छथि- 1) हाइकू विशेषांक 12 म अंक, 15 जून 2008 2) गजल विशेषांक 21 म अंक, 1 नवम्बर 2008 3) विहनि कथा विशेषांक 67 म अंक, 1 अक्टूबर 2010 4) बाल साहित्य विशेषांक 70 म अंक, 15 नवम्बर 2010 5) नाटक विशेषांक 72 म अंक 15 दिसम्बर2010 6) समीक्षा विशेषांक 7) नारी विशेषांक 77म अंक 01 मार्च 2011 8) अनुवाद विशेषांक (गद्य-पद्य भारती) 97म अंक 9) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक 111 म अंक, 1 अगस्त 2012 10) भक्ति गजल विशेषांक 126 म अंक, 15 मार्च 2013 11) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक 142 म, अंक 15 नवम्बर 2013 12) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक 169 म अंक 1 जनवरी 2015 13) अरविन्द ठाकुर विशेषांक 01 नवम्बर 2015 अंक 189 https://store.pothi.com/book/गजेन्द्र-ठाकुर-सम्पादक-विदेह-अरविन्द-ठाकुर-विशेषांक/ विदेहक अरविन्द ठाकुर विशेषांक केर पोथी रूप "स्वतंत्रचेता- अरविन्द ठाकुर: व्यक्तित्व-कृतित्व" केर नामसँ प्रकाशित भेल। 14) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक 01 दिसम्बर 2015 अंक 191 https://store.pothi.com/search/?q=गजेन्द्र%20ठाकुर 15) विदेह सम्मान विशेषाक- 200म, भाग-1, 15 अप्रैल 2016 16) विदेह सम्मान विशेषाक- 205म, भाग-2, 1 जुलाई 2016 17) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- 217 म अंक 01 जनवरी 2017 18) मैथिली वेब पत्रकारिता विशेषांक-313म अंक 1 जनवरी 2021 19) मैथिली बीहनि कथा विशेषांक-2, 317 म अंक 1 मार्च 2021 20) रामलोचन ठाकुर विशेषांक 01 अप्रैल 2021 अंक 319 https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-editor-विदेह-रामलोचन-ठाकुर-विशेषांक/ 21) राजनन्दन लाल दास विशेषांक 01 नवम्बर 2021 अंक 333 https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-विदेह-राजनन्दन-लाल-दास-विशेषांक/ 22) रवीन्द्र नाथ ठाकुर विशेषांक 15 जून 2022 अंक 348 https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-विदेह-रवीन्द्रनाथ-ठाकुर-विशेषांक/ 23) केदारनाथ चौधरी विशेषांक 15 अगस्त 2022 अंक 352 https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-editor-विदेह-केदार-नाथ-चौधरी-विशेषांक/ 24) प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' विशेषांक 01 नवम्बर 2022 अंक 357 https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-editor-विदेह-प्रेमलता-मिश्र-प्रेम-विशेषांक/ 25) शरदिन्दु चौधरी विशेषांक 15 नवम्बर 2022 अंक 358 https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-editor-विदेह-शरदिन्दु-चौधरी-विशेषांक/ 26) "कला-विमर्श विशेषांक (सन्दर्भ- संजू दास, कृष्ण कुमार कश्यप, शशिबाला, एस.सी.सुमन आ श्वेता झा चौधरी)" 15 अप्रैल 2023 अंक 368 https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-editor-विदेह-कला-विमर्श-विशेषांक-सन्दर्भ-संजू-दास-कृष्ण-कुमार-कश्यप-शशिबाला-एस-/ 27) अशोक विशेषांक 1 मइ 2023 अंक 369 https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-editor-विदेह-रचनाकार-अशोक-विशेषांक/ 28) रामभरोस कापड़ि 'भ्रमर' विशेषांक 15 मइ 2023 अंक 370 https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-editor-विदेह-राम-भरोस-कापड़ि-भ्रमर-विशेषांक/ 29) मिथिला स्टूडेंट यूनियन (MSU) विशेषांक 1 जून 2023 अंक 371 https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-editor-विदेह-मिथिला-स्टूडेण्ट-यूनियन-एम-एस-यू-विशेषांक/ 30) लक्ष्मण झा सागर विशेषांक (15 नवम्बर 2023 अंक 382) https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-editor-विदेह-३८२-म-अंक-१५-नवम्बर-२०२३-लक्ष्मण-झा-सागर-विशेषांक/ 3 विदेहक जीवित विशेषांक शृंखलामे किनकर चयन हो ताहि लेल मोटा-मोटी निच्चाक किछु बिंदुक पालन कएल जाइत अछि- 1) लगभग पाँच-छह मास पहिनेसँ विदेह अपन पाठककेँ सुझाव देबा लेल लेल सूचना दैत अछि। 2) आएल सुझावमेसँ विदेह मात्र जीवित लेखककेँ चयन करैत अछि। संस्था सेहो वर्तामनमे जीवंत हेबाक चाही। 3) सभ जीवित मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशकक बीचमे हुनकर लेखन/ काज एवं आचरणक साम्यता देखल जाइत अछि। जाहि लेखकक लेखन/ काज ओ आचरणमे बेसी साम्यता (कम फाँक) भेटैए तेहन छह टा नाम चयनित होइत अछि। 4) छह नाम एलापर ई तुलना कएल जाइत छै जे ई छहो मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशक अथवा संस्थाकेँ रचना लिखबाक वा समाजिक काज केलाक एवजमे समाजसँ की भेटलनि। 5) जिनका सभसँ कम भेटल बुझाइत अछि ताहि तीन मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशक,-संस्थाकेँ अगिला चरण लेल राखि लैत छी। 6) एहि तीन चयनित जीबित मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशकक वा संस्थाक रचना, काज, हुनक उद्येश्य आदिक बीचमे परस्पर तुलना कएल जाइत अछि आ, 7) अंतिम रूपसँ विदेह द्वारा नाम चुनि सालक अंतमे घोषणा कएल जाइत अछि आ नियत समयपर ई विशेषांक निकालबाक प्रयास करैत छी। एकर मतलब ई भेल जे पाठककेँ सुझाव देबाक सूचना हरेक बर्खक अप्रैल-मइ धरिमे चलि जाइत छनि। प्रश्न उठि सकैए जे कि उपरक नियम एहन छै जाहिमे अंतिम रूपसँ सभ सुयोग्य जीवित लेखक केर चयन समयपर भ़ऽ जेतनि? तऽ एकर उत्तर छै- नै। विदेहक पाठक लग सेहो अपन सीमा छनि। मुदा अही सीमाक संगे हमरा सभकेँ अपन यथासाध्य श्रेष्ठ देबाक छै आ मैथिली लेल एकटा एहन रस्ता बना देबाक छै जाहिसँ आबए बला 500-600 बर्खक साहित्य विदेहक लीकसँ प्रेरणा पाबए। अही विचारक संग विदेह ओहन जीवित लेखकपर अपन धेआन सेहो केंद्रित कऽ रहल अछि जे कि सुयोग्य छथि मुदा जिनकापर विदेहक विशेषांक कोनो कारणवश नहि प्रकाशित भऽ सकल। एकर नाम भेल विदेहक "नित नवल सिरीज"। एहि नव विचारक मुख्य बिंदु एना अछि- 1) विदेहक संपादक गजेन्द्र ठाकुर एकटा कोनो जीवित लेखक वा कलाकारपर एकाग्र आलोचना करता मने ओहि लेखक केर उपल्बध सभ साहित्यपर। एहि पोथीक भाषा मैथिली अथवा अंग्रेजी कोनो एक भाषामे रहत। एहि पोथीक पहिल रूप ई-बुक केर रूपमे आएत आ प्रयास रहत जे एकर प्रिंट सेहो आबए जे कि परिस्थितिपर निर्भर करतै। 2) लेखक वा कलाकार केर चुनाव संपादक अपन रुचि वा विदेह टीमक रुचि केर हिसाबें करता। 3) एहिमे ओहने लेखक वा कलाकार केर चयन संभव हएत जिनकर उपल्बध हरेक पोथीक PDF रूपमे विदेहक माध्यमसँ सार्वजनिक भेल छनि। कलाकार लेल यूट्यूब एवं आन साइट सेहो मान्य हेतै। 4) एहि परियोजनाक लेल चयनित लेखक वा कलाकारपर काज संपादक केर समय केर अनुसारे हेतै। तँइ एकर समय सीमा कहब संभव नहि। नित नवल सिरीजमे एखन धरि प्रकाशित पोथीक सूची एना अछि- 1) Rajdeo Mandal- Maithili Writer (ई प्रिंट रूपमे सेहो प्रकाशित भेल अछि) 2) नित नवल सुभाष चन्द्र यादव (ई प्रिंट रूपमे सेहो प्रकाशित भेल अछि, संगे-संग ई प्रिंट आॉन डिमांड रूपमे सेहो अछि) https://store.pothi.com/book/गजेन्द्र-ठाकुर-नित-नवल-सुभाष-चन्द्र-यादव/ एकर अतिरिक्त विदेहक वर्तमान अंक सभमे धारावाहिक रूपें "नित नवल सुशील" आ "नित नवल दिनेश मिश्र" सेहो प्रकाशित भऽ रहल अछि आ दूनूक पोथी रूप जल्दिये आएत। 4 ई तँ भेल जे काज हम सभ कऽ सकलहुँ तकर विवरण मुदा किछु एहनो घोषणा छै जे कि हम सभ नै कऽ सकलहुँ जेना 2016 मे हम सभ परमेश्वर कापड़ि, कमला चौधरी आ वीरेन्द्र मल्लिक विशेषांक केर घोषणा कइयो कऽ नहि प्रकाशित कऽ सकलहुँ। पाठक एहि घोषणाकेँ एहि लिंकपर देखि सकै छथि- सूचना बादमे विदेहक "वीरेन्द्र मल्लिक विशेषांक" (जे कि प्रकाशित नै भऽ सकल) लेल वीरेन्द्र मल्लिक जीक साक्षात्कार जे नबोनारायण मिश्रजी से विदेहक 337म अंकमे प्रकाशित भेल पाठक एकरा एहि लिंकपर पढ़ि सकै छथि- 1 जनवरी 2022 अंक 337 2017 मे विदेह "नेपालक वर्तमान मैथिली साहित्य" विषयक विशेषांक निकालबाक नेयार केने छल जे एखन धरि पूरा नहि भऽ सकल अछि। तेनाहिते विदेहक "साहित्यिक भ्रष्टाचार विशेषांक" हमरा लोकनि एखन धरि नै प्रकाशित कऽ सकलहुँ अछि। एकर घोषणा हम 2019 मे केने रही। एहि घोषणाक फेसबुक लिंक देखू। तेनाहिते विदेहक 'मिथिला विकास परिषद्" विशेषांक केर घोषणा कइयो कऽ नहि प्रकाशित कऽ सकलहुँ अछि। एकर घोषणा हम जुलाई 2023 मे केने रही। एहि घोषणाक फेसबुक लिंक देखू। परिशिष्ट-1 परिशिष्ट-2 परिशिष्ट-3 विदेह अपन कोनो अंकमे "साहित्यिक भ्रष्टाचार विशेषांक" निकालत (लिंक कमेंटमे) ताहि लेल अपने सभसँ निम्नलिखित विषयपर आलेख आदि चाही। 1.साहित्य, कला एवं सरकारी अकादमीः- (क) पुरस्कारक राजनीति (ख) सरकारी अकादेमीमे पैसबाक गैर-लोकतांत्रिक विधान (ग) सत्तागुट आ अकादमी केर काजक तौर-तरीका घ) सरकारी सत्ताक छद्म विरोधमे उपजल तात्कालिक समानांतर सत्ताक कार्यपद्धति (1985सँ एखन धरि) ङ) अकादेमी पुरस्कारमे पाइ फैक्टरः मिथक वा यथार्थ 2.व्यक्तिगत साहित्य संस्थान आ पुरस्कारक राजनीति 3.प्रकाशन जगतमे पसरल भ्रष्टाचार आ लेखक 4. मैथिलीक छद्म लेखक संगठन आ ओकर पदाधिकारी सभहँक आचरण 5.मैथिली विभागमे पसरल साहित्यिक भ्रष्टाचारक विविध रूपः- (क) पाठ्यक्रम (ख) अध्ययन-अध्यापन (ग) नियुक्ति 6. साहित्यिक पत्रकारिता, रिव्यू, मंच, माला, माइक आ लोकार्पणक खेल-तमाशा 7.लेखक सभहँक जन्म-मरण शताब्दी केर चुनाव, कैलेंडरवाद आ तकरा पाछूक राजनीति 8.दलित एवं लेखिका सभहँक संगे भेद-भाव आ ओकर शोषणक विविध तरीका उपरक विषयक अतिरिक्त जँ कियो साहित्यिक भ्रष्टाचारक कोनो नव विषयपर लिखए चाहथि तँ ओकरो स्वागत रहत। परिशिष्ट-4 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.नरेन्द्र झाजीक संक्षिप्त परिचय नरेन्द्र झाजीक संक्षिप्त परिचय एहिठाम प्रस्तुत अछि नरेन्द्र झाजीक संक्षिप्त परिचय। एहि परिचय केर किछु तथ्य पहिनेसँ सार्वजनिक छै। अधिकांश तथ्य विदेह द्वारा जुटाओल गेल अछि। नाम- नरेन्द्र झा जन्म तिथि: 22 सितंबर 1934, अनन्त चतुर्दशीक दिन पिता: विद्यावाचास्पति पं. उपेन्द्र झा जन्मस्थान: तरौनी (दरभंगा) स्थायी पता: झा एण्ड एसोसिएट्स, 406-407, ग्रैण्ड प्लाजा फ्रेजर रोड, पटना- 800001 (बिहार) शिक्षा: CA (जनवरी-1966) वृत्ति: CA नरेन्द्र झा जी केर परिवारक अन्य सदस्य: पत्नी: पन्ना झा (रिटायर्ड प्रोफेसर एवं लेखिका) छोट भाए: अग्निपुष्प (मैथिली लेखक) पुत्री: नीलिमा पुत्र -1: राजीव कुमार झा पुत्र -2: संजीव कुमार झा प्रकाशित कृति मौलिक: कोलकत्तेसँ चार्टर्ड एकाउटेंटेक डिग्री आ ओतहि दस वर्ष अपन पेशाक संगहि मिथिला दर्शन, मिथिला मिहिर, समय-साल आ अन्य पत्रिकामे मिथिलाक उद्योग-धंधा आ अर्थव्यवस्थापर नियमित लेखन। मिथिला-मैथिलीक आन्दोलन आ सांस्कृतिक गतिविधिमे संलग्न। 1976 सँ पटनामे अपन पेशासँ जुड़ल रहैत मैथिली पत्र-पत्रिका आ आकाशवाणी पटनासँ मिथिलाक अर्थव्यवस्था आ अर्थतंत्र पर लेखन आ निम्न पोथीक प्रकाशन (पोथीमे लिंक देल गेल अछि, ताहिपर क्लिक कऽ पाठक पोथी धरि पहुँचि सकै छथि)- 1. मिथिलाक आर्थिक विकास (2000) 2. मिथिलाक जनपदीय विकास (2005) 3. मिथिला मे जल संसाधन ओ प्रबंधन (2006) 4. विकास ओ अर्थतंत्र )2008) 5. अर्थतंत्र ओ भ्रष्टाचार )2012) 6. परिभ्रमण )2012) 7. स्मृति (2013) 8. Mithila Rising (2014) एकर अतिरिक्त नरेन्द्र झा अपन आत्मकथ्य 'चपल चरन चित चंचल भान' शीर्षकसँ अंतिका पत्रिका (जनवरी-जून 2009) लेल लिखने छलाह जे बादमे अंतिके प्रकाशन द्वारा "अपना नजरि मे" नाम पोथीमे संकलित भेलै। संस्थागत सेवा- अनेक संस्थासँ जुड़ल छलाह जाहिमे बाबू साहेब चौधरीक संग सक्रिय सहयोगी रहलाह। बादमे पटना एलापर सेहो अनेक संस्थासँ जुड़लाह। मैथिली लेखक संघक स्थापना केलाह आ अही मैथिली लेखक संघक अध्यक्ष रूपमे बेसी ख्यात भेलाह। हिनके कारणसँ गजेन्द्र ठाकुर मैथिली लेखक संघ केर वेबसाइट सेहो बनेलाह। किछु बर्ख ई वेबसाइट गजेन्द्रजीक खर्चपर चलैत रहलै बादमे गजेन्द्रजी एहि वेबसाइटकेँ ब्लाग रूप दऽ देलाह जकर लिंक अछि https://maithililekhaksangh.blogspot.com/ नरेन्द्र झाजीक सक्रिय सहयोगसँ मैथिली लिटरेचर फेस्टीभल केर शुरूआत भेल जे जकर प्रथम संस्करण पटनामे भेल। बादमे इएह लिटरेचर फेस्टीभल केर आन-आन संस्करण सफलता पूर्वक विभिन्न शहरमे भऽ रहल अछि। संगहि आनो संस्था सभ द्वारा आब विभिन्न लिटरेचर फेस्टीभल भऽ रहल अछि। सम्मान आ पुरस्कार: 1. शेखर सम्मान (2006) 2. वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' सम्मान (2019) नामः पन्ना झा जन्म तिथि: अप्रैल, 1946 मृत्यु- 15 फरवरी 2024 पिता: स्व. शुभनारायण चौधरी जन्मस्थान: दुलारपुर (दरभंगा) स्थायी पताः झा एण्ड एसोसिएट्स, 406-407, ग्रैण्ड प्लाजा फ्रेजर रोड, पटना- 800001 (बिहार) शिक्षा: बिहार विश्वविद्यालय, मजफ्फरपुरसँ मनोविज्ञानमे प्रतिष्ठाक संग स्नातक आ कलकत्ता विश्वविद्यालयसँ वर्ष 1967 मे एम.ए. पटना विश्वविद्यालयसँ मनोविज्ञानमे पी.एच.डी.। वृत्तिः मगध विश्वविद्यालयक जे.डी. महिला महाविद्यालय, पटनामे स्नातकोत्तर मनोविज्ञानक प्राध्यापिका आ विभागाध्यक्ष। वर्ष 2008 मे महाविद्यालय सेवासँ निवृत्त। प्रकाशित कृति मौलिक: 1965 सँ अद्यावधि विभिन्न पत्र- पत्रिका, स्मारिका, कथा-संग्रह, अभिनन्दन ग्रंथ आदिमे मौलिक, अनूदित कथा, आलेख, निबंध, साक्षात्कार, पोथी-समीक्षा आदि प्रकाशित। पटना आकाशवाणी आ दूरदर्शन सँ समय-समय पर कथा, निबंध, साहित्य- चर्चाक प्रसारण, आ निम्न पोथीक प्रकाशन (किछु पोथीमे लिंक देल गेल अछि, ताहिपर क्लिक कऽ पाठक पोथी धरि पहुँचि सकै छथि)- 1. Psycho Social Stress and Schizophrenia (2003) 2. अनुभूति (2009, कथा संग्रह) 3. अनुशीलन (2012, निबंध संग्रह) 4. अभिलाषा (2021, कथा संग्रह) संस्थागत सेवा- विभिन्न साहित्यिक, सांस्कृतिक, सामाजिक संस्था मे सक्रिय सहयोगी। सम्मान आ पुरस्कार- 1. श्री जानकी सम्मान (2014, मैथिली महिला संघ, पटना) 2. यात्री सम्मान (2016, मिथिलांचल विकास परिषद, लहेरियासराय, दरभंगा) 3. मिथिला विभूति सम्मान (2016, अखिल भारतीय मिथिला संघ, नई दिल्ली) ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.कल्पना झा- "अनुशीलन"क अनुशीलन आवश्यक कल्पना झा "अनुशीलन"क अनुशीलन आवश्यक पन्ना जीक "अनुभूति" सँ प्रारम्भ भेल "अनुशीलन" आ "अभिलाषा" धरिक साहित्यिक यात्राक अवलोकन करैत एक बातक अफसोच भ' रहल अछि, एक्कहि शहर पटनाक निवासी रहितहुँ हमरा हुनका सँ भेंट, हुनकर लेखनीक माध्यम सँ भ' रहल अछि। सशरीर भेंटघाँट कहियो नहि भ' सकल। भेंटघाँटक क्रम मे गप्पे गप्प मे बहुत किछु बुझितहुँ। हुनकर व्यक्तित्वक सभ आयाम सँ परिचित होइतहुँ। खैर जे-से। एमहर विदेह टीम जखन "नरेन्द्र झा विशेषांक" निकालबाक घोषणा कएलनि, तखन नरेन्द्र झा जीक अर्द्धांगिनी पन्ना झाक साहित्यिक अवदान पर लिखबाक बात सेहो सुनबामे आएल। देखलहुँ, पन्ना झाक पोथी सभ विदेह साइट पर उपलब्ध अछि। झट सँ डाउनलोड केलहुँ। सभ सँ पहिने पन्ना जीक "अभिलाषा" पढ़लहुँ। नीक लागल। विशेष प्रभावित भेलहुँ एहि कारणेँ जे सभ टा मनोवैज्ञानिक आधार पर लिखल कथा सभ अछि उक्त पोथी मे। ओना तँ कोनो कथा मे मनोविज्ञान रहिते छै, मुदा मनोवैज्ञानिक आधार पर लिखल कथा मे पात्रक मन:स्थितिक चित्रण, भावनात्मक पक्ष पर विशेष फोकस, सामान्य कथा सँ भिन्न तरहक निश्चिते। मनोविज्ञान चूँकि हमर अपन विषय सेहो रहल अछि, तँ स्वाभाविके बेसी मोन सँ पढ़लहुँ। पात्रक मोन मे पैसबाक रचनाकारक प्रयास केँ भाँफि सकलहुँ। आदरणीय भीमनाथ झा जी, पोथीक 'भूमिका' मे अपन बात राखैत कहलनि अछि "मनोविज्ञानक शिक्षिका प्रो. पन्ना झा व्यक्ति ओ समाजक अध्येता सेहो रहलीह अछि। अध्येते टा नहि निरीक्षिका सेहो। निरीक्षणक संग ई ओकरा मे अबैत परिवर्तनक रेखांकन करैत चलैत छथि-शब्दचित्र रचैत जाइत छथि।आ ओहि मे प्राण फूकि दैत छथि। ओकर प्रत्येक क्रिया-कलाप अहाँक मोन पर ठोकर मारैत अछि।" अक्षरशः सत्य कहलनि अछि आदरणीय। सभटा कथाक सभ पात्रक चयन पन्ना जी समाजक अध्ययन करैत, लोकक मानसिकताक निरीक्षण करैत कएने होएतीह, से स्पष्ट दृष्टिगोचर भेल पोथी पढ़ैत काल। कोनो छोटो सन घटना, कोनो परिस्थिति केँ कथाक रूप देब, हिनकर लेखन कौशलक परिचायक अछि। जेना पोथीक पहिल कथा, "बहन्ना"क नायक बैजूक संग भेल घटना। एहि तरहक घटना देखबालेल तँ बहुत लोक देखैत रहैत अछि, मुदा कतेक लोक देखलथि आ बिसरलथि, सएह हिसाब रहैत छैक। आ ओएह घटना संवेदनशील लोक केँ बहुत किछु सोचबा लेल विवश करैत छै। मुदा बहुत किछु सोचलाक बादो, ओहि परिस्थितिक शब्द-चित्र खींचब सभक बुत्ताक बात नहि। संवेदनशील होएब कोनो रचनाकारक मूल गुण अछि, आ ई गुण स्पष्ट देखाएल हमरा, हिनकर लिखल कथा सभ पढ़ैत काल। एकटा विशेष बात ध्यान देबा योग्य इहो अछि, जे हिनकर पहिल कथासंग्रह "अनुभूति"क बात हुअए किंवा "अभिलाषा"क बात हुअए। बिनु प्रयोजनक कोनो प्रसंग घुसिया क' कथा केँ नमहर करबाक प्रयास नहि कएल गेल अछि। कहबाक माने पाठकक बहुमूल्य समय बेरबाद करबाक आरोप नहि लगा सकैत अछि केओ हिनका पर। जखन कि मनोविज्ञान आधारित कथा सभ मे पात्रक मानसिक स्थितिक चित्रण करैत अनर्गल प्रलाप करबाक स्कोप भरपूर रहैत छै रचनाकारक समक्ष। कथासंग्रह "अनुभूति" वास्तव मे रचनाकारक अनुभूतिएक संग्रह थिक। जाहि मे अपन विचार, अपन भावनाक अभिव्यक्ति सहज, सरल भाषा मे देखबा लेल भेटल। चाहे ओ "अनमोल आनन्द" मे अपन पाँच सँ बारह बरखक नाति-नातिन आ पोताक संग बिताओल अनमोल पल केर अनमोल अनुभूति होइन किंवा "असामान्य के" सन संवेदनशील कथा हुअए। सभटा अपन अनुभूतिएक अभिव्यक्ति छनि। "अनुभूति" नामकरणक पाछाँक कारण सेहो इएह छलनि, जे हिनका कथाक पात्र सभक संग जीबाक अवसर भेटल छनि। घटित घटना हिनकर हृदय केँ प्रभावित कएलकनि। पन्ना जीक "अनुभूति" पढ़ब शुरु करितहि, नजरि गेल "समर्पण" पर। सामान्यतः जेना होइत छै, सभ सँ पहिने नजरि जाइते छै "समर्पण" पर। से नजरि पड़ितहि, मोन मे छपि गेल जेना। "समर्पण-ओहि सभ व्यक्ति ओ पात्र केँ, जिनका सँ कथा लिखबाक प्रेरणा भेटल" बहुत नीक लागल, विशेष लागल, उचित लागल, हृदयतल सँ लिखल शब्द लागल। सामान्यत: रचनाकार लोकनि अप्पन खास लोक केँ समर्पित करैत छथि, से देखल छलए, तैँ आर विशेष लागल। अपन कथाक पात्र सभक प्रति थैंकफुल होएब, हिनकर विनम्रताक द्योतक छनि। वास्तव मे हिनकर लेखनीक माध्यम सँ हिनकर व्यक्तित्व सँ परिचित होएब बड़ सहज छनि पाठकक लेल। जेना हिनकर स्वीकारोक्ति "कच्छप गतिए लेखन चलैत रहल। संग लागल गृहणी आ प्राध्यापिकाक ड्यूटी बड़ कड़गर छल, तैँ लेखन प्रक्रिया के अवाध गति नहि द' सकलियै" सँ स्पष्ट अछि जे ई अपन सभ जिम्मेदारी कतेक निष्ठाक संग निभाबैत जीवन बितओलनि। हमरा लेखेँ ई बेसी महत्वपूर्ण बात! अवाध गतिए साहित्यिक आवदान दैत जँ दोसर जिम्मेदारीक अवहेलना होइतनि, से अनुचिते बात होइतनि। दुनू कथासंग्रह "अनुभूति" आ "अभिलाषा" पढ़ला उत्तर "अनुशीलन" पढ़लहुँ। ई बेसी उपयोगी पोथी बुझाएल। ई पोथी निबंध-संग्रह अछि। मुदा निबंध-संग्रह बुझि एकरा उबाउ सन पोथी नहि बूझब केओ। रुचिकर विषय सभ अछि एहि पोथी मे। संगहि एकेडमिक महत्वक सेहो अछि ई पोथी "अनुशीलन" जाहि मे नारी-लेखन सँ संबंधित साहित्य-विमर्श सेहो भेटत। मनोविज्ञान संबंधी आलेख सभ सेहो भेटत। जेना "आत्महत्या:मानसिक विकृति" आ "बाल अपराध:सामाजिक अभिशाप" सन आलेख। पन्ना जीक एहि निबंध संग्रह "अनुशीलन"क पहिल निबंधक चर्चा मोहन भारद्वाज जी अपन आलेख "साहित्य आ साहित्य दृष्टि"क अन्तर्गत करैत छथि। हुनकर कहब छनि-" साहित्य किएक लिखल जाए"- ई वाक्य प्रश्न मूलक अछि। एहि वाक्य सँ अनेक वाक्य जनमैत अछि। साहित्य किएक आवश्यक अछि, साहित्य की अछि, ककरा लेल अछि, आदि आदि।" आगाँ ओ कहलनि अछि --"साहित्य-लेखन चिपड़ी पाथब नहि अछि। कहबाक लेल साहित्य लिखा रहल अछि, किन्तु ओहि मे साहित्य-दृष्टि नहि छैक। साहित्यकार लेल अँखिगर होएब जरूरी छैक।" एही स्थितिक प्रतिक्रिया थिक पन्ना झाक ई पोथी "अनुशीलन"। एहि मे साहित्य अछि। साहित्य-दृष्टिक आवश्यकता पर जोर अछि। पन्ना झा जीक एक टा वक्तव्य सेहो अवलोकनार्थ प्रस्तुत करैत छी,जाहि सँ "अनुशीलन"क अनुशीलन करबाक इच्छा सभक मोन मे सहजहि जागृत होएत। "साहित्य आ समाज मे अन्योन्याश्रय संबंध छैक। एकक बिना दोसरक परिकल्पना नहि कएल जा सकैत अछि। मनोविज्ञान तँ साहित्य आ समाज दुनूक अभिन्न अंग अछि। तैँ समाज, परिवार आ व्यक्ति केँ प्रभावित करए बला किछु मनोवैज्ञानिक तथ्य केँ हम "अनुशीलन"क माध्यम सँ उपस्थित करबाक प्रयास कएल अछि।" निबंध संग्रह "अनुशीलन"मे संकलित सभटा आलेख सार्थक आ उपयोगी विषय सँ संबंधित अछि। एक दिस प्राचीन भारतीय संस्कृति मे नारी, समाजक सशक्तिकरण मे मैथिल महिलाक योगदान, बेटी:सृजन आ संघर्षक रूप, आधुनिक मैथिली कथा मे नारी, सन अनेक विषय पर साहित्य-विमर्श आधारित आलेख अछि। ओतहि फैशन:एक आवश्यकता, धिया पूताक फूसि बाजब, कामकाजी महिला:सुविधा-असुविधा, विद्यार्थी आ अनुशासनहीनता, हीनताक भावना एवं तकर निदान, सन आलेख समाजोपयोगी विषय पर आधारित अछि। बिना कोनो लाग-लपेट केँ हमर स्पष्ट मत अछि,जे पन्ना जीक साहित्यिक यात्रा भले छोटे रहलनि मुदा रहलनि निस्सन। तीनू पोथी अपना अपना जगह पर बहुत नीक। पठनीय ओ संग्रहनीय । मुदा जँ सभ सँ नीक पोथी चुनबाक गप्प करी, तँ हम "अनुशीलन" केँ चुनब। ई पोथी सभ केँ पढ़बाक चाही। चाहे ओ लिखनाहर होइथ कि पढ़नाहर, माने लेखक/पाठक सभ लेल समान रूप सँ उपयोगी सिद्ध हेतनि। एकटा गप्प आरो कहिए देब ठीक। मोनक बात मोन मे किएक राखी। ई तँ सर्वविदित अछिए, हरेक व्यक्तिक, हरेक रचनाकारक अपन फराक दृष्टिकोण होइत छै। समाज मे घटित घटनाक अवलोकन करबाक, ओहि पर मंथन करबाक,अपन नजरिया होइत छै। ओहि विषय पर किछु लिखबाक, अपन शिल्प होइत छै, अपन शैली होइत छै। आ अपन अपन स्थान पर सभ सहीए रहैत अछि, एहि बात केँ सेहो नकारल नहि जा सकैत अछि। हम अपन बात राखि रहल छी। हमरा हिसाब सँ "माता क्वचिदपि..."क शिप्रा आ "एक टा आर समिधा"क गायत्रीक खिस्सा (अभिलाषा कथासंग्रह सँ) केँ एकटा भिन्न दिशा देल जा सकैत छलए। निस्संदेह दुनू पात्रक जीवन मे घटित घटना झकझोरने हेतनि रचनाकार केँ, तखने एकरा अपन कथाक विषय बनओलनि अछि। मुदा एहि विषय केँ एकटा एहन संदेश दैत कथा बुनबाक प्रयास समाजक लेल बेसी हितकर भ' सकैत छलए, जाहि मे मात्र समस्या सँ जुझैत आ फेर हारि मानि, जान देब टा उपाए नहि देखाओल जाइत। समस्या सँ जुझैत ओहि सँ बहरेबाक उपाए करितथि, कथाक मुख्य पात्र। ओना बेटीक प्रति निष्ठुर समाजक चित्रण सेहो बहुत किछु सोचबा लेल विवश तँ करिते अछि। संगहि स्थिति मे सुधार लेल जागरूक सेहो करैत छै लोक केँ। तथापि हमरा बुझाएल जेना कथा केँ दोसर मोड़ सेहो देल जा सकैत छलैक। ओना एहि ठाम हमरा इहो बात स्पष्ट करब आवश्यक अछि जे, जेना अधिकतर महिला साहित्यकारक रचना मात्र स्त्रीक शारीरिक-मानसिक पीड़ा केँ 'हाइलाइट' करबा पर देखैत छी (जकरा साहित्यिक भाषा मे स्त्री विमर्शक संज्ञा देल जाइत अछि) तेना पन्ना जीक रवैया नहि देखाएल। किछु कथा छोड़ि, स्त्री केँ निरीह प्राणी देखएबाक प्रयास करैत नहि देखएलीह हमरा। सत्य कही तँ मात्र स्त्रीक दुख पर फोकस करब नीक बात अछिओ नहि। स्त्रीक जीवनक अपन महत्व छै, अनेक सुख सेहो छै। कखनो स्त्री होएबा पर गौरव-बोध कएनिहारि स्त्री-पात्रक खिस्सा सेहो हुअए। स्त्री होएब, मतलब मात्र दुख भोगब, से अविश्वसनीय सन बात भेल आ पुरुख मतलब महिला के दुख देमएबला, प्रताड़ित करएबला, सेहो ओतबे अविश्वसनीय। पन्ना जीक साहित्य मे विविध विषयक समावेश छनि। जे देखि/पढ़ि हम तँ बड़ आह्लादित भेलहुँ। हिनकर रचना संसार लेल अंग्रेजीक शब्द "remarkable" एकदम उपयुक्त बुझा रहल अछि हमरा। बेसी सँ बेसी लोक पन्ना जीक रचना पढ़थि, गुनथि, लाभान्वित होइथ, हमर कामना! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.मुन्नी कामत- मिथिला-मैथिल केर चहुविकासक शुभचिंतक श्री नरेन्द्र झा मुन्नी कामत- संपर्क-दिल्ली मिथिला-मैथिल केर चहुविकासक शुभचिंतक श्री नरेन्द्र झा दरभंगा जिलाक तरौनी गाम अपन विभूति सब लेल अपन देश आऽ विदेशो मऽ प्रसिद्ध अछि। बाबा 'यात्री'क ई जन्मभूमि अछि जतए माटिक कण-कणमे साहित्य बसैत अछि। ओहि गामक लोगक क्षेत्र चाहे जे होए अपन मातृभाषा, अपन समाज, अपन क्षेत्र लेल चिंतन स्वभाविक अछि। हमर अहि बातक उदाहरण छैथ आदरणीय श्री नरेन्द्र झा आऽ हुनकर ई अनमोल कृति " मिथिलाक आर्थिक विकास" हिनकर कर्म क्षेत्र कलकत्ता रहल आऽ व्यवसायिक क्षेत्र चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट। अति व्यस्तताक बादो अपन मातृभाषा सँ प्रेम आऽ अपना समाज लेल चिंतनक परिणाम ई पोथी अछि। शिखा प्रकाशन सँ प्रकाशित पोथी " मिथिलाक आर्थिक विकास" केँ माध्यम सँ पोथी संगे हमर पहिल परिचय श्री नरेन्द्र झा सँ भेल। हुनकर विचार सँ भेल। हुनका अनुसार " कोनो राज्य छोट होए अथवा पैघ से महत्त्व नै अछि, महत्वपूर्ण बात ई अछि जे ओऽ आर्थिक रूपे सुदृढ़ होए"। हुनकर अहि तरहक विचार मात्र सँ मिथिलांचलक विभिन्न परिवेश सोझाँ मे नाचि उठैत अछि। जखन आर्थिक संपन्नताक बात करैत छी तँ अहि क्षेत्रक लोग सबसँ पाछाँ देखाइत अछि। लोग अपन शारीरिक बूत्ता पर जिनगीक चाक घुरा रहल अछि। आखिर स्वतंत्रताक बादो कियाक बिहार अखैन तक पछुआएल रहल। अहि पर चिन्तन स्वभाविक अछि। " मैथिलीक आर्थिक विकास" नामक ई पोथी अपना मऽ समस्या संगे समाधानो समेटने अछि। पोथीक पहिल अध्यायमे नदी घाटी परियोजनाक बात विस्तृत रूपेँ कैल गेल अछि। जकर तहत बिहारक त्रासदी केँ कारण कहैए बला अल्हर नदी सब आऽ ओहि नदी सबपर बान्हल गेल बान्ह। जे पानि केँ सदुपयोग लेल बनाउल गेल, माने कृषि आऽ बिजली उत्पादन हेतु विभिन्न परियोजना शुरू कैल गेल। करोड़ो लागत सँ शुरू कोशी, कमला, गंडक, महानन्दा, लखनदेई आदि परियोजना सभ शामिल अछि। कतेको परियोजना अखनो फाइल मऽ चैल रहल अछि आऽ कतेको शुरू भऽ थप पड़ल अछि। अहि सब परियोजनाक लाभ बिहारक जनता केँ कतेक भेटल आऽ भेट रहल अछि से वैह जानत जकर फसल अखनो रौदीमे जैर जाइत अछि आऽ अखार मऽ बैह जाइत अछि। परियोजना केँ नाम पर राजनितिक खेलक गवाह अछि ई पोथी। दोसर अध्याय जनसंख्या एवं आर्थिक विकास अछि जकर तहत आर्थिक विकासमे कृषिक योगदान, कुटिर एवं लघु उद्योग। उद्योगीकरण मऽ चीनी मिल, सुती वस्त्र उद्योग, कागज मिल, बरौनी खाद्य कारखाना आदि केँ विस्तृत वर्णन कैल गेल अछि। सम्पूर्ण पोथी कऽ मिथिलांचल क्षेत्र केँ दशा आऽ दिशाक रिपोट कहि सकैत छी। कि भेल, कि हेबाक चाहि आऽ कि भऽ रहल अछि अकर पूर्ण विवरण अहि पोथी मऽ समाहित अछि। श्री नरेन्द्र झा केँ ई पोथी मिथिलांचलक सजीव चित्रण अछि। लेखक केँ लेखनी मनलग्गू संगे कतेको प्रश्न ठार करैत ओहि पर मंथन लेल रोकैत अछि। शिखा प्रकाशन सँ प्रकाशित हिनकर दोसर पोथी " मिथिला मे जल संसाधन ओ प्रबन्धक" अछि। अहि पोथी मऽ पहिने गंडक नदीकेँ उद्भव, विकास आऽ अहि कछाइरमे बास केनिहार लोगक वर्णन कैल गेल अछि। ग्रामीन सबकें नदी सँ होए बला हाभ -हानियक वृत्तान्त अछि ई पोथी। ऐना नैं जे नेपाल सँ बिहार अबैए बला नदी सब बिहार लेल अभिशाप अछि, नदी आऽ पानि तँ युगो -युग सँ जीवनक वरदान बैन कलकल बहैत रहैत अछि। नदीक माटि पानि सँ सिंचित मानव जीवन पोसाएत आबि रहल अछि। जखन हम कोनो नदी संगे मशीनीकरण करैत छी, ओकर बहैत धार केँ बन्हैत छी तँ ओहो अपन मर्यादा लाँघि दैत अछि। जकर परिणाम विनाशक होइत अछि। गामक गाम भासि जैत अछि आऽ नदी जीवन दायिनी कलंकनी बैन जाइत अछि। मानव अपन कैल कृति केँ स्वयं अपने वाणी सँ झाँपि दैत अछि। गंडक नदी कहियो मिथिलांचलक जीवन दायिनी छल। जखन अबैत छल हरियाली लबैत छल, आऽ जैत खन अपन उपजाउ माटि सबठाम उझैल जाइत छल। पर इहो नदी संगे नीत परियोजनाक खेल होइत रहल। बेर -बेर अकरा बान्हल समटल गेल। काज सार्थक रूपेँ नै भेल। कतऽ चूक भेल कि हेबाक चाहि आऽ की भेल अहि सब बातक एगो रिपोर्ट रूपें श्री नरेन्द्र झा अपन पोथी मऽ लिखने छैथ। अहि पोथी मऽ बिहारक प्राचीन आऽ वर्तमान दुनू नदीक चर्चा कैल गेल अछि। केतेको नाम हमरा पहिल बेर सुनल। कतेको नदी महत्वहीन भऽ गेल, कतेको अखनो अपन छोट आऽ सिकुरैत धारा केँ चुपचाप देख रहल अछि। ई पोथी अहाँ केँ चिन्तन लेल मजबूर करैत अछि। लेखक मिथिलांचल में पानिक अम्बारक बीच जल विद्युतक चर्चा करैत छथि। अहि क्षेत्रमें जल विद्युतक विशाल संभावना आऽ साधन अछि मुदा नियति नै अछि। सरकार सँ सब बेर मात्र आश्वासन भेटैत अछि कार्य अखनो धरातले पर ओंघराएल अछि। श्री नरेन्द्र झा जी अपन अहि पोथीमे नदीक पानि केँ समुचित उपयोग कोना कऽ हम अकरा वरदान बना सकैत छी आऽ अहि पर अपना क्षेत्र में कतेक काज भेल तकर सुन्दर व्याख्यान प्रस्तुत केने छैथ। मैथिली मऽ अहि तरहक पहिल पोथी हमरा पढ़बाक अवसर मिलल। अहि पर बिहार सरकार द्वारा कतेको परियोजना सब ऐल मुदा बात वैह भेल -" ऐल पानि, गेल पानि, फाटल दरैर हरैल पानि।" ज्यौं आजादीक बाद अखैन तक कोनो सरकार अहि पर अपन निष्ठा आऽ ईमानदारी सँ काज करैथ तँ अहि क्षेत्रक आर्थिक संकट बहुत हद तक कम भऽ सकैत। हिनकर एगो और पोथी अछि -" मिथिलाक जनपदीय विकास" इहो शिखा प्रकाशन सँ प्रकाशित अछि। ई पोथी बाढ़ि, सुखाड़ आऽ बेरोजगारी सँ लहालोट मिथिला लोकक जीजीविषा केँ समर्पित अछि। प्रत्येक व्यक्तिक कोना आर्थिक विकास भऽ सकैत अछि अहि बातक विवरणात्मक एगो शोध पत्र अछि ई पोथी। अहिमे पूर्णिया, अररिया, किसनगंज, कटिहार, सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, खगड़िया, बेगुसराय, दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर, वैशाली, चम्पारण आदि जिलाक सम्पूर्ण इतिहासक वर्णन लेखक केनें छैथ। ओहि जिलामे रहै बला लोगक आर्थिक स्थिति, गली, शहर, सड़कक स्थिति पर चर्चा कैल गेल अछि। हिनकर एगो और पोथी " विकास ओऽ अर्थतंत्र" जे अंतिका प्रकाशन सँ प्रकाशित अछि। मैथिली आंदोलन आऽ सांस्कृतिक आलोड़न सँ सक्रिय रूप सँ संबद्ध आंदोलन कर्मी ओ रंगकर्मी केँ समर्पण केर लिखल गेल अछि। ओहि पोथी सब सँ अलग अहि पोथीमें मिथिला राज आऽ राजनीतिक चर्चा कैल गेल अछि। मैथिली भाषा लेल एकजुटताक आह्वान कैल गेल अछि। मैथिली सेवी संस्था सब सँ मिथिला राज्यक मांग कऽ बेर -बेर रखबाक मांग कैल गेल अछि। मिथिलाक विकास -मार्गमे मिथिलांचलक समन्वित विकास, आर्थिक विकास, उद्योग आदि केँ चर्चा करैत छथि। लेखक अपन सब पोथी मऽ मिथिलांचलक सब रूप मऽ पृष्ठ भूमि ठार करैयमे पूर्णत: समर्पित देखा रहल छैथ। आश्चर्यक बात तँ इ अछि जे ई सब पोथी लिखबाक एक दशक सँ बेसी समय बितलाक बादों बिहार आऽ मिथिलांचलक स्थिति अखनो वैह अछि जे ई पोथी लिखबाक समय छल। अखनो बिहार संगे राजनेता सबहक वैह खेल चैल रहल अछि। अखनो अतए केँ जनता भूखल नांगट अछि। पलायनक बाट पर बिहार आऽ मिथिलांचलक क्षेत्र अपन मातृभूमि लेल नोर बहा रहल अछि। अकर कारण कि अछि तकर जबाब सेहो लेखक अपन एगो और पोथी " अर्थतंत्र ओऽ भ्रष्टाचार" मऽ विस्तृत रूपसँ देने छैथ। मिथिलाक वंचित समाजक लोकसभकें समर्पित ई सब पोथी संग्रहनीय अछि। लोकतंत्र आऽ राज्य तंत्र केँ बीच पिसाइत मिथिलाक उल्लेख केल गेल अछि। भ्रष्टाचार मऽ लिप्त उच्च पदाधिकारीक सबहक परिणाम इ भेल जे बिहार मात्र अखनो धैर मजदूरक राज्य बैन रैह गेल। हिनकर अहि विधा केँ वैचारिक शोध पत्र कहि सकैत छी। अहि मऽ कोनो कल्पना नै अछि।देखल,भोगल व्यथा केँ विस्तृत रिपोर्ट सोझाँ में राखल गेल अछि। जे मैथिली साहित्य लेल अमुल्य नीधि सावित हैत। भविष्य मऽ जखन मिथिलांचलक इतिहासक बात हैत तऽ हमरा पूर्ण विश्वास अछि जे अहि सब पोथी केँ जरूर पलटल जैत। भगवती हिनकर लेखनी केँ अहिना धरगर रखैत संगे स्वस्थय आऽ दीर्घायु रखैत अहि कामना संगे विराम दैत छी। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.हितनाथ झा- आत्मविश्वासक प्रेरणास्रोत डा. प्रो. पन्ना झा हितनाथ झा-संपर्क-09430743070 आत्मविश्वासक प्रेरणास्रोत डा. प्रो. पन्ना झा साहित्य ओ समाज आ एहि दुनूक विभिन्न अंग मनोविज्ञान अछि। मनोविज्ञानक प्राथमिक लक्ष्य होइत अछि, आचार-विचारक वर्णन, व्याख्या, भविष्यवाणी तथा परिवर्तनक आहट। मूल रूपसँ मनोवैज्ञानिक प्राणीक मानसिक एवं शारीरिक क्रियाक अध्ययन करैत अछि। एहिमे जीवन रक्षा सम्बन्धी भिन्न-भिन्न प्रकारक अवयवक रचना एवं कार्यक मनन अति आवश्यक अछि। एकरा जँ आर विस्तार क' कही तँ मनोवैज्ञानिकक लक्ष्य मानसिक असन्तुलन अथवा भावनात्मक कठिनतासँ ग्रसित लोकक सोचक अध्ययन आ ओकर निदानक परामर्श देब। हम एतय उपर्युक्त बात एहि हेतुएँ कहल जे मैथिली साहित्यमे, मिथिला समाजमे आ विश्वविद्यालयक शिक्षणमे हमरा लोकनिक बीच एक एहन महिला छलीह, जे मनोवैज्ञानिकक दृष्टिएँ साहित्यमे अपन स्थान बनौलनि, सामाजिक संस्थामे बढ़ि-चढ़ि क 'हिस्सा लेलनि आ विश्वविद्यालयमे मनोविज्ञानक प्राध्यापिका बनलीह आ विभागाध्यक्षक पदसँ सेवा निवृत्त भेलीह। डा. पन्ना झाक जन्म दरभंगा जिलाक दुलारपुर गाममे रामनवमी दिन 1946 मे भेलनि। कलकत्ता विश्वविद्यालयसँ एम.ए., पटना विश्वविद्यालयसँ पीएच.डी. एवं मगध विश्वविद्यालयक जे. डी. महिला महाविद्यालयमे प्राध्यापिका छलीह। हिनक पति श्री नरेन्द्र झा एफ.सी.ए. जे मैथिली लेखक संघक अध्यक्ष छथि आ आर्थिक विषयक पोथीक लेखक छथि। डा. पन्ना झा पति संग मीलि साहित्यिक सामाजिक गतिविधिमे आ स्वतंत्र रूपसँ सेहो सामाजिक, सांस्कृतिक संस्था 'मैथिली महिला संघ' पटनाक प्रारम्भहिसँ सदस्य, सचिव, उपाध्यक्ष, अध्यक्ष एवं परामर्श दात्रीक पदकेँ सुशोभित करैत ओहि संस्थाकेँ सकारात्मक गति प्रदान कयलनि। 'अनुभूति' (2010)आ 'अभिलाषा' (2021) हिनक दू गोट कथा संग्रह आ एक निबन्ध संग्रह 'अनुशीलन' (2012) प्रकाशित कृति छनि। 1965सँ ई लिखब प्रारम्भ कयलनि आ विभिन्न पत्र-पत्रिका (मिथिला दर्शन, मिथिला मिहिर, शिखा, कथा पुष्प, कर्णामृत, घर-बाहर), स्मारिका, अभिनन्दन ग्रन्थ आदिमे प्रकाशित होबय लगलनि आ आकाशवाणी पटनासँ कथा, आलेख आदि प्रसारित होइत छलनि, किन्तु पहिल पोथीक प्रकाशन लेखन प्रारम्भक पैंतालीस वर्षक बाद भेलनि। एतेक दीर्घ अवधिक लेखनमे जे दुनू पोथीमे कथा संकलित छनि, ओकर संख्या मात्र तैंतीस अछि। कथा-लेखिकाक ई स्वीकारोक्ति, किछु कथा जे पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित छलनि, भेटि नहि सकलनि। मुदा जतबा छनि, मनोविज्ञानक कथाक रूपमे मैथिली साहित्यक विशिष्टतम कृतिमे हिनकहु कृतिक स्थान सुरक्षित रहत से अग्रिम पंक्तिक कथा लेखिकाक रूपमे। डा.प्रो.भीमनाथ झा हिनक कथा सभक सफलताक विषयमे कहैत छथि - 'डा.पन्ना झाक कथाक सफलताक एक प्रधान कारण थिक संतुलन। एको टा घटना आ एको टा उक्ति संदर्भहीन नहि, बाइली नहि। मनोवैज्ञानिक कथामे एहि चूकक आशंका बेसी छैक। हमरा से कतहु नहि अनुभव भेल। जैं से नहि छैक, तैं सभ कथा साइजमे छैक।... 'हिनका अपन शिल्प छनि, अपन पात्र छनि, अपन भाषा छनि, अपन वातावरण छनि आ तकरा संग अपना ढंगे घुलै-मिलै छथि। पात्रक मनमे पैसि ओकर ऊहापोह, ओकर व्यथा-कथा, ल' लैत छथि आ पाठकक सोझाँ ध' दैत छथि।" हिनक कथा प्रेम आधारित मानसिक असंतुलनपर अछि, असहाय नारीक कर्तव्य चेतनाक निर्वहनमे अबैत बाधाक तोड़बाक प्रयास तँ अछि, मुदा समाजक कुदृष्टिक विश्लेषण अछि, पेनफ़्रेंडक सकारात्मक पक्षक सेहो कथा अछि, पुरान पीढ़ीक जे समाजमे विद्रूपता पसरल छलैक, ओकरा नव पीढी कोना पुनरावृत्ति करैत अपन पूर्वजक कैल गलत काजकेँ चेतेबाक संग अपन जीबाक स्वयं बाट तकैत कथा अछि। ("बाबू! हम कोनो नव काज त 'नहि क 'रहल छी ?लोक कहैत छै नेनापर वातावरण आ आनुवांशिकताक प्रभाव पड़ैत छै। संभवतः एही दुआरे हम अहाँक वंश परम्पराक पुनरावृत्ति क' रहल छी। भविष्यमे हम अहाँक भावना आ प्रतिष्ठाक ध्यान राखब। (जँ मानी तँ) अहाँक बेटी- सुधा पृष्ठ 35), दलित नारीक साहसक कथा अछि, मध्यमवर्गक आपसक अविश्वासक बढ़ैत कारणक कथा अछि, हिनक कथामे स्त्री पात्र प्रमुख होइत अछि आ ओ पितृसत्तात्मक परम्परासँ प्रत्यक्ष आ परोक्ष दुष्प्रप्रभावक आशंकासँ जुझैत अछि, आत्महत्याक मूल कारणक तहमे जा कथाक सृजन महत्वपूर्ण छनि, अंतर्जातीय विवाह आ पुनर्विवाहपर स्त्रीक पक्षक लेल ओतबे जरूरी, जतबा पुरुष पक्षक लेल आदि तैंतीसो कथामे मनोवैज्ञानिकक जे दायित्व छैक समाजक लेल ओ कथाक रूपमे अपन समाज लग राखि देलनि अछि, साहित्यानुरागीक लेल कथाक विशिष्टता तँ अछिए, संगहि मनोवैज्ञानिक सोच समाजकेँ प्रगतिशीलता दिस ल' जाइत अछि। हिनक कथाक विषयमे अनलकांतक कथनकेँ सेहो रेखांकित करैत अपने लोकनिक समक्ष राखि रहल छी- 'हमरा विश्वास अछि जे मैथिली कथा प्रेमी लोकनिक बीच निश्चये पन्ना झाक 'अनुभूति'क समस्त कथाक व्यापक स्वागत हेतनि। मैथिल स्त्रीक संघर्षक जे वृतान्त एत' भेटैत अछि, ई पछिला चालीस-पचास सालक परम्परित मैथिल जड़ताकेँ तोड़ैत, सम्बन्धक नकली मर्यादाकेँ भंग करैत, अपन पहिचान गढ़क संगहि स्त्रीक आत्मनिर्भरताक शुरुआतक शिलालेख थिक।" डा. पन्ना झाक तेसर पोथी आ निबन्ध संग्रहक एक मात्र पोथी छनि "अनुशीलन', जाहिमे सत्रह गोट विविध विषयक निबन्ध अछि। जेना स्वयं लेखिका अपन आत्मकथ्यमे कहलनि अछि 'अनुशीलनक आलेख सभ विभिन्न पत्रिकामे प्रकाशित, आकाशवाणी, दूरदर्शनसँ प्रसारित आ गोष्ठीमे परिचर्चित अछि।" स्वाभाविक अछि, जाहि विषय आधारित निबन्धक माँग भेल हेतनि, ओकरे पुस्तकाकार रूपमे एकर प्रकाशन कयलनि। आकाशवाणी हो वा दूरदर्शन, पत्रिका हो वा परिचर्चा, हिनक आलेख मनोविज्ञान आधारित माँगल गेल हेतनि, आ से छनिहे एहि संग्रहमे।" "साहित्य कियैक लिखल जाय" एहि संग्रहक पहिल निबन्ध अछि। एहि निबन्धपर अपन टिप्पणी करैत प्रसिद्ध आलोचक मोहन भारद्वाज कहलनि अछि- "ई वाक्य प्रश्नमूलक अछि। एहि एक वाक्यसँ अनेक प्रश्न जनमैत अछि। साहित्य कियैक आवश्यक अछि, साहित्य की अछि, ककरा लेल अछि, आदि-आदि। मैथिलीमे एक टा शब्द अछि अँखिगर। विषयकेँ पकड़िनिहारकेँ अँखिगर कहल जाइत छैक। साहित्यकारक लेल अँखिगर होयब जरूरी अछि। मैथिली साहित्यकारमे ऊहिक अभाव सभ दिन रहल अछि, आइ किछु बेसिए भ' गेल अछि। साहित्य-लेखन मुदा चिपड़ी पाथब नहि अछि। कहबाक लेल साहित्य लिखा रहल अछि, किन्तु एहिमे साहित्य दृष्टि नहि छैक।तैं आइ आन्हर लोकक बौक साहित्यक भरमार अछि। एही स्थितिक प्रतिक्रिया थिक पन्ना झाक ई कृति।" एहि संग्रहक रचनाकेँ मोटा-मोटी दू कोटिमे मोहन भारद्वाज रखलनि अछि- पहिल, साहित्य विमर्श आ दोसर, ज्ञान-विज्ञान तक ओकर विस्तारक संकेत।" नारी विषय केंद्रित हिनक एहि संग्रहमे प्राचीन भारतीय संस्कृतिमे नारी, सामाजक सशक्तिकरणमे मैथिल महिलाक योगदान, आधुनिक मैथिली कथामे नारी, कामकाजी महिला: सुविधा-असुविधा, नारी लेखनक कथा-दिशा आदि। दोसर प्रकारक निबन्धमे फैशन: एक आवश्यकता, धीया-पूताक फूसि बाजब, हीनताक भावना आ तकर निदान, आत्महत्या: मानसिक विकृति आदि। हम हिनक एहि संग्रहक एक -एक निबन्धक विस्तारमे नहि जाय, हिनक सभ निबन्धमे तत्कालीन समाजमे स्त्रीक शोषणक विद्वत्तापूर्ण विश्लेषण करैत, उदारवादी दृष्टिकोणक सकारात्मक पहलूपर आबि आलेखकेँ समाप्त कयलनि अछि, जे एहि पोथीकेँ पठनीय आ संग्रहणीय बनबैत अछि। हिनक कथा हो वा निबन्ध, शब्द ओतबे भेटत, जतेक जरूरी। निरर्थक शब्द एको टा नहि। "बेटी: सृजन आ संघर्षक रूप"मे जे हिनक निष्कर्ष छनि, हिनकहि शब्दमे देखल जाय - "बेटी हो या बेटी दुनूक सर्वांगीण विकास लेल पारिवारिक संरक्षण आ सहयोग आवश्यक होइत छैक। आवश्यकता छैक बेटीकेँ सामाजिक, शारीरिक आ मानसिक दंशसँ बचेबाक।स्त्रीकेँ देवीक रूपसँ मुक्ति द' जँ एक मात्र मानवीय रूप देल जाय आ सर्वांगीण रूपें विकसित होबय देल जाय त' ओ सृष्टिक, सृजनकर्ती, संरक्षिका आ धरतीकेँ स्वर्ग बनबयवाली स्वयंसिद्धा साबित हेतीह।" से ई मात्र कथा आ निबंधे टा मे नहि, अपन सामाजिक जीवनमे सेहो नारीकेर महत्व समाजमे अपन विद्या, आत्मविश्वास, संघर्ष आ स्वतंत्र रूपेँ सोचक सभदिन वकालत करैत रहलीह, ओकर एक टा मात्र उदाहरण दैत हिनक सहभागितासँ मैथिली महिला संघ, पटनाक संस्था अपन लक्ष्य प्राप्त करक दिस अग्रसर भ' समाजमे अपन स्वतन्त्र अस्तित्व बनयबामे सक्षम भेल अछि। हिनक विचार एहि रूपमे अछि- "मैथिली महिला संघक स्थापनासँ मैथिल महिला लोकनिमे आत्मविश्वास आयल। ओ स्वछन्द-स्वतन्त्र भेलीह। कार्यक्रम कयलनि अपना दमपर-भाषा, विचार आ गीत-नाद सब किछु। नचलीह-गओलीह आ बकार फुटलनि। फगुआ-मिलन, सावन मिलन, स्थापना दिवस, जानकी अवतरण दिवस आयोजित कयलीह। मैथिली भाषी नेना- भुटका लेल चित्रकला आ मैथिली बजबाक प्रतियोगिता होइए। मैथिली महिला संघक बैसारमे मैथिली बाजब अनिवार्य कयल गेल, मैथिली बाजब शुरू भेल। अभियान जारी अछि। "हिनक साहित्यक सृजन आ सामाजिक संस्थामे सक्रियता देखैत, मैथिली महिला संघ, पटना द्वारा "श्री जानकी सम्मान", मिथिलांचल विकास परिषद, लहेरियासराय, दरभंगा द्वारा 'यात्री सम्मान' आओर अखिल भारतीय मिथिला संघ, नई दिल्ली द्वारा 'मिथिला विभूति सम्मान' सँ विभूषित कैल गेल छनि। चेतना समिति, पटना हिनका 'चेतना समितिक ताम्रपत्रसँ सम्मानित करैत 2022मे जे वाचन कयने छल ओ एतय उद्धृत कय रहल छी- "मैथिली भाषा -साहित्यक विकास एवं संरक्षणक लेल सदा आन्दोलित रहनिहारि, महिला समाजक सामाजिक सक्रियता आ आत्मविश्वासक प्रेरणा-स्रोत, सहज-सरल व्यक्तित्वक धनी, प्रबल इच्छा शक्तिक समाजसेवी, मनोविज्ञानक यशस्वी प्राध्यापिका, परम उपकारी, उदारमना, मृदुभाषी, 'अनुशीलन', 'अनुभूति 'आ 'अभिलाषा 'संग्रहक यशस्वी लेखिका डा. प्रो. पन्ना झाक कर-कमलमे ई ताम्रपत्र सादर ससम्मान समर्पित।" मनोविज्ञान विषयक अंग्रेजीमे हिनक एक पोथी 'Phycho -Social-Stress and Schizophrenia प्रकाशित छनि जे बहुचर्चित भेलनि। सरस्वतीक आराधिका- साधिका डा. पन्ना झाकेँ एहि वर्ष(2024)क सरस्वती पूजेक राति(अंग्रेजी तारीख 15.02.2024) विद्यादायिनी अठहत्तरि वर्षक आयुमे अपने लग बजा लेलखिन। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.अजित कुमार झा- मिथिलाक अर्थशास्त्री: श्री नरेन्द्र झा अजित कुमार झा, संपर्क-यजुआर-9472834926 मिथिलाक अर्थशास्त्री: श्री नरेन्द्र झा विदेह अपन विशेषांक लेल नामक चुनाव करयमे बहुत साकांक्ष रहल अछि। मिथिला-मैथिली लेल समर्पित जीवित व्यक्तित्व जेना कि साहित्यकार-सम्पादक, संगीत कर्मी, रंगकर्मी, संस्था ओ अन्य क्षेत्रक मैथिल कर्मीकेँ सम्मानित करबाक एहन अनुपम प्रयास निस्संदेह सराहनीय काज अछि। मैथिलीमे साहित्यकारक कमी कहियो नहि रहल अछि। साहित्यक विभिन्न विधामे खूब लिखल गेल अछि मुदा जाहि विधापर सबसँ कम लिखल गेल अछि ताहिमे आजीवन धुरझार लिखैत रहलनि अछि श्री नरेन्द्र झा जी। हँ, आर्थिक विषयपर लिखय वाला केर संख्या आंगुरपर गनल जा सकैत अछि। कविता, कथा-कहानी, उपन्यास, संस्मरण, यात्रा एवं अन्य सब विधापर त' प्रचुर साहित्य भेटत मुदा ई विषय नहि जानि किएक उपेक्षित रहि गेल? वर्तमान इन्टरनेटकेँ युगमे सेहो अपना देशमे दैनिक अखबार बड्ड चावसँ पढ़ल जाइत अछि। मुदा पढ़य बलामे किछु राजनीतिक खबरि पढ़ैत छथि, त' किछु मात्र खेलसँ जुड़ल समाचार। किछु फिल्मसँ जुड़ल पढ़ैत छथि, त' किछु शेयर बजारसँ जुड़ल। कहबाक तात्पर्य जे सबहक पसन्द अलग-अलग छन्हि । ओना एक बेर बॉलीवुड केर महा नायक अमिताभ बच्चन अपन पिता हरिवंश राय बच्चनसँ पूछने रहथि जे ओ कखन समझताह जे आब हुनका आओर किछु पढ़बाक आवश्यकता नहि छन्हि अर्थात् ओ पूर्णरूपेण शिक्षित भ' गेल छथि। जवाबमे हरिवंश राय बच्चन बाजल रहथि जे कोनो एकटा दैनिक अखबार उठाउ आ पहिल पन्नासँ शुरु करैत अन्तिम पन्ना धरि पूरा पढ़ि जाउ आ जौँ सब समझमे आबि जाय त' बूझब जे आब पढ़ाई पूर्ण भेल। वास्तवमे ई संभव नहि जे कोनो भी व्यक्ति सब विषय केर जानकार होइथ। सुगमतापूर्वक जे समझमे आबि गेल ताहिमे रुचि बेसी रहैत छैक आ अर्थशास्त्र समझय लेल ओहि विषय केर अध्ययन बहुत जरुरी छैक। हम ई किन्नहु नहि कहि रहल छी जे अन्य विधा लेल अध्ययन जरुरी नहि। मिथिलामे महाप्रलय केर साल 1934केँ 22 सितंबर तरौनी गाममे हिनकर जन्म भेल छलनि। म. म.परमेश्वर झा केर वंशज विद्या वाचस्पति पं० उपेन्द्र झा केर पुत्र नरेन्द्र झा जी केर प्रारंभिक पढ़ाई गामक स्कूलमे भेल छलनि आ पाँचम कक्षासँ दरभंगामे अपन पिताक आश्रम अर्थात् गुरुकुलमे रहि पढ़लनि। सन् 1954मे जखन आइ.कॉम केर परीक्षा देल भ' गेल छलनि तखन डा० लक्ष्मण झा केर संपर्कमे अयलाह। ओ दरभंगामे 'मिथिला मंडल' संस्था केर माध्यमसँ मिथिला मैथिली लेल काज क' रहल छलथि। हुनकासँ दीक्षित भ' "पाया आन्दोलन"सँ जुड़ि गेलाह। मिथिला मैथिली आन्दोलन लेल एत्तहिसँ बीजारोपण भेलनि। हिनका संग हिनकर अर्थशास्त्र केर गुरु डा० लक्ष्मी नारायण सिंह सेहो छलखिन्ह। ई मिथिला छात्र संघक सचिव बनि गेल छलाह। सन् 1956मे बी.कॉम परीक्षा पास कय सी. ए. केर पढाई करबाक हेतु कलकत्ता विदा भेलाह। कलकत्ता पहुँचि छात्रावासमे शरण लेलाह आ एत्तह अबिते प्रोफेसर प्रबोध नारायण सिंहसँ भेँट केलनि जे कि ओहि छात्रावास केर पासेमे रहैत छलथि। मिथिला मैथिलीक जे बीजारोपण दरभंगामे भेल छलनि तकरा अंकुरित होबय लेल एत्तह अनुकूल परिवेश भेटलनि। प्रोफेसर साहेब हिनका 'मिथिला संघ' केर बैसारमे आबय लेल कहलखिन आ ओहि बैसारसँ ई बड्ड प्रभावित भेलाह। कलकत्तामे मिथिला मैथिली आन्दोलन आ राजेन्द्र छात्र निवास एक दोसर के पूरक अछि। हिनकर परिचय बाबू साहेब चौधरी, हरिश्चंद्र झा 'मिथिलेंदु', राज नन्दन लाल दास एवं अन्य मिथिला विभूति सबसँ भेलनि। एक तरफ सी. ए. केर पढ़ाई आ दोसर तरफ मिथिला मैथिली अभियान । सी. ए. केर आर्टिकलसिप लेल हिनका दिल्ली जाय पड़लनि आ लगभग अढ़ाई बरख अहि सबसँ दूर रहय पड़लनि। सन् 1962मे पुन: कलकत्ता अयलाह आ सी. ए. केर तैयारीमे लागि गेलाह। कहबाक प्रयोजन नहि जे मिथिला मैथिली लेल अपन कर्तव्य सेहो निमाहैत रहलाह। अन्ततः सन् 1966मे सी. ए. बनि गेलाह आ जाहि ऑडिट फर्ममे काज सिखैत छलथि ओहीमे पार्टनरशिप भेटि गेलन। सन् 1975 धरि कलकत्तामे रहलाक उपरान्त सपरिवार पटना चलि अयलाह आ ' झा एंड एसोसिएट्स ' केर नामसँ अपन फर्म खोलि काज करय लगलाह। विद्यार्थी जीवनसँ जे मिथिला मैथिली लेल समर्पित भेल छलथि से अचानक कोना स्थिर भ' सकैत छलाह। पटना आबि चेतना समितिक आजीवन सदस्यता लेलनि मुदा मात्र विद्यापति पर्व समारोह, साहित्यिक गोष्ठी आ मिथिला विभूति सबहक जयंतीसँ हिनका अपन उद्देश्यक प्राप्ति केर लक्ष्य मुश्किल बुझि पड़लनि। डा० लक्ष्मण झा केर उद्देश्य छलनि एक समृद्ध मिथिला राज्य आ हुनकेसँ प्रभावित भ' ओ अहि समरमे कूदल छलथि। मोनमे निराशा भेनाइ स्वाभाविक छलनि किएक त' मिथिला मैथिलीक कोनो भी संस्थाकेँ पास मिथिलाक आर्थिक विकास विषयपर ने त' कोनो विजन छल आ ने अहिसँ संबंधित कोनो कार्यक्रम। ई बात हिनका सदैव टीस मारैत छलनि मुदा अपन उद्देश्य हेतु समर्पित रहलाह आ कोना मिथिला पहिने जँका आर्थिक रूपसँ समृद्ध होअय ताहि लेल शोधपरक आलेख लिखैत रहलनि। पटना आकाशवाणीसँ 'भारती' कार्यक्रममे भाग लैत रहलाह। सन् 1997-98मे हृदय रोगसँ ग्रसित भेलाह आ आपरेशन केर बाद सक्रिय रुपसँ मिथिला-मैथिलीक अभियानमे जुड़ल रहनाइ हिनका लेल संभव नहि छलनि। तखन जा क' लेखन केर माध्यमसँ मिथिला मैथिलीक सेवा मोन प्राणसँ करय लगलाह। मैथिलीक विभिन्न पत्रिका सब लेल त' लिखिते छलथि आब पुस्तक लिखबाक काजमे लागि गेलाह। दिल्लीसँ प्रकाशित 'अंतिका' पत्रिकामे एकटा स्तंभ रहैत छलै 'अपना नजरिमे'। अहिमे विभिन्न साहित्यकार सबहक संक्षिप्त आत्मकथा रहैत छलै। जनवरी-जून 2009 केर अंकमे 'चपल चरण चित चंचल भान' नामसँ नरेन्द्र झा जी केर आत्मकथा छपल छलनि। अंतिकामे छपल चयनित आत्मकथाक संकलन केदार कानन जी केर संपादनमे सन् 2021मे प्रकाशित भेल छल। अहिमे सेहो हिनकर संक्षिप्त आत्मकथा संकलित छल। अहिकेँ पढ़लासँ हिनकर व्यक्तित्व आ जीवन संघर्षसँ परिचित भेनाई सहज भ' जाइत अछि। सन् 2000मे 'मिथिलाक आर्थिक विकास', सन् 2005मे 'मिथिलाक जनपदीय विकास', सन् 2006मे 'मिथिलामे जल संसाधन ओ प्रबंधन', सन् 2008मे 'विकास ओ अर्थ तंत्र' सन् 2012मे दूटा पोथी 'परिभ्रमण' एवं 'अर्थतंत्र ओ भ्रष्टाचार', सन् 2013मे 'स्मृति' एवं सन् 2014मे 'Mithila Rising' प्रकाशित भेल छलनि। सबसँ खुशी केर गप्प जे उपर्युक्त सब पुस्तक पाठक सबहक लेल 'विदेहक पेटार'मे सुरक्षित अछि। विद्यार्थी जीवनसँ मिथिला-मैथिली आन्दोलन लेल एक समर्पित सेनानीकेँ रूपमे अपन अतुलनीय योगदान दैत रहलनि। डा० लक्ष्मण झा जी केर संग मिथिला राज्यक जे सपना देखलाह से एखन धरि मूर्त रूप नहि ल' सकल अछि मुदा जहिया कहियो ई स्वप्न साकार हेतैक त' अपन सबहक मिथिला राज्य पूर्णरूपेण समृद्ध राज्य कोना बनि सकैत अछि तकर संपूर्ण 'विजन' अपन लेखनी केर माध्यमसँ पुस्तकाकार स्वरूपमे आबय वाला पीढ़ीकेँ मार्गदर्शन करत ताहिमे लेश मात्र संदेह नहि। आर्थिक दृष्टिसँ मिथिला पुन: स्वावलंबी बनि सकय ताहि लेल सतत् अध्ययनशील रहलनि। पेशासँ चार्टर्ड एकाउंटेंट आ अर्थशास्त्र केर गहन अध्ययन केर कारण हिनक शोधपरक आलेख सबहक संकलन मिथिलाक एक अमूल्य निधि अछि। जेना कि हिनकर एक पोथीक शीर्षक 'स्मृति' आ दोसर केर शीर्षक 'परिभ्रमण'सँ स्पष्ट परिलक्षित होइत अछि जे ई दुनु अलग फ्लेवर केर कृति छन्हि। 'स्मृति'मे कुल आठ मिथिला मैथिलीक सुपुत्र केर विषयमे अपन संस्मरण लिखने छथि आ 'परिभ्रमण'मे यात्रा वृतान्त। अपन वंशक परंपरा केर ध्वज ई सदैव फहराबैत रहलनि अछि। मात्र इएह नहि अपितु हिनक अर्द्धांगिनी स्व० पन्ना झा आ अनुज अग्नि पुष्प सेहो माँ मैथिली केर सेवामे समर्पित रहलनि। ईश्वरसँ इएह प्रार्थना अछि जे ई स्वस्थ रहथि आ डा० लक्ष्मण झा जी केर सान्निध्यमे देखल हिनकर समृद्ध मिथिला राज्य वाला स्वप्न सेहो साकार होउक। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.डॉ. धनाकर ठाकुर- श्री नरेन्द्र झा-मिथिलाक आर्थिक पक्ष रखनिहार किन्तु ऐतिहासिक विभ्रम उत्पन्न केनिहार लेखक डॉ. धनाकर ठाकुर श्री नरेन्द्र झा-मिथिलाक आर्थिक पक्ष रखनिहार किन्तु ऐतिहासिक विभ्रम उत्पन्न केनिहार लेखक दादा भाई नौरोजी भारतक आजादी लेल आवश्यक आर्थिक पक्ष रखनिहार छलथि तऽ नरेन्द्र झाकेँ हम ओहिना मिथिलाक राज्य बनक लेल आर्थिक पक्ष रखनिहार कहब। हमरा हुनकासँ भेंट कहियो भेल हो तऽ मोन राखय लेल कोनहुँ चर्चा स्मरणीय नहि नहि किन्तु हम हुनक अधिकांश पोथी सभ पढ़ने छी। जखन नरेन्द्र झाक कोलकातासँ 'मिथिला चैम्बर ऑफ कॉमर्स' और पत्रिका 'श्रीमिथिला' आबय लागल से हमरा नीक लागल। कटिहारमे एक प्राध्यापक डा. एस.के झा (प्रसिद्ध लेखक 'व्यासजी' क पुत्र) क पोथी 'इकानॉमिक हेरिटेज आफ मिथिला' देखलहुँ तऽ बेसी प्रसन्नता भेल छल किन्तु ओइसँ अधिक प्रसन्नता नरेन्द्र झाक मिथिला राज्य निर्माणक आर्थिक पक्ष देखि भेल जे हम बहुत जल्दी में कतहुँ उल्टौलहुँ। बादमे नरेन्द्र झा जीक आलेख सभ पुस्तक रूपमे सेहो आएल, साधुवाद एहि सारस्वत कार्य लेल। मिथिला वाणिज्य छात्र परिषद (स्थापित 26.1.2001, कोलकाता राजेन्द्र छात्रावासमे) वा मिथिला वाणिज्य परिषद जे बादमे भेल मुदा अपन स्वरूप नहि लऽ सकल। हमहीं सभ नहि कऽ सकैत छी भनहि इच्छा हो जाहि लेल। एहि विधा लेल नरेन्द्र झा सन अनेकानेक व्यक्तित्व चाही। बादमे मिथिलामे आर्थिक मंचक गठन दलसिंहसरायमे अर्थशास्त्री डा. रामभरत ठाकुरक ओतऽ हम 31.12.2022 क केलहुँ। 2000 में छपल नरेन्द्रजीक पोथी ’मिथिलाक आर्थिक विकास' हम नहि पढ़ि पयलहुँ। 'मिथिलाक जनपदीय विकास' 2005 मे छपल लगैत अछि लेखक तावत् कोलकातासँ पटना आबि गेल हेताह कारण एहिमे वैह जिला सभ अछि जाहिकें पं. ताराकांत झा स्वीकार केलाह। नरेन्द्र झाजीक सारस्वत अवदान पर केन्द्रित केवल अनुमान लगाओल कारण मिथिला राज्य अभियान लेल मिथिलाक नक्शा हमरहि द्वारा मेकन, राँचीक वैज्ञानिक डा. अशोक कुमार घोघरडीहा वासी द्वारा बनबाओल गेल छल। तारा बाबू गंगाक दक्षिण मिथिलाक भाग किन्नहुँ नहि मानलाह तऽ बनबा देल किन्तु हम अपन पहिल बनाओल ग्रियर्सनक सर्वेक्षण आधारित नक्शा देवघर तक मानैत-चलबैत रहलहुँ जे कहियो बिहार-झारखंडक नक्शा काटि-जोड़ि साटि बनौने छलहुँ जे आब बहुप्रचारित अछि। तथापि मिथिलाक जनपदीय इतिहासमे सामग्री अनेक स्रोतसँ जुटायल गेल अछि आओर ऐतिहासिक महत्वक संगहि आर्थिक विवेचनाक संग उन्नयनक मार्ग सेहो बताओल गेल अछि। पोथीक नाम जरूर गलत अछि। महाजनपदीय अवधारणा बौद्ध जातक कथाक सोलह महाजनपदसँ आयल किन्तु मिथिला तहियो कोनहुँ सोलहमक अनेक जनपदमे एक नहि स्कन्द-पुराणक समयसँ भारतवर्षक एक विशिष्ट भू-भौतिक क्षेत्र अछि जे कहियो महाजनपद किछु जनपदक जोड़सँ भेल। नाम भनहि विदेह वा मिथिलासँ लिच्छवी-वृज्जि भेल किन्तु सदैव मगधसँ फराक किन्तु सांस्कृतिक जीवनमे अंगकें समेटने एतेक जे ओ निकटतम मगधसँ ओहिना अलग-अलग रहल जेना संगममे गंगा-यमुनाक पानि जे भनहि किछुए दूरमे एक भय जाए। अंग मिथिलाक संगहि सदैव रहल ओ 1774 सँ राजनीतिक रूपसँ पटना वा 1912सँ बिहारमे रहितहुँ मैथिल, ने बिहारी भेल नहिए कहियो होयत जे एकदम सटीक राज्यक माँगक आधार अछि। एकर संगहि विद्वान लेखक मिथिलांचल ओ मिथिलाक समानार्थी उपयोग केलाह जे केवल शुद्ध मिथिला हेबाक चाही। 2006 मे छपल हिनक पोथी 'मिथिला मे जल संसाधन ओ प्रबंधन' मे दिनेश मिश्रजीक संदर्भ यदि ठीकसँ लेल गेल होयत तऽ तकर निष्कर्ष बहराएत जे बाढ़िक संग जीनाइ श्रेयस्कर अछि, पैघ बाँध विनाशक कारण। 2008 क छपल 'विकास ओ अर्थतंत्र'क शीर्षक अपूर्ण अछि। ई 'मिथिलाक विकास ओ अर्थतंत्र'क रूपमे अपूर्व होइत। एक-दू लेख डंकल आदिक मिथिला पर प्रभाव जँ लिखल जाइत किन्तु लेखक मेहनतिसँ बँचैत किछु बेतरतीब लेखसभक संग्रह पोथीकें बना देलाह जाहिमे एकसँ एक ऐतिहासिक मैथिली कार्यकर्ता (उपेन्द्र झा, डा. लक्ष्मण झा, बाबू साहेब चौधरी, डा. प्रबोध नारायण सिंह) पर नीक संस्मरणात्मक लेख भाषा ओ संगठन लेल किन्तु डंकल जकाँ पोथीक शीर्षकसँ अपच। ओना मखानसँ जूट तक, सूर्यमुखीसँ कुसियार तक (एत गन्ना वा ईख पर हमर आपत्ति अछि; अररिया जिला तकमे कुसियारगाँव स्टेशन छैक जतक बगलक स्टेशन रेणुक गाम सिमराहा जे आंचलिक हिन्दी नहि मैथिली लीखि हिन्दीक भाषाइ साम्राज्यवादकेँ बढ़ौलाह। एकरा जयकांत मिश्र prostitution of language ठीकहि हमरा कहने छलाह जहिया 14.12.1994क ओ हमरा संगे फारबिसगंजसँ पूर्णिया बससँ जाइत छलाह)। नरेन्द्र झाक जनपदीय पोथीमे जे अररिया, सुपौल, पूर्णिया कटिहार आदिक जे सटीक वर्णन अछि से मधुबनीक नहि। सेपल मिशनरीसँ सुपौल जकाँ मेरीगंज, रानीगंज वा पूसा फिलिप्स आफ यूएसए क नहि ताकि पयलहुँ किन्तु ए जी फोर्ब्सक विवरण नीक लागल। कोशी 220 सालमे 110 किलोमीटर पूब गेलीह। 1731मे हमर जन्मस्थली फारबिसगंजमे बहैत छलीह, की कहियो मधुबनी टपतीह से तऽ दिनेश मिश्रजीक संदर्भमे सेहो नहि तऽ अर्थशास्त्री नरेन्द्र झाजीकमे नहिए भेटत। हँ, पलायन पर लेख अछि किन्तु नियोजनमे ओ कतहुँ दूर देश वा प्रान्त कि अमर्त्य सेनक 'पोवर्टी इकानॉमिक्स' क कालाहांडीक आम अकालमे कोलकाताक जकाँ कोशी-कमला बाढ़िमे पंजाबसँ आब केरल ओ दुबई तक नहि जाइत छथि। 'फ्लड इकानॉमिक्स' तऽ अर्थशास्त्री नरेंद्र झाक लेखन हेबाक छल हम तऽ 'फ्लड पालिटिक्स'क संकेत देब बलुआ परिवारकें कमला ओ आब 'कमल' पलायन? हिनक पोथी 'अर्थशास्त्र ओ भ्रष्टाचार '(2012 मे प्रकाशित) मे आशानुरूप एकर चर्चा अछि जे 2008 क कुशहा टूटक बादहु कहियो ओ चुनावी मुद्दा नहीं बनल। 'फ्लड स्कैम' केना भेल वा कोशी प्रोजेक्टक 'स्कैम गाथा' जरूर दिनेश मिश्रक मेहनति लेखनक अर्थशास्त्रीय उपेक्षाक आरोप हमर रहत चिकित्सकीय निदान जकाँ। जतय लेख दुखी छथि नदी जोड़ परियोजना नहि भेल दिनेश मिश्र एकरा अव्यावहारिक मानैत बाढ़िक संग जिसके बात कहताह। नरेन्द्र बाबू सेहो बिनु बारिस बाढ़ि मानलाह अछि जाया हम कहियो एक कवितामे होने छी, एहि बेर बर्षा नहि भी दी गाम गाम भासि गेल। 2008-11 बीच लिखल अनेक लेखक संकलन बहुलांश मिथिलाक बाढ़ि कृषि प्रधान राज्य अछि जतय दू तिहाई कखनहुँ कृषि आधारित। उद्योग मरणासन्न। किछु लेख वैश्विक स्थिति देखबैत। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामाक चुनाव ओ भारतमे मनमोहनी चुनाव जतय सूचना अधिकार रहितहुँ भ्रष्टाचार जे सदाचार मानि लेल गेल संस्थागत भए गेल। लोकपाल धोखापाल सलाह। आशावादी लेखनीमे पूर्णिया बेसिनक तेल संभावनासँ पर्यटन ,चौरक, उद्योगक विवरणात्मक विश्लेषण अछि किन्तु दोसर औद्योगिक बेगुसराय कत? कृषि, नदी, बिजली, पलायनसँ आगाँ सड़क, रेल पर चर्चा नीक किन्तु पुरान भेल जाहि पर युवा पीढ़ीक अर्थशास्त्री आगाँ आबथि। 1934 क जन्मल नरेन्द्र झा सेहो कोलकाता लक्ष्मणवादी तऽ सैह ने कहताह जिनक 'मिथिला विल राइज' क छाप हिनक 2014क 'राइजिंग मिथिला' पोथी जे बहुत सुन्दर प्रस्तुति किन्तु की 22.1.1954 क आसनसोल गिरफ्तारीक बाद सीधे हुनकहि , ' 'आइ एण्ड .... डिमांड..' ई नहि केवल गलत अंग्रेजी ('आइ' बादमें लिखल जाइत छैक) गलतबयानी 2014 में प्रकाशित पोथी लेल सेहो। से कि ठीके ओहि के बाद मिथिाल लेल कोनो आन्दलोन किनको द्वारा नहि भेलै? 1992 सँ हम अपने मिथिलाक राज्य लेल कार्यरत छी। डा. लक्ष्मण झाजीकेँ 1956 में आंदोलन छोड़लाक बाद ओहि पझाएल आगिकेँ सुनगेनिहार छी (बीचक भाषाक आंदोलन वा दरभंगा समस्तीपुर बड़ी रेल बनेबाक आंदोलन राज्य लेल आंदोलन नहि छल जेना कि कतिपय लेखक मानि लेलाह)। हमरा ओहि 1992क समय राज्य आंदोलनकारी कोनहुँ संगठन नहि भेटल बल्कि बिना नाम लेने डा. सुरेश्वर झा एक पोथीमे हमर एहि कार्य को विरोध में लिखलन्हि किन्तु स्वयं सेहो बादमे एहि कार्य में मनोयोगसँ कुदलाह। 20.9.1992क राँची एक्सप्रेसमे हमर दीर्घ लेख 'छोट राज्य विकास लेल आवश्यक' संभवतः 1956 क बाद मिथिला राज्य विषयक पहिल लेख होयत आओर 1994 क साइकल यात्राक बाद 35.10.1994क हिन्दुस्तान दैनिकमे दू कार्यक "मिथिला राज्य की माँग के लिए साइकिल यात्रा पूरी", फेर चारि कार्यक 2.11.1994 क 24 जिलों वाले पृथक् मिथिला राज्य के लिए आन्दोलन की सुगबुगाहटआओर 8.1.1995 में हमरहि द्वारा बनायल मिथिला राज्य संघर्ष समिति दवारा 27.3 1995क डाक-बंगला चौराहा पर चुनचुन मिश्र, उदयशंकर मिश्र आदि द्वारा धरना एंकर फोटो समाचार आर्यावर्त्त दैनिक में 28.3.1995 क छपल एहन कोनहुँ 1956 उपरांत अधुना संगठनक कार्य जकर अध्यक्ष नाते घोषणा डा. जयकांत मिश्रक हमरहि द्वारा 8.1.1996क मधुबनीमे हमरहि जमीन पर भेल दोसर अन्तरराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलनक अन्तिम सत्रमे भेल छल। हम प्रारंभहिसँ आर्थिक विकास लेल मिथिलाक राज्य लेल माँग करैत रहलहुँ जे अन्तरराष्ट्रिय मैथिली परिषद क 1993सँ लगातार प्रस्तावसँ स्पष्ट हैत। (पं. ताराकांत झा मिथिलाक गौरव, मैथिलीक उन्नायक किन्तु मिथिलाक राज्य आंदोलनमे हमरहि द्वारा 2000 ईस्वीमे आनल गेलाह जेना ओ स्वयं 7 अगस्त 2000 क पत्रमें लिखलाह,"अहाँक पत्र पाबि , मिथिला राज्य संबंधी घोषणा-प्रेस कांफ्रेंस माध्यमसँ कर देल." डा. जयकांत मिश्र सेहो 20.11.1994 क हमरहिसँ सहमत भऽ पओलाह जखन हम कहलियन्हि जँ राज्य नहि हैत तऽ मैथिली भाषा नहि बाँचत)। किनकहुँ ई हमर आत्मप्रशंसा लागि सकैत अछि किन्तु ई केवल एक सत्य अछि। विदेहक 15 अगस्त 2024 विशेषांकमे तारा बाबूक स्वलिखित पत्र सेहो एहि विषयमे भेटत। 1992 तक से रहल हो तकर बाद किछु जरूर भेल तें 2000 सँ एहन नीक पोथी सभ हिनक कलमसँ लगातार निकलल जकर स्वीकरण होयबाक छल से नहि भेल तें हमरा 'पेनी तीत' लागल ओना सौंसे स्वादिष्ट। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.८.अशोक- मिथिला मैथिली आ नरेन्द्र बाबू अशोक-संपर्क-8986269001 मिथिला मैथिली आ नरेन्द्र बाबू मिथिला-मैथिलीक चर्च-वर्च आ जागरण तऽ उन्नैसम शताब्दीक अंतमे शुरू भऽ गेल छल मुदा मिथिला राज्य आ मैथिली भाषा आन्दोलन देशक स्वाधीनताक बादक परिघटना थिक। यद्यपि एकर चर्च-वर्च स्वाधीनतासँ किछु पूर्वहिंसँ शुरू भऽ गेल छल। नरेन्द्र बाबू लिखैत छथि " २७ जुलाइ १९५२केँ डा. लक्ष्मण झाक अध्यक्षतामे दरभंगा नगर भवनमे आयोजित दरभंगा मजदूर सम्मेलन दू गोट प्रस्ताव मैथिलीमे स्वीकृत कएल। प्रथम प्रस्ताव छल भाषाक आधारपर मिथिला तथा अन्य प्रांतक निर्माण। एतहिसँ प्रारंभ होइछ मिथिला राज्यक आन्दोलन एवं मिथिला-मैथिलीक सर्वांगीण विकासक हेतु प्रथम राजनैतिक प्रयास" ओ ईहो लिखने छथि जे " मैथिल महासभा १९५१ मे सर्वप्रथम मिथिला राज्यक माँग केलक- महाराजा दरभंगाक नेतृत्वमे जे स्वतः प्रस्तावक संगे मरि गेल। जमींदारी प्रथाक अंतक आशंकासँ चिंतित भऽ अपन नेतृत्व बरकरार रखबाक हेतु ई महराजी प्रस्ताव छल। अपन नेतृत्व रखबाक हेतु १९५२ केर संसदीय चुनावमे दरभंगा महराज ठाढ़ सेहो भेल रहथि मुदा जमानत जब्त भऽ गेलनि।" नरेन्द्र झा वर्ष १९५४ ई. मे जखन ओ दरभंगामे इंटर कामर्सक छात्र रहथि, मिथिला-राज्यक प्रथम उद्घोषक डा. लक्ष्मण झाक संपर्कमे एलाह। मिथिला आ मैथिली काजक प्रति हुनका डा. लक्ष्मण झा आ डा. लक्ष्मी नारायण सिंहसँ प्रेरणा भेटलनि। पहिल काज पाया आन्दोलनमे भाग लेलनि। सुरसंडसँ जयनगर तक नेपाल बिहारक सीमा-रेखासँ सटल दूनू बगलक गामक जनमानससँ पायाक औचित्यपर चर्चा केलनि। सात गोटेक टोली छल जकर नेतृत्व डा. लक्ष्मण झा कऽ रहल छलाह। ओ दरभंगामे छात्र लोकनिक बीच मिथिला-मैथिलीक काजमे तत्पर रहैत छलाह। १९५६ मे सी.ए पढ़बाक हेतु कोलकाता (ओहि समय कलकत्ता) चलि गेलाह। ओतऽ प्रो. प्रबोध नारायण सिंहक निकट संपर्कमे एलाह। ओतहु मिथिला-मैथिलीक विभिन्न काजमे अपन सक्रिय योगदान देलनि। एही संग विभिन्न पत्र-पत्रिकामे लेख सभ लीखऽ लगलाह। १९७५ मे सी. ए केर व्यवसायमे पटना एलाह। झा एंड एसोशिएट केर नामसँ हिनक प्रसिद्ध फर्म छनि। आ एखन धरि ई पटनेमे छथि। पहिने हम हिनका मैथिलीक कवि अग्निपुष्पक जेठ भाइकेँ रूपमे जनैत छलियनि। भेंट-घाँट विभिन्न आयोजन सभमे होइत छल। मुदा जखन हम वर्ष १९९१ ई. मे पटनाक 'पाटलिपुत्र सेन्ट्रल को-आपरेटिभ बैंक'क प्रबंध निदेशक रूपमे पदस्थापित भेलहुँ तऽ नरेन्द्र झाजीसँ संपर्क बढ़ि गेल। एकर कारण ई भेल जे बैंकक मुख्यालय एस.पी वर्मा रोडमे 'मदनधारी भवन'मे रहैक आ ओही भवनमे हिनकर ऑफिस सेहो रहनि। ओहीठाम 'समकालीन जनमत' केर कार्यालय सेहो रहए जाहिमे अग्निपुष्प कार्यरत रहथि। दूनू भाइसँ एहि कारणे निकटता बढ़ि गेल। ओकर बादसँ हम सभ विभिन्न साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधिमे संग-संग रहऽ लगलहुँ। २००६ ई. मे जखन प्रसिद्ध साहित्यकार रमानाथ झा, काशीकांत मिश्र 'मधुप' आ काञ्चीनाथ झा 'किरण'क जन्म शताब्दीक अवसरपर विशेष समारोह करबाक निर्णय भेल तऽ एहि हेतु एक संस्था बनल 'प्रतिमान' नामसँ राजमोहन झा ओकर अध्यक्ष नरेन्द्र झा कोषाध्यक्ष आ हम सचिव भेलहुँ। आयोजन सफलता पूर्वक संपन्न भेल। नरेन्द्र बाबू आ अग्निपुष्पजीक ओहिमे बहुत सहयोग रहल। जखन मैथिली लेखक संघ बनल तऽ नरेन्द्र झा ओकर अध्यक्ष भेलाह आ विनोद कुमार झा महासचिव। लेखक संघ कार्यक्रम सभ करऽ लागल। आब नरेन्द्र बाबूक 'झा एंड एसोशिएट केर कार्यालय फ्रेजर रोडक ग्रांड प्लाजामे आबि गेल रहए। लेखक संघक ओ कार्यालय सेहो बनि गेल। ओतहि मासमे एक बेर रचना गोष्ठीक आयोजन हुअऽ लागल रहै। वर्ष २०१४ मे जखन पटनाक साहित्यकार सभक द्वारा मैथिली लिटरेचर फेस्टीभल आयोजित करबाक निर्णय भेल तऽ एहि हेतु संस्थाक रूपमे सहयोग करबाक लेल मैथिली लेखक संघ सहर्ष तैयार भेल। पटनामे ई फेस्टीभल १२ दिसम्बरसँ १४ दिसम्बर धरि वर्ष २०१४ आ १२ फरवरीसँ १४ फरवरी धरि वर्ष २०१६ मे आयोजित भेल रहए। आयोजन समितिक अध्यक्ष रूपमे नरेन्द्र बाबूक सहभागिता आ परिश्रम बिसरए बला नहि अछि। हुनकर संपूर्ण परिवारक सहयोग एहिमे प्रसंशनीय रहल। नरेन्द्र बाबूक पत्नी प्रसिद्ध कथाकार डा. पन्ना झा कला, शिल्प ओ व्यंजन मेला लेल महिला संघक सदस्य सभकेँ उत्साहित केलनि। दोसर बेर स्मारिकाक संपादन केलनि। नरेन्द्र बाबूक मिथिला-मैथिलीक काजमे आजीवन संलग्नता ओ सक्रियताक संग दोसर महत्वपूर्ण पक्ष अछि हुनक मिथिला राज्यक औचित्य लेल साहित्येतर लेखन। एहि संदर्भमे हुनक पोथी 'मिथिलाक आर्थिक विकास', 'मिथिलाक जनपदीय विकास', 'मिथिलामे जल संसाधन', 'विकास ओ अर्थतंत्र' एवं 'Mithila Rising' केँ देखल जा सकैत अछि। एकर अतिरिक्त हुनक 'अर्थशास्त्र ओ भ्रष्टाचार', 'परिभ्रमण' एवं 'स्मृति' पोथी सेहो प्रकाशित अछि। मिथिला राज्य आन्दोलनकेँ सैद्धांतिक आधार देबाक लेल जेना डा. लक्ष्मण झा, डा. लक्ष्मीनारायण सिंह, प्रो. विद्यापति सिंह विभिन्न पोथी सभ लिखलनि, ओही कड़ीमे ओकर बाद हमरा जनैत नरेन्द्र झा अबैत छथि। नरेन्द्र बाबू मानैत छथि जे जे एहि क्षेत्रक विकास लेल मिथिला राज्य बनब आवश्यक अछि। वर्ष २००५ मे लिखल निबंधमे ओ कहैत छथि ' विकासक पटरीसँ मिथिला पूर्णतः नीचा उतरि चुकल अछि। जातीय जोड़-तोड़, अपराध, अपहरण, फिरौती, रंगदारी विकसित भेल। तखन विकासक दर २.७५ अछि जे राष्ट्रीय औसतसक आधासँ कम। औद्योगिक विकास लगभग शून्य। एहि राज्यमे ६५००० उद्योग बीमार। रोजगारक अवसरमे वृद्धिदर एक फीसदी। एहए प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष बिजली खपत ५० यूनिट, जे पंजाबमे ५०० यूनिट तथा राष्ट्रीय औसत ३५० यूनिट। भूमि सुधारमे असफलता पिछड़ापनक पैघ कारण। ७० प्रतिशत मजदूरकेँ कोनो काज नहि। राज्य सरकार मात्र केंद्र सरकारपर निर्भर। उद्यमिता विकास नरादद। बाढ़ि नियंत्रणपर भाखड़ा-नांगल परियोजनासँ बेसी खर्च भऽ चुकल तथापि सप्तकौशिकी यजना लटकले। विकासक मुद्दापर झारखंड अलग राज्य बनल। मिथिलाक विकास सेहो तखनहि संभव।' आइसँ करीब बीस वर्ष पूर्वक स्थितिसँ आजुक मिथिलाक तुलना करी तऽ ई देखबामे आओत जे किछु क्षेत्रमे जेना बिजली, सड़क ओ विधि व्यवस्था क्षेत्रमे सुधार तऽ भेल अछि मुदा नव-नव समस्या उत्पन्न सेहो भेल अछि। शराबबंदीक कारण ओकर अवैध व्यापार आ ताहि कारणे उत्पन्न गाम सभमे बढ़ैत अपराधिक गतिविधि, कृषि क्षेत्रमे मजदूरक अभाव, रोजगार लेल अधिकांशक पलायन आदि स्थितिकेँ क्रमशः गंभीर बना रहल अछि। आर्थिक उदारीकरण क युगमे कृषि क्षेत्रमेक उपेक्षाक प्रति नरेन्द्र बाबू चिन्ता व्यक्त करैत छथि। ओ कहैत छथि जे 'मिथिलाक आर्थिक विकास गामक विकाससँ साक्षात जुड़ल अछि। ग्रामीण विकास कृषि पशुपालन, मत्स्यपालन, कुटीर एवं लघु उद्योगक विकासपर निर्भर छैक। ओतए एहि कार्यक लेल आधारभूत संसाधनक उपलब्धता तथा ग्रामीण रोजगार सेहो आवश्यक। एहिसँ ग्रामक निर्धनता दूर हएत एवं कायाकल्प हएत। ई भू-भाग कृषि प्रधान क्षेत्र अछि। कृषि आधारित उद्योगक विकास-विस्तारसँ ग्रामीण विकास हएत। कारण ग्रामीण बेरोजगारीकेँ दूर करब एवं अर्थव्यवस्थामे सुधार अनबाक क्षमता कृषि आधारित उद्योगमे समाहित अछि।' नरेन्द्र बाबूक पत्नी डा. पन्ना झा मनोविज्ञानक प्रोफेसर रहथि। किछु दिन पूर्व हुनक देहावसान भेलनि अछि। हुनक दू टा कथा संग्रह 'अनुभूति' आ 'अभिलाषा' प्रकाशित अछि। 'अनुशीलन' नामसँ निबंध संग्रह सेहो छनि। अपन कथा सभमे ओ एहि पुरुषतंत्री समाजमे स्त्रीक उपेक्षाकेँ मनोविश्लेषात्मक ढंगसँ कथात्मक अभिव्यक्ति केने छथि। हमरा लगैत अछि जे वर्तमानमे अथवा भविष्योमे जे व्यक्ति मिथिला राज्यक लेल सोच विचार करता हुनका नरेन्द्र बाबूक पोथी सभकेँ पढ़ब आवश्यक हेतनि। से नहि केवल हुनक दृष्टिकेँ फड़िच्छ करतनि अपितु राजनीतिक-अर्थशास्त्रक दृष्टिसँ संपूर्ण देशक एहि क्षेत्रक विभिन्न विचारधाराकेँ बुझबामे सेहो मदति भेटतनि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.९.लक्ष्मण झा सागर- श्री नरेन्द्र झाजी: हमरा नजरिमे लक्ष्मण झा सागर, संपर्क-9903879117 श्री नरेन्द्र झाजी: हमरा नजरिमे हम हिनकर नामसँ परिचित रही सत्तरिक दशकसँ मिथिला मिहिरक माध्यमे। हिनक आर्थिक सम्बन्धित लेख बेसी काल मिहिरमे छपैत रहनि। हम वाणिज्यक छात्र रही तेँ हमरा हिनकर लेख पढ़यमे नीक लागल करय। प्रभावित होइत रही। उपकृत होइत रही। हिनका बारेमे ई बुझल छल जे चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट छथि। तहिया मिथिला भरिमे आँगुर पर गिनल सी ए रहथि। सुनियै जे सी ए बनब तहिया बर दुरुह काज रहै। तेँ हिनका प्रति नीक धारणा बनल छल मोनमे। ईहो बुझल छल जे हिनकर गाम तरौनी छनि आ सासुर दुलारपुर छनि। ई नै बुझल छल जे हिनक बियाह स्व. बाबूसाहेब चौधरी जी अपना गाममे करेने छलखिन। से बादमे पता चलल। ईहो बुझल छल जे श्रीमती पन्ना झा हिनक पत्नी छथिन आ श्री अग्निपुष्प हिनक अनुज़ छथिन। पन्ना झाजी मैथिली साहित्यक एकटा नीक कथाकार छथि आ हिनक रचना आ आलेख सेहो हमरा मिहिरमे पढ़ल छल। अग्निपुष्प मैथिलीक एकटा नीक कवि छथि। अग्निपीढ़ीक एक अन्यतम स्तम्भ छथि। श्री नरेन्द्र झाजीसँ हमर पहिल भेंट आ परिचय 9/1, खेलात घोष लेन, मैथिली आर्ट प्रेस, कलकत्ता 700006 अर्थात् श्री बाबूसाहेब चौधरी जीक प्रेसमे भेल छल। अवसर छल नरेन्द्र झाजीक विदाइ गोष्ठी। ओ अपन व्यवसाय (सी एक प्रैक्टीस) कलकत्तासँ पटना लय गेल छलाह। पटनामे हिनकासँ पूर्व श्री रामेश्वर ठाकुर जीक औफिस मेसर्स ठाकुर वैद्यनाथ एयर्श एंड कम्पनी छल। हिनक कम्पनीक नाम छल झा एंड एसोसियेट, फ्रेजर रोड,पटना जे एखनो अछि। ओहि गोष्ठीमे अखिल भारतीय मिथिला संघ, कलकत्ताक किछु गणमान्य लोक सभ नरेन्द्र झाजीक व्यक्तित्व आ कृतित्व पर अपन विचार रखै जाइ गेलाह। अंतमे चौधरी जी भाव विह्वल होइत अपन बात रखलनि। पन्ना झाजी सेहो उपस्थित छलीह। हम हुनके लग बैसल रही। हम सभ गोटेक वक्तव्यसँ एहि निष्कर्ष पर आयल रही जे नरेन्द्र बाबू मिथिला मैथिलीक लेल समर्पित व्यक्तित्व छथि। मिथिला संघक मेरुदंड रहथि। बड़ सज्जन आ नीक लोक छथि। संघके आर्थिक सहयोग अपनो करैत छलथि आ दोसरोसँ कराबैत रहथि। एको पाइ ई घमंड नै जे हम सी ए छी। सभ गोटेकें आदर सम्मान दैत रहैत छथि। ओ अपन संबोधनमे सभ गोटेकें भावुक बना देलनि। कहलनि जे कलकत्ता हमरा जीवनके नव दिशा निर्देश देलक अछि। हम मैथिल छी। हमर मातृभाषा मैथिली थिक। हम अपन पहिचान मैथिली बाजि कऽ कायम राखि सकैत छी। हमरा जीवन भरि अपन भू भाषाक प्रति प्रेम आ सेवा करबाक प्रेरणा कलकत्तेसँ प्राप्त भेल अछि। बहुत देर धरि बजैत रहलाह। सब बात मोन नै अछि। ई समय छल 1974 ई.। हुनकासँ दोसर बेर हमर भेंट होइत अछि मैथिली लिटरेचर फेस्टीभल, पटनामे। ओ पटना जा कऽ मिथिला मैथिलीक विकासक काजमे लागि गेल रहथि। पटनाक मैथिली सेवी संस्था सभक अपन मैथिलीक साहित्यकारक प्रति उपेक्षा भाव हिनका बड़ अखरलनि। ओ श्री विनोद कुमार झा (सरकार)क संग मिलिके मैथिली लेखक संघक स्थापना केलनि। एहि महत्वपूर्ण काजमे हिनका दुनू गोटेक संग देबय वाला पटनाक किछु नामचीन साहित्यकार लोकनि सेहो रहथि। विचार भेलै जे आने भाषाक पर्व जेकाँ मैथिली साहित्यक पर्व सेहो मनायल जाय। संगमे रहथिन पन्ना झाजी आ अग्निपुष्प। अग्निपुष्पजीक चेहरा विकृत देखि हमरा चिन्हयमे भाँगठ भेल छल। अपने कहलनि ई मुंशी छथि। देखैत नै छियनि जे अपन शरीर केहन बना लेने छथि पी-पी कऽ। हमरा सहीमे हुनका देखिके बड़ दुख भेल। एक बेर हिनकासँ दिल्लीक एम एल एफ़मे सेहो भेंट अछि। पर्वक ई तेसर आयोजन छल दिल्लीमे। नरेन्द्र जी हमरा देखलनि। बड़ प्रसन्न भेल रहथि। भरि आयोजन जखन तखन भेटि जाथि। आ पुछि लेल करथि जे जलपान भेलै? भोजन भेलै? एहन आपकता देखल नहि। पन्ना जी सेहो आँखि लऽ कऽ परेशान छलीह। पटनाक मैथिली महिला मंचसँ जुड़ले टा नै बहुत सक्रिय रूपेँ स्थापित भय गेल छलीह। नरेन्द्र बाबू अपने सेहो खूब बेसी स्वस्थ नै लगलाह। हमरा पुछलनि स्व. बाबूसाहेब चौधरी जीक पुत्र विद्यापति चौधरीक बारेमे। हुनक बचिया सभक कन्यादानक बारेमे। हुनक बेटा सभक नोकरीक बारेमे। हम कहलियनि जे कन्यादान सभ तऽ भय गेल छै। बेटा एकटा छै नोकरी तकैत। अपने यदि कतहु लगबा दितियनि तऽ नीक रहितै। स्पष्ट जवाब देलनि जे चौधरी जी ककरा ककरा ने नोकरीमे लगेलनि मुदा, अपन बेटाक लेल किछु नै केलनि। हम के होइत छी हुनकर बेटाके नोकरी लगेनिहार। कहैत छथि जे अहाँ खराब नै मानब असलमे चौधरी जी मनुक्ख नै महा मानव छलाह। दधिचि छलाह। हुनका सन लोक हैब बड़ कठिन काज अछि। हमर मानब अछि जे मिथिलाक कोनो भाषा अभियानीके एतेक निष्ठुर नै हेबाक चाही। मैथिल समाज कृतघ्न समाज अछि। अहाँ भूखे मरि जायब तऽ कियो ई नै कहत जे अहा, बड़ पैघ त्यागी छलाह। बड़का ईमानदार छलाह। उल्टे कहत जे बड़ बेकूफ छलाह। संकोची छलाह। अरे, भूखे कियो मरि सकैत अछि?आब हमरा पर बरसय लगलाह। कहलनि जे हम अहाँके कहने रही जे चौधरी जीक बहकाबामे नै आयब। खूब मोन लगा कऽ पढ़ल करू। मिथिला मैथिलीक झंडा उठौने गुजर नै हैत। सी ए बनि जायब तऽ नीक नोकरी भेटत। तकर बाद जे मोन हैत से करैत रहब। मुदा, अहाँ हमर बात नै मानलहुँ। खैर, आब चिंते कय के की? लागल छी बड़ बढ़ियाँ लागल रहू। नरेन्द्र बाबू निरपेक्ष लोक छथि। हमरा लागल जे ई व्यक्ति महान छथि। हमर शुभचिन्तक छथि। एहन लोक अपना समाजमे कय गोटे छथि? अगाध विद्वान छथि। हिनक विद्वता जानबाक लेल आवश्यक अछि हिनक मिथिलाक आर्थिक स्थिति पर लिखल गतगर मोटगर पोथी सभ पढ़नाइ। बाढ़िक समस्या आ निदान पर लिखल आ एहन आरो किछु महत्वपूर्ण बिषय पर लिखल हिनक पोथी (ग्रन्थ) सभ पढ़बाक बेगरता अछि सुधी पाठक लोकनिक लेल। एकटा घटनाक सेहो हम चर्चा करय चाहैत छी। मिथिला दर्शन (नव पर्याय)क एक अंकमे कार्यकारी सम्पादक श्री रामलोचन ठाकुरजी श्री नरेन्द्र झा, श्रीमती पन्ना झा आ श्री अग्निपुष्पक रचना छापि देने रहथि। हम एकर प्रतिवादमे श्री नचिकेता जीकें एकटा खानगी पत्र दर्शनक पता पर देने रहियनि जे मैथिली साहित्य एतेक दरिद्र भय गेल अछि की जे एक अंकमे एक्के परिवारक तीन गोट साहित्यकारक रचना छापल जाइये। रामलोचन ठाकुर जी ओहि पत्रकें दोसर अंकमे छापि देलनि अविकल। जेना कि ठाकुर जी हमरा बादमे कहलनि जे नरेन्द्र बाबू हुनका फोन केलखिन जे ई अहाँक संपादकीय चूक भेल अछि। आ तकर बाद ठाकुर जी फेर कहियो एहन भूल नै केलनि। हमरा कचोट भेल आ नरेन्द्र बाबूक प्रति आदर आ श्रद्धा बढ़ि गेल। आइ काल्हि तऽ लोक हमरा गारि पढ़ि कऽ दरबज्जा लगा दितथि। मतलब जे नरेन्द्र झाजी एकटा नीक सी ए, एकटा नीक निबन्धकार, एकटा नीक टिप्पनीकार, एकटा नीक मैथिली अभियानी, एकटा नीक संस्मरण लिखनिहारे टा नै छथि बल्कि एकटा नीक लोक सेहो छथि। मिथिला मैथिलीक लेल समर्पित एहन व्यक्तित्वक मैथिल समाजक लोक कहियो कोनो संज्ञान नै लेलकनि। ने कोनो सम्मान ने कोनो पुरस्कार हिनका देल गेल। हमरा परम खुशी भेल जे विदेह टीम हिनका पर केन्द्रित एकटा विशेष अंक निकालि रहल अछि। हम श्री नरेन्द्र झाजीक स्वस्थ दीर्घायु हेबाक कामना करैत छी! विदेहक टीमक प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करैत छी!! अपन मंतव्य editorial.ऽtaff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१०.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'- की थिक मिथिला की छथि मैथिल जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'-संपर्क-8789616115 की थिक मिथिला की छथि मैथिल मैथिलीमे एहेन पोथीक संख्या नगण्य अछि जाहिमे मिथिला आ मैथिलक सम्बन्धमे सभ दुष्टिसँ जानकारी योग्य पर्याप्त सामग्री होइ, एहि अभावक पूर्ति करैत अछि आदरणीय श्री नरेन्द्र झा जीक पोथी 'मिथिलाक आर्थिक विकास'। एहि पोथीमे निम्नलिखित विन्दु आ विषय सभपर बहुत रास जानकारी उपलब्ध कराओल गेल अछि: 1. नाम, क्षेत्रफल आ आर्थिक विकासक सम्भावना। 2. परियोजना- जाहिमे सम्मिलित अछि कोशी परियोजना, गण्डक परियोजना, बागमती परियोजना, कमला नदी परियोजना आदि। 3. नदी- बूढ़ी गण्डक, महानंदा नदी आदि। 4. जनसंख्या एवं आर्थिक विकास। 5. जिलावार जंगलक विवरण: एहिमे कटिहार, खगड़िया, पूर्वी-पश्चिमी चम्पारण, पूर्णियाक जंगल क्षेत्रक जानकारी देल गेल अछि। 6. उद्योगीकरण एवं आर्थिक विकास: एकरा अंतर्गत चीनी उद्योग, कागज़ उद्योग, हस्तकरघा उद्योग,लघु, कुटीर एवं ग्रामोद्योग, पर्यटन उद्योग, कसीदा उद्योग, कृषि आधारित उद्योगक विवरण देल गेल अछि। पर्यटन उद्योगक अंतर्गत सिंघेश्वर स्थान, बाल्मीकि आश्रम, कुशेश्वर झील, मोटी झील आदिक वर्णन उपलब्ध कराओल गेल अछि। कृषि आधारित उद्योगक अन्तर्गत मशरूम (कुकुरमुत्ता ), नारियल, केरा, तमाकुल, सूर्यमुखी, जूट, चाह आदिक खेतीक सम्बन्धमे अवसर, उपलब्धि आ संभावनाक विवरण देल गेल अछि। 7. मिथिलांचलमे व्यापारक अन्तर्गत यातायातक साधन, 246 मील धरि स्थित 18 टा सडकक आ 161 मीलमे स्थित आठटा सड़कक विवरण देल गेल अछि। 8. 'ऊर्जा' क अन्तर्गत 10478 गाममे विद्युतिकरणक विवरण अछि। 9. मिथिलाक अन्तर्गत श्रम शक्तिक विवरण देखल जा सकैत अछि। 10. पोथीमे सरकारक असंतुलित आर्थिक नीति, ओकर दुष्परिणाम,ओहिमे आवश्यक संशोधनक आवश्यकता, चर्चित अर्थशास्त्री अमर्त्य सेनक कल्याणकारी अर्थव्यवस्थामे योगदानक वर्णन आदि अछि। 11. मिथिलांचलमे संचार सेवाक स्थितिक वर्णन अछि। लेखक श्री नरेन्द्र झा दरभंगा, दिल्ली आ कोलकातामे अध्ययन केने छथि, कोलकातासँ सी ए केर डिग्री प्राप्त केने छथि आ किछु वर्ष ओतहि अपन पेशाक संग 'मिथिला दर्शन' आ 'मिथिला मिहिर'मे मिथिलाक उद्योग-धंधा आ अर्थ-व्यवस्थापर नियमित लेखन करैत आएल छथि, मैथिली-आन्दोलन आ सांस्कृतिक गतिविधिमे रमल रहैत आएल छथि, मिथिलाक अर्थव्यवस्थापर आकाशवाणी, पटनाक लेल लेखन करैत आएल छथि, तें हिनक ई पोथी सामान्य लोकक जानकारीक लेल, छात्र-शिक्षक, शोधार्थी, आंदोलनकर्मी, विभिन्न योजना आ परियोजनासँ सम्बंधित कर्मचारी, अधिकारी, राजनेता आ सरकारमे विभिन्न रुपें संलग्न विभिन्न कोटिक लोक सबहक लेल उपयोगी बनल अछि। पोथीमे कतेक तरहक आंकड़ा आ सारणी द्वारा विवरण प्रस्तुत भेल अछि जे अद्यतन स्थितिक समावेशक अपेक्षा करैत अछि। बिहारक विकासक लेल मिथिलांचलक विकास आवश्यक अछि, आ मिथिलांचलक विकासक लेल एहि ठामक श्रम-शक्ति आ उपलब्ध अन्य संसाधनक समुचित उपयोग करैत उपयुक्त योजना-परियोजना द्वारा बंद पडल मिल सभके पुनर्जीवित कए, नव-नव कल-कारखानाक स्थापना कए रोजगारक पर्याप्त अवसरक सृजन कएल जा सकैत अछि, जाहि अभियानमे ई पोथी पथ-प्रदर्शकक काज क' सकैत अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.११.जीवन मिश्र- अद्भुत देश मिथिला (मिथिला राइजिंग: प्रकाशनसँ एखन धरि, हमरा नजरिसँ हमर सूचना सहित) जीवन मिश्र (संपर्क-8830819713) अद्भुत देश मिथिला (मिथिला राइजिंग: प्रकाशनसँ एखन धरि, हमरा नजरिसँ हमर सूचना सहित) आगू बढ़बा सँ पहिने स्पष्ट कऽ दी जे नरेन्द्र झाजीक पोथी मिथिला राइजिंग केर किछु अंश लऽ, ओकर मैथिली अनुवाद कऽ ओहिमे जे किछु सूचना छूटल भेटल से हम जोड़ि देलहुँ अछि। पाठक एकर अनुवाद मानथि वा कि आलेख से हुनकर इच्छा छनि। मिथिला प्राचीन अछि कारण एकर संबंध जनक-दार्शनिक राजा, याज्ञवल्क्य-दार्शनिक/कानून निर्माता, मंडन, वाचस्पति, उदयन, गंगेश, वर्धमान आ पक्षधर, सदृश महान नाम स अछि। भारतीय दर्शन के लगभग 5000 वर्षक इतिहास दुनिया के सब सं पुरान इतिहास मे से एक छै जबकि एकर भूमि के भूवैज्ञानिक गठन लगभग डेढ़ लाख साल पुरान छै । ई पृथ्वी के नवीनतम स्तर से एक छै । मुदा हम सब आब एकटा गंभीर संकट सं गुजर रहल छी। आब 75 साल भ गेल अछि जे हम सब स्वतंत्र भ गेलहुं, मुदा एखनो दिल्ली/पटना सत्ता स कष्ट उठा रहल छी । हम सब पहिने स बेसी कष्ट उठा रहल छी, कारण जे हमर सबहक आशा पूरा नहि होइत अछि आ सब सरकार से अपमान भेटए जतय हमरा सब के अस्तित्व मे गरिमा एबाक अपेक्षा छल। हम सब आइ पिछड़ल छी -गरीब, अज्ञानी आ कमजोर, दुनिया के तेजी स आगू बढ़ैत राष्ट्र के लेल दया के वस्तु बनल छी । हमरा केँ पड़ोसी सभ नीचाँ देखैत अछि जे हमरा सभकेँ बेकार आ कमजोर बुझैत अछि । मिथिलाक लोकक कोनो चिन्ता ककरो नहि बुझाइत अछि । जे कहैत छथि जे मिथिला, राज्यक रूप मे अपन दम पर ठाढ़ नहि भ' सकैत अछि, हुनका अपन एखन धरि अविकसित आ उपेक्षित प्राकृतिक संसाधन मे अपार संभावित धन केँ ध्यान मे राखय पड़तनि। जे अपन लोक केँ आत्मनिर्भर आ समृद्ध नहि बना सकैत अछि हुनका से यैह संभव जे ओ मिथिला के बिहार राज्य आ भारतीय संघ कए एकटा अनाथ संपत्ति घोषित करथि । हम सब अपन विशाल संभावित धन के नाली मे जेबाक बात तक से सचेत नहि छी। हमरा सब के पटना आ दिल्ली के "शासक" के सतमाय व्यवहार के सामना करय पड़ि रहल अछि। मिथिला के बिहार राज्य स अलग आ ओकरा पूर्ण राज्य बना देब ओकर अन्न, स्वास्थ्य, आवास, शिक्षा आ गरीबी समस्या के एकमात्र समाधान अछि। राज्य बनलाक बाद मिथिलाक लोक विशाल नदी से बरहमसिया नहर बना सकैत छथि आ सब मौसम मे फसिल ले उपयोगी बना सकैत छथि । गंडक, बागमती, कमला, बलान, कोसी, महानंदा आ ओकर सहायक नदी सब के वश मे करला सं बाढ़ पर नियंत्रण, अनेक महामारी के प्रसार सं बचाव, खाद्य फसल मे वृद्धि, संचार मे सुधार आ घरेलू आ व्यावसायिक उपयोग के लेल सस्ता जलविद्युत के आपूर्ति होयत। राज्यक रूप मे मिथिलाक व्यवहार्यता पर कोनो संदेह नहि। बहुतो लोक एखनो मानैत छथि आ कहैत छथि जे भारतीय संघक भीतर स्वायत्त राज्यक रूप मे मिथिला मे एतेक संसाधन नहि अछि जे अलग राज्य बनी सकय। मिथिला मे एहन लोक छथि, हुनका कम बुझल छनि से संभव मुदा हुनकर संसाधन हुनकर आकारक कोनो आन राज्य सँ कम नहि छनि । हमर लोक आ हमर प्राकृतिक संसाधन- जमीन, पहाड़ी, जंगल आ नदी, जानवर हमर सबहक धन अछि। हम दुर्भाग्यवश एहि विशाल संभावित संसाधनक बीच गरीबी आ अज्ञानताक जीवन जीबैत छी । ई एकटा गंभीर समस्या अछि जाहि पर हमरा सब के तत्काल ध्यान देबय के जरूरत अछि। परिचय मिथिला के उत्तर मे हिमालय, दक्षिण मे गंडक, पूर्व मे कोसी आ पश्चिम मे गंडक द्वारा सीमाबद्ध भौगोलिक क्षेत्र के रूप मे जानल जाइत अछि। ई पूर्व स पश्चिम तक लगभग 180 मील आ उत्तर स दक्षिण तक 125 मील अछि, क्षेत्रफल मोटा-मोटी 22500 वर्गमील अछि। एहि मे पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण, मुजफ्फरपुर, हाजीपुर, सीतामढ़ी, मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, बेगूसराय, खगड़िया, किशनगंज, पूर्णिया, सहरसा, अररिया, मधेपुरा आ नौगाछिया (उत्तर भागलपुर) के आधुनिक जिला अछि, जे लगभग 18914 वर्ग मील के अछि। बिहार मे आ नेपाल मे 4853 वर्ग मील अर्थात मोरंग, सप्तरी, महोतरी, सर्लाही, रौतहट, बारा आ पर्सा जिलाक जिला। ई अक्षांश २५’३० उत्तर आ २७'५० आ देशांतर ८३'८० पूर्व आ ८८' ७ ई के बीच स्थित छै । बृहद् विष्णुपुराण (मिथिला खण्ड) (८,५०० ई. पूर्व मे) एहि भूमिक वर्णन अछि । पर्सा, बारा, रौतहट, सर्लाही, महोतारी, सप्तरी आ मोरंग मे गोरखा लोकनिक अपन जमीनक क्षेत्रफल लगभग 5000 वर्ग मील होयत। ई व्यवस्था अंग्रेज लोकनि दिसम्बर १८१६ मे सुगौली मे संधि कए गोरखा लोकनिक पक्ष मे केने छलाह, कारण एहि काल मे भारत आ यूरोप मे अंग्रेज पर कठिन दबाव छल। तहिया सँ हमर भूमि जे आब तराई के नाम सँ जानल जाइत अछि, जे हमर जीवन रेखा अछि, मुदा आब नेपाल देश भेल। इ एकटा मूल्यवान आ उत्पादक संपत्ति छै जे नदीक के शीर्ष पर छै, हमर जल आ जल-विद्युत के आपूर्ति लाइनक, गोरखा के नीचा तराई इत्यादि हमरा सब के पहाड़ी पर जेबा स रोकैत अछि जकर बिना हम सब अपन नदी के ऊपर बांध नै क सकैत छी या पाथर स सड़क के मरम्मत नै क सकैत छी। मिथिला मे खेती बिना नदी के वश मे केनै नै सुधरि सकैत अछि जे सब हिमालय स उतरैत अछि। हमर उद्योग के विकास हमर जलविद्युत के भविष्य पर निर्भर छै । मिथिला अनिवार्य रूप स कृषि क्षेत्र अछि, तइयो एकर औद्योगिक संरचना पूर्व मे काफी विकसित छल । ई पूरा क्षेत्र औद्योगिक परिदृश्य स पूर्ण रूप स समाप्त भ गेल अछि। जनसंख्या के तेजी स बढ़ोत्तरी आ एकर अत्यधिक बोझ पूरा क्षेत्र क औसत राष्ट्रीय स्तर स बहुत नीचा धकेल देलक । त्रासदी ई छै कि एहि क्षेत्र के हमर राष्ट्रीय योजनाकार कहियो सीध नजर स नै देखलक, भले ही एकरा मे समृद्ध आर्थिक क्षेत्र होय के लगभग सब आवश्यक क्षमता छै, जेना कि पूर्व मे छलै । केंद्र आ राज्य सरकार दुनू दिस स सबटा योजना आ परियोजना शुरू भेलाक बादो इ क्षेत्र कोनो विशेष ध्यान आकर्षित करबा मे असफल रहल अछि। आजादी स पहिने लगभग ओतहि अछि जतय छल। बहुतो लोक एखनो मानैत छथि आ कहैत छथि जे भारतीय संघक भीतर स्वायत्त राज्यक रूप मे मिथिला मे एतेक संसाधन नहि अछि । मिथिला मे हमरा सब के एहन लोक भेटैत अछि, मुदा हुनका सब के ई कम बुझल छनि जे मिथिला के संसाधन कोनो आन समआकारी राज्य के संसाधन स कम नै छै। 5।6 करोड़ व्यक्तिक (जनगणना 2011) आ 25000वर्ग मीलक विस्तारक जमीनक टुकड़ा जे उपजाऊ गाद सं ढकल अछि जे सब सं नीक फसल देबा मे सक्षम । नियमित अंतराल पर नदी सब साल भरि हिमालय सं समुद्र धरि पानि ल जाइत अछि जे पूरा जमीन के सिंचाई आ हर घर के लेल जलविद्युत के व्यवस्था करय लेल पर्याप्त अछि, रेलवे ट्रेन, ट्राम कार आ बस के संग-संग छोट आ पैघ उद्योग के लेल सेहो पर्याप्त अछि । मिथिला मे उद्योगक अभाव वा गरीबी कहियो संसाधनक अभाव मे नहि होइते । दिल्ली आ पटना मे शासक नहि चाहैत छथि जे मिथिला विकसित हो। तकनीकी उन्नति सदिखन सामान्य शैक्षिक आ आर्थिक प्रगति के संग चलैत अछि । मिथिला गरीब अछि आ ओकर गरीबीक कोनो समानांतर नहि, प्रति व्यक्ति आय अल्प अछि। जीवन स्तर दुनिया के सब स निचला स्तर मे अछि। कौतुहल के बात ई छै कि ई अत्यधिक गरीबी "भरलपूरल संसाधन" के बीच मे छै। एकर आर्थिक जीवन के वैज्ञानिक अध्ययन करब जरूरी छै ताकि परिस्थिति मे सुधार लेल उपाय सुझायल जाय । लगभग लाख वर्ष पूर्व जाहि क्षेत्र के हम सब मिथिला के नाम स जनैत छी ओ ओहिना अस्तित्व तक नहि छल। ई समुद्रक ओ भाग छल जे हिमालयकेँ विन्ध्यसँ अलग कए अरब सागरसँ बंगालक खाड़ीमे मिलैत छल। ताहि सँ पहिने सेहो हिमालय स्वयं अस्तित्वहीन छल, ई विन्ध्य सँ बहुत बाद मे आयल छल आ जखन कि एकर ऊँचाई विंध्य सँ बेसी अछि| गंगेटिक मैदान हिमालयसँ छोट त अछिए संगहि एहिसँ जन्मल सेहो अछि । गंगा, गंडक, कोसी आदि नदी हिमालय सँ दक्षिण दिस बहैत छल। पहाड़ सॅं गाद आनि दक्षिण आ बाद मे पूर्व दिस अपन बाट मे जमा क' देलक । नदी माटि मे उर्वरता बहाल करबा लेल गाद आ ओकरा सिंचाई लेल पानि अनैत अछि । बाढ़ि ल' क जाइत छथि जे जीवन-सम्पत्तिकेँ नष्ट करैत अछि । मिथिलाक मैदानक सामान्य ढलान उत्तर सँ दक्षिण आ फेर दक्षिण-पूर्व दिस अछि उत्तर मे जंगल आ पहाड़ी अछि। उत्तरी पहाड़ी पर महाभारत आ चुरिया श्रृंखला अछि । महाभारत समय के कतेको स्थानक ऊँचाई आ जलवायु पूर्व मे दार्जिलिंग, कालिम्पोंग, कुर्सेओंग आ पश्चिम मे नैनीताल, अल्मोड़ा, देहरादून, मसौरी, शिमला आदि सँ तुलनीय अछि। जयनगर सँ ३० मील उत्तर-पूर्व आ निर्मली सँ ४० मील उत्तर-पश्चिम उदयपुरगढ़ी लगभग ६००० फीट ऊँच अछि । एकर तुलना दार्जिलिंग, मकवानपुरगढ़ी स कैल जाय सकै छै, आ अमलेखगंज स १५ मील दूर हरिहरपुरगढ़ी, बैरगनिया स ४५ मील, सिंधुलीगढ़ी सीतामढ़ी स ५५ मील, धरान बाजार के उत्तर मे पहाड़ी जोगबनी स ३० मील आ फेर नक्सलबारी स २५ मील दूर ई सब स्थान छै जे पर्यटन केंद्र, स्वास्थ्य रिसॉर्ट आ बाजार मे विकसित कैल जेबाक चाही। महाभारत पट्टी मकवानपुरगढ़ी के तीन अलग-अलग मे बंटल अछि-जेकरा चिसपानी गढ़ी, सिंधुल गढ़ी आ उदयपुरगढ़ी सेहो कहल जाइत अछि। मिथिलाक माटि या त बलुआही, डोरास, मतियार, चिकिनी या उसार अछि । बलुआही रेतीला दोमट अछि जाहि पर रब्बी फसल-गहूम, जौ, दाल, बीआ तेल फसिल सब नीक उगैत अछि। मक्का आ अन्य भदई फसल जे बहुत बेसी नमी सहन नहि क सकैत अछि, सेहो एहि पर पनपैत अछि, कारण ई फालतू पानि जल्दी सोखि लैत अछि । डोरास माटि आ बालुसँ बनल हल्का दोमट अछि । ई जाड़क चाउरक संग-संग भदाई आ रब्बी फसलक लेल सेहो उपयुक्त अछि। एक साल मे दू-तीन बेर बोआओल जाइत अछि। मटियार एकटा "क्लेवी" माटि अछि जे नीक मात्रा मे नमी बरकरार रखैत अछि । जाड़क चाउर लेल ई सबसँ नीक होइत अछि, चिकनी माटी सेहो मटियार सँ माटिक हल्का होइत अछि एहि मे बालु के मिश्रण होइत अछि। भदई फसल चिकनी माटी "अपलैंड" पर आ जाड़क चाउर नीचाँ पड़ल चिकनी माटी पर उपजैत अछि । उसर माटि मे नमक'क फूल होइत अछि जकरा रेथ (रेत) कहल जाइत अछि । ई पूरा क्षेत्र मे वितरित अछि । एकर व्यावहारिक रूप स खेतीबाड़ी क लेल कोनो उपयोग नहि अछि। दक्षिण आ पूर्व मे बलुआहीक प्रधानता अछि । बुरही गंडक के दक्षिण मे ई क्षेत्र अपन बलुआही माटी पर उगल बहुमूल्य रब्बी फसल के लेल सुप्रसिद्ध छै । कोसी पट्टी मे बलुआही माटि उपजाऊ नहि होइत अछि । माटिक एकटा आओर वर्गीकरण अछि धनहर आ भीठ मे । धनहर नीचाँक जमीन अछि जाहि पर धानक खेती होइत अछि आ भीठ अर्थ होइत अछि उभड़ल जमीन जाहि पर रब्बी फसल उपजैत अछि। ईंट आ माटिक बर्तन बनेबा मे माटि क उपयोग होइत अछि। नदीक तल मे साधारण बालू खूब भेटैत अछि । एकर उपयोग जोड़ाई काज करबा मे होइत अछि। भूमि के मालिकाना छोट विखंडन सं जमीन के गुणवत्ता सीमित भ जाई छै मुदा जं एकर प्रबंधन सहकारी या सामूहिक आधार पर कैल जाय त खेतक के आकार बढ़तय। माटिक संरक्षण, सिंचाई, खाद, बीज आ औजार के सुधार के लेल संसाधन उपलब्ध होयत। फसल क बेहतर योजना बनेबाक गुंजाइश रहत। खेती-बाड़ीक पर्यवेक्षण आसान होइत। कीट आ आवारा जानवर सं फसल के सुरक्षा के व्यवस्था बेहतर होयत। नदी एवं नदी घाटी परियोजना मिथिला नदी स भरल अछि बुझु जे मछहर वला जाल जेना एक दोसर स जुड़ल अछि। एकर कारण ई क्षेत्र के 'तीरभुक्ति' (नदी किनार के भूमि) कहल गेलै । गंडक, बुरही गंडक, बागमती, कमला, बालन, तिलजुगा, कोसी, कंकाई, मे ची, बालसुन, महानदी (महानन्द) नदी आ ओकर सहायक नदी हिमालय मे उठि मिथिला आ आगु बहैत अछि । पश्चिम सँ आगू बढ़ैत हमरा लोकनि केँ गंडक, बुरही गंडक, बागमती, कमला, तिलजुगा (त्रियुग) आ कोसी भेटैत अछि। एहि प्रमुख नदी सभ मे जुड़ि बहैत अनेक छोट-छोट नदी अछि । ई सब हिमालय मे उठैत अछि आ एकल वा संयुक्त रूप सँ विभिन्न बिन्दु पर गंगा मे खसैत अछि। गंडक (सदानिरा वा सालग्रामी), पश्चिम मे अंतिम आ कोसी, सबसँ पूर्वी, कोनो एक नदी नहि अछि। ई दुणु हिमालयी नदीक दूटा प्रणाली थिक । एहि मे सँ प्रत्येक मे एक संख्या-पारंपरिक रूप सँ सात-नदी होइत अछि जे पहाड़ सँ आगू मैदान दक्षिण मे पहुँचबा सँ पहिने एकल धारा बनबैत अछि। दुनू व्यवस्था गंडक आ कोसी गठन मे एतेक समान अछि जे एकर धारण नाम सेहो एक समान अछि। गंडक व्यवस्था 'सप्तगंडकी' (सात गण्डक) के नाम सँ जानल जाइत अछि आ मैदान मे पहुँचबा सँ पहिने अंतिम संगम केँ 'त्रिवेणी' (तीन प्रणाली) कहल जाइत अछि। कोसी प्रणाली के 'सप्तकौस्की' (सात कोसी) के नाम स जानल जाइत अछि आ एकर अंतिम संगम के 'त्रिवेणी' के नाम स सेहो जानल जाइत अछि। ई दुनू प्रणाली हिमालय मे नेपाल पर लगभग 8000फीट पर घाटी द्वारा एक दोसरा सँ अलग अछि । गंडक प्राचीन काल मे सदानीरा के नाम सँ जानल जाइत छल। वैदिक आर्य द्वारा गंडक उत्तर पूर्वी भारत के पुनर्प्राप्ति के संबंध मे शथपथ ब्राह्मण (1000 ई।पू।) मे एहि नदी के सबस पुरान संदर्भ भेटैत अछि। मध्यकाल मे जखन शालेग्राम शिला (गोल कारी पाथरक टुकड़ा) के विष्णु के प्रतीक के रूप मे पूजा होबय लागल छल तखन गंडक के शालग्रामी कहल गेल छल कियाक त एकर धार मे शालग्राम शिला प्रचुर मात्रा मे भेटैत अछि| एकरा शालग्रामी गंडक सेहो कहल जाइत अछि। गंडक हिमालय के मध्य क्षेत्र मे उठै छै जेकर जलग्रहण क्षेत्र १४, ६१२ वर्ग मील के छै । सात धारा एकजुट भ' पहाड़ी मे नदी बनबैत अछि । ई नदी तिब्बत के धौलागिरी पहाड़ी मे अपन उत्पत्ति स 7620 मीटर के ऊंचाई स उतरैत अछि । ई स्थान सुप्रसिद्ध किंवदंती गजेन्द्रमोक्ष सँ जुड़ल अछि। गंडक नदी के पूर्वी भाग मे त्रिवेणी के सामने मिथिला के पश्चिम चंपारण जिला मे वाल्मीकि नगर कस्बा स्थित अछि। ई मिथिला आ नेपाल के बीच लगभग 18।5 किमी।, वाल्मीकि नगर के नीचा आ आगू लगभग 80 किमी।, नदी मिथिला आ उत्तर प्रदेश के बीच सीमा बनबैत अछि। त्रिवेणी मे एकर जलग्रहण क्षेत्र ३५,४७० वर्ग किलोमीटर आ त्रिबेनी आ सोनपुर के बीच नदी के अतिरिक्त जलग्रहण क्षेत्र ४१८८ वर्ग किलोमीटर छै । नदी के कुल जलग्रहण क्षेत्र के मात्र १३ प्रतिशत भारत मे स्थित छै । संकेत छै कि नदी बहुत हल्का ढलान स बहय छै । बुरही गंडक-सोमे श्वर पहाड़ी के पश्चिमी छोर मे बुरही गंडक उभरैत अछि जाहि मे पहाड़ मे 900 वर्ग मील के जलग्रहण क्षेत्र अछि। ई पश्चिम चंपारण जिला के बगहा मे गाम विश्वमपुर के नजदीक एक चौर लग अबै छै। ई पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण मुजफ्फरपुर, दरभंगा, समस्तीपुर, खगड़िया आ बेगूसराय जिला होइत दक्षिण आ दक्षिण पूर्व मे बहैत अछि । एकर मैदान मे २७० मील लम्बा घुमावदार छै । ई खगड़िया लगगंडक मे मिलि जाइए आ मिथिला के सब स नमहर नदी मे स एक अछि। एहि क्षेत्र मे रेलवे क विकास स पहिने इ एकटा महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग क काज करैत छल । दहिना कात एकर एकमात्र सहायक नदी धनौती अछि जे चंपारणक झील मे उठैत अछि । एकर बायां किनार के पहाड़ी स छोट-छोट धारा छै । एहि गंडक लेल 'बुर्ही' (पुरान) उपनामक व्याख्या करब कठिन अछि । निस्संदेह एकर उद्देश्य एकरा सदानिरासँ अलग करब छल । बागमती-बागमती नेपाल घाटी के उत्तर पूर्व मे गोसाईनाथ ऊंच पहाड़ी लगपहाड़ मे उठै छै जे समुद्र तल स २६३०५ फीट ऊपर छै आ एकर जलग्रहण क्षेत्र १७०० वर्ग छै । एकरा व्याघर्मती (बाघक भरमार) के नाम सँ सेहो जानल जाइत अछि। हिमालय मे अत्यंत असमान भूमि सतह स बहैत ई आवाज जरूर करैत छल आ एकर तट पर तराई जंगल मे बाघ के भरमार छल । पहिने एकर तट पर दू टा राजधानी शहर छल-नेपालक काठमांडू आ मिथिलाक सिमरावन । सदियो बाद काठमांडू एखनो नेपाल के राजधानी बनल अछि जाहि मे घाटी के आगू के विशाल जमीन शामिल अछि जखन कि सिमरावन गढ़ सीमा पर खंडहर मे अछि, एकरा नेपाल मे पवित्र नदी के रूप मे मानल जाइत अछि जेना हम सब एतय गंगा के व्यवहार करैत छी । ई बारहमासी नदी अछि जे झरना द्वारा पोसल जाइत अछि । भारी बरखा के बाद ई जल्दी धार करै छै, एकर तेज धारा ऊपरी भाग मे सात मील तक चलै छै । ई तराई क्षेत्र के जिला रौतहट आ सर्लाही के बीच के सीमा बनाबैत अछि आ सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर आ दरभंगा जिला स गुजरैत अछि। एकर मिलन कुशेश्वरस्थान के दक्षिण-पूर्व मे बेलाही मे कोसी स होय छै । ई सीतामढ़ी-रक्सौल रेल लाइन के धेंग रेलवे स्टेशन लगसबसे पहिने प्रवेश करै छै । कमला-कमला नदी हिमालय के महाभारत श्रृंखला मे उदयपुर जिला के सागरमाथा क्षेत्र स उत्पन्न होइत अछि, जे सिन्धुलियागढ़ी के नजदीक 1200 मीटर के ऊंचाई पर, नेपाल मे अछि। धनुषा जिला के जनकपुर क्षेत्र मे पहुँचि तराई मे 20 मील बहैत अछि। कमला समय समय पर अपन मार्ग बदलि देलक आ चारि अलग-अलग मार्ग'क अस्तित्व ज्ञात । संक्षिप्त वर्णन एहि तरहेँ अछि : बछराजा धार-कमला जयनगर'क पश्चिमक बहुत नजदीक बहैत छल। मधुबनी स पश्चिम सेहो बहैत छल मुदा दरभंगा मे नदी शहर स तीन किलोमीटर पूब स गुजरैत छल । पटघाट(पैट घाट) कमला-जयनगर के पूब स शुरू भ क कमला के जयनगर- सकरी रेल मार्ग स राजनगर स्टेशन तक चलैत छल आ फेर दक्षिण दिस मोड़ लैत लोहना रोड रेलवे स्टेशन स पश्चिम मे सकरी-निर्मली रेल लाइन पार क तखन कमला बलथरवा गामक समीप 'तिल्युगा' मे जुड़ि गेल आ नदी' क ई 189 किलोमीटर लंबा मार्ग पटघाट कमला के नाम सँ जानल जाइत छल। सकरी कमला-पटघाट कमला कहियो अपन स्थान पर नहि रहल । जीवछ कमला-कमला 1930 मे मोहनपुर गामक समीप अपन मार्ग बदलि लेलक। 1896-97 के अभूतपूर्व रौदी मे दरभंगा महाराज कमला के ओहि पार 6 टा अस्थायी गेट लगा देलखिन आ ओकर पानि के नदी के पुरान आ परित्यक्त चैनल मे मोड़ि देलखिन, जतय स किसान सब के खेती ले जल भेटल। एहि तरहें ओ 9000 हेक्टेयर धानक फसलक बचत केलनि। मई 1901 मे ओ 3 किमी जोड़लनि। नहर मे बेसी जोड़ से 42 गाम मे धान क फसल क फायदा भेल। ओही वर्ष ओ कमलाक सम्पूर्ण प्रवाह केँ नदी' क ओहि पार माटिक बान्ह लगा कए जीवछक पुरान नदी मे मोड़ि देलनि आ नीक रबी सुरक्षित कयलनि। एहि परियोजना कए राजा नहर क नाम स जानल जाइत अछि। जीवछ-जीवछ के उत्पत्ति दुधैल के पूर्व मे एकटा चौर स होइत अछि जे बेनीपट्टी थाना के दक्षिण मे अछि। एकर पहिल धारा दुधैल सं शुरू भ बिरखौली आ कायमचक गाम के पार क बेला महल लग दरभंगा शहर तक पहुंचैत अछि आ दरभंगा सं उत्तर-पूर्व मे बहैत अछि । एकटा आर धारा ओहि चौर सँ शुरू होइत अछि जे सिंघिया (बेनीपट्टी) होइत चलैत अछि, हनुमाननगरक जलवाड़ा मे प्रवेश करैत अछि। नदी सिंघिया-बिरौल दिस बहैत कमला सँ मिलैत अछि। ई आगू फुहिया गामक पूर्व मे करेह सँ जुड़ैत अछि। करेह-दरभंगा जिला मे बागमती के करेह कहल जाइत अछि। ई सिरनिया गाम के पश्चिम मे समस्तीपुर-दरभंगा रेल लाइन के नजदीक बहैत अछि। एकरा छोटी बागमती के नाम स जानल जाइत अछि। ई खुटौना गाम के पश्चिम मे जीवछ मे मिलैत अछि आ आगू बढ़ैत अछि आ तिलकपुर गाम मे कमला मे मिलैत अछि। नदीक अधवारा समूह-एहि समूह मे पन्द्रह टा छोट-छोट नदी अछि । बालन आ भूतही बालन-उदयपुर गढ़ी के दक्षिण-पश्चिम पहाड़ी मे बालन उठैत अछि आ मुखसारी मे मैदान मे पहुँचैत अछि। पहाड़ी मे एकरा गगन खोला के नाम सँ जानल जाइत अछि। नेपाल मे पैर पहाड़ी के ठीक लग बहुत छोट-छोट धार एकरा जोड़ि कए नदीक आकार दैत अछि । कोसी या कमला के विपरीत तिलयुग शांत आ निर्दोष अछि । बनैली-श्रीनगर एस्टेट द्वारा निर्मित 14 मील लंबा बाढ़ि सुरक्षा तटबंध, जहिया सं क्षतिग्रस्त भ गेल छल आ आब कोसी भ गेल अछि । कोसी के जलग्रहण क्षेत्र लगभग ७४,५०० वर्ग किलोमीटर छै । एहि मे स लगभग 85 प्रतिशत तिब्बत मे आ शेष भाग मिथिला मे अछि। नदीक कुल लम्बाई ४६८ कि।मी। जाहि मे 248 किमी मिथिला मे बहैत अछि। ई नेपाल घाटी के पूर्व हिमालय मे आ दार्जिलिंग के पश्चिम मे सिंगालिला श्रृंखला के पश्चिम मे पसरल कतेको धारा मे उठैत अछि। पहाड़ी मे मुख्य धारा सूर्य कोसी, अरुण आ तामार छै आ ई तीनों कोसी प्रणाली के सबसें महत्वपूर्ण नदी छे जेकरा सप्तकौसिकी, सात कोसी के नाम सें जानल जाय छै । सूर्य, अरुण, तामार अपन सहायिकाक पानि ल' क' समुद्र तल सँ लगभग 3000 फीट ऊपर त्रिवेणी मे अबइत अछि आ एकटा एकल धारा बनबैत अछि जकरा सप्तकौसिकी नाम सँ जानल जाइत अछि जे दक्षिण दिस मिथिलाक मैदान मे बहैत अछि। महानदी (महानन्द)-महानदी कुर्सेओंग (पश्चिम बंगाल) के पूर्व मे हिमालय के महादीर्म पहाड़ी पर उठैत अछि । नदीक के आपस मे संपर्क-भारत सरकार के जल संसाधन विभाग 1980 मे , जल के अंतर-बेसिन स्थानांतरण के लेल राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना तैयार केलक। 1982 मे भारत सरकार परिप्रेक्ष्य योजना के आधार पर व्यवहार्यता अध्ययन तैयार करय के लेल राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी (एनडब्ल्यूडीए) के स्थापना कैलकै, जेकरा मे बाढ़ के पानी के नहर आ भंडारण बेसिन के नेट वर्क बना क, उत्पादन के अलावा, कमी वाला बेसिन मे स्थानांतरण के कल्पना कैल गेल छै मुदा एखन धरि एहि परियोजना पर काज नहि भ सकल अछि। खेती मिथिला के आर्थिक जीवन मे कृषि के महत्व पर जोर देबय के जरूरत नै होयत। ई आर्थिक व्यवस्थाक मुख्य रीढ़ थिक । असल मे कृषक समृद्धि मिथिलाक समृद्धिक पर्याय थिक । क्षेत्र के अर्थव्यवस्था मे कृषि के स्थान स्पष्ट रूप स सामने छै : (i) रोजी-रोटी के स्रोत- ८८ प्रतिशत स अधिक काजकाजी आबादी सीधा खेती मे जुरल छै आ जं ओहो जे अप्रत्यक्ष रूप सं कृषि पर निर्भर छै, जोरल जाय त उपरोक्त प्रतिशत आर बेसि भ जायत। विकसित देशक मे कृषि पर निर्भर काजकाजी आबादी के अनुपात मिथिला के अनुपात से बहुत कम छै, असल मे जतेक विकसित देश अछि, राष्ट्रीय उत्पादन मे कृषि क हिस्सा ओतबे छोट अछि। (iii) खाद्य के आपूर्तिकर्ता-ई कृषि छै जे क्षेत्र के आबादी के पोषण करैत छै। (iv) उद्योगक के समर्थन करैत छै- कृषि न केवल आबादी के बल्कि ओकर निर्माण उद्योगक के सेहो कच्चा माल सं पोषण करैत छै। उपरोक्त के अलावा मिथिला मे कृषि के काफी सामाजिक आ आर्थिक महत्व छै। कृषि कर्मी मजबूत आ आत्मनिर्भर लोक होइत छथि । समाजक रीढ़ आ सामाजिक आ राजनीतिक स्थिरताक अंग थिक । एतबे नै, उद्योग वला रोजगार के तुलना मे , जे औद्योगिक केंद्र मे भीड़ प्रदूषण के कारण, स्वास्थ्य के नुकसान पहुंचाबै छै, कृषि खुला हवा वला पेशा छै आ स्वास्थ्य प्रदान करय छै। मिथिला'क बहुत उपजाऊ जमीन बहुत नीक स सम्पन्न अछि आ एहि क्षेत्र मे पैघ संख्या मे अनाज'क फसल, तरकारी आ फल क खेती होइत अछि। एकटा शोधकर्ता ई क्षेत्र मे उपजल जाय वला ५६ तरह के अनाज, दलहन, फल आ तरकारी के फसल के गिनती छै मुदा समृद्ध संभावना'क बावजूद किसान ओकरा लेल उचित दाम सुरक्षित नै करा सकै छै। एकर कारण छै कि क्षेत्र के अधिकांश गाम साल के अधिकांश भाग दुर्गम होय छै । बहुत रास गाम एहन अछि जतय बरखा आ बाढ़ि के कारण जून सं दिसंबर तक जेनाय संभव नहिं अछि। एहि इलाका के अर्थव्यवस्था के एकटा पैघ बढ़ावा भ सकैत अछि यदि परिवहन आ गाम-घर मे संचारक सुविधा नीक भ सकल। परिवहन आ संचार सुविधा के कमी के कारण वस्तु आ व्यक्ति के अइ क्षेत्र मे आ बाहर आवागमन पर भारी दिक्कत छै आ एकर परिणामस्वरूप आर्थिक गतिविधि बहुत कम स्तर पर संचालित होयत छै। मिथिला मे फसलक विस्तृत श्रृंखलाक उत्पादन होइत अछि। एहि मे खाद्य फसल गैर-खाद्य फसल पर प्रधानता अछि आ एहि क्षेत्रक कुल खेती योग्य क्षेत्रक लगभग चारि-पाँचम हिस्सा अछि, फसल केँ भदै (शरद ऋतुक फसल) अगहनी (जाड़क फसल)आ रबी (वसंत फसल) मे वर्गीकृत कयल गेल अछि । चाउर हमर सबसँ महत्वपूर्ण फसल अछि । ई क्षेत्रक अग्रणी फसल अछि । गहूम : ई अगिला महत्वपूर्ण फसल अछि आ आब मुख्य भोजन अछि । हरित क्रांति के परिणामस्वरूप उपज मे काफी बढ़ोतरी भेल अछि। प्रति एकड़ उपज 62 पाउंड अछि जे अन्य देशक मुकाबले सबस कम अछि। जौ : ई खाद्य फसल स बेसी नगदी फसल अछि कियाक त एकर उपयोग बीयर बनेबा मे होइत अछि। एकर खेती 6 प्रतिशत खेती योग्य क्षेत्र मे होइत अछि । मक्का : ई कम इलाका मे मुख्य भोजन सेहो अछि। एकर खेती 12 प्रतिशत खेती योग्य क्षेत्र मे होइत अछि। प्रति एकड़ उपज 625 पाउंड अछि अन्य खाद्य फसल अछि खेसारी, चना, मुंग, रहरी, मसुरी, उराद, कुर्थी, सैम, चिन, कोडो, जनेर, मटर आदि। मिथिलाक लोकक लेल दलहन बहुत महत्वपूर्ण खाद्य पदार्थक गठन करैत अछि। क्षेत्र के शाकाहारी आबादी के प्रोटीन के सेवन लेल दाल पर निर्भरता छै । जमीनी उर्वरता के बहाल रहबाक लेल फसल के रूप मे दलहाँ उगाएल जायत छै। गन्ना : मिथिला गन्ना के मूल घर त अछि मुदा कहियो एकर सबस पैघ उत्पादक छल। जूट : जूट मिथिलाक रेशाक फसल थिक, उच्च नकद मूल्यक कारणेँ 'गोल्डन फाइबर'क नाम सँ जानल जाइत अछि। कटिहार, अररिया, किशनगंज, पूर्णिया, मधेपुरा आ सहरसा महत्वपूर्ण उत्पादन क्षेत्र अछि । चाह : 1992 स किशनगंज जिला मे चाह क उत्पादन भ रहल अछि। उत्पादित चाह के गुणवत्ता के तुलना दार्जिलिंग के चाय सं आसानी सं कएल जा सकैत अछि। तिलबीज : मिथिला मे उगाओल सरसों, अलसी, आदि। तम्बाकू : समस्तीपुर जिला मिथिला मे सबस पैघ तम्बाकू उत्पादक क्षेत्र अछि। एतय उत्पादित तम्बाकू के पत्ता बहुत हद तक खाइ वला छै आ सिगरेट निर्माण के लेल उपयुक्त नै छै। मिथिला तरकारी स काफी समृद्ध हेबाक दावा क सकैत अछि, उपजाओल तरकारी अछि बैगन, झिगुनी, खीरा, करइला, कुमहर, कदीमा,सजमणि (लौकी), रामझिगुनी, सीम, कोबी, बंधकोबी, टमाटर, गाजर मुरई, मुनिगा आदि। धन्नी, मे थी, मर्चाई आ लहसुन सेहो अछि। तेतैर, करोना फर, धात्री, कुतरूम खट्टा मसाला के रूप मे प्रयोग होइत अछि। बीच मे औषधीय पौधा तुबी, गुरिच, कटैया, ब्राह्मी आदि अछि जलीय पौधाक खाद्य उत्पादक मे मखान, सिंघरा, भेंट, केसौर आदि अछि । पान आ सुपारी सेहो उगाओल जाइत अछि । मे हदी के पात के उपयोग महिला सब हाथ के रंग देबय लेल करैत छथि, घर के फूस के लेल कतेको तरहक खरह आ खरही के उपयोग करैत छथि। चटाई बनेबा मे मोथा आ पटर क उपयोग होइत अछि। एहि ठाम विभिन्न प्रकारक रतालूक खेती होइत अछि आ ओ अछि अल्हुआ, सुथानी, औरी, खमहौर आदि दू तरहक खरबूजाक खेती होइत अछि। एकटा के हरियर भेला पर कंकारी आ पाकल पर फुटी कहल जाइत छैक। दोसर के नाम तरबूज छै आ नदी के किनारे के रेतीला माटी पर एकर खूब खेती होय छै । मिथिला मे आम, कटहर, केरा, अमरूद, खजूर , सुपारी, करंजा, संतरा, नींबू, खरबूजा, खीरा, अनार, अंजीर, शरीफा, पपीता, लीची, बैर आदि अनेक फल के उत्पादन होइत अछि। 'फलक राजा' के नाम सँ जानल जाय वाला आम, भारी मात्रा मे आ नीक गुणवत्ता मे उगाओल जाइत अछि। आम आ केरा एहि क्षेत्र लेल पैघ कारोबारी वस्तु बनि गेल अछि। मिथिला के गाम निश्चित रूप स गाछी स घेरल अछि। 2012 मे मुजफ्फरपुर जिला मे लगभग 2100 किसान मोतीपुर, मीनापुर आ कांटीक 76 गाम कए 1200 हेक्टेयर जमीन मे जैविक लीची क खेती केलथि अछि। मिथिला मे माछ सबसँ बेसी मूल्यवान खाय योग्य वस्तु अछि । एकर महत्व आओर बढ़ि गेल अछि कारण परंपरागत रूप स मिथिलाक लोक माछ छोड़ि कोनो आन शाकाहारी भोजन नहि लैत छथि । लगभग हर गाम मे एक स बेसी पोखरि अछि आ कतेको एहन लोक अछि जे अपन घरक आगू वा पाछू मे पोखरि राखि सकैत अछि, खोदि सकैत अछि । हमर कृषि उत्पादन के एगो महत्वपूर्ण विशेषता ई छै कि ई पूर्ण रूप स फसल उत्पादन स बनल अछि। फसल मे खाद्य फसलक प्रधानता अछि। हर पांच खेती हेक्टेयर मे चारिटा खाद्य फसल मे पड़ैत अछि। हालांकि कुल बोयल गेल क्षेत्र के चारि-पांचम हिस्सा खाद्य फसलक के तहत आबै छै, मुदा आम तौर पर इ अफसोस के बात छै कि पिछला 50 सालक मे खाद्यान्न क्षेत्र के अपन खपत के लेल सेहो पर्याप्त नहि छै। मिथिला मे फसल उत्पादन मे सब स गंभीर दोष अछि जे सब फसल क प्रति हेक्टेयर एक समान रूप स कम पैदावार भेटैत अछि। ई एके बेर मे हमर सबहक कमी के व्याख्या करैत अछि, हमर खेती के अक्षमता के दर्शाबैत अछि आ हमर कृषि जनमानस के गरीबी के लेल जिम्मेदार अछि। मिथिला मे कृषि उत्पादन कम हेबाक समस्या बहुत जटिल समस्या अछि आ एकरा कोनो एक कारण सँ नहि कहल जा सकैत अछि । दोसर दिस ई एकल वा संयोजन मे संचालित अनेक कारणक परिणाम थिक । कृषि उत्पादन के वृद्धि के मंद करय वाला कारक छै: (i) मानवीय कारक - हमर किसानक के अशिक्षा आ अज्ञानता आ ओकर रूढ़िवादी दृष्टिकोण। ई सब हुनका खेती के आधुनिक तकनीक अपनाबय के बाट मे बाधा पहुंचैत अछि। (ii) तकनीकी-आर्थिक कारक-अतिरिक्त जनशक्ति छै; बेहतर बीज, खाद आ पौधाक के सुरक्षा के अभाव; पुरान औजार; सिंचाई के सुविधा के कमी; पर्याप्त वित्तक अभाव; उत्पादक निवेशक अभाव; विपणन सुविधाक अभाव; आ कृषि अनुसंधानक उपेक्षा। (iii) संस्थागत कमी-दू सिद्धांतक पाठ्यक्रम छोट आकार आ बिखड़ल मालिकाना आ दोषपूर्ण भूमि अधिग्रहण प्रणाली छै। मिथिला मे कृषि उत्पादकता बढ़ेबाक लेल एकटा बहुत व्यापक उपायक आह्वान कयल गेल अछि । मिथिला मे उपरोक्त विस्तार सँ भूमि नीतिक तीनू उद्देश्य महत्वपूर्ण अछि । जमीन आ सुरक्षा पर काज करबाक स्वतंत्रता, अपन श्रमक फल भोगबाक स्वतंत्रता महत्वपूर्ण अछि। जतय आय मे तीव्र असमानता रहल अछि ओतय समानता के बहुत महत्व देल जाइत अछि। प्रति आदमी उत्पादकता जेना सब प्रति एकड़ कम अछि आ ओकरा बढ़ेबाक अछि। पैघ संख्या मे खंडित मालिकाना अछि। जमींदारी के उन्मूलन अपने आप मे मिथिला के खेती के लेल पर्याप्त नै छै जे ओकरा भोगय पड़ैत छै। इ स्वतः कृषि मे सुधार आ उत्पादकता मे वृद्धि नहि क सकय छै। उपविभाजन आ विखंडन के बुराई स एखन धरि निपटयके अछि। जमींदार के किरायेदार के मात्र सरकार के किरायेदार मे बदलला स हम सब आधुनिक कृषि तकनीक के शुरूआत नै क सकैत छी। आवश्यकता अछि मिथिला मे कृषि'क समस्त संगठनात्मक पैटर्नक पूर्ण पुनर्निर्देशन । ई बुझनाई जरूरी छै कि जमीन्दारी व्यवस्था के उन्मूलन से कृषि प्रगति आ समृद्धि नै भेटत भूमिहीन कृषि मजदूर के दुर्दशा स व्यथित महसूस करी के महात्मा गांधी के करीबी सहयोगी आचार्य विनोबा भावे ई भूमि-उपहार आन्दोलन शुरू करी के एकरा 'भूदान यज्ञ' कहलकै । एहि मे समाजक दबल वर्गक प्रति ओकर कर्तव्यबोध केँ अपील कए जमीन मालिक सँ जमीनक उपहार संग्रह करब होइत छैक। एहि तरहें एकत्रित जमीन भूमिहीन मजदूर मे बाँटल जाइत अछि । 1951 मे आचार्य वियोनोबा भावे यज्ञ के लेल जमीन के चंदा संग्रह के लेल अपन भ्रमण शुरू केने छलाह। आन्दोलन शुरू मे काफी उत्साह उत्पन्न केलक । भूदान समिटी के गठन भेल आ केंद्र आ राज्य सरकार एकरा अपन सक्रिय समर्थन देलक अछि। तदनुसार बिहार राज्य मे भूदान अधिनियम पारित भेल जाहि स जमीन-उपहार आ भूमिहीन मजदूर मे ओकर वितरण मे सुविधा होए। बिहार मे इ आंदोलन सफल रहल अछि जे असगर 20।88 लाख एकड़ जमीन दान मे अछि। जाहि मे दरभंगाक महाराज जमीनक पैघ दाता मे सँ एक छलाह। एहि आन्दोलनक नैतिक आ आर्थिक बहुत पैघ महत्व अछि । मुदा तथ्य ई छल जे किसानक विशाल वर्ग केँ जमीन पर कब्जा नहि देल गेल छल । कृषि श्रम- मिथिला मे कृषि श्रमक समस्या अछि । कृषि श्रमिकक पंक्ति तेजी सँ बढ़ैत रहल अछि । दोसर दिस हुनकर आर्थिक स्थिति लगातार बिगड़ैत रहल अछि। ई मिथिला मे सब'स बेसी उपेक्षित वर्ग छथि। कृषिक मशीनीकरण-ई सर्वविदित तथ्य अछि जे एहि मशीन युग मे सेहो मिथिलाक किसान मुख्यतः आदिम औजार आ यंत्र पर निर्भर छथि। एकर परिणाम अवश्य कृषि अक्षमता अछि । ई ज्ञात तथ्य छै कि मुख्य रूप स मशीनीकरण के माध्यम स पश्चिम के देश मे कृषि क्रांति लानल गेल छै । देश मे वर्तमान मे पसरल 'हरित क्रांति' मे योगदान देबय वाला कारक असल मे मशीनीकरण रहल अछि। उद्योग मिथिलाक अर्थव्यवस्था पुरना जमाना मे स्वावलम्बी छल। एहि क्षेत्र मे लगभग हर आवश्यक वस्तुक उत्पादन होइत छल । समाजक एकटा विशेष वर्ग एहि काज मे लागल छल आ एहि विशेष वर्गक निर्वाह समाजक जिम्मेदारी छल । एहि सब वस्तुक बिक्री सं कमाई हुनका लोकनिक लेल पर्याप्त छलनि, मुदा ब्रिटिश वाणिज्यिक उपनिवेशक आ हुनक मशीनी उत्पादक आगमन सं एहि क्षेत्रक हस्तशिल्प वस्तु आ उद्योग नाश होमय लागल। मिथिला क्षेत्र के लोक के कम आमदनी के एकटा महत्वपूर्ण कारण खेती पर बेसी निर्भरता अछि । यदि आबादी के किछ हिस्सा के खेती सं गैर-कृषि के काज मे बदलल जाए त लोक के हालत मे सुधार होएत। कृषि आ अन्य आमदनी स्रोत मे कोनो टकराव नै छै। असल मे एक दोसर के समर्थन करैत अछि । उद्योग कृषि व्यवसाय के खाद, कीटनाशक, कृषि उपकरण आ उपकरणक के आपूर्ति करैत छै आ कृषि बदला मे औद्योगिक विकास के लेल श्रम शक्ति आ कच्चा माल के आपूर्ति करैत छै। एकटा बढ़ैत कृषि अनेक वस्तुअक के लेल बाजार प्रदान करैत छै, एकर अलावा, जेना जेना किसान समुदाय के आय बढ़त, ओकर मांग तृतीयक उद्योगक के लेल बढ़त। कोनो क्षेत्र मे औद्योगीकरण के पैटर्न आंशिक रूप सं संसाधन संपदा के अनुसार निर्धारित कैल जायत छै। मिथिला क्षेत्र मे खनिज भंडार नहि अछि तइयो कृषि कच्चा माल के आधार पर औद्योगीकरण के आगू बढ़ाओल जा सकैत छल। एक बेर कृषि आधुनिक भ गेलाक बाद आ कृषि उत्पादन बढ़ला पर कृषि उत्पादक के प्रसंस्करण के लेल पैघ पैमाना पर प्रसंस्करण उद्योगक के आवश्यकता होयत जेना चीनी मिल, पेपर मिल, जूट मिल, सब्जी आ फल के डिब्बाबंदी, कोल्ड स्टोरेज, आटा, चावल, दालि, तेल, तम्बाकू, चाह आदि। एहि बात पर जोर देबय के जरूरत नहिं जे आधुनिक प्रसंस्करण उद्योग के अभाव मे आधुनिक कृषि के कायम नहि राखल जा सकैत अछि। वर्तमान मे किसान बाजार मे दाम क पूरा लाभ नहि पाबि रहल छथि। एक बेर जखन ओ एहि उत्पाद क प्रोसेसिंग क आयोजन करि लेताह त हुनका बाजार मूल्य क पूरा लाभ भेट सकैत छल । कृषि व्यवसाय हमर लोक के पूर्ण रूप स संलग्न नै करत ओ कृशेतर अर्थात डेयरी, मुर्गी, सुअर पालन, बकरी पालन, भेड़ पालन आदि के आयोजन क अपन आमदनी के ऊंच क सकैत छल । मिथिला क्षेत्र मे अपन असंख्य पोखरि, नदी, चौर, मोइन आ अन्य मे मत्स्य पालन के विकास के पैघ संभावना अछि। कृषक आम, लीची, केला, अमरूद आ अन्य कतेको उद्यानिक उत्पाद के खेती से अपन आय मे काफी वृद्धि क' सकय छै। ई क्षेत्र मखाना के खेती के लेल विशिष्ट रूप स उपयुक्त छै । एकरा आधुनिक बनेबाक जरूरत अछि। पारम्परिक उद्योग मे मिथिलाक सबसँ पुरान शिल्प बढ़ईगिरी, धातु आधृत उद्योग, बुनाई, सिलाई, जूता चप्पल उद्योग, चटाई, गद्दी बनेनाइ अछि । ऋग्वेद मे हिनका लोकनिक उल्लेख अछि। युजुर्वेद एकर अतिरिक्त, टोकरी बने निहार, सोनार, आभूषण कलाकार, हाथी रखनिहार(महथ), शराब बने निहार के संदर्भित करैत अछि। जातक आ कौटिलियाक अर्थशास्त्र संकेत करैत अछि जे चीनी आ गुर बनेबाक कला एतय 2500 वर्ष पूर्व जानल जाइत छल। एहि क्षेत्रक पारंपरिक उद्योग अखैन पिछड़ल अछि । जल परिवहन व्यापारी सब लेल नीक परिवहन साधन छल। एतय बहुत प्रारंभिक काल सँ नाव आ जहाज बनैत छल। वर्णरत्नाकर विभिन्न प्रकारक नाव आ ओकर विभिन्न भागक जानकारी दैत अछि। कपड़ा उद्योग : अपन घर मे मिथिलाक महिला एखनो चक्री पर बेहतरीन सूत के उत्पादन क रहल छथि। साधारण पहिया पर बैसल ई महिला आ छायादार गाछक नीचा बुनकर हमर जरूरत के कपड़ा उपलब्ध छल आ कने बेसि निर्यात लेल तैयार छल । प्राकृतिक भूरा रंग के कोकटी रंग जे पहिने सार्वभौमिक रूप स प्रयोग कयल गेल, आब गायब भ गेल अछि । हर परिवार के अपन चरखा से पेट भरय लेल अपन-अपन कपास के पौधा (बैंग) होइत छैक। ई लूरि मारि कए हमरा सब के पश्चिमी भारत क मिल पर निर्भर बनेबाक हर संभव प्रयास कैल गेल अछि। बर्तन उद्योग-मिथिला मे पहिने एकटा देशी उद्योग छल, जे बर्तन आ अन्य घरेलू सामान तैयार करैत छल। ई वस्तु सब 'बिदारी' नामक धातु विशेष सँ बनल छल। ई धातु तांबा आ कुछ अन्य स्थानीय सामग्री के साथ जस्ता मिला के तैयार कैल जाय छलै । ई उद्योग मुख्यतः 'कासेरा' कलाकारक हाथ मे केंद्रित छल । 'कुम्हार' नामक जाति विशेष छल जे नीक गुणवत्ताक माटिक बर्तन तैयार करैत छल, आ अधिकांश गरीब आ एतय धरि जे कम मध्यम आय समूहक परिवार एहि माटिक बर्तनक उपयोग नित्य उपयोगक लेल करैत छल। मोसनाई आ छपाई उद्योग-बुकानन मिथिलाक कुटीर उद्योग मे तैयार निम्नलिखित रंगक विवरण देलनि अछि जे निम्नलिखित अछि-कक्रेज (गहरे भूरा), अगरी (भूरा), उड़ा (ब्रिंजल), हबसी (खून लाल), शतारे (हल्का भूरा), असमानी, फख्ता (ब्लू मिक्स ऐश कलर) आ शिशाहा (फेयर ब्लू)। रंग-रोगन उद्योग समस्त मिथिला क्षेत्र मे छिड़ियाएल छल आ जे एहि मे लागल व्यक्तिक लेल कहियो रोजी-रोटीक मुख्य स्रोत छल। रेशमी कपड़ा, सूती कपड़ा आ आन कतेको वस्तु केँ रंगल गेल। एहि कुशल मजदूर सभकेँ 'रंगरेज' कहल जाइत छल। सिंदूर या सिंदूर उद्योग-विवाहित मैथिल/बंगाली महिला अपन कपार के ऊपर सिंदूर के प्रयोग करैत छथि। ई सुहाग , दाम्पत्य के सुखद अवस्था के बोध करबै छै । एकर प्रयोग व्यक्ति मुख्य रूप स धार्मिक संस्कार आ पूजा मे सेहो छै । मिथिला मे दू तरहक सिंदूर तैयार कयल गेल-एकटा पूर्णिया मे आ दोसर दरभंगा क्षेत्र मे । मुदा धीरे-धीरे यूरोपीय व्यापारी विदेशी सं सिंदूर आयात करय लगलाह जाहि सं एहि उद्योग के पतन भेल। 19म शताब्दी धरि एहि ठाम सिंदूर तैयार होइत छल । जूट बैग उद्योग-19वीं सदी तक लगभग पूरा पूर्णिया आ किशनगंज जिला मे बहुत रास लोक छल जे एहि जूट बैग (पटक बोरा) उद्योग मे लागल छल। 'कच', 'भीम', आ 'राजवंसी' जाति के लोक एहि उद्योग मे विशेष रूप सँ लागल छलाह। कागज उद्योग- कागज जूट-गूदा आ किछु अन्य स्थानीय सामग्री सँ तैयार होई छल। जूट के गुणवत्ता के आधार पर एकर दू किस्म छल- 'मुन्यासी' आ 'कोशा'। पहिने किशनगंज जिला मे 'कगडिया' नामक लोक'क एकटा विशेष वर्ग छल। ई लोक उत्तम गुणवत्ताक कागज बनेबा मे विशेषज्ञ छलाह । 1877 क आसपास 30 हजार लोक एहि उद्योग मे लागल छलाह। बुनाई आ बुनाई उद्योग-ई मिथिलाक बहुत पुरान उद्योग अछि। एहि क्षेत्रक लगभग अस्सी प्रतिशत महिला लोकनि 'तकुरी' 'चरखा'क सहायता सं कपड़ाक धागा तैयार करैत छलीह, जोल्हा' जाति छल जे सूतक कपड़ा तैयार करैत छल। मिथिला मे कुटीर उद्योग बहुत विकसित छल आ मिथिला उत्कृष्ट कपड़ा के लेल प्रसिद्ध छल। विश्व प्रसिद्ध 'मलमल' के केंद्र मधुबनी जिला मे उत्पन्न भेल छल। एहि क्षेत्र'क एहि भागक माटि कपासक खेती लेल बहुत अनुकूल छल आ एतय भारी मात्रा मे 'कोकटी' कपासक खेती होइत छल। भौरा, कपसिया आ पंडौल पहिने एकर पैघ केन्द्र छल । पुरान पूर्निया जिला मे सेहो ई खरवा, नेहनगर, डंगरखोरा आ गोंगुरिवा सन गामक केंद्र मे तैयार होइत छल। गुण ओतेक महीन नहि छल आ एकरा 'खस' कहल जाइत छल । दरभंगा, मुजफ्फरपुर, चंपारण, बेगूसराय आ पूर्णिया मे कच्चा आ मोट गुणवत्ता वाला कपड़ा क उत्पादन होइत छल। करटोया आ महानन्द के ऊपरी क्षेत्र मे पहिने 'चापल' नामक जाति विशेष छल, एहि जाति के लगभग अस्सी परिवार एकटा विशेष प्रकार के कपड़ा बुनैत छल जेकरा 'चेक' कहल जाइत छल, स्वदेश आ चरखा आन्दोलेन एहि गौरव के किछु गति देलक। आजादी बाद'क काल मे सरकार एहि सब उद्योग के उत्थान के कोशिश नै केलक। सत्रंजी आ कम्बल बुनब -मिथिला मे सत्रंजी आ कम्बल बुनबाक प्राचीन परंपरा अछि। चंपारण जिला सत्रंजी के उत्तम गुणवत्ता के लेल प्रसिद्ध छल। गरेरी जाति के लोक के मुख्य व्यवसाय बरद पालन आ कम्बल बनेबा मे छल। चंपारण, मुजफ्फरपुर, दरभंगा आ कटिहार कम्बल लेल प्रसिद्ध छल। लकड़ीक काज- कमर जाति के लोक के रोजी-रोटी के मुख्य स्रोत बढ़ईगीरी छल। टेबुल, कुर्सी, खाट, दीवान आ कृषि आ घरक समान एतय बनै छल। मिथिला मे ई उद्योग चारू कात छिड़ियाएल छल मुदा विशेष रूप सँ मुजफ्फरपुर आलीशान सौन्दर्य सँ निर्मित पालकी आ खरखरियाक लेल प्रसिद्ध छल। बाँसक काज- भवन निर्माण, टोकरी, पंखा, सरकी, चटाई आदि मे बाँसक प्रयोग होइत छल। घरक छोट-छोट सामान जेना छिट्टा, सुप, कोनिया, पैना, ढाकी, चंगेरा आदि सेहो तैयार कयल जाइत अछि। एहि पेशा मे बेसीतर समाज कए गरीब जाति सब लागल रहैत छल। मुख्य कच्चा माल, बाँस एतय प्रचुर मात्रा मे भेटैत छल। बहुत रास बाँसक हथियार सेहो के एकटा विशेष वर्ग गोधि द्वारा बनाओल जाइत छल। गोधीक मुख्य पेशा छल माछ मारब आ एहि लेल ओ लोकनि अनेक प्रकारक बाँस जनित हथियार आ बांस हथजाल बनबैत छलाह। मिथिला मोठी सँ बनल पेन(लेख) लेल प्रसिद्ध छल। सुन्दर पटिया आ सीतलपटी सबिना-घास आ मोठी द्वारा तैयार होइत छल। एहि वस्तु सभकेँ तैयार करबाक असली विशेषज्ञ तिवान आ गंगोट छलाह । लोहार- ई एहि क्षेत्रक सबसँ पुरान पेशा मे सँ एक छल । प्राचीन काल मे सेहो गाम मे लोहाक उपयोग वस्तु अर्थात छूरी, तलवार, कैंची, भाला, गुप्ती, खंजर, बरछा, भाला,गरांस, हसुआ आदि बनैत छल। एहि पेशा मे लागल व्यक्ति बेसीतर लोहार नामक जाति के छल। ई वंशानुगत पेशा छल आ एकर निर्माण परिवार मे सभक मे ल से होइत छल । सरिसोपाही आ पंडौल सरोट्टा आ चाकू लेल प्रसिद्ध छल । हाजीपुर जिला के लावापुर उच्च श्रेणी के लोहा के हथियार के लेल प्रसिद्ध छल। राजनगर आ खजौली सेहो लोहा-उत्पादक लेल प्रसिद्ध छल। लाह आ चूड़ी उद्योग-एतय अलग-अलग साइज आ डिजाइन के सुंदर आ सजावटी चूड़ी आ कंगन बनै छल। मिथिलाक लड़की आ महिला लोकक लेल चूड़ी सबसँ पैघ आभूषण अछि । मिथिला मे विवाहित महिलाक चूड़ी पहिरबाक प्रथा अछि । लहेरियागंज आ नरहन अपन उच्चतम गुणवत्ता 'लहठी' लेल प्रसिद्ध छलाह। मुख्य रूप स एहि पेशा स जुड़ल लोक "नहरी' नाम देल गेल। चमड़ा बनेबाक देशी विधि आ साधारण चमड़ा क बर्तन क उपयोग पूरा मिथिला क्षेत्र मे मोची द्वारा परिवार क इकाई क रूप मे जूता चप्पल उद्योग के अतिरिक्त ढोल, मिरदंग, पखावाज, नगाड़ा, तबला, डमरू, ढोलक आदि वाद्ययंत्र मे सेहो चमड़ाक प्रयोग होइत छल। सकरी लग सगरपुर चमड़ाक काज लेल प्रसिद्ध छल। पुर्णिया, समस्तीपुर, दलसिंगसराय, सीतामढ़ी आ पंडौल सेहो चमड़ा उद्योग के बहुत महत्वपूर्ण केंद्र छल। । चाउर आ तेल मिल- धान मिथिलाक मुख्य फसल रहल अछि आ ताहि लेल धान मिल एहि क्षेत्रक पारंपरिक उद्योग रहल अछि। पहिने धान-कुटब हाथक श्रम सँ होइत छल। चाउर-कुटेबाक मुख्य उपकरण ढ़ेकी आ उखारी-समाथक उपयोग होइत छल। बहुत दिन स एहि क्षेत्र मे तीसी,अंडी, तिल आ महुआ के रूप मे पूरा क्षेत्र मे पसरल तेल मिल के भरमार छल। पहिने 'कोल्हू' के उपयोग तेल निकालय लेल होइत छल, एकर उप उत्पाद के उपयोग पशु-भोजन के लेल कयल जाइत अछि। कुटीर आधार पर एहि उद्योग क महत्व कम भ गेल अछि आ अपेक्षाकृत पैघ पैमाना पर धीरे-धीरे एकर महत्व बढ़ि गेल अछि मुदा ओ मिथिला से बाहर अछि । धातु निर्माण उद्योग-मिथिला मे धातु निर्माणक लंबा इतिहास अछि । सब बेसी सब पारंपरिक आ ज्ञात धातु के अपन निर्माण आ विपणन केंद्र एहि क्षेत्र मे छल। ओहि ठाम 'फूलही' वा सोन/चानीक बनल भोजनक थारी आ कप बनैत छल । लोहा के पिघलबै आ ढ़ालि के बहुत रंग के वस्तु बनेबाक कला लोहार सब के लेल प्राचीन काल स ज्ञात/सुप्रसिद्ध छल। चाकू, तलवार आ कृषिक औजार बनबैत छलाह, सोना, चानी आ मिश्रित धातुक आभूषण तैयार करबा मे सोनार/लोहार कुशल छलाह। एहि उद्योग कए एकर उचित विकास लेल हर तरह क मदद क जरूरत अछि। उपरोक्त उद्योगक अतिरिक्त बीड़ी निर्माण, मक्खन, घी आ क्रीम उद्योग, टाइल्स आ ईंट उद्योग, मधुमक्खी पालन आ मधु उद्योग, गुर खंडसारी उद्योग, बटन उद्योग आदि मिथिलाक सबसँ पुरान शिल्प आ कुटीर उद्योग छल। एहि मे स अधिकतर उद्योग वित्त आ विपणन क सुविधा क अभाव मे सुस्त अछि। कुटीर उद्योग स ऊपर ओ उद्योग आ शिल्प अछि जे सामान्य तौर पर कारीगर क घर मे चलैत अछि । हुनकर काज मे प्रायः परिवारक सदस्य द्वारा सहायता भेटैत छनि । ई संभव जे ई पूरा समय के काज नै हो या ओ कारीगर मूलतः खेती वला हो तs खाली समय मे एकरा सहायक व्यवसाय के रूप मे आगू बढ़ाबै के काज छै । कुटीर उद्योग मे बिजली क उपयोग नहि होइत अछि आ उपयोग मे अबैत औजार सेहो आसान अछि । मिथिला के कुटीर उद्योग के अध्ययन स पता चलैत अछि जे ई सब नीक हालत मे नै अछि। किछु मरि गेल अछि, किछु सुस्त अछि आ तइयो किछुए गोटे अपना केँ जीबैत रखबाक लेल संघर्षरत छैथ । कुटीर उद्योग सब के किछु दिक्कत अछि : (क) आर्थिक सुविधा के अभाव, कारीगर के गरीबी आ ऋण सुविधा के समस्या (ख) संगठित विपणन के अभाव जे कारीगर के पूर्णतः बिचौलिया के दया पर फेंक दैत अछि। (ग) अकुशल तरीका आ उत्पादन के उच्च लागत जेकरा सं लाभ के मामूली अंतर रहय छै। (घ) कारीगर के अशिक्षा, अज्ञानता एवं असंरक्षण जनित अकुशल मानवीय कारक। एहि दोष के दूर करय के लेल एकटा व्यापक योजना आवश्यक छै। मिथिला क्षेत्र मे औद्योगिक क्षेत्रक काजकाज संतोषजनक नहि रहल अछि । कारण छल जे हुनकर औद्योगिक क्षेत्र नीक सं चयन नहिं कएल गेल । आर्थिक विचार स बेसी राजनीतिक प्रभाव स्थान निर्धारित करैत छल । सब राज्य मे लघु उद्योग सेवा संस्थान क स्थापना कैल गेल अछि। इ संस्थान छोट उद्योगक के तकनीकी सलाह दैत छै। एकर अलावा कुटीर आ लघु उद्योग मे ई सब के बीच सहकारी समिति के गठन के प्रोत्साहित करै ले छै । सरकार देशक प्रत्येक जिला मे एक-एकटा जिला उद्योग केंद्र बनेबाक निर्णय लेलक अछि। एहि योजना क पाछु विचार अछि जे जिला क भीतर एकटा छत क नीचा एकटा कार्यालय उपलब्ध कैल जाए जे नव औद्योगिक इकाइ क स्थापना लेल सबटा आवश्यकता कए पूरा करत। एकर क्षेत्रीय विकास ले मण्डल कार्यालय, बैंक आ विशेष वित्तसंस्थान यथा सिड्बि, नाबार्ड सं घनिष्ठ संबंध होयत। मुदा व्यवस्था के बावजूद खगड़िया, मधेपुरा, पुर्णिया आ सहरसा मे नै छै, जबकि चंपारण पूर्व/पश्चिम मुजफ्फरपुर आ बेगूसराय औद्योगिक रूप स पिछड़ल जिला छै । मिथिला क्षेत्र मे दू टा औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण एकटा दरभंगा मे आ दोसर मुजफ्फरपुर मे छल । दरभंगा औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरणक स्थापना 1976 मे भेल आ एकर संचालन क्षेत्र दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, बेगूसराय, पुर्णिया, किशनगंज, सुपौल, कठिहार, सहरसा, मधेपुरा आ अररिया छल । एहि यूनिट सबहक मुख्य उत्पादन कार्ड बोर्ड, दवाई, एल्युमिनियम, खाद, दाल, मैडा मिल, आ अन्य आवश्यक वस्तु छल । एकर अलावा रामनगर, बेतिया, रक्सौल, मोतिहारी, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, हाजीपुर, मधुबनी, झंझारपुर, समस्तीपुर, बरौनी,बेगूसराय, सहरसा, पुर्णिया आ कटिहार मे औद्योगिक क्षेत्र अछि। यद्यपि औद्योगिक क्षेत्र आ औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरणक के स्थापना योजनाबद्ध आ भौगोलिक रूप सं संतुलित तरीका सं अइ क्षेत्र के औद्योगिक विकास के प्रस्तावित उद्देश्य सं कैल गेलय आ मुदा ओकर उपलब्धि निम्न स्तरीय रहल। सूती हैंडलूम उद्योग-हस्तकरघा विशेष प्रकार से कपड़ा निकलय छै जे पैघ स्तर पर उत्पादन के लेल उपयुक्त नै छै। हाथ स बनल कपड़ा के बहुत लोक मिल मे बनल कपड़ा स बहुत बेहतर मानै छै, ई गर्मी मे ठंडा, जाड़ा मे गरम, आ पसीना सोखै मे नीक मानल गेल । पूंजी सहायता आ कुशल निर्देशन मे बुनकर के संगठन सं हुनकर किछु दिक्कत दूर भ सकैत अछि। यदि हैंडलूम उद्योग के मदद के लेल सब संभावित डेग लेल जाय त एकर सभ'क आर्थिक जीवन मे सम्मानजनक स्थान के आश्वासन देल जा सकैत अछि। कुल मिला क' मिथिला मे 36580 हस्तकरघा अछि। मुख्यतः धोती, चादर, लुंगी, गमछा, पर्दा कपड़ा, सजावट के लेल कपड़ा आदि के उत्पादन करैत छथि, बुनकर के सूत के आपूर्ति के लेल पंडौल सहकारी कताई मिल के स्थापना बिहार सरकार के तरफ सं भेल छल मुदा आब ओ संचालित नहिं अछि। मिथिला पेंटिंग-मिथिला के अद्वितीय योगदान अछि आ आधुनिक दुनिया मे मिथिला पेंटिंग के नाम विकसित भेल अछि। ई विशेष प्रकार के चित्रकला कहिया आ कोना अस्तित्व मे आयल से निश्चित रूप स नै कहि सकैत छी मुदा एतेक निश्चित अछि जे ई कला बहुत प्राचीन मूल के अछि आ एकर शुरुआत मिथिला के प्राचीनतम संस्कृति स' भेल अछि। तांत्रिक रूप सब से एकर सम्बन्ध एकर प्राचीनताक सूचक अछि। मिथिलाक धार्मिक मान्यता आ लोक एहि चित्रात्मक लोक कला के विभिन्न माध्यम स जीवित रखने अछि । हर विशिष्ट चित्रक एकटा कथा होइत छैक । भले मिथिला समस्त पूर्वी भारत मे सबसे प्रारंभिक आर्य केन्द्र मानल जाय, मुदा मिथिला के लोक शिव आ शक्ति के (हुनकर सब रूप में) समर्पित उपासक बनल रहल अछि। मिथिला मे सब संप्रदायक सामाजिक कार्य सँ पहिने एक प्रकारक चित्रकला होइत अछि जे अरिपन नाम सँ जानल जाइत अछि। मिथिला मे कोनो सामाजिक कार्य, बिना अरिपन पेंटिंग के सोचल नहि जा सकैत अछि । अरिपनक प्रकार कार्यक अनुसार भिन्न होइत अछि । अरिपन धरती, लकड़ीक तख्ता, पूजा स्थल, कागज पर रेखांकित कयल जाइत अछि आ सब अवसर (जन्म सँ मृत्यु धरि) लेल कयल जाइत अछि। कोहबर मे सात गोल अरिपन बनैत अछि जाहि मे माछ, बाँस, पोखरि आदिक चित्रण विवाह, चतुर्थी, द्विरागमन, मुंडन, उपनयन आदि चित्र मे कयल गेल अछि।महुऔका कन्या'विवाह के लेल प्रमुख चित्रकला अछि। मिथिला मे चित्रकला महिला लोक द्वारा अनादि काल स संरक्षित अछि। अधिकांश तांत्रिक रेख स्वरूप बनावट प्रतीकात्मक अछि मुदा अधिकांश प्रतिमान प्राकृतिक वस्तु जेना फूल, पात, गाछ, माछ, मोर, साँप, सूर्य आ चन्द्रमा, देवी-देवी, हलधर, सफाईकर्मी, भरिया (वाहक) आदिक प्रतिनिधित्व करयवला आकृति अछि। महिला द्वारा बनाओल चित्रक प्रेरणा मुख्यतः धार्मिक अछि । अनादि काल सँ एहि क्षेत्र मे हिन्दू धर्म आ लोक-बौद्ध धर्म सँ ल' क' लोकप्रिय लोक-कथा धरि अनेक तरहक मान्यता के आत्मसात कयल गेल अछि। माटिक देबाल पर बनल चित्र पुस्तक जकाँ अछि, दृश्य शिक्षा जाहि सँ प्राचीन महाकाव्य, साम्प्रदायिक मिथक आ किंवदंती सीखल जाइत अछि। लगभग तीन हजार वर्ष स मिथिलाक महिला सब हिन्दू देवी-देवता के भक्ति चित्र बना रहल छथि। तखन ई कहब कोनो अतिशयोक्ति नहि जे ई कला भारतीय सभ्यताक सबसँ वास्तविक पक्षक अभिव्यक्ति थिक । भारत आ विदेश मे ई पेंटिंग के गहन मांग भ गेल छै आ अब॑ पश्चिम के निजी संग्रहकर्ता आ संग्रहालय मुख्य रूप स जापान मे एकर बेसी महत्व छै। मिथिला पेंटिंग के पहिल बेर भारत सरकार द्वारा 1970 मे मान्यता भेटल छल जखन मधुबनी जिला के जितवारपुर गाम के श्रीमति जगदम्बा देवी के भारत के राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित कयल गेल छल। एही से यूरोप आ अमे रिका, जर्मनी, फ्रांस, पोलैंड, डेनमार्क, कनाडा, हंगरी आ अन्य महत्वपूर्ण जगह पर प्रदर्शनी के आयोजन संभव भेल । सिक्की लोक कला-मिथिला क्षेत्र सांस्कृतिक पुनर्जन्म के केंद्र छल आ भव्य आ सुरुचिपूर्ण कला आ शिल्प लेल प्रसिद्ध छल। लोक कला के बहुविध कृति मे सिक्की कृति रोचक परंपरा के उजागर करै छै, विभिन्न क्षेत्र के कृषि समाज मे गरीब महिला सब अनाज के भंडारण के लेल माइट संगे गहूम आ चावल के भूसा मिला क अनाज रखबा ले गोदाम सब तैयार करै छैथ। कुश द्वारा बनाओल गेल रंगीन आ सुन्दर लेख के प्रयोग गामक लोक मे सामान्य प्रथा छल। ई बात सब मानई छल जे कन्या के विवाह स पहिने सिक्की के ई कला के जनबा'क चाही । विवाह योग्य कन्या सब अपन बुजुर्ग स ई कौशल प्राप्त करैत अछि । विवाहक बाद कनियाँ केँ स्वयं आ संगहि अपन माय आ दादी द्वारा तैयार कयल गेल विभिन्न रंगक वस्तु केँ सासुर ल जेबाक परंपरा छल आ एहि सँ ओहि परिवार मे हुनकर अत्यंत सम्मान होइत छनि। आ ओकर गुण-दोषक तुलना ओही घरक आन पुतहु सभक रचना सँ कयल जाइत अछि। एहि तरहें सासुर मे कनियाँक परिवारक मान ओकरा द्वारा आनल सिक्की वस्तुक निष्पादन, बारीकी आ रंगक चटक अनुसार नापल जाइत छलई। यैह कारण अछि जे ई शिल्प बचि गेल अछि । सोनाक सिक्की घास जे मानसून मे प्रचुर मात्रा मे उगैत अछि, ओ एक तरहक नमहर तना बला घास अछि जे मिथिलाक बंजर भूमि मे भेटैत अछि। बरसात के मौसम मे ई अपन पूरा बढ़ोत्तरी तक पहुँची जाय छै आ घास के ऊपरी भाग जेकरा मे फूल होय छै, ओकरा हटा के शेष भाग के पातर-पातर टुकड़ा मे बाँटि के साल भर संरक्षित क'के सिक्की के वस्तु बनाबै के काज कैल जाय छै । गामक महिला सब सामान्यतः एकरा किछु महत्वपूर्ण रंग जेना लाल, कारी, नीला, हरियर आदि सँ रंगैत छथि, । पुरान जमाना मे महिला प्राकृतिक वनस्पति स' रंग तैयार करैत छलीह जेना पात सं हरियर रंग, लाल फूल सं लाल आदि। एकर अतिरिक्त पौती, मौनी, धौकुली, डगरा, चंगेरी, कोसिया, पनबट्टी, बिरहरा सेहो बनैत छल। मिथिलाक सिक्की रचना लोक नारीक भावना'क अभिव्यक्ति थिक । सिक्की कार्य के मिथिला के लोक के जीवन स घनिष्ठ संबंध कतेको पीढ़ी स व्यापार के जीवित रखने अछि। एक प्रयास भेल जे एहि सुन्दर सिक्की लोक-कला के एकटा उद्योग के रूप मे पुनर्निर्माण आ विकास आ महिला सब के व्यावसायिकरण लेल तैयार कयल जाय । मणिगाछी (दरभंगा) आ सुरसंद (मुजफ्फरपुर) मे पहिने सँ एही उद्देश्य सँ एकटा केन्द्र स्थापित भ' गेल छल। पटना के लोक-कला आ शिल्प संग्रहालय एहि महान राष्ट्रीय धरोहर (लोक-कला) के दुर्लभ आ अद्वितीय नमूना के पुनः संकलन आ संरक्षित करय के पूरा कोशिश क रहल अछि। मिथिला क्षेत्र के उपज सिक्की घास स बनल शिल्प के 26 जनवरी 2013 के नई दिल्ली मे गणतंत्र दिवस परेड मे प्रदर्शित कयल गेल। खादी उद्योग-अनाद काल स खादी उद्योग के प्रधान कुटीर बनल छल उद्योग मिथिला मे मधुबनी मलमल कपड़ा के निर्माण के प्रसिद्ध केंद्र छल, आ भारत आ विदेश के लोकप्रिय बाजार मे एकर कोक्ति मलमल (खादी-रेशम) के अपन अलग स्थान छल। मिथिलाक एहि सबसँ लोकप्रिय कपड़ाक तुलना मे उच्च गुणवत्ताक विदेशी कपड़ा सेहो तुच्छता मे राखल गेल । खादी आ गाम उद्योग के तरह-तरह'क समस्या'क सामना करs पड़ै छै आ सदैव सरकार के हाथ स सतमाय व्यवहार भेटई छै। बिहार के शासन मिथिला के खादी संस्थान के छूट के अनुमति नै द'क मिथिला सहित राज्य के सब टा खादी आ गाम उद्योग के नष्ट क देलक। चीनी उद्योग-मिथिला क्षेत्र गन्ना उत्पादन लेल सुप्रसिद्ध अछि । एहि क्षेत्रक माटि सेहो एहि लेल उपयुक्त अछि । पूर्वी चंपारण, पश्चिम चंपारण, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर एवं पुर्णिया जिला सब मे भारी मात्रा मे गन्ना निकलैत अछि। नीक बीया नहि भेटैत अछि। जमीन गोबर'क भूखल अछि। बाढ़ि आ रौदीक बेर-बेर आबय सं हुनकर मुनाफाक संभावना खराब भ जाइत छनि। शुरू मे गुर-खण्डसरी उद्योग छल। मुदा मिथिला क्षेत्र मे चीनी उद्योग के पुनर्गठन आ पुनर्जीवित करबाक वास्तविक श्रेय इंडिया डेवलपमेंट कंपनी के जेबाक चाही जे 1900-01 मे गन्ना के खेती के लेल मुजफ्फरपुर मे अताहर आ अग्रैल इंडिगो फैक्ट्री खरीदने छल। चीनी उद्योग क क्षेत्र मे एकटा बहुत महत्वपूर्ण विकास 1937 क कानून छल, जे बिहार चीनी कारखाना नियंत्रण अधिनियम क नाम स जानल जाइत अछि। एहि अधिनियम क अनुसार प्रत्येक कारखाना क चारू कात किछु क्षेत्र गन्ना क खेती लेल आरक्षित आ आरक्षित छल, जेकरा संबंधित कारखाना ले खरीदब बाध्य छल । अधिकांश फैक्ट्री लग व्यक्तिगत जमीन या पट्टा पर देल गेल जमीन छल जाहि पर ओ सब स्वयं गन्ना के खेती करैत छलाह। नीक दिन मे ई चीनी कारखाना बेंत उगाबय वाला के एडवांस दैत छल। मिथिला क्षेत्र मे सोलह टा चीनी कारखाना छल आ ओ सब अछि : उत्तर बिहार चीनी मिल, बाघा ,सुगौली चीनी मिल, हनुमान चीनी मिल, मोतिहारी हरिनगर चीनी मिल, चंपारण चीनी मिल, लौरिया, न्यू स्वदेशी मिल, नरकटियागंज, मोतीलाल पदमपत चीनी मिल, मझौलिया, मोतीपुर चीनी कारखाना, मुजफ्फरपुर, सीतापुर चीनी कारख़ाना, गोरौल, बेलसंड चीनी कारखाना, रेगा, दरभंगा चीनी कम्पनी, लोहट, दरभंगा चीनी, सकरी, रैयाम चीनी कंपनी, समस्तीपुर सेंट्रल शुगर कंपनी समस्तीपुर, द न्यू इंडिया शुगर मिल, हसनपुर, बनमनखी सहकारी चीनी मिल पुर्णिया। 1974-75 मे बिहार सरकार राज्य मे चीनी उद्योग क पुनरुद्धार आ चौतरफा विकास लेल कंपनी अधिनियम 1956 क तहत बिहार राज्य चीनी निगम लिमिटेड कए निगमित करि देलक। निगम पन्द्रह टा चीनी कंपनी के अपन नियंत्रण मे ल लेलक। एहि क्षेत्रक रय्याम, लोहट, सकरी, समस्तीपुर, गोरौल, बनमनखी, लौरिया, मोतीपुर, गुरारू आ सुगौली मे चीनी कारखाना निगम द्वारा अपन कब्जा मे लेल गेल। निगम एहि कंपनी सब कए गलत तरीका स प्रबंधित केलक । चीनी कंपनी बंद भ गेल । करीब छह लाख गन्ना उत्पादक आ उद्योगक 40 हजार मजदूर, के ऊपर मिथिला के एहि पैघ उद्योग बंद भेला पर सीधा असर परल। जूट उद्योग-मिथिलाक माटि जूट उत्पादन लेल बहुत उपयुक्त अछि। दलदल, नदी आ प्राकृतिक बाढ़ि सं बनल पैघ खाई सं काटल जूट के लेल नीक प्रोसेसिंग वाटर चैम्बर उपलब्ध करायल गेलय। मिथिला मे प्राचीन काल सँ जूट कपड़ा तैयार करब बहुत प्रचलित छल। जूट निर्माता पहिने महीन जूट कपड़ा बुनैत छलाह, जेकर उपयोग सामान्यतः समाजक गरीब वर्ग करैत छल। जूट के टाट के कौशल के बहुत मांग बनल रहलै । सीमेंट फैक्ट्री जे जूट-बैग क मुख्य ग्राहक छल, आब कम बर्बादी क कारण सिंथेटिक बैग तैयार करैत अछि। मिथिला क्षेत्र मे तीन टा जूट फैक्ट्री अछि-एकटा मुक्तापुर (समस्तीपुर जिला) मे आ दूटा मिल कटिहार मे । रामे श्वर जूट मिल'क स्थान अनुकूल छल, कियाक त कच्चा माल के भरमार छल आ परिवहन सेहो आसान छल। कटिहार मे दू टा जूट मिल छल अर्थात (1) कटिहार जूट मिल लिमिटेड, कटिहार आ एकटा आओर (ii) मोतीलाल चमरिया जूट मिल, कटिहार, एकरा सरकार किनलक, कुप्रबंधन भेल आ कंपनी बंद भ गेल। एकटा आओर कंपनी मोतीलाल चमरिया जूट मिल बहुत दिन स बंद अछि। फोरबिसगंज, अररिया, कटिहार, गुलाबबाग, किशनगंज, निर्मली, मधेपुरा आ सहरसा क मंडी कोलकाता क फैक्ट्री कए जूट क आपूर्ति करि रहल अछि। मिथिला क्षेत्र मे 4.25L एकड़ क्षेत्र मे जूट के खेती भ रहल अछि। जूट खेती के मामला मे ई पश्चिम बंगाल के बाद दोसर स्थान पर अछि। एहि क्षेत्र मे कच्चा जूट क कुल उत्पादन 560 हजार गठरी से बेसी (2011) अछि। पुर्णिया आ सहरसा जिला मे जूट उगाबै वाला इलाका मे परिवहन क पर्याप्त सुविधा भ रहल अछि। राज्य मे तैयार जूट सामान क पर्याप्त आंतरिक बाजार अछि आ कुशल श्रमिक सेहो उपलब्ध अछि। हमरा लोकनिक मानब अछि जे मिथिला मे मौजूदा जूट उद्योग केँ मजबूत करबाक लेल शीघ्र कार्रवाई उचित अछि। कागज उद्योग-कागज आ कागज बोर्ड के मात्र तीन श्रेणी छै जेना (i) लेखन आ मुद्रण कागज (ii) औद्योगिक कागज जेना लपेटनाय आ पैकेजिंग पेपर बोर्ड आदि, (iii) विशेषता कागज जेना कार्बोनाइजिंग टिश्यू फिल्टर पेपर, सिगरेट टिश्यू, इन्सुलेटिंग पेपर आदि देशी विधि स कागज के निर्माण पुर्णिया, दरभंगा, मधुबनी आ समस्तीपुर मे होइत छल, कागज तैयार करय मे प्रयुक्त सामग्री सामान्यतः 'सान आ पट' भूसा, बेकार कागज आदि के गूदा छल । मिथिला क्षेत्र पेपर मिल के विवरण निम्नलिखित अछि : ठाकुर पेपर मिल लिमिटेड समस्तीपुर, अशोक पेपर मिल लिमिटेड दरभंगा, बरौनी पेपर इंडस्ट्रीज लिमिटेड बेगूसराय, आर्यभट्ट पेपर मिल लिमिटेड दरभंगा, जयचंडिका पेपर मिल लिमिटेड बरौनी, उपेन्द्र पेपर मिल प्राइवेट लिमिटेड, मुजफ्फरपुर, विश्वनाथ पेपर मिल लिमिटेड पुर्णिया, बैद्यनाथ पेपर मिल लिमिटेड पूर्णिया क्राफ्टवेल पेपर प्राइवेट लिमिटेड पुर्णिया, कटिहार पेपर मिल लिमिटेड कटिहार, ठाकुर पेपर मिल लिमिटेड, समस्तीपुर । भूसा आ घास मुख्य कच्चा माल छल। जापानी तकनीक अपनाओल गेल। कंपनी सरकारी दखलअंदाजी से बंद भ गेल। अशोक पेपर मिल लिमिटेड क स्थापना 1957-58 मे दरभंगा क हायाघाट मे भेल छल। 320 एकड़ जमीनक व्यवस्था भेल। अमे रिकी सहयोग स भेल। मिल के आर्थिक संकट के सामना करय पड़ल आओर एकरा सरकार के कब्जा मे ल लेलक। तखन असम सरकार आ बिहार सरकार सहयोग केलक आ कंपनी पूरा क्षमता मे कागज के उत्पादन क रहल छल। पुनः आर्थिक संकट के कारण एकरा बंद क देल गेल। मिथिला मे कागज उद्योग के भविष्य के विकास पर एकटा आकलन ई अछि जे ई मुख्य रूप स असम के गूदा के आधार पर बढ़ि सकैत अछि (ई बहुत पैघ स्रोत भ सकैत अछि जौं असम मे केंद्र सरकार के किछु परियोजना क्रियान्वयन के चरण मे पहुंच जाय) आ संभव नेपाल स कच्चा माल (या गूदा) क खरीद संभव हो। अतः स्थान चुनाव मामला मे गुददी से कागज मे परिवर्तित करय पर आधारित परियोजना के स्थापना के लेल मिथिला नीक स्थिति मे अछि। सहकारी क्षेत्र डेयरी विकास-मिथिलाक पशु संपदा दुग्ध खाद्य, पनीर, घी आ अन्य उपभोक्ता दूध उत्पादक लेल डेयरी आ डाउनस्ट्रीम दूध प्रसंस्करण आ उत्पाद उद्योगक विकासक अपार संभावना प्रदान करैत अछि। चारा के अपेक्षाकृत संतोषजनक आपूर्ति आ गाय-भैंस पालन के अनुकूल परिस्थिति के कारण मिथिला के मैदान विशेष रूप' स दरभंगा, समस्तीपुर, मधुबनी, सहरसा, मधेपुरा, अररिया आ पूर्णिया दूध उत्पादन के मुख्य केंद्र रहल अछि मुदा दूध के असंतोषजनक विपणन व्यवस्था के कारण एकर विकास मे बाधा पहुंचल। राज्य सरकार बरौनी मे एक लाख लीटर दूध/प्रतिदिन लेल दूध संयंत्र लगा रहल अछि। डेयरी उपकरणक के एकटा पैघ हिस्सा स्वीडिश क्रेडिट के तहत सरकार के भेटल छै। संयंत्र मे दूध के पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करय के दृष्टि सं कृषि पुनर्वित्त निगम सं बेहतर किस्म के क्रॉस ब्रेड मवेशी के खरीद के लेल क्षेत्र मे डेयरी खेती मे निकलय वाला कृषिकर्मी के आर्थिक सहायता के योजना तैयार कैल गेलय। मुख्य उत्पाद पाश्चुराइज्ड दूध, घी, पाउडर दूध, कैसिइन आ आब मिठाई अछि । तहिना हमरा सब लग डेयरी प्लांट अछि आ निम्नलिखित स्थान पर संचालित अछि। दूध योजना, दरभंगा -पाश्चुराइज्ड दूध, मुजफ्फरपुर डेयरी -पाश्चुराइज्ड दूध आ मिठाई के किस्म, समस्तीपुर चिलिंग सेंटर-पाश्चुराइज्ड दूध हाजीपुर डेयरी-पाश्चुराइज्ड दूध, खगड़िया चिलिंग सेंटर-पाश्चुराइज्ड दूध, एकर अलावा, अन्य दूध चिलिंग सेंटर पूरा अइ क्षेत्र मे छै। सब दूध संयंत्र सहकारी क्षेत्र मे नीक काज क रहल अछि। मिथिला के अधिकांश डेयरी किसान के बेसी दाम के कारण पशु चारा खरीदय मे दिक्कत होइत छनि, पशु चारा के निर्यात लगातार बढ़ि क सालाना एक अरब डॉलर भ गेल अछि। एकर अलावा किसान सं उपभोक्ता के दूध पहुंचाबय के लेल ओहि ठाम सं कोल्ड चेन के सुविधा के आवश्यकता होयत छै। मूल्य वर्धित दूध उत्पाद'क टिकबाक समय बेसी होयत छै, मुदा तरल दूध के जल्द सं जल्द ठंडा करय के होयत छै आ गुणवत्ता मे सुधार'क लेल प्रशीतन आवश्यक छै। मिथिला मे पर्याप्त प्रशीतन सुविधाक गंभीर अभाव अछि। डेयरी उद्योग के सरल उपकरणक के उपयोग करैत उत्पादकता मे सुधार के योजना बनावा आ समृद्धि प्राप्त करय के लेल किसान के शिक्षित करनाय आवश्यक छै। डेयरी उद्योग क भविष्य उज्जवल अछि। पर्यटन उद्योग-पर्यटन वैश्विक गतिविधि के रूप मे कैल जाय छै आ मानव जाति के महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक अवकाश के साधन के रूप मे देखल जाय छै । ई विदेशी मुद्रा के कमाई आ घरेलू राजस्व छै । पर्यटन विकासक स्तर वास्तव मे मिथिला क्षेत्रक सौन्दर्य आ आकर्षणक सूचकांक थिक । हमरा सब लग पर्यटन के नीक संभावना अछि, धर्म सं जुड़ल पर्यटन सं ल क वन्यजीव आ प्रकृति पर्यटन तक। पर्यटन स छोट-छोट निवेश स पैघ फायदा होइत अछि। मिथिला मे पर्यटनक नीक संभावनाक बादो अपर्याप्त बुनियादी ढांचा आ एकीकृत पर्यटन नीतिक अभाव मे समुचित दोहन नहि भ सकल। पर्यटन विकास मे आवश्यक बुनियादी ढांचा के सुविधा के कमी स्पष्ट अछि। किछ प्रमुख चिंता निम्नलिखित रहल छै: खराब चिकित्सा सेवा, अपर्याप्त विशेष बुनियादी ढाँचा, जेना होटल आ रेस्टोरेंट के कमी, पर्यटन के देल जाय वाला प्राथमिकता मे मिथिला के कोनो स्थाने नै, हाल हाल मे हैदराबाद मे प्रदर्शित बिहार पर्यटन निगम के विज्ञापन मे मिथिला के कोनो चर्च नहि छल । जनता के लाभ निम्नलिखित छै: महत्वपूर्ण अतिरिक्त रोजगार, दूरस्थ पर्यटन स्थल पर ग्रामीण आबादी के सामान्य विकास, गरीबी उन्मूलन, सामान्यतः कमाई क्षमता मे सुधार, क्षेत्रीय कला, संस्कृति आ हस्तशिल्प के प्रचार-प्रसार, क्षेत्रक लेल एकटा छवि निर्माण, वन्यजीव पर्यटन-चम्पारण बाघ परियोजना-हिमालय के सोमे श्वर रेंज-बेगूसराय के कौआर झिल-पक्षी अभयारण्य-एक शीर्ष श्रेणी के पक्षी अभयारण्य मे विकसित भ सकईये, कुशेश्वरस्थान-पक्षी अभयारण्य बिहार मे टाइगर फाउंडेशन के स्थापना से वाल्मीकी टाइगर रिजर्व स जुड़ल परियोजना के देखरेख हेतई आ टाइगर रिजर्व लेल धन जुटबै लेल अलग-अलग एजेंसी, सरकारी आ गैर-सरकारी दूनू संग समन्वय करतै । गोगाबिल पक्षी अभयारण्य-कटिहार आ शाहपुर पटोरी पक्षी विहार-समस्तीपुर जिला में पर्यटन केंद्र बनि सकत। धार्मिक-वाल्मीनगर- प्रथम कवि वाल्मीकि के नाम पर-सीता अपन जीवन लव आ कुश के संग बिता देलनि। गांधी स्मृति स्थल-भीतिहारवा आश्रम-पांडव अज्ञातबास-सहस्माद, बेनुगढ़ एवं बरिजन 'स्वर्ण त्रिकोण' अररिया जिला, देदाबरी मंदिर-फ़ोरबिसगंज, रक्तकाली एवं महाजोग्नी मंदिर-महिषी, सहरसा, मंडन धाम-महिषी, सहरसा-मंडन एवं शंकराचार्य से सम्बन्धित, उग्रतारा-महिषी, सहरसा-मैना-महपुरा-कारु खिरहरी-नुहट्टा, सहरसा, लक्ष्मीनाथ गोसाईं-महिसी, सहरसा, लोकदेव लोरिक गढ़-हरदी गाम, कपिलेश्वर स्थान, सुखासन-लोकदेव 'खेदान महराज-मधेपुरा, साहूगढ़-गुप्त काल, मधेपुरा, मुर्हो-बुद्धकाल, मधेपुरा, सिंहेश्वर स्थान-बखरी सलोना-जादु टोना, खगड़िया सिमरिया-गंगास्नान, बेगूसराय-अहिल्यास्थान के लिये प्रसिद्ध, गौतम ऋषि/आ अहिल्या स्थान, उच्चैठ-कालिदास-देवी भगवती-मधुबनी जिला में, मधुबनी जिला के याज्ञवाल्क्य वृक्ष के जगवान-आश्रम। मधुबनी जिला के भवानीपुर-उगना महादेव, पुनौरा-सीतामढ़ी जिला मे देवी सीता जन्मस्थान, प्राकृतिक शीतलनगर झील, मत्स्यगंधा परियोजना-पर्यटन परिसर, सहरसा-विशाल पकरीगछ-महिषी, मैत्री सरोवर-बीरपुर अलौलीगढ़-सेरैयामणि झील-पश्चिम चंपारण। मोती झील-पूर्व चंपारण, सेरोत्तर झील-केसरिया प्रखंड-पूर्व चंपारण। चिसापानी-जयनगर बीर सिंह ऐतिहासिक किला-बीरनगर बिसहरिया राजोखरी-महाराजा शिवसिंह द्वितीय-घोरदौर पोखरी-मणिगाछी अंचल जरहतिया-महाराज भैरव सिंह-पोखरी, बलिराजगढ़ मे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तहत ईसा-मसीह से 200 वर्ष पूर्व स्थान, मधुबनी के महेश ठाकुर की भौर-राजधानी, मल्देव के राजधानी मे भीठ-भगवानपुर, सरिसब पाही-पक्षधर मिश्र एवं अयाची मिश्र जन्म स्थान, -मधुबनी जिला मे चमनिया पोखर, अंधराठारी-वाचस्पति मिश्र-भामती टीका के जन्मस्थान एतय लिखल गेल छल, पाली-मधुबनी जिला मे ज्योतिश्वर ठाकुर-वर्ण-रत्नाकर का जन्म स्थान। मंगरौनी-गंगेश उपाध्याय का जन्म स्थान। बिस्फी-महान कवि विद्यापति का जन्मस्थान। द्वलख-गंगदेव पुत्र राजा नान्यदेव बंगाल के पुत्र बल्लाल के एतय पराजित केलनि। करियन- उदयनाचार्य से सम्बन्धित। खरौनाडीह-एतिहासिक स्थल, उत्खनन केपी जायसवाल शोध संस्थान, पटना सम्पन्न भेल । हरिहर क्षेत्र-गजेन्द्र मोक्ष किंवदंती के अनुसार सोनपुर ओ जगह अछि जतय विष्णु वन के स्वामी (हाथी) आ जल के स्वामी (मगरमच्छ) के बीच ऐतिहासिक लड़ाई के समाप्त केने छलाह-कार्तिक पूर्णिमा- एशिया के सबस पैघ पशु मे ला। वैशाली-ईसा पूर्व छठम शताब्दी मे वैशाली मे विश्वक पहिल लोकतांत्रिक गणराज्य मे सँ एक छल। इहो ओतहि अछि जतय भगवान महावीर, 24म आ अंतिम 'जैन त्रिथंकर' के जन्म भेल छल। बुद्ध एतय अपन अंतिम प्रवचन देलनि जतय आइ-काल्हि 'कोलुहा परिसर' के खंडहर पड़ल अछि। सबसँ उल्लेखनीय अछि 2300 वर्ष पुरान अशोक स्तम्भक ऊपर कुलीन शेर , 3 किमी दूर खंडहर के एक दिश मे एकटा स्तूप अछि जतय बुद्ध के अस्थि के आठम हिस्सा (दाह संस्कार के बाद लाश के हिस्सा बचि गेल) भेटल छल। लगहि मे एकटा छोट सन संग्रहालय आ चमकैत जापानी पीस पैगोडा छै, अभिषेक पुष्कर्णी-40 किमी। केसरिया- जतय मरैत बुद्ध अपन भीख कटोरा दान केने छलाह। एतs पुरातत्वविद संभवतः दुनिया के 2 सबसें ऊँच बौद्ध स्तूप, जे पाल काल के छै , ऊपर सं 425 मीटर के परिधि वाला विशालकाय बौद्ध तांत्रिक मंडल आरेख सं नौ अद्वितीय आकार के छत (सात वर्तमान मे उजागर) , चकिया लग पूर्वी चंपारण मे स्थित सूर्य मंदिर-सूर्य पृथ्वी के जीवन आ ऊर्जा के अंतिम स्रोत मानल जाइत अछि। वेदक सबसँ लोकप्रिय गायत्री स्तोत्र सूर्य भगवान सँ प्रार्थना अछि। वास्तव मे सूर्य के अस्तित्व समग्र सृष्टि के स्रोत छै आ, कृतज्ञ मानव जाति अनादि काल स सूर्य के पूजा क रहल छै । मिथिलाक शास्त्रक महान विद्वान रुद्रधर लगभग 600 वर्ष पूर्व छठि पर्व पर खूब लिखने छलाह । हुनका लेल एहि पावनिक कथा आ अन्य विवरण स्कन्द पुराण सँ लेल गेल अछि। सूर्य के पूजा स एकटा हिस्सा, ई पावनि मातृ देवी स्कंदा माता यानी पार्वती (छठी मैया) के पूजा के लेल मनाओल जाइत अछि। एक तरहेँ ई पावनि अद्वितीय अछि, कारण सूर्यक पूजा छटी मैयाक पूजाक संग मिश्रित अछि। एहि व्रत (व्रत) कए भक्त कए सब रोग आ खतरा स मुक्ति मानल जाइत अछि । कार्तिक मासक शुक्ल पक्ष के छठम दिन ई पावनि मनाओल जाइत अछि। सब सूर्य मंदिर कए आधुनिक पर्यटन स्थल क रूप मे विकसित करबाक अछि ताकि एहि मंदिर स काफी राजस्व भेट सकए। एहि क्षेत्र मे सात टा सूर्य मंदिर अछि आ ओ निम्नलिखित अछि : कालीबाग मंदिर-बेतिया : वर्ष 1664 मे बेतिया राज द्वारा स्थापित , नौलखा मंदिर-रक्सौल : जनवरी, 1993 मे स्थापित , कंदाहा-सहरसा :1431 मे किंग बंशधर द्वारा निर्मित-महिषी लग,सीतामढ़ी-लक्ष्मण नदीक तट पर, मुजफ्फरपुर,एतय तीन टा सूर्य मंदिर अछि, जाहि मे सँ चतुर्भुज स्थान मंदिर बहुत प्रसिद्ध अछि। पर्यटन क्षेत्र मे रोजगार आ पूंजी निवेश अनुपात सब स बेसी अछि। उद्योगक क्षमताक दोहन करबा मे असमर्थता त' मिथिला केँ कतेको सौ करोड़क अतिरिक्त राजस्व उत्पन्न करबा मे त' नुकसान पहुँचाओत, संगहि हजारो लोक केँ रोजगारक अवसर सँ समान रूप सँ वंचित क' देत, जे दुनू बदला मे एहि क्षेत्रक आर्थिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़त। मिथिला के लेल छवि निर्माण बहुत महत्वपूर्ण अछि, आ पर्यटन के एकटा प्रभावी माध्यम के रूप मे उपयोग करब परम आवश्यक । खुदरा क्षेत्र व्यापार-मिथिला प्रारंभिक काल में, एकटा पैघ वाणिज्यिक केंद्र छल। सुविधा या सुचारू संचार युगों स संभावित व्यापार के जीवन रक्त रहल छै । चूँकि एहि भूमि केँ लगभग 20 टा नदी आ बहुत रास पोखरि छल, ताहि लेल मिथिला मे व्यापारक स्थिति समृद्ध छल आ विभिन्न स्थान पर सामान पहुँचेबाक लेल अनेक भूमि आ नदी मार्ग छल। प्राचीन साहित्य समुद्री आ कारवां व्यापार के संदर्भ स भरल छै, जेकरा स ई सिद्ध होय छै कि समुद्र के संग संग स्थलीय मार्ग के उपयोग अंतरराष्ट्रीय वाणिज्य के राजमार्ग के रूप मे प्रारंभिक काल मे मैथिल द्वारा स्वतंत्र रूप स कैल जाय छेलै । महत्वपूर्ण नदी मार्ग गंगा, कोसी आ गंडक के धारा के माध्यम स छल जे अंतरराज्यीय व्यापार के मुख्य धमनी बनबैत अछि।व्यापारक एकटा पैघ केंद्र हेबाक कारणे मिथिला मे छोट-छोट व्यापारी लोकनिक आवागमन होइत छल। हमरा लोकनि केँ कहल गेल अछि जे बुद्धक शिष्य लोकनि गाड़ी-भारक वस्तु ल क व्यापारक लेल विदेह गेलाह। मिथिला राजगढ़, गया, चंपा आ पाटलीपुत्र सन प्रमुख शहर सँ कच्चा सड़क सँ जुड़ल छल, जेना सब ठाम अधिकांश प्राचीन रस्ता संग छल। समुद्री-व्यापार के संदर्भ अछि जे मिथिला के वाणिज्य के एकटा महत्वपूर्ण अंग बुझाइत अछि। 'ऐतरेय-ब्राह्मण' मे अक्सर समुद्र आ समुद्र जाय वाला जहाज द्वारा नौकायन के संदर्भ देल जाय छै । जातक उद्घोष करै छै कि समुद्र मे व्यापार करै वाला व्यापारी के संख्या बहुत छेलै, आरो व्यापारी लेन-देन के कारोबार लेल विदेशी भूमि पर रहै छै । विभिन्न अन्य स्रोत सँ पता चलैत अछि जे मिथिलाक चीन, तिब्बत, नेपाल, शिलांग, रोम, अरब, फारस आ बेबिलोन सँ व्यापारिक संबंध छल। ई व्यापार प्रायः व्यक्तिगत रूप स कैल जाय छेलै मुदा साझेदारी सेहो प्रसिद्ध छेलै आ व्यवहार मे छलै । वैशाली एकटा महत्वपूर्ण व्यापारिक केन्द्र छल। कोशल के श्रावस्ती स अंग के चंपा आ मगध के राजगृह तक महामार्ग पर पड़ल छल। श्रावस्तीसँ कुसिनारा धरि व्यापारी गंडक पार कए वैशालीमे रुकि गेल आ हाजीपुर लग गंगा पार कए राजगृह गेल। वैशाली उत्तरी पहाड़ी सँ एकटा आओर मार्ग सँ जुड़ल छल जाहि सँ अशोक अपन यात्रा मे नेपाल उपत्यका मे ललितापट्टनम (पाटन) यात्रा केने छलाह। वैशाली सँ भिखना धरि एहि राजमार्ग पर अशोकक शिलालेखक चारि टा पाथरक स्तम्भ भेटल अछि। धूसर बलुआ पाथर सँ बनल अशोकक खंभा नदी मार्ग गंगा-गंडकक संग चुनार सँ आनल गेल होयत। मिथिला सेहो गौर (बंगाल) सँ अपन व्यापार करैत छल। पाल राजाक समय मे झारखण्ड आ मगध बाद मे मुस्लिम काल मे मुर्शिदाबाद आ डक्का (अखन बांग्लादेश) सँ व्यापारक विकास भेल। 17म शताब्दी मे पुर्तगाली, डच, फ्रांसीसी आ अंग्रेजी व्यापारी के आगमन के संग हमरा लोकनिक सामान-कपड़ा, चीनी, तिलहन, तम्बाकू, मिर्च आदि के काफी पैमाना पर विदेश मे आशा कयल गेल छल। मिथिला पहिने निर्यात आ आयात करैत छल। मिथिलाक मुख्य निर्यात छल : चावल, गहूम, दाल, तेल, घी, मसाला, तम्बाकू, जूट, रेशम, रेशम-वस्त्र, बोरा, टाट, कपास, चीनी आ कपास-वस्त्र, हाथीदांत,बटन, जड़ी-बूटी, सिंदूर, माछ, चमड़ा आ चमड़ा आदि एहि वस्तु सभक निर्यात मुख्यतः बंगाल, राजगृह, वाराणसी आ अन्य स्थान पर होइत छल। नमकीन, मिर्च आ नील जे पहिने नीक स्थान पर छल से उनीसम शताब्दीक अंत धरि पर हमरा लोकनिक निर्यात सं गायब भ गेल। हम मगध के जूट, जूट के सामान, हैंडलूम प्रोडक्ट, गुर, चीनी, मिर्च, तम्बाकू, माछ, हड्डी, चमड़ा आ खाल के निर्यात करैत छलहुं। हम गोरखपुर आ कानपुर कच्चा जूट निर्यात करैत रही, सुपारी के पत्ता (पान) से वाराणसी, इलाहाबाद एवं लखनऊ, मखाना से भोजपुर, अवध, आगरा, दिल्ली, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात एवं महाराष्ट्र , हम कानपुर, अहमदाबाद आ बम्बई सं कपासक सामान आ सूत, कानपुर, पंजाब आ मुंबई सं ऊनी सामान, कानपुर, आगरा, मुंबई आ कोलकाता सं चमड़ाक सामान आयात करैत छी; झारखंड स आयरन एंड स्टील, दक्षिण बिहार आ मध्य प्रदेश स चूना आ सीमेंट, पश्चिम बंगाल, मुंबई आ गुजरात स साइकिल, ड्रग्स आ सुपारी, जखन कि पहिने हम अपन कारीगर आ किसान द्वारा उत्पादित उपभोक्ता वस्तु कए निर्यात करैत छलहुं। हम आइ कच्चा माल निर्यात करैत छी आ तैयार सामान आयात करैत छी। हम सब चमड़ा आ खाल, जूट आ तिलहन के कोलकाता आ कानपुर पठा दैत छी आ ओतय स चमड़ा आ जूट के सामान प्राप्त करैत छी। हमरा सब के कोलकाता, मुंबई, अहमदाबाद, दिल्ली, कानपुर आ अन्य क्षेत्र मे उद्योग के फीडर मे बदलि देल गेल अछि । पहाड़ स हमर सबहक व्यापार कम भ गेल अछि। हमर सबहक नदी-जहाज व्यापार अपंग भ गेल अछि। हमर आन्तरिक व्यापारक महत्वपूर्ण केन्द्र अछि बेतिया, मोतिहारी, नरकटियागंज, बगहा, रक्सौल, बैरगिनिया, सीतामढ़ी, जयनगर, लहान, राजविराज, हनुमाननगर, धरान, विराटनगर, फोरबिसगंज, बनमनखी, मुरलीगंज, मधेपुर, सहरसा, पूर्णिया, किशनगंज, कटिहार , कारागोला, बिहपुर, खगड़िया, हाजीपुर, मुजफ़्फ़रपुर, दरभंगा, झंझारपूर, निर्मली, रोसरा, दलसिंगसराय, समस्तीपुर, गुलाबबाग आदि ग्रामीण क्षेत्र मे हमर व्यापारक एकटा पैघ हिस्सा साप्ताहिक आ द्विसाप्ताहिक हाट मे ला चारि-पांच गाम मे समय-समय पर खरीदारी के लेल अपन हाट छै। पड़ोसी गाम आ बाजारक बनिया सभ निर्धारित दिन-निर्धारित स्थान पर अपन दोकान खोलैत अछि । किसान आ कारीगर ओतय अपन उत्पाद बेचय आ अपन रोजमर्रा के उपयोग के लेल सामान खरीदय लेल अबैत छथिन्ह। वार्षिक मे ला अनेक धार्मिक स्थान पर होइत अछि । समस्तीपुर, बेतिया, कुशेश्वरस्थान, सिंहेश्वरस्थान, जट्टमलपुर, कारागोला, आदि मे वार्षिक मे ला बहुत महत्वपूर्ण अछि। गाम-गाम मे व्यापार खुदरा चलित व्यापारी द्वारा कयल जाइत अछि। ई सब बर्तन, कपड़ा, तेल आ दैनिक उपयोग के अन्य सामान के कारोबार करैत छथि । हालांकि हाल के साल मे ग्रामीण क्षेत्र मे छोट-छोट बाजार के बढ़ला सं हुनकर कारोबार प्रभावित भेल अछि। हमर गामक लोक अपन खरीदारी के लेल जतेक बेर बाजार पर जाइत छलाह, ओहि सं बेसी बेर जाइत छथि। मिथिला के भौगोलिक स्थिति एकरा एकटा एहन क्षेत्र के केंद्र मे रखैत अछि जाहि मे पूर्वी यूपी, नेपाल, पश्चिम बंगाल आ बांग्लादेश शामिल अछि। पश्चिम बंगाल आ नेपाल स अपन निकटता आ लंबा संबंध क कारण मिथिला एहि दूनू बाजार स व्यापार आ अन्य आदान-प्रदान क लेल सेहो अनुकूल स्थिति मे अछि। ओना, वर्तमान मे पूरा क्षेत्र कम खपत वाला बाजार अछि, मुदा एकर आबादी विशाल अछि। जेना-जेना एहि क्षेत्रक अर्थव्यवस्था केँ प्रोत्साहन भेटैत छैक आ विस्तार होइत जाइत छैक, मिथिला सन क्षेत्र लेल जे अपन जनसंख्याक बाजारक संग एहन उद्योगक विकास क' सकैत अछि आ पड़ोसी क्षेत्र मे पैघ बाजार सेहो ताकि सकैत अछि, जखन कि स्थानीय लोक सेहो उपभोग क सकत। । हमर व्यापारी सामूहिक प्रयास लेल संगठित नहि भेल अछि। परिवहन, बैंकिंग, बीमा आदि के कठिनाई हुनका सब के संयुक्त प्रयास के लेल प्रेरित नै केलक अछि। हमरा सबहक विशाल संसाधनक बारे मे हुनका लोकनि केँ खराब समझ छनि, हुनका सब के सही लाइन पर शिक्षित करय के अछि आ आगू जे समृद्धि अछि ताहि सं अवगत कराबय के अछि। माइक्रोफाइनेंस आ सेल्फ हेल्प ग्रुप-एकर उद्देश्य छल जे गरीब गरीबी रेखा पर अपन वित्तपोषण के लेल सस्ता क्रेडिट के उपयोग क सकय। एहि दौरान नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट (नाबार्ड) शोध अध्ययन के एगो श्रृंखला कैलकै जेकरा स पता चललै कि ग्रामीण गरीब के सेवा दै वाला ग्रामीण बैंक शाखा के व्यापक नेटवर्क के बावजूद बहुत बड़ संख्या मे गरीब के गुना स बाहर ही रहलै औपचारिक बैंकिंग प्रणाली के। ई अध्ययन स ईहो पता चललै कि मौजूदा बैंकिंग नीति, प्रणाली आ प्रक्रिया, आ जमा आ ऋण उत्पाद शायद गरीबक के सब सं तत्काल जरूरतक के पूरा करय के लेल उपयुक्त नहि छल। ईहो लगलै कि गरीब के सच मे सस्ता कर्ज़ के बजाय, ई सेवा आ उत्पाद तक बेहतर पहुँच के जरूरत छै । एहि पृष्ठभूमि मे वैकल्पिक नीति, प्रणाली आ प्रक्रिया, बचत क जरूरत महसूस कैल गेल आ ऋण उत्पादक, अन्य पूरक सेवाक, आ नव वितरण तंत्र, जे गरीबक के आवश्यकताक के पूरा करतय, खासकर ऐहन घरक के महिला सदस्यक लेल। स्वयं सहायता समूह(SHG) 10 सं 20 लोकक के समूह छै, आमतौर पर समान वर्ग आ क्षेत्र के महिला'क जे एक साथ आबि'क बचत आ ऋण संगठन बनायत । ओ सदस्यक के छोट ब्याज वाला ऋण देबा'क लेल वित्तीय संसाधनक के एकत्रित करत। इ प्रक्रिया छै जे पहिले बचत पर ध्यान केद्रित करैत छै। एकर तुरंत बाद आरबीआई वाणिज्यिक बैंक सब के सलाह देलकै कि SHG के लोन सुविधा देल जाय। वित्तीय क्षेत्र स एसएचजी क संबंध दुनू पक्ष लेल नीक रहल। बैंक एकटा पैघ बाजार से व्यापार करबा मे सक्षम छल, यानी कम आय वाला घर, लेनदेन क लागत कम आ वापसी'क बेसी संभावना छल। एसएचजी अधिक वित्तपोषण के संग अपन संचालन के पैघ पैमाना पर करय मे सक्षम छल आ बेसि उत्पादक तक पहुंच प्राप्त करय मे सक्षम छल। महिला सदस्यक के अपन मदद लेल साझा हित समूह उपलब्धि उल्लेखनीय छै, मुदा एसएचजी के कर्मचारीक के क्षमता के निर्माण के लेल बहुत रास रस्ता तय करबाक हेतई । सहायता प्रदान करय के लेल गैर सरकारी संगठनक के भूमिका एसएचजी के सफलता के कहानी के लेल आवश्यक छै। मिथिला मे गैर सरकारी संगठन भारतीय आ विदेशी दुनू तरहक फंडिंग संस्थान के मदद सं एसएचजी के स्थापना केलक अछि। मिथिला लेल राज्य विषम आ असहज राज्य बिहार आ ओकर संविधान सँ अलग भ' क' मिथिला केँ भारतीय संघक अंतर्गत राज्य बना देब ओकर भोजन, स्वास्थ्य, आवास, शिक्षा आ संचार के जरुरी समस्याक एकमात्र समाधान अछि। तखने लोक नदी के वश मे करय के काज तुरंत क सकय छथिन्ह आओर अपन खेती मे सुधार क सकय छथिन्ह। नदी गंडक, वागमती, कमला, कोसी, महानंदा आ ओकर सहायक नदी के वश मे करला स बाढ़ पर नियंत्रण होयत, बहुत रास महामारी के प्रसार नै होयत, खाद्य फसल बढ़त, संचार मे सुधार आ हमर उद्योग आ कारखाना के संचालन के लेल सस्ता जलविद्युत के आपूर्ति होयत। जे कहै छथि जे मिथिला राज्यक रूप मे अपन दम पर ठाढ़ नहि भ' सकैत अछि, ओ अपन एखन धरि अविकसित आ उपेक्षित प्राकृतिक संसाधन मे ओकर अपार संभावित सम्पत्ति केँ ध्यान मे राखौत। उचित देखभाल से ओकर लोक केँ स्वावलम्बी आ समृद्ध त' बनेबे करत, संगहि भारतीय संघ के एकटा संपत्ति सेहो बनत। राज्यक रूप मे मिथिलाक व्यवहार्यता पर कोनो संदेह नहि। एकर क्षेत्रफल भारतीय संघक बहुत रास राज्यसँ पैघ अछि । 2011 के जनगणना के अनुसार एकर जनसंख्या 5.55Cr अछि, भाषाई, भौगोलिक आ सांस्कृतिक इकाई के रूप मे लेल जाय या अपन क्षेत्र के विस्तार पर विचार कयल जाय या अपन क्षेत्र के विस्तार पर या अपन जनसंख्या के ताकत पर विचार कयल जाय त' मिथिला के राज्य के नीक दावा अछि। नई दिल्ली आ पटना के शासक के हाथ स अपन लोक के उपेक्षा, शोषण आ दुख के देखैत राज्य भेटबाक ई दावा एकटा जरूरी आवश्यकता अछि। ओहि दावा के स्वीकार करय सं मना करला के परिणाम मात्र हमर लोक के लंबा समय तक दुर्दशा रहत। मिथिलाक लोक हुनकर कुशासनक शिकार अछि। बहुतो लोक मानैत छथि आ कहैत छथि जे भारतीय संघक भीतर स्वायत्त राज्यक रूप मे अपना केँ चलाबय लेल मिथिला मे एतेक संसाधन नहि अछि । मिथिला मे स्वयं एतेक ज्ञान अछि जे ई बोध छनि जे मिथिला के संसाधन हुनकर आकारक कोनो आन राज्य सँ कम नहि छनि । 5.55 करोड़ के मानव शक्ति आ 25,000 वर्ग मील के जमीन के विस्तार मे उपजाऊ गाद स ढकल सक्षम धरती स्वयं एकटा विशाल संसाधन अछि। साल भर हिमालय सं पानि ल क नियमित अंतराल पर नदी जे पूरा जमीन के सिंचाई करय लेल पर्याप्त अछि आ हर घर के लेल ट्रेन आ बस के संग-संग छोट आ पैघ उद्योग के लेल जलविद्युत उपलब्ध कराबैत अछि। संसाधन काफी अछि। उत्तरी सीमा पर स्वयं हिमालय जे सब तरहक खनिज आ व्यवहार्य लकड़ीक संग जंगल धारण करैत अछि। मिथिला मे उद्योगक अभाव वा गरीबी कहियो संसाधनक अभाव मे नहि होइत छैक । शासक नहि चाहैत छथि जे एहि क्षेत्रक विकास हो। कोनो साम्राज्यवादी कहियो नहि चाहैत छल जे ओकर उपनिवेश तकनीकी रूप' स विकसित हो। तकनीकी उन्नति सामान्य शैक्षिक आ आर्थिक प्रगति के संग-संग चलैत अछि। जँ हमरा सभ लग ई सभ अछि तँ हमरा सभकेँ शाही मालिक' क कोनो काज नहि अछि जिनकासँ हम सभ मात्र दूर रहए चाहैत छी । एकटा चतुर मालिक तेँ चाहत जे अहाँ पिछड़ल रही। अहाँक जनशक्ति अप्रशिक्षित आ अहाँक प्राकृतिक संसाधन अविकसित। हुनका लग अहाँ के मात्र अपन कूली या दुकान के खबास आ कार्यालय मे रजिस्टर एमहर ओमहर केनिहार सस्ता मजदूर चाही । हमर सबहक उद्योग एक के बाद एक सफाया भ' गेल। 27 जुलाई 1952 कए मिथिलवासी दरभंगा टाउन हॉल मे भारतीय संघ क अंतर्गत मिथिला राज्य क मांग सार्वजनिक केलक। पुनः 26 जुलाई 1953 कए ओही हॉल मे मांग कए प्रभावी निष्कर्ष पर पहुंचेबा लेल एकटा विशेष सम्मेलन क आयोजन कैल गेल । 22 नवम्बर 1953 के कोलकाता मे अखिल भारतीय मैथिल संघ के आयोजन मे एकटा विशाल प्रदर्शन-आधा मील लंबा जुलूस आ कोलकाता के 15 हजार मैथिल के गिरीश पार्क मे डॉ लक्ष्मण झा के नेतृत्व मे बैसार भेल। ई खबर कोलकाता के अखबार मे आ बाहर व्यापक रूप स आयल छल। पटना'क शासक लोकनि एकर संज्ञान लैत उपाय करय लगलाह। जानकी नंदन सिंह के नेतृत्व मे कांग्रेसी ज्ञापन देबय लेल कोलकाता बढ़ल । 22 जनवरी 1954 कए बिहार सरकार क आग्रह पर पश्चिम बंगाल पुलिस द्वारा अचानक आसनसोल रेलवे स्टेशन पर 56 गोटे कए गिरफ्तार भेल । सरकारक ई काज मिथिलाक लोक केँ जतय-जतय छल, भड़का देलक। कोलकाता, पटना,दरभंगा आ गाम-गाम मे आन्दोलित स्त्री-पुरुषक विशाल जमघट सरकार के अत्याचार के निंदा करैत मिथिला राज्य के गठन के लड़ाई जारी रखबाक संकल्प लेलनि। 22 दिसम्बर 1953 कए संसद द्वारा राज्य पुनर्गठन आयोग क नियुक्ति कैल गेल जाहि मे सैयद फजल अली कए अध्यक्ष आ हृदयनाथ कुंजरू के ज्ञापन देल गेल मुदा हम सब फेर धोखा खा गेलहुं। कोनो प्रतिक्रिया नहि भेटल। तखनो दिल्ली आ पटना मे शासक या त दुश्मन बनल अछि या उदासीन आ एहन बुझाइत अछि जे हुनकर दुश्मनी आ उदासीनता जारी अछि। हम सब आब अपना पर विश्वास करब आ असगरे लड़ब तखने प्रगति क सकब। तेँ हम सभ अपन राज्यक मांग करैत छी । मिथिला के मुआवजा देबय के जरूरत अछि । वर्षों स विकास'क कमी के कारण जे प्रत्यक्ष रूप स राज्य आ केंद्र सरकार के उपेक्षा के कारण भेल। हम एहि क्षेत्रक लोकक संग मिथिला क्षेत्रक समान विकासक लेल न्यायिक दृष्टिकोण अपनाबय के आग्रह करैत छी । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१२.प्रणव झा- नरेंद्र झा: सीए, मैथिल आर्थिक-सामाजिक लेखक आ मिथिला अभियानी प्रणव झा नरेंद्र झा: सीए, मैथिल आर्थिक-सामाजिक लेखक आ मिथिला अभियानी सीए नरेंद्र झाक नाम मिथिला आ मैथिलीक लेल समर्पित एकटा एहन लोक के रूपमे लेल जा सकैत अछि जिनकर लेखनी अङ्ग्रेज़ी आ मैथिली भाषाक माध्यमसँ मिथिलाक संप्रति ज्वलंत समस्या सभ के उठेलक अछि। एकटा चार्टर्ड अकाउंटेंट हेबाक संगे ओ मिथिलाक इतिहास, संस्कृति आ आर्थिक विकासक प्रबल पक्षधर रहलाह अछि। हुनकर चर्चित पुस्तक "मिथिला राइजिंग" मिथिलांचलक सर्वांगीण विकास आ ऐ क्षेत्रकेँ एकटा अलग राज्यक रूपमे स्थापित करबाक माँगके बुलंद करैत अछि। पुस्तकमे श्री नरेंद्र झा ऐ बातपर विस्तारसँ प्रकाश देने छथि कि कै तरहें लगातार उपेक्षाक कारण मिथिला विकासक रेसमे पिछड़ल अछि आ एकटा अलग राज्य बनने कै प्रकारसँ ऐ क्षेत्रके विकास हेतै आ मिथिला कै प्रकारसँ राष्ट्र निर्माणमे सेहो अपन महत्वपूर्ण योगदान दऽ सकैत अछि। नरेंद्र झा जीक जन्म 1934 मे दरभंगा जिलाक तरौनी गाममे भेल छल। तरौनी संजोगसँ हमर मातृक सेहो अछि। ई गाँव संस्कृत अध्ययनक एकटा प्राचीन केंद्र रहल अछि। हुनकर पिताजी विद्यावाचस्पति पंडित उपेंद्र झा सेहो एकटा उद्भट संस्कृत विद्वान छलाह जिनका राष्ट्रपति पुरस्कारसँ सेहो सम्मानित कैल गेल छल। ऐ गामसँ कैएक टा उद्भट विद्वान बहरायल छथि। एहन वातावरणमे पलल-बढ़ल नरेंद्रजीकेँ मिथिलाक समृद्ध परंपरा विरासतमे भेटल छल। यैह कारण छैक जे हुनकर लेखनमे मिथिला क्षेत्र के उत्थानक गँहीर संदेश निहित रहल अछि। अपन शिक्षा गाँवसँ शुरू केलाक बाद ओ उच्च शिक्षा लेल दरभंगा एलाह आ फेर कलकत्तामे चार्टर्ड अकाउंटेंट बनए लेल गेलाह। कलकत्तामे 10 साल तक अभ्यास करबाक पश्चात ओ 1975मे पटना आबि गेलाह। ओ 1996 मे इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया के पटना शाखा के अध्यक्ष सेहो बनल छलाह। मिथिला-मैथिलीक काजमे श्री नरेंद्र झा जी 1954 सँ लागि गेल छलाह जखन ओ इंटर कॉमर्स के परीक्षा पास केने छलाह। एहि काज लेल हुनका डॉ० लक्ष्मण झा आ डॉ० लक्ष्मीनारायण सिंह सन दिग्गजक सान्निध्य आ प्रेरणा भेटल छल। बक़ौल श्री नरेंद्र झा, डॉ० लक्ष्मण झाक नेतृत्वमे 'पाया आंदोलन' हुनकर पहिल सामाजिक आंदोलन छल। 1956मे जखन ओ कलकत्ता सीए के पढ़ाई लेल गेल छलाह त ओतऽ हुनका प्रो० प्रबोध नारायण सिंहक सानिध्य प्राप्त भेल छल जिनका संपर्कमे श्री झाकेँ अंदर मिथिला-मैथिली के प्रति समर्पण आर दृढ़ भेल छल। कलकत्तामे बंग भाषी सब के अपन भाषा के प्रति प्रेम आ सम्मान देख हिनका भीतर मातृभाषा मैथिली के प्रति प्रेम आर बेसिए उत्कट भेल छल । मैथिली एकटा प्राचीन आ स्वयंमे एकटा समृद्ध भाषा छैक। वाजपेयी जीक सरकारमे एकरा संविधानक आठम सूचीमे सेहो समाहित कएल गेल। तथापि मैथिलीमे लिखल-छपल कदाचित आन-आन भारतीय भाषासँ कम अनुवाद होइत अछि। कदाचित शब्द के प्रयोग ऐ दुआरे कैल जे भऽ सकैत अछि जे ई बात गलत सेहो हो। किए की हमरा अपना देखबामे रहल अछि जे बहुत रास किताब अलग-अलग विषयमे या साहित्य कविता, कथा, उपन्यास आदि छपल तऽ अछि मुदा कतौ गुमनामीमे हेरा कऽ रहि गेल अछि। एकर मूल कारण जे हमरा बुझना जाइत अछि से अछि i) देशक औसत तुलनामे मिथिलामे साक्षारता व पढ़ाइ (खास कऽ इंटर पास) के कमी ii) गरीबी, जै कारण पोथी किनबाक आदत लोकमे बनिए नै पाबय छै iii) मिथिला क्षेत्रमे सरकारी या प्राइभेट पुस्तकालय के आभाव। एनामे अक्सर होइत छैक जे कोनो विशिष्ट विषय पर मैथिलीमे लेखन के अभाव छैक। जेना मानि लिय जे स्वातंत्र्योत्तर मिथिलाक आर्थिक-सामाजिक विषय पर हमरे चाहे आरो कियौ लोक के मोनमे भऽ सकैत अछि जे पुस्तक के अभाव छैक। मुदा जखन आशीष जी आ विदेह के पेटार उनटाओल तऽ देखल जे नरेंद्र झा नाम केर एकटा चार्टर्ड एकाउंटेंट 60-70 के दशकेसँ ऐ सभ विषय पर मैथिलीमे लिखनाइ आ सामाजिक परिचर्चा शुरू कऽ देने छलाह। 90 आ 2000 के दशकमे मिथिलाक आर्थिक-राजनैतिक पहलू पर खोइया-खोइया छोड़ा कऽ लिखने छथि। मिथिलाक भौगौलिक, आर्थिक आ समसामयिक सामाजिक बुनावट पर विस्तार पूर्वक लिखल गेल छै। कोनो राज्य के लेल सबसँ महत्वपूर्ण बात ई होइत छैक जे ओ आर्थिक रूपसँ कतेक सुदृढ़ अछि आ ओतय रहनियार लोक सब कतेक सुख-सुविधा आ अधिकार के भोग करै छथि। पिछला दसेक वर्षसँ मिथिला राज्य के माँग जोड़ पकड़ि रहल अछि। भऽ सकैत अछि जे भविष्यमे देर-सवेर मिथिला सेहो एकटा अलग राज्य बनि जाए। मुदा अलग राज्य ओतेक बड़का बात नै हेतैक जते कि मिथिलाकेँ आत्मनिर्भर आ सुखी-सम्पन्न राज्य बनायाब। ई काज बिना सुविचारित आर्थिक नीति आ उपलब्ध संसाधनक समुचित उपयोगकेँ संभव नै भऽ सकैत अछि। आ ताहि लेल आवश्यक अछि जे सरकार आ मिथिलामे कार्यरत उद्यमी, नेता, सामाजसेवी आ सरकारी कार्मिक सभकेँ ऐ क्षेत्र के नदी, खेत, उद्योग, सामाजिक व्यवस्था आदि के नीक ज्ञान हो। मिथिलामे नदीतंत्र के एकटा जाल बुनल छैक। आ प्राचीन कालसँ ई ऐ क्षेत्र के समृद्धि आ विपत्ति दुनू के कारण रहल अछि। इतिहासमे जै कालमे लोक-समाज ऐ तंत्र के समझ बना के एकर सदुपयोग केलक लोक के समृद्धि भेटल आ नै तऽ नदी के बाढ़ि रूपमे विपत्ति। मिथिलाक नदीतंत्र के विषयमे हमरा विस्तृत जनतब सबसँ पहिले श्री दिनेश मिश्र द्वारा हिंदी भाषामे लिखल किताब सब के मार्फत भेल छल, जकर बादमे श्री गजेन्द्र ठाकुर द्वारा मैथिली रूपान्तरण सभ सेहो विदेहमे पढ़ल। हम जखन नरेंद्र जीक पुस्तक पढ़लहु तऽ ज्ञात भेल जे "मिथिलामे जल-संसाधन एवं प्रबंधन" आ "मिथिलाक आर्थिक विकास" नाम के पुस्तकमे नै खाली मिथिला के नदीतंत्र के विस्तृत विवरण मैथिली भाषामे देने छथिन अपितु समकालीन जिलावार आर्थिक व्यवस्था, भौगोलिक आ सामाजिक स्थिति के सेहो विस्तारसँ चर्चा केने छथिन। निश्चिते एतेक लिखबा के लेल अपन सीए केर पेशासँ कतेक रास समय निकालि कऽ रिसर्च केने हेता से हुनकर मिथिला क्षेत्र आ मैथिली भाषा आ ऐ विषय के प्रति प्रेम आ लगाव के निर्धारित करैत अछि। एकटा वस्तु जे हम आइ के समय के बहुत रास मैथिल युवामे देख रहल छी, जे किछु युवा जतय राजनैतिक रूपसँ सक्रिय भऽ मिथिलाक विकास के संभावना खोजि रहल छथि ओतय किछु उद्यमी आ औंटरप्रेन्योर मानसिकता बला मैथिल युवा आ अनुभवी लोक सब सेहो मिथिला के विभिन क्षेत्रमे सक्रियतासँ कृषि, कुटीर उद्योग आ तकनीकी आधारित कारोबार ठाढ़ करबा के प्रयासमे छथि। हमर विशेषज्ञता नै राजनीतिमे अछि आ नै व्यापारमे। मुदा अपन सैद्धान्तिक ज्ञान आ अनुभव के आधार पर हमर मानब अछि जे ई दुनु माध्यममे अपन आ क्षेत्र के प्रगति लेल काज करऽ के इच्छुक लोक लेल ई आवश्यक अछि जे क्षेत्र के इतिहास (आर्थिक आ सामाजिक परिप्रेक्ष्यमे), भूगोल, संसाधन आ तंत्र के विषयमे ठीक-ठाक समझ बना ली। तखने राजनीति आ कि उद्यम व्यापार के माध्यमसँ विकास के पथ पर अग्रसर भऽ सकैत छी। आ हम अपन पाठकीय अनुभव के आधार पर कहि सकैत छी जे ऐ के लेल नरेंद्र झा द्वारा लिखल उपरोक्त दू टा पोथी के अतिरिक्त "मिथिलाक जनपदीय विकास" आ "विकास ओ अर्थतन्त्र" के अध्ययन करबाक चाहिएन। ओना ऐ तरहक सामाग्री अङ्ग्रेज़ीमे सेहो भेट जेतनि (स्वयं नरेंद्र झा के सेहो साहित्य अङ्ग्रेज़ीमे उपलब्ध अछि), कदाचित हिंदीमे सेहो, मुदा जखन मातृभाषा मैथिलीमे लोक ऐ प्रकार के सामाग्री के अध्ययन के लेल अग्रसर हेता तऽ भाषा के रूपमे मैथिली के सेहो विकास हेतै आ मैथिलीमे अध्ययनसँ मिथिला के प्रति भावनात्मक लगावमे सेहो वृद्धि संभव छैक। श्री झा के लेखनीमे नै खाली भारतक सीमा क्षेत्र के मिथिला के भूगोल, सामाजिक-राजनैतिक-आर्थिक परिस्थिति के चर्चा कैल गेल छैक अपितु नेपाल के अंतर्गत आबय बला मिथिला के विषयमे सेहो सारगर्भित आलेख उपलब्ध छैक। अंतिका प्रकाशनसँ 2008 मे छपल हुनकर पुस्तक "विकास ओ अर्थतन्त्र" जकरा ओ मैथिली आंदोलन आ सांस्कृतिक आलोड़नसँ सक्रिय रूपसँ सम्बद्ध आंदोलनकर्मी आ रंगकर्मीकेँ समर्पित केने छथि तकरा चारि भागमे विभक्त कय लिखने छथि- "मिथिला: राज्य ओ राजनीति", "मिथिलाक विकास मार्ग", "अर्थतन्त्र" आ "स्मृति शेष" ऐ मोट-मोट विषय के अंतर्गत 90 आ 2000 के दशक के बीच के मिथिला के राजनीति अर्थतन्त्र आ विकास पर लिखल सारगर्भित लेख पठनीय अछि आ आजुक संदर्भमे सेहो बहुत बातमे प्रासांगिक। ऐ पुस्तकमे 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव के मिथिला के एक एक सीट के केंडीडेट आ परिस्थिति के विस्तारसँ वर्णन केने छथि जे हुनक ऐ संदर्भमे पकड़ के द्योतक अछि। ' विदेह 1 जून 2024 के अंक 'श्री नरेंद्र झा' विशेषांक के रूपमे प्रकाशित करबाक नियारलक अछि ई स्वागत योग्य बात अछि। एहि प्रकारक क्रियाकलापसँ मैथिलीमे लिखित साहित्यक पोखरिमे हेरायल-नुकायल लेखन सभ पर प्रकाश पड़ैत छैक जैसँ ने खाली हमरा सन पाठक सब के नब-नब विषय पर मैथिली साहित्य पढ़बाक प्रेरणा भेटै छैक अपितु भविष्यक पाठक लेल सेहो मैथिली साहित्य के पेटार के मूँह फुजै छैक। आ सबसँ बेसी बढ़ि कऽ ई बात जे अर्थव्यवस्था, उद्योग, विज्ञान, तकनीकी आदि विषय पर लोक के मैथिलीमे पढबा-लिखबाक प्रेरणा सेहो भेटै छै जैसँ कि मैथिली भाषा आ ओकर साहित्य सेहो समय के संग-संग समृद्ध हेतैक। विदेह के संपादक मण्डल आ पाठकगण के 'श्री नरेंद्र झा'विशेषांक के लेक बहुत रास बधाइ आ शुभकामना। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१३.रमेश- मिथिलाक अर्थव्यवस्थाक विरल व्याख्या करैत लेखक: नरेन्द्र झा, सी.ए. रमेश (संपर्क-दरभंगा) मिथिलाक अर्थव्यवस्थाक विरल व्याख्या करैत लेखक: नरेन्द्र झा, सी.ए साहित्यकारो लेखक होथि, तें 'गैर-साहित्यिक लेखन' केनिहार लोक, 'लेखक' नहि होथि, से बात नहि! ई सत्य आ तथ्य नहि थिक। 'गैर-साहित्यिक लेखन केनिहार', 'असली लेखक' आ 'लेखके टा' होइत छथि! मैथिली भाषा मे, से गैर-साहित्यिक लेखन, अदौकाल सँ कमजोर रहल, आ एहेन लेखकक संख्या दयनीय रहल। कारण, साहित्य-लेखने मात्र, साहित्यकारगणक 'समर्पणपरक जिद्द आ निजी व्यय' सँ होइत रहल, तँ 'साहित्येतर आन क्षेत्रक लेखन' पर विद्वान सब, सामूहिक रुपें, कोना सक्रिय होइतथि? समाज, शासन आ मिथिलाक प्रजातान्त्रिक धन्नासेठ सबहक, कोनो सहयोग नहि रहल, साहित्य वा साहित्येतर लेखन के। तें, भाषा, भाषा आन्दोलन, सामाजिक व्यवस्था, अर्थव्यवस्थाक लेखन, राजनैतिक मीमांसा करैत लेखन, समाजक अभगदशाक आ धर्मक्षेत्रक लेखन, देस-दुनियाँ आ विज्ञान-आधारित लेखन, मिथिलाक प्राकृतिक आ मनुष्य निर्मित आपदाक लेखन, आदि क्षेत्र पर आलेख आ पोथी-लेखनक धारा, जे कोनो समाजक, 'प्रत्यक्ष आ वास्तविक अयना' होइत अछि, से उपेक्षित रहल, मिथिला समाज आ मैथिली भाषा मे! ई बहुत दुर्भाग्यपूर्ण, लेखन-घटना भेल अछि! एहेन सन दयनीय स्थिति मे, जे किछु गोटे,फाँड़ बान्हि क', गैर-साहित्यिक लेखनक माटि स्वीकार केलनि, ताहू मे अग्रगण्य छथि, श्री नरेन्द्र झा, सी.ए, पटना! ओ जहिया कहियो, कतहु भेटला, भेटिते देरी सब दिन, पहिल पाँती कहलनि- 'हम त' 'लेखक' नहि छी, अहाँ सब जकाँ!' हुनकर ई पाँती, हमर साहित्यकार पर प्रहार करैत रहल, आ हमरा हीया सालैत रहल, मैथिली भाषाक गैर-साहित्यिक लेखनक दयनीय दशा पर, आ नरेन्द्र झा एहेन विशेषज्ञ लेखकक उपेक्षा पर! हुनकर लेखनक उचित संज्ञान नहि लेल जायब, उचित मूल्यांकनक कोनो टा आयोजन आइ धरि नहि कयल जायब, मैथिली भाषाक लेखन-संवर्गक बड़का त्रुटि थिक। अइ पैघ अभाव अभियोगक, आइ उत्तर थिक, 'ई-विदेह'क' ई आयोजन'! जखनकि ओ 'मैथिली लेखक संघ', पटनाक, संस्थापक आ अध्यक्षे छथि, हुनका ई अबिनखेद आइ धरि किए छनि, जे मैथिली-संसार हुनका 'लेखक' किए नहि मानलक? तकर एकमात्र कारण थिक, हुनकर लेखनक मूल्यांकन लेल, लेखन-संवर्गक कलम नहि उठब। मैथिली मे कोनो लेखकक उपेक्षाक ई परिस्थिति, बहुते क्लेशदायक अछि! हम मुदा, हुनका सब दिन कहलियनि, जे 'हम अहीँ के 'असली लेखक' मानैत छी, साहित्यकार लोकनि के, 'साहित्यकार' मानैत छियनि'! ओ कहथि, 'लिखि क' कहिऔ'! सैह लिखि क' कहबाक, आइ हमरा अवसर भेटल अछि, 'विदेह'क अइ सार्थक आयोजन मे। लेखक नरेन्द्र झा, मैथिली आन्दोलन मे सेहो, खूब सक्रिय रहलाह, अपना जीवन मे। दरभंगा मे रहथि, त' डा. लक्ष्मण झाक संग काज केलनि, आ स्वभावत: 'मिथिला राज्य निर्माण'-आन्दोलनक समर्थक बनलाह। से पटनो मे, आ कोलकाता मे सेहो। तें, पैघ आन्दोलनी, स्व.बाबू साहेब चौधरी, आ स्व.प्रबोध ना.सिंह सँ घनिष्ठता रहलनि। तहिना कोलकाता आ दरभंगा मे निरंतर, आजीवन, आन्दोलनात्मक आयोजन केनिहार, 'मिथिला संघर्ष समिति,दरभंगा' आ 'साक्षर', दरभंगा, के कर्त्ता-धर्त्ता, एकटा आन्दोलनी श्री कमलेश झा, सेहो छथि। ओ हमरा चारि-पाँच बर्ख पूर्व कहलनि, जे 'बच्चा रौ, अइ बेरक विद्यापति पर्व मे, हम किनका सम्मानित करियनि? कोनो तेहेन समर्पित नाम सुझाब' हमरा!' हम छुटिते कहलियनि- 'नरेन्द्र झा, तरौनी/पटना(सीए)आ हुनकर कथाकार पत्नी डा.पन्ना झा(आब स्व.)!' भाइ कमलेश झा, आ हम सब बजौलियनिन, अ.भा.मै.सा. परिषद्, दरभंगाक, डीह पर (दिग्घी पच्छिम, दरभंगा) आ मिथिलांचल विकास परिषद्, लहेरियासराय (डा.एस एम नवाब/डा.शंभुनाथ मिश्र/श्री कमलेश झा बला संस्था) दिस सँ हुनका दुनू बेकती (आब स्व.डा.पन्ना झा, मैथिलीक कथाकार)क स्वागत करैत, एकटा मर्यादित सादा समारोह मे ''वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' सम्मान'', 2019 ई. आह्लादपूर्वक देल गेल। तहिया, हुनकर समस्त लेखन, जीवन, आ आन्दोलनी कार्यकलाप पर, प्रथमहि चर्चा भ' सकल! परम आश्चर्यक गप्प जे, जाहि मैथिली लेखक संघ, पटनाक ओ अध्यक्ष छलाह आ अपन निजी कार्यालय मे, लेखक संघ के, कार्यालय आ बैसार लेल, एकटा कोठलीयो देलनि, से हुनकर समग्र लेखन पर, कम सँ कम ओहू कोठली मे, एकटा 'समीक्षा-गोष्ठी' धरि, आयोजित नहि क' सकल, अपन 'लेखक-अध्यक्ष' लेल! मुदा ओ कार्यक्रम-समाप्तिक बाद कहलनि- 'अइ सँ हम कमलेश जी के त' मोजर आ धन्यवाद द' देबनि,मुदा, अहाँ के नहि! अहाँ लिखब हमरा पर, तखने मोजर देब हम!' हम फेर गछलियनि। आइ आत्मसंतोष भ' रहल अछि, जे, हुनकर लेखन पर, लीखि पाबि रहल छी! ओ आ हुनकर अनुज अग्निपुष्प जी, हमर एहेन अपन साढ़ूक पितिऔत छथिन, जे हुनकर घराड़ीयो छीनि लेलखिन, गाम मे! तकर व्यथा, हमरा, हुनका लग लज्जित क' दैत अछि! मुदा आब से हमर तकर अबिनखेद, कहियो दूर नहि भ' सकत! मुदा, तकर कहियो,अपन पितिऔतक शिकाइति, हमरा लग नहि केलनि। पटना-दिल्लीक एम एल एफ (मैथिली साहित्य उत्सव)मे भेटलाह, त' कहलनि- हम देखैत छी, जे कहिया अहाँ हमरा, लिखित रुपें, लेखक मानैत छी..? आइ 'विदेह'क ई आयोजन, हुनका पर नहि होइतय, त' 'जुलुम' भ' जइतय! लेखक नरेन्द्र झाक लेखन-क्षेत्रक चयन, खूब तर्कसंगत, आ हुनक विशेषज्ञता-आधारित अछि। मिथिलाक अर्थव्यवस्था-आधारित पाँच-पाँच टा पोथी, कोनो गैर-साहित्यिक लेखकक आबय, से अपना-आप मे, 'असाधारण घटना' होइत अछि! आ तकर समीक्षा-मूल्यांकन नहि होअय, से मैथिली मे 'साधारण घटना', भेल करैत अछि! तद्विषयक हिनकर महत्वपूर्ण पुस्तक सब अछि :- 1. मिथिलाक आर्थिक विकास (2000 ई.) 2. मिथिलाक जनपदीय विकास (2005 ई.) 3. मिथिला मे जल संसाधन ओ प्रबंधन (2006 ई.) 4. विकास ओ अर्थतंत्र (2008 ई.) 5. अर्थतंत्र ओ भ्रष्टाचार (2012 ई.)। नरेन्द्र झाक अर्थव्यवस्था-आधारित लेखनक, अनेक आयाम अछि। जेना, मिथिलाक भूगोल, विकास, भ्रष्टाचार, अर्थतंत्र, जल संसाधन आ तकर प्रबन्धन! ताहू मे, 'विकास'क दू मुख्य आयामक, हिनक दू टा स्वतंत्र पोथीए अछि :-1.आर्थिक विकास आ 2.जनपदीय विकास। पुस्तक सब,आलेखेक संग्रह सब अछि। हिनकर, अपन चयनित विषयक, एतेक रास मात्रात्मक लेखन, पाठक के चकविदोर लगा सकैत अछि, जखनकि सबटा छपियो नहि सकलनि अछि। मिथिलाक अर्थतंत्र पर खूब जमि क' काज केनिहार लेखक नरेन्द्र झाक विकासक अवधारणा सुस्पष्ट आ तार्किक छनि। आलेख-लेखन मे, हुनकर दृष्टिकोण, सामान्यत: समाजवादी छनि। ओ 'अनियोजित विकासक' 'दुष्परिणाम' सँ 'वाकिफ' छथि, आ हरदम, 'मिथिलाक नियोजित विकास'क पक्ष मे,(अपन अनेक आलेख मे) रहैत छथि। 'विकास आ अर्थतंत्र'क 'अन्तर्सम्बन्ध' हो, अथवा 'अर्थतंत्र आ भ्रष्टाचार'क अन्तर्सम्बन्ध हो, एक-दोसराक अन्तर्सम्बन्धक प्रसंग मे, हुनकर 'दृष्टि', साफ छनि। ई कोनो लेखक लेल पहिल शर्त्त होइत अछि, जकरा ओ पूरा करैत छथि। अर्थतंत्र पर लेखनकार्य केनिहार लेखकक परिश्रम अपरिमित होइत अछि, जतेक मौलिक लेखन केनिहार लेखक के परिश्रम नहि होइत अछि। कारण, मौलिक लेखन मे, 'नैसर्गिक आ अर्जित सृजन-प्रतिभा', बेसी महत्वपूर्ण भेल करैत अछि! मुदा, 'अर्थतंत्र-परक लेखन' मे, 'आँकड़़ा-जुटानी' सँ ल' क', 'अर्थव्यवस्थाक क्षेत्रीयताक अध्ययन' आ 'स्थानीयताक उपयुक्तता' देख' पड़ैत छै, ताहि लेल अनेकानेक जमीनी यात्रा करय पड़ैत छै! तखन जा क' कोनो आलेख आँकड़़ा-पूरित आ तथ्यपूरित भ' पबैत अछि। तें, एतेक 'परिश्रमसाध्य लेखन' केनिहार, 'लेखके नहि, प्रणम्य देवता', भेल करैत छथि! से ताहि अर्थ मे विरल आ एकल लेखक छथि, नरेन्द्र झा! अइ विषयक आन कोनो लेखकक लेखन/पोथी/आलेख, खाहे त' अंग्रेजी/हिन्दी मे छनि,अथवा, एतेक संख्या मे पोथी नहि छनि, अथवा, मैथिली मे, एहेन गुणवत्ताक पोथी सब नहि छनि। नरेन्द्र झा, अपना विषयक, मैथिलीक सब स' पैघ लेखक छथि। हिनकर आरंभिको लेखन, 'मिथिलाक आर्थिक विकास '(2000 ई.) अपना विषयक संग न्याय केलक अछि, जाहि मे, मिथिला मे आर्थिक विकासक विविध आयाम सबहक, सैद्धान्तिक निरुपणक संग, तकर सबहक दयनीय जमीनी स्थिति सेहो वर्णित भेल अछि। तहिना, मिथिलाक क्षेत्रीयताक प्रति न्याय करैत, 'मिथिलाक जनपदीय विकास'(2005 ई.) मे, उप-क्षेत्रीय उपस्थापन, आलेख सब मे केलनि अछि। सेहो, 'स्थानीय अर्थ-विशेषता' सबहक चित्रण करैत! मिथिला मे जल संसाधनक कहियो 'नियोजित प्रबन्धन' भेबे नहि कयल। अनियोजित रुपें, हठात्, राजनैतिक लाभक दृष्टि सँ, अनावश्यक रुपें, कहियो नदी सबहक तटबन्ध-संस्कृति, आम जनजीवन पर थोपि देल गेल, आ कहियो 'चारि-दशकीय'/ 'पांच- दशकीय' 'नहरि-परियोजना' चला क', लूटि-लटबाक बहन्ना बना, परियोजनाक अर्थे, निरर्थक क' देल गेल, जखन कि मिथिलाक भूगोल जल संसाधन सँ, सदा भरल-पुरल रहल। ताहि ठाम, अर्थतंत्रक विशेषज्ञ लेखक नरेन्द्र झा, स्वभावत: 'जल संसाधनक न्यायपूर्ण वितरण' के, 'तार्किक प्रबन्धन' द्वारा, सुनिश्चित करय चाहैत छथि, जे एकदम विशुद्ध वैज्ञानिक सोच थिक ओ बर्खाजल, नदी-जल, झील आ बाढ़िक जल, सब तरहक जलक प्रबन्धनक रस्ता देखौलनि अछि, सेहो मैथिली मे! अइ विषयक ईहो पोथी, मैथिली मे, असगरे भेटल अछि, एखन धरि! ('मिथिला मे जल संसाधन ओ प्रबन्धन', 2006 ई.) स्वाभाविक अछि, जे नरेन्द्र झा सन जमीनी लेखक, मिथिला राज्यक पक्ष मे होथि, आ राज्य- निर्माणे मे, मिथिलाक सब समस्याक समाधान देखैत होथि! से कोनो अनुचितो बात नहि थिक, जखन कि प्राय: हिनकर सब पोथीक कवर-फ्लैप पर, अपन अनुशंसा लिखनिहार अनुज, मैथिलीक कवि भाइ अग्निपुष्प जी, मिथिला राज्यक अवधारणाक विरोधी छथिन। 'विकास ओ अर्थतंत्र' (2008 ई.)क पहिल खंडक पहिल निबंध, 'सुख-समृद्धिक लेल अपन राज्य', 'मिथिला राज्य निर्माण'क माँगक औचित्य साबित क' दैत अछि। अही खंड मे, ओ मैथिलीसेवी संस्था सब के, 'किछु' कहैत छथि, मिथिला सँ 'प्रतिभा-पलायनक कारण' पर विमर्श करैत छथि, आ 'मिथिला मे पंचायती राज व्यवस्थाक' मूल्यांकन सेहो करैत छथि! यद्यपि अइ पोथी मे संस्मरण-आलेखक स्थान उचित नहि छल, तथापि,डा.लक्ष्मण झा, स्व.बाबू साहेब चौधरी, आ डा.प्रबोध ना.सिंह, जे लोकनि मिथिला-मैथिली लेल अपन-अपन जीवन होम क' देलनि, तिनकर सबहक सामाजिक कार्यकलापक संस्मरण, कतहु सँ अप्रासंगिक नहि बुझाइत अछि। 'मिथिलाक सर्वतोमुखी विकासक मार्ग' पर, जतेक आलेख लेखक नरेन्द्र झा लिखलनि अछि, ततेक मैथिली मे क्यो एकगोटे नहि लिखलनि अछि। मिथिलाक समन्वित विकास हो, मिथिलाक आर्थिक विकास मे कृषिक भूमिका हो, पटौनीक समस्या/समाधान हो, नदी योजना,गंडक परियोजना, सप्तकौशिकी डैम परियोजना, सब साल विकास के पोछैत बाढ़िक विनाश-लीला, खाद्य संकट, विद्युत अव्यवस्था, जर्जर सड़क, चीनी उद्योग अथवा कृषि-आधारित उद्योगक समस्या हो, मखानक व्यवसाय, मत्स्यपालन व्यवसाय हो, अथवा, संगठित उद्योगक परिकल्पना, नरेन्द्र झा, विकासक कोनो आसंग के विश्लेषण छोड़ैत नहि छथि। सेहो, आलेखक संग न्याय करैत नरेन्द्र झा, समस्याक आधारभूत कारण, सुझाव,आ समाधानक प्रावधान सेहो, करैत छथि! मिथिलाक 'विकासक विविध आसंग'क, ओ 'मास्टर-लेखक' छथि! साहित्येतर लेखक नरेन्द्र झा, जहिना मिथिलाक सर्वतोमुखी विकासक सब आसंग, तकर परिस्थिति, दिशा,आ समाधान पर खूब लिखलनि अछि, तहिना मिथिलाक अर्थतंत्रक घून (भ्रष्टाचार)पर, खूब धरगर आ धुरझार लिखलनि अछि। भ्रष्टाचार आ कारी धन, विकासक पैघ बाधक तत्व थिक, आ बाजारवाद तकरा आर प्रश्रय दैत अछि। ई महगी के चरम पर पहुँचा दैत अछि। लेखकक एहेन विचार अकाट्य अछि! मिथिलाक अर्थतंत्रक एतेक विशद् परिचय, आइ धरि कोनो लेखक मैथिली मे देबे नहि केलनि अछि, जतेक आर्थिक विशेषज्ञ लेखक नरेन्द्र झा देलनि अछि। कमला-कोसीक बाढ़ि, तकर व्यथा-आलेख, अनावृष्टि आ रौदी-दाही, विद्युत संकट आ माओवाद सँ तबाह मिथिला, खाद्य असुरक्षा आ विफल भूमि सुधार सँ बेदम भेल मिथिला, मिथिलाक एक-सँ-एक कटु यथार्थ, हिनकर आलेख मे प्रथमहि उतरल अछि! मूल्यवृद्धि सँ पीड़ित जनमानस, फेर वैश्वीकरण सँ थकुचल जाइत अछि। गरीबीक मापदंड दोषपूर्ण अछि, से आइ धरि मैथिलीक कोनो आन लेखक, आलेख लिखि क' नहि कहलनि। 'लोकपाल बिल' के धोखपाल कहि, आलेखो त' नरेन्द्रे झा लिखलनि! आर्थिक उदारीकरणक दुष्परिणामक, एतेक नीक विश्लेषण केलनि अछि, जे मैथिली मे विरल अछि 'आरटीआइ'क बेचैनी, सँ ल' क', 'महगी आ विकासक चुनौतीक बीच झूलैत वित्तमंत्रीक बजट' धरिक यथार्थक आलोचनात्मक विवेचन, पढ़' योग्य अछि। अर्थतंत्रक अर्थनीतिक बहन्ने, किछु राजनैतिक आलेख सेहो ओ लिखलनि अछि, जे मोनगर अछि! जेना, 'तृणमूल कांग्रेसक रेल बजट', 'भंवर मे मनमोहन सिंहक अर्थनीति', 'नितीशक शासन मे खोटहि-खोट', 'दिवालिया लाल दुर्ग मे ममता बनर्जी', 'लोकतंत्रक महापर्व आ मिथिला'! उपर्युक्त निबंध सब, राजनैतिक स्वाद त' बिलहलक, मुदा, 'उदासीन पाठक' आ 'भौतिक-सुख-भोगीन्द्र पाठक' लेखें, धैनि सन! 'मिथिला मे नदी, संगम सँ समृद्धि तक', बहुत नीक बाट देखबैत अछि, समृद्धिक! मुदा सरकार लेखें धैनि सन! 'सरकारी जोड़-तोड़ मे घुरियाइत मिथिलाक विकास', मिथिजनक भ्रम तोड़ैत अछि। मुदा कुभकर्णी निंद मे सूतल मिथिजन लेल,धैनि सन! मिथिलाक अर्थतंत्र पर लिखल, एहेन-एहेन महत्वपूर्ण पाँच टा पोथीक, साहित्यकारगण आ आन क्षेत्रीय बुद्धिजीवीगण द्वारा संज्ञान नहि लेल जायब, मैथिली लेखन-जगतक विडंबनापूर्ण परिस्थिति थिक, जे व्यथित करैत अछि! यद्यपि, आ.लेखक नरेन्द्र झा, अनेक बेर 'मिथिला' शब्दक पर्यायवाची बना क' 'मिथिलांचल' सन विखंडनवादी शब्दक प्रयोग केलनि अछि, जे आलोच्य अछि आ हुनका सँ अपेक्षित नहि अछि। तखन अइ सँ कोसिकांचल, कमलांचल, सीमांचल, आदि मिथिलाक भूगोलक विखंडनवादी शब्द-समूह के, अनुचित औचित्य आ अनुचित प्रश्रय भेट' लगैत छै। से नहि हेबाक चाही। तहिना, अनेक आलेख कनेक 'विस्तार'क मांग करैत छल, आ 'संक्षिप्त' रहि गेल! मुदा आजुक परिस्थिति मे, जखन कि हुनका सँ लेखनक अपेक्षा, आब नहि कयल जा सकैछ, हुनका द्वारा कृत-कार्य आ हुनकर कृतिक सम्यक् मूल्यांकने, हुनकर लेखनक प्रति, कृतज्ञता-ज्ञापन भ' सकैछ! एतेक मूल्यवान अर्थक्षेत्रीय लेखक, मैथिली संसार सँ, 'ततबा न्यूनतम अपेक्षा', त' राखिए सकैत छथि! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१४.मधुकांत झा- नरेन्द्र झा लिखित मिथिलाक आर्थिक संरचनापर प्रकाशित पुस्तक-एक ऐतिहासिक दस्तावेज मधुकांत झा (संपर्क-9934916785) नरेन्द्र झा लिखित मिथिलाक आर्थिक संरचनापर प्रकाशित पुस्तक-एक ऐतिहासिक दस्तावेज नरेन्द्र झा, एक प्रसिद्ध चार्टर्ड एकौन्टेन्ट जे पटनामे लगभग 50 वर्षसँ अपन चार्टर्ड एकौन्टेन्ट्स फर्म केर सर्वेसर्वा छथि। श्री झा अपन विद्यार्थी जीवनसँ मैथिली भाषा आ मिथिला राज्य अभियानी डा. लक्ष्मण झा, बाबूसाहेब चौधरी, प्रबोध नारायण सिंह एवं उदय नारायण सिंह नचिकेता आदि के संपर्कमे रहल छथि। श्री झा मिथिलाक आर्थिक दशा, दिशा आ दुर्दशा पर अनेक पुस्तक मैथिलीमे लिखलनि। हिनकर मिथिलाक प्रति रुचि, प्रेम, आ आकर्षण अनुकरणीय अछि। श्री झा के निम्नलिखित पुस्तक मुख्यतः प्रसिद्ध अछि- क) मिथिलाक आर्थिक विकास ख) मिथिलामे जल संसाधन ओ प्रबंधन ग) विकास ओ अर्थतंत्र घ) अर्थतंत्र ओ भ्रष्टाचार च) मिथिला राइजिंग (अंग्रेजीमे) नरेन्द्र बाबूसँ पहिने मैथिलीमे आर्थिक स्थिति पर आन कियो लिखलनि से हमरा ज्ञात नहि। हँ, श्री एस के झा एवम् बी एन झा द्वारा एक पुस्तक अंग्रेवीमे "दि इकोनॉमिक हेरिटेज औफ मिथिला" जरूर प्रकाशित अछि। एकर पश्चात मैथिलीमे मधुकान्त झा लिखित "आर्थिक तंत्र आ राजनीति" प्रकाशित भेल अछि। स्पष्ट अछि जे अपन विशिष्ट योग्यता तथा अनुभव के अनुसार नरेन्द्र बाबू मिथिलाक भूमि, जल, सडक, सिंचाई परियोजना, विद्युत परियोजना, कल कारखाना के हालात के विस्तृत विवरणी अपन पुस्तकमे प्रस्तुत कयलनि अछि जे मिथिलाकें एक राज्य के रूपमे प्रतिष्ठापित करैछ। पुस्तकमे मिथिलाक आर्थिक स्थिति सूक्ष्मसँ सूक्ष्मतम आँकड़ा प्रस्तुत कs मैथिल के आँखिपरसँ झोल हटेबामे सफल भेलाह अछि। मिथिला दरिद्र नहि छल ओकरा षड्यंत्रपूर्वक भिखारि बनाओल गेल अछि से प्रमाणित होइछ। नरेन्द्र बाबूक सत्प्रयासक जतेक सराहना कयल जाय, कम हैत। हुनकर देल विषयवार आँकड़ा तकर प्रमाण अछि। ई डाटा भविष्यमे मिथिलाक उत्थान लेल कोनो अभियानक पथप्रदर्शक बनत। लेकिन हिनकर प्रस्तुत पोथी सभकें पढलासँ जे एक बात हमरा मोनमे खटकैत अछि ओ अछि जे नरेंद्र बाबू मिथिलामे, जे छल वा अछि, तकर आँकड़ा संकलनमे जतेक ध्यान देलनि ओतेक ध्यान मिथिलाक वर्तमान समस्या, चुनौती आ समाधान पर नहि दs सकलाह। ई हिनकर प्रयासकें छुछून करैत छनि। प्रथमतः दरभंगा महाराजा जमींदारी के विफलता अछि जाहि पर लेखक मुखर नहि भेलाह। मिथिलाक आर्थिक समस्या के मूलमे शासक दरभंगा महाराजक जमींदारी रहल अछि। एहि शासन के गुण-दोष पर नजरि नहि देब तँ सभ निष्कर्ष निरर्थक हैत। महाराजा 1962 के युद्धक समय सरकार के 13 मन सोना दान देलनि। कलकत्ता, पटना, काशी, प्रयागमे महल निर्माण कयलनि। ई धन मिथिलाक जनता के रक्त चुसल धन नहि छल? अकाल बाढि दुर्भिक्ष के समय लगान, मालगुजारी नहि देबाक कारणे किसानक जमीन नीलाम कs देल गेल। अनाथ किसान परदेश पलायन करय लगलाह। मोरंग, बंगाल, कलकत्ता लोक प्राण रक्षा हेतु भगलाह। आश्चर्य ई जे कोनो मैथिली साहित्यकार राजक एहि जघन्य अपराध पर आइ धरि कल्ला नहि अलगौलनि। साहित्य जँ सत्तासँ नहि लड़त तँ ओ कहियो समृद्धशाली नहि बनि सकैछ। नरेन्द्र जी उक्त परिपाटी के बरकरार रखैत बुझाइत छथि। मिथिलाक वर्तमान गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता आ भयंकर पलायनक शिकार के समस्या पर गंभीरतासँ विचार नहि कयलनि। मिथिलामे दू तिहाई लोक भूमिहीनक नजदीक अछि। जमीन किछु सामंत के हाथमे अछि। भूमि सुधार नहि भेल। जनसंख्या अधिक, पीढी दर पीढीसँ विभाजित खेत अलाभकारी जोत भs गेल। कोनो सुधार नहिं भs रहल। मिथिलामे महाराष्ट्र गुजरात सदृश कोऑपरेटिव संस्था नहि जे खेती के आधुनिक बना सकय। मिथिलामे कुसियार, पटुवा के खेती के कोनो प्रोत्साहन नहि। माछ, आम, जामुन, लताम, लीची, मखान के वाणिज्यिक स्तरपर उत्पादन, प्रसंस्करण उद्योग के लेल जमीन, पूँजी, संयंत्र आ तकनीकी मानव बल के अभाव मिथिलाक विकास के लकवाग्रस्त कs रखने अछि जाहि पर विद्वान नरेन्द्र झा जी उचित ध्यान नहि देलनि से प्रतीत होइछ। निष्कर्षतः ई कहल जा सकैछ जे हिनकर अधिकांश पुस्तक मात्र सरकारी, गैरसरकारी स्रोतसँ प्राप्त आँकड़ा के दस्तावेज थिक जकरा आधार पर वर्तमान समस्या के निदान हेतु समुचित उपचार के खोज कयल जा सकैछ। हँ, मैथिली भाषामे आर्थिक पुस्तक लेखन, प्रकाशनमे नरेन्द्र बाबूक योगदान सराहनीय रहत। आशा अछि जे नरेन्द्र बाबूक अनुकरण करैत मिथिलाक विद्वान लोकनि आनो आनो विषयक पोथी लिखता तथा मैथिली भाषा के सत्तासँ संघर्ष के पथ प्रशस्त हैत। संपादकीय टिप्पणी- अही विशेषांकमे अशोक जीक आलेखसँ स्पष्ट होइत अछि जे नरेन्द्र झासँ पहिनेहो मैथिलीमे आर्थिक लेखन छल। ओना एहि विषयपर आरो शोध केर आवश्यकता अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१५.शैलेन्द्र मिश्र- श्री नरेन्द्र झा : मिथिलाक अर्थतंत्रक जानकारी रखनिहार एकटा विशेषज्ञ अर्थशास्त्री शैलेन्द्र मिश्र-संपर्क-7600744801 श्री नरेन्द्र झा : मिथिलाक अर्थतंत्रक जानकारी रखनिहार एकटा विशेषज्ञ अर्थशास्त्री मिथिला भूमिक जानकार लेखकक जखन कखनो बात कएल जेतै तखन श्री नरेन्द्र झाक नाम बहुत प्रमुखता सँ लेल जायत। हिनकर दृष्टि-संपन्नता हिनका द्वारा लिखित पोथी सभ मे स्पष्टताक संग भेटि जायत। कोनो भाषाक समृद्धताक मानदंड ईहो होइ छै जे साहित्य सँ इतर ओइ भाषा मे ज्ञान-विज्ञान आ विभिन्न सम -सामयिक विषय पर कतेक लिखल जा रहल छै। मैथिली मे बेसी गोटे साहित्ये लेखन कऽ रहलाह अछि। ताहि दृष्टिकोण सँ श्री नरेंद्र झा एकटा विशिष्ट लेखक छैथ जिनकर मैथिली आ अङ्ग्रेज़ी मे लिखल पोथी सभ मिथिलाक समग्र चिंतन प्रस्तुत करैत अछि। हिनकर अपन गप निधोख भऽ आ सोझ भाषा मे प्रस्तुत करबाक शैली पाठक के एकदम आकृष्ट करैत छै आ बान्हि कऽ रखैत अछि। हिनकर वितान बहुत नमहर छैन्ह आ विशिष्टता एतेक जे मिथिलाक सम्बंध मे नदी-नाला सँ लऽ कऽ कृषि योग्य भूमि, जंगल आ वर्तमान समस्याक पूर्ण अध्ययन छैन्ह। कोनो बात के खाली मनगढ़ंत ढंग सँ नै कहैत छैथ, ओकर तर्कपूर्ण विश्लेषण आ आँकड़ा प्रस्तुत करैत छैथ जे हिनकर लेखन के विश्वसनीय आ गंभीर बनबैत अछि। हिनका लग मिथिला, बिहार, देश आ दुनियाँ मे चलि रहल राजनीति के जानकारी छनि लेकिन हिनकर लेखनक केंद्र मे मिथिला अछि। हम ई वर्तमान आलेख श्री नरेंद्र झाक दू गोट किताबक अध्ययनक आधार पर लिख रहल छी जकर शीर्षक 'Mithila Rising' (अँग्रेजी भाषा मे) ओ 'अर्थतंत्र ओ भ्रष्टाचार' अछि। जाहि आधार पर निधोख भऽ कहल जा सकैत छै जे हिनकर दृष्टि-संपन्नता एतेक छैन्ह जे कोनो विषय हिनकर अनुभवी आँखि सँ नै नुकायल रहि सकैत अछि। ओना तँ हिनकर चिंतन मे समग्र भारते अछि मुदा मिथिलाक वर्तमान समस्या आ ओकर निदान की हेबाक चाही ताहि लेल मुखर भ' लिखैत रहलाह अछि। एकटा आलेख 'Statehood For Mithila' मे लिखैत छैथ जे 'Separation of Mithila from the heterogeneous and unwieldy State of Bihar and its constitution into a state under the Indian Union is the only solution to its pressing problem of food, health, housing, education and communication. Only then the people there can take up promptly the work of river-taming and improve their agriculture.' (Mithila Rising, pp-161) (मिथिलाके बिहार जकाँ विषम ओ बोझिल राज्य से पृथक क' भारत देशक अंतर्गत एकटा अलग राज्यक रूप मे गठित केनाइ टा भोजन, स्वास्थ्य, आवास, शिक्षा आ संचार जेहन मिथिलाक ज्वलंत समस्याक एकमात्र समाधान अछि। तखने एतुका लोकके नदी सभ केँ नियंत्रित करै के काज तेजी से शुरू भ सकैत छै आ अपन खेत-पथार केँ उपजाउ बनाएल जा सकैत अछि।) सच कही त' मिथिलाक उपेक्षाक आ पिछड़ल रहबाक असली कारण त इएह रहल अछि जे मगध के शासक गण जानि-बुझि मिथिला के आगु नै बढ़' देब चाहैत अछि। सभ दिन विकासक धारा ओहि पार तक सीमित रहल। आर्थिक रुप सँ दबा के रखबाक कारण एक्केटा डर छै जे यदि मिथिला क्षेत्र सशक्त भऽ जायत त सत्ताक पाँजसँ निकलि के एकटा पृथक राज्यक निर्माण कऽ लेत। मिथिलाक हिस्साक सबटा संसाधन केँ दोसर तरफ मोड़ि देल जाइ छै। मैथिली भाषा के सेहो राज्य भाषा के दर्ज़ा नै देनाइ के पाछु सेहो वएह डर छै। श्री नरेंद्र झा अग्रसोची सेहो छैथ कारण जे आइ से करीब 12 वर्ष पूर्वहि मे लोकपाल आंदोलन के भविष्य देखि लेने रहैथ जे ऊपर सँ जे हुए, सभ राजनीतिक दलक मूल स्वभाव एक्कहि छै। तें एतेक समय बीत गेल मुदा एखन तक लोकपाल कानून नै बनि सकल अछि। "भ्रष्टाचारक विरुद्ध लोकपाल नहि धोखापाल" लेख मे राजनीति दलक पोल-खोल कय तत्कालीन सरकारक पोल-खोल केने छैथ -" भारतक राजधानी दिल्लीमे अर्थशास्त्री देशक मुखियाक आँखिक सामने भ्रष्टाचारक गंगोत्री बहैत रहल आ मुखिया स्वयं क्रियाहीन। देशक महारानी आ युवराज दर्शक, किंकर्तव्य, विमुख, अकर्मण्य। देशक नागरिक उम्मीद हारि चुकल छलाह आ वैराग्यक शरण लेबाक कगार पर छलाह। जखन 2011 मे थोक भाव मे माननीय लोकनिक इज्जति माटि मे मीलि रहल छलनि। .............. महाराष्ट्रक एक छोट गाम रालेगण सिद्धिक एक गांधीवादी अनशन कयल, बेलगाम सत्ताधारी के ललकारलनि, जेल गेलाह, मध्य वर्गकें ओकर आरामदायक जड़ता सँ जगायल, युवा ओ आदर्शवादी कें राजनीतिक गली सँ सड़क पर उतारल तथा भ्रष्ट दिल्लीक सत्ताक बुनियाद हिला देलनि जे सत्ताधारी लगातार शर्मसार होइत छलाह, अपना नाँगटपन कें झाँपय मे लागल रहलाह तखनि रालेगणक 74 वर्षीय योद्धा साहस ओ आक्रमकता सँ नव इतिहास रचलनि। "(अर्थतंत्र ओ भ्रष्टाचार, पृष्ठ संख्या -173) हिनका मिथिलाक अर्थतंत्रक विराट जानकारी छैन्ह कियाक तऽ जिलावार उद्योग-धंधा से ल' कऽ ओकर मजगूत पक्ष ओकर कमजोर पक्ष आ केना कऽ सर्वांगीण विकास हुए जे मिथिला पुनः अपन गौरवशाली इतिहास के दोहरायत। एकटा अन्य लेख 'सरकारी जोड़-तोड़ मे घूरियाइत मिथिलाक विकास' मे नरेन्द्र झा मिथिलाक आर्थिक विकासक बाधा के बारे मे महत्वपूर्ण आँकड़ाक माध्यमसँ महत्वपूर्ण जानकारी प्रस्तुत करै छैथ। मिथिला जे मूल रूपसँ कृषि आधारित अर्थतंत्र रहल मुदा कृषकक हाल सब दिन खराबे रहल। ओ लिखैत छैथ- " मिथिलाक 65 प्रतिशत जनसंख्या कृषि पर आश्रित अछि। एतय अर्थव्यवस्था मे कृषि क्षेत्रक सबसँ पैघ योगदान। मुदा एहि सँ जुड़ल कृषक सबसँ बेसी फटेहाल। पछिला किछु वर्ष मे दिनानुदिन काश्तकारक पैघ भाग कृषक मजदूर मे बदलि गेलाह। ग्रामीण क्षेत्र मे सबसँ अधिक सीमांत ओ उप सीमांत किसान बदलि गेलाह। ग्रामीण क्षेत्र पूर्णतः कंगाल भ' गेल छै। अलाभकर कृषि कारणें छोट-छोट काश्तकार जमीन बेचि क' ग्रामीण क्षेत्र सँ रोजगारक हेतु पलायन अथवा अपना घरक जनी-जाति पर खेतीक काज छोड़ि दोसर राज्य मे नोकरीक तलाश मे चल गेल छथि। स्थिति गंभीर आ भयानक।" (अर्थतंत्र ओ भ्रष्टाचार, पृष्ठ संख्या -19) मिथिला मे नदी संगम सँ समृद्धि तक विषयक आलेख मे मिथिला या कही तऽ संपूर्ण बिहारक समस्या जाहि मे किछु क्षेत्र बाढि से तबाह रहैत अछि तऽ किछु क्षेत्र सुखाड़़ से। नदी परियोजना के अंतर्गत नदी सभके आपस मे जोड़ि कऽ एवं उचित प्रबंधन सँ एक संगे दुनु समस्याक निदान संभव छै। हिनकर आलेख "मिथिलामे नदी संगमसँ समृद्धि तक" मे लिखैत छथि जे "बाढि आ सुखाड़ सँ बिहार मरि रहल अछि। मिथिलामे 76 प्रतिशत खेती योग्य भूमि बाढि सँ प्रभावित छैक। शेष बिहार मे 68 प्रतिशत जमीन बाढ़ि आ सुखाड़ सँ यथासाध्य मुक्ति भेटय। हिमालयीय नदी सबकें जोड़बाक 10 लिंक परियोजना अछि जाहिमे पाँचटा मिथिला से संबंधित छैक।" (अर्थतंत्र ओ भ्रष्टाचार , पृष्ठ संख्या -34) अंत मे इएह कहल जा सकैत अछि जे श्री नरेन्द्र झा एकटा एहन व्यक्ति आ लेखक छैथ जिनका मिथिलाक विशिष्ट जानकार आ अर्थतंत्रक ओ राजनीतिक विरल अनुभव छैन्ह। हिनकर पोथी सभ मे मिथिला क्षेत्रक समस्या आ ओकर समाधान देल गेल छै जाहि पर यदि शासन-तंत्र अमल करै तऽ बहुत जल्दी ई क्षेत्र सम्पन्न भऽ जायत। ई मैथिली भाषाक साहित्येत्तर विधाक एकटा स्थापित लेखक छैथ। हम अपन ई आलेख श्री नरेन्द्र झा जीक मिथिला-मैथिलीक प्रति विशेष उद्गारक लेल समर्पित करैत छियैन्ह। संदर्भ ग्रंथ:- 1. Jha, Narendra. Mithila Rising,Sasta Sahitya Mandal,New Delhi,2014 2. झा, नरेंद्र. अर्थतंत्र ओ भ्रष्टाचार, अपर्णा प्रकाशन,पटना, 2012 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१६.डॉ कैलाश कुमार मिश्र- अर्थतंत्र ओ भ्रष्टाचार: नरेन्द्र झा केर पोथी सँ विषय वस्तु आ व्यक्ति केर व्यक्तित्व पर चिंतन डॉ कैलाश कुमार मिश्र अर्थतंत्र ओ भ्रष्टाचार: नरेन्द्र झा केर पोथी सँ विषय वस्तु आ व्यक्ति केर व्यक्तित्व पर चिंतन
श्री नरेन्द्र झा केर एक पोथी हस्तगत भेल अछि: "अर्थतंत्र ओ भ्रष्टाचार"। हिनका सँ परिचय हमर अतबे अछि जे 2018 केर मैथिली लिटरेचर फेस्टिवल केर समय हमरा हिनका सँ किछु क्षण हेतु भेट भेल अछि। भेट मे कोनो साहित्य अथवा हिनक विषय पर चर्च नहि भेल अछि । खैर! अपन विधा केर अनुकूल हम हिनका बारे मे किछु साहित्यकार लोकनि सँ चर्चा कएल। हिनका पर किछु पढ़ल। उपरोक्त पोथी पढ़ल आ हिनका सँ प्रभावित होइत हिनका पर एक लघु निबंध लिखबाक निर्णय लेल। ई लेख तकरे प्रमाण थिक। हिनका हम अपना हिसाबे आ एक प्रवासी मैथिल केर हिसाबे बुझबाक यत्न कएल अछि। आशा करैत छी पाठक लोकनि के हमर प्रयास नीक लगतनि। साहित्य लिखला सँ भाषा मे लालित्य अबैत छैक, ओकर सौन्दर्य देखार होइत छैक, नाट्य, गायन, कल्पना, धर्म, कर्तव्य, पौरुष, देशभक्ति, प्रेमक अभिव्यक्ति बढैत छैक। मुदा कोनो भाषा आ संस्कृति अथवा भाषा केर वांग्मय अग्गब साहित्य सँ संभव नहि छैक। मराठी, बांग्ला, आ तमिल केर विकास मे एक बात जे सर्वविदित छैक से छैक ओहि भाषा सब मे गणित, विज्ञान, इतिहास, पुरातत्व, मीमांसा, दर्शन, राजनीती, कला, आदि पर प्रचुर मात्रा मे उपलब्ध लिखित प्रमाणिक दस्तावेज जे पोथी, शोध ग्रन्थ, पाण्डुलिपि, जर्नल आदिक रूप मे उपलब्ध छैक। वकाटक राजवंश केर द्वारा एलोरा मे एक पाथर सँ निर्मित दुमंजिला कैलाशनाथ मंदिर (गुफा)। ई अपन स्थापत्यकला, मूर्तिकला आदि लेल विश्व विख्यात अछि। एहि विषय पर महाराष्ट्र राज्य केर पुरातत्व विभाग केर निर्देशक सँ हम विस्तृत चर्च करैत रही। ओ हमर चैनल फोकब्रेन पर एक विस्तृत ऑनलाइन लेक्चर देने छलाह। जखन हुनका सँ मंदिर केर स्थापत्य, इतिहास, विशेषता आदिक सम्बन्ध मे हम सन्दर्भ केर बात कएल तँ ओ कहलनि जे अधिक प्रमाणिक सन्दर्भ मराठी भाषा मे उपलब्ध अछि। शांति निकेतन यात्रा केर क्रम मे पता चलल जे अर्थशास्त्र मे नोबेल पुरुस्कार विजेता देशरत्न प्रोफेसर अमर्त्य सेन अर्थशास्त्र केर गंभीर विषय पर एक पोथी बंगाली भाषा मे लिखने छथि। संयोग देखू जे हिनक पोथी अपन विषय केर मूल, प्रमाणिक आ बेजोड़ कृति मानल जाइत अछि। बाद मे कोनो गंभीर शोधकर्मी एहि पोथी के बंगला सँ अंग्रेजी मे अनुवाद केलनि। उदाहारण अनेक अछि आ तकर उदेश्य मात्र अतबे जे भाषा मे साहित्य केर अतिरिक्त आन विषय केर महत्त्व बुझि सकी। मगही भाषा केर लेखन पक्ष जेना-जेना विलुप्त भेल गेल तहिना-तहिना आयुर्वेद केर अनेक सूत्र ख़त्म भेल गेल। खैर! ई अलग विषय अछि एकरा पर अतए चर्च करब जरुरी नहि। आइ-काल्हि देख रहल छी जे मैथिल, विशेष रूप सँ प्रवासी मैथिल सब मैथिली साहित्य लेखन मे आगाँ आबि रहल छथि। निश्चित रूप सँ ई उत्साहक विषय अछि मुदा एहि मे एक समस्या अछि। मैथिली भाषा केर आँगन मे एकरंगी फूल फुला रहल अछि। इंजीनियर, प्रबंध विषय केर जानकार, डॉक्टर, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, राजनीति, पारिस्थितिकी, मानवाधिकार, जेंडर, दलित, पत्रकारिता, नगर निर्माण, आदि के विषय सँ सम्बंधित अधिकांश लोक साहित्य लिख रहल छथि। यद्यपि किछु लोक आनो विषय पर लिख रहल छथि मुदा एहेन लेखक आ लेखनी बहुत कम अभरैत अछि। हमरा लगैत अछि जे इंजीनियर मिथिला केर भूमि मे अभियांत्रिकी केर सम्भावना पर लिखथि, चिकित्सक स्वास्थ्य पर लिखथि, कला समीक्षक कला पर; कियोक जल प्रंबंधन पर लिखथि, राजनीती, पर गंभीर लेखन होबाक चाही। झारखण्ड आन्दोलन केर समय झारखण्ड केर तमाम दिग्गज झारखण्ड राज्य केर आवश्यकता कियैक छैक ताहि विषय पर अनेक भाषा मे लिखैत छलाह। तहिना मिथिला के लोक के केना क्षेत्रीय दुर्भाव केर कारण मिथिला विकास केर गति मे बाधित भऽ रहल अछि ताहि पर लिखथि आ प्रमाणिकता एवं सन्दर्भपरक लेख, पोथी लिखथि। पोथी अथवा लेख अतेक आवश्यक हो जकर चहुँ दिस चर्च हो, लोक बूझए, सरकार आ निति निर्धारक लोकनि तक बात पहुँचय। से कखन हएत? तखन जखन ओहि विषय केर सम्बंधित लोक ओहि पर गंभीरता सँ लिखता। एक बेर साहित्य अकादमी केर एक कार्यक्रम केर ऑनलाइन प्रसारण देखैत रही। विषय रहैक "मैथिली मे पर्यावरण पर कुन तरहक काज भेल छैक?" वक्ता ओहि विषय पर उपलब्ध तमाम गूगल डाटा सँ बाजि रहल छलाह। सब किछु छल मुदा मैथिली मे लिखल पोथी, लेख आदिक चर्च नहि छल। संचालक सेहो शायद एहि बात पर गंभीर नहि रहथि! तखन एकर इएह समाधान अछि। हमरा स्मरण अबैत अछि भोगेन्द्र झा सदैव कमला आ कोसी केर जल प्रबंधन केर बात करैत छलाह, जल प्रबंधन मे कोना भारत केर मिथिला आ नेपाल केर मिथिला केर भाग्योदय भऽ सकैत अछि तकर बात करैत छलाह। मुदा हुनका स्थानीय नीतिकारक, जानकार लोकनि, अभियंता, वैज्ञानिक, पर्यावरण केर ज्ञाता, आदि केर सहयोग यथेष्ठ नहि भेटैत छलनि। ईहो एक सत्य बात छैक जे अपन अनेक योजना मे भोगेन्द्र जी पढ़ल-लिखल समुदाय केर सहयोग सँ भावहु-भैंसुर केर सम्बन्ध रखैत छलाह आ सब काज यूनियन मोड पर करैत छलाह जकर साक्षात् उदाहरण अखिल भारतीय मिथिला संघ केर वर्तमान स्वरुप अछि ! खैर! एहि विषय सब पर कहियो गंभीरता सँ निर्भीक लेखनी सँ लिखल जा सकैत अछि। एखन बात कऽ रहल छी श्री नरेन्द्र झा केर लेखनी, हुनक व्यक्तित्व आ हुनक एक पोथी केर मादे हुनक मैथिली वांग्मय मे योगदान पर। नरेंद्र जी शिक्षा सँ चार्टर्ड अकाउंटेंट छथि। अर्थशास्त्र आ राजनीती के बुझैत छथि। मैथिली साहित्य के कुनो साहित्यकार सँ अधिक पढैत छथि। साहित्य, संस्कृति, संस्कृत सँ जन्महि सँ जुड़ल छथि। साहित्य केर विन्यास सँ लऽ कऽ ओकर राजनीति तक केर गति, मति, सुगति, दुरगति सब किछु बुझैत छथि। साहित्य-संस्था लेल काज करैत छथि। साहित्यकार लोकनि संग तारतम्य बनबैत रहैत छथि। ई भेल हुनक स्वभाव आ मैथिली साहित्य सँ लगाव। जखन लिखबाक बात होइत अछि तखन ई राजनीति आ मिथिला ओहि मे कोना कात कऽ देल जैत अछि, पानि केर समस्या, नदी मे बाँध बनेबाक औचित्य, विकास आर्थिक विकास आ भ्रष्टाचार, स्थानीय नदी केर स्वरुप आ तदनुकूल वैज्ञानिक आ तथ्यपरक चिंतन संग सुझाव आदि पर मैथिली भाषा मे लिखैत छथि। चुनाव, चुनाव केर धांधली आ ओहि मे मिथिला केर योगदान आ अवस्था पर लिखैत छथि, केना मगध आ आन ठामक लोक, अधिकारी, मुख्यमंत्री, नेता, नियंता लोकनि जोड़-तोड़क माध्यम सँ मिथिला के विकास केर डेग मे पैर खीच लेत छथि, ताहि पर लिखैत छथि। मिथिलाक माटिक आ अगल बगल केर नदीक संगम भेला सँ मिथिला आ अतय केर लोक कोना समृद्ध जीवन जीबि सकैत छथि, ताहि पर लिखैत छथि। हिनक सोचब छनि जे बाढि आ मिथिला भूमि एक दोसरक पूरक अछि। एक केर बिना दोसर केर अस्तित्व नहि। तँइ अदौ सँ मिथिलाक जीवन, संस्कृति, व्यापार, कृषि कर्म आदि ताहि अनुकूले चलि रहल छल। एहि पर स्थानीय ज्ञान केर बिना सोचब आ निर्णय लेब सतत घातक रहल अछि। स्थानीय ज्ञान, जैव परंपरा, प्रकृति संस्कृति संवाद सँ निर्णय लेब हितकर रहत। ई सोचब छनि नरेंद्र जी केर। राहत केर नाम पर कोना धांधली होइत अछि। कोसी कोना कहर उतपन्न करैत अछि। ताहि पर हिनक चिंता एकक नहि अपितु लोकक अथवा जनमानस केर चिंता लगैत अछि। माओवादी नेता, आन्दोलन आदि कोना मिथिला केर सौहार्द आ सामाजिक समरसता आ शांति के सत्यानाश कऽ रहल अछि ताहि पर हिनक आलेख गंभीर चेतावनी दऽ रहल अछि। नरेंद्र जी मिथिला मे विद्युत् समस्या, असफल भूमि सुधार, रौदी-दाही केर समस्या, नीतिश कुमार केर शासनकाल कोना मिथिला क्षेत्रक हानि कऽ रहल अछि आदि विषय पर जनमानस केर मनोभाव केर प्रतिनिधि स्वर दऽ रहल छथि। एहन प्रतिनिधि जे प्रत्यक्षदर्शी थिकाह। ज्ञानी छथि। शिक्षा आ बाहरी परिवेश केर सोच आ डेग सँ परिचित छथि। एहन प्रतिनिधि जिनका लेल मिथिला केर सर्वोन्नत विकास मिशन स्टेटमेंट छनि। ई हिनक पोथी केर USP छनि। ई बात सब, बिंदु सब, विषय सब, सोच सब हमरा सन समान्य पाठक केर ध्यान अपना दिस खीचैत अछि। हिनक लेखनी केर धार, हिनक सोचक सार अगर बुझक हो तँ एहि पोथी मे सम्मिलित आलेख सबहक नामकरण पढ़ने जाउ आ हमर बात स्पष्ट भेल जायत। आलेख सबहक नाम एक पाठक के एहि पुस्तक केर लेखक केर सोच, चिंता, ज्ञान, गरिमा, मैथिली, मैथिल आ मिथिला प्रेम सँ परिचित करबैत जायत आ पाठक अगर गंभीर छथि तँ हिनक पोथी पढ़बा लेल अवश्य आगू बढताह। आब कने लेख सबहक नामकरण देखल जाय: लोकतंत्रक महापर्व आ मिथिला; सरकारी जोड़-तोड़ मे घुरियाइत मिथिला विकास; कोसी कहर ओ बाढि राहत; मिथिला मे नदी संगम सँ समृद्धि तक; मिथिला मे बाढि अबैत रहत; मिथिला मे बाढिक व्यथा कथा; मिथिलांचल मे विद्युत संकट; मिथिला मे असफल भूमि सुधार; माओवादीक प्रभाव क्षेत्र मे मिथिला; आशा मे जीवित मिथिला; अनवृष्टिक चपेट मे मिथिला; खाद्य असुरक्षा एवं हरित क्रांति; रौदी-दाही सँ तबाह मिथिला आब अर्थव्यवस्था सँ सम्बंधित आलेख सब देखल जाय: मूल्य वृद्धि सँ पीड़ित जनमानस; वैश्विक मन्दी, मूल्यवृद्धि आ हम सब; भ्रष्टाचार एवं कारीधन; महगी कम नहि होयत; दिवालिया लाल दुर्ग मे ममता; भ्रष्टाचार आ कारीधन प्रगतिक बाधक; नीतिशक शासन मे खोटे खोट; दिखावटी सुरक्षक विफलता; वैश्वीकरण सँ जनमानसक अधोगति; गरीबी केर मापदंड मे गड़बड़ी; आरटीआईक बेचैनी; महगी आ भ्रष्टाचार बाजारवादक देन; तृणमूल कांग्रेसक रेल बजट; महगी ओ विकासक चुनौती मे झुलैत वित्तमंत्री केर बजट; बिहार शताब्दी वर्ष- पोल-खोल; आर्थिक उदारीकरणक दुष्परिणाम; भंवर मे मनमोहनक अर्थनीति; लोकपाल नहि धोखापाल । पोथी मे यद्यपि जेना होइत छैक, लेखक के दल विशेष सँ अनुराग आ द्वेष भाव एक संग देखार भऽ रहल छनि तथापि अपन बातक आ कथ्यक पुष्टि लेल प्रमाण बेर-बेर लबैत छथि। कतहुँ हिनक मिथिला प्रेम तँ कतहुँ पॉलिटिकली करेक्ट बात सब उभरैत रहैत अछि। विषय सब यद्यपि बहुत प्रमाणिक आ मिथिला केर सन्दर्भ मे औचित्य रखैत अछि। भारत केर गणतांत्रिक आ प्रजातान्त्रिक स्वरुपक खोज वैदिक काल आ बुद्धकाल सँ करैत नरेन्द्र जी लिखैत छथि: "विश्वक सबस पैघ जनतंत्र भारत चुनावी महासमर मे छल। 70 करोड़ मतदाता 545 सदस्यता वाला लोक सभा चुनावक तैयारी मे छलाह। भारत ऋग्वैदिक काल सँ जनतांत्रिक अछि। वैदिक काल मे सभा समिति छल तथा बुद्धकाल मे गणतंत्र छल।" कहबाक अर्थ जे पोथी प्रमाणिकता अनैत अछि। भ्रष्टाचार केर बात के प्रमाणित करबा लेल नरेन्द्र जी दी एक्नोमिस्ट पत्रिका सँ सन्दर्भ लैत लिखैत छथि जे डेमोक्रेसी केर सूचकांक पाँच मानक पर कएल जाइत अछि: 1. चुनाव प्रक्रिया 2. नागरिक अधिकार 3. शासनक कार्य कुशलता 4. राजनीतिक भागीदारी 5. राजनीतिक संस्कृति । बात के आगाँ बढबैत फेरो कहैत छथि जे उपरोक्त अध्ययन मे लोकतान्त्रिक देश के दू श्रेणी मे राखल गेल अछि: 1. अपूर्ण लोकतंत्र आ, 2. दोषपूर्ण लोकतंत्र। भारत केर लोकतंत्र के दोसर श्रेणी अर्थात दोषपूर्ण लोकतंत्र मे राखल गेल अछि। अतेक पुष्ट प्रमाण संग पोथी केर शुरुआत कएल गेल अछि जे अपना आप मे एकर विशिष्ट गुण भेलैक। अहि तरहक पोथी सँ मैथिली केर सम्मान बढैत अछि। हमरा लोकनि आजुक समय मे गहन चिंतन कऽ रहल छी जे लगभग सब प्रमुख भाषा मे साहित्य सँ इत्तर रचना सब आबि रहल अछि। मैथिली मे सेहो एबाक चाही। किछु लिखा रहल अछि मुदा ततबे सँ काज नहि चलत। राजनीति पर, जलनीति पर, जल संसाधन पर, चुनाव पर, लोकपाल पर, क्षेत्रीय विकास पर, संविधान पर, भूगोल पर, भाव भूगोल पर, बाँध पर, पुल पर, रोजगार पर, उद्यम पर, पलायन पर लिखब जरूरी अछि । केवल लिखला सँ नहि हएत ओहि विषय सब पर साहित्य अकादमी भारत सरकार, मैथिली भोजपुरी अकादमी दिल्ली (सरकार), मैथिली अकादमी बिहार (सरकार) विभिन्न स्थानीय आ प्रवासी मैथिली संस्था सब चर्चा परिचर्चा करबथि। गंभीर बनथि। अखिल भारतीय मिथिला संघ, मिथिला स्टूडेंट यूनियन, सखी बहिनपा संगठन आदि अहि तरहक पोथी, लेखक, विचारधारा केर लोक सब सँ तथ्य ग्रहण करथि। ताहि सँ हिनका लोकनि केर डेग ठोस हेतनि। ई सब भविष्यक योजना बना सकैत छथि। अकादमिक स्तर पर विश्विद्यालय आ शोध संस्थान केर लोक अपन विद्यार्थी के एहि तरहक विषय पर नूतन शोध लेल उत्साहित करथि। नीक प्रबंधन संस्थान केर शोधकर्मी, विद्यार्थी के सहजता सँ जोड़ल जा सकैत अछि। ताहि तरहक कार्यकर्म मे नरेन्द्र झा आ हुनक पोथी नेयों केर निर्माण कऽ सकैत अछि। सब सँ पैघ बात ई जे नरेन्द्र जीक सब पोथी जतबा हमरा जानकारी अछि ताहि हिसाबे विदेह केर पोर्टल पर बिना कुनो शुल्क के उपलब्ध छैक। कियो लऽ सकैत अछि, पढ़ि सकैत अछि। फेर पोथी दिस अबैत छी। पोथी मे स्थानीय अथवा क्षेत्रीय आँकड़ा अलग-अलग समय केर अलग-अलग विषय पर सारगर्भित ढंग सँ देल गेल छैक। सब डाटा संग ओकर प्रेजेंटेशन आ ओकर विवेचन मिथिला सम्मत छैक। ओहि आँकड़ा सब के फेरो देखल जा सकैत अछि। नव डाटा पूल बनाएल जा सकैत अछि। हिनक काज पर बहुत आगाँ केर नीति आ रणनीति तैयार कएल जा सकैत अछि। हिनका आ हिनका एहन आन लोक सबहक रचना केर पुनर्पाठ सँ हमरा लोकनि तार्किक मैथिल भऽ सकैत छी मिथिलावादी भऽ सकैत छी। एखन समय केर घनघोर दिक्कत अछि तँइ अतबे कहि सकैत छी जे नरेन्द्र झा पर विदेह केर ई काज जे हिनक केन्द्रित आलेख केर एक विस्तृत अंक छपत से अपने आप मे बहुत पैघ काज अछि। विदेह केर टीम विशेष रूप सँ गजेन्द्र ठाकुर आ आशीष अनचिन्हार धन्यवाद केर पात्र थिकाह मुदा विदेह के एक डेग आरो आगाँ एबाक चाही हिनक रचना केन्द्रित संगोष्ठी केर आयोजन हो आ ताहि पर किछु नीतिगत बात हो। कारण नरेन्द्र झा सन लोकक मिथिला के सही अर्थ मे मिथिला भूमि पर आ प्रवास मे दरकार छैक। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१७.आशीष अनचिन्हार- कुपोषित मैथिली भाषा-साहित्य लेल एकटा अनिवार्य पौष्टिक तत्व: नरेन्द्र झा आशीष अनचिन्हार-संपर्क-8876162759 कुपोषित मैथिली भाषा-साहित्य लेल एकटा अनिवार्य पौष्टिक तत्व: नरेन्द्र झा 1. बिहारक पटनामे ICAI - The Institute of Chartered Accountants of India केर ब्रांच हो ताहि लेल नरेन्द्र झाक विशेष योगदान अछि। पटनामे ब्रांच बनलाक बाद ओ एहि शाखा केर शीर्ष पदपर सेहो रहलाह अछि। 20 दिसंबर 2023 केँ विदेह नरेन्द्र झा जीक ऊपर विशेषांक प्रकाशित करबाक निर्णय लेलक आ 23 जनवरी 2024 केँ The Institute of Chartered Accountants of India दरभंगामे अपन ब्रांच खोलबाक निर्णय लेलक। एहि निर्णयकेँ एहि लिंकपर देखि सकैत छी- https://resource.cdn.icai.org/78807rba-040224-darbhanga.pdf विदेहक विशेषांक आ ICAI केर दरभंगा ब्रांच खुलाबक बीच कोनो संबंध नहियो हो तैयो ई दूनू एहन समयमे भेल अछि जाहिसँ नरेन्द्र झा जीक महत्व पता चलैत अछि। निश्चित तौरपर हमरा लोकनि नरेन्द्र झाजीक योगदानकेँ विदेहक एहि विशेषांकक माध्यमे रेखांकित कऽ रहल छी। 2. सामान्यतः कुपोषण माने शरीर लेल जे अनिवार्य तत्व भोजनक माध्यमे जे जाइ छै से कम भऽ जाएब छै, मुदा हम अपन अनुभवसँ कहब जे शरीरमे कोनो अनिवार्य तत्व केर अधिकता सेहो कुपोषण होइत छै। शरीरमे सभसँ बेसी भऽ जाए बला अनिवार्य तत्व चर्बी छै। भोजनक माध्यमे अहाँ जतेक चर्बी लेबै से सभ देहमे जमा भऽ जाइत छै आ अनेक कारणसँ कोनो लोकक पेट, कोनो लोकक जाँघ, कोनो लोकक हाथ वा कोनो लोकक पूरा देहमे चर्बी जमि जाइत छै। चर्बी जमनाइ केर प्रक्रिया ततेक कम होइत छै जे एकर असरि बहुत बादमे देखार होइत छै। आ जखन देखार होइत छै तखन पूरा देहकेँ बेडौल आ रोगग्रस्त बना दैत छै। एहन नै छै जे देहसँ चर्बी घटेनाइ संभव नहि मुदा चर्बी जमनाइ केर प्रक्रिया जतबे कम होइत छै चर्बी घटनाइ केर प्रक्रिया ताहूसँ बहुत बेसी कम होइत छै। ई मात्र हम चर्बी केर उदाहरण देलहुँ देह लेल जे-जे अनिवार्य तत्व छै से जँ देहमे बेसी भऽ जाए तँ विभिन्न रोग भऽ जाइत छै। आ उपचारमे डाक्टरी दवाइ सहित ओहि बेसी भेल तत्वकेँ छोड़ि देबा लेल सेहो कहल जाइत छै। कोनो भाषा, कोनो साहित्य देहे जकाँ होइत छै। जँ अनिवार्य तत्व कम भेल तैयो कुपोषित आ जँ बेसी भऽ गेल तैयो विभिन्न रोग। जँ मैथिली साहित्यकेँ देखी तऽ वर्तमानमे कथा-कविता-संस्मरण ई तीनू विधाकेँ चर्बी मानू। ई तीनू विधा मैथिली साहित्यमे ततेक ने जमा भऽ गेल अछि जे मैथिलीक देह बेडौल भऽ गेल अछि, एकरामे विभिन्न रोग सभ आबि गेल छै। अही तीनू विधाक कारणे मैथिली साहित्यमे साहित्यिक राजनीति, मंचा-मंची, घिनमा-घिनौअलि होइत अछि। देहे जकाँ मैथिली साहित्यकेँ दवाइ तऽ चाहबे करी संगे-संग बेसी भेल कथा-कविता-संस्मरण विधाकेँ त्यागि देबऽ पड़त एक निश्चित अवधि धरि लेल। देहक लेल सभ अनिवार्य तत्व चाही, साहित्य लेल सभ विधा चाही, सभ विधाक सम्मान ओ चर्चा भेटबाक चाही। मैथिली साहित्यमे जे एक अनिवार्य तत्व बहुत दिनसँ छूटल अछि ओ तत्व ओ विधा अछि 'आर्थिक लेखन'। आ जँ मैथिलीमे 'आर्थिक लेखन' केर बात करी तऽ एहिमे जगजियार नरेन्द्र झा छथि। ई कहब तऽ उचित नहि जे नरेन्द्र झा मैथिलीक एकमात्र आर्थिक लेखक छथि तँइ, ई बात हम उचित मानैत छी जे नरेन्द्र झा ओहि विधामे लिखलाह जाहि विधामे पढ़लाह, जाहि विधासँ उपार्जन केलाह ताही विधामे ओ लिखबो केलाह। आ एहन लेखक मैथिलीमे कम्मे भेल छथि। नरेन्द्र झा आर्थिक लेखन खूब केलाह, जमि कऽ केलाह। जँ हुनक व्यक्तिगत बात कएल जाए तऽ प्रचुर मात्रामे आर्थिक लेखन केलाह मुदा जँ संपूर्ण मैथिलीक हिसाबें देखल जाए तऽ ई समस्त आर्थिक लेखन बहुतोसँ बहुत बेसी कम अछि, तँइ मैथिलीमे आर्थिक लेखन केर ने लीक बनि पेलै आ ने भविष्य। तऽ की नरेन्द्र झा एहि लेल दोषी छथि? नरेन्द्र झा नै, हम सभ दोषी छी एहि कुपोषण लेल। हमरा लोकनि गला फाड़ि कऽ चिचियाइत छी जे मैथिलीमे साहित्येतर लेखन नै भऽ रहल अछि मुदा जखन कियो साहित्येतर लेखनमे अबैत छथि तऽ हुनकर बहिष्कार हमहीं सभ करैत छी। हुनकर हिस्साक मंच-माला-माइक-सम्मान-पुरस्कार कथा-कविता-संस्मरण बला सभ हड़पि लैत अछि। जेना मोट-सोट लोक खूब खाइत अछि, ठूसि-ठूसि कऽ खाइत अछि। चर्बी युक्त आहार लैत अछि तहिना मैथिली साहित्य विभिन्न रोगग्रस्त भेलाक बादो एहि साहित्यमे कथा-कविता-संस्मरण केर लेखन भऽ रहल अछि। IIT मे पढ़बैत कोनो प्रोफेसर जँ मैथिलीमे मनेजमेंट केर पोथी नै लीखै छथि, प्रशासनिक सेवामे रत लोक प्रशासनिक कार्यपर पोथी नै लीखै छथि, इतिहास केर प्रोफेसर मैथिलीमे अनुवाद केर पोथी छापै छथि मुदा इतिहास केर नै, अंग्रेजीक प्रोफेसर जँ मैथिली-अंग्रेजी रेपीडेक्स पोथी नै लीखि जँ व्यंग्य लीखै छथि तऽ ई सभ मैथिली संगे मजाक भेलै। हम मात्र किछु उदाहरण देल आनो लोक लेल हमर भावना एहने अछि। अपन मूल विधा छोड़ि कथा-कविता लीखब शार्ट-कट छै पुरस्कार लेल। ई शार्ट-कट विज्ञानसँ जुड़ल लोक सेहो करै छथि जखन कि ओ विज्ञानक पोथी नै लीखि विज्ञान कथा लीखै छथि। मैथिली साहित्यकेँ जा धरि दवाइ नै भेटल छै ता धरि ई उचित जे आवश्यकतासँ बेसी भेल विधापर रोक लागए आ जे विधा कम अछि ताहिमे लेखन करी। ओहिपर चर्चा करी आ ओहीपर मंच-माला अर्पित करी। नोट- जे लोक अपन देहक चर्बी कम करऽ चाहैत छथि से विदेहक संपादक गजेन्द्र ठाकुरक स्वानुभूत अनुभव विदेहक अंक 354 मे पढ़ि सकै छथि जे गजेन्द्र ठाकुर अपन ओजन कम कोना केलाह आ पाठक एहिसँ लाभ उठा सकै छथि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। 200 || विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in विदेह ३९५ म अंक ०१ जून २०२४ (वर्ष १७ मास १९८ अंक ३९५) नरेन्द्र झा विशेषांक|| 199
Tue Instrrure or CHarteRED ACCOUNTANTS OF INDIA (Set up by an Act of Parliament) (70 BE PUBLISHED IN PART III SECTION 4 OF GAZETTE OF INDIA) NOTIFICATION (Chartered Accountants) No. 4-CA (7)/226/2024 23" January 2024 In pursuance ofthe Reguation 259 (2) of the Chartered Accountants Regulation, 7986, the Counc ofthe Institute of Chartered Accountants of India is pleased to 00 the setting up of ranch of Cantal India Regional Coun in Darbhanga (Bhar) with effect from January 3, 2024. ‘The Branch shal be known as Darbhanga Branch of Cental India Regional Council and ts Headquarters shall be at Darbhanga (Bihar). The Jurisdiction of the Branch shall besides Darbnonga ey, ince the folowing ces/towne fling within a radius of 50 kms from the ty ims of Darbhanga: - 2. Darbhange Sadar 2. Bahedurpur 3 Keot मे Singhwara 5. dale 6 Manigachi 7, Tardin 8 bahen 9. Hayaghat 70, Hanuman Nagar मा Benipur 42: inagor 3 Brau 4 Ghanshyampur 45: Kusheshwar Asthan 46. Kusheshwar Asthan East 47, Kiratour 8: Gaure Bauram 49. Samastpur 20. Madhabant |As prescribed under sub-reguiation (3) of Regulation 59, the Branch shall function subject to the contol, supenion and directions of the Cound trough Cental nda Regional Counc and stl cary odie: may, forme tone हट sey te Covi. <x SO ‘ca(0r.) Jai Kumar Batra Secretary Poot ox. 70, New e000. ७०० Trl canal org | Wobete: tps cao
One" one SS es St कलकत्ता केर विद्वान सभ सहयोग करयि लें निश्चित rece BH 'स्िच्चिल्ला Prema परिष्' de क्काजसक उपर flees घकाश्शित crear Sew HTT fate अपन परिपाटीक उऊलुसार wie संस्थाक रुण-दोष-कसी-घ्रसंशा-जआालोचचना सपा Geer प्रकाशिल करल। संस्थाक जे सदस्य सभ एवं चिद्धान सभ oF एकर eproTeH डाटा er टाइप कपल Shar देखि लें ई एकटा लीक काय छेलै। fer हस सात weer कड eave सकी. खरा करवाकर भार सकललकत्लापर खेली टाइप कपल darcy निर्भरता रहलै। Lakshman Jha Sagar Vijay Kr tssar Ashok Jha Anjay Chaudhary भोसती ara Amar Nath Jha Nabo Narayan Mishra 43, <ftex eof, srererrr - 700 007
rs स्वाद: दा मदर. सट्टा era cee See em a ne eee ee ema a ee Soars sere eee Leen eee भट्ट पट paige pe hoi Sere enero roe eer cee दि कल सम — Se
<— @ चिदेडक परमेन्वर nas. बॉ Sen ancninner = fates etre ary, eee ser on toe fore Peter Seer Bel oy SRGnCION Wio/manabin ae zimneeran a etl hii Micra i ee लग Sores mace aoe 8 geese Sea re es ASO pci Stee kh Teer le SE Ree ee oe ee See ie oe ee eee ae ee Fee a ie. Cerna eae aaa cy Fee ere ee ee See een oon ay ere eee ee Sea Poe Roc rae ey OR SE SR Er RO ESS ON a ae Aa Ae ea ee ee Se ene na oe ee eee ia दायर m foe) जन = © ee) Vee CAS