ISBN 978-93-340-7795-7 (Book) ISSN 2229-547X(online) 𑒀 विदेह ३९६ म अंक १५जून२०२४ (वर्ष १७ मास १९८ अंक ३९६) [विदेह(since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004)www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह-प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक:गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। कॉपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रतिएवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादन अथवा संचारन-प्रसारणनै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००-२०२४. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html, http://www.geocities.com/ggajendraआदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.htmlकेर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२४. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000)ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. It is a platform for scholars, researchers, writers and poets to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, and poetry in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@gmail.com. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover designed by AUM GAJENDRA THAKUR Videha e-Journal: Issue No. 396 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- भाषाविद् रामावतार यादव विशेषांक १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय- वैय्याकरणाचार्य, शब्द प्रमाण (न्याय): ज्ञान आ तत्त्व मीमांसा: भाषाविद् रामावतार यादव(पृ. २-५१) २.१.प्रस्तुत विशेषांकक संदर्भमे(पृ. ५४-७३) २.२.रामावतार यादवजीक संक्षिप्त परिचय(पृ. ७४-८३) २.३.भीमनाथ झा- 'तहिया'केँ तहियाक' राखल- श्री रामावतार बाबू(पृ. ८४-९१) २.४.उदयनारायण सिंह 'नचिकेता'-रामावतार यादव जी-जेना हम हुनका चिन्हने छलियनि(पृ. ९२-१००) २.५.धीरेन्द्र झा 'मैथिल'-भाषा वैज्ञानिक प्रो. डा. रामावतार यादव(पृ. १०१-१०४) २.६.राम चैतन्य धीरज- भारोपीय भाषा परिवारवाद आ भाषा दर्शन(पृ. १०५-११८) २.७.डॉ. धनाकर ठाकुर- ध्वनिविज्ञानी प्रो. डा. रामावतार यादवक अनुसार वर्णरत्नाकरक भाषा मैथिली(पृ. ११९-१२४) २.८.अयोध्यानाथ चौधरी- मिथिला-मैथिलीक मूल स्तम्भ: प्रा. डा. रामावतार यादव(पृ. १२५-१३६) २.९.डॉ. शिव कुमार मिश्र- प्रोफेसर डा. रामावतार यादव ओ हुनक विलक्षण अनुसंधान तकनीक (मिथिला भारती शोध पत्रिकाक संदर्भमे)(पृ. १३७-१४४) २.१०.केदार कानन-विद्वानक सत्संग-कथा(पृ. १४५-१५२) २.११.संतोष कुमार मिश्र-ओ बाद कहिया आओत(पृ. १५३-१५५) २.१२.कवि राजीव झा 'एकान्त'-"हिस्टोरिओग्राफी ऑफ मैथिली लेक्सिकोग्राफी"केर मनोवैज्ञानिक आ आलोचनात्मक व्याख्या(पृ. १५६-१७४) २.१३.शैलेन्द्र मिश्र- डॉ रामावतार यादव : मैथिली भाषा- साहित्यक असाध्य काज साधवला एकटा निष्काम कर्मयोगी(पृ. १७५-१८६) २.१४.कुन्दन कुमार कर्ण- डा. रामवतार यादवसँ पहिल भेंटक संस्मरण(पृ. १८७-१९०) २.१५.आशीष अनचिन्हार-विशिष्ट आलेख संचयन केर सामान्य परिचय(पृ. १९१-१९९)
१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय वैय्याकरणाचार्य, शब्द प्रमाण (न्याय): ज्ञान आ तत्त्व मीमांसा: भाषाविद् रामावतार यादव वैय्याकरणाचार्य लोकनिक मत अछि जे शब्द-ब्रह्मण बा स्फोट अन्तिम सत्य अछि आ ऐ विश्वक निर्माणक कारण सेहो शब्द-ब्रह्मण अछि। शब्द-ब्रह्मणक ने कोनो आदि अछि ने अन्त, ई सभ ठाम उपस्थित अछि, ई कोनो काज करबामे स्वयं सक्षम अछि आ सभ घटनाक ई द्रष्टा अछि। आत्मा जखन अपनाकेँ ऐ शब्द ब्राह्मणसँ एकीकृत भेनाइ बुझि जाइए, मुक्त भऽ जाइए। शब्द-ब्रह्मण अछि ध्वनि सिद्धान्त, जे शब्द आ वस्तु दू भागमे बँटि गेल, मुदा दुनू भाग एक दोसराक समानान्तर। शब्द चारि भागमे बँटि गेल, (१) परा (२) पश्यन्ति, (३) मध्यमा आ (४) वैखारी। परा स्थितिमे शक्ति आ शक्तिमानमे पूर्ण तादात्म्य अछि। पश्यन्तिमे काल जुड़ि गेल आ ई सभ शब्द आ वस्तुक स्रोत अछि। पश्यन्ति अछि प्रणव (ॐ) जकरा प्रतिभा सेहो कहै छिऐ, पश्यन्ति सभ शब्दक स्रोत अछि आ प्रतिभा सभ अर्थक; मुदा पश्यन्ति आ प्रतिभा एक्के अछि, मात्र तर्क लेल फराक अछि। मध्यमा स्तरपर शब्द आ वस्तुक अन्तर चिन्हल जाइत अछि, आ शब्दक क्रम देखबामे अबैत अछि, मुदा अखनो ध्वनि मस्तिष्क धरि सीमित अछि। वैखारी स्तरपर शब्द वस्तुक बोध करबैत अछि आ कण्ठ, दाँत, मूर्धा, जिह्वा आदिसँ चिन्हित होइत अछि आ बहराइत अछि। प्रारम्भमे शब्द ब्रह्म रहैत अछि सत्, जइमे चित, आनन्द, ज्ञान, इच्छा, क्रिया सभ अछि, स्वातंत्र्य शक्ति आ काल सेहो अछि। फेर सत अपनाकेँ काल केर मदति सँ विभाजित करऽ चाहैए आ चित आ आनन्द अलगसँ अबैए, फेर चित् सँ ज्ञान आ आनन्दसँ इच्छा बहराइए। आ सत् बनि जाइए पश्यन्ति, छअ विधिसँ; सत्, चित, आनन्द, ज्ञान, इच्छा आ क्रियासँ। पश्यन्ति स्थितिमे शब्द आ वस्तु बड्ड महीन रहैए, आ एक दोसरामे मिज्झर रहैए। मध्यमामे शब्द आ वस्तु अलग-अलग देखार होइए, मुदा उत्पन्न अखनो नै होइए। मुदा वैखारी मे शब्द आ वस्तु दू अलग-अलग धारामे उत्पन्न होइए। भाषाक सभसँ छोट भाग कोन अछि? वर्ण, पद (शब्द) बा वाक्य? मीमांसक वर्णकेँ, नैय्यायिक पद केँ आ वैय्याकरणाचार्य वाक्य केँ भाषाक इकाई मानै छथि। गंगेश उपाध्यायक तत्त्वचिन्तामणि चारि खण्डमे विभाजित अछि- १. प्रत्यक्ष (सोझाँ-सोझी), (२) अनुमान, (३) उपमान (तुलना केनाइ, सादृश्य) आ (४) शब्द (मौखिक गवाही)। वैध ज्ञान प्राप्त करबाक ई चारिटा साधन ऐ चारि खण्डमे अछि। प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान आ शब्दसँ अनुभव प्राप्त होइए। गंगेश उपमानकेँ न्यायशास्त्रमे एकटा समुचित स्थान दियेलन्हि, शब्दार्थ तकबाक विधिक रूपमे। आ अही भाषाकेँ बान्हबाक प्रयास भेल, व्याकरण द्वारा। मीमांसक कहै छथि जे शब्द आ ओकर अर्थक संग सम्बन्ध आदि-अनन्त कालसँ अछि, ई बहरायल नै अछि आ तटस्थ अछि। प्रारम्भिक मीमांसक ईश्वरमे विश्वास नै करै छला मुदा वेदमे विश्वास करै छला। बौद्ध भाषाकेँ, वेदक भाषाकेँ सेहो, मानवीय काल्पनिक रचना, विकल्प, मानैत छथि। जाक डेरीडा बौद्ध आ मीमांसकक बीच सेतु बनै छथि। ओ भाषाक प्रारम्भ लेखन कलामे मानैत छथि मुदा तइसँ ओ नागार्जुनसँ दूर आ भर्तृहरिक व्याकरण विचारसँ लग आबि जाइ छथि। ओना डेरीडा बौद्ध सन भाषाकेँ आदर्शवादी बनेबाक विरुद्ध छथि, आ विषयनिष्ठताक पक्षधर छथि। पारम्परिक व्याकरण आ आधुनिक भाषाविज्ञानक बीच तुलनात्मक अध्ययन- जियान ली आ किंग मिंग ली [मानविकी आ विदेशी भाषा संकाय, शियान प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, शान्सी शियान, चीन] [शिक्षा, प्रबंधन, वाणिज्य आ समाज पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन (ईएमसीएस २०१५) पृ. २८७-२९१] पारम्परिक व्याकरण सबसँ प्राचीन व्याकरणक रूपमे, पारम्परिक व्याकरणक उत्पत्ति १५म शताब्दी ईसा पूर्वमे भेल छल, जाहिमे यूनानमे प्लेटो आ अरस्तू आ भारतमे पाणिनी नामक संस्कृत विद्वान छलाह। विभिन्न रोमन आ प्रारम्भिक ईसाई युगक लेखक लोकनि सेहो पारम्परिक व्याकरणमे योगदान देलनि, मुदा पारम्परिक व्याकरणकार सभ १८म शताब्दीमे सबसँ प्रभावशाली रूपेँ लिखब प्रारम्भ कयलनि, ओइ समयक जखन अङ्ग्रेजीकेँ एकटा अलग भाषाक रूपमे गम्भीरतासँ लेल जाय लागल छल, ने कि मात्र एकटा आन स्थानीय भाषाक सन। पारम्परिक व्याकरणक विशेषताकेँ एना चित्रित कयल जा सकैत अछि। पहिल, व्याकरणक एकटा मुख्य विशेषता ई अछि जे सामान्यतः अर्थ पर आधारित अछि। पारम्परिक व्याकरणक अनुसार, वाक्य शब्दक एकटा समूह अछि जे पूर्ण विचारकेँ व्यक्त करैत अछि। पारम्परिक व्याकरण प्रायः एकर अर्थ आ अर्थ सँ रूप धरि विश्लेषण करैत अछि। भाषा शिक्षणक दृष्टिकोणसँ पारम्परिक व्याकरण भाषाई घटनाक व्यवस्थित वर्णन नहि दैत अछि। ई प्रायः सतह स्तर पर वर्णन दैत छैक आ प्रायः कोनो वाक्यक विश्लेषण अलग-थलग करैत छैक ने कि प्रवचन स्तर पर । आ कखनो-कखनो ई बिना वर्णन स्तरक सेहो होइत छैक, तेँ ई शिक्षककेँ ओइ भाषाक संतोषजनक विवरण नहि दैत छैक जे ओ पढ़ा रहल छथि, आ छात्रकेँ ओहि भाषाक पर्याप्त विवरण नहि दैत छैक जकरा ओकरा सिखबाक आवश्यकता छैक। पारम्परिक व्याकरण सामान्यतः मौखिक भाषापर विचार आ अध्ययन कयने बिना लिखित भाषाक वर्णन करैत अछि। आ संगहि, ई लिखित केँ मौखिक रूपसँ भ्रमित करैत अछि, मुदा जेना कि हम जनैत छी, मौखिक भाषाक प्रणाली लिखित भाषासँ किछु हद धरि भिन्न अछि। तेँ पारम्परिक व्याकरण छात्र सभ लेल मौखिक संचारक तंत्र प्राप्त नहि कऽ सकैत अछि। आ पारम्परिक व्याकरण आकृति विज्ञान आ वाक्यविन्यासकेँ एकटा प्रमुख स्थान दैत अछि, पारम्परिक व्याकरणमे लेक्सिस आ ध्वनिविज्ञानक उपचार बहुधा अपर्याप्त होइत अछि। एकर नुकसानक बावजूद, पारम्परिक व्याकरण भाषा शिक्षण, विद्यालय व्याकरणक लेल बहुत मूल्यवान अछि, आ बहुत रास लोक अखनो मानैत छथि जे ई एकटा कार्यात्मक, सुरुचिपूर्ण, समय-सम्मानित तरीका अछि जे लोकसभकेँ भाषाक विषयमे की जानबाक चाही से सिखाबैत अछि| आधुनिक भाषाविज्ञान आधुनिक भाषाविज्ञानक आरम्भ स्विस भाषाविद् फर्डिनेल डी सॉसर (१८५७-१९१३) सँ भेल छल, जिनका प्रायः 'आधुनिक भाषाविज्ञानक जनक' आ 'एकटा एहन अनुशासनक निपुण' कहल जाइत अछि, जकरा 'आधुनिक' बनाओल जाय (कुलर १९७६:७)। आधुनिक भाषाविज्ञान भाषाई अध्ययनक विज्ञान अछि। आधुनिक भाषाविज्ञानक अनुसार, भाषा एकटा प्रणाली अछि आ व्याकरणकेँ कोनो निश्चित भाषाक व्यवस्थित वर्णनक रूपमे मानल जाइत अछि, चाहे ओ लिखित वा मौखिक हो। व्याकरण वितरण मानदंडक अनुसार सतह संरचना तत्व सभक वितरणात्मक विश्लेषणकेँ सेहो संदर्भित करैत अछि। संगहि, आधुनिक व्याकरणमे ध्वन्यात्मक आ शब्दार्थ घटकक सेहो ध्यान राखल जाइत अछि। सामान्यतः आधुनिक व्याकरणक मूल्यांकन वर्तमानमे प्रयोज्यता, सरलता, पूर्णता, स्पष्टता, आ विरोधाभासक अभावक आधार पर कयल जाइत अछि। आधुनिक व्याकरण वर्णनात्मक व्याकरण, संरचना व्याकरण, कार्यात्मक व्याकरण, परिवर्तनकारी-जननात्मक व्याकरण (प्रकरण व्याकरण) आ बहुत रास अन्य व्याकरणसँ प्रारम्भ होइत अछि। वर्णनात्मक व्याकरण: वर्णनात्मक व्याकरण वर्णन करैत अछि जे कोनो भाषा वास्तवमे कोना बाजल आ लिखल जाइत अछि आ ई वर्णन नहि करैत अछि जे कोनो भाषाकेँ कोना बाजल वा लिखल जाय। वर्णनात्मक व्याकरणक अनुसार, एहिमे कहल गेल अछि जे भाषण भाषाक मूल रूप अछि, आ बाजल आ लिखल भाषामे अन्तर अछि। फ्राइज एकटा प्रतिष्ठित व्याकरणविद छथि, हुनक कृति 'अमेरिकन इंग्लिश ग्रामर' एकटा प्रसिद्ध कृति अछि। हुनक अनुसार, सभ शब्दकेँ दू भागमे वर्गीकृत कयल गेल अछि: विषयवस्तु शब्द आ कार्यात्मक शब्द, पारम्परिक व्याकरण जकाँ वाणीक दस अलग-अलग भाग नहि। विषयवस्तु शब्द ओहि शब्दकेँ सन्दर्भित करैत अछि जकर विभक्ति होइत अछि आ जकर शाब्दिक अर्थ होइत अछि, जेना संज्ञा, क्रिया, विशेषण आदि। कार्यात्मक शब्द ओ शब्द छैक जे संरचना, निर्धारिती, अधीनस्थ संयोजन, सहायक आ जोरदार शब्द तैयार करबामे महत्वपूर्ण भूमिका निमहाबैत छैक। संरचनात्मक व्याकरण: संरचनात्मक व्याकरण पारम्परिक व्याकरणसँ एकदम भिन्न अछि। एकर बदला जँ व्यक्तिगत शब्द आ ओकर काल्पनिक अर्थ या वाक्यमे एकर वाणीक अंश-कार्य पर ध्यान केन्द्रित कयल जाय तँ संरचनात्मक व्याकरण संरचनाक समूह - ध्वनि, रूप, शब्द समूह, वाक्यांश - छोट सँ पैघ इकाइ धरि काज करय पर केन्द्रित अछि। संरचनात्मक व्याकरण शब्दार्थ केँ सेहो देखैत अछि (यद्यपि एकर किछु पूर्ववर्ती अधिवक्तालोकनि एकर अनदेखी करबाक प्रयास कयलनि), मुदा ई शब्दार्थ अर्थपर, वाक्यविन्यास पर जोर दैत अछि। अर्थात्, संरचनात्मक व्याकरण वाक्यविन्यास पैटर्न द्वारा कएल गेल अर्थक विश्लेषण करैत छैक जे मॉर्फीम आ शब्द एक दोसरक संग बनबैत छैक, पैटर्न जेना बहुवचन रूप, संशोधक-क्रिया या संशोधक-विशेषण कनेक्शन, विषय-विधेय कनेक्शन आदिसँ बनैत छैक। आकृति विज्ञान आ वाक्यविन्यास पर सामान्य जोरक अतिरिक्त, संरचनात्मक व्याकरण तीन विशेष रूपसँ उपयोगी विश्लेषणात्मक तकनीक विकसित कयलक: परीक्षण फ्रेम, तत्काल घटक विश्लेषण, आ वाक्य सूत्र। टेस्ट फ्रेम विशेष रूपसँ स्कूलसभमे व्याकरण पढ़ाबैमे सहायक रहल अछि। संरचनात्मक व्याकरणक नोकसान निम्नानुसार अछि:- ई भाषाक व्याकरणिक प्रणालीक अपूर्ण वर्णन प्रस्तुत करैत अछि, आ व्याकरणात्मकताक अनंत श्रृंखलाक निर्माणक लेल आवश्यक नियम प्रदान नहि करैत अछि। ई रूपात्मक आ रूप-ध्वन्यात्मक नियमसभपर अत्यधिक भार दैत अछि, मुदा शब्दार्थ सम्बन्धपर कनेकबे ध्यान देल गेल, जेना पारम्परिक व्याकरणमे अछि। ई वाक्यक सतहक संरचना आ कतेको गहींर सामान्यीकरणक गलत निर्माणक वर्णन करैत अछि। संरचनात्मक व्याकरण वाक्यक व्याकरणिकता आ व्याकरणात्मकताक डिग्री निर्धारित करबाक लेल एकटा मानदण्ड दैत अछि। आ ई स्पष्ट समझ आ सही उपयोगक गारंटी देबाक लेल पर्याप्त स्पष्टीकरण नहि दैत अछि। एहिसँ शिक्षार्थी त्रुटि कऽ सकैत छथि। एहिमे अर्थक उपचारकेँ शामिल नहि कयल गेल अछि, मुदा यदि अर्थकेँ ध्यान मे नहि राखल जायत तँ कोनो व्याकरणिक विश्लेषणक कोनो उपयोग नहि होयत। ई आओर दूटा महत्वपूर्ण क्षेत्रक लेल संतोषजनक आधार प्रदान नहि करैत अछि: रचनात्मक विश्लेषण आ व्यावहारिक भाषाविज्ञानमे अनुवाद। परिवर्तनकारी- जननात्मक व्याकरण Transformational- generative Grammar: परिवर्तनकारी-जननात्मक व्याकरण, टीजी व्याकरण, नॉर्मन, चोम्स्की द्वारा विकसित कयल गेल अछि। ई १९५७ मे प्रकट भेल जखन भाषाविज्ञानमे एकटा क्रांति भेल। किछु भाषाविज्ञानीक अनुसार, टीजी व्याकरण [Transformational-generative Grammar] पारम्परिक व्याकरण आ संरचनात्मक व्याकरणक योगदानक संश्लेषण अछि। जतय धरि संरचनात्मक व्याकरणक सवाल अछि, चोम्स्की अपन व्याकरणक पहिल चरणक रूपमे आईसीए (तत्काल घटक विश्लेषण)क पुनर्निर्माण कयलनि, मुदा ओ बहुत आगू बढ़लाह आ अपन कतेको चरणसँ गुजरल औपचारिकतामे सटीकताक माँगकेँ पूरा कयलनि जेना- शास्त्रीय सिद्धांत, मानक सिद्धांत, विस्तारित सिद्धांत, आ संशोधित विस्तारित सिद्धांत। पहिल चरण- प्रतिनिधि कृति, 'वाक्यात्मक संरचना'[Syntactic Structure], ई संदर्भ मुक्त संरचना द्वारा उत्पादित वाक्यसभक अनंत समूहसँ सम्बन्धित अछि। ई मूल परिवर्तनकारी नियम बनबैत अछि। दोसर चरण- प्रतिनिधि कृति 'वाक्यविन्यासक सिद्धांतक पहलू'[Aspects of the Theory of Syntax ] क सङ्ग, मूल वाक्यविन्यास सिद्धान्तकेँ व्याकरणक एकटा सामान्य सिद्धांत धरि विस्तारित कयल गेल अछि जाहिमे स्वरविज्ञान आ शब्दार्थ सम्मिलित अछि। वाक्यविन्यासक आधार गहींर संरचना छैक, आ सतह संरचना घटना, जेना स्वर, शब्द क्रम आ विषय-छंद। विस्तारित सिद्धांतक चरणमे, एतऽ ध्यान व्यक्तिगत व्याकरणसँ सार्वभौमिक व्याकरणमे परिवर्तित भऽ गेल अछि। एहि चरणमे, सभ परिवर्तनकारी नियमकेँ मात्र एकटा नियममे घटा देल जाइत छैक। संगहि एहि चरणमे, बाधाक सार्वभौमिक सूत्रीकरण विकसित कयल जाइत अछि। अतः टीजी व्याकरणक लाभ ई अछि : पहिल, ई वास्तवमे वाक्यविन्यास स्वरविज्ञान, शब्दकोश आ शब्दार्थकेँ जोड़ैत अछि। तेँ ई प्रणाली भाषाक समग्र अवधारणा दैत अछि। आओर ई तंत्र कोनो आन व्याकरणिक मॉडलक तुलनामे बेसी सटीक आ बेसी पूर्ण अछि। दोसर, टीजी व्याकरण भाषाक बेसी किफायती आ व्यवस्थित वर्णन दैत छैक, ई नियमक एकटा प्रणाली प्रदान करैत छैक जे अनंत संख्यामे व्याकरणिक वाक्यक निर्माणक अनुमति दैत छैक। पारम्परिक व्याकरणक विपरीत, टीजी व्याकरणमे कहल गेल नियम बहुत स्पष्ट आ औपचारिक रूपसँ स्पष्ट अछि। तेसर, टीजी व्याकरण हमरा सभकेँ बहुत स्पष्ट रूपसँ देखबैत अछि जे ई एकटा पैघ सामान्यीकरण शक्तिकेँ संसाधित करैत अछि। ई अन्तर्निहित संरचना आ नियमितताकेँ सेहो स्पष्ट करबामे सक्षम अछि, जकरा पारम्परिक व्याकरण आ संरचनात्मक व्याकरणक व्याकरणविद अनदेखी कयलनि अछि। चारिम, टीजी व्याकरण गहींर संरचनाक स्तर पर भाषाक बीच भाषाई सार्वभौमिकता आ विश्लेषणक अस्तित्वकेँ स्वीकार करैत अछि। ..संरचनात्मक व्याकरणक अनुसार, प्रत्येक भाषा एकटा व्यक्तिगत संरचना प्रस्तुत करैत अछि। मुदा टीजी व्याकरण स्वीकार करैत अछि जे सभ भाषाक वर्णनमे समान सामान्य रूप आ एक प्रकारक नियम होइत अछि। ई पूर्व सार्वभौमिकता केँ संदर्भित करैत अछि। आ ओ सभ सामान्य श्रेणी आ गहींर संरचना सेहो प्रस्तुत करैत अछि आ ई मूल सार्वभौमिकताकेँ संदर्भित करैत अछि, आ टीजी व्याकरणक अंतिम लाभ ई अछि जे ई व्याकरणिकता आ व्याकरणात्मकताक स्तरक धारणाकेँ चिह्नित कऽ सकैत अछि जे मूल्यांकन, परीक्षण आ त्रुटि विश्लेषणक क्षेत्रमे अपरिहार्य अछि। फंक्शनल ग्रामर-कार्यात्मक व्याकरण एम.ए.के. हैलिडे द्वारा बनाओल गेल छल। १९५० मे एकरा व्यवस्थित व्याकरण कहल गेल छल। कार्यात्मक व्याकरणमे, अर्थकेँ एहि उद्देश्यक रूपमे लेल जाइत अछि जे वक्ता चाहैत छथि जे सुननिहार बुझथि। एतय कोनो वाक्यक अर्थ ओकर कार्यक समान होइत अछि। कार्यात्मक व्याकरणक उद्देश्य अर्थ आ शब्दक प्रासंगिक विकल्पक सीमाक अध्ययन करब अछि। आ भाषाक कार्यात्मक दृष्टिकोणक एकटा महत्वपूर्ण निहितार्थ एकर संदर्भ अछि। माने कार्यात्मक व्याकरण संदर्भकेँ ध्यानमे रखैत अछि, आ ई भाषाविज्ञानकेँ समाजशास्त्र दिस लऽ जाइत अछि। ओ संस्कृति आ समाजमे प्रासंगिक विशेषता सभक व्यवस्थित अध्ययन थिक, जे ओहि सन्दर्भक निर्माण करैत अछि जाहिमे भाषाक प्रयोग कयल जाइत अछि। कार्यात्मक व्याकरणक अनुसार, सभटा शब्दकेँ ओपन सेट आ क्लोज्ड सेटमे विभाजित कयल जा सकैत अछि। ओपन सेट संज्ञा, क्रिया, विशेषण आ क्रियाविशेषण अछि; ओ शाब्दिक शब्द वा सामग्री शब्द अछि। .. कार्यात्मक व्याकरणमे समूह आ वाक्यांश दूटा अलग-अलग अवधारणा अछि। समूह शब्दक विस्तार अछि, जखन कि वाक्यांश खण्डक संपीड़न अछि। वाक्यांश विशेष रूपसँ पी.पी.केँ संदर्भित करैत अछि; कार्यात्मक व्याकरणमे संरचित आ कार्यात्मक लेबल सेहो अछि। संरचनात्मक लेबल तत्वसभक संरचनाक प्रकृतिकेँ संदर्भित करैत अछि, जखन कि कार्यात्मक लेबल खण्डसभक वाक्यात्मक कार्यकेँ सन्दर्भित करैत अछि। आधुनिक भाषाविज्ञान आ पारम्परिक व्याकरणक बीच अन्तर भाषाविज्ञान वर्णनात्मक अछि निर्देशात्मक नहि: अधिकांश आधुनिक भाषाविज्ञान वर्णनात्मक अछि, किएक तँ ई वर्णन करबाक प्रयास करैत अछि जे लोक वास्तवमे की कहैत छथि, नहि कि लोककेँ की कहबाक चाही। ई भाषाक वर्णन ओकर सभ पहलूमे करैत अछि, मुदा 'शुद्धता'क नियम निर्धारित नहि करैत अछि। ई पछिला शताब्दीमे भाषाक अध्ययनक विपरीत अछि। ई अधिकांशतः निर्देशात्मक छल। पारम्परिक व्याकरण लोकसभकेँ भाषाक उपयोग केना करब बतबैत छल। स्कूलक शिक्षककेँ रखरखावक लेल अपन कर्तव्यक रूपमे देखबाक चाही। एकर बदला ओ सभ पर्यवेक्षक आ तथ्यक अभिलेखकर्ता बनब पसिन्न करत, मुदा न्यायाधीश नहि। हुनकर मानब छनि जे प्राकृतिक भाषण (संकोच, अपूर्ण उच्चारण, गलतफहमी आदि) मे जे किछु होइत छैक ओकर वर्णन हुनकर विश्लेषणमे कयल जेबाक चाही। ओ सभ बुझि सकैत छथि जे फैशनक प्रभावक कारणेँ एक प्रकारक भाषण दोसरक तुलनामे सामाजिक रूपसँ बेसी स्वीकार्य प्रतीत होइत अछि। मुदा एहिसँ हुनका ई नहि सोचय पड़तनि जे सामाजिक रूपसँ स्वीकार्य विविधता आन सभ किस्मक स्थान लऽ सकैत अछि, अथवा पुरान शब्द हरदम नव वा विपरीत सँ नीक होइत अछि। ओ सभ भाषा आ भाषाक उपयोगमे परिवर्तनकेँ एकटा स्वाभाविक आ निरंतर पूर्वाग्रहक परिणाम मानत, मुदा कोनो एहन चीजक नहि जकरा डरबाक चाही। भाषा परिवर्तनकेँ देखल जेबाक चाही आओर वर्णित कएल जेबाक चाही। मुदा, ई एहि बातसँ इनकार नहि करैत अछि जे भाषाक नियम होइत अछि। एना स्पष्ट रूपसँ होइत अछि नहि तँ हम सभ एक दोसरकेँ नहि बुझि/ बुझा सकब। दोसर दिस, कोनो एकल नियम या अभिव्यक्ति आवश्यक रूपसँ सदाक लेल नहि रहैत अछि। भाषाविज्ञान बाजल जायवला भाषाकेँ प्राथमिक मानैत अछि, लिखितकेँ नहि: अतीतमे, व्याकरणविद लिखित शब्दक महत्वपर बेसी जोर देलनि अछि, आंशिक रूपसँ एकर स्थायित्वक कारण। ध्वनि रिकॉर्डिंगक आविष्कारसँ पहिने क्षणभंगुर उच्चारणक सामना करब कठिन छल। पारम्परिक शास्त्रीय शिक्षा सेहो आंशिक रूपसँ दोषी छल। लोकसभ शास्त्रीय कालक 'सर्वश्रेष्ठ लेखक'क उपयोगक अनुसार भाषाकेँ ढालबा पर जोर देलनि आ ई लेखक मात्र लिखित रूपमे अस्तित्वमे छलाह। यद्यपि, तथ्यक रूपमे, कि हम सामान्य रूपसँ मानव वाणीक इतिहासक विषयमे सोचैत छी जे व्यक्तिगत वक्ता, बाजल जायवला भाषाक भाषाई अनुभव प्राथमिक घटना थिक, आ लेखन एकर कमोबेश अपूर्ण प्रतिबिम्ब थिक। हम सभ पढ़नाइ सिखबासँ पहिने भाषण बुझनाइ सीखैत छी, आ लिखनाइ सिखबासँ पहिने बजनाइ सीखैत छी। हम सभ जतेक पढ़ैत छी ओहिसँ बेसी भाषा सुनैत छी आ लिखबासँ बेसी बजैत छी। बाजल जायवला भाषा सामान्यतः लिखित भाषासँ बेसी लचीला होइत अछि। ई भाषाई विकासक नेतृत्व करैत अछि, जखन कि लिखित भाषा बेसी बा कम अंतराल पर ओकर अनुसरण करैत अछि। बाजल जायवला भाषाकेँ कतेको कारणसँ प्राथमिक माध्यम मानल जाइत अछि। बाजल जायवला भाषा ऐतिहासिक रूपसँ लिखित भाषासँ पहिने होइत अछि। दोसर शब्दमे, ई लिखित प्रणाली अस्तित्वमे अयबासँ बहुत पहिनेसँ अस्तित्वमे छल। आइयो बहुत रास सुविकसित भाषामे एखन धरि लिखित प्रणाली नहि अछि। आनुवंशिक रूपसँ बच्चा सभ लिखब सीखबासँ पहिने सदिखन बाजब सीखैत अछि। आन्हर बच्चासभकेँ बाजब सिखबामे कोनो कठिनाई नहि होइत छैक मुदा बहिर बच्चासभकेँ बहुत कठिनाई होइत छैक। एहिसँ पता चलैत अछि जे दृष्टिक चैनल ओतेक महत्वपूर्ण नहि अछि जेना कोनो भाषा सीखबामे ध्वनिक चैनल। मुदा, ई लिखित भाषाक महत्वसँ इनकार करबाक लेल नहि अछि, जकर अपन लाभ अछि जे बाजल जायवला भाषाक नहि अछि। पहिल, लिखित भाषाक सङ्ग, सन्देशकेँ अन्तरिक्षमे लऽ जाय सकैत अछि। मानव आवाज मात्र कानक शॉटक भीतर प्रभावी होइत अछि। लिखित भाषाक मदति सँ, ..हम विशाल स्थान पर संदेश भेज आ प्राप्त कए सकैत छी। दोसर जे लिखित भाषाक सङ्ग सन्देशकेँ समयक माध्यमसँ लऽ जायल जा सकैत अछि। बाजल जायवला शब्द 'मरि जाइत अछि', मुदा एकटा लिखित सन्देशकेँ उत्पादनक क्षणसँ बहुत आगू, बहुधा पीढ़ीसँ पीढ़ी आ एक संस्कृतिसँ दोसर संस्कृतिमे प्रेषित कयल जा सकैत अछि। तेसर, मौखिक संदेश विकृतिक अधीन होइत छैक, या तँ अनजानमे (जखन उदाहरणक लेल गलतफहमीक कारण) बा अन्यथा। दोसर दिस, लिखित संदेश ठीक ओहिना रहैत अछि चाहे एक हजार साल बाद पढ़ल जाय या दस हजार मील दूर। बाजल जायवला उच्चारण लिखित वाक्यक सङ्ग बहुत रास सामान्य विशेषता साझा करैत अछि, मुदा ओ काफी अन्तर सेहो प्रदर्शित करैत अछि। एहि लेल भाषाविदक मानब छनि जे बाजल जायवला रूप आ लिखित रूप अलग-अलग प्रणालीसँ सम्बन्धित अछि यद्यपि ओ ओवरलैप भऽ सकैत अछि। सिस्टमक अलग-अलग विश्लेषण करबाक चाही: पहिने बाजल जाइत अछि, फेर लिखल। भाषाविज्ञान पारम्परिक व्याकरणसँ एहि लेल भिन्न अछि जे ई भाषासभकेँ लैटिन-आधारित ढाँचामे बाध्य नहि करैत अछि: अतीतमे, बहुत रास पारम्परिक पाठ्यपुस्तक सभ निस्सन्देह ई मानलक अछि जे लैटिन एकटा सार्वभौमिक रूपरेखा प्रदान करैत अछि जाहिमे सभ भाषा फिट होइत अछि, आ अनगिनत स्कूली बच्चा अङ्ग्रेजीकेँ विदेशी पैटर्नमे बाध्य करबाक अर्थहीन प्रयाससँ भ्रमित भऽ गेल अछि। उदाहरणक लेल, कखनो-कखनो ई दावा कयल जाइत अछि जे जॉन लेल सन वाक्यांश 'डेटिव केस'मे अछि। मुदा ई स्पष्ट रूपसँ असत्य अछि, किएक तँ अङ्ग्रेजीमे लैटिन-प्रकारक केस सिस्टम नहि अछि। अन्य समयमे, लैटिन ढाँचाक प्रभाव बेसी सूक्ष्म होइत छैक, आ तेँ बेसी भ्रामक होइत छैक। बहुत रास लोक गलत तरीकासँ किछु लैटिन श्रेणीकेँ 'प्राकृतिक' मानय लगलाह अछि। उदाहरणक लेल, सामान्यतः ई मानल जाइत अछि जे भूत, वर्तमान आ भविष्यक लैटिन कालक विभाजन अपरिहार्य अछि। तैयो बेसीकाल एहन भाषासभसँ भेँट होइत अछि जइमे ई तीन सुव्यवस्थित काल भेद नहि होइत अछि। किछु भाषामे कोनो क्रियाक अवधिकेँ व्यक्त करब बेसी महत्वपूर्ण अछि, चाहे ओ एकटा फराक काज हुअय बा निरन्तर होइबला काज, नै कि कोनो काजकेँ समयमे ताकब। एकर अतिरिक्त, किछु संरचनापर निर्णय प्रायः लैटिन मूलक निकलैत छैक। उदाहरणक लेल, लोकसभ बेसीकाल तर्क दैत छथि जे 'नीक अंग्रेजी' स्प्लिट इनफिनिटिव [स्प्लिट इनफिनिटिवमे कोनो क्रिया विशेषण बा क्रिया विशेषण वाक्यांश "टू" आ " इनफिनिटिव " घटकमे फराक कएल जाइत अछि] सँ बचैत अछि जेना to humbly apologize वाक्यांशमे, जतय to apologize केर 'विभाजन' कयल जाइत अछि humbly द्वारा। ई विचार जे स्प्लिट इनफिनिटिव गलत अछि से लैटिन पर आधारित अछि। शुद्धतावादी लोकनि जोर दैत छथि कि, चूँकि लैटिन इनफिनिटिव मात्र एकटा शब्द अछि, एकर अंग्रेजी समकक्ष एक शब्दक यथासंभव नजदीक होयबाक चाही। भाषाविद लेल एक भाषाकेँ दोसर भाषाक मानकसँ तुलना कऽ निर्णय करब अकल्पनीय अछि। ओ लोकनि एहि धारणाक विरोध करैत छथि जे कोनो एकटा भाषा आन सभ लेल पर्याप्त रूपरेखा प्रदान कऽ सकैत अछि। ओ सभ एकटा सार्वभौमिक ढाँचा स्थापित करबाक प्रयास कऽ रहल छथि, मुदा ई मानव जाति द्वारा उपयोग कयल जायवला अधिकांश भाषासभ द्वारा साझा कयल गेल विशेषतासभ पर आधारित होयत। सारांश यद्यपि आधुनिक भाषाई आ पारम्परिक व्याकरणक बीच बहुत अन्तर छैक, मुदा समकालीन व्याकरणिक विश्लेषणमे निर्देशात्मक रूपसँ नहि बल्कि वर्णनात्मक रूपसँ कयल गेल अधिकांश काज जेना ओटो जेस्परसेन, डब्ल्यू. नेल्सन फ्रांसिस आ हेनरिक पौत्स्मा सन विद्वान द्वारा, पारम्परिक व्याकरण भाषामे लिखल गेल छल। कोनो आधुनिक व्याकरणकेँ बुझबाक लेल, आ शैलीगत विश्लेषणक स्तर पर लेखन वा साहित्यक विषयमे वस्तुतः सभटा चर्चाकेँ बुझबाक लेल, पारम्परिक व्याकरणसँ निकालल गेल शब्दावलीक समझ होयबाक चाही, यदि सम्पूर्ण प्रणालीक नहि। - जियान ली आ किंग मिंग ली नेपालक मैथिली भाषा पाठ्यपुस्तक लेल रामावतार यादव जीक मैथिली व्याकरणक आधारपर बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण "र् ह"जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ "र् ह"क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे "व"क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु "य"क उच्चारण "ज"जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे "ए"केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ "य"क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो "ए"क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (' / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़' गेलाह, क' लेल, उठ' पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। हमसभ हुनक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ चलबाक प्रयास कएलहुँ अछि। पोथीक वर्णविन्यास कक्षा ९ क पोथीसँ किछु मात्रामे भिन्न अछि। निरन्तर अध्ययन, अनुसन्धान आ विश्लेषणक कारणे ई सुधारात्मक भिन्नता आएल अछि। भविष्यमे आनहु पोथीकेँ परिमार्जित करैत मैथिली पाठ्यपुस्तकक वर्णविन्यासमे पूर्णरूपेण एकरूपता अनबाक हमरासभक प्रयत्न रहत। कक्षा १० मैथिली लेखन तथा परिमार्जन महेन्द्र मलंगिया/ धीरेन्द्र प्रेमर्षि संयोजन- गणेशप्रसाद भट्टराई । प्रकाशक शिक्षा तथा खेलकूद मन्त्रालय, पाठ्यक्रम विकास केन्द्र,सानोठिमी, भक्तपुर। सर्वाधिकार पाठ्यक्रम विकास केन्द्र एवं जनक शिक्षा सामग्री केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुर। पहिल संस्करण २०५८ बैशाख (२००२ ई.) । योगदान: शिवप्रसाद सत्याल, जगन्नाथ अवा, गोरखबहादुर सिंह, गणेशप्रसाद भट्टराई, डा. रामावतार यादव, डा. राजेन्द्र विमल, डा. रामदयाल राकेश, धर्मेन्द्र विह्वल, रूपा धीरू, नीरज कर्ण, रमेश रञ्जन । भाषा सम्पादन- नीरज कर्ण, रूपा झा । मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली १. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ- ग्राह्य एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए। २. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर' गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह। ३. प्राचीन मैथिलीक 'न्ह' ध्वनिक स्थानमे 'न' लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि। ४. 'ऐ' तथा 'औ' ततय लिखल जाय जत' स्पष्टतः 'अइ' तथा 'अउ' सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि। ५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह। ६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे 'इ' के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)। ७. स्वतंत्र ह्रस्व 'ए' वा 'य' प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ 'ए' वा 'य' लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि। ८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे 'य' ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह। ९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव 'ञ' लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ। १०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। 'मे' मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। 'क' क वैकल्पिक रूप 'केर' राखल जा सकैत अछि। ११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद 'कय' वा 'कए' अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए। १२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय। १३. अर्द्ध 'न' ओ अर्द्ध 'म' क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध 'ङ' , 'ञ', तथा 'ण' क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ। १४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक। १५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क' लिखल जाय, हटा क' नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक। १६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं। १७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय। १८. समस्त पद सटा क' लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क' , हटा क' नहि। १९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय। २०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय। २१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय। ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ जियान ली आ किंग मिंग ली लिखैत छथि- अधिकांश आधुनिक भाषाविज्ञान वर्णनात्मक अछि, किएक तँ ई वर्णन करबाक प्रयास करैत अछि जे लोक वास्तवमे की कहैत छथि, नहि कि लोककेँ की कहबाक चाही। ई भाषाक वर्णन ओकर सभ पहलूमे करैत अछि, मुदा 'शुद्धता'क नियम निर्धारित नहि करैत अछि। ई पछिला शताब्दीमे भाषाक अध्ययनक विपरीत अछि। ई अधिकांशतः निर्देशात्मक छल। पारम्परिक व्याकरण लोकसभकेँ भाषाक उपयोग केना करब बतबैत छल। मुदा गोविन्द झा, श्रीकान्त ठाकुर आ सुरेन्द्र झा "सुमन" ग्राह्य-अग्राह्य दऽ कऽ शुद्धता आ अशुद्धताक निर्णय दऽ दै छथि। रामावतार यादव सेहो "अ रेफेरेन्स ग्रामर ऑफ मैथिली" मे कत्तौ-कत्तौ मानकता आदिक आधारपर निर्णय दैत बुझाइत छथि। अ रेफेरेन्स ग्रामर ऑफ मैथिली ऐ पोथीक पृष्ठ १२ पर रामावतारजी सूचित करैत छथि जे किछु शब्दक नाकक मेलसँ उच्चारण तथाकथित मानक मैथिलीक लक्षण कहल जाइत अछि जकरा मैथिलीक ब्राह्मण उपभाषा सेहो कहल जाइत अछि। पृ. ३७६ पर रामावतारजी सूचित करैत छथि जे ओ किछु अशिक्षित/ अर्द्ध-शिक्षित ब्राह्मण युवाकेँ पहिने देखने छथि जे 'निम्न' जातिक उमेरगर लोक केँ "तोँ" सँ सम्बोधित करैत छथि, मुदा आब (१९९६ मे) से बर्दास्त नै कएल जाइत अछि। सुभाष चन्द्र यादव लिखै छथि-मैथिलीक वैयाकरण सभ संस्कृताह आ हिंदिआह व्याकरणिक ढाँचा तैयार कयलनि। ओ सभ दलित मैथिलीक विशिष्टता आ भिन्नता कें विचार-योग्य नहि बुझलनि। डॉ. रामावतार यादव एकमात्र एहन भाषाशास्त्री छथि जे एहि पर थोड़े विचार कयने छथि। ... एक बेर अनुग्रह नारायण सिन्हा सामाजिक संस्थान, पटना मे एकटा कार्यक्रम भेल। केन्द्रीय भाषा संस्थान, मैसूर एहि कार्यक्रमक आयोजन कयने छल। कार्यक्रमक मूल चिन्ता मैथिली भाषाक विकास छल। विकास कोना हो, ताहिपर अनेक वक्ता अपन-अपन वक्तृता देलनि। डॉ. मेघन प्रसाद सेहो अपन विचार रखलनि। हुनक भाषा मे ओतेक आदरसूचकता नहि छलनि, जतेक विद्वत समूह कें अपेक्षा रहनि। फल ई भेल जे हुनक भाषिक स्खलन लेल भाषणक बिच्चहि मे बहुत अशिष्टतापूर्वक हुनकर हँसी उड़ाओल गेल। ई दृश्य हमरा विचलित कयने छल आ एहि तरहक भाषिक असहिष्णुताक प्रतिकार हम तत्क्षण कयने रही। [पचपनिया मैथिली -सुभाष चन्द्र यादव; गुलो: कला आ भाषा, २०२२ मे संकलित] सुभाष चन्द्र यादव लिखै छथि- "डॉ. रामावतार यादव एकमात्र एहन भाषाशास्त्री छथि जे एहि पर थोड़े विचार कयने छथि।" आ से सत्य छै कारण ओ थोड़े विचार तँ केने छथि। मुदा से पर्याप्त नै अछि। अ रेफेरेन्स ग्रामर ऑफ मैथिली मे पहिल अध्याय मैथिली व्याकरणक सय सालक इतिहास, दोसर- ध्वनिक व्यवस्था आ लिपि, तेसर- संज्ञा, चारिम- सर्वनाम, पाँचम- विशेषण, छअम- क्रिया, सातम- क्रिया-विशेषण, आठम- मुख्य आ गौण वाक्य प्रकार आ नौम अध्याय- सरल आ मिश्र वाक्यक वाक्य-विन्यास आ शब्दार्थ विज्ञान पर आधारित अछि। फ्राइज लिखै छथि -Prescriptive and scholarly grammars belong to a "prescientific era"; ... the new approach- the application of two of the methods of structural linguistics, distributional analysis and substitution makes it possible to dispense with the usual eight parts of speech.[ Ch. Fries- The Structure of English. London, 1959] एन. एम. रायेवस्का लिखै छथि- सी. फ्राइज शब्द सभकेँ चारिटा "रूप-वर्ग"मे वर्गीकृत करैत छथि, जे संख्या द्वारा निर्दिष्ट अछि; आ "प्रकार्य शब्द"क पन्द्रह समूह, जे अक्षर द्वारा निर्दिष्ट अछि। अभिव्यक्तिक चारि प्रमुख भाग (संज्ञा, क्रिया, विशेषण, क्रियाविशेषण) जे फ्राइजक दर्ज सामग्रीमे प्रतिस्थापनक प्रक्रिया द्वारा स्थापित कयल गेल अछि, एहि तरहेँ संख्याकेँ छोड़ि कोनो नाम नहि देल गेल अछि: वर्ग १, वर्ग २, वर्ग ३, वर्ग ४। चारि वर्ग मोटा-मोटी ओहिसँ मेल खाइत अछि जकरा अधिकांश व्याकरणविद संज्ञा आ सर्वनाम, क्रिया, विशेषण आ क्रियाविशेषण कहैत छथि, यद्यपि सी. फ्राइज विशेष रूपसँ पाठककेँ ओहि कथनक अनुवाद करबाक प्रयासक विरुद्ध चेतावनी दैत छथि जे ओ पुरान व्याकरणिक शब्द पुस्तकमे देखैत छथि। प्रकार्य शब्दक समूहमे नहिये केवल उपसर्ग आ संयोजन होइत छैक, वरन् किछु विशिष्ट शब्द सेहो होइत छैक जकरा बेसी पारम्परिक व्याकरणविद एकटा विशेष प्रकारक सर्वनाम, क्रियाविशेषण आ क्रियाक रूपमे वर्गीकृत करैत छथि। [MODERN ENGLISH GRAMMAR, N. M. RAYEVSKA, http://web.krao.kg/2_inostran/english/3.pdf] मैथिली व्याकरणमे लोक की बजै छथि (विवरणात्मक निअम) केर संग हुनका की बजबाक चाही (निर्देशात्मक निअम), दुनु देखल जाइत अछि। आधुनिक मैथिली व्याकरणमे एकर समावेश हेबाक चाही। औपचारिक आ अनौपचारिक भाषा (जेना क्रमशः उपन्यास आ शोध-निबन्ध), क्षेत्रीय आ आर्थिक-सामाजिक भेद आ निर्देशात्मक निअमक स्थितिक अध्ययन समाज-भाषा-भाषिकी कहबैत अछि। रामावतार यादव वाचिक मैथिलीपर एकटा संरचना अपन व्याकरणमे प्रस्तुत केने छथि। नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला २०२४- भाषा पैवेलियनमे रामावतार यादव आ योगेन्द्र प्रसाद यादव जीक आदमकद पोस्टर गंगेश उपाध्यायक तत्त्वचिन्तामणि गंगेश उपाध्यायक तत्त्वचिन्तामणि चारि खण्डमे विभाजित अछि- १. प्रत्यक्ष (सोझाँ-सोझी), (२) अनुमान, (३) उपमान (तुलना केनाइ) आ (४) शब्द (मौखिक गवाही)। वैध ज्ञान प्राप्त करबाक ई चारिटा साधन ऐ चारि खण्डमे अछि। खण्ड एक प्रत्यक्ष गङ्गेशक आह्वान: त्रिमूर्ति शिवक आह्वानसँ ई खण्ड शुरू होइत अछि।आ तेँ आह्वानक विषयपर चर्चा शुरू होइत अछि। ई मानल जाइत अछि जे कोनो परियोजनाक प्रारम्भमे भगवानक आह्वानसँ ई कार्य पूर्ण होइत अछि। आपत्तिः जे कोनो आह्वान कोनो काज पूरा करबाक कारण अछि, से सकारात्मक बा नकारात्मक संगतिक माध्यम सँ स्थापित नै कएल जा सकैत अछि, किएक तँ एहनो भेल अछि जे कोनो आह्वानक बिना सेहो कोनो काज पूरा कएल गेल। आपत्तिक उत्तर: एकर कारण ई अछि जे ई आह्वान पूर्व जन्ममे कयल गेल छल/ हएत। आपत्तिः नै, ई तँ घुमघुमौआ तर्क अछि, आ ओनाहितो कोनो काज पूरा केना होइत अछि तकर अनुभवजन्य कारण सभ आह्वानकेँ अनावश्यक सिद्ध करैत अछि। आपत्तिक उत्तर: ई प्रमाण जे आह्वान कार्य पूर्ण हेबाक कारण छै, तइमे दू चरणक अनुमान शामिल अछि। पहिल, ई जे ई शिष्ट लोक द्वारा निन्दित नै अछि वरन हुनका सभ द्वारा सेहो आह्वानसँ कार्य प्रारम्भ कएल जाइत अछि। तखन ई अनुमान लगाओल जा सकैत अछि जे काज पूरा भेनाइ फल अछि किएक तँ ई नियमित रूप सँ इच्छित अछि, आ आन कोनो फल उपलब्ध नै अछि। आपत्ति: ई तर्क काज नै करत कारण ई पहिनेसँ ज्ञात अछि जे आह्वानक अछैतो काज पूर्ण भऽ सकैत अछि, कारण-सम्बन्ध कोनो तर्कसँ स्थापित नै कएल जा सकैत अछि। आपत्तिक उत्तर: हम सभ ऐ तर्क (जे आह्वान कार्य पूर्ण करबैत अछि) क समर्थन लेल वैदिक आदेशक आह्वान करैत छी। मुदा कोनो एहन वैदिक कथन नै भेटैत अछि। से अनुमान कएल जा सकैत अछि जे ऐ तरहक आह्वान सुसंस्कृत लोक सभ द्वारा शुरू कएल गेल आ कएल जाइत अछि। प्रार्थना देह (जेना प्रणाम), वाणी (गायन) आ मस्तिष्क (ध्यान) सँ होइत अछि। मुदा कोनो ईश्वरमे विश्वास केनिहार सेहो कार्य सम्पन्न कऽ लैत अछि, तँ की ओ पूर्व जन्ममे आह्वान/ प्रार्थना केने हएत? आ आह्वानक बादो कखनो काल कार्य सम्पन्न नै होइत अछि, से की ढेर रास बाधा ओइ साधारण आह्वानसँ दूर नै भेल हएत? ऐ तरहक तर्कसँ प्रारम्भ भेल छल ई ग्रन्थ, ७-८ सय बर्ख पहिने! (सन्दर्भ: कार्ल एच पॉटर: एनसाइक्लोपीडिया ऑफ इण्डियन फिलोसोफी, १९९३; सतीश चन्द्र विद्याभूषण: अ हिस्ट्री ऑफ इण्डियन लॉजिक, १९२१) स्टीफन एच. फिलिप्स लिखै छथि: मिथिलामे राखल गेल पञ्जी वंशावली अभिलेखसँ पता चलैत अछि जे हुनक पत्नी आ तीनटा बेटा आ एकटा बेटी छल। एकटा बेटा छलन्हि प्रसिद्ध न्याय लेखक, वर्धमान। गङ्गेश स्पष्ट रूपसँ अपन जीवनकालमे प्रसिद्धि प्राप्त कयलनि, जकरा "जगद-गुरु" कहल जाइत अछि, जे हुनक समयक शैक्षणिक संस्थानक लेल "प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय प्रोफेसर" क लगभग समकक्ष हएत। Genealogical records kept in Mithila suggest that he had a wife and three sons and a daughter. One child was the famous Nyaya author, Vardhamana. Gangesa apparently achieved quite some fame during his lifetime, referred to as "jagad-guru," which would be the rough equivalent of "Distinguished University Professor" for the educational institutions of his time. [Phillips, Stephen, "Gangesa", The Stanford Encyclopedia of Philosophy (Summer 2020 Edition), Edward N. Zalta (ed.), URL = https://plato.stanford.edu/archives/sum2020/entries/gangesa/ ] गंगेश जगदगुरु तँ रहथि परमगुरु सेहो रहथि आ परमगुरुक उपाधि हिनका अतिरिक्त मात्र नूतन वाचस्पति (वृद्ध वाचस्पतिक परवर्ती) केँ पछाति जा कऽ प्राप्त भेलन्हि। मुदा गंगेशक संगे जे अन्याय रमानाथ झा आ उदयनाथ झा अशोक केलन्हि से बीसम आ एक्कैसम शताब्दीमे भेल आ तकर दुष्परिणाम स्टीफन फिलिप्स सन नैय्यायिक उठेबा लेल अभिशप्त भेला। एतऽ अहाँकेँ सूचित करी जे स्टीफन फिलिप्स तत्त्वचिन्तामणिक चारू खण्डक सम्पूर्ण अंग्रेजी अनुवाद केनिहार पहिल व्यक्ति छथि [Jewel of Reflection on the Truth about Epistemology: A Complete and Annotated Translation of the Tattva-cinta-mani, Bloomsbury Academic (2020)]। हुनका अलाबी वी.पी. भट्ट सेहो तत्त्व चिन्तामणिक चारिमेसँ ३ खण्डक सम्पूर्ण अनुवाद २०२१ धरि कऽ लेने छथि [१. प्रत्यक्ष (सोझाँ-सोझी), (२) अनुमान, आ (४) शब्द (मौखिक गवाही); (३) उपमान (तुलना केनाइ)बाँकी छन्हि [Word The Sabdakhanda of Tattvacintamani- With Introduction, Sanskrit Text, Translation And Explanation (2 Vols Set) 2005; Perception The Pratyaksa Khanda of The Tattvacintamani 2012 (2 Vols Set); Inference the Anumana Khanda of the Tattva Chintamani ( With Introduction, Sanskrit text, Translation & Explanation ) (2 Vols Set) 2021 Published by Eastern Book Linkers, Delhi]। HONOUR KILLING OF GANGESH UPADHYAYA (FIRST BY RAMANATH JHA, THEN BY UDAYANATH JHA 'ASHOK' (A PARALLEL HISTORY OF MITHILA AND MAITHILI LITERATURE, WHY TODAY ITS NEED BEING FELT MORE INTENSELY?) I was not surprised, though I must have been when I saw a monograph on Gangesh Upadhyaya, whose copyright is being held by Sahitya Akademi, the author of the monograph is Udayanath Jha ' Ashok'. I thought that Udayanath Jha ' Ashok', who has been given Bhasha Samman also, by the same Sahitya Akademi, would do some justice. But truth and research seem elusive in Sahitya Akademi monographs, at least that I found in this monograph. I searched and searched through chapters, that now the author will show courage. But the author like Ramanath Jha seems ashamed of the roots and offspring of Gangesh Upadhyaya. He tries to confuse the issue, but there is no confusion now at least since 2009. But in 2016 Sahitya Akademi seems to carry out the casteist agenda. Udayanath Jha mockingly pretends to search his name, lineage etc, where nothing is there to search for, yet he could not muster the courage, to tell the truth, and ends up just repeating the facts in 2016 that Dineshchandra Bhattacharya already has published way back in 1958. The honour killing of Gangesh Upadhyaya by Prof. Ramanath Jha is being taken forward by Sahitya Akademi, Delhi in a most hypocritical way. Ramanath Jha's obscurantism vis-a-vis Panji is evident from one example. The inter-caste marriage in Panji was well known to him (but he chose to keep the Dooshan Panji secret- which has been released by us in 2009), and it was apparent that the great navya-nyaya philosopher Gangesh Upadhyaya married a "Charmkarini" and was born five years after the death of his father (see our Panji Books Vol I & II available at http://videha.co.in/pothi.htm ). Sh. Dinesh Chandra Bhattacharya writes in the "History of Navya-Nyaya in Mithila". (1958) "The family which was inferior in social status is now extinct in Mithila----- Gangesha's family is completely ignored and we are not expected to know even his father's name-----...As there is no other reference to Gangesa we can assume that the family dwindled into insignificance again and became extinct soon after his son's death." [1958, Chapter III pages 96-99), which is a total falsehood. He writes further that all this information was given to him by Prof. R. Jha, and he seemed thankful to him. The following excerpt from Our Panji Prabandh (parts I&II) is being reproduced below for ready reference: महाराज हरसिंहदेव- मिथिलाक कर्णाट वंशक। ज्योतिरीश्वर ठाकुरक वर्ण-रत्नाकरमे हरसिंहदेव नायक आकि राजा छलाह। 1294 ई. मे जन्म आ 1307 ई. मे राजसिंहासन। घियासुद्दीन तुगलकसँ 1324-25 ई. मे हारिक बाद नेपाल पलायन। मिथिलाक पञ्जी-प्रबन्धक ब्राह्मण, कायस्थ आ क्षत्रिय मध्य आधिकारिक स्थापक, मैथिल ब्राह्मणक हेतु गुणाकर झा, कर्ण कायस्थक लेल शंकरदत्त, आ क्षत्रियक हेतु विजयदत्त एहि हेतु प्रथमतया नियुक्त्त भेलाह। हरसिंहदेवक प्रेरणासँ- आ ई हरसिंहदेव नान्यदेवक वंशज छलाह, जे नान्यदेव कार्णाट वंशक १००९ शाकेमे स्थापना केने रहथि- नन्दैद शुन्यं शशि शाक वर्षे (१०१९ शाके)... मिथिलाक पण्डित लोकनि शाके १२४८ तदनुसार १३२६ ई. मे पञ्जी-प्रबन्धक वर्तमान स्वरूपक प्रारम्भक निर्णय कएलन्हि। पुनः वर्तमान स्वरूपमे थोडे बुद्धि विलासी लोकनि मिथिलेश महाराज माधव सिंहसँ १७६० ई. मे आदेश करबाए पञ्जीकारसँ शाखा पुस्तकक प्रणयन करबओलन्हि। ओकर बाद पाँजिमे (कखनो काल वर्णित १६०० शाके माने १६७८ ई. वास्तवमे माधव सिंहक बादमे १८०० ई.क आसपास) श्रोत्रिय नामक एकटा नव ब्राह्मण उपजातिक मिथिलामे उत्पत्ति भेल। So, the Srotriyas as a sub-caste arose around 1800 CE as per authentic panji files. Sh. Anshuman Pandey [Gajendra Thakur of New Delhi provided me with digitized copies of the genealogical records of the Maithil Brahmins. The panjikara-s whose families have maintained these records for generations are often reluctant to allow others to pursue their records. It is a matter of 'intellectual property' to them. I was fortunate enough to receive a complete digitized set of panji records from Gajendra Thakur of New Delhi in 2007. [Recasting the Brahmin in Medieval Mithila: Origins of Caste Identity among the Maithil Brahmins of North Bihar by Anshuman Pandey, A dissertation submitted in partial fulfilment of the requirements for the degree of Doctor of Philosophy (History) in the University of Michigan 2014]. Later these Panji Manuscripts were uploaded to Videha Pothi at www.videha.co.in and google books in 2009). The so-called Maharajas of Darbhanga were permanent settlement zamindars of Cornwallis, and there were so many in British India, but in Nepal there were none. In the annexure of our book (Panji Prabandh vol I&II), we have attached copies of genealogy-based upgradation orders (proof of upgradation for cash). So, before 1800 CE, there was no srotriya sub-caste in British India and there is no such sub-caste within Maithil Brahmins in Nepal part of Mithila even today. Srotriya before that referred to following some education stream in British India, in Nepal it still has that meaning. ORIGINAL PANJI REFERENCES ARE PLACED BELOW: DOOSHAN PANJI- THE BLACKBOOK ४९. १८८/२ चर्मकारिणी माण्डर वभनियाम छादन तत्त्वचिंतामणि कारकगंगेश छादनगंगेशक नाँई रत्नाकरक-मातृक (अज्ञात) गंगेश वल्लभा भवाइ माहेश्वर जीवे २१//१० छादनसँ तत्व चिन्तामणि कारक जगद्गुरु गंगेश छादनसँ तत्व चिन्तामणि कारक गंगेशक वल्लभा चर्मकारिणी पितृ परोक्षे पञ्च वर्ष व्यतीते तत्व चिन्तामणि कारक गंगेशोत्पत्ति- चर्मकारिणी मेधाक सन्तानक लागिमे छलन्हि छादन सँ तत्व चिन्तामणि कारक मōमō गंगेश "तत्व चिन्तामणि कारक म. म. पा. गंगेशक विषयक लेख प्राचीन पञ्जीसँ उपलब्ध"।। पितृ परोक्षे पंच वर्ष व्यतीते गंगेशोत्पत्तिः इति प्राचीन लेखनीय: कुत्रापि देवानन्द पञ्जी ३९-२ छादनसँ जगदगुरू गुंरू गंगेश सुताय वभनियामसँ जयादित्य सुत साधुकर पत्नी देवानन्द पञ्जी ३३९-३ जगदगुरू गंगेश सुत सुपन दौ भण्डारिसमसँ हरादित्य दौ.।। पुत्र सुताच गोरा जजिवाल सँ जीवे पत्नी ए सुत सन्दगहि भवेश्वर। अत्रस्थाने सुपनभ्रातृ हरिशर्म्म दारिति क्वचित् जजिवाल ग्राम देवानन्द पञ्जी ३०=५ छादनसँ उपायकारक म.म. पा. वर्द्धमान सुताच खण्डवलासँ विश्वनाथ सुत शिवनाथ पत्नी गंगेश- म.म. वर्द्वमान/ सुपन/ हरिशर्म्म Gangesh, the author of the Tattvachintamani, wrote one text equivalent to 12,000 texts. Now come to the fact mentioned in the Panji- it clearly states that Gangesh of Tattvachintamani was born five years after the death of his father and he married a tanner, so why did Ramanath Jha hide this from Dinesh Chandra Bhattacharya? Vardhamana, son of Gangesh, calls Gangesh sukavikairavakananenduh. But the conspiracy under which the poems of a famous scholar like Gangesh are not available today is clear from the example given above. Vasudev of Bengal was a classmate of Pakshadhar Mishra of Mithila, he came to study in Mithila, passed the shalaka examination and received the title of sarvabhaum. Vasudeva memorised the tattvachintamani of Gangesh and the nyayakusumanjali karika of Udayana. Pakshadhar and other Mithila teachers did not allow writing (copying) tattvachintamani. Raghunath Shiromani, a disciple of Vasudeva, took the right of certification after he defeated his guru Pakshadhar Mishra in a scriptural debate (shastrartha). The Navya Nyaya school was founded in Navadvipa by Vasudeva-Raghunath. Pakshadhar Mishra was a contemporary of Vidyapati (distinct from the Padavali writer who was of the pre-Jyotirishwar period) who wrote in Sanskrit and Avahatta. And the arrival of Mithila students of Bengal from Bengal stopped after Raghunath Shiromani. Gangesh Upadhyaya enjoyed 'param guru' as well as 'jagad guru' titles, the highest titles of the time and as per Panji only Vacaspati Mishra II was the other person who enjoyed the title of 'param guru'. The extinction of Navya-Nyaya School from Mithila, as described above, was a revenge of nature against the honour killing of Gangesh Upadhyaya and his family. [Translation of the Maithili Short Story, 'Shabdashastram' (based on the true Panji records of Gangesh Upadhyaya) was done by the author Gajendra Thakur himself: published as 'The Science of Words' Indian Literature Vol. 58, No. 2 (280) (March/April 2014), pp. 78-93 (16 pages) Published By: Sahitya Akademi] -Gajendra Thakur, editor, Videha (be part of Videha www.videha.co.in -send your WhatsApp no to +919560960721 so that it can be added to the Videha WhatsApp Broadcast List.) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। भाषाविद् रामावतार यादव विशेषांक २.१.प्रस्तुत विशेषांकक संदर्भमे २.२.रामावतार यादवजीक संक्षिप्त परिचय २.३.भीमनाथ झा- 'तहिया'केँ तहियाक' राखल- श्री रामावतार बाबू २.४.उदयनारायण सिंह 'नचिकेता'-रामावतार यादव जी-जेना हम हुनका चिन्हने छलियनि २.५.धीरेन्द्र झा 'मैथिल'-भाषा वैज्ञानिक प्रो. डा. रामावतार यादव २.६.राम चैतन्य धीरज- भारोपीय भाषा परिवारवाद आ भाषा दर्शन २.७.डॉ. धनाकर ठाकुर- ध्वनिविज्ञानी प्रो. डा. रामावतार यादवक अनुसार वर्णरत्नाकरक भाषा मैथिली २.८.अयोध्यानाथ चौधरी- मिथिला-मैथिलीक मूल स्तम्भ: प्रा. डा. रामावतार यादव २.९.डॉ. शिव कुमार मिश्र- प्रोफेसर डा. रामावतार यादव ओ हुनक विलक्षण अनुसंधान तकनीक (मिथिला भारती शोध पत्रिकाक संदर्भमे) २.१०.केदार कानन-विद्वानक सत्संग-कथा २.११.संतोष कुमार मिश्र-ओ बाद कहिया आओत २.१२.कवि राजीव झा 'एकान्त'-"हिस्टोरिओग्राफी ऑफ मैथिली लेक्सिकोग्राफी"केर मनोवैज्ञानिक आ आलोचनात्मक व्याख्या २.१३.शैलेन्द्र मिश्र- डॉ रामावतार यादव : मैथिली भाषा- साहित्यक असाध्य काज साधवला एकटा निष्काम कर्मयोगी २.१४.कुन्दन कुमार कर्ण- डा. रामवतार यादवसँ पहिल भेंटक संस्मरण २.१५.आशीष अनचिन्हार-विशिष्ट आलेख संचयन केर सामान्य परिचय २.१.प्रस्तुत विशेषांकक संदर्भमे 1 2008 सँ एखन धरि विदेह http://videha.co.in/ द्वारा जे विशेषांक सभ आएल अछि तकरा तीन चरणमे बाँटि सकैत छी। पहिल चरण 2008सँ जनवरी 2015 धरि जाहिमे विषय आधारित विषेषांक सभ प्रकाशित भेल आ मधुपजीपर सेहो विषेषांक प्रकाशित भेल। एकदम प्रारंभिक विषेषांक सभमे "विशेषांक" नाम नहि लीखल गेल छै मुदा ओहिमे ओहन रचनाक बेसी स्थान देल गेल छै सायास रूपें (क्रम-1 सँ 12)। दोसर चरण भेल 2015 सँ लऽ कऽ एखन धरि जाहिमे मात्र जीवित लेखकपर विशेषांक प्रकाशित करबाक निर्णय लेल गेल आ इम्हर पछिला बर्ख एहिमे संस्था आ पत्र-पत्रिकापर विशेषांक प्रकाशित करबाक सेहो निर्णय लेल गेल क्रम- 13 एवं 14, 20 सँ 30)। तेसर चरण भेल पछिला सालमे विदेहक संपादक द्वारा "नित नवल सिरीज" प्रकाशित करबाक (एकर विवरण अलगसँ देल गेल अछि)। विदेह द्वारा 'जीवैत लेखकपर विशेषांक शुरू कएल गेल छल 2015 सँ जे विभिन्न नामसँ होइत आब "विदेहक जीवित मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशकपर विशेषांक शृंखला" नामसँ जानल जाइत अछि। मैथिलकर्मीसँ हमर सभहक आशय जिनकर काज मिथिला-मैथिली-मैथिली लेल कोनो माध्यमसँ भेल हो। ओ संगठनकर्ता सेहो भऽ सकै छथि, आन भाषाक लेखक सेहो। तहिना संगीतकर्मी मने गीत-संगीतसँ जुड़ल लोक। निच्चा एहि सभ चरण केर विस्तृत सूचना क्रमबद्ध रूपें देल जाएत। विदेहक विशेषांक सभ लेल हम ओहनो लोक सभ लग आलेख लेल जाइत छी, हुनका सूचना दैत छी जे कि विदेह या गजेन्द्र ठाकुरक धुर विरोधी छथि। दू-चारि लोक कहि सकै छथि जे हमरा सूचना नहि भेटल, तऽ हुनकासँ हमर आग्रह जे कमसँ कम ओ अपन ह्वाटसएप आ फेसबुक केर मैसेज बॅाक्स (इनबॅाक्स) देखथि। हमर एहि प्रयासक प्रतिफल विदेहक आन विशेषांक संगे एहूमे देखाइ पड़त से उम्मेद अछि। 20 दिसंबर 2023 केँ विदेह प्रो. डा. रामावतार यादव जीक ऊपर विशेषांक प्रकाशित करबाक सार्वजनिक घोषणा केलक आ प्रस्तुत अछि ई विशेषांक। एहि सूचनाकेँ एहि लिंकपर देखि सकैत छी-घोषणा। एहि विशेषांकसँ पहिने विदेह 31 टा विशेषांक प्रकाशित कऽ चुकल अछि आ एहिठाम आब हम कहि सकैत छी जे ई एकटा चुनौतीपूर्ण काज छै। अनेक संकट केर सामना करए पड़ैत अछि लेख एकट्ठा करएमे। मुदा संगहि ईहो हम कहब जे संकटसँ बेसी हमरा लग समर्थन अछि। हँ, ई मानएमे हमरा कोनो दिक्कत नहि जे जतेक लेख केर उम्मेद केने रहैत छी हम ततेक नै आबैए, जतेक लोक लिखबाक लेल गछैत छथि से सभ अंत- अंत धरि आबि चुप्प भऽ जाइत छथि। आ एकर कारणो छै, किनको ई लागै छनि जे आनपर लिखब से हम अपने रचना किए ने लीखि लेब, किनको लग पोथिए नै रहै छनि, जखन कि हम सभ यथासंभव पाठककेँ विकल्प रूपमे पोथीक पी.डी.एफ फाइल सेहो देबाक लेल तैयार रहैत छी। कियो विदेहक समावेशी रूपसँ दुखी छथि, तँ किनको मित्रकेँ विदेहसँ दिक्कत छनि तँइ ओ नहि देता। एकरो हम संकटे बुझै छियै जे सभ फेसबुकपर लंबा-लंबा लेख वा कमेंट टाइप कऽ लै छथि सेहो सभ विदेह लेल हाथसँ लिखल पठाबैत छथि। जे सभ कहियो काल फेसबुकपर टाइप कऽ लीखै छथि तिनकर आलेख हम सभ टाइप करिते छी। खएर पहिने कहलहुँ जे संकटसँ बेसी समर्थन अछि तँइ आइ पहिलसँ लऽ कऽ तीसम (संस्था सहित) विशेषांक धरि पहुँचलहुँ हम। आन विशेषांक लेल इएह बात मानू। 2008 सँ लऽ कऽ 2024 क एखन धरि 32 टा विशेषांक प्रकाशित भेल मने बर्खमे दू टासँ कनी कम। निश्चिते समर्थन बेसी भेटल हमरा। जखन कि विदेहक ई बत्तीसो विशेषांक केर अलावे आन अंक हरेक पंद्रह दिनपर (मासमे दू बेर) लगातार प्रकाशित भइए रहल अछि। एकर अतिरिक्त ईहो बात संतोषदायक अछि जे विदेहक हरेक व्यक्तिपरक विशेषांक अभिनंदनग्रंथ हेबासँ बाँचि गेल अछि। मुख्यधारा जकाँ विदेहकेँ अभिनंदनग्रंथ नहि चाही। अभिनंदनग्रंथ अहू दुआरे नै चाही जे ओहिसँ लेखक वा जिनकापर निकालल गेल छनि तिनकामे सुधारक गुंजाइश खत्म भऽ जाइत छै। तँइ विदेहक विशेषांकमे आलोचना-प्रसंशा सभ भेटत। प्रो. डा. रामावतार यादव जीक रचना वा हुनकर अवदानक ऊपर कतहुँ किछु प्रकाशित भेल हो तकर संख्या बहुत कम हएत कारण कमसँ कम हम ओकरा अवलोकन करबासँ वंचित छी। बहुत संभव प्रो. डा. रामावतार यादव जीक ऊपर लिखल गेल हो मुदा हमहीं नै देख सकल होइ, एहन स्थितिमे पाठक-आलोचक हमरा सूचित करथि हम अपन सूचनाकेँ सुधारि लेब। एहि संदर्भमे हम कहि सकै छी जे विदेहक ई प्रस्तुत विशेषांक एहन पहिल प्रयास अछि जाहिमे ई बुझबाक प्रयास कएल अछि जे प्रो. डा. रामावतार यादव जीक रचना केहन छनि। ई अलग बात जे हम सभ कतेक सफल वा असफल भेलहुँ से पाठक कहता। एहि विशेषांक केर शुरूआत विदेहक आने विशेषांक जकाँ अछि। संगे-संग ई क्रम ने तँ उम्रक वरिष्ठता केर पालन करैए आ ने रचनाक गुणवत्ताक। हँ, एतेक धेआन जरूर राखल गेल छै जे पाठकक रसभंग नहि होइन आ से विश्वास अछि जे रसभंग नै हेतनि। प्रो. डा. रामावतार यादवजी नेपालक मैथिलीकेँ प्रतिनिधित्व करै छथि तँ किछु आलेख नेपाल दिससँ सेहो आएल अछि तँइ भाषा संबंधी किछु बात देखल जाए जे कि मात्र भारतीय पाठक लेल अछि- 1) भारतीय पाठक कोनो लेखक लेल जेहन आदरसूचक शब्दक प्रयोग देखैत-पढ़ैत एलाह अछि से नेपालक आलेखमे भेटियो सकैए आ नहियो भेटि सकैए। आ नेपालक मैथिली लेल ई सामान्य बात भेलै। 2) भारतीय पाठकसभकेँ किछु शब्दक अर्थ नहि लगतनि आ एहि लेल हुनका विदेहपर उपलब्ध नेपालीय मैथिली मैथिली साहित्यकेँ पढ़ए पड़तनि। 3) फान्टकेँ बदलबामे सेहो बहुत रास दिक्कत भेल छै जाहिपर हम सभ काज कऽ रहल छी। 4) नेपालमे विक्रमी संवत चलैत छै। तँइ जइ ठाम संवत छै ताहिमेसँ 57 घटा देने अंग्रेजी बर्ख आबि जाएत। पहिने विदेहक सभ अंक नागरी, तिरहुता आ ब्रेल लिपिमे प्रकाशित होइत छल आब एहिमे कैथी, नेवाड़ी, एवं आइ.पी.ए. लिपि सेहो जोड़ल गेल अछि, मने एखन विदेह कुल छह लिपिमे प्रकाशित होइए। एकर अतिरिक्त विदेहक किछु अंक रंजना (नेवारी केर एक आर रूप), ब्राह्मी, खरोष्ठी, उर्दू, तिब्बती एवं तिब्बती-उमे लिपिमे सेहो छपल अछि। कुल मिला कऽ देखी तँ विदेह बारह लिपि अपना लेल रखने अछि जाहिमेसँ कुल छह टा लिपिमे विदेह लगातार प्रकाशित भऽ रहल अछि। 2 पाठक जखन एहि विशेषांककेँ पढ़ताह तँ हुनका वर्तनी ओ मानकताक अभाव लगतनि। वर्तनीक गलती जे थिक से सोझे-सोझ हमर सभहक गलती थिक जे हम सभ संशोधन नै कऽ सकलहुँ मुदा ई धेआन रखबाक बात जे विदेह शुरुएसँ हरेक वर्तनी बला लेखककेँ स्वीकार करैत एलैए। तँइ मानकता अभाव स्वाभाविक। एकर बादो बहुत वर्तनीक गलती रहल गेल अछि जे कि हमरे सभहक गलती अछि। मैथिलीमे किछुए एहन पत्रिका अछि जकर वर्तनी एकरंगक रहैत अछि आ ई हुनक खूबी छनि मुदा जखन ओहो सभ कोनो विशेषांक निकालै छथि तखन वर्तनी तँ ठीक रहैत छनि मुदा सामग्री अधिकांशतः बसिये रहैत छनि। ऐतिहासिकताक दृष्टिसँ कोनो पुरान सामग्रीक उपयोग वर्जित नै छै मुदा सोचियौ जे 72-80 पन्नाक कोनो प्रिंट पत्रिका होइत छै ताहिमे लगभग आधा सामग्री साभार रहैत छनि, तेसर भागमे लेखक केर किछु रचना रहैत छनि आ चारिम भागमे किछु नव सामग्री रहैत छनि। मुदा हमरा लोकनि नव सामग्रीपर बेसी जोर दैत छियै। एकर मतलब ई नहि जे वर्तनीमे गलती होइत रहै। हमर कहबाक मतलब ई जे संपादक-संयोजककेँ कोनो ने कोनो स्तरपर समझौता करहे पड़ैत छै से चाहे वर्तनीक हो कि, मुद्राक हो कि विचारधारक हो कि सामग्रीक हो। हमरा लोकनि वर्तनीक स्तरपर समझौता कऽ रहल छी मुदा कारण सहित। प्रिंट पत्रिका एक बेर प्रकाशित भऽ गेलाक बाद दोबारा नै भऽ सकैए (भऽ तँ सकैए मुदा फेर पाइ लागि जेतै) तँइ ओकर वर्तनी यथाशक्ति सही रहैत छै। इंटरनेटपर सुविधा छै जे बीचमे (इंटरनेटसँ प्रिंट हेबाक अवधि) ओकरा सही कऽ सकैत छी मुदा सामग्रिए बसिया रहत तँ सही वर्तनी रहितो नव अध्याय नै खुजि सकत तँइ हमरा लोकनि वर्तनी बला मुद्दापर समझौता केलहुँ। हमरा लोकनि कएलनि, कयलनि ओ केलनि तीनू शुद्ध मानैत छी, एतेक शुद्ध मानैत छी एकै रचनामे तीनू रूप भेटि जाएत। आन शब्दक लेल एहने बूझू। उम्मेद अछि जे पाठक विदेहक आने विशेषांक जकाँ एकरा पढ़ताह आ पढ़ि एकर नीक-बेजाएपर अपन सुझाव देताह। जँ अहाँ अइ विशेषांक केर PDF पढ़ि रहल छी तँ कोनो शब्द वा पाँति अंडरलाइनमे वा बिना अंडरलाइनकेँ नीला वा कोनो रंगक देखाए तँ बुझि लिअ जे ओहिमे लिंक देल गेल छै रेफरेंस लेल आ तकरा क्लिक करबै तँ ओ लिंक खुजि जाएत। कोनो-कोनो फोटोमे सेहो लिंक देल गेल छै। पाठक एहि माध्यमसँ कम समयमे रेफरेंस सभहक अध्य्यन कऽ सकै छथि। मुदा प्रिंटमे प्रकाशित पोथीमे ई सुविधा नै रहत। अइ कारणसँ भऽ सकैए जे पाठककेँ एहि पोथीक किछु पाँति प्रचलित नै बुझेतनि। जाहि ठाम लिंक देल गेल छै ताहि ठामक पाँतिक किछु शब्दक बीच बेसी स्थान छूटल छै। ओकरा एक पाँति बना पढ़ी से आग्रह। हम चाहितहुँ तँ सभ लिंक वा चित्रकेँ एकठाम दऽ सकै छलहुँ मुदा हमर सोच अछि जे पाठककेँ एकै ठाम तर्क आ सबूत भेटनि। विदेहक द्वारा जीवैत लेखक ओ संस्थाक विशेषांक शृखंलामे प्रकाशित भेल आन विशेषांक सभहक लिस्ट एना अछि (एहिठाम जे अंकक लिस्ट देल गेल अछि ताहि अंकपर क्लिक करबै तँ ओ अंक खुजि जाएत)। जे विशेषांक केर विदेहक लिंक छै ठीक तकर निच्चा एहि किछु विशेषांकक पोथी.कॅम केर प्रिंट आॉन डिमांड लिंक अछि जाहि ठाम पाठक एकरा आॉनलाइन कीनि सकै छथि- 1) हाइकू विशेषांक 12 म अंक, 15 जून 2008 2) गजल विशेषांक 21 म अंक, 1 नवम्बर 2008 3) विहनि कथा विशेषांक 67 म अंक, 1 अक्टूबर 2010 4) बाल साहित्य विशेषांक 70 म अंक, 15 नवम्बर 2010 5) नाटक विशेषांक 72 म अंक 15 दिसम्बर2010 6) समीक्षा विशेषांक 7) नारी विशेषांक 77म अंक 01 मार्च 2011 8) अनुवाद विशेषांक (गद्य-पद्य भारती) 97म अंक 9) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक 111 म अंक, 1 अगस्त 2012 10) भक्ति गजल विशेषांक 126 म अंक, 15 मार्च 2013 11) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक 142 म, अंक 15 नवम्बर 2013 12) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक 169 म अंक 1 जनवरी 2015 13) अरविन्द ठाकुर विशेषांक 01 नवम्बर 2015 अंक 189 https://store.pothi.com/book/गजेन्द्र-ठाकुर-सम्पादक-विदेह-अरविन्द-ठाकुर-विशेषांक/ विदेहक अरविन्द ठाकुर विशेषांक केर पोथी रूप "स्वतंत्रचेता- अरविन्द ठाकुर: व्यक्तित्व-कृतित्व" केर नामसँ प्रकाशित भेल। 14) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक 01 दिसम्बर 2015 अंक 191 https://store.pothi.com/search/?q=गजेन्द्र%20ठाकुर 15) विदेह सम्मान विशेषाक- 200म, भाग-1, 15 अप्रैल 2016 16) विदेह सम्मान विशेषाक- 205म, भाग-2, 1 जुलाई 2016 17) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- 217 म अंक 01 जनवरी 2017 18) मैथिली वेब पत्रकारिता विशेषांक-313म अंक 1 जनवरी 2021 19) मैथिली बीहनि कथा विशेषांक-2, 317 म अंक 1 मार्च 2021 20) रामलोचन ठाकुर विशेषांक 01 अप्रैल 2021 अंक 319 https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-editor-विदेह-रामलोचन-ठाकुर-विशेषांक/ 21) राजनन्दन लाल दास विशेषांक 01 नवम्बर 2021 अंक 333 https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-विदेह-राजनन्दन-लाल-दास-विशेषांक/ 22) रवीन्द्र नाथ ठाकुर विशेषांक 15 जून 2022 अंक 348 https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-विदेह-रवीन्द्रनाथ-ठाकुर-विशेषांक/ 23) केदारनाथ चौधरी विशेषांक 15 अगस्त 2022 अंक 352 https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-editor-विदेह-केदार-नाथ-चौधरी-विशेषांक/ 24) प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' विशेषांक 01 नवम्बर 2022 अंक 357 https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-editor-विदेह-प्रेमलता-मिश्र-प्रेम-विशेषांक/ 25) शरदिन्दु चौधरी विशेषांक 15 नवम्बर 2022 अंक 358 https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-editor-विदेह-शरदिन्दु-चौधरी-विशेषांक/ 26) "कला-विमर्श विशेषांक (सन्दर्भ- संजू दास, कृष्ण कुमार कश्यप, शशिबाला, एस.सी.सुमन आ श्वेता झा चौधरी)" 15 अप्रैल 2023 अंक 368 https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-editor-विदेह-कला-विमर्श-विशेषांक-सन्दर्भ-संजू-दास-कृष्ण-कुमार-कश्यप-शशिबाला-एस-/ 27) अशोक विशेषांक 1 मइ 2023 अंक 369 https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-editor-विदेह-रचनाकार-अशोक-विशेषांक/ 28) रामभरोस कापड़ि 'भ्रमर' विशेषांक 15 मइ 2023 अंक 370 https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-editor-विदेह-राम-भरोस-कापड़ि-भ्रमर-विशेषांक/ 29) मिथिला स्टूडेंट यूनियन (MSU) विशेषांक 1 जून 2023 अंक 371 https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-editor-विदेह-मिथिला-स्टूडेण्ट-यूनियन-एम-एस-यू-विशेषांक/ 30) लक्ष्मण झा सागर विशेषांक (15 नवम्बर 2023 अंक 382) https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-editor-विदेह-३८२-म-अंक-१५-नवम्बर-२०२३-लक्ष्मण-झा-सागर-विशेषांक/ 31) नरेन्द्र झा विशेषांक (1 जून 2024 अंक 395) https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-editor-विदेह-३९५-म-अंक-१-जून-२०२४-नरेन्द्र झा-विशेषांक/ 3 विदेहक जीवित विशेषांक शृंखलामे किनकर चयन हो ताहि लेल मोटा-मोटी निच्चाक किछु बिंदुक पालन कएल जाइत अछि- 1) लगभग पाँच-छह मास पहिनेसँ विदेह अपन पाठककेँ सुझाव देबा लेल लेल सूचना दैत अछि। 2) आएल सुझावमेसँ विदेह मात्र जीवित लेखककेँ चयन करैत अछि। संस्था सेहो वर्तामनमे जीवंत हेबाक चाही। 3) सभ जीवित मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशकक बीचमे हुनकर लेखन/ काज एवं आचरणक साम्यता देखल जाइत अछि। जाहि लेखकक लेखन/ काज ओ आचरणमे बेसी साम्यता (कम फाँक) भेटैए तेहन छह टा नाम चयनित होइत अछि। 4) छह नाम एलापर ई तुलना कएल जाइत छै जे ई छहो मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशक अथवा संस्थाकेँ रचना लिखबाक वा समाजिक काज केलाक एवजमे समाजसँ की भेटलनि। 5) जिनका सभसँ कम भेटल बुझाइत अछि ताहि तीन मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशक,-संस्थाकेँ अगिला चरण लेल राखि लैत छी। 6) एहि तीन चयनित जीबित मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशकक वा संस्थाक रचना, काज, हुनक उद्येश्य आदिक बीचमे परस्पर तुलना कएल जाइत अछि आ, 7) अंतिम रूपसँ विदेह द्वारा नाम चुनि सालक अंतमे घोषणा कएल जाइत अछि आ नियत समयपर ई विशेषांक निकालबाक प्रयास करैत छी। एकर मतलब ई भेल जे पाठककेँ सुझाव देबाक सूचना हरेक बर्खक अप्रैल-मइ धरिमे चलि जाइत छनि। प्रश्न उठि सकैए जे कि उपरक नियम एहन छै जाहिमे अंतिम रूपसँ सभ सुयोग्य जीवित लेखक केर चयन समयपर भ़ऽ जेतनि? तऽ एकर उत्तर छै- नै। विदेहक पाठक लग सेहो अपन सीमा छनि। मुदा अही सीमाक संगे हमरा सभकेँ अपन यथासाध्य श्रेष्ठ देबाक छै आ मैथिली लेल एकटा एहन रस्ता बना देबाक छै जाहिसँ आबए बला 500-600 बर्खक साहित्य विदेहक लीकसँ प्रेरणा पाबए। अही विचारक संग विदेह ओहन जीवित लेखकपर अपन धेआन सेहो केंद्रित कऽ रहल अछि जे कि सुयोग्य छथि मुदा जिनकापर विदेहक विशेषांक कोनो कारणवश नहि प्रकाशित भऽ सकल। एकर नाम भेल विदेहक "नित नवल सिरीज"। एहि नव विचारक मुख्य बिंदु एना अछि- 1) विदेहक संपादक गजेन्द्र ठाकुर एकटा कोनो जीवित लेखक वा कलाकारपर एकाग्र आलोचना करता मने ओहि लेखक केर उपलब्ध सभ साहित्यपर। एहि पोथीक भाषा मैथिली अथवा अंग्रेजी कोनो एक भाषामे रहत। एहि पोथीक पहिल रूप ई-बुक केर रूपमे आएत आ प्रयास रहत जे एकर प्रिंट सेहो आबए जे कि परिस्थितिपर निर्भर करतै। 2) लेखक वा कलाकार केर चुनाव संपादक अपन रुचि वा विदेह टीमक रुचि केर हिसाबें करता। 3) एहिमे ओहने लेखक वा कलाकार केर चयन संभव हएत जिनकर उपलब्ध हरेक पोथीक PDF रूपमे विदेहक माध्यमसँ सार्वजनिक भेल छनि। कलाकार लेल यूट्यूब एवं आन साइट सेहो मान्य हेतै। 4) एहि परियोजनाक लेल चयनित लेखक वा कलाकारपर काज संपादक केर समय केर अनुसारे हेतै। तँइ एकर समय सीमा कहब संभव नहि। नित नवल सिरीजमे एखन धरि प्रकाशित पोथीक सूची एना अछि (पहिनेक विशेषांक सभमे ई क्रम नहि छल, एहिठाम संशोधित आ पूर्ण सूची अछि)- 1. Rajdeo Mandal- Maithili Writer (2022) 2. JAGDISH PRASAD MANDAL- Maithili Writer (2023) 3) नित नवल सुभाष चन्द्र यादव (2023)(ई प्रिंट आॉन डिमांड रूपमे सेहो अछि) https://store.pothi.com/book/गजेन्द्र-ठाकुर-नित-नवल-सुभाष-चन्द्र-यादव/ 4) नित नवल सुशील (2023, संशोधित 2024) एकर अतिरिक्त विदेहक वर्तमान अंक सभमे धारावाहिक रूपें "नित नवल दिनेश मिश्र" सेहो प्रकाशित भऽ रहल अछि जकर पोथी रूप जल्दिये आएत। 4 ऊपर भेल जे काज हम सभ कऽ सकलहुँ तकर विवरण मुदा किछु एहनो घोषणा छै जे कि हम सभ नै कऽ सकलहुँ जेना 2016 मे हम सभ परमेश्वर कापड़ि, कमला चौधरी आ वीरेन्द्र मल्लिक विशेषांक केर घोषणा कइयो कऽ नहि प्रकाशित कऽ सकलहुँ। पाठक एहि घोषणाकेँ एहि लिंकपर देखि सकै छथि- सूचना बादमे विदेहक "वीरेन्द्र मल्लिक विशेषांक" (जे कि प्रकाशित नै भऽ सकल) लेल वीरेन्द्र मल्लिक जीक साक्षात्कार जे नबोनारायण मिश्रजी से विदेहक 337म अंकमे प्रकाशित भेल पाठक एकरा एहि लिंकपर पढ़ि सकै छथि- 1 जनवरी 2022 अंक 337 2017 मे विदेह "नेपालक वर्तमान मैथिली साहित्य" विषयक विशेषांक निकालबाक नेयार केने छल जे एखन धरि पूरा नहि भऽ सकल अछि। तेनाहिते विदेहक "साहित्यिक भ्रष्टाचार विशेषांक" हमरा लोकनि एखन धरि नै प्रकाशित कऽ सकलहुँ अछि। एकर घोषणा हम 2019 मे केने रही। एहि घोषणाक फेसबुक लिंक देखू। तेनाहिते विदेहक 'मिथिला विकास परिषद्" विशेषांक केर घोषणा कइयो कऽ नहि प्रकाशित कऽ सकलहुँ अछि। एकर घोषणा हम जुलाई 2023 मे केने रही। एहि घोषणाक फेसबुक लिंक देखू। परिशिष्ट-1 परिशिष्ट-2 परिशिष्ट-3 विदेह अपन कोनो अंकमे "साहित्यिक भ्रष्टाचार विशेषांक" निकालत (लिंक कमेंटमे) ताहि लेल अपने सभसँ निम्नलिखित विषयपर आलेख आदि चाही। 1.साहित्य, कला एवं सरकारी अकादमीः- (क) पुरस्कारक राजनीति (ख) सरकारी अकादेमीमे पैसबाक गैर-लोकतांत्रिक विधान (ग) सत्तागुट आ अकादमी केर काजक तौर-तरीका घ) सरकारी सत्ताक छद्म विरोधमे उपजल तात्कालिक समानांतर सत्ताक कार्यपद्धति (1985सँ एखन धरि) ङ) अकादेमी पुरस्कारमे पाइ फैक्टरः मिथक वा यथार्थ 2.व्यक्तिगत साहित्य संस्थान आ पुरस्कारक राजनीति 3.प्रकाशन जगतमे पसरल भ्रष्टाचार आ लेखक 4. मैथिलीक छद्म लेखक संगठन आ ओकर पदाधिकारी सभहँक आचरण 5.मैथिली विभागमे पसरल साहित्यिक भ्रष्टाचारक विविध रूपः- (क) पाठ्यक्रम (ख) अध्ययन-अध्यापन (ग) नियुक्ति 6. साहित्यिक पत्रकारिता, रिव्यू, मंच, माला, माइक आ लोकार्पणक खेल-तमाशा 7.लेखक सभहँक जन्म-मरण शताब्दी केर चुनाव, कैलेंडरवाद आ तकरा पाछूक राजनीति 8.दलित एवं लेखिका सभहँक संगे भेद-भाव आ ओकर शोषणक विविध तरीका उपरक विषयक अतिरिक्त जँ कियो साहित्यिक भ्रष्टाचारक कोनो नव विषयपर लिखए चाहथि तँ ओकरो स्वागत रहत। परिशिष्ट-4 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.रामावतार यादवजीक संक्षिप्त परिचय एहिठाम प्रस्तुत अछि प्रो. डा. रामावतार यादव जी केर संक्षिप्त परिचय। एहि परिचयक किछु तथ्य सार्वजनिक छै एवं किछु जुटाओल गेल अछि, पारिवारिक तथ्य आ फोटो सभ स्वयं रामावतार जीक सौजन्यसँ भेटल अछि। निच्चा हिनकर नाममे विभिन्न लिंक सभ यथा विकीपीडिया, गूगल स्कालर आदि देल गेल अछि ताहिपर क्लिक केलासँ ओ पन्ना सभ खुजि जाएत। एहि परिचयमे स्वाभाविक तौरपर भाषाविज्ञान आ ध्वनिविज्ञानक अनुरूपे प्रतीकचिह्न सभ लगाएल गेल छै (किछु प्रतीकचिह्न फॉण्ट बदलाबक क्रममे हटि गेल अछि ताहि लेल पाठक सभसँ क्षमाप्रार्थी छी)। नाम- प्रो. डा. रामावतार यादव जन्म तिथि : 10 सितंबर 1942 माता : स्व. जामवती देवी यादव पिता : स्व. प्रभु यादव गाम: मुड़ीबा, विदेह नगरपालिका-5, धनुषा, जनकपुर, मधेश प्रदेश, नेपाल शिक्षा : 1) M.A, अंग्रजी, 1964, काठमांडू, 2) पोस्ट-ग्रेजुएट डिप्लोमा (Teaching English as a Foreign Language), विलायत, 1971 3) एम.फिल (भाषाविज्ञान), अमेरिका, 1977 4) पी.एच.डी (भाषाविज्ञान), अमेरिका, 1979 5) Postdoctoral Research as a Senior Fulbright Visiting Scholar, USA (1989) 6) Alexander von Humboldt Foundation Postdoctoral Senior Visiting Scholar, Germany (1983-84, 1989, 2000-2001, 2013, 2018) प्रकाशित कृति: (एहिठाम किछु पोथीमे ओकर लिंक देल गेल अछि ताहिपर क्लिक करबै तँ ओ पोथी खुजि जाएत)- 1. Maithili Phonetics and Phonology, Mainz (Germany): Selden Und Tamm, 1984 2. A Reference Grammar of Maithili, Berlin & New York: Mouton de Gruyter, 1996 [Also published by Munshiram Manoharlal, New Delhi, 1997] 3. A Facsimile Edition of a Maithili Play: Bhūpatīndramalla's Parśurāmopākhyāna nāṭaka, Kathmandu: B. P. Koirala India Nepal Foundation, 2011 4. मैथिली आलेख सञ्चयन (1989-2015), जनकपुरधाम, मैथिली विकास कोष, 2016 5. Elegy Written in a Royal Courtyard: A Facsimile Edition of Jagatprakāśamalla’s Gītapacaka, New Delhi: Adroit Publishers, 2018 6. Historiography of Maithili Lexicography & Francis Buchanan's Comparative Vocabularies: Facsimile Edition of the British Library, London Manuscript, Darbhanga: Maharajadhiraja Kameshwar Singh Kalyani Foundation, 2022. Kameshwar Singh Bihar Heritage Series 23 7. मैथिली आलेख सञ्चयन (2015-2022), मधुबनी (बिहार, भारत), अनुप्रास प्रकाशन, 2022 8. मध्ययुगीन मैथिली नाट्य र गीति कृतिहरूको भाषावैज्ञानिक वर्णन-विश्लेषण, काठमाडौं, नेपाल सङ्गीत तथा नाट्य प्रज्ञा प्रतिष्ठान, 2023 (नेपाली) 9. Critical Edition of MSS. of Three Medieval Sanskrit and Maithili Plays, Janakpurdhām: Maithili Vikāsa Koṣa, (In Press). ऊपरक सूचीक अतिरिक्त 1976-2023 केर बीच प्रो. डा. यादवजीक 95 टा शोधपत्र जे कि मैथिली एवं भाषाविज्ञानसँ संबंधित अछि से Nepal, India, USA, UK, and Germany आदि देशमे प्रकाशित भेल अछि। वृत्ति- प्रध्यापन, शैक्षिक योजना एवं व्यवस्थापन: त्रिभुवन विश्वविद्यालय, काठमांडू (नेपाल)मे प्रध्यापनसँ अवकाश लेलाक बाद आ तकरा बाद नेपाल सरकाक विभिन्न शैक्षिक-प्रशासनिक पदपर अपन सेवा देलाह। शैक्षिक-प्रशासनिक पद केर सूची एना अछि- 1) Director, Curriculum Development Centre, Tribhuwan University, Kirtipur, Kathmandu, 1990-1992. 2) Member, National Education Commission, HMG / Nepal 1991-1993. 3) Executive Director, National Centre for Higher Secondary Education, 1992-1993. 4) Director-General, Curriculum Development Centre, Ministry of Education, Keshar Mahal, Kathmandu, 1995-1997. 5) Member-Secretary, High Level National Education Commission, HMG / Ministry of Education, Kathmandu, 1997-1998. 6) Joint Secretary, Ministry of Education, Keshar Mahal, Kathmandu, 1999. 7) Executive Director, National Centre for Educational Development, MOES, Sanothimi, January 2000-September 2000. 8) Former Vice-chancellor, Purbanchal University, Biratnagar, Nepal 2007-2011. डा. रामावतार जी केर परिवारक अन्य सदस्य : पत्नी: निरूपमा यादव पुत्री: उषा यादव (विद्यालय शिक्षक, काठमांडू, नेपाल सरकार) पुत्र: डा. विजय यादव MBBS, MD (Internal Medicine), DM (Cardiology) Fellowship/Super Specialisation in Cardiac Electrophysiology at the AIG Hospitals, Hyderabad, India (2023 onwards) पुत्रवधु: डा. सरिता यादव MBBS, MD (Ophthalmology), Fellowship for MS in Ophthalmology at the Kedia Eye Hospital, Birgunj, Nepal (2022 onwards) सम्मानः 1) British Council Scholarship Award, 1970- 1971, UK 2) Fulbright-Hays Scholarship Award, 1974- 1979, USA 3) King’s Medal: Mahendra Vidyābhūṣaṇa Padaka, 1982, Kathmandu, Nepal 4) Alexander-von-Humboldt Language Scholarship Award, October 1982- January 1983, Bonn, Germany 5) Alexander-von-Humboldt Postdoctoral Research Fellowship Award, 1983- 1984, Bonn, Germany 6) British Council Visitor Award, London, 1989, UK 7) Senior Fulbright Visiting Scholar, Council for International Exchange of Scholars, Washington DC, USA, 1989 8) Alexander-von-Humboldt Senior Visiting Research Fellowship Award, 1989, Bonn, Germany Royal Nepal Academy Pāsāṅg Lhāmu Prajnā Puraskāra- 1996, Kathmandu, Nepal 9) Baidyanātha-Siyādevi Foundation Maithili Award- 1999 CE, Janakpur, Nepal 10) Alexander-von-Humboldt Senior Visiting Research Fellowship Award, 2000- 2001, Bonn, Germany 11) Mithilā Ratna, International Maithili Conference, Chennai, India, 2008 12) Mithilā Vibhūti, Vidyāpati Sevā Saṁsthāna, Darbhanga, India, 2011 13) Government of Nepal Nepāla Vidyāpati Maїthilī Anusandhāna Puraskāra- 2068/ 2011 CE, Kathmandu, Nepal 14) Alexander-von-Humboldt Senior Visiting Research Fellowship Award, 2013, Bonn, Germany 15) Alexander-von-Humboldt Senior Visiting Research Fellowship Award, 2018, Bonn, Germany 16) Nepal Academy Nepāla Prajnā Bhāṣā Puraskāra-2074/2017 CE, 2017, Kathmandu, Nepal 17) Pahila Śabdakośakāra Paṇḍit Bhavanātha Miśra Sāhitya Śikhara Sammāna- 2017, 2017, Sahityāṅgana, Jhanjharpur, Bihar, India 18) Nepal Music & Drama Academy Nepāla Music & Drama Prajnā Puraskāra-2074/2017 CE, 2018, Kathmandu, Nepal 19) Cetanā Samiti Tāmrapatra Sammāna (Bronze Citation Honor), 2019, Patna, India 20) Dr. Dhīrendra Sāhitya Saṁskr̥ti Puraskāra 2077, 2022, Maithilī Vikāsa Koṣa, Janakpurdham, Nepal 21) सद्गृहस्थ संत जगन्नाथ चौधरी शोध सम्मान-2024 (जय-राम शोध संस्थान, सुलतानपुर द्वारा) परिवारक सदस्य सभक चित्र- चित्र1-निरूपमा यादव चित्र 2-प्रो.डा. रामावातार यादव एवं निरूपमा यादव प्रो. डा. रामावतार यादव ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.भीमनाथ झा- 'तहिया'केँ तहियाक' राखल- श्री रामावतार बाबू भीमनाथ झा-संपर्क-7482066855 'तहिया'केँ तहियाक' राखल- श्री रामावतार बाबू संयोग एकरे कहै छै। ई संयोग ककरो सौभाग्य भ' जाइ छै। ताहूसँ आगाँ जाक' ताहिमे किछुकेँ तँ गौरव बढ़ा दै छै। ओकरा भारी बना दै छै। श्री रामावतार बाबूक सहपाठी होयबाक जहियासँ हम अनुभव कर' लगलहुँ अछि, तहियासँ अपन ओजन बढ़ि गेल सन बुझना जाइछ। मुदा, हम बुझै छी, अपनेकेँ सहजेँ ई बात बुझबामे नहि आयल होयत। 'जहियासँ' माने की? जहियासँ सहपाठी थिकनि तहिए सँ ने! तखन जहियासँ हम अनुभव कर' लगलहुँ की भेलै? मुदा, असल बात सैह भेलै। सहपाठी छलियनि 1958-60 सत्रमे, तकर अनुभव कर' लगलहुँ ओकर पचास-पचपन वर्षक बादसँ। घटना एना छै। 1958 मे गामक हाइ स्कूलसँ मैट्रिक सेकेंड डिवीजनसँ पास कैलहुँ। पितृहीन रही। तेहन क्यो मार्गदर्शक नहि। रिजल्ट भेना किछुए दिन भेल छलै कि ककरौड़क पीसा ऐला। बुझलनि तँ खुशी भेलनि। कहलनि- काल्हि चलू, आर.के. कालेजमे नाम लिखा दै छी। कहलियनि- एखन तँ नम्बरो-तम्बरो नहि ऐलैए। स्कूलसँ एस.एल.सी.सेहो नहि लेलहुँ अछि। पाइयो-कौड़ी हाथपर नहि अछि। आगाँ की करबाक अछि, सेहो नहि बुझै छिऐ। तखन कोना चलू? कहलनि- आगाँ पढ़ब, से तँ निश्चय अछि। कहलियनि- सेहो निश्चय नहि अछि जे नहि पढ़ब, पढ़ब तँ कोना पढ़ब? ताहिपर कहलनि- पढ़ू तँ अबस्से। अइ बयसमे कोन नोकरी हैत? नाम लिखैबाक चिन्ता नहि करू। प्रिंसिपल हमर अपेक्षित छथि। तत्काल एको पाइ ने लागत। कोनो कागज-पत्रक काज नहि। बादमे सभटा जमा क' देबै। पीसा एक हिसाबे बलजोरी हमरा मधुबनी ल' गेला। प्रिंसिपल साहेब (प्रो.अरुण कुमार दत्त)क आवासपर जा, हुनकासँ गप क', हमरासँ ओतहि एक दरखास्त लिखा, ताहीपर ऑडर करबा लेलनि। पीसा कॉलेज ल' जाक', बिना एको पाइ देने, आइ.ए.मे हमर नाम लिखा देलनि। हमर रौल नम्बर पाँच भेल। माने, चारि गोटे हमर पीसोसँ तेज निकलला। फार्मपर ऐच्छिक विषय लिख' पड़ै छलै। हमरा तकर ज्ञान नहि। पीसो अङरेजी पढ़ल नहि। एकटा परिचित प्रोफेसरकेँ पुछलथिन। ओ हमरासँ मैट्रिकक विषय पुछलनि, रिजल्ट पुछलनि। पीसा कहलथिन जे सोझ विषय कहियनु। ओ कहलथिन- तखन सिभिक्स, साइकोलोजी, मैथिली राखि लेथु। हम भरि देलिऐ। सिभिक्स आ मैथिली तँ मैट्रिकमे पढ़ल छलो, साइकोलॉजी की भेलै, से नहि बुझलिऐ। बादमे जाक' बुझलिऐ जे सिभिक्स साइकोलॉजी मैथिलीकेँ ताइ दिन कहल जाइ चूड़ा दही चीनी तथा सिभिक्स लौजिक मैथिलीकेँ पान बीड़ी सिगरेट। माने ई दुनू ग्रुप सभसँ सोझ, माने विद्यार्थी भुसकौल। कॉलेजमे विद्यार्थीक संख्या बुझबैक? ओहि बैचमे एक वर्गमे, फस्ट इयर आर्ट्स टामे दू हजार छात्र, तहिना सेकेंड इयरमे तथा ताही अनुपातमे डिगरीक दूनू वर्षमे। भोर छौ बजेसँ साँझ छौ बजे धरि लगातार क्लास चलैत। मुख्य सभ विषयमे तीन-तीन सेक्शन। संस्कृत छोड़िक'आर्ट्सक सभ विषयमे दू सेक्शन तँ अबस्से। सौँसे कॉलेज गनगनाइत। हमर रौल नम्बर जेँ कि 5 छल, तेँ सभ विषयमे 'ए' सेक्सन भेटल। हम तेजगर तँ रही नहि, सहमिलुओ नहि रही, दब्बू रही, चुपचाप जाइ-आबी। तेँ मित्रमंडली कोनो छल नहि। अपनो सेक्शनक छात्र सभसँ घनिष्ठता नहि। ओइ समयमे एनुअल इग्जामिनेशनक रिजल्ट पटनाक हिन्दी-अङरेजीक दैनिक पत्र सभमे प्रकाशित होइ, सभ पास विद्यार्थीक नामसँ। (हमरासँ एक वर्ष पूर्वक बैच, माने 1957 धरि मैट्रिकोक रिजल्ट अखबारमे नामेसँ अबैक, 1958 सँ रॉल नम्बर छप' लगलैक। मुदा, इंटरमे नाम छपब जारिए रहलै।) फस्ट डिवीजनरक नाम योग्यताक्रमसँ बिहार युनिवर्सिटीक सभ कॉलेज मिलाक' समेकित रूपमे एके ठाम रहैक। मन्त्रेश्वर झा (सी.एम.कॉलेज)क नाम फस्ट डिवीजनरक लिस्टमे सभसँ ऊपर रहनि। (ज्ञातव्य जे तहिया बिहारमे दुइएटा युनिवर्सिटी रहै, पटना युनिवर्सिटी आ बिहार युनिवर्सिटी।) सेकेण्ड आ थर्ड डिवीजनसँ पास विद्यार्थीक नामावली 'कॉलेज वाइज' छपै। अपन नाम आर.के.कॉलेजक सेकेंड डिवीजनरक लिस्टमे भेटि गेल तँ ताहीसँ हम सन्तुष्ट भ' गेलहुँ। तकर बाद फस्ट डिवीजनरक समेकित लिस्ट देख' लगलहुँ, जाहिमे आर.के.कॉलेजसँ छौ कि सात गोटे मात्र अभरला। दू हजार छात्रमे एतबे फस्ट डिवीजन। ताहिमे जे नाम मन पड़ैत अछि से ई रामावतार यादव, बालेश्वर ठाकुर, मार्कण्डेय झा, महेन्द्र नारायण कर्ण आ दू-तीन गोटे रहथि आरो। ओहि साल अठारह प्रतिशत रिजल्ट भेल रहै। कहक काज नहि जे आर.के.कॉलेजक दू हजार छात्रमे फस्ट डिविजनर सभ वास्तवमे केहन मेधावी रहल हेता! तकर बाद दीर्घ अन्तराल। ओहि बीच रामावतारजी अपन दिशा निश्चित कयलनि, प्रतिभाशाली रहबे करथि, अवसरो भेटैत गेलनि, देश-विदेशमे पढ़लनि-पढ़ौलनि, भाषाविज्ञानमे विशेषज्ञता प्राप्त कयलनि, शोध-अनुसन्धानमे अन्तर्राष्ट्रीय नाम भेलनि, एक-पर-एक उत्कृष्ट ग्रन्थ आ शोधप्रबन्धक लेखन-प्रकाशन कयलनि, अनेको महत्त्वपूर्ण विलुप्त पाण्डुलिपिकेँ ताकि सम्पादित क' सोझाँ अनलनि। फलत: समस्त प्रबुद्ध मैथिल समाजक बीच ई चुनल शीर्षस्थ विद्वन्मणिमालाक एक दाना मानल जाय लगला। मुदा, गौरवक कारण एतबे टाक हेतु नहि, अपितु एहिसँ बेसी, कहू बीस एहि ल'क' छनि जे हिनक अधिकसँ अधिक काज मैथिली भाषासँ सम्बद्ध छनि, मैथिली साहित्यपर छनि, मिथिलाक हेतु छनि; अङरेजियोमे छनि तँ तकर विषय मैथिलीए थिकै आ मैथिलीयोमे तँ छनिहेँ। सभ जनै छी जे सम्प्रति ई शीर्ष श्रेणीक भाषावैज्ञानिक छथि, जे मिथिला-मैथिलीक खुट्टाकेँ विश्वभाषाक अध्ययन-संसारमे मजगूतीसँ गाड़ने छथि। दोसर दिस एक हम छी जे जतबो पढ़लहुँ से पढ़' पड़ल तेँ, जतबे जे लिखलहुँ से लिख' पड़ल तेँ। मुदा, सौभाग्यसँ रहलहुँ जेँ कि अक्षर-संसारमे, तेँ घर-बाहरक गतिविधि, चालचूल, चहल-पहल, खासक' मैथिली सम्बन्धी तँ कानमे पड़िते आबि रहल अछि। ताही सिलसिलामे रामावतार यादवक प्रशस्ति सुनब स्वाभाविके छल, एम्हरो आ जनकपुर यात्रामे सेहो। मुदा ई वैह थिका आर.के.कॉलेजवला, तहि दिस ध्यान नहि गेल छल। 'मिथिला मिहिर'मे रही, तहिएक बात थिक जे एक बेर मार्कण्डेयजी (सहरसा कॉलेजक प्रोफेसर आ हमर बैचक एक फस्टडिविजनर) गप्पक क्रममे हिनक आ महेन्द्र नारायण कर्ण (जे तहिया अनुग्रह नारायण सिंह समाज अध्ययन संस्थानक डाइरेक्टर छला)क चर्चा कयलनि आ कहलनि जे चलू कर्णजीसँ भेट करबै छी। तखन जाक' निश्चय भेल जे विख्यात रामावतारजी तँ हमर क्लासमेटेवला थिका। तकर बादसँ जाहि कोनो सभामे ई रहथि आ हमरा बजबाक अवसर भेटय तँ सम्बोधनमे 'मित्रवर' कहि हिनको नाम लेब' लगलियनि। मुदा हिनक विद्वत्ता आ प्रसिद्धिक धाह तेहन सहजोर रहनि जे लग जाक' कहियो गप करबाक वा परिचय देबाक साधंस नहि होइ छल। एकाध बेर 'मित्रवर' सुनि ई अनठा देने होथि से सम्भव थिक, मुदा अकच्छ भ' गेल हेता तँ एक दिन ई आर.के.कालेजक मित्र (संयोगसँ हमरो मित्र) डॉ.देवेन्द्र झाकेँ पुछलथिन जे क्यो भीमनाथ झा हमरा 'मित्रवर-मित्रवर' कहै छथि, से के थिका ओ? अहाँ चिन्है छियनि? कविता-तविता बनबै छथि से बेस, मुदा हम हुनक मित्र कहिया भेलियनि? ओम्हर, देवेन्द्र बाबू तँ अपनहिँ गप्प-सम्राट, से तेना क' हमरा द' कहने हेथिन जे हिनको भेल हेतनि जे ईहो क्यो अछि! रामावतारो बाबू हुनक चकमामे आबि गेला। तकर बाद दुनू गोटे पहुँचल रही महेन्द्र मलंगिया समारोहमे दिल्ली, जे 8-9 दिसम्बर 2018 ई.केँ भेल रहै। ओहिमे पहिने रामावतारे बाबू टोकलनि बहुत स्नेहसँ। तेहन आत्मीय रूपमे गप कैलनि जे हम तँ पानि-पानि भ' गेलौँ। खूब फैलसँ हमर नाम लिखि, अपन हस्ताक्षर क' अपन पोथी 'मैथिली आलेख संचयन' देलनि। कालेज-जीवनक संस्मरण, अपन अध्ययन आ कार्यक विषयमे तथा नाना प्रकारक आनो स्नेहसिक्त गप सुनबैत रहला। तकर बादसँ तँ काठमांडू आ जनकपुरोसँ फोनपर कुशल-समाचार रहरहाँ लैत रहै छथि तथा मिथिला-मैथिलीक घर-बाहरक गप कहैत रहै छथि आ हम तृप्त होइत रहै छी। कहबाक मन होइए जे कही, 'सिखैत रहै छी', मुदा अपनाकेँ रोकि लै छी एहि कारणे जे हुनक गूढ़ भाषाविज्ञानक विषयकेँ बुझबो लेल ज्ञानक जे स्तर चाही, से हमरा कत'? 'मैथिली आलेख संचयन'क दोसर खण्ड अनुप्रास प्रकाशन मधुबनीसँ 2022 मे ऐलनि। प्रकाशक श्री विद्यार्थीजीकेँ खासक' हमरा पहुँचा देब' लेल कहलथिन। जून 2023 मे श्रीमती विभा झाक एक वृहत् समारोहमे भाग लेब' जनकपुर गेलौँ। ईहो काठमांडूसँ खासक' ओही लेल आयल छला। दू दिन धरि लगभग संगहि रहलौँ। एकसरे आयल छला, तेँ परिवारसँ भेट नहि करा सकला। तकर अपसोच व्यक्त कयलनि। अपन सम्पादित बहुत विशिष्ट, बहुमूल्य ग्रन्थ A Facsimile Edition of a Maithil Play: Bhupatindramalla's Parasuramopakhyana—natak क शाही संस्करण हमरा सनेसमे देलनि, से की लिखिक' देलनि से बुझबै? With warmest personal regards to Prof. Bhimnath Jha- Ramavatar Yadav. Janakpur, Nepal, June 12, 2023. जखन कखनो हिनक मैथिलीक अनुसन्धानपरक लेख तथा उक्त पोथी पढ़ै छी तँ दू प्रकारक भावना मनमे एक्के बेर उठैए, रामावतारजीक नाम तँ शारदावतारजी हैब उचित छलनि आ हमर नाम अबुद्धिक भीमाकार पहाड़जी! एही दुनू ध्रुवक बीच मैथिली खिलखिलाइत रहथि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.उदयनारायण सिंह 'नचिकेता'-रामावतार यादव जी-जेना हम हुनका चिन्हने छलियनि उदयनारायण सिंह 'नचिकेता'-संपर्क-9434050218 रामावतार यादव जी-जेना हम हुनका चिन्हने छलियनि रामावतार यादव जी सँ पहिल साक्षात् भेल छल 1978 मे जखन हम इलिनॉय विश्वविद्यालय मे एक सेमेस्टर लेल लिंगविस्टिक इंस्टिट्यूट प्रोग्राम मे शोधरत छात्र के रूप मे गेल रही। हमरो शोध-कार्य अंतिम चरण मे छल दिल्ली विश्वविद्यालय के भाषाविज्ञान विभाग मे आ' हुनको थीसिस लगभग समाप्ति के सूचना दैत छल। ता धरि ओ एम.फील. त कैये नेने छला मुदा तखन केंसास विश्वविद्यालय के लॉरेंस कैंपस सँ ओ डॉक्टरेट डिग्री के अंतिम चरण मे छला। हम बहुत आश्चर्य चकित भेल छलहुँ अहू लेल जे जखन भारतो मे साधारणतया क्यो प्रायोगिक ध्वनिविज्ञान पर चर्चा नहि क' रहल छल, तखन केंसास के जर्नल मे हुनकर महत्वपूर्ण निबंध, 'A Fiberoptic Study Of Stop Production In Maithili' छपि चुकल छल 'केंसास वर्किंग पेपर्स इन लिंग्विस्टिक्स' के चारिम वॉल्यूम में - जतय वर्णन छलै एहि तरहक: "A fiber optic study was made to investigate the temporal course and width of the glottis during the production of four types of Maithili stops in initial, medial and final positions. The results show that the voiced-voiceless distinction correlates with the adduction-abduction gesture of the larynx. The study also suggests that glottal width is the key factor for aspiration and that sounds which are produced by a combination of vibrating vocal cords and aspiration should, in fact, be called 'voiced aspirated' consonants." हमर ज्ञानतः मैथिली कियैक, हिन्दियो मे भरिसक एहन अध्ययन क्यो नहि क' रहल छल। हँ, ई बात अवश्ये कहब जे आगाँ चलि कय श्रद्धेय डॉ सुभद्र झा जी के सुपुत्र डॉ प्रभाकर झा पेरिस मे एही तरहक काज कयने छला - सोरबोन में कैल डॉ मुनीश्वर झा के मैथिली कें आर आगाँ बढ़बैत। मुदा जे बुझलहुँ (बुझबा मे दिक्कत त छलैहे कियैक त हमर विषय छलै अन्वय अर्थात सिन्टैक्स आ' समाज-भाषा-विज्ञान। तखन हम त चौंकबे करब। भेंट करबाक इच्छा छलै - मुदा हम क' रहल छलहुँ एडवांस्ड कोर्स यहां सब विषय मे - बर्नार्ड कॉमरी के 'भाषाजगतक सार्वभौमता' (Language Universals), जॉर्जिया ग्रीन के 'भाषा-व्यवहार-विज्ञान' (Pragmatics), जेर्री सैडॉक के 'भाषाविज्ञानक तर्कप्रणाली' (Linguistic Argumentation) आ' विश्वख्यात पाणिनीय विशेषज्ञ जॉर्ज कार्डोना के 'इंडियन ग्रामेटिकल ट्रेडिशन' - मुदा ओ त ओझरल छला निरीक्षामूलक ध्वनिशास्त्रक अत्याधुनिक प्रयुक्ति के क्षेत्र मे। पहिल दर्शने आर चमत्कृत क' देबय बाला छल - हमरा ज्ञानतः एहन कोनो मैथिली के विद्वान नहि छथि जे हिनका सँ बेसी प्रभावी ढंग सँ अंग्रेजी तथा जर्मन मे अपन बात कें अंतर्राष्ट्रीय फोरम मे राखि सकै छथि। तहिये सँ हम हिनकर क्रियाकर्म कें नीक जकाँ देखैत पढ़ैत बुझैत रहलहुँ। रामावतार जी अध्यापक के रूप मे प्रसिद्ध अंग्रेजी भाषा आ साहित्य के जानकार छला - त्रिभुवन विश्वविद्यालय आ पाटन कॉलेज मे पढ़ौने छलथि। मुदा केंसास विश्वविद्यालय के प्रशिक्षण हुनका दक्षिण एशियाई देश सभक प्रमुख ध्वनि-विज्ञानी बना देलकनि। मुदा हिनक विशिष्टता ईहो जे ओ मात्र नीरस भाषाचार्य नहि छला, साहित्यो के क्षेत्र मे ओ एकटा प्रतिष्ठित नाम छथि। अन्ततः पूर्वांचल विश्वविद्यालयक कुलपति सेहो नियुक्त भेला। हुनक मूल पोथी जे हुनका ख्यातिक शीर्ष पर ल' गेलनि, से छल: जर्मनी के श्रेष्ठ प्रकाशन De Gruyter Mouton संस्था द्वारा छपल A Reference Grammar of Maithili (1996) आ' ताहू सँ पहिने Selden and Tamm प्रकाशन संस्था सँ छपल Maithili Phonetics and Phonology (1984)। देश-विदेशक भाषाविज्ञान सम्बन्धी पत्र-पत्रिका मे पचासो आलेखक प्रकाशन द्वारा ओ मैथिलीक विशिष्टताकेँ उजागर केलनि। मैथिली ध्वनिशास्त्र आ मैथिलीक संदर्भ व्याकरण 1पर काजक अलाबे 2000 ई. मे लंदनसँ प्रकाशित भारतीय आर्यभाषा पुस्तक मे संकलित हिनकर मैथिली भाषा संबंधी आलेख विशेष उल्लेखनीय छलनि। नेपाल राजकीय प्रज्ञा-प्रतिष्ठानसँ पासाङ ल्हामु प्रज्ञा-पुरस्कारसँ सम्मानित भेल छला। एहि बीच मे रामावतार जी कतेको महत्वपूर्ण बात सब कहलनि जकरा दिसि हम सभक ध्यान आकृष्ट करय चाहब। मैथिली भाषा-भाषी पर आयोजित तीन दिवसीय मिथिला कला साहित्य आ फिल्म महोत्सव 28 दिसम्बर 2018 मे ओ सहरसा के रमेश चन्द्र झा महिला कॉलेज सभागारमे कहने छला जे मैथिली भाषामे प्राथमिक शिक्षा भेनाई बहुत जरूरी अछि। मिथिला मिरर मे एकर नीक विवरण हमसब पढ़नहि छी। समारोहकेँ संबोधित करैत भाषावैज्ञानिक के रूप मे डा. रामावतार कहने छला जे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मैथिली भाषाक व्यापक स्तर पर प्रसिद्वि अछि। मुदा अपने घरमे माने अपने भूभागमे मैथिलीक स्थिति कमजोर भ' गेल अछि। हुनकर कहब छलनि जे हमसभ अपन भाषाक प्रयोग कम आ दोसर भाषाक प्रयोग बेसी करैत छी। एहन स्थितिमे प्राथमिक शिक्षामे मैथिली भाषाकेँ शामिल केनाय बहुत जरूरी भ’ गेल अछि। एहि पर हमरा सब कें गहन चिंतन करबाक जरूरी अछि आ' संगहि मैथिली भाषाकेँ अपन दैनिक जिनगीक व्यवहारमे आनयके नितांत आवश्यक अछि। हुनकर कहबाक तात्पर्य छलनि जे साहित्यक-सांस्कृतिक गतिविधि होइत रहै' आ' एहन तरहक आयोजनसँ भाषाक पकड़ मजबूत होयत। मैथिली भाषा हमर अपन भाषा अछि आ हमरा सभकेँ एहि पर गर्व होयवाक चाही। एम्हर 2021 के दैनिक भास्कर रिपोर्ट कैलक जे रामावतार जी कहलनि जे मैथिली भाषा माध्यम सँ नेपाल में राजकाज क शुरुआती प्रक्रिया के शुभारम्भ भ' गेल। बिहार सरकार तथा मिथिलांचल पछुआ रही सकैत अछि मुदा नेपाल तीव्र गतिएँ आगा बढ़ि रहल अछि। दड़िभंगा के महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय के प्रमुख डॉ. शिव कुमार मिश्र के कहब छनि जे प्रो. रामावतार यादव सँ हुनका ई जानकारी भेंटल छनि जे लैंग्वेज कमीशन आफ नेपाल तकर अनुशंसा क' देने अछि जे नेपालक दूटा प्रदेश मे राजकाज केर भाषा के रूप मे मैथिली आ' भोजपुरीक प्रयोग शीघ्र हैत। धरती पर भरिसक पहिल बेरि कोनो सरकार एकर प्रक्रिया प्रारंभ क' रहल अछि। सभक कहब छलनि जे भरसक एकर सकारात्मक प्रभाव बिहार सरकार पर सेहो पड़ि सकैत अछि। मैथिली साहित्य संस्थान क सचिव भैरव लाल दास क कहब छलनि जे नेपाल मे जाहि तरहक निर्णय लेल गेल अछि, ताहि सँ ईहो भ' सकैछ जे आब भारत सरकार सेहो मैथिली कें शास्त्रीय भाषा के दर्जा देबय मे राजी भ' जाओत। 2019 मे कोरोना सँ पहिने रामावतार जी के आर एकटा वक्तव्य हमसब सुनने छी। रमेश झा महिला महाविद्यालय मे आयोजित कला साहित्य तथा फिल्म महोत्सव मे 2018 के दिवंगत मैथिली साहित्यिक प्रतिभा - प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन, मोहन भारद्वाज, डा.प्रेमशंकर सिंह, आदि कें श्रद्धांजलि अर्पित करैत ओ कहलनि जे ज्यों आम आदमी जेना मैथिली भाषा बाजल जाइत अछि तहिना ओ बाजैत आ' लिखैत रहता तखन मैथिली नहीं मरती - हमर धरोहर विलुप्त नहि हैत। अपन रेफेरेंस ग्रामर मे यादव जी बड़ स्पष्ट रूप सँ जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सनक ओहि बात कें दोहराइने छथि जतय ओ मैथिली भाषा आ' साहित्यक गहन अध्ययनक बाद ओ उल्लेख करैत छथि: Maithili is a language and not a dialect. It is the custom to look upon it as an uncouth dialect of untaught villagers, but it is in reality the native language of (millions of) people who can neither speak nor understand either Hindi or Urdu without greatest difficulty. Alexander von Humboldt Foundation मे हुनकर जे गरिमामय शोध-समय बीतलनि ओतय यूरप के श्रेष्ठ भाषाविद लोकनि के साथ ओ काज कयने छला - कय गोटे मैथिल से जानै छथि? माइन्ज़ के प्रख्यात Institut for Indologie, जे कि Johannes Gutenberg-University Mainz मे छै, ओतहुका विद्वान् Prof. Georg Buddruss के संग ओ काज कयने छला, संगहि भारत अध्ययनक एकटा प्रमुख केंद्र किएल क Seminar for Allgemeine und Indogermanische Sprachwissenschaft, जे कि ओतहुका Christian-Albrechts-University Kiel के अंतर्गत अछि, ओतहु ओ छला। ओत्त' आचार्य वेर्नर विंटर आ' जॉन पेटर्सन के साथ ओ काज कयने छला पोस्ट डाक्टरल के समय। 2018 मे अंग्रेजी साहित्य के क्षेत्र मे प्रकाशित हुनक काज - Elegy written in a Royal Courtyard - A Facsimile Edition of Jagatprakasamalla’s Gitapancaka (जकरा एड्रोइट प्रकाशन छापने छल) सेहो देखबैत अछि जे साहित्यो मे हुनक रूचि छलनि। एम्हर ओ एकटा नव पोथी पर काज क' रहल छथि - a critical edition of an early 18th-century Maithili play मैनुस्क्रिप्ट जे कि भूपतींद्र मल्ल के रचना छलनि, तकरा पर काज क' रहल छथि। भक्तपुर शैली के नेपालमण्डल मे सोडष सदी के मैथिली नाटक के stagecraft केहन होइ छलै तकरो पर ओ काज कयने छथि। नेपाल-प्रांतक इतिहासकार आ भाषा-विद्वान लोकनि क लेल एकटा बुझौअलि जकाँ ई बात काज करैत अछि जे नेपालमंडलक क्षेत्र मे - जतय शासक आ आम जनता नेवारी बजैत छल, ओतय मध्यकाल मे कोना एकटा भारतीय-आर्य भाषा- अपन साहित्यिक अभिव्यक्ति कें प्रतिष्ठित क' पौलक एकटा अत्यंत शक्तिशाली आ मजबूत साधनक रूप मे तकर आविर्भाव भेलै - एहि केर निदानक रूप मे रामावतार जीके नवतम काज मे प्रयास कयल गेल छनि। ई नेपाल-तिरहुत कनेक्शन कोना बनल, आओर भूपतिन्द्र मल्ल (1696-1722) जकाँ मैथिली नाटककार कोना आविर्भूत भेला ई तकरे ऐतिहासिक-राजनीतिक-भाषिक दलील बनि सकत से हम विश्वास करै छी। अंत मे केहन केहन अपमानजनक परिस्थिति के भीतर सँ मात्र 'मधेशी' हैबाक कारणें एहन महान व्यक्तित्व कें जीवन व्यतीत करय पड़ल छलनि, तकर एकटा मर्मस्पर्शी विवरण पाठक देखि सकैत छथि हुनक दीर्घ निबंध 'ऑन बीइंग मधेशी' मे। जे 'मधेशनामा' मे प्रकाशित भेल छल। दक्षिण एशियाई देशक पुनः पुनः विभाजन सँ कतेको प्रतिभाशाली व्यक्ति कें हम सब मिलि कय दूर किनार क' कय रखने छी से हम अपन बारम्बार बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका तथा पाकिस्तान भ्रमण के माध्यमें देखने छी - अपन कतेको प्रिय अफ़ग़ान छात्र सँ सेहो जानने छी। तैं हमरा प्रसन्नता भेल ई जानि कय जे ई-विदेहक एकटा विशेषांक बहरा रहल अछि जे कि मित्रवर रामावतार यादव जी जकाँ व्यक्तित्व पर समर्पित अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.धीरेन्द्र झा 'मैथिल'-भाषा वैज्ञानिक प्रो. डा. रामावतार यादव धीरेन्द्र झा 'मैथिल' (संपर्क- जनकपुर) भाषा वैज्ञानिक प्रो. डा. रामावतार यादव जनकपुर उद्योग-वाणिज्य संघक सभा हॉल प्राङ्गन। ओ एकटा प्लास्टिक बला कुर्सीपर बैसल रहथिन। काँख तर जाँतल प्लास्टिक फाइल रहनि। अंतर्राष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन ओतऽ आयोजन छलै। कार्यक्रम होबऽसँ पहिनहि ओ उपस्थित छलाह। हमहूँ तहिना सकाले पहुँचि गेल छलहुँ। हम हुनका देखलियनि, मुदा नीक जकाँ परिचय नहि छल तँइ काते-कात ठाढ़ छलहुँ। ओ किछु बजैत छलखिन। मैथिली शब्द, वाक्य आ भाषा विज्ञान संबंधी विषय-वस्तु ककरो बुझबैत छलखिन। हमरो मन-मस्तिषक हुनके शब्दपर टाङल छल। चीन्हजान नहि रहितो हुनक प्रभाव हमरापर बढ़ैत जा रहल छल। हमरो नहि रहल गेल। हम ससरि कऽ हुनका बगलमे ठाढ़ भऽ गेलहुँ। भाषा आ शब्द जे हुनका मूँहसँ निकलि रहल छलनि से गंभीर ओ भरिगर हमरा अनुभव भेल। हम रुचिपूर्वक हुनकर बात सूनऽ लगलहुँ। अपन बात रखैत क्रममे ओ कहलखिन जे "लोक हमरा ब्राह्मण बुझैत अछि। छथि, अछि, केलखिन, बजलाह, चलि गेलाह, की कहबाक अछि, आदि-आदि शब्द जँ कोनो अनजान व्यक्ति सुनैत छथि तऽ हमरा 'बाभन छै की?' से प्रश्न कऽ दैत अछि। रामावतार यादव तऽ बाभन भाषापर जोर दैत छथिन। ओ तऽ बाभनकेँ समर्थ करै छथिन। ओ तऽ बाभन प्रभावित व्यक्ति छथि।" अपनेसँ ई बात ओ बजलखिन। तहन हम बुझि गेलहुँ जे इएह व्यक्ति डा. रामावतार यादव। हमर मोन प्रसन्न भऽ गेल। बहुत दिनसँ ई बात मोनमे घुरिआइत छल। बहुत दिनसँ डा. साहेबसँ भेंट करबाक नियार छल। कतऽ भेटताह, कोना भेटताह? एहि तरहक बात हमरा मोनमे बहुत दिनसँ खेलि रहल छल। हमरा मोनमे एकटा अलग प्रकारकेँ खुशीक तरङ्ग उठि बैसल। हिनकासँ किछु बात करबाक चाही आ किछु जिज्ञासा रखबाक चाही-एहि तरहक बात हमरा भीतर उत्पन्न भेल। प्रो. डा. रामावतार यादव असाधारण व्यक्तिमेसँ एक छथि। अंग्रजीक विद्वान छथि। सुप्रसिद्ध भाषावैज्ञानिक छथि। मैथिली भाषापर अनेक शोध-अनुसंधान केने छथि। भाषा की छै? कोन ठाम कोना बाजल जाइत छै? शब्द कोना लिखल जाए? शब्दक उच्चारण कोना कएल जाए? मैथिली कतऽ, कोन तरहे बाजल जाइत अछि? एहि सभ परिवर्तनक पाछा कारण की छै? एहि तरहक सभ विषयपर स्वयं लिखल पोथीमे चर्च केने छथिन।ब्राह्मण-कायस्थक भाषा एवं अन्य जातिक भाषामे फरक रहल जकर उल्लेख ओ केने छथिन। हुनका अनुसार भाषामे जगहक अनुसार फरक होइत छैक। बाजब फरक होइत छै। मुदा लीखलमे एकरूपता हेबाक चाही। अंग्रेजी, हिंदी, नेपाली वा अन्य भाषाक व्याकरण जकाँ मैथिलीक सेहो छै। मैथिली समृद्ध भाषा छै। शब्द- व्याकरण आन भाषासँ पैघ छै। नेपालीमे- उहाँ आइसक्नु भयो' आदरसूचक वाक्य जेना होइत छैक तहिना मैथिलीमे 'ओ आबि गेलाह' शुद्ध बाजल जेतै आ तहिना लिखल जेतै। ई नहि जे 'ऊ अलै', 'ऊ आबि गेलै' 'ऊ एलै', 'ऊ एलखिन' इत्यादि कनफ्यूजन बात बिल्कुल नहि हेबाक चाही। एहि तहक बात हुनका मूँहसँ बेर-बेर सुनबाक अवसर भेटल। ओ स्पष्ट केलखिन- "भाषा ब्राह्मण वा अन्य ककरो खरीदल नै छै। सज्झा संपति छै। भाषोक जाति अनुसार बाँट-बखरा जे केयो करऽ चाहै छथि ओ नीक नहि छथि। ब्राह्मण समुदायमे मैथिलीक शुद्धता देखल गेल अछि। नीक बातकेँ अनुशरण करबाक चाही। जबरदस्ती हम इएह शब्द बाजब वा लिखब जे कियो कहै छथि, नीक नहि भेल। मैथिली शब्दकोश छै, व्याकरण छै, भाषाविज्ञानक शोधपत्र छै, काव्य, निबंध, नाटक, उपन्यास, कथा, इतिहास लगायत अनेक तरहक पोथी छै। हमरा लोकनिकेँ अध्य्यन करबाक चाही।" ओ ईहो बातपर जोड़ देलखिन जे "मैथिली भाषी फुट-फुटि कऽ मगही-मगही अनाप-सनाप बात केनिहार नीक बात नै भेलकै। ई दुर्भाग्य जे एहि तरहक बात केओ करै छथि वा चेष्टा करै छथि। मैथिलीमे व्यक्ति पाछा आदरसूचक शब्द छै। जेना- बाबू लेल-- बाबू आबि गेलाह / आउ माय लेल-- माय आबि गेलीह / आ समधि लेल-- समधि आबि गेलाह / आएल जाओ जमाए लेल-- जमाय आबि गेलथि / आउ बौआ लेल-- बौआ आबि गेलै / आउ सभ के लेल एकहि तरहक शब्द-वाक्य नहि होइत छैक। सिखबाक प्रयास करी। नीक-नीके होइत छै। हमरा बाजब नहि भेल तऽ गोबर-माटि मिझरा देबै, से सोच जे केओ करै छथि से नीक नहि भेलै। प्रो. डा. रामावतार यादवजीकेँ ताहि दिन हम नीक जकाँ चिन्हलियनि। मैथिली भाषाविज्ञानक ओ जननी छथि नेपालक परिप्रेक्षमे। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.राम चैतन्य धीरज- भारोपीय भाषा परिवारवाद आ भाषा दर्शन राम चैतन्य धीरज (संपर्क- 6203681693) भारोपीय भाषा परिवारवाद आ भाषा दर्शन मैथिली भाषा विज्ञान आ धरि ओही भारोपीय भाषा परिवारसँ संगठित आ निर्धारित अछि जे हमर भाषाकेँ गुलामीक जंजीरमे तेना जकड़ि देलक जे आइयो रहरहाँ हिंदी मैथिलीकेँ अपन बोली कहि धकियाबैत रहैत अछि। भारत सरकार एकरा संविधानक अष्टम अनुसूचीमे स्थान देलक, तकर बादो हिंदी भाषाक राजनीति मैथिलीकेँ अपन बोली कहबासँ बाज नहि अबैत अछि। ई मानल जे संस्कृतसँ मैथिलीक विकास भेल अछि, जखन कि ई तथ्य यथार्थ नहि छैक, तथापि मैथिलीक तद्भव संस्कृतसँ विकसित अछि से मानैत छी। विश्वक कोनो एहन भाषा नहि जकरामे किछु ने किछु ध्वनि साम्य नहि हो, तँ एहि दृष्टिसँ कोनो राष्ट्र वा क्षेत्र विशेषक स्वाधीन भाषा अस्मिताकेँ नकारि नहि सकैत छी। आ तेँ भाषा चिंतनक जे आयाम निर्धारित होइछ, ओ टूटैत रहल अछि। संरचनावादी दृष्टिकोणक मानब छल जे जँ एहि दृष्टिकेँ विश्व मानव ग्रहण कऽ लिअए तँ भेदक समस्या समाप्त भऽ जाएत। ई सर्वविदित अछि जे ई प्रयोग साम्राज्यवादी शक्ति अंग्रजी तंत्र प्रारंभ केलक आ एहि दृष्टिकोणसँ विश्वमे दू टा विश्व युद्ध भेल आ अंततः प्रत्येक राष्ट्र साम्राज्यवादी शक्तिसँ संघर्ष कऽ स्वयंकेँ स्वाधीन केलक। अपन भाषा-संस्कृति, विचार ओ व्यवहारकेँ समृद्ध केलक। आइ राष्ट्र भाषा तथा एकर विवेक स्वाधीन अछि तथा पैघ माछ छोटकेँ खाइत अछि, ई मान्यता क्षेत्रीय भाषाक समक्ष बनल अछि। हिंदीक मानसिकता जे भारोपीय भाषा-परिवारसँ निर्धारित छल, एखनो धरि अपन स्वभावसँ मुक्त नहि भेल अछि। माने हिंदी अंग्रेजियतक शिकार अछि। की मैथिली एहि परिवारक संग जीवित रहि सकत? हमरा जनैत आब मैथिली साम्राज्यवादी मानसिकताक गुलामी खटबाक लेल तैयार नहि अछि। एकर स्वतंत्र इतिहास दृष्टि छैक तथा अवधारणा आ विचारक आयाम छैक, जाहिसँ एकर ऐतिहासिक संस्कृति लोकभाषा आ वेदभाषाक व्यवहार सामंजस्यमे सुरक्षित अछि। वेद भाषक समानान्तर लोक भाषा चल जकरा ॠगवेदमे मानुषी भाषा कहल गेल अछि। कालक्रममे इएह मैथिली भाषाक नामसँ प्रसिद्ध भेल। साम्राज्यवादी सोचक जंजीर टूटि रहल अछि आ एकरा समग्र रूपें तोड़ि देबाक हम आग्रही छी। ताहि लेल निरपेक्ष अनुसंधानक आवश्यकता छै। संरचनावादी तोता रटंतसँ ई संभव नहि। हम तुलनात्मक भाषा विज्ञानकेँ समीचीन मानैत छी मुदा एकरा अंग्रेजियतसँ मुक्त होबऽ पड़तै। विचार सभमे होइत अछि, मुदा सृष्टि वा उत्पति संदर्भें विचार वा जिज्ञासा सभमे नहि होइत अछि। आ जँ होइतो अछि तँ जिज्ञासाक समाधान स्वयंमे सभ नहि होइत अछि। ओकरा लेल कोनो शिक्षक वा विशेषज्ञसँ ज्ञान लिअ पड़ैत छैक। स्वयंमे जिज्ञासा आ स्वयंमे समाधान विरले मानवमे होइत अछि। वस्तुतः विचारक प्रक्रिया जिज्ञासा वा प्रश्न तथा समाधान वा उत्तरमे निहित होइत अछि। तेँ विचारक वा वैज्ञानिक प्रकृति रूपसँ विरले होइत छथि। माने दर्शन वा विज्ञान विरले होइत अछि। दर्शन कोनो प्रकारक जिज्ञासाक समाधान चेतना वा प्रकृति संदर्भमे अपन चेतन विवेकसँ करैत अछि, तँ विज्ञान दर्शनक ज्ञानकेँ निरीक्षण-परीक्षण तथा अनुसंधानसँ व्यवहारिक बनबैत अछि। तें विचारक प्रक्रियामे संसार अछि आ एकर क्रिया-प्रतिक्रिया अछि। चेतना स्वयं विचार प्रक्रियामे आबि दार्शनिक आ वैज्ञानिक होइत अछि तथा अपन-अपन ज्ञानसँ संसारकेँ सहज आ पारदर्शी बनबैत अछि। विशेषज्ञ तथा विचारकमे अंतर होइत अछि। विशेषज्ञ अपन विषय तकर सीमित होइत छथि तँ विचारक दर्शन आ विज्ञान तक विस्तृत। हमरा जनैत मैथिली भाषामे भाषोत्पति सन गूढ़ आ रहस्यात्मक विषयकेँ कियो नै सोझड़ौलनि अपितु एहि विषयपर हमहीं नव रूपसँ विचार केलहुँ। एहि संदर्भकेँ 'मन आ भाषोत्पति' मे देखल जा सकैत अछि।1 हमरा जनैत भाषाक उत्पति विचार प्रक्रियाक स्फोट थिक। पहिने आकस्मिक रूपें भाषाक विचार मनमे आएल आ तत्पश्चात क्रमिक रूपें ई स्वरयंत्रसँ अभिव्यक्त भऽ अनुसंधानक क्रममे आकृति-प्रकृति ग्रहण करैत, संसारकेँ नाम रूप प्रकृतिमे बदलि देलक। पहिने- हे, हो, हेयो, हेय आदि संबोधनक उ्चारण भेल हएत।2 मात्र मूँहसँ उच्चरित शब्द भाषा नहि थिक, अपितु शरीरक ऐन्द्रिक क्रियासँ कएल गेल व्यवहार-विचार भाषा थिक। तेँ भाषाक दू रूप होइत अछि- वाचिक तथा कायिक। उच्चारण नियम कायिक भाषाक परिणाम थिक। चेतना सभ क्रिया भाषिक होइछ। भाषा अपन अव्यक्तावस्थामे कायिक रहैछ, मुदा व्यकतावस्थामे ई भाषिक भऽ जाइत अछि। अर्थात चेतनाक कार्य भाषा रूपमे व्यक्त होइत वाचिक भऽ जाइत अछि। वाचिक भाषामे ध्वनिक महत्ता सभसँ बेसी भऽ जाइत अछि। किएक तँ ध्वनिएँ वर्ण-स्वर तथा अक्षर समूहसँ भाषामे आकृत भऽ जाइत अछि। तें ध्वनिक आकार-प्रकार, जे प्राणवायुसँ निर्धारित होइत अछि- ओ मात्राबलक संग स्वरूपक निर्माण करैत शब्दमे रूपांतरित भऽ जाइत अछि। एहिसँ ध्वनि शास्त्र एवं व्याकरण निर्मित होइत अछि। अर्थात ध्वनि प्रभाग एवं वाक्य प्रभागक निर्माण होइत अछि। अस्तु भाषा विज्ञान एही प्रभागमे अभिव्यक्त होइत चलि जाइत अछि। प्रो. डा. रामावतार यादव वस्तुतः विचारक नहि अपितु विचार कएल गेल भाषा संरचनाक वैज्ञानिक उपस्थापन दऽ मैथिली भाषाकेँ विश्वपटलपर अनबाक प्रयास केलनि जाहिसँ विश्व संरचनावादी भाषाक निकट मैथिली सेहो विस्तार पौलक। अंग्रेजीमे मैथिली ध्वनिक निरीक्षण-परीक्षण कऽ ओही परंपरामे एकर संदर्भित विश्लेषण करैत समग्र मैथिली व्याकरण आ एकर अवधारणाकेँ ई आयाम देलनि। मुदा एहि विश्लेषणक आधार रहल संरचनात्मक भाषाक (structured language) स्वरूप आ विकास, जकरा अंग्रजीक विद्वान अपन कल्पनाक विधि-नियममे पारंपरिक स्वरूप देलनि। अंग्रजी विद्वान भारोपीय भाषा परिवारक संरचनावादी दृष्टिकोणकेँ स्थापित केलनि आ एही परंपरामे कथित आधुनिक भारतीय भाषाक विकास देखौलनि आ ई मानलनि जे एहि भाषा परिवारक जननी कोनो एकटा भाषा हएत। प्रायः ई मानि लेलनि जे जननी भाषा संस्कृत अछि आ एही भाषासँ भारोपीय भाषा परिवारक विकास भेल अछि। आधुनिक भारतीय भाषाक विकासक संदर्भमे एहि विचारक मान्यता अछि जे वैदिक संस्कृतसँ लौकिक संस्कृत आ क्रमशः प्राकृत तथा अपभ्रंश होइत आधुनिक भारतीय भाषाक विकास भेल अछि। एहिमे मैथिली भाषाक संदर्भ संस्कृत, मागधी प्राकृत आ अपभ्रंशसँ जुड़ल अछि। एकर उपलब्ध साक्ष्य लोक व्यवहार तथा विचार नहि अपितु ओहि पुस्तक सभसँ लेल गेल अछि जे पुस्तक कोनो व्यक्ति वा व्यक्ति-परंपरामे लिखल गेल अछि। जन व्यवहार आ विचारक आधारपर भाषोत्पति एवं एकर विकासकेँ मोजर नहि भेटल। जर्मन भाषा दार्शनिक लुडविग विटजेन्सटीन (Ludwig Wittgenstein) लिखैत छथि जे -if we had to name anything which is the life of the sign, we should have to say that it was its use. 3 ई उपयोगितावादी विचार, संरचनावादी विचारक एकमात्र चुनौती छल, जे शब्दक प्रयोग व्यवहार एवं उपयोगितापर आधारित होइछ, कहैत अछि। ताहि कारणे कोनो प्रकारक अमूर्त विधि-नियममे विकासकेँ देखेबाक नव-नव क्षमता नहि होइत अछि। ई एकटा नियममे मूर्त स्वरूप नहि रहि जाइत अछि। संगहि ई परंपराक रूपमे नव चिंतन, मनन आ नव चेतनाक आधार नहि बनि पबैत अछि तेँ Ludwig Wittgenstein परंपरासँ स्थापित नियमकेँ अमूर्त विधान मात्र कहैत छथि। "A rule is an abstract entity" 4 एकरे अध्ययनमे मनुष्य अपन ऊर्जाकेँ नष्ट कऽ लैत अछि। नव दृष्टिक विकास वा मूर्त विचार जे व्यवहार सिद्ध होइत अछि, तकर विकास संभव नहि। ई ईहो लिखैत छथि जे "the scientific framework is not appropriate everywhere, and certainly not for philosophical investigations." 5 तें नव अवधारणा वा कोनो नव खोज कोनो खास नियमसँ प्रतिबंधित नहि होइत अछि अपितु नव परिकल्पनाक संग एकटा मार्ग बनबैत अछि, जकर विचार आ व्यवहार जन-समूहक भाषा व्यवहार होइत अछि। वस्तुतः प्रो. डा. रामावतार यादव संरचनावादी भाषा परंपरामे हमर विचार आ दर्शनकेँ देखलनि आ तेँ हिनका हमर तर्क आ प्रमाण प्रतिकूल बुझा पड़लनि-"Dhiraj's claim may tend to tacitly imply that the grammatical system of the New Indo-Aryan language Maithili had indeed intruded and/or influenced the structure of the grammar of the Old Indo-Aryan Vedic. Sanskrit of the Rgveda. Lately, in contradistinction to contemporary knowledge on the probable time of the origins of the New Indo-Aryan languages, including Maithili, Dhiraj (2019: 127) has unabashedly reiterated his earlier untenable position and additionally erred into claiming about the existence of Maithili" 6 वस्तुतः आमलोके जकाँ विद्वानक दृष्टि अपने ज्ञानक अनुशीलनमे होइत अछि, तेँ ओ अपने ज्ञान-विज्ञानसँ दोसरोकेँ देखैत छथि आ मतखंडन करैत छथि। प्रो. डा. यादव हमरा संदर्भमे जे किछु लिखलनि ओ हिनक संरचनावादी दृष्टिक प्रतिबिंब थिक जखन कि हमर दृष्टि मैथिली भाषाक विकास संदर्भे- 'भाषाक स्वरूप तथा मैथिली भाषाक विकास' मे स्पष्ट अछि जे ॠगवेद कालमे ज्ञान-विज्ञानक भाषा वैदिक संस्कृत छल, जकरा हम लेख्य अवग्राही भाषा कहने छी, तथा बोलचालक भाषा एकर समानान्तर लोक भाषा छल, जकरा हम संभाष्य अवग्राही भाषा कहने छी। ओहि समयमे संभाष्य अवग्राही भाषा लेख्य अवग्राही भाषासँ सर्वथा स्वतंत्र छल।7 हम ' ओ ना मा सी धं' आलेखमे ईहो स्पष्ट केने छी जे ई ॠगवेदक 'एम सिद्धं' सँ विकसित अछि। 'एम सिद्धं', 'ॐ नमः सिद्धम् > ओ ना मा सी धं'। इएह वैदिक संस्कृतसँ लोौकिक संस्कृत तथा मैथिली भाषाक विकास थिक। एहि ज्ञानक विकास मिथिलेमे भेल। तेँ सिलेट पकड़ैत काल देवनागरी लिपिक प्रारंभमे ओ ना मा सी धं' सँ होइत छल। हम स्वयं एकर गवाह छी। माने तत्समसँ मैथिली तद्भवक विकास भेल अछि। ओ ना मा सी धं विशुद्ध दर्शन थिक आ प्रारंभिक अक्षर ज्ञान थिक। व्याकरणक उत्स थिक। अभिप्राय ई जे व्याकरणक उत्पति दर्शनसँ भेल अछि, प्रत्येक ध्वनिक अपन दर्शन होइत छै।8 तेँ नव परिकल्पना भाषाक क्षेत्रमे दर्शन थिक आ एकरासँ अलग व्याकरण कार्यरूप कोनो तरहें अलग सिद्ध नहि अछि। तेँ कोनो टा नव परिकल्पना अपन दार्शनिक अनुसंधान तर्क आ प्रमाणेक आधारपर करैत अछि। हम ॠगवेदमे व्यवहृत तात्कालीन लोक भाषा (संभाष्य अवग्राही भाषा)क पचास टा शब्द जे प्रथमे मण्डलसँ लेल गेल अछि संगहि अही मण्डलमे 'यो' संबोधनक प्रयोगक आधारेपर अपन मैथिली भाषा दृष्टिकेँ स्थापित केने छी, जे वैचारिक प्रभावमे भाषा दर्शन थिक, व्याकरण नहि।9 हमर दृष्टि संरचनावादी भाषा विज्ञान नहि, अपितु भाषा दर्शन अछि, जाहिमे नव-नव अनुसंधानक तेवर बनल रहैत अछि। हमरा जनैत भाषा दर्शनकेँ व्याकरणक आवश्यकता अही लेल पड़ैत अछि जे शब्द वा वाक्यक उपास्थापन शुद्धता हो। नहि तऽ भाषा दर्शनकेँ व्याकरणक कोनो आवश्यकता नहि अछि। ई सर्वविदित अछि जे ॠगवेद वा अन्यवेदक भाषा व्याकरण सिद्ध नहि अछि आ व्यवहारक भाषा पुश्त दर पुश्त लोक मूँहसँ हस्तांतरित होइत अछि, ईहो कोनो व्याकरण सिद्ध नहि छल-तखन व्याकरणक संरचनाक आधारपर भाषा दर्शनक कसौटी कोना मानी आ कोना भारोपीय भाषा परिवारक विकासकेँ समीचीन मानी। वेदकेँ जनबाक लेल व्याकरण बहुत बादमे बनल, मुदा भाषा दर्शनेमे वेद अछि, जकर भावात्मक साक्षात्कार शब्द दर्शनमे निहित अछि। मैथिली भाषाक विकास हमरा जनैत तत्सम > प्राकृत > अपभ्रंश होइत नहि अपितु तत्समसँ सीधे मैथिली तद्भवमे भेल अछि आ देशजसँ तत्सम सेहो बनल अछि।10 हमरा लेल महत्वपूर्ण भाषा दर्शन अछि, घिसल-पिटल तथाकथित भाषा विज्ञान नहि। बिरिछ, हाथ, काठ, पीठ आदि शब्दक विकास सीधे वृक्ष, हस्त, काष्ठ, पृष्ठ आदि तत्सम शब्दसँ भेल अछि, नहि कि एकरा लेल कोनो प्राकृत वा अपभ्रंश चक्रायल। जहिना तत्समसँ मैथिली तद्भव शब्दक विकास भेल, तहिना विदेशी शब्दसँ मैथिली विदेशज शब्दक विकास सेहो भेल। जेना- दरोगासँ दरोगा, नजरसँ नजरि, पोस्टकार्डसँ पोस्टकाट, स्टेशनसँ टीशन आदि। हमरा जनैत ॠगवेद कालमे वैदिक संस्कृत ज्ञान-विज्ञान तथा राज-काजक भाषा रहल हएत। एकर समानान्तर मानुषी भाषा (जकरा बादमे मैथिली भाषा) कहल गेल, से छल। तेँ मैथिलीक विकास मानुषी भाषासँ भेल, कहल जेबाक चाही। वस्तुतः मैथिली, मिथिला आ मैथिलक विकास एकर अपन भूगोल संस्कृति, विचार एवं व्यवहारसँ भेल अछि तेँ मैकाले शिक्षाक अनुसार एकर विश्लेषण नहि हेबाक चाही। ईहो सर्वविदित अछि जे संस्कृत संस्कार कएल गेल भाषा थिक जे तात्कालीन लोक भाषाकेँ धातु, उपसर्ग तथा प्रत्ययसँ संस्कार कऽ संस्कृत बनाओल गेल। तेँ ई कहियो जन-सामान्यक उपयोगक भाषा नहि रहल। विद्यापति स्वयं एकरा स्वीकार करैत कीर्तिलतामे लिखलनि अछि जे- सक्कयवानी बहुअ न भावय, पाउअ रस को मम्म न पाबय, देसिल बयना सभ जन मिट्ठा, तेँ तैसन जम्पओ अवहट्ठा अर्थात संस्कृत बहुजनकेँ नीक नहि लगैत अछि। प्राकृत मर्मकेँ व्यक्त नहि कऽ पबैत अछि। देसी बाषा सभकेँ मीठ लगैत अछि। तेँ एहने सन अवहट्ठ भाषाकेँ जन्म दऽ रहल छी। स्पष्ट अछि जे संस्कृत अभिजात्यक भाषा रहल अछि। तेँ मैथिली भाषाक संदर्भमे मैकाले शिक्षा यथार्थ नहि अछि। ई मानल जे मैथिली भाषाक संदर्भमे अंग्रेजी विद्वान बहुत किछु देलनि, मैथिलीक उद्भव आ विकासक संदर्भमे प्रो. डा. यादव जाहि भारोपीय भाषा परिवारक आधारपर हमर परिकल्पनासँ असहमति जतौलनि, वस्तुतः ई हिनक भ्रामक दृष्टिकोण थिकनि। कोनो विज्ञान दर्शनेसँ प्रारंभ होइत अछि तेँ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीकेँ एही आधारपर रेखांकित करबाक चाही। एही रेखांकनसँ नव अवधारणा आ चेतनाक विकास संभव हएत। प्रत्यक परिकल्पनामे एकटा विज्ञान निहित होइत अछि। ओना विज्ञानक आधारे परिकल्पना थिक, तेँ विज्ञानकेँ अनदेखा नहि करबाक चाही। उपनिषद् जे विज्ञानकेँ पराभौतिकी मानैत अछि 11 आ भाषाकेँ ध्वनि एवं विचारसँ संश्लिष्ठ करैत अछि 12। माने विज्ञान आ भाषा एकटा परा भौतिकी अवधारणा थिक, जे अंततः चेतना आ एकर भाषिक विशेषताकेँ स्वीकार करैत अछि आ मानैत अछि जे विज्ञान चेतना थिक आ आ एहि चेतनासँ भाषात्मक संसारक उत्पति अछि 13। तेँ एक वा अनंत भाषे दर्शनक प्रतिपाद्य थिक। हमरा जनैत भाषा जँ नहि होइतैक तँ संसार अव्यक्त रहितैक तथा सभ्यता-संस्कृति नामक कोनो अवधारणा नहि होइतैक। तेँ समग्र बौद्धिक आनंद भाषाक अंतर्भावमे निहित अछि, जे कर्म रूपमे रूपांतरित होइत अछि। एकरा व्याकरणसँ नहि भाषे दर्शनसँ बूझल जा सकैत अछि। कोनो भाषाकेँ समग्र रूपेँ ओकर साहित्यसँ नहि बूझल जा सकैत अछि, अपितु जनबोध आ जनसरोकारसँ बूझल जा सकैत अछि। साहित्यमे व्यक्तिक भाषा, वस्तु तथा भावात्मक दृष्टि होइत अछि, जखन कि जनसरोकारमे समग्र सभ्यता आ संस्कृति। वैदिक संस्कृत वा लौकिक संस्कृत जन सरोकारक भाषा नहि थिक अपितु ज्ञान-विज्ञानक भाषा थिक तेँ एकर संबंध सीधे विद्वान वर्गसँ भऽ जाइत अछि, जखन कि सामान्य जनक दृष्टि, विचार आ व्वहार एकर मौलिक धारामे नहि रहैत अछि, तेँ एकरासँ सामान्य जनकेँ कोनो संवाद नहि रहल। अस्तु, व्याकरण जे वेदोक नहि रहल, ओहि आधारपर हम व्याकरण संरचनाक महत्व कतेक दी-विचारणीय अछि। हमर परिकल्पनामे प्रमाण अछि, तर्क अछि जे चेतनाक गुणीभूत भाषा दृष्टिकेँ व्यक्त करैत अछि। अस्तु, व्याकरणक विवशता अछि जे ई भाषाकेँ शुद्धता दृष्टिसँ सुधारि सकैत अछि, मुदा जन्म नहि दऽ सकैत अछि। हमरा जनैत व्याकरणोक आधार दर्शन ताकब आवश्यक, जाहिपर व्याकरण संख्या आदेशमे अछि। ओना व्याकरण कथित शुद्धताक साम्राज्य बनेबाक दृष्टि अवश्य राखैत अछि, मुदा प्रकृतिक सापेक्षिक नियम एकर विरुद्ध अछि, तेँ शुद्धताक साम्राज्य नहि बनि पबैत अछि। एना किएक, ताहि लेल व्याकरणकेँ बुझबासँ पूर्व एकर दर्शनकेँ बूझब आवश्यक। व्यक्तिनिष्ठ परंपराक आधारपर कल्पित भारोपीय भाषा परिवार एहन संरचनावादी अवधारणा हमरा जनैत द्वितीय विश्वयुद्धक बादे अप्रासांगिक भऽ गेल। भाषाक नव दृष्टि भाषा दर्शनसँ फरिच्छ होअए लागल, जे विश्वकेँ एकटा नव दृष्टि देलक आ साम्राज्यवादी हिंसाक विरुद्ध स्वाधीनता आ शांतिक नव चेतना देलक। प्रो. डा. यादवकेँ एहि दिशामे सोचबाक चाही आ शांति एवं मुक्तिक संवादकेँ पुनः दासत्वक जंजीर नहि देबाक चाही। संदर्भ- 1. भाषा विचार आ मैथिलीक प्राचीन साहित्य (राम चैतन्य धीरज, पृष्ठ 11-28) 2. तत्रैव 3. The Blue and Brown Books (पृष्ठ-4) 4. Philosophical Investigations (पृष्ठ 185) 5. तत्रैव (पृष्ठ 240) 6. Historiography of Maithili Lexicography & Francis Buchanan’s Comparative Vocabularies (Fascimile Edition of the British Library London Manuscript) Edited by Ramawatar Yadav (पृष्ठ 17-18) 7. मैथिली भाषाक वैचारिक अस्मिता (राम चैतन्य धीरज, पृष्ठ 116-124) 8. भाषा विचार आ मैथिलीक प्राचीन साहित्य (राम चैतन्य धीरज, पृष्ठ 78-84) 9. मैथिली भाषाक वैचारिक अस्मिता (राम चैतन्य धीरज, पृष्ठ 124) 10. भाषा विचार आ मैथिलीक प्राचीन साहित्य (राम चैतन्य धीरज, पृष्ठ 25-28) 11. तैत्तिरीयोपनिषद् (प्रथम एवं सप्तम अनुवाक) 12. तत्रैव 13. तत्रैव अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.डॉ. धनाकर ठाकुर- ध्वनिविज्ञानी प्रो. डा. रामावतार यादवक अनुसार वर्णरत्नाकरक भाषा मैथिली डॉ. धनाकर ठाकुर (संपर्क- 9843376861) ध्वनिविज्ञानी प्रो. डा. रामावतार यादवक अनुसार वर्णरत्नाकरक भाषा मैथिली ध्वनिविज्ञान भाषाक एकटा शाखा थिक जकरा विषयमे सामान्य जनक ज्ञान सीमित रहैत अछि। डा.रामावतार यादव एहिपर काज कएलन्हि आओर मैथिलीपर सेहो। तेँ हुनक नाम हमहुँ सूनलहुँ। पढ़बाक संयोग अनायासहि भेल, कारण ई हमर विषय नहि अछि, तथापि अपन मातृभाषाकेँ उपेक्षित कोना क' सकै छी। मातृभाषा लेल केओ किछुओ केलन्हि ओ आदरणीय छथि। एहि क्रममे हमरा हुनकासँ मात्र एक बेर भेँट काठमांडूमे उनैसम अन्तरराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलनक उपरांत भेल छल 14 अप्रैल 2009 ई. केँ। अन्तरराष्ट्रिय मैथिली परिषदक शिष्टमंडलकेँ नेपालक महामहिम उपराष्ट्रपति परमानन्द झासँ भेँट करबाक छल जाहिमे अन्तरराष्ट्रिय मैथिली परिषदक निवर्तमान अध्यक्ष डा. भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैता आ' नवनियुक्त अध्यक्ष डा. कमलकांत झाक संग डा. रामावतार यादव सेहो छलथि। बहुत बात आब हमरा याद नहि अछि, मुदा डा. रामावतार यादवक एकटा बात स्मरण जरूर अछि जे ओ गुरूमैताजीकेँ कहलखिन्ह जे गुरुमैताजी, "वर्णरत्नाकरक भाषा मैथिली अछि"। हमरो तँ यैह बूझल छल जे ओ मैथिलीक पहिल पोथी उपलब्ध अछि आओर यैह डा. रामावतार यादव सेहो मानैत छथि। एकर चर्च डा. यादव अपन पोथी "A Reference Grammar of Maithili'क पृष्ठ संख्या 13 पर कएलनि अछि। एहि प्रसंग पहिनहुँ कतोक ठाम अनेक विद्वान् लोकनि द्वारा कएल गेल अछि। तत्कालीन समय जँ विश्वकोश होइतैक तँ तकर खोज अवश्य भेल रहैत आ' तखन मैथिली क्लासिकल भाषामे आबि जाइत। मुदा, ई मैथिली वा अन्य प्राक्मैथिली भाषा मध्य विद्वान् लोकनिक बीच अद्यावधि विवादक विषय बनल अछि। गुरुमैताजी कम बजैत छथि, किछु नहि बजलाह वा चलैत कालमे नहि सुनलाह किन्तु एक बात जरूर जे डा. रामावतार यादवक अनुसार वर्णरत्नाकरक भाषा मैथिली अछि आओर हमरासन सामान्य लोकक लेल यैह पर्याप्त। आब हुनक पोथी 'A Reference Grammar of Maithili' पर किछु विचार कएल जाए। अंग्रेजीमे लिखल करीब चारि सए पृष्ठक ई पुस्तक एकटा संदर्भ ग्रन्थ थिक। एहि पोथीक पहिल अध्याय मैथिली व्याकरण सान्दर्भिक एक शताब्दीक परम्परापर अछि जे जार्ज अब्राहम ग्रियर्सनक 1881ई.क लिखल व्याकरणसँ प्रारम्भ होइत अछि। पश्चात् आर. झा -1955ई., बालगोविंद झा 'व्यथित' 1966 ई., पं.गोविन्द. झाक 1966ई., डी. झा 1976 ई., वाई. झाक 1979 ई., भैरवलाल दास आ' आनन्द मिश्र मैथिलीक व्याकरण लिखलन्हि जकरा सभक चर्चा प्रस्तुत पुस्तकमे भेल अछि। एहि पोथीमे आठ स्वर ओ 26 व्यंजनक विस्तारसँ वर्णन विभृत अछि। ध्वनिवैशिष्ट्य एहि पोथीक केन्द्र अछि आओर ई सिद्ध करैत अछि जे मैथिली हिन्दी वा बंगलाक बोली नहि अपितु पृथक् भाषा थिक। संभवतः अंगिका, जकरा ग्रियर्सन पूर्वमे 'छिका छिकी: कहलखिन्ह हम दक्षिणी मैथिली नामकरण देल, से आब स्वीकार भय चुकल अछि तकरा संग मगही ओ नगपुरिया मैथिलीक बोलीक कसौटीपर ताकल जा सकैत छल। एकर दोसर अध्यायमे ध्वनि-तंत्र आओर लिपिपर अछि जे अलग अध्यायक विषय अछि। लिपि मिथिलाक्षर बंगला जकाँ प्रचलित भेल जा रहल अछि जखन कि एहिमे 62% अन्तरक संदर्भ देल गेल अछि। संज्ञा ओ सर्वनामपर अलग अध्याय अछि किन्तु ओकरा विशेषणक अध्यायमे मिझरा देल गेल अछि। मैथिलीमे संज्ञाक चारि लिंग- पुलिंग, स्त्रीलिंगक अतिरिक्त नपुंसक लिंग संस्कृते जकाँ, आओर चारिम उभयलिंगी चर्चा भेल अछि। मुदा, आधुनिक मैथिलीमे लिंग-भेद समाप्त भेल जा रहल अछि। तहिना एकवचन ओ बहुवचनक प्रायः नहिए जकाँ अछि। मैथिलीमे संस्कृतहि जकाँ आठ कारक प्रारम्भिक वैयाकरण द्वारा आनल गेल, मुदा संबोधनकेँ एत' फराक नहि देखाओल गेल अछि। कर्म ओ सम्प्रदानक बीच अन्तर नहिए जकाँ। मैथिलीमे सर्वनाम पुरुष, सम्मान, वचन ओ कारक लेल अछि, लिंग लेल नहि। तीन पुरुषमे दोसर, तेसर लेल आदर-अपने, अहाँ, तों क्रमश: उच्चतम, उच्च ओ मध्य सम्मानसँ, तूँ असम्मानसँ। तेसर पुरुषक आदरक लेल ओ सब लोकनि संग अनादर लेल उ सभ / ओ सब। 'अं'केँ विविध प्रकारक विशेषण मानल गेल अछि -एक, पहिल, आधा, साढ़े, दोसर, दूनू। विशेषण मैथिलीमे वचन ओ कारक भेद नहि करैत अछि; सीमित लिंगभेद करैत अछि। सभटाकेँ लगाए बहुवचन बना लिअ। क्रियाक अध्यायमे क्रियाक मोहाबरा लय लेल गेल अछि। क्रियाक लक्षण मैथिलीकेँ भारतक आन बाँकी भारतीय-आर्य भाषा सभसँ फराक एक भाषाक रूपमे स्थापित कए दैत अछि। वचन ओ लिंग मैथिली लेल विशिष्ट नहि। पाँच भावक, सम्मानक संग, क्रियापदक अति सार्थक ओ पठनीय विशद विवेचना प्रस्तुत पोथीमे कएल गेल अछि। क्रियाविशेषणक अध्यायमे पार्टिकल तहिना जे लेखक स्वीकार करैत छथि। क्रियाविशेषणक परिभाषा मैथिलीमे कठिन अछि तथापि विभेद वर्णित अछि। युक्ति, अन्तर्विरोध, गौणपद अधिक आदि प्रकारक एतहि विवरण नीक जकाँ भेटैत अछि। वाक्य ओ वाक्यरचनाक दू अध्यायकेँ संगमे राखल जा सकैत छल। वाक्यक विविध प्रकारक वर्णन अछि। मैथिलीमे ज्ञापक वा डिक्लेरेटिव वाक्यांश बहुधा जाहिमे कर्ता ओ कर्म दूनू क्रियाक नियंत्रण करैत अछि। अभद्र भाषा व्यवहारमे अछि किन्तु कान मूनि लिअ, लेखक कहैत छथि। मैथिलीमे कर्ता, कर्म, क्रियाक वाक्य रचनाक्रम सामान्यतः अछि किन्तु सुभद्र झाक संदर्भ लेल गेल अछि वक्ताक मोताबिक शब्दक्रम राखि सकैत छी, किन्तु आर. पी यादवक एहिपर असहमति छनि। नकारात्मक समेत अनेक प्रकारक कारणात्मक वाक्यरचनाक विस्तार पोथीमे भेटत। मैथिलीमे विविध भावक समन्वय संभव अछि। जोड़ि लिअ, तोड़ि लिअ। विविध प्रकारक वाक्यखंडक, उपयोगी जानकारीसँ भरल पोथी अछि। सभ अध्यायपर नोट आओर संदर्भ ग्रन्थ- सूचीक संग नाम ओ भाषाइ सूची एहि कार्यकेँ वरेण्य बना दैत अछि किन्तु अंग्रेजी व्याकरणक पारिभाषिक शब्दावली वैयाकरण सभ लेल बोधगम्य; किन्तु, हमरा सन पाठक लेल अबोधगम्य। ओतहि जँ मैथिली अनुवाद एहन तकनीकी शब्दक रहैत तँ सुगम होइत। तहिना एकर अनुवाद मैथिलीमे अपेक्षित जाहिमे कोष्ठमे अंग्रेजीमे एहन शब्द जरूर होअए। संगहि एकटा संक्षिप्त अध्याय मैथिली व्याकरणक विशिष्टतापर सेहो जे सभ अध्यायमे आएल जरूर अछि किन्तु एतेक विस्तारमे बिसरा जाइत अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.८.अयोध्यानाथ चौधरी- मिथिला-मैथिलीक मूल स्तम्भ: प्रा. डा. रामावतार यादव अयोध्यानाथ चौधरी (संपर्क- जनकपुर) मिथिला-मैथिलीक मूल स्तम्भ: प्रा. डा. रामावतार यादव हम गौरवान्वित छी जे हमरा प्रा. डा. रामावतार यादव प्रति अपन श्रद्धा आ सम्मान प्रकट करबाक सुअवसर प्राप्त भेल अछि। हमरा अहू बातक गौरव होइए जे जाहि हाई स्कूलक ओ विद्यार्थी छलाह, ताही स्कूलक विद्यार्थी कालातंर मे हमहुँ रहलहुँ। अर्थात मधुबनी जिलान्तर्गत श्री बी. के. एस. उच्च विद्यालय, जटुलिया जे मिथिलाक प्रसिद्ध विद्वान लोकनिक दूटा गाम महिनाथपुर आ जोंकीक निकटस्थ अछि। हमरा अहू बातक गौरव होइए जे हमरा दुनू गोटेक गाम एके नगरपालिकामे पड़ैत अछि। अर्थात नेपालक धनुषा जिलान्तर्गत विदेह नगरपालिका। हमरा अहू बातक गौरव होइए जे हमरा हुनक साहचर्यसँ यदाकदा बिभिन्न विषयक विशिष्ट ज्ञान प्राप्त होइत रहैए। हमरा अहू बातक गौरवबोध होइए जे ओ जाहि मूल विषयक प्राध्यापक रहलाह, हमहुँ ओही मूल विषयक शिक्षक रहलहुँ, अर्थात अंग्रेजी। हमरा अहू बातक गौरवबोध होइत रहैए जे हुनका पश्चिमी देश सभमे जाए जतेक विशद् अध्ययन आ तालिम प्राप्त करबाक सुअवसर भेटल छन्हि से विरले व्यक्तित्वकेँ प्राप्त होइत छनि। जेना हुनकर दुर्लभ योग्यता तहिना हुनकर दुर्लभ भाग्य। योग्यता अनुकूल ओ सब दिन उच्च स्तरीय सरकारी ओहदा पर विराजमान रहलाह। ओ मूल रूपमे अत्यन्त यशस्वी प्राध्यापकक रूपमे त्रिभुवन विश्वविद्यालय, काठमांडूमे करीब तीस वर्ष धरि नेपाल सरकारक सेवामे रहलाह। तकर बाद अवकाशप्राप्त करबाधरि नेपाल सरकारक अनेक अति प्रतिष्ठित पदसबकेँ सुशोभित कयलनि। जहिना हुनकर दुर्लभ योग्यता, जहिना हुनकर दुर्लभ भाग्य तहिना हुनकर दुर्लभ कृतित्व। हमरा जनैत हुनक एक-एकटा कृति मैथिली भाषा-साहित्यक हेतु अनमोल धरोहर अछि। मैथिली भाषा-साहित्यक इतिहास अनन्त समय धरि गर्व करैत रहत। जर्मन, अंग्रजी आ मैथिलीमे मोटगर आ महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखिनहारकेँ समीक्षा आ टिप्पणी लिखबाक फुर्सति कतय? एकबेर हम अपन कथा-संग्रह "एकटा हेरायल सम्बोधन" बास्ते टिप्पणी (blurb) लिखबाक अनुरोध कयलियनि। ताहि पर ओ जबाब देलनि- टिप्पणीक कोन प्रयोजन? ओ त' जकरा नहि केओ जनैत छैक, तकरा बास्ते छैक। आ फुर्सतिक अभाव देखा नहि लिखि सकलाह। दोसर बेर हम अपन गीत-गजल संग्रह "चली ... किछु गुनगुनाली" हेतु पुन: अनुरोध कैल। मुदा अहू बेर हमरा निराश करब हुनका ठीक नै बुझेलनि। आ' से जे ओ लिखलनि से देखल जाय--"कतेकहु महान् कवि-आलोचक लोकनिक मतेँ कवि-सर्जक ओ कवि-व्यक्तिक दू फराक फराक स्वत्वमे परस्पर साम्य-मूलकताक तादात्म्यकताक अभाव रहैत अछि; मुदा ई उक्ति अयोध्यानाथक गीत-गजल सभमे चरितार्थ नहि होइत अछि। अयोध्यानाथ-गीत / गजल-शतीमे संगृहीत गीत / गजल सभक ई सटीक विशेषता रहल अछि जे जहिना सरल, मृदुभाषी, कलुषताविहीन कवि-व्यक्तित्व तहिना सहज, अकृत्रिम, मृदुल, आह्लादपूर्ण, एवम् ललितगर अभ्यर्थना-नेहोरासँ परिपूर्ण आ मूक उद्वेग, निरीहता, वेदना, तथा निश्छल सुकोमल प्रेम-भावसँ सराबोर कवि-सर्जक सृजित मैथिली गीत-गजल सभ। जहिना स्मितभाषी कवि-व्यक्तित्व तहिना सर्जित गीतसभमे एकहुगोट हरफ फाजिल नहि। हमर ई दृढ धारणा अछि जे शीघ्रहि ई मर्मस्पर्शी गीत-गजलसभ जनसाधारण मैथिलक लोककण्ठमे स्थायी बास पाओत आ ओलोकनि अनायासहि एकरा गुनगुनाब' लगताह। मैथिली गीत विधाक श्रेष्ठता प्रतिस्थापित करबाकहेतु अयोध्यानाथ धन्यवादक पात्र थिकाह"। ओ (रामावतारजी) जाहि विषय आ विधा पर कलम चलबैत छथि से डेग समधानल रहैत छनि। हम कहिलियनि जे अपनेक भाषा एकदम'श्रोत्रिय' भाषा होइत अछि, ताहि पर ओ किञ्चित मुस्कुराइत रहि गेलाह आ हम हुनक सामर्थ्य पर चकित रहि गेलहुँ। ई सर्वाधिक गौरवक विषय थिक जे आब अवकाशप्राप्त भेला उपरान्त, जीवनक उतरार्द्ध मे, ओ सम्पूर्ण समय लगा मातृभाषा मैथिलीक सेवामे समर्पित छथि। हुनक अत्यन्त कष्टसाध्य लिखल आलेखक हेतु पटनासँ प्रकाशित होबयबला नामी पत्रिका'मिथिला भारती'क हेतु संपादक शिव कुमार मिश्र जी तथा मधुबनीसँ प्रकाशित होबयबला नामी पत्रिका'अनुप्रास'क हेतु दीप नारायण'विद्यार्थी' जी केँ अपन-अपन पत्रिकाक पहिल पृष्ठ पर प्रतिष्ठापित करबाक मनोकांक्षा आ व्यग्र प्रतीक्षा रहैत छनि। हुनक बहुआयामिक व्यक्तित्व पर जौं आलेख लिखल जाए त' एकटा मोटगर किताबक रूप ग्रहण करत। तैं हुनक निबन्धकार व्यक्तित्व पर मात्र एकटा निबन्ध के आधार बना किछु लिखबाक सोच बनौने छी। हुनक मैथिली आलेख सञ्चयन भाग एक आ दू मैथिली भाषा-साहित्यक अनमोल निधि छनि जाहिमे क्रमश: सोलहटा आ नौटा अति उच्च-स्तरीय आलेख संगृहीत छैक। एक-एकटा आलेख पर जौं विचार कैल जाए त' ओहि मे प्रयुक्त सन्दर्भ सूची देखि लेखक कोन विधि ओतेक पुस्तक, पत्र-पत्रिका आदि उपर कएने होएताह, फेर ओकर अध्ययन-अनुशीलन कएने होएताह आ तखन कतेक समय लगा लेखन-संपादन कएने होएताह से सोचि चकित भ' जाइत छी। लेखक निश्चय विशिष्ट धन्यवादक पात्र छथि आ हम पाठक लोकनि स्वत: आभारसँ नतमस्तक भ' जाइत छी। कोनो आलेख ककरोसँ कम नहि। हुनक निबन्धसब मे पाँचटा बात अत्यन्त प्रभावित करैत अछि। पहिल-भाषा सौष्ठव। दोसर-दुर्लभ जानकारी। तेसर-सकारात्मक भाव बा आशावादिता। चारिम-निष्कर्ष बा उपसंहार। पाचम-अत्यन्त लाम सन्दर्भ सूची। सन्दर्भ सूची अन्तर्गत आधासँ बेशी ग्रंथ अंग्रेजी भाषाक रहैत छनि जाहिमे ओ अपन अंग्रेजी भाषाक विशद् ज्ञान केर व्यापक उपयोग कय दुर्लभ आ नवीनतम जानकारी दय पाठककेँ मंत्रमुग्ध कएने रहैत छथि। आब हम एहि सभ विशेषताकेँ संक्षिप्त रूपेँ राखि रहल छी- 1. भाषा सौष्ठव डा.यादवक विभिन्न आलेख सभमे किछु यदा-कदा प्रयुक्त पाण्डित्यपूर्ण आ ठेठ शब्द सभ दिस हमर ध्यान आकृष्ट भेल त' हमरा भेटल-उपोदघात, बेआलिस, संगृहीत, अनुसंधित्सु, वैदुष्यपूर्ण, अन्त्यानुप्रास, अन्तर-अनुप्रास, पूर्वहि, अनुसन्धेत्सु, अनुसन्धाता, खगता, दुई, तीनि, धन्यवादार्ह, निष्प्रयोजनीय, प्रयोजनवशात्, प्रयोक्ता, नेहोरा, हरफ, प्राक्कलन, अक्षुण्ण, अद्यतन आदि-आदि। हुनक तत्सम-बहुल शब्दक प्रयोग देखि एक दिन प्रश्न कयलियनि जे अपनेक भाषा आम लोकक हेतु कठिन बुझना जाइछ। ताहि पर ओ जबाब देलनि जे भाषाक स्तर के खसेबाक काज हम किन्नहु नहि क' सकैत छी। इएह त' ओकर निजत्व आ सौन्दर्य छैक। अंग्रेजी भाषा सेहो कतेक रूप मे बाजल आ लीखल जाइत अछि। स्वयं इंग्लैंडक विभिन्न प्रान्तमे विभिन्न प्रकारसँ अंग्रेजी व्यवहृत होइत अछि। परन्तु आर.पी. साउन्डक खास आ विशेष महत्व छैक ने। अमेरिकन आ आस्ट्रेलियन अंग्रेजीक त' बाते छोड़ू। तहिना मैथिली भाषा विभिन्न क्षेत्र मे विभिन्न रूप मे लीखल आ बाजल जाइत छैक। मुदा छैक त' सब मैथिलीए। कनेक मेहनत कयलासँ लोक स्तरीयता प्राप्त क' सकैत छथि। हुनक निबन्ध सभ एकपर एक उपरि-जुपरि छनि। सब ओहने व्यापक आ श्रम-साध्य। तैं हम दृष्टान्त स्वरूप हुनक एकमात्र निबन्धक चर्च करय चाहब, मुदा हमरा डर अछि जे हुनक अधिकांश कथ्यकेँ यथावत-यथारूप नहि राखि हम नहि रहि सकैत छी। तकर कारण आशय पूर्ण रूपसँ स्पष्ट परिलक्षित करबाक समस्या। एखन हुनक महत्वपूर्ण कृति "मैथिली आलेख सञ्चयन" भाग दू हमरा हाथ मे अछि। हमरा कहबाक अछि एहिमे प्रयुक्त दोसर निबन्ध 'नेपालक भाषा नीति आ मैथिली' (p.19) मादे। 2. दुर्लभ जनतब नेपालमे ई. 1950सँ ई. 1990 धरि पंचायती व्यवस्था कालखंडमे शिक्षा आ भाषा प्रति तत्कालीन सरकारक केहेन संकीर्ण आ हास्यास्पद नीति छलैक तकर किछु दुर्लभ जनतब एहि आलेखमे एना भेटैत अछि। ओकर नीति छलैक-एउटै भाषा, एउटै भेष, एउटै धर्म, एउटै देश। एउटै अर्थात एकेटा। आब अर्थ स्पष्ट अछि। शिक्षा तहिआ किछु खास व्यक्तिक हेतु मात्र आवश्यक बूझल जाइत छलैक। देखल जाय- "Education was discouraged, even prohibited except for sons of the government officials. (Hugh B. Wood 1958: 429)" आब भाषाप्रतिक सरकारी रबैया तत्कालीन नेपालक सरकारकेँ प्रस्तुत Education in Nepal: Report on the Nepal National Education Planning Commission (NNEPC) प्रतिवेदनक किछु मुख्य बूंदापर ध्यान देल जाए- "Local dialects and tongues, other than standard Nepali, should be vanished from the school and playground as early as possible in the life of the child. (NNEPC, p. 92)" "If the younger generation is taught to use Nepali as the basic language, then other languages will gradually disappear, and greater national strength and unity will result. (NNEPC, p. 93)" आब एहिपर विद्वान डा. रामावतार यादवक स्पष्ट, दू टूक प्रतिक्रिया देखल जाय- "ई प्रतिवेदन नेपाली-इतर भाषा सभकेँ नेपाल राष्ट्रक अमूल्य धरोहर (Language-as-Resource) नहि मानि एक गोट समस्या अर्थात (Language-as-Problem) बूझि अल्पमत भाषिक अधिकारकेँ (Language-as-Right) न्यून प्राक्कलन करबाक दोषक भागी अछि।" 3. सकारात्मक भाव / आशावादिता ओना आब स्थिति बदललैक अछि। वर्तमान मे 'नेपालमे मैथिली'क गरिमाक चर्च करैत हुनक स्वर मे आशावादिताक झलक भेटैत अछि- "मैथिली नेपालक दोसर सर्वाधिक बाजए जाए वाला एक गोट समृद्धिशाली ओ प्राचीन भाषा अछि। ई भाषा नेपालमे प्राथमिकसँ लए विश्वविद्यालय स्तर धरि पढाओल जाइत अछि। नेपाल सरकारक सञ्चार माध्यममे एहि भाषामे समाचार वाचन सेहो होइत अछि। वस्तुत: सम्पूर्ण आर्यभाषा मध्य मराठीकेँ छोडि मैथिली सर्वाधिक पुरान भाषा अछि। बेसी नहि त' कम स' कम 12 सय बर्ष पूर्वहिसँ एहि भाषाक लिखित साहित्य एखनहुँ अक्षुण्ण अछि। आ, नवम शताब्दीसँ लए अठारहम शताब्दी धरिक मैथिली भाषाक हस्तलिखित पाण्डुलिपिसभ अद्यतन नेपालक राष्ट्रिय अभिलेखालयमे संगृहीत एवम् अनुरक्षित अछि। ई सर्वविदित अछि जे एतहिसँ पाण्डुलिपि सभक छायाप्रति ल' जाए कए भारतीय, जर्मन, अङरेज, फ्रेन्च, तथा इटालियन विद्वान सभ विश्वप्रसिद्ध भेल छथि।" 4. उपसंहार / निष्कर्ष मैथिली भाषाकेँ नेपालक मधेस-प्रदेशमे सरकारी कामकाजक भाषा बनाओल जयबाक जे चर्च चलि रहल अछि ताहि मादे ओ कहैत छथि जे ताहि उत्तरदायित्वक सफल निर्वाह एवम् कार्यान्वयनक हेतु मैथिली विद्यमान स्थितिमे पूर्वरूपेण अशक्त अछि, असक्षम अछि। हुनक कहब छनि जे शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, वन, मत्स्यपालन, विज्ञान, प्रविधि, वाणिज्य, कानून, प्रशासन, व्यवस्थापन, वातावरण, ऊर्जा, कम्प्यूटर, संचार आदि अनेक क्षेत्रमे विभिन्न स्तरक मैथिलीमे प्रवीण दक्ष जनशक्तिक आवश्यकता एकाएक मुह बाबि क' ठाढ भ' जाएत। तैं ओ मैथिली अनुरागीजनसँ आग्रह करैत छथि जे ओलोकनि एहि मादे गम्भीर चिन्तन-मनन करथि एवम् एहि पुनीत कार्य दिस प्रवृत भए दत्तचित्तसँ आगाँ बढ़थि। हुनक गम्भीर चिन्ता आ सुझाव हुनके मुहे सुनल जाए-"अन्तत:, हम नवतुरक जिज्ञासु मैथिली अनुरागी तथा अनुसन्थित्सु युवक-युवतीसँ विनम्र अनुरोध कर' चाहब जे ओलोकनि मैथिली भाषा-साहित्यक गम्भीर अध्ययन-अनुसन्धान दिसि उन्मुख होथि, उत्प्रेरित होथि। हम स्पष्ट रूपेण देखि रहल छी जे मैथिली भाषा-साहित्यक विविध क्षेत्र मे अनुसन्धानक जे उच्च मानक स्तर अद्यावधि स्थापित भ' चुकल अछि तकर कुशल संवाहक भए ताहि स्तरीय कार्यकेँ निरन्तरता प्रदान करबाक हेतु नव पीढीक लोक ने त' तत्पर छथि आ ने प्रवीण प्रतीत होइत छथि। सम्भवत: आजुक प्रतिस्पर्धापूर्ण वैश्विकरणक युगमे हुनका ई काज निष्प्रयोजनीय बुझना जाइत छैन्हि। हमरा जनितेँ ई एकगोट चिन्ताक विषय थिक। आ, जनकपुर तथा लग-पासक क्षेत्रमे मैथिलीक प्रयोक्ता वा कहू जे उपभोक्ता लोकनि विभिन्न व्यापारिक प्रयोजनवशात् सञ्चार माध्यममे एहि भाषाक जाहि स्वरूपक प्रयोग वा कहु जे कुप्रयोग करैत छथि से त' गम्भीर चिन्ताक विषय अछिए।" डा. यादव सन निर्भीक आ स्पष्टवक्ता भेटब कठिन। आ की नहि ? 5. लाम सन्दर्भ सूची कोनो आलेख तैयार करबासँ पहिने डा. यादव कतेक किताब सभक, पत्र-पत्रिकादिक संगोर करैत छथि से प्रत्येक आलेखक अन्तमे देखल जा सकैए। ओ आवश्यकतानुसार विदेशी मित्र लोकनिसँ सेहो सन्दर्भ-सामग्री सभ उपलब्ध कएल करैत रहैत छथि। जेना उपर्युक्त आलेखमे तेरहटा अंग्रेजी किताबक आ चारिटा मैथिली किताबक उल्लेख अछि। एहि मैथिली आलेख सञ्चयन भाग दूमे पहिल आलेखमे सोलहटा, दोसरमे सत्रहटा, तेसरमे सत्रहटा, चारिममे पैंतीसटा, पाचममे छब्बीसटा, छठममे बाइसटा, सातममे उन्नहत्तरिटा, आठममे चौंतीसटा, नवममे सैंतिसटा सन्दर्भ सूचीक उल्लेख अछि। एहि समुद्रमेसँ कोनाक' ओ आवश्यकतानुसार छोटका आ बड़का माछ ऊपर करैत छथि से ओएह जानथि। परन्तु ई सहज बोधगम्य अछि जे बहुत समय लगा', बहुत श्रमपूर्वक अपन कार्यसम्पादन करैत होएताह। डा. रामावतार यादव एकटा अति विशिष्ट भाषावैज्ञानिक, अन्तर्राष्ट्रिय ख्यातिप्राप्त प्राध्यापक, विरल निबन्धकार, कुशल प्रशासक त' छथिहे, ओ व्यक्तिगत, पारिवारिक आ सामाजिक जीवनमे जाहि मूल्यबोध आ शालीन व्यवहारक परिचय दैत रहैत छथि तकर शब्दश: वर्णन हमरा कठिन बुझा रहल अछि। हम हुनक विशिष्ट, बहुमुखी आ व्यावहारिक ज्ञानसँ अभिप्रेरित आ अनुप्राणित होइत रहैत छी। ओ बिरासी बर्षक छथि। ओ दुनू पारक नवका पीढीक किछु रचनाकारक प्रतिभासँ आशान्वित छथि आ चाहैत छथि जे ओलोकनि आर अध्ययनशील भए, विशेष समर्पणभावसँ अपन रचनाशीलताक परिचय देथि। हम सेहो हुनक आशय पर जोर दैत बैद्यनाथ मिश्र' यात्री'जीक किछु शब्द "नवतुरिया आगाँ आबथु आब" सापटी लए अपन कथ्यकेँ विराम देबए चाहैत छी। संपादकीय टिप्पणी- एहि आलेखमे रामावतारजीसँ संबंधित किछु सूची जेना कि हुनक शैक्षिक, प्रशासनिक आ कृति केर छल जकरा दोहरावसँ बचेबाक लेल रामावतारजीक परिचय बला खंडमे समाहित कऽ लेल गेल अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.९.डॉ. शिव कुमार मिश्र- प्रोफेसर डा. रामावतार यादव ओ हुनक विलक्षण अनुसंधान तकनीक (मिथिला भारती शोध पत्रिकाक संदर्भमे) डॉ. शिव कुमार मिश्र (संपर्क- 9122686586) प्रोफेसर डा. रामावतार यादव ओ हुनक विलक्षण अनुसंधान तकनीक (मिथिला भारती शोध पत्रिकाक संदर्भमे) अंतरराष्ट्रीय लब्धप्रतिष्ठ भाषा वैज्ञानिक प्रोफेसर डा. रामावतार यादवक अनुसंधान काजक समीक्षा करबाक सामर्थ्य कोनो गंभीर भाषाविदहिसँ संभव छैक। हमरामे ई सामर्थ्य नहि जे हुनक अनुसंधान काजक समीक्षा अथवा मूल्यांकन कए सकी तथापि आशीषजीक आग्रह पर एहन गंभीर विषय पर विशेषरूपसँ मिथिला भारती शोध पत्रिकामे प्रकाशित शोध आलेखक संक्षेपमे किछु चर्चा करए चाहब। मिथिला भारतीसँ पहिल संपर्क प्रोफेसर यादव महोदयकें 2016 मे होइत छन्हि जखन स्वर्गीय पण्डित गोविन्द झाक 'मैथिली क्रियापद-रुपावलीक मूलान्वेषण' (मिथिला भारती, भाग-3 ,2016, पृष्ठ -110-112) नामक शोध आलेख पढ़ैत छथि। प्रोफेसर यादव महोदय एहि आलेखक गंभीरतापूर्वक समीक्षा कयलन्हि। एहिमे पण्डित गोविन्द झाक कतोक तथ्यक समर्थन ओ कतोक विचारसँ कोनो संकोच बिनु कयने असहमति व्यक्त कयलन्हि। ई गवेषणात्मक समीक्षा पण्डित गोविन्द झाकें पत्रक माध्यमे प्राप्त भेलन्हि। ई पत्र जखन हमरा हाथ लागल तखन हमरा लोकनि आनंदित भेलहुँ एवं मिथिला भारतीक दोसर अंकमे (भाग-4, 2017) प्रकाशित कयल गेल। एकर प्रकाशनक पश्चात वाट्स एप पर श्रीमानसँ मिथिला भारतीक मादे चर्चा भेल। वार्ताक क्रमे श्रीमानसँ आग्रह कयल जे मिथिला भारतीकें अपनेक सहयोगक नितांत आवश्यकता छैक। ओ हमर प्रार्थना स्वीकार करैत पूर्ण सहयोगक आश्वासन प्रदान करबाक कृपा कयलनि। तहियासँ मिथिला भारतीकें हुनक सहयोग भेटि रहल अछि। बर्ख 2023 मे मैथिली साहित्य संस्थान द्वारा श्रीमानसँ आग्रह कयल गेल जे मिथिला भारतीक संपादक मंडलमे शामिल भय आशीर्वाद देल जाय तकरा हुनका द्वारा स्वीकार करबाक कृपा कयल गेल। आब मिथिला भारती शोध पत्रिका अंतरराष्ट्रीय स्तरक स्वरूप ग्रहण कय लेलक अछि। विश्वविद्यालय अनुदान आयोगक केयर लिस्टमे सम्मान सेहो भेटि चुकल अछि। प्रोफेसर यादव महोदयक 'Metathesis in Maithili' नामक पहिल शोधालेख मिथिला भारतीमे प्रकाशित भेल (भाग-7, 178-187)। ई शोधालेख मौलिक संदर्भ पर आधारित छैक। पण्डित गोविन्द झाक पोथी ओ अन्य विद्वान सभक ग्रंथक बेस चर्चा भेल छैक एवं एहिपर तुलनात्मक अध्ययन सेहो छैक। शोध तकनीकक पूर्ण व्यवहार करैत कतोक शब्दकेँ मथि कए स्पष्ट कएल गेल छैक जाहिसँ शोधकर्ता लोकनिकें बुझबामे कनियों भांगठ नहि होनि। डाइक्रिटिकल मार्कक विलक्षणता अपूर्व छैक। डायक्रिटिकल मार्कक व्यवहार वर्तमान समयमे कम्म भए गेल छैक तैं शब्दक शुद्ध उच्चारण असंभव भय गेल छैक। मुदा प्रोफेसर यादव महोदयक शोधालेखमे डायक्रिटिकल मार्कक तकनीक अंतरराष्ट्रीय स्तरक शोधकर्तागणकें आकर्षित करैछ। एहि आलेखक संदर्भ देखला पर बुझना जाइछ जे संसारक कतोक दुर्लभ ग्रंथक अध्ययन कयल गेल छैक। एहि भागमे एकगोट पुस्तक समीक्षा सेहो हुनक प्रकाशित भेल छैक। 'The History Janakpurdham: A Study of Asceticism and The Hindu Polity: Brief Remarks' नामक छओ पृष्ठक समीक्षा (मिथिला भारती -भाग 7, पृष्ठ 213-218)अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्यकें शोधार्थीलोकनिक सोझाँ रखैत छैक। ई समीक्षा नेपालक प्रथम राष्ट्रपति डा. रामबरन यादवक सोझां पुस्तक विमोचन समारोहमे प्रोफेसर यादव महोदय द्वारा देल गेल भाषण छैक। Richard Burghart महोदय द्वारा लिखित प्रस्तुत पोथीमे कहल गेल छैक जे अठारहम शताब्दीमे वैष्णव मताबलम्बी रामानंदी लोकनि जनकपुरमे बाँस खढ ओ भीतक घर बनाय पूजा पाठ आरंभ कयलनि। कालक्रमे पजेबाक मंदिर बनाय राम सीताक पूजा पाठ आरंभ कएलनि। एहि तरहें जनकपुरधाम नामक प्रसिद्ध धर्म स्थलक स्थापना अठारहम शताब्दीक आरंभमे भेल। एहि पोथीमे एहि नगरक क्रमिक विकासक चर्चा विस्तारसँ कएल गेल छैक। नेपाल देशक प्रमुख शासक एवम् बुद्धिजीवी लोकनिक सोझाँ ई चर्चा अत्यंत तथ्यात्मक रूपमे प्रोफेसर यादव महोदय द्वारा राखल गेल छल। मिथिलाक प्रसिद्ध ओ सभसँ पैघ पुरास्थल बलिराजगढ़क पुरातात्विक ओ ऐतिहासिक अध्ययनक क्रमे हमरा जे साक्ष्य भेटल छल ताहि आधार पर हम एहि तथ्यकें जगजियार करबाक उद्देश्यसँ एकगोट शोध आलेख तैयार कयने छलहुँ जे अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकामे प्रकाशित भेल छल ('पुरातत्व की दृष्टि में मिथिलापुरी -बलिराजगढ़', The Journal of The Bihar Research Society, Volumes 75-78,1990-92,117-123)। प्रोफेसर यादव महोदयक ई समीक्षा पढ़लाक उत्तर हमर सोच आओर दृढ़ भेल जे नेपालक जनकपुरक कोनो संबंध राजा जनकक राजधानीसँ नहि छैक। बर्ख 2021 मे प्रोफेसर रामावतार यादव महोदयक 'A Hitherto Undiscovered and Unstudied Hand- Copied Newari Manuscript of Maithili Barahamasa Song by King Jagatprakasamalla(1643-1673CE) of Bhaktapur: A Preliminary Analysis '(मिथिला भारती- भाग- 8, 2021,88-119) नामक एकगोट विस्तृत शोधालेख प्रकाशित भेल। एहि आलेखमे राजा जगत्प्रकाशमल्लक व्यक्तित्व ओ कृतित्वक चर्चा भेल छैक। हुनका अनुसारें मैथिली भाषाक पहिल बारहमासा ई छैक जे नेवारी लिपिमे लिखल छैक। एहि हस्तलेखक प्राप्ति स्थानक उल्लेख करैत प्रोफेसर यादव महोदय द्वारा देवनागरी एवम् रोमन लिपिमे एकर रुपांतरण कएल गेल छैक जाहिसँ अंग्रेजी भाषा जे नहि जनैत छथि तिनको बुझएमे सुगम हेतन्हि। आन-आन भाषामे लिखित बारहमासासँ तुलनात्मक अध्ययन सेहो कएल गेल छैक। एहि बारहमासामे प्रयुक्त विविध प्रकारक राग ओ स्वरूपक विस्तृत विवरण ओ अध्ययन प्रस्तुत छैक। डायक्रिटिकल मार्क ओ संदर्भक तकनीक अंतरराष्ट्रीय स्तरक उपयोग कएल गेल छैक। एहि तरहें ई शोधालेख शोधज्ञ लोकनिक लेल अविस्मरणीय सिद्ध भ' सकैछ। 'The Nepal--Tirhut Connection: A Linguistic Analysis of Middle Maithili Archival Literary Texts' (मिथिला भारती, भाग-9, 2022,104-133) एवम् 'Diachronic Phonology of Maithili: Vowel Sequencing, Glide Insertion, and Diphthongization' (मिथिला भारती, भाग -9, 2022,134-156) नामक दुइ गोट शोध आलेख प्रकाशित भेल छैक। पहिल आलेखमे भारत ओ नेपालक अभिलेखागारमे संकलित मैथिली पाण्डुलिपिक संदर्भ सहित चर्चा करैत ओकर भाषायी विश्लेषण कएल गेल छैक। भारतीय ओ नेपाली भाषाविद ओ इतिहासकार लोकनिक उल्लेख करैत मध्य मैथिलीक (1600-1769) उत्पत्ति, संरचना ओ विकासक विश्लेषण कएलन्हि अछि। आकृति, लिपि, शब्द, काल, उच्चारण प्रभृतिक विस्तारसँ विश्लेषण कएलन्हि अछि। दोसर आलेख पूर्णरूपेण व्याकरण पर आधारित विश्लेषण छैक। ऐतिहासिक उच्चारणक क्रमे कतोक वैयाकरणक उल्लेख छैक। प्राचीन मैथिली (10म-15म शताब्दी) भाषाक उच्चारणमे स्वर अनुक्रमणक विश्लेषण करैत चर्यापद, वर्णरत्नाकर ओ पदावलीक संबंधमे कएल गेल कतोक विद्वान सभक विचारक चर्चा छैक। तहिना मध्य ओ आधुनिक मैथिलीक स्वर अनुक्रमणक विश्लेषण ओ समीक्षा भेल छैक। प्रोफेसर यादव महोदयक 'नेपाल राष्ट्रिय अभिलेखालय काठमांडूमे अनुरक्षित एवम् नेवार नरेश- विरचित मध्य मैथिली गीति-काव्यमे छन्दोलक्षणगुम्फित गीतक छन्दशास्त्रीय विवेचन' (मिथिला भारती, भाग -10 ,2023, 35-65) नामक आलेख प्रकाशित भेल। मिथिला भारतीमे मैथिली भाषाक ई हुनक पहिल शोधालेख छन्हि जे एहि अंकमे प्रकाशित भेल छन्हि। एहिमे गीतक उल्लेख करैत छन्दशास्त्रीय विवेचनक क्रमे गीतमे प्रयुक्त विविध प्रकारक राग ओ तालक चर्चा अछि। गीत सभक वर्णन- विश्लेषण ओ समीक्षात्मक टिप्पणी अत्यंत तथ्यात्मक ओ ज्ञानवर्धक छैक। दोसर आलेख अंग्रेजीमे प्रकाशित छन्हि। 'AUX Forms in Mid- Maithili-With Special Reference to Medieval Archival Literary Texts of Drama and Songs Composed by Newar Kings of Nepalamandala' (मिथिला भारती, भाग- 10, 2023,133-159) नामक आलेख प्रकाशित भेल अछि। एहिमे अभिलेखीय साक्ष्यक आधार पर मध्य मैथिलीक व्याकरणिक श्रेणी सभक वैज्ञानिक भाषागत विवरण प्रस्तुत भेल अछि। एहि क्रमे जगज्ज्योतिर्मल्ल, सिद्धिनरसिम्हमल्ल, जगत्प्रकाशमल्ल ओ भूपतींद्रमल्लक कतोक ग्रंथ सभ एवं मैथिली अभिलेख गीतमालाक शिलालेखमे उल्लिखित मैथिलीक सहायक स्वरूपक विवरण छैक। एहिमे अछि, थिक, छथि, छी प्रभृतिक उत्पत्ति ओ विकासक विश्लेषण अत्यंत महत्वपूर्ण अछि। एखन धरि जतेक शोधालेख मिथिला भारतीमे प्रकाशित भेल छैक ताहि आधार पर कहल जा सकैछ जे प्रोफेसर रामावतार यादव महोदय सदृश मैथिली भाषाक लेल एतेक गंभीर अध्ययन कएनिहार प्रायः असगरे छथि। हमरा नजरिमे एहन गंभीर अध्ययन कएनिहार मैथिली भाषामे प्रायः नहिये केयो भेल छथि आ निकट भविष्यमे केयो दोसर सेहो नहि देखबामे अबैछ। अनुसंधानक तकनीक जतेक वैज्ञानिक छन्हि तहिना तथ्यपूर्ण ओ मौलिक साक्ष्य प्रस्तुत करबाक विधि अपूर्व छन्हि। साक्ष्यक सत्यताक पुष्टि करबाक विधि ओ क्षमता हुनकामे एहि अवस्थामे जे छन्हि से विरले भेटैछ। संदर्भ सूचीमे एक एक सूचनाकें शामिल केनाय अनुकरणीय अछि। तहिना सहयोग केनिहारकें धन्यवाद देबयमे पूर्ण सचेष्ट रहैत छथि। प्रूफ रीडिंग करबाक विधि सेहो अद्भुत छन्हि छोटसँ छोट त्रुटिकें ताकि ओकर निवारण करैत छथि। मैथिली भाषाक प्रति समर्पण, तथ्यात्मक अनुसंधान, संपादन, प्रूफ रीडिंग प्रभृतिक जे क्षमता प्रोफेसर यादव महोदयमे छन्हि ताहिसँ बेस सिखबाक सुअवसर हमरा भेटि रहल अछि। हमरा जनतबे मैथिली भाषाक विश्व पटल पर राखए लेल जे काज एवं समर्पण हुनक छन्हि से अद्भुत एवम् दुर्लभ अछि। परमात्मासँ प्रार्थना करैत छी जे प्रोफेसर डा. रामावतार यादव महोदय दीर्घायु होथि ओ स्वस्थ रहथि जाहिसँ बेसी समय धरि मैथिली भाषाक उपकार कए सकथि। संगहि हमरालोकनिक ज्ञानवर्धन करैत रहथि। अपन मंतव्य editorial.ऽtaff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१०.केदार कानन-विद्वानक सत्संग-कथा केदार कानन-संपर्क-7004917511 विद्वानक सत्संग-कथा केदार काननजीक लेख हुनकर हाथक लिखल देल जा रहल अछि। मैथिलीमे किछुए लेखक केर लीखब सुलेखक गिनतीमे आबै छै जाहिमे केदारजी एक छथि। भविष्यक पाठक हिनक सुलेखकेँ देखि सकथि तँइ ई बिना टाइप केर दऽ रहल छी (संपादक)। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.११.संतोष कुमार मिश्र-ओ बाद कहिया आओत संतोष कुमार मिश्र (संपर्क- जनकपुर, 9851011941) ओ बाद कहिया आओत बात बीस बर्ष पहिलुक अछि। हमर पहिल पोथी 'उदास मोन'क विमोचन होबऽ बला छल। आ ओहि दिन आदरणीय कालीकान्त झा ’तृषित’क 'तृषितक फुलवारीमे अभिनव गीत नचारी' नामक पुस्तकक विमोचन सेहो छल। आ, दुनू पुस्तकक विमोचन करऽ आयल छलथि विशिष्ट अतिथि आदरणीय डा. रामावतार यादव। विमोचन भेल। बिभिन्न विद्याक चर्चा-परिचर्चा चलल। मुदा, मैथिल नवयुवा साहित्य परिषद्क अध्यक्ष हम होइतो ओतऽ नहि तऽ हमर पुस्तक पर चर्चा भेल आ हमरा किछु कहबाक मौका सेहो नहि भेटल। कार्यक्रममे आयल विशिष्ट अतिथि आदरणीय डा. रामावतार यादव नहि तऽ ओ हमरा सँ किछु पुछला आ नहि हमरा किछु कहबाक मौका भेटल। हुनकासँ भेंट करबाक इच्छा मनमे लागले रहि गेल। एक बेर बहुत प्रयास कएलाक बाद हमरा हुनकर फोन नं. उपलव्ध भेल, बूढ़ा नीलकण्ठ स्कूलक। फोन कएलियनि। ओ व्यस्त छलथि। बात नहि भेल। फेर किछु दिन बाद सम्पर्क करबाक प्रयास कएलियनि तऽ ओ बिराटनगर चलि गेल छलथि। शायद विशिष्ट अतिथि महोदय सँ हमरा भाग्यमे भेंट होयबाक नहि अछि ई बात हमरा मोनमे भऽ गेल। किछु दिन पहिने कवयित्री बिभा झाक कविता संग्रहक आङ्गल भाषामे अनुवाद हुनके सुपुत्र बिमर्श कएने छल। आ, ओहि अनुवाद पोथीक विमोचनक कार्यक्रम छलै। ओही कार्यक्रममे हम साहित्यकारक हिसाबे नहि, घरायसी सम्बन्धक हिसाबे नौतल छलौं। उपस्थित भेलौं। ओतहुँ वएह तरीका रहनि। किछु सिंडिकेट लगौनिहार साहित्यकार लोकनि आदरणीय डा. रामावतार यादवकेँ साथमे बैसल छलाह। बिमर्शक अनुवादित कविता ’क्राइ नो मोर सीता’ केर विमोचन सेहो हुनके सँ होबऽ के छलैक। विमोचन भेल। बहुत देर बाट तकैत एक बेर मौका हुनका लग पहुँचऽकेँ भेटल। हुनका कहलियनि- अपनेके ऊपर एकटा किताब लिखल जा रहल अछि। किछु साथी सब हमरो सँ आलेख मँगने छथि। मुदा हमरा लग अपने बारेमे किछु नहि अछि। ओ 'बादमे भेटब' कहलखिन। फेर ओ बाद कहिया आओत, नहि जानि। संपादकीय टिप्पणी- संतोषजीक एहि संस्मरणनुमा आलेखमे साहित्यसँ जुड़ल पाठककेँ कोनो गंभीरता नहि नजरि एतनि मुदा हमरा दू टा बात नजरि आएल। पहिल, जे अंततः हरेक विद्वान जनते-जनार्दन लेल होइत छथि आ तँइ जनता-जनार्दनकेँ ओहि विद्वान सभसँ किछु ने किछु अपेक्षा रहिते छनि। ओही किछु अपेक्षाक वाहक थिक ई लेख। पत्रिका, पोथी, संपादक, लेखक सभहक एकै काज छै सार्थक सूचनाक आदान-प्रदान करब। से संतोषजीक सूचना प्रो.डा. रामावतार यादवजी लग पहुँचतनि से हमरा विश्वास अछि। दोसर बात ई जे नेपालमे सेहो सिंडिकेट छै तकर जानकारी भेटैए मुदा एहिपर हम चर्चा नहि करब कारण इम्हर एहि पारक मैथिलीमे 'अखिल ब्रह्मांडीय सिंडिकेट' सभ छै तँइ आनक दोष देखबासँ पहिने हम अपन दोष देखब। पाठक संतोष कुमार मिश्रजीक चारि गोट पोथी- पोसपुत (लघुकथा-संग्रह), उदास मोन (लघुकथा-संग्रह), एना-किए (कविता-संग्रह) एवं, अएना (संपादन- कविता-संग्रह) विदेहपरसँ डाउनलोड कऽ पढ़ि सकै छथि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१२.कवि राजीव झा 'एकान्त'-"हिस्टोरिओग्राफी ऑफ मैथिली लेक्सिकोग्राफी"केर मनोवैज्ञानिक आ आलोचनात्मक व्याख्या कवि राजीव झा 'एकान्त' (संपर्क- कनफुसकी: 9911562859 व्हाट्सप्प: 8287480484) "हिस्टोरिओग्राफी ऑफ मैथिली लेक्सिकोग्राफी"केर मनोवैज्ञानिक आ आलोचनात्मक व्याख्या विदेहक 'व्यक्तित्व विशेष' अंक लेल जखन श्रीमान रामावतार यादव जीक केंद्रित आलेखक आग्रह भेल कने दुविधा मे पड़ि गेलहुँ। इतिहासक दृष्टि सँ लिखित आलेख केँ प्रामाणिक साक्ष्य मानल जाइछ अर्थात आजुक आलेख भविष्यक इतिहास थिक। तँय एकतरहें इतिहासे लिखब भेल। अनावश्यक आलोचना पक्षपात थिक मुदा अनुचित महिमामंडन सेहो अपकारके थिक । मनुक्खक जिनगी मे काल सापेक्ष ओकर कृत्यक परिणाम सेहो देखा पड़ैत छैक। लेखनी सऽ लऽ कऽ अन्यथा विविध पक्ष मे उत्कर्ष - अपकर्ष होइत रहैत छैक। अभिप्राय जे कोनहुँ जीवित व्यक्ति पर लिखब एक तरहें दुनू दिस धार बला तलवार पर चलबा सन थिक कारण जीवित व्यक्तिक चारित्रिक, नैतिक उत्थान आ पतनक संभावना शेष रहैत छैक। लिखल आ प्रकाशित आलेख मनुक्ख सन क्षणभंगुर नहि होइछ। विचार ऊर्जाक रूपमे युग- युगांत धरि स्थिर रहैछ आ देश -समाज- इतिहास कें प्रभावित करैत रहैत अछि। अही सभ चलते ठाढ़ दुविधा आ व्यक्ति विशेष खास कऽ जिबैत लोकक सन्दर्भ मे लिखबाक अपन अभिरूचिक अभावक पछातियो कलम उठेबाक प्रेरक, ई तथ्य आ सत्य रहल जे मैथिली भाषाक परिपेक्ष्य मे डॉ रामावतार यादव जी साधारण लोक नहि थिकाह । भारत सऽ नेपाल धरि भाषाशास्त्रीक रूपमे बेस प्रसिद्धि छन्हि । वैश्विक मंचो पर मैथिलीक प्रतिनिधित्व करैत रहलाह अछि तँय मैथिलीक हित - अहित केँ प्रभावशाली ढंग सँ प्रभावित कऽ सकबा मे सेहो समर्थ छथि। एकरा हमर अलहनरैनिये कहल जा सकैत अछि जे मिथिला- मैथिली आंदोलन मे लगभग एक युग सऽ सक्रिय रहितो श्रीमानक विशेष किछु पढ़बाक चेष्टा नहि केलहुँ, हलाँकि बड़ अवसरो नहि लागल। एहन मे सहजहि अइ आलेखक अवलम्ब बनल 'उद्यान किरण पस्तकालय, दिल्ली' मे उपलब्ध डॉ यादव जीक बहचर्चितपोथी "Histography of Maithili Lexicography & Francis Bucanan's cpmparative Vocabularies"। तँय सम्प्रति अइ आलेख केँ डॉ. यादवक एखन धरिक सम्पूर्ण जीवन यात्राक विवेचना नहि अपितु मात्र आ केवल मात्र हुनक उपर्युक्त पोथीक संक्षिप्त समीक्षा कहल जा सकैछ। ह ! तखन इहो सत्य जे कतेको बेर लेखकक एकटा कृति ओकर जीवन भरिक मुल्यांकनक आ यश - अपयशक कारक बनि जाइछ। हमरा जनैत उक्त पोथी प्रायह एहने सन उदहारण थिक। ई आलेख पोथीयेक आधारे पर मनोवैज्ञानिक दृष्टि सँ लेखकक व्यक्तित्वक निरीक्षण, परिक्षण आ मूल्याङ्कनक प्रयास सेहो थिक । साहित्य आ इतिहास दुनू दूटा भिन्न शास्त्र थिकैक । साहित्य मे तऽ काल्पनिक संस्प्रत्ययक आ अवयवक संभावना रहैछ मुदा इतिहास मे नहि। इतिहास विभिन्न स्रोत सऽ उपलब्ध तथ्य आ साक्ष्यक आधार पर लिखक जाइछ तँय एखन धरि भारतक महाभारत आ रामायण केँ इतिहास हेबाक औपचारिक मान्यता विश्व समुदाय नहि देलक अछि । तथापि साहित्य हो वा इतिहास, विषय वस्तुक उपस्थापन, रचनाकारक चिन्तन आ विचारक प्रतिबिम्ब बनि परिचय अबस्से करबैछ । लेखकक मानसिकता आ मनोविज्ञान अबस्से सोझाँ अबैत अछि। तँय आइ इतिहासकारोक वामपंथी, दक्षिणपंथी आदि-आदि वर्गीकरण देखा पड़ि रहल। अस्तु । डॉ. यादवक पोथी पढ़ि, पोथीक कथ्य, तथ्य आ साक्ष्यक अध्ययन, अन्वेषण आ विश्लेषण केने जे किछु गप्प विशेष अचंभित वा उद्वेलित केलक से आगाँ अपने लोकनिक सोझाँ विंदुवार प्रस्तुत अछि । केन्द्रिय विषय आ नाओं: पोथीक नाओं बेस पैघ अछि "Historiography of Maithili Lexicography & Francis Buchanan's ComparativeDictionary". पोथीक नाओं पढ़ला सऽ जे प्रधान पक्ष बुझा पड़ैछ से अछि, "Historiography of Maithili Lexicography" आ तँय सहजहि शेष पक्ष "Francis Buchanan's Comparative Dictionary" गौण विषय होबक बोधक होइत अछि । मुदा से अछि ठीक एकर विपरित। फरिछ सऽ पोथीक केन्द्रिय विषय केँ चिन्हबाक लेल देल गेल विषय सूची केँ एक बेर फेरो व्यवस्थित करब समीचीन बुझा पड़ैत अछि। PROLEGOMENA आ Maithili Lexicography (पृ. सं. 1 सऽ पृ. सं. 28 धरि) ~डॉ. यादव द्वारा पोथीक परिचय, शब्दकोशक इतिहास पर विमर्श। The Manuscript, Francis Bucanan's Life & Work आ Buchanan's Comperative Vocabulary: A Critique (पृ. सं. 28 सऽ पू. सं. 59 धरि) ~फ्रांसिस बुकानन केर शब्दकोशक उपलब्धता, व्यक्तित्व, शब्दकोश निर्माणक पृष्ठभूमि आ थोड़ बहुत आलोचनात्मक व्याख्या अछि। Buchanan's Comperative Vocabulary (पृ. सं. 60 सऽ पृ. सं. 202 धरि) ~फ्रांसिस बुकानन द्वारा संकलित शब्दकोश Notes to Introduction (पृ. सं. 203 सऽ पृ. सं. 210 धरि) ~पोथी परिचय विषय मे आयल उल्लेख जेना अंग्रेजी मे भेल संस्कृत पोथीक अनुवाद सहित किछु चिट्ठी, ईमेल आदिक प्रतिलिपि ताहू मे फ्रांसिस बुकानन केर उल्लेख अबिते अछि विभिन्न सन्दर्भ मे । Bibliography (पृ. सं. 211 सऽ पृ. सं. 227 धरि) ~सन्दर्भ स्रोतक उल्लेख । देखल जाइ तऽ आरम्भिक 28 पृष्ठ पोथीक विषय मे परिचय आ विभिन्न मैथिली शब्दकोश आ ताहिक निर्माणक परिचय अछि । लेखक द्वारा शब्दकोशसंग्रहक लेल भेल यात्रा आ लोक सभ सऽ भेंट-घांटक विवरण अछि। पुनह देखने पहिल 27 पृष्ठ एकटा ऐतिहासिक पोथीक परिचय लेल आदर्श बुझा पड़ैछ । पृष्ठ संख्या 28 सऽ 59 धरि घुमा फिरा कऽ फ्रांसिस बुकानन पर केंद्रित अछि चाहे हुनक व्यक्तित्व हुअय वा शब्दकोश निर्माणक पृष्ठभूमि अथवा आलोचनात्मक व्याख्या। पृष्ठ संख्या 60 सऽ 203 धरि तऽ विशुद्ध रूपें फ्रांसिस बुकाननक कम्पेरेटिव शब्दकोश केर छाया प्रतिये संलग्न अछि, तँय कोनो गप्पे नहि हो। पृष्ठ संख्या 203 सऽ 227 धरि सन्दर्भ ग्रन्थ वा स्रोतक उल्लेख देने छथि जे, महत्वपूर्ण रहितो ग्रंथक हिस्सा नहि कहल जा सकैछ । एकर अर्थ भेल जे पोथीक सार्थक 202 पृष्ठ मे 174 पृष्ठ मे बुकानन छथि केन्द्रिय विषय जाहि मे सऽ 143 पृष्ठ तऽ विशुद्ध बुकाननक शब्दकोशे अछि। 10 प्रतिशत जे अन्यथा किछु अछियो तऽ से पोथीक भूमिका लेल आदर्श विषय वस्तु मानल जा सकैछ मुदा केन्द्रिय विषय हेबा हेतु कतेक उपयुक्त से तऽ विद्वाने लोकनि कहताह। जँ मानि ली जे एकटा भाषा शास्त्रीक रूपमे स्वयं लेखकोक दृष्टि गेल हेतन्हि तखन इहो प्रश्न ठाढ़ होइछ जे 90 प्रतिशत विषय वस्तु केँ न्यून कियैक देखेलन्हि ? विश्वप्रसिद्ध मानव मनोविज्ञानी A. H. Maslow केर मोताबिक कोनो मनुक्खक क्रिया पांच तरहक प्रेरणा सऽ निर्धारित होइछ, जकरा "Hierarchy of Need" कहल जाइछ। शारीरिक / भौतिक आवश्यकता, सुरक्षा आ स्नेह आदि प्रेरणाक संतुष्ट भेला पछाति मनुक्खक क्रिया आत्म-सम्मानक अर्जन सऽ प्रेरित होइत अछि। [1] आगाँ Constantine Sedikides & Coकेर अध्ययनो मे Self - Potency केर अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निर्धारित होइछ कोनहुँ व्यक्तिक आचरण आ चिंतन प्रक्रिया पर।[2] पोथीक नाओं देबक प्रयोग सऽ लेखकीय श्रेय लेबक सुविचारित उद्योग जँ नहि रहैत तऽ "A Critical Analysis Of Francis Buchanan's Comparative Dictionary & Maithili Lexicography" तुलनात्मक दृष्टिये अधिक सार्थक बुझा पड़ैत अछि। निश्चयात्मकताक संग तऽ किछु कहब कठिन मुदा ध्यातव्य जेA Critical Analysis पोथीक नाओं मे रहने, लेखक यशक भागी तऽ हेबे करितथि मुदा पोथीक 90 प्रतिशत केन्द्रिय विषयो संग न्याय होइत । कहल जा सकैछ जे लेखक फ्रांसिस बुकानन कऽ संग अन्यान्य आ 'श्रेय लेबक अनावश्यक आरोप' सऽ बचि सकैत रहथि । नाओं मे अनुचित शब्द प्रयोग : इतिहास (History) आ इतिहासविद्या (Historiography) दुनू मे समानता लगितो मौलिक भिन्नता छैक। समय काल आ घटनाक अध्ययन इतिहास कहबैत छैक। मुदा इतिहास विद्या शब्दक अभिप्राय बुझबा लेल किछु व्याख्या कें देखब आवश्यक। Britannica मे व्याख्या: Historiography, the writing of history, especially the writing of history based on the critical examination of sources, the selection of particular details from the authentic materials in those sources, and the synthesis of those details into a narrative that stands the test of critical examination. The term historiography also refers to the theory and history of historical writing. [3] Merriam Webster Dictionary: the writing of history based on the critical examination of sources, the selection of particulars from the authentic materials, and the synthesis of particulars into a narrative that will stand the test of critical methods. [4] Collin James Dictionary: The narrative presentation of history based on a critical examination, evaluation, and selection of material from primary and secondary sources and subject to scholarly criteria. [5] Cambridge Dictionary मे Historiography के परिभाषा अछि ~ "The study of history and how it is written." [6] उपरोक्त व्याख्याक आलोक मे इतिहास विद्याक अभिप्राय भेल लिखित वा ज्ञात इतिहासक पुनर्व्यवस्थित अध्ययन जाहि सऽ कोनहुँ नव तथ्यक प्रकट हुअय। अर्थात अइ पोथीक अभीष्ट छल के, केना आ कोन परिस्थिति मे मैथिलीक शब्दकोशक निर्माण केलक संगहि अइ उद्यम केँ कोन बाह्य आ आतंरिक कारक प्रभावित केलक। उपलब्ध इतिहासक समीक्षात्मक अध्ययन द्वारा नव संकल्पनाक स्थापना तऽ नहि भऽ सकल अछि। के केलन्हि शब्दकोश लेखन ताहिक उल्लेख तऽ अछि, मुदा जतय धरि, केना केलन्हि आ शब्दकोश निर्माण केँ प्रभावित करै बला कारक तत्वक विषय अछि, से एकतरहें नहिये सन अछि। तँय हमर दृष्टि मे हिस्टोरिओग्राफी शब्दक प्रयोग ओजन भलो दैत होइक मुदा समीचीन नहि अछि । मैथिलीक प्राचीनतम शब्दकोशक चिन्हान मे असफल : लेखक पोथीक नाओं मे Historiography of Maithili Lexicography (मैथिलीक शब्दकोश विद्याकइतिहास विद्या) केर सार्थकता सिद्ध करबाक लेल देश - विदेशक जतेक शब्द संग्रह वा शब्दकोश आ संग्रहकर्त्ताक उल्लेख केलन्हि अछि आ ताहि हेतु देश विदेश नपलन्हि अछि से प्रभावित भलो करैत होइक, मुदा नव की छैक ? सभटा तऽ पूर्व विदित आ स्वघोषित शब्दकोश थिक। आ तँय मैथिली शब्दकोशक ज्ञात इतिहास मे कोनहुँ नवताक संचार नहि करैत अछि। सत्त कही तऽ अइ समस्त पोथी मे इतिहासक नामे बुकाननक शब्दकोश आ बाँकी डाटा संग्रहक अतिरिक्त सार्थक आयाम मात्र बुकाननक आलोचनात्मक व्याख्या टा अछि। लेखक नूतन अन्वेषणक दृष्टि आ क्षमताक प्रदर्शन नहि कऽ सकलाह अछि। डॉ. यादव अपन पोथी मे मैथिली भाषाक इतिहास आ विशिष्टाकउल्लेख करैत वर्ण रत्नाकरक निकट गेलाह अछि। वर्ण रत्नाकर विलक्षण ग्रन्थ अछि ।कविशेखरक विलक्षणता कहल जा सकैछ । सुनीति कुमार चटर्जी, गोविन्द झा, काञ्चीनाथ झा 'किरण', भुवनेश्वर गुरमैता आ महेंद्र मलंगिया जाहि दृष्टि सऽ देखबाक प्रयास केलन्हि सैह देखा पड़लन्हि। [7] मुदा ताहिये दृष्टिकोण सऽ वर्णरत्नाकरक मूल्यांकन अइ पोथीक आलोक मे निरर्थक श्रम थिक। उपर्युक्त कोनहुँ विद्वान शब्दकोश विद्या विषयक ने विद्वान रहथि, आ ने से अध्ययन केलन्हि। काव्यक विभिन्न धाराक दृष्टि सँ काव्यशास्त्रीय निरीक्षण परिक्षण केलन्हि। मुदा लेखक सऽ तऽ Historiography of Maithili Lexicography लिखबाक क्रम मे वर्णरत्नाकरक विमर्श निरीक्षण परिक्षण, अन्वेषण, मनन - मन्थन अपेक्षित रहय। वर्ण रत्नाकर वस्तुतह एकटा विशिष्ट तरहक शब्दकोश थिक जकरा आजुक परिभाषा मे Thesaurus वा सन्दर्भ ग्रन्थ कहल जाइछ।[8] अइ लैटिन शब्दक व्युत्पत्ति वास्तव मे ग्रीक भाषाक 'थेईसाउरोस'(Thesauros)सऽ भेल अछि जाहिक अर्थ होइछ 'खजाना', संग्रहालय, स्टोर हाउस (Chest.) ।दोसर अर्थं कहल जा सकैछ जे थिसॉरस केर अभिप्राय भेल पर्यायवाची शब्दक खजाना कोश । ई आश्चर्यक विषय जे मैथिली शब्दकोशक इतिहास छनबाक लेल डॉ. यादव मैथिली साहित्यकार समाजक किछु चिन्हल जानल व्यक्तित्व आ विदेशी स्रोत पर टा कियैक आश्रित रहलाह। एक मात्र वर्ण रत्नाकर के शब्दकोश सिद्ध केने प्रयास हुनक लिखल पोथी ऐतिहासिक भऽ सकैत छल । मुदा से तऽ अपने वर्ण रत्नाकरक स्वरूपोकें चिन्हबा मे असफल रहि गेलाह सेहो तखन जखन हुनक मूल उद्देश्ये शब्दकोशक चिन्हान आ नव तथ्यक प्रतिपादन रहन्हि। कहबाक प्रयोजन नहि जे मैथिलीक इतिहास मे गौरवक स्थान सुनिश्चित करबा सऽ चुकि गेलाह। मैथिलीक भाषाइ अस्मिता भंजन : अपना पोथी मे डॉ. यादव मैथिली भाषाक इतिहास तकैत मैथिलीक भाषोत्पत्ति सन्दर्भ मे लिखने छथि, "Lately, in contradistinction to contemporary knowledge on the probable time of the origins of the New Indo-Aryan languages, including Maithili, Dhiraj (2019: 127) has unabashedly reiterated his earlier untenable position and additionally erred into claiming about the existence of Maithili universally believed to have originated from the Eastern Māgadhī Apabhramśa (and not the Ardhamāgadhī Apabhraṁśa, as some would erringly suggest), branching off into West (Awadhi, Bhojpuri), Central (Magahi, Maithili, Angika, Kurmali), and East (Bengali, Assamese, Oriya) New Indo-Aryan languages (cf. Gangananda Singh 1950, Govind Jha 1968, Tsuyoshi Nara 1979, and Tanmoy Bhattacharya 2016) at a time contemporaneous with the Old Indo-Aryan Vedic Sanskrit. [9] ई देखि हतप्रभ छी जे डॉ. यादव सभटा भाषा वैज्ञानिक, भाषा दार्शनिक दृष्टिकोण आ ऐतिहासिक साक्ष्य-तथ्य केँ तऽ ताख पर राखिये देलन्हि अपितु नहि जानि कोन तरहक प्रेरणाक प्रभाव मे आबि अपनहि समस्त पहिलुक शोधक विरोधाभास मे ठाढ़ होइत छथि। ई स्थापित ऐतिहासिक तथ्य अछि जे भागलपुर आ मुंगेर दिस मैथिलीक दक्षिणी मानक शैली आ छिका-छिकी शैलीक प्रयोग होइछ। [10] इहो लगभग स्पष्ट छैक जे भागलपुर विश्वविद्यालय मे बिना UGC के मान्यताक हिंदी विभागक अधीन बलात 2002 अंगिका विभाग खोलि कऽ मैथिली केँ खंडित करबाक कुत्सित प्रयास चलि रहल अछि जाहि सऽ अंगिका केँ कालांतर मे हिन्दीक बोली घोषित कयल जासकय जखन कि कोनहुँ ध्वनि विज्ञान आ भाषा वैज्ञानिक दृष्टि स अंगिका एखनहुँ हिंदी स अधिक मैथिलीक निकट अछि। अंगिकाक संकल्पनो 1960 के दशकक पछातियेक थिक। ताहि सऽ पहिने भाषाक रूप मे मैथिली सऽ अस्तित्वक कोनो साक्ष्यो नहि छैक। एकरा मैथिलीक दुर्भाग्ये कहल जा सकैछ जे भारतक मैथिली ध्वनि वैज्ञानिक एखन धरि मैथिलीक हित रक्षार्थ कोनो तरहक प्रतिरोधक स्वर नहि उठौलन्हि अछि आ ने कोनहुँ शोध आलेख प्रकाशित करा लोक समाजक मार्गदर्शने केलन्हि अछि। कोनहुँ भारतीय वा पाश्चात्य भाषाशास्त्री द्वारा अर्ध मागधी सऽ अंगिका के उद्भावक उल्लेख नहि भेटैत अछि मुदा नेपाल स्थित मिथिलाक लेखक नहि जानि कियैक, कोन आधार पर अंगिका आ मैथिलीक उद्गम एक्कहि स्रोत सऽ लिखबाक प्रेरणा भेटलन्हि। बिनु साक्ष्यक तऽ एहन कोनो बताहे लिख सकैत अछि। दुर्भाग्य जे मैथिलीक समकक्ष आ एक्कहि स्रोत सऽ अंगिकाक उद्भवक साक्ष्य कोन पोथी मे भेटलन्हि, अर्धमागधी अपभ्रंशक केन्द्रिय शैली मे मैथिली, मगही, कुरमाली संग अंगिका नाओं उल्लेख कतय अछि ताहि स्रोतक स्पष्ट उल्लेख नहि अछि। अपितु गप्प के तेना घुमा फिरा कऽ लिखल गेल अछि जाहि सऽ पंडित गोविन्द झा आ गंगानन्द सिंह सहित कुल चारि लेखक पर शंका जाइछ। मुदा ताहि शंकाक निराकरणक उपाय नहि देल अछि। भाषाशास्त्रीक रूपमे ख्याति प्राप्त सुनीति कुमार चटर्जी, जॉर्ज ग्रीयर्सन [11], सुभद्र झा [12], पंडित भगवद्दत [13], भोलानाथ तिवारी [14] आदि किनकहु पोथी मे अंगिकाक उल्लेख नहि अछि। जतबा धरि पढ़बा मे आयल अछि कोनहुँ आन उल्लेखनीय भाषा शास्त्रीक अध्ययन मे अंगिकाक इतिहासक सन्दर्भ मे किछु नहि भेटैछ । एहना मे नेपाल मे मैथिलीक विखण्डन रोकि सकबा मे असफल डा. यादवक ई पोथी मैथिलीक भाषाइ अस्मिता पर कुठाराघात तऽ अछिये, लोक दृष्टिमे अनावश्यक भ्रम आ आरजकताक स्थिति ठाढ़ होइछ । अर्थात 'अश्वथामा हतो नरो वा कुंजरो वा' के चरितार्थ करैत असत्यक स्थापना। भारत सऽ लऽ कऽ नेपाल धरि आ ओतबे टा नहि विश्व भरि मे पसरल अपना - अपना स्तर पर मैथिलीक सेवा मे लागल कोटि- कोटि मैथिली प्रेमीक संग छल कहाओत। ऐतिहासिक अशुद्धिक परिमार्जनक मनोवृत्तिक अभाव : पाश्चात्य विद्वान् एलेन थ्रेसर द्वारा मंडन मिश्रक ब्रह्मसिद्धि पर टीका लिखैत Bachaspati के स्थान पर Bacaspati लिखने छथि । 'Ch' के स्थान पर 'C' के प्रयोग प्रायह पाश्चात्य विद्वान् द्वारा एहने त्रुटि भेल अछि । लेखक मैथिल थिकाह, मिथिलाक माटि पानि सऽ। एहना मे आस कयल जा सकैछ जे पाश्चात्य विद्वान लोकनिक अइ त्रुटिक परिमार्जन करितथि आ से दायित्वो रहन्हि मुदा से प्रवृति नहि देखा पड़ैछ। ओहो Ch के स्थान पर C के प्रयोगे केलन्हि अछि । [15] निष्कर्ष : उक्त पोथी आ ताहि लाथे लेखकक मनोविज्ञानक मूल्याङ्कन सऽ जे फरिछ होइछ ताहि आधार पर ई कहबा मे संकोच नहि जे फ्रांसिस बुकानन अइ पोथीक केन्द्रिय विषय छथि आ ताहि विषयकें यथेष्ट श्रेय नहि देल गेल अछि। इहो कहबा मे संकोच नहि जे शब्दकोशक इतिहास लिखबा काल लेखक केँ शब्दकोशक विविध स्वरूपक विषय मे फरिछ सऽ ज्ञान रहल हैब, नहि बुझा पड़ैत अछि। आ तकरे परिणाम थिक जे वर्णरत्नाकरक वास्तविक स्वरुपो चिन्ह सकबा मे असफल रहलाह। आ इहो सत्य जे "Historiography of Maithili Lexicography" मैथिलीक भाषा साहित्य- शब्दकोश विषयक ऐतिहासिक पोथी नहि बनि सकल अछि । जहाँ धरि मैथिलीक भाषाइ अस्मिताक प्रश्न अछि ई पोथी कथमपि मैथिलीक प्रति संवेदनशील हृदयक प्रतिबिम्बित नहि थिक आ अनावश्यक भ्रम पसरैत अछि। समकालीन लेखकक प्रति लोक समाज मे आक्रोश आ शंका पसारैत अछि, कादो फेकैत अछि। एहन नहि जे मैथिलीक हित चिन्तक संघर्ष नहि करत वा हारिये जायत। इहो नहिजे डॉ. यादव के उल्लेख मात्र सऽ किछु प्रमाणित भऽ जायत मुदा भाषाइ राजनीति मे कमजोर पड़ैत मैथिलीक विरोधी केँ एकटा सशक्त उल्लेख (reference) केर हथियार भेट गेलैक अछि आ मैथिलीक लेल संकट अबस्से ठाढ़ होइत अछि। नेपाल मे जखन मैथिलीक विघटन देखि रहल छी । पछिमा शैली केँ बज्जिका नामे पृथक भाषाक दर्जा भेट गेलैक अछि आ भारतोक झारखण्ड मे अंगिका के द्वितीय राज्यभाषा बना देल गेल अछि, इतिहास, डॉ. यादव केँ मैथिली हितैषीक रूपमे कतेक दिन स्वीकार करत वा मोन राखत ई देखबाक विषय अछि । इति। संदर्भ : 1. A. H. Maslow, Psychological Review, A Theory of Human, Motivation, 1943 2. Constantine Sedikides & Asst., Psychology, Faculty Publication University of Dayton, A Three Tier Hierarchy of Motivational Self-Potency, 2013, PP 235-295 3. Britannica Encyclopedia 4. Merriam Webster Dictionary 5. Collin James Dictionary 6. Cambridge Dictionary 7. Dr. Ramavtar Yadav, Historiography of Maithili Lexicography & Francis Buchanan's Comparative Dictionary, 2021, Pg. 17 8. Kavi Rajiv Jha Ekant, Pravashi, 2021-22, PP. 21-30 9. Dr. Ramavtar Yadav, Historiography of Maithili Lexicography & Francis Buchanan's Comparative Dictionary, 2021, Pg. 18 10. G. A. Grierson, Linguistic Survey Of India, 1903, PP 13-29 11. G. A. Grierson, Linguistic Survey Of India, 1903, PP 13-29 12. Dr. Subhadra Jha, Formation of Maithili Language, PP. 23-30 13. Pandit Bahgvadutta, Bharatvarsh ka Itihas, 1946 14. Bholanath Tiwari, Hindi Bhasha ka Sankshipt Itihas, 1981 15. Dr. Ramavtar Yadav, Historiography of Maithili Lexicography & Francis Buchanan's Comparative Dictionary, 2021, Pg. 7-28 संपादकीय टिप्पणी जे कियो International Phonetic Script सीखऽ चाहै छथि जे एहि (तिरहुता माध्यमसँ) से एहि लिंकपर आबि सकै छथि- Learn International Phonetic Script through Mithilakshar Script भारतमे अंगिका-बज्जिका केर समस्या किए छै तकर मूल कारणपर आशीष अनचिन्हार द्वारा लिखल गेल आलेख "तीन टा बिंदु" (भाषाक मनोविज्ञान-1 एवं 2) विदेहक 150म अंक, 15 मार्च 2014 मे प्रकाशित भेल छल। पाठक एकरा पढ़ि सकै छथि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१३.शैलेन्द्र मिश्र- डॉ रामावतार यादव : मैथिली भाषा- साहित्यक असाध्य काज साधवला एकटा निष्काम कर्मयोगी शैलेन्द्र मिश्र- संपर्क-7600744801 डॉ रामावतार यादव : मैथिली भाषा- साहित्यक असाध्य काज साधवला एकटा निष्काम कर्मयोगी मैथिलीक अकासमे उदीयमान नक्षत्र जकाँ चमकैत डॉ यादवक पदार्पण कोनो चमत्कार सँ कम नहि। मैथिली बड्ड सौभाग्यशाली छथि जे एक सँ एक वरद-पुत्रक जननी छथि आ ताहि सँ हुनकर ऐश्वर्य आ यश दिनो-दिन बढ़ले जा रहल छन्हि। व्यक्तिगत रूप सँ हमरा हुनका सँ एक्को बेर प्रत्यक्ष रूपसँ भेंट नै अछि लेकिन टेलीफोन, ई-मेल, व्हाट्सप्प आदिक माध्यमससँ कतेको साल सँ हम हुनकर लगातार संपर्क मे छी तें ई नै बुझा रहल अछि जे हमरा हुनका सँ भेंट नै अछि। तकर कारण कही तँ हुनकर मृदु स्वभाव ओ एकटा जागरूक अभिभावकक गुण, जँ यदि हम हुनका फोन केनाइ बिसरियो जाइ छी तँ ओ हमरा नै बिसरै छथि, एकटा नियमित अंतराल पर वार्तालाप होइत रहैए आ हुनका सँ बहुत किछु सिखैत रहै छी। एतेक दिनक संपर्कक आधार पर यदि कही तँ आदरणीय यादव जीक मैथिली भाषा ओ साहित्यक प्रति माश्चर्य आ दायित्व भाव विरल छन्हि। सुगौलीक संधि भले ही मिथिलाकेँ दू-खंड मे बाँटि देलक लेकिन दूनू भाग मे एक-सँ बढ़ि विद्वान छथि। जखन कखनो मैथिलीक चर्चा होइत छै तँ एखनो दूनू पार के समग्र आधार पर कोनो बात के देखल जाइ छै। डॉ यादवक कृति सँ देखल जाय तँ हुनकर ख्याति मैथिलीक एकटा बहुत प्रतिष्ठित भाषाविद के रूप मे छन्हि। हुनकर लिखल मैथिलीक व्याकरण A Reference Grammar of Maithili जर्मनी सँ प्रकाशित अछि आ सार्वकालिक रूप से एकटा एहन पोथी अछि जे मैथिलीकेँ ठोस पहिचान दिएबा मे सफल अछि। दोसर बात हिनकर लिखल ई पोथी शोध पर आधारित छै जाहि मे जर्मनीक भाषा प्रयोगशाला मे कंठ मे फाइबर ऑप्टिकल तार के मददसँ शुद्ध उच्चारण के लेल काज कएल गेल छै। हिनकर आलेख, पोथी ओ विभिन्न अवसर पर देल गेल व्याख्यान मैथिलीक एकटा धरोहर छै जाहि सँ मैथिलीक डंका देश-विदेश मे तँ फहरेबे कएल, नव पीढ़ी सेहो लाभ उठा रहल अछि आ मैथिली भाषाक असली स्वरूप बुझबा मे ई पोथी बहुत सहायक छै। जहिना डॉ सुभद्र बाबु द्वारा लिखल गेल 'The Formation of the Maithili Language' एकटा प्रसिद्ध आ कालजयी कृति छै तहिना डॉ रामावतार बाबुक अँग्रेजी भाषा मे लिखल व्याकरण के बुझल जाय। डॉ रामवातार बाबूकेँ सिर्फ भाषाविद कहनाइ हम व्यक्तिगत रूपसँ उचित नै मानैत छी, जँ हुनकर अन्य कृतिकेँ देखल जाय तँ ओ भाषाविद के संगहि एकटा नीक साहित्यकार, उत्कृष्ट कोटिक अनुवादक, मैथिली भाषाक संरक्षक आ टिप्पणीकार सेहो छथि। लेकिन अइ सभक मूल मे छै आदरणीय यादवजीक अपन मातृभाषा क लेल प्रेम। हमरा सन एकटा साधारण मनुख डॉ रामावतार बाबू के बारे मे लिखी तइ योग्य नै छी लेकिन भाइ आशीष अनचिन्हार जीक समर्पणता ओ तत्परताक सामने हम अइ आलेख लेल मना नै कऽ सकलहुँ, सच कही तँ जेहने-तेहने आलेख से हम अइ महत्वपूर्ण काज मे अपन उपस्थिति दर्ज करा आदरणीय रामावतार बाबू सन लिविंग लिजेंडक चरण-कमल मे एकटा फूल अर्पित कऽ रहल छी। हम हिनकर लिखल किछु पोथीक अध्ययन केलहुँ जाहि आधार पर किछु पोथीक संबंध मे हमर विचार प्रस्तुत अछि:- 1. A Reference Grammar of Maithili, Mouton de Gruyter Berlin. New York. (1996) मैथिली व्याकरणक ई पोथी बहुत बर्खक शोधक बाद लिखल गेल छै आ एकर ई विशिष्टता छै जे पहिल बेर मैथिली भाषाकेँ केंद्र मे राखि, पूर्व मे लिखल गेल मैथिली व्याकरण सभक विश्लेषण केलाक पछाति एकरा लिखल गेल अछि। पूर्व मे लिखल व्याकरण सभ मे मैथिली भाषा मे संस्कृत व्याकरणक नियमक अनुसार व्याख्या कयल गेल छै परंच डॉ यादव अपन पोथी मे उदाहरण सहित बहुत रास पूर्व मान्यताकेँ ध्वस्त केने छथि। प्रमुख बात जे मैथिली मे संस्कृते जकाँ जे आठ टा कारकक व्याख्या कएल गेल छल तकरा ओ कहलथि जे ई मैथिलीक कारक नहि भ' मैथिली भाषा मे प्रयुक्त संबोधनक प्रकार छी। हिनकर अइ पोथीकेँ यूरोप मे भारतीय भाषा अध्ययनक लेल एकटा अनिवार्य पोथी के रूप मे संदर्भ ग्रंथ आ आधार पुस्तकक रूप मे मानल जाइत छै। एखनो झारखंड मे कतेको छोट-छोट भाषा आ बोलीक लेल कएल जा रहल शोध मे ई पोथी अपन महती भूमिका निमाहि रहल अछि। अइ दुरूह काजक लेल ओहि समय मे उपलब्ध कतेको भारतीय भाषा, यूरोपीय भाषा आ अफ्रीकी भाषा सभक उपलब्ध व्याकरणक आ भाषा विज्ञानक अध्ययन कऽ लिखलथि। हिनकर ई व्याकरणक पोथी prescriptive नहि भ descriptive अछि। मैथिली भाषाक एकटा अनमोल धरोहर। पोथीक अध्ययन कएलाक बाद हमरा ई कहबा मे संकोच नै भऽ रहल अछि जे ई व्याकरण मैथिली भाषाक मूल प्रकृतिक हिसाब सँ लिखल गेल एकटा महत्वपूर्ण काज अछि। 2. "A Facsimile Edition of a Maithili Play: 'Bhupatindramalla's Parsuramopakhyana-natak' (2011 ) भूपतिन्द्रमल्ल द्वारा परशुरामोपाख्यान नाटक नेपालक मिथिला मे लिखल मध्यकालीन नाटक अछि। सब सँ महत्वपूर्ण बात ई जे रामावतार यादव जी कठिन मेहनति सँ नेवारी लिपि सँ देवनागरी लिपि आ तकर अँग्रेजी मे अनुवाद प्रस्तुत केने छथि जे बहुत उत्कृष्ट छै। एहि काजक विशेष महत्व छै जे ई नेवारी लिपि मे लिखल अछि। उल्लेखनीय गप ई जे नेवारी लिपि, तिरहुता लिपि आ देवनागरी लिपि जकाँ इंडो आर्यन लैड्ग्वेज परिवारक सदस्य नहि दोसर भाषा परिवार यानि तिब्बतो-बर्मन परिवारक सदस्य अछि आ अइ तथ्य सँ मैथिली भाषा विशिष्ट बनैत अछि जे मैथिली भाषा साहित्यक रचना चारि टा लिपि यानि तिरहुता, कैथी, देवनागरी ओ नेवारी लिपि मे कएल गेल छै। वस्तुतः परशुरामोपाख्यान-नाटकक उत्पत्ति पुराण मे छै आ अइ नाटकक कथा निम्न प्रकार सँ छै:- कन्नौजक राजा रेणुकेँ अपन विवाहयोग्य पुत्री जकर नाम रेणुका लेल सुयोग्य वर चुनवाक हेतु एकटा स्वयंवरक आयोजन करबाक इच्छा होइत छन्हि तें ओ स्वयंवरक आयोजन करैत छथि। ओइ स्वयंवर मे कतेको प्रतापी राजा ओ राजकुमारगण अबैत छथि परंच रेणुका सभकेँ ठोकरा जमदग्नि नामक एकटा ऋषि के अपन होमय वला पतिक रूप मे चुनैत छथि। अइ चुनाव सँ कुपित भऽ राजा आ राजकुमार सभ राजा रेणुक विरुद्ध युद्द ठानि दैत अछि। अइ युद्ध मे राजा रेणु आ जमदग्नि विजेता रहलाह आ अपन शत्रु राजा सभक संहार सेहो केलाह। एकर पश्चात रेणुका ओ जमदग्निक विवाह वैदिक विधि आ परंपरासँ सम्पन्न भेल। विवाहक उपलक्ष्य मे देवराज इन्द्र हिनका कामधेनु गाए सेहो उपहार मे देलखिन। किछु दिनक बाद रेणुकाक पुत्रक रूप मे भगवान विष्णु अपन नव अवतार परशुरामक रूप मे मे प्रकट होइत छथि। देवाधिदेव महादेवक ओ भगवान गणेशक मार्गदर्शन मे परशुराम फरसा चलेबाक कला मे निपुण भऽ जाइत छथि। लेकिन जमदग्निक मोन मे रेणुकाक चरित्रक प्रति शंका उत्पन्न भऽ जाइत छन्हि। रेणुकाक उपर झूठ चरित्रहीनताक कलंकक आरोप लगाके जमदग्नि अपन पुत्र सभकेँ माताक गरदनि कटबाक आदेश देलखिन। दू टा पुत्र आज्ञाक पालन नै कऽ सकबाक कारण पिताक श्रापक भागीदार बनि प्राण गमौलनि, जखन कि परशुराम अपन पिताक आज्ञाक आँखि मूनि पालन करैत अपन माताक मूड़ी काटि देलाह। परशुरामक पिताक प्रति आज्ञाकारिता ओ समर्पण भावसँ प्रसन्न भऽ जमदग्नि रेणुका आ दूनू पुत्रकेँ पुनर्जीवित कऽ दैत छथिन।माहिष्मतीक राजा सहस्रार्जुन जमदग्निसँ कामधेनु गाए केर माँग करैत अछि जकरा ओ ई कहि नकारि दैत छथिन्ह जे कामधेनु गाए स्त्रीधन अछि जे रेणुकाक संपति अछि। सहस्रार्जुन बलजोरी कामधेनु गाए के लऽ कऽ चलि जाति अछि आ छद्मपूर्वक जमदग्निक हत्या कऽ दैत अछि। रेणुका अइ बात सँ अत्यंत दुखी ओ क्रोधित भऽ अपन पुत्रकेँ पिता जमदग्निक हत्याक प्रतिशोध लेब लेल प्रेरित करैत छथिन्ह। परशुराम सहस्रार्जुनसँ युद्ध कऽ ओकर हत्या कऽ दैत छथिन्ह। नाटक एतऽ समाप्त भऽ जाइत अछि। "नेवारी लिपि मे लिखल गेल अइ मध्यकालीन मैथिली नाटक के सभक समक्ष अनबाक पाछू आदरणीय रामावतार बाबूक कतेको बर्खक मेहनति अछि नहि तऽ एतेक नीक मैथिली नाटक सँ हम सभ प्रायः अपरिचित रहितौं। आब हुनकर मेहनतिक नमूना चित्रक माध्यम सँ सेहो राखि रहल छी। नेवारी लिपि मे लिखल गेल मैथिली नाटकक पांडुलिपि देवनागरी लिपि मे लिप्यांतरण रोमन लिपि मे लिप्यंतरण अंग्रेजी भाषा मे अनुवाद अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१४.कुन्दन कुमार कर्ण- डा. रामवतार यादवसँ पहिल भेंटक संस्मरण कुन्दन कुमार कर्ण डा. रामवतार यादवसँ पहिल भेंटक संस्मरण करीब साढ़े आठ बरिस पहिने निर्माण भऽ रहल नेपालक नव संविधानक विरोधमे देशक विभिन्न भागमे भीषण आन्दोलन भेल छल। खास नेपालक तरार्इ क्षेत्रमे विरोधक अवाज आगि जकाँ पसरि रहल छल। आन्दोलने किछु गोटे शहादत प्राप्त कऽ चुकल छल आओर हजारो लोक घायल भेल छल। धियापुता, जवान, बूढ़, साक्षर, निरक्षर, विद्वान सब स्वःस्फूर्त रूपसँ आन्दोलनमे सहभागी होइत देखल गेलैए। आन्दोलन दबेबाक लेल राज्य अपन सम्पूर्ण शक्ति लगा देने छल। विशेष रूपसँ नेपाली भाषी मीडिया आन्दोलनक सन्दर्भमे अनावश्यक आ असत्य भ्रम देशव्यापी फैला रहल छल। ताहि क्रममे आन्दोलन आन्दोलनकारी ऊपर गम्भीर किसमक आरोप लगायल गेलै। जाहिमे एकटा ईहो आरोप छल जे आन्दोलनमे पढ़ल-लीखल आ बुद्धिजीवीक सहभागिता नै छै। गरीब लोक सभके पाइ दऽ कऽ आन्दोलनमे समावेश कराओल जा रहल छै। एहि सन्दर्भमे हमरा मोनमे विचार आएल जे किछु विद्वान/बुद्धिजीवि सभके बजा कऽ एकटा कार्यक्रम कएल जाए आओर एहि आन्दोलन प्रति साहित्यकार एवम् बुद्धिजीवी सभकें सेहो समर्थन छै तेहन सन्देश प्रवाह कएल जाए। ओहि समयमे हम काठमाण्डूमे रहैत छलौं। ओहि समयमे काठमाण्डूमे उपलब्ध किछु विद्वान लोकनि सबसँ सम्पर्क करबाक प्रयास केलौ जाहि क्रममे डा. रामवतार यादव जीसँ 7 नोभेम्बर 2015 के दिन पहिल बेर हुनकासँ सम्पर्क आ भेट भेल। उल्लेखित दिन "वर्तमान राजनीतिक सन्दर्भ आ मैथिलीक भविष्य" विषयक कार्यक्रमक आयोजन केने छलौं जकर प्रमुख अतिथिक रूपमे डा. रामवतार यादव जीक गरिमामय उपस्थिति छल। ओहि दिन हुनकासँ मैथिली भाषा साहित्य, एकर वर्तमान अवस्था, भविष्यक चिन्ता, संरक्षणके उपाय समेत भाषाविज्ञानक सन्दर्भमे ढेर रास गप्प-सप्प एवम् विचार विमर्श करबा भेटल अवसरकें सदुपयोग करैत दर्जनौ प्रश्न पूछल गेलै आओर हुनकासँ समुचित जवाफ प्राप्त भेल। विभिन्न विद्वतगण सभक उपस्थिति रहल कार्यक्रममे एकटा अति उपयोगी शीर्षक "भाषा किए मरै छै?" पर गहिंरगर, ज्ञानबर्धक आ नम्हर व्याखान देलथि। जाहिमे ओ नेपालक मुख्य मातृभाषा सभक वर्तमान अवस्था, भाषा संकटापन्न एवम् लोप हेबाक कारण, मैथिली भाषाक विकासक मुख्य चुनौती, समाधानक उपाय समेत ढेर रास भाषासँ सम्बन्धित विषय पर अपन विचार रखलथि। हुनकर विश्लेषणक भिडियो लिंक हम एहि ठाँ साझा कऽ रहल छी। लिंक पर जा क हुनका नीक जकाँ सुनि सकै छी। देखि सकै छी- https://www.youtube.com/watch?v=TrnRTpwHDbk&t=4s हुनकर उल्लेखित व्याख्यान सुनि कार्यक्रममे उपस्थित सभ केओ प्रभावित भेल। हम किछु बेसीए प्रभावित भेलौं। हमरा मोन होइत छल जे हिनका बेर-बेर सुनी। हिनकर सामिप्यता किछु आर भेटि जाए। कार्यक्रम समाप्त भेलाक बाद हम हुनका घर धरि पहुँचेबाक बहन्ने गाड़ी हिनका संगे लगभग पैंतीस धरि यात्रा करबाक मौका भेटल। ओना कार्यक्रमस्थलसँ हिनकर घरके दूरी मात्र 20 मिनटके अछि। 15 मिनेट ट्राफिक जाममे फँसि गेलौं जे कि हमरा लेल लाभदायी रहल हिनकासँ मैथिली भाषा साहित्य सम्बन्धमे किछु गहन पक्षपर बेसी गप्त सप्प करबाक अवसर प्राप्त भेल। तहियाँसँ आइ धरि हुनकासँ फेर दोहराक भेंटघाट हेबाक अवसर त नै भेटल मुदा हुनकासँ भेल पहिल भेंटक याद एखनो टटका अछि मोनमे। भाषा विज्ञानक सन्दर्भमे नेपालमे बहुत विद्वतगण सभ छथि मुदा ओहि समूहमे हिनकर अपन विशिष्ट पहिचान आ स्थान छै। "मैथिली आलेख सञ्चयन, A Reference Grammar of Maithili, Maithili Phonetics and Phonology" हिनकर किछु प्रसिद्ध पोथी सभ अछि। खास कऽ नेपालक मीडियामे नेपाली भाषी भाषा वैज्ञानिक सभके बेसी प्रचार प्रसार होइत देखल जाइ छै। र्इ विभेद किनकोसँ नुकाएल नै छै मुदा ओ मिथिलावासी रहितो काठमाण्डू आ त्रिभुवन विश्वविद्यालय हिनकर नाओ सम्मानसँ लेल जाइ छै। खास कऽ त्रिभुवन विश्वविद्यालयमे यादव जी अंग्रेजी भाषामे बेसी समय अध्यापन केलथि। जहिना हिनकर अध्यापन प्रभावकारी रहलै तहिना हिनकर लेखन अति गुणस्तरीय देखल गेलै। मैथिली, अंग्रेजी आ नेपाली तीनू भाषा लेखनमे बेजोड़ पकड़ छनि हिनकर। हम फेर ओहने अवसरकें खोजमे छी जे हिनकासँ फेर भेंटघाट होइ, गप्त सप्प होइ। किछु नव ज्ञान प्राप्त करबाक अवसर भेटै। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१५.आशीष अनचिन्हार-विशिष्ट आलेख संचयन केर सामान्य परिचय आशीष अनचिन्हार-संपर्क-8876162759 विशिष्ट आलेख संचयन केर सामान्य परिचय हम जाहि पोथीक चर्चा कऽ रहल छी से थिक प्रो. डा. रामावतार यादवजी द्वारा लिखल "मैथिली आलेख सञ्चयन II (2015-2022)। ई 9 गोट आलेख केर संकलन अछि। प्रबुद्ध पाठक एवं शोधकर्ता, विद्वान लोकनि लेल ई लिखल गेल अछि मुदा हम एकर परिचय सामान्य पाठक एवं गैर शोधकर्ता लेखक लेल लीखल अछि। उम्मेद अछि जे हमर ई परिचय दूनू वर्ग मध्य पुल बनि कऽ सामने आएत। एहिसँ पहिने हिनक "मैथिली आलेख सञ्चयन (1989-2015)" प्रकाशित भेल छल। हमर एहि आलेखमे किछु पोथी, नाम आ शब्दमे ओकर लिंक देल गेल अछि, जे ब्लू रंगमे देखाएत, ताहिपर क्लिक करबै तँ ओ पोथी, नाम आ शब्द खुजि जाएत। 1 एहि पोथीक पहिल आलेख 'नाट्य-विमर्श: रमेश रञ्जनकृत डोमकछ नाटकक सन्दर्भमे' रमेश रंजनक नाटक 'डोमकछ'पर अछि। ई आलेख एहि नाटकक संपूर्ण आलोचना अछि, आलोचना माने चर्चा। मैथिलीमे आलोचना शब्दक भाव हिंदीसँ आयातित छै जकर माने भेल निंदा करब। जखन कि आलोचना शब्दक सभसँ सार्थक प्रयोग असमिया भाषामे होइत छै आ हम असमिये भाषा बला आलोचना मानै छी। असमिया भाषामे प्रेमी-प्रेमिका, वा कि पति-पत्नी वा कि माए-बेटा सेहो आलोचना करैत अछि अपनामे। मूलतः असमिया भाषामे यदि कोनो लोक आन लोकसँ वा कोनो बिंदुपर अपन बात कहै छै (दैनिक बातचीतकेँ) तऽ ओहि लेल आलोचना शब्द प्रयोग होइत छै, आ हमरा इएह अर्थ काम्य अछि। क्रियेटिभ रचना रचबाक जे प्रक्रिया छै ताहूपर एहि आलेखमे बात भेल छै। शब्दकोशक आधारपर डोमकछ नाट्यकेँ उल्लेखित कएल गेल छै। दोसर आलेख 'नेपालक भाषा नीति आ मैथिली' नेपाल देश केर भाषा नीति आ ताहि मध्य मैथिलीक उपस्थितिपर चर्चा करैए। ओकर समस्या एवं मजबूतीपर सेहो चर्चा करैए। तेसर आलेख 'मैथिलीमे विलोम-सन्धि' गोविन्द झाजीक शब्दकोशक आलोचनासँ आ ताहिपर गोविन्द झाजीक एक पत्रसँ उपजल ई आलेख अछि, जाहिमे मैथिली शब्दक विचलनकेँ देखाओल गेल छै सेहो पूर्णतः अनुसंधानक संग। ई आलेख निश्चिते भाषामे रुचि रखनिहारे टा लेल छनि। ई आलेख मैथिली गजलकार लोकनिकेँ नीक जकाँ पढ़बाक चाही। 2009-2014 केर अवधिमे जखन हम मैथिली गजलक व्याकरण स्थिर करबामे लागल छलहुँ तखन ई प्रकरण सेहो हमरा सामने आएल छल आ एहन परिस्थितिमे गजलक काफिया (तुकांत, Rhyme) लेल की नियम हेतै, ओकर बहर (छंद, Meter) कोना निर्धारण हेतै से हम देखेने छलहुँ। ई अलग बात जे गजलक नियम सभकेँ कारण भारत-नेपालक 'किछु लोक' हमरा बहिष्कार केलाह जे एखन धरि हुनकर व्यवहारमे परिलक्षित होइत छनि। मुदा जाहि विधाक जे नियम छै से पालन हेबाक चाही। जँ कोनो पाठक मैथिली गजलमे अभिरुचि रखैत छथि से, हमरे द्वारा लिखल- 'मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास' पढ़ि सकै छथि। चारिम आलेख 'समीक्षा-आलेख' नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान द्वारा प्रकाशित 'प्रज्ञा मैथिली-नेपाली-अङ्ग्रेजी शब्दकोश' केर आलोचना अछि। एहि आलेखमे ओ संपूर्ण मैथिली शब्दकोशकेँ सामने रखैत अपन बात यादवजी रखने छथिन। एक दिस जहाँ हमरा लोकनि मात्र कथे-कविताक एकपक्षीय विवरण दऽ अपनाकेँ आलोचक मानि लैत छी तही ठाम यादवजी शब्दकोशक आलोचना करै छथि। कथा-कविताक एकपक्षीय आलोचना करबामे हमरा लोकनि देखबैत छियै जे हम सभ मेहनति बला काज कऽ रहल छी जखन कि वास्तविक मेहनति बला काज यादवजी करै छथि। ई आलेख वर्ष 2017 केर लिखल अछि तँइ एहि आलेखक संदर्भमे एक बात रेखांकित करबा योग्य अछि जे एहि आलेखमे विदेह शब्दकोशक उल्लेख हमरा नहि भेटल (अथवा हमरे देखबामे नहि आएल)। श्रुति प्रकाशन द्वारा गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा केर संयुक्त संपादनमे कुल चारि टा शब्दकोश प्रकाशित भेल अछि। पाठक लेल एहि चारू शब्दकोशक विवरण निच्चा देल जा रहल अछि- 1. Maithili-English Dictionary Vol. I (2009) 2. Maithili-English Dictionary Vol. II (2009) 3. English-Maithili Computer Dictionary (2009) 4. Videha English Maithili Dictionary, (2012) उदयनारायण सिंह 'नचिकेता' अपन एक आलेख विदेह सिरीजक शब्दकोशपर केंद्रित केने छथि जकरा हमरे द्वारा संपादित 'प्रीति कारण सेतु बान्हल' नामक पोथीमे देखल जा सकैए। यादवजीक उपरोक्त आलेखसँ भारतक लेखक-आलोचक आ साहित्यकर्मी सभकेँ शिक्षा लेबाक चाही। ओना तऽ बहुत एहन काज, एहन आलेख छनि रामावतार जीक जाहिसँ लोककेँ सिखबाक चाही ताहिमे ईहो एकटा अछि जे डा. रामावतारजी लेल मात्र कृति आ ओकर गुण-दोष महत्व राखैत छनि, पद-पोस्ट, धन, जाति, संबंध आदिकेँ ओ कृति लग बिसरि जाइत छथिन। एहि गुणक अभाव भारतक लेखक-आलोचक-साहित्यकर्मी लग छनि। पाँचम आलेख 'मैथिली भाषा-साहित्यक संरक्षण: चुनौती आ निदान' मे यादवजी मूलतः 'मैथिली मरि जाएत' नारा केर परीक्षण केने छथि। 'मैथिली मरि जाएत' एहि तरहक नारा बहुत पहिनेसँ लगैत रहल अछि विभिन्न विद्वान द्वारा। आ मैथिली मरत वा कि नै मरत ताहिपर चर्चा भेल छै एहि आलेखमे। बदलैत परिस्थतिमे मैथिलीकेँ कोना सबल बनाएल जा सकैए ताहूपर चर्चा केने छथि। छठम आलेख 'कखनहु आठ-आठटा कहारवाला पालकीमे बैसल त' कखनहु हौदा-कसल हाथीपर सवार एकगोट फिरिङ्गी मैथिली-सेवकः संक्षिप्त जीवनवृत्त' मूलतः जीवनी अछि जे कि प्रारंभिक मैथिलीक शब्दकोश निर्मातामेसँ एक फ्रान्सिस ब्युक्याननक जीवनी अछि। हरेक जीवनी अपना-आपमे इतिहास होइत छै से ईहो जीवनी एक प्रकारक इतिहासे अछि। पाठक चारिम आ छठम आलेखकेँ एक समयमे पढ़ता तँ हुनका लेल लाभकारी हेतनि। सातम आलेख 'मध्यकालीन मध्य मैथिलीक भाषावैज्ञानिक वर्णन - विश्लेषण नेपालमण्डलक नेवार नृपलोकनि-विरचित ओ नेपाल राष्ट्रिय अभिलेखालयमे अनुरक्षित मैथिली नाट्य तथा गीति-कृतिसभक हस्तलिखित नेवारी पाण्डुलिपिक परिपेक्ष्यमे' नेवार राजा सभ द्वारा नेवारी लिपिमे लिखित मैथिली रचनाक पांडुलिपिक आधारपर ओहि समयक भाषा (मध्यकालीन मैथिली)क व्याकरणिक वर्णन अछि जे कि पूर्णतः भाषावैज्ञानिक आलेख अछि। जे कियो प्राचीन रचनामे रुचि आ पांडुलिपि विज्ञानमे रुचि रखैत छथि से एहि आलेखकेँ अवश्य पढ़थि। नेवार राजा लोकनिक मैथिली विकासमे की योगदान छनि से एहि आलेखसँ नीक जकाँ चिन्हित होइत अछि। नेपाल एवं भारत दूनू पार मिला कऽ नेवारी लिपिमे लीखल गेल प्राचीन साहित्य केर आधुनिक प्रकाशन कते भेल, के सभ केलनि तकर सभ जानकारी एहि आलेखमे अछि। एहि ठाम ई जनतब देब आवश्यक जे विदेह पत्रिकाक किछु अंक सेहो नेवारी लिपिमे उपलब्ध अछि जे विदेहक साइटपर ओकर हरेक अंक जकाँ सभ लेल बिना कोनो मूल्य, बिना कोनो ताम-झामकेँ सभ लेल राखल गेल अछि। आठम आलेख 'मैथिली भाषाक वर्तमान अवस्थितिद' संक्षिप्त टिप्पणी' वर्तमानमे नेपालक मैथिलीक स्थिति-परिस्थितिपर विचार करैत लिखल गेल अछि। ई अलग बात जे पाठक एहि आलेखसँ भारतक मैथिलीक स्थिति-परिस्थिति सेहो बुझि सकैत छथि जे कि एहि आलेख केर विशेषता भेल। नवम आ अंतिम आलेख 'ब्रिटिश लाइब्रेरी, लन्दनक Asia, Pacific and African Collections मे अनुरक्षित ओ भारतविद्याशास्त्रज्ञ हेनरी टोमस कोलब्रुककृत Comparative Vocabulary शीर्षकक अद्यतन अपठित, अशोधित, एवम् अप्रकाशित हस्तलिखित पाण्डुलिपिमे उपलब्ध अमरसिंह-विरचित संस्कृतक प्रख्यात कोश-ग्रन्थ अमरकोषःक 370 शब्दक मैथिली पर्याय-विहङ्गम दृष्टि' कोलब्रुक द्वारा लिखल गेल कोशग्रंथक पांडुलिपि जे कि ब्रिटिश लाइब्रेरीमे सुरक्षित छै ताहिपर आलेख लीखल गेल छै। ईहो आलेख पूर्णतः भाषावैज्ञानिक आलेख अछि। जँ पाठक चारिम, छठम आ एहि नवम आलेखकेँ एक संगे पढ़ता तँ हुनका लेल विशेष लाभकारी रहतनि। 2 सामान्य पाठक एवं गैर शोधकर्ता लेखक किए पढ़थि ई पोथी- 1) प्रो. डा. रामावतार यादवजीक ई पोथी मात्र पोथी नहि विश्वास छै जाहिमे यादवजी अनेकानेक पोथी पढ़ि ओकर सार तत्व आ ताहिपर अपन निष्कर्ष देने छथि। सामान्य पाठक एवं गैर शोधकर्ता लेखक एहि पोथीकेँ विश्वसनीयता लेल पढ़थि। कमसँ कम भारतक मैथिलीमे ई देखल जाइए जे किछु लेखक अपन पाइ, पद-पोस्ट, उम्र वा अन्य प्रभावसँ लेखक बनि जाइत छथि आ बिना पढ़ने अपन लेखकेँ शोध आलेख कहऽ लागै छथि। बिना पढ़नेसँ हमर मतलब जे ओ कथित लेखक कोनो एक हिंदी वा मैथिलीक नीक पोथी लै छथि, आ ओहि पोथीमे देल गेल रेफरेंसकेँ अपन आलेखमे उतारि दै छथि, एवं एना देखबै छथि जे जेना ओ रेफरेंसमे देल सभ पोथी पढ़ने छथि, जखन कि वास्तविकता उल्टा होइत छै। बादमे जखन ओहि कथित आलेख सभहक परीक्षण होइत छै तऽ ओहिमे लेख आ ओ कथित लेखक दूनू फेल भऽ जाइत छथि। 2) किछु गैर शोधकर्ता लेखक अपन लेख लेल मेहनति करै छथि, तथ्यो जुटा लै छथि मुदा ओ ओहि तथ्य सभकेँ अपन आलेखमे जँइ-तँइ प्रयोग कऽ लै छथि। एना केलासँ लेख तँ सफल भऽ जाइत छै मुदा प्रो. डा. रामावतार यादवजीक ई पोथी पढ़लासँ ई ज्ञात होइत अछि जे आलेख कोना लीखी, ओकर फार्मेट (ढाँचा) कोना राखी जाहिसँ ओतबे तथ्यमे ओ आलेख देश-विदेशक विश्वविद्यालयक वा शोध पत्रिकाक शोधपत्र भऽ जाए। हमरा जनैत एहि कारणसँ एहि पोथीकेँ अवश्ये पढ़बाक चाही। 3) कोनो साहित्यकेँ शब्दकोश एवं अन्य मानकग्रंथक आँखिसँ कोना देखल जाए ताहि लेल सामान्य पाठक, एवं गैर शोधकर्ता लेखक एहि पोथीकेँ अवश्य पढ़थि। 4) हरेक देशक अपन नीति होइत छै आ ईहो बात सत्य जे हरेक देश, दोसर देशक नीक नीतिकेँ अनुसरण करबाक प्रयास करैत छै। एकर विपरीत कोनो देशक नीतिमे जे समस्या छै ताहूपर दोसर देशक नजरि रहैत छै। भारत नेपालमे मैथिली कॉमन भाषा छै। तँइ जँ कोनो जिज्ञासु भारतक आँखिसँ नेपालक भाषा नीति देखए चाहथि तिनका ई पोथी अवश्य पढ़थि। 5) यदि कोनो जिज्ञासुकेँ संक्षिप्त रूपमे मैथिली शब्दक विचलन एवं मैथिली शब्दकोशक इतिहास जनबाक हो तिनका सभकेँ ई पोथी अवश्य पढ़बाक चाही। 6) कोनो भाषायी समस्याकेँ भाषायी तरीकासँ कोना सही कएल जाए ताहि लेल पाठककेँ ई पोथी पढ़बाक चाही। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। 196 || विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in विदेह ३९६ म अंक १५ जून २०२४ (वर्ष १७ मास १९८ अंक ३९६) भाषाविद् रामावतार यादव विशेषांक|| 197
adgins में Converbs dn malthilé. x दी stein Bre व Nepal Studie$ 3234,Tan ook H stay मे प्रकाशात्रा« oa pO inca ara बस Ei Pome shee wore ना, wr ear deta मैंछिली -रस्करण et tang are डी । Puts ue eae waters क्रिया । अतिठास 5 रपविज्ञान » वाक्यनिज्ञान एवं sets Bua से नहि कहि | carer वर्ष, से हमर यान दिल्ली प्रकाशित 'जैतिका ' मे प्रयूक्त aA (30 विन्यास का का RT शीर्किक एकोट ony andra fener, grat ही। वर्मनीक प्ररयझ अम्कल्प्ध sare सा मेला सन्तों STRATE किक उदाहरण सम से Phonetée Sy bok समक प्रयोग लॉड्नीय "भर गेल अच् SF आरती sa cer कम्प्यूटरक शविधा उपलब्य्य ही हूँ हम Flobby पढ़ा समेत डी हि ata sh म्रूफरीडिंग जाद़िक संसद आई मुक्त सर ware Robby are हमरा जनकपूर sae Se eat TH ME Bato, Zeca TS weabh महिलासँ हमरा पुनः कहियों Siz ate Set अपन fez fargy a sean of ah, POH FAG, रामावतार दारजी Swain याद ontes wher, 3::2.3004 लि Sr Sra ok Sates de meses and, Le Pe Steer Hae aoe gee Oar | aoe Sy ont 3 Dare हैँ से पठाबी - हमरा ग्रस्नता हो एव । का शत समूह ‘Sita He pa Ee Seep ee One ee डी। अनेकड़ Fear आनिविधि गन: 'विलावस fe ili iil Bert FH खबरि ता? जाति विलाम्बस ada अडि-से कनेक OAT aq 7 मलैगिधा arte a ada ढथि lis Pap eee mate a Rest arate an; ‘Sued ste ST 3 fam ate gre 'अंतिका' SORT सन oP गेल sr oP OB he _searcer Sh xa ate, कामता adr, 'रणावतार Bre
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विदेह ३९६ म अंक १५ जून २०२४ (वर्ष १७ मास १९८ अंक ३९६) भाषाविदू रामावतार यादव विशेषांक | | 49 \ प्री. रामावतार यादव © 3५-, Seam लिनास्0 जिन वि: वि० areata er कातत जी) PGC, MEAG » ।5« 3: व ORG नमस्कार | अंग मी क्शी es, Pragar सम्यादत- कार्य रए ENGR आात गरओीने TONG y ताबतकाल ET समझी TGR बम, et lar eg आलिख सम में खिलीक eB नेषाल जो मास्क अ्नला | तफ़ी at ear cH "मेंथिली शब्द og: एक Rte? nm जनिख पठा TEM डी; STAT He a me ce pineal प्रकाशन: सीर्स Pm ऊपनिक रीणरकत्चते weir सैकल्य वा भारती ASA . Wane मोट pl Fs one ee strat want mara निर्णय ली मेँ एकर प्रूफ रीडिगि कार्य: स्वयं करी) murs सुथम्पाइन द्ट हम निश्वस्त A! wate arate, किक Hea: कुल 6 Yass ore असपनेक;रामावतार आदरणीघ किड़ार BAT HA रन मेरी wae बम ०5०११ saree के FEE रजि लसे इम एक — जे मत्रिनाथा TAA, Sed fe न समा चल - अपनेकें पढने SOME | लेख-प्राप्रिक कोन ETAT अद्यावस्ति am नहि जद सरताँ डी पत्र लिखि TEM लि eres, 'पहिल; दी amg जै cree पहुँचल कि APE तकर शा का Brag, जो लेख AAS प्रकाशन योग्य न # कोन पत्रिकाओं» अति AF. a a ten, aigarett छपत तकर जानकारी Bars | aaa Star संख्या औ प्रकाशत-वर्ष द” “आानकारी 'परमावश्यक | लग + yl tie ee ay or. करी हैँ उत्तम । eee, राजमोहल AT ATT सम्या मा 38-¢6 y eas सैँचिली aera or समीक्षा मन Afra उर्गति देखलास दे rae pauls aA sar मेंघिलीक Pag a 2 ent हुनर CHAE raga समेंथिलीक aD eg os ai SF rege से प्रकाशित “Dignan a सवीनतस stare ढपि गेल कीएबाक METS ER: जि ANE आलेख Z अपन Facet पठाबी | STH IATA प्रबल FTAA HAA 5 TAATH प्रवीज्ञीमि, उमपनिक) रामावताए यादव उदस्णीय श्री Fast, wang.» ५८7: ११ outa RET लमस्कार। PH 22+ 5 scant af ‘eg tor sarah पल at मद Ro gle Bom Bask ee हिल Fmd ad शबद aE OR पुस्तक aah eect मेडल 7 में wary में शनि प्रसन्नता मेला उयदटना» काममदओ भासी ea ना meer . आ af om ee sei WER Riaz, act Gaon हम vit (अँस Her Dah for Se ne aT Ba RS सहला wren ed ere चुका a ' जाप रस “ता Goes Doe hia Saf 9 E 60-6) खाली ote oF Wrage इम अपंतेक सपाइठीय stone se alia) कुल KT देखला att, CHT TT eas हमरा अपने ont मंदूल ot सु . ee अपने, ‘iter waa? में नी बना के ah ‘ar अँक ward oo bees pie, काम / नैपालसे onc रुपया पठाव” में Bea अधि। Sa आप कु
50 || विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in © saat cy गैला पर ARR mint S08 er । भी अवश्य thong विश्वसनीय ae Rf mer हम seated fA कार कम्यादिन ee मेंथिली गाब्दकौडा 2-8 टसिमला (१73, बम 50 के Brea समीक्षा लिखल -जे' मेयालक राजकीय रे Towrnak ef Nepalese stuclics में. प्रकापानाध्वीन अद्धि f अंग्रिजी Foe रहिसँ Fi STAC में लिखल एक site anita Makers (ei) AeSériteness sn Matthili एक अन्य ute Contelbuttons +? Nebalese StucieS में प्रकाशीन्मूखा अच्चि - एहि आनिखक पत्र-वाचचत हम (कवर में (गा Cahéfornian Sala Barbaray usa में आयोनित एकमोट sage MAR ach बहू | वर्मिन में हम, onthe morphology, Syritax and Semanides of-the Confunekive pariiciple. के Maithili shies आमिख लिखना में toma की - जकर 'पत्रवाचन Fifth iemalayan Lan Stternattonal 4 us eae Tae ae umposiamy Kathmandu में सितावर ।१११ मे trem (aie अरजीक सच्यमे; माध्यम स्थिगसत; 5 eg 'भाधाविज्ञानिक aya apis st वर्णनि -निश्लेषण मैंचिनीम हा 2 इसरा मेल दर bia इन WIA Bt! shite os ‘ofa Sar # डी: 20007 Baar Ynde- prayer Langage Lan rR \ SEAR ete Lire Rl Hie आलेख-अच्याय ae गा मचा £ ak rm Thy For gers Greorege Cardona H अविविठत संस्कृत आए फेर ia ! ais » रागावतार यादव आदरणीय bab fea AIA, 5+0°99 उपनिक ।3: 6: 4पक TH 3: 8. १वर्के हस्तगत मेल) WAR Mor Oks स्यत्यवाद | iE wear -ननकपुर सी ret ag gen राय; हमर ch ait» aren शिका» सिंटेश्वर “रा न्कि per ORT ER eer गाममे SEMA फोन कए aa करमीलौन्हि अछि A अपनि AAT सुडौल cantor che) tt Me कटमैरि ste ! निममादशमीक अवसर पर TATA CATA 5 Sar आढि। मैंधिलीक सामग्री सभ पत्रबाक aor छविनि '्यत्यवाद | nae ढालहिँ pl नि भानी जात करओ मैन oft rarer? 4: अहराहुल अछि) ce Foe प्ररुशित नर oes ओ.द्लली से :मकाशित 'अँतिका” (जे हमरा देखल eth atte) में उन सकारानार्ध पावर BAB | नै अपनिक Stor att जर्नल अलभ्य होजए Fear पढाति अपन निखक फीटोकोयी | 'वर्तमानने) अं्रेजीस माध्यमि लिखल , अपन gx ate Mars ऑफप्रिंट पम गत दी - जाहिएँ मैंथिली तट Pager द anger गेल एमए Seu आकलन अपने कर समेत ही | उन _7 क प्रकाबाने अनुमाततो कहिया uh होएत तकर yea पावी । फीस yA परे मद A a He Sate रामावताए UT aac ll Walz, 28.I0-09 ont Be get agit Fra ओवए साझाटकार Ter | St Aral हमर बहुत मान-सर्मात ef पट FE द्वारा पढाओल Package हस्तगत He | Heh साद्यिक विविष्म शामग्री आ किीधरुरं PRN मेंडनक gor प्रकाशित जैक सभा पठरबाक हिढ॒ हादिकि थम्यवाद | geet} of ताहिन्इक सभ नहि A अखिकश WARE जनसपुर प्रवासहिमें हम एक बेर skim रूट FORE ES Maran भाग फ़िर कारमोडसे पढ़ब | समान एवं मै ah कस (TH निकल दीपक A जो. 'सरक्षनक *कालित्दीस पत्र गोविन्द क्रीम नाम” मैसी wera Stor | Ae wear, काठमीडूरों arrays लेल प्रस्थान रुखासँ परम) हम SEH ee पीयर Feros
विदेह ३९६ म अंक १५ जून २०२४ (वर्ष १७ मास १९८ अंक ३९६) भाषाविदू रामावतार यादव विशेषांक | | 57 की Xe) आ अपन Mofile Weed deck हर iis ee रद Mufie was Hart yes wey | आय THT 'सारती 'मंडनक अच्ययन - अवलैौकन समीक्षा- लैख छपबार्क क्रममे vie ee he bik a Kit if wear sued aPel afta, Sag aang भर Far Bais Mes AaB आन fi de or aft होजए | ord sat va Ora ater छोशतहि ढामहि IT YA: out SP a a सामान्य UR दिखनामि sree अछि। = alae cat i a SR, ‘aot नर 2 Soe Ty Aer ° ae a हमर मेखक अूफ ser itera Be te अंग्रेजी शब्कसभ 2 sft Staltchzed afzr/ हमरा व्यक्तिगत रब pall करी। = -अदि-तहिना ? ापी एवं रठि अस्नुकम्याक Sot सम अवसर पर अं sas यरिवारक Tal प्रबल कामना करत» शशस्थयाद | जहाक / रामावतार area air ¢ शशि Har, Sd, दिल, जर्मनी) 6+ he 2000 aiden 7 के stat मेल i daa “भारती & Star, हम सम्प्रति Fag ares निल जर्मलीक ome Hho ar Ay Pa weep genes Bn उलट, सर (Steen rg Ree Se जद + ।व9२- BUS Univesity oF arr. हम नेयालक :एकगीट मूलल न 73०9: Fala rast पर नेवारी लियिमे हस्तलिखित, (Sian उनररवला, कोन मैंथिल HF BID Samar aa Tye कसीपकथतक सबक AeA मध्न्यकालीत मैंथिली ores / व्याकरण क. ्रालप Harr शरवास उपक्रममे तल्लीत ही TSE: 9 काज कठिन sit; aie Sage हमरा अहाँ लीकनिक अुभकामनाक Ag जपेज्ञा अद्धि । देखू की कसर्केत BY | जर्मनी ने हम saa 20) 2002 wiht मात्र रहब। ‘ond team AE ately Tea प्रबल कामता AA ४ -सथन्यवाद | nil WaUeaTT ae अति पति जी) जीने aft Prand (oy en ies फिनुस्थरि ua rare | एक स्थान पर $ oF feag a री Stan Fer 4 Tans जनरुपर » तखने फेर TEAS.» आब झाबओआन शहर — = HAT लिखि रहल Stl A e rath diva नियमित रूप अवदबहिं' प्रकाशित स 'महल Ser ~ से आस अधि! लतवा उ के अर ot पढने em ततवां मात्र दखल Ot | nite soba विदेश ait मध्य; अंग्रेजी omar arent लिखल हमर टू सीट sures shan झेल अधि! eat आलेख देश पल जकर पूर्ण gana Reef निम्नौकित otf: Ramauadtar yadau 2003 © Maite dn :Geonge Concer के Dhanesty Tain, eds. The Indo - Arya Languages Reuitledge ६ London DP New York y 2003, 477-447, awer जे ganar ty आर्यभापा समक भाषा वेंतानिक अध्ययनस Atay प्रकाशित तिनिस्थि- पुस्तक TOT संसार भरिमे पहिल aft " मैंचिली' Wer wet अछि। डी विलजञाण feof Ber कुल 'o6! WH alan oft एवं ery are £465 अयति NRs 22, 20/- sf! Baz brie इस रही लववर 26-27 काउमीडमे आयोजित Linguistec 6००८८) itn oe Nepal nya anf अ्थिवेशनस प्रस्तुत SCT! aie आलेखक विषय on मैथिली rare, "फूष्कालिक, क्रिया 'क रितिहासिक- भाषावे ators, सर्ेकण / aroha - विश्लेक्ठा - जी कुल एम हजार Thatta प्राचीन एवं मुथ्यकालीन प्रकाशित - शरप्रकाशित Bee सभक अस्ययन ~ अनुशीलन पर Breit Hel आलेखक sihfs atte: On diachronic.
अ6 || विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in Elegy Written - A Royal Courtyard कन्या कक oe | Gitapaficaka — याबदा 2... औि नि = = - = a a = — a 2 है | = . | I हे व J