VIDEHA — Issue 397 / अंक ३९७

Publication: VIDEHA · Issue: 397
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ISBN 978-93-340-8313-2 (Book) ISSN 2229-547X (online) 𑒀 विदेह ३९७ म अंक ०१ जुलाई २०२४ (वर्ष १७ मास १९९ अंक ३९७) [विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। कॉपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति ‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२४. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२४. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. It is a platform for scholars, researchers, writers and poets to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, and poetry in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@gmail.com. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover designed by AUM GAJENDRA THAKUR Videha e-Journal: Issue No. 397 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृ. १-४) १.२.अंक ३९५ आ ३९६ पर टिप्पणी (पृ. ५-१६) गद्य २.१.आशीष अनचिन्हार- AI एवं मैथिलक ताम-झाम (पृ. १८-१९) २.२.आचार्य रामानंद मंडल- अशोक वाटिका मे सीता संग वार्ता भाषा बनाम मानुषी भाषा (मैथिली)रामावतार यादवजीक संक्षिप्त परिचय (पृ. २०-२१) २.३.लालदेव कामत- डॉ० (प्रो०) कमल कांत झा: एक व्यक्तित्व/ मायानंदके हेरैत दृष्टि (पृ. २२-२६) २.४.प्रमोद झा 'गोकुल'- रनियाँ (कथा) (पृ. २७-३१) २.५.प्रेमशंकर झा पवन- सभ गुणक खान- फलक राजा आम (पृ. ३२-३५) २.६.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा-कृतघ्न (पृ. ३६-३७) पद्य ३.१.विजय कुमार मिश्र "श्री विमल"- कहलन्हि शकुनी मामा (हास्य कविता) (पृ. ३९-४१) ३.२.मुन्ना जी- गजल (पृ. ४२-४३) ३.३.संतोष कुमार राय 'बटोही'- दोसर गांधी (पृ. ४४-४५) ३.४.मानेश्वर मनुज- जे अहाँ/ लोक बानी (पृ. ४६-५९)

१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय ११७ म सगर राति दीप जरय, दरभंगा (आयोजक हीरेन्द्र झा आ अशोक कुमार मेहता) साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदातृ समितिक अध्यक्ष (आब भूतपूर्व) अशोक अविचलक दृष्टि सगर राति दीप जरय पर पड़ल आ ओकरा गिड़बाक प्रयासमे हीरेन्द्र झा केर ब्लैकमेलिंग केर शिकार ओ सहर्ष भेला आ टैगोरक १५० म जयन्ती वर्षक साहित्य अकादेमीक कार्यक्रम जे दिल्लीक एकटा संस्था करबेने रहय केर गिनती सेहो करैत नम्बरमे हेरफेर करबाक अपराध केलन्हि, जकरा ओ चलाकी बुझैत छथि। मैथिली परामर्शदातृ समितिक अध्यक्ष बनलाक बाद लोकमे ऐ तरहक प्रवृत्ति देखल गेल छै, जकर शिकार रामदेव झा भेला, जे शोधक लेल ख्यात रहथि; चन्द्रनाथ मिश्र अमर भेला, जिनकर पहिल फेजक आन्दोलनी योगदान झँपा गेलन्हि, आब नचिकेतापर ई ग्रहण लागल छन्हि। हीरेन्द्र झा ऐ लगा तेसर बेर ई कुकृत्य केलन्हि अछि, जइमे ऐ बेर कमल मोहन झा आकि मिश्र चुन्नू सेहो हुनकर संग देलखिन्ह। हँ सह-सहयोजक अशोक कुमार मेहता मुदा ऐ कुकृत्यमे हुनकर संग नै देलखिन्ह। भेलै की? पूर्व नियोजित षडयंत्र जइमे अशोक अविचलक योगदान ऊपर कहल गेल अछि, मे हीरेन्द्र झा केँ सगर राति दीप जरय केर सह-आयोजक बनाओल गेल (स्पष्ट रूपसँ कहि देल गेलन्हि जे नम्बरमे हेरफेर नै करता), फेर कमल मोहन झा आकि मिश्र चुन्नूकेँ तैयार राखल गेल। मुदा सभ चोरिमे एकटा निशान छुटिते छै। अध्यक्ष महोदय बिना कोनो प्रस्ताव एने धड़फड़ीमे बाजि देलखिन्ह जे अगिला गोष्ठी पटना आ तकर अगिला दिल्ली (जतऽ साहित्य अकादेमीक मुख्यालय अछि) मे हएत, आ फेर गप सम्हारलखिन्ह जे से तकर निर्णय (दिल्लीक) पटनामे कएल जायत। कमल मोहन झा आकि मिश्र चुन्नू तैयारे-तैयार रहथि, फटाकसँ चोरिक रजिस्टर आ दीप लेलन्हि हीरेन्द्र झा सँ आ निर्ललज्जापूर्वक हँसबाक प्रयास करैत (मुदा हँसी तँ छोड़ू हास्यक पात्र लगै छथि) फोटो घिचबेलन्हि। प्रतिकार की हुअय? ई ऐ लगा हीरेन्द्र झा केर तेसर गलती अछि से हुनका तीन सगर राति लेल बैन कएल जाय, कमल मोहन झा आकि मिश्र चुन्नूक ई पहिल गलती अछि से हुनका एक सगर राति लेल बैन कएल जाय। उपस्थित लोकक बहु-संख्या ११८ म सगर रातिक आयोजक ताकथि। अगिला सगर रातिक नम्बर ११८ रहय आ तकर प्रचार हुअय, जइसँ साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदातृ समितिक अध्यक्ष ई कुकर्म करबाक विषयमे सोचितो डराथि। नव साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदातृ समितिक अध्यक्ष आ सदस्य लोकनिक कुकृत्य नव साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदातृ समिति अपन प्रचारमे पुरना समितिक लेल ई श्लोक पढ़लन्हि: यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभुत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥४.७ (श्रीमदभागवदगीता) जखन-जखन धर्मक नाश आ अधर्मक उत्थान प्रारम्भ हएत हे भरत, तखन-तखन हम आयब (शरीर धारण करब)। आ से ततेक अधर्म भेलै जे नचिकेता आ हुनकर टीम अवतार लेलक। आ केलक की? मासो नै बितलै पहिल बैसकीमे मोनोग्राफ, अनुवाद आदिक बँटवारा भेलै आ टीमक सदस्य सभ अपनेमे सभटा असाइनमेण्ट बाँटि लइ गेल, अपना-अपनी आ लगुआ-भगुआमे, नचिकेताजी देखैत रहि गेला, वरन सहयोगे केलखिन्ह। समानान्तर धाराकेँ स्कोर पहिनहियो शून्य रहै, अवतारी पुरुष सभ तकरा शून्ये रखलन्हि। पुरस्कारक राजनीति नारायणजी दाड़िमक बदला अनार लिखलन्हि आ बाल साहित्यकार ओ छथि नै, पुरस्कार लेल बाल साहित्य लिखलन्हि। मुन्नी कामतक चुक्का विदेह पेटारमे उपलब्ध अछि, नारायणजी ओइ पोथीकेँ पढ़थु आ निर्णय लेथु जे की ओइ पोथीक सोझाँमे हुनकर पोथी ठठै छन्हि। आ जँ अन्तरात्मामा नै छन्हि तँ हीरेन्द्र झा/ कमल मोहन झा आकि मिश्र चुन्नू सन निर्लज्जतासँ पुरस्कार लेथु, हमर अग्रिम शुभकामना। आ जँ अन्तरात्मा नै मानै छन्हि तँ दलदलसँ बाहर आबथु। [विदेह अंक ३९७ सम्पादकीय] [मिशेल फोको (Foucault)क "अनुशासन संस्था" बा मनोवैज्ञानिक बार्टन आ ह्वाइटहेडक "गैसलाइटिंग" दुनूक लक्ष्य एक्के छै। मिशेल फोकोक "अनुशासन संस्था" अछि, सोझाँबलाकेँ अनुशासनमे आनू आ तइ लेल सभकेँ आपसेमे लड़ाउ, किछुकेँ पुरस्कृत करू आ जे अनुशासनमे नै अबैए तकरा आस्ते-आस्ते माहुर दियौ। गैसलाइटिंगमे सोझाँबला केँ विश्वास दिआओल जाइत अछि जे अहाँ जे यथास्थितिक विरोध कऽ रहल छी से कोनो विरोध नै, ई तँ सभ कऽ रहल अछि, अहाँ तँ विरोधक नामपर विरोध कऽ रहल छी आ से अपन कमी नुकेबा लेल। ऐमे समाजमे वर्तमान आधारभूत कमीक सहायता सेहो लेल जाइत अछि, आ आस्ते-आस्ते टारगेट बताह भऽ जाइत अछि बा पलायन कऽ जाइत अछि। मिशेल फोकोक सभटा डिसीप्लिनरी इंस्टीट्यूशन "अनुशासन संस्था" जेना साहित्य अकादेमी, मैथिली अकादमी, मैथिली भोजपुरी अकादमी, आ साहित्य अकादेमी द्वारा मान्यता प्राप्त कथित लिटेरेरी असोसियेशन सभ मूल धारा लग छै। सगर राति दीप जरय केँ मिशेल फोकोक परिभाषित डिसीप्लिनरी इंस्टीट्यूशनमे अनबाक प्रयास बहुत दिनसँ कएल जा रहल छै।] अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १.२.अंक ३९५ आ ३९६ पर टिप्पणी अंक ३९५ आ ३९६ पर टिप्पणी कल्पना झा, पटना विदेह- नरेन्द्र झा विशेषांक (०१.०६.२०२४)- सद्यः प्रकाशित विदेहक "नरेन्द्र झा विशेषांक", जे विदेहक ३९५ म अंक आ तीसम "विशेषांक" अछि,निस्संदेह प्रशंसनीय ओ सराहनीय काज अछि विदेहक। एहि सराहनीय काज लेल साधुवाद विदेह टीम केँ ! १५/०६/२००८ कऽ प्रकाशित "हाइकू विशेषांक" सँ शुरु भेल विदेहक विशेषांक-यात्रा गजल विशेषांक,बीहनिकथा, बाल-साहित्य,नाटक,समीक्षा,अनुवाद, बाल गजल,भक्ति गजल,गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक सन,साहित्यिक विधा ओरिएंटेड विशेषांक सभ प्रकाशित करैत अनवरत चलि रहल अछि। व्यक्ति-विशेष पर पहिल विशेषांक काशीकान्त मिश्र 'मधुप' जी पर एक जनवरी २०१५ कऽ प्रकाशित भेल। इहो विशेषांक प्रशंसनीय मुदा अहू सँ बेसी प्रशंसनीय काज अछि जीवित लेखक पर विशेषांक प्रकाशित करब। जकर शुरुआत भेल अरविन्द ठाकुर जी पर विशेषांक निकालब सँ। पीठे लागल दोसर जगदीश चंद्र ठाकुर 'अनिल'जी पर प्रकाशित भेल। विदेह द्वारा जीवैत लेखक पर विशेषांक प्रकाशित करबाक विचारक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। ई विशेषांक सभ निस्संदेह विदेह केँ एकटा सफल "ई मैगजीन"क रूप मे स्थापित करबा मे सहायक भेलए। रामलोचन ठाकुर विशेषांक आ रवीन्द्रनाथ ठाकुर विशेषांक प्रकाशित होएबा सँ पहिने ओ दुनू गोटे स्वर्गीय भऽ गेलाह,तकरा खराप संजोग कहबाक चाही। मुदा आगाँ केदारनाथ चौधरी विशेषांक ओ स्वयं पूरा पढ़ने छलाह,एहन Ashish Anchinhar जीक पोस्ट सँ जनतब भेटल छलए। ई वास्तव मे संतोषक बात भेल। केदारनाथ चौधरीक उपरान्त प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' जी, शरदिन्दु चौधरी जी,कथाकार अशोक सर,राम भरोस कापड़ि "भ्रमर"जी आ लक्ष्मण झा 'सागर' जी पर विशेषांक निकालल गेल आ स्वाभाविके बात जे ओ सभ अपना उपर विशेषांक पढ़ि संतोषक अनुभव कएलनि। "केदारनाथ चौधरीजी केँ संपूर्ण रूपेँ जनबाक लेल विदेहक विशेषांक पहिल आ एखन धरिक एकमात्र माध्यम छै पाठक लेल।" ई कहब छनि आशीष जीक। एहि सँ अनुमान लगा सकैत छी,जे ई विशेषांक सभ निकालि कतेक महत्वपूर्ण काज कऽ रहल अछि विदेह टीम। महत्वपूर्ण दस्तावेज सन जोगा कऽ राखएबला काज अछि सभटा। एखन धरि प्रकाशित जतेक विशेषांक अछि,से सभटा महत्वपूर्ण अछि,ओहि व्यक्ति केँ संपूर्ण रूपेँ जनबाक लेल,जनिका पर विदेह विशेषांक निकालल गेल अछि। हमहूँ किछु विशेषांक लेल सहयोग कऽ सकलियनि,से संतोषक बात हमरा लेल। एक टा सार्थक काज मे सहयोग केलहुँ,से भाव आबैए मोन मे। विदेहक संग जुडथि आ सार्थक काज मे सहयोग करथि सभ साहित्यकर्मी,से आग्रह हमर। ने आत्मप्रचार,ने विदेहक प्रचार।नीक काजक सराहना हेबाक चाही। प्रणव झा विदेह के ३९५ म अंक नरेंद्र झा विशेषांक के रूप मे बहरायल। विभिन्न पेशा से जुडल लेखक आ पाठक लोकनि अपन अनुभव, मन्तव्य आ विचार नई खाली श्री नरेंद्र झा के मैथिली लेखन के विषय मे रखलाह अछि अपितु मैथिली मे आर्थिक आ आन आन विषय पर लेखन, मिथिला के आर्थिक परिस्थिति आ श्री नरेद्न् जी के परिवार आ व्यक्तिगत जीवन परिचय सहित हुनक अर्धांगिनी डॉ० पन्ना झा के अकादमिक आ लेखकीय परिचय पर सेहो खूब लिखलइथ। बेस ई सब आलेख विभिन्न पाठक वर्ग मे पढ़ल सेहो गेल हेतय। ई रेखांकित करय छैक जे विदेह के संपादक मण्डल नरेंद्र झा विशेषांक निकालबा के जै उद्देश से नियाराने छलाह से फलीभूत भेलइन।

श्रीमती कल्पना झा अपन लेख "अनुशीलन"क अनुशीलन आवश्यक, के माध्यम से श्रीमती पन्ना झा के लेखकीय परिचय हुनक लेखनी के अंश के माध्यम से बड्ड सुन्नर रूप मे केलिह अछि। सुश्री मुन्नी कामत जी के लेख सेहो सारगर्भित लागल आ ओ श्री नरेंद्र झा के पोथी पर चर्चा के माध्यम से लेखक के लेखकीय विषय वस्तु पर इजोरिया दैत छथीन। डॉ० धनकर ठाकुर के आलेख सूचना आ समालोचना से भरल आ पठनीय छैक। श्री आशीष अनचिन्हार के सुगठित व्यंग आलेख अहिना रहल की -देखन मे छोटन लगे चोट करे गंभीर।- सीमित शब्द मे श्री आशीष अनचिन्हार विशेषांक लेखक के लेखकीय परिचय दैत, देश-विदेश मे विज्ञान, अर्थशास्त्र, मानविकी आदि के विभिन्न विधा मे कार्यरत मैथिल बुद्धिजीवी सब के उकटइत आ व्यंग वाण छोड़ईत नै खाली सफल आलोचना क के निकैल जाय छैथ अपितु ऐ वर्ग के पाठक मे अपन विषय वस्तु पर मैथिली मे लेखन के लेल प्रेरणा के एकटा बीया सेहो रोपबा मे सफल होइत छैथ एहन हमर मन्तव्य अछि। रमेश श्री राजीव एकान्त द्वारा,बहुत नीक समीक्षा/आलोचना, डा. रामावतार यादवक चर्चित पोथीक कयल गेल अछि। आलोच्य पोथीक जाहि बिन्दु सबहक आलोचना,प्रस्तुत कयल गेल अछि,से सब आलोचना- बिन्दु, असंगत नहिं अछि। मैथिलीक बोली 'अंगिका'(आ ग्रियर्सनक 'छिक्का छिक्की')क उत्पत्ति, 'भाषाक रुप मे', 'मैथिलीक संग हेबाक' 'अ-तथ्य' लिखब,कटु आलोच्ये नहिं, मिथिला-मैथिलीक लेल 'अहितकारी आ अकल्याणकारी सेहो' अछि। 'हिस्टोरियोग्राफी औफ मैथिली लेक्जिकोग्राफी'क 'केन्द्रीय विषय' नहिं बनब, पोथीक आ प्रश्नगत पोथीक 'नामकरण'क, 'महत्व आ प्रासंगिकता' घटा दैत अछि। अइ मे,ने त' 'हिस्टोरियोग्राफी'( मैथिली शब्दकोषक एखन धरिक इतिहास-लेखनक अद्यतन विश्लेषण आ तकर सिद्धांत निरुपण) पर विशेष किछु लिखायल,आ ने एखन धरिक मैथिली 'लेक्जिकोग्राफी'( मैथिली शब्दकोष निर्माण-विज्ञानक स्थिति अथवा सैद्धान्तिक विश्लेषण)क प्रसंग मे,विशेष लिखायल...(?),तखन त' मात्र 'बुचानन के शब्दकोष' हावी रहल,पोथी पर..? ..आ ब्रिटिश उपनिवेशवादी 'भारोपीय भाषा सिद्धांत' (मैथिलीक उत्पत्तिक सन्दर्भ मे) त' समर्थक छथिए,डा.यादव! से कोनो 'नव आ नीक बात' नहिंएं अछि! तखन,त' पोथीक संग,हिनकर भाषाशास्त्रीय विचार(मैथिलीक उत्पत्ति आ विकासक सन्दर्भ मे) सेहो आलोच्ये अछि! कुल्लम मे,श्री राजीव एकान्तक प्रकाशित ई 'आलोचना-आलेख', बेसी तर्कसंगत अछि!

कल्पना झा पटना डॉ. रामावतार यादव जीक व्यक्तित्व ओ कृतित्व सँ परिचित होएबाक इच्छुक लोकक लेल 'विदेह'क ३९६ म अंक "भाषाविद् रामावतार यादव विशेषांक" सँ नीक कतहु किछु उपलब्ध हेतनि,से संभावना नगण्ये बुझू । जेना कि आशीष अनचिन्हार जी एहि विशेषांक केर पहिल लेख "प्रस्तुत विशेषांकक संदर्भ मे" कहलनि अछि,ताहि सँ तँ सएह बुझाइत अछि। आशीष जीक वक्तव्य अछि "प्रो. डा. रामावतार यादव जीक रचना वा हुनकर अवदानक ऊपर कतहु किछु प्रकाशित भेल हो तकर संख्या बहुत कम हएत कारण कमसँ कम हम ओकरा अवलोकन करबासँ वंचित छी।" ओना आगाँ ओ इहो स्वीकार करैत छथि जे "बहुत संभव प्रो. डा. रामावतार यादव जीक ऊपर लिखल गेल हो मुदा हमहीं नै देख सकल होइ।"

नेपालक मैथिली केँ प्रतिनिधित्व कएनिहार डॉ. रामावतार यादव जीक व्यक्तित्वक सभ आयाम पर चर्चा देखबालेल भेटल एहि विशेषांकक लेख सभ मे। सभ आयाम मतलब नीक/बेजाए सभ। विदेह द्वारा एखन धरि प्रकाशित विशेषांक सभ जकाँ इहो अंक एकटा महत्वपूर्ण दस्तावेज सन अछि। आ विदेहक अपन जे काज करबाक शैली छैक,ताहि शैलीक तहत इहो अंक मात्र अभिनन्दन ग्रन्थ नहि बनल अछि। ई तँ सर्वविदित अछिए जे कोनो मनुष्य सर्वगुणी नहि होइत अछि। तँ से कोनो व्यक्ति होइथ कि संस्था, गुण-दोष दुनूक चर्चा होइत रहल अछि विदेहक विशेषांक सभ मे।

विदेह टीमक ई कार्य शैली बहुतो लोकक लेल प्रेरणाक स्रोत सेहो बनि सकैत अछि। 'बनि सकैत अछि' नहि,बनबे टा करत,से कहबाक चाही। एहि तरहक काजक उपयोगिता सभ आयु वर्गक लोकलेल रहत। अनन्त काल धरि। जा धरि मैथिली भाषा जीबैत रहत । लेखक,संपादक वा कोनो तरहक साहित्यिक गतिविधि सँ जुड़ल लोक सँ ल' क' रिसर्च स्कॉलर धरि, सभलेल उपयोगी सिद्ध होएत।

उक्त विशेषांक मे पाठक केँ डॉ. रामावतार जीक शैक्षणिक उपलब्धिक जनतब तँ भेटबे करतनि संगहि हुनकर साहित्यिक, सामाजिक, व्यावहारिक गतिविधि पर लिखल लेख सेहो भेटतनि। डॉ. रामावतार यादव जीक विद्वता सँ पाठक परिचित होएताह हिनकर प्रकाशित कृतिक नमहर सूची देखि। जाहि मे हिनकर लिखल 95 टा शोधपत्र,जे कि मैथिली एवं भाषाविज्ञान सँ संबंधित अछि, से Nepal, India, USA, UK आ Germany आदि देश मे प्रकाशित भेल अछि,सेहो सन्निहित अछि। हिनकर विस्तृत वृत्ति-क्षेत्रक संग हिनका प्राप्त सम्मानक नमहर सूची देखि स्पष्ट भ' रहल अछि, जे वास्तव मे डॉ. रामावतार यादवजी मिथिला रत्न छथि।

नेपाल सरकारक विभिन्न शैक्षिक-प्रशासनिक पदपर अपन सेवा देनिहार डॉ. रामावतार यादव जीक पद-प्रतिष्ठा देखि हुनकर रचना वा हुनकर व्यक्तित्वक मात्र गुणगान करब विवशता नहि बुझाएल एहि विशेषांक लेल लेख लिखनाहर सभक। देखलहुँ जे,ताहि तरहक लेख कम अछि। कोनो पत्रिका लेखक आ पाठकक बीच सेतुक काज सेहो करैए,जखन कोनो विद्वान पर एहि तरहक काज होइत अछि तखन। एहन कहब छनि आशीष जीक। "अंततः हरेक विद्वान जनते-जनार्दन लेल होइत छथि आ तेँ जनता-जनार्दन केँ ओहि विद्वान सभ सँ किछु ने किछु अपेक्षा रहिते छै।" एहि संपादकीय नोटक संग संतोष कुमार मिश्र (जनकपुर) जीक लेख प्रकाशित करब प्रशंसनीय अछि। संतोष जी लिखैत छथि, "आदरणीय डा रामावतार यादव नहि तऽ ओ हमरा सँ किछु पुछला आ नहि हमरा किछु कहबाक मौका भेटल।हुनकासँ भेंट करबाक इच्छा मनमे लागले रहि गेल। एक बेर बहुत प्रयास कएलाक बाद हमरा हुनकर फोन नं. उपलव्ध भेल, फोन कएलियनि। ओ व्यस्त छलथि। बात नहि भेल। ओ 'बादमे भेटब' कहलखिन। फेर ओ बाद कहिया आओत, नहि जानि।"

तहिना कवि राजीव झा 'एकान्त' जीक लेख यादव जीक पोथी "Histography of Maithili Lexicography & Francis Bucanan's cpmparative Vocabularies" पर समीक्षात्मक लेख अछि। एकान्त जीक कहब छनि," सत्त कही तऽ अइ समस्त पोथी मे इतिहासक नामे बुकाननक शब्दकोश आ बाँकी डाटा संग्रहक अतिरिक्त सार्थक आयाम मात्र बुकाननक आलोचनात्मक व्याख्या टा अछि। लेखक नूतन अन्वेषणक दृष्टि आ क्षमताक प्रदर्शन नहि कऽ सकलाह अछि।"

एहि "भाषाविद् रामावतार यादव विशेषांक" मे हिनकर कृति सभ केहन छनि,ताहू पर चर्चा अछि,किछु आलेख संस्मरणात्मक अछि। किछु समीक्षात्मक आ परिचयात्मक सेहो। मतलब खटमधुर सुआद सँ युक्त अछि 'विदेह'क ई विशेषांक। ठाम ठाम पर लिंक सभ संलग्न अछि जकरा खोलि क' कोनो पर्टिकुलर विषय पर विस्तृत विवरण देखल जा सकैए। कुन्दन कुमार कर्ण जी अपन आलेख "डा. रामवतार यादवसँ पहिल भेंटक संस्मरण" मे एकटा वीडियोक लिंक साझा केलनि अछि । लिंक पर जा क हुनका नीक जकाँ सुनि सकैत छथि पाठक। हुनका देखि सकैत छथि -

https://www.youtube.com/watch?v=TrnRTpwHDbk&t=4s

धीरेन्द्र झा 'मैथिल' जीक आलेख सेहो संस्मरणे छनि।

हुनकर सान्निध्य मे किछुओ समय जे बितौलक,से हुनकर विद्वता सँ प्रभावित भेल,एहन कइअक टा संस्मरणात्मक आलेख पढ़ि अनुभव कएलहुँ हम। धीरेन्द्र जीक शब्द छनि - "भाषा आ शब्द जे हुनका मूँहसँ निकलि रहल छलनि से गंभीर ओ भरिगर हमरा अनुभव भेल।"

डा रामावतार यादव जीक कहब छनि,"भाषा ब्राह्मण वा अन्य ककरो खरीदल नै छै। सज्झा संपति छै। भाषोक जाति अनुसार बाँट-बखरा जे केयो करऽ चाहै छथि ओ नीक नहि छथि।" धीरेन्द्र जीक आलेख मे उदधृत।

भीमनाथ झा जीक संस्मरण "'तहिया'केँ तहियाक' राखल- श्री रामावतार बाबू" पढ़ि बाल्यकालहि सँ हुनकर प्रतिभाशाली होएबाक जनतब भेटैत छै लोककेँ। भीमनाथ जीक शब्द मे- "प्रतिभाशाली रहबे करथि,अवसरो भेटैत गेलनि देश-विदेशमे पढ़लनि-पढ़ौलनि, भाषाविज्ञानमे विशेषज्ञता प्राप्त कयलनि, शोध-अनुसन्धानमे अन्तर्राष्ट्रीय नाम भेलनि।फलत: समस्त प्रबुद्ध मैथिल समाजक बीच ई चुनल शीर्षस्थ विद्वन्मणिमालाक एक दाना मानल जाय लगलाह।"

उदयनारायण सिंह 'नचिकेता' जी अपन आलेख "रामावतार यादव जी-जेना हम हुनका चिन्हने छलियनि" मे कहलनि अछि - 'हमरा ज्ञानतः एहन कोनो मैथिली के विद्वान नहि छथि जे हिनका सँ बेसी प्रभावी ढंग सँ अंग्रेजी तथा जर्मन मे अपन बात कें अंतर्राष्ट्रीय फोरम मे राखि सकै छथि।" आगाँ कहि रहल छथि - 'हमर ज्ञानतः मैथिली कियैक, हिन्दियो मे भरिसक एहन अध्ययन क्यो नहि क' रहल छल। हँ, ई बात अवश्ये कहब जे आगाँ चलि कय श्रद्धेय डॉ सुभद्र झा जी के सुपुत्र डॉ प्रभाकर झा पेरिस मे एही तरहक काज कयने छलाह।"

केदार कानन जी अपन लेख "विद्वानक सत्संग-कथा" मे रामावतार यादव जीक संग भेल पत्राचारक चर्चा करैत लिखैत छथि -"हुनका सन भाषाशास्त्री, मृदुभाषी , सुलेख मे लिखनाहर विद्वानक संसर्ग मे अक्षरक माध्यमे,पत्र पत्रिकाक आदान प्रदानक माध्यमे हम जुड़ल रहलहुँ से निश्चित रूपेँ हमर सौभाग्य थिक।"

शैलेन्द्र मिश्र जीक आलेख "डॉ रामावतार यादव : मैथिली भाषा- साहित्यक असाध्य काज साधवला एकटा निष्काम कर्मयोगी" मे हुनकर मृदु स्वभाव ओ एकटा जागरूक अभिभावकक गुण, आ यादव जीक मैथिली भाषा ओ साहित्यक प्रति माश्चर्य आ दायित्व भावक परिचय भेटैत अछि।

राम चैतन्य धीरज,डॉ.धनाकर ठाकुर,डॉ. शिव कुमार मिश्र सभ गोटाक लेख स्तरीय,जनतब युक्त बुझाएल।

ठीके कहलनि अछि अयोध्यानाथ चौधरी जी - जहिना हुनकर दुर्लभ योग्यता, जहिना हुनकर दुर्लभ भाग्य तहिना हुनकर दुर्लभ कृतित्व। हमरा जनैत हुनक एक-एकटा कृति मैथिली भाषा-साहित्यक हेतु अनमोल धरोहर अछि। मैथिली भाषा-साहित्यक इतिहास अनन्त समय धरि गर्व करैत रहत।

लालदेव कामत प्रो० डॉ० राम अवतार यादव विशेषांक मादे पछिला बरख अर्थात् २० दिसम्बर २०२३ ई० केँ विदेह इन्टरनेट मैथिली पाक्षिक पत्रिका मेँ मैथिली भाषा मर्मज्ञ प्रोफेसर (डॉक्टर) रामावतार यादव जीक उपर विशेषांक निकलबाक घोषणा भेल रहय। से १५ जून २०२४ केँ नुतन अंक -३९६ समय पर बहरायल अछि। एहि भगिरथ परियास लेल विदेह टीमकेँ साधुवाद दैत छीयैन। एहि विषयमे चयनित कयल गेल अनेकों विद्वतजनके आलेख - रचना पढबाक सौभाग्य प्राप्त भेल। वरेण्य साहित्यकार श्री गजेन्द्र ठाकुर जीक सम्पादकीय आ प्रस्तुत विशेषांक 'क संदर्भमे श्री आशिष अनचिन्हार जीके रपट सँ विशेष जनतब पाठकगण केँ भेटैत छैन। विदेहक समावेशी योजना सँ समान्य पाठककेँ प्रशन्नता होयब सोभाविक छैक। सन् २००८ सँ २०२४ धरिमे ३२ गोट विशेषांक मूलतः निकलल अछि। पहिल चरणमे २००८ सँ जनवरी २०१५ धरि विशेषांक केर नामकरण लिखल नहिं गेलैक । दोसर चरणमे २०१५ सँ एखनधरि जीवीत लेखक उपर विशेषांक प्रकाशित भेल अछि। तेसर चरणमे नीत नवल सिरीज़ रूपेँ निकालल गेल अछि। मिथिला - मैथिली लेल जे उत्कृष्ट काज करय बाला संस्था, रंगमंच - रंगकर्मी , संगीतकर्मी , साहित्यकार - सम्पादक सब भेलाह अछि ; हुनका कृतित्व पर विशेषांक श्रृंखला निकालबाक पहिल परियास ई-पत्रिका 'विदेह' मैथिली पाक्षिक म भेल हन्। एहि संग कोनू व्यक्ति केर विषयमे पाठककेँ समेकित रूपेँ विस्तृत जनतब पेयबाक यथेष्ट काज मानल जायत। प्रो० (डॉ०) रामावतार यादव जीक रचना ओ हुनकर अवदान 'क उपर अध्ययन लेल वंचित रही, से प्रतिपूर्ति विदेह जून द्वितीय अंक कयलक अछि। नेपालक रहनिहार मैथिली भाषा विशेषज्ञके मादे संवत् केर उल्लेख भेटत, संवत् मे सँ ५७ अंक निघटाए केँ अंग्रेजी ईस्वीक सन् सहज रूपेँ जानि जाएब। एहि ले उजगुजेबाक नहिँ रहत। वर्तनी ओ मानकीकताक शव्द वोधमे किछु अन्तर सेहो पाठक अनुभव करैत होथि, कियाक तँ तीने कोस पर पानि-वाणी मेँ किछु अन्तर आबि जाइत छैक। व्याकरणिक दृष्टिये समुन्नत मैथिली भाषाके आधार पर जँ शुद्धता पकड़ि केँ चलब तँ मिथिलाक मातृवाणी तीन भाग सँ बेसियेमे फुटि जाएत। पछिम भागक भाषाकेँ बज्जिका बोली आ पूरब दछिन कोनाक बाजबकेँ अंगिका वाणी कहि समृद्ध मैथिलीकेँ खंडित कयल जाइछ। मुदा सबसँ निशन ठेंठी मैथिली भाषा बाजब - लिखब छैक ,जे आवादी अनुसारे सर्वाधिक देख पड़ैत य। विदेहक विशेषता रहल अछि जे एहिमे अखैन धरि कोनूटा विशेषांक अभिनन्दन ग्रन्थ बनय सँ बाँचल अछि। तेँ एहि बाबत आलोचना - प्रशंसा सब कथु पढ़ैक अवसर भेटैत छैक। नेपालक प्रतिनिधित्व करयबाला प्रो० यादव जीके नेपालमे भाषा विज्ञानी रूपेँ अधिकतर लोक कमतर आँकैत छन्हि। डाक्टर साहेवकेँ नेपाल अधिराजमे हुनकर भाषानिति कारणेँ पसीन नहिं कयल जाइत छनि। मुदा भारत - नेपाल 'क चोटिक विद्वान लेखकगण हुनका विषयमे दिलक गहिंरपन सँ निम्न तथ्य पाठक लेल परसि अधिगम बोध मुल्यांकन कयलनि। यथा -: प्रो० भीमनाथ झा जी लिखलन्हि - 'तहिया'-केँ तहियाक' लागल - श्री राम अवतार बाबू। आगू करैत छथि- १९५८-६० सत्रमे सहपाठी छलियनि,से तकर अनुभव भेल ५०-५५ बरखक बाद। सेकेंड डिवीजन सँ मैट्रिक पास भेल रही। ककरौल बाला पीसाजी हमर आई ए में आर के कालेजमे नाम बिनु टांगते पतरके लिखा देलनि प्रिंसिपल साहब सँ कहि केँ। प्रिंसिपल प्रो० अरूण कुमार दत्त जीके बिना एकोपाई देने धरि हमर नामांकन भ' गेल। वाद में सबटा प्रक्रिया पुरा कयल। धरि रौल नं०-५ ए' सेक्शन भेटल रहय। ओई समयमे हमर विषय -: सिभिक्स ,प'साक्लोजी आ मैथिली केँ लोक चूरा दही चीनी केर मेल बूझैक। कला संकायके दू हजार विद्यार्थी परीक्षार्थी मेँ सँ मात्रे पाँच छ नाम प्रथम श्रेणिमे रहैक,जाहिमे एक नाम रामावतार यादव जीके सेहो अखबारमे छपल रहनि। ता बिहारमे मगध आ पटना यूनिवर्सिटी मात्रे रहैक। हमरा तँ द्वितीय श्रेणी सँ उत्तीर्ण हेबाक सौभाग्य प्राप्त भेल छल। रामावतार जी देश विदेशमे पढ़लनि- पढ़ौलनि। भाषा विज्ञानमे विशेषता प्राप्त केलनि। शोध अनुसंधानमे अन्तर राष्ट्रीय नाम भेलनि, एक पर एक उत्कृष्ट ग्रन्थ आ शोध प्रवन्धक' लेखन प्रकाशन कयलनि। अनेकों महत्वपूर्ण विलुप्त पाण्डुलिपिकेँ ताकि सम्पादित क' सोझा अनलन्हि। तेँ समस्त प्रवुध्द मैथिल समाजक बीच ई चुनल शिर्षस्थ विद्वन्मणिमालाक एक दाना मानव जाए लगलाह अछि। मिथिला मैथिलीक खुटाकेँ विश्व भाषाक अध्ययन संसारमे मजगुति सँ गाड़ने छथि।" श्री उदय नारायण सिंह 'नचिकेता ' - रामावतार यादव जी - जेना हम हुनका चिन्हने छलयनि आलेखमे एकठाम लिखने छथि -" हमरा ज्ञानत: एहन कोनू मैथिलीके विद्वान नहिं छथि जे हिनका सँ बेसी प्रभावी ढंग सँ अंग्रेज़ी तथा जर्मनमे अपन बातके अन्तर्राष्ट्रीय फोरममे राखि सकै छथि। अध्यापक रूपमे ओ त्रिभुवन विश्व विद्यालय आ पाटन कालेज मेँ पढ़ौने छलथि। मुदा केंसास विश्व विद्यालयके प्रशिक्षण हुनका दक्षिण एशियाई देशमेयक प्रमुख ध्वनि -विज्ञानी बना देलकनि। ओ मात्र भाषाचार्य टा नहि साहित्यो क्षेत्रमे एकटा प्रतिष्ठित नाम छथि। पूर्वांचल विश्वविद्यालयक कुलपति सेहो नियुक्त भेला।" धीरेन्द्र झा 'मैथिल '- " हम जनकपुर उद्योग वाणिज्य संघक सभा हौलमे एक अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलनमे कार्यक्रम सँ पूर्वहि उपस्थित डॉ० रामावतार यादव जीकेँ पहिल खेप एक गोटे सँ प्लास्टिक कुर्सी पर बैसल गप्प करैत देखलियैन ‌ओहि सँ पहिले परीचय नहिं रहने , हुनक भेंटक अभिलाषी रही। मैथिली शव्द, वाक्य आ भाषा विज्ञान संबंधी विषय वस्तु ककरो बुझबैत रहथिन।ओ गम्भीर आ भरिगर हुनका मुँह सँ निकलल आवाज हमरा कर्णप्रियता आ ज्ञानवर्धक लागल। प्रसंग उठल छलैक - ब्राह्मण कायस्थक भाषा एवं अन्य जातिक भाषामे फर्क रहल ,जकर उल्लेख ओ करैत जगहक अनुसारे मैथिली भाषामे फरक होइते छैक। मैथिली समृद्ध भाषा अछि । अपन बात रखैक क्रममे ओ जे लोक हमरा बाभन बुझैत अछि। ताहि अनजान व्यक्ति क' कहैत छथि- हम ब्राह्मण केँ मजगूत नहिं करैत छी, हम तँ कहैत छी हिन्दी, अंग्रेजी, नेपाली वा आन भाषा' क व्याकरण जकाँ मैथिलिक सेहो छैक। तेँ शुद्ध शव्द लिखनाई आ बाजब पैघ बात छैक। " राम चैतन्य धीरज जीके कथन - "हमरा जनैत आब मैथिली साम्राज्यवादी मानसिकताक गुलामी खटबाक लेल तैयार नहिं अछि। एकर स्वतंत्र इतिहास दृष्टि छैक, तथा अवधारणा आ विचारक आयाम छैक; जाहिसँ ऐतिहासिक संस्कृति लोकभाषा आ वेद भाषाक व्यवहार सामंजस्यमे सुरक्षित अछि।" डॉ० धनाकर ठाकुर केर कहब छनि - " ध्वनिविज्ञान भाषाक एकटा शाखा नीक, जकरा विषयमे सामान्य जनके ज्ञान सीमित रहैत अछि। डाक्टर रामवतार यादव एहिपर काज कयलनि आओर मैथिली पर से हो। ओ वर्ण रत्नाकरक भाषा मैथिली मानैत छथि।।" अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। गद्य २.१.आशीष अनचिन्हार- AI एवं मैथिलक ताम-झाम २.२.आचार्य रामानंद मंडल- अशोक वाटिका मे सीता संग वार्ता भाषा बनाम मानुषी भाषा (मैथिली)रामावतार यादवजीक संक्षिप्त परिचय २.३.लालदेव कामत- डॉ० (प्रो०) कमल कांत झा: एक व्यक्तित्व/ मायानंदके हेरैत दृष्टि २.४.प्रमोद झा 'गोकुल'- रनियाँ (कथा) २.५.प्रेमशंकर झा पवन- सभ गुणक खान- फलक राजा आम २.६.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा-कृतघ्न २.१.आशीष अनचिन्हार- AI एवं मैथिलक ताम-झाम आशीष अनचिन्हार AI एवं मैथिलक ताम-झाम

30 जूनकेँ हरेक बर्ख World Social Media Day मनाएल जाइत छै आ हम एहि तथ्यकेँ अपन पोथी "मैथिली वेब पत्रकारिताक इतिहास"मे देब बिसरि गेल छी। आ तँइ हम सोचलहुँ जे आजुक दिनमे हम एहि बातकेँ अनैत AI माने Artificial Intelligence आ मैथिलक ताम-झामपर बात करी। ओना हम अपन पोथीमे AI पर लिखने छी।

मैथिल ताम-झामसँ हमर मतलब जे AI खास कऽ फेसबुकक AI एलाक बाद बहुत रास महत्वाकांक्षी लोक अपन फेसबुकक वॉलपर AI द्वारा अपन बायो (परिचय) पोस्ट कऽ रहल छथि आ एना देखाबै छथि जेना ओ दुनियाँक नोटेबल पब्लिक फीगर होथि। हम वर्तमानक एहि AI उजाहिकेँ मैथिलक दहेज बला मानसिकतासँ जोड़ि कऽ देखि रहल छी। दहेजक मार्केट जेना मात्र अफवाहपर चलै छै जे फल्लाँकेँ एतेक तँ फल्लाकेँ एतेक भेटलै आ एहि अफवाहेसँ ई मार्केट विस्तृत भऽ गेल छै। तेनाहिते AI केर मार्केँट मैथिलक अफवाहेसँ चलत।

मुदा हमरा सभकेँ जनबाक अछि जे ई AI केकरो बारेमे कोना जानै छै। पहिल बात तँ ई जे AI केकरो बारेमे किछु नै जानै छै। AI केँ केकरो बारेमे जनेबाक लेल किछु शब्दक प्रयोग करऽ पड़ैत छै। जकरा एकटा उदाहरणसँ जानू। मानि लिअ हम AI मे देलियै "आशीष अनचिन्हार"। आब एहि ठाम AI तुरंत कहत जे हम आशीष अनचिन्हारक बारेमे नै जानै छी, अहाँ सहायता करू। आब AI मे आशीष अनचिन्हारसँ संबंधित किछु तथ्य दियौ जे ई गजलकार छथि। फल्लाँ जगहक छथि, हिनकर ई प्रकृति छनि। आब AI नाम, गजल, जगह आ प्रकृतिक शब्दक आधारपर एकटा लेख तैयार कऽ देत। लेखो एकदम खुश करऽ बला रहत। आब जखन कियो जखन AI मे आशीष अनचिन्हारक बारेमे जानऽ चाहतै तँ ओकरा पहिनेसँ फीड भेल तथ्यक आलेख भेटि जेतै। कोनो लोकसँ संबंधित तथ्य जतेक बेर AI लग जेतै आलेख ओतेक शुद्ध होइत चलि जेतै। ई भेलै AI केर काज।

एहि ठाम अबैत-अबैत अहाँ सभ बुझि गेल हेबै जे AI केकरो बारेमे किछु नै जानै छै। फेसबुक जतेक लोक अपन AI बायो पोस्ट कऽ रहल छथि ओहिमेसँ 100 % अपनेसँ AI केँ देल तथ्यपर दऽ रहल छथि। आ एकरा गंभीरतासँ लेबाक जरूरति नै छै। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.आचार्य रामानंद मंडल- अशोक वाटिका मे सीता संग वार्ता भाषा बनाम मानुषी भाषा (मैथिली)रामावतार यादवजीक संक्षिप्त परिचय आचार्य रामानंद मंडल अशोक वाटिका मे सीता संग वार्ता भाषा बनाम मानुषी भाषा (मैथिली)

बाल्मीकि रामायण के अनुसार -

अहं ह्यतितनुश्चैव वानरश्च विशेषतः। वाचं चोदाहरिष्यामि मानुषीमिहं संस्कृताम्।।१७।

एक त हमर शरीर अत्यंत सूक्ष्म हय, दोसर हम वानर छी। विशेषतः वानर होके हम इंहा मानवोचित संस्कृत -भाषा मे बोलबैय।

यदि वाचं प्रदास्यामि द्विजातिरिव संस्कृताम। रावणं मन्यमाना मां सीता भीता भविष्यति।।१८

परंतु एहन करे मे एकटा बाधा हय, जौं हम द्विज के भांति संस्कृत -वाणी के प्रयोग करबैय त सीता हमरा रावण समझ के भयभीत हो जतैय।

अवश्यमेव वक्तव्यं मानुषं वाक्यमर्थवत्। मया सान्त्वयितुं शक्या नान्यथेयमनिन्दिता। ।१९।।

एहन दशा मे अवश्ये हमरा वोइ सार्थक भाषा के प्रयोग करे के चाही जे अयोध्या के आसपास के साधारण जनता बोलैय हय,न त इ सती साध्वी सीता के हम उचित आश्वासन न दे सकब।

हनुमान जी संस्कृत आ अयोध्या के लोक भाषा के लेल मानुष भाषा के प्रयोग कैलै हतन। संस्कृत के लेल विद्वान मनुष के भाषा आ साधारण लोग के लेल मानुष (लोक) भाषा।अइमे मिथिला आ मिथिला भाषा के कोई चर्चा न हय।

-गीता प्रेस,गोरखपुर -बाल्मीकि रामायण के आधार पर।

-आचार्य रामानंद मंडल सीतामढ़ी, मो -9973641075 ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.लालदेव कामत- डॉ० (प्रो०) कमल कांत झा: एक व्यक्तित्व/ मायानंदके हेरैत दृष्टि लालदेव कामत डॉ० (प्रो०) कमल कांत झा: एक व्यक्तित्व/ मायानंदके हेरैत दृष्टि १ डॉ० (प्रो०) कमल कांत झा: एक व्यक्तित्व प्रसिद्ध साहित्यकार डॉक्टर - प्रोफेसर कमलकान्त झा'क जनम मधुबनी जिलान्तर्गत कलुआही प्रखंडके हरिपुर डीहटोलमे २९ मार्च १९४३ ई०मे भेल छलनि। मुदा ओ रहैत छलाह जयनगर केर वार्ड नं० १३ मेँ। हुनक रचना " गाछ रूसल अछि" लेल २०२० के साहित्य अकादमी पुरस्कार लेल कोराना कालमे चयनित भेलनि। मुदा हुनका ई गौरवशाली पुरस्कार लेल गेलनि १८ सितम्बर २०२१ मेँ, ऐ ले मिथिलांचल मे बढ खुशी पसरल रहय। ओ जयनगरके आर्य कुमार पुस्तकालय केर ज्योत्सना मंडल'क सक्रिय सदस्य रहथि। ओडी बी कालेज जयनगरके नौकरी सँ १ अप्रील २००३ केँ सेवानिवृत्त भेल रहथि। मैथिली भाषा साहित्य आ मिथिला राज्य निर्माण आन्दोलन लेल भारत- नेपाल क' लोकक बीच विशेष रूपेँ चर्चा मे छलाह। भारत- नेपाल अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली परिषदके अध्यक्ष पद पर रहैत खूब यशस्वी छलाह। नेपाली भाषा 'क पोथीक मैथिलीमे अनुवाद करने रहथि। मधुबनी जिलाके भाजपाई बीच चर्चित पुरूष ऐ लेल छलाह जे ओ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ केर जजिला संघचालक रहि चुकल छलाह। कमल बाबूक अनेकों पोथी प्रकाशित भेल छन्हि। हुनक कथा पाठ वाचन शैली बढ़ निमन होईत छलन्हि। हम लोहनाक किरणजी स्मृति कार्यक्रम आ छजनाक 'सगर राति दीप जरय ' कथा गोष्ठी मे आमात जातिय सुचक कथा प्रसंग टोकने रहियन्हि। ओहि दू भेंटक बाद सम्पर्क नहिँ भेलाह। विगत ३० मई २०२४ कए ८२ बरखक वहिक्रममे दिल्ली स्थित मैक्स अस्पतालमे निधन भ' गेलनि। ओ अपना पाँछा धर्मपत्नी ७५ वर्षीय शैल झा , पुत्र क्रमश: रमेश झा आ रत्नेश झा पुत्री - अनीता भरल पूरल परिवार छोड़ि गेलाह। विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित!

२ मायानंदके हेरैत दृष्टि प्रसिद्ध मैथिली गीतकार मयानंद मिश्र'क जन्म सहरसा जिलाक आब सुपौल जिलाके बनैनियां गाममे १७ अगस्त १९३४ ई०मे माय दुर्गा देवी आ पिता पं० बबुनन्दन मिश्र जीके घर भेल छलनि। ओ सन् १९५० के दशकमे लेखन काज आरम्भ कयने छलाह। बहुमुखी प्रतिभाक धनी मिश्रजी पटना चौपाल कार्यक्रम आ वादमे सहरसा आकाशवाणी सँ जुटल रहलाह। कालेजमे अध्यापन करैत विद्यापति नगरमे रहैत छलाह। मीठकंठ सँ अपन मातृक गामक किर्तन मंडली सँग भजन गायन लेल परोपट्टामे प्रसिद्धि पवने छलाह। मयानंद जीकेँ १९९८ मे मंत्र पुत्र उपन्यास(१९८६) कृति पर साहित्य अकादमी पुरस्कार आओर २००२ मे प्रवोध साहित्य सम्मान भेटल रहनि। मंत्र पुत्र केर हिन्दी संस्करण सेहो बहराएल रहैक। हुनका परिवार मे पत्नि आ एक पुत्री तथा तीन पुत्रमे जेष्ठ श्री विद्या नंद मिश्र छथि। ओ पान खेबाक आ हुनक ग्रामीण सांसद स्व० गुणानन्द जी बिड़ी सेवन करयके शखगर लोकमे सुमार रहथि। आ ओ नव लोककेँ नवका पान पात तथा पुरान लोकनिकेँ पुरना पान पातक खिल्लि हास्यवश दैत छलथि। मैथिली आ हिन्दी'क विषय सँ एम. ए. करने छलाह। वयोवृद्ध साहित्यकार मयाबाबूक बेसी दिन सँ रूग्णावस्था मे ८२ वरखक उमेरमे शनिवार भोरखनके ३१ अगस्त २०१३केँ पटना स्थित इन्दिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान मेँ अंतिम सांस लेलनि। ओ प्रोफेसर हरिमोहन बाबूक रचना सँ अधिक प्रभावित छलाह । आ ओ ओही धर्रापर अपन कथा लेखनक श्रीगणेश कयलनि। सन् १९५१ ई० मे 'भांग'क लोटा' नामक पहिल कथा संग्रह मैथिली पोथी प्रकाशित करौने छलाह। हुनक प्रकाशित मैथिली कथा संग्रह -: आठ कथाक संग्रह आगि, मोम आ पाथर (१९६०), खोता आ चिड़ै (१९६५) तथा १३ कथाक संग्रह चन्द्र बिन्दु१९८३ मेधारावाहिक रूप सेँ मिथिला मिहिरमे ;वादमे १९८८ म पुस्तकाकार चर्चित कृर्ति छन्हि। हुनक ' दिशान्तर' और ' अवतार ' काव्य संग्रह छपि चुकल छन्हि। ओ अपन गजल संग्रह गीतल नामक सेहो प्रकाशित करौने रहथि। हुनक १९६० मे बिहारि पात पाथर प्रकाशित उपन्यास विधा मे पोथी यथा, प्रथम शैलपुत्री च, स्त्रीधन , सूर्यास्त,आ ठकनी केर अतिरिक्त हिन्दी भाषामे - सोने की चिड़ियां (१९६७) ,मांटि के लोग, पुरोहित सेहो विख्यात भेलनि। मयाबाबुक बेसीतर पोथीकेँ दिल्ली 'क प्रसिद्ध राजकमल प्रकाशन रुचि पूर्वक छापलक। मैथिली साहित्यक इतिहास, भारतीय परम्पराक भूमिका, अभिव्यंजना , मैथिली गद्य- पद्य संग्रह,गद्य किरण आ किसुन रचनावली'क माध्ययम सँ साहित्यमे अमिट छाप छोड़लनि। मैथिली भाषा 'क संरक्षण आ संवर्धन लेल जीवनपर्यंत मैथिली अभिमानी जेकाँ संघर्षरत रहलाह। हुनक ई अवदान मैथिल समाज बिसरि नहिं सकैत छथि। प्रो० मयानंद मिश्र आधुनिक साहित्यकार -गद्यकार रुपमे प्रतिष्ठित भेलाह, मुदा ओ रहथि मूलतः कवि। हुनक हंसिक बजैत' कथा अदभूत ओ विलक्षण छन्हि। श्रद्धेय ललीत आ राजकमल केर सँग मयानन्द बाबूक त्रिमूर्ति छवि रचना जगतमे हरदम चर्चित होईत रहत । खोता चिड़ै मे पिछरल तबकाक लोकक कार्यशैलीक चारित्रिक रूपेँ लिखबाक काज कयलनि। स्व० मिश्रजी यशस्वी शिक्षक आ प्राध्यापक केर संगहि रेडियो कार्यक्रम मेँ अबैत रहलाह। मिथिलाके जातीय ऐतिहासिक तथ्य महिन तरहेँ पांच हजार वरखक हाल लोक कोना रहैत छलथि ,तकर ठोस प्रमाण रखैत समाज शास्त्रीय विश्लेषण समक्ष आनलनि। अंखिगर लोकक बीच सँ आयल हुनका विषयमे कथन किछु एहि प्रकारके छन्हि -: प्रो०(डॉ०) पंचानन मिश्रकेँ अपन बाबूजी सँ हुनका मादे जनतब भेल रहनि जे - १९४९ मे हरिमोहन बाबूक प्रभावक प्रचंड प्रतापे प्रथम - प्रथमे मैथिलीमे 'हम रेल देखब' नामक एकटा गद्य रचना कथात्मक शैलीमे लिखने रहथि जे हाई स्कूलक वार्षिक पत्रिकामे छपल रहनि। ओहि प्रकाशन - प्रोत्साहनक कारणेँ 'भांगक लोटा'क अधिकांश कथा १९४९-५० ई० मे लिखलन्हि । श्री रमाकांत राय'रमा' जीके कहब भेल छन्हि -" एक टाका मूल्यक ९२ पृष्ठक रंगीन कार्डवोडक कवर ४ पृष्ठक संग भांगक लोटा "हास्य व्यंग" केर पाँचगोट गल्पक संग्रह मैथिली पोथीमे छिहत्तर पृष्ठ पाठ्य सामग्री पाठक लेल १९५० विवाह पंचमीके वैदेही प्रकाशन विभाग - लालबाग , दरभंगा सं प्रकाशित जे नागेश्वर कला मंदिर सुपौल (भागलपुर) सँ बहरायल छलैन। जाहिमे भांगक लोटा , थोली काका सिनेमा देखलन्हि, लजकोटर, पाहुनक पहुनाइ आ मधुबाला नहिं दाइ! कथा बेश धमक केर संग दरभंगा साहित्यक वातावरणमे रमणीय छल। श्री उपेन्द्र लाल राही जीक कहब छलैन - कोमल भावक सरस, मधुर कवि, नविन रीतिक प्रयोगवादी कविताक आन्दोलनकर्त्ता आ चतुर्मुखी प्रतिभावान साहित्यकार छलाह प्रो०(डॉ०) मयानन्द मिश्र। श्री परमानन्द प्रभाकर जीके नजैरमे - अभिव्यंजना द्विमासिक पत्रिकाक सम्पादक मायाबाबू उच्च कोटिक कवि तँ छलाहे, उच्च कोटिक गजलकार आ गीतकारक संग- संग नीक स्वर होयबाक कारणेँ गाबितो बड़ नीक छला। डॉ ० भीमनाथ झा हिनका सम्बन्धमे किछु नव बात कहै छथि -" उपन्यास हो कथा हो ,निवन्ध हो , समीक्षा हो, संस्मरण हो- जकरा छूलनि ,सभमे आर बेसी चमक आनि देलनि।" डॉ० योगानंद झा कहैत छथि -" माया बाबूक निवंध रचनाक सर्वाधिक प्रशस्त कोटि साहित्यक आलोचना सँ सम्बन्ध रहलनि। एहि कोटिक निबंध सभमे ओ मैथिली कथा, कविता ओ आलोचना विधा सभक वस्तु स्थिति पर दृष्टि निपेक्ष करैत ओकरामे नवीन ओ युगानुरूप परिवर्तनक आग्रही देखि पड़ैत छथि। ऐ दौडमे श्री केदार कानन जीके कथन केँ साझा करब परम करतब बूझैत छी। हुनक कहनाम देलनि -: हुनका सँ हमरा तँ पारिवारिक साहचर्य भेटल अछि । ओ सुपौलमे प्रसिद्ध संगीतज्ञ पं० नागेश्वर झा उर्फ नागरी झा नाना जीक सानिध्यमे बालपने सँ दुलारू रहलाह आ विलियम हाईस्कूल सँ मैट्रिक पास कय आगूक पढाय लेल दरभंगा गेल छलाह। कोसीक प्रचंड ताण्डव बीच हुनक माय मायानंद जेष्ठ पुत्र आ दोसर संतान पुत्री सती के जन्मक डेढ़ बरषक वाद मरि गेलनि। नानाजीक संगे परोपट्टामे कीर्तन गायिकी करैत अपन परिचिति बना लेने रहथिन। पं० रघु झा शास्त्रीय संगीतक शिक्षक सँ शुभ मार्गदर्शन हाईस्कूल में शिक्षा ग्रहण करैत विशेष अवसर भटनि। माम किसुन जीक स्थापित कयल (१९४३) पुस्तकालयमे हिन्दी मैथिली आ बंगलाक अनुदीत पोथी अनेकों विधाक अध्ययन करना ले उपलब्ध रहनि। माम सेहो हाईस्कूल क' शिक्षकके अतिरिक्त पुरोहितक काज कय हिनका लेल मधुर लाबथि। ओ पितृकूल आ मातृकूलमे सबसँ जेठ भैयारी छलाह। वाक्चातुर्य,प्रत्युत्पन्नमतित्व ,प्रतिभा सम्पन्न रहथि। शिशीर कुमार दास सँ हुनका बालपन्न सँ महर्षि लागल रहनि। साहित्य अकादमी हालहिमे एक कार्यक्रम आयोजित हुनका व्यक्तित्व पर सफलता पूर्वक कट याने रहय। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.प्रमोद झा 'गोकुल'- रनियाँ (कथा) प्रमोद झा 'गोकुल' रनियाँ (कथा)

भोरुकवा अछैते अहल भोरे रनियाँ अङैठी मोर करैत बिछौन पर उठिके बैसि रहल।भेर भ'के अगल बगल सूतल बेटी कमियाँ आ बेटा मदनाक गाल पर अपन हाथ सहलबैत दुनू भाय बहिनीक छवि निहारय लागलि।किछु कालक लेल जेना ओ बिसरि गेलि जे एते सकाल ओ किएक उठलि अछि ? दिवाव पर टाङल घड़ी दिस जै कि नजैर गेलै कि ओ हरबराके बिछौन पर से उतरि गेलि आ लागि गेल अपन नित्त: काज मे। मूहंँ हाथ धोके ढूकलि कीचन मे । हांइ हांइके आटा सनलक आ पराठा बनाके राखि देलकै आ तै पर से आलू सीमक भुजिया सेहो बनाके राखि देलकै।दुनू भाइ बहीनक लंच बक्समे सेट क' के पानिक बोतल सहित बस्तामे सैंतके निश्चिंत भै गेलि आ बसातक झोंका जकाँ बाथ रूम मे ढुकि गेल। किछुए कालमे नहा सोनाके पूरा तैयार भै के निकललि आ एनाक सामने ठाढ़ भै अपन केश थकरैत खूब जोर से बाजलि-तोरा दुनू भाइ बहीन के स्कूल नै जेबाक छौ जे एखैन तक गुलबिया निन्न मे मातल छेँ !! ठुनकैत दुनू भाइ बहीन एके सङ घेंङिहैत बजलै-कने आर सूत' दे ने गै! - बेस ते तूँ सब सूतबे कर आ हम जाइ छियौ काम पर! - से कते समय भेलैहे गै? - सात बजै छौ! -बाप रे! रौ मदन, उठै जल्दी! लेट होइ छौ!! आठ बजैत बजैत ते इस्कूल गाड़ियो हुरहुरैल चल अबै छै।चलै हाली हाली तैयार होइले! थोड़बो काल नै बीतल हेतै कि दुनू भाइ बहीन इस्कूल ड्रेस मे सजि धजिके पिठ पर वस्ता लदने माइक सामने आबिके ठाढ़ भै गेलि। ठिठोली करैत माइ दुनूसे पूछि बैसलै -नहेबो सोनेबो करै जाइ गेलही कि ओहिना तैयार भ' के टुपसे आबि खेलें दुनूटा! - हँ नहेलियैये गै! - बेस ते दुनू भाइ बहिनिक बस्तामे लंच बक्स पानि सहित सेट क'के रैख देने छियौ, मोन पाड़िके खा लै जैहें आ ता एगोके परौठा अचार जड़े खा के पैन पीले! - नै गै, गाड़ी आबि गेलै! बाइ.. कहैत फुद्दी जकाँ उड़िके दुनू भाइ बहीन गाड़ी मे जाके बैसि रहल।जा धैर गाड़ी आँखिसे परोछ नै भेलै ता धैर रानी ओही दिस एक टक देखैत रहल। धिया पुता स्कूल चल गेलै।उनैटके घड़ी दिस तकलक ते साढ़े आठ बजै छलै। चौंकि उठल ओ। मलकिनी कहने छलै सवेरे अबैले। नाहक मे झार सुनब। आंखि नचाके घरमे बिखरल वस्तुजात दिस देखलक आ दरवाजामे ताला लगाके बिदा भै गेल अपन रोजगार पर। रास्तामे ओकरा देखके आटो बला हारन पर हारन बजा रहल छलै मुदा ओकरा हाथ देखाके रोकैक साहस नै भेलै। कारण ऐबती जैतीक किराया चालीस रपैया होइ छै।एतेमे ते भैर महिनाक एकटा बच्चाक इस्कूलक फीस भ' जेतै,तेँ मोन मसोसिके रहि गेल। कने दिक्कत केला से छौंड़ा छौंड़ी पढ़ि लिखिके अपन अपन पयर पर ठाढ़ कहुना भै जाइ सैह बहूत। सोचैत सोचैत ओकर आँखि नोरा गेलै आ ओ पलटिके ताकय लागलि अपन अतीत दिस। बाउ सेहो मरे मजूरी करै छलै,मुदा सान से अपन परिवारक निमेरा करै छलै।चारि भाइ बहीनक बीच हम एसगरे छलियै। कतौ से अबै छलै ते किछ ने किछ सनेस अनितेटा छलै।देहरि पर पयर रखिते हमरा चिकर लगै छलै - कतौ हमर रनियाँ बेटी छेँ गै!! - हैया छिय' हौ बाबू! किछ लेबहक ? - एक लोटा ठंडा पैन लेने आ ! आ ल' जो अपन वस्तुनमा ! सब तूरे बाटि खोटिके का लै जैहें! - कथी छिय' से हौ?? - समोसा आ चटनी। नीक लगै छौ ने! -हँ हौ, लाबह लाबह! - हे ले! सब भाइ बहीन मिल बैटके खैहेँ आ हे माइयोके के हिस्सा लगाके देबही! - आ तूँ नै लेबहक? - हम दोकाने पर खा के पैन पी लेलियौ बेटू! - बेस ते लाबह! आ, एकटा बात बुझलहक बाबू! - की गै? - हम अपना किलास मे फस्ट केलियहहे। - वाह वाह! तखनते हमरा लेल बड़का खुशीक दिन भेलौ।नीक नहैंत मोन जैंतके पढ़ै लिखै जो ! आगाँ इस्सर छथीन ,आर हम की कहियौ! आँखि भरि एलै ठकन के। कान्ह परहक गमछी से आँखि पोछैत रानी से भर्रायल स्वर मे पुछलकै- माइ कत' छौ तोहर? -तोरे पाछाँमे ते ठाढ़ छह! -एँ …पाछाँ घूरिके देखलक ठकन ते आँखि मे आँखि गड़बैत अनुराग भरल स्वर मे बाजल- एकरा नजैर भैर देखैले आँखि हमर विकल आ ई कल बल पाछाँ मे गुदुर गुदुर बात सुनै छलै ! -बाप बेटी ते कैहन दीब पियरगर गप करै छलै,तै बीच हम की कैरतियै ? -हँ सेहो बात ई ठीके कहै छै! -एगो बात पुछियै एकरा? -हँ पुछौ! - एकर आंँखि किए लोरा गेल छलै? -कहबै एकरा तखन बुझतै! -बिन कहने बुझबै से कि कोनो हम अगरजानी जनै छियै! -ते सुनौ ! -कहौ! - यैह जे रनियाँ पढ़ै लिखै मे चन्सगैर छै,ओना छौंड़ो सब कोनो कम नै छै। तै पर से महगाइ दिन पर दिन असमान छूने जा रहल छै। ऐ स्थिति मे कोनाके देहारी मजूरीक दम पर हम एकरा सबके पढ़ेबै लिखेबै। भैर पेट अन आ भैर देह वसन पर ते आफद छै।मजूरक धियो पुता मजूरे होइ छै। गरीब आ बाँझ मौगीक मनोरथ मे मे कोनो अंतर नै। हँ तखन बात रहलै रनियाँके । सेहो कोनो कमाउ वर ताकिके अंक लगा दियै, एक छुट्टी!नाम ने हम रखलियै रानी करम ते अपने संग देतै। -एते किए सोचै छै एखने से ! जेहन समय साल औतै से देखल जेतै। से ठीके बाउ के कहना सच भेलै।बियाहक दस बरीस तक सबटा ठीके ठाक रहलै खाली बीच बीच मे कहियो काल दारू पीबिके उधम मचाब' लगै छलै आ फेर नशाँ टुटला पर सब ठीके ठाक। मूदा दिन पर दिन नशाँ बढ़िते गेलै।नशाँ मे चूर भ' के हद्दौ बखत मारि पीट आ कलह ते आब आम बात भ' गेलै दोसर बात कोनो गैर मौगी संग दिग दानिस सेहो रह' लगलै । कमाइ धमाइ जे होइ छलै से नशां आ ओइ मौगीक पाछाँ लुटबय लगलै। अंतमे हारि थाकि के हमहीं कहलियै जे आब दूटा मे एकटा करौ ई! तै पर जबाब देलकै ओ - बौलौ! नशाँ पानी आ कुकरम छोड़िके हमरा लग रहौ या नै ते जाउ ओही धोंछिया लग जा के आनन्द करौ! वर्दास्तक सीमा आब हमर पार भै गेल अछि।एसगरो हम पैल लेब दुनू बुदरुक के। से जे ईर पर ओइ दिना गेलै से छौ महिना पर घूरिके एलै ,सेहो छन ले। घर मे जे किछ बनल छलै से खा पी लेलकै आ धिया पुताक गाल पर हाथ फेरैत चैल देलकै अपन मंजिल पर।हमहूँ किछ नै कहलियै आ कहबे की कैरतियै? कुकूरचैल गरोसलाहा आत्माके नीक बेजाय थोड़े बुझबामे अबै छै। हमहूँ ठानि लेने छी जे मिहनत मजूरी क' के दुनू भाइ बहीन के नीक से नीक शिक्षा द के अपन पैर पर ठाढ़ कैयेके दम लेबै।।खाहे ऐ वास्ते हमरा दिन राति घरे घर काम किएक कर' पड़ै। सोचैत सोचैत सोहे मे आगाँ बढ़ि गेलि।पाछाँ से जखन मलिकिनी टोकार मारलकै तखन कतौ से सुधि घुरलै ।देखियौ मलिकिनी गेटे पर ठाढ़ि छलै आ हम सोहे मे आगाँ भागल जा रहल छलीयै। मार बाढ़ैन ऐ जरलाहा मोनके! - कत' आगाँ बरहल जा रहल छलही? मैलकैन पुछलकै - नमस्ते माँजी ! कोनाके कहू अहाँ के? - कहबेँ नै ते बुझबै कोना? आदि से अंत तक खेरहा सुनबैत सुनबैत रनियाँ मलिकिनीक चरन पकड़िके फफकि फफकि के कानय लागलि। मलिकिनी ओकर पीठ पर हाथ फेरैत आस्वाशन भरल स्वरमे कहय लगलै - कोनो चिंता नै कर! तोहर मनकामना भगवान पूरा करथून आ सहायता करैले ते हम सब छियौहे। आ हँ हे! ओइ लुच्चाके आइ तारीख से टप' नै दे! - से कोना के हैतै माँजी ! बियाही ते हम ओकरे छियै ने! रानीक बात सुनि मलिकिनी अवाक भै गेलि। -प्रमोद झा 'गोकुल', दीप,मधुवनी (विहार), फोन -9871779851 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.प्रेमशंकर झा पवन- सभ गुणक खान- फलक राजा आम प्रेमशंकर झा पवन

सभ गुणक खान- फलक राजा आम

कियैक कहल जाइत अछि आमकें फलक राजा, जखन कि फल त कुनो रहय स्वास्थ्य बर्धक होइत अछि। मुदा आमक किछु बिशेष गुण, रंग-रूप, स्वाद आ अनगिनत किस्मक कारण, एहि अमृत फल आमकेँ, फलक राजा कहल जाइत अछि। भारतीय आम अपन स्वादक कारण दुनिया भरिमे जानल जाइत अछि। जखनकि मिथिलाक आम अपन अनगिनत किस्मक कारण जग जाहिर अछि, कारण एहिठाम आमकें एकटा मुख्य फसल कें रूप मे देखल जाइत छल। एतय तीन-चारि महीना लोककेँ एकटा अनमना रहैत छलै, जे आमक गाछी मे खोपड़ी-मचान बना कें आमक ओगरवाहि करैत छल। दुनिया भरि मे लगभग १५०० सँ ज्यादा आमक किस्म अछि, जाहिमे १००० सँ बेसी किस्म अकेला भारत मे अछि। ताहिमे मुख्य रूप सँ प्रचलित लगभग १२ किस्म कें आम अछि, जकरा पूरा भारत मे जानल जाइत अछि। जखनकि सबसँ बेसी मिथिला मे आमक सैकरो एहन किस्म अछि जकरा बाकि ठामक लोक नहि जनैत अछि। मिथिला मे किछु मनपसंद भरिपेटा आमक किस्म अछि, जेना गुलाबखास, किशनभोग, शोबजा, लरुबा, बम्बई, कलकत्तिया, फजूलि, जरदालू आ मालदह (सपेता) जकरा दिल्ली एनसीआर मे लंगड़ा कहल जाइत अछि। एकरा कलमी आम कहैत छी, कारण एकर कलम लगाओल जाइत अछि। एकर अलावा बहुतो प्रकारक शरही(बिजू) आम, जे आँठि रोपला सँ होइत अछि जाहिमे सजमनिया, सिनुरिया, रोहनिया, करिअम्बा, धूमनाहा, मिसरिया, सोनहा, घिबहा, बरबरिया, शक्करचिनिया, परोरिया आ केरवी किछु प्रमुख शरही आम अछि, जे लगभग सम्पूर्ण मिथिलामे भेटि जायत। मिथिला मे आमक प्रचुरताक कारणे सीजन मे लोक अन्न सँ बेसि आम खाइत छथि, आ अपना ओहिठाम कहल जाइत अछि जे पनपियाई मे शरही आ कलो मे कलमी। एकर अलावा रंग आ गुणक कारण मिथिलाकें अलग-अलग गाम मे अलग अलग नामक शरही आम भेटि जायत। आमक उपयोग केवल फलक तौर पर नहि होइत अछि एकरा सँ साल भरिक आचार, अमोट आ आमिल बनायल जाइत अछि, संगे आमक सीजन मे चटनी, खटमिट्ठी, पन्ना, शेक, जूस आ कैंडी बनायल जाइत अछि । बहुत सब्जी मे स्वाद बढ़ाबय लेल कांच आमक उपयोग होइत अछि। आम सँ होमयवाला फायदा फलक राजा होयबाक कारणे आममे औषधीय गुण आ अनेक तत्व होइत अछि, जे नीक हेल्थ लेल रामवान अछि। आम खायला सँ दस टा फायदा होइत अछि। १.कैंसर सँ बचाव आम मे उपलब्ध एंटीऑक्सीडेंट कोलोन, ल्यूकेमिया प्रोस्टेट कैंसर सँ बचाव में फायदामंद होइत अछि. एहिमे क्यूसेंटिन, अस्त्रागार, एस्ट्रागालिन आ फिसेटिन जेहन कतेक चीज होइत अछि जे कैंसर सँ बचाव मे मददगार होइत अछि। २. आँखि रहत चमकैत आम मे विटामिन ए अत्यधिक होइत अछि, जे आँखिक लेल उपयोगी अछि, जाहिसँ रोशनी बनल रहैत अछि। ३. कोलेस्ट्रॉल नियमित रखवा मे मददगार आम मे विटामिन सी आ फाइवर खूब होइत अछि, जाहिसँ कोलेस्ट्रॉल संतुलित करवा में मदद भेटैत अछि। ४. त्वचाक लेल फायदामंद आमक गुद्दा कें चेहरा पर लगेला सँ निखार अबैत अछि आ विटामिन सी, संक्रमण सँ बचाव करैत अछि। ५. पाचन क्रिया ठीक रखैत अछि आम मे एहन कतेको एंजाइम होइत अछि जे प्रोटीन कें तोरैक कार्य करैत अछि। एहिसँ भोजन जल्दी पचि जाइत अछि, संगहि एहिमे उपस्थित साइट्रिक एसिड, टरटैरिक एसिड शरीरक अंदर क्षारीय तत्वकें संतुलित बनाकय रखैत अछि। ६. मोटापा कम करैत अछि आमक आँठिमे जे शोन होइत अछि ओ चरबीकेँ कम करय में मददगार होइत अछि। संगे एकटा चीज ध्यान देबाक अछि जे आम खेला सँ भूख कम लगैत अछि, जाहिसँ ओवेरडाइटिंग कें खतरा कम भय जाइत अछि। ७. रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़बैत अछि आम खेला सँ रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ैत अछि। ८. शाररिक क्षमता बढबैत अछि आममे विटामिन इ बहुत पायल जाइत अछि जाहि कारण आमकें शाररिक क्षमता बढ़ाबय वाला फल कहल जाइत अछि। ९. स्मरण शक्ति तेज करैत अछि जिनका बिसरबाक आदत छनि हुनका ज्यादा आम खेबाक चाही जाहिसँ स्मरण शक्ति बढ़त, कारण आममे ग्लूटामिन एसिड पायल जाइत अछि जे स्मरण शक्ति बढ़बैत अछि संगे कोशिका सेहो सक्रीय भय जाइत अछि ताहि गर्भवती महिला कें आम खायबाक सलाह देल जाइत अछि १०. गरमी सँ बचाव करैत अछि यदि जेठक दुपहरिया मे घर सँ बाहर निकलबाक रहय त' पहिने एक गिलास आमक रस पीविकें निकलू, जाहिसँ अहाँके गरमी कम लागत आ शरीर मे पानिक संतुलन बनल रहत। इ त' भेल आमक फायदा, जखनकि आँठि सँ सेहो अनगिनत फायदा अछि, यानि आमक, आम आ आँठिक दाम। आँठिक उपयोग जकरा मधुमखी, भंवरा आ कोनो बिष वाला कीड़ा मकोड़ा कें कटलाक बाद पीसकें लगेला सँ दर्द कम भय जाइत अछि। एकर अलावा आमक आँठिक उपयोग मुँहक रोग, कफ, वात आ मधुमेहक लेल गुणकारी अछि। इ केश झरै आ रुसी मे सेहो बहुत फायदा करैत अछि। एतेक गुण भेलाक बादो, आम किछु लोकक लेल नुकसानदेह छनि। जिनका मधुमेह कें शिकायत छनि ओ आम सँ बेसी आमक आँठि कें सूखा के ओकर चूर्ण बनाकेँ ओकर सेवन करथि जाहिसँ फायदा हेतनि। एक बात हमेशा ध्यान राखय परत जे आम खेलाक तुरंत बाद पैन नहि पीवाक चाहि। आमक धार्मिक आ आध्यात्मिक महत्व आमक गाछ, जे फल देवाक संग कतेको धार्मिक आ आध्यात्मिक महत्व सँ जुड़ल अछि। बिना आमक पल्लव आ लकड़ी कें कोनो धार्मिक अनुष्ठान संभब नहि अछि। संगहि जीबैत मे त' लोक आमक फल, लकड़ी आ पल्लव के उपयोग करिते अछि मरलाक बाद सेहो अंतिम संस्कार मे आमक लकड़ी कें सबसँ बेसी उपयुक्त मानल जाइत अछि। मिथिला मे त' आमक फसल एकटा उत्सवक रूप लय लैत छल, कारण गाम सँ दूर शहर मे रहयवाला लोक कें आमक महिनाक इन्तज़ार रहैत छनि। जखन ओ गर्मी छुट्टी मे गाम आवि आमक गाछी मे बैसि गाछ सँ खसल शरही आमक स्वाद लैत छथि। अपना ओहिठाम आमक गाछी पर कतेक कथा, कविता आ गीत सुनैत आवि रहल छी। जाहिमे रविंद्र नाथ ठाकुर जीक गीत "हमरा टुटिगेल कानक वाली आमक गाछी मे" प्रायः सभ मैथिल जरूर सुनने छथि। हमरा यादि अछि नेनपन मे जखन गाम मे रही त' बाबा मैथिली पुत्र प्रदीपजीक गीत "चलै चल गे बहिना, एलै आमक महिना, बड़का कलम बरबरिया गाछ पर झूला लगा के झूलना" सुनैत छलौ। आब बाबा मैथिली पुत्र प्रदीप नहि रहला मुदा हुनकर इ गीत, आ बरबरिया आमक गाछ अखनो हुनकर गाम कैथवार कें दक्षिणवारी कात बड़का कलम मे ठारह एहि रचनाक गवाह अछि। आम, आमक गाछ आ आमक लकड़ीक बाद आमक पत्ता सेहो बहुत गुणकारी अछि। १० ग्राम आमक पत्ताकें छाहमे सूखाकें ओकरा आधा सेर पैन मे तभकेलाक बाद जे काढ़ा बनय तकरा सेवन केला सँ मधुमेह मे चमत्कारी असर देखबैत अछि। अतेक खूबी रहलाक बादो लोक आब आमक कलम कम लगबैत अछि, पुरना गाछ कटि रहल अछि. नवका लोक नव गाछी लगेबा मे असमर्थ छथि। ताहि आब जरूरत अछि जे अपना जीवन में सभ गोटे कें एकटा आमक गाछी, नै त' कम सँ कम ५ टा आमक गाछ लगेबाक संकल्प लेबाक चाही। जाहिसँ संतुलन बनल रहय। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा-कृतघ्न कुमार मनोज कश्यप लघुकथा-कृतघ्न मांसल  सोंटल देह, अढ़ाई फीट लम्बा, चुस्त बलशाली शेर सनक  जर्मन शेफर्ड टॉमी अबैत जाईत बात-बटोही के नजरि बरबस  अपना दिस आकृष्ट कs लैछ ....... आ कालीबाबू के सीना गर्व सँ चौड़ा! भोर-साँझ टहलाबैत बामा हाथ सs ओकर फीता पकड़ने आ दाहिना हाथ मे हण्टर।  हण्टर रखैत छलाह आवारा कुक्कूर सभ के हाँकई लै जे टॉमी सs ईर्ष्या वा जे होई, देखि कs झाऊँ-झाऊँ करय लागै।  ओकरा सभ के भूकबा पर टॉमी परेशान आ तैं कालीबाबू के मुँह सs कहुखन ओहि कुक्कूर सभ लै अवाच्य कथा सेहो बहरा जाईन।  टॉमी  जखन आगू हूमैच कs बढ़ैत हुनका बलप्रयोग करैक लेल बाध्य करैन तखन हुनकर  गौरव आर बढ़ि जाईन ओकर बल पर। जखन टॉमी कोनो बाट चलैत लोक दिस लपकै आ लोक डेरा कs भागय तखन कालीबाबू भारी आवाज मे 'नो टॉमी! डोंट बी मिस्चवस' कहि ओकरा रोकथिन आ मुस्किया कs लोक के आश्वस्त करथिन जे आहाँ सुरक्षित छी। अपन एकमात्र संतान के ऑस्ट्रेलिये मे घर-गृहस्थी बसा लेलाक बाद टॉमी  कालीबाबू के सून जीवन मे एकटा  नव-विहान अनलकनि आ  तहिया सs हुनकर दिन-दुनियाँ सभ ओकरे मे समाहित। ओहो  दिन सामान्ये  जकाँ टॉमी के टहलाबैत रहैथ कि नहिं जानि कोम्हर सs एकटा बानर अकस्मात  खों-खों करैत आक्रमण के मुद्रा मे हुनका दिस झपटल।  टॉमी संभावित खतरा के अंदाजलक आ अपन जोर देखा हुनका हाथ सs फीता छोड़ा क्षण मे निपत्ता! निःसहाय कालीबाबू जावत किछु सोचितथि कि   तावते मे आवारा कुक्कुर  के झुंड टूटि पड़ल वानर पर आ ओकरा भगा कs छोड़लक। कालीबाबू के कतहु सs जान मे जान एलैन- पैंटक जेब सs रूमाल निकालि चुह-चुहायल पसेना तs पोछलनि मुदा छाती तेज धड़किते रहलनि। ओ टॉमी के बिसरि आब ओहि तथाकथित आवारा कुक्कूर सभ के अपने हाथ सs  खुअबैत छैथ, ओकरे सभ संगे खेलाईत छथि आ ओ  सभ हिनकर गप्पो बुझैत छैन ..... मानैत छैन। अनवरत जीवन के  लेल एक टा सहारा तs चाही !!! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। पद्य ३.१.विजय कुमार मिश्र "श्री विमल"- कहलन्हि शकुनी मामा (हास्य कविता) ३.२.मुन्ना जी- गजल ३.३.संतोष कुमार राय 'बटोही'- दोसर गांधी ३.४.मानेश्वर मनुज- जे अहाँ/ लोक बानी ३.१.विजय कुमार मिश्र "श्री विमल"- कहलन्हि शकुनी मामा (हास्य कविता) विजय कुमार मिश्र "श्री विमल" कहलन्हि शकुनी मामा (हास्य कविता)

घर-घर युद्ध क बिगुल बजादी , ताकी दहिन नहिं बामा । कय कनफुसकी पासा सजादी कहलन्हि शकुनी मामा ।।

हमरे सॅ उपदेश लेल सभ , की ? हमरे बिसरि सकैया । एखनहुं टी. भी. जखने- तखने हमरे नाम जपैया -- 2 गाम -- चौबट्टी , शहर--चौराहा बाॅहि फरकावथि गामा--2 हौ रंगदारीक टैक्स पचावह , कहलन्हि शकुनी मामा ।।

रुनझुन काकी गप्प फरिक्षावथि छलहुं सुनैत महा भारत । नहिं जनलहुं जे नवकी कनियाॅ अंगने कथा पसारत । बूढि बेलना ताकथि नवका , बहुआसिन फेकथि तामा ।। धन्य अहिं वीरांगना नारी , कहलन्हि शकुनी मामा ।।

युग-युग सॅ अछि कुर्सीक महिमा बड़-बड़ रुप देखाओल , कहियो बेटा बापक दुश्मन, कहियो भाय फरिक्षाओल -2 हमर समाज क नेता बड़ बुझनुक , जहिं- तहिं करथि हंगामा । महिमा सदिखन कुर्सीक गावथि कहलन्हि शकुनी मामा ।।

आदर्श गुरु अखरियल चेला , सम्बन्ध एहन नहि पायब । ठेका- पट्टी करी पढाई क , जे बनि परत बनायब --2 चेला सहजहिं किरकिट खेलय पिकनिक तास सिनेमा--2 डिग्री सॅ नहि बंचित रहबह , कहलन्हि शकुनी मामा ।।

पाण्डव-कौरव पासा फेंकथि , तासक नहि तखन व्यवहार । आबो जतय केओ जूआ खेलथि , शकुनी ओहि मे भेटता ठाढ ।

कहियो कुर्ता- बंडी-धोती , कहियो पहिर पैजामा--2 बनलो काज बिगारि रहल छथि घर - घर शकुनी मामा ।। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.मुन्ना जी- गजल मुन्ना जी गजल अहीं स बनल दुरी आ अहीं सँ त' मोह ऐछ मुदा दुनूक प्रेम बुझू एखनो अजोह ऐछ जुनि करू कोनो साँठ माँठ सब केर सोझाँ मे हृदय के भीतर देखू प्रेम केर खोह ऐछ लोक केर दुविधा मे फाँसल छी हम आ अहाँ नै देखाइए सीर मुदा दूर तक बोह ऐछ डर होइए लुटि लेत कखनो चुहार कोनो कतबो छी बिसरै अबै अहीं केर सोह ऐछ दुसै ऐछ गौंवा समाज टोकै घरबैया सब हृदय मे मात्र अहीं केर अबैत जोह ऐछ परा गेल आब लोक लाज कियो नै देखाइए भेल हृदय पातर प्रेम हमर लोह ऐछ (सरल वार्णिक वर्ण- १७) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.संतोष कुमार राय 'बटोही'- दोसर गांधी संतोष कुमार राय 'बटोही'

दोसर गांधी

इ नहि बुझल अछि , तँ बुझि लिअ देशक आब किछु नहि बचलै यौ बाबू ! राशन मुफ्त मिलतै ताहि पर टिकल छै गरीब जनता केर भाग्य अइ देश मे ।

फुँसियौंह केँ गप्प पर लोकतंत्र बिकेलै संविधान केर आब किछु मोजर नहि रहलै धरम केर नाम पर देश आब बँटेलै शासन-प्रशासन सभ मटियेलै ।

सुनबा मे आयल जे आब किछु नीक हेतै संविधान केर संस्कार हेतै ऋग्वेदक मंत्र उच्चारणक बीच उद्घोषणा हेतै छठियार मनौल जेतै आब फेर 'दोसर गांधी' केर जनम हेतै। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.४.मानेश्वर मनुज- जे अहाँ/ लोक बानी मानेश्वर मनुज जे अहाँ/ लोक बानी १ जे अहाँ आजुक राति अहाँक याद मे डुबल रहलौं अखबार में एक नाम देखलौं आहलाद सँ सबकिछु जानक कोशिश करऽ लगलौं एक आखर पर जा नजरि अटकि गेल होरीक लगातिक बात छल ओ

विश्वास भऽ गेल ओ रंगक बात अहाँक अनुपस्थिति मे कोनो यात्राक प्रसंग नहि छल ओतँ अहाँक एहि दुनिया सँ अंतिम यात्राक छल।

1971 सँ लऽकऽ जून एखन तक सब बात अहाँक प्रसंग दृष्टिपटल पर नचैत छल भलेही अहाँ केँ देखैत नहि छलौं प्रतिदिन ... मुदा याद तँ अहाँकेँ सब दिन करैत छलहुँ।

पहिल बेर अहाँक मूर्ति देवाल पर छायाक रूप मे देखने छलौं कामाख्या मंदिरक दृश्य ... तकर बाद तँ सब बातक व्याख्या होबऽ लागल छल अहाँक विषय जीवन जीवक विषय

अहाँक परिवार मे तँ आरो लोक छलै अहाँक दियादनी बड़का बाबूक कनियाँ अमीन साहबक कनियाँ बौआसीन, बौआजीक बहिन मुदा बड़ चटगर बात सब कहैत छल अहाँक प्रसंग आ अहाँक ननदिक प्रसंग दाईजीक कानक प्रसंग सिकिन सुन्दरिक असहमति अपने वरक संग सुतक प्रसंग अहाँक परिसरक किछु लोक ...

अहाँ अगना मे गप्प - सप्प करै छलौं अपनो विषय ... एक घाट मे बाघ आ बकरीक प्रसंग वियाहक पूर्व लत्ती जकाँ अहाँ चतरैत छलौं मुदा बियाहक बाद हरकि गेलौं जेना गाछ - वृक्ष हरकि जाइत छैक सासुर आबि ननदि आ पितियौत दियोरक प्रेमलीला ... सब दिन चलैत छलै रजनी ताहि दिन रजनिए छल ननदि छोड़ि रजनी अहीँक देह दृष्टि देख अहीँ दिस मुड़ल ... प्रेमलीला अहिँक छल वा अहाँक संग बलजोरी लीला दिनों मे ठाढ़ भऽ जाइत छल

बुधना करैत छल बात ... बड़ चटकार सँ कहैत छल कोतरा सेहो कहैत छल ... आपसी झगड़ा - झंझटक विषय कान पकड़ि, उठबैत, बैसबैत छलयनि अहाँ कुमार नम्बरदार केँ जिनका नामक संग लागल छलनि, कान्त मुदा रजनी पर नजरि अहाँक देखने छलहुँ, डम्हायल सन, हमहूँ

अहाँ हमरो नजरि देख कहैत छलियै आंगन मे जे हम नै छी कुमारबार अहाँक मोने हम अंतर्यामी छलौं सब बात सबहक जानि जाइत छलौं की ई बिनु अनुभव सँ संभव छलै

सत्त तँ ई छल जे रसोइघरक देवाल पर ठाढ़ भऽ अहाँक स्त्री - रूप देखने छलौं छाया मे अंग - प्रत्यंग देखने छलौं किन्तु ओ बात तँ छल कल्पनाक बात !

सब दिन अहाँ हमरा दऽ बजैत छलौं, किछु ने किछु अपनो दऽ अंगना मे सुदामा सँ कहैत छलियै अहाँ ओ सब बात हम सुनैत छलौं बाहर दरवज्जा सँ व्याख्या आ विवेचनाक कोनो प्रयोजन नहि छल

अपना बेटा सँ चोरा कऽ हमरा कान मे कहने छलौं अहाँ किछु जे अहाँक भेल छल अॅपरेशन आब फेर सँ नहि बनि सकैत छलहुँ अरो बच्चाक माय अहाँ नहूँ - नहूँ बाजब नहूँ - नहूँ खाएब अहीं हमरा सिखौने छलहुँ मुदा हमरा नाम केँ दुसने छलौं एहन कतौ नाम भेलैआ वर्तमान सँ अधिक सुन्दर भविष्य छल अहाँक नजरि पर, तेँ परिवर्तन आ संशोधनक बात छल अहाँक मोन मे हमरा अप्पन एक सुन्दर नाम राखक चाही, की ई बूढ़सन निश्चिते अपना मोन मे अहाँ हमर एक सुन्दर नाम हमरा चेहराक संग गढ़ैत छलौं अपना मोन मे !

कल्पना जे छल अपूर्ण तकरा पूर्ण करऽ चाहैत छलौं हम जाइत छलौं बेर - बेर गाम अहाँके होइत छल जेना अहाँ अधिकार सँ बंचित भऽ रहल छलौं

जे बात सोचैत छलहुँ अहाँ ओ हमरा सँ पुष्पा आ कामिनी संग किशोर आ कमल सेहो कहैत अबैत छल जे हमर बियाह भऽ गेल अछि से सब बात अहिंक मुँह सँ सुनि ओ सब कहैत छल तैओ अहाँ कहैत छलियै, दूनू ... पुष्पा आ कामिनी सँ जे तोहर दूनूक बियाह करा देबौ हमरा लेल एक गढ़ल नव आ सुन्दर नाम सँ ;हमर ३

अहाँक मोन मे हम अहाँक छलौं वा छलौं पुष्पा ओ कामिनीक मुदा छलौं जरूर ओ तँ अछि आन बात जखन घिचैत छलाह ओ अहाँकेँ अन्हार घर मे मदिरा पीबि पल्ला केवाड़क दुनू फुजले छलै आ अहाँ पल्ला भिरबक प्रयास करैत छलौं बात व्यर्थ हमरा सँ छिपबैत छलहुँ जखन हम बरंडा बैस भोजन करैत छलौं लजाइत, लजाइत पुछैत छलौं ... किछु चाहबो करी हम अहाँक मोनक बात जनैत छलहुँ हम कहि दैत छलौं अहिक मोनक बात ... नै ! अहाँक मोन हर्षित भऽ जाइत छल हाँ कहि दीतहुँ तँ की अहाँ थमि जैतहुँ वा ओ घिचनाई छोड़ि दितथि अहाँक बाँहि, अन्हार दिस धीचऽ सँ भऽ जाइत हास्य बड़का ठाढ़ अहाँ तकैत छलहुँ साकांक्ष हमरा नजरि दिस जे की अछि हमरा नजरि पर वैह तँ बात छल हमरा नजरि पर जे बात छल अहाँक नजरि पर हम जखन कऽ लैत छलौं अप्पन नजरि निच्चा अहाँ केँ स्वतन्त्र छोड़ि देबऽ ला कारण ओ छल जीवन जीवक एक सुनर समय

जतेक जे अहाँक विषय हम जनैत छलहुँ ताहि सँ बेसी अहाँ हमरा दऽ जनैत छलहुँ आ जतेक जे अहाँ हमरा दऽ सोचैत छलहुँ ताही सँ बेसी हम अहाँ दऽ सोचैत छलहुँ !

जानक बाते की होइत छैक जीवन मे दू रोटी ठोकब खायब आ खुआयब किछु नोन अनोन रोटी खायब किछु नोन अनोन जीवन जीयब !

जीवन मे प्यार करैत अछि केओ मेरिनड्राइव आ चौपाटी पर दिनादानिस तँ केओ करैत अछि अन्हारो घर मे चोरा कऽ चोर जकाँ केवाड़ भिरा कऽ। अहाँ देखैत छलौं जे हमरा देहक हड्डी झलकि रहल छल बजैत छलहुँ ... जहिना छलौं, तहिना छी कनिको देह पर मांस नहि आएला

बच्चा जन्म देवऽ काल जनानीक देहक सम्पूर्ण हड्डी केँ तोड़ि देबऽ सन दर्द होइत छैक मुदा अहाँक मोन मे आर बच्चा जनमाबक बात छल कहैत छलियै दुपहरियामे भोजन - साजन केलाक बाद आब हम जन्माब छोड़ि देलौंहाँ नै तँ हम आरो नै जन्मलितहुँ ताहि बातक अपसोच छल अहाँक मोन मे अॅपरेशन भेलाक बादो ! ओ बात अहाँ चोरा कऽ रखने छलौं अपना मोन मे। ओ बात हमहूँ देवालक ओइ पार सँ सुनैत छलहुँ अहाँ बजैत छलहुँ जे ... अहाँ जन्माब बन्द कऽ देने छी ई नै बजैत छलहुँ जे ... ई अधिकार अहाँ सँ छीन लेल गेल अछि हम भल मानुष की अहाँ मनुषी भावना तँ देह मे समाने रूप सँ उठैत छैक दवाओ कऽ रखबै तैओ कोनो ने कोनो रूप मे भावनाक धुँआँ तँ उठिते छैक अपना मोनक बात केँ दबा अहाँ कामिनी आ पुष्पा सँ कहैत छलियै तोहर सबहक बियाह करा हुनका ;हमरा सँ भऽ जायब हम निश्चिन्त कामिनी छल भऽ गेल बियाह जोगरक ताहि दिन कम्मे उमेर मे कऽ देल जाइत छलै बियाह पुछनहो छलथि अहाँक वर हमरा सँ केहन अछि अहाँक घर - द्वार मुदा ई सब बात अछि पुरान हालहि मे अहाँ सँ भेंट कयने छलौं बिसरि गेल छलौं अहाँक नाम पुछने छलहुँ अहाँ सँ तऽ अहाँ कहने छलहुँ, सबिता शाइत अहाँ बिसरि गेल छलहुँ अपनो नाम सासुर मे कारण सासुर मे बेटाक मायक नामे अहाँ के सोर पाड़ैत छल सब हमरा जनैत अहाँक नाम तँ छल उमा, कात्यायनी, गौरी, काली सन किछु मुदा पुछलो पर अहाँ चोरा लेने छलहुँ अप्पन नाम आ कहि देने छलहुँ कोनो नवतुरक नाम बहुत दिन तक अपनो नामक उच्चारण नै केने अवश्ये अपनो नाम बिसरा जाइ छै आ अपना नाम सँ बेसी पूतहुक नाम मोन मे रहै छै जकरा पर आस लगा बैसल जाइ छै दऽ देबक जन्म संतानक ! कतेको प्रसिद्ध लेखकक पढ़ि चुकल छी कतेको कथा सहयोग प्राप्त करक पड़ोस सँ जखन नै छलै सरोगेटक कोनो व्यवस्था ! मधुश्रावणिक कथा मे गौरी दाइक बात गौरी दाई खेलाड़ि गौरी दाइक भागिन गौरी दाइक ननदोइस गौरी दाइक ननदि अहाँ जकरा जे कहैत छलियै हँस्सी मे बियाहक बात ओ सत्य जानि गीरह बान्हि लेने छल हास्य रस मे हमरे सँ पुछला पर ओ सब बात उगलि देने छल जे ओ मोन मे रखने छल ओ छल अत्यन्त आकर्षित मुदा हम नै जुटा पौने छलहुँ किछु आगाँ बढ़ि प्रस्ताव राखक जखन ओ स्वयं चलि गेल छल अन्हार घर मे हमरा सामने द्वारि फोलि बाँहि पसारने

बात बहुत आगाँ बढ़ि गेलै समय की आदमीकेँ दोसर मौका दै छै ओ अप्पन अलग घर बसौलक ओ दू बच्चाक जन्म देलाक बाद ओ एतेक तँ साहस कयने छल दुनू सँ पैर हमर छुऔने छल अपनो घरक कोनटा सँ निकलि पैर छू हमर स्पर्श कयने छल हम सुनने छलौ अहाँक कुमार केँ कहैत छलै किओ ... तोँ लऽ लेलाँ, तूँ कऽ लेलाँ सोझ संबोधन बड़ आकर्षित करै छै दूर - दराज सँ जेँ केओ ककरो मैसेस मे कहै छै वा कहै छै फोन पर ठाहि - पठाहि हम जनैत छलौं ओ हमरो सँ करऽ चाहैत छल बहुत रास बात मुदा हम लजाइत छलहुँ ओ नहूँ - नहूँ कतराइत छलहुँ जहिना हम कोनो बातक कोनो जवाब नै दै छलियै

अहाँ अपने मोन केँ अनका मोन मे लऽ गेल छलै आ घुमा - घुमा कऽ सब बात करैत छलहुँ जीवन आ जगत मे उपस्थितिक यैह रहि जाइत छैक इपिटाफ जे अहाँ, अहींटा छी !

२ लोक बानी

साहित्य के क्लासिक्स बनवक लोभ मे कहीं लोक बानी ने मरि जा। लोकबानी मरि जायत तऽ लोको मरि जायत आ जँ लोके मरि जायत तऽ साहित्ये मरि जायत संसार सिकुड़ि रहल अइ। उपन्यास कथा मे आ कथा लघुकथा मे समटि रहला। महाकाव्य काव्य मे आ काव्य चुटकुला अंत्याक्षरी मे। गुणवत्ता के त्यागि संपादक अप्पन सामर्थ्यक अनुसार शब्द संख्याक मांग करैत छथि, कारण शेष पृष्ठ पर सामग्री समाहित होबक रहै छै

हमर ई भावात्मक कविता जानि - बुझि कऽ एक नमहर आकार अख्तियार कयने अइ। मोन भरि भोजन आ मोन भरि पठन - पाठनक आकाँक्षा अइ। बड़ नीक लगैत अइ जखन कोनो आभा मद्रास सऽ कोनो सुशान्तक फेसबुक पर कॉमेन्ट करै छै?- सुशांत ई उपनाम ककर भऽ रहल छै, तोहर तऽ भऽ गेलौ तूँ अन - मन बाबुए पर गेल छाँ।

दूर - दराज सऽ संवादक ई भाषा अपनापनक कतेक एहसास करबैत छै ई सम्पूर्ण अर्थक संग दिमाग पर प्रहार करै छै। प्रतिविम्वक बोछार करै छै। पता:-मानेश्वर मनुज, आदर्श नगर कॉलोनी, गौशाल रोड, मधुबनी - 847211 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह ३९७ म अंक ०१ जुलाई २०२४ (वर्ष १७ मास १९९ अंक ३९७)|| 57 56 || विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in

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