VIDEHA — Issue 398 / अंक ३९८

Publication: VIDEHA · Issue: 398
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ISBN 978-93-340-8966-0 (Book) ISSN 2229-547X (online) 𑒀 विदेह ३९८ म अंक १५ जुलाइ २०२४ (वर्ष १७ मास १९९ अंक ३९८) [विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। कॉपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति ‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२४. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२४. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. 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People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover designed by AUM GAJENDRA THAKUR Videha e-Journal: Issue No. 398 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृ. १-२०) १.२.अंक ३९७ पर टिप्पणी (पृ. २१-२१) गद्य २.१.निर्मला कर्ण-अग्निशिखा खेप -४१ आ ४२ (पृ. २३-२९) २.२.आचार्य रामानंद मंडल- बुड़बक बेटा आज्ञाकारी (पृ. ३०-३२) २.३.लालदेव कामत-मैथिली काव्य संग्रह : नहि रहतै आब गाम (पृ. ३३-३६) २.४.कल्पना झा- ३२म- ३५म शताब्दीक मैथिलीक नेंओक साक्षी कोबर घर तैयार (पृ. ३७-४१) २.५.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- "प्रीति कारण सेतु बान्हल": सम्पादक - श्री आशीष अनचिन्हार (पृ. ४२-४८) २.६.आभा झा-भाषा आ संस्कृतिक वैश्विक प्रसार लेल दत्तचित्त ठाकुर परिवार (पृ. ४९-५३) २.७.प्रणव कुमार झा- पोथी चर्चा : "प्रीति कारण सेतु बान्हल": सम्पादक - श्री आशीष अनचिन्हार (पृ. ५४-५७) २.८.परमानन्द लाल कर्ण- भादव मासक एकादशीक माहात्म्य (पृ. ५८-६३) २.९.प्रणव कुमार झा- द मिस्टेक (पृ. ६४-७५) २.१०.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा-अछिंजल (पृ. ७६-७७) २.११.डॉ प्रदीप कुमार पबड़ा- मैथिली भाषा परिवार (पृ. ७८-८२) २.१२.कुन्दन कर्ण-बीहनि कथा-जय कमला/ पुछारि सब टोला (पृ. ८३-८४) २.१३.रबीन्द्र नारायण मिश्र- सीमाक ओहि पार (धारावाहिक उपन्यास) (पृ. ८५-१०२) पद्य ३.१.सुप्रसन्ना झा- जिनगी ऐह थिक (पृ. १०४-१०५) ३.२.राज किशोर मिश्र- महानगर (पृ. १०६-१०८)

१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १ सिद्धान्त मार्क्सवादक अलाबे आन समकालीन सिद्धान्त राजनीतिसँ दूर रहल। मुदा समकालीन सिद्धान्त सभ राजनीतिमे तँ नै मुदा दर्शनमे क्रान्ति सन आनि देलक। मार्क्सवाद सामाजिक यथार्थक ओकालति करैत अछि आ द्वन्द्वात्मक प्रणालीकेँ अपन व्याख्याक आधार बनबैत अछि। फ्रायड सभ मनुक्खकेँ रहस्यमय मानैत छथि। ओ साहित्यिक कृतिकेँ साहित्यकारक विश्लेषण लेल चुनैत छथि तँ नव फ्रायडवाद जैविकक बदला सांस्कृतिक तत्वक प्रधानतापर जोर दैत देखबामे अबैत अछि। नव-समीक्षावाद कृतिक विस्तृत विवरणपर आधारित अछि। आब दर्शनमे गणित आ विज्ञान मैथेमेटिकल लॉजिक धरि सीमित रहि गेल। दर्शनक आगमन (विशेषसँ सामान्य) आ निगमन (सामान्यसँ विशेष) क अध्ययन प्रणाली विश्लेषणात्मक प्रणाली दिस बढ़ल। अस्तित्ववाद, मानवतावाद, प्रगतिवाद, रोमेन्टिसिज्म, समाजशास्त्रीय विश्लेषण ई सभ संश्लेषणात्मक समीक्षा प्रणालीमे सम्मिलित भऽ अपन अस्तित्व बचेने अछि। साइको-एनेलिसिस वैज्ञानिकतापर आधारित रहबाक कारण द्वन्दात्मक प्रणाली जेकाँ अपन अस्तित्व बचेने रहत। उत्तर आधुनिकतावादी दृष्टिकोण- विज्ञानक ज्ञानक सम्पूर्णतापर टीका, सत्य-असत्य, सभक अपन-अपन दृष्टिकोणसँ वर्णन, आत्म-केन्द्रित हास्यपूर्ण आ नीक-खराबक भावनाक रहि-रहि खतम होएब, सत्य कखन असत्य भऽ जाएत तकर कोनो ठेकान नै, सतही चिन्तन, आशावादिता तँ नहिए अछि मुदा निराशावादिता सेहो नै, जे अछि तँ से अछि बतहपनी, कोनो चीज एक तरहेँ नै कएक तरहेँ सोचल जा सकैत अछि- ई दृष्टिकोण, कारण, नियन्त्रण आ योजनाक उत्तर परिणामपर विश्वास नै, वरन संयोगक उत्तर परिणामपर बेशी विश्वास, गणतांत्रिक आ नारीवादी दृष्टिकोण आ लाल झंडा आदिक विचारधाराक संगे प्रतीकक रूपमे हास-परिहास, भूमंडलीकरणक कारणसँ मुख्यधारसँ अलग भेल कतेक समुदायक आ नारीक प्रश्नकेँ उत्तर आधुनिकता सोझाँ अनलक। विचारधारा आ सार्वभौमिक लक्ष्यक ई विरोध केलक मुदा कोनो उत्तर नै दऽ सकल। उत्तर आधुनिकतावादी विचारक जाक डेरीडा भाषाकेँ विखण्डित कऽ ई सिद्ध केलन्हि जे विखण्डित भाग ढेर रास विभिन्न आधारपर आश्रित अछि आ बिना ओकरा बुझने भाषाक अर्थ हम नै लगा सकैत छी। प्रत्यक्षवादक विश्लेषणात्मक दर्शन वस्तुक नै, भाषिक कथन आ अवधारणाक विश्लेषण करैत अछि। विश्लेषणात्मक अथवा तार्किक प्रत्यक्षवाद आ अस्तित्ववादक जन्म विज्ञानक प्रति प्रतिक्रियाक रूपमे भेल। ऐसँ विज्ञानक द्विअर्थी विचारकेँ स्पष्ट कएल गेल। प्रघटनाशास्त्रमे चेतनाक प्रदत्तक प्रदत्त रूपमे अध्ययन होइत अछि। अनुभूति विशिष्ट मानसिक क्रियाक तथ्यक निरीक्षण अछि। वस्तुकेँ निरपेक्ष आ विशुद्ध रूपमे देखबाक ई माध्यम अछि। अस्तित्ववादमे मनुष्य-अहि मात्र मनुष्य अछि। ओ जे किछु निर्माण करैत अछि ओइसँ पृथक ओ किछु नै अछि, स्वतंत्र होयाबा लेल अभिशप्त अछि (सार्त्र)। हेगेलक डायलेक्टिक्स द्वारा विश्लेषण आ संश्लेषणक अंतहीन अंतस्संबंध द्वारा प्रक्रियाक गुण निर्णय आ अस्तित्व निर्णय करबापर जोर देल गेल। क्वान्टम सिद्धान्त आ अनसरटेन्टी प्रिन्सिपल सेहो आधुनिक चिन्तनकेँ प्रभावित कएने अछि। देखाइ पड़एबला वास्तविकतासँ दूर भीतरक आ बाहरक प्रक्रिया सभ शक्ति-ऊर्जाक छोट तत्वक आदान-प्रदानसँ सम्भव होइत अछि। अनिश्चितताक सिद्धान्त द्वारा स्थिति आ स्वरूप, अन्दाजसँ निश्चित करए पड़ैत अछि। तीनसँ बेशी डाइमेन्सनक विश्वक परिकल्पना आ स्टीफन हॉकिन्सक “अ ब्रिफ हिस्ट्री ऑफ टाइम” सोझे भगवानक अस्तित्वकेँ खतम कऽ रहल अछि कारण ऐसँ भगवानक मृत्युक अवधारणा सेहो सोझाँ आएल अछि। “गॉड” पार्टिकल विश्वक प्रारम्भक व्याख्याक प्रयास अछि। पोस्टस्ट्रक्चरल मेथोडोलोजी भाषाक अर्थ, शब्द, तकर अर्थ, व्याकरणक निअम सँ नै वरन् अर्थ निर्माण प्रक्रियासँ लगबैत अछि। सभ तरहक व्यक्ति, समूह लेल ई विभिन्न अर्थ धारण करैत अछि। भाषा आ विश्वमे कोनो अन्तिम सम्बन्ध नै होइत अछि। शब्द आ ओकर पाठ केर अन्तिम अर्थ वा अपन विशिष्ट अर्थ नै होइत अछि। आधुनिक आ उत्तर आधुनिक तर्क, वास्तविकता, सम्वाद आ विचारक आदान-प्रदानसँ आधुनिकताक जन्म भेल। नव-वामपंथी आन्दोलन फ्रांसमे आएल आ सर्वनाशवाद आ अराजकतावाद आन्दोलन सन विचारधारा सेहो आएल। ई सभ आधुनिक विचार-प्रक्रिया प्रणाली ओकर आस्था-अवधारणासँ बहार भेल अविश्वासपर आधारित छल। फेर पाठमे नुकाएल अर्थक स्थान-काल संदर्भक परिप्रेक्ष्यमे व्याख्या शुरू भेल आ भाषाकेँ खेलक माध्यम बनाओल गेल- लंगुएज गेम (विटगेन्सटाइन)। पूँजीवादक जन्म भेल औद्योगिक क्रान्तिसँ आ आब पोस्ट इन्डस्ट्रियल समाजमे उत्पादनक बदला सूचना आ संचारक महत्व बढ़ि गेल अछि। इतिहास तँ नै मुदा परम्परागत इतिहासक अन्त भऽ गेल अछि। राज्य, वर्ग, राष्ट्र, दल, समाज, परिवार, नैतिकता, विवाह सभ फेरसँ परिभाषित कएल जा रहल अछि। मारते रास परिवर्तनक परिणामसँ, विखंडित भए सन्दर्भहीन भऽ गेल अछि कतेक संस्था। मिकेल फोकौ कहै छथि - ज्ञान आ सत्य बनाओल जाइत अछि। डेलीयूज आ गुटारी कहै छथि जे हम सभ इच्छा ऐ द्वारे करै छी कारण हम सभ इच्छा मशीन छी। मिखैल बैखटिन भाषाकेँ सामाजिक क्रियाक रूपमे लै छथि। रूसक रूपवादी विचारक साहित्यकेँ मात्र भाषाक विशिष्ट प्रयोग मानै छथि। जीन फ्रान्कोइस लियोटार्ड कहै छथि- सत्यक आ इतिहासक सत्यता मात्र आभासी अछि। बौड्रीलार्ड कहै छथि- विज्ञापन आ दूरदर्शन सत्य आ आभासीक बीच भेद मेटा देने अछि। दुनू उत्तर आधुनिकताक मुख्य विचारक छथि। लाकानक विशेषता छन्हि जे ओ फ्रायडक पद्धतिक भाषिकी अनुप्रयोग केलन्हि अछि। ओ कहै छथि जे अचेतनताक संरचना भाषा सन छै। जखन बच्चा भाषा सीखैए तखन ओकरा एकटा चेन्ह लेल एकटा शब्द सिखाओल जाइ छै। इच्छा, त्रुटि आ आन ई तीनटा तथ्य लाकान नीक जकाँ राखै छथि। इच्छा आवश्यकता आ मांगनाइ दुनू अछि मुदा एकरा ऐ दू रूपमे विखंडित नै कएल जा सकैत अछि। आनक वर्णनमे त्रुटि आ रिक्तता अबैत अछि। विषय अर्थक क्षणिक प्रभाव अछि आ ई आन सन हएत जखन ई आभासी हएत आ त्रुटिक कारण बनत, जइसँ इच्छाक उदय हएत। उत्तर उपनिवेशवादक तीन विचारक छथि- होमी भाभा (फोको आ लाकानसँ लग), गायत्री चक्रवर्ती स्पीवाक (फोको आ डेरीडासँ लग) आ एडवर्ड सईद (फोकोसँ लग) जे उपनिवेशवादीक पूर्वक धूर्तताक, शिथिलता आदिक धारणाक लेल कएल गेल कार्य आ सिद्धांतीकरणक व्याख्या करै छथि। रेमण्ड विलियम्सक संस्कृतिक अध्ययन साहित्यक आर्थिक स्थितिसँ सम्बन्ध देखबैत अछि। नव इतिहासवाद इतिहासक शब्दशास्त्र आ शब्दशास्त्रक ऐतिहासिकताक तुलना करैत अछि। एलीन शोवाल्टर महिला लेखनक मानसिक, जैविक आ भाषायी विशेषताकेँ चिन्हित करै छथि। सिमोन डी. बेवोइर नारीक नारीक प्रति प्रतिबद्धतामे वर्ग आ जातिकेँ (जकर बादक नारीवादी सिद्धांत विरोध केलक) बाधक मानै छथि। वर्जीनिया वुल्फ नारी लेखक लेल आर्थिक स्वतंत्रता आ निजताकेँ आवश्यक मानै छथि। हिनकर विचारकेँ क्रान्तिकारी नै मानल गेल। मेरी वोल्स्टोनक्राफ्ट नारी शिक्षामे क्रान्ति आ औचित्यक शिक्षाकेँ सम्मिलित करबापर जोर देलनि। नव समीक्षा- इलिएट कवितामे भावनाक प्रधानताक विरोध केलन्हि आ एकरा गएर वैयक्तिक बनेबाक आग्रह केलनि। विमसैट आ वर्डस्ले कहलनि जे कविक उद्देश्य वा ऐतिहासिक अध्ययनपर समीक्षा आधारित नै रहत। ई पाठकपर पड़ल भावनात्मक प्रभावपर सेहो आधारित नै रहत कारण से सापेक्ष अछि। ओ आधारित रहत वास्तविक शब्दशास्त्रपर। फिलिप सिडनीसँ अंग्रेजी समीक्षाक प्रारम्भ देखि सकै छी- ओ कविताकेँ सौन्दर्य, अर्थ आ मानवीय हितमे देखलन्हि। जॉन ड्राइडन- प्राचीन साहित्यमे नैतिक प्रवचनपर आ एकर लाभ-हानिपर विचार केलनि। सैमुअल जॉनसन सेक्सपिअरक नाटकमे हास्य आ दुखद तत्वपर लिखलन्हि। रूसोक रोमांशवाद मनुक्खक नीक हेबापर शंका नै करैए (क्लासिकल समीक्षक शंका करै छथि मुदा नव-क्लैसिकल कहै छथि जे मानव स्वभावसँ दूषित अछि मुदा संस्था ओकरा नीक बना सकैए) मुदा संगे ई कहैए जे संस्था सभ दूषित अछि आ मात्र दूषित लोकक मदति करैए। आधुनिक स्थितिवाद -साहित्यक अवस्थितिपर कोनो प्रश्न चिन्ह नै- पर संरचनावाद प्रहार केलक आ तकरा बाद लेखक स्वयं लिखल टेकस्टक विश्लेषण करबाक अधिकार गमेलक। उत्तर संरचनावाद कहलक जे साहित्य ओइसँ आगाँक वस्तु अछि जे संरचनावाद बुझैए। उत्तर-संरचनावादक एकटा प्रकार अछि उत्तर आधुनिकताक।  उत्तर संरचनावाद कहलक जे साहित्यमे संरचना संस्कृति आ सिद्धान्त मध्य कार्य करैत अछि जत्तऽ किछु भाव आ सोच वंचित अछि जे निरन्तरताक विरोध करैए। विखण्डनवाद आ उत्तर आधुनिकता उत्तर संरचनावादक बाद आयल। उत्तर उपनिवेशवाद उपनिवेशक नव रूपकेँ नै मानैए आ अव्यवस्थाक सिद्धांत जेना असफल उद्देश्यकेँ उचित परिणाम नै भेटबाक कारण मानैए। संरचनावाद दमित करैबला पाश्चात्य व्यवस्था आ समाजपर चोट करैए आ ऐ सँ मार्क्सवादकेँ बल भेटलै (अलथूजर)। आधुनिकतावादी-स्थितिवादी, नव समीक्षा, संरचनावाद आ उत्तर संरचनावादक बाद विखण्डनवाद आ उत्तर आधुनिकतावाद आयल जकरा विलम्बित पूँजीवाद कहल गेल (फ्रेडरिक जेनसन)। १९७० ई.क बाद आधुनिक शब्द एकटा सिद्धांतक रूप लऽ लेलक से उत्तर-आधुनिक शब्द पारिभाषिक भेल जकर नजरिमे लौकिक महत्वपूर्ण नै रहल। आधुनिक काल धरिक सभ जीवन आ इतिहास अमहत्वपूर्ण भेल आ खतम भेल। ई सिद्धांत भेल इतिहासोत्तर, विकासोत्तर आ कारणोत्तर। सत्य आ आपसी जुड़ावक महत्व खतम भऽ गेल। जादुइ वास्तविकतावादमे वास्तविक स्थितिमे जादुइ वस्तुजात घोसिआओल जाइत अछि। रचनाकार ऐ तरहक प्रयोग कऽ वास्तविकताकेँ नीक जकाँ बुझबाक प्रयास करै छथि। उत्तर आधुनिक पाश्चात्य बुर्जुआ दृश्य-श्रव्य मीडियाक प्रयोक कऽ असमता, अन्याय आ वंचितक अवधारणाकेँ मात्र शब्द कहै छथि जे समता, प्राप्ति आ न्यायक लगक शब्द अछि। गरीबी जे पाश्चात्यमे समस्या नै अछि से आइ भारत आ नेपालमे पैघ समस्या अछि। उत्तर आधुनिकता नारीवादक आ मार्क्सवादक विरोधमे अछि आ एकर नारीवाद आ मार्क्सवाद  विरोध केलक अछि। जेना ऐतिहासिक विश्लेषणक पक्षमे मार्क्सवाद अछि आ ओइसँ ओ अपन सिद्धांत फेरसँ सशक्त केलक अछि, संरचनावाद-उत्तर-संरचनावाद आ उत्तर आधुनिकतावादक परिप्रेक्ष्यमे। मार्क्सवाद लौकिक पक्षपर जोर दैत अछि मुदा तेँ ई उपयोगितावाद आ चार्वकक दर्शनक लग नै अछि, कारण उपयोगितावाद आ चार्वकवाद मात्र शारीरिक आवश्यकताकेँ ध्यानमे रखैत अछि। नारीवादी दृष्टिकोण सेहो उत्तर आधुनिकतावादक यथास्थिवादक विरोध केलक अछि कारण यावत से खतम नै हएत ताधरि नारीक स्थितिमे सुधार नै आओत। डेरीडाक विखण्डन पद्धति ऊँच स्थान प्राप्त रचना/ लेखक केँ नीचाँ लऽ अनैत अछि आ निचुलकाकेँ ऊपर। रोलेण्ड बार्थेस लिखै छथि जे जखन कृति रचनाकारसँ पृथक भऽ जाइए आ ओकर विश्लेषण स्वतंत्र रूपेँ होमए लगै छै तखन कृति महत्वपूर्ण भऽ जाइए जकरा ओ रचनाकारक मृत होएब कहै छथि। उत्तर-संरचनावाद संरचनावादक सम्पूर्ण आ सुगठित हेबाक अवधारणाकेँ माटि देलक। सौसरक भाषा सिद्धान्त- बाजब/ लिखब, वास्तविक समएक साहित्य वा ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्यक शब्दशास्त्र, महत्वपूर्ण कोनो कृति वा मनुक्ख अछि, महत्ता एकटा भाव अछि, वास्तविक समएमे भाषा वा एकर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य; मुदा एकरा सेहो डेरीडाक विखण्डन सिद्धान्त उल्टा-पल्टा करए लागल। नारीवादी दृष्टिकोण कहैए जे सभटा सिद्धांत पुरुष द्वारा बनाओल गेल से ओ सिद्धांत पूर्ण व्याख्या नै कऽ सकैए। सरल मानवतावाद ऐ सिद्धांत सभक विरुद्ध आएल मुदा ई सेहो एकटा सिद्धांत बनि गेल। सार्थक साहित्यक निर्माण एकर अन्तर्गत भेल। मनोविश्लेषण आ द्वन्द्वात्मक पद्धति जकाँ फुकियामा आ डेरीडाक विश्लेषण सेहो संश्लेषित भऽ समीक्षाक लेल स्थायी प्रतिमान बनल रहत। तँ साहित्य आदर्शवादी, प्रकृतिवादी, यथार्थवादी, मानवतावादी, सामाजिकतावादी वा अनुभवकेँ महत्व देमयबला ज्ञानेन्द्रिय-यथार्थवादी हुअयअ। बा प्रयोजनमूलक हुअय, ऐमे उपयोगितावाद, प्रयोगवाद, व्यवहारवाद, कारणवाद, अर्थक्रियावाद आ फलवाद सभ सम्मिलित अछि। ई सभसँ आधुनिक दृष्टिकोण अछि। जुलिया क्रिस्टोवाक अनुसारे बेटा अपनाकेँ मायसँ दूर करैत अछि, मुदा बेटीमे ओ लय, ओ गुण रहिते छै से ओ दूर होइतो मायसँ, संस्कृतिसँ लग रहैत अछि। जुलिया क्रिस्टोवाक पुरुख, आ ओकर ऐंठीक कारण यएह अछि। जूलिया क्रिस्टोवा अपन प्रस्तुति "वर्ड, डायलॉग एण्ड नोवल"मे इण्टर-टेक्स्टुअलिटी माने अन्तर-पाठ्यताक संकल्पना देलन्हि, मने कोनो पाठ एकटा देबारमे बन्न नै रहि सकैए। से ओ पाठकेँ संकलन कहै छथि। पाठ अभ्यास आ उत्पादनक विषय अछि। से पहिनेसँ समाज-संस्कृतिक पाठ आ साहित्यिक पाठ दू तरहक स्वर निकालैत अछि। विचारधाराक संघर्ष आ तनावकेँ पाठ समाहित करैत अछि। जुलिया क्रिस्टोवाक अनुदैर्घ्य सम्बन्ध बला धूरीमे सोझे लेखक आ पाठकक बीच वार्ता होइ छै। माने लिफाफक बौस्तु आ लिफाफपर लिखल पता केर बीच सोझे वार्ता होइ छै। मुदा जुलिया क्रिस्टोवाक उर्ध्वाधर सम्बन्ध बला धूरीमे "पाठ" मूलधाराक साहित्य संगे सेहो आ एकटा छोट कालावधिमे भेल घटनाक बीच वार्ता करैत अछि।  माने पाठ आ ओकर सन्दर्भक बीच वार्ता होइ छै, एक लेखकक पाठ दोसरक लेखकक पाठ संग वार्ता करैए। ई दुनू धूरी जखन एक दोसराकेँ काटैए तखन शब्द बा पाठ उत्पन्न होइए जइमे कमसँ कम एकटा आर पाठ पढ़ल जा सकैए। जुलिया क्रिस्टोवा बोली-बानीकेँ यथावत राखबाक आ किछु पाठ, जे मनुक्खसँ अलग अछि, केर रूपमे लेखकक अधिकार आ कर्तव्यक वर्णन करैत छथि। जूलिया क्रिस्टोवाक प्रस्तुति "वर्ड, डायलॉग एण्ड नोवल" मिखाइल बाखतिनक संकल्पनाकेँ आगाँ बढ़बैत अछि। संगहि जुलिया क्रिस्टोवा भाषाक संकेत आ प्रतीकक रूपमे सेहो विश्लेषण करैत छथि। जखन बच्चा संकेतक रूपमे, लयसँ गप करैत अछि तँ ओइमे संरचना नै होइ छै, अर्थ नै होइ छै। मुदा जखन ओ पैघ होइए तँ ओकरा अपना आ आनमे अन्तर बुझाइ छै, ओ बाजऽ लगैए आ अङनासँ बहराइए। आ तकरा बाद ओ अपनाकेँ मायसँ दूर करैए। मुदा ओ लाक्षणिक सँ एकदम्मे दूर नै होइए वरन् लाक्षणिक आ प्रतीकात्मकक बीचमे झुलैत रहैत अछि। लाक्षणिक स्त्री गुण, संगीतमय, कविता आ लय सँ युक्त; आ प्रतीकात्मक पुरुष गुण, विधि आ संरचनासँ युक्त रहैत अछि। से चलचित्र आदिमे महिलाक शरीरक आ ओकर किरदारक जे अवमूल्यन पुरुष द्वारा कएल जाइत अछि से मायक शरीर द्वारा ओकर अस्तित्वक खतराक डर अछि। मुदा बेबी चाइल्ड अपन मायसँ लग रहैत अछि से ओ लाक्षणिक स्त्री गुणी, संगीतमयी, कविता आ लय सँ बेशी युक्त रहैत अछि, से ओ मायकेँ अस्वीकार तँ करैत अछि मुदा ओकरेसँ अपनाकेँ परिभाषित करैत अछि। जाक डेरीडा योनि केन्द्रित विखण्डनात्मक सिद्धान्तसँ नारीवादी विचारधारामे जे हस्तक्षेप करै छथि तकर कोर्नेल समर्थन करैत छथि आ गायत्री चक्रवर्ती स्पीवाक स्वागत। किछु दार्शनिक विचारधारा जइ प्रकारसँ योनीकेँ अप्रत्यक्ष रूपेँ महत्व दइए ततऽ डेरीडा द्वारा योनि-केन्द्रित दृष्टिकोणक सीमाक प्रति ध्यानाकर्षण एकटा सार्थक हस्तक्षेप अछि आ तइसँ प्रतीकक घटकक फेरसँ एकटा प्रक्रियाक अन्तर्गत परिभाषा देब सम्भव भेल अछि। डेरीडा आपसमे होइबला सम्वादक गुणनखण्डक असम्भाव्यताकेँ देखबै छथि, ओकरा सरल नै कएल जा सकैए। से स्त्रीकेँ अनुमान आ ज्ञानक वस्तुक रूपमे नै देखल जेबाक चाही। पुरुषत्वक सापेक्ष नारीवादकेँ नै देखबाक चाही वरन् नारीवाद लेल एकटा अलगे मोहाबरा बनेबाक खगता अछि। से पाठ, डेरीडा कहै छथि, मोटामोटी एकटा राजनैतिक कार्य अछि जे शक्ति-सम्बन्ध बा तकरा लेल होइत वार्ताक रूपमे परिभाषित कएल जा सकैए। मुदा डेरीडापर आरोप अछि जे ओ नारीक अबाजकेँ पुरुष द्वारा अधिगृहीत करबाबय चाहैत छथि, नारीक एतेक यत्नसँ जे बकार फुटल छन्हि, जे ओ अपना लेल बाजि रहल छथि, से अधिकार ओकरासँ छीनऽ चाहैत छथि। डेरीडाकेँ महिलाक दिन-प्रतिदिनक होइत समस्या आ शक्तिहीनतासँ कोनो मतलब नै छन्हि। डेरीडा विखण्डनात्मक पद्धतिकेँ नीक आ धनात्मक रूपमे लइ छथि आ नारीवादकेँ अस्तित्वक तत्त्वमीमांसाक/ तर्कक द्वैधक रूपमे राखैत छथि, जेना पुरुष स्त्री। डेरीडा पाश्चात्य दर्शनक केन्द्र आधारित संरचनाक मोहकेँ उघार करैत छथि।  सौसियोरक भाषाविज्ञानसँ प्रेरित संरचनावाद सांस्कृतिक अस्तित्वक वैज्ञानिक विश्लेषणक प्रयास करैत अछि। लेवी स्ट्रॉसक संरचनात्मक मानव विज्ञान सएह लोकगाथा लेल करैत अछि। तहिना साहित्यमे गद्य आ पद्य लेल संरचनात्मक विश्लेषणक प्रयास कएल जाइत रहल अछि। मुदा डेरीडा एकरा उघार करैत छथि, संरचनावाद अपन विश्लेषण लेल एकटा ठोस आधार ताकैत अछि, व्यवस्थाक बाहर एकटा केन्द्र जइसँ ओ एकर वैज्ञानिक विश्लेषण कऽ सकय, मुदा से मात्र दार्शनिकक आभास मात्र अछि। माने कोनो लोकगाथाक कोनो स्थायी बा निर्धारित संरचना केना भऽ सकैए। से लोककथा बा लोक गाथाक संरचनाक अध्ययन करबा लेल अहाँकेँ ओ विचार बा ओ केन्द्र, जकर आधारपर अहाँ एकर विश्लेषण करऽ चाहैत छी, निर्धारित करऽ पड़त। डेरीडा कहै छथि जे कोनो संरचना लेल ओकर संकल्पना-विचार आवश्यक अछि, फेर टुकड़ी-टुकड़ी जोड़ि कऽ अहाँ ओकरा बनायब। मुदा बिनु अन्त सोचने संरचना सम्भवे नै अछि। आ से साहित्यमे सेहो अछि। यावत अहाँ कोनो रचना लेल एकटा स्वयंसिद्ध अर्थ नै ताकि लैत छी ओकर संरचना अहाँ नै ताकि सकै छी, कारण अर्थ माने अन्त ओकर संरचनाकें निर्धारित करैत अछि। से संरचनावादीकेँ अर्थ पहिनहियेसँ पता रहै छै आ तखने ओ ओकर विभिन्न अंग आ तकर आपसी सम्बन्धकेँ विश्लेषित कऽ सकैए। आ यएह विश्लेषणसँ पहिले ज्ञात स्वयंसिद्ध अर्थ अछि डेरीडाक केन्द्र। आ डेरीडा कहै छथि जे यएह निर्धारित करैत अछि जे पाठक संरचना केना बनत, कोन अंगकेँ लेल जायत आ कोन अंगकेँ छोड़ल जायत। से जखन हम साहित्यक संरचनाक विश्लेषण करैत छी तँ ओकर अर्थ आ ओकर प्रभावक गप करैत छी तँ हम ओइ संरचनासँ ओइ तत्त्व सभकेँ चिन्हबाक, फराक करबाक प्रयास करैत छी जे ओइ प्रभाव लेल उत्तरदायी अछि, से ओइ सम्भावित पैटर्नकेँ हम छोड़ि दैत छी जे ओ प्रभाव नै आनत। से ई केन्द्र आरम्भिक स्थल अछि संरचनाकेँ बुझबाक हेतु। मुदा ई विश्लेषणकेँ सीमित सेहो करैत अछि। कारण केन्द्र अपनाकेँ स्थिर रखबाक लेल स्तरीकरणक निर्माण करैत अछि, आ ओकरा पर नियंत्रण करैत अछि। आ ई अर्थक पूर्व ज्ञान पाठकक पूर्व इतिहास आ समकालीन आलोचना सिद्धान्त आ विचारधारापर निर्भर सेहो करैत अछि, ईहो सभ तँ संस्कृतिक अंग अछि तखन केना एकरा सभकेँ संरचनासँ दूर राखल जाइए जे एकरा सभकेँ सीमित करैए मुदा अपने एकरा सभसँ सीमित नै होइए? से अपन विश्लेषणक आधार कोनो स्थायी केन्द्रकेँ बनायब एकटा नुस्खा देब सन अछि आ ई प्रतिक्रियावादी बा यथास्थितिवादी स्थिति अछि। आ ऐ सँ मानक आ गएर-तुलनात्मक स्वतंत्र अर्थ निकालबाक मात्र इच्छा सिद्ध होइए। से ई भ्रम जे हम संरचना ताकि रहल छी भ्रमे अछि, वास्तवमे अहाँ पाठ्य सामग्रीसँ संरचनाक निर्माण कऽ रहल छी। से डेरीडाक उत्तर संरचनावादमे सेहो केन्द्रक बिना प्रारम्भ नै भऽ सकैत अछि मुदा ओ ऐ सिद्ध नै भेल स्वयंसिद्धक विखण्डनात्मक विश्लेषणक आधारपर ओइ केन्द्रकेँ दोसर केन्द्र द्वारा स्थानापन्न करैत अछि मुदा ई नव केन्द्र सेहो स्थायी नै रहत। तहिना सौसियोर (Saussure) अपन प्रतीक सिद्धान्तमे प्रतीकक विश्लेषण करैत छथि जे कोनो शब्द जेना बिलाड़ि- बिलाड़ि अछि कारण ओ किछु आन नै अछि। से शब्द अछि प्रतीक चिन्ह आ जकरा ओ दर्शाबैत अछि से अछि बौस्तु/ प्रतीक। मुदा डेरीडा कहै छथि जे अहू लेल पहिने एकटा संकल्पना आनऽ पड़ैत अछि। आ जँ अहाँ प्रतीक चिन्हकेँ निरपेक्ष बना देब जे ओकर कोनो प्रतीकसँ सम्बन्ध नै छै, जे स्वयंमे एकटा स्वतंत्र संकल्पना अछि आ कोनो प्रतीक/ बौस्तुसँ ओकर कोनो प्रत्यक्ष सम्बन्ध नै छै, मुदा तखन ई संकल्पना सभ प्रतीक चिन्हकेँ पार कऽ जायत आ किछुओ सूचित नै करत। आ जँ हम प्रतीक आ प्रतीक चिन्हकेँ एक्के मानी तँ प्रतीक चिन्हक जड़ियेपर चोट पहुँचत। से सौसियोरक सिद्धान्त तर्काधारितक विपक्षमे अछि जखन ओ कहैत अछि जे प्रतीक चिन्हमे अहाँ प्रतीकक कोनो लक्षण नै देखू। मुदा जखन ओ कहैत छथि जे प्रतीक चिन्ह प्रतीककेँ लक्षित करबा लेल मात्र प्रयुक्त होइत अछि आ तेँ ओकर अधीन अछि ओ तर्क आधारित सिद्धान्तक पक्षमे बुझाइत छथि। से डेरीडा कहैत छथि जे प्रतीक आ प्रतीक चिन्हक ई स्पष्ट भेद मान्य नै अछि, आ प्रतीककेँ प्रतीक चिन्हक ऊपर देल वरीयता सेहो उनटेबाक खगता अछि। प्रतीक चिन्हमे अर्थ पहिनहियेसँ विद्यमान नै रहै छै। आ पूर्ण अर्थ कोनो एकटा प्रतीक चिन्हमे नै भेटत। से पाठकेँ अहाँकेँ घोर-मट्ठा करऽ पड़त, आ ई अनन्त खोज दिस अहाँकेँ धकेलत। से ई प्रतीक चिन्ह दोसर प्रतीक चिन्हसँ अपन अन्तरक आधारपर प्रतीक निर्धारण करैत अछि, जतेक बेशी अन्तर ततेक लग अहाँ प्रतीकसँ होइ छी। मुदा ई कहियो नै हएत जे अहाँ सभटा अन्तर ताकि सकब। मुदा प्रतीक चिन्हमे बारम्बारता हेबाक चाही, तखनो जखन एक प्रतीक चिन्ह भिन्न प्रतीकक निर्धारण करैत अछि। आ ऐ लेल ओइ प्रतीक चिन्हक लिखित इतिहास जानब आवश्यक। से प्रतीक चिन्ह विभिन्न अर्थ आ कखनो काल उल्टा अर्थ सेहो देत। प्लेटो- प्लेटो कहै छथि जे कोनो कला नीक नै भऽ सकैए किए तँ ई सभटा असत्य आ अवास्तविक अछि। प्लेटोक ई विचार स्पार्टासँ एथेंसक सैन्य संगठनक न्यूनताकेँ देखैत देल विचारक रूपमे सेहो देखल जएबाक चाही। डेरीडा लिखै छथि जे प्लेटोसँ सौसियोर (Saussure) आ लेवी स्ट्रॉस धरि सभ लिखलाहासँ ऊपर बजलाहाकेँ राखै छथि, कारण लिखब एकटा माध्यम अछि, असल चीज तँ वाणी अछि।  सौसियोर लिखित रूपमे उच्चारण त्रुटिपर ध्यान दियाबैत छथि। मुदा डेरीडा कहै छथि जे ओ सभ विशेषता जे वाणीमे छै से लेखनमे सेहो छै। आगाँ ओ कहै छथि, प्रतीकक विलुप्ति वाणीमे विचारक प्रत्यक्ष रहबाक भ्रम उत्पन्न करैए। मुदा जँ बाजल वाणीकेँ हम रेकॉर्ड कऽ कय सुनी तँ ओहो लिखल अक्षर सन प्रतीकक शृंखले अछि, जइमे विभिन्न प्रतीककेँ ओकर एक-दोसराक अन्तर सँ चिन्हल जा सकैए। आ लेखन सेहो सामान्य लेखन आ चित्रसँ बुझा कऽ कएल लेखन, ऐ दू तरहेँ भऽ सकैए। 'अपन अवस्थितिक तत्त्वमीमांसा' एकर सभक पाछाँ अछि। पाश्चात्य दर्शनक 'अपन अवस्थितिक तत्त्वमीमांसा'मे जे मुख्य अछि से अछि सद्यः अनुभव- मुदा विखण्डनवाद कहैत अछि जे एहेन कोनो अनुभव परा-भाषा स्तरपर नै होइत अछि, कारण ई अनुभव भाषाक माध्यमेसँ चिन्हल जाइत अछि। फेर ई जे दैवीय चेतनासँ हम परम सत्यकेँ बुझैत छी मुदा विखण्डनवाद कहैत अछि जे ई मात्र सर्जकक सृजन अछि। फेर ईहो जे कोनो बौस्तुक पाछाँ सत्य नुकायल अछि, मुदा विखण्डनवाद कहैत अछि जे तेहन कोनो स्वतंत्र अस्तित्व नै होइ छै, सभटा निर्माण आ पुनर्निर्माण व्यवस्था द्वारा होइ छै। से सौसियोरक स्वतः उपस्थिति किछु नै अछि कारण सभटा व्यवस्थाक अन्तर्गत निर्मित अछि। डेरीडा कहैत छथि जे तर्क ऐ सभटा दार्शनिक चिन्तनक आधार अछि, से कोनो अन्तिम सत्य आ विश्वात्माक परिकल्पना देल जाइत अछि जे सर्वज्ञानी अछि। मुदा डेरीडा कहै छथि जे ओ सिद्ध नै भेल केन्द्रकेँ कखनो गॉड, कखनो विचार आ कखनो विश्वात्मा कहल गेल आ ओ अपनासँ नीचाँ विभिन्न स्तरक निर्माण केलक। से धर्म गॉडकेँ परम सत्य मानलक आ मनुक्ख आ आन रचनाकेँ ओ अपूर्ण आ विरोधी; आ ई सभटा केन्द्र बनल जे अपना हिसाबे विचार-व्यवस्था बनेबाक दावा केलक। मुदा एकरा सभकेँ व्यवस्थासँ ऊपर हेबाक चाही। से गॉडक स्वतंत्र रूपसँ धर्मक बाहर उपस्थिति हेबाक चाही। उत्तर संरचनावादी विखण्डनवाद एहेन कोनो परासत्यक उपस्थितिकेँ आभासी मानैत अछि, आ उत्तर संरचनावादी एकरा भाषाक सिद्धांतक परिणाम मानैत अछि । से ऐ प्रतीक चिन्ह सभक आपसी खेलमे किछु अर्थ कोनो विचारधाराक हस्तक्षेपसँ उच्च स्थान प्राप्त करैत अछि आ ओकर दोसर अर्थ तकर पाछाँ जेबा लेल धकेल देल जाइत अछि। स्वतंत्रता, गणतंत्र, न्याय आदि सन विचारधारा हमरा सभक जिनगीक भाग छी मुदा लागैए जे ओइ सभसँ हमरा सभक जिनगीक बहुत रास अर्थ निकलल मुदा अन्वेषणक उपरान्त ओ सभ दोसर विचारसँ बहार भेल बुझायत। कोनो संकल्पना एहेन नै अछि जइमे दोसर  विचारक अवशेष नै भेटय। "गैसलाइटिंग"क प्रतिकारमे अबैत अछि स्टोरी साइंस, कोन कथा सुनेलासँ लोक आ समाजपर की असर पड़त, ई ओइ आधारपर पूर्व-विश्लेषण करैत अछि।आ स्टोरी साइंस सेहो सएह कहैए, जे कथा सुनायत से करत राज, आ जे जत्ते कथा सुनाओत से तत्ते आगाँ बढ़त। "जे सुनबैए खिस्सा से राज करैए ऐ संसारपर"- होपी अमेरिकी कबीलाक लोकोक्ति। काव्यक भारतीय विचार: मोक्षक लेल कलाक अवधारणा, जेना नटराजक मुद्रा देखू। सृजन आ नाश दुनूक लय देखा पड़त। स्थायी भावक गाढ़ भऽ सीझि कऽ रस बनब- आ ऐ सन कतेक रसक सीता आ राम अनुभव केलन्हि (देखू वाल्मीकि रामायण)। कृष्ण भारतीय कर्मवादक शिक्षक छथि तँ संगमे रसिक सेहो। कलाक स्वाद लेल रस सिद्धांतक आवश्यकता भेल आ भरत नाट्यशास्त्र लिखलन्हि। अभिनवगुप्त आनन्दवर्धनक ध्वन्यालोकपर भाष्य लिखलन्हि। भामह ६अम शताब्दी, दण्डी सातम शताब्दी आ रुद्रट ९अम शताब्दी, एकरा आगाँ बढ़ेलन्हि। रस सिद्धान्त: भरत:- नाटकक प्रभावसँ रसक उत्पत्ति होइत अछि। नाटक कथी लेल? नाटक रसक अभिनय लेल आ संगे रसक उत्पत्ति लेल सेहो। रस कोना बहराइए? रस बहराइए कारण (विभाव), परिणाम (अनुभाव) आ संग लागल आन वस्तु (व्यभिचारी)सँ। स्थायीभाव गाढ़ भऽ सीझि कऽ रस बनैए, जकर स्वाद हम लऽ सकै छी। भट्ट लोलट:- स्थायीभाव कारण-परिणाम द्वारा गाढ़ भऽ रस बनैत अछि। अभिनेता-अभिनेत्री अनुसन्धान द्वारा आ कल्पना द्वारा रसक अनुभव करैत छथि। लोलट कविकेँ आ संगमे श्रोता-दर्शककेँ महत्व नै दै छथि। शौनक:- शौनक रसानुभूति लेल दर्शकक प्रदर्शनमे पैसि कऽ रस लेब आवश्यक बुझै छथि, घोड़ाक चित्रकेँ घोड़ा सन बूझि रस लेबा सन। भट्टनायक कहै छथि जे रसक प्रभाव दर्शकपर होइत अछि। कविक भाषाकेँ ओ भिन्न मानैत छथि। रससँ श्रोता-दर्शकक आत्मा, परमात्मासँ मेल करैए। रसक आनन्द अछि स्वरूपानन्द। आ ऐसँ होइत अछि आत्म-साक्षात्कार। रस सिद्धान्त श्रोता-दर्शक-पाठक पर आधारित अछि। ई श्रोता-दर्शक-पाठकपर जोर दैत अछि। ध्वनि सिद्धान्त: आनन्दवर्धन ध्वन्यालोक- साहित्यक उद्देश्य अर्थकेँ परोक्ष रूपेँ बुझाएब वा अर्थ उत्पन्न करब अछि। ई सिद्धान्त दैत अछि परोक्ष अर्थक संरचना आ कार्य, रस माने सौन्दर्यक अनुभव आ अलंकारक सिद्धान्त। आनन्दवर्धन काव्यक आत्मा ध्वनिकेँ मानैत छथि। ध्वनि द्वारा अर्थ तँ परोक्ष रूपेँ अबैत अछि मुदा ओ अबैत अछि सुसंगठित रूपमे। आ ऐसँ अर्थ आ प्रतीक, ई दूटा सिद्धान्त बहार होइत अछि। ऐसँ रसक प्रभाव उत्पन्न होइत अछि, ऐसँ रस उत्पन्न होइत अछि। न्याय आ मीमांसा ऐ सिद्धान्तक विरोध केलक, ई दुनू दर्शन कहैत अछि जे ध्वनिक अस्तित्व कतौ नै अछि, ई परिणाम अछि अनुमानक आ से पहिनहियेसँ लक्षणक अन्तर्गत अछि। आ से सभ शब्द द्वारा वर्णित हएब सम्भव नै अछि। स्फोट सिद्धांत: भर्तृहरीक वाकपदीय कहैत अछि जे शब्द आकि वाक्यक अर्थ स्फोट द्वारा संवाहित अछि। वर्ण स्फोटसँ वर्ण, पद स्फोटसँ शब्द आ वाक्य स्फोटसँ वाक्यक निर्माण होइत अछि। कोनो ज्ञान बिनु शब्दक सम्बन्धक सम्भव नै अछि। ई भारतीय दर्शनक ज्ञान सिद्धान्तक एकटा भाग बनि गेल। अर्थक संप्रेषण अक्षर, शब्द आ वाक्यक उत्पत्ति बिन सम्भव अछि। स्फोट अछि शब्दब्रह्म आ से अछि सृजनक मूल कारण। अक्षर, शब्द आ वाक्य संग-संग नै रहैए। बाजल शब्दक फराक अक्षर अपनामे शब्दक अर्थ नै अछि, शब्द पूर्ण हएबा धरि एकर उत्पत्ति आ विनाश होइत रहै छै। स्फोटमे अर्थक संप्रेषण होइत अछि मुदा तखनो स्फोटमे प्राप्ति समए वा संचारक कालमे अक्षर, शब्द वा वाक्यक अस्तित्व नै भेल रहै छै। शब्दक पूर्णता धरि एक अक्षर आर नीक जकाँ क्रमसँ अर्थपूर्ण होइए आ वाक्य पूर्ण हेबा धरि शब्द क्रमसँ अर्थपूर्ण होइए। सांख्य, न्याय,  वैशेषिक, मीमांसा आ वेदान्त ई सभ दर्शन स्फोटकेँ नै मानैत अछि। ऐ सभ दर्शनक मानब अछि जे अक्षर आ ओकर ध्वनि अर्थकेँ नीक जकाँ पूर्ण करैत अछि। फ्रांसक जाक डेरीडाक विखण्डन आ पसरबाक सिद्धान्त स्फोट सिद्धान्तक लग अछि। अलंकार सिद्धान्त: भामह अलंकारकेँ समासोक्ति कहै छथि जे आनन्दक कारण बनैए। दण्डी आ उद्भट सेहो अलंकारक सिद्धान्तकेँ आगाँ बढ़बै छथि। अलंकारक मूल रूपसँ दू प्रकार अछि, शब्द आ अर्थ आधारित आ आगाँ सादृश्य-विरोध, तर्कन्याय, लोकन्याय, काव्यन्याय आ गूढ़ार्थ प्रतीति आधारपर। मम्मट ६१ प्रकारक अलंकारकेँ ७ भागमे बाँटै छथि, उपमा माने उदाहरण, रूपक माने कहबी, अप्रस्तुत माने अप्रत्यक्ष प्रशंसा, दीपक माने विभाजित अलंकरण, व्यतिरेक माने असमानता प्रदर्शन, विरोध आ समुच्चय माने संगबे। औचित्य सिद्धान्त: क्षेमेन्द्र औचित्य विचार चर्चामे औचित्यकेँ साहित्यक मुख्य तत्व मानलन्हि। आ औचित्य कतऽ हेबाक चाही? ई हेबाक चाही पद, वाक्य, प्रबन्धक अर्थ, गुण, अलंकार, रस, कारक, क्रिया, लिंग, वचन, विशेषण, उपसर्ग, निपात माने फाजिल, काल, देश कुल, व्रत, तत्व, सत्व माने आन्तरिक गुण, अभिप्राय, स्वभाव, सार-संग्रह, प्रतिभा, अवस्था, विचार, नाम आ आशीर्वादमे। टॉम स्टोपार्डक रेडियो नाटक “इन द नेटिव स्टेट” आ ओइपर आधारित हुनकर नाटक “इण्डियन इंक” रस सिद्धान्तक विस्तृत चर्चा करैत अछि। जॉन केजक “सोनाटाज एण्ड इण्टरल्यूड्स” मे सेहो रस सिद्धान्त आधारित धुन सभ अछि। संगे रिचा बिस्वाल “Analysis of John Donne's Poetry in the Light of Bharata's Rasa-Theory” लिखलन्हि जे कवि कुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय, रामटेकसँ प्रकाशत अछि। मिशेल फोको (Foucault)क "अनुशासन संस्था" बा मनोवैज्ञानिक बार्टन आ ह्वाइटहेडक "गैसलाइटिंग" दुनूक लक्ष्य एक्के छै। मिशेल फोकोक "अनुशासन संस्था" अछि, सोझाँबलाकेँ अनुशासनमे आनू आ तइ लेल सभकेँ आपसेमे लड़ाउ, किछुकेँ पुरस्कृत करू आ जे अनुशासनमे नै अबैए तकरा आस्ते-आस्ते माहुर दियौ। गैसलाइटिंगमे सोझाँबला केँ विश्वास दिआओल जाइत अछि जे अहाँ जे यथास्थितिक विरोध कऽ रहल छी से कोनो विरोध नै, ई तँ सभ कऽ रहल अछि, अहाँ तँ विरोधक नामपर विरोध कऽ रहल छी आ से अपन कमी नुकेबा लेल। ऐमे समाजमे वर्तमान आधारभूत कमीक सहायता सेहो लेल जाइत अछि, आ आस्ते-आस्ते टारगेट बताह भऽ जाइत अछि बा पलायन कऽ जाइत अछि। मिशेल फोकोक सभटा डिसीप्लिनरी इंस्टीट्यूशन "अनुशासन संस्था" जेना साहित्य अकादेमी, मैथिली अकादमी, मैथिली भोजपुरी अकादमी, आ साहित्य अकादेमी द्वारा मान्यता प्राप्त कथित लिटेरेरी असोसियेशन सभ मूल धारा लग छै। सगर राति दीप जरय केँ मिशेल फोकोक परिभाषित डिसीप्लिनरी इंस्टीट्यूशनमे अनबाक प्रयास बहुत दिनसँ कएल जा रहल छै। २ सिद्धान्तोत्तर (पोस्ट-थ्योरी) उत्तर-विखण्डनवादमे पोस्ट-थ्योरी (सिद्धान्तोत्तर) आयल। बीसम शताब्दीक शुरुहेमे रूसमे रूपवाद शुरू भेल। ओ लोकनि ऐ विश्वासकेँ अस्वीकार करैत छथि जे लेखकक विश्वदृष्टिक अभिव्यक्ति साहित्यक रचना छल, वरन् ओ मानैत छथि जे ई अछि एकटा कानून शासित प्रणाली। हुनका सभक लेल शिल्प आ रूप कथावस्तुसँ बेशी महत्व रखैत अछि। ओ सभ मनोवैज्ञानिक समालोचना आ लेखकक जीवनी बा भोगल यथार्थक आधारपर रचना लिखल जाइ छै, ऐ दुनू धारणाकेँ नै मानैत छथि। ओ साहित्यक प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोणक ओकालत करैत छथि आ मानैत छथि जे साहित्यिक भाषा सामान्य भाषासँ अलग होइत अछि, ओकर अलग स्वतंत्र अस्तित्व होइ छै आ ओकर विश्लेषण स्वतंत्ररूपसँ हेबाक चाही नै कि लेखकक जीवनमे ई भेलै, ओ भेलै; बा मनोविश्लेषणक आधारपर माने ऐ साहित्यमे हैमलेट अपन कक्काक हत्या करैमे हिचकिचाइत अछि मुदा अनकर हत्या करैमे ओ नै हिचकिचाइत अछि कारण ओ स्वयं पिताक हत्या करऽ चाहैत छल आ कक्काक हत्या केनाइ ओकरा अपन हत्या केनाइ सन लगैत छै (फ्रायड); ऐ तरहक मनोविश्लेषणक आधारपर नै वरन् साहित्यिक भाषाक जे पाठ छै, तकर आधारपर एकर विश्लेषण हेबाक चाही। फ्रांसक अल्बर्ट कामू जीवनक अयुक्तता, जइमे संकट आ भ्रम चारूकात पसरल छै, मे आस्थाक सोंगर लऽ लऽ चलैबलाकेँ “दार्शनिक आत्महत्या” केनिहार कहै छथि।(१९४२) सुशीलक साहित्यमे अहाँकेँ कत्तौ सुशील द्वारा ऐ तरहक दार्शनिक आत्महत्या नै भेटत। एकटा कलाकारक आत्महत्यामे सेहो नै। फ्रांसक दार्शनिक रोलेण्ड बाथ्स साहित्य रचनाक बादक स्थितिकेँ लेखकक मृत्यु कहै छथि, आ कहै छथि जे पाठ लेखकक की उद्देश्य रहै ओइसँ नै वरन् पाठक ओकर की व्याख्या करैए, तइसँ निर्धारित होइए।(१९६७) फ्रांसिस फुकुयामा कहै छथि जे पश्चिमक उदार-गणतंत्र विरोधी विचारधारा (माने साम्यवाद आ गणतंत्र) क संघर्षसँ निकलल अन्तिम विकासक्रम अछि, आ किएक तँ आब एक्केटा विचारधारा अछि तेँ ई इतिहासक अन्त अछि। (१९९२) पाठककेँ कोनो रचना नीक लगै छै आ कोनो रचना नीक नै लगै छै, आ तेँ साहित्यक समीक्षा पाठक करत कोनो वाद नै। नव-नव सिद्धान्त पुरनके सिद्धान्त सभक नूतन रूप अछि, नव ढ़ंगसँ पुरनके सिद्धान्त सभक रिमिक्सिंग आ रिपैकेजिंग कएल जाइत अछि। रचनाक पाठ मात्र महत्त्वपूर्ण अछि, ओइले कोनो वाद नै चाही। आ ऐ तरहे तार्किक प्रत्यक्षवाद आ नव तार्किक प्रत्यक्षवाद क दृष्टिकोण दिस पोस्ट-थ्योरी आयल अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १.२.अंक ३९७ पर टिप्पणी प्रणव कुमार झा विदेह ३९७म अंक पढ़ल। प्रमोद झा 'गोकुल' केर 'रनियाँ' (कथा) एकटा सामान्य कथा अछि मुदा ऐ तरहक कथा पाठक के सामने बेरमबेर एनए मानवीय संवेदना केर पुनरसंचार होइत छईक। प्रेमशंकर झा पवन के आलेख -सभ गुणक खान- फलक राजा आम- पढ़ि मोन मधुरमय भ गेल। बच्चा रही त अपन गामक गाछी मे आ ब्रहमोत्तरा-सागरपुर आमक गाछी मे , सुग्गा दीदी के आमक गाछी, जलधारी कलम, मे कतेको कतेक आमक भेरायटी देखइत छलीयई। कलमी आ सरही दुनु प्रकार के।आब कहाँ ओ नामो सब याद रहल। महानगरीय जिनगी मे त आब 5-7 टा किस्म देख लेल सैह बहुत छईक। मुदा ऐ आलेख माध्यम से कतेको आमक नाम फेर से जिह पर चढ़ल। लेख मे आमक भोज्य गुण केर सेहो बखान छईक। ई भेल त निक गप्प, मुदा हमर मानब अछि जे ऐ प्रकार के भोज्य या चिकित्सकीय गुण यदि लेख मे देल जा रहल होय त संग मे लेखक केर संक्षिप्त परिचय हेबाक चाहिए (यदि ओ चिकित्सा या भोजन विज्ञान से जुड़ल व्यक्ति छईथ) अन्यथा शोध के रेफेरेंस देबाक चाहिए जेकरा आधार पर भोज्य या चिकित्सकीय गुण के वर्णन कैल गेल, जै से लेख बेसी औथेंटिक होय। विजय कुमार मिश्र "श्री विमल" के कविता कहलन्हि शकुनी मामा आ मुन्ना जी के गजल गुदगुदाबs बला छल। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। गद्य २.१.निर्मला कर्ण-अग्निशिखा खेप -४१ आ ४२ २.२.आचार्य रामानंद मंडल- बुड़बक बेटा आज्ञाकारी २.३.लालदेव कामत-मैथिली काव्य संग्रह : नहि रहतै आब गाम २.४.कल्पना झा- ३२म- ३५म शताब्दीक मैथिलीक नेंओक साक्षी कोबर घर तैयार २.५.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- "प्रीति कारण सेतु बान्हल": सम्पादक - श्री आशीष अनचिन्हार २.६.आभा झा-भाषा आ संस्कृतिक वैश्विक प्रसार लेल दत्तचित्त ठाकुर परिवार २.७.प्रणव कुमार झा- पोथी चर्चा : "प्रीति कारण सेतु बान्हल": सम्पादक - श्री आशीष अनचिन्हार २.८.परमानन्द लाल कर्ण- भादव मासक एकादशीक माहात्म्य २.९.प्रणव कुमार झा- द मिस्टेक २.१०.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा-अछिंजल २.११.डॉ प्रदीप कुमार पबड़ा- मैथिली भाषा परिवार २.१२.कुन्दन कर्ण-बीहनि कथा-जय कमला/ पुछारि सब टोला २.१३.रबीन्द्र नारायण मिश्र- सीमाक ओहि पार (धारावाहिक उपन्यास) २.१.निर्मला कर्ण-अग्निशिखा खेप -४१ आ ४२ निर्मला कर्ण (१९६०- ), शिक्षा - एम. ए., नैहर- खराजपुर, दरभङ्गा, सासुर- गोढ़ियारी (बलहा), वर्त्तमान निवास- राँची, झारखण्ड। झारखंड सरकार महिला एवं बाल विकास सामाजिक सुरक्षा विभागमे बाल विकास परियोजना पदाधिकारी पदसँ सेवानिवृत्ति उपरान्त स्वतंत्र लेखन। (अग्नि शिखा मूल हिन्दी- स्वर्गीय जितेन्द्र कुमार कर्ण, मैथिली अनुवाद- निर्मला कर्ण) अग्निशिखा खेप -४१ आ ४२ ४१ पूर्व कथा उर्वशी अपन वचन अनुरूप कुरुक्षेत्र में आबि गेल छलथि पुरूरवा सौं भेंट करवा हेतु । पुरूरवाअत्यंत प्रसन्न भेलथि हुनका अपना समक्ष देखि। कनिक दूर पर एकटा घनगर वृक्ष के पाछू नुकायल चित्रसेना हुनक मिलन के प्रत्यक्षदर्शी छलीह।

आब आगू "उर्वशी... अहाँ... अहाँ... आबि गेलहुँ... प्रियतमे!... अहाँ चलि एलहुँ... ओह प्रियतमा..... अहाँ हमर समक्ष छी!.....प्रियतमा अहाँ हमर समक्ष छी! की हम अहाँ केँ देखि रहल छी! हम अहीं केँ देखि रहल छी! अथवा की ई हमर मात्र स्वप्न अछि ! अहाँ सत्ते हमरा निकट छी? अहाँ किछु तs बाजू प्रियतमा!" उर्वशी उदासी भरल करुण हँसी हँसैत गंभीर भs बजलीह - . -हँ प्रिय, हम कहने रही जे अगिला साल कुरूक्षेत्र में अवश्य भेंट करब ! आइ ओ दिन अछि, हम अपन वचन अनुरूप एतय आबि गेल छी। हम वचन भंग नहि केलहुँ। "अहाँ हमरो अपना संग किएक नहि लs जाइत छी प्रियतमे ? अहाँ हमरा विरह-ज्वाला में विदग्ध करवा हेतु एतs किएक छोड़ि कs चलि जाइत छी? हम अहाँ सँ विरह मे मरि रहल छी। अहाँ के विरह में हम एतह धधकि रहल छी। अहाँ बिनु हम जीबs में असमर्थ छी। हम मरबाक प्रयास करैत छी, मुदा मृत्यु तक हमरा लग नहि अबैत अछि। हमरा नहि बुझना जाइत अछि जे एहेन कोन शक्ति अछि जे हमरा जीवित राखि रहल अछि,आ ओ किएक हमरा मृत्यु वरण करवा सौं रोकि रहल अछि। मुदा हम आब नहि जीबय चाहैत छी, आब हमरा अपना संग लs चलु प्रियतमे! "प्रियतम! जीवन में तs हमहूँ प्रसन्न नहि भs सकैत छी अहाँक बिनु, मुदा हमर किछु सीमा अछि। हम अपन प्राण के परित्याग नहि कs सकैत छी,ओहिना हम अहाँ केँ शारीरिक रूप सँs कोना कs स्वर्ग लs जा सकब। स्वर्गक अधिपति इन्द्र छथि, हुनक अनुमति बिनु हम अहाँ के स्वर्ग नहि लs जा सकब। ओहुना इन्द्र अहाँ केँ ओतय कहियो देखय नहि चाहथिन आ अहाँ केँ पुनः धरती पर फेक देल जायत" - उर्वशीक एक-एकटा शब्द करुण दर्द सँs भीज गेल छल। "हँ, अहाँ सत्ते कहलहुँ प्रिये, हमर नियति के लेख अछि जे बिरहाग्नि में विदग्ध होइत तड़पि-तड़पि दुख सहैत रहब। अहाँ एहि में किछु नहि क's सकैत छी, हमर कष्ट कम करवा हेतु ?" - पुरूरवा कानैत पुछलखिन। "हँ प्रिये! हम लाचार छी! हम लाचार छी प्रिये !आ हमहूँ अहाँक दोषी छी। जँ हमरा ई बुझल रहैत जे हमर विरह में अहाँक भविष्य एहन भs जायत तs हम कहियो अहाँ सs प्रणय याचना करवा हेतु एहि धरती पर नहि आबितहुँ। हम स्वयं दिन-राति अहाँ के प्रेम में तड़पि-तड़पि दिवा-रात्रि व्यतीत करितहुँ मुदा अहाँक निकट नहि अबितहुँ। एखनहुँ हम अहाँ बिनु सुखी नहि छी, हम अपन समय दर्द में बिताबैत छी। ओहिना पहिनहुँ हम रहितहुँ मुदा अहाँक लग नहि अबितहुँ। अहाँक स्थिति हमरा सs नहि देखल जा रहल अछि" - उर्वशी कानि रहल छलीह। "नहि प्रिये! एना नहि कहू! अहाँ हमर अतीत के अलंकृत केने रही! महक प्रेम सेs हमर जीवन में बसंत आयल छल! जीवन सफल उल्लसित भेल छल!प्रियतमे ! लोक गर्व सs कहैत छल जे पुरूरवा के उर्वशी भेटलथि ! प्रिये! भविष्य में लोक धरती पर गर्व सौं कहत पुरूरवाक प्रेम उर्वशी सौं छल!स्वर्ग अप्सरा उर्वशी सौं ! सर्वसुन्दरी अप्सरा उर्वशी सs प्रेम भs गेल छल "- आब पुरूरवा कने मुस्कुरायल छलथि । ओ उर्वशी के अपना आलिंगन में समेटि हुनका पर अनगिनत चुम्बन के वर्षा कs देलथि। "अहाँ अपन ई केहन दशा बनौने छी प्रियतम? अहाँ केँ एहि हालत मे देखब हमरा सहन नहि भs रहल अछि। अहाँ पहिने जेकाँ नहि छी। अहाँ की छलहुँ आ कथि बनि गेलहुँ? एतेक परिवर्तन! की अहाँ वैह चक्रवर्ती सम्राट छी! जकर आवश्यकता स्वर्ग तक के छल!आ आब अहाँ पृथ्वीक शासन तक नहि सम्हारि पाबि रहल छी! ओहो अहाँ छोड़ि देलहुँ!की अहाँ केँ अपन राज्यक अपन प्रजाक कनेको चिन्ता नहि अछि ?" उर्वशी सिसकैत बज लीह । "नहि प्रिय, हमर स्थिति आब कहियो नहि सुधरि सकैत अछि। प्रियतमे! आब कोनो काज हमरा सौं नहि भs सकैत अछि। हम अहरनिशि अहाँक विरह सँ तड़पैत कखनहुँ कल्पनालोक में विचरण करैत अहाँ सौं प्रणय निवेदन करैत छी,कखनहुँ अहाँ संग रास रचाबैत बने बन घुमइछी।आ कखनहुँ काल हम अहाँक अनुसंधान करैत विस्तृत वान प्रांत में भटकैत छी। आब अहाँ केँ छोड़ि ने हमरा किछु मोन पड़ैत अछि आ ने मोन पाड़य चाहैत छी" - पुरुरवा अपन स्थितिक सटीक विश्लेषण केलनि। "हम अहाँ केँ एकटा सम्मति दिय प्रियतम! अहाँ हमर प्रस्ताव स्वीकार करब?" उर्वशी पुछलखिन। पुरुरवा - "जँ स्वीकार करवा योग्य होयत तखन हम अवश्य करब। अहाँक कोनो प्रस्ताव केँ हम कहियो अस्वीकृत केलहुँ? कहू, अहाँ की कहs चाहैत छी?" "जँ अहाँ हमरा आपस प्राप्त करय चाहैत छी, तखन एहि वास्ते अहाँ गंधर्वराज विश्ववसु के आराधना करू। जँ अहाँ के आराधना सौं ओ प्रसन्न होयताह तखन ओ हमरा अहाँ के सौंप देताह" - उर्वशी राजा केँ आशाक किरण देखौलनि। जँ...जँ ई संभव अछि तखन हम काल्हिये सँs स्वयं हुनकर आराधना प्रारम्भ करब- आसक ओहि क्षीण किरण के झलक पाबि पुरूरवा केँ ह्रदय प्रसन्नता सौं लहकि गेलनि । -हँ! अपना सबहक मिलन के आब यैह एक टा मार्ग शेष अछि, कारण आब हम अहाँ सँs भेंट करबाक लेल धरती पर नहि आबि सकब, हमरा लेल धरती पर एबाक सभ द्वार बन्न भऽ गेल अछि।अहर्निश हम अनेक प्रहरी के मध्य घेरायल रहैत छी। हम कतहु असगर नहि जा सकैत छी। हमरा पर अनेक प्रतिबंध लागल अछि"-उर्वशी आब अपन स्थितिक संग समस्या के संपूर्ण जानकारी अपन प्रियतम के स्पष्ट रूप सs देलथि हुनका सामान्य स्थिति में देखि कs। "तs...तs...आब बरख में एक राति लेल अबैत छी सेहो नहि आएब?" - पुरूरवा आश्चर्यचकित भs पुछलखिन। -नहि प्रियतम, हम आब नहि आबि सकैत छी। हँ! जँ s गंधर्व राजा प्रसन्न भs कs अहाँ केँ हमरा सौंप देताह, तखन हम प्रसन्नतापूर्वक आबि कs अहाँ के समक्ष उपस्थित रहब।कारण तखन हमरा पृथ्वी पर एबा में कोनो रोक-टोक नहि रहत। तखन हम आबि जायब अहाँ लग। तखन तs बस अपना सब रहब!अपन प्रेम रहत!आ रहत अपना सभक उज्जवल भविष्य!" - उर्वशी पुरूर्वा केँ आलिंगन में लैत बजलीह। किछु क्षण पहिने उर्वशी के द्वारा देखाओल आसक क्षीण प्रकाश आब दिव्य किरण बनि पुरूरवाक हृदय केँ प्रकाशित कs देने छलनि। "हँ! अहाँक प्रस्तावक कारणेँ हमर हृदय में आसक किरण उत्पन्न भs गेल अछि, आब हम प्रसन्न छी !...बहुत....बहुत.....प्रसन्न!" - पुरूरवा प्रसन्नतापूर्वक मुस्कुराइत बाजलथि । आब प्रसन्न भs ओ अपन प्रियतमा केँ अपन सुदृढ़ आलिंगन मे बान्हि लेलनि। ओ उर्वशी के आलिंगनबद्ध कs प्रेमालाप करय लगलाह, हुनकर अंग-प्रत्यङ्ग के प्रेम सs भरल स्पर्श करैत चुम्बन लेमय लगलाह । उर्वशी सेहो हुनकर प्रेम के ओहिना प्रेम संs प्रत्युत्तर दs रहल छलीह पुरूरवा अपन उज्जवल भविष्य के कल्पना में उबि-डूबि रहल रहल छलाह मुदा उर्वशी के हृदय के स्थिति! ओ तs मात्र हुनकहि बुझल छलनि! कारण ओ देवलोकक अप्सरा छलीह! साधारण मनुक्ख नहि! मुदा पुरूरवा हुनकर द्वारा देखाओल गेल स्वर्णिम आसक किरण केँ अपन हृदय में स्थापित कय पूर्णतः प्रसन्न छलाह । आब ओ दुनू डूबि गेल छलथि अपन बहु प्रतीक्षित प्रणयरास में । परिवेशक कोनो चहल-पहल सँs अनभिज्ञ-अनजान भेल दुनू गोटे एक दूसर के आलिंगन बद्ध कएने एक-दूसरा में मग्न छलथि । एक-दूसर में मिश्रित भय हुनक श्वास-प्रश्वास के ध्वनि विचित्र अनुभूति करा रहल छल! अपन श्वसन के ध्वनि हुनका सब के एकटा सम्मोहक भाव सs भरि रहल छल ! शरीर के अंग एक दोसरा के छू रहल छल! आ वातावरण में प्रस्फुटित भs रहल छल मात्र हुनका लोकनिक रतिक्रीड़ा जनित अस्पष्ट आनंद पूरित ध्वनि! ४२ कथा एखन धरि उर्वशी के पुरूरवा सs भेंट होयत छैक आ ओ दुनू गोटे प्रेमालाप में निमग्न भय जायत छथि । हुनक मिलन चित्रसेना नुका कs देख रहल छथि।

आब आगू दूर पर ठाढ़ चित्रसेना स्थिर दृष्टि सs पुरूरवा आ उर्वशीक एहि अनुपम आ अपूर्व मिलन विस्मित भय देखि रहल छलीह। हुनक प्रगाढ़ प्रणय देखितहि हुनक हृदय ईर्ष्याक ज्वाला सौं धधकि उठल। आब ओ अपन दुर्भाग्य पर दृष्टिपात केलथि।ओहो अहर्निश पुरूरवाक ओहि अक्षत प्रेम प्राप्त करवा लेल तरसि रहल छलीह। पुरूरवाक प्रणय में डूबि ओहो अपन तन-मन के सुधि-बुधि बिसारि देने छथि। दिन-राति विरहक वेदना सs संतप्त रहथि। जखन विरहक वेदना सहबाक क्षमता समाप्त भय गेलन्हि, तखन पीड़ा सौं व्याकुल भय ओ मृत्यु केँ वरण करबाक प्रयास केलथि । मुदा ओ मृत्यु केँ वरण करबा में सफल नहि भेलथि, नियति के हुनक मृत्यु स्वीकार नहि भेलन्हि! हुनक प्राण रक्षा कय लेल गेल! ओहो किनका द्वारा! हुनक अपन प्रियतम के द्वारा!अपन प्रियतम के आलिंगन में आबद्ध ओ मृत्यु के मुख सs आपस जीवन के द्वार पर पहुँचि गेलथि। मुदा आब विधना के ई केहेन लेख अछि!जाहि पुरुष के ओ अपन प्राण सs बेसी प्रेम करैत छथि, जकरा लेल ओ अपन जीवन के त्याग करवा हेतु तत्पर रहथि ओ दोसरक आलिंगन में सुख के तलाश में छथि।भाग्यक केहन विडंबना ! पुरूरवाक प्रेम अप्राप्य वस्तु के प्रति छैन्हि, आ ओ सहज प्राप्त छथि मुदा हुनका दिस पुरूरवा के कनिको दृष्टि नहि जाइत छैन्हि। अलभ्य वस्तु प्राप्त करवाक कामना में पुरूरवा असाध्य कष्ट सs व्याकुल छथि। मुदा चित्रसेना!ओ तs कोनो अलभ्य वस्तु प्राप्ति के कामना नहि केलथि ! जे साध्य छल ओ स्वयं ओकरे प्राप्तिक इच्छा करैत छथि! मुदा हुनका वास्ते ओ लभ्य वस्तु अलभ्य भय गेल। लभ्य के प्राप्ति हुनका लेल संभव नहि रहल।सेहो ओकरा लेल अप्राप्य भ' गेल अछि।साध्य वस्तुक प्राप्ति सेहो असंभव अछि। एहना स्थिति में आब हुनकर की हेतै भविष्य ? सम्मुख मात्र एकटा प्रश्नचिन्ह ठाढ़ अछि। ओ बहुतो काल धरि सोचैत रहलीह।ओहो विरह-वेदना सँs त्रस्त छलीह, मुदा हुनकर वेदना केँ बुझय बला कियो नहि छल, हुनकर विरह ज्वाला मिझायत कोना ? हुनकर प्रियतम हुनक समक्ष छनि , मुदा ओ हिनका दिस एक बेर घुरि कऽ तकैत नहि छनि । नहि जानि भाग्य मे विधाता की लिखने छथि?सृष्टिकर्ता कथि चाहैत छथि? चित्रसेना आब आर बेसी पीड़ा सहन नहि कs सकलीह, हुनक चेतना विलुप्त भय गेलनि। ओह चेतनाहीन भs कs भूमि पर खसि पड़लीह। … रात्रि के अंतिम प्रहर में उर्वशी के अत्यंत दुखी हृदय सs विदा कएला के बाद पुरूरवा निकटस्थ कोनो उपयुक्त स्थान के अन्वेषण में प्रस्थान कs गेलाथि । एकटा एहन स्थान जे सुरक्षित आ निरापद होन्हि, जतय ओ निर्विघ्न आराधना कs सकथि गंधर्वराज विश्वावसु के । नदीक कात में एक सुरक्षित स्थान देखि ओ तट पर किछु मुलायम घास, पत्ती एवं किछु लकड़ी एकत्रि कय छोट सन पर्णकुटी बनौलनि । एक दिनक मेहनतिक बाद हुनकर कुटी तैयार भs गेलनि, जतय ओ शांतिपूर्वक बैसि कs निर्विघ्न तपस्या कs सकैत छलथि।आब पर्णकुटी तैयार भेलाक उपरान्त ओ नदीक जल में प्रवेश केलथि। स्नान केलाक उपरान्त ओ पर्णकुटी में आसन लगा बैसि गेलाह, आ ध्यानमग्न भय तपस्या में लीन भs गेलाह। अपन सम्पूर्ण ध्यान ओ गंधर्व-राज विश्ववसु में केन्द्रित कs तपस्या में लीन भs गेलथि।ओ एहि कठोर तपस्या में अपन तन-मन के सुधि बिसारि देलनि। खैर, अपना केँ विस्मृत कय ओ गंधर्व-राज विश्ववसु के ध्यान मे लीन भs गेल छलथि ।

क्रमशः

अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.आचार्य रामानंद मंडल- बुड़बक बेटा आज्ञाकारी आचार्य रामानंद मंडल बुड़बक बेटा आज्ञाकारी खोकसी गांव मे एगो समृद्ध किसान रामबचन महतो रहलन।वो बीस बिघा जमीन के जोतनिया रहलन। हुनका दू गो बेटा रहैन। बड़का बेटा बेशी न पढ पायल। खींच खांच के मैट्रिक पास रहय। शुरूये से बड़ बेटा मनोहर अपन बाप के खेती गृहस्थी में संग पूरे लागल। अट्ठारह उमेर पूरैत मनोहर के बिआह पड़ोस गांव बराही के समृद्ध किसान चलितर मंडल के बड़की बेटी सुनीता से भेल रहय। सुनीता सुन्दर आ सुशील रहय। वो मृदुभाषी आ व्यावहारिक रहय।अपन सास के खूब सेवा करय।एकरा से एगो पोतो भेल रहय। पोता किशन बड सुंदर रहय। घर में सभके दुलुरुआ रहय। छोटका बेटा मनोरंजन प्रतिभावान रहय। पहिला किलास से इंटर सांइस तक फस्ट कैलक।वोकरा बाद आइ आइ टी क के अमेरिका मे इंजिनियर के नौकरी करे लागल। कंपनी मे काज करैत अमेरिकी लैइकी से प्रेम बिआह क लेलक।रुपयो पैसा घरे न भेजे।फोन से कहियो काल माय -बाप से बात क लेबे। एनी माय -बाप बुढ भे गेल।सारा खेती गृहस्थी के काज मनोहर करे संगे बाप माय के सेवा सुसर्सा करय। रामबचन महतो बिमार पड़ गेलन। गांव के दोस महिम  रामबचन महतो के देखे आबय त हाल चाल पूछे।एकटा दिन मनोहर अपन बाप के गोर जतैत रहय।ओही समय रामबचन महतो के दोस राम निहोरा राय आयल। मनोहर बाजल -गोर लगैय छियो राम निहोरा काका। कुर्सी पर बइठा। राम निहोरा बाजल -निके रहा मनोहर। फेर रामबचन महतो से रामनिहोरा राय बाजल -किहो रामबचन कि हाल चाल हौअ। रामबचन महतो बाजल -ठीके छी। राम निहोरा राय -बड़का बेटा के कि हाल चाल हौअ। रामबचन महतो खुश होइत बाजल -बड निक।वो त खानदान के नाउ उच्च क देलक।हमर पुतोहुओ अमेरिकी हय आ बेटे वाला कंपनी में काज करैत हय।बेटो के अमेरिका मे नागरिकता भेंटे वाला हय।वोहो अमेरिकन हो जायत। राम निहोरा राय बाजल -हं। मनोरंजन त उजिया गेलौअ।आ मनोहर के लेल कि सोच लोहु हय। रामबचन महतो बाजल -हो।एकरो पढाबे के लेल कि न कैली। एकरा त पढे मे मने न लागैय। खींच खांच के मैट्रिक त पास क गेल। एकरा खेती गृहस्थी में लगा देलिय।इहे सारा खेती गृहस्थी देखय हय। इहे अइ जमाना मे बुड़बक रह गेल। राम निहोरा राय बाजल -हो रामबचन।एना न बोला।देखा,तू एगो निक किसान छा।आबि बुढ भे गेला।परंच मनोहर पूरा खेती गृहस्थी संभाल लेलको। पहिले ही जेका ढेर दू सौ मन धान गेहूं उपजा लेउ छौ।घर अन्न से भरल रहैय छौअ।हं। रुपया पैसा के कनिका तंगी रहौअ छौअ।किसानी मे इ त रहैय छैय। रामबचन महतो बाजल- हो राम निहोरा। खेती गृहस्थी में आबि कि राखल हय।लड़िका फड़िका पढ लिख के देश विदेश में रहय छैय,कमाई छैय,अपना परिवार के त देखैय छैय,वोहे निक रहय छैय।नाम गांव होय छैय।आबि गांव समाज वोकरे निक कहय छय। राम निहोरा राय बाजल -हो परदेशिया आखिर परदेशिये होय छैय।  हो। झूठे प्रतिष्ठे में लोग मातल रहय हय।देखा।पांच बरिस भे गेलो मनोरंजन के अमेरिका गेला। कहियो दू गो रुपयो भेजलको हय।घुमियो के कहियो अलौ हय। लोग प्रतिष्ठे प्राण गंवैय हय। रामबचन महतो बाजल -ठीके कहे छा हो राम निहोरा।कम से कम मनोहर आंखि के सामने त रहय हय।खुब सेवा सुसुर्सा करैय हय। भले समाज के नजर में बुड़बक हय परंच बड आज्ञाकारी हय। पोता किशन आबि पटना मे रहि के कम्पटीशन के तैयारी करैय हय। -आचार्य रामानंद मंडल, सीतामढ़ी।मो -9973641075 ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.लालदेव कामत-मैथिली काव्य संग्रह : नहि रहतै आब गाम लालदेव कामत मैथिली काव्य संग्रह : नहि रहतै आब गाम

कविवर श्री राजकिशोर मिश्र कृत मैथिली कविता संग्रह ' नहि रहतै आब गाम ' सद्य:प्रकाशित पोथीमे कुल १२२ पृष्ठ आ २९ गोट आधुनिक कविता अछि,जाहिक दाम २०० टाका राखल गेल छैक। एहि वर्ष २०२४ मेँ इ पोथी भारतमे प्रकाशित भेल अछि,जकर कविजी स्वयं प्रकाशको छथि। पहिल कविता 'क शिर्षक "नहि रहतै आब गाम" केए पोथिक नामाकरण करल गेल अछि। ऐ पोथीमे रचनाकार श्री राजकिशोर मिश्र जी आम जनमानजस लेल चिन्ता प्रकट करैत छैथ। भारतके आत्मा गाममे बसैत अछि आ तेँ एहि देश केँ कृषि प्रधान देश कहल जाइत छैक। गाम देहातके जे बसाबट अदौ सँ संरचनात्मक रहल ,से आब उजड़ि - उपटि रहलैक अछि। तकर कारण भेलैक जे गामक श्रीमन्त आ विद्वतजन तथा नोकरी पेशा लोक नगरमे जा बसैत अछि। देहातक लोक शहर पर भाड़ बढ़ेने छैक जे पलायन केने अछि से दूरस्थ रहितो गामक जुतिहार बनल रहबाक तिकड़म लगेने रहैत अछि। परंच गामोक किछु भजगर लोक अपन वैभव सँ बाहरी दखलंदाजी केर विचारधाराक काट कार्यमे पारंगत रहैछ। गामक अपेक्षा शहरमे लोक अधिक सुविधाभोगी बनैत छैक,तेँ गामोक जत्था खरका कय नगर- कस्वा कात जा बसैत अछि। ओतय डीह किनब सघन पॉस इलाकामे महाग मोशकिल रहैछ। कम टाका बला जँ जमीन कीनियों लैत छथि तँ एकतल्ला मुकाम पड़ोसक अपेक्षाकृत झुझुआन आ वायुमुक्त रहैत फरफड़ाइत रहैत छैक,तेँ स्वास्थ्यक लेल प्रतिकूल होइछ। शहर तँ कंक्रीटक टाल बनि गेल अछि। पैघ ईमारतके गरमी,पक्का सड़क गरमी, विजली- कारखानाक गरमी सं मानव जीवन सांसतमे उबडुब करैत छैक। तैयो लोक शुद्ध ग्राम्यजीवन सँ जेना उबिकय पड़ोसिक संत्रास सँ सेहो अक्रान्त भ' ग्रामभावना त्यागि पड़ाइत रहल अछि। ई जे नव समस्या संकट बनल जा रहल छैक , ताहि प्रसंग कविवर श्री मिश्रजी चिन्तित देखेलाह अछि। यथा, हुनक सीरजल रचनाक पाँति देखल जाए-: रहतै सहर ,रहतै नै गाम, भीड़, प्रदूषण, रहतै जाम। रेबाड़ि रहल छै नगर गाम के, की बाँचत? बस रहत नाम के, अस्तित्व मेटाबय पर छै लागल, सहर के पाछू लोक छै लागल। गामक रहवासी सुधंग लोकक जे धनगर खेती रहय ,ओहिमे विल्डर अपन प्रभुत्व जमाल लेलकैक आ बाड़ी- झाड़ीमे लोक डीहकात मकई , सागर, तरकारी उपजबै ,पशुके बथान बनेने छैक,से सब जगह छेकने छैक आई जेनरल स्टोरक साईनवोर्ड । रजमा ,रहरिया, राहैर दालि'क स्वयं उत्पादन करैत छल से आब हरसठे दोकान सँ दालिक पाकेट बेसाहय पड़ैत छैक। मोट अनाजमे जनेर महत्वपूर्ण स्थान रखैत छैक,से लोक जतय उबजाबैत रहय ,ताहिठाम तँ स्टेशनरीक' दोकान आ स्टूडियो - फोटोस्टेटके शोप देखल जाइछ। चर- चाँचर सँ अनेक तरहक माछ,श्रृगहार फल, मखान सौरकी,बिशांढ़ आ कोइचला आदि पबैत रहय ,जतय आब स्टेडियम बनि गेला सँ अपने गाम आब अन्चिनहार देखाईत छैक। गामो आब मिनिशहर बनि रहल छैक। एहि ज्वलंत समस्या बात कवि आर्त भावे गाबैत छथि-: .......... उजड़ि जेतै सब गाम , सहर नै देतै घरारी , हर्दिया लेतै बीत - बीत , बँचतै नहि बाड़ी ।............ कवि महोदय ग्राम्यजीवन मे जे देखलन्हि ,प्रदुषण सहर पसरि रहल छैक , देहाती गाढ़दुलार बाला सहिष्णु लगावके जगह चारुभर सँ गाम पर प्रहार देखल गेल छैक आ कल्पना करैत ई जे सन्निकट भविष्यमे गाम शहर-अहारमे परिणत देखाओत। जहिना नगरक लोकमे कूल वंश ,टोला बासीक, ग्रामीत भावना , सामाजिकता नहि रहैछ,तहिना गामोक जीवन ओही ढर्रापर आबि रहल छै। तेँ नक्शा - चौहद्दी मेँ लिखल भेटत गाम ,मुदा भविष्यमे ग्राम भावना उपटि गेल रहत आ एकांगी जीवन सँ लोक मतलब राखत। गामक मधुमय रहन - सहन प्रभावित भ' रहल अछि ,तकरा बचेबाक उपाय के करत? गामो देहातमे आब गीध ,देसीकौवा ,बगरा-फुदी ,खिखीर - नढ़िया नहिं देखा रहल अछि। ओकरो सभके सांस पर आफद केने रहल कार्वनमोनोआक्साइड गैस, उमेर आबै सँ पहिने लोक बुढ़ आ बेराम भ' जाइछ।जल जंगल हरियाली प्रकल्प क' मुँह दुसैत बेसीतर योजना कागते पर सुसम्पन भ' जाई य। सरकारी धनराशि 'क बनरबाँट केर खेलवेल चलल अछि। एकहि मैदानके भरयके नामपर माटिकरण तँ ओहि खेसरालम्बर पर तलाव(रजोखरि) निर्माण गजगज देखाएल छैक। कवि जी 'जूलुम भ' रहल छै' कवितामे अपन मन:स्थिति प्रकट कयलनि अछि -: ....... सोनीत पीब' खेलैत मलंगा कार्बनमोनोआक्साइड गैस, सांशों पर छै आफद केने, गिड़ने जाइ छै सभक वएस।........ दोसर पाँति द्रष्टवय :- घरे - घर छै ओकरे हकार , पचलो अन्न सँ धोनि - ढ़ेकार। प्रदुषण धाह सँ धीपर अम्बर, धरती के त' प्रथमहि नंवर । एहि तरहेँ कवि जीक कविता जेना-: खेती बिनु सभ सुन, मनोपीड़ा , आएल मधुमास, सज्जन जन सँ भेँट कठिन थीक, जीत, जिनगीक नव रीति , भ्रम, खेतक उपराग, स्वबल, भूतक नगरी, भ' गेलैक अछि भोर, जन्मभूमि, पुरान ओ आधुनिक, हम जिनगीके भरिया छी, माँटि- गाछ, बूझि, कापर, नव जुगक संबंध तरु, भारतक बात, किए पोसू अवसाद?, कलिजुग, सुन्ना, भारतवर्ष , ओ किछु ताकि रहल छथि, सिन्धु घाटी सभ्यता -प्रथम भाग, सिन्धु घाटी सभ्यता द्वितीय भाग, हम नहि बनब भाग्य केर चाकर, सारगर्भीत ओ प्रेरणादायक छैक। समाजमे ई पोथी एक नव चेतनाक संचार करैत अलख जगाएत। मुदा मैथिली पोथीक प्रति जन सरोकार कम देखाईछ,विशेषकय कविताक पोथी उपन्यासक अपेक्षा म पढ़ल जाईछ से एक पृथट समस्या छी। कवि श्री मिश्रजी विविध विषयपर नव- पुरान समस्याक समाधान लेल अपन कविताके हथियार बनौलाह अछि। हम हिनक कविता रूचि पूर्वक मनन कयल। हिनक पन्दरह गोट कविताक पोथी बहराएल छन्हि, जाहिमे एक खण्ड काव्य सेहो प्रकाशित भेल अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.कल्पना झा- ३२म- ३५म शताब्दीक मैथिलीक नेंओक साक्षी कोबर घर तैयार कल्पना झा ३२म- ३५म शताब्दीक मैथिलीक नेंओक साक्षी कोबर घर तैयार

मैथिली भाषा-साहित्य मे गजेन्द्र ठाकुर एवं प्रीति ठाकुरक योगदानक आलोचनात्मक विवेचन बला पोथी "प्रीति कारण सेतु बान्हल" Redefining Maithili क लेखकीय प्रति प्राप्त भेल। पोथी देखि मोन प्रसन्न भ' गेल। बहुत नीक डिजाइन कएल गेल अछि। छपाइ,कागज के क्वालिटी सभ किछु बहुत नीक। पढ़बामे सुगम, सभ बएसक लोकलेल(फॉन्टक कारणेँ)। एहि पोथीक सभ सँ बड़का विशेषता वा आकर्षण कहि सकैत छी,जे हमरा ठीके बड्ड आकर्षित कएलक,ओ अछि मैथिली लोकगीतक किछु पाँतिक माध्यम सँ पोथी मे संकलित लेख सभ केँ कैटगराइज करब। एकहक टा गीतक पाँति एकहक टा खंडलेल आ से यथोचित चुनाओ, गज्जब..जेना ----

आजु जनकपुर मंगल भुप सभ आओल हे....अनुक्रम लेल

प्रथम गणेश पद गाओल देवता मनाओल हे.......संपादकीय लेल

सभटा गीतक बोल बेजोड़ चुनलनि अछि।

बनही मे मुँगिया जनमि गेल बनही लतरि गेल हे...... पीपरक पात अकासहि डोलए शीतल बहए बसात यौ.... पहिल पहर गौरी पूजल..... तोड़लनि धनुष कठोर हे परिछन चलू सखिया.... कवन नगर के सेनुरिया सेनुर बेचे आयल रे आहे कवन नगर के कुमारी धिया सेनुर बेसाहल हे.... करमी के लत्ती जकाँ लतरथु पुरैन जकाँ पसरथु हे......

जतबा मोटामोटी पढ़लहुँ/देखलहुँ पोथी, ताहि सँ ई अनुमान सेहो भेल,जे संपादक महोदय रचनाकारक क्षमताक अनुरूपेँ हुनका सँ ओहि विषय पर लिखबाक आग्रह केलनि आ ताहि मे सफल भेलाह। कहबाक माने संपादकक काज बड़ कुशलता सँ केलनि अछि। जेना एकटा सिनेमाक डाइरेक्टर केँ हाथ मे रहैत छै,एक्टर सँ कोना नीक सँ नीक काज लिअए, तहिना एकटा संपादकक महत्वपूर्ण रोल रहैत छै एहि तरहक पोथीक प्रकाशन मे। हमरा मोन अछि कहियो संपादक महोदय ई बात अपन फेसबुक पोस्ट मे कहने छलथि "ई पोथी हमर संपादन कलाक परीक्षा हएत।" तँ से हमरा तरफ सँ संपादक जी 'विथ- डिस्टिंक्शन' उत्तीर्ण भेलाह अछि,एहि परीक्षा मे। ई सर्टिफिकेट हम ओहिना नहि देलिअनि अछि। पोथी जे सभ पढ़ताह/पढ़तीह सभ हमर बात सँ सहमति रखताह/रखतीह।

जे लिपिक जानकार छथि हुनका सँ लिपि संबंधी लेख लिखबौलनि,जे समाजशास्त्त्रक ज्ञाता छथि हुनका सँ दूषण पञ्जी पर विस्तृत विवरण बला आलेख। ई संपादकीय कौशल भेल। संपादकीय कौशलक संग संपादक आशीष अनचिन्हार जीक लिखल संपादकीय आ मैथिली चित्रकथा केर प्रारम्भिक इतिहास (2002 सँ 2016) सेहो पाठक केँ सहजहि प्रभावित करतनि।

"मैथिली चित्रकथा केर प्रारम्भिक इतिहास" आलेख सार्थक सूचना ओ तथ्यक आधार पर लिखल गेल अछि,जे एहि पोथी केँ इतिहासक पोथी सन महत्वपूर्ण बनबैत अछि। तहिना पोथीक पहिल खण्ड "पीपरक पात अकासहि डोलए शीतल बहए बसात यौ...."क अन्तर्गत सियाराम झा 'सरस' जी द्वारा लिखल "करौट फेरैत गामक निदर्शक:के. एन. टी." मे गजेन्द्र ठाकुर जीक पिता,कृपानन्द ठाकुर जी सँ जुड़ल अनेकों प्रसंग पढ़ैत नब-नब जनतब भेटतनि पाठक केँ। जे इतिहासे सन महत्वपूर्ण। जाहि मे गजेन्द्र ठाकुर जीक पारिवारिक एवं सामाजिक पृष्ठभूमि सँ नीक जकाँ अवगत होइत, हुनकर गाम मेंहथक इतिहास-भूगोल,सभ किछु सँ परिचित भ' सकैत छथि पाठक। जखन मधुबनी 'जिला' नहि,'अनुमंडल' छलए, तखनुक परिवेश सँ ल' क' गौँआ-घरुआक बीच के. एन. टी.क ख्याति,पुस्तकालय प्रसंग, फुटबॉलक प्रसंग, गुरु-शिष्य ओ सेवा-व्रत धरिक चर्चा भेटत। आलेखक अन्त मे सरस जी भावुक होइत जे लिखलनि अछि-"मुदा कचोटक बात जे एहि चर्चित गुरु-शिष्यकेँ सामाजिक रूपेँ जेहन मान-सम्मान भेटब वांछित छलनि, जकर ई लोकनि सभ तरहेँ अधिकारी छलाह; से भेटि नहि सकलनि।"से ठीके कचोटक बात!

पोथी मे दू-तीन टा साक्षात्कार सभ सेहो देल गेल अछि,जकरा माध्यम सँ रचनाकार दम्पतिक विजन बुझबा मे सुगमता हेतनि पाठक केँ। गजेन्द्र ठाकुर जीक साक्षात्कार मुन्ना जी द्वारा लेल गेल छलए,सन् 2011 मे,सेहो देल गेल अछि एहि पोथी मे।पुरान साक्षात्कार सँ पाठक हुनक ओहि समयक कमिटमेन्ट आ हुनकर एखनुक एक्टिविटी एवं कमिटमेन्ट मे साम्यता ताकि सकताह,से उद्देश्य छनि संपादकक । संगहि नबका साक्षात्कार सेहो देल गेल अछि,जे आशीष अनचिन्हार द्वारा ई-मेलक माध्यम सँ लेल गेल अछि। संगहि आशीष अनचिन्हार द्वारा ई-मेलक माध्यम सँ लेल गेल प्रीति ठाकुर जीक साक्षात्कार,जे संभवत: प्रीति ठाकुरक पहिल आ एखन धरिक एकमात्र साक्षात्कार सेहो छनि,एहि पोथी मे पढ़ि सकैत छथि पाठकगण।

एकर अतिरिक्त इंटरनेट, पञ्जी, शब्दकोश, लिपि, संपादन, साहित्य, नव लेखक केर प्रोत्साहन आदि बहुत विषय पर बहुत रास स्तरीय लेख सभक संकलन अछि ई पोथी।

बहुविधाविद रचनाकार एवं युवा पत्रकार श्री गजेन्द्र ठाकुर जी आ हिनक अर्द्धांगिनी,मैथिलीक पहिल चित्रकथाक लेखिका प्रीति ठाकुर,किछु एहन केलथि जे मैथिली भाषा-साहित्य लेल पहिल काज छलै,आ एहन-एहन पहिल काजक सूची नमहर छनि हिनका लोकनिक। हुनकर सभ काजक सूचना भेटतनि पाठक केँ एहि पोथी मे। संगहि विभिन्न लोक द्वारा ओहि काजक मूल्यांकन करैत आलेख सभ सेहो भेटतनि। एहि पोथी मे हुनकर कएल काजक गुणगान मात्र नहि अछि। नीक/बेजाए सभ बातक चर्चा देखल जा सकैए।

जबरदस्त तरीका सँ बिगुल बजा देल गेल अछि-"मेंहथ गाम, कृपानन्द ठाकुरक अंगना मे बैसि एखन धरि जे अहाँ सभ पढ़लहुँ,से मात्र प्रस्तावना छल। आब एहिठाम सँ डेग उठा रहल छथि दंपति रचनाकार 22म शताब्दीक मैथिली साहित्यिक कोबर लेल जे पूर्णतया सजि क' तैयार छनि खास हिनके लेल। इएह कोबर घर साक्षी बनत नव नव योजना परियोजनाक।इएह कोबर घर साक्षी बनत भाषा-साहित्य केर सिनेहक। इएह कोबर घर साक्षी बनत ओहि नेंओ केर जाहि पर ठाढ़ हएत 32म-35म शताब्दीक मैथिली........" ई शब्द छनि "प्रीती कारण सेतु बान्हल" पोथीक संपादक आशीष अनचिन्हार जीक।

प्रतीक्षा रहत एहि कोबर घर सँ केहन नव-नव योजना-परियोजना बहराइत अछि,तकर। करमी के लत्ती जकाँ लतरथु पुरैन जकाँ पसरथु हे...... अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- "प्रीति कारण सेतु बान्हल": सम्पादक - श्री आशीष अनचिन्हार डॉ. कैलाश कुमार मिश्र "प्रीति कारण सेतु बान्हल": सम्पादक - श्री आशीष अनचिन्हार हमरा हाथ मे हार्ड बॉण्ड कॉपी आबि गेल अछि "प्रीति कारण सेतु बान्हल" नामक पोथी केर। एहि पोथी केर संपादक छथि श्री आशीष अनचिन्हार। पोथी केर कवर पेज, एकर कागत केर क्वालिटी, फॉण्ट, फॉण्ट साइज़, मुख्य आवरण आ पृष्ठ पेज केर रंग संयोजन, डिज़ाइन, फॉरमेट अलग-अलग विषय हेतु मैथिली लोकगीत केर आखर सँ विभिन्न खण्डक नामकरण इत्यादि एहि पोथी के विशिष्ट आ संग्रहणीय बनबैत अछि। जिज्ञासा बढ़ि गेल ने? यैह छैक एहि पोथी केर विशिष्टता। देखू कने नामकरण:

विषय सूची केर नाम छैक: आजु जनकपुर मंगल भुप सभ आओल हे.. प्रथम गणेश पद गाओल देवता मनाओल हे.. : अतय आशीष अनचिन्हार जी अपन बात एहि पोथीक संपादक के रूप मे रखैत छथि। बनहीमे मूँगिया जनमि लेल बनही लतरि गेल हे.. : अतय संपादक महोदय गजेन्द्र ठाकुर आ प्रीति ठाकुर द्वारा कएल गेल किछु ओहन काज सभ सभहक सूची देने छथि जे काज मैथिली भाषा लेल पहिल छै। काजक सूची सटीक, इमानदारी सँ सभ बातक चर्च करैत अछि। केना एक व्यक्ति अपन जीवनसाथी केर सहयोग सँ असम्भव के संभव बना लैत अछि तकर रेखाचित्र थिक ई अंश। उपरोक्त नामकरण तँ खण्ड सँ पूर्वक अछि, खण्ड केर नामांकरण तँ आब निम्न तरहेँ होइत अछि : खण्ड -1 : पीपरक पात अकासहि डोलय शीतल बहए बसात यौ..। एहि खण्ड मे गजेन्द्र जीक पिता, हुनक पारिवारिक एवं सामाजिक विवरण देल गेल छैक। खण्ड -2 : पहिल पहर गौरी पूजल..।: एहि खण्ड मे प्रीति ठाकुर केर काजक आलोचना 10 गोटे द्वारा भेल अछि जे साहित्य, इतिहास, पत्रकारिता एवं अन्य विधा सँ जुड़ल लोक छथि। खण्ड -3 : तोड़लनि धनुष कठोर हे परिछन चलू सखिया..: एहि खण्ड मे गजेन्द्र ठाकुर केर काजक आलोचना 29 गोटे केने छथि। ओना हमर मानब अछि जे गजेन्द्र जी मैथिली संस्कृति आ साहित्य केर एहेन मनीषी छथि जिनका पर 29 आलेख झुझुआन लगैत अछि। हिनका पर 29 आलेखक बाते छोड़ू 29 पोथी लिखब, सेहो न्यून होयत। जे गोटे गजेन्द्र जीक अवदान सँ परिचित छी से हमर बातक अर्थ लगा लेने हएब ! से जे हो, अहि खंड के गंभीरता सँ पढ़ल जयबाक चाही आ अहि पर अधिक सँ अधिक समालोचना सार्थक दिशा मे होबाक चाही जाहि सँ आरो पक्ष पर आ अगर कुनो पक्ष कम लिखल गेल अछि, कुनो तथ्य, बात, प्रसंग आदि छुटि गेल छैक, तकर निराकरण होबाक चाही ।

उपरोक्त बात भेल तीन खण्डक। एकरा अलावे जे इण्डेक्स इत्यादि देल गेल छैक, संपादक महोदय जे अपन बातक सार संक्षेप लिखैत छथि ताहू सभ मे गीतक आखरे नहि प्रथम पंक्ति छैक। तकर उदहारण देखल जाय:

कवन नगर के सेनुरिया सेनुर बेचे आयल रे आहे कवन नगर के कुमारी धिया सेनुर बेसाहल हे..।: अतय भेटैत अछि गजेन्द्र ठाकुर आ प्रीति ठाकुरक संपूर्ण व्यक्तिगत परिचय। ई ऐना भेल जेना विवाह मे विधिक मादे जखन सेनुर बेचे बला अबैत अछि त ओ लड़की केर विवाह केर प्रथम डेग भेल। आगाक विस्तार होइत रहैत छैक। सेनुर जीवन संग आगा बढतैक जोड़ी तकर गाथा कहैत छैक । ई प्रयोग कतेक नूतन, कतेक मिथिला केन्द्रित, कतेक लोक रंग सँ भरल अथवा उमटाम भेल छैक। एक एक आखर केना अमृत प्रमाणित भऽ रहल छैक! पाठक बूझऽ लगैत अछि जे आब ई बात प्रगाढ़ हेतैक, घरक विस्तार हेतैक, जोड़ी केर वंश वृक्ष बढतैक। कतेक सहज छैक अर्थक बाट ताकब!

करमी के लत्ती जकाँ लतरथु पुरैन जकाँ पसरथु हे..: अतय संपादक महोदय अर्थात श्री आशीष अनचिन्हार जी अपन सार संक्षेप एहि पोथीक विषय मे लिखैत छथि। एहि नामकरण मे बहुत किछु संग साहित्य भविष्य मे आरो उन्नत हो, ओहि मे नाना तरहक नव लेखन, नव स्वर, नव सफुटन, नव चेतना होइक; मैथिली साहित्य आ संस्कृति भारत के कहैत अछि विश्व साहित्य मे अपन नाम स्थापित करय, अपन डंका बजबए तकर शंखनाद छैक।

490 पृष्ठक ई पोथी जकर अँगरेजी केर टैग लाइन एकर अर्थ आरो फरिछा दैत छैक - Redefining Maithili - श्री गजेन्द्र ठाकुर केर मैथिली साहित्यक विभिन्न विधा पर योगदान, हुनक ई-पत्रिका - विदेह केर सतत प्रकाशन, तथाकथित मुख्यधारा सँ धकेल देल गेल अथवा तिरस्कृत साहित्यकार आ हुनक रचना के प्रकाशित करब, अधिक सँ अधिक पाठक धरि ल जाएब, संगहि कियोक अगर लिखैत छथि आ विदेह लग छपबाक हेतु भेजैत छथि तँ हुनक रचना के बिना कुनो पूर्वाग्रह के छापब; आ गजेन्द्र जीक एहि सांस्कृतिक यात्रा मे हुनक पत्नी प्रीति ठाकुर केर परिवारिक संग-संग साहित्यिक साहचर्य। ई पोथी जहिया सँ हमरा भेटल अछि तहिया सँ हमारा मोन मे गजेन्द्र जीक संग-संग आशीष अनचिन्हार लेल सम्मान पहिने सँ अधिक भऽ गेल अछि। गजेन्द्र जी अतबे सँ नहि रुकैत छथि। हिनकर टीम कुनो साहित्यकार अगर चौर कर्म मे लागल छथि आ ओ कतबो पैघ कियैक नहि छथि, तिनका प्रमाण संग समाजक समक्ष अनैत छथि। ई हिम्मत सबहक वश केर बात नहि छैक ! जे पाठक सब हमर कथ्य पढ़ि रहल छी से सब बूझि गेल हेबैक जे के कतऽ आ कोना साहित्य चोरी केर विधा मे लागल छलाह जिनका गजेन्द्र जी केर टीम हरदा बजा देलकनि!

कहबाक अर्थ ई जे गजेन्द्र जी मैथिली संस्कृति अथवा मिथिलाम केर अनेक पक्ष पर बिना कोनो कुनो तरहक सरकारी अथवा संस्थागत आर्थिक सहयोग के मिशन मोड पर काज कऽ रहल छथि। देख रहल छी जे कनौसी भरि काज केला सँ आ सफलता सँ लोक आत्म श्लाघा मे बताह भऽ जाइत छथि, मुदा चरैवेति-चरैवेति केर नाद लगबैत गजेन्द्र जी अपन यात्रा मे लागल छथि।

हमर परिचय हिनका अर्थात गजेंद्र जी संग 2007 -08 सँ अछि। पोथीक पन्ना उनटबैत काल हम जेना एक-एक क्षण के स्मरण करय लगलहुँ। भोगल अतीत के वर्तमान मे देखैत सभ बातक अख्यास करैत गेलहुँ। हम ताहि समय नार्थ ईस्ट भारत पर गहन काज करैत रही। गजेंद्र जी हमरा बेर-बेर लिखबा लेल आग्रह करथि। हम लिखय लगलहु। एक नव आ रचनातम्क सम्बंध बनय लागल। मैथिली साहित्य, संसार आ लेखन सँ सिनेह होमय लागल। फेर लोकक आलेख, अनेक पक्ष पर विचार, विचार आ आलेख केर अति वैज्ञानिक समायोजन एहि पोथी मे एक नव फॉरमेट , नव सोच, नव प्रयोग संग लागल। सभ आलेख केर अक्षर-अक्षर मे गजेन्द्र जी व्याप्त छथि आ संग छथिन हुनक पत्नी श्रीमती प्रीति ठाकुर। एकर महत्त्व आरो पैघ भ जाइत छैक जखन पता चलैत अछि जे पोथी केर सारथी अर्थात संपादक श्री आशीष अनचिन्हार जी छथि जे हमरा जनतब सँ 18 वर्ष सँ गजेन्द्र जी, हुनक परियोजना आ विदेह सँ 100 प्रतिशत समर्पण भाव सँ जुड़ल छथि। संपादक सही अर्थ मे एहि पोथी रूपी प्रदर्शनी अथवा exhibition केर क्यूरेटर छथि। क्यूरेटर कियैक? कियैक तँ अलग-अलग विषय आ बिंदु पर अलग-अलग विद्वान अथवा रिसोर्स पर्सन्स के ताकब , हुनका सँ बात करब, आ लेख लिखा लेब बहुत दुष्कर कार्य थिक। उदहारण केर लेल हमरा दूषण पंजी पर लिखबा लेल कहने छलाह। हम एहि विषय पर नहि लिखय चाहैत रही। दस दिन धरि आशीष जी सँ वार्तालाप होइत रहल आ अंततः आशीष जी हमरा बुझा देलनि जे हमरे लिखक चाही एहि विषय पर। परिणाम ई भेल जे पञ्जी विधा पर हमर ज्ञान बढ़ल आ एकर वैज्ञानिकता, लोक पक्ष, लोक द्वारा शास्त्रक दोख दूर करबाक प्रयोग आ प्रमाण, पञ्जी केर यथार्थ आ थोथेबाजी, पञ्जी प्रबंध सँ सम्बंधित भ्रान्ति, स्त्री मनोदशा, भविष्य हेतु पञ्जी केर व्यवहार, मिथिलाक अन्य जाति मे पञ्जी केर स्कोप, डिजिटल युग मे पञ्जी आदि अनेक बिंदु पर जेना हमर भक खुजय लागल। हमरा ई भान भेल जे पंजी पर जेना खोजी प्रवृत्ति केर काज या त साफे नहि भेल छैक अथवा बहुत नगण्य काज भेल छैक। मिथिला समाजक दर्पण भऽ सकैत अछि पंजी पर नव खोजी शोध जँ उत्तम शोधकर्ता क्षीर-नीर-समभाव केर वैज्ञानिकता आ प्रमाणिकता पर काज करथि! से के करत? कियो ने कियो अवश्य करताह। करक चाही। जकरा अहाँ अपन थाती मनैत छी ओकर कतेक गह धरि जनैत छी? ओकर सब पक्ष बुझबाक प्रयास केने छी। जकरा विज्ञान कहैत छी ताहि मे विज्ञान कतेक अछि? जकर प्रमाणिकता केर इतिहास पर ढोल आ गाल बजा रहल छी से कतेक प्रमाणिक अछि? पंजी के स्त्रीगण केर स्थान के देबाक कोशिश केलनि आ के सब ओकरा ख़ारिज केलाह? कियैक ख़ारिज भेल? राजा आ हुनकर लगिय-भगिया सब एकर कतेक विकास केलाह आ कतेक गर्त मे लऽ गेलाह? अनेक प्रश्न जे भले यक्ष प्रश्न लगैत हो, तकर उत्तर भेट सकैत अछि। मुदा काज करऽ पडत। जकर नींव गजेन्द्र जीक टीम बना चुकल अछि

हमरा स्वीकार करबा मे कोनो शंका नहि अछि जे हम जेना-जेना गजेन्द्र जीक काज सभ पढ़ैत छी तेना-तेना हमरा अपन अज्ञानता केर भान भेल जा रहल अछि! "माधब- तुम समान आरो नहि दोसर!" यैह उक्ति गजेन्द्र जी लेल उचित बुझना जा रहल अछि हमरा।

एहि पोथी मे सभ किछु भेटत - फोटो, तथ्य आ नहि जानि की-की! अगर फ़ोकट मे पढ़य चाहैत छी तँ लिंक सँ पढ़ि सकैत छी। मुदा एहि पोथी केर पढ़बाक मजा पन्ना उलटि-उलटि क चाहक चुश्की संग छैक। पोथी पढ़बाक, ओकर सज्जा देखबाक आनन्द सही अर्थ मे परमानन्द छैक। से तखन बुझबैक जखन पढ़बैक। अथवा जिनका सभके पोथी भेटल छनि से सभ कहता।

पोथी मे अतेक लोकक आलेख अछि आ सभक नाम लेब संभव नहि, तँइ किनको नाम नहि लऽ रहल छी। एक बात मुदा कहब, ई पोथी जोगा कऽ रखने अछि बात, विचार आ आलोचना (समालोचना ) अपन मिथिलाक सभ जाति, वर्ग, समुदाय, लिंग, आ भौगोलिक एवं सांस्कृतिक परिवेश केर लोकक। एक बात आरो, जे पहनहि कहि चुकल छी - सभ ठाम गजेन्द्र जी अपन पत्नी संग विद्यमान छथि। विद्यमान होबाक अर्थ भेल जे अपन लेखन कर्म, मैथिली भाषा, भाषा केर अनेक स्वरुप, साहित्य, मैथिली संस्कृति आ ज्ञान परम्परा संग छथि। एक-एक परम्परा पर बको ध्यानं बला दृष्टि रखने छथि। ज्ञान परम्परा मे ज्ञानी बनल ठाढ़ छथि। अहि दम्पतिक उपस्थिति अगर गंभीरता सँ देखबैक तँ लागत जेना ई मिथिलाक ज्ञान परम्परा केर नव्य नैयायिक होथि; सर्वतंत्रस्वतंत्र आ सब पर ध्यान लगेने। सब विषय हिनक निर्देश सँ संचालित भऽ रहल अछि। कुनो विद्वेष, कुनो गुटवाजी, कुनो क्षेत्रवाद, कुनो जातिवाद अथवा संकीर्णता कतहुँ नहि भेटत। किताबक USP (Unique Selling Price) छैक एक समर्पित, अन्वेषी, प्रयोगशील आ प्रमाणिक संपादक केर Curation जाहि कार्य मे आशीष अनचिन्हार जी अपन दक्षता प्रमाणित कएलनि अछि। हमरा तँ ईहो लगैत अछि जे एहि अति महत्वपूर्ण काजक सम्पादन आशीष अनचिन्हार सँ बढ़ियाँ कियोक नहि कऽ सकैत छल। एक एक बिंदु के पढ़ब, विषय केर चयन, ओकर अनुक्रमाणिका केर निर्माण, लोकगीत सँ सब बिंदु लेल गीतक चयन, अलग अलग बिंदु पर लिखबाक लेल विद्वान केर चयन, हुनका सब संग तारतम्य स्थापित करब, लेख लेब, ओकरा सजेब, फेर माला जकां गुथब बहुत दुष्कर काज छैक जकर सर्वश्रेष्ठ संपादन ई केलनि अछि। एखन अतबे शुभम भूयात अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.आभा झा-भाषा आ संस्कृतिक वैश्विक प्रसार लेल दत्तचित्त ठाकुर परिवार आभा झा भाषा आ संस्कृतिक वैश्विक प्रसार लेल दत्तचित्त ठाकुर परिवार हिन्दीमे कतौ पढ़ल छल-

जीवन हमें भूलता नहीं तीन ही के प्यार से माता, मातामही औ मातृभाषा ज्ञान से।

एतय हम माताक बाद मातामही किऐक, पितामही किऐक नहि, एहि विवाद में नहि जा मातृभाषाक गौरवपूर्ण स्थान मात्रकेॅं रेखांकित करए जा रहल छी। एहि क्रममे भारतेन्दु हरिश्चन्द्रक- निज भाषा उन्नति अहै सभ उन्नति को मूल- सेहो मोन पाड़ैत चली आ प्रमुख रूपसॅं मोन पाड़ी मैथिलीक प्रकृत कवि सीताराम झाकेॅं,जे लिखने छथि-

" पढ़ि लिखि क' जे नहि बजै छथि निज भाषा मैथिली मन होइछ जे झिटुका रगड़ि, कान दूनू ऐंठि ली।"

कविवरकेॅं ई लिखबाक आवश्यकता किएक पड़ल हेतनि, तखने न जखन ओ देखने हेथिन तथाकथित पढ़ुआ लोकनिकेॅं हिन्दी- अंग्रेजी छॅंटैत, धिया-पुताकेॅं अपटुडेट बनयबाक क्रममे मातृभाषाक निरादर करैत, अपन जड़िकेॅं बिसरि फुनगी पर चढ़बाक लिलसा पोसैत! ई स्थिति तखनहि अबैत छै, जखन शिक्षा सतही होइ छै, अपन भाषा आ संस्कृतिक प्रति गौरव-बोधक स्थान पर हीनता ग्रन्थि मनमे जड़ि जमौने रहैत छैक। अपन मूल, अपन भाषा किंवा परंपराक प्रति हीनभावनाक ई स्थिति तखनहि छलैक, से नहि,आबो छैक। कारण की, वैश्विक दुनियांक योग्य अधिकारी बनबा लेल अंग्रेजीक सर्वोच्चताक मानसिक दासता, किछु-किछु विवशतो कहल जा सकैछ। मुदा जे डिग्री आ शिक्षामे,पद आ चरित्रमे,लाभ आ गौरवमे अंतर बुझैत अछि ओ रोजी- रोटी लेल आन विषय वा भाषाक आश्रय लैतो अपन माय आ मातृभाषाक प्रति कर्ममय निष्ठा रखैत अछि, यथाशक्ति ओकर संरक्षण- संवर्धन आ सम्मान लेल प्रयत्न करैत अछि।

प्रश्न उठि सकैछ -एतेक भूमिकाक प्रयोजन की? प्रयोजन मात्र एतबहि जे हम रेखांकित कए सकी गजेन्द्र ठाकुर जीक कर्तृत्वकेॅं जे बिनु हो हल्ला अपन भाषा लेल अभूतपूर्व योगदान देबामे दत्तचित्त छथि, सदेह उपस्थितिसॅं यथाशक्ति बचैत विदेह ई-पत्रिकाक सम्पादन करैत, समयोचित तार्किक लेखकीय आवदानसॅं उपकृत करैत, प्राचीन कालक उपयोगी सामग्रीक संरक्षण करैत, अपन भाषा आ लिपिकेॅं सामान्य आ दिव्यांग दुहूक लेल सुलभ बनबैत वस्तुत: -गजे जकाॅं अपन बाट पर निर्भय चलैत जा रहल छथि। हुनक आ हुनक अर्धाङ्गिनीक विषयमे जे किछु समय- समय पर विभिन्न लेखक द्वारा लिखल गेल आलेखक संचयन कए आशीष अनचिन्हारक सम्पादनमे एकटा वृहत् पोथी आयल जकर उद्देश्य अछि हुनक कर्तृत्वक विभिन्न पक्षकेॅं एकठाम आनि पाठकक सहूलियत।पोथीक नाम अछि -प्रीति कारण सेतु बान्हल।

सभसॅं पहिने नामेक गप! जानि नहि सम्पादक पोथीक नाम की सोचि रखलनि, मुदा हमरा बुझायल जे मातृभाषाक प्रेमक कारण जे भाषाक महार्णव पर कविता,कथा,लेख, सम्पादन, पञ्जी विषयक शोध,लिपिक प्रसार, लिप्यंतरण आदि अनेक मजगूत खाम्हक आधार पर जे मजगूत सेतु बनौलनि,हुनक जीवन वृत्तक विषयमे लोककेॅं ज्ञान होमय,ओहि सेतु पर चलि आगाॅंक बाट अन्वेषण कए सकय। अस्तु,एहि विषयमे प्रामाणिक गप तऽ सम्पादके कि लेखक स्वयं कहि सकै छथि।

आब पोथीक विषयमे संक्षिप्त विचार करब। जे कि ई विभिन्न वरेण्य लेखक गण द्वारा गजेन्द्र ठाकुर एवं हुनक सहगामिनी प्रीति ठाकुरक मैथिली साहित्य एवं मैथिल संस्कृति लेल देल गेल अवदान विषयक लेखक संग्रह अछि, तैं स्वभावत: एहिमे प्रशंसात्मक तथ्यक प्रधानता अछि। गोटेक लेखमे एकाध ठाम प्रश्न अवश्य अछि, मुदा ओ तरकारीमे नून बरोबरि। सत्ताइस टा लेख गजेन्द्र ठाकुरक व्यक्तित्व आ कृतित्वक ऊपर अछि, जाहिमे विदेह डिजिटल पुस्तकालयक विशिष्टता, इंटरनेट मैन रूपमे गजेन्द्र ठाकुरक स्मरण, पञ्जी प्रबंधन संरक्षणमे हिनक भूमिका,पत्रिका, कोश आ साहित्यिक कृतिक मूल्यांकन आदि विषयक सविस्तर उल्लेख अछि। दू टा साक्षात्कार सेहो अछि, गप-शपमे मुन्नाजीक प्रश्नावलीक उत्तर फैलसॅं देने छथि लेखक, मुदा ईमेलक माध्यमसॅं आशीष अनचिन्हारक साक्षात्कारमे प्रश्नक आकार पैघ आ उत्तर अत्यंत संक्षिप्त संतुलित। ई गप सही अछि जे वस्तुत: काज करबाक इच्छा रखै बला लोक आलोचना प्रत्यालोचनासॅं दूर एकनिष्ठ काज करैत रहैत अछि, आत्मप्रशंसाक खगता ओकरे पड़ै छै जकरा स्वयं पर विश्वास नहि रहैत छैक। लेख सभक विषयमे विस्तृत विवेचन कए हम पाठकक उत्सुकता कम करबाक मंशा नहि रखैत छी। पाठक स्वयं पढ़थि, आन-आन लेखक लोकनिक गजेन्द्र ठाकुरक विषयमे मंतव्य जानथि, विदेह पुस्तकालयमे टहलथि- बूलथि आ अपन मत बनबथि।

हॅं, पोथीक दोसर खण्डमे जतय प्रीति ठाकुरक रचना संसार पर आधृत लेख सभ अछि, अवश्य कनेक बूलय-टहलय चाहब। ई अत्यंत हर्षक गप जे मैथिली चित्रकथाक रूपमे हिनक योगदान, जे एहि क्षेत्रमे प्रथम मानल जाइछ, अत्यधिक लोकप्रिय आ तैं प्रशंसित अछि। एकटा स्त्रीकेॅं नीक जकाॅं बूझल रहैत छैक जे धिया पुताकेॅं कोन चीज बेशी आकर्षित करतै। ताहू पर ओ स्त्री जॅं संवेदनशील हो, साहित्यिक रुचि- प्रवृत्ति रखैत हो आ चित्रकलाक शौकीन हो तखन तऽ बालोपयोगी सामग्री निस्संदेह एबे टा करतै। बाल मनोविज्ञानकेॅं ध्यान रखैत प्रीति जी चित्रकथाक रूपमे प्राचीन जनश्रुति आ लोककथासॅं सेहो परिचित करबैत छथि आ अनुवादक क्रममे सेहो बाल-साहित्येकेॅं प्रमुखता दैत छथि। हिनक रचना- संसार पर आठ गोट महत्त्वपूर्ण लेख पोथीमे समाहित अछि। सत्य कही तऽ हुनक रचनादिक विशेषता बुझबा लेल ई लेख सभ पर्याप्त अछि। जे किछु अनदेखार रहि जाइछ ओ आशीष अनचिन्हारक लेख - मैथिली चित्रकथाक प्रारंभिक इतिहास आ हुनकहि द्वारा लेल प्रीति जीक साक्षात्कारसॅं देखार भए जाइत अछि। हॅं, अहू साक्षात्कारमे प्रश्नकर्ता बेकछा कऽ प्रश्न पुछैत छथि आ प्रीति जी नापि-तौलि कऽ उत्तर दैत छथि। चित्रकार प्रीतिजी अपन शब्दसॅं बेशी तूलिकासॅं भाव व्यञ्जित करैत छथि आ अपन विशिष्ट स्थान बनबैत छथि।

ओना हम उनटा क्रमसॅं चलि रहल छी, तथापि पहिल खण्डकेॅं छाड़ि कथ्य समाप्त करब अनुचित होयत।ओ अछि सियाराम झा सरस केर लेख-करोट फेरैत गामक निदर्शक कृपानन्द ठाकुर। सत्य पूछी तऽ ओहि लेखमे तात्कालिक पृष्ठभूमिक संग कृपानन्द ठाकुर जीक चारित्रिक दृढ़ताक जे वर्णन अछि ओ संकेतक अछि गजेन्द्र ठाकुरक व्यक्तित्वक आधारक। बाढ़हि पूत पिता केर धर्मे- ई कहबी लेखक अनुसार सार्थक भेल अछि हिनक परिवारमे।

आ अन्तमे जॅं आशीष अनचिन्हारक सम्पादनक गुरुतर दायित्वक जॅं चर्च नहि हो तऽ काज अपूर्णे रहि जायत। अपन दू दू टा विस्तृत लेख, साक्षात्कार, चित्र संग्रह आ संयोजनक संग आन आन रचनाकारसॅं लेख लय ओकरा छपबाक सभटा काज नीक जकाॅं निमाहैत ओ साधुवादक अधिकारी छथि। कोरोनाकलमे बेशी काज आनलाइन करबाक कारण आँखि लंबा आनलाइन पाठ्य सामग्री पढ़बाक अनुमति नहि दैत अछि, तैं पोथी रूपमे सामग्री पाबि हम व्यक्तिगत रूपसॅं लाभान्वित भेलहुॅं आ हमरा सन अनेक लोक लेल ई लाभकारी सिद्ध भेल होयत। गतगर पोथी, स्पष्ट छपाइ,पैघ सुपाठ्य फोन्ट आ गंभीर लेख सभसॅं संयुक्त ई पोथी पठनीय आ मननीय अछि।लेखक लोकनिक अभिनंदन, गजेन्द्र ठाकुर जीक हुनक साइलेंट काज लेल वर्धापन आ संपादक मंडलक प्रति धन्यवाद। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.प्रणव कुमार झा- पोथी चर्चा : "प्रीति कारण सेतु बान्हल": सम्पादक - श्री आशीष अनचिन्हार प्रणव कुमार झा पोथी चर्चा : "प्रीति कारण सेतु बान्हल": सम्पादक - श्री आशीष अनचिन्हार "प्रीति कारण सेतु बान्हल" पोथी श्री आशीष अनचिन्हार केर संपादन मे प्रकाशित पोथी छैक जै मे वर्तमान मैथिली साहित्य जगत के दीप्तिमान स्तम्भ दंपत्ति श्री गजेन्द्र ठाकुर आ श्रीमती प्रीति ठाकुर केर मैथिली साहित्य जगतक लेल कैल गेल योगदान आ पुरातन मैथिली विवाह आ पंजी पद्धति के संरक्षण एवं संवर्धन लेल कैल गेल प्रयास आ योगदान पर प्रकाश देल गेल अछि। कुल 478 पृष्ठ के एहि पुस्तक मे 32 टा सहयोगी लेखक सबहक आलेख, संस्मरण, साक्षात्कार, आलोचना आदि छैक जे संप्रति साहित्य, इतिहास, पत्रकारिता एवं अन्य विधा सँ जुड़ल छथि। जेना छोट-पैघ बहुते रास नदी सभ मिलि कय समुद्रक निर्माण केने हो। ऐ मे सँ कै टा त संप्रति मैथिली साहित्य जगत के जानल-मानल हस्ताक्षर छथि। पोथी केर विषय-वस्तु के मोट मोट तीन वर्ग मे हम वर्गीकृत करय चाहब : - i) श्री गजेन्द्र आ श्रीमती प्रीति ठाकुर केर पारिवारिक जीवन के गाथा आ ओहि सभ सँ जुड़ल संस्मरण आदि। ii) ऐ साहित्यकार द्वय द्वारा मैथिली साहित्य एवं मैथिल संस्कृति के द्योतक कागजात सबहक अनुवाद आ डिजिटइजेशनक अति महत्वपूर्ण काज मे योगदान आ ओकर यात्रा केर गाथा आ iii) साहित्यकार द्वय द्वारा कैल गेल काज सबहक विषय जेना पंजी प्रणाली आदि संबन्धित विषय सब पर आलेख आ चर्चा।

ऐ पुस्तक के विभिन्न खंड एवं विषय सूची के शीर्षक केर रूप मे विभिन्न पारंपरिक लोकगीत सबहक पंक्ति देल गेल अछि जेना "आजु जनकपुर मंगल भुप सभ आओल हे.."। संप्रति हिंदी कथा लेखन विधा मे सत्य व्यासक लेखन मे सेहो एहन प्रयोग भेटैत छैक। ऐ तरहक प्रयोग पाठक मे विषय-वस्तु आ पोथी के लऽ कऽ जिज्ञासा बढ़ाबै छैक। अलग-अलग सहयोगी लेखक द्वारा अपन-अपन शैली में उपरोक्त तीन टा मे से कोनो एक वा एक से बेसी वर्ग मे आलेख लिखल गेल अछि जे साहित्यकार द्वय के सम्पूर्ण व्यक्तिगत आ साहित्यक जीवन के विभिन्न पहलू के समावेशित करैत अछि। लेख पढ़ै काल पाठक के रूप मे कतेक रास नव-पुरान संदर्भ सभ मस्तिष्क के सोझा उपस्थित भऽ जाइत छैक। संगहि मैथिल ब्राह्मण पंजी प्रथा जेहन विषय के प्रति जिज्ञासा आ कम सँ कम ऐ विषय पर सामान्य पाठक लेल सतही ज्ञान के संचार सेहो। आशीष अनचिनहार आ मुन्ना जी आदि द्वारा साहित्यकार द्वय के साक्षात्कार हुनक मनोवृति आ हुनक काज मे व्यक्तिगत रुचि आदि मे जानबाक अवसर दैत छैक। किछु लेखक अपन संस्मरण द्वारा श्री गजेन्द्र ठाकुरक पारिवारिक जीवन के सेहो नीक चित्र झिकने छथि आ पाठक के ओहि संबंध मे रोचक जानकारी प्राप्त करेबा मे सक्षम बनाबै छथि।

आन-आन आलेख, संस्मरण आ साक्षात्कारक अतिरिक्त श्री जगदीश चंद्र ठाकुर ’अनिल’ आ डॉ० कैलाश कुमार मिश्र द्वारा मिथिला पंजी प्रबंध पर लिखल आलेख पाठक केर रूप मे हमरा लेल व्यक्तिगत रूप सँ खूब रुचिगर आ उपयोगी लागल। सुश्री कल्पना झाक आलेख सेहो मोन के छूलक आ गुदगुदेलक। एकठाम ओ कहै छथि जे एकटा उमरि भेला पर किताब कीनैत डर होइत छनि जे नव पीढ़ी कहाँ कहियो ओहि पोथी के उलटेतै पलटेतै। उल्टे दुनियाँ सँ बिदा भेला पर भऽ सकैत अछि जे हुनका उपराग दैन जे ई की जमा कऽ कऽ धऽ गेलीह अछि। मुदा हमर ऐ विषय मे सोचनाइ अलग अछि आ जे कि हमर अपन अनुभवक आधार पर अछि। हमर बाबा जे कि संस्कृतक विद्वान छलाह आ एकटा ठाकुरबारी मे पुरोहित। हम जखन नेने छलहु 9-10 वर्ष के तखने स्वर्गवासी भऽ गेल छलाह। हमरा मोन अछि हुनक पेटार मे बोराक बोरा भरि भरि कऽ आध्यात्म आ धर्म-संस्कृत केर पोथी सभ छलनि। सभ किताब के हमर कक्का कबाड़ी मे बेच देलखिन मुदा किछु कल्याण विशेषांक, गीता आ पुराण हम छाँटि नेने रही (ओहि समय मे पुस्तक मे देल गेल फोटो सबहक लोभे)। बाद मे नहु-नहु ओहि पोथी सभ के पढ़ैत गेलहुँ तँ ओहि सब मे हमरा रुचि आबय लागल। ओहि समय मे हमर विचार-व्यवहार आ धर्म-कर्म मे हमर रुचि के आकार देबय मे ओहि पुस्तक सबहक हम महत्वपूर्ण योगदान देखै छी। पितिया लगा के हम 7 भाई बहिन मे हमरे टा ओहि पोथी सभ पर मोन गेल छल। अर्थात प्रोबेबलिटी त ओत्तौ 1/7 छलै। ताहि लेल हमर ई विचार अछि जे जखन हम कथा या कथेतर के रूप मे किछु विचार-संस्कार अथवा किछु सूचना पोथीक आकार मे संरक्षित करय छी, त कम्मे प्रोबेबलिटी सही मुदा किछु ने किछु चांस रहय छै जे अगिला पीढ़ी तक ओ विचार-संस्कार आ सूचना पहुँचै। ई पोथी सेहो एकटा कथेतर साहित्य छैक जै मे विषय पर किछु रोचक लेख तँ छैक तथापि विषयक गूढ़ता के कारण सब प्रकार के पाठक लेल मनोरंजक होइ ई आवश्यक नहि। मुदा पुस्तक मे देल सूचना मैथिली साहित्य जगत एवं मैथिल संस्कृति दुनु के लेल संरक्षणीय छैक। ताहि लेल ऐ प्रकार के पोथी के संकल्पना संयोजन एवं सम्पादन लेल श्री आशीष अनचिन्हार जी बधाई, प्रशंसा आ साधुवाद के पात्र छथि। मिथिला आ मैथिली से संबंधित संस्था, कॉलेज आदिक पुस्तकालय मे ऐ तरहक पुस्तकक संग्रह हेबाके चाही।

भौतिक रूप सँ सेहो पोथी नीक बनल अछि। पोथी केर कवर पेज, एकर कागत केर क्वालिटी, फॉण्ट, फॉण्ट साइज़, मुख्य आवरण आ पृष्ठ पेज केर रंग संयोजन, डिज़ाइन, फॉरमेट आदि नीक गुणवत्ता के बनल अछि जे पाठक के हाथ मे लऽ कऽ पढ़ऽ मे एकटा सुखदगर अनुभव कराबैत छैक। पोथी डॉट कॉम के एकरा लेल सराहना कैल जा सकय अछि। पुनः ऐ पोथी लेल श्री आशीष अनचिन्हार जी, श्री गजेन्द्र ठाकुर जी आ श्रीमती प्रीति ठाकुर जी के खूब रास बधाइ।

ई आलेख विदेहक अंक 392, 15 अप्रैल 2024 केँ प्रकाशित भेल छल मुदा वर्तमान अंकक संग सेहो देल जा रहल अछि। जाहिसँ पाठक लग एकै संग चारि टा पाठककीय एक पोथीपर पढ़बाक लेल भेटतनि (संपादक)। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.८.परमानन्द लाल कर्ण- भादव मासक एकादशीक माहात्म्य अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.९.प्रणव कुमार झा- द मिस्टेक प्रणव कुमार झा द मिस्टेक

हॉस्टल के अपन डेरा में बैसल, रजनी यूट्यूब पर एकटा सजेशन वीडियो देख रहल छलिह। वीडियो मे हुनके गामक दृश्य दृष्टिगोचर भेल। गाम मे उत्सव के माहौल सन देखना जा रहल छल। दू दिन पहिने यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के अंतिम परिणाम आयल छल जै मे रजनी के चयन भारतीय प्रशासनिक सेवा अर्थात आईएएस के लेल भेल छल। आठ बरष भ गेल छल रजनी के घर-परिवार आ गाम से कोनो संपर्क नै छल। कियौ कोनो खोज ख़बर लेनहार नै जे रजनी जीवितो छैक की मुइल गेल। मुदा यूपीएससी मे हुनकर चयन के समाचार द्रुत गति से सौंसे पसरि गेल छल। यूपीएससी मे चयनित उम्मीदवार के पूरा जन्मकुंडली मीडिया आ सोशल मीडिया द्वारा खंघालि लेल जाइत छैक। रजनी के अपन गाम से टूटल तार सेहो ऐ परिणाम के बाद मीडिया आ सोशल मीडिया द्वारा जोड़ि देल गेल छल।  पूरा गाम आ ओकर परिवार खुशीयाली मना रहल अछि, साक्षात्कार दैत अछि, यूट्यूब, टीवी पर बाइट द रहल अछि। सभ कियौ खोजि खोजि के ओकरा से अपन संबंध निकालि रहल अछि। चाहक चुस्की लैत ई वीडियो देख रजनीक आँखिक कोना सँ कोरह फाटि जय अछि। एक बूंद नोर हुनक चेहरा से टघरईत चाहक प्याली मे खसि पड़ल छल। ई खुशी आ संघर्षक नोर अछि। हुनका याद अबैत अछि अपन अतीतक ओ पल, जखन हुनक जिनगी मे घुप्प अनहार भ गेल छल।जिनगी मानु जेना समाप्ते भ गेल छल। यैह सर समाज जे आई हुनक सफलता पर नाचि रहल अछि ओय समय मे रजनी के चिन्हऽ से, अपनाबऽ से मना क देने छल। मिथिला के एकटा सुदूर गाम मे रजनी अपन परिवार संगे रहय छलिह। माँ-बाबू, भाई-बहिन, पित्ती-पितियाइन सर-समाज, सभ छल रजनी के जीवन मे। बाबू गामे मे रहि खेती-किसानी करय छलाह। तरकारी के खेती करय छलाह आ बथान पर माल सेहो पोसने छलाह। गाम मे एकटा छोटसन पक्का के  घर। ओहि राति रजनी अपन कापी आ किताबक संग ओछाओन पर बैसल छलिह । ओ पढाई में बहुत होशगर छलिह । हुनक परिवार सेहो ओकरा सँ बड आशा रखैत छल। ओकर पिता कहैत रहइथ, "हम सब त अहिना रहि गेलहु मुदा हमर सपना अछि जे तोरा सभ के एक दिन बड़का अफसर बनैत देखी।" मुदा किशोरावस्थाक उमंग में अक्सर होशगर बच्चा सभ सेहो लीक से उतरि जाय अछि आ कोनो गलती क दय अछि। वैह गलती कखनों काल मिस्टेक के रूप मे देखल जाय अछि आ कखनों वैह ब्लंडर कहल जाय अछि। ई संजोग परिस्थिति आ लोकक नजरिया पर निर्भर करय अछि। लड़कपन के उमइर मे रजनी सेहो एकटा लड़का सँ प्रभावित भऽ गेल छल। लड़कपन के आकर्षण के प्रेम बुझबा के गलती क नेने छल। आई रजनी किताब कॉपी ल क बैसल त छलिह मुदा आई हुनक ध्यान पढ़ाई मे नै लागि रहल छल। जेना हुनक शांत मन के सरोवर मे कियौ बेरमबेर ढेपा फेंक के जलतरंग उत्पन्न क रहल छल। किछू दिन से ओ छौड़ा रजनी के अपन प्रेम पाश मे जकड़ने जा रहल छल। रजनी के बेरम बेर आई दुपहर मे ईस्कूल के टिफिन बेरिया मे भेल गप्प सभ मोन पड़ी रहल छल आ हुनक मोन बेरम बेर कोनो निर्णय तक पहुँच जाय चाहय छल। हाई ईस्कूल मे टिफिन के समय छल। गाछक छाँह में ओ छौड़ा रजनी संग  बैसल अछि। रजनी अपन किताब मे नजैर गाड़ने छलिह  आ ओ छौड़ा ओकरा संग बैसल बतिया रहल छल। ओ छौड़ा, रजनी पर धीरे-धीरे प्रभाव जमा रहल छल आ अपन जाल फेंक रहल छल। ओ छौड़ा: (मुस्कुराइत) "रजनी, अहाँ हमर बात बुझैत छी न? अहाँ संग हमर जीवन सगर राति जकाँ सुंदर होयत।" रजनी: (लजा कऽ) "हमरा ई सब बातक नहि बुझल अछि। हमर परिवार समाज हमरा ई सब गप्प के पर्मिशन नहि दैत अछि।" ओ छौड़ा: (स्नेहपूर्वक) "रजनी, हमरा लेल सब सँ पैघ अहाँकेँ प्रेम अछि। अहाँक परिवार आ समाज कतबो कठोर हो, मुदा हमरा संग भागि जाउऽ, तखन हम दुनू मिलकऽ सब सँ दूर जाकऽ रहि  सकैत छी।" रजनी: (संकोच करैत) "मुदा, हमरा बाबूजी आ मायजी के छोड़ि क    ऽ...?" ओ छौड़ा: (आश्वस्त करैत) "रजनी, अहाँक बाबूजी आ मायजी सदिखन अहाँक खुशी चाहैत छैथ। अहाँ हमरा संग रही, तऽ हमरा दुनू केँ खुशी भेटत। अहाँ हमरा पर विश्वास करू। हम दुनू संग-संग रहब, अपन सपनाक दुनिया बना सकब।" रजनी: (उत्सुकता सँ) "हमरा एतेक साहस कहाँ सँ आयत? हमरा डर लागि रहल अछि।" ओ छौड़ा: (अकिझा करैत) "डर की? हम अहाँक संग छी। अहाँ हमरा पर विश्वास राखू। हम अहाँक सबटा सपना पूरा करब। अहाँकेँ कखनो दुख नहि होयत।" रजनी: (धीरे-धीरे प्रभावित होइत) "तऽ हम अहाँक संग कत जायब?" ओ छौड़ा: (खुश होइत) "हमरा संग दिल्ली चलू। ओतय हमर ममियौत भाय छथि। हुनक बिजनेस छईक। ओ हमर  मदैत करता। हम दुनू संग-संग रहब, आ खुशी सँ जीब सकब।" रजनी: (सोचैत) "मुदा, हमर परिवार...?" ओ छौड़ा: "रजनी, सोचू कि अहाँक खुशी में अहाँक परिवार सेहो खुशी पाओत। अहाँ हमरा पर विश्वास करू। हमरा संग चलू, हम दुनू अपन जीवन खुशी सँ बिताएब।" रजनी: (धीरे-धीरे सहमत होइत) "ठीक अछि, हम अहाँक संग चलऽ लेल तैयार छी।" रजनी ओ छौड़ा के चालाकी सँ प्रभावित भऽ कऽ ओकरा संग भागऽ लेल तैयार भऽ जाइत अछि। एतय सँ ओकर जीवनक नाटकीय मोड़ शुरू होइत अछि। अगिला दिन सौंसे गाम मे हर्बीर्रों उठय अछि जे फलनमा के बेटी कोनो विधर्मी संगे भागी गेल। परिवार मे कन्ना-रोहट पसरल अछि। समाज मे किछू गोटे एकरा राजनैतिक एंगिल द रहल छल त किछू गोटे मामिला के चटकार लऽ लऽ के नाइरेट क रहल छल। जतेक मुँह ततेक बात। किछु सहृदय लोक परिवार के सेहो समहारि रहल छलाह। हारि दारि क परिवार के लोक थाना मे एफ़आईआर कऽ के बैस गेल छलाह। एमहर रजनी के जीवन जल्दीए नारकीय होमय बला छल। रेल मे बैसल रजनी भविष्य केर सुनहला सपना देख रहल छलिह से जल्दीए एकटा भयावह त्रासदी मे परिवर्तित भ गेल छल। स्टेशन पर उतरला के बाद ओ छौड़ा रजनी केँ एकटा कच्ची कालोनी के तंग गली से होइत एकटा कोठरी में ल क पहुंचइत अछि।  ओहिठाम सिगरेट आ दारू के नशा मे मत्त  एकटा दलाल पहले सँ ठाढ़ छल। रजनी आश्चर्य आ भय सँ चारू कात तकैत अछि। वास्तव मे ओ छौड़ा एकटा मानव तस्कर ग्रुप के संगे काज क रहल छल। रजनी: ई अहाँ हमरा कत्त ल क आबि गेलहु? ई जगह हमरा ठीक नै बुझना जाय अछि। ओ छौड़ा: (अग्निशिखा समान आँखि सँ) "अब तोरा बुझा पड़त, असल में हम प्रेम ध्रेम  किछू नहीं बुझय छी, हमरा पैसा सँ मतलब अछि।" रजनी: (आँखि भरल, काँपैत) "तु हमरा धोखा देलें! हमरा घर छोड़ि अएला सँ पहिने तु एहि सब किएक नहि कहलें?" ओ छौड़ा (निर्दयी हँसी संग) " ह ह ह ह .... चुप रह! हमरा पैसाक प्रेम अछि। तोरा जकाँ भोला-भाला लोकक इस्तेमाल कऽ कऽ हमरा पैसा मिलैत अछि।" रजनी: (नोरे झोरे होइत) "हमरा किएक? हम तऽ तोरा सच्चा प्रेम करैत छलहुँ।" ओ छौड़ा: (गंभीर स्वर में) "प्रेम? ईह!  हमरा लेल प्रेम एकटा खेल अछि, जे हम अपन फायदाक लेल खेलैत छी।" रजनी: (हथ जोड़ैत) "प्लीज, हमरा छोड़ि देऽ। हम घर वापस जेबाक चाहैत छी। हम तोरा कखनो किछ नहि कहब।" ओ छौड़ा: (निर्दयतासँ) "चुप! एकरा अपन किस्मत मान आ एहि कोठरी में रहऽ। अब तऽ सब खेल खतम भऽ गेल छौ।" ओ छौड़ा, रजनी केँ दलालक हाथ सौंपि दैत अछि आ बाहर निकलि जाइत अछि। रजनी केँ कोठरी में बंद कऽ देल जाइत अछि। ओ ज़ोर ज़ोर से चिचिया रहल छलिह, मुदा कियौ सुननिहार नहि। रजनी: (कोठरी केँ देवाल पर माथ ठोकैत) "बचाउ! कियौ हमरा बचाउ! हमरा एतऽ सँ निकलऽ दियऽ।" कोठरी में गूँजैत आवाज आ रजनीक कन्नारोहट के  स्वर, मानु कोठरी केँ दरद सँ भरि देने होय। कोठरीक बाहर दलाल कऽ ठहाका आ ओ छौड़ा कऽ निर्दयी हँसी अबै छल। रजनी निराश भऽ कऽ कोठरी में बैस के महादेव के गोहार कर लागल छलिह। रजनी: "हे महादेव! हमरा एतऽ सँ निकालहऽ। हमर अपराध क्षमा करह। ओकर आवाज कोठरी कें अँधार में विलीन भऽ गेल छल, मुदा रजनीक आशा खत्म नहि भेल छल। रजनी के कै दिन ओहि काल कोठरी मे बितल से नहि जानि। साइत ओकरा तस्करी के माध्यम से कोनो दोसर देश ल जेबाक योजना बानि रहल छल। ऐ बीच मे ओकरा हर तरहक प्रतारणा देल जा रहल छल। साइत अपन भाग्य से समझौता क के परिस्थिति के स्वीकार करबाक लेल तैयार कैल जा रहल छल। मुदा एहि बीच मे महदेव चमत्कार केलखिन। एकटा एनजीओ आ दिल्ली पुलिस के ज्व्बाइंट ऑपरेशन से ओय बिल्डिंग पर छापा पड़ल। मानव तस्कर सभ के धर-पकड़ भेल। रजनी सहित कै एक टा किशोरी सभ के ओत्त से रेसक्यू कैल गेल छल। सत्त मोन से कैल गुहार के महादेव अवश्ये सुनय छथीन। रजनी मोने मोन महादेव के कोटि कोटि आभार प्रकट क रहल छलिह। रजनी अँधार कोठरी सँ बाहर निकलबाक बाद, एनजीओक कार्यालय में बैसल छलिह। हुनक चेहरा पर राहत आ चिंता दुनू देखाइत द रहल छल। एनजीओक अधिकारी आ पुलिसक अधिकारी ओकरा सँ बात कऽ रहल छल। एनजीओक अधिकारी: (सहानुभूतिपूर्ण स्वर में) "रजनी, अहाँ आब सुरक्षित छी। हम अहाँ केँ सुरक्षाक साथे अहाँक गाम लऽ जाएब, अहाँक परिवार सँ मिलायब।" रजनी: (नोर सँ भरल आँखि सँ) "आभार! हम घर जाय लेल लालायित छी। हम अपन परिवार सँ भेंट करऽ चाहैत छी।" पुलिसक अधिकारी: (सहजता सँ) "रजनी, अहाँक हिम्मतक प्रसंशा करैत छी। अहाँ जे दुख सहलहुँ, तकरा लेल न्याय भेंटत। अपराधी सभ के जहल हेतैक। आब अहाँ के कियौ परेशान नै करत से निश्चिंत रहू।" रजनी: (डराइत) "मुदा, हमर परिवार आ समाज हमरा स्वीकार करत?" एनजीओक अधिकारी: (दृढ़ता सँ) " किएक नै? अहाँक परिवार आ समाज अहाँ केँ अपन जीवन मे नव शुरुआत करऽकेँ मौका देत। ई समय अहाँक अछि, रजनी। अहाँ केँ भगवान दोबारा मौका देलक अछि। " रजनी: (दृढ़ता सँ) "हम हार नहि मानब। हम अपन सपना पूरा करब आ समाज केँ देखायब जे एकटा गलती जीवन केँ समाप्त नहि करैत अछि।" रजनीक चेहरा पर नवा उम्मीदक झलकि रहल छल । एनजीओ आ पुलिसक सहयोग सँ, ओ अपन भविष्यक नव पन्ना लिखबाक लेल तैयार छलिह। बिहार पुलिस के सहयोग से एनजीओ आ दिल्ली पुलिस रजनी के हुनक गाम वापस ल क पहुंचल छल। रजनी, एनजीओक अधिकारीक संग गामक चौक पर पहुंचल छलिह। गामक लोगक बीच खुसुर-फुसुर भ रहल छल , आ सब कियो ओकरा देख रहल छल।  रजनीक आँखि में नोर आ पश्चाताप देखल जा सकय छल । रजनी के रेसक्यू के खबर टेलीविज़न आ अखबार के माध्यम से गाम मे पहिनेहे पहुँच गेल छल। गाम मे रंग-रंगक पिहानी आ बात बनाओल जा रहल छल। -विधर्मी संग भागि गेल छौंडी, आवारा अछि....... पता नै कतेक संगे की की कुकर्म केने हैत.... छौंडी कुलकलंकिनी निकलल...... ओकर धर्म आ शरीर सब दूरि भ गेल छैक...... समाज मे एहन एहन के आश्रय देने समाज भ्रष्ट भ जायत....हे नै छोट उमरि छल गलती भ गेले एकटा अवसर सुधरऽ के देबाक चाहिए ... आदि....आदि। अस्तु रजनी के आबय से पहिनेहे गाम मे पंचायत बैसल छल, जै मे ई निर्णय सुना देल गेल छल से रजनी के परिवार ओकरा से सभटा नाता तोड़ि देत। गाम मे ओकरा कोनो आश्रय नै देल जेतय अन्यथा रामसिनेही (रजनी के पिता) के परिवार सहित गाम छोड़ऽ पड़त। रजनी के माय बहुत गिड़गिड़यल छलिह मुदा पंचक निर्णय पर ओकर कोनो प्रभाव नै पड़ल छल। राम सिनेही: (दुखी आ विवश स्वर में) "हमरा माफ कऽ दे, रजनी। समाजक दबाव में हमरा ई निर्णय लेबऽ पड़ल।" रजनी: (नोर सँ भरल, दर्दनाक स्वर में) "बाबूजी, अहाँ सभ हमरा एतेक आसानी सँ किएक त्यागि रहल छी? हम अहाँक बेटी छी, हमरा सँ गलती भेल, मुदा हम सीखि लेलहुँ।" राम सिनेही: (कांपैत आवाज में) "हमरा समाजक निर्णय मानऽ पड़त। हम अहाँक पिता छी, मुदा समाजक दबाव भारी अछि, सर-समाज के छोड़ि जीवन नै चलि सकय अछि।" रजनी: (विलाप करैत) "बाबूजी, अहाँ सभ हमरा एकटा अवसर दऽ दिय। हम अहाँ सभक भरोसा टूटऽ नहि देब।" राम सिनेही: (नोर भरल आँखि सँ) "रजनी, हमरा पाछु छोड़ि कऽ चल जा। भगवान तोरा साथ रहथि।" रजनी: (दृढ़ता आ संवेदनशीलता सँ) "ठीक छै, बाबूजी। हम बुझय छी समाजक दवाब। जखन समाजक दवाब मे राम जी के सीता माता के त्याग करऽ पड़ल छल त अहाँ त साधारण मनुखे छी। हम प्रतिज्ञा करैत छी जे अहाँ सभ एक दिन हमरा पर अवश्य गर्व करब ।" रजनी के माय के कनयत कनयत दाँती लागि गेल छल। मुदा कठोर समाज के हृदय नै पसीझल। अंततः रजनी एनजीओ अधिकारी आ पुलिस के संगे वापस घूरि गेल छल। एनजीओक अधिकारी: (दृढ़ता सँ) "रजनी, अहाँक संघर्ष आ साहस प्रशंसनीय अछि। अगर समाज अहाँ केँ नहि अपनाबऽ चाहैत अछि, कोनो बात नहि। हमरा सभ के संस्थान अहाँ सन बच्चा सभ के लेल आन व्यवस्था केने छैक।" रजनीक आँखि में नोर, मुदा चेहरा पर दृढ़ता आ आशा केँ झलक छल। ओ अपन पिताक पैर छू कऽ विदा लैत अछि। एनजीओक अधिकारीक संग चलैत-चलैत ओ नव जीवनक तरफ बढ़ैत अछि। गामक लोगक बीच सन्नाटा, मुदा रजनीक साहस आ दृढ़ता ओकर भविष्य केँ नव दिशा देबाक के प्रयोग मे छल। एनजीओक अधिकारी ओकरा दिल्ली के एकटा अनाथालय में दाखिला दिया देने छल। रजनी ओय अनाथालय मे रहि अपन अतीतक गलती पर पछताइत छलिह, मुदा ओ जीवन के नव दिशा देबय के प्रयास क रहल छलिह। रजनी ओय अनाथालय के सीमा मे रहि दिन बिताबऽ लागल छलिह। एकटा सरकारी विद्यालय मे हुनकर नाम इंटर मे लिखा देल गेल छल। ईस्कूल, पढ़ाई आ अनाथालय के काज, बस एतबे तक रजनी के जीवन सीमित भऽ के रहि गेल छल। एहिना दू वर्ष बीत गेल छल। 12वी के परिणाम आयल त दू वर्ष मे पहिल बेर रजनी के चेहरा पर मुस्कान नेने आयल छल। मानविकी स्ट्रीम मे रजनी अपन जोन मे टॉप केने छलिह। परिणाम देख के रजनी के चेहरा पर मुस्कान संगे आंखि मे नोर सेहो आबि गेल छल जे टघरि कऽ ओकर गाल पर पहुँच गेल छल। ओकर अनाथालय के हॉस्टल मे खुशी मनाओल गेल। सभटा बच्चा आ भोलांटियर सब हुनका बधाई देने छल। रजनी के स्कूल मे सेहो सम्मान कार्यक्रम आयोजित भेल छल जै मे शिक्षा मंत्री रजनी के हुनक उपलब्धि पर सम्मानित करबा के लेल आयल छलाह। रजनी के लेल ई गर्व के क्षण छल मुदा ओकरा साझा करबाक लेल ओकर परिवार रजनी संग नै छल। रजनी आई अपन माय बाबू आ भाई बहिन के मिस क रहल छलिह। शिक्षा मंत्री : "रजनी, अहाँक संघर्ष आ समर्पण प्रेरणादायक अछि। अहाँक सफलता हमरा सबहक लेल गर्वक विषय अछि। ई लड़की सभ मे एकटा नव सशक्ति आ प्रेरणा के संचार करत ई हमर विश्वास अछि। जीवन मे अहाँ खूब सफल बनी आ देश के विकास के लेल काज करी ई हमर सभक शुभकामना अछि।" एत्त से आब रजनी के संघर्ष एकटा नव मोड ल लेने छल। रजनी दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रवेश लऽ लैत अछि आ यूपीएससीक तैयारी शुरू करैत अछि। ओ आब अपन पैर पर ठाढ़ भऽ गेल छलिह। दिल्ली विश्वविद्यालय के हॉस्टल मे रहि फ्रीलान्स वर्क करैत ओ अपन पढ़ाई जारी राखय अछि, ओ संघर्ष करैत अछि, मुदा हार नहि मानैत अछि। ऐ बीचे ओकर बीए, एमए पूरा भ जाय छैक मुदा यूपीएससी के लेल संघर्ष अनवरत जारी छैक। अंततः महादेव के कृपा से ओहो दिन आबय छैक जखन रजनी के चयन यूपीएससी के सिविल सेवा परीक्षा मे भऽ जाय छैक। रजनी अपन हॉस्टल में बैसल अछि आ यूपीएससी परिणाम देखैत अछि। ओ सफल भऽ जाइत अछि। आय यूट्यूब पर गामक वीडियो देखैत रजनी के मोन बहुत सर्द छैक। टीवी रिपोर्टर: "रजनी, गामक बेटी, आइ IAऽ बनि गेल छथि। पूरा गाम खुशीयाली मना रहल अछि।" रजनीक माता-पिता: "हमर रजनी, हमर गर्व अछि। ओकरा संग हमसब जे केलहुँ, ओकरा लेल हम शर्मिंदा छी आ माफी माँगैत छी। मुदा हमर बेटी हमरा लग जे प्रतिजज्ञा केने छलिह से आई पूरा केलिह अछि" रजनी अपन खिड़की सँ बाहर देखैत अछि। ओकर चेहरा पर संतोष आ गर्वक मुस्कान अछि। रजनी(मोने मोन): "हम एकटा पैघ गलती कएने छलहुँ, मुदा भगवान हमरा बचा लेलनि। समाज हमर गलती केँ एकटा अपराध जकाँ देखलक, मुदा हम अपन गलती सँ सीखलहुँ आ भगवानक द्वारा देल अवसर केँ सदुपयोग कैल। हे महादेव! एहन गलती कोनो लड़की से नै होमय दिहऽ। आ जौं ककरो से एहन गलती भऽ जाय त ओकर रक्ष रखिहऽ। ओकर गलती के ’द मिस्टेक’ तक सीमित करबाक सामर्थ्य आ उदारता तोरा मे छह; नै त समाज त लड़कपन के मिस्टेक के ब्लंडर साबित करबाक लेल सदिखन ठाढ़ रहय छैक" रजनी जानय छैक जे ओकर संघर्षक कहानी एकटा प्रेरणाक स्रोत अछि, जे चाहे समाज कतबो कठोर किएक नहि हो, मेहनत आ समर्पण सँ कोनो मंजिल पावल जा सकैत अछि। रजनीक जीवनक संघर्ष आ सफलता सबहक लेल प्रेरणा बनय आ ओ लोक सेवक बनि देश के  लोक के निक से सेवा क सकय यैह आशा रजनी के आंखि मे चमकि रहल छल। -      प्रणव कुमार झा (08.07.2024) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१०.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा-अछिंजल कुमार मनोज कश्यप लघुकथा- अछिंजल एम्हर स्कूल के छुट्टी के घंटी की बाजल; सभ बच्चा अपन-अपन वस्ता समेटैत बेछोह घर दिस पड़ायल। चौड़ तक पहुँचिते एका-एक पैघ-पैघ बुन्नी संग टिक्कर बरिसब शुरू! भिजबा सs बचबा लेल सभ आओर जोड़ सs दौड़ैत-दौड़ैत एकटा घर लग जा क्षणिक विरमल तs मुदा अछोपक घर जानि फेर सs पड़ाइते रहल। अस्थमा पीड़ित ओकर साँस फूलs लगलगलै आ तैं आगू दौड़बा मे अक्षम .... विवश ओतहि ठाढ़ रहि गेल ओ। गामक बाहर ई अछोप के घर छै आ मैयाँ कहै छै जे ओकर छाँहों सs लोक छुआईत छै!  प्राण-रक्षाक वा धर्म-रक्षा ...... एक दिस पोखरि दोसर दिस ईनार ...... महान धर्म-संकट!  अनायासे ओ मूसलाधार बरखा बुन्न सs अपना के आर बचेबाक प्रयास मे दाबा पर चढ़ि भीतक देवाल मे सटि गेल। ताबते आँगन सs एकटा स्त्रीगण के सूप ओढ़ने अपना दिस अबैत देखि ओ डsरे थड़-थड़ कापय लागल। लगलै ओ गंजन करतै जे हमर दाबा ढ़हि जैत आ एतs सs बैला देत। ओ डेराईत-डेराईत दाबा सs स्वयं निचा उतरिते रहै कि ओ स्त्री बजलै - 'बाऊ! बलू अँगना मे असोरा पर आ जाऊ.... हियाँ नईं बाँचब .... बोदरि भs जैब। डेराऊ नईं ....... अपना घर जा के गंगा-जल छीटि पवित्र हो जैब! जान बचल तs लाख उपाय! आहाँ आऊर सुकुमार लोक भीजब तs बेराम भs जैब।' ओ बिनु किछु बजने ओहि स्त्री के देल सूप ओढ़ि झटकारैत ओकर पाछू-पाछू ओसारा पर चढ़ि मोख पजिया कs ठाढ़ भs गेल। बाहर झहरैत बरखाक बून्न आ अंतस मे हौंड़ैत मैयाँ के कथन .... निर्विकार ओ अपलक शून्य मे ताकैत रहि गेल! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.११.डॉ प्रदीप कुमार पबड़ा- मैथिली भाषा परिवार डॉ प्रदीप कुमार पबड़ा मैथिली भाषा परिवार

आजुक समय में मैथिली भाषा में रार ठनल अछि । की मैथिली मात्र एक भाषा थिक ? जी नहि ! मैथिली भाषा नहि, भाषा परिवार थिक । भाषा परिवार ओहि भाषा के कहल जाइत अछि, जेकरा सऽ भाषा समूह जन्म लइत अछि । मैथिली सऽ बंगला, मैथिली सऽ ओड़िया, मैथिली सऽ असमिया भाषा के जन्म भेल अछि । तेंऽ मैथिली के विद्वान लोकनि बंगला, ओड़िया, असमिया के जननी कहैत अछि । जननी कोना नहि कहत ? जंऽ हम लिपि के गप्प करी, तखन किछु अंतर सऽ मैथिली लिपि, बंगला लिपि, असमिया लिपि में समानता अछि, तऽ किछु अंतर सऽ बंगला सऽ ओड़िया लिपि में समानता अछि । आब प्रश्न उठैत अछि जे मैथिलीये कियेक जननी ? ईसा सऽ कयेक हजार वर्ष पूर्व मैथिली भाषी क्षेत्र, बंगलाभाषी क्षेत्र, ओड़िया भाषी क्षेत्र असमिया भाषी क्षेत्र आ शुम्ह क्षेत्र (वर्तमानक बंगलादेश) मिला कऽ एक राष्ट्र छल । नांओ छल आनव देश, आ सम्राटक नांओ छल बलि । जनिक राजधानी मधुबनीक बाबुबरही प्रखंड केरऽ बलिराजगढ़ में छल । बलिराजगढ़क गर्भ में अखनों सब इतिहास दबल अछि, आ उखाड़नाहरक बाट जोहति अछि । राजा बलि के छओ संतान छल । अंग, बंग, कलिंग, शुम्ह आ औद्र । जाहि में अंग सबसऽ पैघ आ राज काज दक्षताक कारणें पिताक सिंहासन पर आसीन भेलाह । बंग के हिंस्सा में बंगाल, कलिंग के हिस्सा में वर्तमानक आसाम, शुम्ह के हिस्सा में शुम्ह प्रदेश अर्थात आधुनिक बंग्लादेश, औद्र के हिस्सा में वर्तमानक ओड़िसा आ पौण्ड्रक हिस्सा में पौण्ड्रिया अर्थात वर्तमानक पूर्णियां गेल । बहुतरास विद्वान ओड़िसा के कलिंग कहने अछि, मुदा कलिंग उड़िसा के कहने छथि । मुदा ओद्र सऽ ओद्रिस, ओड़िष, ओड़िशा, उड़िसा आ भाषा ओद्रिया, ओड़िया, उड़िया बनल अछि । ज्ञातव्य होइ जे अंग, बंग, कलिंग, शुम्ह, पौण्ड्र आ औद्र राज्यक केन्द्र अंग अर्थात बलिराजगढ़ छल । और छओ राज्यक जननी बलिराजगढ़ थिक । बलिराजगढ़क भाषाक नांओ मैथिली थिक, तखन मैथिली माय आ पांच भाषा में बचल तीन भाषा बंगला, असमिया, आ ओड़िया केरऽ जननी तऽ मैथिलीये भेल । पौण्ड्रिया आ बलिराजगढ़क भाषा एकहि थिक । पच्छिमी बंगाल आ पूर्वी बंगाल ( बंगलादेश) केरऽ भाषा एकहि थिक । तखन एम्हर बचल मैथिली माय केरऽ तीन भाषा बंगला, उड़िया आ असमिया । बलिराजेगढ़ अंग थिक । प्रमाण अंग पर मगधक शासन । बलिराजगढ़क खुदाई में मगधकालिन मृण्डभांड आदि सब मिलल छल । मुदा आधुनिक विद्वान लोकनि भागलपुरके बिना प्रमाणे अंग कहैत इतराति छथि । जे गलत अछि । अंग पर इक्ष्वाकुक चढ़ाई कैयलन्हि, आओर वो पूब्ह में कोशी, पच्छिम में गंडकि, उत्तर में हिमालयक तराई आ दक्षिण में गंगा धरिक जमीन जीतलक, आ निमी नांओक पुत्र के इ अहि प्रदेशक राजा बनौलक, जे विदेह राज्यक स्थापना कैयलक । ताहि के बाद भागलपुर मालिनी प्रदेश बनि गेल । आ अंग वंश चंप, चंपा नांओक नगर बसौलक । जे मालिनी प्रदेशक राजधानी बनल । आब प्रश्न उठैत अछि, जे जंऽ हिमवन सऽ संथाल अर्थात औद्रक सीमा धरि अंग छल तखन भाषा मैथिली कोना ? कालक्रम बदलल तऽ शासको बदलल । बलिराजगढ़ सहित चंपा पर मगधक कब्जा भाषा माग्धी, कालांतर में पालक कब्जा । ताहि के बाद बंगालक कब्जा । मुगलकाल में अकबरक कब्जा, अकबरक जमींदार कर्नाटवंश जे तिरहुत राज्य के स्थापना कैयलक । भाषाक नांओ तिरहुतिया राखल आ लिपि कैथी छल । आजुक विद्वान मिथिलाक्षर के तिरहुता लिपि कहै सऽ नहि अघाइत छथि । तऽ आब प्रश्न उठैत अछि जे गंगाक दक्षिणी भाग में तिरहुत तऽ नहि छल तखन मंदारक शिलालेखक लिपि आ सहोदराक लिपि एकहि कियेक थिक ? जंऽ पालकालिन राजाक समय में शिलालेख वा ओहि सऽ पहिलके राजाक समय के शिलालेख थिक, तखन स्पष्ट होइत अछि जे कैथी तिरहुता लिपि थिक । कर्नाटवंश के बाद ओईनबार वंश, ओईनबार वंश के बाद खंडवाल वंश आओल । ताहि के बाद मिथिले नहि समुच्चा भारत अंग्रेजियाक गुलाम भऽ गेल । आब आबैत छी मैथिली नांओ पर । सन 1801 ई० में अंग्रेज विद्वान कॉलब्रुक अहि मधुर भाषाक नांओ मैथिली कहलक । बस्स...एतहि सऽ मैथिलीक शत्रु तैयार । मैथिलीक प्रथम शत्रु श्रोत्रिय बाभन- दरभंगा महाराज सन 1810 ई०में सोति बाभन के भागलपुर में बैसार कैयलन्हि । अहि बैसार में दरभंगा महाराज बाभन के सुच्चा मैथिल घोषित कयलन्हि आ सोति बाभनक बोली के मानक मैथिली । प्रमाण 1949 ई० में कविश्रेष्ठ बाबा नागार्जुन अपना कविताक माध्यमे विरोध जतौलन्हि । तऽ हुनका यातना सेहो मिलल छलन्हि । ओ अपना कविताक माध्यमे मिथिला के सब जातिक साथ बाध-बोन, मांछी-मच्छर सब के मैथिल कहने छथि । जंऽ पढ़बाक हुऽए तऽ श्रीमान दिलीप कुमार झा द्वारा रचित बाबा नागार्जुनक मिथिला नांओक पोथी में श्रीमान दिलीप कुमार झाजी बहुत सुंदर विवेचना कयने छथि । जखन भागलपुरक सभा में खंडवा सऽ आबै बाला लोक अपनेआप के मैथिल घोषित कऽ लेलक, तखन मधेपुराक जमींदार श्रीमान स्व० बी पी मंडल के पिता वा बाबा 1811 ई० में बैसार कऽ सोलकन महासभा के गठन कयलन्हि आ सोलकनक बोली आ मूल मैथिली के अंगिका घोषित कयलन्हि । अहि प्रकारे मैथिलीक प्रथम शत्रु बाभन बनल । तखनो मूल मैथिली में रचना नहि बन्न भेल । बांकाक तेज नारायण कुशवाहा अप्पन रचना लऽ कऽ दरभंगा प्रेस में आओल । चूंकि अर्थाभाव में दरभंगे में प्रेस छल आ वो प्रेस दरभंगा महाराज के छल । परिणाम तेज नारायण कुशवाहा के बेईज्जत कऽ कऽऽ पठाओल गेल । मैथिली खंडित भेल । दोसर रचना ज्वाला प्रसाद साह जे साइत नेपाल सऽ लऽ कऽ आओल हुनको मानक के दुहाई दऽ कऽ बेईज्जत कऽ कऽऽ पठाओल गेल । परिणाम वज्जिका के जन्म भेल । ताहि के बाद आगि में घी देलक पंडित राहुल सांकृत्यायन जे ओहो बाभने छल । वो मैथिली के तीन भाग के बिनु प्रमाणे तीन भाषा कहि देलक आ अप्पन रचना में रचि देलक । ओहि सऽ पहिले लिखित में मैथिली नांओ के सिवा किछु नहि छल । तेसर शत्रु मिथिला राज मांगनाहर थिक । जे अपना नीज स्वार्थ लेल मिथिला मांगै छथि, मुदा वो मिथिला लेल समर्पित नहि रहल आ नहि अछि । चूंकि मिथिला राज्य भाषा के नांओ पर मांगल जाइत अछि । ताहि के खंडन हेतू बिहार सरकार तेसर शत्रु बनि अंगिका अकादमी के गठन कऽ मैथिली के तोड़बाक काज कयलक अछि । श्रीमान कवि एकांत राजीब झा अप्पन नव रचना में कहलथि जे अंगिका, वज्जिका मैथिली भाषा परिवारक सदस्य थिक । तखन हम हुनक अहि कथन के खंडन करैत छी । कारण अंगिका आओर वज्जिका मैथिलीक मूल थिक । मिथिला समाज ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित आ श्रीमान आचार्य रामानंद मंडल द्वारा लिखित पोथी रानियां भिखारिन में भाषा के नहि बंटियौ में लेखक स्पष्ट कहने छथि जे इ भाषा मैथिली थिकैक । नहि कि वज्जिका । अंत में मैथिली भाषा परिवार थिक । इ बंगला, ओड़िया, असमिया भाषाक जननी थिक । सोतिपुरिया तऽ मूल मैथिली के बोली मात्र थिक । अस्तु अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१२.कुन्दन कर्ण-बीहनि कथा-जय कमला/ पुछारि सब टोला कुन्दन कर्ण बीहनि कथा-जय कमला/ पुछारि सब टोला १ बीहनि कथा-जय कमला "जय कमला माइ, क'ल गड़ाई सुफल करिहैथ, बड़ मनोरथसँ क'ल गड़ेलहुँ अछि" "पप्पा, अपना गाममे त बागमति बहैत छथिन त कमला माइ के कियएक गोहरबैत छियैक ?" "कोसी-कमला हमर सबहक जीवन दायिनी छथिन ताएँ हुनके गोहरबैत छियै" "तखन त जय गंगा कहियौ, देशक जीवन दायिनी वएह छथिन" "बौआ, गंगा के महात्म्य मे कोनो शंका नहि मुदा जेना हिन्दी के वेग मे मैथिली बिला रहलीह तहिना जँ नै मोन राखबैन्ह त गंगाक वेग मे कोसी कमला गंडक बागमति बिला जेतीह !!" २ बीहनि कथा-पुछारि सब टोला मोहल्लाक लोक कृतज्ञता भावसँ हरीश बाबू दिस देखि रहल छलखिन, अतेक बड़का हाकिम होइतहु चाईबासासँ ठेंठ मधुबनीक अररिया संग्राम आयल छथिन बालसखा आ दूरस्थ सम्बन्धी भुटकुनके मृत्योपरांत पुछारि लेल , सेहो परिवार सहित। गरीब गुरबा सम्बन्धी वा बालसखाकेँ के मोन रखैत छै ? बेचारी विधवा त कृतज्ञतावश दबल जा रहल छलीह। हरीश बाबू कहैत रहथिन जे श्राद्ध में छुट्टीक बड़ अभाव छल मुदा पलखैत होइतहि भागल अयलहुँ। मुदा ताबात हरीश बाबू के छोटका बेटा बाजि उठलैक "मिलना हो गया तो जल्दी चलिए, मिथिला हाट घूमने में भी 3 घंटे लगेंगे " अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१३.रबीन्द्र नारायण मिश्र- सीमाक ओहि पार (धारावाहिक उपन्यास) रबीन्द्र नारायण मिश्र सीमाक ओहि पार (धारावाहिक उपन्यास) हमर ससुर स्वर्गीय गणेश झा (पण्डौल डीहटोल)क स्मृतिमे, सादर ससिनेह समर्पित! -16- ज्योतिषीजीकेँ जखन नीन्न टुटलनि तँ सौंसे देहमे फोके-फोका भए गेल छल । ओ होसमे नहि छलाह । कीओ ओहिठामसँ जाइत काल हुनका गाछक जड़िमे ओंठगल देखलक । ओ चिचिआएल-"दौड़ैत जाउ! जुलुम भए गेल !' देखिते-देखिते लोकक करमान लागि गेल । सभ एक-दोसरसँ पुछि रहल छल-"की भेल?की भेल?" के ककरा की कहैत?भितरिआ बात तँ ककरो नहि बूझल छल । लोकसभ उठापुठा कए हुनका लगीचक एकटा घरमे लए गेल । हवा केलक । पानि पिओलक । कनीकालमे ओ आँखि खोललाह । "एतेक दिनक बाद तोरा देखलहुँ । हम तँ धन्य भए गेलहुँ।" "की देखलिऐक?"-लोकसभ पुछनि । मुदा ओ आँखि उल्टा दैत छलाह । सभ भयभीत छल । एक-दोसरक कानमे फुसफुसा रहल छल । "लगैए, कोनो ऊपरी हवा लागि गेलनि ।। केओ  कहैत-"गेल घर छथि।" एहि तरहेँ बड़ीकाल धरि धमाचौकरी चलिते रहल । ज्योतिषीजीक पत्नी बिआहक थोड़बे दिनक बाद मरि गेलथिन । हुनकर  सभटा सेहन्ता धएले रहि गेलनि । मरितहि ओ प्रचंड रूप धेलनि । महाकालोकेँ ओकरा सम्हारब मोसकिल भए गेलनि । "एहन तँ आइ धरि नहि भेल छल । आब की होएत?" महाकालकेँ एहि तरहेँ चिंतित देखि हुनकर सचिब बाजल- "सरकार! बहुत परेसान बुझाइत छी ।" "हौ! की कहिअह? एकटा तेहन ने उफाटू आबि गेलि जे सम्हरिए नहि रहल अछि?" "ओ के थिक जे अहूँ सँ नहि सम्हरि रहल अछि? एहन आदमीकेँ तँ अवश्य देखबाक चाही ।" "देखिए कए की कए लेबह? अखन ओकरा देखनाइ शुभ नहि होएत । ओ एखन बहुत उग्र अछि ।" अपना भरि महाकाल अपन सचिवकेँ बुझेबाक बहुत चेष्टा केलाह मुदा ओकरो मोन ओतहि अटकि गेल रहैक । ओ महाकालक बात नहि मानलक । चलि गेल ओकरा लगीचमे। औ बाबू!  ओ तँ आगि उगलि रहल छलि । ओकर हृदयक ताप जेना चारूकात अग्निवर्षा कए रहल छल । आब की होएत? महाकाल ठहाका पाड़लाह । "कहने रहिअह जे बँचि कए रहह परंतु तूँ हमर बात नहि मानलह । आब भोगह ।“ महाकाल बाजिए रहल छलाह कि ओ हुनकर सचिवपर चिचिआ उठलि- " मूर्ख! तूँ हमर दुख नहि बूझि सकलह । आइदिनसँ तूँ सुग्गा भए जाह ।" से कहि ओ क्रोधमे आगिसन भेल हुंकार भरलक । चारूदिसामे प्रलयसन दृश्य भए गेल। देवता,गंदर्भ सभ  चिंतित भए गेलाह। "महाकालकेँ एना नहि करबाक चाहैत छलनि ।-केओ  बाजल । "से की हुनका हाथमे छलनि । ओ तँ मात्र नियतिक हिसाब साफ कए रहल छलाह ।"-दोसर बाजल । "मुदा आब की होएत?"-तेसर बाजल । "नियतिकेँ गोहराओल जाए । तखने साइत मामिला सोझरा सकत ।"-पहिल बाजल । "तँ देखैत की छी । चलै चलू नियतिकेँ प्रार्थना करी नहि तँ प्रलय भए जाएत । सौंसे समाजक लोक मिलि कए नियतिक ओतए विदा भेलाह। एमहर महाकालक सचिव हुनका गोहराबए लागल-"हमरा बचाउ । हमरासँ बहुत भारी गलती भए गेल । जँ अहाँ नहि मदति करब तँ के करत ? अहाँ तँ सभकिछु जनैत छी,सर्वशक्तिमान छी।" "केओ सभकिछु नहि जनैत अछि । ई तोहर भ्रम छह। हम तँ तोरा चेतेलिअह मुदा तूँ अपन जूति चलेलह तखन आब हमरा की कहि रहल छह? " से सुनितहि ओ आओर जोर-जोरसँ कानए लागल । महाकालकेँ बहुत दया आबि गेलनि। ओ बजैत छथि-- "ठीक छैक । तोरा सुग्गा तँ बनहि परतह मुदा हम तोरा अद्भुत शक्ति दए दैत छिअह जाहिसँ तँ भूत, वर्तमान आ भविष्य सभ बुझि, देखि सकबह ।" 'से तँ ठीक छैक मुदा सुग्गा बनि कए हम कोना जिअब, हमर जीवन तँ व्यर्थ भए जाएत?  मोनक सभ सेहेन्ता धएले रहि जाएत।" "रातिमे तँ अपना हिसाबसँ जे चाहबह से बनि जा सकैत छह मुदा दिनभरि सुग्गेक रूपमे रहए पड़तह । एकटा आओर बात।" "की?" "ककरो ई बात कहिअहक नहि । जौँ ई बात ककरो पता लागल तँ तोहर सभटा शक्तिओ चलि जेतह आ सही मानेमे सुग्गे रहि जेबह ।" " सरकार! हम किएक ककरो कहबैक । अहाँ हमर एतेक उपकार केलहुँ तकरा हम कोना सधा सकब?" "सभ चीज वापस नहि कएल जाइत छैक । जे तोरा हाथमे छह से करिअह । " "जे आज्ञा सरकार!" एतेक बात भेलाक बादो सुग्गाकेँ माथपर चिंताक धारी बनले रहए जे महाकालकेँ पढ़ैत देरी नहि भेल । "की बात छैक? आबो तोरा परेसान देखि रहल छी?" "कहबामे लाज होइत अछि मुदा अहाँकेँ नहि कहब तँ ककरा कहबै? के बूझत हमर बात?" "फरिछा कए बाजह । एतेक समय हमरा नहि अछि?" "हम रहब कतए?" "जतए मोन होअए, उड़ि जेबह, एहिसँ नीक बात की होएत? -से कहि महाकाल हँसि देलाह । सुग्गा किछु बाजल नहि मोने-मोन बहुत दुखी रहए । महाकाल ई बात बुझलाह । कहैत छथि -नीलमणि पर्वत तोरे कब्जामे रहत।" -से कहि महाकाल लुप्त भए गेलाह । -तहिआसँ ई सुग्गा ओहि पाकड़ि गाछपर बैसल रहैत अछि। बुझलिऐक ने बात । मुदा ई पाकड़िक गाछ कम रहस्यात्मक नहि अछि । नहि तँ सुग्गासंगे एकर एहन घटजोड़ी थोड़े रहितैक । -17- ओहि दिन  गामक लोकसभ ज्योतिषीजी लग समाधान लेल गेल छल मुदा हुनका अस्तव्यस्त देखि  ककरो किछु रस्ते नहि फुराइक । ज्योतिषीजीक हालति ठीक नहि रहनि । ओ अर्द्धमूर्क्षित  अवस्थामे  विमला,विमला बाजैत रहथि । देहपर सौंसे फोंकासभ भए गेल रहनि। "हिनका केओ  अगिनबान मारि देलकनि अछि ।-केओ  बाजल । "हमरो सएह बुझा रहल अछि ।"-दोसर बाजल । "हमरा तँ किछु आओर बुझा रहल अछि ।-तेसर बाजल । एहि तरहें सभ अपन-अपन अनुमान लगा रहल छल। मुदा ज्योतिषीजी किछु कहबाक स्थितिमे नहि रहथि । लोकसभ उठापुठा कए ज्योतिषीजीकेँ घर लए अनलक । वैदकेँ बजा अनलक । वैद हुनका देखितहि बाजि उठल-"हिनका कोनो विमारी थोड़े छनि । ऊपरी हवा लागि गेलनि अछि ।" "तकर इलाज की छैक?" "से हमरो नहि बूझल अछि।" वैद वापस चलि गेलाह । ज्योतिषीजी सुति गेल रहथि मुदा बड़बड़ेनाइ  रुकबे नहि करनि। लोको सभ क्रमशः चलि गेल । कतेक काल धरि बैसल रहैत । साँझ भए गेल । घरमे डिबिओ नहि लेसल गेल छल । ज्योतिषीजीकेँ असगर रहब कोनो नव गप्प नहि छलैक । मुदा ओहिदिन ओ बहुत अस्वस्थ रहथि । ओहि समयमे हुनका कोनो होस नहि रहनि । ककरो ने ककरो ओतए रहक चाहैत छल। मुदा के रहैत ? सभ झोड़ा झाड़ि विदा भए गेल । असलमे वैदक बात  सुनि सभ डरा गेल । तथापि ककरो रहब  उचित छलैक। मुदा ई थिक स्वार्थी संसार । संकटमे लोकक अपन छाहों संग नहि दैत अछि । ई दृश्य  विमला देखलथि । हुनकर उग्रता आओर बढ़ि गेल। ओ भयाओन वेगसँ आएलि आ ज्योतिषीजीकेँ उठा-पुठा कए लेने चलि गेलि । -18- ओहिदिन सुग्गा महाकालक देल नीलमणि पर्वतपर बैसल छलाह । ई एहनठाम छल जतएसँ सभलोक देखाइत छल । ओहिठाम मौसम सदरिकाल सोहनगर रहैत छल । सुविधाक अंबार लागल  छल मुदा ताहि हिसाबे ओतए लोके नहि छल । एसगर सुग्गा टाँय-टाँय करैत रहैत छल। ओ सोचलक जे ककरो तँ एतए रहबाक चाही जाहिसँ गप्पो-सप्प करब आ बेर-कुबेर मदतिओ होएत । ताहि उद्यश्यसँ ओ मंजुषा लग गेल । रातुक समय रहए । ओकरा इच्छाधारी वरदान रहैक। जतेक सुंदर बनि सकैत छल,से बनि गेल । राजनर्तकी मंजुषा ओकरा देखितहि आकर्षित भए गेलथि आ सुग्गा किछु कहैत,निवेदन करैत ताहिसँ पहिने अपनहि ओकरा लग सहटि कए आबि गेलीह । सुग्गाक मोन तँ गद-गद रहैक। मोने-मोन महाकालकेँ प्रणाम केलक । "धन्य छी अहाँ जे हमरा आइ एहन नीक दिन देखबाक अवसर भेटल।" -सुग्गा सोचलक। मंजुषा सुग्गाक बात मानि ओकरा संगे नीलमणि पर्वतपर  आबि गेलीह । चारूकात सुन्न,कतहु केओ  नहि,से देखि हुनका मोनमे चिंता भेलनि । फेर भेलनि जे भए सकैए आओर लोकसभ फटकी होइक । ओना एक हिसाबे एकांत तँ नीके रहत। खूब रंग-रभस करब । सुग्गा दिनक समयमे उड़ि कए पाकड़ि गाछपर चलि अबैत आ साँझ होइतहि नीलमणि पर्वतपर  चलि जाइत आ मंजुषाक संगे  आनंद मनाबति । एहि तरहेँ बहुत समय बीति गेल। एक राति सुग्गा राजकुमारक भेषमे मंजुषाक संगे प्रेमालाप कए रहल छल कि  लगीचेमे मधुरस्वर सुनेलैक । सुग्गा बाहर निकलि देखलक तँ देखिते रहि गेल । बेस पैघ सामिआना लागल छल । ओहिमे जबरदस्त महफिल सजल छल । लगैत छल जेना कोनो शहरे उठि कए आबि गेल अछि। रातिभरि नाच-गान चलैत रहल । सुग्गाकेँ बुझेबे नहि करैक जे ई सभ के अछि आ एहिठाम केना आबि गेल । ओ एही सोचमे रहए कि मंजुषा सेहो बाहर आबि गेलीह । मंजुषा बाहर अबितहि ओकरासभकेँ चिन्हि गेलि । ओ अपनो तँ एकरे सभक मंडलीमे काज करैत छलि। आब ओकरा चिंता होमए लगलैक जे जँ ओ सभ एकरा देखि लेलक तँ की होएत? कारण ओ तँ विना ककरो कहने सुनने सुग्गासँ मोहित भए ओकरा संगे चलि आएल रहैक । ई संसार रहस्यमयी अछि । ककरो किछु,ककरो किछु बूझल छैक ,संपूर्ण ज्ञान ककरा छैक?  इएह कारण अछि जे एक-सँ एक पंडित,विद्वान एक-दोसरपर आक्षेप करैत रहैत छथि। जखन सुग्गा नीलमणि पर्वत  पर गेल तँ ई थोड़े सोचने छल जे ई बात छैक। ओकरा लगलैक जे सौंसे नीलमणि पर्वत ओकरे नाम कए महाकाल चलि गेलाह । ओ जे चाहत करत,जेमहर चाहत घुमत आ कहि ने की की...। संयोगपर- संयोग होइत गेल । ने मंजुषा ओकर संग अबितथि ने ओतेक ओझरमे ओ पड़ैत । ओहिराति मंजुषाकेँ जखन लगीचेमे नाच-गानक ध्वनि सुनबामे आएल तँ ओ बाहर निकलि देखए लगलीह । ओहिमे मंजुषाक परिचित लोक तँ छलाहे मुदा किछु एहनो लोक छलाह जे पहिलबेर ओहि कार्यक्रममे आएल रहथि। भेलैक ई जे शरद,तिरपित,रागिनी,श्याम,प्रभुसभ गोटे ओहिदिन श्मशानमे बैसल आसपास होइत  घटनाक्रम देखि रहल छलाह कि ज्योतिषीजीक पत्नी विमला हुनका लदने-फदने आबि गेलि। ओ ततेक क्रोधित रहए जे ककरो किछु पुछबाक साहस नहि भेलैक । सभ ओकरा  संगे विदा भए गेल । ओकरासभकेँ एकाएक ओहिठामसँ हटलासँ एकटा शून्यता अएलेक जाहि कारण ओतए बिरड़ो उठि गेल । कैक गोटे ओहि बिरड़ोकेँ देखलक ,मुदा असली बात तँ केओ  नहि बूझि सकल,ने देखि सकल । ओ सभ विदा भए गेल । चलैत-चलैत कतहु सुसस्तेबाक इच्छा भेलैक तँ नीलमणि पर्वतपर रुकि गेल । ओहिठाम नाच-गान चलिए रहल छल । ओतए खेबा-पीबाक इंतजाम सेहो छलैक । ताहि बातसँ ओकरासभकेँ बहुत मदति भेलैक । ओ सभ गीतनाद सुनलक,खेलक,पिलक आ सामिआनाक पाछूमे अड़कि गेल । -19- तृप्तिवोधक अभावमे जन्म-जन्मसँ लोक बौआ रहल अछि। एहि अंतहीन यात्राक कहिओ अंत होइतो छैक कि नहि? की एहिना घिरनी जकाँ लोक घुरिआइत एहि लोकसँ ओहि लोक बौआइत रहैत अछि? केओ  एहि बातकेँ फरिछा नहि पाबि रहल अछि । अपनेक सुधि नहि छैक तँ अनकर अटकर की रहतैक? जीवनभरि नानाप्रकारक लिप्साक वशीभूत भए तकर प्राप्ति हेतु प्रयत्नशील रहैत अछि आ ताहीमे लागले रहैत अछि की महाकालक घंटी बाजि जाइत अछि। फेर शुरु होइत अछि अंतहीन यात्रा जकर गंतव्यक कोनो पता ककरो नहि रहैत छैक । जखन ककरो नहि रहैत छैक तँ हमरे कतएसँ होइत? हमहीटा नहि समस्त जीव-जन्तुक इएह हाल अछि। नियतिवश सभ चलिते जा रहल अछि । ओहि दुर्घटनामे हमर मृत्यु भए गेल । लोक सोचने होएत जे  हमर खेल खतम मुदा से थोड़े होइत छैक । खेल चलिते रहल । पता नहि कोन-कोन लोकसँ हम गुजरि रहल छी। ककरा-ककरा सँ ने भेंट भए रहल अछि । तिरपित,शरद,श्याम,मंजुषा आ कहि ने के-के बौआ रहल अछि । ओहि दिन हम इएह सभ सोचैत रही कि सुग्गा हमरा सामनेमे आबि कए टर्र करए लागल। "की बात छैक? बहुत बाजि रहल छह ।" "पाकड़ि भाइ बजा रहल छथि । कहलाह जे जतए होथि कहबनि जे कनीको काल हेतु आबि जाथि । किछु जरुरी बात करबाक छनि ।" हम सभकाज छोड़ि पाकड़ि गाछतर पहुँचि गेलहुँ । जेठक दुपहरिआ रहैक । गामक कैकगोटे ओहिठाम सुस्ता रहल छलाह । हमरा पहुँचितहि मेघ लागि गेल । पानिक फुहाड़ा खसए लागल । एहि मासमे एहन वर्षा कमे देखल जाइत अछि। मुदा एहिसँ लोकसभकेँ बहुत राहत भेलेक । घामे-पसीने लोक त्राहिमाम कए रहल छल । तेहनमे वर्षा होएब,मेघ लागब  आओर हवो बहए लागब बहुत सुखद भेल । हमरा पाकड़ितर ठाढ़ केओ  नहि देखलक,देखिओ नहि सकैत छल। हम पाकड़िक गाछ लग पहुँचले रही कि सुग्गा हमर स्वागत करए हेतु अएलाह । "बड़ नीक केलहुँ जे आबि गेलहुँ । पाकड़ि भाइ बहुत बेकल छथि । सदरिकाल अहींक चर्चा करैत रहलाह । हम बुझेबो करिअनि जे ओ जहन गछलाह अछि तँ अएबे करताह मुदा हुनका जेना बेचैनी भए गेल रहनि ।- हमरासभकेँ गप्प करैत देखि पाकड़िक गाछसँ अबाज आएल। "अपनेमे गप्प करैत रहब कि एमहरो आएब?" "अहीँसँ भेंट करए आएल छी ।" "आउ, आउ, हम बाटे ताकि रहल छलहुँ ।"- पाकड़िक गाछ बाजए लगलाह॒ । "कोनो खास बात?" "हमरा अहाँ लेल भने खास बात नहि होइक मुदा ज्योतिषीजीक लेल तँ जरूरे खास बात छैक?" "की भेलैक, से तँ कहू ।" ओहिदिन ज्योतिषीजी बेकल भेल हमरा लग आएल रहथि। अपन पत्नीक वियोगसँ ओ कहिआसँ दुखी छथि । हुनका बारेमे जनितहि ततेक आवेग भेलनि जे ओ दुखित पड़ि गेलाह।" "तखन?" "तखन की । हुनका देखनाहर केओ  नहि छल । हुनकर पत्नी विमला ताबे बौआइत ओतए पहुँचि गेलि आ ततेक उग्र भए गेलि जे की कहू? सभक सीटीपीटी गुम्म छलैक ।" "एना किएक भेलेक?" "विमलाक मरलो युग बीति गेल मुदा ओ एखनो ज्योतिषीजीक बाट ताकि रहल अछि । अतृप्त, अशांत भेल बौआइत रहैत अछि ।" ओकरा शांत करबाक किछु व्योंत भए सकैत छैक कि नहि?" " सुनैत छी जे गया जा कए प्रेतशीलापर पिण्डदान केलासँ मुक्ति भए जाइत छैक ।" " हमरा तँ एहि बातमे बहुत जान नहि लागि रहल अछि। गयामे तँ आन धर्मक लोक पिण्डदान नहि करैत छथि तँ हुनकासभक की होइत अछि? की ओ सभ प्रेते रहि जाइत छथि ? फेर एकरा लेल गया जेतैक के? एकरा के छैक,जे से सभ करतैक?" तैँ ने अहाँकेँ बजओलहुँ अछि । ज्योतिषीजी हमर बहुत सेवा केने छथि । हमरो किछु कर्तव्य बनैत अछि । ज्योतिषीजीकेँ जहिआसँ विमलासँ भेंट भेलनि दुनूगोटेक परेसानी बढ़ि गेलनि । विमला तँ ततेक उग्र भए गेल छथि जे महाकालो चिंतामे पड़ि गेल छथि । हुनका शांत करबाक भार ओ हमरा देलथि आ ईहो कहला जे अहाँ हुनकर वंशज छिअनि। अहीं ई काज करी तँ उत्तम।" "मुदा हम हुनकर वंशज छी तकर कोन प्रमाण?" "महाकालकेँ ककर प्रमाणक काज अछि? ओ तँ स्वयं प्रमाण छथि।" "से तँ ठीक मुदा हमर जिज्ञासा तँ स्वभाविक आ उचित अछि । जखन हम हुनकर पिंडदान करए जेबैक तँ मोनमे श्रद्धाक भाव तँ जरुरी अछि आ से तँ तखने आएत जखन सत्य बात हम बुझने रहब । अन्हारमे तीर चलओलाक कोनो फएदा नहि भए सकैत अछि ।" -अहाँ हमर बातपर विश्वास करू । हमहूँ कोनो आइसँ ई सभ नहि देखि, सुनि रहल छी। जखन महाकाल स्वयं बाजि रहल छथि तँ अहिपर प्रश्न नहि उठक चाही ।" "सबाल प्रश्नक नहि अछि, मोनकेँ मनाएब बहुत जरुरी अछि, नहि तँ हुनकासभक मुक्ति होनि नहि होनि हम तँ आओर ओझड़ा जाएब । अखन धरि हम ओहिना बौआ रहल छी, कहीं बौआइते नहि रहि जाइ ।" "ओना बात तँ अहाँ वाजिब कए रहल छी ।" ठीक छैक । पता लगबैत छी जे केना की भए सकैत छैक। फेर गप्प करब ।" हमर पाकड़िक गाछ संगे गप्प चलिए रहल छल कि लागल जेना लगीचेमे ठनका खसि रहल अछि । चारूकातक भयाओन अन्हड़ उठि गेल । लाखो तारा सभ चमकए लागल । लगलैक जेना एकहि संगे हजारो सूर्य उगि गेल हो । एहन परिस्थितिक कल्पना हम नहि केने रही । मुदा पाकड़िक गाछकेँ ई बूझल छलनि । ओ वारंबार हमरा चेता रहल छलाह । हमहूँ  की करितहुँ । मोनकेँ संतुष्ट करबाक प्रयास कए रहल छलहुँ । एहन माहौलमे केओ  हमरा पकड़ि कए जोरसँ धक्का देलक । हम बेसुध भए गेलहुँ । जखन होस भेल तँ हमरा लागल जेना कतेको सए बर्ख पाछू चलि गेलहुँ। -20- हम मुकुंदपुरक देबाल लग ठाढ़ छलहुँ ।  हमर माता -पिता कतहुँ सँ आबि रहल छलाह। हुनकर स्वागत हेतु किछु आओर लोकसभ आबि गेल रहथि । हमरा देखितहि ओ सभ चिकरि  उठलाह-"मनोज! एतेक दिन तूँ कतए चलि गेल छलह ? हमसभ कहिआसँ तोहर बाट ताकि रहल छी ।" माए बहुत शीघ्रतासँ हमरा दिस बढ़लीह। लगेमे पिच्छड़ रहैक। हुनकर संतुलन बिगड़ि गेलनि। ओ धराम दए खसलीह । हुनकर दहिना पैरमे चोट लागि गेलनि । हम दौड़ि कए हुनका पकड़ि लैत छी । पाछूसँ हमर पिता अबैत छथि। हमसभ हुनका प्रणाम करैत छी । सामने एकटा चाह-पानक दोकान पर सुस्तेबाक हेतु बैसि जाइत छी । ओहि दोकानपर बैसले छलहुँ कि एकटा चिठ्ठी कतहुँ सँ खसैत अछि - "आब बुझेलह कि आबो नहि बुझि सकलह? इएह छथि ज्योतिषीजी आओर हुनकर पत्नी विमला । " चिठ्ठी पढ़ि कए हमरा सभटा बात मोन पड़ए लागल । पूर्वजन्मकक बातकेँ एना ओदारि कए राखि देव महाकालेक वशक बात छल । हुनका लेल की काल्हि आ की आइ । ओ समयक सीमाक ओहिपार ठाढ़ छथि। हमहूँ अहाँ ओही अनादि-अनंतक भाग छी । कालक प्रवाहमे हमसभ ओहिना बहि रहल छी जेना धारक तेज प्रवाहमे कोनो कागतक नाओ उबजुबाइत गलि जाइत हो, कैक बेर ओहिपार पहुँचि जाइत हो । हमहूँ सभ सएह छी । कखन छी,केहन छी ,से मात्र एकटा संयोग अछि । सभ महाकालक चक्र छनि । लोक आएत,लोक जाएत मुदा ई कालचक्र निरंतर चलिते रहत । तैँ ने आइ सद्यः मुकुंदपुरक ई दृश्य देखि पाबि रहल छी । ज्योतिषीजीकेँ तहिओ लोक ओही नामसँ जनैत छलनि। ओ गणितक प्रकाण्ड विद्वान छलाह । इसकुलसँ सटले एकटा पैघ मंदिर छल । हम पहुँचले रही कि ओहि मंदिरसँ किछुगोटे बाहर होइत चिचिआ रहल छलाह -" जय महाकाल! जय महाकाल !" हुनका लोकनिक हाथमे मसाल छल जे अनेक रंगक प्रकाश उत्पन्न कए रहल छल । सभक आगू,आगू अत्यंत सुंदरि युवती छलीह,तिनका पाछू-पाछू पचासो गोटे चलि रहल छल। हमरापर प्रकाश  पड़ितहि ओ चिचिआ उठलीह- - "आउ, आउ । अहाँ बहुत समय लगा देलिऐक ।" "अहाँ के छी?" हम छी एहिठामक राजकुमारी निशा ।"-से कहि ओ अपनासंगे  हमरा अपन रथपर बैसा लेलथि  आ कहैत छथि-चलू,अहाँकेँ अपन राजमहल देखबैत छी ।" हम हुनकर संगे विदा भए गेलहुँ । पाछू-पाछू हुनकर अंगरक्षकक दल चलि रहल छल । "मुदा हम अहाँकेँ नहि चिन्हि रहल छी ।" "हम तँ कहिआसँ अहाँक बाट ताकि रहल छी । अहाँकेँ कोना मोन पड़लहुँ सएह आश्चर्य लागि रहल अछि ।" "हम तँ एहिठाम महाकालक आदेश मानि अएलहुँ अछि।" "जेना आएल होइ । अएबाक अएबे केलहुँ मुदा हमर सभ गति कए देलहुँ ।" " से की?" "आब की कहू? जखन अहाँकेँ किछु मोने नहि अछि तँ सभ बेकार थिक ।" " अवश्य कहू । भए सकैत अछि एहूमे महाकालेक कुछु फेरी होइक ।" "से तँ छैके । नहि तँ एना हेबे किएक करितैक?" हमसभ गप्प कइए रहल छलहुँ कि मह-मह करैत सरबत लए हुनकर सेविका आबि गेलीह । निशा अपने हाथे भरल गिलास हमरा पकड़ा देलथि । हम दुनूगोटे गट-गट कए ओकरा पीबि गेलहुँ। ओह! अद्भुत स्वाद छल । दिव्यरसोसँ बेसी मादकतासँ भरल छल। से पिबतहि हमरा जे भेल से कहब मोसकिल । हम मदहोस भए गेलहुँ । आ निशा,ओ तँ ततेक प्रसन्न छलीह जकर वर्णन करब कठिन । संभवतः ओ एहि रसपानक अभ्यस्त छलीह । "ई की थिक।" "हदे भए गेल । हम-अहाँ तँ ई सदरिकाल पिबैत छलहुँ।" "ऐँ! हमरा तँ किछु मोन नहि पड़ि रहल अछि । पहिने तकर किछु व्योंत करू ।" "अगुताइ नहि । जखन आबिए गेलहुँ अछि तँ सभटा सुविधा होएत । एहिठामक सभ्यता आ विज्ञान बहुत आगू अछि।" "ओ हमरा तँ आब बहुत आनंद लागि रहल अछि ।" इएह तँ मुक्तिरसक विशेषता थिक।" एकटा बात बुझलिऐक जे चाहे नाम जे होइक,स्वाद जेहन होइ,मुदा सभलोकमे कोनो-ने-कोनो रसपानक परंपरा अछि। पृथ्वीक मदिरा वा अपना ओहिठामक ताड़ी भने  दिव्यरससँ फराक होउक,किंवा एहिठामक मुक्तिरस हो ,काज सभ एकहि रंगक करैत अछि । लोक एकरा पीबि कए बिसरभोर भए जाइत अछि आ जे मोनमे गड़ल रहैत छैक तकरा निकालि उसासक अनुभूति करैत अछि । हम अनेको लोकसँ गुजरि गेलहुँ । ओहि बीचमे हजारो सालक अन्तर छल । मुदा जतहि गेलहुँ लागैत रहल जेना सभकिछु एखने भेल होअए । की विचित्रता थिक से बुझब मोसकिल अछि। संभवतः वैज्ञानिकसभ सेहो एही रहस्यक सोझराबएमे लागल रहैत छथि ।  मुदा महाकालक एहि रहस्यकेँ बुझनाइ सोझ बात नहि छैक । एतबा तँ तय बात अछि जे कोनो लोक होइ, महाकालक प्रभावसँ केओ  बाँचल नहि अछि । मुक्तिरस पीबि कए हम बेसुध भेल राजकुमारी निशाक संगे गप्प करैत -करैत कखन सुति रहलहुँ किछु नहि बुझलिऐक । भोरे ओ फेर ओहि मंदिर जाइत रहथि तँ हमरो उठओलथि। हम बहुत आलस्यमे छलहुँ । तथापि जल्दी -जल्दी तैयार भए हुनके संगे  मंदिर विदा भेलहुँ । निशाक संगे हुनकर सिपहसलार सभक हुजुम चलि रहल छल । मंदिर लग पहुँचले रही कि लागल जेना आसेपास ठनका खसल  । ठनकाक अबाजसँ हतप्रभ  हम ठामहि थमकि गेलहुँ । आँखि खोलैत छी तँ देखैत छी जे महाकालक मंदिरक सामनेमे ओ स्वयं ठाढ़ कहैत छथि- "तूँ एहिठाम आएल छलह की करए आ कए की रहल छह?" "हमरा तँ किछु नहि बुझा रहल अछि । " से कहि हम  महाकालक मंदिर दिस बढ़लहुँ। महाकाल हमरा दिस बढ़ए लगलाह कि निशा बीचमे आबि गेलीह । "अहाँ हमर सोहागकेँ हमरासँ नहि छिनि सकैत छी ।" "हम ककरो किछु नहि करैत छी । सभ नियतिक खेल थिक ।" "नियतिकेँ कतहु आनठाम पठाउ, हम अपन नियति स्वयं तय करब ।" "एहनो कहीं भेलैक अछि?" "एहिबेर सएह हेतैक ।" से कहि निशा हमरा लेने मंदिरसँ बिना पूजा केनहि चलि जाइत रहलीह । महाकाल कतए गेला,किएक गेला किछु पता नहि चलि सकल । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। पद्य ३.१.सुप्रसन्ना झा- जिनगी ऐह थिक ३.२.राज किशोर मिश्र- महानगर ३.१.सुप्रसन्ना झा- जिनगी ऐह थिक सुप्रसन्ना झा जिनगी ऐह थिक

एक संगीत , एक ताल, एक लय एक थिरकन, कंदील झंझावात सं मोनके हटा कनि हँसि लिअ गाबि लिअ, आ किछ नीक सोचि लिय, कियेक तं जीवन अपन प्रवाह मे चलैत अइछ सतत अहाके मोनक देहरी सं हुनका मिसियो भरि नय अइछ मतलब, अहां निरंतर बहैत एहिमे जिनगीके थाह नहि पाबि सकब, एक जिजिविषा , एक गुंज अहाके अंतर मे जिनगी के प्रति होमक चाही , तहने विषमता सं सामंजस्य बैसा सकैत छी, प्रतिकूलता मे अनुकूलता आनि सकय छी घुप्प अन्हरियो मे इजोरक अभिलाषा राखि सकैत छी , ई जिनगी छिकै कोना हाथ पर हाथ दै निश्चिंत भ सकय छी एक किरण, एक ज्योति सतत, अमावसो म उठबाक कल्पना करैत , हां ई जिनगी थिकै

-श्रीमती सुप्रसन्ना झा, जोधपुर, राजस्थान

अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.राज किशोर मिश्र- महानगर राज किशोर मिश्र महानगर

महा नगर मे कतेको अछि नगर, कंक्री ट-गा छ सघन अछि सगर।

हेरा इत,बौ आइत, ढहना इत लो क, सभ सँ सभ अछि अनचि न्हा र, गो त्र, कुल, आ' गा म नहि एत्त, एत' पा इ, पद, जो गा ड़, रो जगा र ।

व्या पा रक ई वि रा ट डी ह, रो जगा रक सुंदर नंदन बन, स्वप्नलो क नो करी के आ' अलका पुरी मे कुबेरक धन।

मेट्रो स्टेशन पर बड्ड भी ड़, धर्रो हि ला गल अस्पता ल मे लो क, सड़क पर ट्रक,आॕटो क जा म, रेड-ला इटक ठाँ '-ठाँ ' रो क-टो क।

बुद्धि जी वी ,आ' श्रमजी वी सेहो , सि मपो जि अम, तँ श्रम-भत्ता पर भा षण, ज्यो ति षा चा र्यक आश्रम फूजल, ओ बुझा बथि ग्रह लो कनि क अनुशा सन।

बी स टके प्लेट छो ला -भटूरा वेन्डर बेचैछ फुट-पा थ पर, फा इव-स्टा र हो टल मे ओएह, द्वि हजा र लगभग मा थ पर।

उसनल अल्हुआ नो न संगेँ, महग बड़ ला गि रहल अछि हो टल, डि जि टल दुनि आ महा नगर मे, गूगल पर जाँ च करू फूड-पो र्टल।

पा नि बि का इत अछि , को खि बि का इत अछि , बि का रहल अछि रौ द-बसा त, अपनो लेल नहि समय छै लो क के, गा ड़ी क स्टी अरिं ग पर भो जन-भा त।

भा वना - संवेदना केँ, की न लेने अछि टा का , भा ओ-भी ख मँगि ते रहि जेता , एतय नथुनी का का ।

महा नगर के कौ ओ हो इत छैक बड़ चला क, छो टो बा त पर भऽ जा इत छै एतय तला क। भनसा घर तरल सिँ घा ड़ा सन मेरि डि अनक कि चेन मे बनल मो मो ज,

गा मक ना टक सन नुक्कड़ ना टक कनाॅ ट-प्लेसक, सेहो बेजो ड़।

महा नगर अछि सहरक जंगल, केसरि -ची ता हिं सक अगा ध, शां ति पूत नी लकंठ, कपो त खग, ऋषि -मुनि आओर कुटि ल व्या ध। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। 86 || विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in विदेह ३९८ म अंक १५ जुलाइ २०२४ (वर्ष १७ मास १९९ अंक ३९८)|| 85

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