ISBN 978-93-340-9310-0 (Book) ISSN 2229-547X (online) 𑒀 विदेह ३९९ म अंक ०१ अगस्त २०२४ (वर्ष १७ मास २०० अंक ३९९) [विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। कॉपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- २०२४. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२४. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. It is a platform for scholars, researchers, writers and poets to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, and poetry in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@gmail.com. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover designed by AUM GAJENDRA THAKUR Videha e-Journal: Issue No. 399 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृष्ठ १-१) १.२.अंक ३९८ पर टिप्पणी (पृष्ठ २-३) गद्य २.१.निर्मला कर्ण-अग्निशिखा खेप ४३ (अंतिम भाग) (पृष्ठ ५-९) २.२.आचार्य रामानंद मंडल-मिथिलावाद! (पृष्ठ १०-१८) २.३.लालदेव कामत-मैथिली पोथी चर्चा : तेँ ओ बजलैए/ मरुवा खेती लाभकारी य/ देशके धनिक लोकक शिक्षा प्रेम जागल/ एकटा आत्मकथा (पृष्ठ १९-२८) २.४.संतोष कुमार राय 'बटोही'- सासुर मीठगर आओर तीतगर (पृष्ठ २९-३०) २.५.प्रणव झा- कालचक्र [मैथिली कथा] (पृष्ठ ३१-३९) २.६.संतोष कुमार राय 'बटोही'- डायरी- 'लव यू टू' (पृष्ठ ४०-४२) २.७.संतोष कुमार राय 'बटोही'- लघुकथा: चश्मा वाला बाबा (पृष्ठ ४३-४५) २.८.परमानन्द लाल कर्ण- आश्विन मासक एकादशीक माहात्म्य (पृष्ठ ४६-५१) २.९.डॉ योगानन्द झा- सनेस: एक टिप्पणी (पृष्ठ ५२-५६) २.१०.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा- सौंदर्य प्रेम (पृष्ठ ५७-५८) २.११.रबीन्द्र नारायण मिश्र- सीमाक ओहि पार (धारावाहिक उपन्यास) (पृष्ठ ५९-७२) पद्य ३.१.डॉ. जियउर रहमान जाफरी-ई पर्याप्त नहि छल/ बहुत प्रयासरत (पृष्ठ ७४-७५) ३.२.राज किशोर मिश्र-दलिद्दर (पृष्ठ ७६-७९) ३.३.संतोष कुमार राय 'बटोही'- खेतक आरि पर (पृष्ठ ८०-८१)
१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय सूचना हितनाथ झाक लेखन ग्राम इतिहास आ आन रचनाक संग पाठक एवं लेखकक बीच एकटा जरूरी हस्तक्षेप लेल ख्यात अछि। विदेहक ४०५म अंक- ०१ नवम्बर २०२४- हिनकापर एकटा संस्मरण-अंक रहत, जँ अहाँ लग हितनाथ जीसँ संबंधित कोनो रचना बा नीक-खराप अनुभव हुअय तँ से editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १.२.अंक ३९८ पर टिप्पणी नित नवल सुशील पर आशीष अनचिन्हार सुशीलजीक हाथमे गजेन्द्र ठाकुर द्वारा लिखल "नित नवल सुशील" नामक पोथी पहुँचि गेलनि एवं ओ ओकरा पढ़ि रहल छथि। ई हमरा सभ लेल खुशीक बात जे हमरा लोकनि अपन अग्रजक मूल्यांकन हुनका सभकेँ जीबितेमे कऽ रहल छियनि आ हमर अग्रज सभ ओकरा अपन आँखिए देखियो रहल छथि। नबो नारायण मिश्र जीकें सुशील जी पोथी आबि जेबाक सूचना देलखिन। नीक-बेजाए केर कोनो गिनती नहि अछि हमरा लग मुदा मैथिली साहित्यमे विदेह द्वारा एकटा युगांतकारी घटनाक निर्वाह लगातार दस बर्खसँ भऽ रहल अछि जे विदेहसँ पहिने नै भेल छल। अगिला बर्ख एकटा आर नित नवल पाठकक हाथमे रहतनि आ ई हमर विश्वास अछि जे मैथिली ओहि नित नवल द्वारा अपन एकटा बहुत चर्चित मुदा अवडेरल मणि लग पहुँचत। सदिखन अपडेट रहबाक लेल जुड़ल रही विदेहसँ। लक्ष्मण झा सागर बरका बरका देह वाला सभकें विदेह अयना देखाय देलक अछि। हार्दिक बधाइ विदेह!! अभिलाष ठाकुर विदेहक सभ कार्य स्तुत्य अछि!
नबो नारायण मिश्र हार्दिक बधाई
उदय चन्द्र झा विनोद खुशी भेल। गजेन्द्र जी अवडेरल काज करैत छथि। अभिनन्दन दुनू गोटेक। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। गद्य २.१.निर्मला कर्ण-अग्निशिखा खेप ४३ (अंतिम भाग) २.२.आचार्य रामानंद मंडल-मिथिलावाद! २.३.लालदेव कामत-मैथिली पोथी चर्चा : तेँ ओ बजलैए/ मरुवा खेती लाभकारी य/ देशके धनिक लोकक शिक्षा प्रेम जागल/ एकटा आत्मकथा २.४.संतोष कुमार राय 'बटोही'- सासुर मीठगर आओर तीतगर २.५.प्रणव झा- कालचक्र [मैथिली कथा] २.६.संतोष कुमार राय 'बटोही'- डायरी- 'लव यू टू' २.७.संतोष कुमार राय 'बटोही'- लघुकथा: चश्मा वाला बाबा २.८.परमानन्द लाल कर्ण- आश्विन मासक एकादशीक माहात्म्य २.९.डॉ योगानन्द झा- सनेस: एक टिप्पणी २.१०.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा- सौंदर्य प्रेम २.११.रबीन्द्र नारायण मिश्र- सीमाक ओहि पार (धारावाहिक उपन्यास) २.१.निर्मला कर्ण-अग्निशिखा खेप ४३ (अंतिम भाग) निर्मला कर्ण (१९६०- ), शिक्षा - एम. ए., नैहर- खराजपुर, दरभङ्गा, सासुर- गोढ़ियारी (बलहा), वर्त्तमान निवास- राँची, झारखण्ड। झारखंड सरकार महिला एवं बाल विकास सामाजिक सुरक्षा विभागमे बाल विकास परियोजना पदाधिकारी पदसँ सेवानिवृत्ति उपरान्त स्वतंत्र लेखन। (अग्नि शिखा मूल हिन्दी- स्वर्गीय जितेन्द्र कुमार कर्ण, मैथिली अनुवाद- निर्मला कर्ण) अग्निशिखा- खेप ४३ (अंतिम भाग) ४१ पूर्व कथा पुरूरवा अपन तन-मन के सुधि बिसारि ध्यानमग्न भय गंधर्वराज विश्ववसु के तपस्या में निमग्न भय जायत छथि।
आब आगू एक बेर पुरूरवा सिद्धासन में जे बैसलथि, ओ बैसलहि रहि गेलाह। एकर बाद तs दिन- राति, मास आ बरस बीतs लागल। एहि तरहे कतेको वर्ष बीति गेल। ओ तपस्यालीन रहथि, ओहि काल में चित्रसेना अहर्निश हुनकर सेवा करैत रहलीह। चित्रसेनाक परम लक्ष्य छलथि पुरूरवा ! ओ अपन जीवनक अन्तिम लक्ष्य पुरूरवाक सेवा बना लेलथि। अनेकों वर्ष ई क्रम चलैत रहल। जेना पुरूरवा अपन तन-मन के सुधि बिसारि तपस्या में लीन रहलथि तहिना चित्रसेना अपन तन-मन के सुधि बिसारि पुरूरवाक सेवा में लीन रहथि। कतेको वर्षक उपरान्त कालक्रम में चित्रसेना प्रकृति के क्रूर आघात सs आक्रांत क्षत-विक्षत भय मृत्युदेवी के प्राप्त भेलीह।मृत्युदेवी के आलिंगन में बन्हा कs हुनक उपालंभ, प्रवंचना, यातना,विरह-वेदना सब किछु विलीन भs गेलनि । सत्य अछि मृत्यु सँs पैघ सुखक कोनो तत्व नहि अछि! मृत्यु सब दुखक अंत होइत छैक ! एहि सब घटना सँ अनभिज्ञ पुरूरवाक तपस्या निर्बाध चलैत रहलनि । कतेको वर्ष व्यतीत भेलाक उपरांत गंधर्व राज विश्ववसु हुनक समक्ष प्रगट भेलखिन । जखन गंधर्व राज विश्ववसु अपन कोमल हाथ सs पुरूरवाक संपूर्ण शरीर के स्पर्श केलथि,तखन ओ पूर्णतः स्वस्थ भs गेलाथि। हुनकर शरीर पहिने सन स्वस्थ आ सुदर्शन भs गेल छलनि, कारण! गंधर्वराज के हस्तकमल सs हुनकर संपूर्ण शरीर पर अमृतवर्षा भs रहल छल! गंधर्वराज प्रसन्न भs कs बजलाह - "वरदान माँगू वत्स! हम अहाँ सँ अत्यंत प्रसन्न छी!" "हमरा उर्वशी चाही गंधर्वराज। हमरा हमर उर्वशी आपस दs दिअ, अहाँ सँs हमर एकमात्र आग्रह यैह अछि" - पुरूरवा गंधर्वराज सँ अनुरोध केलथि। 'राजन् , अहाँ असंभव वरदान माँगि लेलहुँ! भले अहाँ के दृष्टि में क्षीण माँग अछि ई,जे आहाँ मँगलहुँ, मुदा हमरा वास्ते ई दान असंभव अछि। ई दान देनाई हमर सामर्थ्य सँs बाहर अछि। उर्वशी के विषय में कोनो निर्णय केनाई हमर अधिकार क्षेत्रक सीमा सँs बाहर अछि। हँ ! एकर स्थान पर हम अहाँ केँ ई अग्नि-स्थली दs रहल छी। एहि में प्रज्वलित अग्नि के अहर्निश प्रज्वलित राखब। उर्वशी के नामक जाप करैत दिन-राति एहि में आहुति दैत रहब! जा धरि एहि अग्निकुण्ड के ज्वाला प्रज्वलित रहत, आ जा धरि अहाँ जीवित रहब ता धरि आहुति दैत रहय पड़त। अपन मृत्यु उपरान्त अहाँ सब किछु बिसरि जाएब । अहाँ केँ कनेको स्मरण नहि रहत जे अहाँ के थिकहुँ अथवा अहाँ कहियो उर्वशी सँs प्रेम कएने रही। अपन मृत्यु उपरान्त अहाँ गंधर्व लोक के सुशोभित करब।" गन्धर्वराज पुरूरवा केँ आशीर्वाद दैत एक गोट अग्नि-स्थली देलखिन। पुरूरवा गन्धर्वराजक हाथ सँs अग्नि-स्थली लऽ लेलथि , मुदा एतेक कठिन दीर्घ तपस्याक फलस्वरूप वरदानक रूप में हुनका जखन उर्वशी केँ नहि देल गेलनि तखन ओ अत्यंत क्रोधित भs गेलाथि। अग्नि-स्थली में प्रज्वलित अग्निकुण्ड के अग्नि हुनक हृदय में जा कs प्रचण्ड क्रोधक ज्वाला रूप में प्रज्वलित भs गेलनि। आ ओहि क्रोध के प्रभाव में उचित-अनुचितक बिना कोनो विचार केने ओ गंधर्व राज के कहय लगलाह - "हम एहि अग्नि स्थली के लs कs की करब गंधर्वराज ? ई हमर कोन प्रयोजन सिद्ध करत? हम एहि अग्निकुण्ड के अग्नि किएक प्रज्वलित राखब ? किएक हम अग्निकुण्ड के अहर्निश प्रज्वलित रखबा हेतु निरंतर आहुति दैत रहब ? उर्वशीक वियोग में स्वयं हमर जीवन अहर्निश प्रज्वलित अग्निकुण्ड बनल अछि! जाहि में सभ दिन विधि के लेख सs हमर विदग्ध प्राणक आहुति हविष्यान्न बनि अर्पण होइत अछि। हमर हृदय अग्निशिखा सम प्रज्वलित भय उर्वशीक आगमन के मार्ग प्रकाशित कएने अछि। जाहि सs उर्वशी के आगमन भेला पर निर्विघ्न ओ स्वयं हमर नेत्रपथ में दृश्य भs जाइथ। तेँ हमरा कनिको आवश्यकता नहि अछि एहि अग्निस्थली के।" - ई कहि ओ ओहि अग्निस्थली केँ भूमि पर फेकि देलथि । अग्निस्थली भूमि पर खसि खण्ड-खण्ड भय छितरा गेल छल ! आ ओहि संग खण्ड-खण्ड भय गेल छल पुरूरवाक उर्वशी सs मिलन के आस! संभवत: जीवन पर्यन्त अग्निकुण्ड में आहुति यदि ओ दैत रहितथि तखन मृत्यु उपरांत गंधर्व बनि उर्वशी सs हुनक मिलन भs जा सकैत छल, मुदा आब तs पुरूरवाक संपूर्ण आस छिन्न-भिन्न भs गेलनि lअग्निस्थली फेंकि पुरूरवा उन्मत्त-प्रमत्त सन दिशाहीन एक अपरिचित मार्ग पर प्रस्थान कs गेलथि। गंधर्वराज अग्नि-स्थली दs अंतर्ध्यान भय गेल छलाह । पुरूरवाक नैराश्य जनित क्रोध देखवा हेतु हुनका क्षण भरि रुकवा के पलखति कहाँ छल! आ ने टूटल अग्निस्थली के खण्ड चुनवा के हुनका आवश्यकता छलनि। हुनक वीरता आ अद्भुत शासन-संचालनक यश कीर्ति गंगाक विशुद्ध निर्मल जल सन तीनू लोक में प्रवाहित भs रहल छल। हुनकर अद्भुत शासन, पराक्रम आ वीरताक कथा इतिहास आ पुराण में प्रमुखता सs अपन स्थान बनौने अछि । जा धरि सूर्य चन्द्रमा रहत, ई धरती रहत, ई विस्तृत व्योम बनल रहत हुनक यशकीर्ति अक्षुण्ण रहत। युग-युग तक हुनक पराक्रम के सम्मान संगे हुनकर बहादुरी के बखान लोक-बेद करैत रहत। पुरूरवा आ उर्वशी के प्रेम कथा के गायन मात्र प्रेमीजन नहि,सामान्य जनता आ आम समाज के मानव सेहो प्रेम के प्रतिष्ठा बतबय आ ओकर महत्व प्रतिपादित करवा हेतु करत। पुरूरवा आ उर्वशी के प्रेम कथा अमर भय गेल। मुदा प्रेमसँ व्यथित हुनक जीवनक अंतिम अवस्था में हुनक स्थिति की भेल छलैक, ई प्रश्न सदिखन हुनक अंधकार मय जीवन सन कतहु ने कतहु अतीतक गहन अंधकार में स्थिर नुकायल रहल। ओ सदिखन अंधकार के कज्जल कालिमा युक्त यवनिका सs झाँपल रहल एन-मेन हुनक अन्हार जीवन सन । कियो नहि देखि सकल, केओ नहि बूझि सकल।एते धरि जे हुनक समकालीन राजा हुनक अपन वंशज सेहो प्रेमक प्रति हुनक अनुरागक वर्णन नहि केलथि। इतिहास हुनक अंतिम तमसाछिन्न जीवन केँ कालिमा युक्त शब्द दय अपना में समाहित करबाक साहस नहि जुटा सकल। एहि सँ जनमानस के अंतस में दृढ़ता सँs बसल हुनकर सक्षम प्रशासक आ बहादुर योद्धा केर छवि पूर्णतः कलंकित भs जाइत। संभवतः एहि भय केर कारण इतिहास सेहो हुनक जीवन केर ओहि अमा पक्ष के वर्णन नहि कय मौन रहल। मात्र पुरूरवाक जीवन केर धवल पक्ष के वर्णन कएल जाइत रहल जाहि सौं हुनकर उज्वल यश कीर्ति पर कालिमाक कनियों धब्बा नहि बुझना में अबइन । पुरूरवाक जीवन सदिखन अग्निशिखा सम रहल। एकटा अग्निशिखा जे संसार केँ प्रकाशित करैत रहल - कुशल प्रशासक के रूप में! एकटा वीर योद्धाक रूप में! देवता लोकनि के सहायक बनि मानव जाति केर सम्मान बढ़ेलक! पृथ्वीलोकक सम्मान केँ सम्पूर्ण त्रिलोक में प्रसारित केलक! मुदा एहि अग्निशिखा पर जखन स्वर्ग के स्वार्थ लिप्सा रूपी कालिमा व्याप्त होमय लागल, तखन ई अग्नि शिखा स्वयं पुरूरवाक जीवन के भस्मीभूत कय देलक!
इति
(समाप्त) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.आचार्य रामानंद मंडल-मिथिलावाद! आचार्य रामानंद मंडल मिथिलावाद! (प्रवीण नारायण चौधरी आ आचार्य रामानंद मंडल के वाद-विवाद।इजोत वाह्टस ग्रुप पर चैटिंग।) प्रवीण नारायण चौधरी- कनिक जवाब ताकू तः १. अपन मिथिला समाज मे राजनीति के अर्थ कि रहि गेल अछि? २. नेता आ जनप्रतिनिधि केना चुना रहल अछि? ३. समाज आ सार्वजनिक सरोकार पर केकर निगरानी देखि रहल छी? ४. एहि अकलबेरा (अराजक राजनीतिक गन्डमगोल व्यवस्था) मे 'मैथिली-मिथिला' अर्थात् 'मिथिलावाद' सँ कतेक लोक ताल्लुक रखैत अछि? ५. समाज आ परिवार मे विखन्डन सँ केहेन दूरगामी असर पड़ैत अनुमान लगबैत छी? किंवा केहेन उपद्रव आ हिन्सा के विद्यमान दुरावस्था स्पष्ट देखाय लागल अछि? जिवन्त समाज मे मुंह बाबिकय ठाढ़ किछु महत्वपूर्ण प्रश्न सब पर सक्षम आ सामर्थ्यवान विद्वत् समाज केँ चिन्तन करहे टा पड़त। देखने होयब - वोट के संख्या अपन पक्ष मे पाड़बाक लेल १-२% (अल्पसंख्यक) अगड़ा जाति (एलिट्स, प्रबुद्धजन, आदि) केँ अपन मूल गाम-ठाम सँ उपटिकय प्रवास स्थल पर जाय कोहुना रोजी-रोटी कमेबाक आ परिवार केँ बचेबाक बाध्यकारी परिस्थिति तथाकथित 'समाजवादी आ सामाजिक न्याय वला राजनीति' करनिहार 'भूराबाल साफ करो' कहिकय कय देलक। एकर दुष्परिणाम यैह भेल छैक जे आब समाज मे कोनो बात लेल कियो केकरो रोकटोक आ हंट-दबार न आब अनुशासन आ सुसभ्यता लेल शिक्षक अथवा पैघ अभिभावक लोकनि धियोपुता केँ हंटय-दबारय नहि छैक। कारण ओ 'सामाजिक न्याय' तेना अपन रंग देखा देलकैक समाज केँ जे नीति-नैतिकता गेल भाँड़ मे, सब अपनहि स्वच्छन्दता मे आकन्ठ मस्त अछि। तथापि, चिन्तन चलैत रहबाक चाही। तेँ ई सवाल राखल अछि। काल्हि एकटा मंच पर खुलेआम चुनौती दैत कहलियैक जे एखन त हिन्सक रग्गड़ मात्र ट्रेलर देखि रहल छी, किछु वर्ष (मात्र ५ सँ १० वर्ष) मे अहाँ 'रक्तरंजना' देखब। रक्तक धार बहयवला जनसंघर्ष केना प्यासल दृष्टि सँ हमर मिथिला समाज केँ ग्रास बनबय लेल ताकि रहल अछि से ओ दूर... किछु दूर पर ठाढ़ ओ काल हमरा ओहिना नजरि पड़ि रहल अछि। आगामी पीढ़ी लेल चिन्ता बढ़ि रहल अछि। पलायन सँ पहिने सँ टूटल, किछु समय बाद जनसंघर्ष मे समाज केँ फँसैत एखनहि देखि रहल छी। चिन्तन तेँ बढ़ि रहल अछि। मिथिलावाद जिन्दाबाद!! अपन मौलिक संस्कार केँ शीघ्रातिशीघ्र बचबय जाउ। हरिः हरः!! आचार्य रामानंद मंडल - समाजवाद आ सामाजिक न्याय के विरोध इहे हय मिथिलावाद। तब त समाजवादी आ सामाजिक न्याय के लेल मिथिलावाद पर विचार करनाइ आवश्यक हो जाइ हय। सधन्यवाद। आचार्य रामानंद मंडल - मिथिलावाद के सिद्धांत के बारे मे बताउ। मिथिलावाद के जनक कोन हतन। प्रवीण नारायण चौधरी - मिथिलावाद के सिद्धान्त बहुत सहज अछि। जनक समाजवाद एकर मूल आधार छी। समाज मे कियो केकरो बारि नहि सकैत अछि। सभक श्रमदान केँ परस्पर उपयोग मे आनि सौहार्द्रताक बन्हन मे कसिकय बन्हायल समाज, जे मिथिलाक सामान्य संस्कार आ जीवन पद्धति मे समाहित अछि। डोमक चंगेरा-कोनियाँ, कुम्हारक अहिबात-पुरहर, मालीक मौर, सोनारक सोन, कमारक वेदी, चमारक रसनचौकी, नौआक होम-सामग्री, बाभनक मंत्रपाठ, धोबिनक सोहाग, आदिक जरूरत एकटा विवाह संस्कार लेल आवश्यक बनायल गेल अछि, ठीक तहिना मिथिलाक समस्त कर्म-सिद्धान्त मे एक-दोसरक रक्षा प्रति वचनबद्धताक नीति रहल अछि। आजुक अर्थप्रधान युग मे जातीय कर्म आ जाति-पाँतिक कोनो मर्यादा-सीमा नहि बचि जेबाक कारण आधुनिक व्यवहार अनुसार समाजक वर्गीकरण करैत चारि मूल वर्णक आधार पर व्यवस्थापन करब जरूरी अछि। मन्थन एहि सब विन्दु पर करियौक लोकतंत्र मे लोक द्वारा चुनल गेल सरकार लोकहित मे बनायल गेल संविधान मुताबिक चलायल जाइत छैक। एतय दुइ गो बात पर गौर करू - लोकहित मे बनायल गेल संविधान आ लोक द्वारा चुनल गेल सरकार, संविधान मे समय-समय पर संशोधन करैत लोकहित के सही मूल्यांकन जरूरी छैक, जँ से नहि भेल त दुर्घटना तय अछि। आइ हालत एहेन अछि जे लोकहित कम जातिहित-धर्महित आदिक चर्चाक आधार पर लोकमत (अभिमत) प्राप्त कय जनप्रतिनिधि चुनल जाइछ। लोकहित के सर्वोपरि सिद्धान्त लेल लड़निहार कोनो उम्मीदवार केँ पार्टी टिकट नहि दयकय करोड़ों रुपया खर्च करबाक कुब्बत रखनिहार अधिकांश धनकुबेर केँ चुनाव लड़बैत छैक। ओहि जनप्रतिनिधिक कोनो माइन-मोजर सदन मे नहि रहि पार्टी लाइन पर चलब ओकर नीयति बनि जाइत छैक। संविधान प्रदत्त पार्टी विशेषाधिकार 'व्हिप' मानू विशेष विषय लेल मात्र नहि, सब विषय पर लागू रहल करैत छैक। कोनो जनप्रतिनिधि अपन क्षेत्र आ लोकक प्रतिनिधित्व कतेक कय पबैत अछि से देखिते छी। एहेन स्थिति मे वास्तविक लोकतंत्र चलल या कोनो प्राइवेट लिमिटेड कम्पनीक सरकार चलल? कि ई ब्रिटिश सम्राज्यक ईस्ट इंडिया कम्पनी जेकाँ वर्तमान लोकतांत्रिक सरकार चलब नहि भेलैक? मन्थन एहि विन्दु सब पर करियौ। लोकहित के सिद्धान्त सुपरिभाषित छैक, स्वयं प्रकृति द्वारा ई परिकल्पना पर संसार टिकल अछि जे पैघ-छोट सब मिलिजुलि रहू। जीव के आहार जीव हेतय, लेकिन आहार योग्य सजातीय जीव किन्नहुं नहि हेतैक। मानव कदापि मानव केँ नहि खाय। लेकिन वर्तमान 'सामाजिक न्याय' मे 'भूराबाल साफ करो' वला लोक आओत आ 'मसीहा' कहाओत, ओकरा 'समाजवादी धाराक राजनेता' मानल जायत। आब बताउ! एहेन स्थिति मे केहेन समाजक निर्माण होयत आ ओहि ठामक प्रजाक हित केना होयत? मन्थन एहि सब विन्दु पर करियौक। हरिः हरः!! आचार्य रामानंद मंडल - हम त सोचैत रहली हय कि कोनो आधुनिक सामाजिक चिंतक के विचार हय मिथिलावाद। परंतु इ त मनुस्मृति वा मनु संविधान पर आधारित वर्ण-व्यवस्था वा वर्णाश्रम आधारित मिथिलावाद हय।वा मिथिलावाद के खोल मे ब्राह्मणवाद हय। ब्राह्मणवाद समाजवाद आ सामाजिक न्याय विरोधी सिद्धांत हय।कृषक जनक आ धरती पुत्री सीता के मिथिलावाद से दूरे रखूं।अइला कि इस दूनू सर्वमान्य हतन। सधन्यवाद। प्रवीण नारायण चौधरी - ब्राह्मणवाद, मनुवाद, मनु संविधान, वर्णव्यवस्था, वर्णाश्रम धर्म के परिभाषा अपनेक दृष्टि मे कि अछि ताहि पर हम कोनो विचार नहि थोपब आदरणीय महानुभाव। परञ्च ई तथाकथित समाजवाद आ सामाजिक न्याय के बात कहल त बताउ ७५ वर्ष के स्वतंत्र भारत मे अपने गैर-ब्राह्मण मे शिक्षा आ रोजी-रोजगार सँ लैत वर्गीय अन्तर केँ केना सम्बोधन होइत देखलहुँ? आर, एहि ७५ वर्ष मे रक्तरंजना (जाति-धर्म मे विखन्डित समाज मे जनसंघर्ष) के प्रत्यक्ष तस्वीर कि बुझबैत अछि अहाँ केँ? भूराबाल त साफ भ' गेल। आइ समाज केँ दिशानिर्देश करयवला आधार नव संविधान सँ समस्याक कतेक निदान भ' सकल अछि? आचार्य रामानंद मंडल- हमर अंहा के विचार समानान्तर धारा के विचार हय। समानान्तर रेखा आपस मे न मिलय हय। परंतु गणितज्ञ के मानव हय कि समानान्तर रेखा अनंत विंदू पर मिलय हय। सधन्यवाद। प्रवीण नारायण चौधरी - आर, ई नीक सँ याद राखू - लोकतंत्र मे लोक के संख्या गण्य होइत छैक। ब्राह्मणक संख्या मुठ्ठी भरि छैक, सेहो पलायन उपरान्त गाम-के-गाम खाली कय देलक। काल्हि मिथिलावाद केँ चलबय लेल ओ ब्राह्मण केँ ब्रह्माजी के पावर भेटि जेतैक से समझ जँ मन मे अछि त अपन शिक्षा-दीक्षा आ बौद्धिक क्षमता पर पुनर्विचार करब। चलबाक त अछि भारतीय संविधानहि अनुसार, वैह व्यवस्था, वैह विचार आ वैह तथाकथित समाजवाद आ सामाजिक न्याय, आरक्षणक राजनीति, धार्मिक उन्माद, आदि। प्रवीण नारायण चौधरी- कोन वैज्ञानिक समानान्तर रेखा के अनन्त विन्दु पर मिलय हय कहलकय? कोन ठाम पढ़लियैक ई गणित सर? विचार के मिलन विन्दु व्यक्ति अनुसार नहि होइत छैक। दर्शन कहैत छैक जे विचार मे समानता आ भिन्नता देश, काल व परिस्थिति अनुसार होइत छैक। अहाँ जे किताब पढ़लहुँ, जाहि सामाजिक परिकल्पना मे लागल छी, ताहि मे वैचारिक भिन्नता रहितो लोकमिलन तय विषय छैक। समाज सँ बाहर न अहाँ आ न हम। असगरे लोक फेफियाकय मरि जायत। आचार्य रामानंद मंडल - जी। महाविद्यालय मे प्रोफेसर साहब के कहब।वोहो बीएससी मे।वोना अंहा कोन विषय से पढले छी।आ अपने कंहा के बासी छी जानकारी देब। आचार्य रामानंद मंडल - समानान्तर रेखा अनंत विंदू पर मिलैय छैय। एगो परिकल्पना हय।पढैले हतन।स्व भैरव झा,स्व अभिमन्यु झा । गोयनका कालेज, सीतामढ़ी। प्रवीण नारायण चौधरी - हम गणित विषय के शिक्षक रहल छी। विराटनगर मे अंग्रेजी आवासीय विद्यालयक पूर्व शिक्षक आ वर्तमान मे निर्यात प्रबन्धक (निजी संस्थान) मे कार्यरत छी। जनक-जानकीक सन्तति 'मैथिल' छी। आत्मविद्याक आश्रयदाता भूपाल जनक मैथिलक प्रजा तेँ मैथिल छी। ओना भूराबाल के 'बा' छी। आचार्य रामानंद मंडल - जी। मनुष्य एकटा सामाजिक प्राणी हय।अइ मे कोनो संदेह न हय। परंतु समाज पर कोनो व्यक्ति आ समुहे शासन करय हय।तै कोनो वाद के जन्म होय हय। राजतंत्र वा प्रजातंत्र। प्रवीण नारायण चौधरी - प्रजातंत्र के परिभाषा त स्पष्टे अछि। भोरे लिखने छी। प्रजाक मत सँ जनप्रतिनिधि केना चुनाइत अछि आ प्रजाहितक बात करैत कोना संविधान तैयार करैत अछि, आ पार्टी सँ टिकट व लोक सँ मत प्राप्त करबाक मूलाधार आइ करोड़क-करोड़ टका व बाहुबल कोना छैक, जितलाक बादो ओकर बात सदन मे कतेक चलैत छैक आ केना प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी जेकाँ गवर्नेन्स चलैत अछि, सब बात पर लिखने छी। प्रजाहित लेल परिकल्पित संविधानक दायरा सँ प्रजाक कतेक हित भ' रहल छैक, कतेक विकास देखि रहल छी, सारा विन्दु पर प्रकाश देल अछि। आचार्य रामानंद मंडल - भूराबाल त बिहार होइत नेपाल चल गेल हय।वोना भूराबाल चार गो जाति के संक्षिप्ताक्षर हय।हां बुरा लगय छैय जेना अन्य जाति समूह के सोल्हकन वा रार। सधन्यवाद। प्रवीण नारायण चौधरी- सोल्हकन या रार सामन्ती युग के देन थिक सर। अपनेक भारतवर्ष मे बुद्धकाल आ पछाति काल मे यैह सामन्ती व्यवस्थाक आधार रहल अछि। मुगलकाल व ब्रिटिशकाल सेहो ओहि सामन्ती (बरिया) के माध्यम सँ अपन राज चलेलक। सामन्तवादक शब्द लोकतंत्र मे अवैध घोषित अछि। वर्तमान संविधान मे जातिसूचक सामन्तक प्रयोग कयल शब्द दण्डनीय अपराध थिकैक। कथी लेल घिसल-पिटल विन्दु पर आइयो जिबि रहल छी अपने समान बुद्धिजीवी? आचार्य रामानंद मंडल - जी त राजेतंत्र।इ ब्राह्मणवाद के अनुकूल हय।राजा विष्णु के अवतार होइ हय। जेकरा प्रजातंत्र विखंडित करय हय।आबि राजतंत्र असंभव हय। आचार्य रामानंद मंडल - बात त सही कहय छी। परंतु सामंती के। वोही सामंती के लेल न समाजवाद आ सामाजिक न्याय इलाज हय। प्रवीण नारायण चौधरी - इलाज खाली शब्द मे? आ कि व्यवहारो मे? समाजवाद त देखबे कयल जे केना अपन आ अपन सन्तान व परिजनक हित मात्र कयलक। जमीन पर ७५ वर्ष के परिणाम नहि देखि रहल छी की? आ कि बस अन्ठा रहल छी? प्रवीण नारायण चौधरी - समाज मे रहयवला ब्राह्मणवाद के पीड़ा केना भोगलक? किछु प्रकाश दी, हमर अध्ययन लेल। कारण समाज मे ब्राह्मणक वर्चस्वक कोनो प्रभाव हमरा जीवनकाल (५१ वर्ष) मे हम नहि देखि पेलहुँ, या फेर स्वयं ब्राह्मण होयबाक कारण हमर नजरि एहि दिश नहि गेल होयत। कृपया समझाबी हमरा। आचार्य रामानंद मंडल - परिवारवाद।कि राजतंत्रीय व्यवस्था परिवारवाद न हय। वर्णवाद कि परिवारवाद न हय। प्रवीण नारायण चौधरी - उत्तर गोलमटोल देला सँ काज नहि चलत सर। स्पष्ट रेखांकित करू। ७५ वर्ष के ई समाजवाद आ सामाजिक न्याय के परिणाम ७०% प्रजाक लेल पलायन रोग केना देलक? आचार्य रामानंद मंडल - हम त ६४बा साल मे छी। प्रवीण नारायण चौधरी - हँ, तेँ न हम अहाँ सँ अनुभव प्राप्त करय लेल प्रकाश दियए वास्ते आग्रह कयल। ६४ वर्षक सूर्योदय देखनिहार जाहि कोनो समाज के वासिन्दा होइ, कहू जे ब्राह्मणवाद के पीड़ा समाज केँ केना पीड़ित कयलक? आचार्य रामानंद मंडल- उत्तर कोनो गोल मटोल न हय। ब्राह्मणवाद से कोनो ज्यादा गोल मटोल हो सकय हय।आइ पूरा समाज ब्राह्मणवाद से पीड़ित हय।आ ओकर प्रतिकार से ब्राह्मणवाद पीड़ित हय। प्रवीण नारायण चौधरी - ऊपर के वार्ता बेर-बेर पढ़ी। अपने केँ अपन दृष्टि कतेक फरिच्छ आ दूर धरि कतेक देखबाक सामर्थ्य विकसित भेल अछि से स्वतः पता चलि जायत। हमर शुभकामना। मिथिलावाद के अर्थ विकृत करबाक कुत्सित प्रयास लेल कोनो धन्यवाद नहि। जमीन पर भेटब, समाज के असलियत आँखिक सामने देखाकय, उदाहरण दैत अहाँ सँ बात करब। प्रणाम! आचार्य रामानंद मंडल- मिथिलावाद के अर्थ अंहा संकीर्ण आ कुत्सित क देलीय।हम त मिथिलावाद के आधुनिक सामाजिक सिद्धांत के देखेला रहली हय। परंतु अंहा के विचार से पता चलल कि शराब पुरनके हय शीशी नया हय। मिथिलावाद के आड़ मे अंहा मिथिलावासी से षड्यंत्र क रहल छी। हमरा बड़ा दुख हय। प्रवीण नारायण चौधरी - क्षमा करब। वार्ता अन्त कय देने छी। अहाँ पूर्वाग्रही आ कुन्ठित विचारधाराक लोक बुझा रहल छी। कहियो भेटियेकय समाजक विभिन्न लोक व वर्ग केँ देखाकय प्रत्यक्ष वार्ता नीक रहत। आचार्य रामानंद मंडल - उल्टा बात न करू।बाघ आ बकरी वाला कथा अंहा जनते होयब।हम आधुनिक विचार के छी। अंहा पुरातन विचार के। लोग अब बुधियार हय। लोग अंहु के हमरो विचार के अकांतय आ निर्णय लेतय।कोनो के झांसा मे न अतय। चाहे हम होहु आ अंहा। सधन्यवाद। -आचार्य रामानंद मंडल, सीतामढ़ी।मो -9973641075 ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.लालदेव कामत-मैथिली पोथी चर्चा : तेँ ओ बजलैए/ मरुवा खेती लाभकारी य/ देशके धनिक लोकक शिक्षा प्रेम जागल/ एकटा आत्मकथा लालदेव कामत- मैथिली पोथी चर्चा : तेँ ओ बजलैए/ मरुवा खेती लाभकारी य/ देशके धनिक लोकक शिक्षा प्रेम जागल/ एकटा आत्मकथा १ मैथिली पोथी चर्चा : तेँ ओ बजलैए हालहिमे १०४ लेखकक रचना छपल घरेलू अर्धवार्षिक पत्रिका ' देसील वयना ' दशम विशेषांक पढलहुँ अछि,तँ सहजे श्री आनन्द मोहन झाजी मोन पड़ि गेलाह। हड़री - अंधराठाढ़ी निवासी कवि श्री झा जीके १०४ पृष्ठक ग़ज़ल संग्रह'क मैथिली भाषा मेँ एक अदभुत पोथी " तेँ ओ बजलैए " नवारम्भ प्रकाशन मधुबनी सँ २०२३ म बहराएल रहय। एहि नव पोथीमे ८६ गोट ग़ज़ल छैक। जाहिक दाम दू सय टाका अछि, जे अपन पाँचो छोटे बहिन यथा- जया, अपर्णा, भव्या , विजया आ शैलजा केँ ससिनेह समर्पित कयने छथि। मधुबनी जिला'क चर्चित चन्देश्वरस्थान - हरड़ी गाममे आनन्द मोहन जीक जन्म १४ मार्च १९७२ ई० केँ स्व० मंजूला देवी आओर स्व० चन्द्र मोहन झा जीके घर भेलनि। ओ साइंसमे ग्रेज्यूएशन आ बी. एड० कयने छथि। अपना गाममे बहुतों विद्यार्थी हिनका सँ पढ़ि नीजी जीवनमे आगू बढलैक से सुजश तँ पसरले छलनि,मुदा ताहू सँ बेसी प्रसार भेल छन्हि झा जीके विविध मँच पर गजलकार रूपेँ। अपन सिरजल गजलक पोथी सँ पूर्वहि नव कविताक मैथिली पोथी ' ई नहि थिक हमर प्रार्थना ' - सन् २०२० मे प्रकाशित करेबामे अगुएलाह । मिथिलांचल सर्वांगीण विकास संस्थान, बेनीपट्टी द्वारा २०२२ मे हिनका मिथिला गौरव सम्मान प्राप्त भेलनि। ओहि सँ पूर्व अपना नामे पुरस्कार रूपेँ राजभाषा सम्मान आ मैथिली सेवी सम्मान सेहो अर्जीत कय चुकल छथि। पोथिक आवरण पृष्ठ सज्जा बढ़ आकर्षक पाठककेँ देखमे आओत। निलाकाशमे अनगिनत चकमक करैत तारा केर बीच साहित्यिक चित्र कोयलिक देख पड़ैछ, जकरा मिथिलाक ललना जहांति तुषारिक लालटरेस नैका साड़ी बेसम्हार पहिरल देखाईछ। आनन्द मोहन जीक एहने कोइलिक कूक सन मिठगर वाणीमे रसाएल रमनगर ग़ज़ल सामाजिक चरित्र सभकेँ चिन्हेबामे सक्षमता देखाबैछ। ग़ज़ल मैथिली साहित्यमे रचै संग पूर्व आनन्द गुरूजी हिन्दी मे उर्दू - फारसीक तर्ज पर रचना करैत काव्य गोष्ठीमे प्रस्तुति धरि दैत रहलाह आ थोपरी भेटैत रहलनि। एहि उत्साहवर्धन सँ ओ अपन नेनपनके साहित्यक अभिरुचि केँ आरो परिष्कार करैत आगू डेंग बढौलाह अछि। हिनका स्वयं पर चोटिक गजलकार बशीर बद्र ,मुन्नवर राणा, निदा फ़ाज़ली, अनिरुद्ध सिन्हा, सुनील तंग इनायतपुरी, शकील अहमद मोइन, वसीम बरेलवी, बुद्धिनाथ मिश्र, अनिल सिंह, हातीन जावेद एवम् गुलरेज शहजाद आदिक रचनाधर्मिता'क असैर छन्हि। आनन्द जीके गजल'क 'यूएसपी' वैचारिकताके कायल प्रसिद्ध साहित्यकार सर्वश्री तारानंद वियोगी जी, रमेश जी, कथाकार अशोक जी, शिवशंकर श्रीनिवासजी , विनोद जी, अरविंद ठाकुर जी आ कमल मोहन चुन्नू जी सेहो छथि। आन गजलकारके मतला आ बहर सँ हंटिकय हिनक ग़ज़ल रचना अकविता जँका सरल ओ निछछ स्वस्थ कथ्य समस्यामुलक होई छन्हि जे एकहि गजलमे अनेकों समस्या आ तकर समाधान दिश संकेत करैत छैक। गजल मुख्यत: नायक - नायिका अर्थात स्री- पुरुषक बीचक प्रेमभावके गहींरपनके अन्त:वार्ता होईछ,जकरा अन्तरवार्ता रूपेँ पाठक बीच समक्ष कयल जाइछ। मुदा आनन्द जीक ग़ज़ल समाज , राष्ट्र आ विश्वमे पसरल अनियमितता ओ संकटके निदान कोना होय, ताहि लेल एक विमर्श दैत अछि। तेँ हिनक गजलक प्रशंसा नवतूरक अमल झा, मैथिल प्रशांत, अक्षय आनन्द , गुंजनश्री , बालमुकुंद ,कमलेश प्रेमेन्द्र ,नवल श्री , सुमित मिश्र, राघव रमण, अनुराग मिश्र आदि करैत रहलैन अछि। जाहि धाराक ग़ज़ल आनन्द मोहन जी रचैत सामाजिक विद्रूपता, मूल्यक स्खलन, सत्ताक उद्ण्ड सोभाव आओर जनताक बेवशीकेँ स्वर देबामे एहि विधाकेँ माध्यम बनौलनि से नीक विषय थिक, मुदा गजलके सेहत लेल हिनका गजलके आलोचना करैत आशिष अनचिन्हार, प्रदीप पुष्प , दीप नारायण विद्यार्थी सन गजलकार यक्ष प्रश्न उठबैत रहल। ओना सामान्य पाठकगकेँ हिनक रचनामे जनवादी बुझाएत। यथा- ...., .,.,..., माथे झुकौने ठाढ़ अदौ सँ रहल मुदा संतान ओकर नहिं झुकतै तेँ ओ बजलैए ।
दाबि देबै आवाज समय ओ चलिए गेलै सभ रीति-रेवाज बदलतै तेँ ओ बजलैए। दोसर एकटा हृदय केँ छुबय बाला पाँति द्रष्टव्य -:
अकाल बाटमे ओना गेलैए कुमूदनी रौदमे मौला गेलैए ।
पताका गाड़ि जे एलै शहर सँ से अपने गाम में गाममे बौआ गेलैए। ............
ऐ तरहेँ किसानक अवनति आ धनिकके उन्नति पर हिनक बेखौफ कलम सेहो चललनि अछि -: ......... टाटा - बिड़ला पहिल पृष्ट पर कतिया गेल किसानक बात ।
पैरक त'र सँ धरती घुसकल आर करैत छी चानक बात ।..........
जहिना समाजमे असमानता व्याप्त छैक आ देशके आजादी'क अमृतकाल बितलोपर संविधान 'क अनुसारे राष्ट्रीय लक्ष्य रहल अछि समानता हुअय! से एखनोधरि नहिं भेलैक अछि। आनों - आनों लक्ष्य प्राप्तिक दिसामे सरकार स्तर पर काज प्रगतिमे अछि। हिना लेखक विरादरीमे सेहो पक्षपातक - द्वेष भाव देखल जाईछ,ताहिके सुधारबाक यथेष्ट परियास आनन्द मोहन जी कयलनि,तकर हम प्रशंसा करैत छी। पाँतिक गढ़हैन एहन निम्न भेल छन्हि -: ........ निज जीवन तँ रहलै बिनु अनुशासनकेँ अनका लए सिद्धान्त लिखलकै कवितामे। अगड़ा - पिछड़ा , बाभन - सोलकन माथामे समरस स'र - समाज लिखलकै कवितामे। सरकारी खर्चा पर विश्व भ्रमण क' क' सत्ता मुर्दाबाद लिखलकै कवितामे। २ मरुवा खेती लाभकारी य एकटा एहन जजात जे मिथिला प्रक्षेत्रमे साबिके जमाना सँ खेती -बारी होइत आबि रहल अछि जे गरिबाहा मनुखक मुख्य भोजन होइक। एहिक लाल ढेसर मेँ भैटक दाना सन महीन अन्न कए सरकारी स्तर पर मोटा अनाज कहल गेलैक अछि। उँच्च पोषण क्षमता बाला ऐ जजातके कम पानि आ कमे खाद सँ नीक पैदावार लेल जाइछ। अनेकों तरहक बेमारी सँ जकरल लोक मरुआ चिकस सँ करगर रोटी बनाए कय खाथि तँ गम्भीर रोग सँ मुक्त रहत। मरूवा के दोसर नाऊ रागी आ नाचनी सेहो छी। ई शक्तिशाली अनाज-बुतात आई काल्हि नीक होटलोमे सुपर फुड रूपेँ धनिक लोक बीच जानल जाइछ। ई रोग प्रतिरोधक क्षमताकेँ बढेबामे सहायक होईछ । गर्भवती स्रीकेँ नियमित रूप सँ मरूआके खाद्य पदार्थ आहार लेबाक चाही। मरुआक उपयोग रोटी - चाउरके रुपमे कयल जाईछ। एहिके केक , पुडिंग आ मिठाय सेहो बनाउल जाईछ। औषधीय गुण सँ परिपूर्ण मड़ुआमे पोषक तत्व आ रेशा खुब रहैछ। ई कोलेस्ट्रॉल स्तरके नियन्त्रण कऽ , हड्डी केँ सक्कत बनाबैछ। आओर चिनी रोगक कारनीके लेल खाद्यमे बढ़ नीक मानल गेल छैक। मरूआ (रागी) केर दानामे प्रोटीन ९.१० प्रतिशत, कार्बोहाइड्रेट ७०-७५ प्रतिशत, वसा ३ प्रतिशत,खनीज लवण - २.३ प्रतिशत, कैल्सियम ०.३३ प्रतिशत लोह आ बिटाईमीन सँ सेहो प्रचूर मात्रा मे भरल बताउल गेल य l एहिक खेती -बारी लेल जल निकासयुक्त बलुआही दोमट जमीन मृदा ले सर्वोत्तम होइए। खेतीक लेल हर आ हैरो सँ गहींर जोतकोर आ चौकी देनाई आवश्यक होइछ। कियारीमे मरूआ 'क बीया पारैत काल ओहिमे कैप्टान थीरम वा बवेस्टीन २.५ ग्राम प्रति किलो उपचारित करब निहायत जरूरी छै। बौगक लेल दू फसलिमे एक तँ फागुन मास आ दोसर अखार-साउनमे उपयुक्त समय होईछ। खिच्चा बिरार उखाड़ि कय २०-२५+ १५ सेमी० पर गब (एक गाछ) २-३ सेमी० गहीरमे गारेए-रोपय पड़ैत छै। ऐ कृषि लेल असिंचित भीठ खेतमे उर्वरक ६०: ४९: २५ किलोग्राम प्रति हेक्टेयर यूरियाक अदहा हिस आ फास्फोरस, पोटाश केर पुरा मात्रा रोपनी सं पहिले देल जाईछ, आ यूरिया (नेत्रजन) केर शेष मात्रा देल जेबाक होयत। रोपनिक २५-३० दिनकवाद चौकी (पाटा) देलाक उपरांत छिटबाक होएत। खरीफ समयमे तँ पटौनीक खगता नहि रहैछ, मुदा जलवहाउ केर उचित ओरियान निश्तुकि कयल जेबाक चाहियेक। घास - जंगलाह केँ कमठौन सँ बांचय लेल खासकय केँ चौरगर पताक खर पतवार बेसी तोपने जाए तँ २-४ डी० -०.६ किग्रा० सक्रिय तत्व केँ ४०० लिटर जलमे घोइरके रोपानी अथवा बाउगके २० -२५ दिन पर प्रति हेक्टेयर छिटल (स्प्रै) जाए। सुखल पोडर सेहो ओहि नामेक बजारमे उपलव्ध रहैछ,जकरा छाउर वा बालू (रेत) मेँ फेंटकय सावधानी पूर्वक उड़िया देला सँ शिघ्रहि लाभ होईछ। ऐ फसिल संगहि अन्तरवर्ती जजात जेनाकि दलहनमे राहरि, सोयाबीन,खेरही, तेबखा उपजाओल जा सकैत छैक। फसिल चक्रमे जजात (अन्न) मरूआ - जव/ बदाम/ सरिसब,मौसेरी, खेसारी, चिकना,मोटर -केराउ लेल जाइत छैक। औसत दाना उत्पादन २०-२५ क्विंटल प्रति हेक्टेयर उबजा भऽ जाईछ। ओहि सँ सुखल मवेशी चाराक उत्पादन ४०-५० क्विंटल धरि हरेक हेक्टर पाँछा पुईर जाइछ। एहि अवशेस सँ ईंधन आओर घुरा सेहो होइछ जे प्रगतिशील किसान लेल आवश्यक ओरियान छी। ऐ सबसँ हरियरी पशुचारामे उत्पादन १५०-२०० क्विंटल प्रति हेक्टेयर होइत छैक। मरूआ लारी भारी होइछ,ओहि निशन्न डाँट सँ पत्ती बहारकय बिरबा,दौरी ,घोड़ा आदि वस्तु शिल्पकार आ घरेलू जनिजात लोकनि बनाबैत मिथिला हाटमे विपणन कय रहलैक हन् आ नगदी आमदनी कमा लैत अछि। मरूआके उन्नत प्रभेद एम भी -२०८ आ अछि। अगस्ता लेल भी एल-३४८,भी आर -७०८ आ पचता खेतले बाकुला, ए-४०४ , भी एल -३५२ नंबर प्रभेद अनुशंसित कयल गेल य। ऐ मोटदानाक खेतीमे सरकारी स्तर पर आधुनिक किसान लेल १०० प्रतिशत अनुदान देल जाईछ। संगहि आत्मा० कमिटी सँ प्रशिक्षण सेहो किसान पाठशालामे देल जाईछ। वर्तमानमे ई एकटा फायदामंद उद्योग थिक ,जे लागत सँ कतेको गुणा बेसी आर्थिक स्थिति सम्हरैत छै। ३ देशके धनिक लोकक शिक्षा प्रेम जागल वेदान्ता ग्रूपक मालिक श्री अनील अग्रवाल भारतमे आक्सफोर्ड सँ पैग यूनिवर्सिटी बनाबय चाहैत छथि। एहि लेल २१००० कड़ोर टाकाके आवश्यकता भ' सकैत छैक। से एतेक राशि अपन स्वेच्छा सँ दान करबाक एलान निश्चय स्वागत योग य। ऐ ग्रुपके मालिक अपन जीवनक ७५ प्रतिशत कमाय सँ शैक्षिक काजके बढौताह। एहन आरो धनिक लोक विविध क्षेत्रमे आगू आबि दान करथि,आ नीक काज गरीबक हीत लेल करय । सन् २०२२ मे १.१६१ करोड़ टाका दान भारतमे करनिहारक जै जै भेल रहय। एच सी एल केर मालिक शिव नादर अपन टेक्नोलॉजी 'क संस्थापक छथि जे वित्तीय वर्ष २०२३ म २,०४२ कड़ोर टाका भारतमे दान कयलनि। एहिके औसत रूपें देखल जाए तँ ५.६ करोड़ दान मानव जाएत। २०२२ केर बनसव्त ७६ प्रतिशत अधिक अर्थात ३ करोड़ बेसिये होईछ। विप्रो केर अजीम प्रेमजी २९२३ मेँ १७७४ करोड़ रू० के जे २०२२ केर तुलनामे २६७ फिसदी अधिक भेल छैक। ई भारतीय व्यापारिक प्रमुख हस्ती मानल जाई छथि। रिलायंस इंडस्ट्रीज केर मुकेश अंबानी -: परोपकार मदमे ३७६ करोड़ टाका लेलथिन। ओ रिलायंस फाउण्डेशन सँ शिक्षा आ स्वास्थ्य खातीर दान करैत रहलाह अछि। कुमार मंगलम बिड़ला २८७ करोड़ परोपकारी में खर्च कयलनि हन। गौतम अदानी २८५ करोड़ दान देमयबालख अमीर लोक छथि,जे अडानी समुहके संस्थापक अध्यक्ष छथि। बजाज परिवार २०४२ करोड़ दान कयलथि,जाहिमे २६४ करोड़ टाका शिक्षा मद्दमे देखले गेलैक। अनील अग्रवाल पहिलहुँ कहने छी ,ओ बेदान्ता सँ छथि आ २४१ करोड़ टाका द' चुकल रहथि। नन्दन निलेकणी १८९ करोड़ टाका सँ दानखातामे योगदान करैत इन्फोसिस केर सह संस्थापक हैसियत सँ आठम नम्बर पर आयल रहथि। फिलेन्थ्राफी केर रोहणी नीलेकणी १७० करोड़ द' केँ महिला मे सबसँ आगू रहलीह। सबसे कम उमेरक कामत बन्धू ११० करोड़ दान देलनि, को-फाउंडर ३७ बर्खक जीरोधाके नीखील अपन भाय नीतीश कामतके संग दान सुचिमे स्थान पौलनि। रतनजी टाटा तँ सबसँ पैग दानवीरमे छथिये। टाटा ग्रुप कम्पनी 'क निर्माणकर्ता जमशेदजी टाटा अपन जीवनमे १९२ विलियन डॉलर दान कयने छथि। ७३ वर्षीय सावित्री जिंदल भारतके सबसे अमीर महिला मे जानल जाइछ जे राजनीतिज्ञ सेहो छथि, जे op जिन्दल समूह क' एमरिट्स चेअर केर सम्मानित पद पर रहैत खेल में रूचि रखैत छथि। ८२ वर्षीय साइरस पुणाबाला भारतके भीतर वैक्सीन विकास केर पहिले व्यक्ति छथि जे प्रतिष्ठित सीरम ईन्सट्यूच्यूट कें दुनियां केर कोविड - १९ टीका के खिताब लेल नाम कमेबाक काज कयलाह। ५९ वर्षीय कुमार बिरला -आदित्य बिरला समूह के नेतृत्व करैत छैथ ,ई कागत, सीमटी, एल्यूमिनियम कमोडिटी क्षेत्रमे बोडा आईडिया एवं दूरसंचार सँ संबंध राखि कमोवेश दान करैत रहैत छथिन, जाहि सं देश आगू बढि रहल अछि। ४ एकटा आत्मकथा मंजिल और कितनी दुर ' आत्मकथा वर्ष - २०२१ मेँ ५१२ पृष्ठ'क हिंदी पोथिक प्रकाशन -साहित्य संसद, कैलाशपुरी एक्सटेंशन नई दिल्ली -११००४५ सँ भेल अछि। एहि ग्रन्थके दाम ९९५ टाका य । त्यागक मूर्ति साहित्य रत्न पंडित अनुप लाल मंडल जीकेँ बिहारी स्मिताक दोसर प्रेमचंद कहल गेल छन्हि। मात्रे अपर प्राइमरी पास कय तीन टाका प्रति मास दरमाहा पबैत लोअर प्राईमरी स्कूल'क गुरुजी अनुप लाल मंडलजी एक इन्टर कॉलेजके व्याख्याता पदधरि अपन लगनशिलता सँ बनि नव पिढ़िकेँ पढैक प्रति ललक संदेश रुपेँ छोड़ि गेलाह हन्। हुनक अनेकों मित्रगण आ सरकुटुम आग्रह केलकनि जे आब अपने बैठारिमे आत्मकथा लिखियौ। ओ साहित्यकार रूपेँ १९२६ सँ अनवरत लिखैत आबि रहल छलाह। सन् १९७७ मेँ आत्मकथा 'क पांडुलिपि तैयार कयलनि जे हुनका परोक्ष भेलासन्ता एहि अनुपम रचनाके हुनक नाती श्रीमान आदित्य दासजी छपेबाक काज अरुण नारायण जीके माध्यम सँ कयलनि। मुदा अरूणजी पुस्तक छपै सँ पूर्व एकबेर अशुध्दि दुर नहिं कऽ सकलाह से मुद्रण त्रुटि पाठककेँ अखरैत छै। संस्कृत शब्द - वाक्य केर शुध्दिकरण मैथिली साहित्य सेवी श्री तारानंद वियोगी जी कयने छथि। जनवरी २०२१ मेँ पोथी बाबत अरूण जी प्राक्कथन,लेखकके दू शव्द सँ पुर्व पोथीमे लिखल पाठक बीच परोसलनि हन्। ई पोथी समर्पण लेखकके बन्धू - भोला पासवान शास्त्री केँ कयल गेल य। पोथीके भारत सरकार के isbn . ९७८८१९४४५७७५६ प्राप्त छैक ,जे मधुबनी जिलाके स्थानीय प्राधिकार क्षेत्रक विधान पार्षद द्वारा अनेकों विद्यालयमे उपलब्ध करोओल गेल छैक। साहित्य,कला आ संस्कृति केँ दीर्घ कालधरि संजोगबाक सुव्यवस्थित परिपाटी जे अंग्रेजी शासनकालमे छलै से आजाद बिहार म निरंतर धारासाए होइत चलि गेल छैक। १९४० ई० मे मंडल जीके उपन्यास ' मीमांसा ' पर ओहि समय केर बहुचर्चित फिल्मकार किशोर साहूजी सफल ' बहुरानी फिल्म ' हिन्दी मे बनौने रहथिन। मुदा अनेको पोथी'क रचियता स्व० मंडलजीके मृत्युक चारि दशक बादे समाज क' बीच चर्चा सँ निपत्ता कयल गेलैक। अनुप बाबू केर लेखनीक प्रति चिंता करनिहार वरिष्ठ कथाकार चन्द्र किशोर जायसवाल , रामधारी सिंह दिवाकर, आलोचक सुरेन्द्र नारायण यादव आ कोसी अंचलक चैतन्य युवा लेखक श्रीधर करूणानिधि आ देवेन्द्र कुमार देवेश क्षुब्ध छथि। लगधक ६० सँ अधिक उप शिर्षक मे विभक्त एहि आत्मकथामे लेखक अपन खुद के जीवन आ बिहारक एक पैघ कालखंडक सम्पूर्ण रंगतकेँ दर्शौने छथि। अपना जीवन संघर्षके व्याख्यायित कयने छलाह आ ताहि प्रसंग गांधी,टैगोर अरविंद ,महर्षि रमण, प्रेमचंद,आ निराला सँ अंतरंग भेंट भेलाक संदर्भ केँ जीवंत रूपेँ कलमबद्ध कयने छैक । सन् १९३४ केर बड़का भुमकम , पत्रकारिता ,कैवत्त समाजके पत्रिका (कैवर्त कौमुदी ) आ फिल्म जगतके अपन भोगल अनुभव केँ विस्तार सँ लिखलन्हि। से अपना समयके ई एकटा एहन दस्तावेज थीक,जे बिहारक साहित्यिक , राजनीतिक आ सामाजिक जीवन केँ आलोकित करैछ। एहि आत्मकथामे जतरा, रेखाचित्र , संस्मरण, खिसक्कर ,कविहृदय आ अनुप जीक औपन्यासिक मन: स्थिति एकदमसँ धरती पर उतरल बुझाईछ। ओ मिथिलांचल आ मगध सँ आगू राजस्थान धरि अध्यापक बनि शिक्षाक अलख जगौने रहथि। अनुपबाबु पहिले २२ उपन्यास लिखकय वादमे कथाकार भेलाह। हुनक 'उपदेश की कहानियां' चारि खण्डमे आ 'उपनिषद की कहानियां' दू खंडमे लिखलन्हि । हुनक बहादूर टेटनके कहानी खूब चर्चामे रहनि। पँचामृत -पाँच एकांकि'क संकलन, पत्र गुच्छ ,गद्य मानस आओर काव्यालंकार - प्रवेशिका नायक संकलन सेहो रहनि। रहिमन सुधाके सम्पादन धरि कयने छलाह। मा० रघुवंश प्रसाद सिंह - व्यक्तित्व और कृतित्व, मुसोलिनी का बचपन, श्रीअरविंद आ महर्षि रमणके जीवनी पाठक बीच मुख्य रूपेँ आयल रहनि। स्व० रघुबंश बाबू केँ हुनका निर्दलीय निर्वाचन कार्यमे सेहो स्थापित कांग्रेसीक विरूद्ध चुनावी प्रयत्न 'क चर्चा असरदार भेलनि। ओ तैंतालीस वर्खक वयक्रममे व्यक्तिगत सत्याग्रहमे जहल गेला, तँ ओतय सँ माथटनकी दर्द आजन्म बेसाहने अयलाह। संत सोभावक वादमे भेलाक उपरांत एक बेर पुनः गरीबी दुर करैक परम उद्देश्य सँ ,आ युगान्तर साहित्य मंदीर प्रकाशन संस्था ओ पोथीक भागलपुर दोकानमे बेटाके जकरल कर्जा सँ मुक्त करय लेल देश आजादी'क वाद १९५१ ई० मे बिहार राष्ट्रभाषा परिषदमे लगरपन सँ प्रकाशन अधिकारी बनलाह। कियाक तँ हुनकर पारिवारिक पृष्ठभूमि समान्य निम्न मध्यवर्गीय किसानक रहनि। नेपाल बोडरके भीतर हुनका बहुत जमीन देल जाइत रहनि ,मुदा ताहूके खोजपुछारि नै रखलखिन। श्रद्धेय अनुप बाबूक तीन उपन्यास अप्रकाशित रहि गेल छलनि। ओ केवट महासभा सँ कैवर्त (माहिष्य) जातिकेँ जोड़य चाहैक हेतु अपना पोथीक स्टाल धरि कार्यक्रम स्थल पर आदरणीय सरयू बाबू (पोखराम) केर संघत सँ लगौने रहथि। दि० ११-१०-१८९६ म लबो मंडल जीके जे अनुप पुत्र जन्म लेने रहैन से २१ दिसंबर १९८२; केँ अपन जन्मभूमि समेली (कटिहार) मे रहैत एहि धराधाम सँ सदालेल उठि गेलाह। हुनकर आत्मकथा पढक लिलसा हुअय तँ पाठक अपना गामेक विद्यालयमे पोथीक खोज क' सकैत छथि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.संतोष कुमार राय 'बटोही'- सासुर मीठगर आओर तीतगर संतोष कुमार राय 'बटोही' सासुर मीठगर आओर तीतगर
माय आओर बाबूजीक मुइलाक बाद बटोही बपटुगर आओर मयटुगर भ गेल छलाह। पढ़वाक लेल कोन काज नहि केलाथि। चप्पल फैक्ट्री मे रातिक अनहार मे लॉरेंस रोड मे जायत छलाह। पढ़ि-लिखि कऽ हाकिम तऽ नहि बनि पउला, परञ्च माहटर भऽ गेलाह। बिहार सरकार के नून-रोटी खायत भेलैन्ह जे अपन कनिया के सेहो माहटर बना ली। अर्थक जुग छै। टाकाक पूछ छै। घर मे आमदनी ऐलाह सँ नीक हेतै। कनिया केँ एम ए करौलाथि। आब सोचलाथि जे कनिया के मास्टरनी बनाबी।
तय केल गेल जे रूणा डी एल एड करतीह।डी एल एल केँ फार्म भरलीह। ओई मे पास भेलीह आओर टीचर ट्रेनिंग कॉलेज मे नाम लिखौलीह। कालेज जाय लगलीह, परञ्च कानि-खीझि कऽ जायत छलीह। कारण जे बउआ कोरा मे छलैन्ह। सप्ताह मे कम-सँ-कम दु आओर तीन टा क्लास कोनहु धरानी पूरा करैत छलीह। रुणा केँ अपन माय कोनहु सहयोग नहि करवा केँ मोन बनौने छलीह। रुणा कालेज जाय सँ पहिने भनसा कके जायत छलीह आओर कालेज सँ आबि कऽ भनसा बनाबैत छलीह। मायक भनसा बनाबै मे किनको हाथ नहि बँटाबैत छलीह। माय नहि जेना रुणा केर सासु छलथिन्ह। बटोही केर माय हुनकर ब्याह भेलाक पाँच मास बादे मरि गेलीह। पतोहू केर सुख हुनका नहि भेलैन्ह। "बउआ नहि रहैत छौ, जल्दी आबही" , रुणा केँ माय फोन पर कहलथिन्ह। परञ्च रुणा अखन नहि आबि सकैत छलीह। मधुबनी सँ कोरहिया हॉल्ट केर लेल ट्रेनक सुविधा छै। बस आओर आटो नहि चलैत छै। हुनका आइ डीएमयू छुटि गेलैन्ह।
रुणा हबोडकार मारि क कानऽ लगलीह। माय माय नहि सासु भेल छलीह रुणा लेल। अयांश बाबा लग कतेक नीक खेलैत छथि।परञ्च माय केँ ई बेवहार ठीक कहल जेतै ? जे बेटी केर नीक होयत नहि देखि सकैत अछि। बटोही सासुक ई बेवहार सँ तंग भ गेलाह। एक दिन आटो मे सभ सामान भरलाह आओर सासुर केँ तिलांजलि द देलथिन्ह। बटोही केँ कोनहुँ इज्जत नहि रहलैन्ह सासुर मे। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.प्रणव झा- कालचक्र [मैथिली कथा] प्रणव झा कालचक्र [मैथिली कथा] दू बज्जी राति के समय छल। बाहर पूस के दुलकाबय बला ठंढी बसात बहि रहल छल। रोड पर जाड़ से दुलकैत कुकुर के भौंकब आ कानब के डरावना अवाज आबि रहल छल। सहरसा सिटी अस्पताल के आकस्मिक चिकित्सा विभाग अर्थात इमर्जेंसी मे आने दिन जेका चारि-पाँच टा मरीज पड़ल छल। सिरियस पेसेंट सभ के देख सुनि आ कंडीशन के स्थिर क के जूनियर डॉक्टर सभ वार्ड से चलि गेल छल। आब वार्ड मे उजरका ड्रेस पहिरने एकटा 40-45 वरष उमैर के नर्स छलिह आ 20-22 वर्षक एकटा नवयुवक कंपाउंडर(पुरुष नर्स)। कुर्सी पर बैसल दुनु बतियाइत समय काटि रहल छलाह। जाड़ से बचऽ लेल दुनु वार्ड बॉय से चाह मंगा के चाहक चुस्की लैत पुनः गपियाबऽ लागल छलाह। हम देवाल पर टांगल डिजाइनर घड़ी छी जे टिक-टिक-टिक-टिक करईत अनवरत चलायमान छी आ आई अहाँ के ई कथा बांचि रहल छी। जहिया से ई विभाग चालू भेल अछि ताहिए से हमरा ऐ देबाल पर टाँगि देल गेल अछि। साइत ऐ अस्पताल के मालिक काली बाबू के च्वाइस से हमरा किनल गेल छल। इमर्जेंसी के हृदयविदारक वातावरण मे जतऽ कतेको के रुकल समय एकबार पुनः चलि पड़य छैक त कतेको के समय सदिखन लेल रुकि जाय छैक, हमरा सन सुंदर मनोरम घड़ी के नै जानि की सोचि कऽ टाँगि देल गेल हेतैक। साइत अनवरत चलबाक लेल। साइत एत्त आब बला के एकटा भरोस देबाक लेल। कतेक समय से देख रहल छी। कतेको नर्स आ मेडिकल स्टाफ आयल कतेको गेल। नित दिन इमर्जेंसी के एक से बढि क एक केस देखय छी, अनवरत टिक टिक क के चलईत। गर्मी मे हहा के चलईत पंखा एखन शांत छल, मुदा हम जेना ओकरा कहि रहल छलियई जे चलनाई के मतलब भेल अनवरत चलनाई, नियत चालि से। ई नै जे कखनो हहा के घूमऽ लागल आ कखनो एक्दम्मे शांत। हम समय के दूत छी, तै अनवरत चलय छी, नै मौसम के लेल रुकय छी आ नै मृत्यु के लेल। किछु एमहर-आम्हर, गाम-घरक चर्चा करइत करइत खिस्सा अस्पताल के किछ डॉक्टर आ साथी नर्स के गॉसिप पर पहुंचल। कोनो डॉक्टर संग कोनो नर्स के लसफस के चर्चा भेल छल जै पर प्रोढ़ा बिहूँसि उठल छलिह। नहु नहु बजलिह, बौआ तों ऐ सब मे नय पड़ीह। मोन से अपन नौकरी पर ध्यान लगाबऽ। फेर ओ नहुए नहुए आजु राति ड्यूटी पर तैनात डॉक्टर लेल बाजल छलिह -देखिह, आई राइत ई टटीबा ड्यूटी पर छौ, राति बेकारे नै जाय कहीं। -किए काकी?- ओ नब युवा कंपाउंडर पुछलकै। -अरे ओ दारू पी के मातल रहय छै भोरे से। कोनो काज ठीक से नै आबय छय। पता नै के डॉक्टर बना देलकै एकरा। पक्का चोरी चकारी से डॉक्टर बनल हेतैक।- नहुए नहुए प्रोढ़ा नर्स पुनः बाजल छलिह। -मुदा आब साइत कोनो इमर्जेंसी नै आबय। तै बौआ तों कानि काल चाहे त सुस्ता ले। -नै काकी! ठीक छै। अहिं कनि काल आराम कऽ लिय। -अरे ल ले कनि काल टेबुले पर माथ राखि के झपकी। एत्त कोन ठेकान, कखन के मरऽ लेल आबि जाय।- प्रोढ़ा पुनः बाजल छलिह। आजूक राति मे अजबे मनहूसियत बुझना जा रहल छल। शहरक एकटा छोड़ पर बनल अस्पताल के मनहूस केजुएल्टी मे अपशकुनी कोनो नब बात त छल नै। कन्ना-रोहट, छाती पिटईत लोक, चीखम-चिल्ली, तामस, झगड़ा-लफड़ा, विकलांगता, मृत्यु, कतेको त देखल अछि हमर, डॉक्टर, नर्स आ वार्ड बॉय सभ के संग। स्वाइत डॉक्टर, नर्स आ वार्ड बॉये जेका हमरो आब ई सब मनहूस नै लागे छल। भऽ सकय छैक जे मनुखक मोन मे वेदनाक एकटा कोटा होइत होई, जे चाहे त ककरो धीरे धीरे खर्चा होइत होइक आ की तेजी से। शुरू शुरू मे त हमरो होई छल जे केकरो मुईला के कनिके काल बाद ई सभ चाहक कप के संग गपियाईत आ ठिठियाइत कोना के देखा जाय छैक! मुदा किछु मृत्यु देखला पांछा त हमहू आब ई अपशकुनी भाव से मुक्त भऽ गेल छी आ एकर सबहक ठिठोली पर मुस्किया लैत छी। मुदा तैयो आजुक ई सर्द राति किछु बेसिए अपशकुनी बुझना जा रहल छल। खिड़की के कोनो फुजल भाग से छनि छनि क अबईत घुप अनहार देखा रहल छल। दूर बाट पर लागल भेपर लाइट के मरकरी भूकभाक क रहल छल। दूर तक कुहेस आ चुप्पी पसरल छल, एहि सबहक बीच मे कुकुरक भूकब आ कानब गजबे भुतिया सीनक पटकथा लिखि छल। प्रोढ़ा नर्स कुर्सी पर बैसल ओङ्घाय लागल छलीह। नवयुवक एक बेर पुनः रोगी सबहक ठाहर लेबऽ लेल वार्ड मे राउंड लेबऽ लागल। हमर सूईया अनवरत अपन गति से टिक-टिक करइत घुमि रहल छल। छोटकी सूईया आब 3 आ 4 के बीच मे छल आ अपन मंथर गति से 4 दिस बढ़ल जा रहल छल। कनिकबे काल मे दूर से मंदिरक घंटी, मस्जिदक अजान, बस-गाड़ी के पों-पों, रोगी के परिजन सबहक अफ़रातफरी देखबा सुनबा मे आबय बला छल, आने दिन जेका। मुदा एखन त विशुद्ध चुप्पी पसरल छल, जेकरा कुकुरक आवाज बीच बीच मे तोरि रहल छल। विशुद्ध चुप्पी सेहो कखनो काल के बड्ड डेरबऽ बला होइत छईक। दुनु नर्स आब अनमनायल आ निश्चिंत सन भ गेल छलथि। नवल भोर के आस मे हमर सूइया सेहो अनवरत बढ़ल जा रहल छल। मुदा ई की !! अचानके से देखय छी जे किछ लोक बदहवास सन भेल दौगइत ककरो स्ट्रेचर पर ल क आबि रहल अछि। बड्ड गंभीर एक्सीडेंट के केस छैक साइत। हे दैब! ई त काली बाबू छथीन। ऐ अस्पताल के मालिक। एकटा टैक्सी ड्राइवर आ संग मे पुलिस ल क आयल छल। पछाति घरऽक लोक सेहो पहुंचइत जाइत गेल छलाह, माय-बाबू-पत्नी। कानईत बिलखइत। -हे भगवती! ई कि भेल! पटना एयरपोर्ट लेल निकलल छलाह कि आधे घंटा बाद ई अनहोनी भऽ गेलय हे माई। काली बाबू बेहोश स्ट्रेचर पर पड़ल छलाह। सौंसे देह शोणित से लथपथ भेल छल, सांस ठीक से चलि नई रहल छल। नवयुवक कंपाउंडर फुर्ती के संग हुनका बेड पर लेटा कऽ ऑक्सीज़न लगा देलकै। माथ पर जत्त से शोणित बहि रहल छल तत्त, टिंचर आयोडिन आ रसायन युक्त कॉटन लगा क दबा के राखने छल। वार्ड बॉय के भागि के डॉक्टर के बजाबऽ लेल कहने छल। डॉ रघुवंशी भागल भगल रूम से आयल। युवा कंपाउंडर ओकर मुँह से दारू के महक महसूस केने छल। -काकी सहिए कहय छलिह.... सार ड्यूटियो मे पीबय छैक।- मोने मोन ओ सोचलक। मुदा काली बाबू के ई हाल मे देख के ओकरो निशा उतरि गेल छल। मोन आ हाथ दुनु कंपित भऽ रहल छल ओकर। सीनियर नर्स बाजलिह -सर! हिनका तुरंत इंटूबेट करबाक हेतइक। सांस ठीक से नहि चलि रहल छैक। ब्लड मे ऑक्सीज़न केर स्तर गिरल जा रहल छैक। मुदा डॉ रघुवंशी के इंटूबेट केनाइ आबिते नै छल। आ एमहर ’गोल्डेन आवर’ के एक एक कीमती मिनट जे जान बचाबऽ लेल महत्वपूर्ण होइत छैक से बीतल जा रहल छल। ऐ क्रिटिकल समय मे ओ ककरो कोना कहितई जे हमरा ई इंटूबेशन नै आबय अछि जे इमरजेंसी मे जान बचेबाक पहिल कदम छैक। ओ सांस नली मे घुसबय बला पाईप लऽ कऽ प्रयत्न शुरू केलक। आ संगे आन सीनियर डॉक्टर एनिस्थीसिया,सर्जरी आ क्रिटिकल केयर के सीनियर डॉक्टर के बजाबऽ लेल कहलक। युवा कंपाउंडर आनन-फानन मे सभटा आवश्यक फोन क देलक। सौंसे अस्पताल मे काली बाबू के एक्सीडेंट के समाचार पसरि गेल छल। 15हे मिनट मे सभटा सीनियर डॉक्टर आबि गेल छल। ऑक्सीज़न के स्तर 0 पर छल आ धड़कन के ग्राफ सेहो स्ट्रेट लाइन देखा रहल छल। डॉ० रघुवंशी अंबुबैग से सांस नली मे घुसायल गेल ट्यूब से सांस द रहल छल। एमहर केजुएल्टी मे शुभचिंतक लोक सबहक भीड़ जमल जा रहल छल। अंततः काली बाबू के बचाओल नै जा सकल छल। वार्ड मे कन्नारोहट पसरि गेल छल। जै रंग लोग तै रंग केर खुसुर फुसुर सेहो भऽ रहल छल। मातम के बीच लोक सब काली बाबू के जीवन के अपना अपना तरह से याद कऽ रहल छल। हमहु कनी काल लेल काली बाबू के अतीत मे चलि गेल छलहु। सहरसा जिला के एकटा गाम में काली कांत के जनम भेल छल । माई-बाप नाम राखने छलाह काली कांत मुदा नेनपन मे गामक लोक हुनका "करिया" कहि सम्बोधित करैत छल। साइत ऐ तरहक सम्बोधन के चयन मे सामाजिक परिस्थिति के सेहो योगदान रहय छैक। हुनकर पिता जी हाई स्कूल में पीउन छलाह। हुनकर एक मात्र सपना छल कि हुनकर बेटा एक दिन डॉक्टर बनि जाए। काली कांत के पिता सब किछु करय लेल तैयार छलाह, जै से हुनकर बेटा डॉक्टर बनि सकय। काली कांत मैट्रिक पास कएला के बाद एक प्रसिद्ध कोचिंग संस्थान में नामांकन करेलक। करिया एक साधारण छात्र छल। मुदा बाबूजी के इच्छा आ बल भरोसे मेडिकल के तैयारी शुरू केलक। मुदा दू बेर अपना भरि प्रयास केला के बादो सरकारी सीट पर एमबीबीएस में प्रवेश नहि भेंट सकल। पिछड़ा वर्ग के कोटा में सेहो नै। लेकिन करिया के पिता हार माननिहार नहि छलाह। ओ अपना बेटा के डॉक्टर बनय के जिद्द में अंततः एकटा प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में नामांकन करा देने छलखिन। काली कांत आब ओहि प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस के पढ़ाई शुरू केलक। मुदा ओकर ध्यान मेडिकल पढ़ाई सँ बेसी मार्केटिंग आ एडमिशन प्रोसेस में लागल छल। दोसर साल सँ ओ एडमिशन प्रोसेस में लागि गेल। मेनेजमेंट आ एजेंट संगे मिल विद्यार्थी सबके एडमिशन करा कऽ कमिशन कमाय लागल छल। समय के संग-संग, काली कांत एकरा अपन व्यवसाय बना नेने छल। अपन व्यवसाय में ओकरा सफलतो भेटलइक। संगहि ओ एमबीबीएस कोर्स सेहो कोनो तरहे पूरा केलक। ओकर पिता बहुत खुश छलाह जे हुनकर बेटा डॉक्टर बनि गेल। ओकर माता जी सेहो खुश छलिह जे हुनकर बेटा पढ़ाईए के समय सँ कमाई करय लागल छल आ खूब कनेक्शन बना लेलक अछि। काली कांत एडमिशन काउंसिलिंग आ प्लेसमेंट बिजनेस में तेजी सँ बढ़य लागल छल। ओ खूब पाई कामाय लागल। ओ ऐ धंधा में एना क डूबी गेल छल कि नैतिकता के सेहो बिसरि गेल। ओ मेडिकल प्रवेश परीक्षा, काउंसिलिंग आ एडमिशन में अनैतिक आ अनुचित प्रयोग मे सेहो लागि गेल छल। लोक सभ, जे ओकरा "करिया" कहैत छल, आब ओकरा "काली बाबू" कहै लागल छल। धीरे-धीरे ओ अपन क्षेत्र में बहुत प्रसिद्ध आ गणमान्य व्यक्ति भ गेल छलाह। ओ सहरसा में एकटा मल्टीस्पेशल्टी सिटी अस्पताल बनाओल। जै से हुनक व्यवसाय आ प्रसिद्धि दुनु मे आर बेसि वृद्धि भेल छल। मुदा, हुनक कारोबार में बहुत रास अनैतिकता छल, जेकर कारणेँ कै टा अकुशल डॉक्टर सभ मेडिकल सिस्टम में शामिल भऽ रहल छल। एक बेर काली बाबू के पिताजी हुनका टोकनेहो छलाह , "बेटा, हम अहाँ के डॉक्टर बनबय चाहैत छलहुँ, मुदा अहाँ अपन राह बदलि लेलहु अछि। ई धन-संपत्ति आ प्रसिद्धि के संग नैतिकता आ इंसानियत सेहो महत्त्वपूर्ण अछि।" काली बाबू, किछ क्षण लेल अपन पिता के ई शब्द सुनि ठमकि गेल छलाह। ओ सोचय लगल छलाह, कि की ओ सचमुच डॉक्टर बनल अछि या एकटा धंधेबाज? ओकर मन में सवाल उठल। मुदा, काली बाबू के नाम आ कमाई के तृष्णा हुनका अनैतिकता के एहि बाट पर आगू बढ़बैत रहल छल। वर्तमान मे घूरल त देखय छी जे क्रिटिकल केयर के कंसल्टेंट के नजरि डॉ० रघुवंशी के एक्टिविटी पर गेल। ओ देखला जे इंटूबेशन ट्यूब सांस नली (ट्रेकिआ) के बदला मे खाना के नली (इसोफैगस) मे घुसाओल छैक। वार्ड मे पसरल कन्नारोहट केर बीच मे क्रिटिकल केयर कंसल्टेंट हमरा नीचा मे राखल कुर्सी पर आबि बैस गेला आ संकेत से डॉ० रघुवंशी के बजेलखिन। पुछलखिन - सर के कोन स्थिति मे आनल गेल छल.... की कंडीशन छल ... आदि आदि.. अंत मे कहलखिन -डॉ० रघुवंशी! ट्यूब सही जगह नै छल आ अहाँ अंबु केने जा रहल छलिए। अहाँ इमरजेंसी मेडिकल ऑफिसर छी आ अहाँ एखन धरि ट्यूब सांस नली मे घुसेनाइ नै सीखने छी! अहांक मुँह से दारू के महक आबि रहल अछि! अहाँ ड्यूटी पर दारू पीबय छी? आखिर अहाँ एमडी कोना केलहु आ अहां के ऐ महत्वपूर्ण पोस्ट लेल सेलेक्ट कोना कैल गेल? डॉ० रघुवंशी मुँह लटकौने ठाढ़ छल। ओ किछ नै बाजल। मुदा ओकर माथा मे निश्चिते किछु परिघटना चलचित्र जेका घुमल छल जेकर प्रभाव हम ओकरा चेहरा पर देख नेने छलियई। डॉ० रघुवंशी के एमबीबीएस आ पीजी एड्मिशन के जोगाड़ कालिए बाबू त लगेने छलखिन बिना कोनो मेरिट के तिकड़म से। आ कालचक्र के प्रभाव एहन जे कालिए बाबू हिनका एहि पद लेल सेहो सेलेक्सन केने छलाह कैएक टा मेरिटोरियस डॉक्टर के ऊपर वरियता द के, किएकि त डॉ० रघुवंशी हुनक एकटा धनाढ्य क्लाइंट के लड़का छलय। हम आ ई वार्ड के देवाल बहुत रास केस देखने छलियइ आई धरि ऐ केजुएल्टी मे। नाउम्मीद केस के जीबीतो आ बहुत केस मे मरितो। कतेको डॉक्टर, नर्स, परिजन के देखने छी मरीज के जियाबऽ लेल जी जान लगाबइत। मुदा आजुक घटना ऐ सब से अलग छल। ऐ अस्पताल के मालिक अपनहि अस्पताल मे समय पर सही इलाज नै मिलने मृत्यु के प्राप्त भेलाह। कदाचित ऐ कालचक्र के रचना काली बाबू स्वयं केने छलाह। - प्रणव कुमार झा [राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली 20.07.2024] अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.संतोष कुमार राय 'बटोही'- डायरी- 'लव यू टू' संतोष कुमार राय 'बटोही' डायरी- 'लव यू टू'
अप्रैल , 2017
दुर्गा सप्तशती पाठ : चैती दुर्गा पूजा
कलश स्थापन भऽ गेलै आजु । कमला सँ जल भरि कऽ सभ कियो लौलकिहिन। 2017 साल केँ मार्च मे सृष्टि केँ जन्म भेल छल। ई हमर पहिल संतान छथि। सृष्टि केर असली नाम 'अपराजिता' छियैय। माँ दुर्गा केर नाम छियैय अपराजिता। माँ दुर्गा केर नाम हम अपन बेटी केँ लेल चुनलौं। इ मरि कऽ जी गेलीह। तैं एकर नाम अपराजिता रखलहुँ अछि। पूरा माथा छिला लेलहुँ हम। जेना पुरहित छिला लैत छथि। पीयर रंग मे रंगलाहा धोती, लाल गमछा, उजरा गंजी पेहेन केँ हम पठैत बनलहुँ अछि। गाम मे पठैत बनवाक ई हमर पहिल अवसर छल। मोन भीतर सँ हरखित छल। पोथी अपना लग नहि छल। अलखदेव बाबा सँ पोथी मांगि कऽ पाठ करवाक निश्चय केलहुँ।
जिनगी केर ई पहिल अनुभव छल ई हमरा लेल। माँ दुर्गा केँ आह्वान केलाक बाद कील, कवच, अर्गला केर पाठ करैत अंत मे आरती पर खतम करैत छलहुँ । दुर्गा सप्तशती पाठ करै मे बड़ मेहनत छै। सभ पठैत पाठ कऽ लैत छलाह, तब हमर पाठ खत्म होयत छल। हम, अजीत काका, कौशलजी पाठ करैत छलहुँ। परमेश्वर बाबा, मुखियाजी बाबा आओर सहुरिया गामक पठैत सभ मिलि कऽ दुर्गा सप्तशती केर पाठ करैत छलाह।
अप्रैल, 2017
मधेपुर : संघत चौक
जयप्रकाश नारायण केँ संग झंझारपुर होयत मधेपुर पहुँचलहुँ । ई महिशाम रोड छियैय। संघत चौक सँ आगाँ । दिल्ली पब्लिक स्कूल हम आबि गेलहुँ अछि। प्रेमजी एकाउंटेंट छथि आओर सुरेन्द्र नाथ मिश्र अई विद्यालय केर डायरेक्टर छथि। हम दिल्ली सँ एलाक बाद घर पर ट्यूशन पढ़ा रहल छलहुँ, परञ्च ओई सँ जिनगी आगाँ नहि बढ़ि रहल छल। हम बेरोजगार माफिक छलहुँ।
संघत चौक पर डीपीएस केँ छात्रावास चलि रहल छल। रहवाक बेवस्था बनि गेल आओर खेनै केर बेवस्था सेहो भ गेल । संघत चौक सँ अपन जिनगी केर फेर सँ शुरूआत केलहुँ हम। दिलीप झा जी केर ओ मकान छलैन्ह। आओर समस्तीपुर केर वार्डन छेलैक। पठन-पाठन केर जिनगी। तीन मासक बाद डीपीएस केर प्रिंसिपल बनौल गेल। शुरूआत मे टीचर केर गुटबाजी बड़ फिरिशान केलक। नवीं-दसवीं केँ गणित पढाबै केर परीक्षण भेल। नवीं-दसवीं केँ विद्यार्थी खूब फिरिशान केलक। कारण ई नहि जे हमरा गणित पढौल नहि होएत छल। कारण ई छल जे किछु शिक्षक विद्यालय पर हावी छल आओर ओ कोचिंग केर चक्कर मे हमरा फिरिशान करावैत छलाह जे संतोष जी हमर कोचिंग नहि बन्न करा दिऐ । बड़-बड़ खिस्सा भेल ओतह। विद्यार्थी आओर किछु शिक्षक कँ बीच अलग टाईप केर रिश्ता बनि गेल छलैक। महौल खराब भ गेल रहै। अई महौल केँ सुधारनै जरूरी छेलैक। एक केँ बाद दोसर , फेर तेसर शिक्षक केँ इस्कूल सँ बाहरि केलहुँ। बड़-बड़ राजनीति भेलै। दू बेर मधेपुर थाना केँ सामना केलहुँ। इस्कूल केँ विद्यार्थी केँ तोड़वाक षड्यंत्र किछु शिक्षक केलक। किछु विद्यार्थी नेशनल पब्लिक स्कूल, डीएवी आओर आन-आन विद्यालय चलि गेल। परञ्च हम डीपीएस केँ महौल ठीक करवा मे सफल भेलहुँ। छात्रावास केर वार्डन सेहो भेलहुँ। के सी सिन्हा आओर आर डी शर्मा केर गणित हम पढ़ा रहल छलहुँ। गणित हमर नीक छल। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.संतोष कुमार राय 'बटोही'- लघुकथा: चश्मा वाला बाबा संतोष कुमार राय 'बटोही' लघुकथा: चश्मा वाला बाबा
" इ नीक छियैय जे तों चश्मा लगाबैत छें । आजुक समय मे मोबाइल आयलाक बाद धियोपुता केँ आँखि केँ रोशनी कम भ रहल छै " , ई बडबडायत काका दालान दिस गेलाह।
धिया पुता सभ मोबाइल देखवा मे परिक गेल अछि। हमर बेटा अयांश मोबाइल मे घुसल रहैत अछि। माय केँ कोनो काज रहैत छैन्ह, तँ ओ शुरुआत मे अपन काज निकालै लेल मोबाइल धियापुता केँ दैत छथिन्ह। बाद मे मोबाइल केँ चस्का लगलाक बाद धियापुता मोबाइल लेल माय-बाप केँ फीरिशान क दैत छै।
संयुक्त परिवार केँ विघटनक बाद एकल परिवार मे बच्चा केँ धरनिहार कियो नहि रहैत छै। पहिने परिवार केँ सभ लोकनि मिली कऽ धियापुता केँ कोरा-कन्हा लैत छेलैक। नान्हिटा सँ धियापुता चिरै-चुनमुन केँ खिस्सा-पीहानी दादी-नानी सँ सुनि कऽ भूलायल रहति छलाह। परञ्च आजु समय बदैल गेल छै । मोबाइल केँ बिना कियो नहि रैह सकैत अछि।
" की भेलह ? अयांश केँ आँखि देखौलक ? लाहन लऽ जाहक। ", काका पुछलाथि। "लाहन लऽ जेबै। टाका केँ जुगाड कऽ रहल छियैय। अछि तँ पाँचो हजार टाका दियौ, न ? " , हम प्रत्युत्तर देलियैन्ह।
काका कहलाह अछि, " हम कोनो कमैत छी । घर बैसला दस बरख भ गेल। हमरा टाका कतऽ सँ औत ? वृद्धा पेंशन सरकार समय पर नहि दैत छै जे बैंक खाता मे सँ पाँचो सै टाका तोरा दैतिअह ।" हम कहलियैन्ह , " क्या राम कुमार भैय्या एक्को टा टाका कलकत्ता सँ नहि भेजैत अछि ?"
काका हबोडकार मारि कऽ कानऽ लगलाह। नान्हिटा धियापुता जकाँ नोर आँखि सँ बहऽ लगलैन्ह।
" ओ सार सभ हमरा घसल अठन्नीयो नहि दैत अछि। वृद्धा पेंशन केर एकटा मात्र सहारा अछि। सार सभ केँ अपनो पुत छैन्ह। हमरे जकाँ भीख मंगताह। " . काका बजलाह ।
अयांश केँ आँखि लाल भ गेल छै। ओ दू-दू घंटा तक मोबाइल देखैत रहैत अछि। शॉर्ट वीडियो आओर रील केँ जमाना आबि गेल छै। इंस्टाग्राम पर लोक फेमस भ रहल छथि। सब्सक्राइबर केँ संख्या बढि रहल छै। लोक फेसबुक पर फेमस भ रहल छै। यूट्यूब पर वीडियो अपलोड कऽ रहल छै। लाइक आओर शेयर भ रहल छै।
अंधराठाढी केँ डाक्टर आँखि मे डालै वाला एकटा लिक्वीड हमरा देलक। हम बाइक पर चढि कऽ गाम दिस विदा भेलहुँ । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.८.परमानन्द लाल कर्ण- आश्विन मासक एकादशीक माहात्म्य अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.९.डॉ योगानन्द झा- सनेस: एक टिप्पणी अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१०.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा- सौंदर्य प्रेम कुमार मनोज कश्यप लघुकथा- सौंदर्य प्रेम ओ ओहि झमटल भालसारिक गाछ तsर साँझ चारि बजे नित्य आबि कs ठाढ़ भs सामने फ्लैट के बालकनी के एक टक निहारय। देर-सबेर लगभग ओहि काल एकटा नवयौवना अनिंद्य सुंदरी बालकनी मे आबय - धोअल कपड़ा पसारय वा सुखल कपड़ा समेटय लेल वा एहने सन कोनो काज हेतु .... एहि बात सs मुदा निफिक्र जे दूर सs केयो ओकरा निहारि रहल छै। नवयौवना के बालकनी सs चलि गेलाक बादो ओ कतेक काल ओहिना गाछ तsर बालकनी दिस टकटकी लगेने ठाढ़ रहै .... फेर आपस चलि जाई। ओ ओहि नवयौवना के ने जनैत छै आ ने कहियो आमने-सामने भेल छै। बस ओहिना ओकर अप्रतिम सौंदर्य ओकरा मोहित आ विस्मित केने छै आ ओ बिनु आयास बिनु नागा नित्य सायं काल ओहि गाछ तsर सs नवयौवनाक एक झलक पाबि तृप्त... निश्चिंत घर घुरि जाय। कतेको मास सs ई प्रक्रिया अनवरत चलैत रहलै ... ने कनेको कम्म ने बेसी!
ओहि दिन घटित एकटा छोट-छीन सन घटना मुदा अप्रत्याशित परिणाम मे परिणत भs गेलै .... नवयौवना बालकनी मे कथू सs ठेस लागि मुँहें भरि खसि पड़लै। देखिते एकर मुँह सs टीस बहरेलै आ हाथ अनचोके आगू बढ़ि गेल रहै जेना ओ लsगे मे होई आ ई ओकरा सम्हारि लेतै! मुदा दोसरे पल नवयौवना के उठि कs ठाढ़ हेबा लेल कोनो सहारा के टटोलैत देखि अवाके नहिं सून्न पड़ि गेल! मोन झूर-झूमान भs गेल रहै! फेर बिनु कोनो विलम्ब केने ओकर डेग अनायासे आपस घुरि गेल रहै साईत फेर कहियो ओतs घूरि कs नहिं एबाक संकल्प सहित! ओ नवयौवना कोनो घटना-दुर्घटना सs अनभिज्ञ अपन काज मे निमग्न! मुदा गाछ परहक चिड़ै-चुनमुन्नीक कलरव ध्वनि कान फाड़ने छलै! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.११.रबीन्द्र नारायण मिश्र- सीमाक ओहि पार (धारावाहिक उपन्यास) रबीन्द्र नारायण मिश्र सीमाक ओहि पार (धारावाहिक उपन्यास) हमर ससुर स्वर्गीय गणेश झा (पण्डौल डीहटोल)क स्मृतिमे, सादर ससिनेह समर्पित! -21- मुकुंदपुर सहरक अपन इतिहास अछि । एतए एक सँ एक राजा भेलाह । पढ़ाइ-लिखाइ,नृत्य-संगीतमे एहिठामक लोक माहिर छल । वच्चासभक विशेष ध्यान राखल जाइक,कारण एहिठामक जनसंख्या बहुत कम छल । महाकालक चेतौनीक बाद हमर कान ठाढ़ भेल । बहुत मोसकिलसँ निशासँ जान छोड़ा कए हम भोरे-भोर महाकालक मंदिरक करोटमे बनल इसकुल पहुँचि गेलहुँ । ओहिठाम हमरा ज्योतिषीजी,हुनकर पत्नी विमला भेटलीह। ओ सभ हमरा देखि बहुत प्रसन्न रहथि । कहए लगलाह- "हमसभ कतेक निहोरा केलहुँ, कतेक मनेलहुँ जे अहाँ कतहु नहि जाइ, हमसभ आब बूढ़ भए गेल छी, हमरासभक सेवा करू मुदा अहाँकेँ निशाक संगे तेहन ने रमलहुँ जे किछु सुध-वुध नहि रहल । आब आबिए कए की होएत? हमरा सभकेँ अपन किछु नहि अछि, देहो नहि।" "से कोना भए सकैत छैक?" "सएह सत्य छैक बौआ । महाकालक महिमा अपरंपार छनि ।" "की केना भेलैक, से तँ बुझिऐक?" "की करबै बुझि कए?" "हम एतेक दूरसँ एही लेल आएल छी ।" "भने महाकालक शरणमे गेल छलहुँ । ओतहि चलि जाउ। अपने सभटा बुझि जेबैक।" हुनकासभकेँ एहि तरहेँ उदास देखि हमरा मोनमे बहुत कष्ट भेल । मुदा कइए की सकैत छलहुँ ? जतहि जाइत छी रहस्यक नव शृंखला शुरु भए जाइत अछि । हम ओहिठामसँ महाकालक मंदिर दिस पैरे विदा भेलहुँ। रस्तामे अपना गामक कैक गोटे देखेलाह । हमरा देखितहि सभ चिकरए लागल॒- “आउ, आउ, अहाँ ऐन मौकापर आबि गेलहुँ ।"- हम हुनकर सभक बात सुनि ओतहि ठमकि गेलहुँ । "की सोचि रहल छी?" ऊपरसँ अबाज आएल । "अहाँ के छी आ हमर पछोड़ किएक केने छी?" " बेरि-बेरि ई बात किएक बुझबए पड़ि रहल अछि? हम महाकाल छी । हम ककरो पछोड़ नहि करैत छी ।" "तखन?" "सभ अपने हमर प्रभावसँ उलट-पलट होइत रहैत अछि आ लगैत छैक जे ओकरा केओ पछोड़ कए रहल छैक।" "अहाँक बात बूझब हमर वशमे नहि लागि रहल अछि।" से सुनितहि महाकाल जोरसँ ठहाका पाड़ैत कहलाह- "तखन नीकसँ बुझिए लएह । " महाकाल से बाजि लुप्त भए गेलाह । महाकालकेँ जाइते एहिठाम घटित घटनासभ एक-एक कए सामने आबए लागल । -22- मुकुंदपुरक एकटा छोट गाममे ज्योतिषीजी आ बिमलाक हम एकमात्र संतान छलहुँ । बहुत प्रेमसँ ओ सभ हमर शिक्षाा देलाह। पढ़ाइ समाप्त होइतहि हम राजाक ओहिठाम नौकरी लागि गेल। राजाक एकमात्र बेटी छल निशा। जेहने देखबामे सुंदर ,तेहने विनम्र व्यवहार । लगबे नहि करैत जे ई राजपरिवारक अछि । राजा-रानी अपन एकमात्र संतानक हेतु सभतरहक सुविधाक अंबार लगओने रहैत छलाह । कोनो तरहक रोक-टोक नहि । जे चाहत निशा से बुझू राजाज्ञा भए गेल। बहुत दुलारसँ निशा पालल गेलीह। राजा-रानी करबो की करितथि? लाख प्रयास केलथि बेटा नहि भेलनि । तखन जे भगवान देलखिन ताहीसँ संतोष केलाह । कहबी छैक जे कोनो वस्तु एकहिसाबेसँ नीक होइत छैक। राजा-रानी अपन एकमात्र संतान हेतु सुख-सुविधा जुटबैत रहलथि। एतबा धरि तँ ठीक छल । मुदा ओ सभ ओकर जिद्दक आगू अनुचित मांग सेहो मानैत गेलाह । जँ ओकरा मोनमे किछु बात आएल तँ कोनो हालतिमे हेबाक चाही ,चाहे परिणाम जे होइक। एकतरफा दुलारसँ ओ जिद्दी भए गेलि । राजाक ओहिठाम हम काज प्रारंभ केलहुँ । शुरुमे किछु बुझबे नहि करिऐक । हमर काज सोझे महारानी देखैत छली । हुनकर महलक देखभालक जिम्मेदारी हमरा देल गेल । सैकड़ों कर्मचारी ओतए महारानीक सुख-सुविधाक व्यवस्थामे लागल छल। हमरा जे काज देल जाइत से हम मनोयोग पूर्वक करी कारण हमरा कोनो आओर साधन नहि छल । नौकरी करब एकटा अनिवार्यता छल । हम नित्य भोरे काजपर जाइ । हमर हाकिम छलाह -श्याम। ओ राजमहलक प्रमुख व्यवस्थापक छलाह । श्यामक संगे हुनकर पुत्र शरद सेहो कहिओ-काल आबि जाइत छलाह। ओहि समयमे शरद हमर पिताक इसकुलमे गणितक विद्यार्थी छलाह । पढ़ाइ-लिखाइक पद्धति आइ-काल्हिसँ अलग छल । एक बेर जे विद्यार्थी अबैत से पूरा शिक्षा लेलाक बादे ओतएसँ जाइत। ताहि हेतु ओकरा सभप्रकारक सुविधा देब राजाक जिम्मा होइत छल । शरद पढ़ाइमे नीक करए लागल । ताहिसँ प्रसन्न भए ज्योतिषीजी ओकर नामे छात्रबृतिक जोगार हेतु राजा लग प्रस्ताव पठओलाह। राजा ज्योतिषीजीकेँ बजओलखिन आ शरदक बारेमे सभ बातक जानकारी लेलाह। हुनका मोनमे शरदसँ भेंट करबाक उत्सुकता भेलनि । ओ इसकुलमे समाद देलखिन जे शरदकेँ अगिला मंगल दिन भोरे दरबारमे आनल जाए । राजाज्ञा छल । हुनका एबेक छलनि,से अएलाह। संयोगसँ हमहूँ ओहीठाम किछु काजसँ गेल रही । निशा आ रानी सेहो सभामे उपस्थित रहथि । ओना सामान्यतः ओ सभ राज्यसभासँ फराके रहैत छलीह मुदा ओहिदिन राजा स्वयं हुनकोसभकेँ बजओने रहथि । शरदक प्रतिभाक समाचार दूर-दूर धरि पसरि गेल छल । ओ लगातार अपन कौशलक परिचय दैत रहैत छलाह जाहि कारणसँ राजा सेहो प्रभावित भेलथि आ हुनकासँ भेंट करबाक जिज्ञासा भेलनि । शरदकेँ राजसभामे अबितहि निशाक ध्यान हुनकापर गेलनि । शरद जतबे पढ़बामे तेजगर छलाह ततबे सुन्नर । पहिले भेंटमे निशाकेँ ओ आकर्षित कए लेलथि। राजा हुनकासँ बड़ीकाल धरि गप्प करैत रहलाह । हुनका बारेमे तरह-तरहक जानकारी लैत रहलाह । अंतमे निशा हुनका कानमे किछु कहलखिन । राजा हँसए लगलाह । असलमे निशा चाहैत छली जे शरद राजमहलमे नौकरी करथि मुदा तत्काल ई संभव नहि छल कारण शरदक शिक्षा अखन चलिए रहल छल । निशा अड़ि गेलखिन । हारि कए राजा शरदक पिता श्यामकेँ अपन महलमे भेंट करबाक हेतु बजओलथि। राजाक बात नहि मानबाक कोनो प्रश्ने नहि छल। श्याम तैयार भए गेलाह । बीचक रस्ता निकालल गेल जाहिसँ शरदक पढ़ाइओ चलैत रहनि आ राजाक इच्छोक सम्मान भए जानि । राजाक इच्छा की,असलमे तँ निशाक जिद्द छल जकरा आगू राजाक कोनो तर्क नहि चलैत छल। तय ई भेल जे दिनभरि ओ इसकुल जेना जाइत छथि से जाइते रहताह । साँझमे राजमहाल अओताह आ घंटा-दूघंटा निशाकेँ पढ़बामे मदति करताह । ई काज शुरु तँ भए गेल मुदा निशा शरदकेँ कैक दिन कोनो-कोनो बहन्ना बना कए ततेक देरी कए देथि जे हुनका अपन घर वापस जाएब मोसकिल भए जाए । तखन ओ की करितथि? ओतहि राजमहलमे हुनका एकटा कोठरी दए देल गेल। ओहीमे रहि जाथि । शरद एसगर कोना रहितथि । तेँ हुनक पिता सेहो हुनके संगे राजमहलेमे रहए लगलाह । राजाक एतेक लगीचमे रहबामे हुनका डर होनि । कारण जँ कोनो बातपर ओ बिगड़ि गेलाह तँ जानो जा सकैत छल । लगमे रहलापर एहन संभावना बढ़ि गेल छल । मुदा करितथि की ? निशा राजाक दुलारु बेटी । हुनका के रोक-टोक करैत? जखन मोन होनि शरदकेँ बजा लेथि आ ओकरासंगे रंग-रभस करैत रहितथि । जखन ओ इसकुल चलि जाइत तँ हमरा बजा लेथि । हम दिनभरि हुनके लग किछु-किछु करैत रही । राजा-रानीकेँ ई सभ पता रहनि। हुनकर जासूससभ सदिखन हमरासभक पछोड़ करैत रहैत छल आ राजा-रानीकेँ सूचना दैत रहैत छल। -23- कालचक्र तेहन घुमल जे मुकुंदपुरक आस्तित्वे संकटमे पड़ि गेल । संपूर्ण अंतरिक्ष वारंबार हिलि रहल छल । महाप्रलयक दृश्य उत्पन्न भए गेल छल । देखितहि-देखितहि बहुत जोर अन्हड़ आएल । सौंसे मुकुंदपुरमे हरबिरड़ो मचि गेल। जकरे देखू,सएह भागि रहल छल। अन्हड़कसंगे वर्षा से जोर पकड़ने छल । देखिते-देखिते चारूकात पानि भरि गेल । लोकसभ त्राहिमाम, त्राहिमाम कए रहल छलाह मुदा ककरो,कतहु ससरबाक व्योंत नहि छल । हालति ततेक खराप भए गेल जे एकहि सहरमे एकठामसँ दोसर ठाम जेबा हेतु नाओक काज पड़ए लागल । कैक दिन धरि एहि प्रलयकारी दृश्यक अंत हेबाक कोनो लक्षण नहि छल। मुकुंदपुरमे लोक सभ एहन विचित्र दृश्य पहिने नहि देखने रहथि । हम राजमहलमे आएल रही से वापस नहि जा सकलहुँ । शरद किछु काजसँ बाहर गेल रहथि से घुरल नहि रहथि। जखन अन्हड़ आएल तँ इसकुलमे किलास चलि रहल छल। विद्यार्थीसभ यत्र-तत्र भसिआ गेल । ज्योतिषी जी आ हुनकर पत्नी विमला महाकालक मंदिर दिस भागल रहथि,मुदा से महाकालकेँ मंजूर होनि तखन ने? ओ सभ कतए गेलाह,की भेलनि किछु पता नहि चलि सकल। पता लगबितो के ? एहि तरहेँ प्रलयकारी अन्हड़ आ वर्षासँ सौंसे सहर बहि गेल। राजमहालकेँ बचेबाक सभ प्रयास व्यर्थ चलि गेल । सहरक बीचमे पाकड़िक गाछ छल । अन्हड़मे ओ जड़िसँ उखड़ि जहाँ-तहाँ फेका गेल। लगातार वर्षासँ मुकुंदपुर सहर निपत्ता भए गेल । कतहु किछु नहि बाँचल । ई एकटा संयोगे छल जे पाकड़ि गाछ अन्हड़मे दहाइत केना-ने-केना हमर गाम लग पहुँचि गेल । एहि प्रलयक चर्च दिव्यलोकमे सेहो भेल । हेबेक रहैक । कोनो मामुली काण्ड तँ रहैक नहि जे अंठा देल जाइत। महाकाल हाल-चाल लेबए विदा भेलाह । सभक ध्यान ओना हुनकेपर छलनि कारण ओ कखन कोन पल्टी लेताह आ केमहर प्रलय भए जाएत तकर कोन ठेकान? ओहि प्रलयमे उधिआइत, खसैत-पड़ैत पाकड़िक गाछ मौजपुर आ लखनपुरक सीमापर जा कए अड़कि गेल। मुकुंदपुर सहरक कतेको जीव-जन्तु ओही गाछक संगे चलि आएल । आओर जे आएल से आएल कतेको लोकक आत्मा सेहो ओही गाछपर अड़कल छल ,मुक्त नहि भए सकल छल,सेहो सभ ओहि गाछक डारिसभ पर लटकल रहि गेल । के ककरा मुक्त करैत? तेहन भारी प्रलय भेल जे ककरो पिण्डदानो नहि भए सकल । अनकर कोन कथा, ज्योतिषीजी आ हुनकर पत्नी सेहो ओही गाछक डारिपर भुखल-पिआसल पड़ल छलाह । संयोगसँ महाकालक ध्यान पाकड़िक गाछपर पड़लनि। "की बात अछि, अहाँ बहुत परेसान छी ।"- पाकड़ि गाछकेँ अपसिआँत देखि महाकाल बजलाह । " जहिआसँ मुकुंदपुरमे प्रलय भेल हम घुमिए रहल छी । कतहु ठौर नहि भेटल । जेना-तेना मौजपुर लग ठहरि गेलहुँ। तखनसँ ओहिना छी। हमर जे हाल भेल अछि से अहाँ देखिए रहल छी । अहाँसँ की झाँपल अछि । " "चिंता नहि करू । जहिना विनाश देखलिऐक अछि, तहिना सृजनो देखबैक । -से कहि महाकाल विलुप्त भए गेलाह। आश्चर्यक गप्प थिक जे एतेक झंझावातमे पाकड़िक गाछ बँचि गेल आ मौजपुरक अनुकूल वातावरणमे फेरसँ हरिआ गेल। -24- कहल जाइत अछि जे समय कैकटा समस्याक इलाज स्वयं कए दैत अछि । समय बितलापर कतेक रास बातसभ बिसरा जाइत अछि । लोक नव-नव कल्पनाक सृजनमे व्यस्त भए जाइत अछि । सएह एतहु भेल । पाकड़िक गाछ आ ओहिपर बैसल तमाम जीव-जन्तुसभ अपन दुखसभ बिसरि जीवनक व्योंतमे लागि गेल। सुग्गा कोनो एसगरे तँ रहथि नहि,ओहि गाछपर कतेको आत्मा लटकल छल । सभ कोनो-ने-कोनो रूपमे मौजपुर आ आसपासक गाममे जन्म लेलाह । महाकालक चक्र आगू घुमल । पाकड़ि गाछ लग बैसले-बैसल हमरा पूर्व जन्मक इतिहासक जानकारी भेटल । हम एहि बातसँ आश्वस्त भेलहुँ जे ज्योतिषीजी आ हुनक पत्नी विमला हमर पूर्व जन्मक माता-पिता छथि । हुनकासभक पिण्डदान करबाक हेतु हम गया प्रस्थान केलहुँ। ताबे समय बहुत बदलि गेल छल । गया जेबाक हेतु बहुत रास साधन भए गेल छल । हबाइ जहाजक तँ ओतए अंतरराष्ट्रीय अड्डा भए गेल छल । रेलगाड़ी,बस सँ सेहो बहुत रास यात्रीसभ ओतए अपन पूर्वजक पिण्डदानक हेतु अबैत छथि । हम गया बिदा भेलहुँ । कोना जाएब गया? हम ई सोचिते रही कि महाकालक स्वर सुनबामे आएल- " हद भए गेल । अहाँकेँ कोन पाँच हाथक देह अछि जकर चिंता कए रहल छी । "तखन?" "तखन की? हमरे संगे चलू ।" "जे आज्ञा।'' हम महाकालक संगे किछुए कालमे गया पहुँचि गेलहुँ। मोनोसँ बेसी तेज हिनकर चालि छल । "आब की सोचि रहल छी?" "की कहू । हम तँ गुम्म छी ।" महाकाल ठहाका पाड़ए लगलाह । कहैत छथि- “आओर जे होइ मुदा अहाँ छी बेस रमनगर लोक । " "एहिमे हँसबाक कोन गप्प भेलैक? हम तँ पाकड़िक गाछ आ ताहिपर बैसल सुग्गाकेँ एतए देखि परेसान छी आ अहाँ ठहाका पाड़ि रहल छी । " हमर महाकालक संग चर्चाकेँ पाकड़िक गाछ बहुत ध्यानसँ सुनैत रहथि । कहैत छथि- "हम तँ अहींक मदति लेल आएल छी । सुग्गाकेँ अहाँक बहुत चिंता भेलैक । कहए लागल तँ सोचलहुँ जे किएक ने किछु मदति करी । आखिर हमर पुरान संगी छलाह ज्योतिषीजी आ अहाँ हमरे कहलापर हुनकर पिंडदान करबाक हेतु आएल छी ।" “सुग्गो आएल छथि? कतहु देखा नहि रहल छथि ।" हम एतबा बाजले रही कि पाकड़िक गाछपर सुग्गा टाँय-टाँय करए लगलाह -"हम बैसल-बैसल उबि रहल छलहुँ तँ कनी अपन संवंधीसँ भेंट करबाक हेतु चलि गेल रही ।-सुग्गा बजलाह। "ओ के छथि?" "अपने बुझि जेबैक । से कहि सुग्गा उड़ि गेलाह । हम थाकि गेल रही । पाकड़िक गाछ ई बात बुझलाह । कहैत छथि- " कनी काल एतहि छाहरिमे सुस्ता लिअ । फेर आगूक काज करब ।" "एहि रौदमे सुग्गा कतए चलि गेलाह?" "ओकर सासुर एतहि छैक ने ।"-से कहि ओ हँसए लगलाह। हमरो हुनका हँसैत देखि हँसा गेल । "कतए छैक ओकर सासुर?" "अहूँकेँ खोध-बेध करबाक बहुत आदति अछि ।- से कहि ओ हमरा दक्षिण दिस इसारा केलाह । -25- गया पहुँचितहि ओहिठामक पंडासभकेँ आपसमे घोंघाउज करैत देखलिऐक। " ई हमर जजमान छथि । हिनकर कैक पुस्त हमरा ओहिठाम आबि रहल छथि ।"-एकटा पंडा बाजल । "की बात करैत छह । बाबा सभक बटबाराक बाद ओ सभ हमरा सभक जजमान भए गेल रहथि ।"-दोसर पंडा बाजल । "तूँ दुनूगोटे जानि-बुझि कए झूठ बाजि रहल छह । ई सभ तँ हमर जजमान छथि। हिनकर पिता हमरे ओहिठाम आएल रहथि। नहि विश्वास होअ तँ खातामे देखि लएह ।"-तेसर पंडा बाजल । तीनूमे झगड़ा नहि फरिछाइत रहैक कि टीसनपर ठाढ़ दलाल सभ हाथमे लठ्ठ लेने दौड़ल । "तोरासभक नित्यक इएह लफड़ा रहैत छह । आइ सभदिन हेतु एकरा खतम कए दैत छिअह ।"-केओ दलाल बाजल आ लाठी लेने आगू बढ़ल । पंडासभ इएह ले ओएह ले भागल। दलालसभ ओकरासभकेँ खिहाड़ि रहल छल । एहि दृश्यकेँ देखि हम ओहिठामसँ घसकबाक जोगार मे रही । ताबते मे एकटा दलाल हमर गट्टा धेलक । " के छी? आ कतए सँ अएलहुँ अछि?"-ओ बजैत अछि । हम की कहितिऐक? दिन-राति तँ ओ सभ भूतेक काज करैत रहैत छल । ओकरा किछु अखिआस भेलैक । हमर पैर दिस देखलक । हमर पैर उल्टल छल । देहक कोनो अत्ता-पत्ता नहि । ओ डरा कए भागल आ भागिते रहि गेल ,घुरि नहि तकलक । जाइत -जाइत पंडासभक घर लग पहुँचल । तीनूपंडा सरदार पंडालग खाता खोलने छलाह । तीनू खातामे हमर पूर्वजक नाम रहनि । आब की होइत । सरदारपंडा कहलखिन जे हमही एहि जजमानक काज करब । हुनकर आगू केओ किछु नहि बाजि सकल । सरदार पंडा हमरा कहैत छथि- "ई सभ अखन अनाड़ी छैक । हम अहाँक पिंडदान स्वयं कराएब । मुदा खर्चा बेसी लागत ।” "कतेक लगतैक?"-हम बजलहुँ । “एतए पिण्डदान कोनो एकठाम होइत छैक से बात नहि छैक । सौंसे शहारमे ठाम-ठाम कतेको स्थान चिन्हित कएल गेल अछि जतए तरह-तरहक मंत्र पढ़ि-पढ़ि मृत व्यक्तिक प्रेतयोनिसँ मुक्तिकहेतु पिण्डदान कएल जाइत अछि।“ सरदारपंडा एतबा बाजले रहथि के दलाल हाँफैत ओतए पहुँचल । सरदार पण्डाकेँ हमरासँ गप्प करैत देखि ओ चिकरल - "भागू, भागू ।" "की भेलैक?" " देखि नहि रहल छिऐक जे हमरा पुछि रहल छी?" "फरिछा कए बाजह । बुझौअल नहि बुझाबाह ।" " अहाँ साफे सठिआ गेलहुँ । देखैत नहि छिऐक जे एकर पैर उल्टल छैक? देहक कतहु अता -पता नहि छैक ? ई तँ साक्षात प्रेत अछि ।" से सुनितहि सरदार पंडा भागल । ओ भागिए रहल छल कि कहि नहि कहाँसँ एकटा साँढ़ चिकरैत-भोकरैत ओकरा सामनेमे आबि गेल । साँढ़ सरदारपण्डाकेँ उठा कए पटकि देलक। ओकरा दाँती लागि गेलैक । आसपास लोकसभ आबि गेल । ओ तीनू पंडा सेहो आबि गेल। " ई अछिओ बहुत दुष्ट । दिन-राति बैमानीमे लागल रहैत अछि । लएह आब, भोगह।''-एकटा पंडा बाजल । " एकर कोन दोष? हमहीसभ ने एकरा मौका देलिऐक। आपसमे फरिछा लितहुँ तखन एना थोड़े होइत ।"-दोसर पंडा बाजल । "बँचि गेलहुँ । एहिमे तँ बड़ लफड़ा छैक ।"-तेसर पंडा बाजल । अहाँसभ केहन लोकसभ छी । पहिने हिनकर इलाजक ओरिआन करू, फेर घमरथन करैत रहब ।"-ओहिठाम उपस्थित भीड़मे सँ केओ बाजल । लोकसभ सरदारपंडाकेँ उठापुठा कए घर पहुँचा देलक। ताबे हमहुँ ओतए पहुँचि गेलहुँ । ओतए सुग्गा पहिनेसँ पहुँचल रहथि। "अहाँ कखन अएलहुँ?"-हम पुछलिऐक । "अहाँकेँ तँ पाकड़ि भाइ कहनहि छल ।“ "नहि मोन पड़ि रहल अछि । अहीँ कहि दिअ।" “ई हमर सासुरक लोक छथि । " सुग्गाक बात सुनि कए हमरा आओर किछु नहि फुराएल। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। पद्य ३.१.डॉ. जियउर रहमान जाफरी-ई पर्याप्त नहि छल/ बहुत प्रयासरत ३.२.राज किशोर मिश्र-दलिद्दर ३.३.संतोष कुमार राय 'बटोही'- खेतक आरि पर ३.१.डॉ. जियउर रहमान जाफरी-ई पर्याप्त नहि छल/ बहुत प्रयासरत डॉ. जियउर रहमान जाफरी-ई पर्याप्त नहि छल/ बहुत प्रयासरत १ ई पर्याप्त नहि छल
हुनका लग सब किछु छलनि रूप, सौन्दर्य, लालित्य शैली, आवाज ध्वनि, संगीत हाँ जननतंत्र नहि छल आ बस एहि अनुपस्थितिक कारणेँ ओकर सब किछु बनब फीका पड़ि गेल छल एहि समस्त स्थिति मे जे हुनका लग राखल गेल छलनि मेल फीमेल सें पृथक दोसर के कॉलम में... २ बहुत प्रयासरत
ओ कहियो डाक्टर लग नहि गेलीह ओ कहियो चेक नहि केलक अपन ब्लड प्रेशर ओकरा कोनो जरुरत नहि छलैक खाली पेट पर चीनीक टेस्ट कराबए लेल हुनका कोनो विश्राम स्थल नहि छलनि जाड़, गर्मी, वर्षा ओही गाछक नीचाँ काटि लैत छलीह कहियो खाँसी नहि भेलनि मौसम कहियो हुनका पर अपन वर्चस्व नहि देखौलक ओ आदिवासी महिलाक पालन-पोषण नहि भेल कोनो टा सेठक घर वन भूमि नदी ई सभ ओकर दिन-राति छल ई सबटा ओकर ब्रह्मांड छल... -ग्राम/ पोस्ट - माफी, वाया - अस्थवान, जिला नालंदा बिहार 803107 9934847941 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.राज किशोर मिश्र-दलिद्दर राज किशोर मिश्र दलिद्दर
जी र्ण कुरता पर चेफरी कतेको , ठा म-ठा म ओकर धो ती फा टल, दरि द्रता क अछि चि त्र बना ओल, खो पड़ी क चा र पर पन्नी सा टल।
दा ना बि नु ओकर डेकची मे , छुच्छे उधि आ रहल छै अदहन, अहा ङ-भा ओ के जरनहि बि ना , भऽ रहलैक अछि रा वण-दहन।
चि ड़ै सेहो बि छने हो एत, कि छुओ तऽ अन्नक दा ना , हो एत ने उपा सल, कंठतर, रा न्हल ककरो सा ना ।
भूखल पशु पगहा तो ड़ि क' चरि क' आएल हो एत घा स, मुदा दलि द्दर के नि जगुते, आइयो भेल हेतैक उपा स।
ओकर बा ड़ी पर कबजा केलकै, गा मक दला ल, महा जन, चक्रवृद्धि बेआजक चक्रव्यूह, उठेलकै खो पड़ी क झा झन।
बाँ चल छै ओकर देहक ठठरी , आ' दरि द्रता क अभि शा प, सो नि त सूखल ,पाँ जर पचकल, अँतड़ी मे बुभुक्षा के वि ला प।
अन्न तँ एखनो उपजले हो एत, मुदा नि रसल ओक्कर अङना , को न-को न दरबज्जे नि कसि जा इत छथि , नि त्य देवि अन्नपूर्णा ?
बजा रवा द आ अर्थ-व्यवस्था , ओकर अपन छै दा ओ-पेँच, धन-वंचक आ' दला ल सपि ण्डे , स्वा र्थ सि द्धि लेल कतेको मेच ।
अर्थ-तंत्रक को नो दुर्घटना मे , पसरल ओकर छै अस्थि ,लि धुर, हड्डी चि बबैत अर्थ-पि शा च सभ, सो नि त पी बैत बुझि मधु-मधुर।
खो पड़ी क टा टक टूटि पर, अछि टका -टुकुरक षड्यंत्र ,ढी ठ , अपरा धी सँ ला गल रक्त-दा ग दरि द्रता क बनल ओ सि द्ध-पी ठ।
दलि दरा के तँ भऽ चुकल छै, धन सँ सम्मो हन-मा रण-उच्चा टन, कहलथि न जो तखी -'नहि लक्ष्मी -यो ग, ने देखबे मुहथरि पो खरि आ-पा टन। '
उदा स डी ह पर बैसल अछि भूखक बेता ल, दी नता क फुटल अछि ओतए बेस पता ल ।
अस्थि -पिं जर पर जि नगी क मुर्दा , उघने जा रहल अछि , भूखक अग्नि सँ उठल धुआँ के, सुँघने जा रहल अछि ।
पूर्व-जन्मक पा प बुझअओ कि अपन नि ष्फल कर्म?र्म कि भा गक दो ख बुझि लि अओ, आकि अर्थतंत्र पर शर्म?
ठंढा एल चुल्हा , झमा न तसला , को नो अर्थ-र्थ बधि कक बनल शि का र, घरक टूटल केबा ड़ कऽ रहल अछि , दरि द्रता क सुंदर सिं गा र।
भूख नहि अछि ककरो गुला म, जी त नहि सकला ह कृष्ण-रा म।
तँ, की करतैक दलि दरा हा ? बुभुक्षा लेल त' समा न नृप-रंक, न्या य करथु जग-भा ग्य-वि धा ता , दी न पर कि ए भूखक आदङ्क ? अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.संतोष कुमार राय 'बटोही'- खेतक आरि पर संतोष कुमार राय 'बटोही' खेतक आरि पर
खेतिहर खेतक आरि पर पडल अछि खेत केँ निहार रहल अछि बरखा नहि भऽ रहल छै बाउल बिया सुखा रहल छै रौदी होयतै अइ बेर ।
आलू अइ बेर चालीस छै प्याज पचास टैप गेलै सभ तरकारी दाम चढल छै खेतिहर कानि रहल अछि धियापुता की खेतै अइ बेर ।
दरैर फाटि गेल छै खेत मे ब्लॉकिया बिया, ट्रैक्टर, जन केर दाम ऊपर नहि हेतै बरखा-बुन्नी केर नाम नहि छै धरती माय पियासल रहतीह अइ बेर।
चिरै-चुनमुन पियासले रहतै पोखैर मे माछ कोना जितै देखिनिहार नहि कियो छै खेतिहर मरलै कि जियै छै अछिया पर जेबे करतै अइ बेर। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह ३९९ म अंक ०१ अगस्त २०२४ (वर्ष १७ मास २०० अंक ३९९)|| 79 80 || विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in
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३.२.राज किशोर मिश्र-दलिद्दर (पृष्ठ ७६-७९) ३.३.संतोष कुमार राय 'बटोही'- Gach आरि पर (पृष्ठ ८०-८१) | |
विदेह ३९९ म अंक ०१ अगस्त २०२४ (वर्ष १७ मास २०० अंक ३९९) | | 47 TY ! AG Wa Are aS. WA AAT तय SRO am 4 oedt fare वाजक्रभाव छताट w WITS Aer Ware | ७ धर्मशवाथन TE TSS AAT SIS BATS | AAPA TA जन्न HHT GA छत | ate GRO wa as उखि a OAT ACES GANS । ७ CHA HS CMMI TT मैं Br SAS AA we frre wre | ७ fafa fray जैं अधात्पिक IACI ताशव ACS BATS | AS fa aot ATS एप A Bale ,उशथनदि Tah नावण wert + Got ef sm ane | ANT acto TAP वाजा ठीठ BA Cae आ PAPA FATT जे RAPT AGA BR GAP GA AP Tafa , OPT am ७ कठतनिं - we WACTa ! AIS att HST we डी । आज wis WA HON जन्न US TPT UR OM | THA ANAS APA SAT FOI SR AS ठपया शव HOTT कक | नावन Gt Seat - वाजन ! oT act S&S आाधर्यक ars Sto ही । ठग Faas जैं TTS शत wm, of Sm Aon कद WATS ON vision जैं HR HAT | CIT शगवाजक HST OT ठग WATS Prot & CNG BH । ७ qu UTS CAT मैं GIS OM A Ble | AGA! ७ ais TAT GSS TOA MAA ate | ७ Seal अड्डि एज at 'अन्मिया'
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विदेह ३९९ म अंक ०१ अगस्त २०२४ (वर्ष १७ मास २०० अंक ३९९) | | 53. 2a उलट फिर कक अस्त पड व्मगुध्ल eh DY mar ne उप रियल ain gee mr FTAA OO re Se - joe cere कक ra ores pry ate antkey area Ss HH Sf SEL HYCO बाधक / Saviors बरन्यफताक Srey जाणपाति आदि देपता सिलाड, SEPP SP कि arene निव्तलितासक TT रश्मि PESTS AGEL AE ADL oie as rT aR GSS paren op | VE ST sropaas sare Pan, asa , OFT Ke कि ATS झंग्छिय जाणिक्षका dgTRXFA- AeA A ETAT a See Bele cue LIE जद, BT A OR oy Bre 2th पार्वती PRT 7, oe] onda ayer we BORG rape HORS, ae WT HS RS wnens ote area Hare Se Ian St crafpa of) DUCTS RA HEAL OTE oy | TET rare अति Swords aft | Pie i aE रूपी le \ LTT, HITT) TET auf ES HOT ld Zi ‘ ~ oSaA नवक BEV EES BA Gee Qesoss <P ४ Boar |? <p TAT रत i boa Sar SP I SRA TP aera oaeed : een किक TAR Aore on F okt war VE Soe जात फल हा अति Parad 2 तठिय a zEzate as ~ <> sa ontte ¥ Fo पक I Reve, wagaitean sais OF |
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विदेह ३९९ म अंक ०१ अगस्त २०२४ (वर्ष १७ मास २०० अंक ३९९) | | 55. 4 sake 4 ] oes Han, 2 du |