VIDEHA — Issue 402 / अंक ४०२

Publication: VIDEHA · Issue: 402
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ISBN Number: 978-93-341-2705-8 (Book) ISSN 2229-547X (online) 𑒀 विदेह ४०२ म अंक १५ सितम्बर २०२४ (वर्ष १७ मास २०१ अंक ४०२) [विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। कॉपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति ‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२४. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२४. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. It is a platform for scholars, researchers, writers and poets to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, and poetry in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@gmail.com. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover designed by AUM GAJENDRA THAKUR Videha e-Journal: Issue No. 402 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृष्ठ १-३०) १.२.अंक ४०१ पर टिप्पणी (पृष्ठ ३१-३१) गद्य २.१.उमेश मण्डल- सगर राति दीप जरय- ११८ (पृष्ठ ३३-३९) २.२.परमानन्द लाल कर्ण-कातिक मासक एकादशीक माहात्य (पृष्ठ ४०-५०) २.३.आचार्य रामानंद मंडल-उत्तर बिहार अर्थात मिथिला राज्य (पृष्ठ ५१-५२) २.४.मुन्ना जी- बीहनि कथाक विकास मे संपादक, आलोचकक योगदान (पृष्ठ ५३-५८) २.५.संतोष कुमार राय 'बटोही'-राखी (संस्मरण) (पृष्ठ ५९-६१) २.६.संतोष कुमार राय 'बटोही'-मैथिली साहित्य मे समालोचक केँ कमी (पृष्ठ ६२-६५) २.७.प्रणव झा-फैमिली एडॉप्शन प्रोग्राम (FAP): चिकित्सा शिक्षा में नवाचार आ ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य सेवाक बढ़ावा (पृष्ठ ६६-७०) २.८.रबीन्द्र नारायण मिश्र- सीमाक ओहि पार (धारावाहिक उपन्यास) (पृष्ठ ७१-७७) पद्य ३.१.प्रदीप कुमार मंडल 'पवड़ा'-दुधक ऋण!/ सजनी छोड़ि गेलीह मोरी गाम! (पृष्ठ ७९-८२) ३.२.प्रमोद झा 'गोकुल'- मामी कत मोर (पृष्ठ ८३-८४) ३.३.प्रणव झा- बादल आई फेर तू आयल छलही हमरा आँगन (पृष्ठ ८५-८६) ३.४.राज किशोर मिश्र-साम्प्रतिक परिवेश (पृष्ठ ८७-९०) ३.५.संतोष कुमार राय 'बटोही'-परेमक डोर (पृष्ठ ९१-९२)

१.०.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १ ११८ म सगर राति दीप जरय २१ सितम्बर २०२४, फुलपरास अनुमण्डलक रतनसारा गामक उत्क्रमित मध्यविद्यालय परिसर, (बलान-तिलयुगा-बिहुल कथागोष्ठी)मे २२ सितम्बरक भोरमे सम्पन्न भेल। संयोजक आयोजक रहथि राजीव कुमार, दुर्गानन्द मण्डल आ शिव कुमार राय। ११९म सगर राति दीप जरय दिसम्बर २०२४ मासमे श्री गोसाँइ मण्डलक संयोजकत्वमे सहरसामे हएत। हँ ८-१० गोटे साहित्य अकादेमी द्वारा घोषित लिटेरेरी एसोसियेशन, चेतना समितिमे ११९म कथा गोष्ठी कऽ लेलनि, एकटा बेसिये संख्या आ से उचिते, अस्सी-अस्सी हाथक साहित्यकार सभ छथि, ऐ बीच मे मारिते रास कथा गोष्ठी केने छथि, से १२९ म नम्बर सेहो राखि सकै छला। आ अगिला गोष्ठी दिल्ली नै लऽ जा कऽ गौहाटी लऽ गेला कारण रहल विदेहक अंक ३९७ क सम्पादकीय। आब गौहाटीसँ दिल्ली जायत हुनकर सभक गोष्ठी, २-४ गोटे गौहाटी आ दिल्ली मे सेहो जुटिये जाइ जेता। साहित्य अकादेमी आ ओकर कथित लिटेरेरी एसोसियेशन सभ अपनाकेँ हँसीक पात्र बनबिते रहै छथि, खएर। रचनाकार अशोक भिन-भिनाउजक गप केलन्हि जे आब सगर राति दीप जरय केँ ओपन कऽ देल जाय, जेना विद्यापति पर्व ओपेन अछि सभक लेल। साहित्य अकादेमी द्वारा घोषित लिटेरेरी एसोसियेशन, चेतना समितिक ओना मुख्य काज विद्यापति पर्वे छै से ओकर मंचपर ई घोषणा उचिते छल। मुदा संयुक्त परिवारसँ फराक भऽ असगर कथा गोष्ठी करेबाक कारण कनी अनछज्जल लागल। ओ कहलन्हि जे कथा गोष्ठी रैलीक बौस्तु नै अछि, ऐ मे क्वालिटी तखने आओत जखन नीक समीक्षा हएत आ स्तर बढ़त, मुदा रमानन्द झा रमण अपन आलेख सभमे सुखायल मुख्य धारा द्वारा आयोजित पुरनका सगर राति दीप जरय मे कथित मुख्य धाराक कथाकार द्वारा समालोचना नै सहबाक गप चिकरि-चिकरि कऽ केने छथि, आ जँ क्वालिटी बढ़ल रहितै तँ कथित मुख्यधाराक कथा सभ पीअर कपीश आ सुखायल नै रहितै। खएर.. भिन-भिनाउजक बाद ओपेन युगक पहिल कथा गोष्ठी साहित्य अकादेमीक लिटेरेरी एसोसियेशनक दफ्तरमे ओ सभ शुरु कइये देलन्हि तँ शुभकामना, आ भिन-भिनाउजक बादक दोसर आ तेसर गोष्ठी जे गौहाटी आ दिल्लीमे होइबला अछि तइ लेल सेहो अग्रिम शुभकामना भने ओकर नम्बर १२० आ १२१ ओ सभ राखथु बा नै। क्वालटी बढ़न्हि आ साहित्य अकादेमीक मैथिली प्रभागक प्रकाशन सभमे आगाँ क्वालिटी आबय आ ओकर अनुवाद सभ आगाँ हँसीक पात्र नै बनय तहू लेल शुभकामना कारण ऐ साहित्य अकादेमीक असाइनमेण्टजीवी कथाकार/ कवि/ शोधकर्ता सभ अपनाकेँ मैथिलीक प्रतिनिधि साहित्यकार कहै छथि आ तकर स्तर ततेक निम्न होइ छै जे हमरा सभकेँ की-की नै सुनऽ पड़ैए। ओना अन्तर्जालसँ आब ई तँ भेलैए जे आन भाषा-भाषी ई धरि बूझ गेलैए जे मैथिलीक सुखायल मुख्यधाराक साहित्य आब मिशेल फोको परिभाषित  "अनुशासन संस्था" जेना साहित्य अकादेमी आदिपर मात्र निर्भर अछि, मुदा से प्रतिनिधि मैथिली साहित्य नै छिऐ। २ साहित्य अकादेमीक मैथिली प्रभागक एकटा आर काण्ड १९२३ आ १९२४ मे मात्र तीनटा नीक साहित्यकारक जन्म भेल रहन्हि, रामकृष्ण झा किसुन, अणिमा सिंह आ प्रबोध नारायण सिंह। साहित्य अकादेमी नीक आयोजन कऽ रहल अछि, वएह दस टा लोक जे भिन भिनाउजक बादक कथा गोष्ठीक समर्थक छथि, अहूमे शोधपूर्ण पेपर सभ पढ़ता। तँ की चारू दिस अन्हार अछि? नै, ऐ लिस्टमे ओही इलाकाक अरविन्द ठाकुर छथि जे बारल छथि, से रीढ़क हड्डी बला साहित्यकारक बनब बन्न नै भेल छै। गोविन्द झा १९२३, योगानन्द झा १९२३, उमानाथ झा १९२३, जटाशंकर दास १९२३, राजेश्वर झा १९२३, पोद्दार रामावतार अरुण १९२३, मदनेश्वर मिश्र १९२४, अमोघ नारायण झा "अमोघ" १९२४, मतिनाथ मिश्र मतंग १९२४, आनन्द मिश्र १९२४, ई लोकनि सेहो १९२३ आ १९२४ मे जन्म लेने छलाह। डॉ. सर आशुतोष मुखर्जी १९२४ मे आ म. म. परमेश्वर झा सेहो १९२४ मे मृत भेला,  जहिया हिनकर सभक बच्चा साहित्य अकादेमीक मैथिली प्रभागक अध्यक्ष नचिकेता जी सन बनतन्हि बा केदार कानन जी सन रामदेव झा, चन्द्रनाथ मिश्र अमर आ नचिकेता सन सभक प्रिय हेतन्हि तँ हिनको सभक शतवार्षिकी जयन्ती/ पुण्यतिथि मनाओल जेतन्हि आ फेर सम्मेलन/ सेमीनार साहित्य अकादेमी आयोजित करबे करत, ऐ मे अतेक हरबड़ेबाक कोन गप। नीचाँ उपरका दुनू विषय पर विदेहक दूटा पुरान सम्पादकीय सेहो देल जा रहल अछि। विदेह अंक ३६८ क सम्पादकीय दिल्ली साहित्य अकादमीक प्रख्यात मैथिली विभाग परामर्शदात्री समिति (२०२३-२०२८) १० मे ६ ब्राह्मण + १ नव-ब्राह्मणवादी आ समानान्तर धाराक एक्कोटा गएर-सवर्ण लेखक नहि छथि, जे गत १५ बर्ख सऽ सीमित आर्थिक संसाधनक अछैत मैथिली लेल जान-प्राण अरोपने छथि। नचिकेता जीक ई परामर्शदात्री समिति एलिट अछि, आ ई अगड़ा-पिछड़ा दुनूक एलिट लेल काज करत, साहित्यमे जे एलिट छथि से कतिआयले रहता, राजदेव मण्डल जीक रचना जूरी बाड़ने छथि से बाड़ले रहत। समानान्तर धाराक साहित्तकार लोकनि लेल ई खतराक अलार्म अछि आ से हुनका दुन्ना काज करय पड़तनि। लिस्टः उषाकिरण खान (मृत भेलाक बाद आब नीता झा*), सुभाषचन्द्र यादव, प्रमोद कुमार झा, देवशंकर नवीन, तारानन्द वियोगी, विद्यानन्द झा, रमण कुमार सिंह, अजय झा, वीणा ठाकुर, नचिकेता। *कोष्ठकक विवरण अद्यतन अवस्था अछि। विदेह अंक ३९७ क सम्पादकीय ११७ म सगर राति दीप जरय, दरभंगा (आयोजक हीरेन्द्र झा आ अशोक कुमार मेहता) साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदातृ समितिक अध्यक्ष (आब भूतपूर्व) अशोक अविचलक दृष्टि सगर राति दीप जरय पर पड़ल आ ओकरा गिड़बाक प्रयासमे हीरेन्द्र झा केर ब्लैकमेलिंग केर शिकार ओ सहर्ष भेला आ टैगोरक १५० म जयन्ती वर्षक साहित्य अकादेमीक कार्यक्रम जे दिल्लीक एकटा संस्था करबेने रहय केर गिनती सेहो करैत नम्बरमे हेरफेर करबाक अपराध केलन्हि, जकरा ओ चलाकी बुझैत छथि। मैथिली परामर्शदातृ समितिक अध्यक्ष बनलाक बाद लोकमे ऐ तरहक प्रवृत्ति देखल गेल छै, जकर शिकार रामदेव झा भेला, जे शोधक लेल ख्यात रहथि; चन्द्रनाथ मिश्र अमर भेला, जिनकर पहिल फेजक आन्दोलनी योगदान झँपा गेलन्हि, आब नचिकेतापर ई ग्रहण लागल छन्हि। हीरेन्द्र झा ऐ लगा तेसर बेर ई कुकृत्य केलन्हि अछि, जइमे ऐ बेर कमल मोहन झा आकि मिश्र चुन्नू सेहो हुनकर संग देलखिन्ह। हँ सह-सहयोजक अशोक कुमार मेहता मुदा ऐ कुकृत्यमे हुनकर संग नै देलखिन्ह। भेलै की? पूर्व नियोजित षडयंत्र जइमे अशोक अविचलक योगदान ऊपर कहल गेल अछि, मे हीरेन्द्र झा केँ सगर राति दीप जरय केर सह-आयोजक बनाओल गेल (स्पष्ट रूपसँ कहि देल गेलन्हि जे नम्बरमे हेरफेर नै करता), फेर कमल मोहन झा आकि मिश्र चुन्नूकेँ तैयार राखल गेल। मुदा सभ चोरिमे एकटा निशान छुटिते छै। अध्यक्ष महोदय बिना कोनो प्रस्ताव एने धड़फड़ीमे बाजि देलखिन्ह जे अगिला गोष्ठी पटना आ तकर अगिला दिल्ली (जतऽ साहित्य अकादेमीक मुख्यालय अछि) मे हएत, आ फेर गप सम्हारलखिन्ह जे से तकर निर्णय (दिल्लीक) पटनामे कएल जायत। कमल मोहन झा आकि मिश्र चुन्नू तैयारे-तैयार रहथि, फटाकसँ चोरिक रजिस्टर आ दीप लेलन्हि हीरेन्द्र झा सँ आ निर्ललज्जापूर्वक हँसबाक प्रयास करैत (मुदा हँसी तँ छोड़ू हास्यक पात्र लगै छथि) फोटो घिचबेलन्हि। प्रतिकार की हुअय? ई ऐ लगा हीरेन्द्र झा केर तेसर गलती अछि से हुनका तीन सगर राति लेल बैन कएल जाय, कमल मोहन झा आकि मिश्र चुन्नूक ई पहिल गलती अछि से हुनका एक सगर राति लेल बैन कएल जाय। उपस्थित लोकक बहु-संख्या ११८ म सगर रातिक आयोजक ताकथि। अगिला सगर रातिक नम्बर ११८ रहय आ तकर प्रचार हुअय, जइसँ साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदातृ समितिक अध्यक्ष ई कुकर्म करबाक विषयमे सोचितो डराथि। नव साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदातृ समितिक अध्यक्ष आ सदस्य लोकनिक कुकृत्य नव साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदातृ समिति अपन प्रचारमे पुरना समितिक लेल ई श्लोक पढ़लन्हि: यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभुत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥४.७ (श्रीमदभागवदगीता) जखन-जखन धर्मक नाश आ अधर्मक उत्थान प्रारम्भ हएत हे भरत, तखन-तखन हम आयब (शरीर धारण करब)। आ से ततेक अधर्म भेलै जे नचिकेता आ हुनकर टीम अवतार लेलक। आ केलक की? मासो नै बितलै पहिल बैसकीमे मोनोग्राफ, अनुवाद आदिक बँटवारा भेलै आ टीमक सदस्य सभ अपनेमे सभटा असाइनमेण्ट बाँटि लइ गेल, अपना-अपनी आ लगुआ-भगुआमे, नचिकेताजी देखैत रहि गेला, वरन सहयोगे केलखिन्ह। समानान्तर धाराकेँ स्कोर पहिनहियो शून्य रहै, अवतारी पुरुष सभ तकरा शून्ये रखलन्हि। पुरस्कारक राजनीति नारायणजी दाड़िमक बदला अनार लिखलन्हि आ बाल साहित्यकार ओ छथि नै, पुरस्कार लेल बाल साहित्य लिखलन्हि। मुन्नी कामतक चुक्का विदेह पेटारमे उपलब्ध अछि, नारायणजी ओइ पोथीकेँ पढ़थु आ निर्णय लेथु जे की ओइ पोथीक सोझाँमे हुनकर पोथी ठठै छन्हि। आ जँ अन्तरात्मामा नै छन्हि तँ हीरेन्द्र झा/ कमल मोहन झा आकि मिश्र चुन्नू सन निर्लज्जतासँ पुरस्कार लेथु, हमर अग्रिम शुभकामना। आ जँ अन्तरात्मा नै मानै छन्हि तँ दलदलसँ बाहर आबथु। [विदेह अंक ३९७ सम्पादकीय] [मिशेल फोको (Foucault)क "अनुशासन संस्था" बा मनोवैज्ञानिक बार्टन आ ह्वाइटहेडक "गैसलाइटिंग" दुनूक लक्ष्य एक्के छै। मिशेल फोकोक "अनुशासन संस्था" अछि, सोझाँबलाकेँ अनुशासनमे आनू आ तइ लेल सभकेँ आपसेमे लड़ाउ, किछुकेँ पुरस्कृत करू आ जे अनुशासनमे नै अबैए तकरा आस्ते-आस्ते माहुर दियौ। गैसलाइटिंगमे सोझाँबला केँ विश्वास दिआओल जाइत अछि जे अहाँ जे यथास्थितिक विरोध कऽ रहल छी से कोनो विरोध नै, ई तँ सभ कऽ रहल अछि, अहाँ तँ विरोधक नामपर विरोध कऽ रहल छी आ से अपन कमी नुकेबा लेल। ऐमे समाजमे वर्तमान आधारभूत कमीक सहायता सेहो लेल जाइत अछि, आ आस्ते-आस्ते टारगेट बताह भऽ जाइत अछि बा पलायन कऽ जाइत अछि। मिशेल फोकोक सभटा डिसीप्लिनरी इंस्टीट्यूशन "अनुशासन संस्था" जेना साहित्य अकादेमी, मैथिली अकादमी, मैथिली भोजपुरी अकादमी, आ साहित्य अकादेमी द्वारा मान्यता प्राप्त कथित लिटेरेरी असोसियेशन सभ मूल धारा लग छै। सगर राति दीप जरय केँ मिशेल फोकोक परिभाषित डिसीप्लिनरी इंस्टीट्यूशनमे अनबाक प्रयास बहुत दिनसँ कएल जा रहल छै। गंगेश उपाध्यायक तत्त्वचिन्तामणि गंगेश उपाध्यायक तत्त्वचिन्तामणि चारि खण्डमे विभाजित अछि- १. प्रत्यक्ष (सोझाँ-सोझी), (२) अनुमान, (३) उपमान (तुलना केनाइ) आ (४) शब्द (मौखिक गवाही)। वैध ज्ञान प्राप्त करबाक ई चारिटा साधन ऐ चारि खण्डमे अछि। खण्ड एक प्रत्यक्ष

गङ्गेशक आह्वान: त्रिमूर्ति शिवक आह्वानसँ ई खण्ड शुरू होइत अछि।आ तेँ आह्वानक विषयपर चर्चा शुरू होइत अछि। ई मानल जाइत अछि जे कोनो परियोजनाक प्रारम्भमे भगवानक आह्वानसँ ई कार्य पूर्ण होइत अछि।

आपत्तिः जे कोनो आह्वान कोनो काज पूरा करबाक कारण अछि, से सकारात्मक बा नकारात्मक संगतिक माध्यम सँ स्थापित नै कएल जा सकैत अछि, किएक तँ एहनो भेल अछि जे कोनो आह्वानक बिना सेहो कोनो काज पूरा कएल गेल। आपत्तिक उत्तर: एकर कारण ई अछि जे ई आह्वान पूर्व जन्ममे कयल गेल छल/ हएत।

आपत्तिः नै, ई तँ घुमघुमौआ तर्क अछि, आ ओनाहितो कोनो काज पूरा केना होइत अछि तकर अनुभवजन्य कारण सभ आह्वानकेँ अनावश्यक सिद्ध करैत अछि। आपत्तिक उत्तर: ई प्रमाण जे आह्वान कार्य पूर्ण हेबाक कारण छै, तइमे दू चरणक अनुमान शामिल अछि। पहिल, ई जे ई शिष्ट लोक द्वारा निन्दित नै अछि वरन हुनका सभ द्वारा सेहो आह्वानसँ कार्य प्रारम्भ कएल जाइत अछि। तखन ई अनुमान लगाओल जा सकैत अछि जे काज पूरा भेनाइ फल अछि किएक तँ ई नियमित रूप सँ इच्छित अछि, आ आन कोनो फल उपलब्ध नै अछि।

आपत्ति: ई तर्क काज नै करत कारण ई पहिनेसँ ज्ञात अछि जे आह्वानक अछैतो काज पूर्ण भऽ सकैत अछि, कारण-सम्बन्ध कोनो तर्कसँ स्थापित नै कएल जा सकैत अछि। आपत्तिक उत्तर: हम सभ ऐ तर्क (जे आह्वान कार्य पूर्ण करबैत अछि) क समर्थन लेल वैदिक आदेशक आह्वान करैत छी। मुदा कोनो एहन वैदिक कथन नै भेटैत अछि। से अनुमान कएल जा सकैत अछि जे ऐ तरहक आह्वान सुसंस्कृत लोक सभ द्वारा शुरू कएल गेल आ कएल जाइत अछि। प्रार्थना देह (जेना प्रणाम), वाणी (गायन) आ मस्तिष्क (ध्यान) सँ होइत अछि। मुदा कोनो ईश्वरमे विश्वास केनिहार सेहो कार्य सम्पन्न कऽ लैत अछि, तँ की ओ पूर्व जन्ममे आह्वान/ प्रार्थना  केने हएत? आ आह्वानक बादो कखनो काल कार्य सम्पन्न नै होइत अछि, से की ढेर रास बाधा ओइ साधारण आह्वानसँ दूर नै भेल हएत? ऐ तरहक तर्कसँ प्रारम्भ भेल छल ई ग्रन्थ, ७-८ सय बर्ख पहिने! (सन्दर्भ: कार्ल एच पॉटर: एनसाइक्लोपीडिया ऑफ इण्डियन फिलोसोफी, १९९३; सतीश चन्द्र विद्याभूषण: अ हिस्ट्री ऑफ इण्डियन लॉजिक, १९२१) स्टीफन एच. फिलिप्स लिखै छथि: मिथिलामे राखल गेल पञ्जी वंशावली अभिलेखसँ पता चलैत अछि जे हुनक पत्नी आ तीनटा बेटा आ एकटा बेटी छल। एकटा बेटा छलन्हि प्रसिद्ध न्याय लेखक, वर्धमान। गङ्गेश स्पष्ट रूपसँ अपन जीवनकालमे प्रसिद्धि प्राप्त कयलनि, जकरा "जगद-गुरु" कहल जाइत अछि, जे हुनक समयक शैक्षणिक संस्थानक लेल "प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय प्रोफेसर" क लगभग समकक्ष हएत। Genealogical records kept in Mithila suggest that he had a wife and three sons and a daughter. One child was the famous Nyaya author, Vardhamana. Gangesa apparently achieved quite some fame during his lifetime, referred to as "jagad-guru," which would be the rough equivalent of "Distinguished University Professor" for the educational institutions of his time. [Phillips, Stephen, "Gangesa", The Stanford Encyclopedia of Philosophy (Summer 2020 Edition), Edward N. Zalta (ed.), URL = https://plato.stanford.edu/archives/sum2020/entries/gangesa/ ] गंगेश जगदगुरु तँ रहथि परमगुरु सेहो रहथि आ परमगुरुक उपाधि हिनका अतिरिक्त मात्र नूतन वाचस्पति (वृद्ध वाचस्पतिक परवर्ती) केँ पछाति जा कऽ प्राप्त भेलन्हि। मुदा गंगेशक संगे जे अन्याय रमानाथ झा आ उदयनाथ झा अशोक केलन्हि से बीसम आ एक्कैसम शताब्दीमे भेल आ तकर दुष्परिणाम स्टीफन फिलिप्स सन नैय्यायिक उठेबा लेल अभिशप्त भेला। एतऽ अहाँकेँ सूचित करी जे स्टीफन फिलिप्स तत्त्वचिन्तामणिक चारू खण्डक सम्पूर्ण अंग्रेजी अनुवाद केनिहार पहिल व्यक्ति छथि [Jewel of Reflection on the Truth about Epistemology: A Complete and Annotated Translation of the Tattva-cinta-mani, Bloomsbury Academic (2020)]। हुनका अलाबी वी.पी. भट्ट सेहो तत्त्व चिन्तामणिक चारिमेसँ ३ खण्डक सम्पूर्ण अनुवाद २०२१ धरि कऽ लेने छथि [१. प्रत्यक्ष (सोझाँ-सोझी), (२) अनुमान, आ (४) शब्द (मौखिक गवाही); (३) उपमान (तुलना केनाइ)बाँकी छन्हि [Word The Sabdakhanda of Tattvacintamani- With Introduction, Sanskrit Text, Translation And Explanation (2 Vols Set) 2005; Perception The Pratyaksa Khanda of The Tattvacintamani 2012 (2 Vols Set); Inference the Anumana Khanda of the Tattva Chintamani ( With Introduction, Sanskrit text, Translation & Explanation ) (2 Vols Set) 2021 Published by Eastern Book Linkers, Delhi]। HONOUR KILLING OF GANGESH UPADHYAYA (FIRST BY RAMANATH JHA, THEN BY UDAYANATH JHA 'ASHOK' (A PARALLEL HISTORY OF MITHILA AND MAITHILI LITERATURE, WHY TODAY ITS NEED BEING FELT MORE INTENSELY?) I was not surprised, though I must have been when I saw a monograph on Gangesh Upadhyaya, whose copyright is being held by Sahitya Akademi, the author of the monograph is Udayanath Jha ' Ashok'. I thought that Udayanath Jha ' Ashok', who has been given Bhasha Samman also, by the same Sahitya Akademi, would do some justice. But truth and research seem elusive in Sahitya Akademi monographs, at least that I found in this monograph. I searched and searched through chapters, that now the author will show courage. But the author like Ramanath Jha seems ashamed of the roots and offspring of Gangesh Upadhyaya. He tries to confuse the issue, but there is no confusion now at least since 2009. But in 2016 Sahitya Akademi seems to carry out the casteist agenda. Udayanath Jha mockingly pretends to search his name, lineage etc, where nothing is there to search for, yet he could not muster the courage, to tell the truth, and ends up just repeating the facts in 2016 that Dineshchandra Bhattacharya already has published way back in 1958. The honour killing of Gangesh Upadhyaya by Prof. Ramanath Jha is being taken forward by Sahitya Akademi, Delhi in a most hypocritical way. Ramanath Jha's obscurantism vis-a-vis Panji is evident from one example. The inter-caste marriage in Panji was well known to him (but he chose to keep the Dooshan Panji secret- which has been released by us in 2009), and it was apparent that the great navya-nyaya philosopher Gangesh Upadhyaya married a "Charmkarini" and was born five years after the death of his father (see our Panji Books Vol I & II available at http://videha.co.in/pothi.htm ). Sh. Dinesh Chandra Bhattacharya writes in the "History of Navya-Nyaya in Mithila". (1958) "The family which was inferior in social status is now extinct in Mithila----- Gangesha's family is completely ignored and we are not expected to know even his father's name-----...As there is no other reference to Gangesa we can assume that the family dwindled into insignificance again and became extinct soon after his son's death." [1958, Chapter III pages 96-99), which is a total falsehood. He writes further that all this information was given to him by Prof. R. Jha, and he seemed thankful to him. The following excerpt from Our Panji Prabandh (parts I&II) is being reproduced below for ready reference: - महाराज हरसिंहदेव- मिथिलाक कर्णाट वंशक। ज्योतिरीश्वर ठाकुरक वर्ण-रत्नाकरमे हरसिंहदेव नायक आकि राजा छलाह। 1294 ई. मे जन्म आ 1307 ई. मे राजसिंहासन। घियासुद्दीन तुगलकसँ 1324-25 ई. मे हारिक बाद नेपाल पलायन। मिथिलाक पञ्जी-प्रबन्धक ब्राह्मण, कायस्थ आ क्षत्रिय मध्य आधिकारिक स्थापक, मैथिल ब्राह्मणक हेतु गुणाकर झा, कर्ण कायस्थक लेल शंकरदत्त, आ क्षत्रियक हेतु विजयदत्त एहि हेतु प्रथमतया नियुक्त्त भेलाह। हरसिंहदेवक प्रेरणासँ- आ ई हरसिंहदेव नान्यदेवक वंशज छलाह, जे नान्यदेव कार्णाट वंशक १००९ शाकेमे स्थापना केने रहथि- नन्दैद शुन्यं शशि शाक वर्षे (१०१९ शाके)... मिथिलाक पण्डित लोकनि शाके १२४८ तदनुसार १३२६ ई. मे पञ्जी-प्रबन्धक वर्तमान स्वरूपक प्रारम्भक निर्णय कएलन्हि। पुनः वर्तमान स्वरूपमे थोडे बुद्धि विलासी लोकनि मिथिलेश महाराज माधव सिंहसँ १७६० ई. मे आदेश करबाए पञ्जीकारसँ शाखा पुस्तकक प्रणयन करबओलन्हि। ओकर बाद पाँजिमे (कखनो काल वर्णित १६०० शाके माने १६७८ ई. वास्तवमे माधव सिंहक बादमे १८०० ई.क आसपास) श्रोत्रिय नामक एकटा नव ब्राह्मण उपजातिक मिथिलामे उत्पत्ति भेल। So, the Srotriyas as a sub-caste arose around 1800 CE as per authentic panji files. Sh. Anshuman Pandey [Gajendra Thakur of New Delhi provided me with digitized copies of the genealogical records of the Maithil Brahmins. The panjikara-s whose families have maintained these records for generations are often reluctant to allow others to pursue their records. It is a matter of 'intellectual property' to them. I was fortunate enough to receive a complete digitized set of panji records from Gajendra Thakur of New Delhi in 2007. [Recasting the Brahmin in Medieval Mithila: Origins of Caste Identity among the Maithil Brahmins of North Bihar by Anshuman Pandey, A dissertation submitted in partial fulfilment of the requirements for the degree of Doctor of Philosophy (History) in the University of Michigan 2014]. Later these Panji Manuscripts were uploaded to Videha Pothi at www.videha.co.in and google books in 2009). The so-called Maharajas of Darbhanga were permanent settlement zamindars of Cornwallis, and there were so many in British India, but in Nepal there were none. In the annexure of our book (Panji Prabandh vol I&II), we have attached copies of genealogy-based upgradation orders (proof of upgradation for cash). So, before 1800   CE, there was no srotriya sub-caste in British India and there is no such sub-caste within Maithil Brahmins in Nepal part of Mithila even today. Srotriya before that referred to following some education stream in British India, in Nepal it still has that meaning. ORIGINAL PANJI REFERENCES ARE PLACED BELOW: DOOSHAN PANJI- THE BLACKBOOK ४९. १८८/२ चर्मकारिणी माण्डर वभनियाम छादन तत्त्वचिंतामणि कारकगंगेश छादनगंगेशक नाँई रत्नाकरक-मातृक (अज्ञात) गंगेश वल्लभा भवाइ माहेश्वर जीवे २१//१० छादनसँ तत्व चिन्तामणि कारक जगद्गुरु गंगेश छादनसँ तत्‍व चिन्‍तामणि कारक गंगेशक वल्‍लभा चर्मकारिणी पितृ परोक्षे पञ्च वर्ष व्‍यतीते तत्‍व चिन्‍तामणि कारक गंगेशोत्‍पत्ति- चर्मकारिणी मेधाक सन्‍तानक लागिमे छलन्हि छादन सँ तत्व चिन्तामणि कारक मōमō गंगेश "तत्व चिन्तामणि कारक म. म. पा. गंगेशक विषयक लेख प्राचीन पञ्जीसँ उपलब्ध"।। पितृ परोक्षे पंच वर्ष व्यतीते गंगेशोत्पत्तिः इति प्राचीन लेखनीय: कुत्रापि देवानन्द पञ्जी ३९-२ छादनसँ जगदगुरू गुंरू गंगेश सुताय वभनियामसँ जयादित्य सुत साधुकर पत्नी देवानन्द पञ्जी ३३९-३ जगदगुरू गंगेश सुत सुपन दौ भण्डारिसमसँ हरादित्य दौ.।। पुत्र सुताच गोरा जजिवाल सँ जीवे पत्नी ए सुत सन्दगहि भवेश्वर। अत्रस्थाने सुपनभ्रातृ हरिशर्म्म दारिति क्वचित् जजिवाल ग्राम देवानन्द पञ्जी ३०=५ छादनसँ उपायकारक म.म. पा. वर्द्धमान सुताच खण्डवलासँ विश्वनाथ सुत शिवनाथ पत्नी गंगेश- म.म. वर्द्वमान/ सुपन/ हरिशर्म्म Gangesh, the author of the Tattvachintamani, wrote one text equivalent to 12,000 texts. Now come to the fact mentioned in the Panji- it clearly states that Gangesh of Tattvachintamani was born five years after the death of his father and he married a tanner, so why did Ramanath Jha hide this from Dinesh Chandra Bhattacharya? Vardhamana, son of Gangesh, calls Gangesh sukavikairavakananenduh. But the conspiracy under which the poems of a famous scholar like Gangesh are not available today is clear from the example given above. Vasudev of Bengal was a classmate of Pakshadhar Mishra of Mithila, he came to study in Mithila, passed the shalaka examination and received the title of sarvabhaum. Vasudeva memorised the tattvachintamani of Gangesh and the nyayakusumanjali karika of Udayana. Pakshadhar and other Mithila teachers did not allow writing (copying) tattvachintamani. Raghunath Shiromani, a disciple of Vasudeva, took the right of certification after he defeated his guru Pakshadhar Mishra in a scriptural debate (shastrartha). The Navya Nyaya school was founded in Navadvipa by Vasudeva-Raghunath. Pakshadhar Mishra was a contemporary of Vidyapati (distinct from the Padavali writer who was of the pre-Jyotirishwar period) who wrote in Sanskrit and Avahatta. And the arrival of Mithila students of Bengal from Bengal stopped after Raghunath Shiromani. Gangesh Upadhyaya enjoyed 'param guru' as well as 'jagad guru' titles, the highest titles of the time and as per Panji only Vacaspati Mishra II was the other person who enjoyed the title of 'param guru'. The extinction of Navya-Nyaya School from Mithila, as described above, was a revenge of nature against the honour killing of Gangesh Upadhyaya and his family. [Translation of the Maithili Short Story, 'Shabdashastram' (based on the true Panji records of Gangesh Upadhyaya) was done by the author Gajendra Thakur himself: published as 'The Science of Words'  Indian Literature Vol. 58, No. 2 (280) (March/April 2014), pp. 78-93 (16 pages) Published By: Sahitya Akademi] -Gajendra Thakur, editor, Videha (be part of Videha www.videha.co.in -send your WhatsApp no to +919560960721 so that it can be added to the Videha WhatsApp Broadcast List.) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १.२.अंक ४०१ पर टिप्पणी प्रणव कुमार झा पहिले मैथिली मे राष्ट्रभक्ति (पेट्रीओटिक)गीत, गजल, कविता कम देखs मे आबाय (भs सकय अछि ई हमर भ्रम होय)। मुदा डिजिटैजेशन के ऐ युग मे आई बहुत लोग राष्ट्रभक्ति केर भावना के मैथिली छंद मे पिरोबाक प्रयास कs रहल छैथ। ओना अपना के काबिल बुझानिहार लोक ऐ तरहक प्रयोग के खिद्दांस करैत सेहो खूब देखल जाय छैथ (रचनात्मक आलोचना के स्थान पर)। मुदा जैह सैह। साहित्य सृजन के एकटा मूल स्वांत:सुखाय छैक से भेटबाक चाहिए। आई देख निक लगल जे विदेह के 401म अंक मे सेहो 3 टा राष्ट्रभक्ति के भाव से भरल छंद प्रकाशित भेल छैक, जे प्रायः स्वतन्त्रता दिवस के इर्द-गिर्द लिखल गेल हेतइक। एकटा हमरो दिस से लिखल बाल कविता छैक।

श्याम प्रकाश झा आ प्रदीप कुमार मंडल 'पवड़ा' के खिस्सा मनोरंजक लागल। पी एल कर्ण के आलेख बराबरि देखय छी। टॉपिक सबहक शीर्षक रोचक लागय अछि।मुदा आलेख सब तिरहुता मे लिखल रहय छइक ताहि से हमरा सान अज्ञानी लोक पढ़ि नै पाबय अछि। तिरहुता मे लिखनाई त बड्ड निक गप्प, मुदा जौ देवनागरी मे लिप्यंतरित सामाग्री सेहो उपलब्ध होय त बेसी लोक शायद पढ़ि सकत। मुन्ना जी के लेख सूचनापरक लागल। -प्रणव कुमार झा, +91-9312240126

अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। गद्य २.१.उमेश मण्डल- सगर राति दीप जरय- ११८ २.२.परमानन्द लाल कर्ण-कातिक मासक एकादशीक माहात्य २.३.आचार्य रामानंद मंडल-उत्तर बिहार अर्थात मिथिला राज्य २.४.मुन्ना जी- बीहनि कथाक विकास मे संपादक, आलोचकक योगदान २.५.संतोष कुमार राय 'बटोही'-राखी (संस्मरण) २.६.संतोष कुमार राय 'बटोही'-मैथिली साहित्य मे समालोचक केँ कमी २.७.प्रणव झा-फैमिली एडॉप्शन प्रोग्राम (FAP): चिकित्सा शिक्षा में नवाचार आ ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य सेवाक बढ़ावा २.८.प्रदीप कुमार मंडल 'पवड़ा'- मैथिली फूलवारी थिक २.९.रबीन्द्र नारायण मिश्र- सीमाक ओहि पार (धारावाहिक उपन्यास) २.१.उमेश मण्डल- सगर राति दीप जरय- ११८ उमेश मण्डल सगर राति दीप जरय- ११८ 'सगर राति दीप जरय'क सितम्बर मासक कथागोष्ठी फुलपरास अनुमण्डलक रतनसारा गामक उत्क्रमित मध्यविद्यालय परिसरमे दिनांक 21.09.24क संध्या 6:30 बजे आरम्भ भऽ भिनसर 6:30 बजेमे सम्पन्न भेल। 'बलान-तिलयुगा-बिहुल कथागोष्ठी'क नामसँ ऐ आयोजनक उद्घाटन केलैन श्री गोसाँय मण्डल, श्री बैजनाथी राम, श्री कमलेश झा, श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, श्री नारायण यादव, श्री राजदेव मण्डल, श्री रामचन्द्र राय, श्री रामविलास साहु, श्री झौली पासवान, डॉ. योगानन्द झा, श्रीमती शीला सिंह आ श्री चन्द्रेश। स्वागत केलैन श्री दुर्गानन्द मण्डल आ सुश्री शशिप्रभा तथा मंच संचालन केलैन श्री राम विलास साहु आ उमेश मण्डल। उद्घाटन सत्रक पछाति पोथी लोकार्पण भेल। कुल आधा दर्जन पोथीक लोकार्पणमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक दू गोट कथा संग्रह क्रमश: 'अठहत्तरिम स्वतंत्रता दिवस' आ 'सहोदर भाय', डॉ. शिव कुमार प्रसादक 'राग-विराग' कविता संग्रह, श्री दुर्गानन्द मण्डल 'चक्षु' समालोचना, श्री राजदेव मण्डलक 'मिट्टी और चाक' उपन्यास आ सुश्री पल्लवी मण्डल तथा सुश्री अंजली ठाकुरक सम्मिलित कविता संग्रह- 'ज़िन्दगी को हमने ज़ूम किया' छल। ऐ तरहेँ क्रमश: तेसर सत्र अर्थात् कथा-सत्रक आरम्भ भेल। एक विशिष्ठ अध्यक्ष मण्डलक चयनक पछाति कथा पाठ शुरू भेल। कुल सात पालीमे दू दर्जनसँ बेसी कथाक पाठ भेल आ पठित कथासभपर समीक्षा सेहो होइत रहल। अध्यक्ष मण्डलमे प्रसिद्ध कथाकार श्री नारायण यादव, श्री कमलेश झा, श्री रामेश्वर प्रसाद मण्डल, श्री नन्द विलास राय आ श्री झौली पासवान रहैथ। पठित कथाक विवरण निम्नांकित अछि। ऐगला आयोजन हेतु कुल तीन गोट प्रस्ताव आएल। पहिल, श्री गोसाँय मण्डलक 'सहरसा' लेल, दोसर श्री राम कृष्ण परार्थीक 'बेनीपट्टी' लेल आ तेसर श्री आलोक कुमारक 'मझौरा' लेल। सर्वसम्मति निर्णय भेल जे ऐगला आयोजन सहरसामे हुअए। अत: ऐगला आयोजन दिसम्बर मासमे श्री गोसाँइ मण्डलक संयोजकत्वमे सहरसामे होएत। कथा पाठ केर विवरण निम्नांकित अछि, संगहि किछु फोटोग्राफ सेहो संलग्न अछि- 1. श्री राम चन्द्र राय- माफी 2. पं. शिव कुमार मिश्र- मुकाबला 3. श्री झौली पासवान- हम घराड़ी नहि बेचब 4. श्री नन्द विलास राय- छुच्छाकेँ के पुच्छा 5. श्री परमानन्द राय- बर्बादी 6. श्री जगदीश प्रसाद मण्डल- बीस बर्खक बाद 7. श्री राम विलास साहु- स्वरोजगार 8. श्री मानव अनीष मण्डल- सभसँ पैघ के? 9. श्री रविभूषण कुमार- चिन्ता 10. श्री चन्द्रेश- जरैत सलाइक काठी 11. श्री विप्रकान्त मण्डल- हॉस्पिटल 12. श्री संतोष कुमार राय- घरक चौकैठ 13. सुश्री पल्लवी मण्डल- अपने आँखिये देखब 14. सुश्री शशिप्रभा- अंकिताक बिआह 15. डॉ. पंकज कुमार प्रभाकर- जितिया 16. डॉ. योगानन्द झा- चपला 17. श्री गौरी शंकर साह- खुशहाल विद्यालय 18. श्री सत्य नारायण व्यास- परिस्थिति 19. श्री जगदीश मण्डल- मृत्यु भोज 20. श्री नारायण यादव- एडभांस 21. श्री श्रवण कुमार मण्डल- टोलक सरपंच 22. श्री रामेश्वर प्रसाद मण्डल- अनमोल सहानुभूति 23. श्री राजदेव मण्डल- बिहुल 24. श्री दुर्गानन्द मण्डल- मिस्टर नो ऑल 25. डॉ. उमेश मण्डल- पाइक गुण सगर राति दीप जरय पहिल सँ ११८ धरिक कथा यात्रा १. मुजफ्फरपुर, २१.०१.१९९०, प्रभास कुमार चौधरी; २. डेओढ़, २९.०४.१९९०, जीवकान्त; ३. दरभंगा, ०७.०७.१९९०, डॉ. भीमनाथ झा, प्रदीप मैथिली पुत्र, विजयकान्त ठाकुर; ४. पटना, ३.११.१९९०, गोविन्द झा, दमनकान्त झा; ५. बेगुसराय, १३.०१.१९९१, प्रदीप बिहारी; ६. कटिहार, २२.०४.१९९१, अशोक; ७. नवानी, २१.०७.१९९१, मोहन भारद्वाज; ८. सकरी, २२.१०.१९९१, प्रो. सुरेश्वर झा, डॉ. राम बाबू; ९. नेहरा, ११.१०.१९९२, ए.सी. दीपक; १०. विराटनगर, १४.०४.१९९२, जीतेन्द्र जीत; ११. वाराणसी, १८.०७.१९९२, प्रभास कुमार चौधरी; १२. पटना, १९.१०.१९९२, राजमोहन झा; १३. सुपौल- १, १८.१०.१९९३, केदार कानन; १४. बोकारो, २४.०४.१९९३, बुद्धिनाथ झा; १५. पैटघाट, १०.०७.१९९३, डॉ. रमानन्द झा 'रमण' ; १६. जनकपुर, ०९.१०.१९९४, रमेश रंजन; १७. इसहपुर, ०६.०२.१९९४, डॉ. अरविन्द कुमार 'अक्कू'; १८. सरहद, २३.०४.१९९४, अमिय कुमार झा; १९. झंझारपुर, ०९.०७.१९९४, श्यामानन्द चौधरी; २०. घोघरडीहा, २२.१०.१९९४, डॉ. नारायणजी; २१. बहेरा, २१.०१.१९९५, कमलेश झा; २२. सुपौल (दरभंगा) , ०८.०४.१९९५, कमलेश झा; २३. काठमांडू, २३.०९.१९९५, धीरेन्द्र प्रेमर्षि; २४. राजविराज, २४.०१.१९९६, रामनारायण देव; २५. कोलकाता (रजत जयंती, २८.१२.१९९६), प्रभास कुमार चौधरी; २६. महिषी, १३.०४.१९९७, डॉ. तारानन्द वियोगी/ रमेश प्रायोजित; २७. तरौनी, २०.०६.१९९७, शोभाकान्त; २८. पटना, १८.०७.१९९७, प्रभास कुमार चौधरी; २९. बेगूसराय, १३.०९.१९९७, प्रदीप बिहारी; ३०. खजौली, ०४.०४.१९९८, प्रदीप बिहारी; ३१. सहरसा, १८.०७.१९९८, रमेश; ३२ पटना, १०.१०.१९९८, श्याम दरिहरे; ३३. बलाइन; नागदह, ०८.०१.१९९९, पदम सम्भव; ३४. भवानीपुर, १०.०४.१९९९, डॉ. जिष्णु दत्त मिश्र; ३५. मधुबनी, २४.०७.१९९९, सियाराम झा 'सरस', डॉ. कुलधारी सिंह; ३६. अन्दौली, २०.१०.१९९९, कमलेश झा; ३७. जनकपुर, २५.०३.२०००, रमेश रंजन; ३८. काठमांडू, २५.०६.२०००, धीरेन्द्र प्रेमर्षि; ३९. धनबाद, २१.१०.२०००, श्याम दरिहरे एवं रामचन्द्र लालदास; ४०. बिटठो, २१.०१.२००१, डॉ. अक्कू, प्रो.विद्यानन्द झा; ४१. हटनी (घोघरडीहा), १९.०५.२००१, प्रो. योगानन्द झा/अजित कु.आजाद; ४२. बोकारो, २५.०८.२००१, गिरिजानन्द झा 'अर्धनारीश्वर', मिथिला सा. परिषद्; ४३. पटना, किरणजयंती, ०१.१२.२००१, अशोक, चेतना समिति, पटना; ४४. राँची, १३.०४.२००२, कुमार मनीष अरविन्द; ४५. भागलपुर, २४.०८.२००२, धीरेन्द्र मोहन झा; ४६. पटना, (विद्यापति भवन पटना), १६.११.२००२, अजित कुमार आजाद; ४७. कोलकाता, २२.०१.२००३, कर्णगोष्ठी, कोलकाता; ४८. खुटौना, ०७.०६.२००३, डॉ. महेन्द्र नारायण राम; ४९. बेनीपुर, २०.०९.२००३, कमलेश झा; ५०. दरभंगा, २१.०२.२००४, डॉ. अशोक कुमार मेहता; ५१. जमशेदपुर, १०.०७.२००४, डॉ. रवीन्द्र कुमार चौधरी; ५२. राँची, ०२.१०.२००४, विवेकानन्द ठाकुर ; ५३. देवघर, ०८.०१.२००५, श्याम दरिहरे एवं अविनाश; ५४. बेगूसराय, ०९.०४.२००५, प्रदीप बिहारी; ५५. पूर्णियाँ, २०.०६.२००५, रमेश; ५६. पटना, ०३.११.२००५, अजीत कुमार आजाद; ५७. जनकपुर (नेपाल) , १२.०८.२००६, रमेश रंजन; ५८. जयनगर, ०२.१२.२००६, नारायण यादव; ५९. बेगूसराय, १०.०२.२००७, प्रदीप बिहारी; ६०. सहरसा, २१.०७.२००७, किसलय कृष्ण; ६१. सुपौल-२, ०१.१२.२००७, अरविन्द ठाकुर; ६२. जमशेदपुर, ०३.०५.२००८, डॉ. रवीन्द्र कुमार चौधरी; ६३. राँची, १९.०७.२००८, कुमार मनीष अरविन्द; ६४. रहुआ संग्राम (मधुबनी), ०८.११.२००८, डॉ. अशोक अविचल; ६५. पटना, कथा गंगा-३, २१.०२.२००९, अजित कुमार आजाद/ चेतना समिति; ६६. मधुबनी, ३०.०५.२००९, दिलीप कुमार झा; ६७. समस्तीपुर, ०५.०९.२००९, रमाकान्त रय 'रमा'; ६८. सुपौल- ३, ०५.१२.२००९, अरविन्द ठाकुर; ६९. जनकपुर, ०३.०४.२०१०, राजाराम सिंह 'राठौर'; ७०. कबिलपुर (दरभंगा) , १२.०६.२०१०, डॉ. योगानन्द झा; ७१. बेरमा (झंझारपुर), ०२.१०.२०१०, जगदीश प्रसाद मण्डल, स्थानीय साहित्य प्रेमी; ७२. सुपौल, ०४.१२.२०१०, अरविन्द ठाकुर; ७३. महिषी, कथा राजकमल, ०५.०३.२०११, विजय महापात्र; ७४. हजारीबाग, १०.०९.२०११, श्याम दरिहरे; ७५. पटना, हीरक जयन्ती, १०.१२.२०११, अशोक एवं कमलमोहन 'चुन्नु'; ७६.चेन्नै, १४.०७.२०१२, विभा रानी; ७७. दरभंगा, किरण जयन्ती, ०१.१२.२०१२, अरविन्द ठाकुर ; ७८. घनश्यामपुर, ०९.०३.२०१३, कमलेश झा; ७९. औरहा (लौकही), १५.५.२०१३, उमेश पासवान; ८०. निर्मली (सुपौल), ३०.११.२०१३, उमेश मण्डल, स्थानीय साहित्य प्रेमी; ८१. देवघर, (बिजली कोठी, बम्पासटॉन, देवघर), २२.०३.२०१४, ओम प्रकाश झा; ८२. मेंहथ, (झंझारपुर), कथा बौध सिद्ध मेहथपा, ३१.०५.२०१४, गजेन्द्र ठाकुर; ८३. सखुआ-भपटियाही, ३०.०८.२०१४, नन्द विलास राय/फागुलाल साहु/सूरज नारायण राय 'सुमन'; ८४. बेरमा (मधुबनी), २०.१२.२०१४, शिवकुमार मिश्र, स्थानीय साहित्य प्रेमी; ८५. भागलपुर, (श्याम कुंज, द्वारिकापुरी भागलपुर), ०४.०४.२०१५, ओम प्रकाश झा ; ८६. लकसेना (मधुबनी), २०.०६.२०१५, राजदेव मण्डल 'रमण', सत्यदेव 'सुमन' ; ८७. निर्मली (सुपौल), १९.०९.२०१५, उमेश मण्डल, स्थानीय साहित्य प्रेमी ; ८८. मध्य विद्यालय- डखराम (बेनीपुर), ३०.०१.२०१६, कमलेश झा, अमर नाथ झा ; ८९. लौकही, २६.०३.२०१६, उमेश पासवान एवं प्रेम कुमार साहु; ९०. लक्ष्मीनियाँ (मधुबनी), १८.०६.२०१६, राम विलास साहु, स्थानीय साहित्य प्रेमी; ९१. गोधनपुर (मधुबनी) २४.९.२०१६, दुर्गानन्द मण्डल; ९२. नवानी (मधुबनी), ३१.१२.२०१६, अजय कुमार दास 'पिन्टु'; ९३. रतनसारा (घोघरडीहा), २५.०३.२०१७, राजदेव मण्डल, स्थानीय साहित्यानुरागी ; ९४. लौफा (मधेपुर), २४.०६.२०१७, डॉ. योगेन्द्र पाठक वियोगी, स्थानीय प्रेमी ; ९५. जलसैन डुमरा (मधुबनी), ०९.९.२०१७, नारायण यादव; ९६. धबौली (लोकही), १६.१२.२०१७, राधाकान्त मण्डल ; ९७. बेरमा (लखनौर), २४.३.२०१८, कपिलेश्वर राउत, बेरमा ग्रामवासी ; ९८. सिमरा (झंझारपुर), १६.६.२०१८, डॉ. शिव कुमार प्रसाद ; ९९. मुरहद्दी, (बड़की टोल), २२.९.२०१८, प्रो. प्रीतम निषाद , १००. निर्मली (तेरापंथ भवन), २२.१२. २०१८, उमेश मण्डल, नवरत्न वेंगानी, मनीष जालान ; १०१. झिटकी (मधुबनी), ३०.३.२०१९, भारत भूषण झा ; १०२. मझौरा, (मधुबनी), २९.०६.२०१९, जय प्रकाश मण्डल, आलोक कुमार; १०३. रामपुर (मधुबनी), २८.९.२०१९, उमेश नारायण कर्ण 'कल्प कवि' ; १०४. वलम नगर-महदेवा (लौकही), १४.१२.२०१९,प्रेम कुमार साहु,उमेश पासवान; १०५.दरभंगा (सीतायन सभागार), १३.०२.२०२१, कमलेश झा ; १०६. हटनी (घोघरडीहा, मधुबनी), २५.०९.२०२१, लालदेव कामत; १०७. बेलहा (फुलपरास), २५.१२.२०२१, जीवकान्तक स्मृतिमे, उमेश मण्डल, ई. शैलेन्द्र मण्डल; १०८. मधुरा (मधुबनी), २६.०३.२०२२, डॉ. श्रीशंकर झा; १०९. ननौर (मधुबनी), २५.०६.२०२२, प्रदीप पुष्प; ११०. सोनवर्षा (लौकही), २४.०९.२०२२, अच्छेलाल शास्त्री, स्थानीय साहित्य प्रेमी; १११. रहुआ संग्राम (मधुबनी) ३१.१२.२०२२, अशोक अविचल; ११२ म सगर राति दीप जरय सहुरिया (अन्धराठाढ़ी) मे २५ मार्च २०२३, रामचन्द्र राय। ११३ म सगर राति दीप जरय २४ जून २०२३ नहरी, खुटौना; सच्चिदानन्द सल्हैता, नारायण यादव। ११४ म सगर राति दीप जरय ३० सितम्बर २०२३, मधुबनी जिलाक नरहिया बाजार; राम विलास साहु आ शम्भू सुभाष साहु। ११५ म सगर राति दीप जरय ३० दिसम्बर २०२३, बेरमा गाम (मधुबनी); श्री ब्रह्मानन्द प्रसाद, श्री कपिलेश्वर राउत। ११६ म सगर राति दीप जरय २३ मार्च २०२्४, सुपौल जिलाक निर्मलीक श्यामा कम्पलेक्स सह विवाह हॉल; डॉ. उमेश मण्डल आ अखिलेश कुमार चौधरी। ११७ म सगर राति दीप जरय २९ जून २०२४, एम.एम.टी.एम. कॉलेज सभागार, दरभंगा; अशोक कुमार मेहता आ हीरेन्द्र कुमार झा। ११८ म सगर राति दीप जरय २१ सितम्बर २०२४, फुलपरास अनुमण्डलक रतनसारा गामक उत्क्रमित मध्यविद्यालय परिसर, बलान-तिलयुगा-बिहुल कथागोष्ठी; राजीव कुमार, दुर्गानन्द मण्डल आ शिव कुमार राय। ११९म सगर राति दीप जरय- दिसम्बर २०२४ मासमे श्री गोसाँइ मण्डलक संयोजकत्वमे सहरसामे हएत। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.परमानन्द लाल कर्ण-कातिक मासक एकादशीक माहात्य अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.आचार्य रामानंद मंडल-उत्तर बिहार अर्थात मिथिला राज्य आचार्य रामानंद मंडल उत्तर बिहार अर्थात मिथिला राज्य मिथिला मे मिथिला राज्य निर्माण के लेल बात -बिचार होइत रहय हय। परंच मतभिन्नता पायल जाइत हय। मिथिला के नक्शा पर विवाद हय।कहियो मिथिला राज्य निर्माण आंदोलन में भारत नेपाल सीमा पर अवस्थित पाया तोड़ो अभियान चलल रहय।अभियो कुछ मिथिला राज्य अभियानी भारत आ नेपाल स्थित मिथिला के समेकित मिथिला राज्य निर्माण के बात करैत हय।त कोई बंगाल आ झारखंड के कुछ भाग नया मिथिला राज्य निर्माण में चाहैत हतन। जे उचित न हय। प्राकृतिक मिथिला आबि छिन्न भिन्न हय। जेना आबि प्राकृतिक भारत संभव न हय,तहिना प्राकृतिक मिथिला संभव न हय। एकटा बात आउर के नेपाल मे मिथिला राज्य न बन के मधेश राज्य बन गेल।वोइसे सीख लेबे के आवश्यकता हय। आखिर कैला न मिथिला राज्य बनल। मधेश राज्य बनला पर भी वहां के बासी के धीया सीया से प्रेम कम न हय। असल मे वो राजनीतिक आ सामाजिक विरोध के कारण मिथिला राज्य न बन के मधेश बन गेल।आबि लोग के समझे के चाही कि आबि राजतंत्रात्मक विचार लागू न हो पायत।चाहे वो जनक राज्य कैला न हो।भारतो मे आबि राम राज्य न चलत। कुछ विचारक सांस्कृतिक मिथिला राज्य के बात करैत हतन वोहो आबि न चलत। वर्तमान समय मे संवैधानिक वा राजनैतिक राज्य के बिचार होय के चाही। वर्तमान मे जे मिथिला राज्य निर्माण के बात हो रहल हय वो पक्षीय जान पड़ैत हय।वो सर्वपक्षीय होय के चाही।सभ वर्ग के साझेदारी होय के चाही। सर्वसम्मति होय के चाही। वर्तमान बिहार सरकार प्रशासनिक रूप से बिहार के दो भाग में बांटि देलय हय। उत्तर बिहार आ दक्षिण बिहार। दक्षिण बिहार मे विकास के ज्यादा काज हो रहल हय। वास्तव मे उतर बिहारे मिथिला हय।जे पिछड़ल हय। निष्कर्षत: संवैधानिक आ राजनीतिक रूप से मिथिला राज्य के लेल उत्तर बिहार उपयुक्त हय। मिथिलावासी उत्तर बिहार के मिथिला राज्य बनाबे के मांग बिहार सरकार आ भारत सरकार से करे के आवश्यकता हय।सभ मिथिलावासी के मिथिला राज्य के लेल संवैधानिक संघर्ष के आवश्यकता हय। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.मुन्ना जी- बीहनि कथाक विकास मे संपादक, आलोचकक योगदान मुन्ना जी बीहनि कथाक विकास मे संपादक, आलोचकक योगदान

कलम निर्जीव होइछ कखनो रूकि सकैछ।ओकर स्याही सूखि कखनो ओकर जिनगी स्याह क' सकैछ। अहां त' सजीव छी।अपन उचित आ उच्च विचार सक्रिय राखू।अहांक ओंगरी विराम नै लिए। उपरोक्त पांति सं उत्साह वर्धन करै छलाह संपादक लोकनि।मुदा पत्रिका मे छपवा बेर बीहनि कथा क जगह लघुकथा लिखि प्रसन्न चित्त। भ' जाइ छलाह।इ स्थिति छल बीहनि कथा विधाक प्रारम्भिक अवस्था मे।

कोनो रचना आ रचनाकारक पहिचानक आधार होइछ ओकर प्रकाशित रचना।आ ओतै सं मूल्यांकनक बाट बनैछ।जकर पहिल दायित्व होइछ संपादकक।। अंग्रेजी साहित्य अपन मूल रचना लेल प्रख्यात।हिन्दी साहित्य अंग्रेजी साहित्य सं प्रेरित आ मैथिली साहित्य हिन्दी सं आच्छादित सन।लेखके मे सं त' संपादक।तें मैथिलीयो संपादक हिन्दी बलाक चिलका ' लघुकथाक ' नाम त'र दबल बीहनि कथा कें कतियबैत रहलाह। वर्ष- 2003 मे अपन संपादकीय धर्मक निर्वहन करैत पहिल बेर गाम- घर साप्ताहिकक संपादक श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर। श्री राजक " वात्सल्य " बीहनि कथाकें बीहनि कथा नामे छपवाक जीवटता देखौलनि। फेर शुन्यता। 2008 मे मिथिलांगन,दिल्लीक पहिल अंकमे मुन्ना जीक बीहनि कथाकें बीहनि कथा नामे छपलनि संपादक श्री रविन्द्र दास ' सुमन जी' 2010 मे विदेहक संपादक श्री गजेंद्र ठाकुर विदेह इ पाक्षिकक अंक-62मे मुन्ना जीक बीहनि कथा -' निपुतराहा ' छपलनि।तकर पछाति मैथिली लेखकक बीच ऐ विधाक प्रति निन्न खूजल आ जिज्ञासा शुरू भेल। आ अही वर्ष अक्तुबर (2010)कें विदेहक अंक-67,बीहनि कथा विशेषांक अबिते मैथिली साहित्य मे भूचाल आबि गेल।आ चारू भर मचल हरबिर्रो।किछु नकलची लेखक सब कहनाइ शुरू केलनि-इ सब लघुकथाक नाम बदलि देलनि।जहन कि सोलह आना सांच छै जे मैथिली मे विधाक नकल त' अंग्रेजी साहित्यक विधा सं भेलै।ओत' जे शॉर्ट स्टोरी छै सएह त' मैथिली मे कथा नामे लिखाइए।ओकर कायान्तरण आ नामान्तरण क' लघुकथा नामे मैथिलीयो मे किछु दिन तथाकथित कथाक लेखन भैल रहै। सांच इ छै जै ओहो ओही कथा परिवार यानी शार्ट स्टोरीक सदस्य छल।मैथिली कथा संग्रह मे अंग्रेजी मे लिखल रहैछ ' Collection of Short Story.आ मैथिली मे प्रकाशित लघुकथा संग्रह मे सेहो अंग्रेजी मे लिखल रहैछ-' collection of short story.विधागत दुनू एकहि ।कायान्तरण आ नामान्तरण मात्र।

आब इ नेपाल सं दिल्ली होइत पटना पहुंचि संपादककैं जगौलक।अप्रैल - जुन2012 मे चेतना समितिक पत्रिका " घर- बाहर " संपादक श्री बासुकीनाथ झा द्वारा मुन्ना जीक आलेख छपल।शीर्षक छल " बीहनि कथा संसार " इ सब अल्प कालिक वा तात्कालिक प्रकाशन छल।2010 सं अद्यावदि मात्र विदेह मे निरन्तरता बनल रहल। 2012 सं किशन कारीगरक संपादन मे बहराइत " मिथिलांचल टुडे"क सब अंक मे बीहनि कथा प्रकाशित होइत रहल। जतेक संपादक बीहनि कथाक विकास मे योगदान केलनि ताहि मे एकटा महत्वपूर्ण नाम ऐछ श्री मुकेश दत्त जीक।मिथिलांगन,दिल्लीक पत्रिका सं संपादक रूपें जुड़ला पछाति सब अंक मे बीहनि कथाकें भारी संख्या मे उपस्थिति रहैए।ओना ओइ भीड़ मे किछु अनावश्यक /निरर्थक रचना द' रचनाकार अपन उपस्थिति सेहो दर्ज करौलनि।से प्रारम्भिक अवस्था छल।आब संपादकक संपादन कार्य परिपक्वता दर्शबैए।आ अपन निश्शनताक द्योतक बनि सोझां ठाढ़ ऐछ।हिनक संपादन मे 2021 मे मिथिलांगनक " बीहनि कथा विशेषांक "बहरा चुकल ऐछ जे ऐ विधाक विकासक एकटा महत्वपूर्ण उपलब्धि कें रूपमे गिनल जा सकैए।

पहिने मैथिलीक संपादक सब तथाकथित लघुकथाक बोझ तर अपनो आ बीहनि कथाकें सेहो दाबि जीवन गार्त केने छलाह।5 जनवरी 2019कें मैथिली - भोजपुरी अकादमी, दिल्ली द्वारा आयोजित अखिल भारतीय बीहनि कथा विमर्श सह गोष्ठी सं सबहक आंखि खुजलनि।आ ऐ विधाक पांखि खूजल। 2020 मे संपादक श्री रमानन्द झा रमण " घर- बाहर " मे मुन्ना जीक बहुत रास बीहनि कथाकें छपलनि।ओना तकर पछाति कने गरबराइत देखएल । 2021 मे एक अंकमे डा.प्रमोद कुमारक बीहनि कथाकें बीहनि कथा नामे आ डा.आभा झाक बीहनि कथाकें लघुकथा नामे छपलनि।ओना आब ऐ द्वन्दता सं बहरएल देखाइ छथि। 2020 मे बीहनि कथाक मांजल,लोकप्रिय रचनाकार, संपादक श्री घनश्याम घनेरो जीक संपादन मे बहार होइ बला पत्रिका " पकठोस"क सब अंक बीहनि कथा सं पाटल रहै छल। अही वर्ष राजविराज,नेपाल सं प्रकाशित साप्ताहिक " मिथिला ",संपादक श्री दैवैन्द्र मिश्र जी,अद्यावदि सब अंक मे बीहनि कथाकें निरन्तर प्रकाशित क' अपन संपादकीय धर्म आ जीवटताकें कायम रखने छथि। एखन धरि बीहनि कथा गोटा गोटी प्रकाशित होइत रहल।एकरा विराट रूप देलनि विदेहक संपादक श्री गजेंद्र ठाकुर जी।विदेह इ पाक्षिकक अंक-317(मार्च 2021) बीहनि कथा विशेषांक -2 निकालि।ऐ मे करीब तीन दर्जन बीहनि कथाकारक रचना संग देश - विदेश सं उड़िया,पंजाबी,नेपाली, संस्कृत आ अंग्रेजीक ऐ समकक्ष विधाक निश्शन/ महत्वपूर्ण रचना/ आलैखकैं स्थान द' एकटा संपुष्ट विशेषांक सोझा अनलनि।जै ऐ विधाक लेल मीलक पाथर साबित भैल। अही वर्ष यानी 2021 मधुबनी सं मैथिली पुनर्जागरण प्रकाश ,मैथिली दैनिक संपादक अजयनाथ शास्त्री आ सहयोगी सचिदानंद सच्चू जीक द्वारा बीहनिकथा नियमित प्रकाशन होइत रहल। 2022 मे कवि एकांत राजीव झा जीक संपादन मे मिथिला समाज ट्रस्ट, दिल्लीक पत्रिका " मिथिला समाज " मे बीहनि कथा आ आलेखकैं प्रमुखता सं स्थान देल जाइत रहल। अही वर्ष सं मैसाम ,दिल्लीक पत्रिका " अपूर्वा " संपादक द्वय- संजीव सिन्हा, उज्ज्वल कुमार झा द्वारा बीहनि कथा प्रचुर मात्रा मे छापल जाइत रहल।

वर्ष 2023 सं समदिया मिथिला पटना मैथिली दैनिक,संपादक- सचिदानंद सच्चू एकर साहित्यिक पन्ना पर बीहनि कथाक उपस्थिति दर्ज करबैत रहलाह। अही वर्ष केदार कानन जी द्वारा संपादित आ सुपौल सं प्रकाशित भारती- मंडन अपन युवा विशेषांक मे लघुकथा /बीहनि कथा स्तम्भ मे करीब आधा दर्जन युवा बीहनि कथाकारकें स्थान देने छलाह। 2024 मे सहरसा सं प्रकाशित साप्ताहिक सहर्ष मिथिला मे संपादक श्री किसलय कृष्ण जी बीहनि कथा प्रकाशन मे अपन उपस्थिति दर्ज करौलनि। अही वर्ष लाल दासक जयन्ती पर निकल' बला स्मारिका मे संपादक श्री संजीव शमा बीहनि कथाकें स्थान देबाक सिनैह आ जीवटता देखौलनि ।

मैथिलीक एक मात्र अपन स्वतंत्र विधा बीहनि कथाक निश्शनता आ लोकप्रियता सं होइत पसार देखि मैथिलीक अतिरिक्त अन्यान्य भाषाक संपादक सैहो प्रमुखता सं स्थान दै छथि। 2015 सं पटना सं प्रकाशित हिन्दी दैनिक- दैनिक जागरण आ 2016 सं पटना सं प्रकाशित दैनिक भास्कर अपन साहित्यिक अंकमे बीहनि कथा मूल भाषा मैथिली मे प्रकाशित करैत रहै छथि। श्री योगराज प्रभाकर जीक संपादन मै पटियाला,पंजाब सं प्रकाशित - लघुकथा कलश लघुकथा महा विशेषांक 2017 पहिल अंक सं अद्यावदि हिन्दी अनुदित रचना, आलैख प्रकाशित करैत रहलाह। 2018 मे लघुकथा टाइम्स पछाति लघुकथा वृत नामै आदरणीया कान्ता राय जीक संपादन मे लघुकथा शोध केन्द्र, भोपाल सं बहराइत ऐ पत्र मे हिन्दी अनुदित बीहनि कथा आ छपैत रहली। 2024 ,भागलपुर सं हिन्दी 'दैनिक अंग भारत ' मे डा. श्वेता जीक साहित्यिक संपादन मै मूल मैथिली मे छपैए बीहनि कथा। उपरोक्तक अतिरिक्त सूर्य किरण भुवनेश्वर द्वारा विनय दास बांग्ला मे संपादक - बेबी कारफर्मा नेपाली - गोरखा पत्र द्वारा गौरी आदि मे बीहनि कथाकें स्थान द' दूर आ आन भाषा भाषी धरि ऐ विधा आ मैथिलीक पसार मे महत्वपूर्ण योगदान दै बला सब संपादककैं आत्मीय आभार!

समालोचक:- जहिना शुरू मे संपादकक हाल छलनि तहिना ऐ विधाक एतेक विकासक बादो समालोचकक उदासीनता खटकै बला ऐछ। सम्प्रति मैथिलीक वरिष्ठ समालोचक श्री रमानन्द झा रमण द्वारा डा. प्रमोद कुमारक " कनकीरबा ' पर विस्तार सं लिखल गेलै ।तकर अतिरिक्त श्री गजेंद्र ठाकुरक किछु आलैख विदेह पर प्रकाशित ऐछ। शेष शून्य ।

इ पन्ना मैथिलीक समालोचकक उदासीनता दूर होइन आ अपन कलम सं ऐ विधाकैं आओर समृद्ध करैत तकर बाट जोहैत........खाली ऐछ। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.संतोष कुमार राय 'बटोही'-राखी (संस्मरण) संतोष कुमार राय 'बटोही' राखी (संस्मरण)

अपराजिता डेढ़ बरख केर भेल छलीह। राखी पाविन आबि गेल छलैह। 2018 म' केर गप्प अछि। आब अपराजिता केकरा राखी बान्हत ? एकरा तँ भाय नहि छै। मोन मे बड़ चिंता भेल। अपना सँ बेसी चिंता रुणा केँ चिंता देखलियैन्ह जे बेटा नहि छैन्ह। चिंता अइ दुआरे नहि होयत छलैन्ह जे मुखाग्नि केँ देत । चिंता अइ दु आरे छलैन्ह जे अपराजिता केकरा राखी बान्हत ? अड़ोसिया-पड़ोसिया जनानी सभ दबल मुँह बजैत रहैत छलीह जे रुणा केँ बेटीए छै, बेटा नहि छै । इ गप्प सीधा करेजा मे जाऽकऽ धक सन लागि जायत छलै। इ तेहेन दरद छलैन्ह जेकर ईलाज त छलै, परञ्च अइ मे विज्ञान आओर भाग्य सँ बेसी सूझबूझ केँ जरूरत छलैन्ह।

अइ बेर अपराजिता आरव केँ राखी बान्हलक। आरव एकर मौसेरा भाई छलै। आरव कुरता पहिरने छै आओर अपराजिता फ्राक । रुणा अपराजिता केँ हाथ सँ आरव केँ माथ मे चानन केर टीका लगा देलथिन्ह। आरव हाथ सँ चानन केँ पोछै केँ प्रयास केलक। चानन भरि माथा मे लभैर गेलै। रुणा आरव केँ माथा सँ चानन केँ पोछि देलकै। रुणा फेर आरव केँ माथा मे चानन लगा देलकै। छोटका प्लेट मे राखी राखल छेलै । अपराजिता केँ हाथ सँ आरव केँ कला ई पर राखी बान्हि देलथिन्ह। आओर प्लेट मे राखल एकटा रसगुल्ला आरव केँ खिया देलथिन्ह। आरव ओकिया-ओकिया के खाय लागल।

रुणा केँ आँखि मे अखनो चिंता देखल जा सकैए। हमरा अपन बहिन सभ याद आबि गेल । हमरा तीनि टा बहिन अछि - अनिता बड़की बहिन, फूलो मैथिली बहिन आओर चंद्रकांत छोटकी बहिन। तीनो जयपुर मे रहैत छथि। जखन दिल्ली मे रहैत छलहुँ तँ जयपुर कुनो-कुनो बरख जाऽकऽ राखी बन्हा आबित छलहुँ। गाम पर जखन तीनू बहिन मे सँ कियो रहैत छल तँ राखी बान्हैत छल। एक बेर राखी पाविन मे जयपुर मे छलहुँ , तँ बहिन केँ सखी सभ सेहो राखी बान्हने छल। भाई-बहिन केँ ई बड़का पाविन छियैय। हमरा बहिन केँ कमी नहि अछि आओर हमरा बहिन केँ भायक कमी नहि छै। अक्षरा रुणा केँ पेट मे छलीह। रुणा निराश नहि भेल छलीह। मोन मे छलैक जे बेटा हेबे करत। 22 नवंबर, 2018 मे अक्षरा रुणा केँ जनम लेलीह। अइ बेर ओ निराश भेलीह। परञ्च आशा अखनो धरि बाँचल छलैन्ह। 2021 मे तीन नवंबर केँ अयांश केर जनम भेलै। अयांश दस मासक भेल रहै। राखी पाविन आबि गेल छल। हम दरिभंगा मे पदस्थापित छलहुँ। सपरिवार ओतै छलहुँ। अपराजिता आओर अक्षरा नहा धोऽ कऽ राखी बान्है लेल तैयार छथि। रुणा अयांश केँ नहा धोऽ कऽ कपड़ा पहिरा कऽ अनलाथि। छोटका प्लेट मे दूटा राखी राखल छै। अपराजिता आओर अक्षरा बारी-बारी सँ अयांश मे माथा मे चानन केलाथि आओर राखी भाई केँ कला ई मे बान्हलाथि। राखी बान्हलाक बाद अयांश केँ रसगुल्ला दुनू बहिन खियौलाथि अपनो खेलाथि। रुणा केँ आँखि मे संतोष देखि सकैत छी। ओकरा माथा पर सँ चिंता केँ लकीर छूमंतर भ गेल छै। -संतोष कुमार राय 'बटोही' , ग्राम - मंगरौना, पोस्ट - गोनौली, भाया - अंधराठाढ़ी, जिला - मधुबनी, बिहार सम्प्रति - शिक्षक अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.संतोष कुमार राय 'बटोही'-मैथिली साहित्य मे समालोचक केँ कमी संतोष कुमार राय 'बटोही' 

मैथिली साहित्य मे समालोचक केँ कमी

मैथिली साहित्य आदिकालीन साहित्य अछि। विद्यापति सँ लऽकऽ अखन धरि ढेर रास पोथी लिखल गेल। मैथिली साहित्यक सभ विधा मे लिखल जा रहल अछि। टाकाक कमी कहियौन्ह की ईमानदार प्रयासक कमी मैथिली मे पत्र-पत्रिकाक कमी अछि। लोकक साहित्य मे रुचि सेहो कम भेलैन्ह अछि। उत्तर आधुनिक काल मे हम अहाँ जीवि रहल छी। औखन टाकाक बेसी महत्व बढि गेलैए। समाजवाद पर पूँजीवाद हावी भ गेल छै। सभ कियो 'आनंद' खोजबा मे लागल छथि। जत्ते टाका रहतै ओतेक मौज मस्ती केल जा सकैए ई अवधारणा विकसित भऽ रहल छै।भौगोलिकरण केँ अई घिच्चम-तिरा मे साहित्य सेहो पिसा रहल छथि। टाकाक अभाव मे रचना सभ पड़ल अछि। ओकर मुद्रण नहि भऽ रहल छै। बाजारवाद ततेक ने बढ़ि गेलैए जे आमजन आओर साहित्यिक प्रेमी टाकाक जेब सँ निकालै मे तेरह बेर सोचैत छथिन्ह।

'सगर राति दीप जरय' साहित्यिक गोष्ठी मे जे कथाक वाचन होयत छै, तेकर तत्क्षण समीक्षा केल जायत छै। ई समीक्षा हमरा कहियो पचल नहि। समीक्षा केर आधार की होयत छै एकरे कोनहुँ अता-पता नहि रहैत छै। फुसियौंह केर कथाक समीक्षा होयत छै। समीक्षा केँ आधार कथा केर प्लॉट यानी कथावस्तु, पात्र, देशकाल आओर वातावरण, संवाद, भाषा- शैली, लेखन-शैली, उद्देश्य वगैरह-वगैरह हेवाक चाही। परञ्च मैथिली भाषा केर आलोचक सभ कथावस्तु केँ कथाकार किया चुनने होयतिन्ह अई पर कोनहुँ विचार नहि करैत छथिन्ह। देशकाल आओर वातावरण केँ आधार पर कथा केर समीक्षा नहि भऽ रहल छै। मैथिली साहित्य मे काल-विभाजन नहि केल गेल औखन धरि। देखवा मे ई आबि रहल अछि जे राजकमल चौधरी, यात्रीजी, हरिमोहन झा, उषा किरण खान, जगदीश प्रसाद मंडल वगैरह-वगैरह कथाकार लिखलाथि आओर लिख रहल छथि, परञ्च हुनकर साहित्य पर एकटा नीक साहित्यिक समीक्षा नवका समयानुकूल नहि भऽ रहल छै।

पात्र कथा केँ प्राण होयत छै। पात्रक चुनाव कथाकार कोन उद्देश्य सँ केलथिन्ह आओर पात्रक चालि-चलन ओइ कथावस्तु केँ अनुसार कतअ टिकैत छै, पात्र केँ हिसाब सँ भाषा केर अदायगी करैत छथिन्ह। शब्द केर चुनाव कथाकार पात्र केँ हिसाब सँ कोना करैत छथि एकर समीक्षा हेवाक चाही।

देखल जायत अछि जे आलोचक मैथिली भाषा मे टाट लगाबै केर प्रयास करैत छथि जे हिन्दी आओर अंग्रेजी भाषा मैथिली मे घुसि रहल छै। ई कहनै नीक गप्प नहि छियैय। आजु अंग्रेजी अतेक आगा बढि गेल अछि ओकर पीछा मे किछु काज भ रहल छै। अंग्रेजी शब्दकोश मे फारसी, अरबी आओर दोसर भाषा केर शब्द जोडल जा रहल छै ,तें ओकर स्वीकारोक्ति बढि रहल छै। हम अहाँ टाट लगाबैत रहु।

कथा केर औखन धरि विभाजनक कोनहुँ परिपाटी विकसित नहि भेल अछि वा मैथिली साहित्य केँ आलोचक अइ पर मौनी बाबा बनल छथि। कथावस्तु, देशकाल आओर वातावरण केर आधार पर सेहो कथा केर समीक्षा केल जेवाक चाही। कथा ऐतिहासिक, सामाजिक, पौराणिक, पूँजीवादी अछि वगैरह-वगैरह एकर विभाजन हेवाक चाही। से मैथिली केर आलोचक अइ विषय पर विचार नहि रखैत छथि। समीक्षक कहअ लगैत छथि हम ठीक सँ नहि सुनलियै ओ की कथा पढलाथि। हमरा जंतबे ई अनठियौनै भेलै। कियो कहअ लागैत छथि कथा हमरा पसंद नहि भेल । यौ विद्वज्जन कथा अहाँ केँ पसंद केँ लेल तोड़े लिखल जायत छै। अहाँ कथाकार सँ असहमत भऽ सकैत छी, परञ्च अहाँ केँ लेल ओ कथा नहि लिखैत छथि। ओ अपना लेल लिखैत छथि। अपन मोनक तृप्ति लेल कथा लिखैत छथि । हुनकर मोन मे कोनहुँ बाजारवाद हावी नहि रहैत छै। हँ, किछु कथाकार बाजारवाद केँ दृष्टिकोण सँ कथा केर प्लॉटक सृजन करैत छथि।

मौलिक गप ई छियैय जे जखन कथाकार कथा लिखैत छथि तँ हुनका जेहन मे कथा लिखवाक किछु उद्देश्य तँ रहैत छन्हि,परञ्च लिखवाक क्रम मे कतेक बेर नियंत्रण नहि रहैत छै। कथा कोनहुँ दिस ससैर जायत छै। अइ मे कथाकार कोनहु दोख नहि छै। किया तँ कथा जखन ओ लिखअ लगैत छथि तँ कोनहुँ साँचा नहि रहैत छै। ओ सिर्फ लिखैत छथि। कतेक बेर लिखैत-लिखैत भसिया जायत छथि, परञ्च ओ कथा कथा रहैत छै। कथा कथाकारक फसल छियैय । ओ नीक आओर खराब भ सकैए ।

'सगर राति दीप जरय' कथा गोष्ठी केर उद्देश्य नीक छै जे एकटा मंच केँ ऊपर आओर नीचा बैस क अतेक मैथिली साहित्यिक लोकनि कथा केँ सुनैत अछि आओर पोथीक लोकार्पण होयत छै। परञ्च अपन कथा पढिकऽ सुइत रहब आओर दोसरक कथा सुनबे नहि करब इ गप नहि पाचि रहल अछि। किछु लोकनि मंच पर कब्जा केने रहैत छथि इ हमर आरोप अछि, से नहि हेवाक चाही। नहि तँ मैथिली साहित्यक विकास रुकिए जेतै। मैथिली साहित्य केँ पत्र-पत्रिकाक विकासक लेल सिर्फ गप्पे टा होयत अछि, कोनहुँ अइ लेल ठोस रस्ता नहि बनौल जायत अछि। -संतोष कुमार राय 'बटोही' , ग्राम - मंगरौना, पोस्ट - गोनौली, भाया - अंधराठाढ़ी, जिला - मधुबनी, बिहार सम्प्रति - शिक्षक अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.प्रणव झा-फैमिली एडॉप्शन प्रोग्राम (FAP): चिकित्सा शिक्षा में नवाचार आ ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य सेवाक बढ़ावा प्रणव झा फैमिली एडॉप्शन प्रोग्राम (FAP): चिकित्सा शिक्षा में नवाचार आ ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य सेवाक बढ़ावा नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC), जे पूर्व में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) कहल जाइत छल, ग्रामीण भारत में उत्कृष्ट स्वास्थ्य सेवा प्रदान करबाक लेल योग्य चिकित्सक केर नियुक्ति लेल निरंतर प्रयासरत अछि। एहि दिशा में, नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) द्वारा अगस्त 2019 में फैमिली एडॉप्शन प्रोग्राम (FAP) केर शुभारंभ कएल गेल, जे 2021-22 सत्र सँ एमबीबीएस छात्र-छात्रा सभक नव आधारित चिकित्सा शिक्षा (CBME) पाठ्यक्रम में समाहित कएल गेल अछि। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) द्वारा प्रारंभ कएल गेल परिवार अपनाइब कार्यक्रम (FAP) एक रणनीतिक पहल अछि, जे चिकित्सा शिक्षा में परिवार-केंद्रित देखभाल आ दीर्घकालिक रोगी संबंध सभक समावेश कऽ रहल अछि। एहि कार्यक्रमक तहत, चिकित्सा छात्र सभ केँ दीर्घकालिक रोगी संबंध सभ सँ निपटऽ के व्यावहारिक अनुभव भेटैत अछि, जे हुनक क्लिनिकल कौशल आ परिवारक गतिशीलता केँ बुझऽ में मदद करैत अछि। ई कार्यक्रम समग्र शिक्षा प्रदान करबाक मॉडल पर आधारित अछि, रोगी-केंद्रित दृष्टिकोण केँ प्रोत्साहित करैत अछि, आ संवाद, सहानुभूति, आ टीम वर्क जेकाँ महत्वपूर्ण सॉफ्ट स्किल्स केँ विकसित करैत अछि, जे प्रभावी चिकित्सा प्रैक्टिस लेल आवश्यक अछि। FAP केर उद्देश्य आ प्रारूप: फैमिली एडॉप्शन प्रोग्राम केर उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्र में प्राथमिक चिकित्सक केर सेवा उपलब्ध कराएब आ एमबीबीएस छात्र-छात्रा सभ के समुदाय के वास्तविक जीवन आ हेल्थ सिस्टम केर अनुभव प्रदान कराएब अछि। एहि कार्यक्रम में, प्रत्येक छात्र-छात्रा अपन एमबीबीएस अध्ययन केर बीच मे  में पाँच टा परिवारक दायित्व लैत छथि, जाहि में ओ परिवारक सामान्य स्वास्थ्य केर निगरानी करय छथि, स्वास्थ्य संबंधी समस्याक समाधान दैत छथि, आ चिकित्सा सुविधा प्राप्त करबाक दिशा में सहयोग करय छथि। FAP केर प्रारंभ महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (MGIMS), सेवाग्राम वर्धा  केर "सेवाग्राम मॉडल" स' भेल छल। एहि कार्यक्रम में छात्र-छात्रा के शुरूआत में 15 दिनक कैंप द्वारा गांधी आश्रम में नैतिक शिक्षा प्रदान कएल गेल छल, जेकर बाद ओहि समुदाय में ओ जाऽक अपन अध्ययन करैत गेलईथ। सेवाग्राम मॉडल केर आधार पर, एहि कार्यक्रम में छात्र-छात्रा कऽ परिवारक सामाजिक आ सांस्कृतिक पहलू सभ पर ध्यान देल जा रहल अछि, जै से समुदाय स्वास्थ्य व्यवस्था पर अनुकूल प्रभाव होय। एहि प्रकार सँ, FAP ग्रामीण क्षेत्रक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में सुधार करबाक दिशा में एकटा महत्वपूर्ण डेग अछि। FAP केर क्रियान्वयन आ चुनौति सभ: FAP केर कार्यान्वयन केर बीच मे कतेको चुनौति सभक सामना करऽ पड़ल अछि। विशेष रूप सँ समय आ संसाधन केर अभाव। कोरोना महामारी केर समय मे, कईएकटा प्रतिबंधक कारण सँ 27 घंटा केर बजाए मात्र 21 घंटा केर समय देल गेल। तथापि, एहि कार्यक्रम में छात्र-छात्रा सभ के घरे-घर जाऽक परिवारक स्वास्थ्य जांच, एनसीडी (जेना उच्च रक्तचाप, मधुमेह, आ मोटापा) केर स्क्रीनिंग, आ स्वास्थ्य सेवा प्रदान करबाक अवसर भेट रहल अछि। कतेको ग्रामीण क्षेत्र में, स्वास्थ्य केंद्र आ चिकित्सा सुविधा के अभाव अछि, आ लोक सभक बीच मे स्वास्थ्य संबंधी ज्ञानक सेहो कमी अछि। एहि स्थिति में, FAP के माध्यम से  छात्र-छात्रा के वास्तविक जीवन केर अनुभव होइत अछि आ ओ ग्रामीण क्षेत्रक समस्या सभ के  लऽग सँ देखैत छथि। एहि कार्यक्रम सँ ग्रामीण क्षेत्रक लोक सभ में स्वास्थ्य सेवाक उपयोग आ स्वास्थ्य ज्ञान में सुधार संभव अछि। FAP केर प्रभाव आ संभावना सभ: FAP केर माध्यम सँ छात्र-छात्रा नै खाली अपन क्लिनिकल कौशलक सुधार कऽ सकय छथि, अपितु परिवारक संग मजबूत संबंध सेहो बनबैत छथि। ऐ सँ ओ अपन संवाद कौशल, सहानुभूति, आ टीमवर्क में प्रवीणता प्राप्त कऽ सकय छथि। एहि कार्यक्रम केर माध्यम सँ छात्र-छात्रा आ समुदायक बीच एकटा समझ आ विश्वास के अटूट संबंध बनैत अछि, जे ओतुक्का लोक सभक स्वास्थ्य सेवा में सुधार आ स्वास्थ्य जागरूकता के बढ़ाबैत अछि। सेवाग्राम, केएमसी मैंगलोर, आ अन्य स्थानसभ में FAP केर सफलता सँ प्रेरित भऽ क, भारतक कतेको मेडिकल कॉलेज सभ एहि कार्यक्रम के अपन पाठ्यक्रम में शामिल कऽ रहल अछि। एहि प्रकारक कार्यक्रम सँ ग्रामीण क्षेत्रक लोक सभ में स्वास्थ्य केर प्रति जागरूकता बढ़त, आ चिकित्सक केर सेवा ग्रामीण क्षेत्र में सहज उपलब्ध होइ के संभावना मे सेहो वृद्धि हेतइक। कार्यक्रमक लाभ: 1. नवाचार के अवसर: FAP चिकित्सा महाविद्यालय सभ केँ अपन पाठ्यक्रम में नवाचार आ वास्तविक दुनिया केर अनुभव पर आधारित नव शिक्षण विधि सभ के  समावेश करबाक अवसर प्रदान करैत अछि। 2. समुदाय संग संबंध मजबूत करब: ई कार्यक्रम चिकित्सा संस्थान सभ आ समुदायक बीच संबंध मजबूत करैत अछि, जे संभावित रूप सँ बेहतर समुदाय स्वास्थ्य परिणामक दिस लऽ जेतै। भविष्यक दिशा: 1. अनुसंधान आ मूल्यांकन: ई क्षेत्र परिवार-केंद्रित चिकित्सा शिक्षा आ रोगी परिणामक प्रभावकारिता पर अनुसंधानक अवसर प्रदान करैत अछि, जे प्रमाण-आधारित सुधारक दिशा देखा सकैत अछि। 2. डिजिटल उपकरण आ टेलिमेडिसिनक उपयोग: डिजिटल उपकरण आ टेलिमेडिसिनक उपयोग कऽ कार्यक्रमक पहुँच आ लचीलापन बढ़ाओल जा सकैत अछि, जइ सँ वर्चुअल परिवारक इंटरैक्शन आ व्यापक सहभागिता सम्भव भऽ सकाय अछि अछि। 3. दीर्घकालिक अध्ययन: FAP कऽ प्रभाव मूल्यांकन हेतु दीर्घकालिक अध्ययनक आयोजन कऽ सक्षम डेटा प्रदान कऽ सकैत अछि, जे कार्यक्रमक सुधार आ विकासक दिशा में सहायक सिद्ध होयत। निष्कर्ष: FAP चिकित्सा छात्र-छात्रा कऽ ग्रामीण क्षेत्रक जीवनशैली आ स्वास्थ्य समस्या सभक प्रति जागरूक करैत अछि। एहि कार्यक्रम केर माध्यम सँ, छात्र-छात्रा में आत्मविश्वासक वृद्धि होइत अछि आ ओ परिवारक सदस्य सभक स्वास्थ्य देखभाल केर बेहतर सलाह देबाक क्षमता प्राप्त करैत छथि। एहि प्रकार, FAP चिकित्सा शिक्षा में नवाचारक माध्यम सँ ग्रामीण क्षेत्रक स्वास्थ्य सेवा में सुधार आ "सबके लेल स्वास्थ्य" केर लक्ष्य प्राप्त करबाक दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निमाहि रहल अछि। एकटार अलावा, FAP केर द्वारा कएल गेल स्वास्थ्य शिक्षा आ सेवा सँ ग्रामीण क्षेत्रक लोक सभक स्वास्थ्य व्यवहार में सकारात्मक बदलाव देखा रहल अछि, जे भविष्य में स्वस्थ समाजक निर्माण में सहायक होयत। {शोध संदर्भ: National Board of Examinations Journal of Medical Sciences (NBEJMS), Indian Journal of Community Medicine (Wolters Kluver)} [प्रणव झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली] अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.८.रबीन्द्र नारायण मिश्र- सीमाक ओहि पार (धारावाहिक उपन्यास) रबीन्द्र नारायण मिश्र सीमाक ओहि पार (धारावाहिक उपन्यास) हमर ससुर स्वर्गीय गणेश झा (पण्डौल डीहटोल)क स्मृतिमे, सादर ससिनेह समर्पित!-रबीन्द्र नारायण मिश्र -31- प्रात भेने हम फेर प्रेतशिला दिस विदा भेलहुँ । सौंसे गया घुमि गेलहुँ । केओ  हमरा पिण्डदान करेबाक हेतु तैयार नहि भेल। पणडासभ तर्र दए हमरा चिन्हि जाइत छल । हमरा देखितहि ओ सभ चिकरए लगैत-"भागू! भागू! प्रेत घुमि रहल अछि ।" चलैत-चलैत फल्गु नदी धरि पहुँचि गेलहुँ । ओहिठाम तँ खाली बालुए -बालु देखाएल। पानिक कतहु कोनो लेश नहि । बुझेबे नहि करए जे लोक एकरा नदी किएक कहैत छैक। आगू बढ़ैत छी । हुंजक-हुंज प्रेतसभ घुमि रहल छल । संभवतः पितृपक्ष प्रारंभ भए गेल छल । दूपहर होइत-होइत सौंसे फल्गु नदी भरि गेल। टस सँ मस होएब मोसकिल। पंडासभ अपन जजमानसभक संगे व्यस्त छलाह । मुदा हमरा दिस ककरो ध्यान नहि । अस्तव्यस्त,असोथकित बीच फल्गुमे ठाढ़ रही कि ककरो अबाज सुनाएल- - "ओहि कात चलि जाह । ओतहि दसरथक पिंडदान भेल रहनि । तोरो काज बनि जेतह। बालुए-बालुए हम ओहिकात पहुँचैत छी । पण्डासभ तरह-तरहक मंत्र पढ़ि रहल छथि । कैकटा पण्डा आपसमे झगड़ा कए रहल छथि । हम ओहिकात पहुँचले रही कि एकटा महात्माजी आँखि मुनने ध्यानस्त बैसल छलाह । हुनकर आँखि लाल-लाल छल । ओ पैरसँ माथ धरि भस्म रगड़ने छलाह । माथामे जटा साँप जकाँ चारूकात पसरि रहल छल । फल्गुक बालुपर  कहि नहि कखनसँ ओ पड़ल छलाह । हम हुनकर लगीचमे गेले रही, हमरा बिना देखने ओ बाजए लगलाह - " आबि गेलह । अएनहि छलह । हमर वचन वृथा नहि जा सकैत छल । आब तोरे हाथे सभक मुक्ति होएत ।" "पहिनहि हमर अपन मुक्ति तँ होअए । " "मूर्ख! एतेक दिनसँ बौआ रहल छह, एतबो नहि बुझि सकलह जे हमर आ आन किछु नहि होइत अछि । ई फाँक स्वनिर्मित अछि । सभ मुक्त हेतैक तँ तूँ बैसले  थोड़े रहबह । स्वतः मुक्त भए जेबह।" "अहाँ के छी? हमरा कोना जनैत छी ।?" "लएह, फेर ओएह बात? जे कहैत छिअह से ध्यान सँ सुनह । एहिठामसँ दस डेग पच्छिम दिस जाह । एकटा तमघैल माटिमे गारल भेटतह । ओकरा लेने सोझे मझौल चलि जाह ।" हम सएह करैत छी । दस डेग पाछू  दिस जइतहि कनीक ऊँचगर जगह बुझाएल । ओकरा पैरसँ कोरिअबितहि एकटा तमघैल भेटल । ओ बेस भरिगर छल । बाहरसँ नीकसँ मुनल छल। कहुना कए हम ओकरा बाहर घिचलहुँ । ओकरा कान्हपर धरिते छी कि फेर अबाज भेल- "एकरा अपन गामक सीमाक पार लए जाह । एहिमे सभक मुक्तिक समाधान अछि ।" पाछू देखैत छी तँ ओ महात्माक कोनो अता-पता नहि छल । पाकड़िक गाछ  ओहि महात्माकेँ चिन्हि गेल रहथि आ चिंतितो रहथि जे कहीं हमहूँ हुनकर लपेटमे ने आबि जाइ। इएह महात्मा हिनकर ई गति केने रहथि । मुक्तिओ हुनके करेबाक रहनि। से रस्ता ओ हमरा देखओलथि । फल्गुक बालुसँ कहुना कए बाहर भेलहुँ । पाकड़िक गाछ  आ ओहिपर बैसल सुग्गा भेटलाह। ओ सभ सभटा देखि रहल छलाह। "आब एतए एकहु क्षण रुकनाइ ठीक नहि "-सुग्गा बजलाह । "सही कहि रहल छी "-पाकड़िक गाछ कहैत छथि । हम तमघैलकेँ सम्हारि कए रखैत छी आ हुनका सभक संगे विदा भए जाइत छी । तीनू गोटे रातिएमे मझौल पहुँचलहुँ। गामक सीमक ओहिपार एकटा धार छल । धारसँ सटले परती छल । थोड़बे कालमे घनघोर वर्षा होमए लागल । आब की करी? किछु फुरेबे नहि करए । एतबेमे आकाशवाणी भेल- " मनुक्ख कतएसँ आएल आ कतए चलि जाइत अछि? ई प्रश्न हजारों सालसँ अनुत्तरित अछि । ई बात नहि छैक जे एकर समाधानक प्रयास नहि भेलैक । कतेको लोक अपन-अपन तरीकासँ एहि रहस्यक व्याख्या करबाक प्रयास केलाह । मुदा सही की अछि, ककर बातमे बेसी दम छैक से कहब बड़ मोसकिल काज अछि । जहिना जीवन सत्य अछि तहिना मृत्यु सेहो अकाट्य सत्य अछि । जे जन्मल से मरत । मुदा तकर बाद? की ओकर आस्तित्व सभदिनक हेतु मृत्युक संगे समाप्त भए जाइत अछि, आ की फेरसँ ओकर जन्म होइत छैक ? निर्णायक रूपसँ किछु नहि कहल जा सकैत अछि। पाकड़िक गाछ हो,ओहिपर बैसल सुग्गा हो किंवा तूँ स्वयं ,सभ स्वतःप्रेरित एहि संधानमे लागल रहलह । महाकालक प्रभावसँ कतए-कतए नहि गेलह । कोन-कोन परिस्थितिसँ ने गुजरलह । महाकाल महान छथि। हुनकहि प्रभावसँ सृष्टिमे रचना ओ संहारक शृंखला अनवरत चलि रहल अछि,चलिते रहत । परतीपर उगल नव पम्हसभ पौधक रूप धरत । सृजन मुक्तिदायक थिक । युग-युगसँ बौआइत मृतात्मासभ ओहि नव सृजनसँ एकाकार भए मुक्त भए जेताह। तकैत की छह? एहि तमघैलमे राखल बीआकेँ सौंसे परतीमे छीटि दहक । एहीमे सँ  बौआइत आत्मासभक मुक्तिक रस्ता निकलत । ओकरसभक रुपांतरण भए जेतैक । नूतन किसलय बनि ओ सभ सृष्टिमे सुख ओ समृद्धिक आकार ग्रहण करत। " से सुनि हमर आँखि प्रसन्नतासँ चमकि उठैत अछि । हम सएह करैत छी । तमघैलकेँ खोलि दैत छी । ओहिमे राखल बीआकेँ सौंसे परतीमे छीटि दैत छी । देखितहि-देखितहि संपूर्ण परिदृश्य बदलि जाइत अछि । सौंसे परती  हरिअर कंचन लगैत छल  । युग-युगसँ बौआइत अतृप्त,अशांत आत्मासभकेँ शांति भेटैत अछि,ओ सभ नव रूपमे अंकुरित भए सृष्टिमे सुख,स्मृद्धिक प्रतीक बनि जाइत छथि । सगतरि नूतन जीवनक सृजन भए गेल छल । हमर अन्तर्दृष्टि जागि चुकल छल । हम आब नीकसँ बुझि गेलहुँ जे सभ किछु मोनेक फेर अछि । दिव्यलोक,अंधलोक सभ मोनेमे अछि। जेहन सोचबैक तेहने भए जाइत अछि । एकहि मोनमे की-की ने बसैत अछि । जाधरि हम अपनासँ हटि कए नहि सोचबैक ताबते बौआइते रहब । तेँ तँ हमरा नीलमणि पर्वतपर सभ किछु देखा रहल छल , कारण हम तखन सभ किछुसँ पृथक भए जाइत छलहुँ । दृष्टि जँ सोझरा गेल तँ  इजोते-इजोत नहि तँ सूर्यग्रहण  जकाँ दिनोमे अन्हार। दिव्यलोक जीवनक सकारात्मकताक परिचायक थिक जाहिसँ शांति,सुख आओर आनंदक अनुभव होइत अछि । अंधलोक नकारत्मकताक प्रतिरूप अछि । ओहिठाम अशांति,दुख आओर तनाव भरल रहैत अछि  । अंधलोकसँ दिव्यलोकक यात्रा -तमसो मा ज्योतिर्गमयक कल्पनाकेँ अनुशरण करैछ। ऐहि यात्राक हेतु स्वयंकेर स्वयंसँ साक्षात्कार जरूरी अछि । मनुक्ख अपन सोचक आंतरिक प्रवृतिकेँ बदलि कए जीवनक दिशा स्वयं निर्धारित कए सकैत अछि ।  ईहो बुझबामे आबि गेल जे आखिर पिपही आओर किछु नहि हमरे निर्णनयात्मक वुद्धि अछि जकरा बले हम किछु प्राप्त कए सकैत छी । एही बलेँ पाण्डव महाभारतक युद्ध जीति गेलाह । एकरे अभावमे रावण सन महाबली सभकिछु हारि गेल । पिपहीक कारण सुविधा,असुविधा दुनू भेल ।  हमरा जनैत असुविधा बेसी भेल। नहि तँ भने हम रेल दुर्घटनाक बाद झञ्झटिसभसँ हटि गेल रही । मुदा नियति नव-नव समस्या गढ़ैत रहल । दिव्यलोक,अंधलोक, मुकुंदपुर,मौजपुर आ कहि नहि कतए कतए घुमबैत रहल,की-की देखबैत रहल । हम ओकर हाथक खेलौना छलहुँ, आओर किछु नहि। तैँ ने मरिओ कए कहिओ चैन नहि रहि सकलहुँ । फरीछ भए रहल छल । गाममे स्त्रीगणसभ पराती गाबि रहल छलीह । हमरा लेबाक हेतु एकटा विमान आएल । ओहिमे पहिने सँ तिरपित,शरद,श्याम,मंजुषा,रागिनी,निशा, ज्योतिषीजी,विमला,प्रभु,सभ बैसल छलाह । ओहि विमानक परिचालन महाकाल स्वयं कए रहल छलाह । सभ भूत,वर्तमान,भविष्यक ओझरसँ मुक्त भए गेल छलाह । -32- ओहि राति हमरा बहुत नीक निन्न भेल । एकहि निन्ने परात भए गेल । निंद्रित अवस्थामे भोरहरबामे सपना देखए लगलहुँ । सपना सीनेमाक रील जकाँ बड़ीकाल धरि चलैत रहल। कहि नहि कहाँसँ पाकड़िक गाछ आ ओहिपर गप्प करैत सुग्गा आबि गेल । मौजपुरक परतीक हरिअरी देखि हम कतेक प्रसन्न भेल रही । कैक बेर हम बड़बड़ाइतो छलहुँ । लगमे केओ  नहि छल। एकाएक फोनक घंटी बाजल । मोबाइलक घंटी सुनि हमर आँखि खुजि जाइत अछि । कतहु किछु नहि देखि हम विस्मित छी । ने आब पाकड़िक गाछ छल ने सुग्गा कतहु देखाएल ।  कनीकालमे जखन भक्क टुटैत अछि तँ पता लागल जे ई तँ मात्र सपना छल। एकटा एहन सपना जे हमर मोनकेँ झकझोड़ि कए राखि देलक। कोना हम कैक पुस्त पहिनेक दुनिआमे पहुँचि गेलहुँ ? मुकुंदपुरमे राजकुमारी संगे हमर फेरसँ भेल भेंट केहन सोहनगर लगैत छल । पूर्वजन्ममे ज्योतिषीजी आ विमला हमर माता-पिता छलाह से बात सोचि तँ हम अखनो रोमांचित छी। असलमे जन्म-जन्मक सबंध चलैत रहैत अछि जे हम कैक बेर बुझि नहि पबैत छी आ आश्चर्यचकित होइत रहैत छी जखन केओ  अप्रत्याशित हमर शत्रु-मित्र बनि जाइत छथि । ओहोसभ अपन पूर्व जन्मक बकिऔताक समाधान करैत रहैत छथि । भोरे-भोर हम इएहसभ सोचि  रहल छलहुँ कि फोनक घंटी बाजि गेल छल । रागिनी फोन पर रहथि । कहैत छथि- "बाबूजी हमरसभक बिआह हेतु स्वीकृति दए देलथि ।" "तखन?" "तखन की । शुभस्य शिघ्रम।" (समाप्त) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। पद्य ३.१.प्रदीप कुमार मंडल 'पवड़ा'-दुधक ऋण!/ सजनी छोड़ि गेलीह मोरी गाम! ३.२.प्रमोद झा 'गोकुल'- मामी कत मोर ३.३.प्रणव झा- बादल आई फेर तू आयल छलही हमरा आँगन ३.४.राज किशोर मिश्र-साम्प्रतिक परिवेश ३.५.संतोष कुमार राय 'बटोही'-परेमक डोर ३.१.प्रदीप कुमार मंडल 'पवड़ा'-दुधक ऋण!/ सजनी छोड़ि गेलीह मोरी गाम! प्रदीप कुमार मंडल 'पवड़ा' दुधक ऋण!/ सजनी छोड़ि गेलीह मोरी गाम!

१ दुधक ऋण!

नहि जनमौली बाघ जनानी गीदड़ घर घर पोसने अछि, कुत्ता बनि कौरा नित्य ताकै तंहि अधिकार गमौने अछि ।

लाठी मोटका चार में खोंसल समुच्चा झोल लगौने अछि, नहि अछि देह में कुबति ओकरा तंहि अधिकार गमैने अछि ।

ध्वज मिलल जे हाथ फहराबऽ सान्हि नुका कऽ रखने अछि, नहि निकसत सड़क पर केयो तंहि अधिकार गमौने अछि ।

राखल लुक्का के जराओत ? आस पर आस लगौने अछि, हेरि रहल अछि बाट उद्धारक तंहि अधिकार गमौने अछि ।

के भरत हुंकार हक लेल ? झुट्ठे के पाग पहिरने अछि, नहि नीज सिर बान्हत मुरेठ्ठा ? तंहि अधिकार गमौने अछि ।

धिक्कारै छी हम मैथिलानी के वो केहन पुत्ता जनने अछि, भलमानुष नहि पुत्त प्रदीप वो 'दुधक ऋण' पचौने अछि ।

२ सजनी छोड़ि गेलीह मोरी गाम!

सजनी छोड़ि गेली मोरी गाम !

नहि हम ओकरा हांटल दबारल नहि कयलौंह अपमान, बंटवारा लेऽ हुर्रे मचा कऽ कऽ गेलीह बदनाम ।

सजनी छोड़ि गेलीह मोरी गाम !

राति में भेल किछु कहासुनी भोरे भरलक उड़ान, हम कि जानियै अहिना उड़तीह रुसतीह मोरी परान ।

सजनी छोड़ि गेलीह मोरी गाम !

कंचन संओ सुंदर छन्हि काया मूंह छन्हि मुरत समान, घरक कला में बड़ फूरतगर तंहि घमंडक गियान ।

सजनी छोड़ि गेलीह मोरी गाम !

चहूं ओरि हम हेरि थकलौंह मिलल नहि हमर जान, कहै प्रदीप जा बैठऽ घर में नहि छऽ ओ नरगियान ।

सजनी छोड़ि गेलीह मोरी गाम ।

-प्रदीप कुमार मंडल 'पवड़ा', बाऊजीक नांओ - श्री लक्ष्मण मंडल, मायक नांओ - श्रीमती मंगली देवी, गांव - पवड़ा (इनाई), डाकघर - अरगा, प्रखंड - बहेड़ी, जिला - दरभंगा, पिनकोड - 847105 मो०- 9771245676 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.प्रमोद झा 'गोकुल'- मामी कत मोर प्रमोद झा 'गोकुल' मामी कत मोर

चान अहाँ चान चढ़ल मचान मानल महान शिव केर सान हमहूँ नै आन भारत के ज्ञान वेदक विज्ञान विश्वक गुमान छोड़ब नै पछोर छी अहिंक चकोर भए जाउ बरु भोर चढ़ि के रहब कोर मामा पर सबके जोर जुनि करु बेसी सोर गाम एलौं हम तोर कहु मामी कत मोर ? -प्रमोद झा 'गोकुल', दीप,मधुवनी (विहार), फोन -9871779851 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.प्रणव झा- बादल आई फेर तू आयल छलही हमरा आँगन प्रणव झा बादल आई फेर तू आयल छलही हमरा आँगन बादल आई फेर तू आयल छलही हमरा आँगन, आ बरसि के चलि गेलही ; हम तोहर आभारो नै जता सकलहु ! तोहर बुन्नी से अपन गमछो नै भिजा सकलहु ! तू बड्ड व्यस्त छलहि सबहक प्यास मेटाबऽ मे। मुदा काइल्खन तू फेर आबिहें। बाँहि खोलि करबाक अछि तोहर स्वागत, आ भिजेबाक अछि तोहर बुन्नि से अपन तन मन। बंद करऽ के अछि तोहर बुन्नि के अपन मुट्ठी मे आ झूमि के करबाक अछि प्रेम से तोहर आलिंगन। पुछबाक अछि ई प्रश्न तोहर कारी घट से सुनि रहल छहि न रे करिया बदरी ? कोना लऽ आबय  छहीं तूँ मरुभूमियो मे हरियरी ? कि मेटा सकय छहीं पियास ओहो अभागल सभ के सुखायल अछि कंठ जेकर सदि से, कईएक जनम से। भेंट सकत की सभके कोनो दिन तोहर बुन्नीक हिस्सा आनंदित हेतईक की सभटा मनुक्खक जीवनक खिस्सा! के छैक जे चोरा लैत अछि सब बेर तोहर  मेघ के ? इन्द्र छैक, कोनो दानव आ कि कोनो आन देवता आ कि ऐ पापक भागी सेहो छी हम मनुक्खे टा ! सुनही न, तू आबिहें, फेर आबिहें हमरा आँगन अपन बुन्नी से भिजाबिहें हमरा  सबहक तन मन। -      प्रणव झा [राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड] अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.४.राज किशोर मिश्र-साम्प्रतिक परिवेश राज किशोर मिश्र साम्प्रतिक परिवेश बसा त मे नहि नेहक स्पंदन, असभ्य सन अछि भेल नृशंस, की कहू हा ल चा रू का तक ? वि षा दक दि न-दि न बढ़ल वंश।

बी हरि कतेको ठा म-ठा म , नुका एल ओहि मे बि षधर व्या ल, धो पचट मे जँ पड़ल पएर तँ कि न्नहु नहि छो ड़त ओ का ल।

दि ना दि ष्टी अछि घूमि रहल, सहर-गा म मे शुंभ-नि शुंभ , जा नि ने की करतै समा ज केँ ? अछि धेने हा थ मे गरल-कुंभ।

संवा दक स्वर मे नहि मि ठा स, षड्यंत्रक अछि गुरुत्वा कर्षण, शकुनी क चौ सरि अड्डा पर , बड़ दुर्लभ अछि सज्जन-दर्शन।

ए.सी ,टी वी , फ्री ज आ की नहि , सुवि धा के अछि सजल बजा र, मुदा दुर्यो धन के शी श-महल मे, वि श्वा सघा तक छै उपचा र?

टका -टुकुर, उपभो क्ता वा द, अर्थतंत्रक उपनि वेशवा द , जे पछुएला , पा छू रहला , एहि हो ड़क कि छुए छथि अपवा द।

समा नक सौं दर्य, कड़कड़ौ आ टा का , मो हपा श मे, फँसलथि का का ?

जो रे दलि दरा हा ! छौ फूटल करम, बूझलए नहि तोँ , एहि जुगक मरम।

'भा वना ' थि क एखन मूढ़ता , सभ सुख धेने रुपैआ , बि नु कैँचा ककरा के पूछय? पा इये सँ बा बू-भैआ।

टा का सँ छैक भरल जि लेबी मे मि ठा स, पंचतत्व मे भऽ गेल छै लछमी के वा स। दुर्गति छै ओहि जि नगी क जकरा नहि छदा म, एहि दुनि आ मे तऽ कफनो के लगैत छै दा म।

सम्बन्ध नहि , बँटबा रा क का गत, सम्हा रि क' रखै छथि भैआरी , बँटि जा इत अछि बन्धुत्व पहि ने, तखन खेत सतबि घबा , बा ड़ी ।

लुटा रहल अछि अपन अरुदा , पी कऽ मदि रा , भा ङ, क्षणि क सुखक लेल लो क कि छु, गमबैछ आङ-समा ङ।

टि कली टूटल, लहठी फूटल, गरा सँ उतरल मंगलसूत्र, अठो ङरक उखरि -समा ठ टूटल, मर्या दा भा ङ्गल यत्र-कुत्र।

मतलब सँ मतलब छै लो कक, वि ना श बा द शां ति 'अशो कक'?

मृत्यु -घा टी मे अछि को ना , उतरि गेल अपना पन? दया ,मा नवता , ममता बि नु,नु द्रव्ये सँ जी वन-या पन?

दसे अवता र सँ चलत ने का ज ,यौ भगवा न! दुनि आ मे फड़ि गेलैए बड़का -बड़का हेमा न ।

फोँ क भेल जा रहल परि वेश, अनुरा ग बेगर की रहत शेष?

सो ना -चा नी ,अमूल्य धा तु, सभ अछि बा हरक अलंका र, मो न तँ सुखले रहि ए जा एत, जँ नहि बहत सि नेहक धा र।

देहे बसल अछि , मन-हृदय, ओकरा चा ही भा वक नी र, पि री ति सँ अगधल मो न जे, अनेरो चमकत ओहन शरी र। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.५.संतोष कुमार राय 'बटोही'-परेमक डोर संतोष कुमार राय 'बटोही' परेमक डोर

ई खीचि-तानि कतेक दिन धरि चलतै ? पाथर दिल सचहौं कहियो पिघलतै ?

बेदम भेल छी अइ मर्द सँ आब हम, ओकरा छाती पर दालि केँ दररतै ?

समय आबि गेलैए हिसाब-किताब केर, मसुएल रहला सँ आब काज नहि चलतै।

ठगा गेल छी हम बड़ अहाँ सँ, एना कनखि मारला सँ नहि चलतै ।

बुढ़ भेलहुँ अहाँ केँ नाक लगले अछि , अहाँ केँ बुझवा मे हमरा की लगतै !

की ठाट-बाट अहाँ केँ रैह गेल अछि ? सभटा बिका गेलै आब केँ बकसतै ?

फिरिशान नहि करू हमरा आब साजन नीक लागत देखैत हमर अछिया धधकतै ?

चिन्हार-देखार भेलहुँ अहाँ सभतरि, कनियो लाज आब पुरखा केँ नहि बचतै !

परेमक डोर आब आओर नहि तोड़ियौ, मुइला बादो हमर-अहाँक सिनेह मिटतै ?

-संतोष कुमार राय 'बटोही' , ग्राम - मंगरौना, पोस्ट - गोनौली, भाया - अंधराठाढ़ी, जिला - मधुबनी, बिहार सम्प्रति - शिक्षक अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह ४०२ म अंक १५ सितम्बर २०२४ (वर्ष १७ मास २०१ अंक ४०२) || 91 92 || विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in

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द्वितीय सत्र : साय॑ 4:00 TH wea प्रस्तुति नाटक: हाथीक cia लेखक : प्रबोध नारायण सिंह निर्देशक : कुन्दन वर्मा सहयोग : संजय वशिष्ठ प्रस्तुति : शशि सरोजनी रंगमंच सेवा संस्थान, सहरसा नाटक: सत्ताक मद कवि. : रामकृष्ण झा किसुन अभिनय आ निर्देशन : प्रभाती कमलिनी अणिमा सिंह संकलित लोकगीतक गायन सन्दर्भ आ प्रस्तुति : दीपिका चन्द्रा शनिदिन, 28 सितम्बर 2024 तृतीय सत्र : पूर्वाहन 0:00 बजे प्रबोध नारायण सिंह पर केन्द्रित अध्यक्षता : भीमनाथ झा आलेख-पाठ =: कमलेश झा - प्रबोध बाबू आ कलकत्ताक मैथिली चेतना प्रणव कुमार सिंह - हमर नाना जी फूलचन्द्र झा प्रवीण - प्रबोध बाबूक अनुवाद साहित्य प्रकाश झा - प्रबोध aa नाटकमे तत्कालीन समाज विजयेन्द्र झा — भाषाशास्त्रीक रूपमे प्रवोध बाबू भोजन चतुर्थ सत्र : अपराहन 2:00 बजे अणिमा सिंह पर केन्द्रित अध्यक्षता : गंगानाथ गंगेश आलेख-पाठ =: नीता झा - लोकगीत आ अणिमा जी विश्वनाथ — अणिमा जीक व्यक्तित्व हितनाथ झा - अणिमा site साहित्य आ जीवन आशीष चमन - मैथिली लोकगीत परम्परामे अणिमा जीक योगदान नारायणजी — अणिमा जीक संघर्षक प्रतिफल लोकगीत राजर्षि सिंह - हमर aa आ दादी धन्यवाद ज्ञापन : अभय कुमार मनोज सहायक प्रोफेसर, ईस्ट एन वेस्ट टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज, सहरसा उत्तरापेक्षी : 074-23386626 / 27/28 / 763473526 ई-मेल. : secretary@sahitya-akademi.gov.in_/ enwtte@gmail.com वेबसाइट 4: www.sahitya-akademi.gov.in 7 www.enwtte.ac.in

A iy od "es bo संस्कृति मंत्रालय च्चुछलल भारत संसार साहित्य अकादेमी SS a साहित्य अकादेमी, नई दिल्‍ली a ईस्ट एन वेस्ट टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज, सहरसाक संयुक्त तत्वावधानमे आयोजित रामकृष्ण झा किसुन, प्रबोध नारायण सिंह एवम्‌ अणिमा सिंह शतवार्षिकी संगोष्टीमे wet सादर आमंत्रित छी। 27-28 सितम्बर 2024 स्थान : सभागार, ईस्ट एन वेस्ट टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज, सहरसा कार्यक्रम शुक्रदिन, 27 सितम्बर 2024 उद्घाटन सत्र : पूर्वाहन :00 बजे स्वागत वक्तव्य : कुमार विक्रमादित्य, कार्यक्रम संयोजक अध्यक्षता : रजनीश रंजन, चेयरमैन, ईस्ट एन वेस्ट टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज, सहरसा विशिष्ट अतिथि : मनीषा रंजन, अधिषद्‌ सदस्य, वी. एन. एम. यू., मधेपुरा विषय प्रवर्तन: उदय नारायण सिंह नचिकेता, संयोजक, मैथिली परामर्श मण्डल, साहित्य अकादेमी बीज भाषण... : महेन्द्र, प्रख्यात मैथिली साहित्यकार धन्यवाद ज्ञापन : athe कुमार झा, प्राचार्य, ईस्ट एन वेस्ट टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज, सहरसा भोजन प्रथम सत्र : अपराहन 2:00 बजे रामकृष्ण झा किसुन पर केन्द्रित अध्यक्षता : सुभाष चन्द्र यादव Ses =: केदार कानन - नव कविता आन्दोलन आ किसुन जी रमण कुमार सिंह — किसुन जीक कवितामे परिवर्तनक स्वर अरुण कुमार सिंह — किसुन जीक Raa साहित्य अमृता चौधरी — किसुन जीक कथामे स्त्री विमर्श कुमार राहुल - मैथिली साहित्यिक गतिविधिमे किसुन जीक सक्रियता

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8 || विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in Dd. ACR, 20.05.2003, ZH; Bd. PZT, 02.99.2003, ENS Pia SSH 9". TAD YE (AAI) , d2.0¢.2008, AGP SHA; 9८. TAA, 02.92.2008, ART TE; dS. AgsIaAI, 0.02.2004, sls Maral; 50. Neasn, 25.02.2004, RESIST कक; Od. TCHA-2, 09.98.2007, aT छाफृव; ०२. GTHOMYS, 07.08.200k, रा. बतीन्मूब GUIS Seal; 32. याँठी, 3$.07.2002, FN NA wey, ७४. Tren Sins (EFA, 0८.४४.२००८, रा. WOMB wR; od. AAT, कथा sistt-2, 23.02.2005, 'अकिख es aIKETM/ Goat TRS; oo. Heda, 20.03.2008, Pict! FN सा; ७१. घाप्ताडीधूव, 03.08.2005, SSS BY ‘ASM; St. YOANA- Z, 03.92.2008, Balan Spa OS. TABS, 07.08.2000, THAIN Ne ‘aria; १0. Acres (FSM) , 92.03.2090, झा. AISTAPH सा; १४. AAU (फैसावथुय), 02.30.2030, Esme sm Nec, श्ञासीय softy cot; १२. TACT, 08.92.2090, war Bs 22. Nie, Da याजकासत, 03.02.2099, FAST NaI, १४. AHS, 30.08.20d9, WI Tes; >. ea, Fae FA, 00.02.20Sd, ACM 4a DNATA ‘BY; I9.GE, 9¥.02.20S2, सिखा यानी; ११. HAST, fact Gast, 0.028.208, 2A SIPS ; "८. TPIS, 08.02.2092, FIGHT सा; १. Sze (GWE), dB.B.203, SOPs TET; 20. Raich (eA), 20.99.2002, SEPT NE, श्वानीय its ont; 2s. cave, (ach erst, Sams, GATS),

विदेह ४०२ म अंक १५ सितम्बर २०२४ (वर्ष १७ मास २०१ अंक ४०२) | | 9 22.02.20>8, GN शकान सा; 2a. Glew, Gaya), कथा aie fir GeV, ₹3.08.२09४, अकन्मूव Sips; 22. yen-wadanet, 20.02.2008, FH AN याय/काथतात N/E AN a SIH; te. Gan (HeFaaM), 20.52.200%, Pagar fe, ज्ञानीय wits ost; ८७. Uses, PON FE, Tt wise), 08.08.2035, GN FMT Wl; 2d. ASGAT (NEAR), 20.05.2003, ATMA NSA ‘ane, Moe ‘ST ; 29. Richt (ACH), 9$.0S.20d3, Sort Nea, ज्ञामीय घारिका (लप्ी ; zz wet तिग्ातय- SASH (at), 20.09.2008, DAG सा, ATS नाथ सा ; ८७. (लौकडी, 2.02.20, SEM AAA 4a CN PRIS NT; 80. SENT (IAM, vz.05.208, aN fa sm, seta sie cont: sy. meee Heda) २४.७.२०७७, YSerH Mesa; $2. aah (Seda), 99.92.2008, ISI PHS mm ‘PR ७२. FOIE (INET), 2D.02.2007, THA Nec, sella प्राटिन्ानयाजी ; se. Gre (Nex), 28.08.2009, रा. MGR SS Kars, श्ञानीय est ; ss. TAS Ge (प्रककलैंनी), 05.5.2099, ASAT WA So. yarer (arpa), ७.9४२.२०४१, AMADIS NSA ; $9. AS (TAN), 2v.2.20dz, atic ase, Ga sani ; sz. Sina (ससावणुय), 35.8.20d2, रु. fra PRE AIM ; 5.5. Neem, eat er), 22.4.20d2, (छा. Shon fram , 200. Fic ((उडानंथ TAA), RAV, २0४७८, SEM NSA, ATTA (नानी, HAT जालान् ; 90४.

0 || विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in सिटेकी (dal), 20.2.20d5, SAS BIT सा ; 90२. Naar, (Reef), 2S.05.20dS, TA AHPT झाछत्य, ACTS FHS, d02 aN (Neal), 2t..20d5, VMI TART कर्ण pa कति' ; 208. FAN AS-HEGAa (GIRS), d8.02.208,N PHT Tso oS; ७0७-मवऊँंजा.. (प्रीडायन Tors), 97.02.2023, PNEM FT; 908. sat ((रारायठीडा, Hedel), QD.08.202%>, AIAGA DE; _ 907. Aaa (Bata), 2d2202>, जीतकाइक Hfsq, Vaort yea, oF एबे(एलन्मूय प्रछत; ७0८. HEPAT (सक्षतैंनी), 25.07.2022, रा. MP esd सा; S04. AES (Nedat), 23.08.2022, ott Fa; ७४०. (एयानतसी (Ga), 28.05.2022, -ASAIS *गाछुी, घानीय se (करी; yyy. डक. Nsom (Sede) 75.92.2022, sem अति 9९ घर usa ais मीन Gar sofa (orrarSSl) I २७: smd 20232, anya zl dot N Nea ahs मीन Gag २४ GA २०२२ aed, VAT SSH SAeu, AIST ara! ४४ प्र Noe af मीन Gar 20 Rrowe 2022, Neda fear sai ar aN fa पाक था ETO प्राक। 9७ N vise afte मीन Gar २0 fist २0२३, Gat sm (sed; ft dae oom, ot oticrs aul doo N Sse aie मीन Gar २२ NI २०२४, cacy छिलाक Pcie OO SAGAN NE RAE रात; रा. WOM NST AT

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46 | | विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in PAS एक TUBS aE | जांशेव जैं तद एक Wart थवि aos SY ae , ७ wa of WIS AAT OWA fF Seto ale जशन थवि कॉडिक गाज OF ऊभन्ञाव Ase 2careat उिशि नठि ars Gren ag | FTA asreh & ale Bt Gras कद Gat 3 एताकनि Card AAA At ON AIT ISH FA oa To aE । एस ade अड्धि आ ws शाशूदि खित्ताक Ts TE HAG BT ; AeA ABS GA CAT TET THA शव CMT GST AST a Ho BRA | Us UH SADT Saat शव FET oer Ga, जसशड़ि Ate sf ,वाजा tt We To BAT | IS oto जन एक एनेघ जैं CT ort af , ७ जन्न शान थकठि Bt ‘aca ' अकाफनी SH GHA SAA HTH A GIS al | ae THI BTS Mt एज SA et ७ ST oS GS वाली जशवना शव ears Tl Gt wT w WES Aw । एज ae ene थकामती CS WAH AIA SAS BAA शा Fos AWA BAT SA BAIT , AeA नशिउव नवकक wx HF Bsr mM oA faye शवसथाथ छति GTS ae | AT | ITT US

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48 | | विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in GUAT शा FOIA GT BAA CHA GH शान , ICES अधिक CI A SY WIP GA GI als | Tw WAT WIC Fa WAS मत्वाज्ञाखिऊ va शुनाणी Trarfaora GAMTS GHA SIS OT | एज GIS ABS DON एप उत्शुव AS SSS गाज W HPS AS BIT SIS SY, ७ EAT FOS Va MNS ST | ce a पिन ARGS BST जैं TANGA Sao कांऊिक शाज fords fe , ७ 2m WIS शोध SS जता To BY शा at Cad TSS Fa AO US | कॉडिक ue Anita Sat seat J wa HF DIY TIT ET AAT cere BAT TCHS कि aS , AN a जग आंगि जैं नठि certo BAN । एज खेर कर्म शवायण GS SSH UT एप AS St CH a आधा CTS Wray Aap Pat aco Bl , ATT ois CMAs wa Aco ae । w vert ! Sos मांग OT OIA GAA तगे AP BIT 7 Wt कव'क TS । एल Ge काउऊिक शाज एप Sart शाशूदिक एलन सी es कशाक Ate SAT BY, ७ शशन एजौ8 NS & ofa Hw EY | एज GIS SSF WH I UIA aes HMA कथा WTS UA AAS! Wey CNIS Ba Arto ale | एज ‘ace arate fia fia जीक Pears aT BESS SHA, AAH जाएजां Alot Ht aay शृथित्ी

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