ISBN Number: 978-93-341-5972-1 (Book) ISSN 2229-547X (online) 𑒀 विदेह ४०५ म अंक (हितनाथ झा विशेषांक) ०१ नवम्बर २०२४ (वर्ष १७ मास २०३ अंक ४०५) [विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। कॉपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- २०२४. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२४. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. It is a platform for scholars, researchers, writers and poets to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, and poetry in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@gmail.com. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover designed by AUM GAJENDRA THAKUR Videha e-Journal: Issue No. 405 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृष्ठ १-२) १.२. विदेह ४०५ म अंक (हितनाथ झा विशेषांक) पर टिप्पणी (पृष्ठ ३-११) विदेहक ४०५ म अंक -हितनाथ झा- विशेषांक १.प्रस्तुत विशेषांकक संदर्भमे (पृष्ठ १४-३३) २.परिचय (पृष्ठ ३४-५३) ३.भीमनाथ झा-हितनाथ झाक वंशावली (पृष्ठ ५४-५५) ४.कल्पना झा- मैथिली साहित्यक परम्परा आ विकास सँ परिचित करबैत अछि मैथिली इतिहासक रेखांकन (पृष्ठ ५६-७५) ५.आशीष अनचिन्हार- स्थानवर्णना, नगरवर्णना, ग्रामवर्णना (पृष्ठ ७६-८३) ६.श्री विनयानन्द झा-वैदुष्य कल्पतरु कोइलख (पृष्ठ ८४-९१) ७.डा.धनाकर ठाकुर-कोइलख (पृष्ठ ९२-९४) ८.डॉ कैलाश कुमार मिश्र-सारस्वत परिचायिका-कोइलख (पृष्ठ ९५-९९) ९.पंडित भवनाथ झा-कोइलख (पृष्ठ १००-१०३) १०.श्री सियाराम झा 'सरस ''कोइलख'- ग्राम गाथाक विलक्षण अभिलेख (पृष्ठ १०४-१०६) ११.प्रो. महेशलाल दास –कोइलख (पृष्ठ १०७-१०८) १२.श्रीमती नीलम झा-त्रिवेणी (पृष्ठ १०९-११०) १३.डा. धनाकर ठाकुर –त्रिवेणी (पृष्ठ १११-११२) १४.उदय चन्द्र झा विनोद -लेख-रेख (अनुशीलनक एक विलक्षण बानगी) (पृष्ठ ११३-११४) १५.कुमार विक्रमादित्य-गद्य सं पद्य धरिक सर्जन केर लेखा जोखा प्रस्तुत करैत पोथी-लेख रेख (पृष्ठ ११५-१२२) १६.कल्पना झा-लेख-रेख (पृष्ठ १२३-१२७) १७.डा. आभा झा -भाषांतरणक उत्कृष्ट प्रयास -कविता शम्भु बादलक (पृष्ठ १२८-१३२) १८.डा. कीर्तिनाथ झा-शम्भु बादलक कविता जिनगीक रोशनी (पृष्ठ १३३-१३४) १९.केदार कानन-कविता शम्भु बादलक नव स्वर, नव संधान (पृष्ठ १३५-१३७) २०.कुमार मनीष अरविन्द-कविता शम्भु बादलक हजारीबाग परिसरक विशिष्ट सुगन्धिसँ महमहाइत कविता सभकें पढ़ैत (पृष्ठ १३८-१४३) २१.उज्जवल कुमार झा- मैथिली साहित्यक सशक्त हस्ताक्षर हितनाथ झा (पृष्ठ १४४-१५०) २२.आभा झा-समृद्धि दिशि बढ़ैत बाल-साहित्यमे राजापोता बलगरक मजगूत हस्तक्षेप (पृष्ठ १५१-१५४) २३.लक्ष्मण झा सागर- मिथिला मैथिलीक हितैषी हितनाथ झाजी (पृष्ठ १५५-१५८) २४.प्रवीण कुमार झा- सोशल मीडियाक सदुपयोगसँ रिटायरमेंटक बाद बनल साहित्यकार हितनाथ झा (पृष्ठ १५९-१६४) २५.नारायण झा-हितनाथ झाक जीवन ओ साहित्य (पृष्ठ १६५-१७२) २६.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र-हितनाथ झा समर्पित पाठक केर साकांक्ष प्रतिनिधि (पृष्ठ १७३-१७७) २७.आशीष अनचिन्हार- पाठकीय विधा एवं हितनाथ झा (पृष्ठ १७८-१८१) २८.आशीष अनचिन्हार-हम हितनाथ झाकेँ कोना चिन्हलियनि (पृष्ठ १८२-१८५)
१.०.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय प्रस्तुत अछि विदेहक ४०५म अंक जे अछि- हितनाथ झा- विशेषांक। ऐमे अछि- १.प्रस्तुत विशेषांकक संदर्भमे २.परिचय ३.भीमनाथ झा-हितनाथ झाक वंशावली ४.कल्पना झा- मैथिली साहित्यक परम्परा आ विकास सँ परिचित करबैत अछि मैथिली इतिहासक रेखांकन ५.आशीष अनचिन्हार- स्थानवर्णना, नगरवर्णना, ग्रामवर्णना ६.श्री विनयानन्द झा-वैदुष्य कल्पतरु कोइलख ७.डा.धनाकर ठाकुर-कोइलख ८.डॉ कैलाश कुमार मिश्र-सारस्वत परिचायिका-कोइलख ९.पंडित भवनाथ झा-कोइलख १०.श्री सियाराम झा 'सरस ''कोइलख'_ ग्राम गाथाक विलक्षण अभिलेख ११.प्रो. महेशलाल दास -कोइलख १२.श्रीमती नीलम झा-त्रिवेणी १३.डा. धनाकर ठाकुर -त्रिवेणी १४.उदय चन्द्र झा विनोद -लेख-रेख (अनुशीलनक एक विलक्षण बानगी) १५.कुमार विक्रमादित्य-गद्य सं पद्य धरिक सर्जन केर लेखा जोखा प्रस्तुत करैत पोथी-लेख रेख १६.कल्पना झा-लेख-रेख १७.डा. आभा झा -भाषांतरणक उत्कृष्ट प्रयास -कविता शम्भु बादलक १८.डा. कीर्तिनाथ झा-शम्भु बादलक कविता जिनगीक रोशनी १९.केदार कानन-कविता शम्भु बादलक नव स्वर, नव संधान २०.कुमार मनीष अरविन्द-कविता शम्भु बादलक हजारीबाग परिसरक विशिष्ट सुगन्धिसँ महमहाइत कविता सभकें पढ़ैत २१.उज्जवल कुमार झा- मैथिली साहित्यक सशक्त हस्ताक्षर- हितनाथ झा २२.आभा झा-समृद्धि दिशि बढ़ैत बाल-साहित्यमे राजापोता बलगरक मजगूत हस्तक्षेप २३.लक्ष्मण झा सागर- मिथिला मैथिलीक हितैषी हितनाथ झाजी २४.प्रवीण कुमार झा- सोशल मीडियाक सदुपयोगसँ रिटायरमेंटक बाद बनल साहित्यकार हितनाथ झा २५.नारायण झा-हितनाथ झाक जीवन ओ साहित्य २६.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र-हितनाथ झा समर्पित पाठक केर साकांक्ष प्रतिनिधि २७.आशीष अनचिन्हार- पाठकीय विधा एवं हितनाथ झा २८.आशीष अनचिन्हार-हम हितनाथ झाकेँ कोना चिन्हलियनि हितनाथ झा केर लेखन सुखायल मूलधाराक लेखनक स्वार्थी प्रवृत्तिसँ भिन्न अछि आ तइ कारणसँ ओकर विषय सेहो भिन्न अछि आ से समानान्तर धाराक प्रवृत्तिसँ लग अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १.२. विदेह ४०५ म अंक (हितनाथ झा विशेषांक) पर टिप्पणी प्रणव कुमार झा विदेह 405म अंक, हितनाथ झा विशेषांक, एक समृद्ध आ विस्तृत अंक अछि जे मैथिली साहित्य के विभिन्न आयामक सजीव प्रदर्शन करैत अछि। एहि विशेषांक मे कुल 28 टा आलेख, संस्मरण, विश्लेषण आदि समाहित अछि, जे विभिन्न क्षेत्रक विद्वान लोकनि द्वारा लिखल गेल अछि। ई बात विशेषांकक सफलताक संकेत करैत अछि। एहि लेल सर्वप्रथम विदेह के संपादक मंडल आ विशेषांक के समर्पित प्रतिभागी लेखक सभ के हार्दिक बधाइ। विशेषांकक अध्ययन क्रम मे हम कुल अट्ठाईस आलेख सभ मे सँ करीब आधा पढ़लहुँ। हरेक लेखक विभिन्न क्षेत्रक छथि, ताहि सँ स्वाभाविक रूपे सब रचना अलग-अलग सुवास आ स्वादक संग प्रस्तुत अछि, जे विशेषांकक रोचकता आ वैविध्यताक संग पोषित करैत अछि। विशेषांकक माध्यम सँ कइएक नव वा कम जानल गोटे सँ लेखकीय परिचय भेल, जेना प्रो० महेश लाल दास, उदय चंद्र झा विनोद, कुमार विक्रमादित्य, कुमार मनीष, उज्ज्वल कुमार झा, लक्ष्मण झा सागर आदि। डॉ. आभा झा केर रचना “भाषांतरणक उत्कृष्ट प्रयास - कविता शम्भु बादलक” अनुवाद केर एकटा विद्यार्थी के रूप मे विशेष रूपे उपयोगी आ रोचक लागल। डॉ. कैलाश कुमार मिश्र केर लेख “सारस्वत परिचायिका: कोइलख” सारगर्भित अछि आ 2018 में गामक डेमोग्राफी संगहि ग्राम जीवन के संक्षिप्त मुदा समग्र रूपे प्रस्तुत करैत अछि। कोइलख गामक नाम सँ हमरा पहिलुके परिचय छल, जखन हम पंडौल हाई स्कूल में रही। इंटर स्कूल प्रतियोगिता में एहि गामक बच्चा सभ के पुरस्कृत होयबाक चर्चा हम खूब सुनने छलहुँ। सुनय छलियै जे एहि गामक बच्चा सभ पर भगवती के विशेष आशीर्वाद रहय छैक। विशेषांकक विभिन्न आलेख आ हितनाथ झा केर पुस्तक "कोइलख" सँ ई बात प्रमाणित होइत अछि। मुदा दोसरे ओर देखी तऽ कैलाश जी के लेख सँ ज्ञात होइत अछि जे वर्तमान (2018) में गामक साक्षरता 60% सँ कम अछि। डॉ. धनाकर ठाकुर सेहो अपन लेख में एकर चर्चा कएने छथि। कैलाश जी के अनुसार ई चिंता के विषय अछि। हम कहैत छी जे ई आश्चर्यक विषय अछि। मानल जे ई गामक प्रतिभा पर भगवती केर विशेष कृपा अछि, तऽ 40% लोक पर एतबो कृपा नहि भेल होयत जे ओ साक्षर भऽ सकय! यदि एतेक विभूति सँ सम्पन्न गाम मे एतेक लोक निरक्षर अछि, तऽ ई स्पष्ट अछि जे ई विभूतिगण सम्पूर्ण ग्राम-समाज केर शिक्षा दीक्षा के प्रति या तऽ गंभीर नहि रहलाह अछि अथवा हुनका में ई सामर्थ्य नहि छल जे ऐ आबादी के कम सँ कम साक्षर बना सकथि। एहि विषय पर गंभीर चिंतन आवश्यक अछि। यदि गामक साक्षरता 95-100% रहितै, तऽ राष्ट्रीय आ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मिथिला के आदर्श ग्रामक रूप मे ई गाम बेसी प्रभावशाली होइत। प्रो० महेश लाल दास सेहो अपन लेख में एहि दिस इंगित करैत लिखने छथि जे “पुस्तक मे ब्राह्मणेतर जाति के कोनो उल्लेख नहि अछि। संभवतः एहि वर्गक अपेक्षित विकास नहि भेल हुअऽ अथवा तुलनात्मक दृष्टिये कम विकास भेल हुअऽ, लेकिन अहिठामक जनसंख्याक कोनो परिचय आ उल्लेख एहि परिचयात्मक पुस्तक मे नहि अछि। ई पूरा कोइलख नहि बुझाइत अछि: मात्र रत्नगर्भ के दर्शन बुझाइत अछि।” कदाचित पुस्तकक उद्देश्य रत्नगर्भ के वर्णन मात्र छल, मुदा ई परिचर्चा तऽ चलिये गेल जे ग्राम जीवन के वर्णन कोनो लेख या पुस्तकक माध्यम सँ होय तऽ ओ समग्रता में होय, नहि कि एकाग्रता मे। तखने पाठक गण, विशेष रूपे ओ पाठक जे ग्राम जीवन नै जीने छथि, तिनका समक्ष ग्राम जीवन के वास्तविक चित्र प्रस्तुत भऽ सकैत अछि। कुमार विक्रमादित्य, गद्य सँ पद्य धरिक सर्जन केर लेखा जोखा प्रस्तुत करैत पोथी-लेख रेख के माध्यम सँ मैथिली साहित्यक कतेक रास पुस्तकक संक्षिप्त परिचय आ सार दैत छथि। कल्पना झा केर पाठकीय समीक्षा, लक्ष्मण झा सागर केर संस्मरण, कुमार मनीष आ अरविन्द केर कविता शम्भु बादलक अनुवाद आ आस्वादन पर परिचर्चा, सभक अपन-अपन विशेष फ्लेवर अछि। प्रवीण कुमार झा केर आलेख “सोशल मीडियाक सदुपयोग सँ रिटायरमेंटक बाद बनल साहित्यकार हितनाथ झा” सेहो रुचिगर लागल। प्रवीण जी स्वयं सेहो सोशल मीडिया के माहिर छथि आ हितनाथ झा केर साहित्यिक जीवन आ साक्षात्कार के माध्यम सँ बुजुर्ग आ युवा पीढ़ी दुनू लेल संदेश दैत छथि। युवा लेल हितनाथ जी अपन साक्षात्कार में संदेश दैत छथि जे अपना सभकेँ सदैव अपन परिवारक आभारी रहबाक चाही। पारिवारिक जुड़ाव कायम रहला सँ भाषा आ संस्कृति के समृद्धि कायम रहत। समाज में परिवार टूटि रहल अछि। लेखक के आलोचना के अवसर बुझबाक चाही। सकारात्मक पक्ष के बेसी देखाबी। एहि सबकेँ सोशल मीडिया पर सेहो अमल में लयबाक लेल प्रयासरत रही। प्रवीण जी हितनाथ जी के बहाने सँ रिटायर बुजुर्ग के सोशल मीडिया के सदुपयोग के मार्ग देखाबैत छथि जे एकर उपयोग, भाषा, साहित्य, समाज के समृद्धि लेल कैल जा सकैत अछि आ नहि कि कुख्यात ‘व्हाट्सएप अंकल’ बनि अफवाह, गलत जानकारी, वैमनस्य आदि पसारबा में आ घटिया कंटेन्ट देखबा मे। अपन मिथिला के सभटा गाम आदर्श गाम बनय, एहि स्वप्न के साकारताक आकांक्षाक संग अइ विशेषांक सँ जुड़ल सभ लोक केँ एक बेर पुनः बधाइ। जय मिथिला। -प्रणव कुमार झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली कल्पना झा, पटना विदेहक हितनाथ झा विशेषांक पढ़लहुँ। एक बेर फेर सँ विदेह टीम ई सिद्ध करैत देखा पड़लथि जे विदेहक विशेषांक सभ अभिनन्दन ग्रन्थ नहि रहैत अछि। विदेहक विशेषांक सभमे कोनो व्यक्ति वा संस्था, जे हुअए ताहि पर नीक- बेजाए दुनू पक्ष पर निधोख लिखल देखलहुँ। आ से हुनकर पोथी सँ ल' क' हुनकर व्यक्तित्व धरि, सभ पक्ष पर। आशीष अनचिन्हार जीक लिखल "हम हितनाथ झाकेँ कोना चिन्हलियनि" लेखमे आमिर खान केर फिल्म पी.के केर डायलॉग पर लिखल कविताक प्रसंग आ ओहि संबंधित फेसबुक पोस्ट आ पोस्ट पर कएल गेल कमेन्ट केर माध्यम सँ परिचय - प्रसंग रोचक लागल। आशीष अनचिन्हार जीक अन्य दूटा लेख "स्थानवर्णना, नगरवर्णना, ग्रामवर्णना (मिथिलाक संदर्भमे)" आ "पाठकीय विधा एवं हितनाथ झा" सेहो संलग्न अछि एहि विशेषांकमे। "पाठकीय विधा एवं हितनाथ झा"मे पाठकीय, समीक्षा, आलोचना एवं समालोचनाक एक्कहि गोत्रक रहितहु कोना एक दोसरा सँ भिन्न अछि, से फड़िछाओल गेल अछि। हितनाथ झा जीक पोथी सभ पर चर्चाक गप्प करी, तँ सभ सँ बेसी लेखक संख्या "कविता शम्भु बादलक" पोथी पर अभरल । जाहिमे केदार कानन जीक "कविता शम्भु बादलक नव स्वर, नव संधान" डा. कीर्तिनाथ झा जीक "शम्भु बादलक कविता जिनगीक रोशनी", कुमार मनीष अरविन्द जीक"कविता शम्भु बादलक हजारीबाग परिसरक विशिष्ट सुगन्धिसँ महमहाइत कविता सभकें पढ़ैत" आ डॉ. आभा जीक "भाषांतरणक उत्कृष्ट प्रयास -कविता शम्भु बादलक" संलग्न अछि। तहिना "कोइलख" पोथी पर सेहो कइअक टा लेख अभरल। जाहि मे डॉ. कैलाश कुमार मिश्र जीक "सारस्वत परिचायिका-कोइलख" आ श्री सियाराम झा 'सरस' जीक लिखल "'कोइलख' - ग्राम गाथाक विलक्षण अभिलेख" विशेष रूप सँ उल्लेखनीय अछि। नारायण झा जीक लिखल "हितनाथ झाक जीवन ओ साहित्य" नमहर आलेख छनि, मुदा उबाऊ नहि छनि। डॉ.आभा झा जीक दुनू लेख "समृद्धि दिशि बढ़ैत बाल-साहित्यमे राजापोता बलगरक मजगूत हस्तक्षेप" आ "भाषांतरणक उत्कृष्ट प्रयास -कविता शम्भु बादलक" सनगर छनि। प्रवीण कुमार झा जीक लेख "सोशल मीडियाक सदुपयोगसँ रिटायरमेंटक बाद बनल साहित्यकार हितनाथ झा" मे हितनाथ जीक जीवन यात्राक चित्रण छनि। तथ्यपरक लेख। नीक लेख। "हितनाथ झा समर्पित पाठक केर साकांक्ष प्रतिनिधि" एहि शीर्षक सँ लिखल लेखमे डॉ. कैलाश कुमार मिश्र जीक कहब छनि -- "हितनाथ जी मैथिली साहित्य आ रचनाकें हमरा जनैत एक समर्पित पाठक छथि। ई गुण दुर्लभ गुण भेल आजुक समयमे जखन लोक हेंज बना रचना लिख आ ओकरा प्रकाशित करबा मे अपसियान्त छथि। किनको लग आनक रचना पढ़बाक समय नहि छनि। हितनाथ जी मुदा की नव आ की पुरान, सब रचनाकें गुरुकुल परम्परा केर वेदपाठी जकाँ धोखइत रहैथ छथि।" आगाँ ओ करैत छथि -- "मुदा हमरा कखनो काल लगैत अछि जे हितनाथ बाबू भावावेशी आ समावेशी पाठक छथि। ई बात अगर सत्य छैक तँ हिनका लेल भले जे हो, साहित्य लेल नीक बात नहि भेल! समर्पित पाठक के अपना आपमे हंस जकाँ व्यक्तित्व विकसित करक चाही। हंस व्यक्तित्व केर अर्थ भेल क्षीर-नीर-समभाव।" हिनकर कहब गलत नहि बुझाएल हमरा। श्री सियाराम झा 'सरस' जीक लिखल "'कोइलख' - ग्राम गाथाक विलक्षण अभिलेख" जे अछि, से एकटा छोट-सन लेखमे बहुत बात समेटने सन बुझाएल। एक्कहि पैराग्राफमे पोथीक विषय-वस्तु कोना समेटि लेलनि से एकटा दृष्टान्त प्रस्तुत अछि -- "एहि पोथीमे एकहिठाम पाठक लोकनिकेँ कोइलखक इतिहास, भूगोल, अद्यतन जनसंख्या ( करीब 8500/2011) सहित 'पारिजात हरण केर कृतिकार म.म. उमापति उपाध्याय (16 में शताब्दी), मैथिली साहित्यक आद्य दू प्राध्यापक-पं. (प्रो.) खुद्दी झा एवं पं बबुआजी मिश्र (कलकत्ता वि.वि.केर प्रथम ओ द्वितीय वरेण्य शिक्षक), शास्त्रार्थ मार्तण्ड पं लुट्टी झा, रानी चन्द्रावती (बनैली राजक राजरानी आ मिथिलाक अत्साधारण समाजसेविका), श्रीकांत ठाकुर विद्यालंकार (मैथिली अकादमी. पटनाक पहिल अध्यक्ष तथा आर्यावर्त, प्रदीप, विश्वमित्र, आज, वाराणसी, दै. स्वतंत्र सन-सन अनेको पत्रक प्र. सम्पादक), पं. (महाकवि) काशीकांत मिश्र 'मधुप, पं. (प्रो.) जयदेव मिश्र, पं. हरिनाथ मिश्र (33 वर्ष धरि विधायकी, तखन सांसदो, प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी एवं बिहारक स्वास्थ्य मंत्री-1952-57 रहैत डी.एम.सी.एचकेँ व्यवस्थित चिकित्सा महाविद्यालय बनबौनिहार), डॉ. भवनाथ मिश्र (एम.आर.सी.पी. इंग्लैण्ड, एफ.आर. सी.पी.एफ.ए.आइ.एम.एस. लंदन-एतबा सुयोग्य पहिल मैथिल डाक्टर), योगानन्द झा (मैथिली अकादमी पटनाक निदेशक एवं भलमानुस सन कालजयी उपन्यास ओ उड़ैत वंशी कथा संकलनक रचनाकार), आइ.पी.एस. मिहिर कुमार झा. महान कथाकार घूमकेतु आ पद्मश्री डॉ. मोहन मिश्र प्रभृति मैथिल रत्न सभसँ भेँट-परिचय भए सकतनि। लेखकक प्रयास स्तुत्य अछि।" तहिना श्रीमती नीलम झा आ डा. धनाकर ठाकुर जीक टिप्पणी “त्रिवेणी" पोथी पर जे अछि, से कम शब्द मे नीक विवरण अछि। उक्त पोथीक संदर्भमे। समग्रतामे कही तँ पूर्वमे प्रकाशित विदेहक अन्य विशषांक जकाँ इहो विशेषांक पठनीय ओ संग्रहणीय अछि। निस्संदेह! जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल' विदेहक 405म अंकमे श्रीहितनाथ झा विशेषांक प्रकाशित भेल अछि। एहिमे 28टा आलेखक माध्यमसँ कवि-लेखक-समीक्षक-अनुवादक श्री हितनाथजीक व्यक्तिगत, पारिवारिक आ सामाजिक आ रचनात्मक गतिविधिक महत्वपूर्ण विवरण प्रस्तुत कयल गेल अछि। हिनक पोथी कोइलख, लेख -रेख, राजा पोता बलगर, कविता :शम्भू बादलक अतिरिक्त सम्पादित पोथी त्रिवेणी आ मैथिलीक इतिहासक रेखांकन --एहि सभ पोथीपर विभिन्न विद्वान लोकनि द्वारा विचार आ समीक्षा प्रस्तुत कयल गेल अछि। पोथी 'कोइलख'पर श्री विनयानन्द झा, डा. धनाकर ठाकुर, डा.कैलाश कुमार मिश्र, पं. भवनाथ मिश्र,सियाराम झा 'सरस', प्रो. महेश लाल दास, उज्ज्वल कुमार झा, नारायण झा आ आशीष अनचिन्हारजी द्वारा प्रस्तुत आलेख सुचित करैत अछि जे एहि पोथीमे लेखक द्वारा कोइलख गामक विषयमे बहुत रास जानकारी देल गेल अछि तथापि बहुत जानकारीक अभाव सेहो अछि एहि पोथीमे।एहि अभावक पूर्ति हेतु आशीष अनचिन्हार जीक महत्वपूर्ण आलेख 'स्थान वर्णना, नगरवर्णना,ग्रामवर्णना' पथ प्रदर्शकक काज करतनि। कल्पना झा आ नारायण झाक आलेखमे 'मैथिली इतिहासक रेखांकन' पोथीकें बहुत महत्वपूर्ण कहल गेल अछि। श्री उदय चन्द्र झा 'विनोद', कुमार विक्रमादित्य, कल्पना झा,डा. आभा झा सभ गोटेक आलेख पढ़ि लगैत अछि जे पोथी 'लेख -रेख'मे नव -पुरान रचनाकारक 58 टा पोथीपर जे आलेख प्रस्तुत कयल गेल अछि से समीक्षा कम अछि, पाठकीय प्रतिक्रिया बेसी अछि। पोथी 'त्रिवेणी' मे 'त्रिवेणी सम्मान'सँ सम्मानित रचनाकार लोकनिक विषयमे आ हुनक रचनापर जे विवरण प्रस्तुत भेल अछि तकर प्रशंसा कयल गेल अछि नीलम झा, नारायण झा आ डा. धनाकर ठाकुरजीक आलेखमे। पोथी 'राजा पोता बलगर' मे प्रकाशित 46 टा बाल कविताक प्रशंसा कयल गेल अछि उज्जवल कुमार झा,आभा झा आ नारायणक आलेखमे। पोथी 'कविता : शम्भू बादलक' मे हिन्दीक कवि शम्भू बादलक 29 टा हिन्दी कविताक मैथिलीमे जे अनुवाद भेल अछि ताहि अनुवादक प्रशंसा कयल गेल अछिडा. आभा झा, डा.कीर्ति नाथ झा, केदार कानन आ कुमार मनीष अरविंदजीक आलेखमे। श्री लझ्मण झा 'सागर', प्रवीण कुमार झा, नारायण झा आ आशीष अंचिन्हार प्रस्तुत आलेखक दर्पणमे हितनाथ झाक जीवनी देखाइत अछि। 'विदेह 'क ई विशेषांक भाइ हितनाथ झाकें मैथिलीक लेल एकटा समर्पित पाठक, नीक कवि-लेखक-सम्पादक-अनुवादक आ भविष्यक नीक समीक्षकक रूपमे प्रस्तुत करैत गाम-गाथाक पूर्णताक लेल और पोथी प्रस्तुत करबाक आग्रहक संग समीक्षा-आलोचनाक क्षेत्रमे नीकसँ विशिष्ट केर यात्राक लेल प्रेरित करैत छनि। 'विदेह' ई विशेषांक प्रस्तुत करैत ई भरोस दैत अछि जे 'विदेह' विना कोनो पूर्वाग्रह केर मैथिलीमे सभहक साहित्यिक विशिष्ट योगदानकें महत्वपूर्ण मानैत अछि आ ओहि योगदानकें जन-जन धरि पहुँचयबाक लेल प्रतिबद्ध अछि। -जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल', सम्पर्क : 8789616115 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेहक ४०५ म अंक -हितनाथ झा- विशेषांक १.प्रस्तुत विशेषांकक संदर्भमे २.परिचय ३.भीमनाथ झा-हितनाथ झाक वंशावली ४.कल्पना झा- मैथिली साहित्यक परम्परा आ विकास सँ परिचित करबैत अछि मैथिली इतिहासक रेखांकन ५.आशीष अनचिन्हार- स्थानवर्णना, नगरवर्णना, ग्रामवर्णना ६.श्री विनयानन्द झा-वैदुष्य कल्पतरु कोइलख ७.डा.धनाकर ठाकुर-कोइलख ८.डॉ कैलाश कुमार मिश्र-सारस्वत परिचायिका-कोइलख ९.पंडित भवनाथ झा-कोइलख १०.श्री सियाराम झा 'सरस ''कोइलख'_ ग्राम गाथाक विलक्षण अभिलेख ११.प्रो. महेशलाल दास -कोइलख १२.श्रीमती नीलम झा-त्रिवेणी १३.डा. धनाकर ठाकुर -त्रिवेणी १४.उदय चन्द्र झा विनोद -लेख-रेख (अनुशीलनक एक विलक्षण बानगी) १५.कुमार विक्रमादित्य-गद्य सं पद्य धरिक सर्जन केर लेखा जोखा प्रस्तुत करैत पोथी-लेख रेख १६.कल्पना झा-लेख-रेख १७.डा. आभा झा -भाषांतरणक उत्कृष्ट प्रयास -कविता शम्भु बादलक १८.डा. कीर्तिनाथ झा-शम्भु बादलक कविता जिनगीक रोशनी १९.केदार कानन-कविता शम्भु बादलक नव स्वर, नव संधान २०.कुमार मनीष अरविन्द-कविता शम्भु बादलक हजारीबाग परिसरक विशिष्ट सुगन्धिसँ महमहाइत कविता सभकें पढ़ैत २१.उज्जवल कुमार झा- मैथिली साहित्यक सशक्त हस्ताक्षर हितनाथ झा २२.आभा झा-समृद्धि दिशि बढ़ैत बाल-साहित्यमे राजापोता बलगरक मजगूत हस्तक्षेप २३.लक्ष्मण झा सागर- मिथिला मैथिलीक हितैषी हितनाथ झाजी २४.प्रवीण कुमार झा- सोशल मीडियाक सदुपयोगसँ रिटायरमेंटक बाद बनल साहित्यकार हितनाथ झा २५.नारायण झा-हितनाथ झाक जीवन ओ साहित्य २६.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र-हितनाथ झा समर्पित पाठक केर साकांक्ष प्रतिनिधि २७.आशीष अनचिन्हार- पाठकीय विधा एवं हितनाथ झा २८.आशीष अनचिन्हार-हम हितनाथ झाकेँ कोना चिन्हलियनि १.प्रस्तुत विशेषांकक संदर्भमे प्रस्तुत विशेषांकक संदर्भमे 1 2008 सँ एखन धरि विदेह http://videha.co.in/ द्वारा जे विशेषांक सभ आएल अछि तकरा तीन चरणमे बाँटि सकैत छी। पहिल चरण 2008सँ जनवरी 2015 धरि जाहिमे विषय आधारित विशेषांक सभ प्रकाशित भेल आ मधुपजीपर सेहो विशेषांक प्रकाशित भेल। एकदम प्रारंभिक विशेषांक सभमे "विशेषांक" नाम नहि लीखल गेल छै मुदा ओहिमे ओहन रचनाक बेसी स्थान देल गेल छै सायास रूपें (क्रम-1 सँ 12 केर अधिकांश)। दोसर चरण भेल 2015 सँ लऽ कऽ एखन धरि जाहिमे मात्र जीवित लेखकपर विशेषांक प्रकाशित करबाक निर्णय लेल गेल आ इम्हर पछिला बर्ख एहिमे संस्था आ पत्र-पत्रिकापर विशेषांक प्रकाशित करबाक सेहो निर्णय लेल गेल क्रम- 13 एवं 14, 20 सँ 32)। तेसर चरण भेल पछिला सालमे विदेहक संपादक द्वारा "नित नवल सिरीज" प्रकाशित करबाक (एकर विवरण अलगसँ देल गेल अछि)। पाठक लेल विदेहक हरेक विशेषांक पाँच स्तर, पाँच स्वाद रखने अछि - 1) पत्रिका विशेषांक केर स्वाद, 2) आलोचनात्मक पोथीक स्वाद, 3) शोध ग्रंथक स्वाद, 4) साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित मोनोग्राफ केर स्वाद आ ई पाँचम स्वाद सभसँ विरल अछि 5) जँ विदेहक विशेषांकमे कोनो एहन रचनाकार चयनित होइत छथि जिनकर पति वा पत्नी सेहो रचनाकार छथिन तँ विदेह अपन विशेषांकमे दूनूकेँ मूल्यांकन करैत अछि। उदाहरण लेल विदेहक लक्ष्मण झा 'सागर' विशेषांक आ नरेन्द्र झा विशेषांक देखल जा सकैए। विदेह अपन अंक लेल सागरजी आ नरेन्द्र झाक चयन केने छल मुदा सागरजीक पत्नी शैल झा 'सागर' सेहो रचनाकार छथिन तँ लक्ष्मण जी बला विशेषांकमे शैलजीक रचनाकर्मपर सेहो विचार भेल आ तेनाहिते नरेन्द्र झाजीक पत्नी पन्ना झा कथाकार से नरेन्द्र झा विशेषांकमे पन्नाजीक रचनाकर्मपर सेहो विचार भेल। ई विचार वा घटना संपूर्ण मैथिली साहित्यमे नहि भेल छल हमरा जनैत, से मात्र विदेह द्वारा संभव भेल। जँ हम गलत होइ तऽ सूचित करी हम अपन ज्ञानकेँ सुधारि लेब। साहित्य अकादमीक कथित मोनोग्राफ तँ आइ धरि बहुतो लेखकपर प्रकाशित नहि भऽ सकल अछि। एहन परिस्थितिमे विदेह एकटा नव बाट बना कऽ मैथिली लगमे राखि देने अछि। पाठक चाहथि तँ एहि विशेषांक सभमेसँ आनो स्वाद ताकि सकै छथि। जँ अहाँ अइ विशेषांक केर PDF पढ़ि रहल छी तँ कोनो शब्द वा पाँति अंडरलाइनमे वा बिना अंडरलाइनकेँ नीला वा कोनो रंगक (कारी रंग छोड़ि) देखाए तँ बुझि लिअ जे ओहिमे लिंक देल गेल छै रेफरेंस लेल आ तकरा क्लिक करबै तँ ओ लिंक खुजि जाएत। कोनो-कोनो फोटोमे सेहो लिंक देल गेल छै। पाठक एहि माध्यमसँ कम समयमे रेफरेंस सभहक अध्य्यन कऽ सकै छथि। मुदा प्रिंटमे प्रकाशित पोथीमे ई सुविधा नै रहत। अइ कारणसँ भऽ सकैए जे पाठककेँ एहि पोथीक किछु पाँति प्रचलित नै बुझेतनि। जाहि ठाम लिंक देल गेल छै ताहि ठामक पाँतिक किछु शब्दक बीच बेसी स्थान छूटल छै। ओकरा एक पाँति बना पढ़ी से आग्रह। हम चाहितहुँ तँ सभ लिंक वा चित्रकेँ एकठाम दऽ सकै छलहुँ मुदा हमर सोच अछि जे पाठककेँ एकै ठाम तर्क आ सबूत भेटनि। एकटा आर बात ई जरूरी नहि छै जे एक लेखक लेल हम एकैटा लिंक प्रयोग करी। ओहन लेखक जिनका बारेमे बहुत रास लिंक छै गूगलपर हुनकर नाम जखन एक बेरसँ बेसी अबैत अछि तँ हमर प्रयास रहैए जे हुनकर नाम सभमे अलग-अलग लिंक लगा दी। तँइ पाठक जखन एकै नामक बहुत रास लिंक देखथि तँ ई मानि लेथि जे हुनका लग रेफरेंसक भंडार पहुँचल छनि। विदेह द्वारा 'जीवैत लेखकपर विशेषांक शुरू कएल गेल छल 2015 सँ जे विभिन्न नामसँ होइत आब "विदेहक जीवित मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशकपर विशेषांक शृंखला" नामसँ जानल जाइत अछि। मैथिलकर्मीसँ हमर सभहक आशय जिनकर काज मिथिला-मैथिली-मैथिली लेल कोनो माध्यमसँ भेल हो। ओ संगठनकर्ता सेहो भऽ सकै छथि, आन भाषाक लेखक सेहो। तहिना संगीतकर्मी मने गीत-संगीतसँ जुड़ल लोक। निच्चा एहि सभ चरण केर विस्तृत सूचना क्रमबद्ध रूपें देल जाएत। विदेहक विशेषांक सभ लेल हम ओहनो लोक सभ लग आलेख लेल जाइत छी, हुनका सूचना दैत छी जे कि हमर (आशीष अनचिन्हार), विदेह या गजेन्द्र ठाकुरक धुर विरोधी छथि। दू-चारि लोक कहि सकै छथि जे हमरा सूचना नहि भेटल, तऽ हुनकासँ हमर आग्रह जे कमसँ कम ओ अपन ह्वाटसएप आ फेसबुक केर मैसेज बॅाक्स (इनबॅाक्स) देखथि। हमर एहि प्रयासक प्रतिफल विदेहक आन विशेषांक संगे एहूमे देखाइ पड़त से उम्मेद अछि। 3 अगस्त 2024 केँ विदेह हितनाथ झा जीक ऊपर एकटा संस्मरणक अंक प्रकाशित करबाक सार्वजनिक घोषणा केलक। एहि सूचनाकेँ एहि लिंकपर देखि सकैत छी-घोषणा। चूँकि संस्मरण अंकक घोषणा भेल छलै तँइ एहिमे पाठकक सुझाव बला बाध्यता हमरा लग नहि छल। मुदा जखन हम एकर स्वरूप निर्धारण करऽ लगलहुँ तऽ कतहुँ ने कतहुँ ई विशेषांके सन भऽ गेल। पाठक चाहथि तऽ एकरा नकारि सकै छथि मुदा हम एकरा विशेषांके मानि लेबाक लोभ कऽ रहल छी। एहि विशेषांकमे देल गेल आलेखमेसँ लगभग आधा कतहुँ ने कतहुँ प्रकाशित भेल छै। एहिठाम ईहो हम कहऽ चाहब जे एखन धरिमे इएह हितनाथजी बला अंक एहन अछि जाहिमे किछु बेसिए पुरना आलेखक उपयोग भेल अछि। कारण अतबे जे एकटा नीक संकलन बनि सकए। मुदा ई हमर अपन भरोस अछि जे पुरना आलेखक रचनाकार सेहो जखन अपन लेख एहि विशेषांकमे पढ़ता तँ हुनका अपने नव बुझेतनि, लगतनि जे ई आलेख अही विशेषांक लेल लिखल गेलैए। पुरान आलेख सभमे जाहि पत्रिकामे लेख प्रकाशित छै तकर नाम संगे साभार छै एवं जे फेसबुकसँ लेल गेल ताहिमे "फेसबुकसँ साभार" लिखल भेटत, जाहिमे किछु नहि लीखल गेल से नव आलेख अछि। फेसबुकपर बहुत रास टिप्पणी सेहो भेटल हमरा मुदा ओ मात्र पोथी पहुँचनामा छलै तकरा नहि लेल गेल। संगहि बहुत रास टिप्पणी कवितामे छलै तकरो नहि लेल गेलै एहि अंक लेल। एहि विशेषांकसँ पहिने विदेह 33 टा विशेषांक प्रकाशित कऽ चुकल अछि आ एहिठाम आब हम कहि सकैत छी जे ई एकटा चुनौतीपूर्ण काज छै। अनेक संकट केर सामना करए पड़ैत अछि लेख एकट्ठा करएमे। मुदा संगहि ईहो हम कहब जे संकटसँ बेसी हमरा लग समर्थन अछि। हँ, ई मानएमे हमरा कोनो दिक्कत नहि जे जतेक लेख केर उम्मेद केने रहैत छी हम ततेक नै आबैए, जतेक लोक लिखबाक लेल गछैत छथि से सभ अंत- अंत धरि आबि चुप्प भऽ जाइत छथि। आ एकर कारणो छै, किनको ई लागै छनि जे आनपर लिखब से हम अपने रचना किए ने लीखि लेब, किनको लग पोथिए नै रहै छनि, जखन कि हम सभ यथासंभव पाठककेँ विकल्प रूपमे पोथीक पी.डी.एफ फाइल सेहो देबाक लेल तैयार रहैत छी। कियो विदेहक समावेशी रूपसँ दुखी छथि, तँ किनको मित्रकेँ विदेहसँ दिक्कत छनि तँइ ओ नहि देता। एकरो हम संकटे बुझै छियै जे सभ फेसबुकपर लंबा-लंबा लेख वा कमेंट टाइप कऽ लै छथि सेहो सभ विदेह लेल हाथसँ लिखल पठाबैत छथि। जे सभ कहियो काल फेसबुकपर टाइप कऽ लीखै छथि तिनकर आलेख हम सभ टाइप करिते छी। खएर पहिने कहलहुँ जे संकटसँ बेसी समर्थन अछि तँइ आइ पहिलसँ लऽ कऽ 34म (संस्था सहित) विशेषांक धरि पहुँचलहुँ हम। आन विशेषांक लेल इएह बात मानू। 2008 सँ लऽ कऽ 2024 क एखन धरि 34 टा विशेषांक प्रकाशित भेल मने बर्खमे दू टासँ कनी बेसी। निश्चिते समर्थन बेसी भेटल हमरा। जखन कि विदेहक ई चौंतीसो विशेषांक केर अलावे आन अंक हरेक पंद्रह दिनपर (मासमे दू बेर) लगातार प्रकाशित भइए रहल अछि। एकर अतिरिक्त ईहो बात संतोषदायक अछि जे विदेहक हरेक व्यक्तिपरक विशेषांक अभिनंदनग्रंथ हेबासँ बाँचि गेल अछि। मुख्यधारा जकाँ विदेहकेँ अभिनंदनग्रंथ नहि चाही। अभिनंदनग्रंथ अहू दुआरे नै चाही जे ओहिसँ लेखक वा जिनकापर निकालल गेल छनि तिनकामे सुधारक गुंजाइश खत्म भऽ जाइत छै। तँइ विदेहक विशेषांकमे आलोचना-प्रसंशा सभ भेटत। पहिने विदेहक सभ अंक नागरी, तिरहुता आ ब्रेल लिपिमे प्रकाशित होइत छल आब एहिमे कैथी, नेवाड़ी, एवं आइ.पी.ए. लिपि सेहो जोड़ल गेल अछि, मने एखन विदेह कुल छह लिपिमे प्रकाशित होइए। एकर अतिरिक्त विदेहक किछु अंक रंजना (नेवारी केर एक आर रूप), ब्राह्मी, खरोष्ठी, उर्दू, तिब्बती एवं तिब्बती-उमे लिपिमे सेहो छपल अछि। कुल मिला कऽ देखी तँ विदेह बारह लिपि अपना लेल रखने अछि जाहिमेसँ कुल छह टा लिपिमे विदेह लगातार प्रकाशित भऽ रहल अछि। 2 पाठक जखन एहि विशेषांककेँ पढ़ताह तँ हुनका वर्तनी ओ मानकताक अभाव लगतनि। विदेह मूलतः शब्दमे विभक्ति सटा कऽ लिखैत अछि संगहि मैथिली मानक भाषा आ मैथिली भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम लेल “भाषापाक” नामक अपन दिशानिर्देश सेहो रखने अछि मुदा ओहिमे छपए बला लेखक लेल स्वतंत्रता छै जे ओ कोन रूपमे लिखै छथि, माने जे विदेह शुरुएसँ हरेक वर्तनी बला लेखककेँ स्वीकार करैत एलैए। तँइ मानकता अभाव स्वाभाविक। विदेह सभ वर्तनी आ स्वरूपक सम्मान करैत अछि। तथापि वर्तनीक गलती जे थिक से सोझे-सोझ हमर सभहक गलती थिक जे हम सभ संशोधन नै कऽ सकलहुँ। मैथिलीमे किछुए एहन पत्रिका अछि जकर वर्तनी एकरंगक रहैत अछि आ ई हुनक खूबी छनि मुदा जखन ओहो सभ कोनो विशेषांक निकालै छथि तखन वर्तनी तँ ठीक रहैत छनि मुदा सामग्री अधिकांशतः बसिये रहैत छनि। ऐतिहासिकताक दृष्टिसँ कोनो पुरान सामग्रीक उपयोग वर्जित नै छै। हमहूँ सभ करैत छियै, मुदा सोचियौ जे 72-80 पन्नाक कोनो प्रिंट पत्रिका होइत छै ताहिमे लगभग आधा सामग्री साभार रहैत छनि, तेसर भागमे लेखक केर किछु रचना रहैत छनि आ चारिम भागमे किछु नव सामग्री रहैत छनि। हमरा लोकनि नव सामग्रीपर बेसी जोर दैत छियै। एकर मतलब ई नहि जे वर्तनीमे गलती होइत रहै। हमर कहबाक मतलब ई जे संपादक-संयोजककेँ कोनो ने कोनो स्तरपर समझौता करहे पड़ैत छै से चाहे वर्तनीक हो कि, मुद्राक हो कि विचारधारक हो कि सामग्रीक हो। हमरा लोकनि वर्तनीक स्तरपर समझौता कऽ रहल छी मुदा कारण सहित। प्रिंट पत्रिका एक बेर प्रकाशित भऽ गेलाक बाद दोबारा नै भऽ सकैए (भऽ तँ सकैए मुदा फेर पाइ लागि जेतै) तँइ ओकर वर्तनी यथाशक्ति सही रहैत छै। इंटरनेटपर सुविधा छै जे बीचमे (इंटरनेटसँ प्रिंट हेबाक अवधि) ओकरा सही कऽ सकैत छी मुदा सामग्रिए बसिया रहत तँ सही वर्तनी रहितो नव अध्याय नै खुजि सकत तँइ हमरा लोकनि वर्तनी बला मुद्दापर समझौता केलहुँ। हमरा लोकनि कएलनि, कयलनि ओ केलनि तीनू शुद्ध मानैत छी, एतेक शुद्ध मानैत छी एकै रचनामे तीनू रूप भेटि जाएत। आन शब्दक लेल एहने बूझू। उम्मेद अछि जे पाठक विदेहक आने विशेषांक जकाँ एकरा पढ़ताह आ पढ़ि एकर नीक-बेजाएपर अपन सुझाव देताह। विदेहक हरेक अंक विदेह वेबसाइटपर भेटत आ एकर अलावे गूगल बुक्स Google Books आ आर्कइभ.कॅम archive.org पर सेहो भेटत। तँइ स्वाभाविक रूपसँ विशेषांक सेहो तीनू प्लेटफार्मपर भेटत। पाठक गूगल बुक्स Google Books पर विदेहक Videha eLearning पर जा कऽ विदेहक अंक पढ़ि सकै छथि ओत्तहि संपादक गजेन्द्र ठाकुर Gajendra Thakur पर क्लिक कऽ बहुत रास पोथी पढ़ि सकै छथि। तहिना पाठक आर्कइभ.कॅम archive.org पर जा कऽ गजेन्द्र ठाकुर Gajendra Thakur सर्च करथि हुनका विदेहक अंक सहित ओ सभ पोथी भेटि जेतनि जे विदेहपर देल गेल छै। एकर माने ई भेल जे मात्र विदेहक अंके नै आनो-आनो पोथी सभ भविष्यमे बाँचल रहि जेतै। संगहि विशेषांक सभहक प्रिंट रूप किनबाक लेल ओकर पोथी रूपक लिंक पोथी.कॅम Pothi.com पर देल गेल छै। पाठक पोथी.कॅम Pothi.com पर जा कऽ गजेन्द्र ठाकुर Gajendra Thakur सर्च करथि हुनका विदेहक विशेषांक सहित बहुत रास पोथी भेटि जेतनि किनबाक लेल। पाठक देवनागरीमे गजेन्द्र ठाकुर आ रोमन केर Gajendra Thakur दूनू सर्च करथि से हमर आग्रह रहत। कारण देवनागरी आ रोमन दूनूमे संपादक अपन एकाउंट बनेने छथि आ अपन सुविधासँ दूनू एकाउंटसँ विदेहक अंक आ पोथी अपलोड केने छथि। एहिठाम हम पहिने विदेहक लिंक देब आ ठीक ताही संगे एहि विशेषांकक पोथी.कॅम Pothi.com केर प्रिंट आॉन डिमांड बला लिंक देने छी जाहि ठाम पाठक एकरा आॉनलाइन कीनि सकै छथि। विदेहक द्वारा जीवैत लेखक ओ संस्थाक विशेषांक शृखंलामे प्रकाशित भेल आन विशेषांक सभहक लिस्ट एना अछि (एहिठाम जे अंकक लिस्ट देल गेल अछि ताहि अंकपर क्लिक करबै तँ ओ अंक खुजि जाएत)। 1) हाइकू विशेषांक 12 म अंक, 15 जून 2008 2) गजल विशेषांक 21 म अंक, 1 नवम्बर 2008 3) विहनि कथा विशेषांक 67 म अंक, 1 अक्टूबर 2010 4) बाल साहित्य विशेषांक 70 म अंक, 15 नवम्बर 2010 5) नाटक विशेषांक 72 म अंक 15 दिसम्बर 2010 6) समीक्षा विशेषांक 7) नारी विशेषांक 77म अंक 01 मार्च 2011 8) अनुवाद विशेषांक (गद्य-पद्य भारती) 97म अंक 9) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक 111 म अंक, 1 अगस्त 2012 10) भक्ति गजल विशेषांक 126 म अंक, 15 मार्च 2013 11) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक 142 म, अंक 15 नवम्बर 2013 12) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक 169 म अंक 1 जनवरी 2015 13) अरविन्द ठाकुर विशेषांक 01 नवम्बर 2015 अंक 189, विदेहक अरविन्द ठाकुर विशेषांक केर पोथी रूप "स्वतंत्रचेता- अरविन्द ठाकुर: व्यक्तित्व-कृतित्व" केर नामसँ प्रकाशित भेल। 14) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक 01 दिसम्बर 2015 अंक 191, पोथी.कॅम pothi.com 15) विदेह सम्मान विशेषाक- 200म, भाग-1, 15 अप्रैल 2016 16) विदेह सम्मान विशेषाक- 205म, भाग-2, 1 जुलाई 2016 17) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- 217 म अंक 01 जनवरी 2017 18) मैथिली वेब पत्रकारिता विशेषांक-313म अंक 1 जनवरी 2021 19) मैथिली बीहनि कथा विशेषांक-2, 317 म अंक 1 मार्च 2021 20) रामलोचन ठाकुर विशेषांक 01 अप्रैल 2021 अंक 319, पोथी.कॅम pothi.com 21) राजनन्दन लाल दास विशेषांक 01 नवम्बर 2021 अंक 333, पोथी.कॅम pothi.com 22) रवीन्द्र नाथ ठाकुर विशेषांक 15 जून 2022 अंक 348, पोथी.कॅम pothi.com 23) केदारनाथ चौधरी विशेषांक 15 अगस्त 2022 अंक 352, पोथी.कॅम pothi.com 24) प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' विशेषांक 01 नवम्बर 2022 अंक 357, पोथी.कॅम pothi.com 25) शरदिन्दु चौधरी विशेषांक 15 नवम्बर 2022 अंक 358, पोथी.कॅम pothi.com 26) “कला-विमर्श विशेषांक (सन्दर्भ- संजू दास, कृष्ण कुमार कश्यप, शशिबाला, एस.सी.सुमन आ श्वेता झा चौधरी)” 15 अप्रैल 2023 अंक 368, पोथी.कॅम pothi.com 27) अशोक विशेषांक 1 मइ 2023 अंक 369, पोथी.कॅम pothi.com 28) रामभरोस कापड़ि 'भ्रमर' विशेषांक 15 मइ 2023 अंक 370, पोथी.कॅम pothi.com 29) मिथिला स्टूडेंट यूनियन (MSU) विशेषांक 1 जून 2023 अंक 371, पोथी.कॅम pothi.com 30) लक्ष्मण झा सागर विशेषांक (15 नवम्बर 2023 अंक 382), पोथी.कॅम pothi.com 31) नरेन्द्र झा विशेषांक (1 जून 2024 अंक 395), पोथी.कॅम pothi.com 32) भाषाविद् रामावतार यादव विशेषांक 1 जून 2024 अंक 395, पोथी.कॅम pothi.com 33) अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद् विशेषांक 15 अगस्त 2024 अंक 400, पोथी.कॅम pothi.com एहि लिस्टमे 1, 2, 4, 5, 6, 7, 8, 15 एवं 16 विदेहक स्वतः संख्याक हिसाब बला विशेषांक अछि। ओतहि 2 आ 19 क्रम संख्याक विशेषांक मुन्नाजीक संयोजनमे प्रकाशित भेल अछि। शेष सभ बाँचल विशेषांकक संयोजन आशीष अनचिन्हार द्वारा भेल अछि। 2015 मे विदेहक संपादक लग आशीष अनचिन्हार द्वारा जीवित लेखकपर विशेषांक निकालबाक प्रस्ताव राखल गेल आ संपादकक सहमतिक बाद ई एखन धरि एकटा नमहर रस्ता बना चुकल अछि। पुनः 2022 मे आशीषे अनचिन्हार द्वारा विदेह लग संस्थाक ऊपर विशेषांक प्रकाशित करबाक प्रस्ताव राखल गेल आ संपादकक सहमतिसँ एखन धरि दू संस्थापर अंक निकलि चुकल अछि। विदेहक नवाचार अतबे नहि अछि, एक बेर फेर 2023 मे आशीष अनचिन्हार द्वारा विदेह लग दू टा विचार राखल गेल 1) लेखक-प्रकाशकसँ इतर आन जे लोक पोथी-पत्रिका केर बिक्री कऽ अपन जीवय-यापनक संग मैथिली पोथीक प्रचारमे सहायक छथि तिनको ऊपर विशेषांक प्रकाशित, एवं 2) मैथिलीक कोनो पत्रिकाक उपर विदेह विशेषांक प्रकाशित हो। एहू दूनू कैटेगरी लेल संपादकक सहमति अछि आ निकट भविष्यमे विदेहक माध्यमे पाठक लग नीक विशेषांक पहुँचत। आशीष अनचिन्हार द्वारा संपादित पोथी 'प्रीति कारण सेतु बान्हल' जे कि मिथिला ओ मैथिलीक संवर्धनमे गजेन्द्र ठाकुर एवं प्रीति ठाकुरक योगदानक आलोचनात्मक ग्रंथ अछि ताहिमे संकलित शिवशंकर श्रीनिवास जीक एक शोध आलेख मैथिली पत्रिकामे व्यक्तिपरक विशेषांकक इतिहास अछि आ ओहि इतिहासमे विदेह विशेषांक कोन ठाम अछि तकर मूल्याकंन भेटत संगहि ओही आलेखमे श्रीनिवास जीक मोताबिक जीवितेमे अपन मूल्याकंन पढ़ि लेब कोनो लेखक लेल कोनो सम्मानसँ बेसी महत्वपूर्ण अछि। मैथिलीक बहुत रास पाठक विदेहक जीवित लेखक विशेषांककेँ मूल्यवान मानै छथि ('प्रीति कारण सेतु बान्हल’ मे कीर्तिनाथ झा, कल्पना झा, प्रणव कुमार झा, धनाकर ठाकुर आदिक आलेख), ओतहि किछु पाठक विदेह विशेषांककेँ साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ बेसी महत्वपूर्ण मानै छथि ('प्रीति कारण सेतु बान्हल’ मे लक्ष्मण झा 'सागर'जीक आलेख) यद्पि विदेह साहित्य अकादमी पुरस्कारक आलोचना करैत अछि मुदा अकादमी द्वारा पुरस्कार छोड़ि जे प्रकाशन एवं आन काज छै तकर प्रसंशा सहो करैत अछि। तथापि जँ किछुओ पाठक विदेह विशेषांककेँ कोनो सम्मान-पुरस्कार वा कि साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ बेसी महत्वपूर्ण मानै छथि तँ ई विदेह लेल निश्चिते प्रेरणादायी बात छै। 3 विदेहक जीवित विशेषांक शृंखलामे किनकर चयन हो ताहि लेल मोटा-मोटी निच्चाक किछु बिंदुक पालन कएल जाइत अछि- 1) लगभग पाँच-छह मास पहिनेसँ विदेह अपन पाठककेँ सुझाव देबा लेल लेल सूचना दैत अछि। 2) आएल सुझावमेसँ विदेह मात्र जीवित लेखककेँ चयन करैत अछि। संस्था सेहो वर्तामनमे जीवंत हेबाक चाही। 3) सभ जीवित मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशकक बीचमे हुनकर लेखन/ काज एवं आचरणक साम्यता देखल जाइत अछि। जाहि लेखकक लेखन/ काज ओ आचरणमे बेसी साम्यता (कम फाँक) भेटैए तेहन छह टा नाम चयनित होइत अछि। 4) छह नाम एलापर ई तुलना कएल जाइत छै जे ई छहो मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशक अथवा संस्थाकेँ रचना लिखबाक वा समाजिक काज केलाक एवजमे समाजसँ की भेटलनि। 5) जिनका सभसँ कम भेटल बुझाइत अछि ताहि तीन मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशक,-संस्थाकेँ अगिला चरण लेल राखि लैत छी। 6) एहि तीन चयनित जीबित मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशकक वा संस्थाक रचना, काज, हुनक उद्येश्य आदिक बीचमे परस्पर तुलना कएल जाइत अछि आ, 7) अंतिम रूपसँ विदेह द्वारा नाम चुनि सालक अंतमे घोषणा कएल जाइत अछि आ नियत समयपर ई विशेषांक निकालबाक प्रयास करैत छी। एकर मतलब ई भेल जे पाठककेँ सुझाव देबाक सूचना हरेक बर्खक अप्रैल-मइ धरिमे चलि जाइत छनि। प्रश्न उठि सकैए जे कि उपरक नियम एहन छै जाहिमे अंतिम रूपसँ सभ सुयोग्य जीवित लेखक केर चयन समयपर भ़ऽ जेतनि? तऽ एकर उत्तर छै- नै। विदेहक अपन सीमा छै आ विदेहक पाठक लग सेहो अपन सीमा छनि। मुदा अही सीमाक संगे हमरा सभकेँ अपन यथासाध्य श्रेष्ठ देबाक छै आ मैथिली लेल एकटा एहन रस्ता बना देबाक छै जाहिसँ आबए बला 500-600 बर्खक साहित्य विदेहक लीकसँ प्रेरणा पाबए। अही विचारक संग विदेह ओहन जीवित लेखकपर अपन धेआन सेहो केंद्रित कऽ रहल अछि जे कि सुयोग्य छथि मुदा जिनकापर विदेहक विशेषांक कोनो कारणवश नहि प्रकाशित भऽ सकल। एकर नाम भेल विदेहक "नित नवल सिरीज"। एहि नव विचारक मुख्य बिंदु एना अछि- 1) विदेहक संपादक गजेन्द्र ठाकुर एकटा कोनो जीवित लेखक वा कलाकारपर एकाग्र आलोचना करता मने ओहि लेखक केर उपलब्ध सभ साहित्यपर। एहि पोथीक भाषा मैथिली अथवा अंग्रेजी कोनो एक भाषामे रहत। एहि पोथीक पहिल रूप ई-बुक केर रूपमे आएत आ प्रयास रहत जे एकर प्रिंट सेहो आबए जे कि परिस्थितिपर निर्भर करतै। 2) लेखक वा कलाकार केर चुनाव संपादक अपन रुचि वा विदेह टीमक रुचि केर हिसाबें करता। 3) एहिमे ओहने लेखक वा कलाकार केर चयन संभव हएत जिनकर उपलब्ध हरेक पोथीक PDF रूपमे विदेहक माध्यमसँ सार्वजनिक भेल छनि। कलाकार लेल यूट्यूब एवं आन साइट सेहो मान्य हेतै। 4) एहि परियोजनाक लेल चयनित लेखक वा कलाकारपर काज संपादक केर समय केर अनुसारे हेतै। तँइ एकर समय सीमा कहब संभव नहि। नित नवल सिरीजमे एखन धरि प्रकाशित पोथीक सूची एना अछि (पहिनेक विशेषांक सभमे ई क्रम नहि छल, एहिठाम संशोधित आ पूर्ण सूची अछि)- 1. Rajdeo Mandal- Maithili Writer (2022) 2. JAGDISH PRASAD MANDAL- Maithili Writer (2023) 3) नित नवल सुभाष चन्द्र यादव (2023)(ई प्रिंट आॉन डिमांड रूपमे सेहो अछि) https://store.pothi.com/book/गजेन्द्र-ठाकुर-नित-नवल-सुभाष-चन्द्र-यादव/ 4) नित नवल सुशील (2023, संशोधित 2024) एकर अतिरिक्त विदेहक वर्तमान अंक सभमे धारावाहिक रूपें "नित नवल दिनेश मिश्र" सेहो प्रकाशित भऽ रहल अछि जकर पोथी रूप जल्दिये आएत। एहिठाम ईहो स्पष्ट कऽ दी जे विदेह विशेषांक वा नित नवल सिरीज केर चयन लेखकक शुरूसँ लऽ चयन हेबाक समय धरिक आकलन अछि। मानि लिअ विदेह विशेषांक वा नित नवल सिरीजमे चयनित भेलाक बाद, विशेषांक वा पोथी प्रकाशित भऽ गेलक बाद जँ चयनित लेखकमे नैतिक स्तरपर कोनो विचलन अबैत छनि तँ आन लोकक संगे विदेहो हुनकर विरोध करत। फेरो स्पष्ट कऽ दी जे हमरा लोकनि मात्र नैतिक स्तर केर बात केलहुँ अछि, विचारधारा वा आन कोनो स्तरक नहि। विदेह लेल उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम, आकाश-पाताल सभ विचारधारा अपने छै बशर्ते कि ओ मिथिला, मैथिली आ मैथिलक हितमे हो। 4 ऊपर भेल जे काज हम सभ कऽ सकलहुँ तकर विवरण मुदा किछु एहनो घोषणा छै जे कि हम सभ नै कऽ सकलहुँ जेना 2016 मे हम सभ परमेश्वर कापड़ि, कमला चौधरी आ वीरेन्द्र मल्लिक विशेषांक केर घोषणा कइयो कऽ नहि प्रकाशित कऽ सकलहुँ। पाठक एहि घोषणाकेँ एहि लिंकपर देखि सकै छथि- सूचना बादमे विदेहक "वीरेन्द्र मल्लिक विशेषांक" (जे कि प्रकाशित नै भऽ सकल) लेल वीरेन्द्र मल्लिक जीक साक्षात्कार जे नबोनारायण मिश्रजी से विदेहक 337म अंकमे प्रकाशित भेल पाठक एकरा एहि लिंकपर पढ़ि सकै छथि- 1 जनवरी 2022 अंक 337 2017 मे विदेह "नेपालक वर्तमान मैथिली साहित्य" विषयक विशेषांक निकालबाक नेयार केने छल जे एखन धरि पूरा नहि भऽ सकल अछि। तेनाहिते विदेहक "साहित्यिक भ्रष्टाचार विशेषांक" हमरा लोकनि एखन धरि नै प्रकाशित कऽ सकलहुँ अछि। एकर घोषणा हम 2019 मे केने रही। एहि घोषणाक फेसबुक लिंक देखू। हमरा लोकनि पं. गोविन्द झाजीपर कोनो काज नहि कऽ सकलहुँ से दुख आजीवन रहत। एहन नहि छै जे हमरा लोकनि प्रयास नहि केलहुँ मुदा कोनो ठामसँ उत्साह नहि भेटल। 10 अक्टूबर 2020 फेसबुकपर हम सभसँ आग्रहो केने रहियनि मुदा...। एहि घोषणाक फेसबुक लिंक देखू। तेनाहिते विदेहक 'मिथिला विकास परिषद्" विशेषांक केर घोषणा कइयो कऽ नहि प्रकाशित कऽ सकलहुँ अछि। एकर घोषणा हम जुलाई 2023 मे केने रही। एहि घोषणाक फेसबुक लिंक देखू। परिशिष्ट-1 परिशिष्ट-2 परिशिष्ट-3 विदेह अपन कोनो अंकमे "साहित्यिक भ्रष्टाचार विशेषांक" निकालत (लिंक कमेंटमे) ताहि लेल अपने सभसँ निम्नलिखित विषयपर आलेख आदि चाही। 1.साहित्य, कला एवं सरकारी अकादमीः- (क) पुरस्कारक राजनीति (ख) सरकारी अकादेमीमे पैसबाक गैर-लोकतांत्रिक विधान (ग) सत्तागुट आ अकादमी केर काजक तौर-तरीका घ) सरकारी सत्ताक छद्म विरोधमे उपजल तात्कालिक समानांतर सत्ताक कार्यपद्धति (1985सँ एखन धरि) ङ) अकादेमी पुरस्कारमे पाइ फैक्टरः मिथक वा यथार्थ 2.व्यक्तिगत साहित्य संस्थान आ पुरस्कारक राजनीति 3.प्रकाशन जगतमे पसरल भ्रष्टाचार आ लेखक 4. मैथिलीक छद्म लेखक संगठन आ ओकर पदाधिकारी सभहँक आचरण 5.मैथिली विभागमे पसरल साहित्यिक भ्रष्टाचारक विविध रूपः- (क) पाठ्यक्रम (ख) अध्ययन-अध्यापन (ग) नियुक्ति 6. साहित्यिक पत्रकारिता, रिव्यू, मंच, माला, माइक आ लोकार्पणक खेल-तमाशा 7.लेखक सभहँक जन्म-मरण शताब्दी केर चुनाव, कैलेंडरवाद आ तकरा पाछूक राजनीति 8.दलित एवं लेखिका सभहँक संगे भेद-भाव आ ओकर शोषणक विविध तरीका उपरक विषयक अतिरिक्त जँ कियो साहित्यिक भ्रष्टाचारक कोनो नव विषयपर लिखए चाहथि तँ ओकरो स्वागत रहत। परिशिष्ट-4 नोट- विदेह विशेषांक जाहि खंडमे अहाँ सभ ई सूचना पढ़ि रहल छी तकर नाम छै "प्रस्तुत विशेषांकक संदर्भमे" मुदा हरेक विशेषांकक एहि खंडमे किछु ने किछु भिन्नता भेटत जकर कारण अछि जे भूतकालमे जे-जे हम सभ काज केने छी तकरा सभकेँ फेसबुक वा आन लिंककेँ ताकब समयसाध्य काज छै तँइ हमर आग्रह रहतनि पाठक वर्गसँ जे नवीनतम आ संशोधित सूचना लेल ओ जाहि समयमे तकता ताहि समयक अंतिम विदेह विशेषांकक ई खंड देखथि। उदाहरण लेल मानू जे कोनो पाठक फरवरी 2025 मे विदेह विशेषांकक कोनो पुरानई खंड पढ़लथि आ हुनका ओहिमे कोनो गलती बुझना गेलनि तऽ ओकर संशोधित रूप पढ़बाक लेल विदेहक हितनाथ झा विशेषांकमे आएल एहि खंडकेँ पढ़थि। हुनकर समस्याक समाधान भऽ जेतनि। तेनाहिते एखन जे हितनाथ झा बला खंडमे जे किछु सुधारबाक रहत से हम सभ 2025 मे आबऽ बला विशेषांकमे संशोधित कऽ परसबै। इएह क्रम छै आ लगैए जे लगभग एक-दू बर्खमे हम एहि पन्नाक अंतिम स्वरूप पाबि लेब। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.परिचय एहिठाम प्रस्तुत अछि हितनाथ झाजी केर संक्षिप्त परिचय। एहि परिचय केर अधिकांश तथ्य पहिनेसँ सार्वजनिक छै। किछु तथ्य जुटाओल गेल अछि आ फोटो सभ स्वयं हितनाथ झाजीक सौजन्यसँ भेटल अछि। चित्र- नाम-हितनाथ झा जन्म तिथि : 6 जून 1956 माता : भागीरथी देवी पिता : स्व. तारानाथ झा (1933 मे मैथिली भाषाक हस्तलिखित पत्रिका "प्रभात" केर संपादक) स्थान : कोइलख, पुबारि टोल, मधुबनी भाइ- प्रो. भीमनाथ झा एवं स्व. मित्रनाथ झा शिक्षा : स्नातक (विज्ञान) वृत्ति: वरीय बैंक प्रबंधकक रूपमे सेवानिवृत हितनाथ जी केर परिवारक अन्य सदस्य : पत्नी : श्रीमती नीरू झा संतान : श्री धनंजय झा (पुत्र), श्रीमती रीतू झा(पुत्री) प्रकाशित कृति मौलिक: (एखन धरि हितनाथजीक जतेक पोथी प्रकाशित भेलनि ताहिमेसँ अधिकांश विदेह पोथी डाउनलोडपर राखल गेल अछि आ एहिठाम जे पोथीक लिस्ट देल गेल अछि ताहिमे पोथीक नामपर क्लिक करबै तँ ओ पोथी खुजि जाएत)- 1) मैथिली इतिहासक रेखांकन (संग संपादन-डा. चंद्रेश्वर कर्ण, 2003) 2) कोइलख (ग्रामगाथा, ग्राम इतिहास, 2017) 3) त्रिवेणी (त्रिवेणीकान्त ठाकुर साहित्य सम्मानसँ सम्मानित साहित्यकारक ऊपर आलेख संकलन, 2020) 4) लेख रेख (पोथी प्रसंग, पाठकीय, 2023) 5) कविताः शम्भु बादलक (शम्भु बादलक हिंदी कविताक मैथिली अनुवाद, 2023) 6) राजापोता बलगर (बाल कविता संग्रह,2024) सम्मान- पं.बबुआजी मिश्र मेमोरियल ट्रस्ट, कोइलख द्वारा सम्मानित चित्र- -वाम दिससँ- (स्व.मित्रनाथ झा), पिता (पं.तारानाथ झा), माँ- भागीरथी देवी, (प्रो.भीमनाथ झा), हितनाथ झा (बैसल)। चित्र- -हितनाथ झा ( I.Sc केर समय) चित्र- -हितनाथ झा पत्नीक संग चित्र- -हितनाथ झा पत्नीक संग चित्र- -सपरिवार (हितनाथ झा, श्रीमती नीरू झा संगमे पुत्र एवं पुतोहु) चित्र- 7,8, 9 एवं 10- हितनाथ झाजी विभिन्न कार्यक्रममे। किछु चित्र स्व. तारानाथ झा जी द्वारा संपादित हस्तलिखित पत्रिका "प्रभात" केर जतेक उपलब्ध प्रति अछि तकर मुखपृष्ठक देल जा रहल अछि। अगस्त 1934 और अक्टूबर 1934 क कवर दिबार खा गेलैक। पहिल उपलब्ध अंक अप्रैल 1933 क सेहो। अप्रैल 1933 क कवरमे भीमनाथ झा लिखने छथि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.भीमनाथ झा-हितनाथ झाक वंशावली भीमनाथ झा-संपर्क-7482066855 हितनाथ झाक वंशावली (मूल - खौआड़े नाहस, गोत्र-काश्यप) बीज प्रजापति1, वाचस्पति2, गणपति3-सुत शशिधर4 तनिक गदाधर5, हरिमणि6, रत्नपाणि7 विद्वद्वर
देवादित्य8 - तनय पाँखू9 - सुत भूले10, तनिकर राम11, तदनु नरसिंह12क सुत लवशर्मा13 बुधवर14
तनिक उमापति15, तनिक रमापति16,तनि सुत हरिहर17 रहथि गुणाकर18, तनिक बुद्धिकर19, नारायण20 वर
पुनि निकार21, आ कमल22, गुणाकर23, ब्रह्मदत्त झा24 सुत गोसाइँ25, पुनि वेणीदत्त26क सुत बबुआ झा27
तनिक तनय श्रीनाथ28क सुत छथि तारानाथे29 मासिक पत्र 'प्रभात' चलौलनि अपना हाथे
तनिक तीन सुत भीम-मित्र-हितनाथ30 थिकथि आ हितनाथहुक धनञ्जय31, तनिक हृधान32 दुलरुआ
'रितु'31 नामक हितनाथक छथिन शिक्षिता कन्या सुत प्रत्यूषक माय बनलि ओहो छथि धन्या ।। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ४.कल्पना झा- मैथिली साहित्यक परम्परा आ विकास सँ परिचित करबैत अछि मैथिली इतिहासक रेखांकन कल्पना झा मैथिली साहित्यक परम्परा आ विकास सँ परिचित करबैत अछि : मैथिली इतिहासक रेखांकन
"रिटायरमेंट केर बाद किछु लोक मैथिलीमे कथा-कविता लिखऽ लागै छथि जे कि मात्र पुरस्कार ओ मंचक लेल होइत छै। एकर विपरीत हितनाथ झा रिटायरमेंटक बाद अपन लेखन लेल ग्राम इतिहास एवं पाठकीय लिखब चुनलाह जे कि एकटा अनिवार्य काज छै साहित्य लेल।" ई कहब छनि आशीष अनचिन्हार जीक। आ इएह बात (मंच-माइक-मालाक फेरामे नहि पड़ब) आदरणीय हितनाथ सर केँ विशिष्ट बनबैत छनि। निष्काम कर्म मे लीन बुझाइत छथि। ना काहू से दोस्ती (मतलब अतिशय बला, जे घातक होइत अछि) ना काहू से बैर....इएह छथि हितनाथ सर। चाहे हिनका फेसबुक पोस्ट केर माध्यम सँ जानबाक चेष्टा करी वा प्रत्यक्ष भेंटघाँट करी, हिनकर एहने प्रकृति दृष्टिगोचर होएत। सभक संग मित्रवत, सभक लेल सौम्य।
जखन विदेह टीम द्वारा हितनाथ झा जी पर विशेषांक प्रकाशित करबाक घोषणा कएल गेल, तँ हितनाथ जीक एखन धरिक साहित्यिक यात्रा (प्रकाशित पोथी) पर नजरि खिरौलहुँ। संयोगवश हमरा लग हिनकर सभटा पोथी पहिनहि सँ उपलब्ध छलए। आ सद्यः प्रकाशित "राजापोता बलगर" एखनहि प्राप्त भेलए। हजारीबाग हिनकर निवास स्थान छनि आ हमर पिताजी सेहो हजारीबाग मे बसि गेल छथि। तँ एकटा विशेष आत्मीयता अनायासे बुझाइत अछि हितनाथ सर सँ। आ एही आत्मीयताक परिणाम, जे भेंटघाँटक क्रम मे पोथी भेटि जाइत अछि। हितनाथ झा जीक पहिल पोथी, जे डॉ. चन्द्रेश्वर कर्ण जीक संग हिनकर सम्पादकत्व मे प्रकाशित भेल, से अछि "मैथिली इतिहासक रेखांकन" बर्ख 2003 मे प्रकाशित भेल छलए ई पोथी। तदुपरान्त दोसर पोथीक विषय चुनलनि, अपन गाम कोइलखक प्रसंग किछु जनतब संचित करब, जे ग्रामगाथा "कोइलख" क रूप मे पाठकक हाथ मे एलनि 2017 मे। ई पोथी सर्वाधिक लोकप्रिय भेलनि, हितनाथ झा जीक। ततेक जे लगले दोसर संस्करण सेहो प्रकाशित भेलनि एहि पोथीक। तेसर पोथी छनि, त्रिवेणी आ चारिम लेख-रेख (पोथी-प्रसंग), पाचम पोथी एकटा अनुवाद पोथी छनि, कविता:शम्भु बादलक आ छठम पोथी छनि बालकविता संग्रह राजापोता बलगर। यद्यपि संख्यात्मक रूपेँ हिनकर रचना-संसार वृहत नहि छनि मुदा गुणात्मक रूपेँ देखल जाए तँ वृहत्तर छनि हिनकर रचना संसार। एक सँ बढ़ि क' एक पोथी सभ। सभ भिन्न भिन्न विषय वस्तुक पोथी सभ।
हिनकर पहिल पोथी "मैथिली इतिहासक रेखांकन" विशेष महत्वपूर्ण पोथी छनि। कोयलाक खान सँ चुनि चुनि क' हीरा निकालि अनलनि अछि जेना, तेहने सन बुझू। पोथी मे संलग्न सभटा आलेख ऐतिहासिक दस्तावेज सन अछि। पोथीक पहिल लेख "मैथिली साहित्यक भूमिका" लिखबालेल प्रो. जयदेव मिश्र जी एतेक रास तथ्य कोना कलेक्ट कएने होएताह, हम तँ ताहि सोच मे पड़ि गेलहुँ। कतेक मेहनति सँ ई शोधपरक लेख हमरा सभक सोझाँ परसल गेल अछि, से पढ़ैत काल स्पष्ट बुझा जाएत। विस्तृत विवरण अछि, मैथिली साहित्यक आरम्भ कोना आ कहिया भेल, तकर। मैथिली साहित्यक मध्ययुग, आधुनिक युग, क्रमिक एकर गतिविस्तार कोना भेलैक आ प्रत्येक युगक साहित्यिक विकासक संग सामाजिक कोन प्रचेष्टा कोन रुपेँ संश्लिष्ट छल, से सभटा तथ्य भेटत।
वास्तव मे साहित्य सेहो इतिहासे तँ अछि; विशेष रूप सँ कथा साहित्य। कारण नाम-गाम छोड़ि, सभटा सत्ये तँ लिखल जाइत अछि लेखक द्वारा। जाहि काल, परिस्थिति आ वातावरणक कथानक पर कथा बूनल जाइत अछि ताहि सँ पाठक स्वतः जुड़ि जाइत अछि आ ओहि समयक सामाजिक परिस्थिति सँ, संगहि कोनो पात्रक जाति/वर्ग विशेष सँ नीक जकाँ परिचित भ' जाइत अछि। अप्रत्यक्ष रुपेँ वा कही रोचक ढंग सँ सामाजिक इतिहास बुझबाक हुअए तँ ताहिलेल कथा-साहित्य जाहि मे उपन्यास सेहो संलग्न अछि, पढ़बाक चाही। उदाहरण स्वरूप उषाकिरण खान जीक 'हसीना मंजिल' उपन्यासेक गप्प करी तँ ई पोथी देश-विभाजनक समय केर स्थिति-परिस्थिति सँ परिचित करिते अछि, प्रभावित एकटा चुड़ीहारिन (लहेरी समाजक) क परिवारक खिस्सा सँ, ओहि जाति-विशेषक रहन-सहन, सोच-विचार, सभटा बुझबा मे सहायक होइत अछि, पाठकक लेल। सामाजिक परिस्थितिक संग लोकक मानसिकता मे समयक संग आबि रहल परिवर्तनक झलक सेहो भेटैत छै साहित्य मे। तैँ साहित्य केँ समाजक दर्पण कहल जाइत अछि। "सामाजिक जीव मनुष्यक हृदयक घात-प्रतिघात, आशा-आकांक्षा, शोक-विह्वलताक जेहन मार्मिक चित्रण तत्कालीन साहित्य मे उपलब्ध होइछ, तेहन अन्यत्र नहि।" ई कहब छनि प्रो. जयदेव मिश्र जीक। लेखक एकटा संस्कृतक श्लोकक चर्चा करैत छथि -
"गाव: पश्यन्ति घ्राणेन वेदै: पश्यन्ति पंडिता:। चारै: पश्यन्ति राजान: चक्षुर्भ्यामितरो जना:।।"
आ ओ कहैत छथि जे एकटा साहित्यकार देखैत अछि हृदय सँ। कोनो स्थिति-परिस्थिति केँ अपन हृदयक आँखि सँ देखि ओकरा लौकिक सरल भाषा मे रूप-रस-गंधक शब्दावली मे गाँथि सामान्य लोकक सोझाँ परसैत छथि एकटा साहित्यकार। काव्य मे वा साहित्यक अन्यान्य विधा मे। अस्तु, साहित्य- सृजन मे भाषा एवं भाव दुनू समान रूप सँ महत्वपूर्ण छैक। प्रो. जयदेव मिश्र जी अपन आलेख "मैथिली साहित्यक भूमिका" मे स्वीकार कएलनि अछि, जे अन्य भाषाक साहित्य जकाँ मैथिलिओ साहित्यक आरम्भ लोक-साहित्य सँ भेल। मुदा लेखक "डाक-घाघ" प्रभृतिक रचना केँ लोक साहित्यक प्राचीनतम उदाहरण मानबालेल तैयार नहि छथि। हुनकर कहब छनि, वस्तुतः ई केओ नहि कहि सकैत अछि, जे उपलब्ध लोक साहित्यक रचयिता के छलाह, कहिआ रचना कएलनि। निम्नलिखित लोक-रचना पर विचार करबाक बात कएलनि अछि लेखक -- "चन्ना मामा आ आ रस कुसिआर ला। केरा के भार ला फोका मखान ला ।।"
एहन रचना सभ कहिआ हमरा लोकनिक माए-बहिनिक कंठ मे आबि निवास कएलक तकर लेखा-जोखा इतिहासो नहि राखि सकल। एकर रचयिता के छलाह, तकरो अटकर लगाएब असंभव। अतएव एहि प्रकारक रचना केँ अनादि एवं अपौरुषेय कहबा मे कोनो दुविधा नहि। एकटा गीतक पाँतिक चर्चा कएलनि अछि लेखक -- पिआ परदेश गेल पोखरि खुनाए गेल रोपि गेल नेमुआ अनार...
एहि प्रकारक विशुद्ध लोक-रचना मैथिली मे पूर्ण रूपेँ संरक्षित नहि अछि। जे लोक-रचना उपलब्ध अछि, निस्संदेह ओकर कलेवर प्रचूर मात्रा मे बदलल छैक। छठम-सातम शताब्दी मे पूर्वांचल, यथा मिथिला, बंगाल, आसाम आ उड़ीसा प्रभृति प्रान्त मे प्रायः एक्कहि भाषा बाजल जाइत छल। इएह कारण थिक जे चर्यापद मे मैथिली, बंगला, उड़िया प्रभृति अपन भाषाक रूपसादृश्य देखि दावा उपस्थापित कएल जाइत अछि, जे ई रचना मूलतः हमरे भाषा मे अछि। यथार्थ ई अछि जे चर्यापदक भाषा सन्धिकालीन भाषा अछि। जाहि मे उपर्युक्त प्रत्येक भाषा-भाषी अपन प्रतिबिम्ब देखि सकैत अछि। आंचलिक भाषा साहित्यक विकासक्रम मिथिला मे किछु भिन्न प्रकारक रहल, एहि तरक चर्चा भेटल "मैथिली इतिहासक रेखांकन" शीर्षक आलेख मे। बंगाल, आसाम सन पड़ोसी प्रान्त सँ आगत छात्र लोकनि जखन शिक्षा ग्रहण क' अपना गाम फिरथि, तखन दिमाग मे ल' जाइथ शास्त्रीय ज्ञान-विज्ञान किन्तु जिह्वा पर ल' जाइथ मैथिली कवि लोकनिक गीत। यद्यपि मध्ययुग मे मिथिला, बंगाल, आसाम, उड़ीसाक मध्य यातायातक अनेक उपाय छल मुदा ओ उपाय सभ आसान नहि छल। महानन्दा एवं कौशिकी नदी पार क' पैदल वा बैलगाड़ीक सहारा लेब आवश्यक छल, एहन चर्चा भेटल उक्त आलेख मे।
आगाँ कहि रहल छथि लेखक, जे मध्ययुगीन मिथिला मे दैवयोग सँ शतशः निबन्ध ग्रन्थ निर्मित भेल। एहि निबन्ध ग्रन्थ सभक उद्देश्य छल जन्म सँ मरण पर्यन्त लोक जीवनक यावतो व्यापारक सम्बन्ध मे श्रुति-स्मृतिक आधार पर विधि-निषेधक व्यवस्था करब। जेना फसिल केर चारूकात लोक काँट कूसक बेढ़ लगबैत अछि, किछु तेहने सन। विधर्मी द्वारा नित्य नवीन आक्रमणक वातावरण मे समाजक हेतु निबन्धनक कवच अत्यावश्यक छलैक। प्रो. जयदेव मिश्र जी साहित्यक अध्ययन ओहि युगक सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक परिमण्डल केँ नीक जकाँ स्मरण राखैत कएलनि अछि। लेखक कहि रहल छथि, डाक-घाघक वचनावली सँ ज्योतिरीश्वर धरि अबैत-अबैत हमरा लोकनि दोसर दुनियाँ मे प्रवेश कए जाइत छी। मध्ययुग मे आबि प्राचीन युगक स्वच्छन्दताक बदला मे अनेक प्रकारक नियमबद्धता देखबा मे आओत।विषय- वस्तुक चयन मे, रचना शैली मे, जतए प्राचीन कालक कवि स्वतंत्र छलाह, ओतहि मध्ययुगक कवि लोकनि बन्धन नियमक अधीन भए गेलाह। विचारणीय अछि जे ज्योतिरीश्वरक वर्ण रत्नाकर यथार्थत: काव्य-ग्रन्थ नहि, काव्य रचनाक हेतु सहायक ग्रन्थ थीक।
ज्योतिरीश्वर सँ लए मनबोध धरि प्रायः रचना प्रणाली एक रंगक छल। ओना मध्ययुगक साहित्याकाश मे निस्सन्देह विद्यापति सभ सँ देदीप्यमान नक्षत्र छथि, से स्वीकार करैत जयदेव जी कहलनि अछि, जाहि प्रकारेँ विद्यापति मध्ययुग केँ प्रतिनिधित्व कए सकैत छथि, ताहि प्रकारेँ अन्य कोनो व्यक्ति नहि कए सकैत छथि। हिनका विषय मे सभ सँ महत्वपूर्ण वस्तु थीक हिनक काव्यक स्वतः सौन्दर्य। विद्यापतिक बाद प्रादुर्भाव भेल श्री चैतन्यदेवक। यदि मिथिलाक भावधारा श्री चैतन्यदेव केँ प्रभावित कएलक तँ निस्सन्देह श्री चैतन्यदेवक भावधारा मैथिल कवि गोविन्द दास केँ प्रभाविते नहि अनुप्राणित कएलक। मनबोधक समय केँ जयदेव जी मध्ययुगक अन्तिम सीमा मानि रहल छथि। एकर कारण, जे हिनक भाषा प्रायः वएह थीक जे हमरा लोकनि आइओ बाजैत छी। जँ विषय-वस्तुक दृष्टिएँ आ वर्णनात्मक रचनाशैलीक दृष्टिएँ विचार कएल जाए तँ रत्नपाणि, भानुनाथ, हर्षनाथ धरि केँ मध्युगीन रचयिता मानए पड़त। ओना एखनहु एहन कतेक कवि रचयिता छथि जे छथि तँ वर्तमान समय मे किन्तु हुनक मनोदशा, हुनकर रचना शैली पूर्णतः मध्ययुगीन छनि। एहन वर्तमान कवि मध्ययुगक प्रसार बुझल जा सकैत छथि। गद्य साहित्यक प्रणययन आधुनिक युगक एक आवश्यक अंग थीक। सरल स्वच्छ गद्य हाथ मे अएबाक बाद कविताक भाषा सेहो बदलल। कथा साहित्यक निर्माण तँ सहजहि होमए लागल। जहिना गद्य अथवा कथा साहित्यक क्षेत्र मे तहिना काव्यक क्षेत्र मे आधुनिक युगक अपन अवदान छैक। ई अवदान थीक प्रधानतः भावनात्मकताक रूप मे। मैथिलीक क्षेत्र मे आधुनिकताक प्रकाश विलम्ब सँ आएल, कारण मध्ययुगीन प्रवृत्ति मिथिला मे आवश्यकता सँ अधिक दिन धरि व्याप्त रहल। फलत: मिथिलाक रहन- सहन, भोजन-वसन, संस्कृति-साहित्य सभ किछु बहुत दिन धरि मध्ययुगीने रहल। मिथिला मे आधुनिकताक प्रथम दीप ग्रियर्सन साहेब ल' क' अएलाह। हिनक मैथिली केस्टोमेथी, वैष्णव भजनावली, बिहारी भाषाक व्याकरणक प्रकाशन सँ मैथिली भाषा एक प्रकारक आभिजात्य केँ प्राप्त कएलक। संगहि मैथिल लोकनि बुझलनि जे "रजनी-सजनी" कहि जाहि मातृ भाषाक रचनाक अवहेलना करैत आएल छी, तकरा मे किछु तथ्य अवश्य छैक, अन्यथा सात समुद्र पार सँ आएल ग्रियर्सन साहेब अपार परिश्रम कए एहि रचना सभक उद्धार किएक करितथि ?
मैथिलीक आधुनिक एवं अत्याधुनिक युगक प्रतिफलनक निदर्शन कविताक अतिरिक्त हमरा लोकनि कथा-साहित्य, विशेषत: लघुकथा साहित्य मे पाबि सकैत छी। लघुकथा साहित्य वर्तमान युगक लोक केँ प्रभावित करबा मे बेस सफल होएत। कारण वर्तमान समय मे लोकक लग समयक अभाव छैक। मैथिली नाटकक मादे जयदेव जीक कहब छनि, जे मैथिली नाटक अद्यावधि पौराणिक अथवा सामाजिक विषय-वस्तु सँ उपर नहि उठि सकल अछि। आशा अछि मैथिलीक साहित्यकार लोकनि एहि त्रुटिक परिमार्जनक दिस ध्यान देताह। प्रो. जयदेव मिश्र जीक कहब छनि जे मैथिली साहित्यक वर्तमान धारा विद्यापति पर्वक अनुष्ठान सँ प्रचूर बल पओलक अछि। कोनो साहित्य केँ जाबत जनमतक, जनमानसक समर्थन, स्नेह नहि प्राप्त हेतैक, ताबत ओकर सर्वांगीण विकास संभव नहि छैक। उदाहरण स्वरूप मैथिलीक कवि रवीन्द्र जी अपन लेखन आ गायनक बलेँ स्वयं सेहो अपार ख्याति प्राप्त कएलनि आ मैथिली भाषा केँ सेहो जगजिआर कएलनि, से मात्र विद्यापति पर्वक अनुष्ठानक बदौलति। देश भरि मे एहन कोनो स्थान नहि होएत, जतए जागरूक मैथिल लोकनि रहैत होथि आ विद्यापति पर्वक अनुष्ठान नहि होइत हुअए। ओना ध्यान राखब आवश्यक, जे एहि तरहक बात लेखक द्वारा सन् 2003 सँ पूर्वक स्थिति देखैत कहल/लिखल गेल अछि। आब विद्यापति पर्व - अनुष्ठानक रंग-रूप भिन्न प्रतीत भ' रहल अछि। आब आयोजनकर्ता सभक बीच ओ सामंजस्य नहि रहल, मातृभाषाक लेल ओ अनुराग प्रायः विलुप्त होइत जा रहल अछि। खैर...जे-से।
आब गप्प करब पोथीमे संकलित दोसर लेख केर, जे प्रो. आनन्द मिश्र जीक लिखल छनि। शीर्षक अछि "मैथिली गद्यक विकास" जकर शुरुआत कएलनि अछि लेखक, भारतीय आर्य भाषाक विकास-क्रम सँ। आगाँ आर्यभाषा पर स्थानीय भाषा सबहक प्रभावक बात सेहो करैत छथि लेखक। संस्कृतक विशाल शब्द भंडार मे आर्येतर भाषाक शब्दावलीक मात्रा यथेष्ट अछि। कालानुसार भाषाक स्वरूप "लोक-भाषा"आ "ग्रन्थ-भाषा"क रूप मे सर्वमान्य भेल। ग्रन्थ भाषा विद्वान लोकनि द्वारा अपन ज्ञान-विज्ञानक वाहिनी बनाओल गेल, आ क्रमिक परिष्कृत होइत "संस्कृत" नाम सँ अभिहित भेल। 800 ई. सँ 1200 ई. धरि मैथिलीक उद्भव युग मानल जाइछ, एहन प्रो. आनन्द मिश्र जी उल्लेख केलनि अछि उक्त आलेख मे। मौखिक परम्परा आ लेखन परम्पराक योगदान सँ कोनो भाषाक विकास होइत रहल अछि। मौखिक परम्परा मैथिलीक विकासक्रम पर बहुत प्रभाव छोड़लक। अपना मिथिला मे व्रत-कथा, दन्त-कथा, लोकगाथा, लोककथा बाँचबाक परम्परा रहल अछि। मौखिक परम्पराक पश्चात् लेखन परम्पराक चलती भेल। लेखन परम्पराक सभ सँ पुरान रचना ज्योतिरीश्वर ठाकुरक वर्णरत्नाकर केँ मानल जाइत अछि। ज्योतिरीश्वरक समय चौदहम शताब्दीक प्रारम्भिक दशक कहल जाइछ।
मध्यकाल मे मैथिली गद्य रचनाक प्रधान क्षेत्र रहल नाटक। बेसी नाटक सभ नेपाल तथा असम मे लिखल गेल। प्राचीन एवं मध्यकालीन मैथिली गद्य संरचना पर संस्कृतक भरपूर प्रभाव देखा पड़ैछ। गद्य मे काव्यात्मकता बेसी रहला सँ सर्वजन - बोधगम्यताक अभाव सेहो रहलैक। मैथिलीक आधुनिक काल, उन्नैसम शताब्दीक उत्तरार्द्ध सँ प्रारम्भ मानल गेल अछि लेखक द्वारा। एहि काल मे गद्य लेखनक गति तीव्र भेल। गद्य मे तथ्य एवं स्वरूप, दुनू क्षेत्र मे विविधताक समावेश देखबा मे आएल। आधुनिक कालक चतुर्मुखी विकासक परिचायक छलए विभिन्न पत्र-पत्रिकाक चलन। उपन्यास, कथा, नाटक, निबंध, यात्रा संस्मरण सभ लिखि मातृभाषानुरागी लोकनि मैथिली गद्य-भंडार केँ भरबाक प्रयास मे अग्रसर भेलाह। एहि सँ मैथिली गद्य प्रगति पथ पर द्रुतगतिएँ बढ़ैत देखा रहल अछि। एहि तरहेँ मैथिली गद्यक विकास-क्रमक विवरण छनि प्रो. आनन्द मिश्र जीक आलेख मे।
"राजनीतिक दृष्टिकोण सँ मिथिला भू-भागक अस्तित्व नगण्यप्राय अछि, मुदा आइयो एतुक्का अपन स्वतंत्र सांस्कृतिक आ सामाजिक विशिष्टता छैक। आ तकर मूल प्राचीनकाल मे प्रतिष्ठित मिथिलाक दीर्घकालीन सांस्कृतिक परम्परा अछि। मैथिली काव्यक सन्दर्भ मे परम्परा शब्द सँ जाहि क्रमबद्ध साहित्यिक विकासक बोध होइत अछि, से थिक वस्तुतः विद्यापतिक परम्परा। मुदा विद्यापति अपनहि जाहि परम्पराक चरमोत्कर्ष छलाह, से छल वैदिक लौकिक संस्कृतिक पारस्परिक सम्मिलन आ आ संघर्ष सँ बनल समन्वित सांस्कृतिक परम्परा।" ई बात कहलनि अछि प्रो. रत्नेश्वर झा जीक, अपन आलेख "मैथिली काव्य - विकासक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि"मे। प्रो. रत्नेश्वर जी अपन आलेख मे मिथिलाक वैदिक आ लौकिक परम्पराक गप्प करैत, मिथिलाक आदि साहित्यक प्रस्फुटन लोक-कविताक गप्प करैत छथि।विद्यापति सँ पूर्व लोककाव्यक निर्माता सिद्धाचार्य, डाक-घाघक संग बहुसंख्य अनाम रचनाकारक योगदान पर्यन्त केर चर्चा कएलकनि अछि। लेखकक कहब छनि, "जे हो..मैथिली काव्यक चरमोत्कर्ष छलाह विद्यापति ( 1360 सँ 1448 ई.)" आ ई बात सर्वस्वीकार्य अछिए। पोथीक पहिल आलेख मे प्रो. जयदेव मिश्र जी सेहो कहलनि अछि "मध्ययुगक साहित्याकाश मे निस्सन्देह विद्यापति सभ सँ देदीप्यमान नक्षत्र छथि" वास्तव मे संस्कृतक विद्वान रहितहुँ विद्यापति 'देसिल बयनाक' शरणागत भए अपन पदावलीक माध्यम सँ अपना संग मैथिली काव्यो के अमर कए देलनि।
आगाँ लेखक कहलनि अछि "आचार्य रमानाथ झा मैथिली काव्य विकासक दुइएटा युग मानलनि अछि -- विद्यापति युग आ चन्दा झा युग। चन्दा झा ( 1831 सँ 1907 धरि)क युग आरम्भ होयबा सँ पूर्व धरि कोनो ने कोनो रूप मे विद्यापतिएक परम्परा चलैत रहल। हुनकर बाद मैथिलीक सर्वाधिक प्रतिभाशाली कवि भेलाह महाकवि गोविन्द दास। उमापति उपाध्याय, रामदास, रमापति, लाल कवि, लोचन आदि विद्यापतिक परम्पराक किछु प्रसिद्ध कवि भेलाह, मुदा क्रमिक रूपेँ काव्यक माध्यम सँ लोकसिद्धिक अभीष्ट छूटए लागल आ आब पण्डित समाजक मनोरंजनार्थ रीतिकाव्य लिखल जाए लागल" जाहि सँ स्पष्ट होइत अछि जे कालक्रमेण कोना काव्यधारा अपन दिशा बदलैत रहल अछि। आधुनिक मैथिली काव्य आ साहित्यक विकासक प्रस्थान बिन्दु चन्दा झा मानल जाइत छथि। मुदा हुनक जन्म सँ पचास वर्ष पूर्व मनबोध रीति काव्य परम्पराक विरुद्ध ( रीतिकाव्य, जकर आइ धरि 'रजनी-सजनी काव्य' कहि उपहास कएल जाइत अछि) कृष्णजन्म लीखि प्रबन्ध काव्य लेखनक परम्पराक आरम्भ केलनि आ वस्तुतः मनबोध जाहि काव्य व्याप्तिक भूमिका तैयार कएलनि, ताहि आधार पर चन्दा झा मैथिली भाषाक रामायण महाकाव्य लिखलनि। एहन उल्लेख रत्नेश्वर जीक आलेख मे भेटल। चन्दा झा मैथिली काव्य मे आनो रूपेँ आधुनिक युगक प्रवर्तक भेलाह। मुक्तक काव्यक हुनकर परम्परा केँ आगू आगू बढ़ौनिहार प्रमुख कवि भेलाह यदुवर, मधुर, सीताराम झा, भुवन, यात्री, विनीत, मधुप, किरण, मोहन, सुमन, मणिपद्म, अणु, व्यास, अमर, मार्कण्डेय, गोपेश, निरकुंश, किसुन, आदि। वस्तुतः चन्दा झा सँ जे युग आरम्भ भेल तकरा प्रयोगधर्मी युग कहल जा सकैत अछि आ प्रत्येक नव कवि कोनो ने कोनो प्रयोगक संग अपन कविता ल' उपस्थित होइत रहलाह। प्रो. रत्नेश्वर मिश्र जी द्वारा देल मैथिली काव्य - विकासक ऐतिहासिक पृष्ठभूमिक ई संक्षिप्त विवरण अध्ययनकर्ता आ अध्यापनकर्ताक लेल विशेष उपयोगी सिद्ध होएत। वस्तुतः ई संपूर्ण पोथीए अध्ययन-अध्यापन कएनिहारेक लेल अछि।
"मैथिली पत्रिकाक तीस वर्ष, तीस बिन्दु" कट-टु-कट गप्प अछि मैथिली पत्रिकाक संदर्भ मे। सन् 1971 सँ 2000 धरिक मध्य पत्रिका प्रकाशनक क्रम मे जे पापड़ बेलए पड़ल हेतनि प्रकाशक- संपादक सभ केँ, ताहि पर अपन अनुभवी नजरि खिरौलनि अछि लेखक प्रो. भीमनाथ झा जी। आ नीर-क्षीर विवरण द' देलनि अछि पाठकक सोझाँ। एहि नीर-क्षीर विवरण सँ वस्तुस्थितिक जनतब हेतनि पाठक - लेखक- संपादक सभ वर्गक लोक केँ। संगहि किछु सिखिओ सकैत छथि, आगाँ एहि क्षेत्र मे उतरनिहार लोकसभ। किछु प्रिपेयरेशनक संग उतरताह, से संभव। कहबाक माने सर्वजन हिताय लेख बुझाएल हमरा। प्रो. भीमनाथ झा जीक एहि गप्प सँ सहमति रखताह समस्त मैथिलजन--"ई जनितो जे पत्रिका नहि चलत, अर्थ दण्ड सँ कुहरि उठब, लेख जुटएबामे एड़ी-चोटीक पसेना एक करए पड़त.....तथापि हमरा लोकनि हाथ पर हाथ ध' बैसि कहाँ रहैत छी ? बुझितो जे एहि नदी मे अथाह पानि छैक....तैयो धराधरि नदी मे कुदिते जा रहल छी हमरालोकनि। एहि ललक केँ की कहबैक ? बतहपनिए ने ? यैह बतहपनी तँ पत्रिका केँ जिया क' रखने अछि। यैह बतहपनी रखने अछि मैथिली केँ जिया क' सेहो।"
"मैथिली मे कथाक आरम्भ संस्कृतक आख्यान-उपाख्यानक अनुवाद सँ होइत अछि। अथवा एना कही जे संस्कृतक विशाल भंडार सँ नीतिपरक ओ उपदेशात्मक आख्यान आदिक अनुवाद- सह - अनुकरण करैत पंडित लोकनि मैथिली कथाक भूमि तैयार कएलनि।" ई बात कहि रहल छथि डॉ. विभूति आनन्द जी, अपन "एकैसम शताब्दीमे प्रवेश करैत मैथिली कथा" शीर्षक लेख मे। बहुत नीक, फड़िछाएल विवरण मैथिली कथा संबंधी। समय समय पर कोन कोन तरहक कथा-काल रहल, तरह तरह केर कथाक प्रस्थान आ अवसानक चर्चा। कखनो कथा-लेखन मे आएल तेजी, माने बिहाड़ि सन स्थिति, तँ कखनो गति सामान्य वा सामान्यो सँ मन्द। डॉ. विभूति आनन्द जी कहैत छथि जे लगभग 1920 ई. धरि बहुत किछु स्पष्ट भ' चुकल छल। आख्यान आख्यायिकाक स्थान मौलिक चिंतन ल' लेने छल। यथार्थ बाज' लागल छल। भाषा आ शिल्प पनगी छोड़' लागल रहए। ताधरि एकटा नब चिंतन, कथा आ उपन्यासक चिंतन आरम्भ भ' गेल छलए। 1921 मे अनूप मिश्र एकरा दू फाँक क' फराक कएलनि। आ एकर बादे मैथिली कथा- रूप आ उपन्यास-रूप मे अपन अपन फराक अस्तित्व मे आएल।
"मैथिली नाटकक स्वरूप ओ स्थिति"क विवरण देबाक उपक्रम ततेक रमणगर तरीका सँ कएल गेल अछि, डॉ. अरविन्द कुमार सिंह झा जी द्वारा जे रुचिकर सेहो लगतनि पाठक केँ। 'काव्येषु नाटकं रम्यम्' आ 'नाट्यं वेदं तु पंचमम्' क उल्लेख सँ आलेख केर शुभारंभ कएलनि अछि लेखक। आगाँ जनतब देलनि अछि, जे भारतीय नाट्य शास्त्रानुसार नाटक मूल रूप सँ दू कोटि मे विभक्त अछि -- रूपक ओ उपरूपक। रूपकक दस भेद अछि, जाहि मे नाटक प्रमुख अछि। एकटा छोट सन आलेख मे सभटा तथ्य समाहित अछि। मैथिली नाटकक श्रीगणेश चौदहम शताब्दी मे भेल, जकर प्रारम्भिक स्वरूप, संस्कृत मे संवाद आ मैथिली गीत मिश्रित नाटकक रूप मे भेल। एहि तरहक पहिल नाटक 'धूर्त्तसमागम' प्रहसन थिक, जे दू अंक मे विभक्त अछि। बहुत बात सँ अनभिज्ञ छलहुँ हम। ई पोथी पढ़बाक क्रम मे जनतब भेल जे मैथिली नाटकक विकास मिथिलाक अतिरिक्त नेपाल, आसाम ओ बंगाल मे सेहो भेल। कहल जाइछ जे मैथिली नाटकक माध्यमेँ ज्योतिरीश्वर जाहि मैथिली नाट्य साहित्यक नेंओ देलनि, तकर सर्वाधिक विकास नेपाल मे भेल। नेपाल मे मैथिली नाटकक जे शृंखला स्थापित भेल, तकर श्रेय मल्ल वंश केँ देल जाएत। मल्ल राजा लोकनि द्वारा मैथिली नाटकक हेतु जे सत्प्रयास कएल गेल; तकर साम्राज्य भातगाँव, काठमांडू, बनेपा आ ललितपुर मे भेल। चारू केन्द्र मिलाए लगभग एक सए मैथिली नाटक लिखल गेल। सोलहम शताब्दी आबैत आबैत आसाम मे सेहो मैथिली नाटकक विकास भेल, जकरा 'अंकीया नाट' कहल गेल।उद्देश्य छल, वैष्णव धर्मक प्रचार प्रसार। जकर प्रवर्त्तक शंकर देव रहथि। नाटकक एकटा प्रवृत्ति आन भाषा-साहित्यक उत्कृष्ट नाटक सभक मैथिली अनुवाद करब सेहो थिक। एहि मे संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी, बंगला ओ फ्रेंच साहित्यक उत्कृष्ट नाटक सँ मैथिली नाट्य साहित्यक शृंगार करबाक प्रयास भेल। एकटा नब प्रयास भेल मैथिली-साहित्यक अन्य विधा (उपन्यास, कथा, काव्य)क कृति केँ नाट्य रूपान्तरण करब। जे मंचनक दृष्टिएँ बड़ सफल भेल।
26 जनवरी 1948 मे आकाशवाणी पटनाक आ 2 फरवरी 1976 मे आकाशवाणी दरभंगाक स्थापना सँ मैथिली रेडियो नाटकक शुरुआत भेल। एकर अतिरिक्त मैथिली नाट्य साहित्य केँ द्रुतगतिएँ आगाँ बढ़एबाक श्रेय मैथिली नाट्य रंगमंच केँ सेहो छैक। कलकत्ता आ पटना एहि क्षेत्र मे अग्रणी रहल अछि। पटनाक 'चेतना समिति' आ 'अरिपन' सन संस्था नाट्य विधा केँ समृद्ध करबा मे सहयोगी रहल आ समाजक सर्वांगीण विकासक मार्ग प्रशस्त करैत रहल अछि। एहि आलेखक माध्यम सँ लेखक नाटककार लोकनि केँ नीक सुझाव सेहो द' रहल छथिन। लेखकक कहब छनि, जे नाटककार केँ रंगमंच आ उपलब्ध साधन केँ ध्यान राखैत नाटक लिखबाक चाही। शहर मे जे सुविधा छैक, तकनीकी साधनक उपलब्धता छैक, से ग्रामीण मंच केँ नहि छैक। तैँ शहरी मंच केँ ध्यान राखि लिखल नाटक ग्रामीण मंच पर सफल नहि भ' सकैत अछि। नाटककार लोकनि लेल एकटा आरो सलाह अछि उक्त आलेख मे, जे नाटकक प्रकाशन सँ पूर्व ओकर मंचन करब आवश्यक। कारण मंचनक क्रम मे त्रुटि पर बेसी ध्यान जाइत छै, तँ स्वाभाविके जे परिमार्जनक अवसर सहजहि भेटि सकतनि नाटककार सभ केँ। बंगालक नाटककार गिरीशचन्द्र घोषक लिखल अस्सी टा सँ बेसी नाटकक लेल हुनकर प्रेरणा रहलनि हुनकर स्वस्थापित रंगमंच 'नेशनल थिएटर' (पछाति ग्रेट नेशनल थिएटर) वास्तव मे रंगमंच नाटककारक जनक वा प्रवर्त्तक होइछ।
डॉ. अशोक कुमार मेहता जी "मैथिली उपन्यासक विकासक्रम"क प्रसंग लिखैत, आरम्भ सँ बर्ख 2002 धरिक उपन्यास लेखन पर दृष्टिपात कएलनि अछि आ से हिनकर खूब गहींरगर, फड़िछाएल दृष्टिपात बुझाएल हमरा। ई लेख पढ़ैत सभटा स्पष्ट भ' जेतनि पाठककेँ। मैथिली उपन्यास लेखन कोना आरंभिक कालक संकट सँ जुझैत, विगत शताब्दीक दोसर दशक मे जनार्दन झा 'जनसीदन'क उपन्यास "निर्दयी सासु"क संग "शशिकला"क सहारे निर्मित भेल आ समयक संग लोकप्रियताक सीढ़ी चढ़ैत पूर्णत: विकसित भेल, विस्तृत भेल, से सभ किछु फड़िछाएल बुझना जेतनि पाठक केँ। आ एहि तरहेँ मैथिली उपन्यास लेखनक एकटा गौरवशाली सुदीर्घ परम्पराक स्थापना भेल। तदुपरान्त विगत शताब्दीक छठम, सातम आ आठम दशक मे उपन्यास लेखनक परंपरा उत्कृष्टताक शिखर धरि पहुँचल। मुदा शताब्दीक अन्त होइत-होइत कोना संक्रमणक चपेट मे आबि मृतप्राय होइत चलि गेल, से सभ कालकेँ वर्गीकृत करैत बहुत नीक लेख लिखलनि अछि अशोक सर। नीक एहिलेल कहलहुँ, जे लेख कत्तहु उबाऊ नहि लगतनि पाठककेँ। अनावश्यक तत्व एकटा नहि। माने कखनोकाल लेखकेँ सुदीर्घ करबालेल एहि तरहक चूक भ' जाइत छनि लेखकक द्वारा। से नहि देखा पड़ल। आरंभिक काल, निर्माण काल, विकास काल, विस्तार काल आ संक्रमण काल, एहि तरहेँ वर्गीकृत करैत मैथिली उपन्यासक विकासक्रमक उल्लेख कएलनि अछि डॉ. आशोक कुमार मेहता जी। वर्गीकृत सभ कालक महत्वपूर्ण उपन्यासक चर्चा, संगहि संबंधित उपन्यासकारक चर्चा करैत तथ्यात्मक लेख लिखलनि अछि। जाहि सँ सभ वर्गक पाठक लाभान्वित होएताह।
डॉ. दमन कुमार झा जीक लिखल लेख "मैथिली बालसाहित्य : एक अवलोकन"मे बालसाहित्य ओ बाल साहित्य लिखनिहार साहित्यकार संबंधित तथ्य तँ जे अछि, से अछिए। एकटा नब जनतब भेटल जे अरुन्धती देवीक लिखल "मिथिलाक विदुषी महिला" मैथिलीक पहिल जीवनी पुस्तक थिक, जे 1936 ई. मे प्रकाशित भेल अछि। नारी शिक्षा मे सभदिन पछुआएल मिथिला मे 1936 ई. मे महिले द्वारा महिलागणक परिचय युक्त पोथी छपब सामान्य बात नहि छल। ई गौरव जीवनीए साहित्य केँ छैक जे एकर पहिल ग्रन्थक लेखक महिला भेलीह। ई बात बुझि आह्लादित भेलहुँ। बहुत नीक बात कहलनि अछि दमन जी, जाहि सँ हमर अक्षरशः सहमति अछि। जे साहित्यक मुख्य उद्देश्य थिक समाज केँ असत्पथ सँ रोकब तथा सत्पथ पर बढ़बाक प्रेरणा देब। एकर सभ सँ बेसी प्रयोजन नेने केँ छैक, कारण ओकर मस्तिष्क कोरा कागत रहैछ, ओहि पर जैह लिखि देबैक सैह अमिट भ' जेतैक। दोसर गप्प, बाल साहित्यक बीज मुख्य रूप सँ लोकगीत आ लोककथा मे ताकल जा सकैत अछि। मिथिला मे नेनाक लेल अनेक प्रकारक लोककथाक प्रचलन रहल अछि। जेना बगिया बला प्रचलित खिस्सा हमरा मोन पड़ैए। तहिना लोकगीत सभ सेहो नेनाक लेल पारिवारिक आ सामाजिक महत्वक अछि। बहुत रास नेनागीत शैक्षणिक महत्वक सेहो अछि। बालसाहित्यक रचना लेल बाल मनोविज्ञान बूझब आवश्यक छनि रचनाकार लेल। बाल मनोविज्ञान सँ परिचये मात्र नहि, पूर्ण जनतब आवश्यक तत्व छनि बाल साहित्यकार लेल। उपलब्ध बाल साहित्यक चर्चा करैत ई जनतब देलनि अछि लेखक, जे एखन अधिकांश बाल साहित्य पद्ये रूप मे देखबालेल भेटत। मैथिली बालकथा मे अधिकांश अनूदिते भेटत। मौलिक बाल कथा संग्रहक संख्या अत्यल्पे अछि एखनहुँ। तहिना बाल उपन्यास, बाल एकांकी संग्रहक संख्या सेहो संतोषजनक नहि कहल जा सकैए। बाल जीवनी हुअए कि निबंध, संस्मरण, मैथिली बाल साहित्य मे सभ विधाक रचना संख्यात्मक दृष्टिएँ कम तँ अछि। मुदा एहनो नहि जे नगण्ये अछि। समय समय पर बाल पत्रिका सेहो प्रकाशित होइत रहल अछि। बाल पत्रिका मे किछु महत्वपूर्ण पत्रिकाक चर्चा कएलनि अछि दमन जी। जेना शिशु नामक पत्रिका, बटुक बाल पत्रिका, जे सभ सँ दीर्घजीवी पत्रिका भेल। धीयापूता नामक बाल पत्रिका आ नेना-भुटका नामक पत्रिकाक संग बाल-मिथिला, फोल्डर बाल पत्रिकाक चर्चा देखलहुँ दमन जीक लेख मे। कहबाक माने बाल साहित्यक अभाव नहि देखा पड़ैत अछि। आवश्यकता छै उपलब्ध बाल साहित्य केँ देखबाक, गुनबाक, समीक्षक लोकनि केँ एहि दिस ध्यान देबाक।
"मैथिली लोक साहित्य" आलेखक शुभारम्भ प्रेमचन्द्र पंकज जी 'लोक' आ 'वेद' परिपाटीक फड़िछौट करैत कएलनि अछि। आगाँ लोक साहित्यक वर्गीकरण करैत सुस्पष्ट विवरण प्रस्तुत कएलनि अछि। मैथिली लोक साहित्य केँ एहि तरहेँ वर्गीकृत कएल गेल अछि लेखक द्वारा - लोकगाथा, लोककथा, लोकनाट्य, लोकगीत, पिहानी, कहबी आ वचन। लोक साहित्यक सर्वमान्य परिभाषा देब कठिन एवं दु:साध्य कहलनि अछि लेखक। सामान्य जीवनक मुक्ताकाश ओ धरतीक बीच गहन जीवनानुभूति सँ परिपूर्ण गीत, ऐतिहासिक सांस्कृतिक गाथा, पारम्परिक कथा, अनुभव सिद्ध कहबी, बुद्धि मापक बुझौअलि, रहस्यमय मंत्रादि सँ जे लोक सरस्वती अवतरित होइछ, तकरे प्रभावलीक नाम थिक लोक संस्कृति, जकर जाग्रत रूप लोक साहित्यक रूप मे देखाइत अछि, ई कहब छनि प्रेमचन्द्र पंकज जीक। मूल रूप सँ लोक साहित्य, चाहे ओ लोकगाथा हुअए कि लोककथा वा लोकगीत, किंवा कहबी, पिहानी, वचन, सभटा मौखिके परम्परा रूप मे एक युग सँ दोसर युग धरि अपन अस्तित्व बनओने रहल अछि। मिथिलाक लोकसाहित्यक अन्तर्गत मुख्य रूप सँ प्रेम, शौर्य, त्याग, धर्म ओ नीति विषयक वर्णन भेटत। पावनि-तिहार, पूजा- व्रत, देवी- देवता, परी-दानव आदिक अस्तित्व लोककथाक सुदीर्घ परम्पराक कारणेँ बाँचल अछि। समय समय पर किछु गणमान्य द्वारा एहि लोककथा सभक संकलन कएल गेल, जे सांस्कृतिक अध्ययन हेतु एकटा ठोस काज कहल जाएत। अपन मिथिला, लोक साहित्यक मामला मे समृद्ध मानल जाएत। चाहे ओ लोकगीतक बात हुअए कि लोककथाक, लोकगाथा किंवा लोकनाट्य। पिहानी, कहबी तँ सहजहि मिथिलाक पहिचाने अछि। बात बात मे लोक कहबीक प्रयोग करैत रहैए। वचन क बात करी तँ डाक, घाघ, भड्डरी आदिक वचन प्रसिद्ध अछि। आवश्यकता अछि लोक साहित्यक वैज्ञानिक अध्ययन हेतु मौखिक एवं भौतिक सामग्री सभक संकलन कएल जेबाक। एहिलेल योजनाबद्ध प्रयासक बेगरता अछि।
मिथिलाक विविध लोककलाक जनतब दैत एकटा महत्वपूर्ण आलेख अछि ज्योत्सना चन्द्रम् जीक "मिथिलाक लोककला" जाहि मे लोक चित्रकला तँ प्रमुख अछिए, संगहि मूर्तिकला, जनौ कला, बांतर ( एक जाति विशेष) द्वारा बाँसक कमची काटि-छेबि, ओहि सँ ढाकी, पथिया, ढक आदिक निर्माण करबाक कलाक चर्चा सेहो कएलनि अछि। कुम्हारक रंग-बिरंगक बासन आ मूर्ति गढ़ब, लहेरी वर्ग द्वारा बनाओल लहठी मिथिलाक लोककलाक अन्तर्गत आबैत अछि। लोहार वर्गक कला, मिथिलाक वस्त्रकला ( खादीवस्त्र) सभक चर्चा कएल गेल अछि। संगहि एहि लोककला सभक महत्व आ वर्तमान समय मे एहि लोककला सभक समाज मे की-केहन स्थिति-माँग-पूर्ति-संभावना अछि, से सभटा पहलू पर ज्योत्सना चन्द्रम् जी अपन विचार देलनि अछि।
अपन मातृभाषा मैथिली के उपेक्षित होएबाक आन्तरिक पीड़ा देखा पड़तनि पाठक केँ, पंचानन मिश्र जीक लिखल एकहक शब्द मे। झारखण्ड ओ मिथिलाक एवं संस्कृतिक अन्त: सम्बन्ध पर बहुआयामी दृष्टिकोण देखाएल लेखकक। हिनकर आलेख "अबुअ दिशुममे ठौर तकैत मैथिलजन" मे। ठीके कहलनि अछि लेखक, "कहुखन लगैछ ग्लोबलाइजेशनक सर्वाधिक प्रभाव मैथिले पर पड़ल अछि।" मैथिले द्वारा मैथिलीक उपेक्षा, अपन निजत्व बिसरैत जेबाक उपक्रम सँ आहत छथि लेखक। "एहि बिसरबाक व्याधि सँ स्वस्थ करबालेल झारखण्ड मे गहे गहे मैथिली संस्था ठाढ़ जरूर अछि मुदा ओ सभ निर्लिप्त ओ नि:स्पृह भावेँ पएर रोपने अछि" ई कहब छनि पंचानन मिश्र जीक। झारखण्ड मे भोजपुरी आ मगहीक समान मैथिलीक उपस्थिति रहितहु, जागरूकता, चेतना ओ संलिप्तताक अभाव मे हम सभ पछुआएल जा रहल छी, से चिंताक विषय। आ एकर कारण एतबे अछि जे मैथिलीक प्रति हीनता, ग्लानि ओ असंपृक्तताक भाव व्यावहारिक स्तर पर दिनानुदिन बढ़ैत जा रहल अछि। मैथिली भाषा व्यवहार, प्रयोग ओ दिनचर्याक कलेवर सँ तीव्र गतिएँ दूरस्थ भेल जा रहल अछि। किछु आँकड़ा सभ सेहो देल गेल अछि लेखक द्वारा, माने तथ्यपरक, शोधपरक आलेख छनि। जे विद्यार्थी सभलेल उपयोगी सिद्ध हेतनि। झारखण्डक सम्पूर्ण जनसंख्याक अठारह प्रतिशत मिथिला मूल ओ मैथिलभाषी छथि, 1991 क जनगणनाक अनुसार। 1905 मे जॉर्ज ग्रियर्सनक भाषायी सर्वेक्षण मे एखनुक गोड्डा, देवघर ओ साहेबगंज जिला केँ मैथिली भाषी क्षेत्र मानल गेल छल। विरोधाभास एहन जे सर्वाधिक मैथिलीभाषी क्षेत्र मे अवस्थित विनोबा भावे विश्वविद्यालयक अधीन एक्कहु टा महाविद्यालय मे मैथिली विभाग कार्यरत नहि अछि। आइ प्रयोजन अछि मैथिल जागरण ओ मैथिली संस्था सभक क्रियाशीलताक। तखनहि स्थिति सुधरि सकैत अछि।
पोथीमे संलग्न सभटा आलेख स्तरीय अछि, जनतब युक्त लेख सभ, मुदा छपाइ आ कागतक क्वालिटीक मामला मे बड्ड कमजोर! इएह बात मात्र खटकल पोथी पढ़ैत काल। "मैथिली इतिहासक रेखांकन" पोथीक कन्टेन्ट जेहन जबरदस्त अछि, जँ एहि पोथीक प्रकाशन पर किछु अतिरिक्त पाइ लगाओल जाइत, तँ सोन मे सुगंध बला बात भ' जाइत। टाइपिंग मिस्टेक बहुत ठाम अभरल, जे भोजन करैत काल मुह मे पड़ल आँकर सन अनकट्ठल लागि सकैत छनि पाठक केँ। ओना जेहन स्तरीय लेख सभक संकलन अछि ई पोथी, तकरा देखैत मात्र एकटा कमजोर पक्ष, पोथी केँ कमजोर सिद्ध नहि क' सकत। ज्ञानपिपासु ज्ञानार्जन लेल पढ़िए लेताह आ प्रेम सँ पढ़ताह। पोथीक उपयोगिता विद्यार्थी वर्ग लेल तँ सहजहि बड्ड बेसी छन्हिहेँ; सामान्य पाठकक लेल सेहो उपयोगी सिद्ध हेतनि। जे केओ मैथिली साहित्यक परम्परा आ विकास सँ परिचित नहि छथि ओ संक्षेप मे परिचित भ' सकैत छथि, ई पोथी पढ़ि।
एहन स्तरीय पोथी, पाठकक सोझाँ परसबालेल संपादकद्वय श्री चन्द्रेश्वर कर्ण आ श्री हितनाथ झा जीकेँ साधुवाद!! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ५.आशीष अनचिन्हार- स्थानवर्णना, नगरवर्णना, ग्रामवर्णना आशीष अनचिन्हार-संपर्क-8876162759 स्थानवर्णना, नगरवर्णना, ग्रामवर्णना (मिथिलाक संदर्भमे) दक्षिण भारतक संस्कृत साहित्यमे "स्थलपुराण" नामक विषय भेटैत छै जाहिमे कोनो तीर्थ अथवा मंदिर संबंधित जानकरी रहैत छै। संस्कृतक सभ धार्मिक ग्रंथ सभमे तीर्थ एवं नगरक वर्णन भेटिते छै से चाहे संक्षिप्त रूपमे हो वा कि विस्तार रूपमे। तेनाहिते आधुनिक कालमे देशी सरकार एवं विभिन्न संगठन द्वारा स्थानक विवरण सेहो वैज्ञानिक तरीकासँ एकत्र कएल जाइत छै। मैथिलीक विद्वान एवं लेखक डॉ. कैलाश कुमार मिश्र जी संगठन लेल मिथिलाक किछु गामक अध्य्यन केने छथि आ ओकर विवरण आधुनिक ओ वैज्ञानिक तरीकासँ रखने छथि। एहि प्रकारक विवरण संस्कृते नहि हरेक भाषामे भेटैत छै कम वा कि बेसी। मैथिली साहित्य केर बात करी तऽ सभसँ पहिने ज्योतिरीश्वर कृत वर्णरत्नाकरक बात हएत जाहिमे ओ बहुत रास चीजक वर्णन केने छथि। एखन धरि जे वर्णरत्नाकर रूप हमरा सभहक सामनेमे अछि से ओकर खंडित पांडुलिपिक छै। तथापि ओकर प्रथमे कल्लोल (मने पहिल अध्याय) केर नाम छै "नगरवर्णना"। मने एहि कल्लोलमे नगरसँ संबंधित हरेक निर्जीव-सजीव चीजक चित्रण भेल छै जाहिमेसँ अंतिम भागक किछुए वर्णन भेटैत छै, शुरू आ बीचक भाग अनुपलब्ध छै। हमर अनुमान अछि जे अही खंडमे शायद ग्रामवर्णना सेहो रहल हेतै। ई मात्र हमर अनुमान अछि से अनुमान हम अइ लेल कऽ पाबि रहल छी जे जखन ज्योतिरीश्वर पूरा संसारक वर्णन कऽ देलखिन तखन ओ ग्राम वर्णन नहिए छोड़ने हेता। तथापि हम अपन अनुमान लेल वर्णरत्नाकरक बनावट ओ पैटर्न पाठकक सामने राखब। वर्णरत्नाकरक बनावट ओ पैटर्नक बात करी तँ हमरा समझसँ सभसँ पहिने डा. काञ्चीनाथ झा 'किरण' एकर वर्णरत्नाकरक बनावट ओ पैटर्नक बात करैत एहि पोथीकेँ गद्य नहि काव्यग्रंथ मानै छथि। आब हम अही बनावट ओ पैटर्नक बात करैत ई बात राखब जे वर्णरत्नाकरमे ग्राम वर्णना सेहो रहल हेतै। जँ वर्णरत्नाकरक बनावट ओ पैटर्न देखबै तऽ ई सामने अबैत अछि जे जाहि कल्लोलमे जकर वर्णन शुरू भेलै ताहिसँ संबंधित चीजक सेहो भेल छै। हम जे अनुमान कऽ रहल छी तकर आधार ग्रंथ 1998 मे सुनीति कुमार चर्टजी आ बबुआ मिश्र आ साहित्य अकादमी द्वारा पुनःप्रकाशित वर्णरत्नाकर अछि। एहिसँ इतर आनो संपादकक संपादनमे प्रकाशित भेल अछि आ से हमर अपन व्यक्तिगत पुस्तकालयमे सेहो अछि। मुदा दुख जे संगमे नहि अछि। तँइ हम जे अनुमान कऽ रहल छी से यदि हमर अग्रज सभ द्वारा कएल गेल हेतनि तऽ हमर एहि आलेखमे कएल गेल दाबी स्वतः ओहि अग्रज लेल सुरक्षित भऽ जेतनि (हम ई बात तखनो लीखि रहल छी जखन कि हमरा बूझल अछि जे कतिपय लेखक प्रकाशन वर्षकेँ पाछू वा आगू कऽ अपन-अपन व्यक्तिगत हित सधने छथि)। एहि पोथीक दोसर कल्लोल छै नायिकावर्णना ताहिमे नायक, दुर्ग, सखी आदिक वर्णन छै माने नायिकासँ जुड़ल चीजक वर्णन। तेनाहिते हरेक कल्लोलक इएह बनावट छै। तेसर कल्लोल जखन प्रभात वर्णन शुरू होइत छै तकर संगे दुपहर, साँझ, राति, जाड़, गर्मी, वर्षा सभहक वर्णन एकै संग छै। बात अतबे नहि छै, वर्णरत्नाकरक बनावट ओ पैटर्न बहुत महीन छै जेना पाँचम कल्लोकमे वन, उपवन, सरोवर, पोखरि सहित पर्वतक वर्णन सेहो छै मुदा ताहि संगे सातम कल्लोलमे पर्वतवर्णना सेहो छै। मुदा पाँचम आ सातम कल्लोलक पर्वतवर्णना दूनूमे बहुत अंतर छै। वन संगे जे पर्वत छै ताहिमे पर्वतमे वन, गाछ आ ताहिसँ संबंधित वर्णन छै तँ सातममे तीर्ध, नदी संगे पर्वतक नाम सहित वर्णन छै एकर मतलब ई जे वर्णरत्नाकर बनावट ओ पैटर्ने नहि छै बल्कि सुनियोजित आ तार्किक पैटर्न छै। आ हम अपन अही एकमात्र तर्कक आधारपर ई कहि रहल छी जे "वर्णरत्नाकरक पहिल कल्लोल नगरवर्णनामे 'ग्रामवर्णना' रहल हेतै। वर्णरत्नाकरक बाद विद्यापति कृत भूपरिक्रमण केर चर्चा उपयुक्त रहत। ई अछि संस्कृत पोथी मुदा दू कारणसँ हम एकरा महत्वपूर्ण मानै छी पहिल जे एहिमे जनकदेश अर्थात मिथिलाक स्थानक वर्णन सेहो अछि दोसर जे जनकदेशक वर्णन करैत काल गामक नाम सेहो लेल गेल। भने ओ आजुक ग्रामगाथा नै अछि मुदा ग्रामगाथा विधा जँ अपन उत्स वर्णरत्नाकर आ भूपरिक्रमण ग्रंथ सभमे ताकए तँ दिक्कते की छै? ई भूपरिक्रमण कोन विद्यापति केर छनि, सरस गीत बला कि धर्मग्रंथ बला से विवाद शोधकर्ता मध्य हेतनि। डा. काञ्चीनाथ झा किरण एवं गजेन्द्र ठाकुर अलग-अलग विद्यापतिक उपस्थिति मानै छथि। बहुत रास विद्वान गीत बला आ धर्मग्रंथ बला दूनूकेँ एकै मानै छथि। हम ओहि विवादसँ बचि मात्र भूपरिक्रमणपर अपन बात रखने छी। भूपरिक्रमणक बादक संस्कृत ग्रंथ सभमे सेहो तीर्थक उल्लेख स्थान वर्णनक रूपमे अछि। महाकाव्य सभमे सेहो ई स्थान वर्णन पद्य रूपमे आएल अछि। कुल मिला कऽ ग्रामगाथा नामक विधा स्थान वर्णनक एक भाग थिक। अही क्रममे ईहो सूचित करी जे भवनाथ झा जीक एक लेख "मिथिलाक पञ्जी आ ओकर संरक्षणक दिशामे श्री गजेन्द्र ठाकुर" हिसाबें पञ्जी आन सूचनाक संगे तात्कालीन गामक विवरण अछि। ई आलेख हमरे द्वारा संपादित पोथी 'प्रीति कारण सेतु बान्हल' मे संकलित अछि, जे कि मिथिला ओ मैथिलीक संवर्धनमे गजेन्द्र ठाकुर एवं प्रीति ठाकुरक योगदानक आलोचनात्मक ग्रंथ अछि। अंग्रेज एलाक बाद, अंग्रेज अधिकारी सभ द्वारा ठाम-ठामक जे गजेटियर लिखल गेलै से बहुत रास सूचनाक संगे लिखल गेलै। संस्कृत आ मैथिलीक स्थल पुराणमे मात्र तीर्थे कि वन-उपवन-सरोवरक वर्णन भेटत जखन कि गजेटियरमे ओहि ठामक उद्योगसँ लऽ कऽ भौगोलिक बनावट, सामाजिक सांख्यिकी, भौतिक विशेषता, लोकक प्रवृति आदि सभ भेटत। स्वाभाविक रूपसँ एहि गजेटियरक भाषा अंग्रेजी अछि आ बेसी उपयोगी अछि। ओना खंड-खंड रूपमे पाठक उपलब्ध जिला वा स्थानक गजेटियर पढ़ि सकैत छथि तथापि हम बिहार सरकार द्वारा प्रकाशित आ विभिन्न संपादक द्वारा संपादित Bihar district gazetteers सभकेँ पढ़बाक सुझाव देबनि। मैथिलीक आधुनिक कालमे गद्यक प्रचलन बढ़ल आ हमरा जनैत लेख रूपमे निश्चिते गामक विवरण पुरान पत्रिका सभमे प्रकाशित भेल हेतै। एहि ठाम हम अपनाकेँ अक्षम मानै छी जे ओ पुरान पत्रिका सभ हमरा नजरिक सामने अथवा एहन कोनो बेसी रेफरेंस नहि अछि। तथापि चन्दा झाक ग्राम व्युत्पत्ति विचार, महामहोपाध्याय पंडितपरमेश्वर झाक "मिथिला तत्व विमर्श"मे सेहो मिथिलाक किछु गाम, तीर्थक चर्च छै। प्रो.रमानाथ झाक सरिसव महिमा, नामक निबंध सेहो उपलब्ध छै। मैथिलीमे जेहन आ जतेक लेखन पुरनो समयमे भेल छै ताहि हिसाबें निश्चते गामक ऊपर आरो बेसी लिखल गेल हेतै। शोधकर्ता सभसँ आग्रह जे एहि बिंदुपर आर बेसी इजोत देथि। हमरा जहाँ धरि मोन पड़ि रहल अछि भारती-मंडन नामक पत्रिकाक अंक-4 मे भीमनाथ झा द्वारा मधुबनी जिलाक साहित्यकारक परिचय देल गेल रहै (बर्ख मोन नहि पड़ि रहल मुदा 1999 सँ पहिने केर अंक छै ई)। एक तरहें ईहो स्थानगाथा केर नमूना अछि। पोथी आ निबंध दूनू मिला कऽ यदि देखी तऽ हिंदीमे डा. श्रीकान्त झा लिखित चैनपुर गामक इतिहास (2003), प्रकाशित भेल, संगहि 2007 ई.मे विनयानंद झा द्वारा लिखल हिंदीमे मंगरौनी गामक इतिहास सेहो आएल। मैथिलीमे जगदीश मिश्रक 'नवटोलक उत्पत्ति कथा' (2007) प्रकाशित भेल। डा. किशोरनाथ झा क विट्ठो गामक परिचय पोथी रूप मे 2008 ई. मे प्रकाशित भेल। 2010 मे गजेन्द्र ठाकुर अपन उपन्यास 'स॒हस्र॑ शीर्षा॒' मे अपन गाम मेंहथ केर नाम बौद्ध सिद्ध मेहथपासँ जोड़लथि आ बादमे 31 मइ 2014 केँ जखन गजेन्द्र ठाकुर अपन गाम मेहथमे 'सगर राति दीप जरए' केर आयोजन केने रहथि तखन ओकर नाम 'कथा बौद्ध सिद्ध मेहथपा' रखने रहथि। 2015 ई.मे पंडित गोविन्द झाक सात रेखा सात रंग इसहपुर गाथा,रामचन्द्र मिश्र मधुकरक ग्राम गाथा नरूआर,अर्जुन झा निरालाक चिकना गामक इतिहास, केदार काननक सुपौलाख्यान,प्रो.ललितेश मिश्रक हमर गाम (वनगाम) आदि प्रकाशित हेबाक सूचना अछि। हितनाथ झा द्वारा लिखल "कोइलख" (2017), गिरीश चंद्रक लिखल 'शिवनगर ग्रामगाथा' (2017), आ भैरवेश्वर झाक 'लालगंजक इतिहास' (2017) सेहो प्रकाशित भेल अछि। 2018 मे चन्द्रेशक माउँबेहटक गाथा, डा.यदुवंश मिश्रक गजहरा ग्राम, 2019 मे डा.बीरेन्द्र झा रचित दुल्लीपट्टीक इतिहास ग्रंथ, 2019 मे फेसबुकपर मिथिलेश कुमार झा द्वारा "बेनीपट्टी परिसरमे लेखन" नामसँ बहुत रास खंडमे जानकारी देल गेल अछि जे कि स्थानगाथाक नीक नमूना अछि। विदेह 368 म अंक 15 अप्रैल 2023 मे उदयनाथ झा 'अशोक' जीक आलेख 'गामक नामकरण: एक परिशीलन' प्रकाशित भेल अछि जे ग्रामगाथाक शोधकर्ता सभ लेल एकटा नीक स्रोत अछि। बर्ख 2023 मे मणिकांत झा द्वारा संपादित आ विद्यापति सेवा संस्थान, दरभंगा द्वारा प्रकाशित 'मिथिलाक गाम' सेहो एक नीक पुस्तक अछि जाहिमे लगभग 80-85 टा गामक विवरण लेख रूपमे अछि (ओही बर्खक विद्यापति पर्व समारोहमे लोकार्पित)। अही क्रममे गजेन्द्र ठाकुर एवं प्रीति ठाकुरक योगदानकेँ रेखांकित करैत हमरे द्वारा संपादित आ फरवरी 2024 मे प्रकाशित पोथी 'प्रीति कारण सेतु बान्हल' मे सियाराम झा 'सरस' द्वारा लिखल मेंहथ गामक विवरण आएल अछि जाहिमे संपूर्णाताक संग मेंहथ गामक विवरण पाठक लेल देल गेल छै। अगस्त 2024 हि मे विदेश्वर नाथ झा 'विकास' (फेसबुकपर BJ Bikash) द्वारा "बेनीपट्टी 0 KM" नामक पोथी आएल अछि। विदेश्वर बेनीपट्टीमे रहि कऽ पत्रकारिता कऽ रहलाह (इंजीनियरक छात्र रहलाक बादो) तँइ ई पोथी किछु बेसिए तथ्यात्मक हएत से हमरा उम्मेद अछि। अक्टूबर 2024 मे डा. उषा चौधरी द्वारा लिखल 'हमर गामक माटि (पंचोभ ग्राम गाथा) आदि प्रकाशित भेल। 14 नवम्बर 2024 केँ विद्यापति पर्व समारोहमे एक बेर फेर मणिकांत झा द्वारा संपादित आ विद्यापति सेवा संस्थान, दरभंगा द्वारा प्रकाशित 'मिथिलाक गाम खंड-2’ लोकार्पित भेल अछि (ई सूचना विशेषांक प्रकाशित भेलाक बादक अछि जकरा 14 नवम्बरकेँ लेखमे संशोधित कएल गेल)। ओना तऽ मैथिलीक हरेक विधामे एकै समान बेमारी सभ पसरल छै तखन ग्रामगाथा विधा किए छूटल रहत। मैथिली आत्मकथा एवं ग्रामगाथा दूनू विधामे एक समान बेमारी अछि से सभ किछु नीके कहब। आत्मकथामे लेखक मात्र अपन संघर्षे लिखता चाहे ओ उधारीक संघर्ष किए ने हो आ अपन नीचता नुका लेता से नीचता चाहे जगजाहिर किए ने हो। तहिना ग्रामगाथामे सभ अपन गामक नीके लीखै छथि भने ओहि गाममे हजार खरापी किएक ने हो। ई संकेत विधाक हिसाबें उचित नहि। एहि पक्षकेँ देखैत 'प्रीति कारण सेतु बान्हल' मे सियाराम झा 'सरस' द्वारा लिखल मेंहथ गामक विवरण एकटा नीक लेख अछि जाहिमे गामक अधलाहो पक्षकेँ संतुलित रूपे पाठक लग देल गेल छै। एहिसँ इतर हम एकटा आरो बात मानबाक पक्षधर छी, जेना अंग्रेजक लिखल गजेटियर सभमे उद्योग-धंधाक आदिक विवरण छै तेनाहिते ओहन पोथी जाहिमे आर्थिक वा स्थान विशेषक कोनो प्रवृतिक वर्णन हो तकरा हम स्थान गाथा वा ग्राम गाथा विधा मानबाक पक्षधर छी आ एहि हिसाबें हम राम दयाल राकेश (नेपाल) केर अंग्रेजीमे मिथिलाक ऊपर लिखल, शैलेन्द्र कुमार झा द्वारा अंग्रजीमे आर्थिक लेखन, नरेन्द्र झा द्वारा लिखल मैथिलीमे मिथिलाक स्थान विशेषक आर्थिक पक्ष, शिव कुमार मिश्र द्वारा मिथिलाक विभिन्न गामक शिक्षा पद्धति, आ हालहिमे अवनीन्द्र कुमार झाक लिखल अंग्रेजी पोथीकेँ सेहो ग्राम गाथा मानैत छी। एहि ठाम हम पोथीक नाम नहि लीखल। पाठक हमर फेसबुकपर जा कऽ उक्त अंग्रेजी पोथीक विवरण देखि सकै छथि। किछु पोथी विदेहपर सेहो सार्वजनिक छै। एकर कारण ई जे मैथिलीमे लिखल, हिंदीमे लिखल वा कि अंग्रेजीमे लिखल कोनो स्थान गाथा, ग्राम गाथा संपूर्ण नहि अछि। संपूर्ण नहि हेबाक मतलब ई जे कोनो पोथीमे गामक परिचय मात्र अछि तऽ किछुमे ओहि गामक किछु प्रतापी लोकक चर्च तऽ किछुमे गामक किंदवंती सभहक संकलन अछि। तहिना अंग्रेजीमे लिखल पोथी सभमे तथ्य सभ अछि मुदा ओहि स्थान-गामक विषयमे जे सरस बात छै से गाएब भेटत। तँइ मैथिलीक पाठक लेल ग्रामगाथा नामधारी पोथीसँ लऽ स्थानक आर्थिक-समाजिक सभ विषय बला पोथी पढ़ए पड़तनि तखने हुनका लग एक स्थान वा कि एक गामक विषयमे संपूर्ण जानकारी आबि सकतनि। खेदक विषय ई जे ग्रामगाथा कि स्थानगाथा मुख्यतः इतिहास-भूगोल, अर्थ-समाजशास्त्रसँ जुड़ल विषय अछि आ मैथिलीमे एहि विषयपर अधिकांशतः साहित्यकार सभ कलम चलबै छथि, तथापि किछु ने किछु नीक तथ्य आ संकलन आबिए जाइत छै। अतबे संतोषक बात अछि। हम जनैत छी जे एहि आलेखमे आएल सूचना संपूर्ण नहि अछि, बहुत रास निबंध ओ पोथीक नाम छूटल हेतै। पाठक ओ विद्वान सभसँ आग्रह जे छूटल सूचना दऽ एहि आलेखकेँ संपूर्ण बनेबाक दिशामे आगू आबथि। ओना कहबाक तऽ नै चाही मुदा प्रसंगवश कही जे जनवरी 2015 मे फेसबुकपर हम सूचना देने रही जे हम अपन आत्मकथा "हम अनचिन्हार कोना भेलहुँ" केर नामसँ लीखब। तकरा हम अपन पोस्ट रूपमे कहियो काल दैत रहलहुँ। हम अपन एहि आत्मकथामे अपन गामक ऊपर सेहो लिखबाक प्रयास कऽ रहल छी, समाजक ऊपर सेहो। बादमे हम अपना ऊपर लीखब। जते नीक वा कि अधलाह छै से हम दऽ रहल छी, आ से फेसबुकपर सार्वजनिक भेल छै, चोरा-नुका कऽ नहि। मुदा एखन एकरा मात्र सूचना मानल जाए। ई आधिकारिक तखन बनत जखन हम ओकरा लेख रूपमे वा पोथी रूपमे आनब। फेसबुकपर देल गेल पोस्ट सभ पाठक लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकै छथि- आशीष अनचिन्हारक आत्मकथा भाग-1 आशीष अनचिन्हारक आत्मकथा भाग-2 आशीष अनचिन्हारक आत्मकथा भाग-3 आशीष अनचिन्हारक आत्मकथा भाग-4 आशीष अनचिन्हारक आत्मकथा भाग-5 आशीष अनचिन्हारक आत्मकथा भाग-6 आशीष अनचिन्हारक आत्मकथा भाग-7 आशीष अनचिन्हारक आत्मकथा भाग-8 आशीष अनचिन्हारक आत्मकथा भाग-9 आशीष अनचिन्हारक आत्मकथा भाग-10 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ६.श्री विनयानन्द झा-वैदुष्य कल्पतरु कोइलख श्री विनयानन्द झा-संपर्क-8877374666 वैदुष्य कल्पतरु कोइलख कोइलख मिथिलाक एकटा प्रशस्त गाम अछि। यदि हम वर्तमान कोइलखक बात करी तऽ ई बिहारक किछु गाम मे सँ एक अछि जतय विद्या वैभव विस्तारक हरेक शाखा पसरल अछि। आ ई उपलब्धि मात्र उच्चे जाति सभ धरि सीमित नहि अछि जे एकरा मिथिलाक अन्य उच्च जातिक शैक्षणिक रूपसँ निपुण गाम सभक तुलनामे विशिष्ट बना दैत अछि। मिथिलाक आन पैघ गामक विपरीत, एहिमे मन्दिर आ कुण्डक बहुतायत नहि अछि। आन पैघ गामक तुलनामे एहि ठाम पोखरिक संख्या अपेक्षाकृत कम अछि जे सङ्केत दैत अछि जे गामक मुख्य भूमि अपेक्षाकृत ऊँचाइ पर अछि। मिथिलाक बाढ़ि ग्रस्त गाम सभमे, पोखरिक बाहुल्यसँ आवासीय परिसरक ऊँचाइ बढ़बाक संभावना रहैत छै। गाम मे दूटा प्राचीन मन्दिर अछि जे गामक पश्चिम दक्षिण मे स्थित अछि। दुनू मन्दिरक बीच गामकेँ मधुबानीसँ जोड़यवला सड़क अछि। सड़कक उत्तरमे एकटा शिव मन्दिर अछि जकरा स्थानीय रूपसँ "वनखण्डी महादेव" कहल जाइत अछि। यद्यपि गाम मे मंदिरक संख्या जनसंख्याक तुलना मे नगण्य छल, मुदा मंदिर गामक लोकक आध्यात्मिक आ सांस्कृतिक गतिविधिकेँ ओहि तरहेँ आकर्षित नहि कऽ सकल जेना लगक देवी मंदिर करैत छल। कोइलख मधुबनी रोडक दक्षिणमे भद्रकाली मन्दिर अछि जकर मूर्तिकेँ "कोकिलाक्षी" क रूपमे वर्णित कयल गेल अछि आ ई पाल युगक कारी ग्रेनाइटसँ बनल अछि जे गामक "मोनि" (जल-प्रवाह गड्ढा/खाई) सँ निकलैत अछि ("कोइलख" हितनाथ झा द्वारा, प्रियदर्शी प्रकाशन, पटना, 2017, पृष्ठ-18 पर भीमनाथ झा )। भीमनाथ झा आ गामक आन लोकनिक अनुसार, ओहीठामक वासुदेव झा नामक व्यक्तिकेँ भेटलखिन आ हुनका अपन प्रिय देवताक रूपमे स्वीकार केलाह। भीमनाथ झा (ऊपर), दमन कुमार झा (ये मधुबनी है, मधुबनी, 2003, पृ. 30) आ गामक अन्य लोकनिक अनुसार गामक पूर्व नाम वासुदेवपुर छल। बादमे भद्रकाली कोकिलाक्षीक नामपर एहि गामकेँ कोइलख नामसँ जानल गेल। कोकिलाक्षीसँ क्वैलख तखन कोइलख। कोइलखक संस्कृत विद्वान सभ सेहो कोइलखक लेल क्वैलख लिखैत आबि रहल छथि। मुदा कोकिलाक्षीसँ क्वैलखमे परिवर्तित हएब प्रस्तुत लेखकक लेल ओतेक संगत नहि बुझना जाइत अछि जतेक कि संस्कृतविद् सभ द्वारा कोइलखक लेल कोइलखक कृत्रिम संस्कृतकरण कऽ "क्वैलख" लीखब। अर्थात्, संस्कृतक विद्वान सभ 'क्वैलख' एहि लेल नहि लिखैत छथि जे ई एकर प्राचीन नाम 'कोकिलाक्षी' क अपभ्रंश अछि, बल्कि एहि लेल लिखैत छथि जे एकर तत्कालीन नाम 'कोइलख' छल, जकरा संस्कृतमे कृत्रिम रूपसँ 'क्वैलख' क रूपमे कहल जा सकैत अछि। जँ एकर नाम वासुदेवपुरक बाद "कोकिलाक्षी" भेल रहैत तँ संस्कृतक पंडित सीधे कोकिलाक्षी लिखतथि ने कि "क्वैलख"। जेना कि सरिसवकेँ सषर्प लिखल जाइत अछि ने कि सरिषप या मंगरौनी लेल मंगलवनी लिखल जाइत अछि ने कि मंगरवनी। जखन संस्कृतविद् कोइलख लेल क्वैलख लिखैत छथि तँ ई ध्वन्यात्मक रूपसँ कोकिलाक्षीक तुलनामे कोइलखक निकट अछि। जखन कोनो मैथिली 'क्वैलख' क उच्चारण करत तँ ई 'क्वैइलख' होयत। जखन कोकिलाक्षी केर अपभ्रंश "क्वैलख" नै भऽ कऽ "कोइलाक्छी>कोइलखी>कोइलख" हेतै। प्रस्तुत लेखक एहि बातसँ सहमत छथि जे कोइलख कोकिलाक्षीसँ लेल गेल अछि। मुदा एहि बातसँ सहमत नै छथि जे क्वैलख कोकिलक्षीसँ बनल अछि। भवनाथ झा (पटना/रूपौली) द्वारा रुद्रयामलक नाम पर लिखल पाण्डुलिपि कल्याणपुर लग लदौरा (समस्तीपुर) गामसँ प्राप्त भेल छल जाहिमे मिथिलाक किछु देवस्थलक वर्णन अछि। एहिमे भगवतीपुरक भुवनेश्वरक बाद कोइलखक भद्रकाली कोकिलाक्षीक रूपमे वर्णित छथि। "हुनकर (भुवनेश्वरक) दर्शन कऽ ओहिठामसँ उत्तरमे कोकिलाक्षीक पूजा करू। ओहिठाम भद्रकालीक रूपमे एकटा सौम्यरूपा देवी छथि जे तीनू लोककेँ कल्याण करऽ वाली छथि" दृष्ट्वा ततोप्युदीच्यां वै कोकिलाक्षीं च पूजयेत्। भद्रकालीं सौम्यतरां त्रैलोक्यत्राणकारिणीम्।। भद्रकालीक एहि मन्दिरक पश्चिममे कमला नदीक एकटा मृत धारा अछि जकरा लक्ष्मणा सेहो कहल जाइत अछि। एकर पश्चिममे मोतीपुर टोल अछि, जे एकटा छोट-छोट बस्ती अछि जाहिमे बेसी लोक बसैत छथि जे समयक सङ्ग मुख्य बस्तीसँ पलायन कऽ गेल छलाह। एकर पश्चिममे फेरसँ कमलाक प्राचीन मृत धारा अछि। मंदिरक पश्चिममे मोतीपुर टोलाकेँ छोड़ि आन कोनो दिशामे कोनो प्राचीन बस्ती नहि अछि। मंदिरक उत्तर आ दक्षिणमे कोनो प्राचीन आवासीय क्षेत्र नहि अपितु बाध (कृषि भूमि) आ गाछी अछि। मन्दिरक ठीक पूर्वमे एकटा छोट कुण्ड अछि। एहि कुंडक पूर्वमे एकटा सड़क अछि जे उत्तरमे ग्रामीण क्षेत्र दिस जाइत अछि आ पूर्वमे गाम स्थित अछि। ई सड़क दक्षिणमे पोखरिक दक्षिण-पूर्वी भागक समीप पूर्व दिशामे जाइत अछि आ जकर उत्तरमे मुख्य कोइलख बस्ती अछि। भगवतीस्थान स्थित एहि कुण्डक पूर्व सड़कक पार एकटा विद्यालय आ एकर मैदान अछि, तकर बाद सरकारी अस्पताल, पुस्तकालय आदि अछि। विद्यालय परिसरक उत्तरमे खादी भंडार अछि आ एकर उत्तरमे एकटा ब्राह्मण परिवार आ ओहि परिवार द्वारा बसायल किछु आन जातिक आवासीय परिसर अछि। मन्दिरक पूर्व आ उत्तर-पूर्वमे उपरोक्त सभ निर्माण बीसम शताब्दीक पूर्वार्द्धक अछि। एकर मतलब ई अछि जे बीसम शताब्दी सँ पहिने एहि दूटा मंदिरक लग कोनो बस्ती नहि छल आ एकर निर्माण निर्जन स्थान पर कैल गेल छल। ऊपर वर्णित वनखण्डीनाथ महादेवक पुरातात्त्विक अध्ययन भवनाथ झा (कोइलख, पृ. 121-22) कयने छथि। एहिमे दूटा शिवलिंग स्थापित अछि। मिथिलामे समाधि पर शिवलिंग स्थापित करबाक प्रथा अछि। दूटा शिवलिंगकेँ एक सङ्ग रखलासँ लेखककेँ ई प्रतीत होइत अछि जे ई कोनो धनी दम्पतिक समाधि पर बनल मन्दिर अछि। लेखकक अनुसार दुनू मन्दिरक स्थापना काल चौदहम शताब्दीक बादक मानल जा सकैत अछि किएक तँ उपलब्ध स्रोतक आधार पर कोइलख गामक उत्पत्तिक काल चौदहम शताब्दीसँ पहिनेक नहि मानल जा सकैत अछि। कोइलखक ज्ञानी आ प्रतिभाशाली लोकक उपलब्धिक गणना तारा गनबाक जकाँ अछि। एहि गामक विद्वान सभक उपलब्धि आ एतऽ के शैक्षणिक-सांस्कृतिक संस्थानक गतिविधि पर हितनाथ झाक ग्रन्थ "कोइलख" मे सुन्दर भाषा मे विस्तार सँ वर्णित अछि। तेँ एकर पुनरावृत्ति अर्थहीन अछि। कोइलखमे, जतय कवि काशी कान्त मिश्र कवि चूड़ामणि बनलाह, ओतहि कथाकाशमे धूककेतु चमकैत छलाह। जहाँ न्यायशास्त्रमे उन्नैसम शताब्दीमे राजा झा सन विलक्षण न्यायविद छलाह, बीसम शताब्दीमे न्यायमूर्ति सौम्य सच्चिदानन्द झा जे मधुबनी शहरक साहित्यिक सांस्कृतिक जीवनक हृदयगति छथि। जहाँ मनोज मनुज एकटा प्रभाविष्णु कलाकार छथि, ओतऽ नरेन्द्र झा सन होनहार अभिनेता अपन छोट जीवनमे रजत पटल पर अमिट छाप छोड़लनि। जहाँ मोहन झा सनक बहुजन हितायक प्रति वचनबद्ध यायावर भूदान कार्यकर्ता छलाह, ओतहि शोभकान्त आजाद एहन नेता छलाह जे अपन जीवन समाजक सेवामे समर्पित कऽ देने छलाह। एहि गामकेँ गंगादेवी (रानी चन्द्रवती) केर जन्मस्थल हेबापर गर्व अछि, जे अवयस्क अवस्थामे विवाह आ वैधव्यक प्राप्ति भेलाक बादो दुखसँ अविचलित रहि कऽ कोइलखसँ काशी धरि अनेक धार्मिक आ शैक्षणिक संस्थानक जननी आ कीर्ति ध्वजक वाहक छथि। ने केवल रानी चन्द्रवती सन बेटी सभ अपितु पुत्रवधू सभ सेहो विभिन्न क्षेत्रमे उत्कृष्टता प्राप्त कयने छथि, जाहिमे गौरी मिश्रा, वाणी मिश्रा, कुसुमलता देवी आ फुलेश्वरी देवी उल्लेखनीय छथि। आजुक मैथिली साहित्यक चर्चा करैत छी तँ जहाँ भीमनाथ झाक व्यक्तित्व शालीनताक सागर सन गहींर अछि, ओतहि हुनक साहित्य माउंट एवरेस्ट अछि। हुनक पुत्र दमन कुमार झा सेहो अपन लेखनसँ बौद्धिक जगतमे अपन विशिष्टता स्थापित कयलनि, जाहिसँ हुनक कुलक मर्यादा मे वृद्धि भेल। गामक प्रगतिक लेल कोइलखक विश्वकर्मा समाजसँ निकलल विलायत निवासी मोतीलाल ठाकुरक महान योगदान सराहनीय अछि। कोइलखक प्रत्येक परिवार थोकमे समाजकेँ विभूति प्रदान करैत अछि। एतऽ मात्र दू टा उदाहरण अछि। नाहस मूलक पण्डितप्रवर उमादत्तक तीनटा पुत्र छलाह, राजा, अपूछ आ खुद्दी जे क्रमशः न्याय, ज्योतिष आ व्याकरणमे अपन समयक अग्रणी विद्वान छलाह आ एहि धर्मग्रन्थ सभ लेल कोइलखक अन्तिम महामनीषी छलाह। एकहि वंशक गोवर्धन झाक तीनटा बेटा सेहो छल, दूटा आई. पी. एस. आ एकटा प्रोफेसर/प्रिंसिपल, सङ्गहि एकटा पोता आई. ए. एस.। सोदरपुरिए मूलक बबुआजी (श्रीकृष्ण) मिश्राक बेटा आ पोता इंजीनियर, डॉक्टर, प्रोफेसर, प्रशासक आ राजनेता बनि गेलाह, जे सभ उच्च श्रेणीक छलाह। बबुआजी मिश्रा स्वयं उच्च कोटिक ज्योतिषी छलाह आ कलकत्ता विश्वविद्यालय मे मैथिलीक प्रोफेसर के रूप मे खुद्दी झाक उत्तराधिकारी बनलाह। सुनीति कुमार चटर्जीक सङ्ग ओ वर्णरत्नाकरक पहिल संस्करणक सम्पादन कयलनि। हुनक पुत्र सभमे भवनाथ मिश्रा बिहारक शीर्ष चिकित्सक छलाह। बबुआजी मिश्राक इंजीनियर पुत्र अनिरुद्ध मिश्राक पुत्र मोहन मिश्र सेहो चिकित्सामे उच्च श्रेणीक चिकित्सक छथि जे कालाजार नामक बिमारीक क्षेत्रमे अपन विशेष योगदानसँ बिहारकेँ गौरवान्वित कयने छथि। बबुआजी मिश्राक दोसर पुत्र हरिनाथ मिश्र अपन राजनीतिक कुशाग्रता, शुद्धता, शालीनता आ कौशल जे प्रदर्शन केलनि से विरल अछि। एहि क्रममे बेलौंचे काको मूलक बंधुद्वय उमानाथ झा आ रमानाथ झाक नाम लेल जा सकैत अछि जे क्रमशः अभियान्त्रिकी आ प्रशासनिक क्षेत्रमे अपन दक्षताक प्रदर्शन कऽ गामकेँ गौरवान्वित केलनि। रानी चन्द्रावतीक भाइ पण्डित गीतानाथ झाक पुत्र वीरेन्द्र नाथ झा स्वयं एकटा बहुआयामी प्रतिभा छलाह जकर व्यक्तित्वसँ गामक लोक एवं हुनक हित-अपेक्षित चमत्कृत केने छल। हिनक सब बेटा विभिन्न सेवामे अपन योगदानसँ गाम आ नाहस कुलक नाम प्रशस्त केलाह। हुनकर जेठ बेटा प्रभात कुमार झा अपन पढ़ाइक समयमे एक शानदार, मृदुभाषी, मित्र अनुरागी व्यक्ति छलाह, सङ्गहि अपन बीमा कंपनी के सेवा के दौरान एक कुशल प्रशासक आ एक कुशल पॉलिसी निर्माता सेहो छलाह। हुनकर आकर्षक व्यक्तित्व, वाक्पटुता, आ नीक स्वभाव हुनका कार्यालयक आन कर्मचारी आ सेवा प्राप्तकर्ता सभ लेल प्रिय बना देलक। हम कोइलखक प्रारम्भिक विद्वान सभक उपलब्धिक विषयमे पर्याप्त जानकारी नहि रखैत छी। उन्नैसम शताब्दी के उत्तरार्धक विद्वान मुख्य रूप सँ एहि लेल जानल जाइत छथि कि पहिनेक दू पीढ़ीक वयोवृद्ध लोक मे एहन बहुत लोक छलाह जे हुनका देखने या सुनने छलाह। एहनमेसँ किछु व्यक्तित्वक उल्लेख ऊपर कयल गेल अछि, शेष किछु प्रमुख नाम निम्नलिखित अछि- मित्रकर झा, लुट्टी झा, गिरिधारी झा, वाणी झा, काशीनाथ झा, शिवनंदन ठाकुर, इन्द्रनाथ झा, पं. बबुए मिश्रा, पं. डोमाई मिश्रा, श्रीकांत ठाकुर विद्यालंकर, वेदानंद झा, कार्तिकेय झा, जयदेव मिश्रा, योगानंद झा, सुन्दरकांत झा, दमनकांत झा, गोवर्धन झा, मिहिर कुमार झा, शंकर कुमार झा, सुधीर कुमार झा आदि। एहि लोक सभक उपलब्धि आ योगदानक लेल हितनाथ झाक पुस्तक "कोइलख" देखल जा सकैत अछि। यद्यपि एहि पुस्तकक लेखक स्वयं एकटा बैंक कर्मचारी छलाह, मुदा मैथिली साहित्यमे हुनकर योगदान महत्वपूर्ण अछि। हुनकर लेखन शैली सरल, स्पष्ट आ प्रभावी अछि। झारखण्डमे मैथिली साहित्यक प्रसारमे हुनकर योगदान सराहनीय अछि। ओही कोइलख पुस्तकक परिशिष्टमे दमन कुमार झा गामक साहित्यकार, कलाकार आ विद्वानक सेहो उल्लेख कयने छथि, जाहिमे नव पीढ़ीक उभरैत व्यक्तित्व सेहो शामिल अछि। एहि सूचीक आधार पर ऊपर वर्णित किछु प्रमुख नाममे बालकृष्ण झा, अरुण कुमार झा अरुण, विद्यापति ठाकुर, कामेन्द्रनाथ झा 'अमल', विद्यापति झा, लक्ष्मीनारायण चौधरी, हरेकृष्ण झा, श्रीनारायण झा, राजेन्द्रनाथ झा, अमरनाथ मिश्रा, हीरेन्द्र कुमार झा, प्रफुल्ल कोलाख्यान, निशांत चौधरी, संजय कुन्दन, शुभेंदु शेखर, अंशुमन सत्यकेतु आ मिहिर झा विदेह छथि। हितनाथ झा (उपर्युक्त, पृष्ठ 24, अठारहम शताब्दीक न्यायविद कृष्णदत्त झाक वर्णन करैत छथि जे 1730 ई.मे जन्मल छलाह आ 1825 मे 95 वर्षक आयुमे हुनक निधन भऽ गेल छलनि। हुनक तीनटा शिष्यक नाम हितनाथ झा द्वारा बच्चा झा, बबुआ झा आ चुम्बे झाक रूपमे देल गेल अछि। एतऽ हितनाथ झाकेँ गलत जानकारी देल गेलनि किएक तँ बच्चा झाक जन्म मार्च 1860 मे भेल छलनि। बबुआ झा आ चुम्बे झा सहोदर भाइ छलाह। चुम्बे झा आ बच्चा झा समकालीन आ मित्र छलाह आ दूनू बीच अभेद मित्रता छलनि। बबुआ झा चुम्बे झाक पैघ भाय छलाह मुदा उम्रमे अतबो अंतर नहि छलनि जे ओ पैघ नहि छलाह जे 1825 मे मृत कृष्णदत्त झाक शिष्य बनि सकथि। दमन कुमार झा, मासिक पत्रिका बटुक (प्रयाग, मई, 1965)मे मार्कण्डेय झा गोस्वामी द्वारा लिखित कोइलखक75 विद्वानक सूचीकेँ कोइलख पोथी (पृष्ठ 193) आ 'ये मधुबनी है', पृष्ठ-31) पुनः प्रस्तुत केलनि अछि। एहि सूचीक अधिकांश विद्वानपर कोइलख नामक पुस्तकमे प्रकाश नहि देल गेल अछि। (फेसबुकसँ साभार, मूल आलेख हिंदीमे छल, जकरा लेखकक सहमतिसँ विदेह लेल मैथिली अनुवाद भेल। ई अनुवाद मूलतः AIbharat केर मशीनी अनुवाद अछि जाहिमे जे किछु गलती भेटलै से विदेह लेल आशीष अनचिन्हार दवारा संशोधित भेलै। ई अनुवाद मूल जकाँ गंभीर नहिए रहि गेल अछि तथापि लेखकक भावना पाठक धरि पहुँचिए जेतनि से उम्मेद अछि) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ७.डा.धनाकर ठाकुर-कोइलख डा.धनाकर ठाकुर-संपर्क-9430141788 कोइलख श्री हितनाथ झाक स्वग्रामगाथा "कोइलख" देखबाक आइ सुअवसर भेटल। अपन मातृक आ बहिनक सासुरक कारण भूला-चलता आकर्षण पहिनहिसँ छल। कोइलख मिथिलाक किछु मुख्य गाममे एक अछि जतय पांडित्यक परम्परासँ आधुनिक अंग्रेजी शिक्षणमे संक्रमणसँ व्युत्पन्न अनेकानेक विभूति पर केन्द्रित ई पोथी अपन संकलन लेल साधुवादक पात्र अछि। कोईलख पर केन्द्रित अनेक लेख सेहो यैह प्रतिबिंबित करैत अछि जाहिमे दमन कुमार झाक लेख पुस्तकसँ अधिक जतय परिपूरित अछि सुमनजीक कोईलखक अनुभव बनबैत अछि कियैक कोइलख उदाहरणीय जाहि भाव पर पुस्तक बढैत त कोनहु गाँव लेल ई संग्रहणीय पोथी होइत प्रेरक त अछिए। साहित्य अकादमी पुरस्कारप्राप्त मैथिलीक सिपाही भीमनाथ झा पर पन्ना नहि होएब पुस्तकक अपूर्णता दिस संकेतक भनहि ओ लेखकक अग्रज नाते पक्षपात डरे छोड़ि देल गेल वा हुनक लेखों सम्पूर्ण कयल गेल हो। बबुआजी मिश्रक 1918 मे ब्रजमोहन ठाकुरक संग कोलकाता विश्वविद्यालयमे मैथिली अनबाक चर्चा अयबाक छल। रानी चन्द्रावतीक अलावे हमर माए सन अनेक आओर कोइलख बेटी पर ध्यान जेबाक छल। गामक आँकडा गामक परिचय लेल पर्याप्त आमुख नहि बनबैत अछि। कोइलख सामाजिक जीवनमे अवदान जेना एक संगे बरियातीक संगहि मिथिला - मैथिलीक अस्मिताक रक्षा लेल अवदान पर चर्चा अयबाक छल। एहन-एहन किछु कमी रहितहुँ लेखक प्रशंसाक अधिकारी जे प्रयासमे रहितहुँ हुनक मोनमे बसल गाम पृष्ठ पर उतरि चुकल अछि। ओना त कोइलखमे दू टा जीरो माइल अछि एकर आ कहुत सभ किछुक केन्द्र अछि भगवती स्थान। हितनाथ झाक गाँव पर लिखल 210 पृष्ठक पोथीक आवरणकें ओ देखेबाक छल किन्तु ई रहि गेल देखबैत अन्तहीन बाट miles to go before I sleep जकाँ गिनबैत नामी-गिरामी लोक आ सभा-समितिक चर्चा। जे पढताह ई पोथी पकड़ि लेताह संस्कृताह आ अंग्रेजिया दूनू जीरो माइल। 1835क मेकालीय शुरू भेल कुशिक्षा दू पीढ़ीकेँ अवरोध रहितहुँ शेष पड़ि गेल आ ओ संस्कृत पीठ बिला गेल जे एकहि समय शताधिक महामहोपाध्य रखैत छल। ई गाम कोनो तरहेँ आन जकाँ श्रेय लैत रहल से बात अलग। हरिबाबू मंत्री भेलाह शोभाबाबू आजादहिं रहि गेलाह गाम धरि सीमित। सूचीबद्ध सूचना कोनहुँ गाम लेल ईर्ष्याक बात तें हम एहि गामहिंक दू पोल लेलहुँ जे प्रतीक अछि। जे एहेन विद्वानलोकनिक गाम ओकर साक्षरता मात्र 59.70%। गनाओल बड़का लोकमे केवल वीरूबाबू गामक भेलाह। भारतक गाम टूटत त की कोइलखहुँक बाँचत। उमापतिक गाम सुमनसँ योगानन्द मधुप भीमनाथ तक उत्पन्न केलक मैथिलीक ग्रहणक समय 'प्रभात' किन्तु की प्रभात भेल? 1933-34 दू साल भरिमे कीर्तिमान स्थापित कएलक आ कालकलवित भेल जेना आन सैकड़ों मैथिली पत्रिका। कारण हितनाथजी नहि ताकि पओलाह किन्तु अमरजी लिखने छथि (ओहि आसपास) 1936 मे ओड़िशा प्रान्त गठित भेल त करीब 150 ओड़िया पत्रिका निकलय लागल (आ चलियो रहल छै) हमहूँ त ओहि कोइलखसँ 17.10.1993 सँ पदयात्रा शुरू केने छलहुँ मैथिलीक रक्षा लेल वृद्ध मोहन भूदानी आ बालक संजीव ठाकुर मात्र हमरा सन बलिक छागर सन संग राँटी तक गेलाह। ओहि दिन गामक चारि पाँच सौ लोक दुर्गापाठ छोड़ि दोसर गाम तक आ ओहि गामक दोसर तक त ई पोथी हितनाथजी नहि दोसर प्रान्त वा देशक आबि एहि जीरो माइल सँ लिखैत। जे छथि सभ जएताह ज़नाब, मर ममिऔत नरेंद्र कुमार झा किन्तु अहाँक ई पोथी रहि जायत। हमरा पता अछि अनेक गाम लिखलन्हि आ लिखि रहल छथि किन्तु सब जोड़लहिं मिथिला नहि होयत यदि सभ मिथिला लूल नहि हेतैक नीलकंठ तकैत सीमोल्लंघन करैत पूजित सन्नध शस्त्र छुपाओल शमीवृक्षसँ उतारल चाही जे बतौनाइ कोनहु एहन कोनहु पोथीक युगधर्म। भीमनाथजी अहाँक अग्रज भेलाक कारण 42म क्रममे नहि आबथि से लेखकीय धर्मक विरूद्ध (यैह बात डा. गणेश्वर झा हमर अपन बहिनोइकें कोनहु एहन क्रममे हमर नाम छोड़य पर कहने छलखिन्ह)। लेखक काफी श्रम कय उत्तम प्रस्तुति कयलन्हि जे मैथिलीक विकासक अनेक महत्वपूर्ण आयाम सक्षित केलक अछि तें ई सभ लेल पठनीय। (फेसबुकसँ साभार) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ८.डॉ कैलाश कुमार मिश्र-सारस्वत परिचायिका-कोइलख डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- संपर्क-8076208498 सारस्वत परिचायिका:कोइलख भारतीय परम्परा गामक परम्परा थिक। हमरा लोकनि आइ शहर आ महानगर दिस भागि रहल छी। ओतहि बसि जाइत छी। मुदा महानगरोक जीवनमे गामकेँ तकैत छी। ओतहु गामेक स्वरूपकेँ देखि कs जीबैत छी। कोनो पाबनि-तिहार अथवा उत्सव गामे जकाँ मनबैत छी ,गामेक स्मरणमे लीन भs कs मनबैत छी। आखिर की छैक गाममे ? की छैक ओकर उत्सव ? गाम आइयो कियैक एतेक प्रासंगिक लगैत अछि ? हम लगभग तीस वर्षसँ मानवशास्त्रक छात्र-रूपमे , गामकेँ बुझवाक प्रयास कs रहल छी। जहिया कहियो गाम जाइत छी ,सिखबाक हेतु जाइत छी। गामक प्रत्येक व्यक्ति हमरा लेल कोनो यूनिवर्सिटी प्रोफेसरसँ कम नहि छथि, अपितु अधिक छथि। ओ किताबी बात नहि ,अपितु जीवनक अनुभव ,गामक परम्परा ,इतिहास आ विशेषता इमानदारीसँ कहैत छथि। ओ कथा वाचक नहि ,यथार्थ विवेचक होइत छथि। हम बुझैत छी - प्रत्येक गाम एक स्वतंत्र इकाइ थिक। ओ सर्वसम्पन्न अछि। किछु गोटा गामक अध्ययनकेँ रोमांचित बना दैत छथि। ई ओना देखबा , सुनबा आ पढ़बामे नीक लगैत अछि ,किन्तु यथार्थसँ दूर होब ' लगैत अछि। हम मुदा गामकेँ गामेक नजरिसँ देखs चाहैत छी। एही कड़ीमे एक नाम थिक हितनाथ झाक। ओ बैंक अधिकारी रहल छथि। मधुबनी जिलाक कोइलख गामक निवासी छथि। विद्वान पिताक सन्तान थिकाह। साहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ सम्मानित डॉ0 भीमनाथ झाक अनुज थिकाह। मैथिली भाषा-साहित्य , इतिहास आ कलामे गंभीर अभिरुचि रखैत छथि। हिनका अपन गाम ,ओहि ठामक लोकक इतिहासपर गर्व छनि तथा तकरा ओ संसारकेँ अवगत करबs चाहैत छथि। कोइलख ऐतिहासिक समयसँ आइ धरि सभ क्षेत्रमे अपन सन्ततिक योगदानसँ यशक भागी रहल अछि। शिक्षा आ विकासक कोनो क्षेत्र प्रशासन ,पुलिस ,न्याय ,तंत्र,व्याकरण ,गणित ,ज्योतिष ,चिकित्सा ,अभियांत्रिकी ,साहित्य ,संतपरम्परा, राजनीति ,सामाजिक कार्य आदिमे एहि गामक लोकक अभूतपूर्व योगदान रहल अछि। एहि दृष्टिसँ कोइलख सन्तानगर्भा रहल अछि। एही उद्देशसँ लगभग साल भरिसँ सामग्री एकत्र करबामे ओ लागि गेलाह ,जकरा 210 पृष्ठक पोथीक रूप देलनि। पोथीक नाम थिक -कोइलख। एहि पोथीकेँ चारि भागमे बाँटि कs पढ़ल जा सकैत अछि -कोइलखक पूर्व ख्यातिप्राप्त सन्तति, वर्तमान ख्यातिप्राप्त सन्तति ,कोइलखमे कार्यरत संस्था एवं संगठन तथा परिशिष्ट। परिशिष्टमे छौ विद्वानक लेख संकलित अछि। सभ कोइलखसँ सम्बद्ध अछि। ओकर वाचन आनन्द दैत अछि। सभमे ज्ञान अछि ,कोइलखक महिमा अछि। कतहु अतिशयोक्ति नहि अछि। पोथी पढ़बा काल लागत जे प्रत्येक पाठक जेना कोइलखेक होथि ,जे लेखकक भावनाक संग स्वयंकेँ जोड़ने चलैत छथि। एहि गाममे पुरुष तँ एकसँ एक धुरंधर भेवे कयलाह अछि , महिला सेहो अनुकरणीय छथि। विशेष रूपेँ दू महिला - रानी चन्द्रावती तथा श्रीमती गौरी मिश्रक उल्लेख एहि बातकेँ प्रमाणित करबा लेल पर्याप्त अछि जे ई गाम सभ क्षेत्रमे आगाँ रहल अछि। एक बात जे मनकेँ दुखी करैछ से ई जे एहन पैघ गाम ,एहन प्रजातांत्रिक गाम ,एहन ऐतिहासिक गाम थिक कोइलख ,तथापि ब्राह्मण छोड़ि आन जातिक कोनो व्यक्ति सफलताक झंडा कोनो क्षेत्रमे कियैक ने गाड़ि सकल छथि ? एहि विषयपर चिन्तन आवश्यक अछि। एहिमे सुधार करबाक शीघ्र आवश्यकता अछि। यद्यपि श्री मोतीलाल ठाकुर एक मात्र दुर्लभ रत्न थिकाह जे बरही जातिसँ छथि। नेनेसँ पढ़बामे संस्कारी रहथि। काका हिनका पढ़ोलनि। इंजीनियर बनलाह। फेर इंग्लैंड चल गेलाह। किछु दिन नौकरी ,फेर अपन व्यवसाय शुरू कयलनि। संसारक अनेक देशमे हिनक व्यवसाय पसरल छनि। NRI बनि गेल छथि , तैयो गामसँ लगाव छनि। गामक अनेक प्रकारक सामाजिक कार्यमे संलग्न रहैत छथि। आब दू महिलाक विषयमे। पहिल महिला कोइलखक पुत्री थिकीह , दोसर पुतोहु। हितनाथजी द्वारा दुनू महिलाक उल्लेख नीक लागल। हुनक मनमे महिलाक प्रति सम्मान छनि ,तकर तकर परिचायक ई थिक। रानी चन्द्रावतीक नैहरक नाम गंगा छलनि। हुनक विवाह बनैली (पूर्णिया)क राजा पद्मानंद सिंहक पुत्र कुमार चंद्रानंद सिंहसँ भेलनि ,ताहिसँ हिनक नाम चन्द्रावतीक रूपमे परिवर्तित भs गेलनि। ई जखन पन्द्रहे वर्षक छलीह तखने पतिक निधन भs गेलनि। किन्तु ई धैर्यशीला बनलि रहलीह आ अपन योग्यता ,कार्य-कुशलता , चतुरता एवं इच्छाशक्तिक बलपर राजकाजक संचालन सफलतापूर्वक करैत रहलीह तथा यशक भागी बनलीह। कोइलखमे फ्री मिड्ल स्कूल ,मायक नामपर पोखरि ,पिताक नामपर मन्दिरक निर्माण ,देवघर ,भागलपुर ,विंध्याचल आ काशीमे अनेक कीर्ति कयलनि। हिनक काजसँ प्रसन्न भs वाइ-सराय हिनका रानीक सम्मानसँ सम्मानित कयने छलाह। दोसर महिला श्रीमती गौरी मिश्र अपन चिकित्सक पतिक संग विदेश गेलीह ,ओतयसँ डिग्री हासिल कयलनि। मिथिला पेंटिंग आ कलाकार लेल कयल गेल हिनक योगदानकेँ के नहि जनैत अछि ? एहि प्रकारेँ पारिजात-हरणक रचयिता म.म.उमापति उपाध्यायसँ लs कs पद्मश्री डॉ0 मोहन मिश्र तथा सिनेमा आ थियेटरक दुनियाँमे नरेन्द्र झा धरिक यशोगान आ कृतित्वसँ कोइलख गाम यशक भागी बनैत रहल अछि। ज्ञानक परम्परामे संस्कृत विद्वानसँ आरम्भ भs कs संस्कृत वाङ्गमयक विभिन्न शाखा-उपशाखा -न्याय ,दर्शन ,धर्मशास्त्र ,व्याकरण ,ज्योतिष ,तन्त्र ,वेद आदिपर झंडा गाड़ैत मैथिली ,अंग्रेजी ,विज्ञान सभ विषयमे एहि गामक लोक निष्णात होइत गेलाह अछि एवं कोइलख गौरवमय होइत गेल। हितनाथ झाक बैंक अधिकारी होयब सेहो एहि पोथी लेल नीक साबित भेल। कोना ? से एना जे ई प्रत्येक व्यक्तिसँ संबंधित सूचनाकेँ बहुत संक्षेपमे , तथ्यपरक आ ईमानदारीसँ वर्णन कयने छथि। पाठककेँ एको शब्द बेसी अथवा विषयक सीमासँ बाहर नहि लगैत छैक। कविचूड़ामणि काशीकांत मिश्र मधुप सेहो मूलतः एही गामक वासी छलाह। प0 सुरेन्द्र झा सुमनकेँ कोइलखक सम्बन्धमे पढ़ि कs गामक प्रति सहज प्रेम होबs लगैत छैक। कोइलखमे आठ मन्दिरक संग मस्जिद आ ईदगाह सेहो अछि। जल -प्रबंधनक हेतु एकैस पोखरि अछि। स्कूल ,पोस्टऑफिस सभ अछि। 8648 लोकक आवादीवाला गाम 1937 परिवारमे विभक्त अछि। कोइलख सन गाममे 59.70 प्रतिशत साक्षरता चिन्ताक विषय थिक। आबो जँ एहि ठामक लोक चाहथि तँ एहि स्थितिकेँ ठीक कs सकैत छथि। कोइलखक प्रसंग लिखैत डॉ0 भीमनाथ झा कहैत छथि - " सैकड़ो वर्ष पूर्व गामक पश्चिम होइत बहैत लक्ष्मणा नदी लग कोइला मोनिक खोदाइ करैत काल बौद्धकालीन करिया ग्रेनाइट पाथरक अष्टभुजी ,अद्भुत भंगिमावाली ,लगभग तीन फीटक भद्रकालीक जीवन्त मूर्ति उखड़ल जे गामक सिद्धपुरुष प0 वासुदेव झाक इष्टदेवीक रूपमे मान्य भेल। हिनक अथवा कोनो पूर्वक वासुदेवक नामपर गामक नाम " वासुदेवपुर " छल ,जे पछाति कोकिलाक्षी (भद्रकाली)भगवतीक नामपर क्वैलख भेल आ बादमे कोइलख भs गेल। डॉ0 भीमनाथ झाक कथ्यसँ बहुत किछु करबाक स्कोप बनैत छैक। एहिमे बज्रमान बौद्धिक प्रवेश भs जाइत अछि। कहब अनुचित नहि होयत जे कोइलाबीर मलाहक देवता छथि ,तंत्रक देवता छथि। भगवती कतहु बौद्धतंत्रक देवी तँ ने थिकीह ! किन्तु ई शोधक विषय थिक। कोइलखक महिमा अनन्त अछि। एहि गाममे बहुत किछु भेलैक अछि आ आगाँ बहुत किछु करबाक प्रयोजन छैक। ई गाम ऐश्वर्यशाली आ गुणी अछि। एहि ठामक विद्वान आ सम्पन्न ग्रामीण उत्तम काज बिना कोनो सरकारी सहायतोक कs सकैत छथि। लेखकक अनुसार अनेको व्यक्तिक समावेश पोथीमे नहि भs सकलनि अछि। ओ प्रायः दोसर खण्डमे एकर पूर्ति करथि। किछु संस्था , यथा खादी भण्डार, पुस्तकालय आदिकेँ पुनर्जीवित कयल जा सकैत अछि। शिक्षाक प्रसार सभ जाति-वर्गक लोकमे कयल जा सकैछ। गाम एहि तरहेँ विद्वत्ता आ सम्पन्नताक यात्रामे सदैब आगाँ बढ़ैत जायत। हमर पिता स्व0 रामनन्दन मिश्र गाँधीवादी छलाह। खादीक नौकरीक आरम्भ ओ कोइलख खादी भण्डारसँ कयने रहथि। ओ कोइलखक लोकक प्रशंसा करैत अघाथि नहि। पता नहि कियैक ,हमरो ई पोथी पढ़ि कs किछु एहने अनुभव भेल जेना अपने गामक विषयमे पढ़ि रहल छी। एहि अनुभव लेल एक बेर फेर पोथीक लेखककेँ बधाइ। (साभार :मिथिला दर्शन 2018) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ९.पंडित भवनाथ झा-कोइलख भवनाथ झा-संपर्क-7766055128 कोइलख पुस्तकक नाम- कोइलख। लेखक-सम्पादक श्री हितनाथ झा। प्रकाशक- प्रियदर्शी प्रकाशन, 217, पाटलीपुत्र कॉलोनी, पटना- 800013. प्रकाशन वर्ष- 2017 ई., प्राप्तिस्थान- (1) श्री हितनाथ झा, जयप्रभा नगर, मारखम कालेज के निकट, बड़कागाँव रोड, हजारीबाग- 825301. मो. 9430743070, ईमेल hitnathjha@gmail.com (2) प्रो. भीमनाथ झा, छपकी पड़री, (पंचायत भवन से दक्षिण), लक्ष्मीसागर, दरभंगा-846009 (3) जानकी पुस्तक केन्द्र- गोशाला चौक, मधुबनी-847211. मूल्य 400.00. मुद्रक प्रिंटवेल, टावर, दरभंगा। पृष्ठ संख्या- 210. सजिल्द। विवेच्य पुस्तक कोइलख गामक सारस्वत परम्पराक इतिहास थीक। एहिमे 39 दिवंगत एवं 6 जीवित व्यक्तिक परिचयक संग हुनक कृतिक सूचना संक्षेपमे देल गेल अछि। आरम्भमे कोइलखक प्रसंग आचार्य सुरेन्द्र झा सुमन एवं प्रो. भीमनाथ झा उद्गार देल गेल अछि। कोइलख मे अवस्थित 7 टा संस्थाक परिचयक संग एक शिवमन्दिर वनखण्डीनाथ महादेव मन्दिरक पुरातात्त्विक महत्त्व पर एक आमन्त्रित आलेख अछि। परिशिष्ट भागमे आचार्य सुरेन्द्र झा सुमन, मोहन भारद्वाज, पं. बलदेव मिश्र ज्यौतिषी, प्रो. भीमनाथ झा, प्रो. विद्य़ापति ठाकुर एवं डा. दमन कुमार झाक एक एक आलेख अछि। हमरा जनैत पुस्तक कें देखबाक दूटा दृष्टि होइत छैक- पहिल जे, जे अछि , से केहन अछि? जे नै छैक तकर चर्चे कोन? लिखबाक लेल तँ बहुत किछु छैक! एखनि एतबे सँ सन्तोष। मुदा दोसर दृष्टि होइत छैक जे आर की की रहबाक चाही। स्पष्ट अछि जे पहिल दृष्टि टकसाली समीक्षा थिक, जतए ममत्व नै रहै छैक, दोसरक बेटाक गुण-दोषक विवेचन जकाँ। मुदा दोसर प्रकारक दृष्टि अपन वस्तुकें देखबाक दिशा थीक। पहिल प्रकारक दृष्टिमे पुस्तक बड नीक अछि। एहू दृष्टिमे हम कने उमापतिक परिचय पर रुकब। एकटा शुद्धिनिर्णयकार पगौलीमूलक धर्मशास्त्री उमापति छलाह। एकरा फरिछाएब आवश्यक। कारण जे राघवसिंहक कालमे जे उमापति छलाह हुनक लिखाओल एकटा व्यवस्थापत्र हमरा लग अछि। गोकुलनाथक गुरु धर्मशास्त्री उमापति रहथि। आ तखनि शुद्धिनिर्णय सेहो हुनके रचना भए सकैत अछि। कोइलखक एकटा आर महामहोपाध्याय भैयन शर्मा भेटैत छथि। पद्मानन्दविनोद नाटकमे भराम ग्रामक वासी म.म. मधुसूदन मिश्र लिखैत छथि जे कोइलख गामक वासी भैय्यन झाक दौहित्रक पौत्र लीलानन्द सिंह रहथि आ हुनके दौहित्रक दौहित्र कवि म.म. मधुसूदन मिश्र रहथि। पद्मानन्दविनोद नाटकम्, अंक- 5, पृ. 29 वस्तुतः बनैलीक राजा दुलार सिंहक एक विवाह कोइलखक सरिसब मूलक चतुर्भुज झाक पुत्र भैयन झाक कन्यासँ भेल छल, जनिक पुत्र रहथि राजा सर्वानन्द सिंह आ महाराज वेदानन्द सिंह। हुनका महामहोपाध्याय कहल गेल अछि। ओहि भैयन झाक अन्वेषण होएबाक चाही। हुनक रचना सेहो हुनक वंशज लोकनिक घरमे भेटि सकैत अछि। एखनि हम आशा करैत करैत छी जे एतबा तँ संकलित भए गेल आरो काज होइत रहत। दोसर दृष्टिसँ देखला पर किछु निराशा हाथ लगैत अछि। पुस्तकक शीर्षक थीक- कोइलख। मात्र सारस्वत इतिहास कोनो गामक सम्पूर्णताक द्योतक नै भए सकैत अछि। एक पृष्ठ पर साख्यिकीय सूचना दए देलासँ लेखक कर्तव्य समाप्त नै भए जाइत अछि। जँ पुस्तकक शीर्षक मे सारस्वत इतिहासक संकेत कए देल गेल रहैत तँ उचित होइत। मुदा एतए गामक इतिहास संकेतित अछि। गामक इतिहास-लेखन मे गामक सभ जातिक लोकक विवरण होएबाक चाही। कतेक हलुआइ, कतेक राजमिस्त्री, कतेक गवैया आर आर गुनी लोकनि, अपन अपन काजमे विशिष्ट लोक सभ जातिमे भेटि जेताह। सभटाक सर्वेक्षणक अपेक्षा छैक। कोन कोन मूलक ब्राह्मण एतए रहैत छथि हुनक सामाजिक आ ऐतिहासिक आ पुरातात्त्विक परिप्रेक्ष्यमे कोइलखकें देखल जएबाक चाही। गाममे कोन कोन पूज्य थान सभ अछि, गाममे कोन कोन नामसँ डीह अछि, सभटाक सर्वेक्षण अपेक्षित छैक। कोइलखक बाधमे सेहो कतेको डीह होएत। कमलाक एकटा धाराक कछेरमे बसल गाम, जतए सँ पालकालक अवशेष सभ भेटैत अछि, ओहि डीह सभक नाम संकलित रहितैक। जें कि एकर नामकरण सोझे “कोइलख” कएल गेल अछि तें एतेक रास अपेक्षा अछि, अव्याप्ति दोष आबि जाइत अछि। अस्तु, जे अछि से नीक अछि। मानि लिय जे ई कोइलखक सारस्वत इतिहास थीक। तखनि पुस्तक देखि मोन आह्लादित भए जाइत अछि। एकर पठनीयता छैक। सुन्दर छपाइ आकर्षक अछि। (फेसबुकसँ साभार) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १०.श्री सियाराम झा 'सरस ''कोइलख'- ग्राम गाथाक विलक्षण अभिलेख श्री सियाराम झा 'सरस'-संपर्क-9931346334 'कोइलख'; ग्राम गाथाक विलक्षण अभिलेख हमरा सभ मैथिली भाषा-साहित्यमे कथा, कविता, उपन्यास, निबंध, संस्मरण एवं जीवनी इत्यादि पढ़व बेसी पसिन्न करैत छी। ई सभ विधा अपेक्षाकृत बेसी लिखलो-रचलो जाइत अछि। हालक एक-डेढ़ दसकमे बालसाहित्यपर वा गजल ओ विज्ञान-कथादि दिस सेहो पूर्वापेक्षा अधिक रचना रचब देखना जाइछ । सैह बात अनुवाद-साहित्यहुमे देखल जा सकैछ। मुदा एक टा प्रवृत्तिक रूपें (जे एखन स्थापित नहि भए सकल अछि) ग्राम-गाथाक लेखन-प्रकाशन बेस महत्वक वस्तु कहल जा सकैछ। स्थानीयता ओ आंचलिकतापर डॉ. मणिपदमक एक टा विशिष्ट आलेख हमरालोकनिकेँ देखबाक सुयोग भेटल अछि। किंतु स्थानीयताकेँ नब स्वरूप ओ नब कलेबर दए ठाढ़ करबाक विलक्षण प्रयास कएलनि अछि-श्री हितनाथ झा। श्री झा बैंकक उच्चाधिकारी छलाह आ सेवानिवृतिक बाद हजारीबागक बासी भए, पहिनहुँसँ बेसी रचनाशील देखा पडैत छथि। प्रसंगवश मोन पाड़ि दी जे स्वनामधन्य प्रभास कुमार चौधरीक उपन्यास 'नवारंभ' केर प्रकाशन इएह हितनाथजी (प्रियदर्शी प्रकाशन, पटना) कएने छलाह आ मूलरूपें कोइलखे ग्रामक बासी थिकाह ई। कहबाक प्रयोजन नहि जे मिथिलाक किछु अति विशिष्ट गामसभक सूचीमे सरिसब-पाही, मंगरौनी, बिसफी, लोहना लालगंज, भवानीपुर (पडौल), ढंगा हरिपुर, पिण्डारुच, ठाड़ी, सिंहवार, सतलखा, सौराठ, वनगाँव, महिषी, वरगाँव, धमदाहा, चम्यानगर, श्रीनगर, भ्रमरपुर आदिक संग कोइलखोक नाम अग्रणी अछि। आरो कतिपय नाम अछि मुदा हम एतय दृष्टांतरूपें किछुए नामक चर्च कएल अछि। किंतु से ई नाम सन की हेतुएँ प्रसिद्ध अछि ? ठीक तकरे उत्तर दैत अछि ई पुस्तक 'कोइलख'। ई भद्रकाली कोकिलाक्षी देवीक तीर्थस्थलीक रूपें प्रसिद्ध गाम धिक। डॉ. भीमनाथजीक पाँती द्रष्टव्य थिक :-- "जय - जय भद्रकालि परमेश्वरि, जय कोइलख देवी। विश्वम्मर उर पर जनिकर पद, तनिक चरण हम सेवी ।।" एहिपर पुस्तकक गरिमा कैक गुणा एहि कारणे बढ़ि गेल अछि जे कोइलखक महत्ताकेँ रेखांकित करैत ज्योतिषाचार्य बलदेव मिश्र, आचार्य सुरेन्द्र झा सुमन आ मोहन भारद्वाज सन-सन दिग्गजक रचना परिशिष्ट रूपेँ शामिल भेल अछि। तहिना, कैक ठाम आ कैक संदर्भमे कवि पुंगव काशीकान्त मिश्र मधुपक काव्यमय टिप्पणी सभ सेहो समाहित भेल अछि। एहि पोथीमे एकहिठाम पाठक लोकनिकेँ कोइलखक इतिहास, भूगोल, अद्यतन जनसंख्या ( करीब 8500/2011) सहित 'पारिजात हरण केर कृतिकार म.म. उमापति उपाध्याय (16 में शताब्दी), मैथिली साहित्यक आद्य दू प्राध्यापक-पं. (प्रो.) खुद्दी झा एवं पं बबुआजी मिश्र (कलकत्ता वि.वि.केर प्रथम ओ द्वितीय वरेण्य शिक्षक), शास्त्रार्थ मार्तण्ड पं लुट्टी झा, रानी चन्द्रावती (बनैली राजक राजरानी आ मिथिलाक अत्साधारण समाजसेविका), श्रीकांत ठाकुर विद्यालंकार (मैथिली अकादमी. पटनाक पहिल अध्यक्ष तथा आर्यावर्त, प्रदीप, विश्वमित्र, आज, वाराणसी, दै. स्वतंत्र सन-सन अनेको पत्रक प्र. सम्पादक), पं. (महाकवि) काशीकांत मिश्र 'मधुप, पं. (प्रो.) जयदेव मिश्र, पं. हरिनाथ मिश्र (33 वर्ष धरि विधायकी, तखन सांसदो, प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी एवं बिहारक स्वास्थ्य मंत्री-1952-57 रहैत डी.एम.सी.एचकेँ व्यवस्थित चिकित्सा महाविद्यालय बनबौनिहार), डॉ. भवनाथ मिश्र (एम.आर.सी.पी. इंग्लैण्ड, एफ.आर. सी.पी.एफ.ए.आइ.एम.एस. लंदन-एतबा सुयोग्य पहिल मैथिल डाक्टर), योगानन्द झा (मैथिली अकादमी पटनाक निदेशक एवं भलमानुस सन कालजयी उपन्यास ओ उड़ैत वंशी कथा संकलनक रचनाकार), आइ.पी.एस. मिहिर कुमार झा. महान कथाकार घूमकेतु आ पद्मश्री डॉ. मोहन मिश्र प्रभृति मैथिल रत्न सभसँ भेँट-परिचय भए सकतनि। लेखकक प्रयास स्तुत्य अछि।। (साभार : अरिपन ,झारखण्ड मिथिला मंच ,राँची , स्मारिका 2018) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ११.प्रो. महेशलाल दास –कोइलख प्रो. महेशलाल दास कोइलख लोकप्रिय बैंकर्स हितनाथ झा जी केर सद्यः प्रकाशित मैथिली पुस्तक एक बैसारि मे पढ्य के आनन्द पाओल। हितनाथ जी बहुत बहुत बधाई। अहि पुस्तक केर लेखन मे " प्रोत्साहित कयनिहार" मे अहाँ हमरो नाम लेलहुं अछि, तै लेल अशेष आभार आ धन्यवाद। पुस्तक नीक लागल : साधुवाद। "कोइलख" सुनने रही, देखने, जानल नय रही। रामपट्टी तक गेल रही। शब्दक अर्थ ध्वनि प्रभावो से आभासित होइत छैकः अंग्रेज़ी मे onomatopoeia कहैत छै। तै हिसाबे " कोइलख" जेना कोयला छाउर सनक भाव उत्पन्न करैत : मुदा अहिठाम तँ कोयला के जगह हीरा के खान देखना बुझना गेल। कोइलख हीरा के खान : एक पर एक विद्या गुण सम्पन्न विभूति सब सबहक गाम: एकर नाम " मणिरत्नम पुरम्" करै के लोभ भ ऽ जाइत ! मुदा समाजशास्त्रीय दृष्टि सँ पुस्तक और किछ माँगि रहल जकाँ बुझना गेल। गामक संक्षिप्त परिचय मे अपने लिखने छी जे गाम मे मन्दिरक संख्या ८ और मस्जिद, ईदगाह के संख्या एक- एक। निश्चित रूपें गाम में हिन्दू मुस्लिम दूनु धर्मावलम्बियो छथि । तहिना हिन्दू समाज में कइएक जाति वर्ण के लोकनि रहैत हेताह। पुस्तक में मुसलमान और ब्राह्मणेतर जाति क कोनो उल्लेख नहिं अछि। संभवतः अहिवर्गक अपेक्षित विकास नहिं भेल हुअऽ अथवा तुलनात्मक दृष्टिये कम विकास भेल हुअऽ, लेकिन अहू तथ्यो के उल्लेख, कारण एवं वर्तमान अवस्था के संग अपेक्षित। बुझना जाइए एहि गामक लगभग दू-तिहाई जनसंख्यों के कोनो परिचय आ उल्लेख अहि परिचयात्मक पोथी में नहिं अछि । ई पूरा कोइलख नहिं बुझाइत अछि : मात्र रत्नगर्भ के दर्शन बुझना जाइत अछि। तैं बुझना जाइत अछि जे अहाँ के शीघ्र दोसर संस्करण लिखऽ आ छापऽ परय जाहि में ब्राह्मण विभूति के संगहि संग गामक अन्य निवासी वर्गों के दशा दिशा के परिचय होय। पूरा " कोइलख" तखन देखाओत और चमकत। पुनः पुनः साधुवाद । (फेसबुकसँ साभार) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १२.श्रीमती नीलम झा-त्रिवेणी श्रीमती नीलम झा त्रिवेणी हमरा त्रिवेणी पोथी के पढ़बाक सौभाग्य भेटल। एहि में त्रिवेणी सम्मान सँ सम्मानित मैथिली, हिन्दी उर्दू, एवं बंगलाक साहित्यकार लोकनिक परिचय देबाक हर संभव प्रयास कयल गेल अछि। संपादकीय लेखन कोनहुँ पोथीक स्तम्भ बूझल जाइत अछि। संपादकीय मे झारखंड प्रदेश केर साहित्यकार एवं हुनका सँ जुड़ल साहित्यक संस्थान केर योगदानक विशेष रूप सँ परिचय विस्तार सँ देल गेल अछि। झारखंड प्रदेश मे मूलनिवासी जनजातीय समुदायक संग मैथिली भाषी केर एक विशिष्ट पहचान अछि। एहि बात केर बखूबी निर्वाह कयल गेल अछि। झारखंड प्रदेश मे मैथिली भाषाकेँ द्वितीय राजभाषा केर दर्जा भेटल। एहि कार्य मे राजसभा संसद डा० सर कामेश्वर सिंह केर चर्चा भेल। राष्ट्रीय एवं अन्तरार्ष्ट्रीय स्तर पर आयोजित मैथिली सम्मेलनक संबंध मे विस्तृत जानकारी देल गेल संगहि झारखंडक अन्य साहित्यकारक लोकनिक चर्चा आओर हुनका सँ जुड़ल साहित्यक संस्थानक योगदान केर चर्चा कयल गेल। 'गागर मे सागर' समेटबाक प्रयास कयल गेल अछि। संपादकीय लेखन अति उत्तम भेल अछि। एहि पत्रिका मे विशेष रूप सँ श्री भीमनाथ झा जी द्वारा श्री बुद्धिनाथ झाजीक लिखल मैथिली मे गौरव ग्रन्थ 'ॐ महाभारत'क अठारहो पर्वक विस्तार रूप प्रस्तुत कयलन्हि से अनुकरणीय अछि। श्री नारायण झा द्वारा कुमार मनीष अरविंद आ सियाराम झा सरसजीक चित्रण कयलन्हि सेहो बहुत प्रशंसनीय अछि। धीरेन्द्र नाथ मिश्र द्वारा विद्यानाथ झा 'विदित' केर मैथिली साहित्य विशेष रूप सँ हुनकर उपन्यास साहित्य लेखन मे योगदानक विस्तार पूर्वक लेखन प्रशंसनीय अछि। सुशील कुमार जी द्वारा शंभु बादल जीक काव्य संग्रह 'शंभु बादल की चुनी हुई कविताएँ 'एवं अन्य काव्य संग्रह केर सविस्तार परिचय बहुत सराहनीय अछि। हुनकर काव्य विषय विशेष रूप सँ शोषण, जुल्म आ यातना केर प्रतिकार आ जनविद्रोहक रेखांकन मात्र नहि बल्कि प्रतिकार केर जनविद्रोही रूप मे बदलबाक प्रयास कयल गेल। विशेष रूप सँ जनपक्षधरता सँ जन विद्रोह धरि केर चर्चा कयल गेल अछि। रतन शर्मा, गणेश चन्द्र राही, राकेश ठाकुर एवं डा. फरहत हुसैन 'खुशदिल', जय गोबिंद मिश्र जीक लेखन अत्यंत प्रभावी अछि। एतेक नीक पोथी हमरा पढ़बाक सौभाग्य प्राप्त भेल जाहि लेल संपादक महोदय एवं हुनकर समस्त टीम के साधुवाद। (फेसबुकसँ साभार) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १३.डा. धनाकर ठाकुर –त्रिवेणी डा. धनाकर ठाकुर-संपर्क-9430141788 त्रिवेणी हितनाथ झाक संपादकत्वमे छपल "त्रिवेणी" मे मैथिली, हिंदी-उर्दू,बंगलाक साहित्यिकारक परिचय त्रिवेणी भेटत जाहि साहित्यनदमे गोता लगेबाक किनकहुँ मोन हैत। ओना ई सभ साहित्यकार सम्मानित भेल छथि त्रिवेणीकांत ठाकुर साहित्य सम्मानसँ जाहि मे सम्मिलित छथि मैथिलीक कुमार मनीष अरविन्द, विद्यानाथ झा 'विदित', 2020मे स्वर्गीय भेल पंचानन मिश्र, अपन सरस गीत रचना ओ मंच गायन लेल प्रसिद्ध सियाराम झा 'सरस', मैथिली मे महाभारत लिखनिहार बुद्थिनाथ झा,; हिन्दी क शिवदयाल, सिंह 'शिवदीप', शम्भू बादल, भारत यायावर; बंगलाक अमलसेन गुप्त, अजित कुमार बनर्जीक स़गहि उर्दूक अब्दुल अलीम मुशीरुल होला "अली मुनीर", आओर फरहत हुसैन खुशदिल। देखल जाय त हिन्दी उर्दू लिप्यांतरसँ एकहि भाषा, तें हम त्रिवेणी कहलहुँ, चाहू त' साहित्यिक "चौबटिया" सेहो नाम राखल जा सकैत छल वा आगाँ समस्त भारतीय भाषाक अन्त:सलिला सरस्वतीवत संस्कृत एहि कोटिमे आबय से हम कामना करैत छी। पोथीक प्रारंभमे झारखण्डक मैथिली संगठनक चर्चा सेहो अति एकर प्रारंभ अन्तरराष्ट्रीय मैथिली परिषद् सँ होइत अछि, 1993 मे राँचीसँ प्रथम सम्मेलन प्रारम्भ भय 2020 धरि एकर 32म सम्मेलन भय चुकल अछि( झारखण्ड मे 2000मे जमशेदपुरमे सातम, 2003मे धनबादमे दशम, 2013मे देवघरमे 26म आओर फेर 2018मे राँचीमे तीसम अन्तरराष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन भेल आओर 2008 एवं 2013 मे मिथिला महोत्सवक अतिरिक्त सात टा प्रान्तीय सम्मेलन भेल- 2003मे देवघर, 2004मे बोकारो, 2006मे जमशेदपुर, 2010मे बोकारो आओर जमशेदपुर, 2013मे सिन्दरी आओर 2016मे बोकारो)। सांगठनिक दबाब, धरना प्रदर्शन आदि चलते मैथिलीके भाजपाक झारखण्ड सरकार दोसर राजभाषा बनौलक। आठम अनूसूचीमे मैथिलीके अनबामे झारखण्डक योगदानक जहिया सत्य आकलन होयत अन्तरराष्ट्रीय मैथिली परिषदक काज झारखण्डमे धुरी बनि भेटत। अंक संग्रहणीय अति विशेषतः मैथिली महाभारतक विषय सूची एहि महान कार्यक संकेतक अछि। समस्त त्रिवेणी सम्मानित साहित्यकारक रचनाक विहंगम दृश्य बतबैत अछि जे हुनका सभकें साहित्यिक कसौटी पर नीक जकाँ कसि सम्मानित कयल गेल। हजारीबाग शहरक साहित्यिक गाथा लेल ई पोथी सदैव याद कयल जाएत जे आनहुँ शहर लेल प्रेरक होयत जकर सोच कोइलख ग्रामगाथा लिखनिहार एकर संपादक हितनाथ झाक ई उच्चतर सृष्टि कहायत। (फेसबुकसँ साभार) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १४.उदय चन्द्र झा विनोद -लेख-रेख (अनुशीलनक एक विलक्षण बानगी) उदय चन्द्र झा 'विनोद'-संपर्क-9430827472 लेख-रेख (अनुशीलनक एक विलक्षण बानगी) सन्तोषक बात अछि जे पोथी-प्रकाशनक स्थिति मैथिली मे आब कमजोर नहि रहल। हमरा सनक देहाती सँ सेहो प्राप्त पुस्तक मे सँ अनेक अपठित रहि जाइत अछि। नव-पुरान रचनाकारक पुस्तक लगातार आबि रहल अछि मुदा तकर सम्यक समीक्षा नहि भ' पबैत अछि। समालोचनाक अभाव मे नीक-बेजाय बेरयबाक काज शेष रहि जाइत अछि। कहबाक प्रयोजन नहि जे समीक्षा एक विशेष काज थिक आ तकरा लेल पढबाक प्रवृत्ति संग विवेचना-विश्लेषण करबाक योग्यता चाही। कारयित्री प्रतिभा कनेमने नैसर्गिक होइछ अवश्य मुदा समीक्षा करबाक योग्यता अर्जित कैल जाइछ। मैथिली मे समालोचना विधाक दुर्बलताक कथा जानि नहि कहिया सँ कहल जाइत रहल अछि। अपर आचार्य रमानाथ झा हम सभ अद्यावधि अर्जित नहि क'सकल छी। एहि विधा मे प्रयास नहि भेल अछि से बात नहि। मोहन भारद्वाज कयलनि, रमानन्द झा रमण करैत आबि रहल अछि, तारानन्द वियोगी धमक देलनि अछि मुदा अपेक्षित मात्राक एखनो प्रतीक्षा अछि। अधिक छिटफुटे प्रयास, उपलब्धि नहि कोनो खास। प्रसन्नताक बात थिक जे सोशल मीडियाक प्रतापे एहि दिशा मे प्रयास होइत रहैत अछि। एहने एक प्रयासक प्रतिफल थिक हितनाथ झाक सद्यःप्रकाशित पुस्तक लेख-रेख।अपन गाम कोइलखक सारस्वत साधकक विषयक पुस्तक कोइलख हिनक अध्ययनशीलता आ क्षमताक परिचय देने छल। एहि पुस्तक मे संकलित वस्तु के एक ठाम पढने से भाव आर पुष्ट भेल अछि। विशिष्ट भेल छथि लेखक, बड काजक काज कयलनि अछि। लेख-रेख यद्यपि समीक्षाक पोथी नहि भ' सकल अछि तथापि संतावन नूतन पुस्तक आ एक पत्रिकाक आत्यन्तिक परिचय रचनाकारक वृत्त आ परिधिक उत्तम विस्तार देबा मे सर्वथा समर्थ भेल अछि। भाषा आ कथ्यक उपस्थापन विलक्षण अछि, विश्लेषणो अछि थोड-बहुत, व्यापक अनुशीलन अछि। हिनक दृष्टि जे निकाल बाहर कयलक अछि, तकरा जाहि व्यवस्थाक संग रखलक अछि आ जतबा निष्पत्ति देबा मे जहाँ-तहाँ समर्थ भेल अछि से निश्चयतः श्लाघनीय। कहबाक जे ढंग छनि, हिनक लेखकक जे रंग छनि तकर हम प्रशंसा करैत छी। एहने लोक नीक समालोचक होइत अछि। संतुलन चाही अन्यथा देखिते हेबै जे कतबा लोक गोत्रवाद आ क्षेत्रवाद मे बाझि अपना लेखकक संग समीक्षाक श्राद्ध क' बैसैत छथि। मित्रवर ललितेश मिश्र के पोथी-प्रसंग पढि मोन कचकि उठल। पुस्तकक स्वागत आ हमर आशीष कारण से छोडि आर किछु देबाक योग्यता कहाँ। (फेसबुकसँ साभार) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १५.कुमार विक्रमादित्य-गद्य सं पद्य धरिक सर्जन केर लेखा जोखा प्रस्तुत करैत पोथी-लेख रेख कुमार विक्रमादित्य -संपर्क-7631713526 गद्य सं पद्य धरिक सर्जन केर लेखा जोखा प्रस्तुत करैत पोथी-लेख रेख आजुक समय मे समय निकालि पोथी पढ़ब जतबे कठिन अछि ओहियो सं बेसी दुष्कर अछि ओहि पोथी पर नीक बेजाय लिखब । मैथिली मे समीक्षा आ समालोचनाक स्थिति ककरो सं नुकाओल नहि अछि । ओहो मे नीक लिखब तं आसान अछि मुदा मैथिली मे कोनो लेखनी मे कमी देखायब माने ओहि लेखक वा कवि सं सीधा दुश्मनी मोल लेब । वर्तमान शताब्दी धरि अबैत- अबैत मैथिली साहित्य मे सभ विधा आब अपन उन्नयन पर गर्व करबाक स्थिति मे अछि । मैथिली साहित्य मे उपन्यास, कथा, नाटक, कविता, निबंध, संस्मरण, आत्मकथा, जीवनी, ललित निबंध, गाम-नगरगाथा सभ विधा मे उन्नति भेल अछि । एहि पोथी मे लेखक प्रायः सभ विधा मे अपन समीक्षात्मक दृष्टि डालबाक प्रयास केने छथि । मैथिली साहित्य रसे-रसे सभ विधा मे अपन पएर पसारि रहल अछि । प्रकाशन सं पाठक धरि भने मूल्य खर्च क’ कें बेचबाक आ पढबाक प्रवृति नहि जागल होमय मुदा प्रयोगधर्मिता, भाषांतर, कथ्य, शिल्प मे नवीनताक बोध स्वाभाविक रूपे अकानल जा सकैत अछि । आलोचना- समालोचनाक काज दुरूह छै किएक तं हरेक दृष्टि सं धैर्यपूर्वक काज श्रमसाध्य होइत अछि । कोन चीज समाज कें दशा दिखाओत वा ओ समाज कें ग्राह्य अछि एकर निर्धारण आवश्यक होइत अछि । एहि लेल आवश्यक अछि पोथी केर अन्दर घुसि कें तथ्य कें बहार आनब ।ई पोथी सभ मिथकीय धारणा कें तोड़ि कें सोझा आओल अछि जाहि मे लगभग सभ ज्ञात विधाक पोथी समीक्षा के’ल गेल अछि ।हितनाथ झा जी एहि पोथी मे विगत दु-तीन दशकक कृति केर साहित्यिक विवेचन आ विश्लेषण केने छथि ।हिनक तथ्य केर उपस्थापनक ढंग विशेष रूपें परिचयात्मक अछि । जतय नव-पुरान सभ लेखक केर कृति एक ठाम पर देखार पड़त ।विभिन्न ठाम पर हिनक खोजि दृष्टि सं अभिभूत लेखनी हिनक पोथी कें आन पोथी सं फराक करैत छैक । कुल अठ्ठावन टा पोथी कें एक ठाम बान्हि कें राखल गेल अछि एहि पोथी मे ।नौ गोट उपन्यास, आठ गोट कथा संग्रह, एक टा नाटक, उन्नीस गोट कविता संग्रह, दु टा निबंध संग्रह, पाँच टा संस्मरण, छः टा समीक्षा केर पोथी, एक टा आत्मकथा, एक टा जीवनी, एक टा ललित निबंध, एक टा व्यंग्य, तीन टा नगरगाथा आ एक टा पत्रिका केर सुन्दरताक बखान अछि ई पोथी ।किछु पोथी दु तीन दशक केर पार सेहो जाएत अछि ई जेना बंगट बाबूक अंगरेजी उपन्यास भनहिं काया मे छोट होइत मुदा आइ सं सौ बरखक पहिलुका समाजक चित्रण अपने आप मे महत्वपूर्ण अछि । नन्दीपति दासक ई हास्य उपन्यास मैथिल लोकक नज़रि सं साफे दूर अछि मुदा, एही पोथी केर माध्यमे दोसर हरिमोहन झा कें तँ अकानल जा सकैत अछि ।लेखक लिखैत छथि जे ई पोथी समाजक कुप्रथा पर जबर्दस्त प्रहार करैत अछि।एहि पोथी मे हास्य तँ अछिये, चुभन सेहो, घुटन सेहो, चिंतन- मनन सेहो । येह अछि समीक्षक केर परिपक्व्ताक पहचान । चूँकि लेखक मैथिली मे बहुत दिन सं सक्रिय छथि तें हिनकर परिपक्व नज़रि सं सभ किछु फह्फह देखार पड़ैत अछि । उपन्यास कोनो कालखंडक वर्णन होइत अछि । नीक उपन्यास ओकरे कहल जाइत अछि जाहि मे पाठक कें अपनत्व बोधक भाव साफ़ झलकैत होमय। समीक्षाक पोथी जखन लिखल जाइत अछि तें एकर ध्यान अवश्य राखल जाइत अछि जे कोन पोथीक चयन केल जाय । ताहि मे लेखक निपुण छथि । केदारनाथ चौधरी केर उपन्यास अयनाक चयन तें लेखक केने हेताह ।अपन समीक्षाक क्रम मे ओएहि पोथी केर चर्चा करैत लिखैत छथि मिथिलाक सामाजिक – आर्थिक- साहित्यिक- सांस्कृतिक व्यथा कथा प्रेम अनुराग- विरागक सचित्र चित्रण, ह्रास होइत सभ्यता संस्कृतिक इतिवृति, हाहाकार करैत जीवनक मर्मस्पर्शी कथाक वर्णन ठीक ओहने जेहेन अयनाक प्रतिच्छवि देखार पड़ैत अछि । आगाँ ओ लिखैत छथि बिनु कोनो काट छाँटक, बिनु कोनो कृत्रिमताक भानक, बिनु कोनो आयात निर्यातक लिखल गेल अछि ई उपन्यास जकरा एहि पोथी केर माध्यमे साहित्यिक पुष्टता प्रदान के’ल गेल अछि ।आगां ओ लिखैत छथि जे अयना उपन्यासक शब्द लालित्य अद्भुत अछि । निश्चिते जाहि कथा आ उपन्यासक शब्द लालित्य नीक होइत अछि से उपन्यास नीके टा नहि दीर्घकालिक होइत अछि ।एहि पोथी केर माध्यमे केदारनाथ चौधरी केर वर्णन करैत लेखक लिखैत छथि जे मैथिली केर पहिल सिनेमा “ममता गाबय गीत”लेखक आ निर्माता केदारनाथ चौधरी छथि से महत्वपूर्ण । समीक्षा केर एक पहलू ईहो होइत अछि सूचना सम्प्रेषण-से एहि पोथी मे ठामे ठाम झलकैत अछि । हितनाथ झा जीक धियान मडर उपन्यास पर साफ छैन। भने सुभाषचंद्र यादव जी मडरक बहन्ने गारि कें सेहो उद्धरित कयने छथि आ ओ वेह लिखने छथि जे ओ सुनने छथि। मुदा, इशारा मे कहय सं भी काज चलि सकैत छल। मडरक मुख्य विन्दु अछि अविश्वास आ संदेह जकरा लेखक स्पष्ट करैत अछि। निश्चित रूपे ई काज एकटा सुयोग्य समीक्षक केर बुते ही संभव अछि। मिच्छामी दुक्कड़म उपन्यास केर समीक्षा काल मे हिनक लेखनी केर आरम्भ होइत अछि हुनका भेटल कीर्तिनारायण सम्मान कालक संस्मरण सं जे चेतना समिति केर मंच सं- जे महत्वपूर्ण अछि मनीष अरविन्द जीक परिचयक लेल। आगाँ ओ एक आदिवासी लड़की केर कथाक वर्णन केने छथि जे आदिवासी होइतों अहिंसाक पुजारी अछि। तहिना ओ नामवर सिंहक कथन केर चर्चा केने छथि जाहि मे हुनक मुँह सं निकलल वाक्य कतेक आह्लादित करैत अछि। आश्रयणी की यह शाम अविस्मरणीय है। समीक्षक आ पाठक मे बड़ पैघ अंतर होइत छैक । समीक्षक गुण -दोषक विवेचना करैत अछि आ आम पाठक मात्र लेखकक दृष्टि, लेखकक व्यापक सोच, लेखन शैली, विषयक ज्ञान, शब्दक चयन, संप्रेषणीयता, सत्यक निकटताक वातावरण निर्माण आदिक समावेशक संग उपयुक्त विधा कें चुनि-ओहि विधामे पाठक लग अपन रचना कें जं लेखक ठीक ढंग सं परसि दैत अछि आ पाठक कें पढ़बाक उत्सुकता जगबैत अछि, ओकरा जं पाठक सुरुचिपूर्वक ग्रहण क लैत अछि, तखने भेलाह लेखक सफल। तहिना नीक समीक्षकक काज सभ सं पहिने नीक पोथी केर चयन अछि एहि विशाल समुन्दर मे जे अनवरत बढ़ल जा रहल अछि। तकर बाद नीक सं पढ़ि कें महत्वपूर्ण बिंदु कें बहार आनब। कोन तत्व मे सम्पूर्ण किताबक सार पैसल अछि ओकरा फरिछायब। पंकज पराशरक जलप्रान्तर केर समीक्षाक क्रम मे हितनाथ झा जी लिखैत अछि जे ई किताब नहि दस्तावेज अछि जतय एक एक शब्दक महत्व अछि, एतय एको टा वाक्य नहि बेसी अछि आ नहि कम। एहि तरहक उपमा पोथी कें नीक सं मथलाक बादे देल जा सकैत अछि। एहिना हिनक समीक्षाक कलम खाली पेज पर खूब चललनि अछि। भवेश चंद्र शिवांशुक उपन्यास सोनचिड़ैया मे हिनक कलम सुखान्त कहैत रुकैत अछि तं धीरेन्द्र कुमार झाक उपन्यास उत्तरार्द्ध मे कोर्टक गप्प करैत रुकैत अछि। तहिना हिनक दृष्टि दिलीप झा जी केर उपन्यास सिराउर पर ई कहैत रुकैत अछि जे ई उपन्यास पलायन रोकबाक़ एक सफल कथ्यात्मक संग क़ृषि क्षेत्र मे तकनीकक दृष्टि सं सक्षम शिक्षित युवकक एहि दिस प्रेरणा जगेबाक सुंदर प्रयास छनि। जखन हिनक कथा दृष्टि कें देखब तँ पोथी चयनक उत्कृष्टता नीक जकां जगजियार होइत अछि ।हिनक पोथी चयन एहि दृष्टि सं फराक अछि की फलना साहित्यकार बहुत पोथी लिखने छथि तें हुनके पोथी पर लिखब ।गपाष्टक केर अगर बात करी तँ ओ दमनकान्त झा जी केर छनि जे हुनक पहिल आ अंतिम पोथी अछि ।एहि पोथी केर चर्चा करैत ओ आकाशवाणी पटना आ दरभंगा केर चर्चा मोन पाड़ैत छथि जाहि मेकोनो महत्वपूर्ण बात कें हास्यक पुट दय श्रोताक लेल मनोरंजन प्रस्तुत कैल जाइतअछि ।ओहि चर्चा मे प्रो हरिमोहन झा, पंडित चन्द्रनाथ मिश्र अमर, डॉ भवनाथ मिश्र, प्रो शंकर कुमार झा आ दमनकान्त झा महत्वपूर्ण गप्प केनिहार छल । दमनकान्त झा जी केर एहि पोथी मे आठो कथा पर हास्यक स्पष्ट मुहर लागल अछि । ग्रिभांसक चर्चा करैत ई भीमनाथ झा जी केर वक्तव्य लिखैत छथि जे-'बहुतो लोक एहन छथि, जिनका कहबा लेल किछु छनिहो तँ समाजक डरें आ कि रोचें मुँह सीनहि रह' चाहैत छथि। मुदा, साहित्यकार जे होयत, से चुप नहि रहत, मुँह खोलबे करत, साहसपूर्वक अपन भावना कागतपर उतारबे करत। अमलजी से कयलनि अछि। बाजि तँ सकैत अछि सभ, मुदा कहय थोड़कें अबैत छैक। जकरा कहयाक लूरि छैक, ओकर बात फोंक नहि जाइत छैक, लोक बिच्चेमे छोड़ि के उठि नहि सकैत छैक। से जँ उठि गेल तँ बूझू कह' नहि अयलैक। हम नहि बुझेत छी जे अपने एहि संग्रहक कथा सभकें पढ़ब शुरू करव तँ बिच्चेमे उठि जायब। नहि उठि सकब । आ, सम्पन्न कयलाक बाद मनमे किछु अबस्से घुरघुराय लागत। से भेल तँ म' गेलाह लेखक सफल । पढ़लापर अपनहुँ मानब जे अमलजीक कथा निर्मल छनि-एकदम झकझक, पारदर्शी ।'वस्तुतः हिनक कथा एहि बिंदु केर आस पास मे घुमैत अछि ।समीक्षक केर नज़रि एलेक्शनक ड्यूटी सं आशादीप कथाधरि मे कथ्य मे विश्वसनीयता पर पड़ैत अछि। ओहिना हिनक नज़रि अमरनाथ जीक कबकब कथा संग्रह पर बिनु नेमो केर बहुत बात कहि जाइत अछि ।मुदा मित्रताक बन्हन पुरनो पोथी कें हिनक सोझाँ आनने अछि से समीक्षक अपने स्वीकारैत अछि ।मंतोड़िया(महेंद्र नारायण राम) , चित्रांगदा(भवेश चन्द्रद् शिवांशु) , किछु नहि कहब(वीरेंद्र झा), ई फूलक गुलदस्ता(ऋषि वशिष्ठ)सं सोनू कुमार झा केर गस्सा धरि मे जतेक कथा अछि सभ पर हितनाथ झा केरअपन विमर्श अछि । बिना कोनो उपरागक ओ लगातार बढ़ि जाइत अछि । एहि पोथी मे एक गोट नाटक केर सेहो व्याख्या भेल अछि ।कमल मोहन चुन्नू केर नाटक ऑब्जेक्शन मी लार्ड पर हिनक विचार स्पष्ट छनि जे नाटक तँ देखबाक आ मंचनक चीज छी तें एहिपर विशेष तँ नहि मुदा,ई जरूर जे एहि नाटक कें समाजक बीच मंचन अवश्य हेबाक चाही जाहि सं स्पष्ट सन्देश लोक तक पहुंचे । हितनाथ झा जी एहि पोथी मे उपराग (रमानाथ मिश्र 'मिहिर'), अमरवाणी (वाणी मिश्र), आकार लैत शब्द, व्योममे शब्द (केदार कानन), जिनगीक ओरिआओन करैत (कुमार मनीष अरविन्द), सोनहुला इजोतवला खिड़की (सियाराम झा 'सरस'), दकचल समय पर रेख (कृष्णमोहन झा 'मोहन'),दुःस्वप्नक बाद (रमण कुमार सिंह), उजरा परबाक खोज (विनय भूषण ठाकुर), महानगरमे कवि (विनोद कुमार झा), चल जंगल चल, नशामुक्ति हित गाबी गीत (कुमार मनीष अरविन्द, कल्पना झा), नदीघाटी सभ्यता (रिंकी झा ऋषिका), बदलैत गाम (नवीन कुमार झा शरद), सोना आखर (मिथिलेश कुमार झा), राग उपराग (अमित पाठक), जन अरण्यक बीच (संतोष कुमार झा), औनी पथारी (सोनी नीलू झा), विनतीमे विश्वास (पूनम झा सुधा), कुरल (अनुवाद: कीर्तिनाथ झा) पर जे चर्चा अछि सभ परिचयात्मक अंदाज मे के’ल गेल अछि । एहि पोथी मे ज्योतिष बलदेव मिश्रक निबंध आखर अनंत केर संग चतुरानन मिश्रक विचारार्थ पर सेहो अपन विचार हितनाथ झा जी व्यक्त केने छथि ।तहिना समीक्षाक पोथी मैथिल यादव महासभाक योगदान (कैलासनाथ झा), रचना रसायन (ललितेश मिश्र), अनुसन्धान-प्रतिमान(रमानंद झा रमण), कालजयी कवियत्री(रामचंद्र मिश्र मधुकर), सामाजिक असंतोष आ मैथिली साहित्य(नीता झा), समालोचना श्री(अरविन्द कुमार सिंह झा) पर हिनक विचार किछु हद तक खुजलनि अछि ।किछु कमी सेहो परिलक्षित भेल अछि जे समीक्षाक महत्वपूर्ण आ सबल पक्ष होइत अछि । तहिना उदयचन्द्र झा विनोदक आत्मकथा हम परिनाम निराशा, मुरलीधर झा केर जीवनीक पोथी राष्ट्रपुजारी अटल बिहारी, नन्द कुमार मिश्र नंदनक ललित निबंध दिल्ली पार्क, अशोक जीक व्यंग्य नीक दिनक बायस्कोप, गाम नगर्गाथा सिरीज मे महेंद्र जीक धत्रीपात सन गाम, गिरीशचंद्रक शिवनगर आ वीरेंद्र झाक जयनगरक संग पंचानन मिश्र द्वारा सम्पादित पत्रिका बागमती दामोदर टाइम्स पर समीक्षक समीक्षाक पक्ष एहि पोथीक माध्यमे राखलैथ अछि। एहि पोथी केर सृजनकर्ता हितनाथ झा जी केर पठनीयता केर हम दाद दै छियनि जे एक संगे विभिन्न स्वादक रसास्वादन निधोखे ओ केलैथ अछि । ई कोनो साधारण बात नहि छी । आजुक मोबाइल आ इंटरनेटक दुनिया मे समय निकलब लोक कें मोसकिल अछि मुदा क्यो एकांत मे पालथी मारि कें पोथी गुनय मे लागल अछि से महत्वपूर्ण । बैंकिंग सेवा सन मशीनी काज मे जिनगीक महत्वपूर्ण क्षण बितेलाक बाद पोथी पढ़ब, ओहि पर चिंतन करब आ फेर लिखब वस्तुतः हिनक विशेषता छनि । एहि पोथीक मादे नुकायल ढेर रास बात कें बहार आनि पाठकक सोझाँ आनब हिनकर जीवनक पैघ सफलता थिक । हम आशा करैत छी जे एहिना हिनक पोथी सभ बहरायत रहय ।ओनाहियोमैथिली केर समीक्षा क्षेत्र सीमित अछि ।एहि ठाम एहन साहित्यिक सोच बला केर बड्ड आवश्यकता अछि । प्रत्येक लेखक केर ई आश होइत अछि जे क्यो हुनक पोथी पर लिखय । बेसी लेखक केर प्रशंसासुनि मोन प्रफुल्लित भ’ जाइत अछि ।अगर क्यो कोनो कमी केर चर्च करय तँ लेखक केर मोन दुखी भ’ जाइत अछि ।शायद येह सोचि कें हितनाथ झा जी केरकलम समीक्षा केर परिचय करैत रुकि जाइत अछि ।ई लेखक केर मोन रखबाक वास्ते भनहि नीक होमय जे के संबंध करय मुदा समीक्षक अपन एकटा दायित्व सेहो होइत अछि । वास्तव मे स्वस्थ समीक्षा साहित्यकारक लेल एकटा आयना होइत अछि जाहि केंदेखि ओ अपन लेखनी मे सुधार आनैत अछि । खाली नीके नीक सुनि लेखकक धार कुंड होमय लागैत अछि से कोनो साहित्यक लेल नीक नहि । हमर कहबाक तात्पर्य ई कथमपि नहि बूझब जे समालोचनाक अर्थ जबरदस्ती कोनो विधा मे कमी ताकि साहित्यकार कें हतोत्साहित करब अछि । मुदा कमी कें बिना कोनो दुविधाक लेखक केर सोझाँ राखब समीक्षाक प्रथम दायित्व अछि नहि तँ- ओ समीक्षा प्रशंसात्मक वापरिचयात्मक रहि जाएत अछि । अस्तु ! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १६.कल्पना झा-लेख-रेख कल्पना झा लेख-रेख एम्हरे कोनो पत्रिकामे एकटा आलेख पढ़ने छलहुँ, जाहिमे चर्चा छलैक जे विश्व स्वास्थ्य संगठन(WHO) स्वास्थ्य केँ एहि तरहेँ परिभाषित करैत अछि-सामाजिक स्वास्थ्य(आध्यात्मिक स्वास्थ्य)+मानसिक स्वास्थ्य+ शारीरिक स्वास्थ्य। आ एकटा स्वस्थ मनुष्यक सामाजिक, मानसिक आ शारीरिक स्वास्थ्य दुरुस्त राखबामे पढ़ब-लिखब बड्ड मददगार साबित होइत अछि।तँ हमरा लागैए जे आदरणीय हितनाथ सरकेँ फिटनेस हुनकर निरन्तर पढ़ैत-लिखैत रहबाक परिणाम छनि प्रायः। एकसंग 59 पोथीक समीक्षात्मक विश्लेषण संकलित क' पाठकक सोझाँ परसि देलनि अछि। एहि बातसँ अनुमान लगाओल जा सकैत अछि,जे ई कतेक पढ़ैत हेताह।एतेक लिखबालेल, कतेक पढ़ए पड़ल हेतनि, से अनुमान लगा लै जाउ। हम गप्प क' रहल छी आदरणीय हितनाथ सरकेँ नबका पोथी "लेख-रेख"क।बहुत नीक पोथी-प्रसंग सभ संकलित कएल गेल अछि।पोथी पढ़ितहि त्वरित प्रतिक्रिया स्वरूप हमरा मोनमे इएह आएल -"समीक्षा लिखब केओ हितनाथ सरसँ सीखए।" ओना समीक्षा सभ कनि संक्षिप्त अछि,से अखरल। कनि आरो विस्तार दैत लिखितथि,तँ पूर्णतया समीक्षात्मक पोथी होइतनि। पोथीक प्रारम्भमे स्व.ललितेश मिश्र जीक लिखल "साहित्य सर्जनक लेखा-जोखा"मे सेहो एहि बातक चर्चा देखबालेल भेटल। ललितेश सर कहैत छथि -"पुस्तक लेखक श्री हितनाथ बाबू विगत दु-तीन दशकमे प्रकाशित प्रायः अधिकांश प्रमुख साहित्यिक कृति सभहिक विश्लेषण-विवेचन एहि पुस्तकमे उपनिबद्ध कएलनि अछि आ यथार्थमे हुनक एहि उपस्थापनक रंग-ढंग यद्यपि आलोचनात्मक अछि, तथापि हमरा एहि पुस्तककेँ आलोचना-समालोचनाक ग्रन्थ बूझबा मे विप्रतिपति अछि। हम एहि पुस्तककेँ परिचयात्मक कहब आ से विषय विलक्षणताक सँग प्रतिबोधित अछि।" वास्तवमे पोथी "लेख-रेख" 59टा पोथीक परिचय अछि,जाहिमे 13 विधाक पोथी समाहित अछि आ 51 लेखक/कवि/सम्पादकक पोथीक चर्चा अछि। पोथी सभसँ परिचित करबैत,पोथीमे समाहित नीक-बेजाए तत्वकेँ उजागर करैत छथि लेखक। मुदा जतबे समीक्षात्मक विश्लेषण अछि,से बहुत नीक,स्पष्ट, बिना कोनो लाग-लपेटकेँ कएल गेल अछि।कारण लेखक कोनो तरहक गुटबाजी, गोधियाँगिरीक फेरमे नहि पड़ल छथि,जे फूसिओ ककरो रचनाक गुणगान वा खिधांस करताह। फेसबुक पर बहुत दिनसँ जुड़ल छी हमहूँ लेखकसँ,आ हिनकर साहित्यिक गतिविधि सभ देखैत रहैत छी।बहुत नीक आ सार्थक काजमे लागल छथि सर। "लेख-रेख"सँ पहिने हिनकर एकटा बहुत महत्वपूर्ण काज "कोइलख" पोथीक रूपमे बेस चर्चित ओ प्रशंसित रहल अछि। एकर अतिरिक्त हिनकर संपादकत्वमे दूटा महत्वपूर्ण पोथी "मैथिली इतिहासक रेखांकन" आ "त्रिवेणी" सेहो प्रकाशित भ' चुकल अछि। कहबाक तात्पर्य जे साहित्यिक अवदान बेस ओजनगर छनि आदरणीय हितनाथ झा जीक। साहित्यानुरागी तँ छथिए,संगहि तत्पर रहैत छथि मैथिली भाषाक संरक्षण ओ संवर्द्धन लेल कोनो तरहक गतिविधिक प्रचार-प्रसारमे। अपन लेखनीसँ लोककेँ लाभान्वित करैत,लोककेँ जागरूक सेहो करैत रहैत छथिन,अपन भाषा,अपन संस्कृतिसँ जुड़ल रहबालेल।इतिहासक कोनहुँ साहित्यिक कार्यसँ लोककेँ अवगत कराएब,जेना-कोइलखसँ हस्तलिखित मासिक पत्र बहराइत छल,तकरा फेसबुक पर साझा करब,प्रभात मासिक पत्रक कोनहुँ हस्तलिखित रचना पोस्ट करब। एकर अतिरिक्त अन्यान्य पुरान साहित्यकार लोकनिक कोनो अनमोल कृति पोस्ट क' पाठक पर बड़का उपकार करैत छथिन।एखनहि किछुए दिन पहिने आचार्य सुरेन्द्र झा "सुमन" जीक जयन्तीक अवसर पर हुनकर परिचयक संग हुनकर रचना-संसार आ सम्मान-पुरस्कार धरि सभटाक चर्चा करैत,हुनका स्मरण करब,नीक लागल छलए। कहबाक माने चाहे ओ पोथी प्रकाशनक माध्यमसँ हुअए कि फेसबुक पोस्टक माध्यमसँ,हितनाथ सरकेँ जीवनक उद्देश्य जेना मातृभाषा मैथिलीक संरक्षण,संवर्द्धन छनि, तेहन सन बुझना जाइए। "समीक्षा लिखब केओ हितनाथ सरसँ सीखए"से बात मोनमे आएल एहि कारणेँ, जे 59 टा पोथीपर हिनकर विवेचना सभ पढ़ैत एहि बात पर गौर केलहुँ,लेखक पोथीक विषयमे बहुत किछु कहिओ दैत छथि,आ बहुत किछु अनकहल सेहो राखि लैत छथि।जे पाठकक मोनमे एकटा लालसा उत्पन्न करैत अछि,आ से प्रबल लालसा,किछु एहन सन जे तत्क्षण अमुक पोथी आनि ली आ आद्योपान्त पढ़ि जाइ। ई क्षमता एकटा समीक्षकमे होएब परम आवश्यक।"लेख-रेख" पोथी पढ़ैत अनायास हमरा अपन लिखल कोनहुँ पाठकीय-प्रतिक्रिया पर एक गोटेक टिप्पणी मोन पड़ि गेल। ओ महाशय लिखने छलाह-"अद्भुत। बहुत सुंदर समीक्षा लिखलहुँ। सच पूछी तँ ई समीक्षा पढलाक बाद आब ओ पोथी पढबाक आवश्यकते नहि बुझाइछ।"ओ महाशय हमर प्रशंसामे ई बात लिखने छलाह,मुदा हम एहि टिप्पणीसँ सीख लेलहुँ। असलमे समीक्षककेँ पोथीक विषयमे सभकिछु फड़िछाक' नहि लिखबाक चाही,से पहिने नहि बुझैत छलियै।तँ से जे "लेख-रेख" पोथीक प्रसंगमे कहैत रही,बेजोड़ शैली छनि लेखकक, पोथीसँ परिचित करएबाक। पोथीक विषयमे कतबा बात कहल जाए,कतबा नुकाएल जाए,तकर गुणा-भाग अद्भुत करैत छथि लेखक। सहज-सरल भाषाक प्रयोग सेहो प्रभावित करैत छै पाठककेँ। कामेन्द्रनाथ झा 'अमल' जीक कथासंग्रह "ग्रिभांस"क संदर्भमे,लेखकक कहल बात हुनकहि शब्दमे देखल जाए--"कथा जँ अपन हो,कथा जँ अपन घर परिवारक हो,कथा जँ अपन टोल पड़ोसक हो,कथा जँ गाम घरक हो,कथा जँ वर्तमान समस्या आ समाधानक हो,कथा जँ ककरो अहंकार पर चोटक हो,कथा जँ विनम्रतापूर्वक पराभवक निदानक हो,कथा जँ नारी सशक्तिकरणक हो,तँ निश्चिते ओ ककरो मानस पटल पर अपन छाप छोड़बाक लेल पर्याप्त होएत" विश्लेषण-विवेचन करबाक तरीका,क्षमता अद्भुत छनि लेखकक। एकटा दोसर उदाहरण सेहो प्रस्तुत अछि। श्री नन्द कुमार मिश्र 'नन्द' जी रचित ललित निबन्ध "दिल्लीक पार्क"क चर्चा करैत लेखक कहैत छथि--"कहबाक अपन-अपन ढंग होइत छैक।कियो सोझो बातकेँ तेना क' ने ओझरा क' कहत, जे अहाँकेँ सोझो बात बुझबामे कठिन भ' सकैत अछि।कियो ओझराएलो बातकेँ ततेक सुंदर ढंगसँ सोझराएल अहाँक समक्ष राखि देत जे कठिन बात सेहो सहज लागत।"से ठीके,तहिना सोझराएल भाषामे अपन मन्तव्य राखल गेल अछि पोथी "लेख-रेख"मे। ककर-ककर चर्चा करब, सभटा पोथी-प्रसंग विलक्षण लागत। एहि पोथीक एकटा विशेषता इहो देखबामे आएल,जे एहिमे नब-पुरान सभ बएसक,सभ समयक लेखकक पोथीकेँ संलग्न कएल गेल छनि।तेरह विधाक पोथी संलग्न अछि,से तँ पहिनहि चर्चा कएलहुँ अछि। कहबाक माने पोथीक चयनक परिधि बृहद छलनि लेखकक। दोसर एकटा इहो विशेष बात अछि एहि पोथीक,जे जाहि लेखकक पोथीक पाठकीय समालोचना कएल गेल अछि,हुनकर संक्षिप्त व्यक्तित्व आ कृतित्वक चर्चा सेहो कएलनि अछि। जाहिसँ विशेष जनतबसँ युक्त पोथी बनि गेल ई।संगहि सभ पाठक वर्गलेल पठनीय,संग्रहणीय सेहो। साहित्यिक जगतमे जतबा महत्वपूर्ण एकटा साहित्यकार होइत छथि,ओहिसँ कनिको कम महत्व समीक्षक/आलोचकक नहि।समीक्षकक अभावक चर्चा सुनबालेल भेटैत रहैए यत्र-तत्र। तेहनमे आसक एकटा किरण देखाइत अछि आदरणीय हितनाथ झा जीक रूपमे।हिनका सँ बहुत अपेक्षा छै मैथिली साहित्यकेँ। (फेसबुकसँ साभार) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १७.डा. आभा झा -भाषांतरणक उत्कृष्ट प्रयास -कविता शम्भु बादलक डॉ. आभा झा भाषांतरणक उत्कृष्ट प्रयास -कविता शम्भु बादलक कोनो भाषाक साहित्यकेँ समृद्ध करबामे जहिना विशिष्ट मौलिक साहित्यक योगदान होइत छैक,तहिना नीक अनूदित रचनाक सेहो।जे अपन भाषा आ संस्कृतिसॅं प्रेम करैत छथि, भाषिक गौरव-बोधसॅं आप्लावित रहैत छथि आ आन भाषाक ज्ञान रखैत छथि ओहन नीक पाठक-लेखकक ई दायित्व होयबाक चाही जे कोनो उपादेय सामग्री जॅं कत्तहु देखना जाइ ओहिसॅं अपन भाषाक पाठककेँ लाभान्वित करथि। अनुवाद मात्र दोसर भाषा- भाषी पाठके टा लेल उपयोगी नहि होइछ,ओ ज्ञानक प्रचार- प्रसार, सामाजिक सद्भाव आ सांस्कृतिक एकताकेँ सेहो रेखांकित करैत अछि।दू भाषाक मध्य परस्पर एकता आ विभिन्नता सेहो अनुवादक माध्यमसॅं स्पष्ट होइत अछि। हॅं,एहिमे संदेह नहि जे अनुवादक काज मूल लेखनसॅं बेशी श्रमसाध्य होइत छैक।एहिमे मूल भाषा आ लक्ष्य भाषा दुहूक ज्ञान आ अभिव्यक्ति कौशलक अपरिहार्य आवश्यकता होइत छैक। जॅं नहि त’ परमहंस ‘Great goose’ सेहो बनि सकैत अछि।कथ्य एतबहि जे दुहू भाषाक स्वरूप , प्रकृति आ प्रवृत्तिक गहन अध्ययन-मनन कइएक’ अनुवादक सफल होइत अछि। अनुवादक प्रसंग एतेक गप लिखबाक उद्देश्य मात्र एतबहि जे हाथमे एकटा महत्त्वपूर्ण अनूदित पोथी अछि जकर लेखक छथि हिन्दीक जानल मानल कवि ‘शम्भु बादल’,जे जनसरोकारक कवि छथि,उपेक्षितक नोर पोछनिहार कवि छथि, यथास्थितिवादसॅं मुक्तिक आग्रही कवि छथि। अनुवादक छथि ख्यात मैथिली कवि-लेखक-आलोचक ‘श्री हितनाथ झा’। यद्यपि गणित पढ़निहार अथवा बैंकिग सेवामे योगदान देनिहार लोककेँ सामान्यतया नीरस आ साहित्यसॅं विरत मानल जाइत छैक, मुदा मैथिली भाषा लेल ई सुखद संयोग अछि जे मैथिली लेल आत्मना समर्पित बैंककर्मी सभ सेवाकालहुमे उल्लेखनीय योगदान दए प्रशंसित भेलाह आ सेवानिवृत्तिक बाद त’ सहजहिॅं। आदरणीय रमानन्द झा रमण, आदरणीय प्रदीप बिहारी,श्री राजकिशोर मिश्र, श्री हीरेन्द्र कुमार झा, श्री उमेश मिश्र आ एहि श्रेणीक आन मैथिलीसेवीक शृंखलामे श्री हितनाथ झा जीक नाम जुड़ब सौभाग्यक गप। हितनाथ झाजीक विशेषता लेखन आ संपादन त’ छनिहे मुदा हिनका आमसॅं फराक बनबैत छनि हिनक त्वरित पठन आ पाठकीय टिप्पणी। प्रायः सभ विधाक पोथी रुचिपूर्वक पढ़ब आ ओहि मादेँ सामाजिक संजाल पर लिखब एतेक उपयोगी काज छैक जे सामान्य पाठक न’ब रचनासॅं त’ परिचित होइते अछि, संगहिॅं ओकर विशेषता सेहो बूझि कए पोथी किनबा लेल प्रवृत्त होइत अछि। हमरा स्वयं ई इच्छा रहैत अछि जे किछु पढ़ी त’ ओहि पोथीक प्रसंग अपन बुद्धिक सीमामे दू आखर लिखी, मुदा अनेकानेक काजमे बाझल रहबाक कारण कतेक बेर संभव नहि भए पबैत अछि। किछु तेहने सन अहू पोथीक प्रसंगे भेल। पोथी भेटल फरबरीमे आ पढ़ि सकलहुँ जूनमे । मूल त’ सोझाँ अछि नहि, मुदा कविता सभ पढ़ैत काल ई अनुभवो कतए भेल जे भाषांतर पढ़ि रहल छी ।ई निराधार प्रशस्ति नहि अपितु अनुभूत तथ्य अछि आ जे क्यो एकरा पढ़ताह, अवश्य समानुभूति रखताह। कविता सभमे सामाजिक विषमताक सघन पीड़ा ,स्थानीय लोकक म’नमे संसाधनक अधिग्रहणक असंतोष आ आक्रोश आ तज्जन्य प्रतिहिंसाक भावना आ कविक सहज अभिव्यक्ति ओहि पीड़ासॅं पाठकक तादात्म्य स्थापित कए दैत छैक आ तैं मोनमे ई प्रश्न उठिते नहि छैक जे लेखक हिनक कविता सभकेँ अनुवाद हेतु किऐक चुनलनि? हृदयकेँ स्पर्श करक क्षमता जाहि रचनामे हो ओ रचना अपन मातृभाषामे सेहो आबओ,ई इच्छा सहज आ क्षमता सम्पन्न लोक द्वारा ओकर करणीयता अभिनन्दनीय अछि। एहि पोथीक विषयमे आदरणीय कीर्तिनाथ झाक ‘जिनगीक रोशनी’ कहने छथि त’ आदरणीय केदार कानन नव स्वर-नव संधान कहने छथि।हुनकहि शब्दमे- ‘विश्वास अछि जे एहि अनूदित मैथिली कवितामे मानवीय जीवनक नव स्वर-संधान, नव आरोह-अवरोह, एकटा नव सुगंधक विस्तृत व्याप्ति रचल-बसल भेटतनि मैथिलीक पाठककें।’ झारखण्ड प्रदेश मात्र वन-सम्पदासॅं नहि, अपितु खनिजसॅं सेहो सम्पन्न रहल अछि।यदि वनप्रान्तीय जीवनक कष्ट सहब ओकर नियति त’ ओहि संपदासॅं प्राप्त धन आ सुविधा पर सेहो ओकर अधिकार होयब उचित। जॅं खनिज-क्षेत्रमे खेतीक अन्न पायब कठिन त’ ओहि प्राकृतिक उत्पादक मूल्यमे भाग भेटब सेहो जरूरी। किन्तु भ’ की रहलैय’ - स्थानीय आबादी सभसॅं वंचित अछि, सुख-सुविधा ओकर हिस्सामे नहि आ बाहरी लोक ओतए मालिक बनि बैसल अछि।ई स्थिति ककरो विचलित-अधीर कए सकैत अछि आ परिणामत: नक्सलवाद पनपि,पसरि रहल अछि। जखन समस्या Survival केर हो त’ नीति-अनीति, उचित -अनुचितक बोध हेरायब स्वाभाविक।मुदा आजादीक एतेक बर्ख बितलाक बादो स्थितिमे बहुत परिवर्तन कतए आबि सकलै,सरकारो स्थानीय लोकक शिक्षा किंवा रोजगार लेल म’नसॅं प्रयास कतए केलक,बस आश्वासनक ढोल टा बजबैत रहल अछि। ई सभ देखि कविक म’नमे उद्भूत समानुभूति कविताक रूपमे नि:सृत भेल,जाहिमेसॅं किछु कविताक अनुवाद लेल चयन कए लेखक स्वागत योग्य काज कएलनि अछि। किछु कवितांश,जे हमर अन्तस् केँ स्पर्श कएलक,सोझां राखि रहल छी - कोना सजाओल जायत अपन शहर? नव कली टटका फूल मौलायल महुआक सवाल अछि। विकासक नाम पर प्राकृतिक संसाधनक सीमातीत दोहन आ बाहरी भोगवादी संस्कृतिक पसार कतेक कष्टकारी होइछ ई बूझल जा सकैत अछि। ‘कोल्हा मोची’क बेटाक ढोल फोड़ब एक वाक्यमे उपेक्षा, असमानता आ अन्यायक भूमि पर विद्रोहक चिंगारीक खेरहा कहैत अछि। परिस्थितिक अनुकूलताक निष्क्रिय प्रतीक्षासॅं नीक होइत छैक ओहि लेल कएल गेल संघर्ष -ई गप प्रतीकात्मक रूपमे कवि कहैत छथि- ‘मौसमकेँ हाँकि लाउ’ कवितामे । ‘आउ बाघ’ शीर्षक कविता स्थानीय लोकक हितकेँ कात राखि बाहरी उद्योगपति लोकनिक आमंत्रणक माध्यमसॅं प्रभुवर्गक लोभ, स्वार्थ आ जनताक संग अन्यायकेँ उघाड़ करैत अछि। एहि तरहेँ चहकैत चिड़ै,बुधन सपना देखलक,गुजरा आदि कविता अपन सम्प्रेषणीयताक कारण बहुत प्रभावी बनल अछि। संक्षेपमे एतबहि जे अन्यायक अति सदैव प्रतिक्रियाकेँ जन्म दैत छैक।ई प्रतिक्रिया जॅं तन्त्र आ तन्त्रक तथाकथित पैरोकारक दृष्टिसॅं अनजाने अथवा स्वार्थक कारण जानि कए उपेक्षित होइत छैक,तखन समाजक समरसता आ शान्तिक गप दिवास्वप्न बनि जाइत छैक।त’शोषण दमनसॅं नक्सलवादक अंत संभव नहि,ओ संभव छैक सामाजिक न्यायसॅं,संसाधनक समुचित वितरणसॅं आ सभक लेल मूलभूत आवश्यकताक पूर्त्ति सुनिश्चित कए। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर कहने छथि – शांति नहीं तब तक जब तक सुख -भाग न सबका सम हो । नहीं किसी को बहुत अधिक हो । नहीं किसी को कम हो। धृतराष्ट्र आ दुर्योधनक सभ किछु हड़प' बला प्रवृत्ति केहन विनाशक बीआ बाउगि कएलक, ककरहुसॅं नुकायल नहि। साहित्यकार समाजकेँ दिशा देबाक संग सत्ता केन्द्रकेँ ऐना देखबैत छैक,सावधान सेहो करैत छैक, हॅं गजबहीर लेखे धन सन!अस्तु। कवि आ अनुवादक दुहूक प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करैत लेखनीकेँ विराम देब एहि कवितांशक संग - रत्नगर्भा हरियर-हरियर उर्वर धरतीपर भूखक ज्वाला अपमानित करुणा क्रान्तिकारी लालसा फुलवा भ' गेल कम्युनिस्ट व्यवस्थाक विरोधमे। संपादकीय टिप्पणी- ई आलेख आभाजी अपने पठेलीह अछि संगहि ई फेसबुकपर सेहो देल गेल छै। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १८.डा. कीर्तिनाथ झा-शम्भु बादलक कविता जिनगीक रोशनी डा. कीर्तिनाथ झा-संपर्क-9443655640 शम्भु बादलक कविता: जिनगीक रोशनी पछिला मास श्री हितनाथ जी हिन्दी भाषाक सुपरिचित कवि शम्भु बादलक एक कविताक मैथिली अनुवाद 'फेसबुक' पर देलखिन। हम ओहि कवितासँ दू गोट शब्द बीछि, ओकर आगू प्रश्न चिह्न (?) लगा , ओकरा सबकें ओही 'पोस्ट'पर 'कमेन्ट' जकाँ 'पोस्ट' कए देलियैक। फल ई भेल जे शम्भु बादलक जाहि हिन्दी कविता सबहक मैथिली अनुवाद ओ केने रहथि तकर संपूर्ण फ़ाइल दोसर दिन भोरे हमरा लग पहुँचि गेल. हम पढ़ब आरंभ कयल; बीछल बेराओल कविताक संख्या बहुत नहि रहैक। मुदा , कविता सब कथ्यमे तेहन प्रखर आ भावमे तेहन प्रभावकारी रहैक जे हम एके श्वासमे पोथीक आद्योपान्त पाठ एक तेज दौड़- जकाँ जखन समाप्त कए लेल, तखन बुझबामे आयल जे हितनाथ जी शम्भु बादलक एहि कविता सबकें अनुवाद करबाक विचार किएक केलनि। वस्तुतः, अनुवादक हेतु केओ कोनो ग्रन्थ किएक चुनैछ? ओकर पाछू कोन प्रेरणा वा कारण होइछ? हमरा जनैत, पहिल कारण थिक, पाठककें सम्पूर्ण रूपें साहित्यक नीक लागब, पसिन्न पड़ब, स्पर्श करब. बेसी फड़िछाकए जं कही तं , कविताक भाषा , लालित्य , भाव आ अर्थक सरलता, पसिन्न पड़बाक ओ अनेक कारण सब थिक जकर समुच्चयसँ कविता पाठककें स्वतः मोहि लैछ, मुदा एहि सब साहित्यिक अवयव सबकें जं बिसरिओ जाइ तं हमरा हेतु अनुवाद करबाक पाछाँक मूल प्रेरणा थिक पाठकक ओ मनोरथ जे 'केहन दीव (दिव्य) होइतैक जे ई कविता (सब) अपनो भाषामे होइतैक !" हमरा जनैत अनुवादक हेतु ई मनोरथ अनुवादक प्रथम प्रेरक तत्व थिक। अनुवादक हेतु अपन क्षमताकें तौलबाक विचार तकर बाद अबैत छैक आ अंततः जखन अनुवादककें विश्वास होइत छनि जे हम एहि काजक हेतु सक्षम छी, तखन ओ अनुवादमे हाथ लगबैत छथि। 'कुरल' केर अनुवादक विचार आ अनुवादमे हाथ लगयवाक निर्णयक बीच हमरा करीब पन्द्रह वर्ष लागि गेल छल ! श्री हितनाथ जी द्वारा संकलित आ अनूदित शम्भु बादलक कविता पढ़लासँ समाजपर लागल प्रत्येक घाओक गंभीरता आ सामाजिक विसंगतिपर कविक प्रहारक अनायास अनुभव होइछ। कविताक सोझ अर्थ आ निहित अर्थमे सेहो कोनो आवरण नहि छैक। प्रायः तें ई कविता सब हितनाथजीकें स्पर्श केलकनि आ ओ एहि काजमे हाथ लगओलनि। कवि आ साहित्यकार रूपमे हितनाथजी मैथिली साहित्यमे ओतबे सुपरिचित छथि जतबा अजुका समाजमे 'फेसबुक'। ई गद्य-पद्य-समालोचना-आलेखमे मांजल छथि। शम्भु बादलक कविताक अनुवाद हिनक पहिल अनुवाद थिक। अनुवादहुमे ई कतेक सिद्धहस्त छथि, से कविताक एहि संकलनसँ स्वयं प्रतीत होइछ। पोथी छोट छैक , तैं एहि भूमिकामे विषयवस्तुक संकेत दए आ विवेचना कए पाठकक उत्सुकता थोड़ करब उचित नहि। तथापि , एतबा कहब अत्युक्ति नहि हएत जे संकलित कविता सबहक विषय प्रासंगिक आ समसामयिक छैक। अस्तु , पोथी उठाउ , आ पढ़ि जाउ। (फेसबुकसँ साभार) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १९.केदार कानन-कविता शम्भु बादलक नव स्वर, नव संधान केदार कानन-संपर्क-7004917511 कविता : शम्भु बादलक नव स्वर, नव संधान हिन्दी को प्रगतिशील कविलोकनिक मध्य शम्भु बादलक नाम आदरसँ लेल जाइत अछि। अपन कवितामे आम-अवामक सामूहिक पीड़ा, ओकर दुख-दैन्य कें ओ स्वर देलनि अछि। ओहि सुखक चर्चा ओ सेहो कयलनि अछि जे तप्पत बालुपर एक बुंद जल जकाँ होइत छैक ओकरा जीवनमे। मुदा ओतबा सुख छैक। हिनक कविता एहि तथ्यकें प्रमाणित करैत अछि। शम्भु बादलक कविताक एक महत्वपूर्ण तथ्य ईहो थिक जे ओ यथास्थितिकें तोड़य चाहैत छथि। बहुसंख्यक समाजमे वास्तविक अर्थमे जे स्थिति रहबाक चाही, जाहिसँ ओकर सभक जीवन एक लय, एक आनन्दमे बीतय, ओ तकर कामनाक कवि छथि। मुदा ओकर सभक जीवनमे हाड़तोड़ मेहनति, कठिन परिश्रमसँ प्राप्त स्वल्प आमदनी मात्र छैक। शोषणक पैघ जाल छैक आ ओहि जालमे आम मनुक्ख जकड़ल छटपटाइत रहैत छैक। डेग-डेग पर शोषण, भ्रष्टाचार, ठकपनीसँ घेरल-बेढ़ल आ आश्वासनक फूसि व्यामोहमे पड़ल थकुचल जीवनक संग ठाढ़ ई जनसमुदाय ठीके विवश निरुपाय बनल रहैत अछि। मठाधीश आ सत्ताक छल-कपट, धोखाधड़ीसँ आहत ओ बेर-बेर पराजित होइत अछि। मुदा बादलजीक कविता एहि स्थिति सबहक मात्र चित्रणे नहि करैत अछि अपितु सम्पूर्ण बदलाओ लेल प्रेरित-प्रोत्साहित करैत अछि। ओ आह्वान करैत छथि, ओ प्रत्येक दुरभिसंधिक विरूद्ध जनसमुदायकें सचेत करैत छथि। ई एक महत्वपूर्ण विषय थिक। निश्चित रूपसँ जनसमुदायक संग, ओकर आशा-आकांक्षा, ओकर सुख-दुख, ओकर गहन मानवीय पीड़ाक संग हिनक कविता टहलैत-बुलैत अछि। ओकर सबहक प्रत्येक उसाहल डेगक हिनक कविता भेटैत अछि। ई छोट बात नहि धिक। कोनो कवि जखन जनसमूहक संग ठाढ़ होइत, ओकर सुरमे सुर मिलबैत, ओकर सुख-दुखमे सहभागी होइत आगाँ बढ़ैत अछि तँ ओ कवि आ हुनक कविता सार्थक होइत अछि। एहिमे संशयक गुंजाइश नहि अछि। निस्सन्देह शम्भु बादल मानवीयताक कवि छथि, मानवीय चेतनाक कवि छथि। एहि संग्रहमें संकलित हुनक अनेक कविता व्यापक अर्थ-बोधक कविता धिक, जाहिमे प्रमुख कविता हजारीबाग, माँ, कोल्हा मोची, शिकार, गुजरा, रचनाकार एवं जनता, बुधन सपना देखलक, चाँद मुर्मू, पोखर बाबू, प्रधानक भाषण, श्यामली बुचिया, भाइजी, जनताक कवि, सार्वजनिक सूचना आदि रेखांकित करबाक योग्य अछि। सर्वाधिक प्रसन्नताक बात ई थिक जे एहि कविता सभक धमक मैथिलीमे अनुवाद भेलासँ मैथिलीक कविता-प्रेमी धरि पहुँचत। आ से महत्वपूर्ण काज कयलनि अछि सुकवि-समीक्षक-ग्रामगाथा कहनिहार हितनाथ झाजी। हितनाथजी नव-नव काज करैत रहैत छथि आ व्यस्त रहैत छथि। हिनक अनुभवसिद्ध दृष्टि एहि दिशामे गेलनि आ एक अनुभवसिद्ध हिन्दी कविक कविता सभक अनूदित रूप हमरा सभक सोझाँ आयल, ताहि लेल हितनाथजी बधाइक पात्र छथि। आदिवासी जीवनक गमक-धमक, पहाड़-झरना आ जल प्रपातक मोहक ध्वनिक चमक, एक टा नव जीवनक सुगंध एहि कविता सभमे सर्वत्र छिड़िआयल भेटत, जे एक नव आस्वादसँ पाठककें मोहित करत, से विश्वास अछि। हितनाथजी स्वयं एक सुघड़ आ संवेदनशील कवि छथि। ओ कविताक मर्म बुझैत छथि। चयन करवाक हुनक दृष्टि सेहो विलक्षण छनि। विश्वास अछि जे एहि अनूदित मैथिली कवितामे मानवीय जीवनक नव स्वर-संधान, नव आरोह-अवरोह, एक टा नव सुगंधक विस्तृत व्याप्ति रचल-बसल भेटतनि मैथिलीक पाठककें। आशा करैत छी जे मैथिलीक पाठक वर्ग द्वारा ई कविता सभ सराहल जायत। (फेसबुकसँ साभार) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २०.कुमार मनीष अरविन्द-कविता शम्भु बादलक हजारीबाग परिसरक विशिष्ट सुगन्धिसँ महमहाइत कविता सभकें पढ़ैत कुमार मनीष अरविन्द कविता : शम्भु बादलक (हजारीबाग परिसरक विशिष्ट सुगन्धिसँ महमहाइत कविता सभकें पढ़ैत) श्री हितनाथ झाजी हजारीबागसँ जखन फोन पर ई सूचना देने छलाह जे ओ आदरणीय डॉ० शम्भु बादलजीक किछु हिन्दी कविता सभक मैथिलीमे अनुवाद केलनि अछि आ ओकरा सभकें पुस्तिकाक रूप मे छपवा लेबाक मोन बनौलनि अछि, तँ हम हुनका ई सुझाव देने छलियनि जे एहिमे कमसँ कम एतेक कविता तँ अवश्य सम्मिलित रहय, जे प्रकाशित सामग्री पुस्तकक श्रेणीमे आबि सकय। ई कयलासँ अनुवादक ई काज अपन दीर्घकालिक महत्व बनाकऽ राखि सकत।... आ आइ आब एहि अनुवादक पोथीपर किछु बजबाक मौका भेटलापर, सभसँ पहिने तँ हम बधाइ देबय चाहैत छियनि श्री हितनाथ झा जीकें आ आदरणीय डॉ० शम्भु बादलजीकें। हितनाथ झा जीकें बधाइ एहि कारणें जे ई शम्भु बादल जीक कविता सभक चयन आ अनुवाद बहुत मोनसँ अपन साहित्यिक ऊर्जाक श्रेष्ठ निवेश करैत कयलनि अछि ।... आ डॉ० बादलकेँ बधाइ एहि कारणें जे हुनक श्रेष्ठ रचना आब मैथिली भाषाक विद्वज्जन लोकनि आ सामान्य पाठककेँ सुलभ रूपें उपलब्ध भऽ रहल छन्हि पढ़बा आ गुनवा लेल। डॉ० शम्भु बादल मैथिली साहित्यक मैदानमे सेहो श्रेष्ठ आ निस्सन रचनाकारक रूपमे परिचिति पाबय जा रहलाह अछि। अस्तु ! 'कविता : शम्भु बादलक' शीर्षक सँ छपल एहि 115 पृष्ठक पोथीमे शम्भु बादलजीक कुल 29 गोट हिन्दी कविताक श्री हितनाथ झाजी द्वारा कयल गेल मैथिली अनुवाद मैथिलीक रुचि सम्पन्न पाठक वर्ग लेल कलात्मकताक संग परसल गेल अछि। एकर प्रकाशन किसुन संकल्प लोक, सुपौल द्वारा कयल गेल अछि। पोथीक पहिल संस्करण 2023 ई०मे बहरायल अछि आ पेपरबैक संस्करणमे एकर मूल्य 150 टाका मात्र राखल गेल अछि। कुल मिला कऽ गप्प करी तँ पोथीक छपाइ सफाइ नीक अछि। एहि लेल प्रकाशनक सर्वेसर्वा श्री केदार काननजीकें बधाइ ।अनुवादक एहि पोथीमे प्रारम्भ मे डॉ० कीर्त्तिनाथ झाजीक डेढ़ पृष्ठक टिप्पणी अछि। उल्लेखनीय अछि जे कीर्त्तिनाथ झाजी स्वयं नीक अनुवादक छथि आ हुनक मलयालमसँ 'कुरल'क मैथिली अनुवाद लोकप्रिय भेल अछि। तकर बाद प्रकाशकीयक रूपमे पोथीमे श्री केदार कानन जीक दू पृष्ठक टिप्पणी सेहो सम्मिलित अछि। आ तखन सभसँ अंतमे अनुवादक श्री हितनाथ झाजीक दू पृष्ठसँ थोड़े बेसीक आत्मकत्थ। एहि तीनू टिप्पणी आ कि मंतव्य आ कि परिचयसँ पोथीक काव्य-वस्तुसँ पाठकक प्राथमिक परिचय अवश्य भऽ जाइत छन्हि, से कहबाक अछि हमरा । ई पोथी हमरा सौभाग्यसँ खास आदरणीय शम्भु बादल जीक हाथें राँचीमे दिनांक 19.11.2023 कें प्राप्त भेल। ई सूचना भेटल छल जे एके दिन पहिने दिल्लीसँ प्रकाशक द्वारा पठाओल गेल हिनका भेटल छलन्हि, तें लगैत अछि जे संभवतः हम पहिले व्यक्ति रहल होयब, जिनका ई पोथी कविक हार्थे भेटल छलन्हि। मने बुझू जे कोनो फिल्मक रिलीज भेलापर फर्स्ट डे, फर्स्ट शो सन..... एहि पोथीक कविता सभकें पढ़ैत हम बेर-बेर हितनाथ जीक कविता आ शब्द-दुनू चयनक मोने-मोन प्रशंसा करैत रहलहुँ। कारण एहि चयनित कविता सभकें पार करैत पाठककेँ मूल रचनाकारक कविता सभक तासीरक पता तँ लगबे करैत छैक, संगे-संग पाठककेँ रचनाकार डॉ० शम्भु बादलक व्यक्तित्व आ हुनक जीवन-संघर्षक अनेक छवि आ आयामक झलक सेहो भेट जाइत छैक सुलभ रूपें । ई निश्चये एहि संग्रहक कविता सभक आ तकरा सभकें मैथिलीमे अनुदित करबाक क्रममे शब्दसभक चयनक विशिष्टता हम मानैत छी ।... साधुवाद हितनाथ जी। आब अबैत छी कवितासभक गुणवत्ता आ अनुवादकेर श्रेष्ठता पर। पहिने कविता सभक गुणवत्ता आ ओकर सभक प्रभाव पर दृष्टिपात कऽ ली तँ लगैत अछि जे शम्भु बादल जीक पुरान आ नव करीब-करीब सभटा प्रसिद्ध आ लोकप्रिय रचनासम कें छाँटि कऽ अनुवादक एहि पोथी मे राखि लेलन्हि अछि। ओना हम ई दावा किन्नहुँ नहि कऽ रहल छी जे हम डॉ० शम्भु बादलजीक सम्पूर्ण हिन्दी पद्य रचना सभक पाठ आ परिशीलन कयने छी, मुदा वर्ष 2005 में अपन हजारीबाग पदस्थापनक समयसँ हुनकासँ (आ अपने सभसँ) जे परिचय रहल अछि आ एतय मासिक साहित्यिक गोष्ठी सभ मे जे हुनक रचनासभ सुनैत रहलहुँ अछि, ओहि परिचयक अधिकारसँ ई तँ विश्वासक संग कहि सकैत छी जे कविक सर्वकालिक श्रेष्ठ रचनासभ एहि पोथीमे एक ठाम मैथिली भाषामे अनूदित भऽ कऽ संगृहीत हेबाक ई एकटा पैघ काज भेल अछि। बहुत लोक ई विचार व्यक्त करैत रहैत छथि जे हिन्दीक वस्तुकें मैथिलीमे अनूदित करबाक कोनो आवश्यकता नहि, किएक तँ हिन्दी जानय बला लोक मैथिलीक रचना पढ़ि कऽ ओकरा बूझि सकैत छथि आ तहिना मैथिली जानय बला पाठक हिन्दीमे लिखल गद्य आ कि पद्यके नीक जकाँ बूझि सकैत छथि। मुदा हम एहि विचारसँ किन्नहु सहमत नहि होइत छी। जें कि मैथिलीक शब्द सभक अपन विशिष्ट माधुर्य, अपन फराक अर्थरूप आ अपन अलग प्रभाव छैक, तैं हिन्दीक नीक-नीक रचनासभक मैथिलीमे अनुवाद कयल जेबाक हम समर्थक छी। हम स्वयं परमाणु बमक विध्वंस पर केन्द्रित जापानी कविता सभक हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद कयने छी जे 'त्रासदीक तऽर में' शीर्षकसँ साहित्य अकादेमी, नई दिल्लीसँ 2022 मे छपल अछि।... एहि अनुभवक आधारपर हम ई बात विश्वाससँ कहि सकैत छी जे हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद कऽ लेब कोनो बहुत सरल काज नहि छैक, ई ततबे कठिन काज छैक, जतेक कोनो आन भारतीय भाषासँ अपन मातृभाषामे कयल जाय बला अनुवाद-कार्य। तें हमरा लगैत अछि जे डॉ० शम्भु बादलक कविता सभक जे ई अनुवाद श्री हितनाथ झाजी कयलन्हि अछि, से एकटा विशिष्ट काज भेल अछि मैथिली लेल, किएक तँ मैथिलीक पाठक एहि महत्वपूर्ण कविता सभक आस्वादन मैथिलीमे कऽ सकताह। आब आउ किछु विशिष्ट कविता सभपर गप्प करी। अहाँ 'माँ' शीर्षक कविता पढू। अहाँक सोझाँ कविक सम्पूर्ण बालपनक चित्र अपन सम्पूर्ण मार्मिकता आ स्पष्टताक संग सहजें उपस्थित भऽ जायत। भावक उद्वेगसँ आवेशित भऽ उठब अहाँ। जँ सस्वर पाठ कऽ रहल होई आ कतहु बीचमे जाकऽ कण्ठ रुद्ध भऽ जाय, तँ से कोनो आश्चर्यक गप्प नहि। ई कविता पढ़ैत अहाँ स्वयं अपन मायक विषयमे सोचबा लेल बाध्य भऽ जायब। ई छैक एहि रचनाक सहजता आ एकर गहींर मार्मिकताक स्तर ! अहाँ 'हजारीबाग' शीर्षक कविता पढ़बै तँ अहाँक मस्तिष्कमे एहि शहरक सम्पूर्ण इतिहास, चित्रसभक श्रृंखलाक रूपमे कौंध उठत जेना। 'कोल्हा मोची' पढ़ियौ.... आ होइत अंतमे कोल्हाक, बेटाक तमतमायल मुँह, फूटल ढ़ोल आ विधायकक हाथक दारू.. देखार देत । अहाँ 'आउ बाघ' शीर्षक कविता पढू अहाँकें पूँजी निवेशक लेल आमंत्रणक सभटा तरी-घटी बुझा जायत। किछु पाँती देखियौ एकर - "आउ बाघ ! / एहि रूपें आउ / हमरा नीक लागए / कोनो सुन्दर आवरणमे आउ / बस, पंजा देखाइ ने पड़य काका ! / दाँत केओ देखि ने लेअए, हे हमर आका !" ... अहाँ 'रचनाकार एवं जनता' शीर्षक 'पोखर बाबू' पढ़ब, अहाँ 'जनताक कवि' पढ़ब कऽ सकबाक सामर्थ्य छैक शब्द सभमे, ओकर रचना पढ़ब, अहाँ 'चाँद मुर्मू' पढ़ब, अहाँ सगरे विषय केर आ अहाँकेर मर्म पर चोट अर्थसभमे, ओकर प्रभाव में ! 'घर' 'गुजरा' आ 'भाइजी' शीर्षक कविता सभसँ पार होइत अहाँ समाजक विकृत रूपक यथार्थकें सूक्ष्मतासँ देखि परेखि सकब ।... आक्रोश सँ भरि उठब अहाँ! आ अंतमे आबि जखन अहाँ 'सार्वजनिक सूचना' पढ़ब तखन तँ बिना चमत्कृत भेने नहि रहि सकब । ऐतेक थोड़ शब्दमे बाजारवादक भयावह आ घृणित मूल स्वरुपक वर्णन करैत ओकर बखिया उखाड़ल जाइत हम पहिने कतहु नहि देखने छलियैक। सार रूपमे कही तँ हिन्दीसँ मैथिलीमे अनूदित ई कविता सभ सरल अछि, सहज अछि, चित्रमय अछि आ ठीक-ठीक वएह बात कहि सकबामे सक्षम अछि, जे एकरा सभकेँ कहबाक छैक ! आ इएह कारण छैक जे अधिकांशतः अतुकांत रहितो ई कविता सभ लोकप्रिय भेल आ अपन रचनाकार कवि शम्भु बादलकें खूब चिन्हार बनौलक। सम्पूर्ण पोथीसँ एकटा आर अनूदित कविता, जकर शीर्षक छैक 'सार्वजनिक सूचना'क किछु पांति एतय अहाँ सभक समक्ष रखबासँ हम स्वयंकेँ रोकि नहि पाबि रहल छी - "खुजि गेल / खुजि गेल / बजार खुजि गेल मुक्त भ' गेल बजार / मने मुक्त बजार खुजि गेल एना कही मार्केट ओपने भ' गेल / अर्थात् ओपेन मार्केट स्टार्ट भ' गेल / मार्केट बिग बिग्गर बिगेस्ट / अछि अहाँ जतय जाउ जे करबाक हो / करू / कैंची-सूइ-ताग / जल-जमीन-जंगल / मिल-कारखाना-व्यवसाय / फूड-फ्लैट-फीमेल / कार-हेलीकॉप्टर प्लेन/ हथियार बिस्फोटक-बम / गुण्डा-लुटेरा-हत्यारा / ........ सम्बन्ध-जाति-धर्म। / रंगकर्मी-संस्कृतिकर्मी-मिडिया / विधायिका-कार्यपालिका-न्यायपालिका / अपन-अपन ढंग सँ / उपलब्ध अछि बजार मे.... आ एहि तरहक अनेक कविता सभक घाटी कें पार करैत जखन अहाँ पोथीक अंतिम शब्द धरि पहुँचब तँ एहि पोथीकेँ पढ़बाक समेकित प्रभाव अहाँकेँ जेना किछु बेसी धनीक बनाकऽ छोड़त, से धरि हम बहुत विश्वासक संग कहि सकैत छी। आ विश्वासक संग इहो कहि सकैत छी जे हिन्दीसँ मैथिलीमे अनूदित कविताक पोथी सभमे ई पोथी बहुत समय धरि अपन विशिष्ट स्थान बनाकऽ राखत आ शम्मु बादल सन सुच्चा आ जमीनसँ जुड़ल रचनाकारक परिचय मैथिल पाठक लोकनिकेँ दैत रहतन्हि। से ई एहि कारणें जे झारखण्डक हजारीबाग परिसरक जल, जंगल आ जमीनक सुगन्धिसँ महमहाइत कविता सभ जे मैथिली भाषामे रूपान्तरित भेल अछि, तँ स्वतः एकटा विशिष्टता एहि रचनासभमे घोरा गेल छैक, एकटा विशेष माधुर्य, एकटा विशेष मार्मिकता, एकटा विशेष अर्थवत्ता आ एकटा विशेष प्रभाव। तँ एहि विशेष अनुवाद-काज लेल एक बेर रचनाकार आ अनुवादक - दुनू क लेल फेर सँ हार्दिक बधाइ दैत छियन्हि । (फेसबुकसँ साभार) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २१.उज्जवल कुमार झा- मैथिली साहित्यक सशक्त हस्ताक्षर हितनाथ झा उज्ज्वल कुमार झा -संपर्क-9278888436 मैथिली साहित्यक सशक्त हस्ताक्षर हितनाथ झा
हितनाथ झा मैथिली साहित्यक लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकार छथि। मैथिली साहित्यमे हिनक मूल्याकंन लेल विदेह विशेषांक आबि रहल अछि। माँ भद्रकालीक कोरामे बसल कोइलख गाममे हिनक जन्म 06 जून 1956 ई. मे भेलनि। कोइलख गाम अपन विद्वता ओ मिथिलाक सांस्कृतिक केन्द्रकेँ रूपमे अग्रणी अछि। एहि गाममे कतेको विभूति लोकनि जन्म लेलाह। हितनाथ जी इलाहाबाद बैंकसँ वरीय प्रबन्धक पदसँ सेवानिवृत्त भ’ साहित्य साधनामे लीन छथि। जँ हिनक साहित्यमे अवदानकेँ बात करि तँ हिनक पृष्टभूमि साहित्यिक रहलनि अछि। कोइलखसँ एकटा हस्तलिखित पत्रिका बहराइत छलै जकर नाम छलै ‘प्रभात’ (एकर पहिल अंक जनवरी 1933 मे बहरायल आ अन्तिम उपलब्ध अंक दिसम्बर 1934 मे आयल), ई पत्रिका ‘प्रभात युवक संघ’ द्वारा संचालित आ प्रकाशित होइत छल, जकर सम्पादक ओ व्यवस्थापक हिनक पिता स्व.पं. तारानाथ झा छलथिन। हिनक अग्रज स्वनामधन्य डॉ. भीमनाथ झा मैथिली साहित्यक वरेण्य साहित्यकार छथि। मैथिली साहित्यमे ‘गामगाथा’ बहुत कम लिखल गेल अछि, जाहिमे हिनक नाम सेहो छनि। हिनक ग्रामगाथा पोथी ‘कोइलख’ साहित्यजगतमे हिनका फराक पहिचान दियौलक। जेनाकि हम पहिने कहलहुँ जे कोइलख प्रसिद्ध गाममे अबैत अछि। एकटा बात जे हम बचपनसँ सुनैत अबैत छलहुँ जे कोइलखमे घरे-घरे साहित्यकार ओ अधिकारी भेटता से एहि ग्रामगाथाकेँ पढ़लाक उपरांत सहजहि भान भ’ जायत अछि। एहि पोथीमे कुल 39 गोट विभूतिक चर्चा भेल अछि। संगहि 8 गोट संस्था संगठनक चर्च भेल अछि आ परिशिष्टमे 6 गोट महत्तपूर्ण आलेख संकलित अछि। वस्तुतः ई पोथी कोइलख गामक अदभूत छवि हमरालोकनिक बीच आनैत अछि।
हितनाथ जीक पहिल साहित्यिक परिचय एकटा संपादक केँ रूपमे हमरा सभक सोझाँ अबैत अछि। हिनक दूगोट सम्पादित पोथी प्रकाशित भेल छनि (1) मैथिली इतिहासक रेखांकन आ (2) त्रिवेणी। तकर बाद ई एकटा कुशल अनुवादक केँ रूपमे हमरा सभक सोझाँ अबैत छथि, जाहिमे हिनक एक गोट पोथी ‘कविताःशम्भु बादलक’ प्रकाशित अछि। आ ओकर बाद एकटा कुशल समीक्षक आ त्वरित पाठकीय प्रतिक्रिया दै बला, जकरा ओ अपन लेखनीक आधार बनौने छथि। हितनाथ जी साहित्यक सबसँ महत्ती आ दूरूह विधाकेँ अपनौलनि अछि। आलोचनाक विधा! कोनो कृतिक सम्यक व्याख्या करब ओकर मूल्यांकन करब आलोचना कहबैत अछि।समाज आ साहित्यक मध्य स्थापित संबंधकेँ देखैक काज आलोचनाक माध्यमसँ होइत छैक। साहित्यक सामाजिक प्रासंगिकताकेँ स्थापित करैत पाठकक मध्य साहित्यकेँ ल’ जाएब आ एहि संबंधक उत्तरोत्तर विकास करब आलोचनाक पहिल प्राथमिकता होइत छैक। एहि विशेषताक कारण “आलोचना” साहित्यक स्वतंत्र विधा मानल गेल अछि। मैथिली साहित्यमे आलोचनाक सुदीर्घ आ विकसित परंपरा रहलैक अछि। साहित्य-तत्त्वक अनुसंधान क’ पाठकक जिज्ञासाकेँ तृप्त करैक लेल विशुद्ध वैज्ञानिक दृष्टिसँ संपृक्त भ’ निरंतर प्रवाहित होइ वाला तत्व अछि “आलोचना”। ओना तँ श्रीमान हितनाथ झा जीक संक्षिप्त पाठकीय प्रतिक्रिया/समीक्षा फेसबुकक माध्यमसँ हमसब पढ़ैत रहैत छी, मुदा,किसुन संकल्प लोक, सुपौलसँ प्रकाशित ‘लेख-रेख’ पोथीमे हितनाथ झा अपन गंभीर आ अन्वेषी विचारसँ ओ चिंतनसँ साहित्यक विभिन्न विधाक पोथी पर अपन बात रखलनि अछि। विश्वक अन्य भाषा साहित्यकेँ भाँति मैथिली साहित्यमे जे बदलाव परिलक्षित भेल अछि, तकरा विस्तारसँ पाठकक सोझाँ अनबाक प्रयास कएलनि अछि। एहि पोथीक महत्ता एहि लेल सेहो अछि जे हितनाथ जी जाहि लेखकक पोथीक पाठकीय समालोचना कएलनि अछि हुनक संक्षिप्त व्यक्तित्व आ कृतित्वक संक्षिप्त जानकारी सेहो साझा कएलनि अछि, संगहि विभिन्न विद्वान साहित्यकार द्वारा हुनक साहित्यकेँ प्रति मंतव्य/टिप्पणी सेहो रखलनि अछि। निःसंदेह ई पोथी मैथिली साहित्यक गंभीर पाठक, अध्येता आ शोधार्थी लेल उपयोगी सिद्ध अछि। एहि पोथीमे नओ गोट उपन्यासक, आठ गोट कथा संग्रहक, एक गोट नाटकक, उनैसगोट कविता संग्रह, दूगोट निबंध संग्रह, पाँचगोट संस्मरण, छहगोट समीक्षात्मक पोथी, एकटा आत्मकथा, एकटा ललित निबंध, एकटा व्यंग, तीनगोट गाम-नगर गाथाक पोथी आ एकगोट पत्रिकाक आलोचनात्मक समीक्षा (पाठकीय) कएल गेल अछि।
एखन बात करब हितनाथ जीक बाल कविताक पोथी राजापोता बलगर, एहि पोथीक प्रस्तावनामे लेखक कहैत छथि -“मैथिलीमे पहिल बालपत्रिकाक प्रकाशन 1949मे भलैक । 1949सँ ‘शिशु’ एवं ‘बटुक’क प्रकाशन, 1957सँ ‘धीयापूता’क प्रकाशन, 1996सँ ‘नेना भुटका’, 1998सँ ‘बाल मिथिला’ आ आगाँ ‘बालबन्धु’, ‘बजरबट्टू’ आदि पत्रिका अयलैक आ बन्द होइत गेलैक। आनो पत्रिका सभमे बालसाहित्य लेल अलगसँ स्तम्भ सहैत छलै, जाहिमे मिथिला मिहिर, वैदेही, कर्णामृत, मिथिला दर्शन आदि प्रमुख छल। एहि सभ पत्रिकामे मैथिलीक स्वनामधन्य साहित्यकारक रचना सेहो रहैत छलनि। बाल साहित्यकेँ समृद्ध करबामे सभ पत्रिकाक ऐतिहासिक महत्त्व छैक।”ओ आगाँ कहैत छथि – “संवैधानिक भाषा रहितो मैथिली प्रारम्भिक वर्गमे नहि पढ़ाओल जाइत अछि, तैं अपन मातृभाषाक बालसाहित्यसँ मैथिल नेनालोकनि अपरिचिते जकाँ छथि। अभिभावक आ शिक्षक लवोकनि एहि दिस ध्यान नहि द’ अपन नेना आ विद्यार्थी लोकनिकेँ आने भाषाक पाठ पढ़बैत छथि से उचितो, मुदा हमरालोकनिक ई कर्तव्य अछि अपन मातृभाषाक प्रति नेनालोकनिक ध्यान आकर्षित करब, जाहिसँ नेनालोकनि सरलता आ सहजतासँ अपन परिवार, समाज, गाम, शहर, नगर, महानगर, देश,देश-प्रेम, विधान-संविधान आ विदेशक विषयमे बुझि सकय। नेना लोकनि बुझि सकय अपन इतिहास, परम्परा, पावनि-तिहार, सम्बन्ध-बन्ध, अनुशासनक महत्त्व आ भविष्यक लक्ष्य। बालमन पर प्रभाव पड़बाक चाही ज्ञान-विज्ञान, कला-कौशल, जल-जंगल-पहाड़, चिड़ै-चुनमुन्नी, बाड़ी-झाड़ी-फुलबाड़ी, ऋतु, कलम-बगीचा, खेत-खरिहान, खेल-खिलौना, योग-व्यायाम, आवरण-पर्यावरण, पठन-पाठन, यश-अपयश आ सर्वोपरि सुनबा, पढ़बा आ गुनबाक अभिरुचि। ई सब तखनहि सम्भव, जखन एहि सभ विषयक बाल कविताक पोथी औतैक।”
साहित्य समाजक दर्पण होइत अछि आ बाल साहित्य बालमनक अन्तर्मनक प्रतिबिम्ब तँ ई कहि सकैत छी जे बालसाहित्य बालमनक सहज, सरल छविक दर्पन थिक। बाल-बच्चाक अठखेलि, ओकर सुलभ चेष्टा, नटखटपन आ कल्पनाशीलता बाल साहित्यक जान होइत अछि। बाल साहित्य जँ बाल-बच्चाक हाथ धरि जाए तँ निश्चित रूपें ओकरामे भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक, मानसिक आ आत्मिक संवेदनात्मक उत्कर्ष हेतैक। एहि बातसँ ई सहजहि भान लगाओल जा सकैत अछि जे श्रेष्ठ बाल साहित्यक नींव पर उत्तम, समुन्नत, सम्यक आ स्वस्थ समाज रूपी भवन ठाढ़ कएल जा सकैत अछि...
हालहिमे हितनाथ जीक बाल-कविताक पोथी “राजापोता बलगर” मैत्रेयी प्रकाशन दिल्लीसँ प्राकाशित भेल अछि, एहिमे विभिन्न भावक 46गोट कविता संकलित अछि। एहि पोथीक मादे डॉ. आभा झा कहैत छथि - प्रायः मनुक्ख अपना जीवनमे दू बेर बाल्यकाल जिबैत अछि,एकबेर जखन स्वयं नेना रहैत अछितखन आ दोसर बेर जखन ओ अपन नाती-पोताक संग अपन समयक बहुलांश बितबैत अछि, खिस्सा-पिहानी सुनबैत अछि, कान्ह पर लए टहलबैत अछि, गीत-कवित्त सुनबैत अछि।अपन संतानक संग ई सहज सुख नहि भेटि सकै छै,जकर कारण रहैत छै जीविकोपार्जनक आपा-धापी,बच्चाक खगता पुरैबाक बेगरता, घर-गृहस्थीक नाना तरहक दायित्व निमाहवाक तनाव। मुदा, प्रौढ़मनमे नाती-पोताक उत्सुकता बुझबाक, ओकर मनोभूमि धरि जएबाक आ ओकर अनन्त जिज्ञासाकेँ शमित करबाक सहज इच्छा करौट लेमय लगैत छैक आ जीवन आनन्दमय भए जाइत छैक। एकरे प्रतिफल थिक ई पोथी ‘राजापोता बलगर’।
एहि पोथीक मादे डॉ. प्रकाश झा कहैत छथि- सबसँ कठिन अछि बाल-बच्चाक लेल रचना करब। कारण, एहि लेखनमे बाल मनोविज्ञान आ रचनात्मकताक हरदम ध्यान रचनाकार केँ राख’ पड़ैत छनि । तेँ ओ बहुत रास सीमा सँ बन्हायल रहैत छथि। बच्चाक मानसिकता आ ओकर भावनाक विकासक अध्ययन बाल मनोविज्ञान कहाबैत अछि । एहिमे ई बुझबा पर बेसी बल देल जाइत छैक, जे बच्चा कोना सोचैत छैक?की अनुभव करैत छैक?ओकर व्यवहार केहन छैक?बच्चाक सीखबाक तरीका की छैक?ओ अपन समाज सँ कोना जूड़त?कोना बच्चाक मानसिक विकास सुदृढ़ हेतैक आदि आदि।एहि सब बातकेँ ध्यानमे राखैत ‘राजापोता बलगर’ मे आदरणीय हितनाथ झा बाल मनोविज्ञान केँ बहुत लग सँ पकड़बाक प्रयास कएलनि अछि। जाहिमे सफलतो प्राप्त भेलन्हि अछि। बच्चाक लेल रचना करबाक काल रचयिताकेँ अपन भाषा सरल, मिठगर, चहटगर तथा हल्लुक शब्दक ध्यान हरदम राख’ पड़ैत छनि, जकरा बच्चा आसानी सँ बूझि जाय। सहज शब्दक संयोजन जेना –
दादी पूजा-पाठ सिखौतौ दादा कहतौ कविता गढ़ पापा तखने दौड़ल औतौ मम्मी कहतौ पोथी पढ़...।
बच्चा केँ एहन शब्द सब आकर्षित करैत छैक, जे ओकर अगल-बगलमे हरदम उपलब्ध रहैछ । मैथिली बाल-कविता संग्रह ‘राजापोता बलगर’मेमनलग्गू कविताक संकलन भेल अछि। हितनाथ जी स्वांतः सुखाय लेल रचना करैत छथि, एकर प्रमाण हम एहि तरहें देब – हालहिमे प्रकाशित हिनक पोथी लेख-रेख, जाहिमे संभवतः 58गोट लेखक/लेखिकाक रचनाक समीक्षा संग्रहित अछि, जकरा ओ छपबा क’ ओहि साहित्यकार सभकेँ डाक द्वारा घरधरि पहुँचा देलनि बिना कोनो खर्च लेने। ई हिनक विशाल हृदयक परिचय दैत छथि। मुदा साहित्यकार/पाठक द्वारा साहित्यिक पोथीक क्रय करबाक प्रति उदासीनता प्रकाशक ओ साहित्यकारकेँ हतोत्साहित करैत अछि। कारण जँ ओ साहित्यकार सभ एहि पोथी एक-एक प्रति खरीद लैतथि तँ सहजहि भान लगाओल जा सकैत अछि जे ओहि पोथीक प्रकाशनमे लेखक वा प्रकाशककेँ अपना जेबीसँ कोनो खर्च नहि लगितनि। मुदा से नहि भेल!
वर्तमानमे मैथिली साहित्यमे हिनक सहभागिता स्तुत्य अछि। हम हिनक उत्तम स्वास्थ्य ओ कुशल जीवनक कामना करैत छी। अस्तु। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २२.आभा झा-समृद्धि दिशि बढ़ैत बाल-साहित्यमे राजापोता बलगरक मजगूत हस्तक्षेप डॉ. आभा झा समृद्धि दिशि बढ़ैत बाल-साहित्यमे ‘राजापोता बलगरक मजगूत हस्तक्षेप प्रायः मनुक्ख अपना जीवनमे दू बेर बाल्यकाल जिबै अछि, एकबेर जखन स्वयं नेना रहैत अछि, तखन आ दोसर बेर गंभीरसॅं गंभीर लोककेँ पुनः ई अवसर तखन भेटैत छै जखन ओ अपन नाती-पोताक संग अपन समयक बहुलांश बितबैत अछि, खिस्सा-पिहानी सुनबैत अछि, कान्ह पर लए टहलबैत अछि, गीत- कवित्त सुनबैत अछि। अपन संतानक संग ई सहज सुख नहि भेटि सकै छै, जकर कारण रहैत छै जीविकोपार्जनक आपा-धापी, बच्चाक खगता पुरैबाक बेगरता, घर-गृहस्थीक नाना तरहक दायित्व निमाहक तनाव। मुदा सेवानिवृत्तिक बाद जॅं भगवान् फेरसॅं ई मौका दै छथिन त’ प्रौढ़ मनमे बच्चाक उत्सुकता बुझबाक, ओकर मनोभूमि धरि जैबाक आ ओकर अनन्त जिज्ञासाकेँ शमित करबाक सहज इच्छा करौट लेमय लगैत छैक आ जीवन आनन्दमय भए जाइत छैक। जॅं सौभाग्यवश ईश्वर प्रदत्त कारयित्री प्रतिभा हो, तखन त’ आवश्यकताक अनुरूप कविता-कथादि बनैत चलि जाइ छै। फुरसति आ इच्छा भेल त’ पोथी रूपमे आबि आनो बच्चा लेल उपयोगी बनि कालनिरपेक्ष महत्त्व पबै छै, आ जे से नहि त’ मौखिके रूप धरि सीमित रहि जाइत छैक। ई जरूरी नहि जे उपरोक्त परिस्थितिए टामे नेन्नाक वयसक अनुरूप कविता- खिस्सा लिखाइत छै। साहित्यकारक हृदयमे समाजक प्रति एकटा दायित्व- बोध सेहो होइत छैक। मैथिलीक संदर्भमे जॅं गप कएल जाय त’ एखन धरि मैथिली प्री प्राइमरी, प्राइमरी, मिडिल वा हाइ स्कूलमे नहि पढ़ाओल जाइत अछि। तेँ कि हम सभ सरकारकेँ गरियबैत हाथ पर हाथ धय बैसल रही? किन्नहु नहि! तखन की? अपन साध्य भरि प्रयास करी। जहिना बच्चाक शारीरिक विकास लेल प्रयत्नशील रहैत छी, तहिना बाल-मनक सम्पोषण सेहो मातृभाषाक माध्यमसॅं करी, ओकर रुचि- प्रवृत्तिक अनुरूप कविता गीत,खिस्सा आदि सुनाबी, कनेक छेटगर होइते ओकरा रंगीन कविता- खिस्सा आदिक पोथी उपलब्ध कराबी, जाहिसॅं ओकरा पढ़बाक हिस्सक लागि सकै, ओकर भाषिक एवं संज्ञानात्मक कौशलक विकास संभव भए सकय, ओकरा भीतर सृजनशीलताक बीआक आधान भए सकय। आदरणीय हितनाथ झा गंभीर चिन्तक ओ आलोचक छथि, वृत्तिसॅं सेहो बैंक अधिकारी रहलाह अछि, ओत्तहु गम्भीर दायित्व! मुदा एहि सभक अछैतो मातृभूमि ओ मातृभाषाक प्रति प्रेमक वशीभूत सदैव मिथिला-मैथिली लेल किछु ने किछु करैत रहलाह अछि। तेँ ओ ग्राम गाथा, आलोचना, अनुवाद आदि विधामे लगातार लेखन कए रहल छथि। एहि तीनू पोथीमे हिनक अध्ययनशीलता आ तार्किकता बेश मुखर अछि। मुदा हालहिमे मैत्रेयी प्रकाशनसॅं प्रकाशित ‘राजापोता बलगर’ मे हिनक सहज-सरल कवि रूप देखबामे आएल। एहि संग्रहमे छियालीस टा छोट-छोट बाल कविता छै, जाहिमे किछु प्राथमिक वर्गक बच्चा लेल त’ किछु किशोरवयक बच्चा लेल उपयोगी छैक। बाल कविताक संदर्भमे एतबा त’ निश्चित कहल जा सकैछ जे ओ तखने सहज आ मनलग्गू बनि पबै छै, जखन लेखक स्वयं बच्चाक मनोभूमिमे हो। बाल सुलभ चेष्टा, खेल- कूद, जिज्ञासा आ कल्पनाशीलता आदिसॅं तादात्म्य स्थापित कएने हो। बाल- साहित्यक जान होइत छैक रोचकता, चित्रमयता आ गेयता। बाल-मनोविज्ञानक अनुरूप रचल एहि रोचक पोथीकेँ पढ़ि अहाँके ई अनुभव होयत जे बच्चा कविता सभकेँ रुचिपूर्वक पढ़बे टा करतै, कारण ओकरा ओकर रुचिक अनुरूप तुकान्त रचना एक्कहि ठाम भेटि गेलै। एहिमे गाम छै, आम- लीचीक बगैचा छै, सुरसरबालीक झिल्ली-कचरी छै,झिझिरकोना छै, जे हमरो-अहाँकेँ अपन शैशवमे ल’ जाइत अछि। हॅं ‘गाँती’ सन कविता आइ काल्हुक बच्चाकेँ अवश्य बुझबामे कठिन हेतै, कारण आइ गरीबसॅं गरीब बच्चा गाँती नहि बान्हि फाटलो- चीटल बरु, स्वेटरे-जैकेट पहिरैत अछि। ‘मकान-घर’, ‘छुपल ओहिमे खेला’ आ ‘भाग्यक रेखा’ ई तीन टा कविता हमरा अपन लक्ष्यार्थक कारण बच्चा सभक स्तरसॅं कनेक ऊपर बुझना गेल। मुदा ओही ठाम ‘बौआ दाइ’ कविता बहुत आकर्षित कएलक जतय गामघरक खेल- कूद,पढ़ाइ-लिखाइ लिखिया-पढ़िया आदिक संग चन्द्रयानक सफलताक उल्लेख आ ओतय रहि सकबाक संकल्पना अत्यधिक रुचिकर शैलीमे अभिव्यक्त भेल छैक। ’भोरे भोर’, ’राजा पोता बलगर’, ’दादी पूजा-पाठ सिखौतौ’, ’उड़न’ परी, ‘साइकिल सवारी’, ‘मधुर’,आदि छोट बच्चा लेल बेशी उपयोगी छै त’ ‘मिथिला हो सर्वोत्तम धाम’, ‘वृक्षारोपण’, ’क्षणिका’, दोहा आदि एहन कविता अछि जे किशोर वय बच्चा लेल जॅं पाठ्य-पुस्तक बनय त’ ओहिमे समाविष्ट होयबाक योग्य छै। ‘हिन्दुस्तानक प्राण तिरंगा', शीर्षक कवितासॅं एकटा छोट उदाहरण देखल जा सकैछ- टपकय जा धरि अइ धरतीपर चन्द्रमाक शीतलता सगरो पसरय सूर्य-किरणसँ सक्रियता-उज्ज्वलता सन्तति भारत माँक गर्वसँ कहय-'हमर मन गंगा' ताधरि हिन्दुस्तानक घर-घर फहरय विजय तिरंगा । अहिना कविताक माध्यमसॅं समानार्थी शब्दक ज्ञान लेल ई कवितांश उपयोगी छैक - पंकज-पुष्कर-पुण्डरीक ओ पारिजात-पाथोज जलज-वनज-उत्पल-कुवलय आ पंकरूह-अंबोज। शतदल-उत्पल-कंज-पद्म पुनि नलिन और अम्भोज, सरसिज-सरसीरुह-सरोरुह ओ वारिज सहित सरोज ।। तुकान्त कविता सुनैमे त’ नीक लगिते छै, असानीसॅं याद सेहो भए जाइत छै आ बरखो- बरख स्मृतिमे रहैत छैक। ’बालोSहं जगदानन्द’ कि ‘सा ते भवतु सुप्रीता’ आदि सन अनेक मैथिली-हिन्दी- संस्कृतक कविता एखनहुँ याद अछि एहि द्वारे जे ई बचपनमे सुनल छल आ गेयताक कारण आकृष्ट कएने छल। बेशी कवितांशक उद्धरण दय हम पाठकक उत्सुकता कम नहि करें चाहै छी, तेँ एतय एतबहि। हॅं एतबा अवश्य कहए चाहब कि ई पोथी बच्चा सभक हाथमे अवश्य दी, मैथिली बालकविताक सौंदर्य,सहजता आ अप्रत्यक्ष रीति सॅं व्यक्तित्व-निर्माणक योग्यतासॅं परिचित कराबी। बाल-साहित्यकेँ समृद्धि दिशि ल’ जाइत एहि नव पोथी लेल कविकेँ बहुत बहुत बधाई आ अभिनन्दन। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २३.लक्ष्मण झा सागर- मिथिला मैथिलीक हितैषी हितनाथ झाजी लक्ष्मण झा 'सागर, संपर्क-9903879117 मिथिला मैथिलीक हितैषी हितनाथ झाजी हितनाथ जीकें हम मिथिले मिहिरक अमलसँ जनैत छियनि। हिनकर कथा पिहानी पढ़ल करी मिहिरमे। हमरा हिनक रचना आकृष्ट करैत रहए। हिनक विषयक चयन आ शब्द संसार बड़ नीक लागए। ने कोनो भेंट ने कोनो संवाद तकर बादो हम दुनू मित्रवत् रही। गाम कोइलख छनि ततबे टा परिचय रहय। तहिया ततबे टा परिचयसँ काज चलि जाइत रहै। हुनको हमर गामक नाम बुझल रहनि। हमरे पट्टीमे हमरे एक बहिनक वियाहमे कोइलखसँ बरियाती आयल छल। ओहि बरियातीमे एक गोटे हमर नामक लोकके तकैत रहथि। हमर समांग कियो हमरा ओहि बरियाती लग पेश कय देलनि। ओ हमरा हाथक लिखल एकटा चिट्ठी देलनि। प्रेषक रहथि हितनाथ झा हितेश गाम कोइलख। हम देखल जे हितनाथ जी मिहिरमे प्रकाशित हमर कोनो कथाक खूब प्रशंसा केने रहथि (से पत्र हमर आबय वला पोथीमे संकलित अछि)। हम तऽ अवाक। मोनमे ततेक ने खुशी भेल जे हम सेहो ओही बरियातीक हाथें हुनका पत्रोतर पठा देल। आब दुनू गोटेक बीच परिचय कने आकार लेबय लागल छल। हम मधुबनीक कौलेजमे नाम लिखाय लेने रही। हितनाथ जी पटनाक कोनो कौलेजमे पढ़य चल गेल रहथि। मिहिरमे दुनू गोटेक नेना भुटकाक चौपाडिमे किछु ने किछु छपिते रहय। हम तऽ मात्र अपन पढ़ाइमे लागल रही। मुदा, हितनाथ जी पढ़ाइक अलावे पटनाक साहित्यिक सांस्कृतिक संस्था सभमे सक्रिय रहय लगलाह। आ से खूब काजो सभ केलनि। पोथी पत्रिकाक सम्पादन प्रकाशन सन भरिगर काज सब हाथमे लेथि आ तकरा पूर्ण मनोयोगसँ संपादित करैत रहथि। मैथिली आन्दोलनमे सेहो हिनक सहभागिता रहनि। गपक क्रममे जीवकान्तजीसँ पता चलल जे हितनाथ जी तऽ श्री भीमनाथ झाजीक भाय छथि। तावत भीमनाथ झाजी भीमबाबू बनि गेल रहथि पटनामे। हितनाथ जीकें भीमबाबू संसर्गमे मैथिलीक बड़का बड़का साहित्यकार सभसँ भेंट होइत रहलनि। सम्पर्क आ सान्निध्य बढ़ैत रहलनि। मैथिलीक प्रति स्नेह आ समर्पण बढ़ैत गेलनि। भीमबाबूक अनुज हितनाथ जी अपन दुलारक नाम भगवानजीसँ प्रसिद्धि पाबि लेने रहथि। मधुबनीक बाद हम कलकत्ता चल एलहुँ। कलकत्तासँ असम चल गेल रही आ असमसँ फेर 1997मे कोलकाता आपस आबि गेल रही। हितनाथ जी कतय गेलाह आ की करैत छथि से सब किछु हमरा जानकारीमे नै रहल। आ ने हम जानकारी लेबाक प्रयासे कैल। हमरा दुनूक बीच सम्पर्क भंग भऽ गेल छल। आ से भंग रहल तीन दशकसँ उपरे। एकबेर हम अपन कोनो आलेखमे लिखने रही कोनो स्मारिकामे जे फल्लाँ फल्लाँ लेखक सभ जे पहिने सृजनशील छलाह से सब आब जड़ताक स्थितिमे आबि गेल छथि। एहि लिस्टमे हितनाथ झा हितेश जीक नाम सेहो छलनि। से आलेख हितनाथ जी सेहो पढ़लनि। हुनक भीतरक रचनाकारके कछमच्छी छुटय लगलनि। संयोग एहेन बनल जे दरभंगा गेल रही त शिष्टाचार भेंट लेल लक्ष्मीसागरक आवास पर डा. भीमनाथ झाजीसँ भेंट कैल। गप्पक क्रममे हुनकासँ हितनाथ जीक बारेमे पता कैल। तऽ ओ सविस्तार बात कहलनि जे भगवान जी (मने हितनाथ जी) हजारीबागमे रहैत छथि। बैंकमे बड़का पद पर पदस्थापित छथि। मोन अतिशय प्रसन्न भेल। हुनकेसँ हितनाथ जीक मोबाइल नंबर लेल। आ कोलकाता आबि हम हुनका फोन कैल। पुछलियनि जे अहाँ हितनाथ झा हितेशजी बजैत छी? ओ हमरा नै चिन्हलनि। कोना चिन्हतथि? कहियो गप भेल रहैत तखन ने। हम अपन परिचय देलियनि तऽ बड़ प्रसन्न भेलाह आ कहलनि जे हम अपन उपनाम हितेश तऽ बिसरि गेल रही। अहाँ मोन रखने छी से हमरा लेल बड़का बात। आर गप सप भेल किछु पारिवारिक आ बेसी साहित्यिक। हम कहलियनि जे लिखब पढ़ब कियैक छोड़ि देलियैक तऽ कहलनि बैंकक नोकरी बड़ मजबूरी अछि। समय नै भेटैत अछि। अवकाश ग्रहण करब तहन फेर शुरू करब। हमरा नीक लागल हुनक स्वीकारोक्ति। से ठीके जहिना कहने रहथि तहिना लिखब शुरू केलनि हितनाथ जी (हितनाथ झा नामसँ) आ से रेलगाडीक इंजन जकाँ पहिने धुक-धुक तखन झक-झक आ तकर बाद त राजधानी एक्सप्रेस जकाँ बिना कोनो आवाजके दौड़य लगलाह हितनाथजी अपन लेखन पथ पर। अवकाशक बाद हिनका लग दू टा मात्र काज रहि गेलनि। पढ़ब आ लिखब। खूब पढ़य लगलाह आ तहिना लिखय लगलाह। आब ई जे पढ़ैत छथि से कोनो आजी-गूजी वस्तु नै पढैत छथि। साहित्य अकादेमीक समारोह सभमे आलेख पाठ करबाक लेल बजौल जाइत छथि। ई अपन आलेख लिखय लेल विभिन्न पत्र पत्रिका आ संदर्भ पोथी सभ पढ़ि कऽ अपन आलेख लिखैत छथि। बेस लिखैत छथि। लोक सभ प्रशंसा करैत छनि। ई पहिल साहित्यक एहन लोक छथि जे अपन गाम कोइलखक गाथा लिखलनि। से बड़ चर्चित भेलनि। अपन पिता स्व. तारानाथ झाक हस्तलिखित ताहि जमानाक पत्रिकाक ताक हेर केलनि। तकरा सोशल मीडियामे पोस्ट दर पोस्ट करैत रहैत छथि। लोककेँ चकबिदोर लागि जाइत छैक। फेसबुक आ ह्वाट्सएप ग्रुपमे खूब सक्रिय रहैत छथि। नव-नव रचनाकार लोकनिकें प्रोत्साहित करबाक लेल हुनकर पोथी सभ पढैत छथि। समीक्षा लिखैत छथि। समालोचना करैत छथि आ से पूर्ण ईमानदारी आ मेहनतिसँ करैत छथि। साहित्यक जगतमे ख्याति भऽ गेलनि। ततेक समीक्षाक सामग्री भऽ गेलनि जे 'लेख रेख' नामक पोथीक प्रकाशन भऽ गेलनि। तकर साहित्यक जगतमे खूब स्वागत कैल गेलनि। ततबे नै, नेना भुटकाक लेल से उपयोगी बाल रचना सभ लिखैत रहैत छथि। से बेसीकाल आ बेर-बेर लिखैत रहैत छथि। फेसबुक पर ई हमरासँ प्रतियोगिता करैत रहैत छथि। आ से हमहीं हारि मानि लैत छियनि। ई हारि मानय वला लोक नै छथि। से जँ रहितथि त मैथिली इतिहासक रेखांकन (2003) सन कृति आ त्रिवेणी (2020) सन हजारीबागसँ निकलय बला पत्रिकाक सम्पादनमे क्रमश: संयुक्त आ एसगर एहेन वैशिष्ट्य प्रकाशन नै संभव भऽ सकितै। हिनक आरो आर पोथी सभक प्रकाशनक योजना छनि। हिनकासँ पहिल भेंट अछि राँचीक कोनो साहित्य अकादमीक कार्यक्रममे। गोर नार आ ठाढ़ नाक वला हिनक व्यक्तित्व हमरा बेस प्रभावित केने रहय। दोसर भेंट अछि मुजफ्फरपुरमे सेहो साहित्य अकादमीक सेमिनारमे। बहुत सज्जन आ धीर गंभीर लोक छथि हितनाथजी। सहमिल्लू तऽ सहजहिं स्वभावमे छनि। मैथिली भाषा साहित्यकें हिनका सन लोकक विशेष खगता छैक। मैथिलीक प्रति हिनक स्नेह खूब अगाध छनि। हम हिनक सुदीर्घ आ यशस्वी जीवनक कामना करैत छियनि आ विदेह परिवारक प्रति आभार व्यक्त करैत छी जे हिनका पर विशेषांक निकालि रहल अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २४.प्रवीण कुमार झा- सोशल मीडियाक सदुपयोगसँ रिटायरमेंटक बाद बनल साहित्यकार हितनाथ झा प्रवीण कुमार झा-संपर्क-9643208300 सोशल मीडियाक सदुपयोगसँ रिटायरमेंटक बाद बनल साहित्यकार हितनाथ झा विश्वक महानतम उपन्यासकार लियो टॉलस्टय अपना जीवनक शुरुआती दौरमे तमाम तरहक व्यसनमे पड़ि गेलाह। कॉलेज छोड़लाह, यौन रोगी बनला, अहि शहरसँ ओहि शहर भटकैतसेनामे काज आरंभ केलनि आ’ अंतमे एहन उपन्यासकार बनलाह जे सबसँ बेसी बेर नोबेल पुरस्कार लेल नामित होइत रहलाह। कोलोनल सैंडर्स अपना जीवनक 62 वसंत पार कएलाक बादहि ‘केएफसी’ केर शुरुआत केलनि आ’ दुनियाँ भरिमे नाम कएला। दुनियाँ भरिमे प्रसिध्द‘मैकडोनाल्ड फूड-चेन’ के शुरुआत, रिचर्ड आ’ मौरिस 55 वर्ष वयस बितलाक बादहि कएला। अहिना चार्ल्स डार्विन अपन पचासम सालमे आबि प्रसिध्द “डार्विन के सिद्धांत” रचलनि। एहि तरहेँ रिटायरमेंटक उमेरमे आबि अपन नाम करबामे मिथिलामे सेहो किछु नाम अछि। कोइलख ग्राम निवासी श्रीमान हितनाथ झा जी सीएम साइंस कॉलेज दरभंगासँ शिक्षित भेलाक उपरांत तत्कालीन इलाहाबाद बैंकमे कार्यरत रहलाह। हुनक रिटायरमेंट धरि ओ मात्र एकटा कुशल कर्मचारी रहलाह। मुदा, 2016 मे अपन रिटायरमेंक उपरांत मात्र एक वर्षक भीतर ओ लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकारक रूपमे स्थापित भए गेलाह। आ’ एहि तरहें स्थापित होयबामे मार्क जुकरबर्ग एवं अंबानी सन नाना तरहक डाटा प्रोवाइडरक प्रमुख भूमिका रहल। जखन कि अधिकांश नामी लोक उद्देश्यहीन वा दिशाहीन काज बेसी करैत रहलाह, हितनाथ जी सोशल मीडियाक सदुपयोग कs एकटा गंभीर साहित्यकार बनबामे सफल रहलाह। छोट-छोट काव्य लेखनसँ आरंभ कs ओ मात्र साल भरिमे “कोइलख” नामक चर्चित ग्राम गाथा लिखि लेलनि। मुदा, साहित्यमे हुनक सफलता मात्र एक दिनक चमत्कार नहि। एकर पाछू शुरुहिसँ साहित्यक प्रति हुनक रुचि छल। दरभंगामे पढ़ाइक दरमियान श्रीमान अपन भाय साहब आ’ सुपरिचित साहित्यकार आदरणीय भीमनाथ झा जी लग जहिया कहियो जाइत छलाह, कोनो ने कोनो साहित्य पर चर्चाक संग किताबक सनेश लए विदा होइत छलाह। ओहि समयावधिमे पहिने अपन पढ़ाई आ’ फेर बैंकक दुरूह नौकरीक वजहसँ ओ भनहि ओहि पुस्तक सभकेँ पूर्ण रूपेण पढ़बाक समय नहि दs पओलनि मुदा, पोथीक संकलन करैत रहलाह। हुनक ई संकलनक आदति केर कारण, ओ कोनो भी आयोजन हो, पुस्तक-मे ला हो, वा हॉकर सँ मैथिलीक पुस्तक आनि संजोगति रहलाह। नतीजा जे अपन रिटायरमेंट कालमे हुनका लग लगभग 400 किताबक संकलन उपलब्ध रहनि। बैंक आ’ वाणिज्यक नौकरी, व्यक्तिकेँ कृत्रिम बना दैत छै। एहेन परिस्थिति, मनुष्यकेँ संवेदनारहित आ’ओकर मन-मस्तिष्ककेँ हिसाब-किताब, डेबिट-क्रेडिट आ’ बैलन्स-शीट केर कूड़ादान मात्र बना देत, से स्वाभाविक छै। मुदा, किछु पारिवारिक माहौल आ’ किछु अपन रुचि (जकरा कि ओ अवैध प्रेम संबंध जकाँ बिनु प्रकट कएने नुका कऽ रखने छलाह) हुनका भीतर बाँचल रहनि। 1971 मे मिथिला-मिहिरमे छपल हुनक कविताहुनक एहि रुचि केर पहिल अभिव्यक्ति छलनि। नौकरी करैत 2013 मे एकटा पुस्तकक सम्पादन सेहो केलनि मुदा, आजुक सोशल मीडिया बला युग मोताबिक नाम नहि कए सकलाह। संभवतः अपन रिटायरमेंटक तैयारीमे ओ 2014 मे सोशल मीडिया (फेसबुक) पर अपन उपस्थति दर्ज केलनि जाहि पर साल 2016 धरि सुप्तप्राय मात्र रहलाह। नौकरीसँ अवकाश प्राप्तिक उपरांत ओ अपन गाममे समय व्यतित करए लगलाह आ’ लोक सभ संग अपन गामक इतिहास पर विमर्श आरंभ कए देलनि। हुनकर गाममे 1928 ई. मे उमापति लाइब्रेरी छल... गामक इतिहास बेस वृहत आ’ गहींरगर छल। ओ अपन गामक महान विभूति सब पर जानकारी जुटबय लगलाह। एहि मेल-जोल आ’ भेंट-घाँटक क्रममे फ़ेसबुकसँ सहो हुनकासँ लोक सब जुड़य लगला आ’ सोशल मीडिया पर हुनक व्यक्तित्वक विस्तारक शुरुआत भेल। अपना गामक संबंधमे प्राप्त जानकारी सबकेँ एकत्रित करैत ओ रिटायरमेंटक मात्र एक सालमे (25 September 2017) अपन पहिल किताब छपओलनि– “कोइलख”– एहिमे ओ अपन गामक 46 गोट विभूति केर संबंधमे जानकारी लिखलनि। चूंकि, ओ एकटा सफल बैंकर छलाह, तेँ, समधानल, बिनु नून-मिरचाइ आ’ माखन-मिश्री लगाओल मात्र आवश्यक बातकेँ लिखब, हुनक एहि पुस्तककेँ स्तरीय एवं पठनीय बनओलक। एतेक नीक जे तीन महिनाक अंदरहि (नवंबर 2017) पुस्तक केर नव संस्करण आनल गेल। सैकड़ों लोक एहि किताब पर अपन समीक्षा लिखलाह... ध्यान देबा योग्य बात ई जे उक्त पोथी जाहिमे कोइलख गाम आ’ओहि गामक विभूति सब पर लिखल एहि पुस्तक केर समीक्षक गामसँ बाहरक लोक बेसी छलाह। रिटायरमेंटक बाद खाली समय केर सदुपयोग लेल ओ अपन घरमे संचित लगभग चारि सय किताबकेँ पढ़नाय आरंभ सेहो कए लेने छलाह। किछु समयक उपरांत, पढल किताबक फोटो संग अपन प्रतिक्रिया, फ़ेसबुक पर देनाय हुनक रूटीन भs गेलनि। एहि क्रमे ओ सोशल मीडिया पर पसरल साहित्य पर अपन निष्पक्ष आ पनिगर नजरि बनौने रहलाह। एक दिन जखन ओ अपन पारिवारिक मित्र मोहन भारद्वाज जीक घर पर छलाह, तखने हुनक भैयारी धीरेन्द्रमोहन झा हिनका कहलनि – “हितनाथ बाबू ! ई फ़ेसबुक पर फोटो चेपलासँ नहि होयत, अपनेँ जे पढय छी, ओहि पर अप्पन विचार सेहो लिखू !” – आ’धीरेन्द्र जी’क एहि स्नेहिल आदेशक बाद शुरुआत भेल हितनाथ जी’क समीक्षा लेखनमे प्रवेश। कनिकबे समयमे ओ सैकड़ों समीक्षा लिखि सोशल मीडिया पर एकटा सकारात्मक समीक्षकक रूपमे स्थापित भए गेलाह। संप्रति, हुनक 59 टा समीक्षाक संकलन, पुस्तक “लेख-रेख” 2023 मे आओल। एकटा पूर्णकालिक साहित्यकार आ’ प्रोफेशनल लाइफ केर उपरांत बनल साहित्यकारमे कतेको तरहक अंतर होइत छै। प्रोफेशनल जीवनक उपरांत अधिकांश लोकमे प्रायः समयक महत्व, मुख्यबिन्दु पर केंद्रित बात करब, तथ्यपरक आ’ मात्र आवश्यक बातकेँ अबडेरब, एवं सभ बातकेँ सारांश रूपमे सारगर्भित ढंगसँ राखब, आदि गुण सहजहि आबि जाइत छै। सभसँ पैघ गुण ई आबि जाइत छै जे व्यक्ति स्वयंकेँ विद्वान साबित करबाक कोनो दवाबसँ मुक्त रहैत अछि। आदरणीय हितनाथ जी एकर जीवंत उदाहरण छथि। हालांकि, मिथिला’क समाजमे पूर्णकालिक साहित्यकारकेँ कतियाबय केर परंपरा रहल अछि... सोशल मीडिया पर निरंतर सकारात्मक आ’ बिना कोनो पूर्वाग्रहकेँ अपन बात राखि हितनाथ जी एहि परंपराक विध्वंसक बनबाक लेल अग्रसर छथि। संप्रति हितनाथ जी आ’ सोशल मीडियाक माध्यमसँ हुनक साहित्यिक यात्रा पर आगां बात राखैत– ओ कोविड केर दौर छल। लोक घरमे कैद छल। भेंट-घाट, साहित्यिक गोष्ठी आ’ विद्यापति समारोहक कोनो गुंजाइश नै। लोक लेल एक मात्र सहारा सोशल मीडिया छल। हितनाथ जी अपन जमा कयल पोथी सबमे सँ कविता पढ़थि वा ओकर किछु लाइन “मैथिली-मचान” नामक फेसबुक समूह पर लिखथि। हुनक कविता लेखनक श्रीगणेश इएह लिखबकेँ मानल जाइत छनि। हम कहिओ मैथिली नै पढल आ’ ने मैथिली साहित्येसँ दूर-दूर धरि कोनो सरोकार रहल हमर। एहन स्थितिमे आशीष अनचिन्हार द्वारा देल गेल ई दुष्कर कार्य जे “अहाँ हितनाथ सर पर लिखू”, हमरा लेल चुनौतीपूर्ण काज छल। थोडेक दिनक टालमटोलक बाद हम एक पैराग्राफ लिखल। तकर बाद ई मानि, जे ई हमरा वशक बात नहि, हम गुम्मी लाधि देल। संभवतः आशीषकेँ कोनो पुरान दुश्मनी छल हेतैन, ओ खोंचारति रहलाह। एक दिन सोशल मीडियाक मध्यमसँ जगत-कक्काकेँ अपन ई समस्या कहल आ’ हुनकासँ हितनाथ सर तक पहुंचबाक अर्जी लगाओल। हमरा संध्या तीन बजे के बाद बात करबाक समय देल गेल। थोडेक प्रयासक बाद सरसँ बात भेल आ’ लगभग एक घंटा धरि हुनकासँ वार्तालाप चलल... बहुत रास तार जुडल, लागल जेना पुरान पहिचान हो हुनकासँ। खैर, बात-चीतक उपरांत हुनकासँ हम किछु प्रश्न पुछबाक आग्रह केलियनि जकरा ओ सहर्ष स्वीकार कए लेलनि। हमर विभिन्न विषयक प्रश्न पर ओ निधोख भए अपन उत्तर देलनि। विभिन्न विषय आ’ ओहि पर पूछल गेल प्रश्नक उत्तरमे देल गेल श्रीमानक टिप्पणी देखल जाउ - मैथिली साहित्यक वर्तमान स्थिति पर अपनेक विचार की ? यदि व्याकरणिक गुणवत्ताकेँ छोड़ि देल जाय तs मैथिली साहित्यक विस्तार भेल अछि। एहि विस्तारमे सोशल मीडियाक योगदान बहुत पैघ अछि। नव विषयक जुडाव बहुत सुखद अहि आ’ संगहि ई आब कोनो क्षेत्र विशेष धरि मात्र सीमित नहि भs, वैश्विक विस्तार लेलक अछि। गुणवत्ताक अभाव सेहो बहुत स्वाभाविक अछि किएक तs मैथिली पढिकेँ सोशल मीडिया पर लिखनहारक संख्या बहुत कम अछि। सोशल मीडिया पर साहित्य चर्चा कतेक उचित ? बहुत अधिक साहित्यक उपलब्धताक उपरांतो अहाँ सोशल मीडिया पर उपलब्ध साहित्यकेँ मुख्य धाराक साहित्य नहि कहि सकैत छी। सकारात्मक बात ई, जे सोशल मीडियाक माध्यमसँ अहाँ अपन पहुँच बढ़ा सकैत छी, एकटा औसत लेखनीक /चीजक मार्केटिंग कए सकैत छी। मैथिली साहित्यमे वर्तमान लॉबी पर अपने सोच नीक बात छैक। हम सब लॉबीक संग छी। मैथिली साहित्यमे पुरस्कारक होड़ पर असल पुरस्कार पाठक सँ भेटइत छै। हमर कोनो रचना आजुक दौड़में पुरस्कार योग्य नहि बुझना जाइत अछि हमरा। आ यदि कोनो तरहक प्रतिस्पर्धा अहि त हम अपना आप के उपयुक्त नै बुझैत छी। पाठकक स्नेह भेटय इएह हमर कामना। नव लेखक सबमे नीक काज केनिहार के सब ? मारिते लोक नीक कए रहलाह अछि। निरन्तरताक हिसाबसँ विभूति आनंद, उदयचंद्र झा विनोद, महेंद्र, प्रदीप बिहारी, केदार कानन, दिलीप कुमार झा, अमरनाथ झा “अमर” ...आदि नीक काज कए रहलाह अछि। पुस्तक समीक्षा लिखबमे – डॉक्टर आभा झा, रमेश, कल्पना झा आ’ आशीष चमन जी नीक लगैत छथि। अंतमे आगां आबय वला पीढ़ी लेल संदेशक रूपमे श्रीमान केर किछु अनमोल शब्द हम मात्र ढाई वर्षक रही जखनहमर पिता गुजरि गेलाह। एकटा भाई मात्र 34 वर्षक अवस्थामे संसार छोड़ि देलनि। हम सब सदिखन संगे रही। अपना सभकेँ सदैव अपन परिवारक आभारी रहबाक चाही। पारिवारिक जुड़ाव कायम रहलासँ भाषा आ’ संस्कृतिक समृद्धि कायम रहत... समाजमे परिवार टूटि रहल अछि। लेखककेँ आलोचनाकेँ अवसर बुझक चाही। सकारात्मक पक्षकेँ बेसी देखाबी। अहि सब के सोशल मीडिया पर सेहो अमल में लयबाक लेल प्रयासरत रही अपने सब। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २५.नारायण झा-हितनाथ झाक जीवन ओ साहित्य नारायण झा-संपर्क-8051417051) हितनाथ झाक जीवन ओ साहित्य विशिष्ट कोटिक साहित्यानुरागी, मैथिली साहित्यक पैघ अध्ययनकर्त्ता, मैथिली साहित्यक ऐतिहासिक दृष्टिएँ सचेष्ट विचारक, बैंकिंग क्षेत्रमे वरीय प्रबंधक पदसँ सेवानिवृत्त कुशल ओ दृष्टिसम्पन्न सर्जक व्यक्तित्व छथि-- हितनाथ झा। हिनक पिताक नाम पं. तारानाथ झा, माताक नाम भागीरथी देवी छनि। हिनक जन्म तिथि 06 जून 1956 ई. छनि। हिनक पिता पं. तारानाथ झा कोइलखसँ प्रकाशित प्रभात मासिक पत्रिकाक सम्पादक रहथि, तेँ कहल जा सकैत अछि जे साहित्यिक आ पत्रकारिताक वातावरण कौलिके छनि। विद्वान पिताक सन्तान, साहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ सम्मानित विद्वान परम्पराक कुशल प्राध्यापक डा. भीमनाथ झाक अनुज छथि । हिनका सम्बन्धमे जखन विचारए लगैत छी तँ हिनक गुण एक-पर-एक मोन पड़ैत रहैए, से रोमांचित करैत अछि। जतबए हिनका आदिकालक साहित्य आ साहित्यकारक सम्बन्ध ज्ञान छनि, ओतबए मध्यकाल आ ओतबए आधुनिकसँ लए उत्तर आधुनिक काल धरिक साहित्य आ साहित्यकारक सम्बन्धमे ज्ञान छनि। कतेको बेर हम अपन शोध-कार्यक अवधिमे अपन जिज्ञासा हिनका लग रखैत रहलहुँ आ पहिनोसँ हमरा हिनक सम्बल भेटैत रहल अछि। एक-एक विषयपर भ्रम निवारण पलहि भए जाइत अछि। ततबए हिनक व्यक्तित्वमे पैघ-छोटक प्रति आदर-प्रेमक भाव छनि, से चकित करै वला छनि। सभक लेल आदरणीय छथि, सम्मानीय छथि, सभक उपकारी छथि। हिनकासँ मैथिली साहित्यक कोनो समयक, कोनो पोथीक सम्बन्धमे जानकारी पुछू, झट दए प्रतिउत्तर देबामे सक्षम छथि। हम हिनका 'मैथिली साहित्यक गूगल' कहि सम्मान देलियनि अछि। पढ़ाइ-लिखाइक पश्चात डिविजनल इनजिनीयर्स टेलीग्राफ, धनबादक कार्यालयमे जनवरी 1980सँ मई 1982 ई. धरि रहलथि। ओकर बाद इलाहाबाद बैंकमे जून 1982 ई.सँ जून 2016 ई.धरि रहलथि ताहि चाकरीक क्रममे उत्तरप्रदेश ,पश्चिम बंगाल सहित झारखण्डक अनेको जगहपर जा कार्य कएलथि, ताहिमे सभसँ बेसी समय सेवाक अवधि हजारीबागमे रहलनि। इलाहाबाद बैंकक हजारीबाग शाखाक वरीय प्रबन्धकक पदसँ जुलाइ 2016 ई. मे सेवानिवृत्त भए गेलथि। पहिल रचना 1965 ई.मे " हे माँ भारतकेँ बचाउ" भारत पाकिस्तानक युद्धक स्थितिक समय लिखलनि जखन पाँचमे कक्षामे पढ़ैत रहथि। सार्वजनिक रूपसँ सेहो एही रचनाक पाठ उमापति पुस्तकालय कोइलखमे कएने रहथि, जाहि गोष्ठीक अध्यक्ष रहथि श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'आ मुख्य अतिथि रहथि काशी कान्त मिश्र 'मधुप'। हिनक साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधि सेहो सराहनीय छनि। हजारीबागक मैथिली साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधिमे सक्रिय छथि संगहि 'नवचेतन समिति' हजारीबागमे 1984 सँ संयोजक, महासचिव आदि विभिन्न पदपर बनल छथि। तकर बाद कतेको ऑनलाइन-ऑफलाइन मंचक माध्यमेँ साहित्यिक क्रियाकलापक प्रस्तुति कए चुकल छथि आ नीक जकाँ सक्रिय छथि। रचनाकार हितनाथ झाक पहिल रचना 'मिथिला मिहिर'क(1970) नेना भुटका चौपाड़िमे बाल साहित्य प्रकाशित भेल छलनि। निरन्तर स्मारिका, पत्र-पत्रिकामे जेना--मिथिला मिहिर, जानकी, मिथिला टाइम्स, बागमती -दामोदर टाइम्स पत्रिका सभमे प्रकाशित भेल छनि आ आकाशवाणी हजारीबागसँ कविता, कथा, वार्ता प्रसारित भेल छनि। एखनहुँ घर-बाहर, देसिल बयना, तीरभुक्ति, मिथिलांकुर, मिथिला दर्शन, अनुप्रास, अरुणिमा, मैथिल पुनर्जागरण प्रकाश, लहरि, भारती-मण्डन आदि अर्पण, झारखण्ड मैथिली मंच, झारखंड मिथिला मंच, आदि संस्था सभक स्मारिकामे रचना, पोथी समीक्षा प्रकाशित होइत रहैत छनि। बरोबरि साहित्य अकादेमीक सेमिनार सभमे सहभागिता देने छथि आ दइयो रहल छथि। हिनक पोथीक रूपमे कृति सभ प्रकाशित छनि, जे एहि प्रकारेँ अछि-- सम्पादित कृति- 1. 'मैथिली इतिहासक रेखांकन'(2003)-- विविध साहित्यिक विधागत एगारह गोट आलेख लेखक-समीक्षक केर आलेख-समीक्षा एहि पोथीमे संकलित-सम्पादित कएने छथि। जाहि विषय सभपर आलेख संग्रहित अछि ओ लेखक-प्राध्यापक, अध्येता-शोधार्थी सभक लेल उपयोगी अछि। एहि पोथीक प्रकाशन नवचेतन समिति हजारीबाग, झारखण्डसँ भेल अछि। एहि पोथीक संग सम्पादनमे नाम छनि चन्देश्वर कर्ण जीक। एहि पातर सन पोथीक एक विशेषते कहल जाए जे एहिमे आयल आलेख मात्र गीत विधा छोड़ि प्रायः सभ विधापर संकलित अछि, सेहो महत्त्वपूर्ण लेखक लोकनिक। एहि पोथीक विषय-सूची हम सेहो परसि रहल छी-- मैथिली साहित्यक भूमिका- प्रो० जयदेव मिश्र, मैथिली गद्यक विकास - प्रो० आनन्द मिश्र, मैथिली काव्यक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि -प्रो० रत्नेश्वर मिश्र, मैथिली पत्रिका : तीसवर्ष तीस बिन्दु - प्रो. भीमनाथ झा, एकैसम शताब्दीमे प्रवेश करैत मैथिली कथा -डॉ. विभूति आनन्द, मैथिली नाटकक स्वरूप आ स्थिति -डॉ. अरविन्द कुमार सिंह झा, मैथिली उपन्यासक विकासक्रम - डॉ. अशोक कुमार मेहता , मैथिली बाल साहित्य : एक अवलोकन - डॉ. दमन कुमार झा, मैथिली लोक साहित्य- प्रेमचन्द्र पंकज, मैथिली लोक कला- ज्योत्स्ना चन्द्रम , झारखण्ड मे मैथिली : ठौरतकैत मैथिलीजन अबुअ दिशुमम - पंचानन मिश्र। 2. 'कोइलख' (ग्रामगाथा-2017)-- 'कोइलख' पोथी ग्रामगाथाक अन्तर्गत उत्तम पोथी अछि। ओना हम एहि पोथीकेँ ग्राम्य-इतिहास सेहो कहि सकैत छी। एहि पोथीकेँ चारि भागमे बाँटिकए पढ़लासँ सभ बात फरिच्छ भए जाएत जेना-- कोइलखक पूर्व ख्यातिप्राप्त सन्तति, वर्तमानक ख्यातिप्राप्त सन्तति, कोइलखमे कार्यरत संस्था आ संगठन तथा परिशिष्ट। परिशिष्टमे छौ विद्वानक उत्तम आलेख संकलित अछि, जे एहि पोथीक वैशिष्ट्ये कहल जेतै। सभ तथ्य आ तत्व कोइलखसँ सम्बद्ध अछि, पढ़िकए खूब नीक लागत। पोथीक सभ पक्षमे कोइलखक महत्त्वक नीक जकाँ यथार्थ रूपमे विश्लेषित कएल गेल अछि, कतहुसँ अतिशयोक्ति नहि बुझाएत। 'कोइलख' पोथीक लेखक हितनाथ झाक सम्बन्धमे डा. कैलाश कुमार मिश्र 'मिथिला दर्शन' पत्रिकामे लिखैत ( मिथिला दर्शन- पृष्ठ सं. 27) छथि--"हितनाथ झाक बैंक अधिकारी होयब सेहो एहि पोथी लेल नीक साबित भेल। कोना ? से एना जे ई प्रत्येक व्यक्तिसँ संबंधित सूचनाकेँ बहुत संक्षेपमे, तथ्यपरक आ ईमानदारीसँ वर्णन कयने छथि।पाठककेँ एको शब्द बेसी अथवा विषयक सीमासँ बाहर नहि लगैत छैक।" दू सए दस पृष्ठक एहि पोथीक प्रकाशन प्रियदर्शी प्रकाशन, पटनासँ भेल अछि। कोइलखक धरती अदौकालसँ वर्त्तमान समय धरि, सभ क्षेत्रमे अपन सन्ततिक कार्य-योगदानसँ जागृत अवस्थामे रहल अछि। कोनो क्षेत्रक बात हो, सभ क्षेत्रमे अतुलनीय योगदान देखाइत अछि। प्रशासनिक क्षेत्र, रक्षा क्षेत्र, न्याय क्षेत्र, तंत्र क्षेत्र, साहित्यिक क्षेत्र, विज्ञान-गणितक क्षेत्र, ज्योतिष क्षेत्र, चिकित्सा क्षेत्र, अभियांत्रिकी क्षेत्र, राजनीति क्षेत्र, सामाजिक कार्य आदि क्षेत्र सभमे एहि गामक लोक अभूतपूर्व योगदान दए रहल छथि। एतेक पैघ उपलब्धि आ कार्य आनहु गाम-समाजक लेल अनुकरणीय अछि। ताहि सारस्वत प्रतिभाकेँ एकठाम पोथीमे आनि विलक्षण कार्य कएलनि अछि। पोथीमे पारिजात-हरणक रचयिता म.म. उमापति उपाध्यायसँ लए कए पद्मश्री डा. मोहन मिश्र आओर सिनेमा आ थियेटरक संसारसँ नरेन्द्र झा धरिक कृतित्वक विश्लेषण अछि। पोथीमे कोइलखक आठो मन्दिरक संग मस्जिदोक संगहि ईदगाहक सेहो वर्णन अछि। जल-प्रबन्धनक हेतु एक्कैस गोट पोखरिक वर्णन सेहो अछि। स्कूल, पोस्टऑफिस आदि सरकारी संस्था-संस्थानक सम्बन्धमे सेहो बात आयल अछि। एहि तरहेँ कहल जा सकैछ जे ग्रामगाथाक रूपमे एकटा श्रेष्ठ पोथी अछि-- 'कोइलख'। 3. त्रिवेणी ( सम्पादित आलेख संग्रह- 2020)-- त्रिवेणीकान्त ठाकुर मेमोरियल ट्रस्ट, हजारीबागक एकटा ओहन संस्था अछि जे साहित्यिक गतिविधिकेँ जीवन्त रखने मैथिली संग आनो भाषामे उत्कृष्ट योगदान देनिहार-देनिहारिकेँ पुरस्कृत करैत आयल अछि। आओर ई संस्था त्रिवेणीकान्त ठाकुरक सम्मानमे चलि रहल अछि। त्रिवेणीकान्त ठाकुर एकटा निर्भीक वक्ता, कुशल शिक्षक आ विराट व्यक्तित्व रहथि। ताहि त्रिवेणीकान्त ठाकुर मेमोरियल ट्रस्ट, हजारीबाग संस्थाक हितनाथ झा संयोजक छथि, से कुशल संयोजक छथि। विचारमे अएलिन जे एहि संस्थासँ जे लोकनि सम्मानित-पुरस्कृत छथि, तनिका सम्बन्धमे, तनिकर सम्पूर्ण उपलब्धिक ध्यानमे रखैत आलेखक संकलन निकालल जाए, सएह कएलनि आ एहि 'त्रिवेणी' पोथीक सम्पादन कएलनि। पोथीमे आलेखक संकलन अछि, जनिका त्रिवेणीकान्त ठाकुर मेमोरियल ट्रस्टसँ पुरस्कार भेटल छनि आ ओहि व्यक्ति सभक लेल देल गेल प्रशस्ति पत्रक सेहो संकलन कएल गेल अछि। आलेख शीर्षक आ आलेख लेखकक नाम एहि तरहेँ अछि-- सम्पादकीय- हितनाथ झा, कुमार मनीष अरविन्द- नारायण झा, विद्यानाथ झा 'विदित'- धीरेन्द्रनाथ मिश्र, पंचानन मिश्र- सुशांत कुमार, सियाराम झा 'सरस'- नारायण झा, बुद्धिनाथ झा(मैथिलीमे महाभारत)- भीमनाथ झा, शिवदयाल सिंह 'शिवदीप'- रतन वर्मा, शम्भु बादल- सुशील कुमार, भारत यायावर- गणेश चन्द्र राही, अमल सेनगुप्त (साक्षात्कार)- रतन वर्मा, अजित कुमार बनर्जी - राकेश ठाकुर, अब्दुल अली मुनीरुल होदा "अली मुनीर "- फरहत हुसैन खुशदिल, फरहत हुसैन 'खुशदिल' - जयगोविन्द मिश्र। 'त्रिवेणी' पोथी ठीके त्रिवेणी अछि जतए पुरस्कृत लेखकक अवदान, ओहिपर नीक लेखक द्वारा आलेख लिखल आ पुरस्कृत लेखकक प्रशस्ति पत्र एकहि ठाम संकलित अछि, जे कतेको दृष्टिकोणेँ महत्त्वपूर्ण अछि। 4. राजापोता बलगर (बालकविता संग्रह- 2024) -- रचनाकार हितनाथ झा बालकविता संग्रह 'राजापोता बलगर'मे बालमनकेँ सोहाइ वला, बौआ-बुच्चीक ठोरपर उचरै वला, सरल-सहज ओ उद्देश्यपरक बालकविता सभकेँ सहेजलनि अछि। हितनाथ झा स्वयं एक सिद्धहस्त पाठक छथि, हिनका सभ कोटिक पाठकक स्वाद बुझल छनि। तेँ ओ बालमनकेँ सेहो नीक जकाँ जीबिकए बालकविता लिखलनि अछि। संग्रहक सभ कविता उत्तम अछि जे धियापुता सभ पढ़ि अपन ज्ञान तँ बढ़ेबे करत संगहि मनोरंजन सेहो कए सकत। संग्रहक एक बालकविता शीर्षक 'चुनि ली अप्पन 'रोल'मे कतेक नीक सन्देश देबाक कोशिश कएने छथि जे देखबाक जोग अछि। एतय ओ कहबाक प्रयास कएलनि अछि जे सभक रुचि अलग-अलग होइत छैक। संगहि कहबाक प्रयास कएलनि अछि जे अहाँ अपन रस्ता स्वयं चुनैत छी, से कोन रस्ता चुनबाक अछि स्वयं निर्णय करू। एहि कर्मप्रधान युगमे यशदायक बाट चूनब वा अयशदायक, ओ निर्णय अपनहि हाथमे अछि। बहुत नीक सन्देश देबाक यत्न कएलनि अछि। कविता देखल जाए-- "ककरो बटर पनीर मसाला, ककरो कबकब ओल। ककरो शांति स्वभाव पसिन तँ ककरो लबलब लोल।। ककरो झाँपन नीक न लागय, ककरो दाबल खोल। बाँसुरीक सुर ककरो भावय, ककरो ढबढब ढोल।।
ककरो अनकर टेटर सूझय, ककरो अप्पन गोल। ककरो पूनम चान तँ ककरो गूज्ज अन्हारे टोल।। ककरो चुबइछ लेर-ढेर तँ ककरो मन सन्तोष। ककरो रकटल प्राण मान ले' तँ ककरो ले' रोष।।
ककरो चिक्कन चनुमनु आङन, ककरो भरले झोल। ककरो कचरमकूट भोजनक, कतहु उपासल भोर।। ककरो मनमे धनक पिपासा, कोनो आँखिमे नोर। ककरो न्यायक भरल तराजू , कतहु अनीति-अङोर।।
ककरो गायन कानक कटु तँ ककरो बोल अमोल। ककरो काज बढ़ै अछि चुपचुप, तँ ककरो अनघोल।। मनुखक दुहू प्रकार होइत अछि, चुनि ली अप्पन 'रोल'। यश-अपयश दुनू बजबैए, कोन पसिन अछि टोल।। " ई पुस्तक मैत्रेयी प्रकाशन, दिल्लीसँ एहि बरख 2024मे प्रकाशित भेलनि अछि। अन्तमे हम कहए चाहब जे रचनाकार हितनाथ झा एकटा ओहन सृजनधर्मी लोक छथि जे स्वयं तँ सृजन करिते रहैत छथि, संगहि मैथिली साहित्यक मध्य, साहित्यकार द्वारा भए रहल सृजनक मूल्यांकन सेहो क्रमानुसार कए रहल छथि, जे सैकड़ोक संख्यामे हेतनि। 2023मे 58 पोथी आ 01 पत्रिकाक पाठकीय समीक्षापर आधारित पोथी 'लेख-रेख' सेहो प्रकाशित भेलनि, जे प्रायः एकठाम एक पोथीमे एतेक संख्यामे प्रकाशित ई सम्भवतः पहिल संग्रह थिक। अनुवादक सेहो छथि किएक तँ अनुवाद विधामे एक पोथी 'कविता : शम्भु बादलक' केर सुन्दर अनुवाद कए सोझाँ 2023मे अनने छथि। आइ-काल्हि जखनकि प्रबुद्ध पाठकोक संख्या घटले जा रहल छैक, ताहि परिस्थितिमे हिनक महत्व विराट छनि। हिनक साहित्यिक यात्रा अनवरत एहिना निर्बाध चलैत रहनि। हिनक सुखद जीवनक हम कामना करैत छियनि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २६.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र-हितनाथ झा समर्पित पाठक केर साकांक्ष प्रतिनिधि डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- संपर्क-8076208498 हितनाथ झा: समर्पित पाठक केर साकांक्ष प्रतिनिधि हितनाथ झा पर लिखब केर अर्थ भेल साहित्य सँ ऊपर उठैत मानवीय संवेदना संग लिखी। हितनाथ बाबू नीक गाम, परिवार आ संस्कार केर लोक छथि। विनम्र छथि, मृदुभाषी थिकाह। हिनकर भेट मात्र सँ अहाँक यात्रा आ दिन सफल रहत तकर गारंटी द' सकैत छी। हितनाथ जी मैथिली साहित्य आ रचनाकें हमरा जनैत एक समर्पित पाठक छथि। ई गुण दुर्लभ गुण भेल आजुक समयमे जखन लोक हेंज बना रचना लिख आ ओकरा प्रकाशित करबा मे अपसियात छथि। किनको लग आनक रचना पढ़बाक समय नहि छनि। विश्वविद्यालय केर अधिकांश शिक्षक आ शोधकर्मी सेहो अपना आपके सिलेबस तक संकुचित केने छथि। हितनाथ जी मुदा की नव आ की पुरान, सब रचनाकें गुरुकुल परम्परा केर वेदपाठी जकाँ धोखइत रहैथ छथि। हितनाथ बाबू केवल पढ़ैत नहि छथि, ओहि पोथी अथवा रचना पर अपन पाठकीय मंतव्य सामाजिक संजाल, ऑफलाइन-ऑनलाइन पत्रिका, समाचारपत्र केर मादे दैत रहैत छथि। सभा, संगोष्ठी, कवि समारोह आदिमे हिनक सहभागिता देखार होइत रहैत अछि। अही क्रममे हितनाथ जीक पाठक साहित्यकार भ' उठैत अछि। पौत्र संग समय बितेला केर क्रम मे ई बाल कविता केर निर्माण करैत छथि। अपन गाम कोइलख, ओकर लोक, परम्परा केर इंच-इंच जानकारी रखैथ छथि, हरेक तथ्यक प्रमाण तकैत छथि, प्रामाणिक भेला उत्तर ओहि बात के अपन लेखनी केर मादे सामाजिक संजाल केर पटल पर रखैत छथि, लोकक उत्तर, प्रत्युत्तर पर साकांक्ष रहैत तथ्य केर विस्तार आ अधिक लोक सम्मत बना एकत्रित करैत रहैत छथि। जखन संकलन सब तरहेँ पूर्ण भ' जाइत छनि तखन पोथी प्रकाशित करैत छथि। हिनक भाषा अति सामान्य, सहज आ सामान्य जनक भाषा छनि। जखन ई अपन गाम कोइलख पर खेपे खेप ओकर संतान आ गौरव पर लिखैत छलाह ताहि क्षण हम हिनका संपर्कमे आयल रही। तहिया सँ हमरा लोकनि केर सम्पर्क चलैत समय केर डेग संग ठोस भ' रहल अछि। सामाजिक संजाल पर ओना आरो लोक अपना गाम आ क्षेत्र केर लोक, गौरव आ परम्परा पर लिखैत छथि मुदा ओहि लेखनमे अत्यधिक शुद्धतावादी सोच, वर्ग विशेष पर विशेष ध्यान, व्यक्तिकें यथार्थ सँ बहुत बढ़ा-चढ़ा क' हुनक अनेरे गुणगान रहैत छनि। स्थिति ई भ' उठैत अछि जे हमरा सन पाठक कखनो काल सत्य बातमे सेहो व्यर्थक आडम्बर देखय लगैत अछि। हमरा कहबामे कोनो संकोच नहि अछि जे हितनाथ जी अहि तरहक आडम्बर सँ अपना के दूर रखने छथि। ताहिं हिनक ग्राम्य वर्णन सत्यक प्रामाणिक दस्तावेज छनि जाहिमे साहित्य सेहो किछु अंशमे व्याप्त छैक। हितनाथ जी केर गाम पर जे पोथी छनि ताहि पर हम एतय पूर्ण विराम दैत छी कारण हिनक पोथी पर हमर विस्तृत समीक्षा छपि चुकल अछि। जेना लिख चुकल छी, हितनाथ जी एक समर्पित पाठक छथि। गंभीर पाठक नहि कहबनि , कारण ओ एक अलग व्याख्या केर विषय भ' सकैत अछि। मैथिली रचना लेल समर्पित पाठक सेहो आँगुर पर गानल छथि। मुदा हमरा कखनो काल लगैत अछि जे हितनाथ बाबू भावावेशी आ समावेशी पाठक छथि। ई बात अगर सत्य छैक तँ हिनका लेल भले जे हो, साहित्य लेल नीक बात नहि भेल! समर्पित पाठक के अपना आपमे हंस जकाँ व्यक्तित्व विकसित करक चाही। हंस व्यक्तित्व केर अर्थ भेल क्षीर-नीर-समभाव। हंस जेना पानिमे सँ दूध आ पानि छानि कय एक-एक ठोप अलग क’दैत छैक तहिना समर्पित पाठकके अपन ज्ञान, सोचक क्षमता केर विस्तार करैत ओ रचना जे ओ पढ़ि रहल अछि तकर गुण अवगुण दुनू बातक विस्तार सँ विवरण पॉइंट-टू-पॉइंट सन्दर्भ संग देबाक चाही। हितनाथ जी अपन शिक्षा, नियमित पठन, आ परिवेश केर आधार पर ई गुण विकसित क' सकैत छथि। हिनक अहि गुण केर लाभ ओना तँ सब साहित्यकार के भेटतन्हि मुदा सर्वाधिक लाभ नवोदित साहित्यकारके हेतनि। कारण ओ भविष्य केर लेखनमे अपन गलती, विवेचना, विन्यास, नव प्रयोग, विषय आदिमे सुधार क' सकैत छथि। कोनो रचना अथवा पोथीके नीक अथवा अधलाह कह सँ पूर्व ओकर सन्दर्भ, ओहि तरहक अन्य रचना संग तुलना, पाठक केर आकांक्षा, परिवर्तन केर प्रवाह आदि बिंदु पर चिंतन करब अनिवार्य। हमरा पुनः लगैत अछि जे हितनाथ जी के ई गुण अपनामे आत्मसात करक चाही। जखन ई बात करैत छी तँ हमरा अज्ञेय केर एक लघु कविता जे ओ पाठक हेतु गढ़ने छथि से स्मरण आबि रहल अछि। कविता केर शीर्षक छैक “पाठक के प्रति कवि” आब कविता देखल जाए: “मेरे मत होओ पर अपने को स्थगित करो जैसा कि मैं अपने सुख-दुःख का नहीं हुआ दर्द अपना मैंने ख़रीदा नहीं न आनन्द बेचा; अपने को स्थगित किया मैं ने, अनुभव को दिया साक्षी हो, धरोहर हो, प्रतिभू हो जिया”। अज्ञेय केर कविता स्वतः प्रमाणित छैक। कवि पाठक के सम्बोधित करैत कहैत छथि: जहिना एक कवि अपन सुख, दुःख, आनन्द सँ ऊपर उठैत सब कष्ट सहैत कविता गढ़ैत अछि , स्व के त्याग करैत अछि तहिना एक समर्पित पाठकके ओकर मर्म तटस्थ भ' क' बुझक चाही आ ताहि अनुसार अपन लेखनीके आगा बढ़ेबाक चाही। एखन धरि हितनाथ जी केर आलोचना, जकरा आब ई पाठकीय प्रतिक्रिया लिखैत छथि, मे साहित्यकार केर उत्साहवर्धन, लेखन केर उन्नत पक्ष, लेखनमे प्रयोग, पोथी केर अन्य बातक जानकारी रहैत छनि मुदा ओकर आन पक्ष पर जेना हिनक कलम मौन भ' जाइत छनि। हिनक मौन भेनाइ दोसर निष्पक्ष समीक्षक, गंभीर पाठक अथवा समर्पित पाठक हेतु पैघ समस्या ठाढ़ करैत छनि। से केना? एना जे कोनो बातक प्रबल पक्ष पर जँ ई बहुत लिख दैत छथिन्ह आ दोसर जखन ओकर कमजोर पक्ष दिश संकेत करैत छैक तँ साहित्यकार चिंतन आ निर्णय केर उभयवृततामे रहैत अछि ! ओकरा ई निर्णय करयमे दिक्कत होइत छैक जे ककर बात प्रमाणिक मानय ! ककरा अपन भविष्यक लेखन हेतु मार्गदर्शक बुझय ! समस्या मैथिलीमे गंभीर छैक। अतय बहुत लोक आदान -प्रदान केर समीक्षा अथवा पाठकीय प्रतिक्रिया लिखैत छथि - “अहाँ हमरा रचना पर अनेरे वाह -वाह लिखू, हम अहाँक रचना पर लिखब”। अनेक व्यक्ति आ संस्था ओहेन रचना आ रचनाकारके अनेक कारण सँ पुरस्कृत से करैत छथि। अहिना स्थितिमे तटस्थ पाठक की करत ! आ हमरा जहाँ तक जानकारी अछि ताहि हिसाबे हितनाथ जी सब तरहक गुटबाजी सँ दूर छथि। अगर से छथि तँ हिनका अपना आपमे क्षीर-नीर-समभाव केर गुण आनय पड़तन्हि। आब हितनाथ जी केर लेखनी केर दोसर भाग दिस चली। हिनक लेखनीमे बात बहुत सतही स्तर पर अबैत छनि। सामान्य लेखन लेल तँ ई ठीक छैक मुदा साहित्यकार अगर अपनाके एक दू सैय बरख धरि जीवंत राखय चाहैत छथि तँ हुनका अपन लेखनीमे दर्शन, विज्ञान, कल्पना, सौंदर्य, भविषयक सोच, साहित्यक बिम्ब आदि पर गंभीर होमय पड़तन्हि। लेखनी केर दिशा लघु सँ पैघ करय पड़तन्हि। मैथिलीके अलावे अन्य भाषा केर साहित्य सबमे की प्रयोग चलि रहल छैक, साहित्य केर कुन भागमे गंभीर लेखन केर दरकार छैक तकर अनुसन्धान करय पड़तन्हि। पहिने लीखि चुकल छी जे हिनका लग समय छन्हि, धैर्य छन्हि, खोजी प्रवृत्ति केर लोक छथि, साहित्य सँ सम्बंधित पोथी आदि केर सामग्री प्रचुर मात्रामे उपलब्ध छन्हि, आ सबसँ पैघ बात हिनक लेखनी प्रबल छनि। अगर से भ' गेल तँ हमरा लोकनि मैथिली साहित्यमे एक विलक्षण साहित्यकार हितनाथ झाके रूपमे देखि सकैत छी। एकर मतलब इहो नहि जे आजुक हितनाथ झा कोनो दृष्टिये कमजोर छथि। हिनक लेखनी आइयो नीक छनि मुदा विशिष्ट नहि छनि। हिनका नीक सँ विशिष्ट केर यात्रा लेल अग्रसर होबाक चाही। एक बात आर कहब (अथवा लिखब) रहि गेल। यद्यपि हम हिनक अनेक आलेख आ एक पोथी पढ़ने छी। हिनक बाल पोथी हड़बड़ीमे पढ़ने छी ताहिं हमर विवेचन हम हिनका जतबे पढ़ने छी ततबे पर भेल अछि। इहो संभव छैक जे हमर कहल बहुत बात सब ई अपन आन रचनामे समाहित केने होथि जे हम नहि पढ़ने छी। जँ एहन बात छैक तँ हम आदरणीय हितनाथ झा सँ क्षमाप्रार्थी छी। अंततः हमरा इहो कहयमे कोनो संकोच नहि अछि , बल्कि गर्वक अनभूति भँ रहल अछि जे हितनाथ झा एक समर्पित पाठक छथि, साकांक्ष लोक छथि, आ बहुत सम्मानित व्यक्तित्व छथि। भगवान भास्कर सँ हमर प्रार्थना जे ई सतायु होथि आ मैथिली साहित्यके अपन लेखनी सँ समृद्ध बनबैत रहथि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २७.आशीष अनचिन्हार- पाठकीय विधा एवं हितनाथ झा आशीष अनचिन्हार-संपर्क-8876162759 पाठकीय विधा एवं हितनाथ झा पाठकीय, समीक्षा, आलोचना एवं समालोचना ई चारू एकै गोत्र केर संतान थिक मुदा प्रकृति भिन्न-भिन्न। एहि चारूमे पाठकीय नामक रचनामे पाठकक नितांत निजी भाव लिखल जाइत छै। कोनो पाठककेँ कोनो रचना नीक लगलै वा कि खराप तकरा ओ अपन व्यक्तिगत मापदंडपर कसि कऽ लेखक एवं बाँकी पाठक लग राखि दै छथि। आ से भेल पाठकीय नामक विधा। पाठकीय नामक एहि विधाकेँ एहि बातसँ मतलब नै छै जे जाहि रचनाक बारेमे ओ चर्च केलकै ओहि लेल शास्त्र की कहै छै, साहित्यिक दृष्टिकोणसँ कतेक सफल छै, ओकर सकारात्मक वा नकारात्मक प्रभाव समाज लेल की छै से सभ पाठकीयमे नहि भेटत, कारण ई नितांत निजी भावपर आधारित रहै छै। मैथिलीमे किछुए रचनाकेँ समीक्षा, आलोचना, समालोचना कहल जा सकैए। अधिकांश मात्र पाठकीय रहैत अछि। भने ओकर शीर्षक समीक्षा, आलोचना, समालोचना किएक ने हो। मैथिली गजले जकाँ अहू ठाम गोलमाल छै। जेना मैथिलीक मुख्यधारामे गीत, कविता नवगीत आदिक शीर्षक गजल राखि ओकरा गजल मानि लेल जाइत छै तहिना पाठकीय केर शीर्षक समीक्षा, आलोचना, समालोचना राखि बहुत रास लेखक अपनाकेँ समीक्षक, आलोचक एवं समालोचक मानि लै छथि। जेना कि पाठकीय मात्र निजी विचार होइत छै तँइ बहुत रास पठाकीयमे खरापो रचनाकेँ नीक अथवा नीको रचनाकेँ खराप कहि देल जाइत छै। पछिला किछु बर्खसँ किछु लोक सभ चर्चाक दौरान कहलाह जे हितनाथ जी सभ लेखकक सभ रचनाकेँ नीके कहैत छथिन ई कोना संभव छै जे सभ रचना नीके हेतै? आदि-आदि..। फेर धेआनसँ जखन हम हितनाथ जी द्बारा लिखल कथित समीक्षा सभ पढ़लहुँ तऽ सभसँ पहिने नजरि पड़ल जे हितनाथजी अपने ओकरा फेसबुकपर "पाठकीय" कहैत छथिन। एकर ई मतलब भेलै जे हितनाथ झा जी जकरा पाठकीय कहि रहल छथिन ताहि रचना सभकेँ पाठक समीक्षा, आलोचना, समालोचना बूझि रहल छथिन। तऽ ई दिक्कत पाठकक छनि हितनाथ जीक नहि। बहुत संभव जे हितनाथ जी जकरा पाठकीय कहने छथि से समीक्षा, आलोचना कि समालोचना हो। मुदा एहनो स्थितिमे पाठक पहिने ओकरा पाठकीय हिसाबें पढ़थि आ तकरा बाद ओकर महत्वकेँ देखाबथि जे भने एकरा पाठकीय कहल गेल हो मुदा ई समीक्षा, आलोचना कि समालोचना अछि। मैथिली गजलक आलोचना लेल हम अपने इएह नियम रखैत छी। मानि लिअ कोनो शाइर अपन रचनाकेँ गजल शीर्षक देलखिन तऽ ओकरा हम गजले मानि कऽ पढ़ैत छियै आ पढ़लाक बाद देखैत छियै जे ओहिमे गजलक नियम छै कि नै आ तकर बाद ईहो देखैत छियै जे नियम रहलाक बादो ओहिमे गजलक गुण छै कि नै। तकर बाद हम ओकर निर्धारण गजल, आजाद गजल कि गीत-कविताक रूपमे करैत छियै। एहि ठाम साफे-साफ हितनाथजी अपन रचनाकेँ पाठकीय कहि रहल छथिन तखन ओ सभ लेखकक सभ रचनाकेँ यदि नीके कहि रहल छथिन तऽ ओहिमे आपत्ति की? हमरा बुझने ई पाठकक दिक्कत छनि जे ओ हरेक तुकबंदीकेँ गजल आ हरेक टिप्पणीकेँ समीक्षा, आलोचना, समालोचना मानि लेबापर बिर्त छथि। मैथिलीक पाठककेँ अपन स्तर बढ़ाबऽ पड़तनि आ ताहि लेल पुरान आ नव साहित्यकेँ पढ़ऽ पड़तनि। मुदा की हरेक समय पाठके गलत होइत छथि? एकर उत्तर हँ आ नै दूनू भऽ सकैए। मुदा हितनाथजीक प्रसंगे देखी तऽ किछु दिक्कत हितनाथजीक दिससँ सेहो भेल छनि। जेना- हितनाथ जी फेसबुकपर जखन कोनो पोथी लेल लिखैत छथि तऽ स्पष्ट रूपेँ पाठकीय लिखल रहैत छै से हम हुनक पुरनो पोस्ट सभमे देखि रहल छी मुदा जखन ओ पाठकीय केर संग्रह "लेख-रेख" नामसँ प्रकाशित करै छथि तखन ओकरा पोथी-प्रसंग केर नाम दैत छथि आ भूमिकामे "पाठकीय" शब्दक कोनो चर्चे नहि करैत छथि। हमरा जनैत पहिल भ्रम अही ठामसँ शुरू भेलै आ तकर पूर्णाहुति ओही "लेख-रेख" पोथीमे डा. ललितेश मिश्र (आब स्वर्गीय) केर भूमिका (साहित्य सर्जनक लेखा-जोखा) सँ भऽ जाइत अछि जाहिमे ललितेशजी एहि पाठकीय सभकेँ समालोचना कहि दैत छथिन। सेहो बिना कोनो स्पष्टीकरण, बिना कोनो तर्क, बिना कोनो कारण देने। हम पहिनेहो कहलहुँ जे कोनो पाठकीय अपन गुणसँ प्रमोशन पाबि समीक्षा, आलोचना, समालोचना कहा सकैत अछि अथवा कोनो समीक्षा, आलोचना, समालोचना अपन अवगुणक कारणे पाठकीय केर दर्जामे आबि सकैत अछि मुदा ताहिपर चर्चा तऽ हो, ओकर विवरण आन पाठक लगमे एबाक चाही। हमरा जनैत ललितेशजी एहिठाम चुकि गेलाह। आ हितनाथजी सेहो चुकि गेलाह अछि। तँइ पाठक ई चर्चा करैत भेटि जाइत छथि जे हितनाथजी सभ लेखककेँ नीक आ सभ रचनोकेँ नीक किएक कहि दैत छथिन। ओना हमर स्पष्ट मानब अछि जे कोनो पोथीकेँ जनता लग लऽ जेबाक सभसँ नीक साधन पाठकीय छै, समीक्षा, आलोचना, समालोचना नहि। तँइ 'पाठकीय' नामक एहि विधाकेँ एखनेसँ उचित परामर्शक जरूरति छै। हितनाथजी एहिमे अग्रणी भऽ सकै छथि संगहि एहि विधाकेँ शीर्षपर पहुँचा सकै छथि मुदा शर्त अतबे जे हितनाथजी कथित समीक्षक, आलोचक वा कि समालोचक हेबाक चक्करमे नहि पड़थि। ईहो उम्मेद जे जहिया हितनाथजी अपन पाठकीय केर दोसर पोथी प्रकाशित करताह ताहिमे पाठकीय आ समीक्षा, आलोचना, समलोचना आदि बिकछाएल रहत। ई आलेख मात्र हितनाथजीक पाठकीय लेल नहि जे कियो पाठकीय लिखैत छथि हुनको लेल अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २८.आशीष अनचिन्हार-हम हितनाथ झाकेँ कोना चिन्हलियनि आशीष अनचिन्हार-संपर्क-8876162759 हम हितनाथ झाकेँ कोना चिन्हलियनि
ओना तऽ हमर आदति अछि जे हम अपन लेख सभमे लिंक लगा दैत छियै मुदा एहि संस्मरणमे हम लिंक नहि लगाएब कारण जे बात हम कहि रहल छी से बात प्रायः सभकेँ बूझल हेतनि, आ जिनका नहियो बूझल हेतनि से कहबाक ढंगसँ बूझि जेता। बर्ख 2016 मे एकटा नव कवि (मुदा उमिरगर) अपन एक पोस्ट केलाह कविता रूपमे, हम ओहिपर कमेंट कएल जे ई आमिर खान केर फिल्म पी.के केर डायलाग अछि। हम जाहि कविक चर्च कऽ रहल छी ओ हमर विरोधमे आजाद गजल सभ सेहो लिखने छथि ई मानि कऽ जे बहरयुक्त गजल गजलक विरोध माने आशीष अनचिन्हारक विरोध छै। से बेस घमर्थन भेलै आ जेना मुख्यधाराक बाल-वृद्ध सभ अनचिन्हार, विदेहक विरोधमे केकरो समर्थन दऽ दैत छथिन ओहू ठाम सएह भेलै। बर्ख 2018 मे ओही कविकेँ चेतना समिति, पटना द्वारा 'कीर्ति नारायण मिश्र सम्मान' भेटलनि। तँ हम अपन फेसबुकपर साधारण पाठककेँ संबोधित करैत एक पोस्ट लिखलहुँ जाहिमे हमर कथन छल जे जाहि कविकेँ उक्त पुरस्कार भेटलनि अछि तिनक एक कविता फिल्मी डायलागकेँ नमरा कऽ बनल अछि, पाठक जखन ओहि कविक कविता पढ़थि तऽ जाँचि लेथि जे कहीं ओ चोरीक विचार तऽ नहि पढ़ि रहल छथि। आब एहि पोस्टक बाद जे हंगामा हेबाक रहै से भेलै। उक्त कवि अपन फेसबुकपर हमर विरोधमे सेहो पोस्ट लगेलाह, आ जेना मुख्यधाराक बाल-वृद्ध लेखक सभ अनचिन्हार-विदेहक विरोधमे अबैत छलाह तहिना एलाह। आ अही पोस्टमे एकटा कमेंट हमरा अभरल जे हितनाथ झा केर छलनि, ओ कमेंट एना अछि- "ओह ! की बाजू ? कोना कहब इग्नोर करू । नीके कयलहुँ जवाब दय । अहाँकेँ जे पढ़ने अछि , पढ़ैत अछि , अहाँक प्रतिभा जनैत अछि । चोरिक आरोप fb पर किछु लिखबाक स्वतंत्रताक दुरुपयोग अछि । कचड़ाकेँ लोग dustbin मे फेकि दैत छैक , से dustbin मे जा चुकल अछि , बहुतो साहित्यकार द्वारा । कल्हियो अहाँक चर्चा राँचीमे केने रही मौलिक चिंतन आ नीक कविताक प्रसङ्ग । शुभ हो ।" एहि कमेंटसँ हम हितनाथ झाजीक नाम पहिल बेर देखलहुँ-सुनलहुँ। ओना जँ हितनाथजीक उपरोक्त कमेंट पढ़ल जाए तँ साफ बुझना जाइत छै जे ओ हमर विचार, हमर काज आदि सभ जानै छथि आन माध्यमसँ। ईहो ओ जानै छथि जे आशीष अनचिन्हार लेल दोसर लेखक सभ की सोचै छथि। एहि कमेंटसँ एकटा महत्वपूर्ण बात ईहो बात पता चलि रहल अछि जे आशीष अनचिन्हारक काज लेल मैथिलीसँ जतेक भेटबाक चाही तकरा सायास, खडयंत्रपूर्वक रोकल गेल छै, कथित रूपें डस्टबीनमे फेकल गेल छै आ के-के रोकने छै, के-के कथित रूपसँ डस्टबीनमे फेकने छै तकरो खबरि हितनाथ जीकेँ छनि। मुदा हितनाथ जीक ई कमेंट पढ़ि हमरा हँसी लागल। हँसी एहि दुआरे जे जखन हितनाथजीकेँ हमरा बारेमे एतेक बूझल छनि तँ एकटा बात ओ किए बिसरि रहल छथिन जे हम बेर-बेर लिखित आ मौखिक दूनू माध्यमसँ कहैत रहलियै जे हमर साहित्यक मूल्यांकन हमर मरलाक बाद 50-60 साल बाद हेतै। ई बात हम एखन नै, बहुत पहिनेसँ कहैत आबि रहल छियै जे फेसबुकपर लिखित तौरपर भेटत। लिखित छोड़ू हमर विचार, हमर काजे ई गवाही देत जे कमसँ कम हम अपन कोनो काज कोनो तात्कालिक प्राप्ति लेल नहि करैत छी। भऽ सकैए जे हमरा बारेमे जे सभ हितनाथजीकेँ सूचना दैत हेतैन से ई बात नुका लेने हेतैन। एकै बात, एकै घटना दस मँहे सुनलासँ दस रंगक भऽ जाइत छै, बहुत संभव जे हमरा बारेमे हितनाथजीकेँ जे सूचना भेटैत होनि ताहिमे दस मूँहक प्रभाव हो। बादमे हम आ हितनाथजी फेसबुकपर लिस्टमे एलहुँ तकर बाद ओ सीधा-सीधी हमर विचार, हमर काज देखए लगलाह आ हमहूँ देखए लगलियनि। एक समय एहनो एलैए जे ओ विदेह विशेषांक लेल लगातार लिखैत रहलाह आ आब ईहो समय छै जे अहाँ सभ विदेहक हितनाथ झा अंक पढ़ि रहल छी। हम ईहो दोहरा दी जे हमरा लेल वा विदेह लेल कोनो विचारधारा मायने नहि रखैत अछि। जँ हमरा सभहक विरोधियो विचारधारा बला लोक नीक काज कऽ रहल छथि तँ हुनकर प्रोत्साहन लेल हमरा सभ अपन व्यक्तिगत ईगो वा फुसियाही अहंकार त्यागि दैत छी। सच मानू जँ हितनाथजी कोनो मुख्यधाराक लेखक लेल एहन बात लिखने रहितथिन तँ ओ लेखक पूरा जीवन लेल हिनका संगे दुश्मनी पोसि लेने रहितनि, मुदा... बेसी हमरा किछु नहि कहबाक अछि। हम तऽ बस ई सोचि रहल छी जे ओहि समयमे हितनाथजीकेँ जे-जे अनचिन्हारक विषयमे जते जे कहने हेथिन से सभ आइ विदेहक ई अंक पढ़ि की सभ सोचता से वएह सभ जानथि, मुदा हम फेर दोहरा दी जे हम अपन कोनो काज कोनो तात्कालिक प्राप्ति लेल नहि करैत छी। तँइ जे सभ गलत करबाक मोन बनेने छथि से सभ सचेत भऽ जाथि, हुनकर गलती बकसल नहि जेतनि। तऽ कुल मिला कऽ हितनाथ झाजीकेँ हम एना चिन्हलियनि आ से दूनू गोटेक बीच इएह इंटरनेटे माध्यम अछि। भेंट-घाँट केर हम अभ्यासी नहि छी से हमर कमजोरी अछि। कामना अतबे जे अतबे चीन्हा-परिचयमे हमरा लोकनि मैथिलीकेँ किछु नव आ सार्थक दऽ सकियै। दू टा विषयांतर- 1) हम या कि विदेह कोनो साहित्यिक चोरकेँ नै नुकाबै छी। मोन हेबे करत जे विदेशी कविताक नकल कऽ मैथिलीमे अपन कविता कहऽ बला अन्तर्राष्ट्रीय साहित्यिक चोर पंकज पराशरक खुलासा सेहो विदेहे केने छल। अइ खुलासाक बादो पराशरक ई कृत्य चलल आ मिथिलाक नदी विशेषज्ञ दिनेश मिश्रक शोध ग्रंथ सभसँ तथ्य सभ बिना क्रेडिट देने पराशरक उपन्यास लिखाएल 'जलप्रांतर' नामसँ। गजेन्द्र ठाकुर अपन नवीनतम पोथी 'नित नवल दिनेश मिश्र' मे एहि बातकेँ प्रमाण सहित दऽ रहल छथिन, पाठक एकरा विदेहपर पढ़ि सकैए छथि। पाठककेँ जानि कऽ आश्चर्य हेतनि जे पंकज पराशरकेँ साहित्य अकादमीमे मैथिली दिससँ सदस्य बनाएल गेल छलै किछु बर्ख पहिने। मैथिली साहित्य केर मुख्यधारा ने साहित्य केर हित चाहै छै आ ने मैथिलीक।
2) एखने किछु दिन पहिने हिंदीमे एकटा गैस-बोखार आदि बेमारी बला कविता भाइरल भेल छल, मैथिलीक किछु अजीर्ण बुद्धि बला बूढ़ कवि सभ लहालोट भेल छलाह मुदा बादमे पता चललै जे ओहो कविता एकटा फिल्मक डायलागकेँ नमरा कऽ लिखल गेल छै। हरेक भाषामे ई बेमारी छै आ जखन एहन चोरी पकड़ाइत छै तखन समर्थक खास कऽ बूढ़ सभ मैदानमे आबि जाइत छथि से साहित्य लेल घातक। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह ४०५ म अंक (हितनाथ झा विशेषांक) ०१ नवम्बर २०२४ (वर्ष १७ मास २०३ अंक ४०५) || 185 184 || विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in
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ea o © Be WB ad 490) एक <— Ashish Anchinhar Q és Ashish Anchinhar o- Jan 27, 2079 + & विदेह अपन कोनो अउअंकम्ने "साहित्यिक wera विश्शोष्पांक" 'निकात्तत (fern SBASCA) ताहि Aa अपने Sas निम्नतिलिस्वित विष्पयपर उात्लेख sife चाही। fees गोटाकेँ एहि टुऔआरे टैग Hs Yer STS Hem हमर free नै SIA इनव्को oT Ss स्वूच्चना पहुँच्यनि wars Ss GUST (दरभंगा-पटना-स्हरसा) मठाधीशा Bat ont दिक्कत Sar क्षमाप्रार्थी ह्की-- ५ साहित्य, Hort एवं सरकारी उऊउमसकादम्वी:- (वक) पुरस्कारक्क राजनीति @ सरवकारी अऊउमकादेमीसम्वे पैसव्वयाक गैर-त्नोकतांत्रिक विधान (गा) सत्तारुट St उमकादमी Hz काजक तौर-तरीका ad) Seas Sates Sat विरोधम्वे Baste तात्कात्निक स्समानांतर सत्ताक कार्यपद्धधति ( 98 5सँँ veast eR) S) उमकादेमी पुरस्कारम्वे urs फैक्टर: म्विथिक वा यथार्थ 2. व्यक्त्तिगत साहित्य संस्थान SIT पुरस्कारक राजनीति 3.प्रकाश्शन जगतम्वे Gare WETaR St Aza 4. मैथ्वित्नीक Sat Seas संगठन BAT उोकर पदाधिकारी PAMESH SITAIoT 5.Afah faarrs पसरत्त साहित्यिक weraee fafaer wa:- (कक) Usaha @a) उऊउमध्ययन-उऊध्यापन 6. =r Giepfiteeet a - oe = = ee Write a comment...
विदेहक परमेश्वर कापड़ि , कम... : < @ m.facebook.com < € विदेहक परमेश्वर कापड़ि , कमला चौधरी आ ... ay @. Ashish Anchinhar eee I5 June 2076 at 27:27- 2. विदेहक परमेश्वर कापड़ि , कमला चौधरी आ वीरेन्द्र मल्लिक विशेषांक केर घोषणा Star की सभ गोटा जनै छी जे विदेह 205 मे तीन टा विशेषांक तीन साहित्यकारपर प्रकाशित केलक जकर मापदंड छल सालमे दूटा विशेषांक जीवित साहित्यकारक उपर रहत VA एकटा 60-70 वा ओइसँ बेसी सालक साहित्यकार रहता Ff दोसर 40-50 सालक ( मैथिली साहित्यकार मने भारत आ नेपाल दूनूक)। ऐ क्रममे अरविन्द ठाकुर ओ जगदीश चंद्र ठाकुर "अनिल"जीपर विशेषांक निकलि चुकल अछि। आगूक विशेषांक किनकापर हुअए ag लेल एक मास पहिनेसँ पाठकक सुझाव माँगल गेल छल। पाठ कक सुझाव आएल आ ओइ सुझाव अंतर्गत विदेहक दू टा अगिला विशेषांक परमेश्वर कापड़ि आ वीरेन्द्र मल्लिकजीक उपर रहत संगे-संग भोटिंगमे cher न॑ पर आएल कमला चौधरीजीपर हमरा सभ सेहो निकालब | हमर सबहक प्रयास रहत जे ई सभ विशेषांक जनवरी ओ फरवरी 2077 मे प्रकाशित gary मुदा ई रचनाक उपलब्धतापर निर्भर करत। मने रचनाक उपलब्धताक feared aay ऊपर-निच्चा ys सकैए। सभ Mes आग्रह जे ओ अपन-अपन रचना (आलोचना, समीक्षा, समालोचना, संसमरण आदि) 3 दिसम्बर 06 धरि ggajendra@videha.com पर पठा दी। लि हा sar arg ae बा की v eee OAs 75. | AZ
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विदेह ४०५ म अंक (हितनाथ झा विशेषांक) of नवम्बर २०२४ (वर्ष १७ मास २०३ अंक ४०५) | | 3L परिशिष्ट-4 Ashish Anchinhar cee Jull2-@& Bi कत्नकत्ता केर विद्वान VY सहयोग करथ्थि d faa तौरप्पर हम ‘fAfaer विककास परिषट केर Hist उपर विशेषांक प्रकाश्शित करव्य fae माध्यमसाँ। fate उमपन परिपाटीवक star ufe स्ंस्थ्थाव्क गुण -दोष-कमी-प्रसंशा-सआत्नोच्यना सभ त्नेख प्रकाश्यित करत | dene जे Bass ay एवं विद्धान 44 Si एककर HI Stet ब्वना टाइप Huot Aa देख्यि df ड एव्कटा नीक्क व्काज ea सना SH मात डच्छ्छा Hs Achar हकी.......--- पूरा Beaten ATS ब्कत्नक्कत्तापर Bel टाडप्य Huet त्नेखप्पर निर्भरता xed! Lakshman Jha Sagar Vijay Kr Issar Ashok Jha Anjay Chaudhary eff व्वाव्या Amar Nath Jha Nabo Narayan Mishra ara सिचिल्ना ora Sferefr ora wre 243, <i aeoht, arererat - 700 007 सम्पर्क Ga - 983i0 34987 चंज्लीकत्त संस्ल्था - tar 66058
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