VIDEHA — Issue 407 / अंक ४०७

Publication: VIDEHA · Issue: 407
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ISBN Number: 978-93-341-6721-4 (Book) ISSN 2229-547X (online) 𑒀 विदेह ४०७ म अंक ०१ दिसम्बर २०२४ (वर्ष १७ मास २०४ अंक ४०७) [विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। कॉपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति ‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२४. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२४. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. 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The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover designed by AUM GAJENDRA THAKUR Videha e-Journal: Issue No. 407 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृष्ठ १-३६ ) १.२. अंक ४०६ पर टिप्पणी (पृष्ठ ३७-३७ ) गद्य २.१.संतोष कुमार राय 'बटोही'- लव यू टू (धारावाहिक डायरी) (पृष्ठ ३९-४२ ) २.२.संतोष कुमार राय 'बटोही'- पार्वती केर शपथ (धारावाहिक नाटक) (पृष्ठ ४३-४५) २.३.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा- छगुन्ता (पृष्ठ ४६-४७ ) २.४.परमानन्द लाल कर्ण- शालीग्रामशिलाक पूजनक माहात्म्य (पृष्ठ ४८-५३) २.५.आचार्य रामानंद मंडल- मिथिला राज्य बनाम राजनीतिक दल (पृष्ठ ५४-५६ ) पद्य ३.१.पूनम झा 'प्रथमा'-हम मैथिल छी.. (पृष्ठ ५८-५९) ३.२.राज किशोर मिश्र- सुन्दरता (पृष्ठ ६०-६३) ३.३.प्रणव झा- मास्क पहिरि क ईस्कूल चल (पृष्ठ ६४-६६ ) ३.४.नग्नमुनि एक परिचय (मूल तेलुगु काव्य मानेपल्लि हृषीकेशवराव- मैथिली अनुवाद मानेश्वर मनुज) पहिल खेप (पृष्ठ ६७-७०)

१.०.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय तिरहुता लिपिक उद्भव आ विकास (विद्यार्थी लोकनि लेल निर्देश: अनुलग्नकमे देल ब्राह्मीसँ तिरहुता धरिक विकासक सभ अक्षरक प्रैक्टिस करबाक आवश्यकता नहि अछि। एक वा दू अक्षरक अभ्यास पर्याप्त अछि। अनुलग्नक-५ पर ध्यान देब बेशी जरूरी अछि। अभिलेख सभक विस्तृत विवरण आ तिरहुता दिस लिपिक झुकाव विस्तारमे देल गेल अछि। अहाँ जाहि लिपिक अनुलग्नक-५ सँ अभ्यास करी ओतबे अपन नोटमे ओहि अभिलेखसँ सामिग्री उठाबी। सम्पूर्ण मोन रखनाइ नहिये सम्भव छैक नहिये से जरूरी छैक। ई आलेख साढ़े आठ हजार शब्दक अछि, अहाँ अपन सुविधासँ एकर ६००- १००० शब्दक नोट बना सकैत छी।) लिपि? आ लिपि छी की? लिपिक उद्भव। एजिप्टक लोक कहै छथि जे हुनकर लिपिक आविष्कार टोथ देवता केलनि, मेसोपोटामियाक लोक कहै छथि जे हुनकर लिपि नीबो देलनि, ग्रीसक लोक ग्रीक लिपिक आविष्कारक हर्मीजकेँ मानै छथि आ भारतमे एकर श्रेय ब्रह्माकेँ जाइ छनि। पाषाणकालक लोक मारते रास चित्र लिखलनि आ ओहीसँ चित्रलिपिक प्रेरणा भेटल। मुदा ई चित्र सभ चित्रलिपि नहि छल, कारण एकचित्रक सम्बन्ध दोसर सँ नहि छल आ सभटा चित्र फराक-फराक छल। मुदा ओहिसँ पाछाँ जा कऽ चित्रलिपिक प्रेरणा भेटले होएत। पहिल-लिपि: चित्रलिपि एखन धरिक खोजबीनसँ पता चलैए जे चित्रलिपिक विकास भेल- टिग्रिस-यूफ्रेट्सक कात- मेसोपोटामिया- (सुमेर, फेर बेबीलोन आ तखन असीरियामे), नील नदीक कात (एजिप्टमे) आ क्रीट (ग्रीस) मे। उपरका खोह आ धारक कातक पाथरपर लिखल चित्र आ चित्रलिपिमे अन्तर बिकछेबाक खगता अछि। अहाँ हमरासँ प्रेम करै छी तँ हमर चित्र लिख देलहुँ, कोनो शिकार करै छी तँ से चित्र लिखलहुँ। से अहाँ भेलहुँ लिखिया। से भारतोमे बहुत ठाम छल, मुदा लिखिया लिपिकार चोट्टहि नहि बनि जाएत। लिपिकार जे चित्र बनेलक से कलकारी लेल नहि वरण् खगता लेल। से एतऽ सूर्य बनेबाक लेल वृत्त बना दियौ, पूरा चित्र बनेबाक खगता एतऽ नै अछि, फेर दूटा एहने चित्रक सम्बन्ध स्थापित करू, दूसँ तीन.. आ चित्र लिपि तैयार। से चित्रकार चित्र लिखलक, आ लिपिकार बनेलक। लिपिकारकेँ लिखिया नहि कहि सकैत छिऐ। आ से भेल टिग्रिस-यूफ्रेट्सक कातक (असीरिया, बेबीलोन आ सुमेरमे), नील नदीक कातक (एजिप्टमे) आ क्रीट (ग्रीस) मे ईजियन आ मिनोअन सभयताक लोक। चित्रलिपि: चित्रात्मक चित्रलिपि आ विचार/ भावनात्मक चित्रलिपि बाहरसँ दुनू चित्रलिपि अछि मुदा चित्रात्मक चित्रलिपि चित्रक मात्र बोध करबैत अछि जेना वृत्त सूर्यक बोध करेलक। मुदा जखन एकर प्रयोग गुमार लेल होमए लागल तँ ई भऽ गेल विचार आकि भावनाक प्रतीक आ ओहि लिपिक नाम भेल विचार/ भावनात्मक चित्रलिपि। आब कलाकारीसँ बेशी खगता महत्त्वक भेल आ ताहि लेल चेन्हक आकार सेहो छोट भऽ गेल। आइयो चीन आ जापानमे विचार/ भावनात्मक चित्रलिपिक प्रयोग होइत अछि। मुदा पध-आधारित लिपि चीनमे खतम भऽ गेल, मुदा जापानमे ओ आइयो प्रयोगमे अछि। चित्र-ध्वनि लिपि भाषाक उद्भव आ विकास भेल। जेना ओतए ध्वनिसँ सम्बन्धित शब्द प्रवेश केलक तहिना लिपिमे सेहो भेल। आ चित्र-ध्वनि लिपिक विकास भेल। एहिमे विचार-भावनाक संग ध्वनिक प्रवेश सेहो भेल आ पाछाँ जा कऽ ओ ध्वन्यात्मक लिपि बनल। ध्वन्यात्मक लिपि ध्वन्यात्मक लिपिमे ध्वनि आ वस्तु-व्यक्तिक बीच सम्बन्ध स्थापित करैत चिन्ह बनल। ध्वन्यात्मक लिपिमे ध्वनि वा ध्वनि-समूह लेल चिन्ह बनल। ध्वन्यात्मक लिपिमे पोलीफोन (एक चिन्हक अनेकार्थ वा ध्वनि) आ होमोफोन (अनेक चिन्ह द्वारा एक ध्वनि वा अर्थ) मिला कऽ सेहो अर्थ/ ध्वनि-निर्णय नहि कऽ पबैत छल आ ताहि लेल तेसर ध्वनि-चिन्ह डिटरमिनेटिवक व्यवस्था भेल आ फेर अर्थ वा ध्वनि निर्णय सम्भव भेल। एहि लिपिसँ पद-आधारित आ व्यंजन-प्रधान लिपि बनल। स्थान-लाघव आ प्रयत्न लाघव एतए प्रयत्न-लाघवक चर्च करब आवश्यक अछि। प्रयत्न लाघव लेल कम प्रयाससँ अपेक्षित परिणामक प्राप्ति। माने भाषाक सम्बन्धमे कम शब्दमे सुस्पष्ट विचार व्यक्त करब, पैघ-ध्वनि लेल छोट सर्वमान्य ध्वनिक प्रयोग करब आ ओही हिसाबसँ लिपिक सन्दर्भमे पैघ चेन्ह लेल छोट चेन्हक प्रयोग करब। ओहिना स्थान-लाघव लिपिमे स्थान-कटौती लेल प्रयुक्त होइत अछि। टॊपिक १२ मे शब्द विचारमे लिपि-उच्चारण सम्बन्धी विशेष जानकारी भेटत। से प्रयत्न लाघवसँ कखनो काल ध्वनि अनचिन्हार भऽ जाइत अछि, आ ओकर रूपान्तर लिपिमे प्रत्न-लाघव आ कखनो काल स्थान-लाघ्वक संग होइत अछि। पद-आधारित लिपि पद आधारित लिपिमे प्रयत्न-लाघव आ स्थान-लाघव नहि रहैत अछि। एकरा एना बुझू जे तमिल लिपि अछि सिलेबल आधारित लिपि, रोमन लिपि अछि अल्फाबेट लिपि आ तिरहुता आ देवनागरी अछि अल्फा-सिलेबिक लिपि। माने जतऽ संयुक्ताक्षर नहि अछि से भेल अल्फाबेट आधारित लिपि। माने अंग्रेजी, जे रोमन लिपिमे लिखल जाइत अछि, मे संयुक्ताक्षर नहि होइत अछि, मात्र २६ टा अल्फाबेट होइत अछि, से ओ भेल अल्फाबेट आधारित लिपि। तमिलमे सिलेबल आधारित लिपि अछि। से ओ भेल सिलेबल आधारित लिपि। तिरहुता आ देवनागरी लिपिमे दुनू तत्त्व अछि से ओ भेल अल्फा-सिलेबिक लिपि। एहि तीनूक तुलना मोटा-मोटी वार्णिक (अंग्रेजी), मात्रिक (तमिल) आ वार्णिक आ मात्रिक (तिरहुता आ देवनागरी) छन्दसँ कएल जा सकैत अछि। मुदा एतऽ एकटा पेंच अछि, अंग्रेजीमे वर्णक गणनासँ जे मीटर निर्माण करब तँ लय नहि बनत से ओतऽ सिलेबल आधारित गणना करए पड़ैत अछि, आ किएक तँ ध्वनिक सम्बन्ध मात्र सिलेबलसँ छै, शब्दकेँ सिलेबलमे तोड़ल जाइत अछि। जापानी लिपि पद-आधारित अछि से ओतऽ ई झमेल नहि अछि, आ ओतऽ ध्वनिक ईकाई लेल जे शब्द प्रयुक्त होइत अछि तकर अनुवाद मोटामोटी सिलेबलमे कएल जा सकैत अछि आ ओही आधारपर हाइकूमे १७ टा ध्वनि पुरेबा लेल गणना होइत अछि । तिरहुता, देवनागरी आ ब्राह्मीमे जे बाजल जाइए सएह लिखल जाइए, आ एतऽ पाणिनीपूर्व आ पणिनिक परम्परामे ध्वनि आधारित सन्धिक निअम बनल अछि। कर्मधारय समासक विग्रह पदात्मक होइत अछि, महादेव भेला महान् देव, आ जँ दूसँ बेशी पद अछि तँ से भेल बहुव्रीहि- जेना लम्बोदर (नमगर जिनकर उदर से, माने गणेश)। अंग्रेजी (रोमन लिपि) मे बजबा काल सन्धि होइत अछि मुदा लिखबा काल नहि, मुदा ओतहुओ दीर्घ लेल डबल ए, डबल बी आदि प्रयुक्त होइते अछि, पंकचुएशन सेहो ई काज करैत अछि, हँ ओतऽ ट्रिपल ए नहि होइत अछि, मुदा हमहूँ सभ तँ दीर्घक बाद प्लुतकेँ छोड़िये देने छी। आ तही कारणसँ मैथिलीमे विभक्ति सटा कऽ लिखल जाइत अछि। तिरहुता आ देवनागरी लिपिमे दुनू तत्त्व अछि से मात्रिक आ वार्णिक दुनू छन्द एहिमे गणना कएल जा सकैत अछि। टॊपिक १ मे पृष्ठ १८ सँ गणना (मात्रिक आ वार्णिक) सम्बन्धी विशेष जानकारी भेटत। सिलेबल जेना शब्दसँ सम्बन्धित अछि पद तहिना समाससँ पहिलमे ध्वनि प्रमुख अछि आ दोसरमे पद (अर्थ)। से वएह पद आधारित लिपि ध्वन्यात्मक लिपिक विकास छल। जकर प्रमाण ऐतिहासिक रूपसँ उपलब्ध अछि, आ जतऽ सँ लिपिक असली विवेचन सम्भव अछि। आ चित्र-लिपिक रूपमे जाहि तीन गोट लिपिक चर्च भेल माने टिग्रिस-यूफ्रेट्सक धारक कात (सुमेर, फेर बेबीलोन आ तखन असीरियामे), नील धारक कात (एजिप्टमे) आ क्रीट (ग्रीस) मे एहिमेसँ टिग्रिस-यूफ्रेट्सक धारक कातमे सुमेर, फेर बेबीलोन आ तखन असीरियामे जे सभ्यता सभ क्रमसँ आएल ओहिमे पहिने सुमेरमे क्यूनीफॊर्म लिपिक प्रारम्भ भेल ४००० शताब्दी बी.सी.ई. (बिफोर कॊमन एरा)मे। बेबीलोन लोकनि सुमेरसँ ई लिपि सिखलनि आ हुनकासँ असीरिया लोकनि। माटिक सानल आ लोथ बनाएल पट्टीपर सुखेलासँ पहिनहिये नोकबला स्टायलससँ, मोटा-मोटी ३५० टा अक्षरसँ, ई क्यूनीफॉर्म लिपि लिखल जाइ छल जखन आ फेर रौदमे सुखाएल वा चूल्हिमे पकाएल जाइत छल। आधुनिक कालमे एकरा पढ़बाकश्रेय एकटा अंग्रेज हेनरी रॊलिनसनकेँ जाइ छनि। तेसर चरणक बाद धरि ई पद-आधारित बनि गेल छल। एजिप्टमे हायरोग्लाइफिक (हायरोग्लिफिक, हायरेटिक आ डेमोटिक) लिपि क्यूनीफॉर्म लिपिक समकालीन छल। एहिमे २४ टा चिन्ह रहैक जाहिमे सभटा व्यंजन रहैक। स्वर रहबे नहि करैक, से बहुत रास झमेल आ अस्पष्टता आबि जाइ छलैक, से ओकर निवारणलेल ओ लोकनि आर विशेष चेन्ह आ चित्रक प्रयोग करैत छलाह। ओ सभ लाल मोशि-कलमसँ पेपीरस पातपर लिखैत छलाह, ओही पेपीरससँ पेपर बनल अछि। क्यूनीफॉर्म आ हाइरोग्लाइफिक ई दुनू लिपि दहिनसँ वाम दिश लिखल जाइत छल। एहि दुनू लिपिक समकालीन लिपि छल चीनक लिपि से ऊपरसँ नीचाँ लिखल जाइत छल। पहिने एकटा शब्द लेल एकटा चिन्ह छल, मुदा फेर एकटा विचार लेल एकटा शब्दक प्रयोग होमए लागल। चीनक लिपिमे कोनो अल्फाबेट नहि अछि, ४०,००० चिन्ह अछि। एकर अलाबे एलमाइट सभ पहिने देशज रेखात्मक आ चित्र-प्रचुर अक्षरक प्रयोग केलनि मुदा फेर ओ लोकनि सेहो क्यूनीफॉर्म लिपि पकड़ि लेलनि मुदा ओतऽ ११३ चेन्ह जाहिमे ८०सँ बेशी पद-आधारित चेन्ह छल, केर प्रयोग ओ केलनि। से एजिप्टक बदला लिपिक आविष्कारक मेसोपोटामिया (सुमेर, बेबीलोन आ असीरिया) क लोक रहथि, जे लिखबाक कलाक आविष्कर्ता छथि। जेना ऊपर चर्च भेल अछि, ओ लोकनि पहिने चित्र लिखलन्हि, आ किएक तँ चित्र बनेबामे बेसी समयक नोकशानी होइत छलन्हि से ओ लोकनि प्रयत्न-लाघव आ स्थान-लाघवसँ चित्रकेँ चेन्ह बना देलन्हि, चेन्हमे समानता आ समरूपता आनि रेखात्मक पद्धतिक लिपि बनेलन्हि। फेर ई चेन्ह ध्वनिकेँ प्रदर्शित करए लागल, आ एहि तरहक मोटामोटी ३५० टा चेन्ह बनल। सीरिया-साइप्रस आ फिलिस्तीनमे जे खाँटी वर्ण आधारित लिपि बनल ताहूमे, फेर मिनोअन सभ्यतामे जे लिपि आविष्कृत भेल ओहिमे पद-आधारित लिपिक प्रभाव पड़ल। पद-आधारित लिपिक दूटा रूप चीनमे छल मुदा तकर प्रयोग चीनमे बन्द भऽ गेल मुदा जापानमे ई प्रयोगमे अछि जकर किछु चर्च ऊपर आएल अछि। व्यंजन प्रधान लिपि एकरा वर्णमाला वा वर्ण आधारित लिपि सेहो कहि सकैत छी। आन लिपि सभमे चेन्ह सभक संख्या ततबा बढ़ि गेल जे शिशु लेल ओकर सीखब असम्भव भऽ गेल। एहि लिपिक विकासक कारण छल प्रयत्न लाघव। एक्के लिपिमे अनेक भाषा लिखब सम्भव भऽ गेल। टिग्रिस-यूफ्रेट्सक कात- मेसोपोटामिया- (सुमेर, फेर बेबीलोन आ तखन असीरियामे)क क्यूनीफॉर्म लिपि वर्णमाला नहि बनि सकल। एहि लिपिक सम्बन्ध सेमेटिक भाषासँ हेबाक प्रमाण अछि। चित्रात्मक फेर विचारात्मक, फेर ध्वन्यात्मक लिपि ई बनि सकल। मुदा ध्वन्यात्मक लिपि सेहो संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया आ क्रिया-विशेषणक आवश्यकताकेँ किछु सुधारक संग पूर्ण कऽ सकल। फेर ई पद-आधारित बनल आ एतहि एकर विकास खतम भ‍ऽ गेलैक। बादमे जा कऽ जुरुथ्रुष्टक अनुयायी लोकनि मेसोपोटामियामे अपन लिपिकेँ व्यंजन प्रधान बनेलन्हि जकरा अर्द्ध-वर्णमाला कहि सकैत छी। मुदा ओहिमे कृत्रिम हेबाक प्रवृत्ति बढ़ल, आ ई प्रवृत्ति ब्राह्मीमे सेहो भाषा-वैज्ञानिक लोकनिकेँ देखा पड़ैत छन्हि। क्रीटमे सेहो चित्र-प्रचुर रेखाकृतिसँ आगाँ बढ़ि १३५ चेन्हबला भावना-प्रधान आ ध्वनि-प्रधान लिपि बनेलन्हि। हिनकर लिखब वामसँ दहिन आ दहिनसँ वाम दुनू छल। उतरबरिया सेमेटिक वर्णमाला सीरिया-साइप्रस आ फिलिस्तीनमे मूल वर्णमालाक आविष्कार दोसर शताब्दी बी.सी.ई. मे भेल जकर नाम उत्तरबरिया सेमेटिक वर्णमाला छल। आ तकर बाद आनो-आन मूल वर्णमाला आविष्कृत भेल जेना आरामाइक, फिनीशिअन, ग्रीक आ ब्राह्मी आ ई लिपि सभ अनचोक्के आविष्कृत नहि भेल होएत वरण ओतहु वएह प्रक्रिया भेल हएत जे मेसोपोटामियाक लिपि संग भेल छल। मुदा एक स्तरक बाद मेसोपोटामियाक क्यूनीफॉर्म लिपि पद-आधारित लिपि बनि अपन खिस्सा खतम केलक ई लिपि सभ पूर्ण वर्णमाला बनि गेल। भारतमे लिपि आ लेखनकला नागार्जुनकोण्डासँ प्राप्त दोसर शताब्दीक एकटा मूर्तिमे राजा शुद्धोधनक दरबारक दृश्य अंकित अछि जाहिमे तीनटा भविष्यवक्ता भगवान बुद्धक माता रानी मायाक स्वप्नक व्याख्या कऽ रहल छथि। हिनका सभक नीचाँ बैसल लिपिकार तकरा लिपिबद्ध कऽ रहल छथि। भारतमे लेखनकलाक ई आइ धरिक सभसँ पुरान चित्र आधारित प्रमाण अछि। एहिसँ अतिरिक्त पुरान प्रमाण हड़प्पा संस्कृति, अशोकक अभिलेख आदि तँ अछिये। अशोकक अभिलेख आ हड़प्पा संस्कृतिक बीचमे सेहो मारते रास अभिलेख भेटलाछि जेना सोहगौराक ताम-पत्र अभिलेख, पिपरहबाक बौद्ध-भीड़ अभिलेख, महास्थान आ बर्लीक पाथर अभिलेख, आ भट्टिप्रोलुक अभिलेख। भारतमे हड़प्पा सभ्यतामे पहिल बेर लिपिक प्रयोग भेल मुदा ओ एखन धरि पढ़ल नहि जा सकल अछि। एकर अभिलेख सभ छोट-छोट छैक सभसँ पैघ अभिलेखमे २६ टा चेन्ह छैक। धोलावीर (गुजरात) मे नग्रक द्वारपर एकटा साइनबोर्ड हेबाक प्रमाण अछि जाहिमे ९ टा चेन्ह छैक। ब्राह्मी आ खरोष्ठी ब्राह्मी वामसँ दहिन आ खरोष्ठी दहिनसँ वाम दिशामे लिखल जाइत अछि। मुदा दुनू भारतक वर्णमाला पद्धतिक आधारपर विकसित भेल अछि। अशोकक अभिलेख ब्राह्मी आ खरोष्ठी (मानसेहरा आ शाहबाजगढ़ी) दुनूमे भेटल अछि आ एकरा एकटा अंग्रेज जेम्स प्रिंसेप १८३७ सी.ई. मे ब्राह्मी पढ़बामे सक्षम भेलाह। खरोष्ठी पढ़बाक श्रेय सम्मिलित रूपसँ कर्नल मसोन आ जेम्स प्रिंसेप केँ देल जाइत अछि। एहि अभिलेख सभमे अशोकक नाम पियदस्सी लिखल छैक आ किछुमे असोक (अशोकक पालि-प्राकृत रूप) सेहो। अशोकक अभिलेखमे लिपिकरक चर्च अछि। ब्राह्मी लिपि बहुत दिन धरि विकसित आ परिष्कृत/ परिवर्द्धित होइत प्रयोगमे रहलाअ एहिसँ भारतक आन लिपि सभक उत्पत्ति भेल मुदा खरोष्ठी लिपि अपने संग खतम भऽ गेल। अशोकक अभिलेखक अतिरिक्त इण्डो-ग्रीक राजा सभ एकर प्रयोग अपन मुद्रापर केलन्हि जाहिमे तर आ ऊपरमे ग्रीक आ ्खरोष्ठी लिपिमे राजाक नाम लिखल रहैत छल। नारद-स्मृतिमे लिपिकेँ उत्तम आँखि कहल गेल अछि आ एकर सृजन ब्रह्मा केलनि तकर चर्च अछि। बृहस्पति स्मृतिमे चर्च अछि जे छह मासक बाद स्मृति धोखा देमऽ लगैत अछि से पातपर लिखल आखरक सृजन ब्रह्मा केलनि। चीनक विश्वकोष फा-वां-शु-लिनमे सेहो चर्च अछि जे वामसँ दहिन लिखल जाएबला लिपिक सृजनकर्त्ता ब्रह्मा छथि। एहि लिपिक नाम ब्रह्मी लिपि छल आ से पाणिनी पूर्व व्याकरणाचार्य द्वारा स्वीकृत छल, मुदा पाणिनी व्याकरणक अनुरूप ब्रह्मी अशुद्ध अछि। से एहि लिपिक नाम ब्राह्मी पड़ल। पाणिनी अष्टाध्या आ अमसिंह अमरकोषमे लिपि आ लिबिक चर्च करैत छथि। पाणिनी पूर्व आचार्य यास्क अपन निरुक्तमे बहुत रास पूर्व आ समकालीन व्याकरणाचार्यक नाम गणबैत छथि। वर्णक गणना आधारित छन्द आ व्याकरणाचर्य सभक उपस्थिति अपरोक्ष रूपसँ लेखनकलाक उपस्थितिक आभास करबैत अछि। तीन हजार वर्ष पूर्व झेलम आ चेनाबक बीच गांधार (अखन ओतऽ यूसुफजई पठान निवास करैत छथि) इलाकामे दक्षक संघराज्य छल, एहि इलाकामे काबुल धार पच्छिमसँ आबि कऽ सिन्धु धारमे संगम करैत अछि। ओहि संगमसँ चारि माइल उत्तर लहुर गाम, जे पाणिनीक नानी गाम छल, मे पाणिनीक जन्म भेल, ओइ गामक नाम ओइ कालमे शलातुर रहैक। चीनी यात्री ह्वेनसांग (युआन च्वांग), सातम शताब्दीमे. एहि गामक विद्वान ब्राहमण व्याकरणाचार्यक चर्च केने छथि। माने परम्परा आगाँ-पाछाँ काएम छल। जैनक भगवती सूत्र एहि ब्राह्मी लिपिकेँ नमस्कार करैत अछि। लिपिक आधार- अक्षर, वर्ण आ मात्रा आ तकर साक्ष्य ऋगवैदिक ऋचा वर्णवृत्तमे अछि, मात्रिक छन्दमे नहि। वार्णिक छन्दमे अक्षरक गणना होइत अछि। छान्दोग्य उपनिषदमे अक्षर शब्द उल्लेख अछि दीर्घ स्वरक सेहो। तैत्तरीय उपनिषदमे वर्ण आ मात्रा दुनूक चर्चा अछि। ऐतरेय आरण्यकमे स्वर आ व्यंजन दुनूक चर्चा अछि। पंचविंश ब्राह्मणमे सभसँ छोट दक्षिणा १२ कृष्णल आ सभसँ पैघ दक्षिणा ३,९३,०१६ कृष्णल सुवर्णक चर्चा अछि। कौटिल्यक अर्थशास्त्र चूड़ाकर्म संस्कारक बाद लिपि आ अंकक प्रशिक्षणक निर्देश करैत अछि। राजाकेँ मन्त्रिपरिषदक संग पत्राचार आ गुप्तचरक कूटलिपिमे संदेश पठेबाक चर्च अछि। अर्थशास्त्र कहैत अछि जे लिपिकार तेजीसँ लिखबामे निपुण होथि, साफ-साफ लिखथि आ लेख पढ़बामे सेहो समर्थ होथि। बौद्ध ग्रन्थ सुत्तंतमे अक्खरिका क्रीड़ाक चर्च अछि, जाहिमे अकासी अक्षर बनेबाक स्पर्धा रहैत अछि। बौद्ध भिक्षु लेल एहि क्रीड़ाक निषेध अछि मुदा विनय-पिटक लेखल-कला सिखबाक अनुमति बौद्ध-भिक्षुकेँ दैत अछि। कटाहक जातकमे जाली पत्र देखाकेँ ठकबाक चर्च अछि तँ महासुतसोम जातकमे तक्षशिलाक अध्यापक अपन पुरान शिष्यकेँ पत्र लिखै छथि। कण्ह जातक अक्खर (अक्षरक पालि-प्राकृत रूप) क प्रयोग करैत अछि। महावग्गमे अंक-शब्दक प्रशिक्षण आ कटाहक जातकमे शीतलपाटीक चर्चा अछि जाहिपर लिखब सिखाओल जाइत छल। ललितविस्तर बुद्धक लिपिशाला, हुनकर शिक्षक विश्वामित्र, चाननक शीतलपाटी आ सोनाक लेखनीक चर्चा करैत अछि, एतऽ ६४ टा लिपिक वर्णन अछि जतऽ राजनैतिक सीमाक हिसाबसँ अंगक लिपि, मगधक लिपि वङक लिपिक चर्च अछि मुदा विदेहक लिपिक स्थानपर पूर्व विदेह लिपि लिखल अछि। एकर कारण अछि जे वज्जि विदेहपर अधिकार कऽ लेने छल आ वज्जि आ विदेहक लिपि संयुक्त रूपसँ विदेह लिपि छल। अजातशत्रु तेसर शताब्दीमे वज्जिकेँ जीति मगधमे राजनैतिक रूपसँ मिला लेलन्हि, मुदा सांस्कृतिक रूपसँ ओ अपन अस्तित्व बचेने रहल। ललित विस्तर तेसर शताब्दीक ग्रंथ थिक आ ताहि द्वारे ओ मगध लिपिक संग पूर्व विदेह लिपिक वर्णन करैत अछि। ई प्रवृत्ति बादमे गुप्तकालक तीरभुक्ति (तिरहुत) प्रान्तमे सुदृढ़ रूपसँ सोझाँ आएल आ पूर्वविदेह लिपिक नामकरण भेल तिरहुता। ललितविस्तरमे बाल अवस्थामे बुद्ध-सिद्धार्थक वर्णमाला प्रशिक्षणक चर्च अछि आ ओहिमे वार्णिक अक्षरक काँति आ अलंकरणक योजनाक चर्च अछि जे ब्राह्मी लिपिक अछि। उतरबरिया सेमेटिक वर्णमाला आ ब्राह्मीक बीचमे अलेफ् आ अ, बेथ् आ ब्, गिमेल् आ ग, दालेथ् आ द, हे आ ह, वाव् आ व, जाइन् आ ज, चेथ् आ घ, थेथ् आ थ, योध् आ य, काफ् आ क, लामेध् आ ल, मेम् आ म, नुन आ न, सामेख आ स, आइन् आ ए, फे आ प, साधे आ च, कॉफ् आ ख मे अद्भुत समानता अछि आ मानवक मस्तिष्क कोना दूर रहलोपर एक्के रङ अछि तकर द्योतक अछि। बूलरकेँ ब्रम भेलन्हि जे ब्राह्मी लिपि उतरबरिया सेमेटिक लिपिक अनुकरण केलक। ई ओ काल छल जखन हड़प्पा आ मोहनजोदाड़ोकेँ सेहो मेसोपोटामियाक आउटपोस्ट ताधरि मानल जाइत जाधरि भारतक आन भागमे उत्खनन नहि भऽ गेलै आ हड़प्पा संस्कृतिक देशज रूप प्रकट नहि भऽ गेलैक (हर्मन कुल्के आ दीतमार रोथरमण्ड, अ हिस्ट्री ऑफ इण्डिया, २००४, पृ. १९, मुदा ओ पृ.५४ पर अखनो भ्रममे छथि जे खरोष्ठी अरामेइक लिपिक आधारपर बनल जे तखन फारसक आधिकारिक लिपि छल। अरामाइकमे मात्र २२ टा अक्षर छैक, स्वरक अपूर्णता अछि, ह्रस्व-दीर्घक भेद नहि अछि, स्वरक मात्राक सेहो अभाव अछि से ओ भारतीय भाषा लेल अयोग्य अछि, खरोष्ठीमे ई सभ गुण अछि, संगे दीर्घ-गुण-वृद्धि ध्वनि लेल भेदक चिन्ह सेहो अछि, प्राकृत अभिलेख लेल ई ब्राह्मी सन सक्षम छल, मात्र दहिन-वाम रहने ई विदेशी नहि भऽ जाएत। खरोष्ठी दहिनसँ वाम लिखल जाइत अछि मुदा एकर वर्णमाला भारतीय अछि, दहिनसँ वाम लिखल जएबाक कारण किछु विद्वान लोकनिकेँ एहिमे फारसक प्रभाव देखाइ पड़ैत छनि, मुदा सत्य तँ यएह अछि जे ब्राह्मी आ खरोष्ठी लिपिमे एक्के वर्णमालाक प्रयोग भेल अछि।)। जेना सङीतमे भारतक सारेगामा क सात टा सुर आ पश्चिमी ऑक्टेव (ओत्तहु साते टा छैक, ऑक्टेव माने आठम सँ पुनः पुनरावृत्तिक मात्र ई प्रतीक अछि) ई सिद्ध करैत अछि जे भाषा कोनो हुअए कान वएह छैक मनुक्खबला। ब्रेल आ इण्टरनेशनल फोनेटिक अल्फाबेट ध्वनिक संग मस्तिष्क (ब्रेल) क सेहो संप्रेषण मोटामोटी एक्के हेबाक प्रमाण दैत अछि (देखू अनुलग्नक) से पहिने तँ किछु विद्वान एकरा बैक्ट्रो-पालि आ आरियानो-पालि विदेशी लिपि बुझि कऽ कहलन्हि, कनिंघम एकरा गांधारी कहलन्हि, मुदा ललितविस्तर आ चीनक विश्वकोष फा-वां-शु-लिनक प्रमाण अकाट्य छल आ ओतऽ वर्णित एकर नाम खरोष्ठी सर्वमान्य भेल। चीनी साक्ष्य ब्राह्मीक उद्भव ब्रह्मा द्वारा आ खरोष्ठीक सर्जन ब्राह्मण आचार्य खरोष्ठ द्वारा भेल मानलक अछि। तेसर शताब्दीक बाद अभिलेख संस्कृतमे लिखल जाए लागल, प्राकृतक प्रयोग बन्द भऽ गेल। प्राकृत लेल ब्राह्मी आ खरोष्ठी दुनू सक्षम छल मुदा संस्कृतक सन्धियुक्त अलंकृत क्लिष्ट शब्द, पद आ समास लेल मात्र ब्राह्मी। से एक बेर जे एकर प्रयोग बन्द भेल तँ प्राकृतसँ निकलल भाषा सभ लेल सेहो ब्राह्मीसँ निकलल लिपिक प्रयोग प्रारम्भ भऽ गेल। ब्राह्मीक एरागुडीक अशोकक अभिलेख २६ पाँतीमे अछि। वाम दहिन लेखनक पूर्ण रूपसँ पालन नहि भेल अछि, ओना बेशी पाँती वाम-दहिन अछि। किछु वाम-दहिन पाँतीमे किछु अक्षर वाम-दहिन तँ किछि दहिन वाममे अंकित अछि, किछि ऊपर नीचाँ सेहो अछि। ८ पाँती दहिन-वाम अछि। एक पाँतीमे मात्र एक अक्षर अछि। से दहिन वाम रहने विदेशी प्रभाव सिद्ध नहि होइत अछि। खरोष्ठी सन जापानी सेहो दहिन वाम लिखल जाइत अछि। ललितविस्तरक प्रसंग सेहो इशारा करैत अछि जे व्याकरणक विशेषताकेँ पूर्ण करब ब्राह्मीक उद्देश्य छल, मुदा ई आग्रह ऋगवेदसँ अर्थशास्त्र तक अछि, आ भारतीय परिप्रेक्ष्यमे ब्राह्मी आ ओहिसँ निकलल लिपि ओहि आग्रहकेँ पूर्ण करैत अछि, आ एकर परिष्कृत रूपकेँ कृत्रिम नहि वरण् स्वाभाविक मानल जेबाक चाही। से किछु विद्वान ब्राह्मीक व्याकरण सम्बन्धी आवश्यकताकेँ पूर्ण करए लेल भेल परिष्करणकेँ विदेशी अक्षरकेँ भारतीय प्रारूपमे आनब कहलन्हि अछि (बूलर, ऑन द ओरिजिन ऑफ द इण्डियन ब्राह्मी अल्फाबेट, १८९८), मुदा कनिंघम एकरा भरतीय चेन्ह सभसँ बहार भेल मानलन्हि अछि (कनिंघम, कोरपस इन्सक्रिप्शनम इण्डिकेरम, खण्ड-१)। ब्राह्मी लिपिक अतिरिक्त ६३ टा आर लिपिक चर्च ललित विस्तरमे अछि। सम्पूर्ण यूरोपमे ग्रीस आ रसियन कॉमनवेल्थ छोड़ि कऽ (एहि दुनू ठाम अलग-अलग लिपि छैक) सम्पूर्ण यूरोपमे रोमन लिपिक प्रयोग होइत अछि। से सम्पूर्ण यूरोपमे आइ मात्र तीनेटा लिपि छैक। जँ रूसकेँ यूरोपसँ हटा दी तँ ओ भारतक बराबरे अछि। भारतमे सभ प्रान्तमे मोटामोटी अलग-अलग लिपि अछि, मुदा तमिलक अतिरिक्त सभमे अल्फा-सिलेबिक (अक्षर आ संयुक्ताक्षरक) निर्वहण मोटामोटी एके रङ होइत अछि। एकर कारण छापाखानाक देरीसँ आगमन मात्र अछि। ब्राह्मीक मानक रूप आ ओकर क्षेत्रीय शैली ब्राह्मीक मानक रूप छल आ तकर प्रमाण अछि अशोकक अभिलेख। अशोक १४म प्रस्तर-अभिलेखमे कहै छथि जे अभिलेख-आलेखनक गुण-दोष लिपिकरक जिम्मा अछि, आ सएह कारण छल जे अशोकक अभिलेखमे अक्षर आ ओकर आकारमे समरूपता अछि आ ईहो प्रमाणित होइत अछि जे अशोकक काल धरि ब्राह्मीक मानक रूप आबि गेल छल। जे भेद अछि से क्षेत्र अनुसार, लिपिकरक लेखनक अनुसार आ लेखन उपकरणक विविधताक अनुसार अछि, आजुक हिसाबेँ जँ असमतल पाथर, खोह आदिपर लिपिकार द्वारा पुरातन उपकरणसँ जतेक असमरूपता आएल अछि से मानक ब्राह्मीक स्थिति आर सुदृढ़ करैत अछि। पंकचुएशन संस्कृतमे रहबे नहि करए से प्राकृतमे सएह परम्परा आगाँ बढ़ल। विराम चिन्हक व्याकरणगत आवश्यकता ब्राह्मीक लिपिकारकेँ ओही कारणसँ आवश्यक नहि लगलन्हि। कुटिल लिपि कुटिल लिपि ; उत्तर भारत ६अम शताब्दी सी.ई. ; पच्छिम (शारदा) ; पूब (किराँत, रञ्जना, भुँजिमोल, तिरहुता, नेवारी, तिब्बती, नन्दीनागरी आ देवनागरी। कुटिल लिपिक विशेषतासँ प्रेरित नामकरण- न्यूणकोण वर्णमाला (बूलर, इण्डियन पालियोग्राफी, प्.६८), नह शीर्ष वर्णमाला (टॊड, एनल्स ऒफ राजस्थान, पृ. ७००), भारयीय नाम सिद्ध मातृका,काश्मीर आ वाराणसीमे प्रचलित (अल-बेरुनी, भारत, पृ. १७३, सचाउ), देवल प्रशस्तिमे एकरा लेल कुटिलाक्षरणी प्रयुक्त भेल। आदित्यसेनक अफसड़ पाथर-अभिलेखमे एकर नाम विकटाक्षरणी अछि। विक्रमांकदेव चरितमे कुटिल लिपिमे सिद्धहस्त कायस्थ लोकनिक चर्च अछि। जेम्स प्रिंसेप, जे १८३७ ई. मे अशोकक अभिलेखकेँ पढ़ने छलाह, एकरा लेल कुटिल लिपिक नामकरणक अनुशंसा केलन्हि (जर्नल ऒफ एशियाटिक सोशाइटी ऒफ बेन्गाल, पार्ट-५ पृ. ७७८)। कुटिल लिपिक विकासक की कारण छल? पहिल तँ ई छल जे लिखबाक करची-कलम आ मोशिक प्रयोग संग नव उपकरण आ पुरान उपकरणक नव प्रयोगसँ अलंकरणयुक्त अभिलेख लेखनक इच्छा जागृत भेल, लटपटौआ लिखबाक आग्रह सेहो एहि लेल कारण बनल। एहिसँ उपरका भाग फन सन बनि गेल कारण मोशि ढबकि जाइ, पाछाँ नाङरि आ पद-चिन्ह सेहो सुस्पष्ट भेल। अलंकरणक प्रवृत्तिसँ वर्ण वृत्ताकार आ चिक्कन स्वरूप लेबऽ लागल। अलंकारक कारणसँ एकर नाम पड़ल सिद्धमातृका। कुटिल लिपिक अभिलेख भेटल अछि, कौशाम्बीक माटिक सदण्ड सप्तदीपक (ई मोन पाड़ैए मौर्य कालक बौद्ध सप्ताक्षरी (प्रसिद्ध मंत्र) कूटाक्षरक), मंदसौरक यशोधर्मनक अभिलेख, ईशानवर्माक हरहा पाथर-अभिलेख, सर्ववर्मनक असीरगढ़ मोहर-अभिलेख, अनन्तवर्मनक बराबर आ नागार्जुनी खोह अभिलेख, ईश्वर वर्मनक जौनपुर पाथर-अभिलेख, शाहपुरक प्रतिमापर अभिलेख , मन्दागिरि अभिलेख, जीवितगुप्त द्वितीयक देववार्णार्क स्तम्भ अभिलेख, हर्षवर्धनक मधुबन आ बाँसखेड़ा ताम्रपत्र-अभिलेख, हर्षवर्धनक सोनीपत मोहर-अभिलेख। तिरहुता तिरहुता लिपिक खोजमे आब भारतक पूब भागमे आउ। पूब भागक ब्राह्मीक बाद किराँत, रञ्जना, भुँजिमोल, तिरहुता, नेवारी, तिब्बती, नन्दीनागरी आ देवनागरीक प्रयोग भेटैए। किराँत लिपिमे लिम्बू भाषा आदि लिखल गेल। ई सभ लिपि वामसँ दहिन दिश लिखल जाइए मुदा रञ्जना लिपि कूटाक्षरमे ऊपरसँ दक्षिण लिखल जाइए। नागरीक रूप नन्दीनागरीक प्रयोग मुदा बेशी मध्य दक्कन आ दक्षिण भारतमे भेल आ माध्वाचार्यक द्वैत दर्शनक संस्कृतमे लिखल पाण्डुलिपि नन्दीनागरीमे अछि। विदेह, अंग, वज्जि आ नेपालक तराईमे संस्कृत आ मैथिली दुनू तिरहुतामे लिखल जाइ छल आ एहिमे सभ विषय, जेना साहित्य, गणित, धर्म, दर्शन लिखल जाइ छल आ पाता (सुख-दुख दुनुक) चलै छल आ चिट्ठी-पत्री अहीमे होइ छल। कैथीक प्रयोग हिसाब-किताब, खाता-खतियान लेल होइ छल आ मुख्य रूपसँ कायस्थ एकर प्रयोग करै छला। मुदा मिथिलाक कर्ण-कायस्थक पञ्जी मात्र तिरहुतामे लिखल गेल (मैथिल करण कायस्थक पाँजिक सर्वेक्षण- मेजर विनोद बिहारी वर्मा, १९७३)। एकर विपरीत मैथिल ब्राह्मणक पञ्जीक किछु फील्ड-वर्क आ पत्रचार कैथीमे भेल (अनुलग्नक) मुदा एतहु पञ्जी मात्र तिरहुतामे लिखल गेल। ई १४म शताब्दी सी. ई. (कॊमन एरा) सँ शुरू भऽ कऽ २०म शताब्दी सी.ई. धरि रहल जखन देवनागरीमे पञ्जी लिखब प्रारम्भ भऽ गेल। किछु नव आविष्कृत लिपि लिपिक अनुकरणसँ साइन (इशारा) भाषा वधिर लेल १८म शताब्दी सी.ई. (कॊमन एरा) मे वधिर स्कूलमे फ्रांसक चार्ल्स मिशेल देल एप्पे द्वारा आविष्कृत भेल। ई एहेन लिपि अछि जे कागतपर नहि वरण् वायु माने वातावरणमे बनाओल जाइत अछि। अन्ध-दिव्यांग लेल ब्रेल लिपि १९म शताब्दीमे फ्रांसक लुइ ब्रेल आविष्कृत केलनि। २०म शताब्दीमे रघुनाथ मुर्मू संथाली भाषा लेल ओल-चिकी लिपिक आविष्कृत केलनि। ब्राह्मी लिपिक पुबरिया प्रकारक मुख्य अभिलेख सभ अछि- समुद्रगुप्तक हरिषेन लिखित प्रयाग प्रशस्ति जे अशोकक स्तम्भपर लिखल गेल छल, चन्द्र गुप्त-२ क उदयगिरि खोह लेख, स्कन्दगुप्तक कौहम स्तम्भ अभिलेख, चन्द्रगुप्त-२ आ कुमारगुप्त-१ क गढ़वा अभिलेख। तिरहुता लिपिक खोजमे हम सभ उत्तर आ दक्षिणमे सँ उत्तर भारतीय आ फेर उत्तर भारतीयसँ उत्तर-पूब दिस बढ़ब। उत्तर आ दक्षिण भारतक लिपिक जे अन्तर अछि से “म” मे देखाइत अछि। उत्तर भारतक दुनू प्रकार माने पूब आ पच्छिमक प्रकार श, ष, ल आ ह मे देखाइत अछि। गुप्त कालक अभिलेखक पूब प्रकारमे “ल” केर वाम अंग सोझे नीचाँ दिस झुकैत अछि (उदाहरण जौगड़क फराक अभिलेख)। “ष” केर आधार चेन्ह गोल बनाओल गेल आ बिचुलका चेन्हक माला सन बनि गेल। “ह” केर आधार चेन्ह धकिया देल गेल आ एकर सुल्फी उर्ध्वाधरसँ जोड़ि देल गेल। स्कन्दगुप्तक भिताड़ी स्तम्भ अभिलेखे, ओना तँ भारतक पूबमे अछि, मुदा ओहिमे उत्तर भारतक पच्छिम प्रकारक लिपिक प्रयोग भेल। कलाकार पच्छिमसँ आओल हेताह ताहि कारण सँ ई भेल होयत। फेर ईहो भेल जे उत्तर भारतक ब्राह्मीक पूब आ पच्छिम प्रकारक सीमा रेखा परिवर्तित होइत रहल। कन्नौजपर अधिकारक लेल राष्ट्रकूट, गुर्जर-प्रतिहार आ पाल राजवंशक बेच संघर्ष मोटामोटी ७५०-१२०० ई. क मध्य भेल। एहि तरा-उपरी युद्धमे गुर्जर-प्रतिहार जखन बीस पड़लथि तँ पछबरिया कलाकारक कलाकारी पूब दिस बढ़ल। तहिना पाल जखन बीस पड़लाह तखन पुबरिया कलाकार सभकेँ बेसी पच्छिम धरि रोजगार भेटलन्हि। पछबरिया ब्राह्मी नागरी बनल आ पुबरिया ब्राह्मी तिरहुता, असमी, बांग्ला आ ओड़िया। पुबरिया प्रकारक पच्छिम आरि पाल साम्राज्य, मगध आ विदेह+वज्जि निर्धारित भेल। दसम शताब्दी धरि नागरीक पुबरिया आरि बनारस निर्धारित भऽ गेल आ ओ पूर्ण रूपसँ पुबरिया ब्राह्मीसँ फराक भऽ गेल। घियासुद्दीन तुगलकक बाद फिरोजशाह तुगलक आक्रमणसँ तिरहुत साहित्य आ कलाक क्षेत्रमे पछुआ गेल आ ओकर लिपिक बड्ड भारी नोकसान भेलै। तिरहुता लिपिक विकास ओतहि ठमकि गेलै। मिथिलाक कर्णाट वंशक। ज्योतिरीश्वर ठाकुरक वर्ण-रत्नाकरमे हरसिंहदेव नायक आकि राजा छलाह।  १२९४ ई. मे जन्म आ १३०७ ई. मे राजसिंहासन। घियासुद्दीन तुगलकसँ १३२४-२५ ई. मे हारिक बाद नेपाल पलायन केलन्हि। मुदा एहि हारिसँ पहिने मिथिलाक पञ्जी-प्रबन्धक स्थापनाक ओ प्रयास केने रहथि, ब्राह्मण, कायस्थ आ क्षत्रिय मध्य । आधिकारिक स्थापक नियुक्य भेलाह मैथिल ब्राह्मणक हेतु गुणाकर झा, कर्ण कायस्थक लेल शंकरदत्त आ क्षत्रियक हेतु विजयदत्त। हरसिंहदेव नान्यदेवक वंशज छलाह, मिथिलाक पण्डित लोकनि १३२६ ई. मे पञ्जी-प्रबन्धक वर्तमान स्वरूपक प्रारम्भक निर्णय कएलन्हि। ओना तँ ओहि समयमे हरसिंहदेव मिथिलासँ पलायन कऽ गेल रहथि तैयो हुनका सांकेतिक रूपमे एकर संस्थापक मानल गेल। क्षत्रियक पञ्जी तँ आब उपलब्ध नहि अछि मुदा ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक जे पञ्जी उपलब्ध अछि तकर लिपि मात्र तिरहुता अछि आ २०म शताब्दीक पञ्जीक तिरहुता जे एहि पञ्जी सभमे अछि से १३२६ ई. (१४म शताब्दीक) क पञ्जीक तिरहुतासँ एक्को मिसिया भिन्न नहि अछि। फॉण्ट बनलाक एकर विकासक सीमा बिना रूप परिवर्त्तित भेने असीम भऽ गेल अछि आ एक्के खाँचामे कलाकार अपन कलाकारी देखा कऽ कएक डिजाइनबला अक्षर निर्मित कय सकैत छथि। से ब्राह्मीक विकास भेल उत्तरी आ दक्खिनी प्रकारमे। उत्तरक प्रकार दू भागमे बँटि गेल, पुबरिया आ पछबड़िया। आ मोटा-मोटी १०म शताब्दीमे पुबरिया लिपि पछबरिया लिपिसँ पूर्ण रूपसँ भिन्न भय गेल। पुबरिया लिपिक सीमा मगध, अंग आ तिरहुत निर्धारित भेलै आ नागरी जे पछबरिया ब्राह्मीक रूपमे गुप्त साम्राज्यक पतन धरि प्रयागोसँ पच्छिम धरि सीमित छल ८म शताब्दीमे ई वाराणसी धरि पहुँचि गेल १२म शताब्दीमे गंगाक दक्षिणमे मगधमे पछबरिया आ पुबरिया दुनू प्रकारक प्रयोग होमय लागल। मुदा गंगाक दक्षिणमे मगधसँ पूब पुबरिया प्रकार मात्र रहलै, आ गंगाक उत्तरमे तिरहुतमे सेहो पुबरिये प्रकार मात्र रहलैक। मुस्लिम आक्रमणक बाद समस्त मगधमे पछबरिया प्रकार पसरि गेलैक मुदा १४म शताब्दी धरि (उदाहरण महाबोधि मन्दिर गया) पुबरिया लिपिक प्रयोग एतऽ पूर्णरूपसँ बन्न भय गेलैक।। १३२६ ई. मे पञ्जी लिखबाक प्रारम्भ भेल आ तहियासँ २०म शताब्दी धरि ई तिरहुतामे बिना परिवर्तित भेने लिखाइत रहल आ ओकर ओही रूपमे फॉण्ट बनि गेलै (देखू गूगल बुक्सपर विदेह आर्काइवक पञ्जीक ११००० तालपत्र/ बसहा कागत अभिलेख, जे प्रारम्भसँ २०म शताब्दी धरिक अछि, २०म शताब्दीक अन्तमे पञ्जी सेहो देवनागरीमे लिखल जाय लागल)। तँ तिरहुताक उद्भव आ विकासक सीमा रेखा १३२६ ई. भेल जखन तिरहुताक अन्तिम रूप निर्धारित भय गेल। पञ्जीकारक नीक-अधलाह हस्तलिपिकेँ तिरहुता फॉण्टक विभिन्न डिजाइन मात्र मानल जा सकैत अछि। एकर ई परिणाम भेलै जे तिरहुतामे जे संस्कृत ग्रंथ लिखल जाइ छल, वा पाता चलै छल सेहो अपरिवर्तित रूपमे २०म शताब्दी धरि चलल। तुगलक आक्रमणसँ अभिलेख लिखनिहारक रोजगार खतम भऽ गेलन्हि आ जे कियो बचलाह से तालपत्र आ बसहा कागतपर लिखल अभिलेखसँ भिन्न लेखबाक क्षमतासँ रहित भय गेलाह। छापाखानाक प्रयोगक बाद आ यूनीकोडक अंकनक बाद आब डिजाइनक आपसमे लिपि परिवर्तन सन प्रयोग सम्भव भय गेल। मैथिलीक अष्टम सूचीमे गेलाक बाद संघ लोक सेवा आयोगक परीक्षा आ सरकारी कार्यमे मैथिलीक प्रयोग लेल केन्द्र सरकार मात्र देवनागरीक अनुमति देने अछि। पहिने देवनागरी, तिरहुता, बांग्ला, तमिल आदि लिपिमे संस्कृत लिखाइत छलै, मुदा आब सरकार मात्र देवनागरीमे संस्कृत लिखबाक आदेश देलक अछि। ओना बिहार-झारखण्ड आदिमे अखनो सांकेतिक रूपमे स्कूल, कॉलेजक परीक्षामे आ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षामे मैथिली अहाँ देवनागरी वा तिरहुतामे लिखि सकै छी। केन्द्र सरकार संघ लोक सेवा आयोगक परीक्षा आ अन्य कार्य लेल संस्कृत, हिन्दी, मैथिली, मराठी, कोंकणी, डोगरी, बोडो आ नेपाली केँ देवनागरीमे; संथालीकेँ ओल-चिकी वा देवनागरीमे; सिन्धीकेँ अरबी वा देवनागरीमे; उर्दू आ काश्मीरीकेँ फारसी लिपिमे; मणिपुरी आ बांग्लाकेँ बांग्ला लिपिमे लिखबाक आदेश देने अछि। असमी, गुजराती, कन्नड़, मलयालम, ओड़िया, तमिल, तेलुगु अपन-अपन अही नमक लिपिमे लिखल जायत आ पंजाबी भाषा गुरुमुखी लिपिमे लिखल जायत। आब फेर तिरहुताक विकास दिस घुमैत छी। गुप्त साम्राज्यक पतन धरि पुबरिया लिपिक आरि-धूरि प्रयागक लग-पासक इलाका रहय जे आठम शताब्दीमे काशी पहुँचि गेलैक। १२म शताब्दीसँ-१४म शताब्दी धरि मगधमे पुबरियो प्रकारक प्रचलन रहलै, जकर बाद ओहि इलाकामे मात्र नागरीक प्रचलन रहल। १४म शताब्दीमे १३२६ मे पञ्जी लिखेनाइ शुरू भेल आ मुस्लिम आक्रमणक बाद तिरहुताक विकास पूर्ण रूपसँ ठमकि गेल आ ओ ओहि कालमे जाहि रूपमे रहय तही रूपमे २०म शताब्दी धरि रहल। तिरहुता लिपिक १३२६ ई. धरि क्रमिक विकास आ अन्तिम स्वरूपक प्राप्ति अशोकक प्रयाग आ रामपुरवा, मठिआ, पहेरिया, निग्लीव, राधिया, सारनाथ स्तम्भ लेख सभमे एकरूपता अछि, एकरा ब्राह्मीक उत्तरवर्ती उत्तर-पूर्वी प्रकार कहल जा सकैत अछि। उत्तर-पूर्वी प्रकारमे किछु विशेषता अछि। “ख” केर नव रूप भेटबामे अबैत अछि। बोधगयाक एकटा अभिलेखमे “ख” केर आधार त्रिभुजक आकारक अछि। नव-मौर्य काल, जे अशोकक परवर्ती कालक अछि, मे “च” मे दू टा घुमघुमौआ आकृति लम्बवत रेखाक दुहू दिस बनैत अछि, मुदा दुनू घुमाव एक आकारक नहि अछि, छोट-पैघ अछि आ ताहि कारणसँ वृत्त नहि बनि पबैत अछि। महाबोधि मन्दिरक रेलिंग- बुद्ध परिक्रमा- मे अभिलेख सभाछि जाहि मे “य” आ “ज” उत्तर भारतीय प्रकारक अछि आ “ल” लटपटौआ अछि। जौगड़क फराक पाथर-अभिलेखमे मुदा बड्ड लटपटाकेँ लेखल गेल अछि जे बादमे पूर्व गुप्त अभिलेख (४म-५म शताब्दी) क पुबरिया प्रकारमे आर पुष्ट भेल। जौगड़मे “ह” केर लटपटौआ प्रकार बादमे पुबरिया प्रकारमे देखल जाइत अछि। उत्तर-मौर्य कालक ब्राह्मीक परवर्ती अक्षर प्रकार दशरथक नागार्जुनी खोह अभिलेख उत्तर-पूर्वी प्रकारक अछि आ तकर बाद महाबोधि मन्दिरक रेलिंग (परिक्रमा)क स्तम्भ सभपर अभिलेखमे ई सेहो देखाइत अछि। नागार्जुनी खोह अभिलेखक लटपटौआ “ल” दर्शनीय अछि। “श” कलसी अभिलेखसँ मेल खाइए आ पुबरिया घुमौआ “श”क ई पूर्व रूप अछि (४म-५म शताब्दी)। “स” सेहो परिवर्तित अछि, उपरक नोकशी नमहर भऽ कनेक झुकि कऽ दोसर पाँति सनबनैत अछि। महाबोधि मन्दिरक रेलिंग दशरथक नागार्जुनी खोहक५० बर्ख बादक अछि। एहिमे “क” कटार सनाछि, “ग” दू प्रकारक अछि- लटपटौआ आ कोणाकार, “प” मे बेस परिवर्तन अछि आ दूटा समकोण स्पष्ट देखाइ दैत अछि। “म” सेहो दू तरहक अछि, पहिल प्रकारमे वृत्त नीचाँ आ अर्धवृत्त ओकर ऊपर अछि, दोसर प्रकारमे त्रिभुज नीचाँ आ समकोण ओकर ऊपर अछि। “र” वक्र पाँतिक रूपमे अछि। “व” मे नीचाँ दिस वृत्तक स्थान त्रिभुज लऽ लेने अछि। “स” दू प्रकारक अछि, पहिल वामदिस कने वक्र, निचुलका नोकशी नीचाँ दिस आ दोसर मौर्यकाल सन जतय निचुलका नोकशी कने नम्हर रहैत छल। “ह” बड्ड लटपटौआ अछि जे उत्तर भारतक पूर्वी भागक ब्राह्मीक स्वरूप छल। सारानाथसँ प्राप्त अभिलेख (०१ ई.पू. सँ ०१ ई. धरि) उत्तर-पच्छिमक (०१ ई.पू.-०२ ई.पू.) प्रकारसँ कोनो अन्तर नहि अछि। लम्ब रेखा कने छोट भेल अछि, वक्र रेखा सभ कलाकारीककारण कोणीय भेल अछि। जँ स्वर शब्दक बीचमे अबैत अछि तँ मौर्यकालक कोणीय प्रकार लटपटौआ स्वरूप लय लैत अछि। कुषाण अभिलेख ब्राह्मी लिपिक उत्तर भारतीय प्रकारक पूर्वी प्रकार बोधगयाक महाबोधि गाछक नीचाँमे राखल पाथरमे प्राप्त होइत अछि। “प” केर उर्ध्वाधर रेखा छोट भेल अछि, “म” मे निचुलका भागक त्रिभुज आकार पूर्व कुषाण स्वरूपसन अछि। “श” कोणीय अछि आ एहिमे क्षैतिज रेखा वाम लम्बवत पाँतिकेँ छू नहि सकल अछि। साहेत-माहेत क बोधिसत्त्वक आकृतिपर लटपटौआ “ह” अछि आ आनठाम कोणीय “ह”। “स” मे पछुलका भाग चाकर अछि। “य” कखनो-काल अधोलिखित अछि आ एहिमे तीन फाँड़ अछि। गुप्त युगक प्रारम्भ (४म- ५म शताब्दी) पूर्व प्रकार “ल”, “ह”, “ष” आ “स” मे स्पष्ट अछि। एहि कालक मुख्य अभिलेख सभ अछि- समुद्रगुप्तक प्रयाग स्तम्भ प्रशस्ति, चन्द्रगुप्त-२ क उदयगिरि खोहाभिलेख, चन्द्रगुप्त-२ आ कुमारगुप्त-१ क गढ़वा भांगल अभिलेख, कुमारगुप्त-१ क धनैदाहा अनुदान-पत्र, कुमारगुप्त-१ क मानकुँवर अभिलेख, स्कन्दगुप्तक बिहार स्तम्भ अभिलेख, भीमवर्मनक कोसम आकृति अभिलेख आ स्कन्दगुप्तक कौहम स्तम्भ अभिलेख। लिपिक प्रकारक अन्तर कोना पकड़ी? उत्तर भारतक प्रकार आ दक्षिण भारतक प्रकार (नागरी सहितमे) अन्तर “म” अक्षरपर ध्यान देलासँ आ उत्तर भारतक पूर्वी आ पश्चिमी प्रकारमे “ष”, “ल” आ “ह” पर ध्यान देलासँ लिपिक कलाकारीमे भिन्नता पकड़ाइत अछि। तिरहुताक स्वरूप एहि तरहेँ पूर्वी प्रकारसँ बहार भेल। “ल”-एकर वाम भाग सोझे-सोझ नीचाँ दिस खसैत अछि। “ष” केर आधार कलाकार गोल बनेने छथि आ कनछियाह बिचुलका रेखासँ घुमाकय मिलेने छथि। “ह” केर आधार थकुचि कऽ छोट कयल गेल अछि आ ओकर नोकशी लम्बवत रेखामे मिला कऽ वाम दिस घुमाओल गेल अछि। “स” मे हरदम एकर वाम लम्बवर रेखाक अन्तमे घुमाव रहैत अछि, जे पहिने वक्र वा नोकशी सन रहैत छल। ई कुषाण कालक मथुरामे सेहो भेटल अछि। समुद्रगुप्तक प्रयाग स्तम्भ प्रशस्ति पूर्वक प्रकारक मानक रूप अछि। तिरहुता भारतीय लिपिक तंत्र सिद्धांत बिन्दु, त्रिकोण, वृत्त आ चतुष्कोणक प्रयोगसँ कलाकार तंत्र-मंत्र कय सकल होथि से सम्भव नहि मुदा तिरहुताक अक्षरकेँ सुन्दर बनेबामे ओ अवश्य सफल भेलाह। ब्राह्मीक उत्तरवर्ती पूर्व प्रकार (५५० ई. सँ ११०० ई.) बुहलर (बूलर) एहि कालक लिपिकेँ सिद्धमातृका कहैत छथि। ५५० ई.-६५० ई. एहि कालक मुख्य अभिलेख सभ अछि- नन्दनक अमौना अनुदान अभिलेख, शिवराजक पटियाकेला अनुदान अभिलेख, अनन्तवर्मनक बराबर खोह अभिलेख, अनन्तवर्मनक नागार्जुनी खोह अभिलेख। मुख्य परिवर्तन जे तिरहुता दिस भेल ओ अछि: -तीन फेँड़ बला “य”; -“घ”, “प”, “फ”, “ष”, “स” केर नीचाँ दिस समकोणीय प्रवृत्ति संगे एहि सभ चेन्हमे दहिन दिस पुच्छी वा लम्ब जे पछबरिया प्रकारमे विकसितभेल तकर अभाव। ६५० ई. सँ ७०० ई. -“अ” केर वाम अंगक उपरका भागक कनेक नमगर भय गेल काँटीक नोक (v अक्षर) जकाँ, निचुलका भाग वक्र बनि गेल आ माथपर बट्टम सन चेन्ह अर्द्धविराम सन “आ”- दोसर वक्रमे अन्तर अर्द्धविराम सन, दहिन अंगक निचुलका भागसँ जुड़ल “इ”- गुप्त कालक लिपिक पश्चिम प्रकार जे बिन्दु वा निचुलका वृत्त सन छलै से पैघ वक्रमे विकसित भय गेल “उ”- निचुलका भागक क्षैतिज रेखा वक्रमे परिवर्तित भय गेल आ नमगर भय गेल आ अही रूपमे १०म शताब्दी धरि रहल आ तखनजा कय अन्तिम रूपसँ विकसित भेल “ओ”- नमगर अर्धविराम पाँछा दिस चौरस भय गेल “क”- पहिल बेर वाम दिस सदैव घुमाव रहय लागल, ई घुमाव ११म शताब्दीमे अर्धवृत्त बनि गेल “ख”- अक्षरक आधारमे त्रिभुज आकृति बनल फेर ई सोझ रेखा बनल आ फेर घुमि गेल, त्रिभुजक एक भुजा अर्धवृत्त बनि गेल आ दोसर नमगर भय गेल आ वृत्तक दुनू चापकेँ छूलक। “ग”- आधार रेखाक वक्रता प्रारम्भिक गुप्त कालहिसँ पुबरिया प्रकारमे देखाइ पड़य लागल छल। ६अम शताब्दीक यशोधर्मन अभिलेखक आधार रेखा वामदिस घुमि गेल आ दहिन दिस टेढ़ भय गेल आ दहिन लम्बसँ न्यून कोण बनेलक। “ङ”- निचुला दहिन दिसुका कोण न्यूनकोण बनि गेल आ लम्बवत सोझ रेखा गोलाइ लय लेलक “च”- गुप्त कालक दुनू गोलाइ त्रिभुज बनि गेल जे “वी” आकार ऊपरमे लेलक, आधार रेखा वा निचुलका रेखा वाम दिस कने नमगर भय गेल। “छ”- कोनो अन्तर नहि। “ज”- पुबरिया प्रकारमे निचुलका प्रारम्भिक गुप्त कालहिसँ क्षैतिज आकार स्पष्ट छल आब लम्बवत रेखामे सेहो स्पष्ट रूपसँ गोलाइ देखाइ पड़य लागल। बिचुलका नव क्षैतिज ओतबी घुमि गेल जतेक निचुलका आधार रेखा छल। उपरका क्षैतिज रेखाक दहिन दिस “वी” आकार जुड़ि गेल। “ञ”- कनेक लटपटौआ “ट”- पछबरिया प्रकारसँ बेस अन्तर आबि गेल। खुजल गोलाइ आ “वी” आकृति ओहि गोलाइक उपरका भाग पर क्षैतिज रूपमे राखि देल गेल। “घ”- आधार रेखाक गोलाइ प्रारम्भिक गुप्त कालक पुबरिया प्रकारमे देखाइ पड़य लागल छल, आब ई तीन फेँड़बला “य” सन बनि गेल। “ठ”- पूर्वकालक मौर्य प्रकार अखनो प्रयुक्त होइत रहल। “ड”- दूटा छोट गोलाइ बनि गेल। “ढ”- कोण गोलाइ लय लेलक। “ण”- आधार रेखा टेढ़ भय गेल आ ओ निचुलका भागक दहिन दिस न्यून कोण बनेलक आ वाम नोकशी नमगर भय गेल। “त”- गुप्त कालहिमे दहिन अंगक निचुलका भाग नमगर भय गेल रहय, ई कने गोलाइ लय लेलक आ एकटा “वी” आकार ऊपरमे बनि गेल। “थ”- उपरका भाग चकराइ लय लेलक। “ध”- छोट चाप अर्द्ध-वृत्त मे बदलि गेल। “न”- प्रारम्भिक गुप कालक गोलाइ बला रूप बदलि कय आधुनिक नागरी रूप लय लेलक। गोलाइ मुख्य भागसँ फराक भय गेल आ मुख्य भागसँ एकटा छोट क्षैतिज रेखासँ मिलि गेल आ कने छोट सेहो भय गेल। “प”- कनेक आर बेशी लटपटौआ आकार लेलक आ न्यून कोण आर स्पष्ट भय गेल। “ब”- “ब” केर स्थान “व” लय लेलक। “भ”- “भ” आ “ह” केर बीच अन्तर खतम भय गेल, पछबरिया प्रकार मे ई पहिनहिये भय गेल छल। “म”- न्यून कोण आर तीक्ष्ण भय गेल आ तकर परिणाम भेल जे दहिना अंग नीचाँ दिस बढ़ि गेल। “य”- “य” दू प्रकारक, पहिल दू फेँड़बला, एकर निचुलका हीसमे न्यूनकोण बनैत अछि आ दोसर प्रकारमे न्यूनकोण ओतेक स्पष्ट नहि अछि मुदा दहिन भागक अंग नीचाँ दिस नमगर भऽ गेल अछि। “र”- निचुलका छोरपर “वी” वा तीरक आकृतिक जे पहिलुक्का अभिलेख सभक पछबरिया प्रकारमे सेहो छल। ई “ड” केर छोट रूपसँ मिलानी खाइत अछि। “ल” दू प्रकारक अछि। पहिल प्रकारमे वाम अंगक वक्र वा नोकशी नीचाँ दिस नमगर भेल अछि आ सभसँ नीचाँ जा कय कनिये बाहर दिस वक्र रूप लैत अछि । दोसर प्रकारमे वाम अंगक वक्रपर नोकशी अछि जे नमगर भऽ कऽ नीचाँ जेबाक बदला आन्तरिक आकार लैत अछि। ई मोटा-मोटी आजुक तिरहुता आ देवनागरी सन भऽ जाइत अछि। “व”- एतय ओही तरहक परिवर्तन देखा पड़ैत अछि जेना “ख” केर आधारमे त्रिभुज बनैत अछि। त्रिभुजक दुनू भुजा वक्र बनि जाइत अछि, तेसर नमगर भऽ जाइत अछि। अक्षर ऊपर “वी” आकार बनैत अछि। “श”- अक्षरक उपरका भाग पूर्व गुप्त कालमे वक्र छल, आब जा कऽ उपरका भाग वक्रक रूप लैत अछि, निचुलका दहिन अंग ऊपर दिस नमगर भेल अछि। “ष”- ई तीन प्रकारक अछि- पहिल प्रकारमे रूप वक्रित अछि, दोसर प्रकारमे वक्र फोंक “वी” आकृतिक रूप लैत अछि, तेसर प्रकारमे “वी” आकृतिक उपरका भाग फराक भऽ जाइत अछि आ “वी” आकृति नहि रहि जाइत अछि (ई प्रकार भेटैत अछि ६अम सँ ९अम शताब्दीक उत्तर-पूर्वी अभिलेख सभमे)। “ह”- अक्षरक दहिन अंगमे वक्र आ नोकशीक नमगर होयब आ शीर्षपर “वी” आकृति (ढबकल सन) आ अखनि धरिक क्षैतिज आधार रेखा कने टेढ़ भऽ जाइत अछि। आठम शताब्दी एहि कालक मुख्य अभिलेख जाहिमे ब्राह्मीक उत्तरकालक पुबरिया रूप फराक होइत अछि- जीवितगुप्त २ केर देव-बार्नार्क स्तम्भ लेख, धर्मपालक खलीलपुर अनुदान पत्र आ धर्मपालक समयक बोधगया आकृति अभिलेख। मुख्य बिन्दु अछि। स्वर- कोनो परिवर्तन नहि भेल। क, ग, च, ज, ट, ठ, ड, द, ध, न, भ, म, य, ह- कोनो परिवर्तन नहि भेल। ण- दहिन वक्र वा नोकशी नीचाँ दिस नमगर भेल। त- नीचाँ दिस नमगर भऽ गेल, निचुलका छोरपर बड्ड छोट वक्र। “थ”- “वी” आकृतिक छोरक नमगर भेलासँ उपरका भाग चकरगर भेल। “प” दू प्रकारक- पुरनका रूप जाहिमे न्यूनकोण अखनो स्पष्ट अछि। नवका रूपमे न्यूनकोण उपस्थित तँ अछि मुदा स्पष्ट नहि अछि आ एकर स्थान नीचाँ दिसुका दहिन लम्ब रेखा लऽ लेने अछि। “ल”- न्यूनकोण बड्ड छोट भऽ गेल अछिआ दहिन लम्ब रेखा नीचाँ दिस चल गेल अछि। “श”- ई दू प्रकारक अछि। पूर्व रूप वक्र संग अछि। बादक रूप ९अम शताब्दीक दिघवा-दुभौली अनुदान सन अछि। “ष”- वाम अंगक निचुलका भाग लटपटौआ अछि आ वाम भागक लम्ब सँ आगाँ चलि जाइत अछि। अफसड़ अभिलेखमे सभ ठाम दन्त “स” केर प्रयोग भेल अछि। धर्मपालक बोधगया अभिलेख “श” तीन प्रकारक अछि- पहिल प्राचीन रूप जाहिमे उपरका भाग गोलाइ लेने अछि। बादक रूप बिन डण्टाक अछि। एकटा बिचुलका रूप अछि जाहिमे डण्टा सन आकृति छै, मुदा ओ न्यूनकोणकेँ दक्षिण उर्ध्वाधर रेखाक बदलामे नीचाँमे छुबैत अछि। “ज” मे उपरका क्षैतिज रेखा बिला जाइत अछि आ “वी”आकृति ओकर बदलामे आबि जाइत अछि। बिचुलका क्षैतिज रेखा एकटा वक्र अछि। “न” दू प्रकारक- पुरनका प्रकार फानी सन छल। आब ई गुप्त आ तिरहुताक बीचबला आकार लऽ लैत अछि। “ण”- आधार रेखा बिला जाइत अछि। “ह”- निचुलका दिसुका न्यूणकोण बेसी स्पष्ट भऽ जाइत अछि। धर्मपालक बाद देवपालक अन्तर्गत तिरहुत प्रदेश रहल। मुदा तकर बाद गुर्जर-प्रतिहार सम्राट तिरहुत छीनि लेलनि, बिग्रहपाल -१ आ नारायणपाल क शासनकालमे। ब्राह्मीक परवर्ती पुबरिया प्रकार (९अम शताब्दी सी.ई.) एहि सभमे ई सभ मुख्य प्रकार अछि: १.देवपालक मुंगेर अनुदान पत्र २.देवपालक समयक घोसरवा अभिलेख ३.नारायणपालक बादल स्तम्भ अभिलेख ४.नारायणपालक विष्णुपाद मन्दिर अभिलेख ५.नारायणपालक भागलपुर अनुदानपत्र ६.महेन्द्रपालक दिघवा-दुभौली अनुदान-पत्र ७.महेन्द्रपालक रामाज्ञा अभिलेख घोसरवा अभिलेख अ/आ- उपरका भाग अखनो पूर्ण रूपसँ विकसित नहि भेल अछि। इ- दूटा वृत्त वा बिन्दु ऊपरमे आ काटबला वक्र नीचाँमे। ई-समकोण त्रिभुजक रूप लऽ लेने अछि। ख- अखनो वाम अंगक नीचाँ दिस “वी” आकृति लेनहिये अछि। च- चकराइ बढ़ि गेल। ज- पुरातन रूप- बिचुलका क्षैतिज रेखा कने नीचाँ दिस टेढ़ भेल आ निचुलका क्षैतिज रेखा एकटा छोट वक्रमे खतम होइत अछि। ट/ ठ केर दहिन अंग नहि देखाइ पड़ैत अछि। ण- आधार रेखा पूरा-पूरी खतम भऽ गेल। थ- उपरका भाग चाकर भऽ गेल। द/ ध- निचुलका रेखा नीचाँ दिस वक्र भऽ गेल अछि। न- फानी सन पूर गुप्त काल आ तिरहुताक बीचक रूप। फानी अक्षरक मुख्य अंगसँ विलग भऽ गेल। प- पुरातनरूप नीचा दिस कोनो वक्रता नहि। एकटा अधिक कोण आ एकटा नूनकोण बदलामे निचुलका भागमे दूटा समकोण बनि जाइत अछि। भ-नीचाँ दिस टेढ़ म- फानी अखनो नहि बनल अछि। य- न्यूनकोण चपा गेल अछि आ तिरहुता स्वरूप प्राप्त कऽ लेने अछि। ल- आधाररेखा पूरा-पूरी दबि गेल अछि। व- न्यूनकोणक बदलामे दहिन उर्ध्वाधर सोझ रेखाक नमगर रूप आबि गेल। ष- उपरका रेखा टेढ़ भऽ गेल। स- आधार रेखा फेर क्षैतिज भऽ गेल आ उपरका रेखा नीचाँ दिस टेढ़ भऽ गेल। ह- पुरातन रूप, न्यूनकोण अखनो दोसर निचुलका रेखा नहि बनल अछि। विष्णुपद मन्दिर अभिलेख “इ” दू प्रकारक- पहिल प्रकारमे दूटा वृत्त ऊपरमे आ एकटा कटाव नीचाँमे। दोसर प्रकारमे ऊपरमे एकटा छोट क्षैतिज रेखा आ दूटा वृत्त नीचाँमे। “ख” तिरहुताक आकारक रूप लऽ लेने अछि। “घ” अखनो नीचाँमे न्यूनकोण बनेने अछि। “ट”- दहिन दिसुका उर्ध्वाधर सोझ रेखा पूरा-पूरी बिला गेल। “ठ”- अखनो पुरने रूप अछि। “प”- दू प्रकारक। पुरनका रूप जतऽ कोण अखनो अछिये। दोसर रूपमे तिरहुताक लटपटौआ रूप। “म”- आधार रेखा विलुप्त भऽ गेल। “श” आ “ष” क रूप फानीबला आ अखुनका रूपक बीचबला रूप लेने अछि। नारायणपालक भागलपुर अनुदान अ/ आ- पूरापूरी तिरहुता रूप, एतय धरि जे छोटका रेखा जे दहिना लम्ब रेखाक अर्द्धविराम रूपी कटावसँ मिलैत अछि, नीचाँ दिस टेढ़ भेल अछि। “उ”- एहिमे एकटा उपरका रेखा बनैत अछि आ लम्बरूपी रेखावाम दिस वक्र भऽ जाइत अछि। “क” केर त्रिभुज चाकर भऽ गेल अछि। “ख” तिरहुता सन लटपटौआ भऽ गेल अछि। “घ” मे न्यूनकोण खतम भऽ गेल आ तिरहुता केर आकार लऽ लेलक अछि। “च”- उपरका भाग पातर भऽ गेल अछि। “ज”- बिचुलका क्षैतिज भाग दू टा सोझ रेखामे बदलि गेल अछि आ अधिककोण बनबैत अछि। “ट”- उपरका रेखाक दहिन छोरसँ नीचाँ दिस छोटका रेखा जाइत अछि। “ण”- तिरहुता प्राचीन रूप। दूटा छोट रेखा लम्ब सोझ रेखाक वाम दिस जा कऽ मिलैत अछि। “त”- ई बदलि गेल अछि, एहिमे एकटा उपरका रेखा आ एकटा लम्ब रेखा समकोण पर अछि संगहि एकटा वक्र लम्ब रेखाक वाम दिस जुड़ि गेल अछि, जेना नागरीमे अछि। “थ”- तिरहुता सन उपरका वक्र खुजि गेल अछि। “ध”- उपरा भाग खुजि गेल अछि। “न”- पुरातन फानीबला रूप, फानी नीचाँ दिस झुकल। “प”- उपरका दिस पातर भेल। “फ”- उपरका कम चाकर भेल। “म”- सभरूप फाने सन। “ल”- अन्तिम रूपसँ आधार रेखा थकुचा गेल अछि। “श”- सभ प्रकार फानी सन। “ष”- पुरातन रूप, उपरका आ निचुलका भाग बराबर, दोसर मे उपरका भाग कम चाकर। प्रतिहार नरेश महेन्द्रपालक दिघवा-दुभौली अनुदान (गोपालगंज) एहिमे पुबरिया प्रकारक विशेषता भेटैत अछि जेना च पतरा गेल, ज लटपटा गेल, थ- तिरहुताक पूर्व रूप बुझाइत अछि, फानीबला “म” अछि, “श”मे फानी लम्ब रेखासँ मिज्झर होइत अछि, “ष” मे उपरका रेखा नीचाँ दिस टेढ़ होइत अछि। ई अनुदान पूब आ पच्छिमक मिश्रित रूप प्रस्तुत करैत अछि। १०म शताब्दीमे पैघ साम्राज्य सभ खतम होइत गेल आ तेँ अभिलेखो नहियेक बराबर अछि। नालन्दा आकृति अभिलेख एहि कालक अछि जाहिमे “भ” केर पुरान रूप देखबामे अबैत अछि। “श” केर परवर्ती रूप देखाइत अछि। बोधगया केर आकृति पर अभिलेखमे सेहो भ केर पुरान रूप भेटैत अछि आ श केर परवर्ती रूप सेहो। ख केर रूप तिरहुता सन अछि। तिरहुता लिपिक विकासक अन्तिम चरण किछु लिपि जे अखन धरि नहि पढ़ जा सकल अछि (१)- हड़प्पा लिपि (२)- अलंकृत ब्राह्मी, भारतकसभ भागमे छोट-छोट अभिलेख एहि लिपिमे अछि, मोटा-मोटी नाम आ हस्ताक्षर लेल प्रयुक्त होइत छल। (३)- शंख लिपि- एकर अक्षर सभ शंख सन अछि तेँ एकर ई नामकरण भेल। ई सेहो मोटा-मोटी नाम आ हस्ताक्षर लेल प्रयुक्त होइत छल। (कोल्हुआ, मुजफ्फरपुरक अशोक स्तम्भ (बसाढ़ स्तम्भ) मे जे तीनटा अभिलेख भेटल अछि ओहि मे किछु अक्षर शंख लिपिक सेहो अछि।) (४)- ब्राह्मी सन एकटा लिपि जे माटिक मोहर सभपर पूर्व भारतक चन्द्रकेतुगढ़ आ तामलुकसँ भेटल्;अ अछि। (५)- खरोष्ठी सन दहिनसँ वाम लिखल जायवला एकटा लिपि जे अफगानिस्तानसँ भेटल अछि। तिरहुताक विकासक अन्तिम चरण किछु अक्षर पहिने तिरहुताक रूप लऽ लेलक तँ किछु कने बाद। किछु अभिलेखमे किछु अक्षरक प्रयोगे नहि भेल। अनुलग्नक-५ मे तिरहुता रूपक क्रमिक स्थिति देखाओल गेल अछि। कैथी, तिब्बती आ देवनागरी लिपि अही तरहेँ अपन वर्तमान रूपमे आओल जे अनुलग्नकमे देखाओल गेल अछि। किछु विद्वान हर्षवर्द्धनक बादक समयमे ओकर तिरहुतक मंत्री अर्जुन द्वारा कन्नौजक राजा बनब आ तिब्बतक बौद्ध यात्री सभकेँ तंग करबाक चर्चा केने छथि आ प्रत्युत्तरमे तिरहुत पर तिब्बतक कब्जाक चर्चा करैत छथि। आधुनिक विद्वान ओहिपर शंका व्यक्त करैत छथि। तिब्बतक राजनैतिक प्रभुत्वपर तँ शंका अछि मुदा सांस्कृतिक रूपसँ निम्न तथ्य तिब्बतक वज्रयानक मिथिलामे उपस्थिति देखबैत अछि। बौद्ध देवी तारा, वारी, समस्तीपुर, उग्रतारा मन्दिर, महिषी, सहरसा। मुसहरनियां डीह- अंधरा ठाढ़ीसँ ३ किलोमीटर पश्चिम पस्टन गाम लग एकटा ऊंच डीह अछि। बुद्धकालीन एकजनियाँ कोठली, बौद्धकालीन मूर्त्ति, पाइ, बर्त्तनक टुकड़ी आ पजेबाक अवशेष एतए अछि। बुद्धकालीन एकजनियाँ कोठली नाहर भगवतीपुर भुवनेश्वरी मन्दिर (मधुबनी) मे सेहो अछि, प्रायः बौद्ध भिक्षु लोकनिक ई तपस्या स्थली होयत। फेर बौद्ध सिद्ध सरहपाद जे लिखै छथि- सिद्धिरत्थु मइ पढ़मे पढ़िअउ, मण्ड पिबन्तों बिसरउ एमइउ। ओ सिद्धिरस्तु आ एहि विचार कि माँड़ पीने बुद्धि मन्द होइत अछि दुनूक चर्च करैत छथि जाहिसँ हुनकर बौद्ध धर्मक मैथिल होयबाक प्रमाण भेटैत अछि, हुनकर जे फोटो तिब्बतसँ भेटैत अछि ओहिमे हुनकर फोटोक नीचाँमे तिब्बती लिपिमे वर्णन अछि। ७म शताब्दी आ बादक किछु तिरहुता अभिलेख अन्ध्राठाढी अभिलेख (श्रीधरदासक आंध्रा-ठाढ़ी अभिलेख), मधुबनी, बुद्धमूर्ति अभिलेख (कोर्थु), विष्णुमूर्ति अभिलेख (लदहो), १२म शताब्दीक सिमरौनागढ़क तिरहुता पाथर-अभिलेख, १९म शतीक ब्रह्मपुरा शिलालेखमे तिरहुताक आदर्श रूप, मधुबनी जिलाक जमथरि गाम आ हैंठी बाली गामक बीचक गौरीशंकर स्थान, गौरी आ शङ्करक सम्मिलित मूर्त्ति आ एहि पर मिथिलाक्षरमे लिखल पालवंशीय अभिलेख, बिदेश्वर-मधुबनी जिलामे लोहनारोड स्टेशन लग स्थित शिवधामक स्थापना महाराज माधवसिंह कएलन्हि, ताहि युगक तिरहुताक अभिलेख। मंदार पर्वत-बांका स्थित स्थलमे तिरहुताक गुप्तवंशीय ७म् शताब्दीक अभिलेख अछि। पौराणिक कथामे समुद्र मंथनक हेतु मंदारक प्रयोग भेल छल। निकटमे बौंसीमे जैनक बारहम तीर्थंकर वासुपूज्य नाथक दूटा मूर्त्ति अछि, पैघ मूर्ति लाल पाथरक अछि तँ दोसर काँसाक जकर सोझाँ दूटा पदचिन्ह अछि। जैनक बारहम तीर्थंकर वासुपूज्य नाथक जन्म चम्पानगरमे आ निर्वाण एतहि भेल छलन्हि। बसैटी अभिलेख- पूणियाँमे श्रीनगर (जिला अररिया) लग तिरहुताक ई अभिलेख मिथिलाक पहिल महिला शासक रानी इद्रावतीक राज्यकालक वर्णन करैत अछि। एकर आधार पर मदनेश्वर मिश्र ’एक छलीह महारानी’ उपन्यास सेहो लिखने छथि। बाइसी-बसैटी, अररिया तिरहुता ताम्रपत्र- रानी इन्द्रावती (१७८४-१८०२) जे फूड-फॉर-वर्क आ अन्य कल्याणकारी कार्यक प्रारम्भ कएलन्हि केर मिथिलाक्षर अभिलेख एतए एकटा मन्दिरक ऊपरमे ताम्र-पत्रपर कीलित अछि, जे कारी रंग सँ पेंट कऽ देल गेल अछि आ शिलालेख सन लगैत अछि। जलज कुमार तिवारी आ एस. कृष्णामूर्ति २०१९ ई.मे प्रकाशित अपन आलेखमे निम्न तिरहुता अभिलेख सभक वर्णन दैत छथि जे अखन धरि कोनो पोथीमे नहि आयल छल। चेचर गाम (वैशाली) मे बुद्ध मूर्तिपर अभिलेख भेटल अछि जे तिरहुता लिपि आ संस्कृतमे अछि (९अम शताब्दी)। तारा मूर्ति, जगतपुर बरुआरी (सुपौल) जे सहरसा म्यूजियममे राखल अछि, तिरहुता लिपि आ संस्कृत भाषाक अभिलेख एततसँ भेटल अछि (१० म शताब्दीक)। तारा मूर्ति, दभैछा (वैशाली) मे तिरहुता लिपि आ संस्कृत भाषाक अभिलेख भेटल अछि (१० म शताब्दीक)। पिपरौलिया विष्णु आकृति (मूर्ति), दरभंगा, तिरहुता लिपि. संस्कृत भाषा (१०म शताब्दी)। गाम- भच्छी (बहेरी लगक जिला दरभंगा, मधुबनीक भच्छीसँ भिन्न), तिरहुता लिपि, संस्कृत भाषा (१०म-११म शताब्दी)। कण्दाहा (सहरसा) क पाथर अभिलेख, ओइनवार कालक राजा नरसिम्हदेवक आदेशसँ वंशधर ब्राह्मण द्वारा (तिरहुता १५मशताब्दी, भाषा संस्कृत)। मनसा आकृति (भैरवस्थान, मुजफ्फरपुर)- तिरहुता लिपि आ संस्कृत भाषामे लिखल अभिलेख (१५ म शताब्दी)। बुद्ध मूर्ति, कोर्थु दरभंगा, तिरहुता लिपि, संस्कृत भाषा (१०म शताब्दी)। एकर अतिरिक्त ओ पहिल शताब्दीक एकटा ब्राह्मी अभिलेखक चर्च सेहो करैत छथि [गाम पखौली जिला वैशाली (स्तम्भ अभिलेख) (ब्राह्मी लिपि, पहिल शताब्दी)]। तीनटा अशोक स्तम्भपर, जे कोल्हुआ (मुजफ्फरपुर)मे भेटल अछि, बादमे कियो अभिलेख खचित केने छथि। ओहिमे दूटा अभिलेख ७म शताब्दीक अछि जे नागरी लिपि आ संस्कृत भाषामे अछि आ तेसर ५म शताब्दीक अछि जे संस्कृत भाषामे आ ब्राह्मी लिपिमे अछि। कोल्हुआ, मुजफ्फरपुरक अशोक स्तम्भ (बसाढ़ स्तम्भ) मे जे तीनटा अभिलेख भेटल अछि ओहि मे किछु अक्षर शंख लिपिक सेहो अछि, जे अखन धरि नहि पढ़ल जा सकल अछि। (जलज कुमार तिवारी, एस. कृष्णामूर्ति, मिथिला भारती, भाग-६, अंक १-४, २०१९ ई.) मान्दा अभिलेख, कमौली दानपत्र (विद्यादेव कमौली प्रशस्ति), गदाधर मन्दिर अभिलेख (गदाधर मठ गया), गंजम ताम्रपत्र, लोकनाथक दानपत्र, भागलपुर, मुंगेर आ नालन्दाक दानपत्र, बादल स्तम्भ अभिलेख, विश्वरूप सेनक मदनपाद दानपत्र, अशोकाचलक बोधगया अभिलेख, वल्लालसेनक नैहाटी अभिलेख, ढाका अभिलेख (ढाका मूर्ति अभिलेख), देवपारा प्रशस्ति, अनुलिया आ साहित्य परिषद दानपत्र, भुवनेश्वर, सुन्दरवन, वेलवा आ बोधगया अभिलेख क्रमसँ देवनागरी आ तिरहुताक बीचमे फाँक आनि देलक। उपसंहार तेसर शताब्दी ई.पू. मौर्य, दोसर आ पहिल शताब्दी ई. पू. शुंग, पहिल सँ तेसर शताब्दी शक/ कुषाण, चारिमसँ छअम शताब्दी- गुप्त, सातमसँ ९अम शताब्दी सिद्धमातृका आ तकर बाद तिरहुता, एहि क्रममे तिरहुताक विकास हम देखि सकैत छी। तंत्रक योगदानसँ आ तिब्बती लिपिक प्रभावसँ तिरहुता अलंकृत भेल। मिथिलाक्षरक उद्भव आ विकास मे राजेश्वर झा जी किछु पुरातन तथ्यसँ अपनाकेँ दूर नहि कऽ सकला, जेना ओ नहि फरिछा सकला जे ब्रह्मी पूर्व पाणिनी व्याकरणाचार्य लोकनि द्वारा प्रयुक्त होइत छल आ पाणिनीक व्याकरणमे ओ अशुद्ध भऽ गेल आ तखनसँ एकर नाम ब्राह्मी भऽ गेल। ओ ब्राह्मण लोकनि द्वारा प्रयुक्त हेबाक कारणे ब्रह्मी नाम भेलपर जिदियायल छथि। हुनकर अवधारणा जे वैदेही लिपिसँ ब्राह्मी (जकरा ओ ब्रह्मी लिखै छथि) बहरायल सेहो भ्रामक अछि। मिथिलामे शंख लिपिमे सेहो छोट-छीन अभिलेख भेटल अछि, जकर वर्णन ऊपर कयल गेल अछि, जे हड़प्पा लिपि जेकाँ पढ़ल नहि जा सकल अछि आ ब्राह्मीमे सेहो अभिलेख भेटल अछि, से हुनकर कथन जे सोझे हड़प्पासँ लोक विदेह आयल विदेघ माथवक संग (शतपथ ब्राह्मण) आ एतऽ वैदेही लिपि शुरू कऽ देलक, से मान्य नहि अछि। से सगर भारतमे जे परम्परा छल जे ब्राह्मीमे पैघ अभिलेख लिखल जाइत छल आ नाम आ हस्ताक्षर लेल शंख लिपिक प्रयोग कएल जाइत छल से मिथिलोमे भेटल अछि। राजेश्वर झा तंत्र-सिद्धांत आ एकर तिरहुता लिपिपर प्रभावक सेहो जरूरति सँ बेशी प्रभाव देखेने छथि, जखन कि ओकर प्रभाव किछु सोझे आ किछु तिब्बती लिपिक माध्यमसँ पड़ल मुदा ओ ओहिसँ अलंकृत मात्र भेल। हुनकर ई कथन जे शब्दकल्पद्रुममे देल लिखबाक पद्धतिसँ बांग्ला लिपि नहि वरन् मात्र मिथिलाक्षर (तिरहुता) लिखल जा सकैत अछि, सेहो भ्रामक अछि। बांग्ला वा मिथिलाक्षर वा तिब्बती वा देवनागरी सभ ब्राह्मीपर आधारित अछि आ ई एहि तरहेँ बूझल सा सकैत अछि जे रोमन लिपिमे एकसँ एक फॉण्ट छै जे कखनो अहाँकेँ अरबी सन बुझायत कखनो लटपटौआ, आ सभ एक दोसरामे परिवर्तनीय अछि। शब्दकल्पद्रुममे देल विधि तिरहुते नहि बांग्लो लेल उपयुक्त छल, छापाखाना एलाक बाद जेना रोमन पूर्ण रूपसँ संयुक्ताक्षर खतम कऽ लेलक तहिना बांग्ला बहुत रास संयुक्ताक्षरकेँ खतम कऽ लेलक। आ ओहि नवका रूपकेँ राजेश्वर झा जी शब्दकल्पद्रुमसँ जोड़बाक गलती केलन्हि। राजेश्वर झाकेँ खरोष्ठी लिपिक सम्बन्धमे सेहो भ्रम छन्हि। खरोष्ठी दहिनसँ वाम दिस लिखल जाइत अछि मुदा ई पूर्ण रूपसँ भारतीय लिपि छल, वएह स्वर व्यंजन (कचटतप)। ब्राह्मीसँ किछु चेन्ह कम भेलाक कारण, जखन अभिलेख प्राकृतसँ संस्कृतमे लिखल जाय लागल, खरोष्ठी संस्कृतक समासयुक्त अभिलेखक लेखन लेल अनुपयुक्त भऽ गेल आ खतम भऽ गेल आ कोनो भारतीय लिप एहिसँ बहार नहि भऽ सकल। आधुनिक तिरहुताक रूपक विकास नारायणपालक भागलपुर दानपत्र, श्रीचन्द्र रामपालक दानपत्र, महिपाल प्रथमक वनगढ़ दानपत्र, भोजवर्मनक वेलवा दानपत्र, लक्ष्मणसेनक तर्पण निधि दानपत्र सँ विकसित होइत पक्षधर मिश्र कृत विष्णुपुराण आ १३२६ ई. सँ प्राप्त मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक पञ्जीमे आबि कऽ समाप्त भऽ जाइत अछि। जे किछु छोट-मोट परिवर्तन लेखकक व्यक्तिगत लेखनीक कारण छल से छापाखाना एलाक बाद खतम भेल। रामलोचन शरण (१८८९-१९७१) तिरहुतामे मैथिलीक प्रकाशनक प्रारम्भ केलन्हि।तकरा बाद कम्प्यूटर फॉण्टमे एकरूपता आबि गेल आ से सम्भव भेल देवनागरी यूनीकोड (मंगल), बांग्ला यूनीकोड (वृन्दा) आ तखन तिरहुता यूनीकोडकेँ आधार बनेलासँ। छापाखानामे दिक्कति रहै, जे किछु रूपकेँ ओतय छोड़य पड़ैत छलै, आ घोंघाउज होइत छल जे एहि तिरहुताकेँ सीखि कऽ पाण्डुलिपि नहि पढ़ल जा सकैए। कम्प्यूटरमे एक्के आधारपर विभिन्न फॉण्टक निर्माण भेलासँ विभिन्न फॉण्ट विभिन्न तरहक लेखन रूपकेँ अंकित करैत अछि आ ओ सभ आपसमे परिवर्तनीय होइत अछि। से सभ १३२६ ई. क बादक सभ तरहक परिवर्तन (संयुक्ताक्षर सहित), जे परिवर्तन नहि वरन् लेखनक विभिन्न स्टाइल छल, क समावेश आब सम्भव भऽ गेल अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। १.२.अंक ४०६ पर टिप्पणी अंक ४०६ पर टिप्पणी प्रणव झा डॉ.ज़ियाउर रहमान जाफ़री क लेख मैथिली प्रबंध काव्य हरवहाक बेटी मे फजलुर रहमान हाशमीक दृष्टि रोचक आ इन्फोर्मेटिव लागल। ओना त हमरा कोनो विशेष लेना देना नई रहय अछि तथापि मैथिली साहित्य अकादमी मे की सब चलय अछि तकर ए,बी,सी आशीष अनचिन्हार के लेख/पोस्ट सभ से बुझय छी। एहि कड़ी मे एकटा लेख अहु अंक मे पढ़य लेल भेटल। मैथिली शैली पर विवाद के विषय मे हमर मत अछि जे कियौ देश के अलग अलग भाग से आबय बला हिंदी के पैघ साहित्यकार सभ के रचना पढ़य त ओय मे अलग अलग शैली के झलक देखाइए जेतय, जै मे रचनाकर के क्षेत्रीय परिवेश आ बोली के प्रभाव देखाय छै। तहिना अङ्ग्रेज़ी या अन्य भाषा के रचना/साहित्य संसार सभ मे सेहो देखल जाय छैक। अस्तु मैथिली के विभिन्न शैली के मैथिली के रूप मे अंगीकार केने मैथिली के विस्तारे भेटत, आ ओय आधार पर विभाजन केने भाषा के सिकुड़न। राज किशोर मिश्र के कविता लोक-जिनगी वर्तमान रोज़मर्रा के जिनगी, ओकर आपाधापी आ संघर्ष के चित्र झिकय छैक।

अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। गद्य २.१.संतोष कुमार राय 'बटोही'- लव यू टू (धारावाहिक डायरी) २.२.संतोष कुमार राय 'बटोही'- पार्वती केर शपथ (धारावाहिक नाटक) २.३.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा- छगुन्ता २.४.परमानन्द लाल कर्ण- शालीग्रामशिलाक पूजनक माहात्म्य २.५.आचार्य रामानंद मंडल- मिथिला राज्य बनाम राजनीतिक दल २.१.संतोष कुमार राय 'बटोही'- लव यू टू (धारावाहिक डायरी) संतोष कुमार राय 'बटोही' लव यू टू (धारावाहिक डायरी) अगस्त, 2017

ई भदवरिया : बट्टे साउन

खिडकी सँ देखि रहल छियैय। आम गाछ पर एकटा चिरैय अपन घोसला मे बारिशक बुन्नी सँ अपना केँ बचेवाक कोशिश कऽ रहल छै। परञ्च नहि बचि सकैए, कारण घोसला नीक सँ छारल नहि छै। हम अपन विछावन पर मसुआयल छी । मसोमात जकाँ कुहरि रहल छी। सिनूरदान सँ पहिने वाला मसोमात बनल छी। मोन कुकुइएत अछि। कुक्कुर जकाँ नाँगरि डोलौलाक कोनहुँ फैदा नहि भेल। ओ कुम्भकरण केर नीन्न मे छथि। बेपरवाह ! हमर कोनहुँ सुधि लेनिहार ओ आब नहि छथि मने। सिनेहियाक ई दशा होएत छै। ई भदवरिया हमर प्राण हरि लेत !

बाहर भदवरियाक मेघ बरिश रहल अछि आओर अंदर हमर नयन ! नोरक कोनहुक्ष मोल नहि ! हम आजु बदरा बनल छी। एकटा बिरहित नायिका जकाँ अधमरल पड़ल छी। हमरा मउगा कहि सकैत छी। अगर हम इतिहास पुरुख अकबर केँ संतति रहितहुँ तँ लल्ली केँ कहिया नहि उठा लैतियै, परञ्च मउगा बनल रहि गेलहुँ हम। मौका केँ हम गवाँ देलियै। लल्ली केँ दोख देनिहार हम गलत आदमी छी। आब साउन हमर लेल नोरक प्रतीक बनि गेल अछि। एकटा बिरहा गावै केर मोन होयत अछि -

''रे निर्मोहिया बरिश ले ! तोरे छौ जमाना, हम तँ अधमरल मउगा छी, हम नहि छी दीवाना ।"

आँखि सँ सिनेहिया नोर बहि रहल अछि। आब बरखा बुन्नी खिड़की सँ अंदर घुसि रहल अछि। आओर हृदय केँ कचौटै वाला भदवरिया !

खिडकी सँ बाहर नज़र गेल । एकटा नान्हिटा बालक कागजक नाव बुन्नी के बरसल धारा मे बहा रहल छै। हम नाव दिस ताकि रहल छियैय । मोन मे होयत अछि अइ साउन मे हमर लल्ली अइ नाव मे बैस कऽ औतीह मने। इ हमर भरम अछि अथवा नहि पूरा होइ वाला सपना। आब खिड़की सँ देखि रहल छियैय । अन्हार भऽ रहल छै। आब किछु नहि देखा रहल अछि। नहि बुन्नी, नहि ओ नान्हिटा बालक, नहि नाव। सभटा विलोपित भऽ गेलै। सभ किछु जीनगी मे ओझड़ा गेलै। ई भदवरिया मे किछु पूर्ण नहि भेल। सभ टायँ-टायँ फिस्स भ गेल। सभ बट्टे मे रहि गेल।

दिसम्बर, 2017

शीतलहर : हड्डी गैल गेल

अइ बेर दिसम्बर मे हड्डी केँ गला दै वाला जाड़ लागि रहल छै। हाथ के हाथ नहि देखा रहल छै। बुढ़- वृद्धा के लेल ई जाड़ मारूक छै। बेड पर असगरे पड़ल छी। नौकरी लेल घर सँ दूर भेल छी। पोखरि काते छात्रावास मे पड़ल छी। रजाई ओढ़ने छी, परञ्च ठण्ड लागि रहल अछि। कँपकँपि बढ़ि गेल छै। बिना आगि सेकने ई जाड़ नहि मानत मोने। लल्ली केर कोनहुँ अता-पता नहि। ओ अपन दुनिया मे खो गेलीह। हम अपन दुनिया मे औखन धरि नहि खो सकलौंह। ओ औखनहुँ स्मिरति मे छथि। दिल सँ निकालि केँ फेक देनाय हमरा वशक गप्प नहि अछि। प्रेम प्रेम होयत छै हमरा लेल। हम दुनिया भुलि सकैत छी, परञ्च लल्ली हमरा हिया मे धँसि गेल अछि।

ई जाड़ तँ लल्ली केँ आओर याद दिला रहल अछि। दिल्ली केर ऊ दिन । राजघाट आओर हंसराज कॉलेज । धोइन लागल रहै ओई दिन। जखन हम ठण्ढ मे दिल्ली विश्वविद्यालय के नार्थ कैम्पस केँ बस स्टैण्ड पर लल्ली केँ इंतिजार कऽ रहल छलहुँ। आजु मधेपुर मे कुहरि रहल छी। आजु क्रिसमसक दिन छियैय। ईशु केँ प्रेमिका रहन्हि कि नहि ? उपहार फेर केकरा देल गेलै पहिल बेर। सैंटाक्लॉज कियाक बनै छै। सभ किछु उलैझ गेल छै !

सभ किछु पोथीये मे रैह गेल छै। सभ कियो 'सच' छिपा रहल छथि। 'प्रेम' माने कियो नञि जनैत अछि। प्रेम नयन केर मेल नहि छियैय , विचारक मेल नहि छियैय , प्रेम दैहिक मेल नहि छियैय। प्रेम हृदयक मेल नहि छियैय। प्रेम मे लोक रंगा जायत छथि। जाहिमे लाज नहि होयत छै, नहि दोसरक परवाह होयत छै। प्रेम मे लोक मिट जायत अछि। ई मिटनै हमरा सँ नहि भेल । हम लल्ली र्क प्रेम नहि मिट सकलहुँ अछि। हमर प्रेम झूठ अछि। हमरा हृदय मे ओकरा लेल दीप जरैत छल ओ बुझा रहल अछि। 'वक्त' एहेन औतै जखन हमरा बीच प्रेम नामक कोनहुँ ट्रेस नहि भेटत। हमहुँ परलोक आओर ओहो परलोक। जय जय रे प्रेम ! हमरा हिया मे तोहर दीया बुझा रहल छौ लल्ली !!!

-डॉ.ज़ियाउर रहमान जाफ़री, (प्राध्यापक हिन्दी), ग्राम पोस्ट -माफ़ी, वाया -आस्थावां, ज़िला -नालंदा, बिहार 803107; 9934847941 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.संतोष कुमार राय 'बटोही'- पार्वती केर शपथ (धारावाहिक नाटक) संतोष कुमार राय 'बटोही' पार्वती केर शपथ (धारावाहिक नाटक)

दोसर दृश्य

( ब्रह्मलोक मे ब्रह्मा आओर माय सरस्वती आसन पर बैसल छथि । हुनकर अनुचर सेहो बैसल छन्हि भूयाँ मे। )

(पार्वती केर प्रवेश)

पार्वती : तीनू लोकक भाग्य-विधाता , जन्म देनिहार ब्रह्माजी आओर माय सरस्वती केँ प्रणाम। (ब्रह्माजी आओर माय सरस्वती हड़बड़ा के अपन आसन सँ उठलाथि। )

ब्रह्माजी आओर सरस्वती ( एके संगे) : माय पार्वती केँ प्रणाम !

सरस्वती : बड दिन भऽ गेल छल माय पार्वती सँ मिलला। धन्य छथि विधाता जे ई अवसर उपस्थित भेल। माय पार्वती किछु प्रयोजन सँ आयल हेतीह.....

ब्रह्मा : ( पार्वती दिस घुमि कऽ) पहिले अहाँ आसन ग्रहण करू। माय पार्वती ब्रह्मलोक मे अहाँ केर स्वागत अछि। ब्रह्मलोक आबै केर प्रयोजन कहल जाउ ।

पार्वती : ब्रह्मदेव ! भूलोक मे घोर अन्याय भ रहल छै। एकटा जनानी केँ पाँच-छह टा मर्द गिद्ध जँका नोचि रहल छै। कुक्कुर जकाँ पाँच-छह टा मर्द एकटा जनानी पर टुटि पडैत छै आओर कचवावध कऽ दैत छै। पापी सभ बढल जा रहल अछि भूलोक मे। अहाँ तँ भाग्य विधाता छियैय, जनम देनिहार छियैय। अहाँ एहेन मनुख केँ कियाक जनम दैत छियैय ब्रहम देव ?

ब्रहमा : माय पार्वती केँ प्रश्न सँ हम विचलित भेलहुँ, माय ! ब्रह्माण्ड मे संतुलन जरूरी छै। हम किनको भाग्य मे लिखि कऽ किछु नहि भेजैत छियैय। जे कियो अहाँ केँ कहलाथि ओ मिथ्या कहलक। हम तँ सिर्फ जनम दैत छियैय। जीव अपना भाग्यक बनेनिहार खुद अछि। जेहेन करम करैत अछि ओ लिखैत जायत छै। ओही केँ हिसाब सँ अगिला जनमक भाग्य लिखल जायत छै। मनुक्ख योनी सभसँ नीक योनी छै।

नारद : परञ्च पिताजी ! ई गप्प नीक नहि भेल जे मनुक्ख केँ अतेक आजाद क दैत छियैय जे अतेक अन्याय करैत अछि।

पार्वती : ब्रह्मदेव ! अहाँ केँ सभ गप्प मानलहुँ, परञ्च अभिशापक जिनगी जनानी केर लेल अहाँ बनौने छी।

सरस्वती : बहिन पार्वती शान्त भऽ जाउ। एकर निदान हेतै। बहिन लक्ष्मी सँ गप्प होयत अछि अहाँ केँ ?

पार्वती : देवी लक्ष्मी केर फोन नहि आयल छल। परञ्च हम हुनका सँ गप करबन्हि।

नारद : अगर अहाँ सभ कही तँ हम अहाँ सभक सनेस माय लक्ष्मी केँ कहि एबन्हि ?

ब्रह्मा : आब एकर निदान विष्णुजी करताह, तैं अपने सभ विष्णुलोक चलल जाउ ।

(सभ कियो विष्णुलोक विदा भेलाह। परदा गिर गेल। एहि दृश्यक अवसान भेल ।)

-संतोष कुमार राय 'बटोही', ग्राम : मंगरौना अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा- छगुन्ता कुमार मनोज कश्यप लघुकथा- छगुन्ता हमर आ हमर पड़ोसी राजेश के घरक दरवाजा लगभग  सटले बुझू। आ तैं जँ केबाड़ फुजल हो तs आपसी वार्तालाप के स्वर कनेक ऊँच हो तs  एक दोसरा के घर मे सुनबा जाईत  छै। तहिना ओहि दिन  भेलै । राजेश अपन कनियाँ सs बाइक मे पेट्रोल भरेबाक लेल टाका माँगि रहल छलै आ कनियाँ सवाल पर सवाल कs रहल छलै जे एतबे रूपया के पेट्रोल मे  अखन तक  भरि महिना चलि जाईत  छल; अई महिना बिच्चे मे कोना खतम भs गेल जखन की ऑफिस छोड़ि आन ठाम कतहु गेबो ने केलहुँ। सुनि अचंभित सं भेलहुँ जे  पेट्रोलक के खपत  आब माइलेज मे नहिं नापि कs दिन मे नापल  जाय लगलै!  तत्क्षण यथार्थ-बोध धरातल पर आनि पटकलक ....  निम्न मध्यम-वर्गक जीवन गानल-गुथल किछु रूपया संग असीमित खगता के बीच तारतम्य बैसबैत बीति जाईत छै; काल्हि के स्थिति मे अप्रत्याशित सुधार हेबाक आश बन्हने .......! -कुमार मनोज कश्यप, सम्प्रति: भारत सरकारक उप-सचिव, संपर्क: सी-11, टावर-4, टाइप-5, किदवई नगर पूर्व (दिल्ली हाट के सामने), नई दिल्ली-110023; # 9810811850; ईमेल: writetokmanoj@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.परमानन्द लाल कर्ण- शालीग्रामशिलाक पूजनक माहात्म्य अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.आचार्य रामानंद मंडल- मिथिला राज्य बनाम राजनीतिक दल आचार्य रामानंद मंडल मिथिला राज्य बनाम राजनीतिक दल मिथिला आ बिहार दूटा संस्कृति के परिणाम हय। मिथिला सनातन संस्कृति के त बिहार बौद्ध संस्कृति के परिचय कराबैत हय। पहिले बंगाल से बिहार। पुनः बिहार से उड़िसा आ फेर बिहार से झारखंड अलग राज्य निर्माण भेल।आब मिथिला राज्य के निर्माण के बात हो रहल हय। आजादी के बाद मिथिला राज्य पुनर्गठन के बात भेल परंच तत्कालीन केंद्रीय सरकार बात न मानलन। पहिले मैथिली के हिंदी के बोली मानल जाइत रहय आ मैथिली महाकवि विद्यापति हिंदी के पोथी में विराजमान रहय आ आइओ हय।बाद मे एन केन प्रकारेण मैथिली संविधान के अष्टम सूची मे शामिल भेल। आब मिथिला राज्य पुनर्गठन के जोर पकड़ले हय। परंतु इ चाह के प्याली में चाह के उफान जैसन लगय हय। कारण केवल मिथिला -मैथिली संगठन अपन सांस्कृतिक कार्यक्रम मे डीजे बजबैत छतन।आम मिथिलावासी के अइसे कोनो मतलब न हय।सभ मिथिला -मैथिली संगठन भूराबाल खास क के बाभन आ कर्ण कायस्थ से भरल हय। अइमे सोलकन के प्रतिनिधित्व न के बराबर हय।हय सेहो भूराबाल के गुलाम जैइसन हय। हाल मे राजद के बिधान परिषद के विरोधी दल के नेता आ राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के पत्नी आ पूर्व मुख्यमंत्री रावरी देवी  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिथिला राज्य के मांग कैलन हय।अइ पर अंतरराष्ट्रीय मैथिली परिषद के संस्थापक अध्यक्ष धनाकर ठाकुर राबरी देवी के मांग के समर्थन करैत टोंट कैलन हय कि इ मैथिल वोट के राजनीतिक दबाव के चलते कैलन हय।कि आबि मिथिला राज्य के कोनो राजनीतिक दल उपेक्षा न कर सकैत हय। लालू यादव पहिले झारखंड राज्य निर्माण के विरोध कैलन कि झारखंड हमर लाश पर बनत बाद में झारखंड राज्य निर्माण के समर्थन कैलन आ झारखंड राज्य बनल। जनेउ आ मैथिली के विरोध कैलन। मैथिली के बीपीएससी में खतम कैलन। भूराबाल के चर्चा कैलन।अइ संदर्भ में विचारणीय हय कि जनेऊ के विरोध त लोकनायक जयप्रकाश नारायण सेहो कैलन आ जनेऊ तोड़ो अभियान चलैलन । आइयो केते बाभन जनेउ तोड़ले हतन आ जनेउ न पहिनैत हतन। मैथिली के हटाबे के कारण रहय कि बीपीएससी के रीजल्ट मे मैथिली विषयधारी के अधिकता भे गेल आ मैथिली संशय मे आ गेल। स्वाभाविक रूप से मिथिली के बीपीएससी से निष्कासित कैल गेल। वर्तमान में मुख्यमंत्री नितीश कुमार मैथिली के केवल क्वालिफाईग बिषय बना देलन।एकर अंक जोडल न जाइ हय। मैथिली प्रिय लोग एकर विरोध करैत हतन।परंच पारदर्शिता के लेल इ उचित निर्णय हय। आबि जेना मिथिला में संपूर्ण जाति के दू भाग में बांटल जाइत हय यथा -बाभन आ सोलकन। परंतु इ सम्पूर्ण मिथिला जाति के न दर्शाबैत हय। अइमे राजपूत, भूमिहार आ कायस्थ  छूट जाइ हय। जौं एकरा फारवर्ड कहल जाय आ सोलकन के बैकवर्ड कहल जाय त इ समुचित हय।परंच मैथिल के संवैधानिक शब्द से घृणा होइ हय। जौं बाभन यानी भूमिहार, राजपूत,बाभन आ कायथ के भूराबाल कहल जाय त इ समुचित हय।इ त फारवर्ड के विकल्प भूराबाल हय। जौं बैकबार्ड के सोलकन कहल जा सकैय हय त फारवर्ड के भूराबाल केला न कहल जा सकैय हय इ त संक्षेपाक्षर हय। अइमे बुरा बात त न हय।  मैथिली के साइक्लोपिडिया वर्णरत्नाकर में सोलकन शब्द न मिलैत हय।अंत मे मिथिला राज्य पुनर्गठन पर जौ राजनीतिक दल एलर्ट भेल हय त मिथिलावासी के सेहो एलर्ट हो जाय के चाही कि मिथिला राज्य त बनत त हमर उपस्थित केना रहत। कहीं इंडिया इज रीच बट इंडियन्स आर पुअर बनके न रह जाए। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। पद्य ३.१.पूनम झा 'प्रथमा'-हम मैथिल छी.. ३.२.राज किशोर मिश्र- सुन्दरता ३.३.प्रणव झा- मास्क पहिरि क ईस्कूल चल ३.४.नग्नमुनि एक परिचय (मूल तेलुगु काव्य मानेपल्लि हृषीकेशवराव- मैथिली अनुवाद मानेश्वर मनुज) पहिल खेप ३.१.पूनम झा 'प्रथमा'-हम मैथिल छी.. पूनम झा 'प्रथमा'- जयपुर, राजस्थान हम मैथिल छी..

मैथिल छी एकर अभिमान अछि, मिथिला नगर हमर शान अछि, जे कियो मिथिला वासी छैथ, से सब तऽ मैथिली भाषी छैथ,

मातृभाषा अपन मैथिली अछि, ह्रदय में बसल तैं मैथिली अछि, सब भाषा मुदा अगुआयल अछि, मैथिली किया पछुआयल अछि,

मैथिल तंऽ विश्व में पाटल छथि, मुदा मैथिली बिसरायल छथि, नहि कोनो दोष आन भाषा में, आदर करै छी हम सब भाषा कें,

मुदा मातृ भाषा जौं बिसरि गेलौं, तऽ बूझू स्वयं सं अहाँ दूर भेलौं, मैथिल के एकजुट रहबाक चाही, आपस में मैथिली बजबाक चाही,

ओना आब विचार बदलि रहल अछि, माध्यम सोशल मीडिया सेहो अछि, प्रचार-प्रसारक माध्यम कोनो रहय, मैथिल कें मैथिल आ मैथिली सं प्रेम रहय।

शुभकामना ... शुभकामना ...

-पूनम झा 'प्रथमा'- जयपुर, राजस्थान अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.राज किशोर मिश्र- सुन्दरता राज किशोर मिश्र सुन्दरता सुन्दरता अछि आमक मज्जर मे, बि अहुती अंगना क धमगज्जर मे।

भा गवत कथा क भा व मे, शि ष्ट कन्या क स्वभा व मे।

सूर्य-कि रि नक स्वर्णा भ मे, सन्मा र्ग सँ अरजल ला भ मे ।

प्रेम सँ उचरल बो ल मे, संघर्षक गर्दम घो ल मे।

रञ्जक मि झा इत आगि मे, सज्जन लो कक ला गि मे।

सुहबा मा ङक सि नुर मे, शि शि र का लक घूर मे।

उत्था न के शंखना द मे, शां ति क को नो संवा द मे।

वसुन्धरा क हरि अर पटो र मे, घमैत अन्हा र अहलभो र मे।

ऐँठऐँलक टुटैत घमंड मे, अपरा धी क कठो र दंड मे।

प्रलय-जल पर उगि रहल सृष्टि -ना भि -कमल मे,

जन-कल्या णक यो जना बनि रहल रा ज-महल मे।

वि पत्ति का लक प्रस्था न मे, यो ग्य लो कनि क सम्मा न मे।

नेना के मुहक नि श्छलता मे, को सि स आ' तकर सफलता मे।

दी नक अङना चुल्हा पर बरकैत भा तक अदहन मे, कुजैत चि ड़ै सभ गा छ पर, वि चरैत वन्य पशु बन मे।

नेढ़न-बा ढ़न केँ दुला र मे, वंचि तक कएल उपका र मे।

पा प-प्रा यश्चि तक नो र मे, शुभ-उत्सवक सङो र मे।

स्वा र्थ रहि त अनुरा ग मे, वि दुर जी घरक सा ग मे।

मदमत्त भेल मधुमा स मे, अन्या यक सत्या ना श मे,

इजो त मे ,सृष्टि -सि रजन मे , अपसंस्कृति क वि सर्जन मे।

सत्य मे ,जय मे ,वि जय मे, क्षि ति ज पर अरुण-उदय मे।

धा तुक सि रजल सौं दर्य मे, नहि बसल अछि असल सिं गा र, दुखि त मो न मे तन पर सा जल, ओ उनटे लगैत अछि भा र।

आभूषण नहि ,नहि सुंदर पटो र, नहि देहक सुंदरता चा म गो र।

सुंदरता सुचा लि ,चरि त्र मे, पि री ति क रुचि र चि त्र मे।

सुंदरता नहि अछि सो न मे, सुन्दरता सुंदर मो न मे । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.प्रणव झा- मास्क पहिरि क ईस्कूल चल प्रणव झा मास्क पहिरि क ईस्कूल चल मास्क पहिरि क ईस्कूल चल युग बदललै तोहूँ बदल ज़माना बड्ड खराप छैक बुच्ची सुनि ले माय-बापsक कहल। नै भेंटतौ ओ आम-लताम छुटलौ तोहर बाप केर गाम हाड़-तोरि ओ मेहनत करौथ टाका कमबथु स्वास्थ्य केर दाम। पोखरि मुईन ओ घर बनेलखुन यमुना कात मे प्लॉट कटेलखुन माछsक झोरी बिसरी के आब फास्टफूड ओ फॉइल मे लाबथुन। गाछ-वृक्ष से नै मतलब छै वायु शोधक खूब बिकई छै हवा मे जखने ज़हर घुलै छै किसान सब के नाम अबई छै। मुदा नै भेंटतौ समाधान किए के देतई कियौ कान ! एखन स्वार्थ मे सब आन्हर छै पर्यावरण से नई कोनो मतलब छै जखन जान पर आन पड़य छै तखन खोजय नेता मंत्री केर काम। ऐ जेनेरेशन से नई कोनो आस छै जीवन शैली बनल बकवास छै तै तोरे सभ पर छै आस करबह अपन जीवन मे किछु खास पर्यावरण संरक्षण करबह प्रकृतिक संग प्रेम से रहबह तैं  गे  बुच्ची कहल   मान मुश्किल में छै सबहक जान ! [प्रणव कुमार झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली] अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.४.नग्नमुनि एक परिचय (मूल तेलुगु काव्य मानेपल्लि हृषीकेशवराव- मैथिली अनुवाद मानेश्वर मनुज) पहिल खेप अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह ४०७ म अंक ०१ दिसम्बर २०२४ (वर्ष १७ मास २०४ अंक ४०७) || 69 70 || विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in

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P देवनागरी लिप्यांतरण शालीग्रामशिलाक पूजनक माहात्म्य ( पद्मपुराण उत्तर खण्ड ) कार्तिकिय महादेव. जी सँ कहलनि - भगवन ! अहाँ योगी लोकनि मे श्रेष्ठ छी। हम ama wa ute श्रवण केलहूँ अछि | प्रभो ! आव शालीग्रामशिलाक पूजनक सम्बंध मे वताऊ | महादेव जी कहलनि - आहाँ उत्तम प्रश्न पुछलहूँ अछि । पुत्र ! अहाँ जे fos ufs रहल छी, ओकर उत्तर हम दैत छी । शालीग्रामशिला मे सव mre जीव आ समस्त त्रिलोकीक वास रहैत अछि | जे शालीग्रामशिलाक दर्शन करैत छथि , अपन माथ झुकावैत छथि, शिलाक स्नान करावैत छथि आ पूजन ata छथि हुनका कोटि यज्ञक फल मिलैत अछि । जे लोकनि भगवान विष्णुक शालीग्रामशिलाक चरणामृतक पान करैत छथि, हुनका लेल भयंकर कष्ट नाश Ys जायत अछि | जे भोग मे आसक्त आ भक्तिभाव संँ हीन रहैत छथि , Sel शालीग्रामशिलाक पूजन Gs भगवतस्वरूप Ys जायत छथि | शालीग्रामशिलाक स्मरण, कीर्तन, ध्यान, पूजन व नमन केला a कोटि - कोटि ब्रह्महत्याक पाप नष्ट Ys जायत अछि | जे लोकनि सवदिन शालीग्रामशिलाक पूजन करैत छथि हुनका नहि ds यमराजक भय होयत Ba आ नहिं जीवन - मरणक | जे लोकनि भक्तिभाव सँ शालीग्रामशिलाक नमन मात्र os लेने छथि , आ हमर भक्त कें OR मनुष्य योनि मे जन्म ae ead छैन । ओ मुक्तिक अधिकारी us जायत छथि | जे हमर भक्तिक

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शालीशुयसिवाक ASAD NTT (AGUA GST AE ) कार्डित्कथ Nenad जी जैं Seah - way ! अल GNA AISA प्य Cet ही । ठग AIG HWA धर्मक AST SoM AS | aAcor ! ara शावीशायसिताक ASA HY OT TOTS | Nera जी SEAT - Al GST PPI Aa AS | Aa! wet एज fy aie ded Et , Gea Vad eT Cro EF । Aa Pat Gl Wa छताछत जीत an जग खित्वाकीक ज्ञांज aceo Ae । एज शानिशिंगसिवाक WA Seto Ble, AAT We Yeats Bi, Pas जान Sacto of at yea Sao BIT WAST ETS Tas Va at NS Ci मानक wa cto aie | एज GIA UIA as सातिशुयसखितांक vsiwypSS शान SAS AS , MAP एतत VAST SIP APT OQ Glo We । WWI A sais a रुखिजात्र FH GAT Aceo BA, Orcer वोविशायसिवाक AGA Sa WAACTASA BA GTS BT | MATA Wet, SGA, AA, YAN TAWA at HPSS STMCTIS AIH TH A BITS ale ।सालीशागसिवाक WAT Wa जैं WA AT BT WA GTS AS | एज HSA जन्नभिन AAT PAS AGT PCTS BA AIH नठि OA थमयवाजक रथ TEAS A At नठि Gay - US | एज GSPN ofthe 4 वावीशायसिवाक AW Na ba GA Bt, ७ at ठगव wa & @R WaT aI a GW At Tw AE |

कलियुग मे श्री हरिक कीर्तन सँ. सर्वोत्तम पुण्य मिलैत अछि । श्रीहरिक चरणोदकक पान करला सँ समस्त पापक . प्रायश्चित ys जायत अछि | तहन हुनका लेल दान,उपवास आ चंद्रायण Taw कोनो आवश्यकता नहिं अछि | पुत्र स्कंद ! Ta शुभकर्मक were माप अछि; मुदा शालीग्रामशिलाक पूजन सँ जे फल feta अछि , तकर कोनो माप नहि अछि ।जे विष्णु भक्त ब्राह्मण कें शालीग्रामशिलाक दान करैत छथि , मानु ओ सौ यज्ञ सँ भगवानक पूजन Ss aa अछि जे शालीग्रामशिलाक जल सँ अपन अभिषेक करैत छथि, ओ सव तीर्थ मे नहायक फल पावि ata छथि | जे भक्तिभाव सँ सब दिन एक -एक सेर तिलक दान bs जतेक फल पावैत छथि ,ओतेक फल शालीग्रामशिलाक पूजन मात्र सँ मिल अछि | शालीग्रामशिला कें अर्पण bat गेल थोरबह पात,फूल,फल, जल,मूल आ दर्वादल मेरु पर्वत सँ महान फल दैत अछि | जाहि ठाम शालीग्रामशिला रहैत अछि , ताहि ठाम भगवान श्रीहरि विराजमान ed छथि | प्रयाग ,कुरुक्षेत्र पुष्कर आ नेमिषारण्य wa तीर्थ ताहि ठाम विद्यमान रहैत अछि | जाहि ठाम शालीग्रामशिला संँ प्रकट भगवान शालीग्राम आ द्वारिका सँ प्रकट भगवान गोमती चक्र हो आ दुनुक संगम हो ताहि om निःसंदेह मोक्षक प्राप्ति भ5 जायत अछि | शालीग्रामशिलाक पूजन मे मंत्र जप ,भावना आ स्तुति व कोनो विशेष आचारक बंधन afe रहि. जायत अछि | शालीग्रामशिला ल'ग कातिक मास में स्वस्तिक चिन्ह बना कें लोकनि अपन पीढ़ी पवित्र os लैत छथि | RREEKKK

घमंड सँ हमर प्रमु भगवान ages नमन ae करैत छथि , ओ पाप a मोहित छथि; हुनका हमर भक्त ale बूझक चाही | कोटि कमल पुष्प सँ हमर पूजा करला पर जे फल मिलैत अछि, ओकर कोटि. गुणा फल शालीग्रामशिलाक पूजन सँ मिलैत अछि | जे लोकनि मृत्युलोक मे आवि शालीग्रामशिलाक पूजन नहि ara cele, ओ नहि as हमर पूजन केलथि आ नहि हमरा नमन Hele | जे शालीग्रामशिलाक आगु भाग मे हमर पूजन करैत छथि AG ओ लगातार २१ युग धरि हमर पूजन क$ aoa | जे हमर भक्त Us वैष्णव लोकनिकक पूजन ale करैत छथि आ हमरा सँ द्वेष राखैत Sl, ओ १४ इंद्रक आयु घरि नरक मे रहैत छथि | जिनका घर मे कोनो वानप्रस्थी वैष्णव व सन्यासी लोकनि थोरबह देर विश्राम arta छथि, हुनकर पितामह आठ युग UR अमृतक भोजन ara छथि | शालीग्रामशिलाक सँ प्रकट मेल लिंग के veg वेरि पूजन केला पर लोकनिं योग आ सांख्य रहित भेलाक seg मुक्त Us जायत अछि | हमर कोटि -कोटि लिंगक दर्शन,पूजन आ wa सँ जे फल मिलैत अछि,ओतेक फल vee a शालीग्रामशिलाक पूजन a मिल जायत अछि | जे वैष्णव लोकनि सवदिन शालीग्रामशिलाक पूजन करैत छथि, ओकर पुण्यक वर्णन सुनू | गंगाजीक कछेर पर कोटि शिव लिंगक पूजन सँ आ लगातार आठ युग uk काशीपुरी मे रहला सँ जे पुण्य facta अछि, ओतवे पुण्य एक दिन शालीग्रामशिलाक पूजन सँ Ne जायत अछि | वेसी की कहल जाय - जे वैष्णव शालीग्रामशिलाक पूजन करैत छथि, हुनकर पुण्यक गणना ब्रह्मा जी सेहो नहि Hs पावैत छथि । तैं हमर भक्त लेल उचित अछि जे हमर प्रसन्नताक लेल ओ शालीग्रामशिलाक पूजन करैथधि | जाहि ठाम शालीग्रामशिला रूपी भगवान केशव विराजमान छथि , ताहि ठाम सव देवता ,असुर आ चौदहो भुवन विराजमान रहैत अछि | दोसर देवताक कोटि aR कीर्तन करला सँ जे फल मिलैत अछि, भगवान केशवक एक वेरि पूजन करला सँ ओतेक फल मिल जायत अछि | तैं

विदेह ४०७ म अंक ०१ दिसम्बर २०२४ (वर्ष १७ मास २०४ अंक ४०७) | | 49 ७ श्रखिक ASM we GS EF | OR उखिक Te FT OR IS DIAN ACA TH TAT TS SAT BT, ७ ना मैं एयाठिउ SY ; AIST SH OG We FNS OT | cars ay VA FH CAST भूजा BIT शव एस WH Aw als , TT cers a wa Aya yor A firetw af । एक are qaqa एम आंत raigrPae sor wie alt , ७ vie wy ठुपव To att ar नठि रुपया TT ahs । एज सातीशाभलिताक ay जात एप रुपव AGT SAS ST , WT 3 AMSA २७ VA fA SIA SAT FA Taft | एक ठुपव OG Be ad GISASS FSH चठि SAIS ST था SRF GT TAS BY, ७ 9४ GAS शांश I ATS एम वएहैऊ fF | जिनका घव एम GIT ANA, Gad PT GER tesa wa fet arto Efe , wae Frome as at afe aes एजाजन Peto BT | Aaya मैं ADS एछत विन SH GM AA YON Cat AT एताकनि GNF A जौथा ASS CHAS ATH WIG ST डथि | TIT प्कार्टि-प्कार्छि frie AR pon था Bay जैं एक a filets af , ७तजक wa cote Stars yor मैं Ara arr as । एज Gar Goh जन्नमिन ATMS AST Saw SI, GFT TS ATT TS | ST PRT शय HTS PARAS SA जे Mt AOA tS Tt धवि SPR CT Tear जे एज AT AAG Ale, GTS Ae AS fx Arata Pare शूजन जे रे जांराज शद्धि | et की कठत जाय - THT aa TAPS शूजन Sew छशि,न्नाचकत श्रगाक teat Seat Cate चठि कद IAT BT | WS CIA OVS TE Lib as cH TIT शुजन्जाक GA 8 सावीनामसिवाक Yo कप्वैथि ofS doy वालीशुभलिता कभी wan aia far off , जाठि Sn wa CaO, अजब aT CMR SAT RATT ALES BT | CAPA एमन्उाक TTS CAPA AST

50 || विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in कवता 4 एज a ico aff , UIA AAS थक AAS BOT कवता जे खतउक FF Aa GS AE | (ऊँ कविशभ एप शी ठुविक कीर्उन FT aren eto आअड्ि । शी ठविक छवरगाणक शान DAA HONS शाशक ao ve जाशऊ ae | OT WAST GA मान, GOAT शा छौपाशन FOS HIT aor AS als | AS जुकन्म ! Wa खेउकर्मक SIS vt als; yar वातीशागस्तिताक शूजन जैं एक क्षत AAT AS, OHS HTT थाश चठि AAS | एज fs Sai FATT ट्कें Arta मान arto Bf ,शात्र 8 Of US जे OAS AON a GA ae । cH TMS Ga 4 aT afore Sao Bf, ७ जन्न Gd a नलांशक wf cto ff | एक ise में जन्न PA IF-IF OF उिवक VIN FQ TOS PA AIA BY CwHP TI शातीशामतिवाक oper wa + शित GETS aS । तावीशामतिता एक aster PF OF CMGAM MS, PA, VATA ,मृत A AAT CUE शर्त जन VEN AO US | wife ठीम शावीशागसिता वह ate. of ठीम ora Aes व्िवाजगान acéo eft । Aart weasa, aes ot Arete जन्न ott ore ठाथ IIA aew aS | जाठि Sry सालीशायसिता मैं ass WAT सानिशाय at ofr जें शक OHA CHAS Bui TA शा TTS जैशय Tet ore Sm Asie CIES शाशुठि A GS aie । सावीशामतिवाक OA तय NGA, TAT at Bis a erat AC आछातक tay WE acéo afS । सावीशायतिवा at कािक NPT एप जुद्धिकक Pe वैसा एकें GIR wT जांएजां AHS ofa Se TAT BF | KREKRRK नाम - FSM वात SF_ AGA INI. Jo HATA वात FHF TIS INT - Yo, VAT Ta, नाप - एघांघजय, totto- aaa , जिनां मरऊँभा Past -मांउदकाउव, एजन्ांचिज्ुड, tas, OIA ao are 'छीरियां st ord AwI-karnpni@amail.com. cae Tt 7677479576

विदेह ४०७ म अंक ०१ दिसम्बर २०२४ (वर्ष १७ मास २०४ अंक ४०७) | | 57 देवनागरी लिप्यांतरण शालीग्रामशिलाक पूजनक माहात्म्य ( पद्मपुराण उत्तर खण्ड ) कार्तिकिय महादेव जी सँ कहलनि - भगवन ! अहाँ योगी लोकनि मे श्रेष्ठ छी। हम अपने से wa ute श्रवण केलहूँ अछि । प्रभो ! आव शालीग्रामशिलाक पूजनक सम्बंध मे वताऊ | महादेव जी कहलनि - अहाँ उत्तम प्रश्न Yous अछि । पुत्र ! अहाँ जे fog पुषि रहल छी, ओकर उत्तर हम ea छी । शालीग्रामशिला मे सब चराचर जीव आ समस्त त्रिलोकीक वास wet अछि | जे शालीग्रामशिलाक दर्शन करैत छथि , अपन mer झुकावैत छथि, शिलाक स्नान करावैत छथि आ पूजन करैत छथि हुनका कोटि यज्ञक फल मिलैत अछि | जे लोकनि भगवान विष्णुक शालीग्रामशिलाक चरणामृतक पान करैत Bla, GACT लेल भयंकर कष्ट नाश Ys जायत अछि । जे भोग मे आसकत आ faa A a tea छथि , सेहो शालीग्रामशिलाक पूजन Fs भगवतस्वरूप Ys जायत छथि | शालीग्रामशिलाक स्मरण, कीर्तन, ध्यान, पूजन व नमन केला A कोटि - कोटि ब्रह्महत्याक पाप नष्ट Us जायत अछि । जे लोकनि wafer शालीग्रामशिलाक पूजन करैत wit grat ae cs यमराजक भय होयत Ba आ नहि जीवन - मरणक | जे लोकनि भक्तिभाव A शालीप्रामशिलाक नमन मात्र क$ लेने छथि , आ हमर भक्त कें फेरि मनुष्य योनि मे जन्म नहि होयत छेन । ओ मुक्तिक अधिकारी us जायत छथि । जे हमर भक्तिक

52 || विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in wis सँ हमर प्रभु भगवान वासुदेव के नमन नहि eta छथि , ओ पाप सँ मोहित छथि; हुनका हमर भक्त We बूझक चाही | कोटि कमल पुष्प से हमर पूजा करला पर जे फल मिलैत अछि, ओकर कोटि. गुणा फल शालीग्रामशिलाक पूजन सँ मिलैत अछि । जे लोकनि मृत्युलोक मे आवि शालीप्रामशिलाक पूजन नहि ata केलथि, ओ ale as हमर पूजन केलथि आ नहि हमरा नमन केलथि । जे शालीग्रामशिलाक आगु भाग मे हमर पूजन करैत छथि ,मानु ओ लगातार २४ युग धरि हमर पूजन bs लेलधि | जे हमर भक्त Hs वैष्णव लोकनिकक पूजन नहि करैत छथि आ BRI द्वेष राखेत la, ओ १४ इंद्रक आयु घरि नरक मे रहैत छथि | जिनका घर मे कोनो वानप्रस्थी वैष्णव व सन्यासी लोकनि थोरबह्द देर विश्वाम eta छथि, हुनकर पितामह. आठ युग aR अमृतक भोजन करैत छथि | शालीग्रामशिलाक सँ प्रकट मेल लिंग के veg at पूजन केला पर लोकनि योग आ सांख्य रहित भेलाक बादहु मुक्त Us जायत अछि | हमर कोटि -कोटि लिंगक दर्शन,पूजन आ स्तवन से जे फल मिलैत अछि,ओतेक फल एकहि a शालीग्रामशिलाक पूजन सँ मिल जायत अछि | जे वैष्णव लोकनि सवदिन शालीग्रामशिलाक पूजन करैत छथि, ओकर पुण्यक वर्णन सुनू | गंगाजीक कछेर पर कोटि शिव लिंगक पूजन सँ आ लगातार आठ युग uft काशीपुरी मे रहला सँ जे पुण्य मिलैत अछि, ओतवे पुण्य एक दिन शालीग्रामशिलाक पूजन सँ भेंट जायत अछि । वेसी की कहल जाय - जे वैष्णव शालीग्रामशिलाक पूजन करैत छथि, हुनकर पुण्यक गणना ब्रह्मा जी सेहो नहि Bs पावैत छथि | तैं हमर भक्त लेल उचित अछि जे हमर प्रसन्नताक लेल ओ शालीग्रामशिलाक पूजन करैधि । जाहि ठाम शालीग्रामशिला रूपी भगवान केशव विराजमान छथि , ताहि ठाम सव देवता ,असुर आ चौदहो yaa विराजमान रहैत अछि | दोसर देवताक कोटि वेरि कीर्तन करला A जे फल मिलैत अछि, मगवान केशवक एक aR पूजन करला सँ ओतेक फल मिल जायत अछि | तैं

68 | | विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in | हि igs ares oe eee je ee Gh SSEERs whe ही. धर

विदेह ४०७ म अंक ०१ दिसम्बर २०२४ (वर्ष १७ मास २०४ अंक ४०७) | | 69 er SEs ah reese CSN By f aor a [So ae 7 ie 5 i iE Set Be का pant en दम 4 ao a! ही... ene Ce fh Bist go te Ee है. caren eal ie) सिवा ioe Ree. | SRS ee