VIDEHA — Issue 409 / अंक ४०९

Publication: VIDEHA · Issue: 409
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ISBN Number: 978-93-341-8893-6 (Book) ISSN 2229-547X (online) 𑒀 विदेह ४०९ म अंक ०१ जनवरी २०२५ (वर्ष १८ मास २०५ अंक ४०९) [विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। कॉपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति ‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२५. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२५. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. 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The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover designed by AUM GAJENDRA THAKUR Videha e-Journal: Issue No. 409 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.अंक ४०८पर टिप्पणी (पृष्ठ १-२) गद्य २.१.कल्पना झा- विद्याव्यसनी-कर्मयोगी-समाजसेवी: उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' (16 जुलाइ,1917-30 मइ,2002) (पृष्ठ ४-१७) २.२.संस्कृति मिश्र- गुरुत्वाकर्षण (कथा) (पृष्ठ १८-२७) २.३.परमानन्द लाल कर्ण- वृन्दावन आ श्रीकृष्णक माहात्म्य (पृष्ठ २८-३०) २.४.लाल देव कामत- गुलाबक हर्ष - विस्मय (लघु कथा)/ गार्ड साहेब (लघुकथा) (पृष्ठ ३१-३४) २.५.संतोष कुमार राय 'बटोही' - 'पार्वती केर शपथ' (धारावाहिक नाटक) (पृष्ठ ३५-३७) २.६.प्रणव कुमार झा- नजैर (पृष्ठ ३८-४२) २.७.आचार्य रामानंद मंडल- विजातीय बिआह (पृष्ठ ४३-४६) पद्य ३.१.प्रणव कुमार झा- नगरक सभ्य लोक (पृष्ठ ४८-५०) ३.२.डॉ सुमंगला झा- अपन पीढी (पृष्ठ ५१-५३) ३.३.राम शंकर झा "मैथिल"- (स्मृति शेष)- यौ सुनैत छी/ चुकरी (पृष्ठ ५४-६२) ३.४.प्रमोद झा 'गोकुल'- कतै नुकैलह?/ यैह गीत गुनगुनैय (पृष्ठ ६३-६६) ३.५.संतोष कुमार राय 'बटोही'- खण्ड-काव्य 'उर्मिलाक विद्रोह' (पृष्ठ ६७-६९) ३.६.जगदानन्द झा 'मनु'-१० टा हाइकू (पृष्ठ ७०-७२) ३.७.चंदना दत्त- पर्यावरण दिवस (पृष्ठ ७३-७६)

१.अंक ४०८पर टिप्पणी अंक ४०८ पर टिप्पणी डा. वी. एन. झा श्रीमान ! मैथिली व मिथिला के विकास में एतैक गुनी लोक १९८० के दशक वा ओहु सँ पहिनें सँ संघर्षरत छथिन ई बुझि कें प्रसन्नता भेल I ताहू सँ बेशी प्रसन्नता ई बात सँ भेटल जे कोलकाता के मैथिल भाषी MVP में अत्यंत गतिशील छथिन्ह I मुदा इहो विचार अनिवार्य अछि जे सम्प्रति गुनी लोक के बाद दोसर-तेसर पीढ़ी के हेतिन I मैथिली भाषा व एही सँ जुड़ल विशेष संस्था कें अपन जड़ सँ जुड़ल रहब अपेक्षित ही नहिं अपितु अनिवार्य अछि I अतएव मैथिली के भविष्य कोलकाता नहिं अपितु मिथिला कें केंद्र में रखे पडत I हमर अभिप्राय कोलकाता कें कोनों तरह अवमानना के नहिं अछि I वो लोकनि महत्वपूर्ण कार्य का रहल छथिन I MVP के सभु सदस्य एही पर विचार करैथ से उचित I एक बात आओर मन में आबि रहल अछि जे मैथिली भाषा के चहुमुखी विकास खातिर एहि में विज्ञान व तकनीकी विधा के समावेश अत्यावश्यक अछि I अतएव मैथिल भाषी विज्ञान व तकनीकी विद कें भाषा सँ जुड़े लेल आमंत्रित करू I शुरू शुरू अवश्य दिक्कत हएत मुदा शनैः शनैः भाषा प्रगति करत I सम्प्रति जीवन यापन के हर क्षेत्र तकनिकी सँ जुड़ल अछि अतएव मैथिली में एकर समावेश परमावश्यक अछि I- सप्रेम डा. वी. एन. झा, Scientist 'F', Ex Jt Dir, DRDO प्रणव झा संगठित भ के नै रहनाई मैथिल समाजक एकटा अवगुण बला पुरान पहचान रहल अछि। प्रो0 हरिमोहन झा अपन खिस्सा "ब्रह्मा के शाप" के माध्यम से ऐ अवगुण पर चोटगर कटाक्ष केने छैथ त ओत्तई तीर्थयात्रा नामक कथा पात्र के माध्यम से भगवान जगन्नाथ से निवेदन करय छथिन जे भगवान हमर देश के लोक सब में एकता होय ओ सभ संगठित भ के रहैथ यैह अहाँ से विनती करय छी। यैह अवगुण एकटा पैघ कारण रहल अछि जे तेजस्वी मैथिल समाज देश दुनिया के पटल पर कदाचित ओ स्थान नै बना सकल जे आन आन समाज आई बनउने अछि। तथापि मिथिला मैथिली के नाम पर संगठन विभिन्न स्थान आ काल में बनैत आ चलैत रहल अछि। ओना त कोनो संगठन के कुछ गुण अवगुण रहिते छैक। एहन में कोनो मैथिल संगठन के बहुत प्रभावी आ क्रन्तिकारी इतिहास होय ई ताकब या ऐ कसौटी पर कसब ओत्ते युक्तिसंगत नै हेतैय। यद्यपि हमर मानब अछि जे साईत ई संगठन सभ समय के संग पहिने सँ बेसी कारगर भ रहल अछि आ आशा कैल जा सकय अछि जे ऐ संगठन सबहक माध्यम सँ मैथिल समाज बेसी सशक्त आ संगठित बनत। कोनो पत्रिका के माध्यम से संगठन के इतिहास, कार्य आ कार्यप्रणाली आदि पर चर्चा, आलोचना, समलोचना आदि निश्चिते संस्था के परिचय विस्तार दैत छैक संगे एकर इतिहास आ वर्त्तमान के अभिलेखित क भविष्य क लेल संदर्भित क मैथिल समाज के संगठनक भविष्य के बाट सेहो देखा सकय अछि। मिथिला विकास परिषद कलकत्ता विशेषांक के हम एहि रूप में देखय छी। विदेह ऐ से पहिनेहो किछु संगठन पर विशेषांक निकालने अछि जै में एमएसयू विशेषांक सेहो छल। मिथिला मैथिली बढ़ईत रहय सैह कामना। संगे नरेन्द्र झा विशेषांक के मोन पारैत एकटा विचार मोन में आयल जे अंग्रेजी वर्ष 2025 में विदेह के एकटा विशेषांक "वर्तमान में मिथिला में उद्योग, व्यापार आ रोजगार" पर सेहो निकालबाक विषय में सोचबाक चाही। जय जानकी।

अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। गद्य २.१.कल्पना झा- विद्याव्यसनी-कर्मयोगी-समाजसेवी: उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' (16 जुलाइ,1917-30 मइ,2002) २.२.संस्कृति मिश्र- गुरुत्वाकर्षण (कथा) २.३.परमानन्द लाल कर्ण- वृन्दावन आ श्रीकृष्णक माहात्म्य २.४.लाल देव कामत- गुलाबक हर्ष - विस्मय (लघु कथा)/ गार्ड साहेब (लघुकथा) २.५.संतोष कुमार राय 'बटोही' - 'पार्वती केर शपथ' (धारावाहिक नाटक) २.६.प्रणव कुमार झा- नजैर २.७.आचार्य रामानंद मंडल- विजातीय बिआह २.१.कल्पना झा- विद्याव्यसनी-कर्मयोगी-समाजसेवी: उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' (16 जुलाइ,1917-30 मइ,2002) कल्पना झा विद्याव्यसनी-कर्मयोगी-समाजसेवी: उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' (16 जुलाइ,1917-30 मइ,2002) "मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान" एहि विषय पर लिखब कतए सँ शुरू कएल जाए,  मोन उलबुकाएल सन भऽ रहल अछि। ई विषय देखितहि नानाजी सँ जुड़ल सुनल/देखल बहुतो बात हमरा दिमाग मे घूमए लागल। जनमितहि चूल्हि मे घोसिया देबाक टोना कएल गेल छलनि, ताहि खिस्सा सँ शुरू करी किंवा बाल्यावस्था मे आर्थिक विपन्नता सँ जूझैत उपेन्द्र नाथ पर समाजक किछु उदारमना गणमान्यक विशेष कृपादृष्टिक प्रसंग सँ। आ कि मेधावी छात्र उपेन्द्र नाथ केर कुशाग्र बुद्धि सँ प्रभावित भऽ एक गोट ब्रिटिश ऑफिसर 'ह्विप साहेब' द्वारा बिनु कोनो आवेदन पत्रक सीधे सरकारी विभाग मे नियुक्त कऽ लेबाक प्रकरण सँ। हुनकर आचार-विचार, धर्म-कर्मक चर्चा करी किंवा हुनकर समाज सेवाक भाव पर गप्प कएल जाए। कर्मकाण्डक अनुसरण करितहु आधुनिकताक पक्षधर होएब, माने हुनकर प्रोग्रेसिव सोच केर बात कएल जाए किंवा गीत-संगीत सँ हुनकर लगाओ केर बात करी। हुनकर फोटोग्राफी स्किल केर बात करी कि हुनकर अनुशासित दिनचर्याक बात करी.....हरि अनन्त..हरि कथा अनन्ता....बला पड़ि अछि। आबक लोक लेल ई एकटा नब बात होएत प्रायः। उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' जी गाम मे "चुल्हाइ" नाम सँ जानल जाइत छलाह। आ एहि "चुल्हाइ" नामकरणक पाछाँ कारण अछि एकटा टोना। उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' सँ पहिने परनाना स्व.विश्वनाथ झा आ परनानी स्व. आनन्दी देवीक पाँच-छओ टा संतान जन्मक उपरान्त मृत्यु प्राप्त करैत गेलनि। तखन उपेन्द्र नाथक जन्म काल एकटा टोना कएल गेल। ई टोना बच्चाक दीर्घायु होएबाक गारंटी मानल जाइत छलए, तैँ लोकक सलाह पर ई टोना कएल गेल छलनि। जनमितहि, माटिक चुल्हि मे नेना उपेन्द्र नाथ केँ घोसीया देल गेलनि। आ एही प्रक्रिया केँ क्रियान्वयनक  फलस्वरूप  पहिल नाम "चुल्हाइ" पड़लनि। ई "चुल्हाइ" नामक बालक आगाँ जा कऽ एहन यशस्वी हेताह, तकर अनुमान एक रत्ती नहि छल हेतनि स्व.विश्वनाथ झा आ स्व.आनन्दी देवी केँ। विद्वता मात्र लेल नहि, अपितु अपन सच्चरित्रताक कारणेँ बहुत लोकक हृदय मे जगह बनओलनि उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' जी।जन्म भले ही वर्तमान युग, कलयुग मे भेल छलनि हुनकर। मुदा कलयुग मे जीबैत सतयुग, त्रेतायुग आ द्वापरयुग, सभ युगक झलक देखबालेल भेटत, जखन हुनकर जीवन यात्राक आँकलन करब तँ। हमर एहि बात सँ पूर्णरूपेण सहमति रखताह, हुनकर सान्निध्य मे समय बितओनहार परिजन सभ। ओना तँ "युग” शब्द सँ एकटा निर्धारित काल-खण्डक बोध होइत छैक। मुदा हम एहिठाम ओहि युगक विशेषता सँ ओहि काल-खण्डक गणना कऽ रहल छी। सभ युगक अपन विशेषता रहल अछि। सभ युग मे सामाजिक ताना-बाना भिन्न रहल छलैक। सभ केँ बूझल होएत, जे सतययुगक समाज पाप सँ शत प्रतिशत मुक्त छलए। एहन सुनैत आएल छी हमसभ। सतयुग केँ सुवर्ण युग मानल जाइत अछि। श्रेष्ठ युग मानल जाइत अछि। सतयुग मे देवता आ दानव अलग-अलग लोक मे रहैत छलाह।  पापी सँ दूर रहने प्रायः लोक पाप सँ सेहो बाँचल रहैत छलए। तँ से, पाप आ पापी दुनू सँ बचबाक प्रवृत्ति नानाजीक भीतर जन्मजात छलनि। हमरा नानीगाम मे कहियो पिआजु लहसुनक प्रयोग नहि होइत छलए हुनका जीवनकाल धरि। समुद्र यात्रा निषेध मानल गेल अछि, अपना सभक शास्त्र पुराण मे। समुद्र पार कऽ विदेशी भूमि पर जाएब पाप वा अनिष्टकारी कहल गेल अछि। से तकरा फॉलो करैत ओ प्रयागराज संगम तट पर विधि विधानक संँ प्रायश्चित कएलनि, विदेश भ्रमण सँ घुरलाक उपरान्त। त्रेतायुग रामक युग। जाहि युग मे धर्म ओ संस्कृतिक प्रति अत्यधिक संवेदनशीलता छलैक लोकक भीतर। ओना देवता आ दानव एक्कहि लोक मे रहए लागल छलए, त्रेतायुग मे। दानव द्वारा देवता लोकनि केँ उछन्नर देबाक असंख्य घटनाक्रम  उल्लिखित अछि रामचरितमानस आ वाल्मीकि रामायण मे। खैर...जे-से। विषयान्तर होएबा सँ बचैत मूल बात पर आबी। चर्चा कऽ रहल छी उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' माने पूज्य नानाजीक चरित्र पर सभ युगक छाप केर। त्रेतायुगक अवतारी पुरुष रामक चरित्र सँ तँ अत्यधिक साम्यता देखाइत अछि हमरा, हुनकर चरित्र मे। उपेन्द्र नाथ झा आ महेन्द्र नाथ झा, राम लक्ष्मण सन दू भाए, दुनूक मध्य आजीवन मधुर संबंध रहब एकटा उदाहरण अछि हरिपुर 'बख्शी टोल'क लोकलेल। हरिपुरे टा नहि, सऽर कुटुम्बक संग इलाकाक अन्यान्य परिचित सभलेल सेहो। हमर नानीगामक घर-घरारी कहियो बाँटल नहि गेल हुनका दुनू भाएक मध्य। आजीवन एक परिवार बनि कऽ रहैत गेलाह। कहबाक माने हुनका दुनूक जीवनकाल धरि त्रेतायुग कायम रहल। हुनका दुनूक स्वर्गीय भेलाक उपरान्त भले ही ओहि घर मे घोर कलयुगक झलक देखाए लागल। द्वापरयुग श्री कृष्णक युग। महाभारतक युग। वेदव्यासक युग। महाभारतक रचयिता वेदव्यास जीक नाम सँ 'व्यास' उपनाम पर्यन्त पड़ि गेल छलनि। आ से अनायासे पड़ि गेल छलनि। माने कोनो प्लानिंग केँ तहत नहि। सोचि-विचारि कऽ नहि। ई उपनाम बला प्रकरण रोचक अछि। असल मे, बालक उपेन्द्र नाथ स्कूल मे यदा-कदा अवसर-अनवसर रामायण-महाभारतक कथा शिक्षक आ छात्र सभ केँ  सुनाओल करथिन । जेना पराशर, द्रोपदी, धर्मराज युधिष्ठिर, भीष्म पितामह, घटोत्कच आदिक प्रसंग - से सुनि हुनका रामेश्वर पांडेय नामक एक गोट शिक्षक 'व्यास' कहए लगलथिन । हुनका देखा-देखी सभ  विद्यार्थी-शिक्षक सेहो 'व्यास' कहब शुरु कऽ देलथिन। बाद मे इएह नाम प्रचलित भऽ गेलनि। एहि तरहेँ उपेन्द्र नाथ स्कूलिए जीवन सँ 'व्यास' बनि गेल छलाह। आ से मात्र उपनामे नहि , वैचारिकता मे सेहो। एकरा एना बूझल जाए; जेना वेदव्यास महाभारतक रचयिता मात्र नहि , अपितु ओहि युद्ध, ओहि घटनाक साक्षी रहलाह। अपन आश्रमे सँ हस्तिनापुरक समस्त गतिविधिक सूचना हुनका धरि पहुँचैत रहैत छलनि। आ वेदव्यास जी ओहि घटना पर अपन परामर्श दैत रहैत छलाह। जखन-जखन अंतर्द्वंद्व आ संकट केर स्थिति आबैत छलए माता सत्यवती हुनका सँ विचार-विमर्श करबालेल आश्रम पहुँचि जाइत छलीह। कहियोकाल हुनका हस्तिनापुरक राजभवन मे सेहो आमंत्रित कएल जाइत छलनि। तहिना उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास'क पोस्टिंग कत्तहु रहलनि, गामक हाल समाचार हुनका धरि सभदिन पहुँचैत रहैत छलनि। भले ही ओ मोबाइलक नहि चिट्ठी आ तारक समय छलए। आ गामक समाचार सँ मतलब मात्र अपनहि परिवार सँ नहि। भरि गामक लोकक सुख - दु:ख सुनब आ तखन समस्याक निदान लेल उपाए करब हुनकर जिम्मेदारी छलनि। ई बात प्रायः बहुत लोक केँ बूझल हेतनि, जे 'व्यास' जीक योगदान मात्र मैथिली साहित्ये टा मे उल्लेखनीय/ स्मरणीय नहि रहलनि। समाज लेल सेहो बहुत किछु कएलनि। P H E D मे चीफ इंजीनियर धरि पहुँचैत यथासाध्य  गाम लेल समाज लेल सहयोग करैत रहलाह। जेना - भरि गाम मे डेग डेग पर चापाकल गड़बा देब। घर घर मे P H E D के कर्मचारी भेटि जाएत हमरा नानीगाम हरिपुर 'बख्शी टोल' मे। बहुत लोक केँ रोजगार दिअओलनि। कतेक घरक लोक केँ खेबाक उपाए नहि छलैक , तकर सभहक स्थिति सुधरलैक। एहन लोक लेल देवता छलाह उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' जी। अद्भुत व्यक्तित्व छलनि हुनकर। एहन लोक विरले भेटताह। सामाजिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक, चारित्रिक, सभ स्तर पर खरा सोना। समाज मे ओहन छवि हरसट्ठे सभहक नहि बनि जाइत छैक। हमरा समय मे हिन्दीक पाठ्य-पुस्तक मे एक टा अध्याय छलए, "गुणों की खान-आँवला" प्रायः सातवीँ कक्षाक पाठ्य-पुस्तक मे। से हमरा कोनो बहुमुखी प्रतिभाक धनी व्यक्तिक चर्चा करैत ई चैप्टर निश्चित रूप सँ मोन पड़ि जाइत अछि। उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' सेहो एक टा एहने गुणक खान छलाह। आश्चर्य! एक व्यक्तिक भीतर एतेक गुण कोना भऽ सकैत अछि.... अविश्वसनीय सन लागैत छैक। मुदा सत्य छैक। हमरा तँ बहुत किछु आँखिक देखल सेहो अछि, आ किछु सूनल सेहो अछि।  एक दिस विज्ञान पढ़ि, इंजीनियरिंग केनाइ आ दोसर दिस  साहित्य सँ एतेक लगाव। जखन 1969 मे हुनका साहित्य अकादमी पुरस्कार सँ सम्मानित कएल गेलनि, तखन न्यूज पेपरक फ्रंट पेज पर बॉक्स बना कऽ छापल गेल छलए "Believe it or not, a technocrat is getting the highest literary award in literature from the Sahitya Akademi." आश्चर्यक गप्प ई जे अपन कर्म-क्षेत्र मे सेहो सभ दिन, सभ ठाम यशस्वी रहलाह। कुशाग्र बुद्धि तँ बाल्यकालहि सँ छलाह। जाही क्षेत्र मे, जाहि काजक भार उठओलनि, सफल रहलाह। सफले टा नहि अद्वितीय कहबाक चाही। इंजीनियरिंग सँ जुड़ल गतिविधि मे सेहो एहन निष्णात जे रिटायरमेंटक बादो विभागक लोक सभ संपर्क करैत रहैत छलनि, किछु परामर्श लेल। किछु दैवी शक्ति छलनि जेना। साहित्यिक क्षेत्र मे तहिना अपन विशिष्ट योगदानक संग विशिष्ट स्थान बनओलनि। बता दी जे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास'जी मैथिलीक प्रथमहि रचनाकार छथि जे मूल (दू पत्र) तथा अनुवाद (विप्रदास) उपन्यास साहित्यक लेल साहित्य अकादेमीक पुरस्कार प्राप्त कएने रहथि। दू पत्र - मूल पुस्तक पर 1969 मे आ विप्रदास - अनुवाद पुरस्कार 1990 मे भेटल छनि। हुनकर रचना संसार पर एक नजरि देल जाए -- 1.कुमार (उपन्यास) 1946 मे प्रकाशित 2. संन्यासी (खंड-काव्य) 3. महाभारत आदि पर्व 4.विडम्बना (गल्प-संग्रह) 1952 मे प्रकाशित 5. प्रतीक (कविता-संग्रह) 6.भजना-भजले (कथा-संग्रह) 1989 मे प्रकाशित 7.दू पत्र (लघु उपन्यास) 1968 मे प्रकाशित 8.श्रीमद्भगवत गीता (मैथिली पद्यानुवाद) 9.रुबाइयात-ए-ओमर खैयाम (मैथिली पद्यानुवाद) 10.बाभनक बेटी (उपन्यास, बाङ्लाक अनुवाद) 11.विप्रदास (उपन्यास, बाङ्लाक अनुवाद) 12.पतन (काव्य) 1976 मे प्रकाशित 13.अक्षर परिचय (नेना सभहिक लेल) 14.स्तोत्राञ्जलि (पद्यानुवाद) जाहिमे सौन्दर्य लहरी श्रीमद्भागवत पुराण 15.विदेश भ्रमण (यात्रा वृत्तांत) 1978 मे प्रकाशित 16. दो पत्र (मैथिली उपन्यास दू पत्रक हिन्दी अनुवाद) साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित 17.Two letters (दू पत्र केर अंग्रेजी अनुवाद श्री सत्येन्द्र कुमार झा द्वारा) 2023 मे प्रकाशित (किछु रचनाक प्रकाशन वर्ष छूटल अछि) अप्रकाशित रचना मे महाभारतक किछु पर्व, ऋग्वेद आ शुक्ल यजुर्वेदक भाष्य, जाहि मे व्याकरण, व्युत्पत्ति, अर्थ, विवेचना सभ किछु सन्निहित रहैत अछि। रामानन्द झा'रमण' जीक लिखल एकटा लेख मे पढ़ने छलहुँ "लेखकक साहित्यिक उत्कर्षक मानदण्ड मात्रा नहि, रचना मे अन्तर्निहित गुणवत्ता मानल जएबाक चाही। ढाकीक ढाकी लिखलोपर जँ कोनो जीवन-मूल्य स्वीकृत नहि भए सकल अथवा रचनाकारक पाँती मे पृथक व्यक्तित्व नहि झलकैत रहए तँ भरिगर गत्ताक अछैतो जीवन कालहि मे ओ रचनाकार अप्रासंगिक घोषित भए जाइत अछि।" से हिनकर लेखनी मे हिनक पृथक व्यक्तित्व झलकैत रहल छनि। आ तैँ अमर छथि। लेखनीक चर्चा कऽ रहल छी, तँ नाना जीक एक टा बहुचर्चित कथा "रूसल जमाए"केर चर्चा करब आवश्यक बुझना जाइए। ई एकटा माइलस्टोन कथा रहल। एहि कथाक चर्चा रहरहाँ होइत रहैत अछि, कोनो तरहक साहित्यिक गोष्ठी सभ मे। एहि कथाक संदर्भ मे एकटा रोचक बात सुनल अछि। बहुत लोक केँ भ्रम छलनि जे ई हुनकर अपन खिस्सा छनि। जखन कि ई कथा जाहि समय मे लिखने छलाह (१९४५) ताहि समय ओ कुमारे छलाह। संक्षेप मे कही तँ पूज्य नानाजीक जीवन-यात्राक मुख्य पड़ाओ एना रहलनि - बाल्यावस्था मे आर्थिक विपन्नता सँ दू-चारि होइत रहलाह। किशोरावस्था सँ युवावस्था धरि स्कूल-कॉलेज मे मेधावी छात्र रूप मे आ कर्म-क्षेत्र मे अपन कार्य कुशलता सँ एकटा विशिष्ट स्थान बनओलनि। प्रौढ़ावस्था धरि आबैत उदारमना समाजसेवी आ धर्म-कर्म मे लीन भद्र पुरुषक छवि एहन बनलनि जे वृद्धावस्था धरि कायम रहलनि। नानाजीक ई 'नीक लोक' बला छवि हुनकर लेखन पर सेहो हावी रहलनि। साहित्य सेवा स्कूलिए जीवन सँ  प्रारम्भ भेलनि, से हुनकर जीवनक अन्तिम पड़ाव धरि अनवरत चलैत रहलनि। किछु  रचना सभ अप्रकाशित सेहो रहि गेलनि। जकरा प्रकाशित कराएब हुनकर संतति सभक काज छनि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.संस्कृति मिश्र- गुरुत्वाकर्षण (कथा) संस्कृति मिश्र गुरुत्वाकर्षण (कथा) विनायक पुरीक आद्यापीठमे आइ बेसी भीड़ छैक। आइ गुरुमाइक जन्मदिन छियैक। भक्त सभकेँ मना कएलहु पर के मानै छैक। रुचि मुम्बईसँ चारि घंटा कार चलाकेँ आद्यापीठ पहुँचल रहथि। गुरुमाइ व्यासपीठ पर बैसिकेँ प्रवचन दऽ रहल छलथिन-देहक प्रत्येक रोमक पृथक आ निजी स्मृति होइत छैक। तैँ देहक कोनो अंग पर भेल स्पर्श वा आघात ताहि अंगक स्मृति-कोषमे चिर-संचित रहैत छै। कहियो ओ मेटाइ नहि छैक। अति संवेदनशील अंगक आघात जन्म-जन्मांतर धरि मोन रहैत छैक। स्त्रीक देह बेसी संवेदनशील होइछै, तैँ ओकरा अप्रिय स्पर्शो करवाक शास्त्रीय निषेध छैक। जे वस्तु जतेक बहुमूल्य, तकरा लेल ततेक सुरक्षित राखवाक प्रयत्न लोक करैत छैक। पुरुषक तुलनामे जनीजातिके झाँपन-तोपनक व्यवस्था अही लेल छैक। युवकक तुलनामे युवतीकेँ किछु बेसी प्रतिबंध छैक। तकरा लऽ कऽ मोनमे प्रतिहिंसक भावना नहि उठवाक चाही। शास्त्रीय निर्देश हमरा सभक कल्याणेक लेल अछि।.. रुचि सभसँ पाछाँक सीट पर आबिकेँ बैसि गेल छलीह, मुदा गुरुमाइक नजरिमे पड़िये गेलीह। किछुए कालमे प्रवचन समाप्त भेल। आरती भेलैक आ भक्तगण प्रसाद लेवाक लेल भोजनालय दिस विदा भऽ गेलाह। रुचि आइ प्रसाद लेमय नहि गेलीह। अपना सीटपर बैसले रहलीह। कने कालमे गुरुमाइक सहायिका आयल-'गुरुमाइ अहाँकेँ अपना कक्षमे बजा रहल छथि।' रुचि ओकरा पाछाँ-पाछाँ साधना-कक्ष पहुँच गेलीह। एहिसँ पहिनहुँ ओ एहि कक्षमे अनेक बेर आबिकेँ बैसल छथि आ अपन जीवनक लेल मार्गदर्शन प्राप्त कएने छथि। एकटा सात्विक मुस्कीसँ गुरुमाइ हुनक स्वागत कएल। रुचि हुनका विधिवत प्रणाम कऽ कुशक पटिया पर बैसि रहलीह। - कहू रुचि, अहाँक काज-धंधा कोना चलि रहल अछि। सुनलहुँ जे अहाँ हीरानंदानी सोसाइटीमे फ्लैट किनलहुँ अछि। ओ तँ बड़ महग पड़ल होयत। - जी गुरुमाँ। अपनेक आशीर्वाद सँ भऽ गेलैक। आरबीआइ क नोकरी आ एसबीआइ क लोन। - बियाह नहिये कएलहुँ? - अपना भरि प्रयास तँ करबे कएलहुँ, मुदा तेहन क्यो भेटबे नहि कएल। 'यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति।' पतिक इ फार्मूला स्वयं भगवती देने छथि। आब एकसरे रहबाक अभ्यास भऽ गेल अछि। बियाहक मतलब आधा स्वतंत्रता घटायब आ दुन्ना दायित्व बढ़ायब हेतैक। ताहूमे जँ वर विपरीत स्वभावक भेट गेल, तँ दौड़ैत रहू सालक साल कोट-कचहरी। जीवन नरक भऽ जाइत छैक। - अहाँ गुरुमाँ, किएक संन्यासिनी भऽ गेलियैक? अहाँक समयमे बीटेक कियो-कियो कन्या करैत छलैक। - धुर जाउ, सैह डिग्री तँ गराक फाँस भऽ गेल। बीटेको लड़काक बाप तेहन घमंडमे चूर, जेना ओकर बेटा असर्फी दऽ कऽ पढ़लकैक आ हम गुड़-चाउरक सनिचरा दऽ कऽ। कतौ-कतौ बाबू झुकियो जाथिन, मुदा हम मना कऽ दियैक। - तखन साध्वी कोना भऽ गेलियैक? - हमरा सुरुए सँ भगवानक पूजा - पाठमे मोन लागैत छल। दोसर बात जे क्यो आन पुरुष जँ देह छूबि दैक, तँ चकेत्ता भऽ जाय। तकर बाद तँ संन्यासे रस्ता छलैक। - ई किएक होइत छलै, से डाक्टरसँ नहि देखाओल गेलैक? - मनुक्खक देह अनेक द्वन्द्वात्मक आ रहस्यमय पदार्थसँ बनल जटिल यौगिक होइत छैक। हम सभ अपन लघु जीवनमे जे काज करैत छी, से किएक, से नहि सोचैत छी। काज भऽ गेलाक बादे ओकर औचित्य आ कारण ताकैत छी। - गुरुमाँ, कोनो काजक आरंभ जँ सहज आवेशमे होइ, तँ ओकरा की कहल जाय? आजुक लोक तँ मानव देहकेँ मात्र भौतिक वस्तु मानिकेँ तकर उपयोग करैत अछि। - के कहैत अछि, जे हमर सभक देह आध्यात्मिक नहि, मात्र भौतिक अछि? ओना तँ हम-अहाँ ओहि गौरवसँ वंचित छी, मुदा सच मानू तँ मातृत्व एहि क्षत-विक्षत धरतीपर वरदान अछि। पवित्रता, सौन्दर्य, वत्सलताक जेहन विकास मातृ-हृदय मे होइत छैक, तेहन कतहुँ नहि। - गुरुमाँ, की जीवनमे रति-सुखक एकमात्र उद्देश्य मातृत्व पदक प्राप्ति छै, यौवनक आनंद नहि? - जँ विधाताक दृष्टिसँ देखी तँ यएह स्वीकार करय पड़त। मुदा ओहि आनंदक कारणे प्रत्येक जीव सृजनमे प्रवृत्त होइछैक। - गुरुमाँ, हम सभ विधाता नहि छी। अल्पायु जीव छी। अल्प समयमे बेसीसँ बेसी सुख प्राप्त करय चाहैत छी। आ जँ एहि सुखसँ किछु हितकारी काज भ जाय, तँ की हर्ज? - जेना? - साफहि कहैत छी। जेना कोनो युवती अपन मादक देहकेँ ककरो समर्पित कए अपन पदोन्नति करा लैक वा कोनो अधिकारीकेँ खुश कए अपना पक्षमे दस-बीस करोड़क निविदा निकलवा लैक? तँ की हर्ज? मनु स्मृतिक अनुसारे प्रत्येक मासक पश्चात स्त्री तहिना पवित्र भऽ जाइछैक, जेना बाढ़िक बाद नदी। - देहक उपयोग कोनो छोट स्वार्थ लेल करब अधम कोटिक मानसिकता अछि। शास्त्र एकर अनुमति किन्नहु नहि देत। किन्तु यएह समर्पण जँ प्रेमी-प्रेमिकाक बीच अछि, तँ ओ दिव्य भऽ जाइछैक। मनुस्मृतिक श्लोकक प्रयोजन ई छै जे, जँ कोनो युवतीक संग अप्रिय घटना भऽ जाइछैक, तँ ताहिसँ ओकर जीवन नष्ट नहि भऽ जाइछैक। मासिक धर्मक पश्चात ओकर देह पुनः पवित्र भऽ जाइछैक। हँ, जँ गर्भ रहि गेलैक, तखन ओ एकटा सामाजिक समस्या उत्पन्न करैछैक। ओ शिशु जिनगी भरि टुअरे टापर रहैत अछि। - एहि दृष्टिसँ मनु महाराज बेसी आधुनिक आ व्यावहारिक छथि। कतेक ठाम ओ आजुक भोथहा कानूनक तुलनामे अधिक संवेदनशील छथि। - गुरुमाँ, हमर मूल प्रश्न तँ अनुत्तरिते रहि गेल। आइ वएह प्रश्न हमर मोनकेँ मथि रहल अछि। अहाँ बरमहल कहैत छियैक जे स्त्रीक सौन्दर्य विधाताक सभसँ उत्तम वरदान छियैक। इहो एकटा कमलक फूले होइत छैक, जे भोरे फुलाइत छैक आ साँझ धरि मौला जाइत छैक। दुपहरमे ओहि फूलसँ कोनो प्रिय जनकेँ सुख देनाइ कोनो अपराध छियैक की? इहो तँ उपकारे भेलैक। - ताही लेल तँ गृहस्थ आश्रम क व्यवस्था छैक दाइ। यौवनक उन्माद स्त्री-पुरुष दूनूमे होइत छैक। पुरुष बहिर्मुखी होइत छैक। तैँ ओ तुरंत उत्तेजित भऽ जाइत छैक। स्त्रीक प्रवृत्ति अंतर्मुखी छैक। ओ देरीसँ आ देरी तक उत्तेजित रहैत छैक। अहाँक संयमित जीवनक यएह कारण अछि। - किंतु एक बेर हमर संयमक बान्ह टूटि गेल छल गुरुमाँ। सएह मधुर स्मृति रहि-रहि कऽ कचोटैत अछि। - अच्छा! से कोना? - ओहि घटना केँ बारह साल भऽ गेलैक अछि। हमरा बैंकमे नया नोकरी लागले छल। एक दिन कानपुर आइआइटीक एकटा हमर प्रोफेसर साहेबक फोन आयल जे- रुचि, हम एकटा तकनीकी संगोष्ठीमे मुंबई आबि रहल छी। अहाँ अपन गेस्ट हाउसमे एकटा रूम हमरा लेल बुक करा देब? आइआइटीमे सभसँ मोहक आ शालीन व्यक्तित्व हुनके छलनि। खूब लोकमिल्लू। तैँ छात्र-छात्राक बीच बेसी लोकप्रिय। हम सभ बहुत नकल करियनि हुनकर। ओ आबि रहल छथि, से सोचियेकेँ देहमे झुरझुरी बरि गेल। जेना अतीतक एकटा श्वेत मेघ-खंड हमरा आगाँ आबिकेँ पसरि गेल हो। हम बिना एको पल गमैने हुनका कहि देलियनि जे भऽ जेतैक सर। अहाँ निश्चिंत भऽ कऽ आउ। संयोग सँ, गेस्ट हाउसमे ओहि तारीखमे कोनो रूम खाली नहि छलैक। तखन हम अपने फ्लैटमे हुनका राखबाक विचार कएल। दू बेडरूमक फ्लैटमे एकसरि रहैत रही। सर हमरा एतेक लगीच आबि जैताह, से कल्पने कए रोमांचित भऽ गेलहुँ। सरकेँ आनवाक लेल हम स्वयं एयरपोर्ट चलि गेल रही। सर, लखनऊ क भोरका फ्लाइटसँ एयरपोर्ट पर उतरि कऽ बाहर निकललाह, तँ आवेशमे आबिकऽ हम धिया-पुता जकाँ हुनका छातीसँ चिपकि गेलियैक। टैक्सी कऽ घर ऐलहुँ। जल्दीसँ दूनू गोटे तैयार भऽ कऽ आइआइटी विदा भेलहुँ। रस्ता भरि कखनो हुनकर हाथ आ कखनो हमर हाथ एक दोसरासँ छुआ जाइ तँ सौंसे देह करेंट लागि जाइ। सभागारमे ओ मंच पर चलि गेलाह आ हम दर्शक दीर्घाक पहिल पाँतिमे बैसल सदिखन हुनके दिस एकटक ताकैत रहलहुँ। साँझमे घुरलाक बाद सरक अटैची हम अपन बेडरूममे राखि देलियनि। एसी ओही रूममे छलैक। टॉयलेट सेहो ओकरे नीक छलैक। सर बाथरूमसँ नहा कऽ  निकललाह, तँ हमहू ओहीमे नहाइ लेल चलि गेलहुँ। सर ड्राइंग रूममे बैसिकऽ संगोष्ठीक पेपर सभ तावत देखैत रहलाह। नहाकेँ महीन अद्धीक कुर्ती-पैजामा पहिरि कऽ जखन हम निकललहुँ, तँ भीजल केशक पानिसँ कुर्तियो कने भीज गेल छल, जाहिसँ छातीक उभार भीतरसँ झलकय लागल। हमरासँ गप करैत काल, सरक नजरि बेर-बेरि ओही दिस उठि जाइत छलनि, से हमरा अनुभूति भेल। हम अनबारीसँ एकटा ओढ़नी आनिकऽ ओढ़ि लेल। मुदा पुरुषक परिकल नजरि रहि-रहि कऽ ओम्हरे बढ़ि जाय। आ ताहिसँ हमर छातीक धुकधुकियो बढ़ि जाइत छल। कालोनीक गेस्ट हाउसमे बैंकक कैंटीन छलैक। दूनू गोटे ओतहि रातुक भोजन कएल। काउंटर पर सौंफ लऽ कऽ सरकेँ देलियनि, तँ हुनक हाथक स्पर्श असामान्य लागल। ओ बजलाह-आइ अहाँ बहुत क्यूट, बहुत स्मार्ट लागैत छी।' हम एहि पर 'से बात! 'कहिकऽ हँसि देलियैक, हुनकर मारुक वाक्यक प्रभाव कम करवाक लेल। घर आबिकऽ किछु काल आजुक संगोष्ठी पर आ तकर बाद हमर काज सँ होइत देशक अर्थ व्यवस्था धरि वार्ता पहुँचि गेलैक। राति बारह बाजि गेल छलैक।दूनू गोटे अपन-अपन रूममे सूतय लेल चलि गेलहुँ। हम ओछाइन धरियो नेने रही कि मोन पड़ल जे दवाइ नहि खैलहुँ आइ। दवाइ दोसर रूममे छलैक। उठिकेँ ओहि सर वला रूम गेलहुँ। जीरो वाटक नील रोसनीमे सर अनठेने पड़ल छलाह। ड्राअरसँ दवाइ निकालवाक आवाज सुनि सर उठिकेँ बैस रहलाह। दवाइ खाकऽ जाइत रही कि सर हमर हाथ पकड़िकेँ बैसा लेलनि। हाथ तेना हल्लुक पकड़ने छलाह जे हम छोड़ाकऽ भागियो सकैत छलहुँ। मुदा भागि नहि भेल। हमर आँखि मुना गेल। हुनकर हाथ हमरा हाथ, बाँहि, पीठकेँ हँसोथय लागल। फेर हमर केस, माथ, गाल, गरा सभ हुनकर स्पर्शसँ रोमांचित होमय लागल। तकर बाद हुनकर छाती हमरा छातीसँ आ ठोर हमरा ठोरसँ सटि गेल। पश्चात हुनकर हाथ हमर दूनू वक्षसँ एकाँएकी खेलय लागल। एहि क्रीड़ामे हमरा एकटा अद्भुत स्वाद भेटि रहल छल। एकटा अपूर्व गुरुत्वाकर्षणमे हमर सौंसे अंग-प्रत्यंग बरकय लागल। देहक भीतर ज्वालामुखी जखन असह भऽ गेल, तखन हम अपने कुर्ती उतारि देलियैक आ तकरे संगे हुनकर गंजियो। धधरा पसरलै तँ हम अपन पैजामा आ हुनक डाँढ़मे लपटल धोती सेहो हटा देलियैक। दूनू क ठोरसँ लऽ कऽ पैर धरि छुआइते देरी टेहरी बान्हक सभ दरवाजा खुलि गेलैक आ भागीरथीक तेज जलधारमे सभ किछु भसिया गेल। तकर बाद निच्चाँ पसरल धरती आ उप्पर आरूढ़ आकाश। मोन रहल केवल परकाया प्रवेश, जे कष्ट दैतो खूब नीक लागैत छल। प्रबल उत्तेजनाक धारमे कतेक काल धरि बहैत रहलहुँ, से होस नहि रहल। ज्वालामुखी शांत भेला पर छातीसँ छाती सटा कऽ दूनू सूति रहलहुँ। दूनू निश्शब्द। लाजसँ हमर आँखि मुनले रहल। भोरमे आलसे देह ततेक टुटैत छल जे उठवाक मोने नहि होइत छल। सर बाथरूमसँ नहाकऽ बाहर ऐलाह। तखन अपना गाल पर हुनक ठोरक ठंढा स्पर्शसँ हमर नीन टूटल। तकर बाद जेना राति किछु भेले नहि हो, तेना जकाँ हम नहा-सोना कऽ तैयार भेलहुँ। नाश्ता कैंटीनसँ मँगा लेल गेलैक। सरकेँ नौ बजे 'ओला' कैबसँ एयरपोर्ट विदा कऽ हमहूँ ऑफिस चलि गेलहुँ। किंतु दिन भरि रातुक एक-एक क्षण हमरा पाछाँ करैत रहल। ओही दिन नहि। आइयो धरि जखन-तखन ओ राति मोन पड़ि जाइत अछि आ भीतरक चोर ओकर पुनरावृत्ति करैक लेल उकसावैत अछि। -अही द्वंद्व कऽ निस्तारणक लेल गुरुमाँ, हम अहाँक शरण आयल छी। आँखि मुनने रुचि पूरा वृत्तांत तहिना सुनेलनि जेना इसाई सभ चर्चमे कन्फेस करैत छैक। गुरुमाँ पलथी मारने ध्यानस्थ। मुँह रक्तकमल भेल, किंतु परम शांत। आँखि मुनने गुरुमाँ बजलीह-तकर बाद कोनो संवाद 'सरजी' सँ? -शुरूमे दस-पंद्रह दिन दूनू दिससँ फोन भेलैक। मुदा ओहि रातिक घटनाक कोनो चर्चा नहि। एकाध बेर प्रशंसात्मक स्वरमे ओ प्रसंग उठैलनि, मुदा हमहीं अनठा देलियैक। भरिसक पत्नीक डरे ओ फोनो बंद कऽ देलनि। गुरुमाइ आँखि खोललनि। पुछलीह- तखन आब आगाँ की चाहै छी? - सैह पूछय आयल छी। कारण, हमर शरीर ओहि स्वादकेँ पुनः चाखि कऽ पूर्ण तृप्त होमय चाहैत अछि। राति-बिराति हमर कामना प्रचंड भऽ जाइए। -कामाग्नि मिझैलाक प्रयत्नसँ आर बढ़िये जाइत छैक, रुचि। गोस्वामी जी कहैत छथि- बुझै न काम अगिनि कह तुलसी विषय भोग बहु घी ते। एहि मे पाप-पुण्यक यएह निकर्ष छैक जे जाहि काजसँ आह्लादित भेलहुँ से भेल पुण्य आ जाहि काज कएलासँ ग्लानि भेल से पाप अछि। अहाँसँ कोनो पाप नहि भेल अछि। इहो जीवनक एकटा अनुभव छियैक। अहाँ कहियो एकरा बिसरि नहि सकैत छी। प्रत्येक अंगमे ओ स्मृति एहि जन्मकेँ के कहय, अगिलो जन्ममे बनल रहत। अहाँक संयमकेँ धन्यवाद जे ओ स्वाद चस्का नहि बनल। ओहि राति अहाँक संयोग प्रेमीसँ नहि, ओहि अध्यापकसँ भेल छल, जे अहाँक जीवनमे आदर्श छल। तैँ ओ घटना तात्कालिक भावना छलैक। आकाशकेँ छूबि लेवाक धरतीक सहज उत्कंठा। वएह क्रम जँ आगाँ बढ़ि जैतैक छल, तँ व्यभिचार होइतैक। ई देह ईश्वरक वरदान छियैक। एकर दुरुपयोग कोनो प्रकारक स्वार्थ-साधनक रूपमे करब अधम विचार भेल। ताहि दिस सोचबो पाप होयत। अहाँ मुक्त छी, निष्पाप छी। सभक देहक तापमान एक नहि होइत छैक। तहिना मोनक भावनो सभ समय एक रंग नहि होइत छैक। एहि संसारमे सभसँ सौभाग्यशाली वएह होइत अछि, जेकरा प्रेमक प्रतिदान कएनिहार सुच्चा प्रेमी भेटि जाइत छैक। से प्रेमिका निश्चय राधा स्वरूप अछि। सहसा गुरुमाइ उठिकेँ अपन भीतरी प्रकोष्ठमे चलि गेलीह। रुचि एकसरिए बड़ी काल धरि गुरुमाइक बातक ओझरायल सूत्रकेँ सरियवैत रहलीह। किछु कालक बाद गुरुमाइ स्नान-ध्यान कऽ साधना-कक्षमे ऐलीह। एकवस्त्रा गुरुमाइक सुगठित देहक दिव्य सौन्दर्य देखि रुचि चकित भऽ गेलीह। हुनका झकझोरैत गुरुमाइ बजलीह- जाउ, अहूँ स्नानक लिअ। हमरे गेरुआ चीर पहीर लेब। चारि लोटा ढारिकेँ रुचि जल्दिये आबि गेलीह। तत्पश्चात केराक पात पर दूनू प्रसाद पएलनि। -आइ अहाँ हमरे संग सूति रहू। एखन दूनू संन्यासिनी छी। अनुशासित कन्या जकाँ रुचि हुनका ओछाइन पर अत्यंत संकोचसँ सूति रहलीह। गुरुमाइ रुचिक माथ हँसोथैत बजलीह- रुचि, शास्त्रक निर्देश छैक जे एकांतमे युवतीकेँ अपन भाइयो बापक संग नहि रहवाक चाही। अहाँक यएह गलती छल जे एकसरे घरमे पर-पुरुषकेँ बजा लेलियैक। ई कदापि नहि करवाक चाही छल। अहाँ सिंगल छी। तैँ ई बात ध्यान राखब। अन्यथा समाजक गिद्ध सभ बुट्टी-बुट्टी नोचि लेत आ अहाँकेँ पतो नहि चलत। पुरुष अंततः पुरुष होइत छैक आ स्त्री अंततः स्त्री। भावनाक संगे बुद्धियो भगवान देने छथिन। तकर प्रयोग करवाक चाही। गुरुमाइ स्नेहसँ हुनका माथकेँ चूमि लेलखिन। रुचिकेँ किछु आर मोन पड़ि गेलनि। बड़ी काल धरि अपन माथपर ओ कोनो तृतीय पुरुषक चुम्बन अनुभव करैत रहलीह। गुरुमाइ सत्ते कहने छलथिन जे देहक अंग-प्रत्यंग अपन स्पर्शकेँ जन्म-जन्मांतर धरि मोन राखैत छैक। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.परमानन्द लाल कर्ण- वृन्दावन आ श्रीकृष्णक माहात्म्य परमानन्द लाल कर्ण वृन्दावन आ श्रीकृष्णक माहात्म्य अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.लाल देव कामत- गुलाबक हर्ष - विस्मय (लघु कथा)/ गार्ड साहेब (लघुकथा) लाल देव कामत गुलाबक हर्ष - विस्मय (लघु कथा)/ गार्ड साहेब (लघुकथा) १ गुलाबक हर्ष - विस्मय (लघु कथा) एकटा गाममे एक समय लाल टुहटुह बालकक जनम भेल,जकर मम्हरमे छठिहारी नाम पड़ल गुलाब। गुलाब चौथाधरि पढ़ल रहय। अपना वर्गक मेधावी विद्यार्थी छलय। बालपनमे घरके असगर दुलरूआ नेना देखनुक,तेँ जोगबनी सँ बाबा'क आनल सन्तोला - नशपाति आओर आनों पाकर - काँच फल खूब खाय। ओ लगहैर गाय- महिसक खुटापरक शजबी दुध , मक्खन,छाल्हि आ नीक डाढ़ी पर पलल - बढल रहैय। अपना तुरिया सँ डेढ़हा - दोबरकेँ अखारा पर कुश्तीमे पटैक दैक। साँझकेँ ओस्ताद बौआजी बाबा लग मालीभरि करूआतेल मेहनति सँ सौंसे देहमे पचा लिअ। देहातक मुख्य काज खेती-किसानीमे सेहो खूब शनगर सँ फसिल जजात लगाबैक। तहिना शिकारो खेलैमे सेहो अगुआएल रहय। लुकरीबाला बन्शी सँ ल' क' लहको आ घिरनी बनशी मरना कोसी धारमे चहटी - भंगी पीपरधरि पाथय। पहटा गांज आ टाईप लेल चर्चित युवकमे गिनाते रहय । पंचभैंया सँ ओकर बाबू जहन अलग भेलैक तँ सबटा गामक काजभार ओ डेबि  लेने रहय। एकदिन मकइके चहटगर मखानीमे लुंगी मरचाय ततेक ने खेलकै जे कव्जियत आ पेट दर्द सँ छटपटाइत ईलाज लेल लहेरियासराय म भर्ती हुअ पड़लैक । पछाति गुलाब अपना बाबुजी लग कोलकाता ड्राइवरी सिखय गेल तँ रोग बेसाहने गाम आयल छल। आब दाम्पत्य जीवन कृषि पर आधारित रहल। ओ शान्तिप्रिय लोकमे शुमार होई छलैई। से महाकान्त  छोटका कका द्वारा अपन नीजी एक कट्ठा डीह जमीन बेचबा सँ अति हर्ष होईक तँ सुभक लाल बड़का कका केर कुर्थी दाइल पौध बटेदारी खेती सँ बढ़ विसमय देखल गेलैक। एक दुपहरिया केँ मैनहीं सीमाकात केर केवाला किनल खेत सँ घसबाहिणी द्वारा उखारल गेल कुरथी केँ मादे बोईन नँय देबाक जैरियाएल गप्प सँ ओ खिन्न भ' उठलैक। चट द' बाजलैक बड़का कका यौ! कने बिड़ि धराबय ले सलाय दिन तँ । जखने हाथमे सलाय आयल, झट दया ओ लिसि,पजारि देलक कुरथीक पुरे जाकमे। आ बाजल हे लिअ जन गिरहत आ बटैया सब भ' जाए खकसियाह। झूनाएल सुखल कुरथी गाछ लगले पछिया हवाके सह पाबि सुड्डाह भ' गेल । बांध सँ गामपर आबि सुभग लाल  सबकें कहने फिरै हौ! एहन नै देखल हर्ख - विस्मय केर अकरहर। २ गार्ड साहेब (लघुकथा) भीआरएस लेलाक पछाति गार्ड साहेब दरभंगा सँ आब गामे रहैत छैथ। हुनका एक दिन लाल बाबु वाचमैन सँ गप्पक पछरा पड़लनि। गार्ड साहेब अपन चास बास आ भवन देखाबैत स्वंयके प्रशंसा पबय चाहथि। लाल बाबू हुनका सँ कहलनि हम हूं मुम्बई मेँ गार्ड पद पर सर्विस करैत छी। आ अहाँ सँ बेसिये समाजमे प्रतिष्ठा बढ़ेलौँ हन्। ओ ताहि पर ओ कहलकनि  तों तँ थर्ड डिवीजन सँ मैट्रिक हमरे संगे केलह ,गरीबीक कारणेँ पूबपछिम जायबालाके पछोर धरैत कमाय लेल गेल छलहे से बूझले अछि। गार्ड माने तँतोँ बुझितो नहिं हेबहक। बाहर रहय बाला सभ तोरे जेकां घरेलू काज करै य आ अपना केँ हरिया मिसपीटर गामबलाके बतबैत रहैत छैक। ताहि पर लालबाबू निशाना साधैत बाल यौ! अहाँ जे रेलक गार्ड भेलौं तँ अनैतिक रूपेँ कमाईत रहलहुँ । लौकहा लाईनमे जाधरि कोयला ईंजन चलैत रहल ताधरि खुबे कोयला बेचलौं। डिजल ईंजन बाला ट्रेन में सेहो खुबे चोरि सँ सितामढी आ बरौनी धरि रमल रहलौं। सब किओ अहाँक करतूत पर होंसैत य। अहाँ नीक - नीक लोककेँ अपना बले पंटना सँ दिल्ली धरि फ्रीमे खुअबैत ल' जाइत - अबैत रही। छुटभैया जातीय नेता आ धनिक लोककेँ बेहरी - चंदा अवश्ये देने छी। हमारा तँ अबैध कमाय नै य, तेँ अपनामे लागल रहैत थिकहुँ। बातकेँ बदलैत गार्ड साहेब खुशमिजाज भ' बाजल लाल - पियर धोती कमीज समधियाने म भेटलह की? हौ! दान - दहेजके माँग व्यवस्था तोरा नहिं लेला सँ कि दहेज प्रथा उठि जेतई ? एहि प्रश्नक जा उत्तर दैत लालबाबू ता गार्ड साहेब फेर सबाल आगू रखैत बजलाह-  पुरे रेलयात्री आ ड्राइवर संगहि इंजनक' ईन्चार्य हम रहलहुँ। टीन पर चाहभेण्डर'क स्टाल सँ आगू वा पाछुए ट्रेन रोकि ओकर आमदनी बढ़य सँ बाधा कयल। पुनश्च बड़बराय लगलाह - कियो जे अपना लगक टीशन जाए ट्रेन पकड़ैत अछि से कतेक स्पिडक रेलगाड़ी होईछ तकर निठाह आंकड़ा बुझैत छैक? आगू बात झौंकैत कहलाह- हम एहन तेज गार्ड रहलौं जे अपन तेजस्वीताक बले अगूढ़ काज सब चुटकी बजाकय कए लैत छलौं।लोहियाक पेनीसन हमर बेटी छैक, तकरार लेल चानसन वर सेहो बैंक मैनेजर टेबिल शान-शौकत सँ वियाह करेलौं। से संभव कोना भेल हेतैक कहू ? लाल साहब जबाब दैत बाजल - जुड़वनकेँ के टालत! तँ फेर फटकारैत आ अवाच्य सुरे गार्ड साहेब तरैंग गेलाह। आपे सँ बाहर होइत बजलाह तों महामूर्ख छह,जे बिनु नगदी नारायणके बेटाकेँ बियाहलै। हमरा की बताह बुझै छ जे - लड़का केँ बोराबन्दी टाका सँ तौल लेलियैक। आखिर असली गार्ड साहेब कहबैत छी भौर परगनामे किनै! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.संतोष कुमार राय 'बटोही' - 'पार्वती केर शपथ' (धारावाहिक नाटक) संतोष कुमार राय 'बटोही' 'पार्वती केर शपथ' (धारावाहिक नाटक) तेसर दृश्य ( विष्णुलोक। विष्णुजी सर्पशय्या पर लेटल छथि आओर माय लक्ष्मी हुनकर पैर दबा रहल छथिन्ह।  नारदजी केर आगमन।) नारदजी : नारायण...नारायण...नारायण....सृष्टि केँ पालनकर्त्ता भगवान विष्णुजी आओर माय लक्ष्मीजी केँ प्रणाम ! विष्णुदेव : आउ नारद !  अहाँ केँ की खबर अछि ? बड़ दिन बाद दिखाई देलहुँ अहाँ। सब ठीक-ठाक छथि ने ? लक्ष्मीजी : सचहौं मे,  अहाँ विष्णुलोक एनै छोडि देने छेलियै की ? कतऽ नुकायल रहैत छी अहाँ ? माय सरस्वती आओर ब्रह्मदेव कुशल छथि ने ? नारदजी : माय लक्ष्मी, ब्रह्मलोक मे सब ठीक छथि। पिताजी आबि रहल छथि। ओ विशेष गप्प करताह। रस्ता मे माय पार्वती सेहो आबैत होयतीह। विष्णुजी : सब कियो केँ ऐ लोक मे स्वागत छन्हि। आबऽ दियौन्ह सब कियो केँ । लक्ष्मी, किछु जलपान केँ बेवस्था केल जाउ। लक्ष्मी : सब कियो केँ आबऽ दियौन्ह। कतेक आदमी आबि रहल अछि से पता लागत तब न ? विष्णुजी : हँ, ठीक छै।हमर पाएर दबैनै बन्न करू।काज बेर मे पाएर दबौनै उचित नहि थिक। लक्ष्मी : हमरा तँ किछु काज रहैत नहि अछि, तँ की करू अहुँ के पाएर दबा कऽ चिनिया बेमारी केँ अपना सँ दूर भगाबी ने ? विष्णुजी : (ठहाका मारि कऽ हँसैत बजलाहा) नीक करैत छी। अहाँ अपन परयोजने हमरा जाँतैत छी। नारदजी : नारायण...नारायण....माय लक्ष्मी आओर सृष्टि के पालन केनिहार भगवान विष्णु केँ बीच नोंक- झोंक बड नीक लागि रहल अछि। नारायण...नारायण....। माते ! अहाँ बसैल जाउ, हम कोन बेर काज आयब ? हम सभ कियो केँ सेवा लेल बेवस्था कऽ दैत छियैन्ह। हमरा बहिर्गमन लेल आज्ञा देल जाउ भगवन ! विष्णुजी : हँ, नारदजी ! अहाँ इ बेवस्था करवा मे सक्षम छी। केल जाउ बेवस्था। ठीक छै अहाँ बेवस्था लेल जा सकैत छी। हम लक्ष्मी संग मिलि केँ अतिथि केँ इंतजार क रहल छी। ( नारदजी अतिथि केँ सेवा लेल बेवस्था मे लागि गेलाह । अनअ भगवान विष्णु आओर माय लक्ष्मी दुनू गोटे अतिथि केँ स्वागत लेल बैसल छथि। नारदजी पहिनै परदा केँ पीछा आज्ञा लक चलि गेलाह।) -संतोष कुमार राय 'बटोही', मंगरौना अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.प्रणव कुमार झा- नजैर प्रणव कुमार झा नजैर जोया नाम छल ओकर। तीन भाई बहिन मे सभ सँ पैघ। ओकर माय हमरा घर मे साफ सफाई के काज करय छल। कोरोना महामारी के हुईल एहन उठलय जे ओकर माय-बाप दुनु के उठा लेलकई। तीन टा अनाथ धिया-पूता के देखनाहर कियौ नै। गरीब-गुरबा के संपत्ति के नाम पर कथिए रहय छैक! आ बिनु संपत्ति ककरा के पुछय छैक! अस्तु जे कियौ रिश्ता-नाता मे छल ओकर, से सब कन्नी काटि नेने छल। अपरिपक्व छल ओ, मुदा ठिक ठाक होसियारी छलय ओकरा मे। बहुत जल्दीए बुझि गेल छल जे आब अपन आ दुनु छोट भाई बहिन के जीवन ओकरे चलेबाक छैक। बी-कॉम फर्स्ट ईयर के छात्र छल ओ, ओपेन से स्नातक कऽ रहल छल। कनिमनी कंप्यूटर के ज्ञान सेहो छलय। ओना त जै परिवेश से ओ आबाय छल तै मे एखनहु धिया के स्नातक तक पहुंचनाई कम्मे देखऽ लेल भेटय छै। मुदा महानगरक वातावरण, आ संगत आदि के असर हेतइक जे ओ बी-कॉम कऽ रहल छल। कतेको ठाम आजीविका लेल किछ काज-धाज के सिफ़ारिश लेल गेले हेतइक। हमरो लग आयल छल। कहलक, साहेब माय-बाप के गुजरला के बाद तीनु भाई-बहिन के पेट चलायब हमरे ज़िम्मेदारी अछि। माय जेकन साफ-सफाई के काज मे त दक्षता नै अछि, मुदा कॉमर्स से बारहमी केने छी। कप्यूटरो चला लय छी। यदि कतौ कोनो ऑफिस मे छोट मोट काज धरा दितियई त बड्ड उपकार होइत अहांक। हमर एकटा मित्र छलाह प्रॉपर्टी डीलिंग आ बिल्डिंग मेटेरियल सप्लाई के काज करय छलाह। बढ़िया काज चलय छलइन। छोट छिन ऑफिस छलईन। पता लागल जे हुनका ऑफिस मे एकटा कंप्यूटर ऑपरेटर आ हिसाब किताब राखय बला के आवश्यकता छलइन। हम हुनका से आग्रह केलहु जे ऐ लड़की के राखि लेल जाय, किए त एकरा काज के बड्ड आवश्यकता छैक, आ एकरा संगे दू टा आर जान केर पेट जुड़ल छैक। मित्र कनी अनमनेलाह मुदा ओहि काल मे हमर अनुरोध के अंततः मानि ओकरा काज पर राखि लेलखिन। किछु समय बाद एक दिन जोया हमर घर पर एलय। हम किछु लिखाई-पढ़ाई के काज कऽ रहल छलहु। बहुत डेरायल सन, कातर नजैर! ओकर चेहरा पर गहिर उदासी आ डरक छाप छल। आँखि में नोर ढबरल, जे कखनोक ढब सँ गिर पड़य आ ओकरा कपार पर लटकल केशक संग मिलि कऽ ओकर पीड़ा के जेना और बेसिए गहिर बना रहल छल। ओकर चेहरा के भाव से बुझाना जा रहल छल जे ओ अपन भविष्य के लऽ कऽ बहुत चिन्तित छलिह आ ओकरा जिनगी में कोनो बड़का संग्राम चलि रहल होय। ओ बहुत कातर स्वर मे मिन्नति करैत बाजल जे मालिक हमरा नौकरी से निकालि देलाह। हमर कोनो अपराध नई छल। बस एकटा सामान्य सन त्रुटि के लाथे हमरा निकालि देलाह। फेर ओ सबटा खिस्सा हमरा नाइरेट कऽ के सुनेलक, आ मिन्नति कर लागल जे हम ऐ मामिला मे ओकर मदद करी। अस्तु हम एकबेर अपन मित्र के फोन लगेलहु आ ओकरा से सभ बात केलहु। मुदा ओ मित्र छूटिते बजलाह, दोस! अहाँ के कहला पर हम ओकरा काज पर रखलीयइ किए त ओहि समय मे ओकर पेट के बात छलहि तै अहांक बात पर हम राखि लेलियई नै त एकरा हम कदापि काज पर नै राखितहु। हम कहलहु ओकर कोनो अपराध नै! मित्र बजलाह - आब हमरा क्षमा करू आ फोन कटि गेल। फोन कटिते हमर नजैर ओकर नजैर सँ टकरा गेल। ओकर नजैर में एकटा गहिर कातरता छल, जेना ओ बहुत क्षीण सन उम्मीद सँ बँटल होय, दया आ हारि जएबाक भाव साफ देखा रहल छल। ओई नजरि में एकटा अनकहल व्यथा छल, जे हमरा हृदय के चीड़ रहल छल। हमर नजैर मे सेहो एकटा असहाय आ उम्मीद तोड़बाक अपराधबोध सन आबि गेल छल। हम बेसी काल ओकरा से नजैर नै मिला पेलहु। ओकरा भरोस दैत कहलहु, जे कोनो बात नै छैक जल्दीए कोनो ने कोनो काज भेंट जायत। ता कोनो आवश्यकता होय त हमरा अवश्य कहब। बात अइल-गेल भ गेलय। जोया के भी जिनगी कोनो तरहे चलिए गेल हेतइक। मित्र महोदय के कारोबारो चलिते रहल हेतइक। एहिना कै बरष बित गेल छल ई बात के। सभक जिंदगी के गाड़ी अपन आपाधापी मे आगा बढि गेल छल। मित्र महोदय से संपर्क कम, कम की नहिए सन भऽ गेल छल। एक दिन एकटा अन्य मित्र सँ ज्ञात भेल जे ओय मित्र महोदय के थर्ड स्टेज कैंसर छैन। बहुत दिन से गंभीर रूप से बीमार छईथ। ताहि से कारोबार सेहो सिकुड़ि गेलैन अछि। हम एक दिन सांझक बेर मे पुछारि मे मित्र महोदय के घर पहुंचलहु। देर साँझ के समय छल। घरक वातावरण हलका-अँधियार आ शांत छल। कोठरी में केवल एकटा मद्धिम प्रकाशक बल्ब जल रहल छल। मित्र पलंग पर लेटल छलाह। ओकर चेहरा पर थकान आ पीड़ा स्पष्ट आबि रहल छल। अंतिम बेर देखने रही त कत ओ मस्त मौला खाईल-पियल शरीर, दमकैत चेहरा, आ कत्त आब ई सुखल शरीर! देह मे सौंसे हड्डीए टा देखाई। गाल चुटुकि गेल छल। चेहरा हा बदन पर झुर्री स्पष्ट दृष्टिगोचर भ रहल छल। सभटा केस उड़ल (साइत कीमो के चलते)। कोठली मे पहुंचईत देरी हम पलंग पर बैस गेलहु आ मित्र के हाथ पकड़ईत कहलहु- की हाल दोस? ओ हमर आंखि मे तकैत बाजल- हाल की रहत देखिये रहल छहक!(ओकरा चेहरा पर दर्द आ मुस्कानक मिश्रण छल।) फेर हम ओकरा से गप्प करैत ओकर बीमारी आ इलाज सभक विस्तृत हाल खबर लेबय लागलहु आ संगहि विश्वास आ भरोसा के बोल-भरोस सेहो देबय लगलहु। हम दोस अहाँ इलाज आ परहेज करैत रहु, भगवान पर भरोस राखु। समय जे लागय मुदा अहाँ ठीक भऽ जायब। ऐ पर मित्र बाजल दोस, हमरा जीबय केँ बहुत इच्छा अछि, मुदा ई शरीर आरो दिन-प्रतिदिन हारि रहल अछि। हमरा डॉक्टर आ इलाज पर भरोस उठि रहल अछि। तों, कनी ई कागज सब देख लहक ने। की सभ इलाज सही दिशामे चलि रहल छैक? तों कोनो नीक डॉक्टर के नाम बताबह ने। तोहर त कत्तौ नीक ठाम पहचान हेतऽ, किछु जोगार लगाबह ने। आई काइल्ह इन्टरनेट के जमाना मे सभ कियौ सभ किछु के अपने डॉक्टर बनल फिरई छई। नै जानि ई प्रवृत्ति कतेक निक आ कि कतेक बेजाय अछि, मुदा हम कहियो एहन एक्सपर्ट बनबाक प्रयास नै केलहु। हमरा लेखे त ओ कागज पत्तर काला अक्षर भैंस बराबरे छल। मुदा एत्तेक धरि स्पष्ट छल से ओकर निक हॉस्पिटल मे इलाज चलि रहल छल जै पर भरोसा कैल जा सकय अछि। हम मित्र के कोनो खास मदद करबाक स्थिति मे नै छलहु। मुदा मित्र हमरा ई बात कदाचित बहुत आशा से कहने छल। एक बेर फेर, हमर नजैर ओकर नजैर सं टकरा गेल छल। ओकर नजैर मे वैह निराशा आ वैह कातरता देखा रहल छल, जे ओ दिन जोया के नजैर मे देखने छलहुँ। आई फेर सँ हमर नजैर मे वैह विवशता, वैह अपराधबोध उठि रहल छल, जेना ओ दिन उठल छल! [प्रणव कुमार झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली] अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.आचार्य रामानंद मंडल- विजातीय बिआह आचार्य रामानंद मंडल विजातीय बिआह रेलगाड़ी मुजफ्फरपुर से हैदराबाद के लेल भागल जा रहल हय। हैदराबाद मे सगर राति दीप जरय आयोजित हय। कथा गोष्ठी मे भाग लेबे सीतामढ़ी से दयानंद मंडल जा रहल हतन। वोही डिब्बा में  खगड़िया के राजनंदन मंडल सेहो बैठल हतन। दूनू गोरे के परिचय पात भेल।दुनू गोरे मे गपशप होय लागल।राजनदंन बाबू बतैलन -हमहू हैदराबाद सगर राति दीप जरय मे भाग लेबे जा रहल छी।हम खगड़िया उच्च माध्यमिक विद्यालय मे प्रधानाध्यापक छी। दयानंद बाबू कहलन -हमहू सीतामढ़ी उच्च माध्यमिक विद्यालय मे प्रधानाध्यापक छी। घनिष्ठता बढैत गेल। दयानंद बाबू आब भोजन के आर्डर करे त राजनदंन बाबू के सेहो लेल। पेमेंट दयानंद बाबू करय।राजनदंन बाबू चाय नाश्ता के आर्डर करय त दयानंद बाबू के सेहो लेल। पेमेंट राजनदंन बाबू करय। हैदराबाद मे दयानंद बाबू अपन रचित कथा -विधवा के पियार पढलैन त समीक्षा राजनदंन बाबू कैलन।राजनदंन बाबू कहलन -बिधवा पुनर्विवाह के लेल कथा समाज के उद्वेलित करय हय।राजनदंन बाबू अपन रचित कथा -प्यार मे धोखा पढलैन।आ समीक्षा दयानंद बाबू कैलन। दयानंद बाबू कहलन कि एगो पत्नी केना बेबफा हो जाइत हय आ अपन प्रेमी पति के मरे के लेल मजबूर क देइ छैय। दैहिक आकर्षण आ बासना के आग मे जरैत पत्नी परिवार के समाप्त क देइ छैय।आ सेवारत पति के मरला के बाद अनुकम्पा पर नौकरी प्राप्त कर कथित प्रेमी संग विलासिता पूर्ण जीवन व्यतीत करय हय आ अंत मे प्रेमी द्वारा छोडला पर एकांगी जीवन व्यतीत करय हय। दयानंद बाबू आ राजनंदन बाबू मे प्रगाढ़ता बढल। राजनंदन बाबू पुछलन -अंहा के नजर मे कोनो सरकारी सेवारत लरिका हय। हमरा अपन लरकी के बिआह करय के हय।हमर लरकी पिरिया एम ए हय। दयानंद बाबू बजलन -हमर लरिका शुभम राज इंजीनियर हय आ सिंचाई विभाग पटना मे सेवारत हय।वो विवाह योग्य हय।हम हुनकर विआह करय चाहय छी।राजनंदन बाबू बजलन -तब त हमरा आ अंहा संबंधी बन जाय के चाही। दयानंद बाबू बजलन -शुभम से पूछ लेय छी आ मोबाइल लगैलन।शुभम बजलन -हेलो। बाबू जी। दयानंद बाबू -हेलो।शुभम।हम सगर राति दीप जरय कार्यक्रम  हैदराबाद मे आयल छी। हमरा लग खगड़िया के राजनंदन बाबू हतन।हिनकर लरकी एम ए हय आ इ अपन लरकी के बिआह करय चाहे छतिन।आ हम हिनका बचन अंहा के लेल दे देलिय हय। अंहा के कि विचार हय। शुभम बजलन -बाबू जी हम अंहा से बाहर न छी। अपने के जे बिचार हय कैल जाव। दयानंद बाबू -ठीक हय। आब दयानंद बाबू बजलन -राजनंदन बाबू। शुभम राजी हय।बिआह के लेल हम तैयार छी।घर जा के तैयारी कैल जाय। रेलगाड़ी से दूनू आदमी घर पहुंचलन। दयानंद बाबू अपन परिवार में सभ बात बतैलन। परिवार के सभ लोग खुशी जतैलन। राजनंदन बाबू अपन परिवार मे सभ बतैलन। परिवार के सभ लोग खुशी व्यक्त कैलन। समय पर खुब लेब देब के संग पटना के एगो विआह भवन मे विआह भेल।बिआह के बाद शुभम नव दुल्हन संग अपन घर अयलन।सभ विधि होयल। शुभम समय-समय पर घर आबे लगलन।समय खुशी पूर्वक बितय लागल। एकटा राति पिरिया आ शुभम अपन अपन परिवार के बारे मे बात करैत रहय।त बाते -बात मे बतैलक कि हम मल्लाह छी। शुभम कहलक कि हमरा इंहा मल्लाह त सहनी बोलय हय। अंहा के बाबू के नाम त राजनदंन मंडल हय।पिरिया कहलक कि हमरा इंहा मल्लाह मंडल सेहो बोलय हय।शुभम कहलक कि हम त धानुक छी आ हमरा सभ के टाइटिल मंडल हय।आ दूनू मे विजातीय के लेके  मतभेद पैदा हो गेल।इ बात परिवार मे फैल गेल।अंत मे दूनू परिवार मे मतभेद हो गेल आ बात तलाक त पहूंच गेल। अदालत मे तलाक के लेल मुकदमा भे गेल।पिरिया अपना नहिरा मे रहय लागल।आ शुभम पटना मे रहे लागल। एकटा रात शुभम के फुड प्वाइजनिंग हो गेल। सबेरे जौं बहुत देर तक कमरा से न निकलल त मकान मालिक के संदेह भेल। कमरा के दरबजा के पिटलन। कमरा से कोनो तरह के आवाज न आयल। कमरा के दरबजा तोड़ल गेल।शुभम बेड के नीचा गिरल लोआर -पराल मिलल।मकान मालिक एगो नर्सिंग होम में शुभम के एडमिट करैलक आ सीतामढ़ी घर पर मोबाइल से जानकारी देलक। शुभम के बाबू दयानंद बाबू आ माय नर्सिंग होम पटना अयलन आ उपचार होय लागल। नर्सिंग होम में शुभम के ससुरार खगड़िया के एगो व्यक्ति एडमिट रहय।वो शुभम के पहचान लेलन।कि इत राजनंदन बाबू के दमाद हतन।वो चपके से राजनंदन बाबू के खबर दे देलन।राजनंदन बाबू अपन पत्नी आ बेटी पिरिया के संग नर्सिंग होम पटना मे पहुंच गेलन आ शुभम के सेवा सुसुर्सा मे लाग गेलन।पिरिया त राति दिन शुभम के सेवा करे लागल। शुभम पूर्णतः स्वस्थ हो गेलन।शुभम आ पिरिया के मतभेद प्रेम मे बदल गेल।दूनू परिवार आपसी मतभेद भुला के एक भे गेल।आब विजातीय बिआह मानवीय बिआह मे बदल गेल।आइ दयानंद बाबू बाबा आ राजनंदन बाबू नाना बन गेल हतन।दूनू परिवार खुश आ खुशहाल हय। @आचार्य रामानंद मंडल सीतामढ़ी। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। पद्य ३.१.प्रणव कुमार झा- नगरक सभ्य लोक ३.२.डॉ सुमंगला झा- अपन पीढी ३.३.राम शंकर झा "मैथिल"- (स्मृति शेष)- यौ सुनैत छी/ चुकरी ३.४.प्रमोद झा 'गोकुल'- कतै नुकैलह?/ यैह गीत गुनगुनैय ३.५.संतोष कुमार राय 'बटोही'- खण्ड-काव्य 'उर्मिलाक विद्रोह' ३.६.जगदानन्द झा 'मनु'-१० टा हाइकू ३.७.चंदना दत्त- पर्यावरण दिवस ३.१.प्रणव कुमार झा- नगरक सभ्य लोक प्रणव कुमार झा नगरक सभ्य लोक ई नगर अछि की धूला के फुकना अछि एतुका सभ्य लोक वास्तव में आगिमुतना अछि। कत्तौ गाछ काटि कऽ, कत्तौ पोखैर के भसा कऽ ठाढ़ केलक अछि एत्त सभ्यता के अट्टालिका बना लेलक अछि निगम आ नगरपालिका । रौद मे समेटल बाट पर, भागमभाग रहैत अछि सब, एक दोसर के दाबैत,पिचैत,भागैत डेग दैत अछि सब। धन की मद में बढि रहल अछि अनवरत अनाचार, लोक लाज के एत्त, रहल नहि आब कोनो विचार। ई नगर अछि आ कि स्वप्न के लहरलुटना अछि, एतुका सभ्य लोक वास्तव में आगिमुतना अछि। कखनों सागर के लहर मे जा कऽ, कखनों पहाड़ों पर जा कऽ स्वांग रचइत अछि प्रकृति-प्रेमी होबय के ई फोटो खिंचा कऽ; बनल रहय ढकोसला, कोनो दाम पर हिनक सपना अछि एतुका सभ्य लोक वास्तव में आगिमुतना अछि। जै माटि से सभटा पेलैथ ओकरा ई कहैथ छैथ धूरा पूर्वजक सभ्यता संस्कृति के बिसरलाह ई पूरा बुझल नै छईन्ह जे अंत मे एहि माटि तर घुसना अछि एतुका सभ्य लोक वास्तव में आगिमुतना अछि। रहल नै आब एतुका माटियो सुरक्षित कऽ देलाह ई सभ ओकरो प्रदूषित। कि नदि कि ताल के कहु कथा ! भऽ रहल मृतप्राय ई सबहक व्यथा! चैन भेटत कि अहांके मुईला के बाद मिलि के ऐमे अहाँ सभ सं ई प्रश्न पुनः पुछना अछि  । एतुका सभ्य लोक वास्तव में आगिमुतना अछि। [प्रणव कुमार झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली] अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.डॉ सुमंगला झा- अपन पीढी डॉ सुमंगला झा अपन पीढ़ी अपन पीढ़ी, साठ, पैंसठ सँ, पछत्तर-अस्सी के बीच छईथ I अपना परिचित छथि लालटेन, डिबिया,ढिबरी,टॉर्च इजोत सँ । भनसाक ईंधन जारन घर में, चिर-परिचित छल चिपड़ी-गोइठा I संठी, भुस्सी, लकड़ी, चेरा, घास पात आओर टूटल टटिया । भोर स राति! अंगना-ओसार, बरतन- बासन, झाड़न-बोहारन I मूढ़ी, चूड़ा, चितुआ, सत्तू , भानस-भात स्त्रीगण श्रम सँ । शीत लहरी म संग-संग बैसइत, घूड़, बोरसी, चूल्हि घेराइत I गप शप फूसि साँच बतियाबैत, अल्हुआ, अल्हू, ओढ़ा पकावैत। हमजोली संग खेलैत खेलावैत, साँझक डिबिया में पढ़ैत-पढ़ावैत I बड़-बुजुर्ग के धाख रहल छल, हुनकर सहमति ! आवश्यक छल। मान-सम्मान ! कार्य प्रति अनुमति, मुँह तकैत रहुँ कखन प्रसन्नचित I आग्रह कए अनुग्रहित होएत छलूँ स्वेच्छा सँ अनभिज्ञ रहैत छलूँ I साझा परिवार एकाकी म बदलल, सेहो अद्यावधि टूटल-बिखरल I संघर्ष-वसात म धी-पूत बिछुड़ल, भविष्य-चिंत म भ गेल असगर। - डॉ सुमंगला झा, MA (Soc & Hin), PhD अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.राम शंकर झा "मैथिल"- (स्मृति शेष)- यौ सुनैत छी/ चुकरी राम शंकर झा "मैथिल" (स्मृति शेष)- यौ सुनैत छी/ चुकरी १ (स्मृति शेष)- यौ सुनैत छी यौउ सुनैत छि कनेक कान दियौ न दोसीमना वला भराठ गेल रही कि नैय यौउ सुनैत......! से कि कि भेल कि भेल! कि नै भेल एतेक अनघोल जेना कतहु मेघ गिरल अन्हां कें एहीना छन सँ लागि जाईत अछि जानि नहिं कोन वज्रखसूआ सँ कनेक काल कलेमछे रहु न कलेमछे अन्हां रहअ देलहुँ यौउ सुनैत......! हअमर दिन तअ ताहि दिन वाम भेल हअमर खुंट अन्हांक खुट खुटम खुटा तअ बादो मे एमहर आउ एमहर आउ न देखियौउन सुगनबाबु कें तान पअर तान दए रहल छैथि आहा कतेक सोहनगर एक मिसिया जे अन्हां मुसकिया देलियै हे दैव हे उगलाहा! कोन जन्मक कर्मक भोग यौ सुनैत.....! ज्यों आई भराठ सँ तरकारी नहिं आएल बुझि लिअ एक दू तीन चूल्हा नहिं जरल आई तअ अन्हि चन्ना सन जरि रहल छि किछु मअन पड़ल एहिना तमतमाईत देखने रहि अन्हां हअमर कथाक तेसर दिन अन्हां केबाड़ मे सटल बघुआईत विधकरी वाली मामी पअर यौ आई दिने मे भाँग हुरि लेलहूँ आ कि बताह भगेलहूँ संसारक सबटा भाँग सँ बेसी अन्हांक ओल सन बोल मे अन्हांक सोन संन चमकैत चंगेरा सनक मुखाकृति मे किछु बेसी नहिं भए रहल अछि बेसी! हअमरा तअ कअम बुझना जाअ रहल अछि भटाक ठन ठन.... आँखि फुजि गेल बिलाई दूधक बाटि गिरेलक एकटा आँखि सं बिलाई कें निहोरी एकटा आँखि सँ भिता पअर टांगल लटकल भीतिचित्र कतेक स्नेह सँ भरि राईत जागि जागि कें बुनैत छलिह भीतिचित्र सुग्गा मुँहमे गुलाबक फूल यौ सुनैत.....! बस आब स्मृति शेष जानि नहिं केमहर दअ नुकाएल जाअ रहल अछि जीवनक माधुर्य जीवनक मौउद यौ सुनैत छि...!! बस आब तअ स्मृति शेष २ चुकरी कतेको माह कतेको दिन सँ ताकैंत छलहूँ ऐय कोठी ओय कोठी भन्सा घअर कतेको माह कतेको ....! भगलू काअ कें धनहारी कनियाँ बा कें सोनपेटारी कतह कतह नैय छानी मारलहूँ मुदा जानि नहिं कतअ घुसल केमहर कतअ ओ सुटिआ पसीना चुवैत हाकल पियासल बरेरी वला पाया सँ सटिकए अँखि मुनने किछु स्मृति तरंग कतेको माह कतेको....! गोल गोल चुकरी कुम्हार घुमैत चाक घुमावैत कुम्हार सानल मैइंट ग्रहैईत कुम्हार चाक कें गोल बाल साम्राज्य हअमर ढ़कना हअमर सर्वा अपन अपन सबहक मांग घुमैत चाक घुमावैत....! हअमर चुकरी हअमर चुकरी आवा मे कथिसँ पाअकत बारि-झारी गाछी-वृछी तोरैत ओदारैत करची गौईठा कतेको माह कतेक दिन...! माइंट लेपल आवा लागि गैल दुहाई हे कमला माअ तौउला घईळ सङ्ग चुकरी ज्यों सुन्नर सँ पाकि जाएत चुकरी कें पहिल पाई तोरे बाबा आ बरका काअ कें देल मौउसी मामा नानी कें देल कोना कोना केंचा-कौउरी भरलहूँ लळका चुकरी कतेको माह कतेको ...! ओ चुकरी नहिं ओ जीवनक प्रबंधनक एकटा पाठ छल जीवन जीवाक् कला छल बारिअ-बोह अन्हर-बिहायर सङ्ग लड़बाक सोहनगर युक्ति ओ बाबा कनियाँ बा कें बढ़ पियरगर सनेश छल कनियाँ बा कें मोउद सन बोल वाउ वाउ कि भेल ई रहल आन्हाक चुकरी तखने चेहा उठलहूँ...! आंखि फुजि गेल बअस आब एकटा स्मृति शेष बचल हमर चुकरी हमर चुकरी! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.४.प्रमोद झा 'गोकुल'- कतै नुकैलह?/ यैह गीत गुनगुनैय प्रमोद झा  'गोकुल' कतै नुकैलह?/ यैह गीत गुनगुनैया १ कतै नुकैलह? चण्ठ‌ ठण्ढ की तोरो चपलकह ?? चढ़ि रथ दौरह चीरि पयोद खारा रौद खारा रौद कनकन्नी सुनसुन्नी छै बेजोड़ अकड़ल जकड़ल पोरे पोर । धधकय धधरा तोरम् तोर तैयो नाम जपै सब तोर ।। हुलुकि ताकि की बिलैलह मन मोद खारा रौद खारा रौद घूरक अल्हुवा गेलैये पाकी खोरि खोरि चौदिस हम ताकी तैयो पुरै कहांँ ककरो छाकी धिपले खिचड़ी खुवा गै काकी ! हंँसलै कमल जगलै आस प्रमोद खारा रौद खारा रौद २ यैह गीत गुनगुनैया अमाक अन्हरिया राति हो कि चानक धवल इजोरिया उषाक मधुर भोर हो कि टह टह टनक दुपहरिया । सरस रभस स्वाद नव नव चाखू रभसू बनि बहु रुपिया अदिष्ट बनल सहजोर अहाँके काटय सतत हमर अहुरिया । भव सागर के के थाहि सकैछ ? लय भावक भंजित लकुटिया शापित जीवन संतप्त मन के नहिं ठंढा सकैछ शीतलहरिया । बदहवास उड़ल होसहवास उपहास हास दिन रतिया । कर्म पथक पथिक इहो बटोही तैयो पीटय पुनि पुनि  छतिया । कर्मक खेल मे फेल भेलह तों तें जुनि रुकह भव नाव खेबैया इष्ट सिद्ध करह वा देह हतह तों बढ़ह चलह यैह गीत गुनगुनैया । - प्रमोद झा  'गोकुल',  दीप,  मधुवनी (विहार)  फोन-9871779851 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.५.संतोष कुमार राय 'बटोही'- खण्ड-काव्य 'उर्मिलाक विद्रोह' संतोष कुमार राय 'बटोही' खण्ड-काव्य  'उर्मिलाक विद्रोह' ( तेसर खेप ) लखन केर प्रतिवाद लखन हम पुत्र राजा दशरथ केर छी। गामी भातृ-धर्म पहिले पथ केर छी । राजधर्म  हम मानल अपन सुख छोड़ि कऽ। वनवास हम भेलहुँ उर्मि सँ मुख मोड़ि कऽ। कुन कोना मे छिपायब हम अपन प्रेम रे भँवर ! हे चिरैया ! लऽ अबिहें उड़ि कऽ उर्मि सँ खबर । बड़ अभागल सचहौं हम अवध सँ भेलहुँ दूर। भाग्यक लेखा के मेटत  हम  भेलहुँ  मजबूर । माय सुमित्रा पिता राजा दशरथ कोना होयत ? बिगाड़ल अयोध्या केँ राज फेर ओना साजत ? नगरक प्रजा रोकि पीछा नदी तट आयलाथि। माय केकैयी एको बेर हमरो नहि  रोकलाथि । हे जनककुमारी ! केलहुँ  हम बड़  अन्याय । राजधर्म निहेबाक कारणे ऐलहुँ संग रघुराय। नहि आकाश नहि पाताल बीचि फँसल छी। अहाँ सँ हम अहाँ हमरा हिया मे धँसल छी। एक विश्वास अहीं पर अहाँ हमर आँखिक नूर। भयल हमर सभ संजोयल  सपना  चकनाचूर। नहि विसैर जेबै अहाँ नेहिया केँ कसम अछि। समय पर अपन वश नहि हमरो करम अछि । हे उर्मि ! रुसनै-खिझनै ई छोट गप्प,नहि सही । सिनेहियाक नोर बहि रहल, परञ्च उर मे अहीं। राजा दशरथ केर पुत्रवधू अहाँ केर मान अछि । इतिहास साक्षी रहत  इएहा मे  सम्मान अछि । -संतोष कुमार राय 'बटोही', मंगरौना अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.६.जगदानन्द झा 'मनु'-१० टा हाइकू जगदानन्द झा 'मनु' १० टा हाइकू १. सब होएत भवसागर पार कृष्ण नामसँ २. कृपा सदति बना कय राखब हे भगवान ३. वृंदावनके कन-कनमे कृष्ण वास करैत ४. नंदगाममे सबतरि देवता गोपीभेषमे ५. निधिवनमे गोपाल गोपी संग रास रचैत ६ धर्मक संगे सगरो छथि कृष्ण कुरूक्षेत्रमे ७. नारीमे सारी की सारीमे नारी छै जानथि कृष्ण ८. मथुरा एलौं कृष्णमय भेलहुँ अहीँक कृपा ९. राखब कृपा सबपर माधव सुनूँ विनती १०. बसि जाउ हे हमर राधा रानी 'मन' मनमे - जगदानन्द झा 'मनु', मोबाइल नंबर ९२१२ ४६ १००६ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.७.चंदना दत्त- पर्यावरण दिवस चंदना दत्त पर्यावरण दिवस बाबा,दैखियौ अखबारमे हमर फोटो छपलै मोबाइल पर वीडियोकाॅलमे प्रसन होइत जूही बाजल । वाह बौआ, खुब खुशीक गप्प सुनेलैं भोरेभोर । कोन कमाल कयलक हमर पोती से कहां बुझलहुं ?बाबा जिग्यास  कयलनि। देखे नहि छियै बाबा अखबारमे , हम अपन पाठशालामे एकटा गाछ  लगेलहुं मैंम संगै । से किये , विद्यालयमे तों किये गाछ लगेलहक ओतय चपरासी नहि छह, आ ई अखबारमे छपय वला कोन गप्प भेल हमरा भेल प्रथम श्रेणीमे उत्तीर्ण केने छह तैंफोटो छपलक अखबार वला आब चश्मासं ओतेक नीक सं नहि देखाय अछि,ई लाकडाऊन खत्म हैत त जेबै डाक्टर लग। हं बाबा ,चलि जायब आ दाइयो के ल जेबैन्ह हुनको चश्मा पुरान भ गेल छैक। ओह ,बाबा काल्हि पर्यावरण दिवस छलय ने तकरे समारोह छल पाठशालामे, तें हम  गाछ लगेलहुं फेर मैंम आ सर   गाछक महत्व पर भाषण देलखिन्ह। जूही सभटा खेरहा फरिछाक बाबाके कहलक । बाबा ,मैम  कहलखिन्ह हमरा सभके गाछ नहि काटबाक चाहि  गाछसं आक्सीजन, फल फूल ,औषधि, लकडी आदि त भेटबे करैत अछि वन्यजीव के आश्रय सेहो भेटैत अछि । हमसे बड्ड  थपडी बजेलहुं। बाबा :हं आब त ई सभ बात धियापुताके पढाबय पडैत अछि । हमरा सभकेके समयमे ई सभ पढाई  नहि होय। जूही :बाबा  हमसभ पर्यावरण विज्ञान पढय छी ने। हं आब त बडका इस्कूलक बडका बात, हमर बाबा सभत बडका पोखरि खुदाय देने छलखिन्ह ओकर महार पर आम लीची, नीम कटहर सपाटू दाखिल अरनेवा लगा देने छलखिन्ह। भरि गाम लोक नहाय ,बर्तन भाडा मजाय , मंडिलमे पूजा करय आ गाछीमे बैसि आम खाय । हम सभ कहियो पर्यावरण दिवस नहि मनेने रहि गाम पर गाछमे पानि  पटबैत बाबा बजलाह। -चंदना दत्त, रांटी, मधुबनी; ई मेल duttchandana01@gmail.Com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह ४०९ म अंक ०१ जनवरी २०२५ (वर्ष १८ मास २०५ अंक ४०९) || 75 76 || विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in

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