ISBN Number: 978-93-342-2187-9 (Book) ISSN 2229-547X (online) 𑒀 विदेह ४१२ म अंक १५ फरबरी २०२५ (वर्ष १८ मास २०६ अंक ४१२) [विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। कॉपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- २०२५. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२५. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. It is a platform for scholars, researchers, writers and poets to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, and poetry in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@gmail.com. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover designed by AUM GAJENDRA THAKUR Videha e-Journal: Issue No. 412 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.अंक ४११ पर टिप्पणी (पृष्ठ १-१) गद्य २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-४ (पृष्ठ ३-७) २.२.प्रमोद झा 'गोकुल'-हिजड़ा (पृष्ठ ८-१०) २.३.परमानन्द लाल कर्ण-तीर्थक्षेत्रक माहात्म्य-२ (पृष्ठ ११-१५) २.४.लाल देव कामत-ऊर्जस्विता (पृष्ठ १६-२२) २.५.आशीष अनचिन्हार- साहित्य अकादमीमे नैतिकता-संदर्भ मैथिली प्रभाग-विशेष संदर्भ नचिकेताजीक कार्यकाल (पृष्ठ २३-२५) २.६.आचार्य रामानंद मंडल-महाकवि चंदा झा बनाम भाषाविद ग्रियर्सन : मिथिला भाषा/ अशोक वाटिका मे सीता संग वार्ता भाषा बनाम मानुषी भाषा (मैथिली) (पृष्ठ २६-२९) २.७.प्रणव कुमार झा-जतय मोन ततै हम(लघुकथा) (पृष्ठ ३०-३३) २.८.कुन्दन कर्ण- डेरा (पृष्ठ ३४-३४) २.९.निर्मला कर्ण- गोइठा मे घी सुखायब (पृष्ठ ३५-३६) २.१०.डॉ विद्या नाथ झा- स्वर्ग केहेन ? नर्क केहेन ? (पृष्ठ ३७-४६) पद्य ३.१.कल्पना झा- बकलेल नय छैं (पृष्ठ ४८-४९) ३.२.राज किशोर मिश्र-सभ्यताक भ्रम (पृष्ठ ५०-५४) ३.३.प्रमोद झा 'गोकुल'-सहर्ष मड़ाल (पृष्ठ ५५-५५) ३.४.जगदानन्द झा 'मनु'-३० टा हाइक (पृष्ठ ५६-६५)
विदेह ४१२ म अंक १५ फरबरी २०२५ (वर्ष १८ मास २०६ अंक ४१२) || 65 64 || विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in १.अंक ४११ पर टिप्पणी आशीष अनचिन्हार प्रणव झाक सचित्र यात्रा विवरण नीक लागल। एहि तरहक विवरण पाठक लेल नीक रहत आ उत्सुकता बनेने रहत। एहन-एहन यात्रा विवरण आरो एबाक चाही। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। गद्य २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-४ २.२.प्रमोद झा 'गोकुल'-हिजड़ा २.३.परमानन्द लाल कर्ण-तीर्थक्षेत्रक माहात्म्य-२ २.४.लाल देव कामत-ऊर्जस्विता २.५.आशीष अनचिन्हार- साहित्य अकादमीमे नैतिकता-संदर्भ मैथिली प्रभाग-विशेष संदर्भ नचिकेताजीक कार्यकाल २.६.आचार्य रामानंद मंडल-महाकवि चंदा झा बनाम भाषाविद ग्रियर्सन : मिथिला भाषा/ अशोक वाटिका मे सीता संग वार्ता भाषा बनाम मानुषी भाषा (मैथिली) २.७.प्रणव कुमार झा-जतय मोन ततै हम(लघुकथा) २.८.कुन्दन कर्ण- डेरा २.९.निर्मला कर्ण- गोइठा मे घी सुखायब २.१०.डॉ विद्या नाथ झा- स्वर्ग केहेन ? नर्क केहेन ? २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-४ कल्पना झा मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-४ तन्त्रनाथ-दग्ध' कवि होएबाक आरोप सँ आरोपित 'व्यास' जी
दरभंगा जाए, बड़ी राजमाताक समक्ष हरिपुर 'बख्शी' टोलक निवासीक रूप मे अपन परिचय दएनिहार एकटा बालक; जनिका ओहि गाम मे केओ चुल्हाइ, केओ नुनू, केओ भचाइ केर नाम सँ चिन्हैत छलनि, से बालक विद्यार्थीए जीवन मे अपन बहुमुखी प्रतिभाक प्रदर्शन करैत, मैथिल समाज मे प्रसिद्धि पाबए लागल छलाह। कुशाग्र बुद्धिक कारणेँ शिक्षाक क्षेत्र मे सभदिन, सभठाम, माने स्कूल सँ कॉलेज धरि, अपन विशेष पहचान बनएबे कएलनि, संगहि साहित्यिक गतिविधि मे सक्रियता सेहो विशेष पहचान दिऔलकनि।
'व्यास' जी १९३४ में प्रथमा, १९३६ मे मध्यमा आदिक डिग्री प्राप्त कएलनि। मिथुन राशिक रहने स्वाभाविक रुपें ज्योतिष-विद्या मे हुनकर विशेष अभिरुचि छलनि। गणित पर अधिकार रहलनि, तेँ ज्योतिष-विषय मे डिग्री प्राप्त करबा मे विशेष असौकर्य नहि भेलनि। तत्पशचात पटना साइन्स कॉलेज मे नाम लिखाओल गेलनि...पछाति इंजीनियकिंरग कालेज मे। सौभाग्यवश पाठ्यक्रमक पढ़ाइक संग हुनका साहित्यिक अभिरुचि केँ संवर्धित करबालेल यथोचित वातावरण भेटलनि बिहारक राजधानी पटना मे। ओत्तहि सुभद्र बाबू रिसर्च करैत रहथि। हुनका सँ सम्पर्क भेलनि। प्रोफेसर हरिमोहन झाक आशीर्वाद प्राप्त कएलनि। १९३८ मे दरभंगा सँ स्व.रमानाथ बाबू द्वारा सम्पादित त्रैमासिक 'साहित्यपत्र' मे धारावाहिक रूप मे प्रकाशित श्रध्देय तन्त्रनाथ बाबूक 'कीचकवध'क छन्द विशेष आकृष्ट कएलकनि 'व्यास' जी केँ, ई गप्प ओ स्वयं स्वीकार करैत छलाह।
तन्त्रनाथ बाबूक कीचक-वध सँ ततेक प्रभावित भेलाह 'व्यास' जी, जे ओहि प्रभावक प्रभावेँ एकटा महाकाव्य लिखि लेने रहथि। मुदा से कत्तहु हेरा गेलनि, जे फेर नहिए भेटलनि कहियो। ओना एहि हेरा जेबाक प्रसंग पर हमरा मोन मे तत्क्षण इएह आबि रहल अछि, "जे होइत छैक से नीकेँ होइत छैक" कारण जँ ओ महाकाव्य प्रकाशित होइतनि तँ आरो बेसी आरोप लगितनि, जे 'व्यास' जी 'तन्त्रनाथ -दग्ध' कवि छथि। जाहि व्यक्तिक व्यक्तित्व सँ हमसभ प्रभावित होइत छी, ओहने गुण अपना भीतर विकसित करबाक प्रयास करब स्वाभाविक अछि। तहिना कोनहुँ कविक रचना सँ प्रभावित होइत हुनकर अनुकरण मे लिखब, सामान्य बात छैक। तँ से किछु गणमान्य केँ 'व्यास' जी, तन्त्रनाथ बाबूक अनुकरण करैत बुझा पड़लथिन। आ एही कारणेँ आरोपित भेलाह, बहुत लोक कहए लगलथिन, 'व्यास' जी 'तन्त्रनाथ -दग्ध' कवि छथि।
जखन कि आगाँ चलि कऽ हिनकर सन्यासी (खण्ड-काव्य) एवं प्रतीक (कविता-संग्रह) मे संकलित अनेकों काव्य-रचना मे तन्त्रनाथ बाबू अथवा आन कोनो कविक एक रत्ती प्रभाव नहि भेटत। 'पतन' अपना ढंगक काव्य-रचना थिकनि.. ककरो कोनो प्रभाव नहि ... पूर्णरूपेण मौलिक। 'व्यास' जीक कहब छलनि जे "प्रत्येक कवि अपन रस्ताक तलाश स्वयं करैत अछि। एहि मे पूर्व सँ अबैत कतेक पन्थ, कतेक भाव सँ प्रभावित होइत रहैत अछि। ब्लैंकभर्स... माइकेल मधुसूदन भारत मे प्रचलित कएलनि, अपन मेघनाद-वध मे। तकर बाद तन्त्रनाथ बाबू कीचक-वध मे। हमर कवि-जीवनक आरम्भिक काल छल, हमरो नीक लागल।" कहबाक माने कवि-जीवनक आरम्भिक दौर मे कोनो विशेष कवि सँ प्रभावित होएबाक बात केँ 'व्यास' जी सामान्य ओ स्वाभाविक क्रिया मानि रहल छथि। एहि मे कोनो हर्ज बला बात नहि, तेहन सन।
दुर्गापूजाक अवसर पर मिथिला मिहिर मे प्रकाशित तन्त्रनाथ बाबूक एक 'सॉनेट' (चतुर्दश-पदी) सेहो 'व्यास' जी केँ बेस प्रभावित कएने छलनि। ओहि छन्दक अनुकरण कए ओ पहिल सॉनेट 'सूर्य' १९३८ ई. मेष-संक्रान्ति दिन लिखलनि। एहि चतुर्दश-पदीक किछु पाँती एहि तरहेँ अछि--
जाहि तेज-पुञ्जक अबइछ किछु अंश
शक्ति भरल ज्योतिक तरङ्ग, एहि प्रांत
जीवन रूप, तथा जाइछ आश्रांत
शेष कतए अज्ञात ! विश्वसर-हंस ।
आदि-शक्ति-भाजन, शुभ दीप्त ललाम
ज्योति पदमे स्वीकृत करिअ प्रणाम।
एहि तरहेँ 'व्यास' जीक लेखनी रफ्तार पकड़ैत गेलनि। लोक 'नोटिस' करए लगलनि। पहिल काव्य-रचना 'विदाइ-गान'क उपरान्त किछु छिटपुट कविता सभ लिखैत रहलाह 'व्यास' जी।किछु अंग्रेजी कविताक अनुवाद सेहो कएलनि। विद्यार्थीए जीवन सँ हुनकर लेखनी निर्बाध चलैत रहलनि।
१९३८ मे 'सॉनेट'क उपरान्त 'व्यास' जी 'ब्लैंक भर्स' सेहो अपनौलनि। कहबाक माने सभ तरहक प्रयोग करैत रहलाह। कोनो एक तरहक 'पैटर्न' मे बान्हल नहि रहलनि 'व्यास' जीक काव्य-रचना। पटना मे, १९३९ मे विद्यापति स्मृति-पर्वक आयोजन धूम-धामक संग सम्पन्न भेल रहैक । काव्य-पाठक हेतु 'व्यास' जी केँ सेहो आमन्त्रित कएल गेल छलनि। ओहि दिन, एक साँस मे एक बैसकी मे १७४ पंक्तिक कविता केँ पूरा पाठ कएलनि 'व्यास' जी। आ मूलतः ओही दिनक 'विद्यापतिक मृत्यु' शीर्षक कविताक-पाठ करबाक फलस्वरूप 'व्यास' जी केँ लोक एकटा मैथिली कविक रूप मे चीन्हए-जानए लगलनि। तकरे बाद सन् १९४१ मे 'व्यास' जी सन्यासी खण्ड-काव्य लिखब प्रारम्भ कएलनि। खेपा-खेपी लिखैत चारि बर्ख मे पूरा भेलनि। मौलिक कथानक सँ युक्त ई खण्ड-काव्य १९४७ मे धारावाहिक रूप मे मिथिला मिहिर मे छपलनि। पछाति पोथी- रूप में सेहो छपलनि, मुदा 'कुमार' उपन्यासक बाद। जखन कि लिखलनि पहिने 'सन्यासी' खण्ड-काव्य मुदा प्रकाशित भेलनि पहिने 'कुमार' उपन्यास। जाहि 'कुमार' उपन्यासक सृजन 'रिएक्सन' मे कएल गेल छलए 'व्यास' जी द्वारा।
संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-3 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.प्रमोद झा 'गोकुल'-हिजड़ा प्रमोद झा 'गोकुल' हिजड़ा
गाड़ी हुलकल जारहल छलै आ नितीश अपन उपरका बर्थ पर हिचकोला खाइत आँखि मुनने सूतल छलाह ।तखने कोनो टीसन पर झटकाक सं गाड़ी रुकलै कि हुनक आँखि अकस्मात खुजि गेलैन ।एमहर ओमहर आँखि घुमाके देखलनि ते ककरो आबाजाही नै बुझेलैन ।मात्र दूटा किन्नर थपरी बजबतै भीतर प्रवेश केलकै से देखि ओ आरो गबदी मारि निचेष्ट जकाँ आँखि मूनि लेलैन। ओ दुनू किन्नर बोगी के दुन्नू कात सँ अपन चिरपरिचित अंदाज मे वसूली करय लागल ।सीटल साटल एकटा युवकक गाल के ऐँठैत ओ बाजलि-बड्ड सुन्नर लगै छेँ रे चिकना ! मोन ते होइये जे तोहर दुनू टमाटर सन गाल पर अपन ठोरक छाप छोड़ि दियौ !दही जेबी मे हाथ आ ला दस बीसगो रुपैया !ओ अपन हाथ बढ़बैत बाजलि ।युवक सेहो हरबरा के ओकर हाथ मे एकटा पचासक नोट थमा देलैन ।ढेर आशीर्वाद दैत ओ दोसर तेसर आ चारिम लग ऐहना अश्लील अंदाज मे बढ़ैत गेलि आ सब ओकर हाथ मे मुस्कियैत दस बीसक नोट थम्हबैत गेलै । ओ किन्नर नोट सब के बिलौजक अंदर ठुसैत मोहक अंदाज मे कने आर आगाँ बढ़लि तँ उपरका बर्थ पर गबदी मारने सूतल नितीश पर ओकर नजैर गेलै ।ओ सहैटके पहूँचलि ओकरा लग। पहिने हिला डोला के देखलक ते कोनो असैर नै ।अंततः ओ अपना पर उतैर गेल ।चारू भाग नजैर खिरौलक आ अपन बम्मा हाथ ओकर मार्मिक जगह पर त दैहना हाथे जोर से गाल ऐँठैत बाजलि-किछ देबो करबिहिन कि गबदीये मारने रहबेँ रे चिकना ?ओकर अभद्रता पर भरकैत नितीश खुब जोर सँ बजलाह- -भगै छेँ ऐठाँ से कि नै !!! -नै.. क लेबेँ तोँ हमर ?पैहने हमर मामूली द दे! -नै देबौ !कहै छियौ चल जो नै ते ..कमा के नै खैल होइ छैन ! -हँ ते ठीक छै चल तोहीं राखि ले हमरा !झाड़ू पोछा से ल के खाना पीना तक सब काम क देबौ ,आ हे घरबाली से मोन उचाट भ जेतौ ते बिस्तरो के गरमा देबौ ! -बस्स..मूह नै लगा हमरा से ! हे ले हम एत्तै ऐगला टीसन पर उतैर जाइ छी !के मूह लगाबे तोरा सब से ? -कत्त?पैहने हम्मर द दे..एक हाथे गट्टा पकरि आ दोसर हाथे ओकर डाँर के अपना मे सटबैत बाजलिओ।ओकरा अपना से फराक करैत नितीश बजलाह- -हे ले दस रुपैया ..बेसर्मीक हद होइ छै !आखिर हिजरे छियें कि ने ! की कहलिही ..हिजड़ा..रे सुन ! जैह इस्सर तोरा आरू के बनौने छौ सैह हमरो आरू के बनौने छै ! फर्क एतबे जे प्रकृतिक देल सब वस्तु से तों आरू संपन छेँ आ हम आरू धूवा काया एक रं होइतो विपन! नर ने मादा ! हि..ज..ड़ा..समाज मे उपहास आ अपमानित भय गरलमय जीवन व्यतीत करैक लेल वाध्य! तों ठीके कहलेँ मुदा सुनिले-हमहूँ कागत कलम आ सिलेट पिन्सिल ल के गेल रहियै नाम लिखबैले इसकूल ।माहटर नै लिखलकै हमर नाम आ कहलकै"तों हिजड़ा छियें !ऐ माने आफद !!चल भाग यहाँ से !!!माइयो बाप नै राखि सकलै अपन घर मे ।एक दिन निकैल देलकै ओहो सब अपना घर से आ धकेल देलकै ऐ निर्लज पथ पर जीवन व्यतीत करैक लेल ।जँ सत पूछेँ तँ सबसे पैघ हिजड़ा तोँ आ तोहर समाज छौ!!बुझलीही…एतबा कहैत ओकर आँखि भैर एलै आ कंठ अवरूध सेहो भ गेलै तेँ ऐ से आगाँ नै बाजि सकल ।गाड़ी मे बैसल सबहक दिस नोरैल आँखिये एक बेर देखलक आ फफकि फफकि कानय लागलि ।सब पसीन्जर अपन अपन मूड़ी खसा लेलक जेना वैह सब ऐ समाजक अपराधी हुए ।तखने गाड़ीक गति मन्द भय गेलैक।सैत कोनो टीसनआबि गेलै ।झटकाक सं गाड़ी रुकलै आ ओ भारी मोन सँ उतैर गेलि ------------------------' अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.परमानन्द लाल कर्ण-तीर्थक्षेत्रक माहात्म्य-२ परमानन्द लाल कर्ण तीर्थक्षेत्रक माहात्म्य-२ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.लाल देव कामत-ऊर्जस्विता लाल देव कामत ऊर्जस्विता कविवर राज किशोर मिश्र रचित नव पोथी ऊर्जस्विता जे मैथिली खण्ड - काव्य छी, पढ़बाक सौभाग्य प्राप्त भेल अछि। पोथी एक एहन जटिल विषय पर लिखल गेल छैक,जे मैथिली साहित्य लेले टा नहि वरन् हिंदी जगतमे सेहो ऐ तरहक पोथीक खगता छैक। ऊर्जस्विता नामे सँ सुस्पष्ट बुझाईछ जे ई उर्जा'क विविध अनछुअल प्रसंग सँ पाठककेँ परिचित करेबाक एक सफल परियास होएत। विज्ञान केँ नव - नव अविष्कारक मैमलामे वरदान कहल गेल छैक तँ ओहिक प्रयोगके दुष्परिणाम सँ क्षति देखि अभिशाप सेहो समय पर कहल गेल हन्। एहि धरा धाम पर जे प्रदुषण य आ से नभ तथा समुद्रमे सेहो छैक, जहनकि मानव उर्जाटा संचीत चाहैत अछि। विषयक गम्भीरता पर चर्चा करय सँ पूर्व अपने सब पाठकक समक्ष ई कहबाक य जे ऊर्जस्विता'क प्रकासक रचनाकार श्री मिश्र जी स्वंय छथि जे 2024 ई० म भारतमे छपल य। एहिके आई एस बी एन -978-93-341-0960-3 भेटलनि आ पोथीकेँ दाम दूसय टाका निर्धारित कयने छथि। आकर्षक आ मोटगर छपाई सँ नव साक्षर आओर वृद्ध पाठककेँ खूब भाबैत छैक। अनेकों पुरस्कार सँ सम्मानित कविवर महोदयके हिन्दीमे खण्ड काव्य - उर्जा वर्णन, प्रदुषण पुरष्कृत पोथी छन्हि। दोसरो पोथी हिनक खण्ड काव्यमे यथा- संवेग , जलसंकट बहरा चुकल छन्हि। मातृभाषा मैथिलीमे 19 गोट पोथी हिनक प्रकाशित भ' चुकल छन्हि, जाहिमे बेसीतर कविता संग्रह केर पोथी छैक। खण्ड काव्य ऊर्जस्विता सँ पूर्व "जँ जग जल नहिं होईत" निकलल रहनि। सद्यप्रकाशित मैथिली खण्ड काव्यके पोथी ' ऊर्जस्विता ' मेँ चारि भाग अछि,यथा- ऊर्जाक परीचय ओ महत्व , पारंपरिक उर्जा - स्रोत, नवीकरणीय ऊर्जा - स्रोत, उर्जाक वंचित ओ संरक्षण आ उर्जा आओर पर्यावरण। कविवर राज किशोर मिश्र जीमे उर्जा कूट कूटके भरल छन्हि। आ ओ स्वयं विद्युत बी. टेक. वाराणसी सँ कयने छथि। मुख्य महाप्रबंधक (विद्युत) भारत संचार निगम लिमिटेड सँ अवकाश ग्रहण कय एखनो खूब उर्जावान रहि साहित्य सेवा म रत छथि। कवि जी मिथिलांचल प्रक्षेत्रक मधुबनी जिला अन्तर्गत अड़ेर डीह केर निवासी छथिन। अपना माँटि-पानि सँ सरोकार राखि दिल्ली एन सी आर क्षेत्रक रहवासी बनि गेलाह अछि। ऐ सृष्टिमे इजोतक अनिवार्यता आ ताहिमे रौतका अन्हारके धवल शुक्ल पक्ष सदा बनल रहय से कृष्ण पक्षक गुजगुज तिमीरके हटाकेँ कोना मासोभरि इजोरिया सन् छिटकैत देखाएत सभ्यता। ताहि लेल डिबिया, लालटेन ,मशाल आ चेरा संग कयल ईजोत केर जगह निरन्तर गैसबत्ती आ बिजली बल्व करैत रहय,तकर जड़िधरि अपन विचार काव्यधारामे प्रवाहित कयलाह अछि। पाँति देखू -: ..... सोनहुल सुरूजक उद्योत, धवल कते चन्द्र - ज्योत्सना? स्रष्टा , जोति - देवता,रचलनि, बिना इजोतक सृष्टि कोना? मानवीय सभ्यताक आरम्भिक समय सँ सूर्य - चन्द्र आ तारा सँ मेघ,वरखा आ वाढ़ि सँ तथा पात्र सँ पाथरक टकराहट ओ गाछ वृक्षके रगड़घस सँ तथा वायु- बिहारि सँ उर्जा पेयबाक लोक आभास लगौलनि। प्रागैतिहासिक काल केर वाद जहन मानव वस्त्र धारण करब सीख देलनि तँ अपना देह सँ वस्त्र बहार करैत एक चर- चर- चर- शव्दट ध्वनि सुनि परेखलनि जे उर्जा रूपेँ जानल गेलैक। एखनो भोतिक रूपे अपना सब शरीरक वस्त्र बहार करैत घरी एक तरहक वस्त्रमे विद्युत अकानैत छी। चुम्बकीय विद्युत् परीक्षण लेल सुखद केस कहीं वा झरनी सँ थकैर केँ छोट- छोट कागतक टुकरीमे कंघीकेँ स्पर्श करबैय सँ फराके ओ टुकरा स्वत: उपर उड़ि सटि जाईछ। तेँ कवि अपना कल्पनाके यथार्थ परक सजीब चित्र एहि पाँतिमे गढ़लनि अछि -: ऊर्जा जँ नहिं होइत, सभ्यता कथि पर करैत सिंगार ? तेल बिना जेना दीप ओ बाती भ' जाइत अछि बेकार। तेँ कवि अतितमे निहारि देखैत छथि,जौं ऊर्जा'क वैकल्पिक ओरियान नै भेल रहैत तँ आधुनिक युगमे पेट्रोलियम वगैर वायुयान आ कोयला, डीजल अथवा विजुली बिनु रेलगाड़ी कोना चलैत गन्तव्य धरि! कल कारखाना , जनसंचार आ इन्टरनेट सँ विश्वके गाम- नगर अनजाने रहि जाइत। सृष्टि केर भीतर नव अविष्कारक बलेँ नव सृष्टि सेहो कायम भेल अछि। तैयो विज्ञान आगू बढ़ैत नित्य दिन प्रौद्योगिकी - विस्तार सँ जन सुख - सुविधा निर्माण भ' रहलैक अछि। सब तकनीकी यन्त्रके रचैता मनुख खुदे छथि, ओही ऊर्जा बले मंगल ग्रह पर यान - प्रज्ञान चानधरि टहलि रहलैथ हन्। कविजीक पाँतिक गरहैन देखल जाए -: सृष्टि के भीतर यंत्रसृष्टि , रचि देलक अछि मानव, साम्प्रतिक सुविधा बिना, कहू कतेक सभ कानब? देहाती इलाकामे गिरहत आ जोन आब यान्त्रिक पर निर्भर भेल जाइत अछि। स्वचालित औद्योगिक संयंत्र सँ परिवर्तन सर्वत्र देखाइत छैक। कविजी निराला अंदाजमे कविता सृजित कयलाह अछि -: हट्ठा मे नहि आब बड़द, टेक्टर खेत जोतैत अछि, नहि गीत गाबि बोनिहारिनि , यंत्र धान रोपैत अछि।
गमछा, ओढ़ना, कंबल, कुरता, मशीन बुनैत अछि टालक टाल, घर बनाबैछ विश्वकर्मा सन, कथि लेल कोनो खुष्टम - खेआल?
एकटा दोसरो पाँति देखू -: कंप्यूटर अछि आरो कमाल, दुनियांभरि पसरल नेट- जाल। नदी- समुद्र पर बान्हल पुल, परिस्थिति बना लेलक अनुकूल। कविजीक नजैर आरो आगू जीवाश्म एवं नाभिकीय ऊर्जा पर विशद् रूपेँ गेलैन अछि। कथाकार -कवि जगदीश प्रसाद मंडल जीके सैकड़ो मैथिली साहित्य पोथी बहराइल छैन, मुदा एकोटा एहन नहिं जाहिमे चाह केर चर्चा नहिं भेल होय! से कोइला शिर्षक कवितामे बिनु चाहक चर्चा श्री मिश्र जी कोना नै करितथि। कहलो गेल छैक - ककरा न तोहर चाह- चाह! पाँति द्रष्टव्य अछि -: सुनगैत कोइला आगि पर , उधिया रहल अछि अदहन, भफाईत चाह लेल चौक पर, थहाथहि लोक करैत जखन। ऐ कोयलाक उपयोगिता अनेको क्षेत्रमे होइछ, ऐ के मिझाएल पथरचुना बाला कोयला सँ हम 1984 ई0 मे वस्त्र पर इस्त्री करैत रही,से एन्थरासाइड कोयलाक ताउ सँ कम नहिं होय। कतेक ने बियैन होंकियै जे हाथ दुखा जाइत रहय। आब तँ बिजली हिटर आ स्टोव के जगह गैस दुल्हा सँ काज चलैत य। कविजी बढ़ निम्न पाँतिक सृजन केलैथ हन् -: जुनि कहियो कोइला एकरा, ई अछि ' कारी हीरा' , इयह त' विद्युत - आपूर्ति लेल, उठा लेने अछि बीड़ा । अंधाधुंध कोयलाक खपत आ कोलयरीक खानमे लागल आगि मिझेबामे कतेको मास- साल लागि जाइछ,जाहि सँ भंडारण शेष होइत चलि जा रहलैक हन् । आजुक समय एहन द्रूतगामी भेल जा रहल अछि जे प्रायः परिवार साइकिल केर जगह आब मोटरसाइकिल सवार ' गेल छैक। ईंधन पेट्रोल रूपेँ आ गैस सिलेंडर रूपेँ उपयोग करैत छैक। पेट्रोल -डिजल भारत कच्चातेल आयात कय रिफाइनरी करैत परिशुद्ध तेल पेट्रोल पम्प पर उपलब्ध कराबैछ। आटो आ सीटी रिक्शा गाम-गाममे घनेरो आबि गेल छैक। बोरींग--पम्पसेट आ आंटा हालरचकी सभ सेहो चलैत छैक किराशन तेल आ डीजल पर से खपत धरल्ले सँ समयके आवश्यकता थीक। याहू पर बारीक सँ कविजीक नजैर हुलकी देलनि अछि -: कक्का चढ़ला मोटरसाइकिल, हुनको नित चाहिऐन्ह पेट्रोल, रेलगाड़ीक इंजन के चाही, भरि दिन डीजल डोले- डोल ।
डीजल - इंजन - जनरेटर, आफिस , होटल - मऑल म, तकर पोख मे डीजल चाही , तखन चलत डील-डौल मे। सांसारिक जीवनो बढ़ कठिनाह छलैक। भोरगरे पता खररि कय , ताहि जरना सँ भनसा होय। पसाही लगा पर पछिया हवामे अगली सँ टोल गाम जरिए सुड्डाह भ' जाईक। बनगोइठा गोरहा आ काँच चेहरा सँ भरिघर धुआं,छोट सोकबा एकचारीमे आँच फुंकि कोलहा पजारैत महिला मेहेरक आँखि जल्दीये रोगग्रस्त भ' उठैक। कतेको पताखड़रनी कुवर सिहानी केँ पछिम गामक मियांजी अपहरण कय धर्म परिवर्तन करा लै छल। से धनिकेटा जे सांसद सँ गैस सिलिंडर लैत रहल तँ आब देखियौ ने सरकारी नियम सँ हरसठे सब कियो उजाला गैसचुल्ही ल' लेने य। कविजीकेँ एहनेमे कविता फुराईत छन्हि -: हे गै झोँझीबाली ! नहि हम जेबौ अनरोखे खड़रय पात, गैस-चुल्हा , कथिक' चिन्ता? उठबै हम जखन हेतै परात। कवि जी अपन कवितामे परमाणु ऊर्जा सँ ल' के' आ गोबर गैस प्लांट तथा शौचालय गैसबत्ती धरि उपयोग करैत देखेलाह। प्रकृति सँ जे यूरेनियम अयस्क आ रेडियोधर्मी विकिरण केर पावर हाउस छैक तकर उपलब्धि पर हार्दिक रूप सँ खुशी मनाबैत छथि -: नाभिकीय रिएक्टर सँ ऊष्मा, ऊष्मा सँ भाफ चलाबै टरबाईन, टरबाइन घुमाओत जेनरेटर के, आएलि बिजुरी! गाबथु गीतगाइनि। जतय ऊर्जा बेबाक,आ सही तरीका सँ डेबबाक होता,ततय सब तरहक ऊर्जाक' स्रोत बनल रहय से कविजीक अभिष्ट छन्हि। मैथिली साहित्य केर अक्षय भंडार केँ भरबामे हिनक अभूतपूर्व योगदान कें बिसरल नहिं जाएत। तेँ एहि वृहद ग्रन्थ केँ सब पुस्तकालयमे रहब अति आवश्यक अछि,जाहि सँ नव पिढ़ि पढि लाभ उठा सकत। प्रस्तुत पोथीमे सारांश रूपेँ श्री मिश्र जी आरम्भमे ' अवतरणिका' लिखैत पाठकवृंध सँ आशिर्वचनक अपेक्षा केने छथि। एहने अथक परिश्रम सँ आरो पोथी लिखताह से आश जगैत अछि।
-लाल देव कामत मो० ७६३१३९०७६१ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.आशीष अनचिन्हार- साहित्य अकादमीमे नैतिकता-संदर्भ मैथिली प्रभाग-विशेष संदर्भ नचिकेताजीक कार्यकाल आशीष अनचिन्हार साहित्य अकादमीमे नैतिकता-संदर्भ मैथिली प्रभाग-विशेष संदर्भ नचिकेताजीक कार्यकाल जेना कि पहिने कहने छी विदेहमे लगातार २००८ सँ एखन धरि साहित्य अकामदीक मैथिली प्रभागपर भेल नीक-बेजाए काजपर लिखल गेल छै। ताहि संदर्भमे फेर आइ हम लीखि रहल छी। वस्तुतः समयक संग साहित्य अकादमीमे मैथिली प्रभागक नैतिकता निच्चे जा रहल अछि, खास कऽ एखन भाषाविद् उदय नारायण सिंह 'नचिकेता' जीक नेतृत्वमे तँ अकादमीक नैतिकता आर निच्चा गेल अछि। एकर एकटा टटका उदाहरण देखल जाए- ७ फरवरी २०२५ केँ अकादमीक एक कार्यक्रम भेल जाहिमे विद्यानंद झा एवं सुभाष चंद्र यादवजीक बातचीत भेल। जे मैथिली साहित्यमे छथि तिनका सभकेँ ई बूझल हेतनि जे विद्यानंद झा एवं सुभाष चंद्र यादव दूनू बकायदा साहित्य अकादमीक टीममे सेहो छथि। हमरा जनैत ई उचित नहि भेल। अकादमीक सदस्य छोड़ि आन लेखककेँ लेल जेबाक चाही छल, मुदा प्रश्न वएह फेर फेर नैतिकताक। नचिकेताजीक कार्यकालमे वएह सभ भऽ रहल अछि जे पहिनेसँ होइत आबि रहल अछि। कोनो परिवर्तन कोनो नव वा कोनो सुधार नहि। बल्कि नैतिकताक मामिलामे निचिकेताजीक कार्यकाल आरो बेकार साबित हएत। निच्चामे अकादमीक उक्त काजक फोटो देल जा रहल अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.आचार्य रामानंद मंडल-महाकवि चंदा झा बनाम भाषाविद ग्रियर्सन : मिथिला भाषा/ अशोक वाटिका मे सीता संग वार्ता भाषा बनाम मानुषी भाषा (मैथिली) आचार्य रामानंद मंडल महाकवि चंदा झा बनाम भाषाविद ग्रियर्सन : मिथिला भाषा/ अशोक वाटिका मे सीता संग वार्ता भाषा बनाम मानुषी भाषा (मैथिली) १ महाकवि चंदा झा बनाम भाषाविद ग्रियर्सन : मिथिला भाषा
महाकवि चंदा झा के जन्म पिंडारुच (दरभंगा) मे १८३१ई मे आ मृत्यु १९०७ई में भेल रहय।हुनकर मुख्य कृति मिथिला भाषा रामायण (१८९२)हय।परंच मिथिला में हुनकर रामायण के बारे मे मिथिला अंजान हय। इंहा के संत महात्मा आ कथावाचक सेहो अंजान लगैत हय। मिथिला मे एकाह नवाह में संत तुलसीदास कृत रामचरितमानस के पाठ होइए हय जे अवधि में हय। इतिहास बतबैय हय कि महाकवि विद्यापति के बाद महाकवि चंदा झा मैथिली के विकास में योगदान कैलन।परंच मिथिला के विद्वान हिनका उपेक्षा कैलन। मैथिली के विकास में अंग्रेज पदाधिकारी भाषाविद ग्रियर्सन के महत्वपूर्ण योगदान हय।हुनकर जन्म१८५१आ मृत्यु १९४१मे भेल रहय।वो १८७०मे भारत अयलन।वो भारतीय भाषा सर्वेक्षण (१८५८) कैलन। सर्वेक्षण रिपोर्ट २१भाग मे हय।जैमैं १७९ भाषा आ ५४४ बोली के विस्तार से वर्णन हय।हुनकर मैथिली साहित्य मे मैथिली ग्रामर (१८८०),सेवेन ग्रामर्स आफ दी डायलेक्ट्स आफ दी बिहारी लैंग्वेज (१८३३-१८८७). के विशेष महत्व हय। इंहा महत्वपूर्ण इ हय कि वर्तमान मैथिली भाषाविद कहैत हतन कि भाषा के ग्रामर होइ छैय परंच बोली के ग्रामर न होइ छैय। ज्ञातव्य होय कि कालब्रुक मिथिला के भाषा के मैथिली नाम देलन आ जार्ज ग्रियर्सन मैथिली के क्षेत्र निर्धारण केलन। कहल जाइत हय कि महाकवि चंदा झा मैथिली के क्षेत्र आ भाषा -बोली के निर्धारण मे जार्ज गिरियर्सन के भारी सहयोग कैलन।परंच प्रश्न उठय कि जौ मिथिला के भाषा के नाम मैथिली निर्धारित हो गेल रहय त महाकवि चंदा झा अपन कृति रामायण के नाम मिथिला रामायण आ मैथिली रामायण के बदले मिथिला भाषा रामायण काहे रखलन।कि हुनका लगलैन कि मिथिला के भाषा मैथिली कुछ वर्ग के भाषा हय। वास्तव मे मिथिला के भाषा मिथिला भाषा त बहुसंख्यक के भाषा हय। मिथिला भाषा रामायण मिथिला के भाषा( मैथिली , अंगिका, बज्जिका, सुरजापुरी आदि) अर्थात मिथिला भाषा के परिचायक हय।
२ अशोक वाटिका मे सीता संग वार्ता भाषा बनाम मानुषी भाषा (मैथिली)
बाल्मीकि रामायण के अनुसार -
अहं ह्यतितनुश्चैव वानरश्च विशेषतः। वाचं चोदाहरिष्यामि मानुषीमिहं संस्कृताम्।।१७।
एक त हमर शरीर अत्यंत सूक्ष्म हय, दोसर हम वानर छी। विशेषतः वानर होके हम इंहा मानवोचित संस्कृत -भाषा मे बोलबैय।
यदि वाचं प्रदास्यामि द्विजातिरिव संस्कृताम। रावणं मन्यमाना मां सीता भीता भविष्यति।।१८
परंतु एहन करे मे एकटा बाधा हय, जौं हम द्विज के भांति संस्कृत -वाणी के प्रयोग करबैय त सीता हमरा रावण समझ के भयभीत हो जतैय।
अवश्यमेव वक्तव्यं मानुषं वाक्यमर्थवत्। मया सान्त्वयितुं शक्या नान्यथेयमनिन्दिता। ।१९।।
एहन दशा मे अवश्ये हमरा वोइ सार्थक भाषा के प्रयोग करे के चाही जे अयोध्या के आसपास के साधारण जनता बोलैय हय,न त इ सती साध्वी सीता के हम उचित आश्वासन न दे सकब।
हनुमान जी संस्कृत आ अयोध्या के लोक भाषा के लेल मानुष भाषा के प्रयोग कैलै हतन। संस्कृत के लेल विद्वान मनुष के भाषा आ साधारण लोग के लेल मानुष (लोक) भाषा।अइमे मिथिला आ मैथिली भाषा के कोई चर्चा न हय।
-गोरखपुर प्रेस से प्रकाशित बाल्मीकि रामायण के आधार पर। -आचार्य रामानंद मंडल सीतामढ़ी। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.प्रणव कुमार झा-जतय मोन ततै हम(लघुकथा) प्रणव कुमार झा जतय मोन ततै हम(लघुकथा) काशी नगरी में दू टा संगी रहै छलाह मोहन आ अमित। दुन्नु गोटे में घुट्टासोहैर मित्रता छलैन्ह। रहनाय-खेनाय, हँसनाय-काननाय सभटा एक्कै संगे होय छलैन्ह। एक बेर के गप्प ऐछ, बाबा विश्वनाथ के दरबार में एकटा बड़का कीर्तन के कार्यक्रम भ रहल छल। इ दुन्नु संगी नियारलैथ जे "की दोस, अपनो सब चलैत छी आई राइत मऽ बाबा के दरबार में कीर्तन करबाक लेल।" दुनू संगी नियारल समय पर बाबा विश्वनाथ के दरबार में हाजिरी लगाबय लेल विदा भेलाह। बाट में एकटा गणिका के कोठा छलै। ओ देख मोहन के मोन भटकै लागल छल। ओ बाजल - यौ मीता सुनु ने बाबा विश्वनाथ त शताब्दी से एत्तहि छईथ। कोनो भागल त जा नै रहलाह अछि! आ कीर्तन भजन त चलते रहैत अछि, से किएक ने आई राति एहि गणिका के दरबार में जा क लहरिया लूटल जाय ही ही ही। इ सुनि अमित हुनका बोकियाबैत बाजलाह - ईह! शिव।।शिव।।शिव।।शिव। चललहुँ अछि बाबा दरबार में हाजरी देबय लेल आ बाट में इ पापी बला काज करब! एहन विचार अहाँ मोन मे आनबो कोना केलहु? ई सब नै हैत। चुपचाप चलै चलु बाबा दरबार में। मुदा मोहन के मोन ओहि कोठे पर टिंग गेल छल। ओ बाजल जे - ठीक छै मीता। तखन एना करै छि जे अहाँ कीर्तन में भेने आउ हम ता ऐ गणिका के एत लहरिया लुटैत छि। भोर में अहाँ हमरा इ सामने जे पूल बनि रहल अछि एहि तर में भेंट हैब फेर संगे घर चलब। अमित बजलाह जे जौं अहाँ के यैह विचार अछि त यैह सही, तखन हम बढ़ैत छि बाबा दरबार दिस। इ कहि ओ बाबा विशवनाथ के मंदिर दिस विदा भेलाह आ मोहन ओय गणिका के कोठा दिस। मंदिर पहुंचला के बाद अमित कीर्तन में शामिल भेलाह आ कीर्तन करय लगलाह। मुदा हुनकर मोन ओय गणिका के कोठा पर अटैक गेलैन। सामने त कीर्तन चलि रहल छल मुदा हुनका आँखि के आगाँ में ओय कोठा के काल्पनिक दृश्य सब नाचय लागल। ओ मोने मोन अपना आप के कोसय लागल जे ओह! हमहुँ बड़का बूड़ि आदमी छि। ओम्हर मोहना ओय गणिका के एतय लहरिया लुटैत हेतै आ हम बूड़ि खटहिदास एतय आबि बंगोर खोटैत छि। एहि प्रकार भरी राति अमित के देह त बाबा के दरबार में छल मुदा मोन ओय गणिका के कोठे पर लटकल रहलै। एम्हर मोहन ओय गणिका के कोठा पर त पहुँच गेल मुदा किछुए छण बितला पर ओकर मोन ओकरा धिक्कारै लागल। जो रे पापी! एहन अधम तूं भेलैं जे चलल छलैं बाबा विश्वनाथ के दरबार लेल आ पहुंच गेलहि एहि पाप के अड्डा पर। ओम्हर ओ मीता अमित बाबा के दरबार के मनोरम छटा के आनंद लैत हेतै, कत्तेक सुन्दर कीर्तन होइत हेतैक आ हम पापी एतय मुजरा सुनि रहल छि। हे बाबा विश्वनाथ हमर ऐ अपराध के क्षमा करब! ऐ प्रकारे मोहन के देह त सगर राति ओय कोठा पर रहलै मुदा मोन बाबा विश्वनाथ पर टिंगल रहलै। भोरे भेने दुनू संगी ओय पूल के नीचा भेंट भेल जतय दुनू नियारने छल। दुनू गोटे भेंट भेला के बाद जखन अपन अपन आपबीति खिस्सा सुनबै छल तखने देवयोग सं ओ पूल टूटि गेल आ कइएक टा लोक संगे इहो दुनू संगी काल के गाल में समा गेलाह। यमक दूत जखन हिनका सब के लेबय लेल एलखिन त मोहन के स्वर्ग दिस आ अमित के नर्क दिस लय बिदा भेलाह। ऐ पर अमित के घोर अचरज भेलैन। ओ दूत से पुछलखिन जे यौ महाराज जखन हम दुनू संगी के रहनाय-खेनाय, हँसनाय-काननाय सभटा एक्कै संगे होय छलै त एकटा के स्वर्ग आ एकटा के नर्क लऽ जाय के निर्णय कोना कैल गेल? ऐ पर दूत बजलाह जे देखू मृत्युक समय व्यक्ति के आचरण केहन होइत छैक यम न्याय में एकर बहुत महत्त्व छैक। इ सुनि अमित के मुर्झायल चेहरा पर ख़ुशी के भाव आबि गेलैन आ ओ बजलाह - आह! तखन अवश्ये अहाँके किछु धोखा भेल। इ मोहना राति भारी ओय गणिका के कोठा पर छल अनैतिक काज में लिप्त छल आ हम राति भरि बाबा विश्वनाथ के दरबार में कीर्तन करै छलहुँ। तै हिसाबे हम स्वर्ग आ इ नर्क के भागी अछि। ऐ पर यमदूत अट्टाहास करैत बाजल - रौ बाबू, तों भरि राति बाबा के दरबार में छलैं मुदा तोहर मोन ओय गणिका के कोठे पर टाँगल छलौ, मुदा मोहन ओय गणिका के ओतय रहितो भरि राति बाबा विश्वनाथ के स्मरण करैत रहल। रौ प्राणी के मोन जतय रहैत छै ने प्राणी ओतय रहैत छै। मनुक्ख बुद्धिजीवी प्राणी होइत छैक आ तैं ओ प्रत्यक्ष किछु आर आ मोन में किछु आर भ सकै अछि। जानवर सब में विवेक कम होइत छैक तैं ओकरा मोन में वैह रहैत छै जे प्रत्यक्ष देखाई पड़ै छै। तैं मनुक्खक मूल्यांकन हम सब ऐ बात से करैत छि जे ओकर मोन-विचार कोन प्रकार के छैक। -प्रणव झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली [प्रणव कुमार झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली, जनवरी 2025] अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.८.कुन्दन कर्ण- डेरा कुन्दन कर्ण डेरा
ट्रेन लेट छल, गाम पहुँचैत 11 बाजि गेल। घ'र पहुँचलहुँ त देखैत छी ओगरबाह माघो आ पनिचोभवाली हमर कोठलीमे पलंग पर सूतल अछि। देखिक' हालोचाल नहि पुछलक। एहन सपरतीव !!
"जाह, तोंसब असोरा पर सूतह, भोरमे गप्प करैत छियअ"।
अहाँ असोरा पर सूतुगअ , आब ई घ'र हमरे भेल, लालाजीसब घर छोड़थिन त जे रहतैक तकरे ने घ'र भेलै" मोनत भेल एक एंड़ ... मुदा बयसक लेहाजक' चुप रहलहुँ, कहलियै सूतह भोरमे गप्प करबह। निन्न खुजल त दुनु नहि छल।तमतमायल ओकर आंगन पहुँचि बाहरेसँ हाक देलियैक, ओकर पुतहु बहरेलै आ बाजल "किनका हाक दैत छथिन मालिक , बुढ़बा बुढ़िया त परुकेँ बाढ़िमे भासिया गेलैक, बरखियो भेलै !! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.९.निर्मला कर्ण- गोइठा मे घी सुखायब निर्मला कर्ण गोइठा मे घी सुखायब
"कनियाँ,आइ बुच्ची बेटी केँ कनि नीक सs तैयारी कs देबै। आई वरागत सब बुच्ची के देखइ लेल आबि रहल अछि। सब किछु तय भs गेल अछि बस बुच्ची पसिन्न भs जायन्ह तखन गंगा नहा लेब " - मोहन बाबू अपन पुतहु संगीता केँ कहलथि। . -तखन विवाह तs निचीते बुझु! हमर बुच्ची एतेक सुन्नर आ संस्कारी अछि!ओहि पर इंटर! आ ओहो विज्ञान विषय सौं पास अछि। ओकरा पसिन्न नहि केनाई असम्भव अछि.. दादी सेहो प्रसन्नता सौं हुमकि कs बजलीह। "मुदा बाबूजी! हिनका तs बुझल छन्हि जे बुच्ची मेडिकल के प्रवेश परीक्षा अतेक नीक नंबर सौं पास केलक अछि। ओकरा एम्स भेट रहल छैक । एहन स्थिति में आब एहि समय ओकर विवाह करब उचित रहतन्हि ? विवाहक बाद कोना पढ़ाई क' सकत ओ ?"- संगीता, कनेक सकुचाइतअपन विचार सासु आ ससुरक समक्ष व्यक्त केलथि । "अरे! कनियाँ कतबहु पढ़त,बुचिया केँ तs भानसे कर' पड़तैक ! ओहुना ई हमरा सभक घर में तs रहत नहि, दोसरहि घर में जायत! तखन गोइठा मे घी सुखयला सँ की लाभ!" "नहि बाबूजी,बुची दिन-राति एक कएने छल मेडिकल प्रवेश परीक्षा में सफलता हेतु । आब ओकर पाँखि नहि कतरब। आकाश में उड़ान भरs दियौक एकरा । हम अपन सब किछु बेच देव मुदा ओकरा डॉक्टरी अबस्से पढ़ायब। डाक्टर बनि कs ओ अपन गामे नहि संपूर्ण क्षेत्र के नाम उजियार करत.. अपन ऑफिस जाइ लेल निकलैत काल हुनकर बेटा सोहन माय, बाबू आ अपन घरनीक गप्प सुनि कs अपन निर्णयक घोषणा कs देलथि। दादा-दादीक बात सुनलाक बाद बुच्चीक खून सुखs लागल छलन्हि,आब अपन बाबू के निर्णय सुनलाक बाद आसक दीप हुनक नेत्र में प्रज्वलित होमय लागल।
-निर्मला कर्ण, राँची, झारखण्ड अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१०.डॉ विद्या नाथ झा- स्वर्ग केहेन ? नर्क केहेन ? डॉ विद्या नाथ झा स्वर्ग केहेन ? नर्क केहेन ?
स्वर्ग-नर्क के जन-अवधारणा
कियो प्राणी अपन जीवन में नेँ तँ स्वर्ग देखने हेतै नेँ नर्क I तैयो कोनो एहन व्यक्ति नहिं भेटत जिनका स्वर्ग वा नर्क में पठाएब के धमकी, सुझाव या प्रेरणा नहिं देल गेल होवए ओ चाहे खिन्न भाव वा तामस में ही किए नै देल होवए I आदि काल सँ मानव के मन-मस्तिष्क में स्वर्ग व नर्क के एक अवधारणा बनाओल गेल अछि कि ओ केहेन होएत I ओ अवधारणा के अनुरूप अधिकांश व्यक्ति के मोन में लालसा भ सकैछ कि स्वर्ग के दर्शन हुवै वा ओहि ठाम के विलासिता में रहइ के अवसर भेटए I विरले ही कियो एहन व्यक्ति हएत जे स्वर्ग के प्रसिद्ध नर्तकी उर्वशी या मेनका के नाम नहिं सुनने हएत Iओना यदा कदा कियो कियो प्राणी केँ अपन जीवन में ही एहन लालसा भ सकैछ जे स्वर्ग के अप्सरा के नृत्य देख सकी I तँ मोटा मोटी ई मानूँ जे जौं केहू केँ स्वर्ग जाए के लालसा भेल तँ कोनों आश्चर्य नहिं होबाक चाही I दिक्कत आवै छै ओ लोकोक्ति पर जे 'अपनाहिं मरणोपरांत स्वर्ग देख सके अछि" I तँ जौं स्वर्ग देखे लेल मरए पड़त तँ लोकनि अपन अपन पाँव पाछू करि लेतन्हि I
विरले कोन्हों एहन धर्म ग्रन्थ अछि जाहि में स्वर्ग वा नर्क के वर्णन नहिं होवए I बालपन सँ ही सुनल छलहुँ जे सुकर्म व कुकर्म के फल क्रमशः स्वर्ग व नर्क में होए छैक I मुदा सुकर्म आ कुकर्म की होए छैक ई ज्ञात नहिं रहए I तहिनहिं इहो ज्ञान नहिं छल जे स्वर्ग की होए छैक आओर नर्क की ? हाँ ! गाम घर में ई सुनैत छलहुँ जे मृत्यु पश्चात् श्राद्ध कर्म सँ स्वर्गलोक के प्राप्ति होए छैक I कबहुँ कबहुँ काकी काका केँ अन्यान्य व्यक्ति केँ कोसइत सुनैत छलहुँ जे फलाँ केँ हुनक कुकृति के कारण नर्क में सेहो जगह नैं भेटत I तखन मोन में स्वतः आबै छल जे ई तँ बढियाँ बात भेल जे जौं नर्क में जगह नैं भेटत तँ स्वर्ग के द्वार तँ स्वतः खुजि जाएत I आ सेहो बिना श्राद्ध कर्म केने I
बाल्यावस्था के अबोधपन में सुकर्म वा कुकर्म के बोध नहिं रहए I अपन भोलापन में एक बेर अपन बड़की काकी सँ ई रहस्य पूछिए लेलहुँ जेकर परिणाम ई भेल जे सभु स्त्रीगण के हँसी के पात्र बनि गेलहुँ I तत्पश्चात स्वर्ग नर्क के विषय में कोहु सँ पूछै में एक धाख सन लागै लागल मुदा मोन में अनेकों प्रश्न उठै छल I पहिल प्रश्न छल जे स्वर्ग, नर्क कतए अछि ? की दोनों कोनों दूर प्रान्त में आजु बाजू अछि ? ई आकाश में अछि कि पाताल लोक में ? आकाश में स्वर्ग या नर्क के घर-आँगन बिना जमीन के कोना टिकतई ? आओर जौं ई पाताल में अछि तँ अवश्य कुइयाँ सँ सेहो नीचाँ हेतइ I तँ फेर जल में डूबल केओ स्वाँस कोना लेत ? ओ ठाम तँ अन्हार सेहो होतै I तँ स्वर्ग कोन बात के ?
नैं I एना नहिं भ सकैछ I स्वर्ग अवश्य आकाश के प्रकाश में होतैक आ नर्क पाताल के अन्हार में I तँ हथिया या चित्रा नक्षत्र में झमाझम वर्षा में सभु लोकनि भीज जेताह I ओतए तँ प्रचंड बिजुरी के कड़क में सब डर सँ भागि जेताह I ई सभु के अतिरिक्त खुजल आकाश के तेज हवा-बसात में कियो कोना रहि सकैछ ? ओहिनहिं मोन में आएल जे जौं नर्क पाताल में छैक तँ पानी में डूबल दम घुटि जाएत I तँ नहिं तँ कोनो व्यक्ति वा यमराज महाराज ओहि ठाम रहि सकैछ I तँ आखिर स्वर्ग नर्क कतए बसल अछि ? एहि सब मोन में देर देर तक आबि जाए छल आ ओ चिंता के क्षण में बाबूजी (हमर पिता) के आँखि हमरा पर पड़ल I ओ पूछि लेलन्हि जे की बात ? पिछला अनुभव, जेहि में स्त्रीगण के हँसी के पात्र बनल रहोँ, कहलक जे चुप रहू, से किछु बाजव उचित नहिं बुझलहुँ आ झेंपल आँगन चलि गेलहुँ I मुदा मोन में स्वर्ग नर्क के जिज्ञासा अनवरत बनल रहल I
स्वर्ग-नर्क के प्रामाणिक अवधारणा
विद्याध्ययन में स्वर्ग के सन्दर्भ में भगवान राम के कथन पढ़ाओल गेल "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" जे ताहि बालकाल में बुझए में नहिं आएल कि हमर जन्मभूमि आओर माँ, स्वर्ग सँ कोन रूपेण श्रेष्ठ भेल ? जन्मस्थान हमर गाम घर तँ अदना सन रहए I अड़ोस पड़ोस से अभावग्रस्त छलैक I हमर बाल्यकाल में ही माँ के देहांत भ गेल छलनि से पूर्णतया ज्ञान नहिं रहए कि जननी जन्मभूमि केँ स्वर्ग सँ कोना तुलना कए सके छी I अड़ोस पड़ोस में पुरुष लोकनि के श्रमी दिनचर्या, स्त्रीगण के संघर्षपूर्ण जीवन यापन आओर नैना भुटका सभक अक्सर अभावग्रस्त बालपन केँ स्वर्ग कहए में अवश्यमेव कवि बाल्मीकि सँ गलती भेल होएत; से अपन अनुमान छल I
प्राथमिक, माध्यमिक ओ उच्च विद्यालय में पढ़ए के दौरान स्वर्ग व नर्क के अलग अलग परिकल्पना केलहुँ I फेर किछु पुस्तक ओ पाठ्यक्रम में इहो बोध कराओल गेल जे स्वर्ग ओ नर्क, दुनू एही ठाम अछि जेकर भोग लोकनि अपन अपन जीवन के अलग अलग कालखंड में करै छन्हि I तँ मोटामोटी ई कहि सके छी जे अपन पुस्तक ओ पाठ्यक्रम में आध्यात्म बोध नहिं के बराबर अछि जे भारतीय शिक्षा प्रणाली में एक वड कमी या चूक कहि सके छी I स्नातक व स्नातकोत्तर के पढ़ाई, तत्पश्चात सशस्त्र सेना व वायव्य अंतरिक्ष वैज्ञानिक सेवा के दौरान बिसरि गेल छलहुँ कि स्वर्ग कतए वा नर्क कतए I अपन धर्म-ग्रन्थ जेना पुराण व उपनिषद इहो बोध करावैत अछि जे भू-लोक (पृथ्वी) के उत्तर में स्वर्ग लोक व दक्षिण में मर्त्य लोक अछि मुदा एकर भौतिक वा वैज्ञानिक प्रमाण अद्यावधि नहिं देल गेल अछि I आधुनिक अंतरिक्ष विज्ञानं सँ ई तँ प्रमाणित अछि जे दोनों दिशा में अनेकों उपग्रह दशकों सँ पृथ्वी सँ ४०० सँ २००० किलोमीटर ऊपर अनवरत परिक्रमा कए रहल लेंस या वैज्ञानिक संवेदक (scientific sensors) में कोनों एहन संकेत नहिं आओल अछि जाहि सँ स्वर्ग या मर्त्य लोक के परिकल्पना प्रामाणिक भ सकए I
सम्प्रति सेवा निवृत्त जीवन के अंतिम प्रहर में आध्यात्म के ब्रह्माण्ड रुपी विशाल चेतना के परम बोध तँ संभव नहिं अछि मुदा एकर प्रकृति के आभास लिए के एक प्रयास अवश्य कए रहल छी I वैज्ञानिक प्रमाणिकता के आभाव में वेद, उपनिषद व पुराण में उद्धृत किछु आध्यात्मिक तथ्य केँ व्यक्त क रहल छी I
वेदों, उपनिषद, गीता में उद्धृत स्वर्ग-नर्क
अथर्ववेद के मन्त्र ६:१२०:३ में यथार्थ स्वर्ग के वर्णन अवश्य भेल अछि जे स्वर्ग-नर्क के भौतिक अवधारणा सँ बिलकुल अलग अछि I ई जीवन के ओ मुद्रा अछि जेहि में भौतिक काया केँ कोनों विशेष महत्त्व नहि रहि जाय छैक :-
-यात्रा सुहार्दः सुकृतो मदन्ति विहाय रोगं तन्वः स्वायाः। अश्लोणा अंगैरह्रुताः स्वर्गे तत्र पश्येम पितरौ च पुत्रान्।। ६:१२०:३ II
ई मन्त्र के व्याख्या महान संन्यासी *स्वामी वेदानन्द तीर्थ* जी के संक्षिप्त वेदव्याख्यान में कए गेल अछि :-
प्रसिद्द वेद-वेत्ता **रामी सिवान** के मत छन्हि जे स्वर्ग-नर्क के अवधारणा सनातन धर्म में ऋग्वेद के मूल स्वरुप के बाद में आएल अछि I हाँ ! पुराण में, विशेषतः गरुड़ पुराण में एकर वृहत वर्णन अछि जेकर उद्देश्य वैयक्तिक सुकृत्य केँ प्रोत्साहन दे के छल I तदनुसार व्यक्ति व समाज में सदाचार केँ बढ़ाएब व दुराचार केँ आपराधिक बनाओल लेल कए गेल रहए I हाँ ! स्वर्ग के एक अंश गीता में सेहो अछि जे भगवान् श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन केँ देल ज्ञान के संक्षिप्त आशय थीक जाहि में स्वर्ग के अभौतिक-स्वरुप प्रतीक अछि :-
"ते तम भुक्त्वा स्वर्ग-लोकम् विशालम् क्षीणे पुण्ये मार्त-लोकम् विशन्ति | एवं त्रयी-धर्मं अनुप्रपन्न गतागतं कामकामा लभन्ते || ९:२१ ||
सनातनी आध्यात्म में अपन अल्पज्ञान के कारण हम सभु धर्मग्रन्थ व काव्य में वर्णित स्वर्ग-नर्क के अवधारणा सँ अनभिज्ञ छी लेकिन एकर मतलब ई नहिं जे एकर उद्धरण अन्यान्य ग्रन्थ में नहिं होते I उक्त विषय वस्तु पर अवश्य अनेकानेक विद्वान अनेकों खोज केने हेताह, अनेकों मत देने हेतन्हि जे हमर संकुचित ज्ञान के परे अछि I हम एहि लेल पाठक सँ क्षमा याचना कए रहल छी I
देव राज इंद्र के अधीन स्वर्ग अछि जाहि में सब तरह के देवोपयोगी प्रसाधन उपलब्ध मानल जाएत अछि I ओहि ठाम अत्यधिक देव लोकनि के वास छैक आ सुकर्म करए वाला मानव के आत्मा के निवास सेहो एहि ठाम होए छैक I ई बात उल्लेखनीय अछि जे स्वर्ग स्थित आत्मा के पुनर्जीवन के चक्र में आवइ पड़े छै I अन्यान्य दानव लोकनि के आँखि इंद्र के सिंहासन पर रहइ छलनि जेकर चर्चा अन्यान्य ग्रन्थ में अछि I एहि सभु के विपरीत यमराज के आधीन नर्क लोक अछि जाहि में कुकर्म करै वाला व्यक्ति के प्राण के वास होए छैक I उपनिषद व पुराण में नर्क के अनेकों प्रकार अछि, कियो चारि नर्क के उद्धृत करै छथि तँ कियो बीस I नर्क में पापी जाएत छन्हि जिनका तेल में पकाओल जाइछ, खाए में विष्ठा-पिल्लू आदि अभक्ष्य पदार्थ देल जाइछ ओ सुतए ल कंटिका के सेज होइछ इत्यादि इत्यादि I नर्क में हर तरह के उत्पीड़न होए छैक आ अवधि पूर्ण होवए पश्चात् पुनर्जन्म लिए पड़े छै I चूँकि ई सभ उद्धरण सम्पूर्ण मानव जाति लेल अछि I एहि सँ ज्ञात होएत अछि जे सम्प्रति मुल्ला लोकनि जे भ्रान्ति फैलावै छथिन जे जिहाद में मृत्यु पश्चात् जन्नत में ७२ हूर देल जाइछ से बिलकुल गलत अछि*** I तँ जे कियो व्यक्ति (जेना जिहादी) दोसर मानव के प्रताडतिन्ह या ह्त्या करतिन्ह हुनका लेल नर्क सुनिश्चित छन्हि I
जीवन चक्र सँ छूटे लें मोक्ष चाही जाहि में आत्मा परमात्मा विष्णु (ब्रह्म) में लीन भ जाइछ I इहो मान्य अछि जे मोक्ष के बाद आत्मा केँ योनि-प्रवेश व जन्म-मरण सँ मुक्ति भेट जाए छैक I संक्षिप्त ज्ञान भगवद गीता सँ प्राप्त कए सके छी I हमर सन सामान्य ज्ञान राखै वाला सनातनी वयक्ति केँ चारो वेद, अट्ठारहो पुराण तथा १०८ उपनिषद में आध्यात्म विषय पर, विशेष कए स्वर्ग-नर्क के विषय में किछु अंतर्द्वंद अवश्य परिलक्षित होएत अछि I कठोपनिषद में स्वर्ग या मोक्ष प्राप्ति लेल अग्नि-विद्या व ब्रह्म-विद्या के प्रावधान कए गेल अछि I
उपरोक्त स्वर्ग-नर्क के आध्यात्मिक वर्णन सँ एक बात तँ लगभग स्पष्ट भ गेल कि मानव जाति लेल भू लोक पर ही एक सांकेतिक स्वर्ग भ सकैछ जे माँ के आँचल में अछि I सेही आँचल में नेना-भुटका आत्मसात सर्वोत्तम आत्म-संतुष्टि के अनुभव करै छै जे स्वर्ग सँ कम नहिं I वात्सल्य में माता-पिता ही संतान के भगवान् होए छैक जे किछु कहै बिना ही हुनकर आवशयकता बुझि, ओकर निदान करै छथि I बाल्यावस्था सँ निकलैक पश्चात् आध्यात्म के भाव सिखब-पढ़ब सम्पूर्ण मानव जाति लेल अत्यावश्यक अछि जाहि सँ निराकार वा साकार ब्रह्म ज्ञान के बोध होवए I
अन्यान्य धर्म-आस्था में स्वर्ग-नर्क
सनातन के पुराण में वर्णित स्वर्ग-नर्क के देखा-देखी, बाद में आवै वाला अन्यान्य धर्म वा आस्था सेहो एकर अनुकरण-अनुसरण कएने गेलाह I जहिना पारसी में दुजन्हा आओर गरोडेमन; ईसाई में हेवन आओर हेल, इस्लाम में जन्नत आओर दोजख इत्यादि... I इस्लाम में तँ ***स्वर्ग-नर्क के परिकल्पना एक अ-तार्किक पराकाष्ठा अछि *** I ई सभु एकेश्वरवादी आस्था में स्वर्ग-नर्क केँ अत्यंत बढ़ा चढ़ा कए एतेक विकृत क देल्हनि जे ओ आस्था के अनुसरण कर्ता केँ स्वतः भय उत्पन्न भ जाए I उदाहरणतः स्वर्ग में सुरा व मधु के नदी बहइ छैक, वाटिका सदैव फल-फूल सँ भरल रहैछ, विलासिता के सब साधन उपलब्ध रहैछ अदि अदि I मुदा जनमानस में गलत अवधारणा बनि गेल पश्चात् प्रायः सभु धर्म व आस्था के पंडित, पुजारी, पादड़ी, मुल्ला आदि एकरा सँ लाभ उठावै खातिर नर्क सँ बचावै तथा स्वर्ग में पहुँचावै हेतु तरह तरह के आडम्बर व धर्मान्धता बनौलन्हि जे तिरस्कार के विषय थीक I कर्मकांडी पंडित पर सेहो दोषारोपण अनुचित हएत किए कि कठोपनिषद में ही स्वर्ग या मोक्ष प्राप्ति लेल अग्नि-विद्या व ब्रह्म-विद्या के प्रावधान कए गेल अछि I
सारांश
हम नें कोनो आचार्य या पंडित छी नहिं सनातन के धर्म ग्रन्थ वेद, उपनिषद के ज्ञाता I अतएव उपरोक्त विषय वस्तु में अपन निपुणता नहि रखे छी I मुदा आजु के जनमानस में स्वर्ग-नर्क के प्रति जे गलत अवधारणा देल गेल अछि ओहि सँ चिंतित अवश्य छी I से ई चिंता बाल्यपन सँ अद्यावधि अछि I जौं पढ़ल लिखल व्यक्ति केँ एहन अवधारणा बनल अछि तँ एहि में कोनों संदेह नहिं जे साधारण जनमानस में सेहो ओहिनहि धारणा होतइ I अपन मुख्य धर्म-ग्रन्थ वेद व गीता सँ ई प्रतीत होइछ जे स्वर्ग वा नर्क कोनों अलग लोक में नहिं बसल अछि I ई वैयक्तिक व सामाजिक मूल्य के महत्त्व दिए वाला सदाचार केँ बढ़ाएब व दुराचार केँ आपराधिक बनाओल लेल पुरातन काल सँ ही एक व्यवहारिक व्यवस्था थीक जेकर अनुकरण बाद में बनए वाला अन्यान्य धर्म व आस्था सेहो कएलक I ई जीवन के ओ मुद्रा अछि जेहि में भौतिक काया केँ कोनों विशेष महत्त्व नहि रहि जाय छैक I मुदा जनमानस में स्वर्ग-नर्क के गलत वा अस्पष्ट अवधारणा बनाबए में किछु योगदान तँ सभु धर्म-ग्रन्थ के सेहो भूमिका या योगदान छनि जाहि सँ प्रायः सभु धर्म व आस्था में कुकर्मी के मरणोपरांत नर्क में दंड के प्रावधान छन्हि I ई अलग बात छी जे पंडित, पादड़ी, मुल्ला आदि एकरा सँ अर्थ-लाभ उठावै खातिर नर्क सँ बचावै तथा स्वर्ग में पहुँचावै हेतु तरह तरह के आडम्बर व धर्मान्धता बनौलन्हि जे तिरस्कार के विषय थीक I --------------------------------------------------------------------------------------------------------- References * महान संन्यासी स्वामी वेदानन्द तीर्थ जी के संक्षिप्त वेदव्याख्यान में कए गेल अछि अथर्ववेद मे यथार्थ स्वर्ग का वर्णन- https://wp.me/p6VtLM-3Qg
**वेदों और पुराणों के अनुसार स्वर्ग और नर्क https://sanatanadhara-com.translate.goog/2020/01/28/heaven-hell-as-per-vedas-puranas/?_x_tr_sl=en&_x_tr_tl=hi&_x_tr_hl=hi&_x_tr_pto=tc
*** ’Busy God Supplying Hoors’, https://thecounterviews.in/articles/busy-god-supplying-hoors/
-डॉ विद्या नाथ झा, MBBS, AMD, MD, FeISAM, MIDST, सेवा-निवित्त वैज्ञानिक 'F’, उप-निदेशक, DRDO अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। पद्य ३.१.कल्पना झा- बकलेल नय छैं ३.२.राज किशोर मिश्र-सभ्यताक भ्रम ३.३.प्रमोद झा 'गोकुल'-सहर्ष मड़ाल ३.४.जगदानन्द झा 'मनु'-३० टा हाइकू ३.१.कल्पना झा- बकलेल नय छैं कल्पना झा बकलेल नय छैं
गे माय तों बकलेल नय छैं, ने पढ़लैं ? तयो ऽ सब किछु गनि गनि रखलैं, दहिया फुफरी लागल पितरिया बर्तन के सोन सन चमकौलैं, तयोऽ किछु नय बजलैं, घर क चिनमारि सं दलानक मान सब दिन रखलैं, लेकिन कहियौ नय पितेलैं, चस्मा लगा ऐना में निहारि कते थपरि पिटलैं, लेकिन किलोलो ने केलैं, कनमा भरि तेल में कोना क रणलैं, तयोऽ किछु नय कहलैं, भनसा घर तोहर कते टा प्रयोगशाला छव, रसायन, अर्थशास्त्र, पाक विज्ञान आ चिकित्सा सब में निधोरि भ पारंगत छैं, घर क कोनि में लागल गुलाब गमकैत कते छै, ले ने इ सिनेहक छाप होय छै, माय गे तों बडु बुद्धियार छैं, कांटक डरै गुलाब नय छुबै छैं।
-कल्पना झा, बोकारो, झारखंड अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.राज किशोर मिश्र-सभ्यताक भ्रम राज किशोर मिश्र सभ्यताक भ्रम
सभ्यताक के डेग बढ़ल, खोह सँ, पाषाण सँ, सिंधु नदी के तीर सँ, काशीक महामसान सँ।
बनवासी के पर्णकुटी सँ, कुम्हारक चाक, बासन सँ, बाँसक कनसुपती, पथिआ सँ, राजा के सिंहासन सँ।
शांति-मर्यादा सृजन मे, चण्डिका, दुर्गा सप्तशती, अर्गला स्तोत्र, देवी कवच, 'असुर भयाउनि 'भगवती।
सुर-असुरक संग्राम सँ, पंचवटी ,आ' लंका सँ, कुरुक्षेत्रक चक्रव्यूह सँ, रण मे बजैत डंका सँ।
तक्षशिलाक आचार्य सँ, 'अर्थशास्त्र' के पन्ना सँ, राज-चौहद्दी-विस्तार लेल, षड्यंत्र-व्यूह-बहन्ना सँ।
वेद-ऋचा सँ, त्रिपिटक सँ, वराहमिहिरक खगोल-ज्ञान सँ, आर्यभट्टक दशमलव-खोज सँ, विज्ञानक शोध, अनुसंधान सँ।
कोन हाबा कतय सँ आएल ? पूब भर सँ कि पछिम सँ, मिजहर भऽ कऽ घमल सभ्यता, जे जमल बड़ छल हिम सँ।
जीवनशैलीक नव-नव सिद्धान्त, सभ लागल अपन पसार मे, लूझि-लूझौअलि बात-विचारक, नहि ककरो किओ सम्हार मे।
कैक्टस-धाधर सँ भालरि काँपल, डिस्को रेबाड़ल , सोहर , खेत छोड़ि चाँचरि पड़ाएल, अरिपन पर अङरेजी मोहर।
चलैत रहल चितकबड़ा सभ्यता , एकपेड़िआ ,कखनो राज-पथ, बनवासी, महानगर मे कखनो, भीष्म कखनो ,कखनो जयद्रथ।
हमरा लागि रहल अछि ओ तँ चौबटिआ पर ठाढ़ अछि, लाल-हरिअर भेल सिग्नल, भ्रम-सान्द्रता बड़ गाढ़ अछि।
सीरध्वज जनक सनक ओ बनि गेल अछि विदेह , शेयर बजारक सेहो ओकरा अछिनरे छैक सिनेह।
सिराउर पाड़ैत, हरबाहक चुबैत घाम मे, कुल-गोत्र सँ ,पैरबी सँ पाओल नाम मे।
सूगरक खोभाड़ सँ किकिएबाक गर्द-अनघोल मे, कार-शोरूमक भीतर मे,मर्सिडीज-क्रयक मोल मे।
मोहाबरा, लोकोक्ति मे, गढ़ल जनजीवनक सिद्धांत, होटल मे तऽ रिलाॅक्स-टाइम, आ' खोपड़ी मे मासांत।
रामलीला-मंडलीक बिलौकी मे, सिने-जगतक आभा-भौकी मे।
पसाहनि कएने अर्थतंत्र, मोहाएल ओहि पर सभ्यता, राजतंत्रक ऐश्वर्य-वैभव, आ' प्रजातंत्रक भव्यता।
धर्मदण्ड ,आब संविधान, जनता अछि सभ सँ महान।
धनुख-वाण सँ ल' क' परमाणविक अस्त्र, गाछक छाल सँ ल' क' आधुनिक वस्त्र।
पुष्पक सँ मंगल आ' चंद्रयान, सभ्यताक गरुड़वाहन, विज्ञान।
अनुष्टुप् किंवा मुक्तछंद, सभ्यता-मन मे बहुत द्वन्द्व।
पीताम्बर आओर जींस बीच, तुरुछल, रभसल मोन, कखनो ई, आ' कखनो ओ, दुविधा मे, चाही कोन?
भऽ गेल छै ओकरा अधकपारि उठल छै घर मे बिड़रो -बिहारि।
कोमहर निकसतै चौबटिआ सँ? चलतै कहिआ? भरमाएल मन सभ्यताक, घुमतै कोन पहिआ? अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.प्रमोद झा 'गोकुल'-सहर्ष मड़ाल प्रमोद झा 'गोकुल' सहर्ष मड़ाल
रवि राति बिताय कतौ भोरे उगला भुक । टुह टुह रूप निरखि नलिनी बाजलि दू टूक ।। ककरा संग भेलै जगरना जे रूप एहन अङोर । राति भरि हम कनैत रहलौं आब पोछै छी नोर ।। जाउ हम नञि बजै छी जुनि दिक करू हमरा । बूझि पड़ैये भेलौं अहूँ आब चित चोरा भम्हरा ।। शंका करू निर्मूल प्रिये !जीवन मे कहाँ विश्राम । दिन राति दह दह कह कह एतय ओतय सब ठाम ।। सेनुरी किरनक स्पर्श सुख पवितहिं विहुँसलि नलिनी तत्काल । पञ्चम सुर मे कोइली बाजलि गूँजि उठल सहर्ष मड़ाल ।। - प्रमोद झा 'गोकुल', दीप, मधुवनी (विहार) फोन-9871779851 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.४.जगदानन्द झा 'मनु'-३० टा हाइकू जगदानन्द झा 'मनु' तीसटा हाइकु तीसटा हाइकू १ वीणा धारिणी कमल विराजनी बुद्धि दिअ माँ २ हे माँ सारदे हमरो ज्ञान दिअ हम अज्ञानी ३ महाकालिका हमर कुल देवी कल्याण करु ४ हे महाकाली शरण एलौं हम रक्षा करु माँ ५ संग जखन मैयाक आशीर्वाद तँ डर किए ६ गोर लगै छी दुनू कऽल जोड़ै छी हे जगदंबा ७ जाएत कोना माँ अहाँकेँ छोरि क अहाँक बेटा ८ कनैए बेटा मैया कोना सुतती जागू हे अम्बे ९ भक्ती नै जानी नै जानी पूजा विधि तोरा जानी माँ १० कोना सहबै मैया एतेक दुख दूर करु ने ११ हे माँ भवानी किएक बिसरलौं जग कल्याणी १२ एतेक दिअ जे हम बाँटि सकी अहाँक कृपा १३ ललका फूल तोड़ि अनलौं मैया करु स्वीकार १४ भेलै सिंगार मैयाक अदभुत अरहुलसँ १५ कपट मोने नहि मैया भेटती बुझल करु १६ हमर साँस तोहर देल मैया बिसरल छी १७ हे भोले बाबा सुधि हमरो लिअ ओधर दानी १८ कमरथुआ सजल निहाल छै बाबा नगरी १९ जगदीश्वर हे प्रभु कृपा करु शरण लिअ २० भोग लगाबू गरीबक नबेद हे भगवान २१ कष्ट हरु हे पिता परमेश्वर आश अहीँक २२ राम नामसँ सभ किछु होएत भरोसा करु २३ सगरो हल्ला पाथर जीबि गेलै रामक स्पर्शे २४ राधा रमण जगत केर स्वामी कतय अहाँ २५ कृष्ण हमर किए बिसरने छी सुनू पुकार २६ अबि क प्रभु भक्तक कुटियामे दर्शन दियौ २७ यशोदा मैया तोहर बलकबा तंग करैए २८ बाल गोपाल मोनक मंदिरमे आबि बिराजु २९ लड्डू गोपाल लड्डू लेने हाथमे मन मोहना ३० हरे गोविंद कतय गेलौं कृष्ण दर्शन दिअ - जगदानन्द झा 'मनु', मोबाइल नंबर ९२१२४६१००६ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
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साहित्य जकादेपी पल साहित्य अकादेमी द्वारा नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला 2025 के अंतर्गत आयोजित = fata मैथिली साहित्यकार = सुभाष चंद्र यादव से सुपरिचित मैथिली लेखक विद्यानंद झा की बातचीत सुनने के लिए आप सादर आमंत्रित हैं शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2025, अपराहून 5:00 बजे ; स्थान : हॉल नं. 5, स्टॉल नं. 7-3, की प्रगति मैदान, नई दिल्ली साहित्य अकादेमी पुस्तक प्रदर्शनी एवं बिक्री हॉल नं. 2 एवं 3, Ria नं. एल-9 एवं हॉल नं. 5, स्टॉल नं. T-i3 उत्तरापेक्षी : 0-23386626-29 ई-मेल : secretary@sahitya-akademi.gov.in वेबसाइट : www.sahitya-akademi.gov.in
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स्वर्ग किसी देशविंशेष (स्थान विशेष) या लोकविंशेष का नाम नहीं है, वरन् उस अवस्था को स्वर्ग कहते हैं, जिस अवस्था मे मनुष्य को शारीरिक, आत्मिक, पारिवारिक आदि सब प्रकार के सुख प्राप्त हैं, जिंस अवस्था में मनुष्य को कोई शारीरिक FerAl, मानसिंक पीड़ा नहीं सताती, माता-पिंता तथा सन्तान का सुख प्राप्त हो, शरीर सुन्दर तथा सुडौल हो, कोई त्रुटि न हो, इसकी प्राप्ति का साधन सद्धिचार तथा उत्तम सदाचार है। दूसरे शब्दों में रोग, दुःख, अंग-भंग, कुरूप शरीर आदि पापों का फल है। संक्षेप में 'सुखविशेष भोग तथा उसकी सामग्री' का नाम स्वर्ग है। (यह स्वर्ग मनुष्य के अपने भीतर, अपने निवास, परिवार, समाज व देश में ही होता है व माना जा सकता है। वाल्मिकी रामायण में भी मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम लक्ष्मण जी से कहते हैं कि 'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी। ' पूरे श्लोक का भाव है कि मैं जानता हूं कि लंका सोने की है परन्तु फिर भी मुझे यह अच्छी नहीं लगती। क्योंकि अपनी माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं। यह इसलिए कि जो सुख विशेष अपनी माता और अपनी जन्म व देश भूमि में मनुष्य को प्राप्त होता व हो सकता है, वह अन्यत्र नहीं मिल सकता। -लेखक)
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