ISBN Number: 978-93-342-3822-8 (Book) ISSN 2229-547X (online) 𑒀 विदेह ४१३ म अंक ०१ मार्च २०२५ (वर्ष १८ मास २०७ अंक ४१३) [विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। कॉपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- २०२५. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२५. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. It is a platform for scholars, researchers, writers and poets to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, and poetry in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@gmail.com. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover designed by AUM GAJENDRA THAKUR Videha e-Journal: Issue No. 413 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.अंक ४१२ पर टिप्पणी (पृष्ठ १-१) गद्य २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-५ (पृष्ठ ३-७) २.२.प्रमोद झा 'गोकुल'-शाहीन बाग (पृष्ठ ८-१०) २.३.परमानन्द लाल कर्ण-तीर्थक्षेत्रक माहात्म्य-३ (पृष्ठ ११-१७) २.४.आचार्य रामानंद मंडल-महर्षि परशुराम के सीता से बिआह प्रस्ताव (पृष्ठ १८-२०) २.५.होलीक अवसरपर "विदेहक उपाधि" (पृष्ठ २१-३३) पद्य ३.१.अम्बालिका कुमारी- वसंत (पृष्ठ ३५-३६) ३.२.राज किशोर मिश्र-हम बेटी छलहुँ... (पृष्ठ ३७-४०) ३.३.प्रमोद झा 'गोकुल'-चैलते रहब (पृष्ठ ४१-४३) ३.४.जगदानन्द झा 'मनु'-३० टा हाइकू (पृष्ठ ४४-५३) ३.५.आचार्य रामानंद मंडल- मैथिली/ मखाना (पृष्ठ ५४-५७)
विदेह ४१३ म अंक ०१ मार्च २०२५ (वर्ष १८ मास २०७ अंक ४१३) || 57 56 || विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in १.१.अंक ४१२ पर टिप्पणी आशीष अनचिन्हार कल्पना झा जी द्वारा लिखल जा रहल "मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान"क भाग सभ पढ़ि रहल छी। एहि आलेखक तेसर भाग (1 फरवरी 2025) मे कल्पनाजी लिखैत छथि जे व्यासजीक पहिल रचनाक प्रेरणा स्रोत ओहि समयक एकटा तर्ज "मसीहा बनके बीमारों को किस पर छोड़ जाते हो" अछि।
ई हमरा जनैत नात छै। एहि नात केर मात्रा क्रम छै 1222-1222-1222-1222 एहि मात्राक्रम केर नाम छै 'बहरे हजज मोसम्मन सालिम'। एहि बहरमे बहुत रास गजल, नात, सलाम, दुआ, फिल्मी गीत आदि लिखल गेल छै। फिल्मी गीतक चर्च करी तऽ
1- बदल जाये अगर माली चमन होता नही खाली 2- खिलौना जानकर तुम तो मेरा दिल तोड़ जाते हो एकर साफ मतलब भेल जे व्यासजीक लेखन केर मूल प्रेरणास्रोत उर्दू शाइरी अछि आ तँइ एकर रूप एहनो आएल जे व्यासजी उमर खैय्यामक रुबाइ सभहक अनुवाद केलथि। ई अनुवाद विदेह पोथीपर सेहो राखल गेल छै। नोट- मैथिली गजलमे सेहो एहि बहरपर नीक-नीक गजल लिखल गेल छै जकरा पाठक पढ़ि सकै छथि।
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। गद्य २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-५ २.२.प्रमोद झा 'गोकुल'-शाहीन बाग २.३.परमानन्द लाल कर्ण-तीर्थक्षेत्रक माहात्म्य-३ २.४.आचार्य रामानंद मंडल-महर्षि परशुराम के सीता से बिआह प्रस्ताव २.५.होलीक अवसरपर "विदेहक उपाधि" २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-५ कल्पना झा मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-५ रिएक्सन मे लिखलनि पहिल उपन्यास 'कुमार' "असलमे हम रिएक्सन मे 'कुमार'क रचना कएल" ई वक्तव्य छनि उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' जीक। सर्वविदित अछि जे १९३३ ई. मे प्रकाशित हरिमोहन झाक उपन्यास 'कन्यादान' लोकप्रियताक नब कीर्तिमान स्थापित कएने छलए। मूलतः ई एहन उपन्यास सिद्ध भेल, जे हरिमोहन झा जी केँ तँ लेखकक रूप मे स्थापित कएबे कएलकनि, मैथिली साहित्यक लोकप्रियता सेहो बढ़ौलक। हमरा तँ इहो सुनल अछि जे 'कन्यादान' उपन्यास पढ़बालेल बहुत लोक, जे गैर-मैथिली-भाषी छलाह; सेहो मैथिली सीखब शुरु कएलनि। एहि उपन्यास मे लेखक मैथिल समाज मे व्याप्त अंधविश्वास आ पाखंड केँ देखार कएलनि अछि। संगहि मैथिल समाज मे बेटा आ बेटीक पालन पोषण, पढ़ाइ-लिखाइ मे जमीन-आसमानक अन्तर, संगहि मैथिल लोकक संकुचित सोच दिस पाठकक ध्यान आकृष्ट करबाक प्रयास कएने छथि। पोथीक समर्पणे मे मैथिल समाज पर कटाक्ष रूपी प्रहार देखबा/पढ़बालेल भेटि जेतनि पाठक केँ "जाहि समाजमे बी० ए० पास पतिक जीवन संगिनी ए बी पर्यन्त नहि जनैत छथिन।" मैथिल समाजक नकारात्मक पक्ष केँ उजागर करैत ई पोथी 'व्यास' जी केँ बहुत नीक नहि लगलनि। एमहर एहि उपन्यास 'कन्यादान'क लोकप्रियता सँ उत्साहित भ' १९४३ ई. मे एकर अगिला भाग 'द्विरागमन' सेहो प्रकाशित भेलनि हरिमोहन झा जीक। १९४५ ई. में 'प्रणम्य देवता' कथा-संग्रह सेहो प्रकाशित भेलनि। सभ पोथीक विषय-वस्तु ओएह...मैथिल समाजक कौचर्य-कुचेष्टा-खिधांस। किछु लोक हरिमोहन झा जीक पीठ ठोकैत कहथिन - वाह ! हरिमोहन बाबू वाह ! की बढियाँ लीखल अछि ! मुदा 'व्यास' जी वैचारिक स्तर पर हरिमोहन बाबूक रचनाक संदेश सँ असहमत रहथि। खाली अपन समाजक खिधांस, खाली अपन संस्कृति पर आक्रमण, 'व्यास' जी केँ नहि अरघलनि। हुनकर कहब छलनि, "मैथिल समाजक उत्कर्ष, आदर्श एवं गरिमामय संस्कृति सँ के नहि परिचित हेताह ? उत्कर्षक कत्तहु चर्चा नहि, मात्र अपकर्षक चर्चा... खाली अपकर्षक चर्चा करैत रहबाक की औचित्य ? एहि सँ मैथिल समाजक मनोबल टूटय लगतैक। लगतैक जेना सभटा खरापे-खराप अछि अपना मिथिला मे।" संयोगवश एक दिन सतीश बाबू (पूर्व मुख्य न्यायधीश) आ हरिमोहन बाबू आमने-सामने बैसि क' गप्प करैत रहथि। 'व्यास' जी सेहो ओत्तहि ठाढ़ रहथि। सतीश बाबू व्याकुल जकाँ हरिमोहन बाबू सँ पुछलथिन - "ई की अहाँ अपन समाजक खाली खिधांस लिखैत छी ? अपन समाजक उत्कर्ष पर लिखू !" 'व्यास' जी केँ सेहो नहि रहल गेलनि। तखन ओ पढ़ितहि छलाह। तथापि ओहो निवेदन कएलथिन - "ठीके... प्रोफेसर साहेब, अपने की-कहाँ लिखने जा रहल छियैक ! बहुत अनुचित भ' रहल छैक।" तकर बाद तँ जेना प्रलय भ' गेलनि 'व्यास' जी लेल। हरिमोहन बाबूक आँखि लाल-लाल भ' उठलनि। 'व्यास' जी दिस आग्नेय नेत्र सँ ताकैत बजलाह - अहाँ विद्यार्थी छी....अहाँ की टुभ-टुभ बजैत छी..... अहाँ की बुझैत छिऐक..... अहाँ केँ कोन ज्ञान ? 'व्यास' जी स्तब्ध रहि गेलाह। तत्काल तँ ओ कोनो उत्तर नहि द' सकलथिन। सोचलनि, "आब लेखनक माध्यमे हम हरिमोहन बाबू केँ उत्तर देबनि।" तकर बाद 'व्यास' जी एक आदर्श व्यक्तित्व केँ मुख्य पात्र बनाए उपान्यास लिखब आरम्भ कएलनि। इएह उपन्यास पछाति 'कुमार' नाम सँ प्रकाशित भेलनि। कुमार उपन्यास 'व्यास' जी लिखलनि जखन ओ कुमारे छलाह। पाण्डुलिपि मुजफ्फरपुर मे मित्र उमानाथ बाबू केँ द' देने छलथिन। प्रूफ-आदि देखबाक भार हुनके उपर छलनि। तहिया उमानाथ बाबू मुजफ्फरपुर मे रहैत छलाह। छपबा मे बड़ समय लगलनि। बिआह आ चतुर्थी आदिक बाद जखन 'व्यास' जी मुजफ्फरपुर पहुँचलाह तँ पाँच-सात प्रति कुमारक छपल भेटलनि। कहबाक माने कुमार मे लिखल 'कुमार' उपन्यासक प्रकाशन तखन भेलनि जखन 'व्यास' जी विवाहित भ' गेल छलाह। कुमार उपन्यास पर 'व्यास' जीक समकालीन लेखक लोकनिक बहुत नीक-नीक प्रतिक्रिया अएलनि। सबसँ बेसी प्रशंसा कएलथिन 'सुमन'जी । ओ कहलथिन - 'व्यास'जी अहाँ रुचिए बदलि देलियैक पाठकक... खाली विवाह ... द्विरागमन .... विवाह-द्विरागमन - इएह उपन्यासक विषय रहइक ... अपने मौलिक उपन्यास लिखल अछि । रमानाथ बाबू, तंत्रनाथ बाबू, सभक प्रशंसा भेटलनि। हरिमोहन बाबू सेहो पीठ ठोकलथिन। आशीर्वाद देलथिन। 'व्यास' जीक वस्तुत: आदर्शोन्मुखी विचारधाराक लोक छलाह। हुनकर लेखनी मे सेहो तकर झलक स्पष्ट देखल जा सकैछ। दुष्ट चरित्रक चित्रण करए नहि चाहैत छलाह 'व्यास' जी। आदर्श चरित्र केँ 'हाइलाइटेड' करब हिनकर स्वभाव-अनुकूल लक्षण कहि सकैत छी। दुष्टहु लोकक चरित्र मे गुण देखा, ओकरा मानव बना दैत छलाह। कथानकक अनुरूपेँ कतहु-कतहु पुरुष चरित्र मे दूषणता भेटियो सकैए, मुदा हिनका द्वारा चित्रित स्त्रीगण सर्वथा शुद्ध ओ निर्दुष्ट भेटतीह। ई 'व्यास' जीक नीक लोक बला छवि जे छलनि, आदर्श व्यक्तित्व बला छवि, से हिनकर लेखनी पर सभदिन हावी रहलनि। ई एकटा अकाट्य सत्य अछि। समाज मे आदर्श स्थापित करबाक प्रयास हिनकर लेखनी मे यत्र-तत्र अभरत। ध्यान देबाक बात अछि, जे सुधारवादी सन 'ऐटिट्यूड' नहि देखाएत हिनकर लेखनी मे, हँ...आदर्शवादी अवश्य देखाएत। चूँकि ओ स्वयं अपन व्यक्तिगत जीवन मे एकटा आदर्श पुत्र, आदर्श अग्रज, आदर्श पति, आदर्श पिता आ कर्म-क्षेत्र मे आदर्श अभियन्ता बनि क' सभठाम आदर्श स्थापित करैत रहलाह। से हिनकर रचना मे जँ परिलक्षित भ' जाइत अछि, तँ से कोनो आश्चर्यक गप्प नहि ने ? संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-4 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.प्रमोद झा 'गोकुल'-शाहीन बाग प्रमोद झा 'गोकुल' शाहीन बाग
भारत सरकार मुर्दाबाद! नागरिकता कानून वापस लो!!! आदि शासन बिरोधी नारा लगबैत जनी जैत आ बाल बुदरुकक संग संगोर करैक लेल अबदुल्ला पहुँचल मंजूर अलीक दलान पर ।ओत ओ सब आर जोर जोर सँ प्रधानमंत्री आ गृहमंत्रीक विरोध मे चिचिया लागल सोर सराबा सुनि मंजूर अली आ ओकर पत्नी अपन छोट छोट छोट बच्चाक संग धरफरा के बाहर निकलल आ अकचका के ओ अबदुल्ला सँ पूछि बैसल---कथीक हुजूम छियै ई भाइजान! -अरे , तोरा कुछो नै बूझल छह ?अबदुल्ला बाजल । -न्न, हमरा ते नै बूझल अछि! अबैत बाजल मंजूर । -नै बूझल छह ते सुनह! -हँ हँ कहह ! -यैह जे शाहीन बाग मे बड़का धरना प्रदर्शन भय रहल छै,ओइमे कतेको पाटीक बड़का बड़का नेता आ अपना आरूक लीडरक संग मुल्ला मौलबी सेहो सिरकत कय रहल छै ।जनाना आ बुदरूक सब के तिरंगा संगेँ बुलौलकैहे ,तेँ सब जा रहल छै ओत्तै ।एकटा तूँ जे अकान बनल छह ।धू मरदे.. -बात के बतंगर किएक बनबैत छह? हमहूँ ते सएह पूछै छिअह जे कथीक धरना प्रदर्शन भय रहल छै? -नीक नहैंतते अपना आरुक लीडरे बतौतह ,ओना हमरा इएह बूझल अछि जे सरकार एगो नागरिकता कानून पास केलकैहे ,जकरा मुताबिक बाहरी हिन्दू सिख इसाइ आ पारसी सब जे एत' आबि चुकल छै आ जे आब'बला छै तकरा सब के सादर नागरिकता भेटतै मुदा अपन मोहमडन के नै ।बाहरी जतेक अपन बिरादरिक लोक रोजी रोटीक टोह में एत'आयल छै ओकरा सब के खदेर के बैला देतै ।आब तोहीं कहह की ई उचित भेलै? -अनुचित की भेलै से कहह ने! ऐँ हौ! पाकिस्तान बँगला देश आ अफगानिस्तान आदि जगह से जे अपन बिरादरिक लोक एत एलै से की करैले? एकरा सबके अपन देश मे कोनो दिक्कत नै छलै तखन जे एत एलै से मात्र दंगा फसादे मचबैले ने!सरकार आ देश जखन एकरा सब से आजिज भय गेलैए तखन ओकरा ऐ तरहक निर्णय लेबय पड़लै ,से ते बुझहक! दोसर बात हिन्दू सिख इसाइ आ पारसी के ओतुक्का सरकार आ लोक दुर्दशा कयके राखि देलकै ।इज्जत आबरू धर्म आ धन सब दाव पर लागि गेलै ओकरा सबहक ।ने ओ सब ओत' सोतंत्र भय के जिबिये सकैये आ ने भरिये सकैये । एतबा सुनैत देरी अबदुल्ला आगि बबूला भय गेल ।ओ मंजूर अली के गरियबैत बाजल- साला तूँ हिन्दूक संग पूरि काफिर जकाँ बात करै छेँ! -काफिर तूँ कि हम ?मंजूर अली बाजल । - तूँ साला मादर चो..! -खबरदार! मूह सम्हारि के बाज नै ते .. -नै ते की? -रे चोट्टा! हमरा लेल पैहने देश आ एतूक्का अनमोल भारतीय संस्कृति आ सभ्यता ,तखन मजहब ।भारतक खूजल आसमानक नीचाँ रहि हमरा सब बेरोक टोक अपन धार्मिक अनुष्ठान करैत निर्भय जीबि रहल छी ।कहाँ केओ हमरा सब के प्रताड़ित करैये प्रत्युत सब एक दोसराक सुख दुःख नीक बेजाय मे जाति धर्म बिसरि सहभागी बनि हिल मिल के आनन्द पुर्बक रहि रहल छी तखन ई बेसुराह सुर किएक? -नत होइत अबदुल्ला बाजल- भाइ जान! तों ठीके कहै छह,हमहीं भटकि गेल छलौं नेतबा सबहक झाँसा मे आबि के ।माफ कय दैह हमरा! ठीके एहन सुख शान्ति कोनो मुस्लिम देश मे कहाँ छै ?बिना भेद भाव के संविधान हमरा सब के सबटा अधिकार दैत अछि । --प्रमोद झा "गोकुल", दीप,मधुवनी (विहार), फोन+९८७१७७९८५१ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.परमानन्द लाल कर्ण-तीर्थक्षेत्रक माहात्म्य-३ परमानन्द लाल कर्ण तीर्थक्षेत्रक माहात्म्य-३ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.आचार्य रामानंद मंडल-महर्षि परशुराम के सीता से बिआह प्रस्ताव आचार्य रामानंद मंडल महर्षि परशुराम के सीता से बिआह प्रस्ताव
महर्षि बाल्मीकि कृत रामायण आ संत तुलसीदास कृत रामचरितमानस में सीता बिआह प्रसंग में महर्षि परशुराम के प्रवेश धनुष भंग के उपरांत धनुष यज्ञशाला मे प्रवेश होइत हय। परंच संत लाल दास कृत मिथिला रामायण में एगो विस्मितकारी रहस्योद्घाटन हय कि महर्षि परशुराम स्वयंबर से पहिले जनक दरबार जनकपुर मे आयल रहतन। सीता के देखके राजा जनक से पुछलन इ दिव्य बालिका कोन हय।इ बालिका त विष्णु प्रिया लगैत हय।राजा जनक कहलन कि इ बालिका हमर पुत्री सीता हय।तब महर्षि परशुराम सीता से बिआह के इच्छा जतैलन आ सीता के मांग कैलन। राजा जनक कहलन कि अभी उपयुक्त समय न हय। अपने तपस्या करे जायल जाव। उचित समय पर आयब। महर्षि परशुराम जनक से कहलन कि अंहा सीता के बिआह के लेल इ प्रस्ताव राखब के जे शिव धनु के प्रत्यंचा चढ़ा देत वोकरे से सीता के बिआह होयत। महर्षि परशुराम के इ गर्व रहैन कि अइ शिव धनुष के हमरा बिना कोनो इ काज न क सकय हय।वो तपस्या करे चल गेलन। जौं राम शिव धनुष तोड़ के टंकार सुनके ऋषि परशुराम जनकपुर अयलन आ अपन क्रोध जतैलन।बाद मे अपन धनुष के प्रत्यंचा चढ़ाबे के परीक्षा राम से लेलन।राम के परीक्षा मे पास होयला पर रामावतार जान के पुनः तपस्या हेतु हिमालय चल गेलन। लाल दास कृत मिथिला रामायण के पंक्ति द्रष्टव्य हय। चौपाई -
तदनन्तर भृगुपति सम्प्राप्त।भेल जनकपुर भयसौं व्याप्त। देखि विभव मिथिलाक अनूप।क्षणभरि छला परसुधर चूप। मिथिलापति कयलनि सत्कार। क्षत्रिय नाशक जनिक कुठार। देखल जानकिक अनुपम देह।सुरकन्याक भेल संदेह। नृपसौ पुछल कहू ई नीकि। लक्ष्मी सन के कन्या थीकि। बुझि पड़ देखयित हिनकर भाल। विष्णुवधु सनि विभव विशाल। जनक कहल महि जोतल जखन। कन्या लाभ महीसौं तखन। परशुराम कहलनि अगुताय।नृप हमरहिं कन्या देल जाय।। कन्यारत्न हमर छथि योग्य। पाणिग्रहण करब सुख भोग्य।। से सुनि कहल जनक महराज। अपने जाइत छी तप काज।। अपने रहब समाधि लगाए।गिरि कंदर शत वर्ष बिताए।। वनमे कन्या रक्षा हीनि।अबला रहतिह ककर अधीनि।। अपने एखन विपिन गेल जाय।समय स्वयंबर आयल जाय।। कहल परसुधर गर्वित वाक।सुनु नृप ई थिक शिवक पिनाक।। जौं हमरा तपमे लग देरि।धनुमुख करब विवाहक बेरि।। आबथि जखन वीर समुदाय।एहन प्रतिज्ञा देव सुनाय।। जे एहि धनु पर तंतु चढ़ाव।सैह वीर सीताकां पाब।। से सुनि जनक भेला आंनद। कहलनि बेश -बेश सानंद।। परशुधरक मनमे ई भाव।बिनु हमरे के धनुष उठाव।। दोहा - परशुराम तप हित तखन,गेला हिमालय प्रांत। योगासन मन ईश पद, लगला भजय एकांत।।
-आचार्य रामानंद मंडल सीतामढ़ी। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.होलीक अवसरपर "विदेहक उपाधि" होलीक अवसरपर "विदेहक उपाधि" होलीक अवसरपर प्रस्तुत अछि "विदेहक उपाधि"। ई उपाधि धारण करथि साहित्यकर्मी आ विदेहक संग जुड़ि सार्थक काज दिस आबथि से कामना............(प्रस्तुति विदेह टीम) 1. अरविन्द ठाकुर- आब भेटि रहल अछि। 2. जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल- निपत्ता। 3. प्रेमलता मिश्र 'प्रेम'- मात्र प्रेमसँ काज नहि चलत। 4. शरदिन्दु चौधरी- हम उपेक्षित कहियो नै रहलहुँ। 5. कथाकार अशोक-पुरस्कार हाथक मैल छै। 6. रामभरोस कापड़ि 'भ्रमर'-मधेशक मठाधीश। 7. लक्ष्मण झा सागर -सत्य बातक काल्पनिक लेखक। 8. नरेन्द्र झा - हम भने आर्थिक लेखक छी। 9. प्रो. डा. रामावतार यादव - धरना बला सभ भाषावैज्ञानिक बनि गेल। 10. हितनाथ झा-हम आलोचक कहिया बनि सकब? 11. शिव शंकर श्रीनिवास - प्रतीक्षा, प्रतीक्षा आ मात्र प्रतीक्षा। 12. नारायण जी चौधरी- गोहि उर्फ पोखरिक रखबार। 13. जगदीश प्रसाद मंडल - हम अपने बनि गेलहुँ। 14. सुभाष चंद्र यादव - अपने अकादमी अपने वार्ता। 15. राजदेव मंडल - कविताक राजमिस्त्री। 16. सुशील - कलकत्तामे कियो ने चीन्हैए। 17. दिनेश कुमार मिश्र- कोसी नदीक सहेली। 18. अशोक झा (मिथिला विकास परिषद्)- जे छी से हमहीं छी। 19. वीरेन्द्र मल्लिक - लाइफटाइम अचीभर। 20. परमेश्वर कापड़ि - भ्रमरक डंकसँ बोखार भेल। 21. भीमनाथ झा - खाली आलेख बेरमे खोज करैए हमरा। 22. नचिकेता -जिनका प्रबोध सम्मान भेटल छनि मुदा अकादमी पुरस्कार नहि तिनके हम देबनि। 23. गंगेश गुंजन - कियो चर्च नहि करैए। 24. प्रदीप बिहारी-आब हमहूँ 'पहिल' बला लिस्टमे आबि गेलहुँ। 25. योगानन्द झा- हरेक मंच हमरे अछि। 26. चन्द्रेश- दुर्भाग्यसँ "मणि" भेटल। 27. मुन्नाजी - कियो बीहनिकथाक अस्तित्व नहि मानैए। 28. प्रीति ठाकुर - चित्रकथा छोड़ि किछु नै। 29. वीणा ठाकुर - साहित्य अकादमीक नेहरू। सभ गलती लेल जिम्मेदार। 30. रमेश- अनचिन्हार डसने अछि। 31. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र - हमर गाम अरेड़ अछि। 32. रबीन्द्र नारायण मिश्र - एखन हम उपन्यास लीखब शुरुए केलहुँ अछि। 33. बिनयानंद झा - मिथिलाक सभ जिलाक विकास मधुबनीसँ भेल छै। 34. शैलेन्द्र आनन्द- हमरो नहि भेटत हम त्रिकोणक तेसर कोण छी। 35. कल्पना झा (पटना)- आलोचनासँ पाठकीय दिस। 36. नबोनारायण मिश्र - आब दिल्ली सेट। 37. गजेन्द्र ठाकुर -40 बर्ख धरि छातीपर बैसल रहबै। 38. अजित कुमार झा - के पड़त झमेलामे। 39. दिलीप कुमार झा - आँगनमे आन्दोलन उर्फ दरबज्जापर धरना। 40. नारायणजी- सुतरि गेल। 41. प्रदीप पुष्प -मुरझाएल पुष्प। 42. अभिलाष ठाकुर-कहियो काल 43. कुंदन कुमार कर्ण - साफे गाएब। 44. कीर्तिनाथ झा -कुरल केर आसा पुरल नै। 45. धनाकर ठाकुर -परिषद्सँ परिषद् धरि। 46. योगेन्द्र पाठक 'वियोगी' - साढ़ू संसारक सभसँ नीक लोक होइत छै। 47. गौरीनाथ- के छथि अरविन्द ठाकुर? 48. शेफालिका वर्मा-हमरोपर विशेषांक निकलि गेल। 49. श्रीधरम- उपन्यासक कहबैका। 50. सियाराम झा 'सरस' - आब गजल नै सम्हरैए। 51. शिव कुमार टिल्लू - मोहन भारद्वाजक सपनासँ एकटा गीतकार धरि। 52. विभा रानी- अपने मनमानी। 53. कुणाल - सभ सांप्रदायिक छै। 54. विनय भूषण ठाकुर - हरेक विधामे फेल। 55. रविन्द्र कमार चौधरी - सावधान रहलाक बादो अकादमी नै पूछैए। 56. मुकेश दत्त- हम संस्थासँ बाहर नै छी। 57. चंदना दत्त- बेसी लीखि की करब? 58. शैलेन्द्र मिश्र- कविता पाठ केर भीडियो। 59. रमेश रंजन - साहित्य नाटकेसँ चलैत छै। 60. विजय इस्सर - एखनो उताहुल छी। 61. कामेश्वर झा कमल - बिना पानि-कादोक कमल छी। 62. मुन्नी कामत - फाइनलसँ बाहर। 63. केदार कानन - सभसँ 'संकल्प' लिया कऽ छोड़बै। 64. डा. शिव कुमार मिश्र - एक दिन सभकेँ पुरातत्व बनि जेबाक छै। 65. प्रेमकान्त चौधरी-संस्था तऽ व्यक्तिगत काजक संवाहक छै। 66. उदय चन्द्र झा 'विनोद'- सभ किछु विनोदहिमे भेल। 67. लाल देव कामत - छोट पाठकीय 68. आचार्य रमानंद मंडल - जीवनकेँ मानकीकरण सेहो हेबाक चाही। 69. सुरेन्द्र ठाकुर - बाबू साहेब चौधरीसँ शुरू आ बाबू साहेब चौधरीपर खत्म। 70. चन्द्रमणि झा - पुरस्कारक नामक रागपर हम कतेक गाबि सकब? 71. बैद्यनाथ चौधरी 'बैजू' - अतेक काज केलाक बादो दरभंगिया हमरा शिक्षा माफिया कहैए। 72. दमन कुमार झा - अपन सभ इच्छाक दमन कऽ लेलहुँ। 73. आशा मिश्र - एखनो उचाट लागल अछि। 74. नीरजा रेणु- कहाँ कियो बात करैए। 75. अमरनाथ - कबकब। 76. विश्वनाथ - आब साक्षात्कार नै। 77. विभूति आनन्द - अभिलाषा-अभिनंदनग्रंथक। 78. शैलेन्द्र कुमार झा - बुढ़ारीमे सगर राति जागब। 79. प्रेम मोहन मिश्र- नै सम्हरल। 80. भवेशचन्द्र झा शिवाशं- जूरी बना कऽ अइ बेर हलाल कऽ देलक। 81. मंजर सुलेमान- हो अल्ला, केहन मंजर देखेलह। 82. महेन्द्र नारायण राम - मुख्यधाराक जाति फिलर। 83. सत्येन्द्र कुमार झा - दरभंगे धरि। 84. हीरेन्द्र झा - सगर राति केर प्रबंध संपादक। 85. देव शंकर नवीन - आब पुरान भेल जा रहल छी। 86. रमाकान्त राय रमा- जवानीमे किछु नै भेल तँइ फेसबुकपर ललितगर फोटो दैत छियै। 87. ईशनाथ झा - कांग्रेसी कॉलेजमे छी तँइ भाजपाक विरोध करब हमर काज भेल। 88. नाटककार आनन्द कुमार झा - जहिया मूल पुरस्कार घोषित हेतै तहिये नाटक लीखब। 89. अजित आजाद - दू बौहुसँ हारल आ नवकी प्रेमिकाक मारल।. 90. नील माधव चौधरी-नवीन वियोगी चौधरी। 91. विजय चन्द्र झा- तालकटोराक तालमे। 92. विनोद कमार झा सरकार - फेस्टीभल करबै तऽ कहू। 93. बुद्धिनाथ मिश्र- मैथिलीमे अकादमी भेटब सहज छै। 94. चन्द्र मोहन कर्ण - केकरा कतेक दियै? 95. मधुकान्त झा- हमर लट लीलामे मधु भरल छै। 96. केष्कर ठाकुर - PHD चाही? 97. कामिनी- दोसर गिलास केर खोजमे। 98. चन्दन कमार झा - मूल पुरस्कार लेल जगबे करबै। 99. रमानन्द झा रमण - एसाइन्मेंटक महंथ। 100. तारानन्द वियोगी- हमरा अप्रमाणिक साबित कऽ देलक। 101. अंशुमान सत्यकेतु - मुख्यधाराक मोड़पर। 102. निर्मला कर्ण - नुकाएल अग्निशिखा 103. कुमार मनोज काश्यप - हमरा बीहनि कथा नै चाही। 104. परमानन्द लाल कर्ण - लिप्यांतरण करै छी। 105. संतोष कुमार बटोही -लक्ष्यक पता नै। 106. डा. जियाउर रहमान जाफरी - मैथिलीमे गजल लिखनाइ छोड़ा देलक। 107. जगदानंद झा 'मनु' - फेरसँ ताल ठोकब। 108. राजकिशोर मिश्र - पोथी पठबै छी। 109. सुशील लाल दास - तमिल दिस दोहा मैन। 110. दयानंद झा (दड़िमा) - हमर अनुवाद कियो ने पढ़ैए। 111. पं. दयानंद झा - छंदशास्त्री माछ भंडार। 112. सत्यनारायण झा - ओहिना किछु लीखि लैत छी। 113. प्रणव झा - आब कने-मने लीखैत छी। 114. भैरव लाल दास - गाँधी लाल दास 115. भवनाथ झा - जनकपुर भारतमे छै। 116. अंजय चौधरी - पीढ़ी सह विशेषण सह दशक विशेषज्ञ। 117. संतोष कुमार मिश्र - हम तऽ मैथिलीक पोसपुत छी। 118. धीरेन्द्र झा 'मैथिल' - उपन्यास कीनू। 119. रघुनाथ मखिया - भोजनो बना कऽ भुखले रहलहुँ। 120. डा. आभा झा - संस्कृताह। 121. किशन कारीगर - पुरस्कार लेल अलगे कारीगरी चाही। 122. कुन्दन कर्ण - भाजपा समर्थित बीहनि कथा। 123. धीरेन्द्र कुमार झा - प्राइभेटे सही, कहुना पुरस्कारक लिस्टमे नाम आएल। 124. कमल मोहन चुन्नू - मुन्नू केर प्रतीक्षामे। 125. चण्डेश्वर खाँ- कच्छमच्छी छोड़ा देबनि। 126. ॠषि वशिष्ठ - दानव दल केर ॠषि। 127. मेनका मल्लिक- अनुवाद केर मल्लिका। 128. अनमोल झा - लघुकथाक मोजर नै। 129. किशोर केशव- हमर नाम नै कहबै। 130. डा. राम चैतन्य धीरज - हरेक धीरज केर एक सीमा एक रेखा होइत छै। 131. विद्यानन्द झा- साहित्य शास्त्रीय नहि चाही मुदा शास्त्रीय संगीतमे रुचि। 132. मिथिलेश कुमार झा - दस-बीस बर्खपर तऽ मंच भेटैए तकरा कोना छोड़ू। 133. कुमार मनीष अरविन्द- जंगले-जंगल महल धरि। 134. आशीष अनचिन्हार - पुरस्कार चाही तँइ आब चुप रहैत छी। 135. राजकुमार मिश्र - बिठुआमे कोनो दम नहि। 136. कृष्णमोहन झा मोहन - ग्लोबलो गाममे राजनीति छै। 137. शभेन्दु शेखर- मुल्लाक दौर महजिद धरि। 138. बैकुण्ठ झा - गजल बहरमे लीखू मुदा मात्राक्रम किए लीखै छी। 139. बीरेन्द्र कमार झा - हम अहिना लीखै छी। 140. प्रीतम निषाद- आन्दोलन विषाद दैए। 141. महेन्द्र - पातपर बैसले छी। 142. धीरेन्द्र प्रेमर्षि - माइक बलपर लेखक। 143. मन्त्रेश्वर झा - आब छोड़ि दिअ। 144. गंगानाथ झा गंगेश- अपना मोने नै लीखब। 145. अरविन्द अक्कू - फुटानी चौक केर सरदार। 146. सस्मिता पाठक- उपराग नहि। 147. अशोक अविचल - हमरो कार्यकाल अहिना छल। 148. डा. बासुकीनाथ झा - आब जे हो सभ मान्य छै। 149. अमरनाथ झा 'भारती' - भोरुकवासँ पहिने अस्त। 150. दीपक दिनकर - निपत्ता। 151. आनंदमोहन झा - व्याख्यानमालाक चसक। 152. राजीवरंजन झा -शौकिया। 153. राजीवरंजन मिश्र - सालमे एक मास दर्शन देब। 154. परमेश्वर झा 'प्रहरी' - हम कतहुँ नहि। 155. काश्यप कमल - अछिंजलेसँ पएर पखारब। 156. रेवतीरमण झा - अमेरिकी मैना 157. अयोध्यानाथ चौधरी - कहू किनकर अनुवाद छूटल। 158. बाबा वैद्यनाथ - आब हिन्दिएमे लीखब। 159. सतीश वर्मा - ने पत्रकार ने लेखक। 160. कुमार राधारमण -अपने वर्ग पहेलीमे फँसल। 161. देवांशु वत्स - कहियो काल चित्रकथा। 162. गंगा झा - टूटल मंचक निर्देशक। 163. दिनेश यादव - नेपालोमे ब्राह्मणवाद छै। 164. किशोर ठाकुर - हमर मिथिला हाट कब्जा कऽ लेलक। 165. सच्चिदानंद सच्चू - अतेक उपन्यास लिखलाक बादो मोजर नहि। 166. बिनीत ठाकुर - कहियो काल उगबै। 167. प्रवीण कुमार झा- बिना डाटा, बिना नेट बला सवा लाखक मोबाइल। 168. अशोक झा 'भोली' उर्फ भोली बाबा- खरापो लोक मंच देत तऽ ओकरा नीक कहबै। 169. मुकेश आनंद- हम ओकील छी से जानि कऽ हमर कथाक आलोचना करू। 170. रामबाबू सिंह- बस चौपाड़िए भरि। 171. मुरारी कुमार झा- हमर साइकिले हवाइ जहाज अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। पद्य ३.१.अम्बालिका कुमारी- वसंत ३.२.राज किशोर मिश्र-हम बेटी छलहुँ... ३.३.प्रमोद झा 'गोकुल'-चैलते रहब ३.४.जगदानन्द झा 'मनु'-३० टा हाइकू ३.५.आचार्य रामानंद मंडल- मैथिली/ मखाना ३.१.अम्बालिका कुमारी- वसंत अम्बालिका कुमारी वसंत
जखन कोइलीक कूक कान मे पड़ैत अछि / जखन गाछ सँ पात भूमि सँ मिलैत अछि / खेत जखन हरियर कचोर भ जाइत अछि / पीयर-पीयर सरसोकें चादरि ओछा जाइत अछि / वसंत आबि जाइत अछि।
जाड़ कें टाटा आ बाइ बाइ करैत अछि / मंद मंद हवा सुगंध भ' बहैत अछि/ नील रंग आकाश मे पंछी उन्मुक्त उडैत अछि / मोन सँ गीत कोनो सहजे फुटि जाइत अछि / वसंत आबि जाइत अछि।
गाछी में मंजर मदहोश क' जाइत अछि / लोकक चेहरा पर अबीर चढि जाइत अछि / कृष्णक तान राधा कें घीच ल' अबैत अछि / वसंत आबि जाइत अछि , वसंत आबि जाइत अछि ।
-अम्बालिका कुमारी; शोध छात्रा, विश्वविद्यालय मैथिली विभाग अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.राज किशोर मिश्र-हम बेटी छलहुँ... राज किशोर मिश्र हम बेटी छलहुँ...
हम अहाॅंक बेटी छलहुँ, तेँ कोखि मे हमरा मारि देलहुँ, दुनिओ देखि ने सकलहुँ हम, पहिनेहे हमरा टारि देलहुँ।
हमहूँ सन्ताने छलहुँ, तखन किएक ई गति भेल? कोन हमर अपराध छल ? एहन किएक कहू मति भेल?
प्रपंच, छल नहि जनैत छलहुँ, किएक तखन अन्याय? किए पक्षपात, किए एहन असरधा ? पूछै छी अए माय !
बूझि नहि सकलहुँ ,शक्तिपुञ्ज हम, चिन्हि ने हमरा सकलहुँ, हम चन्द्रकांत मणि, सूर्यकांत मणि, अहाँ झिटुका बुझि कऽ अँकलहुँ।
लक्ष्मी के हम रूप छलहुँ, हम सरस्वती के वाणी, 'असुर भयाउनि' हमहूँ बनितहुॅं, बनितहुँ बिकराड़ भवानी।
बनितहुँ हम गार्गी, मैत्रेयी, हम झाँसीबाली रानी, हमर पराक्रम, हमर शौर्य केँ, दुनिया सुनैत पिहानी।
अंतरिक्ष मे हमहूँ जयतहुँ, बनितहुँ हम कल्पना चावला, 'इसरो 'के वैज्ञानिक बनितहुँ, के नहि हमरा चिन्हैत, भला!
हम एस.पी बनितहुँ , कलस्टर बनितहुँ, बनितहुँ कम्प्यूटर विशेषज्ञ, चिकित्सिका बनि अस्पताल मे, जीवन-दानक करितहुँ यज्ञ।
विधनाक लेखनी अपन हाथ लए , दऽ देलहुँ हमरा मृत्युदण्ड, बिनु दोखे मारि देलहुँ हमरा, मातु-पिता भऽ एहन मोचण्ड ?
छीन लेलहुँ अधिकार जीबऽ के, की छाती एहि सँ जुड़ाएल? मातृ -पितृ तॅं देव तुल्य छथि, अहाँ के कनिको ने कनाएल?
'माता कुमाता न भवति ' , तखन कोना ई भेल? कनिआँ-पुतरा, सामा-चकेबा, मुदा पहिने मारि देल गेल।
हमरो लेल तऽ पमरिआ नाचैत, ओ बाजैत रानी-बेटी, दुरागमन मे सऽख, मनोरथ, अहाँ सँठितहुँ पेटार-पेटी।
परञ्च हमरा तॅं मारि देलहुँ, आबऽ सँ पहिने बारि देलहुँ।
हम, सराप तॅं नहि देब अहाँ केँ, परञ्च पूछब त' प्रश्न कए गोट, माए-बाबू के एहेन हृदय होइछ? होइत अछि नहि कोनो कचोट? अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.प्रमोद झा 'गोकुल'-चैलते रहब प्रमोद झा 'गोकुल' चैलते रहब
चलैत चलैत हमर जाँघ भय रहल अछि लोथ टटा रहल घुठ्ठी अकड़ि रहल पुठ्ठी पयरक पञ्जा कहि रहल हम लेलौं थस्स करू आब बस्स . घुरि तकै छी पाछाँ रस्ता निपत्ता गहींर अति गहींर खत्ते खत्ता गुज गुज अन्हार दैवक प्रहार बम्मा दैहना सेहो तैहना हाय रे कप्पार ! आगाँ पहाड़ दुर्ग अति दुर्ग पथ भय रहल बेसम्ह्रार लड़ाइ जे ठनलौं लड़ब जमि के बमकि के जीतब ठसकि जे ठानल संघर्ष आर पारक से जेना की ठमकि गेल ? ठमकल मनुख ठमकल नदीक वेग जत्तै ठमकि गेल तत्तै ठन ठन गोपाल भय,भय जायत ग्रास काल तेँ ऐ बेहाल हालो मे हम रुकब नै प्रवहमान नदीक वेग जकाँ बढ़ैत रहब,चलैत रहब वय के ठेंगा देखवैत रहब लक्ष्य हमर समुद्र नहिं रोकि सकत क्यो बरु हो पथ कंटकाकीर्ण कियेक ने ! तदपि हम बढ़िते रहब चलिते रहब ! चलिते रहब .. - प्रमोद झा 'गोकुल', दीप, मधुवनी (विहार) फोन-9871779851 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.४.जगदानन्द झा 'मनु'-३० टा हाइकू जगदानन्द झा 'मनु' तीसटा हाइकू १ लाली सेनुर हमर पिया केर आयु बढ़ेतै २ प्रेमक रस मोनमे फूटल छै आनन्दे हम ३ डेग नै उठै पिया जखन आगू मड़बापर ४ कोबर घर पिया संगे रातिमे मोन अधीर ५ चिट्ठी लिखलौं खूनक आखरसँ सिनेहीयाकेँ ६ फोन एलैये भोरे पियाक आइ ओ गाम एता ७ प्रेममे अहाँ माय बनि गेल छी हम चिलका ८ करु इलाज प्रेम रोग लागल यौ पतिदेव ९ पुषक जाड़ बितत कोना राति चलि आबू ने १० मोन कनैए नींद नहि अबैए आबू यौ पिया ११ हारलौं नहि जीवनसँ कहियो संगे अहाँक १२ मोनक तार अहीँ संग जूड़ल ई मानि लिअ १३ हम मरलौं गालक तिलपर जँ अहाँ बूझी १४ हम हारलौं तन मन अपन पिया सिनेहे १५ मोनक आरि हुनक दर्शनसँ टूटल किए १६ कनियाँ व’र रौदी दाही सुखल पलंग तोड़े १७ नेबोकेँ स्वाद नै लगैए पियाजी चाँच कराउ १८ नव कनियाँ भरि मोन खेसारी सुतल वऽर १९ खाली घरमे मचानपर खीरा सहब कोना २० आगि मिझोने भूख नहि मेटत चाही संतुष्टि २१ शिथिल देह कादोमे छप-छप अतृप्त मोन २२ एक्के रंग छै कारी गोर चाम ई बत्ती बुतेने २३ आजुक प्रेम मकैकेँ लाबा जँका जट-पटसँ २४ नवकी काकी काका संगे चलली गामक हाट २५ लवड़ा वऽर फुसियाही कनियाँ फरलै खूब २६ करीया वऽर सरकारी नोकरी गोर कनियाँ २७ मेहनतसँ नहि हम हारब अहाँक संगे २८ नारीक मोन आ पुरुषक मौन के बुझलक २९ गुलाब अहाँ हम काँट रहितो निबैह गेल ३० दू बूँद नोर हमर सारापर खसा देबै ने - जगदानन्द झा 'मनु', मोबाइल नंबर ९२१२४६१००६ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.५.आचार्य रामानंद मंडल- मैथिली/ मखाना आचार्य रामानंद मंडल मैथिली/ मखाना १ मैथिली
कि हय मातृभाषा ? कि हय भाषा?
मातृभाषा माय के बोली। भाषा बाप के लोली।
मातृभाषा हय देसी। भाषा हय अदेसी।
माय हय मातृभाषा। बेटी हय भाषा।
मातृप्रधान हय मातृभाषा। पितृप्रधान हय भाषा।
लोकभाषा हय मातृभाषा। बर्चस्ववाद हय भाषा।
अंगिका- बज्जिका हय मातृभाषा। मैथिली हय पितृभाषा।
अंगिका- बज्जिका हय शोषित मातृभाषा। मैथिली हय शोषक भाषा।
अंगिका- बज्जिका हय मिथिला भाषा। मैथिली हय दू घरिया भाषा।
अंगिका- बज्जिका आदि भाषा। रामा बनय समावेशी मैथिली भाषा।
२ मखाना
मखाना न हम मखान लिखब। मिथिला पेंटिंग न हम मधुबनी पेंटिंग लिखब। मिथिला न हम दरभंगा राज लिखब। तिरहुत न हम मिथिला लिखब। तिरहुता न हम मिथिलाक्षर लिखब। तिरहुतिया न हम मैथिल लिखब। वैष्णव न हम शाक्त बनब। सिया न हम जानकी लिखब। धिया न हम माय लिखब। अंगिका बज्जिका न हम मैथिली कहब। अगड़ा पिछड़ा न हम उच्च नीच लिखब। संविधान न। हम मनुस्मृति पढब। श्रमण न हम ब्राह्मण बनब। हिंदू न हम सनातनी बनब। धार्मिक न हम आडंबरी बनब। सच न रामा मिथक लिखब। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
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