ISBN Number: 978-93-342-5078-7 (Book) ISSN 2229-547X (online) 𑒀 विदेह ४१४ म अंक १५ मार्च २०२५ (वर्ष १८ मास २०७ अंक ४१४) [विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। कॉपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- २०२५. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२५. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. It is a platform for scholars, researchers, writers and poets to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, and poetry in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@gmail.com. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover designed by AUM GAJENDRA THAKUR Videha e-Journal: Issue No. 414 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.अंक ४१३ पर टिप्पणी (पृष्ठ १-४) गद्य २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-६ (पृष्ठ ६-११) २.२.प्रमोद झा 'गोकुल'-नागरिकता (पृष्ठ १२-१४) २.३.परमानन्द लाल कर्ण-तीर्थक्षेत्रक माहात्म्य-४ (पृष्ठ १५-२१) २.४.मुन्ना जी- पोथी परिचय- तोहर कतेक रंग (पृष्ठ २२-२५) पद्य ३.१.प्रमोद झा 'गोकुल'-कोइली (पृष्ठ २७-२८)
१.१.अंक ४१३ पर टिप्पणी डा धनाकर ठाकुर 171 क मूलांक 9 त होली उपाधि 2025 सटीक किन्तु विदेह पुरुषक अकादमिय अपूरित लक्ष्य पर हस्ताक्षर जाहि अनेक दर्जनक जाहिमे भनहि हमरा नहि राखल हो विदेशमा परिषद् सँ परिषद् हि तकक हमरहि रिकार्ड सहस्राधिक पृष्ठक एक हि अंकक बनि गेल जे तोड़ब प्रायः असम्भव होएत किछु मासमे संख्यानुसार संशोधित परिणाम दू सहस्रँ अघिक केवल मिथिला जागरण यात्राक भए जाएत जे मासिक अभिवृद्धि संग तीन सय टपि जाएत किन्तु यैह यायावरी नहि हमर आन मिथिला संबंधित लेखन जोड़ने ककरहूँसँ अधिक हो वा नहि अअकादमीय अपुरस्कृत श्रेणी लेखनमे ओ सर्वश्रेष्ठ नहिओ तथापि सर्वोच्च संख्यानुसार जरूर आओर आओर एहि लेल विदेहकेंटँ धन्यवाद जे हमर नाम हमरहि सहपाठीक नीचा सहजहि टीपलहि भनहि परम पूज्य शंकराचार्य पुरी प्रशंसित हमर मैथिली गद्यगीताक पांच सहस्र प्रति गाम-गाम पहुँच रहल हो जे धार्मिक चलते अपुरस्करणीय श्रेणीमे तैयो अग्रिम अनेकक श्रेणीमे सहसा कचोटित अनेक चुटकी बतबैत अछि जे कतेक मेहनतिसँ एतेक नाम विदेह संकलित करैत अधिकांशतः सटीक होली उपाधि देलक जकर विशद विवरण अजयमेरु (अजमेर) जाइत ट्रेनमे करे लागी त ओहिमे भोर भई जैत तेँ एहि एकल पंक्तीय टिप्पणीक समापन ई कहि करब जे ई नाम ओ प्रतिनाम मैथिली भाषाक वर्तमान ओ ओकर सतत लेखनीय समस्याक सद्यः निदेशक ओ समाधानसंकेतक सेहो अछि। (1.3=2025:2212, भरतपुर-जयपुर रेलमार्ग) प्रणव झा होलीक अवसरपर "विदेहक उपाधि" विदेह टीम द्वारा कैल गेल मजेदार प्रयोग छैक। ऐ के माध्यम से नै खाली संप्रति मे मैथिली लिखय-पढय बला बौद्धिक लोक सब के नाम एक ठाम संकलित कैल गेल छैक अपितु दु-चारि शब्द वा एक पंक्ति के मजेदार उपाधि द हुनक वर्तमान आंशिक अथवा सम्पूर्ण व्यक्तित्व के परिभाषित करबाक कोशिश रहल छैक। एहि लाथे लोक के फगुआ मे डिजिटल पटल पर एक दोसर के स्मरण करबाक, परिचय पेबाक एक दोसरक रंग मे रंगेबाक अवसर सेहो भेटल। संगहि अपन व्यक्तित्व के लोक के नजैर से ताकबाक अवसर सेहो। गंगेश गुंजन नीक। किन्तु एहन अवसरक उपक्रम मे सामान्यतः मानसिक रूपें पाठकक पहिल आशापेक्षा रहैत छैक व्यंग्य विनोदक गुदगुदाइ वला नामकरण सब पढ़बाक आशीष जी। हमरा जनैत ई 'अभिधावादी' विधा नहिं छैक। आब जेना 😝एक गोटेक नाम 'प्रेम-अघोड़ी' भ' सकैत रहनि किनको- बटुआ-विनोद ! कनको हाथक मैल पुरस्कार उपाय/उद्योग,किनको 'साहित्य मिस्त्री',एवं क्रमे...हमरा लगैए,से व्यंग्य-विनोदी सरस कल्पना-शीलता एत क्षीण छैक। ई हमर निजी मत अछि। एकर कारण संभव छैक जे अहँक 'एक लोकिया सेना' हयब भ' सकैत अछि वा एतेक दीर्घ कवि-लेखक सूची अथवा आन किछु से तंँ नहिं ज्ञात। बहुत बधाइ आ स्वागतक अधिकारी तँ अहाँ सहजहिं थिकहुएंं। शुभकामना।
कुणाल
171 के सूची मे मात्र 17 टा महिला ? 10 % मात्र!! बहूत बेइंसाफी !
लक्ष्मण झा 'सागर'
बहुत नीक लागल होलीक उपाधि! अपनो आ अनको। हार्दिक बधाइ!
अशोक अविचल नीक आ सामयिक व्यंग्य। वधाई
किशोर केशव
उपाधि सब नीक, मुदा हम बेसीक अर्थे नहि बुझलहुँ। जकर बुझलहुँ ताहिमे हास्य व्यंग्य नहि अभरल। तथापि एहि प्रयास लेल अभ्यर्थना। कहुना जीबैत रहओ मैथिली
शैलेन्द्र मिश्र
बहुत दिन भऽ गेलै कविता पाठक भीडियो पोस्ट केना। पुनः मैथिली साहित्यिक लेल काज शुरू करब। बंद पड़ल काज सभ फेर हेतै। कल्पना झा
बेजोड़ आ सटीक
दिनेश यादव (नेपाल)
सिर्जनाक' एकगोट अद्भुत शैली.... ! व्यङ्गमे यथार्थपरक भावक परावर्तन सेहो बेजोड ....! फगुवाके बहुत राश शुभकामना ! रमेश
क्यो कतबो 'गेल-गुजरल वा विक्षिप्त' लेखक हो,ओकरा लेल 'डंसनाइ/सांप- विशेषणक' उपयोग,नहि करबाक चाही,जेना उपाधि-सूची मे श्री 'आशीष अन्चिनहार' लेल कयल गेल अछि। विशेषणक चयनकाल मे, बहुत सतर्कताक आवश्यकता होइ छै।
दुनू दिसुका खंडन-मंडन आ सहमति-असहमति त' साहित्यक विशेषते थिक!ओइ लेल डंसनाइबला (कु) भावनाक, कोनोटा स्थान नहि अछि।
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। गद्य २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-६ २.२.प्रमोद झा 'गोकुल'-नागरिकता २.३.परमानन्द लाल कर्ण-तीर्थक्षेत्रक माहात्म्य-४ २.४.मुन्ना जी- पोथी परिचय- तोहर कतेक रंग २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-६ कल्पना झा मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-६ आदर्शोन्मुखी कथाकार उपेन्द्रनाथ झा 'व्यास' 'सन्यासी' खण्ड-काव्य आ 'कुमार' उपन्यासक प्रकाशनक उपरान्त १९५२ ई. मे उपेन्द्रनाथ झा व्यास जीक पहिल कथा-संग्रह 'विडम्बना' प्रकाशित भेलनि। जे सात गोट उत्कृष्ट कथाक संग्रह अछि। ओना एही पोथी 'विडम्बना'क भूमिका लिखैत रमानाथ झा पोथी मे संकलित कथा सभ केँ 'गप्प' कहलनि अछि। रमानाथ जीक कहब छनि जे 'व्यास' जीक प्रतिभा विशेष रूप सँ 'गप्प' काव्य मे निखरैत अछि। हिनका सँ जे केओ परिचित छथि, जे केओ हिनका संग गप्प कएने छथि, सभ स्वीकार करताह जे गप्प करबाक हिनका मे एक गोट अद्भुत छटा छनि। अपन हृदयक भाव केँ प्रच्छन्न राखि हिनका गप्प करए नहि आबैत छलनि। हिनकर गप्प सँ हिनक स्वभाव, हिनक आचार, हिनक संस्कार, सभ कथूक जेना अभिव्यंजन होइत रहए। तेहने हिनक लिखलो 'गप्प' सभ छनि। हिनक लिखल 'गप्प' मे जँ हिनकर नाम नहिओ रहतनि तथापि हिनका सँ जे केओ नीक जकाँ परिचित छथि से बूझि जेताह जे ई हिनके रचना थिकनि। एनमेन कहबहिक अनुरूप 'गप्प' लिखबाक हिनक आत्माभिव्यंजनक संग मीलि हिनक रचना केँ रोचक ओ विलक्षण बनाए दैत अछि। ओ विषय किछु रहौक हिनक 'गप्प' मात्र सुपाठ्य होइत अछि, पाठकक चित्त केँ बिनु आकृष्ट कएने नहि रहि सकैत अछि। खैर जे-से। कथाक संग्रह होइक वा 'गप्प'क, अछि धरि सातो के सातो सनगर। एहन सनगर जे कथाक विकास-धारा मे नब मोड़ अनलक। विविध पृष्ठभूमिक कथानक सँ युक्त एहि कथा-संग्रह केँ पढ़ि लेखकक हृदयक कोमलता सँ लोक सहजहि परिचित भ' जाएत। मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण सँ कोनो घटनाक अवलोकन/चित्रण करब पसिन कएल गेल पाठक वर्ग द्वारा। युवावस्था मे 'संन्यासी' आ 'कुमार' सन कृतिक प्रकाशन लोक केँ भ्रम मे ध' देने हेतनि जे 'व्यास' जीक हृदय सांसारिक सुख सँ विरक्त सन तँ ने छनि। युवावस्था मे एहि तरहक विषय पर लिखबाक पाछाँ वैराग्य सन मानसिकताक अनुमान सेहो लगा लेल गेल होएत बहुत लोक द्वारा। अपन मैथिल समाज अनुमान लगएबा मे सभदिनाँ उस्ताद रहल अछि। से मुदा कथा-संग्रहक प्रकाशन एहि तरहक अनुमान पर विराम लगएबा मे निश्चित सहायक रहल होएत, से हमर अनुमान अछि (छी तँ हमहूँ मैथिले ने....अनुमान लगा लेलहुँ हमहूँ) सांसारिक सामाजिक जीवनक छोट-छोट सुख-दुखक संग अन्तर्मनक द्वंद्व केँ उजागर करैत अछि 'व्यास' जीक कथा सभ। कथा लिखैत काल एकटा नीक कथाकार अपन हृदय उपछि क' राखि दैत अछि। आ से स्पष्ट परिलक्षित होइत अछि 'व्यास' जीक लिखल कथा सभ पढ़ि क'। हिनकर दोसर कथा-संग्रह 'भजना-भजले' प्रकाशित भेलनि १९८९ ई. मे। दुनू कथा संग्रह मिला क' मात्र सतरह गोट कथाक सृजन कएलनि उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' जी। जे हिनक विराट व्यक्तित्वक (साहित्यिक ओ सामाजिक, दुनू तरहेँ) अनुरूपेँ झुझुआन लगैत अछि। महान साहित्यकार रूप मे जानल जाइत रहल छथि। स्कुलिए जीवन मे 'व्यास' बनि गेल छलाह, उपनामक संगे वैचारिकता मे सेहो.....तखन कथाक संख्या कम होएब एहि बातक द्योतक अछि जे 'व्यास'जीक सर्जनात्मक अभिव्यक्तिक मूलविधा कथा नहि छलनि। ओना जँ 'व्यास'जीक रचनात्मक जीवनक सम्पूर्ण उपलब्धि केँ एकठाम राखि क' देखल जाए, तँ ई स्वतः स्पष्ट भए जाइछ जे हुनक रचनात्मक जीवन मे निरन्तरता अछि। ओ निरन्तरता कथाक अतिरिक्त उपन्यास, कविता, यात्रा-साहित्यक संग अनुवाद साहित्य केँ सेहो पुष्ट करैत भेटत। ओहुना लेखकक साहित्यिक उत्कर्षक मानदण्ड 'मात्रा' नहि, रचना मे अन्तर्निहित 'गुणवत्ता' मानल जएबाक चाही। ढाकीक ढाकी लिखलो पर जँ कोनो जीवन-मूल्य स्वीकृत नहि भए सकल अथवा रचनाकारक पाँती मे पृथक व्यक्तित्व नहि झलकैत देखा पड़ल तँ भरिगर गत्ताक अछैतो जीवन कालहि मे ओ रचनाकार अप्रासंगिक घोषित भए जाइत अछि। हिनक कथा सभ कल्पितो हो, तथापि कहबाक छटा तेहन चमत्कारी, भाषा तेहन प्राकृतिक, परिस्थितिक वर्णन तेहन स्वाभाविक आ चरित्रक चित्रण तेहन सहानुभूतिपू्र्ण रहैत अछि जे बुझा पड़त सभटा सत्ये गप्प अछि। ताहू मे उत्तम पुरुष मे कहल गप्प वा कथा सभ मे वक्ताक स्वभाव ओ संस्कार मे लेखकक स्वभाव ओ संस्कारक ततेक साम्यता भेटैत अछि जे संदेह नहि विश्वास भ' जाइत छनि पाठक केँ जे सभटा घटना लेखककक संग घटल छनि। माने अपन भोगल घटनाक साहित्यिक वर्णन कएलनि अछि लेखक। जेना हिनक सुप्रसिद्ध कथा 'रुसल जमाए' आ 'एकादशी महात्म्य' अप्पन अनुभव सन बुझा पड़त। 'व्यास' जी गप्प करबाक छटा मात्र सँ नहि एक दोसरो कारण सँ विशिष्टताक परिचय दैत रहलाह अछि अपन लेखनी मे। काव्य हो, कथा हो वा उपन्यास, सभ तरहक कृत्य मे हिनक मैथिलत्वक झलक स्पष्ट देखा पड़त। मैथिल परिवारक, मैथिल समाजक एहन वास्तविक, स्वाभाविक आ सुरुचिपूर्ण चित्रण बहुत कम रचनाकारक रचना मे देखबा लेल भेटत। अपना केँ मैथिल कहबा मे हिनका संकोच नहि होइत छनि। ने अपन समाजक उपहास वा कुचेष्टा कए अन्य समाज मे प्रतिष्ठा लाभ हिनक अभीष्ट रहलनि। मैथिलक जे पुरान संस्कृति छैक, ताहि पर गौरव छनि हिनका। मुदा कालक्रमेण अपना समाज मे जे त्रुटि सभ आबि गेल अछि ताहि दिशि आँखि मूनि केवल प्राचीनताक पक्ष धरब सेहो हिनक उद्देश्य नहि रहलनि। प्रत्युत वर्तमान समय मे नवीन परिस्थितिक माध्यमे अपना समाज मे जे सुधार आवश्यक छैक तकरो महत्व ई नीक जकाँ बुझैत छथि। प्राचीनताक पथ धएने जीवनक कठिन संघर्ष मे जाहि साधना सँ समाज अपन प्राचीन महत्व अक्षुण्ण राखि सकत ताही रूपक हिनक चित्रण अछि आ ताहि मे नवीनताक जे सामंजस्य अछि से हिनक भावुक हृदयक परिचय दैत अछि। दुष्टहुक चरित्र मे गुण देखाए ओकरा मानव बनाए दैत छथि। नर पिशाचक चित्रण 'व्यास' जीक रचना मे कतहु नहि भेटत। सर्वविदित अछि जे समाज मे सभ तरहक लोक होइत अछि, चोर-उचक्का, दुराचारी-व्याभिचारी सँ लए केँ त्यागी, परोपकारी एवं सद्वृत्तिक लोकधरि। परंच, 'व्यास'जी ओहन प्रवृत्ति अथवा प्रकृतिक लोक केँ अपन कथाक चरित्र नहि बनओलाह। जाहि सँ सामाजिक जीवन किंवा व्यक्तिगते जीवन मे मूल्यहीनताक स्थिति आबए, ओकर विजय होइक, दुष्टता बढ़ैक। वेदव्यासक प्रसंग कहल जाइत अछि, अठारह पुराण मे मूलतः दुइएटा तथ्य लिखल अति - परोपकार थिक पुण्य आ परपीड़न थिक पाप। जीवनक इएह आदर्श कथाकार 'व्यास' जीक कथाक नायक/नायिकाक जीवन मे परिलक्षित होइत अछि। ई आदर्शवादी आस्थावादी दृष्टि जीवन मूल्य केँ सामाजिकता प्रदान करैत अछि। मुदा 'व्यास' जीक आस्थावाद व्यक्ति आधारित नहि अछि, व्यक्ति आत्मबल केँ प्रकट नहि करैत अछि। जीवनक आ जीवनक प्रति व्यक्त एहि आस्थाक जड़ि अछि परोक्षसत्ता मे। धर्मनिष्ठ व्यक्तिक प्रत्येक आचारणक परिणति अथवा कर्मक फल केँ ईश्वराधीन मानबा लेल प्रतिबद्ध रहैत अछि, से हिनक लेखनी मे यत्र-तत्र परिलक्षित होएत। 'व्यास' जीक कथा सभ मे समाज मे व्याप्त विकृति आ रूढ़ि पर प्रहार भेल अछि। आचरणक शुद्धताक संगे विचारक शुद्धता आ उच्चता पर विशेष बल देल गेल अछि। कहबाक माने समाज मे एक टा आदर्श स्थापित करबाक प्रयास करैत सन। मूलतः आदर्शोन्मुखी साहित्यकार छलाह 'व्यास' जी। स्तरीय कथानक ओ कथ्यक संग हिनक कथाक एकटा पैघ विशेषता रहलनि रोचकता। संगहि भाषाक विशुद्धता सेहो विलक्षण। आ तैँ मैथिली कथा साहित्यक विकास मे 'व्यास' जीक कथाक छवि सभ सँ भिन्न अछि। समकालीन अथवा परवर्तीकालक कथाकारक संरचना सँ सर्वथा भिन्न स्वाद हिनक कथा दैत अछि। 'व्यास' जीक कथा समसामयिक जीवन सँ विशेष प्रभावित नहि होइत अछि आ परिवर्तित होइत युग-जीवन आओर विकृति आ विडम्बना सँ अप्रभावित रहैत अछि। जे 'व्यास' जीक कथाक स्वाद आ प्रभाव केँ बासि-तेबासि होमए नहि दैत अछि। टटका बनल रहल सभदिन। जेना पात्रक निर्दुष्टता आ सच्चरित्रता 'व्यास'जीक कथाक वैशिष्ट्य थिकनि, ओहिना भाषाक शुद्धताक रक्षा करैत मनोरंजक शैली मे अपन बात कहि देब 'व्यास' जीक कथाक आकर्षण ओ विशेषता थिकनि। संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-5 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.प्रमोद झा 'गोकुल'-नागरिकता प्रमोद झा 'गोकुल' नागरिकता आइ भोरे से दिनकर के मेघ झपने छैन ।झिहिर झिहिर हवा आ टिपिर टिपिर पानि ठण्ढ के और बढ़ा देने छै आ तै पर से विरोधी दलक आन्दोलन आर हरकम्प मचा देने छै ।केहनो हमय रहौ जाय ते पड़बे करतै, जखन गछने छियै तखन उपैये की!तै पर से ऐ बैसारी मे दू सय रुपैया आ नास्ता पानी सेहो देतै एहन खराब मौसम मे दरो देहारी कहाँ कतौ लगै छै?भेलै ते भैर दिनका बात ,साँझ पड़ैत घर ते चैलिये एबै! टेक्टरो जे घड़ी ने एलैये कलौवो बनिये गेल हेतै, खा पी के तैयार भ'जाइ छी ।कने आंगन जा के देखै छियै बनरझुल्ला बाली के खाना बनौलकै कि नै! घरबाली के मनुहार करैत बाजल ललन कामैत- -खाना बैन गेलै बनरझुल्ला बाली ? -एत्ते सबेर पेट मे खौंती किए फेकने छै आइ एकरा? --हम लरम से कहै छियै आ ई बैंह गरम से बाजै छै! आइ जेबै धरना परदर्शन मे ,बैठल ठाँ कि अल्हुवा तौलबै? तेँ जाइ छियै ओत्तै ।दौ झपसिन दू कौर सुअन,नै ते सतुवे गूर पर निमेरा कर' पड़तै । -हे लौ !थारी आगाँ मे रखैत बाजलि बनरझुल्ला बाली ,पुनः किछु सोचि- ऐ धरना परदर्शन से की हेतै? -से की जान' गेलियै हम ? सुनै छियै मोदी सरकार कोनो कानून पास केलकैहे, तकरे विरोध मे । -मर ! मोदी सरकार ते बड निम्मन काम सब केलकैहे !आइ तक गरीबक सुरता एना भ'के कियो कहाँ लेने छलै! तखन विरोध कथी के? एगो बात बुझाबौ ते ई! -कथी ! -ऐ कानून के नाम की छै? -से हम की जान'गेलियै? -तखन ई जाइ छै कथी ले ? -दू सय रुपैया ले! -तखन ई नै जाउ! -से किए? -जखन एकरा कुछो बुझले नै छै त'की कर' जेतै? -पाइ ल' नेने छियै नेताजी से! -भाँड़ मे जाउ पाइ आ नेताजी !कोनो नीके बात ले सरकार कानून बनौने हेतै ।हम पूछै छियै बौवा के, ओ ते पढ़ल लिखल छै ! -पुइछ लौ! -बौवा रौ! -हँ गै माय! -कोन कानून पास केलकैहे मोदी सरकार! -नागरिकता संशोधन कानून! -ऐ से की हेतै? -आन आन देश से लुटि पिट के जे हिन्दू सिख इसाइ आ पारसी भाइ बहीन एत' एलैहे ओकरा नागरिकता भेटतै ।अपने आरू जकाँ ओकरो सब के सुबिधा आ अधिकार भेटतै ,सएह! -ऐ मे हर्जे की छै? ओ सब सबटा गमा के ऐ ठाँ एलैहे, अपने जैनके कि ने! तखन जँ ई कानून पास भेलैहे त' कोन अनर्थ भ' गेलै ? कान खोइल के सूनि लौ! जँ ई ऐ ठाँ से ससरलै ते कोनो करम बाँकी नै रखबै एकरा हम । -ठीक छै, जखन यैह मना करै छै ते नै जेबै! भारी मन से बाजल ललन । ---''---''''---''----''''---'''------ --प्रमोद झा "गोकुल", दीप,मधुवनी (विहार), फोन+९८७१७७९८५१ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.परमानन्द लाल कर्ण-तीर्थक्षेत्रक माहात्म्य-४ परमानन्द लाल कर्ण तीर्थक्षेत्रक माहात्म्य-४ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.मुन्ना जी- पोथी परिचय- तोहर कतेक रंग मुन्ना जी पोथी परिचय- तोहर कतेक रंग
निहुरब,आओर निहुरि जएब मुदा नेहोरा,किन्नहुं नै करब।इतर विधाक सम हएब हम सब।ताहि लेल बेरएल/ कतिएल,बेकछएल बीहनिक एक एक ग'बकें जतन सं रोपैत डोभैत झमटगर करबाक जुगत में जुमल बीहनि कथाकार में सं चिन्हार भेल रचनाकार छथि श्री जगदानन्द झा ' मनु'। किछु उठल्लू रचनाकारक ऐ विधाक प्रति कएल खिधांस ऐ विधा/ लेखनीकें अड़ाचने रहल।आ हम सब नहुंए नहुंए परती परल मैथिली कथा साहित्यक खेतकें हरियर कचोर करैत डेगा डेगी मोकाम दिस ससरल नहि दौगल जा रहलौं।आब अहां सबहक अदखोइ बदखोइ आ अवडेरवाक प्रयास कहां सबकें कतिया रकबा में सक्षम भेल।आ हीनता सं बहरा ऐ विधाकें पालि पोषि झमटगर/ संपूर्ण गाछ बनेबा मे हमर सबहक सक्षमता कें अकानू।
लेखक द्वारा दू आखर शीर्षक सॅं देल लेखकीय विचार मे वर्णित -" तोहर ( नारीक) कतेक रंग पर आधारित कहै छथि।मुदा नै,किन्नहु नै।हम एकरा आओर आगू ल' जा देखै छी कि ओ इ बिकछेबाक प्रयास कएलनि ऐछ जे पुरुषकें पुरूषाह बनेबा आ रखबा में स्त्रीक विभिन्न रूप/ संबंध मात्र ठाढ़ भ' इजोत देखबैए।आ पुरूष तखनहि अपन अस्तित्व पेबा/ बचेवा मे सक्षम भ' पबैए।
मानव जीवनक प्रत्येक रंगकें उभारि चित्रित करबा में जाहि कुशलता( फरीछ आ तीक्ष्ण दृष्टि)क खगता चाही तकर निवहता में लेखक सए प्रतिशत सफल भेलाह ऐछ।
एकर भूमिका मे ऐ विधा के फरिछबैत लेखक स्वयं लिखै छथि-" जेना कहियो क्रिकेट मे पाॅंच दिवसीय मैचक प्रचलन छल।पछाति एकदिवसीय आ आब खगतावश ट्वेंटी ट्वेंटी लोकप्रिय भ' चलनि मे ऐछ।तहिना मैथिली कथा विधा विकासक क्रमे उपन्यास सॅं चलि दीर्घकथा, लघुकथा होइत बीहनि कथा पर आबि टिकल।आ समकालीन कथा विधाक सिरमौर भ' चलनि मे बसि रहल।
105कथाकें एक सूत्र मे बन्हनाइ संभव आ उचितो नै।से एक दशक सॅं बेसी सॅं बीहनि कथा मे रमल रहबाक कारणे एक दिस निश्शन,निछरल दृष्टि फरीछ रचना देब' मे सफल भेलाह। मुदा दोसर दिस ऐ विधाक वैधानिक परिधि सॅं बहरएल कथाक समिलात,संयोजन मे चुक सेहो भेलनि।ओना त' माय- बापक लेल सब संतान प्रिय होइछ।मुदा फाॅंटक बेर मिझर क' राखब कतेक उचित ?बेटीकें कान्या वा बालक बालिका सह शिक्षा विद्यालय मे नामांकन करा सकै छी। मुदा बेटाक कान्या पाठशाला मे नामांकनक प्रयास करबै?रचनाक अहां लग अभाव नै,जॅं अभावो त' कथा संख्या-9,10,12,13,18,20,21.......आदि कथाकें बागि संख्यात्मक रूपें कमी क' गुणात्मक निश्शनता सोझां अबैत। एखन खोंचाह सन!
दियादी डाहकें सोझां रखैत- कक्का माय बड़जोर दुखित ऐछ,अहां दस हजारक इंतजाम क' दैतौं। हौ ,तोरा सॅं हमर हालति की नीक ऐछ।तों अपन जामुनक गाछ बेचि लएह दस हजार आबि जेतह। मुदा कक्का,ओ त' 25-30 हजारक ऐछ। हौ,खगल मे जे आबि जेत' से उपकार! आइ माए भर्ती भेलखिन, कक्का अपन खाता मे पन्द्रह हजार जमा क' एलाह।"--- बेगरता
निकम्मा पुतक चिन्ता मे डूमल पिता अपन पौत्र सॅं- " बौआ,ललन कत' गेलाह ? पौत्र- बाबा,बाबूजी पूजा क' रहलाह। आंइ,खेत पर नै गेलाह ?
नै,त' हौ,कहिहौन जे - घर मे अन्न- धन भरल रहै छै तखने पूजोक पटि होई छै।----अन्न धन।
प्रत्येक कथा मनुष्यक संवेदना हीनता पर अंगुली उठबैत, संकेत करैत जीवनक पुष्टि करैछ।जेना बस मे भरल लोकक बीच दु गोटे कें मारि मुर्दा क' देलक आ 60-65लोक तमशबीन बनल बुझू। 70म कथा में वर्णित ' प्रेम ' ओकर मोनकें 30बरख पाछां ल' गेल।नवीं में संग पढ़ै बाली आइयो मानस पटल पर सटएल सन।इएह छै असल प्रेम।वासना मे बहकव,प्रेम नै थिक।
अंध विश्वास में फांसल लोककें उत्कृष्ट लेखकीय दृष्टि सं फरीछ करैत लिखै छथि- ' मइयां , भगवान कत' रहै छथि ? सबठाम हौ। तहन अहां नित दिन मन्दिर किए जाइ छी ?"
एहि संग्रहक एक एक कथा पढ़ैत काल अपन जीवनक घटना परिलक्षित होइत जएत।आ रसे रसे पढ़बाक उत्सुकता से दुन्ना, तिगुना बढ़ैत पुरे स़ग्रहकें पढ़ा देबाक लेल पूर्ण सक्षम ऐछ।
पोथी-" तोहर कतेक रंग " विधा- " बीहनि कथा" लेखक - जगदानन्द झा "मनु" प्रकाशक-पल्लवी प्रकाशन,निर्मली,सुपौल( बिहार) पृष्ठ-102, दाम- 200 भा.रू. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। पद्य ३.१.प्रमोद झा 'गोकुल'-कोइली ३.१.प्रमोद झा 'गोकुल'-कोइली प्रमोद झा 'गोकुल' कोइली गा गा गै कोइली !विरह गीत तों उड़ि बैस वाँसक घन झोंझ मे । कतेक पीड़ भरने छेँ तों भीतर जे रुदन भरल छौ मिठ बोल मे ।। चल हमरो सङ कएले करियाही अपन फराके दुखियाक टोल मे । तों गबिहेँ गै ! हम कानब सङ मे नित दिन नीरव वनक सङोर मे ।। दुखक तप्त अनलमे स्याह भेल तों रचै छें अनुरागक सुमधुर परिभाषा । अन्तर्वेदन रुदन सदन भए हमरो पथ हेरय पुनि मिलनक प्रत्याशा ।। एकसुराह बनि वसन्तमे गै !तोहूंँ अपने धुन मस्तीमे छेँ लागल । घोघ उघारिके फूलक मधुकर भए रहल अछि केहन पागल ।। तेँ सुन बात हमर गै करियाही ! जो जगा आ तों हमर बियाही । खग जानय खग केर भाषा दुखी हम तोँ सहज दुखियाही ।। - प्रमोद झा 'गोकुल', दीप, मधुवनी (विहार) फोन-9871779851 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह ४१४ म अंक १५ मार्च २०२५ (वर्ष १८ मास २०७ अंक ४१४) || 25 26 || विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in
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