VIDEHA — Issue 417 / अंक ४१७

Publication: VIDEHA · Issue: 417
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ISBN Number: 978-93-342-8247-4 (Book) ISSN 2229-547X (online) 𑒀 विदेह ४१७ म अंक ०१ मई २०२५ (वर्ष १८ मास २०९ अंक ४१७) [विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। कॉपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति ‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२५. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२५. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. 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The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover designed by AUM GAJENDRA THAKUR Videha e-Journal: Issue No. 417 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.अंक ४१६ पर टिप्पणी (पृष्ठ १-३) गद्य २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-८ (पृष्ठ ५-१२) २.२.परमानन्द लाल कर्ण-तीर्थक्षेत्रक माहात्म्य-६ (पृष्ठ १३-१९) २.३.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा- उस्सर (पृष्ठ २०-२१) २.४.प्रमोद झा 'गोकुल'-कुकुर वाणी (पृष्ठ २२-२५) २.५.संतोष कुमार राय 'बटोही'- कथा समीक्षा: गंगा लाभ: मराएल जिनगी (पृष्ठ २६-२८) पद्य ३.१.प्रणव कुमार झा-जीवन-चक्रव्यूह (पृष्ठ ३०-३२) ३.२.जगदानन्द झा 'मनु'-२० टा हाइकू (पृष्ठ ३३-३९) ३.३.संतोष कुमार राय 'बटोही'-मजदूर छी हम (पृष्ठ ४०-४१)

१.१.अंक ४१६ पर टिप्पणी प्रणव कुमार झा यद्यपि अखनो समाज मे स्त्रीक जीवन कथा व्यथा पुरुष सं बेसिए करुण, विडंबनापूर्ण आ संघर्ष से भरल छैक मुदा अखुनका समय मे परिवार आ समाज मे पुरुषक कथा व्यथा सेहो कम नै छैक। एकर बहुत रास कारण भऽ सकय अछि जै मे से एकटा सामाजिक-सांस्कृतिक अपक्षय, समिश्रण, रिश्ता-नाता के तानाबाना मे कमी आदि छैक। जेना हम सेकेन्डरी क्लास मे पढ़ने रही जे परिवार के सबसे महत्वपूर्ण गुण की छैक? जेकर उत्तर मे रटाओल जाय छल ‘सहिष्णुता’। एकर कमी परिवार आ रिश्ता मे बहुत रास परेशानी के कारण बनि रहल छैक। डॉ. जियाउर रहमान जाफरी एहि बात के ‘पुरुषक समस्या’ नाम के अपन कविता के द्वारा उठेबा के प्रयास केलाह अछि। "पुरुषक समस्या" कविता पुरुषक अन्तर्मनक एकाकीपन, सामाजिक अपेक्षाक बोझ आ अस्तित्वक संकट केँ मार्मिक ढंग सँ अभिव्यक्त करैत अछि। ई कविता मात्र पुरुषक पीड़ा नहि, बल्कि एक सम्पूर्ण पितृसत्तात्मक समाजक विद्रूप चित्र सेहो प्रस्तुत करैत अछि जाहि मे पुरुष केँ सदिखन "बलवान", "निर्णायक" आ "उत्तरदायी" मानि कऽ ओकर भावनात्मक पक्ष केँ नगण्य मानल जाइत अछि।

कविता पुरुष पात्रक माध्यम सँ एकटा घरक अदृश्य तनाव, पारिवारिक कर्तव्यबोध आ कानूनी-सामाजिक दबाव केँ चित्रित करैत अछि। एक दिस ओ माँ केँ संतोष नहि दऽ सकैत अछि, जे पुतहुक आगमन केँ बेटा सँ दूरी मानि छथि; दोसर दिस, पत्नी सँ सम्बन्ध बिगड़ल रहैत अछि, मुदा सामाजिक-नैतिक भय सँ ओ सम्बन्ध छोड़ि नहि सकैत अछि। जेना कोरोना के सेकेंड वेब के बाद साइत एहन कियौ ने बचल रहलाह जकर जानकारी मे एकरा से प्रभावित कोनो लोक नै होई, तहिना आई समाज ऐ विचित्र परिस्थिति मे पहुँच गेल अछि जे, सबहक लागि-भागि मे ऐ तरहक व्यथित स्थिति देखबा मे आबि रहल अछि। ताहि लेल आब ई समस्या पर विचार त करहे पड़त। मुदा एकर मतलब ई मानि लेनाई कथमपि नै छैक जे समाजक सभटा बोझ पुरुषे पर आबि गेल आ स्त्री लोक के कोनो समस्ये नहि छैक। वास्तव मे हितक टकराहट से ऐ प्रकार के जटिल समस्या बिना कोनो खास कारण के दुनु दिस से उत्पन्न भऽ रहल अछि। ऐ तरहक समस्या के उन्मूलन समाज मे पारिवारिक, वैचारिक आ सांस्कृतिक मूल्य के उत्थान आ परिवार मे नव पीढ़ी मे पारिवारिक मूल्य आ संस्कार बनेने बिना संभव नै।

कविताक भाषा सहज आ स्पष्ट अछि, मुदा ओकर सहजता मे दुख दर्द नुकायल अछि। कवि कोनो अलंकारिक या विशेष प्रतीकात्मकता सँ कविता केँ जटिल नहि बनेने छथि, मुदा सामाजिक यथार्थ अपन सम्पूर्ण तीव्रता सँ पाठक के समानेराखि दैत अछि।

"चिता के टुकड़ा भ जायत" एह पंक्ति मे आत्महत्या या मानसिक ध्वस्तता केर संकेत छैक, जे बतबैत अछि जे पुरुषक संघर्ष मात्र बाहरी नहि, अपितु मानसिक स्तर पर गहिर छैक।

कविताक अंतिम पंक्ति "हम एक व्यक्ति छी मुदा हम कतेको मे रहैत छी" - एहि मे काव्यक सार निहित अछि।

एहि अंक मे सामाग्री कम प्रकाशित भेलैक अछि। गद्य आ पद्य दुनु आधारित खंड बहुत संक्षिप्त छल। एहि कारणें एकटा अधूरापन महसूस भेल।हम बुझैत छी जे कोनो अंक निकालब अनेक व्यावहारिक कठिनाइ सँ गुजरि कऽ संभव होइत अछि, मुदा आशा करैत छी जे आगामी अंक मे सामग्रीक विविधता आ संख्या दूनू मे संतुलन रहत।

-प्रणव कुमार झा , नई दिल्ली   अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। गद्य २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-८ २.२.परमानन्द लाल कर्ण-तीर्थक्षेत्रक माहात्म्य-६ २.३.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा- उस्सर २.४.प्रमोद झा 'गोकुल'-कुकुर वाणी २.५.संतोष कुमार राय 'बटोही'- कथा समीक्षा: गंगा लाभ: मराएल जिनगी २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-८ कल्पना झा मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-८ मिथिलाक सरल संस्कृति ओ अग्रगामी परम्पराक सुच्चा संवाहक : 'व्यास' जी

रिटायरमेंट काल 'चीफ इंजीनियर' छलाह 'व्यास' जी। माने सरकारी विभाग मे एकटा उच्च पदस्थ अधिकारी। इंजीनियर सँ चीफ इंजीनियर धरि पहुँचैत, सभ दिन सभ तरहक सरकारी सुविधा सँ लैस रहलाह अपन कार्यकाल मे। गाड़ी-घोड़ा सँ ल' क' चौबीस घंटा जी-हजूरी मे लागल स्टाफ पर्यन्त। मुदा एतेक सुविधा-सम्पन्न जीवन रहितो पैर सदिखन धरती पर रहलनि। आ से तेहन जबरदस्त तरीका सँ पैर रोपने रहलाह धरती पर जे दुनियाँ क्षुब्ध रहि जाए हुनकर अपन परम्परा केँ गसिया क' धएने रहबाक 'ऐटिट्यूड' देखि। जतए कत्तहु पोस्टिंग रहलनि; सभ ठाम ओ अपन पारम्परिक खान-पान सँ ल' क' पारम्परिक पहिरन-ओढ़न, पाबनि-तिहार, विध-व्यवहार, गीत-नाद, सभ किछु अपनौने रहलाह। संगहि अपन हीत-मीत केँ सेहो प्रेरित करैत रहलाह; अपन सभ्यता-संस्कृति-परम्परा केँ अक्षुण्ण राखबा लेल। राँची रहथि, कि गया, आ कि मुजफ्फरपुर-पटना, सभ ठाम एकटा छोट की पैघ; जेहन संभव रहलनि तेहन, अप्पन मैथिल समाज बना लेल करथि 'व्यास' जी। पाबनि-तिहार सँ ल' क' अनदिनाँ सेहो; ई मैथिल समाज सभ ठाम हिनकर संग पूरैत रहलनि। चाह-पानक दौर चलैत रहैत छल आ ताहि संग गप्पक दौर सहजहि। चाहे ओ सरकारी क्वार्टर मे रहलाह किंवा अपन पटना स्थित आवास 'श्री भवन' मे। पटनाक रौनक तँ किछु-किछु हमरा अपनहुँ देखल-सुनल अछि। जएह कहियो काल एनाइ-गेनाइ रहल; ताही क्रम मे। 'व्यास' जीक देहावसानक उपरान्त जेना ओहि घरक 'श्री' बिला गेल कतहु....। एकदम सुन्न-मसान ! रोग-क्लेश-दु:खक प्रकोप बढ़ए लागल आस्ते आस्ते। नानी अमरावती देवी 'व्यास' जीक देहावसानक सात बरख उपरान्तहु रहलीह मुदा 'ओ' रौनक नहि रहल कत्तहु ! एक्कहु रत्ती नहि रहल !

अप्पन मिथिलाक संस्कृति, अप्पन परम्परा बड़ विशिष्ट रहल अछि। ओना संसारक सभ समाजक रहन-सहनक अपन-अपन विशेष तौर-तरीका रहिते आएल छैक सभ दिन सँ। आ इएह विशेष तौर-तरीका समाजक लोक केँ एक संग बान्हि क' राखैत रहल अछि। ई परम्परा गतिशील होइत अछि, माने समयक संग बदलैत रहल अछि।

कोनो समाजक सभ्यता-संस्कृति एकटा जटिल प्रणालीए सन बुझू ! कोनो समाजक, हरेक सदस्य एक-दोसराक संग ज्ञान, विश्वास, कला, इत्यादि सभ किछु समान रूपेँ दीर्घकाल सँ साझा करैत रहल होइथ; आ तकरा वर्तमान पीढ़ी फॉलो करैत अगिला पीढ़ी धरि ट्रांसफर करथि, इएह भेल संस्कृतिक महत्व ! एही तरहेँ कोनो समाजक संस्कृति अक्षुण्ण राखल जाइत रहल अछि; समाजक एक-एक इकाइ द्वारा। आ एही तरहेँ समाजेक लोक सभक बनाओल; वंशानुगत आबि रहल अप्पन नियम-कानून, नैतिकता, रीति-रिवाज, आ अन्यान्य सीखल व्यवहार सभ, समाजक हरेक व्यक्ति केँ एक-दोसरा सँ जोड़बाक काज करैत रहल अछि अदौ काल सँ। माने इएह ओ प्रणाली अछि, जे कोनो समाजक लोक केँ एक संग बान्हबाक काज करैत अछि। आ सएह लोक केँ लोक सँ बान्हबाक काज 'व्यास' जी आजीवन करैत रहलाह। व्यावहारिक रूपेँ दिनानुदिनक गतिविधिक माध्यम सँ सेहो आ अपन लेखनीक माध्यम सँ सेहो।

आ परम्पराक गप्प करी तँ लौकिक आ वैदिक, दुनू परम्पराक समान रूप सँ निर्वहन करैत आएल अछि मैथिल समाज। ओना मूलतः लौकिक परम्पराक अनुसरण करैत जीवन जीबैत अछि लोक। लोक द्वारा बनाओल तौर-तरीकाक अनुसरण करबाक परम्परा रहल अछि अपन मिथिला मे। वैदिक परम्परा पूजा-पाठ-यज्ञादिक निर्वहन लेल काज आबैत छैक। आबक अत्याधुनिकताक चपेट मे आएल मैथिल समाज भले ही सभ तौर-तरीकाक 'ऐसी-तैसी' क' रहलाह...खैर...एकर दुष्परिणाम आगाँ देखा पड़तनि आधुनिक लोक सभ केँ। "अपन महीस कुड़हरिए नाथब, ताहि सँ मतलब अनका की" बला पड़ि छनि युवा पीढ़ीक। जे-से । हमरा की ! हम किछु कइए नहि सकैत छी, तँ किएक सोची किछुओ। आब बसात बेरोकटोक सन बहए लागल अछि।

विषयान्तर होएबा सँ बचैत गप्प अपन परम्पराक। कोनो समाजक एकटा अपन प्रचलित स्टाइल होइत छैक; जीवन जीबाक; माने खान-पान, पहिरन-ओढ़न, हंँसब-बाजब, नाचब-गाएब, उत्सव मनाएब, सभ किछु अप्पन तरीकाक। इएह भेल लौकिक परम्परा। इएह परम्परा हमरा सभ केँ अपन पूर्वज सभक जीवनशैली, मान्यता आ हुनकर सिद्धान्त सँ जोड़ि क' राखैत अछि; आजीवन। इएह परम्परा हमर सभक अपन एकटा विशिष्ट पहचान सेहो दैत अछि देस-विदेस मे। संगहि अपन जन्मभूमि सँ एकटा विशेष भावनात्मक जुड़ाव केर अनुभव करैत अछि कोनो क्षेत्र विशेषक बच्चा-बच्चा।

जेना मिथिलाक खान-पानक गप्प करी तँ एकटा अलगे वैशिष्ट्य रहल छैक एकर। अपन मिथिलाक अनेक तरहक भोजन-विन्यास मतलब 'रेसिपी' एहन अछि जे अन्यत्र नहि बनैत होएत। जेना मिथिलाक तिलकोरक तरुआ, पथरचूरक, फूलक तरुआ ! ओलक सन्ना, अरिकोंचक तीमन, रंग-रंगक माछक प्रकार...!

आ भोजनक विन्यासी 'व्यास' जी सन भेटब कठिन। बड़ सौखीन ! एकादशीक व्रत करथि तँ मखानक खीर भेले ताकए। घी मे भूजल अल्लूक चरिफक्का आ ताहि पर सँ काँच केरा उसिनि-सन्ना बनाए घी मे सेकल ओकर छोटे-छोटे सोहारी कि परठा जे बुझी, से बनले ताकए। अनूना दिन क' सेबइक खीर, अनून भुजिया, पछुआ-पू , ई सभटा 'व्यास' जीक फरमाइसी भोज्य पदार्थक व्यवस्था होइते टा छलनि।

एकर अतिरिक्त सुआद ओ शुद्धताक तेहन पारखी जे सभटा मसल्ला टटके पिसाइत छलए तरकारी तीमन लेल, सभदिनाँ। सिलौट-लोढ़ा पर हरदि, धनी, मिरचाइ, जीर-मरीच सभ किछु सभ दिन टटका-टटकी पिसाइत छलए आ तरकारी सभ मे पड़ैत छलए। जखन पिसलाहा पाउडर बला मसल्लाक चलती भ' गेल छलए, तखनो धरि 'श्री भवन'क परम्परा चलैत रहलैक सिलौट-लोढ़ा पर पीसल मसल्ला बला तरकारी बनबाक।

तहिना अदौड़ीए बनए तँ तीन रंगक। अगबे उड़ीद दालि बला। उड़ीद आ मसुरी दालि फेंटि क' आ उड़ीद, मसुरी, बूटक दालि, केराउ, सभ किछु फेंटल बला अदौड़ी सेहो बनबाबथि नानी, ई कहि जे हुनका पसिन छनि। अदौड़ीक अलावा कुम्हरौरी, चरौरी, दनौरी, मुरौरी, बिड़ियाक सौखीन। खेबाक खूब सौखीन छलाह 'व्यास' जी। मुदा अनुशासित रहैत खाएब जानैत छलाह। असमय वा बेहिसाब बला बात नहि।

मिथिलाक पहिरन-ओढ़न सेहो शिरोधार्य रहलनि सभदिन 'व्यास' जी केँ। पहिरन-ओढ़न केर सेहो अपन अलगे विशिष्टता रहल अछि मैथिल समाजक। धोती कुर्ता, पाग-दोपटा भद्र पुरुषक पहिरन रहल अछि अपन मिथिला मे। स्त्रीगणक लेल घोघ-मरौतक परम्परा। सीधा पल्ला लेब। ई सभटा 'श्री भवन' मे 'फॉलो' कएल जाइत रहल 'व्यास' जीक जीवन काल धरि। घर मे तँ जानिए क' ओहि घरक पुतहु सभ केँ माथ उघारि घर सँ बहरएबाक सहास नहि छलनि। राजधानी पटनाक बोरिंग रोड चौराहा सन 'पॉश' इलाका मे एकटा मिनी मिथिला बसल छलए जेना। मुदा जेना कि पहिनहुँ कहि चुकल छी, परम्परा गतिशील होइत अछि, माने समयक संग बदलैत रहल अछि। तँ से फेर समयक संग अपन पोती सभ लेल समयानुकूल ओतेक बदलाव स्वयं केर सोच मे, अनुशासन मे आनैत देखएलाह 'व्यास' जी।

कलाक गप्प करी तँ सभ लूड़ि मे दक्ष जहिना 'व्यास' जीक माए आनन्दी देवी छलथिन; तहिना पत्नी अमरावती देवी। पूजा-पाठ, विवाह-दानक अवसर पर अरिपन देबाक लूड़ि हुअए किंवा पुरहर-पातिल रांगब ढौरब, सीकी-मौनी बूनब, स्वेटर बूनब, सिलाइ करब पर्यन्त, अमोट-अचार बनाएब, सभ किछु केर टेक कायम रखलनि ओहि घरक स्त्रीगण सभ। परम्पराक संवाहक मूल रूप सँ स्त्रीगणे होइतो छथि ओना। मुदा घरक पुरुख जँ इंटरेस्ट देखाबथि सभ पारम्परिक गतिविधि मे तँ स्त्रीगण आरो उत्साहक संग काज करैत छथि; से धरि निश्चित बात !

से तहिना 'व्यास' जी गीत-संगीत मे सेहो बेस रुचि रखनिहार लोक। पारम्परिक गीत-नाद बड़ प्रेम सँ सुनथि। आ ई गुण हम मामा सभ मे सेहो देखने छी। कहियो कोनो काज मे प्राती वा बटगबनी सन कोनो गीतक भास आ गीतक बोल पर चर्चा करैत देखल-सुनल अछि हमरा। मतलब अपन पारम्परिक गीतक महत्व केँ बूझब/अकानब ओहि घरक परम्परा रहल छैक।

एकटा सामान्य सनातन मैथिल जकाँ 'व्यास' जी सेहो पंचदेवोपासक छलाह। शक्तिक उपासक तँ छलथिहे, संगहि महादेव, विष्णु, गणेश आ सूर्यक उपासना सेहो बड़ श्रद्धापूर्वक करैत छलाह। दुर्गा-पूजा मे दुर्गा सप्तशतीक तेरहो अध्याय-पाठ करब, भगवतीक आराधना करब, कुमारि भोजन, हवनादि करब, संगहि चौबीसो एकादशीक व्रत, बारह टा चतुर्दशी, छओ मासक रवि केर अनूना-एकसंझा सभ किछु ठानल छलनि/करैत रहलाह बहुत दिन धरि। चौठचन्द्र पाबनि आ अनन्त चतुर्दशीक अवसर पर खूब उत्साहपूर्वक बृहत पूजाक आयोजन होइत छलए 'श्री भवन' मे। कहबाक माने आजीवन कर्मकाण्डक पक्षधर रहलाह 'व्यास' जी।

घोर कर्मकाण्डी होएब आ संगहि आधुनिकताक पक्षधर होएब, विरोधाभासी बात बुझाइत अछि ओना; मुदा ई यथार्थ अछि 'व्यास' जीक संदर्भ मे। एहने छलाह 'व्यास' जी। हुनकर सोच 'प्रोग्रेसिव' छलनि। माने समय संँ पाछाँ धकेलबाक प्रयास कहियो नहि कएलनि धिया-पूता केँ। स्वेच्छा सँ जकरा जाहि क्षेत्र मे जेबाक छलैक; से जाइत गेलनि। एकटा छोट सन प्रसंग सँ स्पष्ट करब एहि बात केँ हम। नब्बेक दशकक ई गप्प होएत प्राय: जखन दुनू छोटका बालक माने चारिम आ पाँचम नंबर मामा (मोहन जी आ सोहन जी) राति मे कनि अबेर सँ घर अएलाह तँ पिता पुछलथिन , "एतेक राति धरि कहाँ छलहुँ ?"

उतारा भेटलनि, "ओ एकटा अंग्रेजी सिनेमाक बड़ चर्चा सुनि रहल छलियैक...सएह देखए लेल गेल छलहुँहेँ..!"

----"बेस ! घर मे ककरो कहि क' जेबाक चाही छलए ने..?"

बालकद्वय मूड़ी गोँतने ठाढ़ ! आब जोर सँ दबारताह पिता; ताहि आशंकाक संग।

मुदा पिता सँ डाँट-फटकार नहि भेटलनि। उन्टे पूछल गेलनि, "केहन लागल सिनेमा ?"

बालकद्वय द्वारा सिनेमाक 'रिव्यू' संतोषजनक भेटलनि। पिता आदेश देलथिन, "हमरा लेल कल्हुका टिकट ल' लेब। हमरा देखबाक अछि, आखिर एहन की नीक लागल अहाँ लोकनि केँ।"

सएह भेल। अगिला दिन 'व्यास' जी ओ सिनेमा जा क' देखि अएलाह। सिनेमाक नाम विस्मृत भ' रहल अछि एखन हमरा।

कोन बएस मे पुत्रक संग कड़ाइ करब आवश्यक आ कोन बएसक पुत्रक संग मित्रवत व्यवहार करबाक चाही, से हुनका खूब नीक जकाँ बूझल छलनि। 'व्यास' जीक व्यवहार उक्त प्रसंग मे देखि ई स्पष्ट अछि। 'पिता'क रूप मे हुनकर ई व्यवहार अनुकरणीय अछि। आदर्श पुत्र, आदर्श पति आ आदर्श पिताक संग समाजक सोझाँ सेहो सभदिन, सभठाम आदर्शे प्रस्तुत करैत रहलाह 'व्यास' जी।

'व्यास' जी केँ अपन संस्कृति, सनातन धर्म, देवता-पितर, कौलिक परम्परा आदि पर पूर्ण निष्ठा छलनि। हुनकर जीवन पर हुनक नानाक अप्रत्यक्ष प्रभाव रहल छलनि। नाना बड़ पैघ तांत्रिक छलथिन। डोकहर मे तपस्या करैत रहथिन। अन्तर मात्र एतबे छलनि, जे 'व्यास' जीक नाना अपन तपस्या सँ प्राप्त शक्तिक प्रयोग प्रेतक उपद्रव केर शमन करबा मे करैत छलाह आ दोसर दिशि 'व्यास' जी सभ दिन दोसरे तरहक तपस्या मे लागल रहलाह। देवता-पितर केँ गोहराबैत माँ मैथिलीक तपस्या मे लीन। यश-अपयश, निन्दा-प्रशंसा सँ उपर साहित्य-साधना मे निमग्न 'व्यास' जी ! समाज मे आदर्श स्थापित करबाक प्रयास करैत 'व्यास' जी! संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-7 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.परमानन्द लाल कर्ण-तीर्थक्षेत्रक माहात्म्य-६ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा- उस्सर कुमार मनोज कश्यप लघुकथा- उस्सर लाल काका के दलान गामक चौपाड़ि बुझू......  हरदम दस लोक के जुटान आ हँसी-ठहक्का सs जीवंत बनल! अबैत-जाईत लोक यदि कोनो धड़फड़ी मे नहि हो तs एको पल लेल ओतs बैसय के लोभ संभरण नहिं कs पबैत छल। लोक कहै जे गाम मे केकरो तकबाक हो तs सोझे पहिने लाल काका के दलान पर चलि जाऊ, बेसी संभावना जे ओ ओतहि भेटत। तकर कारण छलै ओतs होई बला मनोरंजक गप्प-सड़क्का ....   देश-दुनियाँ, नीति-राजनीति, हँसी-मजाक सभ समाहित केने! सभ आपसी विवाद के फैसला एतs चुटकी मे!  कोनो काज-प्रयोजन .... छोट हो वा पैघ .... प्रारंभिक विचार-विमर्श सs लs कs फेहरिश्त, वित्त प्रबंध, जिम्मेदारी विभाजन सभटा एहि ठाम बैसले-बैसल भs जाई! दलानक आगू मोटका झमटगर नीमक गाछ सेहो चिड़ै-चुनमुन्नी के चुहचुही सs भरि दिन जीवंत! गाछक छाहरि मे चौकी आ गोटेक दस-बारह दsढ़-हथटुट्टा कुर्सी सभ बिछायल। चिड़ै-चुनमुन्नी के कलरव तs पहर साँझ बितैत शांत हुअ लगै; मुदा लोकक जुटान रेडियो पर प्रादेशिक समाचार सुनला के बादे उसरै!  तकरा बाद बाँचि जाथि ओतहि सुतनिहार - लाल काका आ टुन्नी खबास!  ओहो दुनू गप्प करैत-करैत कखन निद्रा देवी के कोर मे चलि जाईत छथि से के जानय? से ओ दलान लाल काका के आँखि मुनिते पक्का देबाल सs दू फाट मे बँटा गेलै!  नीमक गाछ देबालक ठीक बीचोबीच पड़ैत छलैक तैं ओकरा काटि देल गेलै। आब ने ओ देवी आ ने ओ कड़ाह! कैक बरखक बाद आई दलानक आगाँ सs गुजरैत डेग हठात ठमकि गेल। दलानक एक कात चौकी ओहिना छैहे मुदा ओहि पर नौ मोन गर्दा जमल!  घर मे बड़का-बड़का लटकल ताला .... सगरो पसरल मकड़ाक जाल .... बाकी सुन्न-मसान! लागल लाल काका अपन छाती के बीचोबीच ठाढ़ देबाल तsर सs कुहरैत बाजि रहल होथि - ' हे बताह! तों एत अनेरे कथि लै बिलमि गेलह? .....  सभ अपन-अपन दुनियाँ-दारी मे मस्त अछि; तोहूँ रहs ......! जाह........  अनेरे कियै अपन समय गमवैत छह......  !'  व्यथित हम फिरिते रही कि टिटही के एकटा जोड़ा 'टें-टें' करैत हमरा माथक ऊपर सs उड़ि गेल। कि जानि ओहो हमरे जकाँ भोतिया कs ओतs पहुँचि गेल हो! -कुमार मनोज कश्यप; सम्प्रति: भारत सरकार के उप-सचिव; संपर्क: सी-11, टावर-4, टाइप-5, किदवई नगर पूर्व (दिल्ली हाट के सामने), नई दिल्ली-110023; # 9810811850 ईमेल: writetokmanoj@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.प्रमोद झा 'गोकुल'-कुकुर वाणी प्रमोद झा 'गोकुल' कुकुर वाणी

साओन भादवक समय रहै .अकास मे कारी मजीठ मेघ डवाडब कय रहल छलै आ तै पर से हवाक सिहकीक संग टिपिर टिपिर पानि परब सेहो सेहो सुरूह भ' गेल छलै ।लगै छै जेना आइ जोरगर वर्षा हेबेटा करतै ।एहन विकराल समय मे सब अपन अपन दूरा दरबज्जा पकरि लेने छल आ माल जाल सेहो बथान पर आँखि मूनि पाउज कय रहल छलै । एहन दुर्दिनमे सड़क ओहिना सुनसान भ' जाइ छै.सब वर्षा सँ बचैक जोगार मे लागि जाइत अछि .संयोगबश एकटा मोट डांट कुकुर पानि सँ बचैक लेल निच्छोह सड़क पर भागल जा रहल छल, आओकर पाछाँ पाछाँ एकटा अगत्ती छौंड़ा हाथ मे सटकन लेने सेहो दौड़ि रहल छल.ओइ छौंड़ा के भेलै जे ई कुकुरबा आब हमरा नै पाब' देत ।धत्त !हमर मनोरथ मने रहि जायत जे ऐ सरबा के खैंच के सटकन नै मारलौं .तेँ ओ आब देखलक ने ताब समधैन के सटकन जोर सँ घुमौलक आ खैंच के फेकलक झटहा ।संयोग एहन भेलै जे ओ झटहा लगलै कुकूरक पैछला टांग मे ।ओ जोर सँ किकिया उठल आ कैँ कैँ रुदन करैत टाँग अलगौने भागल राज दरवार दिस . दरवार मे सर सिपाहीक चाक चौकस रहितो ओ कुकूर ककरो नै मानलकै.सब धार धार करिते रहिगेल परंच ओ जेना तेना राजाक समक्ष पहुँचिये गेल आ जोर जोर सँ ऊपर छत दिस मूहँ कय कानय लागल-उऊऊ.. कुकुरक कानब अशुभ मानल जाइत छैक तेँ दरवारी सब ओकरा पर झपटि परलाह आ लगला ओकरा दुत्कारय-भाग ..भाग …अलच्छा नैहतन !तोरो कनैक लेल यैह जगह भेटलौ ?भगै छें कि एखने दोसरो पयर तोड़ि दियौ ? जैकि दरवारी लोकैन मारैक लेल लाठी उसाहलैन कि राजा हाथ उठाके गम्भीर स्वर मे मंत्री के आदेश दैत बजलाह -'कुकूर सँ पूछल जाय जे एकरा कोन कष्ट छैक, आ ई एना कियेक कनैये ? मंत्री आदेशक पालन करैत नम्र स्वर मे ओकरा दिस तकैत बजलाह- -कहू कुकूर !अहाँ के कोन कष्ट अछि जे एना भोकारि पाड़ि कनै छी ?एतबा सुनिते ओ घेंट उठा आर जोर जोर सँ कानय लागल –ऊऊऊ… -आहिरेबा !अहाँ बजबे नै करबै त' हम सब बुझवै कोना जे अहाँक कष्ट केहन अछि ? ऐ पर ओ कुकूर राजा दिस ताकि जोर जोर सँ भूकय लागल-भौं भौं भौं… राजा हाथ ऊपर कय बजलाह -हँ आदेश अछि,अहाँ निसंकोच बाजू ! क्यो मारलक की ? - कुकूर पुन:जोर सँ भूकय लागल -भौं भौं भौं… -ओ बूझल ! अहाँके क्यो मारलक,सैह ने ! -कुकूर भुइयाँ पर ओंघरा के किकिया लागल-उँइई… - के ? - राजाक एतबा बात सुनैत देरी ओ बाहर जयवाक रस्ता दिस भुकैत विदा भेल.राजाक आदेश पाबि सिपाहिक टोली सेहो ओकर पाछाँ पाछाँ दौड़ल .थोड़ेक दूर आगाँ बढ़लाक बाद कुकूर के वैह छौंड़ा देखाइ देलकै जे ओकरा मारने छलै.ओकरा देखितहिं ओ जोर जोर सँ भूकय लागल-भौं भौं भौं… -कुकूरक भूकब सुनि सिपाही बाजल-यैह बालक अहाँक दुर्गति कैलैन की?उत्तर मे पुनः ओ भूकय लागल. सिपाहीओइ बालक के पकड़ि राजाक समक्ष प्रस्तुत केलक.कुकूर सेहो ढेकी कुटैत सभा मे प्रस्तुत भेल.राजा कुकुरक दिस मुखातिब होइत पुछलखिन - की ओ यैह बालक थिकाह जे निरपराध तोरा मारलखुन ?ऊत्तर मे ओ किकिया लागल-ऊँइ ई… -ओ.. बूझल … यैह ओ बालक थिकाह !पुनः बालक दिस घूमि राजा कड़क स्वर मे बजलाह -अहाँक कोनो ई अपराध केने छलाह जे एना मारलियैन ? - जी नै सरकार !बालक हाथ जोड़ि बाजल - तखन कियेक मारलियैन ? -कुकूर बूझि सुलभ बाल कौतुक मन मे जागल तेँ ! -अहाँ अपन अपराध स्वीकार करै छी ? - जी ! -ई बालक अपन अपराध स्वीकार करैत छथि.हिनका केहन दण्ड देल जाय ? कुकूर दिस घूमि राजा बजलाह -राजन ! नगरक प्रधान शिव मन्दिरक मठाधीश हिनका बना देल जाय ! मन्ष्योचित वाणी मे कुकूर बाजल -आँइ ! हिनका अहाँ दण्ड दय रहल छियैन कि वरदान ? - नै महाराज ! हम दण्ड दय रहल छियैन ! - से कोना ? -पूर्व जन्म मे हमहूँ ओही शिव मन्दिरक प्रधान पुजारी छलौं.सामाजिक प्रतिष्ठा आ मान मर्यादा अनेरे दिन प्रतिदिन बढ़ैत गेल जखन कि हम ओइ जोकरक नै छलौं .गनले दिन मे हम विशाल सम्पदाक स्वामी बनि भोग विलास मे लिप्त रहय लगलौं .बिसरि गेलियै जे ई काया शिवक देल अन्न पर पोषित पालित अछि.भक्त जनक आदर सत्कार पावि एकोहं द्वितीयो नास्ति बूझय लगलियै,तकरे परिणाम आइ भोगि रहल छी .इहो ओ पद प्रतिष्ठा आ ऐश्वर्य पावि हमरे गति के निश्चित पौताह,तेँ प्रभुता पावि जे अनाचार आव्यभिचार करैत छथि ,आ आशन पर आसीन भय आसानी सँ सेवाभाव बिसरि मेवाभाव मे लिप्त भय जाइत छथि हुनका हमरे जकाँ वा ई कहू जे सड़क पर घुमैत बिलखैत अन्न पानि बिन नित मरैत असंख्य ककुरे जकाँ दशा होइत छनि. कुकुरवाणी सुनि सभा स्तव्ध भय गेल आ राजा अपन मूड़ी झुका लेलैन . -प्रमोद झा 'गोकुल; दीप,मधुवनी (बिहार); फोन -9871779851 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.संतोष कुमार राय 'बटोही'- कथा समीक्षा: गंगा लाभ: मराएल जिनगी संतोष कुमार राय 'बटोही' कथा समीक्षा: गंगा लाभ: मराएल जिनगी १ कथा- समीक्षा कथा : गंगा लाभ कथा- संग्रह : मराएल जिनगी कथाकार : कपिलेश्वर राउत प्रकाशक : पल्लवी प्रकाशन, निर्मली ( सुपौल) पहिल संस्करण : 2023 समीक्षक : संतोष कुमार राय ' बटोही '

श्री कपिलेश्वर राउत जीक कथा 'गंगा लाभ' एकटा मार्मिक कथा अछि। ई कथा कथाकार केँ कथा-संग्रह ' मराएल जिनगी ' मे संग्रहित अछि।ई कथा हृदय केँ करीब कहल जा सकैत अछि। नैतिक मूल्यक कोना ह्रास भऽ रहल अछि आओर बनावटी दुनिया केर सृजन कोना भऽ रहल अछि तेकर कथा राउतजी लऽकऽ पाठक केर सोझा मे ऐलाह अछि। ई कथा उपदेशात्मक सेहो कहल जा सकैत अछि। परञ्च ऐ कथा केँ कथावस्तु यथार्थ लऽकऽ हमरा अहाँ केँ सोचवाक लेल बेवस कऽ दैत अछि । माए सन ऐ दुनिया मे कोनो चीज नहि होयत छै। सभ किछु बिकाय छै, परञ्च मायक सिनेह आओर ममता नहि कीन सकैत छी हम-अहाँ । श्यामबाबू सिमरिया नहाय केर बहाने माय केँ डुबा कऽ मारि दैत छथिन्ह आओर हुनकर नामे नतहारी सभ केँ रसगुल्ला केर भोज खुएबै छथि। ई किरदानी दिखा रहल अछि जे नैतिक मूल्यक कतेक ह्रास भऽ रहल अछि आओर लोक मृतक वेक्ती केर नाम पर रसगुल्ला कोना कऽ खै लेल राजी भऽ जाएत अछि। गंगा स्नान सँ किछु नहि होएत छै। माय- बापक सेवा-टहल केनै पैघ गप्प छियैय। जुड़ी-शीतल मे लोक पित्तर केँ सारा पर डाबा टैंग कऽ भरि महिना पानि दैत छथि जे पित्तर जुड़ेताह, परञ्च जिन्दा रहैत पित्तर एक लोटा पानि लेल घिघरी काटैट रहि जाएत छथि। ई देखावापन हमरा मोने नीक नहि कहल जा सकैत अछि।

राउतजी ऐ कथा केर मार्फद मनुक्खताक संवैदना केँ खोजि रहल छथि। रिश्ता- नाताक अहमियत केर विचार पर बल दऽ रहल छथिन्ह। पाप-पुण्य केकरा कहल जाएत छै आओर देखावा की होएत छै एकर दिस इशारा कऽ रहल छथिन्ह। ई कथा घोर कलियुग केर दिस इशारा कऽ रहल छै। २ कथा समीक्षा

कथा : मराएल जिनगी कथा- संग्रह : मराएल जिनगी कथाकार : कपिलेश्वर राउत प्रकाशक : पल्लवी प्रकाशन, निर्मली (सुपौल) संस्करण : पहिल, 2023 कथा-समीक्षक : संतोष कुमार राय ' बटोही '

श्री कपिलेश्वर राउतजी केर ई कथा सोचै लेल मजबूर कऽ दैत अछि जे समय के नहि पकड़बै आओर अपना आपके लालबुझक्कड़ बुझबै, तँ मोहन बाबू जकाँ जिनगी भऽ जाएत, तेँ मौका केँ हाथ सँ नहि जाएइ दियौ । केकरो लेल कुविचार मोन मे नहि हेबाक चाही। जे जेहेन करम करतैथ हुनका ओहने फल भेटतै। औखन केँ दौर ज्ञानक दौर नहि छै। औखन लोक पढ़ि-लिखि कऽ नौकरी आओर रोजगार केँ खोजैत छथि, कियाक तँ पूँजीवादी अर्थवेवस्थाक जुग आबि गेल छै। औखन लोक सुखक जिनीस बटोरै मे लागल छथि। पेट सँ बेसी बैंक-बैलेंसक चिंता रहैत छै।

कथाकार राउतजी अइ कथा केँ मार्फत कहै लेल चाहैत छथिन्ह जे भाई-भैयारी मे मेलजोल रहवाक चाही। बेमानी सँ अरजल धन बेसी दिन नहि टिकैत छै। आओर अपना संतान केँ सामाजिक सिख जरूर देल जाउ। वेवहारिक ज्ञान नहि रहला सँ समाज मे ओकर कोनहु मोजर नहि रहैत छै। मोहन बाबू पढ़ा-लिखा कऽ बेटा-बेटी केँ उच्च शिक्षा तऽ देलखिहिन , परञ्च सामाजिक ज्ञान देवा मे ओ पिछैड़ गेलाह।

राउतजी परिवार मे भिनभिनौज कियाक भऽ जाएत छै एकर कारण दिस इशारा केलाथि । चुल्हि फुटौलाक बाद हृदय सेहो सिकुड़ि जाएत छै। लोक भाई-भाई यानी सहोदर केँ भुलि जाएत अछि। से अइ कथा केँ केन्द्रीय कथ्य अछि। आधुनिकताक आपा-धापी मे लोक अपन माय-बाप केँ सेवा करनै केँ बोझ समझि रहल छथि । ई सोच नीक नहि कहल जा सकैत अछि। पित्तर के सेवा करनै सबसँ पैघ पुण्यक काज थिक से हमरा-अहाँ केँ जरूर मानऽ पड़त। इतिश्री । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। पद्य ३.१.प्रणव कुमार झा-जीवन-चक्रव्यूह ३.२.जगदानन्द झा 'मनु'-२० टा हाइकू ३.३.संतोष कुमार राय 'बटोही'-मजदूर छी हम ३.१.प्रणव कुमार झा-जीवन-चक्रव्यूह प्रणव कुमार झा जीवन-चक्रव्यूह विकल मोन मानि लै कि हारि अखन हम, कि सीमा तोड़ि विजय पाबि अखन हम? पराजय हल्लुक छैक, भारी छैक विजय तऽ, मुदा कि सत्य छैक, ई जानी अखन हम ।।१।। विजय कि छैक सदिखन सुखक निवाला? सघन वन मे सभ कियौ नै पाबय उजाला! पराजय में सेहो लुकायल कत्तहु लुत्ती सन, आशा से भरल जेना कोनो पेय प्याला।।२।। ई जीवन बनल अछि चक्रव्यूह दोधारी, रचलकै मोह कोनो भ्रमजाल  भारी। बुझल अछि एतय करू  प्रवेश कोनाक, मुदा नहि ज्ञात अछि निकास द्वारि।।३।। कत्तहु हम ऐ जाल में फँसि नै जाय, चोट खाऽ कऽ कत्तहु फेर सहि नै पाबि! विचारक ज्वार में डगमगा रहल छी, घूरि जाय की विजयक गीत गाबि।।४।। नहि! घुरनाई तऽ कोनो वीरता नहि छैक, सहज छैक परेनाई, कठिन धीरता सही छैक। कठिन बाट चुनि, चलय निर्भय सदिखन जे, धर्मध्वज, शौर्य केर हकदार वैह छैक।।५।। प्रथम नहीं हम भेलहू एहि दौड़ में तऽ, दोसर स्थान पर सदिखन रहलहू हम। नै पेलहु सभकिछू, नै छूटल बहुत किछू, विजय केर अंश के लऽ कऽ चललहूँ हम।।६।। प्रयत्न से हमर नाता रहल अछि, अभाव में सेहो हम गाबैत रहलहु अछि। एक एकटा हारि से सीखि के निरंतर, नवआशा ज्योति जराबैत रहलहु अछि।।७।। हे मैया! तू ही आब हमारा ई शक्ति दे, कि हम सभ मोह जाल से मुक्त भऽ जाय। नै होय लक्ष्य खाली पराजय-विजय केर, मनुषऽक हृदय में जुड़ि के जिबि हम ।।८।। ओहि भूमि पर बनय स्थान हमरो, जतय कर्म, करुणा, समर्पण बसल होय। जतय लोक श्रद्धा से लेबय नाम हमर, जतय मूल्य मानव धर्म के सजल होय।।९।। -प्रणव कुमार झा राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नै दिल्ली अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.जगदानन्द झा 'मनु'-२० टा हाइकू जगदानन्द झा 'मनु' २० टा हाइकू १ पाइ फेक क सब किछु भेटत आज्ञा तँ करु २ यादि अबैए हमर साइकिल दहेज बला ३ बड़ राक्षस टेंगारी पिजा राखू काज आएत ४ जग नापब आब अप्पन बुते आश केकर ५ दू पाया भेलौं चौ पायासँ अखने से बुझाइए ६ गृहस्थ भेषे अहाँ ऋषि कोनो छी हे महामना ७ पति रहिते एकादशी करब के कहलकै ८ पतिकेँ छोड़ि सभकेँ पूजलक ओ कोन व्रता ९ पतिव्रतासँ व्रत हटा केहेन पति पिटेला १० व्रता आ पति फैशनकेँ दौरमे एक्के लाइने ११ मोन तोरैत हुकूम चलबैत रानी पिशाच १२ आदर संगे जे मोन बुझलक नीक स्पाउस १३ परिवारमे अहाँकेँ शांति अछि तँ स्वर्गमे छी १४ घरमे भेद अशांत परिवार नर्कक भोग १५ हऽम नै कम जेए चूप्प रहब मास्टरनी छी १६ मनुखपर संगत आ रंगत चैढ़ते छैक १७ नूनक भाव चाँदी चम्मच बला कोना बुझतै १८ किछु सम्बन्ध नियोजन कारणे बचल नहि १९ भीखो भेटै छै ओकाइत देख क गामघरमे २० सब सुनलै ओल सनक बोल घोघे तरसँ - जगदानन्द झा 'मनु', मोबाइल नंबर ९२१२४६१००६ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.संतोष कुमार राय 'बटोही'-मजदूर छी हम संतोष कुमार राय 'बटोही'

मजदूर छी हम

ईंटभट्टा पर काज केनिहार मकान बनेनिहार नाला साफ केनिहार हगनी-मूतनी केँ साफ केनिहार मजदूर छी हम ।

होटल पर बर्तन साफ केनिहार चाह बनेनिहार नाश्ता बनेनिहार ठेला पर फल बेचनिहार मजदूर छी हम ।

घर मे गृहिणी स्कूल मे मास्टरनी नेनाक माय हम मरद सँ कन्हा मिलाकऽ काज केनिहार मजदूरीन छी हम ।

खेत मे बोइन केनिहार रेलक टीशन केँ चमकेनिहार फैक्ट्री मे काज केनिहार सूअर पालनिहार मजदूर छी हम ।

हमरे पर टिकल ई दुनिया हमरे देखैत अछि कनखी आँखि सँ सेवा मे किछु कमी नहि होयत हमरो किछु अधिकार चाही मजदूर छी हम । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह ४१७ म अंक ०१ मई २०२५ (वर्ष १८ मास २०९ अंक ४१७)|| 39 40 || विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in

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