ISBN Number: 978-93-342-8354-9 (Book) ISSN 2229-547X (online) 𑒀 विदेह ४१८ म अंक १५ मई २०२५ (वर्ष १८ मास २०९ अंक ४१८) [विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। कॉपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- २०२५. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२५. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. 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People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover designed by AUM GAJEDRA THAKUR Videha e-Journal: Issue No. 418 at www.videha.co.in समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.१.अंक ४१७ पर टिप्पणी (पृष्ठ १-१) गद्य २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-९ (पृष्ठ ३-६) २.२.परमानन्द लाल कर्ण-तीर्थक्षेत्रक माहात्म्य-७ (पृष्ठ ७-१४) २.३.आशीष अनचिन्हार- हम अनचिन्हार कोना बनलहुँ (मिथिलाक कोनो एकटा गामक बभनटोलीक आत्मकथा)-१ (पृष्ठ १५-१७) २.४.प्रमोद झा 'गोकुल'-कत तोर करब बड़ाई (पृष्ठ १८-२०) २.५.लाल देव कामत- करचीके टाट पर सोनाक' लत्ती (बिहैन कथा) (पृष्ठ २१-२१) पद्य ३.१.मुन्ना जी- सत्ता (पृष्ठ २३-२४) ३.२.जगदानन्द झा 'मनु'-२० टा हाइकू (पृष्ठ २५-३१) ३.३.प्रमोद झा 'गोकुल'- आङ उघार छी हम (पृष्ठ ३२-३३) ३.४.आशीष अनचिन्हार-दू टा गजल (पृष्ठ ३४-३५)
१.१.अंक ४१७ पर टिप्पणी मिथिलेश कुमार झा उस्सर लधु कथा, मनोजजीक ई कथा नीक लागल। प्राय: प्रत्येक गाम मे एहने लाल ककाक दलान होईत छल, से आब प्राय: बिलीन होमक कगार पर अछि।
पढि क मन नहि भरल, इएह होबाक चाही लधु कथाक। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। गद्य २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-९ २.२.परमानन्द लाल कर्ण-तीर्थक्षेत्रक माहात्म्य-७ २.३.आशीष अनचिन्हार- हम अनचिन्हार कोना बनलहुँ (मिथिलाक कोनो एकटा गामक बभनटोलीक आत्मकथा)-१ २.४.प्रमोद झा 'गोकुल'-कत तोर करब बड़ाई २.५.लाल देव कामत- करचीके टाट पर सोनाक' लत्ती (बिहैन कथा) २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-९ कल्पना झा मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-९ समाज सुधारक नहि समाज उद्धारक : 'व्यास' जी समय ठीके कतेक बदलि गेलैए ने...आइ मोने-मोन इएह बड़बड़ाइत लिखब शुरु कएलहुँ अछि। दिमाग मे चलि रहल अछि ओ खिस्सा सभ, जे कोना 'व्यास' जी तन-मन-धन सँ 'बख्शी टोलक' लोक लेल तत्पर रहैत छलाह। माने हरिपुर 'बख्शी टोल' मे जनमल एकटा बालक उपेन्द्र नाथक इंजीनियर बनब भरि गामक लोक लेल वरदान सन भ' गेल रहैक। भरि गामक लोक लेल जीबाक उपाए भ' गेलैक जेना। ओहि गाम सँ दुःख दारिद्रक उन्मूलन भ' गेलैक। आब ने ओ ठाम, ने ओ कड़ाह....आब कोनो आइ ए एस ऑफिसरो प्राय: ओतेक परोपकार करबाक ने सोचि सकैए आ ने संभवे छैक। पहिने स्कोप सेहो पूरा छलैक। कम्मो पढ़ल-लिखल लोक केँ अपन विभाग पी एच ई डी मे घुसिया देलथिन। बख्शी टोलक किन्साइते कोनो घर बाँचल होएत, जाहि घर मे पी एच ई डी मे कार्यरत कर्मचारी नहि छल होएत।
ताहि दिन गरीबीओ तहिना छलैक। कतेको घर एहन छलैक जाहि घर मे ने खेत-पथार पर्याप्त छलैक आ ने रोजगारक अन्य कोनो उपाए। ताहि तरहक परिवार लेल 'व्यास' जी साक्षात भगवाने छलथिन। अवतारी पुरुष जकाँ भरि गामक उद्धार करबा लेल जेना धरती पर आएल होइथ।
धार-पोखरि-इनारक भरोसे जीबैत गामक लोक लेल डेग-डेग पर चापाकल गड़बा देलथिन। से मात्र अप्पन गाम हरिपुर 'बख्शी' टोले टा मे नहि। अपन मिथिलाक अन्यान्य गाम, जतए-जहिया जे सर-कुटुम्ब इच्छा व्यक्त कएलथिन "एकटा चापाकल हमरा दरबज्जा पर भ' जइतैक" बस...मुँह सँ खसबाक देरी रहैक....हुनकर इच्छा पूर्ति हेतु 'व्यास' जी तत्पर। भले ही सरकारीए खर्च पर काज होइत छलैक, मुदा प्रयास तँ करइए पड़ैत छलनि।
कतेको लोकक कन्यादान मे आर्थिक सहयोग करब। ककरो बालकक यज्ञोपवीत संस्कार लेल यथासाध्य आर्थिक सहयोग करब, एहि सभ बातक तँ चर्चे की कएल जाए।
मोन पड़ैत अछि नानीगामक घर के बगल केर एक टा आँगनक एक गोट मामाक (पड़ोसी) नाम छलनि खूनी। खूनी नामकरणक पाछाँ कारण छलैक जे ओ बच्चा माएक गर्भ मे छलथि तखनहि हुनक पिताक मृत्यु भ' गेल छलनि। से ओहि बच्चा आ बच्चाक माए केँ ता धरि सहारा देलथिन जा धरि ओ बच्चा पढ़ि-लिखि अपना पैर पर ठाढ़ नहि भ' गेलाह। ओ खूनी माए राँची सँ ल' क' पटना डेरा धरि संगे रहलथिन, बहुत दिन तक।
तहिना एकटा पति द्वारा परित्यक्ता दूरक संबंधी महिला आ हुनकर पुत्र के अठारह साल धरि संग रखलथिन। रखबे टा नहि कएलथिन, माए-बेटा दुनू केँ पढ़ौलथिन आ स्वावलंबी बनौलथिन। ओ महिला जनिकर विवाह मैट्रिक पास करितहि भ' गेल छलनि तनिका पति द्वारा परित्यागक उपरान्त एम ए आ पीएचडी धरि करौलथिन 'व्यास' जी। नि: स्वार्थ भावेँ एहि तरहक सहयोग विरले केओ ककरो करैत होएत।
उदारमना 'व्यास' जी सँ ककरो कोनो तरहक अपेक्षा रहलनि तँ तकरा ओ यथासाध्य पूरा करबे कएलथिन। माने जेना लोक कोनो तीर्थक विषय मे बाजैत अछि ने.... जे मैयाक दरबार सँ केओ खाली हाथ नहि लौटैए, किंवा बाबाक दरबार जाए सभक सभ टा मनोरथ पूरा होइते टा छैक। तहिना 'व्यास' जीक दरबार सँ सेहो कहियो केओ खाली हाथ नहि घूरल होएत। जे जाहि कामनाक संग आएल, चाहे ओ बच्चाक पढ़ाइ केर इच्छा होइन, कि अपन नौकरी-चाकरीक जोगाड़क इच्छा सँ आएल होइथ चाहे आर्थिक सहयोग लेल, निराश नहि कएलथिन ककरो। आ तैँ हुनकर आश्रम, गृहस्थाश्रम नहि कोनो भंडारा सन चलैत रहल सभ दिन। से रिटायरमेंट केर उपरान्तहु धरि ई क्रम चलैत रहल। एखनहुँ मामा-मामी सभक संग एहि संदर्भ मे चर्चा चलैत अछि तँ हुनको सभ केँ आश्चर्य लागैत छनि मोन पाड़ि क'। कोना ओतेक टा आश्रमक खर्च-बर्च चलैत रहलैक से आश्चर्य लागैत छनि सोचि क'। अन्नपूर्णाक प्रसादात् कहियो कथुक अभाव नहि रहलैक, कतबो लोकक आश्रम रहए ताहि सँ की !
एमहर गाम पर अपन अनुज महेन्द्र नाथ झाक सभ धिया-पूताक पढाइ-लिखाइ सँ ल' क' विवाह-दानक जिम्मेदारी उठौलनि। कारण 'व्यास' जीक आज्ञाक पागन करैत अनुज महेन्द्र नाथ एल एल बी कएलाक बावजूदो गामे पर रहलाह। हुनका अपना सेहो भगवती ओगरब-पूजब, खेत-पथार आ गाछी-कलमक देख-रेख करब पहिल कर्तव्य बुझना गेलनि। एहन राम-लक्ष्मण सन प्रेम भाव दू भाएक बीच विरले देखबा मे आबैत छैक। जहिना रामचन्द्र भगवान लेल लक्ष्मण जीक त्याग, समर्पण रहलनि तहिना उपेन्द्र नाथक लेल अनुज महेन्द्र नाथक। जखन कि गाम छोड़ि जँ छोट सन शहर मधुबनीओ आबि प्रैक्टिस शुरू करितथि, महेन्द्र नाथ झा, तँ वकालत करैत नीक पाइ सेहो कमा सकैत छलाह, आ अपन एकटा पहचान सेहो बना सकैत छलाह। अग्रज 'व्यास' जी सन महेन्द्र नाथ सेहो मेधावी छात्र रहल छलाह सभ दिन।
पटनाक संग गाम पर सेहो घर बनवाएब, गाछी-कलम, खेत-पथार बढ़ाएब, अपना भरि सभटा जिम्मेदारी बखूबी निभाबैत अपन जीवन केँ सार्थक ओ सफल बनौलनि 'व्यास' जी। अप्पन घर सँ ल' क' समाज आ गाम धरिक उद्धार कएनिहार एहन व्यक्तित्व केँ अपन शब्द - कुसुमाञ्जलि अर्पित करैत संतोषक अनुभूति क' रहल छी हम। संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-7 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-8 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.परमानन्द लाल कर्ण-तीर्थक्षेत्रक माहात्म्य-७ परमानन्द लाल कर्ण तीर्थक्षेत्रक माहात्म्य-७ (पद्म पुराण उत्तर खंड) श्रीपार्वतीजी पूछलखिन - भगवन ! नंदिकुंड सँ निकलि साभ्रमती नदी कोन - कोन देश केर पवित्र केलनि अछि, से बतावऽक कृपा करु।
श्रीमहादेव जी कहलनि - देवी ! परम पावन नंदिकुंड सँ निकलला पर पहिले मुनि लोकनि सँ प्रकाशित कपालमोचन नाम सँ तीर्थ पड़ेत अछि । ई तीर्थ अति पावन आ सवसँ बेसी तेजस्वी अछि । पार्वती ! एहि ठाम हम ब्रह्मकपालकक परित्याग केलहुँ अछि , तैं हमरा सँ कपालमोचन तीर्थक उत्पत्ति भेल अछि । एकरा कपालकुंड तीर्थ सेहो कहल जायत अछि । ई तीर्थक राजा अछि । एहि शुभ आ निर्मल तीर्थ में देवगा, नाग, गंधर्व, किन्नर आदि आ महात्मा लोकनि निवास करैत छथि । ई तीनु लोक में विख्यात , ज्ञानदाता आ मोक्षदायक तीर्थ अछि । एहि ठाम स्नान कs पूजा करवाक चाही । एक राति सहि बाभन भोजन करैवाक चाही । एहि ठाम नुआ दान करला सँ लोकनि अग्निहोत्रक फल पावैत छथि । जे केओ एहि तीर्थ मे दर्शन-व्रत करैत छथि ओ देह त्यागोपरांत निश्चय शिवलोक जायत छथि ।
भागीरथ कुल मे सुदास नाम सँ एकटा महाबली राजा भेल छलाह । हुनक पुत्रक नाम मित्रसह छल । राजा मित्रसह सौदास नाम सँ सेहो विख्यात छलाह। ओ महर्षि वसिष्ठक शाप सँ राक्षस भs गेल छलाह । ओ साभ्रमती नदी मे स्नान केलनि । जाहि सँ शापजनित पाप सँ ओ मुक्त भs गेलाह । एहि नंदी तीर्थ मे गंगा ,यमुना ,गोदावरी आ सरस्वती आदि पुण्यदायनी पवित्र नदी निवास करैत छथि । पृथ्वीक समस्त पतित जीव साभ्रमती जलक स्पर्श सँ शुद्ध भs जायत छथि । जे केओ भक्ति भाव सँ एहि ठाम श्राद्ध करैत छथि , हुनक पितर तृप्त भs परमपद पावैत छथि ।
तदनन्तर महर्षि कश्यपक उपदेश सँ साभ्रमती नदी ब्रह्मर्षि लोकनि सँ सेवित विकीर्ण वन में एलीह । हुनक प्रबल वेग सँ बहैत पानि पहाड़ सँ टकरा कs ओ सात भाग मे बँटि गेलीह । पहिल धार पवित्र साभ्रमती नाम सँ विख्यात भेलीह । दोसरक नाम श्वेता अछि, तेसर वल्कला आ चारिम हिरण्यमयी कहावैत अछि । पाँचम धारक नाम हस्तमती अछि , जे सव पापक नाशिनी वताओल गेल अछि । छठम धार वेत्रवती नाम सँ विख्यात अछि । सातम धारक नाम भद्रामुखी आ सुभद्रा अछि । ई सातो धार कतेको देश केर पाक करैत एकहि साभ्रमती नदी ’सप्तस्रोता’ रूप मे प्रतिष्ठित अछि । जे केओ विकर्ण तीर्थ मे पितरक उद्देश्य सँ श्राद्ध व दान करैत छथि , ओ गया में पिण्डदानक फल पावैत छथि । जे केओ धर्मभ्रष्ट भेलाक कारण सद्गति सँ वंचित छथि, जिनकर पिण्ड आ जलदानक क्रिया लुप्त भs गेल अछि , ओ सेहो विकर्ण तीर्थ में पिण्डदान आ जलदान करला पर मुक्त भs जायत छथि । एहि तीर्थ में कश्यप जी बाभन लोकनि कें सम्बोधित करैत कहने छलाह जे द्विज लोकनि ! जौं अहाँ सव कें ऋषिलोकक इच्छा अछि तs एहि विकर्ण तीर्थ में , जाहि ठाम सातु नदीक उद्गम भेल अछि , विशेष रूप सँ स्नान करु । एहि ठाम स्नान कएल जाय तs सव दुःखक नाश भs जायत अछि । ई विकीर्ण तीर्थ सव तीर्थ में श्रेष्ठ अछि । ई शुभगति प्रदायक आ दोषनिवारक अछि ।
विकीर्ण तीर्थक बाद श्वेतोद्भव नाम सँ उत्तम तीर्थ अछि, जाहि ठाम त्रिलोक विख्यात श्वेता नदी बहैत अछि । ई नदी हमर शरीर मे लागल भस्मक संयोग सँ प्रकट भेल अछि, तें ई देवता सँ सम्मानित भेल अछि । एहि में स्नान कs पवित्र आ जितेंद्रिय भाव सँ तीन दिन- राति निवास करला पर लोकनि महकालेश्वरक दर्शन करला सँ रुद्रलोक में प्रतिष्ठित होयत छथि । जे केओ श्वेताक तट पर कुश आ तिल सँ पितर कें पिंडदान करैत छथि , हुनकर पितर पूर्णरूपेण तृप्त भs जायत छथि । श्वेतगंगा परम पुण्यमयी , दुःख आ दरिद्रताक नाशक अछि । पार्वती ! हम ओकर पवित्र संगम मे सवदिन निवास करैत छी । ओहि मे जे स्नान दान करैत अछि हुनका हम अक्षय फल दैत छी । जे केओ ओहि ठाम धूप ,फूल , माला आ आरती सँ निवेदन करैत छथि , ओ पुण्यात्मा छथि । जे वेलक पात लs के श्वेताक कछेर में शिव पर चढ़ावैत छथि, ओ मनोवांछित फल पावैत छथि ।
श्वेतगंगा सँ आगु गणतीर्थ अछि । ई तीर्थ स्थल चंदना नदीक तट पर अछि । शिवगण ओकर नाम त्रिविष्टप राखलैन अछि । पूर्णिमा केर एकाग्रचित्त भs त्रिविष्टप तीर्थ मे स्नान कs लोकनि ब्रह्महत्या एहन पाप सँ मुक्त भs जायत अछि । जे केओ बरखा कालक चारि मास ओहि ठाम रहैत छथि , ओ महान सौभाग्यशाली आ पाक भs रुद्रलोक में प्रतिष्ठित होयत छथि । कृष्णपक्षक अष्टमी के गणतीर्थ में स्नान कs जे केओ उपवास करैत छथि आ बकुलासंगम मे गोता लगवैत छथि , ओ लोकनि स्वर्गलोक जायत छथि । एहि तीर्थ स्नान कs बकुलेश्वरक दर्शन करला सँ लोकनि गणेशजीक प्रसाद सँ गणपति पद पावि लैत छथि । एहि ठाम परम पराक्रमी चंद्रवंशी राजा विश्वदत्त कठिन तपस्या केने छलथि आ गणेशजीक प्रसाद सँ गणपति पद पेने छलाह । वसिष्ठ , वामदेव , कहोड ,कौषीतक, भारद्वाज, अंगिरा विश्वामित्र आ वामन - ई पुण्यात्मा मुनि लोकनि श्रीगणेशजीक कृपा सँ एहि तीर्थक सेवन करैत छथि । एहि तीर्थक सेवन सँ पुत्रहीन कें पुत्र , धनहीन कें धन , विद्याहीन कें विद्या आ मोक्षार्थी कें मोक्ष मिलैत अछि । जे केओ एहि ठाम स्नान व पूजन करैत छथि , ओ सव पाप सँ मुक्त भs विष्णुक परमपद पावैत छथि ।
महादेवजी आगु कहैत छथिन - साभ्रमतीक ईशान कोण दिश पालेश्वर नाम सँ तीर्थ स्थल अछि , जाहि ठाम चण्डीदेवी प्रतिष्ठित छथि । ई योगमाताक पीठ अछि, जे सव सिद्धिक साधक अछि । ओहि ठाम सव देवताक कामक सिद्धिक लेल माय रहैत छथिन । एहि तीर्थ स्थल पर व्रतक पालन करैत तीन राति रूकला सँ लोकनि चण्डीपति भगवान शंकर लऽग जा के दर्शन करैथि । साभ्रमती में स्नान कs समाधि विधि सँ युक्त दर्शन कएल जाय तs लोकनि सहस्र गोदानक फल पावैत छथि । अग्नि तीर्थ मे स्नान कs चामुंडाक दर्शन करला सँ लोकनि राक्षस , भूत आ पिशाच सँ नहि डरैत छथि । साभ्रमती मे जाहि ठाम गोक्षुर नदी मिलैत अछि , ओहि ठाम कतेको तीर्थ स्थल अछि । ओहि ठाम तिलक चूर्ण सँ श्राद्ध , पिण्डदान आ बाभन भोजन करला सँ अक्षय पद मिलैत अछि ।
बड्ड पुरान बात अछि जे कुकर्दम नाम सँ एकटा पापिष्ट आ दुर्धर्ष राजा रहैत छलाह, जे खली ,मूढ़, अहंकारी, ब्राह्मणक निंदक, गोहत्यारा, बालघाती आ उन्मत्ति छल । ओ पिण्डार नाम सँ नगर मे राज करैत छलाह । पूर्व जन्म मे ओ किछु पुण्य केने छलाह, तेकरे परिणाम सँ हुनका गुरुक सत्संग मिलल । पूर्व जन्म मे ओ वेदपाठी बाभन छलाह । ओ सव दिन महादेवक पूजा आ अतिथिक स्वागत सत्कार करलाक बाद भोजन करैत छलाह । ताहि पुण्यक प्रभाव सँ ओ राजा भेल छलाह । एक समय अधर्मक योग सँ ओ मरि गेलाह । तदुपरांत हुनक जन्म प्रेत योनि भेल । ओ दोसर प्रेतक संग करुण स्वर में कानैत हाहाकार मचवैत एम्हर ओम्हर भटकैत छलाह । सुखल मुँह, कंकाल शरीर, पीयर रंग, विकराल रूप छल । दैव संयोग सँ ओ अपन गुरुक आश्रम मे पहुँच गेलाह । हुनकर ई रूप देखि आश्रमवासी ब्राह्मण कहोड व्याकुल भs गेलाह ।
कहोड कहलनि - राजन ! ई अग्निपालेश्वर तीर्थ अछि । हम एहि अद्भुत,मनोरम आ रमणीय स्थान में रहैत छी । अहाँ तs हमर यजमान छी, तैयो एना अहाँ प्रेत कोना भs गेलहुँ ।
प्रेत रूप में राजा कहलनि - देव ! हम पिण्डारपुर में राज करैत जे किछु केने छी , से सुनू । बाभनक हिंसा, असत्य भाषण, प्रजाक उत्पीड़न, जीवक हत्या,गौ माताक दुःख देनाइ, सज्जन लोकनि केर कलंक लगेनाई , भगवान विष्णु आ वैष्णव केर निंदा केनाई हमर काम छल । हम दुराचारी आ दुरात्मा छलहुँ । जाहि ठाम जे जी मे आवैत छल,ओ खा लैत छलहुँ । कखनहु शौचाचारक पालन नहि करैत छलहुँ। द्विजराज ! ताहि पाप कर्मक योग सँ हम प्रेत योनि मे पड़ल छी । एहि ठाम कतेको प्रकार दुःख सहन करैत छी । जिनका माय ,बाबूजी ,भाई आ सगा सम्बन्धी नहि अछि , हुनका लेल गुरु माय आ गुरु माता होयत अछि । ब्रह्मण ! ई जानि हमरा मोक्ष प्रदान करू ।
कहोड कहलनि - राजन ! हम अपनेक प्रार्थना पूरा करव । अहाँक संग जे ग्यारह टा प्रेत छथि , हुनको एहि तीर्थ मे मुक्ति दिलायव ।
पार्वती ! ई कहि कहोड सवहक संग तीर्थ मे जा केर तिल सहित पिण्डदान आ जलदान केलनि । ब्राह्मण सँ श्राद्ध कर्म पूरा केला पर एहि तीर्थ मे ओ सव मुक्त भs गेलाह आ उत्तम विमान पर बैसि हमर धाम चलि गेलाह । सुरेश्वरी ! जाहि ठाम साभ्रमती नदीक संग गोक्षुरा नदीक संगम होयत अछि , ओहि ठाम स्नान आ दान करला सँ करोड़ यज्ञक फल मिलैत अछि । कपालेश्वर क्षेत्र मे जाहि ठाम अग्नि तीर्थ अछि , ताहि ठाम साभ्रमती नदी मुक्ति प्रदान करैत छथि ।
देवी ! आव हम दोसर तीर्थ हिरण्यासंगमक वर्णन करैत छी । पूर्व काल मे जखन साभ्रमती सात धारा मे विभक्त भेलीह , तखन ओ ब्रह्मतनया सप्तस्रोता नाम सँ विख्यात भेलीह ।हुनक सातम स्रोत केर हिरण्या कहल जायत अछि । ऋक्ष आ मंजुमक मध्य सत्यवान नाम सँ एकटा पर्वत अछि । ओकर पूव दिस हिरण्यासंगम नाम सँ महातीर्थ स्थल अछि, जाहि मे स्नान करला सँ लोकनि शुभगति पावैत छथि। ओहि ठाम सँ वनस्थली मे जा के पापहारी भगवान नारायण केर दर्शन करऽक चाही। ई वएह स्थान अछि जाहि ठाम नर आ नारायण तपस्या केने छलाह । एक हज़ार कपिला गायक दान सँ जे फल मिलैत अछि, दशाश्वमेधतीर्थ मे चंद्रग्रहण आ सूर्यग्रहण खन स्नान करला सँ जे पुण्य मिलैत अछि,तुला पुरुषक दान सँ जे फल मिलैत अछि, वएह पुण्य हिरण्यासंगम मे स्नान करला सँ मिलैत अछि । हिरण्यासंगम मे जे केओ स्नान करैत छथि , ओ शिवधाम जायत छथि ।
देवी ! हिरण्यासंगमक बाद आवs वाला धर्मतीर्थक वर्णन करैत छी, जाहि ठाम साभ्रमती गंगाक संग धर्मावती नदीक संगम भेल अछि । ओहि ठाम स्नान कs लोकनि धन्य भs जायत अछि आ निश्चय हुनका स्वर्ग लोक मिलैत छैन । जे केओ ओहि ठाम धर्म सँ स्थापित तीर्थक दर्शन करैत छथि,ओ पुण्यक भागी होयत छथि । जे केओ ओहि ठाम श्राद्ध करैत छथि, ओ पितृऋण सँ मुक्त भs जायत अछि । ओहि ठाम सँ मधुरातीर्थक यात्रा करऽक चाही ,जाहि ठाम सव पापक नाश भs जायत अछि । मधुरातीर्थ मे स्नान कs मधुरसंज्ञक श्रीहरिक दर्शन करऽक चाही । कंसासुरक वधक पश्चात जखन भगवान श्रीकृष्ण द्वारिकापुरी दिस विदा भेलाह , तखन ओ चंदना नदीक तट पर सात राति रूकल छलाह । तकर बाद भोज,वृष्णि आ अंधकवंशी लोकनि सँ घेरल ओ समस्त यादव वीरक संग मधुरातीर्थ में एलाह आ विधि विधान सँ स्नान कs द्वारिकापुरी गेलाह । जे केओ एहि तीर्थ मे स्नान कs मधुर नाम सँ विख्यात भगवान सूर्यक पूजा करैत छथि आ माघ मासक शुक्ल पक्षक सप्तमी केर कपिला गायऽक दान करैत अछि, ओ एहि लोक में दीर्घकाल धरि सुख भोगलाक पश्चात सूर्यलोक जायत छथि ।
महादेव कहैत छथिन -पार्वती ! कम्बूतीर्थ मे स्नान आ पितृतर्पण कs रोग- शोक सँ रहित देवदेवेश्वर भगवान नारायणक पूजा करऽक चाही । तकर वाद ब्राह्मण केर विधि-विधान सँ दान देला पर लोकनि श्रीविष्णुधाम जायत छथि । तकर बाद कपिश्वर तीर्थ दिस जाय के चाही, जे महापातक केर नाशक अछि । पूर्वकाल मे श्रीराम - रावण युद्ध शुरू भेला सँ पहिले जखन सागर पर बाँध बान्हल जायत छल, तखन एहि पर्वत पर कपि सव एकर विशेष रूप सँ केने छल । ओ एहि ठाम कपीश्वरादित्य तीर्थक स्थापना केने छलाह । एहि तीर्थ स्थल पर स्नान आ पितृतर्पण कs कपीश्वरादित्यक दर्शन केला पर लोकनि ब्रह्महत्या सँ मुक्त भs जायत अछि । कपीश्वर तीर्थ मे खास कs चैत मासक अष्टमी के स्नान करऽक चाही । हनुमान जी आदि प्रमुख वीर एहि तीर्थ मे तीन दिन धरि स्नान केने छलाह । ओहि ठाम सँ परमपावन एकधार तीर्थ दिस यात्रा करऽक चाही । जे केओ एकधार मे स्नान कs एक राति उपवास करैत अछि आ स्वामिदेवेश्वरक पूजन करैत अछि । ओ अपन सौऔ पीढ़ीक उद्धार कs दैत अछि । ओहि ठाम स्नान आ जलखई करला सँ लोकनि ब्रह्मलोक जायत छथि । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.आशीष अनचिन्हार- हम अनचिन्हार कोना बनलहुँ (मिथिलाक कोनो एकटा गामक बभनटोलीक आत्मकथा)-१ आशीष अनचिन्हार हम अनचिन्हार कोना बनलहुँ (मिथिलाक कोनो एकटा गामक बभनटोलीक आत्मकथा)-१
"हमर गामक बभनटोलीमे मर्द बहुत छै। मर्दे मर्द। एकछाहा मर्द भेटत। सेहो किस्म-किस्मक। एक बीतसँ लऽ कऽ दस हाथक मर्द। कारीसँ लऽ कऽ गोर मर्द। शीशो सन कोमल आ चहुक सन अपनत्वसँ भरल मर्द"
हमर गामक नाम अछि 'भटरा घाट'। ई दू शब्द, दू मुख्य टोलक प्रतिनिधित्व करैए।
भटरामे मुख्यतः यादव वर्ग अछि तऽ घाटमे बाभनसँ लऽ कऽ डोम धरि। घाट केर बाभन कने बेसी पढ़ल-लिखल छल तऽ गामक नाम अपन मूँहक माध्यमे प्रचलित केलाह "घाट भटरा"।
घाट केर बाभन समूहमे अधिकांश लोक नीक छल आ पाँच-दस लोक दुष्ट। एखनो इएह हालति छै। मुदा आश्चर्यजनक रूपसँ पाँच-दस दुष्ट बाभन सभ पहिनेहों अधिकांश नीक बाभनपर भारी पड़ैत छल आ एखनो दुष्टे बाभन सभ भारी अछि।
कोनो आदमी, समूह, जाति आदिक ईगो दू तरीकासँ संतुष्ट होइत छै पहिल- या तऽ ओकरा लग सार्थक उपलब्धि हो वा दोसर ई जे ओ छल-प्रपंच कऽ बातकेँ अपना पक्षमे कऽ लैत हो। से घाट केर बाभन समूह लग कोनो एहन सार्थक एवं सार्वजनिक उपलब्धि एखनो धरि नै छै जाहिसँ गामक बाहरी लोककेँ लागै जे ईहो कोनो गामक समूह छै। घाट टोलक बाभन मात्र दू-चारि कीलो-मीटरक रेंजमे चीन्हल जाइत अछि अबरजातक कारणे, दूर-दराज गाममे कुटमैतीक कारणे वा किछु दूरमे पदस्थ शिक्षकक कारणे। कोनो उपलब्धिक कारणे कतहुँ नै चीन्हल छल आ ने एखनो चीन्हल जाइत अछि। आन गाममे तऽ छोड़ू घाटक बाभन सेहो अपन टोलमे नै चीन्हल जाइत अछि। दू-चारि लोक एहन अवश्य छथि जिनका घाट टोलमे चीन्हल जाइत छनि मुदा ओकर कारण छै जे ओ दू-चारि लोक घरही झगड़ा लगेबामे माहिर छथि आ पुनः झगड़ा लगा दू पार्टीक बीच पंच बनि जाइत छथि। आ अही बदौलति हुनकर पहिचान अपन टोलमे बनि जाइत छनि, बनल रहि जाइत छनि।
से इएह घाट केर बाभन समूह लग जखन कोनो अपन उपलब्धि नै छलनि तऽ ओ छल-प्रपंचसँ गामक नाम उल्टा कऽ देलाह आ "घाट भटरा" केर नामसँ ओकरा प्रचलित कऽ अपन ईगोकेँ संतुष्ट केलाह। आ अइ काजमे घाट केर अधिकांश नीक बाभन संगे आनो जाति समूहक मौन समर्थन छलै। बेसी प्रचलित नाम इएह छै। मुदा हमरा जनैत कोनो स्थानक नाम उल्टा कऽ देब ओकर ऐतिहासिक दृष्टिकोणसँ खून करब छै।धार्मिक दृष्टिकोणसँ एवं समाजशास्त्रीय दृष्टिकोणसँ सेहो।
हम जतेक जनैत छी ताहिमे कोनो नदी-धारक ओ स्थान जाहि ठामसँ लोक सुगमतापूर्वक पार कऽ सकए, कोनो नदी-धारक ओ स्थान जाहि ठाम व्यापारिक-सामरिक केंद्र हो अथवा कोनो स्थायी-अस्थायी धार्मिक स्थान लेल नियत स्थान लेल "घाट" शब्दक प्रयोग होइत छै। जेना सिमरिया घाट, छठि घाट, श्राद्ध घाट...... इत्यादि। एहन परिस्थितिमे जखन कोनो स्थानक नाम छै 'भटरा घाट' तऽ ई मानि कऽ चलऽ पड़त जे 'भटरा' कोनो महत्वपूर्ण नदी-धार अथवा कोनो पुरान धार्मिक स्थान रहल हएत जकरासँ घाट शब्द जुड़लै। एहन परिस्थितिमे ई हमरा लग ई जनबाक दायित्व आबि जाइए जे ई "भटरा" की छै? एकर इतिहास ओ महत्व की रहल हेतै? ओकर व्याप्ति आ प्रसिद्धि की रहल हेतै?
भटरा घाट नामक गाम बिस्फी आ विद्यापतिक डीहसँ अतेक नजदीक अछि जे हमरा लग एक नै, सौ नै, हजार अवसर अछि जे हम कोनो ने कोनो मिथक गढ़ि सकी आ अपन गामक बड़ाइ पचासो पन्नामे कऽ सकी। मुदा हमरा भटरा घाट केर बनावट आ ओकर स्थिति कहैए जे कहियो ई सामरिक एवं व्यापरिक केंद्र रहल हएत। आ जहाँ धरि हमर क्षमता रहत हम तहाँ धरि अही विषय-वस्तुक अनुसंधानपर केन्द्रित रहब। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.प्रमोद झा 'गोकुल'-कत तोर करब बड़ाई प्रमोद झा 'गोकुल' कत तोर करब बड़ाई
-हे गै माय ! -हँ कह ने ! -आइ जनम अष्टमी छियै! -किए ,वरत करबिहीन से ? -नै हम राधा रानी बैन के बैसबौ ! -आब से तोहर वयस छौ जे राधा रानी बनि किसन कन्हैया संग बैसबिही ? नेना बुदरुक सब बनि के बैसै छै! -सुन ने कनी !मनुहार करैत बाजलि स्नेहा -अच्छे त कह ,की कहै छें ? -कन्हैया जहन गोकुल से मथुरा चल गेल रहथीन तखन जेहन रूप राधाक भ' गेल रहैन ,हम से बनि के बैसबौ ! बलाठ बाली स्नेहाक बात सुनि हक्का बक्का भय गेलि ।काल्हिये ते उजान बला कथा टुटलैये ।बरक बाप सात लाख टका पर अड़ि गेलै ।कत से सिनेहिया बाबू एतेक रास टका जुटैबतथिन? जेहो जथा जाल छलैन से दुन्नू भाइ बहीन के पढ़ौनी मेआँट क' देलखीन,तैयो सरधुवा बरक बाप सब के चाहियै छिट्टा भरि टाका ।जखन कि बरक सोलहो आना इच्छा छलै आ सिनेहियो ओकरा खूब चाहै छै ।कालेजे दिन मे दुन्नू के परिचय भेलै आ ओ कखन सुच्चा पिरीत मे बदैल गेलै से दुन्नू मे केओ कहाँ बूझि सकलै ?आइ रोड़ा बनि के बीच मे ठाढ़ भ' गेल छै पाइ आ बड़क बाप । सोचैत सोचैत कोंढ़ फाटि गेलै बलाठ वाली के ।दहो बहो आँखि सँ नोर चुबबैत ओ सिनेहियाक माथ पर हाथ रखैत बाजलि -ते तों कन्हैयाक राधा बनबे करबिहीन ? -हँ गै माय !हमरा अपन कन्हैया पर विस्वाश अछि जे लाखो रोड़ा बनि बीच मे केओ किएक ने अबौक परंच ओ अपन स्नेह रूपी राधाके किन्नौं नै छोड़तै ।देख लेबही तों हमर किसन कन्हैया हमरा अपनेबेटा करतै ! बलाठ बाली भरि दिन अहुँछिया कटैत रहलि ।ओकर आँखिक सोझाँ खन बेटीक आत्म विस्वाश भरल बोल ते खन सिनेहिया बाबूक हतोप्रत्याश छवि नाचि उठै छलै कहूँ छौंड़ी ई ओ क' लेलकै त' सिनेहिया बाबूक की हेतै ?आ जँ ओकरा कुच्छो भ' गेलै तऽऽऽ ई मोन मे ऐबते धक् क' उठलै बलाठ वालीक छाती ।ओ निच्छोहे दौड़लि सिनेहिया लग कि तखनहिं सिनेहिया विरहिणी राधाक परिधान मे बाहर निकललि आ लागलि भाव भंगिमा मे ई गीत गाबय-माधव !हम परिनाम निराशाऽऽऽ आ जा बैसलि दरबज्जा पर । लोकक हुजूम दौड़ पड़लै ओकरा देखक लेल ।टुह टुह दुनू गाल पर दने नोरक टघार बहैत देखि सबहक आँखि छलछला गेलै।थोड़बो काल नै बीतल हेतै कि कन्हैया कृष्णक भेख मे बाइक पर हुरहुड़ैल एलै आ सिनेहिया दिस हाथ बढ़वैत कहय लगलै --वाहन गरुड़क संग हम हम आबि गेलौं राधे !आउ ,पकड़ू हमर हाथ आ चलू राधा कृष्णक मन्दिर मे सदाक लेल एक होइ ले ।कंस रूपी दहेज किन्नौ नै फराक कय सकैत अछि हमरा अपन स्नेहा रूपी राधा सँ ।सलज्ज स्नेहा नहुँ नहुँ उठली आ कन्हैयाक हाथ पकड़ि गरुड़ बाइक पर जा बैसली आ विदा भय गेल दुनू गोटे जन्म जन्मान्तरक लेल एक होइक लेल राधा कृष्णक मन्दिर मे ।अकस्मात तखनहिं ककरो कंठ सँ मधुर स्वर गूँजि उठलै-माधव कत तोर करव बड़ाई
. -प्रमोद झा 'गोकुल; दीप,मधुवनी (बिहार); फोन -9871779851 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.लाल देव कामत- करचीके टाट पर सोनाक' लत्ती (बिहैन कथा) लाल देव कामत करचीके टाट पर सोनाक' लत्ती (बिहैन कथा)
गरिबा भैया सँ भेंट करय गम्हरिया गेल छलहुँ। ओ मुसहरनियाँ सँ मातृक गाममे गृहबासु भऽ गेल रहथि। भरिगाम सभहक भीतक घर आ हुनक कैरचिक टटघर टुटल-झुकल देखि जाहि मरूआ लगानी ओसुलै गेल रही , से मांगैके बाते बिसरि गेलहुँ। हुनक वृध्द बाबू मौसीके कुष्ठ रोग औषधि लाबय बेलही ले बिदा होईत कहलाह - बौआ एतय नीक नहि लागतह,से चलह देखय मिश्रीलाल मामा दालान पर दाहा एलै य! हम कहलियैन मौसाजी भरि नेन देखय दिअ अपनेक करची टाट पर सोना सन छिटकैत अमीबा कीराके छोड़ल चमचम रेह । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। पद्य ३.१.मुन्ना जी- सत्ता ३.२.जगदानन्द झा 'मनु'-२० टा हाइकू ३.३.प्रमोद झा 'गोकुल'- आङ उघार छी हम ३.४.आशीष अनचिन्हार-दू टा गजल ३.१.मुन्ना जी- सत्ता मुन्ना जी सत्ता
सत्ता! माने राजशाही राजतंत्र हो वा लोकतंत्र सत्तसीन,अपन राजशाही लेल गढ़ैए पर्दा
भीड़ पर छीटैए मरछाउर जकरा पर क' जाइछ असरि ओकरा डूमा ' भजा क' बचबैए सत्ताक सिंहासन
शेष जनक माझ रोपैए बीहनि जाति- धर्मक आ नहुंए नहुंए खड़रति रहैए सलाई,बेर पाबि
किछु लोक भ' जाइछ वेश्या सन देहक नै,व्यवहार आ कर्तव्य सं बेरि बेरि उढ़डैए लाभक लोभमे
किछु मातल रहैछ बिनु पिने स्थापित इतिहास ध्वस्त क' गढ़ल जाइछ बिनु आधारक वर्तमान पन्ना उनटबिते देखाइछ नांगट अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.जगदानन्द झा 'मनु'-२० टा हाइकू जगदानन्द झा 'मनु' बीसटा हाइकू १ कलम धार मुरझायल अछि टाका इजोते २ सेल आ साला दुनू तंग करै छै ब्याहकेँ बाद ३ माछक मूँड़ा सभटा बँटिगेल काँट बचल ४ भंसा घरमे झोरगर तीमन भात दाइल ५ हम्मर मुँह हाथके दोस्ती खत्म पाइ नै छै ने ६ सुगर बीपी गरीबकेँ नै है छै भूखक आगू ७ भूख आ मृत्यु ई दूएटा बेमारी बाँकी छलावा ८ एक्के घरमे रहितो लोक सब बड़ दूर छै ९ कमाऊ पूत दूधगर मालक लातो नीमन १० घरजमाई आ गामक कुकुर दुत्कारै लेल ११ गाम आबि क शहरक कुकुर भुकै बड़ छै १२ घरक जोगी मंत्र पढ़े कतबो भागै नै भुत १३ लोभ खातिर लोग संगे सगरो एहि जगमे १४ पानि जान दै पानिमे डूबि गेने पानि जान लै १५ दोष पानिक सदिखन नै रहै हेलब सिखू १६ दूमुँहा लोक मने साँपक गुरु बँचि क रहु १७ कियो दोस्त नै सत्य बजै बलाके कलियुगमे १८ झूठक राज लगै रमणगर क्षणिक लेल १९ भूखल पेटे बसिया भात नून नीक लगै छै २० दुख कतेक सुखकेँ ताकैमे छै जे संगे छल - जगदानन्द झा 'मनु', मोबाइल नंबर ९२१२४६१००६ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.प्रमोद झा 'गोकुल'- आङ उघार छी हम प्रमोद झा 'गोकुल' आङ उघार छी हम
झर झर झहरय जेना फूल सिंहार टप टप टपकय जेना ओसक फुहार तहिना नोरक टघार छी हम मौलल फूल बेकार छी हम । बात बात मे अभहेला डेग डेग पर ठेलमठेला गुड़ गुरु चिन्नी चेला जत'तत' रेलमपेला खिन्न मन लाचार छी हम मानू एक विचार छी हम । चौदिस तम,तम तम करय प्राण अवग्रह जतय ततय ज्ञान इजोतक मन्त्र जपय अज्ञान मुक्का मुकियाबय दुर्दिनक मारल अभिशाप छी हम सप्त रथीक धरि अनुचक्र छी हम । भूखल पेट तृषित कण्ठ आहो भर रे केओ चण्ठ ! छुछ्छ डीङ हाँकय लण्ठ सब सुखी वसन आकण्ठ रुदन मे घोर चीत्कार छी हम वसन बिनु आङ उघार छी हम । . -प्रमोद झा 'गोकुल; दीप,मधुवनी (बिहार); फोन -9871779851 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.४.आशीष अनचिन्हार-दू टा गजल आशीष अनचिन्हार दू टा गजल १
बेपार सदा सोहागिन पैकार सदा सोहागिन
उपकार मरलै छन छनमे अपकार सदा सोहागिन
कहू कोन सिंदूर लगा सरकार सदा सोहागिन
सभ अबैत जाइत रहतै संसार सदा सोहागिन
बिलेतै अनुचित समर्थन प्रतिकार सदा सोहागिन
सभ पाँतिमे 22-22-22-2 मात्राक्रम अछि। दू अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि। २ गहुमन बली अजगर गली धामन बली साँखर गली नेहक धनी जाइत रहल आँचर गली काजर गली बगुला भगत भेटल बहुत बाहर गली भीतर गली कोना चलब अतबे कहू हिनकर गली हुनकर गली आएल रहथिन देवतो पापक महल पामर गली सभ पाँतिमे मात्राक्रम 2212-2212 अछि (बहरे रजज मोरब्बा (दू) सालिम वा बहरे रजज सालिम चारिरुक्नी)। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह ४१८ म अंक १५ मई २०२५ (वर्ष १८ मास २०९ अंक ४१८)|| 35 34 || विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in
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