VIDEHA — Issue 420 / अंक ४२०

Publication: VIDEHA · Issue: 420
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ISBN Number: 978-93-342-9891-8 (Book) 𑒀 विदेह ४२० म अंक १५ जून २०२५ (वर्ष १८ मास २१० अंक ४२०) [विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in ] विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। कॉपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति ‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२५. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२५. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004). सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. 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It is a platform for scholars, researchers, writers and poets to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, and poetry in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@gmail.com. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover designed by AUM GAJENDRA THAKUR Videha e-Journal: Issue No. 420 at www.videha.co.in ISSN 2229-547X (online) समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अनुक्रम ऐ अंकमे अछि:- १.अंक ४१८-४१९ पर टिप्पणी (पृष्ठ १-३) गद्य २.१.हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान (पृष्ठ ५-८) २.२.प्रमोद झा 'गोकुल'-सापिन (पृष्ठ ९-११) २.३.कुमार मनोज कश्यप- अनुत्तरित प्रश्न (लघुकथा) (पृष्ठ १२-१३) २.४.लालदेव कामत- एवमस्तके निहितार्थ/ अहर्निश मैथिली साहित्य सेवक डॉ०तारानंद वियोगी (पृष्ठ १४-२८) २.५.परमानन्द लाल कर्ण- तीर्थक्षेत्रक माहात्म्य- ८ (पद्म पुराण उत्तर खंड) (पृष्ठ २९-३७) पद्य ३.१.राम शंकर झा "मैथिल"- कोल्हूक बरद/ मुदा आब (पृष्ठ ३९-४८) ३.२.प्रमोद झा 'गोकुल'- आगाँ बढ़ल जा रहल छी (पृष्ठ ४९-५०) ३.३.जगदानन्द झा 'मनु'- बीसटा हाइकू (पृष्ठ ५१-५५) ३.४.प्रणव कुमार झा- एक कप चाह (पृष्ठ ५६-५८)

१.अंक ४१८-४१९ पर टिप्पणी अंक ४१८ पर टिप्पणी प्रणव कुमार झा आशीष अनचिन्हार के ग़ज़ल में 'सदा सोहागिन' के प्रतीक द्वारा समाज में व्याप्त किछु विरोधाभासी सच्चाइ पर सटीक व्यंग्य कैल गेल अछि। आशीष जी के जीवनी के अंश पहिनेहो पढ़ने रही। पाठकीय दृष्टिकोण सँ ई लेख एकटा आत्मीय, व्यंग्यात्मक आ गहिर सामाजिक विश्लेषण प्रस्तुत करबाक प्रयास बुझाना जाय अछि। लेखक गामक भूगोल आ जातीय संरचना केर माध्यम सँ मानव स्वभाव, गौरवबोध आ स्थानीय राजनीति के देखेबाक प्रयास क रहल छैथ। "कोनो स्थानक नाम उल्टा कऽ देब ओकर ऐतिहासिक दृष्टिकोणसँ खून करब छै।" लेखक के दृष्टि मे ई कोना छै से लेखक के फरिछा के कहबाक दरकार छै। शेक्सपियर कहने छलाह जे नाम मे की छै, त नाम उल्टा के रखनाइ एकटा फैशन/एकटा शैली सेहो त होइत छैक जेना थाना-बीहपुर, चक-मकरंद, चक-सिकंदर, ग्राम खरिका आदि। अंक ४१९ पर टिप्पणी हितनाथ झा विदेहक हम दू वर्षसँ कने बेसिए समयसँ नियमित पाठक छी। पत्रिको नियमित निकलैत अछि। लीकसँ हटि क' सोचब आ अमलमे आनब कम कठिनाह काज नहि। जाहि दिस आन-आन सम्पादकक ध्यान नहि जाइत छनि, ओहि दिस हिनक ध्यान पड़िते टा छनि। अद्यावधि एहि पत्रिकाक करीब 35 विशेषांक निकलि चुकल अछि। ओ व्यक्तिपरक तँ अछिए, संस्थाक गतिविधिक विषयमे सेहो। आनो-आन विषयक अछि विशेषांक सभ। एक खास बात आओर छनि हिनक विशेषांकमे। साहित्यकारक विषयमे जँ ली तँ सभ जीबैत साहित्यकारक व्यक्तित्व आ कृतित्वक विषयमे रहैत अछि। अबडेरल साहित्यकार जनिक साहित्यमे महत्वपूर्ण अवदान छनि, ओहिपर केंद्रित अंक विश्वसनीयताक दृष्टिसँ सेहो महत्वपूर्ण रहैत अछि। हालक विशेषांकमे महत्वपूर्ण लेखक रबीन्द्रनाथ ठाकुर, रामलोचन ठाकुर, राजनन्दनलाल दास, केदारनाथ चौधरी, शरदिंदु चौधरी आदि जे आब एहि संसारमे सदेह नहि छथि, मुदा हुनक व्यक्तित्व आ कृतित्वक विषयमे साहित्य संसार पीढी-दर-पीढ़ी परिचित रहत। अंतर्राष्ट्रीय मैथिली परिषदक विशेषांकमे जतेक आलेख अछि, प्रलेखक रूपमे सभ दिन विद्यमान रहत। पर्यावरणविद नारायणजी चौधरीपर विशेषांक निकालि विदेह ई साबित केलक जे मात्र साहित्यकारे टा समाजक कल्याण नहि सोचैत अछि, पर्यावरणक रक्षा-सुरक्षा कोना हो, जीवन सहज कोना चलय, एहि हेतु जे कार्य करैत अछि, आन्दोलन करैत अछि, ओहेन व्यक्तित्वपर विशेषांक निकालल जाय से जल-पर्यावरण संरक्षणक लेल नारायणजी चौधरीक अमूल्य अवदान छनि, हुनकापर केन्द्रित विद्वान लोकनिसँ आलेख लिखबाय विशिष्ट अंक निकाललनिअछि, जाहिमे डा. कैलाश कुमार मिश्र , आशिष अनचिन्हार, डा. शिव कुमार मिश्र, प्रणव झा, डा. धनाकर ठाकुर, अजित कुमार झा आदिक अनुसंधानपूर्ण आ सूचनाप्रद आलेख छनि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। गद्य २.१.हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान २.२.प्रमोद झा 'गोकुल'-सापिन २.३.कुमार मनोज कश्यप- अनुत्तरित प्रश्न (लघुकथा) २.४.लालदेव कामत- एवमस्तके निहितार्थ/ अहर्निश मैथिली साहित्य सेवक डॉ०तारानंद वियोगी २.५.परमानन्द लाल कर्ण- तीर्थक्षेत्रक माहात्म्य- ८ (पद्म पुराण उत्तर खंड) २.१.हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान हितनाथ झा मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान विदेह लेल 'मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान’ विषयपर लिखबाक लेल जखन आशीष अनचिन्हारजी हमरा कहलनि तँ कनेक काल लेल हम भावशून्य अवस्थामे चलि गेलहुँ कारण नहि गछब उचित नहि होइत आ गछब हमरा लेल अतीतक बिसरल बातकेँ पुनि समक्ष आनब आ लोकक मध्य रखबामे जे सामर्थ्य हेबाक चाही से अपनामे कनियो नहि पाबि रहल छी ओकर अनेक कारण अछि। पहिल जखन हम दू-अढ़ाइ वर्षक रही, तखने हमर पिताक निधन भ' गेलनि। हमरा लेल तँ दुनियाँ ओही समय अन्हार भ' गेल छल, मुदा पिता सदेह उपस्थित नहियो रहैत हुनक आशिष हमरा सदति माथपर रहैत छल, ई हम तखन बुझलियैक जखन हमरा ज्ञान-प्राण होबय लागल आ समयक गतिक अनुसार आगाँ बढ़बाक लेल डेग केहनो विकट परिस्थितिमे अवरोध नहि होइत छल। दोसर-तेसर आदिक कारणक तहमे एखन नहि जा हमरा आशीष अनचिन्हारजीक आग्रह टारब अपन पिताक आशीर्वादक बदला कृतघ्नता होइत जे अल्पायुमे बैकुण्ठवासी होइतहुँ सामाजिक, शैक्षणिक, चिकित्सीय, साहित्यिक गतिविधिमे जे सक्रिय छलाह, तत्कालीन समाजक प्रेरणास्रोत बनल छलाह, ओहिसँ अपन समाजकेँ वंचित राखि हुनक त्याग-तपस्याकेँ सेहो अल्पायु बना देब कृतघ्नता नहि होइत तँ आर की? जखन आशीष अनचिन्हारजी एहि हेतु विदेह पत्रिका ल' क' हमरा समक्ष उपस्थिति भेलाह आ धारावाहिक रूपेँ साहित्यिक समाजमे व्यक्तित्व आ कृतित्वकेँ अनबाक लेल कहलनि तँ हमरा स्वीकारब अनिवार्य बुझना गेल। गछि तँ लेलियनि, जेना-तेना अपन सामर्थ्यक अनुसार लिखबाक लेल सोचलहुँ, तँ भेल पहिल अंकमे ' तारानाथ झाक वंशावली देल जाय। तैंतीस पीढ़ीक ई वंशावली अछि जाहिमे अद्यावधि कुलबृक्ष तक लेल गेल अछि, जतेक हुनक अंश छथिन। एखनि हम एतबहि कहब जे हुनक आगाँक पीढ़ी लोकनिक साहित्यिक जे अवदान अछि, ओहिमे ज्येष्ठपुत्र प्रो.भीमनाथ झाक अवदान सर्वविदित अछि। साहित्यिक ककहराक लेल हमरहु कलम कहुखन चलि जाइत अछि। हमर माँझिल भाइ जे राजनगर कॉलेजमे कार्यरत छलाह मित्रनाथ झा सेहो अल्पायु भेलाह। चि.प्रो.दमन कुमार झा, तारानाथ झाक ज्येष्ठ पौत्र आ प्रो. भीमनाथ झाक बालक ल.ना. मि.विश्वविद्यालय, दरभंगाक वर्तमानमे मैथिलीक विभागाध्यक्ष छथि आ मैथिली साहित्यमे हिनक योगदान अनेक विधामे महत्वपूर्ण अछि। तारानाथ झाक ज्येष्ठ पौत्री आ प्रो. भीमनाथ झाक ज्येष्ठ पुत्री मैथिली आ हिन्दीक कवयित्रीक रूपमे सुपरिचित छथि। एहि अंकमे प्रो. भीमनाथ झाक रचित तारानाथ झा जीक वंशावली काव्यमय वंशावली देल जा रहल अछि आ अग्रिम अंकसँ पारिवारिक, सामाजिक, साहित्यिक, संपादकीय दायित्व, चिकित्सकीय आदिक अवदानक विषयमे लिखब। (मूल- खौआड़े नाहस, गोत्र-काश्यप) वंशावली बीज प्रजापति1, वाचस्पति2, गणपति3-सुत शशिधर4 तनिक गदाधर5, हरिमणि6, रत्नपाणि7 विद्वद्वर देवादित्य8 - तनय पाँखू9 - सुत भूले10, तनिकर राम11, तदनु नरसिंह12क सुत लवशर्मा13 बुधवर14 तनिक उमापति15, तनिक रमापति16,तनि सुत हरिहर17 रहथि गुणाकर18, तनिक बुद्धिकर19, नारायण20 वर पुनि निकार21, आ कमल22, गुणाकर23, ब्रह्मदत्त झा24 सुत गोसाइँ25, पुनि वेणीदत्त26क सुत बबुआ झा27 तनिक तनय श्रीनाथ28क सुत छथि तारानाथे29 मासिक पत्र 'प्रभात' चलौलनि अपना हाथे तनिक तीन सुत भीम-मित्र-हितनाथ30 थिकथि आ हितनाथहुक धनञ्जय31, तनिक हृधान32 दुलरुआ 'रितु'31 नामक हितनाथक छथिन शिक्षिता कन्या सुत प्रत्यूषक माय बनलि ओहो छथि धन्या ।। -जयप्रभा नगर, हजारीबाग-825301, 9430743070 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.प्रमोद झा 'गोकुल'-सापिन प्रमोद झा 'गोकुल' सापिन

भोरका उखराहा मे कोनो घरक मजमा अलगे होइ छै ।इसकुलियया बच्चाक लंच बाकस से ल' के कमौवा धैर के तैयार कय फेर हँसि के बिदा करै मे जे गति होइ छै से कोनो कुशल गृहणीयें कहि सकैत छथि ।जहिना सेनाक जवान के सीमा पर सजग चौकसी रहैत छैक तहिना हिनको सब के रहै छैन ।कनियों चूक भेला पर बिन गोला बारुदक धमाका सहजहिं होमय लगैत छैक आ हिनका लोकैन के अकारण कोट मार्सल सुरूह भय जाइत छैन तेँ मनोरमा सतर्क भय समय सँ पहिनहिं आइ तैयार छथि । मोने मोन फुसफुसेली जे रिंकिया नेहेने सोनेने छैहे, जामे सकूलक टास्क बनौतै तामे गाड़ियो ओकर चैलिये औतै।ततबे मे छोटकी बहीन उमा सेहो आबि गेलै ।जान मे जान एलै मनोरमा के ।आब निश्चिंत से डागदरक ओइठाँ जायब ।ओतौ की होयत से नहिं जानि! चारिम महिना छियै ।जाँच बला कहलकै जे 'फेनो बेटिये है पेट मे' तेँ ,नै ते किन्नौ ने हम ई काम कैरतियै! अपने हाथे अपन बच्चा के मारै मे ककर ने करेज दहलतै! मुदा करियौ की ?भगमान एगो पहिनै द' देलकै ,ओकरे निमेरा नीक नहैंत कैल पार नै लगै छै आ फेनो तै पर से बियाह दान जर जैतुक अलहदा ।धौर!हमहुँ कोन मन कथा मे लैग गेलियै ?अपनो ते तैयार हेबा के छै!अपनो जे घड़ी ने एलखिनहें !हैया आबि ते गेलखिध! मर !कत'चल गेल रहियै ? -आर कत'जेबै ?डागदरक लग नम्मर लगा एलौंहें ! -ओ…कै बजे के? -से ते नै कहलक; मुदा जल्दिये! -बेस ते चैह पीबि के तैयार भ'जाउ झप सिना! ता हमहूँ छौंड़ी के तैयार क' दै छियै ,इसकुलिया गाड़ी ऐबते हेतै! आ हे! उमियो आबि गेलैहे! -आँइ! एली उमा दाइ!!तखन ते… -हे मोन नै बेसी बढ़ौ! चुप चाप बाथ रूम मे घुसू से कहि दैत छी ।चौल करैत बजली मनोरमा । -बेस सरकार जे आज्ञा !एतबा कहि सगुन तैयार होइले चल गेलाह आ एमहर लैग गेली मनोरमा अपन तैयारी मे रिंकु के सेहो अपन सकुलक सब टास्क ते तैयार भ'गेल रहै परंच मैथिली सरक एकटा सवाल नै बैन पौलकै तेँ माय सँ पूछि बैसलि-- गै माँ! -हँ कह ने! -एगो सवाल के जबाब कहबेँ! -पूछ ते ! -सवाल छै मैथिली मे! -हँ गै कह ने! ते सुन! जे अपन बच्चा के अपने खा जाइ छै ओकरा एक शब्द मे की कहबै? -सा-पि..न …अचानक मनोरमाक मूह सँ ई शब्द निकलि गेलै ।ओ सोचय लागलि जे ठीके हम सापिन छी ।अपन संतान के अपने खाइ बाली! न न न्न …एहन काज हम किन्नौं नै करब ।फेनो बेटिये हेतै सएह ने! ओकरे पढ़ा लिखा के किछ बना देबै! अंतरे की छै बेटी बेटा मे? रिंकुवा बाबू के मना क' दै छियै ।ओकरो भीतर से मोन ते नैहें छलैहे, हमहीं जिद केलियै तेँ । उधेरबुन मे बैसलि मनोरमा एना मे बिगरैत सम्हरैत अपन छवि निहारि रहल छलि ।शनैः शनैः दृढ़ताक आभा ओकर मुखमण्डल पर पसरि रहल छलै कि तखने सगुन टोकार मारलकै- एना कतय हेरायल छी? -न न नै! हरबड़ाइत बजलीह मनोरमा -किछ बात ते जरूर छै! बाजू ने!! -डागदर लग नै जेबै आब हम! एके साँस मे बजली -से किएक? -हम सापिन नै बनब …अपन बच्चाके अपने नै खायब …फफकैत मनोरमा सगुनक अंक लागि गेलीह आ ओहो मनोरमाक केश मे हाथ फसबैत बजलाह- धुर बताहि! हमहुँ ते इएह चाहैत छलहुँ ।

-प्रमोद झा 'गोकुल', दीप,मधुवनी (विहार), फोन-9871779851 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.कुमार मनोज कश्यप- अनुत्तरित प्रश्न (लघुकथा) कुमार मनोज कश्यप अनुत्तरित प्रश्न (लघुकथा) मैंयाँ के सरझप्पी प्रात दलान पर दस लोक के जुटान आ आरम्भ भेलै श्राद्ध आ भोज पर गहन विचार-विमर्श! पंडितजी श्राद्धकर्म हेतु वस्तु-जात के संगहिं घाट आ आँगन के दान इत्यादि के फेहरिश्त लिखा चुकल छलाह। एम्हर कै गाम के जवार नेओतल जाय ताहु पर निर्णय भs गेलाक बाद असल घमर्थन हुअ लगलै जे कोन दिनक भोज मे कोन-कोन वस्तु-विन्यास हेतैक। सभक अपन-अपन सुझाव छलैक आ तैं सर्वसम्मत निर्णय मे बेसी माथापच्ची स्वभाविके! पंडितजी लोटा सs जल पीबा सs पहिने कुरूड़ फेकैत बजला - ' हे! सुनै जाई जाऊ। भोज मे जे वस्तु-विन्यास राखी से अपन निर्णय, मुदा बुड़ही के मनपसंद वस्तु सभ जरूर हेबाक चाही। नहिं तs बुड़ही के पईत नहिं हेतनि।' एहि प्रस्ताव के उपस्थित सभ जन मुड़ी डोला कs समर्थन केलनि। अंततोगत्वा सभ वस्तु-जातक फेहरिश्त संगे भोज मे कोन दिन की विन्यास रहतै, जेनेरेटर, टेन्ट हाऊसक सामान, हलुआई, कार्यकर्ता सभक नाम आदिक विषद सूची बनेबाक कार्य सम्पन्न भेलै। रजिस्टर आ कलम आशू के हाथ मे दैत भैया आँगन मे राखि देबा लेल कहि कुर्सी सs उठि डाँड़ सोझ करs लगलाह। आशू भोजक विन्यास पढ़ैत बाजल - 'जा पापा! एहि लिस्ट मे 'नोन रोटी' कहाँ लिखलियै? … मैंयाँ तs रोज इहै खाईत रहै ने?  … तकर माने ओकरा इहै बेसी पसिन्न छलै! पंडितजी एखने कहलखिन ने पापा जे मैंयाँ के पसिन्न के वस्तु भोज मे अवश्ये राखक लेल? ' सुनिते मातर भैया तामसे लाल भs गेलाह - 'तेहन घरमेच्चा मारबौ जे मुँहे टुटि जेतौ! ..  जो अपन काज कsर गs।' अपरतिभ भेल आशू कलम-रजिस्टर लेने ओतs सs चलि तs गेल; मुदा ओकर नेनमति मे ई जिज्ञासा हौंड़िते रहि गेलै। -कुमार मनोज कश्यप, सम्प्रति: भारत सरकार के उप-सचिव; संपर्क: सी-11, टावर-4, टाइप-5, किदवई नगर पूर्व (दिल्ली हाट के सामने), नई दिल्ली-110023; # 9810811850; ईमेल: writetokmanoj@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.लालदेव कामत- एवमस्तके निहितार्थ/ अहर्निश मैथिली साहित्य सेवक डॉ०तारानंद वियोगी लालदेव कामत एवमस्तके निहितार्थ/ अहर्निश मैथिली साहित्य सेवक डॉ०तारानंद वियोगी १ एवमस्तके निहितार्थ साहित्यकार श्री रामेश्वर प्रसाद मंडल जीक ९ गोट कथाके संग्रह 'एवमस्त' मैथिली भाषा मेँ पोथी आयल अछि। एहि १२१ पृष्ठक पोथी'क मूल्य ३९९ टाका निर्धारित छैक ,जाहिक आकर्षक छपाय निरमलीक पल्लवी प्रकाशन सँ भेलैक हेन। कथाकार रामेश्वर बाबू'क सद्यप्रकाशित पोथीमे वरेण्य साहित्यकार श्री नन्द विलास राय जीके आमुख पाठककेँ कथा प्रति अभिरुचि जगबैत छन्हि। श्रीमान मंडलजी जिला प्रगतिशील लेखक संघ सँ जुटल छथि आ स्थानीय प्रगतिशील बौध्दिक समाज'क प्रमुख संचालक सेहो छथि। हिनक बौकी उपन्यास,बगवार - पद्य उपन्यास आ चिख' नाटक' खूब चर्चा म आयल रहय। साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत "पंगू" केर मैथिली संग हिंदी अनुवाद आ जगदीश प्रसाद मंडल - एक (बायोग्राफी) जीवनी केँ मैथिली सँ हिन्दी भाषान्तर कार्य बहुत प्रशंसनीय रहल अछि। हिंदी आ मैथिलीमे अनेको कथाक रचना पूर्वमे कयने छैथ। एवमस्त पोथी अभिरुचि पूर्वक पढलहुँ,से बहुत नीक लागल हेन। ताहि संदर्भमे अपन पाठकीय प्रतिक्रिया अहाँ सभक बीच प्रस्तुत कऽ रहल छी। पहिल पाठके शिर्षक थीक - पति परमेश्वर। ऐ कथाके नायक सुधीरक'क गामेक नाम बढ़ उर्जावान राखल गेल य- संस्कार पुर। ठीक ताहिक विपरीत नायिका शकलीके गामक नाम छियै - मंदपुर। शिक्षित वर केँ एक अनपढ़ कन्या सँ वियाहक प्रतिफल देखौनाई लेखकक अभिष्ट रहल छन्हि। देहाती क्षेत्रमे दू दशक पूर्वधरि बालिका शिक्षाक प्रचार - प्रसार कमे रहैक आ ताहि सँ पहिले तँ मात्रे धनिक वर्गमे महिला साक्षरता भेल रहय। आजुक समाज एहि। पुरनका दर्रा पर आधारित कथा पढयमे विशेष रूचि नहिं करैत अछि। समय आब तीव्र गति सँ वैचारिक प्रगति केलक अछि,तेँ पाठककेँ लेल नव विषय श्री मण्डल जीकेँ लिखबाक चाहैत रहनि। ओना कथामे कतेको ठाम माधुर्य गीतक प्रविष्टि करने छथि। टीशन पर दुल्हिन सँ नवोदित दुल्हाक' तिरष्कार बावत मोसाफीर खानाके स्त्रीगण कहैत छथि नवकनियाँ पूरी- जिलेबी कियाक फेकलौं! पति तँ परमेश्वर होईछ,हुनक बात सोलहो आना मानूं। पाठ-२ शिर्षक - हमरो बहिन अछि कथा माध्यम सँ ग्रामीण क्षेत्रक आचार विचार पर एक छोट विद्यार्थी केँ सौन मासके राखी पाबैन पर एक अन्वेषणकर्ता रूपेँ स्थापित कय समाजमे अनोखा संदेश पसारबाक चेष्टा कयलाह अछि। मुसहरु नामके एक दम्पतिके एकलौता पुत्र प्रेमनाथ रहैछ,तकरा ओ मिडिल स्कूलमे पढबैमे लागल देखाईछ। नामक अनूकूल ओहि छौरामे प्रयाप्त प्रेमक भाव रहैछ। ओकर सहपाठी लोकनि राखी बावत खुब चिरौरी करैत रहला सँ ओ अपना माय- बाबू सँ एकटा बहिनक अपेक्षा करैत छैक। माय पारोकेँ धीयापुता आब अपना नहिं होई छै,से बूटाक प्रस्ताव पर एक बेटी गोदी लेबाक लेल छान मारैत छै। अथक परियास सँ एक दलित परिवारक ५ बेटीक गरीब माय तेतरी अपन छोटकी बेटी सिनेह पूर्वक सदा पालन लेल दैत उदारता देखेलनि अछि। आगू राखी पाबनिक दिन ओ बचीया ५ वर्खक बुधनी उर्फ विद्या कुमारी जे स्कूलक छात्रा बनलीह से धर्मक भायके गटा पर निर्मली सँ आनल राखी विधिवत बान्हि पुलकित होईत रहैछ। संगी साथी धरि प्रेमनाथके राखी देखि लजाईत रहल। तेसर पाठक शिर्षक ' अनमोल सहानुभूति ' पर कहब जे सहानुभूति शव्द अपने आपमे पूर्ण छैक तँ अधिक शव्दक प्रयोग फ़ाज़ील भेल छै। जेना तरूण युवा लिखवा पर होईछ। कियाक तँ युवा शव्द अपने आपमे तरुणाई समेटने छै। ऐ कथामे मण्डल जी गरीबी सँ त्रस्त परिवार अपना बेटी रूणाकेँ बीए० धरि शिक्षित करैत पिता कोरोना बेमारी सँ मरिखपि जाइछै। माय सेहो कुटौन - पिसाउन करैत रोगग्रस्त भ' जाइछै। आब रूणा बेराम पड़ल मायके उपचार आ भरण- पोषण लेल एक हवेलीके मोईलकानि सँ घरेलू कामकाज बाबत जुड़ैत छै। मुदा मालिक ओकर मायके ईलाज लेल अगाऊ ५ हजार टाका किन्नहुँ नै दैत कठोर बनल देखाईछ। कननमुंह रूणाकेँ मालकिनक सहानुभूति शव्द सुनि कोढ़ फटैत छै,कनिते बहराईत छै। वाटमे एक सज्जन व्यक्ति कानबाक कारण पुछि - बुझि सान्तवना दैत छै। ओ टाका सेहो दैत छथिन आ बेकारिक स्थितिमे अपना ओहिठाम काज पर राखि बिजनेस पार्टनर सेहो बना लैत छथि। तेजस्वीता रूणाक परिश्रम आ ईमानदारी लेल ' फिल्ड अफसर' पुरस्कार दैत आब अपन फैक्टरी'क मैनेजर पद पर पदोन्नति धरि करैत छैक। एकटा सुपरवाइजर'क भर्ती लेल रिक्तिक विरूद्ध इन्टरव्यू देमय जे व्यक्ति पुरान मोइल वस्त्र पहिरने आयल छै से वेटिंग रूममे रूणा केँ चिन्हैत अनर्गल प्रलाप करैछ। कथाकार एतय हिन्दीमे वार्तालाप देखाबैत रोचकता आनबाक भाव प्रदर्शित कयलाह अछि। कालवेल भेलापर ओयह व्यक्ति केर पहिल साक्षात्कार रूणा लैत ओकरा अपन अस्तित्व रक्षार्थ कतिपय गप्पेमे झारैत छथिन। तकरा नोकड़ीपर धरि राखि एक व्यक्ति केँ आत्महत्या करय सँ बचाबैत एक नव ट्रेण्डके कथा समक्ष आयल छै। कलयुगी सुपरभाईजरके पत्नी धरि माली हलात देखि पहिलहि परा गेल छलैक। चारिम पाठ कथा- देखते रहिए गेल म मण्डल जी धानुक जातिक समाजशास्त्रीय अध्ययन प्रस्तुत कयलाह अछि। नवपुर गामक तिनू टोलमे सामाजिक संचालन लेल साबिके जमाना सँ स्थापित मान्यतानुसारे तीनू टोल केर पृथक- पृथक मरड़ कायम छलैक। दक्षिण टोलके मरड़ किशन जी के करतुत विरुद्ध उत्तर टोलके मरड़ आ मध्य टोलके भलचर मड़रके आचरण समाजमे विपरीत छै। बिचला टोलके मरड़क खेत सँ दलित समाजके एक सीयान छौरी उखियार खाय ले एक छरिया शीलतोरू गमि तोरि भुख मिटबैत रहय, से ओकरा एसगर देखि पोनै पर धांय सटका खींचैत छै। बिचला टोलके मरड़'के हरबाहा भुल्ला खबाश पर सब तरहेँ शोषण- दोहण करैक नियत ओकर उजागर भेलैक हेन। ताहिठाम ओकरा बेरपरक मदैतगार साबित होइत किशन मरड़ ठाढ भऽ बेटीके वियाह'क सब तत्कालीन संकट दूर करैत समर्थ भेलैक। जहनकि भुल्ला'क बेटी फूल'क वियाह लेल गच्छल सहायता ओकर मालिक समय पर नै केलकै। आ ओकरा बेटी उपर कुत्सित भाव सेहो राखै। उत्तर टोलक मरोड़ सँ मिलीभगत कय वरके बाप छठूबाबू केँ धरि जबुरिया सिखा- बुध्दि करैत छै,जे एक भरि सोना ,लालइमली साल आ १० हजार टाका नगद बिनु लेने सिनुरदान नै हुअ दियौक। दुल्हाक पिता सँ अराकेँ तीलक चुकबैत छै। उ दूनू मरड़ जतय लोकक बकरी-खस्सी चोरा लैक,माइरपिट करय आ आनों गाम हंसेरीमे लुटय जाइक, गरीब लोककेँ चन् तरहेँ सताबैक ततय किशन मरड़ गामक मान प्रतिष्ठा पर बट्टा नै लाग' दैथ। परसामा गामके हरिदेव किशन मरड़के मित्र धरि समय पर मदैतमे आगू आयल रहथि। देखते रहि गेल से दूनू मड़रके चारू नेत्र पालकी (महफ्फा)। बेटी विदाई काल जे लाउडस्पीकर सँ गीत .. . "धीरे-धीरे चलू रे कहारा - सूरुज डूबे रहे नदिया।" ई पाँति एहि पोथीक आनो पाठमे श्री मंडलजी दोहरौने छथि। सन् १९६५ सँ पूर्व खवाश कहाबैत लोकक धियापुताके ई सरनेम (टाईटिल) शपथपत्र अनुसारे मिथिला सँ हंटि गेलासन्ता ई प्रयोग इतिहास बोध करौने धरि छैक। पाँचम कथा - भाग्य विधाता छी,एहिमे कथाकार मंडल जी ग्राम्य अंचलके धनीक वर्गक हिकारत भावके प्रदर्शित कयलाह अछि। मुदा सामंत शव्द आधुनिक समाजमे नहिं चलैत छैक। भवनाथजी सन तीन व्यक्ति'क परिवारक प्रति मदनपुरक समंगगर परिवार सब हीन-भावना रखैत छैक। ईमानदार रहैत ओकरा बेइमान कहल जायक, काबिल -बुधियार रहलोपरान्त बुड़ि आ ढहलेल कहि तिरष्कृत कयल जाए। भवनाथजी'क बेटाके तुरिया वयक्रमके एक सामन्त हुनका मरूआ खेतमे अजरा जवर्दस्ती महीस चराबैत देखाईत छैक। मनो कयलापर ओ हुनका माथेपर एक पेना मारैत बजैछ- तों हमरा महिसबार कहबेँ! भवनाथजीक पत्नी समक्ष अबैत छथिन ; हुनको दू- तीन पेना सटाकऽऽऽ...... तराक ऽऽऽ खींचैत छैक। दूनू प्राणीके पटाकऽऽऽ बूहोस मरूआ ढेर जकां पड़ल देखि गस्ती बाला पुलिस जीप गाड़ीमे उठा अस्पताल ल' जाइछ। इलाजक वाद मीसपिटरके व्यानमे बतेलखिन तँ ओ सब पकड़ाकेँ हाजत जाइछ। पैरवी संग छुटैत फेरो थकुचाएल साँपसन कनाइर ओकरा पर राखय साम्यवादी सोचके लोकसभा। भवनाथजीक बी,एससी पास बेटा मोहन 'मधु' गामक राजनीति सँ अलग रहि बिहार लोक सेवा आयोग'क पीटी. कयने रहैक मुदा मेन्सक तैयारी पटना शहरमे करैत छैक। माय-बाबू गहना-गुड़िया सब बोहा आर्थिक आरो ओरियान लेल अपन घर सेहो बन्हकी लगाकय बेटाक पढौनीमे सहायक रहैत छथि। मायके द्वारा भनक लगला सँ बीडीओ बनय बाला प्रतियोगगिक मोन विचलित होइत छैक। होटलक खेनाई खाइतघरि किछु लोकक गप्प अकानैत ओ सहयोग लेमय गजेन्द्र सेठक ओहिठाम जुमैत छैक। चन्दनपुर मोहल्लामे मित्तल निवासपर स्वयं सेठजी बातचीत पक्का कय एगारह हजार टाकाक ठीकामे लोहा लक्कर आ गीटिकेँ उठेबाक आ शरण स्थलक गलीमे सैंतबाक रहैक,से टीनमे भरि-भरि हार्डवर्कमे अपना तन्दरूस्तीक हुबा सँ काजमे लागि जाइछ। मोहनके परिश्रम आ ईमनदारी सँ सेठजी बाप-बेटी प्रभावित होईछ। मोहनी सेठजीक बेटी बीए इन्टरनेशनल पालिटिकल साइंस आनर्सक परीक्षा द'कें विलायत सँ आयले रहैछ। ऐ युवक श्रमिक केँ जलखै करबैतकाल आपसमे शिष्टाचार वार्ता सेहो होई छैक। सेठजी ४० कोटरिक कोठामे विधुर जीवन बितबैत शहरके नामी कारोबारी आ ४ कारखानाके मालिक रहथि। से स्वयं बेराम रहय लागल रहला सँ बेटी बियाहक चिन्ता मोनमे आबैन। बेटी सं आ मोहन सँ फराक-फराक विचार लैत अपन निर्णयानुसार हाथ धरौलनि तँ मोहन हुनका संवेदीत भऽ कहैत छैन- "अहीं हमर भाग्य विधाता छी।" कथाकेँ प्रेरक बनाबयमे धरि 'वगवार' उपन्यास नायिकाके रातिमे पढैत देखेबाक यथेष्ट चेष्टा कयलन्हि अछि। छठम पाठ- सागक महिमा दीर्घ कथा छी। ई कथा २८ पृष्ठ म समाएल छैक,जे केन्द्रीय कथा - एवमस्त 'क पृष्ठ सं आध दर्जन बेसी पन्नामे य। एहि कथामे सागके सम्पूर्ण इतिहास पाठक बूझि समैझ सकैत छी। साग कतेक गुणकारी आ कोना सागपातमे केहन गुण छैक,तकर विशद् चर्चा ऐ पाठमे कथाकार रामेश्वर बाबू कयलाह अछि। सागक उत्पादक रूपेँ वादमे तरकारी खेती देखाएल गेल जे बजारमे बेचि धन उपार्जन सँ बेटाकेँ बाहर पढबै छैक। कथाक आरम्भ बोझिल रहला सँ ' प्रथमे ग्रासे मच्छिका पात्रे " कहि सकैत छी। संगहि दूनू बहिनमे छियैन, देतहीन, लेतहिन शव्द मिथिला'क कोनू गाममे दू सहोदर बहीन बीच कथमपि नहिं बाजल जाइत छैक। एहन शव्दक टोनके' कुकुर मांर पिबैत छथिन' सन वाक्य अटपटा लगैत छैक ।प्राय: सबटा पाठमे मुद्रण त्रूटि सेहो अछि,जे पढि समान्य पाठककेँ खिस्सा सँ भटका दैत छैक। सुधा - रतन दूनू प्राणी पथलतोर श्रमके बलेँ एकमेव पुत्र शंकरकेँ नालन्दामे डाकदरी पढ़ाकय समाजमे कृतिमान स्थापित करैत छैक। ओना पढौनीमे शंकरके मावशी परोक्षरूपे सहायता केलीह अछि। आ हुनके सुझेलापर शंकर अपना डाक्दर मित्र आनन्द 'क सहयोग सँ बसुआरामे " सागेश्वर अस्पताल " बनाकय दीन-दुखियाक सफल उपचार करैत छैक। पढल- लिखल प्रायः सब क्षेत्रके यशस्वी मेधाक पलायन शहर आ विदेश धरि होइए, ताहिठाम कथाकार शंकर के माध्यम सँ एक नीक संदेश कथामे देलाह हेन,जे देहाती क्षेत्रमे अस्पताल 'क स्थापना कयल गेल छैक। पाठ ७मे क्षणमे छनाक भेल लघुकथा एक एहन निर्धन विधवाक विषयमजे अछि जे अपन बपटुअर ४ बरखक नेनाक पालन- पोषण अपन चन्द्रपुर गाममे आनक घरेलू काज करैत मसोमाती जीवन बितबैत छैक। पारिवारिक उन्नतिक खिस्सा एहिमे कहल गेल छैक। ओ टेल्हू हिरबाके इसकूलो पठबैत य,मुदा छौंड़ा पढलकै नहिं। धरि बेदरे सँ गमैया लुरि सीख काज करैत समरथो भऽ जाइत छैक। ओकर माय खजनी अपना बेटाक बियाह कराबैत छै एक मयटुगर गुणबती कन्या सँ। पूतौह डेबैत ओई सिध्दी कनियां केर काजुल आ व्यवहारिक पक्ष मजगूत पबैत छथिन। हीरबा अधिक उपार्जन लेल पलायन कऽ मोरंग चलि जाई छैक। ओतय सँ ओ कनियाँके चिट्ठी पठबैत छै जे एक बेंगबा नवजुबक आबि भाउज हाथमे देलक। अछि। ओहि तत्कालीन समय संवाद केर माध्यम पत्रे होईक। कनियाँ केँ श्रृंगार पेटार करैत सजैत- धजैत देखि सासु अचरजमे पड़ैत प्रश्न करैत छैक। तँ केम्हरो सँ ओ जाउथ बेंगबा आबि चिठ्ठी केर खेरहा कहैत छैक काकी सँ। कनियाकेँ खोपरी सँ परिवर्तित कोठरी म बाकसके चाभी नहिं देखाईत रहने ओन्ही -पथारी दैतकाल दियोर टोइन दैछ- "क्षणमे छनाक भेल ।" ग्रामोफोन पर गीत बाजय लगलैक- क्षणमे छनाक भेल दाय गेल; गेल पेंटिके कुन्जी हेराय गे...। नियत समय पर नैकी कन्या बियौहति साड़ी आ गहना धराऊं सँ बहार कय पहिरैक मनसुवा मोनमे नियारैत रहैक। पाठ ८ चकबिदोर दू मित्रक' समर्पणके खिस्सा थीक। एहि कथाक माध्यम स्कूलक संगीके जीवनपर्यंत सामाजिक भेदभाव'क विरूद्ध अश्पृश्यता निवारण केर संदेश पसारबाक सफल चेष्टा कयल गेल छैक। कुबेर नामक दूगोट छात्र मल्लिकपुर कस्वामे रहैत छै। ओ लोकनि अपना- अपना टोल सँ लोअर प्राईमरी पासकय बैरिया ही मध्य विद्यालयमे नामांकित होईछ। वर्गक उपस्थिति घंटीमे एक छात्र कुबेर ' ए' तँ दोसर कुबेर " बी" नामे चर्चित भऽ जाइछ। कुबेर ' ए' मध्यवृत्त परिवार सँ तँ कुबेर "बी" निठाहे गरीब घरक रहैक। दूनू चटियामू नीक मैत्रीभाव निमहलैक। स्कूलक एके ब्रींचपर संग -संग बैस पढय-लिखय,ऐ तरहेँ दिनचर्या सँ सबहक नजैरमे आकर्षणक केन्द्र बुझाय। टीपीनकाल दूनू एक दोसरक खेनाई खाई,पनिचला जेकां। मुदा समाजक नजैरमे कुबेर 'बी' अछूत परिवार सँ मानल- जानल जाइत रहैक। सामाजिक व्यवस्था अनुसारे घर आंगनमे छूआछूत घृणा प्रथा रूपेँ पसरल रहैक। दूनू छात्र संविधान द्वारा स्वीकृत राष्ट्रीय लक्ष्य - समाजवाद अन्य दिश डेंग बढौने रहैक। गामक मुख्य पूरुख आ मान्यजन केर फरमान जारी होयते रघुनी जी अपन ५ बिगहा खेत में सँ तीन बिगहा बेचकय भोज देलकै। तैयो ओसरा पर बैसाकय खुएबा सँ नै बरजलै। रघुनी जी दुखित पड़तहि हुनक बेटा जे मैट्रिक आ इन्टर कोने तरहेँ पास केने रहैछ,से कैंचा कमाबय शहर जाए दालि फैक्टरीमे काज करैत छैक। ओकर मित्र नीक लव्धांक सँ मैट्रिक आ पटना जाए विज्ञान विषयमे अस्नातक करैत प्रतियोगी परीक्षा द'कें हाकीम भऽ जाईछ। दाइल कारखानामे बोरा उघैत कुबेर"ए" खसि पड़ैत छैक,जाहि सँ माथे फुटि गेने शोणित बहुत बहि जाइछ। राहगीर ओ दृश्य देखि वाट बदलि लैत छैक। अधमिरीत हालमे ओहि बाटे इन्दौरके जिला पदाधिकारी'क नेमप्लेट लागल गाड़ी बहराइत ओतय ठमकैत छै आ बेहोश घायल मरीजके होस्पीटल ईलाज करबय जाईछ। डॉक्टर जाँचमे ओ पोजेटीव खून चढाबय लेल कहैत छै जे कलक्टर साहेब स्वंय दैछ आ अपने रक्त अल्पताक शिकार भऽ उठैछ। ओहि ठाम परिस्थिति समान्य भेलासन्ता दूनू मित्रगण बीच जानपहिचान होइत छन्हि। ऐ तरहें कृष्ण सुदामा सन मिलन देखि सब चकित होईछ। हुनका माय- बाबू दुआरिधरि ओहि गाड़ी सं पहुंच सब केओ आशिष प्राप्त करैत देखाएल हेन। सब वृतांत बुझि रघुनीजीक सहानुभूति सँ चकविदोर लगैत सब गछत जे सुखान्त कथा एक नव संदेश संचार केलक अछि। एवमस्त आखरि पाठ ऐ पोथी 'क केन्द्रीय कथा छी जे एक गुरूजीक सदैत कृपा कयला सँ अधिगम स्तर सँ नीचाके छात्रकेँ पराकाष्ठा धरि पुंगेलनि अछि। प्रेमपुर गाममे डेनमार्क जेकाँ दुधक नदि बहय। ओतय दूध- दही, अखराहा कुश्ती, राजनीतिक पक्ष- विपक्ष दलक समर्थक आ हिन्नू- मुसलमान आवादिक दोस्ती सब रहैछ। पढल- लिखल लोकमे बीडीओ, एसडीओ, इंजिनियर -डाकदर , प्रोफेसर सं लऽ कऽ फोरग्रेड सं फस्टग्रेड धरिकेँ सरकारी नोकरीमे ग्रामीण रहैछ। से एहन सुन्दर सन गामकेँ कोसी 'क विनाश लीला आ भुतही बलान नदीके प्रलंयकारी भीषण वाढ़ि त्रस्त कयने रहैक। सन् १९८७ आ २००४ केर बाढि त्रासदी सँ पैघ-पैघ हसामी डोलि गेलैक। गामक स्मृतिमे आब पोखैर ,ईनार , नलकूप आ तीन फसिला खेत ,पान माछ मखान आम कलमके चेन्हासी धरि पतनुकान लेने छै। मधुबनी जिलाक लोक वाढ़ि सह जीवन केर मातहत अंगेज लेने रहय आ मगन भ' निशन्न कण्ठ सँ गाबि रहल छलैथ-: उमरल छै कोसी आ बिगरल छै कमला उनटल छै बिहुल बलान गे माय जिनगी के नै छै ठेकान ........ वाढ़िक दुष्परिणाम सँ मातबर ओ मड़रशारि सब ढहि ढनमनाके ,सय बिगहा जोतक मालिक केर पलिवारमे गोटेक ५ बिघा खेतीमे समटा गेल रहैक। कथाकार एहि परिस्थितिक दिग्दर्शन पाठक बीच संस्कृतके श्लोक -: विभुक्षित: किम न करोति पापम क्षीणा नरा निश्करूणा भवति आदि सँ ठाठ-ठाम दैत पाठकेँ रोचक बनेबाक परियास कयलाह अछि। टुटल घरक करपरदार रूपें एक पात्र काशीनाथ बाबू छथि। ओ अपन बेटा रविके पढ़ाया लेल झखैत छैक। सातमा वर्गमे पढय छै, अभिप्राय ई जे कहुना घीच घाइचके मैट्रिक पास भ' जाय। ज्ञानेश्वर गुरूजी लग सँ पुर्ण आश्वासन भेटैछ जे एवमस्त! आ फर्स्ट डिवीजन सँ पास करय लेल अजस्र ऊर्जा झौंकैत साबित करैत अभिभावक आ छात्र दूनेके हृदयमे जगह जमेला हेन। रवि पटना सँ बायलोजी विषय पढि डॉ० बनय चाहैत य। से ओकर छोट भाय कवि एकटा पत्र आनि पारिवारिक खुशी जेठ भाय बावत पसारलक । प्रशन्नता लेल गुरुवर महोदय सँ प्रगतिक चर्चा करैत पुन: पुनः एवमस्त आशिष पाबैत छै। पोथीमे मैथिलीक शव्दके जगह बिदेशज शव्द आ हिन्दी केर प्रयोग भेल छैक से मैथिली भाषा आ साहित्य लेल अधलाह बात छी। २ अहर्निश मैथिली साहित्य सेवक डॉ०तारानंद वियोगी नकारात्मक परिस्थिति सँ उबरय ले साहित्यकार लोकनिक सतत् जोगदान होईत रहल अछि, जाहिकेँ परेख अँखिगर संस्था - समिति कार्य क्षमतानुसारे कोनू लेखक - लेखिकाकेँ मंच सँ पुरस्कृत करैत छैक। ओहि कड़िमे प्रसिद्ध ' शकुन्तला - भुवनेश्वर ' पुरस्कार 'क घोषणा मिथिलांचल सँ बाहर तेलंगाना सँ मुख्य न्यासी आ देसिल बयना ( मैथिली साहित्य मंच - सिकन्दरावाद ) केर मुख्य सम्पादक श्री सी एम् कर्णजी दिश सँ एहिबेर सहरसाक श्री वियोगी जी आ भारती मंडन मैथिली पत्रिका केर सम्पादन सहयोगी श्रीमती सुष्मिता पाठक जीके संयुक्त रुपेँ देबाक चर्चा सँ लेखकीय समाजमे अतिशय प्रशन्नता पसरल हेन। बाबा वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' जीक मैन्टर रूपेँ जगजियार डॉ० तारानंद वियोगी जीक जन्म सन् १९६६ में सहर्षाक नामीगाम महिषीमे भेलनि। हिनका संस्कारमे संस्कृत भाषा ततेक ने गहीरपन सँ व्याप्त छैन जे कोनू ग्रन्थ यथा - " मंजील और कितनी दुर " प्रकाशन सँ पूर्व श्लोकक शुद्धता हिनके सँ पाण्डुलिपि जँचाएल गेल रहैक। श्री वियोगी जीके पहिल मैथिली पोथी ग़ज़ल विधामे ' अपन युद्धक साक्ष्य ' बहराएल रहनि। तारा नन्द बाबूक आनो पोथी सब प्रकाशित भेल छन्हि जे खूब चर्चित भेलनि। यथा- हस्तक्षेप,प्रलय रहस्य, दुनिया घर मेहमान,साखी - धारासायी हेबाक समय (कविता संग्रह), बिटवीन द टू डैम्स,बुध्द का दुख और मेरा; जैसे अंधेरे में चाँद (मैथिली कविताक हिन्दी आ अंग्रेजी मे अनुवाद), अतिक्रमण,छियानत ( कथा संग्रह) , शिलालेख (लघु कथा संग्रह), कर्मधारय,रामकथा आ मैथिली रामायण ' बहुवचन, धूमकेतु, महाप्रकाश, मंडन मिश्र : मिथक आ यथार्थ् (आलोचना) ,जीवन क्या जिया (संस्मरण), युगों का यात्री ( यात्री नागार्जुनक जीवनी) , राजकमल चौधरीक कथाकृति ' एकटा चम्पाकली एकटा विषधर, देसिल बयना ( स्वातंत्र्योत्तर मैथिली कथा) संकलन- सम्पादन । मैथिली भाषा मेँ पोथी हिनक " तुमि चिर सारथी" ९५ पृष्टक नवम्बर १९९९ ई० मे यात्री जीके पहिल बरखीक अवसर पर प्रकाशित भेल रहय, जकर दाम २० टाका छैक। कामाख्या झिंगुर साहित्य परिषद् ,मलाढ़- थरबिट्टा (सुपौल) सँ प्रकाशित ई पोथी बढ़ विशेख छैक,से हमरा पढ़ल अछि। मैथिली रचना जगतमे डॉ० तारा बाबूक संलग्नता कमाल के रहैत छैन,जहनकि ओ शासकीय सेवामे व्यस्त रहैत छथि। सम्प्रति एखन ई परिवहन मंत्री बिहार सरकार केर आप्त सचिव पद पर कार्यरत छथि। यात्रीजी हिंदी क्षेत्रमे नागार्जुन नामे जानल जाइत छलाह। ओ मिथिला सँ बाहरो घुमक्कड़ रहथि। फणीश्वर नाथ रेणु केँ धनरोपनी करैत फोटो सेशनके अवसर हुनकेखेत पर देने छलाह। साम्यवाद लेखक रूपेँ आ बौध भिक्षु सन परिचय हुनक बनल रहनि। त्यागी आचरण केर एहन सिध्द पुरूखक संगति वियोगी जीकें भेटलनि ,जे मैथिली साहित्य आन्दोलन मेँ हिनका स्वत: स्फूर्त देखल जाइत य। नौकड़िपेशा पेशा सँ जुटल समस्त मैथिली सेवीकेँ ओ शनिचरा हस्ताक्षर कहैत रहथि। आओर जतेक शनिचरा हस्ताक्षर रचनाकार छथि वा रहथि से मैथिली साहित्य केर अक्षय भंडार केँ अपना कृति सँ भरलनि। ई संतोखक गप्प जे कृषक - श्रमिक वर्गके भीड़ सँ सेहो बहुत लोक आगू अयलाह जे अपन मैथिली पोथी सँ साहित्य जगतमे एक पैघ चेन्हासीक डांरि पारलनि हेन। यात्री जी अपना अमलदारीमे जाहि नवतुरिया केर बीच कहलनि - हमर पेट जरय लागल तँ मैथिली सँ हिन्दीमे आबि कैंचा कमाय करियै! से सब ओहि समयके नवजुबक तँ आब स्वयं वृद्धावस्थामे बाबा बनल छथि, मुदा अखनके युवावर्ग जे यात्री जीक देखौंश कय मैथिली सँ विमुख भ' हिन्दी झारैत छथि से तँ मातृभाषाक' विकासके पांछा करैवला मानल जाएत। मैथिली आ हिन्दी दूनू भाषामे लिखब एक नव फैशन बुझैत ' यात्री 'क राह बताओल पर चलनिहार कहाबैछ। मैथिली लेल दिनराति काज कयनिहार रचनाकारमे एक श्रेष्ठ नाम श्रद्धेय डॉ० तारानंद वियोगी जीक छन्हि ।हिनक बाबा यात्रीजी संग परिचय प्रगाढ़ करयमे नव तुरिया बीच सूचना संचार 'तुमि चिर सारथी ' माध्यमे बढलनि से हमर मोन गच्छैत य। वियोगी जीक वाक पटुता संभाषण, कतेको सेमीनार मेँ सुस्पष्ट वक्तव्य आ आलेख लेखन ओ समालोचना रुपेँ यशोगान जनमानस बीच बढ़ल छन्हि। हिनक पोथी साहित्य अकादेमी मैथिली बाल साहित्य पुरस्कार -२०१० ' ई भेटल तँ की भेटल' लेल देल गेल रहनि। यात्री - चेतना पुरस्कार -२०१० आ ई- विदेह सम्मान - २०१३ सेहो भेटल छन्हि। सहरसा' के लाल आरो खूब नाम कमाबथि से लालसा रहत। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.परमानन्द लाल कर्ण- तीर्थक्षेत्रक माहात्म्य- ८ (पद्म पुराण उत्तर खंड) परमानन्द लाल कर्ण तीर्थक्षेत्रक माहात्म्य- ८ (पद्म पुराण उत्तर खंड) (गतांक सँ आगु ...) तत्पश्चात् तीर्थ यात्री सप्तधार तीर्थक यात्रा करथि । ओ सव तीर्थ में उत्तम तीर्थ अछि । एहि तीर्थ केर मुनिलोकनि सप्त सारस्वत नाम देलनि अछि । त्रेतायुग में महर्षि मंकि एहि ठाम संकितीर्थक निर्माण केने छलाह । फेर द्वापर में पाण्डव एकरा सप्तधार तीर्थ में प्रवृत्त केने छलाह । भगवान शंकरक जटा सँ निकलैत गंगाजल एहि ठाम सात धारा में प्रकट भेलीह,तें ई सप्तधार कहावैत अछि । सातु लोक में जे गंगाजीक सात रूप सुनल जायत अछि, ओ एहि सप्तधार नाम सँ तीर्थ में अपन पवित्र जल प्रवाहित करैत छथि । सप्तधार तीर्थ में कएल गेल श्राद्ध पितरक तृप्ति प्रदायक होयत अछि ।

देवेश्वरी ! ओहि ठाम सँ ब्रह्मवल्ली नाम सँ महान तीर्थक यात्रा करी । जाहि ठाम साभ्रमती नदीक जल ब्रह्मवल्लीक जल सँ मिलैत अछि, ओ स्थान ब्रह्मतीर्थ कहावैत अछि । एकर महत्त्व प्रयाग सन मानल गेल अछि । ब्रह्माजीक कथन अछि जे ओहि ठाम पिण्डदान करला सँ पितर केर बारह बरख धरि तृप्ति बनल रहैत अछि । विशेषतः ब्रह्मवल्ली मे पिण्डदान गया श्राद्ध सन पुण्य मानल गेल अछि । पुष्कर, गंगानदी आ अमरकण्टक क्षेत्र में गेला सँ जे फल मिलैत अछि, ओ ब्रह्मवल्ली मे विशेषरूप सँ मिलैत अछि । चंद्रग्रहण आ सूर्यग्रहणक काल मे जे केओ दान दैत छथि, ताहि सँ मिलs वाला फल ब्रह्मवल्ली मे स्वतः मिल जायत अछि । ब्रह्मवल्ली मे स्नान कs तुलसीक माला धारण केने भगवान नारायणक स्मरण करैत लोकनि वैकुंठधाम जायत छथि, जे आनंदस्वरूप आ अविनाशी पद अछि । तत्पश्चात् वृषतीर्थ दिस जाय केर चाही, जे खण्डतीर्थ नाम सँ सेहो प्रसिद्ध अछि । पूर्वकाल में गाय एहि ठाम स्नान कs दिव्य गोलोकधाम गेल छल । एहि तीर्थ में निराहार रहि जे केओ गौ माताक लेल पिण्डदान करैत छथि, ओ चौदह इंद्रक आयुपर्यंत सुखी आ अभ्युदशाली होयत छथि । खण्डतीर्थ सँ बेसी कोनो दोसर तीर्थ नहि तs भेल अछि आ नहि होयत । पार्वती ! जे लोकनि एहि ठामक यात्रा करैत छथि , ओ पुण्यक भागी होयत छथि । ओहि ठाम जा के गाय केर पूजन करवाक चाही । तकर बाद वृषभक पूजा कs स्नान करवाक चाही । गौ पूजन सँ लोकनि गोलोक जायत छथि , तहि मे कोनो संदेह नहि अछि । जे केओ ओहि ठाम पाँच टा औराक गाछ लगवैत छथि, ओ एहि लोक में सुख भोगि अंत मे श्रीहरिक धाम जायत छथि ।

तदनंतर संगमेश्वर नाम सँ उत्तम तीर्थक यात्रा करी । ई बड्ड पैघ तीर्थ स्थल अछि । एहि ठाम पुण्यमयी हस्तिमती नदी साभ्रमती नदी सँ मिलैत अछि । ई नदी कौण्डिन्य मुनिक शाप सँ सूखि गेलीह।तत्पश्चात् लोक मे बहिश्चर्या नाम सँ विख्यात भेलीह। ओ त्रिलोक विख्यात तीर्थ परम पावन आ समस्त पापक नाशक अछि । लोकनि एहि तीर्थ मे स्नान आ महेश्वरक दर्शन कs सव पाप सँ मुक्त भs रुद्र लोक जायत छथि । देवी ! जाहि शापक कारण नदीक जल सूखि गेल छल , ओ प्रसंग बतावैत छी , सुनु ! जाहि ठाम परम पावन महानदी साभ्रमती गंगा आ हस्तिमती नदीक संगम भेल छल , ओहि ठाम मुनिवर कौण्डिन्य कठिन तप शुरू केने छलाह । बहुत काल भगवान नारायणक आराधाना करैत छलाह । एक समयक बात अछि दैवयोग सँ अतिवृष्टि भेलाक कारण नदी जल सँ भरि गेल । तहन मुनि कौण्डिन्य एहि स्थान केर परित्याग कs देलनि; मुदा राति में नदीक बाढ़ि सँ बड्ड कष्ट भेलनि । हुनक आश्रम दिव्य शोभा सम्पन्न आ महान छल; मुदा जलक वेग मे फल ,मूल आ पोथी सवटा नदी मे बहि गेल । तखन मुनिश्रेष्ठ कौण्डिन्य नदीक शाप देलनि – ‘तौं कलियुग मे बिना जलक भs जायव ।‘ एहि प्रकार हस्तिमती केर शाप दs विप्रवर कौण्डिन्य सनातन विष्णुधाम चलि गेलाह । अखनो संगमेश्वर नाम सँ तीर्थ मौजूद अछि , जेकर दर्शन कs पापी लोकनि ब्रह्महत्या आदि पाप सँ मुक्त भs जायत छथि । देवेश्वरी ! ओहि ठाम सँ तीर्थ यात्री रुद्रमहालय तीर्थक यात्रा करथि । ई केदारनाथ तीर्थ सन अनुपम अछि । साक्षात् रुद्रदेव एकर निर्माण केलनि अछि । ओहि ठाम श्राद्ध कर्म अवश्य करी; किएक तs ई पितरक पूर्ण तृप्तिक कारण अछि । एहि तीर्थ स्थल पर श्राद्ध करला सँ पितर आ पितामह तृप्त भs रुद्रक परम पावन पद पावैत छथि । जे केओ रुद्रमहालय तीर्थ मे कातिक आ वैशाख मासक पूर्णिमा केर वृषोत्सर्ग करैत छथि, ओ रुद्रक संग आनंदक भागी होयत छथि । केदार तीर्थ मे जलखई करला सँ लोकनि केर पुनर्जन्म नहि होयत अछि ।ओहि ठाम स्नान करला सँ ओ मोक्षक भागी होयत छथि । देवी ! एक समय हम साभ्रमती नाम सँ महागंगाक महत्त्व जानि कैलाश छोड़ि एहि ठाम आयल छलहुँ आ लोक हितक लेल एहि ठाम स्नान आ जलखई कs एकरा परम तीर्थ बना के फेर अपन कैलाश चलि एलहुँ । तखन सँ महालय परम पुण्यमय तीर्थ भs गेल अछि । देवी ! जे केओ कातिक आ वैशाख मासक पूर्णिमा केर एहि ठामक यात्रा करैत छथि , हुनका फेर कखनहु संसार जनित दुःख नहि होयत छैन ।

पार्वती ! आव देवगणक लेल सेहो दुर्लभ उत्तम तीर्थक वर्णन सुनु । ओ खंगतीर्थ नाम सँ विख्यात आ समस्त पापक नाशक अछि । खंगतीर्थ में स्नान कs खंगेश्वर शिवक दर्शन करला सँ लोकनि कखनहु दुर्गति मे पड़ैत छथि आ अन्त मे स्वर्गलोक जायत छथि । जे खंगधारेश्वर महादेवक दर्शन करैत छथि आ कातिक मासक पूर्णिमा केर हुनक विशेष पूजा करैत छथि, हुनका सर्वेश्वर भगवान विश्वनाथ सदिखन एहि पृथ्वी पर सव प्रकारक सुख दैत छथिन; किएक ई मनोवाछित फल दैत छथिन ।

साभ्रमतीक तट पर चित्रांगवदन नाम सँ एकटा तीर्थ स्थल अछि, जे गया सँ सेहो श्रेष्ठ अछि ।एहि शुभकारक तीर्थक अधिष्ठातृ देवता मालार्क नाम सँ सूर्य छथि । जिनका कोढ़ि भs गेल अछि, ओ जौं एहि तीर्थ मे जायत छथि तहन भगवान मालार्क हुनका कोढ़ि मुक्त कs दैत छथिन । जे महिला शास्त्रोकत विधि सँ ओहि ठाम अभिषेक करैत छथिन, ओ मृतवत्सा व बंध्या भेलाक वादहुँ पुत्रवती भs जायत छथि । एहि तीर्थ स्थल पर रवि कें जौं स्नान, संध्या, जप ,होम, स्वाध्याय आ देवपूजन कएल जाय तs ओ अक्षय भs जायत अछि । ओहि ठाम सूर्यव्रत करवाक चाही । एना करला सँ लोकनि एहि लोक मे सुख भोगि सुर्यलोक जायत छथि । जे केओ एहि तीर्थ स्थल पर जा के विशेषरूप सँ उपवास करैत अछि आ इंद्रिक वश में कs भगवान मालार्कक पूजा करैत छथि, ओ निश्चय मोक्षक भागी होयत छथि ।

मालार्क तीर्थ स्थलक उत्तरबारी कात चंदनेश्वर तीर्थ अछि। ओ उत्तम स्थान सदिखन चंदनक सुगंध सँ सुवासित रहैत अछि । ओहि ठाम स्नान ,जलपान आ पितृतर्पण करला सँ लोकनि कखनहु नरक में नहि जायत छथि आ हुनका रुद्रलोक मे स्थान मिलैत छैन । ओहि ठाम जगतक कल्याणकारी विश्वक स्वामी भगवान चंदनेश्वरक दर्शन कs रुद्रलोकक इच्छित लोकनि यथाशक्ति हुनक पूजन करथि । एहि तीर्थ स्थल पर कल्याणकारी साक्षात् परमात्मा श्रीविष्णु नित्य निवास करैत छथिन ।

ओहि ठाम सँ जम्बूतीर्थ मे स्नान करs क लेल जाय केर चाही । कलियुग मे ई तीर्थ मानुषक लेल स्वर्गक सीढी सन अछि । पूर्वकाल मे भगवान जामबवान एहि ठाम दशांग पर्वत पर अपना नाम सँ एक टा शिवलिंगक स्थापना केने छलथि । एहि ठाम स्नान कs श्रीराम आ लक्ष्मणक स्मरण करी आ जाम्बावतेश्वर शिव केर नत मस्तक भेला पर लोकनि रुद्रलोक मे प्रतिष्ठित होयत छथि । जाहि जाहि ठाम श्रीरामचंद्रजीक स्मरण कएल जायत अछि ओहि ठाम समस्त चराचर जगत् मे भव बंधन सँ मुक्ति देखल जायत अछि । हमरे राम बुझी आ श्रीराम रुद्र छथि - ई जानि कतहुँ भेद दृष्टि नहि राखी । जे मने-मन ‘राम ! राम ! राम’ एना जप करैत छथि , हुनक समस्त मनोरथ सव युग मे सिद्ध भेल अछि । देवी ! हम सदिखन श्रीरामचंद्रजीक स्मरण करैत छी ।श्रीरामचंद्रजीक नामक श्रवण करला सँ कखनहु भव - बंधन मे लोकनि नहि पड़ैत अछि । पार्वती ! हम काशी मे रहि सवदिन भक्तिभाव सँ कमल नयन श्री रघुनाथजीक निरंतर स्मरण करैत छलहुँ । पूर्वकाल मे जाम्बवान् परम पावन श्रीरामचंद्रजीक स्मरण कs जम्बूतीर्थ मे जाम्बवत नाम सँ प्रसिद्ध शिवलिंग स्थापित केने छलाह । ओहि ठाम स्नान,देवपूजन आ भोजन करला सँ लोकनि शिवलोक जायत छथि । ओहि ठाम सँ इंद्रग्राम नाम सँ उत्तम तीर्थ स्थलक यात्रा करी , जाहि ठाम पूर्वकाल मे स्नान कs इंद्र घोरपाप सँ मुक्त भेल छलाह ।

श्रीपार्वतीजी पूछलखिन - भगवन् ! इंद्र केर कोन कर्मक घोर पाप लागल छल आ ओ कोना पापरहित भेलाह । एहि प्रसंग केर विस्तार सँ सुनाउ ।

श्रीमहादेवजी कहलखिन - देवी ! पूर्वकाल मे देवराज इंद्र आ असुरक स्वामी नमुचि आपस मे प्रतिज्ञा केलनि जे हम दूनु गोटे एक-दोसरा केर बिना कोनो शस्त्रक सहायताक वध करव; मुदा इंद्र आकाशवाणीक कथनानुसार जलक फेन सँ नमुचिक हत्या कs देलखिन । तहन इंद्र केर ब्रह्महत्या लागि गेलनि । ओ गुरु सँ अपन पापक शांतिक उपाय पूछलखिन। फेर वृहस्पतिजीक आज्ञानुसार साभ्रमतीक उत्तरबारी घाट पर एलाह आ ओहि ठाम स्नान केलथि । एहि सँ हुनक सव पाप तत्काल नष्ट भs गेल । शरीर चान सँ भs गेल , तहन ओ ओहि ठाम धवलेश्वर नाम सँ शिवक स्थापना केलनि ।

ओ शिवलिंग एहि पृथ्वी पर इंद्रक नाम सँ प्रसिद्ध भेल । ओहि ठाम पूर्णिमा, अमावस, संक्रांति आ गहनक दिन श्राद्ध करला पर पितर केर बारह बरख धरि तृप्ति बनल रहैत अछि । जे केओ धवलेश्वर लग जा केर बाभन भोजन करावैत छथि, हुनका एक टा बाभन भोजन करेला पर सहस्र बाभन भोजनक फल मिलैत अछि । जे ब्राह्मण एहि ठाम आवि रुद्रमंत्रक जाप करैत छथि , हुनका भगवान् शंकरक प्रसाद सँ कोटिगुना फल मिलैत छैंन ।जे केओ एहि तीर्थ स्थल पर आवि उपवास करैत छथि, हुनक समस्त कामनाक पूर्ति निसंदेह भs जायत छैन । जे केओ बेलक पात लावि भगवान् धवलेश्वरक पूजा करैत छथि, ओ एहि पृथ्वी पर धर्म, अर्थ, आ काम तीनु पावि लैत छथि । बिशेषतः सोम दिन जे केओ ओहि ठामक यात्रा करैत छथि, हुनका भगवान् धवलेश्वर सव रोग दुःखक निवारण करैत छथिन, जे सव रवि केर हुनक विशेष पूजा करैत छथिन, हुनक महिमाक ज्ञान हमरा कखनहु नहि भेल । जे केओ दुव, आकक फूल, करवीरक फूल आ पात सँ श्रीधवलेश्वरक पूजन करैत छथि , ओ पुण्यक भागी होयत छथि । जे केओ उज्जर आकक फूल लावि भगवान् धवलेश्वरक पूजा करैत छथि, हुनका मनोवांछित फल मिलैत छैन । सतयुग मे भगवान् नीलकंठ नाम सँ प्रसिद्ध भs सबहक कल्याण करैत छथिन । त्रेतायुग मे भगवान् हर नाम सँ विख्यात भेलाह , द्वापर मे हुनक संज्ञा शर्व छल आ कलियुग मे भगवान् धवलेश्वर नाम सँ प्रसिद्ध भेलथि । जे श्रेष्ठ लोकनि एहि ठाम स्नान आ दान करैत छथि, ओ धर्म, अर्थ आ कामक उपभोग कs शिवधाम जायत छथि । चंद्रग्रहण, सूर्यग्रहण आ बाबूजीक बरखी पर श्राद्ध करला सँ जे फल मिलैत अछि, ओ धवलेश्वर तीर्थ में अनायास मिल जायत अछि । धवलेश्वर मे काल सँ प्रेरित जिनकर प्राण पखेरू उड़ि जायत अछि, जखन धरि सूरज चान रहत तखन धरि ओ शिवधाम मे निवास करताह ।

श्रीमहादेवजी आगु कहैत छथिन - साभ्रमतीक तट पर बालार्क नाम सँ श्रेष्ठ तीर्थ स्थल अछि, जे भोग आ मोक्षदायी अछि । जे केओ बालार्क तीर्थ में स्नान कs तीन राति रुकि भोर मे बाल सूर्यक दर्शन करैत छथि,ओ निश्चय सूर्यलोक जायत छथि । रवि दिन , संक्रांति, सप्तमी तिथि,विषुव योग, अयनक शुरुआती दिन, चंद्रग्रहण आ सूर्यग्रहण केर स्नान कs देव,पितर आ पितामहक तर्पण करी । फेर ब्राह्मण केर धेनु आ गुड़-भातक दान करी । तत्पश्चात् कनेर आ जापक फूल सँ बाल सूर्यक पूजन करी । जे केओ एना करैत छथि , ओ सुर्यलोक मे निवास करैत छथि ।जे केओ एहि ठान लाल रंगक दुधारू गाय आ जवान एक टा बरदक दान करैत अछि, ओ यज्ञक फल पावैत छथि आ कखनहु नरकगामी नहि होयत छथि । एतवे नहि, रोगी रोग सँ आ कैदी बंधन मुक्त भs जायत अछि । एहि तीर्थ में पिण्डदान करला सँ पितामहगण पूर्ण तृप्त भs जायत छथि ।

पूर्वकालक बात अछि , एक टा बुढ महिष वृद्धावस्थाक कारण जर्जर भs गेल छल , जे बोझा नहि उठा सकैत छल । ई देखि व्यापारी ओकरा रास्ता मे त्यागि देलक गर्मीक महीना छल, ओ साभ्रमतीक तट पर पानी पीवाक इच्छा सँ आयल। दैववश ओ महिष कादो मे फँसि गेल आ ओ ओहि ठाम मरि गेल । नदीक पवित्र जल में ओकर हाड़ बहि गेल । एकर प्रभाव सँ ओ महिष कान्यकुब्ज देशक राजकुमार भेल , पैघ भेला पर राजसिंहासन पर बैसल। ओकरा पूर्वजन्मक स्मरण बनल छल । ओ अपन पूर्व बात केर यादि कs एहि तीर्थक प्रभाव सँ अभिभूत भs , उक्त तीर्थ स्थल पर आवि स्नान कs दान देलनि संगही संग ओहि ठाम देवाधिदेव महेश्वरक स्थापना केलनि ।ओहि ठाम स्नान कs महिषेश्वरक पूजन आ बाल सूर्यक दर्शन कs लोकनि सव पाप सँ मुक्त भs जायत अछि । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। पद्य ३.१.राम शंकर झा "मैथिल"- कोल्हूक बरद/ मुदा आब ३.२.प्रमोद झा 'गोकुल'- आगाँ बढ़ल जा रहल छी ३.३.जगदानन्द झा 'मनु'- बीसटा हाइकू ३.४.प्रणव कुमार झा- एक कप चाह ३.१.राम शंकर झा "मैथिल"- कोल्हूक बरद/ मुदा आब राम शंकर झा "मैथिल" कोल्हूक बरद/ मुदा आब १ कोल्हूक बरद कोल्हूक कें बरद बनि घूमि रहल छी जिनगी कें पहिया घसा रहल छी..! कोल्हूक बरद बनि......! कतह जायब..? कोना जायब...? कियाक जायब.? कि लअ जायब सब देखा- देखी मे भागि रहल अछी पराअ रहल अछी कोल्हूक बरद बनि....! सब कें बुझल छैय सबकें देखल छैय सब कें रमल छैय सबकें गमल छैय किछु आंगा किछु बीच मे किछु पहिने किछु संजोगने किछु समाहरने नुकाबैत कोल्हूक कें बरद बनि....! एहि बारि ओहि बारि ई खेत उ खेत जोईत रहल छी जोतबा रहल छी एहि गाम ओहि गाम ई नगर उ नगर छीछीआ रहल छी बौआह रहल छी कियाअ कथिलाअ ककरालाअ..? ने हिनका बुझल ने हुनका बुझल सब एक दोसर कें दाबैत पिचैत कोल्हूक कें बरद बनि.....! मरदक मोंछ बनि ऐंठि रहल छी ग़ुमान लेल गामा पहलबान लेल खरीदा रहल किताअ पअर किताअ ठोकबा रहल छी कोठी पअर कोठी नहिं साँझ नहिं भोर नहिं भिंसर नहिं कलौउ नहिं बेरहट नहिं राति बताह भेल भकुआ रहल छी कोल्हूक कें बरद बनि....! एहि ठाम ओहि ठाम सुनि रहल छी आउ ठाम आउ ठाम सुनबा रहल छी सब घर-घरान गाबि रहल अछी सब सर -समांग गबबा रहल अछी मुदा कें सुनत किनका सुनत..? अपनहिं उल्लू सोझ करबाक लेल ओंघाल अपसिंआत ओझराल छी कोल्हूक कें बरद बनि....! ज्यों जिनगीक यथार्थ मर्म बुझि किछु दैत रहि किछु दियाबैत रहि हंसी-हंसा बाजि हँसाबैत रहि हंसी-ठठाक बथान मचान धिया-पुता सङ्ग बनाबैत रहि मुदा जानि नहिं..... कोल्हूक कें बरद बनि घूमि रहल छी जिनगी कें पहिया घसा रहल छी...!! कोल्हूक कें बरद बनि घूमि रहल छी २ मुदा आब झारल झमारल पड़ल टुकुर टुकुर ताकैत आकाश दिस कखनो चाअर कें निहारैत आँखि खुलैत बन होईत पड़ल छी मृत्युश्या..! मुदा आब..? कखनो बुझना जाईत घिरनी जंका घर नाचैया कखनो बुझना जाईत बिजलौका लौकि रहल आ हअमरा छाति गिरल पड़ल छी मृत्युश्या...! मुदा आब..? फुदन किछु कहि रहल मरनी माअ फटकि रहल मकैईक घुन आ सुराआ तखने बुझना गेल छोटका बड़का गाछ वृछ पूछी रहल हे यौ बाउ हअमरा आ हअमर धिया पुता काईट काईट गाय महिंस कें पेटभाड़ा भोज करबैत रहलूँह चूल्हा मे झोंकि झोंक जरेलहूँ घर बथान बनलहूँ मुदा आब...? पड़ल छी मृत्युश्या...! तखने बुझना गेल भरल पईन पोखैर ईनार सेहो पूछी रहल हे यौ बाउ अपन प्यास बुझेलहूँ घर घरैनक प्यास बुझेलहूँ चास बॉस खेत पअटेलहूँ पड़ल छी मृत्युश्या...! मुदा आब..? तखने बुझना गेल चुट्टी पिपरी कीड़ा मकोड़ा सेहो पूछी रहल हे यौ बाउ अपन पेट भरबाक लेल घर घरैन समांगक लेल खेत पथार जोईति आईर सिमान ढ़ाहैत बड़का बड़का ढ़ेला फोरि हअमर सबटा नेना भुटका अपसियांत बमकैत कोदाईरक पसाठ मार लहूँ मुदा आब....? अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.प्रमोद झा 'गोकुल'- आगाँ बढ़ल जा रहल छी प्रमोद झा 'गोकुल' आगाँ बढ़ल जारहल छी

ककरा कहू ? के पतियायत ?? पतिया लिखि अपने हाथे पतिया कटै छी । दिन राति झटैछी माथ अपन भाउ ने क्यो दियय तैयो भाव तकैछी । उधिया रहल मन मे हठात बात वसात झिज्झुर कोना कहि कहि ओ कहय पू झात बन्न बकार मुहँ मे किछु नहिं कहि पबै छी अपने हाथे अपन हाथ मचोड़ै छी । आगाँ सजल चिन्ताक तप्त पथ निर्धूम अनल करय कह कह जड़य तन सदिखन धह धह इस्स !तक नै कहि पबै छी आँखि मूनि आगाँ बढ़ल जा रहल छी ।

-प्रमोद झा 'गोकुल', दीप,मधुवनी (विहार), फोन-9871779851 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.जगदानन्द झा 'मनु'- बीसटा हाइकू जगदानन्द झा 'मनु' बीसटा हाइकू

१. अहाँ धनिक गरीबो मनुखे छै ई बुझि लिअ

२. सोना महग मनुख सस्ता किए भेल जाइ छै

३. सभ दिनसँ एनाहिते भेलैए सज्जन संगे

४. माटिक देह तकर घमंड की आगिमे जेतै

५. जरैत देह धधकैत गाछीमे घमंड संगे

६. जीवन भरि जेकरा पोसलहुँ देलक आगि

७. माहुर चिखि दुनियामे हमहुँ पेट भरलौं

८. जीबैत देह मरल आत्मा संगे लोक घुमैए

९. अप्पन आन सभ मतलबकेँ धरतीपर

१०. नअ महीना जे पेटमे रहल बिसरि गेलै

११. मुइलापर हिस्सा लेबै खातिर अप्पन एलै

१२. अभाबे गेला भोजक लिस्ट आइ पैघ बनै छै

१३. बड़ भोगलौं झुग्गी बस्ती दिल्लीक नरक भोग

१४. दर्शन केलौं भोरका सूरुजक प्रथमे बेर

१५. हमरो मोन कुंभ जाइकेँ छल कर्मे बन्हेलौं

१६. सगरो मेला बहुते भीड़ भाड़ माँ असगरे

१७. घर माँछ तँ बाहरो माँछे माँछ नीक जतरा

१८. कपार तेज तँ सुखलोमे धान नै तँ जीयान

१९. वनवासमे सियाराम लखन भागक खेल

२०. कपार ठीक पुरुषार्थ उपर सभदिनसँ

जगदानन्द झा 'मन', मोबाइल न० ९२१२४ ६१००६ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.४.प्रणव कुमार झा- एक कप चाह प्रणव कुमार झा एक कप चाह एक कप चाह अहाँक हाथ केर जिनगी मे नव ताजगी जगा देलक एक कप चाह अहाँक हाथ केर हमर ठोरहक पुरना प्यास मेटा देलक । हृदयक कोठली मे पसरल छल गुज अन्हरिया अहाँक नैनक जादू से ओ क्षण मे जगमगा उठल अहाँक मुख पर देखायल जे चंद्रमा सन मुस्की शोणितक कण मे बिजुरि बनि जगमगा उठल। एक कप चाह अहाँक हाथ केर जिनगी मे नव ताजगी जगा देलक। सखी! अहाँक हमरा सं आँखि चोरेनाइ लजा क हमरा से एना रोज नुकेनाइ हृदय मे कतेको चाकू-छुरी चला देलक एक कप चाह अहाँक हाथ केर जिनगी मे नव ताजगी जगा देलक। चाहक प्याली में बसल अहाँक एहसास, घूँट- घूँट में भफाइत अछि हमर जज़्बात, सौंधगर भाप में घोराइल अहिंक मिठास, गाछ तर भोरे खसल जेना महुआ के बास। चाहक संग नै जानि की की पिया देलहु ! एक कप चाह अहाँक हाथ केर जिनगी मे नव ताजगी जगा देलक। अहाँक उँगरीक अरहुल सन स्पर्श, कप पकड़ाबैत ओ मनोरम संदर्श, भऽ गेल जेना हृदय पर अंकित, स्थिर मोनक स्पंदन बढ़ा देलक। एक कप चाह अहाँक हाथ केर जिनगी मे नव ताजगी जगा देलक। अहाँक ठोरह पर जखन चाहक कप सटल, ओ सिहरन, ओ गर्मी, ओ एहसास अटल, काश हमहु ओहि कप सन बनि जाय, अहाँक ठोरह से छू के, अहीं मे समाय। नैन मिलल त अहाँ फेर से लजा गेलहु एक कप चाह अहाँक हाथ केर जिनगी मे नव ताजगी जगा देलक। साँझक झरोख में जखन याद लुकायत अछि, अहाँक मुस्की से फेर राति जगमगायत अछि, एक कप चाह आ एकटा मीठगर सन बात, जेना प्रेम में घोराइत होय मधुरक सौगात। यथार्थ से होइत स्वप्नमे ओझरा देलक एक कप चाह अहाँक हाथ केर जिनगी मे नव ताजगी जगा देलक। हमर निष्ठा पर आब तऽ विश्वास कऽ लिय चाह त पिया देलहु, आब प्यार कऽ लिय मानलहु अहाँक अछि, किछु सिहंता किछु इच्छा पूरब अहाँक इच्छा, ई सिहंता जागा देलक एक कप चाह अहाँक हाथ केर जिनगी मे नव ताजगी जगा देलक। - प्रणव कुमार झा , राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह ४२० म अंक १५ जून २०२५ (वर्ष १८ मास २१० अंक ४२०)|| 57 56 || विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in

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