विदेह ४२१ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। [विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X Videha e-Journal (since 2000) at www.videha.co.in ] ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। कॉपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- २०२५. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२५. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA. सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@gmail.com. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover design: AUM GAJENDRA THAKUR VIDEHA:421 समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा। मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अनुक्रम [विदेह ४२१ म अंक ०१ जुलाइ २०२५ (वर्ष १८ मास २११ अंक ४२१)] १. अंक ४१९ पर टिप्पणी (पृष्ठ १-२) गद्य २.१.हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२ (पृष्ठ ४-१०) २.२.मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-१० (पृष्ठ ११-१६) २.३.जगदानन्द झा 'मनु'-बीहनि कथाक कथा कहानी संगे (पृष्ठ १७-१९) २.४.प्रमोद झा 'गोकुल'- नोटबंदी (कथा) (पृष्ठ २०-२१) २.५.परमानन्द लाल कर्ण- तीर्थक्षेत्रक माहात्म्य- ९ (पद्म पुराण उत्तर खंड) (पृष्ठ २२-२७) २.६.लालदेव कामत-आर्यावर्तके कौटिल्य'क दृष्टि ओ कूटनीति (पृष्ठ २८-३३) पद्य ३.१.राम शंकर झा "मैथिल"-ठकहरबा (पृष्ठ ३५-३७) ३.२.प्रमोद झा 'गोकुल'-रोपब लात हम तकरा मत्था (पृष्ठ ३८-३८) ३.३.जगदानन्द झा 'मनु'- बीसटा हाइकू (पृष्ठ ३९-४२)
१. अंक ४१९ पर टिप्पणी प्रणव कुमार झा [विदेह नारायण जी चौधरी विशेषांक पर मंतव्य] हाले में ब्लूम्बर्ग के देल एकटा इंटरभ्यु में एकटा सवाल के जवाब में सीडीएस जनरल अनिल चौहान कहलखिन जे बिमान गिरनाई महत्वपूर्ण प्रश्न नै छैक अपितु महत्वपूर्ण ई थीक जे ओ कोना गिरल, हमसब एकर हल तुरत खोजलहु आ रननीति में आवश्यक बदलाव क के बहुत जल्दीए दुश्मन पर बढ़त लेलहुँ। किछु विशेषांक एहन होइत छैक जे कोना निकलल आ कहिया निकलल से बेसी महत्वपूर्ण विषय भ जाय छैक। विदेह नारायण जी चौधरी विशेषांक के ऐ दृष्टिकोण से देखल जा सकय अछि। ऐ विशेषांक के व्यक्ति आ विषय दुनू साहित्येत्तर अछि मुदा मिथिला के भौगोलिक, आर्थिक सामाजिक महत्व से जुड़ल विषय ताही दुआरे हमरा अनुसार एकटा महत्वपूर्ण विशेषांक कहल जा सकय अछि आ हमरा लागय अछि जे एकरा बेसी से बेसी मिथिला क्षेत्र के लोक खास क के युवा आ जनसेवा के क्षेत्र मे कार्यरत लोक सभ तक प्रचारित प्रसारित करबाक चाहि जाहि से लोक सभ मे नै खाली जल प्रबंधन संबन्धित चेतना के प्रस्फुटन होय अपितु ऐ क्षेत्र मे कार्यरत लोक के बेसी से बेसी पहचान आ सम्मान भेटय संगे एहि क्षेत्र मे अपन अपन स्तर पर कार्यरत लोक सभ के सेहो एक दोसरा से जुड़s के आ प्रोत्साहित हेबाक अवसर सेहो भेटय। ऐ अंक मे विदेह नै खाली साहित्येत्तर व्यक्ति आ विषय के महत्व देलक अपितु भाषा के सीमा से ऊपर मिथिला के महत्वपूर्ण विषय जल संरक्षण आ प्रबंधन के देलक अछि। स्वाइत मिथिला मे जल प्रबंधन के लs कs सजग आ स्वतंत्र विचारक रणधीर झा के अङ्ग्रेज़ी लेख के सेहो विशेषांक मे शामिल कैल गेल छैक। विशेषांक मे डॉ० शिव कुमार मिश्र, अजित झा के लेख से कै टा नव जानकारी भेटल। नारायण जी के हुनका काज लेल सम्मानित करबाक वाकया सेहो आ इहो जे ओ अपन अभियान मे अपन टीम के कतेक महत्व दैत छथीन। निश्चिते कोनो पैघ अभियान निक टीम वर्क के बिना सफल नै भs सकय अछि। विदेह के विशेषांक मे नारायण जी के संग टीम के परिचय देनाई बहुत निक लागल। सामाजिक विषय पर डॉ० कैलाश कुमार मिश्र आ हितनाथ जी के लेख रुचिगर लागल। डॉ० धनाकर ठाकुर के आशीर्वाद आ समर्थन सेहो ऐ विशेषांक के मार्फत नारायण चौधरी के भेटलई, ई निक गप्प। मिथिला के महत्वपूर्ण मुद्दा आ विषय पर एहिना विमर्श होइत रहबाक चाहि। जय मिथिला। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। गद्य २.१.हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२ २.२.मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-10 २.३.जगदानन्द झा 'मनु'-बीहनि कथाक कथा कहानी संगे २.४.प्रमोद झा 'गोकुल'- नोटबंदी (कथा) २.५.परमानन्द लाल कर्ण- तीर्थक्षेत्रक माहात्म्य- ९ (पद्म पुराण उत्तर खंड) २.६.लालदेव कामत-आर्यावर्तके कौटिल्य'क दृष्टि ओ कूटनीति २.१.हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२ हितनाथ झा मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२ तारानाथ झाक वंशावली पहिल अंकमे प्रकाशित भेल छल। अपन स्थिति हम कहने रही जे जहिया हमर पिताक निधन भेल रहनि, ओहि समय हम बहुत छोट रही। दू वर्षक नेनाक की अवगति रहल हेतैक, स्वतः अनुमान कैल जा सकैछ। पहिल अंकक लेखमे सेहो हम स्पष्ट केने छी। आशीष अनचिन्हार जीक तगेदा जखन तेज भेलनि आ हमरा पिताक प्रारम्भिक जीवनक विषयमे बहुत कम सुनल छल, माँ अथवा अनके किनकोसँ पुछबाक साहस कहियो हमरामे नहि आयल, जे कतहु-कतहु सुनने छलहुँ, ओतबे टा बुझल छल। ओहिपर जीवनक प्रारंभिक अंश लिखब उचित नहि बुझायल। भाइजी(प्रो. भीमनाथ झा)सँ सेहो कहियो नहि पुछने छलियनि। एहि बीच भाइजी सेहो किछु दिनसँ अस्वस्थ छलाह। दिल्लीसँ जखन दरभंगा घुरलाह तँ एक दिन कहलियनि-बाबूजीक प्रारम्भिक जीवनक विषयमे जानकारी देबाक लेल। ओहो तँ बाबूजीक निधनक समय एगारहे-साढ़े एगारह वर्षक रहल हेताह, तथापि कहलनि, जतबा जेना बूझल अछि, लिखि पठा रहल छी, आब तँ बिसरितो बहुत छियैक। भाइजी जे लिखि क' पठेलनि, ओकरा हम अविकल एतs प्रस्तुत क' रहल छी। बाबूजी बाबूजीक देहान्त जहिया भेल रहनि तहिया हम एगारह वर्षक रही। तेँ, तखन हुनक जीवन-प्रसंग ने बुझल छल, ने बुझबाक ऊहि छल। एतबे बुझैत रहिऐ जे ओ सहोदर तीन भाइ रहथि। स्मृतिमे स्पष्ट उभड़ैत अछि ओ पोखरापाटन खपड़ैल घर, जाहिमे रहै जाथि बड़का काका (चन्द्रनाथ झा), दादा (सूर्यनाथ झा)आ बाबू (तारानाथ झा), बड़की काकी, काकीमाँ आ माँ, भौजी (बड़का काकाक जेठ पुत्र उपेन्द्रनाथ झाक विधवा) तथा हमरा लगा सात टा धीयापुता (बड़का काकाक जीवनाथ, दादाक माया, वीणा, तीर्थनाथ, भवनाथ। बाबूक हम भीमनाथ आ मित्रनाथ। हितनाथक जन्म बहुत बादमे भेलनि)। साझी आश्रम। तीनटा बखाड़ी, दूटा महीस, एक जोडा बड़द, एकटा आदमी (खबास)। कमनिहारि भोर-साँझ। प्रशस्त दलान, खरिहान। सटले, पोखरिक मोहारपर पैघ बहरघरा। ओतहु चौकी, सितलपाटी, खिनहरि। लोकक अवर्यात, खासक' जाड़मे भोर-साँझ घुड़ारी, ओत' लोक सभ आगि ताप' अबथिन। पीपरक गाछ लग मालक घर। जहिया हमरा ऊहि भेल, ताहिसँ पहिनहि बाबू काशी चल गेल रहथिन श्यामा मन्दिरमे एकाउंटेंट पदपर नोकरी कर'। ईस्वी रहल हेतै 1944-45। 1947 मे पचमे (पाँचम वर्षमे) हमर मूड़न-कर्णबेध भेल। तकर स्मृति हमरा नहिएँ जेकाँ। जेहो, से झलफल। 1949 मे ओ हमरो काशी ल' गेला। ओहिँ पहिने ककहरो लिखब सिखने रही कि नहि, सेहो मन नहि अछि। तेँ एक तरहेँ हमर विद्यारम्भ काशिएमे भेल- श्यामा मन्दिर, कचौड़ीगलीमे। श्यामा मन्दिर तँ आइयो अछि, मुदा आइ ओत' अमावास्या छैक, हमर बाबूजीक समयमे पूर्णिमा रहैक। श्यामा मन्दिर माने खाली मन्दिरे नहि। चारि टा मन्दिर तथा एक टा अति विशाल पचमहला मकान। मैथिलक सभसँ बड़का गढ़। चारि मन्दिरमे तीन एक पतियानीमे, एकटा बगलमे। पतियानीवलाक बीचमे श्यामा माइ, तकर पश्चिम चन्द्रेश्वर महादेव (पाथर-निर्मित ई दुनू पैघ मन्दिर) तथा पूबमे लक्ष्मी माइ। बगलवलामे राम लक्ष्मण सीता हनुमान (ई दुनू संगमर्मरक अपेक्षाकृत छोट मन्दिर)। सम्पूर्ण आलय श्यामामन्दिरसँ विख्यात। दू टा पुजेगरी अनवरत देवार्चनमे निरत। देवताकेँ राजसी भोग-राग। समय-समयपर नाच-तमासा, उत्सव। बरखमा दिनपर काशीक हजारो कंगालकेँ द्रव्य आ अन्नदान। दातव्य औखधालय, एक चिकित्सक सतत तत्पर। (कहियो डा. काञ्चीनाथ झा किरणजी सेहो छलाह।) सं्कृत महाविद्यालय, जाहिमे सात-आठ विषयक आचार्य धरिक अध्यापन। मिथिलाक नामी विद्वान् ओकर अध्यापक- पं. उग्रानन्द झा नैयायिक (प्रधानाचार्य), पं. मधुकान्त झा ज्योतिषी, पं. गणेश दत्त झा वैयाकरण प्रभृति। विशाल पुस्तकालय। सैकड़ो छात्रक हेतु नि:शुल्क अध्ययन आ दिनका भोजनक व्यवस्था। नि:शुल्क छात्रावास श्यामा छात्रावास लगेमे अवस्थित। केओ मैथिल काशी पहुँचलाह तँ श्यामा मन्दिर अयलापर हुनका तीन दिन धरि दिनका भोजन। कोनो मैथिलक निधन भेलनि तँ हुनक दाहसंस्कार लेल लगले आर्थिक साहाय्य। काशीस्थ सकल पण्डित समाजक वर्षमे एक बेर सम्मेलन, शास्त्रार्थ, हुनका लोकनिक पूजन, हुनका लोकनिकेँ दक्षिणा। महामहोपाध्याय गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी, म.म. गोपीनाथ कविराज, पण्डितराज राजेश्वर शास्त्री, पण्डितप्रवर भूपनारायण झा, पं.आनन्द झा न्यायाचार्य, ज्योतिषी पं. सीताराम झा प्रभृति विद्वानक शास्त्रार्थ देखबा योग्य होइत छल। समस्त मैथिलानी विधवा तथा गरीब मैथिल ब्राह्मणकेँ मासिक साहाय्य। काशीक बाहरो जे गरीब छात्र पढ़ैत छलाह, आवेदन कयलापर हुनको लोकनिकेँ आर्थिक साहाय्य देल जाइत छलनि। कतेक कहू। ताहि समयक श्यामा मन्दिर तत्रस्थ समस्त मैथिलक केन्द्रस्थल रहैक आ छोट-पैघ सभ मैथिलजन ओत' जुटबे करथि। श्यामा मन्दिरक जे विशाल मकान छैक, तहिया ताहिमे नीचाँक महलमे डेरा रहनि पं. घनश्याम सुन्दर झाक (ओ मामाजी कहाबथि)। ओही विशाल बरंडापर सभक बैसार-स्थल, मन्दिरक सोझाँ-सोझी। दोसर अलंगमे भनसाघर, भोजनालय तथा पुजेगरी आ भनसीया सभक निवास। दू टा भनसीया आ चारि टा नोकर सदिखन कार्यरत। दोसर महलपर पं. काशीनाथ झा, मैनेजरक निवास। दोसर अलंगमे हमर बाबूजी आ पं. बालादत्त झा (सुविख्यात पण्डितप्रवर खुद्दी झाक छोट पुत्र, मन्दिरक क्लर्क)क निवास सेहो। तेसर महल महाविद्यालय तथा पुस्तकालय। दोसर अलंगमे अतिविशिष्ट अभ्यागतक निवास-व्यवस्था। चारिम महलपर छात्रक भोजनालय, भनसाघर। पाँचम महल छत। 1949 सँ बाबूजी हमरा संग राख' लगला। संध्याकालकेँ सभ दिन जुटान होइक नीचाँमे, बरंडापर। नाना प्रकारक गप्प, हँसी-ठट्ठा, शास्त्रचर्चा, समस्त शहरक गतिविधि बैसले ठाम प्राप्त। से, ओही ठाम हमर प्राथमिक शिक्षाक श्रीगणेश भेल। मैनेजर पं. काशीनाथ झाजी (जे हमर आचार्यगुरु सेहो रहथि। हमर उपनयन 1953 मे भेल रहय) वयोवृद्ध, योगाभ्यासी आ'रिजर्व' रहथिन। दोसर वरिष्ठ अधिकारी बाबुएजी रहथिन, तेँ व्यवहारतः सकल प्रशासनिक आ सामाजिक दायित्वक निर्वहन-भार हुनके जिम्मा रहनि। फलतः काशीक तत्कालीन व्यापक मैथिल समाज ओ सारस्वत संसारसँ हुनका साक्षात् सम्पर्क बनल रहैत छलनि। मन पड़ैत अछि, कविवर सीताराम झा, डा.सुभद्र झा ओ पं.आनन्द झा न्यायाचार्य प्रभृतिक आगमन तँ अव्याहत होइत छलनि। हमहूँ, बिना माँक, ओही ठाम रह' लगलहुँ, पढ़' लगलहुँ। प्रतिदिन प्रात:काल बाबूक संग मणिकर्णिका घाटपर जाय गंगास्नान कयलाक बाद बाबा विश्वनाथ, माता अन्नपूर्णा आ ढुंढिराजक दर्शन करैत श्यामा मन्दिरक सभ देवताकेँ गंगाजल चढ़ओलाक बाद रतुका भोगक प्रसाद राखल पूरी-हलुआक जलपान करैत रही। तकर बाद पढ़ाइ-लिखाइ होइ। स्कूलमे नाम नहि लिखाओल गेल। मन्दिरमे चहल-पहल, हरदम लोकक आबरजात बनले। हमरा नीक लागय। गामक ध्यान बेसीकाल नहि आबय। बाबूजी सालमे दू बेर गाम जाथिन एक-डेढ़ मास लेल एक बेर धनरोपनी बेरमे, दोसर बेर धनकटनी बेरमे। हमहूँ संगहि जाइ-आबी। 1954क अन्तमे कि 55क शुरूमे हुनक बामा बाँहिमे दर्द उठलनि, झुनझुनी। कतेको उपचार कयलनि, दबि जाइन, फेर उखड़ि जाइन। छुटनि नहि। गाममे बड़ जोर दुखित पड़लाह। गामक सरकारी अस्पतालक यशस्वी डाक्टर बालेश्वर झाजी हुनका गोटेक मासमे ठीक क' देलथिन। दुखित पड़बासँ पहिने, जेँ कि ओही बेर हमरा हरिश्चन्द्र कालेजिएट स्कूलमे नवम वर्गमे नाम लिखबा देने रहथि, तेँ स्कूल खुजि गेलापर पहिल बेर, टोलबैया पड़ोसी श्री अरुण कुमार झा बच्चन'जीक संग, जे बी.एच.यू.क छात्र रहथि, हमरा काशी पठबा देने रहथि। तकर बाद गाममे दुखित पडला। निकेँ भेलाक बाद काशी गेला। ओत' मास-डेढ़ मासक बाद फेर दुखित पड़ि गेला। प्रसिद्ध डाक्टर खन्नासँ इलाज शुरू भेलनि। सप्ताहक भीतरे, एक नवम्बर 1955क भोरहरबामे, कोजागराक प्रात रहै, आँखि मुनि लेलनि। ओहि काल हम सुतल रही। गलगुलक आहटिपर आँखि खुजल तँ डाक्टर साहेब सहित मन्दिरक सभ गोटेकेँ बेचैन देखलियनि। बादमे जाक' बात बुझलिऐ। श्राद्धकर्म काशिएमे भेलनि। तकर लगले बाद हम सभ दिन ले' गाम आबि गेलहुँ। बड़का काका एक साल पहिनहि (1954 मे) दिवंगत भ' गेल रहथि। दुखित पड़लथिन तँ बाबू काशी बजा लेलथिन। ओतहि प्राणत्याग कयलथिन। हुनक पुत्र एक-सावा वर्षक छलथिन, सेहो गाममे रहथिन आ हमर उपनयनक वर्ष लागि गेल छल, तेँ आगि हमरेसँ देआओल गेलनि। काशिएमे श्राद्धो हमहीँ कयलियनि। दुर्भाग्य ई जे वर्ष बितलाक लगले बाद अपन बाबुओक श्राद्ध कर' पड़ल। गाम घुरलापर नवम वर्गमे हमरा राखि देल गेल। अगिला सत्रमे दसममे नाम लिखाओल गेल। मैट्रिक एगारहम रहै। घरमे प्रतिष्ठित पुरुषमे दादा मात्र रहथि। आङनमे दाइ रहय, जकरा वर्षे दिनमे दूटा डाङ लागि गेल छलै। दू काकी, एक भौजी आ माँ रहथि। आर सभ नेने-भुटका। दादा पक्का गृहस्थ रहथि। ताहि दिनुका पढ़ल चिट्ठी-पतरी, हिसाब-बाड़ी, खाता-खेसरा आदि। किछुए दिनक बाद भिनाउज भ' गेलै, मेलेसँ। तीनू भाइक हिस्सामे वैह दू-दू घर पड़लनि, जाहिमे पहिनेसँ जे रहैत रहथि। हमरा ने ऊहि रहय, ने जिज्ञासे। काशीक पोथी-पढाइ आ गामक पोथी-पढाइमे कत्तौ मेल नहि। हम ओहीमे लटपटायल। अपनहि गाममे अनभुआर सन। तेँ, बाबूजीक पूर्वजिनगी जनबाक ने ध्यानमे कहियो अपना आयल, ने क्यो कहलनि। कोनो प्रकरणमे दादाकेँ ककरो कहैत सुनने रहियनि जे हुनक अपन जन्म 1901 मे छलनि। बाबू हुनक पीठेपर भेलथिन। तेँ, बादमे हम अनुमान कयलहुँ जे बाबूजी 1903 क रहल हेता। जखन किछु छेटगर भेलहुँ, कालेज जाय लगलहुँ, किछु-किछु कवितो लिख' लगलहुँ, साहित्य पढ़ब नीक लाग' लागल, तखन एक दिन भड़ार घरक देबालक एक कोनमे बनल मचानपर मोटरी-चोटरीक नीचाँमे मारते रास अखबार आ मोट-मोट कापीक संगहि किछु आनो मुद्रित आ हस्तलिखित कागत, जे अस्तव्यस्त जकाँ पड़ल छलै, तकरा देखबाक उत्सुकता भेल। ताहिमे छलै, जतबा मन अछि, कलकत्तासँ प्रकाशित 'विश्वमित्र' अखबारक बहुतो प्रति- दू-तीन बंडलमे। दू-चारिटा पत्रिका, जकर नाम नहि ठेकान अछि। 'प्रभात'क प्रतिसभ, जतबा बाँचल रहलै से। किछु हाइ स्कूलक कोर्सबुक, सभ अङरेजीमे। किछु बाबूजीक लिखल प्रश्नोत्तरी अङरेजिएमे। किछु अर्धवार्षिक आ वार्षिक परीक्षाक मुद्रित प्रश्नपत्र, हाइ स्कूलक। सभ विषयक प्रश्नपत्र अङरेजीमे। बाबूजी वाटसन स्कूल मधुबनीमे पढ़ने छला, हुनक टिक कैलहा 1919 क मेट्रिकक प्रश्नपत्र देखि एते तँ निश्चय भ' गेल जे ओ मेट्रिकमे परीक्षा देने रहथिन। पास कयलनि की नहि, तकर कोनो प्रमाण नहि भेटल। मुदा, ई तँ प्रमाणित अछिए जे ओ गृहस्थे टा नहि रहथि, अपितु गामक सार्वजनिक उत्थान लेल व्याकुल आ सचेष्ट ताहि दिनुक किछु जागल नवयुवक दलमे चर्चितो रहथि। ओ फुटबौलक नीक खेलाड़ी रहथि, जकर उल्लेख प्रो. जयदेव मिश्रजी अपन कोनो एक लेखमे कयने छथिन। अपन गामक टीम के.डी.क्लब (अर्थात् कोइलखदेवी क्लब)क ओ प्रमुख सदस्य रहथि, जे टूर्नामेंटक मैच खेलाय आनो गाम जाइ छल आ शिल्ड जीतिक' अनै छल। लोकसेवक रहथि, 1934 क भूकम्पमे औखध, अन्न-पानि आ आनो अपेक्षित सेवाकार्यमे ओ अग्रसर रहै छला। साहित्यिक अभिरुचि, लेखन-प्रकाशन- संगठन-जागरणक प्रति रुझान आरम्भेसँ रहलनि। कविचूड़ामणि मधुपजी अपन संस्मरणात्मक पोथी 'प्रेरणापुंज'मे अनेक ठाम, अनेक प्रसंगमे हुनक प्रशंसात्मक उल्लेख कयने छथिन। आचार्य सुमनजी अपन आत्मकथा 'मन पड़ैत अछि'मे कोइलखमे बिताओल अपन आरम्भिक छात्रावस्थाक स्मृतिकेँ जगबैत गामक जाहि किछु तहियाक प्रतिष्ठित व्यक्तिक नाम लेने छथि, ताहिमे एक नाम हुनको छनि। गामक सर्वविध विकासक लक्ष्यसँ ओ नवयुवक दलक संगठन 'युवक संघ' नामसँ स्थापित कयलनि, जकर अध्यक्ष रहथिन उमानाथ झा, जे गामक पहिल इंजिनियर भेलाह। ओही संस्थाक तत्त्वावधानमे 'प्रभात' नामक हस्तलिखित मासिक पत्रिका लगातार दू वर्ष धरि (1933-34) प्रकाशित होइत रहल। ठामठीम किछु चर्चा भेलो अछि, भैयो रहल अछि, तेँ एत' ताहि प्रसंग किछु कहबाक प्रयोजन नहि बुझैत छी। +++ +++ +++ आब ने ताहि दिनुक 'युवक संघ' अछि, ने 'के.डी.क्लब' अछि, ने तहियाक लोके छथि, किन्तु जे बचलहा 'प्रभात' अछि से आइयो समाजक प्रबुद्ध लोककेँ, खासक' कोइलखवासीकेँ की जगा नहि रहल अछि? सुनल जाय ओकर उद्घोष- खिलल कमल गुंजित मधुप रवि-छवि शोणिम भेल। ठरर दैत की छी पडल? उठु 'प्रभात' भय गेल। ----------------------------------------- अग्रिम अंकमे बाबूजी(तारानाथ झा)क प्रसंग जे कविचूड़ामणि काशीकान्त मिश्र 'मधुप'जीक प्रेरणापुंज (संस्मरणात्मक पद्यकथा), 'मधुपक पत्र : भीमनाथ झा'क नाम, आचार्य सुरेन्द्र झा 'सुमन'क पोथी 'मन पड़ैत अछि'(आत्मकथा) आ प्रो. जयदेव मिश्र लिखने छथि, ओहि विषयमे लिखब। संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-1 -जयप्रभा नगर, हजारीबाग-825301, 9430743070 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-१० कल्पना झा मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-10 अग्रज 'व्यास' जीक परम भक्त: महेन्द्र झा उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' जीक आत्मा निश्चित असन्तुष्ट रहि जेतनि जँ "मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान" श्रृंखला मे एक अध्याय हुनकर अनुज महेन्द्र जीक लेल नहि समर्पित करी हम। तँ सएह 'व्यास' जीक आत्माक सन्तुष्टि लेल ई अध्याय नानाजी महेन्द्र झाक नामेँ समर्पित छनि। हरिपुर 'बख्शी टोल'क लोक हुनका 'कन्हाइ' नाम सँ चिन्हैत छलथिन। ज्येष्ठ भाए चुल्हाइ आ छोट कन्हाइ। वास्तविक नाम छलनि महेन्द्र झा। पूजा-पाठ बेसी करथि तँ पंडित महेन्द्र झाक नाम सँ सेहो जानल जाइत रहलाह समाज मे। वयस्क भेलाक उपरान्त दीर्घकाल धरि सहस्त्र गायत्री जप आ बाद मे तेरहो अध्याय दुर्गा सप्तशतीक पाठ, सालक तीन सए पैंसठियो दिन करथि। चारि- चारि घंटा पूजा पर बैसथि। बड़ धर्मात्मा लोक। से दुनू भाइ। 'व्यास' जी सेहो सरकारी सेवा मे रहितहु पूजा-पाठ लेल समय निकालिए लैत छलाह। कर्मकाण्डक अनुसरण ओहि घरक परम्परा रहल सभदिन। उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' जी सँ आठ बरखक छोट छलाह महेन्द्र झा। सन् 1925 मे जन्म भेल छलनि महेन्द्र झाक। पढ़बा-लिखबा मे बुधियार महेन्द्र जीक शिक्षा-दीक्षा प्राइमरी स्कूल कलुआही सँ शुरु होइत, हाइ स्कूल लोहा आ तत्पश्चात सी एम कॉलेज सँ ग्रेजुएशन धरि भेलनि। ग्रेजुएशनक बाद लॉ के पढ़ाइ सेहो केलनि, सी एम कॉलेज सँ। शुरुआती पढ़ाइ लेल 'व्यास' जी जकाँ महेन्द्र जी केँ सेहो राजमाता सँ सहयोग राशि भेटैत रहलनि। आ जखन 'व्यास' जी इंजीनियरिंग क' कार्यरत भ' गेलाह, तखन ओ स्वयं अनुजक पढ़ाइ-लिखाइ केर जिम्मेदारीक निर्वहन केलनि। उपेन्द्र आ महेन्द्र, दुनू भाएक बीचक स्नेह केर चर्चा कतए सँ शुरु कएल जाए, असमंजस मे छी। असले त्रेता युग सन दृश्य देखल अछि हमरा अपन नानीगाम मे। माने उपेन्द्र नाथ असले राम जीक अवतार आ महेन्द्र लक्ष्मणे जीक अवतार बुझू। ओना कइअक बेर अग्रजक लेल हुनकर भक्ति, रामभक्त हनुमान सन सेहो बुझना जाइत छलए। अग्रजक जेहने आज्ञाकारी, तेहने भक्त छलाह महेन्द्र झा जी। हुनका लेल अपन पत्नी आ धिया-पूता सँ बेसी महत्वपूर्ण रहलथिन अग्रज। माने अग्रजक इच्छा-अनिच्छाक ध्यान राखब हुनका लेल सर्वोपरि रहलनि सभदिन। आ से कोनो देखावटी नहि छलनि, हृदय सँ स्नेह छलनि, सम्मान भाव छलनि। हमसभ गर्मी छुट्टी मे हरेक साल हजारीबाग (झारखण्ड) सँ गाम जाइते टा छलहुँ। चूँकि अपन गाम देवपुरा मे गाछी कम छलए; तँ अपन गाम दसे दिन रहल करी आ नानीगाम बीस-बाइस दिन निश्चिते रहैत छलहुँ। कारण नानीगाम मे बहुत वेराइटीक आमक गाछ सभ छलए, चाहे ओ कलमी आमक वेराइटी हुअए कि सरही (बिज्जू)। भिन्न भिन्न स्वाद आ भिन्न-भिन्न आकारक आम सँ युक्त दू-दू टा 'कलम' छलए नानीगाम मे। कटहरबना अलग सँ। से देखल अछि आमक मास मे, अग्रजक अबाइ केर प्रतीक्षा मे ओहि सभ आम केँ जोगा क' राखथि, नहि तोड़ाबथि अनुज महेन्द्र जी। 'भाइ औथिन तखन टुटतै ओहि गाछक आम' से कहि राखल जाइत रहए। 'भाइ' के गाम आगमन, भगवानक आगमन सँ कम नहि छलनि हुनका लेल। 'भाइ' कहैत छलथिन अग्रज केँ। भाइ लेल ओ शबरी सेहो बनि जाए चाहैत छलाह। सभ बस्तुक बेस्ट क्वालिटी अग्रजक लेल राखल जाए, से भाव। तेहने सिनेह अनुजक लेल 'व्यास' जीक हृदय मे सेहो छलनि आ रहलनि जीवनक अन्तिम साँस धरि। अग्रजक देहावसानक उपरान्त महेन्द्र जी पटना डेरा माने श्री भवन नहिए अएलाह। जखन कि 'व्यास' जीक देहावसानक बारह बर्खक उपरान्त महेन्द्र जी देह-त्यागनि। अच्छा...आब मोन पड़ल, नानी माँ अमरावती देवीक दिवंगत भेला पर दू दिन लेल आएल छलाह, हुनकर काज मे सन् 2011 मे। 'व्यास' जीक उपस्थिति मे अनन्त पूजा मे नियम छलनि पटना आएब महेन्द्र झाक। कारण खूब धूम-धाम सँ श्री भवन मे अनन्त पूजाक आयोजन होइत छलए, हरेक साल। खूब श्रद्धा-भाव सँ, नियम-निष्ठा सँ। पूड़ी-पकमान बनबैत छलीह मामी सभ। मुहल्लाक आरो लोक सभ अनन्तक संग अपन-अपन डलिया मे फूल-नैवेद्य ल' क' जुटैत छलीह। अनन्त पूजाक अतिरिक्त जँ कोनो साल आमक मास मे अग्रज 'व्यास' जी गाम नहि आबि सकलाह तँ महेन्द्र जी कार्टून मे वा बोरा मे किंवा काठक पट्टी सँ बनल बक्सा मे, जेना सुतरनि तेना आम ल' क' खबासक संग स्वयं पटना आबैत छलाह कतेक बेर। आ कतेक बेर अपन कोनो बालक द्वारा 'व्यास' जीक पसिनक आम सभ पठा देल करथि। आमक अतिरिक्त गामक सेहन्ता बला बस्तु सभ (जेना अमोट-अचार) सेहो पटना पहुँचए, ताहिलेल महेन्द्र झा स्वयं तत्पर रहैत छलाह। 'व्यास' जीक इच्छाक मान राखैत, आजीवन महेन्द्र जी गाम धएने रहलाह। गामक जमीन-जथा, गाछी-कलम आ ताहू सँ बढ़ि क' भगवतीक ओगरबाही, पूजन, अर्चन लेल अपन लॉ के डिग्री ताख पर राखि देलनि। जखन अपन संतान सभ होशगर भ' गेलथिन, माने हमर मामा सभ कखनो काल कटाक्ष करथिन पिता पर, "ई कोन बुधियारी केलहुँ, पढ़ि-लिखि गाम पर बैसि रहलहुँ..." मुदा हुनका स्वयं कहियो एहि बातक अफसोस नहि रहलनि। ओ अग्रजक मोन राखि कृतकृत्य छलाह। हुनका अपन जीवनक सार्थकता बुझेलनि एहन करबा मे। आ अग्रज 'व्यास' जी सेहो, सभटा जिम्मेदारी अपना कान्ह पर लेब्बे टा नहि केलनि; निष्ठापूर्वक निभएबो केलनि। सहर्ष निभेलाह सभटा जिम्मेदारी। माने बोझ नहि बुझेलनि हुनका ओ जिम्मेदारी। दुनू भाए मे छओ-छओ, कुल बारह टा धिया-पूता जे भेलथिन, से सभक पढ़ाइ-लिखाइ, विवाह-दान, सभ किछु केर जिम्मेदारी 'व्यास' जीक माथ पर छलनि। हरिपुर 'बख्शी टोल'क निवासी दुनू भाएक प्रेमक गवाह रहलाह हरिपुर 'बख्शी टोल'क निवासी। परोपट्टा मे एहेन सुखमय गृहस्थाश्रम विरले देखबा लेल भेटैत छलनि लोक केँ। दुनू भाएक बीच तँ खैर बाल्यकालहि सँ एकटा विशेष बॉन्डिंग बनले छलनि, दुनू भाएक विवाहोपरान्त दू गाम सँ आएलि दुनू दिआदनीक बीच सेहो ओहिना प्रेम-भाव रहलनि सभदिन, से आश्चर्यजक गप्प छलैक लोक लेल! अथरीक बड़की नानीमाँ अमरावती देवी, आ रुपौलीक छोटकी नानीमाँ फूल दाइक बीच दू सहोदर बहिनिओ सँ बेसी प्रेमक धार बहैत छलनि, बहैत रहलनि जीवन भरि। कहियो केओ ककरो अवाच्य कथा कहने होएथिन, एहन नहि भेल। एखनुक समय मे ई आश्चर्यजक गप्प लागि सकैत अछि, उपेन्द्र नाथ आ महेन्द्र झाक बीच कहियो जमीन-जायदाद, गाछी-कलम, कथूक बँटवारा नहि भेलनि। दुनू नानाजीक दिवंगत भेलाक उपरान्त सेहो बहुत सालक बाद एमहर आबि क' भेल अछि बँटवारा आठो मामाक बीच। लॉ के डिग्रीधारी महेन्द्र झा जा धरि सक्षम रहलाह, ता धरि कृषि कार्य मे लागल रहलाह (जौन-बोनिहारक सहयोग लैत)। माने जखन धरि शारीरिक दुर्बलता बाधा नहि बनलनि, तखन धरि। अँगनाक दुरुखा मे हऽर राखल रहैत छलए, से ओहिना मोन अछि हमरा। आ दरबज्जा पर बऽरद। बऽरदक सोझाँ मे नादि। नादि मे देल जाइत माँड़, आमक खोंइचा सभ। संगहि अन्यान्य उगरल खाद्य सामग्री (भात-रोटी)। कुट्टी काटए बला मशीन सेहो नानीए गाम मे देखल अछि हमरा सभ भाइ-बहिनि केँ। अपना गाम मे सभदिन बटिदारेक हवाले रहल खेत सभ। नानी गामक ओ टहलू छौँड़ा जकर नाम छलै "फुसियाहा" ओकरा कुट्टी काटैत देखब, "अर्जुनमा" नामक परमानेंट जॉन द्वारा कनहा पर हऽर उठा क' खेत दिस विदा होएब, आ पाछांँ-पाछाँ महेन्द्र झा। हमरा सभ भाइ-बहिनिक बालसुलभ मन मे एकटा कौतूहल उत्पन्न करैत छलए, ई सभ दृश्य। नानाजी कतए जा रहल छथि...ई की क' रहल छथि "फुसियाहा"....ई कनहा पर हऽर ल' क' कतए जा रहल छथिन.... एकर की हेतैक (काटल कुट्टी देखि)...... तहिना दस-एगारह बाजैत-बाजैत जॉन लेल आँगन सँ गमछी मे बान्हि क' रोटी नून तेल जाएब, पिआजु मिरचाइक संग। सभटा कौतूहलक विषय छलए। फेर साँझ मे ओहि जौन केँ बोनि रूप मे धान/गहूम वा चाउर भेटब, जॉन द्वारा ओहि बोनि केँ गमछी मे बान्हि क' अपना घर ल' जाएब, ई सभ दृश्य चलचित्र जकाँ चलाएमान भ' रहल अछि एखनहुँ। लाबा-दुआ मे पाँच-दस टा आम द' देल करथिन नानी हमर। जौन-बोनिहारक आत्मा तिरपित ! ओहि कृषक बला जीवन मे परेशानी तँ छलनि महेन्द्र झा-फूल दाइ, दुनू गोटे केँ मुदा आनन्दक संग करैत छलाह ओ सभ। माने कतहु शहर मे रहि वकालत करितथि, तँ निश्चिते भौतिक संसाधन सँ परिपूर्ण, सुखमय शहरी जीवन जीबि सकैत छलाह महेन्द्र झा आ हुनक परिवार। रौद मे मुह लाल क' कृषि कार्य कराएब वास्तव मे कष्टकर तँ छैके। मुदा महेन्द्र झाक मुह रौद सँ भले लाल होइत रहलनि, मोन मलिन कखनो नहि केलनि ओ। अग्रजक प्रति एहि तरहक श्रद्धा-भाव, नानाजी महेन्द्र झाक प्रति श्रद्धा-भाव उत्पन्न करैत अछि हमरा मोन मे। हमरे टा नहि समाजक लोक सेहो बहुत सम्मान भाव राखैत रहलनि हुनका प्रति, सभ दिन। माने हुनका जिबितहु आ हुनका मृत्युपरान्त सेहो। सन् 2014 मे महेन्द्र झा सेहो दिवंगत भ' गेलाह। आब ओहि घर मे द्वापरयुग आ कलयुग, दुनूक झलक देखा रहल छनि समाजक लोक केँ। जेना सभ घर मे देखाइत छै। घर-घर देखा एक्के लेखा बला परि। संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-7 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-8 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-9 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.जगदानन्द झा 'मनु'-बीहनि कथाक कथा कहानी संगे जगदानन्द झा 'मनु' बीहनि कथाक कथा कहानी संगे हिन्दी साहित्यमे पहील कहानी किछु गोटे "रानी केतकी की कहानी" केर मानै छथि। ई कथा सैयद इंशाअल्लाह खान द्वारा 1803 या 1808 मे लिखल गेल छल । ई कहानी मध्यकालीन भारतक प्रेमकथा अछि । कथामे रानी केतकी आ राजकुमार वीरसेनक प्रेम कहानी कहल गेल अछि । ओतए किछु गोटे किशोरी लालक इन्दुमती केर तँ आओर किछु गोटे माधवराव केर �एक टोकरी मिट्टी� केर। मुदा हिन्दी कहानीक असली विकास प्रेमचंदक कहानी आ हुनक समयसँ भेल । प्रेमचंदक जीवन काल - 1880 सँ 1936 छल, 1803 सँ पहिने कहानी शब्दक प्रयोग कियो नहि केलक। तँ की 1803 वा प्रेमचंद केर युगसँ पहिने कोनो कहानी नहि छल ? वेद, उपनिषद, पुराणमे हजारो कहानीक वर्णन अछि, मुदा ओकरा कथा कहल जाइत छल। जेना पंचतंत्रक कथा जे की 300 ई.पू. पहिने लिखल गेल छल। वर्तमानक हिन्दी साहित्यमे कहानीक अर्थ अंग्रेज़ी केर Sort story सँ लेल जाइ छैक। मुदा हिन्दी साहित्यमे आइ-काल्हि हिन्दी साहित्यक कहानीसँ अलग, छोट छोट कहानी क़रीब तीन चारि सय शब्दमे खूब लिखल जा रहल अछि तेकर नामकरण हिन्दी साहित्यमे लघु कथा केर नामसँ भेल अछि। आ एहि लघु कथाकेँ ज्ञानी लोकनि सभ मैथिली केर बीहनि कथासँ तुलना करै लेल आतुर छथि। ज़खन कि मैथिलीमे बीहनि कथा आ लघु कथा दुनू स्वतंत्र रूपसँ लिखल जा रहल अछि। आब मैथिली कथाक वर्गीकरण केर हम एना देख सकैत छी- बीहनि कथा : कथ्य वा संवाद जेकर मुख्य अंग छैक, एक दृश्यमे संपूर्ण कथा होइ, शब्द सीमा अधिकतम एकसय तक करीब हुए तँ उत्तम। लघु कथा : संवाद संगे भुमिका अथवा बिना संवादों, एकसँ दूँ दृश्यमे संपन्न होबा चाही, शब्द सीमा क़रीब पाँच सय तक। कथा : जकरा हिन्दी साहित्यमे कहानी कहल गेल छैक। मैथिली साहित्यमे कथा वा कथाक संग्रह केर खूब रचना भेल अछि। दीर्घ कथा : अर्थात नमहर कथा। जाहि ठाम विस्तारसँ व्याख्या कय क रचना केएल गेल हुए। एतेक नमहर जे चारि-पाँच टा कथासँ एकटा पोथीक निर्माण भ सकेए। आब कने गप्प करै छी, बीहनि कथा केर मादे - बीहनि कथा नव विधा होइतो, आइ ई कोनो तरहक परिचय लेल मोहताज नहि अछि। मैथिलीमे नित्य नव-नव बीहनि कथा आ बीहनि कथाक पोथी लिखल जा रहल अछि। हम एकर इतिहास आ उत्पतिकेँ मादे एखन नहि कहब मुदा एतवा कहबामे कोनो हर्ज नहि जे बीहनि कथाक स्थापना आ विकास लेल मुन्नाजीक (मनोज कर्ण) भगरथि योगदानकें नहि बिसरल जा सकैत अछि। हमरो हुनके मार्गदर्शन आ सहयोगे बीहनि कथा लेखनमे उदय भेल। मुन्नी कामतजी, डॉ. आभा झाजी, सात्वना मिश्राजी, कल्पना झाजी, गजेन्द्र ठाकुरजी, घनश्याम घनेरोजी, विद्याचन्द झा 'बंमबंम' जी, डॉ. प्रमोद कुमारजी, ओमप्रकाश झाजी, डॉ. उमेश मण्डलजी, कपिलेश्वर राउतजी आदिक बीहनि कथा लेखनमे जतेक प्रशंसा कएल जे से कम। वर्तमान समयमे मैथिलीक बीहनि कथाकार सभ दुनियाँक बड़का-बड़का भाषाकेँ एहि दिस सोचै लेल बिबस कए देलखिन्ह। अंग्रेजीमे एकर नामकरण अथवा भाषांतर �सीड स्टोरी� कहि भेल। हिंदी अंग्रेजीमे जकर कोनो स्थान नहि ओहेन एकटा नव विधाक अग्रज मैथिली साहित्य आ ओ विधा थिक �बीहनि कथा�। किछु लोक बीहनि कथा आ लघु कथामे फराक नहि कय पबैत छथि मुदा दुनूमे बहुत फराक अछि। बीहनि अर्थात बीआ। तेनाहिते मोनक बिचारक बीआ जे कखनो कतौ फूटि सकैए, बीहनि कथा। विचारक एकटा एहेन बीहनि, बीआ, सीड जे लोकक करेजाकेँ स्पर्श करैत, मस्तिष्ककेँ सोचै लेल विवस क दै। बीहनि कथाक आवश्यकता समयक संग जरुरी अछि, जेना एक समयमे पाँच दिनक क्रिकेट मैचक प्रचलन छल ओकर बाद आएल वन डे क्रिकेट आजुक समयक माँग अछि ट्वेन्टी ट्वेन्टी। तेनाहिते एखुनका समय अछि बीहनि कथाक। बीहनि कथा कोना लिखबा चाही आओर एकरामे की-की गुण होइत छैक ? शंक्षेप्तमे कही तँ एक गोट श्रेष्ठ बीहनि कथामे निचाँ लिखल गुणँ होबाक चाही � ▪सम्पूर्ण कथा मात्र एकटा दृश्यमे होबाक चाही। जेना नाटकक मंचन मंचपर होइत छैक आ ओहिमे कतेको बेसी दृश्य भऽ सकैत छैक मुदा बीहनि कथाक कथ्य आ कथा दुनू एके दृश्यमे सम्पन्न भए जेबा चाही। ▪बीहनि कथाक मुख्य अंग संवाद अछि। जतेक सटीक आ नीक संबाद होएत ओतेक नीक। शव्द चयन एहेन हेबा चाही जे पाठककेँ अर्थ बुझैक लेल सोचय नहि परनि। तुरन्त आ जे हम कहै चाहै छी ओ पाठकक मानस पटलपर जेए। ▪कथाक गप्प पाठकक करेजाकेँ छूबि लनि आ पढ़ला बादो करेजामे दस्तक दैत रहनि ओकर परिणाम वा समाप्तिक फरिछौँटमे नहि परि कय पाठकपर छोरि दी। ▪जँ कथा कोनो सार्थक उदेश्य वा गप्पकेँ प्रस्तुत करैमे सफल अछि, समाजकेँ कोनो नीक बेजए पक्षकेँ दखा रहल अछि तँ सर्वोतम। ▪पढ़ैक कालमे पाठकक मोनमे मनोरजन संगे-संगे रूचि आ कौतुहल जगा सकेए। एना नहि बुझना पड़े जे कोनो प्रवचन सुनि रहल छी। ▪जँ सम्भव हुए तँ इतिहास बनि गेल पात्र आ घटनासँ बचबाक चाही। -जगदानन्द झा 'मन', मोबाइल न० ९२१२४ ६१००६ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.प्रमोद झा 'गोकुल'- नोटबंदी (कथा) प्रमोद झा 'गोकुल' नोटबंदी (कथा)
अधरतियामे रामधन एकाएक जोरसे चेहा उठल। बापरे बाप! फेनो अनर्थ भ'गेलै ।पजरा लागिके सूतलि ओकर घरवाली खौझैत बजलै -मर,एना ई सुतली रातिमे किलोल किए कटै छै?एनामे धियोपुताक निन्न उचैट जेतै!कोनो डरौन सपना तपना देखलकैये की? - हँ ! -कथी? -फेनो मोदी सरकार नोटबन्दी क'देलकैए ,सैह। -शुभ शुभ बोलौ इहो! कहूं पहिले जाँकित भेलेते जुलुम भ'जेतै । -हमहूँते सपनेमे देखलियैए। आ, जँ कहूँ साँच भ'गेलै ते? - हौ दैवा! तहनते अनर्थ भ'जेतै ।ऐगला बेरिया पेट दुख काटिके चालीसगो सजरिया नोट जमा केने रहियै,जे महाजनक कर्जा सधा देबै।सभै परानी मिलके लाइनमे लगलियैते जेना तेना तीसगो भजलै आ दसगो चुलहीक मूहँमे गेलै।ऐ बेरदाते आर पचासगो दुहजरिया नोट छौंड़ीक बियाहले रखने छियै, की हेतै से नै जानि। कहै छलियै एकर बंकमे जमा क दौ सबटा से मुरछी मारने छलैन। - इहो कने थीर रहौने!यैह जँ एना करतै त' बल्लूग हम बताहे भ'जेबै । - त पूछौने ककरोसे! -ककरासे पुछियौ? सब सूतल हेतै।विहान होमय दौ तहन देखल जेतै। -विहानक भरोसे जँ रहतैते हमर परान निकैल जेतै।कने बाहर जाके देखौने! कियोने कियो जागल हेबे करतै। -बेसते देखै छियै! एतबा कहि रामधन अपन घर सं बाहर भेलते देखैये मजूर मजुरनीक जमघट लागल बरहम थानक आगांमे। सबहक ठोर पर एकेटा आखर छलै जे फेनो ओही साल जेना नै ते हेतै ।लालच बुरी बलाय।केहन बढ़ियाँ बंक मे जमा भ' गेल रहितैते आइ ई फिरीसानी नै भोगय पड़िते,से चोरुक्का जमा करैक फेरमे अपने करममे अपने आगि लगा बैसलै सब।जते मूहं ततेक बात सुनि एकटा पढ़ुवा छौंड़ा सबके दैत बजलै -एना अशान्त नै होइ जाइ जाह।तोरा सब लग दस बीसटा नोट हेतह , से आसानीसे भजि जेतह।भोगत ओ जे करोड़क करोड़ दाबिके रखने छै। जल्दी से जल्दी अपन अपन दुसजरियाके बेंकक अपन खातामे जमा कय लै जाह वा भजा लैह। -बुरतै नै ने रौ? -नैहौ!एखने समाचारमे खोंइचा छोड़ाके सबटा बात कहकैये।सब आरामसे सूतहगे एखन हँ एतबा धैर अवस्स जे जल्दी सँ जल्दी अपन अपन दुहजरियाके जगह लगा लैजाह नै ते भाड़ी फेरमे पड़ि जाइ जेबह। एखनुक सरकारके कोनो ठीक नहिं। कखन कोन दाउ खेलतै । रामधनके जी मे जी एलै। घरवालीके सबटा खघिस्सा सुनाके चैनसे सूति रहल। -प्रमोद झा 'गोकुल', दीप,मधुवनी (विहार), फोन-9871779851 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.परमानन्द लाल कर्ण- तीर्थक्षेत्रक माहात्म्य- ९ (पद्म पुराण उत्तर खंड) परमानन्द लाल कर्ण तीर्थक्षेत्रक माहात्म्य- ९ (पद्म पुराण उत्तर खंड) (गतांक सँ आगु ��..) महादेवजी आगु कहलनि - साभ्रमती नदीक तट पर खंगधार नाम सँ विख्यात परम पावन तीर्थ स्थल अछि, जे अखन गुप्त भs गेल अछि आ प्रसंगवश एहि ठाम कखनहु स्नान आ जलपान करला सँ लोकनि सव पाप सँ मुक्त भs रुद्रलोक मे प्रतिष्ठित होयत छथि । साभ्रमती नदी पाताल दिस जायत देखैत रुद्र अपना जटा मे धारण कs लेलनि आ खंगधार नाम सँ विख्यात भs ओहि ठाम निवास करs लगलाह । ओहि ठाम स्नान करला सँ पापी सेहो स्वर्गलोक जायत छथि । पार्वती ! माघ मास, वैशाख मास आ विशेषतः कातिक मासक पूर्णिमा मे जे केओ ओहि ठाम स्नान करैत छथि, ओ पाप मुक्त भs जायत छथि । वसिष्ठ, वामदेव, भारद्वाज आ गौतम आदि ऋषि ओहि ठाम स्नानक लेल आ भगवान शिवक दर्शनक लेल आवैत छलाह । जे केओ एहि स्थान पर आवि विशेषरूप सँ हमर पूजन करैत छथि तहन हुनक सव पाप तत्काल नष्ट भs जायत अछि । जे केओ एहि तीर्थ मे माटि सँ हमर मूर्ति बना कs पूजैत छथि, ओ हमर परमधाम मे निवास करैत छथि । हमर विग्रह कलियुग मे खंगधारेश्वर नाम सँ विख्यात होयत अछि । सत्ययुग मे �मंदिर� कहावैत छी त्रेता में �गौरव� । द्वापर मे हमर �विश्वविख्यात� नाम होयत अछि आ कलियुग मे �खंगेश्वर� व �खंगधारेश्वर� । एहि तीर्थ स्थलक दक्षिणबारी कात हमर स्थान अछि- ई जानि जे विद्वान लोकनि हमर मूर्ति बना कs सव दिन पूजा करैत छथि, हुनका मनोवांछित फल मिलैत छैन । ओ धर्म, अर्थ, काम आ मोक्ष - चारु पुरुषार्थ पावि लैत छथि ।
खंगधार तीर्थ सँ दक्षिण दिस परम पावन दुग्धेश्वर तीर्थ स्थल वताओल गेल अछि, जे सव पापक नाशक अछि । एहि तीर्थ में स्नान कs दुग्धेश्वर शिवक दर्शन करला सँ लोकनि पाप जनित दुःख सँ तुरतहि छूटकारा पावि लैत छथि । साभ्रमतीक तट पर जाहि ठाम परम पावन चंद्रभागा नदी मिललथि अछि, महर्षि दधीचि ओहि ठाम घोर तपस्या केने छलथि । ओहि ठाम कएल गेल स्नान, दान,पूजा आ तप आदि सव शुभ काम दुग्धतीर्थक प्रभाव सँ अक्षय भs जायत अछि ।
दुग्धेश्वर तीर्थ सँ पूव दिस एक टा परम पावन तीर्थ अछि, जाहि ठाम साभ्रमती मे चंद्रभागा नदी मिलैत अछि । ओहि ठाम पुण्यदाता चंद्रेश्वर नाम सँ महादेव सव दिन विराजमान रहैत छथि । जे सव लोकनिकक सुखदायी, परम महान आ सर्वव्यापी छथि । एहि तीर्थ स्थल पर चंद्रमा कतेको बरख तप केने छलाह आ वएह चंद्रेश्वर नाम सँ महादेवक स्थापना केने छलाह । ओहि ठाम स्नान, ध्यान आ शिवक पूजा करला सँ लोकनि धर्म आ अर्थ पावैत छथि । जे केओ ओहि ठाम विशेषरूप सँ वृषोत्सर्ग आदि काम करैत छथि, ओ पहिले स्वर्ग भोगि शिव धाम जायत छथि । जे केओ दोसर दिस जा के चन्देश्वर नाम सँ शिवक अर्चना करैत छथि आ रुद्र मंत्रक जाप करैत छथि, हुनका शिवरूप समझवाक चाही । जे केओ एहि ठाम सव दिन स्नान करैत छथि, हुनका निःसंदेह विष्णु स्वरूप समझवाक चाही । जे तिलपिण्ड सँ एहि ठाम श्राद्ध करैत छथि, ओ सहो एहि प्रभाव सँ विष्णुधाम जायत छथि । एहि ठाम विधि विधान सँ स्नान आ दान करला सँ ब्रह्महत्या आदि पाप सँ सेहो छुटकारा पावि लैत छथि । जे केओ एहि तट पर विशेषरूप सँ वटक गाछ लगावैत छथि, ओ देहान्तोपरांत शिव पद पावैत छथि ।
दुग्धेश्वर तीर्थ लग एक टा अति पावन आ रमणीय तीर्थ स्थल अछि, जे एहि पृथ्वी पर पिप्पलाद नाम सँ प्रसिद्ध अछि । देवेश्वरी ! ओहि ठाम स्नान-ध्यान आ खान- पान करला सँ ब्रह्महत्याक पाप दूर भs जायत अछि । साभ्रमतीक तट पर पिप्पलाद तीर्थ गुप्त अछि । ओहि ठाम स्नान करला सँ लोकनि मोक्षक भागी होयत छथि । ओहि ठाम विधि विधान सँ पीपरक गाछ लगावsक चाही । एना करला सँ लोकनि कर्म बंधन सँ मुक्त भs जायत छथि । पिप्पलाद तीर्थ सँ आगु साभ्रमतीक तट पर निम्बार्क नाम सँ नीक तीर्थ स्थल अछि, जे व्याधि आ दुर्गंधक नाश करैत अछि । पूर्वकाल मे कोलाहल दैत्यक संग युद्ध मे दानव सँ परास्त भs देवता लोकिन सूक्ष्म शरीर धारण कs गाछ मे समा गेल छलाह । ओहि ठाम गेला पर विशेष रूप सँ भगवान सुरजक पूजन करवाक चाही । सुरजक पूजन सँ मनोवांछित फल मिलैत अछि । जे केओ एहि तीर्थ स्थल पर सुरजक बारह टा नामक पाठ करैत छथि, ओ जीवन भरि पुण्यात्मा बनल रहैत छथि । जे केओ बारह नामक ( आदित्य,भास्कर, भानु, रवि,विश्वप्रकाशक, तीक्ष्णांशु, मार्तण्ड, सूर्य,प्रभाकर, विभावसु, सहस्राक्ष आ पुषा) पाठ करैत छथि, ओ धन,पुत्र आ पौत्र पावैत छथि । जे केओ एहि मे सँ एक- एक टाक नामक उच्चारण कs सूर्यदेवक पूजन करैत छथि, बाभन सात जन्म धरि धनाढ्य आ वेदक पारगामी होयत छथि । क्षत्रिय राज्य, वैश्य धन आ शुद्र भक्ति पावैत छथि ।
निम्बार्क तीर्थ स्थलक वाद तीर्थराज नाम सँ एक टा उत्तम तीर्थ स्थल अछि, जाहि ठाम सात टा नदी बहैत अछि । दोसर तीर्थक अपेक्षा एहि ठाम स्नान करला सँ सऔ गुणा पुण्य मिलैत अछि । एहि ठाम साक्षात् भगवान वामन विराजमान छथि । जे केओ एहि ठाम माघ मास मे तिलकी धेनुक दान करैत छथि, ओ सव पाप सँ मुक्त भs अपन सोऔ पीढ़ी केर उद्धार करैत छथि ।जौ एहि ठाम शुद्ध चित्त सँ तिलमिश्रित जल पितर के अर्पित कएल जाय, तहन कोटि बरख धरि श्राद्ध कर्म सम्पन्न भs जायत अछि । जे केओ एहि तीर्थ स्थल पर ब्राह्मण के गुड़ आ खीरक भोजन करावैत छथि, एक बाभन भोजन करेला पर हुनका सहस्र बाभन भोजनक फल मिलैत अछि ।
तदनन्तर , साभ्रमतीक तट पर गुप्त रूप सँ स्थित सोमतीर्थक यात्रा करवाक चाही, जाहि ठाम कालग्निस्वरूप भगवान शिव पाताल सँ प्रकट भेल छलाह । सोमतीर्थ मे स्नान कs सोमेश्वर शिवक दर्शन करला सँ निःसंदेह सोमपानक फल मिलैत अछि । जे केओ सोम दिन भगवान सोमेश्वरक मंदिर में दर्शनक लेल जायत छथि, ओ सोमलिंगक कृपा सँ मनोवांछित फल पावैत छथि । जे उज्जर फूल, कनेरक फूल आ पारिजातक प्रसून सँ पिनाकधारी श्रीमहादेवक पूजा करैत छथि, ओ परम उत्तम शिवधाम पावैत छथि ।
ओहि ठाम सँ कापोतिक तीर्थक यात्रा करवाक चाही, जाहि ठाम साभ्रमती पश्चिम दिस बहैत छथिन । जे केओ वैशाखक पूर्णिमा मे एहि तीर्थ स्थान पर स्नान कs पियर सरसों सँ परम उत्तम प्राचिनेश्वर नाम सँ शिवक पूजा करैत छथि, ओ अपनेक तs तरि जायते छथि संगहि संग पितर आ पितामह के सेहो उद्धार कs दैत छथि । ई वएह स्थान अछि, जाहि ठाम कबूतर अपन अतिथि केर प्रसन्नताक लेल अपन शरीर दs देने छलथि आ विमान पर बैसि समस्त देवताक मुख सँ अपन प्रशंसा सुनैत स्वर्गलोक चलि गेल छलथि।तखन सँ ओ तीर्थ कपोत तीर्थ सँ विख्यात भेल। ओहि ठाम सँ स्नान- ध्यान आ खान-पान करला सँ लोकनि ब्रह्महत्याक पाप सँ मुक्त भs जायत छथि ।
ओहि ठाम सँ आगु काश्यप ह्रद लग गोतीर्थ अछि, जे सव तीर्थ मे श्रेष्ठ आ महापातकक नाशक अछि । गोतीर्थ मे स्नान करला सँ ब्रह्महत्या एहन पाप सेहो कटि जायत अछि , ताहि मे कोनो संदेह नहि । जे केओ ओहि ठाम स्नान कs गाय के एक दिनक भोजन करावैत छथि, गो माताक प्रसाद सँ ओ मातृ ऋण सँ मुक्त भs जायत छथि । जे केओ गोतीर्थ मे स्नान कs श्रेष्ठ बाभन के दुधारू गायक दान करैत छथि, ओ ब्रह्मपद पावैत छथि ।
एहि ठाम एक दोसर महान तीर्थ स्थल सेहो अछि,जे काश्यप कुण्डक नाम सँ विख्यात अछि । ओहि ठाम कुशेश्वर नाम सँ महादेव विराजमान छथि । ओहि ठाम कश्यप जी सँ वनाओल गेल नीक कुण्ड अछि । एहि मे स्नान करला सँ लोकनि नरक मे नहि जायत छथि । एहि तट पर सव दिन अग्निहोत्र करs वाला आ वेदक स्वाध्याय मे लागल कतेको शास्त्रक ज्ञाता निवास करैत छथि । जे काशीक माहात्म्य अछि, वएह माहात्म्य ऋषि निर्मित एहि नगरीक अछि कलियुग में ई तीर्थ स्थल महापातकक नाश करs वाला अछि । ओहि ठाम सँ भूतलाय तीर्थ स्थल दिस गमन करवाक चाही, जे पापहारी उत्तम तीर्थ स्थल अछि । ओहि ठाम भूतक निवासभूत वटक गाछ अछि जाहि ठाम पूव दिस चंदना नदी बहैत अछि । भुतालय मे स्नान कs जे केओ वटक गाछ केर दर्शन करैत छथि, भगवान भूतेश्वरक कृपा सँ हुनका कोनो भय नहि होयत छैन । ओहि सँ आगु घटेश्वर नाम सँ तीर्थ स्थल अछि जाहि ठाम स्नान आ दर्शन करला सँ लोकनि निश्चय मोक्षक भागी होयत छथि । ओहि ठाम जे केओ विशेष रूप सँ पाकरिक पूजा करैत छथि, ओ एहि पृथ्वी पर मनोवांछित फल पावैत छथि ।
तत्पश्चात वैद्यनाथ नाम सँ तीर्थक यात्रा करी । एहि ठाम स्नान कs विधि-विधान सँ शिवजीक पूजा करी । एहि ठाम पितरक तर्पण करला सँ समस्त यज्ञक फल मिलैत अछि । एहि ठाम देवता सँ प्रकट भेल विजय तीर्थ अछि, जेकरा दर्शन सँ लोकनि मनोवांछित फल पावैत छथि ।वैद्यनाथ तीर्थ सँ आगु उत्तम देवतीर्थ अछि, जे समस्त सिद्धि प्रदाता अछि । एहि ठाम धर्मराज युधिष्ठिर राक्षसराज विभीषण सँ कर लs के राजसूय यज्ञ केने छलाह । नकुल दक्षिण मे विजयी भेलाक उपरांत साभ्रमती नदीक तट पर भक्ति भाव सँ पाण्डुरार्य्या नाम सँ विख्यात देवीक स्थापना केने छलाह, जे भोग आ मोक्ष प्रदायनी अछि । साभ्रमतीक जल में स्नान कs पाण्डुरार्य्या केर नमन करs वाला लोकनि अणिमा आदि आठू सिद्धि आ मेधाशक्ति पावैत छथि । जे केओ शुद्ध भाव सँ पाण्डुरार्य्याक नमन करैत छथि , मानु हुनक एक बरखक पूजा सम्पन्न भs गेल अछि । जे केओ एहि ठाम मरैत छथि, ओ कैलाश शिखर पर पहुँच भगवान चंद्रेश्वरक गण होयत छथि ।
एहि तीर्थ स्थल सँ आगु चण्डेश नाम सँ उत्तम तीर्थ स्थल अछि, जाहि ठाम ऐश्वर्य प्रदायी भगवान चण्डेश्वर सव दिन निवास करैत छथि । हिनक दर्शन सँ लोकनि सव पाप सँ मुक्त भs जायत छथि । सव देवगण मिल एक नगरक निर्माण केने छलाह, जे भगवान चण्डेश्वर नाम सँ विख्यात अछि । ओहि ठाम सँ आगु गणपति तीर्थ अछि , ओहि ठाम स्नान करला सँ लोकनि निःसंदेह मुक्त भs जायत छथि । एहि प्रकार साभ्रमतीक पावन तट पर लोक कल्याणक कामना सँ पृथ्वीक सव तीर्थ केर परित्याग कs जे केओ भगवान रुद्र मे भक्ति राखैत जितेंद्रिय भाव सँ श्राद्ध करैत छथि ,ओ शुद्ध चित्त भs सव यज्ञक फल पावैत छथि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.लालदेव कामत-आर्यावर्तके कौटिल्य'क दृष्टि ओ कूटनीति लालदेव कामत आर्यावर्तके कौटिल्य'क दृष्टि ओ कूटनीति चाणक्य मात्रे मानवतावादिए टा नहि रहथि,ओ प्रकृति केर समस्त वस्तुमे गुरूत्तर विचार संयोगने छलाह। जीव - जन्तु धरि सँ सीख लेमय गुणग्रहण करबाक अनुसंशा कयलन्हि। चिन्तन - मनन चाणक्यके पकठोस हुनक विचार! अध्ययन - अनुकरण जे करय, निखसय सकल बिकार!! मैथिली साहित्यकार चन्द्रनाथ मिश्र 'अमर' चाणक्य मादे कहने रहथि-: "महाकाव्य 'क संदर्भमे लगधक ६० साल पूरवहि दीनानाथ पाठक 'वन्धूक' मैथिली पोथी बीर रसक महाकाव्य लक्षणामे जतबा कहल गेल छैक,तकर सम्पूर्णक पूर्ति तँ कम्मे ठाम भेटत। एहिमे संक्षिप्तीकरण आ कविता तंँ आब छन्दोक बन्हन सँ मुक्त रहैछ। तेँ छन्दोवध्द काव्य रचना कयनिहार प्राचिनवादी कहेबाक उपहास सँ नहीं बँचैतछथि।" रवि आ अनल पर कवि जीके व्याख्यान ओहि पोथीमे सुधि पाठक पढ़ि ताहिक ब्राह्मण समाजमे उपादेयता बढ़ल देखल रहल अछि। तकर व्यापक चर्चा पुर्न प्रकाशित अनुप्रास प्रकाशन सं दू शाल पूर्व पोथी छपला पर भेल रहैक। जँ जग जल नहिं होइत, उर्जस्विता केर वाद आब श्री राजकिशोर मिश्र जी सम्पूर्ण मानव समाज लेल कौटिल्य : विष्णुगुप्त केर जीवन गाथाकेँ मैथिली खण्ड काव्य रूपेँ 'आचार्य - चाणक्य ' नवारम्भ - दिल्ली सँ मई २०२५ मेँ छपौलनि हेन। एहि ग्रन्थमे १२० पृष्ठ छैक,जकर किमत ३०० टाका लागल गेलैक। नीक कागतमे छपाई आर.के. ऑफसेट प्रोसेस, नवीन शाहदरा - पुरना डिल्ली सँ भेल छैक। सद्यप्रकाशित " आचार्य - चाणक्य " केँ कविवर राजकिशोर मिश्र जी अपन पितामह स्व० कलाधर मिश्र साकिन - अड़ेर डीहटोल केँ समर्पित कयलाह अछि। मुद्रण सँ पूर्व ऐहिक पाण्डुलिपिक शिघ्रता सं टंकण काज लेल अपन धर्मपत्नी श्रीमती अनीता मिश्र जीकेँ धैनवाद देवा सँ नहिं चुकल छथि। कथाभाग आओर आखरि छठम् सर्गमे कौटिल्य नीतिक प्रचलित विवरण दैत प्रबन्ध - काव्य पूर्ण कयलाह अछि। बहुआयामी व्यक्तित्वक धनि विष्णु गुप्तक उर्फ आचार्य चाणक्य जिनका कौटिल्य नामे सेहो जानल गेल रहय,तिनका उपर श्री मिश्र जी खण्ड काव्य रचना कऽ उत्कृष्ट कार्य कयनिहारमे अपन नाम शुमार करौलाह अछि। अर्थ शास्त्र, बौद्ध ग्रंथ-'महावंश' ,जैन ग्रंथ 'परिशिष्ट पर्वन' , विशाखदत्तक लिखल ' मुद्राराक्षस ' नाटक , मेगास्थनीज द्वारा लिखित पोथी 'इंडिका ' आ किछु पुराण सभक विशद् अध्ययन कय राजकिशोर मिश्र जी एक अभिनव प्रयोग कय मातृभाषा मैथिली क अक्षय भंडार केँ भरलाह अछि। सनातन धर्मक लोक लगधक ३७५ ई० पूर्वके एम्हर २३०० लगायत पूर्वके बरख सं समाजमे चलैत व्यवहारिक पक्षकेँ प्रणयन कय अपन नैतिक कर्तव्यक एक शोध कवित रुपेँ कयलाह हेन। हिनक रचनामे जे लालित्य आ तथ्य छन्हि से हमरा बुते अकथ्ये रहि जाएत। तकर कारण जे मूल पोथी तँ मनोयोग पूर्वक पढ़ि गेलहुँ आ पाठकीय प्रतिक्रिया लेखन काज आरम्भ करय सँ पहिनेहि १० जून -२५ केँ आठ बजे रौंद ४२� रहैक आ खेरही खेतमे आधहा दवाय छिटल पार लगले छल कि लूह लागि गेल। अचेत अवस्थामे मोटर बाइक सँ भातीज आ छोटपुत्र प्राथमिक उपचार लेल अमही बाध सँ गामपर लाधि अनलक। १५ दिन सँ अशक्तपना द्वारे दोहरौनी पोथी पढनाई बाँकिये रखने छी,आ किछु - किछु पाँति देख मनन करयमे लागल छी। कलहन्त मोनमे स्वस्थ्य बुध्दि सेहो तँ निपत्ता भ' जाई छैक किनै। तैयो साहित्यिक प्रसंग - विचार हमरा नीक लगैत य, बनसवृत राजनीतिक संवाद मोबाइल पर नहिं अरघैत अछि। मुदा जिला जबारक सह संयोजक आ अपना विधानसभा'क कार्यक्रम प्रभारी नियुक्त रहने तँ कोनू दिन एहन नहिं बितैत अछि जे दूसय गोटेय सँ वार्ता नहिं करैत होय! ताहि पर सँ संस्था- समितिक' जुरावक जे दायित्व थोपल अछि सेहो सक्रियता पूर्वक निमाहैत रहलहुं अछि। मुदा फेसबुक 'क ५००० मित्रगण जेकाँ जिगेसा करय धरातल पर अपवाद छोड़ि नहियें कियो देखय आयल। आ जे सभ अयलाह हुनका प्रति विनम्र भावे आभार अछि। पोथी'क पाठकीय प्रतिक्रिया समय सँ लिखब मुख्य विषय थीक, आन बात ओनहिना अपनेकेँ बुझेबा लेल लिख देल,कृपा कऽ के अन्यथा नहिं लेब! हँ तँ कहय चाहैत रही आचार्य चाणक्य पर ई एकटा पैघ काज कयलाह श्रध्देय राज किशोर मिश्रजी। हिनक बहुत रास प्रकाशित पोथी हमरा पढ़ल अछि आ बेसितर पोथीक समीक्षा सेहो लिख विभिन्न पत्र-पत्रिका आओर इन्टरनेट पत्रिकामे प्रकाशनार्थ पठोने छलहुँ। अभिलाषा तं मोनमे विशेष औंटने- पौरने छी, कदाचित ई आलेख हम छपल देख पाएब वा नहिं? अद्भुत साहित्यिक उल्लास सँ रचल एहि पोथीक पन्ना- पन्नाक पावस ऋतुक मन्द- मन्द वसात सं तरंगीत होइए। आ पाठककेँ ई पोथी पढ़ैत सेहो मोन कम तरंगीत नहिं हेतन्हि। कविवर श्री मिश्रजी अपन दू आखरके माध्यम चाणक्य ओ चन्द्रगुप्त मौर्य सँ संबंधित ग्रन्थ सभमे उपलब्ध जनतबमे एकरूपता ओ समानताक सर्वथा अभाव गच्छलनि हेन। तें एहि विषय पर विद्वान लोकनिक बीच मैतक्य रहला कारणेँ कथामे सर्वमान्य जनतबकेँ आधार बनाबैत एहि खण्ड काव्यके पाठक हाथमे देलनि अछि। मानव समाजक बीच एहन अद्वितीय विद्वान, कूटनीतिज्ञ ओ कालद्रष्टा पर वृहद् काव्य -रचना करैत पोथी विलक्षण पोथी उपस्थित कयलाह से स्तुत्य काज हमरा नजैरमे भेल य। भारत देश स्वतंत्र भेलासन्ता आजादी आन्दोलनके सर्वश्रेष्ठ प्रणेता महात्मा गांधी जी - बापू कहौलाह,परंच ओ संवैधानिक पदधारी कथमपि नहिं बनलाह। ओ भारतीय मीशन केर रहस्य बुझि जेना आचार्य चाणक्य चाहितथि तँ नरेश स्वयं बनि सकैत छलाह,मुदा ओ शिष्य केँ राजा रूपें देखलनि। तें कवि जीक एहि संदर्भ म पाँति जे सृजल गेल छैक से हृदयके अतरतल केँ छुबैत छैक। यथा-: नहिं चाही जिनका सिंहासन नहिं सुख - सुविधाकेँ सोह लोक - हित लेल निज ज़िन्दगी सँ जिनका नहि कनिको मोह 1 एकटा दोसरो पाँति देखू -: ....... ओ जुग - द्रष्टा , ओ जुग - स्रष्टा भारत भूखण्डक स्वाभिमान सहस्त्राब्दीमे कहियो - कहियो लै छथि जनम एहन श्रीमान l मगध सम्राट धननन्द ,हुनक महाअमात्य राक्षस आ साम्राज्यक मंत्री शकटार केर अछैत मौर्य साम्राज्यक निर्माता रूपेँ चाणक्य,एहि वंशक मगध सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य , तक्षशीलाक राजकुमर - आम्भीक मादे विस्तृत प्रसंग पाठक पढ़ि गुणताह। दोसर दिस पंजाबक राजा - पर्वतेश्वर (पोरस,पौरव) आ यवन सम्राट - सिकन्दर ,तकर सेनापति सिल्यूकस'क पारिवारिक सदस्यक दुश्मनी केँ कोना मैत्री आ संवंधीधरि बनाओल गेलैक से पाठक बुझि अचंभित रहताह। खूब गहींरपन सँ प्रायः सब पात्रक भूमिका'क निर्वहन आ समन्वय सँ नेपथ्यक चाणक्य कूटनीति सुस्पष्ट झलकैत बुझाइछ। आचार्य चाणक्य बावत जे समान्य मान्यता बौद्ध धर्मावलंबी'क बीच आयल अछि,ताहि सँ अन्तर जैन समाजमे मानता छैक। मुदा सनातन धर्मक अनुयायी संहार करैत नहिं पाबि बंदी रूपेँ वादमे दृष्टांत देखाईछ। आर्यावर्तक ऐयाशी पूर्वक राजपाट करयबाला राजा सबमें आपसी दुश्मनी सँ फराक संबंध रहैत आयल छैक। तेँ विदेशी आक्रमणकारी शत्रु राजा केँ फबि जाए। चेतौनी कयलोपर मानै ले तैयार नहिं होइक। पाँति द्रष्टव्य -: महाराज ! ई बात सुनय जाए आर्यावर्त अछि बड़ विपतिमे यवन - सेना पश्चिम - उत्तर मह ओतऽ मेल ने कोनो - नृपत्तिमे । देखू तँ आर्यावर्तके हितमे एकोटा युद्ध नहिं छैक। आ एहि तरहेँ कथाक्रम बढ़ैत छैक। सब सर्गमे पांतिक निमन झलक पाबि पाठक नेहाल भ' उठता आ पाठकके सराहला सँ श्रीमिश्रजी कृत-कृत्य भऽ उठताह। हुनक पत्थलतोर श्रम सँ ई समग्र रचना स्वयंमे पुलकित भ' रहल अछि अतिशय रोचकता सं भरल सम्पूर्ण खिस्सा आ कत्थेतर पात्रक चरित्र चित्रण तथा भाउ सुस्पष्ट रहला सँ पाठककेँ कतहुँ कोनू प्रसंग बुझबामे जटिल नहिं लगैत छैक।यथा -: बीतल बेसीए दूं सहस्त्राब्दी मुदा ,जीबते अछि चाणक्य - नीति सद्नीति , अर्थनीति , राजनीति ओहिमे सनातनक जीवन- रीति। एक समय महाकवि पं० लाल दास जी ,जे मैथिली रामायण ' रमेसर- चरीत' के रचनाकार ,कविश्वर चन्दा झाक समकालीन भेल छलाह; कियाक तँ ओही राज आश्रित रहथि आ कयने रहथि मैथिलीमे रामायण'क रचना। से लाल दास जी सबसँ बढ़िकय एक पृथक सँ पाठ- पुष्कर कांड लिखकय। तहिना कवि राजकिशोर जी अपन नविनतम रचना ' आचार्य चाणक्य ' मेँ पृथक सँ छठम् सर्ग आखरिमे जोड़ैत प्रचलित चाणक्य नीति केँ काव्य रुपेँ प्रस्तुत कय वर्तमान समाज आ भविष्यक अध्येता- शोधार्थिगण लेल एक अनुपम दृष्टांत धरि दैत भविष्यक चिन्ता कयलाह हेन। जेना -: बेटा ओ जे बातकेँ मानथि दोस ओ जे होअय विशबासी भार्या पति- सुख बुझथि महान। ऐ तरहें पृष्ठ ११३ सँ १२० धरिमे अनेकों चयनित अंशक अवलोकन पाठक कऽ सकैत छी। दोसरो एकटा सिरजल पाँति देखल जाए-: सुन्दर वचन सुनि ककर नहि हरखित होइत अछि मोन ? बाजयमे कोन कैंचा - कौड़ी ? किरपनताक परोजन कोन ? मैथिली लेखनक प्रेरणा स्रोत हिनका किनकर रचना प्रेरित कयलकन्हि जे हिन्दीक बाट छोड़ि मातृभाषामे श्रीमान मिश्र जी कविता संग्रह मेघपुष्प,चाननि, नव पात- नव बात, उपायन, सप्तपर्ण,नव घर उठय- पुरान घर खसय ,प्रलय पाश, टेमी,जिनगीक सोनसन पाँखि ,उबेर, कनक कदलि, उगरास, सभ्यताक भ्रम , ई संसार,नहि रहतै आब गाम पोथी रचलनि। आचार्य चाणक्य सृजन कय लेखकीय उर्जा अपन चौथापन वयक्रम अजस्र रूपें आरो बढ़ा लेलनि से झलक अगिला पोथी बहराईते थाह चलि जाएत। -लाल देव कामत, नौआबाखर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। पद्य ३.१.राम शंकर झा "मैथिल"-ठकहरबा ३.२.प्रमोद झा 'गोकुल'-रोपब लात हम तकरा मत्था ३.३.जगदानन्द झा 'मनु'- बीसटा हाइकू ३.१.राम शंकर झा "मैथिल"-ठकहरबा राम शंकर झा "मैथिल" ठकहरबा जानि नहिं हअमर निन कतह हेरा गेल कोना कए हेराअ गेल कोन गाम कोन बाट ने कोनो सुधि ने कोनो बुद्धि जानि नहिं हअमर....! केहन स्नेह केहन प्रीति कोन डोरा सँ बनलहूँ हे सप्ताह माई हे विप्ताह माई ज्यों हअमर निहोरा सुनि कतेको रैव कतेको शैएन ई जन्म के कहाअ सातो जन्म अहिं कें गोर आंचर पसारब कनेक मैत फेरि दियौ कनेक सुधियौ तअ लेताह जानि नहिं हअमर....! पेंईच ळ कतेक जतन सँ जाहि बाड़ी मे रोपलैथ झुमनी, सजमैन केराअ सगरों टोल गाअम पूछि रहल कहिया काटब केराक घौउंर कोनाक कहिए के पतिएता कबुला केने छि मने-मन हे भगवती हे दीनानाथ ज्यों कुशलेछेम आबि जेताह पहिल छिमी सिरा आगु.. जानि नहिं हअमर....! भोरक भुरूकबा सँ घर दुहारि आ निपी अंगना चट कखनो कोलखी आबि चट कखनो भन्साघर आबि चूल्हाक आंच कखन मिझाएळ ने किछु सुझि रहल अछि ने किछु बुझि रहल छि कखन अधहन खौलल कखन तरकारि सिझअळ कहैत ननैद साउस आ दिआदनि कनियां कें अझट लागल देखाउ हिनका ओझा-गुणी दुहाई हे कमला माअय जनिह हे उगलाहा दयैब जानि नहिं हअमर....! भगवती कें पातैर दैत तुलसी चौरा जल ढ़ारैत एक संझा सङ्ग एकादशी बटुक-कुमाईर खुआबि जानि नहिं हअमर...! अन्हा कें कूटल सिलौट लोरही सेहो घसाअल मुदा नहिं घसाअल अन्हा कें लगाओल हअमर हाथक मेंहदी जानि नहिं हअमर...! दलान घरक पछुऐत मे नानी कें देल अन्हा कें रोपल सिंघापुरी केरा कें गाछ कि आसिन कि भादो मास टिपीर टिपीर मेघ बरैस रहल केराअक पाअत पअर बुन्नी ऐना छिटैक रहल अछि जेना अन्हाक जुल्फीक छिंट ई केराक पाअत टिपीर टिपीर जेना सखुआ कांटाक टीस जानि नहिं हअमर....! हे छठी माय हे चौठी चान अन्हा मीरा कें दर्द सुनलहूँ सत्यभामाक दर्द बुझलहूँ अन्हा ककर नहिं दुःख हरलहुँ हअमर कहिया कखन हरब माअ देल ई गेरुआ बहिनक देल ई सूजनी जाहि पअर लिखल प्रीति सङ्ग मैथिल मुदा आब हअम एहि गेरुआ एहि सूजनी मोटका आखर मे लिखब प्रीति सङ्ग ठकहरबा... ठकहरबा..ठकहरबा..!! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.प्रमोद झा 'गोकुल'-रोपब लात हम तकरा मत्था प्रमोद झा 'गोकुल' रोपब लात हम तकरा मत्था रूप बसन्ती काया तोहर हमहूँ सजलौं भेलौं लाल । चल घर सँ निकलै जाइ जो देशक भीतर ढुकलौ काल ।। धवल हिम उत्तुंग शिखर पर चमकै शिव त्रिशूल विकराल । विंध्य गिरि पर दुर्गा हुम्हरथि सुनिले स्वर खर्गक तत्काल ।। गंगा यमुनाक स्वर लहड़ी मे माँ भारतीक करुण पुकार । भीतर बाहर जे शत्रु संवाहक झटसे करू एके संग संहार ।। हे भारतक धीर वीर बेटा बेटी ! हुरदंगी आतंकीके दियौ गलहत्था । सीमा पर जे ढीठ डीठ देखाबय रोपब लात हम तकरा मत्था ।। -प्रमोद झा 'गोकुल', दीप,मधुवनी (विहार), फोन-9871779851 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.जगदानन्द झा 'मनु'- बीसटा हाइकू जगदानन्द झा 'मनु' बीसटा हाइकू १. भाग रामकेँ वनवास देलक कर्मेँ ईश्वर २. लाबा छीटलौं आंजुर भरि भरि भेटल बूढ़े ३. स्वर्गक बाट नै आसान रहलै बिन मरने ४. कोरामे नेना भुखे छल व्याकुल चोर बनलौं ५. मायक दर्द दोसर बुझत के नेना पोसैमे ६. हे महामाय एतेक अत्याचार कोना सहै छी ७. सभ चलाक अपनाकेँ बुझै छै दोसराकेँ नै ८. चुरा अचार बिन दही खाइ छै बेबस लोक ९. पीठक पाछू आइ तँ सभकियो लूटब चाहै १०. घर अँगना सगरो छै चमकै भौजीकेँ एने ११. गाछीमे फल बाड़ीमे तरकारी परिश्रमसँ १२. हमर काज परिश्रम केनाइ बिन चिंताकेँ १३. सूप कोनियाँ घरसँ बिला गेलै पैकेट एने १४. पुतहु बौक बेटी बज्जककैर बड़ पसिन १५. बहुत कम ठोप कयल माथ गामो घरमे १६. बताह नहि भलमानुस जकाँ हम चुप छी १७. टाकाक खेल सभसँ अपनाकेँ दूर क दै छै १८. बिन इजोते आन्हर बनि गेलै लोक रातिमे १९. एसगरमे भीतरक राक्षस बाहर एलै २०. सोनाक मोल बिकाइत छै झूठ आदालतमे -जगदानन्द झा 'मनु', मोबाइल न० ९२१२४ ६१००६ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। 1 || विदेह ४२१ विदेह ४२१ || 1
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MeO | di ey विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् oe : \ oe सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर
if fidcaoa Phy. : “ = rz a Se > डे है jay डे [Er i हि ५ \ Yah [No biog i SS बी... ni, NS Wy ee ONS TS wil | j ae | (८0२०००- २०२५, विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X (८)३०००- 2028 RTS: ArT CAAT नादिक क-नजिका ISSN 2229-547X =