VIDEHA — Issue 422 / अंक ४२२

Publication: VIDEHA · Issue: 422
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विदेह ४२२ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। [विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X Videha e-Journal (since 2000) at www.videha.co.in ] ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। कॉपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२५. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२५. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA. सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@gmail.com. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover design: AUM GAJENDRA THAKUR VIDEHA:422 समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा। मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अनुक्रम [विदेह ४२२ म अंक १५ जुलाइ २०२५ (वर्ष १८ मास २११ अंक ४२२)] गद्य २.१.मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-११ (पृष्ठ ३-९) २.२.हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान -३ (पृष्ठ १०-२१) २.३.मुन्नाजी-त्वरित कविता :: संक्षिप्त परिचय (पृष्ठ २२-२५) २.४.प्रणव कुमार झा- स्नातकोत्तर चिकित्सा प्रशिक्षण(PGME) मे हेल्थ इकोनॉमिक्स (पृष्ठ २६-३४) २.५.मुन्नाजी- दिल्ली ०६ जुलाई २५ कें पूर्वी दिल्लीक लक्ष्मी नगर स्थित मौर्या कम्पलेक्स मे आयोजित भेल बीहनि कथा गोष्ठी (पृष्ठ ३५-३८) २.६.परमानन्द लाल कर्ण-किस्मतक खेल (कथा) (पृष्ठ ३९-५२) २.७.प्रीतम कुमार निषाद- आचार्य-चाणक्य(खण्ड-काव्य)मादे,मैथिली केँ सेवैत : कविश्री राजकिशोर मिश्रा (पृष्ठ ५३-६६) २.८.प्रमोद झा 'गोकुल'-गबदी (पृष्ठ ६७-६९) २.९.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा- आन दिनक अप्पन (पृष्ठ ७०-७२) २.१०.शीला कुमारी आ प्रो. दमन कुमार झा- त्रिकोणक एक कोणक कथाकार : शैलेन्द्र आनन्द (पृष्ठ ७३-८२) पद्य ३.१.प्रणव कुमार झा- संघर्ष आ तपन (पृष्ठ ८४-८८) ३.२.प्रमोद झा 'गोकुल'-रचू खेलौना गीत (पृष्ठ ८९-९०) ३.३.जगदानन्द झा 'मनु'- बीसटा हाइकू (पृष्ठ ९१-९९) ३.४.शिवानी मिश्र-पश्चाताप ( कविता) (पृष्ठ १००-१०१)

गद्य २.१.मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-११ २.२.हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान -३ २.३.मुन्नाजी-त्वरित कविता :: संक्षिप्त परिचय २.४.प्रणव कुमार झा- स्नातकोत्तर चिकित्सा प्रशिक्षण(PGME) मे हेल्थ इकोनॉमिक्स २.५.मुन्नाजी- दिल्ली ०६ जुलाई २५ कें पूर्वी दिल्लीक लक्ष्मी नगर स्थित मौर्या कम्पलेक्स मे आयोजित भेल बीहनि कथा गोष्ठी २.६.परमानन्द लाल कर्ण-किस्मतक खेल (कथा) २.७.प्रीतम कुमार निषाद- आचार्य-चाणक्य(खण्ड-काव्य)मादे,मैथिली केँ सेवैत : कविश्री राजकिशोर मिश्रा २.८.प्रमोद झा 'गोकुल'-गबदी २.९.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा- आन दिनक अप्पन २.१०.शीला कुमारी आ प्रो. दमन कुमार झा- त्रिकोणक एक कोणक कथाकार : शैलेन्द्र आनन्द २.१.मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-११ कल्पना झा मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-११ 'व्यास' जीक जीवनक एकटा चूक ई एकटा अकाट्य सत्य अछि, जहिना कोनो लेखकक समग्र रचना संसार पर नजरि खिराएब तँ सभटा स्तरीयए नहि भेटि सकैत अछि। तहिना कोनो व्यक्ति विशेष मे मात्र गुणे-गुण नहि भेटत वा हुनकर कएल सभटा कृत्यक प्रशंसे नहि भ' सकैत अछि समाजक लोक द्वारा। कोनो ने कोनो चूक एहेन भइए जाइत छैक हरेक मनुष्य सँ, जकर निंदा (कनफुसकी) होमए लागैत छैक। एकरा एहि तरहेँ कहल जा सकैत अछि, जे लाख सचेष्ट रहलाक बादो, जानि बूझि क' नहि सही, अनजाने मे सही मुदा जीवन मे कोनो ने कोनो भूल-चूक सभ सँ भइए जाइत छैक। हिन्दी में कहल जाइत छैक "इंसान गलतियों का पुतला है" से सभक सुनल होएबे करत। मतलब मनुष्यक वश के बाते नहि छैक जे आजीवन किछु गलती नहि करत।

एतेक भूमिका बान्हब आवश्यक छलए एहि कारणेँ, जे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एकटा एहन व्यक्तित्व छथि, जे सम्माननीय टा नहि पूजनीय छथि हमरा लेल। मुदा "यथार्थ जे अछि से लिखबाक चाही हमरा" ई बात बेर-बेर दिमाग मे आबि रहल अछि। संगहि विदेह टीम 'अभिनन्दन ग्रन्थ' प्रकाशित करबा सँ बाँचैत रहल अछि, सेहो दिमाग मे आबि रहल अछि बेर-बेर। आ तैँ आइ हुनका द्वारा भेल एकटा चूकक गप्प क' रहल छी।

जेना कि पहिनहि चर्चा कएल अछि, 'व्यास' जीक परम भक्त छलाह हुनकर अनुज महेन्द्र झा। मर्यादा पुरुषोत्तम रामक अनुज लक्ष्मण सन आज्ञाकारी आ हनुमान जी सन भक्त। से महेन्द्र झा आज्ञाकारिता आ भक्तिक उदाहरण प्रस्तुत करैत पढ़ि-लिखि अपन डिग्री (लॉ) ताख पर राखि गाम ओगरि क' बैसि गेलाह, अग्रजक इच्छाक मान राखैत। भाए-भाउजक जीबैत धरि गामक सम्पत्ति पर अनुज महेन्द्र झा आ हुनक पत्नी फूल दाइक सर्वाधिकार रहलनि। माने अग्रजक सोझाँ कोनो तरहक आर्थिक-मानसिक कष्ट नहि झेलए पड़लनि महेन्द्र झा आ फूल दाइ केँ। सौहार्दपूर्ण वातावरण रहलनि सभदिन। पटना सँ 'व्यास' जी वा हुनकर संततिक आगमन पर दुनू प्राणी जी-जान सँ सत्कार करथिन। आ सामने सँ सेहो ओतबे सिनेह-सम्मान भेटनि महेन्द्र झा आ फूल दाइ केँ। माने 'व्यास' जीक संग हुनकर धिया-पूता, सभक सिनेह-सम्मान भेटैत रहलनि।  

मुदा ने समय एक रंग रहैत छैक आ ने लोकक मोन एक रंग रहैत छैक सभदिन। से एहि बात पर विचार नहि करब एकटा भारी चूक भेलनि 'व्यास' जी सँ। माने ताहि हिसाबेँ अनुजक भविष्य सुरक्षित क' देबालेल कोनो तरहक व्यवस्था करबा दिस ध्यान नहि गेलनि हुनकर। किछुओ संपति, माने जमीन-जथा आ कि गाछी-कलम लिखित दस्तावेज सहित अनुजक नामेँ कएल जेबाक चाही छलनि, एहेन हमर नहि, गाम-समाजक लोकक कहब छनि।

ओना सोचए बला बात इहो अछि जे जखन मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम भगवान पर सेहो एकटा कलंक लागिए गेलनि, भगवान रहितो (गर्भवती पत्नी केँ राजमहल सँ निष्कासित करबाक कलंक) तखन मनुक्खक बाते कोन !

एहि एक गोट चूकक अतिरिक्त 'व्यास' जीक किछु अन्यान्य स्वभावगत व्यवहार छलनि जाहि सँ हुनकर करीबी लोक परेशान रहैत छलाह। बोलचालक भाषा मे कहल जा सकैछ, हुनकर "हिटलरपना" हुनकर करीबी लोकक परेशानीक कारण रहलनि।  superiority complex वा "अहम् ब्रह्मास्मि" बला मानसिकता,  माने "हम सही छी" बला भाव मात्र नहि, "हमहीं टा सही छी" एहेन भाव रहलनि। जखन कि गहराइ मे जा क' बूझल जाए तँ "अहम् ब्रह्मास्मि" मे अहम् केर अर्थ मनुष्यक आत्मा सँ छैक। आ ब्रह्म भेल सर्वव्यापी चेतना। "अहम् ब्रह्मास्मि"क अर्थ भेल ब्रह्म आ आत्मा दुनूक एकाकार भ' जाएब। एहेन पढ़ल अछि हमरा कतहु।  मुदा आम तौर पर स्थूल रूप, माने अपन शरीर, अपन नाम, अपन बात-विचारक अधीन भ' लोकक भीतर "अहम् ब्रह्मास्मि" बला भाव एहि रूप मे जगह बना लैत छैक "जे छी से हमहीं छी" माने "एकोहम् द्वितीयो नास्ति न भूतो न भविष्यति" कहि सकैत छी। जखन कि उक्त संस्कृत वाक्यांश सभक अर्थ बहुत व्यापक छैक। आत्मा सँ संबंधित छैक। मुदा आम मैथिल-जन जकाँ 'व्यास' जीक भीतर सेहो स्थूल रूप मे अपना-आप के प्रति एहेन भाव कतहु-ने-कतहु प्रवेश क' चुकल छलनि। असल मे विद्यार्थी जीवन मे 'व्यास' जी खर्रख जाइत-अबइत रहलाह। खर्रख सँ हुनकर परिवारक बड्ड दूरस्थ सम्बन्ध रहनि। मुदा खर्रख मे स्व. बलभद्र बाबू आ दयाबाबू सँ अत्यधिक स्नेह, सहयोग, सम्बल आ आत्मीयता भेटलनि हुनका, जाहि कारणेँ अत्यधिक प्रभावित रहलाह हुनका लोकनि सँ। आ खर्रख जाइत-आबैत श्रोतीय परम्परा सभक अनुसरण करब शुरु भ' गेलनि अनायासहि।

राजनगर रहैत किछु समय लेल माछ-माउस खाएब पर्यन्त छोड़ि देने छलाह, मुदा कण्ठी नहि लेलनि, गुरु नहि बनौलनि ककरो। एक वर्ष धरि नहि खएलनि। फेर नौकरी मे रहैत खाए लगलाह। से खूब खाए लगलाह। सप्ताह मे दू बेर चलनि। मूल रूप सँ माछक प्रेमी छलाह 'व्यास' जी। मुदा पिआजु-लहसुनक प्रवेश निषेध छलनि घर मे। आ से अपन बनाओल एहि नियम केँ मानबा लेल हुनकर दबाव रहलनि धिया-पूता पर सेहो।

हरिपुर बख्शी टोलक एक जन गरीब, विपन्न, अभावग्रस्त पंडित विश्वनाथ झाक पुत्र श्री उपेन्द्रनाथ झा 'व्यास' वास्तव मे "सेल्फ मेड मैन" छलाह। हुनकर जतेक-जे उपलब्धि छलनि से सभटा अपना बल-बूता पर छलनि। समाजक लोक सँ सहयोग भेटलनि, मुदा सेहो हुनकर प्रतिभा देखिए क'। तँ तैँ प्रायः superiority complex क शिकार भ' गेल हेताह अनजाने मे।

ओना रिटायरमेंटक बाद कनि नरम पड़लाह, सभ तरहेँ। माने तामस सेहो जतेक पहिले रहल छलनि, से बादक समय मे सुनल अछि जे ततेक नहि रहलनि। बादक समय मे superiority complex सँ सेहो मुक्त होइत गेलाह। से स्पष्ट होइत अछि, एकासी सालक अवस्था मे देल गेल एकटा इंटरव्यू मे कहल हुनकर एहि गप्प सँ , "एहि सभ मे हमर कोनो क्रडिट नहि । हम निमित्त मात्र । सब ईश्वरक कृपा..."

 जखन हुनका सँ सवाल पूछल गेलनि -"अपनेक जीवनक सभ सँ पैघ उपलब्धि की ? इंजीनियर बनब ? साहित्य आकदमी पुरस्कार ? पटना मे मकान ?"

ओना एहि सवाल मे सन्निहित तीनू उपलब्धिक अतिरिक्त समाज मे मान-प्रतिष्ठा आ असंख्य लोकक मोन मे देवता सन स्थान बनाएब 'व्यास' जीक बड़का उपलब्धि रहलनि। आदर्श पुरुष तँ छलाहे, बल्कि अवतारी पुरूष कहि सकैत छियनि हुनका। कहबाक माने हुनकर विराट व्यक्तित्व तँ छलनिहे। हुनका द्वारा समाजक लोक लेल कएल उपकार, हुनकर सत्कर्मक सोझाँ उक्त मानवजनित छोट-मोट चूक आ हुनका भीतरक किछु कमी सभ केँ नगण्ये मानल जाएत।

'व्यास' जीक महानता अक्षुण्ण रहतनि। हुनकर व्यक्तित्वक किछु नकारात्मक पक्ष केर चर्चा करब, हुनकर मान-मर्दन नहि बूझल जाए, निहोरा अछि हमर। सादर श्रद्धांजलि अर्पित करैत छियनि दिव्यात्मा 'व्यास' जी केँ। संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-7 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-8 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-9 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-10 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान -३ हितनाथ झा मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान -3 प्रो.जयदेव मिश्र 'मधुप अमर कीर्ति कवि तोर' स्मृति-ग्रन्थमे कविचूड़ामणि मधुपजीक विषयमे अपन आलेख ' मधुपजीकेँ जेना हम जानल बूझल अछि'मे मधुपजीक संग कोइलखमे बिताओल बाल्यकालक दिनक स्मरण करैत लिखलनि अछि - ' एक बेरि हमरालोकनि कोइलखमे एक टा हस्तलिखित मासिक पत्र चलाएब आरम्भ कएल जकर प्रधान प्रेरक ओ व्यवस्थापक छलाह डा. भीमनाथ झाक पिता पण्डित तारानाथ झा। एकर नाम पड़ल प्रभात। पत्रक उद्देश्य सूचित करैत मधुपजी एक टा पद्यक रचना कएलन्हि। जतबा स्मरण अछि ओ थिक - 'खिलल कमल गुंजित मधुप, रवि-छवि शोणिम भेल। ठरर   दैत  की   छी  पड़ल,  उठु   प्रभात  भय   गेल।।' (सन्दर्भ: मधुप अमर कीर्ति कवि तोर पृष्ठ -75) राजग्राम वासी अयोध्यानाथ सिंह ठाकुर प्रभात एवं प्रभातक सम्पादक तारानाथ झाक कार्य-शैलीक विषयमे जे मन्तव्य लिखने छलथिन, प्रभातक एक अंकमे प्रकाशित भेल अछि। ' सुन्दरतम  लेखावलिसँ अपनेक  प्रभात  सुपूर्ण रहै अछि। चित्र   अनेक  अनूपमसँ पाठकगणकाँ मन मुग्ध करै अछि।। एहि 'प्रभात'क सुन्दर रश्मि समाजमे अभिनव जोश भरै अछि। विद्वद्वर सम्पादकजी ! हम देखि 'प्रभात' प्रसन्न भेलहुँ अछि।। (प्रभात: वर्ष - 2, अंक- 4,अप्रैल 1934 ) आचार्य सुरेन्द्र झा'सुमन'क विद्यारम्भ कोइलखक भद्रकाली संस्कृत विद्यालयसँ भेल छलनि। सुमनजी अपन आत्मकथा  'मन पड़ैत अछि'मे लिखने छथि -' विद्यारम्भे गुरुः श्रेष्ठ:', श्रेष्ठ दिन ठेकनाय, यथादिन जनौ-सुपारी पुस्तकपर चढ़ा लघुकौमदी पढ़ब प्रारम्भ कयल।अध्यापक छलाह प. जय सिंह ठाकुर।' आगाँ लिखैत छथि-' ओहि समय कोइलख संस्कृत विद्वानक केन्द्रग्राम छल।'  कोइलखक विद्वान सभक चर्चा करैत लिखने छथि -इन्द्रनाथबाबू-पीताम्बरबाबू-गोनू बाबू -यदूबाबू-काशीनाथबाबू- तारानाथबाबू आदि ओहि समयमे अन्यान्य विद्वान एवं प्रतिष्ठित व्यक्तिमे गणनीय छला।' (सन्दर्भ- मन पड़ैत अछि- सुरेन्द्र झा 'सुमन' पृष्ठ- 40) मन पड़ैत अछि, जखन हम हाइ स्कूलमे नाम लिखौने रही, ओहि समयमे गामक मुखिया ई.अनिरुद्ध मिश्र( पद्मश्री डा.मोहन मिश्रक पिता) छलाह। स्कॉलरशिप लेल बी.डी.ओ.सँ आय प्रमाण पत्र लेब जरूरी छलैक। बी.डी.ओ. हमरा मुखियाक अनुशंसहिपर प्रमाणपत्र दैत।तेँ हमरा इंजीनियर साहेब ओतs जाय पड़ल। साहसपूर्वक अपन परिचय दैत जखन काज कहलियनि तँ ओ आह्लादपूर्वक हमर पिताजी(तारानाथ झा)क विषयमे अपन संस्मरण सुनौलनि, काशीमे कोना हुनक आतिथ्यमे रहलाह से कहलनि। (सन्दर्भ: कोइलख : पृष्ठ- 74)। कविचूड़ामणि मधुपजीक घर कोइलख, हमर घरक सटल पोखरिक पुबरिया महारपर। मधुपजीक बाल्यकाल कोइलखमे बितलनि। बादमे मधुपजी मातृक कोर्थमे बसि गेलाह। मधुपजीक जीक जीवनक प्रसंग भाइजी (प्रो. भीमनाथ झा) 'मधुप: अमर कार्ति कवि तोर'मे जे लिखने छथि,से उद्धृत क' रहल छी ,ओकर बाद मधुपजी जे अपन पद्यात्मक आत्मकथा' प्रेरणापुंज'मे जे बाबूजी(प. तारानाथ झा)क प्रसंग  लिखने छथिन से प्रस्तुत करब। 'हमरा प्रति हुनक विशेष आवेसक कारण, हम यैह बुझैत छी, हमर कोइलख घर होयब छल। हमर पिता हुनकासँ किछु जेठ। किछुए दिनका। हमर पिताक जन्म 1903मे, मधुपजीक 1906मे।तेँ, संगतुरिया रहितो हमर पिताकेँ भाइ कहैत। हमर मायकेँ ओ बरोबरि पयर छुबि प्रणाम करैत रहलथिन।'प्रेरणापुंज'मे अपन किशोरावस्थाक वर्णन करैत एकाधिक ठाम हमर पिता(तारानाथ झा)क उल्लेख कयने छथि। अपन संगतुरिया आत्मीय भाइक बालक रहबाक कारणे हम हुनक भातिज, ओ हमर काका। ई भाव ओ आजीवन रखलनि।' ( संदर्भ- मधुप: अमर कीर्ति कवि तोर' पृष्ठ- 470) प्रेरणापुंजमे मधुपजी अपन बाल्यकाल वर्णनक आरम्भहिमे लिखने छथि- ' स्वर्गन्ता नवे वयमे सुशिक्षित बन्धुवर विनयी कलाचय-निपुण तारानाथबाबुक श्रमे चालित बालवर्गक हेतु के. डी. क्लबक चित्ताह्लादकारक साधने क्रीडित कतेको पत्र पुस्तक केर अध्ययन करइत बिताबी समय सुखदे। तत' रहइत एक दिनका गप एखन छी लिखि रहल- कन्दुक-क्रीड़क- प्रतिस्पर्द्धाक आयोजन तत' छल सभ तकर साधन जुटाब'मे रही तल्लीन व्यस्त तारानाथबाबुक देनउँ  आज्ञा एक क्रीड़क बन्धु काज से नहि कयल कुटिल कठपिङ्गल परम ओ, जाहिसँ भ ' क्रुद्ध दैत तनिका गालपर ओ एक थापर बाजि उठला - 'नीचसँ एही प्रकारेँ ल' सकैत छी काज।' ताहि उक्तिक सत्यताक प्रमाण देल ओ मतिमान शीघ्र क' सम्पादिते से काज। देखि से हमरा मुँहे प्रस्फुटित भेले एक दोहा सूनि से भ' चकित बजला भाइ साहेब: 'हमर काशीकान्तबाबू आशुकवि हैताह शीघ्रे।' जकर ई थिक रूप - बिना ताड़ने नीच की, कौखन काज करैछ? लखु लति, लतिऔने बिना, गेन न ऊड़ि सकैछ।। (सन्दर्भ: प्रेरणापुंज: मधुप पृष्ठ - 13-14) मधुपजीकेँ अपन पिताक आज्ञाक पालन करैत कोइलख गाम छोड़य पड़लनि, मुदा कोइलखक लोकक विषयमे ओहिना स्नेह रहलनि। एक प्रसंग एतय उद्धृत क' रहल छी - जखन भाइजी( भीमनाथ झा ) दरभंगाक सी.एम. कॉलेजमे पढ़ैत रहथि तँ एक पत्र कोइलखसँ मधुपजीकेँ पद्यमे लिखने रहथिन। ओहि पत्रकेँ पढ़ि मधुपजी हुनक परिचय पयबाक लेल चिन्तित रहथि - ' कोनो दिन /  कोइलखसँ समागत/   एक टा पढ़ि पत्र / मूक रोमांचित व्यथितचित /   अपर व्यक्ति ने बुझय तेँ /   अवरुद्धलोचननीर /   कतेक छन धरि द्रवित हिय / सह्य करइत पीड़  /   कोन कोमल हृदय लिखि ई कयल  एखन अधीर ?/  जे छात्र रहितउँ/  अर्थ-सौष्ठव भाव-समलंकृत  / करुण-पद-सृजन-प्रतिभा-धीर।  (संदर्भ : प्रेरणापुंज पृष्ठ- 187) पत्र लिखनहारक परिचय पयबाक लेल चिन्तित छलाहे कि मधुपजीक दोसर पुत्र श्री मणिकांत मिश्र हिनक परिचय दैत कहलथिन- ' काका ! /   अही व्यक्तिक रचित /  अपने केर प्रशंसात्मक / ललित लेखो सुनौने  हम रही /  जे मिथिला महाविद्यालयक /     पत्रिकामे प्रकाशित छल भेल,/ तहू दिन परिचय बिना रहि चिन्तिते। (सन्दर्भ: प्रेरणापुंज : मधुप पृष्ठ- 187) जखन परिचय बुझलखिन ,तखन जे हुनक कलमसँ उद्गार निकललनि - ' ई भीमबाबू थिका भातिज, /  परम प्रिय स्वर्गीय  /  तारानाथबाबुक पुत्र /    पैतृक  सकल सद्गुणसँ विभूषित   / पूर्ण - दीप्ति-भविष्य। '  सन्दर्भ : प्रेरणापुंज: मधुप  -पृष्ठ - 188) ओहि पत्रक जे मधुपजी उत्तर देलथिन ओहिमे पिता तारानाथ झाक सेहो चर्च केने छथिन,ओकर एक अंश - 'वत्सलता-नव-लता-कुसुम-कोरक ! कोइलख-कोरक कमनीय नूतन  जातक, प्रतिभा  जलजातक  सौरभेँ   लसित  रमणीय सरल स्वभाव, सुयोग्य पिताक सुयोग्य भविष्णु तनय चिरजीवि श्रील भीमबाबू !  शुभ  आशिष   तुअ  पत्रक  पद्यक  मधु  पीबि।। प्रमुदित  चित स्वर्गीय बन्धुवर /   ताराबाबुक   विरहक  आधि बिसरि जकाँ  अनुभव न करी   सांसारिक  संकटजन्यो  व्याधि। (सन्दर्भ : प्रेरणापुंज मधुप, पृष्ठ-,190) परिवारक सुखक घड़ीमे आ दुखक घड़ीमे सेहो पारिवारिक सदस्यक जकाँ अनेक पत्र भाइजीक नाम प्रेषित छनि जे  'मधुपक पत्र  : भीमनाथ झाक नाम'सँ प्रकाशित अछि, जाहिमे तारानाथ झाक प्रसंग अनेक पत्रमे अनेक प्रसंगक चर्च छनि। एतय मात्र दू पत्रक अंश जे 26.10.1980क लिखल अछि, जखन भाइजी(भीमनाथ झा)केँ भारत सरकारक संस्कृति मंत्रालयसँ जुनियर रिसर्च फेलोशिप भेटल छलनि आ दोसर 10.12.1982क पत्र जखन हमर माझिल भाइ (मित्रनाथ झा)क निधन(13.11.1982)क सूचना भेटलनि, उद्धृत क' रहल छी - पहिल पत्र- ' पूर्ण भेल प्रतीति/   प्रतिभा केर सभ तरि मान/  दिवंगत प्रिय बन्धु /  तारानाथ बाबुक आइ आत्मा/  नन्दनक उपवनहुँमे रहि  / ई अमन्दानन्द लहि/  तुअ चिरंजीवित्वक मँगैत हेताह   / तारासँ मधुर वरदान,/   आ, अदृष्टिक वश विपन्ना /  अहीं लोकनिक पालनक भारें विखिन्ना /      अहाँ सभक परोक्षमे कनइत /    समुत्साहक त्रिपथगा  /   श्रीमती भौजीक कोखि  जुड़ैल   / के नहि मान/   पूर्ण अछि विश्वास/   प्राप्त फेलोशिप/  अहाँ तै रूपसँ ई शोधकार्य देखैब/   जाहिसँ मैथिलिक सब तरि हैत कीर्तिक  गान   / (सन्दर्भ ; मधुपक पत्र : भीमनाथ झाक नाम , पृष्ठ- 44-45) दोसर पत्र - ' बन्धुवर तरबाबुक/  अल्पे वयमे निधनो भेने /   जे आदरणीयाँ भौजी /     सहितो अति निर्जु सकल  सन्ततिकेँ   / लालन- पालन शिक्षा - दीक्षा करा /   हृदयपर  पाथर  रखने   / दुखी न हो सन्तान - ताहि ले '/  नोर न नयनक निःसृत कयलनि,  / जरा- जर्जरा ताहि नियति से डाड� लगौलक  /    मूर्छायन्ता   / तनिक नोरायल  मूँह देखब हम कोना/   देब  वा कोन प्रकारेँ बोल-भरोसो /   स्वयं विशीर्ण हृदय भs गेने/  किन्तु साध्य की ?  / भालक लिपिपर नहि ककरो अधिकार/ (सन्दर्भ : मधुपक पत्र भीमनाथ झाक नाम, पृष्ठ-51) एकर अतिरिक्त प्रभातक प्रसंग अनेको पत्र सम्पादकक नाम आयल छलनि, जकर चर्च प्रभात पत्रिकाक विषयमे लिखबाक समय उद्धृत करब, किन्तु एक पत्र जे मंगरपट्टीक प. मदनानन्द झाक प्रभातमे प्रकाशित अछि- 'क्वैलखक युवकगणक प्रति' ओहि पत्रक एक अंश- सम्पादक  गुणवान  हितैषी, बुद्धिमान श्री तारानाथ। खाली युवक संघ के हित ओ, सतत   खपाबथि   माथ।। (सन्दर्भ: प्रभात वर्ष-1,अंक-अप्रैल 1934) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.मुन्नाजी-त्वरित कविता :: संक्षिप्त परिचय मुन्नाजी त्वरित कविता :: संक्षिप्त परिचय मैन्युअल युग सं डिजिटल युगमे प्रवेश दैनिक जीवनक सब स्तर बदलि देलक।सामाजिके बदलाव साहित्यिक बदलावक आधार थिक।प्रारम्भिक अवस्थामे मैथिली साहित्य मध्य विद्वानक भरमार छल।तें पहिने मैथिली लेखन समकालीन कथ्य गसल शिल्पें चरमोत्कर्ष पर रहल।जे अपन सबहक धरोहर बनि स्थापित अछि।कालान्तरे वास्तविक विद्वानक संख्या बल क्षीण पड़ैत गेल।आ क्रमशः ओ स्थान छेकैत गेलाह अल्प ज्ञानी,स्वघोषित विद्वान ।ओहोन रचनाकार मैथिली भाषा - साहित्य सं बेसी अपन पीठ कुरिएबामे लीन पुरान परम्परा उघैत,उघबैत रहला।ओ छल मैन्युअल युग। आब डिजिटल युगमे सब व्यस्त,मस्त।तकरे फलस्वरूप कथामे उपन्यास, कथा होइत .... डेरिबल( 100 शब्द धरिक कथा)एलै।जेना मैथिलीक बीहनि कथा।इ आजुक सं अगिला कतेको पीढ़ीक कथा साहित्यक पूर्ण खोराक थिक। तहिना कविता दिस चली तं महाकाव्य, काव्य( कविता,गीत,गजल)क्षणिका,हाइकुक संग अवतरित भेल त्वरित कविता( insta Poetry) जकर पृष्ठ भूमि अछि- Instagram,Twitter / X,Kinder.....! इ समयक मांग थिक।जं अहां समयक संग चलब नै सिखलौं त' आउट डेटेड भ' जाएब।जेना HMT,Nokia.....!जं अपनाकें मैथिलीक भविष्यक कविक रूपें बचाकें राखय चाही छी त' त्वरित कविता रचू।इ पारम्परिक कवि/ आलोचककें नै अरघतैन।मुदा इ अबै बला दु- चारि पीढ़ीक उपयुक्त साहित्यिक खोराक थिक।अहां कखनो जाहि विधामे लिखि ओ वर्तमान संग दु चारि पांच दशकक आगुक प्रासंगिकताकें ध्यान मे राखि लिखी।संगहि महत्वपूर्ण बात जे अहां कोनो विधा मे लिखी,अपन साहित्य सृजन मात्र पाठकक लेल करी।चाहे पाठक आम जन होइथ वा लेखक।अपन रचना कखनो कोनो आलोचक लेल नै करी।आ ने किनको सं अपन रचनाक आशीर्वाद लेल मुंह निहारी।अहां अपन रचनामे ओ शक्ति, क्षमता आनू जे पाठकक मगज मे जा बैसै।जहिया पाठक( लेखक सहित) अहांकें अकानि लेत।अहांक लेखनक सिद्धता स्वत: सिद्ध भ' जाएत।आलोचक रहथि अपन बाट तकैत।अहां हुनकर बाट नै ताकू।अहां अपन पाठकक भीड़ ठाढ़ करू जे अहांक नव रचनाक बाट तकैत रहय।जे स्टाम्प ल' बौआय छथि कोनो विधा वा लेखककें मोजर देबा लेल ओ स्टाम्प अपन कपार पर लगा लैथ।सजग रहैथ जे ओ बरखा बुन्नीमे धोखरि नै जाइन। मैथिली आन भाषा- साहित्यक सोझां सब दिन सं पछिला पौदान पर लटकल सन रहल।हम सब जेना कथामे बदलैत विश्व परिदृश्यकें अकानि  बीहनि कथाक अवधारणा आनल आ समवेत प्रयासे विकसित कएल।  जहिया विश्व कथा परिदृश्य मे डेरिबल (Upto 100 Words  stories) क प्रादुर्भाव भैल छल। तहिना हम आह्वान करै छी- मैथिलीक लेखक/ कवि लोकनि कें जै मैथिलीमे त्वरित कविता( Insta Poetry)क बीजारोपन कएल जाए।जकर प्रासंगिकता आगामी 5-10 दशक पछाति सिद्ध हएत। अंग्रेजी कवियित्री  भारतीय मूलक( पंजाबन) कनाडा प्रवासी ' रूपी कौर' आइ त्वरित कविता मे विश्व चर्चित कवियित्री भ' गैल छथि।हिनकर जन्मे बीसम सदीक उतरार्द्ध ( 4 अक्तुबर 1992)मे भैल।इ पहिने अपन चित्रकारी आ कलाकारी सं चर्चित रहथि।जकर छाप कविता पर सेहो पड़ल।हिनक कविता लेखन 21म सदीक पहिल दशकक अंत(2009)सं भैल।2014 मे हिनक पहिल त्वरित कविता संग्रह - मिल्क एण्ड हनी आयल जे विश्वक 43 भाषा मे अनुदित भेल।एहैन कविताक लोकप्रियताक अंदाजा लगा लियय।द सन एण्ड फ्लावर-2017 आ तेसर संग्रह - " होम बडी'2020 मे आनि विश्वचर्चित भैली।हिनक अतिरिक्त अंग्रेजीक दर्जन भरि कविक त्वरित कविताक संग्रह आबि चुकल अछि। हिन्दीमै सेहो त्वरित कविता लेखनक प्रयोग/प्रयास जोर पकड़ने अछि।मुदा किनको सझिया वा व्यक्तिगत संग्रहक जनतब एखन धरि नै अछि।मैथिलीमे त' कोनो खोड़ चाल धरि नै सुनाएल।प्राय: 40-50 बरखक पछाति अकानल जाएत। दर असल ऐ तरहक कवितामै छंद आ तुकबंदीक प्रधानता नै राखल गैलैए।छंदयुक्त दोहा,सोरठा...... सब आब पुरान भ' गैल( Out Dated)।आब कवि/ अंग्रेजी आलोचक  पारंपरिक कविताक तुलनामे बैसी सारगर्भित  आ भविष्यक मशालक रूपमे वर्णित क' रहलाह। त्वरित कविता( Insta poetry ) ----+--------+---------+--------+---- 1- चानक बखान/ सगरो सुना पड़त/ गुणी त' सुरूजो बड़ छथि। 2-पोखरि,इनार भत्थन क'/ लोक बेगरता पाबि/ कीनैए टब। 3-हम क' देलौं घोषणा शांतिक/ चिन्ता छल/ कोना बिकायत घातक हथियार । 4-हे यै,एनी सुनू ने/ लोक देखि लेत तहन?/ त' की मौला जायब अहां। 5-छन्द विला नै गेलै/ अपन बेअसर देखि/मन्द भ' गेल। अपन मंतव्य  editorial.staff.videha@gmail.com  पर पठाउ। २.४.प्रणव कुमार झा- स्नातकोत्तर चिकित्सा प्रशिक्षण(PGME) मे हेल्थ इकोनॉमिक्स प्रणव कुमार झा स्नातकोत्तर चिकित्सा प्रशिक्षण(PGME) मे हेल्थ इकोनॉमिक्स एकबेर लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज मे माँ के देखाबय लेल गेल रही त ओत्त श्वसन रोग विभाग मे प्रो० डॉ० तन्मय तालुकदार के देखने रहियई जे ओ रोगी सभ से ओकर स्वास्थ्य संबंधी स्थिति आ हिस्ट्री के पूछताछ के संग संग ओकर सामाजिक आ आर्थिक परीथिति के भी विषय मे जानकारी लऽ रहल छलाह। आ तदनुसार ओकर इलाज आ दवाई-टेस्ट आदि लिखी रहल छलाह। हमर जिज्ञासा पर ओ बतेने छलाह जे अलग अलग सामाजिक आर्थिक परिवेश बला रोगी सभ के इलाज आ टेस्ट के निर्णय लेबय मे ओकर जीवन शैली आ आर्थिक स्थिति के ध्यान मे राखला से इलाज प्रभावी आ किफ़ायती बनयत छैक। उदाहरण लेल एकटा कम आय बला घर के रोगी के जे हम महरग दवाई लिख दी त ओ ओहि मे से आधा किनत आधा नै किनत, नतीजा दवाई रोग मे ओतेक प्रभावकारी नै हेतइक। ताहिना यदि कोनो रोगी कोनो पैनल मे छैक त नाना प्रकारक टेस्ट द्वारा ओकर डायग्नोसिस हमरा लेल आसान भऽ जाइत छैक आ ताहि लेल ओकरा सभटा टेस्ट लिखि दैत छी, मुदा कोनो कम आय वर्ग के रोगी के एत्तेक टेस्ट लिखि ओकरा पर आर्थिक बोझ देनाइ ओकर इलाज के बीच मे बाधा बानि जाय अछि आ कत्तेक बेर ओ फेर इलाज अंठीया दैत छैक जै से बाद मे मामला आरो खराब होय के संभावना रहय छैक। ऐ के बदले जौं हम डायग्नोसिस पद्धति मे कनिके बदलाव करय छी त सीमित टेस्ट मे भी ओ इलाज संभव भऽ सकय छैक भले ओहि लेल चिकित्सक के कनि बेसी एफर्ट करय परय। रोगी के दिनचर्या आ वर्क प्लेस कंडीशन आदि के आधार पर सेहो चिकित्सकीय परामर्श मे बदलाव करय परय छैक।  ओहि बातचीत से हमर ध्यान एहि दिस गेल छल जे हेल्थ इकोनॉमिक्स के ज्ञान आ अनुभव सेहो चिकित्सक आ चिकित्सा व्यवस्था के प्रभावी बनाबय मे महत्वपूर्ण भूमिका मे भऽ सकय अछि। आजुक वैश्विक स्वास्थ्य प्रणाली तेजी सँ बदलि रहल अछि। खर्च बढ़ि रहल अछि, संसाधन सीमित भऽ रहल अछि आ लोकक उच्चगुणवत्ता सेवाक प्रति अपेक्षा दिनानुदिन बेसी होइत जा रहल अछि। एहन परिस्थिति में चिकित्सक सभ के केवल चिकित्सकीय ज्ञान सँ सज्जित रहब पर्याप्त नहि अछि, हुनका आर्थिक दृष्टिकोण सँ सेहो सजग होबय के आवश्यकता भऽ गेल अछि। एकर समाधान रूपेँ "हेल्थ इकोनॉमिक्स" - अर्थात् स्वास्थ्य सेवामे संसाधनक वितरण आ मूल्यांकन के अध्ययन - पोस्टग्रेजुएट मेडिकल शिक्षा में एक अनिवार्य घटक बनेबाक आवश्यकता अछि। अक्सर डॉक्टर केँ एक संप्रेषणात्मक निर्णय लेबाक पड़ैत अछि - एक टा इलाज प्रक्रिया आ दोसर टा इलाज प्रक्रिया में चुनाव करब। ई निर्णय मात्र प्रभावकारिता पर आधारित नहि होइत अछि, बल्कि ओकर लागत, अवसर लागत (opportunity cost), आ दीर्घकालीन प्रभाव सेहो महत्त्वपूर्ण होइत अछि। हेल्थ इकोनॉमिक्स के ज्ञान ई सुनिश्चित करैत अछि जे चिकित्सक अपन निर्णय में संसाधनक सर्वश्रेष्ठ उपयोग करैत छथि। विशेषतः भारत सन मध्यम एवं निम्न-आयवाला देश में स्वास्थ्य संसाधन सीमित अछि। एहन स्थितिमे चिकित्सक केँ एहन निर्णय लेब जरूरी अछि जे खर्च कम हो आ परिणाम अधिक लाभकारी हो। हेल्थ इकोनॉमिक्स एकर प्रशिक्षण दैत अछि। आजुक समय में भारतक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली खास कऽ ग्रामीण इलाकामे गंभीर चुनौतीक सामना कऽ रहल अछि - एक दिस सीमित संसाधन, दोसर दिस बढ़ैत जनसंख्या आ रोगीक भार। बिहार, झारखंड सन राज्य जतए चिकित्सा आधारभूत संरचना कमजोर अछि, ओहि ठाम चिकित्सकीय निर्णय में हेल्थ इकोनॉमिक्स के ज्ञान चिकित्सकक निर्णय-शक्ति के संगहि सामाजिक न्याय आ सेवा दक्षता सेहो बढ़ा सकैत अछि। एहन संदर्भ में हेल्थ इकोनॉमिक्स के पोस्टग्रेजुएट मेडिकल शिक्षा (PGME) में शामिल करब जरूरी भऽ गेल अछि। एकर प्रशिक्षण सँ चिकित्सक केवल क्लिनिकल क्षेत्र में नहि, बल्कि अस्पताल प्रशासन, सार्वजनिक स्वास्थ्य योजना, आ नीति-निर्धारण के स्तर पर सेहो अपन प्रभाव छोड़ि सकैत छथि। एक अध्ययन में कहल गेल अछि जे हेल्थ इकोनॉमिक्स में प्रशिक्षित चिकित्सक नीति-निर्माण के संवाद में अधिक प्रभावी भूमिका निभबैत छथि (researchgate.net; pmc.ncbi.nlm.nih.gov)। जखन चिकित्सक स्वास्थ्य बीमा, निधि वितरण, नीति नियोजन जेकाँ प्रणालीगत पहलू बुझैत छथि, तखन ओ बेहतर निर्णय ल सकैत छथि। उदाहरण स्वरूप, NHS आ NICE केर निर्णय-प्रक्रिया के अध्ययन सँ चिकित्सक रोगी केँ ई स्पष्ट करि सकैत छथि जे कियैक किछु उपचार उपलब्ध अछि, आ कियैक नहि। जखन चिकित्सक आर्थिक विश्लेषण (जेना - लागत-लाभ विश्लेषण) के आधार पर निर्णय लैत छथि, तखन कम खर्च में बेसी स्वास्थ्य लाभ संभव होइत अछि। सऊदी अरब में भेल एक अध्ययन कहैत अछि जे हेल्थ इकोनॉमिक्स प्रशिक्षण सँ चिकित्सक वित्तीय प्रभाव के ध्यान में रखिकऽ बेहतर क्लिनिकल निर्णय लऽ सकैत छथि (researchgate.net)। नीति विमर्श में भाग लेबय लेल चिकित्सक केँ केवल क्लिनिकल ज्ञान नहि, बल्कि आर्थिक तर्क आ मॉडल के समझ सेहो जरूरी अछि। मानसिक स्वास्थ्य नीति निर्माण में, हेल्थ इकोनॉमिक्स के आधार पर विशेषज्ञ अपन सलाह बेहतर ढंग सँ नीति निर्धारक तक पहुँचा सकैत छथि (pmc.ncbi.nlm.nih.gov)। बिहार आ झारखंड के हजारों प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) में डॉक्टर सब केँ दवाई, मशीन, आ मानव संसाधनक अभाव रहैत अछि। एक्के डॉक्टर केँ दर्जनों मरीज देखय पड़ैत अछि। एहन स्थितिमे कोन इलाज में अधिक लाभ हेतैक आ कोन खर्च के औचित्य नहि छैक - ई निर्णय बिना आर्थिक समझ संभव नहि। हेल्थ इकोनॉमिक्स प्रशिक्षित चिकित्सक के ई निर्णय आत्मविश्वासपूर्वक लेबामे सक्षम बनबैत अछि। बिहार-झारखंड में अधिकांश ग्रामीण परिवार रोजी-रोटी लेल संघर्ष करैत छथि। निजी अस्पताल में इलाज करब हुनका लेल आर्थिक संकट उत्पन्न करैत अछि। लोक अक्सर  इलाज के चक्कर मे कर्ज के बोझ तर डूबि जाइत अछि। डॉक्टर जँ लागत-प्रभावी इलाज, जे सरकारी योजनाक तहत कवर होइत अछि, ओहि दिशा में निर्णय लेताह, त रोगी आ स्वास्थ्य प्रणाली दुनू लाभ मे रहत। उदाहरण स्वरूप, आरोग्य सेतु योजना, आयुष्मान भारत, जन औषधि केन्द्र सभक जानकारी जँ प्रशिक्षु डॉक्टरक पास रहत, त ओ रोगी सभ के एकर उपयोग के सुझाव द्वारा इलाज के आर्थिक बोझ घटा सकताह। ग्रामीण क्षेत्र में अक्सर स्वास्थ्य योजना बनाबैत समय डाटा आधारित लागत विश्लेषण नहि होइत अछि। प्रशिक्षित चिकित्सक एहि कमी के पूरा कऽ सकैत छथि। हेल्थ इकोनॉमिक्स के ज्ञान रखनिहार डॉक्टर अपन संस्था या जिलास्तरीय स्वास्थ्य समिति में निर्णय लेबाक प्रक्रिया में शामिल भऽ सकैत छथि, जाहिसँ नीति के जमीनी हकीकत के संग सहि तरीका से जोड़ल जा सकै अछि। हेल्थ इकोनॉमिक्स के PGME में समावेशक पद्धति 1. मौजूदा पाठ्यक्रम में विषय समावेश: किछु संस्थान अपन PGME पाठ्यक्रम में हेल्थ सिस्टम, बीमा आ स्वास्थ्य नीति पर आधारित सप्ताह-लंबा पाठ्यक्रम शुरू कएने छथि। ई कोर्स में हेल्थ इकोनॉमिक्स के परिचय देल जाइत अछि, जे रेसिडेंट चिकित्सक द्वारा बहुत प्रशंसित भेल अछि। 2. प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम आ ऑनलाइन मॉड्यूल: हेल्थ टेक्नोलॉजी असेसमेंट पर आधारित Massive Open Online Course (MOOC) बनाओल जाइत अछि, जे चिकित्सक केँ लागत-प्रभावकारिता के व्यावहारिक ज्ञान दैत अछि। निरंतर शिक्षा (Continuing Education) के तहत प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम सेहो प्रभावी सिद्ध भऽ रहल अछि। 3. व्यावहारिक QI परियोजना (Quality Improvement Projects): रोगी देखभाल में सुधार हेतु बहु-आयामी टीम (medicine, nursing, pharmacy, social work) के संयुक्त प्रोजेक्ट, जे खर्च आ दक्षता के लक्ष्य राखैत अछि, डॉक्टर सभ के व्यावहारिक अनुभव दैत अछि। एहन प्रोजेक्ट क्लिनिकल आ आर्थिक ज्ञान के संग समन्वय स्थापित करैत अछि (pubmed.ncbi.nlm.nih.gov)। 4. सिमुलेशन आ केस गेम्स: Clinical Health Economics System Simulation (CHESS) एकटा कंप्यूटर आधारित प्रतिस्पर्धी खेल थिक, जाहिमे चिकित्सक टीम विभिन्न पेमेंट मॉडल अंतर्गत रोगी देखभाल कऽ अभ्यास करैत छथि। ई चिकित्सक केँ बजट सीमा आ लागत-प्रभावकारिता केँ सजीव रूप में बुझबैत अछि। 5. अंतर-पेशागत शिक्षा (Interprofessional Education � IPE): चिकित्सा आ स्वास्थ्य देखभाल मात्र चिकित्सकक काम नहि, बल्कि नर्सिंग, फार्मेसी, सामाजिक कार्य जेकाँ अन्य पेशा सँ समन्वय करबाक आवश्यकता सेहो होइत अछि। साझा कक्षा आ सिमुलेशन अभ्यास सँ प्रशिक्षणार्थी सब के विभिन्न पेशागत दृष्टिकोण सँ लागत आ मूल्य समझ में अबैत अछि। ताहि लेल आवश्यक छैक जे दरभंगा, मधुबनी, मुजफ्फरपुर, बेतिया, पटना, रांची, भागलपुर, जेकाँ मेडिकल कॉलेज सभ में कोर्स में ओहन केस स्टडी जोड़ल जाए, जतए ग्रामीण मरीजक इलाज विकल्प पर खर्च बनाम लाभ के तुलना कैल जाए। ई रेसिडेंट डॉक्टर केँ सिखाबय अछि जे एके रोग में अलग-अलग परिस्थिति में कोन तरीका प्रभावी हो सकैत अछि। बिहार आ झारखंड सन राज्य, जतए स्वास्थ्य सेवाक ढांचा अखनो असंतुलित अछि, ओहि ठाम हेल्थ इकोनॉमिक्स प्रशिक्षित डॉक्टर स्वास्थ्य सेवा के नव दिशा दऽ सकैत अछि। पोस्टग्रेजुएट मेडिकल शिक्षा में ई विषय के जोड़ब मात्र एक पाठ्यक्रमीय सुधार नहि, बल्कि एक सामाजिक परिवर्तन के प्रस्फुटन छैक। जखन डॉक्टर रोगीक स्वास्थ्य संग-संग ओकर आर्थिक स्थिति आ संपूर्ण प्रणाली के ध्यान में रखिकऽ निर्णय लेताह, तखन स्वास्थ्य सेवा अधिक मानवीय, टिकाऊ आ प्रभावकारी बनत। एही से जरूरी अछि जे हेल्थ इकोनॉमिक्स के PGME में एक अनिवार्य आधार बनाओल जाए - विशेषतः ओहि क्षेत्र में जतए जीवन आ सेवा दुनू कठिनाइ सँ गुजरि रहल अछि। संदर्भ: प्रो० मीनू बाजपेयी, मानद कार्यकारी निदेशक, एनबीईएमएस researchgate.net pubmed.ncbi.nlm.nih.gov journals.lww.com pmc.ncbi.nlm.nih.gov नीति आयोग बिहार स्वास्थ्य नीति दस्तावेज झारखंड स्वास्थ्य मिशन वार्षिक रिपोर्ट 2023�24 -(प्रणव झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.मुन्नाजी- दिल्ली ०६ जुलाई २५ कें पूर्वी दिल्लीक लक्ष्मी नगर स्थित मौर्या कम्पलेक्स मे आयोजित भेल बीहनि कथा गोष्ठी मुन्नाजी दिल्ली ।06 जुलाई 25कें पूर्वी दिल्लीक लक्ष्मी नगर स्थित मौर्या कम्पलेक्स मे आयोजित भेल बीहनि कथा गोष्ठी गोष्ठीक शुरुआत बीहनिकथाक अधिष्ठाता श्री मुन्ना जीक वक्तव्य सं भेल।ओ जनौलनि जे मैथिली मे उपन्यास आ कथाक पछाति आओर छोट कथाक खगता बुझल गेल।जाहि खगता पूर्तिक लेल 1987मे बीहनि कथाक अवधारणा बनल जे क्रमश: संशोधित होइत 1995 मे बीहनि कथा नामे समवेत स्वीकृत भ' आगां बढ़ल। बीहनि कथा की थिक,आगू एकर पसार कोना हुअए ताहि पर अधिवक्ता श्री मुकेश आनन्द,जयन्ती कुमारी, श्री मोहन कुमार झा..... आदिक द्वारा जमिकें विमर्श भेल।

दोसर सत्र मधुबनी सं पधारल सेवानिवृत प्रोफेसर श्री शुभ कुमार वर्णवाल जीक अध्यक्षतामें भेल बीहनि कथा पाठ।जकर शुरुआत आदरणीया अनिता मिश्रक दु गोट बीहनि कथा-छोटकी ,अंग्रेजी माध्यमक पाठ सं भेल।तकर पछाति,गोष्ठीमे पहिल बेर आयल आ पहिल बेर बीहनि कथाक पाठ केलनि - वन्दना स्वाभिमानी ।हुनक दुनू रचना बीहनि कथा विधाक माणदण्ड पर उतरल संपुष्ट छल। आब बारी छल- मुकेश आनन्द जीक। ओहो पढ़लनि- हे यौ,आ दोसर हे यै।आब जयंती कुमारी अपन रचना-खौंझी,बात विचार पढ़ि कार्यक्रम एक डेग आओर आगां ल' गेली।आब नंबर आयल मुन्ना जीक ओ अपन दु गोट रचना पटकनिया आ करोटक पाठ केलनि।हुनक डोम सं छुआछुत पर आधारित रचना पटकनिया कें आउट डेटेड कथा करार देल गेल।जहन कि पुतौहक निसंतान रहला पर दोसर विवाहक घोषणा पर आधारित कथ्य बला रचना करोटकें क्रांतिकारी आ कतेको दशक आगुक कथ्य मानल गेल। श्री मोहन झा जी अपन दुटा रचना- बौक आ चोरा नुकी पढ़ि सामयिक आ आगुओ प्रासंगिकताक छाप छोड़लनि।अगिला रचनाकार श्री कुंदन कर्ण जी,एक पर एक तीन गोट रचना सुपारी,सासुर जीवि आ नजरि पाठ क' सामयिक, प्रासंगिक, हास्य- व्यंग्य सं पूर्ण रचना सं उपस्थित भीड़कें हंसा मोनहल्लुक क' देलनि आ तेहने काज केलनि श्री प्रमोद झा " गोकुल" अपन दुधा वैष्णव आ एकटा चाह परसि। आब सबहक नजरि छल अध्यक्ष महोदय पर - ओहो पहिल बेर अपन रचना सबमेसं दु गोट बीहनि कथा-सुन्नरि पुतौह,महानगरमे फ्लैटक प्रवेश पढ़ि बीहनिकथाक सब मापदण्ड यथा कथ्य - शिल्पमे अव्वल रहबाक संकेत देलनि। आब बेर छल अध्यक्षीय उद्बोधनक- जाहिमे कहलनि- जे हम बहुत दिन सं एकरा अकानि रहल छी।इ विधा मैथिली साहित्यक भविष्यक निधि थिक।कतबो बिहाड़ि- बसात आबय आ कि बिर्ड़ो उठय अहां सब लागल रहू।एक दिन एहेन समय एतै जहिया कथाक नाम पर मैथिली मे बीहनि कथा मात्र अंगेजल आ उघल जायत।दोसर किछु कतिएल सन रहत। श्री मोहन जीक मंच संचालन मे संपूर्ण कार्य क्रम अपेक्षा सं अधिक लोकक उपस्थितियो भेने सबहक मोन गद् गद् भ' उठल।

अगिला बैसार श्री कुंदन कर्ण जीक संयोजनमे पश्चिमी दिल्ली मे हएब संभावित भैल। आजुक कार्क्रमक पूर्णताक घोषणा अधिवक्ता बीहनि कथाकार श्री मुकेश आनन्द जीक धन्यवादक स्वर सं भेल । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.परमानन्द लाल कर्ण-किस्मतक खेल (कथा) परमानन्द लाल कर्ण किस्मतक  खेल (कथा) बड्ड डरल  सहमल दूनु आँखि एम्हर- ओम्हर  देखैत  छल, ओ हर एक चेहराक देखैत छल, लागैत  छल जे ओ किनको ढूँढ़ि रहल अछि, रेलवे स्टेशन पर  वैसल ओ बुजुर्ग सव यात्री दिस एक सवालिया निगाह सँ देखैत छल, मानु ओ सव सँ किछु पूछs चाहैत अछि, मुदा फेर ओ चुप भs बैसि जायत छलाह । तखनहि एक टा  रेलगाड़ी प्लेटफार्म पर आयल । सव लोकनि रेलगाड़ी पर बैसवाक लेल दौड़s लागल । बुजुर्ग आदमी सेहो जल्दी सँ उठि  ज़ोर ज़ोर सँ आवाज़ देलक- �कमलकान्त ! कमलकान्त !� आ दौड़ैत सव डब्बा लग अपन झोरा उठेने अवाज लगावs लगलाह - � बौआ कमलकान्त !  बौआ कमलकान्त !, मुदा दुई मिनट रूकलाक वाद ट्रेन स्टेशन पर सँ चलि गेल । तकर बाद स्टेशन पर सन्नाटा पसरि  गेल । बुजुर्ग आदमी थकि  हारि  केर फेर प्लेटफार्म पर आवि बैसि गेलाह । प्लेटफार्म पर एक टा खोईंचावाला नवयुवक ओहि बुजुर्ग आदमी दिस देर सँ निहारि रहल छल । हुनका लग आवि ओ कहलक -�बाबुजी की भेल ? बुजुर्ग हुनका दिस देखैत कहलक- � बाउ ! एक बात बताउ, टिकट काउंटर एहि ठाम सँ कतेक  दूर अछि ? नवयुवक कहलनि - �बाबुजी ! टिकट काउंटर तs बगले मे अछि �। बुजुर्ग आदमी एक दिस हाथ उठावैत कहलनि - � हमरा बेटा एहि दिस टिकट काउंटर सँ टिकट लेवाक लेल गेल अछि, मुदा अखन  धरि घुरि  के नहि आयल अछि �। नवयुवक कहलनि - �नहि, बाबुजी टिकट काउंटर तs  दोसर दिस अछि�। देख़ु  एहि ठाम सँ टिकट काउंटर देखि पड़ैत अछि । बुजुर्ग आदमी - �हमर बेटा कहलक जे गामक टिकट कोनो दोसर काउंटर सँ मिलैत अछि� । ई कहि  ओ हमरा एहि ठाम वैसा कs टिकट लेवाक लेल गेल अछि । ५ घंटा  समय वीत गेल अछि, मुदा ओ नहि एलाह । आव हम की करु ? नवयुवक कहलक - � बाबुजी ! अहाँ चिंता नहि करु । एतेक  देर सँ अहाँ बैसल छी,  अहाँक भूख सेहो लागि गेल होयत । बाबुजी ! अहाँ ई खाना खा लीअ, हम अपना लेल आनने छलहु । मुदा हमरा समय नहि मिलल । काँपैत हाथ सँ खाना खा लेलथि आ हुनका ढेर सारा आशीर्वाद देलनि । नवयुवक कहलनि - � बाबुजी ! हमरा घर जयवाक अछि । अहाँ एक बात बताऊ जे अहाँक  कोन गाम जायवाक  अछि , कोन गाम सँ आयल छी ? हम टिकट लावि दैत छी� । बुजुर्ग आदमी - � नहि बाउ  ! हमर बेटा आवैत हेताह, अहाँ जाउ । हमर चिंता नहि करु�। आव हिनक कथा विस्तार सँ वतावैत छी। आख़िर ओ बुजुर्ग के छलाह आ स्टेशन पर की कs रहल छलाह ? बजुर्गक नाम गोपाल कृष्ण  छल । हुनका दुई टा बालक छलैन , जिनकर नाम कमलकांत आ उदयकांत छल । गोपाल कृष्ण  बड्ड गरीबी मे अपन समय व्यतीत कs  रहल छलाह, मुदा अपना  बेटाक  परवरिश मे कोनो कमी नहि राखलथि । दुनु बेटाक नीक सँ पढ़ैलथि।पढ़ि लिख कमलकांत बाहर चलि गेलाह मुदा उदयकांत अपन बाबुजीक डेयरी  संभालs लगलाह । गोपाल कृष्ण  उदयकांतक संग गाम मे रहैत छलाह । कमलकांत  जालंधर मे नीक दुकान खोलि अपन जीवन यापन करैत छलाह । एक समयक बात अछि गोपालकृष्णक  पत्नी एहि दुनिया सँ अलविदा भs गेलीह । पत्नीक देहावसानक पश्चात गोपालकृष्णक  स्थिति सेहो नीक नहि रहैत छल । भरि दिन डेयरी मे काम करैत करैत थकि  जायत छलाह । बुजुर्ग भेलाक कारण आव डेयरीक काम हुनका सँ नहि होयत छलैन । बेटा आ पतोहू सेहो आव कदर नहि करैत छलनि । तैयो गोपालकृष्ण जेना  तेना समय गुज़ारि रहल छलाह । एक दिन डेयरी मे काम  करैत छलाह तखनहि कमलकांतक  फोन  आयल, बहुत दिनक बाद कमलकांतक फोन एला सँ हुनका खुशीक ठिकाना नहि रहल । अपन हाथ धोय के खुशी सँ हुनक फोन उठोलनि । ओ कहलनि - हेलो ! बौआ ! कमलकांत । ओम्हर सँ आवाज आयल हेलो ! बाबुजी ! गोर लगे छी । गोपालकृष्ण कहलनि - नीके रहु । अहाँ ठीक छी । ओम्हर सँ आवाज़ आयल - हाँ  बाबूजी ! हम तs ठीक छी, मुदा अहाँक पुतोहुक  तवियत ठीक नहि अछि । चारि  पाँच दिन सँ हुनका बुखार आवि रहल छैन । ठीक नहि भs रहल अछि । गोपाल कृष्ण कहलनि - डाक्टर सँ देखा दीओन नहि तs कमजोरी आवि जेतनि ।  कमलकांत कहलनि - बाबुजी !  एम्हर दुकान आ घर दुनु देखवा मे दिक्कत  भs रहल अछि । अहाँ आवि जेतहु तs ठीक रहत । ई सुनैत गोपालकृष्ण कहलनि - बेटा हम अवश्य आयव । हम अहाँक दुकान देखि लेव आ अहाँ घर देखि लेव । सव ठीक भs जायत । ई कहि फोन राखि देलखिन । गोपालकृष्ण पत्नीक  देहावसानक  बाद बीमा कम्पनी सँ किछु पाई मिलल छल दुनु बेटा आ पूतोहुक  नजरि एहि बीमाक पाई पर छल । एहि सँ बाबूजीक प्रति हुनक प्रेम दिखावा छल । मुदा गोपालकृष्ण एहि बात सँ अनजान छलाह । बेटाक  प्रति प्यार सँ ओ सोचैत छलाह जे बौआ कमलकांत कोना दुकान सम्भालैत होयत आ कोना घर देखैत होयत । हम एहि ठाम कोन नीक सँ रहैत छी । ओहि ठाम जायव तहन हम बौआक  दुकान संभालि देवेन आ ओ कनियाक  देख भाल नीक सँ कs लेताह । ई सोचि  रहल छलाह  कि हुनकर  नजरि उदयकान्त पर पड़ल । दुःखी  मन सँ ओ  उदयकान्त सँ कहलनि - �बौआ ! कमलकांत फोन केने छलाह ।� हमरा टिकट कटा  दीअ हम जालंधर जायव । ई सुनि  उदयकांत चौंक गेलाह आ कहलनि- बाबुजी  ! की भेल ? अहाँ किएक जालंधर जायव ?� गोपालकृष्ण कहलनि - कमलकान्तक  कनियाक   तवियत खराब  रहैत छैन । ओ दुकान देखताह  की   घर देखताह ? ओ हमरा कहलनि अछि आवsक  लेल । ई बात सुनैत उदयकांत ग़ुस्सा सँ लाल भs गेलाह आ जोर  सँ कहलनि - आई धरि हुनका बाबूजीक  यादि नहि छलनि। कखनहु कोनो खोज खबर नहि लैत छलाह । आई बीमाक पाई मिलल  तs  ओ अपना लग बुला रहल छथि । बाबूजी हुनकर सव चाल हम जानैत छी । हुनकर  नजरि अहाँक  पाई पर छैन । तखनहि गोपाल कृष्ण  कहलनि - नहि बौआ, कनियाक तवियत वाकई ठीक नहि अछि । कमलकांत हमरा सँ झूठ नहि बाजत । उदयकान्त कहलनि - बाबूजी ठीक अछि , हम अहाँक जालंधरक  टिकट कटा दैत छी, मुदा जालंधर जाय सँ पहिले अपना खाता सँ बीमाक  मिलल पाई हमरा खाता मे जमा करा  देव । किएक तs अहाँक  आ मायक पूरा खर्च हमहि उठेलहु अछि ।तें ओहि पाई पर हमर हक अछि। जौं अहाँ अपना खाता मे पाई राखव तहन हमरा विश्वास अछि जे ओ अहाँ सँ सव पाई लs लेताह । गोपाल कृष्ण  कहलनि - अखन  अहाँक पाई सुझि  रहल अछि, ओहि ठाम कनियाक तवियत खराव छैक । जौं अहाँक विश्वास नहि अछि तहन बीमाक पाई मे सँ किछु हमरा खर्चा पानीक  लेल दs देव शेष अपना खाता मे जमा करवा लेव । ई कहि  चेक काटि  उदयकान्त के दs देलखिन । चेक  मिलैत हुनका खुशीक ठिकाना नहि रहल । ओ बैंक सँ पाई निकालि  किछु हुनका दs देलखिन आ शेष अपना खाता मे जमा करा लेलथि संगहि संग जालंधरक टिकट सेहो कटा कs  आनि  देलखिन । दोसर दिन बाबुजी के खुशी खुशी ट्रेन में बैसा देलखिन । एक दिस गोपालकृष्ण बड्ड दुःखी  छलाह जे कनियाक तवियत खराव अछि, तs दोसर दिस खुशी छलनि जे बहुत दिनक बाद हम कमलकान्त सँ मिलव । जालंधर पहुँचला पर देखलनि  जे कमलकान्त हुनकर रास्ता देखैत छलाह । बाबुजीक  देखैत हुनका गोर लागि  अपना गाड़ी पर बैसाक  घर लs  आनलथि । घर पर आवि कहलनि - आव सव ठीक भs  जायत, अहाँ कनियाक देखभाल  करु हम दुकान सम्भालि  लेव । कनिया कहलखिन - बाबुजी  ! हमरा सेवा सँ बेसी दवाईक  आवश्यकता अछि । अहाँक बौआ भरि दिन मक्खी मारैत  रहैत छथि । दुकान ठीक सँ नहि चलि रहल अछि । गोपालकृष्ण कहलनि - बौआ कनिया के अंग्रेज़ी दवाई नहि दs के हम जे कहि  रहल छी से दीऔन ठीक भs जेतीह । हमर सवहक  अजमायल नुस्खा अछि ।  अहाँ तुलसीजीक काढ़ा बनाक दीऔन सर्दी सेहो ठीक भs  जेतनि आ संगहि  संग बुखार सेहो । हम सव एहि  नुस्खा पर अपन समय काटलहु  अछि । ई सुनि  कमलकांतक कनिया कहलखिन - सुनै छिये , ई ओना पाई नहि देताह । बीमारीक  नाम पर । आव कोनो दोसर उपाय करs  पड़त । दुनुक  नजरि तs  हुनकर पाई पर छल । बेटा आ पुतोहु कोनो बहाना सँ आव थोड़े थोड़े पाई माँगs  लागलैथि । गोपालकृष्ण सेहो चुपचाप पाई दs देथिन । एकर अलावा घरक  समान अननाई, तरकारी,दूध वगेरहक भार हुनके  पर आवि गेलनि  । गोपालकृष्ण सेहो खुश भs काम करैत छलाह । ओम्हर दुनु प्राणि  सेहो खुश छलथि  जे घरक सव भार बाबुजी  उठा लेने छथि । एक दिनक  वात अछि जे बाजार  सँ सामान लावैत काल हुनकर पाइर कतहु फिसलि गेल जाहि सँ हुनका पाइर मे दर्द होयत छलनि । ओ अपना बेटा सँ कहलनि जे बौआ हम बाजार  सँ आवैत काल खसि पड़लहु अछि लागैत अछि पाइर मे मोच आवि गेल अछि से कनि कोनो डाक्टर सँ हमरा देखा दिअ  । एहि बात पर कमलकान्त कहलनि - बाबुजी  ! एहि माह बड्ड खर्चा भs  गेल अछि, अहाँक  संग में जे पाई अछि ताहि  सँ हम अहाँक  डाक्टर सँ देखा दैत छी । ओ कहलनि बौआ हमरा पास आव पाई कहाँ अछि, जे पाई छल से अहाँ सव माँगैत छलहु तs हम दs दैत छलहु , संगहि संग घरक  समान सव लावैत छलहु । एहि सव में हमर पाई खर्च भs  गेल अछि । आव तs  हमरा लग एकहु टा पाई नहि वांचल अछि । ई सुनि कमलकांत तिलमिला गेलाह आ कहलखिन बाबुजी  अहाँ सव पाई तs उदयकांत के दs  देलहु अछि । हमरा लेल किछु नहि राखलहु । एहि ठाम अहाँ कोन खर्चा केलहु  अछि जे कहैत  छी सव पाई खर्च भs  गेल । एहि ठाम अहाँ देखि रहल छी जे हमर काम धंधा नीक सँ नहि चलि रहल अछि । अहाँ जखन सव पाई हुनका दs  देलहु अछि तहन हुनके संग अहाँ रहु । एहि बात पर हुनक बाबुजी  कहलखिन  जे अहाँक  काम धंधा ठीक नहि  चलैत अछि तहन अहाँ भविष्यक लेल किछु बचा कs किएक नहि राखलहु  जे खराव दिन मे काम आओत । ई सुनैत कमलकान्तक  कनिया कहलनि - एहि ठाम बेसी नहि बोलु , बड्ड मुश्किल सँ  एहि ठाम घरक  खर्चा चलि रहल अछि । अहाँक  बोझ कोना उठायव ? कमलकान्त कहलनि - बाबुजी  अहाँ गाम उदयकान्त लग चलि जाउ । ई सुनि हुनक आँखि सँ ढ़व -ढ़व नोर गिरs लागल । कानैत अपना बेटा सँ कहलनि - बौआ ! अहिंक कहला पर हम एहि ठाम एलहु अछि। आव तs हमर सव पाई खर्च भs गेल अछि , तहन दुई जुनक रोटी अहाँक भारी लागैत अछि । की अहाँ हमरा पाईक  लेल बजेने छलहु ? जौं ई बात छल तs अहाँ फोन पर बता देतहु हम  अहुँक  पाई भेज देतहुँ । ई सुनि हुनक कनिया कलहनि - बाबुजी ! फालतुक   नाटक बंद करु । अखन  हमर खर्च तs  चलि नहि रहल अछि , ऊपर सँ अहाँक खाना -पीनाक खर्चा हम कोना उठायव । कमलकांत कहलनि - बाबुजी !  अहाँ अपन सामान समेट लिअ, काल्हि  खन अहाँक  स्टेशन छोड़ि देव, अहाँ ट्रेन सँ गाम चलि जायव । ई बात सुनि  गोपालकृष्ण तुरंत उदयकांत के फोन पर सव बात कहलखिन । ओ फोन पर सव बात सुनि कहलनि - बाबुजी  ! हम एतेक दिन अहाँक  राखलहुँ , किछु दिन  ओ अहाँ के नहि राखि सकैत छथि । सव दिन हमहि अहाँक  बोझ किएक  उठायव । आव एहि ठाम आवsक आवश्यकता नहि अछि , अहाँ ओहि ठाम  रहु । ई कहि  ओ फोन काटि  देलनि । गोपालकृष्ण केर अपना कान पर विश्वास नहि भs  रहल छल । ओ सोचैत छलाह दुनु बेटाक  पालि पोषि  काबिल बनेलहुँ । आइ दुनुक लेल हम बोझ भs  गेलहुँ अछि । आखिर  ई दुनु कोन जन्मक बदला हमरा सँ लs  रहल छथि । ओ अपना भाग्य पर कोसैत छलाह । ई दिन देखला सँ पहिले भगवान अपना लग किएक नहि बुला लेलथि । जाहि बेटाक  मोह सँ हम अपन घर छोड़ि एहि ठाम एलहुँ ओ बेटा एहन वर्ताव करत, हम कखनहुँ नहि सोचने छलहुँ । दोसर दिन गोपालकृष्ण उठलाह तहन ओ देखैत छथि जे हुनक बेटा आ पुतोहु हुनकर सव सामान पैक  कs  रहल छथि । कमलकान्त हुनका सँ कहलखिन - बाबुजी जल्दी सँ तैयार भs  जाउ, अहाँक  अपना गाड़ी सँ स्टेशन छोड़ि दैत छी । ओ कहलनि - नहि बाउ ! हम कतहुँ नहि जायव । ई बात सुनि हुनक कनिया कहलनि - बाबुजी जखन अहाँक  गाम जयवाक लेल कहल जायत अछि तहन अहाँ गाम किएक नहि जायत छी ?  एहि ठाम अहाँ हमर खर्चा बढ़ा  रहल छी । गोपालकृष्ण कहलनि - कनिया हम कतs  जाउ,उदयकांत गाम एला सँ मना कs  देलनि अछि । कमलकांत कहलनि - ओ ई कोना कहि  सकैत छथि, चलु हम अहाँक  गाम पहुँचा दैत छी ।  ई कही कमलकान्त बाबुजी के रेलवे स्टेशन पर बैसा कs  टिकटक  बहाने  गायब  भs  गेल छलाह । गोपालकृष्ण बेबसी सँ अपन बेटाक  राह देखि रहल छलाह । मायुस  सँ बैसल- बैसल दिन राति कटि  गेल, मुदा  कमलकांतक  कोनो अता - पता नहि छल । दोसर दिन खोईंचावाला  फेर स्टेशन पर आयल । गोपालकृष्ण के देखि हुनका बड्ड कष्ट भेलनि । तखनहि समाज सेवी संस्थाक किछु सदस्य गरीब, बेसहारा  आ मज़दूर लोकनिकक  लेल भोजन देवाक लेल स्टेशन पर आयल । ई देखि खोईंचावाला  बुजुर्ग दिस इशारा करैत हुनका खाना देवाक लेल कहलखिन । संस्थाक सदस्य हुनका खाना देलखिन । गोपालकृष्ण के जोर सँ भूख लागल छल एहि सँ जल्दी जल्दी खाना खा लेलथि आ फेर हुनका सँ कहलखिन - बौआ  आओर खाना अछि आ हमरा आओर दs  सकैत छी । ई सुनी समाज सेवीक सदस्य हुनका खाना दैत पूछलखिन  जे चाचाजी कोन ठाम सँ अहाँ एलहुँ  अछि ? अपनेक  घर कोन ठाम अछि ? ई सुनैत गोपालकृष्ण सव वृतांत हुनका कहलखिन आ आगु कहलनि जे आव बेटा लग नहि जायव । समाज सेवीक सदस्य सँ ई बात कहि हुनका आँखि सँ ढ़व -ढ़व नोर खसय लागल । एकर वाद ओ सव हुनका एक वृद्धाआश्रम मे लs गेलाह आ कहलनि चाचाजी जखन धरि अहाँक  परिवार वालाक  सजा नहि मिलत तखन धरि अहाँ एहि ठाम आराम सँ रहु । गोपालकृष्ण कहलनि जे हमरा किनको सजा देवाक नहि अछि, आव हम ओहि नरक में नहि जायव । हम एहि ठाम शेष जीवन काटि लेव । समाज सेवी सदस्य हुनकर एक टा विडियो बनोलनि आ न्यूज़ कवर कs  सोशल मीडिया पर पोस्ट केलनि -�कहल जायत अछि जे बच्चाक  लेल माय-बाप हुनका पूरा दुनिया होयत अछि । तें माय-बाप के भगवानक  दर्जा देल गेल अछि , मुदा पैघ भेला पर माय-बाबुजी हुनका लेल बोझ  लागैत  अछि । ईएह कारण अछि जे किछु बच्चा अपन माय आ बाबुजीक  बृद्धाआश्रम छोड़ि  दैत छथिन । आइ एहन घटना अछि जे एक बुजुर्ग पिताजीक हुनक दुई टा बालक दर-दरक  ठोकर खायवाक लेल मजबूर केलनि अछि । आखिर  ई कखन  धरि चलत ।� न्यूज़ कवर कs  गोपालकृष्ण के सांत्वना दैत ओ सव चलि गेलाह । चारि -पाँच दिनक  बाद आश्रमक  संचालक हुनका सँ कहलनि - अहाँक  बेटा आ पुतोहु अहाँ सँ मिलवाक लेल आयल छथि । गोपालकृष्ण ई सुनी हैरान भेलाह ।खुशी सेहो भेलनि जे आखिरकार हमर बेटा पुतोहु हमरा सँ मिलवाक लेल आयल छथि।मुदा जखनहि ओ बाहर एलाह तs देखलखिन जे एकटा नवयुवक अपन कनियाक संग किनको आयवाक  इंतजार कs रहल छल । ई देखि गोपालकृष्ण घुरि के आवs  लगलाह; किएक तs एहि नवयुवक के ओ नहि पहचानलखिन। तखनहि पाछु सँ आवाज़ आयल �चाचा अहाँ हमरा नहि पहचानलहुँ।� ई सुनि हुनका हेरानी  भेलनि । किएक  तs  आवाज़ किछु जानल पहचानल लागि रहल छल । फेर पाछु घुरि के देखलखिन, तहन ओ नवयुवक कहलखिन चाचा हम शंकर छी । तहन ओ  किछु याद कs  कहलखिन - अरे शंकर! अहाँ कतेक पैघ भs गेलहुँ । अहाँ बड्ड छोट छलहुँ तखनहि अहाँक  देखने छलहुँ । दरअसल शंकर एक अनाथ बालक छल, जिनका आगु पाछु केओ नहि छल । गोपालकृष्ण बालकक दशा देखि अपना डेयरी में हुनका काम देने छलाह। तनख्वाहक  संगहि संग हुनकर पढ़ाई-लिखाई आ भरण पोषणक  खर्चा सेहो उठावैत छलाह । जखन उदयकान्त डेयरीक काम संभालैत, तहन चोरीक  इल्ज़ाम लगा कs  हुनका निकालि देने छलाह । गोपालकृष्ण कहैत छलाह जे हमर शंकर ई काम नहि कs  सकैत अछि , मुदा हुनकर एकहु टा बात नहि सुनलक आ उदयकांत हुनका काम सँ निकालि देने छलाह । शंकर कहलनि - � चाचाजी शंकर के नहि पहिचान पेलहुँ । अखन जे किछु छी से अपनेक देन अछि ।� ई कहि  शंकर हुनका गोर लागलखिन । गोपालकृष्ण शंकर के भरि  पाँज पकड़ि कानs  लगलाह । ओ ततेक कानलाह जे हुनका नोर सँ हुनकर देहक नुआ सेहो भिंग गेल । शंकर कहलनि - � चाचाजी हम काल्हि खन अपनेक खबर मोबाइल पर देखलहुँ । तहन हम अपना के नहि रोकि सकलहुँ ।� ईश्वरक  कतेक  अजीव खेल अछि । जिनका माय-बाबुजी होयत छैन,हुनका लेल कोनो कदर नहि होयत अछि । हम अनाथ माय -बाबुजीक  लेल तड़पि  रहल छी । चाचा जी आव अहाँ हमरा संग रहु । गोपालकृष्ण कहलनि - नहि बेटा ! हम आव ककरहु पर बोझ नहि बनs  चाहैत छी । जिनगी  जतेक दिन वांचल अछि एहि ठाम रही गुज़ारी लेव । शंकर कहलनि - चाचाजी अहाँ जे बच्चा मे हमरा प्यार आ सहारा देने छलहुँ से हम कोना भुला जायव । अपनेक एहसान अछि जे हम अखन एक पैघ कम्पनी में मैनेजर पद पर काम करैत छी । आइ हम अहाँक  एक नहि सुनव । अहाँ हमरा संग घर चलु । शंकरक  कनिया सेहो हुनका गोर लागि कहलनि - जौं अहाँ हमरा संग चलव तs हमरा बाबुजीक  प्यार मिल जायत अछि आ बच्चा के दादाजीक  छाया । शंकर गोपालकृष्णक  पाइर पर गिरैत कहलनि - चाचा जी एतेक एहसान हमरा केने छी आओर एक टा एहसान कs दिअ । आइ हमरा संगे घर जयवाक लेल मना नहि करु । अंत में गोपालकृष्णजी शंकरक  बात मानि हुनका संग घर चलि गेलाह आ खुशी सँ ओहि ठाम रहs  लगलाह । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.७.प्रीतम कुमार निषाद- आचार्य-चाणक्य(खण्ड-काव्य)मादे,मैथिली केँ सेवैत : कविश्री राजकिशोर मिश्रा प्रीतम कुमार निषाद आचार्य-चाणक्य(खण्ड-काव्य)मादे,मैथिली केँ सेवैत : कविश्री राजकिशोर मिश्रा आर्यावर्त अथवा भारतवर्षक ऐतिहसिक तथ्यादि सँ  देश केँ कतेको कविर्मनीषी लोकैन कलम साधना संग समर्पित छथि।जाहिमे मिथिला-मैथिलीक मर्मज्ञ कवि राज किशोर मिश्रा'क साहित्य-साधना सेंहो नुकाएल नहि अछि।भारत सरकार'क विद्युत-अभियन्ता पद सँ सेवानिवृत्ति पछाइत ओ विज्ञान'क शिक्षा के साहित्य- विधा सँ सम्पृक्त करबाक धर्म निमाहि रहल छथि। वस्तुतः१२०पृष्ठक पोथी "आचार्य चाणक्य"मैथिली- खण्ड-काव्य, सृजन कए सुधी-पाठक बीच परोसि केँ  प्रशंसनीय काज कयलनि अछि। जाहि मे अपन पूज्य  पितामह स्व० कलाधर मिश्रकेँ समर्पित करैत पोथीक भूमिका अन्तर्गत 'दू आखर'शीर्षक मे प्राच्य-भारतक ई०पू०३७५ केँ आस-पास विष्णुगुप्त केँ जन्म हेबाक जनतब देलनिअछि। संगे लगभग २३००बरख पूर्वेहि केँ हुनक जिनगीक काल-खण्डकेँआँकैत राजनीतिक, कूटनीतिक,सामाजिक एवं व्यावहारिकताक श्रेष्ठतम प्रसंगक सूत्रपात कयलनि अछि।ओ संज्ञानी उपदेशक  ऋषि चणक-पुत्र रूपे "चाणक्य" नामे जानल गेलथि।  जिनक'अर्थशास्त्र' व 'चाणक्य-नीति'कालजयी-ग्रन्थ रूपे प्रतिष्ठापित भेल। संगहि बौद्ध-ग्रन्थ - 'महावंश', जैन-ग्रन्थ - 'परिशिष्टपर्वन', विशाखदत्तक लिखल 'मुद्राराक्षस नाटक', मेगास्थनीज द्वारा लिखित पोथी 'इण्डिका'आ किछु पुराण सभक ग्रन्थादिक श्रोत लऽ चाणक्य ओ चन्द्रगुप्त मौर्य सँ सम्बन्धित कृति केँ ओ आधार लेबाक चर्चा कएने छथि। जाहि मे ओ प्रबन्ध-  काव्य मानि छःसर्गक एहि पोथी विष्णुगुप्त(चाणक्य) केँ बहुआयामी व्यक्तित्व व राष्ट्र-निर्माता,राजनीतिज्ञ, अर्थशास्त्री, रणनीतिकार एवं सामाज वैज्ञानिक रूपे चरित्र चित्रण कयलनिअछि।हुनका अद्वितीय विद्वान, कूटनीतिज्ञ ओ कालद्रष्टा सिद्धकए,नाट्य-काव्य जकाँ सृजन कयलनि अछि। पोथीक कम्पोज (टंकन) हेतुएँ  सह धर्मिनी पत्नी श्रीमती अनिता मिश्राक सहयोग केँ सेहो ओ मुक्त कंठ सँ कयलनि अछि। रचयिता कविश्री मिश्रा जी कथावस्तुक परिकल्पना मादे १८(अठारह)गोट  पात्रक परिचय पृष्ठ के अलावे १२ पृष्ठीय पहिल सर्ग मे व्यष्टि-विज्ञानक समाहार संग  सृष्टि-प्रकृति जन्य अनगिन तात्विक समेकन एवं पुरु- षार्थी वीर'क कीर्तिकेँ,अमरत्व प्रसादक द्योतक मानैत छथि। अकादमिक शिक्षा मे विज्ञान विषयक अध्येता रहबा कारणे रचनाक शब्दावली मे जैव-रसायन एवं भौतिकी शब्दादि सहेजल देखाइत अछि। तदनुकूले धर्म-संस्कृति,लोक-सभ्यता एवं ऐतिहसिक सदाचारी जुग पुरुखक वृत्ति-चित्रण मादे, ओ अखण्ड भारतक सम्प्रभुता तथा राष्ट्रीय एकता निमित्ते विराट व्यक्तित्व केँ अनुरागी बनल छथि। आर्यावर्तीय पश्चिमोत्तर व पूर्वोत्तर मध्य-भारत क्षेत्रक तथा मगध-साम्राज्यक राजधानी,पाटलिपुत्रक घटना- वृत्तिएँ पोथीक सृजन भेलअछि। कविश्री मिश्राक परि कल्पित यात्रा एवं भारतक अतीत व प्राच्य-प्रवृत्ति केँ किंवदन्ती आओर कतिपय ग्रन्थीय आधार लऽ सरल ओ सरसता केँ चाशनी रूपे कविता केँ तुकबन्दी कए रोचकता सहेजने छथि। ओना तँ काव्यास्वादन मादे कोमलावृत्ति केँ आनन्द प्राप्ति होइत अछि। जौँ, कि एहि सर्गक सारत्व मे प्राचीन भारत अन्तर्गत वैदेशिक आक्रामक गतिविधि वा अपनो देशक निष्ठुर सम्राट'क कोप भाजन होइत, लाचार व भयातुर जन-समूह केँ  उपदेशन मादे सम्बल बढ़बैत तक्षशिलाक 'भद्र-पुरुष- चणक' पुत्र 'आचार्य चाणक्य' वा 'विष्णु गुप्त' जीक कुटिल-शौर्य (कूटनीति) केँ प्रधानताक चित्रण अछि । ओना तँ "आर्यावर्ते भरतखण्डे जम्बूद्वीपे" मन्त्रोच्चार  मादे देशक प्राचीन सभ्यता - संस्कृति एवं अर्वाचीन काल-क्रमक लोकानुराग समर्पित होइतआबैत अछि। ताहि संग भारत भूखण्ड'क स्वाभिमान, सम्प्रभुता व एकता' निमित्ते सहस्राब्दीक साक्ष्यांकित पद-पंक्ति... " विश्व-इतिहास-विराट क्षितिज पर चाणक्य चमकैत अमर्त्य नक्षत्र। ओ शिक्षक,नीति ओ अर्थशास्त्रक छथि भऽ गेल मानक प्रमाण-पत्र।। " तदनुरुपेँ ... एहि सर्गक तक्षशिलाक कानन कुटीर मे आवासित पुरखा (पिता) चणक केँ अनुपस्थित देखि जिज्ञासु-सुत चाणक्य,प्रतिवासी(पड़ोसी)के पूछ-ताछ  मे मगध-नरेश घननन्द सँ निर्वासित होयबाक जनतब  पावि पाटलिपुत्रक यात्रा-वृतान्त सहेजल अछि।जतय चाणक्य पहुँचि केँ अपन पिताक सुधि लेबा लेल वार्ता  क्रमे असन्तुष्ट रहै'छ। संगेहि यवनक आक्रमण वृत्तिएँ यूनानी सम्राट सिकन्दर सेनाक पड़ाव कारणे चिन्तित होइत,चाणक्यक कूटनीतिक अभीप्सा केँ सूत्रपात मे लीन भऽ जाइतअछि।सिकन्दरक सेनापति सैल्युकस, एन्टीगोनस व दूतमेगास्थनीज आदि केँ चरित्र-चित्रण,  भारतक ऐय्याशी सम्राट घननन्द'क विद्रोही पर्वतेश्वर, आम्भीक,बन्दी-शकटार,राजकन्या कल्याणी,अलका तथा यूनानीसुन्दरी काॅर्नेलियाक विवरण संग भारतक शासन-दुर्व्यवस्था'क चित्रण कयलनि अछि। कविश्री मिश्रा जीक काव्यमयी लेखनी मादे ... " अछि आग्रह मगध सम्राट सँ पाबथि पोरसक सहयोग । नहि तँ यवन आक्रमण कारी कहू, की छोड़त कोनो दोग ।।" एहि तरहक आशंकित संवाद सँ आक्रोशित भावे घननन्दक कुवाणीक बानगी ... " तामसे बाजऽ लगलनि नन्द-चुप रह तोँ  अविनीत ! चलिजो हमर दरबार सँ नहि सुनब तोहर हम नीत।।" अनुरूपेँ,ओ आचार्य चाणक्य केँ अपन प्रतिहारी मादे टीक(चुटिया)धएने दरबार सँ बहार कराबैत अछि। तँ अपमानक प्रतिशोध केँ पालैत चाणक्य (विष्णुगप्त) बाटेहि-बाट क्रोधक अन्तर्ज्वाले उद्विग्न होइतअछि... " अहंकार नहि टिकलै केकरो रावण कि मथुरापति कंस । सिंहासन लेल पाहुन तोँ छह जल्दी उजड़त नन्दक वंश।।" आचार्यक अन्तर्मन मे प्रतिशोधक क्रोधाग्नि सुलगैत रहल। बाटेहि मे बालक्रीड़ा रत राजकीलम् खेलाइत एकटा बटुककेँ भूप बनल कौतुकपूर्ण अवस्थामे देखि  चाणक्य केँ संचेतना सुदृढ़ भेलैक। तखनओ बटुक सँ नाम व परिचय लऽ अपन शिष्य बनेबाक इच्छा व्यक्त  कएल।ओ अपन पिता सँ आज्ञा प्राप्ति अनुसारे इच्छा  पूर्ति केँ वचन देलथि । आचार्य हुनक पालक पिता सँ बटुक ' चन्द्रगुप्त' केँ लऽ अपन शिष्य बनावैत अपन संकल्प सिद्धि मे जुटि गेलथि। पोथी केँ ३४ पृष्ठीय दोसर सर्ग मे कविक लेखनी   तक्षशिलाक आम्भीक आओर राजकुमारी अलका केँ मातृभूमि सिनेहे मगध-नायक पर्वतेश्वर के सहयोगक अपेक्षा सँ यवन सेना सँ मुकाबला योजनाक विवरण कएल गेलअछि। एहि बीचआचार्य चाणक्यक संकल्प  निर्देशन मे सभ तरहक प्रशिक्षण 'चन्द्रगुप्त' केँ भेटैत रहल।आचार्यकआदेश पाबि चन्द्रगुप्त दाण्डायनऋषि के आश्रम जाइ छथि।जतय यूनानीगुरु अरस्तूक प्रति छवि आँकैत सिकन्दर, हुनका सँ आशीर्वादक अपेक्षा  कएल, तँ ऋषिदाण्डायन निस्वार्थ भावे शौर्य-बुद्धिक सहारे सदयता पालैत विजयक कामनार्थी होयबा केँ उपदेशन कएल। एहि उपदेश केँ शिरोधार्य कऽ यवन सम्राट सिकन्दर युद्धविरामक घोषणाकए वापस गेल। तखन चन्द्रगुप्त उपस्थितभऽ'तक्षशिला-विद्या पीठक-  स्नातक'रूपे परिचय दैत,कहलनिजेँ पश्चिमोत्तर सीमा   पर यवनक आक्रमण सँ लोक-मन मे विकट संकटक दौर अछि। ई सुनि दाण्डायन चन्द्रगुप्त केँ धीर गम्भीर भावे युद्ध-कला व रणनीतिक कौशल सिखबाक ज्ञान दैत अछि। क्रमशः बन्दी मंत्री शकटार पुत्री सुवासिनी के रंगशाला मे दाव-पेंच, राजमहल'क कतेको षडयंत्र  सँ त्रस्त परिवेशक करुणा सहेजल अछि। एहि सर्ग मे चन्द्रगुप्त'क उत्सुकता देखाओल गेल अछि।चन्द्रगुप्त   भेष बदलि कऽ सिकन्दर के शिविर-दरबार मे जाइत अछि।जतय हुनका गुप्तचर मानिके पेश कएल जाइत अछि।यवनक सैन्य व्यवस्था देखि ओ छगुन्तामे पड़ैत  रहल। सिकन्दर के पूछल प्रश्नक उत्तर दैत स्वाभिमान  सँ भरल चन्द्रगुप्त कहल, जेँ हम अपनेक हितक बात  कहए अएलहुँ अपने सीमापर सँ सेना हटा लेल जाउ। अपने विश्व-विजयक मनोरथ त्यागिकेँ अपन देश घुरि जाउ। तखन सैल्युकस के प्रतिवादक जवाब दैत चन्द्र गुप्त कहलक जे,की मैसीडोनिया,बेबीलोन आ यूनान जीत कऽ विश्व विजेता कहा सकैत छी ?तखन बन्दी बनेबाक आदेश सूनि ओ पड़ाइत अदृश्य भऽ गेल। क्रमशः यवन विरुद्ध रणनीतिक रचना करैत आचार्य सँ पौरवक नायक पोरस कहलनि हम यवन केसेना सँ युद्ध करब। रणनीति के बाबत बरसात मौसमक बीच  युद्ध छिड़ल एवं अलका-चन्द्रगुप्तक उत्साहो जागल। वितस्ता ओ झेलम नदी उफनैत रहए,युद्धक्रमेअन्ततः  पौरव नायक पोरसकेँ शौर्य सँ आकर्षित भऽ सिकन्दर हुनका संग मित्रताक भाव प्रदर्शित कएल। तदनुकूल कौटिल्यक मगध सम्राटकेँ सिंहासन सँ हटेबाक उद्यम   मे घोर मीमांसा भेल। ताहि प्रसंगक निम्न पाँती... "एकाग्रचित्त भऽ चन्द्रगुप्त छल सुनि रहल चाणक्यक बात। अपनेक आज्ञा शिरोधार्य विद्यार्थी हम छी अहाँक तात्  ।।" पोथी केँ २२पृष्ठीय तेसर सर्ग अन्तर्गत मगध सम्राट घननन्द केँ अपन वैभव-पराभव केँ मूल्यांकन अछि। सिंहरण ओ अलकाक प्रेमालाप वर्णन के अलावे देश द्रोही आम्भीक प्रतिएँ छद्मआक्रोसक विचार विनिमय होइत अछि।तक्षशिलाक महरानी रूपेँ अलका केँ सर्व सम्मति बनेबाक विवरण निमित्ते ... " चाणक्यक नीति, कूटनीति कते जड़ि ओकर गँहीर। आम्भीक नहि छल जोग जते बूझि पबैत कतऽ धरि सीर।।" वस्तुतःएहि सर्ग मे चाणक्यक गुप्तचर मादे घननन्दक ऐय्याशी व रंगशाला'क गीत-नाद संग सुरा-सुन्दरी केँ निर्लज्ज-विलास परिणामे प्रजा लोकनिकआक्रोस,व सत्ता विद्रोह रणनीति मे बन्दी आम्भीक हाथे अनुजा कन्यादानमादे अलका-सिंहरण परिणयविवरणअछि। पोथीक १९पृष्ठीय चारिम सर्ग अन्तर्गत मगध सम्राट घननन्द के सत्ताच्युत करबा लेल पाटलिपुत्र मे सैन्य- संगठनक सूत्रपात के चर्चा अछि। मालव, क्षुद्रक मित्र राज्य सभक सैन्यबल ओ सिन्धु-घाटी जनपदक प्रति वासी केर समर्थन-सहयोगेँ, चन्द्रगुप्त-चाणक्यक संग सैन्य बल विदा भेल। मास भरि चलल युद्ध मे विविध प्रकारक  ह्रास-त्रासक परिस्थिति अभरल। कौटिल्य मुनिक कूटनीतिक ब्यूह-रचना प्रभावे चन्द्रगुप्त मौर्य केँ नेतृत्व मे युद्ध होयबाक रोचक वर्णन सँ कविक लेखनी समर्थ भेल अछि। युद्धक चितेरा-चाणक्य'क चपल-चातुर्यक रणनीतिएँ अन्ततः नन्द-वंश'क अन्त भऽ गेल। जेकर बानगी रूपेँ प्रस्तुत पाँती... " कौटिल्यक कूटनीति आ हुनकर सुदृढ़ आर्यावर्तक दृष्टि। चन्द्रगुप्तक पुरुषार्थ, पराक्रम 'विजय'क ई सभ कएल सृष्टि ।।" परिणामस्वरूप घननन्द केँ बन्दी बनाओल गेल। चन्द्र गुप्त मौर्यक राज्याभिषेक'क हवनादि केँ तैयारी भेल। कविश्री मिश्रा जीक लिखल पद-पाँतीक उत्सुकता... "मगध साम्राज्य! ओकर दरबार! मुदा नन्द नहि, चन्द्रगुप्त सम्राट । लाओल गेल बन्दी घन नन्द केँ जे वंचित अछि निज राज-पाट।। चाणक्य पुछलथिन- " मोन छह ? घिसियौलह हमरा धऽ कऽ टीक । एखनो धरि तँ फूजले अछि ओ, प्रतिज्ञा! ताकह,हमरा सीक।।" अस्तु मगघ साम्राज्य'क संचालन निमित्ते जन- कल्याणकारी प्रशासन'क जिम्मेदारीआब चन्द्रगुप्तके भेटल,तथा 'मौर्य-वंशक' स्थापना संग मगध-इतिहास मे नव अध्याय के सूत्रपात जारी भेल। मंत्री-परिषद् मे  राक्षस केअलावे वररुचि ओ शकटारके शामिल कएल  गेलैक।पाटलिपुत्र मे सुखद-मुक्तिक सिहकैत बसात व राक्षस-सुवासिनी बियाहक वर्णन कएल गेल अछि। ग्रन्थ केँ १३ पृष्ठीय पाँचम सर्ग अन्तर्गत मगधक उत्कर्ष बीच महीपाल चन्द्रगुप्तक अधीन स्वर्णगिरि सँ पञ्चनद धरि, सौराष्ट्र सँ बंग, उत्तरापथ के मालव एवं क्षुद्रक धरि शान्ति-समृद्धिक साम्राज्य रहबाक चित्रण अछि। सिकन्दर केँ मुइला बाद सेल्युकस अधीन बेबी लोनक महीप थिर नहि रहलैक। तखन ओ जम्बूद्वीप (भारत)जितबाक मंशा लऽ बैक्ट्रिया विजय बाद पुनः सन्धि-शर्त केँ बिसरैत आर्यावर्तक पच्छिम सीमा पर आधिपत्य निमित्तेअगुआएल।सूचना पावि आक्रोशित आचार्य चाणक्य व सम्राट चन्द्रगुप्त संग यूनानी गिद्ध  दृष्टि के धूमिल करबा लेल सिन्धु तीर चलबाक सलाह दैत अछि। जतय फेरसँ युद्धक प्रक्रिया भेल आ ओहि युद्ध मे आम्भीक वीरगति भेटलैक।घमासान संग्रामक परिणाम मे यवन हारि गेल। अशक्य वयसे वन-यात्री भेलाह। काल प्रहारक प्रभाव  सँ आर्यावर्तक महाननेता महाप्रयाण कए एहि भूलोक सँ सुरधाम दिश विदा भऽ गेलाह। अन्ततःआठ पृष्ठीय छठम सर्गक मादे कविक लेखनी  चराचर जगतक कौतुकपूर्ण तथ्यादि सँ समापनी भेल अछि। जाहि मे लोकमन केँ स्वभाव मादे सन्तति,परि जन एवं कौटुम्बिक उपदेशक प्रतीकअछि। धिआपूता के कुसंगतिसँ अभीष्ट काजमे बाधा होयबाक संचेतना जगाबैत अछि। विद्याहीन व्यक्ति केर सुन्दरता काज नहि दैत अछि। पुरुषार्थी लेल कोनो काज कठिन नहि  होइत अछि। विद्वान लेल ने कतहु परदेस आ ने केओ  बैरी होइत अछि। जेना करिकी कोइलीक रूप ओकर  मीठ बोल होइत अछि,तहिना मृदुभाषी जन केँ महत्व  सभ ठाम बढ़ैत अछि। एकटा लोक संदेशक पाँती... "मूढ़ जतय नहि पूजल जाय धन-धान्यक जतय बरिसात। पति-पत्नी मे जतय कलह नहि बसथि ओतय लक्ष्मी साक्षात्।।" *********** " ज्ञान-ग्रहण लेल अनिच्छुक जे ओकरा, उपदेश बेकार। नहि बाँस सुगन्धित चानन-तरु बीच मलयाचलक पहाड़ ।।" उपर्युक्त तथ्यादि के संगोरैत कविक पोथी-आवरणक अन्तिम पृष्ठपर परिचयात्मक विवरणअछि। ताहि संग हुनक २१ गोट विवध विधाक मैथिली कृति एवं हिन्दी केँ ११ गोट साहित्यिक कृतिकेँ जनतब देने छथि।नवा रम्भ प्रकाशन मधुबनी/पटना/दिल्लीसँ मुद्रित पोथीक मूल्य ₹२००टाका अंकित अछि। अस्तु पोथीक रचयिता कविश्री राजकिशोर मिश्रा केँ एहि अनुपम कृति लेल साधुवाद...जय मैथिली..! -साहित्यश्री प्रीतम कुमार निषाद, मुरहदी-बाबूबरही(मधुबनी), सम्पर्क:- ९५३४५९०८१४. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.८.प्रमोद झा 'गोकुल'-गबदी प्रमोद झा 'गोकुल' गबदी गोसाँइ गोनूक पयर दबा रहल छलनि आ ओ कोनो गम्भीर विचारमे आँखि मुनने तरे तर कुहरि रहल छलाह ,से देखि ओ गौनूके झकझोरैत बाजल - आहिरेबा! की भेल जे एना कुहरै छियै गुरूजी! प्रत्युत्तर नहिं पाबि ओ अनिष्टक आशंका सँ सिहरि उठल।एना आन दिनते कहियो नै करै छलखीन तखन आइ? आखिर  बजथीन जँ नै तखन कोनाके किछो बुझबै? हनुमान टीला परहक भगतके बजा अनियै! ओ अपनहिं सँ पुछलक।सेहोते ठीक नै हेतै एकटा आर नाटके भै जायत। तखन कोनो डागदर बैदके? सेहो किछ कहथीन तखनने!‌ मोनमे छ-पाँच करैत पुन: ओ जोरसे दूनू पयरके दबबैत कारुणिक स्वरमे बाजल -गु��रू����जी����� !!!! - अरे छोड़ छोड़!! की इच्छा जौ जे गुरूजीक पयर थकूचि दियैन? एह एहनो कतौ भेलैये! हमते अहाँके निसबद देखिके डरा गेल रही। मोनेने थीर भै रहल छल जे धामिके बुलबियै कि डागदरके। - भने ने ककरो बजौलें,नै ते बड़का नाटके भै जैते। -तहन एना गबदी किए मारने छलियै?हमहूँ डरा गेलौं! - व्यतीत भेल अतीत मोनके मथि रहल छल आ वर्तमान आगाँमे ठाढ़ भैके ललकारि रहल छल।आ, हम अतीत आ वर्तमानक बीचमे किंकर्तव्यविमूढ़ भेल कराहि रहल छलहुँ । तोहर पयर दाबब सुवास नहिं आश्वासनक काज कय रहल छल। तोहर व्यग्रता भरल टोकार संजीवनीक काज केलकौ गोसांइ अन्यथा ई अवसाद कखैन छोरिते तकर कोनो ठेकान नै। -एहन कोन बात अहाँके भितरे भीतर मथि रहल अछि जकरा पालि पोसिके बलवन्त बना रहल छियै,जँ अहिना रहल तँ हमरा जनैत नीक नै गुरूदेव।दाँत कुचैत बाजल गोसांइ। - हँ बातते तों ठीके कहैत छह। मुदा, हम करू की? हमर जिनगीक रूप -रेखा तय करै बेरमे बिधातोक कलम जेना भसिया गेलैन। हमर सब हम ककरो नै। कइएक बरीससे तहूँ देखैत छह जे हम कोना रहि सहि रहल छी।ककरा छै एकर चिंता?  हमराते कखनो कालके होइय जे हम जीबैछी कि मरि गेलहुँ । जँ नहिं मुइलहुँ तँ चलैत फिरैत कमाइत खटाइत जीवैत लाश बूझह। -एना बाजिके आर अपन मोनके कसाइन क' रहल छी। अपन कर्तव्यक निर्वाहमे अहाँ कतौ नै चुकलियै,तखन जे नहिं भेट रहल अछि से कपारक दोष। - बातते तोहर ठेकनगर होइत छहु ,मुदा असफलताके कपार पर नै बजारह। अपन मिहनत आ कर्मठताक बल पर अदिष्टके सजौल जा सकैये।ई ज्ञानक गेंठ बान्हि लैह जे सफलताक एकटा रास्ता भाग्यक सीढ़ी चढ़ि तय करैत छैक ते दोसर श्रम घामक धारमे बोहियाके। भाग्य संग दै मे जतै असमर्थ भै जाय ततै श्रमक बाट गैह ली।यैह पुरुषार्थ कहबै छै। - यथार्थ कहल अपने।सैत हमरे ई पाठ पढ़बैले स्वांग रचने छलियै। -तोहींते एकटा छह जे खोजो खबैर रखै छह,नहिंते स्वयंके देखि आब सिहरि जाइ छी।ई कहैत आँखि नोरा गेलैन। -दीप,मधुवनी (विहार) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.९.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा- आन दिनक अप्पन कुमार मनोज कश्यप लघुकथा- आन दिनक अप्पन ओहि कॉलोनी मे जखन लोक बसबो ने शुरू केने छलै ओहि सs पहिने सs सड़कक ओहि कात झोपड़ी छलै बलचनमा के! रिक्सा चला कs ओ कहुना अपन जीवन-यापन कs रहल छल। कॉलोनी बसिते सुसभ्य आ संभ्रांत लोक के एहि कॉलोनी मे बलचनमा के ओ झोपड़ी आ रिक्शा .... गोर अंग पर कारी बदनुमा दाग सs कम्म नहिं बुझल जा रहल छलै। खास कs हरेंद्रबाबू के तs ठीक घरक सामने छलैक झोपड़ी!  तैं हुनका बेसी असौकर्य बुझाईत छलैन। जखन हुनकर व्यक्तिगत प्रयास झोपड़ी के उजाड़बा मे सफल नहिं भेल तs ओकरा ओ नव-सृजित रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन  मे मुद्दा बनेलनि। सफलता मुदा एखन तक नहिं प्राप्त भs सकल छलैन आ तकर मुख्य कारण बलचनमा के दावा  जे ई जमीन ओकर पुस्तैनी छै। जखन कॉलोनी बनेबाक लेल जमीन अधिग्रहण शुरू भेलै तखन ओकरो पुरखा जमीन देने छलै; मुदा ई दू धूरक भूखंड अपने लग रखलक � अपन बास खातिर। ओ एकर सबूतो देखबैत छै। बात चाहे जे हो कुल मिला कs स्थिति ई छै जे ओकर झोपड़ी एखनो यथावत छै। हरेंद्रबाबू के आब बलचनमा अपन जानी दुश्मन बुझना जानि पड़ैत छलैन। हरेंद्रबाबू के ओहि राति अनचोके मे हार्ट अटैक भेलैन तखन घर मे कनियाँ के छोड़ि केयो दोसर नहिं! बेचारी स्त्री एकसरे निशिभाग राति मे की करौ? मदद लेल कनैत भागल गेली पड़ोसी ओतs। ग्रील खटखटकबैत रहली; मुदा केयो खोललकै नहिं। दोसर पड़ोसी केबाड़ खोललकै तs जरूर मुदा अपने बीमार हेबाक बात कहि कोनो सहायता करबा सs असमर्थता व्यक्त केलकै। आब ओ निरिह स्त्री करौ की? दुःखद आशंका सs भरल कनैत घर घुरि केबाड़ खोलिते रहै कि सहसा कोनो आहट बुझेलनि .... सामने बलचनमा ठाढ़ - 'की भेल मेमसाहेब? एते राति मे आहाँ के हड़बड़ायल बाहर जाईत देखली ....  सभ ठीक-ठाक हई ने?' प्रश्नक एहि झड़ी के बीच ओ अबला अपन बहैत नोर आ हिचकी के कारण बाजि तs किछु नहिं सकली; बस ईसारा मात्र कs सकली बिछान पर बेसुध पड़ल अपन पति दिस! बलचनमा हरेंद्रबाबू के देह टोबलक आ फुर्ती सs बाहर बाजैत निकलल - 'मेम साहेब आहाँ तैयार रहू, हम अपन रिक्शा निकालने अबै छी।' बेतहाशा पैडल मारैत आधा घंटा के भितरे ओ हॉस्पिटल के गेट पर छल। बिना अटेंडेंट के प्रतिक्षा केने ओ दौड़ल गेल आ स्ट्रेचर पर हरेंद्रबाबू के अपने भरी पाँज उठा कs इमर्जेन्सी वार्ड दिस भागल। डॉक्टर के ताकि कहुना नेहोरा- विनती कs कs अनलक। स्थिति किछु सामान्य होईते बलचनमा मेम साहेब के वार्डक बाहर बेंच पर डाँड़ मोड़ै लै जबर्दस्ती पठा स्वयं बेडक बगल मे ठाढ़ � हरेंद्रबाबू के अबैत-जाईत साँस पर गहिंकी नजरि गाड़ने! साँझ होईत-होईत हरेंद्रबाबूक ऑंखि कनेक खुजलनि �   पहिल नजरि बलचनमा पर आ तकरा बाद कनियाँ पर! दुनू के ठोर पर मुस्की पसरि गेल! फेर कात मे ठाढ़ बलचनमा दिस कातर नजरि सs देखलनि। आँखि साईत आँखिक भाषा बुझि गेल छलै! -कुमार मनोज कश्यप, सम्प्रति: भारत सरकार के उप-सचिव, संपर्क: सी-11, टावर-4, टाइप-5, किदवई नगर पूर्व (दिल्ली हाट के सामने), नई दिल्ली-110023 # 9810811850 ईमेल: writetokmanoj@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.१०.शीला कुमारी आ प्रो. दमन कुमार झा- त्रिकोणक एक कोणक कथाकार : शैलेन्द्र आनन्द १. शीला कुमारी * २. प्रो. दमन कुमार झा ** ' त्रिकोण' कथा संग्रह तीन गोटेक संयुक्त कथाक संग्रह थिक, जाहिमे अशोक, श्रीनिवास आ शैलेन्द्र आनन्दक पाँच-पाँच गोट कथा अछि। तीनू कथाकार समकालीन छथि, तीनूक भूमि -मिथिला, समाज- मिथिला, आ परिस्थिति-मिथिलाक अछि। हम एहिठाम मात्र शैलेन्द्र आनन्दक कथाक प्रसंगक चर्चा करऽ चाहए छी। संग्रह में शैलेन्द्र आंनदक पाँच गोट कथा अछि। ओ थिक -- तूतीक अलाप , एकटा आर मडर केस,अनुत्तरित प्रश्न,उठ पुत्ता : पुरल-पुरल आ चिनगी। पहिल कथा 'तूतीक अलाप' मे विवशताक एहन चित्रण अछि, जाहिमे नोकरी नहि भेटला पर आ गाम घूमि गेला पर हताशल युवाक मनोभावकेँ देखाओल गेल अछि । आर्थिक विपन्नता आ बेरोजगारी एहि कथाक महत्वपूर्ण अंग अछि । खास कऽ मिथिलाक युवासभ रोजगारक अभावमे गांव सॅं शहर दिस पलायन करैत अछि। एहि कथाक नायक केँ ट्रेनक सीट पर बैसल-बैसल मोन उबिया जाइत छै । बुसटक जेबीकेँ टटोलैए तॅं ओहिमे एकटा ट्रेनक टिकट आ एकटकिया रहैत छै। ओ सोचैए बारह घंटा तँ बीत गेल मुदा एखनो बारह घंटाक यात्रा बाँकी अछि। एक बेर चाह पीबि लेब तँ मोन हल्लुक भऽ जाएत । ओ इशारा सॅं चाह बलाकेँ लग बजा एक कुल्हड़ चाह लैत अछि । एकटकिया नोट बढबैत अछि तॅं फिरता दैत अछि चारि आना । ओ चाह बलाकेँ कहै छै � �एके कप चाह छैक हौ ।� �अभिए से ठकमुड़ी लगता है आगे तो एक रुपया से कम में मुहो न बोलने देगा।�� ओ चाहक चुस्की लैत,चाहबलाक गप्प ओकरा मोनमे बेर�बेर आबैत छै। ओकरा होएत छैक जे चाह बला अपने क्षेत्रक छी,ओ पेट भरबाक हेतु एहि टीशन पर आबि -काहे -कूहे बजैत दिन बिता रहल अछि। चाह विक्रेताक फराक-फराक यूनियन छैक। मुदा नगरे-नगरे छिछिआएत बेरोजगार युवकक कोनो यूनियन नहि कियो देखऽ बाला नहि । सर्टिफिकेटक पुलिन्दा एखनो बैगमे पड़ल छै ओकरा होएत छैक जे सम्पूर्ण सर्टिफिकेट भूखक भूगोल छिए । कथाक नायककेँ उच्च शिक्षाक बहुतो सर्टिफिकेट हेबाक बावजूदो बेरोजगारी आ ताहि सॅं जनमल पेटक भूख एक शहर सॅं दोसर शहर घुमबाक लेल विवश कऽ दैत अछि । मुदा तैयो जीवन यापनक कोनो मार्ग नहि भेटैत अछि। आ ओ शहर सॅं गाम आ गाम सॅं शहर करितेऽ रहि जाइत अछि � �आव नै आएब शहर ओ कतेक बेर तूती चिड़ैं जकां बाजल होएत आ फेर ओहि चिड़ैं जकां ओ खा'क छनबाक लेल विवश भऽ जाइए।�� �एकटा आर मडर केस� तत्कालीन समाजमे व्याप्त वर्ग संघर्ष ,शोषण, अत्याचार आऽ व्यभिचारमे लिप्त समाजक जीवंत वर्णन अछि । माघ मास छल जाड़क डर सॅं सूर्यक जखन धाही फूटनि तखन लोक घर सॅं बाहर निकलए । कुसियारक कंटनी शुरु भऽ गेल रहैए । ककरा मारबाक छै एहि ठंढ सॅं मुदा रघुनंदन मिसर लोभे पतन रहथि । ओ अपन बहलमानकेँ तीने बजे भोरमे उठि जाय लेल कहने रहथि । �गिरहत एतेक भिनसरबामे उठल पार लगतै ? देह तॅं बलू बरफ भऽ जायहय आ ताहु पर देह बेनंगन भेल अइ ।सभ हवा सिट- सिटकेँ देहमे माड़ते बलू ।�� ओ ओकरा लोभ दैत कहने रहथिन एहि बेरूका कुसियारक पाइमे एकटा तौनी खरीद देबौ पहिने कुसियार तॅं बेच । ओ निरुत्तर भऽ घर चलि गेल । भोरे तीन बजे रघुनंदन मिसर जागि ओकरा हाक देने रहथिन -झोंटहा छेंरौं । रौ झोंटहा ओकरा टिटकारैत कहै छथि की मरदकेँ कोखिमे जनम लऽ घिनबैत छैं । राटन नहि जेबही ? ओ फटकी खोलि बाहर आएल माघक सिहकी ओकर करेज तक भेधि देलक ।ओ दांत खटखटबैत गिरहत सॅं कहै छनि एहन समयमे परानो नहि बचतै । रघुनंदन मिसर रहथि घाघ लोक ओ चुप कोना भऽ जएतथि ओ ओकरा पोल्हबैत कहैत छथिन काल्हिए तोहर तौनी आवि जेतौ, एकटा गोल गला सेहो सिया लिहें तोरा पत्नीक लेल सेहो नूआ ओकर पत्नी अर्थात मटरी । झोंटहाकेँ ओकर मालिक यमदूत बुझाएत छै । रघुनंदन मिसर मटरिक देह पर अपन कामुक नजरि गरबैत कहै छथि,मतिछिनू छै हम तॅं मालो-माल कऽ देब हमर बात माने तखनिने ? कुसियारक गाड़ी ढलान पर आविते पलटि गेल उपर सॅं गाड़ी आ तरमे झोंटहा। रघुनंदन मिसर सीधे थाना गेलाह,आ नहि जानि कतेक काल धरि दरोगा सॅं हॅंसि-हॅंसिकऽ गप्प कएलनि । हवोढकार कनैत मटरी ठाढ़ छलनि-�गीरहत यो गिरहत आब ककरा देखिकऽ जीवन वितेवए यो गिरहत आ साड़ीकें हुनक आगांमे पटकैत कहऽ लगलनि- �ई साड़ी ओकरे खून में बोरल हइ ।�⁴ रघुनंदन मिसरके लागि रहल छलनि जेना ओकर एक � एक गप्प पोल खोलबाक लेल काफी अछि । ओ परबोधैत कहै छथिन भावीकेँ रोक निहारकेँ ? जो ज्ञान कर हम तोहर परवरिस कऽ देबौ । ओकरा गिरहत आदमखोर बाघ बुझाए छै । रघुनंदन मिसर अपन नाम आ रुतवा लेल किछु कऽ सकैत अछि । सांझ होएते थानाकेँ गाड़ी दरबाजा पर लागि गेलनि ।जीप सॅं सिपाहीक संग दरोगा उतरल आ खाए पिवैक दौर चलल आठ बजे राति तक आ तकर बाद आंगनमे घमर्थन। भोरे दरोगा थाना चल गेलाह। यमुनाक माय कनैत केश छिड़ियोने आंगनमे बैसल छलिह । मटरीकेँ कहल सब बात सच भऽ हुनक जीवन मे उतरि रहल छनि मोन कहै छनि- जो गे यमुनाक माय एहि दिन लेल तोहर बाप एहेन पुरुषक हाथ धरा विदा कएने रहो ? एहि दिन लेल माय कहने रहो नैहरक लाज रखिहें,नहि यमुनाक माय आब तोहर एहि ठाम कोनो काज नहि छौ । जाहि पति पर नारीकेँ एतेक गुमान आ भरोसा रहैत अछि मोनमे कोनो डर नहि पतिक रहैत पत्नीक हिम्मत बनल रहैत छैक आइ वैह पति अपनाकें बचेबाक लेल अपने इज़्ज़त, अर्धांगिनी जे हिनका देबता जकां पूजा केलक तकरा राक्षस बनि एकटा दरोगा हाथे बली चढ़ा देलनि । की एहि दिन लेल ओ अपन चरकाहा स्वामीकेँ भगवान बुझैत आएल ? ओ नारीकेँ नारी नहि वस्तु बूझि दोसरकेँ सौंप देलनि �मोनक दोसर कोन कहै-जे मरि जेबैं तॅं यमुना आ प्रयाग पर की विततै ? की ओ सभ अपनाकेँ सम्हारि सकत ? हॅं ठीके होएतै । सभके एकटा सबक भेटि जएतै आ फेर कियो दोसर यमुनाक माय नहि होएत। ई फेर एकटा मर्डर केस मुदा नहि ओ अपन बापकेँ,अपन भाइकेँ, अपनाकेँ फांसीक फंदा पर दऽ आवि सकैए मुदा दोसर कड़ी, एहि क्रममे नहि जोड़त । �अनुत्तरित प्रश्न�मे बिकौआ प्रथाक चित्रण भेल अछि । कालीचरण अपन बेटीकेँ जीवतेमे दाह संस्कार कऽ दैत छथि। आ कहै छथि हमर बेटी गंगामे डुविक मरि गेली । एहि बातकेँ दस वर्ष बीति गेल आ आइ वैह रेखा बीस वर्षक बाद वियाहलि कनियाँक रूपमे बचपनक संगी विकास संग भेंट भेल । ओकर प्रश्नक संग हमर तन्द्रा टुटल । आहांक नाम विकास छी ने ? स्वीकृतिमे हमर मूंड़ी डोलि गेल छल आ हमहु पुछलिएन कहांकें छी ? हमर प्रश्नक संग ओ चौंकि उठैत अछि आ नूआकेँ खूट सॅं अपन बामा हाथकेँ झंपैत कहैत अछि, हमर माय बाप तऽ मरि गेलै हम असगरे एहि दुनियामे छी । आ गप्पक संदर्भ बदलैत दोसर प्रश्न कऽ देलक अहां बियाह केलिएक कि कुमारे छिएक ? हं गामेमे कऽ लेलिएक ओकर मुंह फेर लटकि गेल। ओकरा हमर गाम माने तरौनी सॅं घृणा छलए । ई तामस किएक हम ओकर कारण नहिं जानि सकलिए । तावत ट्रेन जयनगर टीसन चल आएल छल । हमर हाथक मुट्ठी बन्हैत कहैए - विकास बाबू हम कतेको बेर गाछ सँ लताम तोड़िक अहाँकेँ देने छी,कतेक बेर पानि आनि पियौने छी । हरदम तऽ अहिंक संग खेलाइत छलौं मोन पारु ? हम अनायासे बाजि उठलउ अरे रेखा ? हमर बाजब सुनि ओकर आंखि भादबक मेघ जकाँ सजल भऽ आएल छलए । ओ निधोख बाजि देलनि � �अहाँ डेराउ नहि विकास बाबू हम भूत नहि एकटा जीवित लहास छी, जे चलितो अछि खाएतो अछि आ हंसियो लैत अछि । मुदा-------�⁵ एकटा मरलकेँ जिंदा देखला सँ की हाल होएत अछि हमर छाती जोर � जोर सँ धरकऽ लागल आ ओ सभटा बात कहैत गेल जे कोना ओकर बाप जहाज़ देखाबक लेल गंगा कात अनलक आ एकटा पंडाक हारे छब्बीस सयमे बेचि देलक ओ अहुरिया काटैत रहि गेल । ओहि समयमे ई दस वर्षक छलीह । रेखा हमर मुँह पर हाथ राखि बाजल हमर सप्पत जे ई कतौ बाजी। एहि बातकेँ एक सप्ताह भऽ गेल छल। हमर ध्यान रहि-रहिक ओम्हरे चल जाएत छल हम मोन बहटारबाक लेल चाहक चुस्की लैत छी तखने बोतला बजबैक लेल आवि गेल जे हमर बाउ गाछ सॅं खसि पड़लए। बोतला हमर टोलक गरीबक लोक अछि। मुदा बातक पक्का। हम चाह राखि तुरंत बिदा भऽ गेलउ । कोनो डर नहि गरम पानि सँ ससारहीन हम आयोडेक्स लेने अबैत छी। ओहि बीच कालीचरण बाजि उठल अहां सब थोपिकऽ राखने छिए लहेरियासराय ल जाइयो प्राण बचतै तॅं पाइ बहुतो कमा लेतै बोतला बाजि उठल ��नै मालिक अहाँ अपना मोन सँ करियो एहि गिरहकट्टकेँ हाथे हमरा नहि दिअ ई एहि तरहेँ हमर डीह लिखबऽ चाहैत अछि । कालीचरण करिया नाग जकां बोतला पर फुफकारलक हमरा नहि रहि भेल � चुप्प अहां की बाजब अहां तऽ स्वयं कसाइ छी । ओ एक बेर फेर बमकि उठलाह हमहु ओहि स्वरमे बाजि उठलउ � चुप्प बेटी बेच्चा धनक गुमान तॅं हम नहि सहि सकबौ कालीचरणकेँ मुंह सियाह भऽ गेल । हमरा रेखाक देल सप्पत मोन पड़ि गेल। ओहि काल हम स्वयं अवाक भऽ गेल छलहुं । हमर बात सुनि ओहि ठाम बैसल सब लोक अवाक रहि गेल,की एकर जबाब कालीचरण दऽ सकताह ।�⁶ �उठ पुत्ता : पुरल-पुरल� निम्नवर्गीय खेतीहर मजदूर जे महाजन आ बैंक सॅं कर्जा लऽ कहुना खेती कऽ जीवन यापन करैत अछि। आ मोसमकेँ साथ नहि देला सॅं गामक मजदूर कर्जा चुकाबक लेल पंजाब जाएत अछि आ ओहि ठाम सॅं घुरिकऽ नहि अबैत अछि तकर मार्मिक चित्रण भेल अछि । सड़क कात वला बड़का बऽड़क गाछ ओहि टोलक चौकरीहि बनि गेल छै । सांझ कऽ ओहि गाछ तर लोकक मजमा लागल रहैत छल खिस्सा सुनैक लेल । खिस्सो कहैक अलवत्ते ढंग छै मुक्तेसर कामतिकेँ, बाट चलैत राही-बटोही ओकर खिस्सा सुनबाक लेल रुकि जाए छै। एक दिन ओ एकटा पौरकीक खिस्सा कहने छलाह । एकटा महिला छल ओकरा एकटा बेटा छलए ओ महिला एक दिन राजाक धान कूटैत रहए ओकर बेटा ओहि ठाम बैसल छल । दू सांझक उपासल छौंड़ा कतेक सहाज करितैक ? एक लप चाउर लऽ मुंहमे धऽ लेलक ओकर मायके बड़ तामस चढलै । जे चाउर घटि जाएत तॅं राजा भकसी झोंका देत । ओ बेटाक एक चाट लगा देलकै । छौंड़ा ओहि ठाम सूति गेल आ सब दिन लेल सुतले रहि गेल । जखन चाउर पूरि गेल तॅं ओकरा उठाबऽ गेल तॅं बपहारि तोरि कानऽ लागलि । श्रापित भऽ जखन ओ पौरकी चिड़ै भेल तॅं वैह रट सदिखन लगबैत रहए � उठ पुत्ता पुरल- पुरल । खिस्सा कहैत-कहैत मुक्तेसरकेँ मोनमे डर भऽ गेल जे हमरो एकहिटा संतान अछि कही अपना सॅं दूर नहि करऽ पड़ए आ ओहि पौरकी जकां -- । ओहि गाम परोपट्टामे तीन साल सॅं वर्षा नहि भेल छलै आ भेवो केलै तँ फूं-फाह गृहस्थ सभ रटिते रहि गेल जे - �एक बेर दमसि कऽ बरसतए तँ दुख दूर भऽ जाएत नक्षत्र सभ बीतैत रहि गेल की पुनर्वसु की पुख की हथिया ? डाकक बात सभ झूठ भऽ गेल । कहां गेलए ओ कहबी � �जौं पुरवैया पुरवा बहए, सुखलो नदिया नाव चलाबए। गामक फनैत बात लोकैत कहैत छथिन � कातिक कंता धूरि उड़ाबय� परदेश पकरह आब किसान ।�⁷ आ मुक्तेसरकेँ करेज भालड़ि जकां कांपय लगैक । पहिले रौदीमे गाय, महींस बीक गेल यदि बरदो बेचि लेते तॅं जेहो आस छै सेहो टूटि जएतै । गाममे पंजाब जएबाक होड़ लागल छैक । रामशरण सेहो पंजाब जाए लेल बाप सॅं जिद्द करऽ लागल मुक्तेसरकेँ बोल नहि फूटए जे अपन बेटा सॅं किछु कहितै । बाउ पंजाब नहि जाय देवह तॅं डीहो बिका जेतह । रामशरण दु- तीन बेर मनिआडर सॅं पैसा भेजलक आ सब बेर चिट्ठी लिखै जे अगिला बेर सॅं महाजनक कर्जा चुकाएब किछु दिन ई क्रम चलल तकर बाद एकदम चुप्पी । मास दिनक बाद ओकर दोसक चिट्ठी आएल जे रामशरणकेँ कतहुं पता नहि छै । मुक्तेसर कामति चिट्ठी सुनिते धराम सॅं खसि पड़ल । पंजाबमे ई सभ होइते छै । दू-चारि महिना खटौलक आ पैसाकेँ बात करु तॅं चोरमे नाम लिखा देत आ तकर बाद बिला देत । मुक्तेसर सबहक गप्प सुनि रहल छल आ शुन्य अकाश दिस ताकि रहल छलै । ओकर आंखि कहि रहल छलै � �रामशरण गाम चलि आ । महाजनक कर्जा पूरि गेलए । आब कहियो पंजाब नहि जाए देबौ । आ तखने बऽड़क गाछ सॅं पोरुकी बाजि उठल � �उठ पुत्ता, पुरल-पुरल ।�⁸ �चिनगी� कथामे शोषण प्रलोभन, अत्याचारकें बोझ सॅं दबल जीवन बिताबैत निम्नवर्गीय संघर्षरत नारीकें लेखक चित्रण कऽ देखौने छथि । किर्तू गिरहत अछि आ नन्हकू हुनक जोन अर्थात नोकर । बिना चारा छिड़ियौने माछक शिकार नहि कएल जाएत छैक । ताहि लेल नन्हकूकेँ ओतुक्का हसबदार बना देल गेल । नन्हकूकेँ उम्र पैतीस सॅं बेसी भऽ गेल छल मुदा संतान नहि छल । गिरतक कृपा सॅं शशिधरबा अपन मायकेँ पेट में आएल । एक राति नन्हकू कनियां सॅं पुछने रहए � �कहलियैकि एकरा केहन बुझाई छैक छौंड़ा हेतै कि छौंड़ी । ओकर पत्नीक देह ओकर गप्प सुनि कांपि उठल आ मोन परि गेल ओ राति जहिया किर्तू गिरहतक ओहि ठाम धान कुटै लेल गेल छल । आ ओहि राति घुरल तऽ ओकर पएर भारी लागि रहल छलय आत्मग्लानि इनार पोखरि डूबि मारबाक लेल कहैत छल, मुदा ओकरा मरला सॅं नन्हकू पर की बितत गिरहतकेँ की बिगरतै ओ तऽ एकरा पहिले धमकी दऽ चुकल छल ��यदि ई बात कतौ बाजबैं तऽ सार नन्हकूके जेल भेजे देबौ आ तोहर जे हाल हेतौ से देखतौ नगरक लोक ।�⁹ सात साल बीत गेल शशिधरबा टहलुक भऽ गेल ओकर माय ओकरा हरदम अपनहि संग राखए गिरहतक धान कुटै लेल गेल । तऽ छौंड़ा कुदि-कुदिक ढेकि चलौलक चाउर कुटल भऽ गेल तॅं शशिधरबा एक लप चाउर उठौलक कि ताबत गिरहतनी आबि गेल आ लप्प सॅं हाथ धेलक नहि जानि छौंड़ाकेँ की फुरलै । ओ चोट्टे दोसर हाथे एक फक्का चाउर लऽ मुंहमे धऽ लेलक । कतेक सपरतीव ? एकर सबके काजे एहने । पत्नीक ललकब सूनि किर्तू गिरहत घरके मोख पर ठाढ भऽ गेलाह । शशिधरबा पर एकर कोनो असर नहि, मुदा हेबो करत किए । ओहो तऽ एहि घरक संतान अछि । गिरहत आइयो चुप्प छलाह ओहिना मुदा मोन हुनको मथि रहल छलनि । अपनो एकटा बेटा छनि । शशिधरबा मायकेँ ठकमुड़ी लागिगेल छल । आगूमे आबो दू टा कूड़ी छल � �एक भाग चाउर आ एक भाग खुद्दी चाउर गिरहतकेँ आ खुद्दी ओकर । ओ सभ दिन खुद्दीएक हकदार रहत, चाउर ओकरा कहियो नहि भेटत ।��⁰ गिरहतक बेटा गेंद खेलाएत आएल शशिधरबा गेंद दिस लपकल आ गेंद उठा जोर सॅं फेकलक गेंद घरके छत पर चलि गेल । किर्तू गिरहतकेँ होइत अछि जे शशिधरबा आगि अछि । ओ गेंद नहि एकटा चिनगी फेकलक आब हमर घर नहि बांचत डहि कऽ सुड्डाह भऽ जाएत । एहि तरहें देखै छी जे त्रिकोण कथा संग्रहमे संग्रहित शैलेन्द्र आनन्दक कथा सभ अपन समाजक यथार्थ चित्रण करैत अछि। अपन समाजमे पसरल विभिन्न पात्रकेँ, घटनाकेँ, वातावरणकेँ एहि तरहें मिश्रण कयलनि अछि जे एकटा मंजल कथाक जन्म होइत अछि । ओकर कथानक हमरे सभ बीचक अछि । तें पाठक हिनक कथामे लागले डूबि जाइत छथि । उत्सुकता हिनक कथाक प्राण वायु थिक। ********* *शोधप्रज्ञा, (जे. आर. एफ.) विश्वविद्यालय मैथिली विभाग, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा। **शोध निर्देशक, प्रचार्य एवं अध्यक्ष, विश्वविद्यालय मैथिली विभाग, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा। संदर्भ संकेत :- 1. आनन्द शैलेन्द्र,त्रिकोण,उर्वशी प्रकाशन पटना (1986)ई.पृष्ठ � 83 2. तत्रैव, पृष्ठ � 84 3. तत्रैव, पृष्ठ � 89 4. तत्रैव, पृष्ठ � 90 5. तत्रैव, पृष्ठ � 94 6. तत्रैव, पृष्ठ -97 7. तत्रैव, पृष्ठ � 99 8. तत्रैव, पृष्ठ -101 9. तत्रैव, पृष्ठ -103 10. तत्रैव, पृष्ठ -104 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। पद्य ३.१.प्रणव कुमार झा- संघर्ष आ तपन ३.२.प्रमोद झा 'गोकुल'-रचू खेलौना गीत ३.३.जगदानन्द झा 'मनु'- बीसटा हाइकू ३.४.शिवानी मिश्र-पश्चाताप ( कविता) ३.१.प्रणव कुमार झा- संघर्ष आ तपन प्रणव कुमार झा संघर्ष आ तपन तप से जे तपि कऽ निखरल अछि, वैह धरा पर चमकल अछि। सोना सहि कऽ तपन आँच केर, कुंदन बनि कऽ दमकल अछि। लोहा जा धरि ताप नै पाओत, कोना क ओ फौलादी बनत? जे सहि जाय अछि चोट विकट, वैह तऽ युद्ध में तनल रहत! कांसा जखन भट्ठी में पिघलय, सुंदर मूरत गढईत अछि। तपि कऽ, गलि कऽ,  साँचा में ढलि मोल ओकर फेर बढ़ईत अछि। मोम जड़य जखन बनि कऽ दीप, अस्तित्व ओकर बिला जाएत अछि। कोयला, सेहो जैड़ कऽ, तपि कऽ, बनि कऽ राख़ मेटा जाय अछि। संघर्षक ताप सहि पाबय ओ, जकरा में अछि मूल्य गहल। जे भीतर से छैक खोखला ओ झोंका में ढहल बहल। संघर्ष नहि बस तोड़य सदिखन, मुदा गढ़य व्यक्तित्व नवल। जेकरामें होय मूल्य, धीरज, बल वैह तपि कऽ फेर आरो निखरल। आत्मा मे होय दीप्ति ज्ञान केर, अन्हरिया किछु कऽ पाबय की? जे दुख के पीबि कय जीबय, संघर्ष से ओ फेर डेराय अछि की? धीरज, साहस, सत्य, विवेक चित्त में जेकरा बहय अछि। वैह मनुष महान बनल अछि, सभटा तम जे सहय अछि। जड़य तऽ सबके परय अछि, किछु राख, किछु अंगार बनल। किछु डिबिया सन टिमटिम जड़य, किछु तपि कऽ फौलाद बनल। [प्रणव कुमार झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली] अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.प्रमोद झा 'गोकुल'-रचू खेलौना गीत प्रमोद झा 'गोकुल' रचू खेलौना गीत आनी मानी हम नै जानी फुसिये भाखा हित कानी । नाम गाम हेतु खूब रची सुन्दर कविता  कहानी ।। तर तर पीटी फुसिये तासा जोर लगा के बाबू रौ हैसा !!! माध्यम बनौ स्कूल में झट पट माइक मूहँक मिठगर भाषा ।। मुदा पढ़त जे विद्यालय में ताहि दिस नै ककरो ध्यान । निज स्वार्थ मे मस्त दम्पति मोवाइलक बढ़वथि मान ।। परिक रहल शिशु यू ट्यूब पर सीखय ओकरे काहे कूहे भाषा । थिरकय नाचय मारय ठहक्का पुलकित परिजन देखि तमासा ।। कक्का बाबू  बाबा बाबी बाजय नहिं केओ कखनो । डैड मोम अंकल ताऊ सिखि देखबय सबके सुंदर सपनो ।। रचू खेलौना गीत प्रीत केर मैथिली मे कविवर एखने । सुग्गा मयूर काग हंस सङ वानर भालुक खिस्सा यतने ।। -प्रमोद झा 'गोकुल', दीप,मधुवनी (विहार), फोन-9871779851 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.३.जगदानन्द झा 'मनु'- बीसटा हाइकू जगदानन्द झा 'मनु' बीसटा हाइकू १ भरोसा नहि बचल आब कतौ सहोदरोमे २ आइ बहुते मोल तौल होइ छै मायक संगे ३ टका देवता माय बाप छी टका आइ सभक ४ मेलामे सस्ता घरमे महग छै हिसाब केने ५ आइ काल्हि तँ मोल मनुखक नै पाइ केर छै ६ कोबीक फूल वेलेंटाइन दिन पति देलनि ७ बसबिट्टीमे परल ओधि सन हम बारल ८ पलाश जकाँ सबतरि बारल नीक भेने की ९ नव टिकुला नव गाछमे एलै परिश्रमसँ १० भूखल पेटे मरुआ रोटी नून बड़ निमन ११ दूधक दाँत टूटबसँ पहिने भेलौं गरीब १२ हमर राशि रहतै सब दिन गरीब किए १३ हम गरीब मरबसँ पहिने नहि रहबै १४ रूसल पिया हराएल सम्पत्ति बड़ कचोतै १५ अंतिम घड़ी आँगनक माटिसँ ठोप क देब १६ पहील नेना बड़ सेहेंतगर लगै सभके १७ नर्कक भोग जनरलक यात्रा रेलगाड़ीमे १८ कर्मक खेल कीनब रेलमे की एसी स्लीपर १९ एक्के रेलमे स्वर्ग नर्क दुनू छै दाम हिसाबे २० पानिमे डुबा बिस्कुट कोना खाइ सिखा गेल ओ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.४.शिवानी मिश्र-पश्चाताप ( कविता) शिवानी मिश्र पश्चाताप  ( कविता) हँ केलौँ हम गल्ती अहाँक साथ नहि देलौँ  ।। अहाँ सगँ गुजार ला उमेर अपन हाथ नहि देलौँ । हम सुनाबए नहि आएब विवस्ता अपन  ।। सम्पुर्ण जीवन पछताएब चुइन रस्ता अपन । अहाँक अपराधी छी हम अगर बाटमे छोरलौँ ।। सपना देखाक अहाँके पिडाक कातमे छोरलौँ । हमरा त हमर अपने शरीर पर अधिकार नहि ।। हमर कर्मफल एह अछि तएँ ककरोसँ कोनो उपराग नहि। किए त ककरो ल जाक कैनो नहि सकै छी ।। बितल ओ दिन घुराक आइनो नहि सकै छी । अनकर जीवन इजोत करैत छी ।। अपन दुखमे नहि शोर करै छि । संसारक रीत प्रीय हम लैर नहि सकलौँ ।। ममताक कर्ज प्रीय हम उताइर नहि सकलौँ  । आब त केवल प्रतीक्षामे छी कहिया मरन हएत ।। हे दता अते उपकार करब बेटीमे नहि दोवारा जनम हएत । # शिवानी मिश्र,जनकपुर धाम,नेपाल, मो. +977 970-2903088: mishratrisha612gmail.com; qualification : BBS second year अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। 1 || विदेह ४२२ विदेह ४२२ || 1

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