VIDEHA — Issue 424 / अंक ४२४

Publication: VIDEHA · Issue: 424
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विदेह ४२४ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। [विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X Videha e-Journal (since 2000) at www.videha.co.in ] ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। कॉपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२५. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२५. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA. सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@gmail.com. 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ISBN:978-93-343-7356-1 [विदेह शिवशंकर श्रीनिवास कृतित्व] © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover design: AUM GAJENDRA THAKUR VIDEHA:424 समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा। मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अनुक्रम [विदेह ४२४ म अंक १५ अगस्त  २०२५ (वर्ष १८ मास २१२ अंक ४२४)] विदेह शिवशंकर श्रीनिवास विशेषांक ०.१.विदेह अंक ४२४ पर सम्पादकीय टिप्पणी (पृष्ठ १-२०) ०.२.विदेह अंक ४२४ पर पाठकक टिप्पणी (पृष्ठ २१-३०) १.शिवशंकर श्रीनिवास विशेषांकक संदर्भमे (पृष्ठ ३३-५८) २.शिवशंकर श्रीनिवासजी केर संक्षिप्त परिचय (पृष्ठ ५९-६८) ३.कल्पना झा-सिनुरहार-एखनहुँ प्रासंगिक (पृष्ठ ६९-७४) ४.डा. धनाकर ठाकुर- 'असमंजसी मध्यममार्गी 'कथाशिल्पी शिवशंकर श्रीनिवास' '(सेनुरहार' कथा केर संदर्भमे) (पृष्ठ ७५-७८) ५.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र-सिनुरहार-'शिवशंकर श्रीनिवास'क कथा (पृष्ठ ७९-८२) ६.चंदना दत्त-श्री शिवशंकर श्रीनिवास (पृष्ठ ८३-८४) ७.डॉ. आभा झा-चयनित -कथाक मादें किछु गप (पृष्ठ ८५-९३) ८.नवीन कुमार झा 'शरद'-मिथिलाक माटि-पानिक कथाकार शिवशंकर श्रीनिवास (९४-१०४) ९.वैद्यनाथ झा-अद्भुत कथाशिल्पी शिवशंकर श्रीनिवास (पृष्ठ १०५-१०९) १०.अशोक- शिवशंकर श्रीनिवास आ मैथिली कथालोचन (पृष्ठ ११०-११८) ११.अजित कुमार झा- शिवशंकर श्रीनिवास जीक गामक लोक (पृष्ठ ११९-१२५) १२.देवशंकर नवीन-उठ जाग मोसाफिर भोर भयो (निसभेर नीनमे सूतल समाज'क पहरू कथाकार) (पृष्ठ १२६-१६५) १३.दिलीप कुमार झा-माटि वस्तुए सएह छैक (पृष्ठ १६६-१७५) १४.रबीन्द्र नारायण मिश्र-बेजोड़ छथि श्री शिवशंकर श्रीनिवास (पृष्ठ १७६-१७९) १५.केदार कानन-एक निस्सन कथाकार (पृष्ठ १८०-१८३) १६.जगदीश चंद्र ठाकुर 'अनिल'- किए हँसै छथि गोपीनाथ (पृष्ठ १८४-१८५) १७.आशीष अनचिन्हार-मीना मधु जी केर रचना संसार (पृष्ठ १८६-१८८) १८.डा. शैलेन्द्र मिश्र-श्री शिवशंकर श्रीनिवासक कथा-संसार एकटा मूल्यांकन (पृष्ठ १८९-१९२) १९.आशीष अनचिन्हार-या तऽ अपूर्ण शीर्षक या तऽ अपूर्ण पोथी (पृष्ठ १९३-१९९)

०.१.विदेह अंक ४२४ पर सम्पादकीय टिप्पणी (विदेह शिवशंकर श्रीनिवास विशेषांक सम्पादकीय) शिवशंकर श्रीनिवासक कथा मे चरित्र सभक अपूर्ण विकास रहैत अछि । भाषामे स्थानीय शब्दावली आ कहबीक प्रचुर उपयोग ओ नै करैत छथि, जखन कि हुनकर लेखन गाम घरक प्लॉट पर आधारित रहैत अछि। अतिरंजना सम्वादमे रहैत अछि। सामाजिक परिवर्तनक अभाव, स्त्रीक आत्मसम्मान आदि नीक-नीक कथ्य आ प्लॉट हुनका लग छन्हि मुदा ओइ छोट-छोट क्रान्तिक (लोक आ परिवार विशेष धरि सीमित) पाछाँ कोन बड़का धार बहैत अछि से ओ फरिछा नै पबैत छथि। से संजय सन ओ पर्यवेक्षक बनि जाइत छथि आ कथाक अन्त ओइ छोट-छोट क्रान्तिसँ भऽ जाइत अछि। कथानक अस्पष्ट रहैत अछि, चरित्र एक-आयामी रहैत अछि। शिवशंकर श्रीनिवासक कथा सिनुरहार [हमरा द्वारा कएल एकर अंग्रेजी अनुवाद विदेहक २१म अंकमे (दिनांक ०१ नवम्बर २००८) ई-प्रकाशित भेल छल जे नीचाँ देल जा रहल अछि], जमुनिया धारक सम्बन्धमे ई लक्षण सभ आर बेसी प्रखर लगैत अछि। शिवशंकर श्रीनिवासक कथा सिनुरहार रामभद्र झा सपरिवार हैदराबाद सँ गाँव आएल छलथि अपन पुत्रक उपनयन संस्कार लेल। कल्याणी,बेटी, सेहो आयल अछि।कल्याणी अपन पहिल पतिक मरलाक बाद पुनर्विवाह कयने छल। लोक सभ प्रश्न कय रहल छल, जमायक विषयमे, ओकर जाति, पेशा आदि। प्रीता ओकर सहपाठी आ ओकर परिवारक प्रोत्साहन पर कल्याणी अपन दोसर विवाह कयलक। कल्याणीक माय ओलबा-दोलबाक डरे ओकरा समारोहमे भाग लेबय सँ रोकय चाहैत छलीह, मुदा पिता रामभद्र झा ओकरा सहजतापूर्वक लेबाक पक्षमे छथि। उपनयन संस्कारक समय कल्याणी सिनुरहारमे शामिल होमय चाहैत छलीह। सिनुरहार बिधमे, जतय सुहागिन स्त्रीक माथ पर तेल-सिंदूर लगाओल जाइत अछि, मे कल्याणीक माय ओकरा नै बजेलकै। कल्याणी एकटा खिड़की सँ ई सभ दुखी भऽ देखैत छलि, कारण ओकर माय ओकरा अशुभ मानैत छलि। पिता ओकर समर्थन मे छला मुदा माय क्रोधमे बजली जे कल्याणीक उपस्थिति सँ बेटाक अमंगल हएत। कल्याणी पहिने तँ गाम छोड़बाक सोचलक, मुदा भाईक प्रेम ओकरा रोकलकै। मुदा फेर कल्याणी हिम्मत केलक सिनुरहार मे शामिल होइले खीर-पूड़ीक थारी उठा लेलक आ भौजीकेँ देलक, ओकर पितयौत बहिन ललिता ओकर मायक हाथसँ सिन्दूर लऽ कऽ ओकर माथ पर सिंदूर लगेलकै। सभ अचंभित भेल, मुदा कल्याणीक आभा देखि सभ प्रसन्न भेल।

जमुनिया धार सूत्रधार दालान पर बइसल लिखि रहल छथि। ओत्तै सलमा नामक युवतीक संग भेंट होइत अछि, ओ खड़-पात बहारैले आयल अछि। फातिमाक बेटी सलमा रूप-सौन्दर्यसँ पूर्ण। ओ ओकरा घुरा दै छथि, पत्नी बजा लै छथिन्ह कारण तिलाठवाली गाम गेल अछि। सलमाक दुःखक कथा- पति आवारा सन। सलमा दुस्साहसपूर्वक कहैत अछि जे ओ "खुल्ला" कऽ फेरो विवाह कऽ सकैत अछि। सलमाक पतिक साँप काटलासँ मृत्यु होइत अछि। सलमा कानैत अछि। सूत्रधारकेँ आश्चर्य लगै छन्हि, खुल्ला कऽ दोसर बियाक सोचि रहल छलि, तखन ओकर मरलापर कननी किए? मुदा सूत्रधारक पत्नी ओकर पीड़ाकेँ बुझै छथि, तामसमे लोक की नै बजैत अछि? अंतमे सूत्रधारक पत्नी कहै छथि जे सूत्रधार नारी नै छथि से ओकर दुःख की बुझता? शिवशंकर श्रीनिवास मैथिली साहित्यक एक प्रमुख लेखक छथि, हिनकर कथा सभ गाम-घरक जीवन (व्यक्ति विशेष आ परिवार धरि सीमित सामाजिक परिवर्तन आ स्त्रीक आत्मसम्मान) पर मुख्य रूपसँ आधारित रहैत अछि। हुनकर कथामे गामक लोक आ समाजक जीवंत चित्रण अछि, मुदा तकर अछैत हुनकर लेखनमे किछु मूल कमी साफ देखाइत अछि, खास कऽ चरित्र सभक विकास, भाषिक शैली आ कथानकक संरचना, जे हिनकर कथा सभक प्रभावकेँ कम करैत छै।

श्रीनिवासक कथामे चरित्र सभक विकास अपूर्ण रहैत अछि। भय, अंतर्द्वंद्व आ सामाजिक प्रतिक्रिया सन तत्वक कारण स्पष्ट नै रहैत अछि। उदाहरण लेल सिनुरहारमे कल्याणीक विधवा-विवाह आ ओकर सामाजिक संघर्षक चित्रण छै, मुदा से ओतेक गहींर रूपसँ नै। आरो तँ छोड़ू ओकर मनोदशाक सेहो पूर्ण विवरण नै भेटैत अछि। जेना ओ अनचोक्के कोनो निर्णय लेलक आ ओकर पिता प्रसन्न भऽ गेला, तकरा हुनकर मौन समर्थन कहल गेल अछि। चरित्र सभ जमुनिया धारमे एकाकी आ दुखी भऽ फिरि रहल अछि, मुदा आंतरिक द्वंद्व सतही रहै छै। चरित्र एक-आयामी लगैत छै - नीक तँ नीके-नीक, अधला तँ अधले-अधला। एहि सऽ कथाक वास्तविकता केँ गहींर लऽ जेबामे ओ असफल रहै छथि, से पाठककेँ संतुष्ट नै करैत अछि। दोसर कमी हुनकर भाषिक शैलीमे अछि। हुनकर लेखन मुख्यतः गामक प्लॉट पर आधारित रहैत अछि, मुदा भाषामे स्थानीय शब्दावली आ कहबीक प्रचुर उपयोग नै रहैत अछि, धूमकेतुक कथाक मोन बेर-बेर पड़ैत अछि जे ऐ दोषसँ रहित अछि। गामक जीवनक चित्रण लेल स्थानीय तत्व आवश्यक छै, जे कथाकेँ जीवंत बनबैत छै, केशव रेड्डीक तेलुगु लघु उपन्यास सभ पढ़ू आ तइसँ तुलना करू। श्रीनिवासक कथामे संवाद अतिरंजित रहैत अछि, जइसँ संवाद स्वाभाविक नै लगैत अछि, आ पाठकक कथासँ जुड़ाव कम होइत अछि। तेसर ई जे सामाजिक परिवर्तन आ स्त्रीक आत्मसम्मान सन नीक कथ्य हुनका लग छन्हि, मुदा ओइमे अस्पष्टता, छोट-छोट क्रांति जेना परिवार विशेषक लोक-जीवनक चित्रण भऽ पबैत अछि, मुदा ऐ सभक पाछाँक बड़का सामाजिक धार जे बहल छै, से ओ स्पष्ट नै कऽ पबै छथि। लेखक पर्यवेक्षक बनि जाइत छथि, संजय सन, आ कथाक अंत ओइ छोट क्रांति सभसँ भऽ जाइ छै, बिना ओकर गहींर विश्लेषणक। श्रीनिवासक एकटा कथा पढ़लापर नीक लागत मुदा दोसर-तेसर पढ़लापर ई सभ दोष सोझाँ आबि ठाढ़ भऽ जायत। से ई कथा सभ सामाजिक परिवर्तनक सशक्त माध्यम नै बनि सकल अछि। कथानक अस्पष्ट आ चरित्रक विकास सीमित रहबाक कारण ढेर रास समस्या कथा सभमे आबिये जाइ छै।     समग्र रूपसँ शिवशंकर श्रीनिवासक कथामे संभावना छै, छोट-छोट क्रान्तिक सफलताक कामना छै। से कथा मनोरंजनक संगे समाजक तँ नै मुदा कथेमे, कथा कहबाक शैलीमे, परिवर्तनक माध्यम बनि सकल अछि। श्रीनिवास मैथिली साहित्यकेँ समृद्ध केने छथि। अशोकक कथा/ सुशीलक कथा: संगहि श्रीनिवासक कथा कथाकार अशोक कम कथा लिखने छथि आ तेँ उच्च कोटिक कथा सेहो कम्मे छन्हि। कथाकार अशोकक विशेषता अछि जे ओ आधुनिक सामाजिक समस्याक प्रति सचेत छथि, विषयमे विविधता अनै छथि, मनोविज्ञान केँ भावनाकेँ नीक चीर-फाड़ करै छथि। मुदा विषयकेँ फरिछेबाक कला बेसी काल मारि खाइत छन्हि बेसी काल हुनकर पंचलाइन-एण्डिंगक इच्छाक कारण, कारण ओ पंचलाइन कखनो काल बहुत सामान्य, आ पुनरुक्ति युक्त लगैत अछि। कथाकार सुशीलक माँजल फरिछेबाक कला आ कथा लिखबाक कला, नव आधुनिक कथा लिखबाक कला बेर-बेर मोन पड़ैत अछि।  'छल' कथाकार अशोकक सर्वश्रेष्ठ कथा अछि, ई अति उच्च कोटिक कथा अछि जकर सामान्य कोटिक अंग्रेजी अनुवाद विद्यानन्द झा केने छथि [The Book of Bihari Literature (Abhay K. Editor, Harper Collins, 2022) मे संगृहीत], मुदा कथे तते सशक्त छै जे तहू अनुवादमे जान आबि गेल छै। मनोविज्ञान, अहाँ जकर अभिनय करब, तकर आत्मा अहाँमे पैसि जायत, उगनाक बिछोहमे विद्यापतिक अभिनय करू, अहाँकेँ बिन ग्लिसरीन लगेने नोर चुअय लागत। भोली झा, चुस्त-चलाक, मुदा एहने आत्मा ओकरामे पैसि गेलै। मस्जिद: सुशीलक सभसँ बेशी चर्चित कथा। देवकान्तक गुरुकेँ नमाज पढ़ैले दूर जाय पड़ै छै, ओ गुरुजी लेल मस्जिद गामेमे बनबाबैए, सभक सहयोगसँ। देवकान्त पत्रकारकेँ कहै छै– अयोध्याक राम मन्दिर ओतुक्का लोक पर छोड़ि देतै। मुदा छोड़तै नञि, से जानि लिअ।… एहन त कतेक उदाहरण भेल हेतै देशमे। कोनो फरक पड़ै छै? सुशील चारियेटा पोथी लिखलनि, दूटा उपन्यास, एकटा नाटक आ एकटा लघुकथा संग्रह। रामलोचन ठाकुर अस्मिताक आमुखमे लिखै छथि- “ई बहुत रास कथा लिखने छथि, किन्तु सभ पुस्तकाकार प्रकाशित कराएब सम्भव नहि।” सुशीलक आधुनिकता ऐ मे छै जे ओ नग्र आ गाम दुनूक नीक आ अधला बौस्तुकेँ सोझाँ अनै छथि, ओ नहिये आधुनिक, नहिये पुरातन, नहिये नव बौस्तु बा विचारधाराक मोहमे छथि। सुशीलक आधुनिकता समावेशी अछि, एक दोसराक विचारधारा सँ किछु लेबा, किछु देबामे विश्वास करैत अछि, संगहि कोनो गलतीकेँ झँपबा-तोपबामे विश्वास नै करैत अछि, विचारधाराक नामपर सेहो नै। आ तेँ मूलधाराक छद्म समीक्षक गंगेश सन हिनको ऑनर-किलिंग करैत छन्हि। मुदा अशोक आ श्रीनिवास मे बहुत रास ध्रुव अछि, “एत्ते धरि” आ “तइसँ आगाँ एक्को डेग नै” केर स्वयंसँ निर्धारित सीमा सभ छन्हि आ तेँ मूलधाराक छद्म समीक्षक लोकनिक ओ सभ प्रिय छथि। संख्या दृष्टिसँ श्रीनिवास सुशीलसँ बेशी लिखलन्हि मुदा श्रीनिवास सुशील सन माँजल कथाकार तँ नै छथि, हुनकर जमुनिया धारसँ मस्जिद बहुत आगाँ अछि, बघोतिया हुनकर सिनुरहारसँ बहुत आगाँ अछि। गुणात्मक दृष्टिए अशोक सँ आगाँ आ सुशीलसँ पाछाँ तँ ओ छथिए। श्रीनिवास जीक "बदलैत स्वर" [विदेह ई पत्रिका पेटार- विदेह सदेह ३६ सँ] श्रीनिवास जीक "बदलैत स्वर"मे कोनो कमी नै अछि, बशर्ते ओकर टाइटल जँ रहितै "बदलैत स्वर-मैथिली कथा श्रीनिवास-अशोक-विभूति-बिहारी-वियोगी-नवीनक विशेष सन्दर्भमे"; मुदा ई पोथी  सम्पूर्ण मैथिली कथा साहित्यक स्वर हेबाक दावा करैत अछि। से एकर सीमामे ने बिसाँढ़ आबि सकत, आ ने पइठ। जै ग्रुप/ गोधिंयावाद हेबाक बातसँ देवशंकर नवीनजी बेर-बेर अपन विदेहमे देल साक्षात्कार [विदेह ई पत्रिका पेटार विदेह सदेह ३३]मे मना केलन्हि अछि, तइ ग्रुप/ गोधिंयावादक स्वर "बदलैत स्वर"क स्वर अछि। जगदानन्द झा मनुक माटिक बासन [सन्दर्भ जगदानन्द झा मनुक चोनहा आ शिवशंकर श्रीनिवासक "पण्डित ओ हुनक पुत्र" विदेह ई पत्रिका पेटार अंक ३५३] कथाक धनात्मक पक्ष बेटा माटिक ढाकन-बसनीक बदलामे मूर्ति बनबय लगैत अछि। दोसर जे माटिक बासन बनेबापर सरकार कोनो प्रतिबन्ध नै लगेलकै, उनटे अहाँकेँ मोन हएत जे रेलगाड़ीमे माटिक कुल्हड़मे चाह बेचबाक आ ओइमे पीबाक फैशन छै, सरकार ओइमे मदति केलकै। मुदा ओइ गौण संस्कृतिक स्मृति तँ हमरो अछि, अहूँकेँ हएत आ कथाकारोकेँ छन्हि। मुदा ओ ऐ कथाकेँ आगाँ लऽ गेलाह आ लोककथाक सन्दर्भसँ जोड़लन्हि जइमे नैतिक उपदेश बाल साहित्यक उद्देश्य रहैत छै। अहाँकेँ मोन हएत शिवशंकर श्रीनिवासक "पण्डित ओ हुनक पुत्र"(मिथिलाक लोककथापर आधारित बालकथा), जे विदेहमे ई-प्रकाशित भेल आ संकलित भेल विदेह:सदेह ४ मे (पृ. १३८-१४१) आ उपलब्ध अछि विदेह पेटारमे ऐ लिंकपर https://videha.co.in/archive.htm मुदा श्रीनिवास जीक बालकथा घोषित रूपमे लोककथापर आधारित अछि, मुदा "माटिक बासन" केर अन्तिम भाग मात्र लोककथासँ प्रेरित अछि आ गौण-संस्कृतिक आधुनिकीकरणक प्रयासक ऐ कथाक उद्देश्य नै अछि, उद्देश्य वएह श्रीनिवासजी बला अछि, जे ओ लोककथाक पुनर्लेखनक माध्यमसँ केलन्हि आ जगदानन्द जी गौण-संस्कृतिक आधुनिककरणक प्रयास मध्य मूल कथा-प्लॉट छोड़ि वएह टॉपिक आगाँ बढ़ेलन्हि। कथाक ऋणात्मक पक्ष जगदानन्द जीक बाल-उपन्यासक हम चर्चा पहिनहियो केने छी, आ ओ छी हुनकर "चोनहा"। विदेहमे जगदानन्द झा "मनु"क एकटा दीर्घ बाल कथा कहि लिअ बा उपन्यास प्रकाशित भेल, नाम छल चोनहा। बादमे ई रचना विदेह:सदेह ९ (विदेह शिशु उत्सव पृ. १०९-१२६) मे संकलित भेल, आ उपलब्ध अछि विदेह पेटारमे ऐ लिंकपर https://videha.co.in/archive.htm ई रचना बाल मनोविज्ञानपर आधारित मैथिलीक पहिल रचना छी, मैथिली बाल साहित्य कोना लिखी तकर ट्रेनिंग कोर्समे ऐ उपन्यासकेँ राखल जेबाक चाही। कोना मॉडर्न उपन्यास आगाँ बढ़ै छै, स्टेप बाइ स्टेप आ सेहो बाल उपन्यास। पढ़बे टा करू से आग्रह। मुदा "माटिक बासन"मे जगदानन्द जी निराश केलन्हि, हुनकासँ हमरा चाही छल "पेडिण्ती अशोक कुमार"क "जिगरी" सन बौस्तु मुदा भेटल साधारण सन शिवशंकर श्रीनिवासक "पण्डित ओ हुनक पुत्र"। ई सत्य जे "माटिक बासन" बाल बीहनि-कथा अछि, मुदा जकरा लग प्लॉट रहतै- "माटिक बासनक जगह स्टील आ आन-आन धातु लेबए लागल।"- से ओइ कथाक अन्त करथि- "मुदा हमर सपना ------- आब नहि पूरा होएत । ई कहि ओ ओहि कक्षसँ बाहर भऽ गेला ।" ई हमरा स्वीकार्य नै। आ तेँ एकटा अद्भुत प्लॉट एकटा नीक मुदा मेडियोकर कथा बनि कऽ रहि गेल। विश्लेषण  ऐ कथाकेँ विस्तृत करबाक आवश्यकता अछि, शब्दमे विस्तारो दऽ कऽ ई भऽ सकैए, आ अही शब्द-संख्याक अन्तर्गत रहि कऽ कथ्यकेँ विस्तार देल जा सकैए। मुदा लक्ष्यसँ जेना ओ भटकि गेला- "माटिक बासनक जगह स्टील आ आन-आन धातु लेबए लागल।" केँ विस्तार नै दऽ सकला से "चोनहा"क लेखकसँ हम आशा नै केने छलौं। ऐ कथाक पुनर्लेखन लेखककेँ करैए पड़तन्हि आ तइमे ई बीहनि कथा रहत बा लघुकथा बा दीर्घकथा बा उपन्यासो बनि जायत। [From Videha, Maithili eJournal Issue No 21, November 01, 2008] Author: Sri Shivshankar Srinivas (b. 02.07.1953), village Lohana, Madhubani | Famous story writer | Published works: Trikona, Adahan, Gaachh Paatha (story collections). Translated by: Gajendra Thakur SINURHAR (Putting Vermilion on Married Women by the Host) It was the occasion of the investiture ceremony (sacred thread ritual) of Rambhadra Jha's son. The family had come to their native village from Hyderabad. Kalyani also came with them. She was Rambhadra Jha's only daughter. Ten years younger than her was the son, whose sacred thread ceremony was now being performed. "Kalyani has come!"-this was the talk all over the tola (hamlet). The reason was striking: this Brahmin daughter had remarried after being widowed. She had come to the village, and that too, to participate in the sacred thread ceremony! That was enough to cause amazement. Even those in the tola whose communities permitted widow remarriage were astonished. Different kinds of gossip were in the air, especially among the women. Along with arguments and speculations, most of the discussion revolved around her new husband. Someone said: - "The groom is excellent. Such a smiling face!" Another asked: - "But to which caste does he belong?" A third replied: - "Whatever his caste, once he married a widow, that says everything." Then came further questions: - "What type of job does he do?" - "He works in a bank." - "Then it is good. Whatever it is, Kalyani will remain happy." Thus, all sorts of gossip and chatter spread through society. For this lineage, Kalyani's remarriage was not an impossible event, but it was certainly unprecedented. The marriage had not taken place in the village, but in Hyderabad, where Rambhadra worked and lived with his family. Kalyani's first marriage had been solemnised five years earlier, in the village itself, with great pomp and gaiety. She had been married into a respectable family, with a good groom. But fate was cruel-only four months later, her husband died instantly in a railway accident. At that time, Rambhadra and his family were still in the village. The news threw the household into chaos and mourning. The entire village wept with them. Rambhadra Jha decided not to leave Kalyani in the village. Three days after the incident, the entire family left for Hyderabad-though they were much criticised by society for doing so. In Hyderabad, Kalyani's mother slowly created an environment to help her daughter forget the tragedy, urging her to think of the marriage as if it had never happened, as though it were just a dream. But Kalyani could not easily steady herself. She lived in shock and trembling for quite some time. Yet Hyderabad, with its city life and fresh environment, began to breathe new life into her. At that time, Kalyani was pursuing her B.A. and attending college. One day, her classmate Preeta introduced her to her elder brother. Kalyani hesitated at first, but with Preeta's gentle encouragement, she began to come out of her shell. Preeta's family was originally from Uttar Pradesh; though Brahmins, they no longer followed caste restrictions. They consented happily to a love marriage. Kalyani's mother, who had always wanted her to remarry, welcomed the proposal joyfully. Enthusiasm filled the household, and soon Kalyani was married again. The news travelled back to the village without delay. Some villagers, living in Hyderabad, carried the news home. In no time, it spread throughout the village and the surrounding area. At first, there was intense discussion, but gradually things calmed down. Some criticised, others approved, but most eventually accepted it in good spirit. Now, with the sacred thread ceremony of Rambhadra's son, the same matter resurfaced. When the date was fixed in Hyderabad, the question of inviting Kalyani arose. Surprisingly, her mother did not want her to go. She feared the villagers, dreading that people might ostracise them during the ceremony, where community participation was necessary-not only for the rituals, but also for the feast. She expressed her fears to her husband, Rambhadra. But Rambhadra disagreed: - "Even if Kalyani does not come, people will still outcaste us if they wish. The more we fear, the more they will oppress us." Though unconvinced, his wife remained silent. A few days before the ceremony, she softened. Sitting beside her husband in the morning, she requested tearfully: - "When you go to the office today, return via Kalyani's house. Tell her about Bauwa's ceremony and ask her to come with us. She is our child. Bauwa is her only sibling. How can she stay behind?" That evening, Rambhadra returned and told her cheerfully: - "The moment Kalyani heard the news, she began dancing with excitement and making plans." - "And... him?" asked his wife with hesitation. - "Who?" - "The son-in-law!" - "On his face, I saw a quiet contentment. He is truly a gem," Rambhadra replied. His wife's expression changed. He realised she had wished only for her daughter's presence, not her son-in-law's. But he said nothing. When the family arrived in the village, both Kalyani and her husband were with them. People saw this, and gossip began. Yet no one openly opposed them. All the arrangements for the feast and rituals went smoothly with the villagers' cooperation. Outwardly, there was social harmony. But inwardly, Kalyani's mother remained restless. She felt everyone's eyes were fixed on her daughter and son-in-law. She wished she could make them invisible, yet powerless; she only grew anxious. For Kalyani, however, everything was normal. She laughed freely with visiting women, while her husband mingled cheerfully. But her mother, startled by her loud laughter, feared it might provoke disapproval. Eventually, she scolded her: - "This is the village, not the city. People may object at any time. You should remain calm and disciplined here." Kalyani, shocked at her mother's changed face, lost her enthusiasm. Preparations for the sacred thread ceremony began in earnest. The marba (ritual platform) was erected, plastered with clay and dung, and decorated. The day before the ceremony was the sacred bathing ritual, with drums, pipes, and songs of auspiciousness filling the air. That was also the day of the Sinurhar ritual-when the host applies vermilion to the partings of married women's hair, symbolising the well-being of their husbands. Gifts of sarees, kheer, and fried chapatis were to be given. Rambhadra's wife, the boy's mother, invited all the clan's married women. But Kalyani's name was not on the list. She was not invited. Kalyani sat by a window in the southern wing, watching and listening. Women lined up joyfully for the ritual. She trembled with disbelief-at her own brother's sacred thread ceremony, she was excluded from Sinurhar! Memories of her grandmother's rigid rituals flooded her mind. She recalled how widows were treated as inauspicious, while widowers faced no such stigma. "Women are hawks hunting other women," she thought bitterly. Her mother had excluded her, considering her a bad omen. Just then, her father noticed her absence and asked his wife: - "Why isn't Kalyani in the Sinurhar?" His wife snapped: - "She is my daughter, but her fate was ill. This is a ritual for married women whose husbands are alive. Because of her, I will not allow harm to come to my son." Silence fell. Many disliked her mother's attitude, but none protested aloud. Kalyani, though shaken, soon gathered strength. She looked at her brother's innocent face, filled with affection. How could she leave? Her father's quiet support and her husband's loving glance gave her courage. She walked into the courtyard. Taking the ritual plate, she handed kheer and chapatis to a sister-in-law in line. Cousin Lalita quickly pulled her into the line. Taking the vermilion plate from her mother, Lalita applied sindur to Kalyani's hair. The mother froze, uneasy. But the crowd admired Kalyani's radiant face. Rambhadra, watching, smiled quietly with pride. Her husband's eyes glowed with affection. And thus, in that moment, Kalyani claimed her place. ०.२.विदेह अंक ४२४ पर पाठकक टिप्पणी रमेश 'विदेह' आ मिथिलाक विख्यात कथाकार, श्रीनिवास जी,दुनू के, उपलब्धिक शुभकामना! कैलाश कुमार मिश्र शिवशंकर श्रीनिवास जी पर विदेह समूह केर समर्पित विशेषांक पढ़ल. प्रोफ़ेसर देवशंकर "नवीन", यद्यपि शुरू मे भटकि रहल छलाह मुदा बाद मे जौर कें गासिया क' पकरैत अपन कथ्य गंभीरता सं राखए मे सफल भेलाह. केदार कानन, कथाकार अशोक अपन बात कहलनि. नीक लागल, इहो अनुभव भेल जे इ सभ बात के आरो विस्तार द' सकैत छलाह. कल्पना झा एक पोथी पर केंद्रित होइत अपन बात सफलतापूर्वक रखली. डॉ. आभा झा, डॉ. दिलीप कुमार झा ठीक लिखलनि. डॉ. शैलेन्द्र मिश्र शीर्षक तं बहुत पैघ उठेलाह मुदा बात तुरत खत्म क' देलनि. रबीन्द्रनारायण मिश्र अपन बात साहित्यकार सं भेट हएबाक संयोग, हुनका ओतय जयबाक विवरण आ साहित्यकार एवं हुनक पत्नी द्वरा आव भगत धरि सीमित रखलनि. एकौ आखर हुनक रचना अथवा लिखबाक शैली पर नहि लिखलाह. चन्दना दत्त सेहो भोज पुरि लेलीह. नवीन कुमार झा परिचय देमय मे सफल रहलाह . अजित कुमार झा "गामक लोक" पर अपन बात रखलाह . ठीक लागल. जगदीश चन्द्र ठाकुर श्रीनिवास जीक एक कथा धरि केंद्रित छथि. ई प्रयोग नीक. आशीष अनचिन्हार जी शिव शंकर श्रीनिवास जीक सभ सं नव पोथी "मैथिली उपन्यास केर आलोचना" पर नीक प्रकाश देने छथि. बैद्यनाथ झा लघु किन्तु सटीक बात लिखने छथि. साहित्यकार केर पत्नी पर अनचिन्हार जीक लेखनी नब बातक बम फोडैत छनि. ई सुखद संयोग नीक लगैत अछि. मुदा हमरा ईहो लगैत अछि जे शिव शंकर श्रीनिवास सन साहित्यकार पर आरो विस्तार सं सभ बातक समालोचना कएल जा सकैत छल. मुदा एतबो जे भेल से विदेह केर प्रयास सं. सभ गोटे के आभार. साहित्यकार, विदेह समूह आ अंत मे आशीष अनचिन्हार जी के विशेष बधाई जे ई काज संभव भेल. कल्पना झा विदेहक बहुप्रतीक्षित "शिवशंकर श्रीनिवास विशेषांक" पढ़लहुँ। ठीक-ठाक अंक अछि। बहुत नीक कहबा योग्य नहि। दू-तीन टा कारण अछि, बहुत नीक अंक नहि भ' सकबाक। श्रीनिवास जीक नमहर रचना-संसारक, हुनकर साहित्यिक गतिविधिक, जेहेन वृहत् मूल्यांकन होएबाक चाही छलनि, से ताहि मे किछु कसरि रहि गेलनि। बहुत कम रचनाक चर्चा भेलनि। माने बहुत किछु छुटि गेल। किछु लोकक आलेख एकभगाह सन बुझाएल। जाहि मे हम अपन लिखल "एखनहुँ प्रासंगिक" शीर्षक आलेख केँ सेहो गानि रहल छी। लिखैत काल नहि बुझाएल छलए एकभगाह सन। आब जखन सभक लिखल पढ़लहुँ, विशेष रूप सँ डॉ. धनाकर ठाकुर जीक लिखल "असमंजसी मध्यममार्गी 'कथाशिल्पी' शिवशंकर श्रीनिवास (सेनुरहारक कथा केर संदर्भमे)" पढ़लहुँ, तँ जेना भक्क टूटल। साहित्य केँ बुझबाक, ओकर आँकलन करबाक अपन क्षमता पर स्वयं अपनहि डाउट भेल। हमरा "सिनुरहार" कथा मे कतहु कोनो विसंगति नहि भेटल, ई हमर संकुचित ज्ञान-बुद्धिक परिचायक भेल। हमरा त्रुटि नहि देखाएल आ एकर ठीक विपरीत डॉ. धनाकर ठाकुर जी केँ कमीए-कमी देखा पड़लनि उक्त कथा मे। हम शीर्षके देलियैक "एखनहुँ प्रासंगिक" आ धनाकर ठाकुर जी स्पष्ट कहलनि अछि, "पुनर्विवाहक बादक मानसिकताक ऊपर एहेन प्रगतिशील कथा 2025 ईस्वीमे ओतेक प्रासंगिक नहि लागैए कारण विधवा विवाह नहि तलाकक बाद पुनर्विवाहक कथा अधिक समाजमे आब भए रहल अछि।" खैर, हम अपन लेख सँ तुलनात्मक अध्ययन करबा मे बेकारे ओझरा गेलहुँ। आगाँ बढ़ैत छी। डॉ. धनाकर ठाकुर जी अपन लेख शुरु कएलनि अछि शिवशंकर श्रीनिवास सँ भेल अपन एकमात्र साहित्यिक भेंटक प्रसंग सँ, जे नीक नहि रहलनि, ई बात ठाकुर जी निधोख लिखने छथि। २०१५ ई.क ई बात अछि, जखन ओ श्रीनिवासजीक कथा सुनितहि हिन्दीक समाचारपत्रमे छपल कथाक संग भावसाम्यता ओ कथासाम्यताक आरोप लगा देने छलथिन। अंग्रेजीक कहावत अछि ने.. "first impression is last impression" से किछु तेहने सन बुझाएल हमरा डॉ. धनाकर ठाकुर जीक लेख पढ़ैत काल। पूर्वाग्रह सँ ग्रसित सन। नकारात्मक पक्ष पर बेसी फोकस रहलनि, श्रीनिवासजीक साहित्यक मूल्यांकन करैत काल। मुदा बात मे दम तँ छनि, निस्संदेह ! किछु त्रुटि सभ तँ बहुत सटीक प्वाइंट-आउट कएलनि अछि धनाकर ठाकुर जी। सहीए कहलनि अछि - "हुनक 'य' केर मैथिलीमे अधिकांश मैथिली लेखक जकाँ हिन्दी जकाँ हरसठ्ठहि प्रयोग नहि नीक लागल, जखन 'ए' उपयुक्त ओ उचित।" ठीके एहेन वरिष्ठ साहित्यकार द्वारा हरसट्ठे मैथिली लिखैत काल "य" के प्रयोग देखि हमहूंँ क्षुब्ध रहि जाइत छी। "ए" के प्रयोग उपयुक्त, से बूझल नहि हेतनि, अविश्वसनीय लागैत अछि। चंदना दत्त जी बिधपुरौअले कएलनि अछि। तहिना डॉ. शैलेन्द्र मिश्र जी सेहो संक्षेपे मे निपटा लेलनि काज। रबीन्द्र नारायण मिश्र जीक संस्मरणात्मक लेख नीक छनि। कथाकार अशोक जीक लेख "शिवशंकर श्रीनिवास आ मैथिली कथालोचन", संगहि केदार कानन जीक लेख "एक निस्सन कथाकार" हिनकर दुनूक सुलेखे सन सुन्दर लागल। नीक सोचलनि संपादक महोदय, भविष्यक पाठक दुनू आदरणीय केर सुलेख केँ देखि सकथि तँइ ई बिना टाइप कएल, माने हुनकर सभक हाथ सँ लिखल लेख देल गेल अछि। दुनू लेख मे सुन्दर हैंडराइटिंगे सन सुन्दर सुन्दर बात सभ लिखल गेल अछि श्रीनिवास जीक विषय मे। डॉ. कैलाश कुमार मिश्र जी सेहो नीके-नीके बात लिखलनि अछि। " 'सिनुरहार' शिवशंकर श्रीनिवासक कथा" लेख मे देखलहुँ, जेना हमरा सभटा नीके-नीक बुझाएल "सिनुरहार" कथा मे, सएह पड़ि कैलाश जीक देखा पड़ल। आ ओही कथा मे धनाकर जी असंख्य त्रुटि देखा देलनि। धनाकर जीक अवलोकन-दृष्टि सँ सिखबाक चाही हमरा सभ केँ। हम सभ उपरे-उपरे देखि/बुझि लिखि देल। धनाकर जी व्यापक दृष्टि सँ देखलनि/बुझलनि। दिलीप कुमार झा जीक लेख "माटि वस्तुए सएह छैक" मिठगर-मिठगर बात सँ भरल लेख छनि। एकरो एकभगाहे कहल जाएत। देवशंकर नवीन जीक लेखनी सेहो मित्रताक भार तर दबल सन प्रतीत भेल हमरा। "उठ जाग मोसाफिर भोर भयो" (निसभेर नीनमे सूतल समाजक पहरू कथाकार) मूल्यांकन लेख नहि, अभिनन्दन लेख भ' गेल छनि। भ' सकैए देवशंकर नवीन जी द्वारा बेर-बेर "विशिष्ट कथाकार" कहैत अपन बात राखब हमर मोन मे एक तरहक 'मिसअंडरस्टैंडिंग' सन स्थिति बना देने हुअए। आ लेख केर समापन करैत काल एकटा निबंध मे श्रीनिवास जीक सैकड़ा भरि मूल्य-बोधित (वैल्यू-लोडेड) कथा पर विचार करबा मे स्वयं केँ अक्षम कहलनि अछि देवशंकर नवीन जी, सेहो बात हमर 'मिसअंडरस्टैंडिंग' केँ बल देबाक काज कएलक प्रायः। तहिना वैद्यनाथ झा जी सेहो अपन लेख "अद्भुत कथाशिल्पी शिवशंकर श्रीनिवास" मे श्रीनिवास जी केँ अद्भुते सिद्ध करैत देखा पड़लाह। जखन कि कोनो लेखक, लेखक रूप मे किंवा व्यक्ति रूप मे, नीके-नीक रहिए नहि सकैत अछि। भले ही "मनुष्य गलतियों का पुतला है" आम आदमी लेल कहल गेल छै, मुदा कोनो महानो व्यक्ति द्वारा कएल गेल सभ कृत्य नीके-नीक नहि भ' सकैत छैक। नीक-बेजाएक मिश्रण रहैत छैक सभक जीवन/व्यक्तित्व। भूल-चूक सभ सँ होइत छैक, लेखनी मे सेहो आ जीवन मे सेहो। एहेन हमर मानब अछि। कहबाक माने सम्यक विवेचन होएबाक चाही, नीक-बेजाए दुनू पर बात हुअए। आ से देखाएल गजेन्द्र ठाकुर जीक नूतन अंक संपादकीय मे। विदेहक "शिवशंकर श्रीनिवास विशेषांक सम्पादकीय" नीक लागल, मतलब बैलेंस्ड बुझना गेल। शुरुआते कएलनि अछि संपादक महोदय एही बात सँ, " शिवशंकर श्रीनिवासक कथा मे चरित्र सभक अपूर्ण विकास रहैत अछि। कथानक अस्पष्ट रहैत अछि।" माने संपादक महोदय कथाक चरित्र सभक विकास, भाषिक शैली आ कथानकक संरचना, सभ किछु पर सवाल ठाढ़ कएलनि अछि। जाहि पर श्रीनिवास जी केँ ध्यान देबाक चाही। आगाँ संपादक महोदय कहैत छथि, "दोसर कमी हुनकर भाषिक शैलीमे अछि। हुनकर लेखन मुख्यतः गामक प्लॉट पर आधारित रहैत अछि, मुदा भाषामे स्थानीय शब्दावली आ कहबीक प्रचुर उपयोग नै रहैत अछि, धूमकेतुक कथाक मोन बेर-बेर पड़ैत अछि जे ऐ दोषसँ रहित अछि।" मुदा एहि ठाम धूमकेतु सँ तुलना करब उचित नहि बुझाएल हमरा। सभ रचनाकारक अपन तरीका होइत छै लिखबाक। आ दोसर गप्प समयक संग शिल्प ओ शैली मे परिवर्तन होइत रहल अछि। कहबीक प्रयोग पुरान जमानाक गप्प भ' गेल अछि। ओना हम श्रीनिवास जीक लिखल बहुत पढ़ने नहि छी। जेनरली एहेन होइत रहल छै, से कहलहुँ। माने कहबीक प्रयोग समयक संग स्वत: कम होइत गेल। संपादकीय के अतिरिक्त डॉ. आभा झा जीक लेख "चयनित -कथाक मादें किछु गप्प" सेहो समीचीन बुझना गेल। एकटा बात जे डॉ. आभा झा प्वाइंट आउट कएलनि अछि, तकर चर्चा हम विशेष रूप सँ करए चाहब --" 'मनुक्ख नदी थिक' कथामे पौत्रक पत्नी लेल नतिन पुतौहु शब्दक प्रयोग पाठकवर्गकेँ भाषिक भ्रमक स्थितिमे आनि सकैत छैक।" एकटा स्थापित साहित्यकारो जखन एहि तरहक चूक करथिन तखन आम आदमी नहिए अवगत छथि बहुत रास संबंधसूचक शब्द सँ, तँ कोनो आश्चर्यक बात नहि ! एहि प्रसंग पर हमरा मोन पड़ल चारि मास पूर्व अपन जइधीक विवाह समय के बात। हम गप्पक क्रम मे एकटा बुद्धिजीवी लोक केँ कहने छलिअनि, "एखन अत्यधिक व्यस्तता रहैत अछि, जइधीक विवाह ठीक भेल छनि, अमुक तारीख क' विवाह अछि घर मे।" से ओ महानुभाव पूछि बैसलाह, "जइधी की होइत छै ?" तखन हम फड़िछौलहुँ, "हमर पतिदेवक भतीजी, माने हमर दिआदनीक बेटी।" उक्त प्रसंगक माध्यम सँ हम कहए चाहि रहल छी जे संबंध-सूचक शब्दक मामला मे पुरुष लोकनि गड़बड़ाइत छथि प्रायः। ओना साहित्य-लेखन मे सामान्य गप्प-शप्प जकाँ गड़बड़ करब ठीक बात नहि। "मीना मधु जी केर रचना संसार" सँ प्रायः केओ नहि परिचित छल होएत। माने हुनकर परिवारे धरि सीमित रहल होएत ई बात। एहि विशेषांकक एकटा बड़का सार्थकता रहल, जे ई जनतब लोक धरि पहुँचल। मीना मधु जीक विषय मे आशीष अनचिन्हार द्वारा देल महत्वपूर्ण जनतब -- 1. पहिल कथा हुनक मूल नाम (वसुन्धरा देवी) सँ उपमान पत्रिका केर जुलाइ-सितंबर 2023 केर अंकमे प्रकाशित भेल छल जकर शीर्षक छलै 'की आर खिस्सा कहू।" 2. मीना मधु जीक कुल चारि कथा प्रकाशित अछि आ लगभग 13-14 टा कथा अप्रकाशित छनि संगहि एक गोट उपन्यासक पांडुलिपि सेहो अप्रकाशित छनि। आ एहि लेख केर अन्त मे सभ सँ महत्वपूर्ण बात कहलनि अछि आशीष जी, "कहल जा सकैए जे परिवारक जिम्मेदारी लैत-लैत स्त्री अपन प्रतिभाकेँ बिसरि जाइत अछि।" आशीष अनचिन्हार अपन दोसर लेख "या तऽ अपूर्ण शीर्षक या तऽ अपूर्ण पोथी" लिखबा मे पर्याप्त समय ओ श्रम लगौने छथि, से पढ़ैत काल बुझाएल। श्रीनिवासजीक पोथी "मैथिली उपन्यासक आलोचना" जे बर्ख 2021 मे प्रकाशित भेल अछि, तकर पोस्टमार्टम क' क' ध' देलनि अछि। रिपोर्ट सही/गलत की-कोना देलनि अछि, से तँ ओ लोक सभ बेसी नीक जकाँ कहि सकताह/सकतीह जे श्रीनिवास जीक पोथी पढ़ने हेताह/हेतीह। ओना जे लिखलनि अछि से तर्कसंगत तँ निश्चिते छनि। नवीन कुमार झा 'शरद' जीक लेख "मिथिलाक माटि-पानिक कथाकार : शिवशंकर श्रीनिवास" परिचयात्मक लेख अछि। जाहि मे ओ श्रीनिवास जीक प्रारम्भिक शिक्षा सँ ल' क' हुनकर शोधक विषय (मैथिली कथामे मिथिलाक सामाजिक जीवनक चित्रण) पर्यन्तक विवरण दैत, हुनकर रोजगार-संबंधी विवरण, तदुपरान्त हुनकर साहित्यिक यात्राक चर्चा सेहो कएलनि अछि। नीक लेख छनि। समग्रता मे देखल जाए तँ ई विशेषांक ताहि स्तर के नहि भ' सकल, जेहेन पहिलुक किछु विशेषांक सभ भेल छलनि विदेह टीमक। जेना कि शुरुआते मे कहलहुँ, ठीक-ठाक अंक अछि, सएह। प्रणव कुमार झा विदेह मैथिली भाषा साहित्य से जुड़ल लेखक साहित्यकार आदि के साहित्यिक यात्रा आ व्यक्तित्व से परिचय, चर्चा, समलोचना आदि के लेल समय समय पर व्यक्ति विशेषांक निकालैत रहय अछि। एहि क्रम में ऐ बेर शिवशंकर श्रीनिवास विशेषांक निकालल गेल जाहि में व्यक्ति विशेष के लेखन एवं व्यक्तित्व परिचर्चा, समलोचना आदि पर विभिन्न लेख पढ़ल। जाहि से श्रीनिवास जी के साहित्यिक यात्रा के विषय में बहुत किछु जनतब भेल। सच पूछि त एहि स पहिने डॉ ममता झा के पोथी 'मोह' के आवरण कथा (forward) में ही हिनका पढ़ने रही। डॉ धनाकर ठाकुर, प्रो0 देवशंकर नवीन के लेख में श्रीनिवास जी के लेखन के बहुत सूक्ष्म दृष्टि से लेखा जोखा कैल गेल अछि।श्री अशोक जी के हस्तलिखित लेख आकर्षित केलक जे आजुक समय में सेहो एतेक सुन्नर देवनागरी लिखावट बांचल अछि।जखन की हमरा सन लोक जेकर अक्षर बोगलाक टांग सन होइत छैक तकरा लेल ई आर बेसी सेहन्ता के गप्प।आब बेसी काल लोक कंप्यूटर या मोबाईल पर टाइप करय अछि। हम अपने पाँच पन्ना या बेसी अंतिम बेर लगभग दू वर्ष पहिने लिखने हेबय जखन एमए ट्रांसलेशन स्टडीज के अंतिम परीक्षा देने रही। खैर ई नीक गप्प अछि जे विदेह पत्रिका द्वारा ऐ तरहक सुंदर अक्षर के सेहो रिकॉग्निशन देल जाई अछि। ऐ से पहिनेहो श्री पी एल कर्ण के तिरहुता में लिखल लेख विदेह पर देखने रही आ किछु आर हस्तलिखित लेख सब। श्री श्रीनिवास, कंट्रीब्यूटर लेखक सब आ विदेह संपादक मंडल के विशेषांक लेल बधाई। जय मिथिला। १.शिवशंकर श्रीनिवास विशेषांकक संदर्भमे २.शिवशंकर श्रीनिवासजी केर संक्षिप्त परिचय ३.कल्पना झा-सिनुरहार-एखनहुँ प्रासंगिक ४.डा. धनाकर ठाकुर- 'असमंजसी मध्यममार्गी 'कथाशिल्पी शिवशंकर श्रीनिवास' '(सेनुरहार' कथा केर संदर्भमे) ५.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र-सिनुरहार-'शिवशंकर श्रीनिवास'क कथा ६.चंदना दत्त-श्री शिवशंकर श्रीनिवास ७.डॉ. आभा झा-चयनित -कथाक मादें किछु गप ८.नवीन कुमार झा 'शरद'-मिथिलाक माटि-पानिक कथाकार शिवशंकर श्रीनिवास ९.वैद्यनाथ झा-अद्भुत कथाशिल्पी शिवशंकर श्रीनिवास १०.अशोक- शिवशंकर श्रीनिवास आ मैथिली कथालोचन ११.अजित कुमार झा- शिवशंकर श्रीनिवास जीक गामक लोक १२.देवशंकर नवीन-उठ जाग मोसाफिर भोर भयो (निसभेर नीनमे सूतल समाज'क पहरू कथाकार) १३.दिलीप कुमार झा-माटि वस्तुए सएह छैक १४.रबीन्द्र नारायण मिश्र-बेजोड़ छथि श्री शिवशंकर श्रीनिवास १५.केदार कानन-एक निस्सन कथाकार १६.जगदीश चंद्र ठाकुर 'अनिल'- किए हँसै छथि गोपीनाथ १७.आशीष अनचिन्हार-मीना मधु जी केर रचना संसार १८.डा. शैलेन्द्र मिश्र-श्री शिवशंकर श्रीनिवासक कथा-संसार एकटा मूल्यांकन १९.आशीष अनचिन्हार-या तऽ अपूर्ण शीर्षक या तऽ अपूर्ण पोथी १.शिवशंकर श्रीनिवास विशेषांकक संदर्भमे 1 2008 सँ एखन धरि विदेह http://videha.co.in/ द्वारा जे विशेषांक सभ आएल अछि तकरा तीन चरणमे बाँटि सकैत छी। पहिल चरण 2008सँ जनवरी 2015 धरि जाहिमे विषय आधारित विशेषांक सभ प्रकाशित भेल आ मधुपजीपर सेहो विशेषांक प्रकाशित भेल। एकदम प्रारंभिक विशेषांक सभमे "विशेषांक" नाम नहि लीखल गेल छै मुदा ओहिमे ओहन रचनाक बेसी स्थान देल गेल छै सायास रूपें (क्रम-1 सँ 12 केर अधिकांश)। दोसर चरण भेल 2015 सँ लऽ कऽ एखन धरि जाहिमे मात्र जीवित लेखकपर विशेषांक प्रकाशित करबाक निर्णय लेल गेल आ इम्हर पछिला बर्ख एहिमे संस्था आ पत्र-पत्रिकापर विशेषांक प्रकाशित करबाक सेहो निर्णय लेल गेल क्रम- 13 एवं 14, 20 सँ लऽ एखन धरिक प्रस्तुत विशेषांक)। तेसर चरण भेल पछिला सालमे विदेहक संपादक द्वारा "नित नवल सिरीज" प्रकाशित करबाक (एकर विवरण अलगसँ देल गेल अछि)। पाठक लेल विदेहक हरेक विशेषांक पाँच स्तर, पाँच स्वाद रखने अछि (पाँचम स्वाद सभसँ विरल अछि)- 1) पत्रिका विशेषांक केर स्वाद, 2) आलोचनात्मक पोथीक स्वाद, 3) शोध ग्रंथक स्वाद, 4) साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित मोनोग्राफ केर स्वाद, 5) जँ विदेहक विशेषांकमे कोनो एहन रचनाकार चयनित होइत छथि जिनकर पति वा पत्नी सेहो रचनाकार छथिन तँ विदेह अपन विशेषांकमे दूनूकेँ मूल्यांकन करैत अछि। उदाहरण लेल विदेहक लक्ष्मण झा 'सागर' विशेषांक आ नरेन्द्र झा विशेषांक देखल जा सकैए। विदेह अपन अंक लेल सागरजी आ नरेन्द्र झाक चयन केने छल मुदा सागरजीक पत्नी शैल झा 'सागर' सेहो रचनाकार छथिन तँ लक्ष्मण जी बला विशेषांकमे शैलजीक रचनाकर्मपर सेहो विचार भेल आ तेनाहिते नरेन्द्र झाजीक पत्नी पन्ना झा कथाकार से नरेन्द्र झा विशेषांकमे पन्नाजीक रचनाकर्मपर सेहो विचार भेल। ई विचार वा घटना संपूर्ण मैथिली साहित्यमे नहि भेल छल हमरा जनैत, से मात्र विदेह द्वारा संभव भेल। जँ हम गलत होइ तऽ सूचित करी हम अपन ज्ञानकेँ सुधारि लेब। साहित्य अकादमीक कथित मोनोग्राफ तँ आइ धरि बहुतो लेखकपर प्रकाशित नहि भऽ सकल अछि। एहन परिस्थितिमे विदेह एकटा नव बाट बना कऽ मैथिली लगमे राखि देने अछि। पाठक चाहथि तँ एहि विशेषांक सभमेसँ आनो स्वाद ताकि सकै छथि। मैथिलीमे जे लोक सभ विश्वविद्यालयसँ जुड़ल छथि आ कि ओहनो लोक जे सभ प्रोफेसर सभहक संगतिमे छथि ताहिमे किछु लोकक मूँहे ईहो सुनबा लेल भेटल जे जिनका-जिनकापर विदेह विशेषांक प्रकाशित भऽ चुकल अछि ताहिमेसँ अधिकांशपर विश्वविद्यालय सभमे शोध हेबाक लेल पंजीयन भऽ रहल छै। हमरा लेल ई समाद बहुत पहिनेसँ सूनल मानू। वास्तविकता ई छै जे विदेह विशेषांकमे जते सूचना रहैत छै ततेमे ओही एक लेखकपर एकै समयमे कमसँ कम 15-20 दृष्टिकोणसँ शोध भऽ सकैत छै। खएर मैथिलीमे विश्विद्यालयक शोध जेहन होइत छै, जेहन प्रोफेसर आ शोधार्थी सभ होइत छै ताहिमे हम सभ मानि बैसल छी जे विदेह विशेषांक एहिना सार्वजनिक होइत रहत आ शोधार्थी सभ बिना अनुमति, बिना क्रेडिट देने चोरा कऽ कथित शोध करैत रहता। जँ अहाँ अइ विशेषांक केर PDF पढ़ि रहल छी तँ कोनो शब्द वा पाँति अंडरलाइनमे वा बिना अंडरलाइनकेँ नीला वा कोनो रंगक (कारी रंग छोड़ि) देखाए तँ बुझि लिअ जे ओहिमे लिंक देल गेल छै रेफरेंस लेल आ तकरा क्लिक करबै तँ ओ लिंक खुजि जाएत। कोनो-कोनो फोटोमे सेहो लिंक देल गेल छै। पाठक एहि माध्यमसँ कम समयमे रेफरेंस सभहक अध्य्यन कऽ सकै छथि। मुदा प्रिंटमे प्रकाशित पोथीमे ई सुविधा नै रहत। अइ कारणसँ भऽ सकैए जे पाठककेँ एहि पोथीक किछु पाँति प्रचलित नै बुझेतनि। जाहि ठाम लिंक देल गेल छै ताहि ठामक पाँतिक किछु शब्दक बीच बेसी स्थान छूटल छै। ओकरा एक पाँति बना पढ़ी से आग्रह। हम चाहितहुँ तँ सभ लिंक वा चित्रकेँ एकठाम दऽ सकै छलहुँ मुदा हमर सोच अछि जे पाठककेँ एकै ठाम तर्क आ सबूत भेटनि। एकटा आर बात ई जरूरी नहि छै जे एक लेखक लेल हम एकैटा लिंक प्रयोग करी। ओहन लेखक जिनका बारेमे बहुत रास लिंक छै गूगलपर हुनकर नाम जखन एक बेरसँ बेसी अबैत अछि तँ हमर प्रयास रहैए जे हुनकर नाम सभमे अलग-अलग लिंक लगा दी। तँइ पाठक जखन एकै नामक बहुत रास लिंक देखथि तँ ई मानि लेथि जे हुनका लग रेफरेंसक भंडार पहुँचल छनि। विदेह द्वारा जीवैत लेखकपर विशेषांक शुरू कएल गेल छल 2015 सँ जे विभिन्न नामसँ होइत आब "विदेहक जीवित मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशकपर विशेषांक शृंखला" नामसँ जानल जाइत अछि। मैथिलकर्मीसँ हमर सभहक आशय जिनकर काज मिथिला-मैथिली-मैथिली लेल कोनो माध्यमसँ भेल हो। ओ संगठनकर्ता सेहो भऽ सकै छथि, आन भाषाक लेखक सेहो। तहिना संगीतकर्मी मने गीत-संगीतसँ जुड़ल लोक। निच्चा एहि सभ चरण केर विस्तृत सूचना क्रमबद्ध रूपें देल जाएत। विदेहक विशेषांक सभ लेल हम ओहनो लोक सभ लग आलेख लेल जाइत छी, हुनका सूचना दैत छी जे कि हमर (आशीष अनचिन्हार), विदेह या गजेन्द्र ठाकुरक धुर विरोधी छथि। दू-चारि लोक कहि सकै छथि जे हमरा सूचना नहि भेटल, तऽ हुनकासँ हमर आग्रह जे कमसँ कम ओ अपन ह्वाटसएप आ फेसबुक केर मैसेज बॅाक्स (इनबॅाक्स) देखथि। हमर एहि प्रयासक प्रतिफल विदेहक आन विशेषांक संगे एहूमे देखाइ पड़त से उम्मेद अछि। विदेहक शिवशंकर श्रीनिवास विशेषांक केर घोषणा 18 दिसंबर 2024 मे भेल छल। एहि घोषणाक फेसबुक लिंक देखू। श्रीमती मीना मधु लेखिका छथि आ श्री शिवशंकर श्रीनिवास जीक पत्नी सेहो। मैथिलीमे दंपति लेखक केर जे अवधारणा छै ताहिमे ईहो एकटा छथि। तऽ अइ विशेषांक केर अवसरपर हमरा लोकनि श्रीमती मीना मधुजीक रचनाकर्मपर चर्चा सेहो राखि रहल छी। उद्येश्य अतबे जे विदेहक पाठक एहि अंकमे श्रीनिवासजीक संग मीना मधुजीकेँ सेहो जानि सकथि। एहि विशेषांक समेत विदेह 37 टा विशेषांक प्रकाशित कऽ चुकल अछि आ एहिठाम आब हम कहि सकैत छी जे ई एकटा चुनौतीपूर्ण काज छै। अनेक संकट केर सामना करए पड़ैत अछि लेख एकट्ठा करएमे। मुदा संगहि ईहो हम कहब जे संकटसँ बेसी हमरा लग समर्थन अछि। हँ, ई मानएमे हमरा कोनो दिक्कत नहि जे जतेक लेख केर उम्मेद केने रहैत छी हम ततेक नै आबैए, जतेक लोक लिखबाक लेल गछैत छथि से सभ अंत- अंत धरि आबि चुप्प भऽ जाइत छथि। आ एकर कारणो छै, किनको ई लागै छनि जे आनपर लिखब से हम अपने रचना किए ने लीखि लेब, किनको लग पोथिए नै रहै छनि, जखन कि हम सभ यथासंभव पाठककेँ विकल्प रूपमे पोथीक पी.डी.एफ फाइल सेहो देबाक लेल तैयार रहैत छी। कियो विदेहक समावेशी रूपसँ दुखी छथि, तँ किनको मित्रकेँ विदेहसँ दिक्कत छनि तँइ ओ नहि देता। एकरो हम संकटे बुझै छियै जे सभ फेसबुकपर लंबा-लंबा लेख वा कमेंट टाइप कऽ लै छथि सेहो सभ विदेह लेल हाथसँ लिखल पठाबैत छथि। जे सभ कहियो काल फेसबुकपर टाइप कऽ लीखै छथि तिनकर आलेख हम सभ टाइप करिते छी। खएर पहिने कहलहुँ जे संकटसँ बेसी समर्थन अछि तँइ आइ पहिलसँ लऽ कऽ एहि प्रस्तुत विशेषांक धरि पहुँचलहुँ हम। निश्चिते समर्थन बेसी भेटल हमरा। जखन कि विदेहक एहि विशेषांक सभहक अलावे आन अंक हरेक पंद्रह दिनपर (मासमे दू बेर) लगातार प्रकाशित भइए रहल अछि। एकर अतिरिक्त ईहो बात संतोषदायक अछि जे विदेहक हरेक व्यक्तिपरक विशेषांक अभिनंदनग्रंथ हेबासँ बाँचि गेल अछि। मुख्यधारा जकाँ विदेहकेँ अभिनंदनग्रंथ नहि चाही। अभिनंदनग्रंथ अहू दुआरे नै चाही जे ओहिसँ लेखक वा जिनकापर निकालल गेल छनि तिनकामे सुधारक गुंजाइश खत्म भऽ जाइत छै। तँइ विदेहक विशेषांकमे आलोचना-प्रसंशा सभ भेटत। पहिने विदेहक सभ अंक नागरी, तिरहुता आ ब्रेल लिपिमे प्रकाशित होइत छल। एकर अतिरिक्त विदेहक किछु अंक कैथी, नेवाड़ी, आइ.पी.ए. लिपि, रंजना (नेवारी केर एक आर रूप), ब्राह्मी, खरोष्ठी, उर्दू, तिब्बती एवं तिब्बती-उमे लिपिमे सेहो छपल अछि। कुल मिला कऽ देखी तँ विदेह बारह लिपि अपना लेल रखने अछि। 2 पाठक जखन एहि विशेषांककेँ पढ़ताह तँ हुनका वर्तनी ओ मानकताक अभाव लगतनि। विदेह मूलतः शब्दमे विभक्ति सटा कऽ लिखैत अछि संगहि मैथिली मानक भाषा आ मैथिली भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम लेल “भाषापाक” नामक अपन दिशानिर्देश सेहो रखने अछि मुदा ओहिमे छपए बला लेखक लेल स्वतंत्रता छै जे ओ कोन रूपमे लिखै छथि, माने जे विदेह शुरुएसँ हरेक वर्तनी बला लेखककेँ स्वीकार करैत एलैए। तँइ मानकता अभाव स्वाभाविक। विदेह सभ वर्तनी आ स्वरूपक सम्मान करैत अछि। तथापि वर्तनीक गलती जे थिक से सोझे-सोझ हमर सभहक गलती थिक जे हम सभ संशोधन नै कऽ सकलहुँ। मैथिलीमे किछुए एहन पत्रिका अछि जकर वर्तनी एकरंगक रहैत अछि आ ई हुनक खूबी छनि मुदा जखन ओहो सभ कोनो विशेषांक निकालै छथि तखन वर्तनी तँ ठीक रहैत छनि मुदा सामग्री अधिकांशतः बसिये रहैत छनि। ऐतिहासिकताक दृष्टिसँ कोनो पुरान सामग्रीक उपयोग वर्जित नै छै। हमहूँ सभ करैत छियै, मुदा सोचियौ जे 72-80 पन्नाक कोनो प्रिंट पत्रिका होइत छै ताहिमे लगभग आधा सामग्री साभार रहैत छनि, तेसर भागमे लेखक केर किछु रचना रहैत छनि आ चारिम भागमे किछु नव सामग्री रहैत छनि। हमरा लोकनि नव सामग्रीपर बेसी जोर दैत छियै। एकर मतलब ई नहि जे वर्तनीमे गलती होइत रहै। हमर कहबाक मतलब ई जे संपादक-संयोजककेँ कोनो ने कोनो स्तरपर समझौता करहे पड़ैत छै से चाहे वर्तनीक हो कि, मुद्राक हो कि विचारधारक हो कि सामग्रीक हो। हमरा लोकनि वर्तनीक स्तरपर समझौता कऽ रहल छी मुदा कारण सहित। प्रिंट पत्रिका एक बेर प्रकाशित भऽ गेलाक बाद दोबारा नै भऽ सकैए (भऽ तँ सकैए मुदा फेर पाइ लागि जेतै) तँइ ओकर वर्तनी यथाशक्ति सही रहैत छै। इंटरनेटपर सुविधा छै जे बीचमे (इंटरनेटसँ प्रिंट हेबाक अवधि) ओकरा सही कऽ सकैत छी मुदा सामग्रिए बसिया रहत तँ सही वर्तनी रहितो नव अध्याय नै खुजि सकत तँइ हमरा लोकनि वर्तनी बला मुद्दापर समझौता केलहुँ। हमरा लोकनि कएलनि, कयलनि ओ केलनि तीनू शुद्ध मानैत छी, एतेक शुद्ध मानैत छी एकै रचनामे तीनू रूप भेटि जाएत। आन शब्दक लेल एहने बूझू। उम्मेद अछि जे पाठक विदेहक आने विशेषांक जकाँ एकरा पढ़ताह आ पढ़ि एकर नीक-बेजाएपर अपन सुझाव देताह। विदेहक हरेक अंक विदेह वेबसाइटपर भेटत आ एकर अलावे गूगल बुक्स Google Books आ आर्कइभ.कॅम archive.org पर सेहो भेटत। तँइ स्वाभाविक रूपसँ विशेषांक सेहो तीनू प्लेटफार्मपर भेटत। मुदा तीनू प्लेटफार्मपर अंक सभकेँ अलग ढंगसँ सजाएल गेल छै जकरा हम पाठक लग राखि रहल छी। पाठक निच्चा बला पैराग्राफपर ध्यान देताह तऽ हुनका कम्मे समयमे नीक रिजल्ट भेटतनि। विदेहक अपन साइट आ आर्कइभ.कॅम archive.org पर विदेहक हरेक अंक क्रमबद्ध तरीकासँ भेटत। आर्कइभ.कॅम archive.org पर विदेहक हरेक अंक पढ़बाक लेल पाठक Gajendra Thakur सर्च करथि आ https://archive.org/details/@videha_editorial_staff पर जाथि जाहिठाम क्रमबद्ध तरीकासँ सभ भेटतनि। संगे ईहो लिंक सहायक हेतनि https://archive.org/details/videha_pdf_202305 मुदा गूगल बुक्स Google Books पर विदेहक अंक सभकेँ सर्च करबाक हिसाबसँ राखल गेल अछि। माने जे पाठक गूगल बुक्स Google Books पर जँ कोनो शब्दकेँ वा लेखककेँ वा किताबक नामकेँ वा आन कोनो की वर्डसँ तकताह आ जँ ओ शब्द, लेखक, किताब वा ओ सर्च वर्ड विदेहमे प्रकाशित भेल छै तऽ पाठक लग विदेहक ओ सभ अंक देखाबऽ लगतै जाहिमे पाठक द्वारा शब्द, लेखक, किताब वा ओ सर्च वर्ड देल गेल छै। एकर माने ई भेल जे विदेहमे प्रकाशित हरेक शब्द, लेखक, किताब वा ओ सर्च वर्ड पाठकक मुट्ठीमे आबि गेल आ अन्य माध्यमक अपेक्षा बेसी दिन धरि पाठक केर पहुँचमे रहत। आ संगहि जँ ओ शब्द, लेखक, किताब वा ओ सर्च वर्ड विदेहसँ इतर आन कोनो पोथीमे छै तँ ओहो पाठकक सामने आबि जेतनि माने पाठक लेल दुन्ना फायदा। पाठक गूगल बुक्स Google Books पर विदेहक Videha eLearning पर जा कऽ विदेहक अंक पढ़ि सकै छथि ओत्तहि संपादक गजेन्द्र ठाकुर Gajendra Thakur पर क्लिक कऽ बहुत रास पोथी पढ़ि सकै छथि। तहिना पाठक जा कऽ गजेन्द्र ठाकुर Gajendra Thakur सर्च करथि हुनका विदेहक अंक सहित ओ सभ पोथी भेटि जेतनि जे विदेहपर देल गेल छै। एकर माने ई भेल जे मात्र विदेहक अंके नै आनो-आनो पोथी सभ भविष्यमे बाँचल रहि जेतै। संगहि विशेषांक सभहक प्रिंट रूप किनबाक लेल ओकर पोथी रूपक लिंक पोथी.कॅम Pothi.com पर देल गेल छै। पाठक पोथी.कॅम Pothi.com पर जा कऽ गजेन्द्र ठाकुर Gajendra Thakur सर्च करथि हुनका विदेहक विशेषांक सहित बहुत रास पोथी भेटि जेतनि किनबाक लेल। पाठक देवनागरीमे गजेन्द्र ठाकुर आ रोमन केर Gajendra Thakur दूनू सर्च करथि से हमर आग्रह रहत। कारण देवनागरी आ रोमन दूनूमे संपादक अपन एकाउंट बनेने छथि आ अपन सुविधासँ दूनू एकाउंटसँ विदेहक अंक आ पोथी अपलोड केने छथि। एहिठाम हम पहिने विदेहक लिंक देब आ ठीक ताही संगे एहि विशेषांकक पोथी.कॅम Pothi.com केर प्रिंट आॉन डिमांड बला लिंक देने छी जाहि ठाम पाठक एकरा आॉनलाइन कीनि सकै छथि। विदेहक द्वारा जीवैत लेखक ओ संस्थाक विशेषांक शृखंलामे प्रकाशित भेल संगहि आन विशेषांक सभहक लिस्ट एना अछि (एहिठाम जे अंकक लिस्ट देल गेल अछि ताहि अंकपर क्लिक करबै तँ ओ अंक खुजि जाएत)। 1) हाइकू विशेषांक 12 म अंक, 15 जून 2008 2) गजल विशेषांक 21 म अंक, 1 नवम्बर 2008 3) विहनि कथा विशेषांक 67 म अंक, 1 अक्टूबर 2010 4) बाल साहित्य विशेषांक 70 म अंक, 15 नवम्बर 2010 5) नाटक विशेषांक 72 म अंक 15 दिसम्बर 2010 6) समीक्षा विशेषांक 7) नारी विशेषांक 77म अंक 01 मार्च 2011 8) अनुवाद विशेषांक (गद्य-पद्य भारती) 97म अंक 9) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक 111 म अंक, 1 अगस्त 2012 10) भक्ति गजल विशेषांक 126 म अंक, 15 मार्च 2013 11) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक 142 म, अंक 15 नवम्बर 2013 12) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक 169 म अंक 1 जनवरी 2015 13) अरविन्द ठाकुर विशेषांक 01 नवम्बर 2015 अंक 189, विदेहक अरविन्द ठाकुर विशेषांक केर पोथी रूप "स्वतंत्रचेता- अरविन्द ठाकुर: व्यक्तित्व-कृतित्व" केर नामसँ प्रकाशित भेल। 14) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक 01 दिसम्बर 2015 अंक 191, पोथी.कॅम pothi.com 15) विदेह सम्मान विशेषाक- 200म, भाग-1, 15 अप्रैल 2016 16) विदेह सम्मान विशेषाक- 205म, भाग-2, 1 जुलाई 2016 17) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- 217 म अंक 01 जनवरी 2017 18) मैथिली वेब पत्रकारिता विशेषांक-313म अंक 1 जनवरी 2021 19) मैथिली बीहनि कथा विशेषांक-2, 317 म अंक 1 मार्च 2021 20) रामलोचन ठाकुर विशेषांक 01 अप्रैल 2021 अंक 319, पोथी.कॅम pothi.com 21) राजनन्दन लाल दास विशेषांक 01 नवम्बर 2021 अंक 333, पोथी.कॅम pothi.com 22) रवीन्द्र नाथ ठाकुर विशेषांक 15 जून 2022 अंक 348, पोथी.कॅम pothi.com 23) केदारनाथ चौधरी विशेषांक 15 अगस्त 2022 अंक 352, पोथी.कॅम pothi.com 24) प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' विशेषांक 01 नवम्बर 2022 अंक 357, पोथी.कॅम pothi.com 25) शरदिन्दु चौधरी विशेषांक 15 नवम्बर 2022 अंक 358, पोथी.कॅम pothi.com 26) “कला-विमर्श विशेषांक (सन्दर्भ- संजू दास, कृष्ण कुमार कश्यप, शशिबाला, एस.सी.सुमन आ श्वेता झा चौधरी)” 15 अप्रैल 2023 अंक 368, पोथी.कॅम pothi.com 27) अशोक विशेषांक 1 मइ 2023 अंक 369, पोथी.कॅम pothi.com 28) रामभरोस कापड़ि 'भ्रमर' विशेषांक 15 मइ 2023 अंक 370, पोथी.कॅम pothi.com 29) मिथिला स्टूडेंट यूनियन (MSU) विशेषांक 1 जून 2023 अंक 371, पोथी.कॅम pothi.com 30) लक्ष्मण झा सागर विशेषांक (15 नवम्बर 2023 अंक 382), पोथी.कॅम pothi.com 31) नरेन्द्र झा विशेषांक (1 जून 2024 अंक 395), पोथी.कॅम pothi.com 32) भाषाविद् रामावतार यादव विशेषांक 1 जून 2024 अंक 395, पोथी.कॅम pothi.com 33) अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद् विशेषांक 15 अगस्त 2024 अंक 400, पोथी.कॅम pothi.com 34) हितनाथ झा विशेषांक 1 नवम्बर 2024 अंक 405, पोथी.कॅम pothi.com 35) मिथिला विकास परिषद् विशेषांक 15 दिसंबर 2024 अंक 408, पोथी.कॅम pothi.com 36) नारायणजी चौधरी विशेषांक 1 जून 2025 अंक 419, पोथी.कॅम pothi.com एहि लिस्टमे 1, 2, 4, 5, 6, 7, 8, 15 एवं 16 विदेहक स्वतः संख्याक हिसाब बला विशेषांक अछि। ओतहि 2 आ 19 क्रम संख्याक विशेषांक मुन्नाजीक संयोजनमे प्रकाशित भेल अछि। शेष सभ बाँचल विशेषांकक संयोजन आशीष अनचिन्हार द्वारा भेल अछि। 2015 मे विदेहक संपादक लग आशीष अनचिन्हार द्वारा जीवित लेखकपर विशेषांक निकालबाक प्रस्ताव राखल गेल आ संपादकक सहमतिक बाद ई एखन धरि एकटा नमहर रस्ता बना चुकल अछि। पुनः 2022 मे आशीषे अनचिन्हार द्वारा विदेह लग संस्थाक ऊपर विशेषांक प्रकाशित करबाक प्रस्ताव राखल गेल आ संपादकक सहमतिसँ एखन धरि 3 संस्थापर अंक निकलि चुकल अछि। नवाचार अतबे नहि अछि, एक बेर फेर 2023 मे आशीष अनचिन्हार द्वारा विदेह लग दू टा विचार राखल गेल 1) लेखक-प्रकाशकसँ इतर आन जे लोक पोथी-पत्रिका केर बिक्री कऽ अपन जीवय-यापनक संग मैथिली पोथीक प्रचारमे सहायक छथि तिनको ऊपर विशेषांक प्रकाशित, एवं 2) मैथिलीक कोनो पत्रिकाक उपर विदेह विशेषांक प्रकाशित हो। एहू दूनू कैटेगरी लेल संपादकक सहमति अछि आ निकट भविष्यमे विदेहक माध्यमे पाठक लग नीक विशेषांक पहुँचत। दिसंबर 2024 मे एक बेर फेर आशीष अनचिन्हार -विदेहक नवाचार सामने आएल जाहि अंतर्गत विदेहक संपादकक सहमतिक बाद "विदेह लिटरेचर फेस्टीभल” केर घोषणा भेल। एहि फेस्टीभलक विस्तृत विवरण अही लेखमे निच्चा भेटत। आशीष अनचिन्हारक नवाचार अतबे नहि अछि,एहि क्रममे "स्व-निंदा विशेषांक" सेहो अछि जाहि लेल पहिल नाम अशीषे अनचिन्हारक राखल गेल अछि। ई पूरा मैथिली साहित्य लेल एकटा नव प्रयोग हएत। संभवतः पूरा विश्वक साहित्य लेल ई नव प्रयोग हएत। ई सिरीज लेखकक इच्छापर प्रकाशित हएत माने जे लेखक चाहै छथि जे हुनका अपन दुर्गुणक बारेमे हुनक समाज, हुनक पाठक की विचार राखै छनि से ओ लीखि सकैत छथि। एहि सिरीजमे कोनो प्रकारक प्रशंसात्मक आलेख नहि रहत। जँ कदाचित् आबियो गेल तऽ ओहि आलेखकेँ हटा देल जाएत। एहि सिरीजक मूल उद्येश्य ई अछि जे लेखक अपन दुर्गुणकेँ चीन्हि सकथि आ ओकरा हटा सकथि। एकर विस्तृत विवरण फेसबुक पोस्टक फोटो निच्चा देल गेल अछि। आशीष अनचिन्हार द्वारा संपादित पोथी 'प्रीति कारण सेतु बान्हल' जे कि मिथिला ओ मैथिलीक संवर्धनमे गजेन्द्र ठाकुर एवं प्रीति ठाकुरक योगदानक आलोचनात्मक ग्रंथ अछि ताहिमे संकलित शिवशंकर श्रीनिवास जीक एक शोध आलेख मैथिली पत्रिकामे व्यक्तिपरक विशेषांकक इतिहास अछि आ ओहि इतिहासमे विदेह विशेषांक कोन ठाम अछि तकर मूल्याकंन भेटत संगहि ओही आलेखमे श्रीनिवास जीक मोताबिक जीवितेमे अपन मूल्याकंन पढ़ि लेब कोनो लेखक लेल कोनो सम्मानसँ बेसी महत्वपूर्ण अछि। मैथिलीक बहुत रास पाठक विदेहक जीवित लेखक विशेषांककेँ मूल्यवान मानै छथि ('प्रीति कारण सेतु बान्हल’ मे कीर्तिनाथ झा, कल्पना झा, प्रणव कुमार झा, धनाकर ठाकुर आदिक आलेख), ओतहि किछु पाठक विदेह विशेषांककेँ साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ बेसी महत्वपूर्ण मानै छथि ('प्रीति कारण सेतु बान्हल’ मे लक्ष्मण झा 'सागर'जीक आलेख) यद्पि विदेह साहित्य अकादमी पुरस्कारक आलोचना करैत अछि मुदा अकादमी द्वारा पुरस्कार छोड़ि जे प्रकाशन एवं आन काज छै तकर प्रसंशा सहो करैत अछि। तथापि जँ किछुओ पाठक विदेह विशेषांककेँ कोनो सम्मान-पुरस्कार वा कि साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ बेसी महत्वपूर्ण मानै छथि तँ ई विदेह लेल निश्चिते प्रेरणादायी बात छै। 3 विदेहक जीवित विशेषांक शृंखलामे किनकर चयन हो ताहि लेल मोटा-मोटी निच्चाक किछु बिंदुक पालन कएल जाइत अछि- 1) लगभग पाँच-छह मास पहिनेसँ विदेह अपन पाठककेँ सुझाव देबा लेल लेल सूचना दैत अछि। 2) आएल सुझावमेसँ विदेह मात्र जीवित लेखककेँ चयन करैत अछि। संस्था सेहो वर्तामनमे जीवंत हेबाक चाही। 3) सभ जीवित मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशकक बीचमे हुनकर लेखन/ काज एवं आचरणक साम्यता देखल जाइत अछि। जाहि लेखकक लेखन/ काज ओ आचरणमे बेसी साम्यता (कम फाँक) भेटैए तेहन छह टा नाम चयनित होइत अछि। 4) छह नाम एलापर ई तुलना कएल जाइत छै जे ई छहो मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशक अथवा संस्थाकेँ रचना लिखबाक वा समाजिक काज केलाक एवजमे समाजसँ की भेटलनि। 5) जिनका सभसँ कम भेटल बुझाइत अछि ताहि तीन मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशक,-संस्थाकेँ अगिला चरण लेल राखि लैत छी। 6) एहि तीन चयनित जीबित मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशकक वा संस्थाक रचना, काज, हुनक उद्येश्य आदिक बीचमे परस्पर तुलना कएल जाइत अछि आ, 7) अंतिम रूपसँ विदेह द्वारा नाम चुनि सालक अंतमे घोषणा कएल जाइत अछि आ नियत समयपर ई विशेषांक निकालबाक प्रयास करैत छी। एकर मतलब ई भेल जे पाठककेँ सुझाव देबाक सूचना हरेक बर्खक अप्रैल-मइ धरिमे चलि जाइत छनि। प्रश्न उठि सकैए जे कि उपरक नियम एहन छै जाहिमे अंतिम रूपसँ सभ सुयोग्य जीवित लेखक केर चयन समयपर भ़ऽ जेतनि? तऽ एकर उत्तर छै- नै। विदेहक अपन सीमा छै आ विदेहक पाठक लग सेहो अपन सीमा छनि। मुदा अही सीमाक संगे हमरा सभकेँ अपन यथासाध्य श्रेष्ठ देबाक छै आ मैथिली लेल एकटा एहन रस्ता बना देबाक छै जाहिसँ आबए बला 500-600 बर्खक साहित्य विदेहक लीकसँ प्रेरणा पाबए। अही विचारक संग विदेह ओहन जीवित लेखकपर अपन धेआन सेहो केंद्रित कऽ रहल अछि जे कि सुयोग्य छथि मुदा जिनकापर विदेहक विशेषांक कोनो कारणवश नहि प्रकाशित भऽ सकल। एकर नाम भेल विदेहक "नित नवल सिरीज"। एहि नव विचारक मुख्य बिंदु एना अछि- 1) विदेहक संपादक गजेन्द्र ठाकुर एकटा कोनो जीवित लेखक वा कलाकारपर एकाग्र आलोचना करता मने ओहि लेखक केर उपलब्ध सभ साहित्यपर। एहि पोथीक भाषा मैथिली अथवा अंग्रेजी कोनो एक भाषामे रहत। एहि पोथीक पहिल रूप ई-बुक केर रूपमे आएत आ प्रयास रहत जे एकर प्रिंट सेहो आबए जे कि परिस्थितिपर निर्भर करतै। 2) लेखक वा कलाकार केर चुनाव संपादक अपन रुचि वा विदेह टीमक रुचि केर हिसाबें करता। 3) एहिमे ओहने लेखक वा कलाकार केर चयन संभव हएत जिनकर उपलब्ध हरेक पोथीक PDF रूपमे विदेहक माध्यमसँ सार्वजनिक भेल छनि। कलाकार लेल यूट्यूब एवं आन साइट सेहो मान्य हेतै। 4) एहि परियोजनाक लेल चयनित लेखक वा कलाकारपर काज संपादक केर समय केर अनुसारे हेतै। तँइ एकर समय सीमा कहब संभव नहि। नित नवल सिरीजमे एखन धरि प्रकाशित पोथीक सूची एना अछि (पहिनेक विशेषांक सभमे ई क्रम नहि छल, एहिठाम संशोधित आ पूर्ण सूची अछि)- 1. Rajdeo Mandal- Maithili Writer (2022) 2. JAGDISH PRASAD MANDAL- Maithili Writer (2023) 3) नित नवल सुभाष चन्द्र यादव (2023)(ई प्रिंट आॉन डिमांड रूपमे सेहो अछि) https://store.pothi.com/book/गजेन्द्र-ठाकुर-नित-नवल-सुभाष-चन्द्र-यादव/ 4) नित नवल सुशील (2023, संशोधित 2024) एकर अतिरिक्त विदेहक वर्तमान अंक सभमे धारावाहिक रूपें "नित नवल दिनेश मिश्र" सेहो प्रकाशित भऽ रहल अछि जकर पोथी रूप जल्दिये आएत। एहिठाम ईहो स्पष्ट कऽ दी जे विदेह विशेषांक वा नित नवल सिरीज केर चयन लेखकक शुरूसँ लऽ चयन हेबाक समय धरिक आकलन अछि। मानि लिअ विदेह विशेषांक वा नित नवल सिरीजमे चयनित भेलाक बाद, विशेषांक वा पोथी प्रकाशित भऽ गेलक बाद जँ चयनित लेखकमे नैतिक स्तरपर कोनो विचलन अबैत छनि तँ आन लोकक संगे विदेहो हुनकर विरोध करत। फेरो स्पष्ट कऽ दी जे हमरा लोकनि मात्र नैतिक स्तर केर बात केलहुँ अछि, विचारधारा वा आन कोनो स्तरक नहि। विदेह लेल उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम, आकाश-पाताल सभ विचारधारा अपने छै बशर्ते कि ओ मिथिला, मैथिली आ मैथिलक हितमे हो। आब बात करी विदेह लिटरेचर फेस्टीभल केर। विदेह अपन आन कार्यक्रम संगे "विदेह लिटरेचर फेस्टीभल" केर शुरुआत कऽ रहल अछि। एकर परिभाषा हम ई रखने छी जे एक बर्खमे एक लेखक द्वारा एक विधामे जे रचना विदेहमे प्रकाशित हएत तकरा हम सभ पोथीक रूपमे दऽ ओहि संबंधित लेखक लग ओकर लिंक पठा देबनि। जँ लेखकक सहमति रहतनि तऽ एकै पोथीमे विभिन्न विधाकेँ सेहो समेटल जा सकैए। एहिमे भाग लेबाक निम्नलिखित प्रक्रिया रहत-

1) विदेहक बर्खमे कुल 24 अंक प्रकाशित होइत छै सामान्यतः हरेक मासक 1 आ 15 तारीखकेँ। ई फेस्टीभल हरेक बर्ख 1 जनवरीसँ लऽ कऽ 15 दिसम्बर बला अंकमे प्रकाशित रचनापर लागू हएत। रचना टाइप कएल रहबाक चाही। रचना पठेबाक लेल मेल अछि- editorial.staff.videha@gmail.com विदेह ऑनलाइन पत्रिका छै (मैथिलीक पहिल) तँइ लेखकीय प्रति मात्र PDF रूपमे देल जाइत छै।

2) विदेह लेल रचना दू भागमे अछि, गद्य एवं पद्य। गद्य एवं पद्य केर सभ विधा लेल ई मान्य अछि (मुदा छंदमुक्त कविता लेल संपादक अपन विवेकक प्रयोग करताह जे ई रचना पोथी लेल उपयुक्त हेतै वा कि नहि, एहन नहि जे छंदमुक्तमे नीक रचना नहि भऽ सकैए मुदा मैथिलीमे छंदमुक्तकेँ गलत मतलब निकालि कविता विधाकेँ सत्यानाश कऽ देल गेलै) विदेहक कुल 24 अंकमे जँ कोनो रचनाकारक गद्य (जेना आलेख, आलोचना, समीक्षा, कथा, कथेतर गद्य, यात्रा,संस्मरण आदि) केर 15-20 टा रचना हेबाक चाही। बीहनि कथा एवं लघुकथा कमसँ कम 200 हेबाक चाही। उपन्यास, नाटक आदि जँ 24 अंकमे पूरा भऽ गेल अथवा जाहि अंकमे पूरा भऽ जेतै तकर बाद ओहिपर काज शुरू कऽ देल जेतै। छंदोबद्ध पद्य वा गजल 100 टा हेबाक चाही। छोट-छोट छंदोबद्ध रचना जेना दोहा, सवैया आदि लेल कमसँ कम 500 रचना हेबाक चाही। छंदोबद्ध पद्य एवं गजलक निच्चा ओकर विधान एवं नाम सेहो देनाइ अनिवार्य रहत। छंदोबद्ध पद्य वा गजल पूर्णतः मानक हेबाक चाही, वर्तनी सही हेबाक चाही, अन्यथा 100 संख्या भेलाक बादो विदेह ओहिपर विचार नै करत। लेख लेल सेहो एहने बात मानि कऽ चलू। गोल-मटोल भाषा बला समीक्षा-आलोचना मान्य नहि हएत। तहिना जाहि संस्मरणमे आनसँ बेसी अपनापर लीखल गेल हो सेहो मान्य नहि हएत।

3) जेना उपन्यास वा नाटक धारावाहिक रूपमे प्रकाशित होइए तेनाहिते कोनो एक विषयपर आलेख, आलोचना सेहो धारावाहिक रूपमे मान्य हएत। लेखक अपना हिसाबें विषय केर चयन कऽ सकैत छथि। मुदा एहि बर्ख हम मात्र उदाहरण लेल एकटा विषय एक रचनाकार लेल प्रस्तावित कऽ रहल छी जाहिसँ आरो स्पष्ट हएत। जेना कि एहि बेर लेल हम विषय बनेलहुँ "मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान" आ एहि लेल हम Kalpana Jha कल्पना झाजीकेँ नामित कऽ रहल छियनि। आब कल्पना जी सुविधानुसार एहि विषयपर जेना-जेना खंड लिखैत चलि जेतीह आ विदेहमे प्रकाशित होइत रहत आ अंतमे पोथीक रूपमे आबि जाएत।

4) जनवरी 2026 आ तकर बाद हरेक सालक जनवरीमे ओहन लेखक सभकेँ सूचना देल जेतनि जे एहि क्राइटेरियाकेँ पूरा केलाह, आ हुनकासँ ओहि रचना सभहक संशोधित रूप माँगल जेतनि। जे लेखक जाहि समयमे संशोधित रूप देताह तकरा ओहि समयक हिसाबें आ हुनकर लिखित सहमतिक संग ओहि रचना सभकेँ समेटि ओकरा पोथी रूप देल जाएत, ओकरा ISBN सेहो देल जाएत आ ओकर लिंक संबंधित लेखककेँ दऽ देल जेतनि। लिंक देलाक बाद लेखक-पाठक अपन मूल्य लगा ओकरा कीनि सकै छथि। विदेह क्रय-विक्रय केर काज नहि करैत अछि तँइ एहिसँ संबंधित कोनो समस्या लेल विदेह उत्तरदायी नहि हएत। हँ, स्वविवेकक उपयोग करैत विदेह टीम लेखकक समस्याक समाधान करबाक लेल प्रयास कऽ सकै छथि।

5) एहि योजनाक अंतर्गत आएल पोथीमे विदेहक नाम, लोगो, ओकर उद्येश्य, आन सूचना सहित ईहो लिखल रहत जे ई पोथी "विदेह लिटरेचर फेस्टीभल बर्ख...." योजना द्वारा चुनल गेल अछि।

6) रचना विदेह लेल अप्रकाशित हो माने ओकर प्रकाशन आन कतहुँ नै भेल हो। जँ पोथी रूपमे एलाक बाद पता चलल जे ओहि केर रचना आन ठाम छपल छै तऽ ओकर लिंक नष्ट कऽ देल जेतै।

7) रचनाक गुणवत्ता एवं ओकर मौलिकता लेल लेखक अपने उत्तरदायी हेता। मौलिकता संबंधी कोनो विवाद भेलापर ओहि पोथीक लिंक नष्ट कऽ देल जाएत आ ओहि लेखकक रचनाकेँ पुनः विदेहमे नै छापल जाएत।

8) विदेह दिससँ कोनो प्रकारक वित्तीय सहायता लेखककेँ नै भेटतनि कारण, विदेह किनकोसँ लैतो नै छै। विदेह मात्र रचनाकेँ समेटि, ओकर डिजाइन आ ISBN लेल प्रयास करत।

9) एहिमे साझी संकलन आदि मान्य नै हएत।

10) विदेहमे प्रकाशित रचना लेल जे नियम पहिनेसँ अछि से यथावत रहत आ एहि फेस्टीभेलक रचनापर सेहो लागू हएत। पाठक-लेखक चाहथि तऽ विदेहपर जा कऽ पूरा ब्यौरा देखि सकै छथि। नोट- विदेह लिटरेचर फेस्टीभल केर घोषणाक मात्र किछुए दिन बाद 1 जनवरी 2025 सँ "मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान" केर आलेख शुरू भऽ गेल। पाठक एहि लेल विदेहक 1 जनवरी 2025, अंक 409 पढ़ि सकै छथि। बादमे "मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान" केर घोषणा सेहो भेल जकरा लिखबा लेल हितनाथ झाजीसँ अनुरोध कएल गेल। 4 ऊपर भेल जे काज हम सभ कऽ सकलहुँ तकर विवरण मुदा किछु एहनो घोषणा छै जे कि हम सभ नै कऽ सकलहुँ जेना 2016 मे हम सभ परमेश्वर कापड़ि, कमला चौधरी आ वीरेन्द्र मल्लिक विशेषांक केर घोषणा कइयो कऽ नहि प्रकाशित कऽ सकलहुँ। पाठक एहि घोषणाकेँ एहि लिंकपर देखि सकै छथि- सूचना बादमे विदेहक "वीरेन्द्र मल्लिक विशेषांक" (जे कि प्रकाशित नै भऽ सकल) लेल वीरेन्द्र मल्लिक जीक साक्षात्कार जे नबोनारायण मिश्रजी से विदेहक 337म अंकमे प्रकाशित भेल पाठक एकरा एहि लिंकपर पढ़ि सकै छथि- 1 जनवरी 2022 अंक 337 2017 मे विदेह "नेपालक वर्तमान मैथिली साहित्य" विषयक विशेषांक निकालबाक नेयार केने छल जे एखन धरि पूरा नहि भऽ सकल अछि। तेनाहिते विदेहक "साहित्यिक भ्रष्टाचार विशेषांक" हमरा लोकनि एखन धरि नै प्रकाशित कऽ सकलहुँ अछि। एकर घोषणा हम 2019 मे केने रही। एहि घोषणाक फेसबुक लिंक देखू। हमरा लोकनि पं. गोविन्द झाजीपर कोनो काज नहि कऽ सकलहुँ से दुख आजीवन रहत। एहन नहि छै जे हमरा लोकनि प्रयास नहि केलहुँ मुदा कोनो ठामसँ उत्साह नहि भेटल। 10 अक्टूबर 2020 फेसबुकपर हम सभसँ आग्रहो केने रहियनि मुदा...। एहि घोषणाक फेसबुक लिंक देखू। परिशिष्ट-1 परिशिष्ट-2 परिशिष्ट-3 विदेह अपन कोनो अंकमे "साहित्यिक भ्रष्टाचार विशेषांक" निकालत (लिंक कमेंटमे) ताहि लेल अपने सभसँ निम्नलिखित विषयपर आलेख आदि चाही। 1.साहित्य, कला एवं सरकारी अकादमीः- (क) पुरस्कारक राजनीति (ख) सरकारी अकादेमीमे पैसबाक गैर-लोकतांत्रिक विधान (ग) सत्तागुट आ अकादमी केर काजक तौर-तरीका घ) सरकारी सत्ताक छद्म विरोधमे उपजल तात्कालिक समानांतर सत्ताक कार्यपद्धति (1985सँ एखन धरि) ङ) अकादेमी पुरस्कारमे पाइ फैक्टरः मिथक वा यथार्थ 2.व्यक्तिगत साहित्य संस्थान आ पुरस्कारक राजनीति 3.प्रकाशन जगतमे पसरल भ्रष्टाचार आ लेखक 4. मैथिलीक छद्म लेखक संगठन आ ओकर पदाधिकारी सभहँक आचरण 5.मैथिली विभागमे पसरल साहित्यिक भ्रष्टाचारक विविध रूपः- (क) पाठ्यक्रम (ख) अध्ययन-अध्यापन (ग) नियुक्ति 6. साहित्यिक पत्रकारिता, रिव्यू, मंच, माला, माइक आ लोकार्पणक खेल-तमाशा 7.लेखक सभहँक जन्म-मरण शताब्दी केर चुनाव, कैलेंडरवाद आ तकरा पाछूक राजनीति 8.दलित एवं लेखिका सभहँक संगे भेद-भाव आ ओकर शोषणक विविध तरीका उपरक विषयक अतिरिक्त जँ कियो साहित्यिक भ्रष्टाचारक कोनो नव विषयपर लिखए चाहथि तँ ओकरो स्वागत रहत। परिशिष्ट-4 नोट- विदेह विशेषांक जाहि खंडमे अहाँ सभ ई सूचना पढ़ि रहल छी तकर नाम छै "प्रस्तुत विशेषांकक संदर्भमे" मुदा हरेक विशेषांकक एहि खंडमे किछु ने किछु भिन्नता भेटत जकर कारण अछि जे भूतकालमे जे-जे हम सभ काज केने छी तकरा सभकेँ फेसबुक वा आन लिंककेँ ताकब समयसाध्य काज छै तँइ हमर आग्रह रहतनि पाठक वर्गसँ जे नवीनतम आ संशोधित सूचना लेल ओ जाहि समयमे तकता ताहि समयक अंतिम विदेह विशेषांकक ई खंड देखथि (ई विशेषांक कोनो कैटेगरीक भऽ सकैए)। हुनकर समस्याक समाधान भऽ जेतनि। संगहि एहि विशेषांकमे जँ किछु छूटत से से हम सभ भविष्यमे आबऽ बला विशेषांकमे संशोधित कऽ परसबै। इएह क्रम छै आ लगैए जे लगभग एक-दू बर्खमे हम एहि पन्नाक अंतिम स्वरूप पाबि लेब। २.शिवशंकर श्रीनिवासजी केर संक्षिप्त परिचय एहिठाम प्रस्तुत अछि शिवशंकर श्रीनिवासजी केर संक्षिप्त परिचय। चित्र- 1 नाम : शिवशंकर श्रीनिवास मूल नाम : शिवशंकर झा जन्म तिथि : 02 जुलाई 1953 (प्रमाणपत्रक हिसाबें) माता : स्व. जया देवी पिता : स्व. बदरीनाथ झा बाबा : स्व. विद्यानाथ झा दाइ : स्व. रामप्यारी देवी स्थान : लोहना (मधुबनी) शिक्षा : एम.ए , पी.एच.डी वृत्ति: व्याख्याता, मैथिली शिवशंकर श्रीनिवास केर परिवारक अन्य सदस्य : पत्नी : वसुन्धरा देवी (लेखकीय नाम- मीना मधु) संतान : पुत्र- आशीष कुमार झा एवं आशुतोष कुमार झा, पुत्री- सोनी झा एवं श्वेता मिश्र नोट- शिवशंकर श्रीनिवासजीक वास्तविक जन्मतथि 13 सितंबर 1953 छनि मुदा प्रमाण पत्रपर 02 जुलाई 1953 संगहि श्रीनिवासजी मानैत छथि जे ओ अपन दाइ स्व. रामप्यारी देवीसँ कथा रचब सिखलनि। प्रकाशित पोथी- (1) त्रिकोण (सहयोगी कथा–संग्रह) -1986ई. (2)अदहन (कथा–संग्रह) -1991ई. (3) गामक लोक (कथा–संग्रह) –2005 ई. (4) गुण-कथा (कथा–संग्रह) - 2014 ई. (5) माटि (कथा संग्रह) -2021 ई. (6) बदलैत स्वर (समालोचना) –2011 ई. (7) मैथिली उपन्यासक आलोचना -2021 ई. (8) विश्लेषण (मैथिली आलोचना ओ संस्मरण) - 2022 ई. चयनित कथा-शिवशंकर श्रीनिवास (हिनक प्रतिनिधि कथाक संकलन उज्जवल झाक संपादनमे प्रकाशित भेल) संपादित पोथी - (1) परिचय शतक (मधुपजीक एक सय कविताक संकलन)-1988 ई. (2) कथा किरण (कांचीनाथ झा ‘किरण’क कथा संग्रह) -1988ई. (3) कतेक दिन बाद (कांचीनाथ झा ‘किरण’क कविता-संग्रह) -1989ई. (4) मैथिली कथा संचयन ( नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित 38 टा कथाक संकलन) -2007 ई. सम्मान ओ पुरस्कार–शिवशंकर श्रीनिवासकेँ निम्नलिखित संस्था द्वारा सम्मानित कएल गेल अछि – (1) किरण साहित्य शोध संस्थान, धर्मपुर, दरभंगा द्वारा ‘किरण साहित्य सम्मान’-2013 ई. (2) साहित्य संसद समस्तीपुर द्वारा ‘गौरीकान्त चौधरीकान्त शिखर सम्मान’-2015 ई. (3) आचार्य यंत्रनाथ मिश्र साहित्य शिखर सम्मान -2017 ई. (4) झारखण्ड साहित्य मंच, राँची द्वारा ‘गुण-कथा’ पोथी पर ‘पूर्णेंदु विदेह साहित्य सम्मान’- 2019 ई. (5) सांस्कृतिक परिषद्, मधुबनी द्वारा ‘मैथिली साहित्य संस्कृति समिति सम्मान’- 2019 ई. (6) चेतना समिति, पटना द्वारा ‘गुण-कथा’ पोथी पर ‘डा. गणपति मिश्र साहित्य सम्मान’-2019 ई. (7) साहित्यिकी, सरिसब-पाही, मधुबनी द्वारा ‘साहित्यिकी सम्मान’– 2020 ई. (8) शकुंतला-भुवनेश्वरी मैथिली-संस्कृत संवर्धन न्यास, हैदराबाद द्वारा मैथिली भाषा-साहित्यक विकास हेतु ‘शकुंतला-भुवनेश्वरी सम्मान’ -2021ई. (9) नव मिथिला नव मैथिली संस्था द्वारा अर्घ्य सम्मान -10.10.2022 (10) मैथिल समाज रहिका द्वारा किरण सम्मान –03.3.2023 (11) विश्वम्भर फाउंडेशन, राँची द्वारा ‘विश्वम्भर मैथिली साहित्य सम्मान’ –08.4.2023 (12) चेतना समिति, पटना द्वारा यात्री चेतना सम्मान -2023

शिवशंकर श्रीनिवास एवं हुनक परिवारक फोटो सभ- फोटो-1 शिवशंकरजी अपन युवावस्थामे, फोटो-2 शिवशंकरजी अपन पत्नीक संग। फोटो-3 लेखिका मीना मधु, फोटो-4 शिवशंकरजी अपन बच्चाक संग। फोटो-5 शिवशंकरजीक संतान, फोटो-6 लेखिका मीना मधु फोटो-7 एवं 8 पारिवारिक छवि सभ ३.कल्पना झा-सिनुरहार-एखनहुँ प्रासंगिक कल्पना झा सिनुरहार- एखनहुँ प्रासंगिक हम अपन जीवन मे मात्र दुइए बेर सिनुरहार होइत देखने छी। होइत की, माने कएल अछि सिनुरहार दू बेर। मतलब कर्ता रूप मे परिचित भेलहुँ पहिले-पहिल "सिनुरहार" शब्द सँ, सिनुरहारक प्रक्रिया सँ। सन् २००० मे पहिल बेर आ दोसर बेर सन् २००६ मे। सासु आ गामक लोक जेना-जेना बता देलनि, तेना-तेना करैत गेलहुँ, अपन दुनू बौआक मूड़न आ यज्ञोपवीत संस्कार मे। हजारीबाग आ पटना नैहर-सासुर रहने गाम-समाजक काज मे उपस्थितिक अवसर ततेक भेटल नहि कहियो। आ हमर अप्पन गाम वा नानीगाम मे सिनुरहारक परम्परा छैक नहि। मिथिला मे गाम-गामक बिध-व्यवहार माने एहि तरहक लौकिक परम्परा मे भिन्नता होएब कोनो नब बात नहि। कोनो-कोनो गाम मे मूड़न-उपनैन सँ एक राति पहिले भगता खेलाइत छैक। कोनो गाम मे ओहिना भगवतीक आराधना क' बरुआ आ बरुआ माएक नब वस्त्र राखल जाइत छैक भगवतीक सीर लग। तहिना मूड़न-उपनैनक अवसर पर कोनो गाम मे खीर-पूड़ी-मधुरक पातरि पड़ल, तँ कोनो गाम मे बलिप्रदानक रिवाज। हमर सासुर मढ़िया मे ओहने सिनुरहार होइत छैक जेहन सिनुरहारक चित्रण शिवशंकर श्रीनिवास जी अपन कथा "सिनुरहार" मे कएने छथि। भरि गामक सभ अहिबाती केँ हकारि क' बजाओल जाएत आ सभ एक लाइन सँ ठाढ़ रहतीह। भगवती घर सँ ओसारा पार करैत आँगन धरि चलि जाइत छलए अहिबातीक ओ पाँती। सभ अहिबाती केँ तेल-सिंदुर-धाँसा कएल जाए आ तकर बाद सभ केँ नब रुमाल पर खीर-पूड़ी, गुड़-चाउर, सुपारीक टूक आ सिक्का दैत अपन आँचरक खूट पर लोटा ल' क' सभक पैर कनि-कनि जल दैत आशीर्वाद लेबाक प्रक्रिया भेल सिनुरहार। से ई कथा "सिनुरहार" पढ़ि अपन दुनू बौआक मूड़न उपनैनक ओ दृश्य आँखिक सोझाँ नाचि गेल। जे निस्संदेह सुखद अनुभूति देलक। विस्मृत सन भ' गेल छलए जीवनक आपा-धापी मे। कथा "सिनुरहार"क बुनावट एकदम कसल छनि। कथा बूनब भात-दालिक कौर नहि छैक। बहुत पापड़ बेलए पड़ैत छैक, तखन एकटा नीक कथाक सृजन संभव होइत छैक। कथानकक चयन, भाषा, शिल्प, सभ किछु मे एकटा संतुलन हुअए आ कथाक माध्यम सँ समाजक लेल जे संदेश देल जा रहल अछि, से स्पष्ट हुअए, तखन बनैत छैक एकटा उत्तम कथा। एहि कथा "सिनुरहार"क पाठ करैत हमर ध्यान केन्द्रित रहल लेखकक लेखन-शैली पर। एकटा सामान्य सन कथानकक आधार पर अद्भुत कथाक सृजन कएलनि अछि श्री शिवशंकर श्रीनिवास जी। हमरा जनैत कोनो कथा केँ विलक्षण बनबैत छैक लिखबाक शैलीए। कखनोकाल देखबा मे आबैत छैक जे कथानक बहुत जबरदस्त रहितहुँ कथा ओतेक जानदार/शानदार नहि बनि पाबैत छैक। कारण बस एक्कहि टा रहैत छैक, कथाक भटकल सन, छिड़िआएल सन शिल्प। एहि तरहक चूक मजबूत कथानक केँ सेहो कमजोर कथा मे परिणत क' दैत छैक। उक्त कथा "सिनुरहार"क संग उन्टा बात देखा रहल अछि हमरा। सामान्य सन कथानक केँ नीक ढंग सँ प्रस्तुत कएलनि अछि लेखक। प्रशंसनीय अछि! एहि कथाक माध्यम सँ कथाकार पाठकक ध्यान एहि बात दिस आकृष्ट करबाक प्रयास कएलनि अछि जे स्त्रीए स्त्रीक शत्रु तँ नहि कहि सकैत छी मुदा एकटा स्त्री केँ मानसिक/शारीरिक प्रताड़ना देबा मे स्त्रीए आगाँ रहैत छथि। पुरुष प्रायः बचावे करबा लेल तत्पर देखा पड़ैत छथि। एहि बात मे संशय केर एक रत्ती गुंजाइश नहि अछि। बहुत रास एहन घटना हमरो आँखिक देखल अछि। किछु कान सँ सुनल सेहो अछि। विशेष रूप सँ एकटा स्त्री केँ सासुर मे सासु आ ननदिए मिलि उलाउ-चुलाउ करैत छथि जेनरली। ससुर-भैंसुर-देओर विरले कोनो घरक एहन करैत हेताह। ओना एहि कथा मे तँ सासु द्वारा पुतहुक नहि, माए द्वारा अपन बेटीक उपेक्षा करैत देखाओल गेल अछि। आ एकर विश्वसनीयता पर कोनो प्रश्न चिन्ह नहि लगाओल जा सकैत अछि। अपन मिथिला मे होइत छैक एहनो। समाजक डर, संभावित अमंगलक डर, एकर मूल कारण देखाइत अछि। अपन मिथिला मे घरक पुरुख लेल पाबनि-तिहार, व्रत-उपास करबाक परम्परा रहल छैक। पुरुखक स्वस्थ रहबाक कामना, दीर्घायु होएबाक कामना करब स्त्रीक धर्म रहल छैक। अदौकाल सँ स्त्रीगण बेटा आ पतिक लेल अपन देह केँ साधैत रहलीह अछि। आ तैँ कोनो स्त्री अपन घरक पुरुख केँ अमंगलक छायो सँ दूर राखबाक लेल बेहाल रहैत छथि सदिखन। इएह कारण अछि जे अपशकुनक डरेँ माए सिनुरहारक प्रक्रिया सँ कल्याणी केँ दूरे राखब उचित बुझलनि। कोनो तरहक अमंगलक डर सँ डेराएल माए बेटीक हृदय आहत करबा मे एक रत्ती संकोच नहि करैत छथि। जखन रामभद्र बाबू टोकैत छथिन तँ पत्नीक उतारा छनि, "ओ हमर बेटी छी। कर्म फुटलै जोड़ि देलियै। धर्म-अधर्मक कोनो विचार नहि कएलियै।" पति पर खिसिआइत बाजैत छथि, "ई ऐहबक पूजा छियै, भगवतीक पूजा। ओकरा दुआरे हम अपन बेटा के अमंगल नहि होमए देबैक।" माएक मुहेँ एहन बात सुनि कल्याणी तत्क्षण ओहि ठाम सँ विदा भ' जेबाक नेआर करए लागैत छथि, मोने-मोन। मुदा फेर सोचए लागैत छथि, "माए हमरा अमंगल बुझि रहलीह अछि? पिता कहाँ अमंगल बुझैत छथि!" माएक एहन सोचक पाछाँक मूल कारण अछि पुत्र-प्रेम! बेटा सँ वंश चलैत छै, बेटा कुल के दीपक होइत छै, बुढ़ापा मे माए-बापक सहारा बेटे होइत छै, एहि सभ तरहक धारणा अपन मैथिल समाज मे व्याप्त रहल अछि। मैथिले टा नहि संपूर्ण भारतवर्ष मे कमोबेश एहने स्थिति छैक। ओना आब समय बहुत बदलि गेलैए: बदलि रहलैए। सभ सँ बड़का बदलाव ई एलैए जे आब बेटाक आस मे पाँच टा, छओ टा बेटीक लाइन लगाएब नहि देखाइत अछि कत्तहु। एम्हरे दू - चारि दिन पहिने वरिष्ठ रचनाकार विभा रानीक फेसबुक पोस्ट अभरल, जाहि मे ओ एहि धारणा केँ (समाज मे स्त्री द्वारा स्त्रीक प्रताड़ना कएल जेबाक) "पितृसत्तात्मकता का खेल" कहलनि अछि। हुनकर कहब छनि जे पुरुषे लोकनि, एहि तरहक बात (स्त्रीए स्त्रीक शत्रु होइछ) स्त्रीगणक दिमाग मे भरि देने छथि। एहि तरहक धारणा बना देलनि अछि पुरुष-वर्ग, अपन उल्लू सीधा करबाक लेल। आगाँ ओ दलील दैत कहि रहलीह, जे वर्चस्वक लड़ाइ जहिना दू गोट महिलाक बीच रहैत छैक तहिना दू टा पुरुषोक बीच रहैत छैक। सभ कार्यक्षेत्र मे एहन देखबा लेल भेटैत छैक। मुदा पुरुषक लेल आइ धरि नहि कहल गेलए जे, "पुरुषे पुरुषक दुश्मन होइत छैक।" 'एहि बात केँ बुझू', से कहैत स्त्रीगण केँ ललकारैत सन पोस्ट बुझाएल हमरा। विभा रानीक शब्द मे,"आज भी यह जुमला 'औरत ही औरत की दुश्मन है' फेंक दिया जाता है। हम औरतों को इससे बचने, इसके नैरेटिव को समझने और अपने विचार को दुरुस्त करने की ज़रूरत है, अन्यथा हमारी बादवाली पीढ़ियाँ भी यही सुनने के लिए अभिशप्त होती रहेंगी कि 'औरत ही औरत की दुश्मन है'।" हिनका सन बहुत महिला रचनाकार छथि जे स्त्री सँ जुड़ल सभ समस्याक जड़ि अपन मैथिल समाजक "पितृसत्तात्मक" होएबा केँ मानैत छथि। हमर कहब अछि, जैँ समाज पितृसत्तात्मक अछि तैं स्त्रीक मान-सम्मान बाँचल अछि। स्त्रीक सत्ता मे तँ भगवाने मालिक बुझू ! खैर, आब एहि बात केँ विराम देब ठीक। बेसी खोंइचा छोड़ेबाक बेगरता नहि अछि एहिठाम। एहि कथाक प्रासंगिकताक गप्प करी तँ ई कथा "सिनुरहार" एखनहुँ ओतबे प्रासंगिक अछि, जतेक ई लिखल जेबा काल रहल होएत। भले ही आब एहन कोनो अनिष्ट भेलाक बाद पुनर्विवाह करबा देब सामान्य बात भ' गेल अछि, मतलब एक्सेप्टेबल भ' गेल अछि समाज मे। अपन मैथिल समाज मे सेहो। मुदा ओहि स्त्रीक संग स्त्रीगण द्वारा उपेक्षित व्यवहार करब जारी अछि। से ओकर नैहर परिवार होइक वा समाजक लोक, ओ मान-सम्मान नहि भेटैत छैक ओकरा जे एकटा सामान्य ऐहब केँ लोक दैत छैक। कथा मे नकारात्मक पक्ष, माने त्रुटि ताकैत रहि गेलहुँ किछु अभरल नहि तेहन। कथानक, चरित्र-चित्रण, शिल्प-शैली सभ परफेक्ट ! ४.डा. धनाकर ठाकुर- 'असमंजसी मध्यममार्गी 'कथाशिल्पी शिवशंकर श्रीनिवास' '(सेनुरहार' कथा केर संदर्भमे) डॉ. धनाकर ठाकुर 'असमंजसी मध्यममार्गी'कथाशिल्पी शिवशंकर श्रीनिवास (सेनुरहार'कथा केर संदर्भमे) शिवशंकर श्रीनिवाससँ हमर एकमात्र साहित्यिक भेंट नीक नहि रहल। नवटोलमे २० दिसम्बर २०१५क आयोजित अन्तरराष्ट्रिय मैथिली परिषदक दोसर 'कथा कुम्भ' मे ओ आएल छलाह। मैथिलीक नामी कथाकार किन्तु कथा गोष्ठीक सामान्य नियम जे अप्रकाशित कथा पढ़ल जाए केर जगह ओ अपन पोथीसँ एक प्रकाशित कथा पढ़ि देलाह किन्तु अध्यक्ष डा. कमलकांत झा आपत्ति नहि केलखिन्ह तऽ अनुशासनक कारण हमहूँ चुप रहलहुँ (जेना एखन किनकहुँ हिन्दीक पोथीक लोकार्पण १२२म सगर राति दीप जरयमे जलवारमे सेहो भेल)। किन्तु श्रीनिवासजीक कथा सुनितहि हम हिन्दीक छत्तीसगढ़मे २०१५ क एक हिन्दी समाचारपत्रमे छपल कथाक संग भावसाम्यता ओ कथासाम्यताक आरोप लगा देलिएन्हि। दूनू कथामे कुमारि भोजन लेल कोनहुँ दम्भी व्यक्तिकेँ किनकहुँ आगाँ याचना करऽ पड़ल छलन्हि जिनक घर कुमारि बेटी छल जिनका ओ दम्भी हमेशा दूसैत रहैत छल। हम अपन मुँहफटीमे राजकमलक प्रसिद्ध 'ललका पाग' मैथिली कथा पर सेहो शरदचन्द्रक एक कथासँ भावचोरीक आरोप लगाओल जाहिमे एक विवाहिता अपन पतिकेँ दोसर बिआह लेल जाइत काल शंखध्वनि करक लेल बाध्य करैत अछि। शिवशंकर श्रीनिवासक एक कथाक पीडीएफ 2005 मे प्रकाशित 'सिनुरहार' क कथा विधवा विवाह बल्कि पुनर्विवाहक बादक मानसिकताक ऊपर एक प्रगतिशील कथा 2025 ईस्वीमे ओतेक प्रासंगिक नहि लागैए कारण विधवा विवाह नहि तलाकक बाद पुनर्विवाहक कथा अधिक समाजमे आब भए रहल अछि। उक्त कथामे कल्याणी नामक एक बेटी विवाहक चारि मासक बाद रेल दुर्घटना चलते विधवा भए गेलीह। हैदराबादक महानगरीमे अपन पिताक नौकरीस्थल पर अपन सहपाठिनी द्वारा अपन भाइक प्रति हुनक झुकाव करबा उत्तर प्रदेशक एक आधुनिक कथित जाति-पाति नहि मानएबला ब्राह्मण परिवारमे विवाह भए गेलैन्हि। एकर पाँच वर्षक बाद कल्याणीकेँ एक भाइ भेलन्हि जकर उपनयनक समय सधवा लोकनिक सेनुरहार प्रथा पर ई कथा अछि जाहिमे विधवाक विवाहक बाद ऐहब नहि मानि या ओकरा अमंगली मानकक संशय कल्याणीक मोनमें अन्त तक रहि जाइत छन्हि। कल्याणीकेँ विवाहक पाँच वर्ष भाइक जन्म जाकर बूझू 8 वर्षक बाद ओकर उपनयन यानी 13 वर्षमे कल्याणीकेँ कोनहुँ सन्तानक चर्चा नहि कथामे एक कमी देखाइत अछि। कल्याणीक माए गाममे विधवाक पुनर्विवाहसँ यज्ञमे विघ्नसँ डरैत छथि किंतु पतिकेँ अन्तमे बेटीक घर जा गाम लेल नोतए कहैत छथिन्ह। जमाए सेहो संग गेलाह से हुनका नीक नहि लगलन्हि जे गाममे किछु गड़बड़ नहि भ जाएत। जखन कि पिता जमाएक गाम संग गेलासँ प्रसन्न छथि। एहि अन्तरालमे गामक बदलबाक चर्चा नहि भेनाइ कथाक कमी अछि। ओतए बारि देबाक कोन कथा सहयोग भेटैत छन्हि। सिनुरहार प्रक्रियामे माए बेटी कल्याणीकेँ नहि कहैत छै जे बेटाकेँ अमंगल नहि हो। कल्याणीकेँ मोन होइत छै वापस चलि जाए किन्तु अबोध भाइकेँ मुँह देखि असमंजसमे ओकर मनोदशाक नीक वर्णन कथाकार श्रीनिवास करैत छथि। हुनक प्रगतिशील लेखकत्व कल्याणीकेँ उत्प्रेरित कए स़धवा पंक्तिमे ठाढ़ करैत अछि। ओ एक भौजीकेँ खीर-पूआ दैत छथि तऽ एक पितियौत बहिन कल्याणीक माएक हाथसँ तेल-सेनूरलए कल्याणीक सिउँथिमे लगा दैत छथि। कल्याणी प्रसन्न, ओकर पति प्रसन्न (नेपथ्यमे पिता सेहो प्रसन्न भेल होथि) किन्तु माएकेँ 'असमंजसी कथाकार' शिवशंकर श्रीनिवास अवाक् मुद्रामे राखि दैत छथि। हम कहैत छी कथाकर शिवशंकर श्रीनिवास उच्च जातिबोधक मानसिकतामे फँसल एक आधुनिक पढ़ल-लिखल, आधुनिक सोचक कथाकर छथि किन्तु शत प्रतिशत आधुनिकताक नहि। ओ विधवा विवाह सेहो करबैत छथि तऽ दोसर भाषी किन्तु स्वजातीयहिमे। कथानक हमेशा असमंजसमे ओ द्वंद एवं आधुनिकीकरणक दिशि किछुए। ई पूर्ण वैज्ञानिक सापेक्षक पक्षधर नहि नहिए पुरातनपंथी वरन् असमंजसी स्थितिमे जाहिमे वैह नहि अधिकांश उच्च सामाजिक वर्गक लोक एखन धरि अछि। एखनहुँ पुरुषकेँ प्रगतिशील ओ महिलाकेँ दकियानूसी देखेबाक आदति जेना एहि कथामे माता दकियानूसी पिता प्रगतिशील जखन कि अगिला पीढ़ीमे लड़की कल्याणीक भाउजि ओ पितियौत बहिनक प्रगतिशीलताक बिना प्रशंसा केने विवरण अछि। ई दकियानूसी जाएमे एक-दू पीढ़ी आओर लगतै वा फेर 'यू टर्न' हैत जे परिणामफल देखल जा रहल अछि एहन विवाहक परिणति बहुत तलाक या विवाह टूटनमे। की परिवार संस्था समाप्त हैत? के जानए किन्तु ई कथा 20 साल पहिले लिखल संभवतः आब प्रासंगिक नहि जखन 2005 मे लिखल गेल तखन एक तरहसँ प्रगतिशील प्रगतिगामी कथा लेखकक रूपमे शिवशंकर श्रीनिवासकँ मानल जएबाक चाही छल वा मानल गेल होएत। एखन 2025 मे निश्चितरूपसँ समाजमे वैज्ञानिक दृष्टिकोण आओर बढ़ि रहल अछि। किन्तु 2005 मे ई प्रगतिशील कहाओल गेल होएत यद्यपि तखनहि मिथिला समाज तलाकसँ आक्रान्त भए चुकल छल ओ 60+ वर्षक औसत आयु यानी 1947-57क हैजा-मलेरियाजन्य अल्पजीवी औसत आयु 21 वर्ष छल जखन विधवा बहुत होइत छलथि आओर ओ कलंकिनीसँ आगाँ मिथिलामे सेहो उठि गेल होएतीह। तथापि कथा शैली नीक शिवशंकर श्रीनिवासकेँ छनि। हमरा हुनक 'य' केर मैथिलीमे अधिकांश मैथिली लेखकजकाँ हिन्दीजकाँ हरसठ्ठहि प्रयोग नहि लागल जखन 'ए' उपयुक्त ओ उचित। एहि कथा लेल हम आरो लीखि सकैत छी मुदा एखन अतबे। ५.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र-सिनुरहार-'शिवशंकर श्रीनिवास'क कथा डॉ. कैलाश कुमार मिश्र सिनुरहार–शिवशंकर श्रीनिवास’क कथा शिवशंकर श्रीनिवास'क एक कथा "सिनुरहार" जे हिनक कथा संकलनक पोथी "गामक लोक" मे छनि, आइ भोरे-भोर पढ़लहुँ। कथा अनेक दृष्टिकोण सँ नीक लागल। पोथी त' ई सोचि पढ़नाइ प्रारम्भ कएने रही जे सब कथा पढ़ि अगर किछु बात नीक-अधलाह लागत त' ओहि पर अपन विचार राखब, मुदा पहिल कथा ततेक प्रभावित कएलक जे भेल कि पहिने एहि कथाक विवेचना करी। उच्च जाति, मुख्य रूप सँ ब्राह्मण, ताहू मे मैथिल ब्राह्मण मे वैधव्य एक श्राप थिक। ई लोकक नारीक प्रति अपराध आ कुंठाक भाव प्रदर्शित करैत अछि। ई पुरुख़क ढकोसला केँ उजागर करैत अछि। असमय मृत्यु चाहे पुरुख़क हो अथवा स्त्रीगणक, एक वज्रपात अछि। लेकिन ई वज्रपात सेहो प्रजातान्त्रिक अछि। असामयिक मृत्यु ककरो, कखनो कतौ भ सकैत अछि - की पुरुख आ की स्त्री। अगर एकर सूत्र अतेक सार्वभौमिक अछि त फेरो स्त्री आ पुरुख़क मृत्यु मे विशेष समाजक विशेष जाति अनरगल अंतर आ सीमारेखा (लक्ष्मण-रेखा ) कथीलेल खिचैत अछि? दूनूक लेल अलग-अलग मापदण्ड कथी लेल गढ़ैत अछि? पत्नी मरला पर पुरुख कखनो विवाह क' सकैत अछि, किछु खा सकैत अछि, ओकरा कोनो अनुष्ठान, सामाजिक शुभ कार्य आदि सँ नहि बारल जाइत छैक; सब रंगक वस्त्र पहिरक आज़ादी, सब भोजनक आज़ादी छैक, वैह समाज पतिक मृत्युक बाद स्त्रीगण अर्थात ओकर विधवा लेल अतेक कठोर-निर्दय कियैक भ जाइत अछि? ख़ैर, ई त भेल व्यवस्था आ ओहि व्यवस्थाक लेख आ संरचना मे जे शिक्षा आ समाजक बढ़ैत परिदृश्य मे परिवर्तन भ रहल अछि। विधबा विवाह आ विवाहक बाद समाजक अस्वीकृति-आ स्वीकृतिक द्वन्द कोना चलैत अछि, पुरुख विधवाक पिताक रूप मे अपना केँ केना देखैत अछि, परम्परा आ बेटीक जीवन एहि दूनूक बीचक उभयवृत्तता मे कोना एक माय फँसल रहैत अछि, आदिक बहुत सजीव वर्णन एहि कथाक कथाकार शिवशंकर श्रीनिवास कएने छथि। कथा के अगर संक्षेप मे कही त रामभद्र झाक बेटी कल्याणी विवाहक चारि मासक भीतर विधवा भ जाइत छथिन। कल्याणीक माता-पिता कल्याणी केँ लेने हैदराबाद चलि जाइत छथि। कल्याणी ओतय फेरो सँ पढै लगैत अछि। किछु दिनक बाद कल्याणीक एक सहेली अपन भाई सँ जे की उत्तर प्रदेशक ब्राह्मण छैक आ बहुत पहिने हैदराबाद मे बसि गेल छैक, ओकरा सबलेल जाति-पाति कोनो खास वस्तु नहि छैक, कल्याणीक विवाहक प्रस्ताव रखैत छैक। लड़का केँ कल्याणीक सम्बन्ध मे सब जानकारी छैक तकर वादो ओ विवाह लेल तैयार छैक। कल्याणीक माता-पिता थोड़ेक उधेर-बुनक बाद विवाह लेल हाँ क दैत छथिन। कल्याणी अपन पति संग सुखमय जीवन जीबैत अछि। रामभद्र झाक गाम मे लोक नाना तरहक बात बनबैत छैक। किछु लोक यद्यपि एहनो छैक जे विधवा विवाहक स्वीकृति दैत छैक। कथा मे मोड़ तखन अबैत छैक जखन रामभद्र झा अपन पुत्रक उपनयन मे हैदराबाद सँ गाम जयबाक योजना बनबैत छथि। दूनू पति-पत्नी मे पहिने ई विवाद होइत छनि जे कल्याणी के ल’ जाई अथवा नहि। जखन निर्णय भ’ जाइत छनि जे कल्याणी केँ ल जेताह त बात कल्याणीक वर पर अबैत छैक। अन्तिम निर्णय लैत छथि जे कल्याणी दूनू प्राणी गाम जेतीह गाम गेलाक बाद लोक कल्याणीक सम्बन्ध मे बहुत तरहक बात करैत अछि। गैर ब्राह्मण जातिक स्त्रीगण जकरा मे विधवा विवाहक प्रचलन छैक तकरा सबकेँ कनि आश्चर्य लागि रहल छैक। खैर! जखन ई निर्णय होइत छैक जे किछु सोहागिन सब भगवती केँ सिनुरहार देतैक त’ परम्परा मातृत्व पर भारी पड़ि जाइत छैक आ अनिष्टक आशंका सँ कल्याणीक माय कल्याणीक नाम सोहागिन महिलाक सूची मे नहि रखैत छथि। एहि विषय पर हुनक अपन पति संग बहस होइत छनि जकरा टाटक दोगे कल्याणी सुनि लैत छैक। कल्याणीकेँ ग्लानि आ अपमानक अनुभूति होइत छैक। ओ किंकर्तव्यविमूढ भ जाइत अछि। जखन सिनुरहारक बेर अबैत छैक त ओ हिम्मत करैत जाइत अछि सेनुर स्त्रीगण सबहक सीथ मे लेप दैत छैक। कथाक ताना-बाना बहुत सुन्दर आ मनोवैज्ञानिक ढंग सँ रचल गेल छैक। कथा मे समाजक बदलैत रुख पर सेहो ध्यान देल गेल छैक। ई कथा लीक सँ अलग अहुलेल कहल जा सकैत अछि जे अहि मे अन्धविश्वास आ नारी शोषण केँ समाज खुलि क सहयोग नहि क रहल छैक। समाज केँ मौन भ गेनाई, केवल काना-फुस्सी केनाई, कल्याणी केँ माता-पिता केँ समाज सँ बहिष्कृत नहि केनाई किछु एहेन डेग छैक जे ई सिम्पटम देखबैत छैक जे समाज परिवर्तन लेल तैयार छैक। कथा मे कखनो कल्याणीक माता त कखनो पिताकेँ परम्परा आ यथार्थक बीच उभयवृतताक अवस्था देखेनाई लेखक केँ समाज सँ कतेक गहीर संबंध छनि ताहि बातक प्रमाण छैक। कल्याणीक मायक मनोदशा जाहि रुपे वर्णित छैक से ई कहबा लेल पर्याप्त छैक जे कथाकार जखन कथाक निर्माण करैत छथि त ओ तटस्थ भेल करैत छथि, नारी मनोदशा केँ तह मे घुसबाक हिम्मत रखैत छथि। हम एहि कथा केँ एक पाठक सँ अधिक एक मानव आ समाजशास्त्रक विद्यार्थीक रूप मे पढ़लौ। कथा अर्थपूर्ण लागल। एक प्रसंग आरो स्मरण आबि गेल। अहि बेर दिल्लीक अंतर्राष्ट्रीय मैथिली लिटरेचर फेस्टिवल मे शिवशंकर श्रीनिवास केर रचना पर एक सत्र छल। सत्रक दू साहित्यकार हुनका पर बजैत रहैथ। आश्चर्य तखन लागल जखन दूनू ई बजला जे ओ सब अहि साहित्यकार केँ नीक सँ नहि पढ़ने छथि। हम एक दर्शक आ आयोजक मण्डलक सदस्य होब केँ नाते अपन आपत्ति दर्ज करौने रही। बाद मे शिवशंकर श्रीनिवास जी स्वयं सबहक शंकाक समाधान केलाह। ई कथा पढ़ि लागल, अगर एहेन साहित्यकार केँ हम सब नहि पढ़ैत छी त फेर कथी लेल मैथिली-मैथिली करैत छी???? एखन अतबे। फेर जखन हिनक पोथी “गामक लोक” केर सब कथा पढ़ि लेब त किछु लिखबाक प्रयत्न करब। ६.चंदना दत्त-श्री शिवशंकर श्रीनिवास चंदना दत्त श्री शिवशंकर श्रीनिवास श्री शिवशंकर श्रीनिवास मैथिली साहित्यमे ग्रामीण परिवेशकक कथा-कहानी केर अद्वितीय शिल्पी छथि। हिनकर कथा पाठककेँ मानसिक रूपें ओहि स्थान पर लऽ जा कऽ राखि दैत अछि। मैथिली साहित्यमे हिनकर कथा एकटा नव इजोत दिस लऽ जायत अछि। हमरा हिनकर कथा हिनके सँ सुनबाक सौभाग्य मधुबनीमे भेटल। कथा छल "गामक लोक" ओहि कथामे ततेक विस्तार सँ ओ आजुक परिवेशमे जे अफसर पुत्रक महा अफसरानी पुतोहक मनोवृत्ति आ ताहिमे माय कतेक महीन भावें अपन नीक मनोवृत्ति केर वर्णन कयने छथि जे पाठकके ई बुझबामे अबैत अछि जे हम अपने टोल पड़ोसक खिस्सा पढ़ि-सुनि रहल छी। एकदम वास्तविक लय-ताल। एकहक आखर सत्य, जे माय कतेक कष्ट काटि अपन करेजक टुकड़ा के पढ़ौनी करा अफसर बनौलनि से वैह बुझय छथि आ हुनकर सभटा तपस्या केर मोल बुझनिहार कियो नहि, तखन ओ चुप्पेचाप ओहि बस्तीमे जाय छथिन्ह जतय हुनकर मार्गदर्शन केर आवश्यकता अखनो छन्हि आ ओ सभ हिनकर सम्मान करैत छथिन्ह। ई बात क्लब संस्कृति वाली पुतोहके अनर्गल बुझाइत छैन्ह। ई हुनक समाजसेवा पर धयले चाट चुप्पेचाप दऽ जाय छथिन्ह। साँचे समाजिक परिस्थिति केर ऐना देखेनाय जे साहित्यकार को दायित्व छन्हि से हिनक सभ रचनामे झलकै छन्हि। हम त हिनके सभक रचना सँ सीखि रहल छी आ भविष्यमे हिनके सभक आशीर्वाद सँ सीखैत-लिखैत रहब। ७.डॉ. आभा झा-चयनित -कथाक मादें किछु गप डॉ. आभा झा चयनित -कथाक मादें किछु गप आदरणीय शिवशंकर श्री निवासजी गद्य, पद्य दूहू विधामे रचना करैत छथि, स्तरीय आलोचनात्मक निबंधादि लिखने छथि, मुदा सर्वाधिक ख्याति अर्जित कएने छथि वरेण्य कथाकारक रूपमे। हिनकर साहित्यमे रमणीक बंकिम भ्रू-भंगिमाक वर्णन कम्मे अछि, कल्पनाक मधुर मनोहर उड़ानो बेशी नहि, ओ मजगूतीसॅं ठाढ़ अछि यथार्थक कटु कठोर आधार पर। लेखक मात्र मनोरंजन लेल साहित्य सृजन नहि करैत छथि, एकटा जिम्मेदार नागरिक जकाँ समाजकेँ उचित अनुचितक बोध करयबा लेल, उचित पथ पर चलबा लेल पाथेय दैत छथि। मुदा उपदेश सुनबाक धैर्य ककरा छैक? के सुनतनि हिनक गप? मुदा ओ उपदेशो कत' दैत छथिन, ओ त' खिस्सा सुनबैत छथिन। खिस्सामे मनोरंजन त' होइते छैक, हिनकहु कथामे आनन्दतत्त्व छैक अवश्य, मुदा अन्तस् मे समेटने छैक एकटा विचार, एकटा स्पष्ट दृष्टिकोण, समाजमे विद्यमान विभिन्न समस्या आ संगमे कथाकारक संवेदनाक मलहम। कथा सभ एकटा विशिष्ट उद्देश्यक संग बढ़ैत अछि आ अंत तक अबैत- अबैत निन्नसॅं जगा दैत अछि। सहृदय आ साकांक्ष पाठक खिस्सा पढ़ि चिहुँकि उठैत अछि, भक्क द' आँखि फोलि दैत अछि। हॅं, सप्रयोजन रचल कथा सभमे स्वाभाविक बहावक गति कतौ कतौ सायास कम-बेशी कएल जाइत छैक, कथाकार सेहो कएने छथि, मुदा एहिसॅं कथाक रोचकतामे कत्तहु कोनो प्रकारक न्यूनताक अनुभव नहि होइत अछि। हिनक कथा सभ मात्र फैंटेसी नहि, सत्यक आधारभूमि पर काल्पनिकताक गिलेबासॅं ठाढ़ कएल कथा-भवन थिक जाहिमे प्रवेश आदर्श समाजक रचनाक क्रियाशीलताक अपेक्षा रखैछ। एहि तरहेँ कथाकार साहित्य सृजन लेल पारंपरिक प्रयोजनकेँ "व्यवहारविदे आ कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे" स्वीकारि ओकरा मूर्त रुप दैत छथि। साहित्यिक कृतिक उद्देश्यो यैह होयबाक चाही, से कल्याण-पथक निर्देश हिनक कथा सभमे अप्रत्यक्ष रूपसॅं विद्यमान अछि। बहुत हद तक पंचतंत्रक परम्पराक पालन करैत लोक-समाजक मूनल आँखि फोलबाक प्रयोजन मनमे राखि गाम-घरक परिवेशसॅं तादात्म्य स्थापित करैत समसामयिक कथावस्तु पर रचल खिस्सा सभ कौखन गामघरक स्थिति दिशि ध्यान आकृष्ट करैत अछि त' कौखन अमरलत्ती जकाँ पसरैत बाजारवाद आ ओहि चकचोन्हीसॅं उचित-अनुचित-विवेकदृष्टिक लोप सावधान करैत अछि। उपेक्षित वृद्धावस्था, नगर दिशि पलायन, स्त्री-शिक्षा, समानता आदि अनेक समसामयिक विषय कथाकारक दायित्व- बोध आ गंभीरताकेँ स्पष्टत: रूपायित करैत अछि। हिनका द्वारा लिखल पाँच टा कथासंग्रह प्रकाशित आ पाठकक सिनेहसॅं अभिसिंचित भेल अछि। एखन ओहि खिस्सा सभमेसॅं चयनित कथा मात्र पर विचार करब एतय अभीष्ट अछि, जकर संपादन श्री उज्ज्वल कुमार झा कएने छथि आ जे सिद्धिरस्तु प्रकाशन सॅं छपि क' आयल अछि। पोथीक विस्तृत भूमिकाक प्रारंभमे प्रो.देवशंकर नवीनजी हुनका 'निसभेर निन्नमे सूतल समाजक पहरू कथाकार' कहने छथिन। समाजमे पोर-पोरमे व्याप्त भौतिकता ओ बाह्याडंबर आ तकर परिणामस्वरूप ढहैत ढनमनाइत नैतिकता चिन्तन आ परिमार्जनक खगता देखबैत अछि, आन्हर भए कतेक दौड़ब कनेक थम्हू, विचार करू, बेमारीक उपचार करू। बढ़ैत धार्मिक सामाजिक असहिष्णुता, उपेक्षित वृद्धावस्था, सामाजिक समरसताक विखंडन, खेती-बारी, कुटीर- उद्योग आदिक उपेक्षा, स्त्री-जीवनक विसंगति आदि अनेक विचारणीय विषय सोझाँ आनि कथाकार पाठकक संवेदना जगबैत छथि आ एहि तरहेँ लेखकीय दायित्वक निर्वहण करैत छथि। कथाकारक सभसॅं पैघ चिंता छनि गामसॅं पलायन आ फलस्वरूप कृषि-भूमिक उपेक्षा, गाछ-पातक उपेक्षा, गाममे अदौसॅं चलि अबैत हस्त-कौशलक अवमानना। एहि चिंताकेँ अभिव्यक्ति दैत छथि ओ चिन्ता, मित्र, अद्भुत, चिड़ै नहि मनुक्ख थिक आदि कथामे। किछु उद्धरण द्रष्टव्य अछि- चिन्ता कथा सहजहिॅं एकटा जिम्मेदार नागरिकक स्वाभाविक चिन्ताकेँ सोझ सपाट भाषामे व्यक्त करैत अछि। 'माता भूमि: पुत्रोSहं पृथिव्या:' एहि भावकेँ कथाक प्रसंगवश ओ कहै छथिन, 'धरती माता थिकीह। हरियरी हुनक प्रसन्नता छियनि। विभिन्न धार हुनक वादन आ हुनक उर्वरा थिकनि मातृत्व जाहि पाबि कऽ जीव एहि धरा पर जीबैए, मुदा सैह आइ हुनक पुत्र सभ हुनका नाश करैमे लागल अछि। एनामे धरतीक बिगड़ि जेतीह। संसार नष्ट भऽ जायत। ' "सम्हरतौ तँ सम्हरि जाइ जो, जंगल कटि रहलौ तकरा रोक, जंगल लगा। गंगा दूषित भऽ कराहि रहलीहे। उद्योग-धन्धाक धुंआ हरियरी नष्ट कऽ रहलौए। बचा धरतीके। गामसँ लोग उपटि रहलैए तकरा रोक। ' फर्क कथा शिक्षित समुदायक शारीरिक श्रमकेँ न्यून बुझबाक प्रवृत्ति पर प्रहार करैत अछि। जखन बेटा हुनकर डोरी बाँटबकेँ नाक कटायब कहैत छनि त' ओ विक्षुब्ध भए कहैत छथि- "देखह, हम डोरी नहि बॅंटै छी, हम अपन जीवन जीबै छी, ताहि ठाम जे तोहर माथ नहि जाइत छह तॅं बूझह जे तोरामे आ हमरामे यैह फर्क छह। हमर अपन लूरि आइयो विकास-मानि अछि। " एहने सन भाव गुणकथामे देखाओल गेल अछि जतए इंजीनियर पुत्र आ तथाकथित समाजसेविका पुतौहुकेँ सासुक निर्धन बस्तीमे जाक' शिक्षाक ज्योति देखायब, पेंटिंग सिखायब किंवा गरीब-गुरबाक मदति करब प्रतिष्ठाक अवमूल्यन लगैत छनि। कथाकार मात्र समस्या सोझाँ नहि रखैत छथि, समाधान सेहो देखबैत छथि- संग्रहक पहिल कथा बुत्ता दोसरासॅं उमेदक बैशाखीकेँ नकारैत अछि, अपन ताकति पर भरोस करबाक प्रेरणा दैत अछि आ कोनो काजकेँ छोट बुझबाक हीनग्रन्थिसॅं मुक्ति दिया आत्मविश्वास, आत्मसम्मान आ कर्मठताक त्रिवेणीसॅं आप्लावित करैत अछि। डेग लैत एकटा ज़िनगी विपरीततमो परिस्थितिमे एकजुटताक संग संघर्ष, मनुष्यताक रक्षा आ अन्याययक सोझाँ ठेहुन नहि रोपबाक संदेश कतेक सहज रूपमे दैत अछि- "मोहन! मनुक्खकेँ अपन स्वभाव नहीं छोड़बाक चाही। कियै त' एहि बिना एकर मौलिकता नष्ट भ' जेतै आ मौलिकतासॅं अलग होएब कठिन छै। तैं संघर्ष करबाक स्वभावकेँ बिसरी नहि। अपन मनुक्खकेँ जियौने रही, एकरा बेची नै। " समाधान त' ओ देखबैत छथि जिनगी, पितामही, बदलैत रूप, जकर टांङ तकर आम आदि कथामे सेहो। अपन जीवन, अपन रुचि-प्रवृत्ति महत्वपूर्ण होइत अछि, जकर आदर स्वयं करबाक चाही। जीवनमूल्यक ह्रास दिशि इंगित करैत कथाकारक पीड़ा हुनक पात्र सभमे जीवन्त भेल अछि। किछु उदाहरण सोझाँ अनैत छी- बताहि कथा महानगरक चकाचौंधमे भोतिआयल युवा दम्पतीक स्वार्थान्ध व्यवहार आ पिता जकाँ पालन-पोषण कयनिहार जेठ भाइक पीड़ाक सजीव वर्णन करैत अछि, मुदा एत' कथाकार छोट भाइक अमानुष व्यवहारक तह तक पहुंचैत छथि, ऊपरसॅं कृतघ्न जकाँ बुझाइत हृदयक दुखाइत रग धरि जा कहबैत छथिन- "नहि, शहर आब हमरा गाम नहि रहय देत। हम बियाह कयलहुँ आ परास्त भ' गेलहुँ। " घटना घटैत सामान्यो लोक देखैत छैक, परञ्च लेखक ओकर कारण सेहो अकानैत छैक, विवशता सेहो बूझैत छैक आ एकटा इशारा द' आगू बढ़ि जाइत छैक। अपन परार धनक मृगतृष्णामे हेराइत संबंध- बंधक पीड़ादायक कथा अछि, मुदा सत्य ई जे आब प्रायः अधिकांश परिवार स्वार्थक दंश भोगबा लेल अभिशप्त अछि। विवाह-मात्र स्त्री-जीवनक प्रत्येक क्रियाकलापक आधार नहि, ई संदेश दैत कथाकार प्रत्येक बालक- बालिकाक स्वतंत्र व्यक्तित्व निर्माणक प्रेरणा दैत छथि अपना लेल कथामे। एहि मादें ओ प्रत्येक माता पिताकेँ धियापुताक पालन पोषणमे सावधान रहबाक आवश्यकता बुझबैत छथिन। बांट बखरा कथामे पिताक मृत्युक उपरांत मायक मनोदशाक उपेक्षा, बिनु पुछने भिन्न- भिनाउज आ मायक स्थिति पेंडुलम जकाँ करब कतेक पैघ मानसिक अत्याचार अछि, एकरा रेखांकित करैत बूढ़ीक साहस देखा एक दिशि स्वार्थी संतानकेँ ऐना देखबैत छथिन आ दोसर दिशि स्त्रीक मुंह पर पड़ल जाबी हटबैत छथि। ई संवाद कतेक मार्मिक अछि से देखल जा सकैछ- मायक नोरायल आँखि देखि चारू चौंकि गेलाह। जेठ जन पुछलथिन - "की भेलौ माय? केओ किछु कहलकैए?” बुढ़ही कहलथिन–‘“हमरा केओ किछु ने कहलक 'ए, मुदा हमरा बहुत किछु भऽ गेलऽए। हमर पैर टूटि गेलऽए। हमरा होइए जेना हम अपन ठठरीमे ओइ घरसँ ओइ घर गुड़कि रहल होइ। हम प्रेत भऽ गेल छी प्रेत "कहैत-कहैत बुढ़ी दृढ़ भऽ उठलीह-"हम दसोदिसिया जीवन नहि जीब। पछबरिया घर हमर भेल। हमर अन्न-पानि फुटका दै जाह। हमर खेती-पथार बाँटि दै जाह। हम अपन जीवन अपने चलायब। .... " संतानक स्नेह एक दिशि, मुदा आत्मगौरवक रक्षा सेहो जरूरी। एहि तरहक साहसक शिक्षा जॅं प्रत्येक माता पिता ल' सकथि, त' कोनो संतान माइक जिनगी अछैत भिन्न-भिनाउजक कथा सोचिओ सकत? बदलैत रूप सेहो पुत्रक कृतघ्नताक कथा सुनबैत अछि, मुदा ओत्तहि निराशा त्यागि अपन परिश्रमक ब'ल पर आत्मसम्मान पूर्ण जिनगीक बाट तकबाक, ओहि बाट पर चलबाक रोशनी सेहो दैत छैक। गुणकथा त' बाजारवादक नग्न रूप देखा रहल अछि पारिवारिक संबंधक आ नैतिकताक क्षरणक मादें। बेटा-पुतहुकेँ मायक नीको काज अधलाह लगैत छनि आ पोता त' स्नेहक स्थान पर लाभक प्रत्याशामे पितामहीकेँ रोकबाक सुझाव दैत छनि। स्वाभाविक छैक जेहने संस्कार देल जेतै, ओहने व्यक्तित्व बनतै!जेहने बीआ तेहने त' वृक्ष! किछु एहने सन साहुकारी कथा समाजमे जड़ि बैसौने वणिकवृति पर चोट दैत अछि। प्रत्येक व्यक्तिक मनमे शिक्षा-ग्रहणक उद्देश्य मात्र पाइ कमायब आ बाहरी ताम झाम पसारब रहि गेल अछि, जे चिंतनीय अछि। स्त्रीक सामाजिक स्थिति, हुनक परवरिशमे कमतर हयबाक भाव भरब कथाकारकेँ अभीष्ट नहि रहलनि, ने ओ विवाहकेँ जीवनक प्रमुखतम लक्ष्य मानै छथि आ ने पुत्रीक परिवारक भार उठायब खराप। हॅं स्त्रीक स्वयं केर ग्रन्थि सेहो ओ देखि ओहि दिशि देखबा लेल पाठककेँ प्रेरित करैत छथि। किछु निदर्शन देखल जा सकैत छैक- बेटीक परिवारक कर्णधार बनब, लीकसॅं हटिक' जीविकाक साधन चुनब आ रसातलमे जाइत परिवारक भविष्य सम्हारब धरती ऊपर उठि गेलीए कथाक प्रेष्य संदेश अछि। सिनुरहार कथा स्त्री-स्वभावक अन्तर्द्वन्द्व, अनप्रेडिक्टेबल चिन्तन आ व्यवहार, सामाजिक नियम- कानूनक अव्यक्त भय आ सभसॅं बढ़ि कए ओहिसभमे जकड़ल मानस- तन्तुक सजीव चित्रण करैत अछि आ ओहि जालसॅं बहरैबा पर आश्वस्तिक अनुभूति करबैत अछि। पिजराक सुग्गा कथामे सेहो समाजक संग स्त्री- म'नक निस्सहायता आ परावलम्बिताक आख्यान अछि। जे स्त्री बेटाक विह्वलता देखि ओकरा सांत्वना दैत मजगूतीसॅं कहैत अछि - "अधीर नहि होअ'। बाप ने चल गेलथुन, हम त छियहे। तोरा' कथीक चिन्ता?" ओएह स्त्री नैहर जयबाक गप पर कहैत अछि- "पुछबै नै?बेटा थिक तें की? माउग-मेहरि भ' क' जुति चलायब?" संभवतः कथाकार कथाक माध्यमसॅं युग- युगसॅं चलि रहल पराधीनताक पाशक म'न पर पड़ल गहीर प्रभावक दिशि ध्यान आकृष्ट कए जागरूक करए चाहैत छथि। रूमाल कथा ऊपरसॅं हल्लुक- फल्लुक लगैत अछि, मुदा सुखी गार्हस्थ्यक मूल मंत्र दै मे सफल अछि। पति-पत्नीक मात्र संग रहब नहि, अपितु एकात्मता, दु:ख- सुखक अनुभूति, रुचि- प्रवृत्तिक आदर- मान वैवाहिक संस्थाक आधारशिला होइछ। से जॅं नहि, जीवन बालूक ढेरी पर बान्हल घ'र जकाँ व्यर्थे! माटि कथामे कथाकारक पात्रविशेषक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण प्रभावित करैछ। मोहक ताग कोना विरक्त ओ उद्भ्रान्त मनुक्खोकेँ जीयब सिखा दैत छैक, सकारात्मक बना दैत छैक, तकर जीवन्त उदाहरण थिक ई कथा। जकर टाङ तकर आम कथाक कथ्यवस्तु प्रभावी अछि, उपस्थापन सेहो सहज आ रमणगर, सतत निष्काम कर्मशीलताक संदेश सेहो ग्राह्य, मुदा शीर्षक बहुत प्रासंगिक नहि बुझना गेल। मित्र, बदलैत रूप, अद्भुत, ज़िनगी, पसाही आदि सभ कथा रोचक अछि। ई संग्रह पढ़लाक बाद कहल जा सकैछ जे शिवशंकर श्री निवासजी माँजल कथाकार छथि। गामघरक परिवेशसॅं उठाओल कथा-वस्तु सहजहिॅं पाठककेँ एकाकार कए लैत छैक। प्रस्तुतीकरणक ललित-मनोहर ढंग पाठककेँ बान्हिक' रखबामे पूर्णतः सक्षम अछि। संगहिं कथामे उठाओल गेल समस्या जागरूक मनुक्खकेँ किछु समाधान तकबा लेल प्रेरित करैत छैक, गामघ'रक स्थिति सुधारबाक आह्वान करैत छैक, धार्मिक वैमनस्यक जहरसॅं बचबाक नेहोरा करैत छैक, माता-पिताक सम्मान करबाक सीख दैत छैक, स्त्रीक शिक्षा, स्वतंत्रता आ स्वावलंबनक ध्यान रखबाक ओकालति करैत छैक आ पलायन छाड़ि गामेमे रोजगार सृजित करबाक आवश्यकता पर जोर दैत छैक। एकटा संग्रह, मात्र पच्चीस गोट कथा आ एतेक रास उपलब्धि! गागरमे सागर कहबी चरितार्थ भए रहल अछि एतय। हॅं, 'मनुक्ख नदी थिक' कथामे पौत्रक पत्नी लेल नतिन पुतौहु शब्दक प्रयोग पाठकवर्गकेँ भाषिक भ्रमक स्थितिमे आनि सकैत छैक। 'डेग लैत एकटा ज़िनगी' कथामे मनुष्यताक स्थान पर 'मनुक्ख' शब्दक प्रयोग सेहो कनेक अखरैत छैक(अपन मनुक्खकेँ जिऔने रही)। तथापि संभवतः प्रचलनमे हयबाक कारण प्रयुक्त भेल हयतै। लेखकक कथा-सागरसॅं पच्चीस गोट महत्त्वपूर्ण कथाक चयन कए ओकरा एक ठाम पाठक लेल उपस्थित करबाक महनीय काज करबा लेल श्री उज्ज्वल कुमार झा बधाइक पात्र छथि। महनीय लेखककेँ सप्रणाम अभिनन्दन आ युवा संपादक उज्ज्वलजीकेँ निरन्तर सकारात्मक सृजनशीलताक शुभकामना। इतिशम्। ८.नवीन कुमार झा 'शरद'-मिथिलाक माटि-पानिक कथाकार शिवशंकर श्रीनिवास नवीन कुमार झा ‘शरद’ (9955089655/ (W) 6200015746) मिथिलाक माटि-पानिक कथाकार : शिवशंकर श्रीनिवास मैथिली कथा साहित्यक इतिहासमे एक्कैसम शताब्दीक दोसर दशकक महत्वपूर्ण कथाकार छथि शिवशंकर श्रीनिवास। गामक अस्तित्व, विकास आ प्रतिष्ठाक लेल संघर्षरत, कृषक संस्कृतिमे रमल, बदलैत सामाजिक परिस्थिति ओ जनचेतनामे मुक्तिक छटपटाहटिकेँ स्वर देनिहार शिवशंकर श्रीनिवासजी अपन कथामे मिथिलाक माटि-पानि, आमलोक, विकाससँ दूर अनभुआर होइत गाम तथा मानव ह्रदयक रागात्मक सम्बन्धकेँमनोविश्लेषणात्मकरूपसँ जगजियार करैत, पाठककेँ सहजहिँ आकर्षित ओ प्रभावित करैत छथि। हिनक प्रारम्भिक शिक्षा मध्य विद्यालय, लोहनामे भेलनि। लक्ष्मीश्वर एकेडमी, सरिसब-पाहीसँ 1970 ई. मे मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण भेलाह। लक्ष्मीश्वरसिंह महाविद्यालय, सरिसब-पाहीसँ 1972 मे आई.ए. तथा 1976 ई. मे मैथिली विषयसँ बी.ए. प्रतिष्ठा उत्तीर्ण कएल। ल.ना.मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगासँ 1979ई. मे मैथिलीसँ एम.ए. तथा बी.पी.मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरासँ 1991ई. मे हिन्दी विषयसँ एम.ए. केर परीक्षा उत्तीर्ण कएल। 1993 ई.मे ल.ना.मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगासँ पी.एच.डीक उपाधि प्राप्त कएल। हिनक शोधक विषय छल –‘मैथिली कथामे मिथिलाक सामाजिक जीवनक चित्रण।’शोध निर्देशक छलाह डा. भीमनाथ झा। कर्ममय जीवन -श्रीनिवासजी 1972 ई.मे आई.ए. केर परीक्षाक पश्चात् चारि माह तक रोजगारक खोजमे गुवाहाटीमे छलाह। 1976-77 ई.मे सकरी पब्लिक स्कूलमे सहायक शिक्षकक पद पर कार्य सेहो केलनि । 01 फरवरी 1980 ई. केँ हिनक नियुक्ति उमेश संस्कृत महाविद्यालय, तरौनीमे मैथिलीक व्याख्याताक पद पर भेल। 1999 ई.मे कल्याणी मिथिला संस्कृत महाविद्यालय, दीप, मधुबनीमे मैथिलीक व्याख्याता नियुक्त भेलाह आ ओतहिसँ 31 जुलाई 2018 ई. केँ उपाचार्य सह प्रभारी प्रधानाचार्य पदसँ सेवानिवृत्त भेलाह। मैथिली साहित्यमे रचना -सरिसब-पाही परिसर सदासँ साहित्य आ सांस्कृतिक रूपेँ समृद्ध रहल अछि। किरणजी द्वारा शुरू कएल गेल ‘विद्यापति गोष्ठी’ क प्रसादात मैथिली भाषा-साहित्यक प्रचार-प्रसारक संग-संग एकर विकासक बाट प्रशस्त भेल छल। एहि गोष्ठीक क्रिया-कलाप परिसरक नव-नव साहित्यकार केँ दिशा निर्देशित कए उत्साहित करैत रहल। श्रीनिवासजी अपन एहि परिवेशीय वातावरणसँ प्रभावित भए मैथिली भाषामे लेखन दिस प्रेरित भेलाह। 1972 ई. मे सोमदेव केर संपादकत्वमे प्रकाशित पोथी ‘अग्नि संकलन’ मे हिनक पहिल कविता ‘काँट कटि रहल अछि’ प्रकाशित भेल।कलकत्तासँ बाबू साहेब चौधरी केर संपादकत्व प्रकाशित ‘मैथिली दर्शन’पत्रिकामे हिनक पहिल कथा ‘इजोत’1973 ई. मे प्रकाशित भेल छल। श्रीनिवासजी कथाक अतिरिक्त कविता, गीत आ समालोचना सेहो लिखैत छथि, जे समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित होइत रहल अछि। किरण साहित्य पर सेहो हिनक कार्य उल्लेखनीय अछि। मैथिली साहित्यमे श्रीनिवासजीक पाँच गोट कथा-संग्रह, तीन गोट समालोचनाक पोथी एवं चारि गोट संपादित पोथी प्रकाशित पोथी अछि। मौलिक प्रकाशित पोथीक संक्षिप्त परिचय - (1) त्रिकोण (सहयोगी कथा–संग्रह)– उर्वशी प्रकाशन, पटनासँ 1986 ई. मे प्रकाशित ई पोथी साझी कथा-संग्रह थिक। एहिमे एकहि गाम लोहनाक तीन कथाकार अशोक,शिवशंकर श्रीनिवासक ओ शैलेन्द्र आनंद द्वारा लिखल कुल पन्द्रह गोट कथा प्रकाशित अछि। एहि पोथीमे श्रीनिवासजीक पाँच गोट कथा प्रकाशित अछि – दक्षिणा, अपन बुत्ता, धार आ मनुक्ख, परिस्थिति आ एकटा डेग लैत जिनगी। संग्रहक एहि कथा सभमे मिथिला केर जन-जीवनमे होइत सामाजिक, आर्थिक ओ राजनीतिक परिवर्त्तनक चित्रण कएल गेल अछि। (2) अदहन (कथा–संग्रह)-भाषा प्रकाशन, श्रीराम भवन, पटनासँ1991ई. मे प्रकाशित एहि पोथीमे कुल पन्द्रह गोट कथा संकलित अछि। कथाक शीर्षक अछि- परिवर्त्तन, बताहि, आदंक, इजोत, सीतापुरक सुनैना, अवामबला, नाङट, अपन परार, अपना लेल, बसातमे उड़िआइत लोक, जागल गामक लोक, दृष्टि भेद, बाँट – बखरा, पनिडुब्बी, आ धरती। श्रीनिवासजीक कथा ओ शिल्प पर विचार प्रकट करैत प्रसिद्द साहित्यकार जीवकान्तजी एकर भूमिका मे लिखने छथि –“हिनक कथा सभमे कहबाक जे ढंग अछि, से उत्सुकता जगबैत अछि। एहि दृष्टिएँ ओ बंगलाक कथाकार सभ जकाँ पाठक पर अपन पकड़ बनओने रखबामे सिद्धहस्त छथि...। कमला आ बागमती कछेरक मैथिली ई खूब सुन्नर लिखैत छथि। सामान्य लोकक दैनन्दिन भाषाक किछु अद्भुत शब्द सभ ई जीवनसँ सोझे उठा कए देलनि अछि। एहू तरहें ओ भाषा आ साहित्यकेँ संपन्न कए रहलाह अछि।” श्रीनिवासजी एहि पोथीक कथा सभमे कृषकसँ मजूर बनबाक व्यथा, पाखण्ड चरित्र एवं अवसरवादिताक उदघाटन, स्त्रीगणक दुरवस्था एवं शोषण, पारिवारिक मतभिन्नता, घरक बूढ़-बुढानुसक मानसिक पीड़ा, लोकक बीच आपसमे अविश्वास आदिक सटीक चित्रण कएल अछि। (3) गामक लोक (कथा–संग्रह)– सुशील–स्मृति, लोहना, सरिसब-पाही, मधुबनी द्वारा 2005 ई.मे प्रकाशित एहि पोथीमे कुल सत्रह गोट कथा संकलित अछि।कथाक शीर्षक अछि-सिनुरहार, हरिजीक कृपासँ, चक्का, जमुनिया धार, पिंजराक सुग्गा, पटोर, एक सत, महतोक बहुरिया, अपन घर, गाछ-पात, इछाइन, हेल्पर, लड़ाई, दिशा, फर्क, चिंता, चिडै नहि मनुक्ख थिक। श्रीनिवासजीक कथाक प्रसंग एहि पोथीक भूमिकामे प्रसिद्द कथाकार अशोक लिखैत छथि –“ शिवशंकर अपन कथा सभक माध्यमे सुन्दर जीवनक एक प्रारूप प्रस्तुत केलनि अछि। एहि क्रममे जे किछु कुरूप अछि, व्यक्तित्वक विकासमे बाधक अछि, जीवन लेल अवांछित अछि, तकर निषेधो केलनि अछि। एहन कतेको प्रारूप आर भए सकैत अछि। एहि सभ मादे श्रीनिवासक अपन एक ख़ास दृष्टि छनि, से दृष्टि एकदम स्पष्ट छनि। ओ जनैत छथि जे जीवनमे संघर्ष वैह लोक क’ सकैत अछि जे सुन्दर ओ व्यापक रूपें जीवन जीब’ चाहैत अछि।” श्रीनिवासजी गाममे रहनिहार आम लोकक कथाकार छथि। अपन माटि-पानिसँ हिनका अटूट स्नेह छनि। ‘गामक लोक’ संग्रहक कथा सभमे शोषण मुक्त समाजक कल्पना करैत, ओकर मानवीय पक्षकेँ उद्घाटित करबामे कथाकार पूर्ण सफल भेलाह अछि। (4) गुण-कथा (कथा–संग्रह)- नवारम्भ प्रकाशन, पटनासँ 2014 ई. मे प्रकाशित एहि पोथीमे कुल तेरह गोट कथा संकलित अछि। कथाक शीर्षक अछि- साहुकारी, सहरजमीन, सतभैया, गुण-कथा, रुमाल, दबाई, उग्रह, रसक अर्थ, अनुराग, आयास, पितामही, धार नहि मजरलै, मनुक्ख नदी थिक। एहि पोथीमे संकलित कथा सभमे श्रीनिवासजी स्वार्थ पर आश्रित संबंध, बाजारवाद, वर्ग संघर्ष,पारंपरिक पारिवारिक रूढिवादिता पर प्रहार, दाम्पत्य संबंधक मनोविश्लेषणात्मक चित्रण, एकल परिवारमे वृद्ध जनक उपेक्षा, रोजगारक खोजमे अपन माटि-पानि छोड़बाक विवशता, दाही-जड़तीक प्रभावसँ कराहैत सामान्य जन आदि विषय-वस्तुकेँसहज भाषामे प्रस्तुत केलनि अछि। (5) माटि (कथा संग्रह)-नवारम्भ प्रकाशन,मधुबनीसँ एहि पोथीक प्रकाशन 2021 ई.मे भेल अछि। शिवशंकर श्रीनिवासक ई पाँचम कथा –संग्रह थिक। एहि पोथीमे सोलह गोट कथा संकलित अछि। कथाक शीर्षक अछि – माटि, बदलैत रूप, बेगरता, पसाही, शुभ इच्छा, अखण्ड दीप, जाकर टांग तकर आम, जिनगी, अद्भुत, अंतर, जड़ी, मित्र, पुतोहु –बेटी, निजदेश, पिरीत, संवेदना। एहि संग्रहक कथा सभमे कथाकार शोषित –पीड़ित-वंचित समाजक संघर्षपूर्ण जीवनक चित्रण करैत मानवताक बाट पर डेग बढाओल अछि। कथाकार स्वयं आमलोक छथि आ सदिखन अपन माटि-पानीसँ जुड़ल रहलाह अछि। आमलोकक बुत्ता पर हिनका अटूट विश्वास छनि। अपन अस्तित्व, विकास आ प्रतिष्ठाक लेल संघर्षरत चरित्रक सृजन कए, कथाक माध्यमसँ पाठकक समक्ष प्रस्तुत करबामे श्रीनिवासजी पूर्ण सफल भेलाह अछि। श्रीनिवासजीक कथाक प्रसंग प्रसिद्द कथाकार अशोक अपन आलेख –‘कथाकार शिवशंकर श्रीनिवास’ मे लिखने छथि –“ कथाकारक काज होइत छै जे ओ वास्तविक संसारसँ पृथक अपन मनोरथक अनुकूल एक फराक कथा-संसार रचय। जन-जीवनसँ उठा कए एहन चित्र सभ उपस्थित करए जे एक फूट संसार रचबाक विन्याससँ सुसज्जित हो। ओकर आँखिमे बसल हो। से मनोरथक संसारकेँ श्रीनिवासक कथा – संसारमे देखल जा सकैत अछि।” (6) बदलैत स्वर (समालोचना)-नवारम्भ प्रकाशन, पटनासँ 2011ई. मे प्रकाशित एहि पोथीमे मैथिली कथाक आलोचनात्मक अध्ययन प्रस्तुत कएल गेल अछि।एहिमेश्रीनिवासजी स्वतंत्रतापूर्व, स्वातंत्रोत्तर एवं समकालीन कथा साहित्यक विशद वर्णनक संग-संग मैथिली कथाक समकालीन स्वरकेँ प्रभावी रूपसँ व्यक्त करैत निम्नलिखित कथाकारक समुचित समालोचना प्रस्तुत केलनि अछि–भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’, कांचीनाथ झा ‘किरण’,हरिमोहन झा, मनमोहन झा,धीरेश्वर झा ‘धीरेन्द्र’, रामदेव झा,मायानंद मिश्र, राजकमल चौधरी, प्रभास कुमार चौधरी अओर जीवकान्त। मैथिली साहित्यक अध्येता ओ शोधार्थीक लेल ई पोथी बहुत उपयोगी अछि। (7) मैथिली उपन्यासक आलोचना– शेखर प्रकाशन,पटनासँ एहि पोथीक प्रकाशन 2021 ई.मे भेल अछि। शिवशंकर श्रीनिवास द्वारा एहि पोथीमे डा.कांचीनाथ झा ‘किरण’क अभिमानिनी, प्रो० हरिमोहन झाक ‘कन्यादान’, डा.शैलेन्द्र मोहन झाक ‘प्रतिमा’ ओ ‘मधुश्रावणी’, यात्रीजीक ‘बलचनमा’ ओ ‘नवतुरिया’, ललितक ‘पृथ्वीपुत्र’, डा.धीरेश्वर झा ‘धीरेन्द्र’क ‘भोरुकवा’, ‘कादो आ कोयला’,‘ठुमुकि बहु कमला’, श्रीमती लिली रेक ‘मरीचिका’ तथा दिलीप कुमार झाक ‘दू धाप आगाँ’ उपन्यासक विस्तृत आलोचनाक संग-संग उपन्यासक संरचना ओ शिल्प पर आलेख तथा उपन्यासक आलोचना सम्बन्धी दू गोट पोथी मोहनभारद्वाजक ‘बलचनमा : पृष्भूमि आ प्रस्थान’ तथा अशोकक ‘कथा उपन्यास : उपन्यासक कथा’ पर आलोचनात्मक दृष्टिएँ विशद रूपसँ विवेचन ओ विश्लेषण कएल गेल अछि। (8) विश्लेषण (आलोचनात्मक निबंध संग्रह)– सिद्धिरस्तु प्रकाशन, नई दिल्लीसँ एहि पोथीक प्रकाशन 2022 ई. मे कएल गेल अछि। मैथिली साहित्यक आलोचनासँ सम्बंधित श्रीनिवासजीक ई तेसर पोथी थिक। एहि पोथीमे शिवशंकर श्रीनिवास द्वारा लिखित साहित्यिक विविध विधा आ साहित्यकार पर सत्रह गोट आलोचनात्मक आलेख आओर तीन गोट आत्मीय संस्मरण संकलित अछि। ई आलेख सभ 1989 ई.सँ 2020 ई. क मध्य लिखल गेल अछि आर विभिन्न पत्रिका ओ पोथीक भूमिकाक रूपमे पूर्व प्रकाशित अछि। संपादित पोथीक विवरण-शिवशंकर श्रीनिवास द्वारा संपादित पोथीक विवरण एहि प्रकारेँ अछि – (1) परिचय शतक– चिनगी प्रकाशन, लहेरियासराय, दरभंगासँ ‘परिचय शतक’ केर प्रकाशन 1988 ई. मे भेल अछि। शिवशंकर श्रीनिवास द्वारा संपादित एहि पोथीमे कविचूड़ामणि काशीकांत मिश्र ‘मधुप’ जीक एक सय पद्य संकलित अछि। ज्ञातव्य जे राजदरभंगाक मैनेजर पं. हरिश्चन्द्रक मिश्रक प्रेरणासँ,1941 ई मे दरभंगामे, एक मोदीक दोकान पर,एकहि रातिमे टिमटिमाइत डिबियाक इजोतमे, मधुपजी द्वारा एकर रचना कएल गेल छल। मधुपजीक ‘प्रेरणा पुंज’ कविता संग्रहमे एहि प्रसंगसँ सम्बंधित कविता देखल जा सकैत अछि। ‘परिचय शतक’ केर भूमिकामे पोथीक प्रसंग श्रीनिवासजी लिखने छथि – “कविक परिचय काव्य होइत अछि आ काव्य ओहि काल, युग, समाज ओ परिस्थितिक होइत छै। आ एहि भावकेँ राखि कवि अपन अर्थात् व्यक्तिक रूपमे परिचय नहि लिखि काव्यक जे व्यापकताकस्वरूप ओकर जनित विभिन्न स्थिति जे युगक समाज, तकर परिचय लिखलनि अछि। सैह अछि ई परिचय शतक “ एहि पोथीमे मधुपजी द्वारा तत्कालीन मिथिलाक सामाजिक समस्या यथा –बाल-विवाह, दहेज प्रथा, स्त्री शिक्षाक उपेक्षा, राजदरबारक चाटुकारिता, छूआछूत, जाति प्रथा, तथा विद्यापति, शंकराचार्यकेँ पराजित कएनिहारि भारती आदिक चर्चा एक-एक मुक्तकमे कएल गेल अछि। (2) कथा किरण–भाषा प्रकाशन, पटनासँ एहि पोथीक प्रकाशन 1988 ई.मे भेल अछि। एकर द्वितीय परिवर्धित संस्करण,किरण मैथिली शोध संस्थान, धर्मपुर, दरभंगासँ 2019 ई. मे प्रकाशित भेल अछि। श्रीनिवासजी द्वारा संपादित एकर पहिल संस्करणक पोथीमे कांचीनाथ झा ‘किरण’ द्वारा लिखित पंद्रह गोट कथा संकलित अछि। एहिमे ग्यारह गोट कथा 1937 ई.सँ 1965 ई. क मध्य किरणजी द्वारा लिखल गेल अछि। चारि गोट कथा –चनरा, जाति-पाँजिक जादू, अभिनव उत्तर तथा रूपा 1988 ई. क लिखल अछि। ई चारू कथा श्रीनिवासजी हुनकासँ मौखिक सुनि- सुनि लिपिबद्ध कएने छलाह। 2019 ई. मे प्रकाशित एकर दोसर संस्करणमे किरणजीक अप्रकाशित छओ कथा – पतराक शुभ दिन, प्रभात, अनुभव, खानदानी संस्कार, कस्मै नम:, एक सत्य कथा तथा एक अनुदित कथा – चित्रकार कुल 21 मौलिक ओ एक अनुदित कथा प्रकाशित अछि। दोसर संस्करणक सम्पादकमे शिवशंकर श्रीनिवासक संग-संग डा. सतीरमण झा सेहो छथि। ‘कथा किरण’ किरणजीक एक मात्र कथा – संग्रह थिक। एहि पोथीमे संगृहीत कथा सभमे किरणजी सामाजिक कुसंस्कार, सामंती वर्ग द्वारा दलित-पीड़ितक शोषण, समाजमे अनैतिकता,अत्याचारक गठजोड़, स्त्री-पुरुषक स्नेह आ निश्छल प्रेम, गरीबीक आँचमे जरैत सामान्य जनक प्रति सहानुभूति, जातीय भेद-भाव, समतामूलक समाजक प्रतिष्ठापन, सामान्य वर्गक ह्रदयमे उठैत क्रांतिक हिलोरक चित्रण करैत प्रगतिशीलताक बाट देखाओल अछि। हिनक कथा साहित्यमे सामाजिक चेतना आ विद्रोहक स्वर प्रमुख अछि। (3) कतेक दिन बाद–किरण मैथिली शोध संस्थान, धर्मपुर, दरभंगासँ एहि पोथीक प्रकाशन 1989 ई. मे भेल अछि।शिवशंकर श्रीनिवास द्वारा संपादित एहि पोथीमे काँचीनाथ झा ‘किरण’ द्वारा रचित 38 गोट कविता आ 7 गोट गीत संकलित अछि। एहि संग्रहक कविता सभमे मिथिलाक समसामयिक समस्या, उपेक्षित, उत्पीडित लोकक आर्तनादक प्रति संवेदनाक चित्रण करैत कवि द्वारा आधुनिक मानव मूल्यसँ प्रेरित परम्पराक, संवेदना – चक्षुसँ अवलोकन कएल गेल अछि। ‘‘सभकेँ भेटे वस्त्र भरि देह, सभकेँ भरै अन्नसँ गाल” –भावनासँ अनुप्राणित किरणजी अपन मनोभावना कविताक माध्यमे प्रकट केलनि अछि। (4) मैथिली कथा संचयन– नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्लीसँ एहि पोथीक प्रकाशन 2007 ई.मे भेल अछि। श्रीनिवासजी द्वारा संपादित एहि पोथीमे विभिन्न कथाकारक 38 गोट कथा संकलित अछि। (5) चयनित कथा-सिद्धिरस्तु प्रकाशन, नई दिल्लीसँ 2022 ई. मेश्री उज्जवल कुमार झाक संपादकत्वमे शिवशंकर श्रीनिवास द्वारा लिखित 25 गोट कथाक संकलन ‘चयनित कथा’क नामसँ प्रकाशित भेल अछि। अस्तु, एहि प्रकारेँ श्रीनिवासजीक समग्र कथा पर विचार करैत कहल जा सकैत अछि जे हिनक कथा सभमे युगक धाप पूर्ण रूपसँ सुनल जा सकैछ। गाम-घरक विपन्न जन केर दीनताक संग परम्पराक बान्ह छेकक बन्हनकेँ काटि विकासक बाट धरैत लोक आ समाजक यथार्थ चित्र प्रस्तुत करबामे श्रीनिवासजीपूर्ण सफल भेलाह अछि।श्रीनिवासजीक कथा आर शिल्प पर विचार करैत प्रसिद्द कथाकार विभूति आनंद लिखैत छथि – “ माटिपानिक कथाकार छथि शिवशंकर, गाममे रहैत छथि, अर्थात् माटि पर रहैत विश्वक चिंतनकेँ अपन कथा सभक आधार बनबैत छथि। अलगसँ ई जे ओ कथा –कहन शैलीमे आधुनिक शिल्पक अद्भुत सामंजस्य बैसबैत छथि।”मैथिली कथा साहित्यक क्षेत्रमे हिनक अवदान एक महत्वपूर्ण उपस्थितिक बोध करबैत अछि। वर्त्तमान समयमे शिवशंकर श्रीनिवास अपन गाम लोहनामे घरहि पर रहि माँ मैथिलीक सेवा हेतु साहित्य-सागरमे रचना -पुष्प अर्पित करबामे लीन छथि। संपादकीय टिप्पणी- एहि आलेख केर बहुत रास सूचना परिचय बला खंडमे साभार समाहित कऽ लेल गेल अछि आ दोहरावसँ बचबाक लेल एहि लेखसँ हटा देल गेल अछि। ९.वैद्यनाथ झा-अद्भुत कथाशिल्पी शिवशंकर श्रीनिवास वैद्यनाथ झा (संपर्क-9582221968) अद्भुत कथाशिल्पी शिवशंकर श्रीनिवास हमरा साहित्यक आन-आन विधामेसँ कथा बड़ नीक लगैय। ताहूमे मैथिली कथा। मैथिली कथाक ’टेक्स्चरे’ भिन्न होइत छैक। एक बेर हम एकटा कथा पढ़ैत छलहुँ-’पितामही’। लेखक छलाह शिवशंकर श्रीनिवास। पितामही आ पोतीक समानान्तर केन्द्रीय चरित्र मुदा पोतीक चरित्र बेसी भरिगर छलै। कथानक यैह जे पितामहीक बेटा-पुतहु महानगरीय तनाओक प्रभावे बेटीकेँ माता-पितामे प्रायः परस्पर विवाद होइक। दुनू ओकर दुष्प्रभावसँ बचबऽ लेल बेटीकेँ होस्टलमे देबाक योजना बनेलक। पोतीकेँ दादीसँ बेसी आपकता छलै, दुनूमे परस्पर संवाद रहै। होस्टल जयबा लेल तैयार नहि छल। ओ दादीसँ मदति माँगलक। दादी अपन वीटो पावर लगा ओकर होस्टल जयबाक कार्यक्रम रद्द करबा देलखिन। कथ्य, शैली, संवाद एतेक रोचक छलै जे कथा बहुत नीक लागल। बेर-बेर लेखकक प्रति आकर्षण बढैत गेल। हम हिनक लिखल दू कथा-संग्रह ’गामक लोक’ आ ’गुणकथा’ पढ़लहुँ। हम सम्मोहित भऽ गेलहुँ। कथा लेखक अपन कथामे एकटा समाज, ओकर संस्कृतिकेँ अपन शैली, शिल्प आ भाषिक-संरचनासँ ओकरा पठनीय आ पुनर्पठनीय बना दैत छैक। हम शिवशंकरजीक पाठक-वर्गक विस्तार हेतु हिन्दीमे अनुववाद शुरू कएल। हमरा द्वारा हिन्दीमे अनूदित कथा ’अनुराग’ (जनपथः आरा) ’रूमाल’ (राजस्थान सा0 अका. पत्रिका ’मधुमती’ आ ’मनुक्ख चिड़ै नहि अछि’ (परिकथाः दिल्ली) मे प्रकाशित भेल। ’परिकथा’क सम्पादक शंकर जी हमरा कहलथि जे 'हम लेखकसँ बात करऽ चाहैत छी’ आ ओ फोनसँ गप कयलखिन। ओ शिवशंकरजीसँ प्रभावित छलाह। तकरा बाद हम हिनक 15 गोट कथाक चयन कऽ हिन्दीमे ’जमनिया धार’ शीर्षकसँ अनुवाद कऽ कथा संग्रह प्रकाशित कयल। एहि कथा संग्रहक भूमिका हिन्दीक सम्प्रति शीर्ष साहित्यकार डा. रामदरश मिश्र जी लिखलनि। डा. रामदरश मिश्र आइ 101म बर्खक छथि, सयसँ बेसी पोथी लीखि चुकल छथि, सरस्वती सम्मान, व्यास सम्मान, साहित्य अकादमी पुरस्कार, भारत-भारती आदि पुरस्कारसँ सम्मानित छथि आ स्वयं लमसम 186 कथा लिखि चुकल छथि। एहन शीर्ष पुरूष कथा सभ पढ़ि कहलखिन-’मैथिलीमे भी अच्छी कहानियाँ लिखी जा रही हैं’। हुनक पत्नी ’पितामही’, ’रूमाल’, ’अनुराग’ पढ़लखिन। ओ ई कथा सभ दू बेर पढ़लखिन। उपरोक्त प्रसंगसँ ई जनबाक उत्कण्ठा होइत छैक जे आखिर शिवशंकरजीक कथा सभ एतेक ’अपीलिंग’ किएक होइत छनि? कोन एहन तत्व छै जे पाठककेँ घीचैत छनि। हिनक नव कथासंग्रह ’माटि’ सेहो पढ़लहुँ। हमरा हिनक कथा सभ पढ़लासँ कोनो विशेष वैचारिक प्रतिबद्धता नहि बुझायल। हिनक कथा सभ मानवतावादी छनि। संवेदना, करूणा, मौलिक जीवनमूल्यसँ सिक्त छनि। ओ सभ कथा मनुक्खक कथा छनि आ मनुक्ख लेल लिखल गेल छैक। मनुक्ख-मनुक्खक बीचक कथा छैक। समाजक कथा छैक, लोकक कथा छैक। लोकक मानसिकताक कथा अछि, गामक कथा अछि, टोल, डीहक कथा अछि। मान-सम्मान, गरीबीक कथा अछि, सम्पन्नताक कथा अछि। स्त्रीक कथा अछि-पुरूषक कथा अछि। हिनक कथा सभमे गामक विषमता, दुर्दशा, जातिभेद, पलायन, प्रवासमे मैथिलक संस्कृति, सोच, परम्परा जोगेने रहबाक वर्णन सेहो रहैत छनि, समय संगे दौड़ैत मैथिल सेहो रहैत छनि। हिनक कथा-रचनाक एतेक आयाम किएक? कोना? मधुबनीक एकटा गाम लोहनामे रहैत छथि। गामक एक-एकटा टोंपोग्राफी हिनका लग छनि जे कथा सभमे आयल छनि। व्यक्तित्वमे सहजता आ संवेदना छनि तैं भाषामे सेहो वएह तत्व परिलक्षित होइत छनि। शिवशंकर श्रीनिवासजीक भाषामे शब्द-चयन कुशलतासँ कएल गेल छनि। शब्द, वाक्य किंवा पदबंधमे नीक प्रयोग कएल गेल छनि तँ फकड़ा/कहबी का अन्य गामक प्रचलित बोल सभक समावेश छनि। कथा विधामे ओ विदेशी कथाकार सामरसेट मौबसँ प्रभावित छथि। शिवशंकरजीक कथा सभक एकटा विशेषता आओरो छनि। ओ कथामे कोनो सामाजिक समस्या उठबैत छथि तँ ओकर समाधानो दैत छथि। स्त्री-पात्र-विशेषरूपे निम्न-मध्यम वर्गक, कठिन जीवन-संघर्ष आ ओहिसँ निस्तार सेहो हिनक कएकटा कथामे भेटैत अछि। सुगिया, सलमा, रनिआ एहने पात्र छनि। ’शुभ इच्छा’ कथामे ओ कृषिकर्मक प्रधानता पर जोर दैत छथि। जंगलक कटनाइ वा-खेती-बाड़ीक काजसँ विरत .... मनुष्यता विनाशसँ जोड़ैत छथि। पात्रक माध्यमे कहैत छथि- ’’हौ, हमरा सभक बाप-पित्ती फहथिन जे बाध माने खेती-पथारी निरन्तर पबैय तँ मनुक्खक भाग पर हँसैए। देखह, मनुक्ख जंगल काटिकऽ घर बनौलक, गाम बसौलक, फेर शहर नगर- गेल। ओहि नि मनुक्खकेँ श्राप भेटलै। जहिआ बाध माने खेत-पथार एकदम्मे छोड़ि देत तहिआ ई मनुक्ख जाति समाप्त भऽ जायत।’’ श्रीनिवासजी समाजक प्रति अपन लेखकीय दायित्वक प्रतिए सजग छथि। समाजक परम्परा आ बिध-बेवहार मे कोनो अव्यावहारिक, अतार्कि वा अमानवीय तत्व भेटैत छनि तँ स्पष्ट विरोध करैत छथि। हुनक दृष्टि नब छनि, तर्कपरक छनि। ओ समाजकेँ चेतबैत छथि। गाममे एकटा पारम्परिक दृष्टिकोण छैक जे कुमारि भोजनमे ब्राहम्णक बेटी आमंत्रित कयल जायत। शिवशंकरजीक एहि मामिलामे दृष्टि अलग छनि। ’पिरीत’ कथामे कुमारि खोअयबाक प्रसंगमे गुलाब दाइक भाउज पुछलखिन तँ हुनक सासु ब्राहम्ण कुमारिकेँ कमीक गप उठौलखिन। कनिया कहलकनि ’’रामखेतारी बालीकेँ देखै छियनि। तीनटा नातिन छनि। हिनके नातिन सभकेँ नीत देबनि।’ रामखेतारी बाली ओतहि रहै, वएह टोकि देलकनि-’’की कहलियै, हमर नातिन सभकेँ कुमारि खोआयब? हम कुमारि छी, से नहि बूझल अछि? हमरा अउरीक बच्चा कतौ कुमारि खाइ? कुमारि खाइ के हमहूँ सभ ब्राहम्णों बेटीकेँ तकै छियै।’ नै नै, कोनो कुमारि, सभ एके रंग होइ छै .....’ कनिया ओकरा बुझाबऽ लगथिन।’’ ई भेल क्रांतिकारी - सोच - परम्पराभंजक, जड़ताभंजक सोच। जन्मप्रधान नहि कर्मप्रधान समाजक सपना। हुनक कथा सभक भाषिक-संरचनाक मादे ई कहल जा सकैय जे ओ लिखैत तॅ छथि गद्य मुदा भाषाक स्वरूप उत्तम छनि। गद्योमे ओ काव्यात्मक बिम्ब आ प्रतीक सेहो कएक ठाम कयने छथि। एहि तरहक प्रयोग पाठकक रूचि आओर बढ़बैत छैक। हुनक सम्पूर्ण कथा सभामे ’ठेहकऽ लागल,’ ’नेहाल भऽ जाइथि’ भदबरिया चन्ना भऽ मोन मेघ तर नुका रहलीह’, सौंसे जीवन हरियर-हरियर भऽ गेलनि’, कमलक प्रीतिक ई लाल फूल अहिना सदा फुलायल रहौ सन सन वाक्यसँ कथाक भाषिक सौन्दर्य आओरो करैत छैक। गत 1973 सँ कथा-लेखन प्रारम्भ कयने शिवशंकर जी निरंतर कथा लेखन कऽ रहल छथि। मैथिली-कथा भंडार भरि रहल छथि। समाज सेहो हुनक योगदानकेँ सम्मानिक कऽ रहल छनि। किछु समय पूर्व रांचीक प्रतिष्ठित विश्वम्भर फाउन्डेशन इुनका पुरस्कृत कयलकनि। डा0 शिवशंकर श्रीनिवासजीकेँ शुभकामना। १०.अशोक- शिवशंकर श्रीनिवास आ मैथिली कथालोचन अशोक (संपर्क-8986269001) अशोक जीक लेख हुनकर हाथक लिखल देल जा रहल अछि। मैथिलीमे किछुए लेखक केर लीखब सुलेखक गिनतीमे आबै छै जाहिमे अशोकजी सेहो छथि। भविष्यक पाठक हिनक सुलेखकेँ देखि सकथि तँइ ई बिना टाइप केर दऽ रहल छी (संपादक)। ११.अजित कुमार झा- शिवशंकर श्रीनिवास जीक गामक लोक अजित कुमार झा (संपर्क-9472834926) शिवशंकर श्रीनिवास जीक: गामक लोक विदेहक अहि श्रृंखला हेतु शिव शंकर श्रीनिवास जी केर नाम देखि हमरा लेल प्रसन्न भेनाइ स्वाभाविक छल किएक त' विभिन्न पत्र पत्रिका मे हिनका पढ़बाक सौभाग्य भेटैत रहल अछि। जाहि सूक्ष्म दृष्टि सँ ई कोनो कथा के मूर्तरूप दैत छथि से मात्र हमरे आकृष्ट करैत होएत से संभव नहि। विभिन्न पत्रिका सब मे छिड़िआयल कथा सब केँ एकठाम राखब पाठक वर्ग लेल सहूलियत भेल। समस्त पत्रिका एकठाम उपलब्ध होअए सेहो आमजन हेतु से त' संभव नहि। खैर हिनकर तेसर कथा संग्रह 'गामक लोक' सन् 2005 मे सुशील स्मृति, लोहना द्वारा प्रकाशित भेल छल तकरा पढ़बाक सौभाग्य भेटल आ निस्संदेह सुखद अनुभूति भेल। गाम ओ नगर मे रहनिहार गामक लोक केँ समर्पित अहि मे कुल सत्रहटा कथा समाहित अछि। अहि कथा संग्रह केँ पढ़ैत काल सतत् इएह आभास होइत रहल जे हम अपना नजरि के सामने ओहि दृश्य सब केँ देखि रहल छी। कथा पढ़ि रहल छी से कनिको नहि लागल। एक्कहुटा कथा बनावटी नहि बुझायल। यथार्थक अतेक सजीव चित्रण अतेक सहजता सँ केनाइ कोनो सहज काज नहि। अहि कथा संग्रह केर पहिल कथा अछि 'सिनुरहार' जे पढ़ि मोन द्रवित भ' उठैत अछि। अपना समाज मे अदौ काल सँ विधवाक जे करुण स्थिति छल ताहि सँ त' सबगोटे अवगत छी। समय बदललै आ कहय लेल सोच सेहो बदललै मुदा एखनहु बहुत किछु बदलबाक प्रयोजन अछि। ब्राह्मणक बेटी कल्याणी केँ विधवा वाला जीवन जीबैत देखनाइ ओकर माय बाप लेल कम कष्टकर नहि छल आ तैँ गाम सँ दूर हैदराबाद चलि जाइत छथि आ बेटीक पुनर्विवाह होइत छनि। कल्याणी केँ जीवन मे पुनः खुशी अबैत अछि। अपन बेटाक उपनयन मे रामभद्र झा हैदराबाद सँ सपरिवार गाम अबैत छथि। बेटी जमाय केँ सेहो संग मे आनैत छथि मुदा गाम अयलाक उपरांत अचानक कल्याणीक माँ कमजोर पड़ि जाइत छथि। हुनका मोन मे समाजक भय एवं बेटाक प्रति कोनो अपशकुन केर भाव उपजय लगैत छनि आ अपन बेटी कल्याणी हुनका अलच्छी बुझाय लगैत छनि। अहि कथा मे कल्याणी, ओकर माँ एवं पिता राम भद्र केर मनोदशाक विलक्षण चित्रण भेल अछि। कल्याणी केँ बुझाइत छैक जे स्त्रीगणे स्त्रीगणक शिकार करैत अछि मुदा अंत मे जे घटना घटैत अछि ताहि सँ बुझाइत अछि जे समाज बदलि रहल अछि। दोसर कथा अछि 'हरिजीक कृपा सँ' जाहि मे टुटैत पारिवारिक ताना बाना केर वर्तमान स्वरुपक चित्रण अछि। जिनका अपन पौरुष नहि छनि, हर त' पकड़ि लेलाह अछि मुदा पैर माटि पर नहि रोपि पाबि रहल छथि आ सभ किछु ढ़नमना गेलाक उपरांतो बभनौती सँ बाज नहि आयल पार लगैत छनि ओकरा पर हरिजीक कृपा कोना हेतनि? भाई- भाई मे मतभेदक पराकाष्ठा अहि उलहन सँ स्पष्ट झलकैत अछि- एकटा भाई दिल्ली जाय लगलथिन त' कलक डंटा छोड़ा क' राखि देलथिन आ दोसर भाई जे छथिन से छथिने। तेसर कथा अछि 'चक्का' आ स्वतंत्रता प्राप्तिक उपरांत जमींदारक डेओढ़ी मे कैद शिक्षा व्यवस्था केँ प्रत्येक वर्गक आम आदमी तक पहुँचेनाइ कोनो आसान काज नहि छल आ एहन काज केँ सफलतापूर्वक संपन्न करय वाला व्यक्ति सेहो असाधारणे रहल हेताह। आजादी केँ संग्राम मे भाग लेनिहार किछु लोग त' राजनीति मे आबि अपन समृद्धि लेल मार्ग प्रशस्त करय लगलाह आ किछु लोग प्रगति केर चक्का केँ सोझ राखय हेतु अपन जीवन खपा देलाह आ ओहन व्यक्ति केँ एत्तह बताहक उपाधि देल गेलन। समय केर पहिया सदैव गतिशील रहलैक अछि आ पुन: एकटा समय एलै जाहि मे सरकारक प्रमुखता मे छनि उदारीकरण। एहन मे सरकारी समस्त उपक्रम केँ निजीकरण करबाक प्रयास चलि रहल छैक। शिक्षा आखिर अहि सँ कोना बाँचल रहि सकैत अछि। ओना एखनहु किछु लोग छथि जे प्रगतिक चक्का सोझ राखय लेल बताह बनल छथि। चारिम कथा अछि 'जमुनियाँ धार' आ अहि मे स्त्रीक पीड़ा एवं ओकर मनो दशाक सजीव चित्रण अछि। लेखक केँ पत्नी कहैत छथिन्ह- "अहाँ मौगी नै ने छी त' अहाँ ओकर दुःख की बुझबै।" अपन पाँचम कथा 'पिजराक सुग्गा' मे सेहो नारी जीवनक पीड़ा केर अद्भुत चित्रण केने छथि। नारी जनमहि सँ पराधीन रहैत अछि आ सदैव ओकर एकटा गार्जियन रहैत छैक चाहे ओ पिता होइथ, पति होइथ अथवा पुत्र। बेटी अपना मने कत्तहु नहि आबि जा सकैत अछि। बेटीके सासुर कि नैहर केओ बिदागरिये क' ल' जाइ छै। पिजराक सुग्गा जँका नारी सेहो पिजरे मे कैद रहैत अछि। पटोर, एक सत् आ महतोक बहुरिया अहि तीनू कथा केँ सेहो नारी विमर्शक कथा कहल जा सकैत अछि। बड्ड अद्भुत कथा अछि सब, बेजाय एक्कहुटा नहि आ सब नारीक सामाजिक संवेदना सँ जुड़ल अछि। 'अपन घर' एक अलग तरहक कथा अछि। मास्टर साहेब नाना जंजाल मे पड़ि अपन पत्नी केँ कहियो अपना संगे नहि राखि सकलाह आ जखन रिटायर भ' क' गाम अयलाह तखन हुनक पत्नी अपन बेटी जमाय केर संग रहय लगलाह। मास्टर साहेब अकेले अपन घर मे औनाइत रहैत छथि। बेटा केँ पास जखन जाइत छथि मास्टर साहेब तखन हुनका अपन समधि केँ बात सँ अपन घरक परिधि बुझना जाइत छनि। अगिला कथा 'गाछ पात' मे बुढ़हीक बेटा हुनका अपना संग ल' जाय लेल सपरिवार आयल छथि मुदा अपन पतिक हाथ सँ लगाओल बगानक एक-एकटा गाछ पात मे हुनका अपन संतान नजरि अबैत छन आ बूढ़ा केँ नहि रहने ओहि गाछ पात केँ प्रति ममत्व बढ़ि जाइत छनि। बेटाक संग जयबाक इच्छा नहि होइत छनि आ मोन पड़ैत छनि एकटा फकरा- "बापक राज राज, साँयक राज महाराज आ बेटाक राज मुँहतक्की।" 'इछाइन' कथा कलियुगी सोच पर आधारित अछि। सब मतलब केँ यार आ हिन्दी सिनेमाक एकटा प्रसिद्ध गीत छल- मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं। हलाँकि अहि कथा मे लेखक जाहि उद्देश्य सँ राँची जाइत छथि सेहो गलत अछि। अगर ओ सही अछि त' फेर हिनकर अगिला कथा 'हेल्पर' लिखबाक कोन प्रयोजन। हेल्पर वाला कल्चर त' आब समस्त परीक्षा मे देखल जाइत अछि। संगठित गिरोह चलाओल जा रहल अछि अहि काज लेल। एकरा रोकय लेल उपयुक्त कदम नहि उठाओल जा सकल अछि एखनधरि। तखन पहिने मैट्रिक आ इन्टरक परीक्षा सब मे हेल्पर के जे मेला लगैत छल से निस्संदेह शर्मनाक गप्प छल मुदा आब तेहन स्थिति नहि अछि। मेधावी छात्र जे अपन काबलियत पर नीँक नम्बर सँ उत्तीर्ण होइत छलथि हुनको लोग ओही नजरि सँ देखैत छलन। बदनामी के बात त' पुछु नहि। माता पिता स्वयं हेल्पर बनि अथवा आन ककरो हेल्पर केँ रूप मे पठा अपन बच्चा केँ कुसंस्कारी एवं रीढ़ विहीन बनाबय लेल उताहुल रहैत छलथि। हँ एहन मे मास्टर साहेब त्रिलोकबाबू जखन अपन पत्नी केँ दवाब सँ व्यथित छलाह ठीक तखने हुनकर पुत्र आबि क' अपन माय सँ कहलकनि- माय, हम भुसकौल नै छी जे हमरा संगे केओ हेल्पर जायत। हँ जरुरत पड़ला पर लड़बाक चाही लड़ाइ मुदा कखनो क' रणछोड़ बनय सँ लाभ होइत छैक। कृष्ण जी केँ सेहो रणछोड़ कहल जाइत छनि। परिस्थिति के देखैत लोग केँ निर्णय लेबाक चाही। सबहक भविष्य दाव पर लगा क' लड़नाइ बुद्धिमानी नहि कहल जा सकैत अछि। लड़ाइ अन्तिम उपाय छैक मुदा ओहि सँ कहाँ ककरो समस्याक समाधान भेलैया। राधे पासवान सेहो लड़ाइ ठानि सकैत छल मुदा बच्चा सबहक भविष्य लेल लड़ाइ केँ टालि जीवन मे आगू बढ़ि गेलाह। शिक्षाप्रद कथा अछि 'लड़ाइ'। एक सत्य केँ नुकाबय लेल एक सौ झूठ बाजय पड़ैत छैक आ सत्य सँ पड़ा क' लोग कतह जयताह। सत्य केर सामना त' करहे पड़त। शिक्षा जगत मे व्याप्त भ्रष्टाचार आ ट्रांसफर पोस्टिंग मे पैसा केर खेल कोनो न'ब गप्प नहि। सरयू राय हिम्मत देखौलनि आ इच्छित ट्रांसफर लेल घूस नहि देलाह मुदा न'ब स्थान पर जातिगत समीकरण केँ देखैत झूठ बाजि गेलाह आ फेर लगातार झूठक सहारा लेबय पड़लनि। खैर आब उपयुक्त समय आबि गेल छन अपन झूठ पर सँ पर्दा उठाबय केँ। मोनक भीतर चलैत अन्तर्द्वन्द सँ पार पाबय लेल कोन दिशा मे चलताह तकरे सजीव चित्रण अछि कथा 'दिशा'। 'फर्क' कथा मे एकटा कलाकारक मनः स्थिति केँ चित्रण भेल अछि। साधना केँ बल पर कोनो भी कलाकार अपन क्षेत्र मे एकटा विशिष्ट स्थान बनबैत अछि मुदा जखन ओकर अपन परिवारक लोग ओहि काज केँ हीन भावना सँ देखैत छैक तखन ओहि कलाकार केँ दुःख होइत छैक आ फेर ओहि कला केँ विलुप्त होबय सँ आखिर कोना बचायल जा सकैत अछि? अहि कथा संग्रह केर अगिला कथा अछि 'चिन्ता' मुदा ओहि संबंध मे बाद मे। पहिने अंतिम कथा 'चिड़ै नहि मनुक्ख थिक'। हँ बहुत साल पहिने एकटा नाटक देखने रही 'बुड़िबक बेटा टके काबिल'। ओतेक त' मोन नहि अछि तखन एकटा बात त' सत्य अछि जे अपन गाम समाज मे आइ ओकरे काबिल बुझल जाइत छैक जकरा पास टका छैक। आ जकरा पास टका नहि टकसाल छैक तकरा आगू लोग पमरिया जँका हाँजी-हाँजी करैत रहैया। मुदा एखनो किछु लोग छथि जे अहि सब सँ उन्मुक्त छथि आ अपन जीवन अपना ढ़ंग सँ जीबैत छथि जेना कि अहि कथा मे वामदेव छथि। हुनकर भीतर केर मनुक्ख एखनो जीवित छनि। नीँक कथा अछि। आब पुनः वापस चलैत छी हिनकर कथा 'चिन्ता' मे। मेहीं कामति चिन्तित छथि आ निस्संदेह इ अपना सबहक लेल चिन्ताक विषय अछि। अपन खेती मजूरी छोड़ि गाम घर सँ दूर कोनो आन राज्य मे पलायन एक गंभीर समस्या अछि। पलायन थमबाक नाम नहि ल' रहल अछि। पर्यावरण केँ ल' क' मात्र मेहीं कामति केँ चिन्ता कयला सँ हेतैक? अहि केँ लेल त' सबकेँ आगू आबय पड़तैक। पानी सेहो पीबय वाला इ कोनो छोट छिन चिन्ताक विषय नहि अछि। अहि कथा सँ सबहक आँखि खोलबाक प्रयास भेल अछि। सपने मे सही मेहीं कामति अपन गाम खोजि रहल छथि जे कि हुनका भेटि नहि रहल छनि आ ओ डेरा जाइत छथि। खैर जागैत छथि त' शांति भेटैत छनि। उम्मीद छनि जे हुनकर बेटा आ अन्य नवयुवक सब सेहो एक दिन घर अवश्य घुरत आ अपनो सबहक ओहिठाम खुशहाली हेतैक। शिवशंकर श्रीनिवास जी केर ई कथा संग्रह अनुपम अछि। निरन्तर लिखैत छथि आ पढ़बाक सौभाग्य भेटैत अछि। हिनकर कथा सब मे सूक्ष्म सँ सूक्ष्म तथ्य केँ मनोवैज्ञानिक विश्लेषण हिनका विशिष्ट बनबैत छनि। हमरा अपन एकटा घटना मोन पड़ि गेल हिनकर कथा 'चिन्ता' पढ़ि क'। अपन नौकरी केर क्रम मे आठ साल हम मुजफ्फरपुर सँ समस्तीपुर ट्रेन सँ डेली पसेंजरी कयलहुँ। बहुत तरहक लोग नित्य भेटैत रहलाह आ नहि जानि कतेको विषय पर विमर्श होइत रहल। एक दिन अहिना गाम घरक चर्च शुरु भ' गेल। सब अपन अपन मंतव्य व्यक्त क' रहल छलाह। हमर बगल मे एक बुजुर्ग बैसल छलथि जे कि पूसा एग्रीकल्चर मे कृषि वैज्ञानिक पद सँ सेवा निवृत्त छलाह बाजि उठलाह - 'अहा गामक बात किछु आओर छैक। गाम मे जे मजा छैक से अन्य कत्तहु कहाँ?' हँ बात त' ठीके कहलनि मुदा हमरा मुँह सँ अनायास निकलि गेल - सर बुरा नहि मानी त' एकटा प्रश्न पुछु? गाम मे कि आब गाम बाँचल अछि? गामक गाम वीरान नजर अबैत अछि। एकर शहरीकरण बड्ड तेजी सँ भ' रहल अछि से मात्र इन्फ्रास्ट्रक्चरे मे नहि, हमर सबहक सोच मे सेहो। किछु देर मौन रहि ओ कहलनि- हँ से सत्ते। शिवशंकर श्रीनिवास जी अहिना धुरझार लिखैत रहथि इएह शुभकामना अछि। १२.देवशंकर नवीन-उठ जाग मोसाफिर भोर भयो (निसभेर नीनमे सूतल समाज'क पहरू कथाकार) देवशंकर नवीन (संपर्क-9868110994)

उठ जाग मोसाफिर भोर भयो (निसभेर नीनमे सूतल समाज’क पहरू कथाकार)

शिवशंकर श्रीनिवासक समस्त कथाक अवगाहन जँ मिथिलाक अर्द्धांशो नागरिक केने रहतथि, त’ आइ धरि मिथिलासँ श्रम आ प्रतिभाक पलायन बन्द भ’ गेल रहितए। समस्त मैथिल समाज स्वार्थपरतासँ बहरा कए सामुदायिक हितमे लीन भ’ गेल रहितथि। ‘कृषि-कर्म’ आ पशुपालन-वृत्ति सन सामुदायिक उद्यमकें मैथिल-जन, सम्मानित दृष्टिएँ देखए लागल रहितथि। भविष्यक प्रति निराशा आ नकारात्मकता मैथिल नौजवान’क चिन्तनसँ मेटा गेल रहितए। उन्नत आत्म-बल’क स्वामी नौजवानसँ भरल मिथिला सरिपहुँ शस्य-श्यामला बनि लहलहाइत रहितए। मातृभाषा मैथिली तथा मिथिलाक संस्कृतिक नाम पर मैथिल लोकनि जतए-ततए उटपटांग आचरण नइँ करितथि।...मुदा से नइँ भेल, नइँ होइ’ए। मैथिल लोकनिकें मातृभाषाक प्रति तेहनो कोनो अनुराग नइँ छनि, जै लेल ओ मैथिल भाषाक साहित्य पढ़थि। हुनकर अध्यवसायक सूचीमे मातृभाषाक साहित्य नइँ अछि। मातृभाषाक माध्यमे मैथिल लोकनि आइयो धरि अपन पहिचान सुनिश्चित नइँ क’ सकलाह अछि।

विदित अछि जे बिहारक[1] अड़तीस गोट जिलामेसँ उत्तरी भागक उनैस[2] गोट जिलाक आबादी[3] मैथिलीभाषीक क्षेत्र थिक। किछु भूगोलशास्त्री पश्चिमी चम्पारण (बेतिया)कें सेहो मैथिलीभाषी क्षेत्र मानै छथि। तदनुसार बेतियाक[4] जनसंख्या जोड़ला पर मैथिलीभाषीक संख्या-बल[5] पाँच करोड़सँ बेसी होइत अछि। दुनिया भरिक 223 देशमेसँ 104 देशक संख्या-बल अइसँ कम अछि।        

भारतक छत्तीस गोट राज्य आ केन्द्र शासित राज्यमेसँ मात्र दसे टा राज्यक जनसंख्या मैथिलीभाषीक संख्या-बलसँ बेसी अछि। एन.सी.आर. दिल्लीक संख्याक तीन गुणासँ बेसी। तथापि मैथिलीक पचासो टा स्तरीय पोथीक अवगाहन मैथिल-जन अनुरागसँ नइँ करै छथि। ई बात हुनकर भाषा-बोध’क परांग्मुखताक द्योतक थिक। किनकहु ई उलहन मान्य नइँ हएत जे मैथिलीक पोथीमे हुनका ओ सुख नइँ भेटै छनि, जे आन भाषामे भेटै छनि। कारण मैथिलीक जमापूजी छ’ गोट चर्चित प्रकाशक द्वारा प्रतिवर्ष प्रकाशित लगभग दू-अढ़ाइ सए पोथीमेसँ पचासक लगाइत पोथी एहेन अवश्य होइत अछि, जकरा पढ़लासँ निकेनाँ पाठकक चित्त-विरेचन भ’ सकैत अछि।

आनहु भाषा-साहित्यक सम्मान अवश्य हएबाक चाही; मुदा से मातृभाषाक गरिमा-बोधक संगहि। भाषा, केवल सम्प्रेषणक साधने टा नइँ होइत अछि। ओ, मनुष्यक राष्ट्रीयताक पहिचान आ मनुष्यक सोच-विचार’क आधार सेहो होइत अछि। मनुष्य जे किछु सोचैत अछि, कोनो ने कोनो भाषामे सोचैत अछि। अइ सोच-विचार’क काज ओ जै भाषामे करैत अछि, सएह ओकर प्रथम भाषा होइत अछि।

विदित अछि जे भारतक समग्र राष्ट्रीयता कोनो एसगरुआ राष्ट्रीयता नइँ थिक; ई प्रान्तीय स्तरक भिन्न-भिन्न भाषिक-सांस्कृतिक राष्ट्रीयताक समन्वयनसँ समृद्ध भेल अछि। भौगोलिक भिन्नता आ विस्तारक कारणें एतए ई भिन्नता अवश्यम्भाविए छल; मुदा अनेकताक अछैत एकताक विलक्षण राष्ट्रीय पहचान अइ देशक विशेषता थिक। अइ देशमे 1652 मातृभाषाक प्रचलन अछि, मुदा भारतीय संविधान द्वारा एखन धरि मात्र बाइसे टा भाषाकें राजभाषाक मान्यता देल गेल अछि। मैथिली ओही बाइस भाषामेसँ एक थिक। मैथिलीकें राजभाषाक मान्यता तँ भेटलै सन् 2003हिमे, मुदा आइयो धरि मैथिल-जन अपन मातृभाषाक महत्त्व बूझि नइँ सकलाह अछि। हुनका लोकनि लेल भाषा एखनहुँ उपयोगी साधन थिक। किछु उद्योगी लोकनि लेल तँ आत्म-स्थापन, राजनीतिक हितसाधन आ धनार्जनक उपस्कर थिक। मिथिलांचलक बजार-व्यवस्थाक भाषा तँ मैथिली नहिएँ अछि, साधन-सम्पन्न अधिकांश मैथिल परिवारक पारिवारिक भाषा सेहो आब मैथिली नइँ रहि गेल अछि।

जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन (सन् 1851-1941)[6] बिहारक तीन टा भाषाई राष्ट्रीयता--मैथिली, मगही आ भोजपुरी मानलनि। जाहिमे ओ भोजपुरीभाषीकें उद्यमी, मुदा मैथिलीभाषीकें डरपोक एवं गृह-व्यसनी मानलनि। भोजपुरीभाषी सरिपहुँ स्वभावसँ उद्यमी होइ छथि। धनार्जन लेल ओ परदेश की, विदेश (मॉरीशस आदि) धरि जाइत रहलाह अछि; मुदा मैथिल-जन अपन निवास छोड़ि कहिओ मोरंग, वाराहक्षेत्र, ढाका, कलकत्ता, कामरूप-कामख्यासँ आगू भरिसके टसकलाह। अइ समस्त परदेशी वातावरणमे मैथिल लोकनिकें कहिओ भाषा सम्बन्धी असुविधा नहिएँ जकाँ भेलनि। अइ ठाम’क भाषा-विधानमे हुनका लोकनिकें कोनो ने कोनो रूपें मैथिलीक ध्वनिबोध होइत रहलनि। मातृभाषाक निकटतर भाषाभाषी क्षेत्रमे रहिकए हिनका लोकनिकें कहिओ मातृभाषा सम्बन्धी असुविधा नइँ भेलनि। परिणामस्वरूप मातृभाषाक महत्त्व लेल चिन्तित नइँ हएबहिनका लोकनिक सहजे आचरण छल।

शिवशंकर श्रीनिवास एहने उदासीन लोक’क मातृभाषाक विशिष्ट कथाकार छथि। हिनकर गनती मैथिली साहित्यक ओहेन गनल-गूथल कथाकारमे होइ छनि, जे सदैव निष्कलुष नागरिककें आधुनिकताक बिहाड़िमे उधिअएबाक जोखिमसँ सावधान करैत रहलाह अछि। सातत्यमूलक गुणकारी परम्परासँ विमुख हएबाक अनिष्टकारी परिणामक चेतौनी दैत रहलाह अछि। सामुदायिक चेतनाकें उन्नत करैत, जन-जनमे मनुष्यताक गुणसूत्र तकबा लेल प्रवृत्त रहलाह अछि। साहित्य-सृजनकें ओ कहियो आत्म-स्थापन अथवा आत्म-प्रचारक माध्यम नइँ बनौलनि। मैथिलीक सुबुद्ध पाठककें एहेन खिसक्कड़ कथाकारक सहयात्री हएबाक गुमान छनि।...

कथा त’ बहुत गोटए लिखै’ए, मुदा खिसक्कड़ स’ब नइँ होइ’ए। शिवशंकर श्रीनिवास खिसक्कड़ छथि। दर्शन-शास्त्रो प्रसंग ओ खिस्सा जकाँ सुना देताह अथवा लिख देताह।...हुनकर कथा-कौशल सदैव वाचिक आचरणसँ निर्देशित रहैत छनि। तें प्रायः घटनाविहीन प्रसंगहु पर लिखल हुनकर कथा मनोरम आ उद्बोधक होइत छनि। उदाहरणक खगता हो, त’ हुनकर अनेक कथामे सँ ‘अपन बुत्ता’, ‘पिजराक सुग्गा’, ‘चिन्ता’ सन-सन किछु कथा पर नजरि देल जा सकैत अछि। भारतीय समाजमे खिस्सा ओहुना वाचिक परम्पराक वस्तु शुरुअहिसँ रहल अछि। मिथिलांचलमे तँ विशेष रूपें!

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शिवशंकर श्रीनिवास, बीसम शताब्दीक आठम दशकमे ठाढ़ भेल मैथिली कथाकारक झमटगर पीढ़ीक विशिष्ट रचनाकार छथि। अइ पीढ़ी सोझाँ दायित्वक विकराल ढेरी लागल छल। समकालीन सामुदायिक जीवनक क्रूर यथार्थ आ राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय पराभवसँ परांग्मुख मैथिली साहित्यक जबदाह रचावकें किरण-यात्री आ ललित-राजकमल-मायानन्द’क पीढ़ी जतबा गतिशील बनौलनि; गुंजन-प्रभास-जीवकान्तक पीढ़ी तकर त्वराकें आओर पुष्ट केलनि। आठम दशक’क कथाकारक सोझाँ एक दिश अइ पूर्ववर्ती ध्वजवाहक’क ऊँच कृतिकर्मकें आओर ऊँच करबाक कर्तव्यबोध छलनि; त’ दोसर दिश समकाल’क चुनौतीसँ जनसामान्यकें चेतौनी देबाक दायित्वबोध; तेसर दिश परवर्ती पीढ़ी लेल बाट फरीछ करबाक आ दायित्व ठाढ़ करबाक ऋणबोध। अइ लेल देश-दुनियाक साहित्यिक-सांस्कृतिक हवा-पानि, आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक हलचल आ समकालीनताक बोध अनिवार्य छल; तें अइ पीढ़ीक अधिकांश कथाकार अपन क्षेत्रीय अस्मिता आ भाषिक अनुराग’क संग-संग देश-दुनियाँक गति-अधोगतिक प्रति खूबे सजग रहै छलाह।

ई पीढ़ी अध्यवसाय आ चिन्तन-मनन द्वारा विभाजनक त्रासदी (सन् 1947), भारत-चीन राजनयिक सम्बन्ध (सन् 1950), पारस्परिक सम्प्रभुसत्ता आ प्रादेशिक अखण्डताक सम्मानार्थ चीन-भारत सम्बन्ध (सन् 1954), भारत पर धोखेबाज चीनक आक्रमण (सन् 1962), जवाहरलाल नेहरूक मोहभंग आ मृत्यु (सन् 1964), भारत-पाकिस्तान सीमा-संघर्ष (सन् 1965), लाल बहादुर शास्त्रीक रहस्यमय निधन (सन् 1966), भारत-पाकिस्तानक ताशकन्द समझौता (सन् 1966), थोड़बे दिन बाद पुनः भारत-पाकिस्तान युद्ध (सन् 1971), अकालमे दाना-दानाकें तरसैत लोक (सन् 1957, 1966), नक्सलबाड़ी आन्दोलन (सन् 1967)क मर्म-भेद जानि चुकल छल। आपातकाल (सन् 1974), चुनाव-पर्वमे निरंकुश काँग्रेसी सत्ताक पराभव (सन् 1977), मध्यावधि चुनाव (सन् 1980); राजनीतिक अपराधीकरण आ अपराधक राजनीतिकरण, इन्दिरा गाँधीक हत्या (सन् 1984); बेहिसाब बाढ़िक प्रकोपसँ मजदूर-किसान’क दुर्दशा; अफसरी क्रूरता आ अकर्मण्यता; लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलमक आत्मघाती हमलावर द्वारा चुनाव अभियानमे श्रीपेरम्बदूर (तमिलनाडु)मे राजीव गाँधीक हत्या (सन् 1991); ओही बर्ख घनघोर आर्थिक संकटसँ जूझैत भारत देशकें उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण (एल.पी.जी)क नीति द्वारा उबारबाक प्रयासमे प्रमुख सुधारवादी अर्थशास्त्री आ वित्त-मन्त्राी मनमोहन सिंहक सुबुद्ध उद्यम; बाबरी-मस्जिदक ध्वंस (सन् 1992), दीर्घकाल धरि सामाजिक-राजनीतिक विवाद आ राजनीतिक रैलीक हिंसक आचरण; भारत-पाकिस्तान शिमला समझौता (सन् 1972)क अछैत कारगिल युद्ध (सन् 1999); सुविधापरक राजनीतिक अभिक्रिया दिश साहित्यिक सामन्तक लोलुपता, छोटभैया चमचा लोकनिक चालबाजी...अइ समस्त स्थितिकें ई पीढ़ी ग’रसँ देखैत-भोगैत आबि रहल छल। पूर्ववर्ती पीढ़ीक त्वराकें देखैत ई पीढ़ी स्वयं अपन दायित्व अइ सगरो दिशामे बढ़ा नेने छल। कारण, पर्याप्त सजगताक अछैत, पूर्ववर्ती पीढ़ीसँ किछु-किछु बिन्दु छूटि गेल छल। पूर्ववर्ती पीढ़ी अपन भाषिक गौरव आ साहित्यिक विरासतकें अप्पन पूर्ववर्तीक जड़तासँ मुक्त करेबामे ततेक ने संघर्ष केलनि, जे किछु बिन्दुक छूटि जाएब सहजे छल।

आठम दशक’क शुरुआतहिसँ विश्वविद्यालयीय शिक्षाक अध्यापकीय मानस अपन अज्ञान-दुर्गकें बन्द क’ चुकल छल; मिथिलाक युवा अध्येता कोनो तरहें मातृभाषा आ मैथिली-साहित्यमे अपन भविष्य नइँ ताकि पाबि रहल छल। से तकबाक दृष्टि अध्यापक लोकनि न’ब तूरमे नइँ भरि पबै छलखिन। कृषि-कर्मक निस्सहाय स्थिति आ रोजगारविहीन अराजक शैक्षिक वातावरणसँ ग्रामीण श्रमिक आ शिक्षित नौजवानमे निरर्थकताबोध भरि गेल छल। फलस्वरूप शहरोन्मुख पलायन बेहिसाब बढ़ि गेल। एकरा संगहि अनेक अनुषंगी विकृति समाजमे पसरए लागल। श्रम-मूल्य, सम्बन्ध-मूल्य, नीति-मूल्यक पराभव एना होअए लागल जे आर्थिकताक अलावा स’ब किछु निर्मूल्य भ’ गेल। संवेदनाहीन समाजक न’ब संस्कृति भकरार भ’ गेल। मूल्यविहीन बजारक वातावरणसँ समाज-व्यवहार चल’ लागल। एहेन दारुण स्थितिक चित्र अपन रचनामे निरूपित करैत, समाजकें चेतन आ परवर्ती पीढ़ीकें दिशा-संकेत देबाक दायित्व सेहो अइ पीढ़ीक कान्ह पर बैसल रहल। शिवशंकर श्रीनिवास अही पीढ़ीक सम्मानित, व्यवस्थित, नैष्ठिक, प्रतिबद्ध आ जिम्मेदार रचनाकार छथि।

मैथिली कथा-सृजनमे हुनकर सबल पदार्पण अही पीढ़ीमे भेल। आइ मैथिली कथाकारक अइ झमटगर पीढ़ीमे हुनकर नाम आदरसँ लेल जाइत अछि, त’ तकर कारण हुनकर एकनिष्ठ प्रतिबद्ध सृजन-दृष्टिए थिक, जे अपन लेखन आ आचरण--दुन्नूमे विज्ञान-प्रौद्योगिकी आ आधुनिकताक सम्मान केलनि, मुदा आधुनिकताक प्रति अमंगलकारी सम्मोहनक कहियो सराहना नइँ केलनि। मंगलमय मनुष्यता लेल उपादेय परम्पराक प्रशंसा केलनि, मुदा रूढ़िग्रस्त परम्पराक तिरस्कार अपन कर्तव्य बुझलनि।

हुनकर लेखनारम्भ त’ भेलनि सन् 1966क लगाति, मुदा हुनकर पहिल प्रकाशित कथा थिक ‘इजोत’, जे सन् 1973मे ‘मैथिली दर्शन’ पत्रिकामे प्रकाशित भेल। एखन धरि हुनकर लिखल कथाक संख्या लगभग एक सय अछि, जाहिमे कतोक कथा अद्यावधि असंकलित आ अप्रकाशितो अछि।

‘त्रिकोण’ शीर्षकसँ प्रकाशित (सन् 1986) एकटा सहयोगी संकलनमे हुनकर पाँच गोट कथा प्रकाशित भेल। अइ संकलनक त्रयी कथाकार छथि--अशोक, शिवशंकर श्रीनिवास आ आ शैलेन्द्र आनन्द। उर्वशी प्रकाशन, पटनासँ प्रकाशित अइ तीनू कथाकारक पाँच-पाँच गोट कथाक संकलन ‘त्रिकोण’कें पाठक समुदायक पर्याप्त सम्मान भेटलैक। अइ संकलनक बाद ‘अदहन’ शीर्षकसँ भाखा प्रकाशन, पटनासँ हुनकर पन्द्रह गोट मैथिली कथाक संकलन प्रकाशित (सन् 1991) भेल। सुशील स्मृति प्रकाशन, लोहनासँ हुनकर सतरह गोट कथाक संकलन ‘गामक लोक’ शीर्षकसँ प्रकाशित (सन् 2005) भेल। हुनकर तेरह गोट कथाक संकलन नवारम्भ प्रकाशन, पटनासँ ‘गुण-कथा’ शीर्षकसँ प्रकाशित (सन् 2014) भेल। नवारम्भ प्रकाशन, पटना/मधुबनीसँ हुनकर सोलह गोट कथाक संकलन ‘माटि’ शीर्षकसँ प्रकाशित (सन् 2021) भेल। एकर अलावा हुनकर आलोचनात्मक निबन्धक संग्रह ‘बदलैत स्वर’ (सन् 2008), आलोचनात्मक पोथी ‘मैथिली उपन्यासक आलोचना’ (सन 2021), आ आलोचनात्मक निबन्धक संग्रह ‘विश्लेषण’ (सन् 2022) सेहो प्रकाशित भेल।

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सन् 1973मे जखन शिवशंकर श्रीनिवास अपन कथा-लेखन शुरुह केलनि, ओहि समय धरि भारतीय स्वाधीनताक रजत जयन्ती मनाओल जा चुकल छल। छब्बीस वर्षीय स्वाधीन भारतक परिवेशमे जीवन-यापन करैत जनसमुदायकें एहेन किछुओ टा नइँ देखा रहल छलनि, जै लेल ओ अपन स्वाधीनता पर गर्व करितथि। लोकतन्त्राी सरकारसँ शासित देश आ सामन्ती समाज-व्यवस्थाक चाँगुरमे कछमछाइत जनसामान्यकें जेहन स्वाधीनता देखाइ छलै, तेहेन कोनो अर्थ ओहि काल धरिक कोनहु कोशमे नइँ भेटै छलै। शासकीय शिकंजा, धार्मिक पाखण्ड, सामाजिक दबाव, आर्थिक जर्जरता, चिकित्सकीय अराजकता, शैक्षिक पराभव, राजनीतिक उत्पीड़न, साम्प्रदायिक द्वेष, जातीय भेद-भाव, पदक्रमेणक वर्चस्व, भूखक ताण्डव आ क्रूर शोषणक आबामे समस्त नागरिक पटपटा रहल छल। पूर्ववर्ती रचनाकार लोकनि भारतीय परिदृश्य आ मैथिल समाजक चिन्ताकें अपना ढंगें रेखांकित क’ चुकल छलाह। भारतीय राजनीतिक परिदृश्यमे किछु महत्त्वपूर्ण घटनावली जाहि तरहक स्थिति समाजमे उत्पन्न केने छल, तकर क्रूर चित्र पूर्ववर्ती कथा साहित्यमे आबि चुकल छल। काँचीनाथ झा किरणसँ पूर्वक कथाधारासँ प्रेरणा लेबाक कोनहु टा खगता अइ पीढ़ीक ऊर्जस्वित कथाकार लोकनिकें नइँ भेलनि। हँ, किरण-राजकमल-गुंजन-प्रभासक सृजन-सरोकार निश्चये अइ पीढ़ी लेल उपादेय भेलनि। अनुकरण लेल नइँ, प्रेरणा लेल; स्थानीय प्रसंगक विडम्बना, सामुदायिक जीवनक जटिलता राष्ट्रीय समस्याक प्रति ओइ पीढ़ीक चिन्ताकें आगू बढ़ेबा लेल। अइ पीढ़ीक कथाकार लोकनि अपन अभिगृहीत दायित्वकें निरन्तर विस्तार दैत रहलाह। अइसँ मैथिली कथा-धाराक भावी दिशा सेहो प्रशस्त भेल।

नवम दशकमे सक्रिय भेल किछु आओर कथाकारक योगदानसँ आठम दशकमे निर्मित शिवशंकर श्रीनिवासक ई पीढ़ी आ मैथिली कथा-धारा पुष्ट भेल। मुदा शिवशंकर श्रीनिवासक कथा-कौशल तँ फुट्टे अपन सुपुष्ट सृजन-दृष्टिक परिचय दैत रहल। लगभग साढ़े पाँच दशकक एकनिष्ठ कथा-साधनाक बाद, आइ आलोचक लोकनिकें हुनकर कथा-प्रविधि पर गम्भीरतासँ विचार करबाक प्रयोजन भेलनि अछि, त’ तकर मूल कारण हुनकर कथा-दृष्टिए थिक।

कुटिल-बुद्धि समालोचक आ मनोरंजन-प्रेमी पाठककें हुनकर कथामे एहेन किछुओ टा नइँ भेटतनि, जाहिसँ ओ अपन मनोरंजक भाव आ भावुकताकें सोहरौताह अथवा मनोविकारक शमन करताह। तकर कारण ई नइँ, जे कथाकार शिवशंकर श्रीनिवासकें अपन सामान्य पाठक’क चिन्ता नइँ रहै छनि; खूबे रहै छनि। मुदा हुनकर कथा-लेखन’क उद्देश्य आत्म-विलास अथवा तात्कालिकता नइँ होइ छनि। शाश्वत मूल्य मात्रक कथा लिखब ओ अपन कर्तव्य मानै छथि। गाममे रहै छथि, ग्राम्य वातावरणमे नागरिक-जीवनक स’ख-मनोरथ, सुख-सुविधा, दुख-दुविधाकें ग’रसँ देखैत रहलाह अछि। जीवन-संघर्षक दुख-दुविधासँ उबरबा लेल विवेकी नागरिक’क नैतिक उद्यम आ स’ख-मनोरथक पूर्ति लेल नागरिक जघन्यताक एक सँ एक उपक्रमक प्रत्यक्षदर्शी रहल छथि। ग्राम्य वातावरणमे अस्तित्व-रक्षा आ अस्मिता-निर्माणक जैविक क्रिया एतेक जटिल होइ छै, जे वार्तिक रचैमे बड़का-बड़का भाष्यकार आ दार्शनिक दिग्भ्रान्त भ’ जेताह। मोहनदास करमचन्द गाँधी कोनो समयमे जाहि गाममे देशक आत्माक निवासक गप करै छलाह; गाम आब से नइँ रहि गेल अछि। शहरुआ वातावरण’क समस्त कुटिलता कनेक बेसिए घनत्वक संग आब गाममे क्रियाशील रहैत अछि। जे किओ ग्राम्य समाज’क गहन ज्ञान रखै छथि, से ई बात निकेनाँ जनैत हेताह। मुदा शिवशंकर श्रीनिवासकें तकरा बूझैमे कहिओ कोनो भ्रम नइँ भेलनि। कारण ओ अइ समग्र क्रियाक अनुशीलन आ अभिग्रहण, कोनो पूर्व आचार्यक प्रतिपादित सिद्धान्तसँ नइँ केलनि। क्रियाक पूर्णतामे सहायक समस्त कारक’क लिप्सा आ विवशताकें सूक्ष्मतासँ विश्लेषित केलनि।

भाषा-विश्लेषक नीक जकाँ तय करताह जे मैथिली भाषाक क्रियापद’क बहुस्तरीयताक मूल कारण वस्तुतः मैथिल-जन’क जीवन-व्यवहारक बहुस्तरीयता थिक; जतए मनुष्य सोचै-ए किछु, बजै’ए किछु, करै’ए किछु। किछु अपवादक क्षण छोड़ि, बेसी काल मैथिल’क निर्णय स्वार्थहिमे ओझराएल रहै छनि। माइ, मातृभूमि आ मातृभाषाकें विद्वत्समाज समान महत्त्व दैत रहलाह अछि; मुदा मैथिल परिवेशमे त’ आब माइओक प्रति प्रदर्शित अनुराग कोनो नाटकीय आचरणक हिस्सा भ’ गेल अछि! स्वभावतः मातृभूमि आ मातृभाषाक प्रति कोनो सघन अनुराग मैथिल परिवेशमे नइँ अछि। रहितए, त’ पाँच करोड़हुसँ बेसीक संख्या-बल’क भूखण्डमे भाषिक चेतनाक अलोपित हएब नइँ देखबितए। अपन सांस्कृतिक मूल्यक विपर्यय’क प्रति न्यूनांशो मैथिलकें कोनो चिन्ता नइँ छनि। अराजक अत्याधुनिकताक अन्धानुकरणमे हुनका भने अपन पतन नइँ देखाउन, संस्कृतिक मूल्य-रक्षामे हुनका रूढ़ि अनेरे देखा जाइ छनि।

जें कि शिवशंकर श्रीनिवासक कथा-लेखन समाज-परिस्करण आ नागरिक-चेतना निर्माणक अतिरिक्त दायित्वसँ संचालित होइ छनि; हुनकर कथाक रचाव अइ बहुस्तरीय मिजाजसँ विरत नइँ भ’ पबै छनि। ओ ने तँ दर्शन-शास्त्री छथि, ने मनोविज्ञानी; मुदा शोध-प्रविधिक व्यवहार कहै’ए जे जीवन-संचालनक जटिलता सोझरएबाक उद्योगमे अपन मेधाक बलें स’ब किओ, दर्शन आ मनोविज्ञान पढ़नहि बिना थोड़े-थोड़े दार्शनिक आ मनोविज्ञानी भ’ जाइ’ए। मिथिला त’ ओहुना दर्शन आ मनोविज्ञानक केन्द्र प्रारम्भिक कालहिसँ रहल अछि। प्रमाणस्वरूप--‘सिनुरहार’, ‘चिन्ता’, ‘गाछ-पात’, ‘पिजराक सुग्गा’...आदि किछु कथामे चरित-निरूपण’क हुनकर कौशल देखल जा सकैत अछि। ‘सिनुरहार’ कथामे एसगरे कल्याणीक माइक दुविधा अथवा ‘चिन्ता’ कथामे मेंहीक दुविधा अथवा ‘गाछ-पात’ कथामे बुरहीक दुविधा देखि स्पष्ट होइत अछि जे जीवनक यथार्थ आ सिद्धान्तक यथार्थमे कतेक भेद होइत अछि। तें विहंगम दृष्टिएँ शिवशंकर श्रीनिवासक कथा पढ़ब कथाक मर्मसँ अपरिचित रहि जाएब हएत। हिनकर कथा पढ़बा लेल, कथाक मूल-तत्त्व ग्रहण करबा लेल सजग पाठकीय दृष्टि अनिवार्य अछि; देश-दुनियाँ आ मनुष्यता-सामाजिकताक प्रति सूक्ष्म सावधानी अपरिहार्य अछि। ओना आजुक समस्त सशक्त कथा-पाठ लेल सुबोध आ सचेत पाठकीय मानसिकता राखब त’ अनिवार्य अछिए।

विश्व-साहित्यक कोनहुँ भाषाक कथा जकाँ मैथिली कथा-लेखनमे सेहो कथावस्तुक फलक बहुत पहिनहि टूट गेल छल। मैथिली कथा प्राचीन परिपाटीक घसल-घसाएल प्रक्रियासँ बहराकए, राजा-रानीक कथा आ घटना-प्रधान, चरित्र-प्रधान कथाक मोह त्यागिकए शैली-प्रधान कथामे राजकमलेक पीढ़ीमे प्रविष्ट भ’ गेल छल। आजुक मैथिली कथा देश-दुनियाक साहित्यिक रचनाक समानान्तर अपन रचना-प्रक्रियासँ परिचय देब शुरुह केलक अछि। आठम-नवम दशकमे तैयार भेल मैथिली कथाकारक चिन्तामे अपन शंका आ अपन समकालीन समाजक चिन्ताक अलावा भविष्य लेल एकटा मार्ग प्रशस्त करबाक चिन्ता सेहो आएल। पूर्ववर्ती रचनाकार द्वारा उठाओल महत्त्वपूर्ण चिन्ताकें रेखांकित करबाक दबाव सेहो अइ पीढ़ीक कथाकार पर छलनि। स्पष्टतः अइ पीढ़ीक कथाकार अपन समाजक नागरिक-जीवनक विडम्बनाकें रेखांकित करैत आगन्तुक समय लेल लिखल जाइवला कथाक एकटा शृंखला तैयार करबाक प्रविधि निर्माण क’ रहल छलाह। शिवशंकर श्रीनिवास एहने कथाकारमे अग्रणी छथि, जे ने केवल अपन समकालीन समाजक जीवन-दशाकें विलक्षण दृष्टिएँ आरेखित केलनि, बल्कि समकालीन समाजक जीवन-संघर्षक मर्मकें बुझबाक चेष्टा केलनि; परवर्ती पीढ़ी लेल एकटा कठिन मानदण्ड ठाढ़ केलनि।

हुनकर विशिष्ट कथा ‘अपन बुत्ता’ बेरोजगारीक संकटसँ जूझैत एकटा सभ्य, सुशिक्षित, स्वावलम्बी, स्वाभिमानी नायकक कथा थिक, जैमे कोनहुँ टा कथानक नइँ अछि। बेरोजगार नायकक कुण्ठा, सन्त्रास आ जिजीविषा एतए देखाइत अछि अवश्य; मुदा नायक कतहु टूटैत नइँ देखाइ छथि। लाख प्रतिकूल परिस्थितिक अछैतहु हुनकर कोनहुँ कथाक नायक कोनहुँ परिस्थितिमे टूटल-हारल नइँ देखाइ छथि। वस्तुतः अपन नायकक जीवन-संघर्षक विज्ञापनसँ कथाकार अपन समाजकें संघर्षशील मनुष्यक विजय देखेबाक आग्रही छथि। से, अहू कथाक नायककें सदैव अप्पन बुत्ता पर, अप्पन कार्यशैली पर अटूट आस्था छनि।

ई कथा वस्तुतः मानसिक उद्वेगक कथा थिक। प्रथम पुरुषमे लिखल गेल अइ कथाक वाचक बेरोजगार रहैतो, अपन मित्र सुरेशक असंगत सफलताकें देखितहु, अपनाकें विफल नइँ मानै छथि। अइ कथामे आपातकालक चर्चा अछि। आपातकालक बाद भारतमे जाहि तरहें अपराधक राजनीतिकरण आ राजनीतिक अपराधीकरण उदग्र रूपें विकसित भेल छल, तकरहि गम्भीर रेखांकन एतए देखाइत अछि। अही क्रममे कथावाचक’क मित्र सुरेश, जे अध्यवसायक समय नितान्त भुसकौल छल, राजनीतिक संरक्षण पाबि मुँहपुरुख भ’ गेल। कथावाचक’क पत्नी तकरहि सहयोगसँ पतिकें नोकरी प्राप्त करबाक सलाह दै छथिन। मुदा वाचककें अपन योग्यता पर भरोस छनि, ओ पत्नीक लाख प्रेरणाक अछैत, राजनीतिक मदतिसँ नोकरी लेबाक इच्छा नइँ केलनि। हुनकर दिढ़ मान्यता छनि जे नैतिकताक लोप नइँ भ’ सकैत अछि। चारू भर समाजमे नैतिकताक लोपक स्थिति देखाइ छल, मुदा कथावाचकक आस्था छलनि जे नैतिकताक लोप नइँ भ’ सकैत अछि। नैतिकता घटि सकैत अछि, ओकर क्षरण भ’ सकैत अछि, मुदा नैतिकताक बिना मनुक्ख किन्नहुँ नइँ रहि सकैत अछि। ओ मानै छथि जे एखन मनुक्ख सूतल-सन अछि। एक दिन अवश्य जागत। मनुक्खकें मनुक्ख जगौतै। मनुक्ख अपन मनुक्ख लेल जागत।...दिग्भ्रान्त, स्वार्थमे आन्हर आ परिस्थितिवश पराजित नायककें मनुष्यताक क्षमता पर एहेन आस्था इजोतक दर्शन करबैत अछि।

ई कथा संसाधनविहीन गाममे शिक्षित बेरोजगार नौजवान लेल गामक उदासीन दृष्टि पर व्यंग्यात्मक प्रहार करैत अछि। गाममे चाह-पानक दोकानक बढ़ैत संख्याकें ओ गामक लोकक रोजी-रोटीक साधन रूपमे नइँ देखै छथि, आपदाकें अवसर बना लेबाक पतित-दृष्टिसँ ओ घृणा करै छथि। ओ देखै छथि जे ई दोकानक बाढ़ि गामक लोकककें व्यसनी बना देने अछि। ओकर जीवन-यापनक खर्च बढ़ा रहल अछि। लोककें ज्ञान-विमुख क’ रहल अछि। चाह-पानक दोकान पर भीड़ जुटल रहैत अछि, मुदा लगीचेक पुस्तकालयसँ राताराती पोथी चोराकए रद्दीक भावें लोक बेचि अबैत अछि। पुस्तकालय खण्डहर बनि गेल अछि। गाम श्रीविहीन भ’ रहल अछि। चाह-पानक दोकान पर निरर्थक विषय पर बहस होइत अछि। सार्थक आ सृजनात्मक ग’प किओ नइँ करै छथि। कथावाचककें चिन्ता छनि जे लोकक खोराक बढ़ि रहल अछि, माथ पर कर्जा बढ़ि रहल अछि; बाल-बच्चाक पढ़ाइ-लिखाइ चैपट भेल जा रहल अछि; आमदनीक स्रोत मात्र खेती अछि, जे संसाधनक अभावमे नष्ट भेल जा रहल अछि। लगले सुर’मे कहि देब उचित होएत जे गाम आ कृषि-जीवनक बदहालीक चिन्ता शिवशंकर श्रीनिवासक अनेक कथामे गम्भीरतासँ आरेखित भेल अछि। सूत्र-निर्माणक अनुमति हो, आ जँ कथा-लेखनकें सामाजिक रूपें उपादेय बनेबाक सदीच्छा हो, त’ आसानीसँ कहल जा सकैत अछि जे हिनकर कथा ”ासोन्मुखता दिश तेजीसँ बढ़ैत समाज पर नियन्त्राण रखबाक लगाम थिक।

अइ कथाक वाचक भरण-पोषण लेल एकटा महींस पोसने छथि, ओहीसँ पारिवारिक बेवस्था चलै छनि। मुदा हुनकर अइ आचरणकें समाजक लोक हेय दृष्टिएँ देखै छनि। खिधांस करै छनि। ग्रामीण समाजक एहेन घृणित सोच-विचार, श्रमशील आ काजुल लोक लेल एहेन विकृत मानसिकता पर अइ कथामे घनघोर व्यंग्य देखाइत अछि। कथावाचक’क पत्नी अत्यन्त सुघर आ सुगढ़ स्त्री छथि, जिनका परिवारक चिन्ता छनि, पतिक मानसिक शान्ति आ आत्मविकासक चिन्ता सदैव सतबै छनि। तें ओ अपन पतिकें सलाह दै छथि, जे संसार बदलि रहल अछि, अहूँ बदलू। मुदा कथावाचक नइँ बदलै छथि।...एहेन की अछि जे ओ नइँ बदलै छथि? अइ बदलबाक अर्थ की थिक?...पत्नी बेर-बेर आग्रह करै छनि जे ओ राजनीतिक रूपें सबल भ’ गेल अपन मित्र सुरेशक सहयोगसँ कोनो नौकरी पाबि लेथु, मुदा विवेकशील समाजक प्रतिनिधि आ अइ कथाक वाचक स्वयंकें बदलए नइँ चाहै छथि, कारण हुनका अप्पन बुत्ता पर आस्था छनि। हुनका मोनमे कृषि-कर्मक चिन्ता छनि। ग्रामीण समाजक एकजुटता पर भरोस छनि आ सरकारी नीतिक विधान पर शंका छनि। कथाक अन्तिम अंशमे सरकारी योजनाकें निरस्त करैत जाति-धर्मसँ निर्लिप्त सहकारी उद्यमक सलाह देल गेल अछि।

आत्मबल केन्द्रित अइ कथाक शीर्षके कथाक मर्मकें उजागर करैत अछि, जाहिमे मनोरंजनक तत्त्व भने किछु नइँ हो, मुदा पाठककें रोकि रखबाक पर्याप्त गुण अछि। मनोरंजन करब कहिओ कोनो साहित्यक उद्देश्य नइँ रहल अछि। ओ त’ पाठककें बिलमएबाक एकटा छोटा सन तत्त्व थिक, जकरा बलें भावक रचनासँ जुड़ल रहै छथि। साहित्यक उद्देश्य अही बाटें पूर्ण होइत अछि। मनोरंजनक प्रलोभनसँ जुड़ल पाठक रचनाक अवगाहनक बाद उद्वेलित होइ छथि, जे हुनका आत्मपरिचयक स्थितिमे अनैत अछि आ ओ अपन चेतनाकें उद्बुद्ध करै छथि। ‘अपन बुत्ता’ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथा अछि, जाहिमे जनशक्ति पर भरोस देखाओल गेल अछि। गामक श्रमिक समाज एकजुट भ’ कए बान्ह बान्हि लैत अछि। आश्वस्त भ’ जाइत अछि जे अइ बेर निकेनाँ पटौनी हएत आ बढ़ियाँ उपजा हएत। उपजाक कल्पनाक उत्साहसँ पूरा समाज प्रसन्न अछि, गामक उत्साह देखि हुनकर पत्नियो उत्साहित छनि। ओ घोषणा करै छथि जे गृहस्थ लोकनि एकजुट भ’कए काज करथि, त’ किनकहु नोकरी-चाकरी लेल बाहर जएबाक प्रयोजन नइँ हेतनि। गामसँ नीक ठाम की हएत? शिवशंकर श्रीनिवासक ई कथा वस्तुतः कृषि-कर्मक प्रति आस्थाक कथा थिक।

आइ जखन सगरो समाजमे भ्रान्ति पसरल अछि जे गाम-गाममे सड़क भ’ जाएब समाज-विकासक लक्षण थिक, ओतए क्रियाधर्मी रचनाकारक चिन्तित हएब उचित अछि, जे सड़क-निर्माण गामक विकासक लक्षण नइँ थिक। ओ गामसँ श्रम-संसाधनकें खेहारि क’ ल’ जएबाक, पूँजीपति आ बहुराष्ट्रीय कम्पनी द्वारा किसानक उपजाओल अन्न गामसँ बाहर ल’ जएबाक आ अपन उत्पाद घरे-घरे बेचि लेबाक साधन थिक। गामक विकासक असली लक्षण थिक--गाममे कर्म-निष्ठाक प्रसार, अध्यवसायक प्रवृत्ति जगाएब, जाति-धर्मसँ मुक्त मनुष्यवादी सहकार, मानव-प्रेमसँ भरल एकजुटता, कृषि-कर्ममे सहकारिता...। विकासक असली चेहरा कृषिक विकास थिक। सामुदायिक सहयोगहिसँ कोनहु समाजक कृषि समृद्ध भ’ सकैत अछि। अइ कथाक माध्यमे शिवशंकर श्रीनिवास एकटा विराट सन्देश प्रतिपादित केलनि अछि, जे आजुक समाजसँ लुप्त भेल जा रहल अछि। वस्तुतः प्रेमेक विकास मानवीयताक विकास थिक!

हुनकर अत्यन्त लाक्षणिक आ व्यंजनापरक कथा ‘सिनुरहार’मे कथावस्तु त’ एतबहि टा अछि जे परदेसमे नोकरी आ जीवन-यापन करैत रामभद्र झा अपन छोट बालक’क उपनयन करबए सपरिवार गाम आएल छथि। संगमे बेटी-जमाए सेहो आएल छथिन। बेटी कल्याणी अल्पायुमे विधवा भ’ गेल छलखिन, माता-पिताक सद्भावनाक कारणें सुयोग्य ब’रसँ हुनकर पुनर्विवाह भेलनि। से जानि, गामक लोक घरे-घर कनपुफसकी करै’ए। उपनयन संस्कारक विधि-विधान चलि रहल’ए, मुदा अनेरबा अन्धविश्वासक कारणें रामभद्रक समाजभीरु पत्नी कल्याणीकें विधि-विधानसँ अलग राखए चाहै छथि।

शिवशंकर श्रीनिवास ने त’ स्त्री-विमर्शक अतिवादक पक्षधर छथि, ने रूढ़ मान्यताक पोषक। जाहि सामाजिक परिस्थितिक कारणें स्त्री-जीवनक दुर्दशा बढ़ैत चल जा रहल अछि, तकरा प्रति ओ सदैव चिन्तित रहै छथि। हुनकर लगभग कथामे स्त्री-जीवनक दारुण पीड़ा उजागर भेल अछि। माटि-पानिक सरोकार, पारम्परिक सम्बन्धक निर्वाह आ सामाजिकतासँ जुड़ल स’ब वस्तुक प्रति चिन्ता हुनकर कथामे रक्षित होइत अछि। हुनकर कथा-दृष्टि सदैव मनुष्य-विरोधी दुष्कृति पर कुपित रहै छनि।

बेटाक उपनयन संस्कारमे पुनर्विवाहित बेटीक सहभागितासँ सम्भावित व्यवधानक प्रति रामभद्रक पत्नीक आशंका सगरो कथामे मँड़राइत रहैत अछि। विलक्षण कौशलसँ सृजित अइ कथामे कथाकारक विलक्षण कथा-दृष्टिक परिचय भेटैत अछि, जे एक दिश सामाजिक यथार्थक परिचय दैत अछि, त’ दोसर दिश मानवीय व्यवहारक परीक्षण करैत, स्थापित सिद्धान्तक सूत्र आ प्रमाणकें निरुपाय साबित करैत अछि। आ तखनहि आबि कए ई प्रमाणित होइत अछि जे सामुदायिक व्यवस्थामे जीवन-यापन’क सूत्रक कोनो एकटा सिद्धान्त नइँ भ’ सकैत अछि। स्थान-काल-पात्रक पर्यवस्थितिक अनुसार ओहिमे विचलन आएब स्वभाभाविक थिक। मनुष्य कोनो रासायनिक पदार्थ नइँ थिक, तें ओ सिद्धान्तहि टासँ नइँ चलत, परिस्थितिवश बदलैत रहत।

कल्याणीक माइक मानसिक द्वन्द्वकें आरेखित करबामे ओ ततेक कौशल लगा देने छथि, जे पैघ सँ पैघ मनोविज्ञानी विफल भ’ जा सकै छथि। ई स्त्री प्रगतिशील छथि कि रूढ़िवादी, तय करब कठिन अछि। प्रगतिशील एतबा जे विधवा बेटीक विवाह करबैमे कनेको इत-उत नइँ केलनि; सन्तान-मोह एहेन जे बेटाक उपनयनमे बेटी-जमाएकें संग नेनहि गाम अएलीह; समाजभीरु एहेन जे खिलखिलाकए बेटीक हँसला पर धोपि देलनि, जे एना जुनि हँसू; धर्मभीरु एतेक जे शुभ-कार्यमे विधवाक सहभागिता वर्जित अछि, तें उपनयनक विधानमे कल्याणी उपस्थित नइँ रहतीह; स्वीकार-भाव एतेक जे कल्याणीक पितिऔत बहिन कल्याणीकें विधि-विधानमे ल’ अनलखिन, त’ माइ मुदित भ’ गेलीह...सरिपहुँ मनुष्यक मनोजगत कतेक द्वन्द्व सहैत अछि!...आ बलिहारी कथाकारकें जे यथार्थवादक प्रचलित परिभाषाक सीमा तोड़ि एमिल जोलाक प्रकृतवाद आ सात्र्राक अस्तित्ववादकें सूक्ष्मतासँ बेकछा देलनि।

एतए कनेक यथार्थवाद आ प्रकृतवादक गुणसूत्र पर विचार करब उचित लागि रहल अछि। प्रकृतवाद वस्तुतः यथार्थवादेक विस्तृत आयाम अतियथार्थवाद थिक; जतए सामूहिकता आ समग्रताक स्थान पर सामुदायिक जीवन जिबैत एक-एक नागरिक’क क्षणिक मनोवेग, दुख-दुविधा, सुख-सुविधा, स’ख-मनोरथक संज्ञान लेल जाइत अछि। समग्र संज्ञानमे वैयक्तिक जीवन’क दशा कतोक बेर दबि जाइत अछि। ‘सर्व मंगल मांगल्ये’क धारणामे ई बात यद्यपि भारत आ खास क’ मिथिलामे शुरुअहिसँ छल, मुदा आधुनिक साहित्यिक धारामे ई बात नुका गेल छल। ललित-राजकमल-मायानन्द’क पीढ़ीसँ पूर्वक मैथिली साहित्यमे अइ बात’क संज्ञान किरण आ यात्रीक अलावा कतहु देखाइ नइँ छल।

साहित्यिक आन्दोलन’क रूपमे उनैसम शताब्दीक अन्तिम चरणमे ई धारणा सर्वप्रथम प्रफांसमे प्रसिद्ध प्रकृतवादी प्रफेंच उपन्यासकार, पत्रकार एमिल जोला (सन् 1840-1902)क माध्यमे आएल। सन् 1880मे अपन एकटा आलेख ‘दी एक्सपेरिमेण्टल नॉवेल’मे ओ जे यथार्थवादी शैली प्रस्तावित केलनि, तकरहि प्रकृतवाद कहल गेल। तदनुसार रचनामे क्रूर जीवन-यथार्थक अंकन अनिवार्य मानल गेल। अइ धारणाक अनुसार साहित्य एवं कलाक दृष्टिएँ कोनहु टा सत्य वर्जित आ गर्हित नइँ रहल। एकटा असंगठित साहित्यिक प्रवृत्तिक रूपमे प्रफांसीसी साहित्य-चिन्तनमे प्रचलित अइ प्रकृतवादकें बीसम शताब्दीक प्राथमिक चरण अबैत-अबैत भारतीय साहित्यमे सेहो पर्याप्त प्रतिष्ठा भेटए लगलै। स्वातन्त्रयोत्तरकालीन भारतीय समुदायमे तँ खूबे भेटलै। रचनामे जीवनक क्रूर-कठोर यथार्थकें निर्ममतासँ अनावृत करबाक यथेष्ट प्रयास भारतीय साहित्यमे होअए लागल। पात्र-प्रसंग-पर्यावरणक विश्वसनीयता, सहजता एवं जीवनक जैविक प्रयोजन पर अइ धारणामे बल देल जा लागल। समाजक लघुत्तम एकाइ, अर्थात् प्रत्येक मनुष्यक निजी जीवनक छोट-छोट अनुभूतिक संज्ञान लेल जाए लागल। तथ्यतः संसारक श्रेष्ठतम रचना मनुष्य थिक। जकर जन्मजात वृत्ति जिजीविषा थिक, तें हरेक प्राणी जीबा लेल संघर्ष करैत अछि, परिस्थितिकें अनुकूल बना कए स्वयंकें सुरक्षित करैत अछि। अइ प्रक्रियामे ओ जीवनक क्रूर यथार्थसँ मुठभेड़ करैत अपना लेल कैक परिस्थितिक निर्माण सेहो करैत अछि। एहने स्थितिमे किरण-यात्री आ ललित-राजकमल-मायानन्द’क पीढ़ीक रचनाकार लोकनि यथास्थितिक-सम्पोषक बनि गेल मैथिल समाजक पिछड़ल मानसिकताकें बदलब शुरुह केने छलाह। यथार्थसँ मुँह नुकबैबला पाठकक सोझाँ न’ब क्षमतासँ ठाढ़ हएबाक प्रविधि तकने छलाह। समकालीन सामाजिक प्रवृत्तिक व्याधिकें उजागर करब अपन प्राथमिक दायित्व मानि चुकल छलाह।

कृति-प्रसंगक पूर्णता लेल पात्र-प्रसंग’क युक्तियुक्त वर्णन रचनाकारक कर्तव्य होइत अछि, एक सीमा धरि विवशतो। कथामे सृजित चरित्रक विस्तार, प्रामाणिकता, घटना-प्रसंगक विश्वसनीयता आ अनेक आनुषंगिक सूचना लेल नगर, प्रकृति, पारम्परिकता, रीति-रिवाज, चैपाल-संवाद, लोक-परलोक, इतिहास-दर्शन, राजनीति, जाति-धर्म-सम्प्रदाय, वर्चस्व-पराभव, शोषण-विद्रोह, युद्ध-क्रान्ति, यथास्थिति, मनोवेग, उमंग-उत्साह, प्रेम-घृणा, ईष्र्या-अनुराग, अतीतावलोकन, स्मृति-खण्ड, भविष्य-चिन्तन ...आदिक वर्णन अनिवार्य होइ छै। कोनहु श्रेष्ठ रचनामे ई वर्णन निष्प्रयोजनीय नइँ होइत अछि। किऐक तँ साहित्यमे चित्रित जीवन-सत्ये टा पर्याप्त नइँ होइ छै, ओकर सत्य लागब सेहो अनिवार्य होइ छै। अविश्वसनीय यथार्थ साहित्यकें निष्प्रभ आ निर्मूल्य करैत अछि। रस-सिद्ध भावककें अइ तथ्यक गहन समझ रहै छनि, से रहबाको चाही।

कल्याणीक माइक जीवनक एहने छोट-छोट अनुभूतिक संज्ञान ‘सिनुरहार’ कथामे कथाकार लेलनि अछि। मुदा विचारणीय अछि जे जीवनक एहेन दुर्वह दुविधा मेटाओल जाए कि झाँपि-तोपि कए व्यूहसँ निकलि जएबाक उपाय ताकल जाए। जाहि सामाजिक वातावरणमे ओ बेटाक उपनयन करए आएल छलीह, ओही समुदायक आतंकमे जीबि रहल छलीह। अइ पराभवक स्थितिमे मनुष्य यथासाध्य समस्यासँ बचि निकलबाक बाट तकै’ए; आवश्यकतानुसार टकराइतो अए; अस्तित्व-रक्षाक अइ दुविधाग्रस्त परिस्थितिमे मनुष्य कखन ईश्वरवादी भ’ जाइ’ए, कखन अनीश्वरवादी...बूझब कठिन अछि। तें अस्तित्ववादक अइ दुनू धारा--ईश्वरवादी आ अनीश्वरवादी...पर ग’र करब प्रयोजनीय अछि!

न’ब युगक लेखनमे अस्तित्ववादक प्रतिपादन सन् 1843मे प्रसिद्ध डैनिश चिन्तक सोरेन किर्केगार्द (सन् 1813-1855) केलनि; मुदा ओ अस्तित्ववाद शब्दक प्रयोग नइँ केलनि। साहित्य-चर्चामे अस्तित्ववादक ख्याति प्रसिद्ध प्रफांसीसी विचारक ज्याँ पाल सात्र्रा (सन् 1905-1980)क सत्प्रयाससँ भेल। एकरा अधीन कोनो स्थापित शक्तिसँ मोहभंग भेला पर मनुष्य अस्तित्ववाद दिश उन्मुख होइत अछि। ‘सिनुरहार’ कथामे कल्याणी आ कल्याणीक माइ-बापक मनोदशामे अइ दुनूक दर्शन होइत अछि।

कथाक बुनावटिमे समस्त अनिष्ट’क सम्भावना कल्याणीक पुनर्विवाहसँ बनैत देखाइत अछि। मुदा रोचक प्रसंग ई थिक जे अइ सम्पूर्ण प्रकरणमे रामभद्र कखनहुँ कोनो बात लेल समाज-व्यवहारक प्रति ओतेक भयभीत नइँ छथि, जतेक हुनकर पत्नी। बेटीक पुनर्विवाहक प्रति आ बेटीकें बेटिए जकाँ स्वीकार करबाक प्रति रामभद्रकें कखनहुँ कोनो तरद्दुत नइँ होइ छनि; जखन कि रामभद्रक पत्नीकें डेगे-डेग पर चिन्ता सतबैत रहै छनि, जे अन्तर्जातीय पुनर्विवाहक मामिलाकें ल’ क’ जानि नइँ, कखन गामक लोक कन्नी काटि जाए; उपनयनक विधि-विधानमे कोन वितण्डा उपस्थित भ’ जाए। सोहागिन स्त्रीक विचित्र परिभाषा रामभद्रक पत्नीक मोनमे बसल छनि। पुनर्विवाहित भ’ गेलाक बादहु ओ कल्याणीकें सोहागिन मान’ लेल ओ तैयार नइँ छथि। मुदा जेना अपन विरहाकुल पदमे महाकवि विद्यापति अन्त अबैत-अबैत समस्त विरह-दशा मेटाकए संजोगमय आ सुखमय वातावरण आनि दै छथि; ठीक तहिना ‘सिनुरहार’ कथामे शिवशंकर श्रीनिवास, अन्त अबैत-अबैत समस्त प्रतिकूल परिस्थितिकें निपटा क’ सुखमय वातावरण निर्मित क’ दै छथि। अहूसँ रोचक प्रसंग ई थिक जे अइ सुखद वातावरणक निर्माणक अगुआ कल्याणीक पितिऔत बहिन ललिता होइ छथि; एकटा नवयुवती; अर्थात् नवांकुर’क प्रतीक।...जै कल्याणीकें अपने सहोदर भाइक उपनयन संस्कारक विधि-विधानसँ अलग राखल जाइत अछि, ओही कल्याणीकें ललिता बाँहि पकड़िकए ल’ अबैत अछि आ आह्लादक संग विधि-विधानमे शामिल करबै छथि। अन्ततः कल्याणीक माइक हृदय सेहो परिवर्तित होइत छनि आ प्रमुदित मुस्कानक संग एकटा मुदित वातावरणमे कथाक अन्त होइत अछि।

ग्रामीण नागरिकक निरर्थक आ निकृष्ट चिन्ताकें कथामे सूक्ष्मतासँ रेखांकित कएल गेल अछि; जैमे किनकहु रुचि कोनो सार्थक प्रसंगक चिन्तामे नइँ छनि; उपनयन संस्कारक सफलतामे नइँ छनि; अधिकांश लोक अइ सुँघानीमे लीन छथि जे अकालमे विधवा भेल युवती कल्याणीक विवाह कोन जातिक पुरुखसँ भेलनि? ब’र कोन नोकरी करै छनि, कतेक पाइ कमबै छनि, हँसमुख अछि की खड़ूस?...सब किओ तइ चिन्तामे लिप्त छथि, जकर कोनो सम्बन्ध हुनका लोकनिक निजी जीवन आ कि सामाजिक आचारसँ दूर-दूर धरि नइँ अछि।

जीवनक सहजता विरोधी समाजक असली स्वरूपकें नाँगट केनिहार दार्शनिक कथाकार शिवशंकर श्रीनिवासक अइ अत्यन्त प्रभावी कथामे रामभद्रक पत्नीक परिवार सुलभ चिन्ता अछि। मुदा समाजक आतंकक विचित्र प्रश्न अछि। रामभद्रक सम्पूर्ण परिवार पर जै समाजक आतंक बरमहल मँड़राइत रहैत अछि, रामभद्र ओही समाजमे पुनः आबिकए अपन बेटाक उपनयन किऐ करए चाहै छथि? एहेन दुर्मुख समाजक आतंकमे जीबाक विवशता आइयो लोककें सम्मोहित करै छै।

मनोरथ आ भय’क द्वन्द्व अइ कथामे विचित्र तरहें दर्शाओल गेल अछि। न’ब पीढ़ीक जीवन-दर्शन एना अछि जे रामभद्र अपन बेटीक मनोभावक चिन्तामे परेशान छथि; रामभद्रक पत्नी सामाजिक आचार-व्यवहार-अनुशासनक आतंकसँ परेशान छथि; मुदा न’ब पीढ़ीक प्रतिनिधि कल्याणी लेखें धन्न सन। ओ निश्चिन्त छथि, एकदम सहज। हुनकर पति सेहो तहिना सहज। कल्याणी खिलखिलाइत रहै छथि। बेटीक हँसीक ऊँच स्वरसँ माइ परेशान छथि। ई न’ब-पुरान पीढ़ीक भेद थिक। गाम अएलाक बाद कल्याणीकें अपन प्रगतिकामी माइक दोसरे रूप देखाइ छनि। गाम आ शहर’क अइ अतार्किक भेदकें, दोसर’क पारिवारिक व्यवस्थामे जबर्दश्ती नाक डुबएबाक ग्रामीण आचरणकें आ अपन माइक अइ निरर्थक समाजभीरुताकें कल्याणी चाहिओ क’ नइँ बूझि पबै छथि; ओ नइँ बूझि पओतीह। स्त्री-जीवनक परिस्थितिकें शिवशंकर श्रीनिवास अइ कथामे विलक्षण ढंगें प्रस्तुत केलनि अछि।

सन् 1942मे प्रकाशित अपन पोथी ‘शृंखला कड़ियाँ’मे स्त्रीक मनोविज्ञान आ जीवन-क्रिया पर महादेवी वर्मा सूक्ष्मतासँ विचार केलनि अछि। हुनका मतें पवित्र गृहस्थीक नींव पुरुखक शत्तिफक बलें नइँ स्त्रीक बुद्धिक बलें राखल जाइत अछि। हुनकर मानब सही छनि जे ‘पुरुष आ गृह’ कोनो स्त्रीक जीवन होइत अछि, जखन कि ‘स्त्री आ गृह’ पुरुखक जीवनक कोनो एकटा आवश्यकता। समाज आ परिवार लेल क्षमतासँ बेसी योगदान आ त्याग करैत स्वविहीन भेल जाइत स्त्री सरिपहुँ पोसुआ सुग्गा भेल जा रहल छथि; पिजराक सुग्गा। अवसर अएलहु पर ओ विहग नइँ होअए चाहै छथि। ‘पिजराक सुग्गा’ शीर्षक शिवशंकर श्रीनिवासक कथा महादेवी वर्माक अही धारणाक व्याख्या करैत अछि। प्रतीकार्थमे ई कथा एक दिश स्त्री जातिक शौर्यशाली पराक्रमक स्वरूप ठाढ़ करैत अछि, त’ दोसर दिश जीवन सम्बन्धी हुनकर पराश्रयी सुखलीनता। अइ कथामे वाचक, अपन विधवा माइक जीवन-संग्रामक कथा कहै छथि; जे परिवारक नीड़-निर्माणमे सम्पूर्ण जीवन अर्पित क’ दै छथि। ओ ओइ परिवारक ‘मझिला घरक खाम्ह’ छथि; मुदा जइ बेटाकें पोसि-पालि कए दुनियाँ देखबाक दृष्टि देलनि अछि; आब ओही बेटाकें अपन अभिभावक मानै छथि। वाचककें ई बात कोनहुना पचि नइँ पबै छनि। माइकें अप्पन माइक श्राद्धमे नैहर जेबाक छनि। तइ लेल कथावाचक’क माम अनुनय करै छनि जे कनेक अगतरे जाए दहक! वाचक छुबुधिमे छथि जे जै माइकें पूछि कए हम स्वयं कतहु जाइ-अबै छी, तइ माइकें हम कोना आदेश देबै जे ओ कहिआ जाए, कहिआ नइँ जाए? वाचक’क दृष्टिमे पिताक मृत्युक बाद त’ माइए हुनका लोकनिक पिताक भूमिकामे रहलखिन! माइएसँ जीवन भरि दिशा-संकेत पओलनि। से माइ कहिआ नैहर जेतीह, तकर निर्णय हम कोना लेब?...अपन द्वन्द्वक परीक्षा लेल वाचक माइक मोनक टोह लेब’ दलानसँ आँगन अएलाह त’ माइ, बहिन आ पत्नीक बीच अही विषय पर चर्चा सुनलनि। जखन वाचकक बहिन कहलखिन ‘काल्हि चल जो!’, त’ माइ कहलकनि, ‘से बौआ कहतै तखन ने!’...वाचकक दिग्भ्रान्त हएब स्वाभाविक छल।

सामाजिक व्यवहार आ पारिवारिक वातावरणक विचित्र ओझराहटिसँ भरल ई कथा एक अर्थें रांगेय राघवक कथा ‘गदल’क स्मरण करबैत अछि। कथानायिका गदल सेहो एहने पराक्रमी आ पारिवारिक छथि। केहनो प्रतिकूल परिस्थितिमे मान-मर्यादा-स्वाभिमान आ परिवारक रक्षा लेल तैनात। मुदा एकटा पुरुखक अभिभावकत्वमे रहबाक अनुरागसँ भरल। ‘पिजराक सुग्गा’ कथाक वाचकक माइ अपन बेटाक अभिभावकत्वमे अन्तिम समयक जीवन बितबए चाहै छथि। वाचक देखै छथि जे हुनका घ’रक तीन स्त्री--पत्नी, जेठ बहिन आ जन्मदात्री माइ--तीनू, नारी हएबाक कारणें पुरुखक अधीन रहि, पुरुखसँ अपनाकें बचा रखबामे सहमत छथि। हठात् हुनका पिंजरामे बन्न आन्हर सुग्गाक संग खेलौड़ करैत अपन पित्तीक सुनाओल कथा मोन पड़लनि। हुनकर लालकाका पिंजराक द्वार खोलि कए सुग्गाकें बाहर जएबा लेल प्रेरित करै छलखिन, मुदा सुग्गा बाहर जाइक बदला पिजराक देबालमे सटि जाइ। ई क्रिया देखि लालकाकाकें कौतुक होइन्ह। ओ बूझथि, जे ई आन्हर पक्षी गगनबिहारी नइँ हएत। तैइओ ओ खेलौड़ करथि...।

कथावाचककें अपन पित्तीक सुनाओल कथा पर तामस उठनि। आब हुनका बूझिमे अएलनि। लालकाकाक ओइ आचरणकें ओ नारी स्वातन्त्रयक मिथ्या धूम मचैनिहार पुरुखक रूपमे स्मरण केलनि। मुदा स्त्री जाति स्वयंकें पिंजरामे बन्न किऐ राखए चाहै छथि? हुनकर माइ अइ पिंजरासँ किऐ नइँ निकलि सकलथि? पुरुखक बनाओल पिंजरा त’ हुनका सोझाँ कहिओ प्रकट नइँ भेलनि। सम्पूर्ण परिवार लेल सदैव ओ स्वयं अभिभाविका रहलीह! आइ हुनका अभिभावक’क खगता किऐ भेलनि? कथावाचक कान’ लगै छथि। हुनका आँखिमे नोर देखि, माइ तत्काल आलिंगन करैत कहै छनि --अधीर जुनि होउ, अहाँक पिता ने चल गेलाह, हम त’ संग छी!...माइक ई संरक्षक रूप फेरसँ देखिकए वाचक अपराधबोधसँ मुक्तिक अनुभव करै छथि।...सरिपहुँ सामाजिक यथार्थक ई जटिलता अगोचर अछि। समाजमे त’ लोक ई क्रिया सदति काल देखै’ए, मुदा कथाक रूपमे उपस्थित भेला पर एकर मर्म तकबाक सहज बेगरता स’बकें होइत हेतनि।

रोजगारक फेरमे गामक श्रमिक आ प्रतिभाक पलायनसँ ने केवल गाम खाली भेल अछि आ किसानीक अवहेलना भेल अछि; बल्कि आर्थिकताक अइ घनघोर दबावसँ मानवीय सम्बन्ध आ परिवारक अनुराग पर घातक असर पड़ल अछि। सम्बन्ध-मूल्यक संवेदना नष्ट भेल अछि। शिवशंकर श्रीनिवास अइ जोखिमकें सूक्ष्मतासँ आरेखित करैत रहलाह अछि। ‘गाछ-पात’ शीर्षक अपन कथामे अइ मूल्यगत ”ास पर ओ गम्भीरतासँ विचार केलनि अछि। अइ समस्त आचरणकें विलक्षण कौशलसँ रेखांकित केलनि अछि।

धनार्जनक लोभमे गाम छोड़ि शहर गेनिहार लोक अपन जड़िसँ त’ विच्छिन्न होइते छथि, अन्धानुकरणक फेरमे प्रयासपूर्वक अपन सांस्कृतिक मूल्यकें सेहो ताख पर राखि दै छथि। मूल्यबोध’क अइ परांग्मुखताक कारणें ओ मूलोच्छिन्न भ’ जाइ छथि। अपन माटिक हवा-पानिसँ हुनका कोनहुँटा संवेदना नइँ रहि जाइ छनि। अही चसकमे परवर्ती कालमे गाम आ ग्राम्य आचरण हुनका लेल निरर्थक, निष्प्रयोजनीय भ’ जाइ छनि। एतए ‘माटि’ शब्दक प्रयुक्ति हिन्दी’क शब्द ‘मिट्टी’ जकाँ नइँ भेल अछि। मैथिलीमे माटि अपन विराट अर्थबोध’क संग प्रयुक्त होइत अछि, जाहिमे माटि अपन पर्यावरण, रीति-रेवाज, संरचना, गढ़नि...स’ब किछुक संग अबैत अछि। सौभाग्यवश अइ शीर्षकसँ शिवशंकर श्रीनिवासक एक गोट कथा सेहो अछि, जकर पाठ-विश्लेषणसँ ‘माटि’क असली तत्त्वबोध सम्भव अछि।

‘गाछ-पात’ कथा गामक डीह पर शेष जीवन बितबैत एकटा वृद्ध माइक अही संवेदनाक कथा थिक। बेटा बोकारोमे इंजीनियर छनि, पुतौह ओतहि उच्च विद्यालयमे शिक्षिका। पोता-पोतीसँ भरल-पुरल परिवार छनि, मुदा गाममे एसगरे दिवंगत पतिक लगाओल बाड़ी-झाड़ीक गाछ-पात संग फदकैत आनन्दित रहै छथि। पति जीवित छलखिन त’ लत्ती-फत्ती लगबथिन, मुदा फ’र तोड़थिन बुरहिए। पतिकें केवल लगेबा धरिसँ मतलब रहै छलनि। एतए ‘कर्ता’ आ ‘सम्प्रदान’क भेद स्पष्ट करै’मे, असली स्त्री-विमर्शक संकेत दैत कथाकारक विलक्षण चतुराइ व्याख्येय अछि।

विवरणसँ भरल अइ सम्पूर्ण कथामे विवरण कतहु निरर्थक नइँ प्रतीत होइत अछि। अइ विवरणकें एमिल जोलाक प्रकृतवादसँ जोड़िकए देखब उपादेय लगैत अछि आ तखन स्पष्ट होइत अछि शिवशंकर श्रीनिवासक विवरणक जादू समस्त कथामे कोना उच्चासन चढ़ि बैसैत अछि।

खण्ड-खण्ड जिनगीक पलछिनक अनुभूतिक रेखांकन कथामे आबिकए विशिष्ट भ’ गेल अछि।...बुरहीक बेटा-पुतौह अइ बेर हुनका संग ल’ जेबा लेल जिदिआएल छथिन; मुदा बुरही द्वन्द्वमे छथि। बेटा-पुतौह, पोता-पोतीक संग जेतीह आकि बाड़ीमे दिवंगत पतिक लगाओल गाछ-पातक संग मुदित हेतीह। सम्बन्ध-मूल्यक एक-एक तन्तुकें कथाकार एतेक सूक्ष्मतासँ आरेखित केलनि अछि, जे बुरहीक जीवनक रोम-रोम उजागर भ’ गेल अछि। प्रतीकार्थमे प्रतीत होइत अछि जे सरिपहुँ उपवनक मालीसँ गाछ-बिरिछक सान्निध्य छीनब पैघ अपराध थिक। माइ-बाप अपन परिवारक माली होइ छथि। गाछ-पात मालीकें छोड़िकए जा सकै’ए, सुखाइओ सकै’ए, माली मुदा गाछ-पातकें छोड़िकए नइँ जा सकै’ए! कथाक अन्तिम अंशमे बेटाक संग बुरहीक जाएब तय भेला पर जखन बुरहीकें बाड़ीक गाछ-पात’क स्मरण अएलनि, आ ओ गाछ-पातसँ अनुमति लै लेल बाड़ी गेलीह, तखन मन्द-मन्द बसात बहि रहल छल, गाछ-पात प्रसन्नतासँ झूमि रहल छल। मुदा बुरहीकें लगलनि जेना स’बो टा गाछ-पात उदास भ’ रहल’ए। बुरही गाछ-पातकें कहलखिन--आब त’ हम जा रहल छी। अहाँ सबकें के देखत?...आ एतबा कहैत बुरही विह्वल भ’ गेलीह। आँखि नोरा गेलनि। मोन भेलनि जे बेटाकें कोंढ़सँ लगा ली।...ध्यातव्य थिक जे ई समस्त प्रकरण अपन रूपकार्थ प्रकट क’ रहल अछि। ओ बजलीह--बच्चा, आब हमरा एत्तै रह’ दैह। अही गाछ-पातक बीच! एकर सभक सेवामे। हम कत्तौ जाएब, मोन एतै टाँगल रहत। तहन फेर जाकए हेबे की करत?...प्रतीकार्थक आश्रयमे लिखल ई एकटा विलक्षण कथा थिक।

‘चिन्ता’ शीर्षक कथा वस्तुतः शिवशंकर श्रीनिवासे नइँ, पूरे देशक ग्राम्य परिवेश लेल सजग समाजक चिन्ता’क कथा थिक। कृषि-कर्मक सूक्ष्म विवरणसँ भरल ई कथा एक दिश कथाकारक मोनमे कृषि-कर्मक पुरोधा लोकनि जकाँ वशीकरणकजन्य अनुराग उत्पन्न करैत अछि, त’ दोसर दिश देश-दुनियाँक दशासँ अवगत हएबाक अभिलाषासँ सेहो भरल देखाइत अछि। अइ कथाक बहुस्तरीय मर्म एकर संवादमे जगमग करैत रहैत अछि। ई कथा पल-प्रतिपल अपन नायक मेंहीक चारू भर मँड़राइत रहैत अछि। मुदा थोड़ेक आगू अएला पर श्रेष्ठ कृषकक रूपमे मेंहीक नायकत्वकें पुष्ट करबा लेल किछु आओर पात्र जुटै छथि।

कृषि-कर्मसँ जुड़ल समस्त प्रसंगक ज्ञाता मेंही एतए कोनो ऋषि जकाँ प्रस्तुत भेल छथि। मेंही कृषि-कर्मक पुरोधा छथि, मुदा निरक्षर नइँ। थोड़-बहुत पढ़लो-लिखल छथि। समाजक बात-विचारमे सदैव अग्रसर रहै छथि। अखबार पढ़ैमे खूब मोन लगै छनि। चर्चा छल जे अखबार पढ़िकए ओ स’ब बातकें स्मरणमे रखै छलाह। साँझुक पहर प्रतिदिन मास्टर साहेबक ओतए जाकए अखबार पढ़थि। शिवशंकर श्रीनिवास अपन नायकक एहेन चरित्र सोद्देश्य गढ़ने छथि। हुनकर इशारा छनि जे कृषि-कर्मक पुरोधा हएबे टा पर्याप्त नइँ अछि। परिवेशक हाल-समाचारक प्रति सावधान रहब सेहो जरूरी अछि। देश-दुनियासँ परिचित रहब सेहो आजुक किसान लेल अनिवार्य अछि। से मेंही आद्रा नक्षत्रक भरि पोख बरसलासँ प्रसन्न छथि। मुदा श्रम आ कौशलक समस्त कलासँ सम्पन्न रहनहुँ संसाधनक अभावमे हुनकर कृषि लाचार छनि। थोड़बे दिन पहिने हुनकर बर’द मरि गेलनि। आब बर’दक बिना त’ रोपनी होअए नइँ! तें ओ आश्रित छथि, किओ बर’द देथिन त’ रोपनी हेतनि। एहने विकट समयमे हुनकर बेटा गाम छोड़ि शहर जएबाक जिद पर अड़ल छलनि। हुनकर लाख विरोधक कोनो प्रभाव बेटाक निर्णयकें बदलि नइँ पबै छनि। गामसँ श्रमिकक पलायन हुनकर अनेक कथामे आएल अछि।

पलायनक प्रति न’ब पीढ़ीक आकर्षण आ पुरान पीढ़ीक क्रोध अइ कथामे मुखर रूपें आएल अछि। आधुनिकताक कारण समाजमे पसरल विकृति आ अन्धानुकरणक कारणें नासमझीसँ उत्पन्न दिशाहीनता पर शिवशंकर श्रीनिवासक कुपित दृष्टि जतए-ततए देखाइत रहैत अछि; से हुनकर व्यंग्यात्मक स्वरमे प्रकट होइत अछि। मुदा तें ई नइँ मानबाक थिक जे हुनका आधुनिकताक प्रति कोनो कुण्ठा छनि। आधुनिकताक बिहाड़ि तँ ठीक भ’ओ सकै’ए, मुदा तै कारण सम्बन्धक अनुराग-सूत्र टूटि जाए, से सरिपहुँ विकृति थिक।

अइ बातकें ओ अत्यन्त मार्मिक ढंगें अइ कथामे एकटा आनुषंगिक प्रसंगसँ रेखांकित केलनि अछि। मेंहीक एकटा वृद्ध मित्र अपन बेटा-पोता पर अइ लेल व्यथित नइँ छथि जे हुनकर जेठ पोताक विवाह परदेसेमे भ’ गेलनि। ओ दुखी छथि जे मुदैया सब हुनका पोतपुतौहुक मुँह धरि नइँ देखए देलकनि, कनियाँकें कहिओ अपन डीह पर नइँ अनलकनि। देखितथि, त’ नैन जुड़बितनि। मेंहीक मित्रक मान्यता छनि जे न’ब कनियाँक पैर डीह पर पड़ए, त’ स्वर्गलोकसँ पूर्वज लोकनि आशीर्वाद दै छथिन। से डीह पर वंशक पुतौहुक नइँ अएलासँ हुनकर पितर लोकनिक आत्मा नइँ जुड़ेलनि।...आजुक अतिक्रान्तिकारी लोकनिकें ई अन्धविश्वास लागि जाए सकै छनि; लागनु; मुदा जीवन त’ शास्त्रासँ नइँ, व्यवहार आ अनुरागसँ चलैत अछि! मेंहीक मित्रक ई मामूली सन अभिलाषा पूर करबामे न’ब पीढ़ीकें कोनो असुविधा नइँ हएबाक चाही छल। ई अनुराग’क ग’प छल! आधुनिकता बेशक आबए, लोक खूब प्रगति करए, मनोनुकूल काज करए, मुदा पुरना पीढ़ीक एहेन छोट-छोट अभिलाषाक रक्षासँ जँ सम्बन्धजन्य अनुराग बचल रहए, त’ तकरा बचाकए रखबाक यत्न न’ब पीढ़ीकें अवश्य करबाक चाही।

आधुनिकताक होड़मे आब सम्बन्ध-मूल्य तेना तहस-नहस भेल जा रहल अछि, जे पिता आब जन्मदाता नइँ रहि गेल छथि, कुटुम भ’ गेल छथि। जिनकर सन्तान आब अपन जीवन-प्रसंग सूचना मात्र देब पसिन करै छथि। हुनकर सलाह-विचार आब सन्तान लेल अनिवार्य नइँ रहि गेल अछि। आजुक समाजमे एना भ’ओ रहल अछि, शीघ्रहि एकर विस्तार हएत। शिवशंकर श्रीनिवास अपन रचनात्मक-सूत्रमे अइ बातक पुरजोर संज्ञान लेलनि अछि।

छोट-छोट प्रसंग, क्षणिक मनोवेग आ प्रासंगिक कथाक समन्वयनसँ निर्मित ई कथा रसे-रसे पसरैत रहैत अछि। अही क्रममे मेंहीकें जनतब होइ छनि जे हुनकर अपने बेटा कमएबा लेल गाम छोड़ि दिल्ली चल गेलनि। जखन कि मेंहीक धारणा छनि जे जँ अहिना गामसँ श्रमिकक पलायन होइत रहल त’ खेती समाप्त भ’ जाएत। फेर मनुष्य कोना जीयत? खेतक प्रति ममता उमरैत देरी हुनका धरतीक उर्वरता मोन पड़लनि। धरतीक प्रति ई अद्भुत अनुराग स्वावलम्बनक संकेत थिक, अइ सृष्टिमे मात्र खेतिहरे टा स्वाबलम्बी मानल जा सकै छथि। अही स्वाबलम्बनक अनुरागमे मेंही सपना देखए लगलाह। सपनामे पृथ्वीसँ भेंट आ संवाद भेलनि। धरती आ धरतीपुत्रक संवादक ई सपना एकटा विलक्षण दृश्य उपस्थित करैत अछि, जतए खेती-बारीक नष्ट हएबाक सम्भावित संकेत अछि।...अही क्रममे ओ बड़बड़ाए लगै छथि--हँ, आबि गेल। जे माइक उदास मुँह देखि घुरि आबि सकै’ए, ओ पृथ्वीकें सेहो उदास नइँ छोड़ि सकै’ए। संगहि संग धान रोपैत पत्नी अकचकाकए पुछलखिन--की बड़बड़ाइ छिअइ?...त’ मेंही अपरतिब भेनहि बिना कहलखिन--बौआ आएलए! पत्नी पुछलखिन--कहाँ आएल’ए?...त’ मेंही कहलखिन--नइँ आएलए त’ आएत...! आ एतबा कहि मेंही मगन भेल धान रोपए लगलाह। मेंहीक ई आत्मविश्वास धरती आ मानवताक पारस्परिक आस्थाक प्रतीक थिक।

एतए नोबेल पुरस्कार (सन् 1954)सँ सम्मानित प्रसिद्ध अमेरिकी रचनाकार, अर्नेस्ट मिलर हेमिंग्वे (सन् 1899-1961)क सुविख्यात उपन्यास ‘ओल्ड मैन एण्ड द सी’ (सन् 1952)क नायक सैण्टियागो (पृ. 93)क बहुचर्चित उक्तिक स्मरण आएब स्वाभाविक थिक--‘मनुष्य टूटि जाएत, मुदा हारत नइँ (ए मैन कैन बी डिस्ट्रवायड बट नॉट डिफिटेड)।’ सैण्टियागो भरि जीवन यातना सहैत रहलाह, सौंसे उपन्यासमे बेर-बेर’क हताशा नायककें नाभरोस करैत रहै’ए, मुदा हुनकर आत्मबल आ पराक्रम कत्तौ हारि मानै लेल राजी नइँ छथि। सर्वत्र अदम्य उत्साह आ ऊर्जासँ भरल रहै छथि। उल्लेख सुसंगत हएत जे हेमिंग्वे स्वयं दुर्दान्त साहसक स्वामी रहथि। अपन रचल पात्रक जीवनमे त’ स’ब श्रेष्ठ रचनाकार अपने वैचरिकताक संग जीबैत रहै छथि। हेमिंग्वेक ओएह साहसिक जीवन-शैली आ सार्वजनिक छवि परवर्ती पीढ़ीक हृदयमे हुनका पूजनीय स्थान दिऔलकनि।

मेंही सेहो ‘चिन्ता’ शीर्षक कथामे सैण्टियागो जकाँ मानसिक यातना सहै छथि, मुदा पराजित नइँ होइ छथि। अपन आस्था पर डटल रहै छथि। हुनकर जाग्रतावस्थाक सपना आ घोषणामे परदेस चल गेल अपन बेटाक पुनरागमनक आस्था भरल छनि। ई आस्था कृषि संरक्षणक चिन्तामे एकटा महावाणी सन प्रसंग अछि। माइक उदास मुँह देखिकए परदेश गेनिहार बेटा शीघ्रे घुरि आओत, ई सम्बन्ध-मूल्यक रक्षाक पक्षमे आस्थाक वाणी थिक। शिवशंकर श्रीनिवास घनघोर निराशाक क्षणहुँमे आस्थाक रचनाकार छथि।

‘चिड़ै नइँ मनुक्ख थिक’ शीर्षक शिवशंकर श्रीनिवासक कथा जीवन-संचालन आ व्यवस्था-नियन्त्राणक अनेक चिन्तनानुशासनक गुरुतर दायित्वसँ भरल एकटा श्रेष्ठ कथा थिक। आकारमे नइँ, प्रभावमे। ओना अइ कथाक आकारो कोनो तेहेन छोट नइँ अछि। मुदा प्रभावक तुलनामे आकार तेहेन पैघो नइँ अछि। वामदेव सन नैष्ठिक श्रमिकक प्रशंसासँ शुरुह भेल ई कथा, इन्द्रनाथ ठाकुरक एकटा चाटुकार कुबेर झाक तीख बात सुनिकए वामदेवक उपहासपूर्ण उक्ति ‘अहाँ चिड़ै आ मनुक्खमे अन्तर नइँ बुझै छिएै, तँ हम की करी?’सँ समाप्त होइत अछि। बीच-बीचमे आओरो पात्रक जोग अइ कथाकें भैटै छै। मुदा वामदेवक विलक्षण चरित्रक कारणें थोड़बे कालक उपस्थितिक अछैत ओ भरि कथामे चर्चित रहै छथि। वामदेव अपना गामक एकटा कर्मनिष्ठ, मेहनती, ईमानदार, उचितवक्ता, मानवीय, मुँहफट, ग्राम्य-प्रेमी आ अकड़ू व्यक्ति छथि। हुनका किनकहु ड’र-भय नइँ होइ छनि। अप्पन आत्मबलसँ जीवन-यापन केनिहार व्यक्तिकें कहिओ किनकहु भय कहाँ भेलै अछि!

वामदेवक समग्र चिन्ता अपना गामक विकास आ कृषि-संस्कृतिक पारम्परिक धरोहरक उत्थान दिश लागल रहैत अछि। मुदा ई कथा तीन स्तर पर विकसित होइत अछि। एक दिश वामदेवक नैष्ठिक मेहनतिक प्रशंसा गामक हरेक व्यक्ति करै छथि; मुदा हुनकर अकड़सँ गामक स’ब व्यक्ति कोनो ने कोने रूपें व्यथित रहै छथि। दोसर दिश इन्द्रनाथ ठाकुर जे गरीबीक कारण कोनो समयमे दूध बेचबाक अपन पिताक काजमे सहयोग करै छलाह। मुदा किशोरावस्थहिमे हरिदेवक पिटाइक भयसँ गाम छोड़ि पड़ा गेलाह; एकट्ठे अपन हैसियत बनाकए गाम घुरलाह। गामसँ भागल इन्द्रनाथ हरियाणा जाकए एकटा फार्म हाउस किनलनि। ओतए उन्नत कृषिक विकासमे लागि गेलाह। मूलोच्छिन्न हएबाक कोनो टा ग्लानि हुनका व्यथित नइँ करै छनि। गामक कैक गोटएक मदति केने छथिन। अइ बेर गाम आएल छथि खेती-बारी करएबा लेल कोनो निपुण श्रमिक’क ताकमे। गामसँ किसान ल’ जाकए ओतुक्का कृषि-कर्मकें उन्नत करए चाहै छथि। जेना अंग्रेज सब भारतसँ कारीगर ल’ जा क’ इंग्लैण्डमे सामान तैयार करबै छल, तथापि भारतकें पछिलग्गू बूझै छल। तही लेल इन्द्रनाथकें एकटा निपुण व्यक्तिक खगता छनि।

एहने समयमे गामक अनेक चाटुकार वामदेव सन श्रमिक’क प्रशंसा क’ कए इन्द्रनाथ सन सुखी-सम्पन्न व्यक्तिक कृपा-पात्र बनए चाहै छथि, विभिन्न तरहें प्रशंसा करैत हुनकर लिप्सापूर्तिसँ हुनकर भावनाकें सोहरबै छथि। काजुल वामदेवक हुनरक प्रशंसा सुनि इन्द्रनाथकें प्रतीत होइ छनि जे ई व्यक्ति हमर काजक योग्य भ’ सकैत अछि। एतए अर्थ-विस्तारसँ कथाकारक चतुराइ प्रकट होइत अछि जे ई समय कर्म-निष्ठा आ ज्ञान-कौशलक प्रशंसाक समय नइँ थिक; काजुल आ नैष्ठिक व्यक्तिकें उपभोक्ता-सामग्री बनएबाक उद्योगक समय थिक। इन्द्रनाथ अही उद्योगमे तल्लीन छथि। इन्द्रनाथक चाटुकार हुनकर लिप्साकें दिनाइ जकाँ कुरिया रहल छनि। कथाकार अइ धृष्टता आ दुष्टताकें कौशलसँ रेखांकित केलनि अछि।

इन्द्रनाथक चाटुकारितामे बैसल आ क्रियाशील लोक जखन वामदेवक प्रशंसामे की-कहाँ बजै छथि, तखन ओ लोकनि ओकर खोराक’क ग’प सेहो करै छथि। एतबहिमे इन्द्रनाथक पिता अपन जाप रोकि कए बाहर अबै छथि आ अपन बात राख’ लगै छथि। गामक बुजुर्ग लोकनिकें सही बात कहबाक, अनुभूत सत्य कहबाक हिस्सक रहै छनि। कथाक अइ अंशमे कथाकार स्पष्ट देखौलनि अछि जे वृद्ध लोकनिकें आत्मज्ञानक अहंकार आ अनुभव सुनएबाक लालसा हरदम सवारे रहै छनि। विवरणमे अइ बातक स्पष्ट संकेत कथामे गम्भीरतासँ भेल अछि। कुबेर झा वामदेवकें इन्द्रनाथक संग हरियाणा जाकए हुनकर खेती-बारी सँभारबाक लालच दैत सहमत करबामे तत्पर होइ छथि। वामदेव हुनका लोकनिक हँसी उड़बैत कस्तूरी कक्काक उक्ति कहै छनि--पहिने चिड़ैकें जत’ जत’ सुविधा भेटै, तत’ तत’ उड़ि जाइ। मनुक्ख जकाँ चिड़ैक घर नइँ होइ छै। ओ ने रौदी वा बाढ़िसँ लड़ि सकैए आ ने पालाकें फाड़ि सकैए, तें अनुकूल स्थिति तकैत उड़ैत रहै’ए। आब त’ अपना ओहिठाम मनुक्खे उड़ि रहल’ए, तँ आनठामसँ चिड़ै की आाएत।...लोक जखन कहलकनि जे ई बेतूकक ग’प किऐ करै छह, त’ वामदेव उठिकए अपन गमछा झारैत चलि देलक।

वामदेवक ई स्वभाव एकटा काजुल व्यक्तिक आत्मविश्वासक प्रतीक थिक। लोक हुनका रोकलकनि, त’ बजलाह जे लखनदइक बान्ह टूटि गलै अछि, गामक लोकक विचार भेलै अछि ओकरा बन्हबाक। हमहूँ कोदारि ल’कए ओतहि जाएब। लोक प्रतिप्रश्न केलकनि जे तोहर त’ ओतए कोनो जमीन नइँ छौ।...वामदेव कहलकनि--हमर जमीन नइँ अछि, मुदा ओहो हमरे गामक बाध छी ने!...

आत्मबोधसँ भरल वामदेवक ई उतारा ‘सार्थक जीवन’ आ ‘सफल जीवन’क भेद स्पष्ट करैत अछि। ‘सफल जीवन’क सम्बन्ध हरदम ‘व्यष्टि’सँ रहैत अछि जखन कि ‘सार्थक जीवन’क सम्बन्ध हरदम ‘समष्टि’सँ, समाजसँ, सामाजिक सरोकारसँ।

‘गुण-कथा’ शीर्षक कथा तीन पीढ़ीक पारस्परिक व्यवहारक तानी-भरनीसँ बुनल गेल अछि। समाज-सेविका अंजनी देवी अपन बेटा-पुतौहुक संग जै घरमे रहै छथि, ओतए लगेमे एकटा मजदूर-कॉलोनी अछि, जैमे ओ मजदूरक बीच रहिकए अपन जीवन सार्थक करए चाहै छथि। मुदा अंजनी देवीक बेटा-पुतौहुक वर्चस्वकें अइसँ ठेस लगै छनि? अंजनी देवीक पोता विदेशमे पढ़ै छनि। तीन पीढ़ीक अइ त्रिकोणमे सम्बन्धक एहेन वृत्त आ वृत्तान्त अइ कथामे बनैत अछि जे एकटा दार्शनिक शृंखला तैयार भ’ जाइत अछि। मजदूर संगें समय बिताएब आ ओकरा उत्थानक मार्ग दिश प्रेरित करब, अंजनी देवी लेल जीवन थिक; हुनका सन समाज-सेविकाक पोता हएबाक गौरवक संग विदेशी पत्रिकामे लेख छपाकए श्रेष्ठ कहाएब पोता लेल एकटा व्यापार; मुदा अंजनी देवीक बेटा-पुतौहु लेल हुनकर वर्चस्व खण्डित करबाक उद्यम। ई कथा फेरसँ सफल जीवन आ सार्थक जीवनक मर्मकें सूक्ष्मतासँ रेखांकित करैत अछि।

शिवशंकर श्रीनिवासक कथा पढ़ब एकटा रोचक काज थिक। हुनका मुँहें सुनब विरेचक आ आह्लादक; मुदा पाठ-विश्लेषण करैत हुनकर कथाक अनुशीलन श्रमसाध्य काज थिक; श्रमसाध्य थिक, तें फलदायी सेहो। मुदा कोनो एकटा निबन्धमे हुनकर लिखल सैकड़ा भरि कथा पर विचार करब त’ सम्भव नइँ अछि। एतेक मूल्य-बोधित (वैल्यू-लोडेड) कथाक अवगाहन’क समय मिसियो भरि चूक भेलासँ कोनो पैघ संकेत अलक्षित रहि जेबाक खतरा हरदम बनल रहैत अछि। शेष कथा पर विचार हएब बाकी अछि। से फेर कहिओ... सन्दर्भ: [1] आबादी : दस करोड़ चालीस लाख निनानबे हजार चारि सए बाबन [2] शिवहर, सीतामढ़ी, मधुबनी, सुपौल, अररिया, किशनगंज, पूर्णिया, कटिहार, मधेपुरा, सहरसा, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, वैशाली, समस्तीपुर, बेगूसराय, खगड़िया, भागलपुर, बाँका, मुंगेर [3] सन् 2011क जनगणनाक अनुसार कुल आबादी 4.9171685 करोड़ (चारि करोड़ एकानबे लाख एकहत्तरि हजार छ’ सए पचासी) [4] बेतियाक जनसंख्या 39.35042 लाख [5] कुल 5.3106727 करोड़ (पाँच करोड़ एकतीस लाख छ’ हजार सात सए सत्ताइस) [6] ‘लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया’क पाँचम खण्ड, ‘इण्डो-आर्यन भाषा समूह’क दोसर उपखण्ड, सन् 1903मे गवर्नमेण्ट प्रिण्टिंग इण्डिया, कलकत्तासँ प्रकाशित (पृ. 16) १३.दिलीप कुमार झा-माटि वस्तुए सएह छैक दिलीप कुमार झा (संपर्क-9430989449) माटि वस्तुए सएह छैक अपन माटि ,अपन भूमि अपन भाव अपन भाषा सबकें नीक लगैत छै।सोहनगर लगैत छैक।हँ,किछु ओहनो अबूझ प्राणी अछि जिनका लेल अपन कहैवला वस्तु सभसँ कोनो माने मतलब नै।तेहन  लोकक बिषयमे गपे कियै करब? आगाँ बढैत छी। एकटा सत्य घटनापर अबैत छी।दू सय बर्ष पहिने हमरा गामक एकटा परिवार उपटि क' राजस्थानक माउण्ट आबूमे बसि गेल।बसि तँ गेल मुदा कोनो ने कोनो तरहें  गाममे अपन दियाद वादसँ सम्पर्क बनौने रहल।किछु बर्ष पूर्ब ओहि परिवारक पाँचम पीढ़ी गाममे फेरसँ घरारी कीनि क'  घर बनौलनि अछि।पुछलियनि की जरूरति भेल एतय घर बनेबाक? ओ  कहलनि माउण्ट आबूमे हमसब बहुत सुखी छी।मुदा की कही ,एतबे कहब जे माटि बजा लेलक। तहिना फिजी के राष्ट्रपति राम गुलाम जखन बिहारमे अपन पूर्बजक गाम गेल छलाह तँ कहलनि हमर पूर्बजक माटि हमरा भीतरे भीतर बेचैन कयने छल तकरे रजकण माथमे लगेबाक लेल हम एतय एलहुँ अछि।माटि चीजे  सैह छैक।माटि मात्र अन्न,फल  उपजेबाक लेल एकटा भौतिक अवयवे नहि माटि छी हमर पहिचान।माटि छी हमर जीवन।माटिसँ पृथक जीवनक कोनो परिकल्पना नहि कयल जा सकैछ।से प्राणी कतहुँ रहय खाहे ओ कोनो निर्जन गाममे वा आधुनिक महानगरीय सभ्यातामे रचल बसल,माटिसँ पृथक कियो नहि अछि।से हम माटिक बात क' रहलहुँ अछि हेबनियेमे  प्रकाशित भेल कथा संग्रह 'माटि 'क प्रसंग।कथाकार छथि मैथिली कथाकें एकटा विशिष्ट पहिचान दिऔनिहार, समकालीन मैथिल कथाक प्रमुख स्वर डा.शिवशंकर श्रीनिवास।डा.श्रीनिवासक ई पाँचम कथा संग्रह छियनि लकधक पाँच दशकसँ मैथिलीमे कथा लिखि रहल छथि।हिनक कथाक अनेक भाषामे अनुवाद भेल अछि।वैद्यनाथ झा हिनक किछु चयनित कथाक हिन्दीमेअनुवाद कयने छथि। हिन्दीमे 'जमुनियाँ धार' नामसँ पुस्तक प्रकाशित भेल अछि।एहि पुस्तकक भूमिकामे हिन्दीक यशस्वी ओ वयोवृद्ध साहित्यकार रामदरश मिश्र हिनक कथाक बिषयमे लिखैत छथि,'शिवशंकरजी की कहानियों में व्याप्त कथा-रस उन्हें अत्यन्त पठनीय बनाता है।छोटी-छोटी उपकथाएं मुख्य कथा में सहजभाव से मिलकर कथ्य को अधिक सघन बनाती हैं। भिन्न -भिन्न चरित्र आपसी संबंधों को तो उजागर करते ही हैं, पाठकों को संवेदना में भिगोते भी हैं।कहानियों में व्याप्त मानववादी मूल्य-दृष्टि पाठकों को उजास के किसी बिंदु तक ले जाती हैं।'..। माटि कथा संग्रहमे पहिल कथा अछि माटि।कमलनाथक कथा वस्तुतः मनुक्खक जीवनक अवसादक कथा थिक।कोना कमलनाथकें पत्नीक देहान्त पछाति अवसाद घेरि लैत छनि।प्रकृतिक सुन्नर वस्तु सभसँ ओ दूर भाग' लगैत छथि।सृजनक स्थानपर ढहल ढनमनायल चीजसब हुनका बेसी पसिन पड़ैत छनि।कथामे कथानायक कहैत छथि,'चाहे ओ पानिक बाढ़ि हो वा जीवनमे करुणाक बाढ़ि जे कहियौ जखन जीवन कोनो कारणसँ ठहरतै आ माटिसँ जुड़तै तखने फेरसँ  कोनो अवसादग्रस्त,उदास जीवनमे फूल फूला सकैत अछि। से कमलनाथ जखन अपन अनाथ भागिनक पालन पोषण करय लगैत छथि।गाय पोसय लगैत छथि।फूल-पात रोप' लगैत छथि ।बाड़ीए फूलबाड़ीसन हुनको जीवन गमकि उठैत छनि।कथाक बुनाबटि तँ नीक छैहे ओहिमे प्रयुक्त अलंकार काव्यक अनुभूति दैत अछि।अपना अनाथ भागिनक बिषयमे कमलनाथ कहैत छथि-'की कहिय',ओ जखन आनन्दसँ  हँसैए त' इजोड़िया रातिक अरिपन पर लाबा छिड़िया जाइए।' तहिना एकटा कथा अछि 'बदलैत रूप'।परिवारक बिखरैत तन्तु बरिष्ठ लोकनिक जीवनकें कतेक दुरूह बना देलक अछि तकर कथा कहयै बदलैत रूप।मथुरा ठाकुरक पत्नी अछि रानी जे बादमे रनियाँ कालान्तरमे रनियाँ बुढ़िया भ' जाइत अछि।मथुरा ठाकुरक  बेटा बेचनक माय बापक ब्यवहारक कथा घर -घरक कथा छी।जाहि बेटा-बेटी कें एतेक जतनसँ लोक पालैत पोसैत अछि से संतान जखन होश सम्हारैत अछि तँ माय बापकें अपना परिवारक सदस्य नै बुझैत अछि।बापक मेहनतिक टाकाअपन बाल बच्चपर ,अपन नीजी  रहन सहनमे,ऐसो आरामपर खर्च क' लैत अछि।से जखन अन्न,पानि,दवाइ ,पथ्यादिक वेत्रे  मथुरा ठाकुर काहि काटि क' मरि जाइत अछि।रनियाँकें बेटा पुतहु साफे अबडेर दैत अछि तखन सहारा बनैत छैक नैहरक परिजन सभ।रनियाँ बुढ़ियाँ अपना भतिज पुतहु सबसँ प्रोत्साहन पाबि अपन लूड़ि क उपयोग क' फेरसँ नब जीवन शुरू करैत अछि।फेरसँ जीब' लगैत अछि रनियाँ।स्वरोजगार करैत अछि।अपन सहयोगी सबहक सम्बन्धमे कहैत अछि हम ई चारू स्त्रीगण मात्र ई पाँच गोटेयक हमर  परिवार अछि।कथामे देखाओल गेलए जे आब रक्त सम्बन्ध धरि परिवार नहिअछि। जे जीवनमे संग दिए,सुख दुःखमे ठाढ़ हुए ओएह ने परिवार। परिवार आब नब रूप ल' रहल अछि से सम्पूर्ण संवेदना ओ वैचारिकताक संग। भारतमे  साम्प्रदायिकताक जहर कोन रूपमे पसरि रहल अछि से बहुत फरीछ भ'क' आयल अछि एहि संग्रहक कथा 'पसाही'मे।कोरोनासन भयावह महामारी जाहिसँ संसारक मानव समुदाय त्रस्त अछि।एहु समयमे जँ सब किछु जाति, सम्प्रदाय आ दलीय आधारपर संचालित होबय लागय तँ एहिसँ बेसी चिंताक बात की हैत? गामक एकघारा मुसलमान,गामक बेटी नूरो जखन मनमोहन पाठककें कहैत छनि-' अच्छा ई कह'बौआ,दिल्लीक ओ जमाती सब हमर के लागत?ओ जमाती सब कोरोना बेमारी फैलेलक ताहिमे हमर कोन दोख?' तों इहो कह' जे कोनो हिन्नू जँ कोनो मुसलमानकें मारि देलकै,तइमे  दोसर हिन्नूक कोन दोख?गामक लोक नूरजहाँ उर्फ नूरोसँ हरियर तरकारी कीनब बन्न क' देलकै।दाहुरक बेटा ओकरा कहलकै जे ई गाम हिन्नूक छियै ।तों एहि गामसँ भाग।नूरो मनमोहन पाठकसँ प्रश्न करयै- से तों कह' की हम एहि गामसँ भागि जाउ? की ई हमर गाम नहि छी?गामो हिन्नू,मुसलमान होइ छै?ई कहि कान' लागलि नूरो। से जाहि भरोसक संग नूरो मनमोहन पाठक लग आयल छल तकर ओ पूरा संज्ञान लेलनि आ कहलनि-'ई समाज सभ जातिक,सभ धर्मक छै।कियो नै भगा सकैत छौ तोरा फेर हमसब एहि गाममे की करै छियै?' एहने भरोस चाही एकटा लोकतांत्रिक देशमे कोनो प्रकार अल्पसंख्यककें।  चाहे ओ धार्मिक अल्पसंख्यक हुए वा भाषायी वा कोनो अन्य प्रकार अल्पसंख्यक ।मुदा एकटा प्रश्न धरि एतय उठैत अछि जे हमरा देशमे एना कियै भ' रहल अछि? एतय अल्पसंख्यक के अर्थ फरीछा क' बूझ' पड़त।राजनीतिक दल जे अपन परिभाषा गढ़ने अछि से अपन राजनीतिक नफा नोकसानक लेल मुदा हमरा निरपेक्ष भ'क' एहिपर विचार करय पड़त।कश्मीरमे पंडित सबहक संग जखन अन्याय भेलै।ओतय हुनका सबपर अमानवीय अत्याचार भेलै।घर दुआरि छोड़ पड़लै की ताहिदिन कश्मीरक बहुसंख्यक अल्पसंख्यककें संग देलथिन? जँ तहिया कश्मीरक गाम गाममे जँ कोनो अब्दुल,कियो सत्तार,गफ्फार ओतुका अल्पसंख्यकक रक्षाक लेल अबैत तँ एहन हालति होइत! आग बत्तीस बर्षसँ बेचारा सब शरणार्थी शिविरमे दिन काटि रहल अछि।तहिना उत्तर प्रदेशमे कैरानामे कतेको मुस्लिम बहुल गामसँ  हिन्नू सबकें पलायन करय पड़लै। मुजफ्फरनगरमे हिन्नू बहुल गामसँ मुसलमान सभकें भाग' पड़लै।तहिना कतहुँ ईसाइकें, कतहुँ सिक्ख तँ कतहुँ जैन आ बौद्धकें एहन तरहक समस्याक सामना करय पड़ैत छैक। एहन-एहन घटनापर जेना नूरोकें न्याय दियेबाक लेल मनमोहन पाठक,सरयुग यादव,हीरालाल कामति आगाँ एलाह तहिना आरो लोक सबकें, जे जतय बहुसंख्यक अछि,सबल अछि हुनका सबकें समुदायक संगआबय पड़तनि। तखने बाँचत हमर सौहार्द,सामाजिक सदभाव आओर अक्षुण्ण रहि सकत प्रजातांत्रिक शासन प्रणाली।धधकैत साम्प्रदायिकतापर एकटा बहुत निस्सन कथा अछि पसाही। डा.शिवशंकर श्रीनिवास गामकें बहुत ल'गसँ देखैत छथि। गामसँ मतलब गामक जीवनसँ अछि।गाममे होइत परिवर्तनसँ अछि।आब-सुख- सुविधाक मादे गाम आ शहरमे बेसी अन्तर नै छैक।मुदा गाम जेना हेरा रहल अछि।खेती उसरि रहल अछि।लोककें जेना अपना भूमि अपन  सम्बन्ध-बन्धसँ जेना लगाव समाप्त भेल जा रहल छैक। से  कोनो एक गामक कथा नहि भारतक प्रायः  -गामक कथा छी।मिथिलामे पलायन बहुत बेसी छैक तें एतय गामक समस्या आर भयावह देखाइत अछि। से श्रीनिवासजी अपन लेखनमे सेहो लकधक पचास बर्खसँ गाममे भ' रहल परिवर्तनकें देखि रहल छथि,अकानि रहल छथि।गाम बँचल रहय सेहो पूरा परिचितिक संग से लेखकक मोनमे ताहि बातक शुभेच्छा हरदम घुरिआइत रहैत छनि।आओर ओ कथा लेखनमे जखन-तखन प्रकट होइत रहैत अछि। एहि कोरोनाकालमे जखन घरबन्दी भेलै तँ गमैया लोकसब शहरसँ पराय लागल।पराहि लागि गेलै।लोक कोनो धरानी अपन गाम पहुँच जाय चाहैत छल। कथा 'निज देश' मे एहि कोरोनाकालमे जे पराहि लागि गेलै से कोना एकटा बेदरा अपना गाम जेबा लेल आकुल अछि। रेल बस सभ बन्द अछि तैयो स्टेशनपर गाम जेबा लेल लोकक करमान लागल अछि।लोक अपन घर घुर' चाहैत अछि,एकटा आशा आओर उमेदक संग। अपन डीह डाबर बजा रहल छैक ।कहबाक अर्थ ई जे भले लोक रोजी रोजगार लेल शहर चलि गेल,मुदा बहुतो लोकक आत्मा एखनो गाममे बसैत छैक।जँ गामकें फेरसँ अपना पैरपर ठाढ़ करबाक ओरिओन हुए तँ कियै जैत लोक बाहर।एहि संग्रहमे एकटा कथा अछि 'शुभ इच्छा'।हीरानाथ ओ सुधीर मिलिक' गामकें फेरसँ बसेबाक जोगार करैत छथि।ओहिना जेना अशोक जीक कथा डैडी गामक डाक्टर अमेरिकासँ आबि गामकें फेरसँ आबाद करबाक लेल,गामक विकासक लेल फेरसँ काज करय लगलाह।' कथाकारक आत्मा गाममे बसैत छनि।गाममे भ' रहल सामाजिकताक क्षरणसँ व्यथित छथि।गाम आब ओ गाम नै रहल। ताहि चिंतासँ  चिंतित छथि लेखक ।उजरैत गामकें कोना बसाओल जाय?से गामकें आबाद करबाक लेल हिनक अनेक पात्र नगरमे सेवा देलाक पछाति गाम घुरि अबैत अछि चाहे ओ'जकर टाङ तकर आम'क लालपरी देवी होथि वा 'जड़ी' कथाक श्रीश ठाकुर से ई सब शहरमे रहैत छथि मुदा गाम हिनका सबकें घिचि अनैत छनि।ओतबे नहि मित्र कथाक प्रयाग यादवक नाति अंशू जे महानगरमे पढ़ैत अछि।अंशूक गामक प्रति जिज्ञासा,ह'र बरद देखबाक सेहन्ता ई संकेत क' रहल अछि जे नबका पीढ़ी सेहो गामकें बिल्कुल समाप्त नहि होब' देबय चाहैत अछि।गाम अछि  तँ हमर पहिचान अछि।हमर भाषा,बोली,सांस्कृतिक अवयव सब सुरक्षित अछि। 'मित्र' कथामे रामलखन कामति अंशूकें कहैत छथि-' तोरा गामकें बुझबाक छह त' बुझ' तों प्रयाग यादवक नाति छह त'पूरा गामक नाति छह।बुझलह ने?' गाम बाँचत कोना? तकरो उत्तर कथाकार अपन कथा सबहक माध्यमसँ दैत छथि।गाम बाँचत काजसँ।काज जोड़ैत अछि लोककें।काज लोककें असगर नै होब' दैत अछि।काज सम्बन्ध मजगूत करैत अछि। से जँ गामकें बसेबाक अछि तँ गामकें चाही आत्मनिर्भता।गामके़ं चाही अपन ओ सब किछु जे पहिनेसँ गाम लग छल।ग्रामवासी कें एक- दोसराक बिना काज नै चलैत छल।सब पेशागत लोक एक दोसरापर निर्भर छल।मुदा आइ सबहक बेगरता बजार शान्त करैत अछि।सृजनसँ ककरो कोनो माने मतलब नै। तखन आत्मीयता कोना बढ़त?सामाजिक सद्भाव कोना बाँचत? एहि सब बातक बहुत फैलसँ आ फरीछसँ पड़ताल करैत छथि लेखक एहि संग्रहक अनेक कथामे। जेना 'जिनगी' कथाक सरस्वती देवीकें देखल जाय।सरस्वती देवीक  पुतहु सब  ,राग भास सिखबाक लेल हुनका शहर ल' जाय चाहलनि तँ ओ मना क' देलथिन।हुनका सबकें काकी (सरस्वती देवी)त' कम काकीक गुण बेसी आकर्षित केलकनि ओ  हुनक संगीतमे बजार ताक' लगलीह।कोनो कमी नै रहनि हुनका सबकें मुदा बजार एकटा चीजे सैह छैक जतय लोक सब चीज बेच रहल अछि। जे नै बेचल जयबाक चाही सेहो सब।कहबाक नै चाही मुदा लोक अपन जबानी ओ सुन्दरता सेहो बेच रहल अछि।जीवन छी आनन्दक एकटा प'ल।से सरस्वती देवी जिनगी कथामे जखन कहैत छथि,'पराती एकटा बात बुझलहुँ।जिनगीमे कतेक सुविधा भेटयै ओ कोनो बात नहि छै।बात छै जे अहाँकें आनन्द कतय आ कोन तरहें भेटए?अहाँ सब हमर चिंता नहि करू।हम एहिठाम आनन्दसँ रहै छी। 'पिरीत'दाम्पत्य जीवनक एकटा खटमधुर कथा अछि।वास्तवमे दाम्पत्य जीवन तँ खटमधुर होइते अछि।दुनू रसक स्वाद जे लिए ओएह भेल असली गृहस्थ जीवन।मधुमती ओ श्रीकान्तक जीवन जेहने सोहनगर छलनि तेहने रसगर।गजब़कें तरलता अछि कथामे।मधुमती जँ कतहुँ चलि जाइत छथि तँ लगैत अछि जेना श्रीकान्त बीमार भ' गेलाह हुनका अबतहि एकाएक ओ स्वस्थ अनुभव करय लगैत छथि।'हँ, एहिना जेना अन्हार घरमे कोनो दीप सन रहथिन हिनका जीवनमे  मधुमती।आ तहिना मधुमती हिनका कतहु कनियों दिनक  लेल गेलाक बाद एकदमसँ तोड़ल गुलाबक फूल सदृश्य भ' जाइत छलीह,सेहो टहाटही रौदमे राखल फूल सदृश्य। तहिना संवेदना कथामे कुमुदनाथक रुपक जे वर्णन अछि से अद्भुत अछि- 'हमरा तीनूमे कुमुदनाथ अद्भुत सुदर्शन छल।एकदम कमलक फूल जकाँ रतरत,पानिसँ टटके बहरायल सन। से प्रेम ओ सौन्दर्यक चासनी सेहो यत्र-तत्र छिड़िआयल भेटैत अछि एहि संग्रहक कथा सबमे।पर्यावरणीय सुन्दरताक वर्णन करबामे तँ महारति हासिल छनिहें कथाकारकें।ग्रामीण जीवनक गहेगह पसरल सुन्दरताकें कथानकक माध्यमसँ सटीक प्रस्तुतिक अद्भुत कलाशील्पी छथि कथाकार। सम्बन्ध-बन्धमे आबि रहल क्षरण,पति-पत्नी के सम्बन्धमे भ' रहल टुटनक बीच कोना बचल अछि संवेदना कथा 'अन्तर' मे कतेक नीकसँ फरिछबैत छथि।पति द्वारा एकटा दोसर स्त्रीकें जे धोखा देल जाइत अछि संगहि सुगिया स्वयं प्रतारित होइत अछि।मुदा एकटा स्त्रीक पीड़ा स्त्रीए बुझि सकयै से सुगिया पतिक द्वारा एकटा दोसर स्त्रीकें देल गेल धोखासँ व्यथित होइत अछि आओर अपन पुत्र सूर्यनारायणक विरोधक बाबजूदो सतौत अरुणकें अपनबैत अछि। तहिना 'अखंड दीप' कथामे सेहो पाखीक संग धोखा होइत छैक।मुदा पाखी होस करैत अछि अपना मायक देखभाल करैत अछि।अखंड दीप बेटीक आत्मनिर्भर्ताक कथा अछि।उत्तरदायित्वक कथा अछि।जँ बेटा अपन माय-बापक भार नहि उठायत तँ की बेटियो छैड़ि दैतै बूढ़ ,बीमार माय बापकें।नै, बेटी सब आब साकांक्ष भेल अछि,आत्मविश्वासक संग अपन दायित्वक निर्वहन क' रहल छथि। एहि तरहें  एहि संग्रहक एक सोरहि कथा पढ़लाक बाद अहाँ एकैसम शताब्दीक मैथिली कथाक विकासकें अकानि सकैत छी।मिथिलाक समाज कोन नीक -बेजाय स्थितिसँ गुजरि रहल अछि से नीकसँ अनुभव क'  सकैत छी।कथाकार गाममे रहैत छथि एकर मतलब ई नहि जे ओ नगर-महानगरक घटना-परिघटनासँ अनभिज्ञ छथि।ओ पूरा अद्यतन छथि।चाहे ओ घटना गामक कोनो गलीक हुए वा युरोप ,अमेरिकाक कोनो नगरक।हँ,हिनक ग्रामवाससँ मैथिली साहित्यकें एकटा पैघ लाभ ई भेटि रहल छैक जे आब संसारक प्रायः भाषाक प्रायः लेखक नगर-महानगरमे निवास करैत छथि।मैथिलीयोक बेसी एहने छथि।तखन जे किछु लोक गाममे रहिक' लेखन क' रहल छथि ओ बुझल जाय जे भाषाकें किछु विशिष्ट लाभ भ' रहल छैक।से शिवशंकर श्रीनिवासजीक कथा  लेखनसँ मैथिली साहित्य बहुत समृद्ध भ' रहल अछि।हिनक कथा एकटा भरोस दैत अछि जे मैथिली कथा सेहो अन्य भारतीय भाषाक कथाक समक्ष सीना तानि क' ठाढ़ भ' सकयै। १४.रबीन्द्र नारायण मिश्र-बेजोड़ छथि श्री शिवशंकर श्रीनिवास रबीन्द्र नारायण मिश्र (संपर्क-9968502767) बेजोड़ छथि श्री शिवशंकर श्रीनिवास १८ जनबरी २०२५क हम दिल्लीसँ मधुबनी पहुँचलहुँ। किछु दिन गामक काज सभमे लागल रहलहुँ। तकर बाद किछु स्थानीय साहित्यकारलोकनिसँ भेंट करबाककार्यक्रम बनाबए लगलहुँ। एही क्रममेहम मैथिलीक वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय श्री शिवशंकर श्रीनिवासजी मोन पड़लथि।दूसाल पहिने एक बेर दिल्ली द्वारका स्थित हुनकर जमाएक डेरापरहुनकासँ भेंट भेल छल।ओहि दिनहुनकर व्यवहारसँ बहुत प्रभावित भेल रही। ओहि दिन हुनकर पत्नी अस्पतालमे भर्ती रहथिन। मुदा हमरासँ भेंट करबाक लेल ओ अस्पतालसँ डेरा आबि गेल रहथि। हुनकर बेटी,जमाएसभ हमर स्वागतमे लागल रहलथि।हम हुनका अपन किछु पोथीसभ देने रहिअनि। ओहिमे हमर उपन्यास,हम आबि रहल छी, सेहो सामिल छल। किछु दिनक बाद ओ एहि उपन्यासकेँ पढ़लनिआ अपन बहुत सकारात्मक प्रतिक्रिया देलथि।हम एहि बातसँ बहुत उत्साहित भेल रही। हम श्रीनिवासजीसँह्वात्सअपपर संपर्क केलिअनि।हुनका अपनकार्यक्रमक बारेमे कहलिअनि। ओ तुरंत अपन गाम अएबाक आग्रह केलनि,अपन पता पठा देलनि। आइ जाएब,काल्हि जाएब करैत-करैत समय बीतैत गेल। एकदिन हुनकासँ फोनपर गप्प भेल तँ ओ २४ मार्च २०२५ कएपटना होइत दिल्ली जेबाक सूचना देलनि। आब तँ किछुएदिन बाँचल छल। हम दोसरे दिन हुनका लोहना जेबाक लेल टैक्सीक ओरिआनमे लागि गेलहुँ।मधुबनीमे टैक्सीक व्यवस्था नीक नहि अछि। जे से किराया लैत अछि,ओहूपर सँ कतेक तरहक असुविधाक संभावना बनले रहैत अछि। समयक कोनो पाबंदी नहि,व्यवहारक कोनो मर्यादा नहि,किछु बाजि सकैत छथि।एहिसँ नीक आटो बला सभ अछि जे सुभ्यस्तो होइत अछि आ सामान्यतः विनम्रो। मुदा लोहना जेबाक लेल आटो भेटल नहि।आखिर एकटा टैक्सी बलासँ बात तय भेल।ओकरा अपन गंतव्य आ समय बतओलिऐक। सभ बात बुझलाक बात ओ अपन स्वीकृति देलक। १९ अप्रैल २०२५ कए नियत समयपर टैक्सी आबि गेल। टैक्सी बला ओना ठीक-ठाक लोक बुझेलाह,मुदा हुनका लोहना जेबाक मार्गक स्पष्ट जानकारीनहि छलनि।हम हुनका श्रीनिवासजीसँ गप्प करा देलिअनि। ओ मधुबनीसँ लोहना जेबाक रस्ताक सही जनतब हुनका देलखिन।मधुबनीसँ रामपट्टी-भगवतीपुर-बिरौल चौक-(दक्षिण दिस मुड़ि जाउ) -रैमा-रुपौली आ तकर बाद लोहना।ओना हम एहि इलाकामे एक बेर बरिआतीक क्रममे गेल रही। मुदा रातिक समय रहैक,कोनो बहुत जानकारी नहि भए सकल छल। एहि बेर बाध-बोन देखैत-सुनैत करीब घंटा भरिमे हम लोहना पहुँचि गेलहुँ। लोहनापहुँचबासँ पहिने हुनकर फोन कैक बेर आबि गेल छल। जखन हमसभ हुनकर घर लग पहुँचलहुँ तँ ओ अपन दनानसँ सटले रोडेपर हमर प्रतीक्षा कए रहल छलाह।हम टैक्सीसँ उतरलहुँ आ हुनका नमस्कार करैत हुनके संगे हुनकर घरक ओसारापर पहुँचि गेलहुँ। हमसभ आपसमे गप्प-शप्प कइए रहल छलहुँ कि एकटा शोधार्थी सेहो आबि गेलाह।बीच-बीचमे हुनकर शोधपत्रपर अपन टिप्पणी आ ओहिमेसुधारक संभावित विषयपर सेहो ओ मार्गदर्शन दैत रहलखिन।हमर भातिजप्रसिद्ध कवि आदरणीय श्री राज किशोर मिश्रजी आ हुनकर साहित्यिक कृतिक चर्चा सेहो ओ केलनि।प्रसिद्ध कथाकार श्री अशोकक चर्चा सेहो भेल। कहलथि जे ओ गाममे रहितथि तँ अबस्स अबितथि आ सभगोटे संगे बतिबितहुँ। असलमे अशोकजी हुनकर अभिन्न मित्र आ ग्रामीण छथिन। दुनूगोटे एक्के विधा,कथामे लिखैत छथि, संगे समीक्षको छथि।हुनका लोकनिक आपसी सिनेहक चर्चा पहिनहु सुनने छी। बादमे अशोकजी ह्वात्सअपपर हमर एहि यात्राक चर्चा केलनिप्रसन्नता व्यक्त केलनि। श्रीनिवासजीक सरलता,विनम्रता आ अपनत्व भाव ककरो मोहित कए सकैत अछि। ओहिठाम पहुँचितहि लगैत छल जे कोनो अपन आदमीसँ भेंट भए रहल अछि। बरषहि जलद भूमि नियराए,जथा नबहिबुध विद्या पाए। तुलसी रामायणक उपरोक्त कथन सद्यः प्रमाणित भए रहल छल। विश्वास नहि भए रहल छल जे मैथिलीक एहन प्रसिद्ध आ सफल कथाकार, साहित्यक एतेक पैघ विद्वानसँ भेंट भए रहल अछि। अतिसय सहज आ स्वाभाविक मुस्कान हुनकर व्यक्तित्वक आभाकेँ चमत्कृत कए रहल छल। सही मानेमे हुनका संग बिताओल गेल प्रत्येक क्षण आनन्ददायी छल। एहन विलक्षण व्यक्तित्वक लोकसँ भेंट कए हम सरिपहु बहुत आनन्दित भेल छलहुँ। लगभग दू घंटा हम हुनका ओहिठाम रहलहुँ।हुनकर श्रीमतीजी ताधरि जलखैकक ओरिआनमे लागल रहलीह।कहि नहि सकैत छी जे कतेक स्वादिष्ट छल ओ भुजल चूरा आ आलूक चप। कैक बेर परसन लए कए हम खाइत रहलहुँ।ओ जलखै नहि,अपितु भोजन भए गेल। रातिमे मधुबनी डेरापर वापस अएलाक बाद किछु भोजन करबाक जरुरति नहि रहि गेल। आब साँझ पड़ि रहल छल। टैक्सी बलाक संग तय समय सीमाक अधीन वापस हेबाक छल। हम सभ चाह पीलहुँ।श्रीनिवासजीकेँ आ ओतए उपस्थित शोधार्थीकेँ अपन लिखल उपन्यासदेलिअनि।तकर बाद हम ओहिठामसँ बिदा हेबाक लेल हुनकासँ आज्ञा लेलहुँ। फेर ओएह रस्ता,ओएह बाध-बोन। मुदा एहि बेर दुबिधा नहि छल,तेँ सुगम लागि रहल छल। सूर्यास्त भए रहल छल।भगवान सूर्यकेँ मोने-मोन प्रणाम केलहुँ ।मोनमे बहुत संतुष्टिक भाव छल।हम वापस मधुबनी स्थित अपन डेरापर पहुँचि गेलहुँ।हमरा बहुत प्रसन्न देखि श्रीमतीक उत्सुकता बढ़लनि।हुनका सभटा बात कहलिअनि।ओ कहलीह- “अपन समाजमेअखनहु एहन लोकसभ छथि,से बहुत गौरवक बात।” हम दुनू बेकती बड़ी काल धरि आजुक यात्रापर चर्चा करैत रहि गेलहुँ। १५.केदार कानन-एक निस्सन कथाकार केदार कानन (संपर्क-7004917511) केदार काननजीक लेख हुनकर हाथक लिखल देल जा रहल अछि। मैथिलीमे किछुए लेखक केर लीखब सुलेखक गिनतीमे आबै छै जाहिमे केदारजी एक छथि। भविष्यक पाठक हिनक सुलेखकेँ देखि सकथि तँइ ई बिना टाइप केर दऽ रहल छी (संपादक)। १६.जगदीश चंद्र ठाकुर 'अनिल'- किए हँसै छथि गोपीनाथ जगदीश चंद्र ठाकुर 'अनिल' (संपर्क-9570635372) किए हँसै छथि गोपीनाथ श्री शिवशंकर श्रीनिवास जीक कथा संग्रह गुणकथाक पहिल कथा थिक 'साहूकारी'। हमरा लेल ई कथा श्रेष्ठ कथाक श्रेणीमे अछि। ई कथा पढलाक बाद हमरा सोझाँ उपस्थित भ गेल एकटा विराट संसार, जाहिमे हम सभ गोटे रहैत छी, जाहिमे पवित्रता जीवनक प्राथमिकतामे नहि रहि गेल अछि। एहि वातावरणमे सभ ठाम सभ क्षेत्रमे नैतिकता अनिवार्य नहि, एच्छिक भ गेल अछि। सभ ठाम आत्मबलक कमी भ' गेल अछि। आत्मबलक अभावमे लोक अपनाकें असुरक्षित मानैत अछि आ सुरक्षाक लेल अहिंसा, सत्य, आस्तेय, बह्मचर्य, अपरिग्रह अथवा शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय आ ईश्वर प्राणिधानसँ बहुत दूर होइत चल गेल अछि। गोपीनाथ सन किछुए लोक सभ ठाम छथि जे एकटा स्वस्थ जीवन जिबैत अपन कर्मसँ पित्रृऋण, देवऋण आ ऋषिऋणसँ मुक्त हेबाक आदर्शकें अपन जीवनक लक्ष्य मानैत छथि। एहि कथाक अन्तमे अछि जे मास्टर गोपीनाथकेँ मोन पडलनि नेवालाल बनियाँ जकराद' लोक कहै जे नेवालाल अपन घरवालीकें तखने टोकै छै जखन ओकरासँ आमदनी बुझाइ छै, गोपीनाथकेँ हँसी लागि गेलनि, गोपीनाथ हँस लगलाह, ठहक्का मारिक' हँस लगलाह। गोपीनाथकें किए मोन पडलखिन नेवालाल, आइ तँ अपन नेनपनक संगी अमरनाथ रस्तामे भेटल छलखिन, से किए नहि मोन पडलखिन, आइ त छोट पुत्रसँ सेहो फोनपर गप भेल छलनि, ओ किए नहि मोन पडलखिन, पत्नी किए नहि मोन पडलखिन, नेवालाल किए! की ओ नेनपनक संगी अमरनाथमे, अपन छोट पुत्र आ अपन पत्नी सभमे नेवालाल बनियाँक सोचकेँ अनुभव करबाक कारणें ठहक्का मारिक हँस लगलाह? की नेवालालक सोच आइ सम्पूर्ण समाजक सोच बनि गेल अछि? मास्टर गोपीनाथक ठहक्का स्वस्थ चिन्तनक लेल एकटा गम्भीर प्रश्न ठाढ करबामे सफल भेल अछि,, 'एहन सोचक संग मानवता कतय पहुँचत, अन्हारसँ इजोतदिस आकि इजोतसँ अन्हार दिस?' एहि उत्कृष्ट कथाक लेल कथाकारकें बहुत-बहुत धन्यवाद। १७.आशीष अनचिन्हार-मीना मधु जी केर रचना संसार आशीष अनचिन्हार (संपर्क-8134849022) मीना मधु जी केर रचना संसार मीना मधु जीक रचनात्मक परिचय देबासँ पहिने हम अपने द्वारा संपादित पोथी 'प्रीति कारण सेतु बान्हल' (जे कि गजेन्द्र ठाकुर एवं प्रीति ठाकुरजीक काजक आलोचनात्म मूल्याकंन अछि तकर) भूमिकाक एकटा अंश दऽ रहल छी- "हम जतेक जनैत छी ताहिमे ई पोथी संभवतः मैथिलीक एहन पहिल पोथी अछि जाहिमे एकै संग रचनाकार पति-पत्नीक मूल्यांकन कएल गेल अछि। प्रसंगवश ईहो जानब उचित जे ‘पोथी प्रकाशन वर्ष’क आधारपर प्रीति ठाकुर, गजेन्द्र ठाकुरसँ वरिष्ठ रचनाकार छथि। जखन कि मैथिलीमे उल्टा होइत छै। पतिक पोथी पहिने आ पत्नीक पोथी बादमे या बहुत बादमे प्रकाशित होइत छै। किछु पत्नीक पोथी प्रकाशितो नै होइत छनि। सियाराम झा 'सरस' जीक देल सूचनाक आधारपर नीरजा रेणु एवं किशोरनाथ झा केर बाद ई संयोग घटित भेल अछि। एहिठाम ईहो कहब उचित जे किशोरनाथ झा मूलतः संस्कृत केर विद्वान एवं लेखक छथि। संस्कृतमे हुनक पोथी नीरजाजीसँ पहिने प्रकाशित भेल छनि। ओना सरसजी एक-दू नाम आर कहने रहथि जेना नरेन्द्र झा एवं पन्ना झा मुदा तजबीज केलापर पहने पतिक प्रकाशन सामने आएल। जे किछु हो एहन प्रवृति रेयर छै आ मैथिलीक स्त्री-विमर्शकार सभकेँ एहि बातक संज्ञान लेबाक चाही। प्रसंगेवश पाठक ईहो जानथि जे जाहि गामक गजेन्द्र ठाकुरजी छथि ताही गाममे हुनकासँ बहुत पहिने रचनाकार दंपति गोपाल झा 'गोपेश' एवं प्रभावती झा सेहो भेल छथिन” आब एहि भूमिकासँ अलग हटि आबि जाइ मीना मधुजीपर। मीना मधु जीक पहिल कथा हुनक मूल नाम (वसुन्धरा देवी)सँ उपमान पत्रिका केर जुलाइ-सितंबर 2023 केर अंकमे भेल छल जकर शीर्षक छलै 'की आर खिस्सा कहू'। दोसर कथा मीनू मधु (गलतीसँ मीना बदला मीनू भऽ छपल) फेरो उपमाने पत्रिका केर कथा विशेषांक जनवरी-मार्च 2024 अंकमे प्रकाशित भेल जकर शीर्षक छलै 'जगनू आ सोनू'। तेसर कथा 'दालि दड़री...' शीर्षकसँ अरूणिमा नामक स्मारिका (वर्ष-2024) मे प्रकाशित भेल आ चारिम कथा 'पिरितक रंग' शीर्षकसँ फेरो अरूणिमे स्मारिकामे वर्ष 2025 मे छपल। एहि तरहें एखन धरि मीना मधु जीक कुल चारि कथा प्रकाशित अछि आ लगभग 13-14 टा कथा अप्रकाशित छनि संगहि एक गोट उपन्यासक पांडुलिपि सेहो अप्रकाशित छनि। ऊपरक ई रचना संसार छनि मीना मधुजीक। हमरा लग ई प्रश्न रहिए जाइए जे आखिर शिवशंकरजीक पत्नी रहितो मीना मधुजीक साहित्यिक यात्रा अतेक कम किएक रहलनि? एहन नै जे मैथिलीमे अतबे पति-पत्नी साहित्यकार छथि, आरो छथि जाहिमे प्रदीप बिहारी-मेनका मल्लिक सेहो छथि। मेनकाजीक लेखन विपुल छनि मुदा प्रदीप जीक तुलनामे कम। ई सत्य सभ युगल रचनाकार लेल कमोबेस अछि, एकर अपवाद कियो नहि छथि वर्तमानमे। आब पाठक फेरो ऊपर जा कऽ देल गेल भूमिकाक अंश पढ़थि, सुविधा रहतनि। कहल जा सकैए जे परिवारक जिम्मेदारी लैत-लैत स्त्री अपन प्रतिभाकेँ बिसरि जाइत अछि (अथवा की जे मजबूरीमे बिसरि जाइत अछि)। खएर मीनाजीक जतबे रचना छनि तकर प्रकाशनक समुचित व्यवस्था हो आ ओकरा पोथी रूप देल जाए आ ताहिपर समुचित चर्चा-परिचर्चा हो। १८.डा. शैलेन्द्र मिश्र-श्री शिवशंकर श्रीनिवासक कथा-संसार एकटा मूल्यांकन डा. शैलेन्द्र मिश्र (संपर्क-7600744801) श्री शिवशंकर श्रीनिवासक कथा-संसार: एकटा मूल्यांकन मैथिली कथाक इतिहास बहुत पुरान अछि आ एखन तक एक सँ बढ़ि एक कथाकार भेलाह। शिवशंकर श्रीनिवास मैथिलीक एकटा सशक्त हस्ताक्षर छथि। लोकप्रियताक संगहि मिथिला–मैथिलीक भावनात्मक ओ भौगोलिकता के प्रमुख रूप सँ अपन कथा सभ मे एकटा माँजल चित्रकार जकाँ चित्रित केने छथि। हिनकर कथा मैथिल समाजक बदलैत सामाजिक–सांस्कृतिक मूल्यक एकटा ऐतिहासिक दस्तावेज़ कहल जा सकैत अछि। सामाजिक सरोकार, संस्कृति ओ व्यवहारक बदलैत स्वरूप आ आधुनिकता कोना सभटा पुरान व्यवस्थाकेँ ध्वस्त क’ रहल छै तकर वर्णन छन्हि। हिनकर कथा सब मानवीय संवेदनाक जीवंत उदाहरण छै चाहे ओ विभिन्न धर्माबलम्बी के बीच सौहार्द हो वा विभिन्न जातिक बीच। हिनकर कथा एहन घैल सन सुगढ़ रहैत अछि जाहि मे कोनो पात्रक महत्ता कम कऽ कऽ नै देखल जा सकैत अछि। लगभग सभ कथाक पृष्ठभूमि मिथिलाक छन्हि मुदा यदि मिथिला सँ बाहरो कोनो कथाक पृष्ठभूमि छै तँ ओकर सभ पात्र ओ घटना मिथिलाक इर्द-गिर्द घुमैत चलि जाइत छै। श्रीनिवास जी कथाकारक रूप मे अपन कथाक माध्यम सँ बहुत संदेश दऽ जाइत अछि। जेना अमेरिकाक नोबल पुरस्कार सँ सम्मानित विख्यात कवि रॉबर्ट फ्रॉस्ट के बारे मे कहल जाइत छै जे हुनकर कविता सभ एकटा दृश्य सँ शुरू भऽ कऽ एकटा विचार पर समाप्त होइत अछि तहिना शिवशंकर श्रीनिवास जीक कथा कोनो दृश्य सँ शुरू भ’ कोनो ने कोनो संदेश दैत अछि। जौं नारी सशक्तिकरणक बात हुए तँ हिनकर कथाक स्त्री पात्र सभ बहुत मजगूत छन्हि कतेको पात्र तँ खाम्ह जकाँ मजगूत। मानवीय सम्बंध ओ स्त्री-पुरुषक बीचक सम्बंधकेँ बहुत महीन रूप सँ वर्णन हिनकर कथा मे भेटैत अछि। एकटा रुमाल हेरेनाइ के घटना सँ शुरू भऽ पति–पत्नीक बीच संबंधक महत्व ओ जरूरत के देखबैत ‘रुमाल’ शीर्षक नामक कथा बहुत भावपूर्ण अछि जतय मुख्य पात्रकेँ अपन पत्नीक प्रति प्रेम ओ अनुराग दोसर पात्रकेँ सोचवा पर मजबूर कऽ दैत छै जे कोनो वस्तुकेँ खाली छोट ओ पैघ, दामी की सस्ता देखि नै बल्कि ओकर देबय बलाक मोन सँ अँकबाक चाही आ पुरुख ओ स्त्री एक दोसराक बिना अपूर्ण होइत अछि बिना एक दोसराक सहारा बानि जीवन कटनाइ बहुत मोश्किल होइत छै। पत्नीकेँ मोजर ओ सम्मान देने जीवनक रस्ता आसान भऽ जाइ छै। बदलैत मानवीय परिदृश्यक कथा सभ तँ आरो बहुत मारुख छन्हि आ मिथिलाक संस्कार ओ परिवेश लेने कथा सम्पूर्ण भारतक बनि जाइत अछि केना पुरान पीढ़ी अपन धिया-पूताकेँ कष्ट सँ पढ़बैत अछि मुदा जखन ओ संतान काबिल भऽ जाइ छै तँ कोना ओ अपन माए-बापकेँ मोजर देनाइ कम कऽ दैत अछि। वस्तुतः शिवशंकर श्रीनिवास जी आधुनिकता के बिहाड़ि मे टूटि रहल सामाजिक पारिवारिक परिवेशक कथा बहुत मार्मिक रूप सँ केने छथि। बुजुर्ग पीढ़ी कोना अंतर्जातीय, अंतर्राज्यीय आ अंतर्राष्ट्रीय विवाहकेँ सेहो आइ काल्हि स्वीकार कऽ लैत छथि मुदा अपन बेटा-पोताक तिरस्कार सँ कोना टूटि जाइत अछि तकर बेजोड़ उदाहरण हिनकर लिखल ‘मनुक्ख नदी थिक’ शीर्षक नामक कथा अछि। एहि कथा मे श्यामजी नामक मुख्य पात्र जे कि 85 बरिखक छथि से केना पत्नीक मुइने अपनहि बेटा–पोताक उपेक्षाक शिकार भऽ जाइत छथि। एहि निर्मम संसार मे नै ओ अपन पुरखा लेल कोनो आदर रहलै आ ने कोनो संवाद। संवादहीनता ओ पत्नीक जीवन मे महत्व लेने हिनकर ई कथा आइ–काल्हिक समाजक दर्पण अछि। हिनकर कथा ‘सिनुरहार’ हम जखन पहिल बेर पढ़ने रही तँ बुझा गेल छल जे हिनका लेल समाजक एकटा छोट–छोट सामाजिक सरोकार सँ जुड़ल विषय कतेक महत्वपूर्ण अछि। ‘सिनुरहार’ कथा वस्तुतः कल्याणी नामक केन्द्रीय नारी पात्रक चारु तरफ घुमैत अछि। एकर विषय छै ब्राहमण जाति मे विधवा पुनर्विवाह आ ओकर बाद समाजक नजरिया। आब तँ साधारण गप भऽ गेल मुदा जाहि समय मे ई कथा लिखल गेल ओहि समय ब्राह्मण वर्ग मे विधवा पुनर्विवाहकेँ लोक नीक रुपे नहि देखैत छल। दोसर जाति मे विधवा पुनर्विवाह प्रचलित छल। हिनकर दूर-दृष्टि ओ कथाक प्रस्तुति बहुत विशिष्ट अछि। शिवशंकर श्रीनिवासकें अपन पुरान पीढ़ी सँ फराक एहि दुआरे छथि कियाक तँ हिनकर कथाक मुख्य पात्र समाजक कमजोर वर्ग रहैत छन्हि, आर्थिक रूप सँ कमजोर, शोषित, वंचित आ स्त्री सभ हिनकर केन्द्रीय पात्र रहैत छन्हि। शिवशंकर श्रीनिवास मैथिली कथा-साहित्यक परंपराकेँ नहि केवल समृद्ध करैत छथि, बल्कि ओहि मे नूतन दृष्टिकोण आ संवेदनशीलता जोड़ैत छथि। हुनकर कथा सभ पाठककेँ केवल पढ़बाक अनुभव नहि, बल्कि सोचबाक प्रेरणा दैत अछि। १९.आशीष अनचिन्हार-या तऽ अपूर्ण शीर्षक या तऽ अपूर्ण पोथी आशीष अनचिन्हार (संपर्क-8134849022 या तऽ अपूर्ण शीर्षक या तऽ अपूर्ण पोथी मैथिली उपन्यासक आलोचना' ई पोथी छनि शिवशंकर श्रीनिवासजीक जे कि बर्ख 2021 मे प्रकाशित भेल अछि। जेना कि नामसँ पता चलि रहल अछि जे ई मैथिलीमे उपन्यास विधाक आलोचनापर आधारित अछि आ एहि पोथीक भीतर जे लेख छै तकरा हम सभ विस्तृत रूपें देखी। एहि पोथीमे अशोक जीक लिखल भूमिका छनि आ तकरा बाद शिवशंकरजीक कुल 12 टा आलेख छनि। एहि 12 टा आलेखक शीर्षक ओहि आलेखक विवरण निम्नवत् अछि- 1. मैथिली उपन्यासक आलोचना एहि आलेखमे लेखक आलोचना विधाक चर्चा करैत उपन्यास विधापर कतेक आलोचनाक पोथी आएल अछि तकर सूचना पाठककेँ दैत छथि। ई आलेख सूचनाक संदर्भमे उपयोगी अछि। 2. मैथिली उपन्यासक संरचना शिल्प एहि आलेखमे लेखक संरचना. शिल्प आ शैली एहि तीनू शब्दकेँ मिझरा देने छथि आ एक शब्द 'संरचना शिल्प' बना देने छथि। हमरा ई उचित नहि लागल। हमरा जनैत कोनो विधाक संरचना अलग होइत छै आ ओकर शिल्प अलग। एकरा एना बूझू जे कथा केर संरचना अलग होइत छै आ कविता कि उपन्यास आ कि नाटकक संरचना अलग। शिल्प कहबाक तरीका भेलै एकै शिल्प मने कहबाक तरीकासँ कवितो लिखा सकैए आ नाटको। मुदा संरचना पूरा अलग हेतै विधाक। हमरा ई बात एहू कारण लागल जे शिवशंकर जी 1989 केर लगीचमे रमेश जीक लिखल कथित गजल संग्रह 'नागफेनी' केर भूमिका लिखने छथि आ ओहूमे विधा (गजल) केर संरचनापर अपन भ्रामक मान्यता लिखने छथि। 3. निर्माणक भूमिका: 'अभिमानिनी' ई आलेख काञ्चीनाथ झा 'किरण' जी केर अप्रकाशित उपन्यास "अभिमानिनी" केर पांडुलिपिपर आधारित अछि आ संगहि हरिमोह झाक 'कन्यादान'क संगे ओकर तुलना सेहो कएल गेल छै। नव पाठक लेल ई आलेख निश्चित रूपें पठनीय अछि। आ एहि आलेखक ऐतिहासिक महत्व छै। 4. 'कन्यादान' समाजकें सतर्क करैत अछि ई आलेख हरिमोहन झाक उपन्यास 'कन्यादान'पर अछि आ हरेक पाठक लेल उपयोगी अछि। 5. एहन उपन्यास सभ दिन प्रासंगिक रहत ईहो लेख उपन्यास 'कन्यादान'पर अछि आ पाठक दूनू आलेख एक संग जोड़ि पढ़थि तँ बेसी उपयोगी रहतनि। 6. डा. शैलेन्द्रमोहन झाक उपन्यास 'प्रतिमा' ओ 'मधुश्रावणी' एहि आलेखक ऐतिहासिक महत्व छै कारण उपन्यास 'मधुश्रावणी' तऽ विश्वविद्यालयक कोर्समे छै तँ विद्यार्थी वा पाठक लेल सुलभ छै मुदा डा. शैलेन्द्रमोहन झाक अचर्चित उपन्यास 'प्रतिमा'पर लीखि शिवशंकरजी हमरा सन पाठकपर उपकारे केलखिन्ह अछि। 7. यात्रीक 'बलचनमा' ई आलेख यात्री जीक उपन्यास 'बलचनमा'पर अछि आ हरेक पाठक लेल उपयोगी अछि। एहि आलेखमे बलचनमा उपन्यासक मैथिली पाठ आ हिंदी पाठपर चर्चा भेल अछि संगहि महन भारद्वाजजीक विचार सेहो राखल गेल अछि। मुदा शिवशंकर जी समेत सभ पाठककेँ सूचित करबनि जे बलचनमाक मैथिली पाठ केर प्रकाशक मिथिला सांस्कृतिक परिषद्, कलकत्ता केर कर्ता-धर्ता स्व. किशोरीकांत मिश्रजीक बालक दयाशंकर मिश्र केर एक लेख 'बलचनमा' प्रकाशनक प्रसंग श्री तारानंद वियोगी जीक अनर्गल प्रलापक संदर्भमे नामसँ मैथिली पुनर्जागरण प्रकाश नामक मैथिली अखबारक 31 जुलाइ 2023 मे प्रकाशित भेल। दयाशंकरजीक उक्त आलेखसँ मैथिलीक बलचनमाक प्रकाशनक संदर्भमे भेल सुविधा-असुविधाकेँ आजुक पाठक समक्ष तर्कसंगत रूपें राखल गेल अछि आ बहुत रास भ्रम केर खंडन भेल अछि। 8. नवतुरिए आबओ आगाँ ई आलेख यात्री जीक उपन्यास 'नवतुरिया'पर अछि आ हरेक पाठक लेल उपयोगी अछि। मुदा हमरा एक बात खटकल अछि। बलचनमा बला आलेखमे शिवशंकरजी ओकर मैथिली आ हिंदी दूनू पाठ केर चर्चा करैत छथि मुदा एहि आलेखमे नवतुरिया केर हिंदी पाठ (जे कि 'नयी पौध' नामसँ छै) केर कोनो चर्चा हमरा नहि भेटैत अछि। आब ई सायास भेल छै कि अनायास से शिवशंकरेजी कहि सकै छथि। 9. ललितक उपन्यास ‘पृथ्वीपुत्र' ई आलेख ललित केर उपन्यास 'पृथ्वीपुत्र'पर अछि आ हरेक पाठक लेल उपयोगी अछि। एहि आलेखक विशेषता अछि जे कलपू मिसर आ बिजलीक प्रेमकेँ संदर्भमे उपन्यासकार ललितक युगबोधकेँ आधुनिक आ सामंतवादी कसौटीपर कसब। पाठक लेल ई एकटा नव दृष्टिकोण भेल। 10. धीरेन्द्रक उपन्यास ई आलेख धीरेन्द्र जीक कुल तीनू उपन्यास (1. भोरुकवा, 2. कादो आ कोइला 3. ठुमुकि बहू कमला) पर अछि आ हरेक पाठक लेल उपयोगी अछि। ई आलेख एहू लेल उपयोगी अछि से पाठककेँ एकै आलेखसँ धीरेन्द्रजी सभ उपन्याक परिचय भऽ जेतनि। 11. श्रीमती लिली रेक उपन्यास 'मरीचिकामे' समाज लिली रे जीक उपन्यास 'मरीचिका' (दूनू भाग)मे चित्रित समाजक मीमांसा अछि ई आलेख आ पाठक लेल उपयोगी अछि। 12. उपन्यास: ‘दू धाप आगाँ' ई आलेख दिलीप कुमार झा केर उपन्यास 'दू धाप आगाँ'पर अछि आ हरेक पाठक लेल उपयोगी अछि। पाठक जखन एहि शीर्षक सभसँ गुजरि जेता तखन हुनका मोनमे अनायास आबि जेतनि एहि पोथीमे मैथिलीक आरंभिक उपन्यास सहित बहुत रास मध्यकालीन ओ आधुनिक उपन्यासपर किछु नै लीखल गेल छै। ओना लेखक कहि सकै छथि जे सभ उपन्यासपर लीखब बाध्यता नै, से हमहूँ मानैत छी मुदा तखन एहि पोथीक शीर्षक 'मैथिली उपन्यासक आलोचना' कोना राखि देल गेलै। ई तँ भ्रामक शीर्षक भऽ गेलै, आ शीर्षकक अनुरूप पोथीक भीतरमे सामग्री नहि देल गेलै। पाठक शीर्षक देखि बुझतै जे एहिमे मैथिली उपन्यास विधाक संक्षिप्त रूपें आदिसँ एखन धरिक सूचना भेटत मुदा पोथी किनला ओ पढ़लाक उपरांत ओकरा हाथ निराशा लगतै। सभसँ निराशा केर बात ई जे मणिपद्म, प्रभाष कुमार चौधरी, सुशील, चतुरानन मिश्र, जगदानंद झा, केदारनाथ चौधरी, प्रदीप बिहारी, मधुकांत झा, अशोक कुमार ठाकुर, उषाकिरण खान सहित गजेन्द्र ठाकुर, रबीन्द्र नारायण मिश्र , जगदीश प्रसाद मंडल, राजदेव मंडल सन उपन्यसाकारक कृतिपर कोनो आलेख नहि भेटत। ओना शिवशंकरजी कहि सकै छथि जे ओहि पोथीक पहिल आलेख 'मैथिली उपन्यासक आलोचना' छै आ ओकरे पोथीक शीर्षक बना देल गेलै। मुदा हमरा जनैत ई तरीका खिस्सा-कहानी-कथा-कविता-गल्प आदि विधा लेल उपयुक्त छै ने कि आलोचना वा कि इतिहास विधा लेल। जँ शिवशंकरजी ऊपरक तर्क दै छथि तऽ ई मानब उचित जे लेखक आलोचना-इतिहास सन गंभीर विधाकेँ खिस्सा-कहानी-कथा-कविता-गल्प सन मानै छथि। मुदा हमरा बूझल अछि जे शिवशंकरजी ई तर्क नहि रखताह। शिवशंकरजी ईहो कहि सकै छथि जे बहुत रास नामक चर्च ओ ओही पोथीक पहिल दू आलेख (1. मैथिली उपन्यासक आलोचना, 2. मैथिली उपन्यासक संरचना शिल्प) मे केने छी। मुदा ई तर्क हमरा अपर्याप्त बुझाइए कारण एहि दू आलेखक बाद ओ किछु उपन्यासकारपर फूट-फूट चर्चा केने छथि। हमरा बुझने शिवशंकरजी पोथीक शीर्षक आ ओकर भीतरक सामग्रीक बीच तारतम्यता बनेबामे चूकि गेलाह से या तऽ जानि-बूझि कऽ भेल हेतै वा अनजानेमे। मैथिलीमे पहिनेहो एहन किछु पोथी हमरा भेटल जकर शीर्षक आ ओकर भीतरक सामग्रीमे ओतेक सामंजस्य नै रहल छै। हमरा बुझने शिवशंकरजीक ई पोथी ओहि कड़ी केर अग्रिम दाना छै। हमरा बुझने एहि पोथीक शीर्षक आ ओकर सामग्रीमे दू तरीकासँ तारतम्यता बैसाएल जा सकै छल- 1. एहि पोथीक शीर्षक जे छै तकरा संग कोष्ठकमे विवेचित उपन्यासकारक वा उपन्यासक नामक संग संदर्भ देल जा सकै छल-जेना मैथिली उपन्यासक आलोचना (काञ्चीनाथ झा किरण, हरिमोहन झा, शैलेन्द्र मोहन झा, यात्री, ललित, धीरेन्द्र, लिली रे ओ दिलीप कुमार झाक संदर्भमे) जरूरी नै जे एतेक नमहर शीर्षक मुख्यपृष्ठपर हो मुदा भीतरमे एक पन्ना ओनाहिते बेकार जाइत छै ताहूठाम सूचना देल जा सकैए अथवा भूमिकामे सेहो स्पष्ट कएल जा सकैए। जँ अतेक मेहनति नै करबाक हो तखन सीधे लीखू मैथिली उपन्यासक आलोचना (किछु उपन्यासक संदर्भमे)। पाठक लग त्वरित सूचना भेटि जेतै। 2. सभसँ हमरा नीक लगैत अछि कोनो विधाक आंतरिक प्रक्रियापर बात करैत आलोचना करब। जेना शिवशंकर जीक अही पोथीक पहिल जे दू आलेख अछि (1. मैथिली उपन्यासक आलोचना, 2. मैथिली उपन्यासक संरचना शिल्प) तेहने शीर्षकसँ मैथिलीक उपन्यास विधापर बात कऽ आ ओहिसँ संबंधित उपन्यासक चर्च करब। वस्तुतः हमरा बुझने इएह तरीका कोनो पोथी, लेखक आ पाठक लेल उपयोगी भऽ सकैए। मुदा शिवशंकरजी उपरोक्त दूनू कोनो तरीकासँ पोथी नहि लिखलाह जाहिसँ पाठककेँ या तऽ पोथीक शीर्षक भ्रामक लगतनि वा भीतरक सामग्री अपूर्ण। एहि संग हमरा उम्मेद अछि भविष्यमे शिवशंकरजी एवं आनो लेखक सभ एहि प्रकारक तारतम्यताक कमी बला पोथी लिखबासँ बचताह जाहिसँ पाठकक श्रम बचतनि आ पोथीक गुणवत्ता बढ़तै। ऊपरक नाम संबंधी विवेचनाकेँ देखी तऽ ई कहि सकैत छी जे एहि पोथीक शीर्षक अनुरूपें सामग्री नहि देल गेलै आ एक पाठक रूपमे हमरा अपूर्ण लागल। हँ ईहो हमरा स्वीकार करबामे कोनो संकोच नहि जे किछु तथ्य नव रूपें पाठक लग आएल छै आ हम पाठकक रूपमे ओहीसँ संतोष करैत छी। विदेह शिवशंकर श्रीनिवास विशेषांक पर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। विदेह ४२४ || 1 1 || विदेह ४२४

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विदेहक परमेश्वर कापड़ि , कम... : < @ m.facebook.com < € विदेहक परमेश्वर कापड़ि , कमला चौधरी आ ... ay @. Ashish Anchinhar eee I5 June 2076 at 27:27- 2. विदेहक परमेश्वर कापड़ि , कमला चौधरी आ वीरेन्द्र मल्लिक विशेषांक केर घोषणा Star की सभ गोटा जनै छी जे विदेह 205 मे तीन टा विशेषांक तीन साहित्यकारपर प्रकाशित केलक जकर मापदंड छल सालमे दूटा विशेषांक जीवित साहित्यकारक उपर रहत VA एकटा 60-70 वा ओइसँ बेसी सालक साहित्यकार रहता Ff दोसर 40-50 सालक ( मैथिली साहित्यकार मने भारत आ नेपाल दूनूक)। ऐ क्रममे अरविन्द ठाकुर ओ जगदीश चंद्र ठाकुर "अनिल"जीपर विशेषांक निकलि चुकल अछि। आगूक विशेषांक किनकापर हुअए ag लेल एक मास पहिनेसँ पाठकक सुझाव माँगल गेल छल। पाठ कक सुझाव आएल आ ओइ सुझाव अंतर्गत विदेहक दू टा अगिला विशेषांक परमेश्वर कापड़ि आ वीरेन्द्र मल्लिकजीक उपर रहत संगे-संग भोटिंगमे cher न॑ पर आएल कमला चौधरीजीपर हमरा सभ सेहो निकालब | हमर सबहक प्रयास रहत जे ई सभ विशेषांक जनवरी ओ फरवरी 2077 मे प्रकाशित gary मुदा ई रचनाक उपलब्धतापर निर्भर करत। मने रचनाक उपलब्धताक feared aay ऊपर-निच्चा ys सकैए। सभ Mes आग्रह जे ओ अपन-अपन रचना (आलोचना, समीक्षा, समालोचना, संसमरण आदि) 3 दिसम्बर 06 धरि ggajendra@videha.com पर पठा दी। लि हा sar arg ae बा की v eee OAs 75. | AZ

ea o © Be WB ad 490) एक <— Ashish Anchinhar Q és Ashish Anchinhar o- Jan 27, 2079 + & विदेह अपन कोनो अउअंकम्ने "साहित्यिक wera विश्शोष्पांक" 'निकात्तत (fern SBASCA) ताहि Aa अपने Sas निम्नतिलिस्वित विष्पयपर उात्लेख sife चाही। fees गोटाकेँ एहि टुऔआरे टैग Hs Yer STS Hem हमर free नै SIA इनव्को oT Ss स्वूच्चना पहुँच्यनि wars Ss GUST (दरभंगा-पटना-स्हरसा) मठाधीशा Bat ont दिक्कत Sar क्षमाप्रार्थी ह्की-- ५ साहित्य, Hort एवं सरकारी उऊउमसकादम्वी:- (वक) पुरस्कारक्क राजनीति @ सरवकारी अऊउमकादेमीसम्वे पैसव्वयाक गैर-त्नोकतांत्रिक विधान (गा) सत्तारुट St उमकादमी Hz काजक तौर-तरीका ad) Seas Sates Sat विरोधम्वे Baste तात्कात्निक स्समानांतर सत्ताक कार्यपद्धधति ( 98 5सँँ veast eR) S) उमकादेमी पुरस्कारम्वे urs फैक्टर: म्विथिक वा यथार्थ 2. व्यक्त्तिगत साहित्य संस्थान SIT पुरस्कारक राजनीति 3.प्रकाश्शन जगतम्वे Gare WETaR St Aza 4. मैथ्वित्नीक Sat Seas संगठन BAT उोकर पदाधिकारी PAMESH SITAIoT 5.Afah faarrs पसरत्त साहित्यिक weraee fafaer wa:- (कक) Usaha @a) उऊउमध्ययन-उऊध्यापन 6. =r Giepfiteeet a - oe = = ee Write a comment...

3 Ashish Anchinhar nee ही i0.October 2020. 2 No insights to show 6 (9 प्रदीप पुष्प, Kundan Kumar Karna and 72 others 5@ia

a face adap CPUSiag * : २०००- २०२५ 2 see © 2000- 202, “es as : a xc जज ve Vek Q | hs ys पथ 2 2 Ob आह 2 & ee ao. \e न 0 / एप el ae a =i =n Tj) _) aa = (c)2000- 2024] fade: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X | | | | (८)२०००- २०२७। FACS: ART HHA शाशिक छा-शणिका ISSN 2229-547X

Ashish Anchinhar's post x Ashish Anchinhar vee I February -@ विदेहक "स्व-निंदा विशेषांक” ई पूरा मैथिली साहित्य लेल एकटा नव प्रयोग हएत। संझवतः पूरा विश्वक साहित्य लेल ई नव प्रयोग हएत। ई सिरीज लेखकक इच्छापर प्रकाशित हएत माने जे लेखक चाहै छथि जे हुनका अपन दुर्गुणक बारेमे हुनक समाज, हुनक पाठक की विचार Te छनि से ओ लीखि सकैत छथि। एहिं सिरीजमे Hat प्रकारक प्रशंसात्मक आलेख aie रहत। जैँ कदार्चित्‌ आबियो गेल as HTS आलेखकें हटा देल जाएत। एहिं सिरीजक मूत्र उदयेश्य ई अछि जे लेखक अपन GT चीन्हि सकथि आ ओकरा हटा सकथि। आ एहिं सिरीज लेल जे पहिल नाम अछि ओ मेल "आशीष अनचिल्हार' माने हम अपने। हमरा बूझल अछि जे हमरा परोक्षमे बहुत लोक हमरा लेल बहुत रास निंदात्मक बात बाजै छथि मुदा आब समय आबि गेल अछि जे हाँ सम.ओकरा निधोख ats लीखि कर विदेहकें पठा सकैत छिये आ ओ ओहिना बिना कोनो काँट-छॉँटकें छपबो करतै। उम्मेद अछि जे विदेहक आन कार्यक्रम जकाँ ईहो सफल हएत आ भविष्यमे आनो लेखक "स्व-निंदा विशेषांक" लेल अपन नाम प्रस्तावित करता। उम्मेद अछि जे "आशीष अनचिन्हार" dot निंदात्मक आलेख अहाँ सभ लीखि ws जल्दिये पठाएब। विदेहक मेल अछि- editorial staftvideha@gmail.com Uig विशेषांक केर समय किछू आलेख एलाक बाद घोषित हएत। स्व-निंदाक शब्दकोशीय अर्थसँ बेसी एहिठाम तथ्यगत अर्थ ली से HEL Lakshman Jha Sagar Mukesh Anand water कुमार झा Kailash Kumar Mishra Siyaram Saras Pranaw Jha Mukund Mayank Bhairab Lal Das Kailash K Mishra Rajeev Ranjan Jha शैकर मचुपांश Prem Kant Choudhary Vidyanand Jha Roshan Jha Dilip Kumar Jha Anjay Chaudhary Nabo Narayan Mishra Hirendra Kumar Jha Arvind Thakur Kamal Mohan Chunnu Kedar Kanan Jeeban Mishra Akhila Nand Jha Raman संजीव मिथिलाकिड्कर Gangesh Gunjan

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56 ॥ fade 828 परिशिष्ट-५ of सभ विद्वान ओ लेखक रचनात्मक सहयोग करथि a fade पत्रिका बिना मंच-मचानकें 'पं. गोविन्द झा शती' केर आयोजन Hs झिकेए 7 NaC RATS ©O प्रदीप पुष्प, Kundan Kumar Karna and 72 others iIs@ ia

fade v2v ॥ 57 पा 2 न VRS face fidcapd ustad घर घर & ee ASS किसे, — ४77 y wag — Ce — gE = सह हक नमी | ! ee (c)Roco- 2024! विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X —| चर्च... 2220-547 |

62 || विद्रेह 20 शिवशंक्रर श्रीनिवास एवं gare परिवारक फोटो सभ- लि श्र

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बिढ्ेह उर्ठ ॥ 65 फोटो-3 लेखिका मीना मधु; फोटो-१ शिवशंकरनी अपन बच्चाक

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figs vex ॥ 67 im y 4) जन न ै ##/ vA SF » फोटो-$ शिवशंकरनीक संतान, फोटो-८ लेखिका मीना Fey ™ rT Ci पका =< '\ wr a की । oe 4 4.

68 || fags उस 3 [3 हा = ‘St 4 | कं कि (af a {y मै" = बे _ pees फोटो-7 एवं 8 पारिवारिक छवि सभ

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