VIDEHA — Issue 426 / अंक ४२६

Publication: VIDEHA · Issue: 426
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विदेह ४२६ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। [विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X Videha e-Journal (since 2000) at www.videha.co.in ] ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। कॉपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२५. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२५. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA. सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@gmail.com. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover design: AUM GAJENDRA THAKUR VIDEHA:426 समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा। मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अनुक्रम विदेह ४२६ म अंक १५ सितम्बर २०२५ (वर्ष १८ मास २१३ अंक ४२६) ऐ अंकमे अछि:- गद्य २.१.मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-१४ (पृष्ठ २-६) २.२.हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-६ (पृष्ठ ७-१६) २.३.डा धनाकर ठाकुर- ई की केलहुँ (कथा) (पृष्ठ १७-२२) २.४.डा. आभा झा- चाणक्य (पृष्ठ २३-२८) २.५.परमानन्द लाल कर्ण- जीवनक आनन्द (पृष्ठ २९-३५) २.६.लाल देव कामत- विश्व शांति : पोथी चर्चा (पृष्ठ ३६-४०) पद्य ३.१.आशीष अनचिन्हार- दू टा गजल (पृष्ठ ४२-४४) ३.२.जगदानन्द झा मनु - बीसटा हाइकू (पृष्ठ ४५-६)

गद्य २.१.मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-१४ २.२.हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-६ २.३.डा धनाकर ठाकुर- ई की केलहुँ (कथा) २.४.डा. आभा झा- चाणक्य २.५.परमानन्द लाल कर्ण- जीवनक आनन्द २.६.लाल देव कामत- विश्व शांति : पोथी चर्चा २.१.मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-१४ कल्पना झा मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-१४ अद्भुत खण्ड-काव्य : सन्यासी

इंजीनियरिंग कॉलेज मे पढ़ैत काल, जखन 'व्यास' जी थर्ड इयर के विद्यार्थी छलाह, ओहि अल्प बएसक लिखल छनि "सन्यासी" खण्ड काव्य। हम तँ चकित रहि गेलहुँ पढ़ि क'। एतेक गम्भीर विषय-वस्तु पर लीखब फुरेलनि कोना, से सोचि चकित रहि गेलहुँ। जतबे नीक कथ्य, ततबे नीक शिल्प। अद्भुत! मामा सत्येन्द्र कुमार झा (मोहन जी) सँ एहि संदर्भ मे गप्प भेल छलए एक दिन, तँ ओहो एहने सन अपन अनुभव सुनौलनि। मामा कहलनि,"हमहूँ बहुत दिन धरि नहि पढ़ने छलियनि बाबूक लिखल "सन्यासी" पोथी।" घरक लोक, सभ-किछु पढ़बे करताह से होइतो नहिए छै जेनरली। घरक 'लेखक', 'लेखक' सँ बेसी पिता/माता/भाइ/बहिन बनि क' रहि जाइत अछि। माने संबंधक त'र मे दबल पड़ल रहैत छथि घरक 'लेखक'। बहुत बाद मे जखन पुत्र मयंक सतरह-अठारह बरखक भ' गेल छलथिन, आ कोनो छुट्टीक अवसर पर घर आएल छलथिन कॉलेज सँ; तखन हुनका देखौलथिन, हुनकर पितामहक लिखल पोथी। पढ़ि क' सुनौलथिन। बेटा केँ पढ़ि क' सुनबैत, बुझबैत, अपनहु बुझलनि, पढ़लनि। आ से पढ़ैत-बुझैत, केहेन आनन्द अएलनि से तकर वर्णन हमरा संग साझा कएने छलाह मामा। हुनकर वाणी मे आह्लादक संग पिता पर गौरवक भाव स्पष्ट परिलक्षित भेल हमरा। आ मयंक जीक प्रतिक्रिया जे छलनि से अक्षरशः कहबाक मोन भ' रहल अछि हमरा। हुनकर कहब छलनि, "अरे, मैथिली लिटरेचर मे सेहो एहि 'लेवल'क masterpiece book exist करैत छै ? हमरा तँ होइत छलए, मात्र इंग्लिशे लिटरेचर मे नीक-नीक पोथीक भरमार छै। देखियौ त....! बुझलो नहि छलए आइ धरि। ओह ! पहिले पढ़ने रहितहुँ, तँ बाबा सँ कतेक गप्प क' सकैत छलहुँ, एहि पोथी सँ संबंधित। जेना कि आइ-काल्हि चलन अछि, इंग्लिश मीडियम सँ पढ़ल बच्चा सभ इंग्लिशे लिटरेचर पढ़ब पसिन करैत छथि। से सएह मयंक जी इंग्लिश लिटरेचर तँ पढ़ैत रहैत छलाह किछु-किछु, मुदा मैथिलीक पोथी दिस ध्यान नहि गेल छलनि। 'व्यास' जी सन महान मैथिलीक साहित्यकारक, अपनहि घर मे "माँ मैथिली" उपेक्षित भेल जा रहल छलीह धीरे धीरे। इंग्लिश मीडियम पाठ्यक्रमक कारणेँ ई स्थिति घर-घर बनि गेल, से आइ सँ नहि ; चालीस-पचास वर्ष पहिनहि सँ। 'व्यास' जीक स्कूली जीवन मे अंग्रेजी विषय पाठ्यक्रम मे सम्मिलित भेलनि तखन, जखन ओ छठी कक्षा मे गेलाह। मुदा जखनहि सँ कोर्स मे सम्मिलित भेलनि अंग्रेजी विषय, साल - दू सालक भीतरे, भगवान जानथि कतेक आ कोना एतेक रुचए लगलनि ई विषय, जे खूब पढ़ए लगलाह अंग्रेजी साहित्य। विशेष रूप सँ अंग्रेजी कवि Keats, Shelley, John Milton सन कवि सभक लेखनी प्रभावित करैत छलनि 'व्यास' जी केँ। "Paradise Lost" सँ inspired भ' लिखने छलाह 'व्यास' जी अपन पहिल खण्ड-काव्य "सन्यासी"। Blank verse मे। 54 पृष्ठक ई खण्ड-काव्य एकटा दमदार कथानक पर आधारित अछि। दुखान्त कथानक होएबाक बावजूदो रोचकताक अभाव नहि। युवावस्था मे "संन्यासी" सन खण्ड-काव्य आ "कुमार" सन उपन्यास लीखब, लोकक बीच किन्साइत कनफुसकीक कारण सेहो बनल छल हेतनि, जे सांसारिक मोह-माया सँ विरक्ति-भावक तहत तँ ने लिखल गेल छलए उक्त पोथी सभ 'व्यास' जी द्वारा। कहीं ठीके तँ ने सन्यासी बनबाक नेआर मे छथि ओ। मुदा एहेन कोनो बात छलनि नहि। सांसारिक जीवन/ गृहस्थ जीवनक प्रति आकर्षण छलनि 'व्यास' जीक मोन मे। असल मे छात्रावस्था मे रमानाथ बाबूक अनुज शचीनाथजी बड्ड प्रभावित कएने रहथिन 'व्यास' जी केँ। 'व्यास' जीक आदर्श जकाँ रहथिन ओ। जखन कैभिन्डस हाउस (होस्टल) मे रहैत रहथि 'व्यास' जी, तखन शचीनाथ जी हुनकर बगलाबला रूम मे रहैत छलथिन। हनुक विचार, आचरण आ प्रतिभा 'व्यास' जी केँ बड़ आकर्षित करनि। शचीनाथ जी गप्पक क्रम मे बाजल करथि जे विवाह नहि करब ! समाजक हेतु समर्पित भ' जाएब । कुमारे रहब ! तँ से शचीनाथ जीक व्यक्तित्वक झलक 'व्यास' जीक उपन्यास कि खण्ड - काव्यक पात्र सभ मे देखाइत अछि। कतहु-ने-कतहु 'व्यास' जीक दिमाग मे विद्यमान छलथिन शचीनाथ जी। संन्यासी खण्डकाव्य लिखब आरम्भ कएलनि 'व्यास' जी सन् 1941 मे। पूरा होइत चारि बर्ख लागि गेलनि। मौलिक कथानकक ई रचना सन् 1947 मे धारावाहिक रूप मे मिथिला मिहिर मे छपल छलनि। पछाति इलाहाबादक कृष्णकान्त-जयकान्त मिश्र आदिक आग्रह/इच्छा पर पोथी रूप मे प्रकाशित भेलनि। संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-7 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-8 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-9 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-10 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-11 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-12 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-13 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.२.हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-६ हितनाथ झा मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-६ स्वतंत्रता आंदोलनमे प्रभातक साहित्यिक अवदान "प्रभात" मासिक पत्रिकामे अनेक कथा-निबन्ध ब्रिटिश साम्राज्यक विरुद्ध लिखल गेल आ स्वतंत्रता आन्दोलनमे तत्कालीन किछु युवक लोकनि भाग सेहो लेलनि जाहिमे प. दामोदर मिश्र (स्वदेशी आंदोलन, खादी वस्त्रक प्रचार आ खादी भण्डार कोइलखमे 1932मे खोलब, एहि प्रसंगक समाचार प्रभातमे प्रमुखता सँ अयलैक।) प. श्रीकान्त ठाकुर विद्यालंकार, प. हरिनाथ मिश्र आदि। खादी भण्डार खुजलाक बाद प्रभातमे जे छपल रहैक ओ समाचार एतय अविकल प्रस्तुत कयल जा रहल अछि- �मोतीपुरमे मधुबनी खादी भण्डारक शाखा श्री दामोदर मिश्रक संरक्षणमे खुजलै। एहि दुकानमे मधुबनीक दरसँ खद्धर विक्री भय रहल अछि। अतएव खद्धर एवं देशी कपड़ा खरीदय वलाकेँ एहि दुकानसँ अत्यन्त लाभ भेलन्हि अछि। आशा कयल जाइछ जे जाहिसँ ई दुकान चिरस्थायी रहि सकय, तेकर यत्न करबामे कोइलख तथा कोइलखक समीपस्थ गामक खद्धरप्रेमी वृन्द तिल मात्रो पैर पाछु नहि करताह।� (सन्दर्भ: कोइलख: हितनाथ झा, पृष्ठ-111) देशप्रेमक भावनासँ ओतप्रोत अनेक निबन्ध आ किछु कथो प्रभातमे प्रकाशित भेल छलैक जे ब्रिटिश सरकारक विरुद्ध कतेक स्पष्टता आओर निर्भीकतासँ जनमानसकेँ विद्रोह करबाक प्रेरणा दैत रहल जाहिमे एक निबन्ध रमानाथ झाक लेख�दरिद्रता और ओकर कारण� आ दोसर कथा भवनाथ मिश्रक�अद्भुत देशानुराग� युवकक साहस आ लेखनीक कुशलताक स्पष्ट दर्शन होइत अछि। रमानाथ झाक लेखमे तत्कालीन समयक शासकक क्रूरता आ पक्षपातक एक-एक डेटाक संग लिखल गेल अछि। रमानाथ झा युवक संघक सभापति प्रसिद्ध इंजीनियर उमानाथ झाक अनुज एवं बिहार सरकारसँ सचिव पदसँ सेवानिवृत्त भेलाह। ओहि समयक रचनाकारमे हिनक बेस ख्याति छलनि। मिथिला मोद मे हिनक अनेक रचना प्रकाशित छनि। रमानाथ बाबू बिहार सरकारक ट्रांसपोर्ट विभागक सचिव पदसँ सेवानिवृत्त भेलाह। दरिद्रता औऱ ओकर कारण रमानाथ झा (कोइलख) प्राकृतिक नियम सभ ठाम एके रंग कार्य करैत अछि। जाहि सम्पत्तिक कारणक जे फल यूरोपमे होइत छैक, ओकर ओहने फल भारतोमे हैब अनिवार्य अछि। स्थानांतर भेदसँ सामाजिक अवस्था-व्यवस्थाक कारणे कोनो कुफल वा सुफलमे तारतम्य भ' सकैछ, किन्तु कोनो नैसर्गिक कारणक फलमे अन्तर नहि भ' सकैछ। जाबत भारतवर्षमे जमीन्दारी प्रथा नहि छल और राजस्व द्रव्यक रूपमे नहि, किन्तु पैदावारक रूपमे लेल जाइत छल, तावत गृहस्थ केँ ओहि विपत्तिक सामना नहि कर' पड़ैत छलनि,जे आइ कर� पड़ैत छनि। प्राचीन कालमे खेत-खरिहान आदिक पैदावारक दशांश अथवा कोनो स्थितिमे चतुर्थांश वा षष्ठांश राजा केँ राज्यमे सुप्रबन्ध रखबाक हेतु देल जाइत छलैन्ह। एहेन कहियो नहि होइत छल जे खेतमे पैदावार चाहे दस मोन हो अथवा सय मन, किन्तु गृहस्थ अपन�कर� चानी वा सोनाक एक निश्चित परिमाणमे अवश्य देथि। ई तँ एक प्रकारक जूआ थीक। क्यो नहि कहि सकैछ जे कोन खेतमे केहेन पैदावार हैत और कोन साल केहेन वर्षा वा रौदी हैत। इहो क्यो नहि कहि सकैछ जे कोनो खास खेतमे फलाँ उपज बराबरि होइते रहत। बाजारक दर सभ दिन एके रंग नहि रहैछ।जखन पैदावार सभ साल समान हैब असम्भव अछि, तखन राजस्व-कर प्रति वर्ष एक समान लेब और बीच-बीचमे बढ़बितो जैब--एक एहन अनुचित और घृणित कार्यवाही थीक,जकर जतेक निन्दा कैल जायत-थोड़े थीक। सम्राट अकबरक शासन कालसँ सोना आ रुपैयाक रूपमे एक निश्चित कर लेबाक प्रथा चलल। तहिये सँ गृहस्थक सन्तापक विषवृक्ष आरोपित भेल। किन्तु एतबा कहि देब आवश्यक जे अकबर वा हुनक उत्तराधिकारी देशी छलाह और हुनक हित और अहित, हुनक जीवन और मरण देशक हिताहित पर अवलम्बित छलैन्ह। तैं हुनका लोकनि प्रजा पर�कर'क वसूलीमे ओहि तरहक अत्याचार नहि करैत छलाह जे आइ विदेशी शासन कालमे देख'मे अबैये। दोसर बात जे लेखक केर ध्यानमे अनैये ओ थीक-सामाजिक और व्यक्तिगत अपव्यय। किछु लोक एहेन छथि जे सामर्थ्यसँ बाहर खर्च करबाक हेतु ऋण लैत छथि। कतेक लोक मदिरापान, व्यभिचार और शौकीनीमे अपन सम्पूर्ण आमदनी खर्च क' दैत छथि। कतेक लोक सामाजिक रीति ओ प्रथासँ एतेक बाध्य भ' जाइत छथि जे हुनका खर्च करय पड़ैत छैन्ह। और यदि नहि करैत छथि त' समाजमे हुनक निन्दा होमय लगैत छैन्ह। यदि क्यो लोक अपन पिता वा माइक श्राद्ध, बेटाक उपनयन- विवाहादि अन्य संस्कार खूब धूम-धामसँ नहि करैत छथि,यथेष्ट ब्राह्मण भोजन नहि करबैत छथि,तँ समाज हुनका पर हँसैये और हुनका एक प्रकारक कलंकक टीका व्यर्थ लागि जाइत छनि। एही प्रकारक अन्यान्य सहस्रो फजूल खर्ची अछि,जाहिसँ लोक दरिद्रताक दारुण दुख भोगैत छथि। गरीबीक तेसर कारण अनावश्यक टैक्स थीक। कोनो देशमे सरकारी कर्मचारीकेँ एतेक वेतन नहि भेटैत छनि जतबा भारतमे। इंग्लैण्डक सभसँ पैघ कर्मचारी प्रधानमंत्रीकेँ छौ हजार मासिक भेटैत छनि, किन्तु एतुका वाइसरायकेँ एकैस हजार रुपैया और छोटा लाटकेँ दस हजार रुपैया मासिक भेटैत छनि। किन्तु ध्यान देबाक बात थीक-- जतय भारतक प्रति मनुष्यक दैनिक आय सात पैसा अछि ततय इंग्लैण्ड केर प्रति मनुष्यक दैनिक आय प्रायः अढ़ाइ रुपैया अछि,तखन ई उनटा न्याय कहाँ तक युक्तिसंगत थीक से विचार करू। फौजमे साठि करोड़ रुपैयाक खर्च छैक। एहिमे लगभग तीस करोड़ रुपैया पचास हजार गोरा मे खर्च होइये और अवशिष्ट तीस करोड़ दू लाखक लगभग हिन्दुस्तानी फौज पर खर्च होइये। ई सभ रुपैया टैक्स द्वारा अबैत छैक, जाहिमे अधिकांश गृहस्थकेँ देबय पड़ैत छैन्ह। एहि सभक अतिरिक्त हमरा लोकनिक दरिद्रताक कारण वैज्ञानिक आविष्कारक प्रचार थीक। हम देखै छी जे प्राचीन कालक सड़कक किनारमे जतेक सराय,आबादी और दोकान छल, ओ सभ आइ उजड़ल पड़ल अछि। जाहिसँ लाखो दोकानदार, अगणित मजदूर, कारीगर, गाड़ी-घोड़ा वला....आदि परिपालित होइत छल ओ सम्पूर्ण साधन रेलगाड़ीक प्रसादात माँटिमे मिलि गेल। बिजलीक पंखा कतेक मजदूरकेँ बेकार कयलक ? बिजलीक रोशनी कतेक तेलीक सत्यानाश कयलक ? मील सभ कतेक जोलाहाक घर ध्वंश कयलक ?-- कतेक विधवाक मुँहक रोटी छिनलक एकर कोनो हिसाब हैब असम्भव अछि। ई त' किछुए बात देखाओल गेल-- यदि विस्तारसँ सभ बातक विवरण देल जाय त' हमरा लोकनिक दुखक गाथा बहुत बढ़ि जायत। मनुष्यजातिमे विज्ञानक वृद्धि हैब,कला-कौशलक विकास हैब-- एहि सभकेँ क्यो समझदार आदमी खराब नहि कहि सकैत अछि। किन्तु ई तखने सम्भव थीक जखन ओ विकास मनुष्य जाति मात्रक लेल हितकारी हो। जाहि विज्ञानक फल किछु व्यक्तिकेँ लाभ पहुँचयबाक हेतुएँ व्यवहार हो और शेष जनता ओहि लाभसँ वंचित रहय, बल्कि अपन पूर्वोक सुखकेँ नाश क' बैसय तँ ओ अज्ञानपूर्ण ज्ञान कहियो संसारक हेतु हितकारी नहि भ' सकैछ। एही लेल मनुष्यभक्त विद्वान लोकनि तेहेन मार्ग कहैत छथि जकर अनुसरण कयला उत्तर संसार मनुष्य मात्रक लेल शान्तिमय जीवनक पवित्र स्थल भ' जाय और मनुष्यजातिमे कुकुर जकाँ एक टुकड़ी रोटी लय लड़ब बन्द भ' जाय। ओ उपाय यैह थीक जे- देशक छोट-छोट सुविधाजनक स्वतन्त्र खण्ड हो, प्रत्येक खण्ड अपन पैदावारकेँ सम्मिलित सम्पत्तिक रूपमे एकत्र करय और प्रत्येक नर-नारी केँ ओकर उपभोग एवं रक्षामे समान अधिकार हो। ********* {सन्दर्भ: प्रभात, वर्ष-2, अंक-1, जनवरी-1934),संख्या-01) दोसर एक कथा जकर लेखक भवनाथ मिश्र तहिया मात्र 14- 15 वर्षक छलाह,जहिया हिनक निम्नलिखित देशप्रेमसँ ओतप्रोत कथा�अद्भुद्देशानुराग� कोइलखसँ प्रकाशित मासिक पत्रिका� प्रभात�क नवम्बर 1934क अंकमे हनकहि लिखल अक्षरक संग प्रकाशित भेल रहनि। स्वाधीनता आन्दोलनमे मैथिली पत्रिका�प्रभात�क अवदानक मात्र ई एक दृष्टान्त प्रस्तुत अछि। कोइलखक भवनाथ मिश्र,जे चिकित्सकक रूपमे अपार यश अर्जित कयलनि। ई विद्वान परिवारक छलाह,स्वयं विद्वान छलाह, सहृदय छलाह, साहित्यिक रुचि छलनि, संगीतप्रेमी रहथि, राजनीति-रसिक रहथि, स्त्रीशिक्षाक प्रबल समर्थक रहथि। ई महान विद्वान प0 बबुआजी मिश्र (कलकत्ता विश्वविद्यालयक प्रोफेसर)क सुपुत्र रहथि। केन्द्रीय मंत्री एवं बिहार विधानसभाक अध्यक्ष प0 हरिनाथ मिश्र,महान शिक्षाविद प्रो0 जयदेव मिश्र, विख्यात अभियन्ता अनिरुद्ध मिश्रक अनुज रहथि। 1978मे दरभंगा मेडिकल कॉलेज & हॉस्पिटल,लहेरियासरायसँ मेडिसिन विभागाध्यक्ष पदसँ सेवानिवृत्तक उपरान्त साहित्यमे रमि गेल छलाह। प्रो0 हरिमोहन झा, प0 चन्द्रनाथ मिश्र�अमर', विद्याकर कवि, प्रो. शंकर कुमार झाक संग आकाशवाणीसँ हास्यवार्ता प्रसारित होइत छलनि।】 अद्भुद्देशानुराग लेखक-- श्री भवनाथ मिश्र �आबहुँ माफी माँगि ले। किछु वेशी नहि, एतवा कहि दे कि आइ तारीखसँ हम एहि झंझटमे नहि पड़ब�। �कोन झंझट �यैह झंझट, जाहिमे कार्य्य कयलाक कारण तों पकड़ल छें ओ आगू की हयतौक तकर ठेकान नहि। यैह खद्दर पहिरव कोनदन गीत .....अरे ..... 'वन्दे मातरम� गाएब तोरा सत्यानाश करतौक। गामपर रहितें, केहेन आनन्दसँ अपन परिवार ओ दश इष्ट मित्रक संग तोहर दिन कटितौक ? परन्तु एहि कार्य्य कै कयला सँ कोन-कोन देशक अन्नपानि ओ ककरा-ककरा हाथेँ मारि खयबें तकर कोन ठेकान ? �वेश एक वेरि जे कयलें से कयलें, आव फेरि क� एहना कुकर्म्म मे नहि पड़ी।� � ककरा ? खद्दर पहिरव ओ� वन्दे मातरम� गीत गैव कै अपने कुकर्म्म कहैत छिऐक ? तथा अपन रक्त चुसनिहारक अपना भाइ पर घोर अत्याचार करबामे अपन सहायता कै सुकर्म्म ? छि:, छि:, अपने जन्मधारण कय अपन मातृभूमि� भारतमाता� क कोन उपकार कयलिऐन्ह जे अपनेक शारीरक भार ओ एखनहुँ अपना छाती पर वहन करैत छथि ? सुनले होएत-- � जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है, वह नर नहीं नर ...." � चुप वदमाश ! बेहाया !! यहाँ आकर पाण्डित्य छाँटने लगा है।� (बेंत ल'क' खूब जोर स मारिकय) आवहु माँफी मंगवे कि नहि ? शैतान, पाजी, उल्लू कहाँके। आवहुँ वजैत छें कि नहि ? महाशयजी ! आव की भेलैक जे हम माँफी माँगि लिय ? अपने केँ बूझि पड़ल जे बूट सँ मारिकय हमरा सँ अपना इच्छानुसार कहा लेव ? ई अपनेक भ्रम छल। देशक प्रति जकरा वास्तविक प्रेम छैक तकरा मृत्युक डर त' होइतहि नै छैक, बेंतक चोट के ओ कतेक परवाहि करत ? � कोइ है ? पिस्तौल ले आ। (हाथ मे ल' क') आव ? की करवें? आखिरी वात, बाज-- एक ...दू...की ? " कनेक थमि जाउ , ई कमीजो धरि अपनेक गोली कै अयबा में कनेक बाधा कियैक देत ? (कमीज खोलि कय) होउ, लगाउ।।� वेश , एक ...दू...रन..." भारत   मा...ता ...की...जय। आकाशवाणी �         �         �          �         � कमलाकान्त- हौ दीना ! कतौ स रोदनक आवाज अबैत अछि। दीना-- (सूनिकय) सैह, एतेक रातिक' ककरा कोन विपत्ति पड़लैक ? कमला- चल त� देखियैक, स्वयंसेवकक की कर्त्तव्य थिकैक से त' जनले छहु। एखन कोन ? ठनका खसैत रहतैक तैयो जाय पड़तहु। दीना- हम कि से नहि कहैत छी ? (दुनू गोटाक प्रस्थान) (एक उजड़ल घर लग आविकय एक वृद्धाक प्रति) कमला- काकी ! अहाँ कनैत कियैक छी ? अहाँक वालक कि चोरी-डकैती कय कुल मे कलङ्क लगवलक अछि ? स्वदेशक हेतु प्राण देलक। मातृभूमिक हेतु प्राण देवा सँ मानव जीवनक वेशी मूल्य की छैक ? आशीर्वाद दिय जे हमरहु दुहू गोटा कै (दीना दिशि इशारा करैत) एतवे कियैक, गाम भरिक नवयुवक लोकनि केँ स्वदेशक हेतु जीवन दान करक सुअवसर प्राप्त होइन्हि�। वृद्धा---( चुम्वन करैत) बेटा ! हम अपना वालकक स्वदेशक हेतु मृत्यु भ' जयबाक कारण नहि कनैत छी। छाती एहि लै फटैत अछि जे हमर एके टा बेटा स्वदेशक हेतु जीवन दान करक सुअवसर प्राप्त कयलक। धन्य साहस ! धन्य त्याग !!धन्य देश भक्ति !!! (वर्तनी अविकल रखबाक प्रयास कैल अछि।) (सन्दर्भ: प्रभात: वर्ष 2, अंक-11, नवम्बर-1934) प्रसिद्ध आलोचक मोहन भारद्वाज प्रभातक विषयमे लिखने छथि- " मैथिली पत्र-पत्रिकाक इतिहासमे प्रभातक अवदान महत्वपूर्ण अछि। तत्कालीन समाजक स्थिति आ सोच-विचारक दस्तावेज तँ अछिए,साहित्यिक अलबम सेहो थिक। एकर महत्व आओर बढ़ि जाइत अछि जखन एकर हस्तलिखित स्वरूपपर ध्यान दैत छी।� (सन्दर्भ: एकल पाठ-मोहन भारद्वाज) संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झाक एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झाक एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झाक एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झाक एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झाक एवं हुनक परिवारक योगदान-5 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.३.डा धनाकर ठाकुर- ई की केलहुँ (कथा) डा धनाकर ठाकुर ई की केलहुँ (कथा)

"बाबूजी, अहाँ ई की केलहुँ, हमरा विधवा बना केलहुँ अपन जम्एकेँ मारि", बजलीह उर्वशी। " हमर जमाए कहियाकेँ, हम की वरण केलहुँ ओकर जे हमर जमाए तौर ओकरा कहलैँ। " बदलाव राधेश्याम ष "हमर त पति छलाह, ओ"।

" हम ने त कन्यादान केलहुँ तो हर, ने विवाह भेलहुवा ओ तो हर वर्ष भेलहु"! "हम श्यामा मन्दिरमे श्यामामाइकेँ साक्षी मानि सेनूर ओकर लेने छी। हम सीतारामक आब विधवा छी। " "छोट मुँह पैघ बात। " " त की हमरो मारि देब, मारि दिए, हम ओकरहि लग जाएं। " "तोरा नहि मारुति। " "कि एक अहाँ दोसरक बेटीके मारलहुँ अपन बेटीकेँ कि एक नहि मारब। अहाँ एक खून करी की दू खून करी भेटत त एकहि फांसी। " " हमरा पितेबाक जरूरत नहि। " "अहाँ ओकरा कि एक मारलिऐ। हमरहुँ मारू। " "तोरा मारलासँ समस्या समाप्त नहि हैत, तेँ नहि मारुती। " "नहि हम अहाँक बेटी छी तेँ नहि मारब किन्तु अहाँकेँ ई अधिकार कोना भेटल जे अहाँ ककरहुँ बेटीकेँ एहि लेल मारि देब जे ओ अब्राह्मण भए ब्राह्मणक बेटीसँ विवाह केलक। " " फेर वैह बात, हम ई विवाह भेल मानते नहि छी नहिए कानून मानते। " "कि एक?" "एहि लेल जे ओहिमे ने हिन्दू धर्म विधानक पालन बेला नहिए विशेष विवाह नियम के। विवाह होइत छैवेदी पर सैकड़ों विधानसँ जाहिमे सप्तपदीसँ ओ पूरा होइत छैक जकर पहिले कन्यादान होइत छैक। हम स्वयं ओलीले छी, हमरा बूझल अछि जे विवाह की होइत छैक। हिन्दू लेल त ई संस्कार छैक इनमे एक कानूनी समझौता। " "अहाँ ओकील छी त की छूटि जाएं,अहाँकेँ फाँसी भ क रहत। हम गवाही देब अहाँक विरूद्ध । " "गवाहीक जरूरतहि नहि छौ। हम त दा रहल छी अपनहि थाना सरेन्डर करए जे हम दिनदहाड़े डीएमसीएचक चक्रधर आडिटोरियम लग मुख्य द्वारक सामने अपन लाइसेन्सी पिस्तौलसँ प्राचार्याकेँ बजा सीतारामक हत्या केलहुँ ताकि फेर केओ छात्र एना दोसरक बेटीकेँ नहि फुसलाकँए उड़ाहए। हम डरैत नहि छी। हमरा मालूम अछि हमरा की सजा भेटत, हम सब किछु जानबूझिकँए होशोहवासमे ई केने छी। " "नहि अहाँ पागलपनमे ई केने छी। " "अच्छा त तूँ दोसर वर्षमेलरी ग्लैंड अपनाने डाक्टरनी बूझ लगलैँह। से तूँ बन। हम नव ओकील कहना अपन मौसी जमीन बेची तेरा कोटा पटा पढ़ौलहुँ। तोहक माए हमरा छोड़ि देलक, तलाक लेलक जे हम बेकार छी, नहि कमाएर। ओ छलीह तोहरे सन डाक्टरनी हम मैथिलीक प्रोफेसर। मधुबनीमे मोकदमा लड़ैत जे तलाक नहि हे ओही बीचमा औकात पास केलहुँ। आइ तूँ सुनिश्चित ले सब बात जे कहिओ नहि कहने छवियों तो हर माए सेहो बदजात छलहु-ओकर माए यानी हमर सासु भोजपुरी कोनहुँ जाकिर छलीह केँ हुनकर विवाह लेल केओ ब्राह्मण तैयार नहि होइत छल भरि सभागाछीमे। हम छलहुँ संघवादी जतए हिन्दूक बात होइत छैक जातिपातिकेँ नहि केँ हम आगाँ बढ़ि हुनत कान्त पिताजी कोलकातामे शिक्षक चलचित्र प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी खिद्दूबाबूक बेटाकेँ लग गेलहूँ आओर कहलिएन्हि अरूण जेपी आंदोलनमे मीसा सजायाफ्ता रहल छी, हम करब बिआह अहाँक बेटीसँ- हुनक आँखिमे नोर छलकलैन्हि आओर हम ओहि राति बिसारि गाम जा बिआह केलहुँ। ओहि सन्तोषरूपी माए राममणि छलहु एही डीएमसीएचक सेकेन्ड ईयर छात्र। हम वित्तरहित कालेजमे प्रोफेसर जत वेतन भेटिए नहि छलैक। ससुर महोदयकेँ लकवा भेलन्हि ओ जात रहलाह आओर किछुए दिनमे हमर सासु सेहो। हम हुनक एकमात्र सन्तान अपन पत्नीकेँ घरक अपन माएक गहना-गुड़िया बेचि एमबीबीएस पुरा कराओल दाहि बीच तो हर जन्म भेलौ ओहि डीएमसीएमे डा सरोज वर्माक हाथ। ओ कहने छलीह जे 'इसको भी डाक्टर बनाइएगा'।। तो हर माए ओकर संगी। की बेला एक-दू साल ओ रेल के गेली। पहिलेएना सभ हर साल पास कहाँ करैत छलैक, केँसरोज पासभए हाउससर्जन भए गेलैक यावत् केओ एनाटॉमीक आयरन गेट पास नहि करए आगाँ नहि। खैर भला हो नव आएल एचओडी ब्राह्मण झासरकेँ। हम जा हुनका कहलिएन्हि पहिलुका राममणि पर कोनो दया नहि केलक फेल पर फेल करैत रहल खैर ओ पास भेलाह आओर इन्टर्नशिपमे गेली। हमहुँ प्रोफेसरी छोड़् देलहुँ कारण वेतन सालमे कहिओ एक मासक भेटैत छल आओर दरभंगा कचहरीमे ओकालतिक डिग्री पर ज्वाइन क लेने छलहुँ कारण ओहि बीचमे अपन फाइनल इअर करैत तो हर माएक नाजायज सम्बन्ध एक सीनियर रेजिडेंट डा महतोले भ गेल छलैक जकर शंका हमरा लागि गेल छल। ओ हमरा लग आबथि तेँ हम दरभंगा गेल छलहुँ कि ओही बीच ओ मधुबनीमे हमरा, हमर माए-बाप, हमर छोट बहिन पर चार्टर केस दहेज प्रताड़ना आदिक संग संग तलाकक केलीह आओर पालि केलीह आओर ओहि डा महतो संग अरब भागि केलीह नौकरी लेल। तोँ छोट बच्चा, कोर्ट सेहो हमरहि परवरिश लेल द देने छल कारण तोहर माए नहि मंगलकौक। हम त तोरा यैह ने बतौलियौ कि तोहर माए मरि गेलौ- नहि ओ एखनहुँ जीवित छौ, ई बात अलग जे डा महतो अरब ल' जा क' ओकर पासपोर्ट संग ओकरा एक शेखक हाथे ओकर अस्पतालमे काज करए कहीं बेचि देवकी आओर ओतहुँ ओकरा ओही शेपसा सुनीता छी एक बहुत गोर बेटी छैक जे मेडिकल कॉलेजमे पढ़ाई करैत छैक। अपने डा महतो भारत भागि आएल कारण ओ झूठ बाजि बिरहानु केने छल। ओकरहुँ पहिलेसँ एक पत्नी आओर एक बेटा छलैक।से ओ घूमिफिरि अपन जीवन बीतबैत अछि। हम सोचलहुँ आब जे हो पढ़ल-पढ़ाएल पत्नी त' चलि केलीह आब तूँ निशानी छैक, जे सरोज डाक्टरनी से तेरा हम डाक्टर बनाबी। हम दोसर बिआह नहि केलहुँ आओर तोहर परिचर्यामे लागल रहलहुँ। ओतेक ओकालतो कहाँ चलैत छल हमर। तेँ घोघरडीहाक जमीन बेचि तोरा कोटा पढ़ए पठौलहुँ कारण जखन तूँ पहिल बेर पीटने कम्पीट नहि केलैँह हमरा लागि गेल जे प्राइवेट मेडिकल कॉलेज मधुबनी की सहरसा, किशनगंज, कटिहारमे 15 लाख हर साल देनाइ हनर बुत्तामे नहि अछि। से भगवती संग देलन्हि आओर तूँ कहना सरकारी सीट पर डीएमसीएचमे प्रवेश लेलैँह। हमरा लगैत छल जे हनर सब तपस्या सार्थक भेल।किन्तु सुनैत छलहुँ हिन्दू मुसलमान क 'लव जिहाद'। से आब अम्बेडकरक नाम ल लोक हिन्दूक पिछड़ा वर्ग ब्राह्मणक बेटी पर डोरा डालैत अछि जे अम्बेडकर सेहो ब्राह्मणीसँ बिआह केलन्हि अपनासँ नीच हिन्दू जाति में नहि। ई समाजकेँ स्लखित करतैक, आपसी हिंसा-विद्वेषकेँ बढ़ौतैक, जे हम बेर-बेर ओहि छौँड़ाकेँ बूझौलियौ आओर तोरहुँ किन्तु तूँ दूनू हमर बातकेँ मेजर नहि देलैँह तेँ हम ई हत्या गोडसे जकाँ जाक' केलहुँ अछि। हनरा एकर कोनहुँ पश्चाताप नहि अछि। गीतामे भगवान कहलखिन्ह अछि, 'स्वधर्मे निघनम् श्रेयः', अपन-अपन जातिधर्मक काज करैत ओ मोक्ष पाबि सकैत अछि तखन अन्तरजातीय विवाहक जरूरत की? किन्तु ओ नहि मानक तखन हमरा लग की विकल्प छल?" "बाबूजी, अहाँ हमरा मारितहुँ ओकरा कि एक? " "ताकि ओ फेर दोसर लड़कीकेँ नहि बहकाबए। उत्तर प्रदेशमे देखैत छही के नाम इनकाउन्टर होइत छैक,तेँ हम सरेआम हत्या केलहुँ अछि जे छात्र-छात्रा एहि लव फरमेनाइ पिताक पाइपर बन्द करे। हम थाना जाइत छी। फाँसीक फन्दा चूम। तेँ खुश रह'। पढ़िक डाक्टर बन। तोहर फीस लेल हम बीस लाख टाका फिक्स्ड डिपोजिटक नॉमिनेशन आओर विल काल्हि बना चूकल छी।" "बाबूजी! " (9.8.2025:1222, कानपुरमे लिखित आओर 29.8.2025 ट्रेन 18310मे इटावा-प्रयागराजमे टंकी, 123म सगर राति दीप जरय, रांची30.3.2025मे पठित) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.४.डा. आभा झा- चाणक्य डा. आभा झा चाणक्य संस्कृतमे एकटा सूक्ति छै - �क्रियसिद्धि: सत्त्वे भवति महतां नोपकरणै:� अर्थात् कोनो काजक सफलता लेल संसाधनसॅं बेशी आत्मबल आ सङ्कल्पक दृढ़ताक आवश्यकता होइत छैक।एहि सूक्तिकेॅं चरितार्थ देखबा लेल सकलसाधनसंपन्न रावण आ वनवासी रामक बीचक युद्ध देखल जा सकैछ, हस्तिनापुरक राजोचित शक्ति आ सुविधासॅं संयुक्त कौरव सेना आ वन-वन भटकैत पाण्डवक मध्य भेल युद्धकेॅं सेहो रेखांकित कएल जा सकैछ।एहि तरहक अन्य बहुत रास उदाहरण इतिहासक पन्ना उनटौला पर देखल जा सकैछ,जाहिमे मगधमे भेल अभूतपूर्व सत्ता-परिवर्तनक उल्लेख करब अप्रासंगिक नहि होयत। जखन राजा लोकनिक छोट- छोट स्वार्थक परिणामस्वरूप खण्ड प खण्ड भेल भारत विदेशी आक्रमणकारीक जालमे फॅंसल चलल जा रहल छल तखन एकटा नि:स्व ब्राह्मण संकल्प लेलनि अखण्ड भारत बनयबाक आ ओहि लेल अपन राजनीति, अर्थशास्त्र, युद्धकला आ वेदादिक अध्ययनक सभटा कौशल झोंकि देलनि एकटा मेधावी किशोर पर आ तैयार कएलनि मौर्य साम्राज्यक संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्यकेॅं। ओ नि:स्व ब्राह्मण छलाह महान राजनीतिज्ञ, अर्थशास्त्री,दार्शनिक आ कूटनीतिज्ञ चाणक्य, जनिक नाम के नहि जनैत अछि? शक्तिमन्तो जॅं अनाचारी भए जाइ त� ओकरा उखाड़बाक संकल्पकेॅं साकार करए बला दूरदर्शी कौटिल्यक राष्ट्रक प्रति निष्ठाक विषयमे संभ्रम ओ आदर के नहि रखैत अछि? हुनका हिसाबसॅं कोनो नियम वा आदर्श शाश्वत नहि होइत छैक -आवश्यक होइत छैक �राज्य-हित सर्वोपरि� मंत्र।ओ राज्यकेॅं मजगूत करबा लेल गुप्तचरी (जासूसी), कूटनीति आ युद्धकलाक विशेष नियम बनौलनि आ करव्यवस्था, व्यापार, कृषि आ सेनासंगठनक आधुनिक सिद्धांतक न्यों रखलनि ।प्रशासन, अर्थव्यवस्था, कर नीति, विदेश नीति आ युद्धनीति पर विस्तृत ग्रंथ �अर्थशास्त्र� आ राजनीति आ आचरणक सिद्धांत पर �चाणक्य नीति� आइयो पूर्ववत् अर्थवत्ता रखने अछि। ओहन दूरदर्शी चाणक्यक जीवन पर संस्कृतमे एकटा प्रसिद्ध नाटक अछि विशाखदत्त रचित मुद्राराक्षस, जाहि मे चाणक्यक राजनीतिक कुशलता, कूटनीति आ नन्दवंशक पतनक बाद चन्द्रगुप्त मौर्यक राज्याभिषेक धरिक घटनाक वर्णन भेल अछि।एहि ग्रन्थमे चाणक्यक राजनीतिक बुद्धिमत्ता, अटूट धैर्य, रणनीतिक सोच, राष्ट्रहितक प्रति निष्ठा आ कूटनीतिक पराकाष्ठाक वर्णन भेल अछि। महामात्य राक्षसकेॅं अपना पक्षमे करबा लेल ओ बाटक शुचिताक ध्यान नहि रखैत छथि आ अंग्रेजीक ई सूक्ति चरितार्थ करैत छथि -�Everything is fair in love and war�. मैथिलीमे दीनानाथ पाठक बन्धु प्रणीत �चाणक्य� एकटा महत्त्वपूर्ण ग्रंथ अछि,जकर विषयोपस्थापन आ प्रवाह अनायासे पाठककेॅं अपना दिशि खिंचैत छैक। ओकर पहिल सर्गक एकटा छोट सन उद्धरण सोझां रखबासॅं अपनाकेॅं रोकि नहि पाबि रहल छी- 'कान खोलि संसार सुनय ई हमर वाक्य अतिशक्य राजनीति केर पृष्ठभूमिपर उतरि गेल चाणक्य' रविसम दीप्त, अनलसम दाहक पवि सम कठिन कठोर कोनो गूढ़तम भाव-मग्न चिन्तासँ आत्म-विभोर अंग अंगसँ चूबय टपटप सुदृढ़ आत्म-विश्वास पाटलिपुत्रक जनपथ पर के घूमि रहल गत त्रास ? कोनो महापुरुषक ई गुणगौरव थिकनि जे हुनका विषयमे कतबो कहल गेल हो,कहबा लेल बहुत किछु शेष रहि जाइत छैक।से हुनक व्यक्तित्वक संयम, आत्मविश्वास, ज्ञान आ नेतृत्वक्षमतादि गुणसॅं अभिभूत श्री राजकिशोर मिश्र सेहो चाणक्य नामसॅं छ: सर्गक एकटा खण्डकाव्यक प्रणयन कएलनि अछि।कविक शैक्षिक पृष्ठभूमि विज्ञान रहलाक बादो हिनक मातृभाषा-प्रेम ओ प्रतिबद्धताक प्रमाण अछि मैथिलीमे लिखल ई एकैसम पोथी।एकैस टा पोथीमे बीसटा पद्यात्मक अछि आ एकटा निबंध संग्रह। अर्थात् पद्यरचनामे अधिक रुचि रहलाक बादो गद्यलेखन दिशि सेहो प्रवृत्ति छनि। मात्र मैथिलिए नहि, हिन्दीमे सेहो एगारह टा कविताक पोथी लिखि श्री राजकिशोर मिश्र जी अपन अद्भुत लेखन-गतिक परिचय देने छथि। आब किछु गप एहि खण्डकाव्यक मादेॅं- जेना कि पूर्वमे कहल जा चुकल अछि जे ई छ: सर्गक काव्य अछि,जाहिमे पांच सर्गमे चाणक्यक जीवनक लोकविदित प्रसंग सभ रुचिर काव्यात्मक भाषामे प्रस्तुत कएल गेल अछि।छठम सर्गमे किछु चाणक्यनीतिक श्लोकक मैथिली अनुवाद देल गेल अछि आ एहि तरहेॅं ई एकटा अभिनव प्रयोग बनल अछि। प्रायः कविगण पूर्वलिखित विषय सभकेॅं कथात्मक वा काव्यात्मक भाषामे अपना ढंगसॅं लिखैत रहलाह अछि, मुदा मूललेखकक श्लोकादिक अनुवाद अलगसॅं देबाक प्रवृत्ति नहि देखल गेल अछि। मुदा ऐतिहासिक काव्यलेखनक परंपरामे कल्पनाक बहुत पुट देबाक अवसरो नहि रहैत छैक,से सीमा राजकिशोर मिश्रजीकेॅं सेहो पएर छनने होयतनि, तेॅं मात्र एकठाम ओ घननन्दकेॅं जीवित कारागारमे देबाक प्रसंग किछु हटिक� लिखि सकलाह।ओत्तहु ओ अपनाकेॅं विवादरहित बनैबा लेल कहैत छथि - किछु विद्वानक इहो कहब छनि घननन्द युद्धमे मारल गेल किछुके मत छनि,बन्दी नहि ओ मगध साम्राज्यसॅं बारल गेल।(पृष्ठ93,सर्ग 4) एहि खण्डकाव्यक आरंभमे देल पात्र परिचय आ सर्वत्र प्रयुक्त सरल भाषा एकरा काव्यमय मंचनक योग्य बनबैत छैक।एहि तरहेॅं ई व्यावहारिक रूपसॅं अधिक उपयोगी बनल अछि।आरंभिक दू टा पद्य आ पांचम सर्गक अंतक किछु पद्य सोझां राखि रहल छी जे कविक चाणक्यक प्रति अनुराग आ गौरवबोधकेॅं स्पष्ट करैत अछि - ओ युग द्रष्टा ओ युग स्रष्टा भारत भूखंडक स्वाभिमान सहस्राब्दोमे कहियो कहियो लए छथि जन्म एहन श्रीमान्। विश्व इतिहासक विराट क्षितिज पर चाणक्य चमकैत अमर्त्य नक्षत्र ओ शिक्षक नीति ओ अर्थशास्त्रक छथि भ� गेल मानक प्रमाण पत्र।(पृष्ठ 13,सर्ग 1) कवि ओहि इतिहास-पुरुषक बुद्धि,नीति, दूरदृष्टि, युद्धकौशल, देशभक्ति आ भोगक प्रति अनासक्तिक दृष्टान्त सहज आ रोचक भाषामे भावी पीढ़ीकेॅं देमय चाहैत छथि आ तेॅं काव्यक समापनोक बेरमे हुनक गुणगान करैत कहैत छथि - वर्तमान, आओर भविष्यमे जीबिते रहत ओ अतीत जदपि नहि ई स्वर्ग-लोक कालोकेॅं अछि लेने ओ जीत। नीति हुनक, अर्थनीति हुनक ओ कालजयी, ओ अजर-अमर ओ अछि अमर्त्य, नहि मरणशील ओ जीति चुकल अछि काल-समर । बीतल बेसीए, दू सहस्राब्दी मुदा, जीबिते अछि चाणक्य-नीति सद्नीति, अर्थनीति, राजनीति ओहिमे सनातनक जीवन-रीति । एखनो ओहिना प्रासंगिक एखनो ओ 'बूझि' जीवन्त बीतल बीचमे जुग कतेक मुदा जीबिते छथि श्रीमंत । (सर्ग5, पृष्ठ 112) अंतमे एतबहि जे कविताक विषय-वस्तु नव नहि अछि, मुदा एकर प्रस्तुति करैत काल कविक मानस केंद्रमे छनि सामान्य पाठकवर्ग,जिनका ध्यानमे राखि बहुत सरल भाषामे संपूर्ण कथानक उपस्थित कएलनि अछि।ई कोनो भाषा लेल बहुत पैघ काज होइत छैक।जतेक विस्तृत पाठकवर्ग,ततबे भाषिक विस्तार। विद्वत्ता-प्रदर्शनक अपन व्यामोह होइत छैक, मुदा ओहिसॅं लाभान्वित होइत छैक बहुत छोट विद्वत्समुदाय! हॅं,एकटा गपक ध्यान राखब जरूरी छलै, �चाणक्य� शीर्षकसॅं एकहि भाषामे दू टा काव्य परवर्ती पाठककेॅं भ्रमित सेहो करतै आ ई लेखकीय नियम आ मर्यादाक अंतर्गत सेहो नहि।नाममे किछु परिवर्तन कएने एहि दोषसॅं बांचल जा सकैत छलै । अस्तु! कविक एहि नूतन कृति लेल बहुत बहुत बधाई आ अधिकाधिक पाठक धरि पोथीक पहुंचबाक शुभकामना। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.५.परमानन्द लाल कर्ण- जीवनक आनन्द परमानन्द लाल कर्ण जीवनक आनन्द सुशीला साँझ  मे घर एलीह तहन अपन बैग विछौना पर पटकि भनसा घर मे चलि गेलीह । भनसा घर मे काम करैत गुस्सा मे अनाप सनाप भुनभुनाईत छलीह जे घरक बहु छी तऽ सव कामक  जिम्मेवारी हमरहि अछि की ? हमरा एहि ठाम एलाक बाद सासु माँ  तऽ एना बैसि जाईत छथि , बुझना जायत अछि जे  पहिले हुनका आगु पाछु कतेको नौकर चाकर लागल छल । पता नहि कोन जन्मक दुश्मनी हमरा सँ निकालि रहल छथि। हमरा काम मे थोड़ेक हाथ वटा देतथि तऽ किछु काम हलुक भऽ जायत। लागैत छैन जे हाथ बटैला पर हुनक हाथ पाइर घिस जेतनि ।हमहु तऽ आदमी छी । भरि दिन ऑफिस मे काम करलाक वाद थकि जाइत छी । एहि ठाम आवु तऽ भानस  भात मे जुटि  जाउ । सासु माँ के तऽ किताब पढ़ला  आ सीरियल देखवा सँ फुर्सत  नहि होयत छैन । ई कहैत भनसा  घर मे बरतन साफ करऽ लागलीह ।सुशीलाक गुस्साक कारण हुनक सासु माँ नीक सँ बुझैत छलखिन । मुदा मजबुरी छल जे भोर सँ साँझ धरि काम करैत करैत थकि जाइत छलीह । साँझ मे किछु देर अपना लेल निकालि आध्यात्मिक पुस्तक पढ़ैत छलीह आ कखनो कखनो आध्यात्मिक सीरियल टी वी मे देखैत छलीह ।दरअसल मे सुशीला आजुक जमानाक पढ़ल लिखल लड़की छलीह । हुनकर सपना छलैन जे पढ़ि लिख हम नौकरी करी । स्नातक पास केलाक वाद ओ नौकरीक प्रयास करऽ लागलीह ।एहि दौरान हुनक शादी रमेश सँ भऽ गेल । शादीक  समय सुशीला सँ स्पष्ट कऽ देने छलीह जे शादीक वाद जौं हमरा नौकरी लागत तऽ हम नौकरी करव । जौं अहाँ सहमत छी तखनहि ई रिश्ता हम कऽ सकैत छी । रमेश कें कोनो आपत्ति नहि छलनि आ नहि रमेशक माय बाबुजी के छलनि। शादीक उपरांत सुशीला नौकरीक प्रयास करऽ लगलीह । एक बरखक बाद प्रतियोगिता परीक्षा पास कऽ नीक नौकरी ज्वाइन केलीह । नौकरी मिलला  सँ ओ बड्ड खुश छलीह । सुशीलाक सासु माँ  कहलखिन जे हमरा नौकरी सँ कोनो एतराज नहि अछि , मुदा अहाँ के घरक काम काज मे हाथ बटावऽ पड़त । एहि उमर मे घरक  सव काम हम नहि कऽ पायव । ई  सुनि परिवारक सव सदस्य आश्चर्य चकित भऽ गेल । सुशीला सेहो आश्चर्य मे पड़ि गेलीह । रमेश कहलखिन - माँ अहाँ तऽ जानैत छी जे सुशीलक नौकरी कतेक कठिन सँ मिलल अछि , अहाँ सँ ई  उम्मीद नहि छल । एहि बात पर हुनकर माय कहलखिन - बेटा हम ई नहि कहैत छी जे घरक सव काम बहु करैथि । हम केवल ई कहैत छी जे हमरहु किछु सीमा अछि । उमिर बढ़ि रहल अछि । हमर शरीर दिनानुदिन कमजोर होयत । हमरा सँ जे बनि पड़त ओ तऽ हम करवे करव । एहि परिस्थिति मे सुशीला घरक साफ सफाई के लेल काम करवाक लेल एकटा औरत के राखि लेलथि । मुदा सुशीलाक घर पर नहि रहला पर घरक बाकी सव काम हुनके करऽ पड़ैत छलनि, मुदा सुशीलाक घर एलाक बाद ओ किछु नहि करैत छलखिन । तकर बाद सुशीला के करऽ पड़ैत छलनि । सासु माँक ई व्यवहार हुनका नीक नहि लागैत छलनि । घरक भानस भात करलाक बाद जखन सुशीला कें फुर्सत होयत छलनि तहन अपना माय सँ फोन पर बात करैत छलीह । केवल सासु माँक  बुराई कऽ अपन भरास निकालति छलीह । एहिना समय व्यतीत होयत छल । किछु दिनक  बाद सुशीलाक  छोट भायक  शादी भेल । सुशीलाक  भाभी नीक पढ़ाई-लिखाई कऽ नौकरी करैत छलीह । सुशीलाक माय शादीक  समय मे कहने छलखिन जे हम अपना पुतोहु के बेटी जकाँ  राखव । घर मे पुतोहु आवि गेलाक मतलब ई नहि अछि जे हम हाथ पर हाथ  राखि बैसि जाय आ घरक सव काम पुतोहु पर छोड़ि  दी । आखिर ओहो तऽ इंसान छथि । बेचारी घरक काम करतीह की नौकरी करतीह ? अपन मायक बात सुनि सुशीला बड्ड प्रभावित भेलीह आ अपना मायक सोच पर गर्व करऽ लगलीह । ओ सोचैत छलीह जे काश  ! हमरो भाग्य एहिना होयत । हमर सासु माँ हमर परेशानी के बुझतथि  । हमर माय केहन  खुलल  दिमाग के छथि आ दोसर दिस हमर सासु माँ केहन कुंठित विचार के छथिन । विवाहक अगले दिन सँ सुशीलाक भाभी नौकरी पर जा लगलीह । सुशीलाक माय सेहो अपना पुतोहु पर सव सुख सुविधाक  ख्याल राखऽ लगलीह । पुतोहुक ऑफिस जाय सँ पहिले हुनका लेल खाना बना दैत छलखिन आ टिफिन  सेहो बना कऽ दैत छलखिन । हुनका घरक कोनो काम नहि करऽ दैत छलखिन । साँझ मे ऑफिस सँ आवि ओ आराम करैत छलीह आ हुनक सासु माँ रातिक भानस भात मे लागल रहैत छलीह । सासु माँक एतेक प्यार देखि सुशीलाक भाभी गद-गद  छलीह । हुनके इच्छानुसार खाना बनैत छल । जे खाईख  इच्छा हुनका होयत छलैन वएह भोजन मे बनैत छल । सुशीलाक भाभीक सव फरमाइश  हुनक सासु माँ पुरा करैत छलखिन । किछु खुशी सँ बीतल मुदा सुशीलाक  मायक तबियत खराब भेलाक कारण ओ आब पहिले जकाँ काम नहि कऽ पावथिन । दोसर दिश सुशीलाक भाभी के काम करवाक आदत नहि छलनि तें ओ किछु नहि करैत छलखिन । मन  खराव रहलाक वादहु हुनक माँ भरि दिन घरक काम मे लागल रहैत छलीह । एक दिन सुशीला अपना माय के फोन पर बात करऽ चाहलखिन तऽ हुनक फोन ओ नहि उठा सकलखिन।सुशीलाक  चिंता भेलनि जे माय फोन किएक नहि उठोलखिन। तकर बाद कतेको दिन फोन पर बात करऽ चाहलखिन तऽ हुनक माय फोन उठा कऽ कहलनि - बेटी ! अखन काम मे व्यस्त छी । सव काम अखन पड़ल अछि थोड़ेक देर बाद हम अहाँ सँ बात करव । ई  कहि  फोन काटि देलखिन । एक दिन सुशीलाक  माय सव काम सँ निवृत भऽ विछाऊन पर आराम करैत छलीह तखन सुशीलाक  फोन आयल । फोन उठावैत कहलनि - हेलो सुशीला ! ओम्हर सँ आवाज आयल - हेलो माय गोर लगे छी । हुनकर माय कहलनि - निके रहु । अहाँ कुशल मंगल सँ छी ने ? कतेको दिनक वाद हुनका माय सँ बात करवाक मौका मिलल छल । सुशीला फोन पर अपन दुखरा गावैत कहलनि - की कहु माय ! थोड़ेक देर पहिले  ऑफिस सँ एलहुँ अछि । बड्ड थकि  गेल छी , कनेक देर आराम करलाक वाद घरक काम शुरू करव । अहाँ तऽ भाभी कें पुरा आराम करऽ दैत छी , मुदा हमर भाग्य एहन कहाँ अछि । हम घर पर एलहुँ अछि तहन हमर सासु माँ ई  कहि आँगन सँ बाहर चलि गेलीह जे हम काकाजीक आँगन मे सबसँ  भेंट कऽ आवि रहल छी । देखियो ने हुनका समय छलनि , रातिक भनसा बना कऽ राखि देथिन से नहि तऽ अखन घुमऽ चलि गेलखिन। अच्छा माय आव ई  वताऊ अहाँ ठीक छी ने ? आव तऽ अहाँ हमरा भुला गेलहुँ अछि। भाभीक  एलाक बाद तऽ अहाँ हमर फोनो  नहि उठावैत छी  जौं फोन उठावैत छी तहन कहैत छी जे बौआ बाद मे बात करव अखन बड्ड काम अछि । ई  सुनैत हुनक माय कानऽ लगलीह । कानैक  आवाज सुनैत सुशीला कहलखिन - माय ! अहाँ  किएक कानि  रहल छी ? भाभी सँ कोनो बात भेल अछि की ? बैचैनी सँ सुशीला पूछलखिन। एहि बात पर हुनक माय कहलनि - बौआ अहाँक भाभी के सव दिन हम बेटी जकाँ रखलहुँ  । हुनका कोनो तरहक  तकलीफ नहि होनि ताहि लेल हम भरि दिन काम करैत रहैत छी । मुदा अहाँक  भाभीक  एकर कोनो कदर नहि छैन । ओ भनसा घर दिश झाँकवो नहि करैत छथिन । हमरा तऽ लागैत अछि जे हम घरक नौकरानी बनि गेलहुँ अछि । सव कामक लेल ओ हमरा पर हुक्म दैत छथिन ।अपने हाथ सँ एक ग्लास पानियो नहि लैत छथिन । जखन पानि पीवाक  इच्छा होयत छैन तहन ओ हमरा कहैत छथिन हम हुनका पानि  दैत छियेन । आओर तऽ आओर भोर मे जौं टिफिन देवऽ मे कनेक देर भऽ जाय तऽ एना बाजैत  छथि जे मानु हम हुनक नौकरानी छी । आव हमर कोनो अक्ल काम नहि कऽ रहल अछि जे हम की करु ? अपन मायक सव बात सुनि सुशीला स्तब्ध रहि गेलीह । फेर ओ कहऽ लगलीह बेटी ई  सब गलती हमर अछि । अहाँक बाबुजी कतेक बेर हमरा सँ कहलखिन जे कनिया पर थोड़ेक जिम्मेदारी दीओ जाहि सँ ओ बुझथिन जे घर कोना सम्भालऽ जायत छै ? मुदा हम सोचैत छलहुँ जे भरि दिन ऑफिस मे काम करैत करैत थकि  जायत हेथिन एहि ठामक काम कोना करथिन ? बेटी ! आव हमरा एहसास होयत अछि जे अपनेक सासु माँ कतेक समझदार छथिन जे घरक सव जिम्मेवारी अपने नहि सम्भालि किछु अहाँ पर छोड़लथि ।घरक सव काम सव गोटे  मिल के करवाक चाही ।हुनक ई  फैसला बड्ड नीक छैन । अहाँक  थोड़ेक खराव लागैत होय मुदा ई वात सत्य अछि जे अपना लेल थोड़ेक समय जरुर निकालक चाही जौं अहाँक सासु माँ जकाँ समझदारी सँ काम करितहुँ तहन आई ई दिन नहि देखतहुँ ।हमहुँ हुनके जकाँ आत्मसम्मान सँ रहितहुँ।ई बात सुनि सुशीलाक आँखि सँ ढ़व-ढ़व  नोर गिरऽ लागल। थोड़े देरक बाद सुशीला घर सँ बाहर एलीह तऽ देखैत छथिन जे हुनक ससुर जी कुर्सी पर बैसल छथि ।तखनहि हुनक सासु माँ सेहो काकाजीक आँगन सँ घुमि कऽ एलखिन । एहि पर हमर ससुर जी हुनका सँ पूछलखिन जे कतऽ गेल छलहुँ ? ओ कहलखिन जे काकाजीक  आँगन गेल छलहुँ । कतेक दिन भऽ गेल छल काकी सँ भेंट करवाक गेल छलहुँ । ओहि आंगनक हाल समाचार ठीक अछि ने ? हाँ, सव किछु  ठीक अछि ।सुशीलाक  माय कहलखिन जे ओहि आँगन मे पुवारी टोलक किछु लोकनि बात करैत छलखिन जे ओहि टोल मे एकटा संस्था खुलल अछि जाहि मे सव बुजुर्ग एक संग बैसि गप्प सप्प करैत छथिन । जिनका जे इच्छा होयत अछि से करैत छथि । जेना योगा क्लास चलैत अछि, डांस क्लास चलैत अछि । जे बच्चा डांस सिखऽ चाहैत छथि हुनका लेल अलग क्लास चलैत अछि ।कनिया तऽ भिनसरे ऑफिस चलि जायत छथिन तकर बाद घरक काम सव खत्म केलाक वाद हमहु सव जे एहि ठाम मक्खी मारैत रहैत छी ताहि सँ नीक होयत । कतेक देर टी वी देखी आ अखवार पढ़ी ।पता करु कोन ठाम संस्था चलैत अछि आ  कतेक पाई लागैत अछि । एहि पर ओ कहलखिन जे बुजुर्गक लेल कोनो पाई नहि लागैत अछि । बच्चा सवहक लेल फिस अछि । सव बुजुर्ग घंटा दुई घंटा बैसैत छथि तहन अपना अपना घर जायत छथि । एहि ठाम दाई सव काम कऽ दैत छथिन । छीट -फुट जे काम वांचल रहत ओ हम कऽ लेव , तकर बाद चलु ओहि ठाम थोड़ेक देर समय वितायव तऽ मन लागत आ समय सेहो कटि जायत । पहिले कहाँ मौका मिलैत छल । परिवार मे लागल रहैत छलहुँ । आव तऽ वौआ माथ उठा लेलथि  अछि । आवहु तऽ अपन समय नीक सँ वितावी । ई  वातचीत होयत छल तखनहि सुशीला घर सँ बाहर आवि कहलनि - हाँ  बाबुजी ! घर पर बैसल - बैसल बोर भऽ जायत होयव । थोड़ेक देर निकालि घुमि आयव तऽ मन बहलि जायत । आव सुशीलाक एहसास भेलनि जे हुनक सासु माँ नीक करैत छलखिन । सव दिन तऽ काम करवे केलथि आवहु तऽ आराम करथि । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। २.६.लाल देव कामत- विश्व शांति : पोथी चर्चा लाल देव कामत विश्व शांति : पोथी चर्चा वयोवृद्ध ओकिल सेहाएब उर्फ़ श्री जगदीश प्रसाद मंडल जी आब मैथिली लेखन क्षेत्रमे कोनू नव परिचय केर विषय नहिं रहलैथ। हिनक नव सृजन केर एक कथा पोथी थिक - विश्व शांति,जाहिक लोकार्पण करय सहरसा " सगर राति दीप जरय " कथा गोष्ठीमे दि० २८- १२- २०२४ ई० केँ हम गेल छलहुँ। श्री मण्डल जीक ७९म् कथा संग्रह ' विश्व शांति ' मैथिली पोथी पल्लवि प्रकाशन - निर्मली सँ बहराएल छल। से १०५ पृष्ठक सद्यप्रकाशित मातृभाषा'क पोथीके दाम २५१ टाका छैक । एहि पोथीमे दसगोट नैका कथा संग्रहित कयल गेल अछि। अनुक्रम तीन पर पाठ्य- सूचिमे केन्द्रीय खिस्सा ' विश्व शांति ' केँ स्थान देल गेल छै। एखनधरि श्री जगदीश बाबूक ९० टा मैथिली भाषा मेँ कथा संग्रह निकलि चुकल छन्हि, जाहिमे प्रमुख रूप सँ चर्चित पोथी यथा- गामक जीनगी, क्रांतियोग, सुभिमानी जिनगी, त्रिकालदर्शी, दिवालीक दीप, अपन गाम, कृषि योग, रहै जोकर परिवार, कर्त्ताक रंग - कर्मक सँग, गामक सुरति बदैल गेल , अंतिम परीक्षा, फलहार, गुलेती दास, अप्पन साति, एकलव्यपन ,आदि। हिनक मैथिलीमे १२ नाटक-एकांकी ,१२ पद्य संग्रह- कविता अनेकों वाल साहित्य पर आधारित पोथी आ नारी केन्द्रीत विमर्शक पोथीक अतिरिक्त कतेको उपन्यास सेहो प्रकाशित भेल छन्हि। देशक पंगूपन पर आयल एकमेव उपन्यास केँ साहित्य अकादमी पुरस्कार सेहो भेटल रहनि। ओहि पोथीक तीन भाषा ; हिंदी, अंग्रेज़ी आ डोगरीमे अनुवाद सेहो भेलैक हेन। दू पाटन के बीचमे ' पहील कथामे सामाजिक समस्या पर सम्यक रूपेँ विचार कयल गेल य। एकदिन भोरका समय गोपीकृष्ण 'क गाम हुनक हाईस्कूली जीवनक संगी धीरेन्द्र जीक खैरवोनी सँ आगमन होय छैन। अपना ओ गामपर नहिं रहलाक कारणेँ दक्षिणवारि बाट धरि खोजी करैत ओ दूनू बापुत थोड़ेक दुर बढ़ले छलैक तँ सामने हवा खाकय अबैत गोपीकृष्ण देखाईत छन्हि। दूनू गोटेयमे वार्तालाप होई छैक आ घुमि घरमुहान होईछ। बाटमे दैंतक खुनल पोखैर बावत चर्चा होइ छन्हि। धीरेन्द्र जीके कथन होईछ-" दाँईत कि दानव केतौ अन्तय अछि, ओहो तँ हमरे अहाँ जेकाँ ने गाम- गाममे बसलो अछि आ रहबो करैए।" ता दलान पर पुईंग जाई गेला। छिपलीमे छोट बचिया कुन्तीक आनल चाह आ लोटा गीलास सँ पानि दूनू गोटय ढारिकेँ पीबैत छैक। ई कथा ग्रामीण अँचलक आन पात्र जेना-: दुनियाँ लाल , गोपी ,श्याम, मानेसर , रसीक लाल ,प्रदीप आ छात्र- छात्रागण सँ जीवन्त भऽ उठैत छै। गाममे आब रिक्शा - टमटम घोड़ा गाड़ीक जगह ओटो टेम्पू चलला सँ पथिकके समय बचैत छैक। एन एच सँ जुटल गामक सड़क आ डायवर्सन लगक पुला पक्का बनि गेला सँ बगलक खेत उबजा सँ नहिं धंगाईत- मराईत छैक। बसबिट्टिक ग्रामीण सभा सँ मानवीय विषमता पर एक सामाजिक संदेश गरीबी-अमीरी 'क प्रसारित होई अछि। पाठ-२ एक्के साधे सब सधे कथामे रामगुलाम केर गप्प- सप मनमोहन काका सँ होईछ,एकटा काजमे एक व्यक्ति पारंगत होय से फरिछायल गेल छैक। ऐ कथामे स्त्री पात्र सुधिया आ कुमुदिनी छथि। विश्व शांति कथामे जाहि विषय पर ५ मिनट समयमे अदौरिया केँ भाषण शिक्षामंत्री आ सब अध्यापक ओ छात्र लोकनिक बीच देबाक छैक, ताहि मादे किछु विशेष जनतब लेल गुरु कका ओहिठाम धरि जाई य। ओतय परसू खनक संगोष्ठी लेल नवाँ वर्गक सुखदेव बेटाकेँ काका संतुष्टी जोकर विषय बुझा दैत छथि। ई विषय तँ राष्ट्रीय आ अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर उठैत रहैत छै ,आईधरि सरियाकेँ फरिया नहिं पेलक हेन। तैयो ई बुझबा योग्य छैक जे विश्व छी ब्रह्म आ शांति भेल माया। ऐ दू शव्द केँ सन्धि विच्छेद करब तँ एकटा विश्व आ दोसर शान्ति भेल। ऐ कथामे अपराजिता आ सरोजिनी दूई स्त्री नाम आ सम्बोधन करय लेल किछु पुरूष नाम यथा -: रविन्द्र बाबू ,खुशीलाल बाबू , केदार बाबू , बिमल बाबू , रूद्र चन्द्र बाबू , सिंहेश्वर बाबू ,शुभकान्त बाबू केर उल्लेखित कयल गेल छैक। चानक यात्रा विज्ञान कथाके श्रेणीमे अबैत य। विष्णुदेव चान पर जेबाक तीन व्यक्तिक सूचिमे सं एक नाम अछि। ओ चारि साल पर गाम अबैछ आ रिटायर मास्टर पढ़ुआ काका सँ परात भने भेंट करैत छै। दमयन्ति , सोनेलाल ,मनचन पात्र जीवंतता बनौने रहैछ सम्पूर्ण कथामे। छठि पाबैन चलिए रहल छै आ सूर्य तथा चन्द्रमा विषय पर खूब चर्चा चलैत छै। ओना ई लोक आस्था केर पावनि रहैत मूलतः किसानक धान तैयारीके पछाति रव्वि खेती - बाड़ी आरम्भ करैक पावनि जानल आ मानल गेल हेन। सूर्य के एक दिन पूजा सँ एहिक महत्ता पर प्रकाश नहिं पड़त ,जखनकि सूरुजे सँ माँटि आ पानि निर्मित भेल य। बीरान कथामे चम्पापुर केर श्याम बाबू आ कमलपुरके गोपाल केर भेल छैक,जिनक बाबूजी मनमोहन बिराम पढ़ल छैन। श्याम बेटी बियाह लेल खाईन-पीन करय जाई ले दूदिन पहिले अपन विजातीय साथी सँ आग्रह करैत य।जहनकि ओ अपने २० घरक देयादि आ स्वयं समंगर छैक। अपना बापों पर विश्वास नहिं रखैत, भाखै छै ओ झगर लगाउन छै। झगरू सोभावक घनश्याम बाबू ,पूहूपलाल ,देव कान्त आ सिंहेश्वर नामी छै तेँ अजाति सँ एक व्यक्ति नीजी व्यक्ति कें टेबि सरोकारीमे जाएब नीक लक्षण - सगुन बुझैत य। बदलैत बिचार घटैत आशा कथामे एक पात्र कृष्णानन राजके कमतिया बनि ३००० बिगहा कटहरबोनी अरैज लेने छै। हृदयनाथके दादा भोजपुर सँ आबि पहिने राजके सिपाही छलैक। पटवारी मुकुन्द सेहो ओम्हरे सँ मिथिलामे आबि खूब धाख जमेने रहैछ। ओकर पोता मनोज पेसर योगेसर के वियाहमे ३० लाख टाका दहेज लैछ जे कि दिल्लीमे अन्तरराष्ट्रीय कम्पनी म काज करै ,मुदा रहैत छै शराबी। बेटा - पूतौह शीला ट्रक तरमे चप्पा पड़ि जाई छै । दूनू परिवार में ई कुटमैती शोक बढा देलकै। केकरा - ले केलौं कथामे नायक रुपलाल,संगी काका जे तीन मास सँ दर्द सँ काछर कटै छैक हुनक पत्नी सेहो रूग्ण छथिन ,तकर ईलाज ले दूनू बेटामे कियो रूचि नहिं रखैत छै। सुगीया काकी फोनो करने रहथीन। अमारूपी बाली काकी सँ थाह चलला पर रुपलाल तरकारी पहुँचाबय ओतय जाई छै तँ गप्प सरक्का क्रममे जनतब होय छै जे हुनकर दूनू बेटा बाहर रहैत छै। से बड़का बेटाकेँ चारिचकिया गाड़ी बंगला रहैत अपन श्वसुर केर कैंसरक इलाज सोलहैनी खर्च सँ बम्बई म कराबैत पिताके उपेक्षा करैत कथामे एकटा तथ्य गुम रहि गेल छै। परोक्ष रूपें जानि सकैत छी पाठक जे बेटा पर पूतौहक कड़ा शासन रहल हेतैक। सेवा कथामे सेहो गमैया पात्रक नाम देखाइछ।जेना - भूषण, सुमरीतलाल ,जनकलाल, बरस्पतिया, मरनी। साढ़े चारि सालक मरनी अपन बापके कहियो नहिं देखने रहैक । तकर माय रातिमे बेटीके सुतले छोड़ि राताराति गाम सं भागि गेल छै। पराते भने महिला मण्डलीमे पेराकात कानाफूसी होय। ओहि बेटीकेँ भूषण काका पालन- पोषण अपना ओहिठाम आनि करैत एक आदर्श उपस्थित करैत छैक। हुनक ऐ घोषणाके स्वागत हुअ जे बालिग भेलासन्ता सुयोग वर सँ बियाहि देथिन। बत्तीस दांत -: कथामे गोपीनाथ, सुबुध , सुमित्रा, जीयालाल , जीबछ , पूहुपलाल रहैत छै। जगदीश प्रसाद मंडल जीक प्रायः: सब कथामे चाहक चर्च अरबैधके रहबेटा करत। - लाल देव कामत, नौआबाखर -हटनी अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। पद्य ३.१.आशीष अनचिन्हार- दू टा गजल ३.२.जगदानन्द झा मनु - बीसटा हाइकू ३.१.आशीष अनचिन्हार- दू टा गजल आशीष अनचिन्हार दू टा गजल

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पहिने मिठाइ फेर मिरचाइ भेलै चीन्हल जानल लोक हरजाइ भेलै

पहिले दीनमे सजा सुना देलकै तारीखसँ नीक जे सुनवाइ भेलै

जेहन मूँह देखै तेहने रचि दै आब ओहो शब्दक हलुआइ भेलै

अपने घर आँगन अपने दुआरिपर बहुत मस्ती बहुते पहुनाइ भेलै

चलि जाइत रहलै अनचिन्हार बनि कऽ कहियौ एहन कोन अगुताइ भेलै

सभ पाँतिमे 22-22-22-22-22 मात्राक्रम अछि। दू अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि। दिन केर उच्चारण रूप दीन लेल गेल अछि। वर्तनी रूपमे दिन सही छै।

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भूमिपर अघोषित आपदा छै आदमीसँ बेसी देवता छै

मोक्ष लेल साधल मोहमाया साधनासँ बेसी वासना छै

मोन मरि कऽ एलै देह खातरि जीबि जाइ अतबे कामना छै

रत्न सागरक मंथनसँ भेटल ई उठा पटक संभावना छै

मोनमे बसल छै मोन हुनकर संग लेल ई प्रस्तावना छै

सभ पाँतिमे 212-122-2122 मात्राक्रम अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। ३.२.जगदानन्द झा मनु - बीसटा हाइकू जगदानन्द झा �मनु� बीसटा हाइकू १ माछक मुड़ा बासमतीक भात जस भ गेल २ अनकर घी ककरो देखने की बाटी भरि पी ३ जीयान भेलै भोजक रसगुल्ला खेत बिका क ४ गामक पानि शहर केर दुध एक्के सनक ५ गामक सेठ पंजाबमे दिहाड़ी भरल ट्रेन ६ बिन जीविका सगरो गाम खाली शासक फेल ७ मुर्गा जितल हरा आलू झिमनी भंसाघरके ८ भादोमे कादो गाम गाम भेटत खेतमे नहि ९ हथिया एने किसानकेँ सुतने बखाड़ी खाली १० मरुवा रोटी नून मरचाइमे धान रोपाई ११ पिसल तास चासक हरबाहा बेड़ नै देखै १२ गामक हाट लाई मुड़ही झिल्ली यादि अबैए १३ मालक घंटी टनटन बजैत लुप्त भ गेल १४ आजुक नेना हऽर पालो बऽरद नहि चिन्हतै १५ आगू जीलौं तँ बिन कादो धानक खेती देखबै १६ अहूँ गाममे आइर छटनाइ के कला छै की १७ गामक लोक बेसाहसँ तंग भऽ शहर गेल १८ शहरी हबा गाम चलि आएल बेसाह लेने १९ भोजक सुनि जमाइन फकै छै लोक भोरेसँ २० पोखरि घाट कतए बिला गेलै आब गामसँ -जगदानन्द झा �मनु�, मो० न० ९२१२ ४६ १००६ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ। 1 || विदेह ४२६ विदेह ४२६ || 1

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