विदेह ४२७ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। [विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X Videha e-Journal (since 2000) at www.videha.co.in ] ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। कॉपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- २०२५. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२५. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA. सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@zohomail.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@zohomail.in. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover design: AUM GAJENDRA THAKUR VIDEHA:427 समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा। मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अनुक्रम विदेह ४२७ म अंक ०१ अक्टूबर २०२५ (वर्ष १८ मास २१४ अंक ४२७) ऐ अंकमे अछि:- १.१.विदेह ४२५-४२७ म अंक पर मन्तव्य [पृष्ठ १-२] गद्य २.१.मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-१५ [पृष्ठ ४-९] २.२.हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-७ [पृष्ठ १०-२५] २.३.जगदानन्द झा मनु - डॉ. कैलाश कुमार मिश्र जीक उपन्यास मनसरबीक समीक्षा [पृष्ठ २६-२९] २.४.डा. आभा झा-भावुकताक आख्यान-पेपरवेट सन जिनगी [पृष्ठ ३०-३७] २.५.परमानन्द लाल कर्ण-सन्ताप [पृष्ठ ३८-४६] २.६.लाल देव कामत-लोकतांत्रिक कथा- भेंड़िया धसान [पृष्ठ ४७-५२] २.७.आशीष अनचिन्हार-रचना लेल आर मेहनति आर समय चाही [पृष्ठ ५३-६०] २.८.भुवनेश्वर चौरसिया 'भुनेश'- पानीक सदुपयोग / पानीक रंग [पृष्ठ ६१-६३] २.९.प्रमोद झा 'गोकुल'- तिला सँकरैंत [पृष्ठ ६४-६७] २.१०.प्रदीप कुमार मंडल "पबड़ा"- मैथिली मानक सऽ मैथिली के चुनौती [पृष्ठ ६८-७१] २.११.संतोष कुमार राय 'बटोही'- कथा - वध [पृष्ठ ७२-७७] पद्य ३.१.जगदानन्द झा मनु - बीसटा हाइकू [पृष्ठ ७९-८३] ३.२.प्रमोद झा 'गोकुल'- जीवन चक्का [पृष्ठ ८४-८५] ३.३.राम शंकर झा"मैथिल"- अरिपन/ टिपीर-टिपीर [पृष्ठ ८६-९१]
१.१.विदेह ४२५-४२७ म अंक पर मन्तव्य विदेह ४२७ म अंक पर मन्तव्य: प्रणव कुमार झा अंक मे दू टा साहित्यकर्मी उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' आ तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक धारावाहिक लेख के संगहि दू टा पुस्तक (डॉ. कैलाश कुमार मिश्र जीक उपन्यास मनसरबी आ मनीषा झा मृडाणीक पहिल कविता-संग्रह ‘पेपरवेटक फूल सन जिनगी’) पर पाठकीय समीक्षा प्रकाशित भेल अछि। संगे आशीष अनचिन्हार के लेख ‘रचना लेल आर मेहनति आर समय चाही’ सेहो आलोचनात्मक विधा मे पाठकीय समीक्षा अछि मुदा संगे पाठक आ लेखक के रूप मे ई स्मरित कराबय अछि जे नीक रचना आ समीक्षा लेल मेहनत आ समय दुनु के दरकार रहय छैक आ दुनु भूमिका मे लोक के मेहनती हेबाक चाहिए। प्रमोद झा 'गोकुल' के कविता जीवन चक्का गुदगुदेलक। -प्रणव कुमार झा, अनुभाग अधिकारी, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली। दूरभाष (कार्यालय): 011-45493034 विदेह ४२६ म अंक पर मन्तव्य: आशीष अनचिन्हार विदेहक अंक ४२५ मे प्रकाशित कुमार मनोज काश्यपक लघुकथा "साँझक भोर" मार्मिक अछि। पाठक ई सोचबा लेल बाध्य भऽ जाइत अछि जे ओकर एक्सीटेंड भेल छलै वा कि मुआवजाक भरोसपर ओ अपने कारक निच्चा आबि गेल? मैथिलीमे एहन-एहन रचनाक आवश्यकता छै। अही अंकमे प्रणव कुमार झा भारतमे क्रिटिकल केयरसँ संबंधित नीक जानकारी देने छथि। विदेह जँ एहि प्रकारक आलेख प्रकाशित करैत चलि जाएत तँ निश्चिते पाठक लेल ई एकटा 'अथाह ज्ञान स्रोत' बनि जाएत। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। गद्य २.१.मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-१५ २.२.हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-७ २.३.जगदानन्द झा मनु - डॉ. कैलाश कुमार मिश्र जीक उपन्यास मनसरबीक समीक्षा २.४.डा. आभा झा-भावुकताक आख्यान-पेपरवेट सन जिनगी २.५.परमानन्द लाल कर्ण-सन्ताप २.६.लाल देव कामत-लोकतांत्रिक कथा- भेंड़िया धसान २.७.आशीष अनचिन्हार-रचना लेल आर मेहनति आर समय चाही २.८.भुवनेश्वर चौरसिया 'भुनेश'- पानीक सदुपयोग / पानीक रंग २.९.प्रमोद झा 'गोकुल'- तिला सँकरैंत २.१०.प्रदीप कुमार मंडल "पबड़ा"- मैथिली मानक सऽ मैथिली के चुनौती २.११.संतोष कुमार राय 'बटोही'- कथा - वध २.१.मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-१५ कल्पना झा मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-१५ दू पत्र : 'व्यास' जीक चर्चित लघु उपन्यास
सन् 1968 मे प्रकाशित आ सन् 1969 क साहित्य अकादेमी पुरस्कार सँ पुरस्कृत 'व्यास' जीक लघु उपन्यास "दू पत्र" बेस चर्चित रहलनि। चर्चित रहबाक कइअक टा कारण रहल। जाहि मे निस्संदेह मुख्य कारण रहल एहि पोथी के साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटब।
"दू पत्र" की अछि, सेहो चर्चाक विषय रहल। मतलब उपन्यास अछि, कि लघु उपन्यास अछि। नब प्रयोग अछि, सेहो मानबा लेल सभ तैयार नहि। "मैथिली साहित्य मे ई एक नब प्रयोग थिक", से लेखक स्वयं तँ कहलनि अछि, अपन लिखल "दू शब्द" मे। मुदा हरिमोहन झाक "पाँच पत्र" शीर्षक कथा पहिनहि लिखल जा चुकल छलए, तैँ किछु लोकक कहब छलनि जे "दू पत्र" हरिमोहन झाक कथा "पाँच पत्र"क तर्ज पर लिखल गेल अछि। पुस्तकक आकार, मतलब पृष्ठ संख्या सेहो चर्चाक कारण बनल। माने ई उपन्यास कहएबाक पात्रता राखैत अछि कि नहि, सेहो दुविधा छलनि साहित्यकार लोकनि केँ। मात्र 88 पन्नाक पोथी "दू पत्र" लिखलाक बाद रमानाथ बाबू केँ देखए देने छलथिन 'व्यास' जी। रमानाथ बाबू कहलथिन - कनेक छोट अछि। ताहि पर 'व्यास' जी हुनका कहलथिन जे हेमिंग्वे द्वारा लिखित Old Man and the sea एहिसँ पैघ नहि छैक।
अंततः लघु उपन्यास रूप मे स्वीकारल गेल "दू पत्र" केँ।
ओना सत्य कही तँ, मैथिली साहित्य मे ई एक नव प्रयोग तँ ठीके छलए। एहि मे वर्णित विषय, कथा-वस्तु आधुनिक समाज मे सहजहि देखबा मे आबि जाइत अछि। ताहि दिन एहेन घटना कम होइत छलैक, जखन ई पोथी लिखल गेल छलए। "एहि लघु उपन्यासक स्थान, काल, पात्र, सभ कल्पित अछि।" इहो बात चर्चाक विषय रहल। बाहरक लोक मे रहल कि नहि, से तँ नहि कहि; मुदा घरक लोक मे एहि बात पर अवश्य चर्चा होइत रहल यदा कदा। असल मे "दू पत्र"क मुख्य पात्र श्रीमती इन्दु देवी 'व्यास' जीक दूरक संबंधे मे छलथिन। सरहोजि। जनिकर पति विदेश जाए, ओत्तहि के भ' क' रहि गेलाह। अपना देश मे एकटा अबोध बालकक संग रहैत इन्दु देवीक संग जखन ई घटना भेलनि, तखन ओ मात्र मैट्रिक पास छलीह। परित्यक्ता भेलाक उपरान्त आगाँ आइ. ए. , बी. ए., बी. एड. आ एम. ए. धरि पढ़ाइ कएलीह ओ। हुनकर पढ़ाइ-लिखाइ मे 'व्यास' जीक भरपूर सहयोग रहलनि। मतलब 'व्यास' जीक सहयोग सँ पढ़ि-लिखि आत्मनिर्भर भ' गेलीह आ पटरी पर सँ उतरि चुकल जीवनक गाड़ी पुनः पटरी पर आबि गेलनि। आगाँ जा क' हुनका "मिथिला पुत्री" सम्मान सँ सेहो सम्मानित कएल गेलनि। मतलब, धन-वित्त, मान-सम्मान, सभ किछु पर्याप्त भेटलनि। पैघ भ' क' बेटा सेहो पढ़ि-लिखि नीक पोस्ट पर कार्यरत भेलथिन। बहुत दिन धरि 'व्यास' जीक घरक सदस्य जकाँ संग रहलथिन दुनू माए-बेटा। लगभग पन्द्रह बर्ख। एहि ठाम हम 'व्यास' जीक धर्मपत्नी अमरावती देवीक प्रशंसा करए चाहब। पत्नीक सहमति आ सहयोगक बिना ई संभव नहि छलनि 'व्यास' जी लेल जे पति द्वारा परित्यक्त एकटा स्त्रीक जीवन सही रस्ता पर आनि सकितथिन।
आब गप्प ओहि प्रसंगक, जाहि कारणेँ सभ सँ बेसी चर्चा मे रहलनि 'व्यास' जीक पोथी "दू पत्र"। जखन पोथीक चयन भेल साहित्य अकादमी पुरस्कार लेल, तखन ई पोथी चर्चित विषय बनल रहल साहित्यिक गलियारा मे। जेना कि सभ साल पुरस्कारक घोषणाक बाद घोंघाउजक परम्परा सन देखि रहल छी, कइअक साल सँ फेसबुक पर हम सभ। ठीक तहिना, ओहि समय मे बिनु फेसबुकेक घोंघाउज भेल छलए, एहन सुनैत छी। किछु गोटे बड़ गंजन करैत गेलथिन 'व्यास' जीक। सुधांशु शेखर चौधरीक प्रतिक्रिया छलनि जे 'व्यास'जी तँ इंजीनियर छथि, कोनो गरीब साहित्यकार केँ पुरस्कार भेटितैक तँ आर्थिक लाभ होइतैक।'
किछु गोटे कहलथिन जे 'व्यास' जी गुटबाजी सँ पुरस्कार प्राप्त कएलनि अछि। रमानाथ बाबूक गुट मे छथि तेंँ पुरस्कार भेटलनि। जखन कि ओहि समयक नियमक अनुसारे तीन सालक कालखण्ड मे प्रकाशित सर्वश्रेष्ठ पोथी पर पुरस्कार भेटैत छलैक। यदि काशीकान्त मिश्र 'मधुप' आ सुरेन्द्र झा 'सुमन'क पुस्तक रहितनि आ तखन 'व्यास' जीक पोथी केँ भेटितनि तँ गलत कहल जा सकैत छलए। मुदा से तँ रहनि नहि। तखनहुंँ ईर्ष्या, द्वेषक अधीन किछु लोक बहुत दिन धरि विरोध करैत रहलथिन।किछु साहित्यकार एकटा पत्रिका तीन अंक धरि 'व्यास' जीक खिलाफ छापि हुनकर पता पर घर पठा दैत छलथिन।
मुदा एहि सभ बातक कोनो प्रभाव नहि पड़लनि 'व्यास' जी पर। सुबल गांगुली सन निष्णात पत्रकार दू दिन 'व्यास' जीक आवास पर अएलाह आ तखन विस्तृत रिपोर्ट हुनका पर आ हुनकर पोथी पर "द इलस्ट्रेटेड वीकली" मे प्रकाशित भेल छलए।
'व्यास' जी सभ दिन सँ तपस्या मे लागल छलाह, लागल रहलाह। माँ मैथिलीक तपस्या । यश-अपयश, निन्दा-प्रशंसा सँ उपर ओ बस साहित्य-साधना मे निमग्न रहलाह....आजीवन। संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-7 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-8 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-9 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-10 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-11 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-12 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-13 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-14 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.२.हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-७ हितनाथ झा मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-७ तारानाथ झाक किछु महत्वपूर्ण आलेख एवं संपादकीय 'प्रभात'मे सामाजिक, राजनीतिक,आर्थिक आदि साहित्येतर गद्य रचना तँ रहिते छल, साहित्यिक रचना सेहो प्रचुर मात्रामे रहैत छल, संगहि विभिन्न प्रकारक समाचार ( सम्पूर्ण मिथिलाक) जाहिमे खेल समाचारक सेहो प्रमुखता रहैत छल। एहि पत्रिकामे बहुत एहन विषय-वस्तु छल, जे पूर्वमे मैथिलीक पत्रिकाक इतिहास छल, ओहिसँ बहुत आगाँक वस्तुसभ पत्रिकामे समावेश अछि, जे सम्पादकक दूरदृष्टि स्पष्ट झलकि सामने आबि जायत। प्रसिद्ध आलोचक मोहन भारद्वाज एहि प्रसंग कहैत छथि ---- "समाचार खण्डक बानगीसँ पता चलैत अछि जे सम्पादकक दृष्टि कतेक व्यापक छलनि। समाचार संकलित करैत काल हुनका सम्मुख मिथिलाक विभिन्न क्षेत्र आ मिथिलाक गतिविधिक विभिन्न क्षेत्र तँ रहिते छलनि, मिथिलाक सभ जाति आ वर्गक लोक सेहो रहैत छलनि। हुनका लेल व्यक्ति नहि, व्यक्ति आ समाजक जीवन-स्थितिकेँ प्रभावित करयवला महत्वपूर्ण होइत छल। एकटा उदाहरण देखल जाय। अगिलग्गी ककरो लेखे बड़ पैघ घटना थिक। हम सभ जनैत छी जे पूर्णियाक श्रीनगर ड्यौढ़ीमे 17 जुलाइ 1933 केँ श्रीनगर ड्यौढ़ीक जरिकेँ छाउर भs जयबाक पूर्ण विवरणक संग महाराजाधिराज, दरभंगाक श्रीनगर ड्यौढ़ीमे 17 जुलाइ 1933 केँ करीब चारि घण्टा रहबाक सूचना दैत छथि तँ दोसर दिस ई समाचार सेहो प्रकाशित करैत छथि जे 27 मइ 1934केँ कोइलखक बटौआ धानुकक घरमे करीब चारि बजे दिनमे आगि लागि गेलैक जे जनसमुदायक तत्परतासँ विकराल रूप धारण करबासँ पूर्वहि शान्त कs देल गेल। एहिना कोइलखक महादेव ठाकुरक घरमे 15 अप्रैल 1934केँ निशाभाग रात्रिमे कोनो दुष्ट द्वारा आगि लगायब आ हुनक सभ घर तथा सैकड़ो मन अनाजक जरि जायब उल्लेखनीय अछि तँ ओही गामक धोबि सभक घरक स्वाहा भs जयबो महत्वपूर्ण अछि। एहि तरहेँ कहि सकैत छी जे प्रभात मैथिलीमे समाचार-विचारक पत्रिकाक नेओं रखलक। साहित्यिक पत्रिकाक ओहि युगमे सामाजिक-राजनीतिक घटनाक प्रति अतिरिक्त अभिमुखता एक टा एहन पृष्ठिभूमिक निर्माण कयलक जकर फलाफल भेल ' दैनिक स्वदेश '(1955 ई.)मे। इएह दृष्टिकोण थिक जाहि कारणे 'प्रभात'मे कविता-कथाक अपेक्षा निबन्धक संख्या बेसी अछि। ''(सन्दर्भ: एकल पाठ -मोहन भारद्वाज) तारानाथ झाक किछु निबन्ध एतय प्रस्तुत अछि, जे प्रभातक स्वर-भंगिमाक परिचायक होयत आ मोहन भारद्वाजक उपर्युक्त कथ्यक पुष्ट करत। 1 मिथिलाक प्राचीन परिस्थिति प्राचीन कालमे ई मिथिला देश विद्या, बुद्धि, विवेक, विभव, क्रिया, कौशल, कल्याणसँ परिपूर्ण छल, ताहिपरसँ धार्मिक तथा सामाजिक व्यवस्था तेहेन सुदृढ़ छलैक जाहिसँ ई मिथिला देश सब देशसँ अत्यन्त उत्कृष्ट देश कहबैत छल। सामाजिक व्यवस्था एहेन छलैक यदि कोनो तरहक उत्कृष्ट कार्य्य केओ करै छलाह तँ ओकर उल्लेख पञ्जीकारक प्रबन्ध-मालहुमे समाजसँ बहुत शीघ्र करा देल जाइत छलैन्हि, जाहिसँ एको गोटेक उत्कृष्ट कार्य्यसँ समस्त कुलहुक मर्यादा छलैन्हि। तहिना यदि केओ अपकृष्ट कार्य्य करै छलाह तँ ताहिसँ हुनक समस्त वंश के कलंकित होमय पड़ैत छलैन्हि। जहिना सम्मान करबाक हेतु समाज सबखन उदारतापूर्वक प्रस्तुत रहैत छलथिन्ह , तहिना दंडो करबाक हेतु कठोरे। यदि एको व्यक्तिसँ धर्म-विरुद्ध कार्य्य केना जाइत छलैन्हि, तकर प्रख्यात विद्युत जकाँ बहुत शीघ्रे समस्त देश मध्य भय जाइत छलैन्हि, ताहिसँ लाभ ई होइत छलैक जे कोनो तरहक अनुचित कार्य्य केओ नहि करै छल,परस्त्री,परद्रव्य, परांशहरणक कथा कोन, अत्यावश्यक परलौ सन्ता अन्य व्यक्तिसँ याचना-पुरस्सर विशेष धनादिक संग्रहो करब अपन पारलौकिक क्रिया-कलापक हेतु विघ्न स्वरूपे बुझै छलाह। एतद्देशवासी विद्वान लोकनि तेहन सन्तोषशाली छलाह जे अहोरात्रिमे एको संध्या शाक तथा कंद-मूलसँ परिवारक पोषण अपन परम कर्तव्य बूझि, राजाक प्रतिग्रहसँ परांगमुख रहैत छलाह। ताहिसँ आत्मशक्ति तथा विद्या दिनानुदिन वर्द्धिष्णुता के प्राप्त करै छलैन्हि। मिथिलामे पूर्व ब्राह्मण-मण्डलीमे विद्योन्नति छल, तकर तँ उल्लेखो करब हम व्यर्थ बुझै छी। जनश्रुति तँ ई अछि जे अन्य देशी केओ विद्वान मंडन मिश्रसँ शास्त्रार्थ करबाक उद्देश्यसँ मिथिला आबि जाहि ग्राममे मंडन मिश्र रहै छलाह, ताहि ग्राममे प्रवेश कैलन्हि। " मंडन मिश्रक घर कोन थिकैन्हि ? " ई अन्वेषण कयलापर मंडन मिश्रक एक दासी उत्तर देलकैन्हि जे --- 'स्वतः प्रमाणम् परतः प्रमाणम् शूकांगना यत्र विचार्यन्ति। शिष्योपशिष्यइ रूपगीयमान मवेदि तं मण्डन मिश्रधामः।। ई कथा प्रायः कोनो मैथिलसँ अविदित नहि होयत। एहेन-एहेन आदर्शक चौपाड़ि मिथिलामे अनेकानेक छल। पूर्वमे राजाक ध्यान विद्योन्नति दिश पूर्ण रूपेँ रहै छलन्हि। हमरा देशक विद्वान जे किछु अपन मातृभाषा अथवा देवभाषा मध्य अपन कोनो ग्रन्थ लिखै छलाह त राजा हुनका यथोचित पुरस्कार दिया हुनक उत्साहकेँ बढ़बैत छलथिन्ह। (स्रोत : प्रभात, वर्ष-01, अंक- 06, जून-1933) 2 मैथिलक अवनति मिथिला, मैथिल जाति विद्याहीक कारणसँ सदा विख्यात अछि। एहि देशमे ज्ञानक चर्चा त एतेक छल जे ब्राह्मणक कोन कथा, क्षत्रियो लोकनि जनकादि प्रभृत के वर्णन पुराणमे आदर्श ज्ञानीक नामसँ कैल गेल अछि। योगी याज्ञवल्क्य आदि अनेक ऋषिमुनिक जन्मभूमि इएह मिथिला देश थीक। प्राचीन कालक बात के जाय दिअ, एहि कलियुगहुमे मैथिल ब्राह्मणमे मंडन मिश्र, वाचस्पति मिश्र और शंकर मिश्र आदि अनेक धर्मात्मा विद्वान और मदन उपाध्याय सदृश सिद्ध लोकनि एहि संसारक विशेष उपकार कय अपन नाम चिरस्मरणीय कय गेलाह अछि। अन्य देशी विद्वानकेँ परास्त कयनिहार हमरा लोकनिक समयमे खुद्दी झा तथा लुट्टी झा भय गेलाह अछि। एहि तरहक अनेक विद्वान यथा मधुसूदन झा प्रभृति सम्प्रति वर्तमान छथि। जनिक यश एहि देशमे के कहय, विलायतहुमे पसरल अछि। एकर एकमात्र कारण संस्कृत विद्या थीक। मूर्खो मैथिल आन जातिक पण्डितसँ विशेष संस्कारवान होइ छथि, तेकर कारण हमरा बूझि पड़ै अछि जे मिथिला देशक स्त्रीयोक दूधमे संस्कृत विद्याक बीज छैक। ई सभ गुण रहलोपर आब मैथिल समाजक उन्नतिक रंग नहि देखि पड़ै अछि। दिनानुदिन अवनतिये बूझि पड़ै अछि। एहना समयमे हमरा लोकनि के ई परम आवश्यक कार्य थीक जे सभ गोटे अपन-अपन मत लेख द्वारा 'प्रभात' तथा अन्य पत्रादिमे प्रकाशित करी जे कोन रूपे मैथिल समाजक उन्नति भ' सकै अछि। तदनन्तर सभ गोटे इकट्ठा भै कार्य रूपमे परिणत करबाक यत्न करी। हम जहाँ तक तर्क करै छी जे सर्वप्रथम विद्याहीक उन्नति तथा अवनतिसँ देशक उन्नति ओ अवनति होइ छैक। उदाहरणार्थ --- इंग्लैण्ड, जापान और अमेरिका के देखू --- विद्या उन्नतिक कारण संसारमे सभ देशक शिरोमणि कहल जाइ अछि। अतः एहिमे कोनो सन्देह नहि जे मैथिल समाजक उन्नति केवल विद्याहीक द्वारा भेल छल और ओकरे कमी भै गेलासँ अवनति होमय लागल अछि। जाहि मैथिल समाजमे केवल संस्कृतहीक चर्चा होइ छल ताहि समाज के एकत्रित भेलापर सम्प्रति हँसी-ठट्ठा होमय लगै अछि। तेहना स्थितिमे उन्नति कहाँ सँ भय सकै अछि। हमरा लोकनिकेँ अविद्या तेना क' दवा लेलकै जे अपन हित और अहित किछु नहि बूझि पड़ै अछि। विद्या अनेक प्रकारक अछि, ताहिमे सम्प्रति दू मुख्य भेद अछि। प्रथम- संस्कृत विद्या और दोसर - राज विद्या अर्थात अँग्रेजी। एहि दुनू विद्या के पढ़बामे बहुत असुविधा भय गेल अछि। पूर्वमे पाँच-पाँच, सात-सात गामक बीचमे समस्त मिथिलामे पाठशाला छल। जाहि पाठशालामे निःशुल्क छात्र विद्याध्ययन करै छला तथा भोजन वस्त्रादि राजा महाराजा इत्यादिक द्वारा भेटै छलैक। एहिसँ लोक उत्साहपूर्वक पढ़ै छल। आब एकर प्रावधान नहि अछि। एहिसँ एहि विद्याक नष्ट हेबाक क्रम बूझि पड़ै अछि। जखन हमरा लोकनि नीक जकाँ जनै छी जे बिना संस्कृत विद्यासँ एको दिन हमरा लोकनिक कार्य्य चलनिहार नहि अछि अर्थात उपनयन,विवाह, श्राद्ध, पूजा-पाठ इत्यादिमे संस्कृत विद्या बिना कार्य्य नहि चलि सकै अछि, तेहना स्थितिमे संस्कृत विद्याक प्रचारमे सभ केओ कियैक ने ध्यान दै जाइत छी। आबहु संस्कृत विद्याक रक्षा करू नहि तँ पछतेनहुँ किछु लाभ नहि होयत। दोसर अँग्रेजी विद्या पढ़ब आर कठिन अछि। कारण ---मैथिल समाजक आर्थिक स्थिति एहन खराब भय गेल अछि जे भरि पेट अन्नो होयब दुर्ग भय गेलैक अछि। तखन अंग्रेजी विद्याक पठन-पाठनक हेतु अधिक खर्च कोना चलि सकै अछि। अंग्रेजी विद्यामे अधिक द्रव्यक प्रयोजन पड़ै छैक, ई प्रायः सभ गोटे जनितहि होयब। हमरा लोकनि के एक एहन रास्ता निकालक चाही जाहिमे बिना खर्चे अथवा अल्प खर्चे अंग्रेजी विद्याक अध्ययन क' सकय। यदि एकर कोनो उपाय हो तँ प्रभातमे तथा अन्य पत्र-पत्रिकामे लेख द्वारा प्रकाश करै जाउ। जिनकर तर्क सभसँ उत्तम होयतैन्ह तेकर प्रचारमे सभ के तन-मनसँ लागि जयबाक चाही। (सन्दर्भ: प्रभात, वर्ष-01 अंक- 05 मइ 1933) 3 सदस्यक चुनाव भोटक आन्दोलन डिस्ट्रिक्ट बोर्डक मेम्बरक चुनावक हेतु गत एक महीनासँ आन्दोलन भय रहल छल। थाना-थाना सँ प्रजाक प्रतिनिधि बनबाक हेतु कै व्यक्ति ठाढ़ भेल छलाह। राज्यक तरफ सँ प्रत्येक थानामे प्रतिनिधि ठाढ़ करावल गेल छलाह। हुनका लोकनिकेँ राज्य सभ तरहसँ सहायता कय रहल छलैन्हि। फलस्वरूप प्रायः दरभंगा जिलाक अधिकांश थानामे राज्येक तरफक व्यक्ति भोट द्वारा प्रतिनिधिक चुनाव भेल। मधुबनी थानासँ चारि व्यक्ति ठाढ़ भेल छलाह। जाहिमे राज्यक तरफक दुनू व्यक्ति, बाबू शिव शंकर झा तथा लक्ष्मीनाथ मिश्र प्रतिनिधि चूनल गेलाह। बाबू चतुरानन दास और बाबू अनूप लाल ठाकुर भोट कम होयबाक कारण हारि गेलाह। उपर्युक्त दुनू व्यक्ति के जितबाक दू कारण, प्रथम--- राज्यक सहायता। द्वितीय- मैथिल के मैथिलक प्रति सहानुभूति। अन्य सभ जाति के अपनामे एकता बनल रहल छैक। ताहि कारणसँ ओहि जातिक कमो वोटर रहलोसँ अन्य जातिक कमो वोट आबि गेलासँ अपना जातिक प्रतिनिधि भय जाइ छलैक। प्रतिनिधियो अपना जातिक उन्नतिक हेतु सभ तरहसँ उपाय करै छथीन। परन्तु मैथिल ब्राह्मणमे नहि। जहाँ अपन कार्य्य भय गेल तखन अपना जातिक उपकारक त कथे कोन, जहाँ तक भ' सकै छैन अनुपकारे करबामे सर्वदा तैयार रहै छथि। एहि बेर मैथिल अपन जाति भाइक वचन तथा भावी उपकारक आशा पर अपन-अपन वोट दय प्रतिनिधिक पद पर आरूढ़ कय देलकैन्ह अछि। यदि ओ लोकनि अपन-अपन वचनक पालन करताह त विश्वास राखथु जे भविष्यसँ मैथिल वोटर मैथिल छोड़ि अन्य जातिकेँ कदापि वोट नहि दय सकै अछि। 22 मइ वोटक चुनावक दिन छल। मधुबनी वोटरसँ ठसाठस भरल छल। 09 बजे दिनसँ थानामे भोट देबाक कार्य्य प्रारम्भ भेल तथा 05 बजे सायंकाल तक कार्यवाही होइत रहल। सैकड़ो व्यक्ति चारू गोटाक तरफ सँ अपन-अपन बाकसक रंगक पताका नेने गर्द करैत दृष्टिगोचर होइ छलैक। अन्य सवारीक कथे कोन, हाँजक-हाँज मोटर गाम-गाममे पिपिआइत फिरै छल। जकरा इच्छा होइ छलैक, चढ़ि लै छल। कोनो रोक-टोक नहि छलैक। प्रतिनिधिक ओहिठाम भोजनक प्रबन्धक त कथे कोन। एक-एक व्यक्ति ओहि ठाम हजार-हजार आदमी भोजन कयलक। पूरी, चूड़ा, भात, तीनुक प्रबंध छलैक । व्यक्तिक हिसाबसँ भोजन देल जाइ छलैक। जे जाइ छल से भोजन कय लै छल। श्राद्धो, उपनयनमे जमींदारोक ओत एतेक ब्राह्मण भोजन होयब असम्भवे भ जाइ छैक। धन्य ई वोट, जे एतेक ब्राह्मण भोजन। यदि वोटक कार्यवाही बनले रहल त एखन की भेलै, हैत त दिन-दिन। (सन्दर्भ : प्रभात, वर्ष-1,अंक-6, जून1933ई.) 4 मनुष्य गणनाक रिपोर्ट सन 1931 ई.मे जे मनुष्य-गणना भेल छल तेकर रिपोर्ट आब प्रकाशित भय गेल। सरकारी रिपोर्टक अनुसार पता लगै अछि जे सम्पूर्ण संसारक जनसंख्या 1850000000(एक अरब पचासी करोड़) भेलैक अछि। ताहिमे पंचमांश अर्थात 352837778(पैंतीस करोड़ अट्ठाइस लाख सैंतीस हजार सात सय अठहत्तरि) भारत वर्षक जनसंख्या (वर्मा सहित) छैक। भारतवर्षक जनसंख्यामे खास अंग्रेजी राज्यक जनसंख्या 271526933(सताइस करोड़ पंद्रह लाख छब्बीस हजार न सय तैंतीस) (ताहिमे वर्माक जनसंख्या 14667146( एक करोड़ छियालीस लाख सढ़सठि हजार एक सय छियालीस) और देशी राज्यक जनसंख्या 81310845( आठ करोड़ तेरह लाख दस हजार आठ सय पैंतालिस) छैक। सन 1921 ई.मे जे मनुष्य गणना भेल छलैक ताहि हिसाबसँ ज्ञात होइ अछि जे गत दस वर्षमे भारतक जनसंख्या तीन करोड़ चालीस लाख अर्थात सैकड़े साढ़े दस बढलैक अछि। एहिसँ साफ-साफ ज्ञात होइ अछि जे फ्रांस या इटलीमे जतेक कुल आबादी छैक, ओतेक भारत वर्षमे केवल दस वर्षमे बढलैक अछि।1921 ई.मे जे मनुष्य गणना भेल छल ताहिमे संसार भरिमे चीनक आबादी सभ देशसँ बेसी भेल छलैक परञ्च 1931 ई.क मनुष्य-गणनासँ पता लगै अछि जे भारतवर्षक जनसंख्या सभ देशसँ अधिक भेलैक अछि। सन 1921ई.मे एहि देशक पढ़ल-लिखल मनुष्यक संख्या 22623651 छल, परञ्च1931ई.मे 28131315 भ गेलै अर्थात जहाँ सैकड़े सात छल, ओत' 8 भ' गेलै। सम्प्रति 38985427 मनुष्य शहरमे रहै अछि। भारत वर्षमे 39 शहर एहेन अछि जत सर्वदा एक लाख और एक लाखसँ अधिक मनुष्य रहै अछि। गत दस वर्षमे कलकत्ताक आवादी सैकड़े 12, मद्रासमे सैकड़े 23, कराँचीमे सैकड़े 23, दिल्लीमे सैकड़े40, बंगलोर मे सैकड़े 45, नागपुरमे सैकड़े 48, लाहोड़मे सैकड़े 53, अमृतसरमे सैकड़े 65 और सलेममे सैकड़े 96 बढलैक अछि। हिन्दूमे प्राप्त-वयस्क युवतीक संख्या54473438 अछि और युवाक संख्या 51450266 अछि। उपर्युक्त युवतीक संख्यामे 8413773 विधवाक संख्या अछि। पहिला मनुष्य गणनाक अनुसार एहि देशमे विभिन्न धर्मावलम्बीक संख्या निम्नलिखित अछि। हिन्दू --239195140(ताहिमे 122616300 पुरुष और 116578843 स्त्रीक संख्या अछि।) मुसलमान---77677545(जाहिमे 40867320 पुरुष और 36810225 स्त्रीक संख्या अछि।) ईसाई---- 6296763(एहिमे 3227090 पुरुष और 4069673 स्त्रीक संख्या अछि।) ट्राइवल (कबीले)- 8280347 अन्यान्य धर्मावलम्बी- 19079762(एहिमे 9790635 पुरुष और 9289147 स्त्रीक संख्या छैक।) (सन्दर्भ: प्रभात, वर्ष-01,अंक- 11 नवम्बर-1933) 5 रामायणमे आशंका रामायण प्रायः प्रत्येक भाषामे अछि। प्रत्येक भाषाक रचयिता अलग-अलग व्यक्ति छथि। सभसँ प्राचीन ' वाल्मीकि रामायण' कहल जाइ अछि जे महर्षि वाल्मीकि संस्कृतमे श्री रामचन्द्रजीक लीलाक वर्णन कयने छथि। यद्यपि तुलसीदास और चन्दा झा वाल्मीकि रामायण के आधार मानि रचना कयने छथि तथापि कोनो-कोनो स्थलमे वाल्मीकि-रामायणसँ अंतर भय गेल छैक, ई ततेक असंगत नहि, जेना एके व्यक्ति एके ग्रन्थमे स्थल-स्थल पर अन्तर कय देलासँ असंगत अवगत होइछ। यथा महर्षि वाल्मीकि चारि स्थल मे श्री रामचन्द्र जीक वन-गमन-कालक अवस्था चारि प्रकारक देलैन्हि अछि जे गंगाक जहूरी खाँक लेखक वचन प्राप्त कय नीचाँ विवरण करै छी। प्रथम स्थल- जखन रावण यतिक वेषमे सीताक निकट गेलाह तखन सीता अपन पूर्ण परिचय दैत कहलथिन----" मम भर्ता महातेजा वयसापञ्चविशकः।" (10,वा.रा. अरण्य-कांड स.47) एहिसँ साफ-साफ ज्ञात होइ अछि जे वन जाइक समय श्री रामचन्द्र जीक अवस्था 25 वर्षक छलैन्ह। द्वितीय स्थल-जखन विश्वामित्र दशरथसँ राम-लक्ष्मणकेँ मंगवाक हेतु गेल रहथि तखन दशरथ कहलथिन ---- " उनषोडशवर्षों मे रामो राजीव लोचनः। "(2 वा.रा.बा.का. सँ.29। अर्थात रामक अवस्था केवल 15 वर्षक छैन्ह। सीताजी रावणसँ कहलथिन्ह --- " उशित्वा द्वादश समा इक्ष्वाकुण निवेशने।" (4, वा.रा.अरण्य का.स. 47)। अर्थात विवाहक बाद 12 वर्ष तक दशरथक घर रहि तखन हमरा लोकनि वन अयलहुँ। एहि प्रकारसँ श्री रामचन्द्र जीक अवस्था वन-गमनक काल 45+12"=27 वर्षक होइ अछि। तृतीय स्थल- वन जयबाक काल श्री रामजी अपन माय कौशल्यासँ भेट करबाक हेतु गेलाह तखन कौशल्या कहलथिन -- "सप्तदश च वर्षाणि जातस्य तव राघव।" (45,वा.रा. अयोध्या कांड.सँ.20)। एहि प्रकार श्री रामचन्द्रजी के वन-गमन कालक अवस्था 17 वर्षक ज्ञात होइ अछि। चतुर्थ स्थल --- जखन रावण मारीचक निकट सहायताक हेतु गेलाह, तखन मारीच श्री रामचन्द्रजीक वर्णन करैत कहलथिन जे - ' द्वादशवर्षेयमक.......राघवः।' ( 6 वा.रा.अरण्य का.सँ. 38) । अर्थात जखन विश्वामित्र मुनि दशरथसँ राम के माँगक हेतु गेल रहथि तखन श्री रामजीक अवस्था केवल 11 वर्ष छलैन्ह। एहिमे बारह बारह जोड़लासँ वन-यात्राक समय श्रीरामचन्द्रक अवस्था 23 वर्षक होइ अछि। एहना स्थितिमे हमरा सन्देह होइ अछि जे कोन अवस्था ठीक थिक और कियैक महर्षि वाल्मीकि एहि विषयपर पूर्ण विवेचना कय नहि दर्शउलैन्हि ? अतः ई विषय अपने विद्वद्जनक निकट उपस्थित कयलहुँ अछि जे आगामी प्रभातक लेखम युक्ति-युक्त वचन दय हमरा मनक सन्देह हटयबाक कृपा करब। तारानाथ झा (कोइलख)
सम्पादकीय टिप्पणी 'प्रभात'क प्रकाशित 24 अंकमे मात्र 18 अंक उपलब्ध अछि आ जे पहिल अंक उपलब्ध अछि ओ थिक अप्रैल-1933 ई.क। 1 कतिपय लेखक दातावृन्द अपन-अपन लेख प्रभातक कागज कागज रहलहु पर नकल कय लेबाक हेतु हमरा प्रेषित कय दैत छथि। तेकर एकमात्र कारण आलस्य ज्ञात होइ अछि।लेख के रचने करबामे अधिक बुद्धिक तथा परिश्रमक प्रयोजन छैक।और एहिमे बेशी समय लगै छैक। जखन रचना भय जाइ छैक, तखन साधारणो व्यक्ति कागज पर साफ कय सकै अछि। एहिमे कोनो विशेष विद्वत्ता नहि।परञ्च हमर विचार अछि जे जहाँ तक भ' सकय प्रभात मे स्वहस्तलिखित लेखक संख्या अधिक रहक चाही।कारण-एहि प्रकारसँ प्रभात प्रकाशित भेलापर विशेष आदर होयबाक सम्भावना। हम एहि निमित्त ओहि व्यक्ति केँ नहि आग्रह कय सकै छियैन्हि, जिनका प्रभातक कागजपर लिखित लेख पठेबामे अधिक असुविधा तथा खर्च होइन्हि। प्रभातक कार्यालयमे एक सुन्दर लेख लिखनिहार व्यक्तिक परम् आवश्यक छैक। लेखक केँ 20 तारीख सँ 30 तारीख तक प्रत्येक मास मे समय-समय पर लेख लिखक पड़तैन्ह। अधिकांश लेख अपनहुँ घरपर लिखबाक अधिकार देल जयतैन्ह।एकर संग समय-समय पर इहो सूचित कय देब उचित बुझै छी जे संघक आर्थिक स्थिति अत्यन्त शोचनीय छैक, अतः लेखक महोदय के सम्प्रति किछुओ वेतन देबासँ संघ सर्वथा असमर्थ अछि। एहिमे परोपकार अवश्य छैक । परोपकार करबामे त्यागक प्रयोजन पड़ै छैक। त्याग बिना साहस के नहि भय सकै छैक।तेँ हेतु हमर विज्ञप्ति जे एहि निमित्त साहस करू, अवश्य धर्म तथा यश होयत।स्वहस्तलिखित आवेदन पत्र 20 एप्रिलक अभ्यन्तर अयबाक चाही। (वर्ष-01, अंक-4, अप्रैल-1933 ई.) 2 प्रभातमे प्रत्येक भाषाक स्थान देल गेल अछि, अतः तीन चारि भाषा प्रत्येक अंकमे रहै अछि।अनेक लेखकवृन्द एकहि पत्रपर अनेक भाषामे अनेक विषय लिखि प्रेषित कय दैत छथि। प्रथम तँ प्रायः सभ लेखकवृन्द जनितहि होयब जे प्रत्येक भाषा तथा अक्षरक हेतु प्रभातमे क्रमिक रखबाक व्यवस्था छैक।द्वितीय-ई भय सकै अछि जे ओहिमे एक विषय प्रकाश करबाक योग्य रहि सकै अछि और अतिरिक्त नहि। एहिना स्थितिमे लेखक महोदयवृन्द सँ विज्ञप्ति जे प्रभातक एक पत्रपर अनेक भाषामे अनेक विषयपर लिखि खिचड़ी बना नहि प्रेषित करथि, अर्थात अलग-अलग लिखबाक कष्ट करथि। जिनका प्रभातक कार्यालयमे चिट्ठी लिखबाक होइन्ह , अपन कागजमे चिट्ठी लिखि पठाबथि।पूर्ववत प्रभातक कागजमे चिट्ठी अयलासँ कागज नष्ट भय जयबाक सम्भावना।कारण- अनेक चिट्ठी प्रभातमे प्रकाशनार्थ आयल अछि, जेकरा प्रकाश कयला सँ परस्पर विरोध एवं संस्था केँ हानिये भय सकै छैक, तथा अनेक पत्र प्रकाश करब अनावश्यके बूझि पड़ै अछि एहिना स्थितिमे प्रभातमे नहि प्रकाश कयल जा सकै अछि। यदि कोनो पत्रमे प्रकाश करबाक योग्य रहत त कार्यालयहिमे प्रभातक कागजमे नकल कय प्रकाश कय देल जायत। युवक संघक सदस्यक वार्षिक चन्दा सँ प्रभातक खर्च चलावल जाइ अछि।यद्यपि संघ एक प्रति प्रभातक खर्च उत्साहपूर्वक दय रहल अछि और आशा कयल जाइ अछि जे बराबरि र0दैत रहथि।परञ्च संघ सम्प्रति अनेक परोपकारार्थ कार्य कय रहल अछि जाहिमे द्रव्यक पूर्ण प्रयोजन होइत रहै छैक। एहिना स्थितिमे प्रभातक ख़र्चक हेतु द्रव्यक कोनो अन्य प्रबन्ध भय गेला सँ संघकें बहुत उपकार होयतैक। अन्य प्रबन्ध उत्साही व्यक्तिक योग बिना कदापि नहि भय सकै छैक। अतः उत्साही व्यक्तिसँ प्रार्थी छी जे प्रभातक अग्रिम अंक सँ ख़र्चक भार अपना ऊपर लय पूर्ण यशक भागी होउ। (वर्ष-01, अंक-05,मइ 1933ई.) 3 अपने पाठकवृन्दसँ ई अविदित नहि जे मासमे प्रभात एक प्रति प्रकाशित कयल जाइछ। और मासाभ्यन्तर गामक तथा अन्य गामक पढनिहारक संख्या 500सै सँ कम नहि होइ अछि।आनन्दक विषय थीक जे दिनानुदिन पढनिहारक संख्या बढ़ले जाइ अछि। जाहिसँ सभ पढ़ि सकै ताहि दिश सभक ध्यान रहक चाही। परन्तु खेदक साथ लिखक पड़ै अछि जे एहना स्थितिमे कतिपय पाठक महोदयवृन्द प्रभातक नियम के पैर सँ कुचलबा मे एकोरत्ती संकोच नहि करै छथि अर्थात 6 घंटाक बदला दू-चारियो दिन राखि लेब अनुचित नहि बुझै छथि। आब हम एहि विषयपर बेशी लिखब व्यर्थ बुझै छी और आशा करै छी जे भविष्य सँ पाठक महोदय केँ जहाँ तक शीघ्र भ सकैन्हि पढ़ि क प्रेषित कय देथि। कैक व्यक्ति प्रभात अपना ओहिठाम पढ़बाक हेतु ल गेलाह अछि,अपने पढ़ि आनो व्यक्ति के पढ़ैक हेतु द देलखीन्ह अछि। एहि प्रकार सँ कइएक व्यक्ति पढ़ि लै छथि। ई उत्तम विषय त अवश्य थीक,यदि अपन-अपन कर्तव्य पर आरूढ़ रहथि। लेकिन से नहि होइ अछि, ओहिमे केओ व्यक्ति प्रभात ल जा क राखि लै छथि, यदि मासो दिन बीति जयतैन्ह त कनेको चिन्ता नहि।एहना स्थितिमे प्रभातक पता लगैबो दुर्ग भ जाइ अछि।पता लगैबो मे बहुत समय लागि जाइ अछि। एहि प्रकारसँ लाभ सँ बेशी हानिये दृष्टिगोचर होइछ।अतः प्रभात ल गेनिहार व्यक्ति सँ हमर प्रार्थना जे अन्य व्यक्ति के प्रभात नहि दय सम्पादक के प्रभात प्रेषित कय देथि। यदि अन्य व्यक्ति के प्रभात देमक होइन्ह त सम्पादकक अनुमति सँ देथि। (वर्ष-01, अंक 06, जून 1933 ई.। 4 गत फरबरी मासक प्रभातमे प्रकाशित भय चुकल अछि जे लेखक प्रभातक कागजक दुनू तरफ यदि नहि फूटै त लिखि सकै छथि, परन्तु कतिपय लेखक कागज फुटियो गेला पर दुनू पृष्ठमे लिखि दै छथि। कागज फुटि गेला सँ देखबामे भद्दा तथा बाँचवा मे कष्टतर होइछ। अतः प्रत्येक लेखक महोदयसँ निवेदन जे भविष्य सँ कागजक एके पृष्ठ चिन्हित रेखाक भीतर लिखथि। लेखक के लेख लिखबाक समय शुद्धाशुद्ध पर विशेष ध्यान राखक चाहियैन्ह। जाहि लेखक के शुद्धाशुद्धक विशेष ज्ञान नहि छैन्हि तिनका अन्य व्यक्ति सँ शुद्ध करा लेब उचित थिकैन्ह । एहिमे कोनो लाघवता नहि छैक। जिनका अन्य व्यक्ति सँ शुद्ध करायब विचारान्तर होइन्हि से सम्पादक के पठा देथि ओ शुद्ध कय ,करा प्रेषित कय देताह। लेख प्रकाश होयबा मे नियमबद्ध उत्तम रचनाक अतिरिक्त सुन्दर अक्षर तथा शुद्धाशुद्ध पर ध्यान राखल जाइ छैक। एहिमे एको विषयक त्रुटि भेला सँ प्रकाशित होयब असम्भव भ जाइछ। अतः लेखकवृन्दकेँ सूचित करबै छी जे यदि स्वहस्तलिखित अक्षर सुन्दर नहि होन्हि त एहिना स्थितिमे अन्यो लेखक सँ लिखा सकै छथि। (वर्ष-01, अंक-08, अगस्त -1933 ई.) 5 आठ मासक टोटल हिसाबसँ अवगत होइछ जे प्रभातमे लेख लिखबाक हेतु प्रभातक कागज जे लेखकवृन्द के देल गेलैन्हि अछि, ताहि सँ करीब तेहाइ कागज नहि वापस आयल अछि। जहाँ तक पता लगै अछि जे कतिपय लेखकवृन्द कागज लय नष्ट करबामे तिलमात्रो संकोच नहि करै छथि, तिनका सँ हमर अनुरोधक संग-संग प्रार्थना जे भविष्य सँ प्रभातक कागज के अन्य विभागमे खर्च नहि करथि। कतिपय लेखकवृन्द नियमित समयसँ पूर्वहि लेख लिखि लै छथि,परञ्च आलस्यवश नियमित समय सँ पूर्व प्रेषित करबा सँ असमर्थ भय जाइत छथि, जाहि कारण हुनक लेख प्रकाशित होयबामे कै-कै मास विलम्ब भय जाइ छैन्हि। अतः हुनका सँ हमर प्रार्थना जे लेख लिखब समाप्त होइतहिं आलस्य छोड़ि सम्पादक के लेख प्रेषित कय देथि, जाहिसँ समयपर प्रकाशित भय जाइ। (वर्ष-01,अंक-09, सितम्बर) संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झाक एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झाक एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झाक एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झाक एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झाक एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झाक एवं हुनक परिवारक योगदान-6 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.३.जगदानन्द झा मनु - डॉ. कैलाश कुमार मिश्र जीक उपन्यास मनसरबीक समीक्षा जगदानन्द झा �मनु� डॉ. कैलाश कुमार मिश्र जीक उपन्यास मनसरबीक समीक्षा अंतरजातीय प्रेमपर आधारित, डॉ. कैलाश कुमार मिश्र लिखित उपन्यास �मनसरबी� मैथिली साहित्य खास कय मैथिली उपन्यास लेल एक गोट अनुपम धरोहर केर रूपमे, मैथिली साहित्य अनुरागी लोकनीक लेल साबित होएत। मिथिला समाजक ताना-बाना, परिवेश, कुरीति, सामाजिक विसमता, नारीक स्थिति आ अस्तीत्व, धनिक वर्गक द्वारा गरीब सभपर केएल गेल अमानवीय शोषण, धन आ दैहिक शक्तिक दुरुपयोग, बहु आ बेमेल ब्याह, वासना, प्रेम, निश्छल ईश्वरीय प्रेम, कमोबेश मानवीय संवेदनाक सभ पक्ष केर अपनामे समेटने �मनसरबी� मैथिली साहित्यक एकटा उच्चय कोटिक उपन्यास अछि। मनोरंजन सहित लेखक सम्पूर्ण पोथीमे रोचकता आ कौतुहलता बनबैमे पूर्ण रुपसँ सफल भेल छथि। पाठक एकबेर पोथीकेँ पढ़व शुरू केलाक बाद बिना पुरा पढ़ने नहि रहि सकैत छथि। उपन्यासक भाषा जनमानस के कंठमे बसल सोझ, सरल आ चित्रात्मक अछि। पढ़ैकालमे सिनेमाक परदा जकाँ मानस पटलपर एक-एकटा दृश्य चलैमान लगैत अछि। आँगन-दलान, खेद-खड़िहान, धूल-माटि, भूख-पिआस, प्रेम-विरह सभ आँखिक आगाँ साक्षात देखाइ लगैत अछि। संवाद स्वाभाविक आ लयात्मक अछि। �मनसरबी� उपन्यासमे समकालीन मिथिलाक ग्रामीण जीवनक सजीव चित्र जेना संवेदना, यथार्थ आ लोक-संस्कृतिक केर यथार्थ दर्शन होइत अछि। मनसरबी, राघव आ बुलकी केर निश्छल प्रेमक अनुपम प्रेम कथा अछि। राधव संस्कारी, पढ़ल लिखल, बुझनूक, सभकेँ संग लय क चलै बला एकटा गामक गरीब ब्राह्मण घरक बेटा अछि। ओतय बुलकी बहुत गरीब गामक अमात घरक बेटी अछि। ब्याह भेला पछाइतो बुलकी अपन सासुर आ घरबालाकेँ छोड़ि नैहरमे अपन बुढ़ गरीब माय-पापक संगे रहि रहल अछि। गाम घरक सभ काज जेना माल-जालकेँ सेवा, घास करब, बौइनी करब सभ काज करैत अछि। अनुपम सुनरि देह आ मोनक मालकिन बुलकी। ओ अपना सुन्नरता आ आकर्षण केर कारण गामक कतेको लोकक नजरिमे बसैक संगे धनिक आ दवंग राजकांतक बलात्कार केर सजा सेहो पबैत अछि। राघव आ बुलकीक प्रेम जेना, सुग्गा-मैनाक प्रेम। जेना हिर आ रांझाक प्रेम। जेना वसंत आ प्रकृति केर प्रेम। जेना सुर आ बाँसुरीक प्रेम। निश्छल, अलौकिक, प्रेमक पूर्णता, मधुर-मिलन भेला बादो ग्राम्य जीवन आ समाजक बुनल ताना बाना केर बुझैत एक रहितो समाजक नजरिमे एक नहि भय सकला। उपन्यासकार अपन उपन्यासमें दुनूक यौवन, रुप, चरित्र, प्रेम, विरहकेँ एहेन सुन्नर शब्दक मालामे गूँथने छथि जेकर प्रशंसा केनाइ सूर्यकेँ दिया देखबय जकाँ होएत। उपन्यास राघव आ बुलकी संगे संगे बहुत रास आरो कतेको पात्र चरित्र आ कथाकेँ अपनामे समटने अछि। एक तरफ़ राघव आ बुलकी, दू टा अलग अलग जातिकेँ होबाक कारणे समाजिक रूपसँ एक नहि भ सकल ओतय दोसर दिस नैना आ नन्द एक दोसरापर सर्वत्र समर्पण कय देला बादो सामजक सामने एक नहि भ पेला किएक तँ दुनू एक्के गोत्रसँ रहथि। नेना नन्दक प्रेमकेँ अपन करेजामें समटने नहि चाहितो एकटा द्वितीवरसँ ब्याहल जाइ छथि आ किछुए समयमे नन्दक वियोककेँ नहि सहि परलोक बासी भ जाइत छथि। लखरु ख़लीफ़ा एक टा नामी पहलवान अपन ताक़त के जोरसँ समाजमे अन्यायके बले बहुते धन कमाइए। मुदा अंत काल गूँह गिजैत धरपरिवार समाज सभसँ दूर नरक केर यातना भोगैत अछि। उपन्यासक एक-एकटा पात्र मानु जीवन्त हुए। शब्द आ दृश्यक अनुपम प्रस्तुति कैलाशजी कयने छथि। हुनक एहि उपन्यासक लेखनीमें एकटा आकर्षण अछि जे पाठककेँ पूरा उपन्यास पढ़ें लेल उत्साहित करैत अछि। हाँ किछु वर्तनी सम्बंधित दोष अछि, जेकरा प्रकाशन हाउस आँगाक एडिशनमे ठीक कय लेता इ उम्मीद अछि। डॉ. कैलाश कुमार मिश्र जीकेँ हुनक एहि अनुपम कृतिकेँ लेल बहुत बहुत बधाइ संगे माय भगवतीसँ प्रार्थना कि अपने एनाहिते मैथिली साहित्यकेँ समृद्धि करैमे सदति लागल रही। -जगदानन्द झा �मनु�, मो० न० ९२१२ ४६ १००६ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.४.डा. आभा झा-भावुकताक आख्यान-पेपरवेट सन जिनगी डा. आभा झा भावुकताक आख्यान-पेपरवेट सन जिनगी संवेदना मानवक सहज गुण थिक आ कविता लेल भावनाक सामान्यीकरण एकटा आवश्यक तत्त्व। समाजमे नीक- बेजाय सभ तरहक परिस्थिति देखना जाइत छैक,भल-कुभल घटना घटिते रहैत छैक। सामान्य लोक घटनासॅं प्रभावित त� होइत अछि, मुदा भाग्यक सुफल वा दोष कहि कात भए जाइत अछि। मुदा कवि- हृदय लोक ओकर तह धरि जाइत अछि, सुखद स्थितिकेॅं सुन्दर शब्दक माला पहिरा,कल्पनाक मधुर-मोहक चाशनीमे बोरि,कमनीय रूप दैत अछि,कौखन अभिधो मे बात कहि पाठकक मोनकेॅं सन्तृप्त करैत अछि आ कौखन लक्षणा आ व्यंजनाक मदतिसॅं चमत्कारिक प्रभाव छोड़ैत अछि। साहित्यक(कविता,कथा,नाटक) एकटा विशेषता इहो अछि जे पाठक पढ़ैत काल बिसरि जाय जे ओ कोनो आन व्यक्तिक (लेखकक ) रचना पढ़ि रहल अछि। जॅं ओकरा लिखित भावसॅं तादात्म्य स्थापित भए जाय त� ई जीवन्त लेखनक निशानी मानल जाइत छैक। आइ हमर हाथमे अछि नव कवयित्री मनीषा झा मृडाणीक पहिल कविता-संग्रह �पेपरवेटक फूल सन जिनगी�। पोथीक नामकरण कविक अधिकार होइत छैक,ठीक ओहिना जेना एकटा मायक अपन संतानक नामकरणक।तेॅं ओहि पर कोनो गप नहि । हॅं, तत्सम्बद्ध चर्चा जरूर होयत, मुदा बादमे।एखन देखैत छी कविक ओ दृष्टि जे विषय-वैविध्यसॅं पहिलहि पोथीमे चमत्कृत करैत छथि।ओ जलसंकट, गाछ-वृच्छ(बड़क डारि),फुलबारी,हरियरी ,पुष्पगुच्छक मनोदशा आदि पर लिखैत छथि जे आजुक समयक जरूरति अछि। मनीषा जी मिथिला-वर्णनक क्रममे मनोनुकूल ग्रामीण गुण नहि पाबि व्यथित होइत छथि ।एहि क्रममे ओ दू टा कवितामे बाबा यात्रीकेॅं मोन पाड़ैत छथि जे नवीन प्रयोग सन मुदित करैत अछि।ओ वन्ध्याक दुर्दशाक वर्णन करैत छथि (जे किछु समय पूर्वक स्थितिक वर्णन सन बुझाइत अछि)त� आइ वी एफ पर सेहो कलम चलबैत छथि,ओ स्त्रीक खराब स्थितिक वर्णन जरूर करैत छथि,मुदा पिताकेॅं ईश्वर आ मायकेॅं आशक डिबिया कहैत छथि( ई फराक गप जे ओही मायकेॅं अपना पर विश्वास करबा लेल कन्विंस करैत छथि )।अपन कवितामे ओ प्रेमक विविध रूपक वर्णन करैत छथि -कतहु एकनिष्ठ समर्पणक गाथा अछि त� कतहु सामाजिक ओ पारम्परिक ओझराहटिमे फॅंसल असफल प्रेमक। जे कि ई युवा कवयित्रीक पहिल कविता- संग्रह थिकनि, एक्कहि बेर बहुत परिपक्वताक अपेक्षा करब आ आलोचनाक तीक्ष्ण तरुआरि ल� प्रहार करब उचित नहि।एहि युगमे किताब छपायब एकटा सरल प्रक्रिया थिक । कविता कथा आदि लिखनिहारक कविक रूपमे अपन नाम देखबा- सुनबाक लिलसा सेहो स्वाभाविके ! परिणामत: �पेपरवेटक फूल सन जिनगी� पाठकक सोझाॅं अछि। पाठक कविता सभक आनन्द उठाबथि आ अपन पाठकीय प्रतिक्रिया देथि त� सहजहिॅं लेखकक मनोबल बढ़बाक संग गन्तव्यक फरीछ दिशा सेहो भेटतै। आब अबै छी पोथीक शीर्षक पर!�पेपरवेटक फूल सन जिनगी� अर्थात् बाहरसॅं देखाइत सुंदर दृश्य मात्र,जाहिमे ने जान-प्राण हो आ ने वास्तविक सौंदर्य आ ने सुगन्धि।एहि नामसॅं संग्रहमे कोनो कविता त� नहि अछि मुदा ई वाक्यांश �चुटकी भरि सेनुर� कवितामे वर्णित अछि जाहिमे विवाहक बाद स्त्रीक अस्तित्व विहीन स्थितिक वर्णन अछि। पेपरवेटक भितरका बनल छी सभरंगा फूल हम हमरो बाबूजीएक खेत सन राखए पड़ल भरना अपन अस्तित्वक ! यद्यपि आब विवाहिता स्त्रीक स्थिति पहिने जकाॅं अस्तित्व विहीन नहि देखना जाइत अछि, तखन आर्थिक परावलम्बनक कारण कत्तहु- कत्तहु ई स्थिति देखबामे अबैत हो,सेहो असंभव त� नहिए । मुदा आजुक समाजमे सामान्यत: जॅं कोनो पुरुष वा हुनक परिवार एहि तरहक दुस्साहस करैत छथि त� स्त्रीक विरोधी स्वर रहरहाॅं सुनबामे अबिते अछि । कन्याक माता- पिता सेहो पहिलुक माता-पिता जकाॅं कन्यादानक संग वैतरणी पार करबाक भ्रम नहि पालैत अछि।तथापि किछुओ प्रतिशत जॅं एहि तरहक स्थिति देखबामे अबैत छै त� ओ चिन्ताक कारण अबस्से छै आ ओ स्थिति देखि कवि हृदयक विचलित होयब सेहो स्वाभाविके। एहि संग्रहक कइएक टा कवितामे एहनाहे सन स्थितिक वर्णन देखि कनेक असहज होइत छी। स्त्री आ पुरुषक प्रकृति भिन्न होइत छैक आ प्रेमाभिव्यक्तिक तरीका सेहो फराक! मुदा प्रेम-संबंध बनबै बला आ वैवाहिक जीवन ईमानदारीसॅं स्वीकार करै बला पुरुष सेहो आन्तरिक प्रेम करैत अछि,पत्नीक मान- सम्मान करैत अछि आ ओहि बलेॅं सामंजस्यसॅं जीवन जिबैत अछि।दैहिक आकर्षण सेहो उभयपक्षीय होइत छैक। मुदा आजुक युगक युवा कविक एहि तरहक दृष्टि देखि विस्मित होइत छी - अहाँक ऑंखिमे हम तकैत रहलहुँ नेह आ अहाँक चाह छल हमर देह प्रेमवश क' देलहुँ हम सर्वस्व समर्पित बाउग करय चाहैत छलहुँ अहुँक हियमे अपने सन अनमन बाकुट भरि प्रेमक बीया मुदा हम कियेक बिसरि गेलियै उस्सर खेतमे नहि जनमैत अछि एकहुटा दूभि (प्रेम-2) तहिना �उमेद� शीर्षक कवितामे पत्नी अपना दिस पतिक भरिपोख दृष्टि लेल प्रतीक्षिते रहैत छथि- किछु बेसी त' नहि करैत छलहुँ हम उमेद अहाँसँ बस एतबे ने कि कनेक मान आ थोड़-बहुत अधिकार ल' पबितहुँ कोनो निर्णय अपनो लेल बोध मनुक्खक आइ धरि नहि भेल � अहिना �अपराध� शीर्षक कवितामे सेहो स्त्रीक उपेक्षित स्थितिक करुण वर्णन भेटैत अछि - ओहि मकान रूपी घरक भीतर अस्तित्वक लेल सिसकैत तोड़ैत दम नहि जाइत अछि देबालक पार मिसियो भरि आवाज होइत अछि एकटा एहनो गप जे नहिए छपैत अछि कहियो कोनो टा अखबारमे� �प्रशंसा� शीर्षक कविता मे सेहो ओएह शोषण, घरेलू हिंसा आ परमुखापेक्षिता विस्तारसॅं वर्णित भेल अछि किछु एहने सन भाव छै �दूभि� शीर्षक कविताक,बस अंतर एतबहि अछि एतय जे दृष्टि आशावादी अछि - मुदा की ओहिसॅं ओ मानि लैत अछि हारि नहि किन्नहुँ नहि ओ पुनि उठिक� होइत अछि ठाढ़ नहि मेट� दैत अछि अपन अस्तित्व जोगौने रहैत अछि कतहु त� अपन सिर धयने जिद आ विश्वास...। �मुखाग्नि� शीर्षक कवितामे माता-पिताक संतानक उपेक्षाजन्य पीड़ाक भावुक कवयित्री कारुणिक वर्णन कएने छथि। हॅं,�पापनाशिनी गंगा� शीर्षक कविता कवयित्रीक अति भावुकताक अव्यावहारिक सन गप अछि। कोनो गामक कोनो सम्मत व्यक्ति एहि तरहक गप नहि बजैत छल आ ने बजैत अछि - क' रहल अछि ओरियान गामक लोक कहलखिन अछि क' आउ गंगा स्नान बड़ पैघ लागल अछि दाग पड़ि गेल अछि बलात्कारी नाम �अपूर्ण अरिपन� शीर्षक कवितामे �प्रिय� लेल �प्रिये� शब्दक प्रयोग तीन बेर भेल अछि,जे सुधारक अपेक्षा रखैछ।हम बहुत लेखकक रचनामे ई प्रयोग देखैत ठहकैत रहलहुॅं अछि। वस्तुतः पुरुष लेल सम्बोधनमे प्रिय! आ स्त्री लेल प्रिये! शब्दक प्रयोग होयबाक चाही (मूल शब्द प्रिय, स्त्रीलिंगमे प्रिया,प्रियाक सम्बोधनमे प्रिये! )। एकटा �अपवित्र� शीर्षक कविता जे मासिक धर्मक विषयमे लिखल अछि,ओहो आजुक समयमे बहुत प्रासंगिक नहि अछि।आइ सभ बालिका वा स्त्री ओहि समय सभ काज करैत छथि, विद्यालय जाइत छथि,खेल कूदमे भाग लैत छथि, कार्यालय जाइत छथि,मजूर वर्ग स्त्री खेत खरिहानमे काज करैत छथि। हॅं पूजादि काज अवश्य एखनहुॅं अधिकांश घरमे वर्जित अछि,तकर कारण रक्तस्रावक कारण विचलित सन भेल मनोदशा सेहो भए सकैछ। अस्तु। अंतमे हमर कथ्य एतबहि जे मनीषाजीकेॅं कविता लिखबाक एप्रोच पर कने मेहनति करबाक खगता छनि।हम अतीतक उल्लेख ओहिसॅं सीख लेबा लेल करैत छी,अतीतजीवी होयबा लेल नहि।जे कवयित्री मंदिरमे दूधक अपव्यय आ भूखल शिशुक लालसा भरल दृष्टि लिखि सकैत छथि,जे जातिगत विभेदक तार्किक विरोध कए सकैत छथि खून चढ़ैबाक उपमा द� क� ,ओ अपन लेखनशक्तिक उपयोग अधिकतर अन्हार पक्षक वर्णनमे करथि त� कनेक निराशा होइत छैक। स्त्रीक हाथमे कलम हो आ ओ अपन अनंत सामर्थ्यक वर्णन नहि करैत,समाजकेॅं आदर्श रूप देबाक संकल्प नहि दोहरबैत रोदना मात्र पसारय ई अभीष्ट नहि।आइयो जखन हम ई लेख लिखि रहल छी त� सीबीएसईक बारहवीं कक्षाक परीक्षाफलक वर्णनक्रममे सुनि रहल छी जे �लड़कियों ने मारी बाजी�।आ ई मात्र उच्च वर्गक गप नहि,श्रमिक वर्गक धी बेटी सेहो शिक्षित भए रहल अछि। हमर कथ्यक तात्पर्य ई नहि जे एहि दिशामे काज करबाक बेगरता नहि छैक,ओ छैक मुदा दोसर रूपमे। बहुत रास दोसर तरहक समस्या आजुक समयमे छै,जे कवि दृष्टिक अपेक्षा रखैत छैक। हमरा व्यक्तिगत रूपसॅं युवा लेखक- लेखिकाक रचनामे आशावादी दृष्टि आ नवोन्मेष नीक लगैत अछि आ ई कामना हम हिनको लेल अवश्य करबनि। मनीषाजीकेॅं एहि पोथी लेल बहुत बहुत बधाई आ हुनक लेखनक क्रमशः परिपक्वताक कामना। आभा झा 13.5.2025 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.५.परमानन्द लाल कर्ण-सन्ताप परमानन्द लाल कर्ण सन्ताप
अपन बेटा आ पुतोहुक सवदिनक लड़ाई झगड़ा सँ परेशान मोहन बाबू वृद्धा आश्रम जयवाक लेल सोचलैथि । झोरा मे अपन किछु कपड़ा राखलैथि आ उदास मन सँ अपन अर्द्धांगनीक फोटो उठा कऽ मनेमन सोचऽ लगलाह - कतेक जतन सँ एकलौता बच्चा कें पालि पोसि कें पैघ केलहुँ आ आई हमर दिन एहन भऽ गेल । ई सोचैत आँखि सँ ढ़व-ढ़व नोर गिरऽ लागल । मुदा फेर सोचलैथि जे अखन हमरा कमजोर नहि होवाक चाही । आँखि सँ नोर पोछैत फोटो अपना झोरा मे राखलथि आ अपन दोस्त शंकर कें फोन केलखिन, जे वृद्धा आश्रम मे रहैत छलाह । हुनका फोन पर कहलखिन जे हमहु वृद्धा आश्रम मे रहऽ चाहैत छी । ई सुनैत हुनकर दोस्त शंकर स्तब्ध रहि गेलाह । ओ कहलनि अहाँक बेटा-पुतोहु दूनु कतेक नीक सँ राखैत छल । तहन अहाँ एहन किएक करैत छी । सव केओ अहाँक बेटा के दूर छी करतनि मोहन बाबू कहलखिन जे सव दिनक कीच-कीच सँ परेशान भऽ गेलहुँ अछि। तैं आव हम वृद्धा आश्रम मे रहऽ चाहैत छी । थोड़ेक देर मे अहाँ लग आवि रहल छी । ई कहि ओ अपन झोरा लऽ के घर सँ बाहर निकलाह । तखन देखैत छथिन जे हुनकर बेटा पुतोहु घर मे बैसि चाय पी रहल छलाह । मुदा दूनु मे सँ केओ नहि पूछलखिन जे अहाँ झोरा लऽ कतऽ जा रहल छी । थोड़ेक देर में मोहन बाबू वृद्धा आश्रम पहुँचि गेलाह । किछु दिन मे वृद्धा आश्रम मे सव सँ मिल जुलि के रहऽ लगलाह । ओहि ठाम भिनसरे योगा क्लास होयत छल , ताहि मे ओ सेहो जायत छलाह । सबसँ गप्प सप्प करैत नीक सँ समय कटैत छल । धीरे-धीरे मोहन बाबू वृद्धा आश्रम मे घुलि मिल गेलाह । जखन ओ अकेले अपना बिछौना पर बैसैत छलाह व लेटैत छलाह तऽ अनायास हुनकर ध्यान अपना पत्नी पर चलि जाईन । तैं ओ जखन ओ बिछौना पर आवैत छलाह तखन पत्नीक फोटो निकालि सोझा मे राखि मने मन सोचैत छलाह जे अहाँ तऽ संसार सँ अलविदा भऽ गेलहुँ , बेटा सेहो साथ नहि देलक जेकरा लेल पूरा जीवन पसीना बहेलहुँ । आई हम अकेले भऽ गेलहुँ । एहि सन्ताप मे अपन जीवन यापन करैत छलाह । एक दिन मोहन बाबू आश्रमक प्रांगण मे किछु लोकनिकक संग घुमि रहल छलाह तखन देखलखिन जे एकटा कार गेटक बाहर रूकल । आश्रमक लोकनिकक नजरि ओम्हर गेल तऽ देखैत छथि जे एकटा महिला कार सँ उतरलीह, हुनका संग एकटा नवयुवक आ नवयुवती सेहो छल । नवयुवतीक हुनका हाथ मे एकटा झोरा देलखिन आ गोर लागि फेर कार मे बैसि गेलीह । ई देखि आश्रमक लोकनि आपस मे बात करऽ लगलाह जे फेर कोनो मायक ममता तार-तार भेल अछि ।एक मायक सपना चकना चूर भऽ गेल अछि । कतेक जतन सँ अपन धीया पुता के लोक पालैत अछि । पढ़ा लिखा कऽ ई योग्य बनावैत छथि जे बच्चा अपना पाइर पर ठाढ़ भऽ बुढ़ापाक सहारा बनत, मुदा जमाना तेहन भऽ गेल अछि जे विवाहक बाद माय-बाप भारी भऽ जायत छै । महिला मोहन बाबू कें देखि अपन मुँह ढ़कि लेलखिन । मोहन बाबूक एहसास भेलनि जे हम हिनका जानैत छी, मुदा नीक सँ नहि बुझि सकलाह। जे ई के छथिन । जखन महिलाक नजरि मोहन बाबू पर जायत छल , ओ मुँह ढ़कि लैत छलीह । एक दिनक बात अछि मोहन बाबू बगीचा में घूमि रहल छलाह तखन ओ महिला बगीचा मे पूजाक लेल फूल तोड़वाक लेल आयल छलीह । महिलाक नजरि मोहन बाबू पर नहि गेलनि मुदा मोहन बाबू हुनकर चेहरा देखैत हतोसानि भऽ गेलाह । मानु हुनक पाइरक जमीन खिसकि गेल आ हुनका मन मे कतेको सवाल उठऽ लागल । तखनहि हुनक संगी शंकर ओहि ठाम आवि कहऽ लागलखिन नाश्ताक समय भऽ गेल अछि, अहाँ एहि ठाम घुमि रहल छी । चलु सव लोकनि नाशताक टेबुल पर छलाह मुदा अहाँ के नहि देखलहुँ तैं हम बाहर निकललहुँ जे आई अहाँ कोन ठाम चलि गेल छी । कोनो तरहक परेशानी अछि की ? मोहन बाबू कहलखिन जे नहि कोनो बात नहि अछि । घुमवाक इच्छा भेल ताहि सँ एहि ठाम चलि एलहुँ अछि । दूनु आदमी नाश्ता करवाक लेल बैसलाह, मुदा मोहन बाबूक ध्यान महिला पर छल । ओ पुछऽ चाहैत छलखिन जे एहन कोन बात भेल जे अपनेक ई दशा भऽ गेल । हुनकर परिवार भरल पुरल छल । सदिखन कहैत छलखिन जे हम अपना बेटा-पुतोहु सँ बड्ड खुश छी, तहन आई की भेलनि जे ई नौबत आवि गेलनि । एक दिन मोहन बाबू भोजन करैत छलाह तखन रमेश बाबू सँ कहलनि, � दुई दिन पहिले जे महिला आयल छलीह हुनका खाना खाईत नहि देख रहल छी ।� एहि पर ओ कहलनि जे माता जी बड्ड दु:खी छथि तैं आई खाना खाय सँ मना कऽ देलनि अछि । ओ बेर-बेर अपना घरक याद कऽ कनैत रहैत छथि । हुनकर ध्यान भटकैवाक लेल प्रबंधक महोदय हुनका कोनो कोनो काम मे लगा दैत छथिन ताकि हुनकर ध्यान घर दिश नहि जानि । ई सुनि मोहन बाबू परेशान भऽ गेलाह । ओ जानऽ चाहैत छलाह जे आखिर हिनका साथ की भेल जे आई एहि दशा मे पहुँच गेलीह । एक दिन मोहन बाबू बगीचा मे अकेले घुमि रहल छलाह तऽ ओहि महिला कें देखलखिन । मोहन बाबूक देखैत ओ सकपका गेलीह । मोहन बाबू कहलखिन जे हम अहाँ के चिन्ह गेलहुँ अछि , मुदा पूछवाक अछि जे अहाँक ई दशा कोना भऽ गेल ? अहाँ तऽ बड्ड नीक सँ रहैत छलहुँ। ई सुनि हुनका आँखि सँ ढ़व -ढ़व नोर गिरऽ लागल । ओ कहऽ लागलखिन जे समधी जी हम अपन दु:ख की कहु ? हमर घर काल कोठरी बनि गेल छल । घरक सव काम करैत छलहुँ जे बेटा पुतोहु अछि बैसल की करव ? भनसा घर जाइत छलहुँ , जे सम्भव हमरा सँ होयत छल करैत छलहुँ । एक दिनक बात अछि हमरा सँ एकटा कप फूटि गेल । ओहि दिन हमर पुतोहु हमरा कोनो दशा बाकी नहि राखलक । साँझ मे बौआ घर आयल तऽ कनिया हुनका कान भरि देलखिन । दोसर दिन हमर बेटा-पुतोहु दूनु हमरा सँ कहलनि जे अहाँ भनसा घर नहि जाऊ । अहाँक देखा नहि दैत अछि कोनो सँ कोनो सामान गिरा दैत छी आ सामान बर्बाद भऽ जायत अछि ।ताहि दिन सँ हम एक घर मे रहऽ लागलहुँ । कनिया जखन खाना दैत छथि तखन खाइत छलहुँ । नहि तऽ ओहिना रहैत छलहुँ । चाय मिलल मिलल नहियो मिलल । खैर कोनाहुँ दिन काटि रहल छलहुँ । एक दिन बौआ काम पर गेलाह कनिया सेहो घर सँ बाहर निकलि गेलीह । साँझ मे घुमि फिर के एलीह तहन हम पूछलहुँ जे कनिया आई खाना बनल छल की ? ताहि पर हमरा कहलनि ,� आई हमरा पार्टी छल ताहि मे गेल छलहुँ , राति मे भानस भात होयत तहन खायव ।� हम ई सुनी चुप भऽ गेलहुँ । तकर बाद एहन परिस्थितिक पुनरावृत्ति दोसरे तेसरे दिन हुअ लागल । एक दिन तऽ एहन भऽ गेल कनिया भिनसरे जे बाहर गेलीह देर राति धरि नहि एलीह । बौआ आफिस सँ आवि हुनकर इंतजार कऽ रहल छलाह । हुनका सव बात कहलहुँ मुदा ओ कोनो ध्यान नहि देलखिन । कनिया जखन घर एलीह तहन हम कहलहुँ जे कनिया ई बात ठीक नहि अछि । अहाँक एहि बात पर ध्यान देवाक चाही । एतवे कहैत मानु ओ घर अपना माथ पर उठा लेलथि आ हमरा बड्ड बात कहलथि । हमहुँ कानैत घर मे के जा सूति रहलहुँ । दोसर दिन दूनु बेटा - पुतोहु कहलखिन जे अहाँ वृद्धा आश्रम चलि जाऊ । चलु हम छोड़ि आबैत छी । ताहि दिन सँ हम एहि ठाम रहि रहल छी । आजुक समय मे बुढ़ माय-बाप पुरान नुआ सन भऽ जायत अछि । दुनिया बदलि गेल अछि । आब कतेक कठिन सँ पालि-पोसि व पढ़ा-लिखा कऽ बनेलहुँ जे बुढ़ापाक लाठी होयत । मुदा आव सन्ताप अछि । भगवान के जे मर्जी होयत सएह होयत । ई कहि हुनकर आँखि ढ़व ढ़वा गेल । मोहन बाबू ई सुनि चकित भऽ गेलाह । फेर अपना बिछौना पर आवि लेट गेलाह । एक दिनक बात अछि मोहन बाबू आश्रमक बेंच पर बैसल छलाह तखन शुशील बाबू हुनका लग आवि बैसलथि । ओ आई बड्ड खुश छलथि । मोहन बाबू कहलखिन,�की यौ! आई अहाँ बड्ड खुश नजरि आवैत छी, की बात छै ?� शुशील बाबू कहलखिन � आई हमर बेटा आ पोता मिलवाक लेल आवि रहल अछि । सव साल पोताक जन्मदिन पर ओ आवैत छथि । एक बरख भऽ गेल पोताक मुँह देखला आई हम पोता सँ मिलव, ताहि सँ हम खुश छी । ई सुनि मोहन बाबू कहलनि , � बेटा अहाँक ई हाल कऽ देने छथि जे अहाँ एहि आश्रम मे जीवन यापन कऽ रहल छी,आ आई भेंट करऽ आवि रहल छथि तऽ बड्ड खुश छी ।� एहि पर शुशील बाबू कहलखिन जे कम सँ कम एक बरख पर पोताक मुँह तऽ देखा दैत अछि । इएह पैघ बात अछि । एहि सँ बेसीक नहि तऽ आवश्यकता अछि आ नहि इच्छा। फेर दुनु आदमी अपन बातचीत करऽ लगलाह । दूनु बैसल छलथि तखन आश्रमक प्रबंधक महोदय मोहन बाबू सँ कहलनि, � अहाँक बेटा,पुतोहु आ पोता अपनेक मिलावक लेल आयल छथि ,चलु हुनका सँ भेंट कऽ लिओन । ओना तऽ मन नहि होयत छलनि जे अपना बेटा पुतोहु सँ मिलि मुदा पोताक नाम सुनि ओ ऑफिस मे एलाह । मोहन बाबू के देखैत पोता दादू -दादू कहैत हुनका लग दोड़ैत आवि गेल । मोहन बाबू पोताक कोरा मे लऽ लेलखिन । तखन मोहन बाबूक आँखि ढ़व ढ़वा गेलनि। बेटा पुतोहु सेहो हुनका गोर लागलखिन । कुर्सी पर बैसलाक बाद हुनकर बेटा कहलखिन ,� बाबुजी काल्हि बौआक जन्म दिन अछि । हम सव बौआक जन्म दिन बढ़िया सँ मनावऽ चाहैत छी ।दीदी सेहो काल्हि भिनसरे आवि रहल अछि । गामक किछु लोकनि सेहो रहथिन । चलु सवसँ भेंट मुलाकात भऽ जायत ।� मोहन बाबू कहलखिन, �नहि बाऊ ! हमरा छोड़ि दिअ । अहाँ सब जन्म दिन नीक सँ मनाऊ । हम एहि ठाम आराम सँ छी ।� ई सुनि बेटा पुतोहु दुनु असमंजस मे पड़ि गेलाह जे जौं बाबुजी नहि जेथिन तऽ हमर सवहक गाम घर मे की इज्जत रहत ? दूनु आदमी आँखि मे नोर भरि कहलनि बाबुजी अहाँ नहि जायव तऽ गाम घरक लोक की कहत ? काल्हि भरिक बात अछि, परसु सव आदमी चलि जेताह तहन अहाँ के हम गाड़ी सँ पहुँचा देव । ओहि ठाम अहाँ के कोनो दिक्कत नहि हुअ देव । एकटा घर अहाँक लेल साफ कऽ देलहुँ अछि ओहि मे बुढ़ बुढ़ानुस बैसि गप्प करव । दुई दिनक तऽ बात अछि । पोताक जन्म दिनक बात सोचि मोहन बाबू तैयार भऽ गेलथि । मुदा एकटा शर्त राखलनि जे परसु अहाँ दूनु व्यक्ति हमरा एहि ठाम अवश्य पहुँचा देव । ई सुनि बेटा पुतोहुक मन बड्ड हर्षित भऽ गेल । ओ कहलनि � हाँ बाबुजी परसु हम दुनु आदमी जरूर एहि ठाम पहुँचा देव ।� आश्रम सँ मंजुरी मिललाक बाद मोहन बाबू के लऽ के घर चलि एलाह । घर पहुँचि मोहन बाबू देखैत छथिन जे घर नीक सँ सजाओल अछि । मोहन बाबू घर मे बैसलाह तऽ पुतोहु चाय पानि देलखिन । दोसर दिन कुटुम्ब सव आवि गेल । हुनका सव सँ गप्प सप्प करैत मोहन बाबूक पता नहि चललनि जे समय कोना बीत गेलनि । दोसर दिन अपना बेटा सँ कहखिन, �बौआ हमरा वृद्धाआश्रम पहुँचा दिअ ।� मोहन बाबूक झोरा लऽ बेटा पुतोहु दूनु गाड़ी सँ आश्रम एलखिन । आश्रमक गेट पर गाड़ी रूकल आ बेटा पुतोहु दूनु गाड़ी सँ उतरि झोरा मोहन बाबू के देलखिन ।जखन ओ दूनु फेर गाड़ी पर बैसऽ लगलाह तहन मोहन बाबू पाछु घूरि कहलखिन , � बाऊ ! अहाँ सव के एक आदमी सँ भेंट करवैत छी । कनि हुनका सँ भेंट कऽ लिअ ।� बेटा पुतोहु दूनु आश्रमक गेट पर एलखिन तऽ अनायास पुतोहुक नजरि हुनका माय पर चलि गेलनि । हुनकर माय आश्रमक आंगन मे घुमि रहल छलीह । आश्रमक अंदर आवि दूनु हुनका गोर लागलखिन आ आश्चर्य सँ पूछलखिन माय अहाँ एहि ठाम की कऽ रहल छी ? चलु हम अहाँ के घर पहुँचा दैत छी । ओ कहलनि,�नहि बेटी ! आव हमर आशियाना एहि ठाम अछि। हम कतहु नहि जायव।�हम काल्हि भाभी सँ बात करैत छलहुँ , ओ कहलखिन जे अम्मा जी गामक किछु लोकनि के संग तीर्थाटन पर गेल छथि ।� एक बेर आओर बात करैत कहलहुँ जे कनि माय सँ बात करा दिअ ताहि पर कहने छलीह जे माय अखन फूल काकी सँ बात करवाक लेल हुनका आँगन गेल छथिन, एथिन तऽ बात करा देव । मुदा अहाँ सँ बात नहि भऽ सकल । आव एहि ठाम सँ चलु हमरा घर पर रहव । एहि पर हुनकर माय कहलखिन,�नहि बेटी ! अहाँ अपना ससुर कें तऽ एहि ठाम छोड़ने छी आ अहाँ हमरा लऽ जायव । अहाँ आ बौआ मे की अंतर अछि ।� अहाँ दूनु आदमी बुढ़ के पुरान नुआ जकाँ कात कऽ देने छी । एहि पर ओ कहलखिन नहि माय अहुँ चलु आ बाबुजी के सेहो लऽ जायत छी । ई बात सुनि मोहन बाबू तपाक सँ कहलनि,�नहि कनिया आव हम नहि जायव । एहि ठाम हम बड्ड आराम सँ रहैत छी । भरि दिन सवसँ गप्प -सप्प करैत रहैत छी ।हमर दिन एहि ठाम आराम सँ बीत जायत अछि ।� हुनकर माय सहो कहलखिन,�अहाँ सव एहन बेटी आ बेटाक लेल हम सव अपन पूरा जीवन लगा देलहुँ । अपन जीवनक सव खुशी अहाँ सव के देलहुँ , मुदा आई बुढ़ भऽ गेलहुँ तऽ अहाँ सवहक लेल तुच्छ भऽ गेल छी । आव हमरा सवके एहि सन्ताप सँ जिअ दिअ ।� ई कहि ओ आश्रमक अन्दर चलि गेलीह । हुनकर बेटी दामाद सेहो कार में बैसि चलि गेलाह । वृद्धाआश्रम मे रहनिहार सव लोकनि के साथ कोनो ने कोनो प्रकारक दु:ख परिवार दिश सँ अवश्य रहैत अछि ।
-नाम - परमानन्द लाल कर्ण , गाम - घोघसर, पोस्ट - बिरौल, जिला - दरभंगा,बिहार, सेवा निवृत्त प्रबंधक,सेण्ट्रल बैंक ऑफ इंडिया । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.६.लाल देव कामत-लोकतांत्रिक कथा- भेंड़िया धसान लाल देव कामत लोकतांत्रिक कथा- भेंड़िया धसान
मिथिला'क लोकमे सँ किछु गोटेय पढ़ि - लिखि सरकारी आफिसर बनलाह। ताहिमे सँ थोड़ेक गोटय देशके राजधानी दिल्लीमे सर्विस करैत रहय। से सब आब मिथिलाक गाम सँ फराक जीवन जीयैत पुरना डिल्ली सँ नैका डिल्ली आ एनसीआर धरि अपन - अपन फ्लैट कीन- बेसाहि गृहबासु भेल। आब हुनका सभक धीया-पुता शहरी वातावरणमे रहैत अधिक आधुनिक जीवन शैली अपनेने य। सौरभ नामके एक नव जुबक ग्रेज्यूएशनक' वाद आगूक पढ़ाय लेल अपन डिल्ली शहरके जमाहिर लाल नेहरू विश्वविद्यालयमे नामांकित भेल। ओतय ओकरा अनेको हिंदी भाषी जुवक -जुवती पीएचडी शोधार्थी भैटलैक। किछु गोटेय केँ अंग्रेज़ी भाषामे गप्प करैत देखलक। एक सीनियर छात्रा प्रेमलता इशारा सँ लग बजाबैत सौरभ सँ व्यंग- विनोद करय लगलीह। हिन्दी - इंग्लिश बजैत ओ मैथिली टोनक सेहो उच्चारण जेआँ केयलीह ,तखन सौरभ केँ निठाहे हुबा खूब बढ़लैक । आओर ओ पुछि बैसलै - अहाँ कोन जिलाक मूलवासी छी? तँ प्रेम लता कहलीह - हमर बाबूजी दरिभंगा केर थिकाह आ मायक मैकै सीतामढी अछि। सौरभ सँ पुछारि केलीह तँ ओहो अपन पुरखाक डीह सहरसा , अपन मातृक - मधुबनी लग मंगरौनी गाम बतेलक। दूनूक बीच संक्षिप्त परिचय केर मध्य एकटा आरो ओहि यूनिवर्सिटी 'क सिनियर स्टूडेंट्स लीडर आगू आबि प्रेम लता सँ प्रश्न कयल - कि हमरा प्रेममे कोनू खोंट ? तँ सकुचाइत प्रेमलता बजलीह नहिं! नैका मुर्गा एतय देखलहुँ तहन कनेकवे नाम ठेकान पुछि एकरा सँ अपन समय काटैत रही। अहाँकेँ अयबामे बिलम्ब भऽ रहल छल, से हमरा पहाड़ सन समय खुबे काटैत बुझाए । ता चाहलौं हम अपना कांग्रेसी खेमामे एकरा घिंची । जिंस पैन्ट पर पैघ उज्जर धप - धप कुर्ता पहिरने ओ छात्र नेता सौरभ सँ कहलक ऐ केम्पसमे दररोज भेंटघांट करैत रहब, आ हमरा सीपीएम पार्टी क' छात्र फेडरेशन सँ सदस्यता लऽ जुटू। हमहूँ मिथिलांचलेके पूर्णिया सँ एतय पढ़ाय -लिखाय करय आयल छी। ऐ विश्वविद्यालयमे छात्र -छात्राक अदहा संख्याँ वामपंथी विचारधारा सँ जोटल छैक। तोरा कोनू तरहक समस्या अयला पर समाधान हम तुरंत कय देबौक। सौरभ बाजल - अपनेक की नांऊ भेलैक भायजी! तँ ओ कहलकै बासु दा, अर्थात पूर्ण नाउं बासुकी दास। ओ कनेकवे आगू बढ़ल तँ ओहि कैम्पसके पक्का ब्रींच पर चारिगोट छात्र आ समक्षे दोसर लोखंडी ब्रींच पर तीनटा छात्राकेँ बैस सीगटेठ धूकैत बाहर धुईँयाँ रिंग बनाखय फेकबाक प्रतिस्पर्द्धा करैत देखलक। सौरभ केँ प्रदुषण सँ मोन अपसियाँत भेल देखि एकटा नेतानुमा छात्र संकेत कऽ बजा लेलक आ निंचा दुईब पर बैठबाक आदेश केलक। ता दोसर ब्रींचपर सँ उठिकऽ एक छात्रा जे ओतय लगले आबि बैठले छलीह ,से प्रेमलता अपना झोरा सँ एक छोट पानिक शिशी बाहर कऽ ,ओहिमे सँ चुरूक भरि जल सौरभके आँखि पर छिटलीह। टीम लीडर कांग्रेस सँ सम्वध्द छात्र संघक किछु सिद्धांत बताबैत एहि विचारधारा सँ जुड़बाक आग्रह केलकैक। दोसर दिन भने जेएनयू मैदानमे सौरभकेँ बहुत रास आन छात्र - छात्रा सँ सेहो सहज भेंटघांट होईछ आ एक- दोसरा सँ परिचय होई छै। ताहि वार्ताक्रममे ई थाह चलैत छैक जे पचास प्रतिशतमे अदहा एहन स्वतंत्र विचारक छात्र - छात्रा छथि ,जे दूनू दल सँ पृथक रहैत अपन अध्ययन केँ गहिंरपन सँ समै केर सदुपयोग करैत आबि रहल अछि। सौरभ स्वंय स्नातक महाविद्यालय केर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद'क पूर्व सचिव रहल छल।आब ओ जनसंघी विचारधाराक लेल मोन मजगूत कय चुकल रहय। से बीजेपी ईकाई एहि यूनिवर्सिटीमे नहिं देखि पाबि एक यूनिट कायम करबाक मोनमे निश्तुकी कयल। ओ पढ़बो - लिखबो काल मोनेमन भाजपा कोना आगू बढय ताहि लेल चिन्तनशील रहय। किछु दक्षिणभर राज्य'क छात्र सँ परिचय बढ़ला पर सौरभकेँ समर्थन भेटब बढय लागलैक। ओ ताहि गुटक संयोजक बनि छात्र - छात्रा सभसँ भारतीय जनता पार्टी लेल राष्टभावना ओ विदेश नीति तथा सकल घरेलू उत्पाद विषय पर विमर्श करैत एक सम्मेलन आयोजित कऽ प्रेस विज्ञप्ति जारी कयल। सप्ताहिक अखबार - पेपर, पत्रिका ; रेडियो टीवी० पर सौरभ एक नवोदित जननेता केर छवि बना लेलनि। छात्र संघक चुनावमे कांग्रेस गुटक किछु असंतुष्ट सदस्यगण अपना टीम लीडर अहमद हुसैन केँ तरे - तरे असहयोग केलक। भाजपा ओई निर्वाचनमे अपन प्रत्याशी ठाढ़ करबाक हिम्मत नहिं जुटा सकल। तेँ वामपंथी उम्मीदवार बासु......दा....... केर जय- जय भ' गेलैन। अहमद हुसैन साहबके बहिण शाफिया खातुन बपहर भेलाही - सिपौल सँ सेहो डिल्ली आबि पैघ भाय सँ कहलक हमर एडमिशन जेएनयूमे करा दिअ। गाम सँ अम्मी - अबू क़ानून पढ़य एतय अहाँ लग हमरा पठेलनि हेन। साफिया खातुन आब सेहो नियमित रूपेँ यूनिवर्सिटी आबि राजनीतिक गतिविधिमे रूचि रखैत अपना भायजी सँ डेरा पर कहलीह- हम भाजपा० नीति सँ जुटि गेल छी। अहूँ भायजी काॅग्रेस छोड़ू आ बीजेपी विँग सँ सटू। आब ऐ पार्टीमे हिन्नूक अपेक्षा अल्पसंख्यक केर महौत खुबे बढ़तैक। से भाजपा केर राष्ट्रीय अध्यक्षके ओहिठाम पहुंच ओ विधिवत सदस्यता ग्रहण केलनि। आओर केरल आ पछिम बंगालक प्रदेश प्रभारी नियुक्त भऽ निरंतर यात्रा करैत पार्टीक ' कार्यक्रम केँ बढ़बयमे समर्पित भऽ गेलाह। एम्हर आबिके सौरभ आ सोफिया खातुन प्रेम वियाह कय लेलक,आ प्रेम लता सेहो अहमद हुसैन सँ कोर्ट मैरिज करैत संविधान आ नियम कायदाके निहितार्थ विधिक जागरूकता आम जनता'क बीच करय लगलीह । भारतके सब जिलामे हरसठे भाजपाक झट - झट कार्यशाला आयोजित हुअय लागल । सवर्ण समाज आ वैश्य वर्ग अपन - अपन जातीय महासभा 'क संघठन कय बीजेपीके पूर्ण समर्थनमे रहय लागल। भय - भुख आ भ्रष्टाचार केँ मुद्दा बनाबैत भारतीय जनता युवा मोर्चाक' पदधारी लोकनि रामजन्म भूमि आ बोफोर्स - हबाला सन ज्वलंत मसलाकेँ समक्ष राखि जन- जन सँ लगाउ - जुराउ राखैत पंचायत स्तर सँ बूथ स्तर धरि कमिटी गठित कयल। महिला मोर्चा केर काज प्रेमलता आ सुफिया खातुन देशके सब प्रखंडक मंडल आ शक्ति केंद्र धरि रसे- रसे संदेश पहुँचेबामे आ कमेटी गठन करेबामे सफल भेलीह। ऐ तरहेँ आरो समय आगू बढ़ैत गेल। भारतमे कांग्रेसके सरकार खसि पड़लैक आ मध्यावधि चुनावक घोषणा 'क डुगडुगी सेहो बाजि गेल। सब राजनीतिक दल अपना -अपना चहेता ओ सहानुभूति रखनिहार नागरिकक बीच चुनावी मेनोफेस्टो'क संग मतदाता जागरण करय उतरि गेलैक। आब भाजपा एक मजगूत गठबन्धन बनाकय देशव्यापी आन्दोलन आ निर्वाचन अभियानक प्रचार - प्रसार करय ले अगूआएल। संयोग सँ मतदातागणके बीच पक्ष-विपक्षक कामकाजके तुलनात्मक चर्चा चाह पानक दोकान पर आ चौक- चौराहा लग बेरोजगारीक धधक सँ त्रस्त जुबक आ आन आम जनताक बीच होय। ई बहस एक अभिरूचि आ स्वत: स्फूर्त आन्दोलन रूपेँ बढ़ैत गेल। गाम -गाम आ नगर - शहर धरि नुक्कड़ सभामे इन्कलाब - जिन्दलवाद केर नारा बुलंद करय आइसा०, ,एस एफ आई, एबीवीपी आ राजद- जदयू केर कार्यकर्ता सब देखाए पड़ैक। एम्हर एक किसानके बेटा राजनीतिक दुरदर्शिता केँ ठेहैत नव फिरका - सुराजलोक नामक फोरम ठाढ़ केयलनि। ओ सोचलनि पुरूख सदस्यके बनसब्त जनिजात वर्ग एक सँ बेशी वोटरकेँ अपना घर पलिवारमे उत्प्रेरित कऽ लैत अछि । से ओ नेताजी नारी कला जत्थाकेँ भारतके सब यूनिवर्सिटी आ काॅलेज परिसरमे समाज परिवर्तन लेल प्रयाण गीत ओ नुक्कड़ नाटक - प्रहसनके प्रदर्शन करय पठौलनि। मुदा मध्यावधि चुनाव परिणाममे भाजपा गठबंधन केँ बहुमत भेटल आ प्रेमलता प्रधानमंत्री,सोफिया देवी वित्त मंत्री, आ सौरभ जी राष्ट्रपति ओ अहमद हुसैन साहेब उप-राष्ट्रपति पदकेँ सुशोभित केलनि। बाँकि जेएनयू केर अन्वेषक - शोधार्थी आ पोस्ट ग्रेजुएट विद्यार्थीगण डिल्लीक वातावरण अनुसारे एक दोसरकेँ छोड़ि बायफ्रेंड - गर्लफ्रेंड बनल रहल। किछु जोड़ी लव-मैरिज कयल आ किछु -किछ जोड़िक बीच पाँच शाल अबैत- अबैत वैवाहिक संबंध विच्छेद भेलै। पढ़ाकू लोक जहन कैरियर केँ अपने सँ स्वंय प्रेमालापमे रहि कमजोर करैत रहत तँ ओकर भगबाने मालीक! एनै अधिक पिछरल जाति प्रकोष्ठके लोक सभ भेड़िया धसान जहाँति भाजपामे आकर्षण पाबि जर- मिझहर होइत रहल य, ताहिमे सँ गोटपंगराकेँ मोहभंग सेहो भेलैक हेन। तकर मूल कारण रहैक जिलाध्यक्ष केँ अपना जातिक लोककेँ अपना बराबरिमे खुरशी पर बैसल देखबाक सोहान्त नहिं धरय! ओ धकियाबैत अपेक्षित पद - दायित्व सँ नींचा मुहेँ करैत उपेक्षित राखैक। वाए लिअ आब की होय? - लाल देव कामत, नौआबाखर -हटनी अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.७.आशीष अनचिन्हार-रचना लेल आर मेहनति आर समय चाही आशीष अनचिन्हार (संपर्क-8134849022) रचना लेल आर मेहनति आर समय चाही 30 अगस्त 2025 केँ राँचीमे मुख्यधाराक लेखक सभ द्वारा आयोजित सगर राति दीप जरए कार्यक्रममे जेबाक अवसर भेटल (वर्तमानमे सगर राति दू ठाम होइत अछि मुदा मुख्यधाराक बैमान आलोचक सभ द्वारा एकर उल्लेख नहि होइत अछि)। ओही ठाम कवि वासस्पति ठाकुर 'सुजीत' जीसँ भेंट भेल आ ओ अपन दू पोथी देलाह 'सुतय बौआ सुखक निनियाँ�, एवं �विज्ञान-काव्य�। हमरा ई पोथी सभ लेबामे संकोच भऽ रहल छल आ तकर कारण ई जे मैथिलीमे फ्रीमे पोथी बँटबाक परंपरा छै आ तकरा बदलामे कवि-लेखककेँ मीठ-मीठ ओ प्रसंशात्मक समीक्षा सभ पढ़बाक लेल भेटि जाइत छनि। जखन कि हम पोथी बँटबा वा कि बाँटनिहारसँ दूर रहैत छी, कदाचित् जँ कोनो फ्रीमे लेबऽ पड़ि गेल तऽ ओहि पर नहि लिखैत छी आ जँ कोनो दुर्योगवश लीखऽ पड़ि गेल तऽ मीठ-मीठ नहिए टा लिखैत छी। अही कारणे पहिल हम अपने एहन काज सभसँ दूर रहैत छी आ दोसर एहन लेखक सभ सेहो हमरासँ दूरे रहैत छथि। एतेक कारणक अछैतो वाचस्पतिजी हमरा पोथी देलाह आ हम लऽ लेलहुँ तकर एक कारण अछि। हमर गाम आ वाचस्पतिजीक काममे कनिएँ दूरी अछि माने हम दूनू एकै परिसरक भेलहुँ। आ एकै परिसरक रहलाक बादो जँ हम हुनक गुण वा कि अवगुण पाठक लग नहि राखी तखन एक परिसरक हेबाक लाभे की? भऽ सकैए जे वाचस्पतिजी आन कोनो कारण सोचि हमरा पोथी देने हेतान मुदा हम पोथी लेलहुँ से वएह कारणसँ जे एखन हम लिखने छी। हम अपन संकोच वाचस्पतिजीक सामने रखने रही आ ओ सुनियो कऽ ओ हमरा पोथी देलाह तँ हमरा बुझाएल जेना ओ अवधारिए कऽ देलाह अछि। तँ जखन हम दुनू गोटा अवधारिए कऽ कार्य-व्यापार केलहुँ तखन पाठक लग एहि दू पोथीक विषयमे हमर की धारणा अछि से पहुँचिए जेबाक चाही। पहिने हम पोथी 'सुतय बौआ सुखक निनियाँ' केर बात करब। एहि पोथीमे दू गोट भूमिका अछि पहिल अजित आजाद केर आ दोसर कवि केर अपने। बहुत रास प्रसंगमे हम लगभग 10-15 बर्खसँ कहि रहल छी जे अजित आजाद केर लिखल भूमिका जाहि पोथीमे हो से पोथी नीको हेतै तऽ ओ संदिग्ध बनि जेतै, ओकर गुणवत्तापर संदेह कएल जेतै। आ तकर कारणो छै अजित आजादक अध्ययने एतेक कम आ लचराह छनि जे ओ अपन भ्रम, अपन कमजोरीकेँ पूरा साहित्य, पूरा लेखनपर दऽ दैत छथि। ओ अपन कमजोरीकेँ महान मानि दोसरकेँ ओहिसँ नीचा रहबाक लेल बाध्य करैत छथि। अजित आजाद अध्ययन नहि करैत छथि तँइ हुनकर कोनो लीखलमे तारतम्यता नहि रहैत छनि। एकर बानगी 'सुतय बौआ सुखक निनियाँ' केर भूमिकामे सेहो भेटत। एहि पोथीक भूमिकामे अजित आजाद लिखैत छथि "आइ जे बाल-साहित्य लिखल जा रहल अछि, ओहिमेसँ अधिसंख्य एहेन अछि जकरा अहाँ अन्य बाल-साहित्यिक सोझाँ रखबामे संकोच करब। भाषा आ शैलीक बात नहियो करी त' विषयक चयनमे नवीनता नहि भेटत। लागत एना जे एकहि चौहद्दीमे सभ एक-दोसरासँ उपरौंझ क' रहल होइथ। मूस, बिलाड़ि, लुक्खी आ कौआ-मैनासँ आगूक बात एखन अत्यल्प आबि रहल अछि।.........." ऊपरक अंशक मनोभाव जँ बूझल जाए तऽ कहि सकैत छी जे वाचस्पति ठाकुर 'सुजीत' जीक बाल-साहित्य आगू छनि आ शेष सभ बाल-साहित्य कमजोर। ई हम नहि कहि रहल छी, अजित आजाद जीक भूमिकामे कहल बातक अर्थ निकालि रहल छी। बात एहि ठाम धरि ठीक छै मुदा पाठकसँ हम आग्रह करबनि जे ओ अजित आजादक लिखल हरेक भूमिका पढ़थि। ई हमर गारंटी अछि जे भूमिकाक ऊपरक अंश केर अधिकांश पाँति अजित आजाद केर लिखल आनो भूमिकामे भेटत। बामा-दहिना, ऊपर-नीचा कतहुँ भऽ सकैए। बाल-साहित्यक बदला कविता, कथा, आनो कोनो विधा लीखल भऽ सकैए, कवि-लेखक केर नाम बदलि सकैए मुदा अधिकांश पाँति वएह रहैत छनि आ ओकर अर्थ वएह रहैत छनि। एखन ओ वाचस्पतिजीक पोथीमे लिखलनि तँइ ओकर अर्थ निकलै छै जे वाचस्पतिजीक बाल साहित्य आगूक छनि आ बाँकी केर पाछू। फेर ओ भामती नामक लेखिका केर पोथीमे इएह अंश भामती लेखिकाकेँ संबोधित करैत लिखता एवं ओकर अर्थ बदलि जेतै जे भामतीक बाल साहित्य आगू छनि आ बाँकी केर (वाचस्पति ठाकुर समेत) पाछू। आ मंच-सापेक्ष भूमिका अजित जी धड़ाधड़ सभ पोथीमे लीखि हरेक लेखककेँ आपसमे ओझरा कऽ अपन कार्य-व्यापार (बिजनेस) कऽ रहलाह अछि एवं करैत रहताह। मुदा एहिसँ साहित्यकेँ कोनो फायदा नहि छै नोकसाने-नोकसान छै। ढेर पोथी भेल जा रहल मुदा काजक कम। ई बात ठीक जे हुनका बिजनेस करबाक छनि, तऽ करथु मुदा भूमिकाक नामपर साहित्यिक औझरौट नहि पसारथि से आग्रह। आब हम अइ पोथीक रचना सभपर चर्चा करी। बाल रचनाक हिसाबें बात करी तऽ एहि पोथीक रचना सभ नमहर अछि, बहुत नमहर अछि। बाल-बच्चा लेल बेसीसँ बेसी 10-12 पाँतिक पद्य रचना नीक हेतै से हमर अपन अनुभव अछि। बाल-बच्चा लेल रचना करब आ पोथी पन्ना भरब दूनूमे बहुत अंतर होइत छै। मात्र पन्ना भरबाक लेल बाल-साहित्य नै लिखबाक चाही। कम पाँति रहलासँ लय सधैत छै आ बेसी पाँति रहलासँ लय बिखरि जाइत छै ई बात अनुभवसँ बाल-पद्य केर वाचन करऽ बला सभ जानैत छथि। एहि कसौटीपर एहि पोथीक अधिकांश रचना कमजोर अछि माने कवितामे कम पाँति भेने बाल-पाठक-श्रोताकेँ सुविधा हेतनि। हम एही पोथीमे देल एक रचना 'जागू हे बौआ'केँ अपना हिसाबें संयोजित कऽ रहल छी, एकरा वाचस्पतिजी समेत सभ पाठक देखथि। पहिने मूल कविता देब आ तकर बाद हम जे संशोधित करब से देब। पहिने मूल-
उठू-उठू बौआ भोर भ' गेलै दुनियाँमे देखू इजोर भ' गेलै उठू-उठू बौआ भोर भ' गेलै
मुर्गा के कुकड़ू आ कोइली के कूकब कौआ के कुचरब आ कुकुर के भूकब सगरो एहि दुनियाँमे इजोर भ' गेलै उठू-उठू बौआ भोर भ' गेलै
सूरज आकाशोमे ऊपर चढ़ै छथि चंदा परदेशक आब बाटे धरै छथि नुकेलै तरेगण मानू चोर भ' गेलै उठू-उठू बौआ भोर भ' गेलै
जागल छै फूलो आ भँवरा छै जागल अपन-अपन काजोमे सभ कियो लागल सूतल नर आँखिमे नोर द' गेलै उठू-उठू बौआ भोर भ' गेलै
आब हमरा द्वारा संयोजित इएह कविता देखू-
उठू-उठू बौआ भोर भ' गेलै
कौआ कुचरल कुक्कुर भूकल कोइली कुहकै मुर्गा ई बाजल दुनियाँ इजोरे इजोर भ' गेलै
चंदा मामा भागल छथि सूरज बाबा जागल छथि सूतल बच्चा ढोर भ' गेलै
फूलो जागल भमरो जागल अपन काजमे ओ सभ लागल महिस-बकरी के संगोर भ' गेलै
हम एहि पाँति सभकेँ तात्काल संयोजित केलहुँ तँइ किछु गलती हमरोसँ भेल हएत मुदा देखबै जे मूल कविताक पाँति सभ हम छोट कऽ देने छियै, पाँतिक संख्या घटा देने छियै आ किछु शब्दक मैथिली स्वरूप दऽ देलियै। आब मूल कविताक वाचन एवं ओकर प्रभाव संगहि हमरा द्वारा संयोजित रचनाक वाचनमे अंतर छै। बाल-साहित्यमे पाँति जतेक छोट हेतै, पाँति कम रहने, संयुक्ताक्षर बला कम शब्द रहने ओकर वाचन प्रभावी होइत छै आ बाल साहित्य केर पहिल डेग वाचन छै। हमरा एखनो नहि बुझबामे आएल जे भमरा शब्द मैथिलीमे रहितो वाचस्पतिजी भँवरा शब्दक प्रयोग किएक केलाह? ई आसावधानी कहल जेतै। एहि पोथीक रचना सभ लेल हमर विचार अछि। सभकँ ठीक करबाक बेगरता अछि। एहि सभकेँ ठीक करबाक लेल मेहनति ओ समय चाही। एखन पुरस्कारक उजाहि उठल छै, बहुत संभव जे वाचस्पतिजीक पोथीकेँ भेटि जाइन मुदा साहित्य केर जे मूल उद्येश्य छै पाठक लग प्रभाव छोड़ब से नहि भऽ सकैए एहन-एहन रचनासँ। आब आबि जाइ हुनकर दोसर पोथी 'विज्ञान-काव्य'पर। एहि पोथीमे फेर दू टा भूमिका अछि पहिल डा. विद्यानाथ झा जीक आ दोसर कवि वाचास्पतिजीक अपने। डा. विद्यानाथ झा विज्ञानक प्रोफेसर छलथि आ मैथिलीमे विज्ञानपरक हुनक कतेको आलेख प्रकाशित छनि। डा. विद्यानाथ झा जीक भूमिका स्वाभाविक रूपें विषय-केन्द्रित अछि आ मैथिलीक पोथीमे एहने भूमिका केर जरूरति छै। पाठककेँ एहिठाम ईहो सूचना देब उचित बुझाइए जे डा. विद्यानाथ झा, हम आ वाचास्पतिजी तीनू एकै परिसरक भेलहुँ। पहिल पोथी लेल जतेक गुण-अवगुण हम लिखलहुँ से सभ एहि दोसरो पोथीपर लागू होइत अछि। एहि पोथीमे बलधकेल तुल मिलाबऽ लेल एहनो शब्दक प्रयोग कएल गेल अछि जकरा उचित नहि कहल जा सकैए। उदाहरण लेल एहि पोथीक पहिले रचना लऽ ली- "हम पेड़ छी", एहि कविताकमे पेड़ शब्दक प्रयोग अनसोहाँत एवं उचित नहि अछि। एहि लेल गाछ शब्दक प्रयोग कएल चेबाक चाही। मुदा गाछ शब्दक तुकान्त तकबा लेल मेहनति आ समय दूनू चाही से वाचस्पतिजी लग नै छनि ई हमरा बुझाइए। एहि पोथीक विषय वस्तु नीक छै मुदा दिक्कत छै जे जे-जे शब्द सिलेबस बला पोथी जे हिंदी भाषामे छै से सभ जस के तस मैथिलीमे आनि देल गेल छै आ जखन कि ओहि शब्द सभहक मैथिलीकरण बहुत पहिनेसँ प्रचलित छै। एकटा फेर उदाहरण लिअ- पृष्ठ 27 पर कविता अछि "फसल उत्पादन" जखन कि ई हेबाक चाही "फसिल उत्पादन"। एहन-एहन बात हम बहुते लीखि सकैत छी मुदा से मात्र पन्ना रंगब हएत। पाठक अतबेसँ बूझि जेताह। एहन शेष अतबे उम्मेद अछि जे वाचस्पति ठाकुर 'सुजीत' जी भविष्यमे एहि बात सभपर धेआन देताह आ हुनक रचना मैथिलीक शीर्ष धरि पहुँचत। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.८.भुवनेश्वर चौरसिया 'भुनेश'- पानीक सदुपयोग / पानीक रंग भुवनेश्वर चौरसिया 'भुनेश' पानीक सदुपयोग / पानीक रंग १
पानीक सदुपयोग
पड़ोसीक छत केर दीवार सेह जुड़ल पानीक पाइप सॅं पानी टपकैत छल। ओहि ठाम हम्मर दादी फुलक गमला सॅं घास निकालैत छलनि। पानी टपकैत देखि जल्दी से एकटा पानी केर खराप मग उठैलनि आ टपकैत पानी ओहि से भरैत फूलक पौधा पटबै लगलनि। हम कहलियनि ये दादी मां इ कि करैय छी ये? इ पानी तऽ बड्ड गंदा अइच्छ। दादी बजलनि पेड़ पौधाक लेल सभ पानी चिकन्ने अछि पेड़ पौधा मनुष्य नैन छल जकरा साफ पानी चाहि। दादी जी बजलनि जों इ पुछलौं तऽ गंदा पानी केर अई से बढ़िया उपयोग हुमे सेह बताऊ। हम ओहि ठाम से घिसैक लेलौंह कियेक हमरा संग कोनो जबाब ननि अइच्छ।
२ पानीक रंग
एक बेर केर बात अइच्छ। श्री बाबा हमर खेत जोतैत रहलिन। ऐ हे माठा ठाम हे हे आ बैलक पीठ पर छड़ी बजबैत रहलिन। गर्मीक दिन अइच्छ। खेत केर बगले मे छोट सन नदी जकरा हम मोइन बजैत छलि। पानी तत गंदा जे कि कहौं कुत्ता बिलाय चिड़ैं चुनमुन्नी के अलावा केयो नै पीबैत हैत। श्री बाबा खेत जोतनाय छोइड़क ओहि नदी मे ठेहुन भरि पानी मे घुसलाह आ पानी केर ऊपर जमल काई के पछाड़ैत कोबा मे पानी भरि कऽ गट गट पीअ लगलैन। हम्म इ देखि स्तब्ध भ गेलि। पानी पिलाक बाद बाबा फेरूं स खेत जोतै लगलनि। हम पुछलियेन बाबा एतेक गंदा पानी कोना पीब गेलि यौ? बाबा बजलाह बौआ प्यास के सामने पानीक रंग नै देखल जाइ छै।
-मकान नंबर:- 288/22,गली नंबर 6एच गांधी नगर गुरूग्राम हरियाणा -122001 दूरभाष -8278107196 ई-मेल पता - bhunesh1976@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.९.प्रमोद झा 'गोकुल'- तिला सँकरैंत प्रमोद झा 'गोकुल' तिला सँकरैंत
भोरे भोर तिलाठबाली बहुरिया बेटाक हाथमे गुरमिश्रित तील चाउर दैत दुलार करैत बजलीह - रौ बौवा! चूड़ा चिल्लाड़ु आ मुरही कोनियाँमे साजिके चिनवार पर राखल छै,से कने कक्का के द' अबहून! नहा सोनाके दलान पर घूर तपैत बैसल छथीन।आ, हे मौनीमे राखल तिलबामे से ल ' लिहें ! तिल चाउर हुनका हम कोनाके देबैन ? जा देखियौ एकटा गप कहबते बिसरिये गेलियौ! - सेहो कहिये दे ने! - अपने दिस खाइले सेहो कहि देबहून! आ हे लूटन अबथीनते हुनका बैसाके रखिहें ! -आर कोनो बात रहि गेलहौते सेहो कहिये दे ने! -इहो छौंड़ा खियाल करै छै! झपसे द' अबहून नै ते एखने हम ��������। चूड़ा मुरही आदि भरल कोनियांँ ल'के मकसूदन दलान पर पहुँचल। ओकरा देखितहिं घूर तपैत कक्का हुलैसके बजलाह - हमरेले अनलेँहेँ की? -हँ कक्का ! माय कहलकए जे तामे जलखै करैले । -मतलब आगोंक विचार छै!तखनते पैजबहिं पयर। -आइ सँकरैँत छियै ने, तेँ खाइयोले कहलकए! -एकरे कहै छै संस्कर आ कुल खानदान ����अच्छे कहते की सब बनबै छौ माय तोहर? -खिचड़ी ! -ओह����खिचैरिये रौ!!! ई खिच्चैरते महिना दिनसे खिचारिके राखि देलक। लगैए जेना कहुँ एहनने भै जाय जे धिया पुता कहय कका 'खिच्चैर' आ लाठी लय हम ओकरा सबके खिहारैले दौड़ परी । - लगैए जेना अहाँ ऐसे ऊबि गेल होइ! - की कहियौ! जहियासे तोहर बिसौलबाली काकी बिगैरके नैहर चल गेलीहे तहियासे विसुनमा दुनू साँझ यैह खुवा खुवा मोनके भाँरि देलकए। कहैये जे हमरा आर किछ बनबैयेनैअबैयै।खायबते खाउ नै ते चूड़ा फाँकि पानि घटोसिके सूति रहू !तोहीं कह , एकरो कोनो जबाब छै? तैपरसे ओहो खचराहा आइ अपन माय लग ममहर टरि गेलए । धैन भाग जे तोहर मायके सुरता एलैन। नैते ऐ भरल पाबैनमे ठन ठन गोपाल। - अहाँके खिचड़ी नै नीक लगैये कका! - रौ! नीक किएने लागत। खिचड़ी सनक खिचड़ीने नीक लगै छै,आकि सीधे दालि चाउर मे हरैद नोन द 'के हौंड़ि दियौ, भ' गेलै खिचड़ी ! कहबीयो छै ' खिचड़ीक चारि यार,दही पापड़ घी अचार ' । - भटबर आ खमहरुवाक चक्का सेहो माय छानि रहल अछि आ तैपरसै कक्का ! फूंटि बला कुम्हरौरी देल रसदार डालना सेहो बनि रहल छै । - एह! तखैनते इन्द्रस्य काँइ काँइ आ वरुणस्य टाँइ टाँइ भै जेतै।दही आ घियु सेहोते अपने महिंसिक हेतह? - तहूमे कहैक काज! - सुनियेंके मूहंमे पानि भरि आयल । - जैले मूहँमे पानि भरि गेल से खेबै कोन पेटमे महेस्सर बाबू! - ई ते लुटना सनक आबाज लगैये! - हंँ यौ! खड़ा भेल भेल हम सबटा बात सुनि रहल छी। अहाँके पाउज करैसे फुर्सत हुए तखनने हमरा दिस ताकब! - तहूँ हमरे नजैर लगबैले अरबद्धल छेँ ! ले आब खो तोहीं!! - बचले आब की अहि! दाबि दियौ अपने!! हमरा मैलकाइन बोलौने छै, देबे करतै सबटा। बौवा! कने हमरो अर्जी मैलकाइन लग पहुँचा दियौगेते! -हौए दोलखी लग सबटा ल'के ठाढ़ि छथून जाके लय आबह तोहूँ ! -अरे ! मलकिनी ठाढ़ि छथीन से ते हम बुझबो नै केलियै ।हरबड़ाके लूटन तिलाठबालीक आगाँ जाके सकुचैत ठाढ़ भैके बाजल -ई एत्ती खिनासे ठैढ़ छलखीन से हम बुझबो नै केलियै। -- की करथीन ले! ई भैया सङे गप्प लड़बैमे मस्त छलाह ! लेथु, ई छियैन हिनकर! एत्तै बैसिके पनपियाइ कय लिहैथ आ ई छैन धिया पुताक लेल! दय औथीन,ओहो सब खालेतै! खाइ बेरमे एत्तै आबिके खालिहैथ!आ मझौराबालीके सेहो कहथीन अबैले! धिया पुताक लेल लय जेतै सब किछ। सबहक लेल खेनाइ बना रहल छियैन। पाबैन तिहार सबहक सङे होइ छै ने! मलकिनीक बात सुनि लुटनाट आँखि छल छला गेलै ओ सोचय लागल जे केहेन दयामैन्त छथीन तिलाठबाली बहुरिया! साच्छात अनपुरना माइ! एकरे लोक लछमी कहै छै ने!
-दीप,मधुवनी (विहार), फोन -9871779851 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१०.प्रदीप कुमार मंडल "पबड़ा"- मैथिली मानक सऽ मैथिली के चुनौती प्रदीप कुमार मंडल "पबड़ा" मैथिली मानक सऽ मैथिली के चुनौती
मैथिली भाषा के पहिले पहिल मैथिली १८०१ ई० श्रीमान कॉलब्रुक साहेब कहथिन । ओहि सऽ पहिले मैथिली भाषाक की नाओं छल से तऽ नहि मालूम, मुदा हमरा अनुमाने शाइत इ तिरहुतिया भाषा छल । कियेक तऽ मैथिली में चौदहमी शताब्दी सऽ पहिलियो के रचना मिलैत अछि । जेना- सिद्ध सरहपाक रचना, एगाहरम शताब्दीक बाबा विद्यापतिक (विधापति) रचना । मैथिली में संस्कृत निष्ठ रचना तऽ बारहमी शताब्दी सऽ वर्णरत्नाकर सऽ मिलैत अछि ।
कहबाक अभिप्राय इ जे जखन रचना मिलैत अछि, तऽ भाषाक किछु नाओं तऽ होइत ।
नाओं जे होइ, रचना के हिसाबे मैथिली प्राकृत भाषा अछि । इ किनको धी नहि छी । विभिन्न विद्वानक आलेखक हिसाबे पहिल नाओं श्रद्धेय कॉलब्रुक साहेब देलक अछि । सन १९०१ ई० में प्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक श्रद्धेय जॉर्ज ग्रियर्सन साहेब सर्वे कऽ नेपालक सात जिला आ भारत के वर्तमान नेपाल सीमा सऽ देवघर-जामतारा अर्थात संथाल के सीमा धरि के सब बोली मैथिली घोषित कइने छलाह । मुदा मैथिल सभा जे दरिभंगा महाराज के अध्यक्षता में सन १८१० ई० में गठित भेल, से मैथिली के एकगोट जातिक बोली के मानक घोषित कऽ देलक छल । अहि बोली में मैथिली भाषा में मिथिला मिहिर नाओंक पत्रिका सेहो छपऽ लागल । जाहि लेखनी के अखनों मैथिली विद्वान लोकनि मानक मानै छथि । आ सिद्ध पुरुषक रचना आ एगारहम शताब्दीक बाबा विद्यापति (विधापति) आ चौदहम शताब्दीक बाबा विद्यापतिक रचना के मानक के ठेट्ठी कहि टारि देलक, वो आजु/आइ काल (विनाशक एक रुप) बनि गेल । अर्थात अंगिका बनि गेल, आ मैथिली सऽ अलग भऽ हिंदी के बोली में असथापित भऽ गेल । इ खेल बिहार सरकार २०१५ ई० में अंगिका अकादमी बना कऽ खेलौलाह । परिणाम अंगिका भाषा में एम ए के पढ़ौनी शुरु भऽ गेल अछि । आब हमर बिहार सरकार आ वर्तमान भाषा वैज्ञानिक जे मैथिली सऽ अलग अंगिका के ठाढ़ करौलन्हि, तनिका सऽ प्रश्न:- हमरा बोली अर्थात नेपालक सीमा सऽ गंगा कात धरिक बोली के क्रियापद में छै, छैक्का/छिक्का, छिक्की, होलै, होलो खुब बाजल जाइत अछि । हम दरिभंगा के छी हमरा ओहिठाम बोलै के शैली अछि - हौ कतऽ जाइ छोहो ? हैय्या आबै छियौ/छिहो । काका खैलहो, तूं गेलहो, हरै एम्हर अइलही । हौ सोनार हमर काम होल्लै/भेल्लै ? मालिक परसुये होल्लै । दोस अहां रुक्कू, हम दस मिनट में आबै छिक्की । घड़ी ओतऽ रख्खल छैक्का ।
आब प्रश्न इ उठैत अछि जे, की हम अंगिका बाजै छी ? नहि हम मैथिली बाजै छी । तखन भाषा वैज्ञानिक कोन आधार पर हमरा सोलकनक बोली जे नेपालक सीमा सऽ देवघर धरि बाजल जाइ अछि, तेकरा अंगिका कहि हमरा मायक बोली के अपमान कइलक अछि ।
आब प्रश्न उठैत अछि, जे भाषा वैज्ञानिक कागतक लेखनीये देख भाषा के निर्माण के काज करैत छथि ? तखन वो भाषा वैज्ञानिक नहि भाषाक षड्यंत्रकारी छथि ।
चुनौती:- जाहि प्रकारे मैथिली के तोड़हि के काज चलि रहल अछि । ओहि सऽ मैथिली भाषी विद्वान के मानक में सुधार के जरुरी अछि । मैथिली के लेखनी में संस्कृतक शब्द के कम सऽ कम प्रयोग कऽ, मैथिली माटिक खांटी शब्दक अधिक सऽ अधिक प्रयोग करबाक चुनौती अछि । मैथिली रचना में सब बोली के शब्द आ क्रियापद के समाहित कऽ मैथिली के बचैबाक चुनौती अछि ।
-मो. ९७७१२४५६७६ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.११.संतोष कुमार राय 'बटोही'- कथा - वध संतोष कुमार राय 'बटोही' कथा - वध
भोरहारी मे जीवछ काका केर छोट लड़िका गुजरि गेलाह । हुनका किछु नहि होयत छलन्हि । किछु दिन सँ बेमार छलाह । बेमार पड़लाह आओर गुजैर गेलाह । जखन हम मॉर्निंग वाक करैत छलहुँ, तँ हुनका देखैत छलहुँ । मुइला सँ पाँच-छह दिन पहिने पुछनहुँ छलियैन्ह जे भैय्या ठीक छी ने ? तँ वो जवाब देने रहैत जे ठीक छी । जइ दिन गुजैर गेलाह तँ पता लागल जे वो करीब बीस दिन सँ बेमार छलाह । बुखार लागैत छलैन्ह । 'सुगर' बढ़ि गेल छलैन्ह से केकरो पता नहि छलैह । सभ कियो कहैत छलथिन्ह जे अंधरा के डागडर हुनका कहने छलैन्ह जे बुखार दिमाग मे चढ़ि गेल छन्हि । हुनका दरिभंगा मे देखा दियौन्ह । हुनकर कनिया अतेक लुरिगर नहि भेलैन्ह। करजो लऽकऽ बेमार घर वाला केँ डागडर लग दरिभंगा देखेवाक जै केँ छल । लोक सभ कहि रहल छै ई घरवाली नहि डायन छियैय । घरवाला के खा गेलै ।
हरखु भैय्या के दुटा लड़िका आओर एकटा लड़कि छलैन्ह । बेटीक शादी भऽ गेल छन्हि । आओर जेठ बेटाक शादी ऐ बेर केलैन्ह अछि । इलाज लेल बेटा सभ सँ टाका मंगने छलथिन्ह । परञ्च वो सभ नहि भेजलकैन्ह । किछु जमीनो छलैन्ह सेहो बेचिकऽ इलाज करेबाक चाही छलैन्ह नहि, तँ करजा लक इलाज करेवाक छलैन्ह । हुनका मने मति मारि देने छलैन्ह ताहि दुआरे अपनो जीवित रहवाक लेल किछु कोशिश नहि केलाथि ।
सैंतालीस-अड़तालीस के उमेर भेल हेतैन्ह । इ कुनहु बेसी उमेर नहि कहल जा सकैए । गाड़िक ड्रायवर सेहो छलाह । ठीक भेला पर गाड़ी चला कऽ अपनो करजा सधा सकैत छलाह। करजा कियो नहि देलकैन्ह गाम मे , तँ चंदा भेट जैत छै । चंदा कके बेमारी केँ इलाज करेवाक छलैन्ह । हुनकर मुइनै गाम मे पचि नहि रहल अछि जखनकि आइ-काल्हि गाम मे चंदा लऽकऽ कतेक आदमी इलाज करौलाथि ।
जै दिन हरखू भैय्या केँ मुइलाक खबर भेटल छल, ओहि दिन विहंसरे मॉर्निंग वाक पर दुर्गास्थान मे छलहुँ । वीरेंदर अपन फटफटिया पर आयल । ओई गाड़ी पर सँ मनोज एकटा जनीजाति केँ भरि पाँज पकड़ने कौशल केँ हाक दैत उतरलाह । आवाज़ सुनिक किछु आओर लोक जमा भ गेलाह । सभ कियो हाऊँ-हाऊँ करऽ लगलाह । किछु मिनट बाद आवाज़ सुनिकऽ कौशल आओर हुनकर अंगनाक तीन-चारिटा लोग सेहो बाहर निकललाह । हमहुं सहैट कऽ करीब गेलहुँ । कौशल नब्ज चेक करऽ लगलाह । वो आला लगा कऽ देखलथिहीन । साँस नहि चलि रहल छलैक । ई निश्चित भ गेल जे वो आब नहि रहलीह । तबो आटो मंगौल गेलै आओर ओई पर लैद कऽ मनोज आओर किछु अड़ोसी-पड़ोसी बौका माय केँ अंधरा ल जेबाक लेल तैयार भेलै । शिवा चौक दिस सँ शोभन सेहो साइकिल पर आबि रह छलाह । दुर्गास्थान आबि कऽ हुनका पता लागि गेलैन्ह जे हमरे कनिया छियैय । ओ साइकिल समुदाय भवन दिस फेकलाह आओर ओई आटो पर पीछा सँ चढ़ि गेलाह । उ आटो चलै लेल तैयार भऽ चुकल छेलैक । शोभन कहैत रहैत छलाथि जे हम कहैत छेलियै किछु ई दुनू कके छोड़तै ।
हमरा बुझना मे देर नहि भेल जे महिनवार वाली काकी आब अई दुनिया मे नहि रहलीह । हम गाम दिस विदा भेलहुँ । रस्ता मे पता लागल जे हुनकर पूतोहु हुनका मारि देलकैन्ह । काल्हिए हुनकर पुतोहु झगड़ा केँ दरम्यान कहने छलैय जे सौतिन तोहर अदिनता लिखल छौ । तोहर जान लक हम छोड़बौ । आइ ई जान लक छोड़लकै । एक घंटा बाद पता चलल जे डागडर हुनका मृत घोषित केलाह । आओर हुनकर मृत शरीर केँ गाम पर लौल गेलै । पूरा गाम मे अइ मामला लक के हड़कंप मचि गेलै । फोन पर माय- दाय सभ अपन-अपन नैहरा बता देलकिहीन । गामक लोकनि सभ केँ काने-काने पता लागि गेलैन्ह । महिनवार वाली काकी केँ अंतिम दरशन लेल सभ कियो आबि रहलाह अछि ।
पूरा गाम केँ लोक अचरज मे अछि जे ई घटना कोना भ गेलै । पुतोहु सासु केँ गला दबा क मारि देलकै ? पूरा गामक लोक शोभन काका केँ आंगन मे भरऽ लगलाथि । अपन गाम लोकक संग शिवा, गोनौली, नवटोली, सहुरिया , घोंघरड़िया, पस्टन कें लोक सभ महिनवार वाली काकी के देखवाक लेल आब लगलै । कोलकाता, दिल्ली, मुंबई , गुरुग्राम, पानीपत, लखनऊ, दरभंगा वगैरह सँ गाम पर फोन आब लगलै जे ई कोना भ गेलै । कियो अंगना मे नहि छेलै ? झगड़ा छोड़ा दैतै तँ ई घटना नहि घटतैक । सभ कियो अपन अपन दुख व्यक्त कर लगलाह । आँइ यौ ई घोर कलियुग आबि गेलैक । सासु केँ पुतोहु मारि देतै ? ओ आंगन मे अखनो धरि छेबे करै । फेर पता लागल जे शोभन केँ समधि ऐल रहैत । कनिया सासु केँ मारि कऽ पड़ा गेलीह ।
कारी ठाकुर केँ दोकान पर एकटा चानन केनिहार पुरूख जनानी सभ केँ बीच पुतोह केँ बड़ खिंधौस कऽ रहल छलाह । किछु देर हम हुनकर गप्प सुनलहुँ । हुनकर ढेर रास उपदेश सुनलाक बाद हम कलहियैन्ह , " ई गप्प तँ बड़ नीक अछि जे सासु केँ पुतोह कोना मारि देलकै ? परञ्च दुनु हाथ सँ ताली बजैत छै । सासु केँ जखन पता लागि गेलैक जे हमर पुतोहु बड़ नटिन अछि, तँ अपने दम धरक चाही । सीना जोरी नहि करक चाही । दोसर , गप्प जे आब पहिलुका समय नहि रहलै जे सासु पुतोहु पर शासन करतीह । समय बदैल रहल छै ।"
ओ चानन वाला बजलाथि , " हँ, बउवा अहाँ तँ ठीके कहैत छियैय । आब ओ समय नहि रहलै । समय बदलि रहल छै । आब सासु पर पतोह शासन कऽ रहल छै । बुढ़ाड़ी मे दुर्गा नहि बनक चाही । कुंजी आओर ताला पतोह केँ हाथ मे दके रामनाम जपवाक चाही ।"
हमहु अंगना दिस चलि गेलहुँ । ई घटना हमरा मोन मे खलबली मचा देलक । भरि राति नीन नहि भेल । धियापुता केँ परवरिश लऽकऽ चिनतित भेलहुँ जे कम-कम ओहन परवरिश संतान केँ नहि दियैय जे ओ केकरो मुआ देतैक । राति मे दोसर दिन भने हमर मँझली बहिन फोन केलक जे अपना गाम मे केकरा मारि देलकै । हमरा माथ पर बल पड़ि गेल । हम सफाई दैत बहिन केँ अई घटना के बारे मे सभ किछु कहि देलियै । बहिन संतुष्ट भेलीह जे हम पूरा घटना हुनका कहि देलियैन्ह । हमर कनिया अपन माय केँ रुचि ललके कहलथिन्ह जे माय मंगरौना मे पतोह सासु केँ मारि देलकै वगैरह वगैरह ।
आई देखलियै आंगन मे कियो न्यौता देवाक लेल आयल छथि । ओ प्रदीप काका केँ न्यौता दके चलि गेलाह । ग्यारह दुना बाइस जन केँ नत दके हुनकर श्राद्ध करनै नीक रहतै, परञ्च ओ थान तर देखलियै पूरा भरल छै भोज खेनिहार सभ । हरेजी केँ दुरा पर बड़का कराह चढ़ल छै । भोज खेनिहार सभ मोंछ पिजौने छथि । सभ पाँति मे पत्ता पड़ि रहल छै । भात-दालि, तरकारी, पापड़, अदौरी, बरी, चटनी, दही-चीनी सभ पत्ता पर पड़लै । बौका मायक भोज थै-थै भ गेलै । नेतहारी सभ शोभन काकाजी केँ खूब जश देलखिहीन । नेतहारी सभ अपन अपन घर दिस जैत जैत बाजि रहल छलाह जे भेलियै से भेलियै शोभन श्राद्ध कर्म आओर भोज करवा मे कोनहु कमी नहि केलाथि । बौका माय के जरूर सदगति भेटतै । भगवान अपना सिरे दोख नहि लैत छथिन्ह। महिनवार वाली के अतबे औरदा छेलै, तैं ओतबे दिन जीलीह । पतोह केँ हाथे मुइनै लिखल छलै , तैं ओ ओकरा हाथे मुआ गेलीह । भगवान केँ लीला कियो नहि बुझि सकैत छथि।
हरखू भैय्या केँ कोनहु असाध्य रोग नहि छलैन्ह । सुगर छलैन्ह, अतेक नहि बढ़ल छलैन्ह। किडनी सेहो औखन दुरूस्त छलैन्ह । बुखार सँ टाइफाइड भऽ गेल छलैन्ह । बेटा सभ परदेश मे कमा रहल छलैथ, परञ्च अतबे उमेर मे चलि गेलाह । बौका माय बेबहार सँ नीक छलीह, परञ्च ओई दिन हुनका मुइनै लिखल छलैन्ह । अंगना मे कियो धररहिया नहि छेलैह, तैं ओ अइ लोक केँ छोड़ि कऽ ओ चलि गेलीह । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। पद्य ३.१.जगदानन्द झा मनु - बीसटा हाइकू ३.२.प्रमोद झा 'गोकुल'- जीवन चक्का ३.३.राम शंकर झा"मैथिल"- अरिपन/ टिपीर-टिपीर ३.१.जगदानन्द झा मनु - बीसटा हाइकू जगदानन्द झा �मनु� बीसटा हाइकू १ माछ मखान खेत पटौनी छलै पोखरि बूते २ गामक गाम पानिमे डूबल छै उबारत के ३ गामक यादि सदिखन मोनमे चलैत अछि ४ गीत गाबैत घर घर झींगुर कते विकास ५ दौनीक मेह नहि गोला बड़द गाममे आब ६ बाबीक गेने नहि भोरे पराती कियो गबैए ७ चतरल छै मिथिलाक पानिमे माछ मखान ८ ओरियानीक झहरैत पनिसँ डोलल मोन ९ साउन संगे आबि रहल अछि सुन्नर यादि १० मेघ गर्जल बिलोका चमकल साउन एलै ११ बाड़ी झाड़ीमे बेंगक टर टर अपने धुने १२ मोन जुड़ेलै हरियर कंचन पानि देखि क १३ फूल झुमै छै बसंतक खुशीमे मोर नचै छै १४ वर्षाक संगे तर तर पाथर चाँदी पथार १५ सुर तानसँ टर टर बजै छै बारीमे बेंग १६ बिच भादव जलमग्न धरती चहुदिस छै १७ सेरसो जकाँ थारीमे सजल छै मेघक तारा १८ कते पावन हरीयर आँचर वसुन्धराकेँ १९ छनि कैश ई सोन बालूक कण मातृभूमिकेँ २० प्रेमक बूँद टप टप टपकै मधुमासमे -जगदानन्द झा �मनु�, मो० न० ९२१२ ४६ १००६ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.२.प्रमोद झा 'गोकुल'- जीवन चक्का प्रमोद झा 'गोकुल' जीवन चक्का
जीवन चक्का खा रहल धक्का तुक्का पर केओ मारय छक्का जे जत्ते पैघ नटक्का ठेका ज्ञानक ओकरे पक्का ज्ञानी गुम्म हक्का बक्का भटकि रहल भय मुहतक्का जत्ते जेकरा पैरवी टक्का ओकरे कुर्सी ज्ञान चुटुक्का श्रम जयतेक फुकू फुक्का मानू चलतै सिक्केक सिक्का ईये बीए जे छी पढ़क्का मारू छाती अपने मुक्का विधि विधानक बड़का उक्का धू धू धधकय लाल भुभुक्का पथ प्रसस्त बढ़ू बनू लड़क्का जे चाहब से पायब सरक्का जागू उठू करू धमक्का गति मेआनू जीवन चक्का
-दीप,मधुवनी (विहार), फोन -9871779851 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.३.राम शंकर झा"मैथिल"- अरिपन/ टिपीर-टिपीर राम शंकर झा"मैथिल" अरिपन/ टिपीर-टिपीर
१ टिपीर-टिपीर
भरि राति मेघ वरषल टिपीर-टिपीर..! सङ्ग हवा-वसात बहल अलहर झांअट भरि राति मेघ....! रहि-रहि ठनका ठनकै बेंग बाजय टर्टर भरि राति मेघ...! खपड़ा कें दोग दअ बुन्नी-झींसी पराअ देह सिहराबैय झनझन भरि राति मेघ...! पहर पअर पहर बिती गेल भुरूकबाक अता-पता नहिं बंगु माअ हाक पअर हाक आई ओछाएन नहिं छोड़ब भरि राति मेघ....! चौकी तअर मे घुसल शेरूआ अनमठ कटने ओंघाल शेरूआ कें नेना-भुटका सब झबरा, करिया, अठरहा घुरक छाउर पअर पड़अल हअमरे सङ्ग सब एहि प्रकृतिक आनंद पीबा बेसुध पड़अल भरि राति मेघ....! दाबा लागल केरा कें गाछ जाहि मे हरियर हरियर पाअत ताहि पअर परैयत चोटगर बमकैत -रमकैत मेघक बुन्नी इन्द्रेव उतैर आएल छैथि अपन सब प्रियसी सङ्ग भरि राति मेघ....! बान्हल गाय-बाछी सङ्ग महिंस आ पअरु पाअज पअर पाअज दैत गोबर पअर पूँछ पटकैत ढ़ोल सन टाप दैत भरि राति मेघ....! भरोहो वाली गदह पअर गदह सबटा जारैन मिसिया गेल गोरहा-गोईठा सेहो तीतल आब चूल्हा मे झोंकब कि भरि राति मेघ....! रहि-रहि बसातक झांअट हृदय कें जुराबैय सङ्ग ओसंघानी पअर सुखैत नुआं -धोती कें सिमसिमाबैत भरि राति मेघ....! बुधनी माअ भरि पथीया डोका नेने सगरों टोल अनघोंल मचौने ओलती मे सह-सह चाली भुटकुनीयां बेंग हंजेरक हंजेरक कुदि फानि मचाबैय भरि राति मेघ...! आधा चौकी भिझल आधा ओछान भिझल धोती कें ढ़अटा सँ झंपनै मुँह धीगो बाबु भुस-भुस पादैत भरि राति मेघ वरषल टिपीर टिपीर...!! २ अरिपन
हे अरिपन हे अरिपन सिरा आगू सँ तुलसी चौड़ा गौसोउनिक घर दुआईर सँ हे अरिपन हे..! लबकी मइंट सँ निपल चकमक बीच आँगन बा आ कनियाँ माअ सोंसे हाथ सानल अरबा चाउर हरैद पिठार सङ्ग लागअल लाल सेनूर हे अरिपन हे...! कतेक जतन सँ षटकोण अरिपन षड्दर्शन मे सांख्य अरिपन षड्दर्शन मे योग अरिपन षड्दर्शन मे न्याय अरिपन षड्दर्शन मे वैशेषिक अरिपन षड्दर्शन मे मीमांसा अरिपन षड्दर्शन मे वेदांत हे अरिपन हे...! हअर फाड़ पालो बखारी कोठी सर्वा ढ़कना करौछ लोहिया बासन झांझ सांच चालईन सूप कोनिया खराम छता खुरपी हाँसू चेरिया हरवाह भांट गवैया हे अरिपन हे...! भूरकबे सुति उठि आँखि मिचैईत दौउड़ी बीच आँगन भाअ बहिन ताकि अपन खराम जीवन कला निहारी नब नब मनगर हुलेसगर सीख भेटाअ हे अरिपन हे...! जीवनक उन्नतिक बाट जीवनक सहयोगीक गच्छ बिन किनको नहिं सहज सब के लेल अन्न राखल मालिन बरही कुम्हाईन नबटोल गंगिया धनुकैन सबहक सङ्ग सब कियौ तखन जीवन बनल धन हे अरिपन हे....! सबकें माअन सबकें मोजर सोहनगर साम्यवादक दर्शन कतेक मिठागर सरस समाज सब मैथिल सब मिथिलानी बढ़ अजगुत बढ़ जीवन दर्शन हे अरिपन हे...! जागु जागु हे गोविन्द घुरि आउ घुरि आउ घुरि आउ हे लक्ष्मीनंदन धन्य धान करू दिअ अभायदान सिरा आगू सँ तुलसी चौड़ा हे अरिपन हे अरिपन..!!
-फो.-7970778787/ ई-पत्र संकेत jharam1977@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। 1 || विदेह ४२७ विदेह ४२७ || 1
कैलाश कुमार fret _ जन्म. 8 फरवरों 967 | a) LJ व >, A आम. ate डीह टोल; She: RE हाट 4a 'जिला-मधुबनों (बिहार) मे संपर्क; ची-2/353, तारों नारे, मेथधिली उपन्यास 4 ओल्ड पालम रोड, Sante put < «a __,... सेक्टर IS, द्वारका, नं दिल्ली-।00078 दर eth, wae : 8076208498 iy = = = Sie: _kallashkmishra@amall.com हर a | र एमएससी, ( मानव विज्ञान) , एम.ए. (मानवाधिकार) , डिप्लोमा (पब्लिक एडमिंनिस्टरेशन) is] hg eS wi tk : सर्टिफिकेट (ome एप्रिसिपशन ) , एम.फ़िल. ( पार्ट ।, मानव faa), पी. एचडी. (सामाजिक + \' न हि मातल लिज्ञान)। कर P 4 = रिसर्च एसोसिएट: साउथ साउथ सॉलिडरिटों (कनाडा) a दी के d “ रिसर्च इन्वेस्टिगेटर: पापुलेशन जेनेटक्निस एंड झुमन डेवलपमेंट लिंभाग-नेशनल इंस्टीट्यूट 5 ‘a JL _ aie हेल्थ एंड फैमिली चेलफंयर (स्वास्थ्य जा परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार) . f fad एसोसिएट: सोसाइटी फॉर हेल्थ एजुकेशन एंड लर्निंग पैकंज (HELP) कि ae ‘ fred ऑफिसर: डॉदिस गांधी नेशनल सेंटर फॉर दी Ses Ca ae भारत सरकार) 5 | ’ कंसलदेंड: READ INDIA (READ GLOBAL कोर भारतीय संकल्प) —— 'एकर अतिरिक्त eal, यृएनडोपी , रीड ग्लोबल, 'रीड sea, ललित कला अकादमी ( भारत . = | व WER), मैथिली भोजपुरी अकादमों ( दिल्ली सरकार) आदिक संग अनेक प्रस्यिजनामे शोध 4 i 2 ~ ) SS. आ नौतिगत ard करबाक अनुभव, aes बैंक (IPP-8), गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी है. 2 4 ५ में अध्वापन, आई पी एल एम, रीड कनेक्ट anise (सेक्शन 8 we) कंर फाउंडर i # i\ uh), ‘ डायरेक्टर।' भारतीव आदिवासी, लोक, लॉक जीवन, कंला, मनिवोधिकोर. anf पर कार्य, q है. के गे है tae भारत करे कला संस्कृति आ जन जीतने पर गहन अध्ययन जो ओकरं को ऑडिंगेटरा FI Ao ‘ — . 2 a R= थी ee oe | ISBN 878-87-986846-4-6 = \ VA ard प्रकाशन | my cao Tater D267. गली में . 45, कौशिक एन्क्लेव | | i | | | | FA deli मार 0 ey Seidl] Gus feet-ir0084 9"78898 684646 अतनशन हक ; maitreyipublicationaigmail.com, मूल्य : F 200/-
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