VIDEHA — Issue 428 / अंक ४२८

Publication: VIDEHA · Issue: 428
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विदेह ४२८ (विदेह भवनाथ झा विशेषांक) ISSN: 2229-547X ISBN: 978-93-344-5087-3 विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। [विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X Videha e-Journal (since 2000) at www.videha.co.in ] विदेह भवनाथ झा : ISBN: 978-93-344-5087-3 ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। कॉपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२५. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२५. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA. सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@zohomail.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@zohomail.in. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover design: AUM GAJENDRA THAKUR VIDEHA:428 समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा। मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अनुक्रम [विदेह ४२८ म अंक १५ अक्टूबर २०२५ (वर्ष १८ मास २१४ अंक ४२८) (विदेह भवनाथ झा विशेषांक)] ऐ अंकमे अछि:- ०.०.विदेह ४२८ म अंक पर मन्तव्य (विदेह भवनाथ झा विशेषांक) (पृष्ठ १-१५) १.०.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (भवनाथ झा विशेषांक)१.१.भवनाथ झा विशेषांकक संदर्भमे (पृष्ठ १९-४७) १.१.भवनाथ झा विशेषांकक संदर्भमे (पृष्ठ ४८-८८) १.२.भवनाथ झा केर संक्षिप्त परिचय (पृष्ठ ८९-१२०) १.३.कल्पना झा- साक्षात्कार (पृष्ठ १२१-१३५) १.४.डा.श्री कृष्ण 'जुगनू'-अगस्त्य संहिता- तीस बर्खक प्रतीक्षा (पृष्ठ १३६-१३८) १.५.Vijay Deo Jha-Pandit with MacBook and manuscripts (पृष्ठ १३९-१४८) १.६.डा.विनयानन्द झा-पं.भवनाथ झाक पाण्डुलिपिसँ संपादित पोथीक अद्यतन सूचना (पृष्ठ १४९-१६३) १.७.पंडित भवनाथ झा मिथिलाक जीवित मानव धरोहर- डॉ. कैलाश कुमार मिश्र (पृष्ठ १६४-१७३) १.८.भैरव लाल दास-पं.भवनाथ झाक शोध दृष्टि (पृष्ठ १७४-१८२) १.९.मुन्नाजी-बीहनि कथाक शास्त्रीय पक्षक निर्धारक- श्री भवनाथ झा (पृष्ठ १८३-१८७) १.१०.रमेश-'घुरि आउ कमला' (पृष्ठ १८८-१९३) १.११.डॉ.आभा झा-कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे (पृष्ठ १९४-२०१) १.१२.दीपा मिश्र-उसरन डीह- पाठकीय प्रतिक्रिया (पृष्ठ २०२-२०७) १.१३.सुनिल कुमार भानू -गहबरक बाटपर संघारामक पाखंड आ समाजक यथार्थ (पृष्ठ २०८-२१२) १.१४.पण्डित भवनाथ झा-हितनाथ झा (पृष्ठ २१३-२२०) १.१५.डॉ.धनाकर ठाकुर-संग्रहणीय व्यक्तित्व पं.भवनाथ झा (पृष्ठ २२१-२२२) १.१६.मुरारी कुमार झा-सरलताक आवरण मे निहित विद्याक विराट रूप (पृष्ठ २२३-२२६) १.१७.कौशल कुमार- भवनाथ झा सँ साक्षात्कार (पृष्ठ २२७-२३९) १.१८.डा. शैलेन्द्र मिश्र- नेपथ्य मे रहनिहार मिथिलाक एकटा अदम्य सेवक ओ प्रहरी: पंडित भवनाथ झा (पृष्ठ २४०-२४४) १.१९.आशीष अनचिन्हार-भारतीय ज्ञान परंपरामे भवनाथ झाजीक महत्व (पृष्ठ २४५-२४९)

०.०.विदेह ४२८ म अंक पर मन्तव्य (विदेह भवनाथ झा विशेषांक) प्रणव कुमार झा विदेहक एकटा गम्भीर आ प्रशंसनीय प्रयास रहल अछि जे ओ मैथिली भाषा-साहित्य आ शोध सभक "डिजिटल घर" बनेबाक दिशा मे अग्रसर अछि। पिछला किछु वर्ष सँ विशेषांकक माध्यम सँ परंपरा आ नव-विचारक बीच संवाद स्थापित करबाक प्रयास असाधारण रूपेँ होइत रहल अछि। पाठकक रूप मे पंडित भावनाथ झा विशेषांकक माध्यम सँ मिथिलाक वर्तमान के एकटा आर विद्वानक जीवन आ कार्य/उपलब्धि आदि के विषय मे परिचय प्राप्त करबाक अवसर भेंटल। भवनाथ झा विशेषांक के मैथिली अकादमिक परंपराक एकटा डिजिटल दस्तावेज केर रूप मे देखल जा सकय अछि, जतऽ पं. भवनाथ झा केँ एकटा विद्वान, शोधकर्मी, सम्पादक, संस्कृतज्ञ आ लोक-समर्थक व्यक्ति रूपेँ सम्मान देबाक संगहि हुनक जीवनक अकादमिक योगदानक मूल्यांकन करैत अछि। ई विशेषांक मात्र कृतित्व विश्लेषण नहि, बल्कि ज्ञानपरंपरा, लिपिविज्ञान आ पाण्डुलिपि अध्ययनक विमर्श केँ केंन्द्रस्थ करबाक गंभीर प्रयास कहल जा सकय अछि। एहि अंकमे विद्वान लेखकक योगदान, संपादन-प्रक्रिया आ स्थानीय ज्ञान-धरोहरक प्रति समर्पण देखना जाय अछि। यदि अंककेँ स्रोत-प्रकाशनक बिबलियोग्राफी, दृश्य-सामग्री (पाण्डुलिपि आ शिलालेख झलक, छायाप्रति, भेंट-मुलाक़ात के तस्वीर) के संयोजन सँ आओर समृद्ध बनायल जाए तऽ एहि तरहक विशेषांकक प्रभाव आर बेसी पैघ भऽ सकय अछि। प्रारंभिक लेख सभ भवनाथ झा केर जीवन, शिक्षण, साधना आ अकादमिक दृष्टि पर ठोस प्रकाश दैत अछि। भाषा सरल, तथापि भाव गंभीर। विदेह संपादक मंडलक प्रयास रहल अछि अछि जे विषयक प्रवेश एक तर्कसंगत क्रममे होय। एहिमे संपादकीय संतुलन देखायल। कल्पना झाक साक्षात्कार भावात्मक दृष्टि सँ अत्यंत मूल्यवान लागल। संवादक शैली सहज अछि, आ साक्षात्कार मे पुछल गेल प्रश्न आ ओकर सहज उत्तर रोचक आ ज्ञानवर्धक रहल। एहि साक्षात्कारमे पंडित भवनाथ झा अपन जीवन-यात्रा, प्रारम्भिक सर्जनात्मक लेखन, पाण्डुलिपि-विज्ञान आ शिलालेख-पठनक व्यवहारिक अनुभव, आ आधुनिक समयमे मैथिली/मिथिला लेल आवश्यक नीतिगत-ढाँचा पर स्पष्ट, सहज आ मार्मिक विचार देलनि। ओ अपन व्यक्तिगत संस्मरण (विद्याकोष, विद्यापति-गोष्ठी, साहित्यिक आरम्भ), पाण्डुलिपिक संपादनक पद्धति, शिलालेखक रक्षाबद्ध तकनीक (इंक-स्टम्पेज आ फोटोग्राफी), आ संस्थागत समस्या सभ (संग्रहक क्षय, संस्थानक मृतप्राय अवस्था आदि) पर विस्तृत प्रकाश देलनि। साक्षात्कार कुल मिला कए शोध-उन्मुख, प्रोत्साहक आ मार्गदर्शक स्वर में अछि। विजय देव झा के Pandit with MacBook and Manuscripts अंग्रेजी लेख विशेषांकक अंतरराष्ट्रीय पठनीयता केँ विस्तार दैत अछि। पारंपरिक पण्डितक संग आधुनिक तकनीकी संगमक प्रतीक रूपेँ भवनाथ झा केँ प्रस्तुत करबाक दृष्टि प्रेरक अछि। एहि से पहिनेहो नारायण चौधरी विशेषांक मे रणधीर झाक अंग्रेजी लेख विदेह द्वारा छापल जा चुकल अछि। हमरा लेखे कोनो विशेषांक मे ऐ तरहक आलेख global readership लेल सेहो सेतुक निर्माण करैत अछि। डॉ. कैलाश कुमार मिश्रक आलेख मिथिलाक जीवित मानव धरोहर विशेषांकक केन्द्रीय आकर्षण कहल जा सकय अछि। डॉ. मिश्र द्वारा लिखल ई संस्मरण-आलोचना मिश्रित निबंध भवनाथ झा केँ "पाण्डुलिपि विज्ञानक जीवित धरोहर" रूपेँ प्रतिष्ठित करैत अछि। भाषा प्रवाही, प्रमाणिक आ भावनात्मक रूप सँ ऊर्जस्वित अछि। दासजी भवनाथ झा केर शोध दृष्टि केँ अकादमिक परिप्रेक्ष्य मे रखैत छथि, जबकि मुन्नाजी हुनका "बीहनि कथा"क शास्त्रीय आधार मे देखैत छथि। ई दुनू लेख भावनाथ झा जी केर बहुआयामी ज्ञानक प्रमाण प्रस्तुत करैत अछि। यद्यपि, आलेखन शैली मे आलोचनात्मक एकरूपता केर कनि अभाव देखायल। मुरारी कुमार झा स्वयम युवा शोधकर्ता छईथ। ऐ तरहक विशेषांक मे शोधकर्ता विद्वान के संग अपन संस्मरण लिखब हुनका सन नव शोधकर्ता के नव ऊर्जा आ प्रेरणादायी भेल हेतय। विशेषांक मे आन आन लेखक सबहक लेख द्वारा पंडित भावनाथ झाक कविता, कथा आ आलोचनात्मक समीक्षा सभक समावेश भेल अछि। विशेष रूपेँ "गहबरक बाटपर संघारामक पाखंड" में समाज-संस्कृति पर झा जीक दृष्टिकोणक प्रतिच्छाया झलकैत अछि। हितनाथ झा द्वारा प्रस्तुत लेख आत्मीय संस्मरण अछि, जबकि धनाकर ठाकुरक निबंध संग्रहणीय व्यक्तित्व शीर्षक अनुरूप संतुलन राखैत अछि। आशीष अनचिन्हारक अंतिम लेख "भारतीय ज्ञान परंपरामे भवनाथ झा जीक महत्त्व" सम्पूर्ण विशेषांकक बौद्धिक निष्कर्ष रूपेँ ठाढ़ भेल अछि। -राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली आशुतोष मिश्र

आदरणीय Bhairab Lal Das कऽ आलेख पढलउ , नीक लागल संगहि हुनकर सलाह जेँ आब सेनापति केर असगर युद्ध नहि कऽ नेतृत्व करथि एहि पर आदरणीय भवनाथजी सँ ध्यान देबाक आग्रह। -दरभंगा

डॉ. कैलाश कुमार मिश्र

पंडित भवनाथ झा पुरातत्व, इतिहास, संस्कृत, धर्मशास्त्र, साहित्य, मैथिली लिपि, पांडुलीपि आदि विद्या अथवा विधा केर प्रामाणिक विद्वान छथि। प्रस्तर पर लिखल अथवा उकेरल लिपिकेँ पढ़बाक लूरि हिनका छनि। विदेह द्वारा प्रकाशित पंडित भवनाथ झा विशेषांक हिनक ज्ञान केर एक उदाहरण प्रस्तुत करैत अछि। एहि विशेषांक के पूरा पढ़ल। हमरा जनैत ई एक अति महत्वपूर्ण काज भेल अछि। यद्यपि ईहो अनुभव भेल जे भवनाथ झा पर किछु आरो विद्वान हुनकर अलग-अलग काज पर चर्चा करितथि तऽ विशेषांक केर महत्त्व आर बढ़ि सकैत छलैक। आब जे भेल से कम मुदा सारगर्भित अछि।

विशेषांक पर गजेन्द्र ठाकुर केर संपादकीय केर अतिरिक्त 17 लोक लिखने छथि। जाहि मे एक हमहूँ छी। सतरह मे एक अंग्रेजी मे श्री विजयदेव झा लिखने छथि आ डॉ. श्री कृष्ण जुगनू हिंदी मे लिखने छथि जकर बहुत सार्थक मैथिली अनुवाद श्री आशीष अनचिन्हार जी केने छथि। अनुवाद केर जतेक प्रशंसा करी से कम। कखनो ई नहि लागल जे अनुवाद पढ़ि रहल छी। पंडित भवनाथ झाक संक्षिप्त परिचय एक सारस्वत काज थिक। आशीष अनचिन्हार बहुत कम शब्द मे हिनक परिचय, काज, काजक महत्ता आदि पर प्रकाश दैत छथि। पंडित भवनाथ झा पर अलग सँ एक आलेख सेहो अनचिंहार जी लिखने छथि।

भैरव लाल दास हिनक पाण्डुलिपि विज्ञान पर योगदान, मिथिलाक्षर आ आन बात सभ पर चर्च करैत हिनका अपन विद्या केर प्रसार करबा लेल नव जनरेशनक शोधार्थी के प्रशिक्षित करबा लेल सुझाव दैत छथि। सुझाव नीक छनि। पंडित भवनाथ झा ई काज कऽ सकैत छथि, करक अवश्य चाही। प्रश्न ई उठैत अछि जे एहि कार्य लेल आर्थिक मदति कत' सँ भेटत? मिथिला अथवा बिहार अथवा भारत केर उद्योगपति कॉर्पोरेट सोशल रेस्पोंसिबिलिटी केर फण्ड सँ किछु द' सकैत छथि की? फण्ड लेल की कएल जा सकैत अछि? की एक विद्वान केर समूह बनाबी जे एहि पर काज करथि? एहनो भ' सकैत अछि जे हमरा लोकनि एक प्लेटफार्म बना क्राउड फंडिंग केर बात करी? किछु भ' सकैत अछि। से भेल तऽ विशेषांक अपन उदेश्य मे सफल रहत।

पंडित भवनाथ झा केर रचना आ हुनक ज्ञान परंपरा पर श्रीमती कल्पना झा एक विस्तृत साक्षात्कार प्रस्तुत केने छथि। ई जरुरी काज भेल अछि. साक्षात्कार केर प्रश्न अथवा जिज्ञासा सेहो सार्थक बुझना गेल अछि। यद्यपि ई सम्पूर्ण नहि कहल जा सकैत अछि। साक्षात्कार मे विद्वान सामान्यतया ओही प्रश्न अथवा जिज्ञासा केर उत्तर देत छथि (अथवा समाधान करैत छथि) जे जिज्ञासा हुनका समक्ष राखल जैत छनि। साक्षात्कार अनेक बेर साक्षातकर्ता केर बुद्धि, ओहि विषय पर हुनक पकड़, व्यक्तिगत सोच, कोनो वाद अथवा विषय केर प्रति हुनक पूर्वाग्रह आदिक कारणे समस्त व्यक्तित्व केर परिचय देबा मे समर्थ नहि भ' सकैत अछि. तखन एकर की समाधान आ की विकल्प? हमरा जनैत एकर विकल्प ई भ' सकैत अछि जे विद्वान के अपन कार्य आ उपलब्धि पर एक विस्तृत आलेख लिखबा लेल प्रेरित करक चाही। संगहि जाहि संस्थान आदि लेल काज केने छथि, तकर अधिकारिक विद्वान लोकनि सँ किछु बात लिखा लेबाक चाही। हम अनेक ग्रंथ सभक काज, तकर लिपि के पढ़ब, ओकर अनुवाद, टिप्पणी आदि केर बात देखल अछि पंडित भवनाथ झा द्वारा. नीक लागल. अगर सभ ग्रंथ के बारे में संक्षिप्त जानकारी दस सँ पंद्रह वाक्य मे देल रहितैक तऽ सजग पाठक लेल ई रामवाण केर काज कऽ सकैत छल।

मुन्ना जी बीहनि कथा केर आरंभिक समय मे पंडित भवनाथ झा केर योगदान केर चर्च करैत एक बेर पुनः हुनका सँ अहि मे सक्रिय होबाक आह्वान करैत छथि।

पाण्डुलिपि पर काज करब, कोनो ग्रंथ मे अगर कमी छैक, ओकर सभ बात आ टेक्स्ट मूल रूप सँ ज्ञात नहि छैक, ओकरा कोना सहायक ग्रंथ अथवा आन आन ग्रंथ (प्रमाणिक ग्रंथ) जाहि मे ओहि ग्रंथ सं देल उद्धरण सभ ताकि ओकरा कोना प्रमाणित बना सकैत छी तकर लूरि आ कला पंडित भवनाथ झा मे छनि। ई बात स्पष्ट होइत अछि श्री विजयदेव झा केर आलेख (जे आलेख कम आ हुनक पंडित भवनाथ झा संग काज करक व्यक्तिगत अनुभव पर लिखल गेल कथ्य छनि) सँ होइत अछि।

डॉ. धनाकर ठाकुर अपन आलेख सँ निराश करैत छथि। ठाकुर जी मिथिला मैथिली लेल बहुत काज केने छथि। बहुत तरहक शास्त्र लोक, इतिहास, धर्म शास्त्र आदि केर ज्ञान छनि। हमरा लगैत अछि, ठाकुर जी निश्चित रूप सँ पंडित भवनाथ झा केर अवदान सँ परिचित छथि, मुदा कोनो बात हुनक कथन सँ स्पष्ट नहि भेल अछि। हुनका पढ़ैत काल ई अनुभव भेल जेना ट्रेन केर कोनो जनरल बोगी मे खचाखच भरल भीड़ मे हड़बड़ी मे किछु लिख देने होथि!

एक बात कहब तऽ बिसरि गेल रही जे गजेन्द्र ठाकुर अपन संपादकीय मे पंडित भवनाथ झा केर काज केर महत्ता के स्थापित करैत पाठक के हिनका पर उपलब्ध सभ सामग्री के पढबा लेल उत्कंठा उत्पन्न करैत छथि।

हितनाथ झा जी अपन गाम कोइलख के बारे मे लिखबा के क्रम मे हिनक ज्ञान सँ लाभान्वित भेल छथि, बाद मे किछु पुरातात्विक चीज, मूर्ति आदि के समय आदि के प्रमाणिक होबा मे हिनक ज्ञान केर सार्थक वर्णन करैत छथि। ई एक प्रमाण देब भेल जे भवनाथ जी ज्ञाता छथि। ज्ञाता संग सहज छथि. उत्सुक लोक के सही दिशा प्रदान करबैत छथि. हिनक व्यक्तित्व पर एक प्रकार सँ इ रबर केर मोहर मारब भेल. ई प्रयास नीक छैक।

डॉ. श्री कृष्ण जुगनू केर अनुभव जे "अगस्त्य संहिता' केर प्रमाण लेल तीस बरख सँ भटकि रहल छलाह तकर मूल ग्रंथ, ओकर मूल टेक्स्ट आ टेक्स्ट केर स्पष्टीकरण कोना पंडित भवनाथ झा करैत छथि ताहि पर अनमोल छनि। ई हिनका अर्थात पंडित भवनाथ झाक योगदानकेँ मिथिला के कहैत अछि बिहार सँ बाहर राजस्थान मे कीर्तिमान बनबैत छनि।

डॉ. विनयानंद झा केर काज महत्वपूर्ण छनि कारण ओ पंडित भवनाथ झा केर पाण्डुलिपि सँ सम्पादित पोथी केर एक तरह सँ किछु केर annotated विवरण आ अनेक केर एक सँ तीन वाक्य मे जानकारी प्रस्तुत करैत छथि। ई काज स्तुत्य छनि मुदा ई छुछुआन काज भेल. एकर विस्तार जरुरी छैक. पन्द्रह सँ बीस पन्ना मे भेला सँ ई काज बहुत नीक रहितैक। मुदा अतबो काज त वैह केलनि ताहि लेल साधुवाद हिनका।

लेखक रमेश सँ ज्ञात होइत अछि जे भवनाथ जी एक दीर्घ कथा "घुरि आउ कमला" लिखने छलाह। रमेश जी एक परिपक्व आलोचक केर नाते पोथी केर भाषा, हिनक विवरण, दीर्घ कथा आ उपन्यासिका केर द्वन्द आदिक चर्च करैत कहैत छथि जे भवनाथ जी कथा आ साहित्य कम लिखैत छथि मैथिली मे तँइ हिनक ई विधा ओतेक ठोसगर नहि भ' रहल छनि। मुदा एक बात तऽ अवश्य स्पष्ट होइत अछि जे सभ ठाम हिनक पाण्डुलिपि केर सांच खोजबाक प्रवृत्ति जीवंत रहैत छनि। रमेश जी कथा गोष्ठी अभियान केर "सगरि राति दीप जरय" मे पंडित भवनाथ झाक प्रारंभिक सक्रियता केर वर्णन सेहो करैत छथि।

डॉ. आभा झा केर आलेख पंडित भवनाथ झा केर एक संस्कृत पोथी "भ्रूणपञ्चाशिका" पर छनि। जेना कि नामकरण सँ स्पष्ट छैक, एहि पोथी मे कन्या भ्रूणहत्या पर पचास गोट श्लोक केर मादे समाजिक मानसिकतापर प्रहार कएल गेल छैक. ई छनि पंडित भवनाथ झा केर व्यक्तित्व केर अनुपम छवि अथवा विशेषता। आ अहि पर आलोचना अथवा व्याख्या करक हेतु डॉ. आभा झा सर्वाधिक उचित पात्र छथि। एक तऽ पोथी संस्कृत भाषा मे लिखल छैक आ दोसर जे एकर विषय छैक, दुनू एहि केर व्याख्या हेतु अभा जी के उपस्थिति सार्थक बनबैत अछि। एहि पर अतबे कहब जरुरी जे एकरा अवश्य पढ़क चाही।

पंडित भवनाथ झा केर मैथिली कथा "उसरन डीह" पर दीपा मिश्र केर वक्तव्य (समालोचना कहब उचित नहि) पुनः इतिहास दिस ल' जाइत छैक. कथा केर मूल ई छैक आर्थिक प्रलोभन दए सांस्कृतिक उपनिवेशवादक स्थापनाक कथा। तकर जे विरोध करै छै तकरा भकसी झोंका कए हत्या करबाक प्रवृत्ति देखल गेलैए। इहो आलेख पठनीय छैक।

सुनिल कुमार भानू एक डेग आगा बढैत पंडित भवनाथ झा केर अप्रकाशित मैथिली उपन्यास "गहबरक बाटपर" जे बौद्धकालीन संघारामक पृष्ठभूमि पर लिखल गेल अछि तकर बात करैत छथि । ई अपना आपमे एक ऑय ओपनर छैक. ई कथा केवल भूतकालक इतिहास नहि, अपितु समाजक भीतर चलैत धार्मिक पाखंड आ नैतिक पतनक कथा सेहो कहैत अछि। मुदा मूल मे इतिहास छैक आ पंडित भवनाथ झा केर पाण्डुलिपि प्रेम देखार भऽ रहल छनि।

मुरारी कुमार झा अपन अनुभव सँ ई प्रमाणित करैत छथि जे पंडित भवनाथ झा ज्ञानक घमंड सँ बहुत दूर रहैत छथि। हिनक सहजता आ निश्छल प्रकृति हिनका भीड़ सँ अलग रखैत छनि।

एहि तरहें पंडित भवनाथ झा पर विदेह केर ई विशेषांक जन-जन लेल प्रेरणादायक अछि. सभ पाठक के एकरा पढ़क चाही आ आनो पाठक सभ के पढ़बाक हेतु प्रेरित करक चाही. जे नहि जनैत छथि तिनका ई जानक चाही जे पंडित भवनाथ झा मैथिली, मिथिलाक्षर, मैथिली संस्कृति, संस्कृत, मिथिला, मिथिला केर इतिहास, पाण्डुलिपि केर एक प्रमाणिक विद्वान छथि। -दिल्ली

अजित कुमार झा

विदेह विशेषांक लेल जखन पं० भवनाथ झा जी केर नाम 16 अगस्त 2025 केँ ज्ञात भेल त' किछु समझ मे नहि आयल। झूठ नहि बाजब, हमरा हिनका विषय मे कोनो जानकारी नहि छल। फेर विदेह विशेषांक केर विशेषता ध्यान मे आयल। एकर उद्देश्य मात्र कोनो जीवित व्यक्ति केर मूल्यांकने करब टा नहि अछि, मुदा हमरा सन अज्ञानी व्यक्ति केँ मिथिलाक विभूति सबहक विषय मे जानकारी भेटैक सेहो अछि। अहि सँ पूर्व नारायण चौधरी जी बेर सेहो अहिना भेल छल। ओना हमरा सन बहुत गोटे हेताह जे कि हिनकर नाम सँ पूर्व परिचित नहि हेताह। तकर कोनो एकटा कारण त' नहि भ' सकैत अछि। अनेक कारण मे सँ एकटा भेल विषय वस्तु केर संबंध मे ज्ञानक अभाव। दोसर प्रमुख कारण अछि जे हम सब ग्लैमर के दुनिया मे जीबि रहल छी आ ओहन व्यक्ति सँ अनभिज्ञ रहैत छी जे नेपथ्य मे रहि क' अनवरत जिम्मेवारीक निर्वहन करैत रहैत छथि। अपन समाज मे डाक्टर इंजीनियर सबहक भरमार अछि मुदा ताहि मे अधिकांश डिग्री धारी, जिनका कोनो विषय पर शोध करबाक कोनो बेगरता नहि बुझाइत छन्हि। अथवा एना कहल जा सकैत अछि जे धनोपार्जन सँ पलखति होइन तखन न' एहि तरहक काज सँ जुड़ताह। साधारणतया एत्तह जीवनक एकमात्र उद्देश्य अछि टका कमेनाइ। ओनाहुतो अपना सबहक समाज मे एकटा कहबी छैक जे बुड़िबक बेटा टके काबिल। एकटा बात और छैक जे साहित्य केर क्षेत्र मे अधिकांश शोधकर्ता कट, कापी,पेस्ट मे बाझल छथि। मौलिकता लुप्तप्राय भेल जा रहल अछि। किछु तकनीकी समस्या केर कारण पूर्व निर्धारित तिथि अर्थात् 15 अक्टूबर 2025 केँ विदेहक पं० भवनाथ झा विशेषांक साइट पर अपलोड नहि भ' सकल। अन्ततः 19 अक्टूबर 2025 केँ ई विशेषांक मैथिली भाषी जनता लेल उपलब्ध भेल आ सच पुछु त' अतेक जल्दबाजी मे एखनधरि हम कोनो विशेषांक पूरा नहि पढ़ने छलहुँ। एकर मुख्य कारण अछि पं० भवनाथ झा जी केर विषय मे जनबाक उत्सुकता। विदेहक टीम केँ अहि महत्वपूर्ण कार्य हेतु साधु वाद ।

एक पाठक केँ रूप मे हमरा पं० भवनाथ झा जी पर केन्द्रित विशेषांक पढ़बाक सौभाग्य भेटल अछि आ अहि पर किछु लिखबाक दुस्साहस क' रहल छी। शुरु करब संक्षिप्त परिचय सँ जे कि कोनो तरहें संक्षिप्त नहि भ' सकैत अछि, जौँ केओ एहन विद्वानक परिचय लिखय बैसताह त' से संक्षिप्त भेनाइ संभव नहि। जाहि परिमाण मे हिनका द्वारा कैल गेल काज अछि चाहे ओ शुरुआती दौर मे साहित्यकार केँ रूप मे होइन अथवा पाण्डुलिपि एवं शिलालेख विज्ञान केँ क्षेत्र मे होइन। चाहे ओ पाण्डुलिपिक लिप्यंतरण केर काज होइन अथवा 'बुद्धचरितम्' महाकाव्यक खण्डित अंश केँ पूरा केनाइ सन दुरुह काज किएक नहि होइन। चाहे ओ धार्मिक ग्रंथक अनुवाद होइन अथवा माँ जानकी केँ विवाह स्थलक जानकारी किएक नहि होइन। एक सँ बढ़ि एक विलक्षण काज सब हिनका द्वारा भेल अछि। ओहि केँ बाद आबी कल्पना जी द्वारा लेल गेल हिनक साक्षात्कार पर। सटीक प्रश्न सब पर जेहन प्रभावी ढंग सँ हिनक जवाब अछि से अपूर्व अछि। आठम वर्ग मे पढ़ैत काल कविता लिखनाइ शुरू कयलनि आ जखन 'सगर राति दीप जरय' कार्यक्रम सँ जुड़लनि तखन कथा लिखलनि। एक दू टा नहि मुदा लगभग 20टा कथा गोष्ठी मे निरन्तर न'ब न'ब कथा पाठ कयलनि। शिलालेख पढ़ब बड्ड दुरूह कार्य होइत अछि मुदा विभिन्न भाषा एवं लिपि केर ज्ञानक संग हिनक दृढ़ इच्छाशक्ति अहि काज केँ आसान क' देलकनि। आदरणीय डा० शशि नाथ झा जी केर निर्देशन मे ई निरन्तर प्रेरित होइत रहलाह। कल्पना जी जखन प्रश्न कयलनि जे मैथिलीक प्रोफेसर सभ पांडुलिपि वा शिलालेख विज्ञान मे किएक नहि आगू अबैत छथि ताहि केँ जवाब मे जे कहलनि से एखन काफी चर्चा मे अछि। अपन साक्षात्कार मे ई कहलनि जे यथार्थ सँ बेसी हिनका आदर्श अपना तरफ आकृष्ट करैत छन्हि तथापि अहि प्रश्नक उत्तर मे विशुद्ध यथार्थ केर प्रमाण भेटैत अछि। अहि साक्षात्कार केर माध्यम सँ पाण्डुलिपि एवं शिलालेख विज्ञान केर क्षेत्र मे आबय वाला युवा सब केँ नीँक संदेश देलनि अछि। जरुरत सेहो अछि जे आब नबतुरिया सब आगू आबथि। कल्पना जी द्वारा लेल साक्षात्कार सारगर्भित अछि एवं बहुत रास जानकारी भेटल। ओहि केँ उपरांत डा० श्री कृष्ण 'जुगनू' केर हिंदी आलेख जे कि आशीष जी मैथिली मे अनुवादित कयलनि अछि पढ़ि हिनक विद्वता सँ अभिभूत भेलहुँ। विजयदेव झा जी केर आलेख सँ सेहो पुष्ट जानकारी भेटैत अछि। पंजी शास्त्रक ज्ञाता एवं इतिहासकार डा० विनयानन्द झा पाण्डुलिपि सँ संपादित हिनक पोथी सबहक अद्यतन सूचना बड्ड नीँक ढ़ंग सँ प्रस्तुत कयलनि अछि।

भैरव लाल दास जी केर आलेख मे भविष्यक चिन्ता केर झलक भेटैत अछि। नबतुरिया सब केँ मार्गदर्शन करैत यदि पं० भवनाथ झा जी एकटा दल बना क' काज करथि त' दूटा लाभ सुनिश्चित भ' सकैत अछि। पहिल, काज अधिक मात्रा मे होएत एवं दोसर महत्वपूर्ण बात जे अहि क्षेत्र मे भविष्य केँ ल' क' चिन्ता करबाक प्रयोजन नहि रहत। सेनापति केँ पास सेना त' रहबाके चाही। निस्संदेह हिनका पर महावीर जी केर असीम कृपा छन्हि मुदा तैयो एकटा कहबी छैक जे एसकरि बृहस्पतियो झूठ। आगू आबी पं० भवनाथ झा जी द्वारा बीहनि कथाक शास्त्रीय पक्षक निर्धारण पर। अहि विषय पर मुन्नाजी केर आलेख ज्ञानवर्धक अछि। लघु कथा एवं बीहनि कथा केँ विषय मे फरिछा क' लिखलनि अछि। संगहि अहि आलेख मे जे लिंक सब देल गेल अछि सेहो अहि विषय केँ ल' क' जे भ्रमक स्थिति बनल अछि तकरा तोड़बा मे सफल भेल अछि। 'घुरि आउ कमला' पर लिखैत काल रमेश जी अपन बात बेबाकी सँ रखलनि अछि। ओनाहिते दीपा जी सेहो 'उसरन डीह' पर लिखैत काल बहुत स्पष्ट ढ़ंग सँ अपन विचार प्रस्तुत कयलनि अछि। धार्मिक पाखंड एवं नैतिकताक पतन विषय पर हिनक पहिल मैथिली उपन्यास 'गहबरक बाट पर' सुनील कुमार 'भानु' केर आलेख सेहो नीँक लागल। शोधार्थी मुरारी कुमार झा केर संस्मरण बड्ड रोचक लागल। संगहि अहि बातक पुष्टि करैत अछि जे पं० भवनाथ झा जी कतेक सहज एवं सरल व्यक्ति छथि। भ्रूण हत्या पर हिनक 50टा श्लोकक विवेचना श्रीमती आभा झा बड्ड नीँक जँका केलनि अछि। हितनाथ झा जी केर पोथी कोइलख मे हिनक योगदान छन्हि एवं अपन जन्म दिवस पर साल भरिक काजक स्व विवेचना वाला बात वास्तव मे अनुकरणीय लागल।

आशीष जी त' अपन चिर परिचित अन्दाज मे बेबाक नजर अयलनि। वास्तव मे पं० भवनाथ झा जी सन मिथिलाक विभूति अपन कविता, कथा ओ उपन्यास केँ ल' क' प्रसिद्धि नहि पौलनि आ ओहि विषय पर बहुत चर्चा सेहो नहि भेल अछि । अहि संदर्भ मे महानायक अमिताभ बच्चन केर एकटा साक्षात्कार मोन पड़ि रहल अछि जकर चर्चा करब उचित बुझा रहल अछि। एकबेर अमिताभ बच्चन अपन पिता हरिवंश राय बच्चन सँ जिज्ञासा केने रहथि जे हुनका अहि बातक कोना भान हेतनि जे ज्ञानक क्षेत्र मे ओ आब सब तरहें परिपूर्ण भ' गेल छथि? हरिवंश राय बच्चन जी बहुत सरल एवं सहज भाव सँ उत्तर देलखिन जे दुनियाक कोनो भाषाक एकटा अखबार उठाउ एवं ओकरा पूरा पढ़ि जाउ। शुरु सँ अन्त धरि जौँ सब विषय समझ मे आबि जाय त' बूझब जे ज्ञानक क्षेत्र मे अहाँ आब परिपूर्ण छी। हम त' बस एतबहि कहब जे डा० धनाकर ठाकुर जी ठीके कहलनि जे पं० भवनाथ झा जी एकटा संग्रहणीय व्यक्ति छथि आ संगहि डा० कैलाश मिश्र जी केँ अनुसार जीवित मानव धरोहर वाला गप्प सेहो उपयुक्त लागल। हिनका सम्मानित करबाक उद्देश्य सँ जे ई विशेषांक प्रकाशित भेल अछि ताहि लेल विदेहक संपूर्ण टीम केँ साधुवाद। -मुज्जफरपुर / जजुआर

जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'

साहित्यकार, संपादक, धर्मशास्त्र आ कर्मकाण्डक विद्वान, पुरातत्वविद संगहि पाण्डुलिपि शास्त्रक़ ज्ञाता और गंभीर शोधकर्ता पं. श्री भवनाथ झाजीक सम्बन्धमे एहि विशेषांकक प्रस्तुतिसँ 'विदेह' द्वारा एकटा और उल्लेखनीय एवं प्रशंसनीय काज भेल अछि। श्री मुरारी कुमार झाक अनुसार पण्डित श्री झाजी सरलताक आवरणमे विद्याक विराट रूप छथि। डा. धनाकर ठाकुर जी हिनका संग्रहणीय व्यक्तित्व मानैत छथि। रमेशजी द्वारा हिनक दूटा कथा 'ऐंठ' आ 'घुरि आउ कमला' क सुन्दर समीक्षा कयल गेल अछि। विदुषी दीपा मिश्र द्वारा हिनक कथा 'उसरन डीह ' पर विलक्षण पाठकीय प्रतिक्रिया प्रस्तुत कयल गेल अछि। अपन आलेखमे आशीष अनचिन्हार कहने छथि जे-हिनका द्वारा समाजक लेल नव दृष्टिकोणक संग बहुत अनिवार्य आ उपयोगी काज सभ कयल गेल अछि जाहिसँ मैथिली आ मिथिला दुनू कें फायदा भेल छै खास क' मिथिलाकें बेसी। मुन्नाजीक अनुसार बीहनि कथा गद्य साहित्यक जाहि शास्त्रीय पक्षपर ठाढ अछि तकर पूर्ण श्रेय जाइत छनि श्री भवनाथ झा 'भवन'जी कें। श्री भैरव लाल दास जी द्वारा हिनक बहुमुखी प्रतिभाक विश्लेषण करैत सुचित कयल गेल अछि जे कंप्यूटरसँ सम्बंधित सभ विधाक जानकार आ अभ्यासी सेहो छथि आ 'ब्राह्मी' नामक वेब पेज सेहो स्वयं विकसित केने छथि जाहि ठाम हिनका द्वारा कयल गेल सभ काज सेहो उपलब्ध अछि। केन्द्र सरकारक मैथिली -भोजपुरी अकादमिक परामर्शदाता रहि चुकल डा. कैलाश कुमार मिश्र हिनका गुरु मानैत छथि आ हिनक महत्वपूर्ण योगदानक चर्चा करैत। कहैत छथि जे एखन बिहारमे पाण्डुलिपि विज्ञान अथवा शास्त्र केर सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता आ आधिकारिक विद्वान छथि संगहि मिथिलाक ज्ञान परम्पराक जीवित मानवीय धरोहर छथि। मिश्र जीसँ ईहो जानकारी प्राप्त भेल अछि जे पं. झा 'धर्मायण पत्रिका' सँ जुड़ल धर्मशास्त्र, वेद, ज्योतिष, इतिहास, साहित्य, आयुर्वेद, जैन, बुद्धिज्म आदि केर विद्वान सभक एकटा व्हाट्सप्प समूह बनेने छथि। डा. विनयानन्द झाजी द्वारा हिनक विद्वताक उल्लेख करैत हिनका द्वारा पाण्डुलिपिसँ सम्पादित पोथीक अद्यतन सूचना देल गेल अछि। आदरणीया कल्पना झा द्वारा प्रस्तुत साक्षात्कारमे व्यक्त विचारक अनुसार पं. भवनाथ झाजी साहित्यकें समाजक दर्पण नहि, समाजक दिशा निर्देशकक रूपमे देखैत छथि आ अही दृष्टिकोणसँ मिथिला, मिथिलाक संस्कृति, साहित्यक उदारताक अनुशीलन करैत बामपंथ, ईसाई मिशनरी, आर्य समाज द्वारा पसारल गेल भ्रान्तिकें दूर करय चाहैत छथि। आशा अछि एहि दिशामे भेल प्रगति 'विदेह'क पाठककें अवश्य उपलब्ध करौताह। ई देखब रोचक होयत जे संस्कृति आ साहित्यक उदारताक अनुशीलनक मोहमे सत्य कतेक स्वीकृत अथवा उपेक्षित रहैत अछि। - पटना अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। [भवनाथ झा विशेषांक] १.०.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.१.भवनाथ झा विशेषांकक संदर्भमे १.२.भवनाथ झा केर संक्षिप्त परिचय १.३.कल्पना झा- साक्षात्कार १.४.डा.श्री कृष्ण 'जुगनू'-अगस्त्य संहिता- तीस बर्खक प्रतीक्षा १.५.Vijay Deo Jha-Pandit with MacBook and manuscripts १.६.डा.विनयानन्द झा-पं.भवनाथ झाक पाण्डुलिपिसँ संपादित पोथीक अद्यतन सूचना १.७.पंडित भवनाथ झा मिथिलाक जीवित मानव धरोहर- डॉ. कैलाश कुमार मिश्र १.८.भैरव लाल दास-पं.भवनाथ झाक शोध दृष्टि १.९.मुन्नाजी-बीहनि कथाक शास्त्रीय पक्षक निर्धारक- श्री भवनाथ झा १.१०.रमेश-'घुरि आउ कमला' १.११.डॉ.आभा झा-कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे १.१२.दीपा मिश्र-उसरन डीह- पाठकीय प्रतिक्रिया १.१३.सुनिल कुमार भानू -गहबरक बाटपर संघारामक पाखंड आ समाजक यथार्थ १.१४.पण्डित भवनाथ झा-हितनाथ झा १.१५.डॉ.धनाकर ठाकुर-संग्रहणीय व्यक्तित्व पं.भवनाथ झा १.१६.मुरारी कुमार झा-सरलताक आवरण मे निहित विद्याक विराट रूप १.१७.कौशल कुमार- भवनाथ झा सँ साक्षात्कार १.१८.डा. शैलेन्द्र मिश्र- नेपथ्य मे रहनिहार मिथिलाक एकटा अदम्य सेवक ओ प्रहरी: पंडित भवनाथ झा १.१९.आशीष अनचिन्हार-भारतीय ज्ञान परंपरामे भवनाथ झाजीक महत्व १.०.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (भवनाथ झा विशेषांक) भवनाथ झा- असञ्जाति मन (बुद्धचरितम्- सम्पादक भवनाथ झा, २०१३) अश्वघोष प्राचीन भारतक अद्वितीय कवि, दार्शनिक आ तर्कशास्त्री छलाह। हुनका संस्कृत बौद्ध साहित्यक प्रथम महाकवि मानल जाइत अछि। हुनक प्रमुख रचनामे *बुद्धचरितम्*, *सौन्दरानन्दम्* आ *शारीपुत्रप्रकरणम्* शामिल अछि। एहि सभमे *बुद्धचरितम्* बौद्ध धर्मक रामायण कहल जाइत अछि, जे भगवान बुद्धक जीवन, उपदेश आ तत्त्वज्ञानक काव्यात्मक रूप प्रस्तुत करैत अछि। ई कृति संस्कृत साहित्यक एहन अनुपम रचना अछि जे कालिदासक *रघुवंश* आ *कुमारसंभव* सँ तुलनीय अछि। इत्सिंग, प्रसिद्ध चीनी यात्री, लिखने छथि जे *बुद्धचरितम्* सम्पूर्ण भारत, चीन, तिब्बत आ दक्षिण पूर्व एशियामे गायल आ पठित होइत छल। धर्मरक्षा द्वारा पाँचम शताब्दीमे ई चीनी भाषामे अनूदित भेल आ सातम शताब्दीमे तिब्बती भाषामे सेहो अनुवाद भेल। युआन च्वांग (ह्वेनसांग) अश्वघोष केँ बोधिसत्त्व कहि सम्मान दैत छथि आ हुनका चतुर्थ बौद्ध संगीतिक प्रमुख विद्वान् रूपमे वर्णन करैत छथि। परंतु, दुर्भाग्यवश, *बुद्धचरितम्* महाकाव्यक मूल संस्कृत पाठ केवल चौदहम सर्ग धरि सुरक्षित रहि सकल। पन्द्रह सँ अट्ठाइस सर्ग पूर्णरूपेण नष्ट भए गेल। तिब्बती आ चीनी अनुवादक सहायतासँ बादमे अंग्रेजी अनुवाद ई. एच. जॉन्सटन (E. H. Johnston) द्वारा कएल गेल, जे अत्यंत प्रामाणिक मानल जाइत अछि। स्वतंत्र भारतक समयमे आचार्य किशोर कुणालक प्रेरणासँ मिथिलाक प्रसिद्ध संस्कृताचार्य पंडित भवनाथ झा एहि नष्ट भागक संस्कृतमे पुनःनिर्माण कएलनि। भवनाथ झा अत्यंत विद्वान् कवि छथि, संस्कृत व्याकरण, छन्द, अलंकार आ भावशैलीक गहन ज्ञाता छथि। हुनक पुनर्निर्माण मूल अश्वघोषक शैलीक समान अछि जेहि मे समान छन्द योजना, काव्यिक सौंदर्य, आ दार्शनिक गाम्भीर्य विद्यमान अछि। महन्त रामचन्द्रदास शास्त्री आ सूर्यनारायण चौधरी द्वारा पूर्वमे हिंदी संस्कृत अनुवाद भेल छल, मुदा आचार्य किशोर कुणालक मत अनुसार भवनाथ झा कृत पुनर्निर्माण अधिक काव्यिक आ प्रामाणिक अछि। हुनक छन्द चयन आ भावाभिव्यक्ति एहन अछि जे मूल ग्रंथक सौंदर्यक पुनरुत्थान करैत अछि। ई केवल भाषिक पुनर्निर्माण नहि, अपितु सांस्कृतिक पुनर्जीवन सेहो अछि। भवनाथ झा द्वारा पुनःस्थापित भागमे अश्वघोषक रूपक, उपमा, आ करुण रसक उत्कृष्ट प्रयोग पुनः प्रकट भेल अछि। वृद्धावस्था, मृत्यु, दुख आ मोक्षक चित्रण अत्यंत मर्मस्पर्शी अछि। उदाहरणस्वरूप, आचार्य किशोर कुणाल लिखने छथि जे ई पुनर्निर्माण केवल साहित्यिक उपलब्धि नहि, अपितु भारतीय संस्कृत साधनाक गौरव प्रतीक अछि। भवनाथ झा अपन पुनर्निर्माणमे केवल जॉन्सटनक अंग्रेजी संस्करणपर निर्भर नहि रहलाह, बल्कि चीनी आ तिब्बती अनुवादक गहर अध्ययन करि अनेक ठाम सुधार सेहो प्रस्तुत केलनि। एहि कारणे हुनक कार्य अधिक विश्वसनीय आ वैज्ञानिक मानल जाइत अछि। आचार्य किशोर कुणाल एहि ग्रंथक प्रकाशनक अवसरपर कहने छथि जे * पंडित भवनाथ झा कृत पुनर्निर्माण स्वतंत्र भारतक संस्कृत साहित्यक सर्वोत्तम योगदान छी। * एहि कार्य सँ बौद्ध साहित्यक एहन अमूल्य रत्न पुनः पूर्ण रूपमे उपलब्ध भेल अछि जे सहस्राब्दीसँ अपूर्ण रूपमे विद्यमान छल। अंततः, *बुद्धचरितम्* केवल धार्मिक महाकाव्य नहि, बल्कि मानवीय चेतना, करुणा आ बोधक विश्वसाहित्यिक संदेश अछि। पं. भवनाथ झा द्वारा कएल गेल ई पुनःस्थापना अश्वघोषक गौरव आ भारतक सांस्कृतिक धरोहर केँ पुनः जीवित कएलक अछि। **निष्कर्ष रूपेँ**, पं. भवनाथ झा द्वारा *बुद्धचरितम्*क पुनर्निर्माण भारतीय संस्कृत परंपराक पुनर्जागरण अछि। ई केवल अश्वघोषक रचना नहि, बल्कि भारतीय बौद्ध संस्कृति, काव्यकला आ मानवता क भावनाके पुनर्स्थापित करैत अछि। आचार्य किशोर कुणालक शब्दमे, जेना इत्सिंगक समयमे बुद्धचरितम् श्रद्धा आ प्रेम सँ गायल जाइत छल, ओहिना आब फेर सँ भारत आ समस्त बौद्ध देशसभमे ई पुनः गुँजित हएत। सञ्जाति मन (गीत प्रबन्ध)-[कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर खण्ड-६, २००९] [अश्वघोषक २८ सर्गक संस्कृत बुद्धचरितम् विलुप्त भऽ गेल मुदा एकर तिब्बती अनुवादसँ पुनः संस्कृत रूपान्तर भेल, रूपान्तरकारक नाम अज्ञात। ओ अनुवाद अश्वघोषक मूल संस्कृत बुद्धचरितम् नामसँ ओइ अज्ञात अश्वघोष भक्त (आ बुद्धक भक्त) अनुवादक द्वारा जारी कएल गेल। ओइ अद्भुत् अनुवादकक संस्कृत बुद्धचरितम् केर अति-संक्षिप्त मैथिली अनुवाद- अनुवादक- गजेन्द्र ठाकुर] [सर्ग १- सर्ग २८] असञ्जाति मन [कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक-गजेन्द्र ठाकुर खण्ड-६, २००९] असञ्जाति मन सर्ग १ ई पुरातन देश नाम भरत, राज करथि जतऽ इक्ष्वाकु वंशज। ऐ वंशक शाक्य कुलक राजा शुद्धोधन, पत्नी माया छलि, कपिलवस्तुमे राज करथि तखन। अश्वघोषक वर्णन ई सकल, दैत अछि सम्बल असञ्जाति मनक। माया देखलन्हि स्वप्न आबि रहल, एकटा श्वेत हाथी आबि मायाक शरीरमे, पैसि छल रहल हाथी मुदा, मायाकेँ भऽ रहल छलन्हि ने कोनो कष्ट, वरन् लगलन्हि जे ऐल अछि मध्य क्यो गर्भ। गर्भक बात मुदा छल सत्ते, भेल मोन वनगमनक, लुम्बिनी जाय रहब, कहल शुद्धोधनकेँ। दिन बीतल ओत्तै लुम्बनीमे दिन एक, बिना प्रसव-पीड़ाक जन्म देलन्हि पुत्रक, आकाशसँ शीतल आ गर्म पानिक दू टा धार, कएल अभिषेक बालकक लाल-नील पुष्प कमल, बरसि आकाश। यक्षक राजा आ दिव्य लोकनिक भेल समागम, पशु छोड़ल हिंसा पक्षी बाजल मधुरवाणी। धारक अहंकारक शब्द बनल कलकल, छोड़ि ’मार’ आनन्दित छल विश्व सकल, ’मार’ रुष्ट आगमसँ, बुद्धत्व प्राप्ति ई करत। माया-शुद्धोधनक विह्वलताक प्रसन्नताक, ब्राह्मण सभसँ सुनि अपूर्व लक्षण बच्चाक, भय दूर भेल माता-पिताक तखन जा कऽ, मनुष्यश्रेष्ठ पुत्र आश्वस्त दुनू गोटे पाबि कऽ। महर्षि असितकेँ भेल भान शाक्य मुनि लेल जन्म, चली कपिलवस्तु सुनि भविष्यवाणी बुद्धत्व करत प्राप्त, वायु मार्गे एला राज्य वन कपिलवस्तुक, बैसायल सिंहासन शुद्धोधन तुरत । राजन् ऐल छी देखय बुद्धत्व प्राप्त करत जे बालक। बच्चाकेँ आनल गेल चक्र पएरमे छल जकर, देखि असित कहल, हा! मृत्यु समीप अछि हमर, बालकसँ शिक्षा प्राप्त करितौं मुदा वृद्ध हम अथबल, उपदेश सुनऽ लेल शाक्य मुनिक, जीवित कहाँ रहब। वायुमार्गे घुरला असित कऽ दर्शन शाक्य मुनिक, भागिनकेँ बुझाओल पैघ भऽ बौद्धक अनुसरण करथि। दस दिन धरि केलन्हि जात-संस्कार, फेर ढेर रास होम जाप, करि गायक दान सिंघ स्वर्णसँ छारि, घुरि नगर प्रवेश केलन्हि माया, हाथी-दाँतक महफा चढ़ि। सर्ग २ धन-धान्यसँ पूर्ण भेल राज्य, अरि छोड़ल शत्रुताक मार्ग, सिद्धि साधल नाम पड़ल सिद्धार्थ। मुदा माया नै सहि सकली प्रसन्नता, मृत्यु ऐल मौसी गौतमी कएल शुश्रुषा। उपनयन संस्कार भेल बालकक, शिक्षामे छल चतुर, अंतःपुरमे कय ढेर रास व्यवस्था विलासक, शुद्धोधनकेँ छल मोन असितक बात, बालकक योगी बनबाक। सुन्दरी यशोधरासँ फेर करबाओल सिद्धार्थक विवाह, समय बीतल सिद्धार्थक पुत्र राहुलक भेल जन्म। सर्ग ३ उत्सवक संग बितैत रहल दिन पल, सुनलन्हि चर्च उद्यानक कमल सरोवरक, सिद्धार्थ इच्छा देखेलन्हि घुमक । सौँसे रस्तामे आदेश भेल राजाक, क्यो वृद्ध दुखी रोगी रहथि बाट ने घाट। सुनि नगरवासी देखबा लेल व्यग्र, निकलि ऐल पथपर दर्शन लेल सिद्धार्थक । चारू कात छल मनोरम दृश्य, मुदा तखने ऐल पथपर एक वृद्ध। हे सारथी, सूतजी के अछि ई, आँखि झाँपल भौँहसँ, श्वेत केश, हाथ लाठी, झुकल की छै भेल? कुमार अछि ई वृद्ध, भोगि बाल युवा अवस्था जाय अछि भेल वृद्ध आइ । की ई हएत सभक संग, हमहूँ भऽ जायब वृद्ध एक दिन? सभकेँ अछि बुझल ई खेल, फेर चहुदिस ई सभ करय किलोल ? हर्षित मुदित बताह तँ नै ई भीड़? घुरि चलू सूत जी आब, उद्यानमे मोन कतऽ लाग ! महलमे घुरि-फिरि भऽ चिन्तामग्न, पुनि लऽ आज्ञा राजासँ निकलल अग्र । मुदा ऐबेर भेटल एकटा लोक, पेट बढ़ल, झुकल लैत निसास, रोगग्रस्त छल ओ पूछल सिद्धार्थ, सूत जी छथि ई के, की भेल? रोगग्रस्त ई कुमार अछि ई तँ खेल, कखनो ककरो लैत अछि अपन अधीन । सूत जी घुरू भयभीत भेलौं हम आइ फेर। घुरि घर विचरि-विचरि कय चिन्तन, शुद्धोधन चिन्तित जानि ई घटनाक्रम। आमोद प्रमोदक कऽ आर प्रबन्ध, रथ सारथी दुनू नव कएल शुद्धोधन। फेर एक दिन पठाओल राजकुमार, युवक-युवती संग पठाओल करय विहार । मुदा तखने एकटा यात्रा मृत्युक, हे सूतजी की अछि ई दृश्य, सजा-धजा कऽ चारि गोटे धऽ कान्ह, मुदा तैयो सभ कानि रहल किए नै जानि ? हे कुमार आब ई सजाओल मनुक्ख, नै बाजि सकत, अछि ई काठ समान। कानि-खीजि जाथि समस्त ई लोक, छोड़ऽ ओकरा मृत्यु केलन्हि जे प्राप्त। घुरू सारथी नै हएत ई बर्दाश्त, भय नै अछि ऐबेर, मुदा बुझितो आमोद प्रमोदमे भेर, अज्ञानी सन केना घुमब उद्यान। सर्ग ४ मुदा नव सारथी घुरल नै द्वार, पहुँचल उद्यान पद्म खण्ड जकर नाम। युवतीगणकेँ देलक आदेश उदायी, पुरोहित पुत्र, करू सिद्धार्थकेँ आमोद-प्रमोदमे लीन । मुदा देखि इन्द्रजीत सिद्धार्थक अनासक्ति, पुछल उदायी भेल अहाँकेँ ई की? हे मित्र क्षणिक ई आयु, बुझितो हम केना गमाउ? साँझ भेल घुरि युवती सभ गेल, सूर्यक अस्तक संग संसारक अनित्यताक बोध, पाबि सिद्धार्थ घुरल घर चिन्ता मग्न, शुद्धोधन विचलित मंत्रणामे लीन। सर्ग ५ किछु दिनक उपरान्त, मांगि आज्ञा बोन जेबाक, संग किछु संगी निकलि बिच खेत-पथार, देखि चास देल खेत मरल कीट-पतंग । दुखित बैसि उतरल घोड़ासँ अधः सिद्धार्थ, बैसि जोमक गाछक नीचाँ धऽ ध्यान, पाओल शान्ति तखने भेटल एक साधु। छल ओ मोक्षक ताकिमे मग्न, सुनि ओकर गप, देखल होइत अन्तर्धान। गृह त्यागक ऐल मोनमे भाव, बोन जेबाक आब अखन नै काज। घुरि सभ चलल गृहक लेल, रस्तामे भेटलि कन्या एक, कहल अहाँ छी जनिक पति, से छथि निश्चयेन निवृत्त। निवृत्त शब्दसँ निर्वाणक प्रसंग, सोचि मुदित सिद्धार्थ घुरल राज सभा, रहथि ओतऽ शुद्धोधन मंत्रीगणक बिच। कहल – लऽ संन्यास मोक्षक ज्ञानक लेल, करू आज्ञा प्रदान हे भूदेव। हे पुत्र कएल की गप, जाउ पहिने पालन करू भऽ गृहस्थ । संन्यासक नै अछि ऐल बेर, तखन सिद्धार्थ कहल अछि ठीक, तखन दूर करू चारि टा हमर भय, नै मृत्यु, रोग, वृद्धावस्था आबि सकय, धन सेहो नै क्षीण हुअय। शुद्धोधन कहल अछि ई असंभव बात, तखन हमर वियोगक करू नै पश्चाताप। कहि सिद्धार्थ गेला महल बिच, चिन्तित एम्हर-ओम्हर घुमि निकलला बाह्य । सूतल छंदककेँ कहल श्वेत वेगमान, कंथक घोड़ा अश्वशालासँ लाउ। सभ भेल निन्नमे भेर कंथक ऐल, चढ़ा सिद्धार्थकेँ लऽ गेल नगरसँ दूर । नमस्कार कपिलवस्तु ! घुरब जखन पायब जन्म-मृत्युक भेद ! सर्ग ६ सोझाँ ऐल भार्गव ऋषिक कुटी उतरि सिद्धार्थ, लेलन्हि रत्नजटित कृपाण, काटल केश । मुकुट मणि आभूषण देल छंदककेँ। अश्रुधार बहल छंदकक आँखि, जाउ छंदक घुरु नगर जाउ । नै सिद्धार्थ हम नै छी सुमन्त, छोड़ि राम जे घुरल अयोध्या नग्र। घोटक कंथकक आँखिमे सेहो नोर, तखने एक व्याध छल ऐल, कषाय वस्त्र पहिरने रहय, कहल सिद्धार्थ, हमर शुभ्र वस्त्र लिअ दिअ ई वस्त्र, अदलि-बदलि दुनु गोटे वस्त्र पहीरि, छंदक देखि केलक प्रणाम गेल घुरि। सर्ग ७ सिद्धार्थ एला आश्रम सभ भेल चकित, देखि नानाविध तपस्या कठोर, नै संतुष्ट कष्ट भोगथि पाबय लेल स्वर्ग, अग्निहोत्रक यज्ञ तपक विधि देखि । निकलि चलल किछु दिनमे सिद्धार्थ आश्रम छोड़ि, स्वर्ग नै मोक्षक अछि हमरा खोज । जाउ तखन अराड मुनि लग विंध्यकोष्ठ, नमस्कार मुनि प्रणाम घुरू सभ जाउ, सिद्धार्थ निकलि बढ़ि पहुँचला आगु। सर्ग ८ एम्हर कंथकक संग छंदक खसैत-पड़ैत, एक दिनक मार्ग आठ दिनमे चलैत, घरमुँहा रस्ता आइ कम नै, अछि भेल अनन्त। घुरि सुनेलक खबरि कषाय वस्त्र पहिरबाक सिद्धार्थक, गौतमी मूर्छित, यशोधरा कानथि बाजि-बाजि, एहन कठोर हृदय सिद्धार्थक मुखेटा कोमल रहय, ओकरो सँ कठोर अछि हृदय हमर जे फाटय अछि नै। शुद्धोधन कहथि दशरथक छल भाग्य, पुत्र वियोगमे प्राण हमर निकलय अछि नै। पुरहित आ मंत्रीजी निकलि ताकू जाय, भार्गव मुनिक आश्रममे देखू पुछू ओतय। सर्ग ९ जाय जखन सभ ओतऽ पूछल भार्गव कहल, गेलथि अराड मुनिक आश्रम दिस मोक्षक लेल बेकल। दुनू गोटे बढ़ि आगाँ देखैत छथि की, कुमार गाछक नीचाँ बैसल ओतय। पुरोहित कहल हे कुमार पिताक ई गप सुनू, गृहस्थ राजा विदेह, बलि, राम आ वज्रबाहु, केलन्हि प्राप्त मोक्ष करू अहाँ सेहो। मुदा सिद्धार्थ बोनसँ घुरता नै, मोक्षक लेलन्हि अछि प्रण तोड़ता नै। हे सिद्धार्थ पहिनहु घुरल छथि बोनसँ, अयोध्याक राम, शाल्व देशक द्रुम आ राजा अंबरीष । हे पुरहित जी घुरू व्यर्थ समय नष्ट छी कऽ रहल, राम आ कि आन नै उदाहरण समक्ष । नै बिना तप कोनो क्यो बहटारि सकत, ज्ञान स्वयं पायब नव रस्ता तकैत। घुरल दुहु गोटे गुप्त-दूत नियुक्त कऽ। सर्ग १० सिद्धार्थ बढ़ि आगाँ कएल गंगाकेँ पार, राजगृह नगरी पहुँचि कऽ भिक्षा ग्रहण, पहुँचि पाण्डव-पर्वत जखन बैसलथि, राजा बिम्बसार आबि बुझाओल बहुत । सूर्यवंशी कुमार जाउ घुरि। सर्ग ११ सिद्धार्थ कहल हे राजा बिम्बसार, हर्यंक वंशज, मोहकेँ छोड़ल घुरि जाउ कतऽ? राजा सेहो होइछ कखनो काल दुखित, दास वर्गकेँ सेहो कखनो काल भेटै छै खुशी ? करू रक्षा प्रजाक संग अपन सेहो, सिद्धार्थ वैश्वंतर आश्रम दिस बढ़लाह, मगधराज चकित ! सर्ग १२ अराडक आश्रममे ज्ञान लेल, गेला शाक्य, कहल मुनि अविद्या अछि पाँचटा, अकर्मण्यता आलस्यक अछि अन्हार, अन्हारक अंग अछि क्रोध आ विषाद, मोह अछि ई वासना जीवनक आ संगे मृत्युक, कल्याणक मार्ग अछि मार्ग मोक्षक। मुदा सिद्धार्थ कहल हे मुनिवर! आत्माक मानब तँ अछि मानब अहंकारकेँ, अहाँ गप नै रुचल बढ़ल आश्रम उद्रकक से। नगरी गेला राजर्षिक जे आश्रम छल, मुदा नै उत्तर भेटल ओत्तौ सिद्धार्थक। गेला तखन नैरंजना तट पाँचटा भिक्षुक भेटल, छह बरख तप कएल मुदा प्रश्न अनुत्तरित छल। स्वस्थ तनमे भेटत मनसिक प्रश्नक उत्तर, प्रण कएल ई निरंजनामे कएल स्नान ओ, बाहर बहराय एली तखने कन्या गोपराजक, श्वेत रंग नील वस्त्रमे नन्द बाला जकर नाम छल । आयलि पायस पात्र लेने तृप्त भऽ सिद्धार्थ भोजन कएल। पाँचू संगी देखि ई सिद्धार्थक संग छोड़ल । मुदा ओ भेला सबल बोधिसत्वक प्राप्तिक लेल, दृढ़ प्रण लऽ पीपरक तर ओ आसन देलन्हि। काल सर्प कहल देखू ऐ नीलकंठक झुण्डकेँ, घुमि रहल चारू दिस अहाँक, प्रमाण अछि जे बोधिसत्व प्राप्त करब अहाँ। सुनि ई तृण उठा कएल प्रतिज्ञा तखन, सिद्धार्थ पाओत ज्ञान आ तखने उठत छोड़ि आसन। सर्ग १३ ब्रह्मांड छल प्रसन्न मुदा दुष्ट मार डरायल, कामदेव, चित्रायुध पुष्पसर नाम मारक, सिद्धार्थ प्राप्त कऽ ज्ञान जगकेँ बताओत। हमर साम्राज्यक हएत की तखन, पुत्र विभ्रम, हर्ष, दर्प छल ओकर, पुत्री अरति, प्रीति, तृषाकेँ सेहो कऽ संग। चलू ई लेने ढाल प्रतिज्ञाक, सत् धनुषपर बुद्धिक वाण चढ़ाय, जीतत से की जीतय देबै हमरा सभ आइ? हे सिद्धार्थ यज्ञ कऽ पढ़ि कऽ शास्त्र, करू इन्द्रपद प्राप्त भोगू भोग, छोड़ू आसन देब वाण चलाय। नै देलन्हि सिद्धार्थ ऐपर ध्यान, मार तखन देलक वाण चलाय, मुदा भेल कोनो नै परिणाम। शिवपर सेहो चलल रहय ई वाण, विचलित भेल रहथि ओ सेहो, के अछि ई से नै जानि!! हे सैनिक हमर विकराल-विचित्र, त्रिशूल घुमाय, गदा उठाय, साँढ़ सन दऽ हुंकार, आउ करू विजित अछि शत्रु विकराल। राति घनघोर अन्हरियामे कतऽ छथि चन्द्र? तरेगणक सेहो कोनो नै दर्श! मुदा सभ गेल व्यर्थ पदार्पण भेल अदृश्य, मार जाउ हएत नै ई विचलित। देखू एकर क्षमा प्रतीक जटाक, धैर्य अछि एकर जेना गाछक मूल, चरित्र पुष्प बुद्धि शाखा धर्म फलक प्रतीक। स्थान जतऽ अछि आसन पृथ्वीक थिक नाभि, प्राप्त करत ई ज्ञान सहजहि आइ। पराजित मार गेल ओतयसँ भागि। सर्ग १४ रातिक पहिल पहरमे शाक्य मुनि, पाओल वर्णन स्मरण पूर्व जन्मक सहजहि। दोसर पहरमे दिव्य चक्षु पाबि, देखल कर्मक फल वेदनाक अनुभूति। गर्भ सरोवर नरक आ स्वर्ग दुहुक, पाओल अनुभव देखल खसैत स्वर्गहुँ, अतृप्त भोगी जन्म, जरा, मृत्यु। बीतल तेसर पहर चारिममे जाय, पाओल ज्ञान बुद्ध भऽ पाओल शान्ति। शान्त मन शान्त छल पूर्ण जगत !!! धर्म चारू दिस बिन मेघ अछार !! सूचना देल दुन्दुभि बाजि अकास! सकल दिशा सिद्धगणसँ दीप्तमय छल, स्वर्गसँ वृष्टि पुष्पक इक्ष्वाकु वंशक ई मुनि छल। बैसल ऐ अवस्थामे सात दिन धरि मुनि शाक्य, विमान चढ़ि एला तखन देवता दू टा, करू उद्धार जगतक दऽ मोक्षक शिक्षा। आ भिक्षुपात्र लऽ एला फेर एक देव, कएल स्मरण अराड आ उद्रकक बुद्ध, मुदा दुहु छल छोड़ल जगत ई तुच्छ। आब जायब वाराणसी भिक्षु पाँचो संगी जतऽ, कहल देखि बोधिक गाछ दिस स्नेहसँ। सर्ग १५ बुद्ध चलला असगरे रस्तामे भिक्षु एक भेटल, तेजमय अहाँ के? गुरु के छथि अहाँक? हे वत्स गुरु नै क्यो हमर प्राप्त कएल निर्वाण हम, सभ किछु जानल जे अछि जनबा योग्य लोक कहै छथि हमरा बुद्ध! जा रहल छी काशी दुखित कल्याण लेल दूर सँ देखल वरुणा आ गंगाक मिलन आ गेला बुद्ध लगहिमे मृगदाव वन। पाँचू संगी हुनक रहथि ओतहि देखैत अबैत विचारल क्यो नै करत अभिवादन हुनक मुदा पहुँचिते ई की गप भेल? सभ हुनक सत्कारमे छल लागि गेल? आसन दऽ जखन बैसेलन्हि हुनका सभ क्यो, उपदेश देब शुरु करितथि मुदा तखने बाजल कियो, अहाँ तँ तत्वकेँ नै छी बुझैत, तप छोड़ि बीचहि उठल छलौं किए? बुद्ध कहल घोर तप आ आसक्ति दुनुक हम त्याग कएल मध्य मार्गकेँ पकड़ि बोधत्व प्राप्त कएल। सर्ग १६ बोधत्व सूर्य अछि सम्यक दृष्टि आ एकर सुन्दर रस्तापर चलैए सम्यक संकल्प। ई करैए विहार सम्यक आचरणक उपवनमे सम्यक आजीविका अछि भोजन एकर। सेवक अछि सम्यक व्यायाम, शान्ति भेटैए एकरा सम्यक स्मृति रूपी नगरीमे आ सुतैए सम्यक समाधिक बिछाओनपर ई। ऐ अष्टांग योगसँ अछि सम्भव ई जन्म, जरा, व्याधि आ मृत्युसँ मुक्ति। मध्य मार्ग चारिटा अछि ध्रुव सत्य दुख, अछि तकर कारण, दुखक निरोध आ अछि उपाय निरोधक । कौंडिन्य आ ओकर चारू संगी सुनल ई, प्राप्त कएल सभ दिव्यज्ञान । हे नरमे उत्तम पाँचू गोटे भेल ज्ञान अहाँ लोकनि के? कौंण्डिन्य कहलन्हि हँ, भेल भंते, कौंडिन्य भेला तखन प्रमुख धर्मवेत्ता तखने यक्ष सभ पर्वतपरसँ केलक सिंहनाद, शाक्यमुनि अछि केलक धर्मचक्र प्रवर्तित !!!! शील कील अछि क्षमा-विनय अछि धूरी, बुद्धि-स्मृतिक पहिया अछि सत्य अहिंसासँ युक्त, ऐमे बैसि भेटत शान्ति ई बाजल सभ यक्ष, मृगदावमे भेल धर्मचक्र प्रवर्तित। फेर अश्वजित आ ओकर चारि टा आन भिक्षु कएल निर्वाण धर्ममे बुद्ध दीक्षित, फेर कुलपुत्र यश प्राप्त कएल अर्हत पद यश आ चौवन गृहस्थकेँ कएल बुद्ध सद्धर्ममे प्रशिक्षित। घरमे रहि कऽ भऽ सकै छी अनाशक्त आ वनमे रहियो प्राप्त कऽ सकै छी आशक्ति। ऐमे सँ आठ गोट अर्हत प्राप्त शिष्यकेँ विदा कऽ आठो दिशामे चलला बुद्ध। पहुँचि गया जितबाक रहन्हि इच्छा सिद्धि सभसँ युक्त काश्यप मुनिकेँ। गयामे काश्यप मुनि केलन्हि स्वागत बुद्धक, मुदा रहबा लेल देल अग्निशाला रहै छल महासर्प जतऽ। रातिमे मुदा ओ सर्प प्रणाम कएल बुद्धकेँ भोरमे काश्यप देखल सर्पकेँ बुद्धक भिक्षापात्रमे। कऽ प्रणाम ओ आ हुनकर पाँच सय शिष्य संग एला काश्यपक भाय गय आ नदी । कएल स्वीकार धर्म बुद्धक प्राप्त कएल गय उत्तुंगपर निर्वाणधर्मक शिक्षा लऽ सभकेँ बुद्ध पहुँचल राजगृहक वेणुवण । सर्ग १७ बिम्बसार सुनि ऐल ओतऽ देखल काश्यपकेँ बुद्धक शिष्य बनल पूछल बुद्ध तखन काश्यपसँ, छोड़ल अहाँ अग्निक उपासना किए भंते? काश्यप कहल मोह जन्मक रहि जाइछ देने आहुति अग्निमे केने पूजा पाठ ओकर । बुद्धक आज्ञा पाबि कएल काश्यप दिव्य शक्तिक प्रदर्शन आकाश मध्य उड़ि अग्निक समान जरि कऽ। तखन बिम्बसारकेँ देल बुद्ध अनात्मवादक शिक्षा विषय, बुद्धि आ इन्द्रीक संयोगसँ अबैछ चेतनता शरीर इन्द्रिय आ चेतना अछि भिन्न आ अभिन्न सेहो। बिम्बसार भऽ प्रसन्न दान बुद्धकेँ वेणुवनक देल तथागतक शिष्य अश्वजित नग्र गेल भिक्षाक लेल। कपिल संप्रदायक लोक देखि तेज पूछल अहाँक गुरु के? कहल अश्वजित सुगत बुद्ध छथि जे इक्ष्कवाकु वंशक। सएह हमर गुरु कहै छथि बिन कारणक नै होइछ किछुओ उपतिष्य ब्राह्मणकेँ प्राप्त भेल ज्ञान कहलक ओ मौद्गल्यायनकेँ मौद्गल्यायनकेँ सेहो प्राप्त भेलै सम्यक दृष्टि सुनिकेँ। सुनि वेणुवनमे उपदेश त्यागल जटा दंड पहिरि काषाय कएल साधना, प्राप्त कएल परम पद काश्यप वंशक एकटा धनिक ब्राह्मण छोड़ल पत्नी परिजन प्रसिद्धि भेटल हिनका महाकाश्यप नामसँ। सर्ग १८ कोसलक श्रावस्तीक धनिक सुदत्त ऐल वेणुवन गृहस्थ रहितो प्राप्त भेल तत्वज्ञान ओकरा। उपतिष्य संगे सुदत्त गेल श्रावस्ती नगर जेत केर वनमे विहार बनेबाक कएल निश्चित। जेतवनक मालिक रहय लोभी ढेर पाइ लेलक जेतवनक लेल मुदा देखि दैत पाइ हृदय परिवर्तित भेल ओकर सभटा वन देलक ओ विहारक लेल विहार शीघ्रे बनि गेल उपतिष्यक संरक्षकत्वमे जेतवनमे। सर्ग १९ बुद्ध फेर राजगृहसँ चलि देलन्हि कपिलवस्तु दिस ओतऽ पिता शुद्धोधनकेँ देल अमृत बोधि कोनो पुत्र पिताकेँ नै देने रहय ई। कर्म धरैत अछि मृत्युक बादो पछोड़ कर्मक स्वभाव, कारण, फल, आश्रयक रहस्य बुझू, जन्म, मृत्यु, श्रम, दुखसँ फराक पथ ताकू। आनन्द, नन्द, कृमिल, अनुरुद्ध, कुन्डधान्य, देवदत्त, उदायि कऽ ग्रहण दीक्षा छोड़ल गृह सभ। अत्रिनन्दन उपालि सेहो कएल ग्रहण दीक्षा शुद्धोधन देल राजकाज भाय केँ रहय लगला राजर्षि जकाँ ओ। फेर बुद्ध कएल प्रवेश नगरमे न्यग्रोध वनमे बुद्ध पहुँचि चिन्तन जीवक कल्याणक करय लगला। सर्ग २० फेर ओ ओतऽ सँ निकलि गेला प्रसेनजितक देस कोसल श्रावस्तीक जेतवन छल श्वेत भवन आ अशोकक गाछसँ सज्जित सुदत्त कएल स्वर्णमालासँ स्वागत बुद्धक कएल जेतवन बुद्धक चरणमे समर्पित। प्रसेनजित भेल धर्ममे दीक्षित तीर्थक साधु सभक कऽ शंकाक समाधान कएल बुद्ध हुनका सभकेँ दीक्षित। जा कय स्वर्ग माताकेँ केलन्हि सेहो दीक्षित सर्ग २१ ओतऽसँ एला बुद्ध फेर राजगृह ज्योतिष्क, जीवक, शूर, श्रोण, अंगदकेँ उपदेश दऽ, कएल सभकेँ संघमे दीक्षित। ओतऽ सँ गंधार जाय राजा पुष्करकेँ कएल दीक्षित विपुल पर्वतपर हेमवत आ साताग्र दुनू यक्षकेँ उपदेश दऽ एला जीवकक आम्रवन। ओतऽ कऽ विश्राम घुमैत-फिरैत पहुँचल आपण नगर, ओतऽ अंगुलीमाल तस्करकेँ कएल दीक्षित प्रेमक धर्ममे। वाराणसीमे असितक भागिन कात्यायनकेँ कएल दीक्षित देवदत्त मुदा भऽ ईर्ष्यालु संघमे चाहलक पसारय अराड़ि। गृध्रकूट पर्वतपर खसाओल शिलाखंड बुद्धपर राजगृह मार्गमे छोड़ल हुनकापर बताह हाथी सभ भागल मुदा आनन्द संग रहल बुद्ध लग आबि गजराज भऽ गेल स्वस्थ कएल प्रणाम झुकि उपदेश देल गजराजकेँ बुद्ध। देखल ई लीला राजमहलसँ अजातशत्रु भऽ गेल ओहो तखन बुद्धक शिष्य। सर्ग २२ राजगृहसँ बुद्ध एला पाटलिपुत्र मगधक मंत्री वर्षाकार बना रहल छल दुर्ग, बुद्ध कएल भविष्यवाणी हएत ई नगर प्रसिद्ध तखन तथागत गेला गौतम द्वारसँ गंगा दिस। गंगापार कुटी गाममे देल उपदेश धर्मक फेर गेला नन्दिग्राम जतऽ भेल छल बहुत रास मृत्यु। दऽ सान्त्वना गेला वैशाली नगरी निवास कएल आम्रपालीक उद्यानमे। श्वेत वस्त्र धरि एली ओ बुद्ध चेताओल शिष्य सभकेँ, धरू संयम रहब स्थिरज्ञानमे लऽ बोधिक ओखध अमृत प्रज्ञाक वाणसँ शक्तिक धनुषसँ करू अपन रक्षा। आम्रपाली आबि पओलक उपदेश भेलै ओकरा घृणा अपन वृत्तिसँ मांगलक धर्मलाभक भिक्षा, बुद्ध केलन्हि प्रार्थना ओकर स्वीकार, आयब भिक्षाक लेल अहाँक द्वार। सर्ग २३ सुनि ई गप जे ऐल छथि बुद्ध आम्रपालीक उद्यान लिच्छवीगण एला बुद्धक समीप बुद्ध देलन्हि शीलवान रहबाक सन्देश। लिच्छवीगण देलन्हि भिक्षाक लेल अपन-अपन घर एबाक आमन्त्रण, पाबि आमन्त्रण कहलन्हि बुद्ध मुदा जाएब हम आम्रपालीक द्वार कारण हुनका हम देलियन्हि अछि वचन। लिच्छवीगणकेँ लगलन्हि ई कनेक अनसोहाँत, मुदा पाबि उपदेश बुद्धक, घुरला अपन-अपन घर-द्वार। पराते आम्रपालीसँ ग्रहण कऽ भिक्षा बुद्ध गेला वेणुमती करय चारि मासक बस्सावास। चारि मास बितओला उत्तर, रहऽ लगला मर्कट सरोवरक तट। ओत्तै आयल मार, कहलक हे बुद्ध नैरंजना तटपर अहाँक संकल्प जे निर्वाणसँ पूर्व करब उद्धार देखायब रस्ता दोसरोकेँ, आब तँ कतेक छथि मुक्त, कतेक छथि मुक्ति पथक अनुगामी, आब कोनो टा नै बाँचल अछि कारण करू निर्वाण प्राप्त। कहलन्हि बुद्ध, हे मार नै करू चिन्ता, आइसँ तीन मासक बाद, प्राप्त करब हम निर्वाण, मार होइत प्रसन्न तृप्त गेल घुरि। बुद्ध धऽ आसन प्राणवायुकेँ लेलन्हि चित्तमे आ चित्तकेँ प्राणसँ जोड़ि योग द्वारा समाधि कएल प्राप्त। प्राणक जखने भेल निरोध, भूमि विचलित, विचलित भेल अकास !! सर्ग २४ आनन्द पूछल करू अनुग्रह लिच्छवी सभपर, किए ई धरा आ आकास, दलमलित मर्त्य आ दिव्यलोक !!! बुद्ध कहलन्हि आबि गेल छी हम बाहर, छोड़ि अपन प्रकोष्ठ, मात्र तीन मास अनन्तर छोड़ब ई देह, निर्वाण मे रहबा लेल सतत !!!! आनन्द सुनि ई करऽ लागल हाक्रोस, सुनि विलाप लिच्छवी गण जुटि सेहो, विलापमे भऽ गेला संग जोड़। बुद्ध सभकेँ बुझा-सुझा, चलला वैशालीक उत्तर दिशा। सर्ग २५ पहुँचि भोगवती नगरी, देल शिक्षा जे विनय अछि हमर वचन, जे बोल अछि विनयविहीन, से अछि नै धर्म। तखन मल्लक नगरी पापुर जाय, अपन भक्त चुंद केर घरमे कएल भोजन बुद्ध, दऽ ओकरा उपदेश बिदा भेला कुशीनगर दिस। संगे चुन्द पार कएल इरावती धार सरोवर तटपर कऽ विश्राम, कऽ हिरण्यवती धारमे स्नान, कहल हे आनन्द, दुनू शालक गाछक बीच करब हम शयन। आजुक रातिक उत्तर पहर, करब प्राप्त निर्वाण। हाथक बना गेरुआ, दऽ टांगपर टांग, लऽ दहिना करोट कहल हे आनन्द, बजा आनू मल्ल लोकनिकेँ, भेँट करबा लेल निर्वाण पूर्व। शान्त दिशा, शान्त व्याघ्र-भालु, शान्त चिड़इ शान्त सभटा जन्तु। आबि मल्ल लोकनि कएल विलाप, मुदा घुरेलन्हि सभकेँ दऽ सांत्वना बुद्ध। सर्ग २६ ऐल सुभद्र त्रिदंडी संन्यासी तकर बाद, पाबि अष्टांग मार्गक शिक्षा, कहल सुभद्र हे करुणावतार अहाँक मृत्युक दर्शनसँ पहिने हम करय चाहै छी निर्वाण प्राप्त। बैसल ओ पर्वत जकाँ आ जेना मिझा जाइत अछि दीप हवाक झोँकसँ, तहिना क्षणेमे केलक निर्वाण प्राप्त। छल ई हमर अन्तिम शिष्य! सुभद्रक करू अन्तिम संस्कार! बीतल आध राति, बुद्ध बजा सभ शिष्यकेँ, देल प्रातिमोक्षक उपदेश, कोनो शंका हुअय तँ पूछू आइ। अनिरुद्ध कहल नै अछि शंका आर्य सत्यमे ककरो। बुद्ध तखन ध्यान कऽ एकसँ चारिम तहमे पहुँचि, प्राप्त कएल शान्ति। सर्ग २७ भेल ई महापरिनिर्वाण! मल्ल सभ आबि उठेलक बुद्धकेँ स्वर्णक शव-शिविकामे, नागद्वारसँ बाहर भऽ केलन्हि पार हिरण्यवती धार, मुदा शवकेँ चन्दनसँ सजाय, जखन लगाओल आगि, नै उठल चिनगारि। शिष्य काश्यप छल बिच मार्ग, ओकरा अबिते लागल चितामे आगि! मल्ल लोकनि बीछि अस्थि धऽ स्वर्णकलशमे, आनल नगर मध्य, बादमे कऽ पूजा भवनक निर्माण, कएल अस्थिकलश ओतऽ विराजमान। सर्ग २८ फेर सात देशक दूत, आबि मांगलक बुद्धक अस्थि, मुदा मल्लगण कएल अस्वीकार, तँ बजड़ल युद्ध। सभ आबि घेरल कुशीनगर, मुदा द्रोण ब्राह्मण बुझाओल दुनू पक्ष। बाँटि अस्थिकेँ आठ भाग, द्रोण सेहो लेलक नौम घट जइमे छल सभटा अस्थि पहिले पहिल आ दसम घट लेलक ’पिसल’ जाति, जइमे छल छाउर बुद्धक शरीरक। सभ घुरला अपन देश आब। अस्थि कलश आ छाउर कलश पर बना कऽ दस स्तूप, करै गेला पूजा अर्चना जाय, दसटा स्तूप बनि भेल ठाढ़, जतऽ अखण्ड ज्योति आ घण्टाक होइ छल निनाद। फेर राजगृहसँ ऐल पाँच सय भिक्षु, आनन्दकेँ देल गेल ई काज, बुद्धक सभ शिक्षाकेँ कहि सुनाउ, हएत ई सभ समग्र आब। हम ई छलौं सुनने ऐ तरहेँ, कएल सम्पूर्ण वर्णन नीके। कालान्तरमे अशोक स्तूपसँ लऽ धातु कऽ कय सय विभाग, बनाओल कएक सय स्तूप, श्रद्धाक प्रतीक। जहिया धरि अछि जन्म, अछि दुख, पुनर्जन्मसँ मुक्ति अछि मात्र सुख, तकर मार्ग देखाओल जे महामुनि, शाक्यमुनि सन दोसर के अछि शुद्ध। असञ्जाति मनक ई सम्बल, देलौं अहाँ हे बुद्ध हे बुद्ध हे बुद्ध । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.१.भवनाथ झा विशेषांकक संदर्भमे भवनाथ झा विशेषांकक संदर्भमे एहि ठाम विदेह विशेषांक केर इतिहास, चयन प्रक्रिया, वर्तमान विशेषांक केर प्रारूप, प्रकाशित विशेषांक केर सूची, ओ घोषणा जकरा हम सभ पूरा नहि कऽ सकलहुँ तकर सूची, विदेहक विशेषांक, सामान्य अंक अथवा विदेहसँ संबंधित कोनो PDF पढ़बाक सही तरीका संगे विशेषांक एवं घोषणासँ जुड़ल छोट-छोट सूचना पाठक लग दैत छी। 1 2008 सँ एखन धरि विदेह http://videha.co.in/ द्वारा जे विशेषांक सभ आएल अछि तकरा तीन चरणमे बाँटि सकैत छी। पहिल चरण 2008सँ जनवरी 2015 धरि जाहिमे विषय आधारित विशेषांक सभ प्रकाशित भेल आ मधुपजीपर सेहो विशेषांक प्रकाशित भेल। एकदम प्रारंभिक विशेषांक सभमे "विशेषांक" नाम नहि लीखल गेल छै मुदा ओहिमे ओहन रचनाक बेसी स्थान देल गेल छै सायास रूपें (क्रम-1 सँ 12 केर अधिकांश)। दोसर चरण भेल फरवरी 2015 सँ लऽ कऽ एखन धरि जाहिमे मात्र जीवित लेखकपर विशेषांक प्रकाशित करबाक निर्णय लेल गेल आ इम्हर पछिला बर्ख एहिमे संस्था आ पत्र-पत्रिकापर विशेषांक प्रकाशित करबाक सेहो निर्णय लेल गेल (क्रम-13, 14 एवं 20 सँ लऽ एखन धरिक 38म प्रस्तुत विशेषांक)। जीवैत लेखकपर विशेषांक विभिन्न नामसँ होइत आब "विदेहक जीवित मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशकपर विशेषांक शृंखला" नामसँ जानल जाइत अछि। मैथिलकर्मीसँ हमर सभहक आशय जिनकर काज मिथिला-मैथिली-मैथिली लेल कोनो माध्यमसँ भेल हो। ओ संगठनकर्ता सेहो भऽ सकै छथि, आन भाषाक लेखक सेहो। तहिना संगीतकर्मी मने गीत-संगीतसँ जुड़ल लोक। तेसर चरण भेल विदेहक संपादक द्वारा "नित नवल सिरीज" प्रकाशित करबाक (विवरण आगू देल गेल अछि)। विदेह विशेषांकमे औसत दसे टा (10 टा) आलोचना-समीक्षा मानि लेल जाए तऽ 38 टा विशेषांकमे 380 आलोचना-समीक्षा भेल। संगहि एकै टा (1 टा) आलोचना-समीक्षा केर औसत विदेहक सामान्य अंकमे प्रकाशित मानि लेल जाए एवं दूनूकेँ जोड़ि देल जाए तऽ एखन धरि लगभग 750 आलोचना-समीक्षा प्रकाशित भेलै (वास्तविक संख्या एहिसँ बेसी हेतै)। मिथिला मिहिरक बाद अहाँ सभहक नजरिमे आर कोन एहन पत्रिका अछि जे आन विधाक रचनाक अतिरिक्त 750 टा आलोचना-समीक्षा प्रकाशित केने हो? संगहि जे पाठक ओ शोधार्थी लेल बिना कोनो मूल्य, बिना कोनो बाधाकेँ सार्वजनिक रूपे 24x7x365 आधारपर उपल्बध हो? पाठक लेल विदेहक हरेक विशेषांक वा नित नवल सिरीज पाँच स्तर, पाँच स्वाद रखने अछि (पाँचम स्वाद सभसँ विरल अछि)- 1) पत्रिका विशेषांक केर स्वाद, 2) आलोचनात्मक पोथीक स्वाद, 3) शोध ग्रंथक स्वाद, 4) साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित मोनोग्राफ केर स्वाद, 5) जँ विदेहक विशेषांकमे कोनो एहन रचनाकार चयनित होइत छथि जिनकर पति वा पत्नी सेहो रचनाकार छथिन तँ विदेह अपन विशेषांकमे दूनूकेँ मूल्यांकन करैत अछि। उदाहरण लेल विदेहक लक्ष्मण झा 'सागर' विशेषांक , नरेन्द्र झा विशेषांक आ शिवशंकर श्रीनिवास विशेषांक देखल जा सकैए। विदेह अपन अंक लेल सागरजी, नरेन्द्र झा एवं शिवशंकर श्रीनिवासक चयन केने छल मुदा सागरजीक पत्नी शैल झा 'सागर' सेहो रचनाकार छथिन तँ लक्ष्मण जी बला विशेषांकमे शैलजीक रचनाकर्मपर सेहो विचार भेल, नरेन्द्र झाजीक पत्नी पन्ना झा कथाकार से नरेन्द्र झा विशेषांकमे पन्नाजीक रचनाकर्मपर सेहो विचार भेल आ तेनाहिते श्रीनिवासजीक पत्नी मीनू मधु सेहो रचनाकार छथिन तँइ हुनको रचनाकर्मपर विचार भेलै। ई विचार वा घटना संपूर्ण मैथिली साहित्यमे नहि भेल छल हमरा जनैत, से मात्र विदेह द्वारा संभव भेल। जँ हम गलत होइ तऽ सूचित करी हम अपन ज्ञानकेँ सुधारि लेब। साहित्य अकादमीक कथित मोनोग्राफ तँ आइ धरि बहुतो लेखकपर प्रकाशित नहि भऽ सकल अछि। एहन परिस्थितिमे विदेह एकटा नव बाट बना कऽ मैथिली लगमे राखि देने अछि। पाठक चाहथि तँ एहि विशेषांक सभमेसँ आनो स्वाद ताकि सकै छथि। मैथिलीमे जे लोक सभ विश्वविद्यालयसँ जुड़ल छथि आ कि ओहनो लोक जे सभ प्रोफेसर सभहक संगतिमे छथि ताहिमे किछु लोकक मूँहे ईहो सुनबा लेल भेटल जे जिनका-जिनकापर विदेह विशेषांक प्रकाशित भऽ चुकल अछि ताहिमेसँ अधिकांशपर विश्वविद्यालय सभमे शोध हेबाक लेल पंजीयन भऽ रहल छै। हमरा लेल ई समाद बहुत पहिनेसँ सूनल मानू। वास्तविकता ई छै जे विदेह विशेषांकमे जते सूचना रहैत छै ततेमे ओही एक लेखकपर एकै समयमे कमसँ कम 15-20 दृष्टिकोणसँ शोध भऽ सकैत छै। खएर मैथिलीमे विश्विद्यालयक शोध जेहन होइत छै, जेहन प्रोफेसर आ शोधार्थी सभ होइत छै ताहिमे हम सभ मानि बैसल छी जे विदेह विशेषांक एहिना सार्वजनिक होइत रहत आ शोधार्थी सभ बिना अनुमति, बिना क्रेडिट देने चोरा कऽ कथित शोध करैत रहता। जँ अहाँ अइ विशेषांक केर PDF पढ़ि रहल छी तँ कोनो शब्द वा पाँति अंडरलाइनमे वा बिना अंडरलाइनकेँ नीला वा कोनो रंगक (कारी रंग छोड़ि) देखाए तँ बुझि लिअ जे ओहिमे लिंक देल गेल छै रेफरेंस लेल आ तकरा क्लिक करबै तँ ओ लिंक खुजि जाएत। कोनो-कोनो फोटोमे सेहो लिंक देल गेल छै। पाठक एहि माध्यमसँ कम समयमे रेफरेंस सभहक अध्य्यन कऽ सकै छथि। मुदा प्रिंटमे प्रकाशित पोथीमे ई सुविधा नै रहत। अइ कारणसँ भऽ सकैए जे पाठककेँ एहि पोथीक किछु पाँति प्रचलित नै बुझेतनि। जाहि ठाम लिंक देल गेल छै ताहि ठामक पाँतिक किछु शब्दक बीच बेसी स्थान छूटल छै। ओकरा एक पाँति बना पढ़ी से आग्रह। हम चाहितहुँ तँ सभ लिंक वा चित्रकेँ एकठाम दऽ सकै छलहुँ मुदा हमर सोच अछि जे पाठककेँ एकै ठाम तर्क आ सबूत भेटनि। एकटा आर बात ई जरूरी नहि छै जे एक लेखक लेल हम एकैटा लिंक प्रयोग करी। ओहन लेखक जिनका बारेमे बहुत रास लिंक छै गूगलपर हुनकर नाम जखन एक बेरसँ बेसी अबैत अछि तँ हमर प्रयास रहैए जे हुनकर नाम सभमे अलग-अलग लिंक लगा दी। तँइ पाठक जखन एकै नामक बहुत रास लिंक देखथि तँ ई मानि लेथि जे हुनका लग रेफरेंसक भंडार पहुँचल छनि। विदेहक विशेषांक सभ लेल हम ओहनो लोक सभ लग आलेख लेल जाइत छी, हुनका सूचना दैत छी जे कि हमर (आशीष अनचिन्हार), विदेह या गजेन्द्र ठाकुरक धुर विरोधी छथि। दू-चारि लोक कहि सकै छथि जे हमरा सूचना नहि भेटल, तऽ हुनकासँ हमर आग्रह जे कमसँ कम ओ अपन ह्वाटसएप आ फेसबुक केर मैसेज बॅाक्स (इनबॅाक्स) देखथि। हमर एहि प्रयासक प्रतिफल विदेहक आन विशेषांक संगे एहूमे देखाइ पड़त से उम्मेद अछि। 16 अगस्त 2025 केँ विदेह भवनाथ झा जीक ऊपर एकटा संस्मरण अंक प्रकाशित करबाक सार्वजनिक घोषणा केलक। एहि सूचनाकेँ एहि लिंकपर देखि सकैत छी-घोषणा। किछु लोक संस्मरण शब्दसँ असमहति व्यक्त करैत छथि, हुनकर मानब छनि जे संस्मरण स्मृतिमे लिखल जाइत छै मने मरलाक बाद। मुदा ई सही परिभाषा नै छै। संस्मरण जीवितेमे लिखल जाइत छै। जँ हिंदीक बात करी तऽ महान आलोचक नामवर सिंहपर संस्मरण लिखल गेलै सेहो हुनके लेखक भाए काशीनाथ सिंह द्वारा ओहो नामवर सिंहक जीवैतमे। संस्कृतक पुराण सभहक आख्यान पढ़बै तऽ साफ पता लागत जे ओ सभ संस्मरणे विधामे लीखल गेल छै। हमरा बुझाइए जे 'संस्मरण' शब्दमे जे "मरण" छै तकरे कारण किछु लोक एहि विधाकेँ अशुभ मानऽ लगलाह अछि, जे उचित नहि। विदेह आन चीजक संगे समाजमे पसरल अंधविश्वासकेँ तोड़बाक लेल सेहो कृतसंकल्पित अछि। भवनाथ झाजीक दू रूप छनि पहिल एकदम शुरूआती समय बला जाहिमे साहित्यकारक रूपमे छलाह आ कथा, बीहनि कथा आदि लिखैत छलाह। हुनकर दोसर रूप बादक समय अछि जाहिमे ओ शोधकर्ता, पांडुलिपि विशेषज्ञ, प्राचीन ग्रंथक संपादक आदि रूपमे आबि गेलाह। हिनक वर्तमान स्वरूप शोधकर्ता, पांडुलिपि विशेषज्ञ, प्राचीन ग्रंथक संपादके बला अछि। तँइ एहि विशेषांक केर शुरूआत हम शोधकर्ता, पांडुलिपि विशेषज्ञ, प्राचीन ग्रंथक संपादक आदिक रूप बलापर केंद्रित केलहुँ आ तकर बाद पहिल ओ प्रारंभिक रूपपर। चूँकि संस्मरण अंकक घोषणा भेल छलै तँइ एहिमे पाठकक सुझाव बला बाध्यता हमरा लग नहि छल। मुदा जखन हम एकर स्वरूप निर्धारण करऽ लगलहुँ तऽ कतहुँ ने कतहुँ ई विशेषांके सन भऽ गेल। पाठक चाहथि तऽ एकरा नकारि सकै छथि मुदा हम एकरा विशेषांके मानि लेबाक लोभ कऽ रहल छी। सीताक विवाह स्थान जनकपुर (नेपाल)मे नहि भऽ कऽ भारतमे छै से तथ्य प्रमाणित केलाह अछि भवनाथ झाजी। मिथिला नेपालोमे छै आ ओहिठामक बहुत लोक विदेहक पाठक सेहो छथि। हम फेसबुकपर एक पोस्ट लीखि नेपालक विद्वान ओ लेखक सभकेँ आग्रह केलियनि जे जँ हुनका लग समुचित तथ्य होइन तऽ ओ भवनाथजीक बातक खंडन करथि, विदेह ओकरा भवनाथ झा विशेषांकमे प्रकाशित करत। एकटा संपादकक तौरपर ई हमर नैतिक दायित्व सेहो छल। भविष्यमे नेपालक विद्वान ई नहि कहि सकै छथि जे एकभगाह काज भऽ गेलै विदेह द्वारा। संपादक तऽ मात्र आग्रहे कऽ सकैए, लिखबाक काज तऽ लेखकक छनि। फेसबुक पोस्टक लिंक निच्चाक फोटोमे देल गेल अछि- विविध विषयपर विशेषांकक बाद 2015 मे विदेहक संपादक लग आशीष अनचिन्हार द्वारा जीवित लेखकपर विशेषांक निकालबाक प्रस्ताव राखल गेल आ संपादकक सहमतिक बाद ई एखन धरि एकटा नमहर रस्ता बना चुकल अछि। ई विचार ओहि समयमे एकटा नवाचार छल। नवाचार किएक से एना बूझू। मैथिलीमे एखनो धरि अधिकांश पत्रिका द्वारा कोनो लेखक वा आन कोनो लोकक विशेषांक हुनक मृत्युक बादे प्रकाशित करैत अछि। ओना एक-दू पत्रिका द्वारा विदेहसँ पहिनेहे जीवित लेखक ऊपर विशेषांक प्रकाशित कएल गेल अछि मुदा जिनकापर ओ विशेषांक प्रकाशित भेलै, जे प्रकाशित केलाह तिनकर सभहक संबंध देखबनि तऽ साफे लागत जे ओ सभ एक गुटक छलाह तँइ एहन काज संभव भेलै, एक गुट द्वारा दोसर गुटक लेखकक ऊपर विशेषांक ओ सभ कहियो प्रकाशित नै कऽ सकलाह। तँइ 2015मे जखन विदेह एहन काज केलक तऽ एकरा नवाचार मानल गेलै। अहाँ सभ विदेह द्वारा एखन धरि प्रकाशित विशेषांक केर सूची देखि लिअ ई नवाचार साफ-स्पष्ट रूपे दृष्टिगोचर हएत। नवाचार माने ईहो जे मात्र साहित्यिके लोक एहि हदमे नहि छथि, विदेह भाषाविद्, पर्यावरणविद्, पांडुलिपिविद् , संगीतकला सहित चित्रकला सभपर विशेषांक सेहो प्रकाशित केलक जे सामान्यतः मैथिली पत्रिकामे उपेक्षित रहैत छल। मुदा आशीष अनचिन्हार एवं विदेहक ई नवाचार अतबेपर नहि बंद भेल, बहुत रास नव-नव दृष्टिकोणक संग विदेह विशेषांकक परिकल्पना कएल गेल आ बहुत हद धरि ओकरा साकार सेहो कएल गेल। नीचाक सूची देखल जाए- 1) 2022 मे आशीषे अनचिन्हार द्वारा विदेह लग संस्थाक ऊपर विशेषांक प्रकाशित करबाक प्रस्ताव राखल गेल। 2) 2023 मे आशीष अनचिन्हार द्वारा विदेह लग दू टा विचार राखल गेल 1) लेखक-प्रकाशकसँ इतर आन जे लोक पोथी-पत्रिका केर बिक्री कऽ अपन जीवय-यापनक संग मैथिली पोथीक प्रचारमे सहायक छथि तिनको ऊपर विशेषांक प्रकाशित, एवं 2) मैथिलीक कोनो पत्रिकाक उपर विदेह विशेषांक प्रकाशित हो। 3) दिसंबर 2024 मे "विदेह लिटरेचर फेस्टीभल” केर घोषणा भेल। 4) जनवरी 2025 मे विदेह द्वारा "मिथिलाक वर्तमान उद्योग, उद्योगपति एवं एकर भविष्य" विशेषांक प्रकाशित करबाक घोषणा भेल। 5) 2025 मे "स्व-निंदा विशेषांक" केर सेहो घोषणा भेल अछि जाहि लेल पहिल चयन अशीषे अनचिन्हारक भेल अछि। 6) अक्टूबर 2025 मे "विदेहक रील / शार्ट भीडियो विशेषांक" उर्फ "मैथिली भाषाक विकासमे रील / शार्ट भीडियो केर भूमिका" केर घोषणा भेल। ऊपर घोषणाक सूची देखने हेबै तऽ साफे पता लागल हएत जे विदेह मात्र लेखक वा साहित्यकारे केर गुट नहि तोड़लकै, विषय केर गुट सेहो तोड़लकै आ एहन विषय सभ चुनलक जे आन पत्रिका सभ लेल वर्जित छल। विशेषांक एवं अन्य सामान्य अंक समेत विदेह एकटा नमहर यात्रा कऽ चुकल अछि आ एहिठाम आब हम कहि सकैत छी जे ई एकटा चुनौतीपूर्ण काज छै। अनेक संकट केर सामना करए पड़ैत अछि लेख एकट्ठा करएमे। मुदा संगहि ईहो हम कहब जे संकटसँ बेसी हमरा लग समर्थन अछि। हँ, ई मानएमे हमरा कोनो दिक्कत नहि जे जतेक लेख केर उम्मेद केने रहैत छी हम ततेक नै आबैए, जतेक लोक लिखबाक लेल गछैत छथि से सभ अंत-अंत धरि आबि चुप्प भऽ जाइत छथि। आ एकर कारणो छै, किनको ई लागै छनि जे आनपर लिखब से हम अपने रचना किए ने लीखि लेब, किनको लग पोथिए नै रहै छनि, जखन कि हम सभ यथासंभव पाठककेँ विकल्प रूपमे पोथीक पी.डी.एफ फाइल सेहो देबाक लेल तैयार रहैत छी। कियो विदेहक समावेशी रूपसँ दुखी छथि, तँ किनको मित्रकेँ विदेहसँ दिक्कत छनि तँइ ओ अपन मित्रक ईगो के रक्षा लेल रचना / आलेख नहि देता। एकरो हम संकटे बुझै छियै जे सभ फेसबुकपर लंबा-लंबा लेख वा कमेंट टाइप कऽ लै छथि सेहो सभ विदेह लेल हाथसँ लिखल पठाबैत छथि। जे सभ कहियो काल फेसबुकपर टाइप कऽ लीखै छथि तिनकर आलेख हम सभ टाइप करिते छी। खएर पहिने कहलहुँ जे संकटसँ बेसी समर्थन अछि तँइ आइ पहिलसँ लऽ कऽ एहि प्रस्तुत विशेषांक धरि पहुँचलहुँ हम। निश्चिते समर्थन बेसी भेटल हमरा। जखन कि विदेहक एहि विशेषांक सभहक अलावे आन अंक हरेक पंद्रह दिनपर (मासमे दू बेर) लगातार प्रकाशित भइए रहल अछि। एकर अतिरिक्त ईहो बात संतोषदायक अछि जे विदेहक हरेक व्यक्तिपरक विशेषांक अभिनंदनग्रंथ हेबासँ बाँचि गेल अछि। मुख्यधारा जकाँ विदेहकेँ अभिनंदनग्रंथ नहि चाही। अभिनंदनग्रंथ अहू दुआरे नै चाही जे ओहिसँ लेखक वा जिनकापर निकालल गेल छनि तिनकामे सुधारक गुंजाइश खत्म भऽ जाइत छै। तँइ विदेहक विशेषांकमे आलोचना-प्रसंशा सभ भेटत। विदेह विशेषांकमे प्रकाशित आलेख सभ जखन अहाँ सभ पढ़ैत चलि जेबै तऽ अनुभव हएत जे या तऽ अहाँ सीढ़ीपर चढ़ि रहल छी या उतरि रहल छी। माने एक समान ऊर्जासँ अहाँ पढ़ैत चलि जेबै। बिना कोनो रुकावट बिना कोनो धुकचुकाहटकेँ। आ ई संभव होइत छै आएल लेख सभह प्रस्तुतिकरणक कारणे। अही प्रस्तुतिकरणक कारणे कम्मो आलेख रहैत विदेह विशेषांकमे सूचना भरल रहैत छै। विदेह विशेषांकमे प्रकाशित आलेख कोन ठाम राखल जाए (माने कोन लेखक केर लेख ऊपर हो वा कि नीचा हो) से निर्णय चयनित लेखकक काज एवं हुनकापर आलेख केर प्रवृतिकेँ धेआनमे राखि कएल जाइत अछि। मुदा बहुत बेर ई संभव नहि भऽ पाबैत छै कारण आलेख सभ एकदम अंतिम समयमे अबैत छै आ तखन ओकरा ऊपर-नीचा करब संभव नहि रहैत छै। तथापि हमर सभहक प्रयास रहहैए जे प्रस्तुतिकरण एकदम सही हो। दुर्भाग्यवश मैथिलीमे किछु एहनो लेखक सभ छथि जिनका अपन लिखल आलेखपर कम भरोसा रहैत छनि आ ओ चाहैत छथि जे हमर आलेख सभसँ ऊपर राखल जाए। पछिला एक विशेषांकमे सद्य अनुभव भेल हमरा। मुदा एहि प्रवृतिकेँ हम सभ नकारि देने छी आ जे आलेख जाहि ठाम सही बुझाइए तही ठाम राखैत छी बिना कोनो समझौताकेँ। पहिने विदेहक सभ अंक नागरी, तिरहुता आ ब्रेल लिपिमे प्रकाशित होइत छल। एकर अतिरिक्त विदेहक किछु अंक कैथी, नेवाड़ी, आइ.पी.ए. लिपि, रंजना (नेवारी केर एक आर रूप), ब्राह्मी, खरोष्ठी, उर्दू, तिब्बती एवं तिब्बती-उमे लिपिमे सेहो छपल अछि। कुल मिला कऽ देखी तँ विदेह 11-12 लिपि अपना लेल रखने अछि। 2 पाठक जखन एहि विशेषांक वा विदेहक नियमित अंक (सामान्य अंक)केँ पढ़ताह तँ हुनका वर्तनी ओ मानकताक अभाव लगतनि। विदेह मूलतः शब्दमे विभक्ति सटा कऽ लिखैत अछि संगहि मैथिली मानक भाषा आ मैथिली भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम लेल “भाषापाक” नामक अपन दिशानिर्देश सेहो रखने अछि मुदा विदेहमे छपए बला लेखक लेल स्वतंत्रता छै जे ओ कोन रूपमे लिखै छथि, माने जे विदेह शुरुएसँ हरेक वर्तनी बला लेखककेँ स्वीकार करैत एलैए। तँइ मानकता अभाव स्वाभाविक। विदेह सभ वर्तनी आ स्वरूपक सम्मान करैत अछि। तथापि वर्तनीक गलती जे थिक से सोझे-सोझ हमर सभहक गलती थिक जे हम सभ संशोधन नै कऽ सकलहुँ। मैथिलीमे किछुए एहन पत्रिका अछि जकर वर्तनी एक रंगक रहैत अछि आ ई हुनक खूबी छनि मुदा जखन ओहो सभ कोनो विशेषांक निकालै छथि तखन वर्तनी तँ ठीक रहैत छनि मुदा सामग्री अधिकांशतः बसिये रहैत छनि। ऐतिहासिकताक दृष्टिसँ कोनो पुरान सामग्रीक उपयोग वर्जित नै छै। हमहूँ सभ करैत छियै, मुदा सोचियौ जे 72-80 पन्नाक कोनो प्रिंट पत्रिका होइत छै ताहिमे लगभग आधा सामग्री साभार रहैत छै (माने दू भाग पुरने सामग्री), तेसर भागमे लेखक केर किछु रचना रहैत छै आ चारिम भागमे किछु नव सामग्री। हमरा लोकनि नव सामग्रीपर बेसी जोर दैत छियै। एकर मतलब ई नहि जे वर्तनीमे गलती होइत रहै। हमर कहबाक मतलब ई जे संपादक-संयोजककेँ कोनो ने कोनो स्तरपर समझौता करहे पड़ैत छै से चाहे वर्तनीक हो कि, मुद्राक हो कि विचारधारक हो कि सामग्रीक हो। हमरा लोकनि वर्तनीक स्तरपर समझौता कऽ रहल छी मुदा कारण सहित। प्रिंट पत्रिका एक बेर प्रकाशित भऽ गेलाक बाद दोबारा नै भऽ सकैए (भऽ तँ सकैए मुदा फेर पाइ लागि जेतै) तँइ ओकर वर्तनी यथाशक्ति सही रहैत छै। इंटरनेटपर सुविधा छै जे बीचमे (इंटरनेटसँ प्रिंट हेबाक अवधि) ओकरा सही कऽ सकैत छी मुदा सामग्रिए बसिया रहत तँ सही वर्तनी रहितो नव अध्याय नै खुजि सकत तँइ हमरा लोकनि वर्तनी बला मुद्दापर समझौता केलहुँ। हमरा लोकनि कएलनि, कयलनि ओ केलनि तीनू शुद्ध मानैत छी, एतेक शुद्ध मानैत छी एकै रचनामे तीनू रूप भेटि जाएत। आन शब्दक लेल एहने बूझू। उम्मेद अछि जे पाठक विदेहक आने विशेषांक जकाँ एकरा पढ़ताह आ पढ़ि एकर नीक-बेजाएपर अपन सुझाव देताह। विदेहक हरेक अंक विदेह वेबसाइटपर भेटत आ एकर अलावे गूगल बुक्स Google Books आ आर्कइभ.कॅम archive.org पर सेहो भेटत। तँइ स्वाभाविक रूपसँ विशेषांक सेहो तीनू प्लेटफार्मपर भेटत। मुदा तीनू प्लेटफार्मपर अंक सभकेँ अलग ढंगसँ सजाएल गेल छै जकरा हम पाठक लग राखि रहल छी। पाठक निच्चा बला पैराग्राफपर ध्यान देताह तऽ हुनका कम्मे समयमे नीक रिजल्ट भेटतनि। विदेहक अपन साइट आ आर्कइभ.कॅम archive.org पर विदेहक हरेक अंक क्रमबद्ध तरीकासँ भेटत। आर्कइभ.कॅम archive.org पर विदेहक हरेक अंक पढ़बाक लेल पाठक Gajendra Thakur सर्च करथि आ https://archive.org/details/@videha_editorial_staff पर जाथि जाहिठाम क्रमबद्ध तरीकासँ सभ भेटतनि। संगे ईहो लिंक सहायक हेतनि https://archive.org/details/videha_pdf_202305 मुदा गूगल बुक्स Google Books पर विदेहक अंक सभकेँ सर्च करबाक हिसाबसँ राखल गेल अछि। माने जे पाठक गूगल बुक्स Google Books पर जँ कोनो शब्दकेँ वा लेखककेँ वा किताबक नामकेँ वा आन कोनो की वर्ड (Key Word)सँ तकताह आ जँ ओ शब्द, लेखक, किताब वा ओ सर्च वर्ड विदेहमे प्रकाशित भेल छै तऽ पाठक लग विदेहक ओ सभ अंक देखाबऽ लगतै जाहिमे पाठक द्वारा शब्द, लेखक, किताब वा ओ सर्च वर्ड देल गेल छै। एकर माने ई भेल जे विदेहमे प्रकाशित हरेक शब्द, लेखक, किताब वा ओ सर्च वर्ड (Search Word) पाठकक मुट्ठीमे आबि गेल आ अन्य माध्यमक अपेक्षा बेसी दिन धरि पाठक केर पहुँचमे रहत। आ संगहि जँ ओ शब्द, लेखक, किताब वा ओ सर्च वर्ड विदेहसँ इतर आन कोनो पोथीमे छै तँ ओहो पाठकक सामने आबि जेतनि माने पाठक लेल दुन्ना फायदा। पाठक गूगल बुक्स Google Books पर विदेहक Videha eLearning पर जा कऽ विदेहक अंक पढ़ि सकै छथि ओत्तहि संपादक गजेन्द्र ठाकुर Gajendra Thakur पर क्लिक कऽ बहुत रास पोथी पढ़ि सकै छथि। तहिना पाठक जा कऽ गजेन्द्र ठाकुर Gajendra Thakur सर्च करथि हुनका विदेहक अंक सहित ओ सभ पोथी भेटि जेतनि जे विदेहपर देल गेल छै। एकर माने ई भेल जे मात्र विदेहक अंके नै आनो-आनो पोथी सभ भविष्यमे बाँचल रहि जेतै। संगहि विशेषांक सभहक प्रिंट रूप किनबाक लेल ओकर पोथी रूपक लिंक पोथी.कॅम Pothi.com पर देल गेल छै। पाठक पोथी.कॅम Pothi.com पर जा कऽ गजेन्द्र ठाकुर Gajendra Thakur सर्च करथि हुनका विदेहक विशेषांक सहित बहुत रास पोथी भेटि जेतनि किनबाक लेल। पाठक देवनागरीमे गजेन्द्र ठाकुर आ रोमन केर Gajendra Thakur दूनू सर्च करथि से हमर आग्रह रहत। कारण देवनागरी आ रोमन दूनूमे संपादक अपन एकाउंट बनेने छथि आ अपन सुविधासँ दूनू एकाउंटसँ विदेहक अंक आ पोथी अपलोड केने छथि। एहिठाम हम पहिने विदेहक लिंक देब आ ठीक ताही संगे एहि विशेषांकक पोथी.कॅम Pothi.com केर प्रिंट आॉन डिमांड बला लिंक देने छी जाहि ठाम पाठक एकरा आॉनलाइन कीनि सकै छथि। विदेहक द्वारा जीवैत लेखक ओ संस्थाक विशेषांक शृखंलामे प्रकाशित भेल संगहि आन विशेषांक सभहक लिस्ट एना अछि (एहिठाम जे अंकक लिस्ट देल गेल अछि ताहि अंकपर क्लिक करबै तँ ओ अंक खुजि जाएत)- 1) हाइकू विशेषांक 12 म अंक, 15 जून 2008 2) गजल विशेषांक 21 म अंक, 1 नवम्बर 2008 3) विहनि कथा विशेषांक 67 म अंक, 1 अक्टूबर 2010 4) बाल साहित्य विशेषांक 70 म अंक, 15 नवम्बर 2010 5) नाटक विशेषांक 72 म अंक 15 दिसम्बर 2010 6) समीक्षा विशेषांक 74म अंक 15 जनवरी 2011 7) नारी विशेषांक 77म अंक 01 मार्च 2011 8 अनुवाद विशेषांक (गद्य-पद्य भारती) 97म अंक 1 जनवरी 2012 9) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक 111 म अंक, 1 अगस्त 2012 10) भक्ति गजल विशेषांक 126 म अंक, 15 मार्च 2013 11) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक 142 म, अंक 15 नवम्बर 2013 12) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक 169 म अंक 1 जनवरी 2015 13) अरविन्द ठाकुर विशेषांक 01 नवम्बर 2015 अंक 189, विदेहक अरविन्द ठाकुर विशेषांक केर पोथी रूप "स्वतंत्रचेता- अरविन्द ठाकुर: व्यक्तित्व-कृतित्व" केर नामसँ प्रकाशित भेल। 14) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक 01 दिसम्बर 2015 अंक 191, पोथी.कॅम pothi.com 15) विदेह सम्मान विशेषाक- 200म, भाग-1, 15 अप्रैल 2016 16) विदेह सम्मान विशेषाक- 205म, भाग-2, 1 जुलाई 2016 17) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- 217 म अंक 01 जनवरी 2017 18) मैथिली वेब पत्रकारिता विशेषांक-313म अंक 1 जनवरी 2021 19) मैथिली बीहनि कथा विशेषांक-2, 317 म अंक 1 मार्च 2021 20) रामलोचन ठाकुर विशेषांक 01 अप्रैल 2021 अंक 319, पोथी.कॅम pothi.com 21) राजनन्दन लाल दास विशेषांक 01 नवम्बर 2021 अंक 333, पोथी.कॅम pothi.com 22) रवीन्द्र नाथ ठाकुर विशेषांक 15 जून 2022 अंक 348, पोथी.कॅम pothi.com 23) केदारनाथ चौधरी विशेषांक 15 अगस्त 2022 अंक 352, पोथी.कॅम pothi.com 24) प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' विशेषांक 01 नवम्बर 2022 अंक 357, पोथी.कॅम pothi.com 25) शरदिन्दु चौधरी विशेषांक 15 नवम्बर 2022 अंक 358, पोथी.कॅम pothi.com 26) “कला-विमर्श विशेषांक (सन्दर्भ- संजू दास, कृष्ण कुमार कश्यप, शशिबाला, एस.सी.सुमन आ श्वेता झा चौधरी)” 15 अप्रैल 2023 अंक 368, पोथी.कॅम pothi.com 27) अशोक विशेषांक 1 मइ 2023 अंक 369, पोथी.कॅम pothi.com 28) रामभरोस कापड़ि 'भ्रमर' विशेषांक 15 मइ 2023 अंक 370, पोथी.कॅम pothi.com 29) मिथिला स्टूडेंट यूनियन (MSU) विशेषांक 1 जून 2023 अंक 371, पोथी.कॅम pothi.com 30) लक्ष्मण झा सागर विशेषांक (15 नवम्बर 2023 अंक 382), पोथी.कॅम pothi.com 31) नरेन्द्र झा विशेषांक (1 जून 2024 अंक 395), पोथी.कॅम pothi.com 32) भाषाविद् रामावतार यादव विशेषांक 1 जून 2024 अंक 395, पोथी.कॅम pothi.com 33) अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद् विशेषांक 15 अगस्त 2024 अंक 400, पोथी.कॅम pothi.com 34) हितनाथ झा विशेषांक 1 नवम्बर 2024 अंक 405, पोथी.कॅम pothi.com 35) मिथिला विकास परिषद् विशेषांक 15 दिसंबर 2024 अंक 408, पोथी.कॅम pothi.com 36) नारायणजी चौधरी विशेषांक 1 जून 2025 अंक 419, पोथी.कॅम pothi.com 37) शिवशंकर श्रीनिवास विशेषांक 15 अगस्त 2025 अंक 424, पोथी.कॅम pothi.com एहि लिस्टमे 1, 2, 4, 5, 6, 7, 8, 15 एवं 16 विदेहक स्वतः संख्याक हिसाब बला विशेषांक अछि। ओतहि 2 आ 19 क्रम संख्याक विशेषांक मुन्नाजीक संयोजनमे प्रकाशित भेल अछि। शेष सभ बाँचल विशेषांकक परिकल्पना एवं संयोजन आशीष अनचिन्हार द्वारा भेल अछि। अरविन्द ठाकुर, जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल', केदारनाथ चौधरी, प्रेमलता मिश्र 'प्रेम', शरदिन्दु चौधरी, अशोक, रामभरोस कापड़ि 'भ्रमर', लक्ष्मण झा 'सागर', नरेन्द्र झा, रामावतार यादव, हितनाथ झा, नारायणजी चौधरी, शिवशंकर श्रीनिवास ई सभ एहन लेखक / सामाजिक कार्यकर्ता छथि जे सभ अपना ऊपर प्रकाशित विशेषांक अपन आँखिए पूरा होशो-हवाशमे पढ़ि सकलाह, देखि सकलाह, ई हमर सभहक सौभाग्य। रामलोचन ठाकुर, राजनन्दन लाल दास आ रवीन्द्र नाथ ठाकुर केर विषयमे हम सभ हतभाग्य रहलहुँ जे घोषणा भेलाक बाद मुदा एकरा प्रकाशित भेलासँ पहिने ओ सभ नहि देखि सकलाह। संस्था बलामे मिथिला स्टूडेंट यूनियन (MSU) केर अधिकांश सदस्य, अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद् केर अधिकांश सदस्य आ मिथिला विकास परिषद् केर अधिकांश सदस्य सभ संस्थाक ऊपर प्रकाशित विशेषांक पढ़ने छथि। नित नवल सिरीज बलामे सभ लेखक (राजदेव मंडल, सुभाष चंद्र यादव, सुशील) अपने एकरा पढ़ने छथि। ईहो हमर सभहक सौभाग्य। किछु फोटो आ सूचना जे हमरा भेटि सकल जाहिमे विशेषांकसँ संबंधित लेखक-व्यक्तित्व-संस्था अपने पढ़ि सकलाह तकर फोटो हम निच्चा दऽ रहल छी। आशीष अनचिन्हार द्वारा संपादित पोथी 'प्रीति कारण सेतु बान्हल' जे कि मिथिला ओ मैथिलीक संवर्धनमे गजेन्द्र ठाकुर एवं प्रीति ठाकुरक योगदानक आलोचनात्मक ग्रंथ अछि ताहिमे संकलित शिवशंकर श्रीनिवास जीक एक शोध आलेख मैथिली पत्रिकामे व्यक्तिपरक विशेषांकक इतिहास अछि आ ओहि इतिहासमे विदेह विशेषांक कोन ठाम अछि तकर मूल्याकंन भेटत संगहि ओही आलेखमे श्रीनिवास जीक मोताबिक जीवितेमे अपन मूल्याकंन पढ़ि लेब कोनो लेखक लेल कोनो सम्मानसँ बेसी महत्वपूर्ण अछि। मैथिलीक बहुत रास पाठक विदेहक जीवित लेखक विशेषांककेँ मूल्यवान मानै छथि ('प्रीति कारण सेतु बान्हल’ मे कीर्तिनाथ झा, कल्पना झा, प्रणव कुमार झा, धनाकर ठाकुर आदिक आलेख), ओतहि किछु पाठक विदेह विशेषांककेँ साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ बेसी महत्वपूर्ण मानै छथि ('प्रीति कारण सेतु बान्हल’ मे लक्ष्मण झा 'सागर'जीक आलेख) यद्पि विदेह साहित्य अकादमी पुरस्कारक आलोचना करैत अछि मुदा अकादमी द्वारा पुरस्कार छोड़ि जे प्रकाशन एवं आन काज छै तकर प्रसंशा सहो करैत अछि। तथापि जँ किछुओ पाठक विदेह विशेषांककेँ कोनो सम्मान-पुरस्कार वा कि साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ बेसी महत्वपूर्ण मानै छथि तँ ई विदेह लेल निश्चिते प्रेरणादायी बात छै। 3 विदेहक जीवित विशेषांक शृंखलामे किनकर चयन हो ताहि लेल मोटा-मोटी निच्चाक किछु बिंदुक पालन कएल जाइत अछि- 1) लगभग पाँच-छह मास पहिनेसँ विदेह अपन पाठककेँ सुझाव देबा लेल लेल सूचना दैत अछि। 2) आएल सुझावमेसँ विदेह मात्र जीवित लेखककेँ चयन करैत अछि। संस्था सेहो वर्तामनमे जीवंत हेबाक चाही। 3) सभ जीवित मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशकक बीचमे हुनकर लेखन/ काज एवं आचरणक साम्यता देखल जाइत अछि। जाहि लेखकक लेखन/ काज ओ आचरणमे बेसी साम्यता (कम फाँक) भेटैए तेहन छह टा नाम चयनित होइत अछि। 4) छह नाम एलापर ई तुलना कएल जाइत छै जे ई छहो मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशक अथवा संस्थाकेँ रचना लिखबाक वा समाजिक काज केलाक एवजमे समाजसँ की भेटलनि। 5) जिनका सभसँ कम भेटल बुझाइत अछि ताहि तीन मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशक, संस्थाकेँ अगिला चरण लेल राखि लैत छी। 6) एहि तीन चयनित जीबित मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशकक वा संस्थाक रचना, काज, हुनक उद्येश्य आदिक बीचमे परस्पर तुलना कएल जाइत अछि आ, 7) अंतिम रूपसँ विदेह द्वारा नाम चुनि सालक अंतमे घोषणा कएल जाइत अछि आ नियत समयपर ई विशेषांक निकालबाक प्रयास करैत छी। एकर मतलब ई भेल जे पाठककेँ सुझाव देबाक सूचना हरेक बर्खक अप्रैल-मइ धरिमे चलि जाइत छनि। प्रश्न उठि सकैए जे कि उपरक नियम एहन छै जाहिमे अंतिम रूपसँ सभ सुयोग्य जीवित लेखक केर चयन समयपर भ़ऽ जेतनि? तऽ एकर उत्तर छै- नै। विदेहक अपन सीमा छै आ विदेहक पाठक लग सेहो अपन सीमा छनि। मुदा अही सीमाक संगे हमरा सभकेँ अपन यथासाध्य श्रेष्ठ देबाक छै आ मैथिली लेल एकटा एहन रस्ता बना देबाक छै जाहिसँ आबए बला 500-600 बर्खक साहित्य विदेहक लीकसँ प्रेरणा पाबए। अही विचारक संग विदेह ओहन जीवित लेखकपर अपन धेआन सेहो केंद्रित कऽ रहल अछि जे कि सुयोग्य छथि मुदा जिनकापर विदेहक विशेषांक कोनो कारणवश नहि प्रकाशित भऽ सकल। एकर नाम भेल विदेहक "नित नवल सिरीज"। एहि नव विचारक मुख्य बिंदु एना अछि- 1) विदेहक संपादक गजेन्द्र ठाकुर एकटा कोनो जीवित लेखक वा कलाकारपर एकाग्र आलोचना करता मने ओहि लेखक केर उपलब्ध सभ साहित्यपर। एहि पोथीक भाषा मैथिली अथवा अंग्रेजी कोनो एक भाषामे रहत। एहि पोथीक पहिल रूप ई-बुक केर रूपमे आएत आ प्रयास रहत जे एकर प्रिंट सेहो आबए जे कि परिस्थितिपर निर्भर करतै। 2) लेखक वा कलाकार केर चुनाव संपादक अपन रुचि वा विदेह टीमक रुचि केर हिसाबें करता। 3) एहिमे ओहने लेखक वा कलाकार केर चयन संभव हएत जिनकर उपलब्ध हरेक पोथीक PDF रूपमे विदेहक माध्यमसँ सार्वजनिक भेल छनि। कलाकार लेल यूट्यूब एवं आन साइट सेहो मान्य हेतै। 4) एहि परियोजनाक लेल चयनित लेखक वा कलाकारपर काज संपादक केर समय केर अनुसारे हेतै। तँइ एकर समय सीमा कहब संभव नहि। नित नवल सिरीजमे एखन धरि प्रकाशित पोथीक सूची एना अछि (पहिनेक विशेषांक सभमे ई क्रम नहि छल, एहिठाम संशोधित आ पूर्ण सूची अछि)- 1. Rajdeo Mandal- Maithili Writer (2022) 2. JAGDISH PRASAD MANDAL- Maithili Writer (2023) 3) नित नवल सुभाष चन्द्र यादव (2023) पोथी.कॅम pothi.com 4) नित नवल सुशील (2023, संशोधित 2024) पोथी.कॅम pothi.com एकर अतिरिक्त विदेहक वर्तमान अंक सभमे धारावाहिक रूपें "नित नवल दिनेश मिश्र" सेहो प्रकाशित भऽ रहल अछि जकर पोथी रूप जल्दिये आएत। एहिठाम ईहो स्पष्ट कऽ दी जे विदेह विशेषांक वा नित नवल सिरीज केर चयन लेखकक शुरूसँ लऽ चयन हेबाक समय धरिक आकलन अछि। मानि लिअ विदेह विशेषांक वा नित नवल सिरीजमे चयनित भेलाक बाद, विशेषांक वा पोथी प्रकाशित भऽ गेलक बाद जँ चयनित लेखकमे नैतिक स्तरपर कोनो विचलन अबैत छनि तँ आन लोकक संगे विदेहो हुनकर विरोध करत। फेरो स्पष्ट कऽ दी जे हमरा लोकनि मात्र नैतिक स्तर केर बात केलहुँ अछि, विचारधारा वा आन कोनो स्तरक नहि। विदेह लेल उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम, आकाश-पाताल सभ विचारधारा अपने छै बशर्ते कि ओ मिथिला, मैथिली आ मैथिलक हितमे हो। आब बात करी विदेह लिटरेचर फेस्टीभल केर। विदेह अपन आन कार्यक्रम संगे "विदेह लिटरेचर फेस्टीभल" केर शुरुआत कऽ रहल अछि। एकर परिभाषा हम ई रखने छी जे एक बर्खमे एक लेखक द्वारा एक विधामे जे रचना विदेहमे प्रकाशित हएत तकरा हम सभ पोथीक रूपमे दऽ ओहि संबंधित लेखक लग ओकर लिंक पठा देबनि। जँ लेखकक सहमति रहतनि तऽ एकै पोथीमे विभिन्न विधाकेँ सेहो समेटल जा सकैए। एहिमे भाग लेबाक निम्नलिखित प्रक्रिया रहत- 1) विदेहक बर्खमे कुल 24 अंक प्रकाशित होइत छै सामान्यतः हरेक मासक 1 आ 15 तारीखकेँ। ई फेस्टीभल हरेक बर्ख 1 जनवरीसँ लऽ कऽ 15 दिसम्बर बला अंकमे प्रकाशित रचनापर लागू हएत। रचना टाइप कएल रहबाक चाही। रचना पठेबाक लेल मेल अछि- editorial.staff.videha@gmail.com विदेह ऑनलाइन पत्रिका छै (मैथिलीक पहिल) तँइ लेखकीय प्रति मात्र PDF रूपमे देल जाइत छै। 2) विदेह लेल रचना दू भागमे अछि, गद्य एवं पद्य। गद्य एवं पद्य केर सभ विधा लेल ई मान्य अछि (मुदा छंदमुक्त कविता लेल संपादक अपन विवेकक प्रयोग करताह जे ई रचना पोथी लेल उपयुक्त हेतै वा कि नहि, एहन नहि जे छंदमुक्तमे नीक रचना नहि भऽ सकैए मुदा मैथिलीमे छंदमुक्तकेँ गलत मतलब निकालि कविता विधाकेँ सत्यानाश कऽ देल गेलै) विदेहक कुल 24 अंकमे जँ कोनो रचनाकारक गद्य (जेना आलेख, आलोचना, समीक्षा, कथा, कथेतर गद्य, यात्रा,संस्मरण आदि) केर 15-20 टा रचना हेबाक चाही। बीहनि कथा एवं लघुकथा कमसँ कम 200 हेबाक चाही। उपन्यास, नाटक आदि जँ 24 अंकमे पूरा भऽ गेल अथवा जाहि अंकमे पूरा भऽ जेतै तकर बाद ओहिपर काज शुरू कऽ देल जेतै। छंदोबद्ध पद्य वा गजल 100 टा हेबाक चाही। छोट-छोट छंदोबद्ध रचना जेना दोहा, सवैया आदि लेल कमसँ कम 500 रचना हेबाक चाही। छंदोबद्ध पद्य एवं गजलक निच्चा ओकर विधान एवं नाम सेहो देनाइ अनिवार्य रहत। छंदोबद्ध पद्य वा गजल पूर्णतः मानक हेबाक चाही, वर्तनी सही हेबाक चाही, अन्यथा 100 संख्या भेलाक बादो विदेह ओहिपर विचार नै करत। लेख लेल सेहो एहने बात मानि कऽ चलू। गोल-मटोल भाषा बला समीक्षा-आलोचना मान्य नहि हएत। तहिना जाहि संस्मरणमे आनसँ बेसी अपनापर लीखल गेल हो सेहो मान्य नहि हएत। 3) जेना उपन्यास वा नाटक धारावाहिक रूपमे प्रकाशित होइए तेनाहिते कोनो एक विषयपर आलेख, आलोचना सेहो धारावाहिक रूपमे मान्य हएत। लेखक अपना हिसाबें विषय केर चयन कऽ सकैत छथि। मुदा एहि बर्ख हम मात्र उदाहरण लेल एकटा विषय एक रचनाकार लेल प्रस्तावित कऽ रहल छी जाहिसँ आरो स्पष्ट हएत। जेना कि एहि बेर लेल हम विषय बनेलहुँ "मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान" आ एहि लेल हम कल्पना झाजीकेँ नामित कऽ रहल छियनि। आब कल्पना जी सुविधानुसार एहि विषयपर जेना-जेना खंड लिखैत चलि जेतीह आ विदेहमे प्रकाशित होइत रहत आ अंतमे पोथीक रूपमे आबि जाएत। 4) जनवरी 2026 आ तकर बाद हरेक सालक जनवरीमे ओहन लेखक सभकेँ सूचना देल जेतनि जे एहि क्राइटेरियाकेँ पूरा केलाह, आ हुनकासँ ओहि रचना सभहक संशोधित रूप माँगल जेतनि। जे लेखक जाहि समयमे संशोधित रूप देताह तकरा ओहि समयक हिसाबें आ हुनकर लिखित सहमतिक संग ओहि रचना सभकेँ समेटि ओकरा पोथी रूप देल जाएत, ओकरा ISBN सेहो देल जाएत आ ओकर लिंक संबंधित लेखककेँ दऽ देल जेतनि। लिंक देलाक बाद लेखक-पाठक अपन मूल्य लगा ओकरा कीनि सकै छथि। विदेह क्रय-विक्रय केर काज नहि करैत अछि तँइ एहिसँ संबंधित कोनो समस्या लेल विदेह उत्तरदायी नहि हएत। हँ, स्वविवेकक उपयोग करैत विदेह टीम लेखकक समस्याक समाधान करबाक लेल प्रयास कऽ सकै छथि। 5) एहि योजनाक अंतर्गत आएल पोथीमे विदेहक नाम, लोगो, ओकर उद्येश्य, आन सूचना सहित ईहो लिखल रहत जे ई पोथी "विदेह लिटरेचर फेस्टीभल बर्ख...." योजना द्वारा चुनल गेल अछि। 6) रचना विदेह लेल अप्रकाशित हो माने ओकर प्रकाशन आन कतहुँ नै भेल हो। जँ पोथी रूपमे एलाक बाद पता चलल जे ओहि केर रचना आन ठाम छपल छै तऽ ओकर लिंक नष्ट कऽ देल जेतै। 7) रचनाक गुणवत्ता एवं ओकर मौलिकता लेल लेखक अपने उत्तरदायी हेता। मौलिकता संबंधी कोनो विवाद भेलापर ओहि पोथीक लिंक नष्ट कऽ देल जाएत आ ओहि लेखकक रचनाकेँ पुनः विदेहमे नै छापल जाएत। 8) विदेह दिससँ कोनो प्रकारक वित्तीय सहायता लेखककेँ नै भेटतनि कारण, विदेह किनकोसँ लैतो नै छै। विदेह मात्र रचनाकेँ समेटि, ओकर डिजाइन आ ISBN लेल प्रयास करत। 9) एहिमे साझी संकलन आदि मान्य नै हएत। 10) विदेहमे प्रकाशित रचना लेल जे नियम पहिनेसँ अछि से यथावत रहत आ एहि फेस्टीभेलक रचनापर सेहो लागू हएत। पाठक-लेखक चाहथि तऽ विदेहपर जा कऽ पूरा ब्यौरा देखि सकै छथि। नोट- विदेह लिटरेचर फेस्टीभल केर घोषणाक मात्र किछुए दिन बाद 1 जनवरी 2025 सँ "मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान" केर आलेख शुरू भऽ गेल। पाठक एहि लेल विदेहक 1 जनवरी 2025, अंक 409 पढ़ि सकै छथि। बादमे "मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान" केर घोषणा सेहो भेल जकरा लिखबा लेल हितनाथ झा जीसँ अनुरोध कएल गेल। 4 ऊपर भेल जे काज हम सभ कऽ सकलहुँ तकर विवरण मुदा किछु एहनो घोषणा छै जे कि हम सभ नै कऽ सकलहुँ जेना 2016 मे हम सभ परमेश्वर कापड़ि, कमला चौधरी आ वीरेन्द्र मल्लिक विशेषांक केर घोषणा कइयो कऽ नहि प्रकाशित कऽ सकलहुँ। पाठक एहि घोषणाकेँ एहि लिंकपर देखि सकै छथि- सूचना बादमे विदेहक "वीरेन्द्र मल्लिक विशेषांक" (जे कि प्रकाशित नै भऽ सकल) लेल वीरेन्द्र मल्लिक जीक साक्षात्कार जे नबोनारायण मिश्रजी से विदेहक 337म अंकमे प्रकाशित भेल पाठक एकरा एहि लिंकपर पढ़ि सकै छथि- 1 जनवरी 2022 अंक 337 2017 मे विदेह "नेपालक वर्तमान मैथिली साहित्य" विषयक विशेषांक निकालबाक नेयार केने छल जे एखन धरि पूरा नहि भऽ सकल अछि। तेनाहिते विदेहक "साहित्यिक भ्रष्टाचार विशेषांक" हमरा लोकनि एखन धरि नै प्रकाशित कऽ सकलहुँ अछि। एकर घोषणा हम 2019 मे केने रही। एहि घोषणाक फेसबुक लिंक देखू। हमरा लोकनि पं. गोविन्द झाजीपर कोनो काज नहि कऽ सकलहुँ से दुख आजीवन रहत। एहन नहि छै जे हमरा लोकनि प्रयास नहि केलहुँ मुदा कोनो ठामसँ उत्साह नहि भेटल। 10 अक्टूबर 2020 फेसबुकपर हम सभसँ आग्रहो केने रहियनि मुदा...। एहि घोषणाक फेसबुक लिंक देखू। परिशिष्ट-1 परिशिष्ट-2 परिशिष्ट-3 विदेह अपन कोनो अंकमे "साहित्यिक भ्रष्टाचार विशेषांक" निकालत (लिंक कमेंटमे) ताहि लेल अपने सभसँ निम्नलिखित विषयपर आलेख आदि चाही। 1.साहित्य, कला एवं सरकारी अकादमीः- (क) पुरस्कारक राजनीति (ख) सरकारी अकादेमीमे पैसबाक गैर-लोकतांत्रिक विधान (ग) सत्तागुट आ अकादमी केर काजक तौर-तरीका घ) सरकारी सत्ताक छद्म विरोधमे उपजल तात्कालिक समानांतर सत्ताक कार्यपद्धति (1985सँ एखन धरि) ङ) अकादेमी पुरस्कारमे पाइ फैक्टरः मिथक वा यथार्थ 2.व्यक्तिगत साहित्य संस्थान आ पुरस्कारक राजनीति 3.प्रकाशन जगतमे पसरल भ्रष्टाचार आ लेखक 4. मैथिलीक छद्म लेखक संगठन आ ओकर पदाधिकारी सभहँक आचरण 5.मैथिली विभागमे पसरल साहित्यिक भ्रष्टाचारक विविध रूपः- (क) पाठ्यक्रम (ख) अध्ययन-अध्यापन (ग) नियुक्ति 6. साहित्यिक पत्रकारिता, रिव्यू, मंच, माला, माइक आ लोकार्पणक खेल-तमाशा 7.लेखक सभहँक जन्म-मरण शताब्दी केर चुनाव, कैलेंडरवाद आ तकरा पाछूक राजनीति 8.दलित एवं लेखिका सभहँक संगे भेद-भाव आ ओकर शोषणक विविध तरीका उपरक विषयक अतिरिक्त जँ कियो साहित्यिक भ्रष्टाचारक कोनो नव विषयपर लिखए चाहथि तँ ओकरो स्वागत रहत। परिशिष्ट-4 विशेषांकसँ संबंधित फोटो जे सभ ऊपर भऽ सकल से एना अछि- अरविन्द ठाकुर अपना ऊपरक विशेषांक केर चर्च करैत, एहि फेसबुक पोस्टक लिंक- अरविन्द ठाकुर जगदीश चंद्र ठाकुर 'अनिल' अपना ऊपरक विशेषांक केर चर्च करैत, एहि फेसबुक पोस्टक लिंक- जगदीश चंद्र ठाकुर 'अनिल' शरदिन्दु चौधरी अपना ऊपरक विशेषांक केर चर्च करैत, एहि फेसबुक पोस्टक लिंक- शरदिन्दु चौधरी लक्ष्मण झा 'सागार' अपना ऊपरक विशेषांक केर चर्च करैत, एहि फेसबुक पोस्टक लिंक- लक्ष्मण झा 'सागार' नरेन्द्र झा विशेषांककेँ प्रिंट करबा कऽ कुणालजी हुनका लग पहुँचा देलखिन, एहि फेसबुक पोस्टक लिंक- नरेन्द्र झा रामावतार यादवजीकेँ हम अपन मेलसँ हुनका ऊपर प्रकाशित विशेषांकक पी.डी.एफ पठेलियनि, तकर उत्तर हितनाथ झा अपना ऊपरक विशेषांक केर चर्च करैत, एहि फेसबुक पोस्टक लिंक- हितनाथ झा सुशील जी अपन हाथमे पोथी "नित नवल सुशील" रखने (फोटो सौजन्य-नबोनारायण मिश्र, कोलकाता) MSU केर सदस्य प्रियंका मिश्रा द्वारा कएल गेल कमेंट। फेसबुक लिंक- MSU मिथिला विकास परिषद् विशेषांकक लेख संस्थाक अध्यक्ष श्री अशोक झा द्वारा शेयर कएल गेल पोस्ट। "विदेहक रील / शार्ट भीडियो विशेषांक" उर्फ "मैथिली भाषाक विकासमे रील / शार्ट भीडियो केर भूमिका" हम अपन पोथी "मैथिली वेब पत्रकारिताक इतिहास" मे रील माने शार्ट भीडियोसँ मैथिली भाषाकेँ कतेक फायदा भेलै तकर संक्षिप्त सूचना देने रही संगहि ओही ठाम हम भाषाशास्त्री सभसँ आग्रह केने रही जे ओ सभ एहि विधाकेँ भाषा-विज्ञानक चश्मासँ देखथि। ई अलग बात छै जे रील बनबऽ बलाकेँ एक सीमा आ लोकप्रियता पार केलाक बाद प्रचुर कमाइ सेहो होइत छै। मुदा मैथिलीमे सामान्य साहित्यकारसँ लऽ कऽ भाषाशास्त्री धरि अपनाकेँ अकादमी, प्रायोजित संस्था, पाइ देनिहारक कार्यक्रम धरि समेटि लेने छथि। एहन स्थितिमे एक बेर फेर विदेह एहि विषयपर अपनाकेँ आगू कऽ रहल अछि आ "विदेहक रील / शार्ट भीडियो विशेषांक" उर्फ "मैथिली भाषाक विकासमे रील / शार्ट भीडियो केर भूमिका" एक अंक केंद्रित करबाक विचार कऽ रहल अछि। एहि विशेषांकमे मैथिलीक ओहन क्रियेटर सभहक चैनलपर लिखल जेबाक चाही जिनकर चैनलपर अधिकांश रील मैथिलीक छनि, आन भाषाक रील बला चैनलपर लीखल लेख एहि अंक लेल मान्य नहि हएत। एहि अंककेँ प्रकाशित हेबाक एखन समय-सीमा नहि अछि, जहिया आलेख सभ आबि जाएत तहिया हम सभ एकर तारीख तय करब। आलेख विदेहक मेल आइडी- editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाओल जाए। एहि विशेषांक लेल किछु तथ्य दऽ रहल छी जाहिसँ अहाँ सभकेँ सुविधा रहत- 1) रील बनेबाक लेल प्रमुख ठेकाना। 2) रील कोना बनाओल जाए, मोनेटाइज कोना कएल जाए, कथा-पटकथा केहन हेबाक चाही। 3) मैथिलीक प्रमुख रील चैनल केर नाम, लिंक, ओकर प्रयोगकर्ता एवं ओकर संगी कलाकार। 4) मैथिलीक किछु अतिलोकप्रिय रील आ ओकर भाषिक विवेचना। 5) मैथिलीक रील उद्योग आ आर्थिक लाभ। अहाँ सभ लग जँ आरो कोनो विषय हो एहिसँ संबंधित तऽ लीखि सकैत छी। संगहि जे लीखि सकै छथि तिनको लग सूचना देल जाए। पोस्टक संग लागल रील प्रतीकात्मक अछि आ ई सरिता कुमारी चैनल केर अछि। नोट- विदेह विशेषांक जाहि खंडमे अहाँ सभ ई सूचना पढ़ि रहल छी तकर नाम छै "प्रस्तुत विशेषांकक संदर्भमे" मुदा हरेक विशेषांकक एहि खंडमे किछु ने किछु भिन्नता भेटत जकर कारण अछि जे भूतकालमे जे-जे हम सभ काज केने छी तकरा सभकेँ फेसबुक वा आन लिंककेँ ताकब समयसाध्य काज छै तँइ हमर आग्रह रहतनि पाठक वर्गसँ जे नवीनतम आ संशोधित सूचना लेल ओ जाहि समयमे तकता ताहि समयक अंतिम विदेह विशेषांकक ई खंड देखथि (ई विशेषांक कोनो कैटेगरीक भऽ सकैए)। हुनकर समस्याक समाधान भऽ जेतनि। संगहि एहि विशेषांकमे जँ किछु छूटत से से हम सभ भविष्यमे आबऽ बला विशेषांकमे संशोधित कऽ परसबै। इएह क्रम छै आ लगैए जे लगभग आगामी एक-दू बर्खमे हम एहि पन्नाक अंतिम स्वरूप पाबि लेब। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.२.भवनाथ झा केर संक्षिप्त परिचय एहिठाम प्रस्तुत अछि भवनाथ झाजी केर संक्षिप्त परिचय। भवनाथ झाजी पहिने भवनाथ भवन, भवनाथ झा 'भवन' आदि केर नामसँ लिखैत छलाह। एहि विशेषांक केर आलेख सभमे तीनू नाम आबि सकैए। हिनक मुख्य रुचि छनि- भारतीय ज्ञान-परम्पराक अप्रकाशित ग्रन्थक पाण्डुलिपिक सम्पादन एवं अनुवाद। मिथिलाक ज्ञान-परम्पराक प्रचार-प्रसार। मिथिलाक इतिहास सम्बन्धी भ्रान्ति सभहक निवारण केर प्रयास। संस्कृत, अंगरेजी एवं हिन्दीमे लीखि मिथिलाकेँ देशक अन्य क्षेत्रक बीच उजागर करबाक मानसिकता। हिनकर संपर्क सूत्र छनि WhatsApp-9430676240 आ bhavanathjha@gmail.com, http://brahmipublication.com/। हिनक परिवारक विशेष जानकारी अही पन्नामे नीचा जा कऽ भेटत। एहि परिचयमे देल गेल सूची पुरान मानकपर अछि मने पुरान सूचनासँ शुरू भऽ ओकर अंतमे नव-नव सूचना जोड़ैत जाएब। जखन कि शोधपत्र, शोध आलेख सभमे अंतर्राष्ट्रिय मानक देल जाइत छै मने एकदम नव सूचनासँ शुरू भऽ कऽ अंतमे पुरान सूचना। मुदा विदेह अपन पाठककेँ ध्यानमे रखैत पुरान मानकक प्रयोग करैत अछि। विदेहक पाठक सामान्य वर्गक रहैत अछि, शोधक फार्मेटसँ बेसी हुनका सूचनाक ताक रहैत छनि। हमरा जनैत पुरना मानकक एकटा ईहो फायदा छै जे सूची देखबामे कम्म समय लागत कारण ओकर प्रयोग बहुत दिनसँ होइत रहल छै आ ई मानव-मस्तिष्कमे रचल-बसल छै। तँइ सुविधाजनक छै। चित्र- 1 नाम: भवनाथ झा जन्म तिथि: 23 सितम्बर, 1968 ई. माता: योगेश्वरी देवी पिता: स्व. पं. अमरनाथ झा दाइ: स्व. दुर्गा देवी बाबा: स्व. बुद्धिनाथ झा जन्म स्थान: ग्राम- हटाढ़ रुपौली, डाकघर- हटाढ़ रुपौली, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी, बिहार। भवनाथ झा केर परिवारक अन्य सदस्य: पत्नी: श्रीमती कुमुद झा संतान: श्री राकेश कुमार, श्रीमती आरती मिश्र, श्रीमती अलका झा आ अभिचन्द्र झा वर्तमान निवास: खास महाल, मारुति नगर, पोस्टल पार्क रोड, पटना-800020 वर्तमान पत्राचार: प्रकाशन विभाग, महावीर मन्दिर, पटना, 800001 शिक्षा: 1. एम.ए. (संस्कृत) ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा, 1992 ई. 2. साहित्याचार्य, कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय, दरभंगा, 1995. दक्षता: 1. भाषा-ज्ञान- मैथिली (मातृभाषा), संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी। 2. प्राचीन लिपि ज्ञान– तिरहुता (मिथिलाक्षर), देवनागरी, कैथी, बंगला, ब्राह्मी। 3. विशेष दक्षता– पाण्डुलिपि विज्ञान एवं शिलालेख विज्ञान। वृत्ति: 1. व्याख्याता, साहित्य विभाग, अजित कुमार मेहता संस्कृत शिक्षण संस्थान, लदौरा, कल्याणपुर, समस्तीपुर, 1998-2003 धरि। (मानव संसाधन विभाग, भारत सरकारसँ सम्बद्ध राष्ट्रीय संस्कृत संस्थानसँ स्वीकृत।) अही समयावधिमे कामेश्वरसिंहदरभंगा-संस्कृतविश्वविद्यालय लेल अनुबंधक आधारपर बहुत रास पांडुलिपि लिप्यंतरणक काज सेहो केलाह। 2. प्रकाशन पदाधिकारी, प्रकाशन विभाग, महावीर मन्दिर न्यास, 2003 ई.सँ एखन धरि। सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाक सदस्यता: 1. मनोनयन- समानित सदस्य, बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद् (राज्य सरकार केर संस्था), 2010 ई.सँ मार्च 2016 धरि। 2. सदस्यता- मैथिली भाषा एवं लिपिक विकास हेतु मानव संसाधन विकास मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा गठित समिति, 2018 पाण्डुलिपि व्यवस्थापन एवं सूचीपत्र निर्माण: 1. ग्राम- सिरसियाँ कलाँ, रानीगंज, सहरसा में डा. ब्रह्मानन्द झा के व्यक्तिगत अस्त-व्यस्त पाण्डुलिपि संग्रह का व्यवस्थापन एवं सूचीपत्र का निर्माण, 1998 ई. 2. “A Descriptive catalogue of Sanskrit Manuscripts preserved in Bihar Research Society, the Research & Publication wing of the Patna Museum, Patna,” 2014. 3. श्रीमती प्रियंवदा अय्यर (सुपुत्री- डा. रतिकान्त मिश्र, बरौनी ड्यौढ़ी) के व्यक्तिगत संकलन में अवस्थित अस्त-व्यस्त 250 पाण्डुलिपियों का सूचीपत्र निर्माण, देहरादून स्थित आवास पर, अगस्त, 2015 ई. सेमिनार एवं कार्यशाला: 1. Resource person- National Translation Mission, National Seminar on “Knowledge text Translation in Maithli”, 23-24 Nov., 2010. 2. संसाधन-पुरुष- स्नातकोत्तर संस्कृत विभाग, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा, ‘भारतीय वाङ्मय में वर्णित कृष्णचरित की प्रासंगिकता’ विषय पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा आयोजित संगोष्ठी, 2012 ई. 3. शोधपत्र वाचन- बोधगया एवं पटनामे राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संमिनारमे Emperor Ashoka and Buddhism विषयपर, बौद्ध महोत्सव, 2013. 4. शोधपत्र वाचन– संस्कृत अकादमी, बिहार सरकार द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संस्कृत सम्मेलन में शोधपत्र वाचन, 11-12 अप्रैल, 2013 5. Resource person– National Translation Mission, Workshop for translation into Sanskrit of the web-content of The Indian Institute of Languages, Mysore, February, 2015. 6. Resource person– National Manuscript Mission, Workshop scripts training, (On Mithilakshar Script) Bhagalpur University, June, 2015. 7. Resource person– Nalanda Open University, Workshop scripts training, Patna, 23 January, 2016. 8. संसाधन-पुरुष, महावीर मन्दिर द्वारा आयोजित, कर्मकाण्ड प्रशिक्षण कार्यशाला, कोनहार घाट, हाजीपुर, अगस्त-सितम्बर, 2016 ई. 9. संसाधन पुरुष- Center for Development of Advanced Computing, C-Dac, Mysore द्वारा निर्माणाधीन मिथिलाक्षर/तिरहुता Font केर निर्माण। 10. संसाधन पुरुष– बिहार सरकार के कला, संस्कृति एवं युवा मन्त्रालय (संग्रहालय विभाग) द्वारा मिथिलाक्षर प्रशिक्षण कार्यशाला में लिपि प्रशिक्षण- 28 जनवरी, 2018 से आरम्भ। 11. संसाधन पुरुष- मैथिली साहित्य साहित्य संस्थान, पटना, भारतीय भाषा परिषद्, बिहार पुराविद् परिषद्, इंटैक बिहार चैप्टर एवं फेसेस, पटना के संयुक्त तत्त्वावधान में बिहार पुराविद् परिषद्, पटना के सभाकक्ष में आयोजित कार्यशाला में मिथिलाक्षर का प्रशिक्षण, 20-26 मई, 2018 ई. 12. संसाधन पुरुष- भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर एवं मैथिली साहित्य संस्थान, पटना के संयुक्त तत्त्वावधान में दरभंगा में आयोजित मिथिलाक्षर एवं कैथी लिपि प्रशिक्षण कार्यशाला में मिथिलाक्षर का प्रशिक्षण, जुलाई, 2018 ई. 13. संसाधन पुरुष- राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन एवं भूपेन्द्र नारायण मण्डल विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित 21 दिवसीय पाण्डुलिपि कार्यशाला में मिथिलाक्षर का प्रशिक्षण- सितम्बर, 2018. 14. व्याख्यान-इसमाद फाउंडेशन, दरभंगा की ओर से आचार्य रमानाथ झा हेरिटेज सीरीज के तहत मो. शफी स्मृति व्याख्यान, विषय- 'विदेह की राजधानी: मिथिला की खोज', 28 अप्रैल, 2019. 15. संसाधन पुरुष- भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर द्वारा दरभंगामे आयोजित मिथिलाक्षर एवं कैथी लिपि प्रशिक्षण कार्यशालामे मिथिलाक्षरक प्रशिक्षण, 2018 ई. 16. संसाधन पुरुष- फरवरी, 2023 मे इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्रक अन्तर्गत राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशनमे मैथिलीक अप्रकाशित पाण्डुलिपिपर सेमिनार एवं अभिविन्यास (orientation) कार्यक्रममे सहभागिता। 17. संसाधन पुरुष- राष्टीय पाण्डुलिपि मिशन, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा आयोजित विभिन्न स्थानपर पाण्डुलिपि लिप्यन्तरण कार्यशालामे योगदान, चोटीपुरा, उत्तर प्रदेश। दिल्ली आ अन्य स्थानपर। 18. संसाधन पुरुष- कुमार भास्कर वर्मन् संस्कृतपुरातनाध्ययन विश्वविद्यालय, नलबाड़ी, आसाममे पाण्डुलिपि लिप्यन्तरण कार्यशाला, 2025 ई. ऊपरक सूचीक अतिरिक्त बहुत संभव जे किछु छूटि गेल हो। पाठक एवं आलोचकसँ अपेक्षा जे ओ सूचना देताह जाहिसँ हम एकरा पूर्ण कऽ सकब। सम्पादक: धर्मायण पत्रिका प्रकाशित पोथी (मौलिक रचना): 1. घूरि आउ कमला (मैथिली दीर्घकथा, 2000) 2. भ्रूणपञ्चाशिका (मौलिक संस्कृत काव्यरचना), महावीर मन्दिर प्रकाशन, पटना, 2013 ई. 3. दावाग्निः-संस्कृत उपन्यास (प्रकाशनाधीन) 4. गहबरक बाट पर- मैथिली उपन्यास (प्रकाशनाधीन) एकर अतिरिक्त पत्रिकामे किछु कथा, किछु बीहनि कथा सभ प्रकाशित छनि। विदेहक किछु अंकमे हिनक कतिपय बीहनि कथा प्रकाशित भेलनि जे 'विदेह-सदेह-5' मे सेहो संकलित भेलै। कथा, उपन्यास एवं बहुत रास अन्यान्य रचना सभ अप्रकाशित छनि। प्रकाशित पोथी (अनूदित ग्रन्थ): 1. बुद्धचरितम्- (संस्कृत पद्यानुवाद) महाकवि अश्वघोष कृत प्रसिद्ध महाकाव्यक अनुपलब्ध अंश केर तिब्बती एवं चीनी भाषाक अनुवादक आधारपर मूल शैलीमे संस्कृत श्लोकमे रूपान्तरण, महावीर मन्दिर प्रकाशन, 2013 ई. (ई कृति सभसँ महत्त्वपूर्ण अछि। दोसर शती केर ग्रन्थक पुनर्लेखन अनुवादक आधारपर कएल गेल अछि।) 2. कदमों के निशान– डा. धीरेन्द्र नारायण सिंहक मैथिली कविताक हिन्दी काव्यात्मक अनुवाद, 2021 प्रकाशित पोथी (संपादन): 1. यक्षसमागमम्–म.म. परमेश्वर झा कृत संस्कृत काव्यक संस्कृत व्याख्या एवं हिन्दी अनुवाद, 1996 2. रुद्रार्चन-पद्धति- वैदिक साहित्यमे रुद्र सम्बद्ध सूक्तक संकलन, (सह सम्पादन एवं हिन्दी अनुवाद) महावीर मन्दिर प्रकाशन, पटना, 2004 ई. 3. रामार्चन-पद्धति- रामानन्दाचार्य कृत रामार्चन-पद्धति, हिन्दी अनुवाद सहित सह सम्पादन, महावीर मन्दिर प्रकाशन, 2004 ई. 4. दुर्गासप्तशती- स्व. कृष्णचन्द्रमिश्र द्वारा संकलित प्राचीन संस्कृत टीकापर आधारित हिन्दीमे विशेष व्याख्या एवं टिप्पणीक संग, महावीर मन्दिर प्रकाशन, 2005 सँ 2017 धरि कुल 5 संस्करण 5. Mundeshvari: The oldest Recorded Temple in the Country पुस्तक केर हिन्दी भागक सम्पादन, 2008 ई. 6. अगस्त्य-संहिता–वैष्णव आगमशास्त्रीय ग्रन्थक पाण्डुलिपिसँ सम्पादन एवं हिन्दी अनुवाद, महावीर मन्दिर प्रकाशन, पटना, 2009 ई. 7. सोमवारी व्रतकथा, (पौराणिक ग्रंथ), ई पूर्व प्रकाशित ग्रंथ अछि, किन्तु प्रकाशित प्रति सभमे अशुद्धि छल, तँइ प्राचीन पांडुलिपिक आधारपर एकर पुनः संपादन कएल गेल। धर्मायण, खंड 78, महावीर मंदिर पटना, 2009. 8. पुष्पमाला- म.म. रुद्रधर कृत पुष्पमालाक पाण्डुलिपिसँ पहिल बेर सम्पादन एवं मैथिली अनुवाद, कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालयक व्याकरण विभागक स्मारिका, 2011 ई. 9. नाह्निदत्तपञ्चविंशतिकाविवरणम्- म.म. नाह्निदत्तकृत पञ्चविंशतिकाक म.म. रुचिपति कृत विवरण नामक व्याख्याक संग हिन्दी अनुवाद सहित सम्पादन, शास्त्रार्थ, शोधपत्रिका, मिथिला शोध संस्थान, दरभंगा, 2014 ई. Google e-book क्रय हेतु उपलब्ध 10. वैष्णवमताब्जभास्कर (पदच्छेद एवं हिन्दी अनुवाद) आचार्य किशोर कुणालक ग्रन्थ आचार्य रामानन्द एवं उनका वैष्णवमताब्जभास्करक संग प्रकाशित, महावीर मन्दिर प्रकाशन, पटना, 2014 11. व्यवहार-रत्नावली- म.म. पशुपतिकृत व्यवहाररत्नावलीक पाण्डुलिपिसँ सम्पादन, शास्त्रार्थ शोधपत्रिका, मिथिला शोध संस्थान, दरभंगा, 2014 ई. 12. राममानस-पूजा –पेन्सिल्वेनिया विश्वविद्यालय केर संग्रहमे उपलब्ध पांडुलिपिसँ पहिल बेर संपादित। धर्मायण, खंड 84, महावीर मंदिर पटना, अक्टूबर-दिसंबर, 2014 13. मैथिली क्रियापदकोष (व्याकरण ग्रन्थ), म. वै. दीनबन्धु झा कृत, ब्राह्मी प्रकाशन, मधुबनी, 2016 14. माटी की सुगन्ध, विश्व हिन्दू परिषद्क दक्षिण बिहार शाखाक द्वारा प्रकाशित बिहार का गौरव विषयपर स्मारिका, 2016 ई. 15. मिथिलातीर्थप्रकाश,मूल लेखक- श्रीकृष्ण ठाकुर, मिथिला शोध संस्थान, (बिहार सरकारक उच्च शिक्षा विभागक ईकाई, दरभंगा, 2017 16. मैथिलभक्तिप्रकाश, (मैथिली प्राचीन गीत संग्रह) ललितेश्वर सिंह द्वारा संकलित, ब्राह्मी प्रकाशन, 2017, Google e-book क्रय हेतु उपलब्ध 17. सनत्कुमार तंत्रसँ बालराम-स्तव। धर्मार्थ ट्रस्ट, जम्मूमे उपलब्ध देवनागरी पांडुलिपिपर आधारित।, धर्मायण, खंड 93, महावीर मंदिर पटना, मार्च, 2020 18. मांसपीयूषलता- (सम्पादन एवं हिन्दी अनुवाद) म.म. मदन उपाध्याय कृत ग्रन्थक पाण्डुलिपिसँ पहिल बेर सम्पादन, प्रकाशनाधीन। Google e-book क्रय हेतु उपलब्ध (2020) 19. अयोध्या से मिथिला तक (रवि संगम केर संग सहलेखन)- बिहार में श्रीरामसँ सम्बन्धित प्रमुख तीर्थस्थानक संक्षिप्त परिचय, Google e-book, 2020, Google e-book क्रय हेतु उपलब्ध 20. चतुर्भुज दासक जगज्जीवन-चरितम्, रीवा राज पुस्तकालयमे उपलब्ध देवनागरी पांडुलिपिपर आधारित, धर्मायण, खंड 108, महावीर मंदिर पटना, जुलाई, 2021 21. मेघराज प्रधानक अनंत व्रत कथा (1660 ई.) ई एक हिंदी रचना अछि, जे वास्तवमे संस्कृत अनंत व्रत कथाक काव्यात्मक अनुवाद अछि। एकरा देवनागरी पांडुलिपिसँ संपादित कएल गेल छल। धर्मायण खंड. 123. महावीर मंदिर पटना 22. रामानंद आचार्यक रामरक्षा-स्तोत्र, तीन देवनागरी पांडुलिपिक आधार पर रामानंदाचार्य केर हिंदी रचना रामरक्षा-स्तोत्रक पाठ निर्धारण। धर्मायण, खंड. 103. फरवरी, 2021 23. संत जानकी दासक राम-जन्म बधाई। देवनागरी पांडुलिपिसँ रामजन्म एवं कृष्णलीलासँ संबंधित 20 श्लोकक संपादन। धर्मायण, खंड. 105. महावीर मंदिर पटना। अप्रैल, 2021. 24. सुबोध, म.म. पक्षधर कृत। कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय, दरभंगा, 2023 25. जम्मूवर्णनम्, कुमुदनाथ मिश्रक रचना। कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय, दरभंगा, 2023 26. “An Account of the Maithil Marriage” by Maharaja Rameshwar Singh of Darbhanga Raj टिप्पणी एवं हिंदी अनुवादक संग सम्पादन, इसमाद प्रकाशन, 2023ई., 27. सभाकौमुदी, वामोरि नारायण, संस्कृति मन्त्रालय, भारत सरकार, तत्वम् फाउण्डेशन फॉर पॉलिसी एण्ड रिसर्च, पुणे एवं राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन, 2025 28. सभाविनोद, दैवज्ञ दामोदर, संस्कृति मन्त्रालय, भारत सरकार, तत्वम् फाउण्डेशन फॉर पॉलिसी एण्ड रिसर्च, पुणे एवं राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन, 2025 29. भूपरिक्रमणम्, म.म. विद्यापति, पाठोद्धार एवं हिन्दी व्याख्या (डा.विजय देव झा द्वारा अंगरेजी अनुवादक संग), इसमाद प्रकाशन, 2025. शोध-आलेख: क्रम संख्या शोध आलेख केर शीर्षक पोथी / पत्रिका बर्ख 1 सूरदास आ वात्सल्य रस मिथिला मिहिर, पटना 1980 2 अपराध नियंत्रण में धर्म का योगदान जेकेडी न्यूज, दानापुर, पटना 2000, जनवरी 3 मधुबनी में तिरहुता लिपि का अस्तित्व ये मधुबनी है, मधुबनी जिला गजेटियर, जिला प्रशासन, मधुबनी, 2003 4 समन्वय के प्रतीक गौरीशंकर स्व. मदन झा श्रद्धांजलि ग्रन्थ, पटना 2005 5 वाल्मीकि-रामायणे ज्यौतिस्तत्त्वम् डा. उमारमण झा अभिनन्दन-ग्रन्थ, लखनउ 2006 6 रुद्रयामलक प्रक्षिप्त अंशमे मिथिलाक इतिहास मिथिला भारती, मैथिली साहित्य संस्थान, पटना 2014 7 गुरु की गरिमा प्रज्ञानाद, महामण्डलेश्वर स्वामी प्रज्ञानन्द, कालकाजी दिल्ली 2014, 8 अठारहम शताब्दीक एकटा पत्र: मिथिलाक ऐतिहासिक आ सांस्कृतिक तथ्य मिथिला भारती, मैथिली साहित्य संस्थान, पटना 2015 9 मिथिला सँ उपलब्ध कतिपय नव शिलालेख मिथिला भारती, मैथिली साहित्य संस्थान, पटना 2016 10 वनखंडीनाथ महादेव मन्दिर कोइलख, हितनाथ झा (सम्पादक), प्रियदर्शी प्रकाशन, पटना 2017 11 Some Inscriptions from Mithila मिथिला भारती, मैथिली साहित्य संस्थान, पटना 2017 12 संस्कृत वाङ्मय को बिहार का अवदान भारती, बिहार राज्य संस्कृत अकादमी, पटना 2018 13 पंजीक इतिहास आ ओकर प्रासंगिकता मड़बा, सबिता झा खान, एम.एन.ठाकुर, रिपुंजय ठाकुर (सम्पादक) 2018 14 अंधराठाढ़ीक तीन अभिलेख भामती, भामती-वाचस्पति स्मारक निर्माण समिति, ठाढ़ी 2018 15 वाल्मीकि रामायण में अयोध्या की अवस्थिति द पब्लिक, काठमाण्डू, नेपाल, सावन 2077. 2020 16 सौराठ गाँव तथा सभा का इतिहास जेकेडी न्यूज, दानापुर, पटना 2020, फरवरी, 17 संस्कृत शिक्षा एवं आर्थिक आत्मनिर्भरता जेकेडी न्यूज, दानापुर, पटना 2020, मार्च, 18 विदेह की राजधानी मिथिला नगरी की खोज मिथिला की खोज, इसमाद प्रकाशन, दरभंगा 2020 19 मिथिला का वस्त्र उद्योग अरिपन, सविता झा खान, शिवालिक प्रकाशन, दिल्ली 2021 20 नान्यदेव के भरत-भाष्यम् में आत्मप्रकाश अरिपन, सविता झा खान, शिवालिक प्रकाशन, दिल्ली 2021 21 मिथिला में राम तथा शिव की एकता के सन्दर्भ द हेडमास्टर,(अम्बिकानाथ मिश्र स्मृतिग्रन्थ) ईसमाद प्रकाशन, दरभंगा 2022 22 मिथिलाक्षर/तिरहुता लिपि की प्राचीनता एवं वर्तमान स्वरूप बिहार में भाषाओं एवं लिपियों का विकास, सुभाष शर्मा (सं.), बिहार विरासत विकास समिति, पटना, 2022 23 मिथिला आ ओकर अस्मिताक निर्धारक तत्त्व मिथिला गोआ दर्पण, मिथिला समाज, गोआ 2022 24 संत लक्ष्मीनाथ गोसांईं के देहावसान की तिथि पर एक विमर्श धरोहर, अंक 10, श्री उग्रतारा सांस्कृतिक महोत्सव, महिषी (सहरसा), बिहार की स्मारिका 2023 25 मिथिला विभूति रोहिणीदत्त गोसाँई एवं हुनक कृति अनुप्रास, पत्रिका वर्ष 4, अंक -7, संपादक- दीप नारायण, इन्द्र परिसर, लहेरियागंज मधुबनी, बिहार, 2023 26 जनक-क्षेत्र एवं उसके विस्थापन का एक प्रलेखित अपवाह स्मारिका, अहल्यास्थान सांस्कृतिक महोत्सव, अहल्या स्थान, दरभंगा 2023 27 सीता के जन्म की  मैथिल कथा सीतामढ़ी से प्रकाशित पुस्तक में 2023ई. 28 मिथिलाक पंजी आ ओकर संरक्षणक दिशामे श्री गजेन्द्र ठाकुर प्रीति कारण सेतु बान्हल, संपादक- आशीष अनचिन्हार 2024 29 कोशी क्षेत्र के पौराणिक सन्दर्भ धरोहर, अंक 11, श्री उग्रतारा सांस्कृतिक महोत्सव, महिषी (सहरसा), बिहार की स्मारिका 2024 30 मिथिला क्षेत्र की पाण्डुलिपियों में मूलग्राम का उल्लेख एवं उपयोगिता तत्त्वबोध, अंक 9, राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन एवं इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र., दिल्ली 2024 31 वाल्मीकि-रामायण में श्राद्धकर्म का स्वरूप तर्पण, पितृपक्ष मेला, गया, जिला प्रशासन 2024 32 मिथिलाक परम्पराक रक्षामे एहि न्याससँ अपेक्षा धरोहर, डा. इन्द्र नाथ झा एवं डा. सदानन्द झा (सम्पादक). पण्डित हरिनारायण झा एवं पण्डित शिवनानारायण झा शैक्षणिक एवं सामाजिक सहयोग न्यास, हाटी, मधुबनी (बिहार) 2024 भूमिका-लेखन: क्रम संख्या पुस्तक नाम लेखक प्रकाशन बर्ख 1 पंजी-प्रबन्ध भाग 1 डा. योगनाथ झा अंकित प्रकाशन, सरिसब-पाही, मधुबनी 2010ई. 2 न्यायपालिका दशा ओ दिशा न्यायमूर्ति राजेन्द्र प्रसाद (अ.प्रा.) प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली 2019 3 असतो मा सद्गमय डा. एस.एन.पी. सिन्हा वातायन, पटना 2019 4 मगही मेघदूत बाबूलाल मधुकर बाबूलाल मधुकर 2021 5 जागऽ मक्खलि अइलन बाबूलाल मधुकर बाबूलाल मधुकर 2022 6 साम्ब-पुराण प. गौरीकान्त झा सम्मान ओ पुरस्कार– भवनाथ झाकेँ निम्नलिखित संस्था द्वारा सम्मानित कएल गेल अछि: 1. दिव्यरश्मि सम्मान, 2016, पवनसुत सर्वागीण विकास केन्द्र, पटना 2016, 2. “संस्कृतसेवी सम्मान”, संस्कृत संजीवन समाज, पटना, 2016 3. साहित्य-लेखन केर क्षेत्रमे ‘केवल सच’ मासिक पत्रिका, पटना द्वारा चम्पारण सत्याग्रह सम्मान, 2017 4. श्रीमन्निग्रहाचार्ययशोवर्द्धनसम्मान- साहित्य संम्पादन के क्षेत्र में, 2022ई. 5. “हिन्दीसेवी सम्मान” हिन्दी साहित्य सम्मेलन, पटना, दिनांक 14 सितम्बर, 2020, हिन्दी-दिवस केर अवसरपर 6. मिथिला विभूति सम्मान, विद्यापति सेवा संस्थान, दरभंगा, 2023 ई. 7. हस्तलिपिविशेषज्ञसम्मानम्, 2025, कुमार भास्कर वर्मन् संस्कृतपुरातनाध्ययन विश्वविद्यालय, नलबाड़ी, आसाम द्वारा। 8. सद्गृहस्थ जगन्नाथ चौधरी शोध-सम्मान-2025, जय-राम शोध संस्थान, सुल्तानपुर, कुशेश्वर स्थान, दरभंगा द्वारा भवनाथ झा एवं हुनक परिवारक फोटो सभ: चित्र-2 पिता पं. अमरनाथ झा, चित्र-3 माता योगेश्वरी देवी चित्र-4 पत्नी श्रीमती कुमुद झा, चित्र-5 पुत्री श्रीमती आरती मिश्र चित्र-6 पुत्री अलका झा, चित्र-7 पुत्र अभिचन्द्र झा चित्र-8 पुत्र श्री राकेश कुमार मिथिला में बहैत अमरावती नदीक पश्चिम कछेर पर गंगौली गाम स्थापना भेल। ओकर संस्थापक छलाह गंगाधर उपाध्याय। हिनका दू बेटा रहथिन- वीर उपाध्याय आ नारायण उपाध्याय। छोट बेटा नारायण उपाध्यायक बेटा शूलपाणि हुनक बेटा संकर्षण एक दिस खण्डवा ग्राम उपार्जन कएल आ हुनक संतति खण्डवला कहौलनि। एही गंगाधर उपाध्यायक ज्येष्ठ पुत्र वीर उपाध्यायक पुत्र देवधर उपाध्याय छलाह जनिक पुत्र आदिदेव रहथि। आदिदेवक पुत्र विकर्ण उपाध्यायक पुत्र वाचस्पति पगौली गामक उपार्जन कएल। एकर नाम पबौली सेहो भेटैत अछि। एहि वाचस्पतिक संतति परम्परामे पं. भवनाथ झा छथि। हुनक वंशावली एना अछि (पंजीप्रबन्ध, भाग 1, डा. योगनाथ झा)- वाचस्पति> बापट >जगद्धर > दिवाकर > सुपन > देवदत्त > शिवदत्त > कृष्णदत्त > सभापति > गोप > रतिपति > कालिदास > सदानन्द > कुलानन्द > धर्मानन्द > टेकानन्द प्रसिद्ध जनार्दन > बुद्धिनाथ > अमरनाथ > भवनाथ। एहिमे शिवदत्त उपाध्याय सिद्ध कहबैत रहथि। ओ कालीक प्रख्यात साधक छलाह आ हुनक चलाओल गेल पूजापद्धति एखनहु धरि एहि वंश मे पारम्परिक रूपसँ अछि। एक स्रोतक अनुसार ओ बढियाम अएलाह आ हुनक वंशज कालिदास झा बढ़ियाम गाम छोड़ि वर्तमान गाम रुपौली आबि बसलाह। कहल जाइत अछि जे महाराज नरेन्द्र सिंहक कालमे जखनि कन्दर्पी घाटक युद्धक सूरसार होमए लागल तखनि राघवसिंहक द्वारा होराय झाक नामसँ 1719ई.मे “चतुरंगिणीपरिसर सहित”देल गेल परिहारपुर-राघोपुरग्रामदानकें हुनक पुत्रहीनताक स्थितिमे वापस लए ओतए पुनः शैन्य-शिविर सुगठित कएल आ तरौनी-राघोपुरक चारूकात लग-पासमे विद्वानक छिट-फुट बसल परिवारकें सुरक्षित स्थान पर बसएबाक उद्यम कएल। एही क्रममे कालिदास झा अपन भागिन खुशिहाल झाक संग रुपौली गाम आबि बसलाह। एहि कालिदास झाक संतति परम्परामे आठम पीढ़ी पर पं. भवनाथ झा छथि। हिनक प्रपितामह जनार्दन झा कें तीन पुत्र- बुद्धिनाथ झा, भगीरथ झा आ ऋद्धिनाथ झा। माझिल भगीरथ झाक पौत्र डा. रमण झा मिथिला विश्वविद्यालयक स्नातकोत्तर मैथिली विभागसँ अवकाशप्राप्त आ अनेक पुस्तकक लेखक छथि। ऋद्धिनाथ झाकें तीन पुत्र आ ओहिसँ कुल 9 पौत्र छथिन्ह। ज्येष्ठ पुत्र बुद्धिनाथ झाकें तीन पुत्र- पं. शक्तिनाथ झा, पं. ललितनाथ झा आ पं. अमरनाथ झा। एहिमे माझिल भाइ पं. ललितनाथ झा न्यायशास्त्र आ व्याकरणक विद्वान् छलाह। काशीमे शिक्षा पाबि 1935 ई.मे महारानीक आदेशसँ महरैल आबि ओतए संस्कृत महाविद्यालयक स्थापना कएल। मुख्य रूपसँ हिनके सँ अध्ययन कए पं. अमरनाथ झा व्याकरण शास्त्रमे पारंगत भेलाह। पं. ललितनाथ झा पं. अमरनाथ झा दूनू गोटे अपन मामा महावैयाकरण दीनबन्धु झाक सांनिध्य पाबि विद्याक परम्पराकेँ ग्रहण कए आगाँ बढ़ओलनि। पं. अमरनाथ झाकें दू पुत्र तथा एक पुत्री भेलनि। ज्येष्ठ संतान पुत्रीक विवाह कोइलख पछवारिटोलक नारायण झासँ भेलनि। ज्येष्ठपुत्र पं, शम्भुनाथ झा सेहो संस्कृत साहित्याचार्य आ संस्कृत एवं हिन्दीसँ एम.ए. छलाह। ई सोमेश्वरनाथ संस्कृतोच्च विद्यालय, अरेराज मे अध्यापन आरम्भ कएल आ 1978ई.मे बिहार सरकारक अधीन धर्मसमाज संस्कृत उच्चविद्यालय मोतिहारी एवं मुजप्फरपुर में अध्यापक रहलाह। बीचमे किछु दिनक लेल गया सेहो पदस्थापन भेलनि आ मुजप्फरपुरमे रहैत अनुबन्धक आधार पर लंगट सिंह महाविद्यालयमे अध्यापन सेहो कएलनि। पं. भवनाथ झा पिता आ अग्रजसँ संस्कृतक गहन अध्ययन कए आगाँ बढ़लाह। हिनक माध्यमिक स्तर पर शिक्षा लक्ष्मीश्वर एकेडमी सरिसब पाहीमे भेलनि, जतय मैथिलीक प्रख्यात कथाकार मनमोहन झा, पं. लीलाकर झा, आ श्री जितेन्द्र नारायण झा, श्री जीवनाथ मिश्र हिनक शिक्षक रहथि जे हिनकामे लेखनक रुचि जगौलनि। एहि कालमे ई अपन गामक परिसरक पं. भवनाथ झा दीपक, श्री शैलेन्द्र आनन्द, श्रीराज आदि मैथिलीक गणमान्य साहित्यकारक सम्पर्कमे रहलाह। रुपौलीसँ सटल पूबमे अवस्थित जमुथरि गामक पं. मतिनाथ मिश्र मतंग, पं. यन्त्रनाथ मिश्र आदिक प्रेरणा आ सत्संग हरदम भेटैत रहलनि। माध्यमिक शिक्षा समाप्त कए ई जगदीशनन्दन सिंह महाविद्यालय मधुबनीसँ विज्ञान विषयमे इंटरमीडिएट धरि अध्ययन कए रामकृष्ण महाविद्यालय मधुबनी मे 1985-87क सत्रमे स्नातक कएलनि जाहिमे इतिहास, अंगरेजी आ संस्कृत विषय चुनलनि आ ओतएसँ दू वर्षक स्नातक कए 1987-88ई.क सत्रमे महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह महाविद्यालय सरिसबसँ संस्कृत विषयमे स्नातक (प्रतिष्ठा) धरि पढ़लनि। एतए संस्कृतक प्रकाण्ड विद्वान् डा. रामजी ठाकुरक आ घर पर पिताक सांनिध्य हिनका लेल सुअवसर छल। प्रथम श्रेणीसँ स्नातक प्रतिष्ठा उत्तीर्ण कए मिथिला विश्वविद्यालयक स्नातकोत्तर संस्कृत विभागमे डा. त्रिलोकनाथ झा, डा. शक्तिधर झा, डा. चण्डेश्वर झा, डा. श्रीवर्द्धन ठाकुर, डा. कालीकान्त झा आदि प्रतिष्ठित विद्वानसँ एम.ए. धरि पढ़लनि। सत्र विलम्बसँ चलैत छल तें एम.ए.क परीक्षा 1992 ई.मे भेलनि आ 1993क जूनमे यूजीसी द्वारा आयोजित नेट परीक्षा पास कएलनि। तकर बाद दरभंगामे रहैत हिनकासँ पढ़बाक लेल एम.ए. संस्कृतक आठ टा छात्र अएलाह, जिनका पढ़एबाक क्रममे एक वर्ष धरि स्वाध्याय चरम सीमा पर कएलनि। रोजगारक क्रममे ई 1995सँ 1998 धरि सरस्वती शिशु मन्दिर, औंटा (मोकामा)मे अध्यापन कएलनि। आ 1998ई.मे राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान द्वारा मान्यताप्राप्त अजित कुमार मेहता संस्कृत शिक्षण संस्थान, लदौरामे आचार्य कक्षा धरि पढ़ौलनि। एही ठाम रहैत पं. झा कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालयक 18 टा पाण्डुलिपिक लिप्यन्तरण डा. शशिनाथ झाक निर्देशन आ आदेश पर कएलनि। ई क्रम 2003 धरि चलैत रहल। ताबत धरि लदौरा संस्कृत महाविद्यालयक सचिव स्तर पर धांधलीक कारणें आ प्रमाणपत्र मात्र देबाल संस्था रहि जेबाक कारणें ओकर मान्यता समाप्त करबाक निर्देश आबि चुकल छल। सन् 2003ई.मे कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालयक कुलपति आ महावीर मन्दिर पटनाक सचिव आचार्य किशोर कुणालक निर्देशन पर पर पं. झा ओहि महाविद्यालय कें छोड़ि पटना आबि गेलाह, जतए शोध एवं प्रकाशन पदाधिकारीक पद हिनका देल गेलनि। परिवार पं. भवनाथ झाक विवाह मैबी गाममे दरिहरा मूलक कीर्तिनन्दन झाक पुत्र स्व. सुरेश झाक दोसर कन्या कुमुदसँ भेल। एहिमे हिनका दू पुत्र आ दू पुत्री छथिन- श्री राकेश कुमार- कला एवं शिल्प महाविद्यालय, पटनासँ स्नातक धरि आ तकर बाद विश्वभारती, शान्तिनिकेतन (पश्चिम बंगाल) सँ शिल्पकलामे स्नातकोत्तर कए सम्प्रति पश्चिमी चम्पारणमे बिहार सरकारमे ‘जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी’ छथि। श्रीमती आरती मिश्र- ई ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालयसँ एम.ए. संस्कृत) कएने छथि। हिनक विवाह हरिअम्मे मूलक बेहटक मूल निवासी स्व. सुबोध मिश्रक दोसर पुत्र श्री नीरज मिश्रसँ भेलनि। श्री नीरज मिश्र एखनि दरभंगा जिलाक बहादुरपुर प्रखण्डमे बिहार सरकारक प्राथमिक विद्यालयमे प्रधान शिक्षक छथि। ई लोकनि स्थायी रूपसँ दरभंगामे रहैत छथि। श्रीमती अलका झा- ई कोलकाता विश्वविद्यालयसँ विधिशास्त्रमे स्नातक (बी.ए. एल.एल.बी) कए बिहारक न्यायालयमे अधिवक्ताक रूपमे स्थायी पंजीकृत छथि। हिनक विवाह फंदहवार मूलक मंगरौनी निवासी डा. विनयानन्द झाक द्वितीय पुत्र श्री सव्यसाची अभिजित् प्रसिद्धवागीशसँ भेल छनि। श्री अभिचन्द्र झा- ई सम्प्रति पटना एल.आइ.ए.टी. (NIFT)मे फैशन टेक्नोलॉजीक अन्तिम वर्षक छात्र छथि। पं. भवनाथ झाक पिता पण्डित अमरनाथ झा (02-07-1919 सँ 18-06-2000) डा. सतीरमण झा रुपौलीक पगुलवार बढ़ियाममूलक पण्डित जनार्दन झाक पौत्र ओ पण्डित बुद्धिनाथझा पुत्र पण्डित अमरनाथ झाक जन्म आषाढ़ शुक्ल पञ्चमी 1327 साल तदनुसार 02 जुलाइ 1919 ई. के रुपौलीमे भेल रहनि। हिनक माय 'दुर्गा देवी' इसहपुरक मड़रय सिहौलीमूलक पण्डित फेकू प्रसिद्ध विद्यानाथ झाक कन्या (गङ्गानाथ झाक बहिन) रहथिन।जाहिमे ई तीन भाइ तथा तीन बहिन।भाइमे पण्डित शक्तिनाथझा, पण्डित ललितनाथ झा- वैयाकरण, लक्ष्मीवती संस्कृत पाठशाला, महरैलक संस्थापक अध्यापक ओ पण्डित अमरनाथ झा तथा जेठ बहिनक विवाह पाहीटोलक पण्डित महावीर मिश्रसॅ, दोसर बहिनक विवाह कल्याणपुरक हरेनाथ झासँ तथा तेसर बहिनक विवाह गंगौलीक गणेश झासँ भेल रहनि। पण्डित अमरनाथ झाक प्रारम्भिक शिक्षा घरे पर सुयोग्य अग्रज वैयाकरण पण्डित ललितनाथ झासँ प्रथमा धरि भेल रहनि। तदुपरान्त शास्त्री पर्यन्त शिक्षा रमेश्वर लता संस्कृत महाविद्यालय दरभंगा मे पण्डित सदानन्द झाक सान्निध्य मे ग्रहण कएने रहथि। माम महावैयाकरण पण्डित दीनबन्धु झाक सान्निध्यमे व्याकरणाचार्य कएने रहथि आ व्याकरण शास्त्रक मर्मज्ञ विद्वान् रहथि। अध्यापन प्रारम्भ कएलनि श्री हरिगंगा तंत्रलता संस्कृत उच्च विद्यालय सिमरियासॅ, जतय 1959सँ1970 धरि अध्यापन कएलनि। 21 जुलाइ 1970सँ 25 नवम्बर 1987 धरि तेजधारी नन्दन संस्कृतोच्च विद्यालय इसहपुरमे अध्यापन करैत प्रधानाध्यापकक पदसॅ सेवा निवृत्त भेल रहथि। पण्डित अमरनाथ झा उच्च कोटिक वैयाकरण तॅ रहबे करथि। ज्योतिषशास्त्रक सेहो विशेषज्ञ रहथि।ज्योतिषशास्त्रक हिनकहिसँ अध्ययन कएनन्दन संस्कृत महाविद्यालय इसहपुरक प्रधानाचार्य तथा हिनक ममियौत विद्यावारिधि पण्डित माधव झा ज्योतिषशास्त्र ज्ञाता भए टिप्पणी आदि बनबैत रहथि। पण्डित अमरनाथ झा पाण्डुलिपि शास्त्रक पारम्परिक ज्ञानक उद्भट विशेषज्ञरहथि। हिनक प्रख्यात पाण्डुलिपि विशेषज्ञ पुत्र पण्डित भवनाथ झा अपन पितेक सुयोग्य शिष्य छथि। प्राचीन शैलीक तालपत्र लेखन ले तैयार करब, ओकरा लेलमोसि ( रोशनाइ) बनाएब आ बाङक तूरसँ कागज बनाएब आदि हिनक अभिरुचिक विशिष्ट कला छल। हमर सौभाग्य रहल जे महाविद्यालयमे अध्यापनक प्रारम्भिक छः वर्ष आ हिनक अध्यापनक अन्तिम ओ अवधि एकहि परिसरमे इसहपुरमे बितल अछि। प्रारम्भिक कालक व्याकरण सम्बन्धी अनेक जिज्ञासाक समाधान हेतु पण्डित माधव झाक संग हिनक समक्ष उपस्थित भेल छी आ हिनक सरल सहज बोधगम्यशैलीमे बुझेवाक कलासॅ लाभान्वित भेल छी। हिनक अनेक शिष्यमे एक प्रमुख छथि- पूर्वस्नातकोत्तर मैथिली विभागाध्यक्ष,ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालयक प्रख्यात विद्वान् प्रोफेसर डाक्टर रमणझा। पण्डित अमरनाथ झा एक उच्च कोटिक वनस्पतिक ज्ञाता सेहो रहथि। आयुर्वेदिक औषधि ओ धार्मिक महत्वक दृष्टिसँ अनेक वनस्पति अपन आलयमेलगौने रहथि आ हिनक भेषज्य उद्यानक अवशेष अद्यावधि यथासाध्य सुरक्षित दर्शनीय अछि। कौलिक आचार विचार निष्ठापूर्वक पालन केनिहार, अध्ययन-अध्यापन, पूजा पाठ, जप ध्यानक अतिरिक्त समयमे सामाजिक कल्याणार्थ हिनक उच्च कोटिक विचार प्रशस्त रहल। हिनक विवाह बिट्ठो गामक करमहे बेहटमूलक बतहू प्रसिद्ध छत्रनाथ झाक कन्या स्वर्गीया योगेश्वरी देवीसँ, जाहिमे दू पुत्र तथा एक कन्या। पहिल बालकसाहित्य ओ व्याकरण शास्त्रक विद्वान्, शास्त्र चूड़ामणिपण्डित स्व.शम्भुनाथ झा एवं दोसर बालक प्रख्यात पाण्डुलिपि विशेषज्ञ, विभिन्न ग्रन्थक सम्पादक, प्रकाशन प्रभारी, महावीर मन्दिर पटनामे कार्यरत पण्डित भवनाथ झा छथि। एकमात्र कन्या श्रीमती सीतादेवीकविवाह कोइलखक स्वर्गीय नारायण झासँ। हिनक पौत्र श्री बन्धुनाथ झा, श्री शिशुनाथ झा,श्री राकेश प्रसिद्ध महिनाथ झा ओ श्री अभिचन्द्रझातथा पौत्री श्रीमती सुषमादाइ, श्रीमती अंजनादाइ, श्रीमती पद्मादाइ, श्रीमती आरतीदाइ ओसुश्री अलकादाइतथा दौहित्र श्री सन्तोष कुमार झा तथा दौहित्री श्रीमती वीणादाइ ओ श्रीमती रुपमदाइ आदिसँ भरल-पुरल परिवार वर्तमान वर्धमान छनि। आषाढ़ कृष्ण द्वितीया दिनांक 18 जून 2000 ई. के भगवद् स्मरण करैत वैकुण्ठ प्रस्थान कए गेलाह। ओहि पुण्यात्मा कें सतीरमणकसादर नमन आ विनम्र श्रद्धाञ्जलि भावकुसुमाञ्जलि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.३.कल्पना झा- साक्षात्कार कल्पना झा (उपेन्द्रनाथ झा 'व्यास' साहित्य अध्येता, आलोचक एवं कथाकार) आदरणीय भवनाथ झा जीक साक्षात्कार लेबाक अवसर भेटल हमरा, विदेह विशेषांक लेल, जे भवनाथ झा जी पर केन्द्रित रहत। विदेह सँ जुड़ल रहबाक एकटा पैघ उपलब्धि सन देखि रहल छी, साक्षात्कार लेबाक एहि अवसर केँ हम। जाहि मिथिलाक बुद्धिजीवी वर्ग सर्जनात्मक साहित्य-कथा, कविता आदि लीखि अपन कर्तव्यक इतिश्री बूझि लैत छथि, ओहिठाम भवनाथ झा शिलालेख-विज्ञान आ पाण्डुलिपि-विज्ञान सन कठिन क्षेत्र चुनलनि आ निरंतर लागल छथि गहन अध्ययनमे। यात्री जीक स्लोगन "नबतुरिए आबओ आगाँ" जकाँ भवनाथ झा जी सेहो युवा पीढ़ीक मार्गदर्शन लेल तत्पर छथि। आगाँ अहाँ सभ स्वयं पढ़ू/देखू, कतेक सटीक/समीचीन आ संतोषप्रद जवाब देलनि अछि भवनाथ झा जी, सभटा प्रश्नक- 1) अहाँ साहित्य रचना सेहो करैत छियै मुदा ओकर संख्या कम अछि। तँ की मानल जाए जे अहाँक साहित्यिक रूपपर संपादकीय रूप भारी पड़ि गेल? ई बात सत्य अछि जे हम सर्जनात्मक साहित्यक लेखन कएलहुँ। सन् 1980सँ 1983 धरि जखनि लक्ष्मीश्वर एकेडमी सरिसब पाहीक छात्र रही तँ ओहि समयमे विद्यापति पर्व समारोहक साप्ताहिक कार्यक्रम चलैत छलै। सरिसब-पाही, लोहना, पैटघाट, लालगंज, राजे, विदेश्वर स्थान- ई सभ ओहि समयमे मैथिली साहित्य लेखनमे उर्वर छल। नवयुवककेँ बड़ बेसी प्रोत्साहित कएल जाइत छलै। हमरा मोन अछि जे एक बेर लक्ष्मीवती संस्कृत महाविद्यालय सरिसब-पाहीमे विद्यापति गोष्ठी रहैक। हम आठम वर्गक छात्र रही मुदा स्वयं श्रद्धेय किरणजी हमरा माला पहिराए अध्यक्ष बना देने रहथि। कहलनि जे हमरा लोकनिक सोझाँमे प्रयास करू। निश्चित रूपसँ ई सभ हमरा लेल उत्साहवर्द्धक छल आ कविता खूब लिखलहुँ। हमर पहिल प्रकाशित कविता 1982ई.मे श्री जगदीश मिश्रक सम्पादनमे ‘सरिसब प्रकाशन समिति’सँ प्रकाशित ‘जिजीविषा’ नामक संकलनमे छपल। बहुत दिन धरि अनेक कविता लिखैत रहलहुँ। जखनि मधुबनीमे कालेजक छात्र भेलहुँ तँ विद्यापति गोष्ठीसँ सम्पर्क टुटि गेल। संगहि ओहि कालमे मैथिलीमे प्रगतिशील साहित्यकार लोकनिक द्वारा चलाओल गेल ‘गद्यात्मक कविता’क वर्चस्व हमारा मैथिली कवितासँ विरक्त कए देलक। एखनहुँ हमर डायरीमे अनेक कविता लिखल राखल अछि। बादमे ‘सगर राति दीप जरए’ कार्यक्रम चलल तँ कथा लिखलहुँ। प्रायः 20 टा कथागोष्ठीमे सम्मिलित भेल होएब आ नव नव कथा पढ़ैत रहलहुँ। बहुतो कथा प्रकाशित भेल। बहुत अप्रकाशितो अछि मुदा ओ सभ कथागोष्ठीमे पढ़ल गेल अछि। ओहि पर सकारात्मक प्रतिक्रिया रहल, उत्साहवर्द्धन भेल। तकर बाद सरिसब पाहीक संस्था ‘साहित्यिकी’क गोष्ठीमे लगभग 2003ई धरि सम्मिलित होइत रहलहुँ। ओहिमे संस्कृतमे सेहो किछु रचना कएल। भ्रूणञ्चाशिकाक रचना ओकरे गोष्ठीक प्रतिफल थीक। सन् 2003मे जखनि पटना अएलहुँ तँ हिन्दीमे सेहो किछु कविता लिखलहुँ। ‘पाँचवाँ स्तम्भ’ पत्रिकामे दिल्लीसँ छपबो कएल। ‘गमलामें पौधा’ एकटा दीर्घ कविता हिन्दीमे प्रकाशित अछि। फेर संस्कृतमे बुद्धचरितम् महाकाव्यक खण्डित अंशकेँ पूरा करए लगलहुँ। अनूदित गद्यक आधार पर अश्वघोषक शैली शब्दावलीकेँ ध्यानमे राखि ओकरा फेरसँ संस्कृतमे छन्दोबद्ध लिखब सेहो सर्जनात्मक साहित्य-लेखने जकाँ रहल। मैथिली सर्जनात्मक साहित्यमे यथार्थवादक दादागिरी हमरा एकरा प्रति अरुचि उत्पन्न कएलक। हम संस्कृत काव्यशास्त्रक अध्ययन कएलाक पश्चात् साहित्यकेँ ‘हितक संग’ बुझलिएक; ओकरा कान्तासम्मित उपदेश मानि लेल आ तेँ ‘अन्हार-अन्हार चिचिअएबा’क स्थान पर ‘एकटा दीप जराए लेब’ नीक बुझए लगलहुँ। यथार्थसँ बेसी हमर नजरि आदर्श पर टिकि गेल। वामपंथ हमरा कहियो नै सोहाएल। हम साहित्यकेँ समाजक दर्पण नै, समाजक दिशा-निर्देशकक रूपमे देखैत रहलहुँ। एहि दिशाहीन वामपंथक विरोधमे किछु कवितो लिखलहुँ- पाकल ईंटामे सदिखन जे दलितक लहू देखै छथि। चूड़ि-चूड़ि कए माटि मिलाबथि, नव घर नहि जोड़ै छथि॥

ऊँच अटारी तोड़थि सदिखन ककरो घर नहि ठाठथि। भूखल चम-चटियाकेँ हरदम छुच्छे पाठ पढ़ाबथि॥

माँटिक भीते रहओ एकर, सदिखन ई सोचै छथि। आह, ओह, रे, बौआ हम्मर एतबे सदिखन गाबथि॥

निस्सन खाम्ह बुझै छथि हड़ी, चाहथि अप्पन नाम। रजनी-सजनी केर मसाला सदा जोगाबथि ठाम॥

दीप देखि कए दूर भगै छथि, खोजथि कोल्हु-समाठ। अन्हारे टा भाखथि सदिखन धएने जरल खोंराँठ॥

मील घेरि कए बन्न कराबथि लूटथि अनकर चास। अपन चासमे चाण खूनि कए गोड़थि सहथ-गड़ाँस॥

बाप हमर छल जाहिल, बाबा रहए महा मोचण्ड। तकरो बाबा आर निखत्तर कएलक खण्ड-पखण्ड॥

काबिल एकसर हमही टा छी भूतक भूत भगाउ। काल्हुक बात काल्हिए, जानब आइ लूटि कए खाउ॥ हम स्नातक स्तर पर इतिहासक अध्ययन कएलहुँ। संस्कृत पढ़ल रहए, भारतक विषयमे, मिथिलाक विषयमे वामपंथी लोकनिक द्वारा जे उकबा गढ़ल गेल छल ताहिसँ आरो हमरा मोनमे ओकरा प्रति विरक्ति उपजए लागल, आ हम ओकर खण्डन करबाक लेल शोधकार्य दिस प्रेरित भेलहुँ। मिथिला, सनातन संस्कृति, एकर साहित्य, एकर उदारता हमरा आकृष्ट कएलक आ ओकर अनुशीलन करैत वामपंथ, आर्यसमाज, ईसाई मिशनरी आदिक द्वारा पसारल गेल भ्रान्तिकेँ दूर करब हमर काज भए गेल आ विशेष रूपसँ मिथिलाक गौरवशाली परम्पराक प्रचार-प्रसार हमरा पाण्डुलिपिशास्त्र दिस अनलक आ हम सभसँ पहिल काज कएलहुँ व्यवहाररत्नावलीक संपादन। 14म शतीक म.म. पशुपतिक ई अप्रकाशित ग्रन्थ हमरा अपने घरमे प्रपितामहक हाथक लिखल पाण्डुलिपि भेटल। पिता पं. अमरनाथ झा पाण्डुलिपिक पारम्परिक ज्ञाता रहथि। हुनकासँ बहुत किछु सीखल आ अभ्यास करए लगलहुँ। सन् 2003 ई.मे महावीर मन्दिर, पटनामे शोध आ प्रकाशन प्रभारीक नौकरी भेटल। आचार्य किशोर कुणाल शोध दिस बड़ प्रेरित कएलनि। ओहो इतिहासक नीक विद्वान रहथि। ‘धर्मायण’ पत्रिकाक संपादनक भार भेटल तँ स्वाभाविक रूपसँ संपादनक कार्य हमर जीवनक अंग बनि गेल।सन् 1998सँ 2003ई. धरि कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालयलेल कुल 18 टा पाण्डुलिपिक लिप्यन्तरण कएलहुँ, जकर पारिश्रमिक सेहो भेटल। एहि अवधिमे डा शशिनाथ झाक निर्देशन हमरा लेल पाथेय बनल। आइ हम जे किछु काज कए रहल छी ताहिमे हुनक प्रेरणा आ हुनकासँ भेटल शिक्षा महत्त्वपूर्ण अछि। 2) शिलालेख पढ़बाक लेल की सावधानी राखल जेबाक चाही। शिलालेखसँ अक्षर सभ सुरक्षित अनबाक कोन-कोन तरीका छै। शिलालेख पढ़ब बेसी कठिन छै। लिपिक ज्ञान तँ पहिल आवश्यकता छै, भाषाक ज्ञानक संग जाहि क्षेत्रक ओ शिलालेख थीक ओहि क्षेत्रक इतिहासक ज्ञान अनिवार्य होइत छै। पढबाक संग ओकर अर्थ लगाएब सभसँ पैघ काज होइत छै। बहुत शिलालेख क्षरणक कारणें टुटल भेटैत अछि, बीच-बीचमे अक्षर मेटा गेल रहैत छै। छैनीक सहायतासँ अक्षर खोधबाक क्रममे बहुत अक्षर बदलि जाइत छै। जँ कुशल शिल्पी रहल तखनि तँ सुडौल अक्षर भेटि जाइत अछि नहिँ तँ जेना-तेना खोधल अक्षरसभकेँ पढ़ि ओकर संगति बैसाएब बड़ कठिन होइत छै। शिलालेखसँ अक्षरकेँ सुरक्षित अनबाक सभसँ नीक उपाय छै इंक स्टंपेज। शिलापट्टकेँ पानिसँ भिजाए ओही आकारक कागज साटि देल जाइत छै आ कपड़ाक परत लगाओल थापी (डस्टर सनक वस्तु) पर कार्बन पाउडर लगाए ओहि भिजल कागज पर ठोकि-ठोकि कए एक-एक अक्षरकेँ उभाड़ल जाइत छै। लिखल अंश उज्जर रहि जाइत छै आ शेष अंश कारी भए जाइत छै। कागज सुखा गेलाक बाद ओकरा उचारि लेल जाइत अछि। ई सभसँ पुरान आ नीक उपाय अछि। एल्युमीनियमक पातर चदरा पर सेहो शिलालेखक छापा बनाओल जाइत छलै। आब फोटोग्राफीक चलनि बढ़ि गेलैए, मुदा अनेक परिस्थितिमे फोटोग्राफीसँ पढ़ला पर संदेह उत्पन्न भए जाइत छै। ई सभ काज करबासँ पहिने शिलालेखक सफाई करब सभसँ आवश्यक होइत छै। खोधल भागकेँ नीकजकाँ सफाइ कए ओहिमे फेरसँ खल्लीक पाउडर लेपि अक्षरकेँ स्पष्ट कए फोटोग्राफी करब उचित रहैत अछि। 3) प्राचीन पांडुलिपि पढ़बाक लेल कोनो अध्येताकेँ कोन-कोन जानकारी एवं सावधानी रखबाक चाही। पाण्डुलिपि पढ़बाक लेल लिपिक ज्ञान शत-प्रतिशत चाही। ओहि लिपिक विभिन्न शैलीक सेहो ज्ञान रहब आवश्यक होइत अछि। पाण्डुलिपि सामान्यतः तीन प्रकारक भेटैत अछि- अपन पढ़बाक लेल लिखल, अनका पढ़बाक लेल लिखल आ बेचबाक लेल लिखल। अपन पढ़बाक लेल लिखल गेल पाण्डुलिपिमे अक्षर एक रूपक नहि रहैत अछि मुदा अशुद्धि बड़ कम रहैत अछि। अनका पढ़बाक लेल जे पाण्डुलिपि लिखाइत अछि ताहिमे अक्षर सेहो कनेक स्पष्ट रहैत अछि आ अशुद्धि सेहो नहिए जकाँ रहैत अछि। मुदा व्यावसायिक लिपिकारक लिखल पाण्डुलिपिमे अक्षर तँ मोती जकाँ चमकैत भेटत किन्तु अशुद्धि बड़ रहैत छै। पाण्डुलिपिक वाचन, प्रतिलिपि तैयार करब वा लिप्यन्तरण करब आ ओकर सम्पादन दूनू भिन्न वस्तु थीक। प्रथम कार्य करबाक लेल लिपिक ज्ञान शत प्रतिशत चाही, भाषाक ज्ञान पचहत्तरि प्रतिशत चाही आ ओहि ग्रन्थक विषयवस्तुक ज्ञान जँ पचासो प्रतिशत अछि, कमसँ कम ओहि शास्त्रक शब्दावलीक ज्ञान अछि तँ लिप्यन्तरणक काज कए सकैत छी। सम्पादनक लेल तँ विषयक पूर्ण ज्ञान परम आवश्यक अछि। तेँ लिपि, भाषा आ विषयवस्तु ई तीनूक ज्ञान पाण्डुलिपि पढ़बाक लेल आवश्यक होइत छै। 4) प्राचीन पांडुलिपि वा शिलालेख लेल कोनो सरकारी गाइडलाइन छैक वा कि नहि? पाण्डुलिपि शास्त्र पर अनेक पोथी लिखाएल अछि। मिथिलाक्षरक पाण्डुलिपिक लेल बंगलामे एकटा पोथी अछि- डा. कल्पना हालदारक ‘पाण्डुलिपि पठन सहायिका।’ ई साहित्यलोक सँ छपल अछि। दोसर पोथी अछि डा. त्रिपुरा वसुक लिखल बाङ्ला पाण्डुलिपि पाठपरिक्रमा। जें कि मिथिलाक्षर, असमिया आ बंगला 1800 ई.सँ पहिने एके रंग लिखल जाइत छल तें ई पोथी एहि तीनू लिपिक पाण्डुलिपि पढ़बा लेल अति उपयोगी अछि। देवनागरी पाण्डुलिपि पढ़बाक लेल डा. सत्येन्द्रक पाण्डुलिपि विज्ञान नामक पोथी राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, जयपुरसँ प्रकाशित अछि। दोसर पोथी वेद कुमारी घई के सेहो अछि- पाण्डुलिपि विज्ञान। संगहि अंगरेजीक माध्यमसँ सेहो बहुत पोथी लिखाएल अछि। जैन पाण्डुलिपि पढ़बाक लेल डा. महेन्द्र कुमार जैन ‘मनुज’क पोथी ‘पाण्डुलिपि : सूचीकरण एवं सम्पादन’प्राकृत जैनशास्त्र एवं अहिंसा शोध संस्थान, वैशालीसँ सेहो प्रकाशित नीक पोथी अछि। भारतक विभिन्न संस्थामे डिप्लोमा आ सर्टिफिकेट कोर्स सेहो छैक। हालहिमे केन्द्रीय शिक्षा विभाग सेहो एकर डिप्लोमा आ सर्टिफिकेट कोर्सक पाठ्यक्रम तैयार करबा लेल एकटा समिति बनौने छल, जकर सदस्य हमहूँ रही। हमरा लोकनि पाठ्यक्रम बनाए जमा कराए देल अछि। योजना छैक जे एकर एक रूपरेखा हो। सम्प्रति संस्कृति मन्त्रालयक दिससँ 2003ई.मे स्थापित संस्था राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन कार्यरत अछि। ई अनेक कार्यशाला आयोजित कए युवावर्गकेँ पाण्डुलिपिक लिप्यन्तरणक लेल तैयार कए रहल अछि। एहि मिशनकेँ आरो सशक्त बनाए ‘ज्ञान भारतम् मिशन’क घोषणा भेलैक अछि, जकर स्थापना दिनांक 11सँ 13 सितम्बर, 2025केँ दिल्लीक विज्ञान-भवनमे आयोजित भेल अछि। एहि राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशनसँ हम 2005ई.सँ जुड़ल छी। एखनहुँ ओकरे लेल लगातार ग्रन्थ-सम्पादनमे लागल छी। शिलालेख पढ़बाक लेल भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षणक दिससँ स्थापितइपिग्राफिक इंस्टीच्यूट सभ अछि। बंगलुरु, मैसूर आदि स्थान पर नीक संस्थान अछि। जे पुरातत्त्व विषयसँ स्नातकोत्तर करैत छथि हुनका लेल एक पत्र पूरा शिलालेखक अध्ययनक व्यवस्था रहैत छनि। व्यवस्था सभटाक लेल अछि। 5) मैथिलीक प्रोफेसर सभ पांडुलिपि वा शिलालेख विज्ञानमे किएक ने आगू अबैत छथि? ई मैथिलीक लेल विडम्बना थीक जे श्रद्धेय रामदेव बाबूकेँ छोड़ि आर केओ एहि दिस प्रवृत्त नहिं भेलाह। मैथिलीक प्राचीन साहित्यक प्रकाशनमे आने भाषा आ विषयक रोटी खेनिहार अपन योगदान कएलनि। मैथिलीक अध्यापक अपनाकेँ एकटा ‘फ्रेम’मे बाँधि बंद कए लेलनि। एहि विषय पर हम बेसी की कहब। कोन नव पोथी प्रकाशित भेलैए, ताहिसँ बेसी खबरि मैथिलीक अध्यापककेँ एहि बातक रहैत छनि, जे कोन कम्पनी, कोन मोटरगाड़ीक नव मॉडल बाजारमे उतारलक अछि! मैथिलीक दुर्भाग्य अछि जे ओ लोकनि शोधक्षेत्रमे पिष्ट-पेषणसँ आगाँ निकलबाक कोनो सामर्थ्य नहिं रखैत छथि। अथवा सर्जनात्मक साहित्य-कथा, कविता आदि लीखि अपन कर्तव्यक इतिश्री बूझि लैत छथि। 6) मैथिलीक पांडुलिपि वा शिलालेख विज्ञान लेल साहित्य अकादमीक कोनो काज छैक वा कि नहि? छै तँ कतेक आ नै छै तऽ किएक? साहित्य अकादमी अपनाकेँ सर्जनात्मक साहित्य आ अनुवाद धरि समेटि लेने अछि। सरकार द्वारा स्थापित संस्थाक अपन सीमाबद्धता छैक, तैँ ओ पाण्डुलिपि वा शिलालेख विज्ञानक लेल कोनो काज नहि कए रहल अछि तँ एकरा कोनो विडम्बना नहि मानल जाए। पाण्डुलिपि-शास्त्र अलग विषय थीक, जकरा लेल संस्कृति मन्त्रालयक राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशनक स्थापना भेल अछि, आ ओ मिथिलाक लेल सेहो काज कए रहल अछि। 7) मिथिलामे पांडुलिपि वा शिलालेख सुरक्षित रखबाक कोन-कोन संस्थान छै? दरभंगामे मिथिला शोध संस्थान, कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय, चन्द्रधारी संग्रहालय, लक्ष्मीश्वर पुस्तकालय, कल्याणी फाउंडेशन संस्था पाण्डुलिपिसँ भरल-पूरल अछि। मिथिला शोध संस्थान 1951 मे पाण्डुलिपिक संरक्षण आ ओकर सम्पादनेक लेल स्थापित भेल छल। कामेश्वर सिंह 62 बीघा जमीन, तीन लाख चालीस हजार रुपया आ अपन राज पुस्तकालयक पाण्डुलिपि ओकरा देने रहथिन। एहिठामसँ अतीतमे काजो बहुत भेल छै, मुदा लगभग 35 वर्षसँ ई मृतप्राय भेल सड़ि रहल अछि। एखनि धरि पाण्डुलिपि सूची सेहो नहि छपि सकल छै। पटनामे पटना विश्वविद्यालय, पटना संग्रहालयक प्रकाशन विभागक रूपमे पुनरुज्जीवित बिहार रिसर्च सोसायटी, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, के.पी. जायसवाल रिसर्च इंस्टीच्यूट, खुदाबक्श पुस्तकालय, जैन मन्दिर आदि पाण्डुलिपिसभक पैघ संग्रहकर्ता संस्था अछि। एकर अतिरिक्त बिहार अभिलेखागारमे सेहो बहुत पाण्डुलिपि संरक्षित अछि। बिहार रिसर्च सोसायटीक द्वारा महाराजाधिराज कामेश्वर सिंहक व्ययसँ घरे-घरे जाए पाण्डुलिपिक सर्वेक्षण भेलैक। ओकर विवरणी 11 खण्डमे छपबाक योजना बनलैक मुदा चारि खण्ड मात्र छपि सकल, शेष खण्डक सामग्री सेहो नष्ट भए गेलै। मिथिलाक पाण्डुलिपिक दुर्भाग्य नहिं तँ एकरा की कहल जाए। मुदा एखनो बिहार राष्ट्रभाषा परिषदक संग्रहमे मैथिली ग्रन्थक बहुत पाण्डुलिपि छै, जकरा सम्पादित कए प्रकाशित करबाक काज छै। नेपालमे नेवारी लिपिमे मैथिली नाटकक अप्रकाशित पाण्डुलिपि अछि। किछु तँ हालहिमे archive.org पर डिजिटल रूपमे उपलब्ध सेहो भए गेल अछि। नेपाल अभिलेखागारमे बहुत मैथिलीक पाण्डुलिपि अप्रकाशित पड़ल अछि। 8) कैथी लिपि मिथिलाक छै, मुदा कतेक? एहिपर अहाँक कोनो विचार। कैथी मिथिलाक लिपि थीक ई कहब अनुचित होएत। कैथी वास्तवमे उत्तर भारतक समस्त जनभाषाक लिपि थीक। कैथी मूलरूपसँ हरियाणाक महाजनी आ देवनागरीसँ निकलि नागरीक सरलीकृत रूपमे जनभाषाक साहित्य-लेखनमे व्यवहृत भेल। एकर एकटा दक्षिणी शाखा आधुनिक गुजराती लिपि बनल। तें जकरा हमरा लोकनि कैथी कहैत छियै से अवधी, ब्रजभाषा, भोजपुरी, मैथिली, मगही, काशिका आदि सभ जनभाषाक लिपि थीक। सभ भाषाक रचनाक पाण्डुलिपि कैथीमे भेटैत अछि। हँ, क्षेत्र-भेदसँ एकर स्वरूपमे किछु अंतर आबि गेल छै। मिथिलाक कैथीमे ‘ल’ अक्षरक जे रूप पाओल जाइत अछि से आनठाम नहि छै। मुदा सभठाम स, श,ष, न,ण, ह्रस्व-दीर्घक विचार, संयुक्त व्यंजनक अभाव- ई सभ सामान्य अछि। तेँ ई मिथिलाक लिपि थीक से सत्य नहि अछि। अपितु मैथिलीक प्राचीन रचनाक पाण्डुलिपि सेहो कैथीमे नहि लिखल गेल। मुंशी रघुनन्दन दास सेहो मैथिली गीतक जे पाण्डुलिपि लिखलनि, सेहो तिरहुता/मिथिलाक्षरमे। तखनि हमरा लोकनि कोन आधार पर एकरा मिथिलाक लिपि मानैत छी से नहि जानि। हँ, 19-20म शतीमे मैथिलीमे लिखल चिठी-पत्री, खर्चाक हिसाब, दोकानक पुर्जा, जमीनक दस्तावेज आदि कैथीमे भेटैत अछि। मुदा मैथिली साहित्य-लेखनमे मिथिलाक्षरेक व्यवहार भेल अछि। 9) वर्तमान समयमे मैथिली लेल देवनागरी लिपि उपयुक्त हेतै, तिरहुता हेतै, कैथी हेतै वा कि रोमन? देवनागरी भारतक सभसँ व्यापक क्षेत्रक लिपि थीक, ताहिमे कोनो संदेह नहि। राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशनक द्वारा प्रस्तुत कएल गेल सर्वेक्षणमे एखनि धरि 20,48,440 पाण्डुलिपि सम्पूर्ण भारतसँ भेटल अछि जे हमरा उपलब्ध कराओल गेल आधिकारिक सांख्यिकी रिपोर्टक अनुसार 52 प्रतिशत अछि। देवनागरी लिपिक कारणें मैथिलीक हानि सेहो कम नहि भेल अछि। आइ हिन्दीक घटाटोप जे मैथिलीक ऊपर पसरल जा रहल अछि, जे मैथिल अस्मिता ध्वस्त भेल जा रहल अछि, तकरा पाछाँ देवनागरीक प्रयोग प्रधान कारण रहल अछि। बंगाल आ आसाम एहिसँ बचल अछि। हमरा लोकनि जतेक जल्दी देवनागरीकेँ त्यागि तिरहुता/मिथिलाक्षरक दिस बढ़ि जाइ से मैथिली भाषा-साहित्यक उन्नति आ मैथिल अस्मिताक संरक्षणमे सहायक होएत। जहाँ धरि कैथीक प्रश्न अछि ओ मैथिलीक लेल उपयुक्त नहि अछि। मैथिलीक ग्रन्थ ‘वर्णरत्नाकर’ नाम धरि लिखबाक सामर्थ्य जाहि लिपिमे नहि छैक जाहि लिपिमे ओ ‘बरनरतनाकर’ लिखाएत तकरा ओहि भाषाक लेल आदर्श लिपि मानि लेब सम्भव नहि। रोमन तँ कोनो भारतीय भाषाकेँ लिखबाक सामर्थ्य नहिं रखैत अछि। भारतीय भाषामे सभटा मिला कए 63 वा 64 टा वर्ण एवं संकेत भए जाइत अछि ओकरा मात्र 26 टा वर्ण वला रोमन केना लीखि सकत? भारतीय भाषाकें लिखबाक लेल रोमन diacritical marks बनाए कहुना काज चलाए रहल अछि। किछु गोटे कहताह जे संस्कृतनिष्ठ मैथिलीक प्रयोगे मैथिलीक अपन प्रकृति नहि थीक। सही बात छै, मुदा एतए इहो ध्यानमे राखए पड़त जे भाषा जा धरि एक टोलमे बँन्हाएल रहत ता धरि ओकर स्वरूप भिन्न होएत। जँ मिथिलाक कोनो गामक कोनो दलित समुदायक भाषाकेँ मैथिलीक मानक भाषा मानब तँ ओ ओही टोल धरिक लेल होएत। ओहि भाषामे हजार लोकक सभामे भाषण नहि कएल जा सकैत अछि। पोथी लिखबामे तँ किन्नहु नहि, किएक तँ ओकर पाठक मिथिलाक कोन क्षेत्रक लोक होएताह से लेखक कें ज्ञात नहिं रहतनि। सर्जनात्मक साहित्यक लेल भलें ओहि माँटि-पानिक भाषाक प्रयोग हमरा लोकनि कए ली, मुदा जखनि साहित्येतर गद्य लिखए लागब, आन भाषासँ वैधानिक सामग्रीक अनुवाद करए लागब, भाषाक व्यापक प्रयोग करबा पर विचार करए लागब तखनि मैथिलीक ओ रूप काज नहि देत। ज्ञान-विज्ञानक क्षेत्रमे शब्दावलीक लेल जखनि हिन्दीकेँ सेहो संस्कृतक शब्दावली उधार लेमए पड़लै, तखनि मैथिलीक लेल सेहो ओएह उपयुक्त होएत। आइ पारिभाषिक शब्दावली सभ बनि गेल अछि, ओकरे व्यवहार करए पड़त आ तखनि कैथी मैथिलीक लेल उपयुक्त नहि रहि जाएत, ‘दिन’‘दीन’ बनि जाएत जे कतहुसँ उचित नहि। आइ मैथिलीकेँ शास्त्रीय भाषा बनएबाक लेल प्रयत्न कएल जा रहल छै आ दोसर दिस एकरा समुदाय-भाषाक रूपमे संकुचित कए व्यापक बनबासँ रोकल जा रहल अछि। वर्तनीक मानकीकरण भए चुकल अछि, ओहिमे संविधानक अनुवाद सेहो भए चुकल अछि, ओकरा मानि हमरा लोकनि आगाँ बढ़ल चली। 10) कोन-कोन ठाम उत्खनन भेलासँ मिथिलाक इतिहास बदलि सकैए? मिथिलामे बहुतो एहन स्थान अछि जतए उत्खननक आवश्यकता छै। सभसँ पहिने तँ बलिराजगढ़क क्षैतिज उत्खनन होएबाक चाही, जाहिसँ ओकर विस्तारक पता लागि सकए आ माँटिक तरमे दबल ढाँचासँ पता लागि सकए जे कि ओ राजधानी छल अथवा कोनो शिक्षाकेन्द्र? हालमे पुरातत्त्वक दृष्टिसँ श्री मुरारी कुमारजी बड़ काज कए रहल छथि। ओ बहुतो नव स्थानक पता लगौलनि अछि। हाबीडीह, शंकरपुर, सकरी, जालपाडीह, लोहनामे लखनदेइ कातक डीह सभक उत्खखन भेलासँ शिलालेख सभ भेटि सकैत अछि। आइयो बहुतो शिलालेख मन्दिर सभमे लागल अछि जकर वाचन नहि भेलैए। बड़ काज बाँकी छै। 11) एखन धरि मिथिलाक सम्पूर्ण प्रामाणिक इतिहास नहि लिखाएल अछि, एकर की कारण आ कोना ई सम्भव हेतैक? ई समस्या मिथिले टाक नहि, सभ स्थानक लेल अछि। इतिहास कहियो पूर्ण नहि लिखाइत छै। नव कोनो साक्ष्य भेटितहि इतिहास बदलि जाइत छै। इतिहास सतत शोधक प्रक्रिया थीक। आवश्यकता छैक जे नव स्रोतक प्रकाशन भेला पर ओकरा मान्यता भेटए। विगत 15 वर्षमे बहुतो साक्ष्य भेटलैक अछि, शिलालेख सभक नव वाचन भेलैए मुदा आइयो 100 वर्ष पहिलुके लिखल इतिहासक मान्यता केँ दोहराओल जा रहल अछि। ई प्रवृत्ति मिथिलाक इतिहासक लेल सभसँ पैघ घातक थीक। इतिहासकारकेँ हरदम ‘अपडेट’ रहए पड़तनि तखनि इतिहास लेखन अपन उचित दिशा दिस बढ़त। 12) जे युवा सभ पांडुलिपि वा शिलालेख विज्ञानमे आबऽ चाहै छथि तनिका लेल कोनो संदेश? शिलालेख विज्ञानमे रोजगारक ओतेक गुंजाइश नै छै, मुदा पाण्डुलिपि-विज्ञान मे जे युवा आबए चाहैत छथि, हुनक स्वागत छनि। बहुत काज छै आ ज्ञान भारतम् मिश्नक स्थापनासँ हम आर आश्वस्त छी जे पाण्डुलिपिक वाचन, ओकरासँ संपादन, पाण्डुलिपिक प्रलेखन (Documentation), ओकर संरक्षण (Conservation)क क्षेत्रमे रोजगारक अवसर एखनो छै आ निकट भविष्यमे आर हेतै। बहुतो एहन योजना बनि रहलैए, जाहिसँ भाषा-साहित्यक अध्ययन कएनिहार युवाकेँ अपन घर पर कम्प्यूटरक माध्यमसँ काज कए नीक आमदनी होएतनि। विशेष रूपसँ जे महिला बाहर जाए नौकरी नहि करए चाहैत छथि, हुनका लेल ई काज सभ नीक रहतनि। कम्प्यूटर पर यूनीकोड मे टाइपिंग करबाक क्षमता विकसित करए पड़तनि आ पाण्डुलिपिकेँ पढ़बाक अभ्यास करए पड़तनि। जे केओ एहि क्षेत्रमे आबए चाहैत छथि, हुनका हम निर्देशन करबाक लेल प्रस्तुत छी। पछिला वर्ष हमरा लग एकटा पैघ काज मिथिलाक्षरक पाण्डुलिपिसँ लिप्यन्तरण करबाक लेल आएल छल जे करएबाक लेल हमरा मिथिलामे केओ नहि भेटलाह तँ कलकत्ताक एक प्रशिक्षु सँ हम कराए देलियनि। ई खेदक विषय रहल। मिथिलासँ युवा-युवती एहि क्षेत्रमे आगाँ आबथि से हमर कामना अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.४.डा.श्री कृष्ण 'जुगनू'-अगस्त्य संहिता- तीस बर्खक प्रतीक्षा डा. श्री कृष्ण 'जुगनू' (पुरातत्विद एवं अनेक संकृत पोथीक संपादक, राजस्थान। संपर्क-9672872766) अगस्त्य संहिता: तीस बर्खक प्रतीक्षा तीन दशक पहिने केर बात। ओहि समयमे हम भक्ति आंदोलनक संत सभपर लिखैत रहैत छलहुँ, ज्ञात भेल जे कि 'अगस्त्य संहिता'मे स्वामी रामानंदक जीवनवृत्ति आएल छै आ ओहिमे हुनक बारह शिष्यक परिचय सेहो छै... ई भागवत पुराणक बारह परम भागवते जकाँ वर्णित छै आ हुनका मनु, भीष्म आदिक अवतार कहल गेल छै। डॉ. पीतांबरदत्त बड़थ्वाल एकर उल्लेख की केलनि, अन्य, लेखक सभ सेहो हुनके अनुकरण केलक आ फेर ई रूढ़ भऽ गेलै। हमरा ई आश्चर्य होइत छल जे यदि ई संदर्भ छै तँ 'अगस्त्य संहिता' बेसी पुरान ग्रंथ नहि हेतै मुदा चूँकि आचार्य हेमाद्रि 1260-70 ई. मे एहि ग्रंथक श्लोक उद्धृत केने छथिन, एहन अवस्थामे कि रामानंद केर विवरण बला पाठ प्रक्षिप्त छै...। फेर, ई श्लोक कल्याण केर अवतारकथा अंक मे सेहो उद्धृत कएल गेल छलै। बारम्बार ई समस्या हमर मनो-मस्तिष्कमे अबैत रहल। 'अगस्त्य संहिता' केर खोज जारी रहल, मुदा जे सभ एकर संदर्भ देथि, से सभ एकर स्रोत बतेबाक लेल तैयार नहि छलाह। मुजफ्फरनगरक एक विद्वानक लेखसँ ज्ञात भेल जे ई ग्रंथ 1906 ई. मे डाकोर केर रणवीर पुस्तकालयसँ प्रकाशित भेल छै तऽ हम डाकोर केर यात्रा सेहो केलहुँ, मुदा पता नहि चलल। तीस साल भऽ गेलै, साक्ष्य सभ ताकब बाँकी छल। अही बीच, 'अगस्त्य संहिता' क 1898 ई. में प्रकाशित अयोध्या संस्करण बला पाठ हमरा मित्रवर श्री नरेंद्र उमरीकरक सहयोगसँ पूना केर एक संग्रहसँ भेटल, ताहिमे केवल संस्कृते पाठ छल। हालहिमे श्री गुंजनक सहयोगसँ ई ग्रंथ सुलभ भेल तऽ चौंकि गेलहुँ। पटनाक पं. भवनाथ झा एकर पुनर्संपादन सहित अनुवाद सेहो केने छथि। पं भवनाथजी अनेको पांडुलिपिक आधारपर एकर संपादन करैत प्रमाणित केलाह जे रामानंद बला विवरण शुद्ध रूपसँ प्रक्षिप्त छै आ जाहि भविष्योत्तर खंडक बात कहल जाइत छै, ओ 1903 ई. सँ किछु समय पूर्वे जोड़ल गेल छै। मूल ग्रंथमे केवल 32 अध्याय छै आ एहिमे आर कोनो खण्ड नहि छै। क्षेपककार अगस्त्य संहिताकेँ पढ़ने नहि छलाह, अन्यथा ओ 33म अध्यायसँ अपन पाठक आरंभ करैत जखन कि ओ 131म अध्यायसँ लेखन केने अछि...। एहिमे रामानंद सहित हुनक द्वादश शिष्यक जयन्तीक आयोजनक मुख्यध्येय लगैत अछि...। ई निश्चिते परवर्ती अछि। हमर आशंकाक समाधान पं. भवनाथजीक एहि भूरिश्रमा ग्रंथसँ भेल अछि। 'अगस्त्य संहिता' राम केर पूजक सभ लेल आधारभूत सामग्री प्रस्तुत करऽ बला ग्रंथ अछि। पं भवनाथ झा जीकेँ आभार जे ओ हमर सुदीर्घ शंकाक समाधान करबाक मार्ग प्रशस्त केलाह...। (हिंदी लेख केर मैथिली अनुवाद आशीष अनचिन्हार द्वारा) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.५.Vijay Deo Jha-Pandit with MacBook and manuscripts Vijay Deo Jha (The author of this article is a journalist, author, and political strategist. Contact Number- 7717760438) Pandit with MacBook and manuscripts Scholars in Mithila have long cherished the noble temptation of nurturing their children to surpass them in scholarly pursuits, ensuring that the illustrious tradition of learning is preserved, enriched, and passed on from one generation to the next. The late noted Sanskrit grammarian, Pandit Amarnath Jha of Haṭāḍh Rupauḷī village in Madhubani district of Mithila, had the same noble urge to mentor and mould his two worthy sons, Shambhunath and Bhavanath, as scholars in the distinguished Mithila tradition of learning. While both vindicated the dictum of ‘worthy sons of a worthy father,’ it was Bhavanath Jha who rose beyond all expectations. He chose not to remain content as a Sanskrit scholar in the traditional sense, limiting his study merely to Pāṇini’s grammar, the admiration of finer prose of Kālidāsa, or writing annotations on Dharmaśāstra. He charteda more difficult terrain of academic pursuit that requires serious researches and in-depth understanding of history. In the second decade of this century, the academic world of Mithila begun to notice a young pandit whose research, annotations, interpretations, explanations, and significant inquiries into the traditional Mithila school of learning filled scholarly circles with interest and appreciation.Most importantly, his remarkable works in the field of Indology, historical research, rediscovering and reconstructing the lost and forgotten treasures of knowledge and the knowledge tradition of Mithila won accolades for him. In recent times, Bhavanath Jha has once again garnered significant recognition in academic circles for his exceptional work in deciphering and interpreting ancient manuscripts. Associated with the National Manuscript Mission, his scholarly contributions have shed new light on historical knowledge and have further enriched the understanding of traditional intellectual heritage of Mithila. The whole gamut of his literary, academic, and intellectual pursuits reveals his serious intent to recalibrate and reestablish the intellectual and cultural glory and supremacy of Mithila, which had lost its shine. My association with Bhavanath Jha began around 2017. He would often greet you by sending some rare books, articles, and research papers on history, Dharmashastra, and related subjects for you to read. We had differences of opinion on many academic issues, and we still enjoy differing and being at loggerheads; but with great reverence, he has been a reference whenever any question or curiosity arises. When I first met him, he was a portrayal quite in contrast to any archetypical Sanskrit scholar of Mithila. Here was a Pandit with a MacBook and a mountain of manuscripts and books all around, making the best use of technology to decipher and disseminate the treasures of classical knowledge including that of Mithila. I found him deeply rooted in the past, his feet firmly planted in the present, and his vision sharp toward the future. I had the opportunity to work closely with him on two academic projects — Biography of an Indian Patriot: Maharaja Lakshmishwar Singh of Darbhanga by the late Jata Shankar Jha, and Bhū-Parikramana by Mahakavi VidyapatiEsammad group.In the former, I served as the editor an exclusive undertaking of mine, while in Bhū-Parikramana I worked as the co-editor and translator alongside him. I come from a family renowned for its rich academic and scholarly excellence, revered as a cornerstone of the Maithili language, literature, and its cultural movement.Hence, as if by default—or shaped by the very air of literary pursuit that surrounded me—I inherited a natural inclination for scholarship and a deep commitment to literary and historical research. So, when I started editing project on Biography of an Indian Patriot: Maharaja Lakshmishwar Singh of Darbhanga, Bhavanath Jha remained my constant companion and guide throughout this challenging project. Editing is not the right domain for the lazy or the laggard, for they often mistake it for mere reproduction of the original work and end up doing just. In academia, editing is a most assiduous task that demands critical insight, appreciation, examination, and an in-depth historical understanding of the work under consideration. It entails not only rigorous evaluation but also the valuable additions to the original text. That has been the rudiment of literary editing which I learnt from my scholar father late Dr Ramdeo Jha. The above-mentioned book, written by the noted historian Dr. Jata Shankar Jha, which came into my hands for editing, is one of the finest, deeply researched, and most authentic works ever written on Maharaja Lakshmishwar Singh, the illustrious scion of the Kandwala dynasty.I became cautious and worried because this project demanded a great deal of times and patience, deep penetration, the ability to understand contemporary history, and the faculty to assimilate it within a modern context. It was more than that what I had estimated. Fortunately, Bhavanath Jha graciously assisted me in this project, and I reserved my highest honorific and words of gratitude for him by calling him my editor.He insisted that I completely revise the book's layout to bring it on par with international standards. Furthermore, he asked me to verify every statement and fact in the book with appropriate references and citations. As a result, over a hundred citations and references were included in the edited version with each historical fact with multilayer decoding and descriptions. In addition, previously unknown information, rare illustrations, some of the rarest documents, and multiple editor’s notes were added.This is not an act of self-praise or an attempt to seek validation for my editorial skill; rather, it is a sense of satisfaction in having substantially increased the value and volume of the original work.My year-long research endeavour received fulsome praise and critical appreciation from reviewers.It would be dishonest not to share the moments of praise and recognition with Bhavanath Jha. He was instrumental in the entire effort, frequently searching documents and providing citations and references from extensive archival sources, in addition to personally designing the book’s page layout. We encountered a number of interesting instances, and these anecdotes make for very lively reading. One such instance was related to Ragus. The late king had mentioned Ragus in his diary, arousing our curiosity. Finding Ragus was like searching for a needle in a haystack.I had nearly given-up my hope and attempt to find about Ragus. After all I can’t halt my project for the sake of Ragus. But Bhavanath Jha did not. One quiet, lifeless night, he called me with rare excitement — he had discovered who Ragus was. He even had an entire set of prescriptions written by a doctor for Ragus. Before you rush to imagine that Ragus was some eminent figure — a British official, perhaps, or someone from the Raj Darbhanga court — know this: Ragus was, in truth, the favourite horse ridden by Lakshmishwar Singh.His chase for Ragus makes a separate and very engaging story on how a diligent researcher-editor, driven by curiosity and persistence, can uncover remarkable truths hidden within the folds of forgotten history.The editor must possess historical insight and deep familiarity with the subject, book, and author they intend to edit, ensuring precision and authenticity in their work. My joint academic endeavour with Bhavanath Jha was the translation and editing of Bhū-parikramaṇa, the renowned work of Mahakavi Vidyapati, which has recently been published in three languages — Sanskrit, Hindi, and English.Scholars have so far regarded Bhū-parikramaṇa as a collection of moral tales, whereas in fact, it stands as the earliest example of gazetteer literature ever written, establishing Vidyapati as the forerunner of this genre. The book presents a vivid and descriptive geographical account spanning from Haryana to Mithila. The original manuscript of Bhū-parikramaṇa, on which Munishwar Jha and Basukinath Jha had based their work and which was originally kept at Calcutta Sanskrit College, could not be traced for firsthand verification of the text. As we primarily relied upon the works of these two scholars, we found them riddled with errors—both grammatical and factual. Bhavanath Jha asked me to search for authentic secondary sources. Fortunately, during the course of research, several scholarly articles and references related to Bhū-parikramaṇa were discovered, in which portions of the original text were quoted in fragmented form. These references enabled comparisons, refinements, and rectifications of the extant version of Bhū-parikramaṇa available in the academic domain. Bhavanath Jha, known as a veteran grammarian and expert in manuscript reading, verified, rectified, and reconstructed the entire text of Bhū-parikramaṇa, uncovering many new details. He corrected numerous misspellings of place names, such as Harabhumi to Haribhumi, Sūnapīṭha to Sūtapīṭha, and several others. He worked extensively on identifying the geographical locations mentioned in Bhū-parikramaṇa. He would often insist on consulting James Rennell’s map and old geographical records for reference.Bhū-parikramaṇaalso presents a challenge for archaeologists: identifying the many place names, villages, towns, and capitals it records. He insisted to match ancient names to present-day sites based on linguistic similarities and geographical clues. Fascinatingly, certain place names from the Ramayana are re-examined through this lens One of our interesting findings is that present-day Janakapura in Nepal was neither the abode of Goddess Sita nor the site where her marriage with Lord Ram was solemnized. Vidyāpati mentions Janakapura twice, he offers no descriptive account of the place. Rather, he refers to it merely as a point of reference or a landmark for measuring distances to other locations. In the chapter concerning Janakadeaa, Vidyapati describes all other places except Janakapura. It is difficult to imagine that a scholar-poet of Vidyapati’s calibre would overlook Janakapura so casually—especially given its supposed association with Goddess Sita and its identification as the site of her marriage. Janakapura was a well-known religious site during Vidyapati’s time; however, no evidence suggests that it was explicitly connected with the Ramayana tradition.While working on this issue Bhavanath Jha had meticulously examined all the facts. An editor must be objective and firmly grounded in the facts and claims they make, and this quality I found in Bhavanath Jha, whose approach and style of editing are remarkably distinct.It is neither my place nor my stature to be the jury on his scholarly wisdom and acclaim, yet I see in him a great hope for the revival of the Mithila school of learning and the grand tradition of erudition for which Mithila has been known.His scholarly undertaking means a great deal for the present and for posterity. This Pandit with MacBook and manuscripts is infusing pixels with palm leaves. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.६.डा.विनयानन्द झा-पं.भवनाथ झाक पाण्डुलिपिसँ संपादित पोथीक अद्यतन सूचना डा. विनयानन्द झा (मधुबनी जिलाक इतिहासपर अनेक पोथी प्रकाशित, इतिहासकार, पंजी शास्त्रक ज्ञाता। संपर्क-8877374666) पं. भवनाथ झाक पाण्डुलिपिसँ संपादित पोथीक अद्यतन सूचना मधुबनीक रूपवल्ली (रूपौली) गामक निवासी आ महावीर मन्दिर, पटनाक प्रकाशन विभागक प्रभारी एवं सम्पादक पण्डितकुल नलिनी दिवाकर श्री भवनाथ झा संस्कृतक उच्च कोटिक विद्वाने टा नहि, अपितु विविध लिपियो (प्राचीन-अर्वाचीन)क ज्ञाता सेहो छथि। ई प्राचीन पाण्डुलिपि, शिलालेख आदिकेँ पढ़बामे पटु छथि। अनेक राज्य सरकार, केन्द्रीय सरकार आ विभिन्न शैक्षणिक संस्थान सभक द्वारा पाण्डुलिपि सभकेँ पढ़बा आ संपादन करबामे हिनक सहायता लेल जाइत अछि। हमरा सनक अधीर एहि बातसँ दुःखी रहैत छथि जे वाचस्पतिक भूमि एक्कैसम शताब्दीमे पण्डित शशिनाथ झाजीक बाद संस्कृत विद्या में वन्ध्या ने भए जाए। परन्तु जहियासँ हिनकासँ परिचय भेल, हम आश्वस्त भेलहुँ जे मिथिला मे भवनाथजी-सन विद्वान छथि। पं. झा आइ लगभग 30 वर्षसँ सारस्वत सेवामे छथि आ हिनक एतेक दिनक सभ योगदानकेँ एकत्र करब कठिन समस्या छल। एहि समस्याक समाधान हमर पुतोहु सौ. अलका झा कए देलनि। ओ हुनक पुत्री छथि आ स्वयं विधि-शास्त्र (बी.ए., एल.एल.बी.)क अध्ययन कोलकाता विश्वविद्यालयसँ कएने छथि। ओ अपन पिताक सभटा रचनाक संबंधमे सूचना व्यवस्थित कए आलेखक आधार-सामग्री तैयार कए देलनि। ओकरे आधार पर समस्त आलेख अछि। पं. झाक महान् कृति (magnum opus) छनि ‘बुद्धचरितम्’ के खण्डित अंशक पुनः प्रतिस्थापन। ई मूल रचना दोसर शताब्दीक प्रसिद्ध कवि अश्वघोषक थीक। मूलरूपमे 28 सर्गमे लिखल गेल छल। दुर्भाग्यवश प्रथम सर्गक लगभग 15 टा श्लोक आ 14म अध्यायक आगाँ सभ सर्ग नष्ट भए गेल। नेपालमे सेहो एक व्यापक अन्वेषण भेल, मुदा नहि भेटि सकल। एहि ‘बुद्धचरितम्’क सम्पूर्ण अनुवाद चीनी भाषामे पाँचम शतीमे धर्मरक्ष नामक बौद्ध विद्वान् कएने रहथि, जकर अंगरेजी अनुवाद सैम्युएल बील कएलनि, जे उपलब्ध अछि। एही ‘बुद्धचरितम्’ के समग्र अंशक दोसर अनुवाद सातम शतीमे तिब्बती भाषामे भेल छल, जे सुरक्षित रहल आ ओकर अंगरेजी अनुवाद ई.एच. जॉन्स्टन कएलनि। एहि दूनू अनुवादकेँ सोझाँ राखि तिब्बती अनुवादक श्लोक संख्याक अनुसरण करैत अश्वघोषक छन्दोयोजना आ शाब्दिक प्रवृत्ति केँ ध्यानमे रखैत पं. झा संस्कृतमे एकर पद्यानुवाद प्रस्तुत कएलनि। ई एक प्रकारक प्रतिस्थापन (Restoration) थीक, जे अश्वघोषक मूल रचनाक आभास दिअबैत अछि। एकर प्रकाशन महावीर मन्दिरसँ 2013 ई.मे भेल अछि। हिनक एक लघु कृति ‘भ्रूणपंचाशिका’ सेहो प्रकाशित अछि। कन्या भ्रूण हत्याक विरुद्ध ई 50 श्लोकक मार्मिक संस्कृत काव्य अछि, जकर अनुवाद सेहो प्रकाशित छैक। अगिला दिन जाहि कन्याक भ्रूणकेँ नष्ट कए देबाक योजना बनि चुलक छै, ओ रातिमे अपने मायकेँ व्यथा सुनबैत अछि, नारीक गरिमाक व्याख्या करैत अछि। एकर एक-एक श्लोक करुणामिश्रित आक्रोशसँ भरल अछि। एकरो प्रकाशन महावीर मन्दिरसँ 2013 ई.मे भेल अछि। पं. झा मूल रूपसँ सम्पादक छथि। हिनका अप्रकाशित ज्ञान-परम्पराकेँ संपादित कए प्रकाशित करबाक प्रति विशेष रुचि छनि। आ इएह रुचि हुनका पाण्डुलिपि-विज्ञान दिस आगाँ बढ़एबाक काज कएलक अछि। हमरा लोकनिक पूर्वज जे लीखि गेल छथि ओ समग्र रूपसँ जा धरि उपलब्ध नहि होएत, ओकर अध्ययन नहि कएल जाएत ता धरि ओकर ज्ञानमय स्वरूपक निर्धारण सम्भव नहि अछि। वास्तविकता ई अछि जे मिथिला सहित सम्पूर्ण भारतमे जतेक ग्रन्थ लिखल गेल ओकर अधिकांश भाग नष्ट भए चुकल अछि। मिथिलामे बाढ़ि आ अगिलग्गी दूनू एन पाण्डुलिपि सभकेँ बड़ हानि पहुँचौलक। नालंदाक अगिलग्गी आ उजाड़ विख्यात अछि, तैयो आइ बहुतो एहन ग्रन्थ अछि जकर लिखित प्रति ठाम-ठाम उपलब्ध अछि, मुदा ओकर प्रकाशन नहि भेल छै। प्राचीन लिपि होएबाक कारणें सभक लेल ओकरा पढ़ब सम्भव नहि छै, तेँ ओकरा आधुनिक लिपिमे लीखि ओकर प्रकाशनक आवश्यकता छै। एही आवश्यकताक पूर्ति पं. झा करबाक लेल उद्यत होइत छथि। मिथिलाक जाहि ज्ञान-परम्पराक ई सम्पादन कएने छथि ताहिमे निम्नलिखित पोथीक चर्चा एक ठाम करब आवश्यक प्रतीत होइत अछि- 1. सुबोध- ई महामहोपाध्याय पक्षधरक रचना थीक। एकर प्रकाशन कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय, दरभंगासँ 2024ई. मे भेल अछि। एकर भूमिका संस्कृतमे लिखल गेल अछि, जाहिमे ओ एकरा म.म. बटेशक पुत्र पक्षधरक रचना मानने छथि। एकर मिथिलाक्षरक पाण्डुलिपिक छाया प्रति हुनका संस्कृत विश्वविद्यालयसँ उपलब्ध कराओल गेल रहनि। एकर संपादकीयमे ओ बहुत रास बात लिखने छथि जे भविष्यक शोधकर्ताक लेल उपयोगी अछि, जेना सुबोध ग्रन्थक चर्चा आन आन परवर्ती धर्मशास्त्रीय ग्रन्थमे कतए कतए भेल अछि तकर उल्लेख अछि। यद्यपि ओ उल्लेख एहि पक्षधरीय सुबोधक नहि थीक, मुदा एहि अन्वेषणसँ एतबा स्पष्ट होइत अछि जे सुबोधक नामसँ मिथिलासँ भिन्न प्रदेशमे सेहो ग्रन्थ लिखाएल अछि। संगहि पक्षधरीय सुबोधमे जाहि ग्रन्थसभक उद्धरण आएल अछि तकर परिचय लीखि संपादक एकर कालनिर्णय आ परम्पराक निर्णयकेँ पुष्ट स्थापित कएने छथि। पं. झा कें मिथिलाक ज्ञान-परम्पराक देशव्यापी प्रसारक जतए कतहु प्रमाण भेटैत छनि ओतए मिथिलाकेँ महिमा-मण्डित करबासँ नहि चुकैत छथि। सुबोध ग्रन्थक भूमिकामे रामदत्तक विवाह पद्धतिक पंजाब प्रान्त धरि प्रसार आ ओकर श्रेय मिथिलाकेँ नहि भेटबाक सूचनाकेँ लिखबासँ नहि चुकैत छथि। मिथिलाक प्रति हिनक अनुराग आ अपनत्वक ई प्रमाण थीक। ई सुबोधकार पक्षधर म.म. बटेशक पुत्र, म.म. भवनाथ मिश्र प्रसिद्ध अयाचीक मामा छलाह आ हमरहि गाम मँगरौनीक निवासी रहथि। 2. जम्मूवर्णनम्- एकर प्रकाशन सेहो कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय, दरभंगासँ 2024मे भेल अछि। मधुबनी जिलाक झंझारपुर प्रखण्डक लालगंज गामक आधुनिक नैयायिक पं. कुमुदनाथ मिश्रक ई रचना थीक। एकर भूमिकासँ स्पष्ट होइत अछि जे रचनाकार पं. मिश्रक देहान्त भेलाक बाद हुनक बस्तामे राखल एहि काव्यक अस्तव्यस्त पन्ना सभकें समेटि ओकरा क्रमसँ लगाए भवनाथजी एकर पाण्डुलिपि तैयार कएलनि। ओ पन्ना सभ वास्तवमे ‘रफ कापी’ छलनि जाहिमे शब्द आ चरणकें काटि-काटि अनेक बेर ओकरा परिवर्तित कएल गल छल, संकेत दए श्लोककेँ आगाँ-पाछाँ कएल गेल छल। पं. झा अपन संस्कत ज्ञानक उपयोग कए ओकरा व्यवस्थित कएलनि आ प्रेस कापी तैयार कए हुनक पुत्र पं. मोहन मिश्रजी कें देलनि। अन्ततः ओ विश्वविद्यालयसँ प्रकाशित भेल। एहि सम्पादनमे जम्मूवर्णनम् काव्यक अतिरिक्त 10 गोट समस्यापूर्ति, स्फुट श्लोकक 7 टा संकलन, आ मैथिलीक चारि कविता, हिन्दीमे समस्यापूर्ति, गीत आ अन्तमे पं. मिश्रक न्यायशास्तीरय ग्रन्थ ‘स्यादवादमञ्जरीविद्युत्’ आ ‘देहात्मवाद-खण्डनम्’ सेहो अछि। एहि ग्रन्थक सम्पादकीय विस्तारसँ अछि जाहिमे जम्मूवर्णनम् काव्यक विषयमे लिखैत काल संस्कृत काव्य परम्पराक प्राचीन आ आधुनिक यात्राकाव्यक परम्परा विस्तारसँ देल अछि आ एकर प्रतिपादन करैत संपादक एकरा यात्राकाव्य मानने छथि। विधाक निर्धारण सम्पादकक महत्त्वपूर्ण काज होइत अछि जकरा पं. झा निमाहने छथि। 3. नाह्निदत्तपञ्चविंशतिकाविवरणम्- म.म. रुचिपति कृत व्याख्याक संग ई सम्पादित लघु ग्रन्थ मिथिला संस्कृत स्नातकोत्तर अध्ययन एवं शोध संस्थान, दरभंगाक शोध पत्रिका शास्त्रार्थक वर्ष 2012-13क चतुर्थभाग में पृष्ठ संख्या 370सँ 392 धरि प्रकाशित अछि। पञ्चविंशतिका मिथिलाक परम्पराक ज्योतिष शास्त्रक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ अछि, जाहिमे मात्र 25 टा श्लोकमे सामान्य व्यवहार-ज्योतिषक सभ बात सूत्र रूपमे कहि देल अछि। एकरा मान्यता आइयो धरि मिथिला सहित सम्पूर्ण भारतमे अछि। एतेक धरि जे राम भट्टक ‘मुहूर्तचिन्तामणि’मे सेहो एकर विवाह-विषयक श्लोक उद्धृत कएल गेल अछि। एकर एकटा विवरणनामक व्याख्याक एकटा पाण्डुलिपि पं. झा कें लालगंजक पं. भवनाथ झा ‘दीपक’क घरमे भेटलनि। पाण्डुलिपिक प्राप्तिस्थानक समग्र वर्णन ओ अपन भूमिकामे करैत छथि जे कोन परिस्थितिमे पं. भवनाथ झा ‘दीपक’क संग हिनक पिताक सम्पर्क रहनि आ हुनक मृत्युक बाद आन एनेक पाण्डुलिपिक संग ई अपन घर आनि लेलनि। केवल अनबे टा नहि कएलनि, ओहिमेसँ अप्रकाशित ग्रन्थक निर्धारण कए ओकर संपादन कए सर्वसुलभ कएलनि। एकर 12 पृष्ठक भूमिका विशिष्ट महत्त्व रखैत अछि। एहिमे ओ मैथिल दृष्टिकें रखने छथि जे नाह्निदत्त सभसँ पहिनेविवाहक उल्ख किएक कएलनि? आन ठामक परम्परामे गर्भाधानसँ 16 संस्कारक आरम्भ होइत अछि, मुदा नाह्निदत्त सभसँ पहिने विवाहक दिन तकैत छथि। आन सभ संस्कारक आरम्भ ओहि बच्चाक माता-पिताक विवाह कर्मसँ आरम्भ होएबाक बात लिखब समाजशास्त्रीय दृष्टिसँ महत्तवपूर्ण अछि। एकटा प्रश्न अछि जे कोनो स्त्री-पुरुषक संयोगसँ गर्भाधान भए सकैत छै, मुदा की ओ शास्त्र सम्मत होएत? मैथिलक दृष्टि अछि जे विवाह समाजक निर्माणमे आधार थीक तें एकर पहिल उल्लेख कएल गेल अछि। एहि बात कें पं. झा स्पष्ट कएने छथि। भूमिकामे पहिने संपादक पं. झा नाह्निदत्तक मूल ग्रन्थक विभिन्न पाण्डुलिपिक भारत भरिमे उपलब्धताक विवेचन कएने छथि , जाहिसँ स्पष्ट होइत अछि जे मिथिलाक ग्रन्थक अतीत मे सम्पूर्ण भारतमे अध्ययन होइत छल। संगहि एतए नाह्निदत्तक लेल प्रयुक्त विविध अशुद्ध नामक संकलन कए ओ सिद्ध कएने छथि जे मिथिलाक्षरक पाण्डुलिपिकेँ पढ़बामे आन स्थानक लोककें केना भ्रम होइत रहलनि अछि। एहि भूमिकामे नाह्निदत्तक कालनिर्धारण करबाक क्रममे ओ पंजीक उपयोगक लेल एकाट विशिष्ट सूत्र उपयोग कएलनि जे आनो संपादक लेल मार्गदर्शक अछि। ओ नाह्निदत्त कें करमहा मूलक म.म. हरिकेशक पुत्र लान्हि मानने छथि आ हुनकासँ छठम पीढ़ी पर उत्पन्न दिवाकरक संबंध घोसौत मूलक गोविन्द ठाकुरसँ देखाए, हुनक पुत्र देवनाथ ठाकुर, जनिक काल अन्य स्रोतसँ निर्धारित अछि, तकरा आधार पर लान्हिदत्तक समय निर्धारित कएने छथि। पंजीक ऐतिहासिक उपयोगक ई एकटा उदाहरण थीक, जकर प्रतिपादन पं. झा कएने छथि। संगहि एतए पंचविंशतिकाक विभिन्न सम्पादन आ व्याख्याक उल्लेख करैत म.म. रुचिपतिक विवरणक महत्त्व आ ओकर ऐतिहासिकता प्रतिपादित करैत छथि। पाण्डुलिपिसँ कोनो ग्रन्थक केना संपादन कएल जाएत छै आ ओकर प्रामाणिकताक लेल कोन कोन विवरण देल जाइत अछि तकर ई एकटा मार्गदर्शक संपादन थीक। ई पोथी Google e-book क्रय हेतु सेहो उपलब्ध अछि। 4. व्यवहार-रत्नावली- उपर्युक्त शोध पत्रिकाक ओही अंकमे पृष्ठ संख्या 402सँ 430 धरि ई पोथी संपादित अछि। ई म.म. पशुपतिकृत व्यवहाररत्नावली थीक। ई पशुपति सेहो माण्डरवंशीय म.म. बटेशक पुत्र आ हमरहि गाम मँगरौनीक छलाह। तें सुबोधकार म.म. पक्षधरक भाइ सिद्ध होइत छथि। एकर पाण्डुलिपि संपादक पं. झाकें अपनहि घर मे भेटलनि। हिनक प्रपितामह पं. जनार्दन झाक हाथक लिखल जीर्ण पाण्डुलिपिसँ पाटोद्धार कए एकरा जेना-तेना सम्पादित कएलनि। सन् 2012ई.मे हम अपन घर पर म.म. गोकुलनाथ उपाध्यायक स्मृतिमे एकटा आयोजन कएने रही जाहिमे पं. झा एहि सम्पादनक सम्बन्धमे प्रथम सूचना देने रहथि आ प्रकाशित प्रतिमे सेहो मँगरौनीक सारस्वत साधना पर प्रकाशित हमर पोथीक चर्चा कएने छथि। एहि संपादनक माध्यमसँ डाकवचन पर विशेष प्रकाश पड़ल अछि। एहि व्यवहाररत्नावलीमे चारि टा डाकवचन 15म शतीक लिखित स्रोतसँ प्राप्त भेल अछि। एहूमे “मीन मेष तिन दंडा दीस” आदि जे वचन अछि से छह आँगुर पलभा पर राश्युदय मानक गणित कएल अछि आ तें डाक मिथिलेक छलाह आ 15म शती धरि संस्कृत ग्रन्थकारक द्वारा मान्यताप्राप्त छलाह, एकर ऐतिहासिक साक्ष्य एतए भेटैत अछि। एहि ग्रन्थक भाषानुवादक संग स्वतंत्र प्रकाशनक आवश्यकता अछि। 5. मांसपीयूषलता- ई म.म. मदन उपाध्याय कृतिथीक, जकर प्रथम संपादन पं. झा कएने छथि। सम्प्रति ई Google e-book क्रय हेतु उपलब्ध अछि। संयोगसँ इहो मदन उपाध्याय हमरे गाम मँगरौनीक छलाह। एहि पोथीक संपादनक अनेक विशेषता पबैत छी। मात्र 48 पृष्ठक एहि पोथीक संपादकीयमे म.म. मदन उपाध्यायक टा आरो ग्रन्थक सूचना देल गेल अछि, जकरा लेल संपादक अनेक हस्तलेख विवरणीक सहायता लेने छथि। हिनक श्राद्धप्रदीपक एकटा पाण्डुलिपि म.म. हरप्रसाद शास्त्री राजा राजेन्द्रलाल मित्रकेँ नदिया जिलाक उला नामक गाँवमे भेटल रहनि, तकर सूचना दए ऐतिहासिक विवेचनक लेल आधार प्रस्तुत कएने छथि। एहि विवेचनक क्रममे हमरो पोथीक यथास्थान नाम देने छथि। जाहि पाण्डुलिपिसँ एकर सम्पादन कएल गेल अछि तकर विस्तारसँ विवेचन कए पाण्डुलिपि-शास्त्रीय विवरण देने छथि। एहि संपादनमे भूमिका सेहो पृथक् अछि जाहिमे ग्रन्थक विषयकें प्रस्तुत कएल गेल अछि। एहिमे दैव आ पितृकर्ममे माछ-माँसक अर्पणक विषयमे अन्य स्थानीय ग्रन्थकारक अभिमत उल्लिखित अछि। एहि पोथीमे पाण्डुलिपिक समग्र पत्रक छाया प्रति सेहो अछि तें एकरा फैस्किमिली प्रकाशन कहि सकैत छी। मूल ग्रन्थ बड़ छोट अछि। एकार एकटा आधुनिक कालक निबन्ध मानि सकैत छी, मुदा मीमांसा शास्त्रक ग्रन्थ होएबाक कारणें भाषा गूढ़ अछि जकरा संपादक विस्तारसँ व्याख्यायित कएने छथि। हिन्दी अनुवादक बाद विशेष विवेचनमे आनो आने ग्रन्थसँ उद्धरण लए व्याख्या कएल गेल अछि। छठम स्तबक मे वार्धीणस शब्दक व्याख्या करैत देवण भट्ट, गोविन्दानन्द आदिक मतकेँ उद्धृत करैत वार्धीणस छागड़ थीक वा पक्षिविशेष थीक तकर निर्णय करैत छथि। ग्रन्थकार एकरा भक्ष्य चिड़ैक संग रखने छथि तें ई कोनो विशेष चिड़ै थीक, मुदा आन-आन ग्रन्थसँ प्रतिपादित होइत अछि जे ई बधिया कएल खस्सी थीक। एतए विविध ग्रन्थक अवलोकन कए सभ मतक संकलन भेल अछि। 6. पुष्पमाला- ई म.म. रुद्रधरक सर्वथा अज्ञात ग्रन्थ थीक। कोन देवताकें कें कोन पूल प्रशस्त अछि आ निषिद्ध अछि तकर विवेचन एहि ग्रन्थमे भेल छैक। एकर प्रकाशन मैथिली अनुवादक संग कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालयक व्याकरण विभागक स्मारिकामे 2011 ई.मे भेल अछि। 7. सोमवारी व्रतकथा- ई कथा म.म. रुद्रधरक वर्षकृत्यमे सेहो अछि मुदा अनेक स्थल पर बीचसँ श्लोक खण्डित रहबाक कारणें अर्थ विसंगति रहि गेल अछि। सन् 1855ई.मे श्री बच्चू शर्माक हस्तलिखित मिथिलाक्षरक प्रति हिनका अपनहि घरमे भेटलनि तँ ओकर उपयोग कए एकर विस्तृत भूमिकाक संग महावीर मन्दिर, पटनासँ प्रकाशित ‘धर्मायण’ पत्रिकाक अंक संख्या 78मे सन् 2009ई.मे प्रकाशित करौलनि। एहि संपादनमे ओ देखबैत छथि जे प्रकाशित प्रतिमे कुल 119 श्लोक अछि, जकरा कारणें अनेत स्थल पर कथाक प्रवाह रुकि जाइत अछि। हिनका लग उपलब्ध पाण्डुलिपिमे 132टा श्लोक छै। एहि प्रकारें एहि संपादनक द्वारा सोमवारी अमावस्याक मैथिल कथाक संशोधन पाण्डुलिपिक आधार पर कएल गेल अछि। 8. रुद्रयामल सारोद्धारनामसँ दू खण्डित अंश- पं. झाक संपादनमे दूटा रचना सेहो हमरालोकनिकें भेटैत अछि जे पाण्डुलिपिसँ संपादित कएल गेल अछि। रुद्रयामलक नाम पर बहुतो परवर्ती रचना सभ लिखाएल अछि, जाहिमें तत्कालीन इतिहाल आ भूगोलक तत्त्व भेटैत अछि। जँ अंत आ बहिःसाक्ष्यसँ ओहि अंशक कालनिर्धारण भए जाए तँ बहुत किछु गजेटीयर सन सामग्रीक ओ स्रोत बनि जाइत अछि। पं. झा एहन दू टा स्रोतक संपादन सेहो कएने छथि। पहिल सामग्री अछि रुद्रयामलोक्त तीर्थविधिक खंडित पाण्डुलिपि। एकर पाठ मैथिली अनुवादक संग मिथिला भारती, शोध पत्रिका, पटनाक 2014क अंकमे मैथिली अनुवादक संग प्रकाशित अछि। एकर पाण्डुलिपि हुनका समस्तीपुरक कल्याणपुरक समीप लदौरा गाँवमे रस्ता कातमे 2013ई.मे छिड़िआएल भेटल रहनि, जतए ओ संस्कृत महाविद्यालयमे पूर्वमे अध्यापक रहथि। एहि अंशमे अयोध्याक जन्मस्थान मन्दिरक वला प्रसंग प्रमाणक रूपमे उच्चतम न्यायालयमे सेहो रखल गेल। दोसर अंश सेहो पूर्वोक्त स्थान पर भेटलनि जे मिथिलाक तीर्थसभक प्रसंग छल। ई अंश मूल रूप मे श्रीकृष्ण ठाकुरक रचना मिथिलातीर्थप्रकाशक भूमिकामे मिथिला शोध संस्थानसँ प्रकाशित अछि आ अनुवादक संग हिनक अपन वेबसाइट www.brahmipublication.com पर प्रसारित अछि। एकर किछु अंशकेँ हमहू अपन पोथी‘मधुबनी वर्तमान और अतीत’मे कएने छी। एहि अंशमे मिथिलाक विभिन्न तीर्थस्थानक वर्णन दिशाक संग भेल अछि। एहिमे मिथिलाक सीमा, महिमा, नदी एवं ओहि तीर्थसभमे स्नानक महत्त्वपूर्ण तिथिक संग लोहिनी पीठ, लोहना ग्राम, गौरीशंकर, जमुथरि, छिन्नमस्ता, उजान एवं वनदुर्गा, खड़रख, सरिसब- सिद्धेश्वर शिव, सिद्धेश्वरी, गुरु हलेश्वर, लोहिनीस्थल, लोहनाक प्राथमिकता एवं मन्त्रविधि, कोइलखसँ पश्चिम- मङ्गला मठ तथा मङ्गलवन- मङरौनी, मङरौनीसँ पश्चिम- मधूकवन, मधुबनी, कपिलेश्वर स्थान, कपिलेश्वरसँ पश्चिम- पाण्डुपल्ली- भोजपड़ौल, दोसर पाण्डुपल्ली- पण्डौल, पाण्डुपल्लीक समीप शक्रपुरी- सकरी, सकरीसँ पश्चिम- वृद्धिग्राम- बढ़ियाम, वृद्धिग्रामक पश्चिम जीववत्सा नदी- जीबछ, जीववत्साक पश्चिम दर्भाङ्ग- दरभंगा, दर्भाङ्गसँ उत्तर- योगिवन, अहल्यापुरी- अहियारी, अहल्याक कथा, गौतमाश्रम एवं विश्वामित्राश्रम, विभाण्डक आश्रम, याज्ञवल्क्य आश्रम, दरभङ्गा से पश्चिम गोक्षुर तीर्थ- गायघाट, बेनीबाद आदि विवध स्थानक वर्णन आएल अछि। एहिमे चम्पारण्य, सीमाराम (सिमरौन), भीठ भगवानपुर, महिषीक तारापीठ आदि सेहो वर्णित भेल अछि। मिथिलाक तीर्थ-परिक्रमासँ सम्बन्धित ई पोथी सेहो दुर्बाग्यसँ खण्डिते भेटलनि, मुदा जे अंश अछि ओ बहुत किछु मिथिलाक भोगौलिक इतिहास केँ स्पष्ट करैत अछि। पं. झाकेँ अप्रकाशित सामग्रीक प्रकाशनक अनुराग रखैत अछि आ अनेक छोट-छोट रचनाकेँ पाठक आ शोधकर्ता धरि प्रकाशित करैत रहैत छथि। धर्मायण पत्रिकाक सम्पादक होएबाक कारणें हिनक बहुत संपादन एहिठाम प्रकाशित अछि- 1. राममानस-पूजा – पेन्सिल्वेनिया विश्वविद्यालयक संग्रहमे उपलब्ध पांडुलिपिसँ प्रथम बार संपादित। धर्मायण, खंड 84, महावीर मंदिर पटना, अक्टूबर-दिसंबर, 2014. 2. सनत्कुमार तंत्रसँ बालराम-स्तव। धर्मार्थ ट्रस्ट, जम्मूमे उपलब्ध देवनागरी पांडुलिपि पर आधारित।, धर्मायण, खंड 93, महावीर मंदिर पटना, मार्च, 2020. 3. चतुर्भुज दासक जगज्जीवन-चरितम्, रीवा राज पुस्तकालय में उपलब्ध देवनागरी पांडुलिपि पर आधारित, धर्मायण, खंड 108, महावीर मंदिर पटना, जुलाई, 2021. 4. मेघराज प्रधानक अनंत व्रत कथा (1660 ई.) संस्कृत अनंत व्रत कथाक काव्यात्मक भाषानुवाद थीक। एकरा देवनागरी पांडुलिपिसँ संपादित कएलगेल अछि। धर्मायण अंक. 123. महावीर मंदिर पटना. 5. रामानंद आचार्यक रामरक्षा-स्तोत्र, तीन देवनागरी पांडुलिपिक आधार पर संपित कएल गेल अछि। यद्यपि ई पूर्वप्रकाशित सेहो अछि, मुदा पूर्वप्रकाशन मे भ्रष्टपाठक कारणें एकरा रामचन्द्र शुक्ल धरि रामानंदाचार्यक रचना मानबाक लेल तैयार नहि भेलाह। मुदा एहि संपादनमे एकर अर्थ स्पष्ट अछि आ संपादक पं. झाक अभिमत अछि जे एकर प्रयोग बैष्णव समुदायमे सन्धायवंदनक लेल होइत छल आ तें मौखिक परम्परासँ पाण्डुलिपि तैयार होएबाक कारणें क्रमशः पाठ भ्रष्ट होइत गेल। धर्मायण, अंक103. फरवरी, 2021. 6. संत जानकी दासक राम-जन्म बधाई। देवनागरी पांडुलिपिसँ रामजन्म एवं कृष्णलीलासँ संबंधित 20 पदक संपादन। धर्मायण, अंक105. अप्रैल, 2021. पं. भवनाथ झा सतत सम्पादन कार्यमे लागल छथि। हिनक प्रथम संपादित पोथी म.म. परमेश्वर झाक पूर्वप्रकाशित ग्रन्थ ‘यक्षसमागमम्’ के संस्कृत व्याख्या हिन्दी अनुवाद थीक। ई पुस्तकाकारमे 1996ई.मे प्रकाशित अछि। एकरो भूमिका भाग विशिष्ट अछि। संस्कृत साहित्यक दूतकाव्यक परम्परामे मेघदूतक स्थापना आ ओकरे उत्तरकथा पर आधारित यक्षसमागमकेँ स्थापित कएल गेल अछि। कालिदाक मेघदूत जँ वियोग शृंगारक काव्य थीक तँ ई संयोग शृंगारक विशिष्ट काव्य मात्र 35 श्लोकमे अछि। मुद्रित किन्तु दुर्लभ ग्रन्थकें एहि संपादनक द्वारा सुलभ बनाओल गेल अछि। हिनक संपादित विद्यापतिकृत भूपरिक्रमणम् हालहिमे प्रकाशमे आएल अछि। ई यद्यपि 1976ई.मे कलतत्ता संसाकृतिक परिषद् सँ छपल छल मुदा वर्तमान संपादक पं. झाक अनुसार स्थानक नामसभकेँ पढ़बामे प्रथम संपादककेँ भ्रम भेल रहनि। ‘हरिभूमि’केँ ‘हारभूमि’, ‘सूतपीठ’केँ ‘सूनपीठ’, ‘वाल्मीकिदेश’ कें ‘वाल्मीकिडिच’ आदि रूपमे पढ़ि लेबाक कारणें एकर भौगोलिक आ ऐतिहासिक महत्त्व तिरोहित भए गेल छल। एकरा सभकेँ अपन पाण्डुलिपि-विज्ञानक अनुभवक आधार पर संशोधित कए गजेटीयर आदिक आधार पर स्थानक नामकेँ संशोधित कए एकरा एकटा गजेटीयरक दृष्टिसँ संपादित कए ओकर पठनीय हिन्दी व्याख्या कएलनि। एकर अंगरेजी अनुवाद सेहो एही पोथीमे विजयदेवजीक द्वारा कएल गेल अछि। एकर प्रकाशन हालहिमे इसमाद प्रकाशनसँ भेल अछि। एम्हर पछिला वर्षसँ पं. झा लगातार संस्कृत ग्रन्थक पाण्डुलिपिसँ सम्पादन आ अनुवादक परियोजनासँ जुडल छथि। ई पंक्ति लिखबा धरि हिनक दू टा संपादित कृति दैवज्ञ दामोदरक ‘सभाविनोद’ आ वामोरि नारायणक ‘सभाकौमुदी’ राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार आ तत्वम् फाउण्डेशन, पुणेकसंयुक्त तत्त्वावधानमे क्रमश ‘ज्ञान भारत सीरीज’ 1 आ 3 के रूपमे प्रकाशित भए चुकल छनि। पं. भवनाथ झा सतत सम्पादन कार्यमे लागल छथि। हिनक प्रथम संपादित पोथी म.म. परमेश्वर झाक पूर्वप्रकाशित ग्रन्थ ‘यक्षसमागमम्’ के संस्कृत व्याख्या हिन्दी अनुवाद थीक। ई पुस्तकाकारमे 1996ई.मे प्रकाशित अछि। एकरो भूमिका भाग विशिष्ट अछि। संस्कृत साहित्यक दूतकाव्यक परम्परामे मेघदूतक स्थापना आ ओकरे उत्तरकथा पर आधारित यक्षसमागमकेँ स्थापित कएल गेल अछि। कालिदाक मेघदूत जँ वियोग शृंगारक काव्य थीक तँ ई संयोग शृंगारक विशिष्ट काव्य मात्र 35 श्लोकमे अछि। मुद्रित किन्तु दुर्लभ ग्रन्थकें एहि संपादनक द्वारा सुलभ बनाओल गेल अछि। हिनक संपादित विद्यापतिकृत भूपरिक्रमणम् हालहिमे प्रकाशमे आएल अछि। ई यद्यपि 1976ई.मे कलतत्ता संसाकृतिक परिषद् सँ छपल छल मुदा वर्तमान संपादक पं. झाक अनुसार स्थानक नाम सभकेँ पढ़बामे प्रथम संपादककेँ भ्रम भेल रहनि। ‘हरिभूमि’केँ ‘हारभूमि’, ‘सूतपीठ’केँ ‘सूनपीठ’, ‘वाल्मीकिदेश’ कें ‘वाल्मीकिडिच’ आदि रूपमे पढ़ि लेबाक कारणें एकर भौगोलिक आ ऐतिहासिक महत्त्व तिरोहित भए गेल छल। एकरा सभकेँ अपन पाण्डुलिपि-विज्ञानक अनुभवक आधार पर संशोधित कए गजेटीयर आदिक आधार पर स्थानक नामकेँ संशोधित कए एकरा एकटा गजेटीयरक दृष्टिसँ संपादित कए ओकर पठनीय हिन्दी व्याख्या कएलनि। एकर अंगरेजी अनुवाद सेहो एही पोथीमे विजयदेवजीक द्वारा कएल गेल अछि। एकर प्रकाशन हालहिमे इसमाद प्रकाशनसँ भेल अछि। एम्हर पछिला वर्षसँ पं. झा लगातार संस्कृत ग्रन्थक पाण्डुलिपिसँ सम्पादन आ अनुवादक परियोजनासँ जुडल छथि। ई पंक्ति लिखबा धरि हिनक दू टा संपादित कृति दैवज्ञ दामोदरक ‘सभाविनोद’ आ वामोरि नारायणक ‘सभाकौमुदी’ राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार आ तत्वम् फाउण्डेशन, पुणेकसंयुक्त तत्त्वावधानमे क्रमश ‘ज्ञान भारत सीरीज’ 1 आ 3 के रूपमे प्रकाशित भए चुकल छनि। एहि आलेखकेँ लिखबा काल हमरा गौरव भए रहल अछि आ अपन शुभकामना आ आशीर्वाद दैत छयनि जे एहिना आगाँ बढ़ैत रहथि आ मिथिला सहित भारत ज्ञान-परम्पराकेँ प्रकाशित करैत रहथि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.७.पंडित भवनाथ झा मिथिलाक जीवित मानव धरोहर- डॉ. कैलाश कुमार मिश्र डॉ. कैलाश कुमार मिश्र (मानवशास्त्री, भारतक विभिन्न अदिवासी समूहक विद्वान, शोधकर्ता। संपर्क-8076208498) पंडित भवनाथ झा – मिथिलाक जीवित मानव धरोहर जखन हमरा कहल गेल जे पंडित भवनाथ झा पर किछु लिखबाक अछि ताहि समय लागल “हिनका पर लिखब सहज काज थिक”। जखन लिख’ लगलहुँ तखन अनुभव भेल जे कोनो व्यक्ति सँ बहुत संपर्क मात्र सँ हुनका पर लिखब सहज काज नहि। पंडित भवनाथ झा के हम गुरुतुल्य सम्मान करैत छियनि आ गुरूजी कहि संबोधित करैत छियनि, यद्यपि हम हुनक कहियो प्रत्यक्ष आ परोक्ष रूप सँ शिष्य नहि रहल छी। अनेक विषय पर हुनक सोचब, ज्ञान आ ज्ञान संग लोक परंपरा संग हुनक समर्पण हमरा हुनका समीप अनैत अछि। आइयो भवनाथ जी सहज आ अति साधारण जीवन जीबैत अध्ययन आ कर्मकांड केर प्रति अहर्निश समर्पित छथि। पंडित भवनाथ झा पर किछु बात विस्तार सँ लिखब सँ पहिने एक संस्मरण केर स्मरण करब आवश्यक अछि। प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी बाजपेई केर शासन मे राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन (नेशनल मैन्युस्क्रिपट मिशन) केर विचार भेलैक। ईहो निर्णय भेलैक जे इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र केर परिसर (दिल्ली) मे एहि मिशन केर मुख्यालय रहतैक। ताहि समय केर सदस्य सचिव के कहल गेलनि जे शीघ्र अहि मिशन केर उदेश्य, लक्ष्य, एम्स आ मिशन वक्तव्य संग एकर भविष्यक रूप रेखा केर खाका, समय सीमा, कोन तरहक विद्वान, शोधछात्र के जोड़ल जाए आदि पर विस्तारपूर्वक एक परियोजना केर निर्माण कएल जाए। कला केंद्र मे एक विदुषी छलीह जिनकर नाम छलनि डॉ सुधा गोपालकृष्ण। हम रिसर्च ऑफिसर रही। सुधा जी बहुत विनम्र आ ज्ञान परंपराक सम्मान करऽ वाली विदुषी छलीह। हुनकार पति केरल कैडर केर आईएएस अधिकारी छलथिन जे ताहि समय प्रधानमंत्री कार्यालय मे ज्वाइंट सेक्रेटरी केर ओहदा पर नियुक्त छलाह। सुधा जी के पाण्डुलिपि मिशन (मैन्युस्क्रिपट मिशन) केर पूरा परियोजना संग ओकर रूप रेखा तैयार करक छलनि। सुधा जी हमरा लग अवैत बजलीह: "कैलाश जी, ई परियोजना तुरत तैयार करक अछि। अहाँक सहयोग हमरा चाही। सहयोग मतलब सोरह आना सहयोग।" हमर उत्तर छल: "जाहि तरहक बात अहाँ कहि रहल छी ताहि सँ लगैत अछि जे हम यहि परियोजना केर पात्र नहि छी। कारण हमरा जनैत अधिकांश पाण्डुलिपि संस्कृत केर हेतैक, आ शेष भाग तमिल, तेलगु, मलयालम, बंगला, उड़िया, मराठी, मिथिलाक्षर, नेपाली, पाली, तिब्बत, शारदा आदि लिपि मे हेतैक जकर जानकारी हमरा एकौ रत्ती नहि अछि। दोसर महत्वपूर्ण काज हमरा बुझा रहल अछि जे पाण्डुलिपि अथवा बहुत पुरान छपल रेयर आ अनुपलब्ध पोथी सभक डीजीटाइजेशन केर छैक। ई काज पुनः इंजीनियरिंग आ कंप्यूटर विज्ञान केर विद्वान केर छैक।” सुधा जी मंद-मंद बिहुँसैत हमरा कहलनि: “कैलाश जी, पाण्डुलिपि केर चयन, भाषा अथवा लिपि बोध, डीजीटाइजेशन, ओकर व्यवस्थापन आदि तँ परियोजना जखन अपन स्वरुप पर आबि जेतैक तकर बाद तकनीकी आ अकादमिक लोक केर सहयोग सँ हेतैक। एखन अहाँ केर जरुरत अहि बात लेल अछि जे हम सभ एकर उदेश्य, दिशा आदि निर्धारित कऽ सकी। स्थिति गंभीर छैक कारण जे एक मासक भीतर पूरा रूप रेखा एकर तैयार करक अछि आ संस्कृति सचिव केर सहमति भेटला पर प्रधानमंत्री कार्यालय अंतिम स्वीकृति लेल भेजबाक अछि। ताहिं अहाँ अगर-मगर छोडू आ एहि कार्यक हिस्सा बनु। एखने सँ।” आब हमरा लग सुधा जी केर प्रस्ताव के अस्वीकार करबाक तर्क नहि छल। हुनक संग हम राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन केर रूप रेखा केर प्रारूप केर निर्माण मे लागि गेलहुँ। जखन ओहि पर काज करैत रही त' मंथन केर प्रक्रिया मे ई अनुभव भेल जे पाण्डुलिपि मिशन तखन अपन उदेश्य पूर्ण करत जखन संस्कृत, प्राकृत, पाली, तिब्बतन, मिथिलाक्षर, अरबिक, पर्शियन, तमिल, कन्नड़, मराठी, गुजराती, शारदा, आदि लिपि मे उपलब्ध दुर्लभ पाण्डुलिपि आ पोथी सभक अर्थ, ओहि मे उकेरल, छवि, बिंब, ओहि प्रयुक्त ज्ञान, सूत्र, गणित, विज्ञान, साहित्य, आयुर्वेद, धर्म दर्शन, लोक ज्ञान, मौसम विज्ञान, आर्किटेक्चर, मंदिर निर्माण, गृह निर्माण, खगोलशास्त्र, ज्योतिष, तंत्र, जैनिज़्म, बुद्धिज़्म, आदि पर निरंतर शोध करैत रही। जखन सब पाण्डुलिपि अपन डिजिटल प्रारूप मे शोधकर्मी, शोध संस्थान लेल ऑनलाइन फॉर्मेट मे इंडेक्सिंग, लघु जानकारी, ऐनोटेटेड बिबलियोग्राफी संग उपलब्ध रहतैक तखन लोक सभक भक्क खुजैत रहतैक. कहबाक तात्पर्य जे लोक सभ सँ बात चित केलाक बाद, उपलब्ध सन्दर्भ पढलाक बाद ई अनुभव भेल जे ई परियोजना त' बहुत पैघ परियोजना छैक। भारतीय ज्ञान परंपरा केर संवर्धन, संरक्षण, ओकर प्रसार आ भारतीय ज्ञान केर एक-एक बात के जानकारी प्रमाण संग समस्त संसार के लोक के देल जा सकैत छैक। हमरा स्मरण आबि गेल अपन मिथिला जतए गामक गाम केर पाण्डुलिपि कखनो अतिवृष्टि तँ कतहुँ आगिलग्गी सँ समाप्त भऽ जाइत छल। एहनो बात सुनल आ देखल अछि जे बहुत पैघ विद्वान सभक अकर्मण्य संतति हुनक पाण्डुलिपि के रहस्यमय बनबैत पेटी, संदूक, बक्सा आदि मे सड़ा-गला दैत छलाह मुदा विद्वत समाज लग नहि आबय दैत छलथिन्ह। हमरा ई परियोजना बहुत महत्वपूर्ण परियोजना लागल। सभ किछु तैयार होमए लगलैक। ओकर निर्माण मे भले न्युन मुदा योगदान हमरो छल। जखन सभ ठाम सँ स्वीकृति भऽ गेलैक तखन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी जी केर निवास पर एकर विधिवत घोषणा भेलैक। ओहि उत्सव केर साक्षी हमहुँ रहल छी। यद्यपि अपन अनेक अन्य कार्यक व्यस्तता केर कारणे हम पाण्डुलिपि मिशन संग जुड़ल नहि रहि सकल रही। सुधा गोपालकृष्ण राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन केर प्रथम मिशन डायरेक्टर भेलीह। आब एक प्रश्न भऽ सकैत अछि जे भवनाथ झा जी केर बात करैत काल पाण्डुलिपि मिशन केर की दरकार? एकर बहुत पैघ प्रयोजन हमरा जनैत छैक। पहिल ई जे हिनका मे मिथिलाक्षर, बंगला, उड़िया, संस्कृत, आदि अनेक पाण्डुलिपि केर लिपि पढबाक आ ओकर प्रसंग विस्तार करबाक क्षमता आ ऊर्जा छनि। हिनक ज्ञान धर्म शास्त्र, साहित्य, मैथिली, लोक, इतिहास, पुराण, आदि के पढबाक, बुझबाक क्षमता छनि। पंडित भवनाथ झा जेना कि पाण्डुलिपि मिशन केर बारे मे कल्पना कएल गेल रहैक अहि शास्त्र अथवा विज्ञान, पाण्डुलिपि विज्ञान अथवा Manuscriptology केर आधिकारिक विद्वान, शोधकर्मी, विशेषज्ञ आ गुरु छथि। हिनकर एहि गुण सभ सँ प्रभावित होइत पाण्डुलिपि केर पढ़ब, संरक्षण करब, ओकर वेशेष पोथी केर चयन करब, ओकर अनेक भाषा मे अनुवाद, ओकर पाठकीय टिप्पणी संग आन लोक संग संपादक केर रूप मे छापैत अथवा प्रकशित करैत छथि। एहने किछु नहि अपितु अनेक काजक संपादन ई पटना मे महावीर मंदिर आर्काइव्ज आ प्रकाशन विभाग लेल लेल बहुत दिन सँ करैत आबि रहल छथि। पंडित भवनाथ झा आजुक समय मे अपितु समस्त बिहार मे पाण्डुलिपि विज्ञान अथवा शास्त्र केर सर्वश्रेष्ट ज्ञाता आ अधिकारिक विद्वान छथि। कोनो तरहक पाण्डुलिपि अथवा प्रस्तरलिपि पढ़बाक लेल आ ओकर अर्थ स्पष्ट करबा लेल, संगहि लिपि मे विखंडन होबाक कारणे जे अक्षर शब्द छुटल छैक तकर स्पष्ट आ वैज्ञानिक अथवा न्याय संगत अनुमान लगेबा लेल बहुत अध्ययन आ नियमित अभ्यास केर दरकार होइत छैक। विद्वानक समर्पण अपन विषय आ योजना केर प्रति 100 प्रतिशत भेनाइ जरुरी छैक। ताहि मे कोनो अगर-मगर, इम्हर-उम्हर केर स्थान नहि छैक। जरुरी छैक जे जतेक नव-नव शिलालेख, पाण्डुलिपि केर विश्व केर विद्वान सभ अलग-अलग कालखंड सँ प्रारंभ करैत एखन धरि काज कऽ रहल छथि तकर अपडेट आ उद्धरण केर जानकारी ओहि विद्वान के होबाक चाही। हमर व्यक्तिगत अनुभव अछि जे पंडित भवनाथ झा ई सभ गुण सँ परिपूर्ण छथि। परिपूर्णता संग विनम्रता आ सहज उपलब्धता हिनकर विशेष गुण छनि। अहाँ अपन ज्ञान केर कोनो शंका केर समाधान लेल कखनो हिनका सँ संपर्क कऽ सकैत छी। पंडित भवनाथ झा सदैव बहुत विनम्रता सँ अहाँक प्रश्न, जिज्ञासा, अथवा शंका केर समाधान हेतु उपलब्ध रहताह। ईहो बात हम कोनो पोथी केर लेखी अथवा ककरो सँ सुनिकऽ नहि कहि रहल छी, अपितु अपन व्यक्तिगत अनुभव सँ कहि रहल छी। अनेक बेर हम बिना समय केर चिंता केने जखन कखनो प्रयोजन भेल हिनका दूरभाष पर संपर्क करैत छी। ई तुरत फ़ोन उठबैत छथि आ हमर जिज्ञासा केर समाधान करैत छथि। जखन ई हमर जिज्ञासा केर समाधान करैत छथि तखन हमरा एना बुझना जाइत अछि जेना हम उपनिषद युग मे रहैत छी। हमर जिज्ञासा पंडित भवनाथ झा सँ ओहिना होइत अछि जेना उपनिषद केर एक शिष्य घनघोर अविद्या केर अवस्था मे अपन गुरु सँ करैत छथि। आश्चर्य त ई जे भवनाथ जी हमर जिज्ञासा केर समाधान उपनिषद केर अति ज्ञानी गुरु जकाँ दैत छथि। हमर एक जिज्ञासा मात्र सँ ओ हमर मोनक अनेक जिज्ञासा केर अनुमान लगा लैत छथि। हमर मूल जिज्ञासा के समाधान करैत ओ कहैत छथि: “कैलाश जी, अहाँक मोन मे ईहो शंका भऽ सकैत अछि जे ई एना केना भेलैक? तँ एकर समाधान एना छैक.” अहि तरहें हमर सभक दू मिनट केर बात कखनो काल घंटो धरि चलैत रहैत अछि। फोन रखितहि लगैत अछि जेना भक सँ अन्हार घर मे इजोत जगमग भऽ गेल! देखल जाइत अछि जे नीक-सँ-नीक विद्वान ज्ञानक घमंड अथवा उन्माद मे आबि जाइत छथि। संस्कृत जगत मे एहन बहुत उदाहरण भेटत मुदा भवनाथ जी मे हमरा कहियो कोनो तरहक ज्ञानक घमंड नहि भेटैत अछि। ई हमरा हिसाबे हिनकर दुर्लभ गुण छनि। एक बात जे हमरा पंडित भवनाथ झा दिस अधिक आकर्षित करैत अछि ओ छनि हिनक समावेशी व्यक्तित्व। हम साहित्य अथवा संस्कृत केर लोक नहि छी। मानव विज्ञान, लोक विद्या आदि पर किछु काज करैत छी। हम जखन कखनो कोनो संस्कृत अथवा क्लासिकल विषय केर विद्वान सभ सँ बात करैत छी तँ सामान्यतया ओ सभ लोक अथवा फ़ोक के बहुत निम्न कोटि केर विषय बुझैत छथि। हुनका होइत छनि जेना फ़ोक केर अर्थ भेल निम्न, मुर्ख, असभ्य केर परंपरा अथवा क्षद्म ज्ञान जे संस्कृत अथवा क्लासिक सँ लेल गेल छैक। लोक केर अपन मूल सोच, चिंतन, ज्ञान, वैविध्य, दर्शन, इतिहास आदि नहि छैक। ओ सब कखनो ई बात स्वीकार नहि कऽ सकैत छथि जे शास्त्र कखनो कुनो बात, ज्ञान, परंपरा, विद्या, विज्ञान आदि लोक सँ लऽ सकैत अछि। एकर विपरीत शास्त्र केर विद्वान आ ज्ञाता लोकक पैघ आ प्रतिष्ठित विद्वान, ज्ञानी, वैज्ञानिक के अनेक कहानी आ इतिहास गढ़ि शास्त्र केर अंग बना लैत छथि। एकर सभ सँ नीक उदाहरण छथि मौसम विज्ञान केर लोक विज्ञानी डाक। डाक वचन पर जखन संस्कृत केर विद्वान काज करैत छथि तँ अनर्गल प्रलाप करैत अनेक बात संस्कृत सँ जोड़ैत डाक के या तँ संस्कृत केर ज्ञाता प्रमाणित करैत छथि आ कहैत छथि जे सर्व सामान्य हेतु ओ गूढ़ संस्कृत केर वैज्ञानिक बात सभ लोक भाषा मे सहज शब्दावली केर सहयोग सँ लोक कवित्त केर मादे प्रेषित करैत छथि। किछु विद्वान जिनकर नाम लेब उचित नहि, तँ डाक केर मूल, जाति सभ किछु बदलि दैत छथि। अतए भवनाथ जी कनेक समावेशी छथि। हमरा एक प्रकरण स्मरण अछि जाहि केर हम पात्र सेहो छी तकर वर्णन अथवा दृष्टांत सँ ई बात स्पष्ट भ’ सकैत अछि। भेलैक ई जे स्वर्गीय किशोर कुणाल जी केर अभिभावकत्व मे महावीर मंदिर पटना सँ पंडित भवनाथ झा एक पत्रिका निकालैत छथि जकर नाम छैक धर्मायण पत्रिका। ओना तँ एकर नाम संग पत्रिका शब्द जुड़ल छैक मुदा एकर हरेक अंक बहुत महत्वपूर्ण आ संग्रहणीय होइत छैक। धर्मायण पत्रिका हरेक अंश मे कोनो विशेष बिंदु संग अखिल भारतीय परिप्रेक्ष्य के रखैत विभिन्न विधा केर विद्वान सभ सँ प्रमाणित आलेख संकलित करैत अछि आ छपैत अछि । पंडित भवनाथ झा धर्मायण पत्रिका स जुडल विद्वान सभक एकटा व्हाट्सएप समूह से बनेने छथि। एहि समूह में धर्म शास्त्र, वेद, ज्योतिष, इतिहास, साहित्य, आयुर्वेद, जैन, बुद्धिज़्म आदि केर विद्वान सभ छथि। एक बेर ई सभ निर्णय केलनि जे एक अंक पितर तर्पण आ पितर पूजा पर केंद्रित करैत प्रकाशित करताह। संयोग सँ ताहि समय हम एक लघु पोस्ट फेसबुक मे किछु आदिवासी समाज मे पितर पूजा, तर्पण आ स्मरण पर अपन फील्ड विजिट केर आधार पर अंग्रेजी मे केने रही। पंडित भवनाथ झा जी केर ध्यान हमर पोस्ट पर पड़लनि। ओ हमरा तुरत फोन करैत आग्रह केलाह जे हम एक विस्तृत आलेख आदिवासी समाज मे व्याप्त पितर केर अवधारणा, पितर पक्ष, पितर पूजा, अर्चना इत्यादि पर केंद्रित करैत लिखी। हम हुनक आग्रह के गुरु केर आदेश बुझैत एक आलेख तैयार कएल जकरा भवनाथ झा जी अपन पत्रिका धर्मायण पत्रिका मे यथावत हमर परिचय संग छपलाह। चूंकि हमर आलेख लोक अवधारणा पर छल तँ ई स्वाभाविक छैक जे हमर आलेख मे लोक विद्या (फ़ॉल्कलोर) केर विधि, चिंतन, स्टाइल आ फॉर्मेट छल हेतैक, तथापि हमर आलेख मे भवनाथ जी कोनो तरहक जोड़ तोड़ नहि केलनि। हमरा लेल ई सुखद आश्चर्य छल। ई घटना ईहो बतबैत अछि जे हिनक व्यक्तित्व कतेक समावेशी छनि। हम जाबत धरि दिल्ली सरकार केर मैथिली भोजपुरी अकादमी केर परामर्शदाता रहुलहुँ आ जखन कखनो मिथिलाक्षर लिपि सँ संबंधित कोनो बात पर संशय भेल, बिना कोनो चिंतन आ अल्टरनेटिव सोच केर जे एक नाम हमरा माथ मे अबैत छल से छथि पंडित भवनाथ झा। ओ हमर संकटमोचन जका ठाढ रहैत छलाह। कहब तँ ईहो आवश्यक अछि जे मिथिलाक्षर लिपि पर जे अपना आप के बड़का बड़का मठाधीश आ विद्वान बुझैत छथि, ताहि मे अधिकांश लोक ओ नहि छथि जे दावा करैत छथि, विपरीत एकर पंडित भवनाथ झा अपना के बहुत लो प्रोफाइल मे रखैत छथि आ आजुक समय मे मिथिलाक्षर लिपि, ओकर इतिहास, ओकर अनेक स्वरूप, मिथिलाक्षर लिपि मे उपलब्ध संस्कृत, मैथिली, इतिहास, कर्मकांड, धर्म, न्याय आदि पर उपलब्ध पांडुलिपि आर तँ आर शिलालेख तक पढ़बाक, ओकर समय निर्धारण करवाक, तुलनात्मक विवेचना करवाक प्रमाणित विद्वान छथि । हमरा हिसाबे ई मिथिला केर जीवित ह्यूमन हेरिटेज या मानवीय धरोहर छथि। मैथिली प्राच्य विद्या, आ मैथिली भाषा पर हिनक अधिकार छनि। कखनो काल यद्यपि ई अतिशय शुद्धतावादी या प्यूरिटन जकाँ व्यवहार करैत छथि। ई मानवीय गुण भेल आ विषय संग व्यक्तित्व केर ढालब भेल। एकरा सहज भाव सँ लेबाक चाही। आर बात सभ छोड़ियो दी, पंडित भवनाथ झा केर फेसबुक वाल सँ पता चलत जे मिथिलाक सांस्कृतिक परंपरा आ धरोहर केर ई सजग प्रहरी थिकाह। कोनो तरहक गलत प्रयोग, प्रचार, अशुद्धि आदि के ठीक अथवा निवारण त्वरित आ प्रमाणिक उदाहरण सँ करैत छथि। विनोदी तँ छथिए। विद्या व्यसनी होबाक कारणे आ सतत पाण्डुलिपि सभक ज्ञान बुझबाक प्रयत्न मे लागल रहला सँ एकाधिक विषय, भाषा, लिपि पर हिनक असाधारण अधिकार भऽ गेल छनि। चूँकि पाण्डुलिपि धीरे-धीरे एक स्थापित विज्ञान केर स्वरुप लेने जा रहल अछि, एकर अपन मेथड, तकनिकी, विधान ठाढ़ भऽ रहल छैक, ताहि कारण सँ हिनक बात अपन प्रमाणिकता सँ ठोस भेल जा रहल छनि। जतबे योगदान हिनक पाण्डुलिपि संरक्षण, प्रशिक्षण, ज्ञान केर दोसर तेसर पीढ़ी मे हस्तांतरण मे छनि ततबे पैघ भूमिका मिथिलाक्षर लिपि के प्रचार प्रसार मे। सभ बातक चिंतन करैत आ तथ्यक अवलोकन करैत हमर ई सोचब अछि जे पंडित भवनाथ मिश्र मैथिली ज्ञान परंपरा केर जीवित मानवीय धरोहर छथि। हिनक योगदान दिस ध्यान देब तँ लागत जे 33 मूल शोध आलेख जे विभिन्न विषय पर विभिन्न शोध पत्रिका मे छपल छनि केर अतिरिक्त ई अनेक अनुदित, समादित, पाण्डुलिपि सँ पहिल बेर संपादित ग्रन्थ केर रचना केने छथि। हिनक रचना आ लेखन केर गति लगातार चलि रहल छनि। पंडित भवनाथ झा केर पाण्डुलिपि सँ पहिल बेर सम्पादित पोथी केर संख्या छनि पन्द्रह। ई अपना आपमे हिनक यशक गीत गबैत अछि। संपादकीय टिप्पणी- एहि आलेखमे भवनाथजीक किछु पोथीक नाम सभ देल गेल छल जकर उल्लेख भवनाथजीक परिचय बला खंडमे भेले छै। दोहरावसँ बचबाक लेल एहिठाम एकरा संपादित कएल गेल अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.८.भैरव लाल दास-पं.भवनाथ झाक शोध दृष्टि भैरव लाल दास (महात्मा गाँधी विशेषज्ञ, गाँधी जीपर अनेक पोथी प्रकाशित, शोधकर्ता। संपर्क-9430606724) पं.भवनाथ झाक शोध दृष्टि पं. भवनाथ झाक शोध दृष्टि व्‍यापक छनि। ओहूमे मिथिलासँ संबंधित कोनो विषय हिनका सम्‍मुख आबि जाए त’ जाबत धरि विषयक ओर-छोर सोझरा नहि लेताह, विश्राम नहि लेताह। हमरा लेल ई एकटा व्‍यक्ति नहि, संस्‍थाक समान छथि। हिनका पर भगवानक कृपा छनि जे ई शोध करैत छथि, प्रकाशक छथि, कम्‍प्‍यूटर सँ संबंधित सब विधाक जानकार आ अभ्‍यासी सेहो छथि। इएह कारण अछि जे पं. भवनाथ झा ‘ब्राह्मी’ नामक एकटा वेबपेज स्‍वयं विकसित केलन्हि आ आइ हुनक कएल गेल काज ब्राह्मी वेबपेज पर सेहो उपलब्‍ध अछि। बहुमुखी प्रतिभाशाली छथि। संस्‍कृत, मैथिली आ अंग्रेजी विषयक नीक ज्ञाता। धर्मग्रन्‍थ आ पुराभिलेखक नीक शोधार्थी। मिथिलाक्षरक उद्भट विद्वान। आ सबसँ पैघ बात जे अत्‍यंत सोझमतिया, सरल, सहज व्‍यक्ति। लोभ-लाभ सँ दूर रहए वला व्‍यक्ति। पहिने संस्‍कृत विश्‍वविद्यालय, दरभंगामे सेवारत छलाह। ओहि विश्‍वविद्यालयक तत्‍कालीन कुलपति आचार्य किशोर कुणालजीक नजरि हिनक काज पर पड़लनि। ओ हिनका अपना संगे पटना आनि, हनुमान मंदिरक शोध एवं प्रकाशन पदाधिकारीक दायित्‍व द’ हिनका तेहेन ने ओझरौलखिन जे ओ पटनाक नागरिक बनि क’ रहि गेलाह। व्‍यक्तिगत रूपसँ एहि सँ पंडितजी सेहो लाभान्वित भेलाह कारण पटना एलाक बाद हिनकर काज राष्‍ट्रीय आ अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर पसरैत गेलैन। पं. भवनाथ झा मिथिलाक्षर वा तिरहुताक उद्भट विद्वान छथि। एतबहि नहि, एहि लिपिक कम्‍प्‍यूटर फॉंटक संधारणमे सी-डैक, पुणेक मार्गदर्शक सेहो छथि। कतोक विद्वत गोष्‍ठीमे मिथिलाक्षरक स्‍वरूप निर्धारणक क्रममे हिनक स्‍पष्‍टत अभिमत सँ विद्वान लोकनि पुन: विचारार्थक प्रस्‍ताव स्‍वीकार केने छथि। मिथिलाक्षरक प्रस्‍तर अभिलेख पाठनमे हिनक विद्वताक उपयोग हमरा लोकनि सेहो केने छी। दरभंगामे मिथिला विश्‍वविद्यालय परिसरमे स्‍तंभ अभिलेखक लेल बिहार सरकार विशेष रूप सँ हिनका सँ सहायता लेने छल। तदनुसार सहोदरा अभिलेख, सिमरौनगढ़ अभिलेख स’ ल’ क’ आनो-आन प्रस्‍तर अभिलेखक काल निर्धारणमे पंडितजी अपन स्‍पष्‍ट विचार देने छलाह। एहि क्रममे सिमरॉंवगढ़ प्रस्‍तर मूर्त्तिक प्रसंग विशेष उल्‍लेखनीय अछि। मिथिलाक्षरक प्राचीनता आ प्रसारक कारणे एकर लिखावटमे परिवर्तन आएब सामान्‍य प्रक्रिया मानल जेबाक चाही। बहुत विद्वान लोकनि एखनो भ्रम पसारबामे लागल छथि जे मिथिलाक्षर बेसी पुरान लिपि अछि वा बांग्‍ला-आसामी लिपि। एहि चकचोन्‍हीमे कतोक बेर सरकारक अधिकारीलोकनि सेहो आबि जाइत छथि आ अलर-बलर तथ्‍य पर आधारित निर्णय ल’ क’ नाम हँसबैत छथि। पं. भवनाथ झाक व्‍यक्तित्‍व एहन छनि जे ओ कोनो भावावेशमे आबि तथ्‍य सँ दूर नहि भ’ सकैत छथि। नीर-क्षीर विवेक। मुदा एहन लोकक उपयोगिता वैह क’ सकैत अछि जिनका सत्‍यक लगमे ठाढ़ हेबासँ शीतलताक अनुभव होए। मिथिलाक्षरसँ पुरान लिपि ब्राह्मी अछि। की ई मानल जा सकैत छैक जे ब्राह्मी लिपि आ बांग्‍ला-आसामी लिपिमे कोनो अंतर नहि छैक। मुदा उच्‍च पागवला सब निम्‍नस्‍तरीय शोधक पछुआरिमे ठाढ़ भ’ क’ किछु एहन निर्णय करैत छथि जेकर खिधांश होयब अवश्‍यंभावी अछि। पटना संग्रहालयक सभागारमे आयोजित विद्वत गोष्‍ठीमे पं. भवनाथ झा पावर प्‍वायंट पर एक बेर अपन शोध प्रस्‍तुति देने रहथिन जे मिथिलाक्षरक प्रभाव बांग्‍ला लिपिक कोन-कोन आखर पर कोना-कोना पड़लैक। एतबहि नहि, मिथिलाक्षरक आखरक स्‍वरूपमे कोना-की परिवर्तन भेलै, ताहि पर सेहो हिनक शोधक प्रस्‍तुति छलनि। मिथिलाक्षरक इतिहासमे कतोक परिवर्तन भेल अछि। पाथर, मूर्त्ति वा देवालय आदि पर लिखल मिथिलाक्षर सँ आरम्‍भ भ’ क’, पाण्‍डुलिपि, कागज, सामान्‍य जन, प्रिंट, कम्‍प्‍यूटर फॉंट धरि आबी त’ लिखावटमे भिन्‍नता भेटब स्‍वाभाविक अछि। मुदा विद्वतजन समय-समय पर एकरा सम्‍हारैत रहलखिन जाहि सँ आम जनकेँ कोनो भ्रम नहि होइन। संगहि आखरक स्‍वरूपमे एकरूपता सेहो रहए। मुदा केओ मिथिलाक्षरक आखरमे बांग्‍ला लिपिक आखरक फेंट-फांट करबाक प्रयत्‍न करत, एहि तरहक प्रयत्‍नकेँ प्रिंटमे आनत त’ बुझू जे हमर पंडित भवनाथ झा फराठी ल’क’ मिथिलाक सीमान पर ठाढ़ रहता। कोनो चिन्‍ता नहि करताह जे हम एसकरे छी कि बहुत लोग संगे अछि, मुदा अपन मिथिलाक्षरक मौलिकताक लेल सदैव सिपाही बनल रहता। पं. भवनाथ झाक शोध मौलिक होइत छनि। एहि क्रममे ओ पूर्व निर्धारित ऐतिहासिक अवधारणाकेँ खंडित करबा सँ कोनो तरहक परहेज नहि करैत छथि। एहि लेल एकटा शोधज्ञके जे दृष्टि चाही, जतेक शोध सामग्रीक सहायता चाही अथवा तथ्‍यकेँ रखबाक लेल जतेक तरहक लूरि चाही, ओ सबटा पंडितजीमे छनि। एकर एकटा उदाहरण देबाक अनुमति चाहैत छी। मिथिलाक कतोक स्‍थलक ऐतिहासिकता संबंधमे बेर-बेर प्रश्‍न उठब स्‍वाभाविक अछि। जनकपुरक मादे किछु इतिहासकार प्रश्‍न उठौलनि जे जँ ई राजा जनकजीक राजधानी छलनि त’ निश्चित रूप सँ एहि शहरक इतिहास रामायणकालीन हेबाक चाही। कोनो शहरक इतिहासक निर्धारण ओहि ठाम भेल उत्‍खनन सँ सिद्ध कएल जा सकैत छैक किएक त’ उत्‍खननमे प्राप्‍त पुरावशेषक वैज्ञानिकता एकरा प्रमाणित करैत अछि। किछु इतिहासकारक कथन छनि जे वर्तमान जनकपुर ततेक पुरान नहि अछि कारण वर्तमान सीता मंदिरक निर्माणक इतिहास सोझॉं अछि। पं. भवनाथ झा लग सेहो एहि तरहक ऐतिहासिकता पर वाद-विवाद आयब कोनो नव बात नहि। ओ विद्यापतिक ‘भूपरिक्रमणम्’ नामक ग्रंथक संदर्भ दैत मिथिलाक बहुत रास गाम-ठामक वर्णन अपन शोधालेख मे केलैनि। एतबहि नहि अंग्रेज अधिकारीक प्रतिवेदन आदिक संदर्भ दैत ओ खूब मजगर शोधालेख तैयार केलैनि। पंडित भवनाथ झा लिखैत छथि जे रामानन्‍दी वैष्‍णवक प्रभाव सँ जनकपुरकक पर्याप्‍त विकास त’ भेल मुदा एहि कातक पुरान धर्मस्‍थल अवडेरल गेल। बेसी सँ बेसी भक्‍त लोकनि जनकपुर आबथि ताहि लेल रामानन्‍दी वैष्‍णव सब किछु धर्मोत्तर प्रचार सेहो केलनि। 1894 ई. मे एहि क्षेत्रक गाछक निचला, सबसँ मोटका भागमे माटिक लेबा लगाक’ ओहि पर मानव केशक अंश साटि देबाक घटनामे अनायास वृद्धि भेलै। लोकक नजरिमे रहस्‍यमय घटना छल। अफवाह उड़ल जे स्‍वयं हनुमानजी एकटा पोखरि खुनला आ हुनका हाथमे जे माटिक गिलेबा लगलनि, से ओ गाछ सबमे पोछि देलाह। ईहो जे एहिमे साटल केश जे देखा रहल अछि से वस्‍तुत: हनुमानजीक रोईयाँ छनि। ई घटना कोनो एक गाम मे नहि, गामक-गाम मे देखल गेल। जतेक मुँह ततेक बात। किछु लोकक कहब छलनि जे हनुमानजी हमरा लोकनिकेँ जनकपुर बजा रहल छथि। बहुत लोक एकरा जादू-टोना सँ सेहो जोड़ लगला। लोक सब जनकपुरो जाइ गेलाह, मुदा एहि तरहक कोनो बात नहि देखेलैन। एकर प्रचार ततेक भ’ गेलै जे बात इंग्‍लैंडक हाऊस ऑफ कॉमन्‍स तक चलि गेलै आ ओत’ एकर जॉंच करेबाक आश्‍वासन देल गेलै। बंगाल सिविल सर्विसक अधिकारी डब्‍ल्‍यू एजार्टन द्वारा जुलाई, 1894 ई.मे एकटा विस्‍तृत रिपोर्ट तैयार कएल गेल जकर प्रकाशन लन्‍दनक सैम्‍प्‍सन लॉ, मार्स्‍टन एंड कम्‍पनी सँ प्रकाशित ‘ द नाइन्‍टीन्‍थ सेंचुरी नामक पत्रिकाक 36वां अंकमे 1894 ई.मे भेल। एजार्टन साहेब एहि निष्‍कर्ष पर पहुँचला जे जनकपुरक मेलामे भक्‍तक भीड़ जमा करबाक लेल, जनकपुरक प्रचार-प्रसारक लेल एहि तरहक रहस्‍यमय काज साधु द्वारा कराओल गेल छल जाहिसँ जनकपुरमे बेसी-सँ-बेसी चढ़ौआ आबए आ साधु-संतकेँ भोजनादिमे दिक्‍कत नहि होइन। एहन प्रतिवेदनक संदर्भ सँ धर्मस्‍थानक व्‍यापारक दोसर स्‍वरूप सामने अबैत अछि। एहि तरहक प्रयास आईयो भ’ रहल अछि। समाज वैज्ञानिकक लेल पंडित भवनाथ झा द्वारा कएल गेल एहि रिसर्च मात्र एकटा नवीन दृष्टिकोण उपलब्‍ध करबैत अछि। धर्म आ आस्‍था फराक विषय अछि आ धर्म-आस्‍थाक संग जुड़ल व्‍यापार दोसर विषय। जखन दुनू एक संग भ’ जाइत अछि त’ धर्मस्‍थानक प्रति लोकक आस्‍था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ैत छैक। पंडितजीक एहन तरहक शोध समाजक लेल सेहो अत्‍यंत गुणकारी अछि। मिथिलाक संदर्भ लेल जाए त’ एहिठाम पंचदेवताक पूजनक परम्‍परा रहल अछि। मुदा समाज एहि सोचके एकांगी रूपसँ देखैत अछि। एहिठाम बौद्ध, जैन, मुसलमान धर्मक इतिहासक साक्ष्‍य सेहो भेटैत अछि। कोनो ऐतिहासिक तथ्‍यकेँ स्‍वीकार करी आ एकरा संग आन संदर्भक इतिहासककेँ स्‍वीकार नहि करी, ई कोनो बौद्धिकताक परिचायक नहि अछि। कारण अंतिम सत्‍य किछु नहि होइत छैक। जाहि सत्‍य सँ आइ परहेज होयत, काल्हि दोसर रूपमे समाजक सोझॉं आयत। पंडित भवनाथ झाक इतिहास दृष्टि कनेको झलफलाइत नहि छनि। ओ सत्‍यक आश्रयमे सदैव रहबाक प्रयत्‍न करैत रहलाह अछि। पंडितजीक एकटा श्रमसाध्‍य काज पांडुलिपिक अध्‍ययन सेहो अछि। एहि लेल आब जो बिहार प्रान्‍तहि नहि, आसाम, दिल्‍ली, उत्तर प्रदेश आदिक कतोक संस्‍थाक संग जुडि़ नव पीढ़ीकेँ पाण्‍डुलिपि अध्‍ययनक जटिलताकेँ दूर करबाक प्रयत्‍न क’ रहल छथि। भारतक लिपिशास्‍त्रमे समानता सेहो छैक कारण बेसी लिपि ब्राह्मी सँ निकलल लिपि अछि। जँ जडि़क पर्याप्‍त अध्‍ययन भ’ जाय आ मूल लिपिक विस्‍तारक अध्‍ययन आ अभ्‍यास भ’ जाय त’ एहि लिपिसँ निसृत आन-आन लिपिक अध्‍ययन सुगम भ’ जाइत छैक। पंडित भवनाथ झाक पाण्‍डुलिपि अध्‍ययनक काज, विशेष रूप सँ नव पीढ़ीकेँ एहि दिस प्रेरित करबाक काज बहुत महत्‍वक अछि। एहि दिस समाजमे घटाटोप अन्‍हार छैक। मिथिलाक अपन लिपि मिथिलाक्षरक ज्ञाता आब बहुत कम लोक बॉंचि रहल छथि। विशेष रूप सँ ओहन विद्वान जिनका संस्‍कृत पर अधिकार होइन आ मिथिलाक्षरक पाण्‍डुलिपिक अध्‍ययनक सामर्थ्‍य होइन। मैथिली विषय ओहुना तिरस्‍कृत रहलीह। मिथिलाक्षर मात्र मैथिली नहि, अपितु संस्‍कृतक लिपि रहल अछि। जँ मात्र मिथिला रिसर्च इंस्टिच्‍यूट, कब्राघाट, दरभंगाक संदर्भ लेल जाए त’ ओहि ठाम साढ़े बारह हजार सँ बेसी पाण्‍डुलिपि संगृहित अछि। एहि पाण्‍डुलिपि मे मिथिलाक ज्ञान भंडार अछि। मुदा, एहि पाण्‍डुलिपिमे लिखल चीजक अनुवाद वैह करताह जिनका मिथिलाक्षर लिपिक पाण्‍डुलिपि पढ़बाक अवगति होइन आ ओ संस्‍कृतक ज्ञाता सेहो होथि। मणि-कांचन संयोग आवश्‍यक। एकर अभाव मे मिथिलाक ज्ञानक धुजा ठीक सँ फहरा नहि रहल अछि। मिथिलाक जन-सामान्‍यक वैश्विक मोजर आई मात्र प्रवासी बोनिहा‍रक रहि गेल अछि। एहि काजमे पंडित भवनाथ झा सनक विद्वान नेतृत्‍व क’ सकैत छथि। मुदा एहि लेल सरकार आ समाजक सहयोग सेहो चाही। सहयोग त’ दूरक गप्‍प भेल, असहयोग बेसी अछि। एक बेर मिथिला शोध संस्‍थानमे चोरि भेलैक आ चोर किछु पाण्‍डुलिपि चोरा लेलक। आलमीरा सेहो क्षतिग्रस्‍त क’ देलक। पुलिस आ सरकार चोर पकड़लक कि नहि, चोरि भेल पाण्‍डुलिपि ताकि-हेर क’ आपस अनलक कि नहि, ई सब दीगर गप्‍प अछि। एकर प्रतिफल ई भेलैक जे आब एहि शोध संस्‍थानक कर्मचारी कोनो पाठक, कोनो शोधार्थीके पाण्‍डुलिपिक एको टा पन्‍ना देखेबाक लेल तैयार नहि होइत छथि। हुनका ततेक डर पैसल छनि जे शोधार्थीकेँ ओ चोरक एजेंट मात्र बुझैत छथिन। पाण्‍डुलिपि आ पुस्‍तकालयमे सहयोग त’ बहुत दूरक गप्‍प, दू टप्‍पी मीठ गप्‍पो संभव नहि। तखन पंडित भवनाथ झा सनक स्‍वाभिमानी विशेषज्ञ कोनो काज कोना करताह आ तखन मिथिलाक ज्ञान परम्‍परामे कोना वृद्धि होयत। सरकारकेँ एहि सब पर ध्‍यान देबाक चाही। सबसँ पहिने पाण्‍डुलिपिक सुरक्षाक नीक इंतजाम होए जाहि सँ भविष्‍यमे पाण्‍डुलिपि चोरिक कोनो घटना प्रतिवेदित नहि होए। मिथिलाक पाण्‍डुलिपिक चोर सबपर देशद्रोहक मोकदमा चलायब मोनासिब होयत। पाण्‍डुलिपि सभक डिजिटाइजेशनक प्रक्रिया आरंभ हेबाक चाही। इंटैक दिस सँ हमरा लोकनि एकर पायलट प्रोजेक्‍ट केने रही आ एहि संस्‍थानक किछु पाण्‍डुलिपिक कंजर्वेशन आ प्रिजर्वेशन करौने रही आ इंटैक अपन पाइ खर्च केने रहए। हमरा लोकनि सरकारकेँ प्रस्‍ताव देलियैक जे एहि संस्‍थानक पाण्‍डुलिपिक प्रिजर्वेशन, कंजर्वेशन होय। सरकार प्रस्‍ताव मानियो लेलक आ एहि लेल पाइक बियोंत सेहो केलक। मुदा जखन काज करेबाक समय एलैक त’ ई काज बिहार राज्‍य भवन निर्माण निगम के द’ देल गेलै। बुद्धिजीवी लोकनि सरकारक एहि निर्णयक आलोचना सेहो केलखिन, मुदा ताहि सँ सरकार पर कोनो असरि नहि। कोनो प्रबुद्ध लोक एहि ओझरीमे नहि पड़ चाहैत छथि कारण जँ कोनो पाण्‍डुलिपिक फेर चोरि हेतै त’ खोजबीन हेतै जे ओहि समयमे के सब ओहि संस्‍थानमे पढ़' जाइत छलाह। पंडित भवनाथ झा संस्‍कृत आ मिथिलाक्षरक उद्भट विद्वान छथि, तैं हिनका सँ आशा कएल जा सकैत छैक जे अपन दस-बीस टा चटिया ल’ क’ ई काज अपना हाथ मे लेथि आ महत्‍वपूर्ण पाण्‍डुलिपि सभके अनुवाद-प्रकाशन कराबथि। एखन मिथिलाक स्थिति ई अछि जे संस्‍कृतक सामान्‍य ज्ञाताक संख्‍या सेहो अत्‍यल्‍प अछि। तखन, संस्‍कृतक पोथीमे लिखल गंभीर विषयके रुचिगर, सुपाठ्य बनाक’ जनसामान्‍यक साहित्‍यमे पसरब, एकटा दुरूह काज सनक अछि। मुदा जँ एहिना समय निकलैत गेलै त’ ई भविष्‍यक काज बनि क’ रहि जायत। पीढ़ी समाप्‍त हेबामे 25-30 वर्ष सँ बेसी कहाँ लगैत छैक। पंडित भवनाथ झाक विद्वता आब जगजियार भ’ गेल अछि। एखन धरि ओ जे काज केलथि, कम नहि छैक। एक व्‍यक्ति एसकरे एतेक काज आ एतेक तरहक काज क’ रहल छथि। हिनका पर महावीरजीक विशेष कृपा छनि। पंडितजीक पारिवारिक जिम्‍मेवारीमे सहायता देबाक लेल हिनक सुयोग्‍य आ यशस्‍वी पुत्र आब संग छथिन। एहन स्थितिमे आब पंडित भवनाथ झाकेँ अपन काजकेँ पसारबाक समय आबि गेल छनि। हिनका आब समूहमे काज करक चाहियैन। अपन चेला-चेटियाके पैघ आ गंभीर काज करबाक लेल प्रशिक्षित करक चाहियैन। अपन संपर्क आ प्रभावक उपयोग करैत सरकार आ सरकारी अधिकारी केँ परतारबाक चाहियैन जे मिथिलाक काज कतेक पाछॉं छैक। तखने, मिथिलाक विद्वत परम्‍परा आगॉं बढ़त। जँ पंडितजी एखनो एसकरे काज करैत रहता त’ नीक बात नहि होयत। कारण, जखन सेनापति सिपाही जकॉं युद्ध लड़तै त ओ सेना निश्चित हारि जेतै। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.९.मुन्नाजी-बीहनि कथाक शास्त्रीय पक्षक निर्धारक- श्री भवनाथ झा मुन्ना जी (मैथिली बीहनि कथा केर अगुआ एवं लेखक। संपर्क-9958396353) बीहनि कथाक शास्त्रीय पक्षक निर्धारक-श्री भवनाथ झा बीहनि कथा विधाकें एखन धरि बहुतो लेखक / समालोचक आ विद्वान भिन्न मतें परिभाषित केने छथि। जाहिमे प्रमुख नाम अछि- स्व. श्री राज, घनश्याम घनेरो, मुन्ना जी, राज कुमार मिश्र, भवनाथ झा, डा. नारायण जी, कथाकार अशोक...! मुदा बीहनि कथा गद्य साहित्यक जाहि शास्त्रीय पक्ष पर ठाढ़ अछि ओकर पूर्ण श्रेय जाइत छनि श्री भवनाथ झा 'भवन' जीकें। जेना रेल एकटा निर्धारित पटरी धेने दौगैत गंतव्य दिस बढ़ैत रहैए। ओकरा क्षणे-क्षण पटरी बदलबाक खगता नै होइछ। ओना गंतव्य प्राप्ति हेतु बेर पर ओहो पटरी बदैल लैत अछि। ठीक तहिना साहित्य सेहो साहित्यकार द्वारा निर्धारित लीक पर गंतव्य दिस बढ़ैत एकटा निर्धारित परम्पराक निबहता करैए। मैथिली साहित्यक एकमात्र अपन विधा "बीहनि कथा" परम्परागत सब विधा सँ इतर अपन स्वतंत्र विधाक रूपमे स्थापना पौलक। ताहि लेल बनौलक नव बाट। पारम्परिक सब बाट छोड़ि नव लीक पर चलब शुरू केलक। मुदा ओ नव बाट पुरना कुबाट पर चलनिहार द्वारा लतखुर्दनि कएल जाइत रहलै। कतेको उठा पटक, जोड़-तोड़ पछाति एकटा नव बाट बना ओइ सुबाट पर चलि मोकाम दिस बढ़ल। आ कुबाट सँ इतर अपन एकटा नव साहित्यिक परम्परा कायम क' पौलक। जकर मैथिली साहित्यक आधुनिक समय मे महत्वपूर्ण खगता रहै। कोनो लोककैं सामान्य जीवन जीबा लेल जेना सामाजिक पक्षक अवलोकन वा अँगेजब आवश्यक। तहिना साहित्य विधा लेल शास्त्रीय पक्षक निर्धारण, ओकरा अँगेजब आ उघब आवश्यक। बीहनि कथा अपन प्रारम्भिक चरण मे हिन्दी लघुकथाक नकलची आ कुबाट पर चलनिहार सँ ठाम-ठीम दबाएल जाइत रहल। से नकलक ओइ अवयव सँ जकर कोनो परिभाषा, मापदण्ड आ लिखित कोनो अस्तित्व नै। सब ठाम, सबटा मौखिके खेला-बेला। से चोरकेँ संग दैत चोरक मसियौतक घाल-मेल। जहन कि "बीहनि कथा" मैथिलीक माटि-पानि आ अपन खाँटी शब्द सँ उत्पन्न आ उत्पति-विकास सँ ल' कऽ एक सए शब्दक कथा तत्व सँ भरल ओ पूर्ण कथा हेबाक परिभाषा संग निर्धारित भ' अंगेजल गेल। एकरा स्थायी आ चिरकालिक रूप आ स्वतंत्र विधाक निर्धारण हेतु शास्त्रीय पक्षक खगता भेल। ओइ खगता पूर्तिक लेल आगू एलाह बहुभाषाविद विद्वान आ बीहनि कथा विधाक प्रारम्भकर्ता मे सँ एक श्री भवनाथ झा उर्फ भवन जी। बीहनि कथा शब्दक उत्पत्ति आ परिभाषा डा. भवनाथ झा संस्कृतसँ बीहनि केर अर्थ देखबैत छथि। हुनका मोताबिक- "संस्कृतक 'ब्रीही' शब्दक अर्थ होइछ- बीज। आ मैथिलीमे- बीहनि / बीहन / बीहैन ओही शब्दक मूलमे निहित। ऐ प्रकारें बीज / बीजम् संस्कृते शब्द थिक। यथा- यज बीजै: सहस्त्राक्षं- महाभारत" आगू डा. भवनाथ झा बीहनि कथाक परिभाषा दैत कहैत छथि: - "बीहनि माने बीज/ बीया। जाहिमे विकास करबाक गुण निहित होइछ। मुदा ओ पूर्ण विकसित नै रहैछ, समयान्तरे विकसित होइछ। ओकरामे एक सँ अनेक आ पुष्ट / संपूर्ण हेबाक गुण रहैत छै तेनाहिते बीहनि कथा- एहन कथा जे अनेक कथा, यथा- कथा, उपन्यासकें जन्म देबाक क्षमता राखए। आ ओ कथातत्व सँ पुष्ट अधिकतम सए शब्द मे लिखल कथा हो से बीहनि कथा भेल। अन्यथा नै। तें बीहनि कथाक अन्त खुजल (open ended) होइछ। ओहिमे निष्कर्ष नै होबक चाही। निष्कर्ष पाठक पर छोड़ि देल जाइछ।" डा. भवनाथ झा आगू बीहनि कथाकारसभकेँ साहस दैत कहैत छथि "हम खोंइचा छोड़ा फरिछा देलौं। आब अहाँ लोकनि डेग बढ़बैत चलू।..... कने आओर दूर! हँ कनिके दूर बस! मोकाम हासिल भेले बुझू ।" हुनकर डेगमे हमर सबहक डेग मिज्झर भेल/ संग भेल। हुनकर डेग क्रमिके ऐ बाट सँ हेराइत-बेराइत गेल। आ ओ शोधार्थी आ संगे धर्मायण संग डेग बढ़बैत ओइ मे लीन भ' गेलाह। बीहनि कथा हुनक कलम पर ठमकि वा विलगि गेल। आ ओ हुनक स्मृति पटल पर जा विरमि सन गेल। मुदा भाइ, ने हेरेला आ ने बेरेला ओ बीहनि कथा पर नजरि गरौने, नजरि लगबैत रहलाह। हमरा सबकेँ ठाम ठीम बेर पर ऊँच-नीच होइत देखितै टोकारा दैत रहलाह।- हे यौ,...... हुनकर ई / ओ रचना, बीहनि कथा छै? हमहूँ, जखन जे कोनो काज बीहनि कथा पर करी त' हुनका सँ रचना / विचारक जिज्ञासा करैत रहलौं। ओ बहुत दिन धरि आश पुरबैत रहला। मुदा कालान्तरे व्यस्ततावश कहियो काल निराश करैत रहलाह। धीरे धीरे मूँह फेरैत... मूँह मोड़ि लेलनि। मुदा जहन ऐ विधाकें फड़िछेबाक रहै छै तहन हम सब हुनके ज्ञान / परिभाषा / व्याख्याकें आगाँ क' विश्वस्त वा निश्चिंत होइत छी। निंदा करै बलाकें नीन्न नै अबै छै। भवन जी मैथिली / मिथिला सँ जुड़ल प्राचीन ग्रन्थक संदर्भ सोझाँ अनै छथि। ओ मूल मुद्दाक गप करै छथि। ओ मिथिला/ मैथिलीक प्रामाणिक आ पौराणिकताक गप करै छथि। जाहि सँ स्वघोषित विद्वानकें अपन पएर तरहक जमीन धँसैत सन भान होइत छनि। आ तहन ओ सब गोधियाँ बना अपन निन्न कामै क' हिनका नीचा देखब' लगै छथि। मूलत: विज्ञानक छात्र जहन संस्कृतक संग गप करै छथि तहन शास्त्रीय आ वैज्ञानिक दुनू पक्ष मिझरा सोझाँ अबैए। ई कोनो गोरपुजाइ आ कि हवा हवाइक गप कखनो, कहियो नै करै छथि। हम सब आशान्वित छी जे भवन जी, अपन पहिलुके तेवरमे बीहनि कथामे निरन्तरता आनथि। जाहि सँ ऐ विधाक बाधक व्यक्तिक मूँह पर जाबी लागि सकै। जे एकर उत्पत्ति / विकास आ शास्त्रीय पक्ष पर पक्षपात करै छथि। हुनक निरंतरता सँ बीहनि भकरार भ' धनमंडलक आश राखत। आ ऐ विधाकेँ जहन हिनका सन एकटा विद्वान, श्रेष्ठ लेखकक प्रश्रय भेटतै तहन नवसिखुआ लेखककें सीखबाक आ लिखबाक प्रेरणा सेहो भेटतै। आ ई विधा तहन आओर निश्शन भविष्यक कल्पनाकेँ यथार्थक दर्शन करबाओत। संपादकीय टिप्पणी- बीहनि कथाकेँ नीकसँ जनबाक लेल आशीष अनचिन्हार द्वारा लिखित "बीहनिकथा की छै" लेख उपयोगी हएत जे कि विदेहक बीहनि कथा विशेषांक-2, अंक 317, 1 मार्च 2021 मे प्रकाशित भेल रहै। एकर अतिरिक्त विदेहक बीहनि कथा विशेषांक-1, अंक 67, 1 अक्टूबर 2010 सेहो पाठककेँ पढ़बाक चाही। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.१०.रमेश-'घुरि आउ कमला' रमेश (आलोचक, कथाकार, कवि एवं स्वतंत्र विचारक) 'घुरि आउ कमला' बीसम सदीक अंतिम वर्ष 2000 ई. धरि अबैत-अबैत, मैथिली कथागोष्ठीक अभियान (सगर राति दीप जरय) एतेक जमि गेल छल, जे तकर चयनित अनेक कथा संग्रह छपि चुकल छल। ताही अभियानक कथा संग्रह 'एकैसम शताब्दीक घोषणा-पत्र' (2001ई)क संपादनक क्रम मे, श्री भवनाथ झा 'भवन'क कथा, 'अंइठ' हम ओइ पोथी मे छापि, हिनकर 'लेखकीय प्रति' महावीर मन्दिर, पटना मे, हिनका हस्तगत करौने रही। तहियो मुदा, ई 'ऐंठ' नहिं, 'अंइठ’, लिखैत छलाह। से कोनो तेहेन अस्वाभाविको नहिं छल, कारण, एक त' संस्कृतक विद्वान् आ, दोसर, 'सोइतपुराक सम्भ्रांत मैथिलीक’, हिनकर कथाकार पर पड़ल, स्वाभाविक प्रभाव! तें, हिनकर कथाकारक मैथिली भाषाक वर्तनी/लेखन-शैली के, 'हिनकर प्राचीनताक अति-आसक्तिक चलतें', 'पं.गोविन्द झाक वर्तनी-शैली' पर, जेनाइए रहनि। ओ डा.सुभद्र झाक 'मैथिलीक अपन जमीनी ध्वनि-आधारित वर्तनी' (पं.गोविन्द झा स' फराक), डा.रामावतार यादवक 'मिथिलाक निम्नवर्गीय वर्तनी' अथवा यात्री जीक 'जनोन्मुखी वर्तनी', नहिं अपना सकैत छलाह। 'अंइठ' कथा स' ल' क', 'घुरि आउ कमला' धरि, हिनकर कथाक वर्तनी, सैह प्रमाणित केलक अछि। मुदा मध्यवर्त्ती एकटा पैघ अन्तराल मे, हिनकर मैथिली कथालेखन अवरुद्ध रहबाक कारणें, आइयो हमरा सबके अज्ञात अछि। हिनकर कोनो टा कथा संग्रहक प्रकाशनक, कोनो टा सूचना सेहो, अज्ञाते अछि। तें, 'हिनकर कथा लेखनक विकास-यात्राक मूल्यांकन' लेल, यैह दुइये टा कथा, मैथिली मे आइ धरि उपलब्ध रहबाक सूचना अछि। 'घुरि आउ कमला', 'लोककथा-आधारित कथा' थिक, अथवा, 'लोककथा आधारित उपन्यासिका', सेहो विचारणीय थिक। अथवा,'लोककथा-आधारित दीर्घकथा'...? कोनो स्थिति मे, ई 'कथा' (शौर्ट स्टोरी)त' नहिंएं थिक! ध्यातव्य अछि, जे, 'शौर्ट स्टोरीज', 'लघुकथा' सेहो नहिं थिक। मुदा 'घुरि आउ कमला’, खाहे त' 'दीर्घकथा' थिक, अथवा, 'लघु-आकारीय उपन्यासिका'! हम त' एकर पात्र-संख्या, उपकथाक संख्या, आ संरचनाक संयोजनक आधार पर, अइ कथाक एखनुका स्थिति मे, एकरा एहेन दीर्घकथा मानैत छी, जे 'उपन्यासिका' बनि सकैत छल। मुदा, से बनि नहिं सकल अछि। मुदा, तकरा से एखनहुँ आ आबो बनाओल जा सकैत अछि। आधुनिक समस्या (जल-संकट)क विश्लेषण हेतु, ई दीर्घकथा लिखायल अछि, से 'मात्र नामकरण' आ 'पोखरि कटाव- आख्यान' टा स' बुझाइत अछि, अर्थात्, से 'कथाकारिता मे', 'मुख्य कारक नहिं', भ' सकल अछि। फेरो 'जल-संकटक' 'कारण' के, 'प्राकृतिक, अथवा 'मानव-निर्मित' नहिं' कहि क', कोनो 'अधलाह राजाक कुकृत्य' के कहल गेल अछि, जे अइ समस्याक किंवदन्तिए बला, अथवा, 'धार्मिके कारण' भ' सकैत अछि, 'आधुनिक आ वैज्ञानिक कारण', नहिं! 'आजुक वैज्ञानिक युग' मे, ताहि 'प्राचीन मानसिकता बला कारण' के, कोना स्वीकार कयल जा सकैछ? ई दीर्घकथा त', 'आइ लिखायल अछि'! आजुक कथालेखन हेतु, दन्तकथा आ लोक-कथाक आधार लेब, कोनो बेजाय बात नहिं थिक। मुदा, ताहू मे कथाकार, अपन 'कथ्यक आधुनिकता आ वैज्ञानिकताक अनुकूल', अपन 'दन्त-कथात्मक/लोक-कथात्मक आधार'क आ 'उपयुक्त स्वरुपक' चयन करत। 'राजा-रानी-प्रधान' 'राजतंत्रीय स्वरुप', अइ अत्यंत भयावह आधुनिक समस्याक 'कथा- रूपांतरण हेतु', 'उपयुक्त' नहिं भ' सकल अछि। आबक मैथिली कथालेखन एतेक आगू जा चुकल अछि, जे, 'बैताल पचीसी' आ 'सिंहासन बत्त्तीसी'-'टाइप-दन्तकथा-आधारित-कथालेखन’, 'एकदम पछुआयल' बुझायल अछि। लोककथा/दन्तकथाक जनसामान्य बला चरित्र सबहक नायकत्व, आजुक कथालेखन लेल उपयुक्त, स्वीकार्य, आ प्रासंगिक अछि। 'अओतीह कमला, जयतीह कमला' (कथा संग्रह, प्रदीप बिहारी), 'ठुमुकि बहू कमला' (उपन्यास, डा. धीरेन्द्र), 'कमला कातक राम, लक्ष्मण आ सीता' (नाटक,श्री महेन्द्र मलंगिया), 'घुरि आउ, मान्या' (उपन्यास,स्व. श्याम दरिहरे) आदि पूर्वक पोथी सबहक नामकरण, अइ दीर्घकथाक नामकरण-शैली के, 'पुराने' साबित केलक अछि। तहिना 'प्रेतक आह्वान पर', 'कमलाक आगमन' के सेहो, 'धार्मिके प्रारुपक' आ अविश्वसनीये आगमन', मानल जायत। तें, 'लोककथा-आधारित फंतासी कथालेखन' सेहो,एकरा मानब कठिन अछि। ई हिन्दीक असगर वजाहत, उदय प्रकाश, आ पंकज विष्ट बला 'यथार्थाधारित फंतासी कथालेखन' नहिंएं टा थिक। ई दीर्घकथा, श्री भवनाथ झा 'भवन'क 'प्राचीन वैचारिकता'क 'अनुकूलहिं' अछि, आ तें ओ 'तेहने शिल्प लेल', 'ताहि प्रारुपक तेहने प्राचीन दन्तकथाक चयन' क' सकलाह अछि। मुदा 'अंइठ' कथाक उपरान्त हिनकर कथाकारक विकास, 'राजतंत्रीय अंधयुगबला दन्तकथा' दिस नहिं भेनाइ छल। कथाकारक से विकास 'पंचतंत्रीय लोकयुग' अथवा, 'मिथिलाक लोकगाथा-युगीन नायकगण' दिस, अथवा 'आजुक जननायकगण' दिस भेनाइ, उचित छल। हिनकर कथाकारक मानसिकताक,'आधुनिक कालखण्ड मे उतरबाक', आजुक तिथि मे सहजहिं अपेक्षा कयल जायत। हिनका अपन 'कथा- लेखनक नीति', 'युगीन समय-सापेक्ष' आ 'आजुक समाज-सापेक्ष', बदलबाक चाहियनि। अइ दीर्घकथा मे, ई कथाकार, मैथिलीक 'देशज शब्द-धनीक' कथाकार, साबित भेलाह अछि। से बहुत प्रसन्नतादायक तथ्य थिक, जकर अभाव मैथिलीक बहुतो कथाकार मे रहैत छनि। मुदा खांटी जमीनी शब्द के, 'डा. रामावतार यादव बला जनवादी वर्तनी' रहने, 'वर्तनी आ शब्दावलीक विरोधाभास' समाप्त भ' सकैछ, संगति बैसि सकैछ। मुदा, मिथिला मिहिरक आ. सुमनजीक वर्तनी, अथवा 'पंचकोसी-दसकोसीक सम्भ्रांत वर्गक वर्तनी', 'एहेन निरैंठ आ ठेंठ शब्दावलीक सौन्दर्य- बोध' के 'पाचन मे अक्षम' अछि। अइ कथाकार के, अपन धनीक खांटी शब्दावलीक उपयोग, यात्रीजीक वर्तनी मे, करबाक चाहैत छलनि आ वर्त्तमान मे आबि क', निरंतर कथालेखन करबाक चाहियनि। ई कथाकार कथालेखन मे समर्थ छथि। मुदा, एक दशक मे एकटा कथा लिखने, समकालीन कथाधारा स' अपरिचित रहबाक आ कथापाठ मे अद्यतन नहिं रहि सकबाक, जोखिम रहैत अछि। ई कथाकार, मैथिली कथायात्राक अधुनातन विकास-पड़ाव सब स' अपरिचित रहि गेल छथि, 'अपडेट' नहि भ' सकल छथि। ओ अपन 'प्राचीनताक वैचारिक सीमा मे आबद्ध' छथि। कथालेखन मे निरंतरताक अभावक कारणें, अनेक तरहें तें सक्षम रहितो, अइ दीर्घकथा मे मात्र रोचकता आबि सकल अछि, आधुनिक परिवेशक चित्रण अइ मे संभवे नहिं छल, आ ने संभव भ' सकल अछि। से 'चयनित राजक कथाक सीमा' छल। कथाकारक 'चयन-दृष्टिक सीमा' सेहो, एकरा मानल जा सकैछ। अइ सीमा के, दृष्टिकोणक आधुनिकता आनि, दूर कयल जा सकैछ। मात्र एकटा हिन्दी-शब्द, 'नकदी' (जकरा लेल 'नगदी' मैथिली मे उपलब्ध अछि),पढ़बा काल खैंक जकाँ गड़ैत रहल। शेष सबटा शब्द, हिनकर शब्द-सामर्थ्य के देखाबैत अछि। हिनकर कथाकार के, 'समकालीन वैचारिकताक परिपाक लेल आ युगानुकूल भविष्य-दृष्टिक विकास'क निमित्त, शुभकामना छनि! संपादकीय टिप्पणी- मिथिलामे जलसंकट बहुत अछि मुदा एहि संकटसँ पार लऽ जेबाक लेल किछुए लोक लागल छथि जाहिमेसँ एकटा छथि नारायणजी चौधरी जे कि मिथिलामे 'पोखरि बचाउ अभियान' केर अगुआ छथि। विदेह अपन एकटा विशेषांक नारायणजी चौधरीपर प्रकाशित केने अछि जकरा एहि लिंकपर देखल जा सकैए- नारायणजी चौधरी विशेषांक 1 जून 2025 अंक 419, पोथी.कॅम pothi.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.११.डॉ.आभा झा-कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे डॉ. आभा झा (संस्कृतक शिक्षिका, विद्वान एवं समीक्षक) कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे कहल गेल छैक-’प्रयोजनमनुद्दिश्य न मन्दोSपि प्रवर्तते’। अर्थात् एहि संसारमे कोनो काज निरुद्देश्य नहि कएल जाइत अछि। प्रत्येक काज जकाँ साहित्य सृजन वा समालोचना सेहो उद्देश्यपूर्ण होइत छैक। धन-वैभवक प्राप्ति, यशक लिलसा, जीवन-व्यवहारक शिक्षा, अनिष्टक नाश, कान्तासम्मित उपदेश आ चरम काव्यानन्दक प्राप्ति आदि एकर प्रयोजन मानल गेल छैक। यद्यपि किछु पश्चिमी समालोचक आ हुनकासॅं सहमति रखनिहार लोक ‘कला कलाक लेल’ जकाँ ‘साहित्य साहित्य लेल’ सेहो कहैत-मानैत छथि, मुदा व्यावहारिक रूपमे प्रत्येक कवि-लेखक कोनो ने कोनो उद्देश्य मनमे राखिए क’ साहित्य- सृजनमे प्रवृत्त होइत छथि। आइ जखन आचार्य मम्मटेक काव्य- प्रयोजनसॅं गप आरंभ कएलहुँ अछि, त’ तकर कारण अछि जे सोझॉं मे अछि संस्कृत आ मैथिलीक निविष्ट विद्वान् आदरणीय भवनाथ झाक ‘भ्रूणपञ्चाशिका’। त’ जेना कि नामे सॅं स्पष्ट छैक एहिमे पचास गोट श्लोक छै आ विषय-वस्तु थिकै भ्रूण। भ्रूण त’ भ्रूण थिकै, ओकर लिङ्ग जनबाक इच्छा, जानि क’ ओकरा जीवित रखबाक अथवा नहि रखबाक निर्णय स्वयंमे प्रकृतिक कार्यक्षेत्रमे अवाञ्छित हस्तक्षेप थिकै आ अतिशय निन्दनीय ! कविवर एहि प्रसंगमे जन-जागृति अनबा लेल, लोकक मनोग्रंथि दूर करबा लेल गर्भस्थ सुताक मनोलोकमे प्रवेश करैत छथि आ पचास टा सरस -प्राञ्जल श्लोकक माध्यमसॅं एकटा सुंदर आ उपादेय प्रबन्धकाव्यक सृजन करैत छथि। जे कि सोझे सोझ उपदेश सुनबा लेल केओ तैयार नहि होइत छैक, तेँ कवि काव्यरसक चाशनीमे बोरि सत्यक करैल परसैत छथि, स्वर-लयक सुगन्धियुक्त सुंदर शब्दक माला गाँथि एकटा प्रबन्धकाव्य रचैत छथि। एहि प्रसंगमे इहो कहैत चली जे संस्कृतभाषाक अहैतुक विरोधी सभ संस्कृतक एकहु टा प्राचीन-अर्वाचीन पोथी बिनु पढ़नहि एहि सुसंस्कृत, परिमार्जित, ज्ञानकोशक भण्डार भाषाकेँ कर्मकाण्डीय भाषा, मृत भाषा, मनुवादक पोषक भाषा, आजीविका नहि देनिहारि भाषा, आधुनिक वैज्ञानिक प्रगति आ प्रविधिसॅं दूर भाषा आदि आक्षेप लगबैत अपन कल्पित- विकसित दुनियामे मगन रहैत छथि। एतय हमर अभीष्ट वैदिक अथवा उपनिषद् कालीन उद्धरण दए पाठक लोकनिक समयक अपव्यय करब नहि अछि, हमर उद्देश्य अछि ई कहब जे आइयो संस्कृत भाषामे पठन-लेखन भए रहल छै आ ओहि सभ विषय पर खुलि क’ कलम चलि रहल छै, जाहि पर लिखब आजुक जरूरति छैक। त’ एकटा गंभीर चिन्तकक मनमे ई गप आयब स्वाभाविके जे पुत्र आ पुत्री दुहू संतति होइत छैक आ दुहू माइ लेल एक रंग। कोनो समयमे जे बेटी सरस्वती, दुर्गा आ लक्ष्मीक रूपमे समादृत छलीह, शस्त्र-शास्त्रक समानरूपसॅं शिक्षा लैत छलीह, समाजक प्रत्येक कार्य-व्यवहारमे अपन सशक्त भूमिका निमाहैत छलीह, ओएह बेटीक विषयमे एकटा कालखण्डमे कहय गेल जाइ लगलै जे बेटीक जन्म होइ छै त’ धरती एक हाथ निच्चा धँसि जाइत छैक। सभकेँ पुत्र-रत्नक इच्छा होमय लगलै, पुत्रीक नहि। मुदा प्रकृति त’ ककरो चाहने वा नहि चाहने सृष्टि रचैत नहि अछि, ओ समस्त चराचर जगत् आ सभ प्राणीक अस्तित्वमे संतुलन लेल दुहूक सृष्टि करैत अछि। विज्ञानक भाषामे शिशु-जन्मकेँ एहि तरहेँ परिभाषित कएल जाइत छैक जे एक्स आ वाइ क्रोमोजोमक मेलसॅं पुत्र आ एक्स आ एक्सक मेलसॅं पुत्रीक जन्म होइत छैक। एहि तरहेँ जे कि स्त्रीक लग मात्र एक्स क्रोमोजोम होइत छैक आ पुरुषक लग एक्स आ वाइ दुन्नू, तखन संयोगवशात् (ककरो वश नहि जे हम बेटे उत्पन्न करब वा बेटिए) मुख्य कारणो पुरुषे रहैत अछि। मुदा समाजकेँ बेटी त’ चाही नहि। जे कि किछु प्रान्तकेँ छोड़ि देल जाय त' भारतीय समाज पितृसत्तात्मक छैक तेँ सभटा कुरीतिक छार-भार सेहो पुरुषेक कपार पर। मुदा एहि ठाँ प्रश्न जरूर उठैत छैक कि जे स्त्री मातृत्व सन महनीय दायित्व उठैबामे समर्थ होइत अछि, ओ एहि तरहक निर्णयक बेरमे एतेक दुर्बल किऐक भए जाइत अछि? गर्भ ओकर शरीरमे, ओकर रक्तमज्जासॅं पोसा क’ शिशुक रूपमे धरती पर अबैत अछि आ ओहि गर्भक हेतु मात्र होयबाक कारणे पिताकेँ ई अधिकार कतयसॅं भेटि जाइत छैक जे ओकर अस्तित्व मेटा सकय! कहबाक अभिप्राय ई जे एहि कुरीतिक पसारमे, एहि जघन्य अपराधमे स्त्री आ पुरुष दुहू बराबर दोषी छथि। जखन पुत्रप्राप्तिक अदम्य लिलसा एकटा मनोग्रन्थिक रूप लैत छैक त’ विचार कलुषित भए जाइत छैक आ बहुत रास कन्या-भ्रूण जन्म लेबासॅं वञ्चित भए जाइत अछि। यैह कारुणिक स्थिति एहि प्रबन्धकाव्यक आधार अछि। प्रत्येक पद्यमे अनुस्यूत संदेश, कुत्सित-त्याज्य मनोभावकेँ जड़िसॅं उखाड़बाक आह्वान, स्त्रीक अन्तर्निहित शक्तिक साक्षात्कारक उद्बोधन आ समाजक संतुलन आ समरसताक आग्रहकेँ समेटने एहि पोथीकेँ कविक दृष्टिसॅं देखबाक प्रयास करैत छी - जननि जननि मातर्गर्भलग्ना सुताहं नहि नहि कुलदीपो नन्दनः क्लेशहारी। इति पितरि मदीये ज्ञापिते वैद्यकेन विदलनचतुरेण श्व: निपातो हि मे स्यात्। (श्लोक-3) कविक संवेदनशील हृदय मनुष्यताक ई चरम क्षरण देखि आहत-व्यथित अछि आ ओ ओहि मायकेँ प्रबोधित करबा लेल गर्भस्थे शिशुसॅं कहबाबै छथि जे हे जननी! अहाँ किऐक अपन नामकेँ निरर्थक बना रहल छी? अहाँ निष्क्रिय बैसल छी आ पिता निर्णय लए लेलनि अछि। जे कि हम कुलदीपक नहि छीतेँ काल्हिए हमर खिस्सा खतम भए जायत! आहा! की करुणोत्पादिका अभिव्यक्ति अछि!

स्वपिति तव सकाशे भ्रातृपादो ममैव कुलगृहमणिदीपो नन्दनो दुःखहारी। जननि हि करमूलं मण्डितं का प्रकुर्या- दहह नभसि पूर्णे तस्य रक्षानुबन्धैः। (श्लोक-13)

कवि अधोलिखित श्लोकक माध्यमसॅं कवि-धर्मक निर्वाह करैत ओही बेटीक मुखसॅं प्रश्न करबैत माताक संग संग संपूर्ण समाजक चेतना झकझोरि भावी समस्या दिशि दृष्टि दिऐबाक प्रयास करैत छथि जे जॅं एहि तरहेँ पुत्रीकेँ अवाञ्छित बूझि हत्या करैत रहब तखन के अहाँक बेटाकेँ राखी बान्हत? ओहि शून्यताक कल्पना त’ करू। एतबहि नहि, अहाँक कुलदीपककेँ पत्नी कतयसॅं भेटतनि? की रोबोटसॅं विवाह करायब अपन पुत्रक? लैङ्गिक असन्तुलनक कारण समाज केहन भयावह स्थितिमे जायत तकर कल्पना त’ करू!

वद जननि जगत्यां कन्यकाभ्रूणहत्या प्रतिगृहमपि नारीं यद्यरोत्स्यत्समन्तात्। प्रियतरसुतजायां तेन यन्त्रोद्भवाञ्च कथमिव सममेलिष्यस्तु रोबोटरूपाम्। (श्लोक-15)

माताक अन्तर्मनमे साहस आ शक्तिक संचार करैत, ओकर मनक दौर्बल्य आ भ्रान्तिकेँ दूर भगबैत स्त्रीक योगदान सेहो मोन पाड़ैत कवि ओहि बेटीक मुखसॅं कहबैत छथिन-

गणयसि कथमम्बेमां सदा दुःखरूपां स्मर हिमपतिकन्यां शुम्भहन्त्रीञ्च दुर्गाम्। पठितसकलशास्त्रां पण्डितामेव गार्गीं दशरथरथयन्त्रीं प्रेयसीं वा कनिष्ठाम्। (श्लोक-16)

कवि कन्याक ब्याजसॅं स्त्री- चेतनाकेँ झकझोरि रहल छथि, अकर्मण्यता आ बेचारी- अबलाक तगमाक कारासॅं मुक्त होयबाक ओकालति करैत छथि, अन्यायक विरोध लेल उत्प्राणित करैत छथि आ सही निर्णय लेबाक आह्वान करैत छथि -

वद जननि किमस्मिन् गर्भगे तेऽधिकारो रुधिरपिशितपुष्टे स्वाङ्गभूते वसाक्ते। वद कथमसि तूष्णीमद्य नो चेदशक्ता क्षुरमपि निशिताग्रं वीक्ष्य लोलं पुरस्तात्। (श्लोक-32)

दैन्यक परित्यागक आह्वान लेल अधोलिखित श्लोक से ध्यातव्य अछि -

सुरपतिदिशि पश्य प्रसृतामंशुराशिं निविडतिमिरपुञ्जं गञ्जयन्तीमिदानीम्। परिहर भयमेवं जागृहि प्रातरस्मि- न्नपनय निजदैन्यं रक्ष मां धात्रि! चण्डात्। (श्लोक-33)

आह! कतेक करुण प्रार्थना थिकै ओहि बिनु जनमल कन्याक जे हे माइ! हमहूँ एहि धरती पर पएर धर’ चाहै छी, सूर्यक किरणसॅं तप्त भेला पर चानक चांदनीमे स्नान करय चाहै छी, सरपट दौड़य चाहै छी आ चिड़ैक संग गीत गाब’ चाहै छी! आह! केहन स्वाभाविक इच्छा आ तकर एहन मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति !

अहमपि रसवत्यां धर्तुमिच्छामि पादौ तपनकिरणतप्ता शीतले स्नातुमब्जे। परिमलितसमीरे संव्रजन्ती विदिक्षु सह विहगकुलैर्वा वाश्यमाना सुगीतिम्। (श्लोक-43) एहि काव्यक सभटा श्लोक मालिनी छंदमे रचल अछि। एकर लक्षण थिकै ’ननमयययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः। ‘“नगण नगण मगण यगण यगण”। एहि छंदक प्रत्येक चरणमे 15 वर्ण होइत छैक। ई एकटा सम वर्ण वृत्त छंद थिकै, जाहिमे प्रत्येक चरणमे दू 'न' गण (न न न यानी तीन लघु वर्ण) एक मगण (म म म यानी तीन गुरु वर्ण), आ अंतमे दू यगण (य य य यानी तीन लघु वर्ण) अबैत अछि। आठम आ सातम वर्ण पर यति (विराम) होइत छैक। अन्तमे एतबहि जे ई छोट सनक काव्य मानवताक गम्य मार्गक निदर्शन थिक, कन्याभ्रूण हत्या सन जघन्य अपराधमे लिप्त सामाजिक सोच आ ताहि कारण पापी बनल माता-पिताकेँ सुन्न सपाट स्त्री विहीन समाजक विरूप चेहरा देखा सावधान करैत छैक ई कहैत जे आबहु ठहर, नैसर्गिक काजमे हस्तक्षेप नहि कर, संतानमात्रक स्वागत लेल मनोभूमि बना! कविक एहि उत्कृष्ट कृति हेतु अभिनन्दन! संपादकीय टिप्पणी- 2010 मे बेचन ठाकुरक नाटक "बेटीक अपमान आ छीनर देवी" केर भूमिकामे आशीष अनचिन्हार द्वारा बिहार सहित भारतक आन राज्यक लिंगानुपात समस्या केर विस्तृत विवरण अछि। पाठक पोथीक शीर्षकमे देल गेल लिंकसँ पोथी डाउनलोड कऽ सकैत छथि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.१२.दीपा मिश्र-उसरन डीह- पाठकीय प्रतिक्रिया दीपा मिश्र (कवि, उपन्यासकार एवं संपादिका) उसरन डीह-पाठकीय प्रतिक्रिया मिथिलाक ज्ञान-परम्परामे धर्मशास्त्र आ कर्मकाण्डक विद्वान आ गंभीर शोधकर्ता भवनाथ झाक जन्म 23 सितम्बर, 1968 ई.मे बिहारक मधुबनी जिलाक हटाढ़ रुपौली गाममे भेल छलनि। संस्कृतमे स्नातकोत्तर भवनाथ झा प्राच्यविद् आ पाण्डुलिपि विशेषज्ञ छथि जिनका संस्कृत, मैथिली आ हिन्दीमे कतेको शोध कृतिक श्रेय देल जाइत छनि। अपन उत्कृष्ट शैक्षणिक कृतिक लेल प्रशंसा पओने छथि जाहिमे अनुवाद आ पाण्डुलिपिसँ ग्रन्थक सम्पादन सेहो शामिल अछि। सम्प्रति महावीर मन्दिरक शोधपत्रिका ‘धर्मायण’क सम्पादक छथि। भवनाथ जीक “उसरन डीह” नामक कथा आर्थिक प्रलोभन दए सांस्कृतिक उपनिवेशवादक स्थापनाक कथा छियै। तकर जे विरोध करै छै तकरा भकसी झोंका कए हत्या करबाक प्रवृत्ति देखल गेलैए। ओ विरोधी स्वर जतय पसरए लगैत छै तँ काशीमे ओ पुरान पोथी अंगरेजोक द्वारा छीनि लेल जाइत छै। मि. एक्स कें सेहो चिन्ता छनि आ ओ पुछैत छथिन जे ओहि पोथीक एकोटा पात कतहुँ बचलै नै ने? मुदा ओ आश्वस्त छथि जे हम जे काज कए रहल छी से राम सेहो केने छथि आ अंगरेज सेहो ओएह काज केने रहए। भारतमे 1985मे अमेरिकासँ कृषि पद्धति आयातित भेल रहै। डंकन फार्मूला नाम रहै। ई कथा ओकरे पृष्ठभूमि बना लिखल गेल अछि। ई कथा फ्रेम नैरेटिव अछि। माने एकटा मुख्यकथा के बीच बहुत रास उपकथा ओहिमे होइत छै। एहि कथामे चारि स्तरमे कथा छै, सभ एक संग जुड़ल छै। आ अंततः लेखकक कहब छैन जे मिस्टर एक्स आ राममे कोनो अंतर नहि। कथा पढ़ैत काल मैथिलीक बहुत रास नब शब्द सबसँ परिचय होइए जेना, उसरन जे भेलै परित्यक्त, तुरुंग जे‌ भेल काठक छोट संदुकची, रमना भेल अहात, अहल्या एतय स्त्री नै छथि, ओहुना अहल्या के अर्थ होइए एहन भूमि जकरा जोतबाक आवश्यकता नै हो, दियारा के खेत, जे बीया खसौलक तकर फसिल भेल, अफार खेत, जाहिमे हर नै बहि सकए माने बंजर। त’ कथा केँ बिना अवरोध पढ़बा गुणबाक लेल पहिने ई सब शब्द बूझब आवश्यक। फ्रेम नैरेटिव (Frame Narrative) कथा-शैली साहित्यमे बहुत महत्त्वपूर्ण तकनीक अछि। ई शैलीक अर्थ अछि—एकटा “मुख्य कथा”क भीतर “अन्य कथा”क प्रस्तुति। माने जेना कोनो पात्र अपन अनुभव या कथा सुनबैत अछि, आ ओहि कथा के भीतर आओर पात्र अपन कथा कहय लागैत अछि। एहि प्रकारे मुख्य कथा एकटा “फ्रेम” (ढाँचा) बनबैत अछि, जेकर भीतर उप-कथा सभ प्रस्तुत होइत अछि। कथा सभक बहुस्तरीयता (Multiple Layers) एकै संग अनेक दृष्टिकोण आ स्तरक अनुभव प्रस्तुत कऽ सकैत अछि। यथार्थता आ विश्वसनीयता सेहो रहैत छै एहिमे। जखन कथा “कहानी सुनबैत पात्र” द्वारा कहल जाइत अछि, तऽ पाठकक विश्वास बढ़ैत अछि। एकर कथा-संयोजन आ विस्तार विशेष होइए। एकटा “फ्रेम” रहिते लेखक आसानीसँ ढेर पात्र आ प्रसंग जोड़ि सकैत अछि। साहित्यिक सौंदर्य कथामे विविधता, रोचकता आ नाटकीयता सेहो एहिमे आबि जाइत अछि। लोक परंपरा संग जुड़ाव देख सकैत छी जेना एहू कथामे भेटैये। लोककथा, पुराण, पंचतंत्र, ‘हजार एक रात’ जेकाँ कथा सभमे ई शैली बहुत प्रचलित अछि। विषयगत अनुभवक बिना एकरा नै लिखल जा सकैये। मुख्य कथा आ उपकथा बीच तुलना करैत पाठक गूढ़ संदेश बुझि सकैत अछि। आब एक बेर फेर अबैत छी उसरन डीह कथा पर। ‘शहरक हो हल्ला भरल वातावरणसँ जखैन मि. एक्स गाम अबैत छथि त' एना बुझाइत छैन जेना प्रकृति ओतयसँ लोकक डरसँ भागि एतय निचेनसँ सुतय आबि गेल हो। ओ बड प्रसन्न छलाह आ ओहि कंपनीकेँ आभारी रहैत छथि जे एहि सुरम्य स्थल पर हुनका अपन प्रतिनिधि बनाकेँ पठेलकैन। कथा आरंभेसँ प्रकृति संग मनुष्यक प्रतिस्थापना करैत प्रतीत होइए। हुनका प्रभार भेटल छैन ओहि इलाकाक सालोंसँ पड़ल चीनी मिलकेँ पुनः कोना आरंभ कयल जाए तकर जांच पड़तालक। दस दिन ताबड़-तोड़ एहि लेल लागि के ओ काज करैत छथि आ काज जखैन बहुत हद तक सोझरा गेलैन त' मोन निचेन भेलैन। आब ओ कनेक शांति चाहैत छथि। घड़ी घंटा के अबाज सुनि मंदिर दिस जाइत छथि। ओ मंदिरक भव्यता आ शांतिक तुलना गिरजासँ करैत छथि। ओतय पंद्रह सोलह बरखक बालाकेँ देखि चकबिदोर लागि जाइत छैन। मोन पड़लैन एकरा त' रोज देखैत छथि। मुदा आइ हुनकर जेना हृदय कंपित होइत छन्हि। ठोर सुखाएल जा रहल। ओ कोनहुना ओकरा पेबाक व्योंतमे लगैत छथि। कथामे एहि जगह ई स्पष्ट नै बुझना गेल जे ओ ओकरा प्रति स्नेह भाव राखि रहल वा कामातुर भ' रहल। पाठक एतय आबि ओझरा जाइत छथि। आब जखैन ओहि बाला के प्राप्तिक योजना बनबैत पुजगरी अबैये त' एतयसँ कथाक पृष्ठभूमि पूरा बदैल जाइए। पुजारी हुनका खिस्सा सुनबैत छथिन राजा के जिनका खुदाइमे बहुत रास पुरातत्व संरक्षणक वस्तु भेटैत छन्हि। राजा ओकरा कलकत्तामे संग्रहालय के बेचैत छथि। एहि क्रममे उसरल डीहक खुदाइ होइए जाहिमे एकटा तुरूंग भेटैये। कोहुनाके ओकरा खोलल जाइए त' ओहिमे तरिपत (ताड़पत्र) भेटैये। राजा ओकरा पढ़ेबामे असफल होइत छथि अंततः एकटा पंडित पढ़ैत छथि। ओकरा एकटा पंडित पढ़िके सारांश सुनेलखिन - आब एतयसँ विश्वामित्र, राम आ लक्ष्मणक कथा आरंभ होइए। ओ सब मिथिला क्षेत्र पहुँचैत शस्य श्यामला धरतीक मध्य एकटा उसरल डीह देखलैन। राम लक्ष्मणक उत्कंठा बढ़ैत गेलैन। एतेक हरिहर धरतीक मध्य एहन पाथर, बेजान सन भूमि किएक अछि, कोना अछि? आब हुनकर सभक उत्सुकता देखि विश्वामित्र बैसाके कथा कहैत छथिन-आब एतयसँ फेरो नब कथारंभ होइए। गौतम ऋषि आ वृत्रहा इन्द्रक। जनिक कारण ई सब घटल। शतमन्युक गौरवे आन्हर छलाह। छल बलसँ ओ धन संग्रह करैत छलाह। कोनो नीक वस्तुके ओ अपन संपत्ति बनाबय चाहैत छलाह। सुन्दर वस्तुक उपभोग करब हुनक पहिल कामना रहैत छल। अहल्या, जे अद्भुत भूमि छल ओकरो पर हुनक कुदृष्टि पड़ि गेलैन आ एक बेर गौतम नै छलाह ताहि बीच छलसँ ओ ओकर स्वामित्व ल' लेलैन। घुरलाक बाद गौतम ई बुझला पर ओकर प्रति मोहभंग क' वैराग्य ल' लेलैन। अहल्या अभिशप्त पाषाणी भ' गेलीह। आब विश्वामित्र केँ कहला पर राम ओहि भूमिकेँ उद्धार केलैन। कथा आब वापस पहिलुक कथा सब दिस घुरब शुरू भ' जाइए। ई कथा सुनि राजा भावुक भ' गेलाह।ओ ओहि तरिपतकेँ देवनागरी कराबय चाहलैन जकरा छलसँ अंग्रेज सब जरा दैये। आब मिस्टर एक्स ई कथा सुनि जोरसँ साँस खिंचैत छथि आ पुजगरीकेँ पुछैत छथिन जे ओकर एको पन्ना बचलै त' नै,? पुजगरीक नै कहै पर ओ निचेन होइत छथि। आ पुनः चीनी मिलक उद्धारक बारेमे सोचय लगलैथ। कथा नीक अछि मुदा एतय कतौ कतौ विचलन होइए। एकर कारण एकटा आरो अछि जे प्रेम नैरेटिव कथाक सबसँ विकट पक्ष होइए ओकर जटिलता। बहुत स्तर आ उपकथा होइत-होइत पाठक भ्रमित भऽ सकैत अछि।जे अहूमे भेल से। तरिपत्र बला राजाक उत्साह अचानक अंग्रेज विद्वानक तरिपत्र जरेबासँ नष्ट होइत देखाओल गेल अछि। कथा सभक समय जेना फरिछाएब कठिन भ’ जाइए पढ़ैत काल। ओना ई पाठक पर सेहो निर्भर करैये।एहि तरहक कथा लिखलासँ मुख्य कथा पर बड असर पड़ैये। जे कथा मिस्टर एक्स से शुरू भेल ओ जेना बीचेमे हेरा जाइए। वापस जखैन पाठक हुनका लग तक पहुंचैये त’ ततेक युग घूमि अबैये जे ओ पात्र भ्रामक बुझना लगैये जकरा संग कथाक आरंभ भेल छल। उपकथा सभ कतेक बेर मुख्य कथा के कमजोर बना दैत अछि अथवा ओकर महत्व कम भऽ जाइत अछि। जँ फ्रेम नैरेटिव स्वाभाविक ढंगसँ नहि जुड़ल अछि, तऽ ई बनावटी लागय लगैये। कथानकमे कृत्रिमता आबि जाइए ओना एहि कथामे लेखक ई नै आबय देलैन। हँ एतय एकटा आरो दिक्कत छै जे पढ़ैत पढ़ैत मुख्य कथा के प्रवाह टूटि जाइत छै आ कथा जेना ओझराए लगैत अछि। बहुत उपकथा जोड़लासँ कथा अनावश्यक रूप सँ नमहर आ बोझिल भऽ जाइत अछि। फ्रेम नैरेटिव कथा साहित्यिक सौंदर्य, गहराई आ विविधता दैत अछि, मुदा ओकर सफल प्रयोग लेल लेखककेँ बहुत सावधानी रखबाक आवश्यकता अछि, नहि तँ ओहिमे ओझराहटि, कृत्रिमता आबि सकैत अछि। एहि कथासँ बहुत रास जंगला सेहो खुजैये। एकरा एकबेरमे बूझब नै संभव। ओ गहन दृष्टि आ कनेक इतिहासक ज्ञान सेहो रहब आवश्यक। भवनाथ जी नीक रचनाकार छथि। हुनक बहुत रास कथा सब हम पढ़ने छी। बेसीतर ओ प्रेम नैरेटिव लिखैत छथि। हुनकर ज्ञानक फलक विस्तृत छन्हि जे हुनक सब कथा पढला पर दृष्टिगोचर होइत अछि। संपादकीय टिप्पणी- एहि आलेखमे भवनाथजीक किछु पोथीक नाम सभ देल गेल छल जकर उल्लेख भवनाथजीक परिचय बला खंडमे भेले छै। दोहरावसँ बचबाक लेल एहिठाम एकरा संपादित कएल गेल अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.१३.सुनिल कुमार भानू -गहबरक बाटपर संघारामक पाखंड आ समाजक यथार्थ सुनिल कुमार ‘भानू’ (युवा लेखक) गहबरक बाटपर: संघारामक पाखंड आ समाजक यथार्थ बौद्ध धर्म अपन अवनतिक बाट पर चलि रहल छल। बज्रयानक (बौद्ध वाड़्गमयमे दू मतक चर्चा अछि पहिल हीनयान आ दोसर महायानक। बादमे महायानक रूपांतरण बज्रयान पंथक रूपमे भए गेल छल से देखबामे अबैत अछि।) शाखा बौद्ध धर्ममे भिक्षुणीक उपस्थिति बढ़ा देने छल। ई बौद्ध लोकनि साधनाकेँ अपन फायदा लेल एकटा नब रूप दए देने छल। पंच मकार (मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा एवं मैथुन)क नामपर ई लोकनि खुलेआम व्यभिचार करय लागल छलाह। ई लोकनि अपन यौन उच्छृंखलताकेँ एकगोट दार्शनिक चोंगा पहिरा देने छल, जकरा ई लोकनि ‘महासुखवाद’ कहैत छलाह। एहि महासुखवादक मुख्य आधार छल संभोग। जकरा लिये निम्नवर्ग केर कन्याकेँ इ सभ ‘नायिका’ बनबैत छलीह जे ‘मुद्रा’ कहबैत छल आ जकरा समाधीक मुख्य साधन मानल जाइत छल। ई व्यभिचार हुनका सभकेँ एतेक उदंड बना देने छल जे ओ सभ बुद्धक उपदेश धरिकेँ कतिआएब शुरू कए देने छल। पाला राजा जे शूद्र वर्णक बौद्ध मतावलम्बी छलाह, एहि बज्रयानी लोकनिक आदर करैत छलाह, हुनका प्रोत्साहन दैत छलाह आ जरूरत पड़लापर हुनका सभकेँ राज्याश्रय सेहो दैत छलाह। एहन स्थि ‍तिमे सनातन धर्मक की हाल होइत हेतेय तकर अंदाजा लगा सकैत छी। मुदा एहनो परिस्थिज‍तिमे सनातन धर्मक किछु ध्वलजवाहक छलाह जे सनातन धर्मक झंडा बुलंद केने छलाह। ओ नहि मात्र समजाकेँ जगेबाक काज करैत छल अपितु अपन धर्मक रक्षा लेल एहन-एहन दुराचारीक भंडा सेहो फोड़ैत छलाह। महिषी ग्राम वासी मंडन मिश्र छलनि। हुनका आ हुनक गामकेँ केन्द्रधमे राखि पंडित भवनाथ अपन पहिल मैथिली उपन्यागस लिखने छलाह ‘गहबरक बाटपर’ मैथिली साहित्यमे भवनाथ झा एकगोट चर्चित नाम छथि। हाँ, हुनक रचना बहुत रास प्रकाशित नहि अछि मुदा मैथिली लिपी आ पांडुलिपीपर हुनक जे काज अछि से स्तुात्यर अछि। एहिठाम हुनक एकगोट अप्रकाशित उपन्यास गहबरक बाटपर जे बौद्धकालीन संघारामक पृष्ठभूमि पर लिखल गेल अछि तकर चर्च अछि। ई कथा केवल भूतकालक इतिहास नहि, अपितु समाजक भीतर चलैत धार्मिक पाखंड आ नैतिक पतनक कथा सेहो कहैत अछि। उपन्यासक मुख्य केंद्र एकटा संघाराम अछि -एकटा विशाल मठ, जे बाहरसँ ज्ञान, ध्यान आ साधनाक केन्द्र देखाइत अछि। मुदा भीतरक स्थिति भिन्न अछि। तथाकथित महाश्रमण आ भिक्षु लोक धर्मक नाम पर तंत्र-मंत्र, जादू-टोना आ यौनाचार करैत छथि। साधनाक नाम पर जनताकेँ लोभाकेँ आ विशेष रूपसँ स्त्रीक शोषण करैत अछि। लेखक एहि माध्यम सँ देखाबैत छथि जे जखन धर्मक मूल स्वरूप भ्रष्ट भs जाइत अछि, तखन ओ जनसामान्य लेल बोझ भए जाइत अछि। संघारामक भिक्षु राजनीति आ सत्तासँ मिलि अपन स्वार्थ साधैत छथि। राजा लोक सेहो एहि तथाकथित चमत्कारक सहारा लैत छथि। परिणामस्वरूप जनता शोषणक शिकार बनैत अछि। उपन्यासमे मण्डन मिश्र नामक पात्र वैदिक संस्कृति आ नैतिक मूल्यक प्रतिनिधि अछि। ओ बौद्ध संघारामक पाखंडक विरोध करैत छथि आ धर्मक सच्चा स्वरूपक रक्षा करबाक कोशिश करैत छथि। एहि संघर्ष मे समाजक असली प्रश्न सामने अबैत अछि, ‘की धर्म मनुष्य लेल अछि, कि मनुष्य धर्म लेल’? आलेखक दृष्टिकोणसँ गहबरक बाटपर मात्र ऐतिहासिक कथा नहि, बल्कि चेतावनी सेहो अछि। जेना ओहि समय धार्मिक संस्था पाखंड आ भ्रष्टाचारक केन्द्र बनि गेल छल, ओहिना आधुनिक समाजमे सेहो एहेन खतरा मौजूद अछि। धर्म आ राजनीति जखन मिलि जाइत अछि, तखन समाजक दुर्बल वर्ग शोषणक शिकार बनैत अछि। भवनाथ झा अपन कथा आ शैली सँ स्पष्ट कएलनि अछि जे धर्मक शक्ति केवल करुणा, दया आ सत्यपर टिकल रहि सकैत अछि। जखन ओ शक्ति स्वार्थ आ लोभक अधीन भए जाइत अछि, तखन ओ मानवता लेल घातक सिद्ध होइत अछि। मैथिली उपन्यास परम्परामे कतिपय कृति एहन अछि, जकरा केवल कथा साहित्यक दृष्टिसँ नहि, अपितु समाज-इतिहासक दर्पण रूपेँ सेहो देखल जा सकैत अछि। भवनाथ झाक गहबरक बाटपर एहनहि एकटा कृति अछि। उपन्यासक आरंभमे संघारामक भव्यता वर्णित अछि - विशाल करजान, सुंदर मूर्तिसभ, मण्डप, पोखर आ भिक्षुसभक जप-तप। एहन दृश्य पाठकक मोनमे पवित्रता आ श्रद्धा जगबैत अछि। मुदा धीरे-धीरे परदा हटैत अछि आ संघारामक भीतरक यथार्थ बाहर अबैत अछि। साधनाक नाम पर तंत्र-मंत्र, भूत-प्रेत, यौनाचार आ राजनीति-संधि, ई सब संघारामक असली चेहरा अछि। धर्मक नामपर होइत ई आचरण केवल धार्मिक विकृति नहि, बल्कि समाजक नैतिक पतनक संकेत सेहो अछि। साधनाक बहाना बनाकि स्त्रीक देहक उपभोग, भोला जनता केँ छलि आ शोषित करब -ई सब उपन्यासक मुख्य सरोकार अछि। पंडितजी उपन्यासक माध्यमसँ देखबैत छथि जे जखन धर्म आ राजनीति एक दोसरक सहारा बनैत अछि, तखन जनता सबसँ बेसी पीड़ित होइत अछि। राजा लोक अपन सत्ता सुरक्षित करबाक लेल संघारामक महाश्रमणपर निर्भर करैत अछि, आ महाश्रमण राजाश्रयक बदलामे अनैतिक साधना करैत अछि। एहि गठजोड़क परिणाम समाजक दुर्बल वर्गक शोषण रूपेँ देखाइत अछि। उपन्यासमे मण्डन मिश्रक वैदिक परम्परा आ नैतिक मूल्यक प्रतिनिधि छथि। बौद्ध संघारामक पाखंड आ विकृति देखि ओ प्रतिवाद करैत छथि। मण्डन मिश्रक माध्यमसँ लेखक वैदिक संस्कृति आ बौद्ध धर्मक टकरावकेँ उजागर करैत छथि, मुदा हुनकर मर्म ई अछि जे कोनो धर्म यदि मानवताक सेवा आ नैतिकता सँ अलग भए जाइत अछि, तँ ओ विनाशक कारण बनैत अछि। गहबरक बाटपरमे स्त्री मात्र गृहस्थ जीवनक पात्र नहि, बल्कि धार्मिक साधनाक नामपर शोषणक साधन सेहो बनि गेल अछि। दीक्षा लेल पवित्रताक बहाना, कुमारी कन्याकेँ कपासक सूत्र सँ बान्हनाइ, यौनाचारक कुरीति - ई सब घटनासभ उपन्यासमे स्त्रीक पीड़ादायक स्थिति देखबैत अछि। ई चित्रण केवल इतिहासक नहि, बल्कि पितृसत्तात्मक समाजक सतत् विडम्बनाक प्रतीक अछि। गहबरक बाटपर मैथिली साहित्यक एकटा ऐतिहासिक उपन्यास जरूर अछि, मुदा एकर प्रासंगिकता कालातीत अछि। ई उपन्यास पाठक केँ चेतावनी दैत अछि जे पारदर्शिता, नैतिकता आ मानवता बिना कोनो धर्म आ संस्कृति टिकि नहि सकैत अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.१४.पण्डित भवनाथ झा-हितनाथ झा हितनाथ झा (मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070) पण्डित भवनाथ झा 2016-17 मे जखन हम 'कोइलख'क विषयमे एक पोथी लिखबाक विचार कयलहुँ तँ पोथीक रूप-रेखा तैयार करबाक क्रममे ध्यानमे आयल गामक वनखण्डी महादेवक मन्दिर, जे भद्रकाली मन्दिरसँ सटले सड़कक उत्तर दिस अवस्थित अछि आ हालहि ओहि मन्दिरक जीर्णोद्धार भेल छलैक, ओहिपर किछु तथ्यात्मक वर्णनक जनतब लेल सोचिए रहल छलहुँ जे ककरासँ सम्पर्क कयल जाय, जे सूचना प्रामाणिक हो। एक दिन फेसबुक अथवा कोनो पत्रिकामे स्मरण नहि अछि, देखल प. भवनाथ झाक एक आलेख जे वनखण्डी महादेवपर पुरातात्विक सामग्रीक अध्ययन जे हमरा लेल एक वरदान रूपमे साबित भेल आ निश्चिन्त भेलहुँ जे आब एहि विषयपर सेहो एक प्रामाणिक आलेख कोइलख पोथीमे रहतैक। हिनकासँ परिचित नहि छलहुँ, नामो नहिएँ सुनल छल प्रायः। गाम रुपौली छनि से प्रायः ओही आलेखमे पढ़ने रही। फेसबुकक मैसेन्जर मे हिनका हम अपन आवेदन देल जे हम एहि आलेखकेँ अपन एक पोथी 'कोइलख' मे सम्मिलित करय चाहैत छी जाहिसँ पोथीक महत्व आर बढ़ि जैत। हिनक उदारता जे तुरत अपन सहमति प्रदान कयलनि आ ओ वक्तव्य अविकल कोइलख मे हिनक नामक उल्लेख कय प्रकाशित कयल। ओ वक्तव्य छल- "Archological Remains at Vankhandinath Shiva Temple at koilakha near Bhadrkali Temple." दिनांक 05 मइ 2017केँ हम कोइलख गाम स्थित भद्रकाली मन्दिरमे दर्शनक लेल गेलहुँ। ओही ठाम मन्दिरक सामने उत्तरमे एक टा महादेव मन्दिर अछि। ई पूरा परिसर ऊँच डीहपर अवस्थित अछि। परिसरक द्वारपर वनखण्डीनाथ महादेव मन्दिर लिखल अछि। एकर ई नाम कोन साक्ष्यक आधारपर पड़ल, से अज्ञात अछि। मन्दिरमे दू टा शिवलिंग स्थापित छैक, जे नव अछि। एही गर्भगृहमे दक्षिण-पश्चिम कोणमे एक टा चबूतरापर कारी पाथरक दू टा पुरातात्विक सामग्री अछि जे एहि स्थानक प्राचीनताक प्रमाण अछि। मन्दिरक पुजारीक सूचनाक अनुसार एही परिसरसँ ई दुनू सामग्री भेटल, जकरा एकटा चबूतरा बनाए राखि देल गेल। ई शिवलिंग थिक, जे टूटल अछि। एहिमे शिवमेखलाक नीचाँ यन्त्र अछि। पहिल चक्रमे पाँच दल छैक आ प्रत्येक दलपर बीजाक्षर तिरहुतामे उत्कीर्ण अछि। गौरीशंकर मन्दिर, जमुथरि जकाँ एतहु अक्षर आ यंत्र उभारि कए लिखल गेल अछि, मुदा घसाएल अछि, तेँ ओकरा पढ़ि नहि सकलहुँ। समुचित प्रकाशक अभाव सेहो छल। एहि चक्रसँ नीचाँ दोसर चक्र सेहो छैक, जे पूर्णतः खण्डित अछि। शिल्प आ लिपिक दृष्टिसँ जमुथरिक तथाकथित भैरव (वस्तुतः शाके 1151 अर्थात 1229 ई.मे स्थापित कन्यकेश्वर शिव)सँ साम्य रखैत अछि। एहिमेसँ दोसर सामग्री तँ मूल मन्दिरक आमलक अथवा अमलक थिक, जाहिसँ स्पष्ट होइत अछि जे एतए कारी पाथरक एकटा मन्दिर छल होयत। एहि अमलक ऊपरवला अंश टूटल अछि। भद्रकालीक प्रतिमा सेहो 13मसँ 14म शतीक मानल गेल अछि। दुनू मन्दिरक अवलोकन कएलासँ प्रतीत होइत अछि जे एके कालमे एहि स्थानपर शिव आ शक्ति दुनू मन्दिर आमने-सामने छल होयत, जे एहि स्थानकेँ विशेष गरिमा प्रदान करैत अछि। गर्भगृहक दोसर कोणमे हनुमानक पाथरक प्रतिमा अछि, जे अधिक प्राचीन नहि अछि। गर्भगृहक बाहर गाछक तरमे अनेक छोट-छोट शिवलिंग राखल अछि, जाहिमेसँ एकोटा अधिक प्राचीन नहि बुझाएल। (सन्दर्भ : कोइलख-लेखक हितनाथ झा, पृष्ठ-121-22)। उपर्युक्त कथ्य तँ भेल पुरातत्वविद प. भवनाथ झाक विषयमे, किन्तु समीक्षकक रूपमे सेहो हिनक समीक्षकीय दृष्टिसँ परिचित भेलहुँ, अपनहि पोथीक हिनक समीक्षासँ, जे आकर्षित तँ कयबे कयलक, स्पष्ट संकेत सेहो कम प्रभावशाली नहि बुझना गेल। सामान्यतया देखल जाइत अछि जे अधिकांश समीक्षक खाली प्रशंसे क' अपन विधि पूरा करैत छथि, अवगुणक दिस कम ध्यान दैत छथि आ जँ दैतो छथि तँ समाधान नहि बतबैत छथि मुदा जखन हिनक समीक्षा देखलहुँ, तँ भान भेल जे हिनक संस्कृत आ मैथिलीक प्राचीन साहित्यक कतेक विशाल भण्डार छनि। महामहोपाध्याय उमापति उपाध्याय, महामहोपाध्याय गोकुलनाथ उपाध्यायक विषयमे किछु शंका निवारण कएलनि आ महामहोपाध्याय भैयन शर्मा (जे कोइलखक छलाह, हुनक चर्च हम कोइलखमे नहि कयने छलहुँ) सविस्तार सप्रमाण लिखलनि आ इहो लिखलनि जे ओहि भैयन झाक अन्वेषण होएबाक चाही। प. भवनाथ झा लिखैत छथि --" हमरा जनैत पुस्तककेँ देखबाक दू टा दृष्टि होइत छैक--पहिल जे, जे अछि, से केहन अछि? जे नै छैक तकर चर्चे कोन? लिखबाक लेल तँ बहुत किछु छैक! एखनि एतबेसँ संतोष। मुदा दोसर दृष्टि होइत छैक जे आर की की रहबाक चाही। स्पष्ट अछि जे पहिल दृष्टि टकसाली समीक्षा थिक, जतए ममत्व नै रहैत छैक, दोसरक बेटाक गुण-दोषक विवेचन जकाँ। मुदा दोसर प्रकारक दृष्टि अपन वस्तुकेँ देखबाक दिशा थीक। पहिल प्रकारक दृष्टिमे पुस्तक बड्ड नीक अछि। दोसर दृष्टिसँ देखलापर किछु निराशा हाथ लगैत अछि। पुस्तकक शीर्षक थीक कोइलख। मात्र सारस्वत इतिहास कोनो गामक सम्पूर्णताक द्योतक नहि भए सकैत अछि।...मानि लिय जे ई कोइलखक सारस्वत इतिहास थीक तखन पुस्तक देखि मन आह्लादित भए जाइत अछि।" (सन्दर्भ: विदेह 405म अंक, 01 नवम्बर 2024, पृष्ठ-100-103) आ एहि पोथीक शीर्षक दिस ल' गेलाह आओर निराशाक कारण दिस ध्यान आकृष्ट करौलाह, जे तर्क संगत अछि। आ से एक बेर आर हमरा उचित कर्तव्य बोध दिस ध्यान दिऔलनि। 2018 ई. मे मैथिली मचान, दिल्ली द्वारा मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल, राजनगरमे आयोजित सम्मेलनमे प. भवनाथ बाबू आमन्त्रित छलाह आ हमहूँ बजाओल गेल छलहुँ। प्रायः हुनकासँ पहिल बेर भेँट भेल छल। जखन राजनगरसँ हम हजारीबाग वापस जाइत छलहुँ, तँ एक टा प्रसंगक विषयमे जे सम्मेलनमे खटकल छल, हम फेसबुकमे पोस्ट क' देलियैक, जाहिमे अनेक टिप्पणी आयल, मुदा हिनक टिप्पणी जे आयल से तर्कसंगत लागल। लिखने रहथि, एकरा सार्वजनिक जे अहाँ केलियैक, से अहाँकेँ उचित छल, पहिने संयोजिकाकेँ एहि विषयमे व्यक्तिगत रूपसँ कहितियनि। कतेक कठिन होइत छैक कोनो आयोजनक इन्तिजाम करब आ छोट-मोट त्रुटिकेँ सार्वजनिक नहि करी। हमरो हिनक बात जँचल, मुदा तीर तँ धनुषसँ निकलि गेल छलैक। हुनक ई बात हम आगाँक लेल गीरह बान्हि लेलहुँ। एक प्रसंग आर मन पड़ि रहल अछि। गत वर्षक अप्रैल मासक। 'यूट्यूब'मे एक साक्षात्कार छलैक जे परिस्थिति कत'सँ कत' लोककेँ ल' जाइत छैक, कोन स्थिति आदमीकेँ देखा दैत छैक आ लोक भले कतबो प्रभावशाली हो, कोना विवश भ ' जाइत अछि। दुर्भाग्यसँ ओहि साक्षात्कारक जे मुख्य अंग छलाह से हमरे गामक, हमरासँ 4-5 वर्गक सीनियर आ घरक पड़ोसी सेहो। हमहूँ ओ साक्षात्कार देखने-सुनने रही, दुखी भेल रही आ कतेक लोकक फोनो आयल जे वैह ओ व्यक्ति छथि। एक दिन ओही प्रसंग भवनाथ बाबूक सेहो हमर मैसेन्जरपर एक मैसेज आयल, जकर जवाब हम देने रहियनि--" एखने अपनेक पोस्ट देखल। हमरहु नहि बूझल छल। हमर घरक बगलमे हिनक घर छनि। किछु दिन पहिने हमहूँ ई साक्षात्कार देखल। बादक स्थिति बहुत बढियाँ नहि रहलनि, से की कारण नहि कहि सकैत छी। " हुनक जवाब आयल --" सादर। हिनक एक पुत्रीक विवाह रुपौलीमे हमर पितियौत भाइसँ भेल छनि, तेँ हम कने बेसी खोजमे रही। " हिनक फेसबुकक पोस्ट जखन-जखन देखैत छी, तँ कोनो ने कोनो सार्थक विषय आधारित रहैत छनि। कौलिक विद्वत् परम्पराक प्रतीक प. भवनाथ झा जेहने विशिष्ट पुरातत्वविद छथि, तेहने प्राचीन पाण्डुलिपक संरक्षक, जेहने कर्मकांडक निष्णात पंडित छथि, तेहने संस्कृत साहित्यक गूढ़ अध्येता, जेहने सम्पादकक दायित्वक निर्वहन करैत छथि, तेहने साहित्य लेखनमे सेहो पटुता प्राप्त कयने छथि। मैथिली साहित्यक कथाकारक रूपमे सेहो ज्ञात छथि। अनेक संस्कृत साहित्यक पोथीक अनुवाद व्याख्या सहित कयने छथि। हिनक बौद्धिकताक मिशालक लेल हिनकहि लिखल फेसबुकक पोस्ट जे 23 सितम्बर 2025 क' अपन जन्मदिनपर लिखने रहथि, एहि ठाम प्रस्तुत क' रहल छी आ हिनक दीर्घ जीवनक माँ भद्रकाली कोइलख देवीसँ प्रार्थना करैत छी जे एहिना स्वस्थ रहथि, एहिना सभ क्षेत्रमे सक्रिय रहथि आ मिथिलाक मान-सम्मान बढ़बैत रहथि। "आइ हमर जन्मदिन थीक- 23 सितम्बर। प्रस्तुत अछि एतए विगत वर्ष (सितम्बर 2024सँ सितम्बर 2025) लेखा-जोखा। एहिना सभ वर्ष बितैत जाए से कामना अछि। • ई विगत वर्ष हमर जीवनक स्वर्णिम वर्ष रहल। एको टा टैबलेट दबाई नै एलहुँ, ई सभसँ पैघ बात!! • उत्कृष्ट घरमे एही वर्ष बेटीक विवाह भेल। • विद्यापतिक कृति #भूपरिक्रमण क पाठोद्धार आ हिन्दी व्याख्या कएल, जे ईसमाद, दरभंगासँ प्रकाशित भेल। एकर अंगरेजी अनुवाद श्री विजय देव झाजी कएलनि। • तत्त्वम् फाउण्डेशन फॉर पॉलिसी एण्ड रिसर्च आ राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन, संस्कृति मन्त्रालय, भारत सरकारक परियोजनाक अन्तर्तगत एहि वर्ष पाण्डुलिपिसँ पहिल बेर 4 पोथीक सम्पादन कएल जाहिमेसँ दू टा प्रकाशित भए चुकल अछि- o 1. #सभाविनोद, o 2. #सभाकौमुदी। o #भूकम्पनिर्णय पोथीक पाठोद्धारमे सेहो परियोजनाक अन्तर्गत सहायता कएल। • श्रीमद्दयानन्द आय कन्या महाविद्यालय, चोटीपुरा (उत्तर प्रदेश)मे राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशनक तत्त्वावधानमे पाण्डुलिपिक #लिप्यन्तरण_कार्यशाला मे 9 टा ग्रन्थक लिप्यन्तरण कराओल। ई कार्यशाला सुखद रहल। एतए स्नातक आ आचार्य कक्षाक छात्रालोकनिकेँ संस्कृत भाषाक ज्ञान रहनि। • कुमारभास्करवर्मसंस्कृत-पुरातनाध्ययनविश्वविद्यालयः, नालबाड़ी, आसाममे तीन दिनक लिप्यन्तरण कार्यशालामे स्थानीय लिपि बमुनिया (असमी लिपिक एक प्रभेद) सँ दू टा अप्रकाशित ग्रन्थक लिप्यन्तरण कराओल। • "तत्त्वचिन्तामणि का सारतत्त्व ‘मणिसार’ और उसके प्रणेता म.म. गोपीनाथ"- ‘कृति रक्षण’, संस्कृति मन्त्रालय, दिल्ली के द्वारा प्रकाशित, राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन, vol. 1, No 2, August 2025, pp. 119-128, 2025ई. • एहि वर्ष दू टा सम्मान भेटल- o #हस्तप्रतिलिपिविशेषसम्मानम्, कुमारभास्करवर्मसंस्कृत-पुरातनाध्ययनविश्वविद्यालयः, नालबाड़ी, आसाम। दिनांक 27.6.2025 o #सद्गृहस्थ_संत_जगन्नाथ_चौधरी_शोध_सम्मान, 2025- जयराम शोध संस्थान, सुल्तानपुर, 24 अप्रैल, 2025. • Participation as Group Member- PRE-CONFERENCE WORKING GROUPS, International Conference on “Reclaiming India’s Knowledge Legacy Through Manuscript Heritage”, Dated: 11–13 September 2025, Group 2, Proposal submitted- :A Draft Focusing on Survey and Documentation.” Published in- Gyan Bharatam, Working Group Report, pp. 31-45. आरो बहुत रास बौद्धिक काज- इसमाद प्रकाशनक लेल। https://brahmipublication.com/pt-bhavanath-jha/ " (सन्दर्भ : प. भवनाथ झाक फेसबुकक टाइमलाइन, 23 सितम्बर 2025) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.१५.डॉ.धनाकर ठाकुर-संग्रहणीय व्यक्तित्व पं.भवनाथ झा डॉ. धनाकर ठाकुर (अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद् केर कर्ता-धर्ता, आन्दोलनी एवं मिथिला राज्य अभियानी। संपर्क-9430141788 / 9843376861) संग्रहणीय व्यक्तित्व पं.भवनाथ झा संग्रहणीय व्यक्तित्वक स्वामी छथि पं भवनाथ झा जिनकासँ हमर एकमात्र भेंट कहिओ पटनाक महावीर मन्दिरमे भेल जखन ओ वैशालीमे कार्यरत छलाह। हमर फोन पाबि महावीर मन्दिर आबि गेलाह। हम बातचीत कए ट्रेन पकड़लहुँ। हम हुनका महावीर मन्दिरक पुजारी बुझैत छलियैन्हि किन्तु ओतए ओहि दिन पता चलल जे ओ पुजारी नहि, रिसर्च विभागमे ओतहि छथि। एक मन्दिर जे वर्तमान निर्माण पूर्व एक सामान्य मन्दिर छल जतए हम 26.1.1980 क नेशनल मेडिकोज आर्गेनाइजेशनक विशिष्ट बैठक माननीय गोविन्दाचार्यक संग कए गेल छलहुँ, डा विनय सिद्धेश, मुजफ्फरपुर लऽ गेल छल। फेर कइएक बेर जाइत रहलहुँ, 2012मे ओतहि बैसि हनुमान चालीसाक मैथिली अनुवाद केने छी। कहिओ फेसबुकसँ भवनाथ झाजीसँ परिचय भेल। जखन-तखन हम पूजा बर्षी तर्पण आदिक बारेमे फोनसँ पू़छैत रहलहुँ जकर ओ शास्त्रीय पद्धति पर निराकरण करैत रहलाह अछि। किन्तु महावीर मन्दिर धर्मक मामलामे रिसर्च लेल एक एतेक सुयोग्य आचार्य रखने अछि जानिए प्रसन्नता भेल। हमरा कहलाह कि हूनक शोध ओहि समय मुख्यत: अयोध्या पर केन्द्रित छल जे रामललाक वकीलकेँ सहयोग लेल छल आओर ई कहल जा सकैत अछि जे हुनक प्रमाण बहसमे बहुत हद तक सहायक भेल जे मैथिल समाज लेल गौरवक विषय अछि। विधनाक कोपवश भवनाथजी कने तोतराइत छथि मुदा लिखबामे ओतबहि सिद्धहस्त। ओ एक पंडित परिवारक संस्कृतज्ञ जे धर्मायण पत्रिकाक सम्पादन एखन धरि कऽ रहलाह जे उच्च कोटिक धार्मिक पत्रिका अछि। नहि जानि कतेक पुस्तकक ई सम्पादन, लेखन केलाह जाहिमे दुर्गासप्तशतीक पं.भवनाथ मिश्रक ताड़पत्र पर मिथिलाक्षरमे लिखल पोथीक देवनागरीमे छपबेनाइमे ई प्रमुख सहायक रहलाह कारण ई मिथिलाक्षरक मर्मज्ञ ज्ञाता छथि। किन्तु हिनकर एक पोस्ट मिथिलाक पछबरिया सीमांकन करैत मैथिलीकेँ समय 950 ई तक पाछाँ प्रमाणित कए देलक। नरकटियागंज लग सोदरा गाममे पाओल गेल एक इनार पर लिखल गेल एक अभिलेख द्वारा। 2023मे हम हिनका अपना द्वारा संस्थापित भारतीय लिपि परिषदक अध्यक्ष बनबए चाहैत रही किन्तु ओ कहलाह कि ओ एखन पुरान ताम्रपत्र, पोथी आदिक संग्रहमे लागल छथि ओ संग्रह, संरक्षणक कार्यशालामे अनेक प्रान्तमे घूमि रहल छथि। ई अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य अछि ताहि लेल पं. भवनाथ झा युग-युग तक स्मरणीय रहताह तँइ हम एहि लेखक शीर्षक "संग्रहणीय व्यक्तित्व पं. भवनाथ झा" रखलहुँ अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.१६.मुरारी कुमार झा-सरलताक आवरण मे निहित विद्याक विराट रूप मुरारी कुमार झा (शोधार्थी, प्रा.भा.इ. पुरातत्त्व एवं संस्कृति विभाग, ल.ना.मि.वि., दरभंगा। संपर्क-7562952095) सरलताक आवरण मे निहित विद्याक विराट रूप 10 दिसम्बर 2015 केर भिनसरे ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालयक प्राचीन भारतीय इतिहास पुरातत्त्व एवं संस्कृति विभाग सँ तत्कालीन शिक्षक डॉक्टर अयोध्यानाथ झा सरक फोन आयल जे आइ कने सबेरे विभाग अबिहऽ। हम कहलियैन ठीक छै सर! तद्नुसार, हम दस बजे विभाग पहुँच कऽ जल्दी बजायल जयबाक प्रयोजन बुझबाक प्रयास कयल तऽ पता चलल; जे मोती महल स्तंभ लेख केर पढ़बाक लेल पटना सँ एक विद्वान आबि रहल छथि। मोती महल स्तंभलेख 2 दिसम्बर 2015 केर विभागक परिसरे सँ हम सभ माँटि खूनि कऽ निकालने रही, जाहिपर पाँच पाँतिक मिथिलाक्षर लिपि आ संस्कृत भाषामे लेख उत्कीर्ण कएल गेल छल। विद्वानक अबैया बुझि अन्तरमन सँ विद्वानक एकटा दृश्य सोझाँ आयल जाहिमे ओ कोट-पेंट, करिया जुत्ता, छोटका बैग संग बड़का गाड़ी (कार) मे बैसि कऽ औताह। ई सब चलिये रहल छल कि सरक फोन बजलैन, फोन उठा सर बजलाह; कोन ठाम छी? श्रीमान! फेर कहलाह आबि गेलहुँ! हम तुरत अपन विद्यार्थीकेँ पठा रहल छी। फोन काटैत सर कहलाह, दौगि कऽ जा श्रीमानकेँ लऽ अबहुन। हम पूछलियैन हम कोना चिन्हबैनि, के छथि, नाम की छियैन? स्नातकोत्तर सँ पूर्व तऽ कहियो अकादमिक संसार देखने नहि रही। नाना कहैथ जे, जँ कियो आबैथ तऽ कम सँ कम हुनक नाम आ गाम अवश्य पूछि लेल जयबाक चाही। सर कहलाह पहिने कार्यालय सँ बहरेबहक तखने ने देखेथुन्ह! हम बाहर भऽ देखल, तऽ कोनो गाड़ी नहि आबि रहल छल; बाट जोहैत रही कि एक गोटे कुर्ता-धोती पहिरने हमरा सोझाँ आबि पुछलाह प्राचीन इतिहास विभाग यैह अछि की? हम कहलियनि हँ! हमरा सँ एतबा सुनि ओ कार्यालय दिस चलि गेलाह। हम हुनका दिस ओतेक ध्यान नहि देलियनि। किएक हम तऽ ओहि विद्वानक प्रतिक्षामे वकोध्यान लगा ठाढ़ रही, जे स्तंभलेख केर अवलोकनार्थ आबि रहल छलथि। हमरा प्रतीक्षा करैत करीब पन्द्रह मिनट भऽ गेल, डॉ. अयोध्यानाथ झा सर आ विभागाध्यक्ष डॉ. मदन मोहन मिश्र सर ओहि व्यक्तिक संग बाहर अयलाह; जे हमरा सँ विभागक परिचय पूछैत भीतर गेल रहथि। तीनू गोटे बाहरे मे ओसारा पर राखल स्तंभलेख दिस बढ़लाह। दुनू सर कहलखिन, श्रीमान् यैह अछि अभिलेख! आब नीक जकाँ अवलोकन कएल जाउ। एतबे सुनलहुँ कि मोन उद्वेलित भऽ उठल, जे ओ हमर काल्पनिक भयावह सन परिदृश्य नहि छनि आ हिनक प्रशस्ति मे सरक मुँहे आरो बहुत रास गप्प सुनने रही; खैर! ओहन सन दृश्य हमर कल्पनाशक्ति सँ कोना नहि बहरायत! किएकि ओहि सँ पहिने हमर कोनो तरहक अकादमिक पृष्ठभूमि नहि रहल छल आ सिनेमाक प्रभाव सँ ओहन सन मनोदशाक सृजन भेल। ई विद्वान रहथि महावीर मंदिर, पटनाक प्रकाशन एवं शोध पदाधिकारी परम आदरणीय पंडित भवनाथ झा। पं भवनाथ झाजीकेँ मोती महल अभिलेखक छवि व्हाट्सएप सँ दू दिसम्बर केर साँझ मे पठाओल गेल छलनि। मुदा ओहि काल माटि सँ निकालि कऽ धोनहे रही, तैँ छवि लेबा काल अभिलेख भीजल छल; जाहि कारणेँ मात्र सं. 1398 आ श्री सङ्केश्वर नामटा फरछियाओल रहनि। आब एहि दिन लग मे बैस कऽ पढ़ि-पढ़ि कागत पर लिखैत गेलाह। ओकर उपरान्त विभागक कार्यालय मे बैसि कऽ सभटा रिपोर्ट बनौलाह आ फेर दुपहरिया मे प्रस्थान कऽ गेलाह। ओही रिपोर्टक अनुसारेँ अभिलेखक लिपि मिथिलाक्षर आ भाषा संस्कृत अछि, जकर सम्प्रति आदरणीय पंडित झा विशेषज्ञे छथि। आ ओहि अभिलेखक विवरण देखू- प्रकार- स्तम्भलेख लिपि- तिरहुता (मिथिलाक्षर) भाषा- संस्कृत आकार- 23×26 सेमी., 5 पाँति काल- 1341 ई. 1. ॐ (मंगल चिन्ह) सं. 1398 वैशा 2. ष (ख) वदि 5 बुधे । 3. सप्रक्रिय महाट्ट (ट्टे) श्व 4. र श्रीसङ्केश्वर 5. कस्य धवल गृह्यं (।) एहि तरहेँ हमरा हिनका सँ पहिल भेँट छल। एहि भेंटक उपरान्त एखन धरि कतेको शैक्षिक मंच, पुरास्थलक अन्वेषण, मिथिलाक्षर कार्यशाला मे गुरु-शिष्यक रूपेँ, भू. ना. मं. विश्वविद्यालय, मधेपुरा मे पाण्डुलिपिक संरक्षण एवं संवर्धनक उद्देश्य सँ आयोजित तीस दिवसक प्रशिक्षण कार्यशालामे प्रशिक्षकक रूपेँ (हमर दुनू गोटेक दिन फराक छल) आदि कतेको ठाम हिनका सङ्गे रहलहुँ अछि। हिनक ज्ञान भण्डार अथाह अछि, जकर विस्तार सँ जनतब करायब हमरा सन नवीन अकादमिक आ अतिसाधारण व्यक्तिक लेल दुरूह काज अछि। सम्प्रति पण्डित झा मिथिलाक्षर, प्राचीन देवनागरी, बांग्ला आ असमिञा लिपिक विद्वान छथि। आइ धरि हिनका द्वारा मिथिला सँ भेटल कतेको रास अभिलेखक पाठ फरछियाओल गेल अछि सङ्गहि हिनका लग शोध आ प्रकाशनक सेहो विशाल भण्डार छनि, जाहिमे सैकड़ो आलेख, शोधालेख, प्राचीन ग्रन्थ सभक अध्ययन, सम्पादन आ प्रकाशन, पुरास्थल आ मंदिरक अन्वेषण, पुस्तक लेखन, पुस्तक सम्पादन, धर्मायण पत्रिका सम्पादन आदि अछि। जाहि महावीर मंदिर पटनाक प्रकाशन एवं शोध पदाधिकारी छथि ओहि ठाम सँ धर्म, दर्शन, इतिहास, संस्कृति आदि पर आधारित शोध ग्रन्थ, पोथी, पत्रिका, पुस्तिका आदि प्रकाशित होइत अछि, एहिक परिणाम स्वरूप महावीर मंदिर मात्र आस्थाक केन्द्र नहि, अपितु शोध आ संस्कृतिक जीवन्त केन्द्र बनि गेल अछि। हमरा जतेक अनुभव भेल एखन धरि ताहिमे आदरणीय पण्डित भवनाथ झा सरलताक आवरण मे निहित विद्याक विराट रूप छथि।c अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.१७.कौशल कुमार- भवनाथ झा सँ साक्षात्कार कौशल कुमार (तिरहुता लिपि लेल सूर्यलक्ष्मी नामसँ फॉण्टक निर्माता, तिरहुता लिपि लेल अथक काज एवं सरकारक लिपि संवर्धनक विभिन्न पेड-प्रोजेक्टमे सहभागिता, संपर्क-9210369369) हम 2005 मे बम्बइमे रहैत तिरहुता केर काज शुरू कएने रही। हमर काज, जीवन, विचार, आचार आ सरोकार सभ मैथिली आ मिथिलासँ अछि। तेँ मिथिला, मैथिली आ मैथिलसँ कोनो प्रकारे जुड़ल लोक हमर पहिल प्राथमिकतामे रहैत छथि। एहि क्रममे हमर जीवनमे लहलहाइत हरियर खेतसँ होइत अबैत बासन्ती बसात सम किछु लोक हमरा आशीष, स्नेह आ ज्ञानक सङ्ग-सङ्ग सम्बल सेहो देला अपन काज करैत रहबाक तँ ओहिमे एक गोट नाम पण्डित भवनाथ झा केर सेहो छनि। भवनाथ बाबूसँ हमर पहिल भेँट पटना रेलवे टीसन लगहक महावीर मन्दिरक परिसरमे भेल छल। प्रायः ओ जुलाइ 2010 क कोनो तिथि छल। 2007 मे हमरा लागए लागल जे आब तिरहुताक काज कएनिहार हम एकसरे एहि सकल संसारमे छी। हम तऽ अद्भुत काज कऽ रहल छी। ओइ पर हमर इष्ट-मित्र सभ सदति मना करथि जे ई कथीमे लागल छी, ई सभ बेकारक काज अछि। एहि लिपिक आब आधुनिक जुगमे कोन काज। एहन बातपर हमरा रञ्ज चढ़ि जाइत छल। कहबाक अभिप्राय ई अछि जे लोककेँ जखन भ्रमवश बुझाइ छै जे अमुक काज हम एकसरे कऽ रहल छी सेहो बिनु कोनो मार्गदर्शककेँ तऽ ओकर मोनमे एहने भाव आबिए जाइत छै। हमरा जनैत ई मात्र हमरे सङ्गे नहि भेल बहुतो लोकक सङ्ग होइ अछि। आ इएह भाव, अपन भाषा आ लिपि केर प्रति लगाव कएक बेरि हमरासँ लोकक अपमान करा देलक। मुदा हमर भ्रम तखन टूटल, तखन अपन ओकाइत केर पता लागल जखन एकदिन सर्च करैत काल हमरा अंशुमान पाण्डेय केर काजक पी.डी.एफ हाथ लागल। हम तिलमिला उठलहुँ जे हमरा बुझले नहि अछि आ एत्तेकटा काज भऽ गेलैक? कियो हमरासँ पुछबो नहि केलक! ओ (अंशुमान पांडेय) गजेन्द्र ठाकुर आ भवनाथ झासँ बात केलक मुदा हमरासँ किए नहि केलक? आ अही जिज्ञासामे हम भवनाथजी केर सम्पर्क तकैत पटना महाबीर मन्दिर पहुँचल रही। भवनाथजीसँ जखन हम पूछल जे अपने अंशुमानकेँ किएक नहि कहलियैक जे ओ जे तथ्य राखि रहल अछि ओहिमे बहुत सुधारक प्रयोजन अछि। तऽ भवनाथजी कहलनि, "हमरासँ जे पुछलक आ जे जानए चाहलक से कहलियैक बाद बाँकी ओकर अपन प्रोजेक्ट छलैक जेना फुरेलै ओ रिपोर्ट सौंपि देलकै। मुदा की ओकर रिपोर्टसँ सभटा खराप वा ठीक थोड़बे भऽ जेतैक?" भवनाथजी केर शान्त आ परिष्कृत विचार हमर मोनकेँ शान्त केलक। काज करबाक तरीका हम भवनाथजीसँ सिखलहुँ। अपन जिज्ञासामे हम ई बुझल जे एकहि समयमे एक्कहि तरहक प्रश्न बहुतो लोकक मोनमे चलैत रहैत छै जकर समुचित उत्तर ओ तकैत रहैत अछि। एहि भावनासँ प्रेरित भऽ हम आदरणीय भवनाथ बाबूसँ किछु प्रश्नोत्तरी तिरहुता सम्बन्धमे कएल, जाहिसँ तिरहुताक प्रति हमर, हुनकर आ मिथिलाभाषी, मैथिलीवासी आ प्रवासी केर भाव सोझाँ आबि रहल अछि। अहूँ सभ अपन प्रश्न ताकू आ ओकर उत्तर लिअ- 1. अपनेक जीवनमे तिरहुता कहिया आ किनका माध्यमे आएल? हमर घरमे पारिवारिक संकलनक लगभग 100 पाण्डुलिपि अछि। बच्चामे पिताजीक आदेश पर हुनका संग लागि सभ वर्ष भादवक रौदमे ओकरा सुखाए फेर ओहिना रखबाक अभ्यास भेल। चेतन होइत गेलहुँ, तँ ओकरा पढ़बाक जिज्ञासा भेल, तँ पिताक निर्देश पर हुनकहिं सँ ई लिपि सिखलहुँ आ संगहि पाण्डुलिपि सम्बन्धी बहुत किछु बात जनलहुँ, जे आइयो काज दैत अछि। 2. अपनेक पहिल पाण्डुलिपि कोन छल जे तिरहुतामे रहैक? हमर पारिवारिक पाण्डुलिपि संकलनमे म.म. पशुपतिक व्यवहाररत्नावलीक पाण्डुलिपि हमर प्रपितामहक हाथक लिखल छल। ग्रन्थक पता लगाओल तँ कहल गेल जे अप्रकाशित अछि। तखनि पहिले पहिल एकर लिप्यन्तरण कएल। यद्यपि ओ बहुत बादमे आबि मिथिला शोध संस्थानसँ प्रकाशित भेल। 3. तिरहुताक जे एकटा मान्य व्यवस्था अछि ओहिसँ इतर तिरहुताक विषयमे एहन कोन अन्दाज वा ठेकान अहाँक अछि, जकर कोनो सबूत नहि रहितहुँ, अहाँकेँ लगैए जे तिरहुताक भविष्य निर्धारित कऽ सकैत छल आ एकर ऐतिहासिकताक बेसी जनतब भेटैत? सन् 1873ई. सँ पहिनहि अंगरेज सरकार भारतीय कार्यालयक लेल भाषाक सम्बन्धमे अपन मत स्पष्ट कए चुकल छल जे संयुक्त प्रान्त माने बिहार-उत्तरप्रदेश मे उर्दू अथवा हिन्दी एही दूनूमेसँ कोनो एक भाषाकें मान्यता देल जाएत जाहिमे गजेटीयर आदिक सरकारी प्रकाशन होएत। ओतए स्पष्ट मन्तव्य रहैक जे ब्रिटिश सरकार सभ स्थानीय भाषामे प्रकाशन आ शिक्षा व्यवस्था नहि कए सकैत अछि। एहन स्थितिमे दरभंगामे उर्दू अपन स्थान बनौने जा रहल छल। ओहि समयमे उर्दू अखबारक संख्या बेसी रहैक। दरभंगा कचहरी उर्दूक चपेटमे पूरा आबि चुकल छल। ई स्थिति बहुत दिन धरि रहल तखनि लक्ष्मीश्वर सिंह कें हस्तक्षेप करए पड़लनि आ देवनागरी लिपिमे हिन्दीक लेल आदेश निकालए पड़लनि। ई मैथिली आ तिरहुताकें हटएबाक कोनो योजना नहि, अपितु उर्दूकेँ हटएबाक लेल उठाओल डेग छल। ओम्हर हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तानी स्वतंत्रताक लेल सक्रिय छल, जाहि राष्ट्रवादक भेंट चढि गेल मैथिली भाषा आ तिरहुता लिपि। ई यूरोपीय उपनिवेशवादक दुष्परिणाम छल। 4. की तिरहुता पैशाची लिपिक व्युत्पत्ति अछि? नहि। हमरा जनैत उत्तर भारतमे हर्षवर्द्धनक मृत्यु भेला पर हुनक साम्राज्य बिखरि गेल। एही कालमे भाषा, लिपि आ संस्कृतिक सन्दर्भमे क्षेत्रीयताक उदय भेलैक। छठम शतीमे ब्राह्मीक जे रूप छल ओकर दू टा शैली जन्म लेलक- वर्तुल आ न्यूनकोणिक। तिब्बती आ शारदा लिपि न्यूनकोणिकताक संग पृथक् अस्तित्वमे आबि चुकल छल। समस्य पूर्वोत्तर भारतमे एही न्यूनकोणिकताक संग लिपि शैलीक उदय भेल आ ओ विकसित होइत रहल। एकरा पैशाची आदिसँ कोनो सम्बन्ध नहि। 5. कोनो प्राकृतिक रूपे विकसित लिपि बनबामे अन्दाजन कतेक समय लगैत छैक? जखन लिपिकार एकसँ अधिक लिपिमे लिखए लगैत छथि तखनि हुनका द्वारा प्रयोग कएल गेल सभ लिपिक प्रभाव सभ लिपि पर पड़ैत छनि। रोमन लिखनिहारक देवनागरी, रोमन आ तिरहुता दूनू लिपिक जननिहारक देवनागरी लिपि निश्चित रूपसँ शैली बदलए लगैत अछि। तें लिपिक विकासक सभसँ पैघ कारक होइत छै, ओहिमे लिखनिहारक विशेष लिपिकीय योग्यता। जाहि क्षेत्रमे एकसँ अधिक लिपि लिखल जाइत हो, ओतए विकास अधिक शीघ्रतासँ होइत छै। तें एकर कोनो निर्धारित समय कहल नहि जा सकैत अछि। 6. पूर्ण प्राकृतिक लिपि आ कृत्रिम रूपेँ विकसित लिपिक पहिचान की अछि? कृत्रिम लिपि बनाएब तँ आधुनिक कालक प्रवृत्ति थीक जेना शॉर्टहैंड आदि। प्राचीन कालमे प्राकृतिक लिपिमे जखन आन भाषाकें लिखबाक प्रयोजन होइत रहै तँ संशोधित कए किछु चिह्न जोड़ि नव लिपिक विकासक प्रवृत्ति छल। जेना तिब्बती लिपिमे महाप्राण ध्वनि नहि छैक तँ संस्कृत लिखबाक लेल अल्पप्राणमे नीचाँ ह संयुक्त कएल गेल आ ओकरा सँ काज चलाओल गेल। एहिना ग्रन्थलिपि सेहो अस्तित्वमे आएल अछि। आधुनिक कालमे रोमन लिपिमे विशेष चिह्न दए ओकरा भारतीय भाषाकेँ लिखबाक लेल समर्थ बनाओल गेल अछि। कोनो प्राकृतिक लिपिमे संशोधन कए ओकरा व्यापक बनए बाक प्रयास सभ दिनसँ रहलैए। 7. की कोनो कृत्रिम लिपि कहियो कोनो भाषाक मुख्य वा प्रधान लिपि बनि सकैछ? भाषाक कोनो अप्पन लिपि नहि होइत छै। लिपि आ भाषाक संबन्ध कोनो भू-भागसँ होइत छै। लिपि आ भाषाकेँ एक क्यारीमे जनमल दू टा गाछ मानल जा सकैत अछि। देवनागरीमे अनेक भाषा लिखल गेल अछि आ संस्कृत सेहो भारतक लगभग सभ लिपिमे लिखाएल अछि। तिरहुतामे हिन्दीक ग्रन्थक लेखन सेहो भेल अछि आ फारसीक लेल प्रयुक्त नश्तलिकमे संस्कृत लिखाएल अछि। लिपिकार ध्वनिकांकन लेल बाट ताकि लैत छथि आ ओ धीरे-धीरे ओहि लिपिक संग जुड़ि जाइत छै। 8. तिरहुता कृत्रिम लिपि अछि वा प्राकृतिक? तिरहुता विशुद्ध प्राकृतिक लिपि अछि। एकर प्राकृतिक विकास भेल अछि। देवनागरीमे जे जे विशेषता छैक से सभटा एहिमे छै। 9. एखन धरि तिरहुताक कतेक पाण्डुलिपि अपने सम्पादित, रूपान्तरित आ प्रकाशित कए देने छी? छओ टा ग्रन्थ विशुद्ध रूपसँ मिथिलाक्षरक पाण्डुलिपिक आर पर हमर सम्पादनमे प्रकाशित अछि। एकर अतिरिक्त कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालयक लेल 1998-2003 धरि 17 टा ग्रन्थक पाण्डुलिपि लिप्यन्तरण कएलहुँ। विभिन्न व्यक्तिक संपादनमे प्रकाशन लेल गेलैक मुदा ओ सभटा हेराए गेलैक। ओहीमेसँ एकटा म.म. पक्षधरक ‘सुबोध’ हमर सम्पादनमे छपल अछि। एकर अतिरिक्त अगस्त्य संहिताक संपादन क्रममे रामनवमी पूजापद्धतिक मिथिलाक्षरक प्रति सम्पादित करए पड़ल। मूल ग्रन्थ भलें देवनागरी पाण्डुलिपिसँ सम्पादित कएल गेल हो, मुदा ओकर सहायक पाण्डुलिपिक रूपमे मिथिलाक्षरक हस्तलेखक सहायता लेल अछि। 10. आजुक समयमे तिरहुताक की उपयोग अछि? तिरहुता लिपि मिथिलाक भू-भागक लिपि थीक। मिथिलाक संस्कृतिक रक्षाक लेल ओ एकटा कवच थीक। हिन्दीपट्टीक जे सांस्कृतिक उपनिवेशवादक क्रममे मिथिलासँ अपन गरिमा मेटाएल जा रहल अछि तकर रक्षा होएत। स्पष्ट छै जे भाषाक सेहो अस्मिता बनल रहत। तें जतेक जल्दी मैथिली तिरहुतामे लिखल जाए लागत ओतेक नीक होएत। 11. एकर क्षरणमे दरिभङ्गा महाराजक कतेक योगदान छन्हि? क्षरणक दोष दरभंगा महाराज पर मढ़ल नहि जा सकैत अछि। जा धरि बिहार, बंगाल उड़ीसा एक छल ता धरि कोनो समस्या नहि रहलैक। बिहार राज्य लग भेला पर 1934 वा 1935 में मध्यमा स्तरक परीक्षामे देवनागरी अनिवार्य कए देल गेलैक। सूचनानुसार एक वर्ष तँ मिथिलासँ केओ परीक्षा नहि दए सकलाह कारण जे हुनका तिरहुते टा अबैत रहनि। ओ सभ देवनागरी सिखलनि आ तखनि परीक्षा देलनि। एही वर्ष तिरहुताक सभसँ बेसी क्षरण भेलैक। भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलनमे हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तानीक नारा प्रबल रहै, जकर विपरीत काज ओहि दिनमे सम्भव नहि छलै। राज्यक विभाजनक समय जे राजनीति पसरलै तकर प्रभावसँ तिरहुता समाप्त होइत गेल। तकर बाद दरभंगा महाराजक विरुद्ध जे राजनीति उभरलै, ओहूमे तिरहुताक विरोध भेलै। तिरहुताक व्यवहार करब आ दरभंगा महाराजक समर्थन करब दूनू पर्याय बनि गेल। बहुत दिन धरि श्रोत्रिय समाज आ सौराठक पंजीकार लोकनि एकरा जिआए रखने रहलाह। 12. सरकारी स्तर पर तिरहुताक की भविष्य अछि? सरकारी स्तर पर तिरहुता लिपिक लेल हमर निर्देशन सी-डैक फोंट बनौलक, मुदा ओ प्रकाशित किएक नहि भेल से आधिकारिक रूपसँ हमरा ज्ञात नहि। अपुष्ट रूपें हमरा कहल गेल जे किछु मैथिल हमर नामे पर विरोध पत्र लीखि एकरा रोकबौलनि। एखनि तिरहुताक पाण्डुलिपि पढ़ि ओकर लिप्यन्तरणक लेल पर्याप्त सम्भावना छै। संस्कृति मन्त्रालय दिससँ ‘ज्ञानभारतम्’ के स्थापना भेलैए। निश्चित रूपसँ तिरहुताक पाण्डुलिपि पढबाक लेल योग्य लोककें ओहिमे लगाओल जाएत। ओतए रोजगारक प्रबल संभावना अछि। तें तिरहुता सिखनिहार पढ़बा पर जोर देथु, संस्कृत भाषा सीखथु। सूचना एवं तकनीकी मन्त्रालयसँ पत्राचार कए तिरहुताक यूनिकोड फोंट प्रकाशित कराबथु। 13. की तिरहुता कहियो रोजगारक लिपि बनि सकत? एकर उत्तर हम पूर्व प्रश्नक उत्तर मे दए चुकल छी। पाण्डुलिपि-लिप्यन्तरणक बड़ काज छै ओथए रोजगारक संभावना अछि। 14. अपनेक आकलन केर हिसाबसँ तिरहुता केर वास्तविक जीवन कतेक दिनक अछि? तिरहुता मृत भए जाएत से कल्पना नहि कए सकैत छी। राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशनक दिससँ आयोजित कार्यशाला सभमे अनेक युवा-युवती हमर निर्देशनमे एहि लिपिक ज्ञान पओने छथि, जाहिमे सँ अनेक एहि पर दक्षतापूर्वक काज कए रहल छथि। भलें ओ मैथिल नहि होथि, मुदा तिरहुताक पाण्डुलिपि सभक लिप्यन्तरण कार्य कए रहल छथि। ई लिपि आब देशव्यापी भए रहल अछि, कारण जे लगभग सभ पाण्डुलिपि पुस्तकालयमे तिरहुतामे लिखल पाण्डुलिपि राखल छै। 15. तिरहुताक व्युत्पन्न लिपि सभ कोन-कोन अछि? जकरा हमरा लोकनि तिरहुता कहैत छियै से वास्तवमे बंगाल, आसाम आ मिथिला तीनूक संयुक्त लिपि थीक। बंगला अपनाकेँ पृथक् कए लेलक, आसामी आ ओकर बमुनिया आदि स्थानीय शैली सेहो अपन स्वतंत्र अस्तित्व स्थापित कए रहल अछि तखनि मिथिलामे 1860 ई. धरि जे लिपिक शैली छल ओकरा जँ संरक्षित रखैत छी तँ कहि सकैत छी जे बंगला आ असमिया तिरहुतासँ निकलल अछि। 16. भाषाक संरक्षण, संवर्धन आ प्रसारमे लिपिक की योगदान मानैत छियैक? भाषाक संरक्षण लेल लिपि एकटा कवचक काज करैत छै। एकटा दुर्ग बना दैत छैक, जकर भीतर ओहि भू-भागक संस्कृति आ भाषा सुरक्षित रहैत छै। संरक्षित रहतै तँ संवर्द्धन सेहो होएतैक, ओकर असमिता बाँचल रहतै। मुदा प्रसार रुकि जएतै। आइ बहुतो संस्कृतक ग्रन्थ बंगला लिपिमे प्रकाशित भेलै, जेकरासँ भारतक आन भू-भागक लोक आइयो अपरिचित अछि। जेना दुर्गहीन राजाकेँ केओ गरदनि चाँपि सकैत अछि तहिना अपन लिपिविहीन भाषा असुरक्षित रहि जाइत छै, आ संस्कृति पर सेहो संक्रमणक खतरा बढ़ि जाइत अछि। 17. एखन धरि कतेक लोककेँ तिरहुतामे प्रशिक्षित आ प्रेरित कएल अछि? राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशनक द्वारा अनेक लिपि-कार्यशालामे भाग लेलहुँ। किछु कार्यशाला विशुद्ध मैथिल प्रशिक्षुक संग छल तँ किछु दिल्लीमे कार्यशाला भेल जाहिमे सभ क्षेत्रक प्रशिक्षु रहथि। दिल्लीमे तीन टा बचिया नीक जकाँ सिखलनि आ काज आगाँ बढ़ओलनि। दोसर-दोसर प्रशिक्षु सभकें सेहो सिखौलनि। ओहिमे एकटा बंगालक छथि, एकटा मिथिलाक छथि आऐ एकटा कुरुक्षेत्रक छथि। एहि तीन टाकें हम अपन उपलब्धि मानैत छी। 18. अपने एकटा टीकाकार, लिपिसंवर्धक लोक छी, मुदा की अपनेक बाल-बच्चा एहिमे अपन भविष्य देखि रहल छथि? नहि। हमर परिवारेमे नहि, हमार गामोमे मात्र दू व्यक्ति हमरालोकनि छी जे तिरहुता जनैत छी। 19. अपनेक घरमे की सभ कियो तिरहुता जनैत छथि? केओ नहि। धियापुता केँ सिखौलहुँ मुदा व्यवहारमे नहि रहलाक कारणें सभ बिसरि गेल। 20. की कहियो तिरहुताकेँ मैथिली वा कोनो आन भाषाक पुन: प्रधान लिपि बनबाक कोनो स्वप्न मोनमे अछि? निश्चित रूपसँ मिथिला भूभागक अपन भाषा मैथिली थीक, ओकर प्रधान लिपि तिरहुता हो, से तँ अवश्य इच्छा अछि। 21. की तिरहुताकेँ कहियो मिथिलाक लोक मैथिलीक मुख्य लिपिक रूपमे लिखताह? वा कि मैथिली केर साहित्यकार अपन साहित्य लेल तिरहुताकेँ पसिन करताह? जेना 1860ई.सँ धीरे-धीरे तिरहुताक ह्रास भेलैक आ लगभग 140 वर्षमे बिला गेल, तहिना विगत 25 वर्षसँ विभिन्न संस्था आ व्यक्ति एकर प्रसार-प्रसारक लेल प्रशंसनीय काज कए रहल छथि। इलैक्ट्रॉनिक युग छै, विकासक प्रक्रिया शीघ्रगामी अछि तेँ संभावना तँ छैक जे क्रमशः मैथिली मिथिलाक प्रमुख लिपिक रूपमे स्थापित भए जाएत। आवश्यकता अछि जे मैथिल एकजुट भए इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय पर जोर देथि जे एकर यूनिकोड फोंट प्रकाशित हो आ विबिन्न सोसल मीडिया पर सक्रिय हो तँ कार्यमे प्रगति आओत। साहित्य अकादमी जँ नियम बनाबए जे तिरहुतामे छपल साहित्यकेँ पुरस्कार-योजनामे प्राथमिकता देत तखनि साहित्यकार लोकनि एकरा शीघ्र अपनौताह, पाथी छपत आ पढल जाए लागत। 22. आइ तिरहुताक विकासमे तिरहुताक सम्बन्धमे सभसँ बेसी रुकावटि केर रूपमे ककरा देखैत छियैक? तिरहुते टा नहि, मैथिली भाषाक विकासमे मैथिलक ‘विरोधवाद’ सभसँ पैघ रुकावट अछि। मैथिल अति उत्साहमे सभटा कार्य अपनहि करए चाहैत छथि आ ओकर श्रेय लेमए चाहैत छथि। सामूहिक कार्य करबाक ऊहि मैथिलकेँ नहिं। साहित्यकारे भाषाविद् सेहो आ लिपिशास्त्री सेहो बनए चाहैत छथि। दू-चारि टा कविता लिखिते ‘सरहपादक साहित्य’ पर सेहो साधिकार मत व्यक्त करए लगैत छथि। आ तखनि हुनका बुझाइत छनि दोसर केओ अछिए नहि। ई प्रवृत्ति पैघ रुकावट थीक। अतीतमे सेहो भाषाक मानकीकरण लए ‘विरोधवाद’ सक्रिय भेल तँ आइ हमरालोकनि 75 वर्ष पछुआए गेलहुँ। आइयो जखनि भारतीय भाषा संस्थान संविधानक अनुवाद प्रकाशित कए देलक, भाषाक एक मानक स्थिर भए गेल, तखनि फेर एहि पर काज नहि होएबाक चाही। मुदा भए रहल अछि- समावेशी भाषाक निर्माण करबाक लेल। विवाद सभ दिन एहिना चलिते रहत। एकरा कात कए आगाँ बढ़ि जेबाक चाही। 23. तिरहुताकेँ लऽ कऽ अहाँक आगाँक की रणनीति आ योजना अछि? योजना आ रणनीतिसँ हम अपनाकेँ ओही दिन अलग कए लेलहुँ, जहिया हमरा पर करोड़ों रुपयाक सरकारी फंडक लाभ लेबाक आरोप लागल। हम तिरहुताक सेवक रहलहुँ, आ रहब, मुदा रणनीति वा योजना कोनो नहि रहत। बहुतो गोटे सोझाँ आबि चुकल छथि, मंच पर गरजि चुकल छथि, हमर नामक विरुद्ध तथाकथित रूपसँ आवेदन दए सम्पन्न कएल काज रोकबा चुकल छथि, हुनका सभक लेल स्थान दैत हम पूर्णतः भारतीय स्तरक पाण्डुलिपिक संपादनक रणनीति आ योजनासँ संबद्ध भए गेल छी। जँ सभ किछु ठीक-ठाक रहल तँ अगिला वर्ष ‘गिलगिट पाण्डुलिपि’ सेहो पढ़बाक सौभाग्य भेटत। नेबारीसँ किछु मल्लकालक मैथिली नाटकक संपादनक योजना अछि, एकटा मैथिली गीतक संग्रह भेटल अछि। पाण्डुलिपि हाथ आबि गेल अछि। किछु ‘भुजिमोल’ लिपिक संस्कृत ग्रन्थक लेल सेहो योजनाबद्ध छी। तिरहुताक लेल जे काज करताह हुनका लेल तत्पर रहब। 24. की मैथिलीक पढ़ाइ-लिखाइ तिरहुतामे होबाक चाही? अवश्य होएबाक चाही। आवश्यक अछि जे तिरहुताक यूनिकोड आधारित फोंट सक्षम होअए, ओहिमे पोथी छपए। जतेक पोथी छपत ओतेक पढ़ल जाएत। आ तखनि मैथिलीक पढ़ाईमे सेहो तिरहुताक व्यवहार होमए लागत। संपादकीय टिप्पणी- A. प्रश्नोत्तरीसँ पहिने संस्मरणमुमा आलेख छल जकर अधिकांश पाँतिक अर्थ घूमि-फीरि कऽ एकै छलै तकरा सभकेँ हटा देल गेल अछि। B. कौशल जीक सूर्यलक्ष्मी नामक फॉण्ट केर विवरण आशीष अनचिन्हारक पोथी "मैथिली वेब पत्रकारिताक इतिहास" (शशि प्रकाशन, 2023) मे प्रकाशित भेल। C. 2008 सँ एखन धरि विदेहक अंक देवनागरीक अतिरिक्त तिरहुतामे रहैत अछि, संगहि विदेह द्वारा बहुत रास पोथी तिरहुतामे प्रकाशित अछि जकर विवरण निच्चा अछि-. 1) मैथिली समीक्षाशास्त्र (लेखक- गजेन्द्र ठाकुर) 2) नित नवल दिनेश कुमार मिश्र (लेखक- गजेन्द्र ठाकुर) 3) दूषण पञ्जी- The Black Book (लेखक- गजेन्द्र ठाकुर) 4) पर्वत ऊपर भमरा जे सूतल (लेखक- गजेन्द्र ठाकुर) 5) नित नवल सुभाष चन्द्र यादव (लेखक- गजेन्द्र ठाकुर) 6) कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक (लेखक- गजेन्द्र ठाकुर) 7) Learn Mithilakshar Script (लेखक- गजेन्द्र ठाकुर) 8) Learn Braille through Mithilakshar Script (लेखक- गजेन्द्र ठाकुर) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.१८.डा. शैलेन्द्र मिश्र- नेपथ्य मे रहनिहार मिथिलाक एकटा अदम्य सेवक ओ प्रहरी: पंडित भवनाथ झा डा. शैलेन्द्र मिश्र नेपथ्य मे रहनिहार मिथिलाक एकटा अदम्य सेवक ओ प्रहरी: पंडित भवनाथ झा मंच पर अबै बला कलाकार केँ तऽ सब कियो देखैत अछि, ओकरा लेल थोपड़ी बजबैत अछि, ओकर अभिनयक प्रशंसा करैत अछि— मुदा कमे लोक केँ ई बात बुझल रहैत अछि जे मंचक उज्जर रोशनीक पाछू, नेपथ्य मे कतेको लोक अहिना निःशब्द अपन योगदान दऽ रहल होइत छथि, जिनकर बिना मंचक सफलता संभव नहि भऽ सकैत अछि। नाटक मंचनक सफलता केवल मात्र मंच पर प्रदर्शन करनिहार कलाकार पर निर्भर नहि करैत—ओहि लोक पर सेहो निर्भर रहैत अछि जे परदाक पाछू रहि दिन-रात मेहनति करैत छथि। नाटककार, निर्देशक, परिकल्पक, संगीतकार, तकनीकी सहायक, संपादक, पांडुलिपिक शोधक—एहि सबक श्रम सँ मंचक जादू संभव बनैत अछि। मुदा नेपथ्य मे रहब ने सभहक वशक बात छै आ ने सभ केँ सोहाइत छै। मुदा भवनाथ झा ओहि गोट लोक मे छथि जे नेपथ्य मे रहि मैथिली साहित्य, नाटक आ संस्कृति केँ अपन ज्ञान आ समर्पण सँ पोषित करैत छथि। किछु वर्ष पूर्व जखन हमरा नेपालक मैथिली क्षेत्र मे रहनिहार प्रसिद्ध भाषाविद् प्रो० रामावतार यादव जी सँ वार्तालाप भेल, तऽ ओ अपन बातचीतक क्रम मे बारम्बार भवनाथ झा जीक नाम लैत कहलनि— “आब तऽ अइ पार-ओइ पार, अर्थात भारत आ नेपाल दुनू ठाम पांडुलिपि विशेषज्ञ बहुत कम रहि गेल छथि। भवनाथ झा सन लोक मैथिली संस्कृतिक अमूल्य धरोहर केँ जीवित रखबाक निरंतर प्रयत्न करैत छथि।” एहि बातसँ ई स्पष्ट भऽ जाइत अछि जे भवनाथ झा केवल विद्वान नहि, एकटा आंदोलनक प्रतिमूर्ति छथि—ज्ञान, शोध आ संरक्षणक आंदोलन। मैथिली भाषाक मूल स्रोत—ओ ग्रंथ, जे नेवारी लिपि मे नेपालक राजकीय पुस्तकालय, मठ-मंदिर आ शाही संग्रहालय मे सुरक्षित अछि—तकर पुनर्खोज, पठन, विश्लेषण आ पुनर्प्रकाशन भवनाथ झा जीक जीवनक प्रमुख ध्येय रहल अछि। ओ केवल पांडुलिपिक अध्ययन नहि करैत छथि, बल्कि ओकर पाठ-संशोधन आ विकृति-सुधार सेहो करैत छथि, जाहि सँ ओ ग्रंथ पाठक धरि पठनीय रूप मे पहुँचि सकय। एहि कारण मैथिली साहित्यक आदिकालीन ग्रंथ सभ पुनः जनमानसक बीच जीवित भेल अछि। भवनाथ झा जीक कार्य केवल पांडुलिपि शोध तक सीमित नहि अछि। ओ मैथिली भाषाक शुद्ध उच्चारण, व्याकरण, ध्वन्यात्मक रूप आ मूल भाषिक स्वरूपक रक्षा लेल सतत सक्रिय छथि। ओ मानैत छथि जे “भाषा संस्कृति केर आत्मा अछि”—आ एहि आत्माक रक्षा करब सर्वश्रेष्ठ कर्तव्य अछि। भवनाथ झा केँ एहि क्षेत्रक ‘मौन प्रहरी’ कहल जाए तऽ उचित होयत, किएक तऽ ओ सदिखन मैथिली आ मिथिला लेल सतर्क आ समर्पित रहैत छथि। नेपालक मिथिला क्षेत्र—जनकपुर, धनुषा, सिरहा, सप्तरी, विराटनगर आदि—मैथिली संस्कृति सँ ओतप्रोत अछि। भवनाथ झा जीक शोधक क्षेत्र केवल भारत तक सीमित नहि रहल; ओ नेपालक मठ-मंदिर, पांडुलिपि संग्रहालय आ विश्वविद्यालय सभ मे सेहो शोध करैत रहैत छथि। हुनक प्रयास सँ मैथिली भाषाक कतेको दुर्लभ ग्रंथ, जे नेवारी लिपि मे 15वीं–16वीं शताब्दीक कालखंडक अछि, नव रूप मे उपलब्ध भेल अछि। एतेक महान योगदानक के बादो भवनाथ झा जी सदिखन नेपथ्य मे रहबाक पक्षधर छथि। ने ओ प्रसिद्धिक खोज मे छथि, आ ने पुरस्कारक मोह मे। हुनका लेल साक्षात पुरस्कार अछि—मैथिली संस्कृति आ ज्ञान-संपदाक पुनर्जीवन। एहन लोक विरल भेटैत अछि, जे अपन कर्म सँ समाज केँ समृद्ध बनबैत अछि, मुदा अपन नामक प्रचारक लेल मौन रहैत अछि। भवनाथ झा जी नवपीढ़ीक लेल एकटा प्रेरणा-स्रोत छथि। हुनक जीवन सिखबैत अछि— “लोकप्रियता सँ पैघ अछि लोकसेवा, आ प्रसिद्धि सँ पैघ अछि परंपराक संरक्षण।” एहि भावनाक संग ओ अपन जीवनक प्रत्येक क्षण मैथिली संस्कृतिक संवर्द्धन लेल समर्पित केने छथि। ओ कतेको शोध-पत्र आ व्याख्यान विश्वविद्यालय सभ मे प्रस्तुत कए चुकल छथि। नेपाल, जनकपुर, दिल्ली, पटना, दरभंगा आ मधुबनीक विभिन्न सम्मेलन सभ मे हुनक योगदान विशेष रूप सँ सराहल गेल अछि। मंचक कलाकारक चेहरा भले चमकैत हो, मुदा नेपथ्यक दीपकक रोशनी बिना मंच अपूर्ण रहैत अछि। भवनाथ झा जी ओ दीपक छथि—जे चुपचाप, निःस्वार्थ रूप सँ मिथिला, मैथिली आ संस्कृति केँ उजागर कए रहल छथि। ओ नेपथ्यक लोक छथि, मुदा हुनकर कर्मक आभा सम्पूर्ण साहित्यिक जगत केँ आलोकित कए रहल अछि। मैथिली समाज सदिखन गर्व सँ कहि सकैत अछि— “जँ मंच पर कलाकार मिथिलाक शोभा छथि, तऽ नेपथ्य मे भवनाथ झा जकाँ लोक मिथिलाक आत्मा। ”पंडित भवनाथ झा मिथिला आ मैथिलीक संस्कृतिक क्षेत्रक ओहन सपूत छथि जे बिना कोनो भय आ लोभक अपन बात कहैत छथि। ओ कखनो एहन बातक चिंता नहि करैत छथि जे “लोक की कहत”—सत्य जेना हो, ओहनहि रूपमे रखैत छथि। ओ लोकप्रियताक सस्ता साधन नहि खोजैत, बल्कि अपन आत्मबल आ विद्वत्ता सँ समाजकें दिशा दैत छथि। भवनाथ झा अपन कलम आ शब्दक माध्यम सँ मिथिलाक सुच्चा प्रहरी छथि। हुनकर लेखनी सदिखन सच बजैत अछि—चाहे से मिथिला समाजक बनावट, बनावटिक संस्कृति या तथाकथित “प्रसिद्ध” व्यक्तित्व पर कियैक ने हो। मिथिला मे जे प्रवृत्ति तेजी सँ देखाय दैत अछि—दोसरक रचना या पुरान साहित्य केँ अपन नाम सँ प्रस्तुत करबाक—ताहि बनावट संस्कृतिक विरुद्ध भवनाथ झा लगातार आवाज उठबैत रहैत छथि। ओ एहन व्यक्तित्व छथि जे मिथिलाक आंतरिक विकृति केँ ओघटैत, समाज केँ स्वावलंबनक दिशामे सोचबाक प्रेरणा दैत छथि। सोशल मीडिया पर हुनकर सक्रियता अतुलनीय अछि। ओ ने मात्र साहित्यिक विमर्श करैत छथि, बल्कि मिथिला समाजक नैतिक चेतना केँ जागृत करबाक माध्यम सेहो बनल छथि। जेठ-पुरुखक परंपरा सँ लऽ कऽ आधुनिक सृजनशील पीढ़ी धरि, ओ सभकें निरंतर चेतबैत रहैत छथि—“संस्कृति केँ बचाबू, जे मूल अछि।” भवनाथ झा केँ विशेष बनबैत अछि हुनकर बहुभाषिक अभिव्यक्ति। ओ मैथिली सँ लऽ कऽ संस्कृत, हिन्दी आ अंग्रेजी धरि समान रूप सँ मिथिलाक गौरव केँ प्रचारित करैत छथि। हुनकर दृष्टि स्पष्ट अछि—मिथिला केवल मैथिली भाषा नहि, बल्कि एकटा बहुआयामी सभ्यता आ ज्ञानकेंद्र अछि। ओकरा लेल मिथिला केवल भूगोल नहि, बल्कि एकटा चेतना अछि—जे भाषा, आस्था, शिक्षा आ संस्कृतिकेँ एकसूत्र मे जोड़ैत अछि। ओ अपन शब्द सँ लगातार एहि चेतनाक पहरेदारी करैत छथि। ई सत्य अछि जे पंडित भवनाथ झा मिथिला लेल ओ उजियार दीप छथि जे अन्हारक बीचो-बीच सेहो अपन ज्योति सँ मार्ग देखबैत रहैत छथि। आशा अछि जे भगवान हुनका दीर्घायु करथि, जाहि सँ ओ अपन अमूल्य विचार, तर्क आ निष्ठा सँ मिथिलाक भावी पीढ़ीक मार्गदर्शन करैत रहथि। ओहि नेपथ्यक सेवक केँ प्रणाम, जे बिना नामक लोभ मे मिथिलाक गौरव केँ जिन्दा रखने छथि। -डा. शैलेन्द्र मिश्र (अनुवादक एवं शोधकर्ता, संपर्क-7600744801) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.१९.आशीष अनचिन्हार-भारतीय ज्ञान परंपरामे भवनाथ झाजीक महत्व आशीष अनचिन्हार (मैथिली गजल विशेषज्ञ, मैथिली वेब पत्रकारिता विशेषज्ञ, ब्लॉगर, शोधकर्ता, आलोचक, संपादक। संपर्क-8134849022) भारतीय ज्ञान परंपरामे भवनाथ झाजीक महत्व एहि आलेखमे "भारतीय" शब्द दक्षिण-पूर्व एशियाक अधिकांश देश लेल प्रयोग भेल अछि कारण प्राचीन कालमे ओहि देश सभहक अधिकांश ज्ञान-विज्ञान-धर्म-दर्शन आदिक प्राथमिक स्रोत भारत छल। एहन नै जे सभ चीजक स्रोत भारते छलै, भारतोक लोक सभ उपरोक्त क्षेत्रसँ बहुत किछु सिखने छै। विद्वान बहुत भेल छथि, बहुत छथि आ बहुते हेबो करता। तहिना धनवान, बलवान एवं आनो सार्थक "आन" युक्त लोक एहि धरतीपर होइत रहलाह अछि आ भविष्योमे हेबो करता। मुदा एहि लेखमे हमर अभिप्राय एहन "आन" युक्त लोक सभसँ अछि जिनका कारणे या तऽ "मिथिला" या तऽ "मैथिली" या "मैथिल"केँ फायदा भेलै। बहुत एहनो "आन" युक्त लोक सभ छथि जिनकासँ मिथिला-मैथिली वा मैथिलकेँ कोनो फायदा नहि भेलै, हमरा मोनमे एहन लोक सभ लेल कोनो अनादर नहि अछि मुदा एहन लोक सभ मात्र अपन जीवन-यापन लेल विद्वान, धनवान-बलवान छथि आ से हमरा लेल विवेच्य नहि। बहुतो एहन "आन" युक्त लोक सभ छथि जे मिथिला-मैथिली वा मैथिल लेल काज करबाक प्रयास करैत छथि संगहि ओ सभ एहि काजक प्रत्याशामे सेहो तुरंते लागि जाइत छथि आ जँ एक समय धरि हुनका प्रतिदान नहि भेटैत छनि तँ मिथिला-मैथिली वा मैथिलकेँ अवाच्य कहि अपनाकेँ मिथिला-मैथिली वा मैथिलसँ कात कऽ लैत छथि। हम मानैत छी जे हुनकर एहि क्षणिक काजसँ एक-दू प्रतिशत नीक काज मिथिला-मैथिली वा मैथिल लेल भऽ जाइत छै। आ जँ एहि बातक चर्चा कतहुँ हो से नीक आ किनको आपत्ति नहि हेतनि मुदा एहिठाम हमरा लेल ओहो विवेच्य नहि। जँ उपरोक्त कसबट्टीपर हम भवनाथजीकेँ कसैत छी तऽ कहि सकैत छी जे भवनाथ जी एक नमहर समयसँ अपन विद्वतापूर्ण कार्य कऽ रहल छथि तँइ ई मानबामे दिक्कत नहि जे हिनकर काज क्षणिक नहि छनि। हिनकर काजसँ मैथिली आ मिथिला दूनूकेँ किछु फायदा भेल छै, ताहूमे मैथिलीकेँ कम आ मिथिलाकेँ बेसी। मैथिलीक हिसाबसँ देखी तऽ हिनक किछु कथा ओ बीहनि कथा प्रकाशित भेल अछि आ मुदा क्रमशः हिनक साहित्यिक रचना खियाइत गेल। हिनकर साहित्यिक कर्मपर अही विशेषांकमे आन-आन लेखक द्वारा मूल्यांकन कएल गेल अछि। मिथिलाक हिसाबसँ देखी तऽ बहुत रास पुरान पोथीक संपादन ई केलाह, बहुत रास पांडुलिपि उद्धार केलाह आ बहुत रास पोथीपर टीका-टिप्पणी-व्याख्या कऽ पाठक लेल सुबोध बनेलाह। मुदा ई काज सभ भवनाथजी एकटा नव दृष्टिकोणक संग केलाह। ई कोन दृष्टिकोण छै तकर चर्च कारबसँ पहिने हम प्राचीन कालमे संस्कृत भाषा ओकर लिपि आ प्राचीन भूभाग सभपर बात करी। प्राचीन कालमे संस्कृत भाषा तऽ छल मुदा ओकर लिपि स्थानीय रहैत छल जेना मिथिलामे संस्कृत तिरहुता लिपिमे लिखल गेल, बंगालमे बंगाली लिपिमे, उत्कल (ओड़ीसा)मे उड़िया लिपिमे तेनाहिते तमिलनाडुमे तमिल लिपिमे.... बल्कि आजादीक बादो धरि इएह भऽ रहल छै। स्थानीय तौरपर बंगालमे एखनो बंगाली लिपिमे संस्कृतक पोथी प्रकाशित भऽ रहल छै। किछु समय पूर्व UPSC परीक्षा लेल सर्वसम्मतिसँ निर्णय लेल गेलै जे संस्कृतक लिपि देवनागरी हेतै। तँइ आब जे कियो तमिलनाडु वासी वा आन प्रांत वासी UPSC परीक्षा देताह संस्कृत भाषासँ हुनका देवनागरिए सीखऽ-पढ़ऽ पड़तनि। सभकेँ.. पूरा भारतकेँ। मुदा एहिसँ पहिने जहिया संस्कृत लेल स्थानीय लिपि रहैत छल तहिया स्थानीय दृष्टिकोण, स्थानीय प्रथा सेहो समाहित भऽ जाइत छल, मने एकै ग्रंथ बंगालक पाठ अलग भऽ जाइत छै, ओड़िया पाठ अलग आ दक्षिण भारतीय पाठ अलग। स्थानीय प्रथा तऽ एखनो समाहित होइत छै। तेनाहितो मिथिलाक पाठ आ प्रथा सेहो अलग रहल हेतै मुदा मैथिल सभ दिनसँ सहिष्णु रहल अछि तँइ ओ मिथिला पाठ बिसरि आन-आन प्रकाशक जेना गीताप्रेस आदि बला पाठ केर प्रयोग करऽ लगलाह। आ अही चक्करमे प्राचीन शास्त्रक मिथिला पाठ विलुप्त भऽ गेल। मुदा जखन भवनाथजी शास्त्र सभकेँ संपादित करब शुरू केलनि तऽ ओकरा विलुप्त भेल मिथिला पाठ ओ प्रथाक संग पाठकक सोंझा आनऽ लगलाह। बहुत संभव जे भवनाथजीसँ पहिने एक-दू विद्वान मिथिला पाठ दिस धेआन देने हेताह मुदा ओ सभ ओहि बाटपर दूर धरि नहि चलि सकलाह। भवनाथजी एहि बाटपर बहुत दूर धरि एलाह। मुदा सभ शास्त्रक मिथिला पाठ केर निर्धारण असगर भवनाथजी नै कऽ सकै छथि। स्वाभाविक छैक एतेक विशाल शास्त्रक संपादन-पाठ निर्धारण एकै आदमीक वशमे नहि छै। मुदा ईहो बात सत्य जे भवनाथजी एकर पैरोकार बनि एकटा अलग बाट बना चुकल छथि। ई एकटा नव दृष्टिकोण भेल आ हिनक पहिल महत्व सेहो। ई हिनकर काजक पहिल महत्व अछि मुदा अही एक महत्व लेल हुनका असीम मेहनति करऽ पड़ैत छनि। कोनो एक भाषाक पाठ ओ प्रथा केर संकलन करब, ओहि पाठ ओ प्रथामे समय-समयपर आएल अंतरकेँ अनाकब आ तकर बाद ओहि सभमेसँ छानि कऽ मैथिल पाठ ओ प्रथाकेँ समाने आनब श्रमसाध्य ओ समयसाध्य काज छै। तँइ एकटा जे हिनक महत्व छनि से यूनिक छनि। भवनाथजीक दोसर महत्व ई अछि जे ई हल्लुक काज नहि करैत छथि। मात्र देखेबाक लेल काज नहि करैत छथि। एहन काज हाथमे लैत छथि जकरा पढ़लासँ बुझाइत छै जे ई काज एकदम अनिवार्य छलै आ समाज लेल उपयोगी छै आ ताहि लेल जतेक श्रम जतेक समय चाही से भवनाथजी दैत छथिन। हिनक तेसर महत्व छनि जे ई अनावश्यक मंच-माला-माइक केर फेरमे नहि रहैत छथि। जे आवश्यक छै ताही ठाम उपस्थित रहैत छथि। एकरा एनाहितो कहल जा सकैए जे ई साहित्यिक गोलौसीसँ दूर छथि। भवनाथजीक काजक आरो महत्व सभ छै मुदा एहि आलेखमे हम हुनक किछुए महत्वकेँ रेखांकित केलहुँ अछि। हिनकर आन-आन महत्वपर आरो लेखक सभ लिखने छथि तकरा पढ़ल जा सकैए। नोट- एहि आलेखसँ पहिने भवनाथजीक काजक ऊपर हमर किछु विचार पूर्वप्रकाशित अछि। ई विचार सहमति एवं असहमति दूनू तरहक अछि, पाठक एकरा निच्चाक सूचनापर जा पढ़ि सकै छथि- 1) सामा गीत "गाम के अधिकारी तोहें बड़का भैया हो" पर भवनाथ झाजीक विचार फेसबुकपर आएल आ ताहिसँ हम असहमत भेलहुँ आ एक लेख लिखलहुँ जे विदेहक अंक 195, 1 फरवरी 2016 मे प्रकाशित भेल छल। 2) भवनाथ झाजी तिरहुता लिपिक फाण्ट लेल जे किछु केलाह तकर विवरण हमर पोथी "मैथिली वेब पत्रकारिताक इतिहास" (शशि प्रकाशन, 2023) मे प्रकाशित भेल। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। विदेह ४२८ विदेह भवनाथ झा विशेषांक 𑒫𑒱𑒠𑒹𑒯 𑒦𑒫𑒢𑒰𑒟 𑒗𑒰 𑒫𑒱𑒬𑒹𑒭𑒰𑓀𑒏|| 1 1 || विदेह ४२८ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। 𑒮𑒧𑓂𑒣𑒰𑒠𑒏: 𑒑𑒖𑒹𑒢𑓂𑒠𑓂𑒩 𑒚𑒰𑒏𑒳𑒩।

Ashish Anchinhar vee 28 August at 5:22-@ सीता-राम केर विवाह जनकपुरमे नहिं भारतक सीतामंडप, गिरिजा नामक गाममे भेल छल्र- ई तथ्य साबित केलाह अछि झवनाथ झा अपन एक शोधमे। विदेह I5 अक्टूबर 2025 के अवनाथ झा Bhavanath Jha जीक ऊपर विशेषांक प्रकाशित करत। of अहाँ सभकें लगैए जे हिंनक तर्क गलत छनि, हिनकर तर्ककें अहाँ अपन तर्क काटि as आलेख लीखिं सकैत छी। मुदा ध्यान रहए जे भवनाथजीक जे स्रोत आ संदर्भ छनि ताहिसँ प्राचीन स्रोत अहाँकें अपन आलेखमे देव५ TST जैं एहन कोनो स्रोत ओ आलेख HTS Ts ओकरा editorial.staffvideha@gmail.com टाइप रूपमे अक्टूबर 2025 धरि Tor सकैत छी। Kundan Kumar KarnaSantosh Kumar MishraRam Bharos Kapari BhramarRamesh Ranjan JhaRupa haGangesh Gunjan JhaParmeshwar KapariDinesh YadavKumar BhaskarNarayan MadhushalaGajendra GajurKailash Kumar ThakurDhirendraJha MaithilJha DhirendraDhirendra PremarshiAyodhyanath ChoudharyKali Kant Jha TrishitRupa JhaDev Bishesh PaswanDev Bishesh Paswan DevbisheshNamita JhaBibha JhaMurli DharBijeta ChoudharryDrVijay Binit Thakur Binit Kumar Thakur Amarendra Yadav ee eee

विदेहक परमेश्वर कापड़ि , कम... : < @ m.facebook.com < € विदेहक परमेश्वर कापड़ि , कमला चौधरी आ ... ay @. Ashish Anchinhar eee I5 June 2076 at 27:27- 2. विदेहक परमेश्वर कापड़ि , कमला चौधरी आ वीरेन्द्र मल्लिक विशेषांक केर घोषणा Star की सभ गोटा जनै छी जे विदेह 205 मे तीन टा विशेषांक तीन साहित्यकारपर प्रकाशित केलक जकर मापदंड छल सालमे दूटा विशेषांक जीवित साहित्यकारक उपर रहत VA एकटा 60-70 वा ओइसँ बेसी सालक साहित्यकार रहता Ff दोसर 40-50 सालक ( मैथिली साहित्यकार मने भारत आ नेपाल दूनूक)। ऐ क्रममे अरविन्द ठाकुर ओ जगदीश चंद्र ठाकुर "अनिल"जीपर विशेषांक निकलि चुकल अछि। आगूक विशेषांक किनकापर हुअए ag लेल एक मास पहिनेसँ पाठकक सुझाव माँगल गेल छल। पाठ कक सुझाव आएल आ ओइ सुझाव अंतर्गत विदेहक दू टा अगिला विशेषांक परमेश्वर कापड़ि आ वीरेन्द्र मल्लिकजीक उपर रहत संगे-संग भोटिंगमे cher न॑ पर आएल कमला चौधरीजीपर हमरा सभ सेहो निकालब | हमर सबहक प्रयास रहत जे ई सभ विशेषांक जनवरी ओ फरवरी 2077 मे प्रकाशित gary मुदा ई रचनाक उपलब्धतापर निर्भर करत। मने रचनाक उपलब्धताक feared aay ऊपर-निच्चा ys सकैए। सभ Mes आग्रह जे ओ अपन-अपन रचना (आलोचना, समीक्षा, समालोचना, संसमरण आदि) 3 दिसम्बर 06 धरि ggajendra@videha.com पर पठा दी। लि हा sar arg ae बा की v eee OAs 75. | AZ

ea o © Be WB ad 490) एक <— Ashish Anchinhar Q és Ashish Anchinhar o- Jan 27, 2079 + & विदेह अपन कोनो अउअंकम्ने "साहित्यिक wera विश्शोष्पांक" 'निकात्तत (fern SBASCA) ताहि Aa अपने Sas निम्नतिलिस्वित विष्पयपर उात्लेख sife चाही। fees गोटाकेँ एहि टुऔआरे टैग Hs Yer STS Hem हमर free नै SIA इनव्को oT Ss स्वूच्चना पहुँच्यनि wars Ss GUST (दरभंगा-पटना-स्हरसा) मठाधीशा Bat ont दिक्कत Sar क्षमाप्रार्थी ह्की-- ५ साहित्य, Hort एवं सरकारी उऊउमसकादम्वी:- (वक) पुरस्कारक्क राजनीति @ सरवकारी अऊउमकादेमीसम्वे पैसव्वयाक गैर-त्नोकतांत्रिक विधान (गा) सत्तारुट St उमकादमी Hz काजक तौर-तरीका ad) Seas Sates Sat विरोधम्वे Baste तात्कात्निक स्समानांतर सत्ताक कार्यपद्धधति ( 98 5सँँ veast eR) S) उमकादेमी पुरस्कारम्वे urs फैक्टर: म्विथिक वा यथार्थ 2. व्यक्त्तिगत साहित्य संस्थान SIT पुरस्कारक राजनीति 3.प्रकाश्शन जगतम्वे Gare WETaR St Aza 4. मैथ्वित्नीक Sat Seas संगठन BAT उोकर पदाधिकारी PAMESH SITAIoT 5.Afah faarrs पसरत्त साहित्यिक weraee fafaer wa:- (कक) Usaha @a) उऊउमध्ययन-उऊध्यापन 6. =r Giepfiteeet a - oe = = ee Write a comment...

3 Ashish Anchinhar nee ही i0.October 2020. 2 No insights to show 6 (9 प्रदीप पुष्प, Kundan Kumar Karna and 72 others 5@ia

सर सतत fame fides CPUstaa * : 2000- 2024 : cose ° 2000- 2029 “es ate हे Ay 3} a No — & ee | [कार /। - | ) | कि न (८)२०००- २०२५ विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X | | न (८)२०००- २०२७ FATS: YIN SUVA शाशिक छा-नजिका ISSN 2229-547X

Ashish Anchinhar's post x Ashish Anchinhar vee I February -@ विदेहक "स्व-निंदा विशेषांक” ई पूरा मैथिली साहित्य लेल एकटा नव प्रयोग हएत। संझवतः पूरा विश्वक साहित्य लेल ई नव प्रयोग हएत। ई सिरीज लेखकक इच्छापर प्रकाशित हएत माने जे लेखक चाहै छथि जे हुनका अपन दुर्गुणक बारेमे हुनक समाज, हुनक पाठक की विचार Te छनि से ओ लीखि सकैत छथि। एहिं सिरीजमे Hat प्रकारक प्रशंसात्मक आलेख aie रहत। जैँ कदार्चित्‌ आबियो गेल as HTS आलेखकें हटा देल जाएत। एहिं सिरीजक मूत्र उदयेश्य ई अछि जे लेखक अपन GT चीन्हि सकथि आ ओकरा हटा सकथि। आ एहिं सिरीज लेल जे पहिल नाम अछि ओ मेल "आशीष अनचिल्हार' माने हम अपने। हमरा बूझल अछि जे हमरा परोक्षमे बहुत लोक हमरा लेल बहुत रास निंदात्मक बात बाजै छथि मुदा आब समय आबि गेल अछि जे हाँ सम.ओकरा निधोख ats लीखि कर विदेहकें पठा सकैत छिये आ ओ ओहिना बिना कोनो काँट-छॉँटकें छपबो करतै। उम्मेद अछि जे विदेहक आन कार्यक्रम जकाँ ईहो सफल हएत आ भविष्यमे आनो लेखक "स्व-निंदा विशेषांक" लेल अपन नाम प्रस्तावित करता। उम्मेद अछि जे "आशीष अनचिन्हार" dot निंदात्मक आलेख अहाँ सभ लीखि ws जल्दिये पठाएब। विदेहक मेल अछि- editorial staftvideha@gmail.com Uig विशेषांक केर समय किछू आलेख एलाक बाद घोषित हएत। स्व-निंदाक शब्दकोशीय अर्थसँ बेसी एहिठाम तथ्यगत अर्थ ली से HEL Lakshman Jha Sagar Mukesh Anand water कुमार झा Kailash Kumar Mishra Siyaram Saras Pranaw Jha Mukund Mayank Bhairab Lal Das Kailash K Mishra Rajeev Ranjan Jha शैकर मचुपांश Prem Kant Choudhary Vidyanand Jha Roshan Jha Dilip Kumar Jha Anjay Chaudhary Nabo Narayan Mishra Hirendra Kumar Jha Arvind Thakur Kamal Mohan Chunnu Kedar Kanan Jeeban Mishra Akhila Nand Jha Raman संजीव मिथिलाकिड्कर Gangesh Gunjan

Arvind Thakur's post x Arvind Thakur "अरविन्द ठाकुर जतबे कथा लिखलनि,बड़ साफ-सुथरा लिखलनि।किए ने हिनक कथाक व्यापक चर्च भेलनि, किए ने आलौचक लोकनि अपेक्षित गम्भीरतासं लैत गेलथिन, तकर हेतु बुझबामे अबैत नहिं अछि। हमरा जतबा बुझबाक अवगति अछि, ताहि हिसाबें कथा-लेखनमे हिंनक क्षमता, दृष्टि, गति, अवर्गति आन विधासं अधिक प्रखर-मुखर, सधल-कसल, Fee ee छनि। विषय-चयनक eet, बनावटि-कसावटिक दृष्टिएं, झाषा-प्रवाहक दृष्टिएं, चरित्र-निर्माण आ ओकर उपस्थापन-निर्वाह- निष्पत्तिक दृष्टिएं हिनक कथा समकालीनताक AACS पूरा करैत छन्नि -- चारू खूट दुरूस्त छनि। व्यंग्य ओकरा आर धारदार बनबैत छैक। संग्रहक दसो कथा वास्तवमे 'अन्हारक विरोधमे' ore छनि। खिस्सा सियार-यार, मूस तथा अथ गिरगिट-गाथा त॑ हमरा विशेष रूपें चमत्कृत कयलक। खेद अछि जे एहिं विधाकें ई एम्हर गाँण मानि लेलनि अछि।" -- भीमनाथ झा वर्ष 20i5 मे #बिदेह क हमरा पर केन्द्रित विशेषांक लेल भीम ara जे आलेख लिखलनि (ई आलेख हुनक पोथी 'नाममात्र' मे सेहो संग्रहित है) तेकर एकटा अंश छिऐ उपरोक्त टिप्पणी। ~ ई सत्य जे कोनो लेखक अपन सर्जनात्मक आकुलता कें व्यक्त करबाक aa लिखैत अछि आ से ओकर निजी संघर्ष होड़ छै।किन्तु कखनियो कए बाहरी दबाव Set ओहि सर्जनात्मक प्रस्फुटनक हेतु Set BI भीम भायक उपरोक्त टिप्पणीक अंतिम पंक्ति - 'खेद अछि जे vig विधाकें ई एम्हर गाँण मानि लेलनि अछि' - मे उपस्थित नाखुशी, असंतोष आ saga सदैव हमर संज्ञान मे रहल। हमर अहिं दोसर कथा-संग्रहक प्रकाशन मे अनेक साहित्यकार मित्रनोकनिक तगादा आ भीम भायक उपरोक्त उलहनक श्रेय ठै। wax av

Jagdishchandra Thakur vee 20 September 2023 - a8 विदेहक प्रसाद fade जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल' विशेषांक विदेहमे 2.2.20i5e प्रकाशित विशेषांकर्के पोथीक रूपमे देखि आनन्दित ova स्वान्ाविक अछि। विदेहक माध्यम सँ पोथी डाट wind 355पृष्ठक ई पोथी Re ara डिमांड क विधिसँ छपिक' आएल HT एकर छपाइमे हमरा fing व्यय अथवा और किछु नहिं करय पडल अछि, दू प्रति मंगयबामे पोथीक मूल्य 788 आ कौरियर खर्च 250रू. लागल अछि। पोथी क छपाड़ आ कवर आकर्षित करत अछि। पोथी छपयबामे मोट खर्च आ बिक्री क समस्या सँ 'पोथी ste कॉम क 'प्रिंट आन डिमांड' विधि रचनाकाररकें मुक्ति प्रदान करैत अछि आ पोथी छपाइक परम्परागत विधिक नीक विकल्पक रूपमे लोकप्रियता प्राप्त करबाक सामर्थ्य रखैत अछि। एकर श्याम पक्ष एन हमरा एतबे बुझायल अछि जे एहिमे रचनाकारकें प्रूफ देखबाक अवसर नही प्राप्त होइत छनि। विदेहक एहिं प्रसादक da प्रसन्नता व्यक्त करैत विदेह-परिवारक प्रति आ पोथी डाट कॉमक प्रति कृतनता ज्ञापित करब आवश्यक as अछि। दूनू परिवार कें aga. बहुत धन्यवाद। कु चन्द्र रु र » FASE जगदीश चन्द्र SIDR

Shardindu Chaudhary is in Patna. = *** G7 oct 4,2023-@ Pothi prapta bhel ! Aabhari chhi shri gajendra thakurjee .shri anchinharjee o samast lekhakloknik je hamra lel apan bahumulya samay delani ! khas ka’ hunka prati je hamar aalochna kaylani ! Matra prashansa sa’ kahiyo sahi mulyankan nahi bha' sakaichh ! Pothi prapta karayba lel shri j .c .thakur aniljeek prati visheh aabhar ! | | I=

Lakshman Jha Sagar's post x Lakshman Jha Sagar vee “9 46 November 2023 - 2. कृतनता ज्ञापन! fads हमरा पर केन्द्रित विशेष अंक निकालिके हमरा पर एकटा बरका भार दय देललि अछि। vise हमरा जतबे खुशी भेत्र अछि 'ततबे दायित्वक वोध सेहो stor अछि। एहि अंकमे जे लोकनि अपन बहुमूल्य समय निकाल्रिके हमरा पर जे Peng लिखलनि अछि 'तिनका प्रति हम हृदयसं कृतल छी! विदेहक प्रति हम आत्मासं आभारी छी!! लक्ष्मण झा सागर 'कोलकाता/ 6..2023 ©0 You, Abhilash Thakur, हितनाथ झा and 5 others 7 comments thy Like Q Comment Most relevant ~

Ashish Anchinhar eee Jun 8, 2024 -@ कुणालजी विदेहक नरेन्द्र झा विशेषांक che प्रिंट करबा Hs नरेन्द्रजीकें पढ़बाक लेल देलखिन अछि। ई सूचना विदेह लेल महत्वपूर्ण अछि ait एहि लेल Kunal जीक अभिनंदन। See insights and ads dd Like Q Comment >» Share OO Sangita Mishra + 29

दी uv YY u oo छा 3 सब ९ o विदेहक th. डा. रामावतार यादव विशेषांक केर देवनागरी एवं तिरहुता लिपिक PDF» box cag Ashish Kr. Mishra © Thu,4Jul 2024, 8:00 yy WOT, विदेहक प्रो. डा. रामावतार यादव विशेषांक केर देवनागरी एवं तिरहुता लिपिक POF संलग्न ws रहल छी। एकर स्थायी लिंक विदेह एवं गूगल बुक्सपर एना अछि- विदेह-देवना ram yadav दाना/508/94280ु08,00> Fri, 22 Jul 20240820 x © | F कै Translate to English x How very thoughtful, indeed!

i a हितनाथ झा q i 4 December 2024 - 8. कि .ऐ अंकमे HI g विदेह A सम्पादकीय ८. z | B ४०५म अंक प्रस्तुत विशेषांक सन्दर्भमे ee. हितना। विशेषांक परिचय जे थझा ) on steer sera ? 7 02.कल्पना झा :-मैथिली साहित्यक परम्परा आ विकाससँ परिचित करबैत अछि मैथिली इतिहासक रेखांकन r 4 03.आशीष अनचिन्हार :- स्थानवर्णना, नगरवर्णना J : ग्ामवर्णना... See more AN \ Loan . ate a (0 i08 44 t \ देह ४०५म अंक 08 नवम्बर २०२४ नि जहर, वर्ष १७ मास २०३ अंक You) Q ia i न Most relevant के | तु > y= a i तन Dip Kua oe | q 37w Like Reply ‘ | i | Poonam Jha 4 aa or; शा धर : गजेन्द्र ठाकुर। जम is सम्पादक: कक de Comment as Ashish Anchinhar

ट न ‘cil | कण: a | ं हि १ 2० Fm | है "के | se : ¢ We « ही : < . ं किक is fra नवल सुशील कैश ् दि g ५. | ai .* i गजेन्द्र ठाकुर : bad ही... डे जी ie को 4 : < रे ४. Big Ves?

2y Like Reply Hide 6 e Priyanka Mishra Peed धन्यवाद |, 'विदेह'क माध्यमसँ बहुत fore सिखबाक, बुझबाक अवसरि संग हमरा सभकें मार्गदर्शन Get होएत | हमर सभक प्रयास रहत जे अपनामे निरंतर सुधारक संग काज करबाक प्रयास करी। 2y Like Reply Hide 6 लालदेव कामत हमरो एकटा Bes आलेख ऐ विशेषांक में बहराएल, धन्यवाद अपनेक। ., Iibhn Darl, § LUlteda न हि

Ashok Jha vee gS 45 December 2024 -8 विदेह प्रथम मैथिली पाह्षिक ई पत्रिका विदेह नूतन अंक वि दे ह विदेह Videha far http://www.videha.co.in विंदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal दिंदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ समकें रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. अजय कुमार झा तिरहुतिया (BIH-92306240) मिथिला विकास परिषद: fang सहेजल HEAT It would be necessary to quote, not the history writing, but what I understood from my natural experience and contemplation, what I saw and what spontaneously came to my mind, because I have participated in many programs of the Mithila Vikas Parishad as an eyewitness (इतिहास लिखब नहि, बल्कि अपन अनुभव आ चिंतन TSH THE, जे देखलहूँ आ जे किछू सहज SIH मोन पड़ल से उद्धत करब आवश्यक होयत कारण मिथिला विकास परिषदक कतेकों कार्यक्रम में प्रत्येक्षदर्शीक रूप में भाग लेने छी)। समकालीन संस्था आ व्यक्तिक मूल्यांकन करब सहज कार्य नहि। निष्पक्ष रहब एक कठिन चुनौती होइत Bl अस्तु, लोक अही प्रकारक विवेचन सँँ परहेज करैत अछि। कोनो संस्था S नहि जुड़ला वा कही सकै छी समस्त संस्था सँ समान सामीप्य वा दूरी बनेबाक कारण ई जोखिम fag हद तक आसान होएत छै। समाज मे संस्थागत परिकल्पना अत्यंत प्राचीन जकर उद्देश्य समाजक विभिन्‍न समस्या के निदान tiga ै। मैथिली एक प्राचीन भाषा मात्र नहिं, मैथिल समाज Set अति प्राचीन अछि। शासन HT ore Pitas cree ste onto itor से सर्व Ros सहित eS Se wes ee स्लस्प

Ashish Anchinhar ces (G) sesenuary-@ "मिथिलाक वर्तमान उद्योग, उद्योगपति एवं एकर भविष्य" विदेह एहि विषयपर एक विशेषांक प्रकाशित करत। हमर इच्छा जे ई विशेषांक एहिं सालक दिवाली बला समयमे प्रकाशित हो। दिवाली भारतीय उद्योगक लिहाजसँ सालक अंतिम बड़का पाबनि isa छै, ds हमर ई इच्छा Sal संगहिं Set जे विशेषांकमे मात्र वर्तमान कालक आलेख रहत। भूतकालक उद्योग It हम सम अलगसँ प्रयास करब। उम्मेद अछि जे जेना विदेह विशेषांक अपन एकटा नमहर बाट बना लेने अछि ताहिमे Set विशेषांक सफल रहत। एहिं विशेषांकक विषय लेल पूर्वमे हमरा. जी कहिं चुकल Gog मुदा जीक विदेहमे टिप्पणी एलाक बाद हमर हौसला बढ़ि गेल। उम्मेद जे सहयोग भेटत। गा Ye ow . me =

é Ashish Anchinhar 'विंदेहक रीलर / शार्ट shisat विशेषांक" उर्फ "मैथिली झाषाक विंकासमे fer / शार्ट औीडियो केर भूमिका” इम अपन पोथी "मैथिली वेब पत्रकारिताक इतिहास" मे रील माने शार्ट sats मैथिली भाषाकें कतेक फायदा भेलै तकर संक्षिप्त सूचना देने रही संगहिं ओही ठाम हम TET Tae आग्रह केने रही जे ओ सझ Ui विधाकें झाषा-विज्ञानक चश्मासँ देखथि। ई अलग बात छै जे रील Saas बलाकें एक सीमा आ लोकप्रियता पार केलाक बाद प्रचुर HATS SET aga SI मुदा मैथिलीमे सामान्य साहित्यकारसँ Gis Hs झाषाशास्त्री धरि अपनाकेँ अकादमी, प्रायोजित संस्था, ws देनिहारक कार्यक्रम aft समेटि लेने छथि। Usa स्थितिमे एक बेर फेर fade एहिं विषयपर अपनाकेँ आगू ahs Teo HTB आ "विदेहक रील / शार्ट ीडियो विशेषांक" उर्फ "मैथिली झाषाक विकासमे fet / शार्ट भीडियो केर भूमिका" एक अंक केंद्रित करबाक विचार Hs रहल HSI एहिं विशेषांकमे मैथिललीक ओहन क्रियेटर समहक चैनलपर लिखल जेबाक चाही जिनकर चैनलपर अधिकांश रील मैथिलीक oie, आन भाषाक रील बला चैनलपर लीखल लेख एहिं अंक लेल मान्य नहिं हएत। एहिं अंककें प्रकाशित हेबाक एवन समय-सीमा नहिं अछि, जहिंया आलेख सभ आबि जाएत नहिंया हम सझ एकर तारीख तय करब। आलेख विंदेहक मेल आइडी- editorialstaffvideha@zohomailin पर पठाओल जाए। एहिं विशेषांक लेल fares तथ्य द५ Teo छी जाहिसँ अहाँ सकें सुविधा रहत- L री बनेबाक लेल प्रमुख ठेकाना। 2) रील कोना बनाओल जाए, मोनेटाइज कोना HUA जाए, कथा-पटकथा केहन हेबाक चाही। 3) मैथिलीक प्रमुख रील चैनल केर नाम, fees, ओकर प्रयोगकर्ता एवं ओकर संगी कलाकार।

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