VIDEHA — Issue 429 / अंक ४२९

Publication: VIDEHA · Issue: 429
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विदेह ४२९ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। [विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X Videha e-Journal (since 2000) at www.videha.co.in ] ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। कॉपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२५. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२५. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA. सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@zohomail.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@zohomail.in. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover design: AUM GAJENDRA THAKUR VIDEHA:429 समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा। मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अनुक्रम [विदेह ४२९ म अंक ०१ नवम्बर २०२५ (वर्ष १८ मास २१५ अंक ४२९)] ऐ अंकमे अछि:- गद्य १.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान -16 (पृष्ठ २-७) १.२.हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-08 (पृष्ठ ८-१६) १.३.डॉ.आभा झा-माटिक सुवास (पृष्ठ १७-२०) १.४.आशीष अनचिन्हार-मोट साहित्य (पृष्ठ २१-२५) १.५.लालदेव कामत- चन्द्रहास : पोथी चर्चा (पृष्ठ २६-३१) १.६.लालदेव कामत- पौराणिक बालकथा- मौसरी धुपाधुप (पृष्ठ ३२-३४) १.७.प्रमोद झा ' गोकुल'- परोसिन (पृष्ठ ३५-३७) १.८.परमानन्द लाल कर्ण- स्वावलम्बन (पृष्ठ ३८-४६) १.९.प्रणव कुमार झा - दवाई दारू (लघु कथा) (पृष्ठ ४७-४९) १.१०.संतोष कुमार राय 'बटोही' केर धारावाहिक डायरी 'लव यू टू' (पृष्ठ ५०-५२) १.११.ग्रुप कॅप्टन (डॉ) वी एन झा- परमात्मा के वास कतए ? : एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण (पृष्ठ ५३-६७) पद्य २.१.जगदानन्द झा मनु -५ टा गजल (पृष्ठ ६९-७३) २.२.जगदानन्द झा मनु - बीसटा हाइकू (पृष्ठ ७४-७८) २.३.प्रदीप कुमार मंडल "पबड़ा"- सुखि गेलै कमला सुरुज/ दियौ मैया भू तल नीर हे (पृष्ठ ७९-८१) २.४.राम शंकर झा"मैथिल"- दलान (पृष्ठ ८२-८८) २.५.प्रमोद झा ' गोकुल'-नै कोनो बात भारी (पृष्ठ ८९-९१) २.६.प्रणव कुमार झा- साधारण वोटर (पृष्ठ ९२-९३)

गद्य १.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान -16 १.२.हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-08 १.३.डॉ.आभा झा-माटिक सुवास १.४.आशीष अनचिन्हार-मोट साहित्य १.५.लालदेव कामत- चन्द्रहास : पोथी चर्चा १.६.लालदेव कामत- पौराणिक बालकथा- मौसरी धुपाधुप १.७.प्रमोद झा ' गोकुल'- परोसिन १.८.परमानन्द लाल कर्ण- स्वावलम्बन १.९.प्रणव कुमार झा - दवाई दारू (लघु कथा) १.१०.संतोष कुमार राय 'बटोही' केर धारावाहिक डायरी 'लव यू टू' १.११.ग्रुप कॅप्टन (डॉ) वी एन झा- परमात्मा के वास कतए ? : एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण १.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान -16 कल्पना झा (उपेन्द्रनाथ झा 'व्यास' साहित्य अध्येता, आलोचक एवं कथाकार) मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान -16 'व्यास' जीक एकमात्र कविता संग्रह: प्रतीक

"मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान" पर लिखा रहल सिरीज मे ओना तँ पूर्वहु मे हम "तन्त्रनाथ-दग्ध कवि होएबाक आरोप सँ आरोपित 'व्यास' जी" शीर्षक सँ एकटा लेख मे 'व्यास' जीक कविता-लेखन पर गप्प कएने छी। मुदा 'व्यास' जीक एकमात्र कविता-संग्रह "प्रतीक" पर तेना भ' क' चर्चा नहि भेल छल एहि सिरीज मे। आ से चर्चा होएब आवश्यक बुझना गेल। सैंतीस-अठतीस वर्षक दीर्घ अवधि मे रचित लगभग सभटा (किछुए छूटल हेतनि) मुक्तक कविता एहि पोथी मे संकलित छनि। कुल 29 गोट कविता मे सभटा कविता अपना तरहक, विशिष्ट कविता सभ छनि। किछु महत्वपूर्ण कविता मे अछि "सूर्य्य", "निर्झर नीर", "बनफूल", "शिशिर मेघ", "विद्यापतिक मृत्यु", "हरिद्वार" शीर्षक सँ लिखल दू गोट कविता, "वसन्त", "जय भारत", "शारदा विजय", "मानभूमि", "कातिक धवल तिथि त्रयोदशि....", "जरत्कारु उपाख्यान", "सौन्दर्य बोध", "प्रतीक", "मेहक बड़द जकाँ", "हत्या", "अभिनन्दन", "आउ दुर्गे", "अन्तरिक्ष-यात्री", "बाह रे संसार, देखले संसार", "विद्यापति", "सान्ध्य-प्रभात-तारा", "जेठक दुपहरिआमे", "कौआ", "ओ गाछ" शीर्षक कविता। सभ सँ नमहर कविता अछि "शारदा विजय", जे शंकराचार्य-मण्डन-भारतीक शास्त्रार्थ सन लोकप्रिय कथानक पर आधारित अछि। उक्त कविता-संग्रह मे विषयक विविधता देखि पाठक निश्चित रूप सँ संतुष्ट आ उत्साहित होएताह। किछु कविता ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित भेटतनि, किछु पौराणिक। किछु कविता, जेना "सूर्य्य", "निर्झर नीर", "बनफूल", "शिशिर मेघ", इत्यादि प्राकृतिक विषय-वस्तु पर आधारित छनि। किछु कविता सामाजिक, तँ किछु वैज्ञानिक विषय-वस्तु पर सेहो लिखलनि अछि कवि। विज्ञानक छात्र रहलाह 'व्यास' जी आ आगाँ जा क' अभियंत्रण सेवा मे रहलाह, तँ से कविता सभ मे यत्र-तत्र ओकर प्रभाव देखाइ पड़ब अनर्गल नहिए बूझल जेतनि पाठक द्वारा। एहि तरहक बात 'व्यास' जी उक्त पोथीक "दू शब्द" मे स्वयं लिखने छथि। आ जैँ कि अभियंत्रण सेवा मे लागल रहलाह, बाद मे बहुत नहि लिखि सकलाह। यथा रुचि, यथा समय थोड़ बहुत लिखाइत रहलनि, सएह। जे लिखलनि से "स्वान्त: सुखाए" आ अपन जीवनक अभिलाषा जे छलनि, मातृभाषा मैथिलीक किछु सेवा करी, ताहि उद्देश्य सँ लिखलाह। अत्यधिक व्यस्तता रहितहुँ किछु-ने-किछु, कविता वा अन्यान्य विधा मे लेखन-कार्य करैत रहलाह 'व्यास' जी। मां मैथिलीक चरण मे जएह किछु अर्पित क' सकी, से प्रयास रहलनि। आ ताही प्रयास मे बहुतो विधा पर कलम चलौलनि। उपन्यास, कथा, कविता, खण्डकाव्य, अनुवाद, यात्रा-वृत्तान्त, इत्यादि सभ किछु लिखलनि। भगवान जानथि; 'व्यास' जीक प्रारब्ध छलनि कि हुनकर अपन श्रम-साधनाक फल, आ कि एहन वरदान प्राप्त छलनि जे जाहि काज मे ओ हाथ लगौताह सफल होएबे-टा करताह, नाम-यश कमएबे करताह। चाहे ओ साहित्य-सृजनक गप्प हुअए कि कर्म क्षेत्रक। सभठाम खूब मान-प्रतिष्ठा भेटलनि हुनका। कोनो तरहक 'रोड-मैप' होइक, कि कोनो अन्यान्य पब्लिक सेक्टर संबंधी 'डिजाइन' बनएबाक काज, 'एक्सपर्ट' छलाह सभ काज मे। रिटायरमेंटक उपरान्तहु हुनका सँ संपर्क कएल जाइत रहलनि, कोनो जटिल 'रोड-मैप' वगैरह मे सलाह लेबाक लेल। अरे...विषयान्तर भ' गेल। गप्प क' रहल छलहुँ 'व्यास' जीक एकमात्र कविता-संग्रह 'प्रतीक'क। एहि संग्रह मे संकलित कविता सभ पढ़ि एकटा बात ईहो स्पष्ट भ' जेतनि पाठक केँ जे कवि प्रयास कएलनि अछि कविता सभ छन्दोबद्ध रहए। प्राचीन छन्दक प्रयोग बहुत ठाम देखा पड़त। तथापि छन्दोबद्ध रहबे करए, आ प्राचीन छन्दक प्रयोग अधिकाधिक हुअए ताहि लेल कटिबद्धता कही कि कट्टरता, से नहि देखा पड़त कविक। माने कवि आधुनिकताक पक्षधर सेहो छथि, आ नब-नब छन्दक प्रयोग सेहो कएलनि अछि। कहबाक माने विविध विषय, आ विविध शैली, सभ किछु केर समावेश सँ स्पष्ट अछि जे कवि उदार नजरिया राखैत छथि। आ इएह एहि कविता-संग्रह कें विशेष बनबैत अछि। बल्कि कहबाक चाही, इएह उदारता 'व्यास' जीक साहित्य कें विशेष बनबैत अछि। समग्र रूप सँ। 'व्यास' जी अपन किशोरावस्था मे छलाह, तखनहि सँ किछु-किछु लिखब शुरु क' देने छलाह। "दू शब्द" मे एहि बातक चर्चा ओ स्वयं कएलनि अछि, "तेरह-चौदह वर्षक अवस्था मे मिडिल स्कूलक एक पंडित जी हमरा 'व्यास' कहए लगलाह। एहि आदर्शवादी उपनाम वा मां सरस्वतीक कृपा सँ दू, तीनि वर्षक बाद हम किछु-किछु कविता बनबए लगलहुँ।" मुदा ओहि अल्प बएस सँ कविता लिखब शुरु करबाक बावजूदो मात्र एकटा कविता-संग्रह जोगर कविता लिखलनि ओ अपन जीवन-काल मे, से कनि अजगुत बला बात तँ बुझाइत अछि। एखनुक समय मे की महिला, की पुरुष, केओ जे कविता लिखए लागैत छथि, तँ कविताक अम्बार लगा दैत छथि। एकहक साल मे दू-तीन टा कविता-संग्रह छपवा लैत छथि। आ 'व्यास' जीक साहित्य-संसार मे मात्र एकटा कविता-संग्रह। संख्यात्मक दृष्टि सँ भले कम लिखलनि कथा, कि कविता, किछुओ। मुदा गुणात्मक दृष्टिकोण सँ की-केहन आ कतेक महत्वपूर्ण काज क' गेलाह, से कहबाक बेगरता नहि अछि हमरा। संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-7 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-8 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-9 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-10 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-11 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-12 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-13 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-14 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-15 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.२.हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-08 हितनाथ झा (मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070) मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-08 समस्यापूर्ति 'प्रभात' बहुभाषिक पत्रिका छल। एहि पत्रिकामे मैथिली, संस्कृत, हिन्दी आ अंग्रेजीक रचना सेहो छपैत छल। देवनागरी प्रमुख लिपि छल, मुदा किछु रचना मिथिलाक्षरमे सेहो अछि। तत्कालीन समयमे अधिकांश पत्र-पत्रिका बहुभाषिके होइत छल। मुदा एहि पत्रिकाक विशेषता छल जे निबन्ध, कथा, कविताक अतिरिक्त समाचार, आन्दोलनक गतिविधि, सनातन आ स्वदेशीकरणपर जोड़, समस्यापूर्ति, चुटुक्का, प्रश्नोत्तर, पाठकक पत्र आ ओहि पत्रमे छपल रचनाक आलोचना पक्षकेँ सेहो स्थान देल जाइत छल। नीक आ उपयोगी रचना आबय एहि लेल एक लेखककेँ जनिक वर्ष भरिमे सर्वोत्कृष्ट रचना हेतनि, हुनका पदक प्रदान कयल जयतनि। रचना प्रकाशनक पारदर्शिताक अद्भुत उदाहरण अछि। जाहि रचनाकारकेँ ई होनि जे हमर रचना जानि-बूझि क' नहि छापल गेल अछि ओ लिखित शिकायत करथु युवक संघक सचिवकेँ। ओ रचना युवक संघक सभामे राखल जायत, विचार-विमर्श होयत, तखन जे निर्णय कयल जायत, ओकर पालन सम्पादक करताह। प्रसिद्ध आलोचक मोहन भारद्वाजक एहि विशिष्टताक विषयमे कहब छनि - "ओहि समयक पत्रिकाक भाषिक चरित्र एहने होइत छलैक।मैथिल हित साधन, मिथिला मोद, मिथिला-मिहिर, मैथिल-प्रभा, मैथिली-प्रभाकर, ई सभ पत्रिका बहुभाषिक छल। केवल श्री मैथिली तथा मिथिलामे मैथिलीक रचना रहैत छल। प्रभात एहि दुनू पत्रिकाक अनुगमन नहि कयलक। ओना, अधिकाधिक रचना मैथिलीमे हो से इच्छा आ आग्रह सम्पादकीयमे कतोक बेर कयल गेल अछि। मुदा युवक लोकनिक उत्साह भाषिक बन्धनकेँ मानबाक लेल प्रायः तैआर नहि छल। तेँ भाषिक शुद्धि आ प्रांजलता तथा विषयक परिपक्वतापर ध्यान देलनि, मुदा अवान्तर भाषाक चयनपर नहि।� (सन्दर्भ: एकलपाठ-मोहन भारद्वाज) नव रचनाकारकेँ प्रोत्साहनक हेतु प्रत्येक अंकमे समस्यापूर्ति तीन भाषामे देल जाइत छल- देवभाषा, मैथिली आ हिन्दी। ओहि समय समस्यापूर्तिक प्रचलन छल, शास्त्रार्थ जकाँ । कविचूड़ामणि मधुपजी प्रेरणापुंजमे समस्यापूर्तिपर एक प्रसंग लिखनहुँ छथि, जखन मधुपजी एक तात्कालिक घटनाक बाद दू पाँती रचि तुरत सुना देलथिन, ओ कविता सूनि तारानाथबाबू बाजल छलाह -�हमर काशीकान्तबाबू आशुकवि हैताह शीघ्रे"। ओहि बातपर मधुपजी 'प्रेरणापुंज'मे लिखने छथि- " हमर सम्बद्ध-विषयक गप्प बजला मुदित तारानाथबाबू जे श्रवण क' दैत चौअन्नी हँसी हिन्दीक पटु पण्डित चकित संयोगसँ उपविष्ट ताहीठाम ब्रजनाथबाबू बाजि उठला : " जौं समस्या-पूर्ति कविजी क' सकथि तँ हमहुँ बुझबनि छनि कवित्वक सृजन-प्रतिभा ' कहि, ' नौआ ' पदें पूर्ण करैक ताही क्षण समस्या। चट हमहुँ ताहीठाम कागत और पिनसिल ग्रहण क' पन्द्रह मिनट बिततैह तकरा कयल पूरा जकर अपनउंलोकनि देखु स्वरूप : " देत सेर भरि दूध, मिलौने पानि तीनएँ पौआ, झौआ गामक गोप, मुदा पहिनहिं किछु पौने ढौआ। तहिना केश कटैत, कलोल कराबै बनि मुँहबौआ, लबलब बजइत बात सदच्छन की बलचनमा नौआ।। (सन्दर्भ: प्रेरणापुंज-मधुप, पृष्ठ-15) एहि घटनाक बाद अनेक समस्या-पूर्तिक सन्दर्भ अछि। समस्यापूर्तिक जे विषय प्रभातमे देल अछि आ किछु कविक समस्यापूर्तिक कविता एतय उद्धृत करय चाहब, मैथिलीमे देल समस्यापूर्तिक विषय निम्नलिखित छल- (विभिन्न अंकक समेकित समस्यापूर्तिक विषय एतय लेल अछि) विचारू अहाँ, यदि हो, युवक संघ सेवक जतय, अकचकाय निज कार्यमे, आब हमर रक्षा होयत, व्यक्ति चीन्हि कय भोट दी, मधुकर मदन जगाबय, मिथिला कवि विद्यापति, जत चन्द्रावति रानी, भूतल रहि-रहि डोलय, युवक जगत संचालक, राष्ट्रपति राजेन्द्रबाबू, कुसियार छी, जय ध्वनि कोना?  छोड़ने की भय सकैछ? , 01.युवक संघ अछि सेवक जतय ! ~श्री श्याम सुन्दर झा, कोइलख। सूनू मिथिला के औ वासी, कियैक नहि आब जागल छी। ताजू आलस्य निद्रा काँ, कियैक छी मोहमे फँसय॥ 01॥ हटाऊ द्वेष ईर्ष्या केँ, परस्पर ऐक्यता जोडू । अविद्या काँ हटाउ सब, करू विद्याक मिलि उदय ॥ 02॥ करू उत्साह ओ साहस, हटाऊ विघ्नबाधा के। ' सुन्दर ' क अर्ज काँ मानू, युवक संघ अछि सेवक जतय॥ 03॥ (वर्ष-01, अंक-04, अप्रैल 1933) 02 विचारू अहाँ ~श्री रामचन्द्र झा, रानीटोल। यावत ईर्ष्या द्वेष रहत मन ताबत मेलक नाम कहाँ । यावत मेल-मिलाप बढ़त नहि तावत उन्नति हैत कहाँ।। जौं उन्नति मार्गे चलब नहि त कलुषित जानि क हैब अहाँ। किय कलुषित जाति कहाय रहब मैथिलवृन्द विचारू अहाँ।। 03 यदि हो ओ घर उन्नति करत अवश्यहि भ्रातृ प्रेम सब दिन यदि हो। जाति ओ उन्नति करत अवश्यहि जाति प्रेम सब दिन यदि हो।। ग्राम ओ उन्नति करत अवश्यहि युवक संघ रक्षित यदि हो । देश ओ उन्नति करत अवश्यहि युवक संघ दक्षित यदि हो।। (वर्ष-01, अंक-11, नवम्बर-1933) 04. मिथिलाक कवि विद्यापति ~श्री रामचन्द्र झा 'चन्द्र ' रानीटोल आधुनि ब्रज भाषाक कविता, देखू नयन पसारी। करि की सकला केओ बराबरि, कविता रसिक विहारी।। छथि औखन बहुतो मिथिलामे, मैथिल काव्य कलापति। पर समानता कय सकता के, मिथिला कवि विद्यापति।। (वर्ष-02, अंक-मइ-1934ई.) 05 युवक संघ लेखक जतय ~रामचन्द्र झा 'चन्द्र ' रानीटोल। गो मातु चलू वनमे विचरय हरित ग्रास अछि, बहुत ओतय। फुलित पुष्प सौ बाग सुशोभित चित्त प्रफुल्लित हैत चितय।। करिके हरि नै कै सकता किछु रहब सभय मिलि एक मतय। भय नहि किछुओ रहल ओहि ठा युवक संघ सेवक जतय।। (वर्ष-2, अंक -01, जनवरी-10934 ई.) 06 मौन भई फुलि ई फुलवारी ~श्री ब्रजमोहन ठाकुर 'मोहन' (चपाही) सवैया फूलन के बँगले बिच राजत संग सखा सखि प्याउ अरु प्यारी । अंगन अंग विचित्र वन्यउ पट भूषन जा छवि है न्यारी । आनन फूल समान लसे वच फूल सभी मन फूल उभारी। मोहन संग समाज लिये जनु मौन भई फुलि ई फुलवारी।। ( वर्ध-02, अंक-05, मइ 1934 ई.) 07 शान को बढावेंगे ~श्री महन्थ झा, बड़गांव) शान्ति के पुजारी सुविचारी आज भारत में, सेवा के भिखारी सदा हिय हुलसा वेंगे। खादी के प्रचारक समर्थ देश नायक हूँ हरिजन सहायक प्रिय वाणी को सुनावेंगे।। प्रान्तों में घूमि-घूमि प्यारी भूमि चूमि चूमि, भारत मचादी धूम जान को लड़ावेंगे। चारो ओर गूँजती वाणी फिर भविष्य आज गान्धी से सपूत हिन्द शान को बढ़ावेंगे।। (वर्ष-2, अंक-06, जून-1934ई.) 08 मिथिला कवि विद्यापति ~श्री अनिरुद्ध मिश्र, बी.ई. जनिकर रचना केरि नकल कय बंगक कवि सब पूजित भेला। जनिकर भाव चोराय पुनर्लिखि तुलसी नाम कमैला।। जनिकर सन रचना सुन्दरता कतहु अहाँ नहि पायब। हिन्दी बंगला काव्य ग्रन्थ सब ताकि अहाँ जे जायब ।। जनिकर पाँती ह्वैछ समादृत तीनि तीनि भाषा मे। जनिका सन की कतहु एको कवि अछि ककरहु लेखा में? मैथिल कोकिल -हित उगना बनि रहला स्वयं उमापति । हयत हुनक अपमान कहब जँ�मिथिला कवि विद्यापति"।। (वर्ष-2, अंक-09, सिंतबर-1934ई.) 09� युवक जगत संचालक� ~श्री रामचन्द्र झा रानीटोल द्वेष उठाय हृदय करु प्रफुलित, बेर एखन नहि बैसि गमाबक। हाथ उठाउ?  प्रभातक लेखक ! अहि पर केवल भार प्रचारक।। मेल मिलाप बढ़ाउ युवकगण, आवहु होउ प्रभातक पालक। देश विदेश सदा कहइत अछि, केवल युवक जगत संचालक।। (वर्ष-02, अंक-11, नवम्बर-1934ई.) 10�जत चन्द्रावति रानी" ~श्री रामचन्द्र झा 'चन्द्र' ( रानीटोल) नहि पाय प्रभावक लेस रहे, विच जह्नु सुताक वहैतछि पानी। सुचि सुन्दर वायु प्रफुल्ल हिये, परजा सह शोभित अछि राजधानी।। अति मोद विनोद गुणीगण सौं, दरबारहि बास करै छथि वाणी, 'रामचन्द्र' कहु कमती किय हो, छथि राजित जत चन्द्रावति रानी।। मधुपजी आशुकवि छलाह, प्रभातसँ लगाव छलनि, मुखपृष्ठपर हुनकहि कविता छपैत छलनि, रानीचंद्रावतीपर तँ धारावाहिक निकलैत छलनि, तथापि हुनक एकहु टा समस्यापूर्तिक कविता नहि अभरल, एकर कारण जखन सोचय लगलहुँ तँ प्रेरणापुंज(संस्मरणात्मक पद्यकथा)पर ध्यान गेल जतय एक ठाम मधुपजी लिखने छथि, भ' सकैछ वैह कारण हो - देखल जाय :- " ओइ समयमे प्रतियोगिता कविताक जै ठा होइत छल भगवतीक कृपें प्रथम हमरे रहै छल काव्य ई ख्याति बढ़ल ततेक जे (स्थल केर अछि नहि स्मरण) एकर सम्मेलनक मंचस्थित कविक प्रतियोगितामे जै अपन हम नाम देलियै की दिवंगत बुधमण्डली-मूर्धन्य श्लेष-सारस्वत-सुधा-संतृप्त-सहृदय पद्यमय-भाषण-क्षम मिश्रोपनामक त्रिलोकनाथ ख्यात रोकि हमरा कहल : " विजयी बनि पुरस्कृत भेलहुँ बहुतो ठाम आब नव-नव कविक हेतुक मधुप जी ! प्रतियोगितामे ली अहाँ नहि भाग।" मुदित मन पद-पुण्डरीक स्पर्श क ' हुनकर कहल हम "ऐ कथन-रूप इनामसँ क' नाम लेलहुँ धन्य की त्रिलोकक नाथसँ दोसर पुरस्कृत अन्य? " संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-7 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.३.डॉ.आभा झा-माटिक सुवास डॉ. आभा झा (संस्कृतक शिक्षिका, विद्वान एवं समीक्षक) माटिक सुवास �माटिक सुवास� अपन नामक अनुरूप गामकेॅं केन्द्रमे राखि लिखल लघु उपन्यास अछि। किछु प्रसंग छाड़ि देल जाइ, किछु अतीतक स्मृति कात क� देल जाइ त� पाठककेॅं सर्वत्र गाम भेटैछ।गामक गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, राजनीतिक कदाचार आ अंधविश्वास त� भेटबे करत, संगहिॅं भेटत ओतुका वातावरणक अन्हार देखि इजोत अनबाक कोशिश, परिवेशमे व्याप्त मानसिक गंदगी साफ करबाक प्रवृत्ति, दृढ़ निश्चय आ तदनुरूप परिश्रम सेहो ।ई दोसर पक्ष एहि उपन्यासक आत्मा अछि।समर्थ व्यक्तिक मोनमे गाम-घर लेल किछु करबाक ऊहि जन्म लै,ओ सेवानिवृत्तिक बादे सही, मुदा गाम घुरथि,अरजल पाइक किछु अंश,अपन ज्ञान, अनुभव आ कुशलताक लाभ गाममे रहनिहारकेॅं  देथि,ई लेखिकाक अभिप्रेत छनि । राजनीतिक कुचक्र, पारिवारिक मूल्यक ह्रास आदि बहुत रास बाधाक बादो उपन्यासकेॅं सुखान्त रखबाक पाछू संभवतः लेखिकाक हृदयमे ई विश्वास छनि जे ई सभ संभव अछि, कोशिश त� करू! उपन्यास प्रारंभ होइत अछि सिंगापुर बाली काकीक गाममे रहब शुरू करबासॅं, संगहिॅं अपन संतानसभकेॅं अपन माटिसॅं दूर रखबाक आ गामक प्रति दायित्व नहि निमाहबाक कचोटसॅं।अपन गलती सुधारबा लेल ओ प्रत्येक स्तर पर काज करब शुरूह करैत छथि,घ�र छोड़ै बाली तुलसीक प्रति संवेदना आ संरक्षणसॅं,परिवारेमे यौन- उत्पीड़नक ग्रास बनलि कजरी आ धनसाहि बालीक पक्षसॅं पुलिसमे रिपोर्ट करबासॅं आ स्त्रीकेॅं आत्मनिर्भर बनयबा लेल बहुत तरहक कौशल-शिक्षाक व्यवस्था आदि करबासॅं। तकर बाद नाटकीय ढंगसॅं पोताक गामक यात्रा,पटनेसॅं एमडी करबाक योजना,पुतहुक अनर्गल गारि-श्राप, दुर्घटना,कोमामे जायब,बेटा-पुतहुक एकैस बरख बाद गाम घुरब आ गाममे अस्पताल आ राइस-मिल बनैबा लेल पाइ खर्च करब आदि घटित होइत अछि। एहि सभ रमणगर घटनाक उपस्थापनक संग लेखिका समाजक यथार्थ सेहो सोझां रखैत चलैत छथि।ओ  पकड़ौआ बियाह आ वैधव्यक दंश भोगैत डॉ सुष्मिता,बुच्चन बाबूक जमीनक लोभमे नेताजी संग मिलि चालि चलब,नेताजीक चुनाव जितबा लेल छोटकुन सन अपराधीक संग- साथ,अनेक निरपराध लोकक लहाश पर अपन जीतक गोटी बैसायब,ससुर- भैंसुरक विकृत यौनाकांक्षाक शिकार धनसाहि बाली,जकरा प्रेमी बुझैत छली,तकर जबर्दस्ती भोग्या बनलि तुलसी आदि बहुत रास सामाजिक कुरीति सहज ढंगसॅं परसैत कथा आगू बढ़़बैत छथि। पोथीक भाषा समय आ पात्रानुरूप अछि, रोचक ढंगसॅं बढ़ैत कथानक मनलग्गू त� अछिए,ठाम-ठीम चिंतन करबा लेल विवश करैत चलैत अछि।कहल जा सकैत अछि जे श्रीमती मुन्नी कामत उपन्यास-लेखनक दिशामे थोड़ेक आर मेहनति करती त� नीक प्रभाव छोड़ि सकैत छथि। एकटा पाठकक दृष्टिसॅं जॅं  हम कही त� कतौ- कतौ  किछु अस्पष्टता ओझराबै अछि।कथाक बढ़ैबा काल कजरीक हत्या-प्रसंग आ तुलसीक दुर्घटना अथवा शोषणक परिस्थिति,चंदनक तुलसीक संग दुर्व्यवहार आदि प्रसंग पर कनेक स्पष्टता जॅं रहितै त� पाठकक मोनमे बेशी तृप्ति होइतै। जॅं किछु ओहन पक्ष पर गप करी जतय परिमार्जनक खगता बुझना गेल त� ओ अछि हिन्दी आ अंग्रेजीक बहुल  प्रयोग! पात्रक परिस्थितिक अनुसार जॅं ई भाषा राखब उचित छल त� ओतय शुद्धताक ध्यान राखब सेहो जरूरी! उच्च शिक्षा प्राप्त लोकक भाषामे त्रुटि साहित्यिक दृष्टिसॅं बहुत नीक नहि मानल जाइत अछि।किछु प्रसंग ध्यातव्य अछि- (- 'How are you my son what is the holiday? How many days off, spend some time with mother and father too. ' Where does father have time for me, that's why kept me in boarding school childhood.I am just coming India doesn�t want to spend along in the boarding room, this time with you. (पृ.सं.27) भावनाओं को ठेस पहुंचेगा? तारीफों की पहाड़,चिंता इंसान को खोखला कर देता है,आपके जैसा हिम्मत, सारा जमीन,कमजोरी मायने नहीं रखता,साक्त स्त्री) आदि कतोक एहन स्थान अछि जतय भाषा ठीक कएल जयबाक चाही। पितिऔतक स्थान पर सहोदरक प्रयोग सेहो अखरैत अछी-!बुच्चन हम तोहर सहोदरक संगे पैघ भाइ सेहो छियौ(पृ.सं.51, पंक्ति 6) कतौ कतौ भौगोलिक अस्पष्टता सेहो अछि,जेना सिंगापुर, मलेशिया आदि देशक बीच भ्रमक स्थिति (मलेशियामे रहि रहल ओकर माम घुरियो क� नहि अबैत छै।�. सिम्मीके माय-भाइ भौजाइ सभ सिंगेपुरमे  रहै अछि पृ.सं.45) ई सभ पक्ष रखबाक एकमात्र ध्येय ई जे दोसर संस्करणमे एकर सुधार भ� सकय। मुन्नी जीकेॅं एही नव साहित्यिक बाट पर मजगूतीसॅं बढ़ल डेग लेल बहुत बहुत अभिनन्दन आ बधाई।ई निरंतर सृजनशील रहथु, शुभकामना। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.४.आशीष अनचिन्हार-मोट साहित्य आशीष अनचिन्हार (मैथिली गजल विशेषज्ञ, मैथिली वेब पत्रकारिता विशेषज्ञ, ब्लॉगर, शोधकर्ता, आलोचक, संपादक। संपर्क-8134849022) मोट साहित्य कहल जाइत छै जे दरभंगा महाराज एक समयक बाद अतेक मोटा गेल छलाह जे हुनका दैनिक काज करबामे सेहो परेशानी होइत छलनि। आ तकरा सुचारू रूपसँ चलेबाक लेल ओ विभिन्न लोक सभकेँ नौकरीपर रखलाह। हुनक दैनिक काजमे आन जे काज सभ छल से अहाँ सभ अनुमान करू मुदा एकटा काज 'वायुत्याग' सेहो छल। महाराज केर देह अतेक भारी जे हुनका 'वायुत्याग' काल असुविधा होइन आ ताहि लेल ओ दू आदमी नौकरीपर रखलाह। महाराजकेँ जखन 'वायुत्याग' केर इच्छा होइत छलनि ओ ओहि दू नौकरकेँ इशारा करैत छलखिन, ओ दूनू नौकर हुनकर टाँग उठबैत छल आ तखन महाराज 'वायुत्याग' करैत छलाह। बड़का लोक बड़का बात। लोक एकरे रईशी कहैत छै। मुदा ई रईशी छलै वा कि कष्ट? से के कहत। प्राचीन समयमे मोटेनाइकेँ धनसँ जोड़ल जाइत छलै। जे जतेक धनी से ततेक मोटाएल कारण ओकरा कोनो शारीरिक काज करहे नै पड़ैत छलै। मोट लोक लेल साधारण जनता कहै छलै 'मोटेनाइ' खाए-पीबऽ बला परिवारक निशानी छै। मने प्राचीन समाजमे 'मोटेनाइ' गर्वक बात छल। एहन नै जे प्राचीन कालमे सभ 'मोटेनाइ' 'केँ नीक मानै छलै। भने एकै आदमी हो मुदा ओ एकदम प्राचीनो कालमे जागरुक छल आ कहबी बनेलक "मोट देखि डरू नै, पातर देखि लड़ू नै"। माने प्राचीन कालक ओ एक जागरूक लोक मोटाइ केर भीतरक कमजोरीकेँ जानि लेने छलाह, ओकर ओहि कष्टकेँ जानि लेने छलाह जकरा मोट लोक सभ अपन धनसँ झाँपि लेबाक लेल बाध्य छलाह।  मुदा जेना-जेना समाज बदललै 'मोटेनाइ'केँ रोग-बेमारी मानल जाए लागल। जनता जागरूक भेल। मोट लोक सभ पातर हेबाक लेल जिम-कसरत केर सहारा लेबऽ लागल। भोरमे भ्रमण करबऽ बला संख्या बढ़ि गेल। भोजनपर कंट्रोल होबऽ लागल। मने जागरुकता एलै। ओना जागरुकताक क्रममे ईहो देखल गेल जे किछु लोक अति जागरुकताक उत्साहमे 'जीरो फीगर' लेल व्याकुल भऽ जाइत छथि जकर परिणाम खरापे होइत छै। से समाजक आन वर्ग जतेक जागरुक भेल हो मुदा मैथिली साहित्यिक वर्गक अधिकांश लोक कनियों जागरुक नहि भेल अछि। एहि साहित्यिक समाजमे एखनो पोथी वा कि पत्रिकाक मोटाइ लऽ कऽ भ्रम अछि। जाहि पोथी, संपादित पोथी वा पत्रिकाक लेखक-संपादक जतेक स्थूल बुद्धिक हेताक से पोथी-पत्रिका ओतबे मोट हेबाक संभावना बढ़ि जाइत छै। आ ओ लेखक-संपादक अपन समाजमे ओहि मोटाइकेँ देखा कऽ नितराइत रहैत छथि, ओकरे सर्वोपरि मानि साहित्यिक समाजमे अपन भीतरी कमजोरीकेँ नुकबैत रहैत छथि। मुदा मैथिली साहित्यिक वर्गमे कहियो कियो एकै आदमी सही जागरूक रहले हेताह, तँइ ओ कहबी बना कऽ चलि गेलाह "भुसकौल विद्यार्थीक गत्ता मोट"। माने ओ एक साहित्यिक लोक 'मोट-मोट पोथी-पत्रिका'क भीतरिया कमजोरी अकानि लेने छलाह जकरा नुकाबऽ लेल भुसकौल लेखक-संपादक अपन पद-प्रतिष्ठा, संबंध आदिक सहारा लेने घुमैत छथि। हुनका बुझा गेल छलनि जे मोट-मोट पोथी-पत्रिका मात्र गर्वक विषय छै एहिसँ समाजक कल्याण नहि भऽ सकैत अछि। जाहि पत्रिकामे संपादक मंडलमे जतेक नाम भेटत तही अनुपातमे ओहि पत्रिकाक वैचारिक स्थूलता बढ़ैत चलि जाइत छै। मोट पोथीमे कोनो नव विचार कदाचिते भेटत। अभिनंदन ग्रंथमे सेहो संपादकक संख्या बढ़ि जाइत छै आ ताही संगे ओहिमे वैचारिक स्थूलता सेहो। जेना धनी लोक अपन मोटापा नुकाबऽ लेल ढिल्ला अंगा-पैंट धारण करऽ लगैए तेनाहिते बेसी संपादक बला अभिनंदन ग्रंथक ऊपर "आलोचनात्मक', वा एहिसँ मिलैत-जुलैत भाव बला शब्द युग्म लीखऽ लागैत छथि। इम्हर किछु लेखक-संपादक एकै विषय, एकै आदमीपर ओतबो पन्ना सभकेँ खंड-खंडमे बाँटि दै छथि जे एक पोथीमे आबि सकै छै। जे पोथी जतेक खंडमे प्रकाशित हएत ओकरा एवं ओहिसँ संबंधित लेखक-संपादककेँ बुझाए लागैत छनि जे हम बहुत महान। मुदा पाठक जखन ओहि पोथी सभकेँ लऽ पढ़बाक प्रयास करैत छै तँ कोनो नव बात नहि भेटैत छैक जाहिसँ ओ सीखि सकए, कोनो नव खिड़की नहि खुजैत छै जाहिसँ ओ नव दृश्य देखि सकए, कोनो नव चमत्कार नहि भेटैत छै जकरा अकानि ओ आनंदित हुअए। एकै विषय, एकै आदमीपर खंड-खंडमे बाँटल पोथी "खंडित प्रतिमा" सन बनि कऽ रहि जाइत छै। कोनो कालखंडमे कदाचित् एकटा छह-फिट्टा पोथी-पत्रिका देखाइ पड़ि जाइत छै जकर देहपर मोटापा शोभै छै आ ओकर मानसिक स्वास्थ्यक प्रतीक सेहो बनि जाइत छै, मुदा स्थूल-बुद्धि साहित्यसँ भरल समाजमे ओहन छह-फिट्टाक आयु होइते छै कतेक? जेना मोट आदमीक देह दूरेसँ देखाइ पड़ि जाइत छै तेनाहिते मोट साहित्य केर एहन प्रचार-प्रसार होइत छै जे स्वस्थ साहित्य ओझल भऽ जाइत छै। दोसर शब्दमे मोट साहित्यक विकराल देहक पाछूमे स्वस्थ साहित्य बिला जाइत छै। विडंबना जे ई साहित्यिक वर्गमेसँ बहुतो लोक एखनो धरि जागरुक नहि भेलाह अछि। साहित्यिक व्यायाम करबाक आदति एखनो धरि नहि लगेलाह अछि। एकर परिणाम ई भेल जे समाजक आन वर्गसँ साहित्यिक समाजक दूरी बढ़ि गेलै। साहित्यिक समाज मात्र अपनेमे समेटा गेल, आन वर्गसँ कोनो मतलब नहि। तँइ समाजक आन वर्ग साहित्यिक बातसँ कोनो सरोकार नहि रखने अछि आ ने अपन बाल-बच्चाकेँ सरोकार राखऽ दैत छै। किछु दिनक बाद देखबै जे एहि साहित्यिक समाजमे मात्र स्थूल बुद्धिए बलाक सखा-संतति सभ एतै आ ओकरे वृद्धि हरेक युगमे होइत रहतै। स्वस्थ आ फिट साहित्यिक बुद्धि बला लोक आन क्षेत्रमे अपन महत्व कायम करत। हँ, एक-दू लोक जागरुक भेल छथि मुदा स्थूल बुद्धि साहित्यिक समाजमे ओहि कतिपय जागरुकपर एहन दबाव बनि जाइत छै जे ओ जागरुक सभ 'पलिटिक्ली करेक्ट' बनि जाइत छथि आ अंततः हुनको साहित्य जनताक नजरिमे कूड़े साबित होइत छै। ओना अंतिम कालमे मोट लोक आ स्थूल साहित्य केर "गति" एकै होइत छै। मोट लोकक मरलाक बाद ओकर अर्थी उठेबा लेल बहुत लोक तैयार नहि होइत छनि। परिवारो मजबूरिएमे उठाबैत छनि। उठेलाक बाद संस्कारक समयसँ लऽ बादक समय धरि सभहक बीच ओतबे चर्चा जे धुर अते कहीं मोट लोक हुअए। सदिखन ओकर मोटाइ केर खिधांश। मोट लोकक संस्कारमे समय सेहो लगैत छै, ताहू डरे लोक संस्कारमे जाइयो नहि चाहैत छथि। तेनाहितो मोट साहित्य जखन पाठकक हाथमे जाइ छै तखन पाठक सोचमे पड़ि जाइत छथि जे केखन पढ़ब? कोना पढ़ब, कहिया धरि पढ़ब? आ अही सोच विचारमे पाठक उक्त पोथीकेँ पढ़ि नहि पाबै छथि। अधिकांश पाठक स्थूल साहित्य केर स्थूल दाम देखिए भागि जाइत छथि। किछु आप्त लोक मजबूरीमे ओहि मोट स्थूल साहित्यपर अपन टिप्पणी बेमनसँ दऽ दैत छथि मात्र संबंध बचेबाक लेल। से स्थूल लोक होथि कि जीरो फीगर। स्थूल साहित्य हो वा कि 'पलिटिक्ली करेक्ट' साहित्य ई सभ कुपोषित श्रेणीमे अछि। स्थूल लोक लेल कसरत, स्थूल साहित्य लेल अध्य्यन अनिवार्य पौष्टिक तत्व छै। ने लोक कसरत करैए आ ने अध्य्यन। आब एकरा गति कही वा कि दुर्गति से समय बताएत। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.५.लालदेव कामत- चन्द्रहास : पोथी चर्चा लालदेव कामत चन्द्रहास : पोथी चर्चा मैथिली क्षेत्रमे वयोवृद्ध प्राध्यापक प्रो० अमरनाथ झा'क अद्वितीय योगदान भेल रहनि। ओ प्रतिष्ठित सी एम् कालेज - दरिभंगा,आर के कालेज - मधुबनी आ एम एल एस कालेज अपन गाम सरिसब पाहीमे अध्यापन काज कयलन्हि। हुनक रचना आर्यावर्त, वैदेही, मिथिला - मिहिर आदि पत्र-पत्रिकामे समय समय पर प्रकाशित होईत रहलनि। शास्त्रीय निवन्धक अतिरिक्त आकाशवाणी - दरिभंगा सँ वार्ता सेहो प्रसारित भेल रहनि। जखन आचार्य रमानाथ झा : उपलब्धि ओ प्रभाव " सारस्वत सरमे हे मराल" नामक पोथी प्रकाशित भेलनि तँ एहू पुस्तिका'क (चन्द्रहास) प्रकाशनक उत्सुकता जागलैन। से साहित्यिकि - सरिसब- पाही सँ दरसन् २००३ मेँ ३९ पृष्ठ'क लघु पोथी प्रकाशित भेल छलनि। एहिक दाम पन्दरह टाका छैक। हिन्दू धर्म - सम्प्रदाय केर चर्चित कथा प्रसंग चन्द्रहास मूल- दी स्टोरी आफ चन्द्रहास, लेखक- राई बहादुर ए सी मुखर्जी केर मैथिली अनुवाद अमरनाथ बाबू कबल पूर्वहि कयने रहथि। धरि ओ ताहिक प्रकाशन लेल एक सप्ताहिक पत्रिकामे पठौने छलाह ,मुदा कोनू कारणेँ समय पर नहिं छपि सकलैन ताहि बातक मोन मे कचोट रहनि। जहन ' सारस्वत सर मे हे मराल ' पाठक समक्ष आनलथि तँ एहूक लेल तैयार भेलाह, जे खूब विद्यार्थी लोकनिक बीच सराहल गेल य। संक्षेपणत: कथावस्तुमे दू अन्त:कथा भक्त प्रहलाद आ आस्तिकता सँ भरल ध्रूवके संदर्भत: सेहो आयल छैक। मुख्य पुरूष पात्रमे पाँच वर्षीय चन्द्रहास' केर चरित - चित्रण जानि पाठककेँ नैतिकवान आ धार्मिक बनयमे सहज सहायक होईछ। एक समय नगर कीर्तन करैत नेना दलके मुखिया चन्द्रहासक मीठ कंठ सँ बहराएल भगवत भजन सुनि सब केओ हरखित होईछ। बालक चन्द्रहास विपत्तिक झमारल मुदा बामा पैरमे छ: औंगरिक भाग-कपार तँ संगे रहैक। गाड़ामे पहिरने सीकरी ,ताहिमे गोल छोट पाथर लाल टूहटूह वस्त्रमे द्युतिमान खंड जे ओकर रक्षा कवच रहैक। कन्तल'क राजधानीके गली- कुचिमे अपन बाल टीमके संग भगवत भजन गबैत नगर कीर्तनमे रमल देखि नर- नारी लोकनिक ध्यान स्वत: अपना दिश खिंचैक । से राजाक मुख्य पुरहीत गालबजी ओहि वालकके ललाट पर एक तेज देखते मातर ई जनतब राजदरबारमे देने रहैक। ओ इहो आग्रह राजा सँ करने रहथिन अपने अपुत्र छी,से नै तँ एहि बालकके अपना ओहिठाम राखि पालन करी आ जहन पैघ भऽ जाए तँ अपना पुत्रीक वियाह कय एकरा युवराज बनाओल जाए। राजा सेहो बालकके भजन सुनि आनन्दित होई छथि। गालीब पंडित जी सँ पुछै छथिन अपने एकर पूर्ण परिचय केर पता लगाकय आऊ। राजदरबारमे बालक केर दाय-माय सँ पुछारि कयल गेल तँ ओ बतबैत छथिन , हम ऐ राजकुमार केँ केरल राज्य सँ एतय आनि अहींक राजपाटमे रहि गुजर काटैत छी। ऐ बच्चाक जन्मदात्री माय अपन पतिकेँ आक्रमणकारी हाथे मारल जाएब सँ त्रस्त अपने सती बनै सँ पूर्व ई बालक हमरा सुमझा देलनि। हम खबाशनी आईधरि नेनाकेँ दुष्ट ओ दानव सँ सुरक्षित राखने छी। से ओ हिचुँकि कनैत कल्पैत कहलकैन हमर बालक कतय राजाजीक बचिया संग क्रिड़ा करैत य,से देखाऊ। बच्चाकेँ दुष्ट मंत्री धृत तँ अपना ओहिठाम भजन सुनैक नामे ल' गेल रहैक। कतेको सिपाही खोजी करय ताकुतमे लागि जाईछ। एम्हर धूर्त धृत मंत्री अपन पुत्र सँ राजा बेटीक वालिग भेलासन्ता वियाह कराय सब धनक मालिक बनैक लिलसा मोनमे सदा पोसने रहैत बेटा मदनकेँ राजतिलक चाहैत रहैत य। परंच गालब पंडितके विचार सँ हृदयमे चोट पहुंचैत देखि ओहि गायक बालकके दू जलाद हाथे अकाबोन जंगलमे मृत्यु दण्ड भोगय पठाबैक दृष्टांत अछि। ऐ बेर दूनू जल्लाद जीवनदान दैत भक्तिभावमे रहबाक ओहि बालककेँ वचन दैत ओकर सहमति सँ वमापैरके औंठा काटि अनैत छैक आ मंत्रीकें दैत बकशिस धन पबैत अछि। ओ वालक अरण्यमे रहि एक गाछक खोधरिमे भगवत भजन निमग्न गाबि रहल रहैत छैक,से वनरक्षक कुलिन्द जे नि:संतान रहैछ ओ अकानैत भजनके आवाज दिश अबैत छैक। ऐ वालक सँ चिन्हा - परिचय करैत अपना ओहिठाम आनि पोषपुत बना दूनू प्राणी भगवत भजन सुनैत आनन्दित रहैछ। से एक दिन १२ वरखक वाद धृत जंगल कर' ओसुलै लेल कुलिन्द ओतय अबैत छैक आ एहि किशोर बालकके देखि तजबीज करैत अचरजमे पड़ैत य। वामापैरके औंठा कटल चेन्हासी देखैक संग अशंका निर्मूल नहिं रहै,से मोनमे सोचल जे ओ दूनू जल्लाद ठकपनी केलक। आब ओ एक बहाना बनाय जंगल रक्षक केँ कहलक अहाँ बहुत धन सोना संग्रह कय लेने छी। हमरा ओहिठाम ऐ बालककेँ घोड़ा सबारी सँ एक चिठ्ठी पहुंचाय देबै कहियौन। ओहि बालकके नामकरण पाल्यपिता - माता धरि चन्द्रहास रखने रहय,तकरा पत्र पहुँचेबाक आदेश दैत छथि। मुहरबंद पत्रमे ओ विष देबाले पुत्रकेँ निर्देशित कयने रहैक। दोसर बेर केर ऐ महासंकट सँ चन्द्रहास बचैत छैक । एक अति रूपवती मंत्री बेटीक परियास सँ,जे फूलवारीमे अपन सखि सभके संग पहिलूक सांझ सँ पहिने कमल फूल आनय गेल छलीह। अपरप छँटा एक नवजुवक केँ बान्हल घोड़ाके बगल गाछतर सुतल देख आ ऐ सुदर्शन युवक केँ मुखाकृतिक आभाकेँ बेर- बेर निंहारैक।देखते आयल मुरेठामे एक कागत खोंसल। से ओ चोरी सँ नीक जहांति पत्र लैत पढ़ल तँ अपन पिताक लिखल जहर - माहूर (विष) देबा ले मदनके आदेश छलैक से जानि मोहमे पड़ल । ओ दयाभावे ओहि अति रूपवान परदेशीके जान बचेबाक उद्देश्य सँ अपना कपड़ाके पीन सँ तरहथीमे भेंस शोणित बहार कय विष शव्दक आगू सटाकय एक अक्षर 'या' लिख देलीह। ओहि पत्रकेँ ओहिना फेर मुरेठामे खोंसि देलनि आ ओतय सँ चुपे ससरि गेलीह । संग आयल सखी लोकनि सं घर घुमि चलै लेल कहैत सब केओ झील लग सँ झटकारिकेँ आंगन पहुँच जाई गेलीह। जहन चन्द्रहासकेँ जगबैत ओकर दू समांग ओतय आबि कहलकैन अराम अपने खूब केलहुँ , चलू मदनजीक ओहिठाम आब अन्हार भ' जायत! कथा रोचक अछि, ई समीक्षा विधाके लिक सँ हंटिके लेखन कय रहलहुँ अछि। पाठककेँ इहो बताबैत छी- जे गबैया राधेश्याम तर्ज वा आन दोसरो पोथीक सहारे विषय कीर्तन करैत होथि,जेना स्व० रास बिहारी दासजीक मुहेँ हम सुनने रही - जे विषया नामक मंत्रीके बेटी अपन आँखिक काजैर सँ केशक मिहिंकी किलिफ सँ 'या' वर्ण विष के आगू लिखने छलीह। मंत्री'क लिखल अक्षर आ मोइस सँ मिलैत "या" अक्षर अवश्ये जोड़ल गेल हेतैक विषया द्वारा। मदन जी चन्द्रहास हाथे पत्र पाबि शुद्ध - शुद्ध पढैत पिताके आज्ञा पालनमे उद्यत होई छैक। आंगनक स्त्रीगणमे विषयाक वियाह मादे परिवेशमे वातावरण देखि स्वंय चन्द्रहासोक मोनमे कोतुहल सन होय। परिणय सुत्रमे प्रातेभने चन्द्रहास मदनके बहिन सँ बन्हा गेला ओहि रहस्यके नवोदित दुल्हिन बताबैत अपन दुल्हा सँ पिताके षड्यंत्र पर हरसमैत धियान रखबाक सहचेती करैत दाम्पत्य जीवनक आरम्भ केलीह हेन। गालीब जी राजा लग ओहि चन्द्रहास मादे संवाद करैत मदन सहित हुनका राजदरबारमे भोजन पर निमंत्रित करैत छैक। ओहिठाम रनिबास सँ आदर पाबि धायमाय सेहो चन्द्रहासक आदर करैत पबैत अछि। ता घरमुहांन मंत्री, बेटीक वियाह सुनि अचंभित रहैछ आ मदन सँ पत्रके पुछारि कय विष देबाक बदला विषया देवाले प्रसंग बावत तेसर खेप पुनः जान सँ जमायकेँ मरेबाक योजना बना लैत य। से सहटिकेँ चन्द्रहास लग जाए मंत्री कहैत छैक- अपने दोहरी साँझके देवी मंडील असगरे जाय निवेदित करब ,ई अहांक मंगल कामना लेल आवश्यक छैक। ओ गुप्त रूपेँ मंडीलमे बलि लैक धरगर खंडा ल'के' प्रवीण चंडाल केँ घटना करय पहिले आगन्तुक'क धर सँ शिर अलग करैक आदेश द' देने रहैक। से मदन कनेकबे कालमे पाहुनकेँ राजालग ल' जेबाक काज करैत अछि। राजाज्ञा अनुसारे ओ पुगि गेला आ देरी भेलान्तर मदनजीकें बुझा देने रहथिन,से देवी मंदिर ओ समय सं चलि जेताह। होनी जे हेबाक रहय से मदनके हत्या भ'कऽ रहल। ओ जहन अपन जमायके जीवीत देखल तँ बताह जेकाँ मंदिर दिश पराइत छैक।अपन बेटाकेँ मृत देखि अपनों प्राण त्यागि लेलक। ई सूचना संचार दहोदिश पसरलैक। एम्हर राजा चन्द्रहास केँ अपना राज्यक अभिषेक करैत केरल राज्य सँ फिरंगी केँ सेहो जाकय भगेलक। आब तँ दूं राज्यक राजा बनल रहलाह चन्द्रहास जी। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.६.लालदेव कामत- पौराणिक बालकथा- मौसरी धुपाधुप लालदेव कामत पौराणिक बालकथा- मौसरी धुपाधुप हेमन्त रितुके सुआगतार्थ सब जोन अपना गिरहथके अरहेला पर भीठा बाध काज करय गेल रहैक। जोनमे सोझमतिये जेकाँ सब केओ अपना - अपना पाहि पर लागल धान फसिल हाँसु सँ काटय। दुपहरमे पूभर सँ कनुनियां बुढ़िया मुरही आ लाय बेचय आ सँगमे ओकर बेटा कलरा पान सुपारी डोलमे लेने खेत लग जुमैत छैक। चाल पारैत सोझमतिया सबसँ पहिले एक पाजा धानक शीस कतरिकेँ आदहा आरि पर मीर लेलक आ दू आहूल ओकरा दैत मीठा पान सब खेलक आ लाय - मुरही जेथगरकेँ बेसाहि लेलक। सब जन अपना - अपना धियापुता लऽ अगहनी सनेश बाध सँ गामपर मुन्हारि साँझधरि आनत गिरहत सँ नुकाके। ओनय सोमना, मंगला , बुधना, सुकना आ रविया केर बाऊ बैंगहा पर धानक' बोझ उगहय आ छोपय बाध विदाह होय सँ पहिनहि मालजाल फोलि बहटाबैत अपना - अपना छौंड़ाके चरवाही करय चहटी पर जंगल पठौलक। वृहस्पतिया आ शनियां जे बपटुअर छौरी रहय से ओकरो दूनू गोटेयके माय भगली आ सोझमतिया अपन गाए बाछी खोलि चराबय लेल गैवार सभक जेड़मे संग धरा देलीह। चहटी पर पहिले सँ ओतय अपन महिंस चराबैत मोहमुदबा रहय, बाल बेदरा सँ ओ चेष्टगर छलैक। चहटी पर माल - मवेशी केँ कनौ रोमबाक झंझटि नहिं रहैय। तेँ समय खेपय सातो चरवाह खेल - धुपमे लागि गेल। मनलगू 'बान्हक सुईया ताकू' म रमि जाइ गेल। ऐ खेलमे एक गोटाके विपरीत दिशामे घुमिके ठाढ़ हुअ पड़ैत छैक। जहन सब लोक महराए गबैत आ मूलगैन दू गिरहके कटकी'क सुइया बना , सबा हाथके माटिक बान्हमे भेँसके झाँपि दै तँ ओहि सूईया केँ खोजी करय ओकरा कहल जाय। जे नहिं ताकि सकै तँ ओकरा गाल फुलाकेँ हौफ बनल रहय पड़ैक। एहि खेलमे जहन दण्ड भोगैत शनियां ठाढ़े छलै तँ सब कियो " हे रौ झम्मा ,हेरौ झम्मा - तहूँ जे छिए बलेसरा " धुन गबैत वृहस्पतिया केर नाम पुकारैक सुईया घोंसियबै ले,तँ एतबेमे दूर्भावनावश रंगमे भंग भऽ गेलैक ! अजरा जबर्दस्ती मियां टोलक मोहमुद बाधा उपस्थित केलक। शनियां केर फुलल दूनू गाल पर मौसरी धुपाधुप करैत हलुक सँ करैत ओकर दूनू गाल मीर लाल क' देलकैक। शनिया किकिया उठल आ कनैत गाम पर पराएल चलि आयल। शनियांक माय बोझ उघि कऽ घर अयलीह तँ अपना दस बरखक धियाकेँ कननमुँह भेल बैसल कोनटे सँ देखलीह। जा ओ पुछारि करिते रहय ,आकि वृहस्पतिया दूनू मायधी ओकरा ओहिठाम झटकारि केँ आबि सब खेरहा प्रमाणिक रूपेँ कहय लगलैक। हे यै! हमरा सँ सब छोटे सँगी- साथी सब चहटी पर मिल बैठकेँ खेलाईत रहिऐ। जहन अहाँक शनियांक बारी चोर बनैक अयलैक तँ ओ बान्ह पर दूनू हाथक गहुआ सँ सुईया नहिं झांपि सकलै। तेँ गाल फुलाकय अस्थिर रहक छलैक बेशी कालधरि। हमरा सभ लग सहटि मोहमुद कका आबि खेल देखैत रहय; ओ अहाँक बेटीके गाल दूनू हाथे धुपसिन हलुक थापर चला, लगलैक गाल मिरकेँ लाल करय। से बड़ी जोर सँ शानियां दैया किकिया उठल छलैक। आ तेँ मौसरी धुपाधुप खेल उसरि गेल छलैक। आब झट दऽ चारू गोटय महमुदबा ओतय जाकय ओकरा अम्मी आओर बब्बाके उलहन दैत भगली सब करतुत बुझेलकैन। फुसराहटि सुनि आँगन सँ डेढ़िया पर महमुद केर बीबी कारिया बुरकामे समक्ष अयलीह आ अपना सौहरकेँ हटैत कहलखिन शनियां बुच्ची ढेड़बा सँ सियान भेल जा रहल छैक। से देखैत तों छौड़ी सबके संगहत बाला खेलमे कियेक शागिर्द भेलह! हियाँ पर कान पकड़ि घटी मानह, नहिं तँ हिन्नू टोलमे ऐ परिघटना मादे आइये बड़का शोर मचि जेतह।अनघोल होइतहिं शनियांक समांग सबुटा जुटि जेतह, हल्ला बोल उठि जेतह। तबे महिरम बुझबहक ' मसुरी धुपा धूप' केर! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.७.प्रमोद झा ' गोकुल'- परोसिन प्रमोद झा ' गोकुल' परोसिन

ओह!एतेक पैघ गलती आखिर हम क' कोना गेलियै आ सेहो बेर बेर एक्के तरहक? मतलब साफ छै जे कोनो तरहक अधलाह बात के मनक मैदान पर कबड्डी नै खेलाय दियै,जँ बेर बेर एक्केटा बात के मोन घोखतै ते ओ नीको लोक के अपराधी अपराधी बनाइये देतै ।सएह त' भेलै राम बरन के ! ओकरा सनक नीक लोक कोना आइ अनहार घर मे एकदम सकदम भेल बेचारा बनल बैसल छै ।मुसो खरबड़ाइ छै ते चारू भाग भाग चौंकि के ताकय लगैत अछि कहुँ परोसिनक घर बला लाठी सोटा सं ने आबि रहल हो ।तखन की कहतै लोक आ समाज? ऐ उमेर मे डेग हूसब कहुँ नीक बात छियै !भैर घर जकरा नैत पोता रहतै तकर एहन किरदानी ।छिः छिः ���मोन घिना उठलै राम बरनक । आँखि मिचौवलि ओना छौ महिना सँ भय रहल छलै परोसिनक संग मुदा एतेक दूर धरि बात पहुँच जेतै से नै बुझैत छल ,हँ एतवा धैर अवस्स जे परोसिनक छवि ओकर मन मे तेना के ने रसि बसि गेल छलै जे चाहियोके नै निकालि पौलक मन से ओकरा ।नयन मटक्की चलैत चलैत एक दिन दहीक जोड़न लै ले परोसिन ओकर आङन एलै आ ककरो नै देखि जोर सँ हाक मारलकै- काकी छथीन कतौ यै���!!!एतबा सुनिते राम बरन धरफरा के घर से बाहर निकलल ।परोसिन के आङन मे ठाढ़ि देखि धखमखैत बाजल- कोनो काम छैन! ओते धीया पुता जड़े कतौ गेलैहे ।परोसिन फुसफुसाके बाजलि- तखन जाइ छी! -एह!एहनो कतौ भेलैये ,बाजथुने कोन काम छैन ? -दही पौड़ैले जोड़नक काम छलैहे ! -बस्स एतबे! आबौथ ने घर, जोड़नक सं हिनको जुड़ा दै छियैन! -गै माय!बुढ़बा ते सनैक गेलैहे!दुलकी खिलखिलाहैट मे बाजलि परोसिन । -हिनकर रूपे तेहने छैन जे मुइलो लोक सनैक जेतै आ हम ते�����आबौथ, जे हेतै से हेतै ।फेनो ई मौका भेटतैन कि नै।एतबा कहैत राम बरन परोसिन के अपन बाँहि मे जकैर लेलक आ फेर ओकर बाद �����अस्तम व्यस्त भेल दुनू एमहर ओमहर तकैत बाहर निकलल ।जेब सँ पच सौवा नोट परोसिनक हाथ मे थम्हबैत बाजल- जाथु जल्दी से ई !बेस, फेनो ई जहन इसारा करता तहन आबि जेबैन ! -ठीक छै, मुदा ई जाथु एखन जल्दी से ! -अच्छे जाइ छियैन !बिकट हँसी हँसैत परोसिन रामबरनक आंगन सँ बाहर भय गेलि । परोसिन ते चल गेलै मुदा राम बरनक सगर देह मे पछताबाक जे आगि लगलै से बाल्टीक बाल्टी पानियों ढारलाक बाद नै मिझेलै ।भरल पूरल घर बला कहूँ एहन करम करय! नै आब किन्नौ नै हम एहन कुकरम करब आ ने एहन कुविचार कहियो मोन मे आबय देब ।ककरो भनक लैग जेतै ते की कहत हमरा ?मूहों देखबै जोकरक नै रहब! ।।।----------।।।

- प्रमोद झा ' गोकुल'; दीप, मधुवनी (विहार); फोन-9871779851 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.८.परमानन्द लाल कर्ण- स्वावलम्बन परमानन्द लाल कर्ण                                                          स्वावलम्बन मोहल्ला मे चमकैत  मकान इंगित कऽ रहल अछि जे ई कोनो नीक काम करऽ वाला लोकनिकक घर अछि ।जे केओ ओहि रास्ता सँ गुजरैत छलाह । हुनक ध्यान मकान आकर्षित कऽ लैत छल । मकान एक मास्टर साहवक  छल जिनका दरमाहाक  अलावा नीक कोचिंग सेंटर सँ आमदनी आवैत  छल । शहरक नीक मास्टर मे हुनकर गिनती छलनि । हुनकर नाम छल ईश्वरचंद । ईश्वरचंदक पिताजी रेलवे मे काम करैत छलाह । सेवानिवृत्तक  सव पाई ओ एहि मकान मे लगा देने छलखिन ।ईश्वरचंद मकान के नीक सँ ख्याल राखैत छलाह । मकानक मरम्मत आ रंग रोगन मे कखनहु समझौता नहि करैत छलाह । ईश्वरचंदक  शादी प्रमिला सँ भेल छल । हुनका एकटा लड़का छलनि,  जेकर नाम रवि छल । रविक देखभाल प्रमिला करैत छलखिन । रविक  होमवर्क करेनाई, खाना  बनेनाई आ  घरक दोसर  काम मे भरि दिन लागल रहैत छलीह । एतेक कि स्कूल मे जखन अविभावकक मीटिंग राखल जायत छल ताहु मे प्रमिला जायत छलीह । रविक पढ़ाई  लिखाई भऽ गेला पर नीक नौकरी मिल गेलनि ।प्रमिलाक घर आनंद सँ भरल छल । तकर वाद रविक विआह  नीक घर मे तय केलीह । पुतोहु पढ़ल लिखल छलीह । प्रमिला सोचलथि जे नीक घरक बेटी आओत तहन हमर घर एहिना खुशहाल रहत । पड़ोसी सव सेहो जे देखैत छलखिन से प्रमिला सँ कहैत छलखिन जे अहाँक पुतोहु बड्ड सुन्नर छथि । प्रमिला सेहो गर्व सँ कहैत छलीह जे हमर पुतोहु खरा सोना अछि । एक तऽ मोहल्ला मे ओ सबसँ बेसी पढ़ल लिखल रहवे करथिन दोसर देखवा मे सेहो परी सन छलखिन । विआहक  वाद पुतोहुक खूव मान-दान कऽ रहल छलीह । विवाहक  वाद रविक नौकरी मे सेहो तरक्की भऽ गेल छल । एहि सँ प्रमिला कहैत छलखिन जे हमरा घर में कनियाक एला सँ सरस्वती आ लक्ष्मी दुनुक आगमन भऽ गेल अछि । दोसर दिस रविक दरमाहा सेहो वढ़ि गेलनि । किछु दिनक बाद रविक जौंआ बच्चा भेलनि । जाहि मे एकटा बौआ छल तऽ दोसर बुच्ची छलीह । बौआक नाम पंकज राखलथि आ बुच्चीक नाम पंखुरी । जौंआ बच्चाक पलनाई रविक  लेल एक समस्या भऽ गेल । प्रमिला कहलखिन अहाँ सव हमरा अच्छैत कोनो चिंता नहि करु । भगवान जे करैत छथिन  से नीक करैत छथिन । दूनु बच्चाक देखभाल प्रमिला नीक सँ करैत छलखिन । पंकज आ पंखुरी  पैघ भऽ स्कूल जाय लागल । पोता -पोती सँ हुनका ततेक प्रेम छलनि जे  जखन हुनकर स्कूलक छुट्टी होयत छल तखन ओ मकानक गेट पकड़ि ठाढ़ भऽ जायत छलीह आ सड़क दिस देखैत रहैत छलीह । दूनु हाथ मे चाकलेट लेने बेसब्री सँ  इंतजार करैत छलीह । एकटा आटो रिक्शा आवैत देखथिन तऽ प्रमिला गेट सँ बाहर आवि  सोचैत छलीह जे  हुनकर पोता-पोती एहि आटो रिक्शा मे अछि । मुदा लग एला पर निराश भऽ जायत छलीह । थोड़े देरक वाद जखन आटो हुनका गेट पर आवि  रुकैत  छल तहन पंकज आ पंखुरी  दादी माँ ! दादी माँ ! कहि दुनु बच्चा दौड़ि  के आवैत छल आ दादी माँक  पाइर लग ठाढ़ भऽ जायत छल । प्रमिला तुरंत हाथक चाकलेट हुनका दैत छलखिन । दादी माँक  ममता पूरा मोहल्ला मे नामी छल । तकर वाद दुनु बच्चाक बस्ता राखि खिला-पिला कऽ प्रमिला आराम करैत छलीह ।प्रमिलाक  इएह दिनचर्या छल । किछु दिनक वाद रवि नीक कालोनीक  एपार्टमेंट मे एकटा फ़्लैट खरीदलथि । माँ रवि सँ कहलखिन जे माँ आब अहुँ हमरे सवहक संग चलु । नया घर में सव आदमी एक ठाम रहव । प्रमिला सोचलखिन जे हम एहि ठाम रहि  की करव ? हमहुँ  बेटा पुतोहु लग रहव सएह नीक होयत । पूरा परिवार नीक सँ नव घर मे रहऽ लागलथि । चारु दिस खुशहाली छल मुदा ई  खुशी बेसी दिन नहि रहि सकल । अचानक समयक कूचक्र एहन भेल जे सव किछु उल्टा भऽ गेल । चान सँ पुतोहु पता नहि अचानक ज्वालामुखी मे परिणत भऽ गेलीह । दोसर दिश रविक स्वभाव सेहो बदलि गेल । छोट-छोट बात पर ओ माय कें डाँटि  दैत छलखिन । प्रमिलाक  समझ मे नहि आवैत छल जे की भऽ गेल अछि? ओ सोचैत छलीह जे घरक पैघ आदमी भेलाक कारण हम अपन अनुभव हुनका कहैत छी, मुदा बेटा पुतोहु कें ई नीक नहि लागैत छलनि । ओ दुनु चाहैत छलैथ जे माँ खाना का कऽ अपना घर मे चुपचाप बैसल रहथि । कोनो बात पर हमरा अपन राय नहि दैथि । पुतोहुक स्कूलक एकटा संगी सेहो कातक घर मे रहैत छलीह । आव ओ सव दिन संगी लग जायत छलीह ।  रवि एम्हर अपना काम पर जायत छलाह तऽ एम्हर हुनकर पुतोहु अपना संगी लग चलि जायत छलीह । एक दिन भिनसरे ओ संगीक  घर गेलीह मुदा देर राति ओ घर पर नहि एलीह , तहन रवि ओसारा मे ठाढ़ भऽ हुनकर रास्ता देखैत छलाह । लगभग ग्यारह बजे राति मे जखन ओ घर एलीह तहन प्रमिलाक  जान मे जान आयल । प्रमिला अपना पुतोहु के कहलखिन जे कनिया एतेक राति धरि घर सँ बाहर रहनाई नीक बात नहि अछि । नीक घरक लोकनि कें ई शोभा नहि दैत अछि । आजुक  दिन-दुनिया  बड्ड खराब अछि  से अहाँ जानवे करैत छी । एहि बात पर ओ घर मे बबाल कऽ देलखिन ।पुतोहु मुँह फूला कऽ घर चलि गेलीह आओर तऽ आओर रवि सेहो हुनका नहि समझा कऽ अपना माय पर बरसि  पड़लाह ताहि दिन सँ हुनक व्यवहार प्रमिलाक प्रति ठीक नहि  रहैत छल । रवि सदिखन अपन कनियाक पक्ष लैत छलाह । एक दिनक बात अछि जे बेटा -पुतोहु घर मे बैसि बात करैत छलाह । बात-चीतक  क्रम मे  प्रमिलाक  पुतोहु कहलखिन जे दुनु बच्चा सदिखन अपना दादी मे लागल रहैत अछि।  आव दुनु पैघ भऽ गेल अछि । पढ़ाई पर हिनका सव  कें कम ध्यान रहैत छैन आ दादी पर बेसी । तैं हमर विचार अछि जे अहाँ कोनो एहन व्यवस्था करु जे बच्चाक  पढ़ाई लिखाई ढंग सँ भऽ सके । हमर विचार अछि जे माँ के वृद्धाआश्रम मे दऽ दीओन । ओहि ठाम रहथिन आ दु -चारि बुढ-बुढ़ानुश लग अपन बातचीत करैत हुनकर दिन नीक सँ कटि जेतनि । माँ के मन सेहो लागल रहतनि । ई बात प्रमिला सुनि लेलखिन । ओ सोचलथि जे आव हमरा एहि ठाम रहनाई ठीक नहि अछि । दोसर दिन प्रमिला अपना बेटा सँ कहलखिन जे हम किछु दिन पुरनका घर मे रहऽ चाहैत छी । घर कतेक दिन सँ बंद अछि ,किछु दिन घर पर रहव तऽ घरक देखभाल नीक सँ भऽ सकत । ई  सुनि रवि दुनु प्राणी सोचलथि जे मायक  विचार नीक अछि , किएक  तऽ हम सव दिनक कीच कीच सँ छुट्टी  पा जायव । ई  हमर सव बात पर ध्यान दैत रहैत छथि कोनो काम करऽ चाहैत छी तहन ई  टोका-टोकी करैत रहैत छथि । रवि कहलखिन माँ ठीक अछि । जाहि दिन अहाँक इच्छा होय हमरा कहव हम घर पर पहुँचा देव । एहि पर प्रमिला कहलखिन जे हम आईये चलि जायत छी । रवि कहलखिन,�ठीक अछि ।� प्रमिला अपना पुरनका घर पर चलि एलीह । प्रमिला घर पर आराम सँ जीवन वसर करऽ लागलीह । प्रमिला जाहि मोहल्ला रहैत छलीह ओहि मोहल्ला मे एकटा संस्था खुलल छल । संस्था मे बुजुर्ग लोकनि आवैत छल आ अपन सुख -दु:ख एक दोसरा सँ कहैत छल । एक दिन एकटा बुजुर्ग हुनका सँ कहलखिन,�अहाँ तऽ पहिले अचार बनवैत छलहुँ । आव नहि बनवैत छी की ?� प्रमिला कहलखिन, �हाँ  ! हम तऽ अखनहु अचार अपना लेल बना के राखैत छी । अहाँ खायव तऽ हम काल्हि लेने आयव ।� ओ अचार आनि किछु लोकनि के देलखिन । दोसर दिन एकटा बुजुर्ग कहलखिन जे अहाँक तऽ नीक हुनर अछि किएक नहि एकर उपयोग करैत छी । प्रमिला सोचलथि जे हम घर पर बैसल रहैत छी , अपन आमक गाछ अछि । अखन किछु बेसी अचार बना लैत छी । अचार बना कऽ संस्था मे लऽ गेलीह । संस्थाक आओर लोकनि के अचार दैत कहलखिन जे अहाँ एहि अचार के टेस्ट करु । सव लोकनि हुनकर अचारक बड्ड प्रशंसा केलखिन । संस्था मे एकटा बुजुर्ग कहलखिन जे एना अचार अहाँ कतेक दिन बाँटव । अहाँक जे पाई लागैत अछि ओ तऽ अहाँ लऽ लिअ आ अचार हमरा सव के पाई लऽ के दिअ । एहि प्रस्ताव पर प्रमिला कहलखिन जे हम प्रयास करैत छी । आव ओ बेसी मात्रा मे बनावऽ लागलथि आ संस्था मे बेचऽ लागलथि । धीरे -धीरे जे केओ संस्था मे आवैत छलाह प्रमिलाक  अचार अवश्य खरीदैत छलाह । संस्थाक एक सदस्यक बालक जिनकर नाम बिपिन बिहारी छल , ओ अचारक कारखाना  लगेने छलाह जाहि मे कतेको मजदूर काम करैत छल । बिपिन बिहारी एक दिन प्रमिलाक अचार देखलखिन । अचारक स्वाद चखि ओ अपना बाबुजी सँ पुछलखिन जे अहाँ ई  अचार कोन ठाम खरीदलहुँ अछि । एहि अचारक स्वाद नीक अछि । ताहि पर ओ कहलखिन-बौआ हम जाहि संस्था मे सव दिन जायत छी ,ओहि मे एक सदस्य अचार बनाबैत छथिन । संस्थाक  सव सदस्य अचारक बड्ड गुणगान करैत रहैत छल । तैं हमहुँ आई ई  अचार खरीदलहुँ अछि । बिपिन बिहारी कें प्रमिला सँ मिलवाक इच्छा भेलनि । प्रमिला सँ मिल ओ अपना कारखाना मे काम करवाक लेल कहलखिन । प्रमिला कहलनि, �बौआ ! एहि उमिर मे हम कोन काम कऽ सकैत छी ।� बिपिन बिहारी कहलनि, माँ जी ! अहाँ  बैसल रहव , अचार जेना बनवैत छी तकर तरीक़ा केवल मज़दूर सँ बता देवै । कतेक सामान कखन अचार मे देल जा सएह बतावैत रहवै ।�  प्रमिला सोचलीह जे एहि ठाम बैसल रहैत छी आ ओहु ठाम बैसल रहव किएक  नहि ओहि ठाम चलि जाऊ । मन सेहो लागत आ समय नीक सँ कटि जायत । प्रमिला हुनका हाँ कहि देलखिन । दोसर दिन बिपिन बिहारीजी अपन कार प्रमिलाक घर पर भेज देलखिन । प्रमिला अपन नुआ एक बैग मे लऽ कारखाना चलि एलीह । आव कारखाना मे अचार हिनका निर्देशन मे बनऽ लागल । अचारक गुणवत्ता मे सुधार भेलाक कारण अचारक माँग बढ़ि गेल जाहि सँ अचारक उत्पादन सेहो बढ़ऽ लागल । किछु दिन मे बिपिन बिहारीक कारखानाक अचार मशहूर भऽ गेल । तकर बाद बिपिन बिहारी जी �दादी माँक  अचार� नाम सँ ब्रांड कऽ ओकर बिक्री करऽ लगलाह संगहि संग पैकेट पर प्रमिलाक फोटो अंकित कऽ देलखिन । दोसर दिस प्रमिलक  दरमाहा मे सेहो बढ़ोतरी भऽ गेल । बिपिन बिहारी जी  अचारक प्रचार  यूट्यूव पर देलखिन , जाहि मे प्रमिलाक फोटो सेहो छल । एक दिन रवि मोबाइल मे प्रमिलाक  फोटो देखलखिन तऽ ओ चौंकि गेलाह । अपना पत्नी सँ कहलखिन, � मोबाईल मे माँक फोटो देखा रहल अछि । माँ सँ बात करैत छी जे अखन ओ कोन ठाम छथिन ।� ई  कहि रवि माँ के फोन लगेलखिन । रवि कहलनि, �हेलो माँ ! गोर लगै छी ।� ओम्हर सँ आवाज़ आयल नीके रहु । रवि कहलनि ,�माँ अहाँक  फोटो मोबाईल मे  देखलहुँ अछि । कुशल मंगल सँ छी ने । एहि पर प्रमिला जबाव देलखिन हाँ बौआ  हम ठीक छी । अहाँ सव ठीक छी ने । बौआ-बुच्ची ठीक अछि ने ।� रवि कहलनि, � हाँ माँ सव किछु ठीक अछि ।� हाल-चाल जानलाक बाद फोन राखि देलखिन । प्रमिला भिनसरे तैयार भऽ कारखाना पर जायत छलीह । घर पर रसोईया टिफिन पैक कऽ दैत छलनि , दुपहरियाक  खाना कारखाना पर खायत छलीह। साँझ  के ओ घर आवैत छलीह । थाकल रहलाक कारण कतहुँ बात नहि करैत छलीह । एक दिन प्रमिलाक पुतोहुक फोन आयल । फोन पर भोकारि पारि कानऽ लगलीह । प्रमिला पूछलखिन, � कनिया की भेल ?� ओम्हर सँ जबाव आयल जे काल्हि खन मोटर साईकिल सँ अहाँक  बौआ आबैत छलाह तऽ हुनका दोसर मोटरसाईकिल वाला ठोकर मारि देलकनि । जाहि मे पाईरक हड्डी टुटि गेल अछि । ओ हॉस्पिटल मे भर्ती छथि ।� ई सुनि प्रमिलाक बड्ड दु:ख भेलनि । कारखाना मे कर्मचारी के काम समझा बुझा कऽ गाड़ी सँ हॉस्पिटल एलीह । हुनका देखि रवि आ हुनकर कनिया दुनु कानऽ लागल । ओ कहलखिन, �माय ! आव हम की करी । डाक्टर साहेब कहैत छथिन जे एहि मे कम सँ कम दुई  लाख रुपया लागत । आव तऽ समस्या ई अछि जे बच्चाक स्कूलक फीस आ घरक  खर्चा कोना चलत । आव तीन महीना कतहुँ जाय वाला नहि छी । आव की करि  से नहि बुझा रहल अछि ।� प्रमिला कहलखिन जे अहाँ सव पाईक  चिंता नहि करु । हम हॉस्पिटल मे बात कऽ लैत छी । अहाँ सव केवल अपना पर ध्यान दिअ । अखन हम एक लाख टका दैत छी जाहि मे बच्चा सवहक स्कूलक फीस आ घरक काम चलाऊ । हॉस्पिटलक खर्चा हम अदा कऽ दैत छी । ई  सुनि रवि आ हुनकर कनिया चौंकि गेलखिन । रवि कहलनि, �माँ ! अहाँ एतेक पाई कतऽ सँ आनव ? जमीन बेचव की ?� एहि पर प्रमिला कहलनि, �नहि बाऊ ! हमरा तऽ कारखाना सँ ततेक पाई मिलैत अछि जे हम खर्चा नहि कऽ सकैत छी । बैंक मे पाई अछि, घर पर एतवे पाई छल जे लऽ के हम एलहुँ अछि ।अहाँ कोनो बातक  चिंता नहि करु ।� किछु दिनक बाद जखन रवि ठीक भऽ गेलाह तऽ माँ सँ कहलनि, �माँ ! आव अहाँ घर पर रहु ।� प्रमिला साफ मना करैत कहलनि जे नहि बौआ हम एहि ठाम ठीक छी । जखन धरि हाथ पाईर चलैत अछि । हमरा कोनो सहारा नहि चाही । ई कहि प्रमिला अपना घर पर हँसी-खुशी जीवन यापन करऽ लगलीह । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.९.प्रणव कुमार झा - दवाई दारू (लघु कथा) प्रणव कुमार झा दवाई - दारू (लघु कथा) भार्यावर्त नामक गाम मे सुधाकाल चलि रहल छल। राजा शेर सिंह लोदी के राज मे समाजक जिनगी मदमस्ती आ बेहाली दुनु के कॉकटेल सन बनल छल। एहि गाम के पुबारि टोल मे एक भोरे हर्बीर्रो उठल। राति दर्जन भरि लोक एकबैगे मरणासन्न भऽ गेल। किछू लदा-फदा कऽ जिला अस्पताल लऽ जाओल गेल किछु जा � जा लदेता ता तक लहाश मे परिवर्तित भऽ गामक चौबटिया पर शव रूप मे एकत्रित कयल गेल। परिवार आ शुभचिंतक मे कन्नारोहट पसरल छल। किछु मजगुत हृदय बला शुभचिंतक अंतिम संस्कार से लऽ कऽ मुआवजा तक के जुगत मे लागल छलाह। समाचारक माध्यम से उतरवरिया टोल मे जा बसल मनोहर सेहो ऐ खबर के बुझलक जे पुबारि टोल के फलाँ गली मे दर्जन भरि से बेसिए लोक जहरीला दारू पिबाक चलते मारल गेल। ओकरा मोन मे प्रश्न उठल � �मुदा पुबारि टोल मे तऽ दारू बैन छैक!!� खैर! मामला राजनैतिक रंग धेलक। किछु लोक सब कहय जाय गेलई जे जखन दारू बैन छैक तऽ जहरीला दारू लोक तक कोना पहुंचल? टोलक मुखिया के एकर ज़िम्मेदारी लेबाक चाहि आ पीड़ित के मुआवजा आ दोषी के पता लगा के सजा देबाक चाही। ओना तऽ मुखिया � सरकार सब सभ किछु मैनेज कऽ लैत छल मुदा लोकक प्रेशर मे आबि मुखिया के सफाई देबय पडल। मीडिया कैमरा लऽ पहुँचल तँ मुखिया जी अपन गमछा सँ पसीना पोछैत कहलनि - �देखू, हमर नीति स्पष्ट अछि। हम दारू बैन केने छी लोकक भलाई लेल। मुदा जहरीला दारू जे चोरा-नुका कऽ पीबि रहल अछि, से अपन दुर्भाग्यक जिम्मेवार स्वयं अछि।दारू पीबत तऽ मरबे ने करत यौ। हम तऽ लोकक भलाई लेल दारू बैन केने छी मुदा चोरा के जे पीलक से त अपने ने अपन दुर्भाग्य के जिम्मेदार भेल! ऐ मे हम की कय सकय  छी? अस्तु मुखिया जी के ऐ बात के बुद्धिजीवी वर्ग एम्प्लीफाई कऽ के जस्टिफ़ाई कऽ देलखिन। आब ऐ तरहक घटना नॉर्मल होबऽ लागल। लोक सुनय, आ मरय बला के अभागल कहि बात ऐल-गेल भऽ जाय। एहि बीच एकदिन गामक मधमवारि टोल मे खबर उठल जे किछु समय से किछु बुतरु सभ खाँसी-बोखार से पीड़ित होय आ एकबैग बहुत बेसी बीमार भऽ किडनी फेल के शिकार भऽ कऽ मरि रहल अछि। टोल के गरीब लोक अपन जमीन-गहना-टेंपू बेच इलाज करेला के बावजूद अपन फूल सन बच्चा के नहि बचा पाबि रहल छल। करीब दु दर्जन बुतरु ऐ तरहक रोग के शिकार भऽ चुकल छल। तखन ऐ पैटर्न पर किछु छानबीन भेल। पता लागल जे बच्चा सभ एकटा कफ सिरप पिबाक कारण एहन भयंकर बीमार भऽ रहल छल आ काल के गाल मे समा रहल छल। पता लागल जे ओय कफ सिरप मे किछु जहरीला तत्व विद्यमान अछि जे ई सभ करा रहल छल। बात फैलला पर जनता मे असंतोष नई बढय ताहि लेल मधमवारि टोलक मुखिया कहाँदिन पीड़ित के लेल किछु मुआवजा के घोषणा कय देलखिन। मुदा तखनों एकटा पत्रकार एकदिन भोरेभोर मुखिया जी से पुछि बैसल ई कांड के विषय मे आ एकरा लेल मुखिया जी की कठोर कदम उठा रहल छैथ ताहि विषय मे । भोरे भोर मुखिया जी अपन काजक गुणगान लेल सभा बजेने छलाह आ ताहि मे एहन कटु सवाल हुनका अनसोहांत लागल। ओ क्रुद्ध स्वर मे बजलाह � �ओह ! तों सभ ओ पुरान गप्प किएक पुछि रहल छह। ओकर मुआवजा के हम घोषणा कऽ देने छी ने! बात खतम।� मनोहर यूट्यूब पर ई वक्तव्य देखने छल। ओ सोचय लागल � ई केहन सुधाकाल छैक, जाहि मे दवाई आ दारू दुनु जहरीला बनि रहल छैक आ ओहि पर कोनो गंभीर विमर्श नै � कार्यवाई नै! लोक जखन दुखित होइत अछि तऽ ओकरा दवाई � दारू के सहारा रहईत छैक। मुदा परिस्थिति तेहन सन बनय लागल अछि जे लोक के नै दवाई पर भरोस रहल नै दारू पर। मुदा ऐ सभ पर बात के करौ! सभ कियौ राम भरोसे जिनगी मे मस्त आ व्यस्त भेल छैक। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.१०.संतोष कुमार राय 'बटोही' केर धारावाहिक डायरी 'लव यू टू' संतोष कुमार राय 'बटोही' केर धारावाहिक डायरी 'लव यू टू'

अप्रिल, 2018

पीएच-डी कोर्सवर्क : अनुसंधान

लनामिवि मे पीएच-डी करवाक लेल दाखिला लेलहुँ । परञ्च गाइड चुनवा मे चुकि गेलहुँ अछि। जे गाइड भेटलाह ओ बेवहार आओर विचार दुनु सँ फिरीशान करवाक लेल हरदम मुँह बौने रहैत छलाह । हम हुनका डरे कन्नी कटैत छलहुँ , ओ फिरीशान करवा मे जुटल रहलाह । कोनो धरानी कौर्सवर्क पूरा भेल । परञ्च हुनकर बेवहारक कारणे हमर पीएच-डी पूरा नहि भेल । एक दिन हम पीएच-डी पर काम कके हुनका देखाबै लेल विश्वविद्यालय गेल छलहुँ । ओ अतेक धमकौलाह जे हम आब तोरा सँ घुस लेबौ । हम गरीब कतऽ सँ घुस द सकैत छलियै , से पीएच-डी छोड़ि देलियै । विश्वविद्यालय मे ओ पूरा बदनाम छलाह । टाका के विशेष चिन्हैत छलथिन्ह । कोन धरानी सँ पीएच-डी करवाक लेल हम परयास क रहल छलहुँ ओ उपर वाला जनैत हेताह । हुनकक कारणे पीएचडी करवा मोन मोने मे रहि गेल ।

2019-2020 शिक्षक बहाली : छठम चरण

फार्म भरा रहल छै । शिक्षक लहाली हेबे करतै । हमर बीएड 2011 मे पूरा भेल । परञ्च 2011-12 मे 'टेट' के फार्म भरवा मे किछु ओलझोल भेल ताहि दुआरे हम बिहार मे शिक्षक नहि बनि सकलहुँ । हाई इस्कूल वाला सेहो फार्म 2012 मे कहिया भरेलै ओ कियो नहि कहलाह आओर हम सूचनाक अभाव मे भरि नहि पौलहुँ । ई हमर जीनगीक सबसँ बेसी सेट बैक कहै सकैत छी । मायक मुइलाक बाद बिहार ऐलाहक बाद 2017 मे बिहार टेट पास भेलहुँ अछि । स्टेट 2019 मे भेल रहै ओ नीक नंबर सँ पास भेलहुँ अछि । परञ्च शिक्षक बहाली मे बड़ देरी भऽ गेलै । 2019 मे कतेक बेर फार्म भरै केर लेल तारीख बढ़ौल गेल। पहिने शिक्षा विभाग आओर सरकार सूचना देलकै सिर्फ बिहार टेट पास केलाह के लेल जेतै, परञ्च बाद मे सीटेट पास केलाह सभ विद्यार्थी के फार्म भरवा मे छुट देल गेलै । छठम चरणक शिक्षक बहाली 2019 धरि पूरा नहि भऽ सकलै । घुमि- घुमि कऽ सभ फार्म भरनीहार सरकार दिस ताकैते रहि गेलाह आओर 2019 निकैल गेलै । सरकार के घोषणा छेलैक जे 18 जनवरी, 2020 के योग्य कैंडिडेट केँ नियुक्ति पत्र भेट जेतै । ई सपना बनि केँ रहि गेलै । ट्यूशन सँ जिनगी घीच रहल छलहुँ । आब दोसर कोनहुँ आसरा नहि छल । हमर जिनगी कहिया पटरी पर औतै आओर हम कहिया विधाता केँ लिखल भाग्य केँ नीक होयत देखबै ई बड़ दूर बुझा रहल अछि । पहिने तँ कुमारे रही आब दुटा धिया- पुता भेल अछि । पहिल बेटी 2017म साल मे भेल आओर दोसर 2018म साल मे । गाम घर मे कियो पुछनाहर नहि अछि जे की हाल ? अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.११.ग्रुप कॅप्टन (डॉ) वी एन झा- परमात्मा के वास कतए ? : एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण ग्रुप कॅप्टन (डॉ) वी एन झा परमात्मा के वास कतए ? : एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण

परमेश्वरक स्वरुप हमर सनातन आ किछु अन्य धर्म व आस्था परमात्मा में पूर्ण विश्वास करैत अछि। उपनिषद के निम्नांकित वैदिक मन्त्र विष्णु सहस्त्रनामक भाग अछि, जाहि सँ भगवान् विष्णुक किछु अवस्थाक काल्पनिक वर्णन भेटैत अछि। याद रहए, भगवान् विष्णु सृ्स्टि केर पालनहार छथि आ शेषनागक सिया पर रत रहितहुँ सृ्स्टि के अनवरत सञ्चालन ओ जीवमात्र के पालन करैत छथि। मिथिला आ मैथिल केँ परमेश्वर पर परम विश्वास आ सनातन धर्म के सभु देवी देवता पर प्रगाढ़ आस्था सेहो अछि I प्रायः सभु धर्म ओ आस्था मानैत अछि जे पूरा ब्रह्माण्ड के संचालन परमात्मा के कृपा सँ होइत अछि। सनातन धर्मानुसार भगवान् विष्णु, बौद्ध धर्मक 'ब्रह्म', सिख समुदाय के 'गुरु' द्वारा देखाओल 'परब्रह्म' आ जैनक २४ तीर्थांकर द्वारा देखाओल 'मोक्ष' के मार्ग आदि सैद्धांतिक रूप सँ समान अवधारणा छथि जे कमोवेश आर्यावर्त के आध्ययात्मिक स्वरुप सँ सम्बंधित अछि । विश्व में अन्यान्य धर्म ओ आस्था के प्रादुर्भाव अलग-अलग काल खंड में भेलन्हि जे सामने के बॉक्स में देखाएल गेल अछि I दोसर दिस अन्य विचारधारा में पारसी के 'अहुरा मज्दा' किछु सनातन सँ मिलैत-जुलैत अछि मुदा ओ लोकनि भगवान् इन्द्र व देव केँ नकारात्मक भूमिका में देखैत छथि। ओहिनें अब्राहमिक आस्था में इसाई के एकहि सर्वशक्तिमान 'God' छै जाहि पर अन्य आस्था सँ मत-विवाद वा मतान्तर नहि अछि, मुदा यहूदी 'यावे' (YHWH) केँ एकमात्र अविभाज्य शक्ति मानैत छथि। ओ सभु धर्म-आस्था परमेश्वर के अन्यान्य रूप-प्रारूप सँ विरोध या घृणा नहि करैत छथि। अब्राहमिक आस्थामें एकमात्र इस्लाम एक एहन अछि जे कोनो अन्य धर्म या आस्था के अनुयायी केँ अपन अल्लाह के दुश्मन मानैत अछि आ ताहि लेल धर्मांतरण करै या ह्त्या के विचार व्यक्त करैत अछि। एहि लेल इस्लाम विश्वभर में मानवाधिकार हनन करए के दोषी छथि ( पढ़ें �Gross Fundamental Rights Violations in Many Verses of Quran�, https://thecounterviews.in/articles/gross-fundamental-rights-violations-in-many-verses-of-quran/) I त्रेता युग में जे सुरासुर (देवासुर) संग्राम भेल रहए जेकर वर्णन गांधार राजकुमारी व माता केकई केनें छली, अनुमानतः ओहि भौगोलिक खंड में पड़ैत छैक हालाँकि पारसी-इस्लाम रूपी आसुरी आस्था ओहि काल खंड में नहिं छलैक किन्तु अमानविक राक्षसी वृत्ति वाला मानव अवश्य आसुरी शक्ति के साथ होतैक I खैर, ई सब हमर लेख के विषय-वस्तु नहि थीक I मुदा ई निश्चित अछि जे आसुरी आस्था ओ भूखंड में तत्कालीन सेहो छलन्हिं जे आजु एशिया के मध्यपूर्व देश में देखल जा रहल अछि I अनेकों विचारधारा मानैत छै जे ब्रह्माण्ड के कण-कण में परमात्माक कृपा, शक्ति व वास निहित छै। स्वयं परमात्माक आकार कहें अछि, कियो नहि जानैत। अनेकों ग्रंथ में ब्रह्म केँ निराकार आ ओंकार मानल गेल अछि I अनेकों ऋषि-मुनि के अवधारणा अछि जे परमपिता परमेश्वर सामान्य मानवक संकुचित आध्यात्मिक ज्ञान सँ लाखौं गुना अधिक तेज वाला अनेकों मस्तिष्क समकक्ष, अनेकों आँखि, कान आ हाथ वाला अनंत शक्ति सन्निहित सर्व-विद्यमान छथि I साकार ब्रह्मक अपन अपन समय में अनेकानेक मानव अलग अलग कल्पना केलथि, जेकरा अलग-अलग चित्रकार अलग-अलग रूप देलन्हि । तदनुसार परब्रह्म अनेक मस्तिष्क, अनेक आँखि- कान सँ असंख्य जीवक पीड़ा आ अनुभूति देखैत-सुनैत छथि आ अनेकों हाथ-प्रयास सँ ओकर दुःख निवारण करैत छथि। ब्रह्माण्ड में सभु जीव में ओहि परमेश्वर आत्मा रूप में विद्यमान छथि आ मरणोपरांत ओहि में लीन भ जाइछ I असंख्यों जीवात्मा केँ परमात्मा में लीन होवए के प्रक्रिया किछु क्लिष्ट बुझल जाइछ जाहि में मोक्ष, स्वर्ग, नर्क वा प्रेत योनि आदि सम्मिलित अछि I एकर चर्चा अन्यत्र कएल गेल अछि I ब्रह्मवेत्ता ओ ज्ञानी जे समग्र ब्रह्मक निराकार आ अनंत रूप बुझैत छथि, ओ सभ ई जानैत छथि जे प्रत्येक देवी-देवता ओहि एक परमब्रह्म के अनेकों कला के अलग-अलग कार्यरूप / स्वरुप छथि। तखनहि साकार रूप में देखए, अनुभूति कराए वा ताहि संग समन्वय करै लें लोकनि ओ परब्रह्म के तीन स्वरुप देखे छथि I ब्रह्माण्डक सृष्टिकर्ता भगवान् 'ब्रह्मा' जे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में अनेकों आकाशगंगा, सौर्यमंडल तथा ग्रह आदि में संतुलन बनाओल राखै छथिन I दोसर छथिन भगवान् शंकर जे जीवात्माक सृजक-विनाशक मानल जाएत छन्हि I तेसर छथिन भगवान् विष्णु जे सभु जीवात्माक पालन-पोषण करनिहार मानल जाएत छथिन। ई सब, या तँ अमूर्त रूप में निराकार परब्रह्म मानल जा सकैछ अन्यथा ब्रह्मस्वरूप अन्यान्य रूप में ; जेना ब्रह्मा, विष्णु, महेश, माँ लक्ष्मी, सरस्वती, गायत्री, सावित्री देवी आदिक मातृ वा स्त्री-शक्ति वा स्वरूप में अनुभव करैत छथि, वा अग्नि, वरुण, इन्द्र आदि देवताक पुरुष रूप में। मूर्त रूप में अनेक देवी-देवता मूलतः एकहि परमात्माक अन्यान्य विशिष्ट कलापूर्ण अलग-अलग स्वरुप छथि। मुदा जखन समय-समय पर परमात्मा के जैविक अवतार होइत छै, त हम सभ हुनक दशावतार सँ भिज्ञ छी जे विभिन्न कालखण्ड में भिन्न-भिन्न निमित्त लेल भिन्न-भिन्न आकार-प्रकार में प्रकट भेल छल । अज्ञानी सनातन धर्म में देवी- देवता के अनगिनत संख्यां के गिनती करै लागै छथि जे लाखों या करोड़ों में छै, मुदा आध्यात्म-ज्ञानी जानैत छैथ कि ओ सभु देवी देवता एकै परमात्मा के अलग-अलग कार्य-स्वरूप छैथ। ओ सभु देवी देवता में परब्रह्म के अनेकों कला में सँ मात्र किछु समाहित होइत छै। हँ ! एक प्रश्न बारम्बार उठल छै कि की पुरुषत्त्व के क्षमता राखै वाला आ स्त्रीत्व के संवेदन सन्निहित कला एकै परमात्मा के छै या ओहि परमात्मा के दू समान दिखे वाला किन्तु असमान गुणात्मक भाग छैथ, जकरा महादेव अर्धनारीश्वर के रूप में प्रकट कैल रहतिन्ह । लेखक के ई मत अछि जे जीवात्मा में पुरुषत्व भगवान् विष्णु के तथा अति संवेदनशील स्त्रीत्व देवी लक्ष्मी के सूक्ष्म अंश भ सकैछ I श्रीमद्भागवत गीता में भगवान् कृष्ण अर्जुन केँ अपन अनंत व विराट स्वरूप के एक झाँकी देखौने छलन्हि । अधिकांश धर्म आ आस्था मानैत छथि जे हर जीव में एक आत्मा वास करैत छै, जे ओहि परमात्मा के अतिसूक्ष्म अंश छै। कोनहुँ जीव में ओ आत्मा के जतेक अंश समाहित होइत छै, हुनका में ओहि तरहक दैविक/आध्यात्मिक गुण या प्रभाव हेतैक । कोनों जीव में परमात्मा के जे कला के जतैक अंश होइत ओहि जीव या प्राणी में ओहि तरह के गुण-प्रभाव होतैक जाहि में ओ प्राणी के निकट वातावरण के सेहो प्रभाव पड़ैत छैक । परमात्मा में निहित ६४ कला में सँ प्रत्येक कला अपने-आप में पूर्ण होएत छै। ताहि कला के अंश मात्र सँ जीव में अन्तर्निहित केवल ओहि आध्यात्मिक गुण के प्रादुर्भाव होए छैक जे परमात्मा के ओहि कला में निहित अछि I जीव में सन्निहित आंशिक कला सामान्यतः सम्पूर्ण नहिं होइत छै। ओहि ६४ कला में सँ कोन कला के कतेक अंश कौन जीव के भेटल छै, ओहि से ई तय होइत छै कि अमुक जीव के आध्यात्मिक गुण के स्तर कतबा होएत। कोनों प्राणी के आध्यात्मिक गुण में करुणा, धैर्य, क्षमा, न्याय, निष्पक्षता, वैराग्य, आध्यात्मिक शक्ति, अजेयता, उदारता, सौंदर्य, नृत्य, गायन, ईमानदारी, सच्चाई आदि के अंश मात्र सँ ल केँ परम निपुणता तक भ सकैछ जे कोनों प्राणी केँ तत्स्वरूप देवता बना देत छै जेना गुरुदेव, मातृदेव, पितृदेव परमात्मा के अवतार सनातन धर्म में मान्यता छै कि परमात्मा के ६४ कला छैथ, जकर अतिसूक्ष्म अंश सँ ब्रह्माण्ड के सभ जीव जीवंत बनाैत छै। याहि कला निर्धारित करैत छै कि किछु जीव या प्राणी में कौन कौन दैविक/आध्यात्मिक गुण होयत। परमात्मा के एहि अंश पर ई निर्भर छै कि किनका में कतेक शक्ति वा क्षमता होयत। भगवान् कृष्ण में १६ कला मौजूद छलथि जबकि भगवान् राम में १२। ई दुनू अवतार युग-दृष्टा छलाह आ क्रमशः त्रेता आ द्वापर के समापन संकेत करैथ। ओहना तँ भगवान् परशुराम सेहो त्रेता में ही अवतार लेने छलाह । भगवान् विष्णु अपन मतस्यावतार, कूर्म आ वराह अवतार में एक ही कला सँ सम्पन्न मानल जाइत छलाह । तावहिं नृसिंह आ वामन अवतार में दुई कला सँ सम्पन्न छलाह । परशुराम अवतार तीन कला सँ संपन्न मानल गेल छै। भगवान् बुद्ध के कलियुग के पूर्वार्ध में जन्म भेल छल आ हुनका में एहन अद्भुत आत्मा के वास छल कि महल से बाहर निकलि क' तत्कालीन एक एहसन सामाजिक व्यवस्था बनौलथि, जाहि में अहिंसा के प्राथमिकता देबाक आ सरलता सँ जीवन बितेबाक नया मार्ग प्रशस्त भेल । भगवान् बुद्ध द्वारा प्रशस्त 'बौद्ध धर्म' के में विश्व में बहुत प्रचार भेल। हुनका में कतेक कला छलन्हिं, एहि सम्बन्ध में कोनों वर्णन नहिं भेटल, मुदा ग्रंथ में ई अवश्य कहल गेल अछि कि भगवान् विष्णु के दस अवतार में सँ ओ एक छलाह। हुनका द्वारा देल गेल आध्यात्मिक ज्ञान चहुँ दिशा में विभिन्न शैली के जीवन यापन करबाक प्रेरणा उत्पन्न केलक, ओ स्वयं में दैविक चमत्कार जेकाँ अछि। भविष्य में होवए वाला कल्कि अवतार कतेक कला युक्त की रूप में हतैक कियो नहिं जानैत किन्तु ई बात जरूर अछि जे हुनका समक्ष चुनौतीपूर्ण बहुतों कार्य हेतेय किये कि आसुरी शक्ति चरम पर होतैक I परमात्मा के ६४ कला की अछि ? अक्सर लोकनि आध्यात्मिक कला आ जैविक कला में अंतर करय लें बिसर जाइ छैथ। संगीत, साहित्य, नृत्य, जीवन-मूल्य, भौतिक ज्ञान, वास्तु रचना, दैनिक कर्म केर विभिन्न विधि आदि-आदि सांसारिक आ जैविक कला छैथ। ओहि ठाम परम व सर्वोत्तम कला के कल्पना एक या अधिक दैविक कला में कएल जा सकैत अछि। उदाहरणक लेल प्रत्येक देवी-देवता एक या अधिक दैविक कला में पूर्णता केर प्रतीक छथि जेना माता सरस्वती शिक्षण-ग्रहण केर परम कला केर स्वरूप अछि। एहि तरहें माता लक्ष्मी धन-संपत्ति में, भगवान विश्वकर्मा भौतिक सृजन में, भगवान इंद्र (या देवेंद्र) अन्यान्य शक्ति में समन्वय राखय वाला व जीवात्मा केँ उपकार केर पराकाष्ठा छथि। संगहि ईओ नहि बिसरय चाही जे ई सभ देवी-देवता सर्वगुणसम्पन्न परमात्मा केर एक या अधिक कलाक द्योतक छथि। चमत्कारी-जन व थोपल आस्था युग-युगांतर सँ अलग-अलग कालखण्ड में परमात्मा अलग-अलग कला सँ परिपूर्ण अवतार लेलनि अछि, संगहि परमात्मा किछु लोकनि केँ आत्माक एक एहन अंश प्रदान कएलक जाहि सँ ओ महामानव वा अलग-अलग चमत्कार सँ सुसज्जित चमत्कारी प्राणी बनि गेलन्हिं । एहि तरह एक महामानव भगवान महावीर छलाह, जे जैन धर्मक नीव राखलन्हि ओ अहिंसाक द्योतक भेलन्हि जकर अनुयायी के संख्या बहुत अछि। सनातन धर्म में तऽ अनेकों त्रिकालदर्शी आ चमत्कारी व्यक्ति भेलन्हि । ई अति उल्लेखनीय अछि जे सनातन धर्म में ही �विश्वेदेवाः��विश्वक सभ देवी-देवता के मान-मर्यादाक प्रथा रहल छैथ, आ एहि कारणे कई जनजाति जे असुरी शक्तिकें सेहो मानैत आ पूजैत छैथ, ताहि पर अपन विश्वास राखै छैथ। भारतभूमि पर अनेक कला सँ विभूषित अनेक चमत्कारी विभूति जन्म लेलन्हि, जे अपने केँ स्वयं भगवान नहि बल्कि हुनक भक्त कहलेलन्हि जिनका पर भगवतक कृपा भेल। एहि तरहेँ, १६म शताब्दी में मुस्लिम-उत्पीड़नक कालखण्ड में सनातन धर्म बहुत प्रताड़ित भेल छल, जखन सामान्य लोक अपन धर्म सँ उदासीन होए लगलाह। अंधविश्वास, रीति-रिवाज, परम्परा सँ निम्न वर्गक लोक विचलित भए रहल छल, तखने खत्री कुलक नानकदेव जी में, जे एकटा मुस्लिम गवर्नरक भंडारी छलाह, दैविक अनुकम्पा आयल आ हुनक कविता माध्यम सँ निर्गुण भक्ति शुरू भेल, जेमे गुरुकें सबसे पहिले राखल गेल। छठा गुरु एक नवीन �सिख पंथ� केर स्थापना कएलक, जाहिमे सिख के सभु गुरु द्वारा रचित भजनक संकलन करि एक पुस्तक बनाओल गेल, जकर नाम �गुरु ग्रन्थ साहिब� राखलन्हि । एहि मे भगवान राम, माता सीता, हरि, गोविन्द गोपाल, ब्रह्मा विष्णु महेश आदि सभक वंदन अछि। मुदा ब्रह्म तक पहुँचबाक माध्यम गुरु केँ मानल गेल। अब्राहमिक आस्था में पश्चिमी देश में एक चमत्कारी व्यक्ति �जीसस� केर जन्म भेल, जाहि के स्पर्श मात्र सं कई रोगी आ पीड़ित ठीक भऽ जायत छलन्हि । जीसस में अवश्यहि किछु दैविक / आध्यात्मिक शक्ति हेतन्हि । ओ अपन अनुयायी केँ संदेश देलखिन कि ई संसारके चलानिहार एकटा सर्वशक्तिमान परमपिता परमात्मा अछि, जकरा अनुसार सब कुछ चलैत अछि। ई बात सही अछि जे बाद के शताब्दि में ओकर अनुयायी हुनहिं केँ भगवान माने लगल जे ईसाई पंथ के आरम्भ केलन्हि । जीसस के जन्म के लगभाग छः सत्रक बाद, अरब के बर्बर सभ्यता वाला भूमि पर एक व्यक्ति अपने के पैगम्बर घोषित कएलक, जे अधिकांशतः तलवारिक नोक पर दर्जनों संघर्षरत अरब जनजाति के नरसंहार कएलक या अपन बनाओल इस्लाम प्रथा केँ अनुकरण करबाक लेल लाखों व्यक्ति केँ बलपूर्वक धर्मांतरण कएलक बाध्य कएलक । अपन द्वारा बनाओल इस्लाम के अलावा कोनों अन्य धर्म-आस्था के माननिहार लोकन्हि केँ ओ वा तऽ अपन धर्म बदलबाक लेल मजबूर करैत या मारि देत। ई असुरी प्रथा तत्कालीन कमज़ोर व्यक्ति, समाज व देश पर बहुत भारी पड़ल । परमात्मा के वास कहाँ छैक? परमेश्वर के वास कतए छन्हि ? स्वर्ग में या कतए आओर ? स्वर्ग या नर्क केहन व कतए अछि कियो नहि जानैत अछि ( पढ़ें "स्वर्ग केहेन, नर्क केहेन?", page 37-42; विदेह ४१२ म अंक १५ फरबरी २०२५, https://mail.google.com/mail/u/0/#inbox/FMfcgzQZTVqKqQXLLlJbDfClBgsDGKDs?projector=1&messagePartId=0.2) I ई मानल जाइत रहल अछि जे स्वर्ग धरती के उत्तर दिस आ नर्क दक्षिण दिस मे अछि, मुदा सैकड़ों वर्ष में विज्ञान आ वैज्ञानिक सभ केँ ओकर कोनों प्रमाण नहि भेटल अछि; न ही हिमालय पर, न ही अंतरिक्ष में। आकाश आ अंतरिक्ष में धरती सँ ६०० किलोमीटर ऊपर, पोलर ऑर्बिट में रोज सैंकड़ों वैज्ञानिक उपग्रह अनगिनत चक्कर लगा रहल अछि मुदा कोनो दैवीय उपस्थिति के संकेत नहि भेटल अछि, आ न ही कोनो असीम ऊर्जा स्रोत रूपी परमात्मा केर। सूर्य केर परिक्रमा करैत पृथ्वी केर लगभग वृत्ताकार पथ के सेहो अनेक स्कैन कएल गेल अछि मुदा आत्मा, परमात्मा, स्वर्ग या नर्क, कोनो संकेत नहि मिलल अछि। दूर अंतरिक्ष में देखए वाला रेडार, जे एक छोटका पाथर सेहो देख लैत अछि, लाखों किलोमीटर दूर तक कोनो अलौकिक ऊर्जा या परमात्मा के कोनो पता नहि लगाओल सकलाह। अंतरिक्ष में स्थापित नासा केर 'हबल' आ यूरोप के 'जेम्स' टेलिस्कोप तँ अरबों किलोमीटर दूर अन्तरिक्ष में देख सकैत अछि, मुदा परमात्मा या तादृश कोनो ऊर्जा स्रोत केँ नहि देख सकल अछि। जहिना गीता में वर्णित अछि, संभव अछि कि परमात्मा के कोनो आँखि या भौतिक यंत्र नहि देख सकैत। तँ एकर पता कोना लागत जे भगवान के वास कहाँ होइत छैक? भगवान शंकर केर वास कैलाश पर्वत पर मानल जाइत रहल अछि, मुदा एखन तक एकर कोनो सबूत नहि मिलल अछि। हँ! ओतए गेल लोकनि अपन अपन अलग अनुभूति के वर्णन अवश्य कएलक, जे अत्यधिक उँचाई पर हवा में ऑक्सीजन कम होवै से सेहो महसूस कएल जा सकैत। किछु ग्रंथ में परमात्मा के निवास �क्षीर सागर में बताओल गेल अछि जाहि में सहस्र फन वला शेषनाग पर आसित भगवान् विष्णु के मानल गेल अछि, मुदा ओ क्षीर सागर कतए छै? कम सँ कम धरती या एकर आस-पास मंगल या शुक्र ग्रह पर त नहि अछि। यदि हम भगवान् के निराकार स्वरूप के बारे में बात करी तs उ कोनो एहेन ऊर्जा-श्रोत जेकाँ भ सकैत अछि जे आधुनिक वैज्ञानिक यंत्र, उपकरण या सेंसर के पकड़ में नहि आबि रहल हो I याद रहए कि भगवान् कृष्ण स्वयं गीता में कहलन्हिं रहए जे हुनकर विराट रूप के दर्शन करए लें अर्जुन केँ दिव्य दृष्टि चाही I तँ की ? एकर मतलब ई भेल जे जीवात्मा के चक्षु जे विद्युत्-चुंबकीय प्रकाश किरण केँ देखि सकैत अछि, ताहि सँ अलग कोनों एहन किरण अछि जेकरा दिव्य दृष्टि कहल जाइछ ? मुदा वैज्ञानिक वा आध्यात्मिक खोज के अभाव में ई अवधारणा मात्र छी, साक्ष्य नहिं । आज जखन अंतरिक्ष में जाए केँ प्रयोग आ खोज करब संभव भेल अछि, तs भारतीय / आध्यात्मिक पद्धति आखिर एहन कोनो रिसर्च कियैक नहिं क रहल अछि जे आवै वाला समय में एक एहन 'ॐकार� रूपी नव प्रकाश, विकिरण या किरण के खोज कए सके जे आत्मा, परमात्मा वा अन्य अलौकिक पदार्थ के द्योतक वा परिचायक होवै ? ताहि प्रकाश, विकिरण या किरण के की रूप-प्रारूप हेतै ओकर कल्पना करव सम्प्रति संभव नहिं छैक मुदा वैज्ञानिक / आध्यात्मिक अनुसंधान व खोज के अनवरत प्रयास अत्यावश्यक अछि I एहेन परिष्कृत आध्यात्मिक अनुसंधान करबाक लेल अनेकों ओ तरह के नया उपकरण के आविष्कार करबाक चाही जाहि में �दिव्य दृष्टि� के गोपनीय सूत्र के पता लगाओल जा सकए I एकटा आओर सूत्र के सहारा लेल जा सकैत अछि। हर वर्ष आश्विन मास (सितंबर) के आस-पास सनातनी मान्यता अछि कि 'पितृपक्ष' में सभु पूर्वज के आत्मा पृथ्वी के अत्यंत निकट होइत अछि जेकरा दक्षिण दिशा में जल क अर्घ्य देल जाइत अछि। तऽ की ओहि दिन पृथ्वी अंतरिक्ष के कोनो एहेन भाग से जा रहल छै जतए बिछुड़ल आत्मा के संग्रह या परमात्मा सँ नजदीकी होवए ? ध्यान में इहो राखू जे सनातन धर्म के बहुतों पावनि-त्यौहार एहि कालखंड में होइत अछि, जइसन गणपति पूजा, रक्षा बंधन, अनंत चतुर्दशी, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, जिमूतवाहन पूजा, दुर्गा पूजा, लक्ष्मी पूजा, दीपावली आदि आदि। सारांश लगभग सभ धर्म आ आस्था ई मानैत अछि जे हर जीव में आत्मा के निवास अछि आ हर आत्मा परमात्मा द्वारा संचालित अछि आओर मृत्यु पश्चात ओहि में समाहित होए छैक । मुदा ई कियो नहि जानैत अछि जे आत्मा-परमात्मा कतय, कौन रूप में आसीन छथि । क्षीर सागर कतए अछि जाहि में ६४ कला पूर्ण ओ परमात्मा वास करैत छन्हि, जताए सँ हुनकर अनंत लीला के अनुभूति मात्र हम सभु जीव कए रहल छी। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा कहल गेल अछि जे हजारों सूर्य समान हुनकर आकृति व स्वरुप केँ मानव के आँखि नहि वल्कि केवल �दिव्य दृष्टि� सँ देखल जा सकैछ I तँ की कोनो एहेन वैज्ञानिक यंत्र नहि बनाओल जा सकैत अछि जे आत्मा-परमात्मा या 'ॐकार� रूपी ताहि असीम ऊर्जावान प्रकाश किरण के होएबाक प्रमाण दे सकए ? हम तुच्छ मानव वा वैज्ञानिक लोकन्हि केँ एहि तरह के बहुतों आध्यात्मिक प्रश्न अछि मुदा उत्तर बहुत कम। -ग्रुप कॅप्टन (डॉ) वी एन झा; सेवा निवृत्त वायुसेना अधिकारी; मुख्य, वायुसेना चिकित्सा अनुसन्धान प्रोफेसर, विभागाध्यक्ष ओ स्नातकोत्तर परीक्षक (RUGHS वरिष्ठ वैज्ञानिक �F� व सह निदेशक (डी आर डी ओ) सदस्य, Institute of Defence Scientists & Tech (IDST)

(लेखक एक साधारण वैज्ञानिक छथि जेकरा सनातन के अथाह आध्यत्म के सूक्ष्म-मात्र ज्ञान अछि I अपितु ई लेख में वैज्ञानिक दृष्टिकोण सँ परमपिता परमात्मा के समीक्षा करए के प्रयत्न कए रहल छी जे शायद तर्कसंगत नहिं अछि ) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। पद्य २.१.जगदानन्द झा मनु -५ टा गजल २.२.जगदानन्द झा मनु - बीसटा हाइकू २.३.प्रदीप कुमार मंडल "पबड़ा"- सुखि गेलै कमला सुरुज/ दियौ मैया भू तल नीर हे २.४.राम शंकर झा"मैथिल"- दलान २.५.प्रमोद झा ' गोकुल'-नै कोनो बात भारी २.६.प्रणव कुमार झा- साधारण वोटर २.१.जगदानन्द झा मनु -५ टा गजल जगदानन्द झा �मनु� ५ टा गजल गजल 1 नुका कय मुँह अपन सगरो कनै छी हम विरहकेँ आगिमे  सदिखन जरै छी हम 

लगा नेहक किए ई आँच चलि गेलौं करेजक दर्द  सहियो नहि सकै छी हम लगन एतेक सतबै छै बुझल नहि छल विछोहे राति दिन घुटि-घुटि मरै छी हम नजरिमे छी सभक हारल बताहे टा बुझत की आन आनंदे रहै छी हम पिया ओता हमर ई सोचि जीबै छी लगोने आश �मनु� रस्ता तकै छी हम (बहरे हजज, मात्रा क्रम : 1222-1222-1222) गजल 2 आबि जायब हमर अंतिम बिदाई पर फूल दय देब हाथसँ मुँह दिखाई पर नोर नहि देखलक आँखिक कियो जगमे नजरि सबहक   हमर हाथक मिठाई पर पोसलौं पेट  जीवन भरि कमा हम मरि घेंट लेलक कटा हँसि ओ  फिदाई पर आइ दिन धरि तँ सब सहिते छलौंहेँ हम आबि जिद गेल पापीकेँ मिटाई पर केकरा �मनु� कहत आ के सुनत एतअ सब हँसै छैक आनक पिटाई पर (बहरे मुशाकिल, मात्राक्रम - 2122-1222-1222) गजल 3 बड़ सुनल जस  माइ हे तोहर दुअरिया जोड़ि कल अनलौं  सिनेहक हम गठरिया सूप डाला कोनिया सभमे अरज छै थाढ़ दुखलै गोरबा   फेरूँ नजरिया दुख दुखीयाकेँ हरै   परमेश्वरी तूँ माइ हमरे बेरिया मुनलअ किबरिया दिन छये देने छलौं दर्शन अपन जे फेर दर्शन दिअ अहाँ हम छी भिखरिया मोन टूटल जाइए  छल देह टूटल �मनु� तकै छै माइकेँ सगरो नगरिया (बहरे रमल, मात्राक्रम 2122-2122-2122) गजल 4 अनलौं करेजा अपन ई स्वीकार करु हमरासँ एना   अहाँ नै   बेपार करु गरदनि उठा कनिक हमरा नहि देखबै हम आब एतेक कोना सिंगार करु सस्ता महग बाढ़ि रौदी सगरो भरल सोइच गरीबक अहाँ किछु सरकार करु हरलौं कते युगसँ तन मन धन बनि अपन ऐ आतमा  पर हमर नहि अधिकार करु झूठक बटोरल अहाँकेँ बहुमत रहल �मनु� नहि सड़ल बाँटि जनता बेमार करु (बहरे सगीर, मात्राक्रम - 2212-2122-2212) गजल 5 करेजमे बसा हमरो तँ कनी  पिआर करु अपन बना क हमरा प्रिय अहाँ दुलार करु नुका क छी अहीँकेँ हम रखने हिया त�रे पुजा करैत छी दिनराति किए पसार करु मनक तरंग सबटा छोरि अहीँक छी बनल विचारु नै इना जल्दीसँ अहाँ कहार करु सिनेह होइ की छै आबु  तँ हम कहैत छी जिवू खुशीसँ जीवन नै अकरा पहार करू दुलार नै जतय धन केर बिना कियो करै सिनेह ओइ �मनु� दुनियासँ किना उधार करु (मात्रा क्रम 12-12-12-221-12-12-12 सभ पाँतिमे) -जगदानन्द झा �मनु�- मोबाइल न० 9212-46-1006 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.२.जगदानन्द झा मनु - बीसटा हाइकू जगदानन्द झा �मनु� बीसटा हाइकू १ सीता दाइसँ जे हम सीखलहुँ आइ यादि नै २ झूठक धन बैमानीक संपति केकरा  भेलै ३ भाइ भैयारी सभ बीतल गप पाइकेँ सोंझा ४ कऽलम खेत आँगन खड़ीहान सभ बटेलै ५ आइ हृदय पाथर सन भेलै कते कठोर ६ पटुआ तीत बारीक भय गेलै दिल्ली कमेने ७ विकास संगे कतय हरा गेलै अपनापन ८ लोहाक भाव जेना जेना बढ़लै लोकक कम ९ गरीबकेँ नै बुझलकै मनुख अमीर सभ १० मोनक तार कते छोट भ गेलै मोबाइलसँ ११ नहि केकरो ई हम्मर तोहर सभ छै माया १२ पापीक पाप ओकरे जड़बै छै मानय की नै १३ बिन बुझने मानलौं पियक्कड़ अहूँ ओहने १४ चाह नहि यौ हमरा दारू चाही बुझबो करु १५ शराब संगे चिखना भरपूर होबाक चाही १६ ताड़ी दारूसँ संबंध पक्का बुझू आदिकालसँ १७ कमला माइ अन धन अनली संगे अपन १८ कोसी कातकेँ हरियर दुइब सोहनगर १९ पाप तारनि हमर गंगा माय धरती पर २० गंगा नदी नै ई धारा अमृतकेँ बहैत अछि -जगदानन्द झा �मनु�; मो०न० +९१ ९२१२-४६-१००६ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.३.प्रदीप कुमार मंडल "पबड़ा"- सुखि गेलै कमला सुरुज/ दियौ मैया भू तल नीर हे प्रदीप कुमार मंडल "पबड़ा" सुखि गेलै कमला सुरुज/ दियौ मैया भू तल नीर हे

1. सुखि गेलै कमला सुरुज सुखि गेलै कमला सुरुज करेहो छै पेट में, कतऽ हम अरघ देबऽ अहि बेरि छठि में ।

कहियो नहि बरसल अहि बेरि, भरि मोन बरखा । कातिको में रौद एहन, जेहन रहै जेठ में । !!सुखि०!!

एक तऽ हम दैबक मारल, निर्धन कहाबी । दोसर सुखारक कारण जजाति नहि छै खेत में । !!सुखि०!!

सुनियौ हे रौना मैया, कलेस हरियौ जल के । नहि तऽ हम बाऊले सऽ अरघ देबऽ भेंट में । !!सुखि०!!

2. दियौ मैया भू तल नीर हे

सरिता जे सुखलै, सरोवर सुखलै सुखि गेलै धरती तर के नीर हे, कोन जल पैसि तोरा अरघ देबऽ छठि माय समैया छै बर रे गंहीर हे । !! सरिता ०!!

अहि घाट गेलियै मैया, ओहि घाट गेलियै गेलियै करेहक तीर हे, सेहो जे करेह मैया धार समाओली कोने घाट हेबऽ असथिर हे ।

अंगना में पोखरी खुनैबऽ हे मैया चारु बगल बान्हब ओकर भीर हे, सरुजक जोति चर्ही अइहऽ छठी माय अरघ हम देबऽ पुरी खीर हे ।

कर जोरी कहऽ मैया प्रदीप के वनिता करु मैया क्षेमब मोर कसुर हे, जल बिनु जीव जनत्व नहि जीतै दियौ मैया भू तल नीर हे ।

-प्रदीप कुमार मंडल "पबड़ा" मो० - 9771245676 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.४.राम शंकर झा"मैथिल"- दलान राम शंकर झा"मैथिल" दलान

ओ बैसार दलान जकर नाअम छल बड़का दलान जतह हंसी ठठ्ठा जतह गप्प सरका भरि टोलक लोक नेना-भुटका सङ्ग ओ बैसार .! एकटा कें के पूछाए चारि चारि टा चौकी कसमकस रहैत छल गप्प पअर गप्प खेत पाथर खरिहान सुर ताल कें सङ्ग बैजू बाबा गावैत पराती सङ्ग नचारी ओ बैसार....! जतह पछुएत मे जतह उत्तरवाड़ी कात जतह दक्षिणवाड़ी कात जतह गोहे गोहे रोपल सुन्नर सुन्नर फूलक गाछ जतह राति गमगम जतह दिन बम बम ओ बैसार...! जतह धमाचौकड़ी एक्का पअर एक पअर एक गुणी जतह जड़ीबूटीक ज्ञानी आ विज्ञानी जतह स्वास्थ्य संवर्धनक सोहनगर इंतजाम जतह मेहीं ज्ञानयोग जतह पैघ क्रियायोग जतह बुदुरुक सङ्ग चेतन जतह एक दोसर कें ज्ञान आ अनुभव बांटैत ओ बैसार....! जतह प्राकृतिक ज्ञनगर वैद्य जतह साँझ घोंटाईत छल बाबा बोल बम कें महाप्रसाद थाकल झमारल महिसान जतह ऐका पअर एक किसान जतह दिन राति होयत दौउन जतह एक मेह दसटा बरद जतह बोझ कें बोझ धान जतह भोरे सँ विद्यापतिक गान जतह जयदेव गोविन्द सङ्ग रसखान ओ बैसार....! जतह खेत खरिहान बिया बाउ चास समार सङ्ग तुलसी बाबाक रामायण जतह पंच परमेश्वरक सभादान जतह फैरिछाल जाईत छल सब समांगक दोख गुमान जतह बढ़ चाव बढ़ हूलास सँ बाँटल जाईत परोसल जाईत भूलो बाबाक बाड़ी कें लताम जतह दिआद-बाद आ सभा जतह बारह वरण भोज जवारी जतह सिद्धांत सगुन बाराती सब समाजक पईत राखन ओ बैसार...! जतह बनाओल जाईत छल बढ़ हुलेस सँ गरदाम मुखारी हअर पालो सङ्ग टेंगारी कोदाईर पसाठ ठोकल पच्चर ओ बैसार...! जतह घोरल जाईत खाट सङ्ग पलंग जतह बड़का सङ्ग छोटका भुरूकबा पहर सँ हारमोनियम तान जतह कर्मकांड आ वेद काण्ड कें बीच मचा घमासान ओ बैसार...! जतह नबका पोथी आ पुरना पोथी कें सङ्ग शास्त्रार्थ सबहक अपन तर्क सबहक ज्ञानक ढाकी सँ भरल सङ्गहिं लोक व्यवहार सँ जुरल अचार विचार ओ बैसार...! जतह सेर, कनमा छटांक पौआ अरैया डेरिहा सेवया सङ्ग मनोहरपोथी जतह श्रुति आ ऋचा सङ्ग पणिनिक अष्टाध्यायी व्याकरण जतह अंग आ उपांगक सङ्ग छंद,ज्योतिषक बढ़ सहजोर ओ बैसार...! जतह लौकिक निरुक्त सङ्ग वैदिक निरुक्त जतह विश्वतोमुखीक मनीषी भरल समांग जतह पतञ्जलिक महाभाष्य सङ्ग वैशेषिक न्याय दर्शनक बोध अथातो ब्रह्मजिज्ञासा मीमांसा ब्रह्मसूत्रक सङ्ग वेदान्त-दर्शनक मुंहजोर घमर्थन ओ बैसार...! जतह जीवनक जीवाक कला पावनि तिहार सङ्ग अर्थ धर्म काम मोक्षक बाट जतह विदेह मिथिक तरिहुतक गीत नाद सङ्ग जनकनंदनीक राखल माफा जतह बरेरी कोरो टांगल कांमोर सङ्ग लटकल करिन ओ बैसार...! जतह चाअर मे खोंसल हरबाही पेना सङ्ग कांरि जतह चौकीक निचाअं खराम जतह चुनबट्टी सङ्ग राखल पान जकर नाअम छल बड़का दलान..! बड़का दलान..!! ओ बैसार दलान अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.५.प्रमोद झा ' गोकुल'-नै कोनो बात भारी प्रमोद झा ' गोकुल' नै कोनो बात भारी

डरौना करोना पहुनाइयो मे केलक अड़पेना कहू कतौ जाउ कोना ? जत्तै जाउ तत्तै शंकाक गिद्ध दृष्टि घृणाक ओस वृष्टि आप्तोक टेढ़ दृष्टि ई केहन‌ सृष्टि ? भाड़ी मोन जांत सन पढ़त के खांत कोन ? अवधारि सबटा हूमेचि‌ खुट्टा विदा भेलहुं आखिर छी ते सासुरेटा ! डेग पर डेग‌ दैत पयरे पथ नपैत अछतैत पछतैत पहुंचलहुं सासुर । पहुंचैत मांतर सौंसे खुसुर फुसुर एही ले अयलहुं धुर्र ! तैयो खोजी आंखि हमर ताकि रहल छल अपन भेलेन्टाइन ने ऐन अपगरैन । दोगे सं देखि सार दौगल चुप्पे अंगना मारलक टाहि जोर सं गै माय�����!!! आबि गेलौ पहुना लेने करौना ! मचि गलै खलबली गली गली टोल मुहल्ला - फृल्लीं के घर बला की करैले एखन एला ? डरैल डरैल सहमल सहमल सबहक आंखि मे शंका जमल आन ते आन भेल अपनो विरान भेल आबि के राम कली झात कहि कात भेली देखि कंडेड़िये पकड़ि लेलैन नहूं नहूं पतरकी गली । सदल वल तखने एलै गामक मुखिया सरपंच फरमान भेलै जारी चौदह दिनका करोन्टाइन पहूना बनू मेहमान सरकारी नै कोनो बात भारी ।

- प्रमोद झा ' गोकुल'; दीप, मधुवनी (विहार); फोन-9871779851 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.६.प्रणव कुमार झा- साधारण वोटर प्रणव कुमार झा साधारण वोटर हम एकटा साधारण वोटर एना नै जे किछु भान नहि अछि निक-बेजाय , देश-दुनिया केर हमरा कोनो ज्ञान नहि अछि अंतहीन गलबज्जू बहस से मुदा हम कञ्छियाइत रहय छी एकहिटा तऽ वोट अछि हम्मर वोटिंग के दिन दऽ आबय छी। अपन उलझन, अपन दुनियाँ में सदिखन ओझारायल रहय छी के जानय, कखन, ककरा सं बजरय डरे ककरो से किछु नहीं कहय छी। रहि रहि कऽ चुनाव आबय अछि हम ओत्तहि ठाढ़ रहि जाय छी एकहिटा तऽ वोट अछि हम्मर वोटिंग के दिन दऽ आबय छी। कियौ अपन चिक्कन-चुचुनमुन बोल-बच्चन से लोभाबैत अछि कियौ बना कऽ डरऽक माहौल सबके बहुत डराबय अछि उलजुलूल भाषण से कियौ भ्रमक जाल बिछाबय अछि ध्यान से सुनय छी सबके हम, खास बहुत कहाबय छी मुदा चुनाव केर बाद हम, फेर साधारण बनि जाय छी। एकहिटा त वोट अछि हमर वोटिंग के दिन द आबय छी। चुनय छी मुदा ओकरे जे आन्हर मे होय कनहा राजा संविधान होय, लोकतंत्र होय और जतय होय मुद्दा ताज़ा शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार सुरक्षा नै बेसी त थोरबे आधा सबहक विकासक भ्रम के हम उम्मीद फेर लगाबय छी एकहिटा तऽ वोट अछि हम्मर वोटिंग के दिन दऽ आबय छी। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। विदेह ४२९|| 1 1 || विदेह ४२९

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Origins of various religions Religions/Faiths Originperiod Books World Hinduism (Aryan 40000-4500 BCE, 4 Vedas हैं Upanishads, 64 Clvllaton)truyancient-” Purans,Bhagavad-cita_ 269el6ropping) oroastrianism 600 to 6000 BCE Avesta a6 Judaism 20008CE ‘Torah, Tanach, & Talmud दंड Spiitism 4800 BCE 2 as Taoism 350 80६ Tao-te-ching दो Buddhism 523 BCE Seen abana 6% (érepping) Confucianism 520 80६ Lun Yu a6 Jainism 5708CE Siddhanta, Pakrit am Chinese folk relig 270 8CE None 6% Christianity 300६ Bible 32% (éropping) ‘slam o22ce Quran, Hadith 23% (growing) Shinto 500८६ मल, ना जज... बाड़ Sikhism 4500 CE GuruGranth Sahib दाद Bahai Faith 863 CE Alkitab Alagdas ie

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fide Act साहित्य आन्द्रोलनः मानुषीमिह संस्कृतामू सम्पाद़क: Telos SHRI

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