विदेह ४३२ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। [विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X Videha e-Journal (since 2000) at www.videha.co.in ] ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। कॉपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- २०२५. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२५. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA. सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@zohomail.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@zohomail.in. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover design: AUM GAJENDRA THAKUR VIDEHA:432 समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा। मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अनुक्रम विदेह ४३२ म अंक १५ दिसम्बर २०२५ (वर्ष १८ मास २१६ अंक ४३२)ऐ अंकमे अछि:- गद्य २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान -19 (पृष्ठ २-१०) २.२.हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-11 (पृष्ठ ११-२२) २.३.सुभाष कुमार कामत- चर्चित गाम नौआबाखर (पृष्ठ २३-३०) २.४.लालदेव कामत-२ टा लघुकथा- अगों आ वन्देमातरम (पृष्ठ ३१-३२) २.५.परमानन्द लाल कर्ण-मायक लाल (पृष्ठ ३३-४२) पद्य ३.१.आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल (पृष्ठ ४४-४५) Maithili Literature in English Translation 4.1.The moon s Journey- Jagdish Prasad Mandal (Original Maithili Short Story) Rameshwar Prasad Mandal (English Translation) [page 47-58]
गद्य २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान -19 २.२.हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-11 २.३.सुभाष कुमार कामत- चर्चित गाम नौआबाखर २.४.लालदेव कामत-२ टा लघुकथा- अगों आ वन्देमातरम २.५.परमानन्द लाल कर्ण-मायक लाल २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान -19 कल्पना झा मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान -19 नेना-भुटका लेल अनमोल उपहार: अक्षर परिचय "अक्षर परिचय" पोथी जखन-जखन हाथ मे लैत छी, बहुत किछु चलए लागैत अछि दिमाग मे। "सन्यासी, "श्रीमद्भगवद्गीता, "मैथिली महाभारत" सन पोथीक रचयिता "अक्षर परिचय" पोथी मे ककहारा लिखलनि अछि। ओहिना नहि अद्भुत व्यक्तित्व कहैत छिअनि हम, कि समाज। एहन सर्वतोमुखी योग्यता सभक भीतर थोड़बे ने भ' सकैत छनि। "मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान" पर लेख सभ लिखबाक क्रम मे एखनहि हमरा पता लागल जे "अक्षर परिचय" पोथी मे संलग्न कविता 'अटकन मटकन खेल खेलाउ, आम बीछि गाछीसँ लाउ" बहुत दिन पहिनहि लिखल छलनि। प्रायः विवाह-पूर्वहि। एकदम ठीक-ठीक तँ कहब कठिन छनि घरक सदस्यो सभ लेल। मुदा एतबा पता लागल गप्पक क्रम मे जे 'व्यास' जीक बालक श्री सत्येन्द्र कुमार झा, जनिक जन्म सन् 1958क छनि, से जखन चारि-पाँच बरखक भेलाह, तखनहि सँ हुनका कंठाग्र छनि "अटकन मटकन खेल खेलाउ, आम बीछि गाछीसँ लाउ।" जेना मिथिलाक धिया-पूता के बाल्यकालहि सँ कंठाग्र कराओल जाइत रहल अछि, "सा ते भवतु सुप्रीता देवी शिखरवासिनी उग्रेण तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।" तहिना 'व्यास' जी अन्यान्य श्लोक सभक संग "अटकन मटकन खेल खेलाउ, आम बीछि गाछीसँ लाउ" कंठाग्र करवा देने छलथिन। एहि प्रसंग सँ सिद्ध होइत अछि जे ई रचना सन् 1962-63 सँ पहिने तँ निश्चित लिखल जा चुकल छलनि। मुदा प्रकाशित बहुत बाद मे करबाओल गेल। एहि पोथीक जे प्रति हमरा लग अछि, तकर प्रकाशन वर्ष 1988 लिखल अछि। ई दोसर संस्करण अछि। प्रथम संस्करण 1984 मे प्रकाशित भेल छलनि, एहन सुनल अछि। प्रथम संस्करणक साल एहि पोथी मे लिखल नहि अछि कत्तहु। "अक्षर परिचय" मैथिली साहित्य मे 'व्यास' जीक एकटा एहन योगदान छनि जे देखबा मे छोट-छिन छनि मुदा ओकर प्रभाव आ चर्चा, बड़का-बड़का काज सँ बेसी रहलनि, से कहल जा सकैछ। कतेक लोक करें तँ कंठस्थ हेतनि 'व्यास' जीक ई सुप्रसिद्ध कविता। कारण, गेय रहने कंठस्थ करब बहुते सहज छै। मात्र चौबीस पन्नाक बाल-पोथी 'अक्षर-परिचय' भले ही 'व्यास' जी रचित सभ सँ पातर, सभ सँ कम पन्नाक पोथी छनि मुदा छनि बेस महत्वपूर्ण। नेना-भुटका लेल ई पोथी अनमोल उपहारे बुझू। आ सभ सँ महत्वपूर्ण बात जे एहि तरहक पोथी (नेना सभ केँ अक्षर सँ परिचय कराबैत) एहि सँ पहिने तँ नहिए छलए, मैथिली मे। आ एकर बादो प्रायः एहि तरहक किछु लिखल नहि गेल अछि। ओना भ' सकैए प्रकाशित भेल हुअए आ हमरा जनतब मे नहि आएल हुअए। "अक्षर परिचय" पोथी मे नेना सभ लेल सभ किछु अछि। अक्षर सँ परिचित करबैत, शब्द आ छोट-छोट वाक्य धरि पढ़ब-लिखब सिखबैत सन। जँ एहि पोथी केँ नीक, चिक्कन कागज पर, सुन्दर-सुन्दर चित्रक संग पुनः प्रकाशित करबाओल जाए तँ ई पोथी नेना सभ केँ बहुत आकर्षित करतनि। आ घर-घर राखल जाएत, से विश्वास अछि। एहि दिस ध्यान देथि 'व्यास' जीक संतति आ प्रकाशक लोकनि तँ माँ मैथिलीक प्रति बड़का उपकार होइतनि। आब कने गप्प क' लैत छी "अक्षर परिचय" पोथीक भीतरक कंटेंट केर। नेना सभ लेल पोथीक सृजन करैत बहुत बातक ध्यान राखब आवश्यक रहैत छै। बाल-कविता, बाल-कथा, किंवा कोनो विधाक बाल-साहित्यक रचना करैत रचनाकार केँ ध्यान राखबाक चाही जे ओ बाल-साहित्यक पोथी एहन हुअए जे एकटा नेनाक शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक विकासक लेल 'टॉनिक'क काज करए। एकटा नेनाक मोन मे शिक्षाक प्रति रुचि बढ़एबाक काज करए ओ पोथी। संगहि नेनाक मोन मे जिज्ञासा जगएबाक काज सेहो करए। आ मनोरंजक तँ सहजहि हेबाके चाही। मनोरंजक रहतैक तखनहि ने रुचि सँ पढ़त नेना सभ आ रुचि सँ पढ़त तँ स्वत: बेर-बेर पढ़ए चाहत। अपन संगी-साथी के सेहो पढ़ि क' सुनाओत, पोथी देखाओत सभ केँ। माने अपना रुचिगर लगतनि तँ सहजहि ओ दोसरो लेल रुचि जगएबाक आग्रही बनत। से सभटा बातक ध्यान राखल गेल अछि एहि पातर-छितर पोथीक सृजन करैत। बाल-पोथी सभ मे भाषाक सहजता पर विशेष ध्यान देब सेहो आवश्यक रहैत छै। आ से 'व्यास' जी ततेक ध्यान रखलनि अछि जे नेना सभक लेल लिखल गेल एहि पोथी में कतहु संयुक्ताक्षर नहि भेटत। "अटकन मटकन खेल खेलाउ" नेना सभ लेल लिखल गेल एकटा एहन कविता अछि, जकरा पढ़ैत नेना तँ नेना, नेनाक माएओ-बाप प्रफुल्लित भ' जाइथ। तेहन प्रवाह छनि 'व्यास' जीक लिखल एहि बाल-कविता मे। ई प्रवाह बाल-कविताक लेल सभ सँ आवश्यक तत्व अछि। कविता छन्दयुक्त हुअए किंवा छन्दमुक्त, प्रवाहयुक्त तँ हेबाके चाही ने ! आ प्रवहमान रहने नेना-भुटकाक ठोर पर सहजता सँ चढ़ि जाइत छै कविता। दीर्घावधि धरि कंठस्थ सेहो रहैत छै पढ़ल गेल कविता। से नेनाक लेल लिखल जाए कि चेतन लेल। एम्हरे एकटा बाल-कविता-संग्रहक भूमिका मे केदार कानन जीक लिखल भूमिका पढ़लहुँ। से हुनकर कहल बात हमरा बेसी काल मोन पड़ैत रहैए। ओ कहलनि अछि, "पाँती के तोड़ि तोड़ि लिखि देब कविता नहि भ' सकैत अछि, से गुणीजन लोकनि जनैत छथि। कविता कठिन साधना थिक।" आ से साधक छलाह 'व्यास' जी। छन्द पर नीक पकड़ छलनि 'व्यास' जीक। हमरा हिसाब सँ 'व्यास' जीक बाल-कविता 'अटकन-मटकन खेल खेलाउ' के कालजयी रचना कहल जा सकैछ। आ तैँ ओहि कविता के हम हू-ब-हू एहि ठाम संलग्न करए चाहब। अ--अटकन-मटकन खेल खेलाउ आ--आम बीछि गाछीसँ लाउ इ--इचना माँछक साना होइछ ई--ईटासँ घर महल बनैछ उ--उचकुनकेँ चुल्हा पर देखू ऊ--ऊसर खेतमे गोबर फेकू ऋ-ऋषिमुनि सबहिक फूट समाज लृ--लृ-लृ सँ कोनो ने काज ए--एक पहिल गिनतीकेँ मानू ऐ--ऐना एक कतहुसँ आनू ओ-ओल बहुत कबकब अछि भाइ औ--औँटल पानि बहुत सुखदाइ अं--अंगा हमर छोट भय गेल अः--अः धन हमर चोर लय गेल
क--ककबासँ अहँ सिटू केस ख--खटरलालकेँ लगलनि ठेस ग--गदहा होइयै पशुमे बूड़ि घ--घड़ी अधिक छूनहिसँ दूरि ङ च--चलू सभहि मिलि देखू नाच छ--छओ पैसामे किनलहुँ साँच ज--जलमे बहुतो जीव रहैछ झ--झट द' करब नीक नहिँ होइछ ञ ट--टटका जलसँ खूब नहाउ ठ--ठकक संगमे पड़ी ने बाउ ड--डमरू डिमडिम बजबी आनि ढ-- ढकर--ढकर नहि पीबी पानि ण त--तरबामे नहि होइए केश थ--थरथर काँपथि डरें धनेश द--दही-चुड़ामे गारू आम ध--धनधन छला भरत ओ राम न--नरक जाएब जँ करबे पाप
प-- पड़ा--पड़ा कटतौ ओ साप फ--फटक लगा क' बाहर भेल ब--बड़द केँ चरब' लए गेल भ--भरत नाम पर अछि ई देश म--महाराज कहबथि मिथिलेश
य--यश भगवानक अपरंपार र--रमा संगमे करथि विहार ल--ललका धोती पहिरू बाउ व--वनमे एसगर अहाँ ने जाउ श--शठ रावणकेँ मारल राम ष--षड्मुख सुर-सेनापति नाम स--सभसँ पैघ थिका भगवान ह--हम सभ करी हुनक गुणगान क्ष--क्षत्रिय ऊपर रक्षाक भार त्र-ज्ञ-- त्र-ज्ञ पढ़ि बस अक्षर पार एहि गेय कविताक अतिरिक्त एहि पोथी मे अछि नेना सभ लेल देल गेल अक्षर चिन्हबाक टास्क, दू पन्ना मे। तकर बादक छओ पन्ना मे अछि पढ़बाक अभ्यास लेल छोट-छोट शब्द सभ। 'अ' स सँ ल' क' 'अ:' धरिक मात्रा सँ युक्त शब्द सभ। तकर बाद ककहारा आ तकर बाद पाठ एक सँ ल' क' एगारह धरि छोट-छोट वाक्य बला, छोट-छोट अध्याय सभ। आ सभ सँ अन्त मे भगवानक विनती। एहि पोथीक विषय मे एतेक विस्तार सँ चर्चा करबाक पाछाँ कारण ई अछि जे बेसी-सँ-बेसी लोक केँ एहि पोथीक विस्तृत जनतब होइन। आ एकर उपयोगिता बुझथि सभ। घर-घर राखल जाए ई महत्वपूर्ण पोथी। अन्त मे एहि पोथी "अक्षर परिचय" मे संलग्न आठ पाँतिक विनती सेहो टिपिए दैत छी। बहुत नीक विनती अछि। देखल जाए नेना सभ लेल सरल भाषा मे लिखल गेल 'विनती' -- जय भगवान जय भगवान । हम सभ करी अहँक गुणगान ।। अहिँक रचल अछि ई संसार । जल थल नभक अहीँ आधार ।। माता पिता मित्र अरु भाए । सतत रहू अहाँ हमर सहाय ।। ईश हमर अवगुण हरि लेब । विनती करी, नीक मति देब ।। कतेक नीक विनती छै ने ! एहन विनती पढ़ैत जे बच्चा नमहर होएत, भगवान वास्तव मे हुनका नीक मति देबे करथिन! संपादकीय सूचना- एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-7 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-8 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-9 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-10 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-11 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-12 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-13 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-14 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-15 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-16 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-17 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-18 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.२.हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-11 हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-11 हितनाथ झा (मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070) मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान 11 रानी चन्द्रावतीक कीर्तिगाथा विगत अंकमे रानी चन्द्रावतीक जीवन-चरित्र 'प्रभात 'क उपलब्ध अंकसँ विभिन्न कवि एवं लेखकक रचना प्रस्तुत कयने रही। काशीकान्त मिश्र 'मधुप' जीक सेहो रानी चन्द्रावती-चरित्र धारावाहिक रूपमे प्रकाशित छलनि। सभ अंक मिला क' कुल पद संख्या 51 रहनि, मुदा 1 सँ 19 धरि अंक उपलब्ध नहि रहलाक कारणसँ 20 सँ 51 धरि प्रस्तुत क' रहल छी। मधुप जीक ई प्रारम्भिक रचना थिकनि। मधुपजी अपन संस्मरणात्मक पोथी ' प्रेरणापुंज' मे स्वीकार कयने छथि जे ई रचना सम्प्रति हुनका लग उपलब्ध नहि छनि। (सन्दर्भ : प्रेरणा-पुंज, पृष्ठ संख्या -50)। मधुपजीक एहि आरम्भिक रचनाक ऐतिहासिक महत्त्वकेँ देखैत, कतहु अन्यत्र उपलब्ध नहि रहलाक कारणसँ एकर महत्व आर बढ़ि जाइछ। एहि अंशकेँ प्रो. भीमनाथ झाक पोथी ' कविचूड़ामणिक काव्यसाधना' मे सेहो प्रस्तुत कयल गेल अछि। (सन्दर्भ: कविचूड़ामणिक काव्यसाधना, पृष्ठ~ 259~260)
एवं क्रमे दश वर्ष मे भेलीह कन्या दान काँ। योग्या प्रसस्त गुण युक्ता विभूषित बालिका।। हिनकर सकल गुण केर चर्चा चलल पृथ्वी बीचमे। ई बात पद्मानन्द सिंह नरेन्द्र सुनेलनि बीचमे।।20।।
अति सुन्दरी गुण शालिनी छथि तैं अहा हो व्याह जौं। अइ बालिका काँ संग चन्द्रानन्द सिंहक ठीक तौं ।। कारण निखिल गुण युक्त हमरो पुत्र चन्द्रानन्द छथि। ई बात रानी सौं बनैली भूप बजला पूज्य मति।।21।।
ई बात सम्यक मध्य पुनि बजलाह भूपति मोद मन। अनुमोदनो कय देल सभ जे छल सभा काँ सभ्यजन।। वंश क्वैलखो ई बात पण्डित उग्रनाथ*क कानमे। नृप केर चर पठबौल जे की टेढ़ जातिक शानमे।।22।।
नहि छोट मे हम देब कन्या ई यदपि बजलाह ओ। सभ बन्धु गण काँ प्रार्थना सौं कथा मे पड़लाह ओ।। ओ घटक केँ पठबौल देखै लै वरक गुण रूप केँ। पहिने यदपि सुनने छला सभ हुनक भव्य स्वरूप केँ।।23।।
झट पाग लट पट माथ धोती फाटले सन हाथ मे। फाटल फराठी काँख झोरी भष्म लेपल गात मे ।। चूड़ल सुपाड़ी मूँह बटुआ डॉर चून तमाकुलो। चुनबैत गप्प गढ़ैत सब टा दाँत मुँहक टूटलो।।24।।
मधबाक आँखिक तुल्य भूर विशिष्ट छाता तानने। गेला बनैली घटक रुपया लोभसँ हर्षित मने।। वर देखि केँ चुप्पे भेला गुण केर चर्चा मात्र की । गुण रूप वर्णन शेष शारद कै सकै छथि ठीक की।।25।।
बस देखि वर अयलाह क्वैलख घटक गुप्तहि रूप सौं। कन्या गतक आगू कहल सब बात विस्तर रूप सौं ।। सौंदर्य हुनिकर की कहू ओ विष्णु कॉ अवतार छथि। ओ रूपमे कन्दर्प दर्प विनाश काँ हित ऐल छथि।।26।।
आजानि हुनिकर वाहु लोचन कर्ण तक विस्तार छनि। जनु पाकले तिलकोर काँ फल ठोर दुनू लाल छनि।। मुख केर सुषमा चन्द्रमा सौं दैत लज्जा व्हैत अछि। सकलक दिवस मलीन विष काँ बन्धु जै विधु दीन अछि।।27।।
एहनो द्विजेशक जोति सौं अरविन्द पुनि कुम्हलाइ अछि। उपमा हुनिक की देव् हुनि मुख अनुपमेय यथार्थ अछि।। रवि तुल्य तेज तथापि मृदुता चन्द्रमा काँ धाम सन। रिपु रूप कानन केर पंचानन थिका पुन शान्त मन।।28।।
गुरु तुल्य विद्या केर प्रेमी वित्तमे कुबेर सन। ओ दानमे छथि कर्ण सन रण क्षेत्रमे छथि पार्थ सन।। ओ गानमे ब्रह्मा तनय सन क्रोधमे यमराज सन। अत्यन्त चित्त उदार पूजा पाठमे रत राति दिन।।29।। * रानी चन्द्रावतीक पिता उग्रनाथ झा (वर्ष-2, अंक -4, अप्रिल-1934 ई.)
हुनि रूप गुण वर्णन अशेष न शेष कै सकइछ सखे। पुन की कहू हम तदपि किछुओ कहि सुनावल निज मते।? ई कार्य अपने आशु पण्डित जी पुछै छी बात जौं। आनन्द पूर्वक कैल जाय विचार दै छी स्वान्त सौं।।30।।
सुनि जा बनैली संग पजियारक नरेशक सामने। सिद्धान्त करवावल धनो लुटबौल भूपति कंचने।। जा विन्ध्यपर्वत भेल व्याह परीछ ऐली कामिनी। सुभै सुहागिनि गीत गाबथि मत्त गज सन गामिनी।।31।।
आहा बनैली केर शोभा ताहि कालुक की कहू। हेरम्ब शारद शेष कहि न सकैछ पुन हम की कहू।। यद्यपि सुधांशुक कौमदी छिटकैत छल आकाशमे। पावस ऋतुक भ्रम छल सकल जन कैं अहा ! तै ठाममे।।32।।
कोठाक ऊपर कामिनी चमकैत छल जनु दामिनी। घन तुल्य केशक वेश होमक धूम मानू यामिनी।। ठनका जकाँ आतीस बाजिक शब्द दिव्य गुलाब जल। छिरकैत छल बरखा जकाँ बुझाइ छल जल वा कि थल।।33।।
गहनाक झझंकार झिंगुर शब्द बूझि पड़ैत छल। नटुआक चित्र विचित्र वस्त्र मयूर तुल्य बुझाइ छल।। ओ केश कारी ताहि ऊपर मालती माला कोना। वक पंक्ति नीलाकाशमे विचरैत अछि मानू जेना।।34।।
ई देखि सब मुग्धे भेला सुत ओ बधू कैं मोद सौं । पद्मावती रानी चुमावल दै निछावर प्रेम सौं ।। बीतैत देरी ह्वैछ की सुख केर वासर यामिनी। जहिना चमकि घन मध्य शीघ्रहि लोप होइछ दामिनी।।35।।
आनन्द पूर्वक बीति गेल कतेक दिन उत्सव जकाँ। बहुतोक रंक धनीक भेल बुझैत सुख इन्द्रे जकाँ ।। हा ! हा ! अचानक काल तावत भूप चन्द्रानन्द। कैं। लै गेल सब दिन हेतु पुष्पक पर चढ़ा बैकुण्ठ कैं।।36।। (वर्ष~2,अंक~5, मइ-1934 ई.)
हा ! शोक मेघक घन घटा आयल बनैली राजमे। सब केर आँखिक नोर धारा बहि चलल तइ कालमे।। हा ! बृद्ध भूपति बृद्ध रानी केर हम की कहू दशा। दुनूक कानक शब्द सै लगलीह हा ! उलटै रशा।।37।।
दिन मध्य जम्बुक केर रजनी मध्य कौआ शब्द सौं। दोसर जनक नहि शब्द सूनल जाइ छल अति जोर सौं।। शुक आदि पक्षी तक्क दाना खैब। दुख सौं छोड़लक। गज अश्व बिनु मालीक वत जैबाक हित रजु तोड़लक।।38।।
वैधव्य नव दुख दुःखिता चन्द्रावती रानीक की । दुःख केर हम लीखू दशा जे सभ छली मानीक की ।। पर्यक सौं उतरैत छली नहि जे अहाँ ! एक छल। से मुर्छिता पृथ्वी पड़लि नहि ह्वैछ चेष्टा एक छल।।39।।
सखि वर्ग शीतल वारि चन्दन आदि काँ उपचार सौं। मूर्छा छोड़ावल जागली नाना सुतर्क प्रचार सौं।। जगलीह पुन खसलीह बहुतो काल ओ पड़ले छली। तर्की जनक शुभ तर्क नासौं जागृताsवस्था भेली।।40।।
जगितैहें ओ बजलीह हम पति संग जरबे प्रेम सौं। गुरु वर्ग आबि निवारि देलन्हि बहु प्रकारक युक्ति सौं।। कारण अहाँ काँ भार मिथिला पालवा काँ अछि सुनू। तैं बात मानू पुत्रि के ई धर्म काँ मारग सुनू।।41।
सुनि कै अगत्या मानि बहुतो दिन छली शोकाकुला। अछि भार मिथिला केर लगली अनमनामे दुर्बला।। श्री भद्रकाली केर मठ बनबौल क्वैलख गाममे। खुनबौल सुन्दर एक पोखरि माइ सौं तइ ठाममे।।42।।
ओ माइनर तक पाठशाला फीस बिनु कय देल अछि। मैट्रीक होएत फीस बिनु ई घोषणा भय गेल अछि।। चरवाह तक जनिक प्रसादें पास सम्प्रति माइनर। अछि गाम क्वैलख मध्य ई गप के कहू नहि जान नर।।43।। (वर्ष-2, अंक-6, जून-1934 ई.)
ओ अस्पताल बनाय रोगी हेतु राखल डाकटर। तजि देल रोगो बाट क्वैलख केर जनिकर मानि डर।। निज भाइ लोकनि हेतु बहुतो कीनि पृथ्वी छथि देने। आवास हेतुक उच्च उच्च प्रसाद छथि बनबा देने।।44।।
बहिनौत बाबू मोद एफे पास इंजिनियर विषय। हुनके प्रसादे गेल छथि जे विज्ञ पटनामे पढ़य।। भतिजीक कन्यादनमे जे खर्च लाखों कैल अछि। परिवार वर्गक बात की खा। खा कतेक अघैल अछि।।45।।
दिन राति दीनक हेतु ताला की लगै अछि कोषमे। की दान भागक कर्मचारी रहि सकै छथि रोषमे।। द्विज केर मुख सँ शब्द होइत किच्छु देरी होइछ की। नभ थल रसातल केर वस्तुक हेतु नहि ई ह्वैछ की ।।46।।
गुरु सौं कमी की द्वार पंडित हुन न अल्पो मात्र छथि। निज योग्यता अनुसार के सत्कार के पाबैत छथि।। हुनि माम काघिषणकनेको शुक्र सौं छनि की कमी। जे इम्तिजाम करैछ बहुतो कालमे सुन्दर दमी।।47।।
हुनि यश पताका देश मिथिला मात्र मे फहराइछ की। देखू अहाँ वाराणसी चलि यौत सम्प्रति ह्वैछ की ।। श्यामा तथा शिव केर मन्दिर श्रीमती वनवौलअछि। परकाश हेतुक दिव्य विजुली ज्यौतिके जरवौल अछि।।48।।
विद्या भवन वनवौल पढ़बा हेतु मैथिल छात्र कै। भोजन अनेक प्रकार काँ ओ दैत छथि निज छात्र कै।। यदि श्रीमती सौं होइत नहि शुभ खर्च मैथिल छात्रके। पढ़नाइ काशीमे कठिन भै जाइत विद्वच्छात्रके।।49।।
मैनेजरो अति योग्य सिंहवार कै छथि बाबू तहाँ। रहतैक मैथिल छात्र के पूण लेश क्लेशक की तहाँ।। सब केर अछि जड़ि धर्म्म से विद्याक द्वारा होइत छथि। से पढ़थू मैथिल हेतु तैं श्री श्रीमती तैयार छथि।।50।।
गंगा*क तुल्या श्रीमती रानी हमर चन्द्रावती। जीबथु जखन तक गंगजल अक्लेश युक्ता धीमती। श्री युक्त बबुआ मिश्रकाँ सुत मिश्र काशीकान्त जी। क्वैलख निवासी तारिणी पदमे निवेदन दैछ ई।।51।। * रानी चन्द्रावतीक नैहरक नाम गंगा छलनि। (वर्ष~2, अंक~7, जुलाइ 1934 ई.)
मधुप जीक ई प्रारम्भिक रचना छनि आ 'प्रभात'मे स्वहस्तलिखित छनि, तेँ कोशिश कैल अछि जे ऐतिहासिक महत्वकेँ देखैत हू-ब-हू प्रस्तुत कयल जाय। उतारबामे कतौ जँ व्यतिक्रम भेल हो आ से कतौ-कतौ भेले हैत,एहि हेतु हमरा क्षमा कयल जाय। 'रानी चन्द्रावतीक विषयमे 'प्रभात'क अनेक अंकमे अनेक रचनाकारक गद्य-पद्य रचना अछि। स्वतन्त्र पोथीक रूपमे न्यायाचार्य आनन्द झाक छपल छनि रानी चन्द्रावती चरित। हम रानी चन्द्रावतीक अति संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत कय रहल छी,जे हमर पोथी 'कोइलख'मे प्रकाशित अछि। रानी चन्द्रावती बनैली राज(पूर्णियाँ)क रानी छलीह।हिनक नैहर छलनि कोइलख।ई पुबारि टोलक खौआरे नाहस मूलक प. उग्रदत्त झा वैयाकरणक पुत्री रहथि। हिनक जन्म सन 1299 साल चैत्र शुक्ल चतुर्थी 1891ई.मे भेलनि। ई चारि भाइ आ तीन बहिन छलीह। हिनक नैहरक नाम गंगा छलनि। दुनू छोटि बहिनक नाम यमुना एवं सरस्वती छलनि। हिनक विवाह नौ-दस वर्षक वयसमे बनैली(पूर्णिया)क राजा पद्मानन्द सिंहक पुत्र कुमार चन्द्रानन्द सिंहसँ भेलनि। ओहि समय कुमार साहेबक अवस्था करीब पन्द्रह वर्ष छलनि। माझिल बहिन यमुनाक विवाह गामेक पछबारि टोलक प.जानकीनाथ झासँ भेलनि, जनिक बालक भेलथिन उमानाथ झा(इंजीनियर साहेब) एवं रमानाथ झा। छोटि बहिन सरस्वतीक विवाह मनियारीक जमींदार ब्रजनन्दन ठाकुरसँ छलनि। भाइ लोकनि अल्पायु भेलथिन। एक भाइ गीतानाथ झाक बालक छलथिन वीरेन्द्रनाथ झा। गंगादाइक विवाह भेलनि विन्ध्याचलमे। सासुरमे हिनक नाम पड़ि गेलनि पतिक नामपर चन्द्रावती।विवाहक चारिए-पाँच वर्षक बाद, जखन ई लगभग पन्द्रह वर्षक छलीह, विधवा भs गेलीह। हिनका पर तँ विपत्तिक पहाड़े टूटि पड़लनि। अपन योग्यता-क्षमता, चतुरता तथा दृढ़ इच्छाशक्तिक बलपर राज्यक शासन-सूत्र अपन हाथमे लेलनि आ एक-सँ-एक महत्त्वपूर्ण ओ स्थायी कीर्ति स्थापित कs गेलीह, जे आइयो हिनका जीवित रखने छनि। हिनक किछु कीर्तिक उल्लेख एतs कयल जा रहल अछि --
01.अपन नैहर(कोइलख)मे चन्द्रानन्द फ्री मिड्ल इंग्लिश स्कूलक स्थापना 1924मे कयलनि। 02.कोइलखक पुबरिया सीमापर माइक नामपर पोखरि आ ओकर पुबरिया मोहारपर भव्य मन्दिरक निर्माण करौलनि, जाहिमे माता-पिताक नामपर उग्रेश्वरी-उग्रेश्वर महादेवक प्राण-प्रतिष्ठा कयलनि। 03.कामख्यामे रहनिहार लोकक जल-संकट देखि पहाड़पर पोखरि खुनौलनि एवं ओकर रखरखावक व्यवस्था कयलनि। 04. श्री वैद्यनाथ धाममे अत्यन्त मजबूत सुसज्जित कोठा बनबाय अपन तीर्थ-पुरोहित बदरी द्वारी(पंडा)केँ दानमे दs देलनि। 05.भागलपुरमे ' शिवतारिणी हॉस्पिटल( स्त्रीचिकित्सालय)क आर्थिक दुर्दशाकेँ देखि लाखो टाका दानमे दs ओहि संस्थाकेँ पुनर्जीवित कयलनि। 06. वाराणसीमे बनैली राजक कीर्तिमे तीन टा संस्था छल। रानी चन्द्रावती 1934ई.मे ब्रह्मनाल(कचौड़ी गली)मे श्यामा मन्दिरक स्थापना कयलनि। अनेक दान-धर्मक विभाग रहलाक कारणे एकर विशेष महत्त्व अछि।
श्यामा मन्दिरक प्रसंग ज्ञातव्य थिक जे रानी साहिबा डेढ़ लाख खर्च कs चारि मन्दिर आ एक भव्य विशाल चरिमहला मकान बनबौलनि। चारू मन्दिरमे पहिल-अपन इष्टदेवता श्री 108 श्यामा मन्दिर, दोसर- पतिक नामपर श्री 108 चन्द्रेश्वर महादेवक मन्दिर, तेसर- श्री रामजानकी मन्दिर आ चारिम- अपन भतीजी दिवांगता मालतीक नामपर मालतीश्वरी लक्ष्मीक मन्दिर छनि। मकानमे 'श्यामा महाविद्यालय'क स्थापना कयलनि, जाहिमे वेद,वेदान्त, न्याय, व्याकरण, ज्योतिष तथा अंग्रेजीक पढ़ाइ होइछ। संस्थाक सुचारु संचालनक हेतु पाँच सदस्यीय मैनेजिंग कमीटी बनौलनि। प्रथम कमीटीमे रहथि - कुमार रमानन्द सिंह(Residing Trustee), काशीनाथ झा, उमानाथ झा, जगदीश ठाकुर तथा भागलपुरक ओकील सूरज प्रसाद। वर्तमान कमीटीमे छथि- श्री राजेन्द्रनाथ झा(Residing Trustee), डा. संतोष सिंह ठाकुर, श्री प्रसन्न कुमार झा, श्री शैलेश्वर मिश्र तथा श्री सत्यनारायण झा। रानी साहिबा प्रत्येक संस्थाकेँ अमर बना देबाक हेतु रजिस्ट्री मोसाबिदामे एहि विषयक स्पष्ट उल्लेख कयने छथि जे मूलधनक कहियो क्यो कोनो हेतुक व्यय नहि कs सकैछ, केवल ओकर सूदसँ कार्यसंचालन होयत। श्यामा मन्दिरकेँ दस लाख दान देलनि आ आगुओ कुल धन एही संस्थाकेँ देबाक वचन देलनि। श्यामा मन्दिरक खर्चक रूपरेखा वर्णित अछि। महगीक कारणे बहुत काज शिथिल पड़ि गेल अछि, किछु बन्दो भs गेल अछि। मद अछि- मन्दिरक संरक्षण आ मरम्मति; देवताक भोग-राग; संस्कृत महाविद्यालयक देखरेख, शिक्षकक वेतन, छात्रलोकनिक भोजन, छात्रावासक खर्च, चिकित्सा आदिक खर्च; काशीसँ अन्यत्रो अंग्रेजी पढनिहार छात्रकेँ वृत्ति देल जाइत छल( हमरो मनीऑर्डरसँ दस टाका मास आबि जाइत छल); अभ्यागतक भोजन खर्च; औषधालय; अनाथ बालककेँ मासिक वृत्ति; विधवा ब्राह्मणीकेँ सहायता; दाहसंस्कारक हेतु मदति आदि।
हिनक कीर्ति देखि लॉर्ड विलमिंगटन(Viceroy and Governor General of India) एक सनद प्रदान कs हिनका 'रानी'क उपाधि दs अलंकृत कयलथिन। सनदमे लिखल अछि: " I hereby confer upon you the title of 'Rani' as a personal distinction." एतs ई कहब अप्रासंगिक नहि होयत जे ओहि समय पर्दाप्रथा एहन छलैक जे सम्राटक प्रतिनिधि बनि आयल भागलपुरक कमिश्नर रानी साहिबाक ड्योढ़ीपर स्वयं आबि पर्दाक बाहरेसँ हुनका ई समाचार देलथिन। रानी साहिबाक निधन माघ शुक्ल नवमी शनि 1342 साल,तदनुसार एक फरबरी 1936 ई.केँ भs गेलनि। हिनक श्राद्ध माझिल बहिनक जेठ पुत्र उमानाथ झा कयलथिन। (स्रोत:कोइलख( ग्रामगाथा) : लेखक~ हितनाथ झा, पृष्ठ~39-41) संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-7 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-8 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-9 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-10 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.३.सुभाष कुमार कामत- चर्चित गाम नौआबाखर सुभाष कुमार कामत चर्चित गाम नौआबाखर
गामक नाम सुनैत मातर सँ कतेको रास मोनमे ख़ियाल आबय लगैत अछि। गाममे हमर प्राण आ जान बसैत अछि। विशेषतर ओहि माटिक सौंधी सुगंध सँ गमकैत हमर गाम। पाठक'क मोनमे इहो सवाल उठत जे कि आखिर गाम कहबै ककरा। एकटा छोटछिन मनुखक बसाबट जे शहर - कस्वा सँ छोट आओर कोनू लघु समुदाय रहवासिय स्थल सँ पैघ होइत छैक। अर्थात जाहिठाम लगधक 75 सँ 1000 संख्याँ धरि घर रहैत होय आओर लोक एक दोसर सँ चिर- परिचित रहैत य। ग्रामीण प्रक्षेत्रमे लोक खेती आओर पशुपालन व्यवसाय पर निर्भर रहैत अछि। महात्मा गांधी जी कहनै छलैथ भारतक आत्मा गांउमे बसैत छैक। अखनो बदलल परिस्थितिमे सुन्नर देहात देखैक लेल भेट जाएत। आधुनिक लोक आइयो बहुत किछ सँ सुविधावंचित अछि, तखनो लोक खुशी सँ संतोषप्रद जीवन - यापन कय रहल य। एहिकेँ सुच्चा खाँटी गाम कहू तँ कोनो अतिश्योक्ति नै। देशमे सब साल गामके संख्याँमे गिरावट आबि रहल अछि,जे चिन्ताक विषय थीक। अनेको लोक नित्यत: प्रवासी बनि रहलय आओर जीवन यापनक लेल प्रदेश आ विदेश जा रहल य। शहरी चकाचौंधमे बेसी रमल रहैत आओर अपन मूल समाज सँ कटि जाईछ। आन प्रदेशमे लोक कतबो सुखी संपन्न रहल छल, मुदा करोना काल आओर लाउक डाउन अवधिमे अपन गाम लौटेक लेल मजबूर धरि कयल गेल रहैक। हमरा मिथिलामे सेहो बहुत रास गाम अछि। सभ गामकेॅं किछु नै किछु इतिहास, भूगोल छैक, आ अपन परिसीमन छैक। अपने लोकनि मिथिलाक बहुत गामक नाम सुननै होयब आओर बूलल सेहो होएब। चलू चलै छी मिथिलाक कोसीकन्हा क्षेत्रक एकटा गाम नौआबाखर देखय- घुमय। नवबखार सँ नउबखर आओर नउबखर सँ नौआबाखर। Nowabakher, Nauwabakhar, Nauabakhar सरकारी कर्मचारी सभ जिनका जे मोन भेल से रिकार्डमे लिख देलैथ। कोनू बोली-वाणी आ भाषा कठोरता सॅं सरलता दिश जायत अछि। जेना -: फुलपराग सॅं फुलपरास, गार्डन बाग सँ गर्दनी बाग़, वैद्यनाथ सॅं बैजनाथ, जगन्नाथ सॅं जगरनाथ। ठीक तहिना गामक नाममे रसे - रसे परिवर्तन होईत नौआबाखर भऽ गेलैक। दूर दराजके लोक तँ आइयो नौआबाखर केॅं लौआबाखैरक नाम सँ जानैत - बुझैत अछि। अलापुर परगानक नौआबाखर, मधुबनी जिलाक फुलपरास अनुमंडलके घोघरडीहा प्रखंडमे अवस्थित छैक। नौआबाखर, रेलवे टीशन घोघरडीहा सँ 7 किमी० दक्षिण अछि । बाबाधाम (देवघर) रस्तामे जहिना जिलेबिया मोड़ छै, ओहि सँ कम मोड़ नै हएत एतय। गामक नामकरणके पाछाँक किदवंती ऐ तरहक अछि; कहल जाएत अछि जे- पहिने एतय बौद्ध भिक्षुक निवास स्थान छल। नव+बखार अर्थात नव- नौ , बाखर - अनाज रखैक बड़का बखारी वा ढ़ेक। बौद्ध भिक्षुक सभ एतहि अनाज संग्रहीत कैर रखैत छलाह। दोसर किदवंती अछि - एहि क्षेत्रक भूमि उपजाऊ रहल अछि,तेँ छपरा आदिक बाहरी नोकिरहारा - व्यापारी लोक एतैह आबि रहि गेलैथ। कियाक तँ ई स्थान ऊँचगर छल। एतहि अपन समान, अनाज- बुतात आ खेती सँ संबंधित ओजार सभ रखैत छलाह; से आगन्तुक व्यापारी लोक नउबखर कहै लागल । नउ - नौ (9) आओर बखर - खेत जोतेह वाला औजार सभ जेना - कोदाईर, खुरपी, हांसू, छीटा, हर, हरीश, चौकी, पालो, बरद आदि। गामक चौहद्दी तँ बतौनाई बिसैर गेल छलौंह। यथा- पूभर - मैंनहीं , पछिम - धावघाट , उत्तरमे हटनी आओर दक्षिणमे निघाम- सरौती। दक्षिण भाग मानचित्रमे राजस्व मौजा देवनाथपट्टी छी, मुदा सामाजिक रूपेँ नौआबाखर - देवनाथपट्टी एके गाम छी, एके डिबारकेँ ब्रह्मस्थानमे पूजैत आबि रहलैक हेन। एतुका डिहवार बाबाके नामकरण 'देवनाथ' छन्हि। मूलतः ई कियोट/केउट बाहुल्य बस्ती छी, जतय बारहो वर्ण निवास करैत छैक। कियौट(केउट) जाति एकसांझक भोजमे बारह मोन चाउरक भात खाईत छैक। गामक चौहद्दी नामकरणके पछाँ सेहो किदवंती अनुसारे सरौती - जतय औंती सड़ैयल जाएत छल - गाम गहिंर छल बेसी पानि रहैत छलैक तँ पटुआ गोरल जायत छल। एतहि सँ सोन तैयार करि जूट कारखाना पठायल जायत छल। अखनो पटसनक खेती देखै लेल भेट जाएत। ई किसान आ कृषि मजदूर लेल नकदी जजात मानल जाईछ। मैंनही नामकरण पछाँ ई कहल जाएत अछि जे धारक एतिह पैघ-पैघ मैंन छल अर्थात पाईन खूब बेसी रहैक। मल्लाह सभ खूब माछ मारैत छल। धावघाट- धारक घाट जतह मल्लाह लोक नाव बान्धैत छल। हटनी - जे हटि के बसल नव गाम छी। गामक बिचोबीच बिहुल धार (नदी) बहैत अछि। बिहारके नदियां नामक किताबमे सेहो गामक चर्चा भेलि अछि। दरभंगा महाराज कचहरी सेहो छल, मुदा नँय आब कचहरी रहल ; नै ओ साबिकक लोक सभ आब रहल। गाममे मवेशीक कारावास (ढाठ) सेहो छल जे जिला परिषद सँ संचालित होईछ। गाममे हिंदू आओर मुसलमान दूनू सम्प्रदाय - धर्मक लोक बसैत अछि । हिंदूमे केवट (केउट), कुंभहार, नाई, तेली, सूरी, हलवाई, मोची, डोम, बढ़ई आ राजपूत य तँ मुसलमानमे मोमीन, धुनियाँ, धोबी, कुजराके आवादी छैक। कतेको मंदिर यथा, महादेव मंदिर, काली मंदिर, हनुमान मंदिर, राधाकृष्ण मंदिर, बिसहारा स्थान, कमलेसरी पौखैर आओर तीनटा मस्जिद सेहो अछि। गामक लोकके पेशा कृषि अछि। जाहिमे मुख्य फसल अछि धान, गहूंम, खेरही (मूंग), मडुआ, पटसन(चन्ना-चन्नी)सनै, पटुआ, साग-सब्जी, आम, लीची, बांस, केरा, माछ आओर पशुपालनमे (गाय, महिंस, बकरी, कुक्कुट, बतखक पालन) आओर माटिक बर्तन आय के मुख्य स्रोत छी। । मुख्य बाजार पहिले नहरिया आ मधेपुर छल, आब मधेपुर घोघरडीहा अछि । घोघरडीहा हाट मे सरकारी ITI, महिला टिचर्स ट्रेंनिग, डीग्री कालेज, शिक्षक प्रशिक्षण केन्द्र, अंचल सह प्रखंड कार्यालय, पुलिस थाना, रेलवे स्टेशन (फुलपरास विधानसभाक एकमेव रेलवे स्टेशन) बिजली कार्यालय, डाकघर, अस्पताल, सरकारी अनेक बैंक, गाड़ी एजेंसी आदि रहैत ओना घोघरडीहा उत्तर बिहारक अनाज मंडीमे सुमार छै। एतुका लोक राजनीतिमे सेहो सक्रिय रहल अछि, श्री लालदेव कामत विधानसभा प्रत्याशी (BSP) रहि चुकलाह जे वर्तमानमे भारतीय जनता पार्टी म झंझारपुर जिलाके सहप्रभारी छथि। श्री हीरालाल चौधरी उप प्रमुख बनल छलाह, श्री बलराम साहु जिला पार्षद रहि चुकलाह, श्री रंगलाल चौधरी दू खेप पैक्स० अध्यक्ष रहलाह। प्रमोद ठाकुर (बेचू ठाकुर) दूनू पति-पत्नी पंचायत समिति सदस्य रहलाथि। संजय कुमार निराला मुखिया बनलाह। अब्दुल जलीलके पत्नि सरपंच बनल छलीह। श्रीमती सुमित्रा देवी जिला परिषद प्रत्याशी छलीह, विनोद कुमार कामत मंडल अध्यक्ष भाजपा० रहथि। गाममे शिक्षाके प्रति लोक जागरूक भेलथिन। भारत सरकार आओर बिहार सरकार दूनू जगह नौकरीमे कार्यरत अछि। श्री रामलोचन कामत औभरसियर साहेब आ शिबलोचन कामत दूनू भाय शिक्षक छथि। श्री उमाकांत कामत (BSF), मनोज कुमार (SBI), जय प्रकाश कामत (BSF), राजू जी, अमलेश कुमार आओर अनेको गोटय रेलवेमे कार्यरत अछि। डेढ़ दर्जन सँ अधिक लोक शिक्षक छथि - श्री महाकांत प्रसाद उच्च माध्यमिक शिक्षक संघ मधुबनीक जिलाध्यक्ष रहि चुकल छथि। अवधेश साहु, राजेश कुमार सुमनजी, विशेश्वर कामत, बलराम चौधरी, सुभाष कुमार कामत शिक्षक बनय सँ पूर्व IFFCO केर हेड क्वार्टरमे कार्यरत रहल, ओहि सँ पूर्व कइकटा बैंकमे सेवा दऽ चुकल छथि। कैलाश कुमार आनंद, उदय वर्मा, राजकुमार, बैजू मंडल, मो० फिरोज, ई० रोहित कुमार ( SDO), ई० राहुल कुमार (पोलिटेकनिक), डाॅ अशीष कुमार (वेटनरी), डाॅ अमन कुमार चौधरी (डेंटिस्ट ), प्रो० बेचन साह , मो० शमशेर ग्रामीण पुलिस पदस्थापित अछि।
गामक लोक साहित्य - कला आओर संस्कृति सँ सेहो जुड़ल अछि - समीक्षक श्री लालदेव कामत जी, समाजसेवी केर संग- सँग स्वतंत्र पत्रकार आओर लेखक रहल छथि। कोसी संदेश मैथिली त्रैमासिक पत्रिकाक सह संपादक छथि, गाममे कतेकौह बेरि मिथिला विभूति स्मृति पर्व समारोह आयोजित केलनि आ 'सगर राति दीप जरय' कथा कार्यक्रम सेहो आयोजित करवौने छथि। हुनक किछु पुस्तक सेहो प्रकाशित अछि - अजेय भारत - अटल भारत, दिव्य दृष्टि, विभृति आदि। महाकांत प्रसादजी सेहो पत्र- पत्रिकामे रचना लिखैत रहैत छथि । ऐ पाँतिक लेखक सेहो कविता आओर बीहनिकथा लिखैत रहै छथि। कैलाश कुमार आनंद जीक रचना पत्र - पत्रिकामे कम देखैक लेल भेटय, मुदा सोशल मीडिया पर हुनक गीत आ कविता खूब सूनैय पढ़ैय ले भेटैत अछि। नाटक आओर अभिनयमे प्रमुख पात्र रहलाह अछि- महाकांत प्रसाद, बलराम साहु, रामकुमार कामत, बैजू मंडल, प्रदीप भंडारी, गोपाल सिंह, उदय चौधरी, रामलोचन कामत, मनोज कामत, किसुन राम, सुभाष कुमार कामत, लक्ष्मण साह। लक्ष्मण साह कतेको मैथिली फ़िल्ममे काज कैरि चुकल य। गाममे पहिलेक अपेक्षा आब बहुत रास परिवर्तन भ' गेलैक हेन। नौआबाखर गाम आब गाम नै रहल, दरसन् 1995 ई०मेँ सबसँ पैघ रकबाके मौजा रहने पंचायत बनि गेलैक। नौआबाखर, हटनी, सहोरबा, धावघाट आओर धनपतबरही मिलाके पंचायत परिसीमन बनि गेल य। पंचायत नामकरण नौआबाखर गामेक नाम पर अछि। गामक जन आवादी करीब तीन हजार होयत। मिडिल स्कूल आब उच्च माध्यमिक विद्यालय कोड नौआबाखर बनि गेलि। बिहार सरकार द्वारा पंचायत भवन आओर बाढ़ राहत केन्द्र सेहो बनि गेल, अस्पताल बैनि रहल य। पंचायतक सहोरबा गामक निवासी श्री विरेन्द्र प्रसाद वर्मा जी माननीय न्यायमूर्ति बनलाह पटना हाईकोर्टक। एही पंचायत'क हटनी गामवासी अजीत आजाद जीके हुनक रचना पर साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल छन्हि। युवावर्ग सभ दरभंगा, पटना, दिल्ली, कोटा, बैंगलोर, कोलकाता आ देशक आन - आन क्षेत्रमे जाकय उच्च शिक्षा हासिल कैरि रहिलय हेन। गामक लोक सभ आबि बुझि रहलय जे अपन मातृभाषा केँ। संविधानके अष्टम सूचिमे आबि गेला सँ भाषा (मैथिली) रोज़ी रोटी लेल साधन बनल अछि। युवती सभमे अपन मातृभाषा मैथिली विषय सँ आगा पढ़बाक रूचि जागि रहिलय य। चंदा कुमारी मैथिली विषयमे स्नातकोत्तर पटना विश्वविद्यालय सँ कयलिह, संगहि मधुबनी पेंटिंग सेहो निक बनाबै छथिन। प्रीति कुमारी, बबीता कुमारी,आरती कुमारी आओर संगीता कुमारी संगे आरो युवती सभ मैथिली विषय प्रतिष्ठा सँ ग्रेजुएट भेलिह अछि। गामक युवती सभ सेहो सरकारी नौकरी कैरि रहिलय य। मुस्लिम समुदायके युवातुर सभ रोजी- रोटीक खातिर आब विदेश जाए लागल हेन। गामक किछु नवयुवा वहिक्रमके लोक शदिग्भ्रमित सेहो भ गेल, जे व्यसनमे लिप्त रहि सोशल मीडिया आओर अनर्गल कुसंगतमे पड़ि अपन वर्तमान बर्बाद कैरि रहलय य। गामक चौक हाट- बाजार बनि गेल छैक। किछु आदमी गाम सँ वाणिज्य करि रहलय, जाहिमे सफल अछि- अरविंद साहु (अनाज), उमाकांत कामत(हार्ड वेयर), राजकुमार साह(मिष्ठान और फल), अजीत राम (साइबर कैफे), प्रहलाद कुमार (दवा), लवकुश कुमार (बर्तन भाड़ा), सुंदर लाल चौधरी (मार्बल्स और पत्थर), नरेंद्र चौधरी उर्फ़ लालाजी आओर तारकेश्वर मंडल टेंट साउंड कारोबारी अछि। नवयुवक लोकनि काली पूजा आओर छठिपूजामे गाम आबैत अछि। प्रेम आओर सौहार्द सँ पूजा- पाठ करैत अछि। आब लगधक सभ पूजा आयोजन हुअ लागल जेना- कृष्ण जन्माष्टमी, गणेश पूजा, विश्वकर्मा पूजा, सरस्वती पूजा, तजिया (दाहा), काली पूजामे मेला लगैत अछि। तीन खेप नामी यज्ञ एतय अतितमे सुसम्पन्न भेल अछि। आब गामक शैक्षणिक माहौल बदैल गेल संगे अर्थव्यवस्था सेहो। आखरिमे कवि मंत्रेश्वरक अनचिंहार गाम, लालदेव कामतके - डेरबुक गाम आओर सुभाष कुमार कामतकेर- हरेयाल गाम कविता याद अबैत अछि। सुभाष कुमार कामत पाँति एहि तरहक रचल पढ़ने होयब :- ....�.बढ़ हरास भेलि जखन देखलो टेलीविज़न स्कीन पर गुमशुदाक सूचिमे हरायल अपन गाम। - सुभाष कुमार कामत, +2 शिक्षक (हिंदी), उच्च माध्यमिक विद्यालय नौआबाखर, घोघरडीहा (मधुबनी) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.४.लालदेव कामत-२ टा लघुकथा- अगों आ वन्देमातरम लालदेव कामत २ टा लघुकथा- अगों आ वन्देमातरम १ अगों (लघुकथा)
मिथिलांचल सँ बरदक संगे की - की ने उपटि गेलैक हेन। अगहन मास आबै सँ पहिने बीबी गोल्ड धानक कटनी हटनीमे भ' गेल रहैक। गिरहत सब दौनी कराबय वर्गादार केँ तगेदा कयल। थ्रेसर पर धरि एक खलिया बोरा लऽ गेल छल। से पाँचो कोला खेतक मनजय देखय- सुनय लेल फराक - फराक दौनी कराओल गेल। आब नापी टीन सं करय लेल उद्यत भेल नेवतिया तँ कुला बाबू हाँ- हाँ.... कहैत मना केलाह आ पाँच सूप धान पृथक क' राखै ले कहलनि। हेमन्त ऋतु क' सुआगत धी- बेटी ऐ अगौं बाला धान सँ गामपर करतीह। बेटेदारनि बजलीह बाबू यौ हमरो पोती मुरही किनय ले अँगो दू सूप धान लिअ कहि गेल रहय से एकरंगकेँ दूठाम बाँटि दैत छीयैन। धरि अगों पहिले जेकाँ आब जगजियार शव्द उच्चारित लऽ कछमछाईत रहल।
२ वन्देमातरम (लघुकथा)
पचता गहुंमक बौग भ' चुकल छैक। आरिक पछवरिया खेतिहर कमाल आ बकिम सेहो जऊ बुनलक आ सुभाष केर जनमल बिहैन केँ धांगैत ट्रेक्टर पूभर ल' गेल। धरि पह - नाला बनबैत अरविन - रविनके कवित् सुनि सबके सब मगन भऽ उठल रहय। जजात नोकसान करबाक गप्प तर पड़ि गेलैक। केम्हरो सँ मोहन सेहो धराक दऽ आबि कहलक हौ कविजी मदरसा टोलमे गाबल भ' गेलह तँ हमरा सँगे चलह ने। इयह धरती माय बाला गीत- वंदे मातरम्..�.. गाबि शिवालय पर सुनबिहय! ऐ सँ तँ एकता बढ़ै छै ने। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.५.परमानन्द लाल कर्ण-मायक लाल परमानन्द लाल कर्ण मायक लाल घर मे पतिदेवक तस्वीर पर लागल हार सुधाजी के डोला के राखि देने छल । बुढ़ापा मे असगर पीड़ा असहनीय आ हृदय विदारक होयत अछि ।किछु सोचैत सोचैत सुधाजीक दिल दर्द सँ भरि गेल छल आ आँखि सँ ढ़व-ढ़व नोर गिर रहल छल । हुनकर घरवाला सँ जुड़ल सव चीज समेट बटोरि के आलमारी मे राखि देने छलथि । जे घर कहियो परिवारक खिलखिलाहट सँ गुलजार छल आई ओ एकदम शांत भऽ गेल अछि । ई सन्नाटा सुधाजी के काटऽ दौड़ैत छल । सुधाजीक पति रमेशजीक गुजरला किछु मास भेल छल । हुनकर क्रिया-कर्म में सव रिश्तेदार आयल छलाह ,मुदा आव सव रिश्तेदार अपना अपना घर चलि गेल छलाह । एहन नहि छल जे सुधाजी अकेले छलीह । हुनका दु टा बालक छलैन। दूनुक वियाह नीक परिवार मे भेल छल । पैघ बेटा सौरभक अपन कारोबार छल, हुनक कनिया रोहिणी गृहणी छलीह । छोट बेटा सुमन बाहर काज करैत छलाह । जाहि अफिस मे काज करैत छलाह ओहि ओफिस मे एकटा लड़की सँ हुनका प्रेम भऽ गेलनि । सौरभक वियाह भेलाक बाद रमेशजी के एहि सम्बन्ध मे पता चलल, तहन ओ सुधाजी सँ कहलखिन जे अहाँ सुमन से पुछू जे ई बात सही अछि। एक दिन सुधाजी फोन पर सुमनजी सँ पूछलखिन जे हमरा सबके सुनऽ मे आवैत अछि जे अहाँ कोनो लड़की पसंद केने छी । जौं ई बात सत्य अछि तऽ हमरा सबके वताऊ । हम सव पता लगावी जे ओ केहेन खानदान के छथि । एहि पर सौरभ कहलखिन,�माय ! हम अहाँ सँ किएक छुपायव, एकटा लड़की अछि जे अपने एरियाक अछि । मुदा बिना अहाँ सवहक सहमतिक हम कोनो बात नहि कहि सकैत छी ।� एहि पर हुनकर माय कहलखिन ओ तऽ ठीक अछि, मुदा जौं लड़की ठीक ठाक अछि आ परिवार ठीक अछि तऽ वियाह मे कोन अड़चन अछि । हमरा लड़कीक वायोडाटा भेजू आ लड़की के कहु जे अपना घर मे बात करथीन । सुमनजी ई बात अपन प्रेमिका सँ कहलखिन तहन ओ राजी भऽ गेलीह । घर पर ओ फोनक माध्यम सँ अपना माय के कहलखिन, �माय ! सुमन नामक एकटा लड़का हमरा ओफिस मे काज करैत अछि । हुनकर स्वभाव बड्ड नीक अछि, जौं अहाँ हुनका बाबुजी आ माँ सँ बात करतहुँ तऽ नीक रहितै। ओना अहाँ सव सोचि लिअ।� लड़कीक बाबुजी सुमनजीक बाबुजी सँ बात कऽ शादीक लेल तैयार भऽ गेलाह । एहि प्रकार सुमनजीक वियाह भेल छल । वास्तव मे सुमनजीक कनिया सुंदर आ शुशील छलीह । सुमनजी दूनु प्राणी माय-बाबुजीक महत्त्व बुझैत छलाह । हुनकर शादीक किछु दिन भेल छल । परिवार मे एक दोसर सँ मिलान सेहो रहैत छल । सुधाजीक तबीयत खराब रहैत छल । जखन धरि रमेश जिवैत छलाह, खान-पान आ दवाईक पूरा ध्यान रखैत छलाह ।सुधाजी के कोनो तरहक असुविधा नहि होयत छलैन। मुदा रमेश जीक गुजरलाक बाद हुनकर जीवन अस्त व्यस्त भऽ गेल छल । बाबुजीक क्रिया कर्मक बाद सुमनजी आ हुनकर घरवाली के नौकरी पर जेनाई जरूरी छल । तैं ओ दूनु प्राणी ड्यूटी पर चलि गेलाह । हुनका दूनु आदमीक इच्छा छल जे माय हमरा संग रहथि । मुदा जखन ई बात परिवार मे राखलथि तहन सुधाजीक बड़की बहु कहलखिन, �देवर जी अहाँ दूनु गोटे तऽ नौकरी पर चलि जायव,माँ जी अकेले घर पर बोर हेथिन तैं हुनका एहि ठाम रहऽ दिअऊ । हम नीक सँ हिनकर देखभाल करव । एहि लेल अहाँ चिंता नहि करु । ओ ई बात एहि लेल कहलखिन जे बाबुजीक पेन्शन आव माय के मिलतैन ,जौं ई सुमनजी लग चलि जेतीह तहन पेन्शनक पाई तऽ सुमनजी लऽ लेथिन, तैं ओ सोचलथि जे माय के हम अपना पास राखी । धीरे-धीरे समय व्यतीत भेल सुमनजी माय के दवाई-वीरोक लेल सव महिना भैयाक खाता मे पाई भेज दैत छलखिन। सव किछु ठीक ठाक चलि रहल छल । समयक संग सुधाजीक तबीयत पहिले सँ खराब रहऽ लागल । सौरभ आ हुनकर घरवाली धीरे-धीरे एना मुँह मोड़ऽ लागलखिन जे मानु सुधाजी सँ हुनका कोनो सरोकार नहि छैन आ ओ अपना जिंदगी मे मस्त छलाह । एक दिन सुधाजी अपन पैघ बालक सौरभ के कहलखिन, � बौआ हमर तबीयत ठीक नहि लागि रहल अछि । एक बेर डाक्टर सँ हमरा दिखा दिअ ।� एहि पर सौरभ जी कहलनि, �माय ! हमरा लग अखन समय नहि अछि । अहाँ अपने चलि जाउ ।� ताहि पर सुधाजी कहलखिन, � बौआ ! अहाँ तऽ जानैत छी जे हमर हालत ठीक नहि अछि । कतहुँ चक्कर खा के गिर जायत छी ।� तखन सौरभ कहलनि, �माय सुमन के फोन कऽ हुनका सँ पाई मँगवा लिअ । ओ पाई भेज देताह तहन हम अहाँक डाक्टर लग लऽ जायव ।� सौरभक बात सुनि सुधाजी हैरान रहि गेलीह आ कहलखिन-बौआ ! अखन तऽ सव महीना अहाँक बाबुजीक पेन्शन आवैत अछि, सुमन सेहो भेजने हेताह, अहाँ सेहो कमा रहल छी, तैयो अहाँ लग हमरा लेल पाई नहि अछि । सुधाजी ई बात सुनि बड़की बहू कहलखिन - �केहन अहाँ माय छी जे अपना बेटाक पाई पर नजरि राखैत छी । अखन कोरोनाक कारण सव काम धंधा चौपट भऽ गेल अछि आ सुमनजी तऽ नीक दरमाहा पावैत छथिन, हुनका लेल कोनो परेशानी नहि हेतनि ।� बहूक बात सुनि सुधाजी कहलखिन। �कनिया ठीक अछि । हमरा कनि सुमन सँ बात करा देव ।� ई सुनैत ओ अपना दीअर के फोन लगा कऽ सुधाजी के पकड़ा देलखिन । सुमनजी फोन उठेलखिन तहन सुधाजी कहलखिन, �हेलो बौआ सुमन !� ओम्हर सँ आवाज आयल, �माँ गोर लगै छी की हाल चाल । अहाँ कुशल मंगल सँ छी ने ? भैया भाभी कुशल मंगल सँ छथि ने ?� एहि पर सुधा जी कहलखिन, �बौआ हमर तबीयत ठीक नहि अछि तऽ हम सोचलहुँ जे डाक्टर सँ देखवा ली ।� एहि पर सुमनजी कहलखिन, �माय अहाँक तबीयत खराब अछि आ अहाँ अखन धरि सोचि रहल छी जे डाक्टर सँ देखवावी ।� एहि पर सुधाजी कहलखिन, �बौआ ई बात नहि अछि हमरा थोड़ेक पाईक आवश्यकता छल ।� एहि पर सुमनजी कहलखिन, �माँ ई बात पहिले बता देवाक चाही । ठीक अछि अखन हम भैयाक खाता मे पाई भेज दैत छी । अहाँ तुरंत डाक्टर सँ देखा लेव । हम अहाँ सँ बाद मे बात करव, पहिले भैयाक खाता मे पाई भेज दैत छी ।�ई कहि सुमन जी फोन राखि देलखिन आ सौरभक खाता मे पाई भेज देलखिन । दुपहर मे भोजनक समय मे जखन सौरभ खाना वास्ते घर एलाह तहन सुधाजी कहलखिन जे सुमन पाई भेजलक अछि । मोबाईल मे चेक करव पाई आयल अछि की नहि ? सौरभ अपन मोबाईल मे देखलैथि आ माँ के कहलखिन जे हाँ माँ मेसेज आयल अछि । सुमन पाई भेज देलक अछि, मुदा अखन डाक्टर लग नहि जा सकव किएक तऽ किछु ज़रूरी काम आयव गेल अछि, कनेक देर मे आवि रहल छी तहन अहाँ के डाक्टर लग लऽ जायव । सुधा जी मायूस भऽ बिछौना पर पड़ि रहलीह आ बेटाक अयवाक इंतजार करऽ लागलीह ।बहुत देर इंतजार करला पर जखन सौरभजी नहि एलाह तहन ओ अपना बहू सँ कहलखिन जे कनिया ! बौआ अखन धरि नहि आयल । अहीं डाक्टर लग हमरा लऽ चलू आ डाक्टर सँ दिखा दिअ । बुखार सँ हमर शरीर तपि रहल अछि आ देह सेहो तोड़ि रहल अछि । ई सुनि बड़की बहू कहलखिन, �अहाँ के तऽ दोसर कोनो काम तऽ नहि अछि , थोड़े थोड़े देर पर दर्द लऽ के बैसि जायत छी । अखन एक ठाम दर्द होयत अछि तऽ अखन दोसर ठाम दर्द होयत अछि । बुढ़ारी मे ई सव आम बात अछि आ ई लागले रहत । सदिखन अहींक सेवा सुश्रुषा मे लागल रहव तहन घरक काम कोना होयत ?� एहि पर सुधा जी कहलनि - कनिया हम सौरभ के कहने छलहुँ मुदा जरूरी काम पड़ि गेल हेतनि तैं ओ नहि एलाह अछि । सुमन सेहो हुनका पाई भेज देलकैन अछि ।� ई बात सुनैत ओ आगि बबूला भऽ गेलीह आ झल्लाईत कहलखिन जे हम की करी ? बाहर कोनो काम सँ गेलखिन अछि,जहन एताह तहन अहाँ के डाक्टर पास लऽ जेताह ।हम घर सम्भाली की अहाँक डाक्टर लग लऽ जाऊ । बिछौना पर पड़ल रहू । बेटा आवैत छनि तहन डाक्टर लग लऽ जेतनि ।एकहि बात के बेर बेर कहि हमर दिमाग खराब नहि करु । सुधाजी बहूक बात सुनि चुप भऽ गेलीह आ बिछौना पर लेट गेलीह । लेटल अपन हालत आ भाग्य पर सोचैत छलीह आ बेटाक इंतजार कऽ रहल छलीह जे कखन ओ घर एताह जे हम कहव बौआ हमरा डाक्टर सँ देखा दिअ ।इंतजार करैत-करैत सुधाजी थकि गेलीह राति भऽ गेल मुदा ओ घर नहि एलाह । राति मे लगभग ११ बजे घंटी बजल तहन ओ बुझलथि जे सौरभ एलाह अछि । ओ शराबक नशा मे धूत छलाह । चुपचाप अपना कमरा मे चलि गेलाह । एकहु बेर नहि पुछलखिन जे माय अहाँक तबीयत केहन अछि । सुधाजी सौरभक आवाज सुनि समझि गेलीह जे सौरभ आई नशाक हालत मे छथि ।एहि स्थिति मे हुनका कहनाई ठीक नहि छल तैं ओ चुपचाप बिछौना पर पड़ल रहलीह । दोसर दिश सुधाजीक देह मे जकड़न महसूस भऽ रहल छलनि । मन ठीक नहि रहलाक कारण ओ राति मे खाना सेहो नहि खेलीह । बिना खेने बिछौना पर दर्द सँ कराह रहल छलीह एहि बातक मलाल नहि तऽ सौरभ के छल आ नहि हुनका कनिया के छलनि । दोसर दिश सुमनजी दूनु प्राणी काम मे व्यस्त छलथि । देर राति घर एलाह तऽ हुनका ध्यान मे आयल जे मायक मन खराब छल । भैया के पाई भेजने छलहुँ जे माय के डाक्टर सँ देखा देवै । पता नहि ओ देखलखिन की नहि ? ओ सोचैत छलाह जे ओफिसक काम मे ततेक व्यस्त भऽ गेलहुँ जे मायक हाल-चाल सेहो नहि लऽ सकलहुँ। सुमनजी अपना घरवाली के कहलखिन, �देखु ने ! आई मायक तबीयत खराब छल । हमरा ओफिस मे फोन केने छलीह जे पाई भेज दिअ । हम डाक्टर सँ देखायव। हमर तबबीयत अखन ठीक नहि अछि । हम भैयाके पाई भेज देने छलियेन । पता नहि हुनकर तबीयत केहन अछि ।� एहि पर सुमनजीक धर्मपत्नी कहलखिन जे हम माँ के फोन लगा कऽ हुनकर हाल-चाल बुझैत छी । सुमनजी कहलखिन नहि अखन नहि । किएक तऽ अखन राति बेसी भऽ गेल अछि । माय सवेरे सुति रहैत छथिन । हुनका नहि उठाउ । भिनसरे माय सँ बात करव अखन चलु खाना बनाऊ तहन दूनु आदमी सोचैत छी जे की कएल जाय ? ई बातचीत करैत दूनु प्राणी खाना बनावऽ मे जुटि गेलीह । खाना बना कऽ दूनु आदमी खायत छलाह तखने सुमनजी कहलखिन जे हमर इच्छा होयत अछि जे कनि माय सँ भेंट कऽ आवि । रुकु कनि हम ओफिस मे बात करैत छी जे ओम्हर कम्पनी के कोनो काम अछि की नहि ? जौं ओम्हर कम्पनीक कोनो काम होयत तऽ कम्पनीक काम सँ चलि जायव । ई सुमन जी खाना खा कऽ अपना बॉस के फोन लगेलखिन जे ओम्हर कोनो काम वांचल अछि । हुनका पता चलल जे एक प्रोजेक्ट पर किछु आदमी काम कऽ रहल अछि मुदा प्रोजेक्ट पूरा नहि भऽ रहल अछि । बॉस कहलखिन जे हम तऽ चाहैत छलहुँ जे २-३ दिनक लेल अहाँ देख लेतहुँ तहन ठीके रहत। ओना एहि ठामक काम देख लिअ । एहि पर सुमन जी कहलखिन जे ठीक अछि हम ओझाजी सँ बात करैत छी जे एहि ठाम कोनो काम फँसल तऽ नहि अछि । जौं फँसल नहि होयत तहन हम ओम्हरे चलि जायत छी । सुमनजी ओझाजी सँ पुछि फेर बॉस के फोन केलनि जे एहि ठाम कोनो काम नहि फँसल अछि । हम काल्हि ओम्हरे चलि जायत छी । एहि पर बॉस कहलखिन जे ठीक अछि, अहाँ चलि जाउ देखव जे प्रोजेक्ट मे किएक देर भऽ रहल अछि । ओफिस मे बात करलाक बाद अपना कनिया सँ कहलखिन जे भिनसरे हम गाम दिश जा रहल छी । माय के सेहो देख लेव। ओहि ठाम एकटा प्रोजेक्ट पर काम रूकल अछि, सेहो देख लेव । ई सुनला पर सुमनजीक कनिया सेहो कहलखिन चलु ने हमहु एकटा मेल कम्पनी के डालि देवै । हमहुँ माँजी के देख आवैत छी । दूनु प्राणी अपन किछु कपड़ा बैग मे राखलथि आ भिनसरे गाम जयवाक लेल सोचलथि । भिनसरे दूनु प्राणी गाम आवि गेलाह । गाम मे सव सुतले छल । सौरभ हुनका देख चौंक गेलाह आ कहलनि, �छोटे ! अचानक गाम एलहुँ अछि, कोनो खास बात तऽ नहि अछि । सुमनजी हुनका गोर लागि कहलखिन, �नहि भैया ! हमर कम्पनीक एकटा प्रोजेक्ट अपने गामक बगल मे चलैत अछि,ओहि ठाम किछु काम अछि तऽ सोचलहुँ जे अहुँ सव सँ भेंट कऽ ली ।� सौरभजी कहलनि जे नीक केलहुँ,अपन घर एहिना यादि रखवाक चाही । जन्म स्थान बड्ड पैघ होयत छै । तकर बाद सुमनजी अपना माय के कमरा मे गेलाह । ओ सुतल छलीह, दूनु प्राणी हुनका उठा के गोर लागलखिन तऽ महसूस भेलनि जे मायक शरीर तऽ बुखार सँ तपि रहल अछि आ हुनका लग कोनो तरहक दवाई वगैरह सेहो नहि अछि । सुमनजी बेचैन भऽ कहलखिन - माय अहाँक देह तऽ तपि रहल अछि । अगल-बगल दवाई सेहो नहि देख रहल छी । काल्हि अहाँ डाक्टर सँ नहि देखेने छलहुँ की ? एहि पर सुधाजी कहलखिन जे काल्हि बौआ कोनो काम मे उलझि गेल छल, तैं हुनका फुर्सत नहि मिललैन । आई डाक्टर सँ देखा देथिन । सुमनजी जोर सँ सौरभ के कहलखिन - भैया ! कनी एम्हर आउ। सौरभ कहलनि - हाँ छोटे ! आवि रहल छी ।सौरभ के एलाक बाद सुमन जोर सँ कहलखिन - भैया देखू तऽ मायक देह तपि रहल अछि । अहाँ डाक्टर सँ नहि देखेने छलहुँ की ? एहि सौरभ जी कहलखिन - दरअसल में काल्हि हम एक जरूरी काम मे फँसि गेल छलहुँ । आई हम देखा दैत छी । ओना अहाँक भाभी सँ कहने छलहुँ जे जौं हमरा लेट भऽ जायत तहन माँ के डाक्टर सँ देखा देवै मुदा हुनका घरक काम सँ मौका नहि मिललैन । सुमनजी दूनु प्राणी चुपचाप सुधा जी के डाक्टर लग लऽ गेलखिन । ओहि ठाम बी पी चेक कएल गेल तऽ पता चलल जे बीपी बढ़ल अछि । डाक्टर साहब आओर टेस्ट लिखलखिन । सुमनजी टेस्ट रिपोर्ट डाक्टर के देलखिन । डाक्टर साहब कहलनि -मौसमी बुख़ार अछि , एक दु दिन मे ठीक भऽ जायत । बीपी आ शुगर दूनु बढ़ल अछि तैं आब हिनका बीपी आ शुगरक दवाई सेहो चलत । एहि पर सुमनजी कहलखिन - बीपी आ शुगरक दवाई तऽ चलि रहल अछि । सुमनजी माँ सँ पूछलखिन - माँ ! अहाँ बीपी आ शुगरक दवाई तऽ लैत छी ने ? एहि पर ओ बजलीह - हाँ बौआ ! पहिले तऽ लैत छलहुँ मुदा पिछला महीना दवाई खत्म भऽ गेल , तहिया सँ दवाई नहि खा रहलहुँ अछि । ई सुनि दूनु प्राणी अवाक रहि गेलाह । सुमनजी सव दवाई लऽ के माँ के घर आनलथि आ फेर अपना प्रोजेक्ट पर चलि गेलाह । हुनकर धर्मपत्नी सुधा के खाना खिला कऽ दवाई देलखिन । थोड़ेक देरक बुखार कमि गेलनि आ सुधा जी के नीन सेहो आवि गेलनि । प्रोजेक्ट पर सँ एलाक बाद सुमनजी सौरभजी के कहलखिन - भैया ! माय के सव महीना पेन्शन मिलैत अछि , दोसर दिश मायक दवाई- वीरोक लेल हम सव महीना पाई भेजैत छी । तैयो अहाँ माय के पिछला एक माह सँ बीपी आ शुगरक दवाई नहि दैत छी । आई धरि अहाँ सँ ई नहि पुछलहुँ अछि जे भैया अहाँ मायक पेन्शनक पाई की करैत छी ? हमरा कोनो आवश्यकता सेहो नहि छल, मुदा अहाँ के तऽ माय पर ख्याल रखवाक चाही । एहि पर सौरभ जी कहलखिन जे हम सव महीना दवाई तऽ आनवे करैत छलहुँ,पिछला महीना हमरा ध्यान पर नहि रहल तैं दवाई नहि आवि सकल। दोसर दिन सुमनजी माय सँ कहलखिन - माय आव अहाँ हमरा लग रहु ।अहाँ के कोनो तरहक परेशानी नहि होयत । अहाँक तबीयत ठीक भऽ जायत तखनहि हम दूनु आदमी अहाँ के लऽ के जायव । सुमनजी दूनु प्राणी ओफिस सँ छुट्टी लऽ लेलथि आ गाम मे रुकि गेलाह दु दिनक बाद सुधाजी बुखार ठीक भऽ गेलनि तहन सुमन जी अपना भाई आ भाभी सँ कहलखिन जे हम माई के अपना लग लऽ जायत छी । एहि पर सौरभजी कहलनि - छोटे ! माय के एहि ठाम रहऽ दिअउ , ओहि ठाम हुनका दिक्कत हेतनि । आव बुढ़क शरीर अछि, अहाँ दूनु आदमी ओफिस चलि जायव,माय घर मे अकेले की करथिन । ई सुनि सुधाजी कहलखिन - नहि बौआ , हम सुमन संगे रहव हमरा एहि ठाम दिक्कत होयत अछि । अहाँ के तऽ हमरा डाक्टर सँ देखेवाक फुर्सत नहि रहैत अछि । सुमनजी दोसर दिन सुधाजी के अपना फ्लेट पर लऽ आनलखिन ओहि ठाम एक दाई ठीक केलनि जे दिन भरि हुनक देखभाल करथिन । साँझ मे दूनु प्राणी आवैत छलाह तऽ मायक संगे खाना खायत छलाह । आव सुधाजी आराम सँ छोट बेटाक संग रहैत छलीह । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। पद्य ३.१.आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल ३.१.आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल आशीष अनचिन्हार दू टा गजल
१ उम्हर उड़लै लाखो जी इम्हर टुटलै आसो जी
असगर बैसल आँगनमे माटिक मूरत माधो जी
नहिए भेलै पुण्य शून्य चलिते रहलै पापो जी
ईहो देखब जीवनमे अपनो हँसतै आनो जी
हुनकर कर्मक पोखरिमे नहिए लगलै थाहो जी
सभ पाँतिमे 22-22-22-2 मात्राक्रम अछि। दू अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि।
२
पूरा धरती नापल ओ चुप्पे चुप्पे कानल ओ
सुर लयकारी अनकर छै अनके आशे नाचल ओ
सभटा माया हुनके छनि चट हारल पट जीतल ओ
बिख माहुर ओ कीदन खा कनियें कनियें बाँचल ओ
बड़का दुख अनचिन्हारक चिन्हारक छै दागल ओ
सभ पाँतिमे 222-222-2 मात्राक्रम अछि (बहरे मीर)। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। Maithili Literature in English Translation 4.1.The moon s Journey- Jagdish Prasad Mandal (Original Maithili Short Story) Rameshwar Prasad Mandal (English Translation) 4.1.The moon s Journey- Jagdish Prasad Mandal (Original Maithili Short Story) Rameshwar Prasad Mandal (English Translation) Jagdish Prasad Mandal (Original Maithili Short Story) Rameshwar Prasad Mandal (English Translation) The moon�s Journey
After three years, Vishnudev returned to the village. In truth, visiting the village had not been on his mind at all. The thought came suddenly when his name was mentioned for a programme to travel to the moon. Vishnudev was a scientist. The institute was sending three people to the moon for exploration and study. The moment he heard his name, he thought that there were still twenty days left before departure. He would be leaving on the thirtieth of November, so in the meantime he could go to the village, meet everyone, and come back. Thus, Vishnudev arrived in the village a day before the festival of Chhath�s Kharna ritual. By the time Vishnudev reached the village, evening had fallen. That day he did not go out to meet anyone. Being from a large family, simply talking with everyone at home kept him engaged till late. The next day, around two in the afternoon, Vishnudev went to see Padhua Uncle. Padhua Uncle had been a teacher at the village�s lower primary school. He had retired two years earlier. Vishnudev had been his student for four years, from learning the alphabet to the lower grades, up to class three. Apart from being fellow villagers, the two shared a social connection, and the teacher�student bond deepened their relationship. Sitting at the doorway, Padhua Uncle was quietly thinking about the Chhath festival. The thought crossed his mind that the oil pressed from the sesame seed is heavier than the seed itself. Such was the fervour of the festival that it seemed every Maithil family from other states had returned home with their families, and even those working abroad had also arrived with theirs. Whatever they would spend on the festival itself would be far less than what they had spent on travel fares, and the time lost in travelling would have been considerable too. As soon as he arrived, Vishnudev touched Padhua Uncle�s feet in greeting and said- �I seek your blessings, Uncle.� Although Padhua Uncle was over sixty years old, his disciplined life had preserved both the sharpness of his eyesight and the glow of his body. Blessing Vishnudev, Padhua Uncle said- �You used to come to the village once a year, every year. This time you have come after such a long gap.� Vishnudev replied- �Uncle, travelling with the family by public transport has become very difficult.� He spoke briefly, but Padhua Uncle, understanding yet curious, asked- �Why is that, Vishnudev?� Vishnudev said- �Uncle, for one, the number of thieves and pickpockets have grown so much that you can never tell when something might happen. And another thing, the water we drink in the village, people in the cities will not even accept as a gift. Buying drinking water during travel costs a hundred or two hundred rupees at least.� Smiling, Padhua Uncle said- �People earn precisely so they can eat and drink. And in the cities they earn much more than the people in the villages. So if it costs money, even then it is still better than what the village offers.� Vishnudev replied- �But throwing one�s earnings into the water is hardly a good thing either, Uncle.� Understanding the figurative meaning in Vishnudev�s words, Padhua Uncle decided not to pursue that line of thought further and asked- �And how else are you, Vishnu?� Vishnudev said- �I should say I am well. There is one piece of new news, and it is to share that with you that I came to the village.� Padhua Uncle asked- �What is it?� Vishnudev replied- �Uncle, you are not only my father�s elder brother, you are also my guru. Even now I remember vividly that it was from you that I first learned the alphabet.� Hearing this, Padhua Uncle was deeply moved. A thought also passed through his mind that in today�s environment, most people forget favours as easily as a bitter gourd sheds its bitterness, yet there are still some who always strive to acknowledge a kindness and remain grateful.
With quiet affection, Padhua Uncle said- �Vishnu, every person has their own responsibilities, just as they have responsibilities toward others as well. What was my duty I have fulfilled, and you may think of it in whatever way you wish.� Vishnudev said- �Uncle, on the thirtieth of November there is a scheduled programme to travel to the moon, and my name is among those being considered. So�� Without fully understanding, Padhua Uncle said- �You will have my blessings.� Vishnudev continued- �Uncle, a team of three will go. More than ten people have applied. I have also applied. Selection will be through a lottery, so it cannot yet be said with certainty, but it seems likely that I might be chosen. It will be a space journey lasting a full month. I thought that if I were not able to return from the trip, I should at least visit the village now and meet everyone. Of course, it is not certain that I will not return, nor is it certain that I will definitely come.� Hearing this, Padhua Uncle reflected on the immense potential hidden within the human mind. Until now, they had known and understood the moon in one way, but with scientific exploration, they were beginning to see it in quite another.
While Padhua Uncle and Vishnudev continued their conversation, Padhua Uncle�s wife, Damayanti, came and stood before them. Unlike most women, who keep a little distance before making a request, Damayanti came directly before her husband. This was her own courtyard doorway, and she recognised Vishnudev as well, but still, keeping to her husband�s manner, she stood silently. Seeing her, Vishnudev rose, touched her feet in respect, and said- �Aunty, do you recognise me? I am Vishnudev.� Damayanti said- �How can one not recognise people from the same place? Besides, my eyesight is still as good as it was before. Where do you live now, son?� Carrying the thread of thought forward, Vishnudev replied- �Aunty, as people in the village say, the worker knows his master�s house just as the calf knows its home.� At this, Padhua Uncle asked- �What work is it?� Damayanti said- �Today is Kharna, and the bananas have not yet been riped.� Padhua Uncle said- �Today there is only a small quantity of bananas for in the leaf basket, is there not?� Damayanti replied- �Yes, but the plantain is still unripe.� Padhua Uncle said- �Today is the village market. I will bring the bananas from there in the evening, as they will only be needed later.� Damayanti said- �The Sugarcane has not yet been gathered.� Padhua Uncle replied- �I will bring both the sugarcane and the bananas from the market.� Damayanti asked- �What about the plantain tree?� Padhua Uncle said- �We have to offer plantain. Whether the fruit is ripe or raw, the Goddess of Chhath will hardly mind.� Damayanti was heading towards the courtyard when Sonelal arrived. Coming close to Padhua Uncle, he asked- �Uncle, have you heard the news?� At Sonelal�s question, Padhua Uncle wondered to himself which news this could be, for in the course of a day one hears all kinds. He asked- �Sone, do I ever leave the doorway to hear anything? What news is it?� Sonelal said- �It is very sad news, Uncle.� Hearing �very sad,� Padhua Uncle�s ears stood alert. What could be so tragic? He asked- �What is it?� Sonelal said- �Sharda Sinha has passed away.� Padhua Uncle had not known that she had been suffering from cancer. At once her mood sank. She had been admitted to AIIMS in Delhi, yet the illness had advanced relentlessly, and in the end she breathed her last. He asked- �What had happened to her that she died?� Sonelal replied- �Illness has neither beginning nor end that anyone can predict. I heard she had cancer for a long time, kept it hidden, and then it advanced so suddenly that it could no longer be controlled.� Padhua Uncle said- �Sone, this body of ours is a dwelling place for ailments. No one knows when or how illness will strike. With her, a great luminary of Mithila has come to an end.� Padhua Uncle was still talking with Sonelal, with Vishnudev seated before him, when Manchan arrived. Entering, Manchan touched Padhua Uncle�s feet. Padhua Uncle blessed him and asked- �When did you arrive, Manchan?� Manchan worked for a tea company in Darjeeling. He said- �I arrived the day before yesterday, Uncle, but I was busy making arrangements for the festival.� Padhua Uncle asked- �How have you been?� Manchan replied- �I have developed an ailment in both thighs, Uncle. I vowed to the Goddess of Chhath that if I were relieved of this illness, I would return to the village for the festival. That is why I am here.� Hearing this, many thoughts stirred in Padhua Uncle�s mind, but he said nothing. Just then, Damayanti Kaki arrived at the doorway with four cups of tea. On seeing the cups, Manchan took a tin of tea leaves from his hand bag and gave it to Padhua Uncle, saying- �Uncle, I brought this tin for you. It is tea that does not require milk.� Padhua Uncle asked- �What is the name of this tea?� Manchan replied- �People call it green tea. This half of kilo tin will last at least fifteen days.� After drinking the tea, both Manchan and Sonelal rose and went. Vishnudev and Padhua Uncle remained seated. Padhua Uncle said- �Vishnu, you are a scientist, so your outlook is bound to differ from ours. What do you think of the Chhath festival?� Vishnudev replied- �My life is tied to a fixed schedule, confined within certain limits, so I hardly get the time to think deeply about other subjects. Besides, it would not be right to speak to you about something I do not fully understand.� Padhua Uncle said- �Since there is a plan for you to go to the moon, you must have studied and reflected on the subject of the moon.� Vishnudev replied- �Uncle, the way the moon is regarded in society is very different from how it is seen in scientific terms. The programme is still in preparation. If, by chance, I get the opportunity to go and return, I will be able to share all the details clearly. For now, I am not in a position to say much.� Hearing Vishnudev�s words, Padhua Uncle accepted in his mind that what Vishnudev had said was indeed correct. Padhua Uncle said- �Vishnudev, I do not know everything myself. Whatever I have heard from others, that is all I understand. But�� Vishnudev asked- �But what, Uncle?� Padhua Uncle said- �There are some thoughts on which one can reflect. Today is the fifth day of the bright fortnight of the month of Kartik, and it is Kharna. After partaking of the Kharna prasad, the devotees will remain fasting until the final ritual of the festival. At dawn on the seventh day, at the pond�s ghat, they will offer arghya to the sun, and after that they will end their vow and take prasad. In between, they will remain fasting.� Vishnudev said- �Uncle, I have seen all this with my own eyes and I understand it too, but�� Seeing Vishnudev fall silent after saying �but,� Padhua Uncle felt that Vishnudev was not fully satisfied with his explanation. He thought it would be better to share what he knew so that his own integrity would remain intact. Padhua Uncle said- �Vishnudev, some farmers mark the festival between bringing home the previous harvest, meaning the paddy, and sowing the rabi crops in the fields. In that sense, this festival belongs completely to the farmers.� Hearing Padhua Uncle�s words, Vishnudev nodded in agreement, but from the perspective of his scientific knowledge so far, doubts began to arise. Padhua Uncle noticed this and spoke again. �Vishnudev, although the offering of arghya during this festival is to the sun and not to the moon, the dates of Shashthi and Saptami are determined according to the waxing and waning of the moon, not the sun.� Hearing this, Vishnudev was puzzled. After a moment, he asked- �Then?� Padhua Uncle replied- �Vishnudev, the sun is the source of all life. Soil, water, and all else are formed by the sun�s energy. The festival has scientific, cultural, and religious significance. Just as the sun contains seven colours, so too does life have seven colours. But there is one problem: the sun, which deserves to be worshipped every day, is honoured only once a year. The light of the sun is also seen as the light of knowledge. In the same way that the sun is not worshipped or honoured daily, the knowledge of human beings too is not always respected. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। 1 || विदेह ४३२ विदेह ४३२|| 1
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