VIDEHA — Issue 433 / अंक ४३३

Publication: VIDEHA · Issue: 433
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विदेह ४३३ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। [विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X Videha e-Journal (since 2000) at www.videha.co.in ] ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। कॉपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२६. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२६. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA. सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@zohomail.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@zohomail.in. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover design: AUM GAJENDRA THAKUR VIDEHA:433 समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा। मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अनुक्रम विदेह ४३३ म अंक ०५ जनवरी २०२६ (वर्ष १९ मास २१७ अंक ४३३) ऐ अंकमे अछि:- गद्य २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान -२० (पृष्ठ २-६) २.२.हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१२ (पृष्ठ ७-२४) २.३.डॉ. सुमन मिश्र- वैदेही (पृष्ठ २५-३६) २.४.ग्रुप कॅप्टन (डॉ) वी एन झा- जोशीमठ में भू-धसान आ ओकर मानवीय पक्ष (पृष्ठ ३७-४८) २.५.परमानन्द लाल कर्ण-एक नव सफर (पृष्ठ ४९-५९) २.६.रबीन्द्र नारायण मिश्र- बाबाक दरबारमे (पृष्ठ ६०-११०) पद्य ३.१.राम शंकर झा"मैथिल"- नदी (पृष्ठ ११२-१३०) Maithili Literature in English Translation 4.1.Desolate-Jagdish Prasad Mandal (Original Maithili Short Story) Rameshwar Prasad Mandal (English Translation) [page 132-141]

गद्य २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान -२० २.२.हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१२ २.३.डॉ. सुमन मिश्र- वैदेही २.४.ग्रुप कॅप्टन (डॉ) वी एन झा- जोशीमठ में भू-धसान आ ओकर मानवीय पक्ष २.५.परमानन्द लाल कर्ण-एक नव सफर २.६.रबीन्द्र नारायण मिश्र- बाबाक दरबारमे २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान -२० कल्पना झा 'व्यास' जीक अप्रकाशित कृति जीवनक अन्तिम साँस धरि पढ़ैत-लिखैत रहए बला एकटा बुद्धिजीवीक लिखल की-की, कतए-कतए राखल हेतनि, से तकर हिसाब राखब सहज काज नहि। माने सभ टा लिखलाहाक हिसाब राखब कठिनाहे बुझू घरबैयोक लेल। माने कोनो डायरी, कोनो कॉपी, कोनो फाइल मे सम्हारि क' राखल पन्ना सभ, सभ किछु मे एकहक पन्ना-पन्ना छानि मारब संभवो नहि ने! तँ से छोट-छोट रचनाक तँ कोनो हिसाब नहि उपलब्ध अछि हमरा। मुदा किछु एहन काज जे एखन तत्काल उपलब्ध अछि से सभ निश्चिते मैथिली लेल अमूल्य निधि अछि। नीचा देखल जाए अप्रकाशित रचनाक सूची- 1. "शुक्ल यजुर्वेदक मैथिली भाष्य"- 'व्यास' जीक हाथक लिखल साढ़े बारह सए पृष्ठक पाण्डुलिपि हुनकर अलमारी मे ओरिआ क' राखल छनि। एकर प्रकाशनक प्रति किएक उदासीन छथि घरक लोक, तकर पाछाँक कारण हम ठीक-ठीक कहि नहि सकैत छी। एहि दिस तत्परता देखबैत, एकरा प्रकाशित करबाओल जाएत, से विश्वास अछि। 2. 'श्रीकान्त'क दोसर पर्व- 'व्यास' जीक अनुवाद कार्यक ब्यौरा दैत, हिनकर सातम अनूदित पोथीक चर्चाक क्रम मे श्रीकान्त (प्रथम 'पर्व')क चर्चा कएने छलहुँ हम। जे सन् 1997 मे प्रकाशित भेल छलनि। शरतचन्द्र चट्टोपाध्यायक द्वारा चारि 'पर्व' मे लिखल गेल एहि पोथीक प्रथम 'पर्व'क अनुवाद कएलनि अछि 'व्यास' जी। एहि अनूदित पोथीक 'दू शब्द' मे 'व्यास' जी एहि बातक चर्चा कएलनि अछि जे ओ, उपन्यास लिखबाक कला मे सिद्धहस्त शरत् बाबूक एहि चर्चित उपन्यासक प्रथम आ द्वितीय 'पर्व'क अनुवाद कएलाह अछि। मुदा प्रकाशित तँ मात्र पहिल 'पर्व' भेल छनि। माने दोसर 'पर्व'क अनुवाद 'व्यास' जी कएलनि से हुनकहि कथन सँ स्पष्ट अछि। एकर मतलब दोसर 'पर्व' अप्रकाशिते राखल छनि प्रायः। मुदा घरक लोक एकर पाण्डुलिपिक उपलब्धताक सन्दर्भ मे किछु स्पष्ट कहि नहि पाबि रहल छथि। ई असमंजस बला बात बुझा रहल अछि, 'व्यास' जीक दू शब्दक आधार पर मानि क' चली जे 'श्रीकान्त'क दोसर पर्वक पाण्डुलिपि सेहो कतहु ने कतहु राखल हेतनि घर मे, आ कि पाण्डुलिपिक अनुपलब्धताक आधार पर ई मानि लेल जाए जे जएह प्रकाशित भेल छनि, बस ओतबे अनुवाद कएलनि 'व्यास' जी। एहि दू अप्रकाशित अनुवादक अतिरिक्त बेसी सम्भावना तँ ईहो अछि जे तेसर आ चारिम 'पर्व'क अनुवाद सेहो ने कएने होइथ ओ। कारण शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय 'व्यास' जीक पसंदीदा लेखक मे सँ छलथिन। हुनकर इच्छा जरूर भेल हेतनि चारू पर्वक अनुवाद करबाक। मुदा निजगुत किछु कहब कठिन अछि एहि सन्दर्भ मे। संपादकीय सूचना- एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-7 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-8 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-9 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-10 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-11 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-12 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-13 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-14 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-15 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-16 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-17 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-18 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-19 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.२.हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक हितनाथ झा (मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070) सनातन धर्म ओ संस्कार 'प्रभात'मे निबन्धक संख्या बेसी अछि। निबन्धोमे साहित्यिक विषयसँ बेसी सामाजिक-सांस्कृतिक विषयपर विशेष ध्यान देल गेल अछि। भाषा सेहो मैथिलीक अतिरिक्त हिन्दी आ अंग्रेजी अछि, मुदा मैथिलीक प्रमुखता अछि। अनेक अंकमे सम्पादक द्वारा रचनाकार लोकनिसँ निवेदन कयल गेल अछि जे मैथिलीकेँ प्रमुखता देथि। सनातन धर्मपर अनेक अंकमे मैथिली एवं हिन्दीमे विद्वत्तापूर्ण आलेख अछि। ओहि आलेखमेसँ किछु मैथिलीक आलेख एतय प्रस्तुत क�रहल छी आ किछु अग्रिम अंकमे प्रस्तुत करब। वर्तनी रचनाकारक जे अछि ओकरा हू-बहू रखबाक प्रयास कयल गेल अछि।

सनातन-धर्म्म केदारमणि झा मंगरौनी

जे धर्म्म परम्परा सँ चलल अबैत अछि सैह धर्म्म सनातन धर्म्म थीक। एहिमे सन्देह नहि जे सनातनधर्मावलम्बी अपन धर्म्ममे पूर्ण विश्वास कए एहि पर कट्टर छथि और यैह कारण थीक जे ई धर्म्म अनादि कालसँ अनेकान्य धर्म सँ प्रतिवाधित होइतहुँ संख्यामे कम नहि भेल अछि। जाहि दिन बौद्ध धर्म्मक भयंकर धूआँ समस्त संसार केँ झाँपि देने छल, जैन धर्म्मक प्रकोप सँ सभ धर्म्म कम्पायमान होइत छल और इसलामक घण्टा भूमंडलक कोण-कोण मे आसमर्द कए रहल छल ताहू दिन ई सनातन धर्म अपन प्रतिष्ठा पर अटल रहि संसार काँ विमुग्ध कैल। संसारक एहि प्रलयकालमे जखन कि क्रिश्चियन धर्म काठक घून जकाँ बड़े-बड़े प्राचीन धर्म काँ धक्का दए खसा रहल अछि, मुसलमान हिन्दूक मार्मिक विरोधी, आर्य्य समाज हिन्दू धर्मक प्रतिष्ठा काँ माँटि मे मिला रहल अछि तथापि ई सनातन धर्म अपन रास्ता सँ कनेको विचलित नहि भेल। जेहो किछु ह्रास बुझना जाइछ से मुसलिम धर्मक कारणे नहि, इसाई धर्म्मक कारणे नहि, ई थीक--घरक भेदिया आर्य्य समाजी धर्म ! ई बूझब परम् मूर्खता थीक जे बाबू अँग्रेजी पढ़ि कोट-कमीज पहिरनहि खाइत छथि ! ई अँग्रेजी भाषाक दोष नहि, अंग्रेजक संसर्गक दोष नहि, ई थीक--- बाबूक अंग्रेज बनबाक इच्छाक दोष। कारणे यैह थीक जे केहन-केहन महामहो उपाध्याय लोकनि जूता पहिरिने पानि पिबैत छथि यद्यपि हुनका मे अंग्रेजीक "अ आ इ ई "क लेश नहि ! यदि हुनका संग एहन प्रश्न उठौल जाय जे अपने पनही पहिरिने पानि कियैक पील तँ मनुक,याज्ञवल्क्यक श्लोक सँ कान तोड़ि देताह। ततेक प्रमाणो देताह जे अवाक भए जायब। वस्तुतः विषय की थिकैक कोना बुझू ? सत्यदेव मिश्र ओहि पंक्तिक अर्थ किछु कहताह और लूटी झा किछु ? हमरा लोकनिक मोट बुद्धि तँ वीचहि मे गैव भए जाइत अछि। धर्मशास्त्र अपार अछि। ओइ मे की नहि छैक ? जे जेहन पंडित तकरा तेहन स्वाद। तखन करक वैह चाही जे सभ दिनसँ कए आएल छी। किन्तु करै छी कहाँ ? बिना स्नाने नहि खाइ, अछूत सँ छूत हो तँ स्नान कए ली ! मगर एहि अछूतोद्धारक समयमे जखन कि एक डोम साक्षात विश्वनाथकेँ छूबक हेतु तत्पर अछि, कैक बेर स्नान करब ? उत्तम थीक जे जले मे डूबि रही। बड़े दुःखक संग लिख पड़ैत अछि जे एखन हमरा लोकनिक धर्मक नेता महात्मा गाँधी, प. मदन मोहन मालवीय प्रभृति छथि जनिका लोकनिक शोणित विलायतक दूषित वायु सँ अपरिष्कृत भए चुकल छैन्हि। जे स्वयं यूरपक यात्रा कैक बेरि कए आयल अछि, जकर मलेक्षक अन्नपानि सँ शोणित, हड्डी,मांस बनि चुकल छैक तकरा की अधिकार हमरा लोकनिक निरामिष धर्ममे हाथ ले ? राजनीति द्वारा हमरा धर्ममे कियैक दवाब पहुँचत ? ई आर्य्य समाजी लोकनि जे हारमोनियम बन्हने शहरे-शहर नाच कैने फिरै छथि तनिका ई ज्ञान नहि जे हिनका लोकनिक आदि गुरू दयानंदेकेँ स्वामी शंकराचार्य केहन केँ मूँह कारी कैने छलथीन्ह?वर्माश्रम संस्था बहुत दिनसँ अछि। और की, वेदमे पर्यन्त एकर चर्चा आएल अछि। वैदिक भारत, जखन समस्त संसार अंधकारमय छल, वर्माश्रमक प्रतापसँ की नहि कैलक? एतबो तँ पश्चिमीयो विद्वान मानैत छथि जे ई संस्था नीक थीक और यैह एक प्रधान कारण छल जे भारत वर्षक सूर्य्य एक दिन आकाश मे उठि पड़ल छलाह। वर्माश्रम प्रथा सँ कर्तव्याकर्तव्यक ज्ञान तँ दिव्य रूपेँ होइते छैक, जे एहिसँ सामाजिक, राजनैतिक एवं धार्मिको उन्नति पूर्ण रूपेण होइछ। नियम छल ब्राह्मण मानसिक,क्षत्रिय शारीरिक, वैश्य आर्थिक उन्नति करथि और शूद्र तीनूक सेवा। पाश्चात्य भाषाक विद्वान लोकनि यद्यपि ई संस्था तोड़ि शूद्रो काँ शास्त्राध्ययनक भाग देवामे संकोच नहि कैलन्हि अछि और अनेको नीच जाति यद्यपि दिग्गज जकाँ अपन विद्वताक मदसँ माँति रहल अछि, किन्तु संस्कार कहाँ? अस्पृश्य जाति सँ छूति भेने हड्डी पर्यन्त छूतल जायत संस्कार लुप्त भए जायत। एहि भयसँ एखनो एहन बहूत महात्मा छथि जे गाड़ी सँ उतरतहि स्नान कए लैत छथि। एतबे नहि, स्नानोत्तर गंगाजल छीटि तज्जन्य पापक प्रायश्चित करैत छथि। गाड़ीमे खैताह नहि--भूखे बरु काँकोड़ भए जैताह, कलक पानि सँ लघी नहि करताह,अंग बरु टूटि जाय। पुनः एखनो कतेक व्यक्ति छथि जे�संध्या� ई शब्द कदाचिते सुनने हैताह। की कहू बाबू, समय तँ तेहने आबि गेल अछि जे, जे यज्ञोंपवीत, बाप-माय भिक्षा माँगि-माँगि कए वैदिक मन्त्र सँ होम करैत अग्नि ब्राह्मणकेँ साक्षी कए देलैन्हि अछि तकरा स्थानमे एलेक्जेंडर गोलीताग पहिरि, दहीक घोर केँ छोड़ि विलायती चर्बी और घोड़ाक लिट्टीक बनल भिनोलिया साबून सँ साफ करैत छी। कहाँ तक हुनक संस्कार दिव्य हेतैन्ह ? कलियुगमे चारू वर्ण एक भय जायत एहि श्रुतिवाक्यकेँ कैक घड़ी हम अहाँ रोकबैक? यदि यथार्थ रूपेँ देखल जाय तँ ककरो धर्म बाँचल नहि अछि। बाजारक लड्डू जे कि दोबाड़े चीनीक बनैत छैक, अपने तँ खाइते छी, अलभ्य बुझै छी जे घरक गोसाउनियों केँ बड़े प्रसन्न चित्त भए उत्सर्ग करबा में कनेको मन मलीन नहि होइत अछि। संसर्गासंसर्ग जन्य पापसँ वंचित हजारमे गोटेको भेटब दुर्लभ। जे हो, सनातन धर्म परम प्राचीन अछु और एकर उद्देश्यो बड़े महत्वपूर्ण एवं उदार। सनातन धर्मक संतान लोकनिक यैह कर्तव्य थीक जे दत्तचित्त सँ एकर रक्षणार्थ लागि पड़ी और साम्प्रतिक अछूत-महार्णव सँ रक्षा करी। सनातन धर्मक पैर एखनहुँ टुटलैक नहि। प.राजेश्वर शास्त्री सदृश खम्भ एखनहुँ एहिमे वर्तमान छथि। मिथिला सभ दिनसँ धर्मक केन्द्र मानल गेल। गौतम,शंकर, वाचस्पति प्रभृति धर्मशास्त्रक कीड़ा लोकनि एतैक छला। हुनका लोकनिक सन्तान होइतहुँ यदि हमरालोकनि धर्म रक्षार्थ नहि ठाढ़ होइ तँ एहेन अधम के ? अन्यान्य धर्मकेँ प्रचार करबाक निमित्ते प्रत्यह कोटियो टाका कहि रहल अछि किन्तु हमरा लोकनि देहि ल क ठाढ़ होयबामे अपन अपमाने बुझै छी, वाह रे बुद्धि ? केदार मणि झा (वर्ष-01, अंक-05 मइ 1933 ई.)

सनातन धर्मक अनुसन्धान तुलानन्द मिश्र, नाहर।

बहुत आश्चर्यक विषय थीक जे हमरा लोकनि अपन-अपन धर्म केँ त्यागि अन्य धर्मक अनुकरण क रहल छी। प्रायः कइ हजार वर्ष गत भ गेल जे ई धर्मक प्रचार भारत के प्रत्येक कोन मे पूर्ण तरहेँ छल लेकिन आइ इहो समय आबि गेल अछि जे प्रत्येक घरमे एकर विरुद्ध षड़यंत्र भय रहल अछि। आधुनिक विद्याक कोनो दोष नहि छैक परन्तु शोक सँ कहक पड़ैत अछि जे नवयुवक लोकनि केवल भारत वर्षक इतिहास पर निर्भर भय पूर्वक आचार-विचारकेँ केवल दोष लगाय नवीन सुधार करबाक हेतु पूर्ण यत्न करैत छथि। भारत वर्षक इतिहास जे प्रत्येक वर्गमे पढ़ाओल जाइत अछि, एकदम कल्पना थीक। प्रत्येक व्यक्ति केँ उचित थीक जे वेद के ऊपर पूर्ण विचार करी जे वर्ण-विभागक व्यवस्था केने अछि। ऐतिहासिक लोकनि कहैत छथि जे पूर्वमे वर्ण-विभाग नहि छल केवल Epic periodक बाद ई व्यवस्था भेल अछि लेकिन वेदानुसार ई एकदम झूठ थीक। कारण पुरुष सूक्तमे जे ई अछि--�ब्राह्मणोsस्यमुखमासीद्वाहू राजन्य:कृतः। उरू तदस्य यद्वैष: पद्भ्यां शूद्रोsजायतः। �एहि सँ स्पष्ट बुझि पड़ैत अछि जे वर्ण विभाग वैदिक समयमे पूर्ण तरहे छल। अपन-अपन धर्म के एकदम बिसरब केवल अपन-अपन कर्मक लोप हेबाक कारण बुझि पड़ैत अछि। ब्राह्मण लोकनि अपन-अपन कर्म एकदम छोड़ि देलैन्हि जेकर उदाहरण ई थीक जे प्रत्येक गाँव मे आठ अंशमे एक अंश ब्राह्मण संध्या-तर्पण करैत छथि अन्य कर्मक बात दूर रह। ब्राह्मणक कर्तव्य थीक जे गायत्रीक जप खूब करी लेकिन आइ-काल्हि गायत्री शुद्ध पूर्वक जानब सेहो कठिन भ गेल अछि तेँ हेतु हमरा लोकनि के बार-बार ईश्वर सेहो पूर्ण तरहे दण्डित कय रहल छथि। जखन ब्राह्मण लोकनि अपन-अपन कर्म छोड़ि देलन्हि तखन अन्य वर्णक कोन कथा कहू, पाठक लोकनि के स्वयं विदित हैत। केवल वर्ण-संकर लोकनि एकर अनुकरण कय रहल छथि यद्यपि एहि वर्ण के एकर आग्रह नहि छैन्ह, लेकिन हमरालोकनि एकर भार देबाक कोशिश कय रहल छी जेकरा हेतु महात्मा गाँधी एकर बीड़ा उठा लेने छथि। हमरोलोकनिमे अधिकांश हुनके सहायक बनैत छी। बड़ा शोक के विषय थीक जे हमरोलोकनि अपना-अपना पूर्वजक कर्मकाण्ड के ऊपर लांक्षणो लगाय नूतन हेर फेर चाहैत छी। �कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन�एहि सूत्र के ऊपर किछु विचार नहि करैत छी। सम्प्रति मे सनातन धर्मक ऊपर बड़ा आघात पहुँचि गेल अछि जेकरा हेतु बहुतो पंडित तथा महान व्यक्ति मिथिला मे घरे-घरे घूमि प्रत्येक व्यक्ति के सूचित कय रहल छथि जे आबो अपने लोकनि कुम्भकरणीय निद्रा सँ च्युत भय जाउ। यद्यपि भावी जे हेतैक से हेवे करत तथापि अपन भरि पूर्ण यत्न कय रहल छथि। हमरा लोकनिकेँ ई विश्वास अछि जे ई सनातन धर्मक नीव बहुत मजबूत तथा पक्का छैक। एकरा मे एहि तरहक उपद्रव कैक बेर भेल अछि लेकिन ई डोलबो टा नहि कैल। श्री 108 जगदम्बा एकरा एहि तरहे बचबैत रहतीह। हिन्दू राज्यक समयमे बौद्ध धर्म पूर्ण तरहे जाग्रत भय एहि धर्म के दवा क हेतु पूर्ण यत्न केलक तथा जैन-धर्म सेहो अपना सीमान्त तक पहुँचि गेल परन्तु ई सनातन धर्म कहियो विनष्ट नहि भेल। मुसलमानी राज्यक समय एकरा ऊपर कैक तरहे आघात पहुँचलैक परन्तु एकर जड़ि तेहन पक्का छलैक जे अन्य धर्म के किछु नहि टेरलक। तेँ हेतु आशा करैत छी जे सम्प्रति मे जे अछूतोद्धारक आघात छैक ताहि सँ अवश्ये उबरि जैत। हमरलोकनिक परम् कर्तव्य थीक जे अपना-अपना पथपर आरूढ़ भय�मन्दिर प्रवेश बिल'क पूर्ण विरोधी भय जाइ। गत भूकंप हमरालोकनि के पूर्ण चेतना देलक जे धर्म की वस्तु थीक तथा हमरा लोकनि के की कर्तव्य थीक। यदि धर्मक अभाव नहि रहैत त पृथ्वी एहि तरहे अपना बोझ नहि पटैक दितथि। माय कतौ अपना बेटा के छोड़ैक। एहि तरहक समस्या उपस्थित भय गेल तथापि हमरा लोकनि काहिल भय गेलौं। कर्म-धर्म सभगोटा के बिसरि गेल। तेकर ई फल थीक। आबहु दृढ़ प्रतिज्ञ भय जाउ, जाहि सँ अपन-अपन धर्म बचि जाय तथा एहिमे कोनो तरहक धब्बा नहि लगैक। ई विचार करब हमरा लोकनि के उचित थीक। आधुनिक संस्था एहि तरहक अछि जे ककरो धर्म नहि बचत, परंतु हमरा लोकनि यथासाध्य चेष्टा करी जाहिसँ सनातन धर्मक ह्रास नहि होइक। एकरा हेतु हमरलोकनि तन-मन-धन सँ यथासाध्य अपना केँ बलिदान करबाक पूर्ण यत्न करी। जखन-जखन बात स्वयं सिद्ध अछि जे ई शरीर अवश्य नष्ट हैत तखन धर्मक हेतु नष्ट हो सैह उचित थीक। विशेष हमरा सदृश अल्पज्ञ सनातन धर्मक अनुसंधान कहाँ तक कय सकैत अछि, तथापि आशा करैत छी जे पाठकगण एतबैक सँ पूर्ण तरहे संतुष्ट भय जेताह तथा हमरा लोकनि एहि धर्म-युद्धमे अवश्य विजय प्राप्त करब।

"यत्र योगेश्वर: कृष्ण : यत्र पार्थो धनुर्धर: तत्र श्री विजयोर्भू तिर्ध्रुवानीति मतिमम। "

तुलानन्द मिश्र,नाहर। (वर्ष-02,अंक-04,अप्रैल1934ई.)

संस्कारक शिथिलता श्री रमानन्द झा, कोइलख।

मैथिल मण्डली सदाचार आदि विषयमे पूर्वकाल सँ सर्वदा अग्रगण्य बूझल जाइ छलाह, किन्तु साम्प्रतिको समयमे बहुत समाजक अपेक्षा अग्रगण्य छथि। परञ्च संस्कारक विषयमे क्रमिक शिथिलता आबि रहल अछि। किछु होइतहुँ अछि तँ असमयपर और अविधि। शास्त्रानुसार ब्राह्मण कॉ दश टा संस्कार निर्दिष्ट अछि। गर्भाधान पुंसमन, सीमन्तोन्नयन कोन समयमे होइ छैक वा ई कोन वस्तु थीक एकर परिभाषा यैह अछि। जे सीमन्त उन्नीयते यस्मिन कर्मणि तत सीमन्तोन्नयम। सीमन्तीन्तिनी बधूस्तस्या सीमन्तीन्नयनाख़्य संस्कार स्योत्सवः गर्भिय्यवस्थायाम चतुर्थे गर्भ मासि कार्य:। एकर अर्थ अत्यन्त सुगम छैक। तदुत्तर जातकर्म्म संस्कार, ई संस्कार जन्मकालिक संस्कार थीक। एहि संस्कार मे जन्मक बाद ओही मुहूर्तमे नार काटल जायब सँ पूर्व मे मन्त्र पढ़ि केँ प्रसूत बालक केँ सुवर्ण मधु और घृत चटाओल जाइत छैक। तखनि नामकरण, जन्मदिनसँ ल कए ग्यारहम दिन वा बारहम दिन मे होइ छैक। नाम केहन होमक चाही तकर पतंजलि कृत महाभाष्यमे निर्णय अछि जे द्वयक्षरं चतुरक्षरंम्वा नामकरणम कुर्यात, दु अक्षरक अथवा चारि अक्षरक नाम हो और केहेन होमक चाही तँ मंगलवाचक नाम ब्राह्मणकेँ, बल वाचक नाम क्षत्रियकेँ, धनवाचक नाम वैश्यकेँ और दास भाव वाचक नाम शूद्रकेँ यथा शर्म्म, वर्म्म, भूति, दास,शुभशर्मा आदि। एही तरहे स्त्रीयो जातिक नाममे विचार अछि। स्त्रीक नाम एहन होमक चाही यथा अक्रूर और सरल तथा कल्याण वाचक,यथा यशोदा अछि। तदनन्तर षष्ठम मासमे अन्नप्राशन, प्रथम वा तृतीय वर्षमे चूड़ाकरण और गर्भाष्टमक बाद अर्थात जन्मसँ ल क 6 वर्ष तीन मासक बाद, उपनयन संस्कार होइ छैक। एही तरहे शास्त्रोक नियम अछि। यथा(प्रथमेs तृतीयेवा चूड़ाकरणम द्विजन्मनाम। गर्भाष्टमे ब्राह्मण स्योपनायनम एहि तरहे संस्कार कयलासँ किछु फल छैक की नहि। एहिमे स्मृतिक वचन प्रमाण दैत छी। यथा-

वैदिके:कर्मभिः पुण्यै निकिषा दिद्विर्जन्मनाम। कार्य्य : शरीरे संस्कार:पावनः प्रेत्य चहेच ?

श्री रमानन्द झा, कोइलख (वर्ष-02,अंक-05,मइ 1934 ई.)

धर्म प. श्री द्वारका नाथ झा, क्वैलख।

यतो धर्म्मस्ततोजयः।

एहि क्षणभंगुर संसारमे सर्वतो भावे धर्म उपासनीय थीक। कारण धर्महि सँ प्राणी चिरस्थायी सुखक अनुभव कै सकैछ। परञ्च धर्म ककरा कही, धर्म्म की वस्तु थीक, धर्म्मक केहन स्वरूप छैक, एकर निर्णय करब अत्यन्त क्लिष्ट अछि। कारण धर्मक गति अत्यन्त सूक्ष्म छैक।�घृ�धारणे धातु सँ धर्म्मक साधनिका भेल छैक। यद्यपि धर्म्म अनेको अछि तथापि अर्थ सभक एक्के छैक। अपन-अपन शास्त्रोक्त जे कर्तव्य कर्म करब, प्राणीपर दया राखब सैह धर्म कहै छी तँ यथार्थ कारण जे अहिंसा परमोधर्मः। परञ्च सांख्य सूत्र प्रणेता महर्षि कपिल मुनिक सूत्र छैन्ह जे-�यतोभ्युदय निःश्रेयस सिद्धि: स धर्म्म :। � इहो सूत्र ओहि अर्थ के पुष्ट करैत अछि। मानव धर्मशास्त्रमे एहि तरहेँ धर्म्मक लक्षण लिखित अछि। यथा �विद्वद्भि: सेवितः साद्भिर्नित्य मद्वेष रागिभिः। हृदयेनाभ्यनुज्ञातोयो धर्म्मस्त निवोधत। �अर्थ- साधु तथा राग द्वेष शून्य विद्वान सभैक द्वारा हृदयसँ अनुज्ञात अर्थात मनसँ जानल और निरन्तर सेवन कयल जे धर्म ओकरा सुनू। बिना धर्म्म सँ सुख कदापि नहि भ सकैछ। सुखक अभिलाषा समस्त जीव के होइ छैक। परञ्च मानवीय कलेवर धारी जीव के विशेषतया अभिलाषा होइ छैन्ह। जाहि हेतु पूर्व कालमे ऋषि महर्षि तथा राजर्षि लोकनि धर्माचरणक प्रभाव सँ असाध्य साधन कय अन्त मे अक्षय सुख प्राप्त करैत भेलाह। सर्वप्रिय प्राण थीक जीवमात्रक हेतु परञ्च ताहूसँ श्रेष्ठ धर्म्म थीक। कारण जे प्राण रहनिहार नहि थीक ओकर आधार शरीर सँ अनित्य छैक। शरीर अनित्य भेलासँ अत्यन्त कष्ट सँ प्राप्त जे शारीरिक गुण जे विद्या बुद्धि क्रिया कौशल आदि सभ विनष्ट भ जाइ छैक। तखन शरीरातिरिक्त वस्तुक कोन कथा। एहन एक मात्र सहायक मित्र धर्मे टा अछि जे सर्वदा संग रहनिहार थीक। धर्म्म दूत रहे भ सकैछ अर्थ सँ ओ शरीरो सँ एहि तरहे स्मृतिकारोक्त वचन अछि- शरीरात एतवते धर्म: पर्वतात सलिलं यथा �किंचधनादधर्म:।

प.श्री द्वारका नाथ झा, क्वैलख। वर्ष-02,अंक-07,जुलाइ-1934ई.)

सनातनधर्म श्री शोभानन्द झा बी.ए.

सम्पनं त्रिषु कालेषु सर्वावस्थासु शाश्वतं। सनातनं मतं सत्यं चीयते नापचीयते।।

सनातन धर्म ककरा कही ? स्मरणातीत कालसँ जाहि धर्म केँ हमर पूर्वज लोकनि- वशिष्ठ, वत्स,याज्ञवल्क्य प्रभृति- मानि ऐलाह जे धर्म अद्यपर्यन्त हमरा लोकनिक मान्य अछि तकरे नाम थीक सनातन धर्म। सनातनधर्मक प्रधान अंग थीक वर्णाश्रमधर्म। अतः वर्णाश्रमधर्मक पालन करब सनातनधर्महिक जड़ि सीचब थीक। वर्णाश्रमधर्म निम्नलिखित अछि :-

ब्राह्मण क्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप। कर्मणि प्रविवक्तानि स्वभाव प्रभवैगुंनैः।।

गीतामे भगवान कृष्ण अर्जुन केँ उपदेश कैने छलाह जे ब्राह्मण, क्षत्रिय,वैश्य वो शूद्रक कर्म स्वभावानरूप पृथक कैल अछि।

शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जव मेव च। ज्ञानं विज्ञान मस्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजनं।।

ब्राह्मण स्वभावतः शान्त, जितेन्द्रिय, बह्याभ्यंतर पूत, क्षमासम्पन्न सरल,ज्ञान-विज्ञान प्रिय वो आस्तिक होइत छथि।

शौर्यं तेजो धृतिरदाक्षयं युद्धे चाप्यपलायनम। दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम।।

क्षत्रिय स्वभावतः शूरवीर,तेजस्वी,धैर्यसम्पन्न,चतुर,युद्धमे दृढ़,दानपरायण वो प्रजापालक होइ छथि।

कृषि गौरक्ष्य वाणिज्यम वैश्यकर्म स्वभावजम। परिचर्चाक्तम कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम।।

(गीता अध्याय 12) कृषि, गौरक्षा,वाणिज्य ई तीनू टा कर्म बनियांक स्वभावसिद्ध छैक। अन्ततोगत्वा शूद्रक स्वभाव जन कर्म परिचर्चा थिकैक। सम्प्रति समाजमे स्वभाव विरुद्ध धर्म वा मिश्रित धर्म प्रचलित अछि। ब्राह्मणक शुद्ध स्वभाव थिकैन्ह जे क्षमासम्पन्न होथि मुदा अनेको ब्राह्मण सम्प्रति शूरवीर होइ छथि जेना द्रोणाचार्य पूर्वमे भेल छलाह। ई कोनो तेहन दोष नहि थीक परञ्च क्षात्र धर्मक निशान थीक। शूद्र ज केओ तपस्वी अछि त बुझक थीक जे ओ ब्राह्मणकर्म पालन कै रहल अछि। ई तेहन भ्रष्ट युग अछि जे कतिपय ब्राह्मण अव्याहत रूपसौं वैश्यकर्म ओ कतिपय वैश्य शूद्रकर्म कै रहल अछि। शास्त्रदृष्टया चाण्डाल त प्रायः सभ वर्णमे देखब। भवभूति निर्मित उत्तर रामचरित काव्यमे लिखित अछि जे महाराज रामचन्द्र कोनो शूद्र तपस्वीक बध हेतु शत्रुघ्नकेँ पठौलन्हि। शत्रुघ्न अपना सहोदर भाइक आज्ञा पाबि जम्बूक ? नाम शूद्र केँ मारि यमपुरी प्रेषित कैलन्हि। आब से काल नहि। आइ अनेको शूद्र ब्राह्मणकेँ निःशंकोच धर्मोपदेश कै रहल अछि(जन्मना) ब्राह्मण लोकनि घट्ट-घट्ट उपदेश पीबि रहलाह अछि। अनेको क्षत्रिय वैश्यक चाकरीकेँ गुजर कै रहलाह है। कारण 'आपत्काले मर्यादा नास्ति�अथवा�विनाश काले विपरीत बुद्धि:'। अनेकानेक अनाचार आओर कुसंस्कार दृष्टगोचर भै रहल अछि। अपन-अपन परम्परागत धर्म विसरि गेलय तेँ ई दशा प्राप्त भेल छी। एखनो धरि जे सनातन धर्मपर वस्तुतः आरूढ़ अछि से आनन्द अछि। विद्वान कर्मनिष्ठ ब्राह्मण प्रायः सबठाम सुखी छथि। देशादेशान्तरमे पैर-पूजा करा रहलाहै। पश्चिममे राजपूत लोकनि बहुसंख्यक अपना धर्मपर आरूढ़ छथि, फलतः ओ अपना राज्यमे सुयश प्रजापालन कै रहलाहै। अनेको मारवाड़ी ओ गुजराती बनियाँ वर्ग वाणिज्य वृत्तिसँ दिनानुदिन कोटिध्वज वा लक्षपति भै रहल अछि। कलकत्ता वो बम्बइ मे बनियाँक शान देखबायोग्य अछि। सनातन चालिपर दृढ़ रहने सबठाम विजय हैत। इहलोक परलोक दुनू बनत। कतेक गोटाक भ्रान्तिपूर्ण मत अछि जे सनातन धर्म हमरा लोकनिक सर्वनाशक जड़ि थीक। परञ्च ई सरासर गल्प थीक। कारण जे वशिष्ठ, रामचन्द्र, शुरथ वो हनुमान क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य वो शूद्रक पद्धति पालन कय प्रातःस्मरणीय भय गेलाहै। सीता, सावित्री ओ पद्मिनी सनातन पातिबर्त्य कैं पालन कय भारतवर्षक �एकै धर्म एक व्रत नेमा, काय वचन मन पति पद प्रेमा�मूलमंत्रकैं सन्सार भरिमे उद्घोषित कैलनि अछि। किं वहुना अनेकानेक सनातनधर्मी शास्त्रत, राजनीतिज्ञ, भक्ति, शूरवीर, चित्रकार ओ कारीगर भय अपन समाजक मंगल कैलनि अछि। इतिहास-पुराण एकर साक्षी अछि। धर्मोरक्षति रक्षितः। सनातनधर्मक रक्षा कोना करी ? सनातनधर्म की थिक ई विषय अपना बालक ओ कन्याकेँ नेनहि सँ सिखाबी। पाचमवर्ष सँ नेनालोकनिकेँ अपन मातृभाषामे उपदेश करी। काँच वांशके जाही गरे नबैब ताही गरे नबत। नहि पहिने त उपनयन संस्कार भेलापर बालककेँ सनातनी स्कूल वा पाठशाला मे पढ़क हेतु बइसाबी। संध्योपासना प्रातःकाल ओ संध्याकालक अवश्ये करी ओ हुनको सँ कराबी। लोअर-अपर कक्षाक पोथीमे अपूर्व-अपूर्व दोहा सभ छैक यथा-

"मीठी बोली बोलिये, मन का आपा खोय। औरन को शीतल करै, आपहु शीतल होय।। "

साँच बरोबर तप नहीँ, झूठ बरोबर पाप जाके हृदय साँच है वाके हृदय आप।।

दुखमे सुमिरन सब करे , सुखमे करे न कोय। सुखमे जो सुमिरन करे, दुख काहे को होय।। "

बच्चा लोकनिकेँ एहि दोहा सभहक अर्थ बुझाबी और अपनहुँ अनुभव करी। केवल पाठशालाक गुरूजी पर निर्भर भय अभिभावक लोकनिकेँ नहि चाही जे अपन बोझ पटकि दी। पुत्रवत्सल पिताकेँ अपन कर्तव्य पालनमे कसरि नहि करक चाही। सन्तानक दायित्व सभसँ बेसी माय-बापकें छैक। जखन माय- बाप अपना सन्तानकेँ उचित शिक्षा-दीक्षा देथि तखने ओ संतानसँ सुखक अभिलाषा करथि। यावत धरि पुत्र '�पितरि प्रीतिमापन्ने प्रियन्ते सर्व देवताः�वा �नास्ति मासमो गुरुः�उक्ति सबहिक अर्थ नहि जानय योग्य हैताह तावत अपना माता-पिताकेँ कोना संतुष्ट रखताह ? स्कूलमे बालक-बालिका लोकनि की पढ़इ छथि तकरा दिशि गुरुवत जिज्ञासा राखी। ब्राह्मण माय-बापकेँ संकल्प क लेबक चाही जे सन्तानकेँ ता शास्त्रपारंगत बनौने दम नहि लेब। क्षत्रिय ब्राह्मणहिक आदर्श केँ पालथि से नहि लिखइ अछि। तनिका चाही जे राजनीति,शस्त्रास्त्र ज्ञान इत्यादि अनेको क्षत्रियोचित विषय अपना सन्तानकेँ सिखाबी। वैश्य अपना पुत्रकेँ वाणिज्य व्यवस्थामे चतुर बनाबथि से उत्तम, कारण केवल वकील-मुख्तार बना क अपना समाजक कल्याणसाधन करब मृगतृष्णा मात्र थिकन्हि। नीक होइत यदि पृथक-पृथक वर्णकेँ अपना कर्तव्य कर्म सिखबा हेतु पृथक-पृथक स्कूल होइत। शिक्षा विभागकेँ एहि दिशि ध्यान राखक चाही। वर्णाश्रमधर्म सिखबा हेतु , साधन केर आवश्यकता अछि। म्युनिस्पैलिटी, डिस्ट्रिक्ट बोर्ड, कौंसिल तथा असेम्बली मे एकर आन्दोलन होमक चाही। परन्तु याधारि से व्यवस्था नहि भेलै ताधरि जैह संस्थासभ बनल अछि ताही सँ काज ली। कारण दिल्ली दूर अछि। वा एहिमे विवाद भै सकैछ। सनातनधर्म रक्षार्थ एक टा बात और आवश्यक अछि। राजनीतिक जतेक संस्था अछि यथा कॉउन्सिल, असेम्बली सभठाम सनातनी सदस्य सनातनी जनता दिशसँ जाथि। अनेकानेक ब्राह्मो, आर्य्यसमाजी वा विप्लवकारी सभ एहि संस्था सभमे प्रधान भ बहशलै। सनातनी टुकुर-टुकुर तकिते रहि जाय छथि। सनातनधर्मक कर्णधार लोकनिकें सावधान होमक चाही। अनेकानेक सनातनधर्म विरुद्ध बिल सब असेम्बलीमे पेश हो6इ अछि तकरा विरोध करक हेतु सनातन धर्मी वक्ताकेँ जैव अनिवार्य अछि। सनातनी जनताकेँ कदापि ने बिसरक थीक जे राजनीतिक सत्ता एखन सनातनी राजाक हाथमे नहि अछि। ई बात स्वयंसिद्ध अछि। हमरा लोकनिक संकल्प होमक चाही-

श्रेयां स्वधर्मो विगुणः प्रधर्मातस्व नुष्ठितात। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।।

यदि हमरालोकनि शास्त्रोक्त मार्गसँ विहित कर्म करी तखनहि सनातन धर्मक रक्षा वा अपन रक्षा कय सकै छी अन्यथा भगवाने रक्षा करथि तखने रक्षा भय सकै अछि। भाइ-भाइमे प्रेम

(चन्द्र चुनै वरु अनल कर, सुधा होइ विष तूल। सपनहुँ कबहुँ कि आचरहिं भरत राम प्रतिकूल।।)

बसपा-बेटा मे प्रेम, कि वहुना�बसुधैव कुटुम्बकम '�सभसँ प्रेम ... ई सनातन धर्महिक आदर्श थीक। अन्तमे चारू वर्णक धर्म निर्देश कय हम अपन संक्षिप्त लेख समाप्त करइ छी।

अहिंसा सत्यमस्तेम शौचमिन्द्रिय निग्रहः। एतं सामासिकम धर्मं चतुवर्णएय ब्रवीणमनु।।

लेखक:- शोभानन्द झा बी.ए., भराम। (वर्ष-02,अंक-11 नवम्बर1934ई.) संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-7 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-8 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-9 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-10 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-11 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.३.डॉ. सुमन मिश्र- वैदेही डॉ. सुमन मिश्र वैदेही {1} "अहाँ सभक जलखै राखि देने छी टेबुलपर, खा लेब ! अच्छा सुनू,  हमरा आइ कने विलम्ब हएत आबयमे, ठीक ?", वैदेही दुनू हाथसँ अप्पन पैघ केसके जूड़ा बनबैत बजलीह । राघव हफियाइत आ आँखि मिरैत बैसकी-कक्षमे प्रवेश केलाह, वैदेही दिस तकिते देरी हुनकर मोन प्रफुल्लित भऽ गेलनि । राघव कने एम्हर-ओम्हर देखिके आश्वस्त भेलथि जे पापा-मम्मी अखैनतक नहि उठल छलथि । भरि पाँज वैदेहीके पकड़ि राघव धीरेसँ बजलाह,  "ठीक, तखैन हम कार्यालयसँ आबिके अहाँके पिक-अप कऽ लेब ! अहाँ टिफ़िन लेलहुँ ?" "मम्मी-पापाकेँ आइ डॉक्टरसँ देखेबाक आवश्यक अछि, अहाँक समय भेटत तऽ आइ डॉक्टरके देखेबाक प्रयास करब ? हम बससँ आबि जाएब"- वैदेही सोचैत बजलथि। मम्मी-पापा केँ दू दिन सँ ज्वर धएने रहनि । विवाहक तीन मास भेल रहै आ राघवक माता-पिता पछिला हप्ता पहिल बेर घर आएल रहथि । तखैनसँ ओना तऽ सभटा ठीके चलैत छलय मुदा हुनका सभक वैदेहीक काज करब नीक नहि लगैत छलनि । सेहो आबय-जयबाक समयक ठेकान नहि । वैदेही सीनियर रिसर्च फेलो छलथि तऽ १० सँ ५ वाला रूटीनमे काज कहुना चलैत छलनि । प्रयोगशालामे मशीन सभके बुकिंग लऽ भोरे ८ बजेसँ बेस मारा-मारी होइत छल, दूटा मशीनपर लैबमे आठ गोटाक काज कोना आगू बढ़त ? एही दुआरे लैबक सभटा पीएच.डी विद्यार्थी आ पोस्ट-डॉक कर्मचारीसभ राति दस-एगारह बजे तक नियमित काज करैत रहय । जाबय धरि वैदेही हॉस्टलमे रहैत छलथि सभटा सम्हरि रहल छल । मुदा विवाहक पश्चात काज गड़बड़ा गेल । दुनू परिवारकेँ नीक लगैत छलनि जे कनियां बेस पढ़लि-लिखलि छथि मुदा अवार्ड सभसँ परिवारजन जतेक आनंदित होइत रहथि, ओतेक दैनिक दिनचर्यामे कोनो सहानुभूति नहि रहनि । वैदेही कहैत रहथि अप्पन माता-पिता केँ कि पीएच.डी भेलाक पश्चात विवाह करैमे बेसी सुविधा रहत, मुदा ई भयसँ जे बेटी आन बिरादरीमे कहीं विवाह नहि कऽ लिअय, माता-पिता वैदेहीक विवाह करबा देलखिन्ह । राघव ओना बेस नीक बर छलाह, काजक प्रति हुनकर उत्साह देखिकेँ वैदेहीक मोन आब कने निश्चिन्त भऽ रहल छलनि । मुदा राघवक गाम-समाजमे अपेक्षाक हिसाबेँ कियो वैदेहीक समर्थन नहि करैत रहनि । सासुरक लोक पहिने जोर देलकनि जे नबका घरमे एक मास कनियां एना लैपटॉप लऽके नहि बैसथु, लोक सभकेँ एहेन अशिष्टता बड्ड खराप लगैत छलनि । तकर बाद राघवक पिसाजीक कहब छलनि, "कनियांकेँ पीएच.डीसँ घर थोड़े चलत, हाथसँ लैपटॉप झीकू आ हँसुआ-चक्कू दिऔन, एहन-एहन पीएच.डी हम बड्ड देखनै छियै !" , तऽ दोसर अवसरपर पितियासासु कहलखिन्ह, "यै, नबका घर आएल छी, छह मास- एक साल धरि काज छोड़ि दिऔ, ई सभ तऽ लगले रहैत छैक !" एही सभसँ यैह भेल जे विवाहक पहिने वैदेहीक जेहो उत्साह छलनि अप्पन पढाइ-लिखाइ आ शोध लऽ कए, से आब ओहेन नहि बांचल । लैबमे ओहिने बहुत प्रेशर आ तनाव छल, आब जे छुट्टी सभ लिअऽ पड़ैत छल तेहिसँ वैदेहीक बॉस खौझाइत रहैत छल, दूटा शोध-पत्रसँ नाम सेहो काटि देलक । काल्हि कहने रहनि जे तीन दिनमे काजक रिजल्ट टेबुलपर चाही । तैं आइ सांझतक काज करब आवश्यक छल, मुदा वैदेहीके पता रहैन जे आइ बॉसके प्रसन्न करै लए काज करब तऽ घरमे कोनो विवाद अवश्य आरंभ भऽ जाएत । वैदेही अप्पन टिफ़िन एक हाथसँ पकड़ि दोसर हाथसँ केबाड़ खोलैत लैबक लेल बिदा भेलीह, मोनमे क्रोध होइत रहनि जे स्कूटी-गाड़ी किए नहि सीखलहुँ । राघव हुनकर दिसि ताकिके तुरत्त अप्पन स्कूटी निकालि लेलथि आ वैदेहीक २०० मीटर जाइत-जाइत स्कूटी लऽके सामने आबि गेलाह । "पाछू बैसू वैदेही ! हम अहाँके झटसँ छोड़ि देब कॉलेज", राघव प्रेमसँ तकैत बजलाह । वैदेहीक मोनमे चलैत सभटा आबाज बिला गेल आ हुनकर चेहरापर मुस्की आबि गेलनि । एहि सभ खराप समयमे छुच्छे राघवक स्वभावसँ वैदेहीकेँ कोनो कष्ट नहि बुझाइ छलनि । वैदेही राघवके कसिकऽ पकड़िकऽ पाछू बैसि रहलीह आ दुनू गोटा कॉलेज लेल बिदा भेलथि । एहि समय एकटा छोटका सन स्कूटी वैदेही लेल कोनो पुष्पक विमानसँ कम नहि छल । {2} लैबमे साढ़े आठ बजे ढुकैके बादो वैदेही देखलथि जे हुनकर काजक सभटा मशीन आजुक राति दस बजे तक एकटा दोसर पीएच.डी विद्यार्थी बुक कऽ लेने अछि ! वैदेहीके मोनमे परेशानी भेलनि, ई सभ लैबमे पहिनो होइत रहैत छल मुदा तखन ऐना दूरसँ नहि आबय पड़ैत छल तऽ रातिओमे सभटा काज भऽ जाइत रहै । अखन कैंपसक बाहर राति आठ-नौ बजे रस्ता एकदम सुनसान भऽ जाइत छल । वैदेही सोचलथिजे कनी ई दोसर विद्यार्थीसँ अनुरोध कऽके दिनुक कोनो एकटा समयके बुकिंग स्लॉट लऽ लैत छी । एक्के गोटाके भरि दिनुक काज तऽ ऐना नहि रहबाक चाही जाहिसँ बांकी सभ बैसलै रहि जाए ! वैदेही ओकरा दिसि ताकि सुस्ते बजलीह, "अहाँके पीसीआर मशीनक स्लॉट सभमेसँ हमरा सांझसँ पहिने एकटा तीन घंटाक स्लॉट दऽ दिअऽ प्लीज, आइ हमरा लेल आवश्यक अछि ।" दोसर विद्यार्थी बिना वैदेहीक दिसि तकनै असहमतिमे मुड़ी डोला देलक । वैदेही सोचलथिजे एहेन स्थितिमे लैब सभमे विवाहित महिला सभ लए काज केनाइ कठिन छै, अखन तऽ बच्चा सेहो नहि अछि तखनो ई अवस्था अछि । हुनका मोन पड़लनि जे कोना हुनकर बॉस नियमित रूपसँ अप्पन दस बरखक बच्चा लैबमे अनैत रहथि जखन ओकर स्कूल ख़तम भए जाइत छल मुदा लैबक एकटा पोस्ट-डॉकके पछिला बरख कहने रहथि जे अप्पन नेना-भुटकाके कैंपस मए नहि आनू, लैब कोनो धर्मशाला नहि छियैक । ओ पोस्ट-डॉक वैदेही संग बैसि कानय लागल रहय जे यदि ओकर तीन बरखक बच्चाके कतो राखै के जगह नहि भेटतै तऽ घरपर रहए पड़त । आ से ठीके ओ एक मासक बाद अप्पन त्यागपत्र दऽ बिदा भऽ गेल छलीह । आब वैदेहीके चिंता भेल की केम्हरसँ काज निकलि सकैत अछि । दोसर तल्लापर एकटा आर लैब रहए जतऽ हुनकर काजक मशीन छल । वैदेही जेना-तेना काज अगुऔलथि । दोपहरियामे हुनकर बॉस जे एतेक दिन धरि दू मिनट ठीकसँ गप्प नहि करैत रहय से अप्पन ऑफिसमे बजा लेलक आ खूब मधुर बोलीमे कहय लागल जे जर्मनीमे एकटा पैघ कॉन्फरेंस अछि एक सप्ताह धरि, से हुनकर इच्छा छनि जे वैदेही हुनकर संग जाइथि । ई कहिके हुनकर बॉस मुस्कीक संग वैदेहीक मुँह  ताकय लागल । "ई कॉन्फरेंस अहाँ लेल आगू बहुत काज आएत । ओना खर्चा बहुत अबैत अछि - दू लाखतक लागि सकैत अछि, यदि दिक्कत हैत तऽ अपना सभ शेयरिंग रूम लऽ सकैत छी, अहाँके स्टेजपर बजबाक अवसर भेटय ताहि लेल हम विशेष सिफारिश करब । की कहैत छी, वैदेही ?" वैदेहीक मोन काँपि उठलनि । सभ दिन झोलंगा कपड़ा सभ पहीरि-पहीरि ओ प्रयास करथि जे बॉस आ सहकर्मी सभसँ कोनो परेशानी नहि हुअय मुदा आब हुनका अप्पन अपेक्षापर हँसी अबैत रहनि । ई कोनो पहिल बेरक घटना नहि रहै लैबमे, बेरा-बेरी सभ छात्रा आ महिला सभ संग हुनकर बॉस कॉन्फरेंस जेबाक चेष्टा करैत रहथि जाहिमे कोनो पुरुख विद्यार्थीके आमंत्रित नहि करैत रहथिन्ह । पहिल बेर जखन पहिल पीएच.डी छात्रा हुनकर संग गेल रहनि तऽ कॉन्फरेंसक डिनर पार्टीमे मदिराक निशांमे बॉस अप्पन छात्राके बेस निकट आबिके गप्प करय लागल । तखन एकटा दोसर प्रोफेसर आबिके हुनका दोसर ठाम बांकी प्रोफेसर सभ लग लऽ गेल आ छात्राके इशारा कऽ पुछलनि जे अहाँ ठीक छी ने? ओ छात्रा बादमे आबिके सभटा गप्प अप्पन जूनियर वैदेही कऽ कहने छल । "नहि, हम नहि जा पाएब अहाँक संग, हमरा अखन समय नहि भेटैत अछि ।", वैदेही बिना बेसी समय लेने जवाब देलीह, चेष्टा करैत जे हुनकर मोनमे एतेक जे डर आ कंपकपी रहनि से आवाज़मे नहि आबय । हुनकर बॉस क्रोधित भऽके बजलाह, "गेट आउट यू फ़ूल! एकर बाद देखू केना हम अहाँ के कांफ्रेंस- पोस्टडॉक लेल कतहु जाए दैत छी ! " वैदेही ओकर बाद भरि दिन एम्हर-ओम्हर अप्पन बॉससँ नुकयलथि । सांझमे काज ख़तम होइत-होइत आठ बाजि गेल । वैदेही अप्पन बैग लऽके बिदा भेलीह हड़बड़ीमे जे कोनो बस भेटि जाए । दस मिनट बस स्टैंडपर ठाढ़ि रहलीह, हुनका देखाइत छलनि जे ओम्हरसँ जाएय-आबय बला सभ मोटरसाइकिल वला हुनका ऊपरसँ निच्चा देखैत जाइति रहनि । वैदेही मोनेमोन बजलीह, "महिला सभ लए एक-एक दिन काटब पहाड़ भऽ गेल अछि एम्हर ।" बस भेटल तऽ महिलाक सीटपर दूटा शराबी बैसल छल, वैदेही पाछू दिसि चलि गेलीह । बसक कंडक्टर वैदेहीक ढांड़पर हाथ लगबय लागल । वैदेहीक इच्छा भेलनि जे काली बनि ओकर मुड़ी काटि ली, मुदा देहमे जेना लकबा मारि देलकनि । अप्पन घर लग बससँ उतरैत देरी वैदेही हबोढ़कार भए कानय लगलीह । एकटा महिला जे भरि जीवन सभटा कक्षा सभटा परीक्षा सभमे सभसँ बेसी नंबरसँ उत्तीर्ण करैत रहए, तेकर जीवन आ बांकी कोनो महिलाक जीवनमे कनियों अंतर नहिं । त्रेतायुगक एकटा दस-मुखी रावण जेना कलियुगमे अखन दसटा मुख सँगै-सँग दसटा देह सेहो धारण कऽ लेने रहय । {3} वैदेही अप्पन नोर पोछि के घरमे प्रवेश केलथि । देखलथि जे तीनू गोटय- राघव आ सासु-ससुर चौकीपर बैसि के हुनके दिसि घृणासँ ताकि रहल छलथि। सासु तामसमे बाजय लगलीह, "आबि गेल अहाँक अर्धांगिनी केम्हरोसँ मूँह कारी कऽ के, नौ बजैत अछि, एहेन कोन काज रहैत छौ ? छिनारि कहींके!" वैदेही मूक ठाढ़ि छलीह । किछु बजबाक ने साहस भेल ने आवश्यकता बुझाएल । वैदेहीक आँखिमे नोर जे सुखाएल छलनि से फेर डबडबा गेलनि । ससुरके आँखिमे सेहो क्रोध छलनि, आ तामससँ देह हिलैत छलनि । "राघव, एतेक समय कनियां घरसँ बाहर रहैत छथि, समाज थू-थू करत अहाँपर ! पुरूख छी, स्त्रीके खुंट्टामे बान्हब सीखू, बंद कराउ एकर पीएचडी !" वैदेहीक अप्पन माथ आब बेस भारी लगैत रहैन,  एहि पूरा संसारमे हुनका अखन छुच्छे राघवक समर्थनक आवश्यकता छलनि । ओ राघवक दिसि तकलथि, राघव हुनकासँ प्रेम बेस करैत छलथि मुदा अप्पन माता-पिताक सामने किछु नहि बजलथि । वैदेहीके लगलनि जे राघव हुनकर अझुका समस्त घाहपर नून छिड़कि देलथि ! बिनु किछु कहने, वैदेही नहाय लेल चलि गेलीह। मोनमे खौलैत पानिसँ नहाएके इच्छा छलनि । बैसकी-कक्षसँ हुनकर चरित्रपर जे गप्प भऽ रहल रहय से शॉवरके निच्चाँ सेहो सुनाइ दऽ रहल छल । वैदेहीक मोन समाजसँ एतेक जरल छलनि जे खौलैत पानिक ताप हुनका किछु नहि बुझैलनि । रावणक एहि संसारमे अग्नि परीक्षा आइयो सीतेक जे देबाक छलनि� अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.४.ग्रुप कॅप्टन (डॉ) वी एन झा- जोशीमठ में भू-धसान आ ओकर मानवीय पक्ष ग्रुप कॅप्टन (डॉ) वी एन झा जोशीमठ में भू-धसान आ ओकर मानवीय पक्ष विषय-वस्तु उत्तराखंड में बदरीनाथ धाम जाए के रास्ता में आवै वाला प्रमुख शहर जोशीमठ किछु प्राकृतिक आ किछु मानवकृत आपदा-विपदा सँ गुजरि रहल अछि। ओना तँ टेक्टोनिक प्लेट पर स्थित समस्त चमोली जिला भूकंप सँ प्रभावित अछि, मुदा जोशीमठ में अनियंत्रित बहुमंजिला गृह-निर्माण व घना आवादी ओहि ठाम भू-धसान के मुख्य कारण बनि गेल अछि I एहि ठामक नवीनतम प्राकृतिक आपदा जे २७ दिसम्बर २०२२ क शुरू भेल आ ८ जनवरी २०२३ धरि एक भयावह रूप ल चुकल छल, अनेकों मकान में दरार आवि गेल आ धरातल वा सड़क फाटए लागल । बहुतों घर - दीवार सभ में बड़-बड़ दरार आवि गेल रहए आ किछु तँ धराशाई सेहो भ गेल । घर, आंगन-प्रांगण, सड़क-गली मार्ग, सभ में दरार आबि गेल रहए आ कतहु-कतहु घरक सतह सेहो धँसै लागल। वार्ड संख्या १, ४, ५ आ ८ में एहि आपदा क असर बेसी रहल। एहि प्राकृतिक आपदा सँ बहुतों घर बिलकुल असुरक्षित भऽ गेल आ रहए जकाँ नहिं रहल, जकर तस्वीर नीचा देखायल गेल अछि। जोशीमठ आ पूरा चमोली जिला में हाहाकार मचि गेल, जाहि पर पूरा भारत आ विश्व के ध्यान आकर्षित भऽ गेल रहए । भारत आ दुनियाक मीडिया ओतय रहि, तरह-तरह के समाचार देवै लें वाध्य रहए। दिवस-रात्रि देश दुनियाँ में मात्र एके समाचार छल�जोशीमठ के की हेतै ? तत्काल बचाव कार्य आपदा पश्चात उत्तराखण्ड राज्य सरकार अति सराहनीय बचाव कार्य कयलक । जतबे घर असुरक्षित भऽ चुकल रहए तेकरा चिन्हित कए केँ ओतऽक लोकनि केँ एक सुरक्षित जगह मे स्थान्तरित कए हुनकर देखभाल शुरू कयल गेल । किछु लोक ओहि असुरक्षित घर केँ छोड़ए लें तैयार नै छल जिनका मनाओल गेल । राज्य प्रशासन द्वारा भरसक मदद के आह्वान कए ओ सभु परिवार केँ सुरक्षित स्थान पर लाओल गेल । सभ केँ तुरंत राहत पहुँचाएल गेल आ एक सहमति बनायल गेल जे जतेक लोकनि जोशीमठ सँ बाहर अन्यत्र सुरक्षित जगह जा चुकल छलाह, हुनका घर के किराया सेहो देल जाओल । राज्य आ केंद्र सरकार के सभु राहत संस्था (SDRF, NDRF) केँ तैनात क देल गेल जेकर वैज्ञानिक दल केँ स्थिति का जायजा लेबा लेल पठाएक आदेश देल गेल । सरकारी व अनेकों गैर-सरकारी संस्था केँ राहत कार्य में लगा देल गेल । पीड़ित परिवार में सँ किछु एहेनों समूह छलाह जे चमोली क्षेत्र में दशकों सँ चलि रहल अनियंत्रित निर्माण कार्य व पहाड़-कटाव में सरकारी लापरवाही सँ क्षुब्ध छल। भू-धसानक मुख्य कारण १९७७ में जोशीमठ चमोली में आएल प्राकृतिक विपदा के बाद जे वैज्ञानिक समूह के �मिश्रा कमिटी� बनाओल गेल छलन्हि, ओ अपने समयक सरकार सभ केँ आवश्यक कदम उठेबै लेल दिशा-निर्देश देल छल जे तत्कालीन सरकार अनदेखी का देलन्हि । खास बात ई अछि जे तत्कालीन जनता दल आ तत्पश्चात कांग्रेसक राज्य आ केंद्र सरकार सभ ओ महत्वपूर्ण रिपोर्ट केँ ठंढा बस्तामें राखि, ओहि पर किछु कार्रवाई नैं केलक। बाद में आपदा के पुनरावृत्ति भेल, तें देहरादून स्थित वाडिया हिमालयन भूगर्भ संस्थान सेहो जाँच करि केँ एक आओर रिपोर्ट सरकार केँ सौंपलक, मुदा ओकरा पर सेहो किछु खास कदम नइ उठाउल गेल। केवल कांग्रेस सरकार केँ दोष देब उचित नहि होयत, कारण कि ओकर बाद क अन्य सरकार सभ सेहो ओहि रिपोर्ट केँ ध्यान में राखि कोनों ठोस कार्य नहि कएलक । परिणाम ई भेल जे जोशीमठ में अंधाधुंध रूप सँ बहुमंजिला पक्का मकान केर अनियंत्रित निर्माणक विस्फोट भेल आ ओकर परिणाम हम सभक समक्ष अछि। उल्लेखनीय छै कि जोशीमठ प्राचीन कालीन भूस्खलन के अस्थिर मलबा के ऊपर एक असंतुलित सतह पर स्थित छै, जेकर ऊपर वजन के सीमित सीमा होबाक चाही । जँ ओ भूखंड के वजन ओहि सीमासँ बेसी भ जाएत तँ ओकरा जमीन मे धँसै के संभावना बढ़ि जाएत । जोशीमठ के संदर्भ में वैज्ञानिक मंतव्य अछि जी ओतए एतैक बेशी घर-बार के अनियंत्रित निर्माण करलऽ गेलऽ छै जे सुरक्षित सीमा स॑ बहुत गुना अधिक छै । एकर अलावा किछु पहाड़ी के ऊँच ढलान ओकरा औरो बेशी अस्थिर बना देल छै, जेकरा प॑ अत्यधिक भार के कारण भूस्खलन-भूधसान के अत्यधिक संभावना भ गेल अछि । भारत-एशिया केरऽ �टेक्टरिक चट्टान� केरऽ टक्कर के कारण बार-बार होवै वाला भूकंपऽ स॑ ई दूनू आशंका कई गुना बढ़ि जाय छै । ई सब के संयुक्त परिणाम ई छै कि जोशीमठ में भवन निर्माण के विस्फोट के कारण घर-आँगन में धसान आरू दरार भ रहलऽ छै । संलग्न चित्र मे सेहो इएह बात देखाओल गेल अछि । इहो बुझाइत अछि जे किछु घर मे दरार नीचाँ उतरि रहल अछि। लेखक ई कहे में संकोच नहिं करै छथि जे एरोस्पेस व जैविक विज्ञान के वैज्ञानिक होवै के अतिरिक्त ओ भू-विज्ञान में अनेकों शोध केने छथि व शोध-पत्र सेहो प्रकाशित केने छथि I विगत में सभु राज्य सरकार एहि ठाम अनियंत्रित भवन निर्माण किए नहि रोकलन्हि, ओ समझ सँ परे अछि। एहि शहर मे एकटा सीवरेज सिस्टम क निर्माण किएक नहि कैल गेल, ओ बुझबा स परे अछि। सीवेज सिस्टम मात्र एक वार्ड मे स्थापित अछि आ दोसर निर्माणाधीन अछि जेकर अत्यावधि परिचालन नहि भेल अछि । बाँकी सभु वार्ड के दूषित जल (sewage) कतय जाइत अछि से ककरो ज्ञात नहि । हँ। कोनों परिवार कहियो अपन-अपन सेप्टिक टैंक साफ नहि करय छथि I तँ ई प्रायः स्पष्ट छै कि हर सेप्टिक टैंक स॑ दूषित जल के जमीन म॑ रिसाव होय रहलऽ छै आ संभवतः ओ पानी भूस्खलन म॑ मदद क रहलऽ छै । जोशीमठ के भू-धसान पर राजनीति आ दोषारोपण जोशीमठ के एक छोट जनमानस में बिना कोनो ठोस सबूत के एहो अवधारणा अछि जे ओ भू-भाग के पाछू अनेकों किलोमीटर दूर बनि रहल जलविद्युत परियोजना के कारण ई भू-धसान भ रहल छै । हुनका सब के ई बुझेवाए पडत जे एहि सीमावर्ती क्षेत्र में वैज्ञानिक दृष्टि सँ संचालित सुरक्षित सड़क आ जन-विकास के परियोजना अत्यावश्यक अछि I एहि मे किछु देशद्रोही लोकनि चीन या कम्युनिस्ट पार्टी के समर्थक, भारत सरकार के विरुद्ध आंदोलन के समर्थन क रहल छथि I संभवतः ओ सब नहि चाहैत छथि जे चीन के सीमा सँ लागल ई सीमावर्ती क्षेत्र के विकसित होवए । जल-विद्युत परियोजना कें जिम्मेदार ठहराबै कें एकटा आओर कारण छै I यहाँ वर्ष 2006-07 म॑ �जेबी जल-विद्युत परियोजना' केरऽ कमीशन के किछु दिन बाद भूस्खलन केरऽ घटना घटित होय गेलऽ छेलै । कतौ कतौ नया भूमिगत जल स्रोत आरू प्रवाह स्वतः भ गेल छलै जेकरा आम लोकनि मीलों दूर जल बिजली परियोजना स॑ आवै वाला बुझल, लेकिन एकर पुष्टि नहिं भ सकल अछि । ओ लोकनि ई बुझए में असमर्थ छथि जे नया जल श्रोत के कारण जोशीमठ के भूस्खलन सेहो भ सकैछ I एहिठाम सँ ५ किलोमीटर दूर 'चाय गाँव' में सेहो भू-स्खलन व नया जलश्रोत पाओल गेल अछि हालांकि तुलनात्मक रूप स बहुत कम I ओहि गाँव में बहुत कम घर के निर्माण भेल छै जाहि सँ जमीन पर दवाब कम छैक I ई सभु सँ ई कही सके छी जे कि एनटीपीसी के सुरंग जे 4 किलोमीटर दूर बनाओल जाय छै, जेकर एखन तलक कमीशन सेहो नै भेल छै, जोशीमठ म॑ भ रहलऽ भूस्खलन लेली जिम्मेदार नहिं बनाओल जा सकैछ । किछु भ्र्रान्त लोकनि द्वारा ई गलत धारणा ओहि लोकनि में परोसल जा रहल अछि जे एनटीपीसी मे हाइड्रो पावर बनाबे क बौद्धिक क्षमता नहि अछि, ओ केवल कोयला स बिजली पैदा करब जनैत अछि। दोसर दिस एनटीपीसी आ सरकार एहि गलत धारणा के सक्षमता सँ खंडन करबा मे सेहो असमर्थ बुझाइत अछि। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तुरंत प्रभावित क्षेत्र के दौरा केलनि, जनता सं बात केलनि, एक समिति के गठन केलनि आ सरकार तीन तरहक मुआवजा के प्रस्ताव रखने रहथि : - � एक घर निर्माण ल एकमुश्त मुआवजा � एक सुरक्षित स्थान पर जमीन के बदला में जमीन � सरकारी पीडब्ल्यूडी घर बनेबाक प्रस्ताव ई तीनू विकल्प भूस्खलन सं प्रभावित लोकनि केँ देल गेल छल मुदा किछु लोकनि एहि सं संतुष्ट नहि छलाह I हुनका सभकेँ बेसी जमीन आ मुआवजा चाही। सरकार केरऽ कार्रवाई स॑ असंतुष्ट किछु लोकनि 'जोशिमथ लैंडफिलिंग संघर्ष समिति' के गठन केलन्हि जेकर मुख्य मांग निम्नलिखित छै:- � जिनकर घर नष्ट भ गेल अछि हुनका अधिकतम मुआवजा भेटबाक चाही। � सरकार के प्रभावित लोक के बेशी जमीन देबाक चाही I � वर्तमान समस्या सरकार के लापरवाही के कारण अछि, एहि लेल सरकार के एकर जिम्मेदारी लेबय के चाही I � अवैध आ अनियमित भवन निर्माण सँ संबंधित अधिकारी केँ बर्खास्त करय के चाही I � हुनका इहो चाही जे चमोली रेंज आ एनटीपीसी पावर प्रोजेक्ट मे जारी ट्रैफिक बंद भ जाए I � मोदी के विकास मॉडल हुनका पसंद नहि छनि जाहि में पहाड़ी दूर-दराज स्थान में सड़क आओर बिजली पहुँचाओल जाइछ I � ओ चाहैत छथि जे सरकार के हर समिति मे हुनका लोकनिक प्रतिनिधित्व होवए चाही जिनकर सहमति सँ पहाड़ी क्षेत्र में नव-निर्माण व विकास के निर्णय लेल जा सकए I एहि सब के अतिरिक्त सेहो एहन-एहन मसला उठि रहल अछि जाहि सं ई स्पष्ट नहिं अछि जे ओ लोकनि की चाहैत छथि I लगै छै कि किछु वामपंथी आरू बीजेपी के राजनीतिक विरोधी भी संघर्ष समिति म॑ शामिल भ केँ अराजकता फैलाबे के प्रयत्न क रहल अछि । हुनकऽ ध्येय जोशीमठ के भूस्खलन स॑ प्रभावित लोकनि केँ सहायता पहुचवाईक नै छै बल्कि मोदी सरकार केँ कठघरा में आनैक रहै । ई तँ सर्व-विदित अछि जे किछु लोकनि देश में अराजकतावादी गतिविधि सँ प्रेरित छथि जेना कि सीएए, शाहीनबाग, किसान आ एग्निवर आन्दोलन रहन्हि । एहि सँ जोशीमठ आंदोलन समिति कए सतर्क रहय पड़त। जोशीमठ नगर निगम के पार्षद स॑ बातचीत के दौरान ई बात के खुलासा भेल कि सरकार पीड़ित के प्रति बहुत संवेदनशील छलन्हि आरू अलग-अलग समिति पीड़ित लोकनि के पुनर्वास के पुरजोर प्रयत्न केलन्हि । वैज्ञानिक जाँच रिपोर्ट अन्यान्य आठ संस्था सँ वैज्ञानिक जाँच रिपोर्ट सरकार केँ देल गेल जेकरा पर उत्तराखंड उच्च न्यायालय संज्ञान लेलन्हि I मोटा-मोटी ई तय भेल जे :- � चमोली जिला के जोशीमठ व अन्यान्य शहर में भू-धसान के प्रबल समस्या अछि I � भारत के भूगर्भ वैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) के अनुसार मात्र जोशीमठ में ८१ भूगर्भ दरार अछि जाहि में ४२ नवीन अछि I भूकंप सँ ई दरार के चौड़ा होवै के संभावना अछि जाहि सँ पुनः भू-धसान भ सकैछ I � जोशीमठ भू-धसान में NTPC के हाइड्रो-इलेक्ट्रिक प्र्रोजेक्ट के कोनों दोष नहिं अछि I � दरार मुख्य रूप स घना आबादी वाला क्षेत्र मे प्रकट भेल अछि I एहन घना आवादी के रोके पडत I � केंद्रीय भूजल बोर्ड आरू नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (NGRI) रिपोर्ट सँ पता चललै कि मारवारी म॑ जेपी कॉलोनी के पास बहय वाला नाला घन आबादी वाला क्षेत्र के नीचाँ भूगर्भ में 18-48 मीटर गहरा अछि जेकरा भू-धसान स सीधा संबंध भ सकैत अछि । � जेपी कॉलोनी म॑ जल श्राव केँ NTPC के तोपवन-विष्णुगढ़ जलविद्युत परियोजना के सुरंग स॑ कोनो संबंध नै छै । सारांश राज्य व केंद्र सरकार उत्तराखंड के जोशीमठ आपदा में व्यथित जनसमुदाय केँ पर्याप्त राहत देबाक प्रयास केलन्हि, मुदा पीड़ित लोकनिक मानवीय पहलू पर सेहो ध्यान देबय के आवश्यकता अछि । एहि लेल हुनकर शारीरिक, मानसिक आ बौद्धिक सहायता आ हुनकर व्यवसाय आ रोजी-रोटी के सेहो देखए के आवश्यकता अछि जाहि सं हुनकर परिवार के नुकसान के यथासंभव भरपाई व समाधान भ सकै I ई राहत के बात रहै कि स्थानीय 'सिटी काउंसिल' सँ मानवीय व वित्तीय सहायता मिलला के बाद बहुत हद तक पीड़ित लोकनि के स्थिति बदलल I बंद स्कूल-कॉलेज क॑ फेर स॑ शुरू कएल गेल ताकि छात्रऽ के शिक्षा म॑ कोनो तरह के बाधा नै आबै । पर्यटन पुनः शुरू भेल आ जीवन-यापन सेहो I सम्प्रति जोशीमठ पुनः अपन पुरान दिनचर्या पर लीन अछि किन्तु समस्या के कोनों स्थायी समाधान नहिं भेल छैक I आठ अन्यनंय वैज्ञानिक संस्थान अपन-अपन रिपोर्ट सरकार के समर्पित केलन्हि जेकर आंकलन उत्तराखंड उच्च न्यायालय में कएल गेल आ ओहि आधार पर किछु अनुशंषा सेहो कएल गेल I ई संभावना सँ मुँह नहिं मोड़ि सकैत छी जे भविष्य में सेहो भूकंप सँ उत्पन्न भयंकर भू-धसान व भू-स्खलन होवए I परमात्मा भारत के ई भूखंड पर दयादृष्टि राखै I

-ग्रुप कॅप्टन (डॉ) वी एन झा; सेवा निवृत्त वायुसेना अधिकारी; मुख्य, वायुसेना चिकित्सा अनुसन्धान; प्रोफेसर, विभागाध्यक्ष ओ स्नातकोत्तर परीक्षक (RUGHS); वरिष्ठ वैज्ञानिक �F� व सह निदेशक (डी आर डी ओ); सदस्य, Institute of Defence Scientists & Tech (IDST).

अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.५.परमानन्द लाल कर्ण-एक नव सफर परमानन्द लाल कर्ण एक नव सफर घरक सव कोना मे आँखि दौड़ावैत प्रमिलाक आँखि नोर सँ सराबोर छल । आधा सँ बेसी जिनगी निकलि गेल छल । ओ अपन जीवनक कठिन फैसला लेवऽ सोचि रहल छलीह । हुनका दिल आ दिमाग मे जेना तूफ़ान मचि रहल छल । जखन विआह भेल छल तखन तऽ ओ सपनो मे नहि सोचने छलीह जे एहन फैसलाक नौबत आयत । प्रमिलाक आँखि मे पिछला बरखक यादि कोनो फिल्मक दृश्य जकाँ सबटा परिदृश्य दौड़ैत छल । हुनका यादि आयल ओ लम्हा जे लाल जोड़ा मे लिपटल केहन दृश्य छल । प्रमिला लाल जोड़ा में रानी लागैत छलीह हुनका गोर हाथ मे रचल मेहंदीक लाली कतेक नीक लागि रहल छल । नव साड़ी पहिरने ऐना मे अपनाक देखैत किस्मत पर नाज करैत छलीह । सासुर आयल दु दिन बीतल छल तखनहि भनसा घर मे बर्तन गिरबाक जोर सँ आवाज आयल - एना लागि रहल छल जे कोनो जानि बुझि के बरतन पटकि रहल हो । आवाज आयल जे चतुर्थी सँ पहिले भाभी कोना भनसा घर मे एतीह । चतुर्थीक बाद ओ बरतन छुथिन ता धरि तऽ हमरा सबके काम करऽ पड़त । चतुर्थीक बाद प्रमिलाक सास कहलखिन- कनिया ! आई सँ अहाँ घर सम्भालू । आब अहाँक जिम्मेवारी अछि जे घरक भनसा भात कोना होयत । हुनका चेहरा पर नहि तऽ कोनो प्यार छल आ नहि मुस्कान । प्रमिला हँसि के कहलखिन - हाँ माँ जी ! मोहनक संग जखन प्रमिलाक रिश्ता तय भेल छल तऽ हुनकर चेहरा सौम्य आ शांत छल । मोहनक चेहरा देखि प्रमिला मोहित भऽ गेल छलीह । हुनक माय बाबुजी बड्ड धुमधाम सँ हुनकर विआह केने छलखिन । ओ सोचने छलीह जे नव कनियाक खुशी मे सासुर मे नीक रश्म करथीन । शगुनक तौर पर कोनो मीठगर पकवान बनाओल जायत , जेना आस पड़ोस मे देखने छलहुँ । मुदा एहि ठाम तऽ सव किछु विपरीत छल । जाहि दिन सँ प्रमिला भनसा घर मे ठाढ़ भेलीह सासु माँ हुनका सव काम बता देलखिन । भिनसरक चाय सँ लऽ के राति धरिक काम आव प्रमिला पर आवि गेल । प्रमिला एतेक काम कहियो नहि करैत छलीह मुदा ओ हिम्मत नहि हारलीह । भिनसर मे चाय बना कऽ सासु माँ के देलखिन । सासु माँ चायक चुसकी लैत कहलखिन - कनिया ! नैहर मे एहिना चाय बनवैत छलहुँ की ? एहि मे चाय पत्ती आओर देवाक चाही । कनि आओर पानि खौलऽ देवाक चाही । चीनी सेहो ठीक नहि अछि । कोनो दाई एहि सँ नीक चाय बनावैत अछि। प्रमिला मुस्कुराकऽ कहलखिन - माँ जी ! फेर सँ चाय बना दी ? एहि पर सासु माँ कहलखिन नहि रहऽ दीअ ! हम एहन चाय नहि पियव । मुँहक स्वाद बदलि गेल । अहाँक माय चाय बनेनाई नहि सिखेलथि की ? ई कहि कप राखि देलखिन । सासुमाँक एहन व्यवहार सँ प्रमिलाक आत्मा छलनी कऽ देलक । हुनक सास सख्त मिजाज महिला छलीह । हुनका लेल घरक बहुक मतलव छल - घरक काम करऽवाली मशीन । जे बिना कोनो शिकायत भरि दिन कर करैत रहे । कोनो एक गलती पर सासु माँक ताना सुननाई एक दिनचर्या भऽ गेल छल । ओ कहैत छलीह जे हमर तऽ भाग फुटि गेल जे एहन पुतोहु हमरा कपार मे सटि गेल ।पढ़ल -लिखल भेलाक बादहु एहि लड़की के किछु नहि आवैत अछि । हमर बौआ तऽ एहन लड़की सँ विआह कऽ बड़का गलती केलनि । एहन कतेको व्यंग सव दिन प्रमिला के सुनऽ पड़ैत छल । ननद जे प्रमिला सँ कम उमर के छलीह । ओहो कोनो कसरि नहि छोडैत छलीह । ओ सव बात के तोड़ि मरोड़ी के माय के बतावैत छलीह । सव दिन कोनो ने कोनो तमाशा अवश्य होयत छल । एक दिन पड़ोसन घर पर एलीह आ बातचित करैत कहलखिन आब नीक भऽ गेल अछि। बौआक विआह कऽ अपन आधा जिम्मेवारी पूरा कऽ लेलहुँ । आब बुच्चीक विआह कहिया करव । आव तऽ पुतोहु घर आवि गेलीह ,घर ख़ाली नहि रहत । एहि पर प्रमिला कहलखिन - हाँ चाची ! देख़ु ने कोनो नीक रिश्ता मिल जायत तऽ कऽ देल जायत । कोनो नीक लड़का नजरि मे होयत तऽ बतायव । प्रमिलाक ई बात सुनि हुनकर सासुमाँ कहलखिन - कनिया ! अहाँ ओकात मे रहु , हमर बेटीक विआह कखन होयत आ कखन नहि ई हमर जिम्मेवारी अछि । हम अखन जिन्दा छी , अहाँ कोनो फैसला एहि सम्बन्ध मे कोना लेव । ई सुनि प्रमिलाक आँखि मे नोर ढ़व ढ़वा गेल आ ओ चुप भऽ गेलीह । एहिना कोनो बात आवैत छल हुनका पर सासुमाँ कटाछ करैत छलीह । सबसँ बेसी दुःख तखन होयत छलैन जखन मोहन सेहो प्रमिलाक साथ नहि दैत छलाह । विआहक शुरुआती दिन मे ओ अपना पत्नीक संग नीक वर्ताव करैत छलखिन,मुदा धीरे-धीरे ओ अपन माय बहिनक बात मे आवि गेलाह । आव तऽ ओ प्रमिला के आदमी बुझैते नहि छलाह । हुनकर हर बात आदेशक लहजा मे छल । हुनका आँखि मे कोनो प्रेम नहि अपितु अधिकार छल आ अधिकार एहन जाहि मे सम्मानक कोनो जगह नहि छल । विआहक किछु दिन बीतल छल एक राति प्रमिला खाना बना कऽ मोहन के देलखिन, खाना एक बेर मुँह मे लेलाक बाद प्लेट सरका देलखिन आ कहलनि - अहाँ एतेक दिन सँ खाना बनावैत छी, मुदा अहाँ के अखन धरि एतेक अन्दाज़ नहि भेल अछि जे तरकारी मे नून कतेक देल जाय । आई तऽ लागैत अछि जे अहाँ अनोने तरकारी बनेलहुँ अछि । एहि पर प्रमिला कहलखिन जे रुकु तरकारी मे नून डालि के गरम कऽ दैत छी । तहन ठीक भऽ जायत । एहि पर मोहन जोर सँ कहलनि जे आब हम नहि खायव । प्रमिला सोचने छलीह जे घरवाला साँझ मे एताह तऽ किछु बात करव, मुदा ओ कहाँ जानैत छलीह जे एना भऽ जायत । फेर अपना पतिदेव के मानवैत कहलखिन - ठीक अछि , आगु सँ हम एहि बात के ख्याल राखव , मुदा अखन हम खाना मे नून मिला दैत छी । खा लेतहुँ तहन ठीक रहत भरि दिनक भूखल अहाँ कोना रहव । घर मे केओ लोकनि नहि खेलैन अछि । एहि पर मोहन कहलखिन - अहाँ के तऽ सोचवाक चाही जे घरक लोकनि कोना खेथिन? एहि पर प्रमिला कहलनि - नून कम रहला सँ फेर सुधार भऽ सकैत अछि । अधिक रहितै तहन किछु दिक्कत छल । हम तरकारी एक बेर गरम कऽ लावि दैत छी । प्रमिला तरकारी मे नून दऽ के गरम कऽ देलखिन आ मोहन सँ कहनलखिन - सुनै छी ? हम तरकारी मे नून मिला देलहुँ अछि आ हम कनि खा के सेहो देख लेलहुँ अछि । आव ठीक भऽ गेल अछि । फेर सँ खाना लेने आवि ? एहि मोहन साफ इंकार कऽ देलखिन आ ओहिना सुति रहलाह । सास आ ननद के खाना खिला कऽ अपने ओहिना सुति रहलीह । धीरे- धीरे मोहनक व्यवहार मे परिवर्तन भऽ रहल छल । दिनानुदिन हुनकर रवैया प्रमिलाक प्रति कठोर भेल जा रहल छल । साँझ मे जखन ओ घर आवैत छलाह तऽ पहिले मायक कोठरी में जायत छलाह। ओहि ठाम दूनु माय-धी हुनकर कान फुकैत छलीह , जाहि सँ ओ प्रमिलाक प्रति मोहन के नीक भावना नहि रहैत छल । प्रमिला ई सव बात जानैत छलीह । एक दिनक बात अछि जे प्रमिला सोचलथि जे ओ मोहन सँ किछु गप्प करी, मुदा जखनहि ओ किछु कहऽ चाहलखिन तऽ उल्टे हुनका मोहन डाँटि देलखिन आ कहलनि - अहाँक कहवाक तात्पर्य अछि जे हमर माय आ बहिन गलत अछि । हमर कहव अछि जे अहाँ अपन गलती के सुधारु । हम अहाँक एकहु टा बात नहि सुनव । मोहन कड़क आवाज सुनि प्रमिला हैरान भऽ गेलीह आ बिछौना पर लेट गेलीह । राति भरि खूब कानलीह । आव तऽ प्रमिलाक लेल एक-एक दिन परीक्षा बनल जा रहल छल । धीरे-धीरे प्रमिला टूटि रहल छलीह । हँसैत खिलैत हुनक सपनाक दुनिया आव खामोश भऽ रहल छल । भिनसर सँ साँझ धरि घरक काम, सासु माँक फरमाइश सास ननदक चुगली आ घरवालाक उदासीनता ई सव प्रमिला के झकझोरि रहल छल । एक समयक बात अछि जे प्रमिलाक मन खराब भऽ गेल । हुनका बिछौना पर सँ उठवाक हिम्मत नहि छलनि । शरीर बोखार सँ तपि रहल छल । आँखि बोझिल छल । प्रमिला पलंग पर लेटल छलीह तखन सासु माँ ताना मारैत कहलखिन - महारानी जी ! कोन खुशी मे आई आराम फरमा रहल छी । एहि पर प्रमिला कहलखिन - माँ जी मन ठीक नहि लागैत अछि, बोखार सँ पुरा शरीर तोड़ि रहल अछि । हमरा उठवाक हिम्मत नहि अछि तैं हम लेटल छी । एहि पर सासु माँ कहलखिन - कनिया ! बोखार अछि तऽ ओ एक- दु दिन मे ठीक भऽ जायत । हम सव तऽ बोखारो मे घरक सव काम करैत छलहुँ । एहि पर प्रमिला किछु कहऽ चाहलखिन मुदा किछु नहि बाजि सकलीह । तखनहि मोहन घर एलाह मुदा बिना किछु पुछने ओहि ठाम ठाढ़ भऽ गेलाह आ मोबाईल देखऽ लगलाह ।प्रमिला हुनका सँ कहलखिन-सुनै छी ! हमर तबीयत ठीक नहि लागि रहल अछि । बोखार सँ देह टुटि रहल अछि । हमरा डाक्टर सँ देखा देतहुँ तहन ठीक भऽ जायत । किएक तऽ हम बोखारक दवाई लेलहुँ अछि, मुदा ठीक नहि भऽ रहल अछि । एहि पर मोहन कहलखिन - अखन तऽ ऑफिसक लेट भऽ जायत, ओना मौसमी बोखार अछि एक दुई दिन मे ठीक भऽ जायत । हमरा नाश्ता बना देतहुँ ,ऑफिस जयवा मे लेट भऽ रहल अछि । ई सुनि प्रमिलाक मन मे जे बचल- खुचल उम्मीद छल ओ खत्म भऽ गेल । केहुना बिछौना पर सँ उठि ओ भनसा घर गेलीह, मुदा माथ घूमि रहल छल । धीरे- धीरे मोहनक लेल नाश्ता बना कऽ फेर बिछौना पर लेट गेलीह आ आँखि सँ ढ़व -ढ़व नोर गिर रहल छल । ताहि दिन सँ कोनो बात मोहन के नहि कहैत छलीह । जेना तेना होयत छलैन ओ घरक काम करैत छलीह । एक दिनक बात अछि मोहन अपना माय आ बहिनक संग कोनो रिश्तेदारक कार्यक्रम मे गेल छलाह । प्रमिला घर मे असगरे छलीह । तखन ओ अपना माय के फोन केलखिन । फोन घंटी बाजल तऽ प्रमिलाक माय बड्ड खुश भेलीह । बहुत दिन सँ फोन नहि आयल छल । प्रमिलाक माय पूछलखिन - अहाँ सव कुशल मंगल सँ छी ने ? एहि पर प्रमिला कहलखिन - माय ! हम तऽ एहि ठाम बड्ड परेशान छी । केओ हमरा आदमी बुझैते नहि अछि । मानु एहि घर मे एकटा कामवाली दाई आवि गेल अछि । हमर स्थान तऽ अहु सँ नीचा भऽ गेल अछि । कखनो केओ डाँटि दैत छथि । हम एहि ठाम घुटि -घुटि मरि रहल छी ।एहि पर हुनकर माय कहलखिन - बुच्ची ! विआहक जिनगी आसान नहि होयत छैक । मुदा एक बात अछि जे बच्चा भऽ गेला पर जिनगी बदलि जायत । जखन अहाँ माय बनि जायव तहन अहाँक घरक लोकनिकक मन सेहो बदलि जायत आ सासुरक लोकनि सेहो कदर करत । अपन मायक बात पर विश्वास करैत प्रमिला सोचलथि जे भऽ सकैत अछि किछु दिन मे ठीक भऽ जाय । विआहक दुई बरखक बाद प्रमिला के पुत्र रत्नक प्राप्ति भेल । पुत्रक नाम गोपाल राखल गेल । आव प्रमिला बच्चा के देखभाल करैत घरक सव काम करैत छलीह । गोपालक जन्मक बादहु मोहनक स्वभाव मे कोनो परिवर्तन नहि भेल ।कोनो राति मे जखन गोपाल कानैत छल तऽ मोहन गुस्सा सँ कहैत छलखिन जे बच्चा के चुप किएक नहि करैत छी हमरा भिनसरे ऑफिस जयवाक अछि ।प्रमिला चुपचाप बच्चा के कोरा मे लऽ के सुतेवाक प्रयास करैत छलीह। कोनो -कोनो राति तऽ एहन भऽ जायत छल जे प्रमिला बच्चा के लऽ के जागले रहि जायत छलीह । एक समयक बात अछि जे गोपालक मन खराब भऽ गेल । प्रमिला रोहन सँ कहलखिन- सुनै छी ! बौआक तबीयत खराब भऽ गेल अछि, ओ खाना सेहो नहि खा रहल अछि, कनि डाक्टर सँ देखा देतहुँ । एहि पर मोहन कहलनि - आई हमरा ऑफिस में एकटा महत्वपूर्ण मीटिंग अछि तैं आई हम नहि जा सकैत छी । प्रमिला कहलखिन - हमरा संग मे पाई नहि अछि, किछु पाई दऽ दिअ ताकि हम डाक्टर सँ देखा सकी। एहि पर मोहन कहलनि - अहाँ माय सँ पाई माँगि लेव हम सव पाई माय के दऽ दैत छी । बगले मे नीक डाक्टर अछि जा के देखा लेव । प्रमिला अपना सासु माँ सँ कहलखिन - माँ जी ! बौआक मन खराब अछि । एहि पर हुनक सासु माँ कहलनि - बौआक की भेल अछि ? प्रमिला कहलखिन - सर्दी भऽ गेल अछि आ देह सेहो तपि रहल अछि । काल्हि सँ किछु नहि खा पी रहल अछि । एना मे कमजोर भऽ जायत । आई-काल्हि सर्दी-बुखार बिना डाक्टर सँ देखेने नहि छूटैत अछि । एहि पर तपाक सँ ओ कहलनि - कनिया ! हमहुँ सव बच्चा पालने छी । घरेलू नुख्सा सँ हम सव सर्दी बुखार ठीक कऽ लैत छलहुँ । एहि मे पाई खर्च केनाई फालतु अछि । पाईक अभाव मे प्रमिला ओहि दिन डाक्टर सँ नहि देखा सकलीह । राति मे फेर मोहन सँ प्रमिला ई बात कहलखिन मुदा मोहन किछु नहि कहलखिन । दोसर दिन प्रमिला अपन हाथक अंगूठी बाजार मे बेच कऽ बच्चा के डाक्टर सँ देखेलखिन । ईलाजक बाद गोपालक मन ठीक भेल मुदा बड्ड दुब्बर भऽ गेल छल । प्रमिला सोचलथि जे एहि ठाम नहि तऽ हम ठीक सँ रहैत छी आ नहि बच्चा ठीक सँ रहि पावैत अछि । एक दिन अपना नैहर फोन कऽ अपना माय सँ कहलखिन - माय ! हम गाम आवऽ चाहैत छी से अहाँ कनि एहि ठाम बात करितहुँ । हमरा कहने तऽ ई सव नहि आवऽ देताह अहाँ कहितहुँ तऽ हम चलि अवितहुँ । एहि पर प्रमिलाक माय कहलखिन - हाँ बुच्ची ! नाति के नहि देखलहुँ अछि । हमरो मन होयत अछि नातिक देखवाक लेल। हम समधिन सँ बात करैत छी । समधिन बात करलाक बाद मोहन प्रमिला सँ कहलखिन - अहाँक माय नैहर बुलावैत छथि जायव की ? एहि पर प्रमिला कहलखिन - माय कहैत छलीह जे बौआक देखवाक इच्छा अछि । ताहि पर हम कहने छलहुँ जे एहि ठाम अहाँ सव सँ बात कऽ लीअ । भऽ सकैत अछि जे माँ जी के फोन केने हेथिन ।एहि पर मोहन कहलनि - हाँ ! माय कहैत छलखिन । ठीक अछि अहाँ असगरे चलि जाउ हमरा छुट्टी नहि अछि । प्रमिला बच्चा के लऽ के अकेले नैहर चलि एलीह । एहि ठाम एला पर सव कहानी प्रमिला अपना माय सँ कहलखिन । तकर बाद प्रमिला कहलनि - माय हम मरि जायव मुदा ओहि परिवार मे हम नहि जायव । घुटि -घुटि के मरनाई सँ बढ़िया एक बेर मरनाई नीक होयत अछि । हम अपन जीवन लीला समाप्त कऽ लने रहितहुँ मुदा अहाँ कहने छलहुँ जे बच्चा भेलाक बाद सवहक नजरिया बदलि जायत अछि तैं हम इंतजार करैत छलहुँ । गोपालक जन्मक बादहुँ हुनका सव पर कोनो असर नहि पड़ल । ई कहानी जखन हुनकर बाबुजी सुनलखिन तऽ प्रमिला के कहलनि - अहाँ एतेक परेशान छलहुँ तऽ हमरा किएक नहि कहलहुँ । जौं आव सासुर नहि जाय चाहैत छी तहन अहाँक तालाक लिअ पड़त । एहि पर प्रमिला कहलनि - हाँ बाबुजी ! हम सासुर नहि जायव । हम तालाक लेव आ हम अपन जिनगी अपने हिसाव सँ जीअव । अपना नैहर मे प्रमिला एक प्राइवेट स्कूल ज्वाइन कऽ लेलीह । हुनकर पढ़ाव�क तरीका देखि बच्चा सव बड्ड खुश रहैत छल । धीरे- धीरे स्कूल मे प्रमिलाक ख्याति फैल गेल । प्रमिला स्कूलक बाद प्राइवेट ट्यूशन सेहो करऽ लागलीह । ट्यूशन नीक चलऽ लागल जाहि मे हिनका नीक आमदनी होयत छल । गोपाल सेहो पैघ भऽ रहल छल । स्कूली शिक्षाक उपरांत गोपाल कालेज मे एडमिशन लेलथि । प्रमिलाक इच्छा छल जे साइंस विषय सँ कालेज मे नाम लिखावैथि, मुदा गोपाल मना कऽ देलथि । गोपाल माय सँ कहलनि - माय हम आगु कोनो आर्ट्स विषय राखव आ यूपीएससीक तैयारी करव । प्रमिला कहलनि ठीक अछि । कोनो विषय खराव नहि होयत अछि, अहाँ तन मन सँ पढ़ाई करु । अहाँ जे करऽ चाहैत छी ओ करु मुदा मन लगा कऽ करु । अहाँ के पढ़ाई मे जे खर्च लागत से हम देव तकर अहाँ चिंता नहि करु । गोपाल स्नातकक परीक्षा पास करलाक बाद यूपीएससीक तैयारी करऽ लगलाह । पहिल चांस मे हुनका सफलता नहि मिललैन तहन ओ निराश भऽ गेलाह । प्रमिला हुनका सँ कहलखिन - बौआ ! अहाँ उदास नहि होऊ । असफलताक मतलव ई नहि अछि जे अहाँ नहि कऽ सकैत छी। अहाँ फेर कोचिंग करु आ नव सिरा सँ तैयारी करु । सफल अवशय होयव । अहाँ हिम्मत नहि हारु । मायक विश्वास आ अपन दृढ़ प्रतिज्ञाक फलस्वरूप गोपाल दोसर चांस मे परीक्षा मे पहिल स्थान आयल । गोपालक नाम अखबार छपल जाहि मे मोट हेडिंग छल मायक विश्वास आ पुत्रक परिश्रमक फलस्वरूप बिना पिताक सहयोग सँ सफल भेल छात्र । पेपेर जखन मोहन देखलथि तऽ दंग रहि गेलथि । प्रमिला आ गोपाल दूनु माय पूत अपन खुशी जीवन व्यतीत करऽ लगलाह । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.६.रबीन्द्र नारायण मिश्र- बाबाक दरबारमे रबीन्द्र नारायण मिश्र बाबाक दरबारमे बहुत दिनसँ वाराणसी जएबाक मोन छल। असलमे ओहिठाम बाबा विश्वनाथक मंदिरक आ आसपासक जगहक पुनुरोद्धारक समाचार देखि-सुनि मोनमे बहुत प्रसन्नता भेल छल।हम जखन इलाहाबाद(प्रयागराज) मे रहैत रही तखन एक बेर ओतए गेल रही।इलाहाबादसँ वाराणसी ट्रेनक यात्रामे हमर एकटा संगी सेहो रस्ते मे भेटि गेल रहथि।ओ वाराणसी लग अपन पैतृक गाम जाइत रहथि।हमरा संगे हमर श्रीमतीजी आ हमर पुत्र भास्कर रहथि।ओ ट्रेन इलाहाबादक रामबाग टीसनसँ खुजल रहैक आ वाराणसी धरि गेलैक।रस्तामे सभ टीसनपर रुकैत गेलैक।हमसभ आपसमे गप करैत रहलहुँ।ट्रेन वाराणसी पहुँचलाक बाद हमर संगी अपन गाम चलि गेलाह।हमसभ टीसने लग एकटा आटो रिक्सा केलहुँ। ओ आटोरिक्सा हमरासभक संगे भरि दिन रहल,यथासंभव सौंसे घुमओलक आ ओही दिन साँझमे हमसभ वापस इलाहाबाद आबि गेलहुँ।वाराणसीमे काशी विश्वनाथ मंदिरमे बाबाक दर्शन बहुत नीकसँ भेल रहए,कारण ओहि समयमे स्वर्गीय आर०के० मिश्र(आइएएस) (स्वर्गीय जयकान्त मिश्रजीक भाइ) ,ओ हमरासभक दर्शनक लेल ओरिआन कए देने रहथि। जयकान्त बाबू हमरा लेल हुनका फोन कए देने रहथिन। मंदिरे मे ओ पलथा मारि कए बैसल रहथि। हमरा देखितहि ओ बहुत प्रसन्न भेलथि एकटा पंडाकेँ हमरासभक संग लगा देलथि।तकर बाद हमसभ बहुत नीकसँ महादेवक दर्शन केलहुँ।दर्शन काल पंडासभकेँ बड़का-बड़का परातमे भोजन सामग्री बाबाकेँ प्रसाद चढ़बैत देखेने रहियनि।हमरा भूख लागि गेल रहए। स्वादिष्ट भोजन सामग्रीसभ देखि मुँहमे पानि आबि गेल रहए।बाबाक दर्शनक बाद सोझे होटल गेल रही,भरि पेट भोजन केने रही। तकर बादे हमसभ घुमबाक लेल आगू बढ़ल रही।मोन पड़ैत अछि जे मंदिरक आसपास केहन गलींज छल, पैदलो चलब मोसकिल।बाबा मंदिरसँ गंगा घाटक बीच आएब-जाएब बहुत मोसकिल छल। आब जखन सुनलिऐक जे बाबा मंदिर परिसरक आ आसपासक क्षेत्रक नक्सा बदलि गेल अछि,गंगा स्नानक बाद सोझे मंदिरमे बाबाकेँ जल चढ़ाउ,कतहु कोनो अवरोध नहि,तँ हमरोसभकेँ ओतए एक बेर फेर जएबाक इच्छा होएब स्वाभाविक छल।मुदा एकर कार्यान्वयनमे किछु विलंब भेल।कारण नवका कारीडोर बनलाक बाद वाराणसी गेनिहार लोकसभक मेला लागल रहैत छल। ओहिठाम रहबाक,घुमबाक व्यवस्था करब कठिन बुझा रहल छल। अचानक एक दिन वाराणसी स्थित केन्द्र सरकारक होलीडे होममे पाँच दिन रहबाक लेल जगह भेटि गेल। आब की छल।हम तुरंत हुनका हाक देलिअनि- “हेयै! कहाँ छी?” ओ आबि गेलथि।हम हुनका वाराणसीमे रहबाक जोगार होएबाक जनतब देलिअनि।ओहो बहुत प्रसन्न भेलथि।हम सभ तुरंत रेल टिकटक ओरिआनमे लागि गेलहुँ।भेल जे जखन वाराणसी जाए रहल छी तँ इलाहाबादो घुमिते आएब।हमर अभिन्न मित्र श्री संजीव सिन्हाजीसँ भेँट-घाँट भए जाएत।ओ बहुत दिनसँ इलाहाबाद अएबाक लेल आग्रह कए रहल छलाह।संगे हमरो इलाहाबाद घुमबाक इच्छा छलहे।कारण हम जनबरी ‍१९७८सँ मार्च ‍१९८७ धरि नओ साल ओहिठाम रहल छी। ओतए पहुँचिते हमरा अपन जगहपर पहुँचि जएबाक आनन्द होइत अछि।अस्तु,ओतहु रहबाक लेल सरकारी अतिथि गृहमे रहबाक जोगारमे लागि गेलहुँ जे संयोगसँ संभव भए गेल। ओना सिन्हा साहेबक बहुत जोर छलनि जे हम हुनके ओहिठाम रही।मुदा सिभिल लाइन्स स्थित अतिथिगृह आ जार्ज टाउन स्थित हुनकर घरमे बेसी दुरी नहि अछि,से सभ कहला-सुनलापर ओ मानि गेलाह।हमसभ वापसी रेल टिकट इलाहाबादसँ बना लेलहुँ।आब की छल?बस ओहि दिनक प्रतीक्षामे लागि गेलहुँ। २५ अगस्त २०२५क हमरासभकेँ वाराणसी यात्राक लेल प्रस्थान करबाक छल।हमसभ तैयारी कए रहल छलहुँ। हमर पौत्र हमर श्रीमतीजीकेँ तैयारी करैत देखि दुखी भए गेल। ओकरा बुझा गेलैक जे हमसभ कतहु जा रहल छी।ओ हुनका कहैत छनि- “अहाँ एना नीक नहि लागि रहल छी।अहाँ जहिना रहैत छी,तहिना रहू।” ओ बहुत उदास छल। हमसभ जखन घरसँ बाहर होइत रही तखन सभ केओ बिदा करबाक लेल आएल छल,मुदा ओ नहि आएल। ओ असलमे बहुत दुखी छल। ओकरा दाइसँ फराक होएब नीक नहि लागि रहल छलैक।असलमे दाइसँ ओकरा बहुत लगाओ छैक।इसकुलसँ वापस भेलाक बाद ओ बेसी काल दाइए लग रहैत अछि। हमरोसभकेँ नीक तँ नहिए लागि रहल छल। मुदा जएबाक तँ छलहे।अस्तु,अछताइत-पछताइत हमसभ टैक्सीमे बैसि गेलहुँ। हमर पोती जरूर हमरासभकेँ नीकसँ बिदा केलक। बड़ी काल धरि बाइ-बाइ करैत रहल। हमरासभकेँ स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेसमे एसीटूमे एक आ तीन नंबरक नीचाँक शायिका आरक्षित छल।ई दुनू शायिका बाहरी द्वारिसँ सटले छल।ओ निरंतर खुजैत रहैत छल।लोक अबैत-जाइत रहैत छल।हमरासभ लग दूटा बाकसमे भरल सामानसभ छल।तकर चिंता होइत रहैत छल।अस्तु,हम तँ राति भरि जगले रहि गेलहुँ।भोरे सात बजे करीब हमसभ वाराणसी टीसनपर पहुँचि गेल रही। हमरासभक स्वागत लेल माधवजी(परिवर्तित नाम) आएल रहथि। ट्रेनसँ उतरितहि प्लेटफार्मेपर ओ भेटि गेलथि।प्रथमदृष्टिए माधवजी बहुत आकर्षक आ रमणीय व्यक्तित्वक लोक बुझेलाह।ओहो केन्द्रीय सचिवालय सेवामे रहथि।हमर कैकटा संगी हुनकर परिचित,मित्र छथिन।ओ मूलतः वाराणसीएक वासी छथि,जीवन भरि एही सहरमे रहल छथि।वाराणसीक माटि-पानिसँ बहुत प्रेम छनि,से एहि हद धरि छनि जे ओ अपन दिल्लीक नौकरी एही लेल छोड़ि देलनि। से सुनबामे कनी विचित्र तँ लगैत छैक कारण आजुक अर्थयुगमे लोक एना करत से नहि सोचल जा सकैत अछि,मुदा ओ से केने छथि आ एहि मानेमे एकटा अपना तरहक उदाहरण छथि।अत्यन्त साधारण भेषमे अपन सरल सहज व्यवहारसँ ओ अपना दिस लोककेँ आकर्षित करैत छथि।हम बड़ी काल धरि हुनका बारेमे सोचैत रहि गेलहुँ। हुनकासँ बहुत किछु जानकारी भेटैत रहल।हुनको बारेमे आ सहरोक बारेमे।मुदा ओ नौकरी किएक छोड़ि देलनि,से हम नीकसँ नहि बुझि सकलहुँ ,सेहो तखन जखन कि ओ ओकर बाद फेर कोनो नौकरी नहि कए सकलथि(हमरा जनतबे)।प्रत्येक मनुष्य स्वयंमे अद्भुत होइत अछि,रहस्य अछि।हम कनी काल सएहसभ सोचैत रहलहुँ।टैक्सी आगू बढ़ैत रहल। सहर अपने सभठाम जकाँ।कतहु नव,कतहु पुरान तरीकाक घरसभ देखाइत छल। भोरक समय छलैक।दूबगली दोकानसभ खुजि रहल छलैक। रस्ताक कातमे चाहक दोकानसभसँ धुआँ उठि रहल छल।ठाम-ठाम लोकसभ चाह बनबाक प्रतीक्षा कए रहल छल।हाथमे अखबार आ तरकारीक झोरा सेहो किछु गोटे रखने रहथि। माधवजीक संगे रहलासँ हमरासभक चिंता आब खतम छल।केना जाएब,कतए घुमब,की-की देखब सभ किछु हुनका ऊपर।हुनका संगे टैक्सीसँ हमसभ घंटा भरिक बाद केन्द्र सरकारक होलीडे होम पहुँचि गेलहुँ।होलीडे होमेमे हमरसभक कोठरी दस बजेक बाद उपलब्ध होएत,से बात स्वागती कहलनि।हमसभ ताबत स्वागत कक्षेमे बैसि चाह-पान केलहुँ।तखनहि श्रीमतीजीसँ विमर्शक बाद आजुक घुमबाक कार्यक्रम सेहो तय केलहुँ।आइ मंगल दिन छल।हमसभ उपास केने छलहुँ।तेँ दिनमे भोजनक चिंता नहि छल। आइ हमसभ हनुमानजीक दर्शन करब।तकर बाद लगपासक चीज-वस्तु देखबाक प्रयास करब।मंगल दिन प्रसिद्ध संकट मोचन मंदिरमे हनुमानजीक दर्शन करब महत्वपूर्ण छल,कारण आइ मंगल दिन रहबाक कारण सहर आ बाहरोसँ बहुत भक्तसभ ओतए अबैत छथि।हमसभ अतिथिगृहमे आश्वस्त भए गेलाक बाद करीब तीन बजे टैक्सीसँ संकटमोचन मंदिर लेल बिदा भेलहुँ। करीब आधा घंटामे हमसभ ओहिठाम पहुँचलहुँ। संकटमोचन मंदिर वाराणसी संकटमोचन मंदिर वाराणसीक अति प्राचीन मंदिर अछि।एकर स्थापना तुलसीदासजी स्वयं केने रहथि। एहि मन्दिरक पुनर्निर्माण 1900 ईस्वीमे स्वर्गीय मदन मोहन मालवीयजी द्वारा कराओल गेल। ओएह एहि मंदिरकेँ “संकट मोचन हनुमान मन्दिर वाराणसी” क नामसँ प्रतिष्ठित केलथि। कहबी छैक जे जखन तुलसीदासजी ओहिठाम रामकथा कहैत रहथि तँ एक दिन एकटा प्रेत देखेलनि। ओहो हुनकर रामकथा सुनैत छल। तुलसीदासजी हुनका आग्रह केलखिन जे ओ हनुमानजीक पता बताबथि जाहिसँ हुनकर दर्शन भए सकनि।ओ प्रेत कहलखिन- “हनुमानजी तँ नित्य अहाँक कथामे उपस्थित रहैत छथि। ओ एकटा कोढ़ीक भेषमे सभसँ पहिने अबैत छथि,पाछू बैसल रहैत छथि आ कथा समाप्त भेलाक बाद सभसँ पाछू जाइत छथि।” प्रेतक देल हुलिआक अनुसार तुलसीदासजी हनुमानजीकेँ कोढ़ीक भेषमे चिन्हि लेलखिन आ हुनकर पैरपर खसि पड़लखिन।हनुमानजीकेँ ओ भगवान रामसँ दर्शनक रस्ता बतेबाक प्रार्थना केलखिन।हनुमानजी हुनका कहलखिन- “अहाँ चित्रकुट चलि जाउ।ओतहि अहाँकेँ भगवान राम भेटताह।” तकर बाद तुलसीदासजीकेँ चित्रकुटमे भगवान रामक दर्शन भेल रहनि। कहबाक तात्पर्य जे ओ स्थान बहुत सिद्ध आ प्रसिद्ध अछि। तुलसीदासजी ओतए माटिक हनुमानजी मूर्तिक स्थापना केने रहथि। ओएह मूर्ति अखनहु ओहि मंदिरमे स्थापित अछि।हनुमानजीक हृदयक ठीक सामनेमे भगवान रामक पैर देखाइत अछि।शनि आ मंगल दिन कए ओहिठाम भक्त लोकनिक बहुत भीड़ रहैत अछि।मंदिरे परिसरमे प्रसादक कैकटा दोकान अछि जाहिठामसँ घीमे बनल लड्डू आ आन मिठाइसभ प्रसादक लेल उपलब्ध रहैत अछि।मंदिर परिसरमे प्राचीन इनार अछि।कहल जाइत अछि जे तुलसीदासजीक समयसँ ई इनार ओहिठाम अछि।भक्त लोकनि ओहि इनारक पानि पिबैत छथि। यद्यपि आइ मंगल दिन छल,मुदा मंदिर परिसरमे अपेक्षाकृत बेसी लोक नहि देखेलथि।हमसभ बहुत सुविधासँ हनुमानजीक दर्शन कए सकलहुँ।हनुमानजीक दर्शनक बाद माधवजी हमरासभकेँ वाराणसीक प्रसिद्ध पहलमान लस्सी पियाबए लए गेलाह। पहलमान लस्सी वाराणसी सहरक लंका चौकक पास सन् ‍१९५०मे पन्ना सरदारजी द्वारा पहलवान लस्सीक स्थापना कएल गेल छल। एहि लस्सीक विशेषता ई अछि जे ई हाथेसँ बनाएल जाइत अछि आ शुरूए सँ माटिक कुल्हरमे परसल जाइत अछि।पहलवान लस्सी पीबाक लेल भोरे सँ लोकक पाँति लागि जाइत छल। सालक-साल एकर प्रसिद्धि बनल रहल। किछु महिना पहिने ओहिठामक आसपास सभटा दोकानसभकेँ सड़क बनेबाक लेल ढाहि देल गेल। तकर बाद पहलवानक लस्सी कनीके फटकी दोसर ठाम चलि गेल। हमसभ तकैत-तकैत ओहिठाम पहुँचलहु।कनीक प्रयासक बाद दोकान भेटि गेलाक बाद हमसभ बहुत प्रसन्न रही। चारिटा लस्सी बनेबाक लेल कहलिऐक।थोड़बे कालमे लस्सी तैयार छल। हम तीनूगोटे ओहीठाम बेंचपर बैसि लस्सी पिलहुँ। लस्सीक उपरसँ बेस मोट छाल्ही छल। पहलवान लस्सी जेहने देखबामे रमनगर छल तेहने एकर स्वाद छल।हमसभ लस्सी पिबि सचमुचमे बहुत आनन्दित भेलहुँ। एकटा लस्सी वाहन चालकक लेल सेहो लेने गेलहुँ। एहि बातसँ ओ बहुत प्रसन्न बुझेलाह। लस्सी पिलाक बाद हमरासभमे नवस्फूर्ति आबि गेल छल।आब हमसभ वनारस हिन्दू विश्वविद्यालय परिसर दिस बिदा भए गेलहुँ। वनारस हिन्दू विश्वविद्यालय परिसर बीसवीं शताब्दीक आरम्भक समय भारतक आत्मा स्वतंत्रता आ सांस्कृतिक पुनर्जागरणक लेल आतुर छल। पश्चिमी शिक्षा प्रणाली भारतक नवयुवककेँ ज्ञान तँ दैत छल, मुदा ओ भारतीय मूल्य आ परंपराक आत्मासँ बहुत फटकी कए दैत छल। एहि परिस्थिति मे पंडित मदन मोहन मालवीय अपन अदम्य संकल्पसँ एकटा एहन विश्वविद्यालयक स्वप्न देखलाह जे भारतीय संस्कृति, धर्म, आ परंपराक गौरवकेँ आधुनिक विज्ञान आ शिक्षा संग जोड़ि सकए। एहि स्वप्नक साकार करबाक लेल मालवीयजीकेँ डॉ. एनी बेसेंट, महाराजा रामेश्वर सिंह, (दरभंगा), महाराजा प्रभु नारायण सिंह (काशी) आ अन्य गणमान्य लोकनिक सहयोग भेटलनि। सन् ‍१९१५ ई०मे ब्रिटिश संसदमे पारित बीएचयू कानूनक आधार पर ४ फरवरी ‍१९१६ केँ वाराणसीक पवित्र भूमिपर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालयक स्थापना भेल। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) एशियाक सबसँ पैघ आवासीय विश्वविद्यालय मानल जाएत अछि आ वाराणसीमे ‍१३०० एकड़ मे मुख्य परिसर स्थित अछि, जखन कि मिर्जापुर जिलामे दक्षिण परिसर २७०० एकड़मे पसरल अछि। विश्वविद्यालय मे१४ संस्थान, 14 संकाय आ ‍१४० सँ बेसी विभाग अछि, जतए करीब तीस हजार छात्र अध्ययन करैत छथि। ई विश्वविद्यालय भारत सरकारक “प्रतिष्ठित संस्थान(Institute of Eminence) " मे चयनित अछि आ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सेहो प्रसिद्ध अछि। सर सुंदरलाल अस्पताल, भारत कला भवन संग्रहालय, विशाल खेल मैदान आ सांस्कृतिक केंद्र विश्वविद्यालयक विशेष पहिचान अछि। एहिठाम एक्के परिसरमे 3५० सँ बेसी स्नातक, स्नातकोत्तर आ शोध पाठ्यक्रम उपलब्ध अछि । संक्षेपमे, बीएहयू शिक्षा, संस्कृति, शोध आ सामाजिक एकताक अद्वितीय प्रतीक अछि। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालयक परिसरमे अवस्थित नव काशी विश्वनाथ मंदिर आधुनिक स्थापत्यक अद्भुत चमत्कार आ धार्मिक आस्थाक उज्ज्वल प्रतीक अछि। पंडित मदन मोहन मालवीयक संकल्पसँ ई मंदिर बिरला परिवारक सहयोग सँ ‍१९३१ मे शिलान्यास पाबि ‍१९६६ मे पूर्ण रूप सँ तैयार भेल। करीब २५० फीट ऊँच शिखर आ देबालसभ पर अंकित गीता आ शास्त्रक श्लोक एहि मंदिरक वैभवकेँ बहुत आकर्षक बनओने अछि। शिवक प्रधान स्वरूपक संग नओ अन्य देवालयक उपस्थिति एहि स्थानकेँ बहुआयामी आध्यात्मिक केन्द्र बनबैत अछि। विश्वविद्यालयक छात्र आ आगंतुक लेल ई मंदिर केवल पूजास्थल नहि, अपितु ध्यान, शांति आ सांस्कृतिक चेतनाक आलोकक स्रोत अछि, जतए धर्म, कर्म, अर्थ आ मोक्षक मूल्य संगे-संग प्रतिध्वनित होइत अछि। संक्षेपमे, ई मंदिर विश्वविद्यालयक आत्माकेँ धार्मिक आ सांस्कृतिक रूपमे आलोकित करैत भारतक सनातन परंपराक गौरवक जीवंत प्रतीक बनि गेल अछि। एहन अद्भुत स्थान देखबाक जिज्ञासा ककरा नहि होएत?अस्तु,हमसभ बहुत उत्सुकतासँ टैक्सीसँ आब बीएचयू परिसर दिस बढ़ि रहल छलहुँ। माधवजी हमरा लोकनिकेँ विश्वविद्यालयक विभिन्न संकायक बारेमे बतबैत रहलाह।थोड़बे कालमे हमसभ विश्वविद्यालय स्थित काशी विश्वनाथ मंदिरमे पहुँचि गेलहुँ।हमसभ बहुत चैनसँ मंदिरमे भगवान शिवक दर्शन केलहुँ,चारूकात घुमलहुँ। ओतहि किछु काल विश्रामो केलहुँ तकर बाद बाहर भए गेलहुँ।माधवजीकेँ ओहिठामक समोसा खेबाक इच्छा रहनि। ओ जखन कखनहु एमहर अबैत छथि तखन ओहिठामक प्रसिद्ध समोसा जरुर खाइत छथि। हमरोसभकेँ आग्रह केलथि। मुदा हमसभ तँ मंगलक उपास केने रही। अस्तु, ओ असगरे समोसा खेबाक लेल गेलाह।ताबे हमसभ टैक्सीमे बैसल हुनकर प्रतीक्षा करैत रहलहुँ। तुलसी मानस मंदिर माधवजी जाबे समोसा खेलनि,ताबे हमसभ टैक्सीमे बैसल सुस्ताइत रहलहुँ। हमसभ उपास केने रही आ भोरेसँ किछु-ने-किछु व्यस्तता रहबे कएल।टीसनसँ होलीडे होम पहुँचलाक बादो कोठरी भेटबामे बड़ी काल लागि गेल।फेर हमसभ कोठरीमे सामानसभ रखलहुँ। कनीकाल विश्राम केलहुँ आ बिना किछु खेने-पीने मंदिर लेल बिदा भए गेलहुँ। आब वापसीमे बहुत थाकि गेल रही। कतहु जएबाक मोन नहि छल।तथापि,जखन टैक्सी तुलसी मानस मंदिर लग पहुँचल तँ मोन भेल जे देखिए ली। तुलसी मानस मंदिर ओएह स्थान थिक जाहिठाम तुलसीदास अपन रामायणक रचना केने छलाह। बादमे सन् ‍१९६४मे बंगालक हावराक ठाकुरदास सुरेका परिवार द्वारा एहिठाम मंदिर बनाओल गेल। मंदिरक देबालपर संपूर्ण तुलसी रामायण चित्र सहित उकेरल गेल अछि। एतए एकटा संग्रहालय सेहो अछि जाहिमे अनेक वहुमूल्य पाण्डुलिपि आ कलाकृति राखल गेल अछि।हमसभ एहि मंदिरमे दर्शनक बाद चारूकात घुमलहुँ। किछु काल विश्रामक बाद वापसी यात्राक लेल टैक्सीमे बैसि गेलहुँ। कनीके आगू वाराणसीक प्रसिद्ध दुर्गाकुंड मंदिर आएल,मुदा हमसभ ततेक थाकि गेल रही जे एहिठाम कोनो आन दिन दर्शन करबाक विचार कएल। लगभग आधा घंटाक बाद थाकल-झमारल हमसभ होलीडे होम स्थित अपन डेरापर पहुँचि गेलहुँ।माधवजी पहिने उतरि गेल रहथि। टैक्सीबलाकेँ काल्हि फेर भोरे नओ बजे अएबाक आग्रह कए हमसभ विश्राम लेल अपन कोठरीमे चलि गेलहुँ। होलीडे होमक अपन कोठरीमे पहुँचि हम मोबाइल फोन चार्ज करए चाहलहुँ,मुदा चार्जर प्वाइंटमे जएबे नहि करैक। ओतहिसँ टीभीक सेहो चलेबाक छल। ओहो नहि चलैत छल। अगल-बगलक कैकटा प्वाइंटसभमे इएह समस्या छल।आखिर हम फोन कए ओहिठामक केयरटेकर पाण्डेयजीकेँ बजेलिअनि। ओ कहलाह जे ई समस्या सौंसे मकानमे छैक। ओ बिजलीक प्लगमे पेन घुसा देलखिन, तकर बाद ओहिमे मोबाइलक चार्जर लगा देलथि। एही तरीकासँ टीभी सेहो चलि गेल। हमसभ जखन बादमे भीआइपी कोठरीमे गेलहुँ तखनहु ई समस्या रहबे कएल । वाराणसीक होलीडे होम नबे बनल अछि। ताहिमे एहन दिक्कति नहि होएबाक चाहैत छल। मुदा ई समस्या ओतए अछि। अफसोचक बात ई अछि जे एहि समस्यापर ओतुका व्यवस्थापक लोकनिक ध्यान किएक नहि जाइत छनि।ओना ई होलीडेहोम बहुत नीक अछि आ एहिठाम बहुत मोसकिलसँ कोठरी भेटैत छैक। तेँ हमरा जखने कोठरीक आरक्षण भए गेल तँ हम तुरंत ओही हिसाबसँ रेलक टिकट बनबा लेने रही। हमसभ कुल पाँचदिन ओहिठाम रहलहुँ।भोजन,जलखै आ चाहक कम दाममे नीक व्यवस्था छल।संयोगसँ एकटा बहुत नीक टैक्सीबला लोक भेटि गेल छल जाहिसँ हमरा लोकनिक वाराणसी भ्रमण करबामे बहुत आराम रहल। होलीडे होम वाराणसी टीसनसँ लगभग नओ कीलोमीटरपर अवस्थित अछि। ओहिठामसँ प्रेमचंदक गाम,लमही सटले अछि।मुदा सहरक प्रमुख मंदिरसभ ओहिठामसँ फटकी पड़ैत अछि। होलीडेहोमक परिसर बेस पैघ अछि।ओकर एकदिस विभिन्न प्रकारक सरकारी कर्मचारी,अधिकारी लोकनिक लेल आवास बनल अछि।बीचमे एकटा छोटसन मंदिरो अछि जाहिमे स्थानीय लोकसभ पूजा-पाठ करैत छथि।होलीडेहोमक सामनेमे बड़ीटा मैदान अछि जकर चारूकात घुमनाइ मोसकिल छल।बहुत रास लोकसभ प्रातःभ्रमण करैत देखा जाइत छलाह।ओना होलीडेहोममे ठहरल यात्री लोकनि भीतरेमे चक्कर लगबैत देखेलाह।हमहूँ बेसी काल सएह करी,कारण बाहर बहुत रास कुकुरसभ घुमैत रहैत छल । होलीडेहोमक चारूकात खाली जगहमे अनेक प्रकारक बृक्षसभ रोपल गेल अछि।केकटा रुद्राक्षक गाछ सेहो रोपल देखाएल।गाछक जड़ि लग बृक्षारोपन केनिहार व्यक्तिक नाम लिखल छल। वाराणसीमे आइ हमरा लोकनिक दोसर दिन छल। नियत समयपर ठीक नओ बजे हमसभ तैयार भए गेल रही।तखनहि टैक्सीबला आबि गेल।हमसभ आइ बाबा विश्वनाथक दर्शन करब।माधवजी बीचमे कतहु भेटि जेताह।ओ अपन ठेकान नीकसँ टैक्सीबलाकेँ बता देने रहथिन। करीब दस मिनट चललाक बाद ओ स्थान आबि गेल। हम फटकीए सँ माधवजीकेँ कातमे ठाढ़ भेल देखि लेलिअनि। टैक्सीबलाकेँ सेहो कनीको परेसानी नहि भेलैक। ओ टैक्सी कात लगा कए ठाढ़ केलक आ माधवजी आगूमे बैसि गेलाह।रस्तामे कैकटा प्रमुख स्थानसभ अबैत छल। तकर जनतब माधवजी दैत रहलथि। दस मिनट आर चललाक बाद हमसभ अपन गंतव्यपर पहुँचि गेल छलहुँ। मंदिरसँ फटकीए टैक्सी रोकि देल गेल।तकर बाद हमसभ एकटा एक्का ठीक केलहुँ। एक्का दू गोटेक सहयोगसँ चलैत छल।एकगोटे उपर बैसल छल आ दोसर बेर-कुबेर ओकरा पाछूसँ ठेलैत छल। ऊपर दिस चढ़ान रहैक। बीचमे पुलिस सेहो ठाढ़ रहए। ओकरा माधवजी किछु कहलखिन तखनहि एक्का आगू बढ़ि सकल,अन्यथा ओ ओतहि हमरासभकेँ उतारि दैत।एक्का संगे दौड़ि रहल दोसर व्यक्ति बहुत कम बयसक छल। ओ रहि-रहि कए मधुर स्वरमे एकटा गीत गबैत रहैत छल जे हमरा बहुत नीक लागल।गीतक अर्थ छल- “जखन टाकाक महत्व बेसी हेतैक तखन आर की हेतैक?भाए-भाएक खून करतैक।” हम ओकर गीतक भाव बूझि चकित छलहुँ ।ओ बच्चा बेर-बेर ओहि गीतकेँ दोहरबैत रहल। अंतमे,हम ओकरा बीस टाका इनाम देलिऐक।एहि बातसँ ओ बहुत प्रसन्न भेल छल। “शुक्रिया साहेब। फेर आएब।हमरा जरूर कहब।हमर मोबाइल नंबर लिखि लिअ।” आब मंदिर सामने देखा रहल छल। हमसभ एक्कासँ उतरि गेलहुँ। कनीके फटकी मंदिरक सेवाकेन्द्र छल। ओहिठाम हमसभ भीआइपी दर्शन लेल टिकट कीनलहूँ आ दुनू गोटे पैरे-पैरे मंदिर दिस बिदा भेलहुँ।माधवजीकेँ संगे नहि जाए देलकनि,ने कोनो पंडितजी संगे गेलाह।असलमे हमसभ यदि कनी आर टाका खर्च कए जलाभिषेकक टिकट लेने रहितहुँ तखन पंडितोजी संगे चलितथि आ भीतरमे जा कए शिवलिंगपर जलाभिषको कए सकितहुँ। मुदा हमसभ एहि विकल्पक बारेमे बादमे बूझि सकलहुँ जखन कि सूचनापट्टपर सभबात नीकसँ लिखल रहैक। मुदा हम से नहि पढ़ि सकलहुँ आ माधवजी जे जे कहैत रहलाह तेना-तेना करैत रहलहुँ।बादमे अफसोच होअए जे अपनो माथ किएक ने लगओलहुँ। हमसभ लोकसभसँ पुछि-पुछि मंदिरक भीतर सही जगहपर पहुँचि गेलहुँ।एहि परिसरमे मोबाइल रखबाक बहुत नीक ओरिआन अछि। ओतहि हम अपन मोबाइल जमा करओलहुँ।कनीके हटि कए पूजाक लेल प्रसाद लेलहुँ आ दर्शनक लेल भीआइपी लाइनमे लागि गेलहुँ। बहुत जल्दीए हमसभ शिवलिंगक ठीक सामने पहुँचि गेल रही। ओतए देबालक पाछू शिवलिंग स्पष्ट देखा रहल छलथि। केओ-केओ जलाभिषेक कए रहल छलाह।पंडितजी हुनकासभकेँ मंत्रोच्चार कए पूजाक विधान संपन्न करबा रहल छलाह।हमहूँसभ बहुत नीकसँ भगवान शिवक आराधना केलहुँ आ आगू बढ़ि गेलहुँ। बाबा विश्वनाथक दर्शनक बाद हमसभ कनीके आगू गेल छलहुँ कि एकटा पंडितजी हमरासभकेँ घेरि लेलनि। तरह-तरहसँ बुझबैत रहलाह जे की की केलासँ हमरासभक पुण्य अर्जित भए सकैत अछि। कनीके फटकी एकटा पंडितजीसँ सेहो भेंट करेलथि।ओहो किछु दक्षिणा लेलथि। फेर हमसभ सामनेमे नन्दीक दर्शन केलहुँ जकर ठीक सामनेमे ज्ञानवापी परिसर अछि आ ओतहि कहाँदनि असली शिवलिंग भेटल छथि जाहिपर कानूनी विवाद चलिए रहल अछि।हमसभ पाँतिमे ज्ञानवापीक देबालपर बनल मूर्तिकेँ दर्शन केलहुँ आ मोनमे अपार क्षोभक संग वापस भए गेलहुँ। बाहर पंडितजी ठाढ़ छलाह।हुनको किछु टाका देलिअनि,मोबाइल छोड़ओलहुँ आ तय मार्गसँ वापस बाहर निकलि गेलहुँ। ओतएसँ कनीकाल पैदल चलि हमसभ फेर सेवाकेन्द्रपर पहुँचि गेल रही। ओहिठाम माधवजी रहबे करथि।टैक्सीबला सेहो कनीके फटकी आबि गेलथि।आब हमसभ आगू बढ़ि गेलहुँ। मंदिर परिसरक व्यवस्था मंदिर परिसरक सुरक्षा व्यवस्था बहुत चाक-चौबंद अछि।जहिना लोक एहि दुनिआमे खाली हाथ अबैत अछि आ ओहिना चलि जाइत अछि सएह हाल ओहि मंदिरक अछि।मंदिरमे प्रवेशसुरक्षा व्यवस्थामे लागल कैकटा सिपाहीसभ त्रिपुंड केने देखेलाह।ठाम-ठाम महिला पुलिस सेहो लागल छलीह। मंदिर परिसरमे प्रवेश करबासँ पूर्व सभ किछु बाहरे रखबा लेल जाइत अछि। एकटा समय छल जे मंदिरमे जाएब मोसकिल होइत छल कारण चारूकात अबैध निर्माण भेल छल। अतिशय कठिन गलीसँ जिलेबी जकाँ घुमि-घुमि बाबाक मंदिरमे लोक पहुँचैत छल। आब जा कए देखिऔक।मंदिरक भीतर आ बाहरक संपूर्ण परिदृश्ये बदलि गेल अछि।मंदिरक चारूकात पर्याप्त खाली स्थान अछि।मंदिर परसरमे लोककेँ अएबाक आ जएबाक लेल स्पष्ट व्यवस्था अछि।गंगाक घाटसँ सोझे मंदिर धरि बिना कोनो व्यवधानकेँ लोक आबि-जा सकैत छथि।गंगामे नहाउ,गंगाजल लिअ आ आबि कए बाबापर चढ़ाउ। माधवजीक संगे गलीक रस्तासँ हमहूँसभ गंगक कात धरि पहुँचि गेल रही।मुदा गंगाक पानि बहुत घोरल-घारल छल।ओहिमे स्नान करबाक माने छल घर पहुँचि दोबारा स्नान करब जरूरी अन्यथा जेहो स्वच्छ रही से खराप भए जाएत।गंगाक पानि रहबे करैक तेहने।तथापि,हमसभ घाटपर बहुत नीचाँ धरि गेलहुँ।गंगामाताकेँ प्रणाम केलहुँ आ वापस भए गेलहुँ।गंगास्नान नहि कए सकलहुँ।फेर ओही गलीक बाटे माधवजी हमरासभकेँ वापस सड़कपर अनलनि।बीचेमे एकटा लस्सीक दोकानपर हमसभ लस्सी पीबि फरहर भेलहुँ।मंदिरक लगीचे भंडाराक ओरिआन छलैक।माधवजी ओकर आनन्द लेबए चाहैत छलाह।मुदासभ ताहि लेल उत्साहित नहि रही। पहिने घुमि ली तकर बाद देखल जेतैक-से सोचि हमसभ टैक्सीसँ सारनाथ दिस बढ़ि गेलहुँ। सारनाथ वाराणसीसँ नओ किलोमीटर उत्तरपूब कोनमे अवस्थित सारनाथमे भगवान बुद्ध पहिल बेर अपन शिष्यसभकेँ उपदेश देने रहथि।लुम्बिनी,बोधगया,कुशीनगरक आ सारनाथ बुद्धक अनुयायी लोकनिक लेल बहुत पवित्र तीर्थ मानल जाइत अछि। करीब आधाघंटाक बाद हमसभ सारनाथ पहुँचल रही। टेक्सी बाहरे द्वारिक पास रूकि गेल। तकर बाद हमसभ पैरे-पैरे सारनाथक प्रमुख स्थानसभ देखलहुँ।शुरूऐमे हमरा सभकेँ एकटा गाइड पछोर केलनि। ओ कमे बएसके रहथि आ हुनका ओहिठामक बारेमे कोनो विशेष ज्ञान नहि रहनि।तथापि,हमसभ हुनका उत्साहित करबाक उद्येश्यसँ राखि लेलहुँ। हमरासभकेँ ओ की बतबितथि,उल्टे हमहीसभ हुनका समय-समयपर किछु-किछु बतबैत रहलहुँ।हमसभ बेरा-बेरी संग्रहालय, थाई मंदिर, तिब्बती मंदिर, देखलहुँ। ओहि बच्चा गाइडक बहुत जोर रहैक जे हमसभ निकटवर्ती हथकरघाक दोकानपर चली।संभवतः ओकरा किछु कमीशन भेटितैक।आखिर हमसभ ओहि दोकानपर गेबो केलहुँ,मुदा हमरासभकेँ ओहिठाम कीनबाक योग्य किछु पसिंद नहि भेल। बाहर निकललाक बाद बच्चासभक लेल जरूर किछु खेलौना कीनलहुँ। तकर बाद हमसभ वापसी यात्रामे प्रेमचंदक गाम लमही दिस बिदा भए गेलहुँ। लमही थोड़बे कालमे हमसभ प्रेमचंदक गाम लमहीक ग्रामद्वारिमे प्रवेश कए रहल छलहुँ। द्वारिक दुनू कातमे बरदक चित्र बनल अछि। गाममे कोनो तेहन विशेषता नहि बुझाएल। आने गामसभ जकाँ कोठाक घरसभ। प्रेमचंदक पुस्तैनी घर लग पहुँचलाक बाद हमसभ टेक्सीसँ उतरि गेलहुँ। दहिना दिस प्रेमचंदक नामपर बनल(मुंशी प्रेमचंद शोध एवं अध्ययन केन्द्र-लमही छल। बामा दिस प्रेमचंदक इनार छल जे आब झाँपि देल गेल छल। प्रेमचंदक पुस्तैनी मकानक देबालक पलस्तरसभ झड़ि रहल छल। ओकरा आब संग्रहालय बना देल गेल अछि।ओहिमे प्रेमचंदसँ जुड़ल अनेक प्रकारक वस्तुसभ राखल गेल अछि। हुनकर किछु किताबक पाण्डुलिपि सेहो राखल बुझाएल।किछु पुरान पत्रिका सेहो राखल छल। ओहिठामसँ कनीके फटकी सरकार द्वारा नवनिर्मिति भवन अछि। सामनेमे कार्यालय सेहो बनल अछि जे ओहि दिन बंद छल। आसपास घुमलाक बाद हमसभ प्रेमचंदक पुस्तैनी घरक सामने बनल बैसकीपर बैसलहुँ, थोड़काल रुकलहुँ,फोटो घिचओलहुँ।लगपासमे केओ एहन नहि देखेलाह जिनकासँ प्रेमचंदसँ जुड़ल कोनो बातपर किछु चर्चा कए सकितहुँ।माधवजी किछु-किछु कहैत रहलाह।स्थानीय होएबाक कारण हुनका ओहिठामक बहुत किछु बूझल रहनि।आब किछु करबाक नहि छल। आखिर हमसभ ओहिठामसँ बिदा भए गेलहुँ।कनीके फटकी प्रेमचंदक पोखरि सेहो देखाएल।पोखरि आब काजक नहि रहि गेल अछि। एतेक पैघ साहित्यकारक स्मृतिसँ जुड़ल हुनकर पैतृक घर आ आसपासक वस्तुक स्थिति देखि मोनमे बहुत दुख भेल।हमसभ आब वापस अपन डेरा दिस बढ़ि गेलहुँ।कैंटीनमे फोन कए देलिऐक जे हमसभ भोजन ओतहि करब।माधवजी सेहो हमरासभक संगे रहथि।हमसभ भोजन केलहुँ आ विश्राम लेल अपन कोठरी चलि गेलहुँ। दुर्गाकुंड मंदिर आइ वाराणसीमे हमरसभक तेसर दिन छल।हमसभ सभसँ पहिने प्रसिद्ध दुर्गाकुंड मंदिर गेलहुँ। असलमे पहिने दिन वापसी यात्रामे हमसभ एहि मंदिरक लगे सँ गेल रही।मुदा ओहिठाम पहुँचैत काल धरि बहुत थाकि गेल रही।साहस नहि भेल जे टेक्सीसँ उतरी।आइ सभसँ एहिने हमसभ एतहि पहुँचलहुँ।विलंबसँ अएबाक लेल मातासँ माफी मंगलहुँ। बहुत पवित्र स्थान अछि दुर्गाकुंड मंदिर।एकर स्थापना अठारहम शताब्दीमे बंगालक महरानी भवानी करओने छलीह। कहल जाइत अछि जे एहिठाम माँ दुर्गा स्वयं प्रकट भेल रहथि। दुर्गा मन्दिरमे बाबा भैरवनाथ, लक्ष्मीजी, सरस्वतीजी, हनुमानजी आ माता कालीक मन्दिरो सेहो अछि।मंदिरक सामने एकटा बहुत पैघ पोखरि अछि। पहिने ई कुंड गंगासँ जुड़ल छल। पोखरिक पानि बहुत निर्मल देखाएल।मंदिरमे भगवतीक दर्शन केलाक बाद आसपास घुमलहुँ,कनी काल मंदिर परिसरमे बैसलहुँ आ काशीनरेशक पैतृक महल देखबाक लेल बिदा भए गेलहुँ। काशीनरेशक पैतृक महल(रामनगरक किला) स्थानीय लोकमे एहन मान्यता अछि जे काशीक तीनटा राजा छथि। पहिल बाबा विश्वनाथ,दोसर काशी नरेश आ तेसर डोम राजा।काशी राज घरानाकेँ काशी एस्टेटक नामसँ जानल जाइत अछि। सन् ‍१७०० ई०मे स्वर्गीय मंसाराम एकर स्थापना केलनि।तखनसँ सन् ‍१९४७ धरि ई परंपरा चलैत रहल। सन् ‍१९४७मे स्वतंत्रताक बाद काशी नरेशकेँ महाराजा विभूति नारायण शिंह लिखवाक अनुमति देल गेल छल।सन् २००० ई० मे हुनकर मृत्युक बाद हुनकर पुत्र श्री अनन्त नारायण सिंह कुँवरक नामसँ जानल छथि। संप्रति ओएह ओहिठामक उत्तराधिकारी छथि। ओहिठामक राजपरिवारक स्थानीय जनतामे बहुत धाख छल।मुदा पारिवारिक कलहक कारण आब स्थिति बहुत बदलि गेल अछि। हमसभ जखन रामनगर किलाक मुख्यद्वारिपर पहुँचलहुँ तखन ओकर मरम्मतिक काज चलि रहल छल। मुदा भीतर जएबाक अनुमति छल। अस्तु,हमसभ टिकट लए किलामे प्रवेश केलहुँ। महलक अधिकांश भागमे राज परिवारक पुरान वस्तुसभ प्रदर्शनीक लेल राखल अछि। तरह-तरहक पुरान मोटर,हथियार,वर्तन,राज-परिवारक सदस्य लोकनि द्वारा प्रयोग कएल गेल गृहस्थीक अन्य वस्तुसभ देखबामे आएल। ऊपरका महलमे सेहो थोड़ बहुत राज-परिवारक स्मृतिशेष भेटल। मुदा कनीके आगू गेलाक बाद रस्ता बंद छल।हमसभ सीढ़ीसँ नीचाँ उतरि गेलहुँ। समयो आब समाप्त भए रहल छल। सुरक्षाप्रहरीसभ सीटी बजा-बजा कए लोकसभकेँ वापस जएबाक आग्रह कए रहल छल।हमहूँसभ जल्दी-जल्दी किछु फोटो घिचओलहुँ आ वापसी यात्राक लेल मुख्याद्वारिसँ बाहर निकलि गेलहुँ। बाहर समोसा,चाटक कैकटा दोकान छल। मुदा हमसभ वाराणसीक प्रसिद्ध चाटक दोकान दीना चाट भण्डारपर चाट खएबाक लेल आगू बढ़ि गेलहुँ। बहुत काल चललाक बाद ओहि चाटक दोकानपर पहुँचबो केलहुँ,मुदा ओ बंद छल। तकर बाद हमसभ काशी चाट भंडार ( जे बहुत प्रसिद्ध अछि) दिस बिदा भए गेलहुँ।साँझक समय छल। रस्तामे भीड़ लागि रहल छल। टैक्सीबला चाहिओ कए बहुत तेजसँ टैक्सी नहि चला सकैत छल। आखिर जेना-तेना हमसभ ओहि चाटक दोकानपर पहुँचिए गेलहुँ। जल्दीसँ हमसभ चाटक दोकानपर अपन पसिंदक चाटक आदेश देलिऐक। थोड़बे कालमे गरमा-गरम चाट आबि गेल। ओ सचमुचकेँ बहुत स्वादिष्ट छल।चाटक बाद गरमा-गरम गुलाब जामुन सेहो चललैक।हमसभ तकर बाद ओहिठामसँ निकलिए रहल छलहुँ कि बाहरमे कुल्फी देखाएल।सभगोटे कुल्फीक आनन्द सेहो लेलहुँ ।रस्तामे हमसभश्रीराम पान दोकानपर मीठका पान खेलहुँ।पान कि ओ तँ एक प्रकारक मधुरे छल।आब हमसभ बहुत आश्वस्त छलहुँ।रातिमे किछु खएबाक स्थितिमे नहि रही, तेँ फोनपर केंटीनमे भोजन नहि बनेबाक लेल कहि देलिऐक। आधा घंटाक बाद हमसभ होलीडे होम पहुँचि गेलहुँ। वाराणसीमे चारिम दिन आइ वाराणसीमे हमर सभक चारिम दिन छल। मोटामोटी जे स्थानसभ देखि सकैत छलहुँ,से देखलहुँ।किछु स्थान गंगामे बाढ़िक कारण नहि देखल जा सकल। कतहु-कतहु बहुत पैदल चलबाक रहैत।ताहू ठाम नहि जा सकलहुँ। मुदा आइ की करब?टैक्सी आबि चुकल छल।माधवजी सेहो हमरासभक प्रतीक्षा कए रहल छलाह।आखिर बिदा भेलहुँ।सभसँ पहिने लगीचेमे स्थित हथगरघा म्युजियम पहुँचलहुँ। ओहिठाम हमर श्रीमतीजी पसिंदक सारीसभ कीनलनि। ओतए कैकटा दोकानमे हस्तनिर्मित सामानसभ विक्रय लेल उपलब्ध छल। से सभ देखैत सुनैत हम सभ घंटा भरिक बाद ओहिठामसँ निकलि कबीर पंथक मुख्यालय पहुँचलहुँ। ओहिठाम जएबाक लेल बहुत काल पैरे चलए पड़ल।रस्तामे गाय-महीषसभक गोबर भरल छल।आखिर हमसभ कबीरस्थानमे प्रवेश केलहुँ। ओहिठाम कबीरदाससँ जुड़ल बहुत रास वस्तुसभ राखल देखाएल। अनेक स्तंभसभपर कबीरदासक उपदेशसभ लिखल देखाएल।सामनेमे एकटा महंथजी बैसल छलाह। ओहिठाम गेलाक बाद एकटा महिला हमरासभक स्वागत केलनि आ ओतए भीतरमे बैसबाक आग्रह केलनि।मुदा हमरा ओहिठाम किछु आकर्षक नहि बुझाएल।ओहिठाम सफाइक अभाव छल।संगे बाहरसँ गोबरक गंध आबि रहल छल।हमसभ जल्दीए उबि गेलहुँ।आखिर थोड़ेकाल एमहर-ओमहर घुमलाक बाद हमसभ बाहर निकलि गेलहुँ। भारतमाता मंदिर बाबू शिव प्रसाद गुप्ता द्वारा सन् ‍१९१८सँ ‍१९२४क बीच सात वर्षमे निर्मित भारतमाता मंदिरक उद्घाटन महात्मा गांधी द्वारा पन्द्रह अकटूबर सन् ‍१९३६ कए कएल गेल छल। ई वनारस रेलवे टीसनसँ डेढ़ किलोमीटर आ काशी विश्वनाथ मंदिरसँ छओ किलोमीटर दूरीपर अवस्थित अछि।भारत माता मंदिरमे कोनो देवी-देवताक नहि, अपितु अखंड भारतमाताक चित्र बनाओल गेल अछि। एहिसँ भारतक लोककेँ देश प्रेम आ राष्ट्रीय एकताक प्रेरणा भेटैत अछि। हमसभ एहि मंदिरमे पहुँचि बहुत आनन्दित भेलहुँ। कैक बेर चारू कात घुमलहुँ। श्री शिवाय भोजनालय साँझमे डेरा लौटबासँ पहिने हमसभ श्री शिवाय भोजनालय पहुँचलहुँ। ओहिठाम भोजन करबाक योजना कए दिनसँ बनि रहल छल। हमसभ आइ तय केने रही जे वापसीमे ओतहि भोजन करबाक अछि।तेँ केंटीनमे पहिनेसँ मना कए देने रहिऐक। हमसभ श्रीशिवा भोजनालयमे जखन गेलहुँ तँ ओ खालीए छल। असलमे हमसभ भोजनक समयसँ किछु पहिने पहुँचि गेल रही। तथापि,हमरासभकेँ नीकसँ स्वागत कएल गेल। देशक विभिन्न भागक प्रसिद्ध भोजनसभकेँ समायोजित करैत ओहिठामक थारी भोजन बहुत प्रसिद्ध अछि। अस्तु,हमसभ तीनूगोटे ओहि भोजनक आनन्द लेलहुँ। बेरा-बेरी अलग-अलग प्रकारक भोजनसभ परसल जाइत छल।जे खाइ,जतेक खाइ। हमसभ कतेक खइतहुँ?यथासाध्य भोजन केलाक बाद हमसभ डेरा लेल बिदा भए गेलहुँ। वापसी यात्रा आइ हमर सभक वाराणसी यात्राक पाँचम दिन अछि।आइ किछु नहि करबाक अछि।हमरासभ आजुक दिन विश्रामक लेल रखने छी।हमरासभकेँ होलीडे होममे घरो बदलबाक अछि।एक दिनक लेल हमसभ भीआइपी कोठरीमे जा रहल छी ,कारण दोसर कोठरी उपलब्ध नहि छल। हमरासभ लग बहुत कम सामान अछि। कम सँ कम सामान लए यात्रापर जएबाक चाही।हमसभ सएह प्रयास केने रही। तथापि दूटा बाकस आर किछु सामानसभ रहबे करए।बेरा बेरी ओकरा हमसभ उठा-उठा कए नवका कोठरीमे लए गेलहुँ।हमसभ नवका कोठरीमे पहुँचि बेस खुस रही। बड़ीटा हाल,बेडरूम सेहो पैघ।संगमे आर तरहक सुविधासभ। आब की?थोड़े काल एसी खोलि कए आराम केलहुँ।अचानक ध्यान आएल जे दाँत तँ छुटिए गेल। आहि रे बा!आब की करी?दाँत कतए रहि गेल?हमरा बेचेन देखि ओ कहलथि- “किएक परेसान छी? अहाँ कोन दाँत लगबिते छी जे नहि रहलासँ बेचेन छी। यदि जरूरी बुझाएत तँ फेर बना लेब।” हम की बजितहुँ?चुप रहि गेलहुँ। तकर बाद मोन भेल जे कनी पुरना कोठरीमे जा कए देखिऐक।पुरना कोठरी एक तल नीचाँ छल। ओहिठाम कनीके पहिने सफाइबलासभ काज केने छल। तथापि,सौंसे तकलहुँ।कतहु दाँत नहि देखाएल।ओ एकटा छोटसन डिब्बीमे राखल रहैत छल। एमहर-ओमहर सौंसे बौअएलहुँ। आखिर,वापस नवका कोठरीमे आबि गेलहुँ।टीभी देखबाक प्रयास केलहुँ।मुदा मोन नहि लागि रहल छल। फेर नीचाँ गेलहुँ। पुरना कोठरीक बगलमे कूड़ादान राखल छलैक।भेल जे देखिऐक।की पता एतहि दाँत राखि देल गेल होअए?कहबी छैक – “मरता क्या नहीं करता।” ओहि कूड़ादानमे हाथ देलहुँ।ऊपरसँ कनीके हटओलाक बाद ओ डिब्बी भेटि गेल। ओकर भीतरमे डिब्बीमे पानि आ पानिमे हमर दाँतसभ ओहिना देखा रहल छल। हम तुरंत ओहि डिब्बीकेँ बाहर केलहुँ। ओकरा नीकसँ अनेक बेर साबुनसँ साफ केलहुँ।फेर डिब्बी खोललहुँ।पानि हरा देलिऐक आ दाँतकेँ वारंबार साफ केलहुँ।आब दाँत ठीक बुझाएल। ओकरा लेने विजयी मुद्रामे कोठरी वापस पहुँचलहुँ।हमरा प्रसन्न देखि ओ बुझि गेलथि। “भेटि गेल की?” जबाबमे हम हँसि देलिअनि। बेस कीमती दाँत भेटि गेलासँ हमसभ बहुत आश्वस्त रही।आइ किछु करबोक नहि रहए।कतहु जएबोक नहि रहए।ओतेकटा भीआइपी कोठरीमे दू गोटे ।दिन-भरिक विश्रामक बाद हमसभ कल्हुका यात्राक ओरिआनमे लागि गेलहुँ।हमरासभकेँ वापसीमे विंध्याचल भगवतीकेँ दर्शन करैत प्रयागराज जएबाक छल। अस्तु,हमसभ ओही टैक्सीबलाकेँ ठीक केलहुँ।ओ हमरासभकेँ काल्हि भोरे सात बजे प्रयागराज लए जेताह।हमसभ ताही हिसाबसँ तैयारी केलहुँ।भोरे सात बजे टैक्सी आबि गेल छल।होलिडेहोमसँ काल्हिए फारकती भेटि गेल छल। हमसभ अपन सामानसभ टैक्सीमे रखलहुँ ,कोठरीक कुंजी स्वागतीकेँ दए देलिऐक आ टैक्सीमे आगूक यात्राक लेल बैसि गेलहुँ। कनीकालक बाद एकटा नीक ढाबापर हमसभ चाह पीलहुँ।चाहक चुस्कीक संग हमसभ अपन वाराणसी यात्राक स्मरण करैत रहलहुँ। “केहन रहल अपनसभक ई यात्रा?” “अद्भुत। बहुत आनन्ददायी।” “वाराणसीमे की सभसँ नीक लागल?” “ओना तँ बहुत रास नीक-नीक स्थानसभ देखलहुँ,मुदा बाबा विश्वनाथमंदिरक व्यवस्था बहुत प्रशंसनीय छल। बाबाक दर्शन बहुत बढ़िआँसँ भए सकल।” आब चाह खतम छल।हमसभ फेर टैक्सीमे बैसि गेलहुँ , बिदा भए गेलहुँ ,,,।बहुत किछु देखलहुँ,बहुत किछु नहिओ देखि सकलहुँ।मुदा हमरसभक मोनपर कुलमिला कए एहि यात्राक बड़ नीक प्रभाव पड़ल।हमसभ बादोमे एहि यात्राक प्रसंगसभपर कैक दिन धरि आपसमे चर्चा करैत रहलहुँ। रबीन्द्र नारायण मिश्र [‍१८।१२।२०२५] लेखक परिचयः नाम : रबीन्द्र नारायण मिश्र पिताक नाम : स्वर्गीय सूर्य नारायण मिश्र माताक नाम : स्वर्गीया दयाकाशी देवी जन्म तिथिः२ जनबरी ‍१९५४(प्रमाण पत्र) २४ अगस्त ‍१९५२(जन्मपत्र) पैतृक ग्राम : अड़ेर डीह मातृक : सिन्घिआ ड्योढ़ी वृति : भारत सरकारक उप सचिव (सेवानिवृत्त)/ स्पेशल मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, दिल्ली(सेवानिवृत्त) शिक्षा : चन्द्रधारी मिथिला महाविद्यालयसँ बी.एस-सी. भौतिक विज्ञानमे प्रतिष्ठा : दिल्ली विश्वविद्यालयसँ विधि स्नातक श्री रबीन्द्र नारायण मिश्रक प्रकाशित कृति :मैथिलीमे:- प्रकाशन वर्ष:2017 १. ‘भोरसँ साँझ धरि’ (आत्म कथा), २. ‘प्रसंगवश’ (निवंध), ३. ‘स्वर्ग एतहि अछि’ (यात्रा प्रसंग), प्रकाशन वर्ष:2018 ४. ‘फसाद’ (कथा संग्रह) ५. `नमस्तस्यै’ (उपन्यास) ६. विविध प्रसंग (निवंध ) ७.महराज(उपन्यास) ८.लजकोटर(उपन्यास) प्रकाशन वर्ष:2019 ९.सीमाक ओहि पार(उपन्यास)१०.समाधान(निवंध संग्रह) ११.मातृभूमि(उपन्यास) १२.स्वप्नलोक(उपन्यास) प्रकाशन वर्ष:2020 १३.शंखनाद(उपन्यास) १४.इएह थिक जीवन(संस्मरण) १५.ढहैत देबाल(उपन्यास) १६.पाथेय(संस्मरण) प्रकाशन वर्ष:2021 १७.हम आबि रहल छी(उपन्यास) १८.प्रलयक परात(उपन्यास) प्रकाशन वर्ष:2022 १९.बीति गेल समय(उपन्यास) २०.प्रतिबिम्ब(उपन्यास)२१.बदलि रहल अछि सभकिछु(उपन्यास)22. राष्ट्र मंदिर(उपन्यास) २३. संयोग(कथा संग्रह) २४. नाचि रहल छलि वसुधा ( उपन्यास) प्रकाशन वर्षः2023 २५.दीप जरैत रहए(उपन्यास) २६.ठेहा परक मौलायल गाछ(उपन्यास) २७.पटाक्षेप(उपन्यास) प्रकाशन वर्षः2024 २८ माटि बजा रहल अछि(यात्रा प्रसंग) २९ जयतु जानकी(उपन्यास) ३० यज्ञसेनी(उपन्यास) प्रकाशन वर्षः2025 ३१.कथा अखन बाँकी अछि(संस्मरण) ३२. गाछ बजैत छैक(कथा संग्रह) ३३.सूर्यपुत्र(उपन्यास) In English: - Year of publication:2018 1. The Lost House (Collection of short stories) 2. Life is an art 3.The Ganges Whispers (English translation of my Maithili Novel,Ham Aabi Rahal Chhee (हम आबि रहल छी) हिन्दी में – प्रकाशन वर्ष:2019 १.न्याय की गुहार अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। पद्य ३.१.राम शंकर झा"मैथिल"- नदी ३.१.राम शंकर झा"मैथिल"- नदी राम शंकर झा"मैथिल" नदी

ई नदी जें पियासल

रहि गेल

नहिं जानि कतेको

वरख सँ

आ कि हजारों वरख सँ

लोक वेद सअर समांग

गाछी वृक्षी किड़ा मकोड़ा पिलुआ

चिंराई चुनमुनी

आ कि ई कहु

ककर नहिं कंठ जूरेलक

ई नदी जें....!

कोअन खेत कोअन खारिहान

नहिं पाटल

आ कि नहिं निपाएल

चाहे भीठाह आ कि धनहा

कतहु करीन लागल

कतहु दमकल

ई नदी जें....!

ककर कोख नहिं भरलक

पुरनी पोखैर

आ कि डबरी चअर चांचर

के नहिं नेहाएल

के नहिं सोनाएल

एकर धार मे

आ एकर किछेर मे

पहर दु पहर के कहेआ

भरि भरि दिअन

हरवाह चरवाह गिरहथ

सङ्ग बरद महिंस

ई नदी जें....!

सुरकिया परअर सुरकिया

डुबकी पअर डुबकी

के नहिं चुभकैत रहल

मनसा मौउगी

आ कि नैना भुटका

छिछीआइत बौआइत

आ कि घाम सँ

तअर बतर

के नहिं अपन नुआँ

आ कि धोती

खिचलक

ई नदी जें....!

कट्ठा मे मअन सपे

के कहाअ

तीन तीन मअन

रामहिं जी राम

जोखैत गाअमक

गाअम

भरळ बखारी

उमरल कोठी

एहि नदी कें सुन्नर

पैईन सँ

सगरों पाटल खेत

निपाएळ खरिहान

मुदा

ई नदी जें...

सब वरख लबालब

भरैत चअर चांचर

पोखैर मोईन डाबर

जाहि मे उमरळ

पुरैनक पाअत

गोहे गोह खिलल

कमलक फूल

कतौह लौढ़ा मरुऐन

कतौह निकालय सोन

सँन माखन

मुदा ई नदी जें...!

गाअमक गाअम

भोज जवार

सब कें आगू चतरल

पुरैनक पाअत

मुरन विआह

चाहे होय उननायन

चाहे होय पाबैन

ज्यों हरियर सोन

सँन खेत

सङ्गहिं भरल

बोझक बोझ खरियान

चौकल पुआरक टाअळ

मुदा ई नदी जें....!

दलान भरळ

महिंस बरद गाय सँ

थाअन भरळ

दुग्ध सँ उमरल

भरल बाल्टी डोळ

मटकुरि कसतारा

छाँछ तौउला

जोरअन दैत मिथिलानी

जन्मैत

कठगर सोहनगर

दही सङ्ग मठ्ठा

गिरहथ जौउन

एकहिं आरि बैसि

करैथ कलौउ बेरहठ

जलपान

मुदा ई नदी जें...!

जतह बढ़ हुलांस

गाबैत बटगबनी

समदौन

सङ्गहिं मचान सँ

मल्हार

आएल बलान तअ

भरल दलान

मुदा स्वर्ग सँ पैघ

ई मधुमास संन

दिन राति

कतह पायब कतह

पायब

ई नदी जें पियासल

रहि गेल..!!

राम शंकर झा"मैथिल"

उघरा, दरभंगा l

नदी :

......

ई नदी जें पियासल

रहि गेल

नहिं जानि कतेको

वरख सँ

आ कि हजारों वरख सँ

लोक वेद सअर समांग

गाछी वृक्षी

किड़ा मकोड़ा पिलुआ

चिंराई चुनमुनी

आ कि ई कहु

ककर नहिं कंठ जूरेलक

ई नदी जें....!

कोअन खेत कोअन खारिहान

नहिं पाटल

आ कि नहिं निपाएल

चाहे भीठाह आ कि धनहा

कतहु करीन लागल

कतहु दमकल

ई नदी जें....!

ककर कोख नहिं भरलक

पुरनी पोखैर

आ कि डबरी चअर चांचर

के नहिं नेहाएल

के नहिं सोनाएल

एकर धार मे

आ एकर किछेर मे

पहर दु पहर के कहेआ

भरि भरि दिअन

हरवाह चरवाह गिरहथ

सङ्ग बरद महिंस

ई नदी जें....!

सुरकिया परअर सुरकिया

डुबकी पअर डुबकी

के नहिं चुभकैत रहल

मनसा मौउगी

आ कि नैना भुटका

छिछीआइत बौआइत

आ कि घाम सँ

तअर बतर

के नहिं अपन नुआँ

आ कि धोती

खिचलक

ई नदी जें....!

कट्ठा मे मअन सपे

के कहाअ

तीन तीन मअन

रामहिं जी राम

जोखैत गाअमक

गाअम

भरळ बखारी

उमरल कोठी

एहि नदी कें सुन्नर

पैईन सँ

सगरों पाटल खेत

निपाएळ खरिहान

मुदा

ई नदी जें...

सब वरख लबालब

भरैत चअर चांचर

पोखैर मोईन डाबर

जाहि मे उमरळ

पुरैनक पाअत

गोहे गोह खिलल

कमलक फूल

कतौह लौढ़ा मरुऐन

कतौह निकालय सोन

सँन माखन

मुदा ई नदी जें...!

गाअमक गाअम

भोज जवार

सब कें आगू चतरल

पुरैनक पाअत

मुरन विआह

चाहे होय उननायन

चाहे होय पाबैन

ज्यों हरियर सोन

सँन खेत

सङ्गहिं भरल

बोझक बोझ खरियान

चौकल पुआरक टाअळ

मुदा ई नदी जें....!

दलान भरळ

महिंस बरद गाय सँ

थाअन भरळ

दुग्ध सँ उमरल

भरल बाल्टी डोळ

मटकुरि कसतारा

छाँछ तौउला

जोरअन दैत मिथिलानी

जन्मैत

कठगर सोहनगर

दही सङ्ग मठ्ठा

गिरहथ जौउन

एकहिं आरि बैसि

करैथ कलौउ बेरहठ

जलपान

मुदा ई नदी जें...!

जतह बढ़ हुलांस

गाबैत बटगबनी

समदौन

सङ्गहिं मचान सँ

मल्हार

आएल बलान तअ

भरल दलान

मुदा स्वर्ग सँ पैघ

ई मधुमास संन

दिन राति

कतह पायब कतह

पायब

ई नदी जें पियासल

रहि गेल..!!

-राम शंकर झा"मैथिल", उघरा, दरभंगा अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। Maithili Literature in English Translation 4.1.Desolate-Jagdish Prasad Mandal (Original Maithili Short Story) Rameshwar Prasad Mandal (English Translation) 4.1.Desolate-Jagdish Prasad Mandal (Original Maithili Short Story) Rameshwar Prasad Mandal (English Translation) Jagdish Prasad Mandal (Original Maithili Short Story) Rameshwar Prasad Mandal (English Translation) Desolate Evening had set in when Shyam Babu reached Gopal�s house. Gopal himself was not at home; he had gone to the market to buy medicine for his father. At the doorway, wrapped in a quilt and lying on a wooden cot, was Manmohan. Seeing him, Shyam Babu asked- �Uncle, where is Gopal?� At the sound of his voice, Manmohan sat up slowly and replied- �Ah, Shyam my boy! Come, come, take a seat on the chair. You�ve come after a long while. Gopal has gone to the market, he should be back any moment now.� Hearing this, Shyam Babu sat down on the chair. Inwardly he thought, since he had come here for an important matter, how could he leave without meeting Gopal? And the work he carried with him was something that had to be settled today itself. He was still mulling over this when Gopal arrived, pedaling in on his bicycle. Spotting Shyam Babu seated there, Gopal said- �Brother Shyam! Father�s health has taken a turn for the worse these past seven or eight days. I had to fetch medicines and show the report to the doctor, so I went to the market.� He leaned his bicycle against the wall near the entrance, placed the bag of medicines on the cot where Manmohan had been lying, and then stepped quickly into the courtyard, calling out to his wife- �Make some tea.� Returning, he took a seat beside Shyam Babu on another chair, while Manmohan adjusted himself on the cot, resting against the wall. Shyam Babu asked softly, �Gopal, how is uncle doing?� Gopal replied- �Brother, it isn�t too good. The illness has left its mark.� Shyam Babu said- �Surely his age must have crossed eighty by now?� At the mention of his age, Manmohan himself spoke up- �My boy, I�ve already completed eighty-three years, and now the eighty-fourth is running its course.� Just then, Aparajita, Gopal�s younger daughter, appeared at the doorway carrying three plates of refreshments. Seeing the plates in her hands, Gopal turned to Shyam Babu and said- �Brother, please eat a little first, drink some water. We can talk afterward at leisure.� Shyam Babu and Gopal had been friends since their days in the lower primary school. There was hardly a year�s difference between them, only a few months in age. Though they came from different villages and different castes, their bond was strong. Shyam Babu belonged to Champapur, while Gopal was from Kamalpur. Champapur and Kamalpur were adjoining villages. In truth, they were less than a mile apart, but because of the way the boundaries had been drawn, they fell under two separate panchayats. To outsiders, though, the two villages seemed like one, so close were their ties. The three of them, Shyam Babu, Manmohan, and Gopal, were still finishing their refreshments when Aparajita appeared again at the doorway, this time carrying three cups of tea on a tray. The men sipped their water and then moved on to tea. After a couple of gulps, Gopal said- �Brother, the time for the formal proposal must be drawing near?� Shyam Babu replied- �The day after tomorrow, we will have the feast. That is why I came today to discuss everything.� Gopal asked- �And how have you thought of arranging it?� Shyam Babu answered with a weary smile- �Gopal, the social environment has become such, and is still becoming worse, that people like us can barely breathe. Yet, as long as we live, we have to remain within this same society.� From their conversation, Manmohan understood that the matter at hand was Shyam Babu�s daughter�s marriage, and the upcoming feast related to it. The discussion went on for a while, and then Manmohan broke in gently- �My boy Shyam, you are an educated and thoughtful man, so what can I add? But let me tell you this much: all my life, for these eighty-odd years, I have heard from people and seen with my own eyes that every age has had all kinds of people. The best of men and the worst of men both have always existed. Even in the golden age of Satya Yuga there were thieves and scoundrels, and today we live in Kali Yuga, where such things come even easier. As for my own life, if God grants anyone a son, let him grant a son like Gopal.� Hearing these words, Shyam Babu lifted his eyes and gazed at Manmohan with deep feeling. When Shyam Babu kept looking at him intently, Manmohan felt within himself that Shyam Babu wanted to hear more. He said- �My boy, we see it in our own villages and hear of it in others too, how sons mistreat their fathers. But my own life, the bond between father and son, has been such that even now it feels like the rhythm of day and night in a single season, ever constant, unchanged by the harshness of time. Of course, when nature strikes, storms and disasters do bring a momentary disturbance. For a while the cycle of day and night seems shaken. Yet soon enough, the order returns to what it was before. That is how it has been in my life.� Both Shyam Babu and Gopal listened to Manmohan�s words with full attention, their minds turning over what he said. In the midst of this, Gopal stepped into the courtyard, filled a brass lota with water, then fetched a pill from the medicine bag and handed it to his father. �Babu, take this now, and lie down for a while,� he said gently. After giving his father the medicine, Gopal returned and sat again on the chair beside Shyam Babu. Shyam Babu said- �Gopal, the feast is fixed for the day after tomorrow. You must be there.� Gopal did not answer at once. He sat in silence, though his mind was restless with many thoughts. Until now, whenever there had been a feast in the family, relatives and members of their own caste had always come and gone freely. Yet here was Shyam Babu, setting aside his twenty-household kin and instead calling upon him. Seeing Gopal quiet, Shyam Babu spoke again- �Gopal, five men will go. Father and brother Sushil belong to the household, so they are certain. That makes two. You will be the third, I myself the fourth, and we will take Budhan as the fifth.� At this, Gopal asked hesitantly, �You mean you will not take anyone from your own kin, or your caste?� Without pause, Shyam Babu answered- �No.� Hearing this, Manmohan sat upright on the cot and said in surprise, �Shyam Babu, such a thought...?� Seeing Manmohan�s startled reaction, Shyam Babu�s heart flared like a smoldering fire, the kind that shows no flame on the surface yet burns deep and steady within. Hearing both his own half-spoken thoughts and his father Manmohan�s words, Gopal too felt shaken. He could not fathom why Shyam Babu had suddenly taken such a grave decision. Still, Gopal said nothing, keeping his lips sealed as though stitched shut. Shyam Babu and Gopal were of the same age, classmates from school through college until their B.A. Shyam Babu, after graduation, passed the competitive examinations and entered the Bihar Administrative Service, while Gopal, left alone with his brothers, chose not to pursue employment outside. He stayed back in the village, devoted to farming and family life. From childhood, their ways of thinking had run along the same channel, which strengthened their bond and deepened their trust in one another. Yet Shyam Babu carried a hidden wound. He was not merely displeased but inwardly pained by the character of his father, Ghanshyam Babu. In Champapur, there were four men, Ghanshyam Babu, Puhup Lal, Devkant, and Singheshwar, known for their malicious ways. They thrived on spreading lies, stirring quarrels, and dragging neighbors into lawsuits. Their eyes were ever fixed on seizing others� property. Even in matters of kinship and family rituals, in marriages and alliances, they sowed discord with fabricated tales, creating needless conflict. What made it worse was that, in public, these four often posed as bitter rivals, standing against one another like sworn enemies. Yet behind the scenes, they would join hands and weave plots together. The result was endless disputes in the community, filled with abuse, quarrels, and violence. Shyam Babu could never accept even an ounce of his father�s wicked nature or his destructive role in society. Time and again, he had tried to dissuade Ghanshyam Babu, but nature is stubborn. Once it takes hold, it clings, sometimes for life, until death itself severs it. Because of his father�s relentless malice, Shyam Babu had regarded him as a true enemy of society from the beginning. For this reason, he had never placed the slightest trust in his father. When Manmohan sat upright and fixed his gaze on him, Shyam Babu said- �Uncle, the state of today�s government machinery is something you yourself have seen as well as I. How deeply it has sunk into corruption. Here caste influence dominates, there communal pressure, elsewhere bribery and transactions, and again in another place the pull of regional interests. The entire system is entangled. Yet from childhood I had resolved never to wrong another and never to stain my character. That vow I have kept intact, and so long as I live, I will preserve it.� Manmohan responded warmly- �Wonderful, my boy. For this, you have my blessings.� Shyam Babu went on, �Uncle, I am now arranging the marriage of my second daughter. Not a single coin is being given in dowry, just as in the marriages of my two sons not a single coin was taken in the name of dowry. What social customs are simple and natural, those I have always observed, and I will do so in this marriage too.� At this point Gopal interjected- �Brother Shyam, why is it that you are setting aside your relatives and community and asking me to go with you for the feast?� Shyam Babu replied- �Gopal, even now my heart cannot accept that in the end a father would act as mine has, led by his malicious nature. But you have been my companion all my life. If you stand with me, then no matter what schemes my father plots, not even the malice of God himself could touch me.� Gopal bowed his head slightly and said- �Brother, whatever command you give, I am ready to obey now and always in the future.� अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। विदेह ४३३|| 1 1 || विदेह ४३३

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