VIDEHA — Issue 434 / अंक ४३४

Publication: VIDEHA · Issue: 434
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विदेह ४३४ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। [विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X Videha e-Journal (since 2000) at www.videha.co.in ] ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। कॉपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२६. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२६. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA. सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@zohomail.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@zohomail.in. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover design: AUM GAJENDRA THAKUR VIDEHA:434 समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा। मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अनुक्रम विदेह ४३४ म अंक १५ जनवरी २०२६ (वर्ष १९ मास २१७ अंक ४३४) ऐ अंकमे अछि:- १.१.अंक ४३३ पर टिप्पणी (पृष्ठ १-२) गद्य २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान -२१ (पृष्ठ ४-११) २.२.हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१३ (पृष्ठ १२-२६) २.३.लालदेव कामत- अक्षय पात्रके रचनाकार (पृष्ठ २७-३३) २.४.आचार्य रामानंद मंडल- जननायक कर्पूरी ठाकुर (पृष्ठ ३४-३८) २.५.परमानन्द लाल कर्ण-सीख (पृष्ठ ३९-५१) २.६.मनोज झा मुक्ति- कथा-नह केश (पृष्ठ ५२-५७) पद्य ३.१.जगदानन्द झा मनु - बीसटा हाइकू (पृष्ठ ५९-६८) ३.२.रबीन्द्र नारायण मिश्र-बिसरि जाएब जरूरी छै (पृष्ठ ६९-७८) ३.३.मुन्ना जी- अकविता- उघारू झांपलकें! (पृष्ठ ७९-८१) Maithili Literature in English Translation 4.1.Changing Thoughts, Diminishing Hope-Jagdish Prasad Mandal (Original Maithili Short Story) Rameshwar Prasad Mandal (English Translation) [page 83-94]

१.१.अंक ४३३ पर टिप्पणी प्रिय सम्पादकजी,

सनातन धर्म पर श्री हितनाथ झा द्वारा लिखित-संकलित अलग-अलग लेखक के लेख पढ़लहुँ जाहि में सनातन धर्म, तकर वर्ण-व्यवस्था के बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में तत्कालीन लेखक स-उदाहरण संक्षिप्त व्याख्या करए के प्रयत्न कएल गेल रहनि I कौतूहलवश हितनाथ बाबू सँ संक्षिप्त वार्ता सेहो कएलहुँ I यद्यपि हमर पीढ़ी कें सनातन के ने तँ शिक्षा देल गेल अछि, ने कोनों शास्त्र पढ़ाओल गेल अछि आ नहिं ओ विशाल विषय-वास्तु के समुचित ज्ञान अछि तथापि एहि धर्म के ७२ वर्ष सँ स्वयं आचरण क रहल छी आ अपन संपर्क में लाखों सनातनीं कें सेहो देखल आवि रहल छी I हमर विचार अछि जे कलियुग के आधुनिक परिपेक्ष में वर्ण-व्यवस्था के समीक्षा अत्यावश्यक अछि I जनसंख्याँ विस्फोट आ भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त आरक्षण व्यवस्था में योग्यता के भ रहल अवहेलना में जेकरा जे तरह के जीविका भेट रहल अछि I एहि सँ अनेकों ब्राह्मण शूद्रकर्म व शूद्र आध्यात्मिक कार्य क रहल अछि जाहि सँ पुरातन कर्म पद्धति तर्क-रहित भ गेल अछि I इहो देखे में आवि रहल अछि जे एकहि व्यक्ति वर्ण-व्यवस्था के अन्यान्य कार्य क रहल अछि I  अतएव सनातन आ ओहि में वर्ण-व्यवस्था के आधुनिकीकरण अनिवार्य भ गेल अछि I हर सनातनी कें धर्म के एक मूल प्रारूप विद्यालय पाठ्यक्रम में अवश्य होवए चाही I आजुक युग में बढ़ि रहल कट्टरवाद में मात्र सनातन एक एहन धर्म अछि जे समावेशी अछि आ 'सर्वदेवाः' कें मानैत छैक I समग्र विश्व में धार्मिक वैमनस्यता कें  समाप्त करए में सनातनी मानसिकता के आवश्यकता अछि I  

सप्रेम   डॉ वी. एन. झा अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। गद्य २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान -२१ २.२.हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१३ २.३.लालदेव कामत- अक्षय पात्रके रचनाकार २.४.आचार्य रामानंद मंडल- जननायक कर्पूरी ठाकुर २.५.परमानन्द लाल कर्ण-सीख २.६.मनोज झा मुक्ति- कथा-नह केश २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान -२१ कल्पना झा आत्मकथा लिखबाक अपूर्ण इच्छा "अग्रिम योजना अछि आत्मकथा लिखबाक। अपन आत्मकथा लिखब; निश्चित लिखब... घर-परिवारक.. लोक सभक आग्रह कि दुराग्रह जे कहल जाए, से छनि... आब ईश्वरक जे कृपा!" ई पूज्य 'व्यास' जीक मुखारविन्द सँ निकलल शब्द छनि। मुदा से ई इच्छा अपूर्णे रहि गेलनि हुनकर। मामा, श्री सत्येन्द्र कुमार झा (मोहन जी) सँ गप्प भेल एहि संदर्भ मे। तँ ओ कहलनि, "बाबू केँ जखन-जखन कहिअनि, "Autobiography लिखबाक चाही अहाँ केँ।" तखन हुनकर कहब रहैत छलनि, "Autobiography बड़का लोक, मतलब महान लोक सभ लिखैत छथि, हम तेहन विशिष्ट लोक नहि। आत्मकथा ओ ने लिखैत अछि, जनिकर जीवन-यात्रा सँ लोक प्रेरित भ' सकथि। जेना नेल्सन मंडेला, महात्मा गांधी, बराक ओबामा सन लोक लिखलनि।" मुदा भीतर इच्छा छलनि आत्मकथा लिखबाक, से बुझाइत छलनि परिवारक लोक सभ केँ। जीवन तँ बहुत संघर्षपूर्ण रहलनि 'व्यास' जीक। हुनकर जीवन-यात्रा सँ बहुतो लोक प्रेरित भ' सकैत छलए। ओना Autobiography लिखबा मे समस्या तँ छै। अपन उपलब्धिक चर्चा स्वयं करितथि तँ लोक "आत्ममुग्धता" वा "आत्मगौरव"क अधीन बुझि सकैत छलनि। "आत्मकथा एकटा साहित्यिक विधा अछि जाहि मे कोनो व्यक्ति अपन जीवनक उतार-चढ़ाव, अपन सफलता-असफलताक लेखा-जोखा केँ स्वयं पोथी रूप मे लिखि सार्वजनिक करैत अछि" से कतेक पाठक ई बात बुझितनि, के जानए...। कतहु ने कतहु 'व्यास' जीक मोन सशंकित छलनि प्रायः। आ तैँ मैथिली साहित्य जगतक सुप्रसिद्ध व्यक्तित्व रहितहुँ ओ सहास नहि कएलनि आत्मकथा लिखबाक। जखन कि अपन विचार आ अनुभव सँ लोक केँ अवगत करबाओल जाए, से इच्छा बलवती छलनि हुनका भीतर। खैर, Autobiography नहि biography तँ लिखल जा सकैत अछि। लोक 'व्यास' जीक जीवन-यात्रा सँ बहुत किछु सीखि सकैत छथि। सएह सोचि हम एहि काज मे लगलहुँ अछि। कतेक-की लिखि सकलहुँ, से तँ प्रकाशनक उपरान्तहि स्पष्ट होएत। लोकक प्रतिक्रिया सँ। अवतारी पुरुष 'व्यास' जीक जीवनी लिखैत, हम हुनकर विराट व्यक्तित्वक चित्रण करबाक क्रम मे कतेक सफल रहलहुँ, हमर लिखल कतेक न्यायसंगत अछि, से तँ पोथीक प्रकाशनक उपरान्तहि स्पष्ट होएत। प्रयास तँ पूरा रहल अछि, जे हमरा द्वारा एक्कहु टा शब्दक चयन एहन नहि हुअए, जे हुनकर मान-मर्दन करैत सन प्रतीत होइन पाठक केँ। यथार्थ चित्रण करी एहि मिथिला विभूतिक व्यक्तित्वक, से प्रयास रहल हमर। उपर्युक्त पैराग्राफ मे हम 'व्यास' जी केँ 'अवतारी पुरुष'क उपाधि देलिअनि अछि, से एकरा अतिशयोक्ति रूप मे नहि लेल जाए। किछु-ने-किछु वास्तविकता तँ निश्चित बुझना जाइत अछि एहि तथ्य मे, जे ओ सामान्य पुरुष नहि छलाह। एहन हमहीं टा नहि, बहुत लोकक मुहेँ सुनल अछि हमरा। एहि तरहक प्रतिभा सामान्य मनुक्ख मे कहाँ देखाइत अछि‌। जाही काज मे हाथ लगौलनि, जाही क्षेत्र मे जे काज कएलनि, सभठाम हुनकर लोहा मानलकनि लोक। मतलब कर्मक्षेत्र हुअए कि साहित्यिक जगत, आ कि अन्य सामाजिक गतिविधि, सभठाम खुट्टा गाड़लनि। एकटा इंजीनियर रूप मे, एकटा साहित्यकार रूप मे, एकटा संवेदनशील मानवक रूप मे, सभ रूप मे सभठाम समादृत भेलाह। अवतारी पुरुष कहबाक पाछाँ एकटा कारण सेहो अछि। 'व्यास' जीक नाना छलथिन बड़का भारी तांत्रिक। उचैठ भगवतीक अनन्य उपासक। आनन्दी देवी, माने 'व्यास' जीक माएक, हिनका सँ पहिने पाँच-छओ टा संतान जन्म होइतहि मृत्यु प्राप्त करैत गेलनि। बहुत कबुला-पाती, टोना-टोटकाक उपरान्त एहि अद्भुत प्रतिभाशाली नेनाक प्राप्ति भेल छलनि, आनन्दी देवी केँ। स्वाभाविके एकटा पिता, अपन पुत्रीक स्वस्थ, दीर्घायु सन्तान लेल किछु विशेष पूजा-अर्चना-तप, कएनहि छल हेताह। एहन अनुमान लगबैत अछि लोक। एतेक गुणवान व्यक्ति विरले देखल जाइत अछि समाज मे, तैं एहि तरहक अनुमान लगएबा लेल बाध्य होइत अछि लोक। सहनशीलता, धैर्य, कर्मठता, हुनकर अनुशासित जीवन, दृढ़ संकल्प, सभ किछु सामान्य पुरुष सँ बहुत उच्च स्तरक रहलनि। आ से आजीवन रहलनि। किछु दैवीय शक्ति छलनि प्रायः। किंवा भगवतीक अनन्य भक्त/उपासक छलाह, ताहि भक्तिक शक्ति प्रतापेँ असम्भवो के सम्भव क' लैत छलाह। अन्तरात्मा सँ भक्तिभाव छलनि भगवती लेल। देखावटी बला नहि। देवी भागवतक सम्पूर्ण पाठ दू सए बेर सँ बेसीए क' चुकल छलाह। एक सए आठ बेर पुरि गेलनि सम्पूर्ण पाठ, तकर बाद कुमारि भोजन/कन्या पूजन कएने छलाह। आ तकर बादहु पाठ चलिते रहलनि, अनवरत। तैं घरक लोक अनुमान लगा रहल छथि, जे दू सए बेर सँ बेसीए क' चुकल हेताह, कम नहि। असम्भव के सम्भव करए बला बात जे कहलहुँ, तकर पाछाँक खिस्सा कहब आवश्यक अछि। एक बेर आंशिक पक्षाघातक चपेट मे आबि गेल छलाह 'व्यास' जी। बामा पैर नहि उठनि। से भरि राति मन्त्रोच्चारणक संग पैर उठेबाक प्रयास, ता धरि करैत रहलाह जा धरि डेग उठएबा मे सफल नहि भ' गेलाह। दृढ़विश्वास छलनि जे हम अपनहि प्रयास सँ ठीक क' लेब अपन पैर। "उठत कोना नै" सेहो बाजथि, संगहि अभ्यास आ मन्त्रोच्चारण करैत रहलाह, लगातार । अन्ततः सफलता हाथ लगलनि, आ सरपट चलए लगलाह, बिनु कोनो लाठी/छड़ीक सहारा लेनहि। आजुक लोक के ई प्रसंग अविश्वसनीय सन लगतनि। मुदा अछि ई शत् प्रतिशत सत्य। साल 2002 मे 85 बरखक अवस्था मे हुनकर देहावसान भेलनि। सेहो इच्छा-मृत्यु सन। कोनो दुःख-बेमारी नहि, कोनो दवाइ, कोनो पथ्य-परहेज नहि। आब ई की-कोना संभव भेलनि, से तँ कहब कठिन अछि। ज्योतिष विज्ञानक गहन अध्ययनक फलस्वरूप संभव भेलनि, आ कि कोनो दैवीय शक्तिक फलस्वरूप, से नहि जानि। सिद्ध योगी सभ, योग दर्शन आ तंत्र-उपनिषद् परम्पराक अभ्यासक माध्यम सँ इच्छामृत्यु प्राप्त करैत छलाह, एहन हमरा पहिनहु सुनल छलए। मुदा सामान्य मनुष्य लेल सेहो ई संभव हेतैक, से नहि बूझल छलए। पचासी वर्षक अवस्था धरि, माने अपन अन्तिम साँस धरि 'व्यास' जी लेखन-कर्मक प्रति पूर्णतया समर्पित रहलाह। साहित्य हुनकर सौख नहि छलनि। आ ने हुनकर आजीविका छलनि। साहित्य हुनका लेल साधना छलनि। से ओहि साधना मे लीन रहलाह। अपन जीवनक एकहक क्षणक एहि तरहेँ सदुपयोग करब अनुकरणीय अछि। आउ न'....हम-अहाँ, सभ गोटे संकल्प करी, जे हिनक पदचिन्ह पर चलि सकी आ अपन मनुष्य जन्म सफल/सार्थक बना सकी। जेना 'व्यास' जी अपन जन्म सफल बनौलनि। ततेक सफल, जे अमर भ' गेलाह। संपादकीय सूचना- एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-7 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-8 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-9 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-10 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-11 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-12 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-13 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-14 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-15 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-16 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-17 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-18 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-19 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-20 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.२.हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१३ हितनाथ झा (मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070) 'प्रभात'मे प्रकाशित समाचार प्रसिद्ध आलोचक मोहन भारद्वाज 'प्रभात' (1933-1934)क प्रसंगमे भाव-चित्र, व्यंग्य-चित्र, स्थायी स्तम्भ, समाचार, खेल-समाचार आदिक विषयमे तत्कालीन विभिन्न पत्रिकाक तुलनात्मक विश्लेषण करैत छथि, तँ हुनक दृष्टि निम्नलिखित विन्दुपर पड़ैत छनि - "प्रकाशनक दृष्टिएँ यद्यपि प्रभात मिथिला तथा विभूतिक मध्यवर्ती छल, तथापि संयोजनक आधारपर बहुतो अंशमे दुनूसँ लग छल। भाव-चित्त आ व्यंग्य-चित्र मिथिला तथा प्रभात दुनूमे रहैत छल, किन्तु प्रभात जेँ हस्तलिखित पत्रिका छल तेँ एकर बहुरंगी आ श्वेत-श्याम, चित्रक अनगढ़ आकर्षण बेसी गाढ़ अछि। मुख-पृष्ठक आ किछु अन्य महत्वपूर्ण रचनावला पृष्ठक कलात्मक प्रस्तुतियो दर्शनीय अछि। विभूतिमे स्तम्भक संख्या भने बेसी हो, मुदा प्रभातमे स्तम्भक उपयोग जतेक सुविचारित ढंगसँ कयल जाइत छल ततेक विभूतिमे नहि। जेना समाचार नामक स्तम्भ। सम्वाददातासँ प्राप्त समाचारक संकलन-प्रकाशन आनुषंगिक रूपमे नहि, स्वतन्त्र रूपमे कयल जाइत छल। विभूतिमे देश-दर्शन नामक स्तम्भ एहि क्रममे प्रकाशित होइत छल, किन्तु प्रभातक समाचारमे सामाजिक घटनाक प्रमुखता रहैत छल तँ विभूतिक ' देश-दर्शन'मे राजनीतिक घटना- चक्रक। एकर अतिरिक्त प्रभात प्रायः पहिल पत्रिका छल जे खेल-समाचार प्रकाशित कयलक। एहिसँ पूर्व खेल-जगतकेँ मैथिलीक पत्रिकामे स्थान नहि भेटल रहैक। ई तथ्य अत्यन्त महत्वपूर्ण थिक। एहिसँ मिथिला, मिथिला मिहिर, विभूति आदि पत्रिकासँ प्रभातक चारित्रिक भिन्नता स्पष्ट होइत अछि। ओ सभ पत्रिका मुद्रित छल, प्रभात हस्तलिखित- ई पार्थक्य ओतेक उल्लेखनीय नहि अछि जतेक ई जे आन पत्रिका सभ जतs स्थापित साहित्यकार आ समाजक मठोमाठ व्यक्तिसभहक मानसिक व्यापारक देन छल ततs प्रभात मिथिलाक युवा-तूरक सोच-विचार आ व्यवहार-मर्यादाक प्रवक्ता बनि कs आयल छल।" निज संवाददाता द्वारा समाचार मैथिली तथा हिन्दी दुनू भाषामे अछि। हम एहिठाम मैथिली भाषाक किछु समाचार प्रस्तुत क' रहल छी। आनो विषय-वस्तु ल'क' पहिनहुँ जे प्रस्तुत कयने छी, ओहो मात्र मैथिली भाषाक। हिन्दीमे प्रकाशित समाचार जखन हिन्दीक अन्यान्य विषयक प्रस्तुत करब, तखन हिन्दियोक समाचारसँ तत्कालीन समाजक नीक-बेजाय समाचारसँ अवगत करायब। 01. अंक-08,अगस्त-1933 (निज संवाददाता द्वारा) कोइलख-तारीख ६ जुलाईक कोइलख पछबारि टोल निवासी श्री कृष्णानन्द झाक असामयिक एकाएक मृत्युसँ कोइलख जनसमुदाय अत्यन्त दुःखित अछि। अफवाह ई अछि जे गत बुधक राति, निद्रित अवस्थामे साँप काटि लेलकैन्हि, परन्तु अधिकांश मति एहि बात केँ निर्मूल करैक साथ२ जोड़ दै छथि जे हिनका कोनो आकस्मिक भयानक दुःख आक्रमण कयलकैन्हि। विश्वस्त सूत्रसँ ज्ञात भेल अछि जे ता.१७जुलाईक महाराजाधिराज, दरभंगा श्रीनगर(पूर्णिया जिला) ड्यौढ़ीमे जा करीब ४ घण्टा सुशोभित कयने छलाह। एहि वर्ष संस्कृत प्रथमा परीक्षामे स्थानीय आद्यासदन संस्कृत पाठशालासँ श्री तेज नारायण झा (गुरू, लो.प्रा.स्कूल कोइलख) तथा महेन्द्र नाथ झा (बेटा, काशीनाथ झा उ.उग्रसेन) सम्मिलित भेल छलाह। दुनू गोटे परीक्षोतीर्ण भेलाह। गत १५ जुलाईक खनगाँव टीम तथा पंडौल टीमके मैच सम्भावी छलैक। जाहिमे खनगाँव टीम कोइलख टीमसँ चारि प्लेयर बोरो कय क' पंडौल लय गेल। पंडौल टीमक प्लेयर डरि जयबाक कारण, मैच खेलायब, घुमा फिरा अस्वीकार कयलकैन्हि। कोइलखक श्री काशीनाथ झा उर्फ उग्रसेन के श्री रघुवंश चौधरीक वंशजक किछु जमीन देल करीब पच्चास साठि वर्षसँ अधिकारमे चल अबै छैन्हि। किछु दिन पूर्व ओहि जमीन के दक्षिण वारि टोल निवासी श्री यशोधर मिश्र ( जनिका नामसँ सर्वे भेल छैन्हि तिनकासँ कैवाला लेलैन्हि। तदनन्तर ई अफवाह उड़लैक जे श्री यशोधर मिश्र ओहि जमीन केँ आबाद करक हेतु उद्यत छथि। अतएब काशीनाथ झा सावधान भय अर्थात करीब तीस,चालीस हथियार बन्द आदमी के सङ्ग खेत जा ता.२५ जुलाई क' निर्विघ्न आबाद कयलैन्हि। ता. १५ जुलाई क श्री कार्तिकेय झा उर्फ घुल्ली बाबू केँ बाँसीक रघु बाबू सँ २ बाजी सतरंजक खेल भेल छल।श्री घुल्ली बाबू दुनू बाजी जितलाह। विरौलक समीप एक बाँध छैक, जेकरा कटि गेलासँ विशेष वर्षा भेलापर तथा बाढ़ि अयला सँ बाँध सँ दक्षिण तरफक जायदात बहुत नष्ट भय जयबाक सम्भावना भय जाइ छैक तथा उत्तर तरफक जायदात के सावकाश भय जाइत छैक। गत बाढ़िमे विरौलक सत्यदेव झाक सहायता सँ बाँधक रक्षार्थ दिनराति पहरा पड़ै छल, परञ्च ता.७जुलाई क रातिमे भगवतीपूरक महावीर नायकक सहायता सँ किछु हँसेरी लाठी गड़ास लय ओहि बाँधकेँ जबरदस्ती काटि देलकैक। बाँध कटबाक काल मुठभेड़ो भय गेलैक जाहिमे रोक' वला दिससँ ३गोटे केँ और काट' वला दिससँ १ गोटा केँ मारि लगलैक। मारि होयबासँ पूर्व ओत' विदेशिया नाच भ' रहल छल। ई विषय सरकारमे दाखिल भेल अछि।देखक चाही- की होइ छैक। 02.अंक~९, सितम्बर-१९३३(निज सम्वाददाता द्वारा) कोइलख-गत १० अगस्त क ५।। बजे सायंकाल सँ पंडौलक फुटबॉल मैदानमे रामपट्टीक टीमकेँ पंडौल टीमक साथ फुटबॉलक खेल प्रारम्भ भेल। पंडौलक टीमक तरफ सँ दू साहेब वहादुर नालदार अंगरेजी जूता पहिरने खेलाइ छलाह। खेल प्रारम्भ होइतहि रामपट्टीक प्लेयर के मुक्का-थापर ठेलमठेलाक त' कथे कोन, जूताक नालौक अकारण विदाइ प्राप्त होम लगलैन्हि। क्रमशः एतेक तक बढ़ि गेल जे दर्शको के मुठ-भेड़ भय गेल जेकर फलस्वरूप दस मिनट पूर्वहि खेल समाप्त कय देल गेल। रामपट्टीक खेल उत्तम रहलहुँ सन्ता एक गोल कयलो पर दू गोल सँ हारि गेलाह। रामपट्टीक सहायताक हेतु तीन प्लेयर कोइलखौक छलाह। कोइलख-ता.२१.८.३३ में प्रातः कालहि सँ मूसलाधार वर्षा भय रहल छल।सूर्य्य-ग्रहण देखबाक ककरो आशा नहि होइ छल। परञ्च करीब १०बजे मूसलाधार वर्षा झीसी रूपमे परिणित भय गेल।करीब११॥ बजे झीसी होइतहुँ अर्ध सूर्य्य दृष्टि-गोचर होम लगलाह। झीसी उग्रास्त समय तक होइतहि छल तथापि सूर्य्यक वृद्धि समय२पर साफ२देख में अबै छलैक। ठीक १२ बाजि क२४ मिनट पर उग्रास्त भय गेल। ताहिसँ अनुभव कयल जाइछ जे नियमित समयसँ ग्रहण लागव प्रारम्भ भेल। ता. १ अगस्तक श्री खर्गनाथ झा उर्फ नूनू बाबूक माय सदाक हेतु एहि संसार सँ विदा भय गेलीह।श्राद्ध कर्म्म समयानुसार उत्तमे कहक चाही। बुधवार तदनुसार ता.।२३ अगस्तक ७१ वर्षक अवस्था मे गोखुल ठाकुर के ज्ञान पुरस्सर मृत्यु भय गेलैन्हि। 03. अंक~१०, अक्टूबर~१९३३ कोइलख-स्थानीय कुजर टोली मे मोखतब स्कूल खुजलै, देखा चाही एकर आयु कतेक छैक। दसमीक उत्सव श्री १०८ भद्रकालीक स्थानमे शान्ति पूर्वक समाप्त भय गेल। सिरियापुर,हिसार तथा गामक विदेशिया नाच सभक मनकेँ प्रफुल्लित करैत छल। ता.२२ सितम्बरक निशाभाग रात्रिमे श्री अच्युतानंद झा क घरमे चोरि भेल।दू टा पैघ२ सेंध पड़ल छल।घरबैया के जागि जयबाक कारण चोरक सिनवारि तथा अंगपोछा अगुताइमे छुटि गेलैक, जे दोसर दिन प्रातःकाल थाना पहुँचावल गेल। 04. अंक~ ११,नवम्बर१९३३ कोइलख-ता.१९.१०.३३ ई.क प्रायः प्रत्येक टोलमे गोक्रीड़ा भेल।पुबारि टोलमे चारि सूअर मारल गेल। विश्वस्त सूत्रसँ ज्ञात भेल जे भटसीमरि मे एक दिन बाद अर्थात २० अक्टूबर क गो क्रीड़ा भेल। 05.अंक~१२, दिसम्बर~१९३३ ता.८ नवम्बरक निशाभाग रात्रिमे मौजे कोइलख, टोल कजियानाक सनीर मियाँ परसा सँ पच्छिम कैथाहीक रास्तामे गुंडा द्वारा मारि देल गेल। पुलिस गुंडाक पता लगा रहल अछि।जेकर फलस्वरूप एखन तक परसाक पाँच राजपूत ( ) सन्देहक कारण गिरफ्तार भय हाजतमे राखल गेल छल।जमानत भेलो पर पुनः मजिस्ट्रेट द्वारा अस्वीकार कय देल गेल। एहि मृत्युसँ मुस्लिम समाज तथा परसाक राजपूतमे पूर्ण हाहाकार मचि रहल अछि।देखा चाही एकर परिणाम कहाँ तक की होइत छैक। श्री ५ मती रानी चन्द्रावती साहिबाक अपन नैहर (कोइलख) प्रति उदारताक फलस्वरूप एक सामेना और दू फर्द सतरंजी दय असीम यश के प्राप्त कयलैन्हि अछि। एहि समाजमे एकर पूर्ण अभाव छल। उपर्युक्त वस्तु श्री इन्द्रनाथ झाक संरक्षणमे राखल गेल अछि। विश्वस्त रूपसँ ज्ञात भेल अछि जे श्रीमती रानी साहिबाक कृपा सँ एक टा क्रिश्चियन लाइट मासाभ्यंतरे आबि जायत। श्री हृषिकेश झा उर्फ बचाइ करीब डेढ़ माससँ ज्वर एवं यक्ष्मा रोगसँ क्लेशित छथि। एहिसँ कोइलख निवासी विशेष कय युवक संघक सदस्य अत्यंत व्याकुल छथि।कारण ई, संघ एवं प्रभातक प्रति जे सहानुभूति दर्शउने छथि से अकथनीय अछि। एहि निमित्त युवक वृन्द श्री १०८ जगज्जननी भद्रकालीसँ प्रार्थना करै अछि जे हिनका शीघ्र आरोग्य कय देथिन। रामपट्टी- ता.२ नवम्बरक कार्तिक पूर्णिमाक उपलक्ष्यमे कमला कातमे अन्य वर्ष जेकाँ पुनः मेला भेल।यद्यपि अन्य वर्षक अपेक्षा लोक कम छल।किन्तु जूआक खेल एहि वर्ष अन्य वर्षक अपेक्षा कहीं अधिक छल।जूआक खेलमे मधुबनी तथा अन्य २ स्थानक प्रसिद्ध२सेठ-साहूकार सभ सम्मिलित छलाह। 06 अंक १, जनवरी१९३४ कोइलख- स्थानीय चन्द्रानंद फ्री एम.ई.स्कूलक फोर्थ पण्डित बाबू सहदेव झा गुरू-ट्रेनिंग करबाक हेतु घोघरडीहा गुरू ट्रेनिंग स्कूल गेलाह अछि। कोइलख- चन्द्रानंद फ्री एम.ई. स्कूलक सातवाँ श्रेणीक २५ विद्यार्थी मधुबनी केन्द्र सँ परीक्षामे सम्मिलित भेल छलाह, जाहिमे २१ विद्यार्थी परीक्षोतीर्ण भेलाह। यमसम- ता. २२ दिसम्बर १९३३क प. गोपीनाथ झा उर्फ लुचाइ झा करीब ७२ वर्षक अवस्थामे सदाक हेतु एहि असार संसारसँ विदा भय गेलाह। गत तीन वर्ष सँ लकबा व्याधि सँ ग्रसित छलाह। श्राद्ध कर्म्म उत्तम रूपें कयल गेलैन्हि। ई पंजिकारी परीक्षामे महाराजाक घरसँ दोशाला प्राप्त कयने छलाह।पांजीक विषयमे हिनक जे विद्वत्ता छलैन्हि से अकथनीय अछि। पैघ२ पंजिकारो हिनक प्रशंसा करबामे तिलमात्रो संकोच नहि करैत छथि। करीब ४ वर्ष पूर्व प. उमा झा ककरौड़क मृत्यु भेलापर स्वयं महाराज रामेश्वर सिंह वहादुर अनेक पंजिकारक आवेदन पत्रकेँ अस्वीकृत कय हिनका सर्वप्रधान महाराजी पंजिकारक पद प्रदान कय गौरवान्वित भेल छलाह। एतबै नहि, भौरागढ़ीक दरबार मध्य छोटा लाट साहेब हाथ मिलौने छलथीन्ह। एहेन विद्वानक मृत्युसँ मैथिल समाज अत्यन्त शोकाकुल भय गेल अछि और ईश्वरसँ प्रार्थना करै अछि जे हिनक आत्मा के शान्ति प्रदान करथि। अंक~२,अप्रैल१९३४ मधुबनी- ता.८ मार्च केँ बिहार रत्न बाबू राजेन्द्र प्रसाद जी मधुबनी, राजनगर तथा जयनगरक निरीक्षण कयलैन्ह। कोइलख- ता.८-३-३४ ई.क सायंकाल स्थानीय लो.प्रा.स्कूलक अंगनइमे गौआँक एक सार्वजनिक बैठक भेल। जाहिमे निश्चय भेल जे प्रत्येक टोल सँ दस२ रुपैया दय भूकम्पसँ नष्ट भेल मकानक स्थानपर पुनः संस्कृत पाठशाला और लो.प्रा. स्कूलक एक मकान बनाओल जाय। कोइलख- ता.९ मार्च सँ श्री तारानाथ झाक अध्यक्षतामे युवक संघक तरफ सँ मुफ्त दवा वितरण कयल जाइत अछि। कोइलखक अतिरिक्त अनेक समीपस्थ गामोक जनता मुफ्त दवा लय लाभ उठा रहल छथि। कोइलख- ता. १२-३-३४ ई.क राजग्रामक श्री जय नारायण सिंह ठाकुरक योग्य बालक श्री अयोध्यानाथ सिंह ठाकुरक शुभ विवाह कोइलखक गीतादत्त झाक कन्याक संग समारोहक साथ सानन्द समाप्त भय गेल। एहि शुभ विवाह सँ कोइलख निवासी अत्यन्त प्रफुल्लित अछि। कोइलख- १२-३-३४क प्रातःकाल मधुबनीक मजिस्टर और सब डिप्युटी मजिस्टर कोइलखक भूकम्प-पीड़ित -मनुष्यक मकान के स्वयं निरीक्षण कय स्थानीय चन्द्रानंद फ्री.एम.ई.स्कूलक मैदानमे करीब ४००/-रुपैया खैरात प्रदान कयलैन्ह और कर्जा लेम वलाक नाम लिखि जनता के पूर्ण आश्वासन दैत मधुबनीक लेल प्रस्थान कयलैन्ह। कोइलख- १३-३-३४क मधुबनीक पुलिस सब इंस्पेक्टर कोइलखक खराब-खराब इनार तथा बालुकामय भूमिक निरीक्षण कयलैन्ह। गौआँकेँ अनेक सहायताक वचन दय गेलाह। जेकर फलस्वरूप एक इनार साफ होयब प्रारम्भो भेल परन्तु सेहो पूर्ण रूपे साफ नहि भय सकल। कोइलख- सब डिविजनल-सेन्ट्रल-रिलीफ कमिटीक तरफसँ ४ कूआँ साफक हेतु हाथ लागल। किन्तु कोनो२ तरहसँ केवल २ कूआँक जल लोगक व्यवहारमे आबि रहल अछि। कोइलख- ता.२१ मार्च मे शिक्षा विभागक डिस्ट्रिक्ट इंस्पेक्टर स्थानीय चन्द्रानंद फ्री. एम.ई.स्कूलक निरीक्षण कयलैन्ह। स्कूलक कार्य्यवाही देखि पूर्ण प्रसन्न भेलाह। कोइलख- श्री भरथू झा वैद्य कैक सप्ताह पूर्व सँ घरक भीत देअबै छथि।ओहि घरक माटिक नीचाँ अखन तक तीन मनुष्यक सम्पूर्ण अवयवक हड्डी उखड़लैक अछि। चिरकाल पूर्व ओ स्थान मुसलमानक गोरि अथवा की छलैक ? तकर पता नहि।लगैछ। ता. ११ मार्चक सब डिविजनल सेन्ट्रल रिलीफ कमिटीक अध्यक्ष के कोइलखक कुसियार पेरबाक या जोखेबाक प्रबन्ध करबाक हेतु युवक संघक तरफ सँ लिखल गेलैन्ह। मद्रास निवासी डॉक्टर महाजनी के खैरातक हेतु किछु दवा संघमे प्रेषित कय देवाक हेतु युवक संघक तरफसँ लिखल गेलैन्ह। डॉक्टर महाजनीक प्रथम पत्र आशा जनक देखि पुनः संघक तरफसँ दवाक लिस्ट पठावल गेलैन्ह। तेकर उत्तर निराशाजनक प्राप्त भेल। मधुबनीमे कलकत्तासँ नवीन आगन्तुक रिलीफ कमिटीक अध्यक्ष के युवक संघक तरफसँ कोइलखक भूकम्प-पीड़ित मनुष्यक दुःख निवारण करबाक हेतु निवेदन कयल गेलैन्ह अछि। देखा चाही, एहि दिश किछुओ ध्यान दै छथि वा नहि ? लो. प्रा. स्कूल और संस्कृत पाठशालाक मकानक सहायताक हेतु मजिस्टर, पुलिस सब इंस्पेक्टर कांग्रेस कमिटीक अध्यक्ष एवं कइएक संस्थाक अध्यक्षक सेवामे संघक तरफसँ निवेदन कयल गेलैन्ह अछि। युवक संघक आवेदन पत्र पर सेन्ट्रल रिलीफ कमिटीक राजनगर केन्द्र सँ कोइलख रामपट्टी केन्द्रमे आबि गेल। विगत रूपसँ पता चलल जे गत १० मार्चक रातिमे मौजे महिनाथपुरमे शोणित जकाँ लाल पानिक वर्षा भेलै। हप्तो व्यतीत भेलापर मकानमे लाल२ दाग दृष्टिगोचर होइते छैक। ता.३० मार्चक सायंकाल हरिपुरक श्री परमानन्द झाक दू बालकक सिद्धान्त कोइलखक श्री गोवर्धन झाक दुनू कन्याक प्रसंग बड़गोरियाक गाछीमे भय गेल। मधुबनी- ता. ३१-३ ३४ ई.क ५ बजे सायंकाल सँ स्वराज्याश्रम सँ पूव वला मैदानमे करीब २० मिनट तक महात्मा गाँधीक प्रभावशाली व्याख्यान भेल। एहि सार्वजनिक सभामे करीब ३०-४० हजार जनता इकत्रित छल। सभाक समयमे सनातनधर्मावलम्बी महात्मा गाँधी के कारी झंडा देखबैत नाना प्रकारक हल्ला-गुल्ला मचबैत छलाह। (आगाँ अंकक संचार क्रमशः अग्रिम अंकमे) उपर्युक्त समाचारक अवलोकन कयलापर तत्कालीन समाज विशेषतः कोइलख गामक वैयक्तिक, सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक,धार्मिक इत्यादि विषयक सोच प्रतीत होइत अछि। युवक संघक कार्यप्रणालीक दर्शन होइत अछि। गामक चन्द्रानंद फ्री इंग्लिश मिड्ल स्कूल,लोअर प्राइमरी स्कूल, संस्कृत पाठशाला, मुसलमानक एक स्कूल खुजबाक समाचार, हरिजन विद्यालय आदिक विषयमे समाचार अछि। उपर्यक्त समाचार मे दू अंकक समाचार १९३४ई.क भूकम्पक बादक अछि, जाहिमे गामक निवासी एवं युवक संघक सक्रियता स्पष्ट देखाइत अछि। युवक संघक एक सदस्यक बीमारीसँ चिन्तित होयबाक समाचार सेहो मानवीय संवेदनाक झलक देखबैत अछि। खेल समाचारमे फुटबॉल एवं सतरंजक विषयमे अछि। प्रत्येक समाचार निज सम्वाददाता द्वारा देल गेल आ 'प्रभात'क सम्पादक तारानाथ झाक हाथसँ लिखल अछि। सभ वर्गक समाचार समावेश कयल गेल अछि। डा. राजेन्द्र प्रसादक भाषण एवं गाँधीजीक सभामे सनातनधर्मावलम्बीद्वारा हो-हल्ला एवं कारी झण्डा देखेबाक सेहो समाचार अछि। जतय एक दिस दवाइ वितरणक समाचार अछि तँ दोसर दिस सरकारक सक्रियताक समाचार सेहो प्रमुखता सँ देखाओल गेल अछि। सरकारक कमीक दिस सेहो ध्यानाकर्षित कैल गेल अछि। संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-7 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-8 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-9 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-10 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-11 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-12 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.३.लालदेव कामत- अक्षय पात्रके रचनाकार लालदेव कामत अक्षय पात्रके रचनाकार मधुबनी जिलांतर्गत सकरी थानाके वीरसाइर गामक स्व० गरीबनाथ पासवान आ स्व० फुलेश्वरी देवीजीके घर ९ मई १९५७ केँ श्री झौली पासवान जीके जन्म भेलनि। ओ दादा स्व० ठकाई पासवान आ दादी स्व० रामबोल देवी 'क बढ़ दुलारू एवम् नाना स्व० फेकन पासवान ओ नानी स्व० सुनरी देवी ' के तँ बूझू खेलौना रहथि। बालक झौलीजीक शिक्षा - दीक्षा समय सँ ग्रामीण क्षेत्रमे भेलनि ,स्नातक पण्डौल कालेज सँ कयलाह हेन। सन् २००१ ई० सँ प्रभात संस्था वर्दीवन सँ जुड़िकय महादलित (मुसहर) समाजके धीयापुता कें पढ़ाबैत- लिखाबैत जागरुकता करैत आबि रहलाह अछि। विगत २००३-०५ ई० मेँ राष्ट्रीय दलित मानवाधिकार अभियानक निरीक्षण काज कयल। हिन्दीके बाल पत्रिका ' खिलते फूल " के प्रकाशनमे प्रभात संस्था केँ सक्रिय सहयोग देलनि। कारितास इण्डिया - दिल्ली सँ रोशनी कार्यक्रम केर तहत् मुसहर समुदायके वालिका सभमे शैक्षिक जागरूकता बढेबामे अहर्निश सेवा कयलनि। हिनक रचनात्मक गतिविधिके देखैत रमेश रंजनजी 'हमर मिथिला ' फिल्ममे पिताक भुमिका लेल अवसर देलथिन। वर्तमान समयमे सरकारी विद्यालय केर कमजोर बच्चा सबके स्वतंत्र रूपेँ पढाबैत सराहनीय काज कय रहलाह अछि। बिहार सरकारके राजभाषा विभाग 'क त्रिमासिक पत्रिकामे रचना आओर नौएडा सँ प्रकाशित 'पाखी' पत्रिकामे हिनक कविता छपैल छन्हि। हिन्दी - मैथिली साहित्य आन्दोलनमे नियमित रूपेँ विभिन्न कार्यक्रममे संलग्न रहैत छथि। जाहि लगनशिलता केँ देखि दिल्लीक भारतीय दलित साहित्य अकादमी मार्च २०२१ मे" अम्बेडकर फेलोशिप " सम्मान प्रदान केने रहैन। श्री पासवान जीक मैथिली मातृभाषामे माटिक सुगंध,अक्षय पात्र पोथी प्रकाशित भेल अछि। ओ पहिले हिन्दी भाषामे अपन रचनाधर्मिता निमाहैत छलाह, जे माँ का आंचल, सारथी तथा बाल साहित्यमे आसमां के तारे, इंद्रधनुष,कब आयेंगे चंदा मामा रुपेँ जगजियार भेल रहथि। ई कहि सकैत छी जे हुनक दर्जनों हिन्दी पोथी लेल पाण्डुलिपि छैन से पुस्तक रूपेँ बहरेबाक मदैतगारक वाट जोहि रहल छैक। मैथिली कथा गोष्ठी ' सगर राति दीप जरय' के अवसर पर अपन मैथिली काव्य संग्रह हमरा भेँट केलनि, ताहि मादे किछु चर्चा करैत छी। सद्यप्रकाशित अक्षय पात्र मैथिलीमे छिड़ियाएल काव्यक संग्रहित १२३ पृष्टक पोथी थीक ,जाहिक दाम दूसय पचास टाका राखल गेल छैक। एहिमे ७४ गोट नव कविता अछि जे पल्लवी प्रकाशन निर्मली सँ सन् २०२३ म प्रकाशित भेल अछि। प्रसिद्ध साहित्यकार गजेन्द्र ठाकुर जी हिनका पोथीके महिमा मण्डन कयने छथि। स्वयं कविवर झौली पासवान जी पोथीक वाबत अपन बातमे काव्य सृजन केर अनेको पहलू पर विस्तार सँ आधुनिक साहित्य केर परिपेक्ष्य मे गप्प कयलनि हेन। हिनक काव्य सौष्ठव बढ़ दिव्य होय छन्हि। समकालीन कविता केर पाठक केँ हिनक कविताक भाव स्पष्ट बुझाइत छन्हि। रामायण ग्रन्थके तरह आर्ष काव्य आओर महाभारत ग्रन्थ केर तरह अस्थि काव्य पढ़बाक नवपिढ़िकेँ फूर्सत नहि रहने कविजी एकपनियां - दू पनियां अकविता रचि पाठक वर्ग बीच प्रशंसात्मक काज अवडेरलाह अछि। वर्तमान समयमे गद्य कविता धूम मेने अछि।पद्य जे छंद आ दोहा रूपेँ रचल जाई, तकर जगह आब फकरा आ गीत ल' लेने छैक,जे मंचीय प्रस्तुति सँ थपरी बटोरैत छैक। परंच अपन भाव सोझ रूपेँ जाहि विधामे राखि समाजकेँ उत्प्रेरित करैत होए,ताहिमे नव कविता प्रमुखता सँ स्थान बनौलक हेन। तेँ हिनक कविता अपील करैत देखाईत आओत। प्रजातंत्रमे शिक्षा अहम छैक,आ से ओम्हरे विकासकाज ऐ माध्यम होती।एम्हरका समाजमे शिक्षाक कमी सँ सामाजिक मुख्य धारामे पछुआयल समाज अधिगम स्तर धरि नहिं पहुँच पौलनि अछि। तेँ काव्य केर माध्यम सँ अपन सम्यक दृष्टिकोण रखबामे समर्थ भेलाह अछि। पाँति द्रष्टव्य अछि -: ...... प्रजातंत्रक रीढ़ जे शिक्षा तेकरो हालत नीक कहाँ शिक्षा बँटल दू भागमे समताक दर्शन बनत केना ..�....! समाजमे आजादी'क ७५ म् अमृत भारत वर्ष म हम सब छी,मुदा संविधानके स्वीकृत लक्ष्य -समानताक अधिकार आईधरि नहिं भेलैक। एकोटा अफसर आ राजनेता अपना बच्चाकेँ सरकारी पाठशालामे पढबैत नहिं छथि। प्राईवेट कान्वेंट स्कूलमे नहिं तँ विदेशक महंग स्कूलमे पढबैत देखाईत छथि। कवि पाँति गढ़ैत छथि-: भलहिं जाति आ धर्म अनेक देशमे शिक्षा होअए एक। तखने स्वर- मे - स्वर मिलत मानवता केर बल मिलत ।। मनुखमे मनुखता रहने आ ममत्व रहने ,सबहक प्रति सद्भावना रखने सँ प्रशंसा भेटैत छैक। कदाचित जौं अपना विशेष स्वर्थमे लोक रहैत अछि तँ दस लोकीमे देखार होईछ। एक दिन तँ ऐ रंगमंच सँ लोक आँखि मुनि सदा लेल चलिए जाईछ। तँ एतेक हाँईं- हांईं कथिक ? कवि समरूपता केर पक्षधर छथि। हिनक सिरजल पाँति देखू -: ...... सदा बहार ई रंग मंच अछि एक अबैत एक जाइत अछि। बड़ पुरान ई सिलसिला अछि भू लोकक अमिट कथा अछि।।...... कोनू देशमे श्रम शक्तिक महौत सब दिन सँ छैक । परंच किछ अतिशय बुधियार लोक शारिरीक श्रम सँ दूरस्थ आ मानसिक काज सँ लगीच बनौने रहैछ,ताहूमे चलकपनी धरि खूब करैत काज सुतारैत य। से सरिपहुँ अँखिगर लोक अखियाइस लैत छैक। ताहि टीश केँ अपन कवित्व भावे कविवर महोदय शिक्षक दिवस पर एक काव्यात्मक पोथी लिखि ख्याति अर्जित कयलाह अछि। जोन - बोनिहार 'क विवशताक संग- संग देशमे पसरल अंधश्रद्धा, दलित- दमित उत्पीड़न ,धर्मान्धता आओर वर्गभेद जहन समस्या पर चिन्तित देखेलाह हेन। एक दिश देशमे वैज्ञानिक नव- नव अविष्कार सँ अभिमानमे छथि तँ दोसर दिस जादू टोना आ झार फूंक सन समाजमे अभिशाप सँ व्यथीत सेहो छथि। १४ सालसँ कम उमेरक बच्चा लेल सर्वशिक्षा अभियान आ बालबाड़ी- आंगनबाड़ी केंद्र तथा अनौपचारिक शिक्षा धरि चलल,मुदा शिक्षाके स्तर कमतर रहने बीचेमे छात्र - छात्रा वर्ग सँ तीजन भ' जाईछ। ई एकटा यक्ष प्रश्न भऽ समक्ष ठाढ़ छैक। ऐ संदर्भ मेँ झौली बाबूकेँ कविता फुराईत छैक। अपन संवेदना अनेकों विषय पर कलम चलाबैत व्यक्त कयलाह अछि। समाजके बीच धार्मिक उन्माद आ साम्प्रदायिक तनाउ बढैत देख सुधारवादी रूपरेखा आनबाक ले आर्तनाद सँ अजस्र कवित रसवाला बहेने छथि। हिनक आशु कविक पहचानके कियो प्रांजल कवि कहि दिअ तँ अनसुहांत लागत। पर्यावरण संतुलन आ संरक्षण लेल जल जंगल में बचेबाक लेल अपना कविता सँ पाठककेँ उत्प्रेरित करैत छथि। केन्द्रीय कविता 'अक्षय पात्र' म बढ़ पकठोस बात कहबामे कवि श्री पासवान जी समर्थ भेलाह अछि। ई पोथी सागरमे गागर भरैक काज केलक हेन। ऐ सँ मैथिली साहित्य केँ अक्षय भंडार भरल आ ऐ अक्षय पात्र सँ हीरा चुनि- चुनि अहाँ अपने आपमे गौरव बोध करब से विसबास जगैत य। पोथिमे मुद्रण / टंकण ठाम - ठाम अशुद्ध पाएल गेल अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.४.आचार्य रामानंद मंडल- जननायक कर्पूरी ठाकुर आचार्य रामानंद मंडल जननायक कर्पूरी ठाकुर मिथिला के लाल आ गरीब के मसीहा जननायक कर्पूरी ठाकुर  हज्जाम समाज के अति निर्धन परिवार में माता रामदुलारी देवी के गर्भ से 24 जनवरी 1924 के दिन पैदा होयल रहे। पिता गोकुल ठाकुर हजामत के काज करैत रहथिन।हिनकर गांव आइ कर्पूरी ग्राम से विख्यात हैय।जे बिहार के मिथिलांचल में अवस्थित जिला समस्तीपुर में एकटा गांव पितौझिया हैय। जननायक कर्पूरी ठाकुर मैट्रिक प्रथम श्रेणी से पास भेलन त हुनकर बाबूजी , कर्पूरी ठाकुर के संग अपना गृहस के इंहा खुशी से गेलन आ कहलथिन-मालिक हमर बेटा मैट्रिक पास कैलक हैय।तो मालिक कहलथिन-बड़ा खुशी के बात हैय।आवा कर्पूरी पहिले हमर पांव दबाबा।केतो पढ़ गेला हैय त कि हमनी के पांव त दबाबे के ही पड़त। मालिक के इ कदम कर्पूरी के मान मर्दन करे के लेल रहे। परंच कर्पूरी न त जबाब देलन न डिमोरलाइज्ड भेलन। जननायक कर्पूरी ठाकुर 1942 में गांधी जी के आह्वान पर भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेलन।जेल गेलन। बाद में1967 में बिहार के उपमुख्यमंत्री सह शिक्षा मंत्री बनलन। मैट्रिक में अंग्रेजी पास करै के अनिवार्यता के समाप्त कैलन।दबल कुचल समाज के लैयका के उच्च शिक्षा प्राप्त करे के रास्ता खोल लैन। 1971 में मुख्यमंत्री होयला पर मैट्रिक तक के स्कूल फीस माफ कै देलन।कि गरीब के बच्चा फीस के अभाव में भी पढाई जारी रख सके। मुंगरी लाल आयोग के अनुशंसा के लागू कै के सामाजिक आर्थिक रुप से पिछड़ा के  सरकारी नौकरी में 26प्रतिशत आरक्षण लागू कैलन।जैमे आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण के भी 03प्रतिशत आरक्षण देलन।तयियो आरक्षण विरोधी हिनका गाली देलक। परंच जननायक कर्पूरी ठाकुर हमेशा दबल कुचल आ गरीब के आवाज बनल रहलैन। 1974के छात्र सह लोकनायक जयप्रकाश आंदोलन में भाग ले लेलन।बाद में1977मे बिहार के मुख्यमंत्री बनलैन। मैथिली के संविधान के अष्टम अनुसूची में शामिल करे के लेल भारत सरकार के पत्र लिखनैन। केन्द्रीय सरकार पत्र संख्या-03 आरि-1014/98का-8कैंप दि-22/12/1977 इ पत्र एक जखा से मैथिली के संविधान के अष्टम अनुसूची में शामिल के लेल बीजारोपण हैय। तब मैथिली 2003-2004मे संविधान के अष्टम अनुसूची में शामिल भेल। 23मार्च  1971के अपन मुख्यमंत्री कालि में मिथिला विश्वविद्यालय के स्थापना के लेल विहार विधान परिषद में वक्तव्य देलन आ अइसे पहिले1967मे मिथिला विश्वविद्यालय के लेल यूजीसी के अध्यक्ष से वार्ता कैले रहथिन। बाद में1972मे मिथिला विश्वविद्यालय के स्थापना भेल। 1978 में बिहार पंचायत राज के चुनाव करैलन।आ दलित शोषित कमजोर वर्ग में चुनाव के सहारे नया नेतृत्व कर्ता पैदा कैलन। 21 अप्रैल1979तक बिहार के मुख्यमंत्री रहलन।17फरवरी1988 के अचानक हृदय गति बंद होयला के कारण सदा के लेल संसार से विदा हो गेलन। लोग हुनका प्रेम से जननायक पुकारैत रहे। 1988मे बिहार सरकार हुनका सम्मान में हुनकर गांव पितौझिया के हुनकर नाम पर कर्पूरी ग्राम घोषित कैलक। भारत सरकार सम्मान में डाक टिकट जारी कैलक। बिहार सरकार बक्सर में विधि महाविद्यालय, मधेपुरा में चिकित्सा महाविद्यालय, दरभंगा आ समस्तीपुर में अस्पताल हुनका नाम से स्थापित कैलक। भारत सरकार दरभंगा-अमृतसर लेल जननायक एक्सप्रेस चलैलक। आइ जननायक कर्पूरी ठाकुर हमरा सभ के बीच नै छैथ परंच हुनकर विचार आइयो जिंदा हैय आ लोग के राह दिखवैत हैय। -आचार्य रामानंद मंडल, सामाजिक चिंतक, गौशाला चौक,सीतामढ़ी। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.५.परमानन्द लाल कर्ण-सीख परमानन्द लाल कर्ण सीख अरे  हमर बौआ, कानू  नहि ! दादी तुरंत अहाँक  दूधक बोतल लावि रहल छथि । लीलाजीक पुकार भनसा घरक दिवार सँ टकराइत घर मे गूंजि रहल छल । हुनका हाथ मे दूधक बोतल छल जाहि मे सिरगरम दूध राखैत छलीह आ सोझा मे फर्श पर बैसल हुनक पोता रोहन कानैत छल । लीलाजी आवाज दऽ रोहन के फुसलाव�क कोशीश कऽ  रहल छलीह । मुदा रोहन चुप होवाक नाम नहि लैत छल । लीलाजी  कहैत छलीह - बस हमर लाल ! चुप भऽ जाउ ! दूध गरम भऽ गेल अछि । बस आवि गेलहुँ । लीलाजी बोतल मे दूध गरम कऽ आवि  रहल छलीह कि  कड़क आवाज मे हुनकर पुतोहु कहलनि - माँ जी ! अहाँ की कऽ रहल छी ? हद भऽ गेल । एकहु टा काज अहाँ ढंग सँ नहि करैत छी । देखू तऽ रोहन केना कानि  रहल अछि । रोहन के कोरा मे लऽ अपना सासु माँ पर जोर-जोर सँ कहऽ लगलीह । लीला जी कहलनि - � कनिया ! बौआक भूख लागल छल तें हम भनसा घर मे बौआक लेल दूध गरम करैत छलहुँ । देखू दूधक बोतल हमरा हाथहि  मे अछि । एहि पर  सुषमाजी कहलनि, �कनि  देखू तऽ बच्चाक  की हालत भऽ गेल अछि। नीचा मे लोरे झोरे कोना कानि  रहल अछि ।हमरा पाछू मे बच्चा पर अहाँ की ध्यान दैत छी पता नहि ? लीलाजीक चेहरा लटकि  गेल आ ओ किछु कहऽ चाहैत छलीह तखनहि सुषमाजी कहलनि - माँ जी, अहाँ के सफाई देवाक कोनो जरूरत नहि अछि । लीलाजी कहलनि - नहि कनिया ! कनि सोचू तऽ हम भनसा घर मे बौआक  लेल दूध गरम करवाक लेल गेल छलहुँ तें पलंग सँ नीचा रखने छलहुँ । पलंग पर सँ गिरवाक डर छल । हम नीचा मे चटाई बिछा कऽ बैसेने छलहुँ ,मुदा ओ चटाई पर सँ बाहर खेलऽ लागल । बच्चा अछि तऽ हाथ पाइर तऽ मारबे  करतैक । केकरो नहि देखलक तऽ कानऽ लागल । सुषमाजीक  नजरि  घरक एक कोन मे राखल बच्चाक कपड़ा पर गेल । तुरंत ओ कहलनि - �माँजी ! आन दिन तऽ रोहनक छोट-छोट कपड़ा अहाँ सेहो साफ कऽ सुखा दैत छलहुँ मुदा आई तऽ अहाँ ओहो छोड़ि  देलहुँ अछि । सभटा कपड़ा ओहिना राखल अछि । हमरा तऽ समझ मे नहि आवि रहल अछि जे भिनसर हम सभटा  काम निपटा कऽ जायत छी । दिन भरि अहाँ की करैत छी ? एकटा छोट नेना  के नहि संभालि  पावैत छी।सुषमाक कटु वचन सुनि लीलाजीक दिल पर गहींर चोट लगलनि । हुनका मन मे एक तूफान उठि रहल छल । लीलाजी कहलनि - � कनियाँ ! अहाँ ई  की कहि रहल  छी ? अहाँ के पता अछि जे दिन भरि कोन-कोन काज होयत अछि ? असगरे कखनहु बौआक लेल दलिया बना के दैत छी तऽ कखनहु रागी बना कऽ व कखनहु दूध दैत छी । बच्चाक  मालिश करनाई, नहेनाई सभ असगर करैत छी । अहाँ कोना समझव जे असगरे ई काम कतेक कठिन सँ होयत अछि । सुषमाजी कहलनि -�माँजी ! बस करु,हमरा सभ पता अछि जे भरि दिन कतेक काज होयत अछि । घरक झाड़ू पोछाक  लेल दाई राखि देने छी । भिनसरक  नाश्ता आ तरकारी हम बना कऽ जायत छी । फेर अहाँक  लेल कोन काम बांचल रहैत अछि । देखू तऽ आई बच्चाक  की हाल भेल अछि। लागैत अछि जे अहाँ बौआ के आई  नेहेवो नहि केलहुँ अछि । बौआ आई ओहिना गंदा कपड़ा पहिरने अछि । भरि दिन मे अहाँ एकटा  कपड़ो नहि बदलि सकलहुँ । ई  सभ सुनि लीलाजी के नहि रहल गेलनि । ओ कहलनि - �कनिया ! आई  भिनसरे सँ हमर शरीर बोखार सँ टूटि रहल अछि । एहि दशा मे बच्चाके संभलनाई कतेक कठिन होयत अछि से अहाँ नहि बुझैत छी की ?� ई  सुनि सुषमाजी कहलनि - �माँजी ! बस करु , जखन सुनु तखन कोनो ने कोनो बहाना बना दैत छी । काम करवाक इच्छा नहि होयत अछि तहन कहु हम रोहन के डे-केयर मे राखि दैत छी ।� ई  कहि रोहन के कोरा मे लऽ के अपना कोठरी  मे चलि गेलीह । भनसाघर मे लीलाजीक  आँखि सँ ढ़व-ढ़व नोर गिरऽ लागल । बुझल मन सँ ओ अपना कोठरी मे बिछौना पर लेट गेलीह । आई  भिनसरे सँ लीलाजीक तबीयत खराब छल तैयो भरि दिन रोहनक  पाछु-पाछु दौड़ैत छलीह । एहि हाल मे सुषमाजी एकहु बेर नहि कहलखिन जे अहाँ कोनो दवाई लेलहुँ अछि कि  नहि ? ओना ई  नव बात नहि छल । लीलाजीक  मन ठीक  रहे व खराब सुषमाजी ताना मारऽ मे कोनो कसरि नहि छोड़ैत छलीह । सुषमाजी रोहन के अपना कोठरी मे लऽ जा के पूरा कपड़ा बदलि देलखिन । कपड़ा बदलि पलना पर लेटा देलखिन आ दूधक बोतल ओकर हाथ मे पकड़ा देलखिन । रोहन के दूधक  बोतल पकड़ा कऽ अपना बिछौना पर लेट गेलीह आ सभ दिन जकाँ फोन पर अपना माय सँ कहलखिन, � माय  अखन घर एलहुँ अछि तऽ फेर आई घर मे तमाशा छल । बौआ फर्श पर भूख सँ तड़पि  रहल छल । जोर-जोर सँ कनैत छल ।आई तऽ आओरो हद भऽ गेल, आई रोहन के कपड़ो नहि  बदलल  गेल छल । हम की करु? ओ नहि तऽ बच्चाक ख्याल राखैत छथिन आ नहि घरक कोनो काम करैत छथिन । सुषमाक माय कहलनि - बुढ़िया भरि दिन मोबाईल चलावैत हेतीह नहि तऽ सुतैत हेतीह । बच्चाक  देखभालक  जिम्मेवारी तऽ दादी पर रहैत अछि खास कऽ जेकर माय नौकरी करैत अछि । किएक  तऽ ओ भरि दिन  अपने ओफिस मे रहैत  छथि आ साँझ मे थकल मारल घर  आवैत अछि । सुषमाजी अपन भड़ास निकालैत छलीह आ माय सँ कहैत छलीह जे माय आव हम की करी ? भिनसरे नाश्ता बना कऽ आ दाई के काम समझा कऽ अपना नौकरी पर भागू । नौकरी पर सँ घर आवैत छी तहन माँजीक बहाना सुनैत छी ।सभ दिन ओ कोनो ने कोनो बहाना जरुर बतावैत छथि । आई  देह तोड़ि रहल अछि तऽ आई बोखार भऽ गेल अछि । सब दिन इएह ड्रामा लागल रहैत अछि । एहि पर सुषमाजीक माय कहलखिन - अरे बेटा ! ई  सव  बहाना होयत रहैत अछि । अच्छा ई  बताऊ जे पाहुनक  तबीयत  सब ठीक ठाक अछि ने ?  एहि पर सुषमाजी कहलनि - हाँ  माँ , ठीक अछि मुदा आई ओफिसक  काम सँ बाहर गेल छथि । लगभग एक घंटा दूनु माय-धी सब दिन फोन पर बात करैत छलीह । भरि दिन की भेल तकर पूरा जानकारी देलाक बाद मोबाईल बन्द होयत छल । सुषमाजीक माय अपना रिश्तेदारी मे कहैत छलीह जे हमर बेटी सासुर मे कतेक मेहनत करैत अछि । घर संभालनाई ओफिस जेनाई कोनो आसान बात नहि अछि । लीलाजी अखन माथ पकड़ने बिछौना पर लेटल छलीह । जखन सुषमाजी अपना माय सँ बात करैत छलीह तखन ओ सब बात सुनैत छलीह । मुदा अपना दिल पर हाथ राखि चुपचाप छलीह । अचानक हुनका दिमाग़ मे आयल जे अपन बेटा मनोज सँ सभटा बात कही । फेर हुनका दिमाग मे आयल जे बेटाक कहला सँ किछु नहि होयत । ओ अपना घरवालीक बात सुनत नहि कि  हमर । हमरा बात पर हुनका विश्वास हेतनि की नहि ? लीलाजीक आव एहसास भेलनि जे हम कतबहु घर मे काज करब हमर कोनो कदरि नहि होयत । आई  तऽ देह तोड़ि रहल अछि आ बोखार सेहो अछि तैयो रोहन के भरि दिन संभालहु । घरक काम केलहुँ मुदा कनिया के तऽ हमर गलती देखा दैत छैन । कतेको बेर मन भेलनि जे एहि ठाम सँ दोसर ठाम चलि जाउ मुदा फेर सोचैत छलीह जे गाम मे सेहो घर ठीक ठाक नहि अछि कोन ठाम जाय ? ई सोचि चुपचाप बेटा-पुतोहु लग मन मारी रहैत छलीह । एक दिनक बात अछि सुषमाजीक ओफिस बन्द छल ओ घर पर छलीह । रोहन अपना माय लग खेलाइत छल । लीलाजी अपना घर मे बैसल छलीह तखन हुनका पुरान बात यादि आवऽ लागल जे एकटा समय छल जखन ख्वाव देखैत छलथि जे बच्चा जखन पैघ भऽ जायत आ अपन माथ उठा लेत तहन हम तीर्थ वगैरह जायव । ओना लीलाजी के घुमवाक बड्ड शौक छलनि मुदा घरक  जिम्मेवारी हुनका बान्हने रहैत छल । जखन बच्चा छलीह तखन हुनकर माय कहैत छलखिन जे अखन पढू, पढ़ाई पूरा कऽ लीअ विआहक  बाद घुमव । माय बाबुजीक देख-रेख मे पढ़ाई नीक जकाँ केने छलीह । विआहक बाद हुनका नौकरी करवाक इच्छा भेलनि, मुदा सास- ससुर नौकरीक लेल साफ मना कऽ देलखिन । विआहक बाद जिम्मेदारी ख्वावक जगह लऽ लेलक । सासुर मे साउसक ताना, घरक काज, रिश्तेदारक अपेक्षा आ पतिक  फरमाईश धीरे-धीरे लीलाजी के अन्हार कोठरी मे धकेल देने छल । भिनसर सँ साँझ धरि काम करैत-करैत थकि  जायत छलीह ।बेटाक जन्म भेलाक बाद घरक काज आ बेटाक देखभाल मे समय बीतैत छल । बेटा जखन विआहक लायक भेल तहन हुनक विआह नीक खान दान मे केलीह । हुनका बेटी नहि छलनि तें सदिखन मलाल छलनि जे हमरा बेटी नहि अछि । ओ सोचैत छलीह जे बेटी नहि अछि मुदा बेटा तऽ अछि । विआहक  बाद बेटी जरूर  मिल जायत । बहुक हम बेटी जकाँ राखब । मुदा लीलाजीक ई अरमान सुषमा के एलाक  बाद टूटि गेल। ओ तऽ अपना दुनिया मे मस्त छलीह । सासुर मे सुषमा एकटा स्कूल मे काज करऽ लगलीह आ अपना दुनिया मे मस्त रहैत छलीह । भिनसरक  किछु काम कऽ टिफिन मे अपन खाना पैक कऽ लैत छलीह आ साँझ के आवैत छलीह । साँझ मे घर एलाक बाद फोन पर अपना माय सँ घंटों बात करैत छलीह । घरक सव काज लीलाजी पर छल। सुषमाजीक एलाक पहिले तऽ हुनका किछु राहत छल । कखनो सत्संग मे चलि जायत छलीह तऽ कखनहु अरोस-पड़ोस मे बात कऽ लैत छलीह । मुदा आव पोताक जन्म भेलाक बाद सभटा जिम्मेदारी लीलाजी पर आवि गेल छल । बच्चा के मालिश करनाई, नेहेनाई,ओकर कपड़ा साफ करनाई आ खाना खिलेनाई सभटा काज हिनका पर छलनि। एक दिनक बात अछि लीलाजी अपना पुतोहु सँ कहलखिन - कनिया छुट्टीक दिन घरक  काज मे किछु हाथ बटा  देतहुँ तहन हमरा किछु आराम मिल जायत । भरि दिन काज करैत-करैत थकि जायत छी । एहि पर सुषमाजी कहलखिन - माँ जी,अहाँ तऽ जानवे करैत छी भरि काज करैत-करैत हम थाकि जायत छी आ  सप्ताह मे एक दिन तऽ आराम करवाक लेल छुट्टी मिलैत अछि । अहु दिन आराम नहि करी तऽ फेर आगु कोना काज करव ।अहाँ तऽ भरि दिन घर पर रहैत छी । अहाँ तऽ घरक  काज संभालि  सकैत छी । सुषमाजीक  ई बात हुनका तीर जकाँ लागल । ओ सोचैत छलीह जे नौकरी करनाई के काज कहल जायत अछि आ घरक  काज के कोनो अहमियत नहि अछि की ? आव तऽ लीलाजी बहुक  लेल नौकरानी भऽ गेल छलीह । भरि दिन काज करैत रहु जाहि मे कोनो गलती भऽ गेल तहन बात सुनु । मन खराव रहै वा नीक घरक  सभटा काज करनाई आवश्यक छल । मन खराब रहलाक वावजूद भरि दिन रोहनक देखभाल करनाई, रोहनक खाना बनेनाई आदि सभटा काजक जिम्मेदारी  लीलाजी पर छल । रातिक  खानाक बाद रोहन हिनका लग सुतैत छल किएक तऽ राति मे ओ दूध पीवाक लेल उठैत छल । एक रातिक  बात अछि रोहन नीन मे छल मुदा लीलाजीक  आँखि सँ नीन गायव छल । बिछौना पर लेटल किछु सोचि रहल छलीह । लीलाजी सोचैत छलीह जे आव वर्दाश्त नहि भऽ रहल अछि । आव हमरा अपने किछु निर्णय लिअ पड़त । हमरहुँ जीवनक किछु मोल अछि । ई  साबित करनाई हमर कर्त्तव्य अछि । हम सुषमाक  कतेक तिरस्कार सही ? ओ सोचि रहल छलीह जे रिश्ता के जबरदस्ती बाँधि  के रखनाई नीक नहि होयत अछि । जखन कि  एक पक्ष रिश्ता राखऽ चाहैत अछि आ दोसर पक्ष ओकर मोल नहि दैत अछि । लीलाजीक  सब्रक  बाँध टुटि गेल छल । आव ओ सोचलथि  जे हम एहि घर मे नौकरानीक जीवन नहि जिअव । आव सुषमा के सीख  देनाई आवश्यक अछि । एक दिनक बात अछि भिनसरे लीलाजीक फोनक घंटी बाजल । मोबाईल पर अपन सहेलीक नाम देखलखिन । फोन देखि ओ कहलनि आई  भोरे-भोर फोन केलहुँ अछि, कोनो खास बात तऽ नहि अछि ? एहि पर ओ कहलनि - लीला, हम सव गंगा स्नानक लेल बनारस जा रहल छी । हमरा आँगन सँ आओर  लोकनि जेथिन । अहुँ चलव की ? ओना तऽ अहाँ सव बेर कहैत छी जे हम कोना जायव ? घर के संभालत ? तैयो हम सोचलहुँ जे अहाँ सँ पुछि ली । संग चलव तऽ दूनु गोटे काशी- विश्वनाथक  दर्शन कऽ लेव । ई  सुनि लीलाजीक  माथ ठनकल । गंगा स्नान केला कतेक दिन भऽ गेल अछि । घरक  काज, रोहनक जिम्मेदारी आ  कनियाक  ताना सभ जिनगी के बोझ बना देने छल, मुदा आई सखीक आवाज सुनि बिना ओ किछु सोचने लीलाजी कहलीह - हाँ सखी, हम चलव । ठीक अछि काल्हि हम सव गंगा स्नानक  लेल बनारस जायव । दूनु गोटे बनारस जयवाक लेल तैयार भऽ गेलीह । फोन राखि ओ सुषमा सँ कहलखिन - कनिया, गंगा स्नानक  अहाँक  छुट्टी अछि की नहि ? ओहि पर सुषमा कहलनि - हाँ माँ जी, अखन गंगा स्नान आ रवि लगा कऽ लगातार तीन दिनक छुट्टी अछि । ई सुनि लीलाजी कहलनि - कनिया , हमर इच्छा होयत अछि जे गंगा स्नान कऽ आवि । कनिया काकीक आँगन सँ कतेको लोकनि जा रहल अछि । आई  भिनसरे हमर सखी फोन केने छलीह । हुनके सवहक संगे हम बनारस जा रहल छी । बौआ के सेहो छुट्टी होयत दूनु प्राणी मिल रोहन के संभालि  लेव । एहि पर सुषमाजी कहलनि - ठीक अछि माँ जी, एक दुई दिनक तऽ बात अछि, ओहुना  हम घर पर रहव । अहाँ जाउ गंगा स्नान कऽ आवु । सुषमाजी मने मन सोचि रहल छलीह जे चलु एक-दुई  दिन तऽ घर मे शान्ति  रहत । रोहन के संभालनाई  कोनो पैघ बात नहि अछि । माँजी छुट्टीक दिन  सेहो हमरा सुतऽ नहि दैत छथि । आव दू  दिन देर धरि सुतव । लीलाजी के साँझ मे ट्रेन छल । दिन मे रोहन के संभालैत अपन यात्राक तैयारी केलथि । साँझ मे ट्रेन पकड़वाक लेल स्टेशन चलि एलीह । दोसर दिश सुषमाजी फोन पर अपना माय सँ बात करैत छलीह तखन रोहन सुति रहल । रातिक भानस बनल छल । सुषमाजी भनसा घर गेलीह तऽ देखैत छथिन जे रातिक भानस भेल अछि । ओ खाना खा लेलथि । देर राति हुनकर पतिदेव घर एलाह तहन सुषमा जी गहींर नीन मे छलीह ।बहुत घंटी बजेलाक  बाद उठलीह । अधनीने किवाड़ खोललथि । पतिदेवक  एलाक बाद सुषमाजी पूछलखिन - खाना खायव गरम कऽ दी ? एहि पर ओ कहलनि - खाना गरम भऽ जायत तहन नीक रहत । खाना खा कऽ ओ सुति  रहलाह । थोड़े देरक बाद रोहन जोर-जोर सँ कानऽ लागल । राति मे ओ खाना खा के नहि सुतल छल ताहि सँ भूखे ओ कानि रहल छल । ओना तऽ रोहन राति के दादी लग सुतैत छल । राति मे रोहन के दूध देवाक जिम्मेदारी दादी पर छल, मुदा आई  दादी के नहि रहलाक कारण ई  जिम्मेदारी सुषमाजी पर आवि गेल छल ।सुषमाजी दूध गरम कऽ रोहन के बोतल थमा देलखिन । रोहन दूध पीव बिछौना पर खेलऽ लागल । रोहन के नहि सुतलाक  कारण सुषमाजी सेहो नहि सुतलथि । भोरवा मे फेर रोहन सुतल तहन सुषमाजी के चैन मिलल ।तहन सुषमाजी सेहो सूति रहलीह, मुदा थोड़े देरक बाद घरक  घंटी बजल । सुषमाजी चिरचिरा कऽ मने मन कहलखिन - पता नहि एते  भिनसरे के छथि ? विछौना पर सँ उठि किवाड़ खोललथि तऽ देखलखिन जे दूधवाला ठाढ़ अछि। दूध लऽ के चूल्हा पर गरम होयवाक लेल राखि देलखिन । आ बिछौना पर आवि लेट गेलथि । चूँकि राति मे ओ नहि सुतल छलीह तें हुनका नीन आवि गेल । झपकी लागैत छल कि दाई घरक घंटी बजेलक । किवाड़ खोललाक बाद यादि एलेन जे दूध चूल्हा पर राखल छल । भनसा घर गेलखिन तऽ देखैत छथिन जे दूध उबालि कऽ चूल्हा पर  गिरल अछि । सुषमाजी दाई सँ ओ साफ करेलथि । सुषमाजी मुँह हाथ धो के चाय बना कऽ घरवाला के उठेलथि । मुदा ओ कहलखिन - हम अखन चाय नहि पीयव, हमरा अखन सुतऽ दिअ, ई  कहि ओ सुति  रहलाह । ओ अकेले चाय पीव भानस बनयवाक लेल तरकारी काटैत छलीह तखन रोहन जागि गेल आ जोर जोर सँ कानऽ लागल । तरकारी बनेनाई  छोड़ि सुषमाजी रोहन के कोरा मे लेलखिन, मुदा ओ चुप नहि भेल । तहन रोहन के कोरा मे लऽ के घुमावैत छलीह, तैयो ओ चुप नहि भेल । एकर बाद सुषमाजी अपना घरवाला सँ कहलखिन - सुनै छी ? कनि बौआके देखू हम एकरा लेल दलिया बना दैत छी, ओ खा लेत तहन चुप भऽ जायत ।  एहि पर ओ गुस्सा सँ कहलखिन - हमरा सुतऽ दिअ नीन लागल अछि । ई  कहि ओ सुति  रहलाह । सुषमाजी रोहन के कोरा मे नेने भनसा घर मे आवि दलिया बनेलथि आ ओकरा खुआ देलखिन । तकर बाद सुषमाजी तरकारी बनाव�क लेल बैसलीह मुदा रोहन बेर-बेर हुनका लग आवि तरकारी नहि काटऽ देलक ।थोड़े देरक बाद हुनकर घरवाला उठलथि तऽ कहलनि- चाय मिलत की नहि ? सुषमाजी कहलनि जे रोहन के देखू तहन हम चाय बना दैत छी । ई  कोनो काज नहि करऽ दैत अछि । सुषमाजी चाय बना कऽ देलखिन । एकर बाद रोहन पोट्टी केलक ताहि  लेल साफ करवाक लेल बाथरूम मे गेलथि । रोहन ततेक हाथ पाइर  मारैत छल जे अकेले साफ करवा मे बड्ड परेशानी भेलनि । रोहन आ सुषमाजीक सभटा कपड़ा भींग गेल । बाथ रूम सँ बाहर आवि पहिले रोहनक कपड़ा बदलि देलखिन तकर बाद ओ स्नान करऽ चलि गेलीह । रोहन के बाथ रूम के सोझा मे बैसा देलखिन । नहेलाक  बाद हुनका भूख लगलनि, मुदा भानस नहि बनल छल । मोबाईल सँ खाना आर्डर केलनि तहन खाना खेलथि । तकर बाद घरक  काज मे जुटि गेलीह । भरि दिन कोना बीतल तकर पता नहि चलल । रोहन के पाछु-पाछु लागल पुरा दिन बीत गेल । साँझ मे सुषमाक  माय सव दिन जकाँ फोन केलखिन मुदा हुनका समय नहि मिलल जे फोन पर बात करथिन । फोन उठा कऽ माय सँ कहलखिन - माय ! आई  हमर सासु माँ नहि छथिन, ओ गंगा स्नान गेल छथि ताहि सँ समय नहि अछि जे बेसी बात करव । आई परेशानी बेसी भऽ गेल अछि, दिन मे खाना सेहो नहि बनेने छलहुँ । रोहन के सुता रहल छी, ओ सुतत  तहन भानस होयत । रोहन के सुता कऽ सुषमाजी भानस केलथि । दूनु प्राणी खा रहल छलीह कि  रोहन उठि गेल आ कानऽ लागल । सुषमाजी खाना छोड़ि रोहन के कोरा मे लेलनि आ पतिदेव सँ कहलनि - अहाँ पहिले खाना खा लिअ तहन हम खाना खायव । घरवाला के खाना खेलाक बाद ओ खाना खेलीह । सुतऽ सँ पहिले ओ रोहन के खाना बना कऽ खिलेलथि । रोहन खाना खेलाक  बाद बिछौना पर खेलऽ लागल । सुषमाजीक  लाख प्रयासक  बादहु रोहन नहि सुतल । राति के १२ बजि  गेल मुदा रोहन नहि सुतल । रोहन के जागलाक  कारण सुषमा सेहो नहि सुतैत छलीह । काल्हि राति सेहो ढंग सँ नहि सुतल छलीह । आव हुनका एहसास भेलनि जे हुनकर सासु माँ कतेक कठिन सँ रोहन के लालन-पालन करैत छथि । दोसर दिन फेर वएह दिनचर्या भेल दुई दिन मे सुषमाजी परेशान भऽ गेलीह । दुई दिनक  बाद सुषमाजी गंगा स्नान सँ एलीह तहन हुनका आराम मिलल । तकर बाद सुषमाजी घरक  काज मे हाथ बटावऽ लागलीह । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.६.मनोज झा मुक्ति- कथा-नह केश मनोज झा मुक्ति कथा-नह केश

गाममे अफरा तफरी मचल छै । घरघरमे एतवे चर्च भरहल छै जे आब कि हेतई ? बातो त ओहने छल । एहिसँ पहिने कहियो एहन विवाद गाममे नई देखल गेल छलै ।

किछुदिनसँ सामान्यरुपमे विमार रामानन्द मिसरके देहान्त आई भिनसरमे भेलनि । विवाद एहि बातक छल जे रामानन्द बाबूके मुखाग्नि के देतनि ?

मिसरजीक गन्ती गामक कहवैकामे होइत छलनि । निम्न मध्यमवर्गीए परिवारक होइतो जिल्लाभरिमे अपन हटले पहिचान छलनि मिसरजीकेँ । सन्तानकरुपमे दूटा बेटा आ दूटा बेटी छलनि । छोट बालक अनजातिमे विवाह कएने छलनि, ओहि विवाहमे मिसरजी दूनु प्राणी सहभागि भेल रहथि । आ तकरे बहन्ना बनाविक जेठ बालक मायबापक नामपर नह केश करालेने रहनि, नाता सम्बन्ध मायबाबूसँ तोडि़ लेने रहनि ।

छोटका ननकिरवाक विवाहसँ पहिनही जेष्ठ बालकक जीद्दके देखैत दूनु बेटाके अंशवण्डा कदेने रहथिन्ह मिसरजी । जेठ बालकक ईच्छा अनुसार बिनु जिउका निकालने दूनु बेटाक नामपर आधाआधा सम्पति कदेने रहथिन्ह । शर्त ई रहैक जे सम्पति दूनु बेटाक नामपर भेलाक वादो, मिसरजी दूनूप्राणी आजीवन खेतक उबजा खएताह आ दूनू बेटा प्रतिमास पाँच�पाँच सौ टका तिमनतरकारी वास्ते देतनि । अंशवण्डा जहिया भेल रहैक तहिया जेठ बालक कोनो विदेशी अफिसमे काज करनि आ मोट पाई कामाइन, छोट बालक वेरोजगार रहनि । पारिवारिक पालनपोषणलेल मिसरजीद्वारा लेलगेल बैंकक कर्जके सेहो आधाआधा कयलजएवाक जेठ बालकक प्रस्ताव अएलनि । मिसरजीक ईच्छा विपरीत छोट बालक अपन जेष्ठ भ्राताक आकांक्षा अनुरुप मिसरजी दुनूप्राणीके सहमतिमे लाबि, कर्जक पाइयक बदलामे खेत जेठका भायक नामपर कऽदेलकनि । छोट बालकक विवाहकवाद अपन हिस्साक खेतक उबजा सेहो जेष्ठ बालक अपने उठब लगलनि आ मायबाबूसँ नाता सम्बध तोडि़ लेलकनि । अंशवण्डाक समयमे प्रतिमास पाँचसौ गछल टका एक्को मास जेष्ठ बालक नई देलकनि । छोट त हूनकासबसंगे रहिते छलनि ।

मिसरजीक देहान्तक बाद जेष्ठ बालक कर्ताक भूमिका निर्वाह करबाकलेल देहान्तक खबरि सुनिते गामपर उपस्थित भऽगेल रहनि । मुदा, छोट बालक जेठकाके मिसरजीके मुखाग्नि देबाक बातसँ सहमत नई भेलनि आ ई नौवत आएल छल ।

गामक किछु व्यक्तिक कहब छलनि जे पिताके मुखाग्नि देवाक अधिकार जेष्ठ बालकके होइत छन्हि, ताँए जेष्ठ बालकके मुखाग्नि देवासँ केओ नई रोक सकैय । एम्हर, छोटका बालकके प्रश्न समाजसँ छल, ूएक्कहि व्यक्ति, एक्कहि व्यक्तिक नामपर कए वेर नह केश करौतैक ? जे अपन जिविते रहल मायबाबूक नामपर श्राद्ध कऽ कऽ नह केश करालेने होए, ओ ओहि मायबाबूकेँ मुखाग्नि देवाक अधिकारी कोना अछि ?ू

ओना जेठ बालकद्वारा मायबाबूक नामपर नह केश कराओलगेल बात गामक अधिकांश गोटेके बुझल छलनि ।

स्कूलक प्राँगण गामक लोक आ बाट चलनिहारसँ खचाखच भरिगेल छल । किछुगोटे परम्परा आ संस्कृतिके दोहाई दैत ई विचार व्यक्त कयलन्हि, ूमिसरजीक जेष्ठ बालक गल्ती त कयलक मुदा, कि करबैक ? अपना समाजमे सबदिनसँ जेठे पुत्र मुखाग्नि दैत अएलैय, ताँय जेष्ठे बालक एकर अधिकारी अछि ।ू

सबहक बात सुनिरहल मुखियाजी मिसरजीक छोट बालककेँ अपन पक्ष रखवाक आदेश देलकनि । अपना स्थानपर ठाढ़ होइत मिसरजीक छोट बालक सभके सम्बोधन करैत कहलथि,ू एखनिधरि समाजमे केओ कोनो जघन्य गल्ती कऽलेलाक बाद कि करबै ? गल्ती भेलै । माफी मंगौक । आदि ईत्यादि कहैत समाजमे गल्ती कयने लोकके माफी दैत अएलै, ताँए गल्ती कयनिहार एकर फायदा उठवैत गल्तीपर गल्ती करैत आएल, अपन कर्तव्यसँ मुकरैत अएबाक संस्कारमे दिनानुदिन बढ़ोत्तरी होइत गेल । समाजक एहने उदार भावक फायदा उठबैत समाज दुषित भऽगेल अछि । जकरा जखन जे मोन लागल ओ अपराध करैत गेल । जीवितमे कहियो नूनधरिक आग्रह नई कयने बेटा, मायबाबूकेँ बिनु जिउका निकालनही आधा सम्पति लऽकऽ नाता तोडि़लने बेटा, जिवीतेमे मायबाबूक श्राद्ध कऽदेने घोषण करैत �नह केश� करौने बेटाक हाथसँ मुखाग्नि देवयबाक बात जेसब कऽरहलछी से समाजमे केहन संस्कार देबऽ चाहैत छियै ? समाजमे ई आ एहन गल्तीके माफी दऽ एहि प्रकारक प्रवृतिके जौं प्रोत्साहन करबाक काज होइत रहतै त अप्पन हिस्सा लऽकऽ मायबाबूसँ सम्बन्ध नई रखनिहारक संख्या बढ़ैत�बढ़ैत समाजसँ मायबाबूकप्रतिक बेटाक कर्तव्यक बात बिलीन नई भऽजएतैक ? भाय आ बाँस त ओहने बँटल रहबाक प्रकृतिए बनौने छैक, त भायसँ मनमोटाव भऽगेलापर मायबाबूके अनदेखी करब कतेक उचित ? एहन�एहन बेटाके परम्पराक नामपर मरनोपरान्त मुखाग्नि देवाक अधिकार किन्नहु नई भेटवाक चाही ।ू

बैसारमे उपस्थित अधिकांश लोकक थपड़ीसँ स्कूलक प्राँगण गड़गड़ागेल । माहौल पूर्णरुपेन शान्तिक चदरि ओढिलेलक । कानाफुसीक गुलगुलाहटि वातावरणमे कौतुहलता आनि देने छल । फरकीपर चढल मिसरजीक अन्त्येष्ठीक समयमे सेहो बिलम्ब भऽरहल छलनि ।

मुखियाजीके बेंतक सहारा लैत ठाढ़ होइत देखि वातावरणमे मौनता पसरिगेल । सबकियो निष्प्राण जकाँ होइत मुखियादिसँ टकटक्की लगाक देखऽलागल । ठाढ़ भऽ मुखियाजी कहऽलगलाह,ूमिसरजी आ हूनका दुनू बेटाक खेरहा ओना सबके बीसो वर्षसँ बुझले अछि । सबबातके गौर करैत, समय आ समाजक मनोभावके देखैत हम जे निर्णयपर पहुँचलछी से अपने सबहक समक्ष रखैत छी ।ू नमहर स्वाँसलैत मुखियाजी अपन बात आगु बढयलाह,ू ओना मुखाग्नि देवाक अधिकार अपना सबहक संस्कारमे जेष्ठे सन्तानके रहल अछि । जेष्ठ सन्तानद्वारा जीवित मायबाबूसँगे कुकृत्य एवम् दूव्र्यवहार कयलाकबादो मुखाग्नि देवाक परम्पराक नामपर जाहि प्रकारसँ आईधरि माफी दैत समाज आएल अछि, तकरे कारण आजुक दिन हमरासबके देखऽपड़ल अछि । जे बेटा जिवीत मायबाबूके सेवा नई करत, सम्बन्ध नई राखत, कोनो बहन्नामे जिवीते मायबाबूक नामपर श्राद्ध एवम् �नह केश� कराओत ओहन बेटा जेष्ठे किया नई हुए, मुखाग्नि देवाक अधिकारी नई बनाओल जाए । एहन एहन कुसंस्कारी बेटाके जँ एखुनको समयमे माफ कयल जाए त समाजमे जएह संस्कार बाँचलखुचल अछि तकरा बचौनाई कठीन होएत । अतः मिसरजीके मुखाग्नि देवाक अधिकार जेष्ठ बालक गमाचुकल हमर बुझाई अछि ।ू एतेक कहैत चुप्प भऽ ठाढ़े रहलाह आ स्कूलक प्राँगणमे बैसल लोकसबदिस नजरि घुमाक देखऽ लगलाह । प्राँगणमे उपस्थित लोकसब अपन कर्तल ध्वनीसँ मुखियाजीक फैसलाकेँ अनुमोदन कएलक आ मिसरजीकेँ मुखाग्नि देवाक अधिकारी छोट बालकके बनाओल गेलनि । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। पद्य ३.१.जगदानन्द झा मनु - बीसटा हाइकू ३.२.रबीन्द्र नारायण मिश्र-बिसरि जाएब जरूरी छै ३.३.मुन्ना जी- अकविता- उघारू झांपलकें! ३.१.जगदानन्द झा मनु - बीसटा हाइकू जगदानन्द झा �मनु� बीसटा हाइकू १ गरीब जनि हमर मोन तोरि ओ हँसै छथि २ प्रेममे धोखा बहुते खेलौं हम विश्वास केने ३ तरका मोने आइ काल्हि हमरा ओ तकै छथि ४ मोनमे बसि हमर संग रहू जनम भरि ५ आखर आँखि सुख दुख धेलक पाँति-पँतिमे ६ आखर संगे जीयब सीखलहुँ आखरे मीत ७ सीख नै पेलौं जीवनक आखर मरितो तक ८ आखर सन हमर करेजमे के बसि गेल ९ आँखिक जोत चलि गेल हमर प्रेम तकैमे १० आखर जनि नहु नहु पढ़ू ने मोन हमर ११ लिख दियौ ने हमर मोन पर प्रेम आखर १२ मुँह पर छै करेजाक सिनेह मुस्की बनि कऽ १३ दुख सुखकेँ करेजामे नुकोने बापक चुप्पी १४ दर्द सहितो जे नहि कानि सके ओ तँ बाप छै १५ लाखो खर्चा क जे पुरान कुर्ता मे बेटीक बाप १६ जीवन भरि नुकोलनि नोरकेँ दर्द सहितो १७ ब्याहक खुशी दूर होबैक दर्द भरल आँखि १८ आइ बुझलौं बेटी बिदाइ बाद बापक दर्द १९ बुझब कोना ई नेहक दरेग बिछोह बिना २० जियल जे नै प्रेम केर जीवन ओ बिन प्राण -जगदानन्द झा �मनु�, मो० न० ९२१२-४६-१००६ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.२.रबीन्द्र नारायण मिश्र-बिसरि जाएब जरूरी छै रबीन्द्र नारायण मिश्र बिसरि जाएब जरूरी छै छोड़ि दिअ चिंता मोनकेँ आराम  दिऔ चाहक संग रौदमे भोरुका अखबार पढ़ू कोनो पुरान दोस्तकेँ फोन लगाएल करू बिसरल बात सभ अंतरग प्रसंगसभ चैनसँ बतिआएल करू कखनो-कखनो छुट्टी मनाएल करू आइ-काल्ह करैत जिनगी बीता देलहुँ जे केलहुँ,नहि केलहुँ तकर कोन हिसाब छै बिसरि जाउ पुरान बात मोनकेँ उसास दिऔ नहूँ-नहूँ  गीत गुनगुनाएल करू कखनो काल आरामो कएल करू एक पर एक दुनिआमे  पसरल छै ककरा की छै तकर की माने छै जे किछु  प्राप्त अछि बहुत मूल्यवान  छै कथुक ने अंत छै जीवनमे छोट-पैघ सभक स्थान  छै सुखी रहबाक लेल संतुष्टि जरूरी छै जीवनमे शांति लेल संतोष जरूरी छै छोट-मोट बात बिसरि जाएब जरूरी छै व्यर्थक शंकासँ अनावश्यक चिंतासँ सदिखन बचैत रहू मोनकेँ हल्लुक करू जाहिसँ निचेन रहए आनन्द  बनल रहए से काज अबस्स करू जीवन बड़ छोट छै हँसि कए बितबैत रहू मरबाक तँ छैहे मरिओ कए नाम रहए तेहनो किछु जीबिते करैत  रहू -रबीन्द्र नारायण मिश्र, १६।०८।२०२४ (९।२५ प्रातःकाल) लेखक परिचयः नाम : रबीन्द्र नारायण मिश्र पिताक नाम : स्वर्गीय सूर्य नारायण मिश्र माताक नाम : स्वर्गीया दयाकाशी देवी जन्म तिथिः२ जनबरी ‍१९५४(प्रमाण पत्र) २४ अगस्त ‍१९५२(जन्मपत्र) पैतृक ग्राम : अड़ेर डीह मातृक : सिन्घिआ ड्योढ़ी वृति : भारत सरकारक उप सचिव (सेवानिवृत्त)/ स्पेशल मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, दिल्ली(सेवानिवृत्त) शिक्षा : चन्द्रधारी मिथिला महाविद्यालयसँ बी.एस-सी. भौतिक विज्ञानमे प्रतिष्ठा : दिल्ली विश्वविद्यालयसँ विधि स्नातक श्री रबीन्द्र नारायण मिश्रक प्रकाशित कृति :मैथिलीमे:- प्रकाशन वर्ष:2017 १. �भोरसँ साँझ धरि� (आत्म कथा),    २. �प्रसंगवश� (निवंध), ३. �स्वर्ग एतहि अछि� (यात्रा प्रसंग), प्रकाशन वर्ष:2018 ४. �फसाद� (कथा संग्रह) ५. `नमस्तस्यै� (उपन्यास) ६. विविध प्रसंग (निवंध ) ७.महराज(उपन्यास) ८.लजकोटर(उपन्यास) प्रकाशन वर्ष:2019 ९.सीमाक ओहि पार(उपन्यास)१०.समाधान(निवंध संग्रह) ११.मातृभूमि(उपन्यास) १२.स्वप्नलोक(उपन्यास) प्रकाशन वर्ष:2020 १३.शंखनाद(उपन्यास) १४.इएह थिक जीवन(संस्मरण) १५.ढहैत देबाल(उपन्यास) १६.पाथेय(संस्मरण) प्रकाशन वर्ष:2021 १७.हम आबि रहल छी(उपन्यास) १८.प्रलयक परात(उपन्यास) प्रकाशन वर्ष:2022 १९.बीति गेल समय(उपन्यास) २०.प्रतिबिम्ब(उपन्यास)२१.बदलि रहल अछि सभकिछु(उपन्यास)22. राष्ट्र मंदिर(उपन्यास) २३. संयोग(कथा संग्रह) २४.   नाचि रहल छलि वसुधा  ( उपन्यास) प्रकाशन वर्षः2023 २५.दीप जरैत रहए(उपन्यास)        २६.ठेहा परक मौलायल गाछ(उपन्यास) २७.पटाक्षेप(उपन्यास) प्रकाशन वर्षः2024 २८ माटि बजा रहल अछि(यात्रा प्रसंग) २९ जयतु जानकी(उपन्यास) ३० यज्ञसेनी(उपन्यास) प्रकाशन वर्षः2025 ३१.कथा अखन बाँकी अछि(संस्मरण) ३२.  गाछ बजैत छैक(कथा संग्रह) ३३.सूर्यपुत्र(उपन्यास) In English: - Year of publication:2018 1. The Lost House (Collection of short stories) 2. Life is an art 3.The Ganges Whispers (English translation of my Maithili Novel,Ham Aabi Rahal Chhee (हम आबि रहल छी) हिन्दी में � प्रकाशन वर्ष:2019 १.न्याय की गुहार अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.३.मुन्ना जी- अकविता- उघारू झांपलकें! मुन्ना जी अकविता- उघारू झांपलकें!

चुप्पे ,किए खौंझाइ छी हमरा पर किए कनखियाइत गरौने छी नजरि क' दै छी आरोपित अहां सब हमरा इ कहि जे अहां स्त्री विरोधी छी।

यै,हम मात्र गढ़नि नै गढ़ै छी,बुझलियै हम त' उकसबै छी अहां सबकें सनकबै छी सब जनी जातिकें जिनक आंगुर चलैए शब्द संयोजनमे

बहुत बेर कहलौं जे- स्त्री जन्य बातकें जं लेखक लिखताह तहन ओ मात्र मात्र भावार्थ हेतै जं लेखिका लिखती ? तहन ओ पूर्णत: भोगल यथार्थ हेतै।

हम त' ढ़ाठ खोलि बढ़बाक आह्वान करै छी सबकें ओइ ढ़ठिएल जिनगी सं नै जानि कलम उठाइयो धखाइ छी अहां दोसर स्त्री कें नव दृष्टि, बाट देखेबा सं

धाख जरूरी छै,साख बचेबा लेल पहिने किशोरीक गेम छल कित कित,गोटरस.... आब बेधड़क भ' खेलाइए लिव इन सं पेयर क्लब धरि।

धाखक तर त' ओ दबाएल रहै छलखिन तें बाबा आ दाइक अधरतियाक पहड़मे दबले पएरै ढ़ूकि होइन युग्म दर्शन तखनो धीया- पुता सं घर भरल।

आ,आब...! संवैधानिक, सामाजिक जोड़ा बनै सं पहिने। कतेको बेर कतेको संग लागि जाइछ जोड़,प्रतिस्पर्धा चालू... अहां कनै अवरोधक भ' अजमाउ नै

विषम लैंगिकता प्रकृति प्रदत्त अछि साम्यता कृत्रिम कार्य वहन मात्र तहन उकस- पाकस सं उत्फाल किए? करू प्रदर्शन अपन अस्तित्व जोगा अपन कलेवरक संग!

पारू नवका डरीर ,लिखू अहां उघारि ओ सबटा झांपल बातकें जे अहाकें रखलक ढ़ठिया आ निशक्त बनाकें! कलमक धारकैं पिजाउ ,बनाई धरगर। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। Maithili Literature in English Translation 4.1.Changing Thoughts, Diminishing Hope-Jagdish Prasad Mandal (Original Maithili Short Story) Rameshwar Prasad Mandal (English Translation) 4.1.Changing Thoughts, Diminishing Hope-Jagdish Prasad Mandal (Original Maithili Short Story) Rameshwar Prasad Mandal (English Translation) Jagdish Prasad Mandal (Original Maithili Short Story) Rameshwar Prasad Mandal (English Translation) Changing Thoughts, Diminishing Hope Thoughts grow, and with them hope and faith grow as well. Just as they rise, they can also diminish. When one�s thoughts incline toward the good, toward noble ideas, hope and faith flourish. When they drift toward the base, toward ignoble ideas, hope and faith wither. Yet such a measure does not come easily to a person, for people rarely grasp the nature of events as they unfold. The reason is simple: human beings are prone to confusion. In confusion, the good may appear bad, and the bad may seem good. In the village of Katharbouni, the family of Hridaynath had long been counted among the most prosperous and respected households, not only in the present day but for a full century past. Still, they were not considered the original inhabitants of the village, for Hridaynath�s great-grandfather had come from outside to settle there. His ancestors had arrived from the west, from Bhojpur, and made Katharbouni their home. For three generations, up to the time of Hridaynath�s grandparents, the family spoke only Bhojpuri. After settling in Mithila, the later generations gradually began speaking Maithili. Hridaynath�s great-grandfather Krishnanand had served as a soldier in the Darbhanga estate. Even in that humble post, his mind was sharp and discerning, qualities that won him the estate�s trust. Later, Krishnanand was appointed Kamatia, the overseer of a vast tract of three thousand bighas of estate land. The responsibility for cultivation and upkeep rested on him, while collection of land revenue was handled by the Patwari, Mukund. As chance would have it, both Mukund and Krishnanand hailed from the same region and shared the same caste. In time, they became related by marriage, with one�s son marrying the other�s daughter. Quarrels and reconciliations were nothing new to the Mithila region, and Katharbouni was no exception. With funds from the estate, Krishnanand had a three-bigha pond dug, and on the eastern embankment of that pond he built his home. The estate�s courthouse stood elsewhere, but the presence of that pond brought prestige to Krishnanand�s family, raising them to the ranks of the village�s honored households. Time changed. The grandeur of the Darbhanga estate faded into memory. Hridaynath was a sociable man, free even of the slightest trace of prejudice over the fact that his family had come from the west to settle here while the original inhabitants of Katharbouni were from other lineages. Like a native-born son of the soil, he took an active part in community affairs, whether funerals, weddings, or any public or religious event, offering his presence and assistance, which strengthened his social bonds. Being from a well-to-do household and also educated, he was regarded as one of the prominent figures of the village. With his sound financial footing, he also engaged in the trade of grain and water, including moneylending and interest-based transactions. Most of the native families of Katharbouni had suffered repeated losses from floods and river erosion, forcing them to part with their lands and properties. As a result, the majority of villagers became poor and worked as sharecroppers to survive. Until that time, Hridaynath�s heart had not hardened enough to provoke social opposition; he continued to treat the natives with fairness. Yet he was well aware that his family stood apart in this place, having come alone from elsewhere to settle here. Hridaynath had one son and three daughters. The daughters were married in the Bhojpur�Ara region of the west, but for his son�s marriage he resolved to choose a bride from Mithila. The reason was that by marrying into a Maithil family, the household would absorb Maithil customs into its own traditions, and relations with the Maithil community would deepen. His son Manoj was a very intelligent and hard worker. He passed the matriculation examination in first division. Although a commerce student, his grasp of other subjects too was strong, and this helped him secure a good result. He enrolled at C. M. College for the Intermediate in Commerce, and alongside his regular classes, took private tuitions from college teachers. The reason for these tuitions was to build his backing, a network of connections. With honors, Manoj completed his B.Com. in first division. While he was still pursuing his degree, Hridaynath began speaking of his marriage. In his mind was the wish that, just as his son was well educated, so too should his bride be educated. Mithila remained, in many ways, unchanged. Men�s education had long been valued, but women�s education still lagged behind. Fortune favored them; a proposal came for a B.A.-educated girl, and the talks for Manoj�s marriage began. The practice of dowry was not confined to Mithila alone; it existed everywhere. Yet here it had a certain distinction, since dowries were not uniform in value or form. In some castes the amounts were high, while in others they were relatively modest. For example, a B.A.-educated groom from one caste might command a far higher dowry than a similarly educated groom from another caste. Manoj belonged to a higher caste, so the expected dowry was naturally greater. After negotiations, the marriage was settled with an agreed dowry of thirty lakh rupees in cash. Following the agreement, Manoj was married to a B.A.-educated young woman named Sheela. As in other marriages, family ties began to form between the two households, and the bond between Manoj and Sheela also grew. Along with the wedding came the custom of Duragaman, the ceremonial arrival of the bride at her husband�s home. In earlier times this would take place in an odd-numbered year after the wedding, one year, three years, or five years later. With changing times, Duragaman began to occur alongside the wedding itself, as was the case for Manoj and Sheela. Being a commerce graduate, Manoj secured a job as an accountant in the state�s finance department. As a government employee, his salary was fixed according to official scales. In the modern climate, however, private-sector salaries, whether from domestic or international companies, often surpassed government pay. Manoj was on the lookout for better opportunities and was eventually offered an accountant�s position in an international firm. Resigning from his government post, he joined the private company. The salary was generous, and the benefits impressive. Two years passed quickly. During that time Manoj and Sheela were blessed with a daughter. Up to this point, their married life resembled that of most couples, ordinary in its outward harmony. Yet beneath the surface there was a quiet rift between them. In Manoj�s mind was the ingrained belief in a husband�s authority, while in Sheela�s mind was the memory of the thirty lakh rupees her father had given as dowry. Sheela held to the notion that her father had, in effect, purchased her husband, whereas Manoj viewed the dowry as a customary social arrangement. Sheela�s father, Yogeshwar, was an inspector in the state police, while Manoj�s father, Hridaynath, was a prosperous farmer of high standing. In Delhi, Manoj worked while living with his family. The company had provided them with accommodation. Yet Sheela did not treat him in the manner most Maithil wives treated their husbands. All household chores were left entirely to the maid. Manoj could see that Sheela lacked the warmth and attentiveness expected of a wife, but since their marriage appeared outwardly like any other, he kept his feelings to himself and endured it. Life, however, has its own rhythm. Everyone wishes for a warm and trusting bond between husband and wife so that the family can live in peace. To lessen the restlessness in his mind, Manoj began drinking alcohol. Sheela noticed this change in her husband�s habits. She was aware that drinking altered a person�s behavior, and she could see this difference in Manoj, yet she chose to remain silent and bear it quietly. Being the daughter of a police officer, Sheela also had a strong belief that she could earn her own living if necessary. Observing his wife�s manner, Manoj began to feel inwardly despondent. He often thought that his married life, which was meant to uphold both family responsibilities and social standing, should have been peaceful. He wished for a home where the years ahead, with children and parents together, would be filled with harmony, but he felt this was not happening. The demands of Manoj�s job in the international company left him with little sense of time. His workload continued to grow. The office had its own canteen, so he often left home early in the morning and returned late at night. Disheartened by his wife�s attitude, he began spending more and more time away from home. Five years after their wedding, the rift between Manoj and Sheela had grown so deep that they no longer wished to see each other. Eight days before the Chhath festival, Manoj said to Sheela- �This year we will celebrate Chhath in the village.� Sheela readily replied- �That would be wonderful.� Manoj then said- �When we go to the village, we will take all the festival items and clothes for my parents as well. Tomorrow we will finish all the shopping.� The next morning Manoj and Sheela set out for the market with their four-year-old daughter walking between them. Manoj had drunk heavily. Sheela walked in front, the child beside her, while Manoj followed behind. At a narrow bend in the road, a truck approached from behind. As it came close, Manoj pushed Sheela. She fell beneath the rear wheels, and her life ended instantly. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। 1 || विदेह ४३४ विदेह ४३४|| 1

- «४ ६... Inthatiugy of Muuhde Poems झौली पासवान ham DN ha Py) ae हा av ene ane a SR eg i L oR ora) BS " os i

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fide Act साहित्य आन्द्रोलनः मानुषीमिह संस्कृतामू सम्पाद़क: गनेन्ड्र गकुर।

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