VIDEHA — Issue 435 / अंक ४३५

Publication: VIDEHA · Issue: 435
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विदेह ४३५ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। [विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X Videha e-Journal (since 2000) at www.videha.co.in ] ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। कॉपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२६. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२६. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA. सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@zohomail.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@zohomail.in. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover design: AUM GAJENDRA THAKUR VIDEHA:435 समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा। मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अनुक्रम विदेह ४३५ म अंक ०१ फरबरी २०२६ (वर्ष १९ मास २१८ अंक ४३५) ऐ अंकमे अछि:- १.१.अंक ४३४ पर टिप्पणी (पृष्ठ १-१) गद्य २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान -२२ (पृष्ठ ३-१६) २.२.हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१४ (पृष्ठ १७-३३) २.३.लालदेव कामत-बाँकी जीवन : अनुभव, जिम्मेदारी, आ अर्थक खोज (पृष्ठ ३४-४१) २.४.प्रणव कुमार झा- चिकित्सा शिक्षा एवं सेवाक नव क्षितिज: NBEMS द्वारा 'AI in Medical Education' पाठ्यक्रमक शुभारंभ (पृष्ठ ४२-५३) २.५.परमानन्द लाल कर्ण-बुढ़क दर्द (पृष्ठ ५४-६८) २.६.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा- टीस (पृष्ठ ६९-७१) २.७.प्रीति कुमारी- श्री लालदेव कामत जीक व्यक्तित्व आ कृतित्व (पृष्ठ ७२-८१) पद्य ३.१.जगदानन्द झा मनु -तीनटा गजल (पृष्ठ ८३-८८) ३.२.१० टा कविता- मूल हिन्दी-अविनाश मिश्र- मैथिली अनुवाद- पल्लवी मण्डल (पृष्ठ ८९-१०२) ३.३.कल्पना झा- हेरायल मऽन (पृष्ठ १०३-१०४) ३.४.जगदानन्द झा मनु -बीसटा हाइकू (पृष्ठ १०५-११४) ३.५.रबीन्द्र नारायण मिश्र-मनुक्ख आ भगवान! (पृष्ठ ११५-१२२) Maithili Literature in English Translation 4.1.For Whom Did I Do It-Jagdish Prasad Mandal (Original Maithili Short Story) Rameshwar Prasad Mandal (English Translation) [page 124-126]

१.१.अंक ४३४ पर टिप्पणी गंगेश कुमार पाठक शुभेच्छा बहूत नीक एतिहासिक धरोहर के संरक्षण आ संवर्धन के लेल विदेह कें धन्यवाद् संगहि शुभकामना अशेष🙏 -बोकारो स्टील सीटी, झारखंड।

आशीष अनचिन्हार मनोज झा मुक्तिजीक कथा बहुत दिन बाद पढ़बाक लेल भेटल। मुदा कथामे मुक्तिजी जाहि समाजक वर्णन केने छथि से समाज प्रायः एखन धरि नै भेटै छै, अपवाद छोड़ि। बहुत संभव जे एहन समाज भविष्यमे होइक।

दू-दू टा जीवनी धारवाहिक रूपमे आबि पत्रिकाकेँ नीक बना रहल। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। गद्य २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान -२२ २.२.हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१४ २.३.लालदेव कामत-बाँकी जीवन : अनुभव, जिम्मेदारी, आ अर्थक खोज २.४.प्रणव कुमार झा- चिकित्सा शिक्षा एवं सेवाक नव क्षितिज: NBEMS द्वारा 'AI in Medical Education' पाठ्यक्रमक शुभारंभ २.५.परमानन्द लाल कर्ण-बुढ़क दर्द २.६.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा- टीस २.७.प्रीति कुमारी- श्री लालदेव कामत जीक व्यक्तित्व आ कृतित्व २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान -२२ कल्पना झा उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' जीक परिवारक अन्य सदस्यक विवरण "मैथिली साहित्य मे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान" एहि विषय पर लिखैत आब हम ओहि ठाम पर पहुँचि चुकल छी, जतए 'व्यास' जीक अगिला पीढ़ीक उपलब्धिक चर्चा शुरू कएल जाएत। जँ 'व्यास' जीक परिवारक योगदान मैथिली साहित्ये टाक सन्दर्भ मे देखल जाए, तखन तँ हुनकर मात्र दू गोट सन्तान सक्रिय छथिन। मुदा साहित्य सँ उपर अछि समाज। आ समाजक लेल तँ 'व्यास' जीक सभ सन्तान कोनो-ने-कोनो रूप मे सहयोग कएनहि छथि, एखनहुँ कइए रहल छथि। तैं बेरा-बेरी हम 'व्यास' जीक सभ संतानक चर्चा करब। क्रमवार। जेठ सँ छोट धरि, सभक। छओ गोट सन्तानक पिता छलाह 'व्यास' जी। क्रमानुसार सभक नाम एहि तरहेँ छनि - द्विजेन्द्र कुमार झा (कुमर जी) बृजेन्द्र कुमार झा (किशोर जी) शैलेन्द्र कुमार झा (केशव जी) विजया झा (मुन्नी) सत्येन्द्र कुमार झा (मोहन जी) धीरेन्द्र कुमार झा (सोहन जी) लोकमन्त चिकित्सक : डॉ. द्विजेन्द्र कुमार झा आब चर्चा शुरू करैत छी 'व्यास' जीक ज्येष्ठ संतान डॉ. द्विजेन्द्र कुमार झाक, जनिक घरक नाम छलनि कुमर जी। जन्म भेल छलनि 9 जून, सन् 1948 मे। बहुमुखी प्रतिभाक धनी छलाह। जेहने पिता, तेहने पुत्र। पिता बला बहुत गुण आएल छलनि हुनका मे। कुशाग्र बुद्धिक संग साहित्य आ संगीत मे रुचि, ई गुण सभ पिता समान छलनि। हुनकर मृदुभाषिता, विनम्रता, सादगी, शालीनता एहन छलनि जे पहिले भेंट मे ककरो मोन जीति लेबाक क्षमता रखैत छलनि। घर सँ बाहर धरि कहियो ककरो सँ कोनो तरहक मनमुटावक स्थिति नहि उत्पन्न भेलनि हुनका। एकटा स्मित मुस्की सदिखन ठोर पर विद्यमाने सन बुझना जाइत छलए। कखनो क्रोधितो होइत हेताह, तेहन अंदाज नहि लागैत छल। संगीत मे रुचिक जे चर्चा कएलहुँ, से एहि आधार पर जे शास्त्रीय संगीत सुनिते टा नहि छलाह, बुझितो छलाह‌, गबितो छलाह। राग-तानक नीक जानकार छलाह। एहि मामला मे पिता सँ आगुए छलाह। ई जनतब हमरा देलनि श्री सत्येन्द्र कुमार झा (मोहन जी)। ओ कहलनि जे, "बाल्यावस्था मे हम आ भाइजी एक्कहि चौकी पर सुतैत छलहुँ।" मतलब परमानेंट सीट जे छलनि सुतबाक से मोहन जी आ कुमर जीक एक संग। तँ तैं हिनका देखल छलनि, अपन भाइजीक संगीत प्रेम। राति एगारह सँ बारह बजे तक ऑल इंडिया रेडियो पर प्रसारित होइत छलै शास्त्रीय संगीतक कोनो कार्यक्रम। "भाइजी नियमित सुनैत छलाह, ऑल इंडिया रेडियो पर ओ संगीतक प्रस्तुति। एकटा ट्रांजिस्टर कीनि देने छलथिन बाबू। संभवतः 'संगीते प्रेम'क कारणें ट्रांजिस्टर भेटल छल हेतनि हुनका। आन कोनो धिया-पूता कें एना व्यक्तिगत ट्रांजिस्टर नहि भेटल छलनि। हुनकहि संगति मे हमरो इंटरेस्ट जागल संगीतक प्रति। नहि तँ ओहि सँ पहिने हम शास्त्रीय संगीत सँ अनभिज्ञ छलहुँ। संगीतक आनन्द लेब, मतलब संगीत मे डूबि क' ओकर रसास्वादन करब भाइएजीक कृपा सँ सिखलहुँ हम।" ई वक्तव्य छनि डॉक्टर द्विजेन्द्र कुमार झाक अनुज श्री सत्येन्द्र कुमार झाक। आब बात डॉक्टर द्विजेन्द्र कुमार झाक शिक्षा आ रोजगार संबंधी। इंग्लिश ऑनर्स कएलाक उपरान्त MGM मेडिकल कॉलेज, जमशेदपुर (झारखंड) सँ MBBS के डिग्री लेलनि ओ। तदुपरान्त इंटर्नशिप कएलनि पटने सँ। कोनो हॉस्पिटल सँ ज्वाइनिंग लेटर अबितनि, ताहि सँ पहिले किछु दिन लेल एकटा छोट सन क्लिनिक सेहो खोलने छलाह, पटने मे। माने डिग्री प्राप्त क', एक्कहु दिन बैसल नहि रहलाह। आ संयोग एहन जे अवसान दिन धरि ई क्रम (बैसल नहि रहबाक) जारी रहलनि। पहिल पोस्टिंग भेलनि मिर्जागंज, गिरीडीह जिलान्तर्गत। जतए हॉस्पिटलक कैम्पसे मे आवासक व्यवस्था छलनि। 'ड्यूटी आवर'क अलावे जखन कखनो कॉल आबनि, कोनो इमरजेंसी केस आबनि, अपन "चिकित्सक-धर्म"क पालन बहुत इमानदारी सँ कएलनि। तकर बाद किछु समय धरि पोस्टिंग रहलनि विक्रम। विक्रम सँ ट्रांसफर भेलनि मोतिहारी। मुदा विक्रम मे सरकारी हॉस्पिटल मे कार्यरत रहैत अपन क्लिनिक सेहो खोलि लेने छलाह। आ से क्लिनिक खूब नीक चलि रहल छलनि। बहुत यश कमओलाह ओहि ठाम। ओहि ठामक हॉस्पिटलो मे अन्य डॉक्टरक अपेक्षा मरीज सभ हिनके सँ देखेबाक पक्ष मे रहैत देखाइत छलनि। माने हिनकर प्रतीक्षा मे चारिओ घंटा बैसए लेल तैयार रहैत छलनि मरीज सभ। देखाएब तँ डॉ. झाए सँ देखाएब, तेहन मानसिकता लोकक। आ तैं मोतिहारी ट्रांसफर भेलाक बादो विक्रम आबैत-जाइत रहलाह। मतलब विक्रम बला क्लिनिक चलिते रहलनि। ओहि क्लिनिकक बोर्ड पर एखन धरि 'डॉ. द्विजेन्द्र कुमार झा'क नाम जस-के-तस टंकिते छनि। भले आब ओहि ठाम दोसर डॉक्टर बैसि रहल छथि। मुदा ओहि क्लिनिकक नाम आ पहचान हिनकरहि नाम सँ छनि, एखनहु। मोतिहारीक बाद किछु दिन लेल पालीगंज पोस्टेड रहलाह, जे पटने जिला मे पड़ैत अछि। डॉक्टर मामाक एकटा बड़का विशेषता ई छलनि, जे जखन जाहिठाम पोस्टिंग रहलनि आ जेहन मरीज अएलनि सोझाँ, ओकरा संग ओकर भाषा मे समस्या पुछैत छलथिन। माने देश, काल, परिस्थिति अनुरूप स्वयं कें ढालबा मे निपुण छलाह। मगही, भोजपुरी, हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली, जे मरीज जाहि भाषा मे कंफर्टेबल रहथि, तनिका संग तहिना बतिआएल करथि। आ एकर लाभ ई भेटैत छलनि जे लोक हृदय सँ जुड़ाव महसूस करैत छलनि डॉक्टर साहब सँ। जाहिठाम पोस्टिंग रहलनि, यश-मान-प्रतिष्ठा पर्याप्त भेटलनि। मुदा सभ बेसी लोकक मोन मे जगह बना सकलाह, विक्रम रहैत। आब कने गप्प डॉ. द्विजेन्द्र कुमार झाक व्यक्तिगत/पारिवारिक जीवनक। 24 जून 1974 मे श्री देवानन्द झाक सुपुत्री रीता झाक संग परिणय सूत्र मे बन्हाएल छलाह डॉक्टर मामा। नारायणपट्टी गामक सभ सँ धनाढ्य परिवारक बेटी रीता मामी रंग रूप सँ ल' क' शिक्षा-दीक्षा, सभ किछु मे पतिक सोझाँ कने 'दब' छलीह, मुदा से कहियो पतिक व्यवहार मे पत्नीक प्रति कोनो तरहक उपेक्षाक भाव कहियो ककरो नहि देखेलनि। बहुत प्रेम सँ गृहस्थीक गाड़ी आगाँ बढ़बैत, साल 1979 मे एक टा पुत्रीक आगमन भेलनि हिनकर दुनूक जीवन मे। फेर साल 1981 मे एकटा पुत्रक आगमन भेलनि आ साल 1994 मे दोसर पुत्रीक पदार्पण भेलनि एहि दम्पत्तिक आश्रम मे। ज्येष्ठ पुत्री फैशन डिजाइनिंग के कोर्स क' स्वावलंबी छथि। बौआ चि. शरद Tribhuwan University Institute of medicine Maharajgunj Medical Campus, नेपाल सँ MBBS कएलनि। जखन कि हिनकर सेलेक्शन BHU मेडिकल कॉलेज मे भ' गेल छलनि। मुदा जाहि दिन सेलेक्शनक लिस्ट जारी भेलनि, ठीक ओही दिन 10 नवम्बर 2004 क' डॉक्टर द्विजेन्द्र कुमार झाक निधन भ' गेलनि। आब ओ बच्चा उत्तरी धारण करितथि आ कि मेडिकल कॉलेज मे नामांकनक प्रक्रिया मे लगितथि। भावी जे छलनि, से भेलनि। नेपाल सँ MBBSक डिग्री प्राप्त क' DMCH दरभंगा सँ MD कएलनि। बौआक  पहिल पोस्टिंग पटनाक पारस हॉस्पिटल मे भेलनि। तदुपरान्त दिल्ली पारस, फेर टाटा पावर मे, सम्प्रति पटनाक बिहटा थानांतर्गत रेफरल हॉस्पिटल मे कार्यरत छथि। घरक मुखियाक असमय प्रस्थान क' जाएब, वज्रपात सन बुझना गेलनि घरक लोक कें। मुदा ककरो बिना कोनो काज ने रुकलैए ने रुकतैक, ई अकाट्य सत्य अछि। से सएह, पिताक अवसानक उपरान्त पुत्र पढ़ि-लिखि डॉक्टर बनिए गेलथिन आखिर। यशस्वी डॉक्टर बनि, आब चि. शरद नीक पति आ एकटा नेनाक पिता सेहो बनि गेल छथि। चि. शरद बाबूक जीवनसंगिनी अपर्णा भारद्वाज सेहो डॉक्टर छथिन। डेन्टल डॉक्टर। जे नॉएडा मे अपन क्लिनिक खोलने छथि। डॉक्टर द्विजेन्द्र कुमार झाक ज्येष्ठ संतान सौ. नमिताक विवाह हुनकर रहिते मे भ' गेल छलनि। पिताक अवसानक बाद ओहो एकटा पुत्रक माए बनलीह। आ डॉ. द्विजेन्द्र कुमार झाक सभ सँ छोट संतान सौ. विशाखा अंतरा एखनहि दू साल पहिने परिणय सूत्र मे बन्हएलीह अछि। मतलब तीनू सन्तान अपन-अपन जगह पर सुखमय जीवन जीबि रहल छनि। आइ जँ सशरीर एहि धराधाम पर रहितथि तँ अपन भरल पूरल परिवार देखि कतेक आह्लादित होइतथि डॉक्टर द्विजेन्द्र कुमार झा। मुदा जन्म-मृत्यु पर ककर वश रहलैए जे हिनकर रहितनि। जेना कि सर्वविदित अछि जे डॉक्टर पेशाक बड़का त्रासदी छै मानवीय जीवनक अनिश्चितता, माने लाख प्रयासक बावजूदो अप्रत्याशित मृत्यु सँ दू-चारि होबहि पड़ैत छै सभ दिन, एहि पेशाक लोक कें। हालांकि एहि पेशा के 'सेवा' बला पेशा कहल जाइत अछि। मुदा त्रासदी ई जे विज्ञान सेहो मृत्यु कें हरएबा मे असमर्थ भ' जाइत अछि। आ तैं ई पेशा बहुत तनावपूर्ण जीवनशैली सँ युक्त भ' जाइत छै। अधिकांश डॉक्टर सामान्य लोकक तुलना मे अल्पायु (औसत 55-59 वर्ष) होइत छथि। जाहि ठाम सामान्य भारतीय नागरिकक औसत आयु 69-72 वर्ष रहैत छनि, ओहि ठाम डॉक्टर सभक औसत आयु 55-59 वर्ष मात्र रहैत छनि। मतलब सामान्य नागरिक सँ 10 वर्ष कम। (आँकड़ा गूगल सँ लेलहुँ अछि) आ ताहू मे अधिकांश डॉक्टर हृदय रोगक चपेट मे आबि जान गमबैत छथि। डॉ. द्विजेन्द्र कुमार झाक सेहो एक बेर एंजियोप्लास्टी भेल छलनि। तकर बाद नस-संबंधी किछु समस्या सुनबा मे आएल छलए। अन्ततः मात्र 58 बरखक बएस मे 10 नवम्बर 2004 क' इहलोक त्यागि अनन्त यात्रा पर निकलि गेलाह श्री भवनक जेठपुत 'कुमर' जी। 'व्यास' जीक देहावसानक मात्र दू बरखक उपरान्तहि। ओना जतबे टा जीवन जीबि क' गेलाह, घर-परिवार सँ ल' क' समाज धरि, सभ ठाम 'बहुत नीक लोक'क छवि बना क' गेलाह। से संतोषक गप्प ! एहि ठाम हमरा 'व्यास' जीक ज्येष्ठ पुत्र-वधू, माने डॉक्टर द्विजेन्द्र कुमार झाक धर्मपत्नी श्रीमती रीता झाक धैर्य ओ कर्तव्य पारायणताक चर्चा करब सेहो आवश्यक अछि। हिम्मत नहि हारलीह ओ। पतिक असामयिक मृत्यु सँ हतोत्साहित नहि होइत अपन कर्तव्यक पालन कएलनि। तीनू धिया-पूता कें स्वावलम्बी बनबा धरिक समय, हुनका लेल परीक्षाक समय छलनि। आइ हुनकर सभ धिया-पूता अपन-अपन स्तर पर सुव्यवस्थित, सुखमय जीवन जीबि रहल छथिन, से धिया-पूताक संग माएओक सफलता कहल जाएत ने ! वर्तमान मे रीता मामी अपन पुत्र आ पौत्रक सान्निध्य मे अधिक समय बितबैत छथि। 'व्यास' जीक दोसर पीढ़ीक पहिल बौआ (जेठपुत), जे एखन धरि हमरा सभ लेल 'बौए' छथि, तनिका परिस्थिति समय सँ पूर्वहि बहुत जिम्मेदार नागरिक बना देलकनि। बौआ अपन जिम्मेदारी जहिना सकुशल निभाबैत रहलाह अछि एखन धरि, तहिना आगाँ सेहो निभाबैत रहताह, विश्वास अछि। (डॉक्टर द्विजेन्द्र कुमार झा अपन धर्मपत्नी श्रीमती रीता झाक संग) संपादकीय सूचना- एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-7 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-8 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-9 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-10 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-11 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-12 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-13 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-14 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-15 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-16 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-17 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-18 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-19 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-20 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-21 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.२.हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१४ हितनाथ झा (मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070) 'प्रभात'मे प्रकाशित समाचार (गतांकसँ आगाँ) 08.अंक ५, मई, १९३४ ई. कोइलख- गत १५ जनवरीक भूकम्प जन्य जाहि जमीनसँ बालु बहरेलैक तेकरा नाप करबाक हेतु ता.१०-४-३४ई.क सरकारी अमीन अयलाह। तीन चारि दिन रहि बालुकामय भूमि के नापि कय गेलाह। कोइलख- ता.१४-४-३४ ई.क जूड़शीतल दिन पुबारि और दक्षिणबारि टोल के परस्पर माटि होयबाक चर्चा फगुआक बाद सँ बराबरि चल अबै छल। किछु गुंडा द्वारा बढ़ैत ई समस्या एतेक जटिल भय गेल जे माटि होयब अनिवार्य बुझना जाइ छल, परञ्च युवक संघक उद्योगक फलस्वरूप एक दिन पूर्वहि, पुलिस जमादार, दू पुलिसक सङ्ग घटनास्थलर पहुँचि गेलाह। गौआँ पर १४४क कार्यवाही सरकारक तरफसँ कयल गेल तकर संग२ इहो आदेश छल जे कोनो टोलक आदमी नवी पोखरिमे फुचुक्का नहि खेला सकैछ, जकरा सभ टोलक जनता पालन कयलक। तथापि दुसध टोलीक समीप लाठी-गड़ास बहराइये गेल, परन्तु ईश्वर केँ ओहि दिन रक्षा करबाक छलैन्ह अतः मारि नहि भेल। कोइलख- ता.१५ अप्रैलक निशाभाग रातिमे श्री महादेव ठाकुरक घरमे केओ दुष्ट आगि लगा देलकैन्ह। हिनक कुल घर और सैकड़ो मन अनाज जरि कय स्वाहा भय गेलैन्ह। हिनक अतिरिक्त निकटवर्ती और पाँच-सात व्यक्तिक घर जरलैक। कोइलख- श्री तारानाथ झाक अध्यक्षतामे युवक संघक तरफसँ दवा वितरण होयब पूर्ववत जारी अछि। दवा करीब दू-२ मास सँ वितरण कयल जा रहल अछि। कोइलख- ता. २८ एप्रिलक बेरुका पहर पुबारि टोलक श्री श्रीनन्दन झाक पोखरिक मोहार पर गामक सैकड़ो आदमीक उपस्थितिमे दू जोड़ी कुस्ती भेल। पहिल जोड़ी सुखदेव झा और किसुनमा धानुक। जाहिमे सुखदेव झाक जीत भेलैन्ह। श्री ब्रजनाथ झा जीत' वला के दू रुपैया देवाक वचन वद्ध भेल छलाह अतः सुखदेव झाकेँ दुनू रुपैया दय असीम उत्साह दर्शोउलैन्ह। दोसर कुस्ती सुरेन्द्र झा और केदार पात्र के भेलैन्ह, ताहिमे सुरेन्द्र झा विजयी भेलाह। दंगलक समयमे डफरा- वांसी अखाड़ा केँ दलमला रहल छल। कोइलख- ता.३० अप्रैलक सायंकाल स्थानीय चन्द्रानंद फ्री एम.ई स्कूलक मैदानमे करीब एक-डेढ़ सै जनताक उपस्थितिमे पंजिकार श्रीयुत ववुए मिश्रक सभापतित्वमे सनातन धर्मक सभा भेल। जाहिमे गौसपुर निवासी, लोहना संस्कृत विद्यापीठक अध्यक्ष प. श्रीयुत त्रिलोकनाथ मिश्रक प्रभावशाली भाषण करीब डेढ़ घण्टा तक भेल। ओहिमे निश्चय भेल जे असेम्बली मे पेश मन्दिर-प्रवेश-बिल जाहिसँ नहि पास हो तन्निमिति आगामी ६ मइ क' सभ केओ उपवास अथवा फलाहार करी और लाल झंडा लय बाजाक संग एक जुलूस निकाली, जे जुलूस देवालयमे जाय ईश्वर के आराधना करै। और एकर संग२ इहो निश्चय भेल जे आगामी बुध दिन हैदरपुरक मुकुन्द झाक पोखरि पर पुनः सभा होयत। तदनन्तर सभा विसर्जन भेल। सभा विसर्जन भेलाक बाद दू-चारि अछूतोद्धारक पक्षपाती द्वारा "सनातन धर्मक क्षय, गाँधीजीक जय" कहल गेल एवं दुनू पक्षक जयक्षयक ध्वनिसँ आकाश गूँजि उठल। एहि प्रकारे मिंटो तक भेलाक बाद एकर परिणाम एतेक तक भय गेल जे गारिक तँ कथे कोन, जूता चलवामे तथा शस्त्रास्त्र सँ माटि होयबामे कनेके कसरि रहल। कोइलख- कतिपय युवकवृन्दक उत्साह सँ दुर्गा समिति नामक एक संस्था कायम भेलै। कोइलख- स्थानीय हरिजन पाठशालामे छात्र के कांग्रेस-रिलीफ सोसाइटीसँ वस्त्र वितरण भेल। बहुत हर्षक विषय थिक जे स्थानीय युवक संघक सभापति बाबू श्री उमानाथ झा इंजीनियरिंगक अन्तिम वर्षक परीक्षामे सेकंड डिवीज़नमे परीक्षोतीर्ण भेलाह। युवक संघक सदस्य कोइलख निवासी बाबू श्री अनिरुद्ध मिश्र दरभंगा डिस्ट्रिक्ट बोर्डक इंजीनियरक हेतु उमेदवार छथि।१४ व्यक्तिमे ४ व्यक्ति चुनल गेलाह अछि ताहिमे एक इहो छथि। युवक संघ श्री१०८ भद्रकाली सँ प्रार्थना कय रहल अछि जे आगामी ५ मईक अन्तिम चुनावमे हिनका सफलीभूत करथि। श्री ५ मती रानी चन्द्रावती साहिबाक अपन नैहर प्रति स्नेह जन्य एकटा लटकाव वला पेट्रोमैक्स प्रेषित कय असीम यश के प्राप्त कयलैन्हि अछि। 9 अंक 6,जून-1934 ई. कोइलख- ता.६मई १९३४ ई-सनातन सँ0 धर्मक गत सभाक अनुसार "मन्दिर-प्रवेश-बिल"क प्रदर्शनक हेतु करीब ९ बजे प्रातः काल श्री १०८ लक्ष्मीनारायण स्थानसँ एक सार्वजनिक जुलूस बहरैल जे गामक मुख्य २ मार्ग होइत श्री ०१०८ भद्रकाली स्थानमे पहुँचल। करीब ३ बजे सभा विसर्जन भेलाक बाद जुलूस पुनः श्री १०८ भुवनेश्वर स्थान आयल। ओत' सँ सायंकाल सभ केओ अपन-२ घरक रास्ता धयलैन्ह। एहि जुलूसमे करीब आठ-दस गामक जनता सम्मिलित छल। कोइलख- ७ मई १९३४ ई.- ता. ६ मईक जुलूसक समाचार बड़ा लाट, छोटा लाट और सनातन धर्म महासभा काशी के तार द्वारा सूचित करावल गेलैन्ह। कोइलख- श्री तारानाथ झाक अध्यक्षतामे युवक संघक तरफ सँ दवा वितरण होयब पूर्ववत जारी अछि। दवा करीब ३ महिना सँ वितरण भय रहल अछि। कोइलख- ता.२५.५.३४ ई.क श्री इन्द्रनाथ झाक बा लक श्री जितेन्द्र नाथ झा, ज्येष्ठ भ्राता जगन्नाथ झाक बालक श्री अमरनाथ झा तथा लघु भ्राता बदरीनाथ झाक बालक श्री प्रेमनाथ झाक उपनयन एक मड़बापर एवं भोला झाक पुत्र श्री कुलकुल झा तथा श्री दुल्ली झा और श्री राम झाक पुत्रक उपनयन सानन्द समाप्त भय गेल। कोइलख- ता.२७ मईक करीब ४ बजे दिनमे बटौआ धानुकक घरमे आगि लागि गेलैक। परञ्च ईश्वरक कृपाक फलस्वरूप शीघ्र अधिक संख्यामे जनसमुदाय सम्मिलित भय मिझेबाक यत्न करय लागल, जाहि कारण अपन प्रचण्ड रूप नहि धारण कय सकलाह। हर्षक विषय थीक जे युवक संघक सदस्य श्री हरिनाथ मिश्र एहि वर्ष कलकत्ता यूनिवर्सिटी सँ I.A. परीक्षामे फस्ट डिवीजनमे उत्तीर्ण भेलाह अछि। 10. अंक ७, वर्ष-१९३४ ई. कोइलख- ता.।२२-६-३४ई.क श्री डोमाइ मिश्र पंजिकार , श्री रघ्घू झा तथा श्री यशोधर झाक बालकक उपनयन निर्विघ्न समाप्त भय गेल। कोइलख- ता. २४-६-३४ ई.क हरिपुरक श्री परमानन्द झाक ज्येष्ठ बालकक शुभ-विवाह श्री गोवर्द्धन झाक ज्येष्ठा कन्याक संग सानन्द समाप्त भय गेल। कोइलख- श्री तारानाथ झाक अध्यक्षतामे युवक संघक तरफसँ दवा वितरण होयब पूर्ववत जारी अछि। दवा करीब ४ माससँ वितरण भय रहल अछि। ता. २७ जूनक रामपट्टी टीम के लोहटक समीपस्थ गामक टीमक संग फुटबॉलक मैच रामपट्टीक मैदानमे भेलैक। दोसर समयमे लोहटक समीपस्थ गामक टीम नहि खेलेबाक कारण रामपट्टी टीम 'नेट' गोल कय देलकैक। रामपट्टीक तरफसँ कोइलख टीमौक श्री तारानाथ झा तथा श्री सहदेव झा खेलायल छलाह। कोइलख- ता. २५ जूनक रात्रिमे रातिम मंगलाक बाद किशुन मिश्र और विशुन मिश्रमे मारि भय गेलैन्ह। जेकर फलस्वरूप विशुन मिश्र फौजदारी दायर कयलैन्ह। किशुन मिश्र, चिरंजीव मिश्र, बंगटू मिश्र और भिखारी मिश्रपर सम्मन जारी भेलैन्ह अछि। 11. अंक ८, अगस्त १९३४ई. श्रीमती रानी साहिबा चन्द्रावती जी १५०/-रु. पुस्तकालयक मकानक हेतु दान दय असीम यशकेँ यश केँ प्राप्त कयलैन्हि। कोइलख कम्पनीक रामलीला, जे करीब एक डेढ़ माससँ मधुबनीमे भय रहल छल से आव परस्पर विरोध भय जयबाक कारण सर्वदाक वास्ते समाप्त भय गेल। किछु दिन पूर्व कोइलख मध्य चेचकक प्रकोप बहुत जोर छल से आब बन्दे कहक चाही। किन्तु ज्वर अपन आक्रमण जोरे सँ कयने जाइ अछि। मंगल दिन प्रातक तदनुसार ता.४ जुलाईक प्रातःकाल स्थानीय श्री १०८ भद्रकालीक मन्दिरमे ५श्री रानी साहिबा चन्द्रावती जीक दीर्घ जीवनक हेतु दुर्गापाठ होयत। जेकर आयोजन युवक संघ कय रहल अछि। 12. अंक ९,सितम्बर १९३४ई. कोइलख- मोतीपुरमे मधुबनी खादी भण्डारक शाखा श्री दामोदर मिश्रक संरक्षतामे खुजलै। एहि दुकानमे मधुबनीक दरसँ खद्दर विक्री भय रहल अछि। अतएब खद्दर एवं देशी कपड़ा खरीद वालाकेँ एहि दुकानसँ अत्यन्त लाभ भेलैन्ह अछि। आशा कयल जाइछ जे जाहिसँ ई दुकान चिरस्थायी रहि सकै, तेकर यत्न कोइलख तथा कोइलखक समीपस्थ गामक खद्दर प्रेमीवृन्द, करबामे तिलमात्रो पैर पाछू करबामे बाज नहि औताह। गत अगस्त मासमे बड़गोरिया और नाहरक बीच फुटबॉलक मैच तीन बेर भेल। मध्य मे एक बेर पूर्व निश्चय भेलो पर बड़गोरियाक टीम नहि खेलेबाक कारण नाहरक प्लेयरक रास्तासँ घूमि आयल। पूर्व दू बेर खेल समान रहलैक। और अन्तिम खेलमे बड़गोरिया बाबू साहेबक टीम के कूमरि पोखरीक निकटवर्ती मैदानमे दू गोलसँ हरा देलकैन्ह। ओहि टीनू मैचमे कोइलख टीमक प्लेयर नाहर टीमक तरफसँ क्रमशः ७-८ एवं ४ खेलायल रहैन्ह। कोइलख- ता.१३ अगस्तक मैथिल महासभाक तरफ़ सँ एहि गामक भूकम्प-पीड़ित मैथिल वृन्दके सहायतार्थ एक सज्जन प्रेषित कयल गेल छलाह। जे १३७ व्यक्तिकेँ दू-दू रुपैया तथा एक व्यक्ति केँ एक रुपैया अर्थात १३८ व्यक्तिकेँ २७५/-रु. प्रदान कय गेलाह। एहि निमित्त मैथिल महासभा के हार्दिक धन्यवादक संग२ महाराजाधिराज, दरभंगाकेँ कोटिशः धन्यवाद , आशा जे महाराजाधिराज कौन्सिलक अपन भत्ताक कुल ३७००/-रु. भूकम्प पीड़ित मनुष्यक दुःख निवारण काँ महासभा के दय देलैन्ह। कोइलख- श्री तरानाथ झाक अध्यक्षतामे युवक संघक तरफसँ मुफ्त दवा वितरण पूर्ववत जारी अछि। दवा करीब ६ महिनासँ वितरण भय रहल अछि। कोइलख- ता. २९ अगस्तक करीब १० बजे दिनमे १ मिनट तक लगातार भूकम्प होइत रहल। तदनन्तर तीस तारीखक सायंकाल ५ बजेक करीब पुनः किछु सेकंड्स तक भूकम्प भय गेल। उपर्युक्त भूकम्प कैक सप्ताहक बाद भेल छल। 13. अंक १०, अक्टूबर १९३४ई. कोइलख- ता.२ सितम्बरक कोइलख एम.ई. स्कूलक बी. टीम के काको टीमक सङ्ग फुटबॉलक मैच काकोक मैदानमे भेलैक, जाहिमे स्कूलक बी.टीम एक गोलसँ जीतल। ता. १७ और १८ सितम्बरक औनरेट शील्ड ब्रह्मोत्तरा और नेहराक बीच पंडौलक मैदानमे फुटबॉलक खेल भेलैक, जाहिमे कोइलखक ६ प्लेयर ब्रह्मोत्तराक तरफसँ सम्मिलित छलाह। पूर्व दिन समान खेल भय गेलैक, दोसर दिन ब्रह्मोत्तरा चारि गोलसँ जीतिसेमी-फाइनलमे खेलेबाक अधिकारी भय गेल। कोइलख- मातृनवमीक निमित्त एहि गाम मध्य कतिपय मनुष्य सोमेदिन और कतिपय मंगल दिन भोजन करौलैन्ह। कोइलख- ता. ९ मार्चसँ श्री तरानाथ झाक अध्यक्षतामे युवक संघक तरफसँ मुफ्त दवा वितरण कयल जाइ अछि। कोइलखक अतिरिक्त अनेक गामौक जनता मुफ्त दवा लय लाभ उठा रहल छथि। १५ जनवरीक भूकम्पसँ ध्वस्तक कारण मधुबनीक सरकारी कचहरी के अन्यत्र लय जयबाक चर्चा महीनो सँ छल। परञ्च आब विश्वस्त रूपसँ पता लागल अछि जे मजिस्ट्रेटक वर्तमान वासाक रमनामे कचहरी बनाओल जायत। गत २२ सितम्बरक विश्वेश्वर शील्डक फाइनल मैच जमालपुर टीम और कलकत्ता एरियन टीमक संग दरभंगाक मैदानमे भय गेलैक, जाहिमे जमालपुरक टीम दू गोलसँ जीतल। 14. अंक ११, नवम्बर १९३४ई. कोइलख- स्थानीय श्री १०८ भद्रकालीक स्थानमे वृष्टि एवं झकासक कारण दशहराक अष्टमी ओ नवमी दिन नाच-तमाशा होयब त कथे कोन, लोक के भगवतीक दर्शनक हेतु जायब दुष्कर भय गेल छलैक। दशमीक मेलाक मौका पर एहन विकराल काल प्रायः चिरकाल पर भेल छलैक। कोइलख- जेम्हर बाढ़िक आवागमन नहि छैक, तेम्हर वर्षाक अभावसँ कृषकवृन्दमे हाहाकार मचल अछि। कारण जे अधिकांश खेतमे धान सुखा क' पोआर जकाँ भय गेलैक अछि, एहन स्थितिमे शीश कोना क' फूटि सकैछ।बहुतो कृषक तँनिराश भय धानक फसल के काटि २ जानवरक हेतु घासक काजमे लाब लगलाह। यदि किछु दिन तक वर्षा नहि भेल त अनुमान कयल जाइछ जे दशांशो जमीनमे धान फूटि जाइ त गृहस्थक भाग्ये थिक। कोइलख- ता. २९ अक्टूबरक प्रातःकाल करीब ४बजे मे किछु सेकंड तक भूकम्प होइत छल। ई भूकम्प बहुत दिनक बाद भेलाक कारण जनतामे पुनः नवीन डर उत्पन्न भय गेलैक अछि। कोइलख- श्री तरानाथ झाक अध्यक्षतामे युवक संघक दिशिसँ पूर्ववत बिना मूल्य औषध वितरण भय रहल अछि।औषध लगभग ८माससँ वितरण भय रहल अछि। कोइलख- बोर्डक दिशिसँ श्री खर्गनाथ झाक दरबाजाक आगाँ पानिक कल लगावल गेलैक अछि। एहिसँ राही-बटोही तथा समीपस्थ निवासीकेँ अत्यन्त उपकार भय रहलैक अछि। रानीटोलक श्री रामचन्द्र झा'चन्द्र' जे एहि प्रभातक उच्च श्रेणीक एक लेखक छथि, स्वरचित 'स्वर्णपुरी का राणा' नामक पुस्तक उक्त पत्रक सम्पादक केँ अढ़ाई आना मूल्य रहितहुँ प्रचारार्थ केवल एक आना मूल्य मे विक्रय करबाक हेतु प्रेषित कय देलथिन्ह अछि। वस्तुतः पुस्तक उत्तम छैक अतः प्रत्येक विद्या प्रेमीवृन्द अवश्य एक२ प्रति पुस्तक खरीद कय पढ़थि। 15. अंक १२, दिसम्बर १९३४ई. कोइलख- ता. ९ मार्च १९३४ई.सँ श्री तारानाथ झाक अध्यक्षतामे युवक-संघक दिशिसँ बिना मूल्य औषध वितरण भय रहल अछि। कोइलखक अतिरिक्त अनेक समीपस्थ गामौक जनता विना मूल्य औषध लय लाभ उठा रहल छथि। हर्षक विषय थिक जे राजग्राम निवासी श्री अयोध्या नाथ सिंह ठाकुर, जे सम्प्रति युवक संघक सदस्य छथि, दरभंगा राज्यमे केवल ६ मासक हेतु सहायक मैनेजरक पद पर सुशोभित कयल गेलाह अछि। तदनन्तर मैनेजरक स्थान भेटवाक आश्वासन राज्यक दिशि सँ देल गेलैन्ह अछि। कोइलख- ता.१९ नवम्बरक स्थानीय फ्री. एम.ई.स्कूलक निरीक्षण करबाक हेतु स्कूल विभागक डेप्युटी इंस्पेक्टर पदार्पण कयने छलाह। स्कूलक कार्य्यवाहीसँ अति संतुष्ट भेलाह। कोइलख- सम्प्रति दामस एवं मलेरिया ज्वरक पूर्ण प्रकोप अछि।।एहि दुःख सँ ग्रसित भय कतिपय मनुष्य विकराल कालक गालमे प्रवेशो कय रहलाह अछि। प्रायः भारत वर्षक प्रत्येक प्रान्त मे असेम्बलीक सदस्यक हेतु अधिकांश कांग्रेस व्यक्तिए निर्वाचित भेलाह अछि। ताहूमे बिहारसँ कांग्रेसक अतिरिक्त एको व्यक्ति नहि भय सकलाह। दरभंगा और सारणसँ तीन व्यक्ति ठाढ़ भेल छलाह, जाहिमे कांग्रेसक उम्मीदवार श्री सत्यनारायण सिंहक विजय भेलैन्ह, जिनका ४१४६ भोट भेलैन्ह। कुमार गंगानन्द सिंह (दरभंगा राज्यक प्राइवेट सेक्रेटरी) और श्री रामकृष्ण झा (एडवोकेट, पटना) हारि गेलाह, जिनका क्रमशः १४१७ और ३४३ भोट भेलैन्ह। अत्यल्प भोट होयबाक कारण श्री रामकृष्ण झाक जमानतक रुपैया जप्त कय लेल गेलैन्ह। कोइलख - प. श्री शिवनन्दन ठाकुर व्या.तीर्थ एहि वर्ष पुनः कलकत्ता यूनिवर्सिटी सँ सेकंड क्लासमे हिन्दीक एम.ए. क उपाधि प्राप्त कयलैन्ह अछि। एहिसँ पूर्वहु कलकत्ता तथा पटना यूनिवर्सिटी सँ क्रमशः फस्ट और सेकंड क्लासमे संस्कृतक एम.ए.क डिग्री प्राप्त कयने छथि। ता. १५ सँ १७ नवम्बर तक दरभंगामे अखिल भारत वर्षीय मैथिल पण्डित महासम्मेलन दरभंगा महाराजक दिशिसँ बड़ा समारोहक संग भेल छल जाहिमे पण्डितवृन्द केँ भोजनक अतिरिक्त रेल भाड़ा इत्यादि राज्यक दिशिसँ देल गेलैन्ह। कोइलख - ता.११ नवम्बरक पौने दशबजे दिनमे लगभग एक मिनट तक बहुत जोर सँ भूकम्प होइ छल, जाहिसँ जन समुदाय बहुत भयभीत भय गेल। रामपट्टी- कार्तिक-पूर्णिमा मे कमला-स्नान करबाक हेतु करीब पच्चास-साठि हजार नर-नारी जमा भय गेल। एहन मेला बहुत वर्षक बाद लागल छल। नाशकारी जूआक खेलक खूब धूम छल। ता.१७ नवम्बर केँ श्रीमान महाराज कुमार साहिब श्री विश्वेश्वर सिंह घोषणा कयलन्हि जे एक मास मध्य जे महानुभाववृन्द चिरस्मरणीय मैथिल शिरोमणि भूतपूर्व विद्यापति ठाकुरक विषयमे अर्थात हुनकर अतुल कीर्तिकीर्तन मिथिला भाषामे रचना लिखि प्रेषित करताह, ताहिमे सर्वोत्कृष्ट लेख जिनकर पावल जयतैन्हि, ओहि महानुभाव केँ एक शत (१००)रुपैया पारितोषिक भेटतैन्ह।(लेख यदि मिथिलाक्षर मे हो त उत्तम) ********* 'प्रभात'क समाचार संकलनक व्यापकता आ खेल समाचारक मैथिली पत्रिकामे प्रारम्भ करबाक दूरदर्शिता पर मैथिलीक प्रसिद्ध आलोचक मोहन भारद्वाजक विश्लेषण हुनक एकल पाठ पोथीमे संकलित अछि, जे शोध पत्रिका ' जिज्ञासा'मे सेहो प्रकाशित भेल अछि-प्रस्तुत अछि- " समाचार खण्डक उक्त बानगीसँ पता चलैत अछि जे सम्पादकक दृष्टि कतेक व्यापक छलनि। समाचार संकलित करैत काल हुनका सम्मुख मिथिलाक विभिन्न क्षेत्र आ मिथिलाक गतिविधिक विभिन्न क्षेत्र तँ रहिते छलनि, मिथिलाक सभ जाति आ वर्गक लोक सेहो रहैत छलनि। हुनका लेल व्यक्ति नहि, व्यक्ति आ समाजक जीवन-स्थिति केँ प्रभावित करयवला घटना महत्वपूर्ण होइत छल। एकटा उदाहरण देखल जाय। अगिलग्गी ककरो लेखे बड़ पैघ घटना थिक। हम सभ जनैत छी जे पूर्णियाक श्रीनगर ड्योढ़ी अग्निकांडमे भस्म भs गेल। एक दिस ओ १३ अप्रैल १९३३ केँ श्रीनगर ड्योढ़ीक जरि केँ छाउर भs जयबाक पूर्ण विवरण संग महाराजाधिराज, दरभंगाक श्रीनगर ड्योढ़ीमे १७ जुलाई १९३३केँ करीब चारि घंटा रहबाक सूचना दैत छथि तँ दोसर दिस ई समाचार सेहो प्रकाशित करैत छथि जे २७मई,१९३४ केँ कोइलखक बटौआ धानुकक घरमे करीब चारि बजे दिनमे आगि लागि गेलैक जे जन-समुदायक तत्परतासँ विकराल रूप धारण करबासँ पूर्वहि शान्त कs देल गेल। एहिना कोइलखक महादेव ठाकुरक घरमे १५ अप्रैल १९३४केँ निशाभाग रात्रिमे कोनो दुष्ट द्वारा आगि लगायब आ हुनक सभ घर तथा सैकड़ो मन अनाजक जरि जायब उल्लेखनीय अछि तँ ओही गामक धोबि सभक घरक स्वाहा भs जयबो महत्वपूर्ण अछि। एहि तरहेँ कहि सकैत छी जे 'प्रभात' मैथिलीमे समाचार-विचारक नेओं रखलक। साहित्यिक पत्रिकाक ओहि युगमे सामाजिक-राजनीतिक घटनाक प्रति अतिरिक्त अभिमुखता एकटा एहन पृष्ठिभूमिक निर्माण कयलक जकर फलाफल भेल ' दैनिकस्वदेश' (1955 ई.)। इएह दृष्टिकोण थिक जाहि कारणे प्रभातमे कविता-कथाक अपेक्षा निबन्धक संख्या बेसी अछि।" समाचार संकलनक उपर्युक्त समाचार मात्र मैथिलीक एतय प्रस्तुत अछि, हिन्दीमे लिखित समाचार जखन हिन्दी खण्डक अलगसँ दोसर भागमे प्रकाशनक समय सम्मिलित कयल जायत। श्रीनगर ड्यौढ़ीक समाचार विस्तारसँ पंडित ब्रजनाथ झा लिखने छथि, ओ हिन्दीमे अछि आ कतिपय अन्य समाचार सेहो। संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-7 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-8 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-9 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-10 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-11 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-12 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-13 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.३.लालदेव कामत-बाँकी जीवन : अनुभव, जिम्मेदारी, आ अर्थक खोज लालदेव कामत बाँकी जीवन : अनुभव, जिम्मेदारी, आ अर्थक खोज मधुबनी जिलाक बेरमा ग्रामवासी वरेण्य साहित्यकार श्री जगदीश प्रसाद मंडल जीके 'ठुठ गाछ' मैथिली उपन्यास तँ २०१५ ई० मे मुद्रीत भऽ गेल रहय,जकर पाँचम संस्करण सन् २०२४ मे पल्लवी प्रकाशन निर्मली सँ निकलल छल। एहिके आई एस बी एन ९७८९३८७६७५२५४ छै। ऐ पोथिक लोकार्पण श्री कमलेश झा जीक कर कमल सँ भेल अछि। संशोधित ई- पोथी संस्करण - २०२६ ई०मे बहराए गेल हेन। सद्यप्रकाशित उपन्यासमे एकमात्र स्त्री पात्रक नाम छैक -: सुभद्रा आ पुरुष पात्रमे प्रो० रामकृष्ण, साहित्यसेवी- धीरेन्द्र,सिनुरिया उर्फ़ श्याम सुंदर - मशाला भौरीबाला, अच्छेलाल - नामी चाहबाला, फोंचाई दास एक पितमरू जौन आर राधाचरण काका- पड़ोसी, सीबीआई सँ सेवानिवृत्त । कथाक्रम सुखान्त आरंभ म रहैछ तँ आखरिमे दुखान्तक खबेर दूरदेश सँ पड़ोसी माध्यम वार्ता सँ परिलक्षित होईछ। २८,४७४ शव्दमाल सँ गंथल " ठूठ गाछमे " कोनो असाधारण नायकके कथा नै छै। ई एकटा एहन साधारण आदमीके कथा छै जे अपन जीवनक बेसीरास समय अपन जिम्मेदारीके निर्वहनमे बिता देने छै । आब जीवनक बादक अवस्थामे सोचय लगैत छथि जे हुनका जे समय बचल छनि तकर असली अर्थ की छनि । ई उपन्यास जीवनकेँ उपलब्धि वा उत्कृष्टताक दौड़ नहि बुझैत अछि । ई जीवनके विराम, धक्का, आत्मनिरीक्षण, आरू नया अर्थक खोजके प्रक्रियाक रूपमे प्रस्तुत करैत छैक । उपन्यासक आरम्भ गोधूलि बेला गहींर होइत अन्हार आ ठूठ भेल गाछक दर्शनसँ होइत अछि । एहनेके वैद्यनाथ मिश्र " यात्रीजी" पत्र हीन नग्न गाछ धरि कहने रहथि। ई दृश्य मात्रे वातावरण बनेबा सँ आगूए नै बढ़ि गेल अछि ; वरन् ई समस्त रचनाक केंद्रीय प्रतीक बनि जाइत अछि । ठूठहा गाछ जीवित अछि, तइयो सक्रिय अछि। ई समयक मौन गवाह अछि, बहुत किछु देखि चुकल अछि, से आब काज करबा मे असमर्थ अछि । ई प्रतीक वृद्ध रामकृष्ण बाबूक जीवन सँ गहींरतल धरि जुड़ल अछि । ओकर देह एखनो सक्रिय अछि, चेतना सतर्क रहैत छैक, तइयो ओ धीरे-धीरे जीवनक मुख्यधारा सँ विरक्त भ' रहल अछि । एतय ठूठ भेल गाछ मृत्युक संकेत नहि दैत अछि; ई ओहि जीवन दिस इशारा करैत अछि जे एखनो बाँचि गेल अछि।

सन् 1925 सँ शुरू भेल रामकृष्ण बाबू 'क जीवन स्वतंत्रता आन्दोलन, जमींदारी व्यवस्था, भूमि संघर्ष, आ स्वतंत्र भारत 'क सामाजिक विडंबना' क बीच आकार लैत अछि । उपन्यासकार श्री मंडलजी अपन व्यक्तिगत जीवन केँ इतिहासक व्यापक धाराक भीतर स्थापित करैत छथि । एकरे परिणाम ई छै जे कथा ग्रामीण भारत केर सामूहिक यात्रा सँ कम नहिं,एक व्यक्तिके विषयमे कम अवश्य होय छै । भारतके किसान आ गाम आधारित समाजके रूपमे चित्रित करब ,लेखक स्थापित करैत छथि जे गामक उपेक्षा राष्ट्र केँ भीतर सँ क्षीण करैत अछि । जमीन आ जमींदारिता मात्र राजनीतिक संरचनाके समस्या नहिं थिक; ई सब मानव विघटनके संरचना सेहो छैक। रामकृष्ण केरऽ जन्म जमीन मालिक परिवारमे होय छै, परंच परिवार केरऽ विघटन जल्दीमे खुजि जाय छै । सम्पत्तिक क्षरण, आ पिताक मृत्यु आओर भाय - बहिनक बँटबारा हुनका समय सँ पहिने जिम्मेदारीमे धकेलि देलकनि । पूरा परिवारक भार हुनके कान्ह पर पड़ैत छनि । एहिठाम उपन्यास संयुक्त परिवार सँ व्यक्तिगत जिम्मेदारीमे संक्रमणके आत्मीयता सँ दस्तावेजीकरण करै छै । रामकृष्ण नै विद्रोह करैत छथि आ नै परिस्थिति सँ भागैत छथि । ओ परम्परागत रूपेँ चुपचाप जिम्मेदारी लैत छथि-ई हुनकर संघर्ष छनि, आ ई हुनकर नैतिकता छनि। रामकृष्णके लेल शिक्षा आत्म-विकासके साधन आरू पारिवारिक जिम्मेदारीके निर्वहनके साधनो छै । ओना उपन्यासमे ई स्पष्ट कयल गेल अछि जे शिक्षा अपने आपमे मुक्ति नहि थिक । सामाजिक संरचना असंतुलित रहैत अछि त शिक्षित व्यक्ति सेहो बान्हले भ' जाइत अछि । खेती-बारीके अछैत रामकृष्णके एहि सँ दूरी बदलैत सामाजिक मानसिकताक दिश इशारा करैत अछि, जतय शिक्षा आ कृषिके बीचक अंतर लगातार बढ़ैत जा रहलैक अछि । ई अन्तर खाली पेशे केर नै छै, बल्कि मनोवृत्तिके सेहो छै । रामकृष्ण कोसी क्षेत्रमे शिक्षक बनि सीमित आय, जोखिम, आ त्यागक जीवन स्वीकार करैत छथि | हुनका महापुरुषक रूपमे चित्रित नहि कयल गेल अछि । ईमानदार आ कर्तव्यनिष्ठ छथि, मुदा साधारण आदमी। ओकर विधवा माय ओकर जीवनक नैतिक केन्द्र बनि जाइत छैक । भूख आ संकल्पक विपरीतता उपन्यासक एकटा मार्मिक बिन्दु अछि । भूख सहनाइ आ संकल्प पूरा करब एक समान नहि अछि, आ लेखक एहि भेद केँ गहींर संवेदनशीलताक संग प्रस्तुत कयलाह अछि । रामकृष्णक आत्मसंवाद जीवनक विविधता, दिशाहीनता, आ आन्तरिक खोजकेँ उजागर करैत अछि । एतय जीवन संघर्ष केर घोषणाके रूपमे नै अपितु जिम्मेदारीके मौन स्वीकारके रूपमे उभरैत अछि |आओर कर्मके प्रवचनके रूपमे प्रस्तुत नै कयल जाइत अछि, ओकर अर्थ रोजमर्राके श्रम, ईमानदारी आ आत्मसंयममे भेटैत अछि | उपन्यासकार शुरूए सँ स्पष्ट क' दैत छथि जे ई वीरताक नहि अपितु स्थायित्वक​​कथा थिक; उदात्तताक बात नहि अपितु स्थिरताक विषय मे। एतयके जीवनके अपन जड़िके परीक्षाके रूपमे देखल जाइत अछि। दोसर चरणमे रामकृष्णक सबसँ पैघ आन्तरिक संघर्ष स्पष्ट भ' जाइत अछि । एम.ए. करबाक इच्छा सालों सँ अछि, मुदा एकरा व्यवहारमे उतारबाक साहस देरी सँ विकसित होइत अछि। साहित्य आ अर्थशास्त्रक बीच सदिखन फाटल रहैत छथि । समय बढ़ैत अछि, आ निर्णय बेर-बेर स्थगित भ' जाइत अछि। अंतमे ओकरा ई अहसास होय छै कि लक्ष्य खाली इच्छाके माध्यम सँ नै, बल्कि अनुशासन आरू समयके सही उपयोगके माध्यम सँ प्राप्त होय छै । संकल्प बनैत छैक, मुदा तखने एकर माय आ छोट भाइ-बहिनक जिम्मेदारी स्पष्ट भ' जाइत छैक। आत्म-विकास आ पारिवारिक दायित्वक ​​बीचक ई द्वंद्व ओकर सम्पूर्ण जीवनक क्रम निर्धारित करैत अछि । तेसर चरणमे उपलब्धि भेटैत अछि, मुदा ओकर संग नव जटिलता सेहो अबैत अछि। एम.ए. स्वतंत्रताक बादक सामाजिक परिदृश्य, संस्थाक निर्माण, आ गामक स्थिरता सब किछु ध्यानमे अबैत अछि । रामकृष्णजी राम कृष्ण कॉलेजमे पढ़ेबाक आकांक्षा आ आर्थिक सीमाक बीच संघर्ष करैत रहैत छथि । पंडौल कॉलेजमे हुनकर नियुक्ति हुनकर जीवनमे एकटा मोड़ अछि, मुदा एकर पूर्ण समाधान नहि अछि। लेखक ई दर्शाबै छैथ कि व्यक्तिगत यात्रा शिक्षा व्यवस्था, अवसरके असमानता, आरू राष्ट्रीय यथार्थ केर संग गहराई सँ जुड़ल छै । चारिम चरणमे प्रोफेसरक जीवन बेसी स्थिर भ' जाइत छनि. दरमाहा बढ़ैत अछि, सम्मान भेटैत अछि, आ पढ़ाई आ पुस्तकालयक दुनिया खुजि जाइत अछि। मुदा एकर संग-संग सामाजिक अलगाव सेहो बढ़ैत अछि । रामकृष्ण धीरे-धीरे गामक जनजीवनसँ हटि जाइत छथि । ओकर दुनियाँ किताबमे सिकुड़ि जाइत छैक। एतय उपन्यास एकटा मौन प्रश्न ठाढ़ करैत अछि जे समाज सँ कटल विद्वानक लेल कोन सामाजिक भूमिका रहि जाइत छैक ? पाँचम चरण मे रामकृष्णक साहित्यिक साधना उभरैत अछि । कविता, गीत, डायरी, संगीत हुनका भीतर बहैत अछि । अपन संग्रह प्रकाशित करैत छथि आ एकरा अपन जीवनक विशेष उपलब्धि मानैत छथि । मुदा समाजक प्रतिक्रिया हुनक अपेक्षासँ कम अछि । पोथी नहि बिकाइत अछि, आ ओकरा कोनो सराहना नहि भेटैत छैक। ई क्षण गहींर मार्मिक अछि। लेखक स्पष्ट करैत छथि जे लेखन एकटा व्यक्तिगत साधना थिक, मुदा एकर टूटब सामाजिक उपेक्षा सँ सेहो जुड़ल अछि । एतहि रामकृष्ण आलोचना आ अनुवाद दिस मुड़ैत छथि । ठूठ बनब खाली उम्रके परिणाम नै छै, सामाजिक निराशाके परिणाम सेहो खूब छै। छठम चरण उपन्यासक सांस्कृतिक विस्तार अछि । गामक मंच, साहित्यिक आयोजन, आ विभिन्न क्षेत्रक विद्वानक उपस्थिति गामक बौद्धिक जीवन केँ जीवंत करैत अछि | धीरेन्द्र आ रामकृष्णक वर्षोंक दूरी संवादमे परिणत भ' जाइत अछि । ई भाग ई दर्शाबै छै जे संबंधके गहराई समय सँ नै, संवाद सँ बनल होय छै । सातम चरण सेवानिवृत्ति अछि। ई खाली कैरियर केर अंत नै छै, ई पहचानके संकटो छै। पेंशन अछि, घर अछि, मुदा काज नहि। रामकृष्ण सवाल उठबैत छथि जे बिना श्रमके मर्यादा आ अर्थ कोना जीवित रहत। सुभद्रा संग हुनक वैवाहिक तनाव एहि शून्यता सँ निकलैत अछि । एहि खंडमे घरेलू जीवनक सूक्ष्म मनोविज्ञान केँ बिना कोनो मेलोड्रामाक संवेदनशीलता पूर्वक प्रस्तुत कयल गेल अछि | आठम चरणमे जीवनक शेष भागक दिशा स्पष्ट होइत अछि । तीन बेटा, तीन अलग-अलग जिबिका संसार, आ रसे-रसे टुटैत पारिवारिक संरचना उभरैत अछि। सुभद्राक व्यावहारिक बुद्धि आ आत्मसम्मान कथ्यक संतुलन बना दैत अछि । अंततः सृष्टिक विचार निर्णायक रूप लैत अछि । गीताके अनुवादक प्रकल्प केवल एक कार्य तक सीमित नै छै; हेरायल अर्थक पुर्नप्राप्तिक साधन बनि जाइत अछि । "अपन कर्तव्य करू" एतय प्रवचनक रूपमे नहि देखाइत अछि; जीवनके समझै आओर जीबैके दृष्टि बनि जाय छै। ठूठ गाछ अर्थात "शेष जीवन" ई दर्शाबै छै जे जीवनक अंतिमो चरण निरर्थक नै छै । चेतना जागि गेल तऽ जीवनक शेष भाग सेहो सृष्टिक अवसर बनि सकैत अछि । रामकृष्ण बाबू ठूठ जकाँ छथि, मुदा हुनकर जड़ि एखनो जीवित अछि । ओ जड़ि ओकरा जीवनसँ जोड़ने रहैत छैक । आखरि क्षणमे मिथिलाक रामपुर- कृष्णपुर,पण्डौल- झंझारपुर क्षेत्र सँ बाहर दूर देशमे छथि। एहि उपन्यासमे कोनो सहज निष्कर्ष नहि भेटैत अछि । ई जीवन केर ऐहन सवालके ताकि संबोधित करैत छै जे निठाहे अनुत्तरित रहै छै । ठूठ गाछ कहू वा "जीवन'क शेष" हमरा सब पाठकके ई विचार करय लेल बाध्य करैत अछि जे ,जे बचल अछि जीवन ओ भरिसक सबसँ बेसी मूल्यवान छैक। रामकृष्ण बाबूक जीवनमे जे विराम आ आत्म निरीक्षण होइत छैक से एहि रचनाक सार थिक । - लाल देव कामत, नौआबखर मो० ७६३१३९०७६१ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.४.प्रणव कुमार झा- चिकित्सा शिक्षा एवं सेवाक नव क्षितिज: NBEMS द्वारा 'AI in Medical Education' पाठ्यक्रमक शुभारंभ प्रणव कुमार झा चिकित्सा शिक्षा एवं सेवाक नव क्षितिज: NBEMS द्वारा 'AI in Medical Education' पाठ्यक्रमक शुभारंभ पिछला 1-2 वर्ष के सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम(phenomena) जे वैश्विक स्तर पर लोक सबहक दैनिक जीवन, आर्थिक, अकादमिक आ पेशेवर जीवन के प्रभावित कऽ रहल अछि मे से एकटा अछि कृत्रिम प्रज्ञा (AI) के क्षेत्र मे नित नव प्रगति आ वैश्विक स्तर पर जीवन केर हरेक क्षेत्र मे एकर उयपयोग। लोक सब अपन मनोरंजन, जिज्ञासा, लोक के बुरबक बनाबाय से लऽ कऽ अलग अलग पेशा मे लागल लोक अपन पेशेवर क्षमता के विकास मे एकर प्रयोग कऽ रहल छथि। विभिन्न माध्यम से लोक एक दूसरा से सीख - सीखा रहल छथि आ आगा बढि रहल छथि। मुदा जीवन के विभिन्न क्षेत्र मे एकर बेहतर आ पेशेवर प्रयोग के लेल ओहि क्षेत्र मे ज्ञान आ अनुभव, बेहतर प्रोम्प्टिंग तकनीकी, नैतिक दृष्टिकोण, डाटा सुरक्षा, आ कानूनी पहलू आदि के जनतब भेनाई सेहो बड्ड आवश्यक अछि। स्वास्थ्य आ चिकित्सा क्षेत्र सेहो एहि प्रगति से अछूत नै रहल अछि आ वैश्विक स्तर पर ऐ क्षेत्र मे AI तकनीक के उपयोग चिकित्सा आ स्वास्थ्य देखभाल के बेसी सुगम, सटीक आ सुलभ बनाबय लेल भऽ रहल अछि। आजुक स्वास्थ्य सेवा आ चिकित्सा शिक्षा के अहि युग मे इलेक्ट्रॉनिक्स, बिग डेटा, ऑटोमेटेड डाइग्नोस्टिक्स सऽ लऽ कऽ क्लीनिकल डिसीजन सपोर्ट तक अनेक क्षेत्र मे AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के उपयोग तेजी सऽ बढ़ल अछि। ई तकनीक चिकित्साकर्मी सभक सोच, निर्णय, सुरक्षा आ शिक्षा के एक नव पक्ष प्रदान कऽ रहल अछि  जाहि सऽ मरीजक देखभाल और स्वास्थ्य परिणाम बेहतर बनाओल जा सकय। चिकित्सक लोक के AI के आधारभूत सिद्धान्त, उपयोगिता, आ नैतिक विचार सभक विषय मे ज्ञान प्राप्त करबाक आवश्यकता अछि विशेषकर भारत जेहन विशाल स्वास्थ्य प्रणाली मे दक्षता आ सर्वसुलभता के बढ़ावा देबय लेल। भारतक स्वास्थ्य सेवा क्षेत्रमे कृत्रिम प्रज्ञा (AI) क प्रयोगकें बढ़ावा देबाक लेल एकटा अत्यंत महत्वपूर्ण डेग उठाओल गेल अछि। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकारक अधीन आयुर्विज्ञान राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड (NBEMS) द्वारा ऑनलाइन प्लेटफॉर्मक माध्यम सँ "Artificial Intelligence (AI) in Medical Education: Vikasit Arogya Bharat" नामक एकटा नि:शुल्क ऑनलाइन कार्यक्रमक शुभारंभ 21 जनवरी 2026 से कएल गेल अछि। एहि कोर्स के पोर्टल आ रजिस्ट्रेशन के शुभारंभ 21 दिसंबर 2025 के कैल गेल छल। ई कार्यक्रम मुख्य रूप सँ स्नातकोत्तर (PG) चिकित्सक, संकाय सदस्य (Faculty) आ अन्य स्वास्थ्य पेशेवर सभक लेल तैयार कएल गेल अछि, जे आधिकारिक तौर पर 21 जनवरी 2026 सँ शुरू भऽ कऽ 6 मास धरि चलत। एहि कार्यक्रमक मुख्य उद्देश्य चिकित्सक सभकें एआई (AI) क सुरक्षित, नैतिक आ प्रभावी प्रयोगक शिक्षा प्रदान कएनाइ अछि, जाहि सँ ओ सब अपन 'क्लिनिकल प्रैक्टिस', चिकित्सा शिक्षा आ स्वास्थ्य प्रणालीमे एआई केर भरपूर लाभ उठा सकथि। National Board of Examinations in Medical Sciences (NBEMS) भारत सरकारक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालयक अधीन एक स्वायत्त निकाय अछि। ई बोर्ड डॉक्टर, प्रशिक्षु और चिकित्सीय विशेषज्ञ सभक परीक्षा, शिक्षा, प्रमाणन आ गुणवत्ता सुनिश्चित करबाक कार्य करैत अछि। एहि संस्थाक महत्वपूर्ण भूमिका अछि: �     डाक्टरी डिग्री डीएनबी/DrNB/एफ़एनबी कार्यक्रम सभक परीक्षा और मानकीकरण �     नीट-पीजी/नीट-एमडीएस/नीट-एसएस/एफ़एमजीई/MRE/DRE सन  राष्ट्रीय आ अंतरराष्ट्रीय चिकित्सक परीक्षा सभक  आयोजन �     चिकित्सीय शिक्षा मे सुधार �     उन्नत प्रशिक्षण और अध्यापन मापदंड विकसित करब AI इन मेडिकल एजुकेशन कोर्स सेहो एहि मिशनक एकटा भाग अछि जाहि सऽ आधुनिक चिकित्सीय शिक्षा मे तकनीकी दक्षता आ नैतिकता एक संग आगा बढ़य। ई पाठ्यक्रम मुख्य रूप सँ चिकित्सा क्षेत्रक पेशेवर सभकें एआई (AI) केर व्यावहारिक ज्ञान सँ परिचित करेबाक लेल अछि। एकर मुख्य उद्देश्य निम्न अछि: �     तकनीकी साक्षरता: डॉक्टर सभकें एआई केर मूल सिद्धांत आ चिकित्सा विज्ञानमे एकर उपयोगिता बुझाएब। �     नैतिक दृष्टिकोण (Ethics): चिकित्सा क्षेत्रमे एआई केर प्रयोग काल डेटा गोपनीयता आ नैतिक मापदंडक रक्षा कएनाइ। �     निर्णय क्षमता (Decision Making): नैदानिक (Clinical) निर्णय लेबाक प्रक्रियामे एआई कें एकटा सहायक उपकरणक रूपमे अपनाएब। �     स्वदेशी समाधान: भारतीय स्वास्थ्य ढाँचाक अनुकूल एआई समाधान विकसित करबाक लेल प्रेरित कएनाइ। ई पाठ्यक्रम अत्यंत सुविचारित आ व्यवस्थित बनाओल गेल अछि। एकरा 20 मॉड्यूल मे विभाजित कएल गेल अछि, जाहिमे प्रत्येक मॉड्यूल मे 40 सँ 50 मिनट धरि के लाइव ऑनलाइन क्लास होयत जे मुख्यतः साप्ताहिक रूप से प्रत्येक बुधवार दुपहर 4 बजे से निर्धारित अछि। जाहि मे मुख्य व्याख्याता के व्याख्यान के बाद मोडरेटर द्वारा प्रशिक्षण से जुडल पेशेवर सभक उपयोगी प्रश्न के उठा कऽ ओकर उत्तर देबाक फॉर्मेट छैक।  एकर मुख्य उद्देश्य चिकित्सक सभकें 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' (AI) क मूल सिद्धांत सँ परिचित करेबाक अछि, जाहि मे कोनो गहन गणितीय सूत्र या जटिल प्रोग्रामिंग ज्ञानक आवश्यकता नहि पड़त। ई पाठ्यक्रम एआई कें चिकित्सा क्षेत्रमे एकटा 'सहायक' (Augmentation) क रूपमे प्रस्तुत करैत अछि, नहि कि मानव मेधाक विकल्पक रूपमे। पाठ्यक्रम के प्रमुख मॉड्यूल निम्नलिखित अछि: �     चिकित्सक सभक लेल एआई क परिचय: स्वास्थ्य सेवामे एआई क अवधारणा, स्वचालन (Automation) आ एआई मे अंतर, आ भविष्यवाणिक तुलनामे निर्णय प्रक्रियाक समझ। �     बायोस्टैटिस्टिक्स सँ एआई धरि: जैव-सांख्यिकी सँ एआई धरि पहुँचबाक मार्ग, जाहिमे रिग्रेशन सँ लऽ कऽ 'डीप लर्निंग' धरि चर्चा अछि। �     क्लिनिकल डेटा आ सही प्रश्नक चुनाव: सही प्रश्न पूछबाक कला, संरचित-असंरचित डेटा क समझ, आ 'गार्बेज इन-गार्बेज आउट' क अवधारणा। �     असंरचित आ त्रुटिपूर्ण डेटा: डेटाक कमी सँ उत्पन्न समस्या आ दस्तावेजीकरण मे पूर्वाग्रह। �     मशीन लर्निंगक मूल सिद्धांत: एमएल (ML) क आधारभूत अवधारणा, ओवरफिटिंग आ अंडरफिटिंगक समस्या। �     चिकित्सामे डीप लर्निंग: सीएनएन (CNN), एनएलपी (NLP) आ ट्रांसफॉर्मर आदि क चिकित्सा क्षेत्रमे उपयोगिता। �     पूर्वाग्रह आ निष्पक्षता: स्वास्थ्य सेवा एआई मे व्याप्त पूर्वाग्रह, एल्गोरिथमिक निष्पक्षता आ नैतिकता। �     एआई क नैतिकता: मरीजक सहमति, पारदर्शिता आ मानवीय गरिमाक रक्षा। �     साइबर सुरक्षा आ डेटा गोपनीयता: साइबर जोखिम, डेटा सुरक्षा आ डीपीडीपी (DPDP) एक्टक महत्व। �     एआई टीमक निर्माण आ संचालन: नैदानिक एआई टीमक गठन आ ओकर शासन-प्रशासन। एहि पाठ्यक्रमक लक्ष्य 50000 चिकित्सक सभकें (15000 प्रशिक्षक आ 35000 प्रशिक्षु) प्रशिक्षित कएनाइ अछि, जाहि सँ ओ भारतीय परिवेशक अनुकूल एआई समाधानक सह-निर्माता बनि सकथि। ई कार्यक्रम एआई कें भारतीय स्वास्थ्य सेवाक मौलिक चुनौती (जाहिमे ग्रामीण पहुँच आ संसाधनक अभाव शामिल अछि) सँ जोड़ैत अछि। एखन धरि पाठ्यक्रम के लेल 52000 से बेसी मेडिकल आ मेडिकल एलाइड प्रोफेशनल रजिस्ट्रेशन करा चुकल छथि। भारतक कोना-कोना सँ डॉक्टर सभ एहिमे जुड़ल छथि, जे ई दर्शाबैत अछि जे एआई आब केवल महानगर धरि सीमित नहि अछि। यद्यपि पहिल लाइव मॉड्यूल  21 जनवरी के भेल छल आ दोसर 28 जनवरी के निर्धारित अछि, तथापि देशक विभिन्न कोना से चिकित्सक आ अस्पताल आ मेडिकल संस्थान सभक अनुरोध पर 31 जनवरी तक रजिस्ट्रेशन खुजल राखल गेल अछि जे एनबीईएमएस के निर्णय से आगा सेहो बढ़ाओल जा सकय अछि। पहिल लाइव मॉड्यूल मे 22 हजार से बेसी पेशेवर औपचारिक रूप से हाजिरी बना के लाइव सेशन मे उपस्थित रहल छलाह। संकाय (Faculty) आ वैश्विक सहयोग: एहि पाठ्यक्रमक सभ सँ पैघ विशेषता एकर विश्वस्तरीय विशेषज्ञ संकाय अछि। एहिमे मेयो क्लिनिक, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, आईआईएससी बेंगलुरु, आईआईएम लखनऊ, जीई हेल्थकेयर आ माइक्रोसॉफ्ट इंडिया जेहन प्रतिष्ठित संस्थानक दिग्गज सब शामिल छथि। प्रमुख विशेषज्ञक रूपमे पद्म विभूषण डॉ. डी. नागेश्वर रेड्डी (एआईजी हॉस्पिटल्स) आ डॉ. रसेल फ्रैंको डिसूजा (यूनेस्को चेयर इन बायोएथिक्स) जेहन व्यक्तित्वक सहभागिता अछि। ई अंतरराष्ट्रीय सहयोग भारत कें वैश्विक एआई स्वास्थ्य ज्ञानक मुख्यधारा सँ जोड़ैत अछि। कार्यक्रमक प्रभाव: तकनीकी साक्षरता: एहि कार्यक्रम द्वारा भारत के कोना कोना मे कार्यरत आ प्रशिक्षण लऽ रहल चिकित्सक सभकें वृहत्त स्तर(mass level) पर एआई-साक्षर बनेबाक प्रयास अछि , जाहि सँ ओ तकनीकक आलोचनात्मक आ विवेकपूर्ण प्रयोग कऽ सकथि। नैतिक प्रयोग: भारतीय चिकित्सक सभ मे पूर्वाग्रह मुक्त एआई उपयोग आ गोपनीयता सुनिश्चित करब सेहो एहि कार्यक्रम के प्रभावी उद्देश्य अछि। भारत-केंद्रित समाधान: ग्रामीण स्वास्थ्य आ सीमित संसाधनक स्थिति मे एआई क उपयोगिता द्वारा चिकित्सा सेवा के बेसी सऽ बेसी दक्षतापूर्ण आ सर्वसुलभ बनाएब। विशाल नेटवर्क: 50000 से बेसी चिकित्सक आ मेडिकल एलाइड साइंस मे कार्यरत पेशेवर के नेटवर्क एहि नवाचार आ प्रशिक्षण से भविष्यक नैदानिक सेवा आ नीति निर्माणमे सहायक होयताह एहन उम्मीद कैल जा रहल अछि। सर्वसुलभ: नि:शुल्क भेला सँ ई प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रत्येक स्तरक चिकित्सक आ मेडिकल एलाइड प्रोफेशन जे जुडल लोक धरि पहुँच रहल अछि। NBEMS द्वारा प्रारम्भ कैल गेल �AI for Medical Professionals / AI in Medical Education� कार्यक्रमक संग जुड़बाक प्रक्रिया पूर्णतः ऑनलाइन, सरल आ पारदर्शी अछि। इच्छुक चिकित्सीय पेशेवर सभ केँ कोर्स सम्बन्धी आधिकारिक सूचना, समय-सारिणी, दिशानिर्देश आ अपडेट लेल NBEMS AI in Medical Education Portal पर जाए के चाही। ई कोर्सक मुख्य डिजिटल द्वार छी। पोर्टल https://natboard.edu.in/Sangam/index  पृष्ठ पर कार्यक्रमक उद्देश्य, सत्र-आधारित संरचना, आवश्यक निर्देश, पाठ्यक्रमक रूपरेखा तथा जरूरी दस्तावेज सभ उपलब्ध अछि। पंजीकरण के समय प्रतिभागी केँ अपन मूल विवरण भरि कऽ सहमति देबऽ पड़ैत अछि आ NMC/SMC पंजीकरण विवरण (Registration Number) प्रस्तुत करब होइत अछि, जाहि सँ चिकित्सीय पात्रता के सत्यापन संभव होय। सफल पंजीकरणक बाद प्रतिभागी केँ पोर्टल/लिंकक माध्यम सँ लाइव ऑनलाइन सत्र मे सम्मिलित होयबाक अधिकार भेटय अछि, आ कोर्स सम्बन्धी सूचना, सामग्री, सत्र लिंक तथा आवश्यक अपडेट नियमित रूप सँ ओही आधिकारिक मंच पर उपलब्ध कराओल जाइत अछि। जे लोक कोर्स शुरू करबा सँ पहिने विषय-विस्तार बुझय चाहैत छथि, हुनका लेल पाठ्यक्रमक आधिकारिक PDF �AI in Medical Education � Curriculum Design� पोर्टल पर उपलब्ध अछि, जे कोर्सक दायरा, मॉड्यूल-वार विषय तथा सीखबाक लक्ष्य केँ स्पष्ट करैत अछि। कोर्सक अंत मे NBEMS द्वारा निर्धारित मापदंड (जेना लाइव सत्र सभ मे न्यूनतम 75% आवश्यक उपस्थिति आदि) पूरा करय पर प्रतिभागी केँ डिजिटल Course Completion Certificate सेहो प्रदान करबाक योजना अछि। जे लोक कोर्स के लेल रजिस्ट्रेशन नै करा सकलाह आ किन्तु कोर्स के शिक्षण सामाग्री के देखय चाहय छथि सेहो कोर्स के ओफिशियल यूट्यूब चैनल के माध्यम से लाइव या रिकोर्डेड सत्र देख सकय छथि। 21 जनवरी 2026 के कर्तव्य भवन नई दिल्ली मे AI in Medical Education ऑनलाइन प्रशिक्षण कार्यक्रमक उद्घाटन समारोह केंद्रीय स्वास्थ्य आ परिवार कल्याण राज्य मंत्री, श्रीमती अनुप्रिया पटेल द्वारा संपन्न कएल गेल। एहि अवसर पर श्रीमती पटेल कार्यक्रमक उत्तरदायी, नैतिक आ व्यावहारिक उपयोग पर जोर दैत कहलकथि जे health care मे AI अब वैकल्पिक नहि, बल्कि आवश्यकता बनि गेल अछि। ई तकनीक डाक्टरक स्थान त नहि लऽ सकय अछि, मुदा हुनकर क्षमता केँ बढ़ा देत। ओ कहलनि जे "विकसित भारत" क संकल्पकें पूरा करबाक लेल स्वास्थ्य सेवामे तकनीकक समावेश अत्यंत आवश्यक अछि। मंत्री महोदया एनबीईएमएस (NBEMS) क सराहना करैत कहलनि जे ई पाठ्यक्रम भारतक 'डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर' कें सुदृढ़ करत आ देशक सुदूर ग्रामीण क्षेत्र धरि विशेषज्ञ चिकित्सा परामर्श पहुँचाबय मे मदति करत। उद्घाटन सत्र मे NBEMSक अध्यक्ष डॉ. अभिजात सेठ, स्वास्थ्य सचिव तथा मंत्रालयक वरिष्ठ अधिकारी सभ सेहो उपस्थित छलाह, संगहि राष्ट्रीय आ अंतरराष्ट्रीय क्षेत्रक विशेषज्ञ सभ सेहो ऑनलाइन माध्यम सऽ जुड़ल रहथि। आजुक डिजिटल युग मे इलाज के मात्र चिकित्सकीय नहि, अपितु नैतिकता, सामाजिक न्याय आ मानव-केंद्रितत भेनाई सेहो आवश्यक अछि आ नेशनल बोर्ड ऑफ़ एग्जामिनेशंस इन मेडिकल साइंसेस (NBEMS) द्वारा शुरु कैल गेल ई पहल, भारतक चिकित्सा क्षेत्रक भविष्य के सशक्त, संतुलित आ जिम्मेदार  बनेबाक एकटा राष्ट्रीय स्तर के महत्वपूर्ण कदम कहल जा सकय अछि। -       [प्रणव कुमार झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली ] अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.५.परमानन्द लाल कर्ण-बुढ़क दर्द परमानन्द लाल कर्ण बुढ़क दर्द रश्मिक जिनगी मे ओ दिन कखनहु भूलऽ वाला नहि छल, जखन हुनकर पतिदेव एहि दुनिया सँ विदा भऽ गेल छलाह । ओ एक साधारण किसान छलाह, मुदा मेहनत आ दूरदृष्टि परिवार के एकटा मजबूत नींव देने छल । गामक  पुरान घर जाहि मे दुई  टा  झोपड़ी छल, ताहि मे अपन चारु बेटाक लालन पालन केने छलाह । रश्मि एक मजबूत महिला छलीह । हुनका चेहरा पर सदिखन मुस्कान रहैत छल, जे हुनकर सहनशक्ति के देखवैत छल । मुदा घरवालाक देहावसान हुनका अंदर सँ तोड़ि देने छल । रश्मिक अनंत दुःखक शुरुआत भऽ गेल छल । चारु बेटा मे मनमुटाव आ बिखराव भऽ गेल छल । श्राद्ध कर्मक  बाद चारु बेटा जिनकर नाम मोहन, सोहन,अमित आ रवि छल गामक  हवेली मे एलेथि । मोहन सबसँ पैघ छल, ओ हाई कोर्ट मे वकील छलाह । दोसर बालक मोहन प्रखंड विकास अधिकारी छलाह, तेसर बालक अमित प्रोफेसर छलाह आ सबसँ छोट रवि सरकारी स्कूल मे मास्टर छलाह । चारुक  विआह भऽ गेल छल । चारु दियादनीक  लालन पालन नीक शहर मे भेल छल । सव गोटे चाय पी रहल छलाह तखन रवि जे सबसँ छोट छल, ओ कहलनि, �भैया, आव माय के की करव ?� अमित कहलनि, � गाम मे माय असगरे कोना रहथिन ? हमरा सव के ड्यूटी पर जाय पड़त । एहि ठाम खेत अछि सभटा विलटि  जायत । किएक  नहि जमीन  बेच कऽ पाई हम सव बाँटि ली आ माय के हमसव अपना पास राखी । सोहन एहि बात पर सहमति दैत कहलनि, � हाँ , ई  ठीक अछि मुदा माय किनका पास रहत ? हम तऽ दूनु आदमी काज करैत छी । हमरा रखवा मे दिक्कत अछि । माय के देखभाल कोना होयत ?� मोहन कहलनि, �हम चारि गोटे छी चारुक जिम्मेदारी अछि जे माय के राखी । एक-एक महीना सव गोटे राखू । एहि सँ किनको पर बोझ नहि पड़त ।� रश्मिजी ई सभटा बात किवाड़क पाछु ठाढ़ भऽ सुनि रहल छलीह । बोझ शब्द सुनि रश्मिजीक  दिल टूटि गेल, मुदा ओ चुप रहलीह । चारु भाई मे सबसँ छोट भाय रवि कहलनि, � हम सबसँ छोट छी पहिले हमही माय के अपना पास राखि लैत छी । दोसर दिन रवि माय के अपना साथ लऽ आनलथि । छोट छीन घर छल जाहि मे दु टा  बेड रूम एक किचन आ एकटा हाॅल छल । एक  घर मे चौकी राखल छल  । चौकी पर विछौना बिछा कऽ माय के बैसेलथि आ हुनकर कपड़ा सव आलमीरा मे राखि देलखिन। रविक घरवाली खाना बनेलथि आ सभगोटे खाना खेलथि । राति मे रवि माय लग थोड़े देर बैसलथि किछु गप्प-सप्प केलथि तहन ओ सुतऽ चलि गेलथि।रविक घरवाली सेहो नौकरी करैत छलीह। भिनसरे उठि दिनक खाना बना कऽ राखि देलखिन आ अपना सासु माँ  सँ कहलनि, � माँ जी, हम ड्यूटी पर जा रहल छी अहाँ खाना खा लेव। भानस बनल अछि।� रश्मिजी हाँ मे जवाव देलखिन । रश्मिजी अकेले घर पर टीवी देखैत छलीह व पुरान बात सोचैत दिन गुजारैत छलीह। एक दिनक  बात अछि रविक घरवाली कहलनि, �माँ जी अहाँ भनसा घर मे नहि जाउ । हम साँझ मे सव किछु बना लैत छी ।� रश्मिजी सोचलथि जे कनिया व्यस्त रहैत छथिन तें  कहलथि  अछि। एक दिनक बात अछि रश्मिजी के चारि बजेक बाद चाय पीवाक इच्छा भेल, तहन ओ भनसा घर मे चाय बना कऽ पी  लेलथि । साँझ मे जखन रविक घरवाली एलीह तहन भनसा घर गेला पर देखैत छथिन जे रश्मिजी चाय बना कऽ पीने छलथि। एहि पर ओ आगि बबूला भऽ गेलीह। ओ कहलनि, �माँ जी अहाँ के मना केने छलहुँ जे भनसा घर नहि जायव । मुदा फेर आई भनसा घर जा के गैस बर्बाद केलहुँ अछि। शहर मे सव किछु महँगा अछि, अहाँ नहि जानैत छी । ई सुनि रश्मिजीक दिल मे बड्ड चोट लगलनि । धीरे -धीरे समय बीतल महीनाक अंतिम सप्ताह मे रविक कनिया अमितक घरवाली सँ फोन पर बात करैत छलखिन जे दीदी महीना खत्म भऽ रहल अछि भैया के भेज देवै माँ के एहि ठाम सँ लऽ जेथिन। ओहि पर ओ कहलनि, �ठीक अछि, ई चलि जेताह आ माँ के एहि ठाम लऽ आनथिन । ई बात रश्मिजी सुनैत छलीह। सप्ताहक अंतिम दिन रश्मिजी अपन सव नुआ समेट  लेने छलथि मुदा अमित हुनका लेव�क  लेल नहि एलाह। रवि साँझ मे घर एलाह तहन हुनकर कनिया कहलनि, �आई भैया माँ के नहि लऽ गेलखिन। अहाँ हुनका लग माँ के पहुँचा दियोन ।� रवि अपना भाई अमित के फोन केलखिन  भैया माय के नहि लऽ गेलीयै । अमित कहलनि हम आई  व्यस्त भऽ गेल छी या तऽ अहाँ माय के हमरा एहि ठाम पहुँचा दियौ नहि तऽ काल्हि भिनसरे हम माय के  एहि ठाम लऽ आनव। ई  बात सुनि  रविक कनिया कहलनि, �भैया के छुट्टी नहि छैन तऽ अहीं माँ के पहुँचा दियौ।� रवि कहलनि, � राति भरिक  बात अछि काल्हि भिनसर भैया हम पुछि लेव नहि एताह तहन हम माँ के भैया लग पहुँचा देव।� मुदा हुनकर कनिया ई  बात नहि मानलथि। हारि के माँ के अमितक  घर पहुँचा देलखिन। तहन ओ राहतक  साँस लेलथि। मने मन सोचलथि जे आव तीन मासक  छुट्टी भेल। रश्मिजी अमितक घर एलीह तहन हुनकर कनिया घर खोललखिन माँ के देख हुनका गोर लागलखिन। गोर लागि हुनकर सामान सव एक घर मे राखि देलखिन। फेर चाय बना कऽ चाय आ बिस्कुट रश्मिजी के देलखिन। रवि अपना घर चली गेलाह। रातिक १० बजि  रहल छल। अमित कालेज से आवि सुति  रहल छलाह । अमित के पाँच सालक  एकटा बच्चा छल। ओकरा लऽ के अमितक घरवाली ई  कहि चलि गेलखिन जे माँ जी हम बौआ  के सुतावऽ जा रहल छी। अहाँ एहि घर मे सुति रहव। रश्मिजीक भूख लागल छल। ओ कहलनि, �कनिया, हमरा भूख लागल अछि, दुपहर मे खाना खेने छलहुँ सएह खेने छी। खायक  लेल किछु अछि तऽ हमरा दऽ दिअ।� एहि पर ओ कहलनि माँजी हम सव तऽ खाना खा लेलहुँ अछि। हम बौआ के सुतावऽ जा रहल छी । अहाँ फ्रिज खोलि के देखव जे राखल होयत से अहाँ खा लेव नहि तऽ हम बौआ  के सुता के आवि रहल छी। ई  कहि ओ चलि गेलीह । रश्मिजी बिछौना पर थोड़ेक देर इंतजार केलखिन, मुदा ओ नहि एलथि । तहन रश्मिजी भनसा घर मे जा के देखलखिन जे किछु खाना अछि कि नहि ? फ्रिज खोललखिन तऽ देखलनि के दुई टा रोटी राखल अछि, मुदा सब्जी नहि छल । रश्मिजी रोटी खा कऽ पानि पी लेलथि आ जा के सुति रहलीह। राति भरि गर्मी आ मच्छर सँ परेशान भऽ गेल छलीह। भिनसर पाँच बजे अमित के उठ�क  लेल आवाज देलखिन तऽ हुनकर घरवाली गुस्सा सँ बाहर आवि कहलनि, �माँ जी, भिनसरे नीन खराव नहि करु। काल्हि सँ सात बजे के बाद घर सँ बाहर आयव। हम सव देर राति मे सुतैत छी ।� एहि पर रश्मिजी कहलनि, �कनिया हमरा तऽ आदत अछि जे भिनसरे उठी। पाँच बजे के बाद तऽ हमरा नीन नहि आवैत अछि । कतेक करवट बदलैत रहु । ओहुना आई मच्छर बड्ड काटलक अछि ताहि सँ नीन सेहो नहि भेल अछि।� दिन बीतैत गेल पुतोहुक  व्यवहार कड़वा होयत गेल। रश्मिजी के लागैत छल जे अपने बच्चाक घर मे अजनबी भऽ गेल छी । रश्मिजी एहि ठाम एकटा नव चुनौतीक  सामना करैत छलीह। एक दिनक बात अछि रश्मिजी भनसा घर मे गेलीह तहन हुनकर पुतोहु कहलनि, �माँ जी अहाँ एहि ठाम की करव? हम भानस बना रहल छी।� एहि पर रश्मिजी कहलनि, �कनिया आई  तरकारी मे की बना रहल छी? कोनो तरकारी कम तेल मे बनायव ताकि पेट मे गैस नहि बने।अमितक घरवाली चुपचाप सुनि लेलेथि आ तरकारी मसालेदार बना रहल छलीह । दोसर तरकारी नहि बनेलथि।खानाक समय मे वएह मसालेदार तरकारी खेलथि जाहि सँ रश्मिजीक तबियत खराव भऽ गेल । रश्मिजी अमित सँ कहलनि, � बौआ आई  पेट मे दर्द भऽ रहल अछि। कोनो दवाई अछि तऽ दऽ दिअ ।� एहि पर अमित किछु नहि बजलाह ।ओ चुपचाप काॅलेज चलि गेलाह । रश्मिजी सोचैत छलीह जे एहि बेटाक लेल हम सव कतेक जान दैत छलहुँ । कतेक कठिन सँ पालने छलहुँ, बेटा सभ के पढ़ेलहुँ ताकि सव बच्चा अपना पाइर पर ठाढ़ भऽ जाय आ आश छल जे बुढ़ापाक सहारा बनत, मुदा आई हम हिनका सवहक लेल किछु नहि छी। वएह बेटा हमरा बोझ मानैत छथि। रश्मिजी भरि दिन अकेले घर मे बैसल रहैत छलीह व समय काटवाक लेल टीवी देखैत छलीह । साँझ मे जखन अमित काॅलेज सँ आवैत छलाह तहन थोड़ेक देर बात करैत छल। फेर ओ अपन दुनिया मे रमि जायत छलाह । धीरे-धीरे एक माह बीत गेल। अमितक घरवाली अपना जेठानी सँ कहलखिन,�दीदी,माँजी के  एहि ठाम एक माह भऽ गेल अछि। आव अहाँ हिनका लऽ जाउ ।� एहि पर ओ कहलनि जे अमित के कहु जे माँ जी के एहि ठाम पहुँचा देथिन। अमित रश्मि जी के जेठ भाय सोहन लग पहुँचा देलखिन। रश्मिजी सोहनक घर पर राति के १० बजे पहुँचलीह। अमित हुनका एहि ठाम छोड़ि अपना घर चलि गेलाह। सोहनक कनिया रश्मि जी के गोर लागि कहलनि, �आऊ  माँजी तबियत ठीक अछि ने?� एहि पर रश्मिजी कहलनि, �हाँ कनिया, अहाँ सव ठीक छी ने?� एहि पर ओ कहलनि, �हाँ माँजी, हम सव एहि ठाम ठीक छी।� रोहनक कनिया एक कप चाय बना कऽ रश्मिजी के देलखिन । ओ चाय पीव पुतोहु सँ कहलनि जे कनिया हम चाय पी  लेत छी, मुदा हमरा भूख लागल अछि। आई दुपरहक खेने छी, किछु अछि तऽ हमरा दऽ देव तहन अहाँ सुतऽ जायव। एहि पर ओ कहलनि, �माँ जी हम सव तऽ खाना खा लेलहुँ अछि, मुदा फ्रिज के देखव जे होयत सा अहाँ खा लेव। हम रोहन के सुतावऽ जा रहल छी। हम रोहन के सुता कऽ आवि रहल छी।� सोहनक  घर एक पैघ एपार्टमेंट मे छल । जाहि मे चारि टा बेड रूम छल,तीन टा बाथरूम छल आ एकटा हाॅल छल । रश्मिजी थोड़े देर विश्राम केलाक  बाद फ्रिज खोललथि तहन ओ देखैत छथिन जे एकटा बाटी मे खीर राखल अछि। ओ खीर खा के फेर ओहि सोफा पर बैसि गेलीह। रोहन सुति  रहल तहन हुनकर पुतोहु एलखिन । ओ कहलनि, � माँजी, किछु खेलहुँ की नहि?� ओहि पर रश्मि जी कहलनि, � हाँ कनिया, फ्रिज मे एकटा बाटी मे खीर छल, से हम खा लेलहुँ अछि। आव हम किछु नहि खायव।� तकर बाद रश्मिजी बगलक एकटा घर खोलि देलखिन आ कहलनि, �माँजी, एहि घर मे सुति  रहु।� घर मे पंखा तऽ छल मुदा पंखा सँ हवा नहि लागि रहल छल । नव जगह भेलाक  कारण रश्मिजी के नीन नहि एलनि। राति भरि कछ-मछ करैत रहलीह । भिनसरे रश्मिजी घर सँ उठि सोफा पर बैसि रहलीह । रश्मिजी सोहन के आवाज देलखिन, �बौआ,चाय बना दी?� ई  सुनि हुनकर पुतोहु घर सँ बाहर आवि कहलनि, �माँजी, एतेक भिनसर हमरा सव के नहि उठावु । हम सव सात बजेक  बाद उठैत  छी । अहाँक इच्छा अछि तऽ भनसा घर मे अहाँ अपना लेल  चाय बना लिअ । अखन रोहन आ रोहनक पापा सुतल छथि।� रश्मि जी भनसा घर मे गेलीह चाय बना कऽ सोफा पर बैसि चाय पिलथि । सोहन दूनु प्राणी सात बजेक बाद उठलथि चाय पीव रोहन के नाश्ता बना कऽ स्कूल भेज देलखिन । तकर बाद जल्दी जल्दी खाना बना कऽ तैयार भेलीह आ दूनु प्राणी ऑफिस चलि गेलथि। रश्मि जी अकेले घर मे नहा धो के खाना खेलथि । भरि दिन कखनहु खिड़की सँ बाहर देखैत छलखिन तऽ कखनहु टीवी देखैत छलीह ।एक दिनक बात अछि रश्मिजी के पुरान बात एलनि । ओ सोचलथि जे आई बैगनक भरवा बनायव। पुतोहु सँ कहलनि, �दुलहिन, आई अहाँ सवहक ऑफिस बंद अछि। अहाँ कहि तऽ आई  हम बैगनक भरवा बना दी ? एहि पर ओ कहलनि, �नहि माँ जी, हमरा सव के बैगनक भरवा नीक नहि लागैत अछि। रोहन सेहो बैगन देख नाक भौं सुकड़ैत रहैत अछि । ओना अखन बैगन घर नहि अछि जे अहाँ बनायव।�  रश्मिजी कहलनि, �ठीक अछि, जौं ओ नहि अछि तहन सादा खाना बना लिअ।� मुदा ओ किछु नहि बजलीह । ओ अपना हिसाव सँ भानस बनेलथि । जखन रश्मिजी के खाना देलखिन तऽ थारी मे राजमा आ भात छल ।ओ भात खा लेलथि मुदा थोड़े देर बाद हुनका पेट मे दर्द होमय लागल । पेटक दर्द सँ परेशान भऽ गेलीह राति मे नीन नहि भेलनि । भिनसरे सोहन के कहलखिन, �बौआ, हमर मन खराव लागैत अछि। पेट मे दर्द भऽ रहल अछि, दवाई लेने आयव ।� सोहन मायक बात सुनि अनठिया देलखिन आ दवाई सेहो नहि आनलखिन । धीरे-धीरे समय बीत रहल छल । दिन मे अकेलापन, साँझ मे बेमनक भोजन, राति मे गर्मी आ मच्छर सँ रश्मिजी परेशान छलीह । महीना मे दुई दिन बाकी छल तहन मोहन अपना भाई सँ कहलखिन, �छोटे, हमरा सासुर मे विआह अछि से हम सव जा रहल छी। एहि महीना अहाँ माय के अपने पास राखि लेव । अगिला मास मे माय के दुई मास राखि लेव ।� ई सुनि सोहन दूनु प्राणी चिंतित भऽ गेलथि। सोहन अपना भाई सँ कहलखिन, �भैया बच्चा के छुट्टी भऽ रहल अछि तें हम सव घुमऽ जा रहल छी। टिकट कटि गेल अछि आव माय के किनका लग राखू ?  रश्मिजी ई सभटा बात सुनैत छलीह। हुनकर दिल टूटि रहल छल। साँझ मे बिछौना पर लेटल ढ़व-ढ़व नोर गिर रहल छल। ओ सोचैत छलीह जे चारु बेटा हमरा फुटबाॅल बना देलक अछि । हुनका पुरान बात सभ यादि आवि रहल छल । कोना चारु के पढ़ाई लिखाई करेलहुँ। चारु के विआह केलहुँ । सोचैत छलहुँ जे बेटा नीक शहर मे रहत तहन समय नीक सँ कटत । मुदा एहि ठाम अकेलापन छोड़ि किछु नहि अछि । आव बर्दाश्त सँ बाहर भऽ गेल अछि, कहवाक लेल किछु नहि अछि । हम अपन फैसला खुद लेव । रश्मिजी सोचलथि जे किएक  नहि हम गाम चलि जाय। ओहि ठाम अपन खेत पथार  देखव बटायदार सव की देत नहि देत तकर कोनो ठेकान नहि अछि।सोझा मे रहव तहन खेतक जे उपजा होयत ओकरा जरूरत भरि राखि बेच लेव । एहि ठाम डगराक बैगन बनल छी । ई  सोचि सोहन सँ कहलनि - �बौआ, आव तऽ अहाँ लग एक मास बीतऽ वाला अछि। मोहनक सासुर मे विआह अछि तें ओ सासुर जा रहल छथि ।� एहि पर सोहन कहलनि -�माँ की होयत अहाँ एहि ठाम दिक्कत होयत अछि तहन हम रवि आ अमित सँ बात करैत छी, ओ लोकनि अपना घर पर रहताह तहन हम हुनका लग अहाँ के पहुँचा देव।� रश्मि जी कहलनि - नहि बौआ, हम सोचि रहल छी जे किछु दिनक लेल गाम चलि जाय । अहु ठाम खेत पथार अछि, की उपजा होयत से देख लेव। जे अन्न  बेचऽ वाला होयत ओकर बेच लेव। तें अहाँ हमरा गाम पहुँचा दिअ । सोहनक  कनिया कहलनि - � हाँ माँ जी, ई चारु भाई खेत बेचऽ चाहैत छलाह, मुदा छुट्टी नहि भेलनि जे गहकी ठीक कऽ बेचताह ।जा धरि खेत नहि बेचल जायत अछि ता धरि ओकर देखभाल करनाई आवश्यक अछि ।� सोहन कहलनि -�ठीक अछि माँ, हम अहाँ  दुई दिन बाद अहाँ के गाम पहुँचा देव। रश्मिजी कहलनि, �काल्हि तऽ अहाँक  छुट्टी होयत किएक  नहि काल्हि हमरा गाम पहुँचा दैत छी।� सोहन अपना गाड़ी सँ भिनसरे रश्मिजी के गाम पहुँचा देलखिन । रश्मिजी गाड़ी सँ उतरि अपन पुरान झोपड़ी देखलथि, जेकर दिवार जर्जर भऽ गेल छल । आँगन मे घास-फूस जमि गेल छल, मुदा रश्मिजीक मन प्रसन्न छल । अपन बैग राखि घरक किवाड़ खोललथि । घरक अंदर धूलक मोट परत जमल छल । कुर्सी निकालि घरक बाहर बैसि गेलीह आ राहतक  साँस लेलथि । ओ सोचि रहल छलीह जे सुकून शहरक चमचमाईत घर मे नहि मिलैत अछि जे सुकून एहि कच्चा मकान मे अछि । घरक सफाई कऽ बिछौना सव ठीक केलनि आ भानस बना के खाना खेलथि । राति मे खाना खा कऽ सुति रहलीह । बाहर तारा चमकि रहल छल । चानक  रोशनी खिड़की सँ आवि रहल छल । मच्छर तऽ छल मुदा मच्छरदानी लगा लेला पर मच्छरक  प्रकोप कम छल । शहरक गरम हवा आ उमस सँ दूर एहि ठाम रश्मिजी सुकून सँ सुति रहलीह । दोसर दिन भिनसरे पाँच बजे उठलीह हाथ-मुँह धो कऽ पानि गरम केलीह आ कुर्सी पर बैसि पानि पिबैत मने मन सोचि रहल छलीह जे आई सँ हम अपन जिनगी खुद जीयव । ककरो पर आश्रित नहि रहव । भिनसर सँ घर-आँगन साफ केलथि तकर नहा-धो के भानस बनेलथि । साँझ मे किछु सामान लेवक लेल बाजार जायत छलथि तहन पड़ोसक किछु लोकनि रश्मिजी के मिललनि तऽ आश्चर्य सँ ओ कहलनि, �रश्मिजी अकेले आयल छी कि बालक सभ आयल छथि।� एहि पर रश्मिजी कहलनि, �बेटा सभ के नौकरी मे छुट्टी कहाँ मिलैत अछि, तें ओ सव नहि एलथि ।� रश्मिजी बाजार सँ चाउर,दालि  आ  हरियर तरकारी सव खरीद के आनलथि । साँझ मे अपना चूल्हा पर मनपसंद सादा खाना बनेलथि आ मन भरि खाना खेलथि । हुनका आई भोजन सँ संतोष मिललनि । धीरे-धीरे समय बीतल, रश्मिजीक  मन स्थिर भऽ रहल छल । एक समयक बात अछि रश्मि जी अपन पुरान घर के तोड़ि पक्का मकान बनावऽ चाहलथि तहन बेटा सव मना कऽ देने छल। हुनकर घरवाला सहो कहैत छलाह जे मकान लऽ के की  करव ? बेटा सव शहर मे रहत एहि ठाम के रहत ? ई  सोचि गाम मे कच्चा मकान रहऽ देने छलथि । रश्मिजी सोचलथि जे आव एहि कच्चा मकान के बग़ल मे दुई कमराक पक्का मकान बनावी । रश्मिजी एक बटायदार के बजा कऽ कहलनि, �हम किछु जमीन बेचऽ चाहैत छी । कोनो खरीददार होय तहन कहव ।� गामक  पुरान वकील के बजा कऽ जमीनक पेपर सव देखेलखिन आ हुनका सँ राय लेलथि जे हम कोन जमीन बेच सकैत छी । जमीनक कागज देखि वकील साहेब कहलनि जे सभटा जमीन अहींक  नाम सँ अछि । जे जमीन चाहव से बेच सकैत छी । एक सप्ताह मे जमीनक सौदा पक्का भऽ गेल । कोनो बेटा सँ राय लेने बिना जमीन बेच के बैंक मे पाई राखि लेलनि । रश्मिजी एकटा ठेकेदार के बजेलथि । पुरान घरक दोसर भाग मे दुईटा मकान, भनसा घर आ बाथरूम बनेलथि । घर मे सव सुविधा- पंखा,कूलर,एसी आ इन्वर्टर लगा लेलथि  । बिजलीक ओतेक समस्या गाम मे नहि छल तें एक कमरा में एसी सेहो लगा लेलथि, दोसर कमराक लेल कूलर खरीद लेलथि ।आव घर मे शहरक सव सुख सुविधा उपलब्ध भऽ गेल । रश्मिजी अपना मनोनुकूल भिनसरे पाँच बजे उठि पूजा पाठ करैत छलीह तकर बाद चाय बना कऽ पीवैत छलीह । दुपहरिया मे भनसा घर मे मनोनुकूल भानस बना कऽ खायत छलीह । साँझ मे बाहर लॉन मे बैसैत  छलीह । जमीन सवहक देखभाल करवाक लेल एकटा नौकर राखि लेने छलीह । राति मे गहींर नीन सँ सुतैत छलीह । किछु दिनक बाद मोहन के ख्याल आयल जे माँ के एहि ठाम लऽ आवि कारण सव भाई माय के एक-एक मास राखने छलथि,मुदा ओ नहि राखने छलाह तें ओ माँ के शहर लऽ जेवाक लेल एलाह । एहि ठाम आवि ओ स्तब्ध रहि  गेलाह । ओ देखलथि जे एहि ठाम कच्चा मकानक  संग एकटा  पक्का मकान बनि गेल अछि । मोहन माय के गोर लागलखिन आ माय सँ कहलनि जे माय अकेले अहाँ एहि ठाम की करव चलु शहर हमरा एहि ठाम रहव । रश्मिजी साफ मना करैत कहलनि जे नहि बौआ  हम आव कतहुँ नहि जायव । जखन धरि हाथ पाइर मे दम अछि ता धरि हम कतहुँ नहि जायव । एक दिनक बात अछि चारु भाई गाम एलाह तहन रश्मिजीक  ठाठ बाट  देखि आश्चर्य चकित भऽ गेलाह । ओ अपना माय सँ कहलनि, � माय एतेक पाई अहाँ किएक बर्बाद केलहुँ । एहि ठाम के रहत ? अहाँक  तबीयत  खराव होयत तहन के देखत ।शहर चलु हम सव अहाँ के राखव आ एहि ठामक  जमीन बेच लैत छी ।� रश्मिजी कहलनि, � अहाँ सव अपन -अपन देखू ,इएह जमीन सँ अहाँ सवके एहि लायक़ बनेने छी ।अहाँ सवके जखन इच्छा होय एहि ठाम आवि सकैत छी, मुदा जमीन नहि  बीकत ।जहाँ  धरि ज़मीन बेचवाक प्रश्न अछि अहाँ हमरा रहने जमीन नहि बेच सकैत छी । हम मिश्रजी वकील साहेब के जमीनक  सभटा कागज देखा लेने छी । तें अहाँ सवके अखन कोनो हक नहि अछि ।� अपन मायक बात सुनि सव अचंभित रही गेलाह आ दुई दिनक बाद आव किओ अपना - अपना ड्यूटी पर चलि गेलाह । शहर जायत खन बेटा के रश्मिजी कहलनि जे अहाँ सव जमीन मे हक चाहैत छी तहन मास मे कोनो ने कोनो भाय  एहि ठाम आवैत रहव अन्यथा हम जमीन कोनो ट्रस्ट के दऽ देव । चारु भाई विचार केलथि जे जौं हम सव गाम नहि आयव तहन करोड़ोक धन माय केकरो दान कऽ देथिन तें सव मास कोनो एक गोटे आवि माय के हाल चाल लऽ लेल जाय । एकर बाद जमीनक  लोभ सँ प्रत्येक मास कोनो ने कोनो भाय गाम आवि मायक हाल चाल लैत रहैत छलाह । रश्मिजी आराम सँ अपना घर मे जीवन बसर करऽ लागलीह । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.६.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा- टीस कुमार मनोज कश्यप लघुकथा- टीस कक्का के मुईला उपरांत काकी के बेटा-पुतोहू लग शहर मे रहबाक अतिरिक्त आन कोनो टा उपाय नहिं रहलैन। काकी के नुआँ ठाम-ठाम सs मसकि गेल रहैन। गाम-घर रहल तs लोक फाटलो-पुरान कि चेफड़ियो लगा कs पहिरने रहल; मुदा शहर-बाजार मे तs एना नहिं ने चलतै! अड़ोस-पड़ोस के लोक देखतै तs खिधांसे करतै! काकी के अपन बीतल दिन मोन पड़ि एलैन तs आँखि सs अश्रु-धार बहि गेलैन ....  कक्का अपन जीबैत-जी चाहे जाहि धरानिये होईन; कोनो वस्तुक खगता कहियो होमय नहिं देलखिन। अपना अछैत फाटल की; पुरानो नुआँ-वस्त्र कहियो नहिं पहिरने देने हेथिन!  पेटी कपड़ा सs हरदम भरले! अपने नजरि रखथिन � रंग जहाँ कनिये मलिन भेलै की खबासिन के दिया देथिन। कैक बेर जाँतले स्वर मे नुआँ फटबाक चर्चो के आयास काकी केलनि; मुदा केयो कान-बात नहिं देलकैन। हारि-थाकि कs पोती सs सूईया-ताग मँगलैन जे सीबि लेती। समय पर नहिं सीने फाट तs बढ़िते जेतै! एक तs वृद्धावस्था के कारणे थड़थड़ाईत हाथ आ दोसर एहन काजक अनुभवहीनता, सूईया आँगुर मे भोंका गेलैन। पीड़ा सs मुँह सs   'माय गे माय� के तेहन जोर सs स्वर बहरेलनि जे पुतोहू-पोती सभ दौड़ल जे की भs गेलै!  काकी बिषविषाईत आँगुर के पकड़ने .... शोणितक बुन्न चुबैत! अश्रुपूर्ण कातर दृष्टिये सभ दिस तकैत जे केयो कोनो दवाई लगा देत .... पट्टी बान्हि देत!  से तs भेलैन नहिं; उनटे शोणितक किछु बुन्न सोफा पर खसि पड़ल देखिते पुतोहू के तामस सभ सीमा पार कs गेलैन - 'दुर्र जो! ....... केहन अलबटाहि छैथ! नुआँ सीबs बैसली तs आँगुरे मे भोंकि लेली। देखथुन तs सोफा मे दाग कोना लगा देलखिन? आब ई दाग ओना छुटतै बिनु ड्राईक्लीन करेने? ओनाहे घर-खर्चा मोश्किल सs चलै छै तै पर सs ई बैसल-बैसायल जबर्दस्ती के खर्चा!....... सभटा हमरे कपाड़ पर बथायल छल।'   भनभनाईत पैर पटकैत मुँह चमकबैत ओ दोसर घर चलि गेली। हत्प्रभ काकी किछु बाजि नहिं सकल रहथि। केवल आँखि सs अश्रुधारा बरसाती नदी जकाँ सभटा बान्ह-कछेर तोड़ने अनवरत बहल जा रहल छल। सूईया के टीस त कहुना सहियो लेलनि, मुदा......!!! -कुमार मनोज कश्यप, निदेशक, भारत सरकार , संपर्क :  सी-11, टावर-4, टाइप-5, किदवई नगर पूर्व (दिल्ली हाट के सामने), नई दिल्ली-110023; # 9810811850; ईमेल: writetokmanoj@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.७.प्रीति कुमारी- श्री लालदेव कामत जीक व्यक्तित्व आ कृतित्व प्रीति कुमारी श्री लालदेव कामत जीक व्यक्तित्व आ कृतित्व

विश्व कवि रविन्द्र नाथ टैगोर लिट्रेचर अवार्ड आ साहित्य अकादमी पुरस्कार ( मैथिली मूल) प्राप्तकर्ता श्री जगदीश प्रसाद मंडल जीके बिछल कथा (कथा संचयन) प्रो० रामसेवक सिंह - मैथिली हेड ,भागलपुर यूनिवर्सिटी (२०२५) केर लोकार्पणकर्ता श्री लालदेव कामतजी अन्तरमुखी व्यक्ति छथि। हिनक व्यक्तीत्व केँ जानय लेल बालपनके पृष्ठभूमिमे जाए पड़त। मोरंग काऊटन मिल्सके जोगबनी क्वाटरमे लालदेव जीके जन्म भेल रहनि। प्रदीप दाजूके अम्मा हिनक पुकारु नाउ - पबन रखलखिन। बालपनमे आन बच्चाक अपेक्षा ई दू मास पहिले चलब शुरू केलनि। एक दिन डेगाडेगी दैत पौरके बिजुआ आ सुखदेव जीके पछबरिया क्वाटरधरि चलि गेल छलैक। उत्तरबरिया अपना क्वाटरमे सुतल अवस्थामे ढोढीक मखठी मोलही देवी नोंचि नोकसान पहुचेने छलैन। से सैंली -मैली आ सानो के बहिण काँछी पकैड़ लेने रहैक। ओहि अबघात सँ गंगौली डाक्टर बचा लेने रहैनि। मैच फैक्टरी सँ मैज्यू छुट्टीमे अबथिन तँ भोजन सँ पहिले ओ पबनके दुलारथि आ लोरीक जगह जलजला टाकिजमे लागल फिल्मक गीत सुनाबथिन-: साउनके महिना पबन करय शोर ........... जियरा रे झूमे ऐसे , जैसन बनमा नाचे मोर! ऐ गीतक मीठ धुन पर पबनके सँग पुष्पा, काली,कार्तिक,किशोर आ मंजू सेहो पहारी धियापुता आनन्द उठाबैक। कहय लागल रही २ अप्रिल १९७१ ई० केँ हटनी निवासी बाबूचन कामति उर्फ बाबूलाल केउट आ अरहुल देवी केर घर तेसर खेप एक बालकक जनम भेल रहय, जिनकर नाम जागेश्वर पड़ल। परँच छठिहारी पुकारू नाउ हुनक पितियौत बड़ बहिन लक्ष्मी देवी राखलनि लालदेब,से बहुचर्चित नाम टिप्पैणमे नहि छैक। शिवहरि बाजे ओतय एक सिलेट आ धार्मिक पोथी ल' केँ बहिन वैशाली उर्फ सरोस्वती संग पढय जा लागल तँ कैम्पसमे मदूमाके दूगोट हाँस खेहारलकनि। फेर नेपाल सँ नौआबाखर गाम आबि जाए गेलथि। हुनक छोटका ममा बिराटनगर सँ आबि अपर प्राइमरी स्कूल - नौआबाखर कचहरी पर पं०हेमकर झा, हेडमास्टर लग ल' जाकय पहिल वर्गमे नाम लिखा देलथिन। श्री लालदेव कामत मनोहर पोथी अपना वार्डक सज्जन चौधरीक मरबापर हरखित संगे जाकय सांझ- भोर ट्यूशन पढ़य जाए। ओतय पिरोजगढके काॅ० कामेश्वर राम खानगी रूपेँ मास्टरी करैत कड़ा सँ पढ़बथिन। हिनक संगी- तुरिया सब टिनही सिलेट आ काठक पाठी लऽ पैरमे खरपा पहिरके गुलाबजी सँगे टीशन पढ़य नितह जाई। सब सहपाठी हिनक हवाई चप्पल आ पाथरक सिलेटकेँ अचरज नजरिये देखय। श्री कामतजी तेहने पढ़ैयोमे लगनशील आ अकिलगर रहथि। दुसरा कक्षामे गेलापर जहरी दीदी दोकान सँ सदातावके कागत बेसाहि अपने सँ टाँकि लिखना काॅपी बना लेने रहथि। ओहिमे करचीक कलम - इंक दुआति ल' केँ 'चलो पाठशाला चलें ' पोथीक पाठ सँ देखशी लिखना उतारथि। चित्रकारी सेहो आ अक्षर हूबहू छापथि। घीनसी लिखना देखि टोलक सहपाठी दुर्गानन घर पर आबि एक पृष्ठमे मात्र ५ पाँति वाक्य लिखकेँ बतौलकनि। तखन दररोज तेहने लिखबाक अभ्यास करय लगलाह। हिसाबक जोड़- घटावधरि लिखने कोपीमे अभ्यास कय जमैलाक मोलबी साहेब (अनवारूल हक )केँ देखबय पड़ैन। हिनक सबसँ प्रिय अध्यापक दुर्गीपट्टीक यमुना साफीजी रहथिन,जिनका जन्मभूमि पर लोक गंगा साफी नामे जानैत रहलनि। ओ चनरदेव आ अकलेश केँ बाल वर्गमे सेहो पढ़य लेल सँग लगेलक आ नाऊ लिखबेलनि। जे चटिया तै जमानामे कहियो स्कूल जाय सँ नागा करै तँ साफीजी घर पर सँ ताकि आनथि आ करमीलाके छरी सँ ततारि दैथि। पंडित जी सबक सुनि कतेको चटियाकेँ दे धौल ....! धरि शनीचराक चाउर आ कैँचा लै ले हुनक छोट बालक हरेराम धार टपि आबि जाइन। अपना सँ छोट भायकेँ रानी मदन अमर नामक पीयर ढ़ाउस बड़का किताब केर सँग पहलामे नाम लिखा देलन्हि। ता पहिले खेप नि: शुल्क मैथिली पोथी - मीरा कमल दिनेश ,कर्पूरी जीक कृपा सँ बाल वर्गमे बितरीत भेलैक। ताहि समय हिनका गुलाबजी सँ भुली महिस बाला मैथिली पुस्तक सेहो पढ़बाक सौभाग्य भेलन्हि। जहन चौथा वर्गमे रहथि तँ बुधदिन हटिया जाइतकाल पछोर लागि गेलाह। जहन बगरबोनी लग जीराय खातीर बैसलाह भोगी लालजी आ पाछाँ उनटि देखल तँ बजलथिन देखू काकी अहाँक लालदेब बौआ सेहो चलि आयल। आ बजारमे इसकुलिया बाकस कीनलक। ओहि दिन तारभुज खाइतेकाल मरचाई दोकान बाला लग मुर्छा आबि गेल छलैन्ह। सन् १९८० मे पाँचमाके छात्र कामत जीक बालवियाह २५ फरबरी केँ कु० सूमित्रा उर्फ मुन्नीजीक सँग भेलन्हि। ओहि समय सासुरमे मरजाद दिन अपन जेष्टसार श्री मंगनू जीकेँ गणितक ऐकिक नियम पाठ सँ हिसाबधरि सिखेने रहथि। सन् १९८१ मे छठम वर्गमे हटनीके मध्य विद्यालयमे नामाकंन प्रधानाध्यापक उमेश झा लग करेलनि। कोशी मरनाधार टपिकय आ वर्षाकालिन ऋतुमे जूगत मियाँके नाह सँ पार होइत नितदिन पढाय करय जाथि। नाँह लिखबैसँ सालभरि पहिने शनिदिन बौएलाल जीक सँग हटनी मिडिलस्कूल पढ़य गेल रहथि। ओहि दिन रायजी गुरूजी सब विद्यार्थी सँ लोकगीत गबाबथि। हिनको पँतियानीमे क्रम अयलनि तँ चरफर सँ ठाढ़ भ' अपन मीठकंठ सँ निधोख छकरवाजी नाचमे लेबरा सँ सुनल गीत गौलथि -: पीतरोके गहना द' केँ हमरा फुसिलेलह सोना केँ नै पड़लै गतरमे - गतरमे! गतरमे !! आब नै रहब देह जरूआक घरमे- घरमे !! एके अंतरा गीत सुनि सभ विद्यार्थी थपरी बजेलकनि तँ सतमाक चेष्टगर विद्यार्थी लोकनि पिहकारी पारलकनि। एक आरो प्रसँगक चरच सुनने छी -: नेनपनमे जखन ओ तिसरेमे रहथि तँ पाँच नया पैसा सँ शिक्षक दिवसके टिकस वर्गशिक्षक सँ किनय पड़ल रहनि। से बेरियां पहरमे बजरंगी साह संगे ओकरा घर लगक घाट पर धार टपि दुर्गापूजा होय सँ मासदिन पहिले बनैत मूरूत देखय गेला, हटनीके धियापुता सब मूरूत नहिं देखय दैन। तखन दोसर दिन सँ सबदिन पाँच सितम्बर बाला वोयह टिकट बुसर्ट केर जेबी पर साटिकय जाथि आ अधिकार पूर्वक मैटिक मूरूत छलगरिया केँ बनाबैत देखथि। मधेपुरके कारीगर सँ लुरि मोनेमोन सीख , गामपर कुमरोटी माँटि सँ छोटगर मूर्ति यथा-: भोमरा,भाँटा, करेला ,ऊँट ,हाथी- कुत्ता बनाकय पीठार सँ ढ़ौरकेँ सीमक पातके रस,कुसूम फुलके आ खापरिक पेनी सँ कारिख ल' केँ रंगैत बार्षिक व्यवहारिक परीक्षामे डोरी- बाढ़ैन आ खर्रा सहित पंडीजी मासेएब केँ दैथि,परीक्षा पास करैले नारिकेल - छोहाराधरि छढ़ाबा करय पड़ैन। १९८१ ई०मे एक दिन इंग्लिश विषयके टीचर शंकर मिश्रजी रीडिंग दैलै कहलकैन, छठम् वर्गके सब छात्रकेँ बेराबेरी ठाढ़ करैत गेलाह। हिनकर प्रखर उच्चारण 'इट वाज सण्डे ,देयर वाज ए क्रिकेट मैच इन द स्कूल , पाल वाज कैप्टन .गार्डेन इन प्लेग्राउंड,गोपी .....कहैत काल शाबसी दैत बैसबाक संकेत केलकैन। ओहि दिन संयोगे क्रमांक १ . आशुतोष झा एवम् कुसूम लाल चौधरी वर्ग सँ अनुपस्थित छलैक। एक सोमदिन हटनीके विद्यालयमे बालवर्ग सँ अष्टम (नवीन) वर्गधरिक विद्यार्थीगण साढ़े दसवजे जुमि गेलैक आ वि० शिक्षक कृष्ण देब साहु आ महेश बाबू आयल रहथि। सब वर्गक छात्र - छात्राकेँ वरपिपर- पाखैर गाछतर विर्तमे बैसबैत सातगोट प्रश्न लिखाओल गेलैक। उत्तर पुस्तिका जाँचलेल जमा लेल गेल़ै तँ एकमेव उत्तीर्ण छात्र इयहटा रहथि। बहुत गोरे राष्ट्रीय गान आ गीतमे भ्रमित भऽ लिखने छलैक। एकदिन देवकान्त यादव शिक्षक हिनका हेडमास्टर उमेश जा लग भोजनावकाश समयमे कार्यालय लऽ गेलनि,आ १५ अगस्त पर भाषण सुनबय कहलकैन। से संभाषण कलामे प्रवीण बुझलकन्हि। आनछात्र - छात्राके बन्सव्त शिक्षक लोकनिक बीच हिनका मादे नीक धारणा बनल रहलन्हि। सन् १९८३ ई०मे गामक दक्षिण ३ किलोमीटर पर अवस्थित ने०रा०सा० उँच्च वि० सरौतीमे वर्ग अष्टममे मो० शगीर साहेब वर्ग शिक्षक लग नामांकन लेल दरखास्त आ विद्यालय स्थानांतरण प्रमाणपत्र तथा कौमनचार्य जम्मा देलनि। विद्यालय किरानी रामबाबू कामत लग पिऊन रामप्रकाश शर्मा बजाकय लऽ गेलनि ओतय बालचर रसीद भेटलनि। मैथिली विषय खूब नीकजेकाँ सीताराम कामत पढ़ाबनि। ओहि समय नवम् - दशम् वर्ग लेल मैथिली भाषा साहित्यमे गद्य-पद्य संग्रह, एकांकी , गल्प गुच्छ आ आदर्श जीवन पोथीक अतिरिक्त व्याकरण आओर रचना स्वीकृत रहैक। समसामयिक पत्र - पत्रिका पढ़य लेल सीताराम बाबू हिनका प्रेरित केलकनि। सन् १९८६ मे प्रवेशिकोत्तीर्ण आ १९८८ मे अन्तर स्नातक(कला) तृतीय श्रेणी सँ पास केलाह। हिनका इसकूल - कालेज सरौतीमे फर्स्ट डिवीजन नील चलि गेल रहनि। कर्पूरी नागेश्वर शम्भूनाथ जनता महाविद्यालय सरौतीमे सेकेण्ड डिविजन सेहो नीले भेल रहैक। धरि मातृभाषा मैथिलीमे हिनका १०७ लव्धाँक मेंटल रहनि। आन दोसर विषय यथा इतिहास, राजनीतिक विज्ञान अथवा लौजीकमे ९० अंक सँ कम रहने बी. ए. (आर्ट) सत्र १९८८-९१ टीडीसी फस्ट बैचमे आनर्स नहिं भेलनि। चन्द्रमुखी भोला महाविद्यालय डेवढ़ - घोघरडीहामे कला संकाय केर बहुत कमे विषयमे तत्काल प्रतिष्ठा करैक विषय मंजूर रहैक। इग्नू सँ पीजी. डीआरडी. १९९६ म मुजफ्फरपुर बी आर अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय केर पुस्तकालय कक्षमे नामांकन लेल गेल रहथि। ऐ लेल गाम सँ अथक परिश्रम बले पदयात्रा करैत लोहनामे रेलगाड़ी पकड़ि अवधेश जी आ रामलोचन औभरसियर साहेब सँग पहुँचल छलाह। निर्मली सँ झंझारपुर धरि रेलमार्ग प्रल्यंकारी वाढ़िक कारणेँ कमला नदी लग ठप्प पड़ल रहलैक कतेको मासधरि। आधुनिक किसान आ प्रगतिशील कृषक लेल एन वाय के - मधुबनी सँ जुड़ि तिरहुत कृषि महाविद्यालय - ढोली आ पुसा कृषि विश्वविद्यालय सँ आवासीय प्रशिक्षण 'नगदी फलोत्पादन ' पर करने रहथि। सन् १९९१-९२ मे वेदव्यास ग्राम्य निर्माण सह युवा क्लब गाममे गठित करने रहथि। ग्राम स्वराज सभा कायम कय जनहितमे भूदान किसानके बीच काज कयलनि। हिनका आठमा वर्गमे भारत स्काउट एवं गाइड केर गुरू पद प्रशिक्षण श्रीकृष्ण यादव उँच्च विद्यालय - फुलप्राश सँ शिविर जीवनक अनुभव भेल रहनि। स्काउटिंग बौक्स रखि आवश्यक प्राथमिक उपचार क' सामग्री कतेको सालधरि समाज सेवार्थ व्यवहारिक सुविधा देलनि। प्रखंड आत्मा० सँ मौधमाछी पालन प्रशिक्षण लेल राजगीर (नालन्दा) आ पुष्प खेती पर विशेष प्रशिक्षण लेल भागलपुर कृषि विश्वविद्यालय - सबौर पठाओल गेल छलनि। निवंधित संस्था " मिथिलांचल कोसी विकास समिति केर प्रवक्ता छथि ,ऐ सामाजिक संगठन सँ लोकहीतमे कतिपय काज कयलाह अछि। बड़ी रेल मार्ग सकड़ी सँ पूरब धरि बनय आ ताहि पर सस्ता रेलयात्रा आरम्भ हुअय। ऐ लेल अथक परियास अपना टीम द्वारा करैत रहलाह। जनताक ज्वलंत समस्याक समाधान लेल सरकारी कार्यालय पर अनेकों बेर धरणा - प्रदर्शन करैत रहल छथि। मातृभाषा मैथिली केर प्रचार -प्रसार लेल जत्थामे कतेको जिलामे जन चेतना जगेलाह। कोसी संदेश त्रिमासिक मैथिली पत्रिका माध्यम सामाजिक अव्यवस्था दूर करबामे सदैव लागल रहैत छथि। मिथिला'क लोकमे अंधविश्वास,करिति आ नशापान छोड़ेबाक सेहो काज कयने छथि। श्रीकामत जी अपने आपमे एक करैत - फिरैत स्वयं संस्था छथि। हिनक क्रिया कलाप केर विश्लेषण वा लेखा जोखा कोनो शोधार्थी वा अन्वेषक करथि तँ एक पोथी बनि सकैत अछि। सन् १९९२-९३ मे एन सी आर डी- नागपुर सँ जुड़िकय विनोबा आश्रम शाला प्रकल्प के तहत् आदिवासी बाहुल्य बस्ती हेडरी,तलबारा, कोटमी, गेदा,अहेरी,एटापल्ली,अल्लापल्ली आ बेणागुण्डीमे अपन भरल जवानी कष्टप्रद बितौने छथि। अखिल भारत रचनात्मक समाजके मुख्य पत्र ' नित्य नूतन ' पाक्षिक पत्रिकामे हिनक आर्टिकल्स छपैत रहैत छलनि। १९९२ मेँ पत्रकारिता महाविद्यालय लाजपनगर सँ प्रकाशित मोटगर पुस्तक 'हिन्दी पत्रकारिता कोश'मे हिनक नांऊ छपल 'युवा लेखक एवं पत्रकार ' रूपेँ अशोक गुप्त जी जगजियार कयने रहनि। कामतजी गांधीवादी विचार वो समाजवादी विचारधाराक गहन अध्ययन कयने छथि। देशरत्न राजेन्द्र बाबूक ' सादा जीवन - उँच्च विचार ' बाला दर्शनकेँ आत्मसात करने छैथ। कोशी नदी अपन बहावधारा बदैल श्रेणी, मुदा कोशी कछेरक लालदेव जी अपन एकसुराह धारा ऐ दसकोशीमे नइ बदैल सकला हेन्। सामुदायिक भाव आ परोपकारमे लागल बात हिनका मादे ट्युशन मास्टर सुखदेब पंडित कतेको ठाम बजैत रहथिन। जाहि समय घोघरडीहा बजार जाईमे तीन ठाम नाह पर पार हुअय पड़ैक आ कारनीकेँ चारि आदमी सँ खाटपर डाक्टरी आनल जाई, ओहि समय ई कतेको रूग्ण स्री- वृध- नचार पुरूष केँ साईकिल सँ मधेपुर अन्सारी जी लग ल' जाइन। अपनो हेमोपैथिक, एलोपेथी आ आयुर्वेदी औषधि राखि वरखा कालीन समय जरूरतमंद बेरामी केँ दैत रहलखिन। सुईया भोकाई सेहो नहि लैत रहथि। डायक्रिष्टीन इंजेक्शन लगेला उपरान्त रोगी बुझि नहिं सकै आ दुखाई केँ बात तँ दूरे रहय! पारिबारिक बले कतेको राजनीतिक कार्यकर्ता आ कृषिश्रमिक केँ अपन कुरता,पैजामा- धोती ,बण्डी आ कोट - शाल ओ पनही देने हेताह तकर ठेकान नहिं। नगदो टाका,मफलर- गमछा,रुमाल,टोपी खुशी सँ बाँटलनि। कांपी, डायरी, पत्रिका,पोथी धरि बिलहने छथि। प्रवास यात्रामे टिकट,जलपान आ भोजनधरि होटलके बील इयह चुकबैत अपना लल भेल रहैत ,किछ लोकक नजैरमे अर्धविक्षिप्त सेहो कहेलाह। किछु एहनो लोकक संगहत रहैन जे हिनका सँ माछ,मौस आ अण्डो कीना लैत छलन्हि। आब तँ न आधो सँ लेनाइ,न माधोकेँ देनाए सन अपनाकेँ ठूठ गाछ बूझैत छथीन। पहिलुका जहाँति ५ लोको कोनू पण्डा-पुजारी, अगिलगी पिड़ित, बाढ़िक त्रासदी सं पिड़ित छात्र, क्रिकेट दलके क्रिड़ाकर्मी, वा अन्तयके चन्दा मँगनिहार केँ हिनके हाथे बोहनी नै करबै छथि। आब कोनू आयोजनमे हिनक अमीन बालक आ दूगोट +२ बीपीएससी.शिक्षक पुत्र बढ़ि-चढ़ि क' आर्थिक सहयोगी बनैत छैन। से प्रभाव हिनक व्यक्तित्व आ कृतित्वके कारणेँ भेल छन्हि। हिनक वंशावली (कुर्सीनामा) मैथिली पोथी २०२० ई० आई एस बी एन ९७८९३८८८११५१४ केँ पृष्ठ सं०-४० पर छपल सन्दर्भ स्रोत थीक। मूलनिबासी हटनीक गोविन्द कामति ओऽ बूलो कामति पेसर स्व० हनुमानी कामति मध्यवित् किसान पोखरिया हसामी रहथिन। हटनी गामके अतिरिक्त खतियानी जमीन राजस्व मौजे - नौआबाखर,धनपतबरही, हड़री,मैनही आ अलोलामे छलन्हि। गोविन्द कामतिके तीन पुत्र क्रमशः झपट,बौधू आ ललित भेलन्हि। गोविन्द कामतिके चौथापनमे चुमौन देवनाथपट्टीक मखन कामतिके दादाक अविवाहीत बहिन सँ भेल रहनि। ललित अशेसर केँ पहिल पत्नी सँ ललिया बेटी भेलनि। हुनकर असामयिक निधन उपरांत अपन विधबा छोट साढ़ि रनियाँ सँ समध रचेलनि। ताहि सुकमारपुर बाली सँ दू पुत्र रामकिसुन आ बाबुचन' बबाजी' तथा कुन्ती बेटी जेठ रहलनि। बाबूचन्दकेँ जेठ पुत्र नन्दलाल नान्हियेटामे मरि गेलापर पुत्री सरस्वती आ पुत्र क्रमशः लाल देब,उमाकान्त ओ महाकान्त प्रसादजी भेलनि। लाल देब जी लव्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार आ स्वतंत्र पत्रकार छथि।(शेषांस अंगिला अंकमे)

-प्रीति कुमारी,बी.ए. ऑनर्स (बी.एड०) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। पद्य ३.१.जगदानन्द झा मनु -तीनटा गजल ३.२.१० टा कविता- मूल हिन्दी-अविनाश मिश्र- मैथिली अनुवाद- पल्लवी मण्डल ३.३.कल्पना झा- हेरायल मऽन ३.४.जगदानन्द झा मनु -बीसटा हाइकू ३.५.रबीन्द्र नारायण मिश्र-मनुक्ख आ भगवान! ३.१.जगदानन्द झा मनु -तीनटा गजल जगदानन्द झा �मनु� तीनटा गजल गजल - 1 किए तीर आँखिसँ अहाँकेँ चलैए  हँसी ई तँ घाएल हमरा करैए मधुर बाजि पाजेब पैरक छमा-छम हृदयमे हमर राति दिन ई बजैए बसंतक हबामे हिलोरे खुजल लट चकित लोक दाँतेसँ आँगुर कटैए जखन ससरि जेए अहाँ केर आँचर पकरिते करेजा  कतेको मरैए अहीँकेँ तँ मुँह देखि जीवैत �मनु� अछि भ जेए मिलन मोन सदिखन रहैए (बहरे मुतकारिब, मात्राक्रम 122-122-122-122) गजल - 2 हमरा प्रेम करु सदिखन बसन्ती पिया नहि बाबूक  हम यौ आब रहलहुँ धिया साजन लेल रखने नेह छी कोंढ़ तर रुकि नहि करु जुलम तरसै हमर ई जिया बहुते जतन  सोलह वर्ष सम्हारलहुँ सहलो जाइए नहि आब टूटे हिया आँकुर फूटि गेलै आब मनमे हमर रोपल  जे करेजामे सिनेहक बिया साउन बित रहल दम टूटि �मनु�केँ रहल जल्दी आउ ने  जरि गेल  आसक दिया (बहरे कबीर, मात्राक्रम 2221-2221-2212) गजल -3 ई कमल सन नजरि जे लाजे झुकल अछि प्राण लेलक हमर जे आँचर खसल अछि देखलहुँ मोहिनी रूपक छवि जखन हम भेल पहिनेसँ मनमे जेना बसल अछि हम दुनू मिल जँ जीवनमे संग चलबै प्रेम जग देखतै मनमे जे सजल अछि सत कहै छी अहाँकेँ हम मानियो लिअ बिन अहाँ सुन्न सगरो जीवन बनल अछि छी मनक मित अहीँ हम्मर  सात जनमसँ हाँ सजन केर सुनि ली तेँ �मनु� बचल अछि (बहरे असम, मात्राक्रम  2122-1222-2122) -जगदानन्द झा �मनु�, मो० न० ९२१२-४६-१००६ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.२.१० टा कविता- मूल हिन्दी-अविनाश मिश्र- मैथिली अनुवाद- पल्लवी मण्डल १० टा कविता मूल हिन्दी-अविनाश मिश्र मैथिली अनुवाद- पल्लवी मण्डल 01 विवेक बुझल रहत जौं सुंदरताक माने तखन विपतियोमे जाएत नहि, सुंदरताक स्मरण बेथा दुख विलापहुमे बजा लेत गहदाएल सुंदरता रहलापर नहि नइ रहलापर मोन पड़ैत अछि रहब रहैत चलि जाएब हमरा मन अछि। 02. इत्र एहि तरहेँ प्रवेश करए चाहै छी हम; अहाँमे की हमर कोनहुँ रूप नहि रहय हम अहाँकेँ कनियोँ नहि छेकी मुदा, अहाँकेँ पूरा झाँपि ली। 03. औपरिष्टक अहींसँ मांगब हम; अहाँकेँ खाली अहींकेँ... मुदा अहाँ नहि, नइ कहब दइसँ घटै नहि छइ आओर बँचबैत तँ ओ अछि किने जिनका लग कम होइ छइ। 04. संकल्प अहाँकेँ एतेक चाहलौं कि एकर बदलामे किछु नहि चाहलौं अहाँक अवधान तक नहि। 05. पूर्व प्रेमीसँ प्रेमक कविता की उमेर छल अहाँक जखन पहिल खेप अहाँपर उतरल रहए दुख हमरा हुनक नाओं कहू जे अहाँक आलोकसँ आलोकित नहि भऽ सकल हमरा ओहि वंचितक पता दीअ जे अहाँक स्पर्शसँ विमुख रहि गेल ओकरा अहाँ अप्पन पूर्व प्रेमी नहि कहियौ अभागा कहियौ वा अधम कहियौ ओकरा प्रेमी किन्नहु नहि कहियो अहाँक प्रेममे पड़ि असंभव अछि अहाँक पूर्व प्रेमी होएब! 06. अव्यक्त आश्चर्य सभसँ कम मोल रहि गेल अछि, विचारक जखन कि पोथी निरंतर महग भेल जा रहल अछि पहुँचक बाहर भऽ गेल अछि किछु; बेस जरूरी चीज जखन कि बहुत किछु मंंगनीमे सेहो बाँटल जा रहल अछि अस्पताल अइ रूपेँ महग भऽ गेल जे माए इलाजक अभावमे मरि गेली अइ एक समयमे चीज एतेक महग आओर एतेक रास रहल की बुधियार बच्चा कनैत रहल मुहसँ बिनु आवाज निकालने नहि रहि गेल आब हल्लुक पर्यटन आओर प्रवास जे जेतए रहल ओ ओतइ बनल रहल बिनु कोनो भूमिकाक एक गोट घर सपनामे बनैत, बसैत आओर उजड़ैत रहल सलाय केर दाम तैयो नहि बढ़ल पछिला कतेको बर्खसँ..! 07. सांप्रदायिक वक्तव्य हम सदिखन गलत लिखै छी 'सांप्रदायिक' आओर 'वक्तव्य' सेहो सांप्रदायिक वक्तव्य हम गलत लिखै छी हम गलत लिखैत छी 'सांप्रदायिक वक्तव्य'। 08. पाथर होएब बेहतर अछि अहाँ कि गेलौं बेसुरक भऽ गेलौं हम जीवनसँ संगीत आओर वस्तुगत आकर्षण सभ चलि गेल हम पांतियोकेँ हरा गेला पर कानल छी तखन तँ अहाँ समुच्चा स्त्री छेलौं! 09. स्थिति केहनो होउ कखनो-कखनो सफलता पूरा भेटैत अछि आ कखनो-कखनो आधा कखनो-कखनो तँ भेटिते नहि अछि स्थिति केहनो रहए हम सफलतासँ आसक्त आ असफलतासँ घबराइ नहि छी स्थिति केहनो रहए हम कखनो मयसँ भरल गिलास तोड़ै नइ छी ऊँचगर आवाजमे बजै नइ छी स्थिति केहनो किएक ने रहए ई हमर प्रश्न नहि होएत अछि हमर प्रश्न अछि- 'आखिर हम कऽ की सभ सकै छी'। 10.आगू जीवन अछि खूब रास आत्मस्वीकृति अछि खूब रास दर्द आ सांत्वना सेहो बड्ड कम समय आ खूब रास शुभकामना ओना, सभ परिचित पाछू छूटि चुकल छथि आब, एकटा छोट सन कोठरी मात्र अछि जतए एक गोट छत-पंखा अप्पन अधिकतम गतिसँ घुमैत रहैत अछि जेतए हम, प्रत्येक भोरमे टुटैत देहसँ उठैत रहै छी जेतए भविष्य पहिनहिसँ उपस्थित रहैत अछि ई बुझबैत कि हमरा अवसाद आओर नाउम्मीदीसँ बँचबाक अछि थकान आओर उदासीसँ बँचबाक अछि जलन आओर अधैर्यसँ सेहो; बँचबाक अछि हमरा अभिनय नहि, सच केर संग जीबाक अछि ओना, ई सभ दिनो-दिन कठिन भेल जा रहल अछि भरमाएबैए पड़ोसी आओर नगरक लोक मुदा घृणा नहि, हमरा सभ चीजमे भरोस बना कऽ रखबाक अछि किएक तऽ संभावनासँ स्थिति अखनो छूछ नहि अछि धिया-पुता अखनो हँसि रहल अछि हिनका सभक हाथ अखनो कोमल आ सफेद अछि सक्कत होइत समयपर, अखनो हिनकर पकड़ मजगूत छनि। (अविनाश मिश्रक दस गोट हिंदी कविताक मैथिली अनुवाद। हिंदीसँ मैथिलीमे अनुवाद पल्लवी मण्डल।) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.३.कल्पना झा- हेरायल मऽन कल्पना झा हेरायल मऽन

संउसे घर इजोत, बडु कष्टप्रद अछि इस इजोत ! अंहारे घर कते जगमग छल, किछु फुसि किछु सते सब अनदेखल छल, कते महग भेल ई, समय क डोढ़ि, झलफलाइत आंखि क कोन ठेकान, सियान भेल धी पूत , बसल आन मोकाम,, बेसी नय मुद्दा भरोस छल, अंहार घर में टोहैत, मातृत्व क ओ क्षुद्धा काल्पनिक छल की सते, बताहि भेने कोनो फ़ायदा नय, भावी जिंदगी जुआरि में, खेतक आरि बनने कोनो फ़ायदा नय, निहोरा केने ठार छी, सदि खन इजोते रहै। -कल्पना झा, बोकारो अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.४.जगदानन्द झा मनु -बीसटा हाइकू जगदानन्द झा �मनु� बीस टा हाइकू 1 छलिया प्रेमी संगे लेने चलै छै सेनुर डिब्बी 2 नै बुझलनि हमर प्रेम किए निर्मोही पिया 3 देह हमर ई प्राण पिया केर हमरा लग 4 प्रेमक आगि बारल करेजमे निर्मोहीयाक 5 बाबूजीक ई देहेटा रहिगेल हमरा लग 6 मोनक भाव कागदपर नेने प्रेमपत्रमे 7 सगर राति मुँह नुका कानै छी पियाक यादे 8 जीतक शर्त हारब छै प्रेममे बुझिते राजा 9 बिन जोड़न दही नै जनमतै ठीके सोचलौं 10 बाहर ताकि जीवन हारलहुँ ओ तँ  मनमे 11 माँझ रातिमे गरीबक झोपड़ी सगरो चूबै 12 रोपनी दौनी खूब झूठक खेती नीक लोकमे 13 साँपक डरे गाम घर छोड़ब कहिया धरि 14 जीवन नहि बिन राक्षस दाँत तोड़ने आब 15 जीवन युद्ध अपने केने जीव राम नै औता 16 घूरक आगि प्राण बचबै छैक जाड़ मासमे 17 नून तेलमे गरीबक जीवन ओझरायल 18 पुषक जाड़ शोणित जमेलकै गरीबेटाकेँ 19 गरमी जाड़ गरीबक आफत धनीक मौज 20 ताड़ीक निशा रुपैयाक घमंड दुनू आन्हरे -जगदानन्द झा �मनु�, मो० न० ९२१२-४६-१००६ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.५.रबीन्द्र नारायण मिश्र-मनुक्ख आ भगवान! रबीन्द्र नारायण मिश्र मनुक्ख आ भगवान! एक दिन पलखतिमे ईश्वर सोचलाह जे चली पृथ्वीपर देखी हमर संतानसभ केना छथि? भ्रमण करैत-करैत सभसँ पहिने ओ मनुक्खसभक प्रदेश पहुँचलाह तँ देखैत छथि जे विभिन्न पूजास्थलीपर जमा भेल लोकसभ आपसमे लड़ि रहल  छल हुनके नामपर कहि रहल छल हमर भगवान पैघ तँ तोहर भगवान छोट केओ ककरो सुनबाक हेतु तैयार नहि छल अपितु,मारकाट करबाक हेतु उद्यत छल एहि दयनीय परिस्थितिकेँ देखि ईश्वर  बहुत दुखी भेलाह ओतए थोड़े काल रूकि गेलाह आ हुनकासभकेँ मनेबाक प्रयास केलनि जाहिसँ ओ सभ बूझि सकथि जे ओ कहिओ नहि सोचने रहथि जे घटनाक्रम एहन होएत जे लोक हुनका कोनो खास भवन वा पोथी धरि सीमित करबाक प्रयासमे हिंसक भए जाएत ओ तँ स्वेच्छासँ बहुरंगी दुनिआक सृजन केलनि हुनकर सभक स्वभाव,स्वरुप आ विचार अलग- अलग  देलनि जाहिसँ लोकसभ विभिन्नतामे आनंद मना सकथि आ मतभेद अछैतो आपसमे तालमेल बनओने रहथि मुदा से कहाँ भए सकल? आब जे ओ देखि रहल छथि से सर्वथा हुनकर इच्छाक प्रतिकूल छल ओ कहिओ सोचिओ नहि सकलथि जे हुनकर संतान एना आपसेमे छोट-छोट बात लेल लड़ि कए जीवनकेँ दुष्कर बना लेताह नहि बूझि सकताह अटल सत्य जे सभ तँ हुनके संतान छथि ई सभ देखि ईश्वर बहुत उदास भए गेलथि ओ दुखी मोनसँ जंगल आ पहाड़ दिस बढ़ि गेलाह जाहिसँ ओ अपन आन-आन सृजन जेना जानवर,बृच्छ आ चिड़ैकेँ देखि सकथि ओमहर गेलापर ईश्वर देखै छथि जे ओ सभ बहुत मस्त छल अपन-अपन रुचि आ स्वभावक अनुसार उनमुक्त जीवन जीबि रहल छल यद्यपि ओ सभ कहिओ कोनो धार्मिक स्थानपर नहि गेल कोनो धार्मिक पोथी नहि पढ़लक तथापि,पूर्वाग्रह,बदला वा अनावश्यक हिंसासँ मुक्त छल अपन आयु समाप्त भेलापर बिना कोनो पश्चातापकेँ एहि दुनिआकेँ छोड़ि दै छल ओकरासभकेँ आनन्दमग्न देखि ईश्वर बहुत प्रसन्न भेलाह ओमहर किछु दिन बेसीए रहि गेलाह मुदा पृथ्वीक ओहि भाग दिस जेमहर मनुक्खक बास छल कहिओ नहि घुरलाह बहुत दुखी मोनसँ अपन गाम लौटि गेलाह ईश्वरक संदेश बहुत स्पष्ट आ साफ छल तथापि,हमसभ अज्ञानतावश आपसमे लड़ैत रहि गेलहुँ अहंकारमे रमल रहि गेलहुँ हुनकर भावनाकेँ नहि बूझि सत्यसँ बहुत दूर रहि गेलहुँ । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। Maithili Literature in English Translation 4.1.For Whom Did I Do It-Jagdish Prasad Mandal (Original Maithili Short Story) Rameshwar Prasad Mandal (English Translation) 4.1.For Whom Did I Do It-Jagdish Prasad Mandal (Original Maithili Short Story) Rameshwar Prasad Mandal (English Translation) Jagdish Prasad Mandal (Original Maithili Short Story) Rameshwar Prasad Mandal (English Translation) For Whom Did I Do It For the past seven or eight days I had not met with Sangi Uncle, and my mind was growing restless. Yet the ongoing land survey work had kept me so entangled that I could not find a moment to visit him. My house is in the southern quarter of the village, while Sangi Uncle�s house is in the northern quarter. The different layout of our village is quite that of other villages. In most places, there are mixed hamlets where many castes live together, but not here. In our village, each caste has its own separate quarter. For the past two months, a land survey has been in progress. The entire village has become so absorbed in it that some people spend their whole day following the survey clerks, while others trail the amin (surveyor). My own view is clear: I do not own as much land as some others, so once the work at the survey office quiets down, I will go there and get all my matters settled in a single day. But while in the village, my own thoughts hardly matter, someone or the other is always dropping by to ask something. One person says the land record is missing, another says the title deed is lost, yet another complains that no rent receipt has been issued for years, and still another recalls that when the floods swept away their home, all the papers were ruined. My own case is much the same. When the 1987 flood destroyed my house, the land documents were soaked and decayed beyond recovery. Once again, the thought of Sangi Uncle came to mind. We had been in the habit of meeting at least once every day, exchanging all kinds of conversation, yet for the past seven or eight days that had not happened. There was so much to catch up on, but what could I do? The whirlwind of survey work had kept me from seeing him. Sitting alone at the doorway, I resolved that today I would go and meet Sangi Uncle. As luck would have it, at that very moment Ammarupi, a sister-in-law from the village, was passing by on her way to the market. I caught sight of her and called out- �Bhaujii, please wait a moment.� As soon as I called out, Bhauji came closer, muttering to herself- �I am going to the market. It�s getting late. I have been so caught up with farming work that there hasn�t been a single moment free.� I said- �Since you are already on your way to the market, go ahead. I have work there too, but I do not have a single rupee in hand, so I will first arrange for money and then go, maybe tomorrow or the day after.� Looking unsettled, Bhauji asked- �Why did you call me?� I replied- �It has been seven or eight days since I don�t met Sangi Uncle. I called you only to ask how he is doing.� Ammarupi Bhauji said- �I have not seen with my own eyes, but I heard he has been quite ill.� Sangi Uncle is ill! On hearing this, my eagerness to see him only increased. I said- �That�s what I wanted to know. You should go now, or you will be late for the market.� Bhauji went on toward the market, and I decided in my mind that since I did not have to go to another village for any errands, I would go right now to meet Sangi Uncle. Without even stopping for a snack, I got up and left. On the way, many thoughts came to mind, but I brushed them aside until I reached Sangi Uncle�s doorway. He was sitting on the wooden platform just outside. The sight of him reminded me of what Bhauji had said- but I immediately changed my mind about repeating her words. Since I was already here and he was in front of me, why bring up that topic unnecessarily? I said- �Uncle, my respects to you. I have been so caught up with this survey work that even food feels hard to digest. I spend the whole day running behind it.� Sangi Uncle responded- �Rupalal, land belongs to the one who holds it firmly, otherwise it belongs to someone else.� Hearing this, I could not help but smile, though I also wondered why people still spend their whole day chasing the amin, the clerks, and the survey office if ownership depends on firmness of claim. I kept my thoughts to myself and only said- �Uncle, it has been seven or eight days since we met, so I was feeling restless to see you.� As soon as I spoke, Sangi Uncle replied- �Rupalal, I was beginning to think you must have fallen ill, which is why you have not been coming to this side of the village. Are you keeping well?� I kept talking with him, but at the same time a corner of my mind kept returning to what Bhauji had said about him being unwell. I wondered how I could ask directly if he was sick. If he truly were, would he not have said himself- �Rupalal, I have not been feeling well lately�? Just then Sugiya Aunty, Sangi Uncle�s wife, came from the courtyard to the doorway. Without any preamble, she said- �Son Rup, I am not going to live much longer.� I quickly replied- �Aunty, why speak such inauspicious words? Speaking of good brings good, and speaking of ill brings ill.� Before I could say more, Sangi Uncle interjected- �Rupalal, you talk and think like the old folks.� A little startled, I asked- �What do you mean, Uncle?� He explained- �The people of earlier times believed and often said that speaking ill brings ill and speaking well brings well.� I felt like responding to this, but as I prepared to speak, I held my tongue. Sangi Uncle understood. He could tell I wanted to say something but was choosing not to. Making his own point clear, he said- �Rupalal, speaking alone does nothing. Action is what counts. The one who acts, even without speaking, will succeed. But the one who does nothing and only talks big will achieve nothing.� His words rang true in my mind, and I nodded in agreement. Turning the conversation toward what Ammarupi Bhauji had mentioned earlier, I tried to shift the topic, pulling a face as I said- �Uncle, your face looks troubled to me. Is something bothering you?� In the entire village, if Sangi Uncle trusted anyone more than others, it is me. Perhaps it was because, whether or not I could always help with money or other things, I was always ready to stand beside him with my three-and-a-half-hand-long body in times of need. That kind of readiness naturally inspires trust. Sangi Uncle said- �Rupalal, times have gone crooked.� I could not understand what he meant by �times have gone crooked.� Day and night seemed to be passing just the same as before. How then could time itself be crooked? I asked- �What do you mean, Uncle?� He said- �Rupalal, I cannot speak for others, for in some places fathers mistreat their sons, and in other places sons mistreat their fathers. But what has happened in my own life, I have lived through, so I will speak of my own case.� Hearing him say- �I will speak of my own case,� I pricked up my ears and asked- �What do you mean, Uncle?� He said- �I have two sons, as you know.� I cut in- �Not only I know that, everyone knows it.� Sangi Uncle continued- �Both brothers live in Delhi. I hear they earn quite well.� I replied- �I have heard the same. Each of them owns a flat, has a four-wheeler, and send their children to a convent school.� Adding to my words, Sangi Uncle said- �My elder son�s father-in-law developed cancer. He spent generously to get him treated in Mumbai. You know about that, don�t you?� I had not known, but in my own thinking, I have always believed that whenever possible, one should help others. And if he paid for his father-in-law�s treatment, what harm was there in that? So I said- �Uncle, if a person helps another in need, is that not a good thing?� Shifting the direction of the talk, Sangi Uncle said- �Rupalal, you too have not understood the whole matter, but�� I asked- �But what?� He said- �For the past three months I have been troubled by a painful illness, and it is getting worse by the day. An operation will be necessary. Many times I have spoken to both my sons over the phone, and their mother has also told them, but neither of them has paid any attention.� I said- �If they are not listening, then you have your own land and property. Sell it and get the operation done.� Sangi Uncle replied- �That is easy for you to say. I have this stomach ailment, and my wife�s eyesight has also deteriorated badly. Here in the village she manages to move around and do some small tasks by guesswork, but in the place where the operation would be done, would she be able to manage on her own?� I said- �No, that would not be possible.� Sangi Uncle continued- �The sons for whom I did so much, are they truly sons today?� I agreed- �No, they are not.� He asked- �Then you tell me, for whom did I do all this?� What could I say? I remained silent. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। 1 || विदेह ४३५ विदेह ४३५|| 1

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fide Act साहित्य आन्द्रोलनः मानुषीमिह संस्कृतामू सम्पाद़क: गनेन्ड्र गकुर।