VIDEHA — Issue 436 / अंक ४३६

Publication: VIDEHA · Issue: 436
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विदेह ४३६ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। [विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X Videha e-Journal (since 2000) at www.videha.co.in ] ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। कॉपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२६. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२६. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA. सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@zohomail.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@zohomail.in. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover design: AUM GAJENDRA THAKUR VIDEHA:436 समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा। मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अनुक्रम विदेह ४३६ म अंक १५ फरबरी २०२६ (वर्ष १९ मास २१८ अंक ४३६) ऐ अंकमे अछि:- १.१.अंक ४३५ पर टिप्पणी (पृष्ठ १-१) गद्य २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान -२३ (पृष्ठ ३-७) २.२.हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१५ (पृष्ठ ८-१८) २.३.प्रणव कुमार झा-अपनइति! (पृष्ठ १९-२५) २.४.परमानन्द लाल कर्ण-बाबुजीक सबक (पृष्ठ २६-३२) २.५.प्रीति कुमारी- श्री लालदेव कामत जीक व्यक्तित्व आ कृतित्व-२ (पृष्ठ ३३-४४) पद्य ३.१.जगदानन्द झा मनु -तीनटा गजल (पृष्ठ ४६-४८) ३.२.जगदानन्द झा मनु -बीसटा हाइकू (पृष्ठ ४९-५३) ३.३.रबीन्द्र नारायण मिश्र-प्रदूषणक प्रहार (पृष्ठ ५४-५६) Maithili Literature in English Translation 4.1.Service-Jagdish Prasad Mandal (Original Maithili Short Story) Rameshwar Prasad Mandal (English Translation) [page 58-69]

१.१.अंक ४३५ पर टिप्पणी अरुण मिश्र अति सुन्दर, दिव्य पत्रिका। -Arun Misra, PhD 10995 Parsons Road Johns Creek, GA 30097-1723 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। गद्य २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान -२३ २.२.हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१५ २.३.प्रणव कुमार झा-अपनइति! २.४.परमानन्द लाल कर्ण-बाबुजीक सबक २.५.प्रीति कुमारी- श्री लालदेव कामत जीक व्यक्तित्व आ कृतित्व-२ २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान -२३ कल्पना झा उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' जीक परिवारक अन्य सदस्यक विवरण दर्शन शास्त्रक शोध-विशेषज्ञ: डॉ. ब्रजेन्द्र कुमार झा ई एकटा अद्भुत संयोग छल जे 'व्यास' जीक दोसर बालक किशोर जीक विवाह भेलनि किशोरी नामक कन्याक संग। मतलब ई गीत जे अछि- जेहने किशोरी मोरी तेहने किशोर हे.... बिधना लगाओल जोड़ी केहन बेजोड़ हे...... से बुझू ई गीत हिनके सभ लेल लिखल गेल हो, अक्षरशः फिट' बैसैत छनि। पी.एच.डीक उपाधि प्राप्त डॉ. ब्रजेन्द्र कुमार झा आ हुनक जीवनसंगिनी किशोरी झा पर। आश्चर्यक गप्प इहो जे मात्र नामहि टा मे नहि, आचरण मे सेहो अद्भुत समानता देखना जाइछ, हिनका दुनू गोटे मे। मतलब जेहने माता-पिताक आज्ञाकारी पुत्र रहलाह किशोर जी, तेहने आज्ञाकारी, संस्कारी पुत्रवधू सिद्ध भेलीह हुनकर अर्द्धांगिनी किशोरी झा। सासु चाह पीबि कप खाली करितथिन, ताहि सँ पहिनहि पुत्रवधू हाथ सँ कप लेबा लेल मोस्तैद। सासु-ससुरक प्रति एहि तरहक कर्तव्य निर्वहन बला प्रवृत्ति विरले देखबा लेल भेटैत छै समाज मे। दर्शन शास्त्र (Philosophy) सँ पी.एच.डीक उपाधि प्राप्त क' चुकल ब्रजेन्द्र कुमार झा 'लेक्चररशिप'क बाट धएलनि, रोजगार लेल। राजनगर कॉलेज मे पहिल पोस्टिंग भेल छलनि हुनकर। आ रिटायरमेंट भेलनि जे. एन. कॉलेज मधुबनी सँ। 'एसोसिएट प्रोफेसर'क पद सँ अवकाश प्राप्त कएने छलाह प्रोफेसर साहब। हिनकर शोधक विषय छलनि, "प्राचीन भारतीय वाङ्मय मे आर्थिक अवधारणा।" मूलतः ओ "स्मृति नीति के तत्व"क अध्येता छलाह। मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, अत्रि स्मृति, विष्णु स्मृति, पराशर स्मृति, हारीत स्मृति, गौतम स्मृति, इत्यादि लगभग सभ स्मृतिक अध्ययन कएल छनि हुनकर। मुदा एतेक गहन अध्ययन क' चुकल किशोर जी सँ गप्प-शप्प करैत क्षणहु मात्र लेल आभास नहि हेतनि सामने बला केँ जे एतेक रास अध्ययन कएल छनि हुनकर। बड्ड स्थिर चित्त आ 'लो वॉल्यूम' मे गप्प करताह ओ। जहाँ सभ तरि लोक अपन अल्प ज्ञानक बखान करैत नहि अघाइए, तहाँ ई अपना द्वारा अर्जित ज्ञान कें 'प्रदर्शन'क 'प्'ओ सँ भेंट नहि होमए देलथिन अछि। ई हिनकर सभ सँ पैघ विशेषता छनि। बिधना द्वारा लगाओल एहि अनुपम जोड़ीक मात्र एक गोट संतान छथिन। हिनकर धिया अमिता झा। मतलब हिनकर व्यक्तिगत परिवार मात्र तीन गोटाक छनि। मुदा स्वार्थी जकाँ मात्र अपने तीनू गोटा लेल सोचबाक हिनकर प्रवृत्ति कहियो नहि देखाएल हमरा। सभ कें संग ल' क' चलब, अपन पिता सँ सीखल छनि बुझि पड़ैए। ई प्रवृत्ति एखनहु धरि दृष्टिगोचर होइत अछि, से आश्चर्यक गप्प! मतलब माता-पिताक उपरान्तहु जस-के-तस बनल रहलनि पहिने सन मनोवृत्ति। संपादकीय सूचना- एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-7 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-8 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-9 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-10 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-11 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-12 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-13 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-14 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-15 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-16 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-17 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-18 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-19 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-20 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-21 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-22 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.२.हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१५ हितनाथ झा (मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070) 'प्रभात'मे प्रकाशित कांचीनाथ झा 'किरण'क रचना

हस्तलिखित पत्रक उपयोगिता श्री कांचीनाथ झा (धर्मपुर)

कोनो वस्तुक प्रारम्भिक रूप क्षीण तथा छुद्र देखि ओकर उपेक्षा करब सर्वथा अनुचित। कारण संसारक शृष्टि मात्र परमाणुए सौं बनल अछि। बड़क बीज देखि क्यो कहि सकैछ जे एही राइ समान छुद्र कणमे ओहेन-2 महान वृक्षक आकार गुप्त अछि। हाथी सन-सन प्रकाण्ड जनवरौक शृष्टि एके सेल मात्र सँ ह्वैत छैक। तहिना कोनो संस्था वा संघ प्रारम्भे सौं महान तथा सर्वमान्य नहि रहैछ।

सर्वप्रथम कोनो भावनाक उत्पत्ति एके व्यक्तिक हृदयमे होइत छैक। अनन्तर विचारक प्रचार भेलासँ अनुयायीक संख्या बढ़ि एक समूह बनि जाइछ। और एक विचारावलम्बी जन समूहक नामे संस्था थिक। भावना दृढ़मूल नहि भेलासँ नष्ट भय जाइछ। और पक्षान्तरमे विकसित।

उदाहरण वर्तमान इंडियन नेशनल कांग्रेस एकरो स्थापना प्रायः बहूत अल्प व्यक्तिक द्वारा भेल छल। परन्तु एकर साम्प्रतिक वैभव देखू। हँ, एतवा अवश्य जे संख्या के चिरस्थायी तथा सफल बनेबाक हेतु ओकर संचालक के, भगीरथ समान दृढ़ प्रतिज्ञ तथा प्रयत्नशील होयब एकान्त आवश्यक।

क्वैलख सन सामान्य देहात मे युवक संघक स्थापना तथा ओकर द्वारा द्वारा 'प्रभात' नामक मासिक पत्रक प्रकाशन मिथिलाक उन्नतिक उज्वल भविष्यक सूचना थिक। यद्यपि प्रभातक स्वरूप क्षुद्र क्षीण तथा अपरिष्कृत अछि तथापि उपेक्ष्य नहि थिक। उद्योग कयलासँ ई ' प्रभात' मिथिलाक अशिक्षा रजनीक अज्ञानान्धकार के नासि वास्तविक प्रभात बनि सकैछ।

सम्प्रति, अमुदृति साहित्यक नाम नहि होइछ। एकर आदर नहि ह्वैछ। परन्तु ई, मनोवृत्ति वर्तमान पाश्चात्य-विलासी वातावरणसँ दूषित अछि। जाहि दिनमे मुद्रण यन्त्र नहि छल, कागजक स्थानमे तालपत्र चलैत छल, ओहि दिनमे की विद्याक प्रचार कम छल ! साहित्यक उन्नति कम छलैक? विश्वविख्यात सर्वश्रेष्ठ संस्कृत साहित्यक उन्नति हाथहिसँ तालपत्रेपर लिखि भेल छल। तखन की हमरा सब मैथिलीक उन्नति एहि हस्त लिखित पत्र सँ नहि कय सकैत छी ?

सम्प्रतियो चरखा तथा एकर द्वारा देसी वस्त्रक उद्धारपर दृष्टिपात करू! यदि चरखाक द्वारा, लंकाशायर मैनचेस्टर सन विश्वविख्यात मसीनक प्रतिद्वन्द्विता कय देसी वस्त्रक निर्माणकलाक उद्धार सम्भव हो तँ की प्रभातादिक पत्र द्वारा मैथिली साहित्यक उद्धार असम्भव मानक चाही ? कदापि नहि। एकर उपेक्षा नहि कय, सवहिं सहयोग प्रदान करय तँ एकर मुद्रणो कठिन नहि रहत। हम प्रभातक दयनीय दशा देखि चकित छी कारण एहि गाममे विद्वानक अभाव नहि। फेर प्रभातक ई रूप कियैक! हमर एहि गामक प्रत्येक विद्वानसँ अनुरोध जे प्रभातक पालन सुचारु रूपसँ करथि।

तखन एक बात ! जहाँ तक भय सकय, एखन मैथिलीक दिसि ध्यान देब उचित। बंगलाक वैभव महान छैक। हिन्दीक सेवक बहुत छैक। अंग्रेजीक तँ कथे नहि। सागरमे एक पोखरियोक जल प्रदान कयने कोनो लाभ नहि तखन एक चुरुक आध चुरुक सँ की हो। परन्तु चुकरी एके चुरुकसँ उमटाम भै जाएत।

यद्यपि हिन्दी राष्ट्रभाषा थिक। एकर प्रचार सर्वथा कर्त्तव्य। परन्तु एखन नहि। एखन मैथिली मरि रहल अछि। यावत अन्य प्रान्तीय भाषाक समान नहि बनलि अछि तावत हमरासव तनमन धनसँ एकरे सेवामे एकनिष्ठ रही। अन्यथा एकर अस्तित्व सर्वथा सर्वथा असम्भव। हमरा जहाँ तक आशा अछि- क्यो व्यक्ति एहन नहि होयताह जे मैथिली नहि लीखि सकताह। विशेष 'विज्ञेशु किम अधिकम'।

ईश्वरसँ प्रार्थना जे प्रभात प्रभात हो और युवक संघ सर्वदा युवके रहय। (प्रभात अंक- 06, जून 1933, पृष्ठ- 21)

कविता युवकसौं कांचीनाथ झा "किरण" (धर्मपुर)

हो पैघ काज केहनो साहस के नै हड़ाबी। औचित्य लखि पढ़य जौं निर्भय कदम बढ़ाबी।। -0- आरम्भ काज कय केँ मुख नै कदापि मोड़ी। पथमे पड़ल रहौ किछु कोमल कली की रोड़ी।। - 0 - अपना बुते हुए जौं नहिँ आनकेँ अढ़ाबी। कर्तव्यनिषु भय पुनि कर्तव्यता पढ़ाबी।। - 0 - सद्धर्म थिक युवक केर निज देश जाति सेवा। पहिने भेटत कठिनता परिणाम किन्तु मेवा।। -0- विश्वास निज श्रमक दृढ़ जाधरि रहत हृदयमे। दासी बनलि सफलता रहतीह पयर धयने।। -0- यावत रुधिर गरम अछि चलू ता "सुकाज " कयने। पुनि कय सकब "किरण" की जर जर शरीर भयने।। ---0---

प्रियतमसौं

प्रभु ! मम जीवन जीर्ण कुटीमे कहिया होयत भाग्योदय। हाय ! अनन्तक अमा निशामे लेत मनोहर चन्द्र उदय।। -0- कुमुदिनि-अरुण- अधर पर देखव कखन सरल मुस्कान। प्रेम-पथिक मधुकरक सुनब हम मधुर याचना गान।। -0- विरह-विह्वला मुग्ध चकोरी निरखत नव। ज्योत्सनाक प्रकास। मालतीक पुलकित तनु तनमे होयत नव कलिकाक विकास।। -0- हृतन्त्री मे लहरि उठत प्रिय- मिलन राग केर मृदु झंकार। मुरझल शीर्ण शिथिल तनमे पुनि होयत नव जीवन संचार।। -0- दुर्दिन-विरह बितत पर प्रभु ! कहिया? होयत हृदय-गगन अभिराम। तीव्र अथक-गति नयन निर्झरक श्रोतक कहिया ह्वैत वितान।। -0- होयत शान्त कखन मम मानस- सागर केर हिल्लोल महान। प्रियतम ! ऐ निरीह दुखिया केर मूक वेदना केर अवसान।। -0- मलार हे सखिया ! आजहुन आयल पँतिया !

नीरद नील गगन मंह शोभय चमकि रहय बिजुलतिया। झिंगुर, मोर, पपिहरा गाबय और अमावस रतिया।। सून सदन, वय तरुण चपलमति पीड़थि हिय रति-पतिया। "कांचिनाथ" आवहुँ सुधि लेथिन भय गेल केहन कुमतिया।। - -0- रति-पति = कामदेव

(प्रभात अंक- 06, जून 1933, पृष्ठ- 21, उपर्युक्त तीनू कविता एही अंकमे )

याचना नहि मड�इत छी सौख्य सक्ति सम्पति नहि प्रभुता। नहि विद्या यश कीर्ति वुद्धि वल नहि सुन्दरता।। दृढ़तर हो ई ज्ञान प्राण रह यावत तन मे। "शुभमय ईश विधान" भान हो सन्तत मनमे।। (प्रभात अंक- 08, अगस्त 1933)

ललित-निबन्ध वैदेहि

देवि ! औ स्यमन्तक मणि की भेल ? जे अंशुमालिक समान हृदय -कमल के उत्फुल्ल करैत छल। नवीन नील नीरदक समान मन-मयूर के उद्भ्रान्त कय दैत छल। शीतल शारदीय सुधांशुक समान नयन चकोर के उन्मत्त कय दैत छल। जे संगीतक प्रथम ध्वनि, वेदक प्रणव, शृष्टिक मूल प्रकृतिक समान महान छल।

जकर मधुर धवलिमा सँ आकृष्ट भय स्वयं जगज्जननी एहि स्थानमे अवतीर्ण भेलि छली। जकर मनोहर प्रकाशक अन्वेषण करैत आदर्श रूप मर्य्यादा पुरुषोत्तम, त्रिभुवन पातक रामचन्द्र अयोध्यासँ पैरहिं एक सामान्य अतिथिक रूपमे एहि भूमिक पालक जनकक गृह आयल छलाह।

मा ! की ओ मणि हड़ा गेल! अथवा मादृष क्यो हठी सन्तान अहाँ सँ लय कय नष्ट कय देलक। जाहि मणिक प्रकाशमे व्यास अष्टादश पुराणक रचना कय अज्ञानान्धकार सागरमे निमग्न के पथ देखौलक। याज्ञवल्क्य-स्मृति शृंखलाक निर्माण कय विछऋंखल (vitchhrinkhal)-शक्तिहीन समाज के श्रृंखलित, सम्पन्न बनाय, चिरस्थायी होयबाक योग्य बनौलक। जे श्रृंखला असंख्य अनाचार प्रहार सह्य करैत अद्यावधि ओहने दृढ़ बूझि पड़ैछ। मा ! ओ अमूल्य मणि कतय अछि। जकर सुधांशु शीतल प्रकाशमे अयाचीक साग अंकुरित भेल। वेदान्तवादी सुकक जन्म भेल छल।

कविकोकिल विद्यापतिक कविता मन्दाकिनीक मूल स्रोतो ओही मणिक प्रकाश छल। जाहि मणिक एक किरण पाबि सूर्य्य दिनकर कहाय रहल छथि से मणि की भेल। हाय ! अम्ब ! की कहल ? हड़ा गेल। तखन कियैक नहि कहै छी जे मिथिले हड़ा गेल। मैथिले हड़ा गेल। कियैक जीवित रखने छी। (प्रभात अंक- 08, अगस्त 1933)

रण साज

सपदि चलु सुन्दरि केलि कुटीर

कय आमन्त्रित तोहि रसिक वर शीतल यमुना तीर। सुरत समर परतीक्षा मे छथि सज्जि सर रतिवीर।। कमर वन्द कोच वन्द कंचुकी दृढ़ कए आँचर चीर। उन्नत उरज पताक निरखि सुभ सकुन मीन ससि कीर।। किरण कहथि विजयी निश्चय यदि नहि हयब अधीर। रहत थीर के पीर जखन तुअ छूटत नयज तीर।। (अंक 9, सितम्बर-1933)

उपलब्ध अंकक आधारपर कांचीनाथ झा 'किरण' केर दू आलेख एवं पाँच कविता प्रकाशित छनि, सेहो मात्र तीन अंकमे। ओहि समय किरणजी 26-27 वर्षक छलाह। लेखनी हिनक प्रारम्भिक समयक छनि, मुदा ओहि समय हस्तलिखित पत्रिकाक हस्तक्षेपपर महत्वपूर्ण आलेख लिखने छलाह, एहि पत्रिकामे सेहो आ मिथिला मिहिरमे सेहो। उपर्युक्त आलेख आ कविताक नीचाँ कोनोमे मात्र कांचीनाथ झा (धर्मपुर) आ कोनोमे कांचीनाथ झा 'किरण'(धर्मपुर)।

मैथिलीक प्रसिद्ध आलोचक किरणजीक उपर्युक्त आलेख आ कवितापरटिप्पणी करैत लिखैत छथि- " कांचीनाथ झा 'किरण'क पाँच टा कविता आ दू टा निबन्ध प्रभातक विभिन्न अंकमे प्रकाशित अछि। एक टा निबन्ध हस्तलिखित पत्रक उपयोगिता सँ सम्बद्ध अछि तँ दोसर ललित निबन्ध अछि- वैदेहि। ई सातो रचना किरणजीक दुनू मुक्तक काव्य-संग्रह आ एकटा निबन्ध-संग्रहमे नहि अछि, अन्यत्रो कतहु मुद्रित अछि वा नहि से कहब कठिन। किरणजीक प्रारम्भिक कालक काव्य-स्वरूपक परिचितिक लेल प्रभातक पेटीमे सैंति कs राखल कविता पठनीय अछि।" (सन्दर्भ: एकल पाठ-मोहन भारद्वाज) संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-7 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-8 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-9 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-10 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-11 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-12 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-13 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-14 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.३.प्रणव कुमार झा-अपनइति! प्रणव कुमार झा अपनइति! बात 21म सदी के पहिल दसक के छी। आनंद एखन लखनऊक एकटा सरकारी महकमा मे कार्यरत रहथि। तीन बरख पहिने हिनका ई नौकरी भेटल छलैन्ह। आनंद एकटा अतिसाधारण परिवार सं अबै छथि। पिताजी कानपुरक एकटा मील मे काज करै छलाह, मुदा किछु साल पहिनहे ओ मील बंद भऽ गेल, जकरा संगहि हुनक रोजी-रोटी सेहो बिला गेल। किछु दिन दिल्ली-पंजाब मे हाथ-पैर मारलखिन्ह, मुदा कतौ बात नै जमलैक। अंततः हारि-दारि क गाम पकड़ला। मुदा गामों मे की करितथिन! खेती-बाड़ी नई ओत्ते छलनि आ नै कहियो केने छ्लाह। गाय-गोरू, आटा-चक्की, दोकान-दौरी कै टा आइडिया आबईन मुदा कोना की करी किछु समझ नै आबय। फटेहाली आ भविष्यक चिंता हुनक मानसिक संतुलन डोलबय लागल छल। ओ बताह जेना करय लागल छलाह। मुदा आनंदक माय  धैर्यक प्रतिमूर्ति छलीह। बेसी पढ़ल-लिखल नै छलीह, मुदा संकट कें एहि कालासागर मे ओ परिवारक पतवार केँ थामने रहलीह। आनंद ओहि समय इंटर मे छलाह। दशमा मे प्रथम श्रेणी सं उत्तीर्ण भेला कऽ बाद विज्ञानक छात्र बनल छलाह। कोनो सामान्य कानपुरिया छात्रक जेकां हुनक ऑंखि मे सेहो आईआईटी कानपुरक विशाल गेट झलकैत छलैक। मुदा बिना कोनो कार्पोरेट कोचिंगक ओहि दुर्ग केँ भेदब अत्यंत कठिन छल। बापक नौकरी छूटल तऽ कोचिंगक आस सेहो गेल। सरकारी इंटर कॉलेजक पढ़ाई तऽ बस कागजी खानापूर्ति छल। तथापि, माय कतहु-कतहु सं पाईक जोगाड़ कऽ छोट-मोट ट्यूशनक प्रबंध कऽ देलखिन्ह। आनंद इंटर पास केलखिन्ह आ किछु दोस्त सबहक देखादेखी आईआईटी आ एआईट्रिपलई (AIEEE) क फॉर्म सेहो भरलखिन्ह। आईआईटी तऽ नै भेल, मुदा एआईट्रिपलई मे काउंसलिंगक बुलावा आयल। कोनो एनआईटी भेटबाक नंबर तऽ नै छल, मुदा देशक नामी प्राइवेट कॉलेज आ डीम्ड यूनिवर्सिटी सभक कट-ऑफ लिस्ट मे आनंदक नाम चमकल। मुदा ओहि चमक मे अन्हार बेसी छल - फीसक अन्हार। एहन नै छल जे आनंद ऐ से बेहतर रिजल्ट नै कऽ सकाय छलाह, मुदा किछु परिवारक स्थिति आ कुछ दिशाहीनता के प्रभाव सेहो ऐ रिजल्ट पर छल। शुरू मे त नै मुदा आनंद आ माय के जिद्द आ उत्साह पर बाबू गामक जमीन बेचि कऽ एडमिशन कराबय लेल तैयार भेलाह, मुदा गामक हितैषी सब अपन असली रंग देखा देलखिन्ह। केओ जमीन कीनय लेल तैयार नै भेल, उलटे ताना मारय लागल� "बेटा तोरा फुसिया रहल छौ, बाप बेरोजगार छै आ ई डोनेशन दऽ कऽ इंजीनियर बनत? कतौ दिल्ली-ढाका जाय कमाय नहि करैत ग!" अंततः इंजीनियरिंगक सपना ओहि ठाम दम तोडि देलक। आनंदक किछु सहपाठी इंजीनियरिंग मे एडमिशन लेलाह त किछु दिल्ली पकड़ि रहल छलाह। देखा-देखी आनंद के सेहो एकटा आस लागलैन जे नै इंजीनियरिंग त किछु समकक्ष पढ़ाई लेल दिल्ली जाय। हुनक एकटा मामा दिल्ली रहय छलखिन। आनंद माय के कहलक।  माय अपन भाय (आनंदक मामा) क नाम एकटा मार्मिक चिठ्ठी लिखलखिन्ह। ओ चिठ्ठी अपन बेटा के भविष्य लेल एकटा बहिनक अपन भाय सं कयल गेल अंतिम अनुनय छल। आनंदक माय नियत दिन मे ओ चिट्ठी आ अपन सिरमा मे राखल अंतिम पाँच सैया नोट जे ओ गामक मिशर पंडीजी से उधार मांगने छलिह आनंद के पकड़ा देलखिन। आनंद ओही चिठ्ठी केँ संजो कऽ एकटा पेटी मे किछु किताब आ कपड़ा लऽ कऽ दिल्ली के ट्रेन के जनरल बोगी के कचरमबद्ध मे सवार भऽ गेलाह। दिल्लीक अजनबी भीड़ मे पुछईत पाछईत अंततः मामाक डेरा आगाँ जा ठाढ़ भेलाह। मामाक मदैत सं इग्नू (IGNOU) मे बीसीए मे नाम लिखायल गेल। येन केन प्रकारें तत्काल लेल आनंद कें ओहि सामाजिक अपमान सं सुरक्षा भेटलैक जे नौकरी नहि करबाक कारणे गाम मे सहय पड़ितैक। आनंद ट्यूशन पढ़ा कऽ अपन गुजर-बसर करय लागलाह आ किछु समय बाद अपन एकटा साथीक संग शेयरिंग रूम मे शिफ्ट भऽ गेलाह। बीसीए पूर्ण भेला कऽ बाद असली संघर्ष शुरू भेल। आब घरक स्थिति आ समाजक प्रेशर दुनु आनंद के कन्हा पर नौकरी के उम्मीद मे सवार भेल छल । आनंदक देह पर पहिरल कपड़ा साफ तऽ छल, मुदा हुनक कॉन्फिडेंस आ संवाद कौशल ओहि चकाचौंध भरल ऑफिस सभक लेल पर्याप्त नै छलैक। रेफेरेंसक अभाव आ कमजोर पर्सनालिटीक कारणे एक के बाद एक इंटरव्यू सं निराशा हाथ लगैत छलैक। प्रत्येक बुधवार कऽ अखबार सं वैकेंसीक कतरन काटब, डीटीसी बसक पास बनबा कऽ रौद  मे दिल्लीक कोना-कोना बौएनाइ आनंदक दिनचर्या बनि गेल छल। दिल्लीक करोल बाग सं लऽ कऽ नेहरू प्लेस धरि, आनंदक लेल ई शहर एकटा विशाल अजगर जकाँ छल। इंटरव्यू मे जखन आनंद सं अंगरेजी मे पुछल जाइत छल - "Tell us about yourself," तऽ आनंदक जीह पर अपना हिसाबे यंत्रवत रटल जवाब त अबैत छलैक, मुदा ओहि कॉरपोरेट दुनियाक फर्राटा अंगरेजी नहि। हुनक कमजोर पर्सनालिटी देखि कऽ इंटरव्यू लेनिहार मुसकैत अक्सर कहय छल OK Mr. Anand, You have good logics and coding skills. We will call you latter for the results मुदा ककरो कॉल नै आबय। ककरो हुनक कोडिंग स्किल सं मतलब नै छल, सभक मतलब हुनक पॉलिश कयल जूता आ कॉर्पोरेट एक्सेंट सं छल। कॉलक आस मे आनंद एकटा मोबाइल फोन सेहो लऽ नेने छलाह। तथापि ओहि मोबाइल पर नौकरी ज्वाइन करबाक लेल कॉल एखन धरि नै आयल छल। एही बीच एकटा कंप्यूटर इंस्टीट्यूट मे नौकरी भेटल, मुदा ओतय नौकरी सं बेसी शोषण छल। हुनक काज छल भोरे दस बजे से राति आठ बजे धरि बच्चा सभ केँ एमएस-ऑफिस से लऽ कऽ सी-प्लस-प्लस आ जावा सिखायब, आ जखन कोनो स्टाफ नै रहय, तखन रिसेप्शन सेहो सम्हारब। महिनाक अंत मे जखन आनंद अपन दरमाहा मांगय छलाह, तऽ मालिक हुनका कोनो ने कोनो बहाना बनाबय आ हुनक काज मे खोट गिनाबाय। ऊपर से उपदेश दै - "अखनो अहाँक आवाज मे ओ प्रोफेशनलिज्म नै अछि। क्लाइंट सं कोना बात कयल जाइत अछि, से तऽ सीखू!" आनंद तिलमिला के रहि जाय छलाह। हुनक भीतरक इंजीनियर एहि स्थिति पर विषादित होइत छलैक। गाम-समाज सं कोनो संबल नै, कोनो रेफेरेंस नै भेट रहल छल। एक बेर आनंद गामक एकटा पैघ लोक के फ्लैट पर गेलाह - ई सोचि कऽ जे शायद कतौ कोनो नीक नौकरीक रेफरेंस भेट जाय। गोर लागला पर ओ भलमानुष आनंद के एना के ताकला जेना कोनो म्यूजियम मे राखल वर्तमान मे अनुपयोगी अतीत के कोनो संजोगल वस्तु कें देखल जाइत अछि। ओ कहलखिन्ह - "आनंद, तोहर बाप तऽ कानपुर मे मील मे छलाह ने? ओहने किछु काज देखि लेतहिं। ई आईटी-फायटी तोरा बुते नै हेतौ। ई इंजीनियर बनबाक शौक कथी लेल पोसलह?" आनंदक मोन भेल जे कहि दियौक जे "कक्का, हमर स्किलसेट अहाँक बेटा सं नीके अछि," मुदा जेबी मे राखल डीटीसी बसक पास आ फटेहाल स्थिति हुनका चुप करा देलक। ओ निराश ओतहि सं बाहर निकलि एलाह। दिल्लीक सड़क पर चलैत आनंद कें लागल जे ओ अपनहिं समाज मे एकटा अछूत बनि गेल छथि। ओ अछूत जेकरा लग पैसा आ पावर नै अछि। अंततः, एकटा सरकारी स्कूल मे टेम्परेरी कंप्यूटर टीचरक काज भेटल। ई हुनक मंजिल तऽ नै छल, मुदा एहि सं हुनक बाट अवश्य डाइवर्ट भऽ गेलैक। ओ देखलखिन्ह जे हुनक किछू संगी-साथी सरकारी नौकरीक तैयारी मे छथि। आनंद के रुझान सेहो एहि दिश होबय लागल। ओहो आब कॉर्पोरेट के छोड़ि सरकारी नौकरी के तैयारी केनाइ शुरू केलाह। स्कूल से बचल समय मे सेल्फ स्टडी करय लागलाह। आनंद मे मेधा छलवे छलैक, डेढ़ सालक तैयारी आ दर्जन भैर परीक्षा के बाद ओ सरकारी नौकरी प्राप्त कऽ लेलखिन्ह। जेना-जेना ई खबरि गामक एकपैरिया सं होइत घरे-घर पहुँचल, लोकक मिजाज अचानक हिनक परिवार लेल मधुर आ अपनैती बला भऽ गेल। जे लोक कलंक लगबैत छलाह आ खिधांश करय छलाह, ओ बेटा-बेटा कहि कऽ अपनैती जतयबाक होड़ मे लागि गेलाह। वियाहक प्रस्ताविक बाढ़ि आबि गेल। कक्का, मौसा, गामक मुखिया, अधिकारी सभक लग अपन कोनो ने कोनो योग्य कन्या छल। नियतिक चक्र अपन गति सं चलल। आनंदक वियाह भऽ गेल। विवाह मे खूब गाजा-बाजा भेलइक। समाजक खूब जुटानी, बर-बाराती, नाच-गान सभ भेल। गाम-समाज, सर-कुटुम सभ ठाम मान-दान अपनइति। आनंदक पिताजी के आनंद के कोनो सीमा नै छल। हुनका लागैन जेना हुनकर बिलायल सभटा सम्मान, सभटा खुशी सभटा अपनइति भेट गेल होईन। मुदा आनंद जे पिछला 8 साल के जिनगी देखने छलाह ओकर अनुभव के कारण हुनका एहि अपनइति मे किछू कृत्रिम लागि रहल छल। मुदा ओ ऐ पर ध्यान नै दऽ समयक धारा संगे बहल जा रहल छलह। वियाहक किछु समय बाद, गामक ओहि घर मे जतय आनंदक कोहबर भेल छल, चोरी भऽ गेल। अचम्भा तऽ तखन भेल, जखन ओहि अपनइति जतबय वाला भीड़ कें ऑंखि फेर सं पथरा गेल। जे रिश्तेदार वियाह लेल अपनइति देखबैत अड़ल छलाह आ आगा-पाछा करय छलह, ओ ई कहि कऽ उलहन देबय  लागलाह जे - "हम तऽ कहबे केने छलहुँ जे फलां जगह वियाह कऽ लिअ, मुदा नहि मानलखिन्ह। ई लड़की ठीक नै पकड़ेलई। कुटमईतियो ठीक नै छाईक।  आब भुगतू!"।  कियौ पुलिस-थाना मे रिपोर्ट मे सेहो मदद नै केलक, उल्टे आनंद चोरी के ऑनलाइन रिपोर्ट लिखेलखिन ओकरा लऽ कऽ सरपंच हुनम माय-बाप पर दवाब बनेलखिन जे जे हेबाक छल से भेलय। गाम मे पुलिस एने माहौल खराप हेतैक। ऐ सभ चक्कर मे नै पडू। लोक हुनक घरक चोरी पर चुस्की लैत चर्चा करय लागल। आनंद अपन ऑफिसक मेज पर बैसल विचार कऽ रहल छलाह: ई समाज कोनो व्यक्ति सं नै, हुनक समय सं प्रेम करैत अछि। समय नीक तऽ सभ अपन, समय खराब तऽ परछाई सेहो साथ छोड़ि दैत अछि। ओ गाम, ओ समाज जे किछू समय पहिने अप्पन होयबाक दंभ भरैत छल, आई ओ अपनइति कोना बिला गेलई! आनंद बुझि गेलाह जे ओ आईओ ओही ठाम ठाढ़ छथि, जतय सं ओ दिल्लीक ट्रेन पकड़ने छलाह - एकदम एकसरे। बस आनंदक पिताजी ई बात नै बुझि सकलाह। -प्रणव कुमार झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.४.परमानन्द लाल कर्ण-बाबुजीक सबक परमानन्द लाल कर्ण बाबुजीक  सबक मोहनलाल जी अपना कोठरी मे राखल कुर्सी पर बैसल छलाह । हुनकर बड़की पुतोहु राखी हुनका कोठरी मे आवि रूखल आवाज मे कहलनि - बाबुजी, अपनेक चाय राखि  देलहुँ अछि । चाय पी लेव, नहि तऽ सरा  जायत । मोहनलालजी धीरे-धीरे उठलाह आ चायक कप हाथ मे लेलथि । एक घूँट चाय पीव फेर चायक कप राखि देलखिन किएक  तऽ चाय मे चीनी बेसी पड़ि गेल छल, ओ सदिखन कम चीनीक चाय पीवैत छलाह । हुनकर मन उदास भऽ गेल । ओ चुपचाप अपना कोठरी सँ निकलि भनसाघर मे गेलाह, जाहि ठाम हुनकर पुतोहु काम कऽ रहल छलीह । धीरे सँ ओ कहलनि - कनिया , अहाँ जानैत छी जे हमरा शुगरक बीमारी अछि तैयो एतेक मीठ चाय बना कऽ हमरा देलहुँ  । ई  सुनि ओ कहलनि - बाबुजी, हमरा लग एतेक काम रहैत अछि, हम कोन-कोन बातक ध्यान राखी ? चाय के लेल अहाँ छोटकी कनिया के सेहो कहि सकैत छी । घरक सभटा  जिम्मेवारी हमही उठा लेलहुँ अछि । मोहनलालजी किछु कहऽ चाहैत छलीह तखनहि  छोटकी पुतोहु  जेकर नाम रश्मी छल,ओहि ठाम आवि गेलीह आ कहलनि - वाह दीदी ! अहाँ भरि  दिन कोन पहाड़ तोड़ैत रहैत छी ? भिनसर आ रातिक भनसा अहाँ करैत छी आ बाकी सभटा काम तऽ हमही करैत छी । भनसा घरक माहौल अचानक भारी भऽ गेल आ एक बेर घर मे जंगक शुरुआत भऽ गेल छल । दूनु दिआदीनक बीच बाताबाती होमय लागल । छोट-छोट शिकायत ताना मे बदलि गेल आ ताना झगड़ा मे बदलि गेल । बड़की दिआदनी ऊँच आवाज मे अपन जिम्मेवारी गिनावैत लागल तहन छोटकी दिआदनी कहाँ पाछु रहऽवाली छलीह । ओ हुनकर सव बातक उलाहना दैत छलीह । ई बाताबाती सुनि मोहनलालजीक मन आओर भारी भऽ गेल आ अपना कोठरी मे आवि गेलाह । हुनकर डेग भारी छल आ मन भरल छल, जे सव दिनक दिनचर्या छल । राति मे दूनु भाई आशीष आ सुमन भोजनक लेल बैसलाह । एक कौर खेलाक बाद सुमन कहलनि - भाभी, आई तरकारी मे नून देनाई भुलि  गेलहुँ अछि । राखी किछु कहऽ चाहैत छलीह तखनहि  छोटकी दिआदिनी तंज कसैत कहलनि - दीदी के ध्यान रहनि तहन ने नून डालथिन । हिनकर ध्यान तऽ सदिखन झगड़ा झंझट पर रहैत छैन । ई  बात सुनैत राखीक मुँह गुस्सा सँ लाल भऽ गेल आ कहलनि -  बौआ, अहाँ अपना घरवाली के समझा दियौन नहि तऽ काल्हि सँ भानस अपने बना लेव । ई सुनि छोटकी दिआदिनी  जेकर नाम रश्मी छल ओ कहलनि - हाँ दीदी, हम बना लेव आ अहाँ सँ नीक जकाँ बना कऽ देखा देव । ई सभ सुनैत पैघ भाई आशीष कहलनि - अहाँ दूनुक उतराचौरी कखनहु खत्म नहि होयत । जखन देखू तखन शुरू भऽ जायत छी । सुमन सेहो ई सभ सुनि खाना नहि खेलथि आ उठि कऽ बाहर चलि गेलाह । मोहनलालजी ई सब देखैत चुप -चाप अपना कोठरी मे आवि गेलाह । राति के एक बजि  रहल छल सव लोकनि सुतल छलाह, मुदा मोहनलालजीक  आँखि सँ नीन गायब छल । बेर-बेर करोर फेरैत छलाह, धीरे सँ ओ उठि बत्ती जला कऽ बिछौना पर बैसि गेलाह । सोझा मे हुनकर घरवाली शांतिक फोटो टांगल छल, ठाढ़ भऽ मने-मन कहलथि - शांति अहाँ देखैत छी ने ? एहि घर मे शांतिक छोड़ि सव किछु अछि । आई  बेटा थारी पर सँ बिना खेने उठि गेल आ दूनु पुतोहु एक दोसर सँ नीचा देखावऽ मे कनिको कसर नहि छोड़लथि । अहाँ कहैत छलहुँ जे घर ईंट पाथर सँ नहि आपसी प्रेम सँ बनैत अछि । आई  एहि घर मे प्रेम खत्म भऽ गेल अछि । हमरा बुझना जायत अछि जे हम एहि ठाम बेसी दिन नहि सहि सकव । तखनहि मन मे ख्याल एलनि जे शांति सदिखन कहैत छलीह जे जखन घर अशांत भऽ जाय तहन चुप-चाप नहि बैसवाक चाही । घर मे अमन कायम करवाक लेल किछु ने किछु जरुर करवाक चाही । ओ अपन पुरान कपड़ा झोरा उठेलथि जाहि मे किछु कागज - पतर, किछु नुआ आ दवाई लेलथि । विछौनाक नीचा सँ चप्पल निकालि पहिरलथि । अपना कोठरी सँ धीरे धीरे बाहर आवि गेलाह । मोहनलालजी अपन कान्ह पर झोरा टाँगि अन्हरिया राति मे गली सँ बाहर आवि गेलाह । घर मे ककरहु कोनो खबर नहि भेल । भिनसर जखन घरक लोकनि जागलथि आ मोहनलालक पुतोहु एक कप मे कम चीनीक चाय बना कऽ भरल मन सँ मोहनलालजीक  कोठरी मे एलथि तहन ओ देखैत छथिन जे कोठरीक  दरवाजा थोड़ेक खुलल अछि । कोठरीक अंदर आवि मेज पर चायक  कप राखैत ओ कहलनि - बाबुजी, अहाँक चाय अछि, मुदा कोनो जबाव नहि मिलल तहन बिछौना पर नजरि घुमा कऽ देखैत छथिन जे हुनकर ससुरजी बिछौना पर नहि छथि । हुनकर झोरा सेहो नहि टांगल छल । राखीक माथ पर चिंताक लकीर उभरि गेल । ओ जोर सँ अपना घरवाला  के आवाज देलखिन - सुनै छी ? बाबुजी घर मे नहि छथि।देखू कोन ठाम गेलथि ? आशीष कहलनि जे एतेक भिनसर कोन ठाम गेल हेताह ? बाहर घुमवाक लेल गेल हेथिन थोड़ेक देर मे आवि जेताह । भऽ सकैत अछि कोनो मंदिर व पार्क मे गेल हेताह । बुढ़ मे नीन सेहो कम आवैत अछि । मोहनलालजी राति मे एकटा होटल मे रुकि गेलाह । भिनसरे अपन संगी जिनकर नाम रमेश छल हुनका घर पर आवि अपन जायदादक सम्बन्ध मे बात केलनि । रमेश ओहि ठामक  नामी वकील छलाह । मोहनलालजी कहलनि हमरा जीता जिनगी हमर जायदाद पर किनको हक नहि होय तकर व्यवस्था कऽ दिअ आ एकर बाद एकटा वसीयत बना दिअ ताकि हमर दूनु बेटा आपसी ताल मेल सँ जीवन वसर कऽ सके । एहि बात पर वकील साहब कहलनि - ठीक अछि , हम कागज तैयार कऽ देव । चूँकि अहाँक सभटा  जायदाद स्वअर्जित अछि तें अहाँक जीता जिनगी किनको अधिकार नहि छैन । जहाँ धरि वसीयतक  सम्बन्ध अछि हम बना देव  । हुनका सँ बातचीत कऽ ओ घर पर चलि एलाह । चूँकि ओ गुस्सा मे राति मे घर सँ बाहर गेल छलाह तें ओ चुप-चाप अपना कोठरी मे आवि गेलाह । घर एला पर राखी कहलनि - बाबुजी, भिनसरे चाय लऽ के आयल छलहुँ तहन अहाँ नहि छलहुँ । कोन ठाम गेल छलहुँ  ? एहि पर मोहनलालजी कहलनि - की कहु कनिया, अहाँ सभहक  उतारा चौरी सँ हम परेशान भऽ गेलहुँ अछि । घर अशांत भऽ रहल अछि ।हम की करी जे घरक सव लोकनि नीक जकाँ रहैथि । ई सुनि राखी चुप-चाप रहि  गेलीह । मोहनलालजी के लेल चाय बना कऽ देलखिन, चाय मे कम चीनी छल । मोहनलालजी चाय पीव अपना बिछौना पर बैसि रहलाह । किछु दिनक बाद मोहनलालजी अपन बड़का बेटा आशीष के बजेलखिन आ कहलनि - बौआ, हम बड्ड चिंतित छी जे एहि घर मे ककरो सँ कोनो मेल जोल नहि रहैत अछि ताहि सँ हम चिंतित छी । एहि पर आशीषजी कहलनि - बाबुजी, की कएल जाय ? केओ कोनो बात मानवाक लेल तैयार नहि छथि । मोहनलालजी कहलनि - ठीक अछि, जौं अहाँक बात नहि केओ मानैत छथि तहन हम कोनो ने कोनो उपाय अवश्य करव । अहाँ पैघ छी तें अहाँ सँ कहि रहल छी ।अहाँ एक बेर सव सँ कहु, जौं अहाँक बात नहि मानताह  तहन हम सोचव । एक दिनक बात अछि आशीषजी सुमन सँ कहलनि - छोटे, बाबुजी हमरा सँ कहि रहल छलाह जे घर मे मेल-जोलक कमी अछि, तें हम चिंतित छी । हमरा विचार सँ अहुँ अपना कनिया सँ कहु जे घर मे कोनो तरहक झगरा झंझट नहि करथि । हमहु अहाँक भाभी सँ कहि रहल छी जे घर मे कोनो तरहक विवाद नहि करु । घर मे जतेक शांति रहत ततेक नीक रहत । सुमन कहलनि - ठीक अछि भैया हम कहैत छी । घर मे आवि सुमनजी अपना कनिया सँ सभटा बात कहलखिन । मुदा हुनकर कनिया उल्टे हुनका कहऽ लागलखिन जे दीदी भरि दिन बैसल रहैत छथिन आ हम भरि दिन खटैत रहैत छी । ई कोना होयत ? जौं दिक्कत अछि तहन दूनु आदमी अपन-अपन काम करु । दीदी केवल भानस करैत छथिन तकर बाद सभटा काम हमरा पर छोड़ि दैत छथिन । घर साफ करनाई, बरतन साफ करनाई, नुआ वाशिंग मशीन मे रखनाई आ सुखेनाई सभटा काज हम करैत छी तकर बाद कखनो-कखनो तरकारी सेहो बना दैत छी । हम एहि सँ बेसी नहि कऽ सकैत छी । रश्मिक ई बात सुनि सुमनबाबू  चुप रहि गेलाह । दोसर दिश आशीषजी अपना कनिया सँ कहलनि जे बाबुजी हमरा कहैत छलाह जे घर मे सदिखन षड़मंडल होयत रहैत अछि । तें हमर विचार अछि जे सव केओ मेल - मिलाप सँ रहु । एहि पर हुनकर कनिया कहलनि जे हम की करी ? भानस करनाई आ छोट बच्चाक  संभालनाई मे की परेशानी होयत अछि से हमही जानैत छी । छोटकी तऽ अखन अखुल्ला छथिन । भरि दिन फोन पर बात करैत रहैत छथि । हम बच्चाक लऽ के परेशान छी ।हमरा सँ जतेक सम्भव होयत अछि ततेक हम करव । एक दिनक बात अछि राखीक नैहर सँ किछु लोकनि आयल छल । राखी भानस बनावैत छलीह । तखन हुनक बालक कानऽ लागल, तहन राखी रश्मि सँ कहलखिन - कनिया कनि भनसा घर मे तरकारी चला देव नहि तऽ जरि जायत, हम बौआ के देखैत छी । एहि पर रश्मिजी कहलनि - दीदी, हम छत पर कपड़ा पसारऽ जायत छी । आँच कम कऽ दिअऊ तरकारी नहि जलत । ई  सुनि राखीक नैहरक  लोकनि कहलनि - बुच्ची अहाँक  दिआदिनी बड्ड ठस-ठस बाजैत  छथि । एहि  पर राखी चुप भऽ गेलीह । तखन तऽ कोनो बात नहि भेल मुदा जखन राखीक नैहरक लोकनि चलि गेलथि तहन ओ आशीष बाबू सँ कहलखिन - हम रश्मि संग नहि रहि  सकैत छी । दूनु आदमी अपन - अपन देखू । आव भानस अलग -अलग बनत एक ठाम आव सम्भव नहि अछि । एहि बातक  जानकारी मोहनलालजी के भेलनि तहन ओ आगि बाबुला भऽ गेलाह  । ओ अपना दूनु बालक के बैसा कऽ कहलनि - बौआ , हम की सुनि रहल छी ? दूनु कनिया कहैत छथिन जे अपन अपन चूल्हा अलग कऽ लिअ ।एहि पर सुमनजी कहलनि - हाँ बाबुजी, भाभी कहैत छलखिन जे जौं दिक्कत होयत अछि तहन चूल्हा अलग कऽ लिअ । मोहनलालजी कहलनि - हमरा जीता जिनगी ई नहि होयत । हमरा अछैत एहि घर मे दुईटा चूल्हा नहि  जलत । जिनका दिक्कत छैन ओ अपन किरायाक पर दोसर घर लऽ सकैत छथि । ई  बात सुनि  दूनु भाय परेशान भऽ गेलथि । ओ अपना अपना घरवाली सँ कहलनि - बाबुजी हमरा दूनु भाई के बुला कऽ ई  बात कहि रहल छलाह तें अहाँ सव मिलजुलि के रहु नहि तऽ बाबुजी अपन कोनो फैसला करताह । राखी आ रश्मि सोचलथि जे जौं एहि घर सँ बाबुजी निकालि देताह तहन कोन ठाम जायव ? ई  सोचि दूनु दिआदिन मिल-जुलि के रहऽ लगलीह । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.५.प्रीति कुमारी- श्री लालदेव कामत जीक व्यक्तित्व आ कृतित्व-२ प्रीति कुमारी श्री लालदेव कामत जीक व्यक्तित्व आ कृतित्व-२ (क्रमशः केँ वाद शेषाँस ) लाल देब जीक माय श्वाँस दमा रोग सँ बर्षाकालिन तीनमास सब शाल बेराम पड़ैत छलीह। तेँ १९७४ मे बेटी 'क वियाह - रसुआर कयलीह आ १९८० ई०मे जेठ बेटाक वाल वियाहमे देख लेलीह माथ पर मौर। से २५ फरबरी केँ खड़ौआ निवासी बतहू कामति केर जेठ बेटी सूमित्रा उर्फ मुन्नी सँ पाणीग्रहण जे भेलैक से वर - कनियाँ केँ कोनू बिधके मोन नहि रहलन्हि। उपराहैरके ई जातीय मान्यजन परिवार गीरहबासु - सुखितगर रहथिन। भीखर कियोटके पुत्र भेलखिन गंगाराम,जिनका दू पुत्र अजब आ बतहूजी भेलखिन। बतहूजीक सासुर रहनि मोहना, पत्नी बुलियाक पुत्र मंगनू अमीन आ पुत्री क्रमशः मुनियाँ,रमियाँ आ सोनियाँ भेलथिन। हम श्रीमती मुनी देवी आ श्री लाल देब कामत जीक छोट आनुवांशिक पुत्री छी। हमरा चारि जेठ भाय छथि -: सुभाष, कैलाश, आकाश अमीन आ लवकुश। श्री कामतजी'क पल्लवी प्रकाशनसँ बहराएल मैथिली भाषामे निबंध - प्रवन्ध - समालोचना पोथी " दिव्य दृष्टि " २०२२ मे प्रकाशित भेल,तकर पाँचम् संस्करण निकैल गेल छैक। ओहिके आई एस बी एन ९७८-९३-९३१३५-३३-९ छै,जाहिमे कामत जीक मातृक गम्हरियाक बंशाबली ( जेनरेशन टेबूल ) ज्ञात भेल अछि -: रूपण आ छतन पेशरान नारायण भंडारी पोखरिया हसामी रहथिन। रूपनकेँ तीन पुत्र क्रमशः भीखर,शौली आ लक्ष्मण छलखिन। सौलीके सेहो तीन पुत्र भेलनि क्रमशः मोती,संजीत आ जयलालजी। संजीत केँ दू पुत्र क्रमशः मखसुदन ओ पृथ्वी लाल आ पुत्री क्रमशः धनमा,दनमा आ अरहुल देवी छलखिन। अरहुल देवी हटनीक मयटुअर - बपटुअर खलिफा बाबूचन सँ बियाहल गेलीह। बाबुचन्द बाबाजी दुधा वैष्णव रहथिन आ किशोरावस्था सँ सिध्द गुरूक संगहत केलनि तथा अनेको तीर्थस्थलक यात्री बनलथि। चौथापनमे लाल देबजी माय - बाबू केँ वैद्यनाथ धाम,जग्रनाथपुरी,काली माय कलकत्ता आ सिमरिया गंगाजीक दर्शनार्थ भ्रमण करए लेल ल' गेल रहथि। ताहिकऽ गाउँ आबि खूब नीक तरहेँ भोजभात देलन्हि। श्रीकामत जी स्वयं ठाकुर अनुकूल चन्द्र जीक भव्य स्थान सतसंग नगर आश्रम - देवघर आ पटनाक राजीव नगरमे विहंगमयोग केर स्वतन्त्र देवजी सँ दीक्षा लैत पुन: वैदिक रीति सँ कर्मकांड बाबू जीक आ सालेभरि वाल माताक सुख श्राद्ध कर्म कयलनि। ग्रामीण क्षेत्रमे चलन ओ मान्यताक अनुसार खूब प्रतिष्ठा अर्जन कयलनि। परंच दुरस्थके विद्वतजनके नजैरमे हिनक समाजवादी छवि धुमिल नहिं भेलनि, से कोना कहि सकैत छी। १९९४- ९५ ई० मऽ स्वयं सेवी संस्था - जगतपुरक सरकारी अनौपचारिक शिक्षामे बतौर दू साल पर्यवेक्षक पद पर गुरूत्तर सेवा कोशीबेल्टमे रहि देने छथि। हिनके गाममे सेहो केवट समाजमे पहिल पजेबाक मकान रहनि, ओहिमे भोर सांझ फ्रीमे पूबारि टोलक बच्चा सबकेँ शिक्षा दान देने रहथि। एहि सब क्रियाकलाप सँ हिनक व्यक्तित्व निर्माणमे बेश निखार अयलन्हि। देहाती क्षेत्र सँ प्रकाशित मातृभाषा मैथिली'क त्रैमासिक पत्रिका 'कोसी - सन्देश केँ आर्थिक मदैत देबाक उद्देश्य सँ माय बाबूक बरखीक विज्ञापन धरि करैत रहलाह अछि। गामक छैठव्रत घाट पर चून - व्लिचिंग पोडर छिट आ फिनाईल - डिटौल द्रव्य मुख्यमन्त्री पुला सँ पूबभर छिरकाव मिशिल पीठपर लाधि स्प्रे सँ करैत ओ किन्नो- किनारा पर प्रधानमन्त्री सड़कमे कतेको ट्रैक्टर माँटि कीन अवदान कय यशके भागि बनलाह। एहि क्रममे केराक बीट आ बाँसक मंगनी कयनहारकेँ निराश नहि कयलनि। ऐ उदारताक प्रति अद्भुत धारणा जन- जनके हिनका प्रति बनल रहलनि हेन। गामक होरी पाबैन - जुड़शितल , कृष्णामुठीमे आगू बढ़िकय सहभागिता दैत रहलाह अछि। जतबे श्रधा सँ गणतन्त्र दिवसके समारोह,स्वाधिनता दिवसके राष्ट्रिय तिहार मनाबैथ, ततबे श्रधा आ विशवास सँ दाहा-तजियाके मुहरम आ काली पूजा आयोजनमे सामुदायिक भावे समय दैत रहलाह अछि। गामक अष्टयाम,नवाह ,सरोस्वती पूजन , यज्ञ वा किनको बेटीक सामंजस्य विवाह होय - माय बापक गैत होई ; सबमे शक्तिभरि दासोदास रहैत छथि। ग्राम सुधारके यथेष्ट धेह सँ झगड़ा- फसाद शलटाबैमे पुरणा ग्राम विकास कमिटीमे वृध्दजन पंचक बीच हरियर केसबाला इयेहटा बादमे जड़मिझर रहैत बुझारतके तसफिहा लिखैत छलाह। आब ओहि स्व० पंच लोकनिक बेटा- भातीज आ पोता गामक झंझट निपटारामे परिस्थितिवश लागल रहैत अछि। कतेको फैसला करयमे गामक प्रतिनिधि बनि बाहर पैनचैतीमे- मैंनही बगराहा, गम्हरीया, हड़री ,पररी आ सोनबर्षा सहित बहुतो गाम गेल छथि आ कैथी अक्षर केर कबाला - खतियान पढ़ने छथि। ऐ रचनात्मक काज सँ हिनका एक छोटमोट कोशीके गाँधीजी धरि कहय जा लागल,जे विभृति मैथिली पोथी ,आई एस बी एन ९७८९३८८८११५१४ मऽ पाठक पढ़ने होयत। एहि उत्प्रेरित पोथीमे श्रीकामत जी किसान हीतमे वर्मी कम्पोष्ट खाद आ घरेलू कुटीर उद्योग बावत अनेको रस्ता दखेने छथि। श्रृजनक काज हिनक अभियन्तरमे रहैछ। ताहू लेल ई बेर बखत पर जत्थामे यात्रा धरि करैत अपन लघु साहित्यके द्वारा जन - जनमे सन्देश देवामे समर्थ भेल छथि। एहि तरहक साहित्यिक जागरूकता दोसर कियो कोसी क्षेत्रमे नहिं कयलाह हेन। समय- समय पर एशिया मैत्री- अनियमित कालिन पत्रिका, समता प्रेस सर्विस आ कतेको बुलेटिन तथा परिपत्र- फ़ोल्डर द्वारा लोकमे वैज्ञानिक - राजनैतिक जागृति पसारैत सन् १९९५ सँ अपन कर्तव्यक निर्वहन करैत आबि रहलाह अछि। ई लघु पत्र - पत्रिका वृहत् पोथीक अपेक्षा बेसी असैरदार सामान्य लोकमे होइत छैक। ओहि समान बसपा सँ १११- किशनपुर विधान सभा सँ आ बादमे दरभंगा स्नातक निर्वाचन क्षेत्र सँ अभ्यर्थी बनय लेल उद्यत भेल रहथि। बापू चम्पारण सत्याग्रह शताब्दीके अवसर पर श्रीकामतजी मोतीहारी जाकय कार्यक्रममे भाग लेलनि। संगहि महात्मा गांधी जीके १५०म् जयन्ती पखबारा अवसर पर एक मैथिली पोथी स्वच्छता पदयात्रा - २०१९ मे पल्लवी प्रकाशन बेरमा सँ छपौलनि ,जाहिक आईएसबीएन ९७८९३८८८११३५४ छैक। ऐ पोथीक लेखक लालदेव जीकेँ एक गांधीवादी रुपेँ लोक बूझय ‍लागलनि। ऐ पोथीमे हुनक नागपुर यात्राके सँगे महाराष्टके गाँधीजीक आश्रम- वर्धा आ आचार्य विनोबा भावेके ब्रह्म विद्या मंदिर - पवनार तथा गाधिज्म अर्थशास्त्री जे.सी. कुमारप्पाके मांगनबाड़ी केर यात्रा कयने छथि। साबरमती 'क संत सँ सिखू १० गुर आ एकादश व्रत पाठ मनकेँ मोहि लैत छैक। कामत जीक फेसबुक पेज पर गढ़चिरौली'क स्मरण सेहो एक यात्रा वृत्तांत थीकैक। सामान्यत: सबकेँ २४ घंटाके दिन-रात्रि बूझल होयत, मुदा काजके विवरण अनुसारे हिनका लेल बेशिये घंटा होइत सन लगैत अछि। आ तेँ स्वैच्छिक संस्था , स्वयंसेवी संगठन केर लोकसभ ओ राजनीतिक भटकाउके पैघ समयक अन्तराल आ फेर सबसँ अलग हटिकेँ जे समाजकर्मी रूपेँ अपन समय जनसेवा ओ साहित्य सेवामे लगेलनि, ताहिक मूल्यांकन कयला सँ पाठक स्वत: बूझि जाएब जे हिनका लेल कोनो घड़ीमे अतिरिक्त समय ठीके तँ नहि बढि जाईछ। इयह सक्रियता ओ जीवंतता हिनका बीपी हाय आ साइटिका ओ बाईसीर रोगोकेँ भगाकय सामूहिकतामे अरबैधकेँ धकेलने रहैत छैक। जहन एहि भौतिकवादी युगमे आर्थिक हालात पर सब किछु निर्भर करैत छैक,तहन एहन काज सब करैत तरह- तरहके पोथी - पत्रिका छपायब, आ ऐ लेल छापाखाना ओ प्रकाशनक दौड़ लगाबैत अपसियांत रहनाई एक विशेष जूनून केँ दर्शाबैत छैक। एहि तरहेँ परिवारिक सदस्यक मनाही कयलोपरान्त रातिदिन खटैत रहैत, सर्वप्रिय बनल देखाईछ आ सरकुटूमक ओतय परिभ्रमण ; चुनावी अभियानमे सतत् लागल रहनाई एक आदर्श उपस्थित करैत होथि। गामक एक पदधारी व्यक्ति बजलाह जे " हम सब जौं हिनका जहाँति आर्थिक बेरवादि करब तँ डिहो बोहा जायत आओर भीखमँगा बनि जाएब।" ऐ आलेखमे हिनक कृतित्व पर प्रकाश देब विस्तार सँ संभव नहिं भ ' सकल। एकटा हिनक लिखल पुस्तिकामे समाजसेवी एक्रामूल हक साहेबक उद्धरण छैक- "जौं हमरा सबके बीच एहन अहर्निश कार्यकर्ता समाज शिक्षणके अगुआ रहैत तँ छोटमोट गाँधीजी बनाकय रखितहुँ।" पड़ोसी गाम हड़री (करीहर) मेँ मुसहर समुदायके बच्चा लेल महामहिम राज्यपाल बास्ते भुमिदान कयकेँ बाल विद्यालय आरंभ करौलनि, हटनी म०वि० उत्क्रमित भेलापर हाईस्कूल हिनके पूर्वजके जमीनमे उच्चतर माध्यमिक विद्यालय चलैत छन्हि। नौआबखर सँ मैनही धरि प्रधानमंत्री लिंक रोड लेल खूब दौड़-धूप आ नियमित 'आज' अखबारमे लोसंवाद लिखैत राजनेता आ अफसर सँ मंजूरी लैत एक बिगहा जमीनक एकात सँ यातायात वाहनगम्य बनबौलनि। अपना घर लगक गलीमार्ग केर चौड़ीकरण लेल टोलबैयाक बैठाकर कय लिखित सहमति लेलनि,मुदा अपना नीजी खर्च सँ राजालाल साहके ट्रेक्टर सँ मांट्टिक काज आरंभ होइते १० ट्रेलर माँटि खसिते पूब आ पश्चिममे जनिजात लोकनि सँ काज बाधित करबै गेलाह। से २५ हजार ईंट उघाएल फैल रस्ताकेँ एहन संकीर्ण केने छन्हि जे मुर्दाक अर्थी धरि बोझ भऽ कऽ नहिं निकैल सकैछ। ई अदद डगहर बनाबैक लेल बाधक दू बिगहा खेत बेचने छलाह। जाहि ग्रामीण सब सँ जर्सीमन कैँचा पौने रहथि,सबकेँ बेराबेरी फुलपरास अपना खर्च सँ पहुंच कय बिनु भोजन कयनहि केवाला दस्तावेज बना देलथिन। ऐ तरहक त्यागक मूर्ति,सादगी - सदव्यहारके लोक रहल छथि साहित्यसेवी श्री लाल देव कामत जी। आजिविका लेल दूगोट कारी गाय पोसने छथि,जाहिक दूध आ घी सँ नगदी आय होइत रहलनि अछि। माय - बाबूक खूब सेवा कयलथि। सेवा एहू अर्थमे ,तीनू भाय भिनभिनाउज भेलासन्ता किछ मासिक राशि पाँचगोटे तय कय देलकनि; से छोटभाय तँ १० सालधरि टुकटुकी तका देलनि, परंच मझिला भाय टाकाक एवजमे लगेक १० कठा खेत उबजाबै ले सुमझा देलकनि । से १० साल बाबा- मैयांक मुयना भेलोपर उबजा नहिं बाँटि लैत छन्हि। तखन ई बात जे पौनी - पसारीकेँ हुनका बदला इयह साली भरैत छथिन। ई सामंजस्यके भरत प्रेम भैयारी बावत समाजमे सराहल गेल छैन। खरीफ,रव्बि आ गरमा अन्नक खेती-बाड़ीके अतिरिक्त तरकारी खेती ओ आमबगीचा बाँसकोठि सँ सेहो नगदी आय हिनका होईत रहलन्हि अछि। मधुबनी जिलाक ३९९ ग्राम पंचायतक पाँच सर सँ अधिक गामक दर्शन कयने छथि।आ ताहि भ्रमणशीलताक कारणेँ खेती यथा - बौग पटबन फसल कटाई आ पसरी पड़ल जजातिक उगहाय ओ उगहल जाकल बोझके दौनी सबसँ पछुवाए जाइत रहनि। सरहा,पारा, बोता सँ कांरकेँ उपद्रव सँ दोबर हरानी हुअय पड़ैन। धरि धीर गाय आ बानरक उपद्रव कम रहैछ। जोन मजदूर केँ खासकय गछपँगा ,गाछ कटाय करयबालाके अगरबार टाका देलहा डुबले रहि जाईन। औने- पौने दाममे किनकोक्षशिशोगाछ,गम्हायर गाछ लेबाक होय तँ ,हिनका परोक्षेमे बिनु कहनौ काटि,उधारे ल' जाईन ,से सब ग्रामवासीक नजैतरमे एक फिल्मी सीन जेकाँ मानस पटल पर अंकित भेल सन छैक।एतेक उदारताक हद्द सीमा विरले कतौह ऐ धराधाम पर उदाहरण बनल होय। छोटभायकेँ दरिभंगामे राखि पढ़ाए लेल मोहनजी,शिवनारायण जी हाथे पहिले खेत भरना पड़लैन। वादमे नथुनी भजार हाथे, साढ़े आठ कठा,भगबानी हाथे सबा तीन कठा, सुकन पंडित हाथे दू कठा, मुरारी आ ठिठर हाथे नऊ कठा, अर्जून महराज हाथे साढ़े पाँच कठा, मो० इस्लाम हाथे अढ़ाई कठा,बमभोली हारे अढाय कठा, ऐनूल हाथे पौने सात कठा, बिनोद हाथे सवा तीन कठा,सतन पासवान आ मंसुरी जी हाथे पौने दू कठा जमीन सस्ता सुभिस्तामे बेचलनि। मोनमे रहनि जे पढि- लिख अफसर बनत तँ रामनायणे बाबू नहाति भाय- भातीजके सदैत मदैत दैत रहत। मुदा अपन दूनू छोट भायके एको मासक दरमाहाक याचक नहिं भेलाह। श्री कामत जीके नौ खेप चुनाव हारबाक अनुभव भेल छन्हि। सन् २००५(प्रथम) आम चुनावमे ८१- फुलपरास विधानसभा क्षेत्र सँ एक नेशनल पार्टी'क सिम्बल हाथी छाप सँ एम एल ए . बनय ले ठाढ़ भेल रहथि। ओहि निर्वाचनमे इन सब उम्मीदवार तँ जनताक बीच लोक लुभावन बात राखथि,मुदा लाल देब जीक चुनावी पर्चा एक परिपत्र वा प्रेस विज्ञप्ति सन छपल रहनि। ओ मतदाता मालिकके बीच समाज सुधारक दृष्टिये वोट एहि तरहेँ मांगलनि-: (क)- जे व्यक्ति अपन वियाह, छोट भायक वियाह आ बेटाक वियाहमे कन्यागत सँ दान- दहेज माँग कयने होथि,नगदी डाली - तिलक गनौने होथि ,जैतुकमे गाय - महींस ,खस्सी भेड़ पौने छी से हमरा अपन नापाक वोट दै सँ पड़हेज भऽ जाऊ। (ख) - जे कियो अपना पड़ोसी - ग्रामीण सँ धूर्तता ओ ठकपनी कयने छी ,तकरा अपन वोट हमरा दै सँ मनाही करैत छी। (ग)- हमरा जे मतदान करब से संकल्प लिअ- शक्तिभरि परोपकारमे जीवन पर्यन्त लागल रहब। अन्याण्य ......! ऐ तरहेँ ओ जिला परिषद सदस्य लेल प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र सं० ४५ सँ आ १४- नौआबाखर पंचायतके ग्राम कचहरी सँ सरपँच पदक चुनाव आ १४ नं० वार्डमे पँच के उपचुनावमे हाड़बाक अनुभव प्राप्त कयने छथि। नौआबखर पैक्स० केर अध्यक्ष पद लेल सेहो केवट जाति सँ एकलौता अभ्यर्थी बनि सर्वाधिक वोटर रहैत हारि तेसर स्थान पर लटकि गेल छलाह। जुटल घर कोना चुनाव लड़ि गरीबीकेँ आमन्त्रण करैत एक प्रयोग मानल जाइछ,से हिनको संग सयह बात भेल छन्हि। एकटा आरो काज सँ हिनक दारिद्रता बढ़लनि। गामे गाम नोत पीहानी हकार पुरैत जिला जबार आ राज्यक राजधानी धरि अनेको सभा सासाइटीमे नियमित सहभागी बनला सँ घरक चिकस गील होइत रहलनि। इलाकामे अनेक अवसर पर सबसँ बढिचढिके दाता बनल रहलाह। एक सूरदास हनुमान मंडील बनाबय लगलाह,ताहिमे मुख्यमंत्री आवास योजना सँ २५ हजार राशिमे सँ गनैतकाल एक पंचायत प्रतिनिधि पाँच हजार हुनक दाबि धेलकनि। कोसी बान्ह सँ गामपर अयलापर समाँगके गणना करैत राशि घटला पर ओ समितिकेँ बेटा लगाकेँ श्रापय लागलैक। ताहि वाट सँ श्री कामतजी जाइत ई हाक्रोश सुनि बजलाह - जँ अहाँकमे कियो ५ हजार द' दिअ तँ टाका अपने की करबै? ओ कहलखिन हनुमान जीक जयपुर सँ आनंद पाथर मूर्तिक सुरक्षा लेल ग्रील लगबितहुँ। से बजरंगीबली के लेल अपना स्तर सँ ग्रील देलथिन। श्राफ - अभिशाप धरि पड़िकेँ रहलैक। हरिभंगा उँच्चतर माध्यमिक विद्यालयके +२ बीपीएससी . अध्यापक सुभाष कुमार जीके पोथी समीक्षा ई- पाक्षिक पत्रिका विदेह मैथिलीमेँ १५-२-२०२३ई० मे ३८४म् अंक पढ़ने रही। ओहिमे अपन विलक्षण तथ्य आ तह धरिक बातके अतिरिक्त पोथीक विषय सूचिकेँ गजपट होय सँ बचेबाक सुझाउ देने रहथि। सर्ग१- जीवनी -९ शिर्षक यथा, १. अनन्त बाबू अमर रहय,२. दिनकर जीके उत्कर्ष ,३. मैनेजर स्व० मखसुदन भंडारी जीक पूण्य स्मरण,४. मैथिली सेवी ललन बाबू : एक परिचय,५. सकल समाजके चहेता रामसकल,६. स्वाधीनता सेनानी केँ शत् - शत् नमन,७. साहित्य रत्न अनुप लाल मंडल,८. स्वनाम धन्य शिरोमणि,९. हमर आदर्श स्मृति शेष सूर्य नारायण चौधरी। सर्ग २.निबन्ध १५ पाठ १. अनन्त बाबू केँ सब करैत छन्हि प्रणाम ,२. उपन्यास बनाम बायोग्राफी,३. एहि जगमे के कतेक मदैतगार ,४. कविवर बद्रीनाथ रायजीक ५७म् जन्मदिन,५. कवि लालित्य,६. बहिर्मुखी कामैत कौम,७. कजरी विशेष,८. मिथिलाक रोहित यादव,९. मिथिला राज्य'क औचित्य : एक विमर्श ,१०. युक्ति संगत बनाम तर्क संगत,११. विदृयापतिक आत्मकथा केर दृष्टि बोध,१२. वेदव्यास पूर्णिमा,१३. स्वदेशमे आश्रमक स्थापना, १४. स्व० हरिनन्दन कामत जीक गाम- मँगरौनी ,१५. श्रीमान शंकर बाबूक ओहिठामक जिलेबी। सर्ग ३. पोथी समीक्षा (२३) पाठ क्र०१. सँ २३ धरिके शिर्षक ऐ तरहेँ वर्णमाला आधार पर सजेबाक प्रकाशकके काज रहनि, मुदा चारिखेप संस्करण/ मुद्रण पल्लवी प्रकाशन निर्मली सँ भेलाक वादो जसके तस देख दिव्य दृष्टि केर पाठककेँ छगुन्ता अवश्ये होईत हेतनि। अक्षर- अक्षर अमृत, पाठकीय टिप्पणी, आतंकित नेपथ्य डॉ० ब्रहृमदेव प्रसाद कार्यी उपेक्षित समाज केँ बाट देखाबैत वर्णित रस, कथा एक पोथीक : हमर टोल, युवराज जीक ' परिचय ' एक अनुशिलन, जय प्रकाश मंडल जीक गीत नव दिश, जगदीश प्रसाद मंडल जीक संचरण, टीकापट्टीक संग्राम, नारायण यादव जीक कथा संग्रह नवकी पुतौह, नन्द विलास रायजीक कथा यात्रा शुरू, पाठकीय प्रतिक्रिया, पोथी समीक्षा, पुस्तक समीक्षा, भोलूम- २ देवाश्रमके मूल्यांकन, मैथिली भाषामेँ एकटा दीर्घ कविताक पोथी मादे गम्भीर चर्चा कतेको अखबार -पत्रिकामे हिनके लिखल छपला पर उपरोक्त पोथीक विपणन बढ़लैक। परिशिष्ट रूपेँ जुटल विदेह ई-पत्रिका अंक ३८१ सँ साभार रूपेँ नीक पोथी समीक्षा ' दिव्य- दृष्टि ' मेँ कवि गंगाधर कुंवर हर्ष आ दार्शनिक रामेश्वर प्रसाद मंडल जीके पढि प्रेरणा आ भावना जगैत छैक। एक कचरी पाँति द्रष्टव्य अछि -: आरे रमा लाल देव जीक ई पोथी गुलरी'क फूलबे ऐ हरी ...........!! हिनक अनेको विधामे कतेको पुस्तक पाण्डुलिपि देखबाक अवसर भेटल अछि। प्रकाश्य कृर्ति ' गँहकी नजैर' केर पीडीएफ सोशल मीडिया पर पढबाक लिलसा सेहो पुरा भेल अछि। एहिमे तीन सर्गमे निन्मांकित पाठ शिर्षक देल गेल छैक। जेनाकि -: अलख जगाबैत कर्पूरी ठाकुर जी, आधुनिक चिट्ठी - ई मेल, आर्ट पुरस्कार आ सुरेन्द्र, एक अध्यात्मिक पथके पथिक : स्वतंत्रता सेनानीक जय-जय, औषधीय गुण मौधमे, कथाकार अशोक मादे, गढ़चिरौली 'क स्मरण, जातिगत आकर्षण, जन्मदिन शताब्दी समारोह - पटना, जीवनी अनुवादके एक पोथी, डॉ० रामभरोस कापड़ी ' भ्रमर', एक व्यक्तित्व डॉ०(प्रो०) राम अवतार यादव विशेषांक मादे, डॉ० उमेश मंडल : एक मैथिली अभिमानी, नरेन्द्र झा जीक स्मरण, प्रसिद्ध साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु'क स्मरण, पानक बरेब, भूगोलमे मिथिला राज्य कहिया धरि, मणिपद्मक' शताब्दी 'क वाद, मिथिला स्टूडेंट यूनियन केर हश्र, मिथिला विभूति: खुशी लाल बाबू, मखानक गुण बूझू , मिथिलामे माछक रोजगार, मूल अति पिछड़ाक आरक्षण हक हड़पल गेल, सरौती सपूत : खुशी बाबूक उपलव्धि , सर्वश्री रासबिहारी दासजी : एक विषय कीर्तन ज्ञाता, श्रमिक हीतके उपाय हुअय, श्रीमान मोन पड़ैत छथि, साहित्य अकादमी परेखलक पेन ड्राइवमे पृथ्वी केँ, महामहिम धनिक लाल मंडल आदि। हिनक परिचयके संग पहिल रचना बाबत प्रो० रविन्द्र कुमार चौधरी जीके डायरेक्टरीमे पढ़ल जा सकैत अछि। अनुवाद कार्यके दिशामे सेहो शेष जीवन नामे हिन्दीमे ठूठ गाज(मैथिली) केर प्रकाश्य पोथी आबि रहलन्हि अछि। हम कहि सकैत छी श्री कामत जीक लेखन शैली मैथिली भाषा मानक तय करैयमे अछि शव्दके जगह 'य' आओर हेन केर प्रचलन तथा तहन - तखन केर जगह 'तब' आ लेल केर जगह- ल आओर थीक केर जगह छी केर प्रयोग ठेंठी मैथिली जे मिथिलांचलके ९० प्रतिशत आवादीक जनवाणी मानि ,जे कि भाषायी आत्मा छी महौत लेल जेबाक चाही।

-प्रीति कुमारी,बी.ए. ऑनर्स (बी.एड०) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। पद्य ३.१.जगदानन्द झा मनु -तीनटा गजल ३.२.जगदानन्द झा मनु -बीसटा हाइकू ३.३.रबीन्द्र नारायण मिश्र-प्रदूषणक प्रहार ३.१.जगदानन्द झा मनु -तीनटा गजल जगदानन्द झा �मनु� तीनटा गजल 1 की बनब चाहै छलौं हम कि बनि गेलौं प्रेममे प्रियतम अहीँ  केर    सनि गेलौं आश जे परिवारकेँ  आब नहि रहलै जेब खाली देख सब हीन जनि गेलै सुधि रहल नै बोझ लदने अपन हमरा प्रेम कनिको भेटते हम तँ कनि गेलौं गाम सदिखन खूनमे अछि बसल हम्मर छल लिखल परदेशके  गाम मनि गेलौं नेह अप्पन आब नै नेह टा रहलै मोनमे बसि �मनु� हमर साँस गनि गेलौं (बहरे कलीब, मात्राक्रम  2122-2122-1222) 2 पोथीक तर दबि पढ़ुआ सगर मरि गेल जे प्रेममे  डूबल जीविते तरि गेल सदिखन जतय मनमे छल डरक आतंक अबिते अहाँके नव फूल फल फरि गेल धरती तपल छल जे पानि बिन तरसैत हथियाक हँसिते बरखा निमन परि गेल आनक सुखक चिंता बेस अप्पन दुखसँ डाहसँ कतेको घर तेल बिन जरि गेल पाथरसँ �मनु� शाइर बनि रहल अछि आब तोरासँ जे  मृगनयनी  नजरि लरि गेल (बहरे सलीम, मात्राक्रम - 2212-2221-2221) 3 ताड़ीमे कतए मद जे चाही जीबै लेल माहुरमे कुन जीवन चाही जे चीखै लेल बाँकी नै ताड़ीएटा टूटल मोनक लेल जीवनमे एकर बादो बड़ छै पीबै लेल सिस्टममे फाटल छै मेघसँ धरती धरि कोढ़ एतै कतयसँ दरजी ई सिस्टम सीबै लेल जीतब हारब सदिखन लगले छै जीवन संग फेरसँ उठि कोशिश नमहर हेतै जीतै लेल मोनसँ करबै �मनु� अप्पन जीवनकेँ तैयार कर्मक बीया सगरो बहुते अछि छीटै लेल (बहरे विदेह, मात्राक्रम 2222-2222-222-21) -जगदानन्द झा �मनु�   मो० न० 9212-46-1006 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.२.जगदानन्द झा मनु -बीसटा हाइकू जगदानन्द झा �मनु� बीसटा हाइकू १ संगे ल गेल हमर नानी दाई ढेकी समांठ २ पियरगर माँछ भातक भोज गाम-गाममे ३ भोरका सूर्य आजुक लोक लेल दुर्लभ छैक ४ मनमोहक कल कल करैत गंगाक धारा ५ केहन माया उज्जर कारी धारा संग बहैत ६ चाँदी लगैए आइर परहक ओसक बूँद ७ पोखरि घाट हरियर कजरी लोभै मोनकेँ ८ मनोरंजन कम नहि होयत चुनाव धरि ९ गरीब नेता अमीर बनि गेलै देखते कोना १० यौ सरकार गरीबोकेँ सुनबै जीतला बाद ११ हमरे पिसू भोट हमरे देल लोकतंत्रमे १२ उपदेश नै शिक्षा चाही हमरा नेता देत नै १३ नेताक बेटा नेते किए बनै छै लोकतंत्रमे १४ नेता बनिते सभ पाप धोबेलै केहन  न्याय १५ राजनीतिमे नीति नै बाँकी सभ भ रहल छै १६ पाँचे वर्षमे बोलेरो कोना एलै मुखिया जीक १७ सत्यक मोले झूठ आसनपर पसरल छै १८ जनता अछि नेताक नजरिमे बंसीक बोड़ १९ बड़ बहाना पाइ जाति तअरे भोट बेचक २० के अपन छै सभ मौकाकेँ यार राजनीतिमे जगदानन्द झा �मनु� मो० न० ९२१२-४६-१००६ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.३.रबीन्द्र नारायण मिश्र-प्रदूषणक प्रहार रबीन्द्र नारायण मिश्र प्रदूषणक प्रहार हजार साल बाद जौँ  घुरि आएब एहि पृथ्वीपर तकैत अपन लोकसभकेँ तखन के भेटत? साइत ई दुनिआ बनि गेल रहत मरुभूमि नहि रहत कतहु पानिक एक्को बूंद धह-धह जरैत धरती अचानक फुटि गेल शक्तिशाली आणविक बमसँ निकलैत अजस्त्र उष्मासँ छाउर बनि गेल  सभकिछु समुद्र पर्यन्त सुखाएल  रहत दरारि फाटि गेल रहत सौंसे खण्ड-खण्ड भेल धरती नहि देखाइत रहत सूर्य सौंसे धुआँ-धुआँ भेल रहत मनुक्खक तँ बाते कोन नहि बाँचत कोनो जीव-जन्तु के करत करुण क्रन्दन हाकरोस करैत प्रकृति भष्म भए गेल रहत सभकिछु पता नहि पृथ्वीक आस्तित्व रहिओ सकत कि नहि हमर अहाँक निर्मित सुंदर-सुंदर महल सभक नहि रहत नामोनिसान कतए तकबनि अपन वंशजकेँ? ओ सभ तँ कहिआ ने भए गेल रहताह काल कलवित नहि भोगि सकताह कोनो सुख नहि देखि सकताह पृथ्वीपर सहज सुलभ हरीतिमाक अनुपम सौंदर्य सोचिऔ, ओ सभ की कहताह केहन छलाह हमर पूर्वज जे मिथ्या अहंकारवश नहि बचा सकलाह किछुओ नारात्मक सोचसँ आवद्ध नष्ट कए देलनि सभ किछु आबो सम्हरि जाउ छोड़ू दुराग्रह बचा लिअ पृथ्वीकेँ प्रदूषणक प्रहारसँ बहा दिअ समुद्रमे सभटा आणविक हथियार जे बनि गेल अछि शत्रु  मानव समाजकेँ आब बुझलिऐ केहन बुद्धिमान छलाह पूर्वज पोषण करैत रहलाह प्रकृतिक सर्वत्र रहए शांति  ओ सुख आबो जागथु, सम्हरि जाथु करथु त्याग राक्षसी प्रवृतिकेँ जीबथु संयमित जतबे-ततबेसँ प्रकृतिक संरक्षण करैत सोपि जाथु  वसुंधरा एहिना हरियर कंचन अगिला पीढ़ीकेँ। ‍१९।२।२०२४ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। Maithili Literature in English Translation 4.1.Service-Jagdish Prasad Mandal (Original Maithili Short Story) Rameshwar Prasad Mandal (English Translation) 4.1.Service-Jagdish Prasad Mandal (Original Maithili Short Story) Rameshwar Prasad Mandal (English Translation) Jagdish Prasad Mandal (Original Maithili Short Story) Rameshwar Prasad Mandal (English Translation) Service Early in the morning, when Bhushan Uncle went out for his walk, he saw from a distance that on both sides of the road, east and west, groups of women were talking among themselves. He kept walking forward, though in his mind the thought had already taken shape that something must have happened in the village and it was this incident the women were discussing. As he walked along the road with his eyes fixed downward, watching the path closely, his ears were pricked, ready to catch some hint of the matter. Yet when he was still a little way off, the women continued their chatter, but as soon as he came near, they all fell silent. Thus, not a word of the conversation reached his ears. Even though he had heard nothing, his mind kept turning over the possible nature of the incident being discussed. By the time he reached the main road leading out of the settlement, there was still no clue. That morning, Bhushan Uncle was walking alone, with no companion to exchange words with. As usual, he went as far as the village�s southern boundary and then turned back home daily. On the way, he did meet two or three men and women, but they showed no sign of speaking to him, and he could not bring himself to ask them anything. When he reached home after his walk, his curiosity had only grown stronger. The reason was the thought that if most of the people of the village already knew the news or the talk, then why was he still in the dark? Yet another thought came to him, softening his self-reproach: even though humanity has an immense history, there are such animals or creatures in the forest that a person may never have seen. So if he too did not yet know about some event in the village, what great loss was there in that? Still, the thought came to Bhushan Uncle that since this was a village matter, it was indeed surprising that he had not heard of it yet. After reaching home, another idea crossed his mind: even if he had not heard, his wife must have. Why not simply ask her and find out? Then again, he told himself, his wife was no different from anyone else. If he repeated to someone what she told him, and it turned out to be untrue, would he not be blamed for spreading it? Lost in such weighing of options, Bhushan Uncle was sitting on a chair in the doorway when he saw Sumaritlal coming up the road from south to north. As soon as Sumaritlal came near, Bhushan Uncle called out- �Sumarit, you seem to have forgotten us completely!� Since Sumaritlal regarded Bhushan Uncle with respect, he came straight to the doorway without saying anything, sat down on another chair, and replied- �Uncle, what can I say? I spend the whole day worrying about matters at home.� Bhushan Uncle said- �You worry unnecessarily. Think about how the household can move forward and put your efforts into that work. Worry alone will bring nothing.� Agreeing with him, Sumaritlal said- �Uncle, that is exactly what I try to think, but the family members are such that they never let my thoughts stay steady, nor let my mind be at peace.� Without pursuing the subject further, Bhushan Uncle said- �Sumarit, as long as you live and are part of family life, there will always be entanglements. So why are you getting unceasing worried forit?� Finally Sumaritlal replied- �Yes, Uncle, my own heart says the same, but sometimes it happens that I get caught in some sort of web for no reason, otherwise I would simply leave the house.� Hearing this, Bhushan Uncle laughed and said- �Sumarit, even if you leave home, life will still go on. What will you do then?� Admitting himself at a loss, Sumaritlal said- �That�s exactly why I don�t leave.� Changing the subject, Bhushan Uncle asked- �Sumarit, has any new incident taken place in the village?� Sumaritlal replied- �I have heard a faint hint of something, but I don�t know it clearly.� Bhushan Uncle asked- �What hint have you heard?� Just then, by coincidence, Janaklal was walking down the road from north to south. Seeing him, Sumaritlal said- �Uncle, now we will know the whole story.� Janaklal was known in the village as someone who was always in the thick of every bit of news, spending his days stirring conversations and spreading talk. As soon as he came in front of the doorway, Bhushan Uncle called out, �Janak, come here for a moment before you go any further.� Janaklal stepped up to the doorway and said- �Uncle, my respects to you.� �Stay well,� Bhushan Uncle replied. �Janak, what is the news in the village?� �Uncle, a great injustice has taken place,� Janaklal answered. Hearing the words �a great injustice,� Bhushan Uncle looked startled and asked- �What great injustice has taken place, Janak?� Janaklal said- �Do you know Varaspati?� �That same Varaspati who lives in Assam?� Bhushan Uncle asked. Nodding, Janaklal replied- �Yes, yes, the same Varaspati.� �What happened to him?� Bhushan Uncle asked. Janaklal began- �It has been nearly five years now. Before that time, he used to come to the village every year and send money home every month, enough to keep his family going.� Sumaritlal interrupted- �Who is in his family?� �His parents have passed away,� Janaklal said. �Only his wife and a daughter of about four and a half years are there.� �What happened to him then?� Bhushan Uncle asked again. �Uncle, I will tell you everything as I understand it,� Janaklal replied. Sumaritlal broke in again- �Janak bhai, your house is right next to Varaspati�s, so you must also know how much he spend on things like salt and oil.� Janaklal said- �Uncle, for the last five years Varaspati has neither come to the village nor sent a single rupee.� Hearing Janaklal�s account, Bhushan Uncle began to weigh the matter in his mind. If Varaspati�s family, meaning his wife and child, were living in the village and yet he neither came home nor sent money, then how was the family managing? The more Bhushan Uncle thought, the more different questions arose. He decided it would be best to first hear from Janaklal exactly what he knew. Only when one reaches even a small part of the root of a problem can it be properly understood. Speaking without knowing could easily turn out to be wrong. Steadying his thoughts, Bhushan Uncle said- �Janak, tell me what you know.� Janaklal replied- �Uncle, I have not seen it with my own eyes, but I have certainly heard it with my own ears.� Sumaritlal broke in- �Are you giving testimony in court now, the way you keep hedging? Just say what you know.� Janaklal said- �Sumarit bhai, I have heard that Varaspati is living with a woman in Assam and has even married her.� Laughing, Bhushan Uncle said- �Janak, for many years I have heard that the tribal women in Assam turn our menfolk into cattle, tie them to a peg in the fields for grazing all day long and when they themselves return home in the evening, they bring the men back too, and at home treat them again like men.� Janaklal, who had also heard such talk from old folks, said- �Uncle, I have heard the same, so I agree with you, but I have not seen it myself.� Bhushan Uncle asked- �If Varaspati has not sent money for four or five years, then how is his family managing?� Janaklal answered- �Uncle, his wife is quick-witted. Sometimes she does a bit of sowing and planting; otherwise she spends most of her time gossiping here and there.� Bhushan Uncle said- �All right, she can do what she likes. That is not the point. Tell me what happened today.� Janaklal said- �The last time Varaspati left the village, his wife was pregnant. About seven or eight months after he had gone, a daughter was born. She is a very beautiful child.� Bhushan Uncle thought to himself that such a thing was certainly possible. Carrying the thought forward, he asked- �Was the child brought up entirely by his wife, meaning Varaspati�s wife?� �Yes,� Janaklal replied. Sumaritlal interjected- �All right, she did what she did. But what exactly happened today?� With a look of surprise, Janaklal said- �Sumarit bhai, sometime during the night, that woman left the little girl sleeping and ran away from the house.� Bhushan Uncle asked- �Did she run away alone, or with some man?� Janaklal answered- �Uncle, it is not yet certain whether she went with anyone, but what is clear is that she has left home. In the morning, when Marni, meaning Varaspati�s daughter, woke up and did not see her mother, she stayed quiet for a while but then began to cry, and she has been crying ever since.� Hearing this news, Bhushan Uncle called out to his wife. When she came and stood in front of him, she asked- �What is it?� Bhushan Uncle said- �Let us all go and bring that child, Marni, here to our home and take care of her. She is a girl, and when the time comes for her marriage, we will give her to someone as our own.� Hearing his words, his wife stood silently. Bhushan Uncle then turned to Sumaritlal and asked- �Sumarit, what do you think?� Sumaritlal replied- �Uncle, there is no greater religion than serving another human being. I support your thought not just fully but with all my heart.� �And you, Janak, what do you say?� Bhushan Uncle asked. Janaklal answered- �Uncle, what you are thinking is exactly what I am thinking as well.� अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। 1 || विदेह ४३६ विदेह ४३६|| 1

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fide Act साहित्य आन्द्रोलनः मानुषीमिह संस्कृतामू सम्पाद़क: गनेन्ड्र गकुर।