VIDEHA — Issue 437 / अंक ४३७

Publication: VIDEHA · Issue: 437
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विदेह ४३७ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। [विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X Videha e-Journal (since 2000) at www.videha.co.in ] ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। कॉपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२६. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। (c)२०००- २०२६. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA. सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@zohomail.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@zohomail.in. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover design: AUM GAJENDRA THAKUR VIDEHA:437 समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा। मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। अनुक्रम विदेह ४३७ म अंक ०१ मार्च २०२६ (वर्ष १९ मास २१९ अंक ४३७) ऐ अंकमे अछि:- १.१.अंक ४३६ पर टिप्पणी (पृष्ठ १-१) गद्य २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान -२४ (पृष्ठ ३-११) २.२.हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१६ (पृष्ठ १२-१७) २.३.प्रणव कुमार झा-रंगा सियार रिटर्न (पृष्ठ १८-२०) २.४.विदेहक होली उपाधि- 2026 (पृष्ठ २१-२८) २.५.प्रीति कुमारी-फौजी उमाकांत कामत : एक व्यक्तित्व (पृष्ठ २९-३३) २.६.आशीष अनचिन्हार- किछु लीखि देलासँ, किछुओ लीखि देलासँ गजल नहि होइत छै (पृष्ठ ३४-३६) २.७.लाल देव कामत- श्री मिथिला : एक पोथी समीक्षा (पृष्ठ ३७-४५) पद्य ३.१.बद्रीनाथ राय 'अमात्य'- कुटील कषाइ (पृष्ठ ४७-४८) ३.२.जगदानन्द झा मनु - बीसटा हाइकू (पृष्ठ ४९-५८) ३.३.रबीन्द्र नारायण मिश्र-अन्वेषण (पृष्ठ ५९-६०) ३.४.प्रणव कुमार झा- किछु जोगिरा (पृष्ठ ६१-६३) Maithili Literature in English Translation 4.1.The Poverty of True Vision-Jagdish Prasad Mandal (Original Maithili Short Story) Rameshwar Prasad Mandal (English Translation) [page 65-76]

१.१.अंक ४३६ पर टिप्पणी आशीष अनचिन्हार प्रीति कुमारीक आलेखक दूनू भाग पढ़ल। एक नीक लेखिका विदेह लग आएल अछि। भविष्यमे प्रीति कुमारीक आनो रचना पढ़बाक लेल भेटत। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। गद्य २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान -२४ २.२.हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१६ २.३.प्रणव कुमार झा-रंगा सियार रिटर्न २.४.विदेहक होली उपाधि- 2026 २.५.प्रीति कुमारी-फौजी उमाकांत कामत : एक व्यक्तित्व २.६.आशीष अनचिन्हार- किछु लीखि देलासँ, किछुओ लीखि देलासँ गजल नहि होइत छै २.७.लाल देव कामत- श्री मिथिला : एक पोथी समीक्षा २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान -२४ कल्पना झा उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' जीक परिवारक अन्य सदस्यक विवरण 'व्यास' जीक 'ऑलराउंडर' बालक: डॉ. शैलेन्द्र कुमार झा 'व्यास' जीक तेसर बालक डॉ. शैलेन्द्र कुमार झा, घरक नाम केशव जीक चर्चा शुरु करब हम मैथिली साहित्य मे हुनकर योगदानहि सँ। 'व्यास' जीक सन्तान मे सँ ई पहिले एहन भेलाह जे पिताक जीवनकालहि मे मैथिली साहित्य जगत मे पदार्पण कएलनि। सन् 1994 मे ऑफिशियली मैथिली 'लेखक' रूप मे अपन नाम अंकित करबा चुकल छलाह 'व्यास' जीक 'हैंडसम' 'डैशिंग' 'हीरो' सन बालक केशव जी। 'हीरो' सन बालकक भीतर किछु लक्षण सेहो फिल्मी हीरो बला छलनि। 17 जुलाइ 1952 मे जन्मल ई हीरो ताहि जमाना मे (1976) अपन क्लासमेट भानु झा संगे प्रेम विवाह क' क' तहलका मचा देने छलाह, मैथिल समाज मे। मातृभाषाक प्रति अनुराग रहितहु, अत्यधिक व्यस्तताक कारणेँ मैथिली मे कम लिखलनि। कारण, समय-समय पर हिन्दी, अंग्रेजी मे सेहो काजक पोथी सभ प्रकाशित होइत रहल छनि। मतलब समय खर्च करैत रहलाह, अन्यान्य एकेडमिक गतिविधि सभ मे संलिप्त रहैत। हिनकर लिखल सैकड़ों शोध-पत्र राष्ट्रीय/अन्तर्राष्ट्रीय अकादमिक पत्रिका (journals) मे प्रकाशित भ' चुकल छनि। हिनकर लिखल किछु अंग्रेजी पोथी विदेशी विश्वविद्यालयक कोर्स मे सेहो सम्मिलित कएल गेल अछि। डॉ. शैलेन्द्र कुमार झाक प्रकाशित कृतिक लिस्ट देखि स्वयं बुझबा मे आबि सकैत छनि लोक कें, जे कतेक-की काज क' चुकल छथि ओ। देखल जाउ- 1. आरोह-अवरोह (कथा-संग्रह, 1994) 2. The Economic Heritage Of Mithila (1996) 3. संस्कार (उपन्यास; यू. आर. अनंतमूर्तिक मूल कन्नड़ उपन्यासक मैथिली अनुवाद; साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित, 1999) 4. दसम खुट्टी (कथा-संग्रह, 1999) 5. Imperatives Of Globalization (2003) 6. मुझे चाँद नहीं चाहिए (कविता-संग्रह 2006) 7. प्राचीन भारतीय वाङ्मय में अन्तर्निहित आर्थिक अवधारणाएँ (2009) 8. संघ-चिंतन; व्यवस्थाएँ और विकल्प (2010) 9. फेर एक बेर (कथा-संग्रह, 2019) 10. चालीस नम्बर पन्द्रहम तल्ला (मैथिली उपन्यास, 2024) 11. गाँधी मानुष (मूल उड़िया, साहित्य अकादमी पुरस्कार सँ पुरस्कृत ग्रन्थक मैथिली अनुवाद; साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा अनुबंधित एवं प्रकाशित, (2025) 12. डी. डी. कोशाम्बीक ग्रन्थक अंग्रेजी सँ मैथिली मे अनुवाद; (National Translation Commission द्वारा अनुबंधित; प्रकाशनाधीन) 13. अर्ध-यात्रा (कथा-संग्रह; प्रकाशनाधीन) एकेडमिक गतिविधि मे संलिप्तता/साहित्य-लेखनक अतिरिक्त किछु सौख सेहो पोसने छथि डॉ. शैलेन्द्र कुमार झा। कुकिंग, सिंगिंग के संग-संग खेल-कूद मे सेहो रुचि छलनि। स्टेट लेवल धरि सेलेक्शन भेल छलनि क्रिकेट, बैडमिंटन, लॉन टेनिस, सभ खेल मे। कटिहार रहैत नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर रेलवेज (NFR) क अंदर होमए बला खेल प्रतियोगिता मे भाग लैत छलाह, विजयी होइत छलाह। रेलवे विभाग आ पुलिस विभाग मे शारीरिक आ मानसिक स्वास्थ्य कें बढ़ावा देबाक उद्देश्य सँ विभिन्न खेल सभक प्रतियोगिता आयोजित कएल जाइत रहैए, प्रशिक्षण देल जाइए, से सर्वविदित अछिए। खेल-कूदक संग संगीत मे सेहो अगाध रुचि छलनि। रुचिए टा नहि राखैत छलाह, पारंगत छलाह, से कहि सकैत छी। मात्र गायन मे नहि, तबला आ वॉयलिन बजाबए मे सेहो। बाकायदा सिखने छलाह तबला आ वॉयलिन बजाएब। फोटाग्राफी सेहो नीक करैत छथि। नीके नहि, बहुत नीक करैत छथि। होमियोपैथी दवाइ सभक नीक जनतब राखैत छथि महोदय। मतलब पी.एच.डी होल्डर के संग संग होमियोपैथी डॉक्टर सेहो छथि, से कहल जा सकैए। एहि सभ गुणक संग एकटा 'विशेष'  गुण छनि, अपन गप्प सँ सामने बला केँ प्रभावित करब। बहुत नीक वक्ता छथि। से चाहे घरक लोक सँ सामान्य गप्प सरक्का काल 'कैजुअल' गप्पक बात हुअए आ कि मंच पर वक्तव्य देबाक बात हुअए, एकदम संतुलित वक्तव्य दैत बुझेताह 'व्यास' जीक ई 'ऑलराउंडर' बालक। हालहि मे (2024) हिनकर नबका मैथिली पोथी (उपन्यास) "चालीस नम्बर पन्द्रहम तल्ला" प्रकाशित भेलनि अछि। जाहि लेल लेखक केँ चेतना समिति द्वारा "कीर्तिनारायण मिश्र साहित्य सम्मान-2025" सँ सम्मानित कएल गेलनि अछि। एहि उपन्यास सँ पहिने हिनकर तीन गोट मैथिली कथा-संग्रह "आरोह अवरोह" "दसम खुट्टी" आ "फेर एक बेर" प्रकाशित भ' चुकल छनि। चारिम कथा-संग्रह "अर्ध-यात्रा" प्रकाशनाधीन छनि। माने कुल पाँच गोट मैथिली पोथी (मूल) रूपी फूल अपन मातृभाषाक पएर पर अर्पित कएनिहार मैथिली साहित्यकार छथि। पहिल कथा-संग्रह "आरोह अवरोह"क चौदह गोट कथा मे सँ कोनहु कथा पढ़ि, एक रत्ती लागत नहि जे ई रचनाकारक पहिल प्रकाशित कृति छनि। माने ततेक परिपक्व, स्थापित रचनाकार सन छनि सभटा कथा, जे पाठक कथा पढ़ला उत्तर कतेक काल धरि कथा मे डूबल रहि जाइए। एहन-एहन चरित्र सभ गढ़ने छथि जे लोक केँ चिंतन-मनन करबालेल विवश क' दैत अछि। चाहे ओ 'सीमाबद्ध' कथाक होमी बाबू होइथ किंवा 'लीभ-एप्लिकेशन'क गौरी। 'अनुत्तरित' कथाक बारह-तेरह बरखक अनाम बच्चा होइक वा 'फिल्ली-ब्लैक'क दस वर्ष चारि मासक फिलिप, सभ पात्र दिमाग मे बड़ी काल धरि घुरिआइत रहए बला छनि। दोसर कथा-संग्रह "दसम खुट्टी"क तँ बाते की कएल जाए। शीर्षक कथा 'दसम खुट्टी'क कथानक तँ तेहन जबरदस्त छनि, जे हम मामा सँ पुछनहुँ छलियनि, "एहि कथाक प्लॉट कतए सँ भेटल, कोना भेटल?" आ जतबा नीक कथानक, तेहने शिल्प, भाषा, सभ किछु बेजोड़। ओना शिल्प आ भाषा तँ हिनकर सभ कथा आ कथा-संग्रह मे उत्कृष्ट रहल छनि। से होएब स्वाभाविको। कारण साहित्य तँ हिनका शोणित मे छनि। साहित्यिक परिवेश मे पालन-पोषण, साहित्यिक लोकक संग उठब-बैसब। माने साहित्ये ओढ़न, साहित्ये पहिरन बला गप्प। "दसम खुट्टी" कथा-संग्रहक बहुत रास कथा सभ मे पात्रक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण अद्भुत भेल अछि, जेना 'लालकार्ड'क मुख्य पात्र 'मनकी'क मनोदशाक चित्रण। तहिना 'प्रतीक्षा' शीर्षक कथा मे एकटा निस्संतान स्त्रीक मनोदशाक चित्रण करबा मे सफल भेल छथि लेखक। 'कुछो ने कहिह'....कथा मे घर सँ भागल छौंड़ीक आँखिक कातरता, निरीहता, फेर आतंक सँ ओकर चिकड़ब..."हमर बाबू  के कुछो ने कहिह....." आत्मा केँ झकझोरए बला दृश्य प्रस्तुत करैए। आ 'घोँकल गंगाजल'क मुख्य पात्र लछमीक पूछब "हमरा निकाल त" न देब पप्पाजी.....?" मे ओकर मोनक धुकधुकीक अभिव्यक्ति मार्मिक भेल छनि। विशेष रूप सँ बाल मनोविज्ञान पर हिनकर पकड़, अचम्भित करैए। एक टा कथा 'बाक्' मोन पड़ैए, जाहि मे पल्ली माने पल्लवीक बाक् लागब आस्ते-आस्ते कोना कम भ' जाइत छै, आ पुनः बाक् लागए लागैत छै। एहि प्रकरण केँ कथाक रूप मे बूनल गेल अछि आ बड्ड नीक सँ बूनल गेल अछि। पल्लवीक मनोदशाक चित्रण अद्भुत भेल अछि। तहिना "आरोह-अवरोरह"क सर्वश्रेष्ठ कथा 'फिल्ली ब्लैक' सेहो बाल मनोविज्ञान पर आधारित कथा अछि। बाल मनोविज्ञान हमर पढ़ल विषय अछि, तैँ बाल मनोविज्ञान सँ संबंधित कथा सभ हमरा विशेष आकर्षित करैत अछि, चाहे ओ कोनो रचनाकारक होअए। तेसर कथा-संग्रह "फेर एक बेर" लम्बा अन्तराल पर आएल मुदा निस्सन आएल। एगारह गोट कथाक संकलन मे 'झाड़खण्डी स्टोव' 'एक टा छल कथाकार' विशेष प्रभावित करएबला। 'कीच' कथा मे सिपाही जखन जैकेटक जेबी टेबए लागल, तखन कागज मे मोड़ल, थकुचाएल एक खिल्ली पान भेटब, हृदयविदारक अछि। 'एक टा छल कथाकार' मूलतः मेकिंग ऑफ कथाकार अछि। माने एक टा कथाकारक, कथाकार बनबाक प्रकरण। 'नियतिबद्ध', 'अंततः', 'ऑनलाइन', ई कथा सभ कनि आत्मकथात्मक भ' गेल छनि। 'मिस करेला', 'हमहीं देबै मालिक', 'किछु भेटल अछि', सभ कथाक कथानक जेहने मजगूत, शिल्प तेहने सधल। आब गप्प डॉ. शैलेन्द्र कुमार झाक एकेडमिक उपलब्धि, व्यावसायिक उपलब्धि आ हुनकर व्यक्तिगत पारिवारिक जीवनक। हिनकर स्कूलिंग भेल छनि जिला स्कूल, राँची सँ। इंटरमीडिएट आ ग्रेजुएशन केलनि पटना कॉलेज सँ। तत्पश्चात पटना यूनिवर्सिटी सँ मास्टर्स के डिग्री प्राप्त केलनि। पी.एच.डी. केलनि भागलपुर युनिवर्सिटी सँ। एतेक रास डिग्री हासिल कएलाक उपरान्तहुँ किछु साल लेल प्राइवेट जॉब करबा लेल विवश भ' गेल छलाह। बैसारी मे। चूँकि विवाह भ' गेल छलनि, गृहस्थीक गाड़ी खिंचबाक छलनि। अन्ततः जनवरी 1978 मे पूर्णिया कॉलेज ज्वॉइन करैत शिक्षण क्षेत्र मे प्रवेश केलाह। शुरुआत मे लेक्चरर, आगाँ जा क' Head of the post graduate department, फेर University head, फेर CCDC क पद धरि पहुँचलाह। हिनका अन्दर दर्जन सँ अधिक शोधार्थी शोध कएलथिन। साल 2017 मे अवकाश प्राप्त केलनि। D. S. College कटिहार सँ। बेसी समय एतहि पोस्टेड रहलाह डॉ. शैलेन्द्र कुमार झा। हिनकर अर्द्धांगिनी भानु झा सेहो पति सँ कनिको कम नहि छलीह, प्रतिभाक मामला मे। ओहो लेक्चरर छलीह एम.जे.एम. महिला कॉलेज कटिहार मे। केहुनिया गामक बेटी छलीह। बहुत लोकमन्त महिला। राजनीति (भाजपा) मे सेहो सक्रिय रहए लागल छलीह बादक समय मे। जतबे टा जीवन रहलनि, ताहि मे अपन सभ जिम्मेदारी इमानदारी सँ निभाबैत सभक मोन मे जगह बनएबा मे सफल रहलीह। असाध्य रोगक चपेट मे आबि फरवरी 2008 मे बिच्चहि बाट मे पतिक संग छोड़ि इहलोक त्यागि गेलीह। जे बहुत पैघ झटका छलनि, पतिक संग दुनू सन्तान लेल सेहो। जिन्दगी कतेक भयंकर तरीका सँ पटरी पर सँ उतरल सन बुझना गेल हेतनि, से अनुमान लगाओल जा सकैछ। एहि दम्पत्तिक दू गोट सन्तान। एक पुत्र, एक पुत्री। पुत्र राजा, ऑफिशियल नाम अंशुमान कुमार "यस बैंक" मे कार्यरत छथिन। हिनकर विशेष गुण फोटोग्राफी छनि। पिता सँ बहुत बेसी नीक फोटोग्राफर छथि राजा। प्रोफेशनल फोटोग्राफर सन पारंगत छथि, फोटोग्राफी मे। राजाक सुखद गृहस्थ जीवन जीबि रहलाह अछि। दू टा पुत्रक पिता छथि। सम्प्रति बैंगलुरु मे रहैत छथि। डॉ. शैलेन्द्र कुमार झाक पुत्री अनुरिता, अपन पढ़ाइ पूरा क' 2009 मे "miss gorgeous"क प्रतियोगिता जीति फिल्म लाइन मे प्रवेश कएलनि। अद्यतन फिल्मे लाइन मे छथि आ नव तरहक काज सभ क' रहल छथि। मैथिली सिनेमा "मिथिला मखान" मे अनुरिता, क्रान्ति प्रकाश झा संगे मुख्य भूमिका मे छलीह। नितिन चंद्रा द्वारा निर्देशित एहि सिनेमा के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त भेलैक 2016 मे। आब अनुरिता पटकथा लेखन आ निर्देशन मे सेहो हाथ आजमा रहलीह अछि। निर्माणाधीन शॉर्ट फिल्म "गुठली"क कथा अनुरिता स्वयं लिखलनि अछि आ स्वयं निर्देशित सेहो केलनि अछि। संगहि मुख्य पात्र सेहो स्वयं छथि। देखबाक चाही दर्शकक केहन रिस्पॉन्स भेटैत छनि। वेल सेटल्ड बेटा-बेटीक अछैतो अठारह वर्ष सँ एकाकी जीवन जीबाक लेल अभिशप्त छथि डॉ. शैलेन्द्र कुमार झा। जीवनसंगिनीक संग छुटलाक उपरान्त साहित्यिक गतिविधि मे स्वयं कें पूर्णरूपेण लिप्त क' लेने छथि। हमर अनुमान अछि जे 'लिखब' हुनका लेल 'थेरेपी'क काज करैत हेतनि। लिखैत रहथि, थेरेपी चलैत रहनि, समाजक सोझाँ किछु सार्थक परिणाम आबैत रहए, ताहि मे कोनो हर्जो तँ नहिए ने? शैलेन्द्र कुमार झा अपन पत्नीक संगे संपादकीय सूचना- एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-7 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-8 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-9 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-10 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-11 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-12 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-13 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-14 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-15 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-16 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-17 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-18 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-19 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-20 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-21 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-22 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-23 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.२.हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१६ हितनाथ झा (मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070) विषय आ विधाक विविधता प्रभातक उपलब्ध अंकमे दृष्टिगोचर होइत अछि। समसामयिक विषय-वस्तुक समावेश सेहो देखना जाइछ। फगुआक समयमे जेना मार्च-१९३३क अंकमे होलीपर विशेष हास्य-लेख छपल छल , एकर सूचना 'चैत्रक मजा'क लेखक जखन अप्रैल१९३३क अंकमे निम्नांकित लेख देलनि, तँ होलीक परिक्रमाक चर्चा कयलनि। चूँकि मार्च१९३३क अंक अनुपलब्ध अछि, तेँ ओ एतय प्रस्तुत नहि भ' सकल,मुदा पत्रिकाक दृष्टि तँ झलकिये गेल। एहि अंकमे प्रस्तुत अछि ' चैत्रक मजा' आ एक टा एही अंकक कविता ' प्रातःकाल'। चैत्रक मजा हा-हा-हा........... लेखक - श्री नारायण ठाकुर, कोइलख। श्रीमान सम्पादक जीक कृपासँ होलीक परिक्रमाक तँ मजा देखै गेलौं, आब चैत्रक मजा देखै जाउ... करीब ५बजे भोरक समय थीक। कतेक बाबू लोकनि उठय लागल छथि। कियो त ठररे पारि रहल छथि। कियो उठि कान पर जनौ चढ़ाय तमाल पत्रमे सितुआक चूर्ण मिलाय चुटकी अवति ठोर पर दय हाथमे जलपात्र लय अपन-अपन कलम दिशि दीर्घ शंकाक हेतु जाइत भेला। कियो टहलबोक हेतु जाइत छथि आ मजरक सुगंध लैत शुद्ध-हवाक मजा लुटैत चल अबैत जाइत छथि। आब किछु देर वितलाक बाद फ़ेकु बाबू ओ ढेकु बाबू दुनू गोटे दीर्घ शंका दिशि सँ अबैत भेला। ओ कलममे टहलय लगला। टहलि-टहलि देखय लगला ? फेकु बाबू- की औ ढेकु बाबू, केहेन लक्षण ऐ बेर अछि ? अहाँक कलकतिया तँ खूब जोड़ मजरल अछि ? ढेकु बाबू - हँ, आब देखा चाही। आशा तँ एकरे टा। जँ ई सुतरि जाय तँ ई दुनू गाछ काम सँ कम 25 रु.मे बिकायत ? अहूँक भदैबा तँ बेस मजरल अछि। फेकु बाबू- हँ, भदैबा खूब अछि, परन्तु कलकतिया किछु कम अछि।गाममे तँ रुपैया गढ़बाक कल कलकतिये टा अछि कि कुसियारे । त कुसियारमे पुरजीएक बखेड़ा उठइये, तखन रहल कलकतिया आम जिनका कलकतिया अछि तनिके किछु रुपैया होइ छैन्ह।औ ढेकु बाबू, त अहाँ दुनू गाछ कलकतिया बेचिए लेब कि खेबो वास्ते किछु राखब। ढेकु बाबू- खेवा वास्ते कोहवा और कौआ भोग राखब ? फ़ेकु बाबू- औ एते मनसूबा एखन जनु करी, मज्जर भेने की ? सुतरत तैखन ने ! ता गाछ मे कटहर ओठ मे तेल, पानी मे माछ न न कुटिया बखरा की करै छी ? आब चलू फेर स्नानो करब ग आइ मधुबनी जेबाक अछि ओ धोढ़बा वाला मोकदमाक तारीख आइ थिकैक ? ता विलैया माय ओ सजना के देखलन्हि। फ़ेकु बाबू- गै हरमजादी, के छिके जारन तोरैत। मजरल गाछमे जारन तोड़य एलेहें ? वि.मा. - औ फ़ेकु बाबू, अहाँक मूँह बड़ छुटल अछि।देखू औ ढेकु बाबू, हम एखने एबे टा केलौं अछि, इहे चारि काठी बाँझी तोरली ऐ अछि, तै ले जे गाड़ि पढ़ैत छथि। देखलौं अछि, एखने सजनी एक पथिया खाली धौढ़ी तोरि क ल गेलै से किछु ने ! ओकर तँ खुशामद रहैत छन्हि। भला बुढ़ि भेलहुँ तँ दूरि गेलहुँ। ढेकु बाबू- जो, जो, बात नहि बढ़ा, ओ नहि चिन्हलथुन। चीन्हि क' जानि क नैन गाड़ि पढ़लथुन अछि, तै यो एखन मजरल गाछमे नहि ने तोड़क चाही ? आब फ़ेकु बाबू ढेकु बाबू दुनू गोटे अबैत भेला। धोती लय अन्हरी पोखरिक बिदा भेला। स्नान केलन्हि। संध्या बन्धन ककरा ले करता ? एकर त सब वा खास क युवक लोकनि पटले हटा देने छथि। ऐ पर यदि आब लिखय लागब तँ बहुत बात लम्बाचौड़ा भ' जैत। दुनू गोटे आँगन अयला। चूड़ा दही खाय मधुबनीक जाइत भेला । (प्रभात, वर्ष-१,अंक-४, १९३३ ई.) प्रातःकाल श्री चन्द्र कान्त मिश्र, क्वैलख। केहेन अछि सुन्दर प्रातःकाल। कार्योपयोगी थीक समय ई, प्रकृति करत नव धार। शीतल-२ पवन चलै अछि, पुष्पसब करे फुफकार।। फलसँ झूकल शाखा सभसँ, शिशिरक बूँद खसै भूतल पर। एहि समय पूर्व दिशा मे, रवि सँ शोभा हो पृथ्वी पर।। नवनव सूर्य किरण सभ केर, वृक्षपर खोता क रेखा। क्रमशः पृथ्वी उज्ज्वल भ' क ' करनि अन्हारक लेखा।। जीव सभ उठि एहि पृथ्वी काँ, भोजनक करै अछि तलाश। शय्या कां त्यागि मनुष्य सभ, करै छथि काजक प्रयास।। कृषक सभ निज काज करै छथि, छात्र सभ पढ़थि निज पाठ। सब काँ मन प्रफुल्ल रहै अछि, सिखैछ प्रशान्तक पाठ।। आनन्द होय भ्रमण कयला सँ, सूतब नहि ककरौ उचित। काज क्षमता होय शरीर मे, राति जगरना छी अनुचित।। (प्रभात, वर्ष'0-१, अंक-४, अप्रैल १९३३) उपर्युक्त कविता ,जेना लगैछ, कविक प्रोत्साहन हेतु छापल गेलनि अछि, कविताक गुण-अवगुण पर ध्यान नहि दय कविक नीक सोचक ध्यान राखल गेलनि अछि। पत्रिकाक ई प्रारंभिक समयो छल, तेँ हम एहि अंकमे एक हास्य आ एक कविता प्रस्तुत कैल अछि। अग्रिम अंकमे दोसर रचनाक संग प्रस्तुत होयब। संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-7 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-8 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-9 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-10 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-11 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-12 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-13 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-14 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-15 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.३.प्रणव कुमार झा-रंगा सियार रिटर्न प्रणव कुमार झा रंगा सियार रिटर्न एहि बेर रंगा सियार फेर बस्ती सँ जंगल घूरि आयल छल। मुदा ई ओ पुरान, अकस्मात्‌ रंग में रंगा गेल आ भेद खुलिते हुलकैत भागि जाय बला सियार नै छल। समय बहुत किछु सिखा दैत अछि। अपन पुरखा के गलती पर रंगा सियार अपन टीम संग गहन शोध कयने छल। ओकरा लग जंगल विश्वविद्यालय सँ डिग्री नै, मुदा अनुभव आ चालाकी के एंटायर शोध अवश्य छल। घुरबा सँ पहिनेहे ओ किछु परबा के मोटगर दाना दऽ कऽ अपन “पीआर” पर लगा देने छल। ओ सभ दिन-रात उड़ि-उड़ि कऽ जंगल के सभटा गाछक डाढ़ि पर दू गो बात के बीया छिटकैत फिरैत छल। “जंगल संकट में अछि। वर्तमान राजा आ ओकर कोटरी जानवर सभ के खा रहल अछि। ई अंतिम मौका अछि। एकटा असाधारण जीव आबि रहल अछि जकरा लग समाधान अछि। ई संकट साधारण जीव सँ नै टुटत। एकटा ‘विशेष जीव’ आबि रहल अछि जकरा में चमत्कारिक क्षमता अछि, जे युग परिवर्तन कऽ सकैत अछि।” जंगल के भोला हिरण, श्रमजीवी भैंस, डरायल खरहा, आ एत्त तक कि गम्भीर हाथी सेहो धीरे-धीरे एहि कथा पर विश्वास करय लगल। जे बात बार-बार कहल जाय, ओ अंततः सत्य जकाँ प्रतीत होइत अछि। येन-केन प्रकारेण रंगा सियार के पुनः जंगल में एंट्री भेल। प्रवेश साधारण नै छल। जंगल के सीमा पर स्वागत-ध्वनि, पत्ताक बिछौना, परबा सभक लाइव-चहकाहट। ओही दिन जंगल में रौदो कनी बेसी चमकैत बुझाइत छल - कम से कम परबा सभ त एहनहि चित्र बनौने छल। जल्दिए अपन तंत्र के बल पर रंगा सियार “युग-परिवर्तक” घोषित भऽ गेल छल। कखनो ओकरा “जंगल-पुरुष” कहल गेल, कखनो “अवतारी जीव”, कखनो “नॉनबायोलोजिकल सत्ता”। गद्दी पर स्थापित होइतहि ओ अपन मनमाफिक राज करय लगल। निर्णय ओकर, नीति ओकर, दिशा ओकर। शौख मनोरथ सभटा पुरबय मे कोनो कमी नै। मुदा एहि बेर ओ पुरान गलती नै दोहराबैत छल। कखनो यदि किछु जानवर के चेतना में प्रश्न उठैत: “एहन जीव कखनो हमरा जंगल में देखायल नै छल, ई आखिर के अछि?” त तुरंत परबा सभ इंटरभ्यू लऽ कऽ प्रचारक आकाश भरि दै - ई ‘नॉनबायोलोजिकल’ नेतृत्व अछि।” रंगा सियार के कखनो “हुआ-हुआ” कऽ नाचय-गाबय के मोन होइत छल। पुरखा के स्मृति कनी-कनी भीतर सँ फुँफकारैत छल। मुदा ओ सावधान छल। जखन उत्साह अधिक भऽ जाय तऽ ओ विश्वविजय के नाम पर दोसर जंगल के प्रवास पर निकलि जाय छल। ओतय की-की करैत छल - केकरा संग हुआ हुआ, केकरा संग की समझौता ई सब त वैह जानय छल आ आन जंगल के ओकर संगी सब। मुदा परबा सभ हर बेर मधुर आ गर्मजोशी बला तस्वीर, म्यूटेड वीडियो, स्लो-मोशन में हाथ हिलैत दृश्य प्रसारित करैत गर्वक इंजेक्शन डोज़ भरय -  “देखू! दुनिया भरि के जंगल में अपन डंका बाजि रहल अछि!” जंगल के भोला जीव सभ ताली बजाबय। जकर पेट अंतरी मे लागल छल ओहो सब जंगल-गौरव के गीत गाबय लगैत छल। धीरे-धीरे रंगा सियार के ट्रिक जंगल के किछु आर चलाक जीव सेहो सीखि नेने छल। कोनो भालू अपन इलाका में, कोनो बानर अपन डाढ़ि पर, कोनो लोमड़ी अपन घाटी में - छोट-छोट रंगा सियार पैदा होबय लगल। “रंगा सियार” सौंसे जंगल मे एकटा संस्कृति के रूप लेबय लागल छल। लोकल लेवेल पर सब अपन-अपन हिसाब सँ ऐ प्रवृत्ति के लाभ उठाबय लगल। सभके अपन परबा सभके अपन साम्राज्य। जंगल में अजगुते स्थिति बनि गेल। ऊपर सँ फिटफाट, भीतर सँ मोकामा घाट। बाहर विकास, भीतर अवसाद। बाहर जयघोष, भीतर कराह। समस्या के चर्चा जंगलसंस्कृति के विरोध घोषित भऽ गेल। प्रश्न पूछनिहार खरहा के “नकारात्मक” कहल जाय लगल। आ जे सियार के रंग पर सवाल उठाबय, ओकरा “जंगल-विरोधी तत्व” ठहरायल जाय। रंगा सियार के मेहनत, शोध आ तंत्र के प्रभाव एहन प्रबल छल जे ई सब अनवरत चलैत रहल। सत्य धीरे-धीरे पत्ता जकाँ सूखैत रहल, आ प्रचार वटवृक्ष जकाँ पसरैत रहल। जंगल के इतिहास मे एकटा नव अध्याय लिखा रहल छल जतय तथ्य असली नै, कथा असली बनि गेल। जतय एकटा परबा गाल फुला के कहय “facts are not facts”। -प्रणव कुमार झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.४.विदेहक होली उपाधि- 2026 विदेहक होली उपाधि- 2026 होलीक अवसरपर प्रस्तुत अछि "विदेहक उपाधि"। ई उपाधि धारण करथि साहित्यकर्मी आ विदेहक संग जुड़ि सार्थक काज दिस आबथि से कामना............(प्रस्तुति विदेह टीम)- 1. अरविन्द ठाकुर- नवका आशीर्वादी लाल। 2. जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल- 'गीत-गंगा' केर रऽहु। 3. प्रेमलता मिश्र 'प्रेम'- सभ भेटि गेल। 4. कथाकार अशोक- अंग्रेजीमे प्रचार करबेलहुँ तकरो मोजर नै। 5. रामभरोस कापड़ि 'भ्रमर- हमहीं मधेश छी। 6. लक्ष्मण झा सागर- हमरा अगरतल्ला पठेलक तँइ अकादमी नीक छै। 7. नरेन्द्र झा- हम भने आर्थिक लेखक छी। 8. प्रो. डा. रामावतार यादव- धरना बला सभ भाषावैज्ञानिक बनि गेल। 9. हितनाथ झा- बाल पुरस्कारक लाइनमे। 10. शिवशंकर श्रीनिवास- साहित्य अकादमी कहिया बंद हेतै? 11. नारायण जी चौधरी- गोहि उर्फ पोखरिक रखबार। 12. भवनाथ झा- पाथरपर घसल विद्वता। 13. बृशेष चंद्र लाल- चुपचाप। 14. रमानन्द झा रमण- "मोन पाड़बा"सँ लोक मना करैए। 15. काश्यप कमल (उर्फ पवन झा)- 'प्रकाश' बिनु लोक घंटो-घंटा जीबि सकैए मुदा 'पवन' बिनु एकौ मिनट नहि। 16. सुभाष चंद्र यादव- भेटतै हमरो मुदा अहाँ बुझबै नै। 17. राजदेव मंडल- कविताक राजमिस्त्री। 18. दिनेश कुमार मिश्र- कोसी नदीक सहेली। 19. अशोक झा (मिथिला विकास परिषद्)- मूर्तिपूजक। 20. वीरेन्द्र मल्लिक- आखर गोष्ठीसँ गाएब। 21. परमेश्वर कापड़ि- हमरो पोथी पढ़ू। 22. भीमनाथ झा- भावांजलि बनाम पुष्पांजलि। 23. उदय नारायण सिंह 'नचिकेता'- मात्र मोहर मानू हमरा। 24. गंगेश गुंजन- आदमी सन / आदमीनुमा। 25. प्रदीप बिहारी- 12 मास, 12 कथा। 'कोखि' केँ आराम नहि। 26. योगानन्द झा- हरेक मंच हमरे अछि। 27. चन्द्रेश- दुर्भाग्यसँ "मणि" भेटल। 28. मुन्नाजी- बीहनिकथा संस्था भरोसे। 29. प्रीति ठाकुर- चित्रकथा छोड़ि किछु नै। 30. वीणा ठाकुर- साहित्य अकादमीक नेहरू। सभ गलती लेल जिम्मेदार। 31. रमेश- बहरक विरुद्ध विधवा विलाप। 32. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- गलबज्जू मैथिल। 33. रबीन्द्र नारायण मिश्र- समीक्षा लेल बेहाल। 34. बिनयानंद झा- मिथिलाक सभ जिलाक विकास मधुबनीसँ भेल छै। 35. शैलेन्द्र आनन्द- हमरो नहि भेटत हम त्रिकोणक तेसर कोण छी। 36. कल्पना झा (पटना)- रील बनेबाक प्रेशरमे। 37. नबोनारायण मिश्र- दिल्ली सेट। 38. गजेन्द्र ठाकुर- बैसल रहबै छातीपर। 39. अजित कुमार झा- आब हमरो पोथी अछि। 40. दिलीप कुमार झा- स्मारिकाकेँ पत्रिका कहेबाक लेल व्यग्र। 41. नारायणजी- सही टाइमपर भेटि गेल, मोदीजीक कोन भरोसा। 42. प्रदीप पुष्प- 'बाबा' के फेरमे कतेको बरबाद भेल छै से के कहतनि? 43. अभिलाष ठाकुर- सिखा रहल छी। 44. कुंदन कुमार कर्ण- हमहूँ सिखा रहल छियै। 45. कीर्तिनाथ झा- कुरल कहिया धरि? 46. धनाकर ठाकुर- क्रांतिकारीसँ साहित्यकार बनबाक लौल। 47. योगेन्द्र पाठक 'वियोगी'- साढ़ू संसारक सभसँ नीक लोक होइत छै। 48. गौरीनाथ- पहिने हम अपन पोथी लीखब तखन खुदरा काज करब। 49. शेफालिका वर्मा- सभ यश भेटि गेलाक बादो आरो लेबाक इच्छा। 50. श्रीधरम- उपन्यासक कहबैका। 51. सियाराम झा 'सरस'- हमर 'लाल किला' ढाहि देलक, 'लोक-वेद' सेहो संग छोड़लक। 52. विभा रानी- डहकन सुनबै? 53. कुणाल- चेतना समितिक कार्यक्रमक हकार दैत छी। 54. मुकेश दत्त- हम संस्थासँ बाहर नै छी। 55. चंदना दत्त- बेसी लीखि की करब? 56. शैलेन्द्र मिश्र- आब हमर नाममे डाक्टर लगाउ। 57. रमेश रंजन- साहित्य नाटकेसँ चलैत छै। 58. कामेश्वर झा कमल- बिना पानि-कादोक कमल छी। 59. मुन्नी कामत- यस, भेटिए गेल। 60. केदार कानन- केलियै अकादमी मुट्ठीमे। 61. डा. शिव कुमार मिश्र- रिटायरमेंटक बाद फुरसतिए नै भेटैए। 62. प्रेमकान्त चौधरी- संस्था तऽ व्यक्तिगत काजक संवाहक छै। 63. उदय चन्द्र झा 'विनोद'- सभ कसरि वार्षिक पुरस्कारमे निकालि लैत छी। 64. लाल देव कामत- छोट पाठकीय। 65. आचार्य रमानंद मंडल- काज कम आत्मप्रचार बेसी। 66. सुरेन्द्र ठाकुर- बाबू साहेब चौधरीसँ शुरू आ बाबू साहेब चौधरीपर खत्म। 67. चन्द्रमणि झा- तीन लाख हम देब। 68. बैद्यनाथ चौधरी 'बैजू'- अतेक काज केलाक बादो दरभंगिया हमरा शिक्षा माफिया कहैए। 69. विभूति आनन्द- अभिनंदनग्रंथक असगर नायिका। 70. शैलेन्द्र कुमार झा- बुढ़ारीमे सगर राति जागब। 71. महेन्द्र नारायण राम- मुख्यधाराक जाति फिलर। 72. हीरेन्द्र झा- जखन-तखन पत्रिकाक प्रबंध संपादक बनि ठकेलहुँ आब सगर राति केर प्रबंध संपादक छी। 73. देव शंकर नवीन- हम कतहुँ नै छी। 74. ईशनाथ झा- फेसबुकक गप्पी। 75. नाटककार आनन्द कुमार झा- ने पुरस्कार भेटल आ ने हम नाटक लीखि रहल छी। 76. अजित आजाद- CM 'आजाद' VS आजाद 'CM'।. 77. नील माधव चौधरी- लीखब जरूरी नै छै। 78. विजय चन्द्र झा- स्टेडियमे भरि क्रांति। 79. विनोद कमार झा सरकार- फेस्टिभ सरकार। 80. बुद्धिनाथ मिश्र- मैथिलीमे अकादमी भेटब सहज छै। 81. मधुकान्त झा- वैयाकरण साहित्यकार नै छथि। 82. केष्कर ठाकुर- PHD चाही? 83. कामिनी- लाइभ भीडियो। 84. चन्दन कमार झा- मूल पुरस्कार लेल जगबे करबै। 85. तारानन्द वियोगी- अपन ब्राह्मण संगीकेँ गारि देनिहार। 86. निर्मला कर्ण- नुकाएल अग्निशिखा। 87. कुमार मनोज काश्यप- हमरा बीहनि कथा नै चाही। 88. परमानन्द लाल कर्ण- लिप्यांतरण करै छी। 89. संतोष कुमार बटोही- लक्ष्यक पता नै। 90. डा. जियाउर रहमान जाफरी- उर्दूमे बहर, मैथिलीमे बेबहर। 91. जगदानंद झा 'मनु'- फेरसँ ताल ठोकने। 92. राजकिशोर मिश्र- पोथी पठबै छी। 93. सुशील लाल दास- दोहा सुपरमैन। 94. दयानंद झा (दड़िमा)- हमर अनुवाद कियो ने पढ़ैए। 95. पं. दयानंद झा- छंदशास्त्री माछ भंडार। 96. सत्यनारायण झा- ओहिना किछु लीखि लैत छी। 97. प्रणव झा- पहिनेसँ बेसी लिखैत छी तँइयो कोनो चर्च नहि। 98. भैरव लाल दास- कैथी कुमार। 99. अंजय चौधरी- पीढ़ी सह विशेषण सह दशक विशेषज्ञ। 100. संतोष कुमार मिश्र- हम तऽ मैथिलीक पोसपुत छी। 101. धीरेन्द्र झा 'मैथिल'- उपन्यास कीनू। 102. रघुनाथ मखिया- भोजनो बना कऽ भुखले रहलहुँ। 103. डा. आभा झा- सभ काज लेल लेखक दोषी। 104. कुन्दन कर्ण- भाजपा समर्थित बीहनि कथा। 105. धीरेन्द्र कुमार झा- प्राइभेटे सही, कहुना पुरस्कारक लिस्टमे नाम आएल। 106. कमल मोहन चुन्नू- गजल आलोचनाक घोषणा कऽ डेरा गेलाह। 107. मेनका मल्लिक- अनुवाद केर मल्लिका। 108. अनमोल झा- लघुकथाक मोजर नै। 109. किशोर केशव- रमानंद झा रमणजी हमर "परम मित्र" छथि। 110. डा. राम चैतन्य धीरज- हरेक धीरज केर एक सीमा एक रेखा होइत छै। 111. विद्यानन्द झा- साहित्य शास्त्रीय नहि चाही मुदा शास्त्रीय संगीतमे रुचि। 112. मिथिलेश कुमार झा- अकादमी एक बेर बजेलक तकर बाद बिसरि गेल। 113. जगदीश प्रसाद मंडल- सभहक हिस्साक अनुवाद। 114. कृष्णमोहन झा मोहन- ग्लोबलो गाममे राजनीति छै। 115. बैकुण्ठ झा- गजल बहरमे लीखू मुदा मात्राक्रम किए लीखै छी। 116. महेन्द्र- अही बेर अकादमीक घोषणा किए लटका देल गेलै? 117. धीरेन्द्र प्रेमर्षि- माइक बलपर लेखक। 118. मन्त्रेश्वर झा- आब छोड़ि दिअ। 119. अरविन्द अक्कू- फुटानी चौकपर जीबैत लाश। 120. सुस्मिता पाठक- हमर घरक सभ वस्तु 'अकदमाइन' महकैए। 121. अशोक अविचल- हमरो कार्यकाल अहिना छल। 122. अमरनाथ झा 'भारती'- भोरुकवासँ पहिने अस्त। 123. आनंदमोहन झा (पोथीघर)- व्याख्यानमालाक चसक। 124. राजीवरंजन झा- शौकिया। 125. राजीवरंजन मिश्र- सालमे एक मास दर्शन देब। 126. सुनीता झा (अभिनेत्री, दिल्ली)- गजलनेत्री 127. रेवतीरमण झा- मात्र मधुबनी धरि। 128. अयोध्यानाथ चौधरी- कहू किनकर अनुवाद छूटल। 129. बाबा वैद्यनाथ- हिन्दिएमे लीखब। 130. कुमार राधारमण-अपने वर्ग पहेलीमे फँसल। 131. देवांशु वत्स- कहियो काल चित्रकथा। 132. गंगा झा- टूटल मंचक निर्देशक। 133. दिनेश यादव- नेपालोमे ब्राह्मणवाद छै। 134. किशोर ठाकुर- हमर मिथिला हाट कब्जा कऽ लेलक। 135. बिनीत ठाकुर- कहियो काल उगबै। 136. प्रवीण कुमार झा- फेसबुकपर अमीरीक प्रदर्शन। 137. अशोक झा 'भोली' उर्फ भोली बाबा- खरापो लोक मंच देत तऽ ओकरा नीक कहबै। 138. मुकेश आनंद- ओकील जानि कियो प्रसंशो नहि करैए। 139. रामबाबू सिंह- बस चौपाड़िए भरि। 140. मुरारी कुमार झा- हमर साइकिले हवाइ जहाज अछि। 141. कैलाश कुमार ठाकुर (नेपाल)- नव ध्वजा। 142. कौशल कुमार- झुट्ठेक टेक्नीकल। 143. मणिकांत झा (दिल्ली)- भोज केर संबंध, संबंध केर भोज। 144. इरा मल्लिक- भूतपूर्व लेखिका। 145. विजयदेव झा- "शंकर" रक्षा करथि। 146. सच्चिदानंद सच्चू- कट-पेस्ट बदौलति संपादक। 147. शैलजा झा (बोकारो)- कविता लिखबाक चसक। 148. शम्भू झा (बोकारो)- पत्नी कारण कवि भेलहुँ। 149. मणिकांत झा (दरभंगा)- 'बाथरूम मणि' पोथी लीखब आब। 150. रजनी पल्लवी- घरक गायिका। 151. उज्ज्वल कुमार झा- किसुन संकल्प केर पाछू-पाछू। 152. राम शंकर झा- हमरो कवि मानू। 153. राजकुमार मिश्र (राँची)- पाग टोपटापर कोनो पोस्ट नै लीखब हम। 154. आशीष चमन- जनता लेल 'चमन' आ 'कानन' दूनू शब्दक अर्थ एकै छै। 155. अजय तिरहुतिया (कलकत्ता)- हमरा हिंदी लेखक कहू। 156. शिव कुमार झा 'टिल्लू'- मंच लेल सहमिल्लू। 157. दमन कुमार झा- नै मौलिक तऽ संपादने कऽ लेखक बनि जाइ। 158. कुमार मनीष अरविन्द- मैथिलीमे पुरस्कार हँसोथि लेलाक बाद हिंदी लेखक। 159. नीरज झा (दिल्ली)- स्कूल लेल मैथिली नहि, पुरस्कार लेल मैथिली। 160. गंगानाथ गंगेश- आडंबर प्राइभेट पुरस्कार दियौलक, आडंबरे सरकारियो दियेतै। 161. पूनम झा 'सुधा'- जीवन गरल केर बीचमे हम एक बिंदु सुधा। 162. सुनील पवन- लोक आब हमरा पहिल गजल गायक मानैए। 163. (डॉ) शिव कुमार प्रसाद- हम हिंदी केर लोक छी। 164. गोपाल झा 'अभिषेक'- मुरलियाचक सँ मधुबनी बीचक कवि मात्र। 165. कवि एकांत- ने कवि रहलहुँ ने आन्दोलनी, एकांत रहि गेलहुँ। 166. निवेदिता झा (दिल्ली)- पाइयो लऽ लेलाह मुदा कहलाह जे अगिला साल भेटत। 167. विकास वत्सनाभ- जय नेपाल। 168. संजू दास+रवीन्द्र दास=मिथिला पेंटिंग कि यौन पेंटिंग। 169. देवानंद मिश्र- पंडित भऽ गजल सीखि लेलनि। 170. संजय कर्ण- जनकपुरसँ बारल। 171. बैद्यनाथ झा- अकादमीक परमानेंट अनुवादक। 172. आशीष अनचिन्हार- फसादक जड़ि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.५.प्रीति कुमारी-फौजी उमाकांत कामत : एक व्यक्तित्व प्रीति कुमारी फौजी उमाकांत कामत : एक व्यक्तित्व मिथिलांचल केर एक छोटसन नदी तट पर बसल नौआबाखर (मधुबनी) गाम आलापूर प्रगानामे पड़ैत छैक। ऐ गामक स्मृति शेष बाबू चन कामत आ स्मृति शेष अरहुल देवीक घर १ अप्रैल १९७२ ई० केँ श्री उमा कान्त जीक जन्म भेलनि। ऐ गामक पैघ रकबामे पड़ोसी गाम पछिम सँ धावघाट, पूब भाग मैनही, उतर दिश हटनी आ दछिन सँ सटले - देवनाथपट्टी राजस्व गाम अवस्थित छैक। फुलपरास एन एच सँ १३ किमी. आ घोघरडीहा रेलवे टीशन सँ ५ किमी. दछिनमे ई नामी राजस्व गाम पड़ैत छैक। ई गाम ,गामे नहिं पंचायत मुख्यालय केर दर्जा १९९५ ई० सँ प्राप्त कयने छैक। साबिक जमानामे अही गाममे ऐ इलाका'क मलगुजारी ओसुलैले राज कचहरी चलैत रहैक। एखनो कोशी वेल्टके मीनी ब्लौक पंचायत सरकार भवनमे चलि रहलैक अछि। भूमि सर्वेके अंचल स्तर पर कार्यालय संचालित छैक। जखन भिषण बरखा सँ प्रल्यंकारी वाढ़िक कारणेँ मरना कोसी धार सहित बिहुल बलान धार आ भूतही बलानमे साउन -भादो मास उमरल त्रासदीक सामना करैत लोक घोघरडीहा बजार जाईत छै, तँ जानलेवा सर्पदंश सँ आक्रांतके अन्देशामे रहैछ। एहि दसकोशी केर जनजीवन अस्त-व्यस्त भ' कठिण रहैछ। ताहि दुर्गम भूभाग मेँ सब अपने ले जीवनभरि अपसियांत देखाईछ। एहि वन्सव्त श्री कामत जीके चर्चा करै सँ पूर्व हिनक बालपनके जानब आवश्यक बुझाइए। छह सालक उमेरमे गामक प्राथमिक विद्यालयमे हुनक बड़भाय श्री लालदेव जी नाउं लिखा देलथिन। बाल पोथी आ रानी मदन अमर हिन्दी पोथी पढ़ैत एकटा नव संचार भेलैक। जनता पार्टी केर बिहार सरकार मातृभाषामे' मीरा कमल दिनेश ' मैथिली पोथी नि: शुल्क पहलामे वितरीत कय पढ़ौनी चालू केलक । से मीरा कमल दिनेश केँ ई एक शांसमे पढि जाईथ। धरि बोल सुपूट नहिं कियो बुझि पाबैथ ,ओना ओ कनेकबे तोतराईत सेहो छलाथि। लगधक दसेक वहिक्रममे गामक काउमरेड मनशीजी, रामप्रसाद मंडल आ सुभक लाल ठाकुर ओ मुन्नशी मिश्र,ठको साह ,कैलू मियां ओ माथपर बैटरी लाधने सत्य नारायण कामतके जत्थामे हाऊ- हुसील करैत लालपार्टीक अण्डोलन म गेल रहथि। ऐ जूलूसमे गंजिये पहिरने घोघरडीहा सर्कलमे धरणा देलक। एक बंगाल सँ आयल जटाशंकर मिसिर तोतराईत नारा बुलंद करथि आगू सँ आ सबकेओ पांछा -पांछा ईनक्लाव जिलावाद बजथि -: "सरसती (सरौती) से कोसी बांध तक कच्ची सड़क बनाना होगा!!" फेर आठ सर्किल केर आम जनताके संगोर सँ अपन - अपन छिटा कोदारिक संग हटनी होस्पीटल सँ आनन्द नगर धरि कारसेवा भेल। स्व० गुलाब ठाकुर,अमीन मुक्ति ठाकुर छूटछुटाह कोदरिमे पच्चर लगेबाक काज कय नाम कमेलनि तँ बासुदेव मिस्त्री आ गणेश नेताजी टिनक टीन पानि साईकिल पर उघि जलसेवा दैथि। कतेको गोटे मांटिक चेका काटथि तँ उमाजी सन- सन निहथ लोक चेका उगहि रस्ता-पेरा बनाबथि। जहन श्रमदान सँ बनैत टेढ़ -मेड़ सीमाने डगहर बनल तँ घोघरडीहाके भगिनमान अपना खेतक बीच मेड़ सँ सड़क बनैक अर्चन कयलाह। हुनका हटनी निवासी श्री लखन झा माँटिक बदला माँटि ( एक एकड़ जमीन) दैत दानदाता बनलाह। ८१- फुलपरास विधानसभा क्षेत्र सँ उपचुनावमे जीतल एम एल ए. बिहार'क यशस्वी मुख्यमंत्री जननायक कर्पूरी ठाकुर जी सड़क निर्माण लेल वाढ़ पिड़ित जनताक आशा - आकांक्षा अनुरूप ठाढ़ उतरलाह। भुतपूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत डॉ० जगरनाथ मिश्र ईंट सोलिंग कार्य कयलनि। एखन इयह पथ क्षेत्रीय विधायक श्रीमती हेमलता यादवके अनुशंसा पर पी डब्लू डी रोड लाइफ लाइन बटोही लेल वाहनगम्य बनल अछ। श्री उमाकांत जी ९-१० वर्षक वयसमे माछक शिकार खूब करैत छलाह। लुकरी बाला बंशी, लहको बंशी आ तरेला बाला पथौवा बंशीक अतिरिक्त कुप देलहा पैन खता उपछि सेहो माछ, काँकोर- डोका मारि घर आनथि। पहटा आ अरान सँ सेहो तथा हथौरियामे माछ पकड़बाक कला सीखने रहथि। छह मास झिटकी गाममे मसियौत भाय राजिंदर जी लग सेहो पढाकू आ गैबार बनल रहलाह। पुन: दुखित पड़ला पर जन्मभूमि पर आबि पढ़य लिखयमे रमि गेलाह। मध्य विद्यालय हटनी छठम वर्ग सँ सप्तम कक्षा धरि पढैत धारमे नाह चलौनाई खीख गेलाह। स्व० सुखदेव पंडित जी लग भोर- सांझ टिशन सेहो पढैत हुनकर विकलांग बाबूजी सँ सबैया,डौढ़ा - अढ़ैया आ हुठ्ठा खांत हिसाब मनोयोग पूर्वक सिखथि। सरौती उच्च विद्यालयमे जहन अष्टम् वर्गक छात्र रहथि तँ परसा निवासी श्री काशी कान्त भंडारी जीक जेठ पुत्री सावित्री सँ सन् १९८६ ई० म बालविवाह भेलनि। द्वीतिय श्रेणी सँ मैट्रिक पास कय अन्तर स्नातक (विज्ञान) उत्तीर्ण कयलाह। निर्मली महाविद्यालयमे स्नातक टीडीसी फस्ट ईयरमे पढिते रहथि तँ १९९३ मे सीमा सुरक्षा बलमे नियुक्ति भेटलनि। खुशी पूर्वक अपन जीवनभरिक उपार्जि कैँचा अनुज भाय महाकान्त जीकेँ पढाय लेल उत्सर्ग कयलनि। बच्चो सभकेँ पढायमे नगदी टाका मासे मास समर्पित कयलाह। मुदा भाय तँ नोकरीमे जाय सँ पहिले भैयारी भिन्न भऽ गेलनि। धरि अपन जेष्ट पुत्र प्रकाश जी दारोगा बनि गेलनि। अपन छोटे पुत्र विकासजी आ पुत्री सुखिति कुमारी केँ पढायमे खुब पाई लगेलथि। नोकड़ीमे २० शाल पुरतहि अपने भी. आर. एस. लैत गाम बसि गेलाह आ जेस्ट बालकके वियाह सिपौलमे आदर्श रूपेँ करोना कालमे करेलाह। एकटा मैजिक चरिचकिया लौंन सँ लेलाह आ गामक पुल पर रात्रि - दिवा सेवार्थ व्यवहारिक सुविधा दैत देखेलाह। कियो रोगीक संग बिनु पाईके गाम सँ बाहर इलाज कराबय हिनक गाड़ी किरायामे ल' जाए सकैत छला। जहन घर छोड़ि शीतलहरीमे गाड़ी मरजेंसी खातीर चलाबथि तँ बहुत एहन सक्षम लोक छथि जे हिनका टाका देबे नै करैन। वाध्य भऽ कऽ ऐ वेपार सँ मुक्ति लेलनि। पुन: कारोबार करयके उद्देश्य सँ मालवाहक चारिचकिया गाड़ी ऋण लैत बेसाहला । मोदीखाना चीज बौस्त स्टौर कयलाह। मुदा उधारी सौदा लगला पर ततेक ने चिंतामे पड़लाह जे राजस्थानमे रुग्णावस्थामे समुचित उपचार करय पड़लैन। परहेज राखैत ओना आब सेहत सामान्य रहैत छन्हि। समाजमे असैर पर वेश सहयोगी बनैत बहुतो लोकक हृदयमे जगह बनाबै बाला उपकारी, जागरूक नागरिक छथि। देखल जाईछ एक व्यक्ति अपन जीवनके सम्पूर्ण कमाईके ५०% राशि धर्म-कर्ममे लुटाबैत अपने स्वंयके माली हालतमे दयनीय स्थिति मेँ पेराईत रहैछ। से उमाकांत जी वैज्ञानिक जागरण आ राजनीतिक जागृतिक मूलभूत सिद्धांत अनुसारे सबकेओ केँ जागरूक करैत रहैत छथि। अंध विश्वास आ ढकोसला सँ फराक रहि लोकमे जन चेतना आबय खातीर स्फूर्त वैचारिकी बढाबैत सबकेँ सतर्क करैत देखाईछ। ऐ तरहक सर्वोदयी विचारधारा आ सोच सँ सतत् पछुआयल सुविधा वंचित समाज , जिनगीमे प्रगति कय सकैत अछि। सादा जीवन आ उच्च विमर्श सँ लोक आगू बढ़त से विशवास जगैत छन्हि श्री कामत जीकेँ। ओ अपने जीवनमे एक टुक सुपारी वा कोनू तरहक निशाँ नहिं खाईत - पियैत सबसँ अपील करैत छथि " देखाबटी आ पैछिमी सभ्यता केर होर सँ बचू।"

-प्रीति कुमारी,बी.ए. ऑनर्स (बी.एड०) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.६.आशीष अनचिन्हार- किछु लीखि देलासँ, किछुओ लीखि देलासँ गजल नहि होइत छै आशीष अनचिन्हार (मैथिली गजल विशेषज्ञ, मैथिली वेब पत्रकारिता विशेषज्ञ, ब्लॉगर, शोधकर्ता, आलोचक, संपादक। संपर्क- 8134849022) किछु लीखि देलासँ, किछुओ लीखि देलासँ गजल नहि होइत छै मैथिली साहित्य केर मुख्यधारामे लेखन करबाक अपन एक निश्चित फर्मा छै आ ई फर्मा लेखनक नियमसँ अलग छै। उक्त मुख्यधारामे जे पाइ बला छथि, जिनकर सारक साढ़ूक सरबेटी कलक्टर छथिन, जे प्रभावशाली लोक लग उठक-बैठक करै छथि, जे साहित्यिक नियमसँ अलग भऽ हँमे हँ मिलाबै छथि से सभ लेखक छथि। मुख्यधाराक एहने एक लेखक छथि कमलेश प्रेमेन्द्र। हिनक बहुत रास विधाक बहुत रास पोथी प्रकाशित भेल छनि जाहिमेसँ दू पोथीपर स्पष्टतः गजल विधाक संबंध छै। ई दू पोथीक नाम छै- 1. समय बदललै से ठीके की (गजल-संग्रह) 2. नहि छोड़ी अपन अधिकार (बाल गजल- संग्रह) जँ एहि दू पोथीक बात करी तऽ हम जतेक धरि बूझि सकलहुँ अछि ई दूनू पोथीक रचना गजल विधाक नहि अछि। एहि दूनू पोथीक रचना कविता ओ गीत जे कहि सकी से अछि, गजल तऽ किन्नहुँ नहि अछि। कोनो रचनाकेँ गजल हेबाक लेल जे बहर-काफियाक जे अनिवार्यता छै से एहि पोथीक रचनामे नहिए टा अछि। बहरक बात छोड़ू, काफियो केर अकाल छै। मुदा बात तऽ वएह छै जे मुख्यधाराक साहित्य लेल साहित्य केर नियम नहि, भौतिक जगत केर नियम चलैत छै ताहिमे जँ हिनकर उपरोक्त दूनू पोथीकेँ जँ पुरस्कार भेटियो सकैए, कोनो भारी बात नहि। सरकारी अकामदीसँ लऽ कऽ प्राइभेट संस्थाक मुखिया सभ साहित्यिक तौरपर नहि भौतिके नियमपर चलैत छथि। मैथिलीमे एकै लेखक अनेक विधामे रचना करै छथि तकर उद्येश्य एकै रहै छै जे नै एहिमे तँ ओहिमे पुरस्कार भेटि जाए। मैथिलीमे बाल साहित्य आ अनुवाद एहि पुरस्कारी विधाक लिस्टमेसँ सभसँ ऊपर अछि। कमलेशजीक जे कथित बाल गजल संग्रह आएल अछि जे वस्तुतः गीत वा कविता अछि से अही पुरस्कारक लोभसँ आएल अछि। हम पहिनेहो कहने छी, बेर-बेर कहैत छी जे व्यक्तिगत तौरपर हमरा कोनो आजाद कि बरबाद रचनासँ दिक्कत नै अछि। एकटा पाठक तौरपर हम ओकरो सभकेँ पढ़ैत छी। हमरा दिक्कत तखन होइए जखन कि कोनो विधाक नामपर भ्रम पसारल जाइत छै। अपन कमजोरीकेँ नुकेबाक लेल विधाक नियम संगे मजाक कएल जाइत छै। उपरमे दूनू पोथी केर नाम हम गनेलहुँ से ताहिमे अपन कमजोरी नुकेबाक लेल भ्रम पसारल गेल छै्। आब पचास-सए रचना छै तँ कोने ने कोनो रचना कथ्य हिसाबें नीक हेबे करतै, किछु पाँति नीक लगबे करतै मुदा तकर नाम गजले टा किएक? कविता राखि लिअ नाम जखन नियम केर पालन करिते नै छी तखन ओ गजल कोना? नमहर-नमहर भूमिका लिखल जाइए मुदा जँ एकौ पाँति ओहिमे अपन कमजोरीक बारेमे लीखि देल जाए तँ एहन थोड़े छै जे कोनो पाठक कि कोनो आलोचक लेखककेँ फाँसी लगा देतै। मुदा जँ ई सभ अहिना भ्रम पसारैत रहता तँ कोनो ने कोनो आलोचक हिनका सभकेँ नपैत रहत, आ अहिना बेकार कहैत रहत। लेखक अपन कमजोरीकेँ सार्वजनिक करैत रचना लीखथि ई बेसी इमानदार ओ साहसी काज हेतै। एहि लेखक केर अनेक पोथी छनि आ उम्मेद करैत छी जे आन विधाक विद्वान सभ एकर समीक्षा करताह, हम मात्र गजल विधासँ संबंध छी तँइ हम ई दू पाँति लिखबाक लेल बाध्य भेलहुँ। अंतमे एकटा आर बात एखने कमलेशजीक 18 पोथी एकै संगे लोकार्पण भेलनि आ ताहि लेल किछु लोक व्यंग्य करैत पोस्ट सभ लिखलाह हम एहि व्यंग्यक विरोध करैत छी। 18 कि 180पोथीक लोकार्पण हेबाक चाही। आ जँ ओहि पोथी सभमे कमजोरी छै तकरा अलगसँ रेखांकित करबाक चाही। वर्तमानमे हिनक जे पोथीक संख्या छनि से बढ़नि मुदा ओहि सभमेसँ ई दू पोथी गजलक नहि छनि से हम दर्ज कऽ रहल छी। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.७.लाल देव कामत- श्री मिथिला : एक पोथी समीक्षा लाल देव कामत

श्री मिथिला : एक पोथी समीक्षा

कविवर श्री राज किशोर मिश्रके नव मैथिली पोथी 'श्री मिथिला ' संक्षिप्त इतिहास काव्य थीक। श्री मिथिलामे कविताक पाँति एवं लयक क्रम गेयताभावक विपुलता, कल्पना सूक्ष्मता, माधुर्य रस , भाषा आ अभिव्यंजनाक सौन्दर्य अछि। श्री मिश्र जीके मैथिली भाषा मेँ २१ गोट पोथी पहिले सँ प्रकाशित छन्हि। राज किशोर जी हिन्दीमे सेहो एगारहटा पुस्तक लिख चुकल छथि। जाहिमे सँ खण्ड काव्य -ऊर्जा वर्णन एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स तथा वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स एवं हिन्दी'क प्रथम काव्य ऊर्जा बावत घोषित कयल गेल रहनि। संगहि सन् २०२० मे प्रदूषण खंड काव्य केँ इण्डिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स हिंदीक पहिल काव्य पोल्यूशन बावत घोषित कयल गेल रहनि। हिनक रचनात्मक कार्य बेसीतर कविता विधामे भेल छन्हि। सद्यप्रकाशित श्री मिथिला म कविवर मिश्रजी खूब मेहनत कयने छथि। एहि पोथिक सर्वाधिक महत्वपूर्ण वैशिष्ट्य संक्षिप्त इतिहासिक परिपेक्ष्य लए अछि। पोथीक चर्चा सँ पूर्व हिनक पूर्ण परिचय जानबाक परियास करैत छी। मधुबनी जिलाक अरेड़ डीह गाममे टीचर्स ट्रेनिंग कालेजके प्राध्यापक श्री शशिभूषण मिश्र आ धर्मपरायण श्रीमती जीवेश्वरी देवीक घर २७ जनवरी १९६० ई० केँ एक होनहार बालकके जन्म भेल रहनि,जिनक नाम राजकिशोर पड़लनि। राज किशोर मिश्र जीक प्रारम्भिक शिक्षा अपने गामक सरकारी मिडिल स्कूलमे सातमाधरि भेल रहनि। ओ गामेक सरकारी हाईस्कूलमे अष्टम वर्खमे नामांकित भेलाह,आ वार्षिक परीक्षामे फस्ट डिविजन सँ पास केलाह। ७० केर दशकमे ऐ सफलता पर अपार हर्ष चहुँदिश सहपाठीमे पसरलैक,मुदा श्रीमिश्र जीक जेठभायजी कौशल किशोर मिश्र कहलकैन " अपना स्कूलमे प्रथम तँ बहुतो विद्यार्थी सब साल करैते रहल अछि,जौं बिहार वार्ड परीक्षामे प्रथम आबि तहन ने बड़का बात हैत।" ई बात मोनमे बैस गेलनि राज किशोर जीकेँ आ सोचय लगलाह एखनधरि तँ नेतरहाट सन -सन स्कूलक मेधावी विद्यार्थिगण केँ वन टू टेनमे स्थान भेटैत रहलैक हेन। जौँ हमहूँ खूब परिश्रम करब तँ लक्ष्यधरि पहुँच सकैत छी। ओहि समय बिहार आ झारखंड संयुक्त राज्य छल। मनोयोग पूर्वक पढ़य लेल बाबूजीक कठोर अनुशासन आ ममतामयी मायके ताकुत, शिर पर हाथ धयल छलनि। सन् १९७६ केर मैट्रिक बोर्ड परीक्षाक रिजल्ट घोषित भेलैक तँ १० म् स्थान पर हिनक नाम देख सबकेओ प्रशन्न होइत गेलाह। श्री मिश्र जीकेँ अपनों मेहनत पर संतुष्टि आ गर्व भेल रहनि। हुनक बाबा स्व० कलाधर मिश्र मूलतः कृषक आ पहलवान छलाह, ओ जिलाके पैग क्षेत्र बुझैत सगतर लोक सभकेँ कहथिन " हमर पौत्र जिला फर्स्ट केलक हय!" हुनक बाबूजी प्रखंड शिक्षा प्रसार पदाधिकारी रहथिन,अपन चारू पुत्रकेँ अनुशासन पूर्वक पढ़ेबाक लेल आतुर रहैत छलथिन। ओहि सालके बोर्डमे सर्वोच्च अंक पौनिहार छात्र सब पटना साइंस कालेजमे पढथि। हुनक बाबूजी सेहो ओतयहि हिनक नामांकन करा देने रहथिन। मुदा गाम सँ बाहर कतौह नहिं गेल रहथि कहियो से अनभुआर लागनि। दुर्गा पूजा छुट्टीमे जहन गाम अयलाह तँ दरभंगेमे पढबाक अपन मंशा परिवारमे उजागर करितहिं बबाबूजी बुझबैत तर्क देलथिन " ककरो ओहिठाम एडमिशन नहिं होय छैक, आ तों एहन विचार रखैत छह!" पिताजी केँ तमसाइत देखि मोन मारिकेँ पटना होस्टलमे रहि अन्तर स्नातक (विज्ञान) विषय मनोयोग पूर्वक पढ़य लगलाह। प्रथमे वर्षमे आई आई टी प्रतियोगिता प्रवेश परीक्षा पास कयलाह। प्रशन्नता पूर्वक बाबूजी बाहर रहैक खर्च दैत रहलनि। बाबूजीक कठोर अनुशासन वरदान साबित भेलनि। हुनक आई आई टी .- बी एच यू . वाराणसीमे आह्लादित भऽ अभिभावक नाऊ लिखा देलकनि। जेठ भायके सेहो एडमिशन मोतीलाल इंजिनियरींग कालेज इलाहाबादमे भेलनि। तेसर भाय आनन्द किशोर मिश्र बी आई टी . सिन्द्री सँ इंजिनियरिंग केर पढाए केलाह। छोट भाय डॉ० पवन किशोर मिश्र डीएमसीएच. सँ मेडिकलके पढ़ायमे लागलनि। माय- बाबू चारु बालकके व्यवस्थित पढ़ाय सँ अति आनन्दित रहथि। ताहि समय गामक मेधावी छात्रकेँ ग्रामीण गौरव बूझथि,नीक वातावरण सामाजिक परिवेशमे रहैक। श्री मिश्र जीक मातृक कोंकण , पुपरी(सितामढी) आ सासुर मनपौर (बेनीपट्टी) छैन्ह।आदरणीय श्री रविन्द्र नारायण मिश्र जी हुनक काका छथिन,जे वरेण्य साहित्यकार आ प्रख्यात उपन्यासकार छथि । हुनका सं सदैत विज्ञान विषय केर त्रुटि सुधारमे मदैत भेटैत रहनि। मार्गदर्शनक प्रयोजन भेलापर गलति सुधारि दैत रहलन्हि। बी. टेक. कयलावाद यूपीएससी. द्वारा आयोजित भारतीय इंजीनियरिंग सेवा १९८२ के प्रतियोगिता परीक्षामे उत्तीर्ण भऽ दूर संचार विभागमे सहायक कार्यपालक अभियंता (विद्युत) क्लास १ पद पर योगदान देलनि। विभागीय पत्रिकामे राजकिशोर जी मैथिली मातृभाषामे अपन कविता छपौलनि। छात्र जीवने सँ लेखनके प्रति अभिरुचि रखने रहथि। से सेवा निवृत्त भेलासन्ता बहुत रास मैथिली कविता'क पोथी प्रकाशित करौलनि। यथा -: टेमी,जँ जग जल नहिं होईत,सभ्यताक भ्रम, अष्टदल, मंथन , उगरास ,नै रहतै आब गाम , प्रलय पाश ,कनक कदली, ऊर्जस्विता, आचार्य चाणक्य पर हम पाठकीय प्रतिक्रिया द' चुकल छी,जे विभिन्न पत्र-पत्रिकामे समय- समय पर प्रमुखता'क सँग छपल रहय। हिनक कविता संग्रह मेघ पुष्प,चाननि, नव पात - नव बात, उपायन, सप्तपर्ण,नव घर उठय - पुरान घर खसय, जिनगीक सोन सन पाँखि, उबेर, ई संसार ओ सप्त रश्मि प्रकाशित कृति छन्हि। श्री मिथिला इतिहासिक संक्षिप्त काव्य नवारम्भ प्रकाशन सँ २०२५ मे छपलनि, जाहिक दाम ३०० टाका छैक। ओहि पोथीमे १३६ पृष्ठ छै,जे समर्पण अपन स्व० पिताजी केँ केने छथि। ऐ मैथिली पोथी'क आई एस बीएन ९७८-९३-४९८६७-०३-१ अछि। ऐ पोथीके सुन्दर सन् प्रिन्ट - आर के आफसेट प्रोसेस नवीन शाहदरा, दिल्ली सँ भेल अछि। एहि पोथिमे मिथिलाक विविध आयामकेँ संक्षिप्त, समेकित ओ समग्रता सँ पद्य विधामे प्रस्तुत करैत रचनाकार श्री मिश्रजी भुमिकामे सम्माननीय पाठक लोकनिकेँ चाउ सँ पढ़बाक आश रखने छथि। पौराणिक परिवेशमे कथावृत्तक अवंतारण भेलहुँ जाहि रसबत्ता ओ स्वाभाविकताक संग भारत भूमिक मानचित्रक मध्य वर्णन घटनाक्रमके भेल अछि से खूब नीक छैक। कविजी प्राचीन काल केर नऊ अध्यायमे वृतांत देने छथि,यथा- विदेह, गार्गी - याज्ञवल्क्य सम्वाद, मैत्रेई - याज्ञवल्क्य सम्वाद, अष्टावक्र, अष्टावक्र जनक -सम्वाद, वैदेही, दर्शन समाज संस्कृति ओ अर्थतंत्र, वज्जिमहाजनपद मौर्य वंश गुप्तकाल, पाल वंश, गुर्जर -प्रतिहार चन्देल, आओर मंडन शंकराचार्य -शास्त्रार्थ । प्राचीन काल जे ३०००ई.पू. सँ ६०० ई- पू० धरि विदेह राजक कार्यकाल रहल होयत। ओहू समयमे पर्यावरण सँ आच्छादित गाछ जीवनदायिनी रहय। पाँ दैत कवि कहैत छथि-: बाँस , लवंग, पीपर - पाकड़ि , कदम , अशोक , नीम, बेल, साल, केदली- बदरी, गमकैत महुआ, सघन बोन छल अति विकराल। मिथिला ताहू समयमे अध्यात्मवादके राजधानी छल ,जनक कूलमे सीरध्वज ब्रह्मज्ञानी रहथि। चेतना सँ भरल लोक सब सबहक हितैषिये रहथि - तपश्चर्यामे लीन मुनिगन राजा ब्रह्मज्ञानी शास्त्र पुराणक ज्ञान रखैत छल मिथिला केँ हर प्राणी। इक्ष्वाकु वंशक निमिक पुत्र मिथि राज्य स्थापित कयने छलाह। आर्यावर्त देशमे मिथिला लालित्य सँ भरल - पड़ल सभ्यता ओ संस्कृति से पूर्ण रहय। धन - धान्य सँ भरल मिथिला'क महिमा मण्डन पर पाठककेँ नीक जनतब पौराणिक कालमे होइछ :- विदेह भेल निमि काननम् यज्ञक्षेत्र , नित्य मंगला, वैजयंती, विकल्पषा , स्वर्ण लागल,से मिथिला । मध्य काल केँ सात अध्यायमे बाँटने छथि,यथा -: कणार्ट -वंश, ओइनवार -वंश, विद्यापति, लोकगाथा, खण्डवला - वंश, मध्यकालमे लोकजीवन, आ मैथिली भाषाक मध्य - कालधरिक संक्षिप्त इतिहास। आधुनिक कालके चर्चा धरि ऐ पोथीमे करय सँ अपनाकेँ नहिं रोकि सकलाह। पोथी पठनीय छन्हि,काव्य बढ़ सौष्ठव भेल छैक। एक पाँति देखू -: पँच हैन्दव हर्ष वन्धन अधिन मिथिला सेहो लेलनि ओ छीन। एकटा दोसर पाँति द्रष्टव्य -: एहिना चलैत रहलै किछु दिन, तँ अयला बंगाल गोपाल, पाल वंशकेँ संस्थापक सँ शासनक बदलि गेल सुर-ताल। गोपाल'क वाद हुनक पुत्र धर्मपाल विशाल साम्राज्य बनेबामे सक्षम भेला। ओ कन्नौज,भोज, कुरु , मत्स्य धरि जीत लेने रहथि। पालवंशक लगधक साढ़े तीन सय वरखक शासनमे विग्रहपाल खूब प्रखर व्यक्तित्व भेलाह। आगू बढ़ि कविजी पाँति गढ़लनि -: तत्पश्चात आयल चन्देल, अत्यल्प अवधि वाद चलि गेल। बुकानन हेमिल्टन अपन पूर्णियाँ वृतांत (१८०८- १८१० ई०) मे लिखने छथि " ८ म् सँ ११ हम् शताब्दी धरि पालवंशक पाशवंशी राजा प्रवल शक्तिक रूपमे उभरल छलाह। दरशन १० म् शताब्दीमे बंगालके महिपाल (द्वितीय) नामक पालवंशी राजा सँ लोहा लेनहार मिथिला केवट परिवारके सपूत ऐतिहासिक जननायक भीम कैवर्त छलाह। १०५१ ई० मे भीमा केवटके नि:संतान काका सामंत दिव्योक स्थानीय केवट ,धानुक ,पौण्डरीक, राजवंशी, कोच नागर आ दूसाध जातीक लड़ाकू सेना रखने रहथि आ पुण्ड्रीक भु औरक्ति प्रदेश केर सामीप्य राजा सबकेँ समर्थन लैत पालवंशक शासक पर चढ़ाए कय महिपाल केँ पराजित करैत खतम कय देलकै। " आक्रोशित जनता राज मुकुट दैत शान्तिप्रद रहय लागल। भीम कैवर्त तामके भुरही पाई- छेदाम चलौलनि। ओ देवघर वैद्यनाथ धाम मंडिलके जिर्णोद्धार कयल। जेठ भाय द्वारा जहल देल गेल सूरपाल आ रामपाल केँ बंदी मुक्त कयल जे दक्षिण गंगाकात दिश चलि गेल। सन् १०७७ मे पुनः भीम कैवर्त पर ओयह दूनू भाय द्वारा चढ़ाई आ संघर्षमे मारल गेला। विराट राजाके सीमा लगीच भोरियारीगढ़़ ,अररीया जिलाक गाम- म कैवर्त दिव्योक राजाके जन्मभूमि रहनि। एतेक पैघ घटनाक्रम लेल कविजी दू पांति सिरैज नै सकला आ आगू बढ़ि मिथिला लेल उपेक्षित अध्याय राखि देलनि। अतिशय असुरक्षित रहल ई काल खंड, भयाक्रांत जन-गण भोगथि अराज दण्ड। आर्ष काव्य रामायणमे १२ वरखक लेल रामकेँ वनवास आ अस्ति काव्य महाभारतमे १२ वर्षक वनबास व एक शालके अज्ञात वास पाण्डवकेँ देल गेलक चर्चा छैक। तहिना विद्यापतिक मित्र आ मिथिलाक राजा अज्ञात वास पर राताराति बनौली (सप्तरी)नेपाल पराए गेला। हुनक गजरथपुर केँ यवन विदेशी सेना तहस-नहस कय देलकनि। राजा शिव सिंहके अलोपित भेलाक १२ साल वाद प्रेत घोषित कयल गेलैन। रानी लखिमा हुनक वियोगमे रहय लगलीह। पटनाक सूबेदार बैजलदेव एक प्रस्ताव दिल्ली पठाय रानी लखिमा केँ राजपाट चलेबाक माँग राखलक। रानी नेपाल सँ अपन दिवोर पद्म सिंह आ आप्त सचिव विद्यापति जीके माध्यम सँ राज करैत गुजैर गेलीह। हुनक देवरक दूई साल राज्य शासन चलेलाक वाद निधन भेलापर हुनक पत्नी रानी विश्वास देवी कतेको शालधरि राज्य केलीह। से बात पाँतिमे विस्तार नै पौलक। कविजी अपन रचनामे विद्यापति जीक मैथिली,अवहट, संस्कृत आ प्राकृत भाषा मेँ प्रकाशित पोथीके चर्च अवश्य कयलनि अछि। मिथिलाकेँ हर घर - आंगनमे, विद्यापतिक गीत, नचारी हुनकहि रचित मनोहर सोहर, शुभ अवसर पर गाबय नारी। मध्यकाल १३ म् अध्याय 'लोकगाथा ' पृष्ठ सं० ९८-१०५ बढ़ मनलगू बुझायत। ई मिथिलांचल केर लोक देवता १०८ आ लवहर- कुशहर लोक गाथा रामायण सँ जुड़ल य। मैथिली भाषा असलमे पिछड़ल ,दलित तबकाके कंठक वाणी रहय आ एखनो धरि अछि। ओ लोकनि अपन लोक देवताक अभ्यर्थना गेयरूपेँ कयने छथि। लव-कुश मात्रे एकटा लोकगाथा वनवासीक बीच खूब लोकप्रिय भेलैक। मूलनिवासी अपन नायक आ देवताक गहवर गोहारि,भाव - भगैत , महराय आ गाथा गबैत आबि रहल अछि। तहिना अभिजात वर्गमे लव-कुश गाथा सराहल गेल छैक। से चलैन भारत - नेपाल देशके मैथिली भाषा - भाषी बीच पिढि दर पिढि गौरवपूर्ण स्मिताके संरक्षण करैत संतुष्टि म छैक। गाथा - गायक प्रारंभमे गबैत छथि ' सुमिरन, बन्हन', तत्पश्चात,शुरूह होइत अछि कथाक मनन - विवेचन। महेश ठाकुर जीक पाठशालमे आन शिष्यक संगहि रघुनंदन सेहो पढैत बढ मेधावी भेल। ओकरा गुरूजी बढ़ मानैत रहथिन। से आवेशमे पत्ति सँ बजलखिन " एतेक जे सिनेह दैत छियै रघुननमाकेँ से की ई अपन पहिल कमाय अहींके देते!" ऐ बातक गीरह चटिया रघुके मोनमे गहिंरपन सँ जमल रहल। जँ समय एलैक तँ मुग़ल दरवारमे विद्वता पर दरभंगा राज देल गेलैक।ओ अपन गुरूवाईन केर समक्ष परबाना कागत सुमझाबैत गुरूवर महेश ठाकुर जीकेँ अपन पहिल अरजल सम्पदा समर्पित कयल। जहन कि श्री ठाकुर जीकेँ झीझक होईन आ गुरूमाता तँ ऐ महात्यागीके मुंह दिश तकैत चकित रहि गेलीह। दान केर धरती पर सन् १५२६ सँ १९४७ ई० धरि हुनक पुत्र गोपाल ठाकुर, तकर उतराधिकारी पुत्र टोडरमल ऐ वंशक महिनाथ ठाकुर आ तकर पुत्र लोचन आ तकरावाद माधव सिंह १७५७ मे अंग्रेजी हुकूमतमे मिथिला राज्य भ' गेल दरिभंगा राज जमिन्दार १८७८ सँ रामेश्वर सिंहके वाद हुनक पुत्र लक्ष्मीश्वर सिंह आ तकर वाद हुनक पौत्र कामेश्वर सिंह बहादुर महराजाधिराज राज चलेला। कवि जीक पांति-: नहिं राजा , नहिं रहल सामंत , आब राजतंत्रक भेल अन्त । आधुनिक काल सन् १९४७ में सुराज उपरांत सँ अद्यतन मानल जाईछ। प्रो० रविन्द्र कुमार चौधरी ९०० लगधक मैथिली रचनाकाके डायरेक्टरी गत वर्ष प्रकाशित करौलाह अछि,जाहिमे ५०% गैर सवर्ण लेखक छथि। ओ अपन अहर्निश सेवा सँ मैथिली लेल अभिमानी कोनू ने कोनू रुपमे बनल छथि। मैथिली आरंभ कालमे अभिजात वर्गक बोली -वाणी नहिं रहैक। ओ सभ संस्कृत, प्राकृत आ अवहट केँ मान्य केने रहथि। आई मैथिली सँ सुविधा वंचित समाज पछुआ रहल छैक। एखनो ठेंठी मैथिली रूपेँ ऐ भाषाकेँ जीयाके रखने अछि। मैथिली साहित्य - सृजनमे ओना लागल कतेको साहित्यकार , अपना भरि सभ भरि रहल छथि अपन मातृभाषक भँडार । 'श्री मिथिला' पोथी मैथिली भाषा मेँ अद्भुत साहित्य सृजन कयलनि श्री राज किशोर मिश्र जी ,ताहिक टटका प्रकाशित पोथी पढबाक सौभाग्य भेटल हेन। पाठक लोकनिकेँ सुझाव य, ऐ पोथीकेँ मनोयोग पूर्वक पढ़ि स्वयं कृर्तार्थ होय।

- लाल देव कामत , नौआबाखर (मधुबनी) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। पद्य ३.१.बद्रीनाथ राय 'अमात्य'- कुटील कसाइ ३.२.जगदानन्द झा मनु - बीसटा हाइकू ३.३.रबीन्द्र नारायण मिश्र-अन्वेषण ३.४.प्रणव कुमार झा- किछु जोगिरा ३.१.बद्रीनाथ राय 'अमात्य'- कुटील कसाइ बद्रीनाथ राय 'अमात्य' कुटील कसाइ

सोलकन बाबू यौ! लड़ियौ अपने अधिकारक लड़ाइ। फुसिञाहिके दन्तकथा गढ़ि,ठकलक कुटिल कसाइ।। सोलकन बाबू यौ!लड़ियौ अतने अधिकारक लड़ाइ।

दंतकथाके दाँतके तोड़ू ,तखने हाएत भलाइ। सोलकन बाबूयौ!लड़ियौ अपने अधिकारक लड़ाइ।

संविधान सत्य जीवनके रगड़ू दियासलाइ। सोलकन बाबू यौ!लड़ियौ अपने अधिकारक लड़ाइ।

दूष्ट देवता दंतकथा गढ़ि, सबटा खेलक मलाइ। सोलकन बाबू यौ!लड़ियौ अपने अधिकारक लड़ाइ।

लड़लेपर अधिकार भेटत आब,नञि देत कुटील कसाइ। सोलकन बाबू यौ!लड़ियौ अपने अधिकारक लड़ाइ।

पाखण्डक पछुआरपर मारु सबदिन केलक कुटाइ। सोलकन बाबू यौ!लड़ियौ अपने अधिकारक लड़ाइ। -बद्रीनाथ राय 'अमात्य', ग्राम पोस्ट करमौली, भाया कलुआही, जिला मधुबनी बिहार, 6205190859 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.२.जगदानन्द झा मनु - बीसटा हाइकू जगदानन्द झा ‘मनु’ बीसटा हाइकू १ मेनाक बच्चा भूखे मरणासन्न माय जालमे २ गोल मटोल कारी उज्जर भुल्ल कुकुर बच्चा ३ नांगैर उठा सरपट दौड़ैत अबोध बाछी ४ गरीब संगे ठिठुरैत सुरुज पूसक भोरे ५ वर्षाक बूँद पुरनि पात पर मोती लगैत ६ विरही बेंग टर टर करैत वर्षाक राति ७ धानक खेत कादो सनल पैर कोरामे नेना ८ जेठक मास बाँस खीचैत बाप खाली पएरे ९ जोतल खेत परता रहि गेल बिन वर्षाकेँ १० घूरक गप्प बूढ़क रूसनाइ बुढ़िया फुसि ११ नोर खसल धरती गलि गेल के बूझलक १२ जमा केने छी बाबूजीक यादक मधुर क्षण १३ कतय गेल ढेकी समाठ संगे भोरका तान १४ खेतक बीच नव-नव आइर बँटैत मोन १५ आम जामुन कटा रहल अछि नव विनाशे १६ समांग दूर आकाश भेल लऽग महानगरमे १७ भीड़मे चुप्पी मोबाइल टीपैत आबक पीढ़ी १८ एलै बसंत मोनक सभ रंग हर्षित भेलै १९ मोनमे लाबा आगम बसंतक पिया मिलन २० पिया विदेश बौरायल बसात मोन अधीर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.३.रबीन्द्र नारायण मिश्र-अन्वेषण रबीन्द्र नारायण मिश्र अन्वेषण हे भगवान हमरा ओतए लए चलू जतए केओ भूखल नहि होअए नहि होइक केओ अर्धनग्न जतए केओ रातिमे सड़कपर अहुरिआ नहि काटए जतए कोनो बालककेँ श्रम करबाक मजबूरी नहि होइक जतए कोनो महिलाकेँ प्रताड़ित नहि कएल जाइक जतए धर्म, भाषा, जाति आओर पंथक नाम पर भेदभाव नहि होइक जतए ककरो भय आपसी शत्रुता, द्वेष,प्रतिशोध,नहि होइक हे भगवान! हमरा ओतए लए चलू जतए सभ मुड़ी उठा सकए जीबि सकए सम्मानपूर्ण जीवन भेटि सकैक सभकेँ अपन वाजिब हक जतए न्याय सर्वोपरि होइक आओर स्वतः सुलभ होइक जतए सभ रहथि मित्रवत जतए गरीब आ धनीक होथि सहभागी दुख-सुखमे हे भगवान! हम अनंतमे समाहित भए चलि जाइ दूर,बहुत दूर ताहिसँ पहिने कमसँ कम एक बेर हमरा ओतए लए चलू जतए दुनिआ बुझाइक एकहि सुखी परिवार जतए सभ केओ होथि पूर्ण संतुष्ट जाहिसँ हम एहन दुर्लभ क्षणक आनंद उठा सकी खुसीसँ नाची,गाबी आओर कहि सकी हे प्रभो! अहाँ सचमुच महान छी! -रबीन्द्र नारायण मिश्र [19.2.2022] ; mishrarn@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.४.प्रणव कुमार झा- किछु जोगिरा प्रणव कुमार झा किछु जोगिरा सोशल मीडिया कुरुक्षेत्र भेल, कीबोर्ड बनल तलवार, सच आ झूठ के फर्क करब आब भऽ गेल अछि दुश्वार। ट्रेंडिंग में अछि देशभक्ति मुदा धरातल पर विभाजन देश कोन मार्ग पर अछि बढ़ल कहु आंहू किछु राजन। जोगिरा सा रा रा रा रा… ! जाति-धर्म केर आगि लगाबै, कीबोर्ड केर वीर, टोला-गाँव भाईचारा टूटै हालत बड्ड गंभीर। रोजी-रोटी छोड़ि बहस में, दिन भर होय हलाल भागैत भूतक लंगोटक पाछा अछि समाज बेहाल! जोगिरा सा रा रा रा रा… ! युवा कहै “रोजगार नै”, मुदा मेहनत से राखय दूरी, समय बितै रील मे तखन शिकायत कोन मजबूरी? कौशल सीखब छोड़ि कऽ सब, खोजै बस आराम सूतल सूतल पाई बटोरी, एहने ताकय काम। जोगिरा सा रा रा रा रा… ! महँगाई दिन दूना बढ़ै, तनखा भेल अधमरु रासन लैत फोन से पूछय कनिया कहू की करू? पेट्रोल पंप पर मुस्की दैत अछि नेताजी के फोटो टैक्सी बेच के चला रहल अछि गोपालजी आब टोटो। जोगिरा सा रा रा रा रा… ! वैज्ञानिक अछि जेल मे बंद बाहर घुमय रेपिस्ट उधार लऽ कऽ चुकाबय भोलबा आई फोन केर किस्त । जोगिरा सा रा रा रा रा… ! चुनाव से पहिले पोस्टर भरल “हम मिथिलाक संतान!” टिकट बँटल तऽ चुप्पी गाढ़ल दल बनल भगवान। मुद्दा कहाँ? एजेंडा कत्त? बस फोटो-परचार क्रांतिकारी पर फेर से रहल मिथिला राज उधार! जोगिरा सा रा रा रा रा… ! रोगी गाड़ी चढ़ि पटना जाय, दिल्ली करय सफर मिथिला में सुपरस्पेशलिटी सपना बनल अमर। दस वरष मे बनि ठाढ़ भेल एम्स दरभंगा केर गेट मैथिल सभ लेल एखनों सभसँ बढि क हुनकर पेट। जोगिरा सा रा रा रा रा… ! मिथिला प्रेम केवल नारा नहि, संग होय जिम्मेदारी, वोटिंग टाइम सवाल उठाबै,  वैह असली तैयारी। मैथिली, मिथिला, संस्कृति, सब के हृदय से प्यार, मुदा विकास, शिक्षा,स्वास्थ्य पर चाही खुलल पुकार। जोगिरा सा रा रा रा रा… ! -प्रणव कुमार झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। Maithili Literature in English Translation 4.1.The Poverty of True Vision-Jagdish Prasad Mandal (Original Maithili Short Story) Rameshwar Prasad Mandal (English Translation) 4.1.The Poverty of True Vision-Jagdish Prasad Mandal (Original Maithili Short Story) Rameshwar Prasad Mandal (English Translation) Jagdish Prasad Mandal (Original Maithili Short Story) Rameshwar Prasad Mandal (English Translation) The Poverty of True Vision Durlabham Bharate Janma means that to be born in Bharat is a rare fortune. But why is it said so? What is the special quality or uniqueness of India that makes being born here considered such a high privilege? The answer lies in the fact that one who is born here grows and lives within the ethos of Indian culture. The greatness of Indian culture has been that here wealth, luxury, and power have never been valued as highly as the moral worth of life itself. Greater respect has always been given to those who walk the path of restraint, purity, and virtuous conduct, even if from the material point of view they live in scarcity. In the realm of knowledge, India has long held a place of honor, even if in today’s world many other nations have advanced further. From ancient times, the moral character of human beings here has been of a high order. On one side, the creation of such lofty character has been nurtured by a philosophy rooted in spirituality; on the other side, systems of power have often fostered the growth of degraded character. It is well known that centuries of foreign rule in India did not only plunder its wealth but also its art, culture, and heritage. Even those who explained and spread India’s spiritual philosophy were not entirely free from fault. Most ordinary people, then as now, have been ignorant of the deeper truths of that philosophy. Many interpreters of spiritual thought, wishing to make their own lives more comfortable, presented explanations to the masses that served their own advantage, leading to the continued exploitation of the common people. Just as every region has its villages, there is also a village named Madhavpur. In that village lives a man named Jugai, a cattle herder by occupation. Jugai is a simple and straightforward man who knows nothing of farming, and so he spends his days tending cattle. For those whose cows he herds, there is a fixed monthly payment, and this is the foundation of his livelihood. Just as everything changes from moment to moment, people’s thoughts also keep changing. This is how the good can become bad, and the bad can become good. We see that people with noble ideas sometimes adopt base tendencies, while those with the lowest thoughts adopt virtuous habits and make their lives successful. This does not mean that all good people become corrupt, or that all corrupt people turn good. Good people can adopt even better qualities and become better still, while bad people may also deepen their bad habits and become worse. Jugai herded the cows of four or five families. He worked in two daily shifts. In the morning shift, after the cows were milked, around eight o’clock, Jugai would eat his breakfast, walk along the lanes, untie each cow, and lead them out to the pasture. Between eleven and twelve, he would bring the cows back from the pasture and tie them at their respective owners’ posts. Then Jugai would go home, bathe, have his meal, and rest for a while. In the afternoon, he would again go to tend the cows. The owners paid Jugai a fixed monthly wage for his herding work. When the month came to an end, Jugai went to collect his pay from Rameshwar. Rameshwar was a man well-versed in religious texts and legends. Though he had never received formal schooling, he had gathered his knowledge of scriptures through devotional gatherings and self-study. He sustained himself in the village by wandering about, telling stories, and reciting religious tales to both his own community and others. He did not earn through physical labor, yet his standard of living was comfortable enough. That day Rameshwar was sitting at his doorway. As Jugai reached him, he said- “Uncle, the month’s herding is over. Please give me my wages.” Rameshwar, accustomed to living off others’ earnings and skilled in the art of smooth talk, heard Jugai’s request and responded in a playful tone- “Jugai, wages for what?” “For herding your cow, Uncle,” Jugai replied. Just as a courtesan’s voice can be sweet, so too can that of a cheat. In a gentle tone, Rameshwar said- “Jugai, do you not know what the Vedanta, the scriptures, say about this?” Simple and unlettered, Jugai replied- “No.” Rameshwar said- “In the Vedanta it is written: Sarvam Brahmamayam Jagat.” Not understanding what Rameshwar meant, Jugai said- “Uncle, I am not an educated man. My father died when I was a child, and since then I have earned my living by herding cows for the people of the village.” Rameshwar continued- “Son, our scriptures say that the entire world is pervaded by Brahmamay. You are Brahma and so am I. Then why are you asking for herding wages, and how can I give them to you? Tell me that.” Jugai had no knowledge of such tricks and reasoning. So in his mind he thought that, like other dishonest men, Rameshwar Uncle too was cheating him out of his wages. This was no different from the way he must have cheated in his earlier dealings. Jugai decided he would stop herding Rameshwar’s cows from the next day. Resigned, Jugai said- “Uncle, I am going now.” “Yes, yes, go,” Rameshwar replied. Jugai set off toward home. A person’s thoughts rarely rise beyond the limits of their own knowledge. On the way, Jugai kept telling himself that from tomorrow he would not herd Rameshwar’s cows. But then another thought came: if he stopped, what other work was there for him to do? And almost immediately a third thought arose: there is no shortage of work in the world; he could leave Rameshwar Uncle’s cows and tend the cows of someone else instead. With these thoughts running through his mind, Jugai left that place and went to the home of Rita Lal Bhai. Everyone in the village knew that if anyone could match Rita Lal in being sharp and shrewd, there was no one. In speech and in action, he was unpredictable. No one could say when he would turn a ‘yes’ into a ‘no’ or a ‘no’ into a ‘yes.’ Yet society itself is like the sea, deeper than the ocean and larger than the mountains. Rita Lal was in the garden. His wife was standing at the doorway. Going up to her, Jugai asked- “Bhauji, where is Bhaiya?” Rukmini replied- “He is in the southern garden.” As soon as Rukmini spoke, Jugai walked toward the southern garden. Seeing Rita Lal Bhai, Jugai said- “Bhaiya, I have come to meet you.” Rita Lal asked- “Why?” Jugai replied- “The month is over, give me my pay.” Rita Lal said- “Jugai, have you remained a child all your life?” Startled, Jugai asked- “What do you mean, Bhaiya?” Rita Lal said- “Haven’t you heard of Lord Buddha? There are two kinds of men, one is Mayavi and the other is Tathagata. Lord Buddha’s other name is Tathagata.” Hearing this, Jugai just stared at him blankly. Then Rita Lal continued- “Jugai, do you not even know what the great Buddha said?” Not understanding the subject, but curious about Buddha’s words, Jugai replied- “No.” Rita Lal said- “Buddha said Sarvam Kshanikam Asti. It means everything is momentary. The cows you herded before are now dead, and the cows that are here now are their calves. You are no longer the same, and I am no longer the same. We have both been reborn anew. Now tell me, for which work are you taking payment, and for which work am I to give it?” Hearing this, Jugai’s heart sank. Seeing such open dishonesty, he felt like crying, but feeling powerless and helpless, he turned away and walked toward his home in tears. A little further on, he saw Sonai Baba approaching from the opposite direction. Sonai Baba was the oldest man in the village and also known as a man of his word. Whatever he said- he would do, and whatever he did, he would say. Coming closer, Sonai Baba saw Jugai weeping and asked- “What happened, Jugai, that you are crying like this?” Jugai said- “Baba, you know I earn my living by herding cows, and that is how my mother and I survive. I have a monthly arrangement, and when the month was over, I went to ask for my wages from Rameshwar Uncle and Rita Lal Bhaiya. Rameshwar Uncle said that everything is Brahmamay, and Rita Lal Bhaiya said that the one I was before is not the one I am now, and the one he was before is not the one he is now, so why should he pay me?” Hearing this, Sonai Baba thought to himself and understood that Jugai had fallen into the net of two tricksters. It is because of such petty cheats that India’s spiritual philosophy has been reduced to poverty, and whatever remains will also soon be destroyed. Sonai Baba said- “Jugai, do not cry. Go back to the village cheerfully. Tomorrow, as usual, go and take both their cows out to graze. On your way back, tie both cows at your place. When they come looking for them, repeat their own words back to them.” Jugai found wisdom in Sonai Baba’s idea, and the pain in his heart began to lessen. The next morning, he did exactly as Sonai Baba had instructed. In the evening, when the cows did not return to Rameshwar or Rita Lal, both men, shivering like frost-bitten cane in the cold month of Paush, came to Jugai’s place and found their cows tied up. Without saying a word, both handed over his wages and took their cows home. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। विदेह ४३७|| 1 1 || विदेह ४३७

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6) SS, ee top | 7 ९ ३ fade मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम्‌ सम्पादक: गंजेन्द्र ठाकुर।