विदेह ४३९ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। [विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X Videha e-Journal (since 2000) at www.videha.co.in ] ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। कॉपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- २०२६. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. It is a platform for scholars, researchers and writers to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, prose and verse in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili and from Maithili into English. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. (c)२०००- २०२६. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA. सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@zohomail.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@zohomail.in. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. for the writers, readers, and listeners of Mithilā, who have kept the lamp of Maithilī burning through a thousand years of storms ………………………….. "The Parallel is not the marginal but the truthful, in long delay." Mānuṣīm iha saṃskṛtām © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover design: AUM GAJENDRA THAKUR VIDEHA:439 समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा। मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। मिथिलाक ओइ लेखक, पाठक आ श्रोता लोकनि लेल, जे सहस्र वर्षक झंझावात मे सेहो मैथिलीक दीप प्रज्वलित रखने छथि। समानांतर कात-करोट मे हएब नै अछि, वरन् ई अछि असल सत्य, जे अपन समय लेलक अछि। अनुक्रम विदेह ४३९ म अंक ०१ अप्रैल २०२६ (वर्ष १९ मास २२० अंक ४३९) ऐ अंकमे अछि:- १.१.अंक ४३८ पर टिप्पणी (पृष्ठ १-२) गद्य २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-१ (पृष्ठ ५-११) २.२.हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१८ (पृष्ठ १२-३६) २.३.प्रणव कुमार झा-एआई युग मे सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग - कोडिंग से सिस्टम थिंकिंग तक (पृष्ठ ३७-४४) २.४.आशीष अनचिन्हार-2036 धरिक साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेताक सूची (पृष्ठ ४५-४८) २.५.प्रीति कुमारी-सम्मान'क सम्मान (पृष्ठ ४९-५२) २.६.गजेन्द्र ठाकुर-उमेश पासवानक "मुजरिम" (पृष्ठ ५३-६६) २.७.लाल देव कामत-लगाबू कोनो जोगार : एक अवलोकन (पृष्ठ ६७-७२) २.८.प्रमोद झा 'गोकुल'- नेहक डोर (पृष्ठ ७३-७६) २.९.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा:गिरगिट (पृष्ठ ७७-७८) २.१०.बद्रीनाथ राय अमात्य- विवाहक बीमा/ श्मशान रत्न/ बादरायण सम्बन्ध (पृष्ठ ७९-८६) २.११.बद्रीनाथ राय अमात्य- ५ टा बीहनि कथा (पृष्ठ ८७-९७) २.१२.आशीष अनचिन्हार: इच्छा मृत्यु: स्वतंत्र भारतक पहिल वैध उदाहरण (पृष्ठ ९८-१०२) २.१३.रमेशक कविता-समय : विस्तारक उन्माद आ संकोचक विवेकक बीच- एकटा समग्र मूल्यांकन (पृष्ठ १०३-११९) २.१४.डॉ. उमेश मण्डल-समकालीन मैथिली साहित्यक लोकधर्मी स्वर : राम विलास साहु (पृष्ठ १२०-१३७) २.१५.डॉ. उमेश मण्डल-‘सगर राति दीप जरय’ : मिथिलाक साहित्यिक परम्परा, सांस्कृतिक चेतना आ सामूहिक सहभागिता- परिप्रेक्ष्य : निर्मली केर कथा गोष्ठी (पृष्ठ १३८-१४९) २.१६.डॉ. उमेश मण्डल-‘सगर राति दीप जरय’ : साहित्यिक निरन्तरता, कथा-विमर्श आ सामूहिक सांस्कृतिक चेतना- परिप्रेक्ष्य : शिवनगर कथा-गोष्ठी (पृष्ठ १५०-१६०) २.१७.डॉ. उमेश मण्डल-‘सगर राति दीप जरय’क साहित्यिक अवदान : नरहिया गोष्ठीक आलोकमे एक अध्ययन (पृष्ठ १६१-१७१) पद्य ३.१.राजदेव मंडल- शरशय्या (पृष्ठ १७३-१७४) ३.२.प्रणव कुमार झा- राम चरित (पृष्ठ १७५-१७७) ३.३.जगदानन्द झा "मनु"-२५ टा हाइकू (पृष्ठ १७८-१८२) ३.४.बद्रीनाथ राय अमात्य- हम लिखै छी आँकड़ पाथर (पृष्ठ १८३-१८५) ३.५.रबीन्द्र नारायण मिश्र-रामक जल समाधि (पृष्ठ १८६-१८९) ३.६.तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम'] मूल तेलुगु: नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव) मैथिली अनुवाद: मानेश्वर मनुज [खण्ड १] (पृष्ठ १९०-१९५) 4.Gajendra Thakur- A Parallel History of Mithila & Maithili Literature (Part 1-100) …………………………… for the writers, readers, and listeners of Mithilā, who have kept the lamp of Maithilī burning through a thousand years of storms ………………………….. "The Parallel is not the marginal but the truthful, in long delay." ………………………… APPENDIX: METHODOLOGICAL NOTE The Nepal Bikram Samvat years cited have been converted to approximate CE years using the standard offset of BS minus 56–57 years. Web sources consulted include the Videha digital archive (videha.co.in). All URLs were last accessed April 2026. This research was prepared using primary texts, and standard academic resources. All quoted material is from the cited sources. For the most current scholarship, consult the Videha Parallel History series at www.videha.co.in/gajenthakur.htm. ………………………………………………. A PARALLEL HISTORY OF MAITHILI LITERATURE: INTRODUCTION GANGESA UPADHYAYA: LIFE, LOGIC, AND LEGACY IN THE NAVYA-NYAYA TRADITION NAVYA-NYAYA’S HIERARCHICAL USE OF LIMITORS IS COMPATIBLE WITH MODERN ARTIFICIAL INTELLIGENCE AND NATURAL LANGUAGE PROCESSING (NLP) DALIT LITERARY CRITICISM: TELUGU, GUJARATI, AND ODIA DALIT LITERATURE IN MAITHILI TRANSLATION ABHA JHA ABHILASH THAKUR KUNDAN KUMAR KARN AJIT KUMAR JHA AMOD KUMAR JHA ANAND KUMAR JHA THE MAITHILI GHAZAL ASHISH ANCHINHAR ANJANI KUMAR VERMA PRABHAT RAI BHATT ASHRAF RAIN PRAYAS PREMI MAITHIL ABDUR RAZZAK RAVI MISHRA BHARDWAJ ARVIND THAKUR ASHOK (KATHAKAR ASHOK) BADRI NATH ROY 'AMATYA’ BECHAN THAKUR PANDIT BHAVNATH JHA RAM BHAROS KAPARI 'BHRAMAR' BINAY BHUSHAN KALIKANT JHA ‘BUCH’ SATYANAND PATHAK DINESH KUMAR MISHRA DURGANAND MANDAL HARIMOHAN JHA HITENDRA GUPTA JITENDRA KUMAR JHA ‘JEETU’ NAVENDU KUMAR JHA HITNATH JHA HRIDAY NARAYAN JHA MITHILA & MAITHILI: CRITICAL ANALYSIS OF INSTITUTIONS JAGDANAND JHA ‘MANU’ JAGDISH CHANDRA THAKUR ANIL JAGDISH PRASAD MANDAL DR. KAILASH KUMAR MISHRA KALPANA JHA, DELHI KALPANA JHA, BOKARO KALPANA JHA, PATNA KAMESHWAR JHA ‘KAMAL’ DR KAMINI KAMAYINI KAPILESHWAR RAUT KEDAR NATH CHAUDHARY DR KIRTINATH JHA DR KISHAN KARIGAR KUMAR PAWAN LAL DEV KAMAT LALLAN PRASAD THAKUR KUSUM THAKUR LAXMAN JHA ‘SAGAR’ SHAIL JHA ‘SAGAR’ DR PRAFULL KUMAR SINGH ‘MAUN’ MEENA JHA MUNNA JI MUNNI KAMAT NABO NARAYAN MISHRA PROF UDAYA NARAYANA SINGH ‘NACHIKETA’ NAND KUMAR MISHRA ‘NAND’ NAND VILAS ROY NARAYANJI CHAUDHARY NARENDRA JHA PANNA JHA OM PRAKASH JHA AMIT MISHRA CHANDAN KUMAR JHA PRADEEP PUSHPA PREETI THAKUR PREMLATA MISHRA ‘PREM’ PREMSHANKAR SINGH ILARANI SINGH RABINDRA NARAYAN MISHRA RAJDEO MANDAL RAJNANDAN LAL DAS RAM SOGARTH YADAV SHASHIDHAR KUMAR 'VIDEH' SHIVSHANKAR SINGH THAKUR SANTOSH KUMAR ROY 'BATOHI' SUBODH KUMAR THAKUR SUBODH JHA SUBHASH KUMAR KAMAT ACHARYA RAMANAND MANDAL PROF DR RAMAWATAR YADAV RAMDEO PRASAD MANDAL ‘JHARUDAR’ RAMESH MALA JHA RAMESH NARAYAN NAGENDRA KUMAR GOPALJI JHA ‘GOPESH’ VIJAYNATH JHA PT. RAMJI CHAUDHARY ACHARYA RAMLOCHAN SHARAN RAMLOCHAN THAKUR RAMVILAS SAHU RAVIBHUSHAN PATHAK KUMAR MANOJ KASHYAP RAVINDRA NATH THAKUR PHANISHWAR NATH RENU SANDEEP KUMAR SAFI SANJU DAS KRISHNA KUMAR KASHYAP SHASHI BALA S.C. SUMAN SWETA JHA CHAUDHARY SANTOSH KUMAR MISHRA SIYARAM JHA ‘SARAS’ DR SHAMBHU KUMAR SINGH SHANTI LAKSHMI CHAUDHARY RAJEEV RANJAN MISHRA SHARDINDU CHAUDHARY DR SHIV KUMAR PRASAD SHIV KUMAR JHA ‘TILLU’ SRIJAN SHEKHAR 'AJNEYA' ACHHE LAL SHASTRI ANAMIKA RAJ ANIL MALLIK AMRENDRA YADAV PRANAV JHA SHIVSHANKAR SRINIWAS SUBHASH CHANDRA YADAV SUJIT KUMAR JHA SUSHIL TARANAND VIYOGI UMESH MANDAL UMESH PASWAN VIBHA RANI BINDESHWAR THAKUR ANMOL JHA VIDEHA ISSUES 351-438 VIDEHA PARALLEL AUDIO VIDEO ARCHIVE VIDEHA MAITHILI PARALLEL DRAMA THEATRE VIDEHA (ISSUE 1-350) SADEHA SERIES (1-37) VIDEHA PARALLEL CHILDREN'S LITERATURE VINEET UTPAL YOGANAND JHA KAMLA CHAUDHARY LALITA JHA YOGENDRA PATHAK VIYOGI YOGENDRA PRASAD YADAVA 23 Language Transliterator
१.१.अंक ४३८ पर टिप्पणी विदेह ४३८ म अंक पर पाठकीय मन्तव्य प्रणव कुमार झा 'विदेह' अंक ४३८, १५ मार्च २०२६ मैथिली साहित्यक विविध आयामकेँ समेटने अछि। गद्य-पद्यक संग-संग शोध आ लेख सेहो एहिमे स्थान बनौने अछि। एहि अंक के नव वेबलुक एकटा आर आकर्षण के केंद्र रहल। नव लुक पहिने से बेहतर पठनीयता आ नूतन रूप लऽ कऽ आयल, जे मोबाइल डिवाइस के संग पहिने से बेहतर एडेप्टेशन लेने अछि। एहि के लेल विदेह टीम के बधाई। मयंक कुमार झाक 'एआई युग मे मैथिली' समसामयिक विषय सँ जुड़ल अछि, जे पाठककेँ नूतन चिंतन दिस अग्रसर करैत अछि। लेख मे विविध एआई टूल्स और एप के विवरण पाठक के एहि विषय मे भऽ रहल नित नवल प्रगति आ प्रयोग से अवगत कारबय बला अछि। देवनागरी मे मैथिली लिखबाक कठिनाई से जुझैत ई लेख लिखबा लेल लेखक के बधाई। लेख मे मातृभाषा के जे अवधारणा अछि ओकरा हम खारिज नै करय छी, मुदा एकर एकटा आर अवधारणा डॉ० प्रवीण झा (नॉर्वे) अपन एकटा लेख मे दैत छैथ जे घर मे जे भाषा बाजल जाय सैह बच्चा के मातृभाषा भेल। जेना हमर बड़की बेटी संग हमरा आ ओकर दादी छोड़ि सभ कियौ घर मे हिंदी बाजय, त ओहो हिंदी बाजय लागल। ओ मैथिली बुझय अछि मुदा समान्यतया हिंदी बाजय अछि। ताहि लेल कदाचित हिंदी ओकर मातृभाषा भऽ गेल। छोटकी बेटी संग सब मैथिली बाजय छै, त ओहो सबहक संग मैथिली बाजय छैक। त कदाचित ओकर मातृभाषा मैथिली भेल। अस्तु, मयंक जी के लेख समसामयिक विषय पर बहुत समग्र आ सूचनात्मक बुझाना गेल। प्रीति कुमारीक 'अशिक्षाक शिकार: केवट समाज' एकटा नीक सामाजिक शोध आलेख अछि, जे केवट समाजक यथार्थकेँ प्रस्तुत करबाक प्रयास अछि। गजेन्द्र ठाकुरक 'संरचनात्मक अस्थिरता आ अर्थक लीला: रमेशक मैथिली कथा-संग्रह 'कथा-समय' क एकटा आलोचना' गंभीर साहित्यिक आलोचनाक उदाहरण थीक आ हमरा सन पाठक के लेल सूचनात्मक संग मार्गदर्शक। कल्पना झाक धारावाहिक लेख 'मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान' तथा हितनाथ झाक 'मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान' मैथिली साहित्यक धरोहरकेँ रेखांकित करैत अछि, संगहि लेखक के फ़ैक्ट समेटब आ ओकरा साहित्यिक विधा मे लगातार लिखबाक कमिटमेंट सेहो। आशीष अनचिन्हार विदेहक नव अंकमे मयंकजीक लेख नीक लागल, पुनः स्वागत छनि। उम्मेद जे ओ लगातार लिखैत रहताह। प्रीति कुमारीक लेख शोधात्मक अछि आ उम्मेद जे एहने लेख सभ अबैत रहत।
कल्पना झा (पटना) विदेह'क नव अंक मे अपन अनुज चि. मयंक कुमार झाक लिखल लेख "एआइ युग मे मैथिली" पढ़ि कऽ बहुत नीक लागल। अपन लिखल देखबाक तऽ हिस्सक भऽ गेल अछि पछिला कतेको अंक सँ। एहि बेर दुनू भाए-बहिनक उपस्थिति जेना आत्मा प्रफुल्लित कऽ देलक। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। गद्य २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-१ २.२.हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१८ २.३.प्रणव कुमार झा-एआई युग मे सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग - कोडिंग से सिस्टम थिंकिंग तक २.४.आशीष अनचिन्हार-2036 धरिक साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेताक सूची २.५.प्रीति कुमारी-सम्मान'क सम्मान २.६.गजेन्द्र ठाकुर-उमेश पासवानक "मुजरिम" २.७.लाल देव कामत-लगाबू कोनो जोगार : एक अवलोकन २.८.प्रमोद झा 'गोकुल'- नेहक डोर २.९.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा:गिरगिट २.१०.बद्रीनाथ राय अमात्य- विवाहक बीमा/ श्मशान रत्न/ बादरायण सम्बन्ध २.११.बद्रीनाथ राय अमात्य- ५ टा बीहनि कथा २.१२.आशीष अनचिन्हार: इच्छा मृत्यु: स्वतंत्र भारतक पहिल वैध उदाहरण २.१३.रमेशक कविता-समय : विस्तारक उन्माद आ संकोचक विवेकक बीच- एकटा समग्र मूल्यांकन २.१४.डॉ. उमेश मण्डल-समकालीन मैथिली साहित्यक लोकधर्मी स्वर : राम विलास साहु २.१५.डॉ. उमेश मण्डल-‘सगर राति दीप जरय’ : मिथिलाक साहित्यिक परम्परा, सांस्कृतिक चेतना आ सामूहिक सहभागिता- परिप्रेक्ष्य : निर्मली केर कथा गोष्ठी २.१६.डॉ. उमेश मण्डल-‘सगर राति दीप जरय’ : साहित्यिक निरन्तरता, कथा-विमर्श आ सामूहिक सांस्कृतिक चेतना- परिप्रेक्ष्य : शिवनगर कथा-गोष्ठी २.१७.डॉ. उमेश मण्डल-‘सगर राति दीप जरय’क साहित्यिक अवदान : नरहिया गोष्ठीक आलोकमे एक अध्ययन २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-१ कल्पना झा कल्पना झा मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-1 "श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'क विराट व्यक्तित्वक चित्रण करबा मे हमर लेखनी सक्षम भऽ सकत की? हमरा मे ओ पात्रता अछि की? हमर कलम न्याय कऽ सकत एहि स्वनामधन्य व्यक्तित्वक चित्रण करैत?" हमरा मोन मे इएह प्रश्न सभ घूमए लागल, जखन आशीष अनचिन्हार हमरा सोझाँ प्रस्ताव रखलनि एहि सुच्चा 'मिथिला विभूति'क जीवन-यात्रा पर लिखबाक लेल। ऊहापोह बला स्थिति बनि गेल जेना। एक दिस अपन लेखनीक क्षमता पर 'डाउट' दोसर दिस ई अवसर भेटबाक 'गौरव' सेहो। एहि 'अवसर'क लाभ उठबैत, पूर्वजक प्रति भाव कुसुमाञ्जलि अर्पित करैत अपन जनम सफल कऽ सकैत छी हम; से सोचि यथाशक्ति किछु लिखबाक सहास कऽ रहल छी अन्ततः। नेआर तऽ केलहुँ जे लिखब हम 'विद्यालंकार' जीक जीवन-यात्रा पर। हुनकर कएल काज सभ पर। हुनकर उपलब्धि पर। मुदा असमंजस मे छी जे शुरुआत कतए सँ करी हम। मतलब स्वतन्त्रता सेनानी श्रीकान्त ठाकुरक चर्चा करी पहिले आ कि पत्रकार श्रीकान्त ठाकुरक खिस्सा सँ शुरुआत कएल जाए। पत्रकारो एहन-ओहन नहि,'धाकड़' पत्रकार। एहन पत्रकार जनिका सोझाँ तत्कालीन मुख्यमंत्री संग आरो बड़का बड़का कद्दावर नेता सभ नतमस्तक रहैत छलाह। मुख्यमंत्री अपन कुर्सी पर सँ उठि कऽ ठाढ़ भऽ जाइत छलाह आ हुनका बैसबाक आग्रह करैत छलाह। एहन हस्ती छलाह 'विद्यालंकार' जी। सम्पादक, लेखक, मैथिली भाषाक प्रचार प्रसार मे सक्रियता, हिन्दीक सेवक, भाषा साहित्य संबंधी अन्यान्य बहुत काज कएल छनि, जकर चर्चा विस्तार सँ हेबाक चाही। भाषा पर पकड़, राजनीति पर पत्रकार रूप मे दबदबा, सामाजिक, सांस्कृतिक गतिविधि मे सक्रियता, विशाल वटवृक्ष जकाँ शाखा, उपशाखा युक्त पसरल 'विद्यालंकार' जीक व्यक्तित्वक बहुत रास आयाम छनि। बेरा-बेरी सभ आयाम पर चर्चा हेतैक। मुदा शुरुआत करैत छी ओहि 'स्ट्रीट डॉग' बला प्रसंग सँ। मुदा ओहि सँ पहिने 'विद्यालंकार' जीक व्यक्तित्वक जादू केहन छलनि, से कने चर्चा कइए लैत छी। बिहारक तत्कालीन मुख्यमंत्री पर्यन्त हुनकर सम्मान मे कुर्सी पर सँ उठि जाइत छलथिन, पैर छूबि गोड़ लागैत छलथिन। एहन मुख्यमंत्री मे स्व० कर्पूरी ठाकुर आ स्व० जगन्नाथ मिश्रक नाम उल्लेखनीय अछि। आँखिक देखल प्रसंग सुनौलनि अछि श्री घनश्याम ठाकुर जी मैथिली अकादमी संबंधी एकटा फेसबुक पोस्ट पर अपन प्रतिक्रिया दैत। पोस्ट छलनि आदरणीय भीमनाथ झा जीक। मैथिली अकादमी पर 'तालाबंदी' चर्चा मे छलए एम्हरे चारि-पाँच मास पहिने। मैथिली अकादमीक चर्चा हुअए आ अकादमीक पहिल अध्यक्ष श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार' जीक चर्चा नहि होइत, से कोना भऽ सकैत छलए। सएह अकादमीक संग विद्यालंकार जी चर्चा मे छलाह 'तालाबंदी' प्रकरण मे। ई तऽ सर्वविदित अछिए जे सभ सँ बेसी काज हिनकहि अध्यक्षता मे भेल छलए मैथिली अकादमी मे। श्री घनश्याम ठाकुर जीक वक्तव्य हुनकहि शब्द मे देखल जाए- "विद्यालंकार जीक व्यक्तित्व एहन छल जे स्व० कर्पूरी ठाकुरक मुख्यमंत्रीक समय मे ओ अकादमी मे पूर्णकालिक निदेशक नियुक्ति हेतु मुख्यमंत्री सँ भेंट करए गेल छलाह। संग मे हमहूँ छलहुँ। मुख्यमंत्री जी हुनका पाएर छूबि प्रणाम कएलथिन आ अपन कुर्सी पर बैसबाक निवेदन कएलथिन, जे ओ स्वाभाविक रूप सँ अस्वीकार कऽ देलथिन। जाधरि ओ मुख्यमंत्री सँ बात कएलनि ताधरि मुख्यमंत्री अपन कुर्सी पर नहि बैसलाह आ हुनक बगल मे ठाढ़ भऽ हिनक बात सुनलनि। वापसी काल मुख्यमंत्री स्वयं कार धरि आबि अरियाति अपना हाथें कारक गेट खोलि पूर्ववत पाएर छूबि प्रणाम कऽ विदा कएलनि आ सप्ताहाभ्यन्तरे वांछित कार्य भ' गेलैक।" आब चर्चा 'स्ट्रीट डॉग' बला प्रसंगक। पटना निवासी होएब हमरा लेल सौभाग्यशाली सिद्ध भेल। जैं विवाहोपरान्त पटना स्थायी निवास रहल हमर, तैं श्री भवन आ विद्यालंकार भवन, मतलब नैहर-सासुर दुनू पक्षक 'मन्दिर' सन पवित्र घर आ ओहि घरक लोक सभ सँ कनेक्टेड रहलहुँ, आ छीहे अद्यतन। हमर पतिदेव श्री त्रिवेणी कुमार झा आ हुनकर नाना श्रीकान्त ठाकुरक 'ब्लड ग्रुप' एक्कहि। एक बेर खूनक आवश्यकता पड़ने खून सेहो देने छलथिन नानाजी केँ ई। से नाति लेल बड़का गौरवक बात रहलनि, जे ओहन महान हस्तीक 'नस' मे हिनकर देल शोणित दौड़ि रहल छलनि। नानाजी स्वस्थ भेलथिन तऽ हृदय सँ जे आशीर्वाद देलथिन तकर वर्णने की कएल जाए; कोना कएल जाए। ओह! हम भसिआएल जा रहल छी...भावना मे बहैत... गप्प करबाक छलए ओहि स्ट्रीट डॉगक, जे ओहिना 'कौरा' दैत-दैत पोसा गेल छलनि। जेना कि अपना मिथिला मे एकटा परम्परा रहल अछि, भोजनक अन्तिम कौर कुकुर लेल छोड़ल जेबाक। हमरा देखल अछि नानीगाम जाइ तऽ नानाजी भोजन पर सँ उठैत काल, थारीक अन्तिम कौर हाथ मे उठेने अंगनाक 'दुरखा' (गली) लग लऽ कऽ जाइथ आ कुकुर दौड़ल आबि जाइन, ओ कौर खाए लेल। सएह, ताही परम्पराक निर्वाह पटनाक बोरिंग रोड चौराहा पर अवस्थित विद्यालंकार भवन मे सेहो कएल जा रहल छलए। नित्य कुकुरक कौर निकालैत, दैत एकटा स्ट्रीट डॉग तेना पोसा गेलनि जे बाद मे सौख सँ ओकरा दूध-भात, दूध-रोटी देबए लगलीह घरक धिया (हिनकर मौसी)। हुनका कने विशेष ममता ओहि स्ट्रीट डॉग पर। सभ बच्चाक स्वभाव सभ रंग होइते छै ने....सएह 'विद्यालंकार' जीक छओ गोट पुत्री आ दू गोट पुत्र मे उर्मिला नामक पुत्री विशेष सिनेह देखौलनि ओहि स्ट्रीट डॉग पर। ओकरा नित्य दूध-भात, दूध-रोटी आगाँ मे पड़ए लगलैक। संग दैत छलथिन सभदिन 'विद्यालंकार भवन' मे रहनिहार मामा जी। 'कौरा'क अतिरिक्त दुनू मामा-भगिनी ओहि स्ट्रीट डॉग के प्रेम सँ दिनक भोजन मे दूध-भात आ राति कऽ दूध-रोटी देबए लगलथिन। एक दिन दूध-भात देलथिन तऽ मुहो नै लगौलकनि ओ कुकुर। आ राति मे दूध-रोटी प्रेम सँ खा लेलकनि। पहिल बेर तऽ नै, मुदा पंद्रहम दिन जखन इएह प्रक्रिया दोहरौलक ओ धर्मात्मा कुकुर तखन गौर करैत गेलाह जे ई सभ एकादशी तिथि कऽ भात नहि खाइत अछि। एकादशी करैत अछि बुझाइए। पूर्व जन्मक कोनो भारी 'चूक'क कारणें एकरा 'श्वान-योनि' भेटलैक प्रायः। कुकुरक स्वामी भक्ति तऽ सर्वविदित अछिए। आ ई तऽ धर्मात्मे कुकुर छलाह, स्वामी भक्तिक एहन उदाहरण प्रस्तुत केलनि जे घरक लोक डेराइए गेल। एक बेर चोरक टीम घुसल विद्यालंकार भवन मे, पछुलका गेट सँ। से ई स्वामी भक्त कुकुर तेहन छड़पान छड़पलनि; चोरक गरदनिए धऽ लेलकनि। बाप-बाप कऽ कऽ पड़ाइत गेल। प्रात भेने पैर पकड़ि कऽ माफी माँगैत गेल। भगवान जानथि ई एकादशीक नियम पालन कएनिहार धर्मात्मा कुकुर श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार' जीक पूर्व-जन्मक आत्मीय छलनि, सेवक छलनि आ कि हितैषी छलनि। ओहुना सभ बात मनुक्ख के बुझबा जोग होइतो कहाँ छै। छै कि नहि? संपादकीय सूचना- विद्यालंकारजीसँ पहिने विदेहपर व्यासजीक कृतित्वपर कल्पनाजी लीखि रहल छथि एवं आब विद्यालंकारजीपर भऽ रहल अछि। पाठक व्यासजीपर प्रकाशित एखन धरिक सभ खंड निच्चा केर लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकै छथि- मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-7 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-8 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-9 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-10 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-11 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-12 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-13 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-14 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-15 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-16 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-17 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-18 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-19 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-20 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-21 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-22 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-23 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-24 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-25 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.२.हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१८ हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१८ हितनाथ झा (मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070) 'प्रभात'मे प्रकाशित मैथिली कविता
विदेहक पछिला अंकमे प्रभातमे प्रकाशित दस कविता प्रस्तुत कयने रही आ एहि अंकमे बाँकी अधिकांश कविता प्रस्तुत अछि। धारावाहिक कविता एहिमे नहि अछि। चूँकि सभ अंक उपलब्ध नहि अछि, तेँ बहुत एहन मूल आ अनुवाद कविता अछि जे सम्पूर्ण नहि अछि, तथापि प्रयास करब, जतेक तक सम्भव भ' सकत,अग्रिम अंकमे प्रस्तुत करब। एक निवेदन जे चूँकि पत्रिका हस्तलिखित छैक आ 93-94 वर्ष पुरान तेँ कतौ कतौ अस्पष्टताक कारण उतारबामे गलत होयबाक सम्भावना ओ हमर अल्पज्ञता जानि क्षमा करब, मूलमे अशुद्धिक कम सम्भावना।कविता सभपर जखन दृष्टिपात करैत छी तँ अनेक विषयक कविता लिखल गेल छैक, से सभ युवा द्वारा। जखन कविक गाम देखैत छी तँ ओ लोकनि कोइलखे टाक नहि छथि, अनेक गामक छथि, जेना मंगरौनी, राजग्राम, रानीटोल, चपाही, राजनगर, मंगरपट्टी आदि। मोहन भारद्वाज 'प्रभात'मे प्रकाशित कविताक विषयमे कहैत छथि- संख्याक हिसाबें रानीटोलक रामचन्द्र झा 'चन्द्र'क सर्वाधिक कविता प्रभातमे प्रकाशित अछि। ई मधुप आ किरण तँ नहि भेलाह, मुदा मैथिली काव्य-संसारक परिचित नाम अवश्य थिक। भारत चीन युद्धक पृष्ठिभूमिमे रचित हिनक 'विजयगान' काव्य पुस्तक मैथिलीक प्रसिद्ध कृति थिक।' उमाशंकर गीत पुष्पंज' हिनक अन्य प्रकाशित पोथी थिक। एकर अतिरिक्त मेघदूत, आ कुमार सम्भवक पद्यानुवाद सेहो छपल छनि। एहि प्रकारक लगभग पन्द्रह टा प्रकाशित-अप्रकाशित पोथीक प्रणेता रामचन्द्र झा 'चन्द्र' प्रभातक नियमित लेखक छलाह। काली कुमार दास, जयदेव मिश्र, उपेन्द्रनाथ झा 'व्यास' तथा योगानन्द झाक एक्के-दू टा रचना प्रकाशित अछि, मुदा ओ सभ ऐतिहासिक महत्वक अछि। प्रभातक साहित्यिक रचनाक लेखक लोकनिकेँ दू कोटिमे विभाजित कs सकैत छी। किछु एहन रचनाकार छथि जे प्रभातक रचनाक आधारपर अपना दिस ध्यान आकृष्ट करैत छथि, किन्तु कालान्तरमे ओ साहित्यकारक रूपमे स्थापित नहि भs सकलाह। संगहि किछु एहनो रचना भेटैत अछि जकर रचनाकार आइ मैथिली साहित्य संसारमे बेस प्रतिष्ठित छथि। पहिल कोटिक कवि-कथाकारमे उल्लेखनीय छथि- ब्रजमोहन ठाकुर 'मोहन', केदारमणि झा, श्याम सुन्दर झा, अयोध्यानाथ सिंह ठाकुर, मदनानन्द झा, बलदत्त झा तथा हृषिकेश झा। चपाही ग्रामवासी श्री ब्रजमोहन ठाकुर ' मोहन' मैथिलीक वयोवृद्ध साहित्यकार छलाह। हिनक 'सावित्री-चरित' नामक कथाकाव्य प्रकाशित अछि। विभूतिमे सेहो हिनक रचना छपल अछि। प्रभातक ऊर्जावान रचनाकारमे ई अग्रणी छलाह। मंगरौनीक केदारमणि झा अत्यन्त प्रतिभावान रचनाकार रहथि। हिनक काफी रचना प्रभातमे प्रकाशित अछि। अयोध्यानाथ सिंह ठाकुरक पैतृक रहनि राजग्राम आ सासुर कोइलख। सासुरसँ निकलैत पत्रिकाक भरिपोख उपयोग ई कयने छथि। युवावस्थाक उमंग आ रसिक स्वभावक तरंगक संगम थिक प्रभातमे प्रकाशित हिनक रचना। (स्रोत: कोइलख: -लेखक हितनाथ झा)
कवित्त श्री रामचन्द्र झा, रानीटोल
उपमा अनूप रूप कलाधर नाम जाहि, सिन्धु सँ वहार भै शोभित गगन कैल जे। जाहि तेज पुंज प्रभा व्योम विस्तीर्ण अछि, शंकर उमंग भरि निज शीश धारि लेल जे।। छारि व्योम सूनसान सूनि मिथिलाक तान, क्वैलख सुभद ग्राम आबि जन्म लेल से। 'रामचन्द्र' ख्यात राज धर्म ध्वजा जाहि छाज, वनैली सुशोभित कै ' चन्द्रावति ' नाम धैल से।।
(प्रभात, वर्ष-2, अंक-4,अप्रैल 1934,)
प्रभात श्री ब्रजमोहन ठाकुर 'मोहन ' चपाही 01 अयउ परभात, कियऊँ अलसात। सजग अब होहु, करम नित जोहु।। 02 उठहु प्रिय तात ! सुनहु कछु बात। धरहु मन माँहि, सुभग अति आँहि॥ 03 लखत परभात, भ्रमहु बिन बात। गहहु कछु मर्म, करहु तव कर्म।। 04 करम असनान, धरम अवसान। पठत शुभ पाठ, वनइ तब ठाठ।। 05 करहु अधियैन, मिलइ सुख चैन। अवसि अवलोकु, मिटइ सव शोक।। 06 सुबह जस लाल, बनिहहु गु वाल। सुभग वर थाल, सदृश तम काल।। (प्रभात, वर्ष-2, अंक-4,अप्रैल 1934,)
गर्विता केदार मणि झा, मंगरौनी। हम नहि काटब टकुरी तकुरी हम नहि धूनब बाड�। नोकर चाकर राखि लिय जे पीसै सभ दिन भाड़�। काज करैत करैत इह सभ दिन चढ़ल जाइए जांघ। अहूँ ततबे दिन तक पूछब यावत तक्क समाड�। व्याह कैल की भानस करवेवा घर बढ़ाड़बा हेतु। माँ के एइ बेर निश्चय कहबइ नहि तँ आबहु चेत। टिकुली मडि�यनु सिन्दुर मडि�यनु लेता मुँह केर फेरि। जाउ-जाउ नहि काज कोनो अछि आओत हमरो बेरि।। केदार मणि झा मंगरौनी।
(प्रभात, वर्ष~2,अंक~4, अप्रिल1934 ई.)
अनुरोध श्री केदारमणि झा, मंगरौनी।
राति अंधार मशान मे छोड़ि के सौतिन संग मे रहली से रहली। पहिल सिनेहक वंचन-वद्ध सुपल्लवपान जे चहली से चहली।। "रहु अहँ शीघ्र पुनः हम आएब" ठगि-ठगि बातहुँ कहली से कहली। जीवन स्वयं अपन सभ घातिके अपन सहब हम सहली से सहली।।
(प्रभात, वर्ष~2,अंक~5, मइ1934 ई.)
आधुनिक-विवाह श्री रामचन्द्र झा 'चन्द्र', रानीटोल। तावत पढ़बा मे उत्साह। जावत बाकी रहल विवाह।। ----0---- घटक एला होइत छल पाठ। पाठ छोड़ि भेला मठोमाठ।। गुदरी धोती फाटल पाग। देखि कहल जागल मम भाग।। कन्यागत के कहल बुझाय। छथि ई करबा योग जमाय।। इको यणचि पाठ होइ छैन। पढ़बा स नै रहै छैन चैन।। आदि मे तावत वर के पस्य। छारू शंका करू अवश्य।। कन्यागत पोटि कैलनि ठीक। विलारिक भागे टूटल सीक।। भेल सिद्धान्त एला पजियार होम लागल दिनक नेआर।। अगहन सूदि पाँच बुध दीन। वस्तु ठीक राखव सव कीन।। नित नित नूतन मङ्गल गीत। सखि सव गाबि होथि तिरपीत।। आवि पहूचल नीयत दीन। साजि बरियाति चलल दस तीन।। लागल सव बरियाती द्वार। होमै लागल मंगल चार।। झट्ट विधकरी धैलनि नाक। तैखन कलसी फुटल धराक।। मन मन कहल असगुन ई भेल। तखन वेदी लग लय गेल।। मुट्ठी एक कन्या छलि ऊंच। देखि होश तैखन कयल कूच।। विवाह भेल कोबर गेलाह। रातुक उजगी खुब सुतलाह।। चारू दीन बितल विन नोन। तनिक दशा भेल हैत को।। सकला कुना चतुर्थि पछार। पाठक मनमे करू विचार।। टका देल दुइ हाथ उठाय। देखितहि कामिनि फेकल घुमाय।। बाजब बरु रुपैया बीन। राखू अही लाडु खैब कीन।। प्रेम विनोद बाढ़ल तैखन। देखितहि हुनकर जौबन धन।। भ्रमर भुलल रहला दस दीन। बिन रस पौनहि भेला खीन।। भेल बरियाती वरक विदाई। सवै पहुँचला गाम झमाई।। ललका धोती थकरल ठीक। उनटल झुलफी सोभैछ नीक।। कौखन तिरहुति योगक चर्च। तरुणी मेल मिलापक खर्च।। पढ़बाक वेर मन ऊठल बाढ़ि। आँगुर धै छथि कामिनि ठाढ़ि।। चूटिक चालि तिरहुतिक तान। कहल न जाइछ तखनुक सान।। गुरु पुछलैन भेल पाठक ज्ञान। रहलहुँ आँगन माँझे ठाम।। जाहौ वूरि भेलह वुरियाह। पढ़ब की आब हैब बताह।। सद्यह कलियुग आबिये गेल। कहिनी ई सदर्थ कै देल।। तावत पढ़बा मे उत्साह। जावत बाकी रहल विवाह।।
(प्रभात, वर्ष~2,अंक~5-6, मइ-जून1934 ई.)
" मखौल " अयोध्या नाथसिंह ठाकुर " अवधेश " राजग्राम।
बनू दूध वाली अहँ प्रेयसि हम बनि जायब श्याम। करब उपद्रब रोकब पथ लेबय न देब विश्राम।। एहि गोपि के पयमे छनि जल यथा ब्रह्म मे माया। एहि दूध मे सकल विश्व के गूढ़ रहस्यक छाया।। � � � � ताहि समय लज्जा सँ नागरि पानि पानि अहँ होयब। हम तँ होयब दूध प्रियतमे किन्तु, पानि अहँ होयब।।
( ' प्रभात ',वर्ष: 2, संख्या7 जुलाइ1934)
स्वच्छन्दमत तेजनारायण झा (प्राइमरी स्कूल, कोइलखक शिक्षक छलाह)
( 01) बूढ़-सूढ़ तौं सड़ल-पचल छथि, हुनक कथा की मानब। धर्म सनातन थीक सड़ातन, तकरा लय की कानब।। जाति रहैक की जाय एकता, सकता विश्व मे थापब। ब्राह्मण डोम चमार सबहि मिलि, नूतन राग अलापब।। (02) थिकहुँ हमहि कलियुगी सुधारक, लै नवीन अवतार। खान-पान-सम्मान आदि सौं, करब अछूतोद्धार।। यैह हमर कलयुगी धर्म थिक, एकरा जे नहि मानथि। से समस्त सुख सौं वञ्चित रहि, माथ हाथ धै कानथि।। (03) गहि कर कमल नवल रमणी केँ,संगहि संग घुमाएब। हृदय विकासक हेतु प्रेम सौं, 'गार्डेन' सैर कराएब।। अपना पहिरन पेन्ट बूट, रमणी अहुँकेँ पहिरायब। सबल बनयबाले हुनका हम कसरत खूब करायब।। (04) जाति-पाति केँ कात राखि हम अमेरिका पढ़ै जायब। पति-पत्नी मिलि कला-कुशलता सीख सफल भै आयब।। जाय विलायत ठाट-बाट सौं बैरिष्टर बनि आयब। महा-महा अन्यायी केँ संकट सौं तुरत बचायब।। ******** (तेजूगुरूजी नामे प्रसिद्ध)
( ' प्रभात ',वर्ष: 2, संख्या8, अगस्त1934) . "आइ नहि काल्हि" अयोध्यानाथ सिंह ठाकुर बी.ए.ऑनर्स
' विदा ' 'एतेक शीघ्र?' 'कर्तव्य विवश छी' 'निठुर' 'प्रियतमे !' .................. 'कनैत छी' ................... 'शीघ्रे आयब' ..............�... 'एक चुम्बन' ..................... ' प्रेमक स्मारक रूप' .................... 'एक और' .......................... 'श्रावण मास' ........................ 'मधुर पावस' ..................... 'दारुण वियोग' ....................... 'असह्य' ...................... 'आइ नहि जाउ' 'प्रिये' ! मानि जाउ... (आलिंगन) 'कार्य क्षति होएत'
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'पावस पुनः आओत' 'परन्तु ई यौवन उन्माद नहि' 'प्रिय' 'हम नहि जाए देव्' ...................... 'काल्हि चल जाएब' ... (चुम्बन) 'जे श्रीमती जीक आज्ञा'
(आलिंगन, चुम्बन तखन दुनू प्रेम विभोर)
~ अयोध्यानाथ सिंह ठाकुर बी.ए. ऑनर्स 'अवधेश' (साभार: प्रभात वर्ष-2,अंक-09 सिंतबर1934)
(प्रयोगवादी कविता अछि। कवि छथि राजग्राम गामक स्व.अयोध्यानाथ सिंह ठाकुर, जनिक आरो कवितासभ 'प्रभात' पत्रिकामे प्रकाशित भेल अछि।)
तपोभूमि मिथिला ले. अज्ञात महा मनोहारिणी-शान्ति दायिनी, विचारशीला- तपोभूमि जे छली। अहा ! अहा !! से मिथिला मनोरमा, विकासहीना मिथिला धुना महा।।
सनेह-भूपेन्द्र-विदेह-पालिता, विनोद धारा मधुरा प्रवर्षिणी। प्रफुल्लिता-शीतलता- प्रदा सदा, महा सशोकादय विदग्धकारिणी।।
जतै महाज्ञानवती- सुलक्षणा, सती शिरोरत्न-अमूल्य 'भारती'। प्रसिद्ध 'गार्गी' सम भागिनी जतै, समस्त शास्त्रार्थ रता पवित्रता।।
जतै सुवेदान्त विवेचना मथी, शुकांगना पिंजर-वद्ध सारिका। महा सुधन्या 'मिथिला मही' छली, प्रभावती गौरव ज्ञान -शालिनी।।
जतै 'अयाची'क प्रगाढ़ विद्वत्ता, प्रकाशमाना प्रति देश देश मे। महामना ' मंडन मिश्र ' पूजिता, महा पवित्रा मिथिला मही छली।।
रसौज पूर्ण कविता मनोहरा, जनीक आनन्द अपूर्व दायिनी। निधान सतकाव्य कलाति निर्मल, कवीन्द्र ' विद्यापति ' से छला कतै।।
विकास माना ' कमला ' कतै छली, समोद वीणायुत ' शारदा ' कतै। छली कतै से रघुनाथ- सत्प्रिया, पवित्रतादर्श विशाल ' जानकी'।।
विचार गाम्भीर्य सुधर्म निष्ठता, दयार्द्रता-सद्गुण सौं अलंकृता।। विशेष सौंदर्य कला - प्रसारिणी, विभवासमाना ' मिथिला' मही छली।।
अहा ! अहा !! से मिथिला प्रभावती, प्रभावहीना - मलिनाम्बरा धुना। समस्त श्रृंगार-हता कुशाङ्गिनी, महा सशोकाहृदि -ताप कारिणी।।
ततै कतै आव विचारशीलता, महा पवित्रा तप निष्ठता कतै। विज्ञान गाम्भीर्य कतै दयार्द्रता, विनष्ट हा ! हा !! सभ सद्गुणावली।।
प्रवाद्रता आव ततै दरिद्रता, सु मूर्खता-द्वेष-विशाल-क्षुद्रता। तथा महालोलुपता- विलासिता, कुभाषिता लम्पटता लतासमा।।
न हेरती की करुणा-कटाक्षौ, विदेह जा ई मिथिलाक दुर्दशा। सदा महाधोगति-गर्तमे अहो, निमग्न हा ! की रहते तपो महो।। (कोनो-कोनो शब्द अस्पष्टक कारणसँ उतारबा मेअशुद्धिक सम्भावना।)
(साभार: प्रभात वर्ष-2,अंक-09 सिंतबर1934)
.ईश-विनय ~ श्री भवनाथ मिश्र
हरि हो, भारत कृषकक कष्ट महान।
दिन-दिन मरी क्षुधा - पीड़ासँ दैछ न केओ दान। कठिन परिश्रम करी तदपि हा! हमर कण्ठगत प्रान।।
बैसले बाबू मौज उड़ाबथि करथि सिका ओ शान। रक्त चूसि हमरा सबहक ओ देशक वासी आन।।
शरणागत भय करी प्रार्थना करह हमर कल्यान। नहि त कहब व्यर्थ तोरा थिक 'दीनबन्धु 'भगवान।।
( ' प्रभात ' वर्ष -02,अंक -11 (नवम्बर-1934)
ईश-विनय श्री भवनाथ मिश्र
भज मन दीनबन्धु सियराम। जनिक पवित्र नाम केँ भजि क' गेला कते सुरधाम। जनिक चरणरज लगितहिं प्रस्थर बाजि उठल जयराम। योगी कते शरीर अन्त कय भजल जनिक शुभनाम। से अवश्य हमरा सभहिक दुख हरि देता विश्राम। मिथिला दुःख अवर्णनीय अछि, कलहयुक्त सवठाम। उद्धारी श्री रामचन्द्रकेँ भज मन आठो याम।। भज मन ...
( ' प्रभात ' वर्ष -02,अंक -12 (दिसम्बर-1934)
मैथिलीक आर्तनाद आद्यादत्त झा (कोइलख,पुबारि टोल)
की अपराध हमर अछि कहु-कहु ? हे मिथिलाक सुजान महान ! भै रहलहुँ अछि पतन दृष्टिसँ, जे अछि आइ अहँक शुभथान।।
चूमि-चूमि मुँह हमहि सिखावल, बाजब मायबाप इत्यादि। तखन किए बिसरै छी हा? कहु ? हमर अहाँ लोकनि प्रेमादि।।
ताकू आँखि उठाय कनेको, थिकहुँ मैथिली मातु अहीँक। कोन अवस्था मध्य पड़ल छी, की ई शोचनीय नहि थीक ??
खैने लात फिरै छी घर-घर, कोनो विधिसँ जीवन राखि। किन्तु करू की मरइत छी नहि, केवल अहँक शुभाषा ताकि।।
लाख अहाँ केहनो छी नहि अछि दया, हृदय अछि पूर्ण परवान।. तैयो अहीं लेब सुधि कहियो, हे प्रिय सुत? ताकत के आन ??
(प्रभात, अंक-12, दिसम्बर-1934 ई.)
(जहिया उपेन्द्रनाथ झा "व्यास" राजनगर हाइ स्कूलमे पढ़ैत रहथि, ओही समयक लिखल कविता।)
मिथिला
उपेन्द्रनाथ झा "व्यास"
हिमिगिरि उत्तर दिशि मे राजित जनिक उच्चतम श्रृंगे।
जगदम्बा पति,पितु सिर बहयित दक्षिण दिशि छथि गङ्गे।।
पूर्व दिशा अतितीव्र गामिनी नदी कौशिकी प्रवहित।
गंडक पुनि पर्वत सँ निकसित पश्चिम बहयित जनहित।।1।।
मिथिल नाम महाराज नाम पर अछि तुअ नाम प्रसिद्धे।
जनक आदि अमरोपन मुनिगण बहुत भेला अरु सिद्धे।।
जनक तनूजा लक्ष्मी आदिक छली देवि अवतारे।
नाम जनिक स्मरण होइत मनु जाइत अछि भवपारे।।2।।
किन्तु पूर्व शुभ युग सब बीतल आब न छथि ओ मिथिला।
कर्म्म- धर्म्म - वंचित निज जनसँ भय गेली अछि शिथिला।।
जतय मदन अरु कालिदास छल शंकर झा सन वीरे।
ओतय मूर्ख महिषी चरवाही मे अछि पड़ल अधीरे।।3।।
मैथिल ! आबहुँ उठु एहि जगमे सब क्यो काज करै अछि।
पूर्वोपार्जित यशक ध्यान कयला सँ लाज अबै अछि।।
दुर्दिन अपन देखि कय, आबहु पढ़ु निज वेद विचारू।
देशक उन्नति करू सुचित भय, भाषा अपन प्रचारू।।4।।
(एच. ई.स्कूल, राजनगर।) (प्रभात, अंक-12, दिसम्बर-1934 ई.) व्यासजीक कवितापर आलोचक मोहन भारद्वाजक मन्तव्य-
(स्रोत:-कोइलख पुस्तक:लेखक हितनाथ झा, पृष्ठ: 164~65) आचार्य रमानाथ झाक अनुसार ओहि कालक मैथिली कविताक दुइए टा विषय छल - देश-दशा आ मातृभाषा। व्यासजीक उक्त कविताक प्रतिपाद्य विषय यैह थिक। एतावता प्रमाणित होइत अछि जे व्यासजी ओहू आयुमे, छात्रावस्थोमे, मैथिली काव्यक केन्द्रीय धाराक संग छलाह। दोसर बात,व्यासजी अपन जाहि मानसिकताक लेल आइ जानल-मानल जाइत छथि ताहिसँ भिन्न हुनक ओहू दिनक विचार नहिँ छलनि। तात्पर्य ई जे व्यास जी स्कूलिए जीवनमे व्यास बनि गेल छलाह, आ से केवल उपनामे मे नहिँ, वैचारिकतामे सेहो।
~मोहन भारद्वाज स्वप्न-दृश्य श्री रमानन्द झा
एक जन छथि अत्यन्त सुडौल खोलै छी सभ हुनकर पोल। जाति पाँजि छन्हि सभ टा धोल हुनकर छन्हि दू कौड़ीक मोल।। रासभ सन छन्हि जनिकर बोल बात बजै छथि से अनमोल। भोजनमे एक केवल कोल रमणिक छन्हि अति दुनू कपोल।। जँ किछु पावथि आनक जोर तँ ओ करताह पातक घोर। सुन्दर रूप देह अति सारिल, सुरासुरक ओ छथि वराहिल।। भोरहि भाड� अरु पान चवाबथि, छड़ी हाथ लै, ग्राम पधारथि।। आनक झगड़ा कान्ह लगावथि, दुर्जन मे अग्रगण्य कहाबथि। लोक लोक केँ खूब लड़ाबथि अपने ओ अति मौज उड़ाबथि। भोज्य समय मे लोक जुटाबथि, ब्राह्मण मे छड़ीदार कहाबथि। रामनाम क्षण भरि नहि बाजथि। गप्प- सप्पमे दीन बिताबथि।। छनि प्रख्यात अनेको नाम बसथि सदा ओ मिथिलाधाम। रहथि कुसंग मे आठो याम आबथि जाथि सतत सभठाम।। दूगोलाक करथि गुणगान। नहि ओ बूझथि निज अपमान। परक समुन्नति सुनि सन्ताप ओतहि होथि हर्षमे। व्याप।। धर्म्म काजकेँ बूझथि पाप। पावथि ओ सज्जन सँ शाप। दुखी न होथि ओ आनक दुख सौं। सुखी होथि पुनि अपनहि सुख सौं। निज गुण गान उदधि मे मज्जन। पर उपकार करै नहि दुर्जन।। जँ ओ राखथि सत्य गुमान तँ गुणिजन करथिन्ह सन्मान। जँ नहि भखितथि अपन प्रलाप तँ नहि पवितथि अति सन्ताप। जँ नहि रहितथि छिन्न मती। तँ नहि होइतथि खिन्न अती।। जँ ओ रहितथि किछु सुमती। तँ नहि कटितथि अति विपती।। अपन अभीष्ट करब मे दक्ष। नहि ओ करताह ककरो पक्ष।। मन मलीन तन नहि छन्हि स्वच्छ। ओ छथि गामक मल प्रत्यक्ष।। गारिक फज्झति नहि छनि लाज छनि सब टा नीचक सन काज।। जँ मिलितथि पुनि संग समाज। तँ ओ करितथि अपन स्वराज।। लेखक: (शिशु) (प्रभात, अंक-12, दिसम्बर-1934 ई.) पहिल चित्र व्यासजीक हस्तलिखित छनि दोसर चित्र बुद्धि परीक्षा प्रभात-वर्ष 2, अंक -4 अप्रैल 1934क थिक। संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-7 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-8 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-9 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-10 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-11 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-12 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-13 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-14 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-15 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-16 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-17 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.३.प्रणव कुमार झा-एआई युग मे सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग - कोडिंग से सिस्टम थिंकिंग तक प्रणव कुमार झा एआई युग मे सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग - कोडिंग से सिस्टम थिंकिंग तक मिथिलाक माटि मे मेधाक कहियो कमी नै रहल अछि। तर्क आ दर्शन जतय सदिखन विद्यमान रहल अछि, ओहि धरतीक युवा आइ दुनियाक पैघ-पैघ आईटी (IT) कंपनी मे अपन लोहा मनवा रहल छथि, आ छोट, मीडियम, उच्च हर तरहक प्रोफाइल पर कार्यरत छैथ।21म सदी के शुरुआती से जे ऐ सेक्टर मे विद्यार्थी आ गार्जियन के रुझान रहल तेकरे ई परिणाम छल। मुदा, समयक पहिया अनवरत घुमैत रहय अछि। आइ अपने सभ ओहि युग मे छी जतय सॉफ्टवेयर स्वयं सॉफ्टवेयर लिखय लागल अछि। जाहि "कोडिंग" केँ एक समय 'सुपर स्किल' मानल जाय छल, ओकरा एआई (AI) चुटकी मे कऽ रहल अछि। एहन मे प्रश्न उठैत अछि - की अबै वाला समय मे सॉफ्टवेयर इंजीनियरक आवश्यकता खतम भऽ जाएत? की हमर डिग्री बेकार भऽ जाएत? की आब ऐ क्षेत्र मे स्कोप नै बचत? कदाचित उत्तर अछि - नै, मुदा काज करबाक तरीका अवश्य बदलि जाएत। आन आन फील्ड के संगहि सॉफ्टवेयर डेल्वलपमेंट आ आईटी सर्विसेस के क्षेत्र मे सेहो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) कऽ बढ़इत प्रभाव के कारण ऐ फील्ड के छात्र, नव स्नातक आ मध्यम-कैरियरक पेशेवर सभक बीच उत्साहक मेघ आ चिंताक करिया बादल दुनु संगे संग उत्पन्न भेल अछि। कोडिंग, जे ढांचागत तर्क (Structured Logic) आ दोहराओल जा सकय वाला पैटर्न पर आधारित होइत अछि, एआई ट्रेनिंग लेल विशेष रूप सँ उपयुक्त सिद्ध भेल अछि। जेना-जेना एआई मॉडल कोड जेनेरेट करबा, टेस्ट करबा आ डीबग (Debug) करबा मे बेसी सक्षम भऽ रहल अछि, ऐ फील्ड से जुडल अथवा ऐ फील्ड मे करियर बनेबाक सोचय बला कतेको लोकक मोन मे एकटा सीधा प्रश्न आबि रहल अछि जे प्रासंगिक बनल रहबाक लेल एकटा सॉफ्टवेयर पेशेवर केँ आब असल मे की सीखय पड़त? जे हाई स्किल्ड प्रोफेशनल छैथ वा बहुत निक कॉलेज आ यूनिवेर्सिटी मे पढ़ाई कऽ छैथ ओ सब ऐ प्रश्न के उत्तर संग बेहतर भविष्य के लेल तैयार छैथ, मुदा मध्यम-स्तरीय कॉलेज मे पढ़य बला वा ऐ फील्ड मे एंट्री वा मध्यम लेवेल पर काज करय बला प्रोफेशनल सभ के वा हुनकर हितैषी/गार्जियन सभ के ई प्रश्न अक्सर परेशान कऽ रहल छैन। ताहि लेल अपना सामान्य अनुभव के आधार पर हम ऐ लेख के माध्यम से एकर उत्तर खोजबाक प्रयास कऽ रहल छी। ऐ मामला मे हमर तर्क अछि जे ऐ चिंता आ विमर्श के उत्तर मशीन कऽ गति सँ मुकाबला करब नै अछि, आ नै प्रोग्रामिंग कऽ बुनियादी सिद्धांत (Fundamentals) केँ छोड़ब अछि। एकर बदला मे अपन सोच केँ ऊँच करब आ पढ़ाई/प्रशिक्षण आ काज करय के तरीका मे परिवर्तन करबाक आवश्यकता अछि। आन मशिने जेका एआई सेहो एकटा मशीन अछि आ ताहि दुआरे आने आन मशीन जेका एकरो अपन कंपीटीटर नै अपितु अपन सहायक बनेबाक प्रैक्टिस करबाक अछि। एकटा साधारण उदाहरण से बात के आर बेसी खुलासा से बुझबाक प्रयास करय छी। एलेक्ट्रोनिक केलकुलेटर के प्रयोग करीब सात दशक से भऽ रहल अछि। मुदा आइयो स्कूल मे बच्चा सभ के अरिथमेटिक आ अलजेबरिक केलकुलेशन वैह सिद्दत से सिखाओल जाइत छैक जेना पहिने। ऐ केलकुलेटर के प्रयोग रियल-लाइफ प्रोब्लेम सोलविंग मे वैह बेहतर कऽ रहल अछि जे या त कैलकुलेशन के सभटा सिद्धान्त के बेहतर तरीका से सिखलक अछि अथवा जे केलकुलेटर के बेहतर उपयोग के प्रेक्टिस केलक या दुनु। एकटा आन उदाहरण अछि जे पहिने अकाउंटेंट हाथ सँ बही-खाता लिखैत छलाह। जखन एक्सेल (Excel) अयलै तँ लोक केँ लागल जे आब अकाउंटेंट कऽ काज खतम भऽ जाएत। मुदा भेल एकर उलटा। एक्सेल कऽ कारण अकाउंटेंट सभ बेसी जटिल गणना आ वित्तीय योजना बनाबय मे सक्षम भेलाह। परिणाम बैंकिंग आ वित्तीय क्षेत्र मे ग्राहक के बेहतर सेवा आ सुविधा प्राप्त भेल। एआई सॉफ्टवेयर लाइफ साइकिल केँ फेर सँ परिभाषित कऽ रहल अछि। डिजाइन, आर्किटेक्चर, डिप्लॉयमेंट, सपोर्ट आ निरंतर सुधार मनुष्यक हाथ मे अछि। एआई अहाँक काज केँ फेर सँ परिभाषित कऽ रहल अछि एकटा सॉफ्टवेयर डेवलपर कऽ रूप मे अहाँ की करब? सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट मे एआई के बढ़इत प्रयोग से उत्पादकता मे वृद्धि वास्तविक अछि आ एकर प्रभाव सेहो पैघ अछि। हमर अपन अनुभव मे, डेवलपर्स एकर समुचित प्रयोग से दैनिक कोडिंग काज मे क्षमता (Throughput) me कम सँ कम 30 प्रतिशत कऽ उछाल देखि सकैत छथि। संक्षेप मे कहि त सॉफ्टवेयर बहुत तेजी सँ बनाओल जा सकैत अछि, टेस्ट केस बेसी तेजी सँ जेनरेट कैल जा सकैत अछि, आ इटरेशन साइकिल (Iteration Cycles) छोट भऽ गेल अछि। एकर अर्थ अछि जे टीम आब बेसी स्वतंत्र रूप सँ प्रयोग कऽ सकैत अछि कियैक तँ विफल हेबा मे आ फेर सँ प्रयास करबा मे आब समयक लागत ओतेक नै रहि गेल अछि। गहीर बदलाव इंजीनियरक सोच मे अछि। लाइन-दर-लाइन कोड लिखबा मे अपन समय बितयबाक बदला मे अहाँ केँ सिस्टम कऽ बारे मे बेसी गहराई से सोचय पड़त। हम एहि सिस्टम केँ कोना डिजाइन कऽ रहल छी? हम की समाधान प्राप्त करय चाहैत छी? एक बेर जखन स्पष्टता आबि जाइत अछि, तँ स्ट्रक्चर्ड प्रॉम्प्ट्स (Structured Prompts) एआई टूल्स केँ बेसी सँ बेसी कोड जेनेरेट करबा लेल निर्देशित कऽ सकैत अछि। छात्र सभ लेल संदेश ई अछि जे प्रोग्रामिंग लैंग्वेज केँ नै छोड़ू, भले ही एआई ओहि कोडक पैघ हिस्सा लिखि सकय अछि, मुदा ओकर बुनियादी स्ट्रक्चर, लॉजिक आ सिद्धान्त के लगातार प्रैक्टिस करू। एत्त एकटा समसामयिक उदाहरण देबय चाहब, जे हाल-फिलहाल मे एकटा खबर आयल छल जे एकटा नामी सॉफ्टवेयर कंपनी किछ डेवलपर रिक्रूट कऽ रहल छल। जे सब सेलेक्ट भेल ओकरा सभ के अचानक से एकटा नोटिस निकाली के नियुक्ति ई कहैत रद्द कऽ देलक जे सभ गोटे अप्पन लॉजिक लगेबाक स्थान पर मशीन से कोड लिखेने छलाह। प्रतिउत्तर मे तर्क देल गेल जे साधन जे होय यदि साध्य के प्राप्त कऽ लेल गेल त पाछा ई बहाना से छांटब उचित नई। ऐ पर कंपनी के तर्क आयल जे जखन 100% आउटपुट मशीने से लेबाक अछि त हम ह्यूमन हायर किए करू ! बुनियादी ज्ञान (Fundamentals) कऽ महत्ता: जेना कोनो गजल वा कविता लिखबा लेल भाषा, व्याकरणक ज्ञान, विषय के परिप्रेक्ष्य (Context), भाव आदि के ज्ञान आवश्यक अछि, तहिना एआई कऽ युग मे सेहो कम्प्यूटर आ सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग के 'फंडामेंटल्स' बुझब अनिवार्य अछि। डेटा स्ट्रक्चर आ एल्गोरिदम: ई नीव अछि। जँ नीव कमजोर रहत तँ एआई द्वारा लिखल कोड मे गलती (Bugs) अहाँ पकड़ि नै सकब। संगहि जटिल डाटा फ़्लो के समझ से ही एकटा कॉम्प्लेक्स सिस्टम के विकास संभव भऽ सकय अछि। सुरक्षा आ गवर्नेंस: एआई जखन कोड लिखैत अछि तँ ओकरा 'ओपन सोर्स' सँ उठा सकैत अछि, जाहि सँ सुरक्षाक खतरा बढ़ि जाइत अछि। भविष्यक इंजीनियर कऽ मुख्य काज मे एकटा ई हेतैक जे ओ एहि कोडक सुरक्षा जाँचि सकय। 'प्रॉम्प्ट इंजीनियरिंग' - नवाचारक नव अस्त्र: ई लेखक एकटा मूल मंत्र ई अछि जे स्पष्ट निर्देश देबाक कला सीखू। एआई एकटा एहन अलादीन कऽ चिराग अछि जे अहाँक आज्ञा तँ मानत, मुदा अहाँक आज्ञा कतेक सटीकऽ अछि, ओही पर परिणाम निर्भर करत। जाहि केँ तकनीकी भाषा मे 'प्रॉम्प्ट इंजीनियरिंग' कहल जाइत अछि। CRAFT (Context Role Action Format & Tweaks) मेथड के उपयोग अहाँ के ऐ कला मे माहिर बना सकय अछि। अनवरत अभ्यास (Daily Practice): तकनीक आ इंजीनियरिंग के क्षेत्र मे लगातार एआई टूल्स (ChatGPT, Copilot, etc.) कऽ संग प्रयोग करू। अनलर्निंग (Unlearning): जे पुरान भऽ गेल अछि ओकरा छोड़बाक साहस राखू आ नव तकनीक केँ अपनाउ। एआई अहाँक नौकरी नै छीनि रहल अछि; ई अहाँ केँ अहाँक काज मे की करबाक अछि ओकरा फेर सँ परिभाषित कऽ रहल अछि। सॉफ्टवेयर विकास मात्र कोडिंग नै अछि - कोडिंग लाइफ साइकिल कऽ मात्र एकटा हिस्सा अछि। यद्यपि ई एकटा सही बात अछि जे एक दशक पूर्व तक कोडिंग के सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट के क्षेत्र मे सुपर स्किल मानल जाय छल। हम सभ जेखन ग्रेजुएशन/पोस्ट ग्रेजुएशन मे रही, तखन एकटा सामान्य प्रशिक्षण संस्थान मे लर्निंग के रूप मे सबसे बेसी ज़ोर कोडिंग स्किल पर देल जाय छल। यद्यपि कोडिंग सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट लाइफ साइकिल के 30% से कम हिस्सा छैक तथापि सामान्य प्रशिक्षक आ प्रशिक्षु एहि स्किल पर 70% तक समय दैत आबि रहल अछि। मुदा सुपर स्किल आब ई भ गेल अछि जे अहाँ कोना कोनो अवश्यत (Requirement) केँ एकटा समाधान (Solution) मे बदलैत छी आ फेर ओकरा एकटा स्ट्रक्चर्ड प्रॉम्प्ट मे बदलैत छी। SAD(System Analysis & Design) अपना नामे अनुकूल एकटा उदासीन आ बोरिंग लागय वला विषय छैक, ओतहि डाटा स्ट्रक्चर आ अल्गोरिथम कॉम्प्लेक्स गणितीय व्यवहार बाला विषय। स्वाइत साधारण संस्थान मे ई विषय के लऽ कऽ पढ़बई आ पढ़ई बला दुनु मे अक्सर उदासीनता देखल जाय छैक, मुदा ऐ फील्ड मे भविष्य के बेहतर तैयारी लेल ई विषय सबहक थोरो नॉलेज आवश्यक छैक। हर दिन अभ्यास करू, अपडेट रहू, आ कहियो अपन फंडामेंटल्स (बुनियादी ज्ञान) केँ नजरअंदाज नै करू। चलु फेर से एकबेर केलकुलेटर बला उदाहरण पर चलय छी। केलकुलेटर जे हर तरहक गणितीय केलकुलेशन मे सक्षम अछि के रहितों, लर्निंग के शुरुआती फेज मे विद्यार्थी के मैनुअल केलकुलेशन के खूब अभ्यास कराओल जाय अछि। जाहि से की ओ केलकुलेशन विधा के सभटा सिद्धान्त के ज्ञान आ अनुभव प्राप्त कऽ सकय। ड्रीम वीबर या वीएस कोड सन एडिटर दसको पहिले आबि गेला के बावजूद शुरुआती समय मे विद्यार्थी के साधारण नोटपैड पर कोडिंग के अभ्यास कराओल जाय छैक। जेकर कारण सेहो विषय के फंडमेंटल्स क्लियर केनाइ आ बेसिक अनुभव देनाई रहय छैक। अपन प्रशिक्षण आ शुरुआती करियर के समय मे बौद्धिक शालीनता (Intellectual Complacency) बहुत महत्वपूर्ण अछि । जँ अहाँ अपन कैरियरक शुरुआत मे अपन साभटा सोच एहि टूल्स केँ सौंपि देब तँ अहाँ अपना भीतर जटिल एंटरप्राइज सिस्टम केँ डिजाइन करबाक क्षमता विकसित नै कऽ सकब। एआई कऽ संग प्रोटोटाइप बनयबा मे आ मिशन-क्रिटिकल डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर बनयबा मे अंतर अछि। एहि क्षेत्र मे आर्किटेक्चरल जजमेंट कार्यस्थल पर कतेको सालक समझ सँ विकसित होइत अछि। सुरक्षा आ गवर्नेंस (Security & Governance): एकटा आर महत्वपूर्ण तर्क अछि जे एआई द्वारा कोड लिखायब आ सॉफ्टवेयर विकास आब आधारभूत कौशल (Foundational Skills) बनि रहल अछि। मुदा एआई द्वारा कोड जेनेरेट करबा आ डेवलपर्स द्वारा ओपन-सोर्स रिपॉजिटरी सँ कोड लेबा सँ जोखिम बढ़ि जाइत अछि। अहाँ केँ सुरक्षित, गवर्नड सॉल्यूशन बनयबाक तरीका सिखबाक चाहिए। इंजीनियर केँ कमजोरी (Vulnerabilities) कऽ स्कैन करबा, डेटा लीक कऽ पता लगायबा आ जिम्मेदार एआई सिद्धांत (Responsible AI Principles) लागू करबा मे सक्षम होबय के चाही। अहाँ केँ Encryption (डेटा केँ गुप्त कोड मे बदलव) आ Authentication (सही यूजर कऽ पहचान) कऽ गहीर जानकारी राखय पड़त। OWASP Standards: ई सुरक्षाक एकटा वैश्विक मानक अछि। अहाँ केँ ई सीखय पड़त जे कोना 'एसक्यूएल इंजेक्शन' या 'क्रॉस-साइट स्क्रिप्टिंग' जकाँ हमला सँ अपन सॉफ्टवेयर केँ बचाओल जाय। ट्रबलशूटिंग (Troubleshooting): समस्याक जड़ि धरि पहुँचब: एआई कोड तँ दऽ देत, मुदा जखन ओ कोड क्रैश करत, तखन एआई कन्फ्यूज भऽ सकैत अछि। ओतय अहाँक Debugging स्किल काज लागत। Root Cause Analysis (RCA): मात्र गलती ठीक करब पर्याप्त नै अछि, ई बुझब जरूरी अछि जे गलती कियैकऽ भेल? लॉग्स (Logs) पढ़ब: जखन सर्वर डाउन होइत अछि, तँ सिस्टम लॉग फाइल्स जेनरेट करैत अछि। एकटा नीक इंजीनियर ओहि नीरस फाइल केँ पढ़ि कए समस्या पकड़ि लैत अछि। कोनो प्रकार के सेक्यूरिटी कंप्रोमाइज़ या एरर के स्थिति मे सेहो लोग्स पढ़बाक आ मूल कारण पता लगायब, लीक के सोर्स पता लगायबएकटा महत्वपूर्ण स्किल अछि। एआई सेहो एहि मे अहांक कोपायलट के भूमिका मे राहत। रिवर्स इंजीनियरिंग: कतेक बेरि अहाँ केँ एआई कऽ लिखल कोड केँ रिवर्स कऽ कए देखय पड़त जे ओ कोना काज कऽ रहल अछि। ई कसरत अहाँक दिमाग केँ तेज बनओत। ऐ प्रकार के अभ्यास अहाँ के जॉब मार्केट मे रिलीवेंट बनेने रहत। हमरा इहो नै लागय अछि जे एंट्री-लेवल कऽ भूमिका साफे खतम भऽ जेतैक। शुरुआती झटका अवश्य लागि रहल अछि मुदा लॉन्ग रन मे नौकरी खतम नै हेतैक। ओ परिवर्तित (Transforming) भऽ रहल अछि। एआई कऽ युग मे मात्र ओहि लोक कऽ अस्तित्व खतरा मे अछि जे बदलब नै चाहैत छैथ वा अलग अलग स्किल सेट के सिखबा मे आलस करय छैथ। अहाँ अपन लॉजिकऽ मजबूत करू, SDLC कऽ हर प्रक्रिया मे माहिर बनू, आ कोडिंग केँ (प्रैक्टिस के संग) एआई कऽ भरोसे छोड़ि कए 'सिस्टम थिंकिंग' पर ध्यान दियौ। मिथिलाक मेधा सदा सँ श्रेष्ठ रहल अछि, आ एआई युग मे सेहो मिथिलाक बालक बालिका सब ऐ फील्ड मे अग्रणी रहता ई हमर विश्वास अछि। -प्रणव कुमार झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.४.आशीष अनचिन्हार-2036 धरिक साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेताक सूची आशीष अनचिन्हार 2036 धरिक साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेताक सूची प्रस्तुत अछि 2036 धरिक माने अगिला दस सालक साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेताक सूची। हमर ई सूची 51 टा केर अछि जाहिमे 39 टा एहि ठाम अछि। 2026 केर मास अगस्त धरिक लेल 1 टा नाम हम विदेहक होली उपाधि 2026 मे इंगित केने छी सेहो बाल-पुरस्कार लेल। पाठक विदेहक उक्त होलीक उपाधिसँ मिला सकैत छथि। एहि सूचीमे मात्र लेखकक चयन भेल अछि पोथीक नहि, विधाक नहि, पुरस्कार कैटेगरीक नहि आ वर्षोक नहि। कोनो वर्षमे कोनो विधाक कोनो पोथीपर, कोनो कैटगरीमे भेटनि मुदा भेटतनि सूचीमे देल लेखककेँ। एहि सूचीक आधार वएह अछि जे सभ दिनसँ मैथिलीमे छै- 1) सबिता झा 'सोनी' 2) रमण कुमार सिंह 3) कमल मोहन चुन्नू 4) विद्यानन्द झा 5) सुभाष चंद्र यादव 6) दिलीप कुमार झा 7) कीर्तिनाथ झा 8) केदार कानन 9) शैलेन्द्र कुमार झा 10) विनोद कमार झा 11) तारानन्द वियोगी 12) अरविन्द अक्कू 13) सुस्मिता पाठक 14) गंगानाथ गंगेश 15) निवेदिता झा 16) विकास वत्सनाभ 17) बैद्यनाथ झा 18) रोमिशा 19) रमेश 20) योगेन्द्र पाठक 'वियोगी' 21) देव शंकर नवीन 22) सतीश वर्मा 23) भास्कर ज्योति 24) दीपिका चंद्रा 25) कुमार विक्रमादित्य 26) प्रियंका मिश्रा 27) पुतुल मिश्रा 28) आशीष चमन 29) रंगनाथ दिवाकर 30 अशोक अविचल 31) नूतन झा 32) विनीत उत्पल 33) गुंजन श्री 34) अंजली कुमारी 35) स्वाति शाकंभरी 36) कमलेश प्रेमेन्द्र 37) मैथिल प्रशान्त 38) दीपिका झा 39) दीपा मिश्रा 40) तारानंद झा 'तरुण' 41) चंद्रमणि झा 42) प्रकाश झा 43) कमलानंद झा 'विभूति' 44) विभा कुमारी 45) निक्की प्रियदर्शनी 46) प्रीतम निषाद 47) सोनी नीलू झा 48) विभा रानी 49) अविनाश दास 50) बुद्धिनाथ मिश्र अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.५.प्रीति कुमारी-सम्मान'क सम्मान प्रीति कुमारी सम्मान'क सम्मान
एक सरकारी लटकल सम्मान'क घोषणा बढ़ बिलम्ब सँ भेल अछि। एहि सम्मान वा पुरस्कार संबंधित हो-हंगामा केर अंदेशा सँ किछ समय ले ऐनवक्त पर अनावश्यक रूप सँ घोषणा बढाओल गेला सँ मैथिली भाषा मेँ पोथीके चयन पर उहापोह मचल छल। ताहि बीच साहित्य अकादमी पुरस्कार सँ पृथक सम्मान सँ बिहार'क समान्य लोकमे अतिशय प्रशन्नता पसरल रहय। सम्मानक दौड़मे सन् २०२६ के पद्मश्री सम्मान पाबि चारिगोट विभूति बिहारके मान बढबैत अपन विशिष्ट साधना सँ आई राष्ट्रीय फलक पर विशिष्ट छाप छोड़लनि । गणतंत्र दिवसके पूर्व संध्या पर केन्द्र सरकार एहिक घोषणा कऽ क्षेत्रीय मानसिकता'क बिहार बासिक बीच कला, विज्ञान आ संस्कृतिक क्षेत्रमे एक खुशी पसारलनि। पहिल स्वर्गीय विश्व वन्धु पटनाक (दानापुर) शाहपुर'क रहबासीकेँ मरणोपरांत ९५ वरखक आयुमे कला बावत सम्मानित कयने छलैन। पुरस्कारक घोषणा सँ पूर्वहि २०२५ के मार्चमे हुनक निधन भेल रहनि। लोकनृत्य 'डोमकच' केँ ग्रामीण आँगन सँ बहार कय ओ अन्तर्राष्ट्रीय मंच धरि पहुंचौने रहथि। लगधक ६००० सँ अधिक मंच पर हुनक प्रस्तुति हेबाक वाद्य कलाप्रेमी सुधी पाठकजन अपना मानस पटलमे ई खबेर सहेजने छथि। कमला पूजा षटचक्र अग्नि नृत्य नव विधाक ओ सृजनकर्ता भेलाह। सन् १९५९ ई०मे ओ पटना 'सुरंगन' नामक अकादमी केर स्थापना कय सहस्त्रों युवा केँ एहि लोककला सँ नि:शुल्क प्रशिक्षण दैत कीर्तिमान बनौने छलाह। दोसर श्री भरत सिंह भारती - लोक गायन क्षेत्रमे लगधक १००० सँ अधिक भोजपुरी गीतक रचना कय , ताहिके स्वर देलनि। ई महान् व्यक्तित्व १९६२ ई०सँ आकाशवाणी - पटनामे जुटि लोक संगीतक शुद्धता बनौलनि अछि। ओ तबला- डुग्गी,मजीरा , हैरमुनियम आ बौसली वाद्यके माध्यम लोक गायनकेँ शास्त्रीय रुपेँ चोटिपर पहुँचेलनि अछि। हिनका पूर्वमे संगीत नाटक अकादमी " अमृत पुरस्कार" सँ सेहो सम्मानीत केयने रहनि । तेसर छथि- डॉ ० गोपाल जी त्रिवेदी -: विज्ञान आ इंजीनियरिंग क्षेत्रसँ जे प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक आ राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय 'क पूर्व कुलपति रहि चुकल छथि। ई मुजफ्फरपुर गायघाटके रहबासी थिकाह जे कैनोपी मैनेजमैंट द्वारा लीची बगानक कायाकल्प लेल तकनीक विकसित कैलाह अछि। संगहि किसानके मखान ,सिंहार आ जाड़ा मासक मकई खेतीमे दूगुणा लाभ कोना होय, ताहि ले अभूतपूर्व काज कयलन्हि अछि। डॉ० श्याम सुंदर माखड़िया -: चिकित्सा क्षेत्रमे विशेष कय कालाजार बोखार उन्मूलन लेल समर्पित रहल छथि। सन् १९९४ मे कालाजार रिसर्च सेंटरके स्थापना कऽ लगधक २०,००० सँ बेसी मरीजक मुफ्त इलाज कयलन्हि अछि। सन् २०२५ ई० के मैथिली भाषा मेँ मूल पुरस्कार 'क घोषणा समय सँ होयमे कतेको कारण सँ थकमकाएल छल , से आब फरीछ रुपेँ नाम घोषित भेल अछि। ई पुरस्कार ऐ बेर साहित्योत्सब समारोह , नव दिल्लीमे ३१ मार्च २६ केँ डॉ०(प्रो०) महेंद्र झा जी'क संस्मरण पोथी' धात्री पात सन गाम' केँ देल जायत। आनबेर जेकाँ मैथिली साहित्य पोथी पर आपत्तिजनक बहस होय छल ,से अपवाद छोड़ि कोनू कोन सँ अनघोल नहिं भेल अछि। से एक सकारात्मक सोच सँ लेखकीय समाज आ आन्दोलनीक बीच बेस समन्वय बुझिमे आयल अछि। तेँ सम्मान क' सम्मान करब परम आवश्यक बुझाइत छैक। ई सम्मान हुनका कोसी क्षेत्रक ग्रामीण संस्कृति, परंपरा आ जिजीविषाके मार्मिक चित्रणके लेल भेट रहलनि अछि। एहि सम्मानमे एक लाख टाका नगद, एक तामक पट्टिका आ शाॅल पुरस्कार रुपेँ देल जेतन्हि। डॉ० झाजीक विषयमे संक्षिप्त जनतब साहित्य सेवी श्री लालदेव कामत जीके आलेख पढि भेल रहय , जे मैथिलीक त्रिमासिक पत्रिका " कोसी संदेश " अंक - २४ संयुक्तांक जन०- जून २०२५ मे प्रकाशित भेल रहैक। एहि पत्रिका केँ आई एस एस एन. २३९५- २२५३ भेटल छैक। डॉ० महेंद्र झा जी'क जनम ६ जन० १९४७ ई० मे सुपौलक सटले भेलाही गाममे मैथिल ब्राह्मण परिवारमे भेल छन्हि । ई चिन्हार गाम हमर दिदि श्रीमती सुन्नैर देवीके सासुर आओर श्रीमती लक्ष्मी देवी काकी केर नैहर छी। लगधक ८० वर्षीय लेखक श्री महेन्द्र बाबू विगत कोरोना कालीन समयमे अपन बेटी - जमाय लग राँचीमे रहि 'धात्री पात सन गाम ' मैथिली भाषा मेँ प्रेरक संस्मरण लिखलन्हि। सन् २०२१ ई०मे प्रकाशित एहि पोथीकेँ साहित्य अकादमीक तीनू जुरी महोदय पुरस्कार लेल चयन केलथि। ऐ पोथीक संगहि हुनक पड़ोसी आ अभिन्न मित्र प्रो० सुभाष चन्द्र यादव जीके पोथी सेहो पाईनलमे रहैक । श्री यादव जी मैथिली जगतमे प्रख्यात कथाकार रहल छथि। कोसी कछेरके समाजशास्त्रीय अध्ययन श्री महेन्द्र जीके हुनक पिताजी सँ भेलनि, निधन पछाति १५ जून १९७० केर वाद पित्ती आगू बतबैत रहलनि। सुपौल , सहरसा , तेलंगाना आ झारखंडमे हिनका साहित्यिक अवदान लेल अनेकों पुरस्कार भेटल छन्हि। श्री झाजीक मैथिली साहित्यके कतेको विधामे प्रेरणादायक अनेकों पोथी छपल छन्हि। धर्मपत्नी'क गुजरलाक वादो मातृभाषा लेल अहर्निश सेबक बनल देखाईत छथि। सम्मान'क सम्मान वहुविधावादी सशक्त हस्ताक्षर श्री महेन्द्र के लेल मंगल कामना करैत छियैन , जे ओ शतकजीवी होथि! - प्रीति कुमार,ी बी.ए., बीएड. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.६.गजेन्द्र ठाकुर-उमेश पासवानक "मुजरिम" गजेन्द्र ठाकुर उमेश पासवानक "मुजरिम" उमेश पासवानक �मुजरिम�मे एक सोरे कथा अछि। १ �सुनन्दा� कथा शिक्षित युवती सुनन्दा आ ओकर पिता रमण मास्टरक माध्यमसँ समाजक संकीर्ण सोचकेँ उजागर करैत अछि । सड़कक कात पर भेटल परित्यक्त नवजात शिशुकेँ सुनन्दा दयावश घर लऽ अबैत अछि, मुदा गाम ओकरा चरित्रहीन ठहरबैत अछि । पिता सेहो लोक-दबावमे आबि जाइ छथि । बादमे खुलासा होइत अछि जे बच्चा गामक प्रतिष्ठित घरक अविवाहित बेटीकेँ जन्मल छल । सत्य सामने आबिते सभ आरोप झूठ साबित भऽ जाइत अछि । ई कथा स्त्री पर लगैत सहज दोषारोपण, जाति-प्रतिष्ठाक दबाव, लोकक कुटिचौल आ मानवताक असली अर्थकेँ प्रभावी ढंग सँ उभारैत अछि । अन्तमे नैतिक साहस आ क्षमाशीलता समाजकेँ सही दिशा देखबैत अछि । �सोलकनमा पोखैर� कथा गाममे उत्पन्न भीषण पानिक संकट आ जातिगत भेदभावक विडम्बनाकेँ उजागर करैत अछि । सोलकनमा टोलक पोखैरमे पानि रहितो ऊँच जातिक लोक ओकर उपयोगसँ बचैत अछि, आ जे उपयोग करैत अछि, ओकरा समाजसँ बहिष्कृत कऽ दैत अछि । छुआछूत आ ऊँच-नीचक सोच पानिक मूल आवश्यकता पर भारी पड़ैत अछि । अचानक आगि लागैत अछि, आ पूरा गाम ओही पोखैरक पानि सँ बचैत अछि । जकरा अपवित्र कहल गेल छल, ओ पानि संकटमे जीवनरक्षक बनि जाइत अछि । ई कथा स्पष्ट करैत अछि जे प्राकृतिक संसाधन सभक लेल समान अछि, आ संकट समाजक बनावटी भेदरेखाकेँ भंग कऽ दैत अछि । �कर्मक फल� कथा रंजीतक पतनक कथा अछि । पढ़ल-लिखल आ प्रतिष्ठित घरक बेटा, खराब संगतिक प्रभावमे पड़ि दारूक लतमे फँसि जाइत अछि । पहिल बेर मजाकमे दारू पीबैत ओ पुलिसक हाथ चढ़ि जाइत अछि, जेल पहुँचैत अछि, आ ओतए अपराधीक संगति ओकर जीवनक दिशा बदलि दैत अछि । बादमे ओ दारू कारोबारमे पड़ि जाइत अछि, गिरफ्तारी, फरारी आ भेष बदलि साधु बनि लोककेँ ठगबाक प्रयास करैत अछि । सत्य सामने आबिते लोक ओकरा पुलिसकेँ सौंपि दैत अछि, आ अन्ततः ओकर घर कुर्की-जब्दीमे उजड़ि जाइत अछि । ई कथा स्पष्ट करैत अछि जे गलत संगति आ अनैतिक कर्म अन्ततः अपन दुष्परिणाम अवश्य दैत अछि । �गिरहत घर पर गिद्ध� कथा दौलतपुर गामक जातिगत भेदभाव आ सामाजिक टकराव पर आधारित अछि । श्राद्ध-भोजमे दलित युवकसभकेँ पाँतसँ उठा देल जाइत अछि । बादमे मन्दिर-प्रवेशक कारण एक युवककेँ मारि दण्डित कएल जाइत अछि । अपमानित दलित समुदाय निर्णय लैत अछि जे ऊँच जातिक घरक मरलाहा माल-मवेशी उठेनाइ आ परम्परागत सेवा बन्द करत । कनी दिनमे बेमारीसँ जानवर मरए लगैत अछि आ गाममे गिद्ध मँडराए लगैत अछि, जाहिसँ जमींदार स्वयं संकटमे पड़ि जाइ छथि । अन्ततः पंचायत हस्तक्षेप करैत अछि आ समान अधिकारक प्रश्न उठैत अछि । ई कथा सम्मान, श्रम आ बराबरीक प्रश्न सोझाँ आनैत अछि । �तेतर दास� कथा तेतरा नामक बालकक जीवन-यात्राकेँ प्रस्तुत करैत अछि । जन्म समय माए प्रसवमे गुजरि जाइ छथि, तैं गाम ओकरा अपशकुन मानि �लूटना� कहैत अछि । पिता प्रेमसँ ओकर पालन-पोषण करैत छथि, आ ओ पढ़ाईमे तेज सिद्ध होइत अछि । संस्कृत अध्ययन करैत-करैत ओ विद्वान बनि सन्त रूपमे प्रसिद्ध होइत अछि आ �तेतर दास� कहल जाइत अछि । हजारों लोक ओकर प्रवचनसँ प्रभावित होइत अछि । मुदा गोविन्दपुर मठक महंथ बनबाक प्रस्ताव पर जातिगत विरोध उठैत अछि । पीड़ासँ आहत भऽ ओ सब कुछ छोड़ि गाम घुरि जाइत अछि । ई कथा समाजक जाति-आधारित सोच आ प्रतिभाक अवमाननाक विडम्बनाक मार्मिक चित्र प्रस्तुत करैत अछि । �कोदारि छाप� कथा पंचायत चुनावमे सत्ता आ लोभक खेलकेँ उजागर करैत अछि । बदमाश प्रवृत्तिक फोल्टर आरक्षित सीटक लाभ उठेबाक लेल दलित मजदूर मुसबाक अनपढ़ पत्नी फेकनीकेँ मुखिया बनबैत अछि । दारू, पैसा आ धमकीक बल पर चुनाव जिताओल जाइत अछि । जितलाक बाद फेकनी नाममात्रक मुखिया बनि रहैत अछि, आ सभ वित्तीय निर्णय फोल्टर करैत अछि । सरकारी योजना आ मनरेगा निधिमे भारी घपला होइत अछि । जाँचक दौरान फेकनी सच उजागर करैत अछि जे ऊ केवल औंठा-छाप देत रहल । अन्ततः फोल्टर आ फेकनी दुनू गिरफ्तार होइत छथि । �सहोदरा� कथा दू सहोदर भायक आ प्रेमक संबंध पर आधारित अछि । माता-पिताक मृत्यु बाद जनक अपन छोट भायकेँ पालि-पोसि पढ़बैत अछि । विवाहक बाद घरमे कलह शुरू होइत अछि आ बँटवारा भऽ जाइत अछि । समयक संग प्रेमक भाग्य चमकि उठैत अछि, आ जनक आर्थिक संकटमे फँसि कर्जक बोझ सँ दबि जाइत अछि । एक दिन प्रेम अपन भायकेँ मजदूरी करैत देखि पीड़ा अनुभव करैत अछि । अन्तमे ओ अपन दोकान जनककेँ सौंपि पुनः एकजुट होएबाक निर्णय लैत अछि । ई कथा त्याग, भाईचारा आ परिवारक संबंधकेँ उभारैत अछि । �गरीबक जिनगी� कथा भोल्टा आ ओकर बेटा बंठाक माध्यमसँ गरीब मजदूरक शोषण आ संघर्षकेँ चित्रित करैत अछि । गिरहत नूनूबाबू चाल चलि बंठाकेँ पढ़ाइ सँ हटा अपन घरक नोकरीमे लगा दैत अछि, आ महँगाई बढ़लाक बादो मजूरी नहि बढ़बैत अछि । बंठा प्रश्न उठबैत अछि तँ ओकरा धमकी देल जाइत अछि । गरीब सभ संगठित भऽ बाहरक गाममे काज करए लगैत छथि, जकरा कारण गिरहतक खेती ठप्प पड़ि जाइत अछि । बदला लेबाक भावसँ गिरहत रस्ता रोकि रोगीक इलाजमे बाधा दैत अछि, जकर परिणामस्वरूप बंठाक छोट भाय मरि जाइत अछि । बादमे झूठ चोरिक आरोप लगा बंठा आ भोल्टापर हमला कएल जाइत अछि, जाहिमे भोल्टा मरि जाइत अछि । बंठा हिंसाक रास्ता नहि चुनैत अछि, बल्कि कानूनक सहारा लैत अछि आ न्याय प्राप्त करैत अछि । �श्रमदानी बान्ह� कथा बरखाक समय गामक सुरक्षा-बान्ह पर केन्द्रित अछि । घनघोर वर्षासँ श्रमदानी बान्ह कमजोर भऽ जाइत अछि, आ लोक मुखियासँ मदद माँगैत अछि । मुखिया ऊपरसँ प्रशासनक भरोसा दऽ लोककेँ शांत करैत अछि, मुदा भीतरे-भीतर ओ बान्ह टूटबाक चाह रखैत अछि, जाहिसँ फसल-क्षति, राहत आ आवास योजनामे घूस-कमीशन कमा सकय । रातिमे ओ अपन चमचा सभसँ बान्ह कटवा दैत अछि, परिणामस्वरूप गाममे बाढ़ि पसैर जाइत अछि आ घर, अनाज आ मवेशी नष्ट भऽ जाइत अछि । बादमे पानिमे एक युवकक लाश भेटैत अछि, जे मुखियाक अपन बेटा निकलैत अछि । अन्ततः लालचक परिणाम निजी शोकक रूपमे सोझाँ अबैत अछि । �दछिनवारि टोल� कथामे मानिकपुर गाममे एन.एच. निर्माणक योजना बनैत अछि । गाम बचाबए लेल सड़क दच्छिन दिस घुमा देल जाइत अछि, मुदा दछिनवारि टोलक बुधना मल्लिकक घर उजड़ि जाइत अछि । ओकरा जमीनक मुआवजा नहि भेटै छै, तैं ओ नवका स्थान पर घर बनबैत अछि । सवर्ण टोलक लोक ओकरा जातिक कारण नापसंद करैत अछि आ ओकर पत्नी पर डायन हेबाक आरोप लगबैत अछि । रातिमे ओकर घरमे आगि लगा देल जाइत अछि । परिवार जान बचा कऽ बाहर निकलैत अछि, मुदा उजाड़ अवस्थामे सड़क कात सूतल चारू परानी ट्रकसँ पिचा कऽ मरि जाइत छथि । ई कथा जातिगत घृणा आ अमानवीयताक क्रूर रूप उजागर करैत अछि । �पगला पुल� कथा विनीत दासक जीवनक उतार-चढ़ाव प्रस्तुत करैत अछि । पढ़ाईमे तेज विनीतक, गलत संगति आ नशाक कारण, सभ जमीन बिका जाइ छै, ओ बताह सन भऽ जाइत अछि । गामक लोक ओकरा तिरस्कृत करैत अछि, तँ ओ नदी कात अपन जीविका चलबैत रहैत अछि । एक दिन मंत्री आ अधिकारीसभ नाव डूबला पर संकटमे पड़ैत छथि । सभ लोक तमाशा देखैत रहैत अछि, मुदा तथाकथित �पगला� विनीत नदीमे कूदि चारू गोटाक जान बचा लैत अछि । ओकर साहस चर्चाक विषय बनैत अछि, आ इलाजक बाद ओ आस्ते-आस्ते स्वस्थ होइत अछि । पुरस्कार माँगलापर ओ धन नहि, बल्कि नदी पर पुल निर्माणक आग्रह करैत अछि । अन्ततः पुल बनैत अछि आ समाज ओकरा नव सम्मान दैत अछि । �विधवा विवाह� कथा सुशीलाक जीवन-संघर्षक मार्मिक चित्रण करैत अछि । विवाहक पहिल रातिमे पति राजीव साँपक डँसला सँ मृत्युकेँ प्राप्त होइत छथि, आ सुशीला अल्प आयुमे विधवा बनि जाइ छथि । सासुरमे अपमान आ समाजक तिरस्कार हुनका भीतरसँ तोड़ि दैत अछि । पिता हुनका नैहर लऽ अबैत छथि, मुदा समाज विधवा-विवाह स्वीकार करबाक लेल तैयार नहि अछि । मानसिक पीड़ासँ व्यथित सुशीला आत्महत्या करबाक प्रयास करैत छथि । ओहि समय एक अभियन्ता युवक समय पर पहुँचि हुनका बचबैत अछि आ ओ विवाहक प्रस्ताव रखैत अछि । ई कथा समाजमे विधवा-विवाहक आवश्यकता आ मानवीय संवेदनाक प्रबल पक्ष प्रस्तुत करैत अछि । �वृद्धाश्रम� कथा गोपाल जी आ हुनकर बेटा रमणक माध्यमे कर्तव्य आ कृतघ्नताक संवेदनशील चित्र प्रस्तुत करैत अछि । गोपाल जी अपन जमीन बेचि आ मेहनत-मजूरी कऽ बेटाकेँ पढ़बैत छथि, आ ओकरा बैंक अधिकारी बनबैत छथि । विवाहक बाद रमण आ सुलोचना नौकरीक कारण शहरमे बसि जाइ छथि । वृद्ध माता-पिता सेवा-योग्य रहितो असुविधा बुझि वृद्धाश्रम भेजि देल जाइ छथि । समय बीतैत गोपाल जी आ हुनकर पत्नी दुनू परानीक मृत्यु भऽ जाइत अछि । अन्ततः रमण आ सुलोचना सेहो अपन बेटाक हाथे ओही वृद्धाश्रममे पहुँचा देल जाइ छथि । ई कथा स्पष्ट करैत अछि जे माता-पिताक उपेक्षा अन्ततः अपन जीवनमे दुखद परिणाम बनि घुरि अबैत अछि । �दोस्तक बिआह� कथा मित्रता आ जातिगत भेदभावक अनुभवक सजीव वर्णन करैत अछि । लेखक आ महेश बाल्यकालसँ घनिष्ठ मित्र छथि, संग पढ़ैत आ खाइत छथि । समय बीतैत महेश विवाह करैत छथि, आ लेखक लोकनियाँ बनि संग रहैत छथि । बरातमे लेखकक जाति उजागर होइतहि कन्यापक्ष लोकनियाँक रूपमे हुनका स्वीकार करब सँ इन्कार करैत अछि । ई घटना लेखककेँ अपमानसँ भरि दैत अछि, आ ओ रातिएँ घुरि जाइ छथि । पछाति महेश आ हुनकर परिवार क्षमा-याचना करैत अछि । अन्ततः लेखक सफल नौकरी प्राप्त करैत छथि आ अनुभव करैत छथि जे समाजमे जातिसँ बेसी आर्थिक स्थिति सम्मानक निर्धारक बनि गेल अछि । �मानवताक पूजारी� कथा लालच, शोषण आ आत्मपरिवर्तनक प्रभावशाली चित्र प्रस्तुत करैत अछि । चुन्नीलाल सेठ सूदखोरी कऽ गरीबक शोषण करैत छथि, आ हुनकर बेटा डॉ. श्याम रोगीक अनावश्यक जाँच लिखि धन अर्जित करैत छथि । डॉ. विवेक जानबूझि श्यामकेँ ब्लड कैंसरक झूठ निदान दऽ चेतना जगबैत छथि । मृत्यु-भय सँ विचलित पिता-पुत्र अपन आचरण बदलि दैत छथि, कर्जा माफ करैत छथि, गरीबक सहायता करैत छथि आ निःस्वार्थ भावसँ उपचार करए लगैत छथि । अन्ततः पता चलैत अछि जे बीमारी फुसि छल, मुदा एहि झटकासँ दुनू सचेत भऽ मानव-सेवा अपनबैत छथि । ई कथा स्पष्ट करैत अछि जे सच्ची प्रतिष्ठा धनमे नहि, बल्कि मानवता आ करुणामे निहित अछि । �भगवानपुर� कथा भगवान लाल दासक अद्भुत मानव-सेवा आ त्यागमय जीवनक प्रेरक चित्रण करैत अछि । ओ अविवाहित रहि अपन सम्पूर्ण जीवन गरीब-गुरबाक सहायता, बेटीक बिआह, पढ़ाइ, इलाज आ बसोबासमे समर्पित करैत छथि । बी.डी.ओ. बनलाक बाद सेहो ओ ईमानदारीसँ सेवा करैत अपन आय जनहितमे लगा दैत छथि । अन्ततः विद्यालय स्थापित कऽ शिक्षा-प्रसारक कार्यमे जुटि जाइत छथि । मृत्युक बादो समाजक जातिगत संकीर्णता उजागर होइत अछि, जखन हुनकर दाह-संस्कार श्मशानमे रोकल जाइत अछि । तथापि हुनकर त्याग आ सेवा समाजकेँ झकझोरि दैत अछि आ अन्ततः गाम हुनकर सम्मानमे अपन नाओं बदलि �भगवानपुर� राखैत अछि । २ सभसँ पहिने पोथीक शीर्षक "मुजरिम" स्थापित अर्थक विखंडन करैत अछि । सामान्य अर्थमे 'मुजरिम' ओ थिक जे अपराध करैत अछि। मुदा ऐ पोथीमे 'मुजरिम' शब्द अपन पारंपरिक अर्थ छोड़ि सत्ताक क्रूरता आ विशेषाधिकारक प्रतीक बनि जाइत अछि । समाजमे कात-करोटामे ठाढ़ लोक जेकर शोषण भऽ रहल अछि, ओकरा व्यवस्था 'मुजरिम' घोषित कऽ दैत अछि। एतय प्रश्न उठैत अछि जे असली मुजरिम के अछि�ओ शोषित वर्ग जकरा पर लेबल लगाओल गेल अछि, वा ओ वर्चस्ववादी व्यवस्था जे ई लेबल तय करैत अछि? ३ समाजमे जेकरा 'हीन' वा 'अपवित्र' मानल जाइत अछि, अंततः 'पवित्र' केंद्र ओकरे पर निर्भर होइत अछि। "सोलकनमा पोखैर" कथामे सोलकनमा टोलक पोखैर कें ऊँच जातिक लोक अछूत आ अपवित्र मानैत अछि । मुदा जखन गाममे आगि लगैत अछि, तखन ओही 'अपवित्र' पोखैरक पानि पूरा गामक प्राण बचबैत अछि आ जीवनरक्षक (अमृत/पवित्र) बनि जाइत अछि । ई कथा छुआछूत आ पवित्रताक मिथक कें पूर्ण रूपेँ उलटि दैत अछि आ देखाबैत अछि जे संकट कालमे बनावटी सामाजिक भेदरेखा कोना भसि जाइत अछि । ४ "गिरहत घरपर गिद्ध" कथामे सवर्ण जमींदार स्वयं कें सत्ता आ शक्तिक केंद्र मानैत छथि । मुदा जखन दलित वर्ग अपमानित भऽ कऽ मरल माल-मवेशी उठबय सँ इन्कार कऽ दैत अछि, तखन ओही 'शक्तिशाली' लोकक घरपर गिद्ध मँडराय लगैत अछि आ ओ नचार भऽ जाइ छथि । एतय परिधि पर रहै-बला दलित वर्गक निष्क्रियता केंद्रकें पंगु बना दैत अछि। ई सामंती व्यवस्थाक खोखलापन आ वर्चस्ववादकें विखंडित करैत अछि । ५ "पगला पुल" कथामे समाज जकरा पागल आ तिरस्कृत मानैत अछि (विनीत दास), ओ नदीक कात अपन जीवन निर्वाह करैत अछि । दोसर दिस मंत्री आ अधिकारी वर्ग अछि जकरा समाज 'बौद्धिक' आ 'सभ्य' मानैत अछि । मुदा नाव डूबबाक संकटकालमे 'सभ्य' आ 'बुद्धिमान' वर्ग असहाय भऽ जाइत अछि आ 'पागल' विनीत नदीमे कूदि सभक जान बचबैत अछि । एतय समझदारी आ पागलपनक देवाल खसि जाइत अछि आ 'पागल' समाजकें मानवताक पाठ पढ़बैत अछि । ६ "तेतर दास" कथामे एकटा 'लूटना' (अपशकुन) कहल जाय बला बालक संस्कृतक प्रकांड विद्वान आ सन्त 'तेतर दास' बनि जाइत अछि । ओकर प्रवचनसँ हजारों लोक प्रभावित होइत अछि । मुदा जखन हुनका महंथ बनबाक बेर अबैत अछि, तखन हुनकर 'ज्ञान' पर हुनकर 'जाति' भारी पड़ि जाइत अछि । ई कथा धार्मिक आ आध्यात्मिक समभावक दाबा कें विखंडित करैत अछि आ ई प्रमाणित करैत अछि जे संस्थागत धर्ममे योग्यता सँ बेसी जन्मक सत्ता अछि । ७ उमेश पासवानक "मुजरिम" खाली दलित उत्पीड़नक कन्नारोहट नहि थिक। ई ओइ भाषिक आ वैचारिक संरचनाकें भीतरसँ तोड़ैत अछि जे कात-करोट आ फराक करबाक प्रवृत्तिकें जन्म दैत अछि । ई पाठ देखाबैत अछि जे समाजक केंद्र अपन अस्तित्वक लेल ओही परिधि पर निर्भर अछि जकरा ओ घृणा करैत अछि। ८ अत्यंत मार्मिक आ राजनीतिक दृष्टिसँ महत्त्वपूर्ण कथा "कोदारि छाप" जतऽ पंचायत चुनावमे दलित महिला लेल सीट आरक्षित होएब लोकतंत्रक एकटा पैघ जीत आ शोषित वर्गक सशक्तिकरणक प्रतीक अछि । मुदा कथा ऐ दाबीकें भथा दैत अछि। आरक्षित सीट दलित महिला 'फेकनी' कें शक्ति नहि दैत अछि, बल्कि ओकरा सवर्ण/दबंग 'फोल्टर'क हाथक कठपुतली बना दैत अछि । लोकतंत्रक आवरणमे ई वास्तवमे नव-सामंतवाद थिक, जतय शोषक वर्ग सोझे शासन करबाक बदला दलितकें मुखौटा बना कऽ शासन करैत अछि । 'सशक्तिकरण' वास्तवमे नवका 'शोषण' कें जन्म दैत अछि। चुनाव चिह्न 'कोदारि' मजदूर वर्ग, श्रम, पसीना आ माटिक प्रतीक अछि । ई शोषित मुसबा आ ओकर पत्नी फेकनीक असली पहिचान थिक। चुनाव जितबाक लेल ई 'कोदारि छाप' अपन मूल अर्थ सँ कटि जाइत अछि । जे कोदारि खेत कोड़बाक काज अबैत छल, ओहि कोदारिक छाप आब मनरेगा योजनाक लाखो टाकाक घपला आ लूटक प्रतीक बनि जाइत अछि । शोषितक प्रतीक (कोदारि) कें शोषक (फोल्टर) अपन लाभक लेल 'हाइजैक' कऽ लैत अछि। कथाक अंतमे भ्रष्टाचारक जाँच होइत अछि आ फोल्टरक संगे-संग फेकनी सेहो गिरफ्तार भऽ जाइत अछि । ई देखाबैत अछि जे "कानून सभक लेल समान अछि"। की फेकनी वास्तवमे मुजरिम अछि? फेकनी अनपढ़ अछि , दारू आ प्रलोभनक जालमे फँसल ओकर पति मुसबा ओकरा चुनावमे ठाढ़ करबैत अछि , आ ओ मात्र कागज पर औंठा-छाप दैत रहल अछि । न्याय व्यवस्था फोल्टर (मास्टरमाइंड) आ फेकनी (शिकार) कें एकहि तराजू पर तौलैत अछि । एतय विखंडनवाद स्थापित करैत अछि जे तथाकथित 'न्याय' वास्तवमे अत्यंत अन्यायपूर्ण अछि, किएक तँ ई अज्ञानता आ व्यवस्थागत बेबसीकें सेहो 'अपराध' मानि लैत अछि। सामंती सोच वाला फोल्टर (केंद्र) मुसबा जहिना गरीब मजदूर कें नीचाँ देखाबैत अछि। मुदा सत्ता प्राप्त करबाक लेल (मुखिया बनबाक लेल) फोल्टर कें पूर्ण रूपेँ ओही दलित मुसबा आ ओकर पत्नी फेकनी (परिधि) पर निर्भर होवय पड़ैत अछि । शक्तिशाली फोल्टरक सत्ताक चाभी एकटा गरीब, अनपढ़ दलित महिलाक हाथमे अछि। ई शोषक आ शोषितक बीचक शक्ति-संतुलनकें विखंडित कऽ दैत अछि। "कोदारि छाप" स्पष्ट करैत अछि जे जा धरि समाजमे आर्थिक आ शैक्षिक असमानता (जेना मुसबाक गरीबी आ फेकनीक अशिक्षा) अछि, ता धरि केवल राजनीतिक आरक्षण (मुखिया पद) सँ कोनो वास्तविक बदलाव नहि आबि सकैत अछि । ई कथा शोषक वर्गक चालाकी आ कानूनी व्यवस्थाक डकढोल स्थितिक चित्र थिक। ९ "सहोदरा"मे रक्त-संबंध आ आर्थिक असुरक्षा, दू भायक बीच बँटवारा आ पुनः मिलापक कथा थिक । कथा ई स्थापित करैत अछि जे "सहोदर आखिर सहोदरे होइ छइ" । जनक अपन छोट भाय प्रेमकें पिता जकाँ पोसैत अछि । जखन जनक गरीबीमे फँसि मजदूरी करैत अछि, तखन सम्पन्न भऽ चुकल प्रेम अपन दोकान भायकें सौंपि दैत अछि । ई भाय-भायक प्रेमक एकटा आदर्श आ भावुक विजय थिक। ऐ कथामे पितृसत्ताक एकटा पैघ अंतर्विरोध नुकाएल अछि। घरमे बँटवाराक सम्पूर्ण दोष जनकक पत्नी (स्त्री) पर मढ़ि देल गेल अछि । समाज प्रायः पारिवारिक विघटनक मूल आर्थिक कारणकें छोड़ि स्त्रीकें 'घर फोरनी' वा कलहक कारण मानि लैत अछि। प्रेमक जे महानता देखाओल गेल अछि, ओ वास्तवमे ओकर आर्थिक संपन्नताक उपज थिक। जँ प्रेमक खेत एन.एच. (राजमार्ग) मे नहि पड़ितै आ ओकरा मुआवजासँ दोकान नहि भेटितै , तँ की ओ अपन भायकें ओतबा सहजतासँ उद्धार कऽ सकैत छल? ई कथा अचेतन रूपसँ ई साबित करैत अछि जे महानता आ त्यागक लेल सेहो 'पूँजी' क आवश्यकता होइत अछि। १० "विधवा विवाह" स्त्री-विमर्श आ 'पुरुष उद्धारक' क मिथकक कथा अछि, कथा अल्पायुमे विधवा भेल सुशीलाक संघर्ष आ पुनः विवाहक अछि । समाज विधवाक प्रति अत्यंत क्रूर अछि। सुशीलाकें ओकर सासु डनियाही आ अलक्ष कहैत छथि । समाज ओकरा पर खराप नजरि रखैत अछि मुदा अपनाबय लेल तैयार नहि अछि । कथा एकर विरोध करैत एकटा प्रगतिशील युवा (अभियन्ता) द्वारा सुशीलाकें अपनाबय कें एकटा आदर्शक रूपमे प्रस्तुत करैत अछि । कथाक प्रारम्भमे सुशीलाक शारीरिक सुन्दरता (गोर वर्ण, पैघ आँखि, नम्हर केश) कें बहुत विस्तारसँ बताओल गेल अछि आ ओकरा 'ड्रीम गर्ल' कहल गेल अछि । जँ सुशीला कुरूप वा साधारण रूप-रंगक रहैत, तँ की अभियन्ता ओकरा बचाबय आ बिआह करबाक प्रस्ताव रखैत? स्त्रीक 'मूल्य' अखनो ओकर देह आ रूपे पर निर्धारित अछि। सुशीला समाजसँ आजिज आबि आत्महत्या करय जाइत अछि । ओकरा ऐ दुर्दशासँ निकालबाक लेल एकटा 'सक्षम पुरुष' (अभियन्ता) कें आबय पड़ैत अछि । सुशीला स्वयं स्वावलंबी भऽ कऽ समाजसँ नहि लड़ैत अछि; ओकर मुक्ति एकटा पुरुष सँ दोसर पुरुषक संरक्षणमे जाइ सँ होइत अछि। ई कथा प्रगतिशील भेलाक बादो स्त्रीकें 'असहाय' आ पुरुषकें 'रक्षक' मानबाक पारंपरिक पितृसत्तात्मक द्वैतवादकें नहि तोड़ि पबैत अछि। ११ "श्रमदानी बान्ह" समकालीन राजनीतिक व्यवस्था, संस्थागत भ्रष्टाचार आ 'डिजास्टर कैपिटलिज्म' (आपदा पूँजीवाद) क एकटा अत्यंत तीक्ष्ण आलोचना प्रस्तुत करैत अछि। लोक अपन परेशानी (बान्ह टूटबाक खतरा) लऽ कऽ मुखिया लग जाइत अछि, किएक तँ मुखिया गामक निर्वाचित प्रतिनिधि आ रक्षक थिक । मुखिया आश्वासन दैत अछि जे ओ प्रशासन (बी.डी.ओ., सी.ओ.) कें बजा कऽ बान्हक मरम्मत कराओत । कथा ई स्थापित करैत अछि जे राज्य-सत्ता (जेकर प्रतिनिधित्व मुखिया कऽ रहल अछि) नागरिकक रक्षाक लेल नहि, परन्तु शोषणक लेल अछि। मुखिया ग्रामीण लोककें बान्ह पर माटि देबय सँ रोकि दैत अछि । एतय 'रक्षक' (मुखिया) वास्तवमे 'भक्षक' प्रमाणित होइत अछि जे रातिक अन्हारमे अपन लठैतसँ बान्ह कटवा दैत अछि । ई लोकतंत्रमे जन-प्रतिनिधित्वक दाबाकें पूर्णतः विखंडित कऽ दैत अछि। राजनीतिक दृष्टिसँ ई कथा नव-उदारवादी अर्थव्यवस्थामे 'आपदा' कें 'अवसर' मे बदलबाक क्रूरतम रूपकें उजागर करैत अछि। मुखिया लेल गामक विनाश कोनो त्रासदी नहि, बल्कि एकटा 'प्रोजेक्ट' थिक। ओ स्पष्ट कहैत अछि जे जँ बान्ह नहि टूटत तँ घर केना खसत, आ जँ घर नहि खसत तँ इन्दिरा आवास, फसल-क्षति आ राहतक राशीमे ओकरा कमीशन (घूस) केना भेटत । एतय मानवीय पीड़ा आ बर्बादीकें सीधा-सीधा आर्थिक लाभमे बदलल जा रहल अछि। ई कथा स्पष्ट करैत अछि जे भ्रष्ट व्यवस्थामे 'विकास' लेल 'विनाश' एकटा आवश्यक पूर्व-शर्त बनि जाइत अछि। बान्हक नाम "श्रमदानी बान्ह" अत्यंत प्रतीकात्मक अछि । 'श्रमदान' जनताक सामूहिक शक्ति, आत्मनिर्भरता आ सामूहिकताक प्रतीक थिक। जखन सत्ता (मुखिया) ऐ बान्हकें कटबैत अछि, तँ ई केवल माटिक देवालकें तोड़नाइ नहि थिक, ई वास्तवमे जनताक 'सामूहिक श्रम' आ 'आत्मनिर्भरता' कें राज्य द्वारा नष्ट करबाक प्रतीक थिक। सत्ता नहि चाहैत अछि जे जनता आत्मनिर्भर रहय; ओ चाहैत अछि जे जनता घर-विहीन भऽ कऽ 'राहत' आ 'इन्दिरा आवास' लेल सत्ताक मोहताज बनल रहय। मुखिया लालचमे बान्ह कटबैत अछि आ अंततः पानिमे डूबि कऽ ओकरे अपन बेटा (अमित) क मृत्यु भऽ जाइत अछि । ई अछि "कर्म-फल" क संदेश। सत्ता आ विशेषाधिकारक नशामे मुखिया मानि लैत अछि जे ओ अपन रचल गेल विनाशी व्यवस्थासँ अछूत रहत। ओ सोचैत अछि जे बाढ़िक पानि केवल 'गरीब' कें डुबओत । मुदा प्राकृतिक आपदा आ भ्रष्ट व्यवस्थाक गठजोड़ आन्हर होइत अछि। शोषक वर्ग दोसरो लेल खाधि खनित करैत अछि, ओकर स्वयं कें सुरक्षित रहबाक भ्रमक अंततः टूटनाइ निश्चित अछि । 'मुखियाक सत्ता' प्रकृति आ कर्मक अगाड़ि असहाय भऽ जाइत अछि। "श्रमदानी बान्ह" केवल एकटा भ्रष्ट मुखियाक व्यक्तिगत पतनक कथा नहि थिक, बल्कि ई समूचा 'सिस्टम' कें कटघरामे ठाढ़ करैत अछि। ई देखबैत अछि जे कोना संस्थागत लालच आम नागरिकक जीवनकें दाँव पर लगा दैत अछि, आ कोना सत्ताक केंद्र अपनहि रचल गेल जालमे अंततः फाँसि जाइत अछि। १२ उमेश पासवान जीक कथासभ समाजक यथार्थवादी आ मार्मिक चित्र खींचैत अछि, मुदा एकर विश्लेषण ई देखाबैत अछि जे समाजक सुधारवादी सोचक भीतरो कतहु ने कतहु पारंपरिक पूर्वाग्रह आ आर्थिक यथार्थ नुकाएल रहैत अछि। [सैद्धांतिक विवेचन लेल देखू- मैथिली समीक्षाशास्त्र- गजेन्द्र ठाकुर] अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.७.लाल देव कामत-लगाबू कोनो जोगार : एक अवलोकन लाल देव कामत लगाबू कोनो जोगार : एक अवलोकन मधुबनी , लक्ष्मी सागर - भौआरामे श्रीमती आशा देवी - माय आ बाबु श्री लखनदेव साह जीके घर १ मई १९७९ ई० केँ जेष्ट बालक संजय गुप्ता'क जन्म भेल रहनि। बचपन सँ नीक शिक्षा - दीक्षा पाबि ओ बीए,एल एल बी,आ प्रभाकर धरि पढि-लिख वकालत करय लागलाह। ग्राम कचहरीमे न्याय मित्र पद पर अद्यतन कार्यरत छथि। हिनक अनुज भाय अजय कुमार गुप्ता सेहो +2 उच्च विद्यालय नौआबाखर (हटनी) मे संगीतके शिक्षक बनल छथि। श्री गुप्ता जी हटनीए निवासी श्री अजीत आजाद जीके नवारम्भ प्रकाशन - मधुबनी सँ सन् २००० मेँ ४८ पृष्ठक मैथिली पुस्तिका छपेलनि । एहि पोथी 'लगाबू कोनो जोगार ' केर दाम सय टाका छैक , जाहिके आई एस बी एन ९७८-८१- ९४५३६४-९-९ भेटल छैक। ई एक मैथिली गीत संग्रह थीक। एहिक सुन्दर छपाय आर. के. ऑफसेट प्रोसेस नवीन शाहदरा, दिल्ली सँ भेल अछि। एहि पोथी केँ पाठक गंगा स्वर सागर , हारमुनियम मेकर , कोतवाली चौक , दुर्गा भवन सँ पूभर लक्ष्मी सागर,भौआरा सँ प्राप्त कय सकैत छथि। पोथीक प्रति उद्गार व्यक्त करैत अधिवक्ता श्री वीरेंद्र झा जी लिखैत छथि " धीया - पुता सँ ल' क' वृध्दजनक रुचि अनुरूप गीत सभ अछि। 'सारिक इंतजार ' बेसी चहटगर अछि। प्राय: सब रस एहिमे भेटत । " ऐ पोथीमे संजय कुमार गुप्ता जीक छिरीयाएल गीत कऽ स़जोगिके राखयमे हुनक धर्मपत्नी सीमा देवी आ पुत्र द्वय आर्यन ओ आदित्य केर प्रति रचनाकार श्री गुप्ता जी धन्यवाद ज्ञापन कयलाह अछि। पोथी प्रकाशित करय ले बेर - बेर उत्साहवर्धन कयनिहार अग्रज वीरेंद्र झा जीक प्रति आभार व्यक्त कयने छथि। मैथिली गीत - संगीत बिहार आ नेपाल'क मिथिला प्रक्षेत्रक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत थीक,जे अपन भाव पूर्ण धुन- तर्ज़ आ लोक परंपराके लेल प्रसिद्ध छैक। मिथिला'क पाबनि- तिहारके सुअवसर पर मीठकंठ सँ गायल गीत अत्यन्त मनमोहक सुनयमे लगैत छैक। श्री संजयजी गीतनाद आ गान बजानके लव्ध प्रतिष्ठित उर्जावान गीतकार छथि। हिनक पहिल परियास सद्य: प्रकाशित पोथीमे अधिकांश गीत लघु अछि आ लोकगीत कोटिक अछि। गीतक जहन चर्चा होईछ तँ अनेको सुनल गीत यथा,लगनी - वटगबनी, कीर्तन - भजन, विनय- वन्दना, , प्रार्थना, सामा चकेबाक गीत, जटा जटीन गान, स्वागत गीत, समदाउन, भाव-भगैत, महराय आ श्रवणगीत गाथा केर मिथिलामे अदौकाल सँ चलैनसारि आबि रहलैक अछि। मुदा कूतूहलके बात इ जे भक्ति पक्षके अपील गीत सेहो ईष्टदेव सँ गुहार लगेबाक ऐ पोथीमे पृष्ठ सं० १७ पर दृष्टांत रुपेँ देखल गेल अछि। यथा -: ..... ससुर हमर कान के चौपट सासु हमर छै आँखि के निपट हे ओइ पर सोचू कतका घरो छै अन्हार बाबा लगबू ने जोगार .......... भोला लगबू ने जोगार ऐ पोथीक रचना मंचीय गेयात्मक छैक, जे एकांकी ,प्रहसन, नाटकक एक दृश्य सँ दोसर दृश्यके मध्य प्रस्तुत कयलापर दर्शक आ स्रोताक बीच एक सेतु केर काज करैत रहत। जहन प्रयोग आनो ठाम नर्तकी वा बिपटा अपन हास्य गीत प्रस्तुत कय खुब थपरी पबैत छथि। गीत- संगीत मानव जीवनमे मनोरंजन लेल एक आवश्यक विषय बुझाइत छै। एहिक तरंग सँ रोगीक काया निर्मल होयमे सहायक होईछ। निश्तुकी रूपेँ कहि सकैत छी " गायब आ कानब ,खायब जेकाँ सबकेँ रूचैत अछ। मुदा रचना तँ कियो - कियो रचि सकैत छै। गीत मंजरी, राग परिचय, पारंपरिक लोक गीत श्री गुप्ता जीक घरेलू वातावरणमे पिढ़ि दर पिढि सँ रचल -बसल छन्हि। हिनक पूर्वज राजदरबार - दरभंगा सँ सम्वध्द रहथि। महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह बहादुर हिनक पूर्वज केँ गान - बजान विद्यामेँ प्रवीण होय लेल विदेश सँ उस्ताज १५ दिन लेल मंगौने रहनि। ओहि समय गीतक वैश्विक पहचान दियेबाक लेल प्रतियोगिता कराओल जाए। ताहिमे माँगैन खवाश सन पहुंचल कलाकार मेडल जीतैथ। समाजमे आब निर्गुण गीतक पारखी लोक कम छैक। बेसीतर लोक ' लगबू कोनो जोगार ' तरहक गीतक लय ,भास ,तान आ धुन पर इतराईत रहैछ। संजय जीके गीतक वानगी गाम-घरमे सामाजिक ताना-बानाके विपरीत कोनू झगरा - झंझट , ममिला - फसाद, बुझारत- तसफीहा होय सँ देखल जाइछ। पंचायत स्तरीय ग्राम कचहरीमे निपटारा लेल एक अपील करैत पहिल गीत सृजन करैत पाँति देलनि अछि -: ......... मानो भेटत , शानो भेटत न्यायक संग सम्मानो भेटत भाई - भतिजा संग स्नेह - प्रेमक परमानो भेटत सब सँ सुन्दर ग्राम कचहरी। वर्तमानमे मिथिलाके श्रधालू जन तीर्थ - वर्थ लेल अनेको ठामक बाहरके जतरा करैछ,ओतुका स्थानीय लोक; एतयधरि जे दोकानदारो गारि सँ बात करैत छैक। से अजगूत लागत जे ओ लोकनि अपनाकेँ मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम जीके भैयारी बूझि हँसी-चौल करैत छैक। आ मिथिलांचल केर लोक तँ जनक नन्दनी (सीता) जानकी'क सहोदर भाय छथिये। एक पाँति "पाहुन लेने चलू" शिर्षक सँ उद्धृत अछि -: एक बात कहू अहाँ चोरे न भेली भोरे - भोरे अहाँ एहिठाम अयली जिया सीयाके चोरौली यौ पाहुन लेने चलू मिथिला के गारि उपहार यौ पाहुन लेने चलु। एकटा प्रसंगक चर्चा कय शेष पाठक केँ मनन लेल छोड़ैत छी। एक ' बेटी वरदान छै' शिर्षक रचनामे पाँति गरहल गेल छैक ,जे बेटीक महिमा आ हुनक निर्माण धरती पर भगवानक' सद्कृपा छी। जेनाकि -: लक्ष्मी छै बेटी सरस्वती छै बेटी वेदो मे कयल गेल बखान छै धरती पर बेटी वरदान छै। भार्या बहिन जननी इ हे बनली हिनके पर टिकल जहान छै हिनका कोटि-कोटि प्रणाम छै - लाल देव कामत , नौआबाखर (मधुबनी) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.८.प्रमोद झा 'गोकुल'- नेहक डोर प्रमोद झा 'गोकुल' नेहक डोर
बारहवींक रिजल्ट निकलिते धिया -पुतासे लयके गार्जियन धरिक मनोमस्तिस्कमे खुशीक लहरि दौड़ि गेलैक ।सबहक ठोर पर एक्केटा बात जे फल्लाँक एडमीशन ओइ कालेजमे भै रहल छैक ते चिल्लाँक ऐमे। देवनक बेटी सेहो नीक नम्मरसे पास भेल छै।चंसगैर ते ओ छौंड़ी छलैहे,तैपरसे ऐबेरका मेहनैत आर रंग भरि देलकै।सौंसे जबारमे चर्चाक विषय बनि गेल छै देवनक बेटी नेहा । आखिर चर्चा ओकर हौक कोना नइं,प्रदेश भरिमे पहील स्थान जे पौलकैये! ताहूमे विज्ञान सनक कठिनगर विषयमे सेहो सबसे औवल नम्मर भेटल छै ओकरा। तेँ सबहक मूहँसे प्रसंशाक दू आखर निकलिए जाइछै ओकरालेल। एहि खुशीक बेलामे देवनक मूहँ पर चिंताक स्याह छाया दिनानुदिन आर गाढ़ भेल जारहल छै।ओ आब की करत? नेहाक एडमीशन कोनाके कतय करौत?तेजगैरते ओ बच्चेसे छलैहे,तैपरसे ऐबेरका परीक्षामे आर कमाल कय देलकै।किछते सोचय परबे करतै।ओहिना ते नइं छोड़ि देबै।फेर ओ अपने मनमे प्रश्न केलक जे छौंड़ियेसे पुछै छियै।आखिर ओकर की विचार छै? गुनधुन करैत कखन ओ अपन दलान पर पहुंँच गेल से अपनो नइं बूझि पौलक । भान तखन भेलै जखन सामने आबिके पत्नी ओकरासे आँखि नचबैत जिज्ञासा केलकै - कतयसे एना बेसुध भेल आबि रहल छी? -आँइ ! नइं ���� हँ , कने चल गेल छलियै दूध अनैले। परंच आइ दोकाने बन्द छै! -अनेरे फूसि किएक बजैत छी? -एहिमे फूसि बजैक कोन बात भेलै? -यैह जे हमरोसे मोनक बात नुका रहल छी! हम नइं बुझै छियै जे अहांक मोनमे एखन की चलि रहल अछि? -हँ , से बात ते छै!मुदा हम अहाँके की कहू? माथा काज करब बन्द कय देलक।देखै नइं छियै जे लोकक बच्चा डागदरी आ इंजिनियरिङक तैयारीमे लागि गेलैये आ हम एहन अभागल छी जे अपन बेटीके नीक कालेजोमे नामांकन करबैले दिन तकै छी! आब अहीं कहू जे हम की करू?नेहियाक मोनमे किछ करै बनैक लेल हिलकोर नइं,उठैत हेतैक? नमहर साँस छोड़ैत देवन बाजल। -हूँ ���� किछते करैये पड़तै! - सैहते पुछै छी जे हम की करू? -डागदरी इंजियरी पढ़ेबै,से ते उपाय नइं अछि! हँ , तखन कोनो कालेजमे नाम धरि अवस्से लिखा दियौ! -अंतमे ते हेतै सैह,मुदा छौंड़ी छै चंसगैर! -से की करबै? गरीबक मनोरथ कोनो मनोरथ होइ छै! भेलैते कहुना इए बीए कराके बियाह करा देबै । जेतै अपन सासुर। एक छुट्टि! नेहा माय बापक वार्तालाप सुनि रहल छलि ,मुदा किछ बजबाक साहस नइं जुटा पौलक। ओ जनैत छलि अपन बापक गरीबीक खिस्सा! कोन धरानी ओकरा ट्यूसनक फीस आ फढ़ाइ लिखाइक खर्चा भेटैत छलैक ।संगहिं ओकरा इहो बूझल छैक जे ओकर बाप हिम्मत टूटय नहिं देतैक । एहि खातिर ओ अपनाके कठिन से कठिन परिस्थितिमे धकेल सकैत अछि। तखन की करत ओ? चुप रहि जायत?? नइं , ओ चुप नइं बैसत!ओकरा मुखर होमय पड़तैक । कहूँ बाबू भावावेशमे किछ कय लेता तखन? बाप रे! अनर्थ भै जेतैक।यैहने हम डाक्टर इंजिनियर नइं भै सकैत छी। कारण जे ई विद्या सब विशेष अर्थ साध्य होइत छैक, आ ने हम विज्ञाने राखि सकैत छी। एहूमे अर्थेक प्रयोजन छैक ।दोसर बात कोनो नीक कालेजमे हम एडमीशनो नै लय सकैत छी, कारण जे कोनो नीक संस्था छै से सबटा गाँवसे दूर शहरेमे छै । बाबूक मानस पटल पर यैह सब बात अबैत हेतैन ,तेँ एना चिंतित रहैत छथि। निर्णय हमरे लिय पड़त। सोचैत सोचैत ओकर आँखि कखन मुना गेलै से ओ अपनो नइं बूझि सकल।आँखि खुजलैते सामनेमे माय बापके ठाढ़ देखलक। सकुचैत अपन अस्तव्यस्त कपड़ा सम्हारैत उठिके ठाढ़ि भै गेलि। प्रश्नसूचक नजैरसंं बाप दिस तकलक ते देवन सकपकाके ओकरहिसँ पूछि बैसलै - -किछु होइ छह तोरा नेह! - न्न ���! -तखन एना असमयमे सूतल छलह! - ओहिना,कने आंखि लागि गेल ! -अच्छा , नै कोनो बात! एकटा गप ते कहह जे कतौ नाम लिखेबहक कि नइं? -हँ ����अहाँ सबहक जेना,जत, जे विचार हुए! एक्के साँसमे बाजलि नेहा - तोरो ते किछ विचार हेतह! देवन पत्नी दिस तकैत बजलाह। -हमर विचार,आचार आ सदाचार कहीं छी बाबू! हम सपनोमे अहाँक विचारके लाचार होइत नइं देखि सकैत छी! तेँ हमर नामांकन कोनो कालेजमे करा दियऽ ,हम पढ़ि लेब!संगहिं अहाँक मोनक अनुरूप किछु बनिके सेहो देखादेब!! दृढ़ होइत बाजलि नेहा। - से बड्ड बेस! मुदा����देवनक कंठ भर्रा गेलै। -मुदा तुदा किछ नइं ,अहाँ जे कहय चाहैत छी से हम बुझैत छियै बाबू! यैह ने जे सबके मनोरथ होइ छै से हमरो हैत! ओइ मनोरथक पाँखिके फरफरयबाक लेल अर्थक उर्जा चाहियैक से हमरा लग नै अछि! परंच हमरा लग अहूसँ मजबूत उर्जा अहाँ दुनूक नेहक डोर अछि। जकरा पकड़ि अहाँक नेहा कठिन सँ कठिन परिस्थितिक सामना कय सकैत अछि। इंजीनियर आ डाक्टरेटा बनब जीवनक ध्येय नहिं होइत छैक।आरो किछ एहि समाज आ देशके चाहियैक,जे दृढ़ लगन आ कठिन परीश्रमसे संभव भै सकै छै।अहा़ँ दुनूक स्नेहिल मुस्कानक तागत पाबि हम सपना पूरा कयके रहब । बस्स खाली अपन नेहक डोर अपन नेहासे जोड़ने रहू! एकरा एखन नइं टूटय दियौ बाबू! देवन बेटीक विचार सुनिके स्तब्ध भै गेल।आँखिसँ प्रेमाश्रु झर झर बहय लगलै आ नेहाक माय सेहो अपन आँचरक खूट मूहँमे ठूसिके हिचकय लागलि।
-प्रमोद झा 'गोकुल', दीप,मधुवनी (बिहार), फोन-9871779851 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.९.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा:गिरगिट कुमार मनोज कश्यप लघुकथा:गिरगिट ओ हमर विभाग मे नवे आयल छल। स्वभाविक छलै जे एहि ठामक माहौल, कार्यक प्रकृति, उच्चाधिकारी के मनोभाव आदि सs ओ भिज्ञ नहिं रहबाक कारणे सभ फाईल हमरा सs पुछिये कs करैत छल। हमरो ओकर मदति करबा मे हार्दिक आनंद भेटै। ओहि दिन पेंडिंग फाईल सभ पर बॉस सs चर्चा करैत रही। एकटा फाईल पढ़ैत बॉस ओकर प्रशंसा करैत बजला - 'वाह! शरणबाबू! आहाँ जल्दिये काज पर अपन पकड़ बना लेलहुँ। बढ़िया परीक्षण आ अपन सुझाव!!! ......उत्तम! कीप इट ऑन।' सुनि कs ओकर छाती गर्व सs फुलि गेलै - 'सर! ई अपनेक सक्षम मार्गदर्शन आ प्रेरणा के परिणाम छै। हम एहि विषयक सभ टा नियम आ समय-समय पर निर्गत दिशा-निर्देश सभ के अध्ययन कs फाईल पर अपन मंतव्य लिखलहुँ। अपने के नीक लागल ई हमरा लेल प्रेरणास्रोत अछि सर।' बॉस दोसर फाईल खोलि पढ़ब शुरू केलनि। पढ़ैत-पढ़ैत माथ परहक रेखा जगजियार हुअs लगलनि - 'एहि फाईल मे आहाँ की कहs चाहैत छियै से हम नहिं बुझि पाबि रहल छी?' कहैत ओ फाईल ओकरा दिस स्पष्टीकरण हेतु ठेल देलनि। ओ ओहि फाईल के हमरा दिस ठेलैत बाजल - 'सर! हम सिन्हा साहेब सs पुछिये कs लिखने रही।' कहि कs ओ हमर मुँह निहारs लागल। हम काठ बनि गेल रही ..... नीक हमर आ अधलाह तोहर! -कुमार मनोज कश्यप, निदेशक, भारत सरकार; संपर्क : सी-11, टावर-4, टाइप-5, किदवई नगर पूर्व (दिल्ली हाट के सामने), नई दिल्ली-110023 ; # 9810811850 ; ईमेल: writetokmanoj@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१०.बद्रीनाथ राय अमात्य- विवाहक बीमा/ श्मशान रत्न/ बादरायण सम्बन्ध बद्रीनाथ राय अमात्य विवाहक बीमा/ श्मशान रत्न/ बादरायण सम्बन्ध आइ सकाले निन टूटल।आँखि मिरते उठलहुँ देखलहुँ जे खबरीलाल भैया सामने ठाढ़ छथि।हम अपन मनके आश्वस्त करैत मनके बुझेलहुँ जे खबरीलाल भैया निश्चितरूपेण कोनो खास भफाएल खबर अनने छथि।देखलियनि जे खबरीलाल भैया मुँह नाक आऔर गुदा मार्गसँ भाफ छोड़ैत छथि।हमरा ओ सिताहल नढ़िया जकाँ व्यस्त आऔर डेराएल बुझेला।हाथमे कोनो अखबार छलनि।हम खबरीलाल भैयासँ खबर सुनबाक लेल उताहुल छलहुँ।हम प्रणाम करैत कहलियनि--भैया कोनो खास खबर सुनाएब की?ओ दौड़ले आएल छला, हुनक दम फुलैत छलनि। ओ गुदा मार्गसँ खाँसी करैत कहला---हौ काल्हि मिथिलामे बिहारि उठल छलैक,जे कने मने सत्य मिथिलामे बाँचल छलैक से सब सत्यके बिहारि उधियाक' नेने चलि गेलैक।हम कहलियनि भैया बिहारि उठलासँ नोकसान संङे नफा सेहो होइत छैक। खबरीलाल भैया सिखाओल बसहा बरद सन मुड़ी डोलबैत बजला---हाँ लाभ भेलैक अछि बिहारिमे बहुत रास कवि कवियित्री गायक गायिका उधियाक' आबि गेलैए। सबहक जन्म ब्रह्माक मुखसँ भेल छैक, मुदा ई नञि जानि ब्रह्माक मुँहमे गर्भाधान कोना भेलैक?ब्रम्हाक मुखमे मैथुन कोनो दंतकथा गढ़निहार महाने लोक केने हेता।ई गर्भाधानक मुहुर्त सेहो कोनो नीक मुहुर्तकार मुहुर्त देखि निकालने हेता।आजुक अखबारमे तोरो सारि सुपनेखियाक नाम छपल छैक।ओ कवियित्री छथि से बुझल छल मुदा पढ़लो लिखल छथि से नञि बुझल छल।ओना मैथिलीमे कविता लिखबाक लेल अक्षरवोध आवश्यक नञि छैक,कवियित्री बनबाक लेल पीन पयोधर ,पुष्ट यौवन, उन्नत नितम्ब आऔर सौन्दर्य चाहीसे तऽ प्रकृतिसँ पौनहिं छथि।हौ तोहर सारि सुपनेखियाके बेंट लागल छनि की नञि?हम कहलियनि--भैया बेंट लागल छनि मुदा बेंट छुटछुटाह ढ़ील छनि।खबरीलाल भैया प्रशन्न होइत बजला--बस!बस!बुझि गेलियैक। बेंट छुटछुटाह ढ़ील रहलापर बिना पढ़ने लिखने केओ कवियित्री बनि सकैत अछि मुदा ई सुविधा मिथिले मात्रमे छैक।एहेन परिस्थितिमे लोक कवियित्री नञि बनत तखन आऔर विकल्पे की छैक?हौ एकटा नीक मजगूत पच्चर ठोकबा देबहुन से नञि होइत छऽ?हम कहलियनि भैया बेंट अहूँके नञि लागल अछि,बेंट हुनको छुटछुटाह आऔर ढ़िले छनि।कवि अहूँ छी,कवियित्री ओहो छथि।पढ़ल लिखल अहूँ नञि छी,पढ़ल लिखल ओहो नञि छथि।भोज देखि अहूँ पसरि जाइत छी ,भोज लेल ओहो देह पसारि दैत छथिन ।अहाँक कविता हुनको नीक लगैत छनि,हुनकर कविता अहूँके नीक लगैत अछि।अहूँ अपान वायुसँ मंच महकबै छी ,हुनको अपान वायुसँ मंच महैंक उठैत छैक।अहाँके ओ देहे लागल हेती, हमर सारि सुपनेखियाक संङे अपनेक जोड़ी खूब जमत।गुण संस्कार सबटा मिलते अछि,विचार सेहो मिलत।अपने जँ हमर सारि सुपनेखियाके सम्हारि लेब तऽ सोना छिहे हमर सारि सुपनेखियाक यौवन आगिमे तपलाक बाद किमती कुन्दन सेहो बनि जाएब।बीस हुनक उमिर छनि, चालीस अपनेक अछि। उमेरमे कनेक अन्तर अवश्य अछि मुदा बीस चालीसमे स अक्षरक बढ़ियाँ मिलान छै,सात सकारे सासुर होइत छैक सेहो भेटि जाएत।हमर बात सुनिते खबरीलाल भैयाक मन जे विवाहक लेल माहुर रहैत छलनि से प्रशन्नतासँ महोर भऽ गेलनि आऔर प्रशन्न होइत हमरा हाथ मे किछु पाइ पारितोषिक रुपमे दैत बजला---घटकके मिथिलामे किछु देबाक प्रथा छैक से हम पूरा केलहुँ।हौ लेकिन तुँ आयोजक आऔर समीक्षके जँका ज्ञानक दरिद्र निर्लज्ज आऔर महा दूष्ट छऽ।तोरेपर हमरा शंका बनल अछि।देखिहऽ बनलो बात बिगारि जुनि दिहऽ।हौ तोरो चालि चलन चरित्र नीक नञि छऽ।हमरा सङे विवाह भेलाक बाद ओ तोहर सारि नञि,बादरायण सम्बन्धे भावज हेथुन। एहि बादरायण सम्बन्धक मिथिलामे महत्वपूर्ण महिमा छैक।मैथिली एकादमीक भ्रष्टाचारक मूलमे इएह बादरायण सम्बन्ध व्याप्त छैक,ई बादरायण सम्बन्ध मैथिली एकादमीमे पूर्णरूपेण पुष्पित पल्लवित छैक ।एहि ।बादरायण सम्बन्धे हमरो तोरोमे भैयारी अछिए,बादरायण सम्बन्धे सढ़ुवारे सेहो रहत।भैयारीमे हम जेठ छिहे सढ़ुवारेमे तुँ जेठ भेलह।हौ सुनै छिऐ हुनक विवाह भेल छलनि।हम कहलियनि --भैया विवाह भेल छलनि मुदा दुनु परानीमे नञि पटैत छनि।एतवा सुनितँहि खबरीलाल भैयाक मुँह मीठा गेलनि आऔर विद्वतापूर्ण शैलीमे व्याख्यान दैत बजला--बस!बस!बात बुझलियैक। दुनू परानीमे रिस्ता कमजोर आऔर रस्ता अलगे अलगे हेतेन,दुन परानीक सम्बन्धमे परान आऔर अनुबन्ध नञि हेतेन। तखन मरल रिस्ता कतेक काल चलत?हम कहलियनि भैया अपने अग्रचेती छी,चिन्ता जुनि करि, अपने सङे अवश्य पटतेन।पटेबाक कला होइत छैक,डोल बाल्टी आऔर लोटासँ सेहो पटाओल जा सकैत छैक। ओना ओहो बेलना चलबैमे बिहारि छथि,ओना एकटा सामाजिक सोच चीरकालसँ चलि अबैत छैक जे कवि कवियित्रीक बीच वैचारिक धरातल समतल नञि होइत छैक। अहुँक मनमे विहार करबाक लेल बिहारि उठल अछि बेलनाक मारि खेलाक बाद शान्त सेहो भऽ जाएत।ओ गहनाक बहुत भूखलि छथि से सोना चानी हो तऽ अतिउत्तम अन्यथा लोहोक अवश्य गढ़ा लेब।खबरीलाल भैया अचानक बाजि उठला--ओ सुन्दरता आ यौवनक भार सम्हारिये नञि पबैत छथि, डेग हरदम डगमगाइत छनि ,पैर हरदम भरियाएले रहैत छनि, तखन आभूषणक भार कोना सम्हारि लेती?। हौ कोनो साहित्यिक मंचपर साहित्यिक सुवास होइत छैक से आइ धरि कोनो मैथिलीक मंचपर नञि देखलियैक। हौ तोहर सारि सुपनेखियाके लाज नञि होइत छनि। ओ अभिव्यक्तिक नामपर अपन अपान वायु छोड़ि मंचके मँहका दैत छथिन।हम कहलियनि भैया-सावधान! ओ वुधियार वेदज्ञ विद्वानक बेटी मैथिली मंचक शोभा छथि। हुनक सौन्दर्यक समक्ष व्याकरण,छन्द विधान चिन्हविचार साहित्यिक मर्यादा सब महत्वहीन छैक, एहन अनसोहाँत ओछ बात बजलापर विवाहो नञि हाएत।खबरीलाल भैया जे अपन विवाहक मन मोदक खाइत छला से डरे डेराइत पश्चाताप करैत सावधान होइत साँप सन पल्टी मारैत बजला--नञि नञि!हम हुनक प्रशंसक छियनि। हे ई बात हुनका नञि कहिहक ओ साक्षात सरस्वतीक अवतार लक्ष्मी छथि। हुनका हमर घर एलापर हमर भूत भविष्य वर्तमान सबटा सुधरि जाएत,हुनको सूतल सोहाग जागि जेतेन।हम कहलियनि भैया अपनेक भूत भविष्य कतेक सुधरत से भविष्ये कहत मुदा अहाँ अवश्य सुधरि जाएब से हमरा दृढ़ विश्वास अछि ,ओ अहाँके नीकसँ सुधारि सकैत छथि।हमर विचारसँ विवाहक बीमा अवश्य करबा लेब कारण हुनक वैचारिक ताप बहुत तेज छनि।हुनका लेल सम्बन्धक अनुबन्ध महत्वहीन होइत छैक।सम्बन्ध विच्छेद भेलापर बीमा कम्पनीसँ दाम्पत्य जीवनके दाम भेटैत रहत।खबरीलाल भैया हमर कानमे कनफुसकी करैत निर्लज्जतापूर्वक पूछलनि --हौ किछु दहेजो भेटत की नञि?हम कहलियनि--दहेज सेहो चाही?दहेजक नाम सुनिते हुनक दग्ध देह हरिया गेलनि आऔर अपन रुसल ईष्टके सुमिरैत बजला---भेटैत तऽ नीके होइत ओना हम दहेजक विरोधी साहित्यकार छी। हौ हम गृहस्थ छी, छुटछुटाह बेंट बला कुड़हरि कोदारि हम नञि चलबैत छी,हमरा धप धप गोर श्वेतवर्णी वाला अन्हार घरके इजोत करै बाली कनिञा चाही छल से भेटिए गेल।हम कहलियनि --भैया अहाँके लाजबन्तीक जड़ि पीसक' पिबाक चाही, अहाँ हमरे सन निर्लज्ज छी।ओना एखन मिथिलामे निर्लज्जता किछु खास कुलीन लोकक आभूषण मानल जाइत छैक आओर एहि आभूषणसँ अपने सेहो आभूषित छी।खबरीलाल भैया चाँइ सन चहुदिश चकुवाइत बजला--विवाह जल्दीए नीक दिन देखि भऽ जेबाक चाही। हम कहलियनि भैया निर्लज्जता नैतिकताक सीमाके अपने पार केनहि छी, मर्यादाके कोठी कनहापर राखिये देलियैक, एहिसँ बेसी आब कतेक नीक दिन हाएत?रहलै विवाह मोरै बला बात से कोनो पूज्य दूष्ट देवता दैत्य किन्नर गंधर्व सेहो अपनेक विवाह नञि मोइर सकैत छथि।अहाँ सब शास्त्रक शास्त्रज्ञ वेदज्ञ छिहे, अठारहो पुराण धंङले अछि, बहुते नारी देहके सेहो धंङनहि छी ,ज्योतिषाचार्य सेहो छिहे।आचरण और चरण दूषित अछि से सहजें झपा जेतैक।कने हमरापर कृपा करि, अपने अपन मसियौतके कहि हमरा पुरस्कार दियाउ। एतवा सुनिते खबरीलाल भैया तामसे तरैङ गेला आऔर सिंह गर्जन करैत अपन अस्सल स्वरुप देखबैत अपन परिचय दैत बजला --विवाह भेलाक बाद पहिले हम दून्नू परानी पुरस्कार लेब।हम लोङिया मिरचाइ मे मधुर मिलाक' कहलियनि--भैया अपनेक माथपर माया नाचि रहल अछि।अपने हमर सारि सुपनेखियाक आकर्षण पाशमे पूर्णरूपेण बनहा गेल छी। अपने नारी देहक नीक आऔर पैघ विमर्शकार रहितो खूब मन मोदक खाइत छी।कतऽ गेल अपनेक दिव्य दृष्टि?अपनेक दृष्टि दृष्टिकोण दुनू दूषित अछि। जेकरा अपने अपन दिव्य दृष्टि कहैत छियैक ओ असलमे दूष्ट दृष्टिकोण अछि। सढ़ुआरेमे सँरहा पाड़ा सनक कनारि नञि होमक चाही।जखन अपनेक जन्म ब्रह्माक मुँहसँ भेल अछि तखन व्यवहार विचार किएक एतेक ओछ अछि?एहिवेर खबरीलाल भैया असमंजस मे पड़ला आऔर गंभीर चिन्तन करैत बजला---हौ ब्रह्माक मुँहसँ जन्मै बला बात एकटा रहस्य छैक, से हमहूँ आइधरि नञि बुझलियैक। ई एकटा ओझरी छैक, हमहूँ आजीवन एहि ओझरीमे ओझराएल रहि गेलहुँ।आँखिपर सबदिन अहंकारक पट्टी लागल रहि गेल जे हम ब्रह्माक मुखसँ जन्मल छी ,ई ओझरी मनुख नञि बनए देलक।इएह झुठक अहंकार अध्ययन करबासँ सेहो वंचित रखलक। अही झुठक कारण मैथिली साहित्यक उद्धार नञि भेलैक मुदा सबटा पाप प्रपंच उघार अवश्य भेलैक।असलमे मंदिर ,मंच, धार्मिक अनुष्ठान,आऔर समाजमे उच्च स्थान आरक्षित करबाक अवैध विशेषाधिकार लेबाक लेल गढ़ल गेल झूठ छैक।अही सब झुठक कारण समाजमे घृणाक पात्र भेल छी, लोक पोकिटमार बुझैत अछि, केओ हमरा बातपर विश्वास नञि करैत अछि।सब कामना कात लागल रहि जाइए, सब इच्छा सेहो अभावपर आबिक' अटैक जाइत अछि।लोक उपहास करैत परनाम सेहो अपन पछुआर देखाक' करइए।सौंसे दुनियाके पैरपर झुकेबाक वास्ते जे हमर पूर्वज सार्थक प्रयास केलनि सेहो निरर्थक भेल अछि,आब हम पूज्य नञि रहि गेल छी ।सबदिन हमर सोच रुढ़िवादी रहि गेल, मैथिलीए अछर कटुवा दागल साँढ़ साहित्यकार सनक कहियो प्रगतिशील समतामूलक सोच नञि रखलहुँ।सब दिन फुसिञाहिक खेल पाग पाग खेलाइत चोर छिनार उचक्काके महिमामंडित करैत रहि गेलहुँ ।नामेके पढ़ुआ भैया काका कहबैत रहि गेलहुँ।पढ़ल लिखल कतेक छी से हमरा अपनो बूझल अछिए।हमहूँ पश्चाताप करैत समस्यासँ संतप्त खबरीलाल भैयाके सान्त्वना दैत कहलियनि---भैया अपनेके अभाव अछि, अभावक अधिक अनुभव अछि,कंचन कामिनी आऔर कनिञाके अभावक विलक्षण अनुभव सेहो अछि,मुदा अहंकारक विष तऽ बहुते अछि।दूष्टक प्रपितामह सेहो छिहे।हम जे किछु आऔर कहतियनि से ताहिसँ पहिले खबरीलाल भैया उताहुल होइत बिच्चहिमे बाजि उठला--हे आब ई उलहन उपराग छोड़ऽ आऔर अपन सारि सुपनेखियाके शुभ शुभक' आशीर्वाद दहुन जाहिसँ हमरो किछु कल्याण आ शुभ हुअए आऔर विवाहक बाद मुँह देखना सेहो द दिहौन।हमहू हुनकर चौकापर छक्का मारैत कहिये देलियनि ---भैया एहिमे शुभ हेबाक कोनो आश नञि अछि,अशुभ की सब हाएत से अपने अपन दिव्य दृष्टिसँ देखि लियऽ,रहलै मुँह देखना देबाक से हमरा हुनक इतिहास बुझले अछि, भूगोल देखले अछि, तखन हम की मुँह देखना देबनि?हमर बात सुनि खबरीलाल भैया आसमानसँ खसला आऔर असमान्य स्थितिमे आबि गेला,कौहुना अपनाके सम्हारैत बजला---तखन एहि रिस्ताके हम सुनिश्चित बुझियैक?हम कहलियनि--ब्रह्म रेख बुझल जाए मुदा हमर सारि सुपनेखियाके चित्रपट देखबाक अभ्यास छनि से सप्ताहमे चारि दिन देखबहि पड़त आऔर हुनका बातमे उत्तर प्रति उत्तर करबाक कोनो प्रयोजन नञि। सहजतासँ हुनक बात मानहि पड़त, अन्यथा उतराधिकारीक जन्म नञि हाएत।एहिवेर खबरीलाल भैया हरियाएल मनसँ आनन्दित होइत बजला----से हम चित्र पट शयनकक्षमे शयनासनके समक्षे लगा देबनि।हम कहलियनि-- भैया चित्रपट अपने लगा देबनि से बुझलियैक मुदा चाउमीन चाट आऔर चाहक चटका हुनका सेहो लागल छनि,से की घरमे संभव हेतैक?ई सब लेल शहरे नीक होइत छैक। एखुनका शहरक चित्रपटमे चित्त पट्ट हेबाक कला नीकसँ सिखाओल जाइत छैक। ओना हमर सारि सुपनेखिया चितपट कलामे दक्षताक उपलब्धि केने छथि ,एहि कलाक ओ नीक निपुणा नारी छथि।ओ चित्त पट्टसँ चिता पर चढ़ेबाक कलाधरि जनैत छथि।जाहिसँ अपनेक स्वर्गारोहणक मार्ग सेहो प्रशस्त हाएत आऔर अपनेक चीरकालीन पुरस्कारक अभिलाषा श्मशान रत्न सेहो भेटि जाएत। -बद्रीनाथ राय अमात्य, ग्राम पोस्ट करमौली, भाया कलुआही, जिला मधुबनी बिहार ,फोन 6205190859 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.११.बद्रीनाथ राय अमात्य- ५ टा बीहनि कथा बद्रीनाथ राय अमात्य ५ टा बीहनि कथा १
ज्ञानपीठ पुरस्कारसँ पुरस्कृत हमर बरद
हमर भाषाविद बरद अपन नीक दायित्वक निर्वहन करैत अछी।पुरस्कार पेबाक सक्षम पात्र रहितहुँ पुरस्कारक लोभी नञि अछि मुदा हम ओकर नीक दायित्वक निर्वहनसँ प्रशन्न भऽ सालमे दू बेर सुकराति दिन भरपेट्टा कुट्टी भुस्सा सानी आऔर हरियर घास खुआ पुरस्कार रुपमे नव गर्दामी जौड़ बदैल ओकरा सम्मानित करैत छियैक। ओहो अपन दायित्वक निर्वहन करैत हमर खुवेलाक तदनुकूल गोबर दैत अछि।हम ई बरद बरदक हाटसँ किनक' अनने छी।बरद पोसिनदार कहने छल जे हमर बरद बहुतो बेर ज्ञानपीठ पुरस्कार पौने अछि।मुदा हमरा अपन कृत्यपर पश्चाताप होइत अछि जे हम ज्ञानपीठ पुरस्कारसँ पुरस्कृत अपन बरद के छोट साधारण पुरस्कारसँ पुरस्कृत करैत छियैक। हमरा अधिकार क्षेत्र मे रहितैक तऽ हमहूँ अपन बरदके ज्ञानपीठ पुरस्कारसँ पुरस्कृत करितियैक।हम विवश छी मुदा हम ओहि साँढ़ गायके के धनवाद दैत छियैक जाहि गाय साँढ़क मधुर आऔर सफल मिलनसँ हमर बरदक जन्म भेल छैक।ओना ई बरदक जाइते बहुत वुधियार विद्वान भाषाविद होइत अछि। ई बरदक जाइत मराठी बिहारी उड़िया तेलुगु बंगाली सब हरवाहक भाषा बुझैत अछि।हमरो अपन मैथिल बरद विद्वान वुद्धिमान वुधियार बुझना जाइए कारण कीनक' अनने छी अपन बरद अछि,हम पुरस्कृत करिते रहबै कारण हमहूँ तऽ हरवाहे छी। २ हमर सासुरमे हमर सारि मीनाक्षी चन्द्रवदनीके हमरा रिझेबाक लेल हमर सेवामे प्रस्तुत काएल गेल।ओ अपने सनक मीठ शर्बत हमर सेवामे प्रस्तुत करैत मनमे प्रेमक राग भरने अनुराग सहित कहलनि--एहिवेर जँ अपनेलोकनि हमर मनोनुकूल विद्वान वीर्यवान कमौआ वुद्धिमान वऽरसँ हमर विवाह नञि करेलहुँ तऽ हम कवियित्री बनि जाएब।आब बहुत बेसी बिहारि बसात बर्दास्त नञि होइए। एहि वसन्ती वयसमे विवाह नञि भेल तऽ हम कृष्णाभिसारिका बनि वयस बिता लेब,बाल कुमारिये रहि जाएब मुदा विवाह नञि करब।धिक्-धिक् धिक्कार अहाँक पौरुषके।हम कहलियनि --अपने बेरबेर हमर पौरुषक परीक्षण केनहिं छी,तेकरा बादो अपनेके हमर पौरुषपर शंका बनल अछि?सब दिन अपने शुक्लाभिसारिका सन हमर शयन कक्षक शोभा बढ़बैत आएलि छी, हमहूँ अपन प्रेम अपन शुक्लाभिसारिका सन परसैत आएल छी।हम अपनेक प्रणय निवेदनके सब दिनसँ सम्मान करैत मान रखैत रहलहुँ अछि।धिक्कार अपनेक एहि कृतघ्न यौवनके!!ओ अपन बातक व्यंग्य वाण सम्हारि हमरापर प्रहार करैत बजलथि--छी!अहूँ कोनो आदमीयें छी!हम अहाँसँ आब नञि बाजब। हम हुनक व्यंगवाणसँ विद्ध भेल डेराइते कहलियनि--आमदनी रहैत तऽ अवश्य आदमी रहितहुँ,मुदा अहाँ हमर मानिनी छी,अहाँक मान रखबाक लेल रुसलापर अहाँके अवश्य मनाएब।अपनेक कामना पूर्ण हुअए से शुभकामनाक संङ आशीर्वाद सेहो अछि,ओना कवियित्री बनब से नीक बात मुदा विवाहक आ पुरस्कारक लोभमे मैथिलीक मंच महकबै बाली कवियित्री नञि बनी सएह नीक। कवियित्रीए बनब तऽ महादेवी वर्मा बनि,सुभद्रा कुमारी चौहान बनी।वीरांगना बनब तऽ लक्ष्मीबाई बनि।अहाँ श्वेतवर्णी वनिता छी,अहाँक लेल बहुतो विकल्प खुजल छैक। ३ हमर महिंसलेट कनिञा ओभर वेट रहितहुँ कवियित्री छथि।मित्र कहलनि---अहाँक कवियित्री कनिञाक कविता लेखनमे बहुत अशुद्धि रहैत छनि।मित्रक ई बात हमरा नञि नीक लागल। हमहूँ जरल मनसँ मित्रके कहिए देलियनि जे मित्रता रखबाक अछि तऽ प्रशंसक बनू।हमरा ई बात बुझले अछि जे मन अशुद्ध भेलापर ओ कवियित्री भेलि छथि,तखन अशुद्ध मनसँ शुद्ध कविता कोना लिखती?मित्र कहलनि जे हम हुनका पुरस्कृत हेबाक लेल पुरस्कृत हेबाक योग किछु नीक नीक कविता लिखि दियनि की?हम कहलियनि -- अहुँ तऽ अधजरुआ बीड़िये छी जेकरा पीलाक बाद पैरसँ मसैलक' मिझाओल जाइत छैक तथापि अपनेक स्वागत अछि,एहिमे पुछबाक की प्रयोजन?मित्र पुन: पुछि बैसला--हमरा की भेटत?हम हुनक शंकाक समाधान करैत कहलियनि जे ओ अपनेक भावज छथि, अपने जे चाहबै सएह भेटत,अस्सल पुरस्कार तऽ अहींके भेटत। मित्र प्रशन्न होइत कहला-- हाँ ओ भावज अवश्य छथि मुदा हम अपनेसँ सात सालक जेठ छी। ४ हमर कनिञाके लेखिका बनबाक भूत लागल छनि आऔर हमरो कवि बनबाक।ओ अपनाके हमाज सेविका बुझैत छथि जे अपन अपान वायु त्यागब समाज सेवा बुझैत छथि।ओ मिथिलाक विभिन्न सम्मानित मंचपर अपन अपान वायु त्यागि मंचके मँहका समाजक सेवा करैत छथि।ओ अपन सौन्दर्यसँ स्त्रैन मैथिल साहित्यकार समीक्षके हृदयपर अपन अखण्ड साम्राज्य स्थापित केने छथि।हमर भूत हमर कनिञा स्वामी सुधारक यंत्र बेलनासँ कखनो काल झारि दैत छथि मुदा हम हुनक भूत झारैसँ असमर्थ रहै छी कारण हम आब यौवनक वैभवसँ सम्पन्न नञि,विपन्न छी मुदा हमर कनिञाक यौवनक वैभव एखनो बाँचल छनि,जहिना ओ साहित्य आऔर शब्दपर अत्याचार करै छथि तहिना हमरो लाचार बुझि हमरापर खूब अत्याचार करै छथि।एखनो ओ षोडसी सनक खतरनाक यौवनक खन्जर रखने छथि।हम हुनक धरगर खन्जरसँ सदिखन डेराएल अस्त व्यस्त त्रस्त रहै छी,हुनकामे ठठब हमर बूत्ताक बाहरक बात अछि। ओ रससँ भरल छथि ताँइ हमरासँ हरदम रुसले रहै छथि।ओ यौवनक वैभवसँ विपन्न नञि,पूर्णरूपेण सम्पन्न आऔर वैज्ञानिक सोच रखनिहारि छथि।शाड़ीमे समेटल रहब आब ओ अनुचित बुझै छथि आब ओ सलबारपर उतरि आएल छथि,स्कर्ट आऔर फराक धरि पहुचैमे बेसी विलम्ब नञि हेतेन। वस्त्र ओ अंग झाँपक लेल नञि,स्वाद आऔर स्वार्थानुकूल पहिरैत छथि।जहिना हमर शब्द साहित्यिक सृजनमे नोरसँ भीजल रहैत अछि तहिना हुनक शब्द विलासिताक तेलमे तरल ।ओ वैज्ञानिक सोचक संङ समतामूलक साहित्यिक सोच सेहो रखैत छथि।हुनक कहब छनि जे कोनो खगता बेगरताक आपूर्ति जेना कोहुना कत्तहुसँ करबाक चाही।ओ कोनो तरहक आदानप्रदानमे बहुत बेसी विश्वास रखैत छथि।आनन्द लेब आऔर देब हुनक जीवनक मूल मंत्र छनि।जहिना हुनक साहित्यिक स्वर पुरुषक प्रखर विरोधसँ शुरु होइत छनि;तहिना हमर स्वर हुनक व्यवहार विचार आऔर हुनक बनाओल विधेयकक विरोधसँ। हम युगल जोड़ी वैचारिक विधान सभामे एक दोसराके विरोध आऔर विपक्षमे बैसैत छी।हमरा घरमे हमर सासुरक सरकार चलैत अछि। हमर परोसमे रहनिहार किछू पोसल पत्तलचट्टा पत्रकार सरकार चलबैमे हमर साउस ससुरकेँ पूर्ण सहयोग समर्थन दैत छनि।हमर साउस ससुर केन्द्रीय सत्तामे रहि दुर रहितहुँ दूर्भाष सनक दुर्विक्षण यंत्रसँ हमरा घरक सरकार चलबैत छथि।जहिना बिहारक भूतपूर्व मुख्यमंत्री स्व जगन्नाथ मिश्र अपन सत्ताके सुरक्षित संरक्षित आऔर अक्षुण्य रखबाक लेल एकटा तांत्रिकके कहलापर 108 खस्सीक खूनसँ नहाएल छला तहिना हमर कनिञा हमर नोरसँ नहाइत छथि,जहिना जगन्नाथ मिश्र चाहैत छला जे शोषित,वंचित,उपेक्षित बिना विरोध केने मरनासन्न सूतल रहय तहिना हमर कनिञा चाहैत छथि।हुनक विचार श्रीमान लालू प्रसाद मुख्यमंत्रीजीसँ सेहो मिलैत छनि।हुनक कहब छनि जे पढ़ु लिखु जुनि, मूर्ख बनि हमर ध्वजा वाहक बनल रहू ।जँ पढ़बाक इच्छा अछि त' हमरा पढ़ु, हमर यौवन ,हमर विचार आऔर हमर खगता बेगरताके पढ़ु।हम गुमनामी के अन्हारमे भूखले विहार करै छी, मुदा हमर कनिञा खूब चमकै दमकै आओर छमकै छथि।हमर गृहस्थीक गाड़ी, गृहमंत्रालय आऔर सरकार भगवानक भरोसे चलैत अछि।हमर कनिञाक लिखल कवितासँ बेसी हुनक यौवनमे बेसी अधिक धार छनि।ओ गर्धप स्वरमे गबितो छथि,हुनक गायनसँ समय गति,हवा बसात सूरुज चान आऔर प्रकृति किछु अपान वायु सुघि आनन्दित रहनिहार युवकक दृष्टिकोणसँ थम्हि जाइत छैक मुदा हमरा हुनक गायन वासनाक भूखसँ भूखलि चिचियाइत पिलिया कुक्कुड़ सन बुझना जाइत अछि।ओ कुचेष्टासँ प्रतिष्ठा प्राप्त करैमे व्यवहार कुशल छथि।हुनक घिनाएल चरित्रसँ बेसी हुनक चेहरा अधिक चर्चित आऔर लोकप्रिय छनि।हुनक कहब छनि जे कोनो भूखके जेना कहुना शान्त करक चाही।हुनका कुक्कुड़ समाज स्वजातीय बुझि बेर -बेर विभिन्न विशेष विधान बनाक' पुरस्कृतो केलकनि अछि।एकटा हम छी जे सरकार आऔर कनिञा द्वारा एखनो बारल ,उपेक्षित आऔर बहिस्कृत छी कारण हम रुपैया हीन आऔर रुप हीन छी। ५ मृगनयनी चन्द्रवदनी चम्पावती चम्पै रंङक आकर्षक परिधान पहिरि अपन अमृत सदृश यौवन लए अपन देवताक प्रतीक्षामे प्रतीक्षारत छलि।हुनक अंग सौष्ठव उन्नत नितम्ब पुष्ट पयोधर प्रेमक प्यासल प्रकृतिके प्यास बढ़ा रहल छल।बरियाती एबाक दीर्घकालीन प्रतीक्षा समाप्त भेल। मीनाक्षी चंचल चन्द्रवदनी चम्पावतीक देह पारिजात पुष्प सन गमकि रहल छल जे वातावरणमे मादकता घोरि रहल छल। अतिथि सतकारक सुन्दर पारम्परिक परम्परा परम्परानुसार पूर्ण होमय लागल ।बिच्चहिमे चम्पावती जे कूटल कारी मिरचाइ सन करुगर छलि वऽरसँ ज्ञानक गंगा बहबैत बाजि उठली---अहाँक वौद्धिक आऔर पौरुषक परीक्षण विधि -विधानपूर्वक सजल सजाओल शयन कक्षमे सेजपर काएल जाएत।ई बात सुनितहिं उपस्थित कोमलांगी स्त्रीगण लाजे कठुआ गेली आऔर पुरुषवर्ग सेहो लजा गेला मुदा धीर स्थिर वीरांगना चन्द्रवदनी चम्पावती अपन हार्दिक इच्छाके इच्छानुकूल परिणाम तक पहुँचेबाक लेल तैयार अड़ले छलि।जाहि किछु स्त्रीगण पुरुषके ई बात कठाइन सन लगलनि ओ अपन अपन घऽरक रास्ता धेलनि आऔर किछु धैर्य धारण केनिहारि स्त्रीगण पुरुष एहि कौतुहलपूर्ण दृश्यके देखबाक लेल तैयार बैसले छला। हुनकालोकनीक हृदयक स्पन्दन गति बढ़ि गेल छलनि।उपस्थित लोकमे परस्पर विरोधी विचारक आदानप्रदान होमय लागल।बहुत विद्वान विदूषि लोकनि परम्परा परिवर्तनक पक्षमे अपन अपन विचार व्यक्त केलनि ,बहुते लोक विपक्षमे सेहो छला ।निष्पक्ष किनको नञि देखल गेल।विरोधी विचारक आदानप्रदानमे विशेष नवविवाहिता आऔर अविवाहिता नवयौवना वनिता छली। किनको विरोधक वा समर्थनक स्वर प्रखर, किनको स्वर दबल छलनि।केओ विरोधक स्वरमे बाजि उठली---एकरा की कहल जेबाक चाही?पौरुषक परीक्षण वा विवाहसँ पूर्व पियास मिझेबाक कुत्सित प्रयास?मुदा विद्वान वुद्धिमान वऽर जे विकसित समाजक वैज्ञानिक सोच रखनिहार विशेष जाति वर्गक छला ओ आलिंगनमे आवद्ध होमक लेल उताहुल उद्यत अपन पौरुषक परीक्षणक आऔर प्रदर्शन कए प्रमाण पत्र प्राप्त करबाक लेल पूर्ण प्रयासरत छलाहे।हुनको पौरुषक परीक्षण देबाक लेल अनुकूल अंगमे उत्तेजना आबि गेल छलनि।चन्द्रवदनी बिल्ब स्तनी चम्पावती हुनक आङुर पकड़ि आदर आऔर सम्मानपूर्वक अपन शयन कक्षमे प्रवेश केलनि जे हुनक अध्ययन कक्ष सेहो छलनि।वर महोदय सेहो कुचेष्टासँ प्रतिष्ठा प्राप्त करबाक प्रयास केलनि मुदा पूर्णरूपेण विफल रहला।ओ मारक मारिसँ मर्माहत छला मुदा मारक मर्म नञि बुझैत छला। आधुनिकताक बजारमे बेमोल बिकाइवाली वनिता चन्द्रमुखी चम्पावतीके शयन कक्षमे बहुत बेसी बिलम्ब भेलनि।बाहर बैसल लोकके बुझना गेलनि जे आब ई पियासल युगलजोड़ी प्रशव भेलाक बादे बहरेता ।बहुते औगताएल लोक सब अपन अपन घऽर गेला, बहुते लोक एखनो विवाहक अगिला विधि विधान व्यवहार देखबाक लेल बैसले छला।चंचल चम्पावती जे चन्द्रमासँ इजोरिया छिनिक' अनने छली से आभा हुनक मुखमंडलपर एखनो कक्षसँ बाहर बहरेलाक बादो विद्यमान छलनि।बाहर बहराइते चम्पावतीक अपन अनुजा एवं सखि बहिनपा आऔर बाहर बैसल लोक वरपर विभिन्न प्रकारक कटाक्ष आऔर व्यंगवाणक वर्षा केलनि ।शयनकक्षमे घटित संभावित विभिन्न विषयपर विमर्श होमय लागल चम्पावतीक सौन्दर्य ,रुप शज्या ,केस विन्यास ,वस्त्रावरण विन्यास, मुखमंण्डल पूर्ववत यथावत छलनि। ओ एक दोसराके ज्ञान गंगमे नहेलाक बाद कक्षसँ बहराइत वऽसँ बजली---अपने दोसर ठाम दोसर परीक्षणक तैयारी करी। हमर शुभकामना रहत जे अपने दोसर परीक्षणमे दोसर ठाम सफल रही।अपने अभियन्ता थिकहुँ ,अभियांत्रिकी वेदक वेदज्ञ छी मुदा यौवन अभियांत्रिकी वेदक किछुओ ज्ञान नञि अछि। अपने वेदना नञि बुझैत छी, संवेदनहीन छी।आब अपने एखने बिना बिलम्ब केने अपने अपन सम्मानक रक्षा लेल एहिठामसँ अविलम्ब जाउ।चम्पावती वरके ठेलैत पुन: बजली--अपने अपनाके अपमानित होइसँ बचाउ।अभियन्ता वर अपन आदर्श के बचेबाक लेल आदर्श चालिमे बाहर बहरेला।हिनका दूरा दिस पहुचैसँ पहिले गीतहारि महिला मंडली आऔर दर्शक द्वारा दूरापर ई शुभ घड़ीक अशुभ घटनाक बात विस्तार पौलक। बथानमे बैसल वरक बाप आऔर बरद वुद्धि भोजन भट्ट भोजनानन्द बरियातीक बीच एहि विशेष विषयपर विमर्श होमय लागल।ई घटना वरक बाप आऔर बरियातीके बज्रपात सन बुझना गेलनि।वरक बापके बड़के बेटाक विवाहमे ई बज्र खसब किछु अनहोनी सन बुझना गेलनि।दहेज प्रथाक विरोध आऔर समर्थनमे घमर्थन होमय लागल।पेट पिजौने आएल बरियाती लोकनि जठराग्निक अग्निमे भोजनमे विलम्ब भेलाक कारणे जरैत छला।चम्पावतीक बापके बजाओल गेलनि।वरक बाप आऔर बरियाती लोकनि कन्या पक्षके समक्ष कलजोरि सास्टांग बहु विधि बेर बेर विनती केलनि।यथावत कल जोरने बरक बाप आऔर बरियाती लोकनि कन्याक बापके डेगक अनुशरण करैत डेराइत अंगना एला।चम्पावतीक बाप पूर्णरुपेण आश्वस्त छला। हुनका पूर्ण विश्वास छलनि जे हमर बेटी वुधियारि छथि ओ बिगडल बातके बिगड़ैत बिगड़ैत बना लेती।चम्पावती निर्द्वन्द अभय मुद्रामे कुर्सीपर बैसलि छलि मुदा मुखमंडल आक्रामक अवश्य छलनि, वरक बाप अचानक आबि चम्पावतीके कलजोरि अपन पागक रक्षा लेल पैर छुबि प्रणाम करबाक मुद्रामे झुकला कि हुनक माथमे पहिरल पाग खसलनि। पागके खसैसँ पहिले चम्पावती पागके लौकि लेलनि आऔर अपन पैर छिपैत पागके वरक बापक हाथमे दैत बजली---अपने अछोप छी, हम अपनेसँ छुआ जाएब,अपने हमरासँ दूर रही।अपने हमरा खस्सी बकरीक व्यवसायी सन कठोर कसाय बुझना जाइत छी। वरक बापके आँखिसँ नोर टपकि गेलनि आऔर कातर भावसँ हाथ जोरि बजला----जहिना हमर खसैत पागके रक्षा केलहुँ अछि तहिना हमर खसैत पागके रक्षा एकबेर आऔर काएल जाए ,हम आजीवन अपनेक ऋणी रहब।बिच्चहिमे अभियन्ता वर महोदय बापक समक्ष आबि मूक बनि मूर्तिवत ठाढ़ भेला।हमर वयससँ अपनेक बेटाक वयस बेसीये छनि मुदा हिनकामे एखनो बहुते बचपना बाँचल छनि।अपनेक बेटा अपनेक लाल छथि मुदा ज्ञानसँ लल्ल छथि। अपनेक बेटा अपनेक लेल जतबे सुयोग्य छथि,ओतबे हमरा लेल अयोग्य छथि।ई हमर जाँचक आँचमे नञि थम्हि सकला।ई अपन स्वाभिमानक सत्यानाश केने छथि।अपनेक पुत्र स्वामी रामदेव बाबासँ चमचासन अवश्य सिखने छथि मुदा परम सत्य रामके नञि जनैत छथि। ई चमचासनसँ नोकरी पाबि अपन फाटल तकदीर आऔर भूत भविष्य सीने छथि।अपनेके अपन पुत्र आज्ञाकारी आऔर संस्कारी बुझना जाइत छथि मुदा हिनक चरित्रक प्रत्येक पृष्ठ बहुते कारी छनि।हिनक कौमार्य कामाग्णिक आगिमे जरि गेल छनि।अपनेक बेटा पाइ लेल बाप बदलि सकैत छथि,अपनेक बेटा अभियन्ता संङ पंजीकृत सरकारी अपराधी आऔर भ्रष्ट सेहो छथ।अपनेक पैरमे एखनो बेमाए फाटल अछि मुदा हिनक चारु आंङुरमे चारि भरिक सोनाक अंगुठी आऔर गलामे पाँच भरिक सोनाक चैन, ई कोना किनलनि?हम एखनो अपन कौमार्य अखण्ड रखने छी मुदा अपने पुत्रक कौमार्य खण्ड खण्ड भेल छनि।ई काम कला आऔर रति संग्रामक योद्धा छथि।अपनेक बेटा लिंगोत्थानके अपन पौरुष बुझै छथि।हिनक दृष्टि आऔर दृष्टिकोण दुन्नू दूषित छनि।विवाहसँ पूर्व एहि तरहक प्रयास कखनो प्रशंसनीय नञि अछि। अपनेक लाल ज्ञानक कंगाल आऔर हमरा लेल संङहि सम्पूर्ण नारी जातिक लेल काल छथि।ई एखने शयन कक्षमे कुचेष्टासँ अपन श्रेष्ठता सिद्ध कए प्रतिष्ठा प्राप्त करबाक बहुते प्रयास केलनि अछि मुदा हिनक निशाना खाली गेलनि।अपनेक बेटा अभियन्ता अवश्य छथि मुदा यौवनक अभियांत्रिकीसँ अनभिज्ञ अनुभवहीन छथि।चन्द्रवदनी चम्पावतीक ई बात वरक बापके टटाएल बसिया रोटी सन उसट्ठ बुझना गेलनि तथापि बातके बुढ़ बरद जकाँ वेदान्ती सन बिना दाँतके चिबौने गेला।चम्पावती अपन विद्वतापूर्ण विचार आऔर वौद्धिकताक तेज तरुआरिसँ वरक बापके छकरिक' राखि देलनि।बात बिगड़ैत देखि वरक बाप एकबेर फेर विद्वतापूर्ण प्रपंच रचैत बजला----अपने पुत्रवधुक रुपमे नञि हमर गृहलक्ष्मीक रुप मे हमरा घरमे अपने निवास करियौ से हमर आग्रह। चम्पावती वरक बापक बातके कटैत बजली---ई कोना संभव हाएत अपनेक बेटा चरित्रहीन छथि, ई चरित्रहीनता हिनकामे वंशानुगत छनि।अपनेक पुत्र अपने सन परुष हृदयहीन छथि।ई चरित्रहीनताक अभियोग पूज्य मुदा दूष्ट देवता लोकनिपर सेहो लागल छनि जे शान्ति आऔर प्रेमक पाठ पढ़ै छला। हम अपनेके अंगीकार केलहुँ मुदा अपनेक चरित्रहीन भ्रष्ट बेटा अंगीकार करबाक योग नञि छथि,तथापि ई विष हम पीब लेब।नारी आदिकालसँ अपमान उपेक्षाक विष पिबैत आबि रहल अछि। हम नारी आऔर गरीबक बेटी छी, हम विष पिबाक लेल वाध्य छी। हम अपनेक बिगड़ल बेटाके सुधारबाक दायित्व लेब मुदा हमरो बापके पागक रक्षा होमक चाही।दहेजक रुपमे नगद लेल गेल टका एखनहि अविलम्ब वापिस होमक चाही।हमर बापके हमर विवाहमे बिगहा भरि जमीन बिका गेलनि अछि। ई हमरा लेल कलंकक टीका भेल से हमरापर नञि लागक चाही।हमर अपनेक चरित्रहीन पपियाह बेटाके स्वीकारब हमर कमजोरी नञि बुझब, हमरो गोट चारिटा सरकारी सेवा हेतु चिट्ठी आएल अछि। एखन आऔर चिट्ठी आबि सकैत अछि। कोन ठाम कोन पदपर योगदान काएल जाए से हम विचाराधीन रखने छी।हम अपन पिताक श्रेष्ठ संतान छी।हमरो अपन माए बाप छोट भाइ के प्रति किछु दायित्व बनैत अछि।हम अपन दायित्वक निर्वहन पूर्णरुपेण तत्परतापूर्वक करब ।हम दस बर्षधरि अपन काएल आयके अपना हिसाबे अपन दायित्वक निर्वहनमे करब।वरक बाप नगद लेल गेल टका वापिस करबाक स्वीकृति देलनि आऔर पुतौहपर लगै वला सब सामाजिक प्रतिबन्ध हटबैत सब अनुबन्धके स्वीकृति देलनि।बरियातीमे वरक बापक किछु विरोधी सेहो आएल छला ओ एहि आगिमे घी ढ़ारि अपन हाथ सेंकबाक प्रयास केलनि मुदा नञि चललनि।विवाहक लंम्बित प्रक्रिया विधि विधानपूर्वक पूर्ण होमय लागल। वरक बापक दग्ध आत्मा शीतल आऔर शान्त भेलनि। -बद्रीनाथ राय अमात्य, ग्राम पोस्ट करमौली, भाया कलुआही, जिला मधुबनी बिहार ,फोन 6205190859 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१२.आशीष अनचिन्हार: इच्छा मृत्यु: स्वतंत्र भारतक पहिल वैध उदाहरण आशीष अनचिन्हार इच्छा मृत्यु: स्वतंत्र भारतक पहिल वैध उदाहरण इच्छा मृत्यु केर माने एहन मृत्युसँ लगाओल जाइत छै जाहिमे आदमी अपन इच्छासँ इच्छित दिन, स्थान, मूहूर्त वा परिजनक सानिध्यमे मृत्युक वरण कऽ सकए। प्राचीन कालमे इच्छा मृत्युकेँ दैवी एवं अलौकिक वस्तु मानल जाइत छलै। इच्छा मृत्युकेँ शक्तिक रूपमे वर्णन छै माने ओहन लोक जकरा लग इच्छा मृत्युक शक्ति छै। एहन लोक प्राचीन कालमे अतिरिक्त आदरक पात्र होइत छलाह। भारतीय संदर्भमे भीष्म पितामह एकर नीक उदाहरण छथि जिनका इच्छा मृत्यु वरण करबाक वरदान भेटल छलनि। मुदा सभकेँ ने इच्छा मृत्युक वरदान भेटि पाबै छलै आ ने सभ लग ई शक्ति छलै। तँइ बादमे एकर अन्य रूप आनल गेलै। भारतमे वानप्रस्थ वा जैन धर्मक संथारा हमरा इच्छा मृत्युक एकटा बदलल प्रारूप लगैए। वानप्रस्थकेँ आदमी जीवनक चारिम भाग माने एकदम अंतिम भाग मानल गेलैए जाहिमे लोक अपन पारिवारिक-सामाजिक दायित्वपूर्ण कऽ घर छोड़ि दैत छलाह एवं भिक्षाटन कऽ शेष जीवन बिता मरि जाइत छलाह। तहिना संथारामे जैनीकेँ बूझल रहै छै जे आब हमरा कम भोजन करबाक अछि आ क्रमशः हरेक दिन कम करैत जेबाक अछि। एक समयक बाद भोजन बंद भऽ गेलाक कऽ मृत्यु भऽ जाइत छलै। आनो प्राचीन धर्म सभमे एहन उदाहरण भेटत मुदा लेख नमहर करब हमर अभीष्ट नहि। आधुनिक कालमे ने वानप्रस्थक काज छै आ संथारापर सरकार सभ बैन लगेने छै। इच्छा मृत्यु एवं आत्महत्या ऊपरसँ देखबामे इच्छा मृत्यु एवं आत्महत्या एकै लागै छै मुदा दूनूमे भेद छै। इच्छा मृत्यु संपूर्ण पारिवारिक ओ सामाजिक दायित्व पूरा भेलाक बाद प्रयोगमे आनल जाइत छलै तँइ इच्छा मृत्युकेँ दैवीय एवं सम्मानीय मानल गेलै, मुदा आधुनिक कालमे इच्छा मृत्युकेँ सेहो पाप मानल गेलै। जखन कि आत्महत्या जीवनक असफलता, हताशा, अथवा क्षणिक आवेगमे कएल जाइत छै तँइ आत्महत्याकेँ पाप ओ अपराधक श्रेणीमे राखल गेलै से प्राचीन एवं आधुनिक दूनू कालमे। सतीप्रथा, गंगालाभ एवं इच्छा मृत्यु सतीप्रथाक कोनो संबंध इच्छा मृत्युसँ नहि छलै। मुगलसँ पराजय भेलाक बाद ओकरासँ बलत्कृत हेबाक बदला राजपूतानी सभ जौहर (आगिमे स्वतः जरि कऽ मरि जाएब) चुनलक मुदा बादमे ई कुप्रथा बनि गेल आ स्त्रीक विधवा बेलाक बाद बिना ओकर इच्छाक ओकरा चितापर जरा देल जाइत छल। बादमे ई सतीप्रथा संगठित ओ सामूहिक खून कऽ देबाक उदाहरण बनि गेल, जकरा बंगालक समाज सुधारक राजा राममोहन राय खत्म करबेलाह। मिथिलामे एहने एकटा कुप्रथा भऽ गेल छलै 'गंगालाभ' नामसँ। ई प्रथा सरदीमासमे बूढ़ा-बूढ़ीकेँ धर्मक नामपर गंगामे डुबकी लगा-लगा कऽ मारि देल जाइत छलै। एहि कुप्रथाक असरि देखियौ जे 'हुनका गंगा-लाभ भऽ गेलनि' वाक्यसँ बुझा जाइत छलै जे अमुक लोक नहि रहलाह। बादमे क्रमशः ईहो कुप्रथा कम भेल। अंग्रेजक समयमे एवं स्वतंत्र भारतमे एहि सभ तमाम कुप्रथापर रोक लगलै आ इच्छामृत्यकेँ अवैध मानल गेलै। मुदा अवैध रूपें सही हमर अनुमान अछि जे इच्छा मृत्यु चलैत रहलै। ई कोना चलैत रहलै से जनबासँ पहिने आधुनिक युगमे इच्छा मृत्युक परिभाषा जानि लेब उचित। प्राचीन कालमे इच्छा मृत्यु लोक अपने निर्णय लैत छल। ओकरा बदला आन कियो नहि। मुदा आधुनिक युगमे लोक अपने लऽ सकैए, संगे परिवारक लोक सेहो लऽ सकैए मुदा कोर्टक आदेशक संग, पूर्ण रूपे कानूनी तरीकासँ। अन्यथा एकरा खून मानल जेतै। मुदा अनुमान अछि जे बहुत बेर असाध्य बेमारीक कारणे परिवारक सहमति आ किछु बेसी फीस देलासँ हास्पीटलमे इच्छा मृत्युक काज अवैध रूपे भऽ जाइत छै। तँइ हम शीर्षकमे लिखलहुँ "पहिल वैध उदाहरण"। हरीश राणा बर्ख 2013 मे हरीश राणा चंडीगढ़क एक यूनिवर्सिटी सँ सिविल इंजीनियरिंग पढ़ाइ कऽ रहल छलाह, एवं जाहि घरमे रहै छलाह तकर चारिम तल्लासँ खसि पड़लाह। परिवारक कहब छलनि जे आन छात्र सभ धक्का देलकै। मुदा ओहि घटनामे ओ कौमामे चलि गेलाह माने जिंदा तऽ छलाह मुदा ने चेतना छलनि आ ने अपन काज करबाक शक्ति। भोजन पाइप द्वारा देल जाइत छलनि। परिवार लगातार इलाज करबेलकनि मुदा सभ ठाम कहल गेलनि जे आब ई ठीक नहि हेताह। बर्ख 2024 मे हरीशक परिवार दिल्ली कोर्ट पहुँचलाह हरीशक इच्छा मृत्यु लेल मुदा कोर्ट मना कऽ देलकनि, तकर बाद सुप्रीम कोर्ट सेहो मना कऽ देलकनि। बर्ख 2025 मे दू मेडिकल बोर्ड गठित भेलै जाहिमे एकटा बोर्ड एम्स केर छलै। ई दूनू बोर्ड निर्णय देलक जे हरीश राणा कहियो ठीक नहि भऽ सकताह। आ तकर बाद फेरो परिवार सुप्रीम कोर्ट पहुँचल आ एहि बेर 11 मार्च 2026 केँ सुप्रीम कोर्ट हरीशक इच्छा मृत्युक निर्देश देलक एम्सकेँ। आ एम्सक निगरानीमे हरीशक सभ दवाइ बंद कएल गेलै, लाइफ सपोर्ट सिस्टम बंद कएल गेलै, भोजन बंद कएल गेलै आ 24 मार्च 2026 केँ हुनक निधन भेलनि एहि तरीकासँ। सोशल मीडियामे ई केस सुप्रीम कोर्टसँ एहि आदेशक बाद सोशल मीडियापर बहुर रास बात देखलबामे आएल जाहिमे एकटा छल जे कि कोर्ट परिवारकेँ खर्चा नहि दऽ सकैत छल। एहने सन बात। मुदा बात एकटा हरीश राणाक नै छै, एहन केस बहुत छै कोर्टमे। आ हरीश राणासँ पहिनेहो कोर्ट लग एहन केस गेल छलै मुदा हरीश राणामे मेडिकलसँ साबित भेलै जे आब ई ठीक नहि हएत तँइ ई देल गेलै। दोसर बात जे भारतीय मानस कोनो सुविधाक बहुत गलत प्रयोग करैत छै। आइ जँ कोर्ट एकटा लेल खर्चक व्यवस्था कऽ दितै तऽ फेर अगिले दिनसँ ओकरा लग एहन हजारो फर्जी केस आबि जइतै जाहिमे बेमार आदमीक सेहो सहमति रहितै। तँइ कोर्ट हरीश राणाक परिवारकेँ खर्चा नहि दऽ नीक केलकै। कोर्टक निर्णय एहि लिंकपर पढ़ल जा सकैए- https://www.verdictum.in/pdf_upload/harish-rana-v-uoi-verdictum-1773761.pdf निधनक बाद एम्स केर पुष्टि- अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१३.रमेशक कविता-समय : विस्तारक उन्माद आ संकोचक विवेकक बीच- एकटा समग्र मूल्यांकन गजेन्द्र ठाकुर रमेशक �कविता-समय�: विस्तारक उन्माद आ संकोचक विवेकक बीच- एकटा समग्र मूल्यांकन ����. कविता-संग्रह �कविता-समय� (�पाथर पर दूभि�, �समवेत स्वरक आगू�, �सङोर� आ �नागफेनी�) केर भारतीय आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक आधार पर समीक्षा आ ओकर सीमाक रेखांकन ����. भारतीय काव्यशास्त्र (रस, ध्वनि, अलंकार, वक्रोक्ति, औचित्य), पाश्चात्य सिद्धान्त (मार्क्सवाद, उत्तर-उपनिवेशवाद, नारीवाद, पर्यावरण-समीक्षा, आधुनिकतावाद, उत्तर-संरचनावाद) आ तुलनात्मक दृष्टिकोणक। पहिल खण्ड १. भारतीय काव्यशास्त्रक आधार पर समीक्षा १.१ रस सिद्धान्त भरतमुनिक �नाट्यशास्त्र� मे प्रतिपादित रस सिद्धान्त ऐ संग्रहक केन्द्रीय आधार अछि। रमेशक कवितामे बहुबिध रसक सफल अभिव्यक्ति भेटैत अछि। करुण रस (स्थायी भाव: शोक) कोसी-चक्रक कविता सभमे करुण रसक प्रबल अभिव्यक्ति भेल अछि। �कोसी-लोक�, �मरसीया�, �कोसी-गीत� जकाँका कविता सभमे बाढ़ि, विस्थापन, मृत्यु आ निराश्रयताक चित्रण करुण रसक सशक्त उदाहरण अछि। �तीन दिन भए गेलै नाह पर। भावहु-बेटी-बेदरा के लाजें नद्दी ने फीड़ल जाइ छै।� ��मरसीया� एतय �नदी ने फीड़ल जाइ छै� कहि क� प्रकृतिक निष्ठुरताक संग-संग मानवीय असहायताक द्वारा करुण रसक उद्बोधन भेल अछि। वीभत्स रस (स्थायी भाव: जुगुप्सा) �लोहक मनुक्ख� आ �सरकारक परिभाषा� सन कविता सभमे पूँजीवादी शोषणक वीभत्स चित्रण भेटैत अछि। �सभकियारीक सभ पौधा केँ एक्के रंग पटबिहें।� -�भगतिसंहक वसीयतनामा� एतय मानवीय विविधता आ प्रकृतिक वैविध्यक एकरंगीकरण (homogenization) वीभत्स रसक सृजन करैत अछि। शान्त रस (स्थायी भाव: निर्वेद) �आकांक्षा�, �जीयब-मरब�, �अ/नियति� सन कविता सभमे संसारिक आकांक्षा सभक अन्तिम निर्वेदक भाव शान्त रसक रूपमे व्यक्त भेल अछि। �जिजीविषा�मे हिचकीकँ विलीन करैत समदाउनिक भास कँ, आ नाद-स्वरसँ केना आरोह-अवरोहक ऊर्जस्वता अबैए से भीतर धरि देखबैत छथि।� शृङ्गार रस (स्थायी भाव: रति) �ई प्रेम-पत्र नहि थिक!�, �आदिम राग� सन कविता सभमे शृङ्गार रसक अभिव्यक्ति भेल अछि, मुदा ई पारम्परिक शृङ्गार नै भ� आधुनिक, शारीरिक आ मनोवैज्ञानिक शृङ्गार छी। रौद्र रस (स्थायी भाव: क्रोध) �विद्रोह�, �भगतिसंहक वसीयतनामा�, �एकबार सँ� जका कवितासभमे शोषण-विरोधी क्रोध रौद्र रसक रूपमे व्यक्त भेल अछि। १.२ ध्वनि सिद्धान्त आनन्दवर्धनक �ध्वन्यालोक� मे प्रतिपादित ध्वनि सिद्धान्त अनुसार, रमेशक कवितामे व्यङ्ग्यार्थ (suggested meaning) कऽ सफल प्रयोग भेल अछि। वस्तुध्वनि (Factual suggestion) �कोसी-सरकार� मे घोड़ाक माध्यम सँ सरकारी तन्त्रक व्यङ्ग्यात्मक चित्रण ध्वनिक माध्यम सँ वस्तु-स्थितिक उद्घाटन करैत अछि। अलंकारध्वनि (Figurative suggestion) �लोहक मनुक्ख� मे �लोह� (iron) शब्दक बारम्बार प्रयोग ध्वनित करैत अछि जे मनुष्य आब यन्त्रवत्, निष्ठुर, आ संवेदनाहीन भ� गेल अछि। रसध्वनि (Emotive suggestion) �सदानीरा-तट पर...� मे प्रकृति आ मानवक सम्बन्धक चित्रण रसध्वनिक उत्कृष्ट उदाहरण छी। १.३ अलंकार सिद्धान्त रमेशक कवितामे अलंकारक सर्जनात्मक प्रयोग भेल अछि। उपमा अलंकार �बगुलीमे टोलक सोहाग मथैत हाथक सामने स� जखन�-�इति खग्रास-कथा� रूपक अलंकार �कोसी मिथिलाक आँखि स� बहै छथि। / मिथिला कोसी मे बहै छथि।� -�कोसीक तारांकित प्रश्न� अतिशयोक्ति अलंकार �चन्द्रमाक शीतलता डुमरीक फूल भ� गेल अछि।� -�सदानीरा-तट पर...� विरोधाभास अलंकार �जीवनक राति मे द्वैपदीक चीर जकाँ बढ़ेत आँखिक सूत� -�जिजीविषा� १.४ वक्रोक्ति सिद्धान्त कुन्तकक �वक्रोक्तिजीवित� मे प्रतिपादित वक्रोक्ति सिद्धान्त अनुसार, रमेशक भाषा मे काव्यात्मक वक्रता (artistic indirection) स्पष्ट देखल जाइत अछि। �अहाँ जंगली रही / त� सुखी रही अपना मे / मुदा बाँचि नहि सकलहुँ� -�सन्दर्भ : उबियाइत अफ्रीकी जंगलक मुक्ति� एतय �सभ्यता� शब्दक सीधा प्रशंसा नै क� वक्रोक्तिक माध्यम सँ सभ्यताक आवरणमे नुकायल बर्बरताक अनावरण केने छथि। १.५ औचित्य सिद्धान्त क्षेमेन्द्रक �औचित्यविचारचर्चा� अनुरूपे, रमेशक कवितामे देश-काल-पात्र-प्रकरण-भाषाक औचित्यक पालन भेल अछि। कोसी-क्षेत्रक बोली, संस्कृति, जीवन-शैलीक चित्रणमे प्रादेशिक औचित्यक पूर्ण पालन भेल अछि। २. पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक आधार पर समीक्षा २.१ मार्क्सवादी समीक्षा (Marxist Criticism) रमेशक कविता मार्क्सवादी वर्ग-संघर्ष, शोषण आ विमुक्तिक चेतनासँ गहींरमे जा कऽ जुड़ल अछि। वर्ग-संघर्ष (Class Struggle) �लोहक मनुक्ख�, �बजार�, �कोसी-सरकार� मे शोषक वर्ग (पूँजीपति, राजनेता, नौकरशाह) आ शोषित वर्ग (किसान, मजदूर, विस्थापित) क बीचक संघर्षक चित्रण भेल अछि। सोन-चानीक उपजा, लोह सन हृदय। रुपैयाक मिसल, भावनाक राजस्थान भेटैत अछि �बजार� मे। वस्तु-वैचित्र्य (Commodification) �कोसीक कागत के नैया� मे मानवीय जीवनक वस्तुमे परिणत भेलाक चित्रण भेल अछि। कोसीक कागत के नैया, गंगा मे ओ उतारि दैत छथि। विमुक्तिक चेतना (Consciousness of Liberation) �भगतिसंहक वसीयतनामा�, �विद्रोह�, �एकटा दोसर दिशा मे बढ़बाक थिक� मे विमुक्तिक चेतनाक प्रबल स्वर सुनाई पड़ैत अछि। २.२ उत्तर-उपनिवेशवादी समीक्षा (Postcolonial Criticism) रमेशक कविता उत्तर-उपनिवेशवादी दृष्टिसँ अत्यन्त महत्वपूर्ण अछि। उपनिवेशक मानसिकताक विखण्डन (Deconstruction of Colonial Mentality) �कोसी-कथा� मे �वाराह-क्षेत्र� आ �सुगर� (pig) शब्दक प्रयोग उपनिवेशवादीक (एतय राज्य) मानसिकताक विखण्डन करैत अछि। समस्त वाराह-क्षेत्रक समस्त लोक / बना देल गेल अछि सुगर, शब्दशः। उप-सहायक स्वर (Subaltern Voice) �मरसीया�, �कोसी-लोक�, �गाम� मे उप-सहायक (subaltern) वर्ग बाढ़ि पीड़ित, किसान, महिला, दलितक स्वर सुनाई पड़ैत अछि। भाषाक राजनीति (Politics of Language) मैथिली भाषामे लिखल ई कविता स्वयं भाषायी उपनिवेशवादक विरुद्ध एकटा राजनीतिक अभियान छी। २.३ नारीवादी समीक्षा (Feminist Criticism) रमेशक कवितामे नारी-चेतना आ पितृसत्ता-विरोधक स्वर सशक्त रूपमे उपस्थित अछि। पितृसत्ताक विखण्डन �ई अदराक मेघ नहि मानत...� मे स्त्री-शरीर पर नियन्त्रणक पितृसत्तात्मक प्रयासक विखण्डन भेल अछि। एम.डी.बलसम्मा आकि बुला चौधरी कहियो रण्डी नहि बनि सकैए, गंजी-जंघियाक कारणेँ?� मातृ-शक्ति (Matriarchal Power) �नानीक कविता : एक� आ �नानीक कविता : दू� मे नानीक चरित्रमे मातृ-शक्तिक पारम्परिक आधार पर पुनर्प्रतिष्ठा भेल अछि। जेना-से नानी सप्ता-विप्ताक कथा कहैत छथिन। रोहीदास कें माछक पेटसँ बहार करबाक लेल आ नहसँ नहसूर चीरऽ लगैत छल आदि। स्त्री-शरीरक राजनीति �ई अदराक मेघ...� आ �साँझ भरली� मे स्त्री-शरीरक राजनीतिक विश्लेषण भेल अछि, जतय पुरुष दृष्टि आ सामाजिक नियन्त्रणक प्रश्न उठाओल गेल अछि। २.४ पर्यावरण-समीक्षा (Ecocriticism) रमेशक कोसी-चक्रक कवितासभ पर्यावरण-समीक्षाक दृष्टिसँ अत्यन्त महत्वपूर्ण अछि। प्रकृति-विरुद्ध हिंसा �कोसी-घाटी सभ्यता�, �कोसी-कथा�, �आदि-कथा� मे प्रकृतिक विरुद्ध मानवीय हिंसाक चित्रण भेल अछि। जेना- ईन्जीनियर भए गेलै अङरेज आ नेता भए गेलै तुरुक मे देखाइत अछि। [आदि-कथा] प्रकृतिक सबाल्टर्न स्वर (Nature as Subaltern Voice) कोसी नदी स्वयं एकटा सबाल्टर्न चरित्रक रूपमे उपस्थित अछि, जकर आवाज सुनबाक लेल कियो नै अछि। जेना- कोनोटा असिर नै छै कोसी माइ पर, ने मनाउनक आ ने भगदत्तक। [कोसी-घाटी सभ्यता] स्थानीय पारिस्थितिकीक ज्ञान (Local Ecological Knowledge) �कोसी-लोक�, �कोसी-भगइत� मे स्थानीय पारिस्थितिकीक ज्ञानक महत्व आ ओकर विनाशक चित्रण भेल अछि। २.५ आधुनिकतावादी समीक्षा (Modernist Criticism) रमेशक कविताक शैलीगत विशेषता आधुनिकतावादी अछि। खण्डित आख्यान (Fragmented Narrative) �मिथिलामे बीसम शताब्दी� जकाँ कवितामे खण्डित आख्यानक प्रयोग भेल अछि, जे आधुनिक जीवनक खण्डित अनुभवक प्रतिनिधित्व करैत अछि। प्रवाह-चेतना तकनीक (Stream of Consciousness) �जिजीविषा�, �अ/नियति� मे प्रवाह-चेतनाक तकनीकक प्रयोग भेल अछि। विडम्बना (Irony) �राजा आ प्रजा�, �सरकारक परिभाषा� मे विडम्बनाक सशक्त प्रयोग भेल अछि। जेना- समस्त प्रजा तिला-संक्रान्तिक खिच्चरि लेल केना हनैत अछि से ओ देखबैत अछि। [राजा आ प्रजा] २.६ उत्तर-संरचनावादी समीक्षा (Poststructuralist Criticism) रमेशक कविता भाषाक अस्थिरता आ अर्थक अनिश्चितताक प्रश्न उठाबैत अछि। द्वैतवादक विखण्डन (Deconstruction of Binaries) �ओइ पार, अइ पार�, �शून्यकाल सँ शून्यकाल धरि� मे द्वैतवादी संरचनाक विखण्डन भेल अछि। आरो देखू- हम शब्द गढ़ैत छी- आ फेर,/ ओ आगि गढ़ैत छथि आ फेर, ओ हमरा शब्दकेँ आगि मानैत छथि। [शून्यकाल सँ शून्यकाल धरि] अर्थक अनिश्चितता �प्रश्नोत्तरी� मे प्रश्न आ उत्तरक बीचक अर्थ-अनिश्चितता उत्तर-संरचनावादी विमर्शक प्रतिनिधित्व करैत अछि। २.७ मनोवैज्ञानिक समीक्षा (Psychoanalytic Criticism) रमेशक कविता मनोवैज्ञानिक रूपसँ खूब भीतर धरि जुड़ल अछि। सामूहिक अचेतन (Collective Unconscious) कोसी-चक्रक कविता सभमे सामूहिक अचेतनक प्रतीक (जल, बाढ़ि, बालु) बारम्बार प्रयुक्त भेल अछि। आघात (Trauma) �मरसीया�, �कोसी-गीत�, �एकटा कोनो भटसिम्मरिक कथा� मे सामूहिक आ व्यक्तिगत आघातक चित्रण भेल अछि। दमन आ प्रतिफलन (Repression and Return) �कोसी-घाटी सभ्यता� मे दमित प्रकृतिक प्रतिफलनक चित्रण भेल अछि। ३. भारतीय आ पाश्चात्य सिद्धान्तक समन्वय रमेशक कविता भारतीय आ पाश्चात्य सिद्धान्तक समन्वयक उत्कृष्ट उदाहरण अछि। ३.१ रस आ मार्क्सवादक समन्वय रमेशक कवितामे करुण रस आ मार्क्सवादी वर्ग-चेतना एक-दोसरक पूरक बनैत अछि। �मरसीया� मे बाढ़ि पीड़ितक करुण रस मार्क्सवादी दृष्टिसँ वर्ग-शोषणक प्रतीक बनि जाइत अछि। ३.२ ध्वनि आ उत्तर-संरचनावादक समन्वय ध्वनि सिद्धान्तक व्यङ्ग्यार्थ आ उत्तर-संरचनावादक �अनुपस्थित उपस्थिति� (absent presence) केर बीच सम्बन्ध स्थापित कएल जा सकैत अछि। ३.३ वक्रोक्ति आ विडम्बनाक समन्वय भारतीय वक्रोक्ति सिद्धान्त आ पाश्चात्य विडम्बना (irony) क बीचक समानता रमेशक कवितामे स्पष्ट देखल जाइत अछि। ४. निष्कर्ष रमेशक �कविता-समय� संग्रह भारतीय आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक समन्वयक उत्कृष्ट उदाहरण अछि। भारतीय सिद्धान्तक दृष्टिसँ ऐ संग्रहमे रस, ध्वनि, अलंकार, वक्रोक्ति आ औचित्यक सफल प्रयोग भेल अछि। पाश्चात्य सिद्धान्तक दृष्टिसँ ई संग्रह मार्क्सवादी, उत्तर-उपनिवेशवादी, नारीवादी, पर्यावरणीय, आधुनिकतावादी आ उत्तर-संरचनावादी विमर्शसँ जुड़ल अछि। कोसी-चक्रक कविता सभ एहि संग्रहक सर्वाधिक महत्वपूर्ण हिस्सा छी, जतय प्रकृति-मानव सम्बन्ध, वर्ग-शोषण, उपनिवेशवादी मानसिकता, स्त्री-चेतना आ आधुनिकताक संकट एक संग उभरि अबैत अछि। रमेशक भाषा-शैली आ प्रतीक-योजना ओकरा मैथिली साहित्यक एकटा महत्वपूर्ण हस्ताक्षरक रूपमे स्थापित करैत अछि। अन्ततः, ई संग्रह सिद्ध करैत अछि जे मैथिलीमे लिखल साहित्य वैश्विक साहित्यिक विमर्शसँ संवाद करबाक पूर्ण क्षमता रखैत अछि आ मैथिली कविता आधुनिकता आ उत्तर-आधुनिकताक संकट सभक अभिव्यक्तिक सशक्त माध्यम बनि सकैत अछि। रमेशक �कविता-समय� भारतीय काव्यशास्त्रक परम्परागत सिद्धान्त सभक पाश्चात्य सैद्धान्तिक विमर्शसँ सफल समन्वय स्थापित करैत, समकालीन सामाजिक-राजनीतिक-पारिस्थितिकीय यथार्थक गहन आ मौलिक अभिव्यक्ति देने अछि। दोसर खण्ड कविता-समय संग्रहक सीमा कोनोहु साहित्यिक कृति पूर्ण होइत अछि तँ ओइमे ओकर सीमा आ कमी सभ सेहो होइत अछि। रमेशक �कविता-समय� संग्रह अपन विशालता, गहनता आ सैद्धान्तिक विविधताक बादो किछु सीमा आ कमी सभ सँ मुक्त नहि अछि। नीचाँ विस्तृत रूपमे ओकर समीक्षा प्रस्तुत अछि। १. भाषागत सीमा १.१ अति-प्रादेशिक भाषा (Excessive Regionalism) संग्रहक सबसँ बड़का सीमा ओकर अति-प्रादेशिक भाषा अछि। मैथिलीक कोसी-क्षेत्रीय बोलीक अतिप्रयोग आ किछु स्थान पर हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी शब्दक अनावश्यक मिश्रण पाठकक पहुँचमे बाधा उत्पन्न करैत अछि। जेना- पेटेन्ट/ स्काइ-लैब आदि। सामान्य लोकसँ ऐ तरहक प्रयोग होइत अछि मुदा लेखक/ कविसँ केनी बेशी आशा लोक करैत अछि। ई अति-प्रादेशिकता संग्रहक सीमा संकुचित कऽ दैत अछि, विशेष रूप सँ ओइ पाठक लेल जे कोसी-क्षेत्रीय बोली सँ परिचित नहि छथि। १.२ भाषायी असंगति (Linguistic Inconsistency) एहि संग्रहमे एकटा स्थिर भाषा-शैलीक अभाव अछि। कतौ प्रौढ़ मैथिली, कतौ खिचड़ी भाषा, कतौ अंग्रेजीक अत्यधिक प्रयोग दृष्टिगोचर होइत अछि। जेना- डॉलर झनझनबैत, टाइटेनिक फिलिम आदि। १.३ वर्तनीक अनियमितता (Orthographic Irregularity) पूरा संग्रहमे वर्तनीक एकरूपता नहि अछि। एकहि शब्दक बहुबिध वर्तनी भेटैत अछि। २. संरचनागत सीमा २.१ अति-दीर्घता (Excessive Length) अनेक कविता अनावश्यक रूपमे नाम भऽ गेल अछि, ओतय संक्षेपणक आवश्यकता छल। �कोसी-घाटी सभ्यता� सन कविता अपन दीर्घता आ पुनरुक्तिक कारण पाठकक रस-भंग करैत अछि। २.२ खण्डित आख्यानक अति-प्रयोग (Excessive Fragmentation) आधुनिकतावादी खण्डित आख्यानक तकनीकक अतिप्रयोग कतौ-कतौ अर्थक अस्पष्टता उत्पन्न कऽ दैत अछि। �जिजीविषा�, �अ/नियति�, सन कविता सभमे विचार-खण्डक अत्यधिक खण्डीकरण पाठकक समझबामे कठिनाई उत्पन्न करैत अछि। २.३ विधागत अस्पष्टता (Generic Ambiguity) संग्रहमे कविता, गीत, गजल, निबन्ध, संवाद, कथा-कविताक बीचक सीमा झलफल भ� गेल अछि। �प्रश्नोत्तरी� सन रचना नहिये पूर्ण कविता अछि, ने पूर्ण नाटक, आ नहिये पूर्ण निबन्ध। ३. वैचारिक सीमा ३.१ आदर्शवादी अतिशयोक्ति (Idealistic Exaggeration) मार्क्सवादी आ उत्तर-उपनिवेशवादी विमर्शक अतिशयोक्तिपूर्ण प्रस्तुति कतय-कतय एकांगी दृष्टिकोणक जन्म दैत अछि। जेना- हमरा तों कोंचला खुआ दे- मंजूर अछि। चाहे किच्छु भ� जाय आदिमे। ई क्रान्तिकारी उद्घोषणा अपन आदर्शवादी अतिशयोक्तिमे वास्तविक राजनीतिक व्यवहारक जटिलताक उपेक्षा करैत अछि। ३.२ पुरुष-केन्द्रित दृष्टि (Male-Centered Perspective) नारीवादी चेतनाक बादो, संग्रहक अधिकांश कविता पुरुष-केन्द्रित दृष्टिसँ लिखल गेल अछि। स्त्री-पात्रसभ (नानी, माय, पितिआइनि) अधिकांशतः पुरुष दृष्टिक परिधि मे चित्रित भेल छथि। ३.३ शहरी-ग्रामीण द्वैतक अति-सरलीकरण (Over-simplification of Urban-Rural Binary) शहर आ गामक बीचक द्वैतक अति-सरलीकरण भेल अछि। गामक सभटा �पवित्र�, �सरल�, �सहज� आ शहरक सभटा �भ्रष्ट�, �कृत्रिम�, �शोषक� रूपमे प्रस्तुत करबाक प्रवृत्ति वास्तविकताक जटिलताक उपेक्षा करैत अछि। जेना- आङन मे, चौक मर्दानगीक गर्मी हाथ, लात, मुँह आ डाँड सँ निकालैत अछि। [साँझ भरली] ४. शैलीगत सीमा ४.१ पुनरुक्ति (Repetition) अनेक स्थान पर विचार, प्रतीक आ शब्दक अनावश्यक पुनरावृत्ति भेल अछि। �बाबा गीत� मे �नै-नै�, �बावा� शब्दक पुनरावृत्ति कतौ-कतौ शैलीगत कमजोरीक रूपमे परिलक्षित होइत अछि। ४.२ प्रतीकक अति-प्रयोग (Excessive Symbolism) प्रतीकक अतिप्रयोग कतौ-कतौ अर्थक दुरूहता अनैत अछि। जेना- सूर्यमुखीक पुंकेसर पर परागकणक अविरल संरचना होइए आदिमे। एहि शीर्षक आ ओकर सामग्रीक बीचक सम्बन्ध सामान्य पाठक लेल सहज नहि अछि। ४.३ भावुकताक अति (Excessive Sentimentality) कतौ-कतौ भावुकताक अतिशयोक्ति काव्य-गरिमाक ह्रास करैत अछि। जेना- आह! � कोसीक जीवन! आह! दीर्घ-काव्य, कोसीक जीवन!� कोसी-लोकमे। ५. ऐतिहासिक-सन्दर्भगत सीमा ५.१. समसामयिक सन्दर्भक अति-विशिष्टता (Over-specificity of Contemporary References) �भगतिसंहक वसीयतनामा�, �दिशांश लागल उका-पतङ� मे समसामयिक राजनीतिक सन्दर्भक अति-विशिष्टता ओकरा कालातीत (timeless) नै बनयबाक अनुमति दैत अछि। ५.२ ऐतिहासिक अशुद्धिक सम्भावना (Potential Historical Inaccuracies) �कोसी-कथा�, �आदि-कथा� मे ऐतिहासिक तथ्यक काव्यात्मक प्रस्तुति मे अशुद्धिक सम्भावना रहैत अछि। ६. समग्र मूल्यांकन सीमाक सारांश: | क्रम | सीमाक प्रकार | प्रमुख समस्या | | | --| | | १ | भाषागत | अति-प्रादेशिकता, वर्तनीक अनियमितता | | २ | संरचनागत | अति-दीर्घता, खण्डीकरणक अति | | ३ | वैचारिक | आदर्शवादी अतिशयोक्ति, पुरुष-केन्द्रित दृष्टि | | ४ | शैलीगत | पुनरुक्ति, प्रतीकक अति | | ५ | ऐतिहासिक | समसामयिक सन्दर्भक अति-विशिष्टता | ७. निष्कर्ष रमेशक �कविता-समय� संग्रह अपन सामर्थ्य आ उपलब्धिक बादो किछु सीमा आ कमीसभ सँ मुक्त नहि अछि। ई सीमासभ मोटामोटी चारि स्तर पर देखल जाइत अछि- भाषायी, संरचनात्मक, वैचारिक आ शैलीगत। भाषायी स्तर पर अति-प्रादेशिकता आ वर्तनीक अनियमितता संग्रहक व्यापक पाठक-वर्ग तक पहुँचमे बाधा उत्पन्न करैत अछि। संरचनात्मक स्तर पर अति-दीर्घता आ खण्डीकरणक अति-प्रयोग पाठकक सहज-पठनमे व्यवधान डालैत अछि। वैचारिक स्तर पर आदर्शवादी अतिशयोक्ति आ पुरुष-केन्द्रित दृष्टि वैचारिक एकांगिताकेँ जन्म दैत अछि। शैलीगत स्तर पर पुनरुक्ति आ प्रतीकक अति-प्रयोग काव्य-गरिमाक ह्रास करैत अछि। तथापि, ई सीमासभ संग्रहक मौलिकता आ सामर्थ्यकेँ नकारैत नहि अछि। �कोसी-चक्र�, �नानीक कविता�, �भगतिसंहक वसीयतनामा� सन सशक्त कवितासभ आ भारतीय-पाश्चात्य सिद्धान्तक समन्वयक मौलिक प्रयास ऐ संग्रहक महत्व प्रमाणित करैत अछि। �कविता-समय� संग्रहक सीमासभ ओकर विशालता आ महत्वाकांक्षाक सहज उप-उत्पादन अछि। ई सीमासभ संग्रहक अन्तर्निहित कमजोरी सँ बेसी ओकर अतिरिक्त विस्तार, अति-आत्मीयता आ प्रायोगिक उत्साहक परिणाम अछि। भविष्यक संस्करणमे भाषायी संपादन, संरचनात्मक संक्षेपण आ शैलीगत एकरूपताक माध्यम सँ ऐ सीमासभक समाधान कएल जा सकैत अछि। [सैद्धांतिक विवेचन लेल देखू- मैथिली समीक्षाशास्त्र- गजेन्द्र ठाकुर] अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१४.डॉ. उमेश मण्डल-समकालीन मैथिली साहित्यक लोकधर्मी स्वर : राम विलास साहु डॉ. उमेश मण्डल समकालीन मैथिली साहित्यक लोकधर्मी स्वर : राम विलास साहु डॉ. उमेश मण्डल अतिथि शिक्षक सर्व नारायण सिंह राम कुमार सिंह महाविद्यालय, सहरसा (बिहार) मो.: 9931654742 परिचय श्री राम विलास साहु समकालीन मैथिली साहित्यक एहन रचनाकार छैथ, जिनकर साहित्यिक उपस्थिति प्रतिबद्धता, सक्रियता आ निरन्तर सृजनशीलतासँ चिह्नित होइत अछि। हुनकर जन्म 01 जनवरी 1957 ई. केँ मधुबनी जिलाक लक्ष्मीनियाँ गाममे भेल। हुनकर माता स्वर्गीय कैली देवी आ पिता स्वर्गीय नशीव लाल साहु रहला। जीवन-संगिनी स्वर्गीय मंजूला देवी छेली, जिनकर सहचर्य हुनकर रचनात्मक जीवनमे प्रेरणादायी आ महत्त्वपूर्ण स्थान रखैत अछि। प्रारम्भिक आ उच्च शिक्षा पूरा केलाक बाद ओ निर्मली महाविद्यालय, निर्मलीसँ स्नातक उपाधि प्राप्त केलैन, जे आब हरि प्रसाद साह महाविद्यालय नामसँ जानल जाइत अछि। व्यावसायिक जीवनक शुरुआत ओ हंसवाहिनी निकेतन स्कूलमे अध्यापन कार्यसँ केलैन। शिक्षण क्षेत्रमे अर्जित अनुभव, अनुशासन आ नेतृत्व क्षमता आधारपर ओ ज्ञान भारती पब्लिक स्कूल, निर्मलीमे प्राचार्य पदक दायित्व सम्हारलैन, जतए लगभग चौदह वर्ष धरि पूर्ण निष्ठा आ समर्पणसँ सेवा देलैन। शिक्षणक व्यस्त जीवनक बीच साहित्य-साधनाक प्रति हुनकर अनुराग निरन्तर बनल रहल। वर्तमानमे ओ कृषि कार्यसँ जुड़ल रहैत गामक जीवन-धारासँ अपन आत्मीय सम्बन्ध अक्षुण्ण रखने छैथ। सन् 2008 इस्वीसँ ओ नियमित रूपेँ साहित्य-लेखनमे सक्रिय भेला आ थोड़े समयमे पद्य आ गद्य दुनू क्षेत्रमे अपन विशिष्ट पहचान बनौलैन। मैथिली साहित्यकेँ हुनका द्वारा अनेक महत्त्वपूर्ण पोथीसभ भेटल अछि। हुनकर मैथिली पद्य-संग्रहमे रथक चक्का उलैट चलए बाट 2013, कोसीक कछेर 2017, गामक सुख 2018 आ मनक मैल 2018 विशेष रूपेँ उल्लेखनीय अछि। कथा-साहित्य क्षेत्रमे अंकुर 2016, दुधबेचनी 2018 आ अंशुमान 2021 प्रकाशित भेल अछि। खण्डकाव्य रूपमे नेत्रदान 2022 हुनकर रचनात्मक क्षमता केर सशक्त उदाहरण अछि। हिन्दीमे सेहो हुनकर काव्य-सर्जना प्रकाशित भेल अछि, जाहिमे ‘खुला आसमां धरती की गोद में’ 2023 इस्वीमे प्रकाशित काव्य-संग्रह रूपेँ महत्त्वपूर्ण अछि। ऐ सभक अतिरिक्त ‘आगिये आगि’ शीर्षक कविता-संग्रह प्रकाशनक प्रतीक्षामे अछि। साहित्यिक सक्रियताक संग ओ प्रगतिशील लेखक संघ, मधुबनी, बिहार केर उपाध्यक्ष पदपर कार्यरत छैथ। हुनकर साहित्यिक योगदान लेल हुनका नरेन्द्र सम्मान 2018, लेखकीय सम्मान 2018 आ सृजनरत्न सम्मान 2019 प्रदान कएल गेल अछि। श्री राम विलास साहु अपन रचनासभमे ग्रामीण परिवेश, सामाजिक सरोकार, नैतिक मूल्य आ मानवीय चेतनाक स्वर सजीव रूपेँ प्रस्तुत करैत छैथ। हुनकर लेखन मैथिली समाजक अनुभव संसारसँ अनुप्राणित अछि आ समकालीन साहित्यमे अपन विशिष्ट पहचान स्थापित कएने अछि। हुनकर स्थायी निवास मधुबनी जिलाक ग्राम लक्ष्मीनियाँमे अवस्थित अछि। प्रशासनिक दृष्टिसँ ई ग्राम पोस्ट छजना, भाया नरहिया, थाना लौकही अंतर्गत आबैत अछि। ई स्थानिक परिवेश ग्रामीण मिथिलाक पारम्परिक जीवन-धारासँ जुड़ल अछि, जेतए ओ आइयो अपन सांस्कृतिक जड़िसँ सम्बद्ध रहैत सक्रिय सामाजिक उपस्थिति बनौने छैथ। राम विलास साहु एहेन व्यक्तित्व छैथ जे लगभग 2010 इस्वीसँ ‘सगर राति दीप जरय’ संग निरन्तर रूपेँ संलग्न रहल छैथ। ऐ मंचसँ हुनकर जुड़ाव मात्र औपचारिक उपस्थिति भरि नहि रहल अछि, बल्कि सक्रिय सहभागितापर आधारित अछि। ई निरन्तरता दीर्घकालसँ बनल रहल अछि। एहिसँ स्पष्ट होइत अछि जे हुनकर जीवन-दृष्टि क्षणिक प्रेरणासँ प्रभावित नहि होइत छैथ। असलमे ओ भीतरसँ उपजल सांस्कृतिक निष्ठासँ संचालित होइत छैथ। हुनक ऐ निष्ठामे स्थिरता अछि, गाम्भीर्य अछि, आ दीर्घ साधनाक संकेत निहित अछि। ‘सगर राति दीप जरय’ कथागोष्ठीक प्रति हुनकर सरोकार व्यवहारिक रूपेँ स्पष्ट प्रकट होइत अछि। ओ नाममात्रक लेखक नहि छैथ। कथापाठ, विमर्श, आयोजन-सहयोग आ आत्मीय उत्तरदायित्व आदि सभ स्तरपर हुनकर उपस्थिति अनुभव कएल जा सकैत अछि। मंचक अनुशासन आ लोकतांत्रिक भावनाक ओ सम्मानपूर्वक निर्वाह करैत छैथ। ऐ सक्रियतासँ हुनकर व्यक्तित्वक एक सशक्त आयाम उभरि कऽ सामने अबैत अछि। एहि सँ ईहो सिद्ध होइत अछि जे हुनका लेल अर्थात् श्री राम विलास साहुक विचार, वचन आ कर्म परस्पर पृथक् खण्ड नहि छैथ, बल्कि जीवन-व्यवहारमे परस्पर सम्बद्ध तत्त्व अछि। जे मूल्य ओ अभिव्यक्त करैत छैथ, ताहिकेँ व्यवहारमे उतारबाक सजगता सेहो रखैत छैथ। ऐ प्रकारेँ हुनकर व्यक्तित्व मात्र वक्तव्यपर आधारित नहि; वरण आचरणसँ प्रमाणित होइत अछि। मैथिली साहित्य-जगतमे ई मान्यता स्थापित अछि जे ‘सगर राति दीप जरय’ जकाँ मुक्त आ सतत मंचक स्थायित्व प्रतिबद्ध व्यक्तित्वसभपर निर्भर करैत अछि। राम विलास साहुजीक नियमित उपस्थिति ऐ प्रतिबद्धताक विश्वसनीय प्रमाण अछि। ऐ आधारपर स्पष्ट होइत अछि जे हुनकर भूमिका लेखन-क्षेत्र धरि सीमित नहि अछि। ओ सांस्कृतिक आ सामाजिक गतिविधिसभमे सक्रिय रूपेँ जुड़ल रहैत छैथ। ई हुनकर उपस्थिति निष्ठा आ विश्वसनीयतासँ चिह्नित होइत अछि। ऐ कारण ओ मात्र सहभागी नहि, बल्कि प्रेरक शक्ति रूपेँ देखबामे अबैत छैथ। ‘रथक चक्का उलैट चलए बाट’ श्री राम विलास साहुक पहिल काव्य-संग्रह अछि, जाहिमे कविता, गीत, हाइकू, शेनर्यू आ टनका जकाँ विविध काव्य-रूप समाविष्ट अछि। ई कृति ग्राम्य जीवन, सामाजिक यथार्थ, प्रकृति-संवेदना आ मानवीय मूल्यक समेकित अभिव्यक्ति रूपेँ स्थापित अछि। एकर प्रथम संस्करण 2013 इस्वीमे प्रकाशित भेल छल आ द्वितीय संस्करण 2024 इस्वीमे पुनर्प्रकाशित भेल अछि, जे एकर स्थायित्व आ पाठकीय स्वीकृतिकेँ सूचित करैत अछि। संग्रहक काव्य-विस्तार व्यापक अछि। ‘महगाइ’, ‘बेरोजगारी’, ‘भ्रष्टाचारी’, ‘खेतिहरक जिनगी’, ‘बलानक बाढ़ि’ आदिमे समकालीन समाजक आर्थिक असंतुलन, प्रशासनिक विडम्बना, कृषक-जीवनक संघर्ष आ प्राकृतिक आपदाक मार्मिक चित्र प्रस्तुत अछि- “महगाइ अहाँ केतएसँ आ किए एलौं/आकि जबरदस्ती हमरा देशमे घुसि एलौं/अहाँ विदेशमे भलहिं छेलौं/के अहाँकेँ बजेलक आकि भूलसँ एलौं/अहाँ अबिते हमरा देशमे आगि लगेलौं” कवि श्रम, अभाव आ जीवन-संघर्षक यथार्थ चित्रण करैत समाज-चिन्तनक सशक्त धरातल निर्मित करैत छैथ। प्रकृति-चित्रण ऐ संग्रहक प्रमुख विशेषता अछि। “रामविलास साहुजी चैतावर गबै/लिखै छैथ, बिरहा सुनै छैथ, धनरोपनीपर आ किसानीपर कविता कहै छैथ। आ ऐ सभ विषयपर हिनकर कविताक जोड़ा भेटब कठिन अछि। ई सभ विषय मैथिली कविताकें विस्तार देलक अछि, आ ओइपर लिखबाक सामर्थ्य रामविलास साहुजीमे छन्हि, ओकर भीतरमे ताकिकऽ लिखबाक सामर्थ्य रामविलास साहुजीमे छन्हि।” ‘पियासल धरती’, ‘धनरोपनी’, ‘बेंगक बरियाती’, ‘चैताबर गीत’, ‘चैती गीत’ आदिमे ऋतु-चक्र, वर्षा-प्रतीक्षा, कृषि-कर्म आ जीव-जगतक सामूहिक स्पन्दन जीवन्त रूपेँ अभिव्यक्त अछि। प्रकृति कवि लेल प्रेरणा-स्रोत आ संवेदनात्मक सहचर रूपेँ उपस्थित अछि। दार्शनिक आ आध्यात्मिक चेतना सेहो संग्रहमे सक्रिय अछि। ‘ज्ञानक दीप’, ‘हराएल भगवान’, ‘चिन्ता-चिता’, ‘कर्मक फल’ आदिमे जीवन-मूल्य, कर्म-प्रधानता, आत्मावलोकन आ नैतिक अनुशासनपर बल दैत गम्भीर चिन्तन प्रस्तुत कएल गेल अछि। कवि बाह्य आडम्बरक अपेक्षा अन्तर्मनक प्रकाशपर अधिक आग्रह रखैत छैथ। नारी-जीवन आ पारिवारिक संरचनाक चित्रण सेहो उल्लेखनीय अछि। ‘गामक नारी’, ‘प्रेमक बान्ह’, ‘केकरा संग खेलब होरी’ जकाँ रचनामे स्त्री-मनक प्रतीक्षा, श्रम-सहभागिता, सांस्कृतिक भूमिका आ भाव-गहनता स्पष्ट रूपेँ प्रकट अछि। ग्रामीण समाजक संरचनामे नारीक सक्रिय उपस्थिति संग्रहक संवेदनात्मक आयामकेँ विस्तृत करैत अछि। भाषा-शैली सरल, लोकाभिमुख आ भावप्रधान अछि। ग्राम्य शब्दावली, कृषि-सम्बद्ध बिम्ब, लोक-जीवनक संकेत आ संवादात्मक प्रवाह रचनाक प्रामाणिकता सुदृढ़ करैत अछि। लघु-विधा जकाँ हाइकू आ टनकामे कवि अल्प शब्दमे सार्थक भाव-संप्रेषण करबाक क्षमता प्रदर्शित करैत छैथ, जे मैथिली काव्य-परिदृश्यमे विशेष रूपेँ ध्यान आकर्षित करैत अछि। ‘अंकुर’ श्री राम विलास साहुक लघुकथा-संग्रह अछि, जाहिमे 22 गोट कथा संग्रहीत अछि। कथा-सूची अनुसार ‘डोमक आगि’ सँ प्रारम्भ भऽ ‘बेंगक महंथी’ धरि रचनाक विस्तार समाजक विविध स्तर, मनोवृत्ति आ संरचनात्मक यथार्थकेँ उद्घाटित करैत अछि। संग्रहक प्रकाशन-विवरण आ कथा-क्रमसँ स्पष्ट होइत अछि जे ई कृति सुविचारित संपादन आ संयोजनक परिणाम अछि। ‘डोमक आगि’ सामाजिक विषमता आ जातिगत संरचनाक कठोर यथार्थ सामने आनैत अछि। मृत्यु जकाँ सार्वभौमिक प्रसंगमे सेहो भेदभावक उपस्थिति कथाकेँ मार्मिक बना दैत अछि। ‘स्वर्गक सुख’ श्रम, संतोष आ जीवन-संघर्षक सन्दर्भमे वास्तविक सुखक अर्थ उद्घाटित करैत अछि। ‘स्कूलक खिचड़ी’ आ ‘इमानदारीक पाठ’ शिक्षा-व्यवस्था, शासकीय योजना आ नैतिक शिक्षणक व्यवहारिक अन्तरालपर संकेत करैत अछि। ‘चोर-सिपाही’, ‘घूसहा घर’, ‘केते उचित’ आ ‘इज्जतक सवाल’ कथासभ सामाजिक-राजनीतिक विसंगति, भ्रष्टाचार आ मूल्य-ह्रासक प्रश्न उपस्थित करैत अछि- “घुसहा घरमे घुसल रहै छी/ने जीबै छी आ ने मरै छी/टुकुर-टुकुर तकैत रहै छी/केतेक कहब गामक दोख/बेवस्थाकेँ नहि भेल अखैन धरि होश” लेखक व्यवस्था-तंत्रक आलोचनात्मक अवलोकन करैत सामान्य जनजीवनपर पड़ैत प्रभावकेँ उभारैत छैथ। ‘बौआ बाजल’ आ ‘बाल बोध’ बाल-मनोविज्ञान, पारिवारिक परिवेश आ आरम्भिक सामाजिक शिक्षाक प्रसंगकेँ सरलतासँ प्रस्तुत करैत अछि। जातिगत चेतना आ सामाजिक विभाजन संग्रहक एक प्रमुख विषय अछि। ‘जातिक भोज’, ‘जाति’, ‘छुतहर’ आ ‘हहौती’ कथासभ रूढ़ मानसिकता, सामाजिक दूरी आ मानवीय गरिमाक प्रश्नपर गम्भीर विमर्श प्रस्तुत करैत अछि। लेखक जाति-आधारित व्यवहारक आलोचना करैत समतामूलक दृष्टिकोण अपनबैत छैथ। ‘गंगा नहाएब’, ‘बिलाइ रास्ता कटलक’ आ ‘अबिसवास’ जकाँ कथासभ लोकविश्वास, अन्धमान्यता आ मनोवैज्ञानिक प्रवृत्तिपर विचार करैत अछि। कथासभ व्यवहारिक विवेक आ सामाजिक चेतना जागृत करबाक संकेत दैत अछि। ‘बुजुर्गक दुख के हरत?’ वृद्धावस्थाक उपेक्षा आ पारिवारिक दायित्वक संवेदनशील चित्र प्रस्तुत करैत अछि। ‘मोंछक लड़ाइ’ सामाजिक प्रतिष्ठा आ अहंकारक विडम्बनापूर्ण रूपपर व्यंग्यात्मक दृष्टि दैत अछि। ‘ई छी हमर मजबुरी’ परिस्थितिजन्य विवशताक मानवीय विश्लेषण करैत अछि। अन्तिम कथा ‘बेंगक महंथी’ प्रतीकात्मक संरचना माध्यमे नेतृत्व, समूह-मनोवृत्ति आ सामाजिक आचरणपर विचारोत्तेजक संकेत दैत अछि। संग्रहक शिल्प लघु आकारक होइतहुँ कथ्य गम्भीर अछि। भाषा सहज, लोक-संस्पर्शी आ संवादप्रधान अछि। ग्रामीण परिवेश, दैनन्दिन प्रसंग आ व्यवहारिक स्थिति कथा-विश्वकेँ विश्वसनीय बनबैत अछि। ‘कोसीक कछेर’ श्री राम विलास साहुक काव्य-संग्रह अछि, जाहिमे बहुसंख्य कविता संकलित अछि। ‘कोसीक कछेर’ सँ आरम्भ भऽ ‘बटैया खेती’ धरि शीर्षक-क्रम स्वयं संकेत करैत अछि जे संग्रहक भाव-विस्तार प्रकृति, किसान-जीवन, मिथिला-चेतना, सामाजिक विसंगति, राष्ट्रीय अस्मिता, मानवीय द्वन्द्व आ आध्यात्मिक मनन धरि पसरल अछि। प्रारम्भिक कवितासभ जकाँ ‘कोसीक कछेर’, ‘रौदी’, ‘मेघक बरियाती’, ‘पुसक राति’, ‘नदी’, ‘नदीक धारा’, ‘धधकैत धरती’ आदिमे प्रकृतिक प्रकोप, ऋतु-चक्र, बाढ़ि, सुखाड़ आ धरती-जीवनक संघर्षपूर्ण यथार्थ सजीव रूपेँ उपस्थित अछि। कोसी अंचलक भूगोल आ मानवीय त्रासदी कवि-चेतनामे स्थायी संवेदना रूपेँ विद्यमान अछि। किसान-जीवन संग्रहक केन्द्रवर्ती विषय अछि। ‘सुखल खेत आ भूखल पेट’, ‘किसानक दुख’, ‘किसान’, ‘खेतीक काज’, ‘बटैया खेती’, ‘धन जुआनी बाढ़िक पानि’ जकाँ कवितामे कृषक-वर्गक आर्थिक असुरक्षा, प्राकृतिक निर्भरता आ श्रम-संघर्षक तीक्ष्ण चित्रण भेटैत अछि। कवि श्रमक गरिमा स्थापित करैत व्यवस्था-दोषक आलोचनात्मक विवेचन सेहो करैत छैथ। मिथिला-अस्मिता आ सांस्कृतिक गौरव संग्रहक प्रमुख आयाम अछि। ‘मिथिलाक पियास’, ‘मिथिलाक लाल’, ‘मिथिलाक अपमान’, ‘मिथिलाक गुमान’, ‘मिथिला महान पावन धाम’, ‘केहेन मिथिला’ जकाँ शीर्षक मिथिला-भूमिक प्रति अनुराग, वेदना आ आत्मगौरव दुनू भाव एक संग उद्घाटित करैत अछि। ऐ माध्यमे भाषा, संस्कृति आ पहिचानक प्रश्न सेहो उभरैत अछि। राष्ट्रीय चेतना आ सामाजिक आलोचना सेहो संग्रहक सशक्त धरातल अछि। ‘केना कहब भारत महान’, ‘भारतक शान’, ‘लोकतंत्रक खून’, ‘जागु इंसान’, ‘अग्निपथ’, ‘ई केकर दोख’, ‘जे डरल से मरल’, ‘दोष निर्दोष’ आदिमे राजनीतिक विसंगति, सामाजिक असमानता आ नैतिक पतनपर स्पष्ट टिप्पणी भेटैत अछि- “किए हमरा दइ छी दोख/अहाँ सभकेँ नै अछि होश/अहाँक देशमे होइए बड़-बड़ घोटाला” व्यक्तिगत अनुभूति आ मनोवैज्ञानिक संवेदना सेहो सशक्त रूपेँ व्यक्त भेल अछि। ‘मनक आगि’, ‘मनक पियास’, ‘दिलक दरद’, ‘प्रीत वियोग’, ‘जरल तकदीर’, ‘चंचल मन’, ‘नीन टुटि गेल’, ‘अनमोल जिनगी’, ‘जीवन पथ’, ‘मोह माया’, ‘स्वर्गक खोज’ जकाँ कवितामे आन्तरिक संघर्ष, प्रेम-विरह, जीवन-दर्शन आ अस्तित्व-चिन्तन अभिव्यक्त अछि। ऋतु-सौन्दर्य आ लोक-रस संग्रहक भाव-सम्पदाकेँ समृद्ध करैत अछि- “मनक पियाससँ करेज जरैए/पिया बिनु मन तरसैए हे/वसन्त बनल अछि चित्तचोर जखन/केकरापर करब शृंगार हे” संगहि हिनक ‘वसन्त वहारक गीत’, ‘ऋतुराज वसन्त’, ‘सौन भादो’, ‘फागुक रंग’, ‘मधुरस’, ‘माघक जाड़’ जकाँ कवितासभ लोक-संस्कृति, ऋतु-परिवर्तन आ उत्सवधर्मी जीवन-लयकेँ प्रतिबिम्बित करैत अछि। भाषा लोकाभिमुख, सहज आ प्रवाहमय अछि। शीर्षक-विविधतासँ स्पष्ट होइत अछि जे कवि समाजक बहुआयामी स्थितिसँ सतत संवाद स्थापित करैत छैथ। कथ्य-गम्भीरता आ भाव-स्वच्छता संग्रहक प्रमुख विशेषता अछि। ‘दुधबेचनी’ श्री रामविलास साहुक लघुकथा-संग्रह अछि, जाहिमे कुल 12 लघुकथा संग्रहीत अछि। ‘गामक गाछी’ सँ प्रारम्भ भऽ ‘ई केकर दोख’ धरि कथा-क्रम ग्रामीण समाजक बदलैत संरचना, आर्थिक संक्रमण, अंधविश्वास, स्त्री-संघर्ष, कुटीर-उद्योग, नैतिक दुविधा आ सामुदायिक चेतना जकाँ विविध विषयकेँ समेटैत अछि। ‘गामक गाछी’मे पुरान गछकट्टी, कालेसरक मृत्यु आ बोन-कलमसँ बनल गाछीक प्रसंग कथा-क्लाइमेक्समे उजागर होइत अछि। नवका पंचायत सदस्य आरम्भमे ऐ इतिहाससँ अनभिज्ञ रहैत छैथ अथवा ओकर सामाजिक अर्थपर ध्यान नहि दैत छैथ। मुखियाजी जखन घटनाक स्मरण करैत छैथ, तखन गाम-समाज अपन सामूहिक उत्तरदायित्व बुझैत अछि। कथा ग्राम-इतिहास, पर्यावरण आ सामुदायिक स्मृतिक संग गहींर सम्बन्ध स्थापित करैत अछि। ‘कमतिया हबेली’ शीर्षक स्वयं सामाजिक व्यंग्यक संकेत अछि। कमतियाक घरकेँ ‘हबेली’ कहल गेलापर मदीना दादीक विरोध आ शब्द-प्रयोगपर उठल प्रश्न कथा-विन्यासक केन्द्र बनैत अछि। ऐ माध्यमे ग्रामीण शब्दावली, स्वामित्व-बोध आ सामाजिक प्रतिष्ठाक स्वरूपपर लेखक सूक्ष्म टिप्पणी करैत छैथ। ‘घुमि गाम चलु’ परिवेश-परिवर्तनक आग्रह राखैत अछि, मुदा कथाक आरम्भ आ समापनक बीच संरचनात्मक सघनता अपेक्षित प्रतीत होइत अछि। ‘बिपैत’मे विपत्ति-स्थिति आ मानवीय व्यवहारक संयोजन प्रभावोत्पादक अछि। ‘झंझैटक जड़ि सिनुरिया आमक गाछ’ भिन-भिनौज आ पारिवारिक तनावपर केन्द्रित अछि, जाहिमे प्रतीकात्मक वृक्ष-बिम्ब कथाकेँ वैचारिक प्रौढ़ता प्रदान करैत अछि। ‘जारैन’ नव वस्तु-स्वीकार आ परम्परागत सोचक टकराव प्रस्तुत करैत अछि। लेखक परिवर्तन-विरोधी मनोवृत्तिपर प्रश्न उठबैत छैथ। स्त्री-परिश्रम आ धुँआसँ जुड़ल कष्टक पक्ष यदि आओर स्पष्ट रूपेँ उभरैत तँ विमर्श आओर व्यापक बनैत। ‘जेहेन पाठ ने पढ़ए पुत्ता अपने सिर विसए’ अंधविश्वास-आधारित मानसिकतापर केन्द्रित अछि, मुदा कथ्य-प्रस्तुति पाठकमे किछु दुविधा उत्पन्न करैत अछि। ‘कौल्हुक सुच्चा करु तेल’ कुटीर-उद्योग आ पूँजीवादी संक्रमणक कथा अछि। पारम्परिक तेल-घानी उद्योगक अवसान आ नव व्यवस्था-दबावक यथार्थ प्रभावी ढंगसँ चित्रित अछि। कथा आशामूलक संकेतक संग समाप्त होइत अछि, जाहि कारण ई संग्रहक एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानल जा सकैत अछि। ‘दुधबेचनी’ शीर्षक कथा स्त्री-संघर्षक मार्मिक आख्यान अछि- “हम तँ अहींक वचन ने निभेलौं। कहि गेल छेलौं किने जे जाबे हम गाममे नहि रहब ताबे बालो-बच्चा आ अहूँक देख-रेख हमर दोस करत। हमरा तँ अहाँ माल-जाल जकाँ पोसियाँ लगा गेलौं।” पतिक मृत्यु उपरान्त नायिका अपन श्रम आ संकल्पक बलपर बाल-बच्चाकेँ पोषण करैत अछि, बेटीक बियाह सम्पन्न करैत अछि आ आत्मसम्मानक रक्षा करैत अछि। मोहभंग उपरान्त समाज-हितमे सक्रिय होएबाक भाव कथाकेँ व्यापक मानवीय धरातलपर स्थापित करैत अछि। ‘गामक सुख’ श्री राम विलास साहुक काव्य-संग्रह अछि, जकर प्रथम संस्करण 2018मे प्रकाशित भेल। संग्रहमे 107 कविता सुव्यवस्थित रूपेँ संग्रहीत अछि, जे ‘मनक मोलि’ सँ आरम्भ भऽ ‘चरि पँतिया’ धरि विस्तृत काव्य-यात्रा प्रस्तुत करैत अछि। ई पोथी पल्लवी प्रकाशन, निर्मली द्वारा प्रकाशित अछि। ई संग्रह आधुनिक मैथिली काव्य-धारामे ग्रामीण चेतना, सामाजिक संक्रमण आ समसामयिक प्रश्नसँ गहन संवाद स्थापित करैत अछि। आरम्भिक कविता ‘मनक मोलि’मे आन्तरिक शुद्धि, सत्संग आ आत्मबोधक आग्रह व्यक्त भेल अछि। ‘तृष्णा’ जीवन-दर्शनक धरातलपर मानवीय लिलसा आ संतोषक विमर्श प्रस्तुत करैत अछि। ‘बेटी’ कवितामे नारी-अस्तित्व, शिक्षा आ सामाजिक सम्मानक स्पष्ट उद्घोष भेटैत अछि। संग्रहक एक सशक्त पक्ष किसान-जीवन आ श्रम-यथार्थ अछि। ‘किसानक मजबुरी’, ‘हरबाहाक जिनगी’, ‘पेटक सवाल’, ‘भूखमरी’, ‘धनक खातिर’ आदिमे आर्थिक विषमता, श्रमक अवमूल्यन आ ग्रामीण दरिद्रताक मर्मस्पर्शी चित्रण अछि। ‘कोसीक कहर’ आ ‘बाढ़ि’ प्राकृतिक आपदाक त्रासदीक सजीव अनुभव सामने आनैत अछि। कवि देखल-भोगल यथार्थकेँ साक्ष्य रूपेँ प्रस्तुत करैत छैथ। मिथिला-अस्मिता आ सांस्कृतिक चेतना सेहो संग्रहक प्रमुख आधार अछि। ‘मिथिला महान’, ‘गामक नाच’, ‘घरहटी’, ‘पनिभरनी’, ‘शारदा बन्दना’, ‘सरस्वती वन्दना’ जकाँ रचनामे लोक-जीवन, परम्परा आ भाषिक गौरव प्रकट होइत अछि। ठेँठ मैथिली शब्दावलीक सजीव प्रयोग संग्रहक विशिष्ट पहचान बनैत अछि। राष्ट्रीयता आ सामाजिक उत्तरदायित्वक स्वर ‘देशक सेवा’, ‘शहीदक इच्छा’, ‘अमर शहीद’, ‘कवि लेखकक बलिदान’ आदिमे मुखर अछि। कवि नागरिक कर्त्तव्य, बलिदान-परम्परा आ सामूहिक चेतनाक स्मरण करैत छैथ। सामाजिक आलोचना सेहो संग्रहमे प्रखर रूपेँ उपस्थित अछि। ‘केकरा लेल’, ‘अप्पन बीरान’, ‘बिसवासघात’, ‘कर्म कुकर्म’, ‘अपराधाक उपराग’ आदिमे नैतिक विचलन, भ्रष्टाचार, जातिगत विभाजन आ मूल्य-संकटपर विचार व्यक्त भेल अछि। शहरी आ ग्रामीण जीवनक तुलनात्मक विवेचन ‘गाम शहर’ आ ‘गामक सुख’ जकाँ रचनामे स्पष्ट देखबामे अबैत अछि। नारी-विमर्श संग्रहमे विचारणीय आयाम रूपेँ उभरैत अछि। ‘हम छी नारी’, ‘दहेज’, ‘सेनूरक लाज’, ‘बेटी’ आदिमे स्त्री-सम्मान, शिक्षा, सामाजिक न्याय आ कुरीति-विरोधी दृष्टिकोण मुखर अछि। भाषा सहज, प्रवाहमय आ लोकाभिमुख अछि। छन्द-योजना, गीतात्मकता आ कथ्य-स्वच्छता संग्रहकेँ पठनीय बनबैत अछि। विषय-विविधता आ समसामयिक चिन्तनसँ ‘गामक सुख’ समकालीन मैथिली काव्य-परम्परामे महत्त्वपूर्ण स्थान रखैत अछि। ‘मनक मैल’ श्री राम विलास साहुक लघु काव्य-संग्रह अछि, जाहिमे मैथिली टंका आ हाइकू-शेनर्यू विधाक संक्षिप्त, गहन आ विचारोत्तेजक रचना संकलित अछि। प्रकाशन-सूचना अनुसार ई कृति 2018मे पल्लवी प्रकाशन, निर्मली द्वारा प्रकाशित भेल अछि। आकारमे लघु होइतहुँ ई संग्रह विषय-गम्भीरता आ भाव-घनत्वक कारण विशेष ध्यान आकर्षित करैत अछि। एहि संग्रहक केन्द्रीय बिन्दु मानवीय अंतःकरण, सामाजिक चेतना आ नैतिक आत्मपरीक्षण अछि। शीर्षक स्वयं संकेत करैत अछि जे कवि ‘मनक मैल’ केँ चिह्नित कए ओकर परिमार्जन दिस उन्मुख छैथ। टंका आ हाइकू जकाँ लघु विधामे कम शब्दमे अधिक भाव व्यक्त करबाक सामर्थ्य ऐ रचनासभमे निरन्तर देखबामे अबैत अछि। रचनासभमे सामाजिक विसंगति, भ्रष्टाचार, अन्याय, हिंसा, नैतिक पतन, आडम्बर, लिलसा आ मूल्य-संकटपर तीक्ष्ण टिप्पणी भेटैत अछि। द्रष्टव्य अछि- “गरीबक तँ तकदीर जरल छै/जरलाहा हिस्सा भेटै छै/देशक लेल जे खून बहबै छै/पानियोँ समयपर नै भेटै छै।” कवि अनेक ठाम आत्मबोध, सत्यनिष्ठा, श्रम-गरिमा आ लोक-कल्याणक आग्रह रखैत छैथ। ग्रामीण परिवेश, किसान-जीवन, जल-प्रकृति, कोसी अंचलक पीड़ा, गरीबी आ सामाजिक असमानताक बिम्ब सेहो लघु छन्दमे उभरैत अछि। मानवीय सम्बन्ध, प्रेम, क्षमा, संयम, विवेक, करुणा आ सहअस्तित्वक भाव बारम्बार प्रकट होइत अछि। धार्मिकता आ आध्यात्मिकताकेँ नैतिक धरातलपर पुनर्परिभाषित करबाक चेष्टा ऐ संग्रहक उल्लेखनीय विशेषता अछि। कवि बाह्य कर्मकाण्डसँ अधिक आन्तरिक सुचितापर बल दैत छैथ। भाषा सहज, संक्षिप्त आ लोक-सम्बद्ध अछि। ठेँठ मैथिली शब्दावलीक सजीव प्रयोग संग्रहकेँ स्थानीयता आ प्रामाणिकता प्रदान करैत अछि। छन्द-संयम, शब्द-संक्षेप आ बिम्ब-सूक्ष्मता लघु विधाक अनुरूप संतुलित अछि। ‘अंशुमान’ श्री राम विलास साहुक लघुकथा-संग्रह अछि, जकर प्रथम संस्करण 2021मे पल्लवी प्रकाशन, निर्मली द्वारा प्रकाशित भेल। पोथीमे कुल 39 कथा संकलित अछि। कथा-सूची अनुसार ‘माइक ममता’ सँ ‘अंशुमान’ धरि कथा-क्रम ग्रामीण समाज, पारिवारिक सम्बन्ध, सामाजिक कुरीति, प्रशासनिक विसंगति आ नैतिक प्रश्नक विविध आयाम उद्घाटित करैत अछि। संग्रहक आरम्भिक कथा ‘माइक ममता’ मातृत्वक अजस्र करुणा प्रस्तुत करैत अछि। पुत्र द्वारा प्रताड़ना उपरान्तो माएक हृदय आशीष-प्रधान रहैत अछि। ‘दहेज पाप छी’ दहेज-प्रथाक सामाजिक आ आर्थिक दुष्परिणाम सामने आनैत अछि, जेतए प्रतिष्ठा-लोलुपता अन्ततः परिवारक विघटनमे परिणत होइत अछि। ‘लिंग जाँच’ कन्या-भ्रूण-हत्या जकाँ ज्वलन्त विषय उठबैत अछि आ समाजमे व्याप्त मानसिकतापर प्रश्न करैत अछि- “बाबूजी, अहाँ एक्को पाइ चिन्ता नै करू। हम मनुख संगे बिआह करब। पढ़ल-लिखल कम्मो रहत तइले एको पाइ चिन्ता नहि। एही खातिर ने एते झमेल होइए। एक्को पाइ चिन्ता नै करू।” ‘आतंकी के?’ प्रतीकात्मक शिल्प माध्यमे राजनीतिक शब्दावलीक अर्थ-विस्तारपर विचार प्रस्तुत करैत अछि। ‘विवेक अविवेक’ आ ‘बाबाक विचार’ शिक्षा-व्यवस्था, नैतिक विवेक आ सामाजिक नेतृत्वक प्रश्नपर आलोचनात्मक दृष्टि दैत अछि। श्रम, आत्मनिर्भरता आ संघर्ष संग्रहक प्रमुख आधार अछि। ‘दुखिया बनल सुखिया’ परिश्रम आ धैर्य द्वारा विपरीत परिस्थितिसँ उबरबाक प्रेरक आख्यान अछि। ‘हूनर’ शिक्षाक महत्त्व आ स्वप्रयासक गरिमा रेखांकित करैत अछि। ‘श्रमदान’ सामुदायिक सहभागिता आ सामाजिक सहयोगक आग्रह करैत अछि। ‘दोखी के?’ आ ‘केकर दोख’ कथा-रचनामे व्यंग्य आ प्रतीकक प्रयोग द्वारा व्यवस्था-तंत्र, सत्ता-विलासिता आ सामाजिक उदासीनतापर चोट कएल गेल अछि। ‘सेरपर सबा सेर’ ढोंग-पाखण्डपर व्यंग्यात्मक टिप्पणी प्रस्तुत करैत अछि- “लीअ रूपैआ, कोन जनमक कर्जा अहाँ हमरासँ चुकबै छी ई हम नै जानलौं।” संग्रहक केन्द्रीय कथा ‘अंशुमान’ संयुक्त परिवारक विघटन, संपत्ति-लोभ, भैयारीक तनाव आ माता-पिताक उपेक्षा जकाँ समकालीन प्रश्न सामने आनैत अछि। कथा पारिवारिक संरचनामे बदलैत मूल्यमान्यता आ नैतिक पुनर्स्मरणक आवश्यकतापर संकेत करैत अछि। भाषा ठेँठ ग्रामीण, संवादप्रधान आ सहज अछि। कथासभ लघु आकारक होइतहुँ गहन सामाजिक आशय रखैत अछि। लोक-प्रचलित शब्दावली आ व्यवहारिक प्रसंग कथा-विश्वकेँ प्रामाणिकता प्रदान करैत अछि। ‘नेत्रदान’ श्री रामविलास साहुक रचित खण्डकाव्य अछि, जे समकालीन मैथिली साहित्यमे मानवीय करुणा, त्याग आ सामाजिक उत्तरदायित्वक सशक्त प्रतिपादन करैत अछि। आकारमे अपेक्षाकृत लघु होइतहुँ ई कृति भाव-विस्तार आ नैतिक आशयमे व्यापक प्रभाव छोड़ैत अछि। काव्यक केन्द्रीय प्रसंग धर्मनाथक दृष्टिबाधित पुत्री अन्धरानी आ दीना नामक युवकक आत्मोत्सर्गपर आधारित अछि- “अन्धरानी अछि दुनू आँखिसँ आन्हर/तेकरा बनाएब हम पहिने अँखिगर/तखन सम्पन्न करब बिआहक काज” कथानक संवेदनाक धरातलपर विकसित होइत अछि। अन्धरानी अन्धकारमय जीवन जी रहल छैथ। दीना मानवीय करुणासँ प्रेरित होइत छैथ। ओ अपन एक नेत्र दान करैत छैथ। अन्धरानी पुनः प्रकाश देखैत छैथ। ई नेत्रदान साधारण शारीरिक क्रिया नहि रहि जाइत। ई मानवीय सहानुभूति आ त्यागक उत्कर्ष रूपेँ स्थापित होइत अछि। काव्यमे दानक भाव उच्च नैतिक आदर्शक रूप ग्रहण करैत अछि। सामाजिक समरसता, सेवा-व्रत आ आत्मबलिदानक चेतना एतए केन्द्रमे रहैत अछि। ऐ प्रकारेँ रचना त्यागक मूल्यकेँ समाजसामुख प्रतिष्ठित करैत अछि। पात्र-निर्माण प्रतीकात्मक आ प्रभावकारी अछि। अन्धरानी अज्ञान, असहायता आ अभावक प्रतीक रूपेँ देखाइत अछि, जबकि दीना उदारता, सहानुभूति आ लोकमंगलक प्रतिनिधि बनि उभरैत अछि। धर्मनाथ आ पारिवारिक परिवेश ग्रामीण समाजक यथार्थकेँ सामने आनैत अछि। पात्र-नाम आ कथानक संरचना काव्यक शीर्षकक सार्थकता सुदृढ़ करैत अछि। शिल्प-संरचना छन्दोबद्ध, प्रवाहयुक्त आ भावप्रधान अछि। प्रकृति-चित्रण, ऋतु-संकेत, सामाजिक परिवेश आ करुणा-रसक संतुलित समन्वय काव्यकेँ प्रभावकारी बनबैत अछि। भाषा सहज, सरस आ ठेँठ मैथिली शब्दावलीसँ समृद्ध अछि, जे रचनाकेँ प्रामाणिकता प्रदान करैत अछि। ई खण्डकाव्य पाठककेँ आत्मचिन्तनक दिशा दैत अछि। त्याग, करुणा, पारिवारिक निष्ठा आ सामाजिक दायित्व जकाँ मूल्य आधुनिक जीवन-परिस्थितिमे नव अर्थ ग्रहण करैत अछि। विशेषतः नव पीढ़ीक लेल ई कृति मानवता-केन्द्रित दृष्टिकोणक प्रेरक पाठ सिद्ध हो सकैत अछि। ‘खुला आसमां धरती की गोद में’ श्री रामविलास साहुक हिन्दी काव्य-संग्रह अछि। भाषा हिन्दी होइतहुँ ऐ संग्रहक भाव-दृष्टि मिथिला-संस्कारसँ अनुप्राणित अछि। ऐ कृति मे किसान-जीवन, श्रमिक-संघर्ष, आर्थिक विषमता, राजनीतिक विसंगति आ नैतिक संकट जेकाँ समसामयिक प्रश्न सजीव रूपेँ अभिव्यक्त भेल अछि। राष्ट्र-चेतना, नागरिक कर्तव्य आ सामाजिक उत्तरदायित्व प्रमुख स्वर रूपेँ उभरैत अछि; संगहि लोकतन्त्रक आदर्श आ व्यवहारिक यथार्थक अन्तर पर सेहो आलोचनात्मक दृष्टि प्रस्तुत कएल गेल अछि। मानवीय सम्बन्ध, आत्मचिन्तन आ सामाजिक समरसताक आग्रह ऐ संग्रहकेँ गम्भीर आयाम प्रदान करैत अछि। शिल्पक स्तर पर गीतात्मकता आ मुक्तछन्दक संतुलित प्रयोग, सहज भाषा आ प्रतीकात्मक संकेत एकरा विचारोत्तेजक बनबैत अछि। समग्रतः ई कृति सामाजिक जागरण आ मानवीय मूल्यबोधक दृष्टिसँ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मानल जा सकैत अछि। उपसंहार श्री राम विलास साहु समकालीन मैथिली साहित्यमे एहन रचनाकार रूपेँ प्रतिष्ठित छैथ, जे ग्राम्य जीवनक यथार्थ, सामाजिक सरोकार, नैतिक मूल्य आ मानवीय संवेदनाकेँ निरन्तर सर्जनात्मक अभिव्यक्ति दैत रहल छैथ। पद्य, लघुकथा, खण्डकाव्य आदि सभ विधामे हुनकर सक्रिय उपस्थिति विषय-विस्तार आ अभिव्यक्ति-विविधताकेँ स्पष्ट रूपेँ दर्शबैत अछि। किसानी-जीवन, श्रम-गरिमा, जातिगत प्रश्न, नारी-अस्मिता, राष्ट्रीय चेतना आ आत्मचिन्तन जकाँ विविध आयाम हुनकर रचनासंसारकेँ बहुआयामी बनबैत अछि। भाषा-शैलीक सहजता, लोक-आधार आ अनुभवजन्य दृष्टि हुनकर साहित्यकेँ प्रामाणिकता प्रदान करैत अछि। साहित्यिक सृजन संग-संग सांस्कृतिक सक्रियता सेहो हुनकर व्यक्तित्वक महत्त्वपूर्ण पक्ष अछि। ऐ प्रकारेँ राम विलास साहुजी लेखन आ आचरण दुनू स्तरपर प्रतिबद्ध रचनाकारक रूपमे समकालीन मैथिली साहित्यमे अपन सशक्त पहचान स्थापित केने छैथ। सन्दर्भ सकेत- 1 || विदेह ४३९ विदेह ४३९|| 1
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6) SS, ee top | 7 ९ ३ fade मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् सम्पादक: गंजेन्द्र ठाकुर।
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02 | | विदेह ४३९ ALL INDIA INSTITUTE OF MEDICAL SCIENCES ANSARI NAGAR, NEW DELHI — 20029 MEDIA CELL 24/March/2026 PRESS RELEASE Mr. Harish Rana passed away at व: 0 PM on 24th March 2026 at AliMS, New Delhi. He was under the care of a dedicated team of doctars and was admitted to the Palliative Oncology Unit (IRCH), led by Dr. (Prof.) Seema Mishra, HoD, Onco-Anaesthesia. AIIMS extends its heartfelt condolences to his family and loved ones during this difficult time. With regards, Dr.(Prof.) Rima Dada Media Cell AIMS New Delhi अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।