विदेह ४४० विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। [विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X Videha e-Journal (since 2000) at www.videha.co.in ] ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। कॉपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- २०२६. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. It is a platform for scholars, researchers and writers to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, prose and verse in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili and from Maithili into English. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. (c)२०००- २०२६. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA. सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@zohomail.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@zohomail.in. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover design: AUM GAJENDRA THAKUR VIDEHA:440 समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा। for the writers, readers, and listeners of Mithilā, who have kept the lamp of Maithilī burning through a thousand years of storms ………………………….. "The Parallel is not the marginal but the truthful, in long delay." Mānuṣīm iha saṃskṛtām मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। मिथिलाक ओइ लेखक, पाठक आ श्रोता लोकनि लेल, जे सहस्र वर्षक झंझावात मे सेहो मैथिलीक दीप प्रज्वलित रखने छथि। समानांतर कात-करोट मे हएब नै अछि, वरन् ई अछि असल सत्य, जे अपन समय लेलक अछि। अनुक्रम विदेह ४४० म अंक १५ अप्रैल २०२६ (वर्ष १९ मास २२० अंक ४४०) ऐ अंकमे अछि:- १.१.अंक ४३९ पर टिप्पणी (पृष्ठ- १-२) गद्य २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-२ (पृष्ठ- ४-७) २.२.हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१९ (पृष्ठ- ८-१६) २.३.प्रणव कुमार झा-सहकारिताक धागा सभसँ आगा (पृष्ठ- १७-२३) २.४.डॉ. उमेश मण्डल- पयस्विनी : लोकचेतना आ संवादधर्मिताक समेकित अभिव्यक्ति (पृष्ठ- २४-२८) २.५.१. प्रीति कुमारी- शेष जीवन केर नायक : एक चरित्र चित्रण २.नशामुक्ति अभियान (पृष्ठ- २९-३३) २.६.प्रणव कुमार झा- अर्थ आवर (पृष्ठ- ३४-३५) २.७.लाल देव कामत-१. उपराग केर निहितार्थ २.सगर राति दीप जरय कथा गोष्ठी १२४म् नहरिया: कथाक संक्षिप्त अवलोकन ३.मिथिला - मैथिली सपूतक अवसान (पृष्ठ- ३६-४५) २.८.डॉ. उमेश मण्डल-'बदलैत जीवन' कथा-संग्रहक आलोकमे सामाजिक परिवर्तन आ मानवीय चेतनाक समीक्षात्मक विवेचन (पृष्ठ- ४६-५५) २.९.रबीन्द्र नारायण मिश्र- जयतु जानकी (धारावाहिक उपन्यास) (पृष्ठ- ५६-८८) २.१०.विप्रकान्त मंडल- हॉस्पिटलक हिसाब (पृष्ठ- ८९-९०) २.११.बद्रीनाथ राय अमात्य- ३ टा बीहनि कथा (पृष्ठ- ९१-९३) २.१२.गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली लेल दलित साहित्य समीक्षाशास्त्र (पृष्ठ- ९४-१००) पद्य ३.१.स्व. कालीकान्त झा बूच- ३ टा कविता पाण्डुलिपिसँ (पृष्ठ- १०२-१०५) ३.२.संतोष कुमार राय 'बटोही'- 'उर्मिलाक विद्रोह' (खण्ड-काव्य) (पृष्ठ- १०६-१०७) ३.३.जगदानन्द झा "मनु"-१८ टा हाइकू (पृष्ठ- १०८-११४) ३.४.बद्रीनाथ राय अमात्य- ५ टा कविता (पृष्ठ- ११५-१२०) ३.५.शिव कुमार झा टिल्लू- २२ टा सोहर, नचारी , डहकन, विवाह गीत आ किछु गीत आ कविता (पृष्ठ- १२१-१३४) ३.६.कपिल यादव 'निष्क'- ५ टा कविता (पृष्ठ- १३५-१४०) ३.७.तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम'] मूल तेलुगु: नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव) मैथिली अनुवाद: मानेश्वर मनुज [खण्ड २] (पृष्ठ- १४१-१४४) 4.Gajendra Thakur- A Parallel History of Mithila & Maithili Literature (TOME I-IV VOLUMES- 1-100) APPENDIX: METHODOLOGICAL NOTE The Nepal Bikram Samvat years cited have been converted to approximate CE years using the standard offset of BS minus 56–57 years. Web sources consulted include the Videha digital archive (videha.co.in). All URLs were last accessed April 2026. This research was prepared using primary texts, and standard academic resources. All quoted material is from the cited sources. For the most current scholarship, consult the Videha Parallel History series at www.videha.co.in/gajenthakur.htm. ………………………………………………. A PARALLEL HISTORY OF MAITHILI LITERATURE: INTRODUCTION DALIT LITERARY CRITICISM: TELUGU, GUJARATI, AND ODIA DALIT LITERATURE IN MAITHILI TRANSLATION GANGESA UPADHYAYA: LIFE, LOGIC, AND LEGACY IN THE NAVYA-NYAYA TRADITION [NAVYA-NYAYA’S HIERARCHICAL USE OF LIMITORS IS COMPATIBLE WITH MODERN ARTIFICIAL INTELLIGENCE AND NATURAL LANGUAGE PROCESSING (NLP)] MITHILA & MAITHILI: CRITICAL ANALYSIS OF INSTITUTIONS THE MAITHILI GHAZAL VIDEHA (ISSUE 1-350) SADEHA SERIES (1-37) VIDEHA ISSUES 351-438 VIDEHA MAITHILI PARALLEL DRAMA THEATRE VIDEHA PARALLEL AUDIO VIDEO ARCHIVE VIDEHA PARALLEL CHILDREN'S LITERATURE ABDUR RAZZAK , ABHA JHA , ABHILASH THAKUR, ACHARYA RAMANAND MANDAL, ACHARYA RAMLOCHAN SHARAN, ACHHE LAL SHASTRI, AJIT KUMAR JHA, AMIT MISHRA, AMOD KUMAR JHA, AMRENDRA YADAV, ANAMIKA RAJ, ANAND KUMAR JHA, ANIL MALLIK, ANJANI KUMAR VERMA, ANMOL JHA, ARVIND THAKUR, ASHISH ANCHINHAR, ASHOK (KATHAKAR ASHOK), ASHRAF RAIN, BADRI NATH ROY 'AMATYA’ , BECHAN THAKUR, BINAY BHUSHAN, BINDESHWAR THAKUR, CHANDAN KUMAR JHA, DINESH KUMAR MISHRA, DR KAMINI KAMAYINI, DR KIRTINATH JHA, DR KISHAN KARIGAR, DR PRAFULL KUMAR SINGH ‘MAUN’, DR SHAMBHU KUMAR SINGH, DR SHIV KUMAR PRASAD, DR. KAILASH KUMAR MISHRA, DURGANAND MANDAL, GOPALJI JHA ‘GOPESH’, HARIMOHAN JHA, HITENDRA GUPTA, HITNATH JHA, HRIDAY NARAYAN JHA, ILARANI SINGH, JAGDANAND JHA ‘MANU’, JAGDISH CHANDRA THAKUR ‘ANIL’, JAGDISH PRASAD MANDAL, JITENDRA KUMAR JHA ‘JEETU’, KALIKANT JHA ‘BUCH’, KALPANA JHA, BOKARO; KALPANA JHA, DELHI; KALPANA JHA, PATNA, KAMESHWAR JHA ‘KAMAL’, KAMLA CHAUDHARY, KAPILESHWAR RAUT, KEDAR NATH CHAUDHARY, KRISHNA KUMAR KASHYAP, KUMAR MANOJ KASHYAP, KUMAR PAWAN, KUNDAN KUMAR KARN, KUSUM THAKUR, LAL DEV KAMAT, LALITA JHA, LALLAN PRASAD THAKUR, LAXMAN JHA ‘SAGAR’, MALA JHA, MEENA JHA, MUNNA JI, MUNNI KAMAT, NABO NARAYAN MISHRA, NAGENDRA KUMAR, NAND KUMAR MISHRA ‘NAND’, NAND VILAS ROY, NARAYANJI CHAUDHARY, NARENDRA JHA, NAVENDU KUMAR JHA, OM PRAKASH JHA, PANDIT BHAVNATH JHA, PANNA JHA, PHANISHWAR NATH RENU, PRABHAT RAI BHATT, PRADEEP PUSHPA, PRANAV JHA, PRAYAS PREMI MAITHIL, PREETI THAKUR, PREMLATA MISHRA ‘PREM’, PREMSHANKAR SINGH, PROF DR RAMAWATAR YADAV, PROF UDAYA NARAYANA SINGH ‘NACHIKETA’, PT. RAMJI CHAUDHARY, RABINDRA NARAYAN MISHRA, RAJDEO MANDAL, RAJEEV RANJAN MISHRA, RAJNANDAN LAL DAS, RAM BHAROS KAPARI 'BHRAMAR', RAM SOGARTH YADAV, RAMDEO PRASAD MANDAL ‘JHARUDAR’, RAMESH, RAMESH NARAYAN, RAMLOCHAN THAKUR, RAMVILAS SAHU, RAVI MISHRA BHARDWAJ, RAVIBHUSHAN PATHAK, RAVINDRA NATH THAKUR, S.C. SUMAN, SANDEEP KUMAR SAFI, SANJU DAS, SANTOSH KUMAR MISHRA, SANTOSH KUMAR ROY 'BATOHI', SATYANAND PATHAK, SHAIL JHA ‘SAGAR’, SHANTI LAKSHMI CHAUDHARY, SHARDINDU CHAUDHARY, SHASHI BALA, SHASHIDHAR KUMAR 'VIDEH', SHIV KUMAR JHA ‘TILLU’, SHIVSHANKAR SINGH THAKUR, SHIVSHANKAR SRINIWAS, SIYARAM JHA ‘SARAS’, SRIJAN SHEKHAR 'AJNEYA', SUBHASH CHANDRA YADAV, SUBHASH KUMAR KAMAT, SUBODH JHA, SUBODH KUMAR THAKUR, SUJIT KUMAR JHA, SUSHIL, SWETA JHA CHAUDHARY, TARANAND VIYOGI, UMESH MANDAL, UMESH PASWAN, VIBHA RANI, VIJAYNATH JHA, VINEET UTPAL, YOGANAND JHA, YOGENDRA PATHAK VIYOGI, YOGENDRA PRASAD YADAVA … AND MORE TO COME IN TOME 5. 23 Language Transliterator
१.१.अंक ४३९ पर टिप्पणी विदेह ४३९ म अंक पर पाठकीय मन्तव्य प्रणव कुमार झा रवीद्र नारायण मिश्र के कविता 'रामक जल समाधि' एहि अंक मे छपल हमर कविता 'राम चरित' के एक्सटेंशन बुझना गेल। राजदेव मण्डल के कविता 'शरशैय्या' जिनगि मे अनेकों भावनात्मक आ लौकिक तीर से घायल लोक के मनोव्यथा कहबाक प्रयास अछि। मानेश्वर मनुज द्वारा तेलुगू काव्य के मैथिली अनुवाद काठक घोड़ा स्वागत योग्य। भारतीय भाषा मे अनुवाद के माध्यम से साहित्यिक आदान प्रदान भारतीय संस्कृति आ ज्ञान परंपरा के समझ बढाबे मे उपयोगी छैक।
आशीष अनचिन्हार के आलेख इच्छा मृत्यु (Euthanasia) कें भीष्म पितामहक पौराणिक प्रसंग सँ लऽ कऽ आधुनिक कानूनी विमर्श धरि समेटैत अछि। लेखक हरीश राणाक मामला (2026) कें पहिल 'वैध उदाहरण' मानि, आत्महत्या आ 'गंगालाभ' जेहन कुप्रथा सँ एकर अंतर स्पष्ट कयलनि अछि। ई लेख भावुकताक बदला न्यायिक आ तार्किक परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करैत अछि।
गजेंद्र ठाकुर जे A Parallel History of Mithila & Maithili Literature (Part 1-100) एकटा वृहत्त काज अछि जे कठोर परिश्रम आ साधना से लिखल जा सकाल हेतैक। गजेन्द्र ठाकुरक ई मैराथन लेख "विदेह" आन्दोलनक वैचारिक आधार प्रस्तुत करैत अछि। ई पारंपरिक संकीर्णता कें त्यागि कऽ 'समांतर साहित्य' क वकालत करैत अछि, जतय उपेक्षित वर्ग, दलित विमर्श आ आधुनिक बोधक स्थान अछि। नव्य-न्याय आ पाश्चात्य आलोचनाक समन्वय सँ मैथिलीकें वैश्विक आ डिजिटल क्षितिज पर विस्तार देबऽ मे ई अति महत्वपूर्ण अछि। आशीष अनचिन्हार
प्रणव कुमार झाजीक आलेख 'एआई युग मे सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग - कोडिंग से सिस्टम थिंकिंग तक' पढ़ल। नील लागल। पाठकक जिज्ञासा शांत करैत अछि ई आलेख। एहि तरहक आलेखक रचना करैत रहताह से, उम्मेद अछि। संगहि हिनक कविता राम चरित सेहो नीक अछि। विद्यालंकारजीपर सिरीजक शुरुआत के नव युगक शुरुआत अछि, शुभकामना कल्पनाजीकेँ। लालदेव कामजी एवं प्रीति कुमारी लगातार लीखि रहल छथि से नीक बात। कुमार मनोज काश्यपजी लघुकथामे की कहऽ चाहि रहल छथि से हमरा नहि बुझाएल। मदन मोहन सिन्हा A Parallel History of Mithila & Maithili Literature (Part 1-100): मैथिली भाषाक दुर्लभ प्रतिभा आ विलक्षण व्यक्तित्वक लोक सभक साहित्यिक रचना आ दृष्टिकोणक अत्यंत उत्कृष्ट साहित्यिक विश्लेषण। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। गद्य २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-२ २.२.हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१९ २.३.प्रणव कुमार झा-सहकारिताक धागा सभसँ आगा २.४.डॉ. उमेश मण्डल- पयस्विनी : लोकचेतना आ संवादधर्मिताक समेकित अभिव्यक्ति २.५.१. प्रीति कुमारी- शेष जीवन केर नायक : एक चरित्र चित्रण २.नशामुक्ति अभियान २.६.प्रणव कुमार झा- अर्थ आवर २.७.लाल देव कामत-१. उपराग केर निहितार्थ २.सगर राति दीप जरय कथा गोष्ठी १२४म् नहरिया: कथाक संक्षिप्त अवलोकन ३.मिथिला - मैथिली सपूतक अवसान २.८.डॉ. उमेश मण्डल-'बदलैत जीवन' कथा-संग्रहक आलोकमे सामाजिक परिवर्तन आ मानवीय चेतनाक समीक्षात्मक विवेचन २.९.रबीन्द्र नारायण मिश्र- जयतु जानकी (धारावाहिक उपन्यास) २.१०.विप्रकान्त मंडल- हॉस्पिटलक हिसाब २.११.बद्रीनाथ राय अमात्य- ३ टा बीहनि कथा २.१२.गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली लेल दलित साहित्य समीक्षाशास्त्र २.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-२ कल्पना झा कल्पना झा मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-२ कोइलखक अलंकार: 'विद्यालंकार' श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार' केँ कोइलख गामक अलंकार कहल जाए तऽ अतिशयोक्ति नहि होएत। ओ एहन अलंकार छलाह कोइलखक जनिकर जन्म सँ, जनिकर कर्म सँ हुनकर गामक मान बढ़लनि, नाम बढ़लनि। ओना कोइलखक मान बढ़ौनिहार आरो बहुत विद्वान लोकनिक जन्म एहि पहिनहुँ भऽ चुकल छलनि। एक सँ बढ़ि कऽ एक धुरन्धर (ई सिनेमा बेस चर्चित रहल तैं एहि शब्दक प्रयोग भऽ गेल स्वत:)क जन्म आ हुनकर योग्यता/विद्वता, सत्कर्मक प्रभावेँ मिथिलाक भूगोल मे 'कोइलख' अपन एकटा विशेष स्थान बनौने अछि। से आइ सँ नहि, सैकड़ो वर्ष पहिनहि सँ। श्री हितनाथ झा अपन ग्राम-गाथा लिखैत 'कोइलख'क मान बढ़ौनिहार सभ मनीषीक परिचय दैत, हुनका लोकनिक व्यक्तित्व ओ कृतित्व पर संक्षिप्त विवरण दऽ कऽ मैथिल समाज पर बड़का उपकार केलनि अछि। 'कोइलख' नामक एहि पोथी मे आदरणीय भीमनाथ झाक लिखल "कोइलख-प्रसंग" सँ उद्धृत अंश देखल जाए- "एहि गाम मे एक सँ एक विद्वान भेल छथि। सोरहम शताब्दी मे विख्यात कीर्तनियाँ नाटककार महामहोपाध्याय उमापति उपाध्याय भेलाह, जनिक 'पारिजात-हरण' मध्यकालीन मैथिली साहित्यक मेरुदण्ड मानल जाइछ। हिनक उपाधि 'सुमति' तथा 'कविपण्डितमुख्य' छलनि, जे सामाजिक प्रतिष्ठा तथा पाण्डित्य एवं कवित्व प्रतिभाक शिखरत्वक सूचक छल। मैथिली साहित्यक आद्य दू प्राध्यापक कलकत्ता विश्वविद्यालय मे पण्डित खुद्दी झा एवं पण्डित बबुआजी मिश्र रहथि। व्याकरण, न्याय, ज्योतिष, कर्मकाण्ड, वेद, तंत्रक संगहि मैथिली साहित्यक अनेकानेक कवि-साहित्यकार एहि गाम मे होइत अएलाह अछि, जे अपन-अपन क्षेत्र मे पूर्ण प्रतिष्ठित-सम्मानित भेलाह अछि। राजनीति, पत्रकारिता, प्रशासन, चिकित्सा, शिक्षा, अभियांत्रिकी, व्यवसाय प्रभृति प्रायः प्रत्येक क्षेत्र मे कोइलखक सपूतक अवदान चिरस्मरणीय अछि।" श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार' जीक जन्म 17 जुलाइ 1901 ई. मे भेल छलनि आ अवसान 20 मइ 1989 मे। लगभग अठासी वर्षक हुनकर जीवन मूल रूप सँ राजभाषा हिन्दीक उन्नयन मे बितलनि। हिन्दीक जानल-मानल पत्रकार, सम्पादक, स्तम्भकार, रहलाह। मुदा मातृभाषा मैथिलीक प्रचार-प्रसार लेल सेहो तत्पर रहलाह; आजीवन रहलाह। हिन्दी पत्रकारिता मे तऽ खुट्टा गाड़बे केलनि, संगहि राज्यपाल द्वारा समाजसेवा आ शिक्षा क्षेत्र मे विशेष योगदान लेल मनोनीत कएल गेलाह। पाँच वर्ष लेल। बिहार विधान परिषदक सदस्य रूप मे 1968 सँ 72 धरि हिनकर कार्यकाल रहलनि एम.एल.सी. रूप मे। अपन 'पद' आ 'पावर'के वास्तव मे उपयोग केलनि। चेतना समिति लेल राजेन्द्र नगर मे प्लॉट आवंटित करबाएब एकटा महत्वपूर्ण काज रहलनि। हितनाथ झाक कहब छनि, "पटनाक चेतना समितिक सक्रिय उन्नेतावर्ग मे छलाह, 1963 सँ 66 धरि अध्यक्षो रहलाह। हिनके योगदानक प्रतिफल अछि राजेन्द्र नगरक भूखण्ड तथा ओहिठाम भवन-निर्माण मे भेल बाधाक निराकरण।" चेतना समितिक अतिरिक्त मैथिली अकादमीक अध्यक्ष सेहो रहल छलाह 'विद्यालंकार' जी। से एक टर्म नहि; तीन-तीन वर्षक दू टर्म (1976-82) अध्यक्ष रहलाह आ सेवा देलथिन। वास्तव मे सेवा देलथिन। अपन खून-पसीना सँ सीँचि अकादमी कें ठाढ़ कएने छलाह, से कहबाक चाही। हिनकर अध्यक्षता काल मे मैथिली अकादमी मे सभ सँ बेसी काज भेल, से बहुत लोक केँ निश्चित बूझल हेतनि। शोधार्थी/विद्यार्थी, साहित्य प्रेमी लोकनिक अबरजात रहल अकादमी मे। सभ लाभान्वित होइत गेलाह। साहित्यिक गतिविधि, संगोष्ठी वगैरह होइत रहैत छलए। शताधिक पोथी प्रकाशित भेल। अनूदित आ मूल, सभ तरहक पोथी। काज भले हिन्दी लेल बेसी केलनि, मुदा हृदय सँ 'सुच्चा मैथिल' छलाह ओ। सन्दर्भ ग्रन्थ : "कोइलख" (लेखक हितनाथ झा) संपादकीय सूचना- एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-1 संपादकीय सूचना- विद्यालंकारजीसँ पहिने विदेहपर व्यासजीक कृतित्वपर कल्पनाजी लीखि रहल छथि एवं आब विद्यालंकारजीपर भऽ रहल अछि। पाठक व्यासजीपर प्रकाशित एखन धरिक सभ खंड निच्चा केर लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकै छथि- मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-7 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-8 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-9 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-10 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-11 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-12 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-13 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-14 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-15 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-16 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-17 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-18 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-19 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-20 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-21 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-22 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-23 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-24 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-25 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.२.हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१९ हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१९ हितनाथ झा (मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070) श्री दिगम्बर नाथ झा जीक कथा जे कि प्रभात मे धारावाहिक रूपें प्रकाशित भेल- स्वतन्त्रता रमेश बाबू तथा दीनेश बाबू साक्षात ममिऔत पिसिऔत भाइ छलाह। कमला देवी ज्येष्ठ भाइक पत्नी छलथिन्ह। ओ बहुत नीक कुलशीलक कन्या छलीह।थोड़ बहुत लिखने पढ़ने सेहो छलीह। यद्यपि ओहि परिवारमे यैह तीनू गोटे छलाह, तथापि हुनकालोकनिक व्यय अत्यन्त बेसी छलैन्ह। रमेश बाबू भागलपुरमे एक पैघ फैक्टरीक अधिष्ठाता छलाह जाहिसँ हुनका लाभ पूर्ण रूपेँ होइत छलन्हि। हुनक कनिष्ठ भाइ दीनेश बाबू प्रवेशिका परीक्षा पास कय भागलपुर कॉलेजमे पढ़ैत छलाह। यद्यपि रमेश बाबू तथा दीनेश बाबू सहोदर नहि छलाह तथापि दूनू गोटाक पारस्परिक-प्रेम अत्यन्त गूढ़ छलनि। हुनकालोकनिक आचार, विचार तथा व्यवहारसँ ई ककरो प्रतीत नहि होइत छलैक जे ई लोकनि एक पिताक पुत्र नहि थिकाह। ओहि दिन जखन रमेश बाबू आफिससँ आबि क� अपन कोठरीमे मेजक नजदीकमे बैसि कय विश्राम क� रहल छलाह। हुनक हृदय- हारिणी प्राणेश्वरी कमला देवी ओहि कोठरीमे प्रवेश करैत पूछय लगलथिन्ह--�हमर चूड़ी अनलौं कि नहि? दीअ ने।� रमेश बाबू किछु काल छुओ रहि पुनः धीरे-धीरे ई वचन उच्चारण कयलन्हि--" चूड़ी ! आहाँक चूड़ी त� हम नहि लावि सकलौं। चूड़ी लाब� त� आहाँ ठीक कहने रही परञ्च किञ्चित रुपैआ बाँकी रहि गेला सन्ता दीनेश बाबू केँ एक मित्रक वहिनिक विवाह रुकि गेलनि हैं। बुझल किने, ओ लोकनि बड़ सीदित छथि। भरि पेट अन्नहु टा समयपर नहि प्राप्त होइत छन्हि। यैह सब कारणसँ -" ई सब वार्तालाप के वीचहिमे रोकि कमला देवी दिस ताक लगलाह। श्रीमती कमला देवी मुँह बनाक� किछु मोनहि मोन वाज� लगलीह। परन्तु मोन मे किछु विचारि कय सकुचित मुख-कमलसँ किछु उच्चारण नहि केलनि। पुनः ओ भौंह केँ धनुषाकार करैत स्वामी दिश ताक� लगलीह। अकारण क्रोध करैत शीघ्रता पूर्वक कोठरीसँ बाहर भ� गेलीह। रमेश कोनो तरहेँ पिण्ड छोड़यलन्हि। ओ अपना मोनमे कल्पनो नहि कयने छलाह जे आइ श्रीमती जी एतेक शीघ्र शान्त भय जयतीह। परन्तु एक बात सोचि कय हुनका मोनमे बड़ा अशान्त भ� गेलन्हि। कहल नहि जा सकैत अछि जे कियैक श्रीमतीजीक प्रवृत्ति दिनानुदिन हीनता केँ प्राप्त करय लगलैन्ह। कत शृंगार-पेटार तथा आडम्बरक सामग्री और कत एक कलुषित परिवार के कन्यादान मे सहायता।रमेश बाबू केँ ई दूनू बात नर्क तथा स्वर्गक सदृश प्रतीत भेलन्हि। (२) रमेशबाबू जाहि रूपेँ एहि मामिलाकेँ निवृत्ति जकाँ बुझलनि वास्तवमे ओहि रूपेँ निवृत्ति नहि भेलैक।ओहि दिन संध्याकाल रमेशबाबू टहलि बुलि अपना ओहिठाम जखनि अयलाह तखनि हुनका बुझि पड़लनि जे हुनका सँ बिना पुछनहिं श्रीमती जी पड़ोसीक बंगाली-महिला संग वायस्कोप देख� गेली है। एहि बीचमे किछु दिनसँ वो महिला श्रीमतीजीक घनिष्ठ सखी भ� गेल छलथिन्ह। ओ महिला स्त्री-स्वाधीनताक बहुत पैघ हिमायती छथि।मासमे प्रायः १५ दिन स्त्री सभा करैत छथि आर पुरुषसभक बन्धन तोड़बाक विषयपर बहुत भाषण करैत छथि। रमेशबाबू दू तीन मिनट चुपचाप ठाढ़ छलाह। तदुपरान्त कोठापर अपन कोठरी मे चल गेलाह। ओहिठाम दीनेशबाबू अध्ययन क� रहल छलाह। ओ भाइकेँ देखिते देरी चटपट उठि ठाढ़ भय गेलाह।रमेशबाबू तौनी केँ डोर पर रखैत बजलाह--" बैसू, दीनेशबाबू।ठाढ़ कथी लय छी? तदुपरान्त रमेशबाबू पुनः बजैत भेलाह --" आइ अहाँक मूँह उदास कियै अछि? कॉलेज सँ आबि क� किछु जलपान कयलौं हैं कि नहि? दीनेशबाबू किञ्चित कालतक माथ झुकौने ठाढ़ छलाह। कोनो तरहक उत्तर नहि देलखिन। बात ई छलैक जे जखनि दीनेशबाबू कॉलेज सँ आयल छलाह अपन भाउजकेँ नहि देखि भनसीयासँ जलखै मंगलखिन्ह, ताहिपर भनसीया कहलखिन्ह-" बाबू साहेब, आइ त� आहाँ लय जलपान नहि अछि।" भूख जोर लागल छलन्हि तैं पुनः डपटि कय पुछलथिन्ह--" कियैक नहि अछि? ताहिपर भनसीया बहुत उष्ण स्वरमे उत्तर देलखिन्ह --� ओहि घरसँ एक महिला आयल छलीह, वैह जलपान कय आहाँक भाउजक संग वायस्कोप देख� चल गेलीहि। तत्पश्चात दीनेशबाबू पुनः किछु नहि पुछि तथा अश्रुपातकेँ रोकि कोठापर चल गेलाह। परन्तु रमेशबाबूकेँ ई बात बुझबामे विलम्ब नहि भेलनि।क्रोधसँ ओ कम्पायमान हुअ लगलाह। पुनः ओ दीनेशबाबू केँ अत्यन्त स्नेहक संग कहलखिन्ह-� आहाँ एही ठाम बैसल रहू, हम शीघ्र चल अबै छी।" एतबा कहि ओ शीघ्रतासँ नीचाँ आबि बाजार सँ जलपान लानि कय भाइकेँ सोझाँमे राखि देलथिन्ह तथा कहलथिन्ह। -" लिअ, जलखै क'क� तत्पश्चात पढ़ब। भूखमे कतौ पढ़ल जाइ।" दीनेशबाबू अपन भाइक बात खण्डन कहियो नहि करै छलथिन्ह। आइयो ओ चुपचाप जलखै कय लेलन्हि। ओहि रातिमे रमेशबाबू अत्यन्त खिन्न चित्त भेला सन्ता भनसीयाकेँ बजा क� कहलथिन्ह जे आइ दूनू भाइक भोजन ऊपरे नेने आउ। भनसीया डेराइत-डेराइत कहलथिन्ह-� बाबू साहेब ! आइ त� केवल अहीं टाक भानस भेल अछि। श्रीमतीजी छोटकाबाबूक वास्ते सामग्री नहि देलथिन्ह। जखन हम हुनका वास्ते मंगलियनि त ओ कहलनि जे� हुनका खेबाक कमी कोन छन्हि। भाइसँ जे मित्रक नामपर रुपैया लेलन्हि अछि ओहिसँ हुनक कार्य किछु दिन तक खुशीसँ चलतन्हि।" ई सुनतहि रमेशबाबू क्रोधान्ध भय गेलाह।परन्तु भनसीयाक एहिमे दोष की? अतः रमेशबाबू अपनाकेँ काबू मे राखि भनसीया सँ पुछलथिन्ह -" दीनेशबाबू कत� छथि?� ओ निचला महलमे पढ़ि रहल छथि"।-� जाउ, तुरन्त ऊपर पठा देबनि।" दीनेशबाबू केँ ऊपर अबितहि देरी रमेशबाबू कहलथिन्ह-� राति बहुत भ� गेलैक अछि, भोजन कय लिअ। विलम्ब कयलासँ भात ठंढा भ� जायत।" एकहि स्थानपर भोजनक वास्ते बैसैत दीनेशबाबू भाइक दिश ताकि क� बजलाह-� आर अहाँक थारी? आहाँ नहि भोजन करब की? रमेशबाबू दुखितक भाव दर्शबैत कहलखिन्ह--" नहि दीनेशबाबू। आइ हम भोजन नहि करब । एकाएक हमरा पेटमे दर्द प्रारम्भ भय गेल अछि।" एतबा कहि विछावन पर जा क� पड़ि रहलाह। ई विलोकि दीनेशबाबू तुरन्त भाइक निकट चल अयलाह तथा बहुत कातर स्वरमे पुछलथिन्ह -" भाइ, पेटमे दर्द होइत अछि की? निमक सुलेमानी नेने आउ?� रमेशबाबू तुरन्त उत्तर देलथिन्ह -" कोनो चीज लेबाक जरूरत नहि। एक सन्ध्या उपवास कयला उत्तर काल्हि धरि दर्द छूटि जायत।" त� थोड़ बहुत दूध-तूध पी लिअ। ने ने आउ?� नहि दीनेशबाबू, पेट दर्दमे कतौ दूध पिअल जाइत छैक? आहाँ चिन्ता जुनि करी। बस, हमर कहिनी मानू, जाउ, आहाँ भोजन क� लिअ।" लाचार भ� क� दीनेशबाबू कोनो तरहेँ भोजन कय लेलन्हि। (३) राति बहुत व्यतीत भ� गेल छलैक। एक हावगाड़ी रमेशबाबूक घरक सामने ठाढ़ भय गेल। श्रीमतीजी गाड़ी सँ उतरली, ता तक रमेशबाबू सूतल नहि छलाह। लालटेनक सिरहानामे ल� क� � सर्चलाइट� पढ़ि रहल छलाह।श्रीमतीजीकेँ घरमे प्रवेश करतहि श्री रमेशबाबू आँखि उठा क� हुनका दिश तकलखिन्ह, परन्तु पुनः अखबार पढ़बमे लीन भय गेलाह।श्रीमतीजी अपन पतिकेँ तिरछी नजरिसँ देखैत अपन वस्त्रकेँ परिवर्तन करय लगलीह। लालटेनक ज्योति सब दिश एक समान नहि पड़ैत छलैक। अतः कोनो चीज श्रीमतीजीकेँ तकला उत्तर नहि भेटलन्हि। ताहि ओ खिसिआ क� कहलथिन्ह--" घरमे त� एक टा लालटेन, ओहो आहाँ अपन निकटमे राखि पढ़ाइ कय रहल छी। हजारो बेर बाजल होयब जे लालटेन सँ काज नहि चलि सकैत अछि, बिजली लगबा लेबाक चाही। परन्तु हमर बात सुनैत के अछि? रमेशबाबू लालटेनकेँ चुपचाप हटा क� राखि करोट बदलि कय सुति रहलाह।श्रीमतीजी पुनः किछु नहि बजलीह।लालटेन केँ तेज कय एक अँग्रेजी किताब हाथमे ल'क� पढ़य लगलीह।किछु कालक बाद ओम्हर मुँह फेरि कय रमेशबाबू बजलाह -- जे किछु दोष अछि से हमर। बिना पुछि कय वायस्कोप देखय जायब तथा एकर अतिरिक्त राति क� पुस्तक पढ़बमे जेना कोनो बात नहि।" श्रीमतीजी पुस्तक दिस तकैत बजलीह-� पुछबाक की मतलब अछि? सब कार्यमे पुछहि पड़त की? एतेक कठिन बन्धन मे हम नहि रहि सकै छी। हम ई पहिने सूचित कय देबय चाहैत छी। किछु क्षण ठहरि क� पुनः बजलीह --" श्रीमतीजी बनर्जी ठीके कहैत छथिन्ह जे पुरुषजाति अन्यायपूर्वक स्त्री-जातिकेँ पराधीन बना क'रखैत अछि। जिनकर वास्ते मरै छी अथवा जीवै छी, ओही दुलरुआ भाइकेँ उपदेश दिअ। ओ सब सहन करताह। परन्तु दुःख एहि बातक अछि जे एहेन बुद्धि ल'क� जन्म नहि लेलहुँ आर ताहू पर पितासँ गलती स� दू अक्षर पढ़ब सीख लेलौं। एहि कारणसँ कह� पड़ैत अछि जे किछु कहब ओकरा सिर नबा क �मानि लेब हमरासँ नहि भ� सकैत अछि।" रमेशबाबू चटपट शय्यापर उठि बैसि रहलाह। हुनक चक्षु अग्नि सदृश भय गेलनि। डपटि क� बजलाह -" हँ, हँ, छोट भाइकेँ आदेश देबनि आ हजारो बेर देबनि।किन्तु ....." तदुपरान्त बातकेँ अपूर्ण छोड़ि ओ तुरन्त कोठरीसँ बाहर भय गेलाह। श्रीमतीजी क्रोधित भय किछु काल प्रयन्त चुपचाप किताब खोलने बैसल रहलीह। (४) माघ मास प्रायः खतम भ'रहल छलैक। एक दिन आफिस घर अबैत समयमे रास्तामे रमेशबाबू एकाएक एक प्राइवेट हवागाड़ीपर श्रीमती कमला देवी, प्रबोध चन्द्रबाबू तथा एक कोनो तेसर व्यक्तिकेँ जाइत देखलखिन्ह। प्रबोधबाबू मोटर चला रहल छलाह तथा श्रीमती कमला देवी हुनक पाँजर मे बैसल छलीह। मोटर रमेशबाबूक कात सँ तीरक समान चल जाइत रहल। रमेशबाबू अभिमान तथा क्रोधसँ भारी मोन ल'क� धीरे-२ घर अयलाह। अवितहि देरी दीनेशबाबू केँ पुछलथिन्ह--" आहाँक भाउज घर सँ जाइत काल किछु कहने रहथि?� दीनेश उत्तर देलथिन्ह-� ओ तँ हमरा किछु नहि कहलन्हि।" अनुमान नहि कैल जा सकैछ जे आइ कियैक रमेशबाबू भाइक संग वायस्कोप देख� चल गेलाह। बीचमे जखन 'इनटरभल� भेलैक तँ सहसा रमेशबाबूक दृष्टि ऊपरक एक 'बॉक्स� पर जा पड़लन्हि। ओहिठाम श्रीमती कमला देवी, प्रबोधबाबू तथा श्रीमती बनर्जी तीनू गोटे बैसल छलीह। रमेशबाबू पुनः रुमालसँ आँखि पोछि देखलन्हि, ताकि कोनो सन्देह नहि रहि जाय। देखलनि जे वास्तवमे वैह तीनू गोटे उपस्थित अछि। ओ स्पष्ट देखलथिन्ह जे कोनो बातपर प्रबोधबाबू हँसैत-हँसैत ओतेक लोकक समक्षमे अत्यन्त निर्लज्जतापूर्वक श्रीमतीजीक देहपर लोटि गेल छलाह। ********* छि: छि: ! रमेशबाबू अधिक काल तक ओम्हर नहि ताकि सकलाह। ओ झटपट अपन स्थानपर सँ उठि दीनेशबाबूकेँ कहलथिन्ह --" आहाँ बैसल रहू, हम कनेक बाहरसँ अबैत छी।� ओ मोनहि मोन ई सोचय लगलाह--" ऐ कमला ! कि पर पुरुषके संग एतेक घनिष्ठता।" पुनः वायस्कोप प्रारम्भ भेल।परन्तु रमेशबाबूकेँ मोन नहि लगलन्हि। ऊपरक घृणित दृश्य पुनः-पुनः स्मरण भेला सन्ता ओ बहुत अगुता गेलाह। जैखन वायस्कोप बन्द भेलैक, ओ झट बिना कोम्हरो देखैत सोझे भाइक संग बाहर भय गेलाह। तथा 'बस� पकड़बाक हेतु आगू बढ़लाह। दैव प्रतिकूल छलथिन्ह सहसा 'कमला'क सँग पुनः एक बेरि हुनक दृष्टि एकत्रित भय गेलन्हि।ओहि समयमे कमलाक एक हाथ प्रबोधबाबूकेँ हाथमे फँसल छलन्हि। रमेशबाबू शीघ्र ओम्हरसँ दृष्टि फेरि �बस� मे सवार भय गेलाह। किन्तु ओहि समयमे रमेशबाबू श्रीमतीजीसँ किछु नहि पुछलथिन्ह। श्रीमतीजी सेहो ओहि प्रसंगकेँ छोड़ि देलनि।परन्तु भीतरे भीतर ओ अग्नि प्रज्वलित हुअ लागल। (५) किछु दिनक बाद एक दिन जखनि रमेशबाबू आफिससँ अयलाह तँ हुनका देहमे धाह भय गेल छलनि।हुनक शरीर ज्वर सँ अत्यन्त प्रज्वलित भय रहल छलन्हि। घर मे प्रवेश करितहिं पलंगपर पड़ि रहलाह तथा तुराइ देहपर ओढ़ि लेलन्हि।माथ दर्दसँ हुनक मोन पीड़ित छलैन्ह। साँझक लालटेन जखन लेसबाक हेतु श्रीमती कमला देवी अयलीह त� हुनक दृष्टि बिछौना पर पडलैन्ह। धीरे-धीरे लालटेन लेसि क� टेबुल पर राखि देलथिन्ह तथा किछु काल पर्यन्त स्वामीकेँ म्लान मुखक दिस तकैत छलीह। एहि बीचमे दूनू गोटाक बीचमे मुँहाबज्जी अकारण बन्द भय गेल छलन्हि। कमला देवी सेहो जी खोलि कय वार्तालाप नहि करैत छलीह तथा रमेशबाबू सेहो नहि करैत छलाह।अनुमान नहि कैल जा सकैछ जे कियैक श्रीमतीजीक हृदय विदीर्ण भय गेलन्हि। ओ एक अपराधिनीक सदृश धीरे-धीरे आगू बढ़लीह तथा स्वामीकेँ निकट मे आबि क� स्नेहपूर्ण स्वरमे बजलीह --" ज्वर भय गेल अछि?� रमेशबाबू किछु उत्तर नहि देलथिन्ह। तुराइ ल'क� माथ-पर्यन्त झाँपि करोट बदलि लेलन्हि। श्रीमतीजी किछु कालतक चुपचाप ठाढ़ छलीह तथा पुनः धीरे-धीरे बाहर चल गेलीह। ********* जैखन दीनेश बाबू टहलि बुलिक� घर अयलाह, भाउज बहुत दुखित भय कहलथिन्ह -" आहाँ भाइ के ज्वर भय गेलन्हि अछि। कनेक ऊपरे आबि क� बैसू।हम ता तक दूध गर्म कय नेने अबैत छी।� एकर थोड़े कालकबाद श्रीमती बनर्जी प्रबोध तथा श्रीमतीजीकेँ सोर कयलथिन्ह। आइ स्त्री-स्वाधीनताक विषयपर श्रीमती बनर्जीक अत्यन्त महत्वपूर्ण भाषण हुअ बला अछि। श्रीमती बनर्जी श्रीमतीजीसँ कहने रहथिन्ह जे हम जाइ काल संग कय लेब। सखी स्वर जानि कय श्रीमतीजी तुरन्त भनसा घरसँ बाहर अयलीह तथा उदास मोन सँ कहलथिन्ह-� आइ हम नहि जा सकब--हुनका ज्वर भय गेलनि अछि।" श्रीमती बनर्जी जोरसँ ठहक्का मारलन्हि तथा श्रीमतीजीकेँ कनेक धक्का द'क� बजलीह--� ज्वर भय गेलन्हि अछि? त� थोड़ेक ज्वर भेला सँ ...." श्रीमतीजीकेँ ई नीक नहि लगलन्हि। ओ बीचहिमे बात कटैत बजलीह -;" सखी, कनेक कम जोड़ सँ, नहि तँ सुनि लेताह। हमरा छोड़ि दिअ, एहन अवस्थामे हम हुनका छोड़ि क� नहि जा सकैत छी। एतवा कहि ओ फेरि चुलही लग चल गेलीह। श्रीमती बनर्जी गम्भीरतापूर्वक बजलीह-� मि. प्रबोधचन्द्र गाड़ी पर बैसल बहुत उत्सुकताक संग आहाँक रास्ता देखि रहल छथि।आहाँक नहि गेला सँ हुनका बड़ दुःख होयतन्हि। आहाँसँ हमरा एहन आशा नहि छल।" श्रीमतीजी धीरे-धीरे परन्तु दृढ़तापूर्वक कहलथिन्ह-" श्रीमती बनर्जी मनुष्यकेँ मोन विचार परिवर्तन कर'मे अधिक विलम्ब नहि लगैत छैक। तथा हम हुनका बाट देख� नहि कहने छलिअन्हि, ओ खुशी रहथि वा नाराज, हुनका सँ हमरा लगाव कोन तरहक?� ई कहि ओ भनसा घर मे चल गेलीह तथा तुरन्त गर्म दूध कटोरामे लय ऊपर चल गेलीह। *********** श्रीमती बनर्जी विस्मित भय किछु काल पर्यन्त हुनका दिस तकैत छलथिन्ह तथा पुनः धीरे-धीरे ओहिठाम सँ बाहर चल गेलीह। (६) क्रमशः (प्रभात: वर्ष-१, अंक-१०,अक्टूबर-१९३३ई.) उपर्युक्त कथा जँ आगाँ खण्ड अबितैक तँ उपन्यासो भ� सकैत छलैक, यद्यपि अपूर्ण अछि, आगाँ ६ लिखि क� क्रमशः लिखल अछि, किन्तु अपने आपमे पूर्ण अछि। सभ अंक उपलब्ध नहि रहलाक कारणसँ आगाँक अंकमे कतहु नहि भेटल, लिखल तँ गेले छलैक, कारण ६ लिखल छैक। जे से, अछि धरि ई कथा महत्वपूर्ण। मैथिलानीक नारी स्वतन्त्रताक बात आ ओहि स्वतंत्रतामे पर-पुरुषसँ प्रेम जे बंगाली अछि, ओकर पत्नीक समक्षहि आलिंगनबद्ध होयब, मुदा बिना कोनो दवावक पुनः मैथिलानीक संस्कारकेँ आत्मसात क� लेब,आगाँ बढ़ि, पैर पाछाँ क� लेब नीक जकाँ लेखकक कलम चललनि अछि। जँ आगाँक अंक उपलब्ध रहितैक, तँ ई कथा कोन मोड़ लैत, से कहनाइ कठिन अछि। कथामे शब्दक प्रयोगमे देशज शब्दक बहुतायत अछि, जे आब क्रमशः लुप्त भेल जा रहल अछि। एहन आनो कथा, निबन्ध, कविता सभ अछि, जे पूर्ण नहि अछि, मुदा जे अछि से कोशिश करब आगाँक सभमे प्रस्तुत करबाक, जाहिमे भवनाथ मिश्रक �कुंडली-चक्र� ( एक अन्य उपन्यासक आधारपर), देवनारायण चौधरीक 'आश्चर्य-विचार', अमरनाथ ठाकुर, सिंहवाड़क 'देहाती अर्थ� आदि जाहिमे हास्यो अछि, व्यंग्य सेहो संगहि तत्कालीन सामाजिक व्यवस्थापर आलेख सेहो। कवितामे ययातिक कथा, किष्किन्धा काण्ड-रामायणक अनुवाद सम्पादक तारानाथ झाक ज्येष्ठ भ्राता चन्द्रनाथ झाक अनेक अंकमे अछि, ओहो यथासाध्य पाठकक लेल प्रस्तुत करबाक प्रयास करब। संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-7 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-8 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-9 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-10 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-11 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-12 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-13 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-14 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-15 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-16 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-17 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-18 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.३.प्रणव कुमार झा-सहकारिताक धागा सभसँ आगा प्रणव कुमार झा सहकारिताक धागा सभसँ आगा "सहकारिता के धागे, सबसे आगे"- हमर पिता जी जे पंडौल सहकारी सूत मील, मधुबनी मे काज करैत छलाह, ओहि मीलक दीवारि पर ई सूक्ति जखन मीलक भीतर घूमैक अवसर भेटैत छल तखन हम सभ अक्सर पढ़ैत छलहुँ । ओहि समय मे हम बच्चा रही। 'सहकारिता' की होइत अछि, ओकर किछु ज्ञान नहि छल। बस एतबे जानैत छलहुँ जे कारखाना मे सूत बनैत अछि, पिता जी ओतय काज पर जाइत छथि, आ दीवारि पर लिखल ओहि पंक्ति केँ हम सभ मजा मे अक्सर छंद जकाँ दोहराबैत छलहुँ। बाद मे नागरिकशास्त्रक कक्षा आ पोथी सभ मे सहकारी समितिक विषय मे पढ़बाक मौका भेटल आ एकरा सँ परिचय भेल छल। बात किछु किछु बुझना मे आयल छल मुदा बहुत किछ नै। आब जखन सोचैत छी तऽ लगैत अछि जे ओहि दीवारि पर किछु किछु नहि, अपितु बहुत किछु लिखल छल। निश्चित रूप सँ ई सूक्ति मील मे काज करय बला लोकक मनोबल बढ़यबाक लेल आ सहकारी कारखाना मे बनल सूत (धागा) क गुणवत्ताक समर्थन मे लिखल गेल होयत, मुदा एकरा गहिराई सँ देखला पर एकटा गूढ़ विचारधारा सेहो पिरोयल देखाइत पड़े अछि। "सहकारिताक धागा, सभ सँ आगाँ" - ई केवल एकटा सूक्ति नहि, बल्कि भारतक सामाजिक जीवन, सामूहिक प्रयास आ आत्मनिर्भरताक गहीर समझ केँ दर्शाबय वाला एकटा विचार काहल जा सकय अछि। जेना सूतक महीन रेशा सभ आपस मे जुड़ि कऽ मजबूत धागा बनबैत अछि, ओहिना सहकारिता मे हरेक व्यक्तिक सहभागिता सँ एकटा एहन तंत्र बनैत अछि जे समाज केँ मजबूती प्रदान करैत अछि। सहकारिताक मूल भाव अछि: "साझा प्रयास, साझा लाभ"। एहि मे नै कोनो मालिक होइत अछि, नै कोनो कर्मचारी। सभ सदस्य होइत छथि आ सभक समान अधिकार होइत अछि। ई लोकतंत्रक जड़ि केँ मजबूत करैत अछि, कियाक तऽ निर्णय सामूहिक रूप सँ लेल जाइत अछि आ लाभक वितरण सेहो समान रूप सँ होइत अछि। भारत मे दुग्ध उत्पादन मे 'अमूल' जकाँ सहकारी संस्था सँ लय कऽ बिहारक 'सुधा डेयरी', महाराष्ट्रक 'वारणा', कर्नाटकक 'नंदिनी' आ पंजाबक सहकारी मंडी सभ - ई सभ उदाहरण अछि जे कोना सहकारिता किसान, श्रमिक आ छोट व्यापारी सभ केँ शोषण सँ मुक्ति दिया कऽ हुनका आर्थिक, सामाजिक आ मानसिक रूप सँ सशक्त बना सकय अछि। ई सूक्ति हमरा याद दियाबैत अछि जे अकेले चलला सँ लोक तेज चलि सकैत छी, मुदा संग चलला सँ लोक दूर धरि जा सकैत छी। यैह सहकारिताक आत्मा अछि - मिलि-जुुलि कऽ आगाँ बढ़ब, एकटा महीन धागा सँ सभक संग बान्हल रहब। यदि लोकतंत्रक आत्मा गामक चौबटिया आ पंचायत मे बसैत अछि, तऽ ओकर धड़कन सहकारिताक ताना-बाना मे स्पंदित होइत अछि। ई ओ धागा अछि, जे कच्ची सड़क पर धूर उड़बैत ट्रैक्टर सँ लय कऽ शहरी चकाचौंध मे हाउसिंग सोसाइटीक वार्षिक सभा धरि, हर नागरिक केँ एक सूत्र मे पिरोबैत अछि। सहकारिता केवल आर्थिक साझेदारी नहि अछि; ई ओ विचार अछि, जे खेत-खलिहान, बजार, बस्ती आ हाउसिंग सोसाइटी मे जन-जीवन केँ गरिमा दैत अछि। ई ओ मंच अछि, जतय आम नागरिक केवल मतदाता नहि रहि कऽ सहभागी बनैत अछि, निर्णयकर्ता बनैत अछि, आ अपन सपना केँ गढ़बाक हकदार बनैत अछि। सहकारिता ओ पुल अछि, जे सत्ताक गलियारा सँ दूर, गामक माटि मे बसल उम्मीद केँ शहरक चमक सँ जोड़ैत अछि। ई ओहि किसानक पुकार अछि, जे साहूकारक ब्याज दर सँ मुक्त भऽ अपन सहकारी बैंक सँ कर्ज लैत अछि। ई ओहि महिलाक ताकत अछि, जे स्वयं सहायता समूहक सिलाई मशीन सँ, हस्त उद्योग सँ, अपन बच्चा सभ लेल स्कूलक खर्च जुड़बैत अछि। ई ओ लोकतंत्र अछि, जे संसदक ऊँच दीवारि सँ पार, गामक चौबटिया पर साँस लैत अछि। सहकारिता संसाधनक साझेदारी, मुनाफाक बराबरी, निर्णय मे हिस्सेदारी आ जिम्मेदारीक समानताक प्रतीक अछि। ई ओ प्रक्रिया अछि, जतय लोक मिलि कऽ किछु सकारात्मक रचैत अछि। चाहे ओ दूधक नदी होय, अनाजक गोदाम होय, या स्वरोजगारक स्टार्टअप के नव राह। सहकारिता ओ पाठशाला अछि, जे सामूहिक निर्णय लेबऽ सिखाबैत अछि; ओ बैंक अछि, जे भरोसा बाँटैत अछि; आ ओ गोदाम अछि, जे उम्मीद सभ केँ सँजोइत अछि। वर्तमान भारत मे, जखन लोकतंत्र केँ अक्सर मतदान धरि सीमित कऽ देल गेल अछि, सहकारिता ओकर आत्मा केँ जीवंत रखैत अछि। ई ओ मंच अछि, जतय हर व्यक्ति, चाहे ओ गामक किसान होय, शहरक मजदूर या बस्तीक गृहिणी, अपन मुद्दा के लेल बनल छोट-छोट समूह सभ मे अपन आवाज केँ बुलंद कऽ सकैत अछि। ई ओ व्यवस्था अछि, जे समाज केँ सरकार सँ पहिने रखैत अछि, आ लोक केँ लोकतंत्रक असल नायक बनाबैत अछि। सहकारिता भारतक लेल कोनो आयातित विचार नहि अछि। अपना ओतय तऽ सहभोजन, सहयात्रा, आ सहश्रवणक परंपरा पुरान समय से रहल अछि - संग खायब, संग चलब, आ संग सुनब। ई सामूहिकताक ओ भावना अछि, जे ग्रामीण समाज आ नगरीय अर्थव्यवस्था दुनू मे जीवंत छल। मुदा ब्रिटिश काल मे गुलामीक बेड़ी मे जकड़ल देश मे किछु समय लेल ई भावना कदाचित नैपथ्य मे चलि गेल छल। कहल जाइत अछि जे, हरेक बड़का बदलाव एकटा छोट कदम सँ शुरू होइत अछि। 19म सदीक अंतिम दशक मे, जखन भारत ब्रिटिश राजक बेड़ी मे जकड़ल छल, गामक किसान साहूकार सभक ब्याजक बोझक नीचाँ दबल छलाह। खेत मे पसीना बहैत छल, मुदा फसलक दाम साहूकारक अंटी (पॉकेट) मे जाइत छल। तखने, जर्मनी सँ एकटा विचार आयल - रायफाइज़न मॉडल। ई एहन बीया छल, जे सामूहिकताक माटि मे जनमैत छल। 1904 मे सहकारी क्रेडिट सोसाइटी अधिनियम एहि बीज केँ भारतक धरती पर बाउ केलक। मद्रासक कन्याकुमारी मे पहिल औपचारिक सहकारी समिति बनल, जे किसान सभ केँ सस्ता कर्जक वादा लय कऽ आयल छल। परतंत्र भारतक हजारो-लाखो किसान, कामगार, व्यापारी सभ लेल ई एहन छल, मानु गामक चौबटिया पर एकटा नव गीत शुरू भेल हो - आपसी विश्वास आ एकजुटताक गीत। 1912 मे सहकारी समिति अधिनियम एहि स्वर केँ आर बुलंद कयलक। आब नै केवल कर्ज, बल्कि फसलक विपणन, उपभोक्ता सामान आ उत्पादन लेल सेहो सहकारी समिति सभ बनय लागल। देश लेल ई एकटा नव भोर जकाँ छल, जतय लोक अपन रोज़मर्रा आ आजीविका व्यवस्था लेल आब अकेले नहि, बल्कि एक-दोसरक काँध सँ काँध मिला कऽ चलि रहल छलाह। महात्मा गांधी सहकारिता केँ ग्राम स्वराज क आधार बनौलनि। हुनका लेल, सहकारिता केवल आर्थिक साधन नहि छल; ई सामाजिक आ नैतिक सशक्तीकरणक रास्ता छल। दक्षिण अफ्रीका मे फीनिक्स सेटलमेट (1904) आ टॉल्स्टॉय फार्म (1910) मे ओ सहकारी जीवनक मॉडल प्रस्तुत कयलनि, जतय लोक सामूहिक रूप सँ खेती, उत्पादन आ जीवनयापन करैत छलाह। भारत मे, स्वदेशी आंदोलन (1905) आ असहयोग आंदोलन (1920-22) मे सहकारी समिति सभ स्वदेशी उत्पाद केँ बढ़ावा दऽ कऽ ब्रिटिश शोषणक विरोध कैल गेल छल। सेवाग्राम आश्रम मे गांधीजी सहकारी सिद्धांत केँ जीवंत कयलनि, जतय ग्रामीण समुदाय केँ सामूहिक निर्णय लेबय आ आत्मनिर्भरताक शिक्षा देल गेल छल। ई ओ दौर छल, जखन सहकारिता गाम गामक नस मे गंगाक धारा जेना बहय लागल छल। स्वतंत्रताक बाद, सहकारी आंदोलन भारतक लोकतान्त्रिक ढाँचा मे एकटा महत्वपूर्ण स्थान बनौलक। पंडित जवाहरलाल नेहरू सहकारिता केँ पंचायत आ विद्यालयक संग ग्रामीण लोकतंत्रक आधार मानलनि। प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951-1956) सहकारी समिति सभ केँ ग्रामीण विकासक केंद्र बनौलक। 1963 मे राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC) क स्थापना सहकारी समिति सभ केँ वित्तीय आ तकनीकी सहायता प्रदान कयलक। श्वेत क्रांति सँ अमूलक सफलता साबित कयलक जे सहकारिता लोकतंत्रक ओ परछाइ अछि, जे संसदीय लोकतंत्र सँ सेहो कहीं बेसी जन-केंद्रित अछि। 2011 क 17म संविधान संशोधन सहकारिता लेल एकटा ऐतिहासिक कदम छल। अनुच्छेद 43B सहकारी समिति सभ केँ नीति निदेशक तत्वक रूप मे मान्यता देलक, आ अनुच्छेद 19(1)(c) संगठन बनाबयक मूल अधिकार प्रदान कयलक। ई संशोधन सहकारी समिति सभ केँ लोकतान्त्रिक भागीदारीक एकटा संवैधानिक मंच बनबैत अछि, जतय सदस्य सभ केँ समान मत आ निर्णय लेबय के अधिकार प्राप्त अछि। 6 जुलाई 2021 के भारत सरकार मे अलग सहकारिता मंत्रालयक स्थापना भारत मे सहकारी आंदोलन केँ एकटा नव गति देलक अछि। तखन सँ आई धरि देशक विभिन्न राज्य मे हजारो नव सहकारी संघ बनल अछि, जइ मे महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, जम्मू कश्मीर आ मध्य प्रदेश अग्रणी राज्य अछि। एहि मंत्रालयक उद्देश्य सहकारी समिति सभ केँ एकटा सच्चा जन-आधारित आंदोलनक रूप मे जमीनी स्तर धरि पहुँचाबयब आ सहकारी आधारित आर्थिक मॉडल विकसित करब अछि, जतय प्रत्येक सदस्य जिम्मेदारीक भावनाक संग काज करैत अछि। मंत्रालय 'सहकार सँ समृद्धि' कऽ मंत्रक संग सहकारी समिति सभ लेल प्रक्रिया सभ केँ सुव्यवस्थित कयलक आ बहु-राज्य सहकारी समिति (MSCS) कऽ विकास केँ सक्षम बनौलक। ई लोकतान्त्रिक भागीदारी केँ बढ़ावा देबाक एकटा महत्वपूर्ण कदम अछि, कियाक तऽ ई सुनिश्चित करैत अछि जे सहकारी समिति सभ पारदर्शी आ समावेशी ढंग सँ संचालित हो। सहकारी समिति अपन संरचना मे ही लोकतान्त्रिक अछि। प्रत्येक सदस्य केँ एक वोटक अधिकार होइत अछि, चाहे ओकर आर्थिक स्थिति किछुओ हो। ई 'एक व्यक्ति, एक वोट' कऽ सिद्धांत सहकारी समिति सभ केँ लोकतंत्रक एकटा माइक्रोकॉसम (लघु रूप) बनबैत अछि। उदाहरण लेल, प्राथमिक कृषि ऋण समिति (PACS) गाम स्तर पर कार्य करैत अछि आ किसान सभ केँ सस्ता ऋण, बीज, उर्वरक आ विपणन सुविधा प्रदान करैत अछि। वर्ष 2023 धरि, भारत मे लगभग 1 लाख PACS चलि रहल अछि, जे 13 करोड़ सँ बेसी किसान केँ जोड़ैत अछि। ई समिति सभ ग्रामीण भारत मे लोकतान्त्रिक भागीदारीक एकटा जीवंत उदाहरण अछि, कियाक तऽ ई किसान सभ केँ सामूहिक निर्णय लेबय आ संसाधनक समान वितरणक अवसर दैत अछि। स्वतंत्रताक बाद सहकारिता सँ सशक्तीकरणक दिशा मे किछु मीलक पत्थर: अमूल: लोकतान्त्रिक सशक्तीकरणक प्रतीक: कैरा सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ (अमूल) सहकारिता आ लोकतान्त्रिक भागीदारीक एकटा जीवंत उदाहरण अछि। 1946 मे स्थापित, अमूल डॉ. वर्गीज कुरियनक नेतृत्व मे श्वेत क्रांतिक नींव राखलक। ई मॉडल गाम स्तर पर दुग्ध सहकारी समिति सभ केँ संगठित करैत अछि, जतय प्रत्येक सदस्य केँ एक वोट आ लाभांशक समान अधिकार छैक। ई 'एक व्यक्ति, एक वोट' कऽ सिद्धांत लोकतान्त्रिक भागीदारीक आत्मा केँ दर्शाबैत अछि। 2023 धरि, अमूल 36 लाख दुग्ध उत्पादक केँ जोड़ने अछि, जइ मे 40% महिला छथि। ई करीब 18 हजार गाम से प्रतिदिन 2.5 करोड़ लीटर दूधक संग्रह करैत अछि, आ एकर वार्षिक कारोबार अस्सी हजार करोड़ टका सँ बेसी अछि। अमूल नै खाली लाखो किसान आ कर्मचारी सभ केँ आर्थिक सशक्तीकरण प्रदान कयलक अछि, अपितु ग्रामीण महिला आ सीमांत किसान सभ केँ सामाजिक समानताक मंच सेहो देने अछि। ई सहकारिताक ओ चेहरा अछि, जे लोकतंत्र केँ गामक चौबटिया धरि लय जाइत अछि। सुधा: बिहार मे सहकारी लोकतंत्र: बिहार मे सुधा दुग्ध उत्पादन समिति 1990 कऽ दशक मे आर्थिक संकट केँ बीच एकटा नव उम्मीद जगौने छल। 1990 कऽ दशक मे जखन बिहार मे कल-कारखाना एक के बाद एक बंद भऽ रहल छल, बिहार राज्य दुग्ध सहकारी संघ (कॉम्फेड) कऽ तहत संचालित सुधा, छोट आ सीमांत दुग्ध उत्पादक सभ केँ संगठित कयने छल। 2023 धरि, सुधा दस हजार सँ बेसी दुग्ध सहकारी समिति सभक माध्यम सँ 15 लाख दुग्ध उत्पादक केँ जोड़ने अछि। ई प्रतिदिन 15 लाख लीटर दूधक संग्रह करैत अछि, आ एकर वार्षिक कारोबार पाँच हजार करोड़ टका सँ बेसी अछि। सुधा बिहारक मरइत ग्रामीण अर्थव्यवस्था केँ पुनर्जीवन देलक आ लोकतान्त्रिक भागीदारी केँ सशक्त बनौलक। ई बिहारक दुग्ध उत्पादक किसान आ वितरण आ विपणन मे लागल लोक सभ केँ विकासक एकटा नव दिशा देखौलक, जकर परिणामस्वरूप सुधाक अलावा सेहो कतेको सहकारी दुग्ध उत्पादक समिति सभक गठनक मार्ग प्रशस्त भेल आ आई बिहारक गाम-गाम मे एहन दुग्ध उत्पादक समिति देखय लेल भेटत जे राज्यक लाखो लोकक जीविकाक साधन बनल अछि। किसान उत्पादक संगठन (FPO): सामूहिक सौदेबाजीक शक्ति - किसान उत्पादक संगठन (FPO) सहकारी आंदोलनक एकटा आधुनिक स्वरूप अछि। ई संगठन किसान सभ केँ सामूहिक सौदेबाजी, इनपुट, आ बजार धरि पहुँच प्रदान करैत अछि। राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC) 2023 धरि दस हजार FPO स्थापित करबाक लक्ष्य राखने छल, जइ मे सँ 1100 PACS कऽ माध्यम सँ गठित कयल गेल अछि। 2023 धरि, भारत मे 8 हजार सँ बेसी FPO कार्यरत अछि, जे 20 लाख सँ बेसी किसान केँ जोड़ैत अछि। एहि मे सँ 60% FPO सहकारी मॉडल पर आधारित अछि। उदाहरण लेल, महाराष्ट्रक 'सह्याद्री फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी' बारह हजार किसान केँ जोड़ैत अछि आ फल तथा तरकारीक निर्यात मे हजार करोड़ टकाक कारोबार करैत अछि। ई मॉडल किसान सभ केँ बजारक अनिश्चितता सँ बचबैत अछि आ हुनका लोकतान्त्रिक निर्णय लेबाक मंच दैत अछि। स्वयं सहायता समूह (SHG): महिला सभक आवाज - स्वयं सहायता समूह (SHG) ग्रामीण भारत मे महिला सभ केँ लोकतान्त्रिक भागीदारीक एकटा सशक्त मंच प्रदान कयलक। ई समूह महिला सभ केँ स्वरोजगार, वित्तीय साक्षरता आ सामुदायिक नेतृत्वक अवसर दैत अछि। लिज्जत पापड़ आ 'सेल्फ-इम्प्लॉयड वीमेन एसोसिएशन' (SEWA) एकर जीवंत उदाहरण अछि। 2023 धरि, भारत मे 1.2 करोड़ SHG अछि, जे 14 करोड़ महिला केँ जोड़ैत अछि। एहि मे सँ तीस हजार सँ बेसी SHG सहकारी समितिक रूप मे पंजीकृत अछि, जे 50 लाख महिला केँ रोजगार दैत अछि। उदाहरण लेल, लिज्जत पापड़ 45 हजार सँ बेसी महिला केँ रोजगार दैत अछि आ एकर वार्षिक कारोबार सोलह सौ करोड़ टका सँ बेसी अछि। ई सहकारिताक ओ शक्ति अछि, जे महिला सभ केँ सामाजिक परिधि सँ बाहर अनैत अछि आ हुनका लोकतान्त्रिक नेतृत्वक अवसर दैत अछि। डिजिटल सहकारिता: CSC आ PACS क एकीकरण - कॉमन सर्विस सेंटर्स (CSC) आ PACS क बीच 2022 मे भेल समझौता सहकारी आंदोलन केँ डिजिटल युग मे प्रवेश करौलक। PACS आब 300 सँ बेसी डिजिटल सेवा प्रदान करैत अछि, जइ मे बैंकिंग, बीमा, आ सरकारी योजनाक लाभ शामिल अछि। ई पहल ग्रामीण भारत मे डिजिटल साक्षरता आ लोकतान्त्रिक भागीदारी केँ बढ़ावा दैत अछि। 2023 धरि, 50,000 सँ बेसी PACS डिजिटल सेवा प्रदान कऽ रहल अछि, जे 2 करोड़ सँ बेसी ग्रामीण नागरिक धरि पहुँचि रहल अछि। उदाहरण लेल, उत्तर प्रदेश मे PACS ने प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि आ किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) क माध्यम सँ 1.5 करोड़ किसान केँ लाभ पहुँचाओल। ई सहकारिताक ओ चेहरा अछि, जे डिजिटल मंचक माध्यम सँ लोकतान्त्रिक भागीदारी केँ सशक्त बनबैत अछि। सहकारी समितिक चुनौती: लोकतंत्रक आत्ममंथन सहकारिता जतय एक दिश समाजवादी लोकतन्त्रक व्यावहारिक तंत्र विकसित करैत अछि, ओतहि सहकारिताक बाट मे अनेकानेक काँटा सेहो भरल अछि। स्वतन्त्रता सँ पहिनेहे एहि व्यवस्थाक चुनौती उजागर होबय लागल छल। मैक्लेगन समिति (1915) सहकारी समितिक संचालन मे निरक्षरता, भाई-भतीजावाद आ धनक दुरुपयोग जकाँ समस्या केँ उजागर कयने छल। स्वतन्त्रताक बाद, रामनिवास मिर्धा समिति बतौलक जे 25% सहकारी समिति निष्क्रिय अछि। वर्तमान मे, सहकारी आंदोलन केँ निम्नलिखित चुनौतीक सामना करय पड़ि रहल अछि: राजनीतिक हस्तक्षेप: अक्सर कतेको सहकारी समिति राजनीतिक प्रभाव मे आबि जाइत अछि, जइ सँ ओकर स्वायत्तता कमजोर होइत अछि आ ओकर परिचालन बाधित अथवा प्रभावित होइत अछि। NCUI क 2023 क आँकड़ाक अनुसार, 30% सहकारी समिति मे नियमित चुनाव नहि होइत अछि। ऊपर जइ पंडौल सहकारी सूत मीलक चर्चा कयल गेल अछि, ओहो 2000 क दशक शुरू होइत-होइत बंद भऽ गेल, जकर पाँछा एकटा पैघ कारण राज्यक तात्कालिक आ स्थानीय राजनीति केँ ही मानल जा सकैत अछि। जखन पंडौल जकाँ स्थानीय इकाई सभ वैश्विक प्रतिस्पर्धा या आंतरिक कुप्रबंधनक कारणे बंद होइत अछि, तऽ ई केवल एकटा मील नहि, बल्कि एकटा ओहि से जुड़ल हजारो परिवार के आ सहकारी सपना कऽ टूटब होइत अछि। वित्तीय अस्थिरता: सहकारी बैंक मे गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) क समस्या गंभीर अछि। 2023 मे, सहकारी बैंक मे NPA क स्तर 10% सँ बेसी छल, जे एकटा चिंताक विषय अछि। पारदर्शिताक कमी: सहकारी समिति मे अनुगमन आ निरीक्षण अपर्याप्त रहल अछि। 2016-17 मे केवल 68 सहकारी समितिक अनुगमन कयल गेल, जे कुल समितिक 0.1% सँ सेहो कम अछि। शहरी सहकारिता मे वर्गभेद: शहरी हाउसिंग सोसाइटी अक्सर वर्गभेद आ बहिष्करणक अड्डा बनि जाइत अछि, जे सहकारिताक समावेशी भावनाक विपरीत अछि। ई चुनौती अक्सर ई प्रश्न ठाढ़ करैत अछि कि की सहकारिताक ई लोकतान्त्रिक माध्यम स्वयं पूर्ण रूपेण लोकतान्त्रिक मूल्य पर चलि रहल अछि? भविष्यक राह: सहकारिताक पुनरुद्धार सहकारिता लोकतंत्र मे विश्वास जोड़बाक एकटा वैकल्पिक स्वर अछि। जखन युवा बेरोजगारी सँ जूझि रहल होथि, तऽ सहकारी स्टार्टअप्स रोजगारक नव राह देखा सकैत अछि। जखन महिला सामाजिक परिधि मे कैद होथि, तऽ स्वयं सहायता समूह हुनका सशक्तीकरणक पुल प्रदान करैत अछि। जखन बजार मे पूँजीक प्रभुत्व देखाइत अछि, तऽ उपभोक्ता सहकारी संस्था एकटा नैतिक आ समावेशी बजार ठाढ़ कऽ सकैत अछि। भारत टैक्सी (Bharat Taxi) सहकारिता के तहत स्टार्टअप के एकटा टटका उदाहरण अछि जे देशक पहिल सहकारी राइड-हेलिंग सेवा शुरू केलक अछि, जतय ड्राइवर मालिको छथि। एहि मे जीरो-कमीशन मॉडल लागू छै, अर्थात् ड्राइवर सिर्फ मामूली दैनिक शुल्क दऽ कऽ पूरा कमाई कऽ सकैत छथि। नीतिगत सुधार: सहकारिता मंत्रालय 2023 मे मॉडल उप-नियम लागू कयलक, जइ PACS केँ बहुउद्देश्यीय बनौलक। आब PACS डेयरी, मत्स्य पालन, भंडारण आ अन्य 25 क्षेत्र मे काज कऽ सकैत अछि। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) क संग सहयोग सँ सहकारी बैंक मे वित्तीय पारदर्शिता केँ बढ़ाओल जा रहल अछि। डिजिटल सहकारिता: PACS क डिजिटलीकरणक योजना 1 लाख PACS केँ डिजिटल प्लेटफॉर्म सँ जोड़ि रहल अछि। ई-नाम (नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट) क संग एकीकरण किसान केँ बजार सँ सीधेत जोड़ैत अछि। ई पहल ग्रामीण भारत मे डिजिटल साक्षरता आ लोकतान्त्रिक भागीदारी केँ सशक्त बनबैत अछि। सतत विकास लक्ष्य (SDG): सहकारी समिति सतत विकास लक्ष्य केँ साकार करय मे अग्रणी अछि। गरीबी उन्मूलन, खाद्य सुरक्षा, आ लैंगिक समानता जकाँ लक्ष्य केँ अमूल, सुधा आ SHG जकाँ मॉडल आगाँ बढ़ा रहल अछि। जैविक खेती आ नवीकरणीय ऊर्जा पर आधारित सहकारी समिति पर्यावरण संरक्षण केँ बढ़ावा दऽ रहल अछि। अतः कुल मिला कऽ कहि सकैत छी जे सहकारिता ओ धागा अछि, जे भारतक लोकतंत्र केँ एक सूत्र मे बान्हि कऽ मजबूत बनबैत अछि। सहकारिता मंत्रालय, डिजिटल सहकारिता, आ SDG क संग ई आंदोलन नव ऊँचाई केँ छूबाक प्रयास कऽ रहल अछि। सहकारिता ओ आशा अछि, जे गामक चौबटिया सँ लय कऽ डिजिटल मंच धरि, भारत केँ एकटा समृद्ध, समावेशी आ सच्चे अर्थ मे लोकतान्त्रिक भविष्यक दिशि लय जाइत अछि। सहकारिता बीतल समयक कोनो मीठगर स्मृति मात्र नहि अछि, अपितु ई 21वीं सदीक भारतक आर्थिक आत्मनिर्भरता कऽ महामार्ग अछि। जखन पंडौलक सूत मीलक ओ दीवारि नव रूप मे गाम-गाम कस्बा-कस्बा मे पुनः नव तकनीक आ पारदर्शिताक संग ठाढ़ होयत, तखने सही अर्थ मे 'सहकार सँ समृद्धि' कऽ सपना साकार होयत। -प्रणव कुमार झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.४.डॉ. उमेश मण्डल- पयस्विनी : लोकचेतना आ संवादधर्मिताक समेकित अभिव्यक्ति डॉ. उमेश मण्डल अतिथि शिक्षक सर्व नारायण सिंह राम कुमार सिंह महाविद्यालय, सहरसा (बिहार) मो.: 9931654742 पयस्विनी : लोकचेतना आ संवादधर्मिताक समेकित अभिव्यक्ति आधुनिक मैथिली साहित्यमे जगदीश प्रसाद मण्डलजीक उपस्थिति एकटा सशक्त लोकधर्मी रचनाकारक रूपमे जानल जाइत अछि। हुनकर लेखन जीवनक ठोस धरातलसँ उपजल अछि। गामक सामाजिक संरचना, खेतक श्रम-संस्कृति, परिवारक भीतरक तनाव, लोकाचारक निरन्तरता, स्त्री-पुरुषक पारस्परिक स्थिति, उपेक्षित समाजक पीड़ा आ मानवीय गरिमाक प्रश्न हुनकर साहित्यक मूल क्षेत्र बनैत अछि। ऐ कारण हुनकर रचनासभ पाठककेँ दूरक कल्पना-लोकमे नहि, अपन परिचित जीवन-जगतमे लऽ जाइत अछि। ओइ जीवन-जगतमे अनुभवक ऊष्मा, संघर्षक कठोरता आ आशाक मानवीय प्रकाश एक संग उपस्थित रहैत अछि। जगदीश प्रसाद मण्डलजीक जन्म 5 जुलाइ 1947 केँ मधुबनी जिलाक लखनौर प्रखण्ड अन्तर्गत बेरमा गाममे भेलैन। हिनकर मातृभाषा मैथिली रहल छैन। हिनक प्रारम्भिक संस्कार गामक परिवेशमे आकार ग्रहण केलक। शिक्षा जनता कॉलेज, झंझारपुरसँ स्नातक स्तरधरि आ सी. एम. कॉलेज, दरभंगासँ हिंदी तथा राजनीति शास्त्रमे स्नातकोत्तर स्तरधरि पूर्ण भेल। पारिवारिक दायित्व, खेती-बाड़ी आ आत्मानुशासनक संग अध्ययनक ई समन्वय हुनकर जीवनक आरम्भिक गठनक महत्त्वपूर्ण पक्ष थिक। ई संयोजन हुनका पुस्तकीय ज्ञान आ व्यवहारिक अनुभव दुनूक साझा धरातल प्रदान केलकैन अछि। मण्डलजीक जीविकोपार्जनक साधन मूलत: खेती-बाड़ी रहल छैन। जीवनवृत्तमे हुनकर सामाजिक परिचय आत्मनिर्भर कृषकक रूपमे दर्ज अछि। परम्परागत अनुभव आ वैज्ञानिक दृष्टि हुनकर जीवन-दृष्टिक दू महत्त्वपूर्ण आधार मानल गेल अछि। हुनका लेल कृषि केवल उपार्जनक माध्यम भरि नहि, समाज-निर्माणक आधारशिला सेहो अछि। ऐ दृष्टिसँ श्रम, माटि, उत्पादक वर्ग, लोकनिर्भर जीवन-व्यवस्था आ सामुदायिक नैतिकता हुनकर साहित्यिक चिन्तनक केन्द्रीय तत्त्व बनि जाइत अछि। पछुआएल वर्गक संघर्ष, खेती-बाड़ी, कृषक-जीवनपर आधारित यथार्थवादी साहित्य आ सामाजिक रूढ़ि, अंधविश्वास तथा सामन्तवादक विरुद्ध सक्रिय प्रतिरोधक हिनकर जीवनवृत्तमे स्पष्ट रूपेँ भेटैत अछि। हुनकर जीवन-शैली सेहो विशेष ध्यानाकर्षक अछि। भोर 2 बजेसँ लेखन आरम्भ करबाक आदत, खेतक निरीक्षण, ऋतुगत सादा भोजन, शुद्धलेखन, पुनर्पाठ, शब्द-गणना आ आत्मावलोकनक अनुशासन मण्डलजीकेँ एक सजग साहित्य-साधकक रूपमे स्थापित करैत अछि। लेखकक जीवन आ साहित्य सृजनक बीच एहेन सामंजस्य दुर्लभ होइत अछि। एतए विचार कागजपर उतरल निष्कर्ष मात्र नहि रहैत अछि, बल्कि ओ दिनचर्याक अनुभवसँ पोषित रचनात्मक बोधक रूपमे विकसित होइत अछि। ऐ अनुशासनक प्रतिफल हुनकर विपुल कृतित्व आ लेखनक निरन्तरता दुनूमे देखल जा सकैत अछि। कृतित्वक स्तरपर जगदीश प्रसाद मण्डल अत्यन्त विपुल रचनाकारक रूपमे प्रसिद्ध छैथ। जीवनवृत्तक अनुसार वर्ष 2000 ई.सँ नियमित लेखनक आरम्भ भेल आ तेकरा पछाइत कथा, उपन्यास, नाटक, पद्य, बाल-साहित्य, आत्मकथात्मक गद्य आ शोध-आलेख धरि हुनकर रचनात्मक क्षेत्र निरन्तर विस्तृत होइत गेल। 1100 सँ अधिक कथा, 20 सँ अधिक उपन्यास, 12 एकांकी ओ नाटक, 12 पद्य संग्रह आ 10 बाल-साहित्यक पुस्तकक उल्लेख हुनकर साहित्य-साधनाक व्यापकता प्रमाणित करैत अछि। एतबे नहि, अखन तक हुनकर 135 सँ अधिक पोथी प्रकाशित भऽ चुकल छैन, जे अपने-आपमे एक विलक्षण सर्जनात्मक उपलब्धि थिक। हुनकर पोथीसभ प्रायः पल्लवी प्रकाशन, निर्मली, सुपौलसँ प्रकाशित होइत रहल छैन, जइसँ हुनकर लेखनक सतत प्रकाशन-परम्परा सेहो स्पष्ट होइत अछि। जगदीश प्रसाद मण्डलक साहित्यिक अवदानकेँ समय-समयपर अनेक महत्वपूर्ण पुरस्कार आ सम्मानसँ मान्यता भेटल अछि। हुनका विदेह सम्मान- 2011, वैदेह सम्मान- 2012, कौशिकी साहित्य सम्मान- 2015, वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’ सम्मान- 2016, कौमुदी सम्मान- 2017, यात्री चेतना पुरस्कार- 2017, स्व. बाबू साहेव चौधरी सम्मान-2018, राजकमल चौधरी साहित्य सम्मान- 2020, अमर शहीद रामफल मंडल राष्ट्रीय पुरस्कार- 2022, यात्री सम्मान- 2022, मिथिला शिखर सम्मान- 2022 आ महाकवि पण्डित लालदास साहित्य गौरव सम्मान- 2023 प्रदान कएल गेल अछि। एकर अतिरिक्त, ‘गामक जिनगी’ कथा संग्रह टैगोर साहित्य पुरस्कारसँ 2011 इस्वीमे अलंकृत भेल आ ‘पंगु’ उपन्यास साहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ 2021 इस्वीमे सम्मानित भेल। ऐ सम्मानसभसँ स्पष्ट अछि जे हुनकर लेखन केवल संख्याक दृष्टिसँ नहि, बल्कि गुण, प्रभाव, वैचारिक गहराइ आ साहित्यिक मान्यताक स्तरपर सेहो विशिष्ट अछि। हुनकर लेखन परिश्रम, अनुशासन आ वैचारिक सजगताक संग रचनात्मक निरन्तरताक दीर्घ साधनापर आधारित अछि। मैथिली साहित्यमे मण्डलजीक नियमित, अविराम आ बहुविध लेखन बहुतो विद्वानकेँ सदिखन सोचबाक, पुनर्मूल्यांकन करबाक आ समकालीन साहित्यिक मानदण्डसभपर पुनर्विचार करबाक लेल विवश करैत अछि। वर्तमानमे ओ ‘संस्कार’ नामक पोथीक लेखनमे संलग्न छैथ, जे ऐ तथ्यक प्रमाण अछि जे हुनकर सर्जनात्मक प्रवाह अखनौं अविराम रूपेँ सक्रिय छैन। मण्डलजीक साहित्यक विशिष्टताकेँ स्पष्ट करबामे मैथिली साहित्यक वरेण्य आलोचकसभक मत अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्ध होइत अछि, किएक तँ ऐ मतसभक माध्यमसँ हुनकर रचनाशीलताक बहुआयामी स्वरूप उद्घाटित होइत अछि। किछु आलोचक हुनका ग्रामीण जीवनक सूक्ष्म चित्रकारक रूपमे देखै छैथ, कारण ओ गामक बाह्य दृश्यकेँ मात्र नहि, बल्कि ओकर भीतरी स्पन्दन, श्रम-संस्कृति, सम्बन्धक ऊष्मा, अभावक पीड़ा, लोक-व्यवहारक सहजता आ जीवन-संघर्षक यथार्थकेँ अत्यन्त आत्मीयता आ सजीवतासँ रूपायित करै छैथ। दोसर दिस, अनेक समीक्षकसभक मत अछि जे हुनकर लेखनमे परम्परागत आजीविकाक गौरव, लोक-समाजक स्वाभिमान आ सामाजिक वास्तविकताक स्वाभाविक चित्रण विशेष रूपेँ दृष्टिगोचर होइत अछि। ओ किसान, मजदूर, वंचित, घरेलू स्त्री, बुजुर्ग, युवाक संग लोक-रीति आ ग्राम्य संस्कार सभकेँ एहेन संवेदनात्मक गहराइसँ उपस्थित करै छैथ जे पाठककेँ मिथिलाक जीवन-संसार अपन समग्रतामे सामने उपस्थित बुझि पड़ैत अछि। कियो हुनका मिथिलाक माटि आ जीवन-सत्त्वक सशक्त स्वर कहने छैथ, तँ कियो हुनकर साहित्यकेँ स्वातंत्र्योत्तर भारतमे एक समानान्तर लोक-संसारक सर्जना कहि अभिहित केने छैथ। एहि प्रकारक अभिमत केवल प्रशंसात्मक टिप्पणी भरि नहि अछि, बल्कि ई बातक प्रमाण अछि जे मण्डलजीक रचना-संसार लोकजीवनक साधारण अनुभवसभकेँ गम्भीर साहित्यिक गरिमा प्रदान करैत अछि। ऐ समालोचनात्मक मतसभसँ ई सुस्पष्ट होइत अछि जे मण्डलजी अपन गामकेँ अवश्य केन्द्रमे रखै छैथ, मुदा हुनकर दृष्टि कोनो सीमित आंचलिक परिधिमे आबद्ध नहि रहैत अछि। गाम हुनका लग केवल भौगोलिक स्थल नहि, बल्कि समाजकेँ बुझबाक मूल आधार अछि। ओहि आधारपर ठाढ़ भऽ कऽ ओ वर्ग, श्रम, असमानता, मानवीय मर्यादा, लोक-संस्कृति, सामुदायिक सम्बन्ध आ बदलैत सामाजिक मूल्यसभपर गम्भीर चिन्तन प्रस्तुत करै छैथ। एही कारण हुनकर साहित्य आंचलिकता सँ जन्म लैत अछि, मुदा ओकर अर्थ, सरोकार आ प्रभाव व्यापक सामाजिक धरातलपर सक्रिय भऽ उठैत अछि। ऐ व्यापक रचना-संसारमे पयस्विनी एक विशेष महत्त्वपूर्ण कृति थिक। ई पोथी मैथिलीमे papers, essays and criticism केर संग्रह रूपमे पल्लवी प्रकाशन, निर्मली (सुपौल) सँ प्रकाशित अछि। एकर पहिल संस्करण 2021 इस्वीमे आ दोसर संस्करण 2023 इस्वीमे प्रकाशित भेल अछि। शीर्षक पृष्ठ आ अनुक्रमसँ स्पष्ट होइत अछि जे ऐ पोथीमे दार्शनिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, साहित्यिक आ संवादात्मक प्रकृतिक बहुविध सामग्री समाहित अछि। ‘अवतारवाद’, ‘संस्कार आ संस्कार गीत’, ‘वर्चस्ववादी संस्कृति बनाम हाशियाक समाजक संघर्ष’, ‘अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन’, ‘सगर राति दीप जरय’क 100म कथागोष्ठीक मादे, ‘वेब प्रोग्राम’, ‘भाय राजनन्दन लाल दासजीक जीवन यात्रा’, विभिन्न प्रश्नक जवाब आ दू गोट परिसंवाद ऐ संग्रहक सामग्रीगत विस्तारकेँ प्रमाणित करैत अछि। पयस्विनीक पहिल लेख ‘अवतारवाद’ मण्डलजीक तर्कशील चेतनाक एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण थिक। एतए लेखक धार्मिक अवधारणाकेँ प्रश्नक कसौटीपर परखै छैथ। अवतारवादक ऐतिहासिक विकास, शास्त्रीय सन्दर्भ, मिथकीय संरचना आ मानवीय विवेकक सम्बन्धमे ओ गम्भीर प्रश्न उपस्थित करै छैथ। विचारक केन्द्र मनुष्यक चेतना, तर्क आ आत्मनिर्भर नैतिक दृष्टिपर रहैत अछि। ई लेख मण्डलजीक व्यक्तित्वक तर्कनिष्ठ, निर्भीक आ वैचारिक रूपकेँ उजागर करैत अछि। ओ परम्परागत मान्यताकेँ केवल श्रद्धा, आदर आ भावात्मक स्वीकृतिक आधारपर ज्यों-के-त्यों स्वीकार कऽ लेल जाए, एकरा उचित नहि मानै छैथ। ओ प्रश्नक माध्यमसँ विवेक-जागरणक भूमिका निभबै छैथ। ‘संस्कार आ संस्कार गीत’ मण्डलजीक सांस्कृतिक दृष्टिक समान रूपेँ महत्त्वपूर्ण पाठ थिक। ऐ लेखमे मिथिलाक संस्कार-परम्परा, लोकगीतक संरचना, स्त्रीक भागीदारी, मौखिक परम्परा, जातिगत विभाजन, लोकधरोहर, देवी-पूजा, लोकभाषिक परिवर्तनीयता आ सांस्कृतिक इतिहास-बोधक अनेक स्तरक विश्लेषण भेटैत अछि। मण्डलजी एतए परम्पराकेँ निष्क्रिय रूपमे ग्रहण नहि करै छैथ। ओ एकर सामाजिक निर्माण, ऐतिहासिक कारण आ व्यवहारिक रूपपर विचार करै छैथ। ऐ लेखसँ स्पष्ट होइत अछि जे लोक-संस्कृति हुनका लेल संग्रहालयक वस्तु नहि, बल्कि जीवित समाजक चलैत-फिरैत अनुभवक क्षेत्र थिक। ‘वर्चस्ववादी संस्कृति बनाम हाशियाक समाजक संघर्ष’ मण्डलजीक सामाजिक पक्षधरताकेँ स्पष्ट रूपेँ सामने अनैत अछि। ऐ पाठमे भाषा, साहित्य, संस्कृति, सत्ता, शोषण, सामाजिक विभाजन आ उपेक्षित समाजक प्रश्नकेँ ओ एकहि विमर्श-फलकपर आनै छैथ। एतए हुनकर दृष्टि समाजक बहुसंख्य छुटल हिस्साकेँ केन्द्रमे अनबाक प्रयत्न करैत अछि। प्रश्नोत्तरक एक अंशमे सेहो ओ कहै छैथ जे साहित्य समाजक दर्पण अछि आ अपन रचनामे हुनकर लगातार कोशिश रहै छैन जे छुटल समाजकेँ पकैड़ सृजन कएल जाए। ई कथन पयस्विनीक सामाजिक आशयकेँ बुझबाक लेल केन्द्रीय महत्त्व रखैत अछि। पयस्विनीक एकटा विशिष्ट पक्ष एकर संवादात्मक संरचना सेहो अछि। गजेन्द्र ठाकुरजी, मुन्नाजी आ मुकेश दत्तजीक प्रश्नक जवाब तथा दू गोट परिसंवाद एकरा स्थिर निबन्ध-संकलनसँ आगाँ लऽ जाइत अछि। एतए लेखक अपन साहित्य-दृष्टि, जीवन-बोध, लेखन-प्रेरणा, सामाजिक चिन्ता आ भाषा-सम्बन्धी विचारसभ खुलि कऽ रखै छैथ। एहेन सामग्री आलोचनात्मक अध्ययनक लेल असाधारण महत्त्व रखैत अछि, किएक तँ ऐ माध्यमसँ लेखकक आत्मदृष्टि प्रत्यक्ष रूपमे उपलब्ध होइत अछि। ऐ रूपमे पयस्विनी रचनाकारक भीतरक वैचारिक चालि, सामाजिक प्रतिबद्धता आ संवाद-धर्मिताकेँ बुझबाक आधार-पुस्तक बनि जाइत अछि। जीवनवृत्तमे उल्लिखित मण्डलजीक साहित्य-दर्शन पयस्विनीक मर्मक संग गहींर सम्बन्ध रखैत अछि। “लेखन प्रदर्शन नहि, प्रतिबद्धताक अनुशासित साधना छी”, “हम ओइ लोक लेल लिखै छी जे जीबि रहल छैथ, मुदा बाजि नहि सकैत”, “साहित्यक उद्देश्य मौन पीड़ाकेँ स्वर देब अछि”, आ “मैथिली साहित्य जन-संवादक सजग दस्तावेज बनए” जकाँ कथन हुनकर समग्र सृजन-दृष्टिक सघन रूप प्रस्तुत करैत अछि। पयस्विनीक पाठ केलाक बाद स्पष्टत: बुझि पड़ैत अछि जे ऐ कृतिमे विचार, समाज, संस्कृति आ संवाद चारू तत्त्व ऐ साहित्य-दर्शनक अधीन संयोजित भेल अछि। तर्क एतए लोकसँ जुड़ल अछि। संस्कृति समाजक भीतर सक्रिय अछि। संवाद लेखकक सार्वजनिक आ आत्मीय दायित्वक रूपमे उपस्थित अछि। ऐ कारण पयस्विनीपर पृथक आलोचनात्मक अध्ययनक आवश्यकता स्वाभाविक रूपेँ सामने अबैत अछि। मण्डलजीपर सामान्यतः कथा, उपन्यास आ ग्राम्य यथार्थक प्रसंग अधिक चर्चामे रहल अछि। हुनकर वैचारिक गद्य, सांस्कृतिक विवेक, सार्वजनिक बौद्धिकता आ प्रश्नोत्तर-आधारित आत्मव्याख्याक समेकित परीक्षण अपेक्षित रहल अछि। पयस्विनी ऐ चारू पक्षकेँ एकहि ठाम उपस्थित करैत अछि। तइ कारण एकरा केन्द्रमे राखि लिखल जाइबला पुस्तक मण्डलजीक समग्र रचनाधर्मिताकेँ बुझबाक लेल विशेष उपयोगी सिद्ध होएत। प्रस्तुत पुस्तकक विशेषता ऐ बातमे निहित अछि जे ई पयस्विनीक केवल सार-संक्षेप वा सामान्य परिचय प्रस्तुत नहि करैत अछि, बल्कि ऐ पोथीक भीतरी वैचारिक संरचना, सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक पक्षधरता, संवादधर्मिता, रचना-शिल्प आ मण्डलजीक समग्र रचनाधर्मितासँ एकर अन्तर्सम्बन्धकेँ एकत्र रूपेँ उद्घाटित करब अछि। एतए पयस्विनीकेँ मण्डलजीक स्वतंत्र गद्य-पोथी मात्र नहि, हुनकर चिन्तनक संगठित दस्तावेज रूपमे पढ़ल गेल अछि। ऐ दृष्टिसँ ई अध्ययन मण्डलजीक वैचारिक गद्यक सम्यक् मूल्यांकनक दिशामे एक आरम्भिक, किन्तु आवश्यक योगदान प्रस्तुत करैत अछि। प्रस्तुत पुस्तक पयस्विनी विमर्श ऐ आवश्यकताकेँ ध्यानमे राखि तैयार कएल जा रहल अछि। एकर उद्देश्य पयस्विनीक स्वरूप, अन्तर्वस्तु, विचार-प्रवृत्ति, सांस्कृतिक धरातल, सामाजिक पक्षधरता, संवाद-धर्मिता, भाषा-शैली, तर्क-पद्धति आ मण्डलजीक समग्र कृतित्वमे एकर स्थानक परीक्षण करब अछि। ऐ भूमिकामे मण्डलजीक व्यक्तित्व आ कृतित्वक चर्चा ऐ कारण विस्तारसँ कएल गेल अछि जे लेखकक जीवन-दृष्टि बुझने बिना ऐ पोथीक अन्तरस्वर पूर्ण रूपेँ पकड़ब कठिन होइत अछि। जे लेखक अपन जीवनमे श्रम, अनुशासन, लोकानुभव, सामाजिक न्याय आ जन-संवादकेँ केन्द्रमे रखै छैथ, हुनकर गद्यक प्रकृति सेहो ओहिना होइत अछि। पयस्विनी अही सुसम्बद्ध जीवन-दृष्टिक साहित्यिक परिणति थिक। ऐ अध्ययनमे मुख्यतः पाठ-विश्लेषणात्मक, व्याख्यात्मक, सन्दर्भपरक आ आलोचनात्मक पद्धतिक उपयोग कएल गेल अछि। पयस्विनीक भीतर संकलित लेख, प्रश्नोत्तर, परिसंवाद आ सार्वजनिक टिप्पणीक निकट पाठक आधारपर एकर वैचारिक, सांस्कृतिक, सामाजिक आ शैलीगत स्वरूपक परीक्षण कएल गेल अछि। जइ ठाम आवश्यक बुझल गेल अछि, ओतए मण्डलजीक जीवन-दृष्टि, कृतित्व आ लोकसम्बद्ध साहित्यिक भूमिकाकेँ सहायक पृष्ठभूमि रूपेँ ग्रहण कएल गेल अछि। ऐ पद्धतिक माध्यमसँ पुस्तककेँ केवल सामग्री-संग्रह रूपमे नहि, एक संगठित वैचारिक गद्य-पाठ रूपमे बुझबाक प्रयास कएल गेल अछि। समकालीन मैथिली आलोचना-साहित्यक सन्दर्भमे पयस्विनीक अध्ययन विशेष महत्त्व रखैत अछि। आजुक समयमे जखन भाषा, लोक-संस्कृति, सामाजिक प्रतिनिधित्व, सार्वजनिक बौद्धिकता आ साहित्यक जनपक्षधर भूमिकापर नब सिरासँ विचार भऽ रहल अछि, तखन एहेन पोथीक आलोचनात्मक पुनर्पाठ आवश्यक भऽ जाइत अछि। पयस्विनी एहेन कृति थिक जइमे विचार, समाज, संस्कृति, प्रतिरोध, लोक-चेतना आ संवाद एक-दोसरासँ जुड़ल रूपमे सामने अबैत अछि। तइ कारण प्रस्तुत अध्ययन केवल एक पुस्तकक समीक्षा नहि, बल्कि आधुनिक मैथिली वैचारिक गद्य, लोकधर्मी साहित्य-दृष्टि आ सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्शक एक महत्त्वपूर्ण पाठक दिशामे उठाओल गेल एक गम्भीर डेग मानल जा सकैत अछि। आगाँक प्रकरणसभमे पयस्विनीक बहुआयामी स्वरूप क्रमशः विश्लेषित कएल गेल अछि। पहिल अध्यायमे एकर स्वरूप, रचना-प्रसंग आ विधागत संरचनापर विचार भेल अछि। तदनन्तर दार्शनिक प्रश्न आ तर्कशील दृष्टि, संस्कृति, संस्कार आ लोक-चेतना, हाशियाक समाज, वर्चस्व-विमर्श आ सामाजिक प्रतिरोध, तथा साहित्यिक-सांस्कृतिक सक्रियता आ सार्वजनिक लेखनक विवेचन प्रस्तुत कएल गेल अछि। ऐ क्रममे प्रश्नोत्तर आ परिसंवादमे उद्घाटित मण्डलजीक व्यक्तित्वक चर्चा कएल अछि, तेकर बाद पयस्विनीक आलोकमे मण्डलजीक वैचारिक व्यक्तित्व पृथक रूपेँ सेहो स्पष्ट कएल अछि। आगाँ पयस्विनीक भाषा, शैली, तर्क-पद्धति आ गद्य-सौष्ठवक विश्लेषण भेल अछि, तेकर उपरान्त पयस्विनीक रचना-शिल्प, विन्यास आ अभिव्यक्ति-कौशलपर विचार कएल अछि। अन्तिम अध्यायमे मण्डलजीक समग्र रचनाधर्मितामे पयस्विनीक स्थान निर्धारित कएल आ उपसंहारमे समूचा अध्ययन समेटल अछि। आशा अछि जे प्रस्तुत पोथी मण्डलजीक वैचारिक गद्यक महत्त्वकेँ अधिक सुस्पष्ट करत आ मैथिली आलोचना-परम्परामे एक उपयोगी योगदान सिद्ध होएत। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.५.१. प्रीति कुमारी- शेष जीवन केर नायक : एक चरित्र चित्रण २.नशामुक्ति अभियान प्रीति कुमारी १. शेष जीवन केर नायक : एक चरित्र चित्रण २.नशामुक्ति अभियान १ शेष जीवन केर नायक : एक चरित्र चित्रण
सन् २०१५ ई०मे ठुठ गाछ मैथिलीक सामाजिक आंचलिक उपन्यास पुरस्कृत साहित्यकार श्री जगदीश प्रसाद मंडल जीके बहुचर्चित कृति थिकैन। ताहिक ५म् बेर संस्करण बहरेला पर एहि बेर ई- पुस्तक पर सेहो देल गेल छल। ताहिके राजभाषा हिंदीमे अनुवाद काज करैत समालोचक श्री लाल देब कामत जी "शेष जीवन" नामे पल्लवी प्रकाशन निर्मली सँ पोथी २०२६ मे छपौलनि अछि। एहि पोथीक नहरिया (लौकही) मछहट्टामे हालहिमे लोकार्पण कार्यक्रम ' सगर राति दीप जरय' कथा गोष्ठी'क एक शुभ साँझ भेल रहय। ओहि पोथीकेँ मनोयोग सँ पढ़ैत काल अपन बाबूजीक' जीवन यात्रा साहित्य सृजन मादे संग-सँग चलैत आभाकेँ छेकने चलि गेल से बुझाएल । दीर्घकथा पढ़ैत घरी हुनकामे प्रो० रामकृष्ण बाबू मोनमे बूझाए लागल रहय। ताहि रामकृष्ण बाबुके एहि उपन्यासक असाधारण व्यक्तित्व महा नायक रूपेँ चर्चा करबाक धृष्टता कए रहल छी। ओना हमरा दादा जीक पैघ भायके नाओं सेहो छलन्हि राम कृष्ण कामति। एहि पवित्र नाममे द्वन्द समास छै,यथा -: राम आओर कृष्ण! सुधी पाठक जनकेँ प्रो० रामकृष्ण बाबू मिथिला 'क गामे - गाम परोक्ष रूपेँ देखाए पड़तनि। पहिल तँ ई कथानक कोसी- भुतही,कमला वाढि प्रवण क्षेत्रक एक जमिन्दार पलिबार सँ अछि,जिनक जीवनमे भोगल अनुभव सँ महिमा मण्डित भेल छैक। मूल पोथीक भावानुवादमे दक्ष श्री कामत जीके प्रशंसा हुनक सरौती हाईस्कूलके हिन्दी शिक्षक आ +२ जवाहर उँच्च विद्यालय - मधेपुर सँ सेवा निवृत्त श्री राजेन्द्र बाबू कयलन्हि अछि। एहि भाषान्तर काजक चर्चा वरेण्य साहित्यकार श्री गजेन्द्र ठाकुर जी अपन एक अंग्रेजी ई- पोथीमे विस्तार सँ कयलनि अछि। अनुवाद कार्य रंगशाला कऽ हरिवंश राय बच्चन जी चर्चित रचनाकार भेल रहथि। आब ठूठ गाछक अंग्रेजी, नेपाली, संस्कृत आ मराठी भाषामे सम्पर्क भाषा हिन्दीक अस्तित्वमे अएलापर साहित्यक वैश्विक क्षेत्रमे प्रसार होमय जा रहलैक अछि। सम्पर्क भाषा रूपेँ हिंदी'क माध्यम सँ अनेक क्षेत्रीय भाषा ओ भारतीय संविधानके अष्टम् सूचिमे मिझहर सबुटा भाषामे होय तँ कोनू आश्चर्यक गप्प नहिं। हम मुख्य विषय पर अबैत छी । रामकृष्ण बाबू पात्रके चरित्र - चित्रण पढ़ि एक तरहक सम्पूर्ण पोथीक सारांश - संक्षेपण रुपेँ पटल पर आबि जाईछ। तेँ रामकृष्ण बाबूक संग एकमात्र स्त्री पात्र हुनकर पत्नी सुभद्रा, साहित्यकार धीरेन्द्र, फेरीवाला सिनुरिया उर्फ श्याम सुंदर, अच्छेलाल,फोचांई दास आ राधाचरण के अंतरंग चर्चा कथोपकथन भाव जीवन्तता पूर्वक छन्हि। एतय भारत गामक देश छी आ ग्रामीण क्षेत्रक सामाजिक वातावरणके सुस्पष्ट झलक देखल गेल छैक।पड़ोसक दक्षिण टोला - कृष्णपुर गामक बैसारीमे आयोजन बढ़ आकर्षक बुझाइए। परोक्ष रुपेँ संस्कृत आचार्य, वैज्ञानिक आ आईपीएस अधिकारीक गीता भाष्य छैठिक महिमा आ मनलगू प्रवचन सुनि ग्रामवासी गदगद भ' उठैत छै ,संगहि सब साल आयोजन करबाक लेल संकल्पित सेहो भेला सँ सुखद अनुभूति होय छैक। सबसँ अद्भुत बात जे स्वत: अभिप्रेरणा जगला सँ नवयुवक वर्गमे साहित्यक चेतनाके संचारक प्रमाण थीक जे नवांकुर सब अपन रचना मंच सँ आरम्भेमे वाचन करैत गेलैक। तहन प्रोफेसर साहेब गीता सँ आरम्भ करैत रामायणक सीता हरणके उपर प्रवचन कयलाह । उपन्यासमे संयुक्त परिवारके कर्ता-धर्ता प्रो० रामकृष्ण बाबू केँ एक जिम्मेवार नागरिक रूपेँ स्थापित कयल गलैक अछि। उपन्यासमे कथा आरंभ गोधुली बेला गहिंर होइत अन्हार आ ठूठ गाछक झलफलाइत दृश्य सँ होईत छैक। जे ई प्रतीक वृद्ध रामकृष्ण बाबू'क जीवन सं गहिंरगर धरि जुटल छै। हुनक देह अखनो सक्रिय छन्हि आ चेतना सतर्क रहै छन्हि। एतय पत्रहिन गाछ मृत्युक संकेत नहिं दैत छैक; ई ओहि जीवन दिस इशारा करैत छै जे एखनो बाँचि गेल छै। सन् १९२५ सँ शुरुह भेल रामकृष्ण बाबूक' जीवन स्वाधीनता अण्डोलन ,जिमिदारी व्यवस्था , भूमि संघर्ष आ स्वतंत्र भारतक सामाजिक विडम्बना'क बीच अकार लैत छैक। मूल उपन्यासकार श्री जगदीश प्रसाद मंडल जीके अपन व्यक्तिगत जीवनकेँ इतिहासक व्यापक धाराक भीतर स्थापित करैत छथिन। से रहस्य भाषान्तरकर्त्ता श्री लाल देब कामत जी हू ब हू लोकोक्ति सहित बाँकी जीवन : अनुभव, जिम्मेदारी आ अर्थके खोजकेँ रहलन्हि अछि। इयह अन्तर मशीनी आधुनिक अनुवाद आ भावानुवादमे बिकछाके रहैछ जे मूल कथानक केर आत्मा थिकैक। ई कथा ग्रामीण भारतके सामुहिक यात्रा सँ कम नहिं,एक व्यक्तिके विषयमे कम अवश्य होय छै। भारतके किसान आ गाम आधारित रुपमेँ चित्रित करनाई ,लेखक स्थापित करैत छै जे गामक अपेक्षा राष्ट्रकेँ भीतर सँ क्षीण करैत छै। रामकृष्ण बाबूक जीवनमे कहियो अलग नहिं होईछ। परिवारिक विघटन बढ़ जल्दिये समक्ष उपस्थित होइत छै। चारिठाम भैयारी भू- बँटवारा ,सम्पैत केर क्षरण आ बाबूजीक निधन एक एहन परिघटना होय छै ,जाहि सँ रामकृष्ण बाबू समय सँ किछ पहिनहि सँ दायित्व निमाहैय बाला बनि जाईछ। सम्पूर्ण परीवारिक भार कान्हपर आ साझी परिबारक जिम्मा सँ ओ विद्रोह नहिं वर्णी परिस्थिति सँ गुजरैत रहलथि। शिक्षा हुनक आत्म विकासक साधन आ माध्यम बनैत छै। ओ कोसी पिड़ित क्षेत्रमे हाईस्कूलक अध्यापक बनि बहिनक बियाह कय आ विधबा मायके नैतिक रूपेँ सेवार्थी बनल रहैत छथि। जीवनक आजिबकामे अपनाकेँ परीक्षा लैत खड़ा उतरलाह अछि। एम. ए. करबाक इच्छा पहिनहुँ सँ आबि रहल छलन्हि,मुदा ताहि लेल परिवारिक समस्या नजैर पर सँ नहिं हटैन। मोनमे हरदम घरकेने रहै से स्वतंत्र रूपेँ मधुबनी आर के कालेज सँ अंग्रेजी विषयमे स्नातकोत्तर भेलाह। पण्डौल कालेजमे पढबैत व्याख्याता सँ रीडर आ वादमे प्रोफेसर बनिये गेलाह। मोन मजगूत राखि ठोस संकल्पके सँग ओ अनुशासित रूपेँ आगू बढ़ैत भाय बहिनके शिक्षित करैत सब निमरजाना धरि करयमे समर्थ भेलाह। मायक परिचर्या अपने दूनू प्राणी करयमे पाछु नहिं हटलाह। श्रवण कुमारके जेकां उदाहरण मैथिल समाज लेल मिथिलांचलमे प्रोफेसर साहबके कर्म छन्हि। समय रूटिनके ततेक ने पकिया रहथि जे पुस्तकालयमे बेसी समय बितैन। गहन अध्ययन केर चलते समाज सँ कटल बुझाय। बालपने सँ साज -बाज आ संगीत विरासतमे रहनि। एसकरोमे हरमुनियाँ नितह बजबथि। कविता, गीत ,डायरी सदा संगीतमय भऽ प्रवाहित होइत रहलनि। अपन मोलिक कथा रचना संग्रह प्रकाशित धरि करौलनि। पोथी बण्डल बस सँ आनि पत्नी केँ देखबैत बजैत छथि ई हमर जीवनके अनुपम उपलव्धि छी। मुदा पोथी बिकैत नहिं रहने आ समाज सँ सराहना नहीं भेटने दुखी भ' जाई छथि। चौथापन वयक्रममे सेवानिवृत्त पछाति अनुवाद विधा आ पोथी समीक्षा दिस प्रवृति बढ़लनि अछि। ठूठ गाछ जेकाँ एक निराश भावमे पड़ैत छथि आ पौत्र लग मिथिलांचल सँ बाहर सात समुंदर पार रहैत जिनगिक आखरी शाँस घीच रहल छथि। कारण तीनू बेटा पूतौह तीन शहरमे चाकरी करैत छन्हि। से तीनू भिन्न- भिनौज भेल छन्हि,तेँ पत्नी केँ कहलथिन हम ककरो लग नहिं जायब। ओहि संदर्भमे सुभद्रा सँ मतभिन्नता होय छन्हि। सोचैत छथि आब जयेह शेष जीवन बाँचल अछि से आरो बेसी मूल्यवान अछि। पोथी मुल्य २९९ टाका पृष्ठ सं०-१२४ आई एस बी एन ९७८-९३-४८८६५-०६-९ २ नशामुक्ति अभियान
मिथिला प्रक्षेत्रमे भांग ,गांजा ,चरस आ हफीम केर लत युवापिढ़िमे लगला सँ नशेरीक संख्याँ बढि गेल रहय। प्राय: गामक चौक- चौराहा पर नीक लोक विशेष कय सभ्य नारी वर्गमे एक तरहक दहशत बनल रहैत छल। संध्या कालके वाद अबरजात बंद राखि लोक परहेज भ' जाई। ओहि संत्रास सँ बचय लेल नीतीश सरकारमे अनेकों संस्था - समिति राज्य आ केन्द्रीय मंत्री केँ समस्या समाधान लेल गुहार लगाबय। ताहि क्रममे निवंधित संगठन ' मिथिलांचल कोसी विकास समिति -हटनी सेहो पत्राचार कय विषय परिस्थिति सँ छुटकारा लेल यथेष्ट परियास कयने रहैक। पर्चा- नोटीश आ बैनरके माध्यम सँ कतेको जिला जबारके जत्थामे यात्रा कयल। नशाबाज पुरूख सँ पिड़ित महिलाक' टोली मुख्यमंत्री जनता दरबार धरि अपन दुखड़ा सुनाबय पटना पहुँचल रहय। बिहार सरकार संज्ञान लैत पैघ मानव श्रृंखला बनाकय जनजागृति आनलनि आ शरावबंदीक घोषणा कयलन्हि। शराबक दुष्प्रभाव पर (WHO) विश्व स्वास्थ्य संगठनक रिपोर्ट -: शराबक दुष्प्रभावक लेल पूरा विश्व चिंतित अछि। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO)क' नव रिपोर्ट (ग्लोब स्टेटस रिपोर्ट ऑन अल्कोहल एण्ड हेल्थ 2018) मे शराबक दुष्परिणामक विस्तृत आंकड़ा देल गेल अछि। आ बिहार, राज्य सरकार समाजकें शराबक कुप्रभाव सँ त्राण दिएवय लेल ऐ अभियान चलय पर बल देने अछि। सन् 2016 मे शराबक कारण विश्वभरिमे 30 लाख लोकक मृत्यु भेल अछि, जे विश्वमे कुल मृत्यु दरक 5.3 प्रतिशत अछि। शराबक सेवनक कारण युवा वर्गमे मृत्यु दर बूढ़ लोकक अपेक्षा काफी अधिक अछि आ 20 सँ 39 आयु वर्गक लोकमे 13.5 प्रतिशत लोकक मृत्यु जहर ओ मिलाबट शराबक कारण सँ होइत अछि। शराबक कारण मृत्यु TB, HIV/AIDS, Diabetes (मधुमेह) चिनीरोग सँ होबय वला मृत्यु सँ अधिक अछि, जे चिन्ताक विषय छी। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO)क' रिपोर्टक अनुसारे शराब लगभग 200 बीमारीकें बढ़ावा दैत अछि। शराबक सेवन सँ कैंसर, एड्स, हेपेटाइटिस, टी.बी (यक्ष्मा) , लीवर एवं दिलक बेमारी, मानसिक बेमारी, माय(जच्चा) -शिशु सँ संबंधित बेमारीक सङ्ग-सङ्ग हिंसक प्रवृत्तिकेँ सेहो बढ़ावा दैत अछि। आ महिलाक सङ्ग हिंसामे एकर अहम भूमिका अछि। आत्महत्याक कुल मामलाक 18 प्रतिशत, आपसी झगड़ाक 18 प्रतिशत, सड़क दुर्घटनाक 27 प्रतिशत आ मिर्गीक 13 प्रतिशत मामला मिलावटी शराबक बेसी सेवनक कारणेँ होइत अछि। लीवरक गंभीर बेमारी ; लीवर सिरोसिसक कुल मामिलाक 48 प्रतिशत, (Mouth Cancer)क' कुल ममिलाक 26 प्रतिशत, पैंक्रियाजक गंभीर बेमारी Pancreatitis (पेंक्रियाजक सूजन)क 26 प्रतिशत, ...टीबीक २० प्रतिशत, पैघ आंतक कैंसरक ११ प्रतिशत, ब्रेस्ट कैंसरक ५ प्रतिशत आ हाइपरटेंसिव हार्ट डिजीजक ७ प्रतिशत मामला शराब सेवनक कारणेँ होइत छैक। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी हरदम शराबक विरोध केलनि। गांधी जी कहने छलाह जे- शराब लोक सँ नै सिर्फ ओकर पइसा छीन लैत छैक, बल्कि ओकर बुद्धि सेहो हैर लैत छैक। शराब पीबय बला इंसान हैवान भ' जाइत छैक। जदि हमरा एक घंटाक लेल भारतक तानाशाह बनाओल जाय तँ हम सभसँ पहिने शराबक सभ दोकानकेँ बिना क्षतिपूर्ति पहुँचाबैत बंद करा देब। गांधी जी द्वारा बताओल गेल सात सामाजिक पापकर्म-: सिद्धान्त बिना राजनीति काज बिना धन विवेक बिना सुख चरित्र बिना ज्ञान नैतिकता बिना व्यापार मानवता बिना विज्ञान त्याग बिना पूजा' अछि। बहुतो राज्य सरकार अपन राजस्व बढ़बय लेल शराब बिक्री पर रोक नहिं लगा सकल य। मुदा जननायक कर्पूरी ठाकुर जी केर अनुयाई श्री नीतीश कुमार जी मुख्यमंत्रीके हैसियत सँ बिहारमे शराबबंदी धरि लागू कयने छथि। एकटा महशे गाम केवट बाहुल्य बस्ती छैक, जतय सँ वेदव्यास चेतना समिति बिहार क' माध्यम संदेश प्रसारित कयल गेलैक अछि जे युवा वर्ग नशाके शिकार होइत जा रहल अछि। सब गामक लोक बैसार कय दस-दस अभियानी बनि सूचना संचार करी आ नव जुवकमे मादक द्रव्यके सेवन नहिं हुअय, लागल आदैत सेहो छोड़ेबाक काज होय। एहि सँ गाममे आई ए एस.आओर आई पी एस. हाकिम बनत। पढि- लिखि बेरोजगारीमे दिशाहीन भऽ किछ युवामे शराबक हिस्सक लागला सँ गाँव अशान्त भ' जाईछ। खुशीके बात ओहि गाममे नव सुधारवादी डेग ऊठौला सँ हर स्तरके सरकारी नौकड़ीमे लोक लागल अछि। मेहशे अति पिछरल समाज धन्य छथि, प्रणम्य छथि ,समय सँ चेत गेलाथि अछि। स्व० तनुक लाल कामत जी आजादी सँ पूर्व आ देश स्वतंत्र भेलाक वाद गाम विकास लेल सदा चिन्तित रहैत जातीय महासभाक आयोजन कयने छलाह। मेहशे गाममे आब ममिला - मोकदमा नहिं लड़ैत छथि लोक। समझौता - सोलहनामा कय पुरान नालीश - फौदारी सब खतम कय पढाय - लिखाय पर जोर देलक अछि। गामक लाइब्रेरी लगके दोकानमे शिखर गुटका (तिरँगा ,बिमल आ राजनिवास ) रजनीगंधा दिठा दर्शन नहि बेचल जाईछ। नशामुक्ति देखि एक राजनीतिवाज ओतय आ हुलासपट्टी जागेश्वर स्थान लग रातिकेँ शराब सँ भरल गाड़ी उनटेने छल,जे पुलिस महकमाके तबाही उठि गेल रहय। लोक शराब शिशी लुइझ सरकुटमारे बिलैह आयल। मद्यनिषेध विभाग द्वारा जहन गाड़ी चालक आ औनर पर कसगर कारबाए होय ,तँ से करबाक खगौट छैक। जाहि सँ इलाका नशामुक्त बनल रहय। एक सर्वे अनुसारे १००० आवादी बाला गामक लोक बिड़ीक धुईयां आ तमाकूल थूकैमे सलाना ५ लाख टाका व्यय करैत छैक। जौं एतेक सामुहिक बेहरी कऽ छात्र कल्याणमे लगाओल जाय तँ गामक कायाकल्प भ' सकैत अछि। भारत वर्षक गुजरात प्रदेशमे सन् १९६० ई० सँ पूर्ण शराबबंदी छैक। बिहार प्रांतमे २०१६ ई० सँ पूर्ण प्रतिबंध लागल छै। नागालैंड ओ मिजोरम आ लक्षद्वीप मेँ घरेलू हिंसाके देखैत विशेष कय स्त्री सुरक्षित रहय ,ताहि लेल ड्राई स्टेटक श्रेणीमे राखल गेलैक । १५ अगस्त २०२० सँ सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय,भारत सरकार प्रथम: २७२ जिलामे नशा मुक्त भारत अभियान चलौलनि। एहि कार्यक्रम केँ विस्तार दैत उत्तर प्रदेश केर लखनऊ, इलाहाबाद, वाराणसी, गोरखपुर,मेरठ, मुरादाबाद, आओर आगरा क्षेत्रमे नशामुक्ति केंद्र चलाबैत 'आपरेशन प्रहार ' अपन रूतबामे रहल। बिहारके औरंगाबाद,गया , गोपालगंज, बैशाली आ पूर्व ओ पछिम चम्पारणमे गतिविधि करैत रहल। महाराष्ट्र शासन दिश सँ मुम्बई,पूणे, नागपुर, नासीक, जलगांव, अहमदनगर , गढ़चिरौली(चन्द्रपुर), ठाणे, शोलापुर आ कोल्हापुरमे विशेष फोकसके संग अभियान संचालित छैक। छत्तीसगढ़के गरियाबंद ओ पंजाबके नशामुक्ति अभियान आ हिरोईन जव्दी काज चरम पर रहल अछि। ऐ नेक काजमे लगधक तीन लाख शिक्षण संस्थान रोकथाममे हाथ बढेलक,जे स्तुत्य कार्य थीक। जे भेल नशाक शिकार ! बिगरल तकर घर पलिवार!! - प्रीति कुमारी, बी.ए., बीएड. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.६.प्रणव कुमार झा- अर्थ आवर प्रणव कुमार झा अर्थ आवर मनोहर भोरे नित्या क्रिया से निपैट चश्मा नाक पर टिका अखबारक पन्ना उलटबा मे तल्लीन छलाह। अखबारक पन्ना पलटईट हुनक नजर एकटा सरकारी विज्ञापन पर गेलइन। पोस्टकार्ड साइज के ओहि विज्ञापन मे 'अर्थ-आवर' लेल पैघ-पैघ अक्षर मे लोक सं अपील कएल गेल छल जे धरती के ऊर्जा सुरक्षा आ कार्बन प्रदूषण से बचबय लेल आ ऊर्जा सुरक्षा के चिंता पर एकजुटता देखाबय लेल आई राति 8.30 से 9.30 धरि सभटा बॉल बत्ती सब मिझा कऽ एकजुटता देखाउ। विज्ञप्ति पढ़ि मनोहर बाबू के ठोर पर एकटा 'चवनियाँ मुसकी' छिटकि गेलैन - ओ मुस्की, जे साधारणतः तखन उपजैत अछि, जखन बुद्धि आ यथार्थ एक-दोसर पर ठहाका मारैत अछि। ओ मोने मोन सोचय लगलाह - वाह रे दुनिया! हुनक मोन मे विचार विचरण करय लागल छल जे केना हुनक ऑफिस मे ऊर्जा के बरबादी लोक सभ करय छय। मार्च महिना मे 17-18 डिग्री पर एसी चलाबय जाय जाय छैक। लोक मौका पाबीते दैनिक जीवन मे ऊर्जाक गर्दा उड़बै जाय छै, आ एतय एक घंटा बत्ती मिझा कऽ धरतीक उद्धार कएल जा रहल अछि! ई सब विचार करैत मनोहर अखबार बंद कय स्नान-ध्यान करबा लेल चलि गेलाह। साँझ के मनोहर जखन ऑफिस से घर पहुंचय छैथ तऽ 8 वर्षक हरिप्रिया कहय छैक जे - पप्पा स्कूल से मैसेज आयल छैक आई राति 8.30 से 9.30 धरि सभटा बॉल बत्ती सब मिझा के अर्थ आवर मनेबाक छैक। 'ठीक।' मनोहर उत्तर मे बस एतबे जवाब देने छलाह। हरिप्रिया के जिज्ञासा मुदा शांत नई भेल छल। ओ फेर पूछि बैसलिह - पप्पा ई अर्थ आवर मनेला से की होइत छैक? एकरा मे लोक बॉल-बत्ती किएक मिझा दैत छैक? मनोहर उत्तर मे हरिप्रिया के दुलार करैत कहलाह - आबय बला समय मे दुनिया ऊर्जा संकट आ कार्बन उत्सर्जन के चलते होई बला प्रदूषण के खतरा से बांचल रहल ताहि लेल जागरूकता आ एकजुटता लेल ई अर्थ आवर मनायल जाइत छैक। पप्पा आई के राति बॉल-बत्ती बंद केने कोना के प्रदूषण कम भऽ जाय छैक से बताउ ने ? - हरिप्रिया फेर प्रश्न दागलिह। मनोहर - बाउ गे ऐ काज से कोनो प्रदूषण कम नै होबय बला छैक आ नै ऊर्जा बचत। ई तऽ बस ऐ चीज के लऽ कऽ दुनिया चिंता करय छैक ई देखेबाक एकटा सांकेतिक प्रयास भरि छैक। आबय बला समय मे जे ऊर्जाक संकट आ प्रदूषणक खतरा अछि, ओकरा लेल लोक केँ सजग कएल जाइत छैक। जा धरि दुनियांक वृहत्त समाज ऊर्जा के किफ़ायती उपयोग आ प्रदूषण नियंत्रण के अपन दैनिक जीवन के सभ्यता-संस्कृति मे नहीं उतारत, जा बड़का-बड़का कंपनी सभ ई चीज के लऽ कऽ अपन लोभ छोड़ि पहल नै करत, ता धरि ई सभ रीति-संस्कृति बस ढकोसला मात्र छैक । दुनियाँ कऽ रहल छैक तऽ हमहु अहाँ केने जाऊ! हाँ । तेहने ढकोसला ने जेना लोक नवरात्र मे कुमारी पूजन के ढकोसला करय अछि, कन्या के सर्वश्रेष्ठ सम्मान देबाक, आ पछाति ओकरा दोयम दर्जा के मानय अछि, बहुत घर समाज मे उपभोगक वस्तु मात्र। - ऐ बेर ई बातचीत मे बीच मे घुसैत माया बजलिह। प्रतिउत्तर मे मनोहर किछू नै बजलाह। ओ खिड़की सं बाहर झाँकय लगलाह। हुनक मोन आब दुनियाँक 'पावरफुल' देशक ओहि 4-5 टा सनकी बुढ़बा सभक कारनामा लग पहुँच गेल छल, जे अपन सनक आ कुंठाक पूर्ति लेल दुनिया केँ युद्धक आगि मे झोंकने अछि। ओ सोचय लगलाह जे एक दिस त दुनियाँ ऊर्जा आ पर्यावरण संकट के लऽ कऽ चिंता, सजगाता आ एकजुटता देखाबय लेल ई अर्थ आवर के रीति मना रहल अछि, आ दोसार दिस दुनियाँ के 4-5 टा सनकी बुढ़बा जेकरा येन-केन प्रकारेण अपन देश के शीर्षस्थ पद भेट गेल छैक, दुनियाँ के युद्ध के तबाही मे झौंक के पर्यावरण के दुर्गति केने छैक आ किछुए समय मे एत्तेक ऊर्जा बर्बाद कय देलक जाहि से कोनो छोट-मोट देश के कईएक वर्षक ऊर्जा आपूर्ति कैल जा सकय छल। आजूक समयक सभस पतित आ असली राक्षस यैह बुढ़वा सब छैक, जे सभ्यता के नाम पर विनाश के उत्सव मना रहल अछि। भगवान जे एकरा सभ के उठा लितथि त दुनियाँ के चैन भेटतैक! पप्पा की सोचय छी? - हरिप्रिया टोकलिह । किछू नै - चलु भोजन के तैयारी करी फेर अर्थ आवर सेहो मानेबाक छैक की ने - मनोहर ई कहईत किचन दिस विदा भेलाह जत्त माया भोजन पका रहल छलिह। - अर्थ आवर 28 मार्च 2026। -प्रणव कुमार झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.७.लाल देव कामत-१. उपराग केर निहितार्थ २.सगर राति दीप जरय कथा गोष्ठी १२४म् नहरिया: कथाक संक्षिप्त अवलोकन ३.मिथिला - मैथिली सपूतक अवसान लाल देव कामत १. उपराग केर निहितार्थ २.सगर राति दीप जरय कथा गोष्ठी १२४म् नहरिया: कथाक संक्षिप्त अवलोकन ३.मिथिला - मैथिली सपूतक अवसान १ उपराग केर निहितार्थ साहित्य अकादमी सँ युवा पुरस्कार प्राप्तकर्ता प्रखर ओ मुखर आशुकवि श्री उमेश पासवान जीक मैथिली भाषा मेँ प्रकाशित तीन पोथीके नरहियामे लोकार्पण भेल अछि। जाहिमे पुनः संस्करण पुरस्कृत पोथी ' वर्णित रस ' आ कविता संग्रह 'उपराग ओ दलित कथा संग्रह ' मुजरिम ' केँ पल्लवी प्रकाशन सँ प्रकाशित कयल गेल छैक। १२४म् सगर राति दीप जरय कार्यक्रममे गोटेक पच्चीस पोथी'क सामुहिक रूपेँ लोकार्पित विगत २८ मार्च केँ भेल रहय। सद्यप्रकाशित मैथिलीमे ३९ गोट काव्यके संग्रह "उपराग" विभिन्न अलंकार आ रसमे रचित अछि। उपराग नव कविता पोथीमे १०५ टा पन्ना छैक,जाहिक दाम २९९ टाका निर्धारित य। सन् २०२६ मे छपल एहि पोथीकेँ पढि पाठकगण रूचिगर कविताक भाव जानि प्रांजल कहि कविकेँ धकिया नहिं सकता। ऐ मे ग्रामीण पुलिस,थानाक चौकिदार उमेश जीकेँ सुच्चा मैथिली साहित्यके सेहो चौकिदारी करैत देखल गेल हेन। श्री पासवान जीक अकविता खूब सौष्ठव छन्हि। हिंदी क्षेत्रमे सेहो कविता विधामे हिनक पोथी ' चन्द्रमणी ' सन् २०१६ मे बहराएल छन्हि। मधुबनी जिला अन्तर्गत लौकही प्रखंडके ग्राम +पो०- औरहा ,थाना नहरिया (बिहार) मे दि० १३-१०-१९८४ ई० केँ श्रीमती अमेरिका देवी (माय) आ बाबूजी- श्री खखन पासवान जीके घर एक कुशाग्र बालकक जन्म भेल रहय ,जिनकर छठिहारी नाउँ पड़ल उमेश पासवान। उमेश जी ग्रामीण परिवेशमे पढ़ि- लिखि सरकारी महकमामे सेवारत मुलाजिम छथि। हुनक साहित्यिक रचना कविता मादे यात्रा २००३ सँ निरन्तर जारी छन्हि। ओ अपना मौलिक काव्य सँ विद्वतजनक बीच एक खाश परिचिति बना लेलनि अछि। हुनकर कविता आ कथा अर्थात् गद्य आ पद्य विधामे समान रूपेँ लेखनी चलैत रहलन्हि अछि। ओ सामाजिक अर्थात, मानवीय संघर्ष आ जीवनक सूक्ष्म अनुभूति सभक सशक्त अभिव्यक्ति प्रस्तुत करैत रहल अछि। श्री पासवान एक निर्भीक रचनाकारके संगहि जबावदेह समाजकर्मी सेहो छथि। हिनकर साहित्यिक आ सामाजिक योगदान लेल हिनका विभिन्न प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त भेल छन्हि। सन् २००३ मे माहेश्वरी सिंह 'महेश' ग्रन्थ पुरस्कार सँ सम्मानित कयल गेलनि। वर्ष २०१८ मे कल्याण पथ युवा सम्मान आ २०१९ मे उत्कृष्ट सेवा'क मान्यता स्वरुप पुलिस महानिदेशक, बिहार - पटना द्वारा 'सुरवीर सम्मान' प्रदान कयल गेल छन्हि। कविवर श्री पासवानजी अपन एहि काव्य रचनामे समाजके उपेक्षित वर्गक पीड़ाकेँ आ अपन परिवेशमे सताएल गेल लोकक कष्टके तथा स्वयं अपन भोगल अनुभवकेँ भाव पूर्वक कवितामे कहैत छथि। अधिकतर कविता ग्रामीण संस्कृति आ मानस पटल पर गहिंरगर स्मृतिक' चेन्हासी केँ शव्द रूप दैत भाव पूर्वक गढ़लाह अछि। नव कविताक श्रेणीमे हिनक काव्य छन्हि जे पाठक एवं स्रोताके मोन मोहि लैत छैक। ऐ 'उपराग' पोथीमे उलहनके रूपमे कियो उपराग लेबा लेल नैतिक रूपेँ तैयार ,समाजमे आगू नहिं अबैत छै। मुदा मोनक व्यथा केँ आ कयल गेल शोषणके प्रकाशमे आनैत श्री पासवानजी पकठोस तरहेँ अपन कहनाम कहि देबामे सकुचाईत नहिं छथि। पोथीमे साभार स्तम्भमे ओ व्युत्पन्न ढ़ंगे विस्तार सँ सब बात रखने छथि आ श्री नन्द विलास राय आदि सहयोगीक प्रति धन्यवाद देने छथि। पोथिक भूमिका लिखैत चर्चित पत्रकार ओ जनता कालेज लौकहीके प्राचार्य श्री भरत प्रसाद गुप्ता जीक कथन भेल छन्हि "समाजमे व्याप्त असमानता, भेदभाव आ अन्यायक अन्हार मनुखक गरिमा पर पड़ल ओही छायाकेँ स्मरण कराबैत अछि।" एहि संग्रहक कविता सब ठीक ओई लागल गहनके चिन्हैत अछि। कवि समाजक भीतर छीपल पीड़ा , संघर्ष आ विडंबना केँ शव्द देबाक कठोर परियास कयलाह अछि। धार्मिक आ सामाजिक पाखंड पर कसगर प्रहार करैत एकठाम लिखैत छथि -: " ओ मंत्रण उच्चारण सँ ग्रह नक्षत्रक दशा दिशा बदलै के करत बात मुदा नहिं रोकि सकैत अछि देश- राज्य पर आबै बाला बिपैत" एहि पाँति सभमे कविवर महोदय अंध विश्वास आ कर्मकांडक आडम्बर पर गंभीर सवाल उठबैत छथि। जहन वास्तविक संकट समाज आ राष्ट्र पर उपस्थित होइत अछि,तहन केवल मन्त्रोचार आ कर्मकांड ओकर समाधान नहिं बनि सकैत छै। ऐहि तरहेँ कविता विवेक यथार्थ वोध ,आ सामाजिक जागरूकता'क पक्षमे सशक्त स्वर प्रस्तुत करैत अछि। उपराग केर प्रांजल स्वरक सामना करय लेल जनमानस केँ भीड़ सँ कोनू चिन्हित चेहरा आगू नहिं आओत ने गच्छै लेल तैयार छैक, ओ अपनाके अपराधी अथबा शोषण नहिं मानैत देखाएत सेहो एक बैमानी थिकैक। कविक पाँति सृजल गेल अछि , द्रष्टव्य -: .... दुशासनक भीड़मे पाण्डव हेरा गेलैए आई पसरल छै युद्ध फेसबुक पर कुरुक्षेत्रक रणभूमि कम पड़ि गेलैए ...... मजदूर शिर्षक कवितामे एक बानगी केँ अकानल जा सकय य-: ....... अरजै छै दू जूनक रोटी जइमे देखल जा सकैए खून - पसेना ईमानदारीक मिश्रण तंई बचपनेमे बाल बच्चाक रोग - वियाधिसँ लड़ैबाला बढ़ि जाई छई इम्यूनिटी जवान होयते सतबय लगै छै घर - परिवारक चिन्ता होमय पड़ै छै घर दुआर छोड़ि पलायन । सबसँ बेसी भारी बदबा उपेक्षित - शोषित वंचित वर्गकेँ अपनहि समाजक लोक प्रवल बाधा बनि बाटे नहिं छोड़ैत छैक । देखल जाय 'जमीन' शिर्षक सँ पाँति -: दू ट्राली ईंटा गिरौलिऐ अमीन चलि गेलैए जखन बाधमे खरीदलियै पाँच कठा खेत तँ ओहिमे जमिन्दारक अमीन चलि गेलैए मरलै जखन माय - बाबू घरक करजा देखि हमर भाई मीन भ गेलै ..�.... कवि जी सोझे अभिजात वर्ग पर आक्षेप करैत खेतक दू गो खीरा खेयलापर - अइंठाह भ' गेलई कुशव्द सुनैत छैक। नर्सरी सँ दू गोट मालभोग आमक गाछ बाधक सीमान पर रोपतहि - भुताहि भ' गेलै बाध 'शव्द' सुनय पड़लैक। अपने ओइठाम उबजाएल ढ़ाकिक - ढ़ाकी कदीमा, कूम्हर - अरिकोच साग दैत छै तँ बढ़ नीक आ जखने एगो सजमैन छुबैत छै तँ दगाह भऽ गेलै अपशव्द सुनि हतास भ' उठैत छैक। हुनक कुकूर कतेको बेर नौछरने हेतैक, मुदा एकर बकरी एकरती सींग हिलेलकै तँ मरखाह भ' गेलई भारी शव्द सुनि हतास होईछ । तेँ ओ अँइठलाह कवितामे अगिला पाँति बढ़ सौष्ठव रूपेँ जोड़ैत छैक,यथा -: हिनक बेटा पढ़लकै , लिखलकै तँ बड़ नीक हमर बेटा कनी स्कूल की धरलकै तँ ओ कहलकै बताह भऽ गेलई । दुआरे - दुआरे टहल बजौलिऐ भरि जिनगी,सुखल रोटी ले आई दू रोटी कि खाई छी अपन घरक ओ कहलकै अइठलाह भऽ गेलई। कवि जी ' बाबाक खराम ' शिर्षक कविताक मादे अपनों लोकके असहमति करैत देखैत छथि। तत्कालीन समाजमे जे अपनैती आ सौहार्द वातावरण रहैक से आब निपत्ता भ' गेल देखाइछ। आ संस्मरणमे अबैत छैक ओहि समयक दादीक कहल- कानला पर डेराबैत , हकुआ शव्द , डिबिया समय सँ मिझाबैत माय पुचकारि कहथिन - अन्हार बाड़ी सँ घरक पछुआर बाटे भुत आबि जेतौ, आ लोरी गबैत चांनममाक खिस्सा सुना सुता दैत रहथीन। दादीक हुक़्क़ा - पानी आ खांटी बिड़ी ओ बाबाक मुंहसँ भोरका पराती अलोपित भेल छैक। लोरिक ,दिनाभद्री सलहेसक भाव भगैत ..... धनरोपनी कालक गीत आ गोपीचन आब गुम छैक। मोन पड़ैत छैक गोनैर आ पुरनका लत्ता -कपड़ाक बनल भोटिया, बालपनके डेबल पेंट, गंजी, जाड़ाक टोपी ,सुइटर ,दादीक' फेरल पुरनका टेरीकोसा साड़ी सँ बनल उ सिरहन्नी । गोहाली घरमे जोड़ा बरद, लागैन,लदहा ,चामुक,जाबी ,ढ़ोसि ,घुघुर - घांटी आ बरेरीमे टांगल खोता , सेहो सखारी - पेटारी,डोलची,तम्मा अलोपित भेल छैक। सन्दूक सहित ओईमे सहेजल हौंसली ,कारा, पौंहची ,जंतर नहिं देखाइछ। खजुरक गाछ पर चोंचाक खोता ताहिमे रतुका टिमटिमाइत भगजोगनी ,ढेकी,पटई,बैंगहा मांटिक कोठी आदि लुप्त सरमजान आ खेलधुपक संसाधन आदिक खगता एहि दीर्घ कवितामे पुरनका जमानाक स्मरण कराबैत छैक। जेना -: ....... कहाँ छैक उ लोक जे बाबन हाथक घरक ठाठ उठबै ले भऽ जाइ छलै जमा कहाँ छै उ कठघोड़ा नाच किए फेक देलकै लोक ढ़ोल - पिपही छोड़ि देलकै रसनचौकी । एकटा आरो सिरजल निमन सन पाँति देखू :- केकरा हिस्सामे पड़लै ककसी गाड़ी, ठेक चौपहा बरद,भुल्ली महींस आ लुप्त भेल रिखियाक गाछ बरहरक सील । एहि तरहेँ पाठक केँ उमेश जीक 'उपराग' मे अनेकानेक ठोसगर तथ्य सँ भरल उलहन देखाइछ,जे अनुत्तरित प्रश्न बनिकेँ समाज बीच ठाढ़ छैक। यथा ' फसल क्षति' कविता'क अंश देखल जाए -: मलिकबे ओइठाम जाकऽ करता ओ बैसकी आ मीटिंग तरे- तर तरपेसकी खाद - बीआक भऽ जाएत सेटिंग हम अहाँ की लेब गलल फसिल देखि कऽ आड़ि पर मन भऽ जाइए मलिन खेती करी हम ,पाई खाए हाकिम। कृषक धनरोपनी लेल समय सँ बीया बौग तँ अवश्य करैत छै, मुदा समय सँ बरखा नहिं भेने अकाल पड़ि जाइछ।आ अकाली खेरात सेहो समय सँ व्यवस्था जनहीतमे नहिं भऽ पबैछ! रौदी मुंह बौने छै पोखैर सुखल छै , नव छत पर टँकी , दम तोरै छै कल भेलै रौदी ,भेलै अकाल जरलइ धरती पाईन गेलै पताल किसान अहिबेर काइन रहल छै कमला भुतही जाईन रहल छै एकरो छै इयह हाल सावन मास मे। अछूत शिर्षक कविताक माध्यम सँ कवि अपना केँ पैघौत लोकक दिससँ अश्पृश्य बुझलाक बनिसव्त मोनक टीश उद्धृत कयलनि अछि -: जातिक नाम पर अछूत- अक्षोभ करैत रहै छी तँ से बढ़बढ़ियाँ छुआ - छूत पर हम कने कलम चलौलिऐ तँ जुलूम भऽ गेलइ । हरि जिनगी करेलौं अहाँ टहल - टिकोला नौरी- नौरपनक काज दू सेर ले मजदुरी रखलौं शिक्षा सँ दूर आई कलम पकैड़ यएह साँच लिखलौं तँ जुलूम भऽ गेलई ।........ प्रस्तुत पोथीक केन्द्रीय कविता " उपराग " केर केहन विलक्षण पाँति छैन,तकर एक बानगी देखल जाए -: ......... उपदेश दइबाला केँ उपहास भेलई जे गेलइ शरणमे जीबितै ओ लाश भेल इ दिनकर ज़िन्दगी जत्त - लोढ़ी लाइक जिनगी झाइल भेलइ खेलकै खुब मिली बाँटकऽ परसाद जकाँ कियो मुजरीम कियो सरकारी पठ्ठा आई चिमटेक कारणेँ चिन्हार भेलै घरक पाछाँमे गारल हड्डी हाथक हथकड़ी गलाक गल फाँस भेलई चंदन टीका आ लंगौटा हाथ लाठी बास भेलई दिन जिनगि ....... राम कृष्ण परार्थी आ जय प्रकाश मंडल जीके कविता आई निठाहे मोन पड़ैत अछि। तुलनात्मक अध्ययन लेल हिनका कविताकेँ हुनकर कविता बल प्रदान करैत होय! दृष्टि सम्पन्न कवि - रचनाकार उमेश पासवान जीक चर्चित पोथी केँ पढ़बाट खगोट अछि। - लाल देव कामत , नौआबाखर (मधुबनी) २ सगर राति दीप जरय कथा गोष्ठी १२४म् नहरिया: कथाक संक्षिप्त अवलोकन प्रस्तुतकर्ता -: लाल देव कामत सन् १९९०ई० सँ अनवरत त्रिमासिक कथा गोष्ठी राति भरिक एहूबेर १२४म् मिशन पव्लिक स्कूलमे गत २८ -३-२०२६ केँ सांझखन युवा सम्मान प्राप्तकर्ता श्री उमेश पासवान जीक संयोजनमे आरंभ भेल रहय। सुव्यवस्थित संरचना, बहुआयामी सहभागिता आ रचनात्मक गरिमा'क संग अत्यन्त सफलतापूर्वक पूर्वक सुसम्पन भेल य। गोटेक २५ पोथीक लोकार्पण पछाति के था सत्र चलल। श्री नारायण यादव जी ' कथा- नेतागिरीक भुत' नीक वाचन शैलीमे श्रोता बीच रखलाह। ऐ कथामे सामाजिक विडम्बना देखल गेल। शिवाकेँ पैघ किसान होइतो नेतानुमा पोशाक पहिल ब्लौक तकक नेतागिरी करबाक सनक सबार भेलैक। वर्षाजल सँ ओकर घर चुबाठ रहै छैक। जाहि दिन लोक सँ टाका - पैसा झोरल नहिं होय तँ आश्रमक चुल्ही नहिं पजरैक।अपन शैलून परहक काज सेहो ठप्प पड़ि जाई छै। से बरद लेल राखल मार पीकय समय गुदश करय पड़ैत छैक। सब दिने आम लोक ओकरा ठक सेहो मनेमन बुझैत कन्नि काटि लैक। दोसर कथा 'पुलिसक गस्ती' प्रदीप पुष्प पढलनि। ऐ कथामे प्रशासनिक अनुभव बूझिमे आयल। अनमोल बाबाके चारि घौर केरा तहन कटि जाईछ, जहन रातिमे पुलिसक कराचूर गस्ती चलैत रहै छै। चोर तँ मिलिभगत कऽ शगुन बनबैत छै। से भटो सँ लिलोह भेला पर किछुटा नहिं फुराईत छैन। तेसरकथा विप्रकांत मंडल ' मायक बँटबारा ' प्रस्तुत कयल। एहिमे परिवारिक तनाउ निठाहे बूझिमे अबैत छैक। चारू भाय समय पाबिके संयुक्त परिवार सं भिन्न - भिनौज पर उतरि गेल य, मुदा ने जेठका , आ नै तै सँ छोटका भाय सब कियो मायके अपना हिस्सामे राखैले तैयार होइछै।चारिम कथा ' तेसरका प्रश्न' मेँ डॉ० बीणा प्रसाद प्रश्नानुकुल मानवीय जीवनक झलक स्पष्ट रुपेँ सोझा अबैत छैक। मिश्रजी, सिंहजी आ यादवजी विविध विषयमे साक्षात्कार दैत चतुर्थ वर्गीय रिक्त सीट पर नोकरी पाबय चाहैत छै। मुदा पनसौवा नोटक गडी देखा निश्चित होईत भ्रष्टाचार 'क पोल खुजैत छै। पांचम दीर्घकथा ' युवा नन्दक द्वन्द ' सुनि दर्शक केँ ई बुझबामे अबैत छैक जे समयके बोध राखक चाही। सोनेलाल बाबा सँ युवानन्द कए भेंटवार्ता २० बरख बाद गाममे होय छै।शहर उसठ आ गाम स्वच्छ वातावरण बुझाए पड़ल अछि। पढ़यमे मेधावी रहितो ओ परिस्थितिवश शहर चलि गेल ,मुदा ओतय गाम- गाम सँ लोक पहुंच लोड बढेने रहैत छै। छठम कथा सुश्री पल्लवी मंडल केर 'लिफमे ठाढ़ लोक' विज्ञान ओ टेक्नोलॉजी विषयक कथा छी। ऐ मे आधुनिक मनुखक अन्तर्विरोध देखमे आयल । खराब भेलासन्ता लिफ्टमे नायिकाकेँ एक वूजूर्ग जनिजातक बात तर्क संगत लागैत छैन ओ रेहल-खेहल छथिन,आ ६०७ नं० फ्लैट पर दूध पाकेट सँ विथूत नहिं होय य। सातम लघुकथा ' समैयक वर्वादी ' केर पाठ करैत कथामे स्वयं नायक रूपें चलैत अछि। एहिके सामाजिक अनुभवक बदलैत स्वर कहि सकैत छी। कोचिंगके सरजी कें प्रश्नोत्तरी लहजामे कहैत य- " दू घंटा में सँ डेढ़ घंटा तँ माय - बाबूजीक बीच झगरेमे समय खपै छै ,मात्रे अदहा घंटा बांचल समयमे बाल मनोविज्ञानक जतेक विकास होय! आठम कथा' वर्दी' केर कथाकार नन्दविलास राय जी भूमिका जन्य तनाउ देखेबाक चेष्टा कयलन्हि अछि। एस पी के पत्नि जुबेदा बेगम अपन एकलौता पुत्र (आतंकी) लियाकतके सलामती लेल जान बक्सबाक ईद पाबनि पर उपहार मांगलीह। मुदा डीएसपी इरफान के डेरा पर इफ्तार पार्टीमे ओ कहैत देखाई छथि, राष्ट्रप्रेमी। ओ तटस्थ भऽ पत्नी केँ बुझबैत छै, मातृभूमि लेल हम समझौता नँय कऽ सकैब।आ जौं हमरा निशाना पर कश्मीरमे देखाएत तँ हाथे धोइ लिअ। आ सयह भेलै,लालचौक बारमुला जिलामे पुत्रमोह तियागि आतंकवादी बेटा केँ गोली मारि दैत छैक।वर्दीके लाली देशके सपुत एस पी साहब राखलनि हेन। नवम् कथा 'विद्यापति पर्व समारोह वाबत छन्हि । कथाकार राजकुमार मिश्र एहिमे बदलैत समय देखाबैत छैक। दर्शक दीर्घा मे श्रोताक सर्वथा अकाल देखेलन,परंच पुरस्कार प्राप्तकर्ताक' पतियानी से माछभात पर लूझि मचेने छै। चन्दा दाता जनता-जनार्दन मादे 'कान मोचरब' लोकोक्ति सँ कथामे रोचकता बढल छै। नाच- गानमे ठिकेदारी प्रथा सँ दर्शकक संख्याँ नदारद होईतो भोरधरि कलाकार फकरल हेन । कियाक तँ साटाके बेयना'क अतिरिक्त मुद्रा पेबाक छलैक। दसम् कथा ' झूठ बरप्पन जानक खतरा ' में कथाकार शारदा नन्द सिंह जी खूब जमलाह अछि। मानवीय प्रतीक रूपेँ एक खरहा - गदहा केर खिस्सा परम्परागत ढंग सँ कहलनि अछि। एगारहम कथा' कथीक बड़का 'मेँ गौरी शंकर साह जी सामाजिक दबाव देखेलनि अछि। बेदराके शिक्षामे पेट दर्द के आरमे बेवधान य,फेर सँ दर्द शूरूह । पैघौत केर देखाबटी वर्चस्व नहिं छजैत छैक। बारहम् कथा ' बरगद आ कांचक स्क्रीन ' म कुमरजी नैतिक विडम्बना क' बात उठेलनि अछि। रामनन्दन बबाजी हरदम ईयरफौन सँ गीत सुनैत छोटू टेबुल लग खसि अचेत भ' जाईछ। डीजिटल युग हाबी छैक। तेरहम कथा' वर्चस्व ' मे बेचन ठाकुर जी आत्म संघर्ष आ शक्ति सम्बन्धक अनेक स्तर सहज रूपेँ उद्घाटित होइत देखाएल अछि। २५ साहित्यकार से दीवा गोष्ठी - रामपुर मे होईत देखाईछ जाहिमे नवांकुर के कथा पर समीक्षक द्वय क्रमश: शशिचन्द्र आ लोचन प्राकृतिक वर्णन पौलनि। चौदहम कथा 'बेटीक त्याग ' मे झौली पासवान जी ग्राम विघटन होईत देखेलनि हेन। जेठ मासक भीषण गरमीमे विजलीक ट्रांसफार्मर भंगठल रहला सँ भोजन कराबयमे शाहपुर बाली काकी सहित दलो काका, गुजर कका के झारफुक, फकीरा भाय केर बच्चा ,खुशर काका मादे जगेसर काका कहैत छै ओ गाम में नहिं छै,मुदा सुखदेव काका बजलाह ओ तँ गाम आबि गेल हेन। ऐ तरहेँ चर्चा में सब नेताक कर्तव्य पर पश्नचेन्ह लगबैत कटाक्ष केलक। तेतर ओ घुटरीक १० वर्खक बेटी आशा बावत खेरहा अयलैक हेन। पन्द्रहम कथा 'कालाबजारी' मे कपिलेश्वर राउत स्त्री जीवन पर प्रकाश देलनि अछि। समसामयिक गैस तेल केर अभाव भेलासन्ता कालाबजारी बढि गेलैक ,ई तँ विदेश सँ देश आयात करैत छैक। झंझारपुर सँ दवाई जँ नहिं आओत तँ कहियो बाबा मरि जेताह से वार्ता सोहन सँ करैत छैक।आ ई तँ सहजे गैस दुरस्थ सँ अबै य। देवता बाला देश रहैत गरीब छी हम सब आ अमीर देशमे देवता छैथे नै! सोलहम कथा 'रेत बसल गाम ' रामेश्वर प्रसाद मंडल जीके शिर्षक बालू पर बसल गाम रहैत तँ मैथिली भाषा साहित्यमे अपन निशन्न शव्दक प्रतिष्ठा रहैत। बाढ़ि-पानि सँ त्रस्त हुनक मातृक सिसौनीमे १५० बिगहा बला भज्जू मरड़ हसामीक खस्ता हालत छै। कोसी नदी'क कहर बन ग्रामीण समाजके सुअन्न धरि खायले नहिं भेटैत छै। शिवा पांचों भाई ममा क' बढ़ तबाही रहैछ। एतय सामाजिक अव्यवस्था देखाईत छै। सत्रहम कथा'असल धर्म परिवर्तन ' मे जगदीश मंडल जीक कथामे जीवन संघर्षक अनेक रूप एक संग समक्ष आयल अछि। डमरू जा कट्टर हिन्नू आ खिसियाह सोभावक रहला सँ मटिहानी गाममे रहैछ। ओतय आमक गाछीमे ढेरबा वयसक दलित छौड़ाके मारपीट ,चकूबाजी सँ लहुलुहान करैत छै। आ प्रकाश झाके नीक कालेजमे बी .एससी. म पढबैत मेधाबी बनेने छै। से लुटन मियां अपन पोजेटीव रक्त दैत जान बचेलकै। अठारहम कथा'फूलक प्रेम कथा ' ल'के गगन कुमार साह पाठ करैत य। ऐ कालजयी कथामे मानवीय कोमलता अछि। समाजके न दृष्टिमे राखि ठोस संदेश देलक अछि। उन्नैसम कथा ' तराजूक दोसर पलरा' मे आचार्य चन्द्र मोहन यादव जी मातृ स्नेहक संदेश देलनि अछि। पृथक गबाही वृध्दा गौरी देवीक कथन सँ जस्टिस आदित्य ना०प्रसाद केँ रातिभरिक हरायल नीन व्यवस्थित होय छन्हि। जमाबंदी जमीनके टाईटिल मोकदमाके आखरि तारीख तिलकनाथ वनाम शिवनाथके बीच रहैछ। बीसम कथा ' मायक ममता' मे श्री कान्त जीक कथा में लोकजीवन पर आधारित आ रोचकता सन् भरल छैक। एकैशम कथा 'गोरहा' मे राधाकांत मंडल समसामयिक घटनाचक्र देखेने छैक। ऐ मे मानवीय संतुलन दृष्टि उजागर भेलैक हेन। मझारी बाली जे नव कनियां गोरहा ,गोईठा - चिपरी पाथै तँ खूब इंधनके ओरियाउन करैत तँ फरीक लोक सब हेय दृष्टि सँ ताकैन। आ नोत खायले राजधर आबि,जाए लगैत छै तँ गोठुला सँ एक बोझ गोरहा दैत कहैत छथिन - गैस घटत तँ दोसरो दिन गोरहा आरो लऽ जाएब! बाईसम कथा'अकबक्की ' मे प्रीतम निषाद जी समयक मारि की थीक से कथाक माध्यम कहबामे प्रवीण छथि। दोकान पर चाह बनबैत प्रेमनाथ आ बिहारी'क बीच एकांकी तरहेँ पाठक समक्ष आयल । तेईसम कथा'केहन दिन' मे अच्छेलाल शास्त्री जी के गहन जीवन बोधक स्वर स्पष्ट अकानल गेल । भूत, भविष्य आ वर्तमान कालक भुमि प्रसार सं नहि होयत,नहर ,छहर, बांध सँ जगह खेतीक मराएल छै। आखरिमे दिर्घकथा' त्रिवेणी स्नान' मे जगदीश प्रसाद मंडल जी ग्राम्य जीवन सँ जुड़ल कथा कहलाह अछि। रविदिन सूर्य गहण स्नान ललितपुर गामक त्रिवेणी घाट पर लोक करत। जीतन आ सोहन काका व्यवहारिक लोक छथि। ओ अंधश्रद्धा पर विशबास राखि सुदामा दादी आ रतुपारबाली कें ऋण- पैंच दै लेल गीरधारी सन् महाजन तैयार रहैछ। ग्रहण दान करबाक नीजगुत विचार पसरल छैक। मुदा शरीरके भीतरे छै,से अध्यात्म विषय कतेक श्रद्धालू बुझि सकल ? बाहरी सुख अपने आप सँ प्रेम करब थीक,से सांसारिक छियै। एहि पांतिक प्रतिवेदक लाल देब कामत मंच संचालनमे सहयोगी आ दु पाली कथा सत्रमे समिक्षक रूपेँ भाग लेलनि अछि। ३ मिथिला - मैथिली सपूतक अवसान कोशी संदेश त्रिमासिक मैथिली पत्रिका केर प्रधान सम्पादक श्री गिरिजा नन्द झा 'अर्धनारीश्वर ' जीके गत १५ अप्रैल २०२६ केर ४ वजे भोर ( ब्रह्म मुहूर्त - विष्णु जीक सतुआईन दिन) दिल्ली अस्पतालमे निधन हेबाक खबेर भेटल रहय। ओ मिथिलांचल कोसी विकास समिति हटनी सँ जुड़ल रहल छलाह। मैथिली आ हिन्दी साहित्यमे अनेक विधामे हुनक कतेको पोथी प्रकाशित छन्हि। एतय हम आई एस एस एन २३९५-२२५३ प्राप्त मैथिली भाषा'क पत्रिका 'कोसी संदेश ' मे हुनक प्रकाशित आलेख ,कविता आ कथाके शिर्षक दऽ रहल छी ,जे ओ ११ सालमे २४ गोट अंक प्रकाशित कय चुकल रहथि। ई प्रकाशनक दायित्व सम्पादक मंडल अपना उपर राखि देरी भेलासन्ता संयुक्तांक रूपेँ सेहो बाहर कयल। ओना कोसी संदेशमे पैघ -पैघ लेखक आ कवि तथा कथाकारके रचनाक संग नौसिखुआ रचनाकार लोकनिकेँ सेहो छापल गेलनि अछि। एक अँक १८ वा १९ अर्धनारीश्वर विशेषांक रूपेँ निकलल रहैन। एहि पत्रिकाक २५ म् अंक विशेष रूप सँ निकलय केर तैयारीमे ओ रहथि। प्राय: सब अंकमे सम्पादनक सदाचार आ आनों तरहक रचना लिखलनि,जे पाठक बीच समेकित रूपेँ अनबाक आवश्यकता बुझाईत छैक। यथा -: प्रवेशांक मे सम्पादक मादे, रचना - विदेशी कनियां केर सर्वत्र चर्चा आ सुआगत भेल छल। अंक २ मे मूल प्रश्न तकबाक विवशता , मायक नाम चिट्ठी , वैज्ञानिक सोच जगबैत विज्ञानक बतकही, गीत मणी आ नीलमणी - पोथी समीक्षा आयल रहनि। अंक ३ मे षड़यंत्र सँ सावधान , परेशान माय , मैथिल' छपल रहय। अंक ४. चद्दरि सीमित अछि,वर्ण विचार, क आ म ! अंक ५ मे क्षमा प्रार्थना,ग्रामीण मैथिली संस्थाक स्वरूप । अंक ६ मे गरीबक मनोरथ बनाम गरीब रथ , दिग्भ्रमित जातीय संगठन ,लाल पाग,असमक तीन नाम । अंक- ७ ट्रंप वनाम योगी, बिहारमे छात्र आक्रोश , मिथिला (प्रांत) केर औचित्य छपल छन्हि। अंक- ८ मे अर्धनारीश्वर'क दू गोट कविता - घासबाली , अबूझ जीवन शास्त्र । अंक ९ मे चिनीक घातक मिठास ,पांचाली प्रथाक अंतक खगौट,अन्हार गलियारी । अंक १० मे चाही मिथिला राज ,योर ऑनर प्लीज, समाचार जगत १-३! अंक- ११ मे सिहकल अछि पछवा, द्विज तत्वक राजनीति। अँक- १२. शिर्षक - राजनीति आ मिथिला राज्य , महाकवि दयाकान्त झा संस्मरण ,किछु कालक पाँखि ,प्रवास भ्रमणचिन्तन (यात्रा वृत्तांत) अंक -१३ वास्तविकताक धरातल पर परिवर्तन, मुहाजिर मुसर्रफ । अंक- १४ . साहित्य आ उद्योग । अंक १५ मिथिला बनाम मिथिलांचल । अंक -१६. दुरदर्शी आवास नीतिक आवश्यकता, कीर्तन बेसी-हरि बोल कम ,राजबारिक ठाकुर । अंक १७. विश्व परिदृश्य आ संयुक्त राज्य अमेरिका,अनेक टोल अछि टभका। अंक- २०. राष्ट्रीय क्षितिज पर देदीप्यमान : सुरेन्द्र कुमार मिश्र , समकालीन राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त चित्रकार श्री सुरेन्द्र कुमार मिश्र संग भेंटवार्ता। अँक २१. एकोऽहं बहुस्थाम: ,विदग्ध कविक वेदना। अंक- २२ पाकेट बुक्स आ मैथिली साहित्यकार ; भारत - कनाडा सम्बन्ध वाया रेडसेन्ड बोआस्नेक । अँक २३_ नोबेल शांति पुरस्कारक दुरुपयोग - सम्पादनक यन्त्रनाक क्षण।आओर २४म् अंकमे नाम पर जिच्च (सगर रात्रि दीप जरय ), मैथिलीमे लीखसँ हटिकेँं पोथी (मिथिलाक मार्गदर्शक - स्वाधीनता सेनानी) । एजेंट रास श्रमसाध्य कार्य कयनिहार दिवंगत अभियानीक प्रति शव्द नहिं अति,जे हुनका प्रति " विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित" करबैन।ऊँ शान्ति!! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.८.डॉ. उमेश मण्डल-'बदलैत जीवन' कथा-संग्रहक आलोकमे सामाजिक परिवर्तन आ मानवीय चेतनाक समीक्षात्मक विवेचन ‘बदलैत जीवन’ कथा-संग्रहक आलोकमे सामाजिक परिवर्तन आ मानवीय चेतनाक समीक्षात्मक विवेचन डॉ. उमेश मण्डल अतिथि शिक्षक सर्व नारायण सिंह राम कुमार सिंह महाविद्यालय, सहरसा (बिहार) मो.: 9931654742 1. प्रस्तावना जगदीश प्रसाद मण्डल समकालीन मैथिली साहित्यमे ओहन रचनाकार छैथ, जिनकर समग्र व्यक्तित्व मिथिलाक माटि, कृषक जीवन, लोकानुभव, सामाजिक संघर्ष आ मानवीय प्रतिबद्धतासँ निर्मित अछि। मण्डलजीक जन्म 5 जुलाइ 1947 केँ मधुबनी जिलाक लखनौर प्रखंड अन्तर्गत बेरमा गाममे भेलैन। शिक्षा ग्रहण कएला-पछाति ओ जीवनक मूल कर्मभूमि रूपेँ खेती-बारीकेँ अपनौलैन। हुनकर जीवन-दृष्टि स्पष्ट अछि जे खेती केवल जीविकाक साधन नहि, बल्कि समाज-निर्माणक आधार छी। ऐ कारण हुनकर लेखनमे लोकजीवनक अनुभव पुस्तक-ज्ञानक अपेक्षा अधिक प्रामाणिक रूपेँ अभिव्यक्त होइत अछि। नियमित लेखन-यात्रा वर्ष 2000 इस्वीसँ आरम्भ भऽ कए विशाल रचनासंसारमे परिणत भेल, जाहिमे एगारह सए (1100) सँ अधिक कथा, 20 सँ बेसी उपन्यास, 12 टा सँ अधिक नाटक-एकांकी, दर्जन भरि पद्य-संग्रह आ बाल-साहित्यक्षेत्रक अनेक महत्त्वपूर्ण कृति सम्मिलित अछि। हुनकर लेखनक मुख्य विशेषतामे आन्तरिक संवाद, मौन पात्रक सशक्त प्रस्तुति, ग्राम्य यथार्थ, स्त्री-विमर्श, दलित चेतना, लोकबोली-आधारित संवादपरक भाषा आ सामाजिक विषमताप्रति सजग दृष्टि विशेष रूपसँ उल्लेखनीय अछि। मैथिली साहित्यक परिदृश्यमे जगदीश प्रसाद मण्डलक स्थान विशिष्ट अछि, किएक तँ ओ केवल कथाकार नहि, बल्कि ग्राम्य समाजक अनुभवी अभिलेखक आ परिवर्तनशील लोकजीवनक सजग व्याख्याकार छैथ। आलोचकसभ हुनकर साहित्यकेँ मिथिलाक ग्रामीण समाजक सूक्ष्म, व्यापक आ जीवन्त दस्तावेज मानने छैथ। मन्त्रेश्वर झाक मतानुसार मण्डलजी गाम-घरक कथाकेँ स्वाभाविक परिणति धरि पहुँचबैत छैथ, जखन कि डॉ. तारानन्द वियोगी हुनकर लेखनकेँ ग्रामीण समाजक सकारात्मक जीवन-शैलीक दस्तावेज मानैत छैथ। गजेन्द्र ठाकुरक मतमे हुनकर रचनासंसार परम्परागत आजीविकाक गौरव, आत्मनिर्भर कृषक-संस्कृति आ कथ्य-कर्मक एकात्मताक कारण मैथिली साहित्यमे पुनर्जागरणकारी भूमिका केर निर्वहन करैत अछि। एहि दृष्टिसँ मण्डलजीक साहित्य लोकजीवनक बाह्य चित्रण मात्र नहि, बल्कि सामाजिक संरचना, मूल्य-संकट, चेतना-विकास आ मानवीय संघर्षक अन्तर्धाराकेँ पकड़निहार सशक्त साहित्यिक उपस्थिति अछि। एहने व्यापक साहित्यिक पृष्ठभूमिमे ‘बदलैत जीवन’ कथा-संग्रहक उपस्थिति विशेष रूपसँ महत्त्वपूर्ण भऽ जाइत अछि। पल्लवी प्रकाशनद्वारा 2025 इस्वीमे प्रकाशित ऐ संग्रहमे ‘गामसँ दूर’, ‘स्मृति शेष’, ‘केकरा-ले केलौं’, ‘बदलैत जीवन’, ‘पोथीक ज्ञान पोथीए मे रहि गेल’, ‘केना फरिछाएत’, ‘दसमीक डगर’, ‘अप्पन दोख’, ‘यात्रा’ आ ‘गंगासागर’ शीर्षक दस कथा संकलित छैथ। संग्रहक प्रारम्भिक टिप्पणीमे स्पष्ट कहल गेल अछि जे ऐ कथासभमे मानव-जीवनक सूक्ष्म रूपान्तरण, स्मृतिसँ परिवर्तन धरि, आत्मबोधसँ सामाजिक चेतना धरि, तथा परम्परा आ आधुनिकताक अन्तर्संघर्षक अभिव्यक्ति भेटैत अछि। ई संग्रह मिथिलाक बदलैत यथार्थक चित्रण करैत मानव-गरिमा, धैर्य, अन्तरात्माक आवाज आ सामाजिक उत्तरदायित्वकेँ कथा-दृष्टिक केन्द्र बनबैत अछि। तेँ ‘बदलैत जीवन’क महत्त्व केवल एतबे नहि जे ई दस गोट कथाक संग्रह अछि; एहिमे बदलैत समयक भीतर मनुक्खक बदलैत विवेकक रचनात्मक अभिलेख सेहो सुरक्षित अछि। वस्तुतः ‘बदलैत जीवन’ मैथिली कथा-साहित्यमे ओहि धाराक प्रतिनिधि संग्रह मानल जा सकैत अछि, जाहिमे ग्राम्य समाजक संकट, सम्बन्धक बदलैत प्रकृति, आत्ममन्थन, नैतिक विवेक, स्मृति-बोध आ सामाजिक चेतनाक बहुआयामी स्वर एकसंग उभरि अबैत अछि। मण्डलजी अपन कथासभमे नाटकीयता वा कृत्रिम बौद्धिकतापर निर्भर नहि रहैत छैथ। ओ जीवनक भीतर चलैत तनाव, धीरे-धीरे होइत परिवर्तन, सामाजिक असमानता, लोक-आस्था, पछतावा, आत्मज्ञान आ मनुक्खक नैतिक प्रश्नसभकेँ सहज किन्तु प्रभावकारी ढंगसँ उद्घाटित करैत छैथ। ऐ कारण ई कथा-संग्रह बदलैत ग्रामीण समाजक मात्र प्रतिबिम्ब नहि रहि जाइत; ई मानवीय सम्बन्धक पुनर्पाठ आ जीवन-मूल्यक पुनर्समीक्षाक साहित्यिक उपक्रमक रूपमे सामने अबैत अछि। प्रस्तुत शोध-आलेखमे एही आधारपर ‘बदलैत जीवन’ कथा-संग्रहकेँ परिवर्तनशील समाज आ मानवीय चेतनाक आलोचनात्मक परिप्रेक्ष्यमे बुझबाक प्रयत्न कएल जाएत। ‘बदलैत जीवन’ शीर्षक ऐ कथा-संग्रहक केवल एकटा कथा-नाम भरि नहि अछि; ई सम्पूर्ण संग्रहक मूल संवेदना, वैचारिक धुरी आ रचनात्मक संकेतकेँ अभिव्यक्त करैत अछि। संग्रहक कथा-क्रमपर दृष्टि देलासँ स्पष्ट होइत अछि जे ‘गामसँ दूर’, ‘स्मृति शेष’, ‘केकरा-ले केलौं’, ‘बदलैत जीवन’, ‘पोथीक ज्ञान पोथीए मे रहि गेल’, ‘केना फरिछाएत’, ‘दसमीक डगर’, ‘अप्पन दोख’, ‘यात्रा’ आ ‘गंगासागर’ जकाँ कथासभ जीवनक भिन्न-भिन्न अवस्थासभ, मानवीय अनुभवक बदलैत धरातल आ समाजक रूपान्तरित स्थितिक संकेत दैत अछि। तेँ ई शीर्षक अपन एकल कथात्मक सीमा छोड़ि सम्पूर्ण संग्रहक प्रतिनिधि शीर्षक बनि जाइत अछि। संग्रहक आरम्भिक परिचयमे सेहो स्पष्ट कहल गेल अछि जे ऐ पोथीमे संकलित कथासभ मानव-जीवनक रूपान्तरणशील यात्रा, स्मृतिसँ परिवर्तन धरि, आत्मबोधसँ सामाजिक चेतना धरि, आ परम्परा-आधुनिकताक अन्तःसंघर्ष धरि पसरल अनुभवक आख्यान प्रस्तुत करैत अछि। ऐ कथनसँ स्पष्ट होइत अछि जे ‘बदलैत जीवन’क अर्थ केवल बाह्य जीवन-स्थितिक अदला-बदली तक सीमित नहि अछि; एकर भीतर मनुक्खक चेतनात्मक रूपान्तरण सेहो समाहित अछि। जीवन एतए स्थिर नहि, गतिमान अछि। समाज जकाँ मनुक्खक विचार, सम्बन्ध, मूल्यबोध आ आत्मदृष्टि निरन्तर परिवर्तित होइत रहैत अछि। ऐ कारणसँ ई शीर्षक सम्पूर्ण कथा-संग्रहक केन्द्रीय अर्थ-क्षेत्रक संक्षिप्त, सार्थक आ प्रतिनिधि रूपमे उभरैत अछि। एहि शीर्षकक औचित्यक दोसर महत्त्वपूर्ण पक्ष ई अछि जे मण्डलजी परिवर्तनकेँ केवल प्रगतिक उत्सव रूपमे नहि देखैत छैथ, आ ने मात्र पतनक करुण आख्यान रूपमे। हुनका कथासंसारमे परिवर्तन एक जटिल प्रक्रिया छी, जाहिमे सामाजिक विडम्बना, आर्थिक विषमता, पीढ़ीगत अन्तर, नैतिक संकट, आत्ममन्थन, पछतावा, जागरण आ नव बोध सभ एकसंग सक्रिय रहैत अछि। ‘गामसँ दूर’मे सामाजिक-प्रशासनिक दूरी, वर्गीय असमानता आ चेतनामूलक प्रश्न उठैत अछि। ‘स्मृति शेष’मे समय, जीवन आ नश्वरताक बोध सघन होइत अछि। ‘केकरा-ले केलौं’मे धन, स्वार्थ आ अन्ततः आत्मबोधक स्वर उभरैत अछि। ‘बदलैत जीवन’ शीर्षक कथा जीवन-यात्राक क्रमशः परिवर्तित रूपकेँ केन्द्रीय अर्थ प्रदान करैत अछि। ऐ प्रकार ई शीर्षक संग्रहक भीतर उपस्थित बहुविध परिवर्तनक समेकित प्रतीक बनि जाइत अछि। प्रस्तुत शोधक मूल उद्देश्य ई बुझब अछि जे जगदीश प्रसाद मण्डल परिवर्तनकेँ कोन दृष्टिसँ देखैत छैथ। पहिल, सामाजिक स्तरपर ई देखब अपेक्षित अछि जे हुनका कथासभमे ग्रामीण समाजक संरचना, जातीय सम्बन्ध, प्रशासनिक व्यवहार, लोक-मानस आ सामुदायिक जीवनमे कोन-कोन बदलाव सामने अबैत अछि। दोसर, आर्थिक स्तरपर ई विश्लेषण आवश्यक अछि जे आजीविका, श्रम, कृषक-संस्कृति, महाजनी प्रवृत्ति, जीविकोपार्जनक संकट आ आत्मनिर्भरता जकाँ तत्वसभ कथानकमे कोना सक्रिय छैथ। तेसर, पारिवारिक स्तरपर ई देखल जाएत जे पीढ़ीगत अन्तर, सम्बन्धक बदलैत ऊष्मा, उत्तरदायित्व, स्मृति आ बिखरावक प्रक्रिया कथासभमे कोन रूपमे व्यक्त भेल अछि। चारिम, मानवीय चेतनाक स्तरपर शोधक मुख्य लक्ष्य ई रहत जे पात्रसभ बाह्य घटनासभसँ गुजरैत-गुजरैत आत्मबोध, नैतिक विवेक, पछतावा, संवेदना आ सामाजिक जिम्मेदारीक कोन अवस्था धरि पहुँचैत छैथ। एहि शोधक एकटा गम्भीर उद्देश्य ईहो अछि जे ‘बदलैत जीवन’ कथा-संग्रहकेँ केवल कथात्मक सामग्रीक रूपमे सीमित कए नहि पढ़ल जाए, बल्कि एक वैचारिक पाठक रूपमे ग्रहण कएल जाए। मण्डलजीक समग्र साहित्य-दृष्टि, जाहिमे मौन पीड़ाकेँ स्वर देबाक, जन-संवादकेँ साहित्यक केन्द्र बनेबाक आ जीवनक यथार्थकेँ प्रतिबद्धताक संग अभिव्यक्त करबाक आग्रह प्रमुख अछि, ऐ संग्रहमे सेहो सक्रिय रूपेँ उपस्थित अछि। तेँ शोध-उद्देश्य एतेपर सीमित नहि अछि जे कथासार प्रस्तुत कएल जाए; उद्देश्य ईहो अछि जे ऐ संग्रहमे परिवर्तन जीवनक अपरिहार्य सत्यक रूपमे उभरैत अछि आ लेखक ओकरा मानवीय गरिमा, सामाजिक चेतना आ नैतिक मंथनक धरातलपर परखैत छैथ। अन्ततः कहल जा सकैत अछि जे ऐ शीर्षकक औचित्य संग्रहक समग्रतामे निहित अछि। ‘बदलैत जीवन’ एतए एक कथा मात्र नहि अछि, ई एक दार्शनिक संकेत अछि; एक घटना मात्र नहि अछि, ई एक सतत प्रक्रिया अछि; एक पात्रक अनुभव मात्र नहि अछि, ई मिथिलाक बदलैत समाज आ मनुक्खक बदलैत अन्तर्जगतक सम्मिलित अभिव्यक्ति अछि। एही बुझबक आधारपर प्रस्तुत शोध-आलेख आगाँ संग्रहक कथासंरचना, विषय-विस्तार, सामाजिक यथार्थ, मानवीय चेतना आ शिल्पगत विशेषतासभक आलोचनात्मक परीक्षण करैत चलत। 3. कथा-संग्रहक संरचना आ विषय-विस्तार ‘गामसँ दूर’ बदलैत जीवन कथा-संग्रहक पहिल कथा ‘गामसँ दूर’ संग्रहक वैचारिक आधार निर्मित करैत अछि। कथाक केन्द्रमे गोपीकृष्ण छैथ, जे बी.डी.ओ. बनिकए गामसँ बाहर कर्मभूमिपर पहुँचैत छैथ, मुदा मानसिक रूपेँ अपन गाम, जातीय-सामाजिक संरचना, पूर्वजक वंचना आ श्रमिक वर्गक दयनीय स्थितिसँ अलग नहि भऽ पबैत छैथ। कथा एतए स्थापित करैत अछि जे गामसँ दूरी केवल भौगोलिक नहि अछि; ई सामाजिक, प्रशासनिक आ मानवीय दूरी सेहो बनि जाइत अछि। आलोचनात्मक दृष्टिसँ देखल जाए तँ ऐ कथामे बाह्य घटना कम आ आन्तरिक विचार-प्रवाह अधिक प्रमुख अछि। ई विशेषता कथाकेँ साधारण आख्यानसँ ऊपर उठा कए चिन्तनप्रधान सामाजिक कथा बनबैत अछि। गोपीकृष्णक आत्ममन्थनक माध्यमसँ लेखक स्वतंत्र भारतक ओ विडम्बना उद्घाटित करैत छैथ जेतए राजनीतिक स्वतंत्रता अवश्य प्राप्त भेल अछि, मुदा सामाजिक समानता अखनो अपूर्णहि अछि। जनकलाल आ हरिमोहन बाबा जकाँ पात्र कथा-यथार्थकेँ अनुभवजन्य आधार प्रदान करैत छैथ आ ई संकेत दैत अछि जे सत्ता-तंत्र, जातीय विभाजन आ आर्थिक असमानता ग्रामीण समाजमे गहींर रूपसँ जड़ि जमा चुकल अछि। कथाक आलोचनात्मक महत्त्व ऐ तथ्यमे निहित अछि जे मण्डलजी परिवर्तनकेँ रोमानी आशावादक रूपमे नहि देखैत छैथ। ओ परिवर्तनकेँ संघर्षशील चेतनाक प्रक्रिया रूपमे प्रस्तुत करैत छैथ। गोपीकृष्ण बदलाव चाहैत छैथ, मुदा ओ व्यवस्थाक सीमासँ सेहो परिचित छैथ। तेँ ई कथा सामाजिक विषमताक वर्णन भरि नहि रहि जाइत, जागृत विवेकक बेचारगी आ उत्तरदायित्वक गम्भीर अभिव्यक्ति बनि जाइत अछि। एही रूपमे ‘गामसँ दूर’ संग्रहक विषय-वस्तु, परिवर्तनशील समाज आ मानवीय चेतना, दुनूक प्रभावशाली प्रारम्भिक प्रतिनिधि कथा रूपेँ स्थापित होइत अछि। ‘स्मृति शेष’ संग्रहक दोसर कथा रूपमे जीवनक नश्वरता, स्मृतिक स्थायित्व आ मानवीय सम्बन्धक भीतरी तापकेँ अत्यन्त मार्मिक ढंगसँ सामने आनैत अछि। कथावाचक राधाकान्तक बीमारीक समाचार सुनि हुनकासँ भेँट करए निकलैत छैथ, मुदा यात्रा-क्रममे अप्रत्याशित रूपसँ रविशंकरक मृत्यु-समाचार भेटैत अछि। एतयसँ कथा सोझे वर्तमान घटनाक स्पष्ट वर्णन नहि करैत अछि; स्मृतिक बलेँ ई अतीत, संघर्ष, दोस्ती, श्रम, उन्नति, पतन आ सामाजिक मूल्यक ओझरीकेँ क्रमशः उद्घाटित करैत चलैत अछि। आलोचनात्मक दृष्टिसँ ई कथा विशेष महत्त्व रखैत अछि, किएक तँ ऐठाम जीवनक नैतिक परीक्षणक माध्यम बनैत अछि। रविशंकरक जीवन-यात्रा गरीबीसँ आरम्भ भऽ शिक्षित, कर्मठ आ उन्नमुख व्यक्तित्व धरि पहुँचैत अछि, मुदा पछाति आर्थिक दबाव, पारिवारिक विस्तार आ दहेज-व्यवस्थाक विडम्बना हुनकर व्यक्तित्वमे अन्तर्विरोध उत्पन्न करैत अछि। कथावाचक रविशंकरक अन्तिम आग्रहपर सोचैत आ जूझैत छैथ, आ एही ठाम कथा सामाजिक आलोचनाक रूप ग्रहण करैत अछि। लेखक संकेत दैत छैथ जे शिक्षित भऽ जाएब मात्र पर्याप्त नहि अछि; वैचारिक नैतिक दृढ़ता बिना मनुक्ख समझदार होइतहुँ दिशाहीन भऽ सकैत अछि। कथाक अन्तमे राधाकान्तक मृत्यु-समाचार जीवनक अस्थिरतापर निर्णायक विराम जकाँ अबैत अछि। “यएह छी जीवन” सन निष्कर्ष कथाकेँ दार्शनिक गहराइ प्रदान करैत अछि। एही कारण ‘स्मृति शेष’ परिवर्तनशील जीवनक बीच मानवीय सम्बन्ध, सामाजिक विडम्बना आ मृत्यु-बोधक अत्यन्त सारगर्भित कथा ठहरैत अछि। ‘केकरा-ले केलौं’ कथा-संग्रहमे आत्मालोचन, सामाजिक नैतिकता आ धनक मोहक विडम्बनाक अत्यन्त सशक्त अभिव्यक्ति सामने अबैत अछि। कथाक आरम्भ साधारण गामक समाचारसँ होइत अछि, मुदा क्रमशः ई स्पष्ट होइत अछि जे शोभित भायक अन्हरपन केवल शारीरिक घटना तक सीमित नहि अछि; ई हुनकर समूचा जीवन-चरित्रक नैतिक उद्घाटनक अवसर बनि जाइत अछि। कथावाचक लड़ूलाल, मकशूदन आ रूपलाल जकाँ पात्रसभक संवादक माध्यमसँ कथा गामक सामूहिक स्मृति आ सामाजिक निर्णयक धरातलपर विकसित होइत अछि। आलोचनात्मक दृष्टिसँ ऐ कथाक विशेषता ई अछि जे लेखक प्रत्यक्ष उपदेश नहि दैत छैथ। ओ पात्रसभक कथोपकथन आ संकेतक माध्यमसँ महाजनी प्रवृत्ति, वर्गीय अन्याय आ सामाजिक दोहरापनकेँ उद्घाटित करैत छैथ। शोभित भाय आर्थिक रूपसँ सम्पन्न छैथ, मुदा ओही सम्पत्तिक पृष्ठभूमिमे बेइमानी, शोषण आ संवेदनहीनता जुड़ल अछि। मकशूदनक “अप्पन केलहा फल” आ रूपलालक “धन जमा करैक पाछू लगिते उचित-अनुचित हटि जाइए” सन कथन कथा केँ लोक-न्यायक स्वर प्रदान करैत अछि। एतए समाज एक प्रकारक मौन न्यायाधीशक रूपमे उभरैत अछि। कथाक चरम बिन्दु शोभित भायक आत्मस्वीकृति अछि- “केतेको लोकक गरदैन काटि सम्पत्ति बनेलौं, मुदा आब बुझि पड़ैए जे केकरा ले एते केलौं।” एही वाक्यसँ कथा बाह्य घटनासँ ऊपर उठि गहींर नैतिक निष्कर्ष धरि पहुँचैत अछि। तेँ ‘केकरा-ले केलौं’ परिवर्तनशील जीवनक सन्दर्भमे धनक निरर्थकता, आत्मबोधक पीड़ा आ मानवीय मूल्यक पुनर्स्मरणक अत्यन्त सारगर्भित कथा ठहरैत अछि। ‘बदलैत जीवन’ ऐ कथा-संग्रहक केन्द्रिय कथा थिक आ एही कारण ई केवल शीर्षक कथा नहि अछि; ई सम्पूर्ण पोथीक वैचारिक मेरुदण्ड जकाँ प्रतीत होइत अछि। कथाक केन्द्रमे रघुवीर बाबा छैथ, जे अपन एकासीम वर्षगाँठक अवसरपर बीतल जीवनक पड़ावसभकेँ पुनः देखैत आ परखैत छैथ। पोतीक बधाइ, पड़ोसीक आगमन आ सहज गप-सप्पक बीच कथा क्रमशः गम्भीर जीवन-दर्शनक रूप धारण करैत अछि। एतए जीवनक अर्थ उत्सवमे नहि, आत्मस्मरणमे उद्घाटित होइत अछि। उपलब्धिक मूल्यांकन बाह्य वैभवसँ नहि, समयानुकूल बदलावक विवेकसँ निर्धारित होइत अछि। आलोचनात्मक दृष्टिसँ ऐ कथाक सभसँ पैघ शक्ति ई अछि जे मण्डलजी परिवर्तनकेँ एकरेखीय प्रगतिक रूपमे नहि देखैत छैथ। रघुवीर बाबा अपन जीवनमे आएल चारि गोट बदलावक चर्चा करैत छैथ। पारम्परिक खेतीसँ सिंचाइक सुविधा धरि, उन्नत बीज आ बहुफसली खेतीसँ पशुपालन धरि, आ हाथक श्रमसँ मशीनक उपयोग धरि परिवर्तनक क्रम देखाइ पड़ैत अछि। मुदा ऐ परिवर्तनसभक प्रस्तुति केवल तकनीकी सुधारक इतिहास बनि नहि रहैत। ई ग्रामीण समाजक आर्थिक चेतना, श्रम-संस्कृति, आत्मनिर्भरता आ अनुभवजन्य बुद्धिक विकासक कथा बनैत अछि। लेखक स्पष्ट संकेत दैत छैथ जे बदलाव सफल तखन मानल जाएत जखन ओ जीवनक गरिमा बढ़बैत हो, मात्र उपभोगक लिप्सा बढ़ेबाक माध्यम नहि बनए। रघुवीर बाबाक “उपयोग” आ “उपभोग” बीचक भेद ऐ कथाक नैतिक केन्द्र थिक। ई कथा आकर्षक एतए सेहो बनैत अछि जे एतए वृद्ध पात्र निष्क्रिय स्मृतिलोपी व्यक्ति नहि छैथ, बल्कि जीवनक सचेत दार्शनिक छैथ। ओ अतीतक महिमामंडन नहि करैत छैथ, नव समयक अन्धानुकरणो नहि करैत छैथ। ओ दुनूकेँ परखैत, छाँटैत आ अपन अनुभवनिष्पन्न निष्कर्ष अगिला पीढ़ीकेँ सौंपए चाहैत छैथ। “पाँचम बदलाव”क इच्छा रहितो मृत्यु-बोधक कारण ठमकि जाएब कथाकेँ मार्मिक गहराइ प्रदान करैत अछि। ऐठाम जीवनक विडम्बना ई अछि जे मनुक्ख सुधारक सम्भावना देखैत रहैत अछि, मुदा समय सीमित रहैत अछि। तेँ ‘बदलैत जीवन’ श्रम, समय, कृषि, तकनीकी रूपान्तरण, पीढ़ीगत संवाद आ अस्तित्व-बोधक एहेन कथा थिक जे सम्पूर्ण संग्रहक केन्द्रीय संवेदनाकेँ सर्वाधिक प्रभावशाली रूपमे मूर्त करैत अछि। ‘पोथीक ज्ञान पोथीए मे रहि गेल’ कथा ‘बदलैत जीवन’ संग्रहमे ज्ञान, कर्म आ सामाजिक उपयोगिताक प्रश्नकेँ अत्यन्त सारगर्भित ढंगसँ उठबैत अछि। कथाक केन्द्रमे रघुनन्दन आ दीनानाथ छैथ, जे विद्यार्थी-जीवनक संगी रहितो जीवन-पथमे दू भिन्न दिशा पकैड़ लैत छैथ। दीनानाथ उच्च सरकारी पद, अध्ययनशीलता आ पोथी-लेखनक माध्यमसँ बौद्धिक उपलब्धि अर्जित करैत छैथ, जखन कि रघुनन्दन गाममे रहि प्रत्यक्ष सामाजिक बदलाव, कृषिक उन्नति आ लोक-सहयोगक धरातलपर अपन जीवनकेँ सार्थक बनबैत छैथ। एही विरोधी जीवन-दृष्टिक आधारपर कथा अपन आलोचनात्मक अर्थ ग्रहण करैत अछि। आलोचनात्मक दृष्टिसँ देखल जाए तँ लेखक एतए पुस्तक-ज्ञानक विरोध नहि करैत छैथ। ओ ओहि ज्ञानक निष्प्रयोज्यताक प्रश्न उठबैत छैथ जे समाजसँ कटल रहि जाइत अछि। दीनानाथक पोथी, अध्ययन आ प्रशासनिक अनुभव हुनका निजी उपलब्धि अवश्य दैत अछि, मुदा गामक लोकसँ जीवित सम्बन्ध स्थापित नहि भऽ पबैत। दोसर दिस, रघुनन्दन कम पढ़ल-लिखल होइतहुँ उपयोगी कर्म, निष्कपट सेवा आ मानवीय व्यवहारक माध्यमसँ समाजक आशाक केन्द्र बनि जाइत छैथ। एतए मण्डलजी स्पष्ट करैत छैथ जे ज्ञानक वास्तविक मूल्य तखन अछि जखन ओ लोकजीवनमे उतरि व्यवहारिक रूप ग्रहण करैत अछि। कथाक अन्तिम भाव “पोथीक ज्ञान पोथीए मे रहि गेल” सम्पूर्ण कथाक निष्कर्ष प्रस्तुत करैत अछि। ई वाक्य मात्र व्यंग्य नहि अछि; ई बौद्धिकता आ सामाजिक उत्तरदायित्वक बीच बनल दूरीपर मार्मिक टिप्पणी करैत अछि। एही अर्थमे ई कथा परिवर्तनशील समाजमे जीवित ज्ञान आ संग्रहित ज्ञानक बीचक अन्तरकेँ आलोचनात्मक रूपेँ उद्घाटित करैत अछि। ‘केना परिछाएत’ कथा ‘बदलैत जीवन’ संग्रहमे परम्परा आ नवचेतनाक टकरावकेँ अत्यन्त सूक्ष्म ग्रामीण परिप्रेक्ष्यमे प्रस्तुत करैत अछि। कथाक केन्द्रमे सोमेसर काका, जागेसर आ सुतेसर छैथ। विवादक मूल कारण नवका धानक बीआ अछि। जागेसर परिवारक बढ़ैत आवश्यकता आ अन्न-उत्पादनक दृष्टिसँ उन्नत बीआक पक्षमे छैथ, जखन कि सुतेसर ओकरा “अशुद्ध” मानि पाबनि-तिहारक परम्परागत शुद्धताक प्रश्न उठबैत छैथ। एतए कथा केवल खेती-बाड़ी वा बीजक चयन धरि सीमित नहि रहैत; ई बदलैत ग्रामीण मानसक भीतर चलैत ज्ञान-अज्ञान, उपयोगिता-आस्था आ व्यवहार-परम्पराक तनावक कथा बनि जाइत अछि। आलोचनात्मक दृष्टिसँ ऐ कथाक विशेष महत्त्व सोमेसर काकाक चिन्तनमे निहित अछि। ओ विवादकेँ साधारण पारिवारिक झगड़ाक रूपमे नहि देखैत छैथ; ओ एकरा मानवीय समाजक स्थायी द्वन्द्वक रूपमे ग्रहण करैत छैथ। हुनकर ई विचार जे दिन-राति, इजोत-अन्हार आ ज्ञान-अज्ञान संग-संग चलैत अछि, कथाकेँ दार्शनिक ऊँचाइ प्रदान करैत अछि। मण्डलजी एतए स्पष्ट करैत छैथ जे नव ज्ञानक प्रवेशमात्रसँ अज्ञान समाप्त नहि होइत अछि। दुनूक सह-अस्तित्वसँ संघर्ष जन्म लैत अछि। कथाक समाधान सेहो विशेष ध्यान योग्य अछि। सोमेसर काका पूर्ण परम्परावादी नहि छैथ, आ ने अन्ध-आधुनिक। ओ व्यावहारिक समन्वय सुझबैत छैथ, उत्पादन लेल नव धान आ पाबनि-तिहार लेल परम्परागत धान। एही बिन्दुपर कथा मण्डलजीक संतुलित सामाजिक दृष्टिक परिचायक बनैत अछि। तेँ ‘केना परिछाएत’ परिवर्तनशील समाजमे विवेकपूर्ण समन्वयक सारगर्भित कथा ठहरैत अछि। ‘दसमीक डगर’ कथा ‘बदलैत जीवन’ संग्रहमे परम्परा, सामाजिक बदलाव आ सांस्कृतिक पुनर्पाठक प्रश्नकेँ तीक्ष्ण रूपसँ उठबैत अछि। कथाक केन्द्रमे रामलोचन भाय आ रघुवीर छैथ। रामलोचन भाय पुरान पूजाव्यवस्थाक पक्षधर छैथ, जिनका दुःख अछि जे दुर्गापूजामे एखन “डगर” नहि पड़ि रहल अछि आ मनोरंजनक रूप सेहो बदलि गेल अछि। दोसर दिस रघुवीर नव पीढ़ीक प्रतिनिधि छैथ, जे परम्पराकेँ आँखि मुँदि स्वीकार नहि करैत छैथ; ओ ओकर सामाजिक प्रयोजन आ वर्तमान उपयोगिताकेँ प्रश्नक केन्द्रमे आनैत छैथ। आलोचनात्मक दृष्टिसँ ऐ कथाक मुख्य शक्ति संवादमे निहित अछि। लेखक ककरो सोझे खलनायक नहि बनबैत छैथ। ओ पुरान आ नव, दुनूक विचारकेँ सोझा-सोझी रखि समाजक बदलैत मानसिक धरातलकेँ उद्घाटित करैत छैथ। रघुवीरक तर्क जे “डगर” मूलतः सूचना देबाक माध्यम छल आ बदलल समयमे अप्रासंगिक भऽ गेल अछि, परम्पराक ऐतिहासिक अर्थकेँ वर्तमान जीवनसँ जोड़ि देखबाक आग्रह करैत अछि। एतए मण्डलजी संस्कृतिक जीवित रूप आ जड़ रूपक अन्तर स्पष्ट करैत छैथ। कथाक दोसर महत्त्वपूर्ण पक्ष महिला कलाकारक कार्यक्रमपर उठल विवाद अछि। रघुवीर “रंडी नाच”क प्रति अपन हेय दृष्टिक विरोध करैत छैथ, जकरा माध्यमसँ लेखकक प्रगतिशील सामाजिक बोध स्पष्ट होइत अछि। ओ समाजक दोहरी नैतिक मानदण्डकेँ उजागर करैत छैथ आ कला, स्त्री-अस्तित्व आ सामाजिक सम्मानक प्रश्नकेँ नव अर्थ प्रदान करैत छैथ। तेँ ‘दसमीक डगर’ सांस्कृतिक परिवर्तनक बीच विवेकपूर्ण पुनर्मूल्यांकनक अत्यन्त सारगर्भित कथा ठहरैत अछि। ‘अप्पन दोख’ कथा ‘बदलैत जीवन’ संग्रहमे आत्मालोचन, धार्मिक आडम्बरक आलोचना आ सामाजिक विषमताक सूक्ष्म परीक्षणक महत्त्वपूर्ण कथा थिक। कथाक केन्द्रमे सुवोध छैथ, जे दुर्गापाठ करबाक विचार करैत छैथ; मुदा ई विचार निष्कलुष भक्ति-संवेदनासँ अधिक शंकर देवक व्यंग्यपूर्ण निन्दाक प्रत्युत्तर देबाक मनोवृत्तिसँ प्रेरित अछि। एही ठाम कथा अपन आलोचनात्मक अर्थ ग्रहण करैत अछि, किएक तँ लेखक धर्मक बाह्य कर्मकाण्डक भीतर छिपल अहं, प्रतिद्वन्द्विता आ जातीय उन्मादकेँ पकड़ैत छैथ। आलोचनात्मक दृष्टिसँ ई कथा विशेष रूपेँ उल्लेखनीय अछि, किएक तँ मण्डलजी ऐठाम सोझे उपदेश नहि दैत छैथ। ओ सुवोधक मनःस्थितिक माध्यमसँ देखबैत छैथ जे मनुक्ख प्रायः अपन दोष छोड़ि दोसराक दोषपर दृष्टि केन्द्रित करैत अछि। सुवोध अपन शिक्षकीय योग्यता, आत्मविश्वास आ तर्कशीलतापर गर्व करैत छैथ, मुदा दुर्गापाठ करबाक मूल प्रेरणा धार्मिक साधना नहि अछि; ई अपन संस्कृत-पाठक क्षमता सिद्ध करबाक इच्छासँ जुड़ल अछि। एतए कथाकार धार्मिक प्रदर्शन आ वास्तविक अध्यात्म बीचक अन्तर स्पष्ट करैत छैथ। राम परीछन काकाक पात्र एही कारण कथामे नैतिक सन्तुलन आनैत अछि। हुनकर ई सलाह जे “केकरो देखेलासँ कियो धर्मात्मा नहि बनैए”, कथाक केन्द्रीय आलोचनात्मक निष्कर्ष बनि जाइत अछि। एहि प्रकार ‘अप्पन दोख’ केवल धार्मिक प्रसंगक कथा भरि नहि रहैत; ई आत्मपरीक्षणक कथा रूपमे उभरैत अछि। ई बुझबैत अछि जे परिवर्तनक पहिल चरण दोसराकेँ दोष देब नहि, अपन अन्तर्मनक प्रवृत्तिक पहचान करब अछि। एही अर्थमे ई कथा मानवीय चेतनाक गहींर व्याख्या प्रस्तुत करैत अछि। ‘यात्रा’ कथा ‘बदलैत जीवन’ संग्रहमे धार्मिक अनुष्ठानक बाह्य रूपसँ आन्तरिक जीवन-दर्शन दिस बढ़बाक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथा थिक। कथा दुर्गापूजाक अन्तिम दिनक परिप्रेक्ष्यमे घटैत अछि, जेतए एक दिस गामक सामूहिक धार्मिक क्रियाकलाप चलि रहल अछि आ दोसर दिस कथावाचक मनोहरक भीतर “यात्रा” शब्दक असल अर्थ बुझबाक जिज्ञासा जागृत होइत अछि। प्रारम्भमे ओ “विसर्जन” आ “यात्रा”क अर्थमे अन्तर नहि बुझि पबैत छैथ, मुदा वैदिक काशी भायक व्याख्यासँ स्पष्ट होइत अछि जे पूजा मात्र कर्मकाण्ड नहि अछि; ई जीवनक क्रमिक साधनाक प्रतीक रूपेँ स्थापित होइत अछि। आलोचनात्मक दृष्टिसँ ऐ कथाक विशेषता ई अछि जे मण्डलजी धार्मिक परम्पराकेँ जड़ रूपमे प्रस्तुत नहि करैत छैथ। ओ तकर प्रतीकात्मक अर्थकेँ उद्घाटित करैत छैथ। महाकाली, महालक्ष्मी आ महासरस्वतीक तीन-तीन दिनक आराधनाकेँ क्रमशः स्वास्थ्य, कर्मशक्ति आ ज्ञानशक्तिसँ जोड़ि काशी भाय पूजा-विधानकेँ जीवन-व्यवहारक धरातलपर स्थापित करैत छैथ। एतए कथा धार्मिक संस्कारकेँ आधुनिक मानवीय अर्थ प्रदान करैत अछि। ई मण्डलजीक विशिष्ट दृष्टि थिक जे ओ अनुष्ठानक भीतर सँ जीवनोपयोगी तत्त्वकेँ चिन्हित करैत छैथ। कथाक गहींर अर्थ ऐ तथ्यमे निहित अछि जे “यात्रा” समापन नहि अछि; ई नव आरम्भक संकेत बनि अबैत अछि। तेँ ई कथा बदलैत जीवनक सन्दर्भमे ई स्थापित करैत अछि जे सामाजिक-धार्मिक परम्परा तखन अर्थवान बनैत अछि जखन ओ मानवीय चेतना, कर्म आ जीवन-मार्गकेँ आलोकित करैत अछि। ‘गंगासागर’ कथा ‘बदलैत जीवन’ संग्रहमे तीर्थ, आस्था, लोकविश्वास आ मानवीय चेतनाक अत्यन्त अर्थगर्भित कथा थिक। कथाक आरम्भ गोपीक मनमे केतेको वर्षसँ पलैत गंगासागर-यात्राक अभिलाषासँ होइत अछि। लोकप्रचलित मान्यता “सभ तीरथ बेर-बेर, गंगासागर एक बेर” क प्रभाव हुनका मनमे गहींर रूपसँ बसल अछि, मुदा कथा क्रमशः बाह्य तीर्थ-यात्रासँ आन्तरिक बोधक यात्रामे परिणत होइत जाइत अछि। भजनलाल आ विशेष रूपसँ लोचन मास्टर साहैब संग संवाद एही रूपान्तरणक माध्यम बनैत अछि। आलोचनात्मक दृष्टिसँ ऐ कथाक मूल शक्ति ई अछि जे मण्डलजी तीर्थकेँ केवल कर्मकाण्ड वा मोक्षलाभक रूढ़ धारणाधरि सीमित नहि रखैत छैथ। गोपी पहिने गंगासागरकेँ एक पवित्र भौगोलिक स्थल रूपेँ देखैत छैथ, जेतए एक बेर स्नान कए जीवन मुक्त भऽ जाएत। मुदा लोचन मास्टर साहैब एकर अर्थकेँ विस्तृत करैत छैथ। गंगाक समुद्रमे मिलनकेँ ओ समाजमे व्यक्तिक विलयन, निजी अहंकारक क्षय आ व्यापक समत्व-बोधक प्रतीक मानैत छैथ। एतए कथा धार्मिक यात्राकेँ सामाजिक आ दार्शनिक अर्थ प्रदान करैत अछि। एहि कथाक सार्थकता ऐ बातमे निहित अछि जे मण्डलजी बाह्य तीर्थक महत्त्वकेँ अस्वीकार नहि करैत छैथ, मुदा ओकर गम्भीर अर्थक खोज अवश्य करैत छैथ। ‘गंगासागर’ ई स्पष्ट करैत अछि जे सच्चा स्नान जलमे नहि, चेतनामे होइत अछि, जखन व्यक्ति अपनाकेँ मात्र व्यक्ति रूपमे नहि, समाजक एक अंश रूपमे बुझए लगैत अछि। एही अर्थमे ई कथा संग्रहक सामूहिक जीवन-दर्शनक परिपक्व अभिव्यक्ति थिक। समेकित आलोचनात्मक मूल्यांकन ‘बदलैत जीवन’ कथा-संग्रहक समेकित मूल्यांकनसँ ई स्पष्ट होइत अछि जे ई केवल दस गोट कथाक संचय भरि नहि अछि; ई बदलैत ग्रामीण समाज, मानवीय सम्बन्ध आ नैतिक चेतनाक सुसंगठित कथा-दस्तावेज थिक। संग्रहक कथासभ गाम, स्मृति, कर्म, ज्ञान, परम्परा, आत्मालोचन, पूजा, यात्रा आ सामूहिक जीवन-दर्शनकेँ परस्पर जोड़ैत छैथ। एहि पोथीक सभसँ पैघ विशेषता ई अछि जे मण्डलजी परिवर्तनकेँ एकरेखीय रूपमे नहि देखबैत छैथ। हुनका कथा-संसारमे परिवर्तनक भीतर संघर्ष सेहो अछि, सम्भावना सेहो अछि, भ्रम सेहो अछि आ विवेक सेहो। ‘गामसँ दूर’, ‘केना परिछाएत’ आ ‘दसमीक डगर’ जकाँ कथासभ सामाजिक बदलाव, परम्परा-नवीनता तनाव आ व्यवहारिक समन्वयक प्रश्न उठबैत छैथ। एहि संग्रहक दोसर महत्त्वपूर्ण पक्ष आत्मालोचन थिक। ‘केकरा-ले केलौं’, ‘अप्पन दोख’ आ ‘पोथीक ज्ञान पोथीए मे रहि गेल’ जकाँ कथासभ ई संकेत दैत छैथ जे बाह्य उपलब्धिसँ अधिक आवश्यक अछि अन्तर्मनक शुद्धि, लोकजीवनसँ जुड़ल ज्ञान आ नैतिक जिम्मेदारी। समग्र रूपेँ ई संग्रह बदलैत मिथिला आ बदलैत मनुक्ख दुनूक कथा अछि। मण्डलजी यथार्थक चित्रण भरि नहि करैत छैथ; ओ ओकर सामाजिक आ मानवीय अर्थ सेहो उद्घाटित करैत छैथ। एही कारण ‘बदलैत जीवन’ समकालीन मैथिली कथा-साहित्यमे एकटा विचारोत्तेजक आ सार्थक कथा-संग्रह रूपेँ प्रतिष्ठित होइत अछि। भाषा-शिल्प आ कथा-दृष्टि ‘बदलैत जीवन’ कथा-संग्रहक भाषा-शिल्प एकर महत्त्वपूर्ण शक्ति थिक। मण्डलजी लोकजीवनसँ उपजल, सहज, संवादप्रधान आ अनुभवसमर्थ भाषा प्रयोग करैत छैथ। कथासभमे ग्रामीण बोलचाल, मुहावरा, लोक-व्यवहार आ आत्मकथ्यात्मक स्वर एकसंग मिलि कऽ एहेन प्रभाव उत्पन्न करैत अछि जाहिसँ कथा कृत्रिम नहि लगैत, बल्कि जीयल-जागल अनुभव जकाँ प्रतीत होइत अछि। हुनकर कथन-शैलीमे बाह्य घटना संग आन्तरिक मंथन सेहो समान रूपसँ चलैत रहैत अछि। एही कारण कथासभ केवल आख्यान धरि सीमित नहि रहैत, मानवीय विचार-प्रक्रियाक अभिलेख बनि जाइत अछि। शिल्पगत दृष्टिसँ मण्डलजीक विशेषता ई अछि जे ओ छोट घटना वा साधारण संवादसँ पैघ सामाजिक आ नैतिक अर्थ उद्घाटित करैत छैथ। कथासभमे उपदेशात्मकता कम आ अनुभवजन्य निष्कर्ष अधिक अछि। पात्रसभ अपन कथोपकथन, व्यवहार, स्मृति आ आत्मस्वीकृतिक माध्यमसँ स्वयं अपन अर्थ उद्घाटित करैत छैथ। ‘गामसँ दूर’मे आत्ममंथन, ‘केकरा-ले केलौं’मे नैतिक आत्मस्वीकार, ‘पोथीक ज्ञान पोथीए मे रहि गेल’मे व्यंग्यात्मक निष्कर्ष, ‘यात्रा’ आ ‘गंगासागर’मे प्रतीकात्मक व्याख्या, ई सभ लेखकक कथा-दृष्टिक परिचायक अछि। मण्डलजीक कथा-दृष्टि मूलतः लोकजीवनकेन्द्रित, मानवीय, नैतिक आ विचारप्रवण अछि, जेतए परिवर्तनक मूल्यांकन जीवनक उपयोगिता आ मनुक्खताक धरातलपर कएल जाइत अछि। उपसंहार अन्तमे ई स्पष्ट रूपसँ कहल जा सकैत अछि जे जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘बदलैत जीवन’ कथा-संग्रह समकालीन मैथिली कथा-साहित्यमे विशेष महत्त्व रखैत अछि। ऐ पोथीमे बदलैत ग्रामीण समाजक बहुआयामी रूप अत्यन्त संवेदनशील आ विचारोत्तेजक ढंगसँ उद्घाटित भेल अछि। गामक सामाजिक संरचना, आर्थिक संघर्ष, परम्परा आ नवीनताक बीचक द्वन्द्व, ज्ञानक उपयोगिता, धार्मिक व्यवहार, आत्मालोचन आ सामूहिक जीवन-बोध, ई सभ तत्त्व कथासभमे तेना गुंथल अछि जे पाठककेँ मिथिलाक जीवन-यथार्थक गहींर अनुभूति होइत अछि। मण्डलजी अपन कथा-दृष्टिद्वारा ई देखबैत छैथ जे परिवर्तन केवल बाह्य परिस्थिति बदलनासँ पूर्ण नहि होइत अछि; ओ तखन अर्थवान बनैत अछि जखन मनुक्खक भीतर चेतना, विवेक, जिम्मेदारी आ मूल्यबोधक जागरण होइत अछि। एहि संग्रहक सभसँ उल्लेखनीय पक्ष ई अछि जे लेखक जीवनक साधारण लगैत घटनासभसँ पैघ सामाजिक आ मानवीय निष्कर्ष उद्घाटित करैत छैथ। पात्रसभक अनुभव, संवाद, पछतावा, स्मृति, संघर्ष आ आत्मस्वीकृति मिलि कऽ जीवनक एहेन रूप सामने आनैत अछि जेतए मनुक्ख अपनेकेँ, परिवारकेँ, समाजकेँ आ समयकेँ नव दृष्टिसँ देखए लगैत अछि। ‘बदलैत जीवन’क कथासभ पाठककेँ ई बोध करबैत अछि जे पद, धन, कर्मकाण्ड, ज्ञानक प्रदर्शन वा बाह्य प्रतिष्ठासँ जीवन सार्थक नहि होइत अछि। जीवनक सार्थकता उपयोगी कर्म, लोकहित, आत्मपरीक्षण, मानवीय संवेदना आ समाजोन्मुखी दृष्टिमे निहित अछि। तेँ ई कथा-संग्रह बदलैत मिथिला आ बदलैत मनुक्ख दुनूक प्रामाणिक, मर्मस्पर्शी आ स्थायी साहित्यिक दस्तावेज रूपेँ स्वीकार कएल जा सकैत अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.९.रबीन्द्र नारायण मिश्र- जयतु जानकी (धारावाहिक उपन्यास) रबीन्द्र नारायण मिश्र जयतु जानकी १ लंका विजयक बाद राम जानकी,लक्ष्मण,हनुमान,विभीषण ,अंगद,सहित अनेक योद्धालोकनिक संग अयोध्या वापस आबि गेल रहथि। तकर बाद हुनकर राज तिलक समारोहपूर्वक संपन्न भेलनि । लंकासँ रामक संगे आएल विभीषण ,अंगद,सहित अनेक योद्धालोकनि क्रमशः अपन-अपन देश वापस चलि गेलथि। हनुमान आग्रहपूर्वक अयोध्यामे रहि गेलथि। ओ रामसँ विरत हेबाक लेल तैयार नहि भेलथि। राम हुनकर मोनक बात मानि लेलखिन। बहुत दिनक बाद जानकी रामक संग आनन्दक संग समय बिता रहल छलीह। अयोध्याक शासन बहुत नीकसँ चलि रहल छल। चारूकात हर्षक वातावरण छल। जाहिठाम राजाराम सन शासक होथि तकर जनता किएक ने सुखी रहत? राज्यारोहणक बाद राजाराम निरंतर अपन प्रजाक सुधि लैत रहैत छलाह। हुनकर सुख-दुखक जानकारी भेटैत रहनि ताहि हेतु ओ राज्यभरिमे अपन गुप्तचर पठबैत रहैत छलाह। लोक की कहि रहल अछि,राजाक प्रतिए ओकर सभक की भाव छैक,ओकरासभकेँ कोनो परेसानी तँ नहि छैक? एहिसभ विषयक जानकारी गुप्तचरसभ राजारामकेँ दैत रहैत छलनि। ओकरासभसँ प्राप्त जानकारीक आधारपर ओ आवश्यक कारवाइ करैत रहैत छलाह। एकहुटा प्रजा दुखी नहि रहए,ककरो बातकेँ अनदेखी नहि कएल जाए।सभ महत्वपूर्ण अछि ,केओ छोट-पैघ नहि,रामराज्यमे सभकेँ अपन-अपन महत्व छलैक,सभकेँ अपन-अपन स्थान छलैक। लोकसभ रामराज्यमे सभ तरहेँ सुखी आ संपन्न छल। किएक ने रहैत? जखन राजा स्वयं लोककल्याण हेतु दिन-राति लागल रहत तखन परिणाम तँ नीक हेबे करितैक। रामराज्याभिषेकक बाद जानकीक समय आनन्दमय बीति रहल छलनि। ओ एकदिन एहिना रामक संग आपसी गप्प-सप्पमे गंगाक कातमे बसल ऋषि आश्रमसभकेँ देखबाक इच्छा व्यक्त केलनि। “किएक ने। बहुत जल्दीए अहाँक इच्छानुसार कार्यक्रम बनाओल जाएत।“ बात आएल-गेल। जानकी अपन काजमे लागि गेलथि। ओमहर राजाराम राज-काजमे व्यस्त भए गेलाह। एकदिन सायं काल जनतासभसँ संवाद कए रहल छलाह । अयोध्याक प्रमुखलोकसभ ओतए उपस्थित रहथि। राम हुनकासभकेँ पुछलखिन- “अहाँलोकनि कोना छी? अहाँसभकेँ कोनो परेसानी तँ नहि अछि?” “अपने ई की बजलहुँ श्री मान्? जाहि राजक राजा अपने सन महान होअए,जे दिन-राति अपन जनताक कल्याण लेल सर्वस्व त्याग कए देने होअए,जकर मोनमे सदति न्यायक भावना भरल होइक,ताहिठामक लोक सुखी कोना ने रहत?” “ई तँ नहि भेल। हम अपन प्रशंसा सुनबाक हेतु ई प्रश्न अपनेसभसँ नहि केलहुँ अछि। हम तँ अहाँकेँ अपन परिवारे बुझैत छी आ तेँ अपेक्षा करैत छी जे अपन दुख-सुख सही मानेमे हमरा कहब,संकोच नहि करब। तखने ने हम तकर समाधान कए सकब। अस्तु,हमर निवेदन अछि जे अपने सभ बात हमरा निःसंकोच कही,मोनमे रखने नहि रहि जाइ।” राजारामक स्पष्ट आदेश सुनि हुनकर गुप्तचर भद्र बाजल- “महराज ओना तँ सभ किछु ठीके अछि ,मुदा … ” “मुदा की? संकोच नहि करह। स्पष्ट बाजह जे जनता की बाजि रहल छथि,हुनकर रामराज्यक बारेमे धारणा केहन छनि,केओ हमर निर्णयसँ दुखी तँ नहि छथि?” “महाराज! दुर्भाग्यवश जानकीक अपहरण रावण द्वारा भेलनि। अपने अपन पुरुषार्थसँ रावणक हत्या कए देलहुँ,युद्धमे ओकर संपूर्ण परिवार सहित अनेक सैनिकसभ मारल गेल। अंततोगत्वा,अहाँ विजयी भेलहुँ। अहींक इच्छासँ विभीषण लंका नरेश बनाओल गेलाह। सभ किछु नीके भेल। मुदा … ” “फेर ओएह बात। मुदा, मुदा, की कए रहल छह? अपन बात स्पष्ट रूपसँ राखह।” “चाहैत तँ सएह छी महाराज! मुदा बाजल नहि भए रहल अछि। तथापि,अहाँक आज्ञा मानि बाजहि पड़त। रावण द्वारा जानकीक बलपूर्वक हरण केलाक बाद ओ रावणक अधीन छलीह। ओकरे राज्यमे कतेको दिन रहलीह। मानलहु जे एहिमे हुनकर कोनो दोष नहि छलनि,जे भेल से बिना हुनकर सहमतिक भेल,मुदा ओ छलीह तँ रावणक अधीने। अपने निस्सन्देह हुनका संगे वापस अनबासँ पूर्व हुनकर अग्निपरीक्षा लेलहुँ,मुदा अयोध्याक जनता एकरा स्वीकार नहि कए पाबि रहल अछि। लोकमे ई चर्चाक विषय बनि गेल अछि। लोकसभ बजैत सुनल जा रहल अछि जे राजाराम जे केलथि से उचित नहि केलथि,नीक नहि केलथि। एहिसँ तँ समाज बिगड़ि जाएत। जखन राजा स्वयं एहन आचरण करत तखन जनताक तँ भगवाने मालिक ।” राजाराम ई बातसभ सुनि कए दुखी भए गेलाह । कनी काल लेल तँ माथा सुन्न भए गेलनि। बुझेबे नहि करनि जे की करथि? हुनकर पारिवारिक जीवनमे महासंकट उत्पन्न भए गेलनि। ओ तुरंत ओहि बैसारकेँ विसर्जित केलाह आ अपन भवन वापस बिदा भए गेलाह। राजाराम ओहि सभागारसँ अपन कक्ष धरि कोना पहुँचलाह से किछु नहि बुझि सकलाह। हुनकर माथामे विचारक समुद्र उफना रहल छलनि,लागि रहल छलनि जेना चारूकात अन्हड़ उठि गेल होइक आ ओ हबाक तीव्र वेगमे उधिआ रहल होथि। ओ स्वयंसँ प्रश्न-प्रतिप्रश्न कए रहल छलाह। कोठरीमे पहुँचि ओ अपन पलंगपर धराम दए खसलाह आ पता नहि कोन दुनिआमे चलि गेलाह। “तूही हँ,हँ तूही ने जानकीक प्रथम दर्शनपर बेसुध भए गेल छलह। बिना पिताक जनतबकेँ विश्वामित्रक संगे जानकी स्वयंवरमे भाग लेने रहह। जानकीसँ बिआह करबाक लेल शिवजीक धनुष तोड़ि देने छलह। तकर बाद तूँ कतेक प्रसन्न भेल रहह,से मोन छह कि बिसरि गेलह। तकर बाद तोहर पिता सदल-बल जनकपुर पहुँचल रहथि। एक्के संगे तोहर चारू भाएक बिआह ओही परिवारक कन्यासँ भेल रहए। तखन केओ सपनोमे नहि सोचि सकैत छल जे एहन अटूट बिआह बंधनकेँ ओएह राम एहि हालतिमे पहुँचैत देखताह आ से बरदासो करताह। हे राम! तूँही कहह जे ई कोन न्याय भेल जे एकटा गर्भिणी स्त्रीकेँ ,जे तोहर संतानक माए बनए जा रहल छलीह,अनाथ बना देल जाए,हुनका जंगलमे छोड़ि देबाक एकतरफा आदेश दए देल जाए?” “हम की करी?हम तँ स्वयं घोर धर्मसंकटमे छी। की करी की नहि करी किछु फुरा नहि रहल अछि। एक दिस हमर व्यक्तिगत इच्छा अछि,जानकीक आत्मसम्मान अछि,बेरि-बेरि हुनका द्वारा स्वयंकेँ निर्दोष सिद्ध कए देब अछि आ दोसर दिस एकटा राजाक कर्तव्य थिक। राजा अपन जनताक हेतु आदर्श होइत अछि। आइ जखन समस्त जनतामे जानकीक ऊपर आक्षेप उठि रहल अछि तखन हम मूकदर्शक बनि कोना रहि सकैत छी? कोना हुनका अपन महलमे अपना संगे रहि सकैत छी? हम जनैत छी जे जानकी निर्दोष छथि। कतहुसँ ओ हमरा छोड़ि ककरो स्वीकार नहि केलनि,कइए नहि सकैत छलीह,परंतु… ।” “परंतु,परंतु,परंतु … ई की होइत अछि। जे कर्तव्य एकटा पतिक अछि से केओ आर नहि कए सकैत अछि। तूँ जानकीक पति छह,हुनकर भावी संतानक पिता छह,हुनकर दुख-सुखक सभ दिनक संगी छह। कोना हुनकर संग छोड़ि सकैत छहुन। एहिसँ तँ बहुत बढ़िआँ होइत जे तू राजाक पदो त्याग कए दितह,छोड़ि दितह अयोध्याक राज-पाट,जानकीकेँ संग करितह आ चलि जइतह अयोध्याक सीमाक ओहिपार। तखन आ तखने होइत मर्यादाक रक्षा। आखिर अपन पिताक कहलापर आ हुनकर बात रखबाक लेल तूँ चौदह वर्ष वनबास चलि गेलह की नहि? असलमे तोहर ओएह निर्णय जानकीक बरबादीक कारण बनल। ने तूँ वनबास जइतह ,ने जानकी तोहर संगे जंगल मे रहितथि,ने रावण एहन कुकर्म करबाक अवसर पबैत। ओ तँ बहुत दिनसँ चोटाएल छलहे। जानकी स्वयंवरमे रावणक अपमान भेल छल से बात तँ तोरा बुझले छह। एहन प्रतापी राजा आ विद्वान रहितहुँ रावणक घोर अपमान भेल रहए । संभवतः ओ एहि बातकेँ कहिओ बिसरि नहि सकल आ अवसर भेटितहि तकर प्रतिकार केलक। जनक कहिओ नहि सोचने हेताह जे जानकीकेँ एहन दिन देखए पड़तनि। जे ओ महारानी बनबाक पात्रता रखितहु जंगले-जंगल बौआइत रहतीह । तकर जिम्मेदार के छल? तूँ कहि सकैत छह जे जानकी स्वेच्छासँ तोरा संगे जंगल चलि गेलथि। ओ की करितथि? हुनकर पतिव्रता हुनका अयोध्याक राज छोड़ि तोरा संगे जेबाक लेल विवश कए देलकनि। ई छलनि हुनकर महानता। जंगलमे छलपूर्वक रावण द्वारा हरण कए लेलाक बाद ओ की करितथि? तोरा प्रतिए तन-मन-सँ निरंतर समर्पित रहलीह आ ताहि लेल प्राण पर्यन्त त्याग कए देबए चाहलीह। ताहि जानकीकेँ एहि हालपर तूँ पहुँचा देलह? हद भए गेल। जे भेल से भेल। बातसभ सलटि गेल। आबो तँ हुनका बकसि दहुन। “हे राजाराम! ई की करए जा रहल छह तूँ? एहिसँ बहुत नीक होइत जे जानकीकेँ अयोध्या अनबे नहि करितह। से तूँ नहि केलह। मात्र अपन आहत अहंकारक वशीभूत आ मलिन भेल प्रतिष्ठाक पुनर्प्राप्ति लेल जानकीकेँ रावणसँ जितलह। रावणकेँ मारि देलह,ओकर घरहंज भए गेल। मुदा फएदा की भेल? केओ किछु बाजि देलक आ भए गेल जानकीक सत्यानाश। कहीं तोरा मोनमे पहिनेसँ संका तँ विद्यमान नहि छल? कहीं तूँ स्वयं दुबिधामे तँ नहि छलह। अन्यथा अग्निपरीक्षाक जरुरति कोन छल?जानकी सेहो केलनि। ओहूमे निर्दोष सिद्ध भेलथि। ओहि समयमे समस्त आदरणीयलोकसभक उपस्थितिमे तूँ जानकीकेँ पुनः स्वीकार केलह। अपना संगे अयोध्या अनलहुन, संगे रखलहुन। तकर बाद ओ संतानवती होमए बाली छथि। आब केओ किछु बाजि देत आ तूँ हुनका छोड़ि देबहुन। अनर्थ,महाअनर्थ होएत से। लोक तखनहु प्रश्न करतह,करबे करतह। ककरा-ककरा तूँ संतुष्ट कए सकबह। बाजह ने ,चुप्प किएक भए गेलह?की तोहर मोनमे जानकी लेल सचमुचकेँ प्रेम बाँचल रहि गेल छलह? की सभटा नाटके भए रहल छल?” मोनमे उठैत प्रश्न-प्रतिप्रश्न सँ राजाराम बहुत आहत भए गेल छलाह। बड़ी काल धरि ओछाओनपर एहि करोटसँ ओहि करोट करैत रहलाह। फेर अकस्मात उठि बैसलाह। बाहर ठाढ़ अरदलीकेँ बजओलखिन। “आज्ञा श्रीमान् !” “तूँ भरत,लक्ष्मण आ शत्रुघ्नकेँ तुरंत बजा आनह।” “जे आज्ञा श्रीमान्” अरदली अपन काजपर चलि गेल। एमहर राजाराम ओहि कोठरीमे बताह जकाँ एहि कोन सँ ओहि कोन धरि घुमैत रहलाह,बड़बड़ाइत रहलाह। २ राजारामक आदेश सुनलाक बाद अरदली हड़बड़ा गेल। ओ राजारामक मुँहे देखैत रहि गेल। ओ बहुत परेसानीमे बुझाइत छलाह। हुनकर मुँह मलिन लागि रहल छलनि। हुनकर आँखि नोरसँ डबडबाएल छल। “एहन तँ ओ कहिओ नहि रहैत छलाह?”- ओ मोने-मोन सोचि रहल छल। ओ धरफराएल लक्ष्मणक महल लग पहुँचले होएत की वर्षा जोर-सोरसँ होमए लगलैक । बीच-बीचमे बिजलौका से चमकि रहल छल। अकस्मात चारूकात अन्हार भए गेल। लगैत छल जेना समस्त अयोध्या भयाओन अन्हारमे डुबि गेल अछि। तेहने समयमे अरदली लक्ष्मणक भवनक मुख्यद्वारि लग पहुँचि जाइत अछि। राजारामक अरदली ,ओहो एहन समयमे? के रोकि सकैत छल ओकरा? ओ धराधर भीतर महलमे लक्ष्मण लग पहुँचि जाइत अछि। लक्ष्मण भोजन कए पान-सुपारी खा रहल छलाह । सामनेमे राजारामक अरदलीकेँ करबद्ध ठाढ़ भेल देखि पुछलथि- “तूँ एहन समयमे?” “जी श्री मान् !राजारामक आदेश छनि। ” लक्ष्मण ओकरा बीचेमे टोकि देलथि- “ सभ किछु ठीक तँ अछि ने? ” “की जाने गेलिऐक?” “पहिने तूँ अपन बात बाजह, फेर आर किछु।” “राजाराम अहाँकेँ तुरंत अपन महलमे बजा रहल छथि।” “एतेक रातिमे अचानक बजेबाक कारण?” “हमरा आर किछु ने कहलाह,ने हमरा बुझल अछि।” “ठीक छैक । हम तुरंत ओतए पहुँचैत छी।” अरदली समाद कहि कए ओहिठामसँ चलि गेल । लक्ष्मण बहुत हड़बड़ा गेल रहथि। जहिना छलाह तहिना तुरंत पैरे-पैरे राजारामक महल दिस बिदा भए जाइत छथि,चिंतित,उदास आ व्याकुल। अरदली बाजि तँ गेल कारण ओकरा बजबेक रहैक,राजारामक आदेशकेँ निस्सृत करबेक रहैक। मुदा लक्ष्मण ओकर बात सुनि एना व्याकुल भए जेताह जे अपन भवनसँ पैरे-पैरे राजारामक महल दिस दौड़ि जेताह ओ नहि सोचि सकैत छल। खैर,ओ अपन काज केलक आ अगिला पड़ाव दिस बढ़ल । ओहिठामसँ थोड़बे फटकी छल भरतक राजमहल । ओहि समयमे भरत महलक ओसारापर भोजनोपरांत टहलि रहल छलाह। “राजारामक अरदली,ओहो एहि समयमे?”ओ तुरंत ठमकि जाइत छथि । अरदली हुनका देखितहु दंडवत प्रणाम करैत अछि। “की बात?” “राजाराम अपनेकेँ तुरंत बजाओलनि अछि।” “किछु विशेष बात की?” “किछु नहि कहि सकैत छी। मुदा राजाराम बहुत उदास बुझाइत छलाह,हुनकर आभा बिला गेल छलनि। ओ हमरा अपन आदेश सुनबैतो काल सामान्य नहि लागि रहल छलाह। एहन हालतिमे हम हुनका की पुछितिअनि? हुनकर आदेश सुनि ओहिठामसँ चुपचाप बिदा भए गेलहुँ।” भरत तुरंत बिदा होइत छथि। थोड़बे काल पहिने अन्हड़ आएल रहैक,तखनहिसँ वर्षा भए रहल छल। कनी काल पहिने वर्षा कम जरूर भए गेल रहए,मुदा पानि टिपिर-टिपिर खसिए रहल छल। हड़बड़ीमे ओ छत्ता सेहो नहि लए सकलाह। ओहिना भिजैत-तितैत राजारामक महल दिस बढ़ि गेलाह। ओ चारिए डेग बढ़ल हेताह कि पिछड़ि कए मुँहे भरे खसलाह। भरतक पिछड़ि कए खसैत देखि अरदली देखलक। ओ शत्रुघ्नक महल दिस जा रहल छल। ओतहिसँ हल्ला केलक- “केओ छह? केओ छह?” चारूकातसँ प्रहरीसभ दौड़ल। ककरो हाथमे लाठी,ककरो हाथमे भाला,तँ ककरो हाथमे तरुआरि छल। एकगोटेक हाथमे विशेष प्रकारक लालटेन छल जे केहनो अन्हड़मे,वर्षा पानिमे मिझाइत नहि छल। ओ सभ भरत लग पहुँचल। हुनका माटिपरसँ उठओलक। भरत बहुत अपसिआँत छलाह। ओ हकमि रहल छलाह। हुनका किछु बाजल नहि होनि। हुनकर एहन परिस्थिति देखि प्रहरीसभ परेसान भए गेल। बुझेबे नहि करैक जे एहन बेकाल समयमे भरत एकसर कतए आ किएक जा रहल छथि। ताबतमे राजारामक अरदली दौड़ल ओहिठाम आबि गेल। ओ प्रहरीसभकेँ बुझबैत अछि- “हिनका राजारामक महल जेबाक छलनि। राजाराम बजओने छथिन।” ताबे एकटा प्रहरी भरतक महलक लगीचसँ भरतक रथ आनि लेलक। भरत आब साकंछ भए गेल छलाह। ओ रथपर सबार भए राजारामक महल दिस बिदा भए जाइत छथि। हुनकर देहमे कैकठाम पानि-कादो लागि गेल छलनि। मुदा हुनका तँ कथुक होसे नहि रहनि। बस एतबे सोचाइनि – “पता नहि राजारामकेँ की भए गेलनि? ओ एतेक रातिमे सभ भाइकेँ किएक बजा रहल छथि? कही किछु अनिष्ट तँ नहि भए गेल? कहीं कोनो दुष्ट राजा अयोध्यापर आक्रमण तँ नहि कए देलक?” तरह-तरहक प्रश्नसभ हुनकर मोनमे उचरि रहल छलनि। उत्तर तँ राजा रामे दए सकितथि। ताहि लेल ओतए शीघ्र पहुँचब जरूरी छलनि। ओमहर राजारामक अरदली आब शत्रुघ्न लग पहुँचल अछि। शत्रुघ्नक मोन ठीक नहि छलनि। भोरेसँ पेट गड़बड़ चलि रहल छलनि। कनी-कनी बोखारो छलनि। तेँ सुस्त भेल ओछाओनपर पड़ल रहथि। एहनेमे राजारामक अरदली हुनकर महलक मुख्यद्वारि लग पहुँचि गेल छल। मुदा प्रहरी ओकरा आगू बढ़बासँ मना कए देलकैक। “शत्रुघ्न ठीक नहि छथि। हुनका बोखार छनि,पेट से झड़ रहल छनि। एहन हालतिमे ककरो हुनका लग जेबाक अनुमति नहि अछि।” “मुदा हमरा तँ राजारामक बहुत जरूरी आदेश हुनका कहबाक अछि।” “ठीक छैक। हम भीतर समाद पठा रहल छी। तूँ एतहि प्रतीक्षा करह।” “कोनो हरजा नहि । मुदा देरी नहि हेबाक चाही। कारण लक्ष्मण आ भरत ओतए पहुँचि चुकल छथि। हिनकर प्रतीक्षा भए रहल हेतनि।” शत्रुघ्नकेँ सभ समाचार भेटलनि। “राजारामक अरदलीकेँ तूँसभ बाटेमे रोकि देलहक? अनर्थ करैत गेलह। ओकरा तुरंत भीतर आनह।” शत्रुघ्नकेँ तमसाइत देखि ककरो आर किछु कहबाक साहस नहि भेलैक। ओ सभ दौड़ल बाहर गेल आ अरदलीकेँ शत्रुघ्न लग पठा देलक। ओकरा देखितहि शत्रुघ्न पुछि देलखिन- “राजाराम ठीक छथि ने? की आदेश छनि हुनकर जल्दी सुनाबह।” “ओ अहाँ तीनू भाइकेँ तुरंत बजओलनि अछि।” “लक्ष्मण आ भरत कतए छथि? हुनकासभकेँ समाद भेटलनि कि नहि?” “ओ सभ तँ जा चुकल छथि। आब पहुँचिओ गेल हेताह।” “हमहूँ पहुँचिए रहल छी।” शत्रुघ्न तुरंत रथपर चढ़ि राजारामक महल दिस बिदा होइत छथि। घरसँ बाहर निकलैत काल तरह-तरहक अपशकुन होइत छनि। बिलाड़ि रस्ता काटि दैत छनि। बामाँ आँखि फरकि रहल छनि। “पता नहि की होमए बला अछि? ऊपरसँ मौसम से एहन खराप भेल अछि।” ३ शत्रुघ्न जखन राजारामक भवनमे पहुँचलाह ताधरि लक्ष्मण आ भरत ओतए पहुँचि गेल रहथि। राजाराम हुनकासभसँ किछु-किछु गप्प कए रहल छलाह। हुनकर ठोरपर फिफरी पड़ल छलनि। अबाजमे दम नहि बुझा रहल छलनि। रहि-रहि कए आँखिसँ नोर खसि रहल छलनि। शत्रुघ्नकेँ देखिते ओ गुम भए गेलाह। भरत आ लक्ष्मण एक्के संग बाजि उठैत छथि- “आबह,आबह । तोहर मोन तँ खराप छलह। आब कोना छह? ” “जाए दिअ। हमरा की भेल अछि। कनी-मनी सर्दी-बोखार तँ होइते रहैत छैक। अहाँकेँ सौंसे देहमे थाल कोना लागि गेल?” भरतकेँ आब होस अएलनि। ओ बाजि उठलाह- “अबैत काल पिछड़ि गेल रही। हम एकरा बदलने अबैत छी।” भरत शौचालय जा कए अपन वस्त्र बदलैत छथि। फेर तुरंत वापस आबि जाइत छथि। ताबे राजाराम कोठरीमे एमहर-ओमहर घुमैत रहलाह। तीनू भाई हुनकासँ की पुछितथि? हुनकासभकेँ उम्मीद रहनि जे ओ स्वयं किछु कहताह। तीनू भाइकेँ आएल देखि राजाराम पलंगपर सँ उठि गेलाह। हुनकासभकेँ बैसबाक हेतु इसारा करैत छथि,मुदा ओ सभ ठाढ़े रहि जाइत छथि। राजाराम बहुत उदास छलाह,हुनकर मुँहपर विषाद झलकि रहल छलनि। ओ किछु बाजए चाहि रहल छलाह। परंतु बाजल नहि होनि। भरत हुनकर मनोदशा देखि पुछैत छथि- “अहाँ एतेक उदास किएक छी? की कोनो शत्रु देशक आक्रमणक सूचना अछि?की माता कौशल्याक स्वास्थ्य खराप भए गेलनि अछि?” “से सभ किछु नहि भेल अछि।” “तखन अहाँ एतेक परेसान किएक छी?”-लक्ष्मण बजलाह। “परेसानीक तँ बात अछिए।” “अहाँ सन प्रतापी आ शक्तिशाली राजाक सामने कोन परेसानी रहि सकैत अछि। हमरा आदेश दिअ , ओकरा तुरंत नष्ट कए देबैक। मुदा अहाँ एना उदास,चिंतित नहि रहू। हमरासभक अछैत यदि अहाँ दुखी रहब,चिंता करब ,किंवा स्वयंके राजसुखसँ वंचित राखब तखन हमरालोकनिक जीवनक की अर्थ होएत?कहबाक प्रयोजन नहि अछि जे हमसभ अहाँक आदेशपर सर्वस्व समर्पण करबाक हेतु तत्पर छी। अहाँ एकबेर अपन बात कहियौक तँ।”-लक्ष्मण बजलाह। शत्रुघ्न चुपचाप भाइलोकनिक वार्तालाप सुनैत रहलाह। एतबा तँ हुनको बुझा रहल छलनि जे राजारामक मोनमे किछु असाधारण बात घुमि रहल छनि। ओ कोनो सामान्य व्यक्ति नहि छथि,ने ओ कनी-मनी किछु भेलासँ परेसान कएल जा सकैत छथि । ओ तँ परेसान तहिओ नहि भेलथि जहिआ ओतेक शक्तिसंपन्न रावणसँ युद्ध करए जा रहल छलाह। ओहि समयमे हुनकर संगे के छलनि? ओ कहाँ कनीको घबड़ेलथि। रावणक समस्त परिवार नष्ट भए गेलैक। अपनो मारल गेल। जानकी सम्मानपूर्वक अपन पतिक लग वापस अएलीह। निसस्न्देह ओ घटना ककरो विचलित कए सकैत छल? राम सन वीर , प्रतापी व्यक्तिक लेल ओ समय केहन रहल होएत जखन हुनका जानकीक रावण द्वारा हरणक जनतब भेटल हेतनि? मुदा ओ सभ सहलनि,धैर्य रखने रहलथि। केना-ने-केना एतेक भारी सेना ठाढ़ कए लेलनि आ राबण सन शक्तिशाली राजापर विजय प्राप्त केलथि। से राम आइ एतेक आहत छथि। किछु बुझा नहि रहल अछि जे सही बात की अछि? राजाराम अचानक गंभीर भए गेलाह। हम एहिठाम तोरा लोकनिक भाषण सुनबाक हेतु नहि बजओलहुँ अछि। हम राजकाजसँ संबंधित गंभीर समस्याक बारेमे किछु निर्णय लेलहुँ अछि। तकरे कार्यान्ययन हेतु तोरासभकेँ अचानक एहि समयमे बजबए पड़ल अछि। निश्चय हम एहि निर्णयसँ सुखी नहि छी,भइओ नहि सकैत छी,मुदा राजाक कर्तव्यक आगू एक व्यक्तिक सुख-दुख कोनो माने नहि रखैत अछि। हमसभ आइ छी,काल्हि नहि रहब। मुदा हमरा लोकनिक द्वारा कएल गेल काज,कहल गेल बात समाजक सामनेमे दृष्टान्त बनि कए लोककेँ जुग-जुग धरि प्रभावित करैत रहत। तेँ पैघ उद्येश्यक सामनेमे व्यक्तिगत हितकेँ गौण करहि पड़ैत छैक। समयक आघात-प्रघात सहि हमसभ आइ एतए पहुँचि गेल छी। अयोध्याक राजा बनब हमर कहिओ लक्ष्य नहि छल। तेँ पिता जखनहि हमरा भरतकेँ राजा बनेबाक आदेश देलनि हम ओकरा सहर्ष मानि लेलहुँ । ततबे नहि हुनकर दोसर आदेश जे चौदह वर्ष धरि हमर वनबासक छल से आरो सहजतासँ मानि लेलहुँ। मुदा अफसोच जे हमरा कारण जानकीकेँ जंगलमे रहए पड़लनि। लक्ष्मणकेँ हमरा संग देबाक कारण घोर कष्टक समय बितबए पड़लनि। मुदा हम की करितहुँ? भावी प्रबल होइत अछि से मानहि पड़त। हमरो जीवन समयक अधीन नदीमे तीब्र बायुक प्रवाहसँ भसिआइत नाह जकाँ सदिखन डगमगाइते रहि गेल । आब जखन किछु दिन निचेनसँ रहि सकैत छलहुँ तखन फेरसँ नवसंकट आबि गेल। मुदा तकर की? मूल बात ई अछि जे राजारामकेँ जे कर्तव्य करबाक छनि से तँ करबे करताह। “ “एहिमे कोन सक? मुदा भेलैक की से तँ कहियौक।”-लक्ष्मण बजलाह। “तोरामे इएह गड़बड़ी छह। तूँ चुप रहिए नहि सकैत छह। भेलैक ई जे जानकीकेँ लंकासँ वापसीक बाद हमरा संगे रहब बहुत गोटेकेँ पसिंद नहि छनि। अयोध्यावासीसभमे ई चर्चाक विषय बनि गेल अछि। सभ एतबे बजैत अछि जे राजाराम एकटा गलत दृष्टान्त बना गेलाह अछि। पता नहि ओ लोकनि अपन परिवार कोना सुरक्षित राखि सकताह? कोना बचतनि हुनकर सभक परिवार? काल्हि जा कए ककरो पत्नी कतहु जा कए रहि जाएत आ जखन मोन हेतैक जानकीक उदाहरण दए वापस अपन पति लग आबि जाएत । केहन होएत ओ समाज?की बाजत पतिसभ?” “खबरदार भैया! जे बाजि लेलहुँ से बाजि लेलहुँ। जानकीक विषयमे आब एकशब्द नहि निकालब। नहि तँ…। जानकी मात्र अहाँक पत्नीएटा नहि छथि। ओ हमर भौजी सेहो छथि,माता समान छथि। अयोध्या राजक रानी छथि,मिथिला नरेश जनकक कन्या छथि। ततबे नहि,ओ समस्त मिथिला आ अयोध्याक हेतु पूजनीया छथि। केओ किछु बाजि देत आ ओ अपमानित कए अयोध्यासँ निर्वासित कए देल जेतीह? ई कोन न्याय भेल? एहि मामिलामे जखन अहाँ स्वयं एकटा पक्ष छी,तखन अहाँ न्यायाधीश कोना भए सकैत छी? ई तँ सरासर बैमानी थिक। आखिर अयोध्या जनताक विचार यदि जानबेक अछि तखन स्पष्ट रूपसँ मत सर्वेक्षण होउक,सभक विचार लेल जाउक। ई कोन बात भेलैक जे जखन अहाँक मोन भेल ,हुनका लंकासँ संगे लए अनलिअनि आ जखन मोन बदलि गेल तँ अयोध्यामे अपन घरोसँ निर्वासित करबाक निर्णय लए लेलहुँ। एकटा सामान्यसँ सामान्य स्त्रीकेँ जे अधिकार छैक जे ओ अपन घरमे मर्यादापूर्वक रहि सकैत अछि ताहूसँ हुनका वंचित कएल जा रहल छनि। हमरा जीबैत ई नहि भए सकत। हमर प्राण रहए की जाए,मुदा हम एहन अन्याय नहि होमए देब।”-लक्ष्मण चिकरलाह। लक्ष्मणकेँ बीचेमे रोकैत भरत बजैत छथि- “एतेक उत्तेजित नहि होअ लक्ष्मण । राजारामक उपरोक्त निर्णयसँ हमहूँ सहमत नहि छी। हुनका कोनो कारणसँ अयोध्यासँ निर्वासित करब सरासर अन्याय होएत। जानकीक जीवन महत्वपूर्ण छनि। हुनकर प्रतिष्ठा आ गरिमाक रक्षा करब हमरासभक कर्तव्य थिक। एहि बातकेँ एतेक हल्लुक नहि बनाओल जा सकैत अछि जे हमसभ सड़कपर चर्चाक विषय बनि जाइ। हमरा विचारसँ तँ ओहि व्यक्तिकेँ तुरंत प्राणदण्ड देल जाए। जकरा कारणसँ जानकीक ऊपर एहन संकट आबि गेल अछि ,जकरा कहला पर राजाराम एतेक दुखी भए गेल छथि ताहि व्यक्तिकेँ जीबित रहबाक कोनो अधिकार नहि अछि। सही मानेमे आजुक निर्णय इएह हेबाक चाही। जानकी अयोध्याक रानी छथि , रहबे करतीह। फेर बिना हुनका पुछने,बिना हुनका अपन बात कहबाक उचित अवसर देने एकतरफा एहन कठोर निर्णय केना लेल जा सकैत अछि?यदि कोनो बात भेबे कएल अछि ,यदि कतहुसँ जानकीक गलती छनिहे तँ हुनका अपन बात कहबाक अवसर तँ देल जानि। हमरा विश्वास अछि जे राजाराम अपन निर्णयपर अबस्स पुनर्विचार करताह।” तकर बाद शत्रुघ्न बजलाह- “हमहूँ लक्ष्मण आ भरतक विचारसँ सहमत छी। लंकामे जे किछु भेल, जाहि हालतिमे जानकीक रावण द्वारा हरण भेलनि, केना राम-रावण युद्ध भेल आ अंततोगत्वा रावणक विनाश भेल से सर्वविदित अछि। यदि रावण द्वारा बंदी बना लेलाक बाद जानकी दोषी छलीह तखन अग्निपरीक्षाक की औचित्य छल? यदि अग्निपरीक्षा सही छल तखन जानकीकेँ ओहिमे निर्दोष पओलाक बाद फेर-फेर ओहने प्रश्न किएक उठाओल जा रहल अछि? यदि केओ किछु गलत बाजि रहल अछि तखन राजा ओकरा दंड दितथि,मुदा एहिठाम तँ उल्टे हबा बहि रहल अछि। केओ किछु बाजल आ राजाराम ओकरा कहलापर जानकीकेँ एहि हद धरि दंडित करए बिदा भए गेलाह जे ओ अयोध्या राजक सीमासँ सभ किछु छोड़ि बाहर भए जाथु। अन्याय, अत्याचारक पराकाष्ठा थिक ई। एकर अबस्स विरोध हेबाक चाही। राजाराम यद्यपि हमरासभक आदरणीय छथि,हमसभ हुनका लेल अपन प्राणो उत्सर्ग करबाक लेल तैयार छी,मुदा जानकीओ तँ पूजनीया छथि,माता समान छथि,अयोध्याक रानी छथि। हुनका संगे एहन अन्याय कोना बरदास कएल जाएत?” राजाराम अपन भाइ लोकनिक विरोध देखि चकित रहथि। ओ सपनोमे नहि सोचने रहथि जे लक्ष्मण एना बजताह। भरत आ शत्रुघ्न सेहो विरोधेमे ठाढ़ भए जएताह। तथापि राजाराम अडिग छलाह। ओ अपन निर्णय फेर दोहरबैत छथि- “हम एहिसभ बातपर पहिने बहुत गंभीरतापूर्वक विचार कए लेने छी। यदि हम राजा रहब तँ ई निर्णय लागू हेबे करत। मुदा यदि तोरा लोकनिक इच्छा छह तँ हम तुरंत राजाक पदसँ त्यागपत्र लेल तैयार छी। तकर बाद तूँसभ अपना हिसाबे जे ठीक बुझाह से करियह । मुदा ई बात साफ-साफ सुनि लएह- “हम राजा रही वा हटि जाइ मुदा जानकीक परित्याग हेबे करतनि। ओ आब हमरा संगे नहि रहि सकतीह। प्रश्न हमरेटा नहि अछि,ई तत्कालीन समाजक समस्यासँ जुड़ल प्रश्न अछि। एकर समाधान व्यक्तिगत सुख-दुख किंवा पारिवारिक मान-मर्यादासँ ऊपर उठि कए करबाक हेतैक ।” “हम अहाँक बात नहि बुझि पाबि रहल छी। अहाँ अपन पतिक दायित्वसँ कोना बाँचि सकैत छी?” “हम अपन बात कहि चुकल छी।” “हम मारल जाएब तखनहि जानकी एहिठामसँ बिदा कएल जा सकतीह।”- लक्ष्मणक बात सुनि सभ सन्न छल। राजाराम तामसे आगि भए गेल छलाह। लागि रहल छल जे कोनो क्षण अनर्थ भए जाएत। “सभ गोटे शांत होउ। हमरा विचारसँ ई गंभीर विषय थिक। सभक भावना नीके अछि। संगे हमसभ अपन-अपन कर्तव्यसँ बान्हल छी। अंतिम निर्णय राजा रामेक हेतनि। मुदा हमसभ तत्काल एहि बैसारकेँ स्थगित करी । मोनकेँ शांत करी। घंटा भरि बाद फेर हमसभ एतहि उपस्थित होएब। बढ़िआँ होएत जे जानकीक पक्ष सेहो सुनल जानि। अस्तु,हुनको तखन एतइ बजा सकैत छिअनि।”-भरतक एहि तरहेँ बजलाक बाद बैसार तत्काल स्थगित भए गेल। ४ एमहर राजाराम अपन तीनू भाइक संगे विचार-विमर्श कए रहल छलाह,ओमहर जानकी शयनकक्षमे छटपट कए रहल छलीह। कतबो प्रयास करथि ,हुनका निन्न हेबे नहि करनि। कैक बेर उठैत,बैसथि,पानि पिबथि आ फेर सुतबाक प्रयास करथि। राजारामक शयनक तँ कोनो समय रहबे नहि करनि। ओ तँ दिन-राति राज-काजमे व्यस्त रहैत छलाह। कैकबेर तँ ओछाओनपर पड़ि रहलाक बादो उठि जइतथि,आगन्तुकक कष्टहरणक प्रयास करितथि। तखन कखनहु तीन बजे, कखनहु चारि बजे रातिमे सुतए अबितथि। कैक दिन तँ कौआ डाक दए दितए,तैओ राजाराम नहि सुति पाबथि,काजे करैत रहि जाथि । जानकी हुनकर प्रतीक्षामे राति भरि जगले रहि जइतथि। एहि करोटसँ ओहि करोट बदलैत रहितथि। की करितथि? स्त्रीक कर्तव्य निर्वाह तँ करबेक रहनि। हुनका नीकसँ बुझल रहनि जे बिना विशेष कारणकेँ सूर्यास्तक बाद राजाराम अन्यत्र रहिए नहि सकैत छलाह। अयोध्या सन विशाल राज आ तकर तरह- तरहक समस्यासभ सदिखन मुँह बौने रहैत छल। सही मानेमे कहल जाए तँ जानकीक व्यक्तिगत जीवन अखनहु तपस्ये बनि कए रहि गेल छलनि। “लगैत अछि राजाराम आइओ नहि आबि सकताह। की करू किछु नहि बुझा रहल अछि। ई राज-काज तँ हमर सौतिनि बनि गेल अछि। ने राजाराम एहि झंझटि सभमे फँसितथि ने हमर ई हाल रहैत। अछैते पतिकेँ हम नितान्त एसगरि जीबाक हेति विवश छी। एहिमे हुनकर कोनो दोष नहि छनि। ई हमरे अभाग थिक। हमरे कर्मक फल थिक। लगमे सभ किछु अछि तथापि जीवन एहन एकान्त भए गेल अछि। आखिर किएक? निश्चय एहिमे हमरे पापक भोग थिक। नहि तँ राजाराम सन पतिक पत्नी हेबाक गौरव होइतहुँ हम एहन हालमे पड़ल छी। जखन कखनहु हुनका कनीको अवसर भेटैत छनि ,ओ हमरा प्रसन्न करबाक प्रयत्नमे लागि जाइत छथि। कहि नहि ओ एक्को क्षण अपना लेल जीबैत छथि कि नहि? प्रायः नहि। ओ अपन जीवनक सर्वस्व अयोधयावासीक लेल समर्पित कए चुकल छथि।” जानकी इएह सभ सोचैत पलंगपर पड़ल-पड़ल करोट बदलि रहल छलीह। अचानक जेना कोठरी प्रकाशसँ भरि गेल। जानकीक देहसँ एकटा प्रकाशपुंज बहार भेल आ सोझे राजारामक मंत्रणा भवनमे विद्यमान राजाराम आ हुनकर तीनू भाइ लग पहुँचि गेल। मंत्रणा भवनमे अचानक चारूकात इजोते-इजोत पसरि गेल। राजाराम आ हुनकर भाइ लोकनि गहन विचार विमर्शक बाद कनी विश्राम कए रहल छलाह। ओतेक रातिओमे सेवक सभ हुनका सभकेँ अपन-अपन मनोनुकूल पेय दए रहल छलखिन । एतबेमे ओ कोठरी जगमगा उठल। सभक हाथ-पैर जेना हरा गेलैक। सभ तँ पहिनेसँ असोथकित छलाहे। आब ई की भेल? ओमहर राजारामकेँ तँ जेना लकबा मारि देलकनि। सौंसे देह शक्तिहीन भए गेलनि। पलंगपर कहुना कए करोट लागि गेलाह। हुनकर तीनू भाई लोकनिकेँ सेहो जेना करेंट लागि गेल होनि। जे जहिना छलाह ,तहिना रहि गेलाह। फेर ओ प्रकाशपुंज स्वयं अपन परिचय दैत अछि- “हम छी रामक शक्ति, शक्तिस्वरुपा । हम सदिखन जानकीक रूपमे हुनका लग विद्यमान रहैत छी। हमरा पता चलि गेल अछि जे राजाराम कोनो अनर्थ करबाक लेल सोचि रहल छथि। से हुनका चेतौनी देबाक हेतु हमरा एहिठाम आबए पड़ल अछि। हे राजाराम! अहाँ नीकसँ सुनि लिअ। जाबे हम अहाँ लग छी ताबते अहाँ शक्तिवान छी। हमरासँ फराक होइतहि अहाँक हालति ओहिना होएत जेना बिना करेंटकेँ बिजलीक तारक। अहाँ जन-जनमे लोकप्रिय छी तकर पाछू हमर शक्ति अछि,हमर त्याग अछि,हमर अहाँक लेल अनंत सिनेह अछि। नहि तँ कहि नहि अहाँक की हाल रहैत ,अहाँ कोन हालतिमे पहुँचि गेल रहितहुँ। सोचि लिअ आबो। हम अन्त-अन्त धरि अहाँक संग देबाक लेल आतुर छी। मुदा अहाँ ओहि मूर्ख जकाँ काज करए जा रहल छी जे ओही गाछकेँ काटि रहल होअए जकर डारिपर ओ स्वयं बैसल अछि। आगू अहाँक मरजी।श्रीहीन,शक्तिहीन राजा लोकक सेवा केना आ कतेक दिन कए सकत? नीकसँ सोचि लिअ।” एहिसँ पहिने कि राजाराम किछु सोचि सकितथि,हुनकर भाइलोकनि किछु बुझि सकितथि ओ प्रकाशपुंज अचानक तेजस्वितासँ परिपूर्ण स्त्रीक रूप ग्रहण कए लेलक। ओकरा सामने एना देखि राजाराम बेहोस भए गेलाह। हुनकर भाइ लोकनि हाँइ-हाँइ हुनकापर शीतल जलक फुहारा केलथि,बिअनिसँ ठंढा हबा केलनि। तखन जा कए राजाराम आँखि खोललनि,तथापि ओ एकदम निस्तेज लागि रहल छलाह। हुनकर हालति देखि तीनूभाइ कल जोड़ि कए ठाड़ भए गेलाह। “क्षमा कएल जाए राजाराम। हमसभ अपनेसँ जे किछु बजलहुँ से हमरसभक हृदयमे तत्काल उत्पन्न भावनाक अभिव्यक्ति मात्र छल। हमसभ नहि रोकि सकलहुँ अपना-आपकेँ। नहि सोचि सकलहुँ जे हमर सभक एना बाजब अहाँकेँ कतेक मर्माहत करत। आब तँ बाजि चुकल छी,जे शब्द निकलि गेल,सही-की गलत ओ वापस तँ नहि होएत। मुदा ई कहबाक काज नहि जे अंततः हमसभ अहाँक आदेशक पालन करबाक लेल कृतसंकल्प छी। हम सभ ओएह करब जे अहाँक आदेश करब। राजा अहीं छी आ अहीं रहब। एहि विषयपर भूतकालमे बहुत घमरथन भए चुकल अछि। आब फेर ओहि अध्यायकेँ नहि खोलबाक अछि। एहीमे सभक कल्याण थिक।” “तखन देरी की थिक? हमर आदेशानुसार लक्ष्मण काल्हि भोरे जानकीकेँ रथसँ अयोध्याक सीमाक पार गंगाक पार वाल्मीकि आश्रम लग पहुँचा आबथि।”-एतबा बाजि राजाराम ओछाओनपर पड़ि गेलाह। अचानक शक्तिस्वरुपा बिलीन भए गेलथि। चारू दिस अन्हार पसरि गेल। ओ कोठरी जेना सुन्न भए गेल। ५ एमहर राम बिछाओन धेने छलाह। ओमहर जानकी रामक बाट तकैत-तकैत थाकि गेल रहथि। शक्तिस्वरुपाक अचानक रामक विमर्श भवनमे प्रकट होएब आ थोड़बे कालमे विलीन भए जाएब, एकटा रहस्य बनि कए रहि गेल छल। ने राजाराम ने हुनकर भाए लोकनि शक्तिस्वरुपाकेँ चिन्हि सकलथि,किंवा यदि चिन्हिओ गेल होथि तँ किछु कहि नहि सकलथि। ओ सभ तँ स्वयं परेसान रहथि। ई तँ स्पष्टे छल जे तीनू भाइ जानकीक निर्वासनक समर्थनमे नहि रहथि। से बात ओ अपना भरि राजारामकेँ कहबो केलखिन। कहबेटा नहि केलखिन,विरोधो केलखिन। मुदा जखन हुनका सभकेँ बुझेलनि जे राजाराम निर्णय लए चुकल छथि ,ओ अपन बातपर अडिग छथि, तखन ओ सभ करबे की करितथि? ओ सभ नहि चाहथि जे राजाराम संगे सामना-सामनी झंझटि भए जाए । से होइत तँ ओ विनाशकारी होइत। ओहिमे ककरो हितसाधन संभव नहि छल। अयोध्या नरक बनि जाइत। अस्तु,तीनू भाइ परिस्थितिसँ समझौता केलनि आ राजारामक आदेश मानि लेलनि। आर कोनो उपायो नहि छल। मुदा शक्तिस्वरुपा बैसले नहि रहि गेलीह। “आब बहुत भए गेल। जानकीक शक्तिक सही अनुमान अखनहु अयोध्यावासीकेँ नहि भेलनि अछि। एसगरे राजाराम की कए सकताह? जे राजा स्वयं दुखी अछि,असंतुष्ट अछि,परेसान अछि ओ अपन जनताकेँ केना सुखी राखि सकत?असंभव। हे ओ तँ चलू हुनकर समस्या छनि। मुदा जानकीकेँ अपमानित करबाक अधिकार ककरो नहि अछि। ओ कोनो मामूली नहि छथि,जन्महिसँ विशिष्ट छथि। ओ रामक संग अयोध्याक कल्याणक लेल सोचि रहल छलीह। असलमे भावी प्रबल होइत अछि। जानकीक भाग्यमे कष्टे-कष्ट लिखल छनि। तँ केओ की करत? लोक ई बात कहि सकैत अछि। मुदा ई सभ चलए बला नहि अछि। हम छी ने,हुनके शक्तिसँ निस्सृत शक्तिस्वरुपा। सभकेँ ओकर गलतीक फल भोगहि पड़तैक। मिथिलाक असंख्य पुरुष आ स्त्रीकेँ पता लगबाक देरी अछि। फेर देखि लेब तमासा ।” हनुमानजीकेँ केना-ने-केना एहि घटनाक जानकारी भेटलनि। ओ कहिओ नहि सोचने रहथि जे एहनो भए सकैत अछि। ओ मोने-मोन सोचैत छथि- “जे राम जानकीक अपहरणक बाद गाछ-बिरीछ,जंगलक समस्त जीव-जन्तुसँ जानकीक पता पुछैत रहथि,हुनकर वियोगमे दिन-राति कनैत रहथि, रावण सन प्रतापी राजासँ यद्ध कए ओकरा नष्ट कए देलथि ,सएह राम एकटा मामूली आदमीक कहलापर जानकीक परित्याग कोना कए सकैत छथि? मुदा हम करी तँ की करी? एक दिस राजाराम आ दोसर दिस माता जानकी। ककर पक्ष ली,ककरा बुझाबी।एहन धर्मसंकटसँ तँ रामे रक्षा करथि। ओ तँ सर्वज्ञाता छथि,सर्वशक्तिमान छथि। जे चाहथि से कए सकैत छथि ,तखनहु जानि बुझि कए हुनके संगे, जे हुनकर समस्त शक्तिक श्रोत छथिन,एहन अन्याय करबाक हेतु आतुर किएक छथि?” ओमहर वाल्मीकि मुनिकेँ ध्यानक माध्यमसँ सभ किछु पता लागि गेल रहनि। हुनकर रामायणक अपूर्ण भागक रचना होमए जा रहल छल। ओ मोने-मोन हनुमानजीकेँ ध्यान केलथि । हुनकासँ जानकीक रक्षा करबाक प्रार्थना केलनि। “ऋषिवर! ई की कहि रहल छी? माता जानकी सर्वशक्तिमान छथि। हुनका ककरो रक्षाक प्रयोजन नहि छनि,ओ स्वयं जे चाहतीह से कए सकैत छथि। राजाराम तँ हुनके शक्तिक बले ठाढ़ छथि,नहि तँ …।” “ई सभ तँ भेल मुदा व्यवहारमे ,यथार्थमे जे भए रहल अछि से तँ अहाँ देखिए रहल छी ने।” “चिंता नहि करू ऋषिवर! शक्तिस्वरुपा अपन काज कए रहल छथि। राजारामकेँ ई सभ बहुत महग पड़तनि। देखिऔ तँ सही जे की होमए जा रहल अछि।” “अहाँ तँ बुझौअल बुझा रहल छी। हमरा साफ- साफ किएक ने कहैत छी जाहिसँ रामायणक रचना आगू बढ़ि सकए।हमर कलम आगू चलबाक हेतु आतुर अछि।” “राजारामसँ जानकीक समस्त शक्ति शक्तिस्वरुपा बनि कए निकलि चुकल छथि। ओ जानकीक सम्मानक रक्षाक लेल कृतसंकल्प छथि। अहाँ बेसी चिंता नहि करू ऋषिवर! कलम तैयार राखू। रामायण आगू बढ़ि रहल अछि।” ६ जानकी अखनहु बेहोस पड़ल छथि। शक्तिस्वरुपा हुनका ओहिना छोड़ि बिदा भेलीह मिथिला। ओ वायुमार्गसँ जानकीधाम पहुँचैत छथि। ओहीठामसँ ओ अपन शक्तिक तरंगसँ समस्त मिथिलाबासीकेँ आह्वान करैत छथि- ई समय सुतबाक नहि अछि जानकी जे समस्त मिथिलाक माता समान छथि, जिनका प्राप्त कए जनक सभ दिन आह्लादित रहलाह आनन्दमे रहलाह कतेकदिन दरि बजैत रहि गेल छल रसनचौकी जखन रामसंग हुनकर बिआह भेल छलनि जखन अयोध्यासँ दसरथ अनने छलाह सैकड़ों बरिआती एक्के संगे चारू भाइकेँ भेल रहनि बिआह एक्के परिवारमे केहन मनोरम छल ओ दृश्य सौंसे मिथिला नाचि रहल छल गाबि रहल छल बाजि रहल छल बधाबा गाम-गाम जे समस्त मिथिलाक हृदयमे जन-जनमे विराजित छथि जे आबए बला हजारों साल धरि मोन पाड़ल जेतीह एहि लेल जे ओ अपन पतिक अनुसरण करैत सभ किछु त्याग कए देलथि वर्षक-वर्ष जंगल-झाड़मे बौआइत रहलथि बिसरि गेलथि राजशी ठाठ-बाट जे हुनका सभ दिन जनकक राजमे सुलभ छलनि जे राबण सन दुष्ट आ अहंकारी राजाकेँ नहि देलनि कहिओ भाव आ सहैत रहलीह घोर कष्ट लंकाक पंचवटीमे जिनका तरुआरिक धार नहि डरा सकलनि जे सभ दिन रहलीह समर्पित रामकेँ से जानकी निर्वासित भए रहल छथि अयोध्यासँ ओही राम द्वारा जे लए चुकल छथि हुनकर अग्निपरीक्षा लंका विजयक बाद फेरसँ अंगीकार करबासँ पूर्व कहू ई केहन अन्याय अछि जे जानकी भोगबाक हेतु विवश छथि गर्भवती होइतहुँ छोड़ल जा रहल छथि निरापद जंगलमे बिना कोनो साज-बाजकेँ की मिथिलाक युवक सहि सकत ई अन्याय नहि, नहि तखन उठू ,देरी नहि करू ई प्रश्न जानकीक व्यक्तिगत नहि छनि अपितु,समस्त मिथिलावासीक आत्मसम्मानकेँ चुनौती अछि जागू,जागू हे मिथिलावासी जागू विलंब नहि करू जानकी बजा रहल छथि उठाउ अबाज अन्यायक विरुद्ध जे जानकी भोगबाक लेल विवश कए देल गेल छथि शक्तिस्वरुपाक आह्वानपर जानकीधामक लगपासमे हंगामा मचि गेल। रातिएमे ई समाद काने-कान समस्त मिथिलामे पसरि गेल। राजा जनक ओहि समय विश्राममे छलाह। प्रातः ब्राह्मीमुहुर्तमे उठले छलाह कि प्रहरी दौड़ल आएल- “महाराज! महाराज!” “की भेलह? भोरे-भोर तूँ परेसान किएक छह?” “हम एकटा महत्वपूर्ण सूचना देबए आएल छी।” “बाजह,जल्दी बाजह।” “महाराज पता ने की कारण अछि जे सौंसे मिथिलाक युवक जानकीधाममे उपस्थित भए रहल छथि। ओ सभ जोर-जोरसँ नारा लगा रहल छथि- मैथिलीक अपमान नहि सहत मिथिला चलै-चलू यौ मिथिलावासी ,जानकीधाम चलू।देरी नहि करू।” “मुदा जानकीकेँ भेलनि की?” “से तँ नहि कहि सकैत छी। हम तँ जे पता लागल से कहि देलहुँ।” “ठीक छैक। तूँ जाह। हम पता लगबैत छी जे बात की छैक। जानकी सुरक्षित छथि कि नहि।ओहुना जकर राजाराम सन प्रतापी पति होथि से असुरक्षित कोना भए सकैत छथि? भए सकैत अछि जे ई सभ कोनो षड़यंत्र होइक।” प्रहरी वापस चलि गेल। महाराज जनक तुरंत प्रमुख अधिकारीलोकनिकेँ बजओलनि। ओ सभ दौड़ले राजा जनक लग पहुँचि जाइत छथि। राजा जनक हुनका लोकनिक संग मंत्रणा करैत छथि। राजा जनक आ हुनकर प्रमुख अधिकारीलोकनिक बीचमे मंत्रणा राजा जनक आ हुनकर प्रमुख अधिकारीलोकनि बीचमे मंत्रणा बड़ीकाल धरि चलैत रहल। “हमसभ तँ रामक राज तिलकक समयमे अयोध्यामे छलहुँ। तखन तँ कोनो समस्या नहि बुझाएल। जानकी बहुत सम्मानक संग रामक बामाँ भागमे अपन उचित स्थानपर राजसिंहासनपर विद्यमान छलीह। राम राज्याभिषेकक समय उपस्थित अयोध्याक जनता जानकीकेँ राम संग बैसल देखि भावविभोर छलाह। ककरहु कोनो प्रकारक दुबिधा नहि छल। अचानक केना की भेलैक, एहि बातक सही जनतब होएब जरूरी अछि।”-जनकजी बजलाह। “हमरा पता लागल अछि जे संपूर्ण मिथिलामे केना-ने-केना अयोध्यासँ जानकीक निर्वासनक समाचार पसरि गेल अछि। सैकड़ोंक संख्यामे मिथिलाक युवकसभ जानकीधाममे उपस्थित छथि। सभसँ आश्चर्यक बात तँ ई अछि जे अचानक एकटा मैथिलीपुत्र नामक युवक हुनकासभक नेतृत्व कए रहल छथि । शक्तिस्वरुपा सेहो ओतए पहुँचि गेल छथि।” “शक्तिस्वरुपा के? ” “सुनबामे आएल जे जखनहि राजाराम जानकीक विरुद्ध अपन निर्णय भाइलोकनिकेँ सुनओलनि,तखनहि हुनकर देहसँ सभटा शक्ति बहरा गेलनि,ओ निष्तेज भए गेलाह, व्याकुल भए ओछाओनपर पड़ि गेलाह। तखनेसँ शक्तिस्वरुपा जानकीक सम्मानक रक्षार्थ अयोध्या सहित मिथिलावासी लोकनिकेँ उद्वेलित केने छथि।” “मुदा ई संभव केना भेल?कहाँ अयोध्या ,कहाँ जानकीधाम? एतेक जल्दी ई सभ केना भेल? ” “ई सभ शक्तिस्वरुपाक चमत्कार छनि । महाराज! ओ कोनो साधारण मनुक्ख नहि छथि। जखन जतए चाहथि क्षण भरिमे पहुँचि सकैत छथि। जे चाहथि कए सकैत छथि।” “तखन तँ राजारामकेँ बहुत मोसकिल छनि।” “निश्चित महाराज! हुनकर परेसानीक तँ कोनो अंते नहि बुझा रहल अछि। एकदिस तँ ओ श्रीहीन भए गेल छथि। दोसर दिस जाहि जनताकेँ प्रसन्न करबाक हेतु ओ जानकीकेँ निर्वासित केलनि,सेहो तमसा गेल छनि।” “से केना? ” “सुनबामे आबि रहल अछि जे अयोध्यावासीसभ जानकीकेँ कोनो हालतिमे अयोध्यासँ बाहर नहि जाए देबए चाहैत छथि।” “एतेक जल्दी ओ सभ ई बात कोना बुझि गेलथि?” “शक्तिस्वरुपाक कमाल छनि श्री मान् !” “तखन तँ बहुत चिंताक बात अछि। प्रमुखसचिवक की विचार छनि?” “सभसँ पहिने तँ हमरासभकेँ अपन राजकेँ नियंत्रित रखबाक अछि। पता नहि ई मैथिलीपुत्रके अछि? अचानक जननायक बनि कए सामने प्रकट भए गेल अछि। मिथिलावासीसभ ओकरा पाछू ठाढ़ो भए गेल छथि। हुनकासभकेँ एहि बातक ध्यान रखबाक चाहिअनि जे मिथिलामे जनक सन राजा छथि। ओ स्वयंसमर्थ आ न्यायप्रिय छथि। फेर अयोध्यासँ हमरा लोकनिकेँ बहुत घनिष्टता रहल अछि,अनुराग रहल अछि। हमर चारि-चारिटा बेटी ओतुका राजपरिवारमे विवाहित छथि। प्रश्न मात्र जानकीएक नहि अछि। आर तीन बहिन तँ ओतहि छथि। तेँ संयम आ संतुलन बहुत जरूरी अछि। फेर अयोध्या कोनो मामूली राज्य तँ अछि नहि। राजारामक धनुषक टंकारक आगू ककरो ठहरब मोसकिल होएत। जखन रावण सन प्रतापी राजाकेँ ओ मारि देलनि, ओकर समस्त परिवार नष्ट कए देलनि तखन अनकर तँ बाते छोड़ू।” “तकर माने की ? की हम सभ जानकीक रक्षा नहि करी? मूकदर्शक बनि कए रहि जाइ? यदि हमसभ किछु नहि करी आ मैथिलीपुत्रक नेतृत्वमे समस्त मिथिला अयोध्या दिस बढ़ि जाए तखन की होएत? हमरा सभक इज्जतिक की होएत?”-जनक जी बजलाह। “युद्ध एहि समस्याक समाधान नहि थिक महाराज! हमसभ ज्ञान-विज्ञानक बलेँ दुनिआमे प्रतिष्ठित रहलहुँ अछि। भावनामे बहि कए अनुचित काज नहि करबाक अछि। मानलहुँ जे जानकीक प्रतिए सिनेहक कारण मिथिलाक युवकसभ उत्तेजित छथि,उद्वेलित छथि,मुदा ओ सभ भ्रमित बुझाइत छथि। हुनकासभकेँ सही मार्गदर्शनक प्रयोजन छनि। अन्यथा ओ सभ जानकीकेँ मदति की करताह,अपितु मिथिलाक लेल भारी समस्या उत्पन्न कए देताह।” “अखन बेसी वाद-विवादक समय नहि अछि। प्रमुखसचिव तुरंत जानकीधाम जाथि आ ओहिठामक स्थितिकेँ नियंत्रणमे लेथि। मैथिलीपुत्रसँ हमरा भेंट करबाक व्यवस्था करथि। हम हुनकासँ गप्प करबाक लेल बहुत उत्सुक छी। आर जे होउ,ओ बहुत मार्मिक बात उठओने छथि ताहि लेल सभ किछु प्राण उत्सर्ग करबाक लेल सेहो तैयार छथि। ई मामूली बात नहि भेल।”-जनक जी बजलाह। “अहाँ चिंता जुनि करू महाराज। हमसभ तुरंत जानकीधाम जाइत छी। ओहिठाम जेना जे होएत तकर सूचना हम अपनेकेँ दैत रहब।” ७ ओमहर जानकीधाममे लोकक मेला लागि गेल छल। की जबान,की बूढ़,की स्त्री ,जे जतहि छल जहिना शक्तिस्वरुपाक आह्वान सुनलक,ओतहिसँ जानकीधाम दिस बिदा भए गेल। एतेक जल्दी ओतए लोकक मेला लागि जाएत से ओहो नहि सोचने रहल हेतीह। मुदा जानकीक प्रतिष्ठा आ मर्यादासँ जुड़ल प्रश्न सुनितहि समस्त मिथिलावासी भाव विह्वल भए गेल रहथि। जानकीधाममे उपस्थित भीड़ रहि-रहि कए नारा लगा रहल छल- “जय जानकी! जय जानकी! ” शक्तिस्वरुपाकेँ केओ देखि नहि पाबि रहल छल,मुदा हुनकर ओजस्वी भाषणसँ सभ प्रभावित छल। अचानक ओहि भीड़सँ गौर वर्ण ,छओ हाथक एकटा युवक बहराइत छथि। हुनकर हाथमे मिथिलाक प्रसिद्ध माछ झंडा छलनि। दोसर हाथमे जानकीक चित्र छलनि। ललाटपर लाल ठोप छलनि। हुनका देखितहि ओहिठाम उपस्थित लोकसभ एकस्वरमे बाजि उठल- “मैथिलीपुत्र अमर रहथि! “ मैथिलीपुत्र मंचपर ठाढ़ भए ओतए उपस्थित लोकसभकेँ आह्वान करैत छथि- “समस्त मिथिलावासी भाइ-बहिनकेँ सादर प्रणाम! अहाँसभकेँ एहिठाम उपस्थित देखि हम बहुत प्रसन्न छी। हमरा आब विश्वास भए गेल अछि जे मिथिला जानकीक अपमान नहि सहत,ओकर प्रतिकार कइए कए रहत। जानकीकेँ हुनकर मर्यादा अनुकूल स्थान दिआ कए रहत। कहू हम सत्य बाजि रहल छी कि नहि?” “अटल सत्य मान्यवर! मुदा हमसभ अपनेक परिचय चाहब,बुझए चाहब जे अपनेकेँ कहबाक तात्पर्य की अछि? जानकीकेँ की परेसानी भए गेलनि? ओ तँ मर्यादापुरुषोत्तम रामक अर्धाङ्गिनी थिकीह। तखन हुनका की विपत्ति भेलनि जे अचानक ई सभ भए रहल अछि?सभ बात परिछा कए कहल जाओ।” “अहाँसभ शांत तँ होउ। सभ बात शक्तिस्वरुपा अपने अहाँसभक सम्मुख रखतीह। हम तँ अहींक बीचक लोक छी। मिथिलाक संतान छी। अहाँक भावनाक परिपोषक छी।सभसँ ऊपर जानकीक सम्मानक रक्षार्थ प्रतिवद्ध छी।इएह थिक हमर परिचय। ने हमर कोनो जाति अछि ने कोनो गाम। मिथिले हमर जाति अछि आ मिथिले गाम।हमहीं नहि, एहिठाम उपस्थित सैकड़ों युवकसभक एक्के लक्ष्य छनि। माता जानकीक लेल जिअब, हुनके लेल मरब। जरूरी हेतैक तँ अयोध्या के कहए,कालोसँ हमसभ लड़ि जाएब। जय जानकी! जय मिथिला! आब अहाँसभ धैर्यपूर्वक शक्तिस्वरुपाक आह्वान सुनू। सभ किछु अपने बुझा जाएत।” ओहिठाम उपस्थित सैकड़ों लोकसभ एकस्वरसँ चिकरि उठलाह- जय जानकी! जय मिथिला! जय मैथिलीपुत्र! सभ एही प्रयासमे छथि जे शक्तिस्वरुपाकेँ देखिअनि,हुनकर परिचय प्राप्त करी,हुनका मुँहे सुनी जे हुनकर की अभिप्राय छनि? जानकीकेँ के की कष्ट देलकनि? अखनहि तँ लंका विजयक बाद राजारामक राज्याभिषेक भेल छल। जानकी रानीक रुपमे सुशोभित भेल छलीह। तखन ई सभ की सुनि रहल छी? अचानक लागल जेना बिजलौका चमकल। सौंसे प्रकाशमय भए गेल। उत्तरपूब कोन दिससँ जेना ठनकाक अबाज सुनाएल। मुदा केओ किछु देखि नहि पाबि रहल अछि। लोकसभक जिज्ञासाकेँ शांत करबाक हेतु शक्तिस्वरुपा बाजि उठलीह- हे हमर भाइ-बहिन लोकनि! हम छी शक्ति जे जानकीक रूपमे राजाराम लग सदिखन विराजमान रहल छी। मुदा अखन ओ स्वयं बिदति केलनि आ हमरा अपनासँ पृथक कए देलनि। हम शक्तिस्वरुपा जानकीक मर्यादाक रक्षार्थ हुनकर नैहरक लोककेँ आह्वान करैत छी। आब चुप रहबाक समय नहि अछि। जानकीकेँ एकटा मामूली आदमीकेँ कहलापर अयोध्यासँ निर्वासित कए देल जानि जखन की हुनका संतान होनहारी छनि। से कतएसँ उचित कहल जाएत? मुदा से कएल जा रहल अछि। अहीं कहू जे इ उचित अछि? “कदापि नहि। हमसभ से नहि होमए देब। जान-रहए की जाए।जाबे हमसभ जीबि रहल छी,ताबे जानकीक सम्मानक रक्षा अबस्स करब।अहाँ स्पष्ट करू जे हमरासभकेँ की करबाक अछि।” “अहाँलोकनिक भावनासँ हम पूर्ण परिचित छी। हमरा पूर्ण विश्वास छल जे अहाँ लोकनि अवसर अएलापर जानकीक संगे अबस्स ठाढ़ हेबनि। के कहैत अछि जे ओ अबला छथि? नहि,नहि ,कदापि नहि। ओ तँ स्वयं शक्तिसंपन्न छथि। बस मर्यादाक कारण सभ किछु सहैत रहि गेल छथि। मुदा कोनो बातक एकटा हद होइत छैक। आब तँ तकर सीमा पार कए रहल अछि। हमरा लोकनिक जीवन-मरणक प्रश्न उपस्थित भए गेल अछि। जानकीक सम्मानक रक्षा होएत अन्यथा हमसभ जान दए देब।” मिथिलाक कण-कण जानकीक प्रतिए सिनेहसँ परिपूर्ण अछि। हमर अभिन्न अंग छथि। अखनहु भोरसँ साँझ धरि घर-घर हुनकर चर्चा होइते रहैत अछि। केना जानकीक जन्म भेलनि,केना जनकजी हर चलबैत काल हुनका देखलनि। केना ओ जनमौटीकेँ पाबि प्रसन्न भेल रहथि। तकर बाद सभ दिन राजसी ठाठ-बाटमे ओ पालल गेलीह। ई तँ एकटा संयोगे छल जे विश्वामित्रक संग आएल रामकेँ पुष्पवाटिकामे जानकी संग भेंट भेलनि ओ भेंट अविस्मरणीय बनि गेल। तकर बाद तँ जे भेल से सभ जनिते छी। केहन सुखद माहौलमे जानकीक बिआह भेलनि। समस्त परिवारमे आनन्दक माहौल छल। जानकी सासुर गेलीह। संगे हुनकर आर तीनू बहिनक सेहो बिआह भेलनि। चारू बहिन एक्के ठाम अयोध्याक राज परिवारमे आबि गेलीह। आनन्दे-आनन्द छल। मुदा कहि नहि एहिमे ककर नजरि लागि गेल?जखने रामकेँ वनबास भेलनि जानकीक दुर्दिन शुरू भए गेलनि। सभ किछु सहि आब जखन राम राजा बनलाह,जानकी रानी बनि गेलीह ,तखन ई अचानक की भए रहल अछि?किएक भए रहल अछि? शक्तिस्वरुपाक ओजपूर्ण बात सुनि कए माहौल गरमा गेल।सभ तरह-तरहक अस्त्र-शस्त्र उठा लेलक । लगैत छल कोनो क्षण किछु भए जाएत। सभ अयोध्या दिस बिदा हेबाक लेल तैयार छल। मैथिलीपुत्र हुनकालोकनिक उत्साह देखि दंग छलाह। एतबेमे जनकक प्रमुखसचिव ओतए उपस्थित भेलाह। ८ प्रमुखसचिव जानकीधामक माहौल देखि विस्मित छलाह। हुनका संगे जनकपुरसँ आएल वरिष्ठ सैन्य आ पुलिस अधिकारी लोकनि सामान्य वस्त्रमे चारूकात पसरि गेलथि । ओ सभ लोकक मोनक भाव अखिआसि रहल छलाह। ओहिठाम उपस्थित भीड़ एक हिसाबे उनमत्त छल। जकरा जे मोन होइक से बाजए। जकरा जे नारा लगेबाक मोन होइक से लगाबए। ककरो कथुक परिबाह नहि रहैक,ककरो भय नहि रहैक। ओ सभ किछु करबाक हेतु आतुर छल। बस एकटा चिनगी चाही आ सभ किछू धू-धू कए स्वाहा होमए लागत। प्रमुखसचिव केँ चारूकात पसरल अपन सहायकलोकनिसभसँ गुप्त समाद भेटि रहल छलनि। सभसँ बेसी आश्चर्य आ चिंताक कारण तँ शक्तिस्वरुपा छलीह। मैथिलीपुत्र लए कए कम परेसानीमे रहथि से बात नहि। मुदा कम सँ कम ओ देखल जा सकैत छलाह। हुनकर आकृतिक ऊपर बनैत-बिगड़ैत भाव देखल-परेखल जा सकैत छल। मुदा शक्तिस्वरुपा? हुनकर तँ कोनो थाहे नहि छलनि। हुनका केओ की कए सकैत छल? किछु नहि। “एहन मे की कए सकताह महाराज जनक? ओ यदि स्वयं आबि जाथि,तथापि किछु नहि कए सकताह। ई भीड़ तँ तेहन उन्मादी अछि जे केओ एकरा नहि नियंत्रित कए सकैत अछि। मात्र शक्तिस्वरुपा आ मैथिलीपुत्र किछु करथि तँ करथि।” सभ किछु देखि सुनि लेलाक बाद प्रमुखसचिव मंचपर उपस्थित होइत छथि- “हे मिथिलावासी! सुनू हमर बात। अहाँसभक दुख बहुत उचित अछि। राजा जनक अपने लोकनिक भावनाक आदर करैत छथि। अपने लोकनिक कहल कोनो बात एहन नहि अछि जकरा गलत मानल जा सकत। असलमे राजा जनक घंटो एहि समस्यापर हमरासँ सभ विकल्पपर चर्चा केलनि अछि। अयोध्या बहुत मजगूत राज्य तँ अछिए ,संगे हमरा लोकनिक बहुत आप्त रहल अछि। जानकी आ हुनकर तीनटा बहिन एक्के परिवारमे बिआहल गेल छथि। एहिसँ पूर्वो जखन चित्रकुटमे हमसभ रामक बनवासक क्रममे गेल रही तखनहु परिस्थिति कोनो सामान्य नहि छल। मुदा बहुत प्रयासक बाद युद्ध टारल जा सकल। राम स्वयं कोनो हालतिमे राजा बनबाक लेल तैयार नहि भेलथि। एहन हालतिमे जनक आ हुनकर सेना की करतिथि? सभ केओ वापस चलि अएलाह। राम अड़ि गेलाह, चौदह वर्ष वनबासक संकल्पकेँ पूर्ण करबाक लेल। आर बात तँ छोड़ू,पिताक मृत्युक समाचार सुनिओ कए ओ हुनकर श्राद्ध लेल अयोध्या नहि लौटलथि। रामकेँ कथुक लालसा नहि छनि,राजमद नहि छनि,कोनो छल-प्रपंचक तँ प्रश्ने नहि उठैत अछि । सोचल जा सकैत अछि जे ओ कतेक महान छथि। तखन जानकीक संगे एना किएक भए रहल छनि,ओहो बेरि-बेरि । ई विषय अबस्स विचारणीय अछि। “हम सभ बुझि गेलहुँ। अहाँसभ बुते किछु नहि होएत। जानकी एहिना बेरि-बेरि अपमानित होइत रहतीह। मात्र कहि देलासँ तँ हुनकर दुख कम नहि हेतनि। जखन गर्भिणी जानकीकेँ अपन घर-परिवारसँ हटा देल गेलनि तखन बाँचिए की गेल? ई तँ अपमानक पराकाष्ठा भेल। आब हमसभ स्वयं समाधान करब। मिथिलाक समस्त युवक ई सपथ खाइत छथि जे जाबत जानकी आ हुनकर संतानकेँ सम्मानपूर्ण स्थान नहि भेटि जेतनि ताधरि हमसभ चैन नहि लेब। एहि लक्ष्यक प्राप्तिक लेल हमसभ तत्काल प्रभावसँ जानकीधुजावाहिनीक गठन करबाक घोषणा करैत छी।” “अहाँसभ उत्साह प्रशंसनीय अछि। मुदा एहने परिस्थितिमे मानसिक संतुलन बनेबाक काज रहैत अछि। युद्ध कोनो समस्याक समाधान नहि होइत अछि। हमसभ जानकीक सम्मानक रक्षाक हेतु प्रतिवद्ध छी। एहिमे कोनो संशयक प्रश्ने कहाँ होइत अछि? मुदा ताहि लेल युद्ध अंतिम विकल्प हेबाक चाही। कारण एकर परिणाम ककरो लेल नीक नहि होइत अछि। फेर पारिवारिक समस्याक समाधान युद्धसँ भइए केना सकैत अछि?” “चुप रहू। ई आब पारिवारिक समस्या कतए रहि गेल। जखन धरि जानकी अयोध्याक राजभवनमे छलीह ताधरि तँ ओ पारिवारिक समस्या भए सकैत छल। मुदा आब तँ ओ अपने पति द्वारा अपने घरसँ निष्काषित कएल जा रहल छथि। सुनैत छी लक्ष्मण हुनका रथपर लए अयोध्यासँ फटकी जंगल दिस बिदा भए गेल छथि। आब तँ आर-पारक लड़ाइ हेबे करत। अहाँ चुपचाप देखैत रहू। ई युद्ध राजासभक बीचमे नहि,अपितु मिथिलावासी द्वारा अयोध्याक दुष्ट लोकसभसँ लड़ल जाएत जकरा कारण जानकीक ई गति भेलनि। जानकीधुजावाहिनी बनि चुकल अछि। शक्तिस्वरुपा एकर सर्वस्व थिकीह। हमसभ तँ निमित्र मात्र छी।” मिथिलापुत्रक नेतृत्वमे मिथिलावासीक दृढ़ विचार सुनि कए प्रमुखसचिव केँ ठकबिदोर लागि गेलनि,किछु फुरेबे नहि करनि जे आब की कएल जाए,एहि परिस्थितिसँ कोना पार पाओल जाए। ओ तुरंत ओहिठामक परिस्थितिक जनतब जनककेँ देबाक हेतु सदल-बल जनकपुर वापस बिदा भए गेलाह। ९ राजारामक आदेश पाबि लक्ष्मण जानकी संगे रथपर सबार भए जाइत छथि। रथ तेजीसँ अयोध्याक सीमासँ बाहर भेल जा रहल अछि। जानकीकेँ किछु नहि बुझल छनि जे की होमए बला अछि। ओ तँ आनन्दमे छथि जे हुनकर इच्छाक सम्मान करैत राजाराम हुनका अपन अनुज संगे जंगल आ नदीक विहंगम दृश्यक अवलोकन करेबाक हेतु पठा रहल छथि। मुदा लक्ष्मणकेँ तँ सभ बात बुझल रहनि। तेँ ओ बहुत दुखी छलाह,उदास चलाह। रहि-रहि कए छातीमे दर्द उठि रहल छनि,मोनमे घोर कष्ट छलनि । तथापि,ओ बहुत मोसकिलसँ अपनाकेँ संयत रखने छलाह। मोने-मोन विधाताकेँ उपराग दए रहल छलाह- “हे विधाता! अहाँ एहन क्रूर किएक भए गेलहुँ? हे जे भेलहुँ से भेलहुँ ,मुदा एहन हृदय विदारक दृश्य देखबाक हेतु हमरे किएक चुनलहुँ।” लक्ष्मण रहि-रहि कए कानि रहल छलाह। हुनकर आँखिसँ नोर खसिते जा रहल छलनि। ओ लगातार अंगपोछासँ अपन आँखिसँ खसैत नोरकेँ पोछैत छलाह। एहनमे ओ कतेक काल धरि अपन मनोभावकेँ जानकीसँ नुका सकैत छलाह। आखिर जानकी हुनका एना भाव विह्वल देखि पुछिए लेलखिन- “बात की अछि? अहाँ हमरासँ जरूर किछु नुका रहल छी ।” लक्ष्मण किछु उत्तर नहि दए पाबि रहल छथि। हुनका लोकनिक रथ आब अपन स्थानपर पहुँचि गेल अछि। अयोध्याक सीमा बहुत फटकीए छुटि गेल अछि। आब लक्ष्मण द्वारा राजारामक आज्ञाक पालन करबाक क्षण आबि गेल अछि। मुदा अखनहु जानकी लक्ष्मणक अभिष्टसँ परिचित नहि छथि। से होउ,मुदा लक्ष्मणक मनोदशा ,हुनकर मुखाकृतिपर उभरैत अत्यंत करुणापूर्ण भाव जानकीसँ नुकाओल नहि जा सकल। “अहाँ एना कानि किएक रहल छी?” आब लक्ष्मण लग कोनो विकल्प नहि रहि गेल छलनि। हुनका राजारामक आदेशक क्रियान्वयन करबाक छलनि। ओ अपन छातीकेँ वज्र करैत बजैत छथि- “आब अहाँसँ बिदा लेबाक समय आबि गेल अछि…।”ओ आर किछु बाजए चाहैत छलाह,मुदा बाजि नहि सकलाह। ठोह पारि कए कानए लगलाह। रथ रूकि गेल। लक्ष्मण रथसँ उतरि गेलथि,रथसँ उतरितो काल कनिते जा रहल छथि। जानकी सेहो रथसँ उतरि गेल रहथि। लक्ष्मणकेँ एना बजैत आ तकर बाद कनैत देखि जानकी चिकरि उठैत छथि- “अहाँ साफ-साफ किएक नहि बजैत छी। हम तँ एहिठाम भ्रमण करबाक हेतु आएल छलहुँ,फेर ई बिदा हेबाक गप्प कतएसँ आबि गेल?हम एहिठाम एसगरि रहिए कए की करब? की राजाराम पाछूसँ आबि रहल छथि?” “नहि,नहि। से सभ किछु नहि भए रहल अछि। हमरा ओ आदेश देने छथि जे अहाँकेँ अयोध्याक सीमासँ बाहर वाल्मीकि आश्रम लग पहूँचा दी आ स्वयं वापस चलि आबी।” “एहन जुलुम,एहन छल ,ओहो अपन पत्नीक संगे जे गर्भिणी अछि,जे जल्दीए हुनकर संतानक माए बनए जा रहल अछि। ई तँ घोर अत्याचार अछि,अमानवीय अछि। अफसोच अछि जे एहन क्रूर काजक लेल अहीं सहयोगी भेलहुँ।” “हम अपना भरि हुनका बुझेबाक बहुत प्रयास केलहुँ,हुनकर हाथ-पैर जोड़लहुँ,मुदा ओ एकदम कठोर भए गेलाह। हम आर कइए की सकैत छलहुँ? राजाज्ञाकेँ मानबाक हेतु हम विवश भए गेलहुँ।” “राजाज्ञा, राजाज्ञा की रटि रहल छी। अहाँ हमर भावी संतानक पित्ती थिकहुँ,हमर प्रिय देओर थिकहुँ ,सभसँ ऊपर एकटा श्रेष्ट मनुक्ख थिकहुँ,किछु तँ विचार करितहुँ। मना कए दितिअनि।कहितिअनि जे हम एहन अन्यायक साक्षी नहि बनब,अपितु मरि जाएब। मुदा अहाँ तँ मात्र आज्ञाकारी भाए बनि कए रहि गेलहुँ । अफसोच लक्ष्मण,बहुत अफसोच भए रहल अछि अहाँक व्यवहारपर। ”-एतबा बाजि जानकी बेहोस भए ठामहि खसि पड़लीह। लक्ष्मण बहुत मोसकिलसँ अपनाकेँ नियंत्रित केलनि ,आ जानकीकेँ ओहिना भूमिपर पड़ल छोड़ि रथपर जा कए बैसि गेलथि। तकर बाद सुमंत दिस घुमि कए कहैत छथि- “सारथी ! रथ वापस करह।” रथ आगू बढ़बाक लेल उन्मुख अछि। लक्ष्मण आ सुमंत सिसकि रहल छथि। रथ मोसकिलसँ दू-तीन डेग आगू घुसकल छल कि जानकीक दशा दशा देखि रथक घोड़ा ठाढ़ भए जाइत अछि,आगू बढ़बासँ मना कए दैत अछि। लक्ष्मणकेँ बुझाए नहि रहल छनि जे एहन विकट परिस्थितिसँ केना पार पाओल जाएत? ओ तँ जल्दी सँ जल्दी ओहिठामसँ सहटि जाए चाहैत छलाह। कनीके फटकी जानकी बेहोस पड़ल छथि। हुनकर आँखिसँ अश्रुप्रवाह भए रहल अछि। सामनेमे तमसा नदीक सभटा पानि जेना नोर बनि कए हुनकर आँखमे समाहित भेल जा रहल छल। लगैत अछि जेना एकटा आर धार ओहिठामसँ बहि रहल अछि। जेना लगीचमे बहैत तमसा नदीक दिशा बदलि गेल अछि। सुमंतसे आहत छल,बिना जानकीकेँ रथ वापस लए जेबाक हेतु ओकर मोन निठ्ठाहे नहि मानि रहल छलैक। मुदा ओ की करितए? राजपरिवारक अनुचर छल,आदेश मानबाक छलैक। तेँ रथकेँ वापस मोड़ि लेने छल। मुदा रथक घोड़ा एहन विद्रोह कए देत से केओ पूर्वानुमान केना कए सकैत छल? सुमंतक समस्त प्रयासक अछैत घोड़ा आगू नहि बढ़ल। हारि कए लक्ष्मण रथसँ उतरि जाइत छथि,नहि चाहिओ कए ओ जानकीकेँ भूमिपर बेहोस पड़ल देखैत छथि। लक्ष्मणक हृदय हाहाकार कए उठैत छनि। ओ सहटि कए जानकी लग जाइत छथि,हुनकर पैर छुबैत छथि,हुनकासँ बेरि-बेरि माफी मगैत छथि- “क्षमा माते! क्षमा! हमरासँ घोर अपराध भेल अछि। हमरासँ बड़का जुलुम करओल गेल अछि।हम आब जीबिए कए की करब? एहन कलंकित जीवनसँ मरण नीक थिक। हम अखनहि एहीठाम तमसा नदीमे कुदि कए अपन प्राणहन्त कए लेब। अहाँ बिना अयोध्या वापस जेबाक कोनो अर्थ नहि अछि। हम अहाँकेँ वापस लइए जाएब। चाहे एहि हेतु राजारामसँ हमरा युद्धे किएक ने करए पड़ए।” “छी,छी। ई की सोचि रहल छी।राजारामक आज्ञा सर्वोपरि थिक। हम ओकर विरुद्ध सोचिओ कोना सकैत छी? फेर एहन कठिन निर्णय लेबासँ पूर्व ओ सभ बात अबस्से विचारने हेताह।आखिर ओ एहि मामिलामे स्वयं एकटा भुक्तभोगी छथि। जे किछु भए रहल अछि तकर कुप्रभाव सभसँ बेसी हुनकेपर हेतनि। आइसँ राजभवन सुन्न भए जाएत। ओ दिन-राति भने काजमे व्यस्त रहताह,मुदा जखन कखनहु राजकाजसँ फुरसति हेतनि,विश्राम करबाक हेतु अपन भवन जेताह तखन की पओताह?ककरासँ अपन सुख-दुख बटताह?की ओ कहिओ जानकीक वियोगकेँ बिसरि सकताह? कदापि नहि। तखनो ओ ई निर्णय लेबाक लेल विवश भेलाह। सोचल जा सकैत अछि जे हुनका सामनेमे कर्तव्य केहन विडंबना बनि गेल छलनि। असल दुष्टता तँ ओ धोबी केलक जे बिना ठोस जनतबकेँ मात्र जनश्रुतिक आधारपर जानकीपर आरोप लगओलक। हमर तँ मोन होइत अछि जे अयोध्या पहुँचि सभसँ पहिने अपन तरुआरिसँ ओकर गला रेति दी। ओहि पापीकेँ आब एक्को क्षण जीबाक अधिकार नहि थिक।” “सावधान लक्ष्मण!ई बात नहि बिसरह जे तूँ राजारामक आदेशपाल मात्र थिकह। राजाराम न्याय आ अन्यायक ज्ञान रखैत छथि। ओ जानकीक पतिएटा नहि छथि,अयोध्यासन महान राज्यक महाप्रतापी मर्यादापुरुषोत्तम राम छथि। ओ निर्णय लेबासँ पूर्व एहि मामिलाक सभ पक्षपर नीकसँ विचारि लेने हेताह। तखनहि निर्णय केने हेताह।फेर तकर कार्यान्वयन लेल तोरापर ओ कतेक विश्वास केलनि । एहि काज करबाक लेल तोरे भार देलथि। अन्यथा ओ ककरो संगे जानकीकेँ पठा दितथि। हुनका अबस्से एहि बातक ध्यान रहल हेतनि जे जानकीकेँ एहि परिस्थितिमे घनघोर जंगलमे एसगरि छोड़ि देब कतेक कठिन काज होएत। मुदा तेँ की?” “राजाराम अपन पतिव्रता स्त्रीकेँ ककरो कहलापर छोड़ि देताह,ओकरा वनबास दए देताह आ समस्त परिवार चुप भए देखैत रहत? अफसोच अछि जे हमहूँ तखन बकरी जकाँ मेमिआइत रहि गेलहुँ।“ “अहींटा नहि छलहुँ ओतए राजन!आरो भाइसभ उपस्थित रहथि ओहि मंत्रणाक क्षणमे। राजाराम तँ सभक सामनेमे अपन बात रखने छलाह आ निर्णय सुना देने छलाह।सभ हतप्रभ छलाह । जे भेल,नहि भेल मुदा ताहि लेल जानकीक कोना दोषी मानल जा सकैत अछि?” “आब ई सभ सोचबाक की फएदा?तखनहि बजितहुँ ने। जे करबाक छल से करितहुँ।” “हमरासभ श्रेष्ठ भ्रातालोकनि ओहिठाम उपस्थित छलाह।सभ केओ ओहि घटनासँ पूर्वपरिचित छलाह। कहाँ केओ सोचि सकलथि जे जानकी मिथिलाक राजकुलक बेटी छथि। यदि ओ अयोध्याक राजप्रसादमे नहि राखल जा सकैत छथि तँ हुनका ससम्मान अपन नैहरे पठा देल जइतनि। हुनका वनबास देबाक निर्णय तँ अन्यायक पराकाष्ठा भए गेल।” “ जे भेल से भेल। आब की करबाक अछि से ने सोचू।“ “आब?जखन सभ किछु भइए गेल,जानकीक जे अपमान हेबाक छल से राजाराम द्वारा कएले गेल तखन हम की कए लेब?हुनकर राजाज्ञाक पालन करी अन्यथा हुनकेसँ युद्ध करी।” ओहिठाम ठाड़ भेल लक्ष्मण भयाओन अंतरद्वंदसँ गुजरि रहल छलाह। ओ बेरि-बेरि भूमिपर पड़ल बेहोस जानकीकेँ देखैत रहलाह । मोन होनि जे साहस कए आगू बढ़ी,जानकीकेँ पैर पकड़ि क्षमा मांगि ली,हुनका नेहोरा करिअनि- “चलू,वापस चलू।हम राजारामक आज्ञाक पालन कए लेलहुँ । आब अपन मोनक बात सेहो सुनि लेब जरूरी अछि।” मुदा लक्ष्मण सोचिते रहि गेलथि। ओ किछु नहि बाजि सकलथि। सुमंतक बेरि-बेरि प्रयासोसँ जखन घोड़ा आगू नहि बढ़ल तँ लक्ष्मण स्वयं ओकरा आदेश करैत छथि। घोड़ा तुरंत रथसहित बिदा भए जाइत अछि।लक्ष्मण किंकर्तव्यविमूढ़ भेल जानकीकेँ ओहिना बेहोस पड़ल छोड़ि रथपर सबार भए बिदा भए जाइत छथि। जानकी बेहोस धरतीपर पड़ल रहि गेलथि। लक्ष्मण की बजलाह,ओहिठामसँ कखन चलि गेलाह ओ किछु ध्यान नहि कए सकलथि। हुनका तँ लक्ष्मणक पहिले पाँति सुनि जेना सौंसे देहमे करेंट मारि देलकनि। सक तँ हुनका रहबे करनि जे किछु-ने-किछु गड़बड़ होमए बला अछि। लक्ष्मणक आँखिसँ बेरि-बेरि खसैत नोर आ हुनकर वाधित स्वर बहुत किछु संकेत दए रहल छल। तथापि,मनुक्खक स्वभाव थिक जे ओ अनिष्टकेँ टारए चाहैत अछि,सोचैत रहैत अछि जे ई झूठ थिक,एहन भइए नहि सकैत अछि। सएह जानकीओ संगे भेलनि। मुदा जखन रथ निठ्ठाहे ठाड़ भए गेल,लक्ष्मण स्पष्ट रूपसँ राजारामक आदेशकेँ दोहरा देलनि तखन हुनका सहल नहि गेलनि,अचेत भए ठामहि खसि पड़लथि। जानकी रानी जकाँ सजल छलीह। हुनकर अंग-अंग नाना प्रकारक आभूषणसँ भरल छल। ओ अपन बामाँ हाथसँ अपन मुँह झपने छलीह दहिना हाथ बाहर दिस निकलल छलनि,लागि रहल छल जेना ओ घटित घटनाक घोर विरोध लेल समस्त जीव-जन्तुकेँ आवाहन कए रहल छथि। अचानक एकटा एहन सौंदर्यमयी स्त्रीकेँ माटिपर पड़ल देखि लगपासक समस्त जीव-जन्तु,गाछ-बिरीछ व्याकुल भए गेल।जेना गाम -घरमे कोनो आपातकालीन स्थितिमे सौंसे गामक लोक उपस्थित भए जाइत अछि तहिना ओहिठाम भए रहल छल। आश्चर्यक बात तँ ई छल जे मनुक्ख द्वारा निर्मित एहि दुखद आ अमानवीय प्रसंगक विरोधस्वरुप मनुक्ख निपत्ता भए गेल छल। देखिते-देखिते समस्त जीव-जन्तु ओहिठाम पहुँचि गेल । ओ सभ जानकीकेँ चारूकातसँ घेरि लेलकनि।आसपासक गाछ-बिरीछसभक डारिसभ हिलि रहल छल।ओकर पातसभसँ खन-खन अबाज निकलि रहल छल।लगैत छल जेना ओ सभ जानकीकेँ शीतल हबा देबाक भरिसक प्रयास कए रहल अछि। जानबरसभ आपसमे बतिआ रहल छल- “ई के छथिन? एना एसगरि जंगलमे किएक पड़ल छथिन?” “अखन ई सभ चर्चा करबाक समय नहि अछि। सभसँ पहिने हिनका होसमे आनू। ताहि लेल तमसा नदीसँ शीतल जलक व्यव्स्था करू। किछुगोटे हबा करिअनु। एहि लेल लगीचक गाछ-बिरीछक मदति लिअ।” “सही कहि रहल छी। -हरिण बाजल।” ताबतमे केओ नदीसँ पानि लेने आएल। जानकीकेँ शीतल जलक फुहारा देलकनि। ओहीमे सँ केओ लगीचेक लतामक गाछसँ पाकल लताम तोड़ि अनलक। ओकरसभक सेवासँ जानकी शीघ्रे आँखि खोलि देलनि। चिड़ै-चुनमुनसभ प्रसन्न भए गेल। सभ एकस्वरमे बाजि उठल-“हिनका होस आबि गेलनि। जल्दीसँ किछु जलखैक ओरिआन करू।” ओ सभ अपना भरि जानकीक देख-रेखमे लागल रहल। मुदा ओ तँ होस अबितहि फेर जोर-जोरसँ कानए लगलीह। हुनकर करुण क्रन्दन सुनि चारूकात हाहाकार मचि गेल। हुनकासंगे चिड़ै-चुनमुन सेहो कानए लागल। जानबरसभकेँ अश्रुपात होमए लगलैक। ककरो किछु फुरेबे नहि करैक जे की करए? १० प्रमुखसचिव जनकपुर घुरि गेलाह। एमहर जानकीधाममे माहौल गरमा गेल छल। लगैत छल जेना समस्त मिथिलाक युवक-युवती एकत्र भए गेल छथि। सभ कृतसंकल्प छथि जानकीक सम्मान जीवनक रक्षा लेल। मनुक्ख जखन जान हाथमे लए लिअए तखन कालोकेँ ओकरासँ डर होएत छैक। सएह हाल अखन जानकीधाममे भेल छल। की पुरुष,की स्त्री,की जबान ,की बूढ़ सभ जानकीधाममे आबि गेल छल। जे अखन धरि नहि आएल छल,से रस्तामे छल।जे रस्तामे नहि छल से सभ घरसँ बिदा हेबाक क्रममे छल। चारूकात लोकसभक अथाह समुद्र उपस्थित भए गेल छल। केओ ककरा की कहत? एहन परिस्थितिमे कोनो कुकाण्ड ने भए जाए, ताहि चिंतासँ प्रमुखसचिव वापस जनकपुर चलि गेल छलाह। कारण ओहिठाम केओ हुनकर बातपर विश्वास करबाक हेतु तैयार नहि छल। लोकसभ आब किछु बरदास करबाक लेल तैयार नहि छल। सभ एतबे बाजए- “आब एहि पार की ओहि पार।” “आब जानकी बहुत बरदास कए चुकलीह।” “जानकीक एहन अपमान आ हमसभ मुरदा भेल देखैत रहब? भए नहि सकैत अछि।” लोकसभक आँखि लाल-लाल भए गेल छल। भयाओन लगैत छल। एहन आक्रोशित युवकलोकनिकेँ सम्हारबाक हेतु आगू अएलाह-मैथिलीपुत्र। “हे मिथिलावासी!” हम अपने लोकनिक वंदना करैत छी। जानकीक सम्मानक रक्षार्थ अपने लोकनिक संकल्पक हम प्रशंसा करैत छी। अहाँ सही मानमे सिद्ध कए देलहुँ जे जनभावना सभसँ ऊपर थिक। एहन समयमे राजा जनक स्वयं संबंधक मोहमे ओझराएल छथि,किंकर्तव्यविमूढ़ छथि,हमसभ आब ककरा दिस ताकू?ककरापर भरोसा करू?प्रमुखसचिव अएलाह,चलि गेलाह। हुनको किछु मतलब रहल हेतनि। किछु विवशता हेतनि। किछु मिथिला अयोध्याक संबंधक ध्यान हेतनि। मुदा हमसभ एहिसभसँ फराक छी। माता जानकी हमर सभक एकमात्र लक्ष्य छथि। यदि जानकी नहि तँ मिथिला नहि। हमरोसभक आस्तित्वेक सबाल अछि।” “सही कहि रहल छी। मुदा हमरा सभकेँ की करबाक अछि,से तँ बजिऔक। कहीं एहन ने होअए जे हमसभ सोचिते रहि जाइ आ जानकी चलि जाइत रहथि। तखन हमसभ जीबिए कए की करब? तखन एहि आन्दोलनक की अर्थ रहि जाएत? ” “शांत युवक, शांत।” -मैथिलीपुत्र बजलनि। “शक्तिस्वरुपा मार्गदर्शनक लेल हमरासभक संगे छथिहे। एहिमे ककरो कनीको संशय नहि होअए जे एहि पृथ्वीपर जानकीकेँ केओ किछु नहि बिगाड़ि सकैत अछि। हुनकर शक्ति असीम अछि। ओ तँ स्वयं सर्वसमर्थ छथि। हमरासभकेँ अपन कर्तव्य करबाक अछि। मिथिलाक मर्यादाक रक्षा करबाक अछि। से हमसभ करब। के रोकि सकैत अछि भावनाक एहि प्रचंड ज्वारिकेँ? राजा जनक सभ दिन अपन जनताक संग देलनि अछि। फेर हुनको तँ जानकी बेटीए छथिन। कोन पिता अपन संतानक हित नहि सोचत? हमसभ सभसँ पहिने जानकीधाम चली। ओहिठाम माताक आशीर्वाद प्राप्त करी आ बिदा होइ अयोध्या दिस।” “जय जानकी!”-कहैत सभ केओ जानकीधाम दिस बिदा होइत छथि। मैथिलीपुत्र आगू,आगू आ हुनकर पाछू मिथिलावासी सैकड़ोंक संख्यामे बढ़ि रहल छथि जानकीधाम दिस। मिथिलाक प्रसिद्ध रसनचौकीक सुर आइ बदलल लागि रहल अछि। ओहिसँ योद्धोन्माद उत्पन्न करैत गीतक सुर बाजि रहल अछि। युवकलोकनि थोड़बे आगू बढ़ल होएताह कि जनकपुरसँ सैकड़ों संत-महात्मा ओही दिसामे दौड़ल आबि रहल देखाइत छथि। हुनकरसभक हाथमे त्रशूल अछि। ओ सभ त्रिपुंड लगओने छथि,माथपर लाल-लाल ठोप केने छथि। बीच-बीचमे हर-हर महादेवक नारा लगा रहल छथि। जय जानकी,जय जानकी बाजि रहल छथि। मैथिलीपुत्र जानकीधाम पहुँचि गेल छथि। ओहिठाम उपस्थित सैकड़ों लोकसभ प्रार्थानक मुद्रामे ठाढ़ छथि। सभ केओ जनकपुरसँ आएल संतक स्वागत कए रहल छथि। ओहिठाम तीव्रप्रकाश अचानक चारूकात पसरि गेल। शक्तिस्वरुपा समस्त अस्त्र-शस्त्रसँ सुसज्जित जानकीधाममे विद्यमान भए गेलथि। हुनकर हाथमे तुरुआरि चमकि रहल छल। ओकर धारसँ जेना आगि निकलि रहल छल। जेना ओ कहि रहल छलि- “आब कोनो अन्यायकेँ बरदास नहि कएल जाएत। जे केओ अन्यायक पक्षमे ठाढ़ देखाएत तकर विनाश निश्चित अछि।” “हमसभ की करू जाहिसँ जानकीक कष्ट समाप्त होनि,जाहिसँ हुनकर सम्मान आ जीवनक रक्षा होनि।” अहाँसभ कथुक चिंता नहि करू। मैथिलीपुत्र अहाँसभकेँ आगू मार्गदर्शन करताह। अहाँसभ तहिना करू। हम सदति अहाँसभक संगे छी।” ११ जनकपुरसँ आएल संतलोकनिक उपस्थितिमे मैथिलीपुत्रक नेतृत्वमे जानकीधाममे विद्यमान जानकीधुजावाहिनी शक्तिस्वरुपाक आराधना कए रहल छथि- “हे शक्तिस्वरुपा! अहाँ हमरा लोकनेकेँ शक्ति दिअ जाहिसँ हमसभ जानकीकेँ अयोध्याक रानीक रूपमे देखि सकी। अहाँ हमरा लोकनिक मार्गदर्शन करू जाहिसँ हमसभ सही रस्ताक अवलंबन कए अपन लक्ष्यकेँ प्राप्त कए सकी।“ एतबा कहाबक देरी छल कि चारूकातसँ शंखनाद होमए लागल। घड़ी-घण्टा बाजए लागल। ओही समयमे अस्त्र-शस्त्रसँ सुसज्जित शक्तिस्वरुपा सभक सामनेमे प्रकट होइत छथि। ओ बजैत छथि- “सुनू,सुनू हे जानकीधुजावाहिनी! ई समस्या कोनो एकदिनुका नहि अछि। अहाँसभकेँ ई नीकसँ बुझल अछि जे राजाराम व्यक्तिगत सुखकेँ तिलांजलि दए जानकीक अयोध्यासँ निर्वासित करबाक निर्णय लेलनि अछि। ओ कोनो सुखी छथि से बात नहि अछि,एहन हालतिमे सुखी भइओ कोना सकैत छथि? मुदा राजाक कर्तव्यक आगू ओ विवश भए गेल छथि।” “हमसभ ई सभ बात बहुत बेर सुनि चुकलहुँ। जखन जानकीकेँ सुख नहिए भेलनि,जखन ओ अपनो घरमे नहि रहि सकलीह,जखन सभ तरहेँ सही रहितहुँ ओ दण्डित कएल जा रहल छथिहे,तखन आब बाँकी रहि की गेलैक? जानकीक संगे अन्याय तँ भइए रहल अछि ।एहनमे हमसभ चुप कोना रहि सकैत छी?हमसभ हुनका सही स्थानपर आनिए कए रहबनि।” शक्तिस्वरुपा जानकीधुजावाहिनीक संकल्पसँ प्रसन्न छथि। ओ कहैत छथि- “अहाँसभक कल्याण होअए। अहाँसभ शीघ्र अपन लक्ष्यप्राप्त करबाक हेतु अयोध्या दिस प्रस्थान करू। जानकी लक्ष्मण संग बिदा कएल जा चुकल छथि। तेँ आब विलंब कोनो प्रकारसँ उचित नहि होअत।” “हमसभ तुरंत अयोध्या दिस बिदा होइत छी।“-ओहिठाम उपस्थित सैकड़ों जानकीधुजावाहिनी एकस्वरसँ बाजि उठलाह। ताबतमे एकटा वयोबृद्ध संत शक्तिस्वरुपाकेँ दण्डवत प्रणाम करैत छथि । तकर बाद ओ कहैत छथि- “हे शक्तिस्वरुपा! राजा जनकक किछु संदेश लए हमसभ आएल छी ।अपनेक सहमति होअए तँ हमसभ ओकरा अपनेक सामनेमे प्रस्तुत करी।“ “एहिठाम एखन सभ केओ अनुरंजित छथि। यदि अहाँसभ किछु अन्यथा कहबनि तँ अनर्थ भए सकैत अछि। अस्तु,हमर विचार अछि जे अहाँकेँ जे किछु कहबाक अछि से एकांतमे कहि दिअ। ताबत हमसभ जानकीधुजावाहिनीक संगे आगू प्रस्थान करैत छी। आब हिनकासभकेँ रोकि लेब ककरो वशमे नहि अछि,हमरो नहि।” शक्तिस्वरुपा द्वारा एना कहलापर संतलोकनि की बजितथि? चुप्पे रहि गेलाह। जनकपुरसँ आएल संतलोकनि शक्तिस्वरुपाकेँ एकांत पाबि जनकक देल चिट्ठी दए देलखिन आ हुनकर आदेशक प्रतीक्षा करए लगलाह। परंतु ओ किछु उत्तर नहि देलखिन। अपितु,ओहि चिठ्ठीकेँ खोलिओ कए नहि देखलखिन। संतलोकनि आब की करितथि?शक्तिस्वरुपाकेँ सादर प्रणाम निवेदित कए ओ सभ चलि जाइत रहलाह। ओमहर अयोध्यामे आजुक राति कोना बितल तकर की वर्णन कएल जाए? ठाम-ठाम कुकुर भुकि रहल छल।जेना कोनो अनिष्टक पूर्वसूचना दए रहल होअए। आकाशमे रहि-रहि कए तारा टूटि कए खसि रहल छल। सहरसँ कनीके फटकी कलमसभमे नढ़िआसभ करुणक्रन्दन कए रहल छल। ततबे नहि, रातिभरि सौंसे अयोध्या सहरमे कतहु एकटा इजोत नहि देखाएल। चारूकात अन्हारगुज्ज। एहनेमे भरत आ शत्रुघ्न जेना-तेना हँफैत अपन-अपन महल वापस चलि गेलाह। लक्ष्मण सेहो वापस अपन महल दिस जाइत रहथि कि अचानक माथामे चक्कर देबए लगलनि,जेना घुरमी लागि गेल होनि।अपन महलसँ कनीके फटकी उद्यानमे राखल बेंचपर बैसि गेलाह। कतहु केओ नहि देखा रहल छल। बेंचपर एसगर बैसल लक्ष्मण सोचि रहल छलाह- “हे भगवान एहि हाथसँ जानकीकेँ कोना वनबास देबनि?की हुनका सभ बात कहि देबनि?मुदा से आज्ञा तँ नहि अछि। तखन ? हुनका धोखा देबनि?इएह सभ सोचैत-सोचैत हुनकर आँखि लागि गेलनि। भरत आ शत्रुघ्न अपन-अपन महल जा कए ओछाओनपर पड़ि गेलाह। मुदा एहनमे निन्न कतहु होइक? बस करोट बदलैत रहि गेलाह।भोरुकबा उगि गेल। लोकसभ अपन नित्यक्रममे लागि गेल। तखनहि लक्ष्मणक आँखि खुजलनि। ओ दौड़ल अपन महल जाइत छथि। ओतए अपन नित्यक्रमसँ निवृत्त होइत छथि। सुमंतकेँ समाद दैत छथिन जे ओ रथ तैयार करए। अपने जानकीक महल लग जाइत छथि। हुनका देखितहि द्वारपाल जानकीकेँ संदेश दैत छनि। जानकी एतेक भोरे लक्ष्मणकेँ आएल देखि अकचका जाइत छथि। लक्ष्मणकेँ अगिला कोठरीमे बैसा स्वयं तैयार होइत छथि। थोड़ेकालक बाद जानकी लक्ष्मणकेँ विचारमग्न देखि टोकैत छथि- “अहाँ बहुत चिंतित बुझाइत छी।” “नहि,नहि। राजारामक आदेशानुसार हम अहाँकेँ गंगा कातमे ऋषि आश्रम दिस लए जाएब।” “अहो! ई तँ बहुत उत्तम अवसर अछि। हम तँ एहि यात्राक कहिआसँ प्रतीक्षा करैत रही। राम स्वयं हमरा ओमहर लए जाए बला रहथि। संभवतः व्यस्तताक कारण ई काज अहाँकेँ देने हेताह।कोनो बात नहि। एहि बहन्ने हमसभ भरि मोन बतिआएब। मुनिलोकनिक दर्शन करब। गंगा स्नान करब।” “लक्ष्मण सुनैत रहि गेलाह। थोड़बे कालमे जानकी आ लक्ष्मण रथसँ जंगल दिस बिदा भए जाइत छथि।” १२ निस्संदेह राजारामक आदेशक बाद लक्ष्मण जानकीसंग चुपचाप रथसँ अयोध्याक सीमाक पार जंगल दिस बिदा भए गेलथि,मुदा शक्तिस्वरुपाक सक्रियताक कारण ई बात काने-कान अयोध्यामे सगतरि पसरि गेल। मिथिलामे तँ जे हाल भेल से बुझले अछि। ओमहर जानकीधुजावाहिनी सैकड़ोंक संख्यामे अयोध्या दिस बिदा भए चुकल छथि। ओ सभ जानकीधामक सीमा टपले हेताह कि तीव्र गतिसँ चलएबला कतेको वाहनसभ सामनेमे ठाढ़ देखाएल। ओतए चौबटिआपर शक्तिस्वरुपा स्वयं उपस्थित रहथि। “अहाँसभ एहि वाहनसभमे सबार भए जाउ,जाहिसँ जल्दीसँ जल्दी अयोध्या पहुँचि सकी। किछु प्रमुख लोकनिक हेतु वायुयानक ओरिआन सेहो भए गेल अछि। मैथिलीपुत्र अपन खास-खास समर्थकक संगे वायुयानसँ आगू बढ़थि।किछु महत्वपुर्ण व्यक्ति वाहनसभक संगे सेहो चलथि। ओना कोनो चिंताक बात नहि अछि। सभ किछुपर हमर नजरि अछि आ रहबे करत । जानकीक लक्ष्मणक संगे वनप्रस्थान कए चुकल छथि। हुनका जल्दी सँ जल्दी सहायता चाही जाहिसँ अयोध्याक अनर्थ आगू नहि बढ़ि सकए।” शक्तिस्वरुपाक कहबाक देरी छल कि सैकड़ों जानकीधुजावाहिनी वाहनसभमे बैसि कए लक्ष्य दिस बिदा भए गेलाह। मैथिलीपुत्र हुनकर किछु प्रमुख संगीसभ वायुयानमे बैसि गेलथि। सभक उत्साह देखए जोकर छल। लगैक जेना सौंसे पृथ्वी जानकीक समर्थकसँ भरि गेल अछि। ने ककरो भूख लगैक,ने पिआस । सभ जय जानकी! जय जानकी!क नारा बेरि-बेरि लगा रहल छल। वाहनसभ द्रुत गतिसँ आगू बढ़ि रहल छल। वायुयान तँ घंटा भरिक भीतरेमे अयोध्याक सीमामे टपि गेल छल। ओ सभ ओतेक ऊपरसँ नीचाँ अयोध्यामे घटित भए रहल घटनाक किछु अनुमान नहि कए पाबि रहल छल जे वस्तुतःकी भए रहल अछि? जानकी अखन कतए आ कोन हालतिमे छथि? ओ सभ सही प्रतिकार कोना करथि सेहो नहि बूझि पाबि रहल छलाह,अपितु, बहुत असमंजसमे रहथि। तखनहि शक्तिस्वरुपा हुनकासभक संगे देखेलथि। “अहाँसभ एहीठाम उतरि जाउ। जखन अहाँसभकेँ प्रयोजन होएत ई वायुयान फेर आबि जाएत। अहाँसभ कनीको दिक्कति भेलापर हमरा स्मरण करब आ हम तुरंत उपस्थित भए जाएब।” अयोध्याक आकाशक ऊपर कोनो अपरिचित वायुयानकेँ उड़ैत देखि ओहिठामक कोतबालक ध्यान गेलनि। तुरंत राजारामसँ संपर्क करबाक प्रयास केलनि। मुदा हुनकासँ संपर्क नहि भए सकलनि।ओ अपन महलमे केबाड़ बंद कए पड़ल छलाह। हुनका किछु फुरा नहि रहल छलनि। देहमे कनीको सक्क नहि लागि रहल छलनि। सभटा राज-काज ठप्प पड़ल छल। सामान्य काजक बाद तँ टारि देलि जाइत,मुदा ई तँ अयोध्याक सुरक्षाक प्रश्न उपस्थित भए गेल छल। ओहि विमानक सूचना राजारामकेँ नहि देल जा सकलनि। भरत आ शत्रुघ्न से भरि राति जगले रहथि,भोरमे आबि कए निन्न पड़ि गेलाह,कि ओहोसभ हतप्रभ छलाह से नहि कहल जा सकैत अछि।सुरक्षाप्रभारी करथि तँ की करथि? ओ स्वयं वायुयान चलेबाक प्रयास केलथि,मुदा ओ तँ टस सँ मस नहि भए रहल छल। ततबे नहि,मैथिलीपुत्रक विमानपर कोनो प्रकारक शस्त्र प्रभावी नहि भए रहल छल । हारि कए ओ फेर राजारामक महल दिस गेलाह । मुदा ओहिठाम तँ सन्नाटा पसरल छल। लगैत छल जे ओ घर नहि कोनो श्मशान होइक। अयोध्यामे जानकी वनगमनक समाचार बिजलौका जकाँ पसरि गेल छल। अयोध्यावासीसभ एहि समाचारसँ बहुत दुखी आ उत्तेजित रहथि। “सएह कहू। एकटा मामूली धोबीक कहलापर जानकीक ई हाल कए देल गेलनि? इ कोन न्याय भेल? ई तँ संपूर्ण अयोध्यापर एहन कलंक अछि जकरा मिटेनाइ मोसकिले नहि असंभव अछि।” “हमसभ करी तँ की करी? ” “सभ गोटे ओहि धोबीक ओतए चली जे ई आगि लगओलक अछि। ओकरा सही जगह पहुँचेनाइ जरूरी थिक।” “हमरा हिसाबसँ तँ ओकरा मृत्युदंड हेबाक चाही।” एहि तरहेँ अयोध्यावासी लोकनि ओहि धोबीक घर दिस बिदा भेलाह। ऊपरमे मैथिलीपुत्र सहित हुनकर संगीसभ अयोध्यामे जनविद्रोहक दृश्य देखि रहल छलाह। “ई सभ तँ अपनेमे भिड़ल छथि। हमरासभकेँ किछु करबाक काज नहि बुझाइत अछि।-मैथिलीपुत्र बजलाह।” “मुदा जानकी कतए छथि?हमसभ हुनकर हाल तँ लिअनि।” “सही कहलहुँ। हमसभ तँ एही लक्ष्यसँ बिदा भेल छी।” “जानकी लक्ष्मणक संगे रथपर छथि। ओ अयोध्या सहरसँ बाहर निकलि गेल छथि।” “तखन? ” “तखन की कएल जाए? ” “हमरा विचारे तँ जानकीक रथक पछोड़ कएल जाए। लक्ष्मणक रथ रोकि देल जाए आ जानकीक संगे तत्काल जनकपुर चलल जाए।” “विचार तँ उत्तम बुझाइत अछि। मुदा शक्तिस्वरुपाक की कहबाक छनि से तँ बुझी।” मैथिलीपुत्र शक्तिस्वरुपाक आह्वान करैत छथि। १३ जानकी वनगमनक आदेश देलाक बाद राजाराम एकांतमे घोर निराशामे पड़ल छलाह।समस्त राज-काज ठप्प भए गेल छल।अयोध्यामे चारू दिस अराजकता पसरि गेल छल। जानकी वनगमन प्रसंग लाख प्रयासक अछैत गोपनीय नहि रहि गेल छल ।एहि बातसँ अयोध्या आ आसपासक लोकसभ बहुत उद्वेलित छल,दुखी छल आ कोनो हालतिमे ओहि धोबीकेँ क्षमा करबाक लेल तैयार नहि छल जकरा कहलापर जानकीपर एहन संकट आबि गेल छलनि। सैकड़ों अयोध्यावासी ओकर घरकेँ घेरि लेलनि आ चिचिआ उठलाह- “कहाँ गेलैं रे नेतघट्टा, बाहर निकल। आइ तोरासँ हिसाब करब जरूरी अछि। तोरे कारण प्रातः स्मरणीया जानकीक ई दुर्दशा भेलनि अछि, जे हुनका राजमहलसँ जंगल पठा देल गेलनि। तूँ ई तँ जघन्य अपराध केलह अछि।अस्तु,हमसभ तोरा दंडित करबे करब।” लोकसभक हल्ला सुनि कए कारी,भुट्ट मुदा बेस पुष्ट देह बला एकटा अधबयसू बाहर भेल। ओ बजैत अछि- “की बात छैक?अहाँसभ हमरापर एना किएक तमसाएल छी?” “तूँ तँ एना बाजि रहल छह जेना कि किछु बुझले नहि छह। ने तूँ जानकीक बारेमे अंट-संट बजितह,ने हुनकर ई हाल होइतनि?” “की भेलनि जानकीकेँ?हम तँ किछु नहि केलहुँ?हम के छी हुनका राजमहलसँ बाहर केनिहार?” “बेसी चालाकी नहि करह। तूँही ने बजलह जे लंकामे वंदिनी रहलि जानकीकेँ राजाराम भने राखि लेथि ,मुदा हम अपना घरमे एहन कदापि नहि होमए देब।” “हम जे किछु बजलहुँ से तँ अपन घरमे बजलहुँ,मुदा राजारामकेँ जा कए ई के कहलकनि? फेर हुनका अपनो माथा तँ लगेबाक छलनि। केओ किछु बाजि देतैक आ लोक अपन धर्मपत्नीकेँ घरसँ भगा देतैक? एहनो कतहु भेलैक अछि?” “बेसी कबाइत नहि पढ़ह। राजाराम कोनो सामान्य मनुक्ख नहि छथि। मर्यादा पुरुषोत्तम कहल जाइत छथि। हुनकर राज्यमे प्रत्येक लोकक अपन महत्व छैक। जे किछु तूँ बजलह, से राजारामकेँ पता लगलनि। तकर बादे ई दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटित भेल। एहन घटना जे अयोध्या आ मिथिला दुनूकेँ हिला कए राखि देने अछि। आब तूँही बाजह जे तोरा संगे कोन तरहक व्यवहार कएल जाए।” “अपनेसभ जे बजैत छी से यदि सही अछि तँ लिअ, छोपि दिअ हमर गला तुरआरिसँ। हम एहि पृथ्वीक भार छी,अयोध्याक कलंक छी,हमरा एक्को क्षण जीबाक अधिकार नहि अछि। संकोच नहि करू। उठाउ तरुआरि ।”-ई बात बाजि ओ धोबी माटिपर लौटि रहल छल,भोकारि पारि कए कानि रहल छल,बेर-बेर कहि रहल छल-“हे जानकी! क्षमाकरू । हम सपनहुँमे नहि सोचि सकलहुँ जे घरक एकान्तमे, अपन परिवारमे, बाजल हमर किछु शब्द अहाँक जीवन आ सम्मान लेल एतेक भारी पड़ि जाएत। हमरा तँ आब जन्म-जन्म शांति नहि भेटि सकत। हम मनुक्ख कहेबाक जोकर नहि रहि गेल छी। हम व्यर्थ छी,हमर तुरंत हत्या कए देबाक चाही जाहिसँ पृथ्वीक एकटा भार खतम होअए।यदि अहाँलोकनि एहिमे कनिको देरी करब तँ हम स्वयं आत्महत्या कए लेब। आब हमर जीवन सचमुचमे अर्थहीन अछि।” ई सभ बजैत-बजैत ओ धोबी बेहोस भए माटिपर खसि पड़ल। ओकरा ई हालति देखि चारूकात हाहाकार मचि गेल। लोकक तामस धएले रहि गेलैक। केओ पानि अनलक,केओ पंखा केलक,कहुना कए ओकरा होस आएल। थोड़े कालक बाद उठि कए बैसि गेल।ओ किछु बाजए चाहए,मुदा बाजि नहि पाबए। मुँहसँ अबाज निकलबे नहि करैक। आँखिसँ नोर निरन्तर झहरि रहल छलैक। ओ हाथसँ किछु इसारा करबाक प्रयास करए।लोक बुझि नहि पाबि रहल छलैक जे ओ चाहैत की अछि? ताबे ओहि भीड़मे सँ एकगोटे बाहर आएल ,ओकरा सांत्वना दैत बाजल- “हमसभ तोहर बात बुझि रहल छी। अचानक तोरा मुँहे जे किछु बजाएल तकर परिणाम कतेक घातक भेल से देखिए रहल छह। आब जे बीति गेल,से बीति गेल। तकर बेर-बेर चर्चा केलासँ किछु फएदा नहि । हमसभ राजाराम लग चली। तूँ सेहो चलह।स्वयं हुनकासँ क्षमा मांगि लिअह आ आग्रह करिअहुन जे जानकीकेँ वापस राजमहलमे आनि लेबाक आदेश देथि,जानकी ससम्मान रानीक रूपमे राजारामक बामाँ भागमे विराजमान होथि।हमरासभकेँ बस एतबे चाही।आर किछु नहि।” “जाहिसँ जानकीक कष्ट दुर होनि,हुनकर प्रतिष्ठा आ सम्मानक रक्षा होनि ताहि लेल हम तैयार छी।” तकर बाद धोबी संगे-संगे समस्त अयोध्यावासी राजारामक महल दिस बिदा भए गेलाह। १४ राजारामक महल दिस अपार जनसमूहकेँ बढ़ैत देखि प्रहरीसभ तुरंत साकंछ भेल। आखिर,राजारामक सुरक्षाक सबाल छल। रामराज्यमे एहन जनविद्रोहक कल्पनो केओ नहि कए सकैत छल। तए तँ ने केओ अपराध करए ,ने ककरो दंड देबाक प्रयोजन होइक। सभ पुरुष आ स्त्री परस्पर प्रेम करैत छल,सभकेँ एक-दोसरपर अपार सिनेह छलैक,विश्वास रहैक। घरसभ खुजले रहैत छल,कतहु केबारमे ताला लगेबाक काज नहि पड़ैक। ताहि ठाम एहन समस्या अचानक कतएसँ आबि गेल।प्रहरीसभ कोतबालकेँ समाद देलकनि। ओ स्वयं सभ किछु देखलनि आ तुरंत राजारामक महल पहुँचि गेलाह। ओहिठाम द्वारि धरि तँ पहुँचि गेलाह,मुदा भीतर जेबाक साहस नहि भेलनि। राजारामक कोठरीक केबार बंद छल।घरमे कनीको इजोत नहि छल।चारूकात भम्ह पड़ि रहल छल। आब ओ करओ की? एक दिस कर्तव्य छलैक दोसर दिस राजारामक घरक एहन भयाओन हाल छल। ओ करए तँ की करए? बड़ीकाल धरि ओ एहिना किंकर्तव्यविमूढ़ रहि गेल। आखिर ओ साहस केलक, केबार हल्लुकेसँ खट-खटओलक। राजाराम कोनो सुतल तँ रहथि नहि। ओ बूझि गेलाह जे जरूर किछु तेहन भेल अछि अन्यथा हुनकर एहन दशा जनितहुँ केओ किएक एतेक लग धरि अबैत। राजाराम केबार खोलैत छथि। हुनकर देहक दशा देखि कोतबाल बहुत दुखी भए गेलाह। राजारामक माथपर केस उड़िआ रहल छलनि। आँखि कनैत-कनैत फुलि गेल छलनि। देह वस्त्रहीन जकाँ छल,मात्र एकटा अर्धवस्त्र पहिरने रहथि। एकटा अंगोछा राखि लेने रहथि ऊपरसँ। हुनकर मुँहसँ आभा विलुप्त भए गेल छल। लगैत छल जेना ओ गंभीर कष्टसँ गुजरि रहल होथि। एहनमे कोतबाल की करए?हुनका बाहर घटित भए रहल परिस्थितिक सूचना देथि कि नहि देथि? ओ आखिर अपन मुँह खोललक- “राजारामक जय होअए! ” “की बात? ” “महाराज अनर्थ भए होअए पर अछि।” “की? ” “अयोध्याक जनता विद्रोह कए देलक अछि। ओकरासभकेँ अयोध्यामे जानकी वापस चाही,ओहो रानीक रूपमे,आर किछु नहि। लोकसभ जानकीक चलि गेलासँ बहुत अधिक आहत भए गेल अछि,किछु करबाक हेतु आतुर अछि। स्थितिक भयावहता देखि हमर कर्तव्य बुझाएल जे अपनेकेँ सूचित करी।” “हम अखन किछु नहि कहि सकैत छी। तूँ भरत लग जाह आ हुनका जे कहबाक छह से कहुन। जे करबाक अछि से ओएह करताह।” एतबा बात बाजि कए राजाराम जोरसँ केबार बंद कए लेलनि।केबार बंद हेबाक अबाज बहुत फटकी धरि सुनल गेल। कोतबाल तँ स्तब्ध छल। किछु फुरेबे नहि करैक जे की करए? अयोध्याक रक्षा करए की रामक? “एहन हालतिमे राजारामकेँ छोड़ि कतहु केना जा सकैत छी?” -ओ स्वयंसँ प्रश्न कए रहल छल। ओ तँ कर्तव्यसँ विवश भए राजारामकेँ राजमहलक बाहर चलि रहल अन्हड़क सूचना देबाक लेल आएल छल,मुदा एहिठाम तँ आर कठिन परिस्थिति देखबामे अएलैक । राजाराम बहुत आहत छलाह। “पहिने हुनकर रक्षा करब जरूरी अछि। मुदा से कोना के करत? राजाराम तँ स्वेच्छासँ एकान्तमे पड़ल छथि। ओहिठाम धरि केओ जाइए नहि सकैत अछि। तखन कएल की जाए? चली भरत लग। आखिर राजारामक आदेशो तँ ओएह छनि।” राजाराम केबार बंद कए धराम दए पलंगपर खसि पड़लाह। “जे हेबाक छैक से होउ।हमरा बुते अखन किछु संभव नहि अछि। जानकी नहि तँ रामो नहि। हमर जीवनक आब किछु अर्थ नहि रहि गेल अछि। देहमे कतहु सक्क नहि लागि रहल अछि। हमर मोन सदिखन जानकीपर अड़ल अछि। केना ओ एसगरि जंगलमे रहतीह?केना निर्दयी भए लक्ष्मण हमर आदेश मानैत जानकीकेँ नदीक कातमे जंगलेक बीचमे छोड़ि कए लौटि जेताह? जानकी एहन हालतिमे की सोचतीह,केहन अनाथ ओ अनुभव करतीह आ तकर कारण केओ आर नहि हम स्वयं थिकहुँ। दुर्भाग्य हमर । कहि नहि आर की की हमरा देखब लिखल अछि?जानकीक रावण द्वारा हरण भेलाक बाद एकटा लक्ष्य सामनेमे छल जे जेना-तेना रावणक नाश करबाक अछि जाहिसँ जानकीकेँ मुक्ति भेटनि। हम ताहि प्रयासमे लागल रहलहुँ। एहन भयाओन युद्ध भेल।रावणक घरहंज भए गेलैक। अपनहु मारल गेल। नहि रहलैक केओ ओकरा कुलमे। मुदा आब? जानकी वापस हमरा भेटि गेलीह।ओ अपन संपूर्णताक संगे हमरा लेल फेरसँ समर्पित भए गेलीह। मुदा हम केहन अभागल निकललहुँ? नहि राखि सकलहुँ हुनका अपना संगे। एहन राजा बनिए कए की फएदा? हमरा राजाक पद छोड़ि देबाक छल आ जानकीक संगे चलि जइतहुँ एकबेर फेर जंगल। जखन हमरा वनबास भेल तँ जानकी हमर संग देलनि। कतबो कहलिअनि,ओ अयोध्यामे नहि रहलीह,त्यागि देलीह सभ किछू,सहैत रहलीह अपार कष्ट,घुमैत रहलीह जंगले-जंगल। मुदा हम की कएलहुँ? जानकीकेँ अपने घरसँ एहन हालतिमे निर्वासित कए देलहुँ। वाह रे राजाराम! हम आत्मग्लानिसँ भरि गेल छी। नहि चाहैत छी जे एक्को क्षण जीबी? एहन राजा भइए कए की फएदा जाहिमे हम अपन पत्नीएक संग अन्याय होइत देखि मूकदर्शक बनल रहि जाइ। बाहर की विद्रोह भए रहल अछि। असल विद्रोह तँ हमरा भीतरमे भेल अछि।हमर आत्मा स्वयं हमर विरुद्ध ठाढ़ देखाइत अछि। हम ककरा की कहबैक?कोन मुँहे कहबैक?” “हे जानकी! हे जानकी!” - कहैत राजाराम पलंगपर खसि पड़लाह । -रबीन्द्र नारायण मिश्र; पिताक नाम : स्वर्गीय सूर्य नारायण मिश्र; माताक नाम : स्वर्गीया दयाकाशी देवी; जन्म तिथिः२ जनबरी १९५४(प्रमाण पत्र); २४ अगस्त १९५२(जन्मपत्र) ; पैतृक ग्राम : अड़ेर डीह; मातृक : सिन्घिआ ड्योढ़ी; वृति : भारत सरकारक उप सचिव (सेवानिवृत्त)/ स्पेशल मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, दिल्ली(सेवानिवृत्त); शिक्षा : चन्द्रधारी मिथिला महाविद्यालयसँ बी.एस-सी. भौतिक विज्ञानमे प्रतिष्ठा : दिल्ली विश्वविद्यालयसँ विधि स्नातक; श्री रबीन्द्र नारायण मिश्रक प्रकाशित कृति :मैथिलीमे:- प्रकाशन वर्ष:2017; १. ‘भोरसँ साँझ धरि’ (आत्म कथा), २. ‘प्रसंगवश’ (निवंध), ३. ‘स्वर्ग एतहि अछि’ (यात्रा प्रसंग), ; प्रकाशन वर्ष:2018; ४. ‘फसाद’ (कथा संग्रह) ५. `नमस्तस्यै’ (उपन्यास) ६. विविध प्रसंग (निवंध ) ७.महराज(उपन्यास) ८.लजकोटर(उपन्यास); प्रकाशन वर्ष:2019; ९.सीमाक ओहि पार(उपन्यास)१०.समाधान(निवंध संग्रह) ११.मातृभूमि(उपन्यास) १२.स्वप्नलोक(उपन्यास); प्रकाशन वर्ष:2020 १३.शंखनाद(उपन्यास) १४.इएह थिक जीवन(संस्मरण) ; १५.ढहैत देबाल(उपन्यास) १६.पाथेय(संस्मरण); प्रकाशन वर्ष:2021; १७.हम आबि रहल छी(उपन्यास) १८.प्रलयक परात(उपन्यास); प्रकाशन वर्ष:2022; १९.बीति गेल समय(उपन्यास) २०.प्रतिबिम्ब(उपन्यास)२१.बदलि रहल अछि सभकिछु(उपन्यास)22. राष्ट्र मंदिर(उपन्यास) २३. संयोग(कथा संग्रह) २४. नाचि रहल छलि वसुधा ( उपन्यास); प्रकाशन वर्षः2023; २५.दीप जरैत रहए(उपन्यास) २६.ठेहा परक मौलायल गाछ(उपन्यास) २७.पटाक्षेप(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः2024; २८ माटि बजा रहल अछि(यात्रा प्रसंग) २९ जयतु जानकी(उपन्यास); ३० यज्ञसेनी(उपन्यास); प्रकाशन वर्षः२०२५; ३१.कथा अखन बाँकी अछि(संस्मरण) ३२. गाछ बजैत छैक(कथा संग्रह) ३३.सूर्यपुत्र(उपन्यास); प्रकाशन वर्ष ;२०२६; बिसरि जाएब जरूरी छै(कविता संग्रह) In English:; Year of publication:2018; 1. The Lost House (Collection of short stories) 2. Life is an art; 3.The Ganges Whispers (English translation of my Maithili Novel,Ham Aabi Rahal Chhee (हम आबि रहल छी) हिन्दी में –; प्रकाशन वर्ष:२०१९; १.न्याय की गुहार अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१०.विप्रकान्त मंडल- हॉस्पिटलक हिसाब विप्रकान्त मंडल हॉस्पिटलक हिसाब
शहरक मुख सड़कक कात मे रूपलाल अपना पत्नी बुधनीक संग ठाढ़ अछि । ओ तेज गति सॅं आबि रहल गाड़ि - घोड़ाक कम हेबाक बाट देखि रहल अछि । एकटा हाथ मे कपड़ाक झोड़ा आ दोसर हाथ सॅं बुधनीक हाथ पकैड़ि ओ सड़क पार करबाक कोशिश करै लागल , मुदा जखन बीच सड़क पर पहुचैत अछि की एकटा रिक्शा आगू सॅं कनछी मारैत निकेल जाइत अछि । रिक्शाक चक्का सॅं बुधनीक पाइर छिला जाइत अछि । इ सब देखि एकटा युवक दौड़ केँआबैत अछि आ गाड़ीक आगू हाथ देखबैत दूनू गोटेक सड़क पार करा दैत अछि । फेर बैग सँ मलहम ल केँ बुधनीक पाइर मे लगबैत पुछैत अछि- "हॉस्पिटल जेबाक अछि ? " " हँ। " " कोन हॉस्पिटल ? " रूपलाल - " गामसॅं विचारि केँ तँ नहिं आयल छी बौआ । अहाँकेँ नजैर मे कौनो नीक हॉस्पिटल अछि तँ बता दिय ? " " ओ सामने देखि रहल छियै। ओइ हॉस्पिटल मे कमे खर्च मे नीक इलाज होइत अछि । हमर नाम लेबै । कहि देबै जे दिनेश भेजलक तँ विशेष छूट भेट जाएत । हम फोन कअ दैत छी । " बुधनी सोचलक ई बौआ कतेक उपकारि लोक अछि । हॉस्पिटलक अन्दर पहुँचैते रूपलाल कम्पाउन्डर सँ कहैत अछि -" यौ , हमरा दिनेश भेजलक । " कम्पाउन्डर -" ओ , अहाँ दिनेशक आदमी छी । " रूपलाल -"हँ यौ ! " कम्पाउन्डर -" बैसु ! की दिक्कत अछि ? " रूपलाल बुधनी दिश इशारा करैत बजल -" हिनका दस दिन सँ दरद भ रहल अछि । गामक डागडरसँ कतैक दबाईयो देलिऐ । छुटबै नै करैत छै । " कम्पाउन्डर -" हॉस्पिटल साहेब कनी देर मे आएत । ओहिसँ पहिले अहाँ अल्ट्रासाउंड आओर खून जांच करबा लिय। " रूपलाल -" कते खरचा परतै यौ सर ? " कम्पाउन्डर -" अहाँ जांच करौअ न ! दोसर ठाम सॅं कमे पड़त । अहु मे अहाँ दिनेशक आदमी छी । " रूपलाल -" ठीके छै ! जांच करू । " एक गोटे आबि झट सॅं बुधनीक खून खींच लैत अछि । दोसर गोटे बुधनीक पकड़ैत अल्ट्रासाउंड रूम ल जाइत अछि । घंटा भरि बाद डॉक्टर साहेब आबैत अछि । बुधनीक अपना रूम मे बजबैत अछि । पूछ- ताछ केलाक बाद रिपोर्ट देखि दबाई लिखि दैत अछि । कम्पाउन्डर झोड़ा भरि दबाई रूपलालक आगा मे राखैत बजैत आछि -" एक मुन्ना भोर-सांझ खाली पेट , एगो गोटी राति मे , ई सुईया सात दिन पर । " रूपलाल -" कतैक रूपैया भेल यौ सर ? " कम्पाउन्डर -" बैसी नै , बारह हजार । " सुनितै जैना रूपलालक माथ पर बजर गिर पड़ैत अछि । रूपलाल -" यौ सर ! बहुत बेसि कहि रहल छी , किछ कम करियो । " कम्पाउन्डर -" अहाँ दिनेशक आदमी छी एक हजार कमै दियौ । " रूपलाल झोड़ा सॅं पाई निकालैत मने - मन कानैत गिन केँ दैत अछि । बेंच पर बैसल बुधनी चुप - चाप सब किछ देखि रहल अछि । दबाइक झोड़ा उठबैत रूपलाल बुधनीक हाथ पकैड़ चलि दैत अछि । बुधनी मने-मन सोचैत अछि आयल छलौ दुखक दबाई लेल जा रहल छी दबाइक दुख ल क । शहर मे एहने उपकारि सब रहै छै की ?
[सगर राति दीप जरय 31 सितंबर 2024 स्थान: मध्य विद्यालय रतनसारा मधुबनी मे पठित ।]
- विप्रकान्त मंडल; जन्म: 12 मई 2000; पिता - राजदेव मंडल; मो० 6205313238; mviprakant@gmail.com; शिक्षा : एम.ए हिन्दी साहित्य ( इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय ); पता: ग्राम मुसहरनियां , पो० - रतनसारा , भाया - नरहिया , जिला - मधुबनी , बिहार, पिनकोड - 847108
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.११.बद्रीनाथ राय अमात्य- ३ टा बीहनि कथा बद्रीनाथ राय अमात्य ३ टा बीहनि कथा १ बीकल कविता/ कन्यादान
आइ भोरे हमर समस्याग्रस्त मित्र तेजहीन तेजीलाल भाइ मुँह लटकौने कनैत कहला--भाइ हमर कुटमैती कन्यादान अहू बेर नञि भेल। नञि जानि ओकरा भाग्य मे की लिखल छैक?हमर दुनिया हमरा अन्हार लगइए। इजोतक कोनो आश नञि अछि।एक मात्र रास्ता डूबि मरब रहि गेल अछि।हम अपनेसँ किछु मार्मिक मार्गदर्शन लेबाक लेल आएल छी।हम कहलियनि भाइ हमरालोकनि मैथिल छी,ई धरती मिथिलाक उर्वर धरती छैक। एहिठाम समस्या निदानक बहुतरास विकल्प छैक। एकर सरल सहज सस्ता उपाय छैक। बुचियाक मायक कतेक उमिर छनि?तेजहीन तेजीलाल भाइ लजाइत बजला --लगभग साठिसँ नीचा पचपन पार छनि।हम कहलियनि भाइ कोनो बात नञि दूनू माय बेटीके जिंस पेंट पहिरा कवियित्री बना मैथिली मंचपर उतारु।भगवान कल्याण करथिन, सभटा शुभे शुभ रहतै।माय बेटी दूनूके युवा पुरस्कार भेटि सकैत छैक,फेर सहजे परिचय बढ़लाक बाद ओहिना बिना दान दहेज के वैदिक नञि तऽ गंधर्व विवाह भइये जेतैक।तेजहीन तेजीलाल भाइ चिन्तित होइत बजला-- भाइ!बुचियाक माय नामे लेल पढ़ल लिखल तीसरा फेल छैक आ कविता सेहो नञि लिखल होइत छैक।मिथिलामे बहुते गार्गी मैत्रेयी भारती सनक विदुषि कवियित्री छथि तखन एहि माय बेटीके के पूछतै?अपने कहू जे ई बात एना कोना संभव हेतैक? हम कहलियनि- -भाइ कोनो बात नञि मैथिली कविता लिखबाक लेल शिक्षा एतबे चाही।मैथिली कविता मिथिलाक विभिन्न बाजारमे बिकाइतो छैक।मिथिलामे साहित्यक विपनन वृहत स्तर पर वेदज्ञ विद्वानक द्वारा होइत छैक,एतबे नञि साहित्यकार सेहो बिकाइत छथि।कविता कीनल सेहो जा सकैत छैक,आऔर ई सुविधा मिथिले मात्र मे उपलब्ध छैक।बुचिया रीलांगना अछिए नृत्यांगना सेहो बनाउ। सब काज जिंस पेंट आऔर पैरवी करैत छैक। गार्गी मैत्रेयी भारतीके भरम टूटि जेतेन, ओ सब देखते रहि जेती।
२ हमर कनिञा कहलनि
हम आइ अपन कनिञाके प्रशन्न देखि सन्न रहि गेलहुँ।हमरा किछु अनहोनीक आशंका भेल।ओ लऽग आबि पैर पटकैत टाल ठोकि हवामे हाथ लहरबैत कहलनि--हमरा आब शाड़ी नञि सम्हरैत अछि,हमरा टी शर्ट जिंस पेंट चाही।हम कवियत्री बनब।हमरा शाड़ीमे समेटल नञि नीक लगइए ,हम आब शाड़ीमे समेटल नञि रहब।हुनक कथन आऔर जोश देखि हमरा दाँती लागि गेल। जुत्ता सुङहेलाक बाद मुर्छा भंग भेलापर हिम्मत जुटा प्रार्थनापूर्वक कहलियनि--आब संभव नञि अछि।अपनेक शारीरीक व्याकरण बिगड़ि गेल अछि।मुग्धा रहितहुँ केकरो वाग्दत्ता बनि सकैत छलहुँ।आब दू चारि बेर नाक कटा नालीमे नहेलाक बादे कवियित्री बनि सकैत छी।कारण आब अहाँ बसिया गनहाएल स्वादहीन जिलेबी छी जे कोनो हमरे सनक बुढ़ बरद मात्र खा सकैत अछि।ओना मैथिली एकाडमी साहित्य एकाडमी आऔर चेतना समिति मे सेहो किछु बुढ़ बरद बैसल छैक सेहो नञि गछत जखन कि जंगली कुकुड़के सड़ले नेराओल मांस खेबाक अभ्यास होइत छैक। जँ अपने हमर बात सुनि तऽ आब अहाँ दीवा स्वप्न नञि देखी।आब अहाँ नञि विल्व स्तनी,नञि षोडसी छी।नञि यौवनमे लालित्य अछि, नञि आकर्षण!तखन के मानत कवियित्री?आब अहाँ वयसगरि छी,दाँत टुटि रहल अछि,आब वेदान्ती बनि सकैत छी। एतबा सुनिते हमर कनिञा धरती आकाश पताल एक करैत खिसियाक' हमरा बेलना देखबैत जोरसँ गरजैत बजली --जँ जाँघ नितम्बपर खिडक़ी काटल जिंस पहिरी? हम डेराइत डरे कहलियनी --हाँ तखन संभव छै मुदा खानदानी कुलीन रुप रसक लोभी रसज्ञ लम्पट मैथिल मात्र मानता। उपेक्षित मैथिल कखनो नञि मानता। हमर कनिञा प्रसन्न होइत बजली -हमरा कुलीन मैथिलक मात्र समर्थन चाही। हम हरवाह चरवाह घसवाह सगतोड़नी घसछिलनी के मैथिल मैथिलानी मानबो नञि करबै।मुदा अहाँक विरोध हमरा बर्दास्त नञि अछि।हम डेराइत परामर्श दैत कहलियनि--अपने किछु दिनक लेल नैहर चलि जाउ,ओहिठाम बहुतरास पिज्जाबर्गरक दोकान छैक। ओहिठाम कवियित्री बनबाक बहुत बेसी अनुकूल परिवेश आऔर बहुत बेसी संभावना छै, रहलै खत्तामे नहेबाक बात सेहो नहा सकैत छी।ओहिठाम जलविहार करबाक सम्पूर्ण संसाधन छैक। दू चारि बेर जलविहार केलाक बाद स्वघोषित कवियित्री सहजतासँ बनि सकैत छी। दू चारि दिन चाउमीन चाट खेलाक बाद चेहरा सेहो चमैक जाएत।फेर कवियित्री बनबाक बाट ओहिना प्रशस्त हाएत।अहाँक पद पंकमे पड़ितहिं गाँवमे प्रशन्नता पसैर जेतैक आऔर कलाएल युवकक कल्याण सेहो हेतैक,सब कवि सेहो बनि जाएत। अहाँ प्रमाणित कवियित्री छीहे,बाबू अहाँक मैथिलीक मठाधीश छथिये लगले हाथ पुरस्कार सेहो भेटि जाएत । हमर बात सुनि हुनक हरियाएल मन फुला गेलनि आऔर प्रशन्न होइत बजली--आइ अहाँक साक्षात दर्शन भेल, हम अपनेके एखनधरि नञि चिन्हने छलहुँ,अपने प्रणम्य देवता छी।एतबा कहि हमर कलावती कवियित्री नङटिनी कनिञा लीलावती बनि नाक कटा नैहरक नर्कक नालीमे नहेबाक लेल प्रस्थान केली। हुनका गेलाक बाद हम आश्वस्त भेलहुँ जे ई आब नञि औती कारण भैंस एकबेर खत्तामे लेरहेलाक बाद अपने मनसँ उपर नञि अबैत छैक आऔर तत्क्षण तखनहि हम भीष्म पितामह सन भीषण प्रतिज्ञा लेलहुँ जे विधुर जीवन बिता लेब मुदा फेर विवाह नञि करब। ३ हम सारक विवाहमे कनिञा संङे सासुर गेल छलहुँ जे पुरस्कृत भेलापर सार ससुर साउस सारि सरहोजी आ समस्त सासुरक लोक शुभकामना संङ आशीर्वाद देता मुदा भोर हो॓इत सबटा उनटे भेल ।हम बिछाबन पर सूतले सुनहुँ जे हमर छुछुनरी कनिञा अपन बहिनपा आ बहिन के कहैत छलथि जे एहिवेर हमरो छुछुनराहाके पुरस्कार भेटलैक अछि।बेचैन छी मन डेराएल रहइए ,बहुते छुछुनरी छिहतरी छिनारि छौंड़ी सब पुरस्कार दियेबाक लेल हमर छुछुनराक पाछू पड़ल छैक,कहीं हमर छुछुनरा भसिया नञि जाए।हमर छुछुनरी कनियाक अपने भावज कहिये देलकनि --अहीं कोन दूधक धोल सति सावित्री छी?थुथुनेटा चिक्कन अछि ,बाँकि चालि-चरित्र तऽ अहुँक छुछुनरिये सनक अछि।चारि बच्चाके नालीमे बहेलहुँ,चारिटाके पोसलहुँ,माए कहबै छी तखन कने एखन स्थिर छी आऔर गाछ चढ़ैमे बानरे प्रथम आऔर पुरस्कृत होइत छैक,ताँइ अहाँक बनरबाके विद्वान कोना मानि लेल जाए?बानरक एतवे पौरुष आऔर पराक्रम होइत छैक, एहिमे बेसी प्रशन्न हेबाक कोनो बड़प्पनक बात नञि। -बद्रीनाथ राय अमात्य, ग्राम पोस्ट करमौली, भाया कलुआही, जिला मधुबनी बिहार ,फोन 6205190859 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१२.गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली लेल दलित साहित्य समीक्षाशास्त्र गजेन्द्र ठाकुर मैथिली लेल दलित साहित्य समीक्षाशास्त्र
मैथिलीमे अनूदित गुजराती, ओड़िया आ तेलुगु दलित साहित्यक परिप्रेक्ष्यमे
मैथिली भाषाक साहित्य समानान्तर धाराक अनुवादसँ पुष्ट भेल अछि आ एहि मे मौलिक संरचनात्मक परिवर्तन आयल, कारण मूल धाराक मैथिलीक लिखित साहित्य एकटा खास सामाजिक-धार्मिक रूढ़िवादितासँ परिभाषित रहल, जाहिमे भक्ति, दरबारी विलासिता आ अलंकृत अभिव्यक्तिकेँ प्राथमिकता देल गेल आ उपेक्षित वर्गक यथार्थकेँ कात राखल गेल। ओना मिथिलाक मौखिक परम्परामे राजा सलहेस आ दीना-भदरी सन दलित नायकक लोकगाथा सदिखन जीवित रहल, मुदा एकरा औपचारिक लिखित साहित्यमे आनबामे ब्राह्मणवादी वर्चस्व आ साक्षरताक एकाधिकार एकटा पैघ बाधा छल। मैथिलीमे एकटा समर्पित 'दलित साहित्य' केर उदय हालक घटना थिक, जाहिमे अन्य क्षेत्रीय भाषासभक अनुवादक भूमिका महत्वपूर्ण रहल अछि। विशेष रूपसँ 'विदेह' आन्दोलनक प्रयाससँ तेलुगु, ओड़िया आ गुजरातीक सशक्त दलित परम्परासभक अनुवाद मैथिलीक ओहि रिक्तताकेँ भरने अछि, जाहि सँ सन्दीप कुमार साफी आ उमेश पासवान सन मैथिल दलित लेखकसभकेँ विरोध आ आत्म-अस्मिताक लेल एकटा भाषाई आ वैचारिक आधार भेटल अछि।
ऐतिहासिक अभाव आ उपेक्षित वर्गक संरचनात्मक चुप्पी
बीसम शताब्दीक अन्त धरि मैथिलीमे औपचारिक दलित लिखित परम्पराक अभाव उपेक्षित वर्गक रचनात्मकताक कमी नहि, संस्थानिक बहिष्कारक परिणाम छल। ऐतिहासिक रूपसँ मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ समुदाय भाषाक मुख्य पहरेदार रहलाह, जाहि कारणे 'मानक मैथिली' केँ हुनकरे बोली आ सांस्कृतिक सरोकार तक सीमित राखल गेल। एहि वर्चस्वक कारण मिथिलाक दलित समुदायक अनुभव साहित्यिक चेतनासँ दूर रहि गेल।
मैथिली मौखिक साहित्यक सीमा आधुनिक दलित गद्य आ पद्यक उदयसँ पहिने, उपेक्षित वर्गक आवाज मुख्य रूपसँ 'लोकगाथा' केर रूपमे जीवित छल। राजा सलहेस, नैका बनजारा, आ बिहुला बिसहरी सन गाथासभ ओहि नायकसभक गान करैत अछि जे निम्न जातिक भेला उपरान्त सेहो भेदभाव आ शोषणक विरुद्ध लड़लाह। ई सांस्कृतिक रूपसँ महत्वपूर्ण छल, मुदा साहित्यिक संभ्रांत वर्ग एकरा 'गँवार' वा 'लोक' कहि कऽ मुख्य साहित्यसँ अलग रखलक।
एहि संरचनात्मक चुप्पीकेँ आर्थिक आ शैक्षणिक स्थितिसँ सेहो बल भेटल। सन्दीप कुमार साफीक आत्मकथामे देखल जा सकैत अछि जे दलित परिवारक लेल शिक्षासँ बेसी जरूरी जीवन निर्वाहक लेल शारीरिक श्रम छल। साफीक माता-पिता धोबी जातिसँ छलाह आ गामक कपड़ा धो कऽ गुजर-बसर करैत छलाह, जाहिमे हुनका नगदक बदला अनाज वा आलू भेटैत छलनि। एहि आर्थिक विवशताक कारणे साफी सन कइएक दलित बच्चा स्कूल छोडि कऽ चण्डीगढ़ वा बेंगलोर सन शहरमे मजदूरी करय लेल विवश भेलाह।
विदेह आन्दोलन आ लोकतान्त्रिक हस्तक्षेप कऽ रूपमे अनुवाद मैथिलीमे दलित स्वरक आधुनिक पुनरुत्थान 'विदेह' आन्दोलनक डिजिटल आ साहित्यिक पहलक संग जुड़ल अछि। मैथिली साहित्य ताधरि परिपक्व नहि भऽ सकैत अछि जखन धरि ई अपन सभ भाषिक अनुभवकेँ स्वीकार नहि करै्त। मैथिलीमे दलित गद्य-पद्यक अभावकेँ देखैत अन्य भारतीय भाषासभक साहित्य दिस ताकल गेल।
सांस्कृतिक अनुवादक यांत्रिकी 'विदेह' मे अनुवाद मात्र शब्दक फेर-बदल नहि, बल्कि चेतनाकेँ जोड़बाक एकटा समाजशास्त्रीय कार्य अछि। एकर उद्देश्य मैथिल पाठककेँ 'विरोधक सौन्दर्यशास्त्र' (Aesthetics of Protest) सँ परिचित करायब छल। ओड़िया, तेलुगु आ गुजरातीसँ अनुवादित रचनासभ मैथिलीकेँ प्रतिरोधक एकटा नव शब्दावली देलक, जे पारम्परिक अलंकृत आ श्रृंगारिक परम्परासँ मुक्त छल। अनुवादकक भूमिका, जेना पी. जयलक्ष्मी आ के. पुरुषोत्तमक काजमे देखल जाइत अछि, 'विदेशीकरण' (Foreignization) आ 'देशीयकरण' (Domestication) क बीच संतुलन बनायब छल। तेलुगु उपन्यास 'जिगिरी' (सदा लेल मित्र) क अनुवादमे तेलंगानाक क्षेत्रीय बोली आ उर्दू-तेलुगु मिश्रणक 'देशी रंग' केँ सुरक्षित राखल गेल जाहिसँ दलित आ खानाबदोश अनुभवक बहुलता स्पष्ट भऽ सकय।
तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य: मैथिलीमे तेलुगु दलित साहित्य तेलुगु दलित साहित्य मैथिली अनुवाद परियोजनाक लेल एकटा शक्तिशाली आधार बनल। तेलुगु आन्दोलन, जे १९८० क दशकमे करमचेडू आ चुंदुरू सन अत्याचारक बाद आर उग्र भेल, पारम्परिक वर्चस्वकेँ अस्वीकार करैत अछि।
कोलकलुरी इनोचक "कौआ" (काकी): अछूतक सौन्दर्यशास्त्र "कौआ" कहानीमे इनोच कौआकेँ दलित समुदायक प्रतीकक रूपमे प्रयोग करैत छथि। नायक बण्डोडु मादिग जातिक छथि, जे अभावे-अभावमे जिबैत छथि। ओ कौआकेँ पकडि कऽ खा सकैत अछि, जकरा समाज अशुभ मानैत अछि। मैथिली अनुवाद एहि अस्तित्वक गन्धकेँ (Stench) पकड़ैत अछि, जे पाठककेँ चरम दरिद्रता आ मनोवैज्ञानिक प्रताड़नाक साक्षात्कार करबैत अछि।
विनोदिनीक "कारी मसि" (ब्लैक इंक): शहरी क्षेत्रमे अस्मितातक कलंक विनोदिनीक "कारी मसि" आधुनिक शहरी भारतमे जातिक सूक्ष्म गतिकेँ उजागर करैत अछि। एकटा बच्ची श्रिया, जे अपन डायरीमे नीक चीजकेँ नीला मसि सँ आ खराब चीजकेँ कारी मसि (Black Ink) सँ लिखैत अछि, जखन अपन दलित सहेलीक अस्मिता जानैत अछि तऽ ओकर व्यवहारमे आयल घृणा ई देखबैत अछि जे जातिक कलंक कोना बच्चेसँ माथमे पैसल अछि।
पेद्दिति अशोक कुमारक "सदा लेल मित्र" (जिगिरी): खानाबदोश श्रम विस्थापन
'जिगिरी' उपन्यास कलन्दर समुदायक व्यथा कहैत अछि, जे भालू नचा कऽ गुजर करैत छलाह। जखन सरकार भालू प्रदर्शनपर रोक लगौलक, तऽ मुख्य पात्र ईमामकेँ अपन भालू 'शादुल' केँ मारबाक वा त्यागबाक कठिन निर्णय लेबय पड़ल ताकि ओकर बेटाक भविष्य सुरक्षित भऽ सकय आ ओकरा दू एकड़ जमीन भेटि सकय। ई कहानी मिथिलाक विस्थापित कृषि श्रमिक सभक पीड़ा आ पारम्परिक व्यवसायक समाप्त हेबाक यथार्थसँ मेल खाइत अछि।
अनुवादित प्रतिरोध: मैथिलीमे गुजराती दलित कविता अम्बेडकरवादी दर्शन आ मराठी दलित पैंथर आन्दोलनसँ प्रभावित गुजराती दलित कविता अपन 'कठोर' आ 'अनगढ़' (Rough diamond) गुणक लेल जानल जाइत अछि। मैथिलीमे एकर अनुवाद पारम्परिक कविताक विपरीत एकटा नव धरातल तैयार केलक। -अनीश गारंगेक "पोस्टर": ई कविता देखबैत अछि जे कोना दलित शरीरकेँ राजनीतिक विज्ञापनक लेल 'पोस्टर' जकाँ प्रयोग कएल जाइत अछि, मुदा व्यक्ति स्वयं अदृश्य रहि जाइत अछि। -राजेंद्र वडेलक "जीता": यौन शोषणक विषयकेँ 'जीत' सन व्यंग्यात्मक शब्दक माध्यमसँ प्रस्तुत करैत अछि, जे ऊँच जातिक व्यवस्थामे दलित स्त्रीपर वर्चस्वकेँ एकटा सामान्य हिंसाक रूपमे देखबैत अछि। -उमेश सोलंकीक "लोक, जमि जाए": सामाजिक उपेक्षाक ठंढमे लोकक 'जमि' जयबाक वा जड़ि हेबाक स्थितिक चित्रण करैत अछि।
स्वदेशी मैथिली दलित स्वरक उदय एहि क्षेत्रीय अनुवादसभक सबसँ पैघ प्रभाव स्वदेशी मैथिली दलित लेखनकेँ मान्यता देब छल। उमेश पासवान आ सन्दीप कुमार साफी आब अलग-थलग आवाज नहि, बल्कि एकटा अखिल भारतीय दलित चेतनाक हिस्सा छथि।
उमेश पासवान: ग्रामीण यथार्थ आ 'मुजरिम' केर अवधारणा उमेश पासवानक कहानी संग्रह 'मुजरिम' ग्रामीण मिथिलाक दलित जीवनक एकटा 'नैतिक गवाही' अछि। ओ 'मुजरिम' शब्दकेँ चुनौती दैत छथि आ देखबैत छथि जे कोना ई लेबल सत्ता आ विशेषाधिकार प्राप्त व्यवस्था द्वारा उपेक्षित वर्गपर थोपल जाइत अछि। हुनकर कहानी 'सुनन्दा' शिक्षा आ सामाजिक कलंकक संघर्ष देखबैत अछि, तऽ 'सोलकनमा पोखैर' सामुदायिक संसाधनसँ दलितक बहिष्कारक मुद्दा उठाबैत अछि। हुनकर कविता संग्रह 'वर्णित रस' कोसीक बाढ़ि, आतंकवाद आ युवाक आक्रोशकेँ दलित दृष्टि सँ देखैत अछि।
सन्दीप कुमार साफी: मैथिलीक पहिल दलित आत्मकथा सन्दीप कुमार साफीक 'बैशाखमे दलानपर' मैथिली साहित्यमे एकटा ऐतिहासिक मोड अछि। गजेन्द्र ठाकुरक अनुसार, मैथिलीमे दलित आत्मकथाक पूर्ण अभाव छल, जाहि अभावकेँ ई कृति भरैत अछि। साफी अपन संघर्ष, धोबी जातिक वंशानुगत श्रम, आ चण्डीगढ़मे प्रवासी मजदूर कऽ रूपमे भेल दुर्घटना (पैरमे आगि लागब) क मार्मिक वर्णन करैत छथि।
सौन्दर्यशास्त्रक पुनर्परिभाषा: दशम आ एकादश रस दलित स्वरक आगमन मैथिली सौन्दर्यशास्त्रकेँ पुनर्गठित कएलक अछि। पारम्परिक रस सिद्धान्त 'आनन्द' पर जोर दैत छल, मुदा दलित आलोचक विद्रोह आ आक्रोशकेँ नव रसक रूपमे प्रस्तावित करैत छथि।
1. जीवनक लेल कला (Art for Life's Sake): साहित्यकेँ सामाजिक परिवर्तनक उपकरण मानल गेल। 2. दशम आ एकादश रस: 'विद्रोह' आ 'आक्रोश' (Cry) केँ पारम्परिक रसमण्डलमे शामिल करबाक मांग कएल गेल जइसँ उपेक्षित वर्गक लेखनक सही मूल्यांकन भऽ सकय। 3. सामूहिक अनुभव: दलित साहित्यक पीड़ा व्यक्तिगत नहि, बल्कि हजार सालक सामूहिक यंत्रणा अछि। 4. बोलीक प्रामाणिकता: 'मानक' मैथिलीक बदला 'गँवार' वा स्वाभाविक बोलीक प्रयोग कएल गेल जइसँ उपेक्षित वर्गक आघातकेँ प्रामाणिक रूपसँ व्यक्त कएल जा सकय।
निष्कर्ष: एकटा बहुलतावादी मैथिली साहित्यक दिस मैथिलीमे अनूदित दलित साहित्य ई देखबैत अछि जे भाषा आब एकटा लोकतान्त्रिक विस्तारक दौरमे अछि। लिखित दलित स्वरक ऐतिहासिक अभाव रचनात्मकताक कमी नहि, बल्कि वर्चस्ववादी बहिष्कारक नतीजा छल। विदेह आन्दोलन द्वारा दलित साहित्यक अनुवाद ओहि रिक्तताकेँ भरबाक लेल एकटा 'सेतु' क कार्य कएलक। ई अनुवाद मात्र विदेशी कहानी नहि अनलक, बल्कि एकटा तुलनात्मक ढाँचा देलक जाहिमे उमेश पासवान आ सन्दीप कुमार साफी अपन स्थानीय अनुभवकेँ स्वर दऽ सकलाह। डिजिटल आर्काइव आ सौन्दर्यशास्त्रक पुनर्परिभाषा द्वारा, समकालीन दलित आन्दोलन मैथिली साहित्यक 'ब्राह्मणवादी एकाधिकार' केँ तोड़ि रहल अछि। मैथिली आब मात्र विद्वानसभक भाषा नहि, बल्कि अपन सभ भाषिक मानवता आ संघर्षकेँ प्रतिबिम्बित करय बला एकटा 'ज्ञान समाज' (Knowledge Society) बनि रहल अछि।
२ मैथिलीमे अनुवाद साहित्यक विकास आ अभिलेखीय महत्व: विदेह आन्दोलनक एकटा व्यापक विश्लेषण
मैथिली भाषाक साहित्यिक परिदृश्य, जे उत्तर बिहार, झारखण्ड आ नेपालक तराई क्षेत्रक एकटा पैघ आबादी (१७ मिलियन सँ बेसी लोक) द्वारा बाजल जाइत अछि, वर्तमानमे डिजिटल तकनीक आ अनुवाद आन्दोलनक संगम सँ एकटा क्रान्तिकारी परिवर्तनक दौर सँ गुजरि रहल अछि। ऐतिहासिक रूप सँ मैथिली साहित्य कें दू टा भिन्न दृष्टिकोण सँ देखल गेल अछि: "संस्थापन" पक्ष, जे १९६५ सँ साहित्य अकादमी सन विशिष्ट संस्था सभ द्वारा संचालित अछि, आ "समानान्तर" परम्परा, जे भाषाक लोकतान्त्रिक आ लोक जडि कें पुनः प्राप्त करबाक प्रयास करैत अछि। एहि परिवर्तनक केन्द्रमे विदेह आन्दोलन अछि, जकर प्रतिनिधित्व पाक्षिक ई-पत्रिका विदेह (ISSN 2229-547X) आ ओकर व्यापक डिजिटल आर्काइव करैत अछि। ई मौलिक आ अनूदित रचना सभक एकटा समानान्तर संकलन तैयार क' क' एहि आन्दोलन परम्परागत वर्चस्व कें चुनौती देलक अछि आ मैथिली साहित्यिक विरासतक लेल एकटा वैश्विक भंडार स्थापित कएलक अछि। ई रिपोर्ट मैथिलीमे अनुवाद साहित्यक विश्लेषण करैत आन्दोलनक वैचारिक आधार, तकनीकी पद्धति आ सांस्कृतिक प्रभावक परीक्षण करैत अछि।
मैथिली अनुवाद आन्दोलनक ऐतिहासिक आ भाषाई सन्दर्भ
मैथिली साहित्यक बुझबाक लेल आवश्यक अछि ई बुझब जे अनुवाद समकालीन अभिलेखीय प्रतिरोधक एकटा शक्तिशाली उपकरण कखन आ कोना बनि गेल। भाषाक प्राचीनतम साहित्यिक अभिव्यक्ति चर्यापद मे भेटैत अछि, जे ७०० सँ १३०० ईस्वीक बीच बौद्ध सिद्ध कवि सभ (जेना लुईपाद आ सरहपा) द्वारा सन्ध्या भाषा मे लिखल गेल छल। विदेह आन्दोलन एकटा महत्वपूर्ण विद्वतापूर्ण हस्तक्षेप करैत प्रसिद्ध पदावली कवि आ संस्कृत/अवहट्ट लेखक विद्यापति थक्कुर (१३५०-१४३५ ई.) क बीच स्पष्ट भेद करैत अछि। आन्दोलनक तर्क अछि जे संस्थापन पक्ष कवि विद्यापतिक परिचय कें संकुचित क' क' हुनकर गैर-ब्राह्मण आ विद्रोही पक्ष कें दबा देलक अछि। एहि सन्दर्भमे अनुवाद मात्र भाषाई अभ्यास नहि, बल्कि पुनरुद्धारिक एकटा वैचारिक कार्य अछि। दलित, महिला आ कात-करोटमे धकेलल समुदायक अनुभव कें अनुवादित क' क' आन्दोलन मैथिली साहित्यक केन्द्रमे "धड़कैत मानवीय हृदय" कें वापस आनि रहल अछि।
विदेह ई-पत्रिका आ डिजिटल आर्काइव संरचना २००० मे भालसरिक गाछ याहू सिटी फेर २००४मे ब्लॉगक रूपमे ई शुरू भेल आ २००८ मे विदेह क रूपमे पुनर्गठित ई पत्रिका मैथिली साहित्यक सभ सँ पुरान आ निरंतर डिजिटल उपस्थिति अछि। एहि पत्रिका ४३८ अंक प्रकाशित कएलक अछि, विदेह पेटार नाम सँ एकटा विशाल डिजिटल आर्काइव तैयार भेल अछि। एहि आर्काइव कें विभिन्न "सदेह" (भौतिक रूप) खण्ड सभमे संगठित कएल गेल अछि।
विदेह आर्काइव आ अनूदित पोथी सभक वर्गीकरण विदेह आर्काइवक संरचना साहित्यिक संरक्षणक लेल एकटा व्यवस्थित दृष्टिकोण दर्शाबैत अछि।
आर्काइव/खण्ड विषय विवरण सन्दर्भ विदेह सदेह २७ दोसर भाषा सँ मैथिलीमे अनूदित गद्य आ पद्य। अंक १-३५०; गजेन्द्र ठाकुर आ रवि भूषण पाठक रचना । विदेह सदेह २८ अनूदित गद्य आ पद्यक व्यापक संकलन, जाहिमे पैघ उपन्यास सेहो अछि। क्षेत्रीय भारतीय आ अन्तर्राष्ट्रीय रचना सभ पर केन्द्रित। विदेह सदेह ३७ अनूदित गद्य-पद्यक दोसर खण्ड; तेलुगु/ ओड़िया/ गुजराती दलित कथा/ पद्य सभ पर विशेष जोर। पेद्दिति अशोक कुमारक जिगिरी सेहो एहिमे शामिल अछि।
गद्य-पद्य भारती विशेष "अनुवाद विशेषांक"। अंक ९७; देवनागरी आ तिरहुता दुनू लिपिमे उपलब्ध। मैथिली पोथी डाउनलोड कएल जा सकय बला पीडीएफ पुस्तक सभक श्रेणी। पुरुष परीक्षा आ मोहनदास सन अनुवाद शामिल अछि। लिपिक स्तर पर, आन्दोलन मिथिलाक्षर (तिरहुता) कें यूनिकोड मानकमे आनि डिजिटल प्रकाशन कें सुगम बनौलक अछि। आर्काइवमे ब्रेल लिपिमे पहिल मैथिली पुस्तक आ मैथिली सांकेतिक भाषा (Sign Language) क संसाधन सेहो उपलब्ध अछि।
अनुवादक सिद्धान्त आ कला मैथिलीमे अनुवादक कार्य परिष्कृत सैद्धान्तिक दृष्टिकोण सँ प्रेरित अछि जे सांस्कृतिक निष्ठा आ भाषाई पहुँचक बीच सन्तुलन बनाबैत अछि। विदेह आर्काइवक निबन्ध "अनुवादक कला" (The Art of Translation) एहि जटिलताक अन्वेषण करैत अछि।
भाषाई आ शैलीगत पद्धति मैथिली अनुवादमे "स्वर" (Tone) क अवधारणा महत्वपूर्ण अछि। गजेन्द्र ठाकुर आ अन्य अनुवादक निम्नलिखित रणनीति सभक प्रयोग करैत छथि: 1. गत्यात्मक तुल्यता (Dynamic Equivalence): स्रोत सन्देश कें प्रभाव कें मैथिली पाठकक हृदय धरि पहुँचाबय लेल नीक अनुवाद कएल जाइत अछि। 2. देशीकरण बनाम विदेशीकरण: किछु ग्रन्थ सभकें मिथिलाक ग्रामीण परिवेशक अनुसार ढालल जाइत अछि (Domestication), तँ किछुमे मूल संस्कृतिक विशिष्टता कें सुरक्षित राखल जाइत अछि। 3. परम्परागत सेतु (Paratextual Bridging): पाद-टिप्पणी (Footnotes) आ शब्दकोश (Glossary) क प्रयोग सँ पुआ वा पांचाली सन सांस्कृतिक शब्द सभक व्याख्या कएल जाइत अछि। 4. सहयोगी अनुवाद: भाषाई विशेषज्ञ आ रचनात्मक लेखक मिलि क' भौगोलिक बारीकी आ अनुष्ठान सभ कें पकड़बाक प्रयास करैत छथि।
सामाजिक इतिहासक मामला: 'जिगिरी' क अनुवाद विदेह आर्काइवक एकटा महत्वपूर्ण परियोजना पेद्दिति अशोक कुमारक तेलुगु उपन्यास जिगिरी क सदा लेल मित्र (Friends Forever) नाम सँ मैथिली अनुवाद अछि। ई उपन्यास कलन्दर समुदायक सामाजिक इतिहास अछि जे रीछ-नाच (Bear-dancing) आ सँपेरा क' काज क' क' अपन जीविका चलबैत छलाह। वन्यजीव संरक्षण अधिनियमक बाद एहि समुदायक अस्तित्व संकटमे आबि गेल। मैथिली अनुवादमे एहि समुदायक पीड़ा कें क्षेत्रीय मुहावरा आ ग्रामीण बोलीक माध्यम सँ अत्यंत प्रभावशाली ढंग सँ प्रस्तुत कएल गेल अछि।
क्षेत्रीय आ अन्तर्राष्ट्रीय आयाम - पाखलो (कोंकणी): तुकाराम रामा शेटक एहि उपन्यासक अनुवाद डॉ. शंभु कुमार सिंह द्वारा कएल गेल अछि, जे गोआक मुक्तिक संघर्ष आ मिश्रित नस्लक बच्चा सभक सामाजिक पहचानक गप करैत अछि। - छिन्नमस्ता (हिन्दी): प्रभा खेतानक एहि उपन्यासक अनुवाद शहरी नारीवाद आ मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद कें मैथिली आर्काइवमे स्थान देलक अछि। - बर्तोल्ट ब्रेख्त (जर्मन): ब्रेख्तक नाटकक अनुवाद सँ मैथिली रंगमंचमे "एलियनेशन" (Alienation) सन सैद्धान्तिक अवधारणा सभक प्रवेश भेल अछि। -कुरान: कुरानक पहिल अध्याय (अल-फातिहा) क अनुवाद मिथिलाक बहुलवादी वास्तविकता कें प्रतिबिम्बित करैत अछि।
जगदी़श प्रसाद मण्डलक प्रभाव विदेहक माध्यम सँ जगदी़श प्रसाद मण्डलक आगमन मैथिली कथा साहित्य लेल एकटा निर्णायक मोड़ छल। हुनकर उपन्यास पङ्गु (२०२१ क साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त) आ लघु कथा "बिसाँढ़" ग्रामीण संघर्ष आ मुसहर समुदायक यथार्थ कें बिना कोनो बनावट क' प्रस्तुत करैत अछि। ठाकुर द्वारा हुनकर रचना सभक अंग्रेजी अनुवाद जेना (Struggles of Life) एहि आन्दोलनक नैतिक स्वर कें विश्व स्तर पर पहुँचेने अछि।
निष्कर्ष विदेह आन्दोलनक अनुवाद साहित्य आधुनिक भारतक सभ सँ महत्वाकांक्षी भाषाई आ अभिलेखीय परियोजना सभमे सँ एक अछि। अनुवादक माध्यम सँ "समानान्तर इतिहास" आन्दोलन संस्थापन पक्षक कथानक कें सुधारैत अछि आ चर्यापदक लोकतान्त्रिक जडि सँ ल' क' समकालीन दलित चेतना धरि कें सुरक्षित करैत अछि। एहि डिजिटल आर्काइव आ अनुवादक कलाक प्रति प्रतिबद्धताक माध्यम सँ विदेह सुनिश्चित करैत अछि जे "मिथिलाक आत्मा" सदैव जीवन्त आ वैश्विक पहुँचमे रहय। [सैद्धांतिक विवेचन लेल देखू- मैथिली समीक्षाशास्त्र- गजेन्द्र ठाकुर] अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। पद्य ३.१.स्व. कालीकान्त झा बूच- ३ टा कविता पाण्डुलिपिसँ ३.२.संतोष कुमार राय 'बटोही'- 'उर्मिलाक विद्रोह' (खण्ड-काव्य) ३.३.जगदानन्द झा "मनु"-१८ टा हाइकू ३.४.बद्रीनाथ राय अमात्य- ५ टा कविता ३.५.शिव कुमार झा टिल्लू- २२ टा सोहर, नचारी , डहकन, विवाह गीत आ किछु गीत आ कविता ३.६.कपिल यादव 'निष्क'- ५ टा कविता ३.७.तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम'] मूल तेलुगु: नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव) मैथिली अनुवाद: मानेश्वर मनुज [खण्ड २] ३.१.स्व. कालीकान्त झा बूच- ३ टा कविता पाण्डुलिपिसँ स्व. कालीकान्त झा बूच ३ टा कविता पाण्डुलिपिसँ हिनकर पाण्डुलिपि आब विदेह पेटारमे उपलब्ध अछि।- सम्पादक १ अर्थयुग (कविता )
जकरा त'र रतन अछि ढेरी ओकरा माँथ कंचनक बड़ेरी ताहि घरक अन्नक किछु कणलेल कोटि कोटि भरि रहल अगत्या अग्रज कयलनि अनुजक हत्या हरित क्रांतिक ह'र चलयलनि विश्व शांतिक घ'र बनौलनि देखि रहल छी आई सबेरे तनिके चार गिद्ध बैसल छनि लहलह फाड़ पेट पैसल छनि जे मरि मरि भरि देल बखारी बीकि गेल अछि तनिक घरारी लगा रहल चाननक गाछ जे तकरे शवक लेल नहि काठी दुर्लभ आंच सस्त खोरनाठी बैसल जे आखेट क' रहल जे चलि रहल अंमेट भ' रहल सूतल सूतल जकरि गेल से थाकलसँ तन जता रहल अछि गाँथल आरो गथा रहल अछि घूमि घूमि क' छानल रनवन आनल सुमन सजाओल उपवन तकरे लग तरुओ फटाह ई पथक शूल पद चुभुकि रहल अछि शोणित सगरो भुभुकि रहल अछि जे विकासक कुण्ड बनौलक कल्याणक शाकल मंगबौलक से श्रमदानक हव्यक संगसंग दुनु हाथक श्रुवा जरौलक ऊपरसँ नैनो फोरबौलक नहि अवकाश कहाँधरि कहबह की जीवनभरि मरिते रहबह देखह जर्जर शैल शिखरसँ धीपल पाथर चटकि गेल अछि वज्रपात भ' छिटकि गेल अछि
२ आजुक कवि
आजुक कवि कोकिल नहि कौआ टांहि टांहि केर शोर मचाबथि कुकू कहब बिसरला बौआ रसक रसाल पराग परेमी आइ पीजूकेँ पीबि रहल छथि उपवन तेजि आँगने आँगन अइँठ कुठि पर जीबि रहल छथि लोलक लुत्तीसँ सगरो ई गामे गामक आगि लगउआ काया कल्पक कलाकार ई आइ सुधारक घाउ घिकोरथि बिसरि समाजक गुणा भागकेँ अपनों लेल अशुद्धे जोरथि युगक तराजू केर पासंगसँ सेर बन' चाहथि ई पौआ कप्पक अछि अनुमान पलेटक भाव चम्मचे संचारी अछि बेचल सभ भूषण भाषण पर बाँचल आब एक साड़ी अछि कविताकेँ ई कना कना क' मंच मंचपर पेट पकौआ बिनु डोराक सूइसँ शब्दक नवकी कथरी सीबि रहल छथि पत्नी केर वैधव्यो पर ई चिरंजीवी भ' जीबि रहल छथि काज कोन प्रेमक पुरहरसँ घाटि बियहुति व'र सगहुआ
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ईमान हेरायल
आइ हमर ईमान हेरायल ! मोंट घांट ढमकल मंदिरमे अंग भंग भगवान हेरायल भ्रष्ट भेल आचार विकल अछि आइ विचार जठर ज्वालामे जत' बनल सुमनक सिनेह से कंठ सजल मुण्डक मालामे ग्लानिक देह कत' के गारत लाजक कब्रिस्तान हेरायल दुःशासनक सबल शत प्रतिशत भ्राता देखू भ्रष्ट भेल छथि पाण्डु पुत्र उन्मन उदास छथि अग्रजकेँ बर कष्ट भेल अछि पापीगणक प्रचंड पयोनिधि मे धर्मक जलयान हेरायल लागल कपट विकास पसाही भारत सत्यानाश भेल रे गाम गाम सावनक घटा आ ठाम ठाम मधुमास भेल रे कात करौटक कथा कोन रे सौंसे हिंदुस्तान हेरायल
-स्व. काली कान्त झा "बूच ", ग्राम + पत्रालय : करियन, जिला : समस्तीपुर कालीकान्त झा "बूच" [पुष्पांजलि (पाण्डुलिपि)/ काव्यांजलि (पाण्डुलिपि)] -राजदेव मंडल; Mob:9199592920; Gmail:mandalraj@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.२.संतोष कुमार राय 'बटोही'- 'उर्मिलाक विद्रोह' (खण्ड-काव्य) संतोष कुमार राय 'बटोही' 'उर्मिलाक विद्रोह' (खण्ड-काव्य)
चारिम खेप
राम-लखन संवाद
अनुज लखन ! ई अहाँ नीक काज नहि केलहुँ । उर्मि केँ अयोध्या छोड़ि अहाँ वनवास एलहुँ । पतिव्रता धरम निबेहलीह पति सँ विमुख भऽकऽ । धन्य उर्मि , पत्नी भेलीह एलहुँ बड़ भाग्य लऽकऽ !
कोना हेतीह तीनू माताजी हृदय बड़ बेचैन अछि । पिताजी कोना हेताह दर्शन लेल बेकल नैन अछि। कोना हेतीह मंथरा दासी संग केकैयी माता । सबसँ बेसी चिंता अछि कोना हेताह भरत भ्राता ।
राजपाट-सुख मिथ्या थिक ई बुझल जाउ सभ । रामराज्य कल्पित अछि फेकू मिथ्या वचन नभ । के ककरा लेल मरैत अछि अरजल धन छौर भेल । रिश्ता खतम भेल जग मे सब कियो बौर गेल ।
भैय्या! ई जीनगी नरक अछि जे कुटुंब नहि बुझताह । खयलाह-हगलाह सँ जग नहि चलैत छै से के बुझताह । एक आदमी सँ अवध नहि चलैत छै से सोचि लिअ । अवध हमरे नहि अछि सभ मोन मे ई गप रचिलिअ ।
उर्मि हमर छी हम अपराधी छी ओकर से मानैत छी । जग हँसतैक अगर अनुज भ अहाँ संग नहि अबैत छी । हम किछु नहि बुझैत छियैय भ्राताक धरम नेबाहैत छी । माफ करू गलती हे उर्मि ! हाथ जोरि हम कहैत छी ।
कवि - संतोष कुमार राय ' बटोही' ग्राम - मंगरौना अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.३.जगदानन्द झा "मनु"-१८ टा हाइकू जगदानन्द झा "मनु" १८ टा हाइकू पच्चीसटा हाइकू हाइकू 1 मोनक रस्ता पेटसँ होइत छै संगे आँखिसँ 2 घृणा होएब कोनो कठिन नहि आँखि पढ़ने 3 लोभ चलाकी आँखिक पर्दापर सब लिखल 4 कोमल चित निर्दय वासनासँ नित्य हारैत 5 बाहर बड्ड गाजा बाजा तमाशा भीतर सुन 6 मेघ गर्जैत पियासल धरती तृप्तक आस 7 चौठक चान मेघक घोघ हटा बिहुसि गेली 8 समय संगे बिसैर जाइत छै लोक लोककेँ 9 बिन सोचने जिनका हिया देलौं ओ सौदागर 10 प्रेम पागल पागल सभ प्रेमे नीक अप्रेमे 11 पगल प्रेमी दिन राति बाँचैत प्रेमपत्रकेँ 12 एकटा नाम करेजक पन्नासँ नहि मिटलै 13 चान सुरूज दू बाटक पथिक भेट नै भेल 14 काजर बनि जँ अहाँक आँखिमे बसितौँ हम 15 कतेक राखू एकटा करेजमे अहाँक नाम 16 कतय छलौं हियाक नेह अहाँ एखनधरि 17 प्रेमक फल हमर कोइखमे जग आनन्द 18 अहाँक प्रेम प्रभु केर प्रसाद बनि भेटल -जगदानन्द झा ‘मनु’, मो० न० +९१ ९२१२-४६-१००६ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.४.बद्रीनाथ राय अमात्य- ५ टा कविता बद्रीनाथ राय अमात्य ५ टा कविता १ आत्म व्यथा हम सुना रहल छी हमरा भोरे भूख लगइए। कनिया हमर कवियित्री भेली, घरमे चुल्हा नञि पजरइए।। मंचेपर ओ आगि लगाबथि, चुल्हीक ताप कोना सहती? अनका कहथिन शाड़ी पहिरु, अपने जिंसेपर रहती।। ओकरो कनिञा हेतै कवियित्री, जे केओ हमरापर हँसइए। वज्र खसौ औही कवितापर जे, जे हमरा भूखले राखैइए।। फुटहा हमर प्राणके रक्षक, सेहो आब नञि दर्शन दईए। लाजो नञि स्त्रैन पुरुषके, जे हुनकर कविता सुनइए।। पुरुष स्त्रैनके शाप देबै हम, जे जे सब थपड़ी पिटइए। ओहो कोनो मनुष्ये छी जे, हमर व्यथाके नञि बुझइए।। कनियाके प्रोत्साहन दक', हमर घावपर नोन छिटइए। सब दिन ओ बेंटछुट्टे रहता, जे हमरा बुरिबक बुझइए। । कनिया हमर चाटके आदी, पिज्जा खा बर्गर ढ़ेकरइए। हमरा कहथि महा पेटू छी, केकरा कहबै? लाज लगइए। । शान्ति सेज कहियो नञि भेटल। महासेज सन निन्द अबइए। वज्र खसौ ओहि कवियित्रीपर, जे हमरा जिविते जरबइए।। २ दुखक बात हम सुना रहल छी, सुनू श्रेष्ठ सज्जन श्रीमान। आत्मव्यथा अछि बड़ दुखदारुण, सुनियौ कथा फोलि दूनू कान।। हमर व्यथाके सुनता मैथिल? बकरी चरलक उपजल धान।। हमर करेजपर हऽर बहइए, बाँचत कोना प्रतिष्ठा मान? कनिञा हमर कवियित्री बनली, मैथिली मंच महैंक उठतै। जीवन अस्त व्यस्त भेल हमरो, जागल भाग्य सेहो सूततै।। टी शर्ट जिंस पहिरक' कनिञा, हमरे मान बढ़ौती। पाश्चात्यक परिधान क्षीणमे अपने मान घटौती।। लाल देह कारी झामर भेल , ठनका कोना ठनकि खसलै? हमर विधाता भेल वाम छथि, मनमे पऽर पुरुष बसलै।। पछबा हवा निरस बहलै।। साहित्यसँ सम्बन्ध दूर धरि, हुनका नञि कहियो रहलनि मन करइए डूबि मरी हम, मनमे कोन हवा बहलनि लज्जित आऔर पराजित हम छी, अपन कामिनी कनिञासँ। हम उपेक्षित उपहासित छी, अपन प्राणप्रिय रनियाँसँ।। मिथिला ढ़हतै,मैथिल ढ़हता, हम पहिलेसँ ढ़हले छी। नर्कक नालीमे जीवन अछि, हम बुझै छी जहले छी।। सावधान शिष्ट मैथिलजन, बाधा बहुत अनन्त हेतै। जखन मंचपर चढ़ती कनिञा, देखबै तखन भूकंप हेतैक। । ३ कनक कामिनी कनिञाके हम, कथा कहैत छी,सुनू सुजान। नर्कोसँ जीवन दुखदारुण, सत्य कहै छी हम श्रीमान ।। अपन व्यथा हम सुना रहल छी, सुनियौ सज्जन शिष्ट महान। उपजल धान चरलक अछि बकरी, कहू एकर की उचित निदान?? कनिञा हमर सुनौलनि कविता, कविता सुनिते उन्टी भेल। अपने सनक सुनौलनि कविता, सौंसे देह घाम छुटि गेल। । सरल गनहाएल सुनाक' कविता, केलनि नैतिक दोहन। हमरो बरद बना देलनि ओ, एहन केलनि सम्मोहन।। पुरुष विरोधी कविता लिखथि, पुरुषसँ बहुते वैर रखै छथि। पुरुषे लेल व्याकुल रहथि ओ, जतै ततै ओ झमा खसै छथि।। मंचपर आगि उगलै छथि बेसी, घरमे चुल्हा नञि पजरइए। हाटबजार ओ खा ढ़ेकरै छथि, जीवन आब अन्हार लगइए। । हुनके दोष छै, कोना कहब से? हमरोमे पौरुष नञि बाँचल। राहड़ि झाड़ब बिसरि गेल छी, कनिञा भेली पाँजसँ बाहर। । एहि झगड़ामे पंच बनत से, हम बुझबै ओ लबड़े हाएत। सम्मानित अछि कोनाक' बुझबै? निश्चय ओ चमचोरे हाएत। ।
४ कनिञासँ बतियाइत रही हम, मन हमर फगुनाएल रहय। सासुरसँ सरहोइजक लिखल,चिट्ठी एकटा आएल रहय।।
चिट्ठीमे उपराग लिखल छल, मनके भेद विवाद लिखल छल। दूइभ बाटमे जन्मल पाहुन शीघ्र आउ,सम्बाद लिखल छल। ।
पाँचम बरस विवाहक बीतल, छट्ठम बौआके छठिहार। सालमे दू बेर शोरि सरै छी,भोथ भेल यौवनके धार।।
दुनू परानी अबियौ अपने,कहू एकर की छैक उपचार। सार अहाँके जुलुम करै छथि,लीला हुनकर अपरमपार।।
हमर बात जँ मानी अपने,नाक कटा नैहर चलि जाइ। कोनो नपुंसक गिरहतके सब, खेती बारी दियौ बटाइ।।
आयुर्वेदक सूत्र मुताबिक, इ अचूक एकटा उपचार। हमर बात ई मानू अपने,सातम किएक हेतै छठिहार।।
हमर सारके सासुर भेजू,शीघ्र अहाँ नैहर चलि जाइ। बौआ सबके मातृक भेजू,एक मात्र इ अछि उपाइ।।
चिट्ठी देखि आनन्दित कनिञा, निज नैहरके केलनि बराइ। धन्य धन्य लोक नैहरके धन्ये छथि हमर भौजाइ। ।
चिट्ठी पढ़ि फुलेली कनिञा, पहिनेसँ छेली हरियाएल। अपन चुरैल सन रुप सजौली,नहिरा भोजक छली भुखाएल।।
उजरल नैहर बसा देलनि ओ निज भौजीके देलनि बधाइ। नैहर जाएब सनेश बनाएब, हमरासँ मंङलनि किछु पाइ।।
मरुवा चिक्कस सानि लेल जाए, ललका पूरी लेब बनाइ। ठोरमे काजर, गालमे कारी ,लगा लियऽ, नैहर जँ जाइ।।
नाक कटा कवियित्री भेलहुँ,से जुनि कहबै नैहर जाइ। सत्य बात जँ बुझती भौजी,तखन नीक नञि भेटत विदाइ। ।
ई हम बात अवश्ये कहबनि,नैहरमे भौजीके जाइ। हेतेन सूप सन हुनकर छाती,सुनिते भौजी देती बधाइ। । ५ गुरु भक्ति हम छोड़ि देलहुँ अछि, आब अंङुठा नहिञे देब। शंम्बूक बद्धके उचित कहत जे, की विधान हम मानिञे लेब?
धरती अपन आकाशो बदलब, सब विधानके धाङिञे देब। जागल छी अनुकूल हवा छै, ओहिना नञि हम छोड़िये देब।।
बहिरा निर्लज्जा सूतलके निन चैन हम छिनिये लेब। रगड़ि देबै मिरचाइ आँखिमे, हम विस्फोटक फोड़िये देब।।
सब लहासके जगा देबै हम, हम मृत्युसँ लड़िये लेब। कहबै ले अधिकार अपन तूँ, बन्द चक्षुके खोलिये देब। । -बद्रीनाथ राय अमात्य, ग्राम पोस्ट करमौली, भाया कलुआही, जिला मधुबनी बिहार ,फोन 6205190859 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.५.शिव कुमार झा टिल्लू- २२ टा सोहर, नचारी , डहकन, विवाह गीत आ किछु गीत आ कविता शिव कुमार झा टिल्लू २२ टा सोहर, नचारी , डहकन, विवाह गीत आ किछु गीत आ कविता १ सोहर ( जानकी प्राकट्य गीत )
आऊ आऊ हे सखि देखियौ हे मिथिघर अभिनव रे ललना रे बैसू बैसू हे सखी सुनियौ हे धीयाकेँ कलरव रे लेली अवतार भवानी बेटी भ' एली मिथिघर रे ललना रे अपन जनकपुर धाम कि भूमिजाकेँ नैहर रे झूमिझूमि सखीसभ गबियौ कि रानीकेँ झुमबियौ रे ललना रे अबियौ हे बाबूजी विदेह कि बेटीकेँ खेलबियौ रे ! जगतक जननी कहेलखिन रामजी'केँ प्रीता रे ललना रे धनधन सुनयनाकेँ भाग्य कि बेटी भेली सीता रे ! धन्य मिथिभूमि अविराम कि सिया नामे धन्य भेली रे ललना रे धन्य धन्य मिथिलाधाम कि जानकी प्रगट लेली रे
२ जानकीक अवतार (गीत)
सुखद सुहासिन शोर जनकपुर नगरी रे ललना रे नृप छथि मगन विभोर भरल मोह अँचरी रे सिया तन गहल कनकसँ सुशोभित चुनरी रे ललना रे बरूहोथि जगतक जननी जनकलेल सुनरी रे जननीक नयनमे नोर अनूप बेटी एलथि रे ललना रे देखू सखी जनक विभोर कि बाबूजी कहेलथि रे भरि गेलै मैयाजीकेँ कोर प्रगट भेली दुलरी रे ललना रे बँटल महलमे पटोर कटल दुःखमुंदरी रे देखू देखू गबै छथि सोहर भाट गबैया रे ललना रे चलू शिव माँगि लियौ मोहर रानीसँ रूपैया रे
३ जानकी प्राकट्य सोहर
धन्य पुनौरा गाम विदेह तप सिद्ध भेल रे आहे धन्य जनकपुर धाम सुनयना कोर भरिगेल रे ! भेली पर्याय रे शुचिता जनक धीया सीता रे आहे माय सुनयनाकेँ बनिता कि मिथिलाक प्रीता रे पुलकित सकल चराचर करथि धीया'केँ मान रे आहे भाट सुनाबथि सोहर भावभरि सुरतान रे ! दीन- दुखी जुटल जनकघर माँगथि बधैया रे आहे पाबथि सकल जन मोहर द्रव्य रूपैया रे ! गदगद माय सुनयना कि सुन्न अंक भरलनि रे आहे सुन्नरि धीयामुख शोभनि सियानाम पड़लनि रे ! करू शिव सिया पदवंदन जानकी प्रकट भेली रे आहे आऊ'आऊ करूअभिनन्दन सीता मिथिघर एली रे !
४ सोहर
शुभ'शुभ मिथिलाकेँ धरती जनकपुर धन्या रे ललना'रे अयली जनकजीकेँ अंगना कि चारि सुकन्या रे.. सियाजी सुनयनाकेँ कोर भावुक मोन जनकक हे ललना रे टकटक आँखि विदेह धीया'दिश अपलक हे धायमाय गदगद देखथि चारि'बेटी किलकथि हे ललना रे बिसरि गेलथि राजकाज विदेहराज मुसकथि रे बनल कनक'केँ पलना रेशमडोर झुलना रे ललना रे हँसिहँसि झुलबथि धाय सुनयना'केँ अंगना रे जनकक हिय सानंद अतुल सुख अवसर रे ललना रे चलू सखी मिथिला नगरिया कि गायब सोहर रे
५ जानकी सोहर
महमह मिथिलाकेँ मंदिर खहखह गहबर रे ललना रे सिया'एली धरती'क कोर गाबथि'माय सोहर रे ! गदगद जनकक नेह सुखक नहि परतर रे ललना रे चहचह राज विदेह महल दिशि धरफर रे ! खुशी मोन चानीसोन लुटबथि नृपकेँ सहचर रे ललना रे राग तान नव अनुरागमे सकल चराचर रे ! सजि गेल आशक पात सजल भोग छप्पन रे ललना रे करथि पुरुब अभ्यास देखब कोना नेनपन रे ! गुरुजन गुनल सुदिन दिन सीता भवप्रीता रे ललना रे पसरत मिथिलाक नाओं ई जगत पुनीता रे !
६ प्रेम दर्पणमे(प्रीति गीत )
प्रेम दर्पणमे भाल कुंदन सन गोर गोर गाल श्वेत चंदन सन जोड़ि जोड़ि प्रीति ह'म जुड़ेलौं हिया बाजै छी अहाँ तँ कूकू गुंजन सन प्रेम अमृत कि पी सकब कहियो तृप्ति नहियो तँ कखनो अंजन सन सपनामे डूबि रचि लेलहुँ गीते लागैए ई गीत प्रेम वंदन सन आँखि नहि झुकाऊ प्रिये ताकि लिए' हे देखू शिवकेँ ठोर क्रंदन सन ७
मैथिली नचारी गीत
सभटा संकट हरियौ शिवशंकर त्रिपुरारी यौ एलौं अहाँ'केँ दुआरी यौ ना ... हिय'मे श्रद्धा खाली हाथ गगरी'भरि गंगाजल माँथ उज्जर फूल नै भेंटल उजड़ल हम्मर बारी यौ एलौं अहाँ'केँ दुआरी यौ ना ... लोढ़लौं बाटे'कात अकोन धथूरक फ'ड़ रहल नै मोन धीरे धीरे चललौं संग छथिन महतारी यौ एलौं अहाँ'केँ दुआरी यौ ना ... किछु नहि मांगब हे महादेव जे देबै से मोन'सँ लेब पहिने ओकरे देखियौ जकर कष्ट बड़ भारी यौ एलौं अहाँ'केँ दुआरी यौ ना ... गौरी'माय लेल अनलौं फूल खसखस लालेलाल अड़हुल हे शिव बिसरि गेलौं हम दीप कपूरकेँ थारी यौ एलौं अहाँ'केँ दुआरी यौ ना ... ८ शुभे हो शुभे (मैथिली संस्कृति गीत )
शुभे मिथिला नगरिया शुभे हो शुभे कोसी कमला दुअरिया शुभे हो शुभे शुभे कातिक महिना करथि मास बहिना शुभे हो शुभे गंगाधामे सिमरिया शुभे हो शुभे शुभे फ'ल मेवा हे सामा चकेवा शुभे हो शुभे करू बेटीकेँ सेवा शुभे हो शुभे चखू साग तोरी चलू खेलू होरी शुभे हो शुभे सीखू मैयासँ लोरी शुभे हो शुभे शुभे ग्रीष्म मासे तँ साओन सुवासे शुभे हो शुभे तखन समदन उदासे शुभे हो शुभे हे देखियौ बहरिया एलैये कहरिया शुभे हो शुभे चलू शिवकेँ नगरिया शुभे हो शुभे . ९ शुभे हे शुभे (जानकी- राम विवाह प्रसंग गीत)
आजु शुभ मंगल दिनमा शुभे हे शुभे बेटी सीता''केँ लगनमा शुभे हे शुभे मिथिला'केँ कणकण शुभे प्रेमक अनधन शुभे माय सुनयना जीकेँ मनमा शुभे हे शुभे अवध सगुनमा शुभे मिथिला अँगनमा शुभे देखियौ जनक भवनमा शुभे हे शुभे परिछन पनमा शुभे अन'धन सोनमा शुभे हे शिव रामकेँ चरणमा शुभे हे शुभे
१० शुभे हे शुभे ( सीता'राम विवाह प्रसंग )
शुभे शुभ के लगनमा शुभे हे शुभे भरल सीता नयनमा शुभे हे शुभे ! शुभे दान काले बहिन आँखि लाले शुभे हे शुभे जेती सासुर सकाले शुभे हे शुभे ! केलनि तात दाने भेंटल राम माने शुभे हे शुभे हमर मिथिला महाने शुभे हे शुभे ! सिया सीथि लाले मुदित माय भाले शुभे हे शुभे भरल जनकक महाले शुभे हे शुभे ! सरस शिव'केँ गाते जेना पान पाते शुभे हे शुभे रहय अचला अहिवाते शुभे हे शुभे !
११ बालजन्म सोहर (मैथिली)
चानसन मुख भलमान कि ठोर चकोर सन रे ललना रे जनमल शुभ संतान मुदित घ'र आंगन रे ! किओ कहै श्यामल राम कि कृष्ण कन्हैया रे ललना रे देखू मैया पुत्र अभिराम कि बाँटू'ने बधैया रे ! बाबूजीकेँ मुख मुस्कान कि बालककेँ चूमथि रे ललना रे अंगनामे खुशीकेँ विहान कि दाइ'माइ झूमथि रे ! दिय' दिय' दाइ तेलकूर कहैत सखी नाचथि रे ललना रे लगबथि सभकेँ सेनूर कि डहकन गाबथि रे ! जुग जुग जीबथु ई लाल दियौ यौ बाबा मोहर रे ललना रे दियौ दियौ हे शिव ताल गाबथि सखी सोहर रे !
१२ डहकन गीत
हे आऊ आऊ समधी छोलनीसँ गाले सेकाऊ समधिनकेँ मारल रनबनमे बौआइ छी नट्टिंनसँ नयना लड़ाऊ... लकलक छथि समधी आ समधिन चतरिया हिरनीसँ जोड़ी मिलाऊ.. चोकटल अछि गाल अहाँ दूधकट्टू मनसा खाऊ स'मधि ठूसिठूसि खाऊ .. फूजनि नै मुंह कोना रसगुल्ला खेथिन पाछुएसँ सभ किछु खुआऊ.. डाऊटफूल बेटा पर एतबा टा धाही चेकअप ले डॉक्टर बजाऊ.. तिलककेँ बेर कोना नोरे कनेलथि हिनका ऊरकुस्सी लगाऊ . बेटाकेँ बेच बहुत पापे केलौं शिव जाऊ जाऊ पतिया कटाऊ .. (रचना तिथि : 05.04.2025)
१३ डहकन
तिलक लाख पचासा स'मधि तैयो नै संतोख हे एक पसेरीक खस्सी संगे रसगुल्ला भरिपोख हे नमरल धोधि कदीमा सनकेँ दाँत केहेन छनि चोख हे अपना घरमे काँच सोहारी एक्के क'रमे सोख हे ! सात पिरहीकेँ कृत्त उघारब तैयो नै लागत दोख हे गछने छल हीरा केर गहना ठकि लेलक निस्सोख हे केहेन छथि समधिन जे भेटलनि एहेन बुड़बक लोक हे गारियो सुनि क' किछु नै बाजथि की समधी छथि बौक हे सोलह कैरेटकेँ लॉकेट अनलथि कोनो नै धरीधोख हे गारि सुन'मे किये लगै छनि सभ स'मधिकेँ जोंक हे
१४ टटका डहकन
समधिन मारलथि एक लथारि लगिते समधि काटथि बपहारि स'मैध गुरकि गेलथि गोरथारि अप्पन माँझ दुअरिया ना ......... देखिते समधि हाथमे सटका समधिन उठाक' देलखिन पटका समधिक गत्रगत्रमे झटका लगलनि बीच बजरिया ना............ गहना बिनु घुरि एलथि समैध समधिन पचका देलथिन धोईध स'मैध डफली बनि चिचियाबथि समधिन अपने पमरिया ना......... समधिन जा रहली नैह'र माँथपर मोटा नेने ब'र लछरैत पछरैत घामक त'र समैध चतुर्थीक भरिया ना ......... कोचिला खाउ लिअ' पूर्णांजलि छींटब अंतिमबेर पुष्पांजलि हुनक सोहागक बारहो अंजलि मारू सेंथुमे मरिया ना.....
१५ ओ कविता हेरा गेल
हमर अपन गढ़ल ओ कविता हेरा गेल जाहि'मे हेरि सकितहुँ अपन यथार्थ ! जीवनक क्रम व्यतिक्रमक साँच मोनक शीतलता हीया'केर आंच सभ सर्जना'मे ताकि रहल छी अपन आचरण मुदा ! नहि भेंटल एखनधरि हमहूँ तँ ओहि महाशय जकाँ भेलहुँ'ने जे स्वच्छता अभियानपर भाषण देलाक बाद परिसदन केर साफ़ परिसरक एक कोन'मे पानक पीक' थूकि थूकि क' शोणित सन अपवर्ज्यक सरिता बहा दैत छथि संगहि छींटि दैत छथि खरिका आ गुटखाक पुड़िया जेना लहास जड़ेलाक बाद नदी'मे बहबैत छी जरांठ हम कहने छलहुँ कविते'मे जीबै छी जीर्णशीर्ण शब्दक गुदरी'केँ अतुल्य साहित्यानुरागी सिनेहक ताग'केँ परमार्थक सुई'मे पैसा'क' आशुत्व'सँ सीबै छी भंग भेल हमर तन्द्रा... जखन एक्कोटा रचना एहेन नहि भेंटल ! एहेन कथनीक कोन मोल जकर तारतम्य वाचकक जिनगी'सँ सम्यक नहि हुअए सरिपहुँ समाप्त भ' गेल सहज सत्य कविताक युग आब कवित्व फक्कड़ नहि !!
१६ दारुणि ( कविता )
पेट मारि'क' राति बिताबै नोर चाटि'क' भोर कोना सुनत ई जुग जरलाहा दारुणि कंठक शोर ! अष्टावक्र एक भिखमंगनी ओंगठलि बाटक कात टकटक तकैत रूकथि किछु दानी संतोखी निष्णात कर्मक गति संग भागि रहल नर नारी अप्पन धाम प्रबल शीत बिच रुकल किओ नहि दयावान निष्काम रातुक फेकल टका समेटलि गनिते भेली विभोर कालक देल कनैत बालककेँ झटपट लेली कोर ! कोना देबै एहि ठाम हे कान्हा गीताकेर उपदेश तन अपूर्ण धनमन अभाग लग भारत सन सन्देश ? दिन'मे जे अपवर्ज्य बनल छै राति'मे ओकरे भोग अप्पन तृष्णा तृप्त केलक नर अवला भाग वियोग धन- महिमा लग गुम्म कतेको एहने सन किल्होर अन्तः शोणित पानि बनल हे भीजि'ने सकल बहोर !
१७ कविता (काव्य गीत)
दुखक सांझ कविता सुखक भोर कविता भरल भाव जहिमे बसय ठोर कविता देखाबय जखन सत्य लागय ई दर्पण करय पढ़ि गुणीजन हृदयसँ हे चिन्तन दुखित देखि कविकेँ नयन नोर कविता अन्हारक सोझाँ आश दीपक जड़ाबय बढ़ब कोन पथदिशि दिशा ई देखाबय उपटि आशुकवि'मन चलय जोर कविता बनू नै अकिंचन सदति सत्य रचियौ किए ढ़ाकी हेरै छी सुपतीमे भरियौ गढू तखने जखने पारथि सोर कविता हे बनियौ निर्लोभी नै करियौ दरबारी रहू शिव बैसल अप्पन जेहने दुआरी अयातित कवित्वक छोड़य डोर कविता
१८ मिथिला वर्णन गीत
चलू मिथिलाकेँ अंगना बुलैले बहिना अपन बयना'मे बेना बंटैले बहिना ... एलथि राम पहुना सुनयनाकेँ अंगना देखैले बहिना सीता पहिरै छथि कंगना देखैले बहिना अपन चित्रकारी सजल छै दुआरी सिखैले बहिना धीया पूजथि तुसारी देखैले बहिना .. हरित पात पाने हे उज्जर मखाने चखैले बहिना कवि कोकिलकेँ गाने गबैले बहिना .. बाबी बाट ताकथि बाबाजी बजाबथि मिलैले बहिना काकी आजीकेँ अपना बुझैले बहिना .. हे कमलाकेँ माने हे गंडक बखाने सुनैले बहिना चलू गंगा सनाने करैले बहिना ... हे महिषी नगरिया भारतीकेँ दुअरिया घुमैले बहिना हे शिव ताराकेँ शीरा पुजैले बहिना ..
१९ मिथिलाकेँ अंगना ( मिथिला वर्णन गीत)
मैयाकेँ हँसिहँसि धीया रिझाबै मिथिलाकेँ अंगना आहे मिथिलाकेँ अंगना सम्बन्धक रूनझुन बजना देसिल वयनामे रहसै ललना मिथिलाकेँ अंगना ! पूजै छथि सिया तुसारी ध्रुवचन्दा हिय आभारी बाँचथि बाबी सभ माँथ झुकाबै मिथिलाकेँ अंगना ! सदिखन भावक अनुरंजन पारथि बहुआसिन अरिपन सभ बहिना वंदन भजन सुनाबै मिथिलाकेँ अंगना ! साधन नहि मोन भरल हे संतोषी ह्रदय सरल हे हे शिव देवीकेँ दीप देखाबै मिथिलाकेँ अंगना !
२०
जेना स्वातीक बून !
एहि देहक कणकणमे मिथिलाकेर खून रोजीक बेरि पहर टाटाकेँ नून जेना स्वातीक बून ! मिथिला-कोल्हानधरा लगै क'थ-चून जखन गाम मोन पड़ै हृदय होइ सुन्न जेना स्वातीक बून ! द्रव्यक संग रोग धेलक गढ़ा गेल खून मधुमेही बना देलक मुरुझल प्रसून जेना स्वातीक बून ! चासवास देहे टा तहूमे लगलै घून तनमनमे जंग धेलक विपटल तरुण जेना स्वातीक बून ! भरि जिनगी गाबैत रहब एहि माटिक गुण पाथरपर उपजि रहल सर्जनाक धुन जेना स्वातीक बून ! धाय माय झारखंड भरलथि करुण जामिनीक जीवनमे मद्धिम अरुण जेना स्वातीक बून !
२१ पगला मरि गेल (कविता)
की कहबै एकरा ! नहि मानत विज्ञान भाग्य धर्म भगवान अनिश्चयवादी सेहो एकरा संयोगे कहता मुदा हम की कही ? साहित्य'मे त' जरूरी छैक भाव आ चिंत्तन ओहि लेल होइत छल -चिंता भ' जाइत छलहुँ भावुक ओहि निरीहक दशा देखि एखन'सँ निर्द्वन्द्व छी ! आइ भोरे ओ पगला कोन नाओं देब ओकर बताह सेहो छल - मरि जे गेल ! सभ दिन किछु खुआ दैत छलहुँ अपन तृप्ति- संगहि मानवताक लेल ओकर माय जन्म दैते मरि गेल छलीह यायावरक पिता के ? जन्महिसँ बताह जेना ओतुक्का लोक कहैछ ! सड़कक कात'मे डेढ़ गाही बर्ख काटि लेलक नहि ककरो जिरात धंगलक आ ने जजाति ने कोनो तरुणी दिशि तकलक ने जुआ शराब आ ने हेरलक जन्नी'जातिकेँ सरकारी जमीनपर पड़ल छल माटिसँ सरंग देखैत खासमहलमे बेसी मेघबुन्नी रौद बसातक काल ! "मनुक्ख" घिसिया क' रैन बसेरामे सुता दैत छलै फेर अपने घिसियाइत बाहर निकसैत छल नीक लगैत छलै ओकरा स्वच्छ अकाश ओकरे जकाँ शून्य जे छल ! इएह छल ओकर अकर्मण्य जीवनक हाल !! जहियासँ देखलहुँ ओहिना पड़ल आइ बिनु किछु कहने मरल !!!! संवेदनाक प्रयोजन छल ककरोसँ किछु नहि मँगैत छल भुक्खले रहि जाइत छल आब एहि ठाम कर्म प्रधान विश्व करि राखा की टाटक नहि लगैछ ? जकरा चेतनाक संज्ञान नहि ओकरामे कर्मक भाव देखबै कोनो जोगरक नहि ओकरा लेल विज्ञान -दर्शन -आध्यात्म -साहित्य वा भाखा !!!
२२
वाह वाह रे मनुखक मोन (कविता)
लाज विचार बिक्खक पोखरि'मे घोरि बनाबय धाखक तेल बिधनोसँ नहि ड'र बचल छै मानव हृदय कत' चलि गेल ? तंत्री लेल ई दारुण जीवन बनि रहलै बड़का हथियार घड़ियालक सन नोर बहाक' स'भ बेपारी करय शिकार दाना दीनक गति देखल जग उत्कले नहि उत्कट भेल देश के पहिने वाहवाही लूटत धएने स'भ संचारी भेश रुग्ण कान्हपर ओ लहास ल' चलल जड़ाब' दस बीस कोस पाछाँसँ जे तस्वीर खीचै छल पकड़ि लेतय से नहि छल होस मरली कनियाँ दीन दानाकेँ सभसँ पहिने ह'म देखायब संचारक हमहीं टा प्रहरी युगकेँ पहिने ह'म जनायब औ बाबू अहाँ लोको छी ने चारि कान्ह त' द' दितियै सबलक वाहवाही सभदिन लुटलौं दीनक नेह सेहो लितियै क्षय रोगक जौं ड'र छलै त' कटही गाड़ी लितहुँ जोगारि अर्थक अर्थी खूब बहारलहुँ दीनक चचरी दितहुँ बहारि शासक केँ त' चर्च व्यर्थ अछि कोना हँसोथब ओक्कर मोन दाना'सन चहुदिश जहानमे लाशक संग बौआइत बोन बिसरि गेलहुँ इतिहास अपन जे कहियो छल पंछी ई सोन इतिक पराभव आभारक संग वाहवाह रे मनुखक मोन ! (ई कविता उड़ीसामे अपन कनियाक लहास कान्हपर ल' क' एकसरे चलैत दीन "दाना माझी" (घटना,अगस्त 2016) केँ समर्पित।) -शिव कुमार झा टिल्लू; पिताक नाम : स्वर्गीय कालीकान्त झा बूच; जन्म तिथि : ११. १२. १९७३ ( जन्म स्थान : मातृक : मालीपुर छौराही बेगूसराय ( बिहार ) प्रकाशित कृति : क्षणप्रभा ( कविता संग्रह ) , अंशु ( समालोचना )। स्थायी पता : ग्राम + पोस्ट करियन समस्तीपुर ( बिहार ) पिन : ८४८११७ सम्प्रति : जमशेदपुर प्रवास अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.६.कपिल यादव 'निष्क'- ५ टा कविता कपिल यादव 'निष्क' ५ टा कविता १ नदीः दूरूप कल-कल करैत बहैत धारा, जीवनक सूत्र पिरोए, हरियर चादर ओढल धरती के प्राण सं सींचे।
अपन कोख सँ सभ्यता के जन्म दैत, नदी जखन बहैत अछि खुशहालीक वरदान बनैत।
मुदा शान्त जलक भीतर, कखनो उठैत तुफान, नंदी जखन छोडि दैत अपन सौम्य स्थान।
बाँधक अहंकार के जखन तोडि दैत, अपन तट सँ बाँधल सीमाक छोडि दैत।
तखन रौद्र रूप धारण कs प्रलय बनैत, सपनाक महल पल भर मे बहा ल' जाइत।
कोनो घर नहि बचैत, कोनो आस नहि रहैत, जल-तांडव सँ जीव मात्र भयभीत रहैत।
नदी वरदान सेहो, आ संहारक कारण सेहो, कखनो माँ बिन पूजित, कखनो काल समान सेहो।
ई ओकर क्रूरता नहि, मानवक भूल अछि, प्रकृति क संग छेडछाड़ विनाशक मूल अछि। २ गाउँमे की अछि, की नहि अछि गाउँमे माए छथि, बाबूजी छथि, भाई-बहिन संग प्रेम-दुलार अछि। खेलैत-कूदैत बच्चा सभक टोली, का अछि गाउँमे की नहि अछि।
खाए-पिबाक सरल व्यवस्था, बुजुर्गक सान्निध्यक अमूल्य अवस्था। प्रेम-सद्भाव, आदर-सत्कार अछि, संस्कार आ मिलनसारता सेहो अछि का अछि गाउँमे की नहि अछि।
साफ हवा, शुद्ध पानिक संग, जरूरतमंद लेल दानी लोक संग। काली माई, डीह बाबा केर जयकार, लहरैत हरियर खेत-खलिहान अपार का अछि गाउँमे की नहि अछि।
मंदिरमे घंटीक मधुर ध्वनि, नदी किनारक शांत रवि। पशुक सेवा करैत सहज मनुष्य, मेहनत सँ जड़ल जीवनक सत्य का अछि गाउँमे की नहि अछि।
मुदा अस्पताल सँ दूर जीवन कठिन, बिजली-सड़कक हालत अझुरायल दिन। तथापि प्रकति संग जीवन प्रसन्न अछि का अछि गाउँमे की नहि अछि।
कोनो सरहद पर, कोनो शहरक बीच, सब अपन गाउँक राह ताकैत नीच। लौटि कऽ तीज-त्योहार मनाबैत, माटिक संग अपनत्व फिर पाबैत का अछि गाउँमे की नहि अछि।
गाउँ जीवनक आशा, विश्वास अछि, मानव के इन्सान बनेबाक प्रयास अछि। मकान छोट हो, मुदा दिल विशाल अछि ई गाँव हमर असली संसार अछि। ३ बिहारक माटि: पलायन आ आशा बिहारक माटि, जतऽ सँ लोक दूर जाए, रोजगारक खोज मे छोडि अपन घर-द्वार। गामक खेत, धानक लहलह बाल, सपनाक खुशबू, माटिक अमर माल।
हर घरक कहानी, पलायनक पीडा, दुख-संताप सँ लिखायल ई गाथा गहीरा। रोजगारक कमी युवा कें दूर धकेलै, कम मजदूरी जीवन कें कठिन बनबैत।
जाति-भेदक छाया अबहियो पसैरल अछि, जे हर कदम पर आगू बढब रोकैत अछि। परिवारक टूटन, बचपनक छूटन, बुजुर्गक भार आब नारी पर टूटन।
मदा आशाक किरण अबहियो जीवित अछि, माटिक साँग हर दिल मे बसित अछि। शिक्षा आ कौशल सँ बदलत भविष्यक राह, स्वरोजगार सँ खुलत नव जीवनक चाह।
एक दिन सभ लौटत अपन माटि दिस, गामक गलियामे फेर खिलत नव हँसी। जतऽ सम्मान संग जीबन संभव होय, ओहि बिहारक सपना साकार होय। ४ बिहारक किसान, मेहनत आ माटि बढ़िक पानी डुबा देत खेत-खलिहान, सुखाड़ सेहो करैत किसानक मन वीरान। छोट जोत मे उगैत मखानक आस, बाजार मे कम दाम, टूटैत विश्वास।
दिन सँ राति धरि खेतमे बहैत पसीना, आँखिमे सपना, होठ पर मधुर नगीना। फगुआ-छठ संग बनैत जीवनक गीत, माटि सँ जुडल हर साँस, हर प्रीत।
ओलावष्टि फसल कें करैत तबाह, परिवहन-अभाव सँ बढैत आह। मेहनतक मूल्य नहि भेटै पूरा, कर्जक बोझ बनैत जीवन अधूरा।
लिट्टी-चोखा, सत्-सरल भोजनक पहचान, एहि माटिक सच्चा रक्षक, हमर किसान। धानक लहलह फसलमे बसल जीवनक मान, ओहि पर टिकल अछि बिहारक सम्मान।
फेरो आशाक दीप दिलमे जरैत, हर विपदा पर किसान ठाढ रहैत। यदि नीति-सहयोग सही रूपें भेटत, त' एहि माटिमे खुशहाली फेर सँ फूटत। ५ राति आ शहरमे बदलैत शहर देर राति धरि शोर मचबैत जागैत शहर, भोर भेला पर थाकल-नींदाइत शहर।
रातिक सड़क पर दौड़ैत गाड़ीक कतार, भोर मे ओही राह पर गाय-कुकुरक अधिकार।
पैसावालक लेल उठैत फ्लैट आ होटल शानदार, गरीबक हिस्सा फुटपाथ पर बिछल संसार।
भीड़ मे जीवनक संघर्ष लड़ैत शहर, सपनाक ऊँचाईक राह देखैत शहर।
ऊपर फ्लैटक डीजे बाजैत राति भरि, नीचाँ कतहु मातमक सन्नाटा घर-घर।
शिक्षा, चिकित्सा, रोजगारक वादा करैत शहर, गामसँ परिवार के बोलाबैत,रोजी कमाबैत शहर।
पेडक बलि दे कंक्रीटक जंगल बनैत, धुआँ-धूप में प्रदूषणक जाल पसैरैत।
भौतिक सुख-सुविधा सँ स्मार्ट बनैत शहर, मुदा मानवता आ प्रकृति सँ दूर जाइत शहर।
यदि समरसता, योग आ संतुलन अपनाबै शहर, तें प्रकृतिक संग सतत जीवन पाबै शहर। -कपिल यादव 'निष्क' मैथिली आ हिन्दी भाषा मे लेखन करैत छथि । ओ बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) सँ बी.एस. सी. (B.Sc.) आ एम.एस. सी. (M.Sc.) केने छथि, संगहि हुनका लग बी.एड. (B.Ed.) आ भूगोल विषयमे एम.ए. (M.A.) केर डिग्री सेहो छनि ।ओ अनेक कृतिक रचयिता छथि, जाहिमे उपन्यास 'लोकनायक महावीर लोरिक: प्रेम और पराक्रम', बच्चाक कविता संग्रह 'मस्ती और सीख', आ द्विभाषी कविता संग्रह 'माटि सँ महकैत: मिथिला-बिहारक कविता' प्रमुख अछि । हुनकर लेखन ग्रामीण जीवन, सांस्कृतिक स्मृति, सामाजिक यथार्थ, आ सामान्य लोकक जीवंत अनुभवक अन्वेषण करैत अछि । हुनकर रचना सभ मे माटि, समाज आ परिवर्तनशील समकालीन परिदृश्यक संग गहीर जुड़ाव देखल जाइत अछि । हुनकर हालक रचना सभ पारिस्थितिकी (ecology), चरवाहा जीवन (pastoral life), आ बदलैत सामाजिक-सांस्कृतिक गतिशीलताक विषयवस्तु सँ जुड़ल अछि । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.७.तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम'] मूल तेलुगु: नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव) मैथिली अनुवाद: मानेश्वर मनुज [खण्ड २] तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम' केर लेखक छथि नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव)] मूल तेलुगु लेखक नग्नमुनि एक परिचय नाम: मानेपल्लि हृषीकेशवराव जन्म: 15 मई 1940 जन्म स्थान: शहर- तेनाली, जिला- गुंटूर (आंध्र प्रदेश) वृत्ति: चीफ ऑडिटर, आंध्र प्रदेश विधान सभा, तकर बाद डिप्टी सेक्रेटरी, ओतहि लिंक: पहिने साम्यवादी (कम्युनिस्ट), बादमे राष्ट्रवादी (नेशनलिस्ट) संस्था: अविभाज्यक जनतंत्र, 1990 आंदोलन: दिगम्बर कविता आन्दोलन 1965 लक्ष्य: नंगट, भूखल, दीन, दरिद्रक हित कृति: उदयिंचनि उदयलु (ओ उदय जे उदित नहि भेल) पूर्वा हवा जम्मि चेट्ट विशेष: 1977 ई. मे बहुचर्चित काव्य- 'कोय्या गुर्रम' (KOYA-GURRAM), जकर अर्थ अछि- 'काठक घोड़ा', भाव- 'नकली सरकार'। 19 नवम्बर 1977, शनि दिन बंगालक खाड़ीमे पचास-साठि फुट ऊँच लहड़ि उमड़ि कऽ कृष्णा जिलाक दिविसीमा क्षेत्रकेँ डुबा कऽ नष्ट कऽ देलक। हजारो लोक मारल गेलाह। ई घटना काव्यक वस्तु बनल। विषय आ परिस्थितिसँ उपजल ई काव्य हिन्दी कवि मुक्तिबोधक 'अंधेरे में' क बराबरीक अछि। मैथिली अनुवादक नाम: मानेश्वर मनुज जन्म: गाम- गम्हरिया (बेनीपट्टी) मधुबनी। जनवरी 1958 (प्रमाण पत्रक अनुसार)। वृत्ति: भारतीय नौसेनामे तकनीकी सहायक, तकर बाद भारतीय रेलक वाणिज्य विभाग सँ (रिटायर्ड)। कृति: 'सम्बन्ध', कथा संग्रह (मैथिली) 2007 'कि', कविता संग्रह (मैथिली) 2011 'परिवर्तन', कहानी संग्रह (हिन्दी) 2019 'बेघर', कविता संग्रह (हिन्दी) 2022 'तालाब', कहानी संग्रह (हिन्दी) 2024 अनुभव: विभिन्न भाषा सँ हिन्दी आ मैथिलीमे अनुवाद। हिन्दी आ मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिकामे लेख, कविता, कथा, कहानी इत्यादि प्रकाशित। अनुवादकक टिप्पणी: अनेक तेलुगुमित्र, स्वयं नग्नमुनि जी, हिन्दी तथा अंग्रेजी मे अनुदित पुस्तकक मदति सँ दीर्घ काल तक मंथन कयलाक बाद अनुवाद कयल गेल अछि। ई नग्नमुनिक प्रसिद्ध कविता अछि। नग्नमुनि सँ लगातार हमर पत्राचार होइत छल। ओ अंग्रेजी आ तेलुगुक विद्वान छलथि। हुनक किछु पत्र देसिल-बयना, हैदराबाद मे छपल अछि। -मानेश्वर मनुज सम्पादकीय टिप्पणी (खण्ड-२) खण्ड-२ मे प्रवेश करैत कवि नग्नमुनिक वाणी आरो तीक्ष्ण, क्रूर आ यथार्थपरक भऽ जाइत छन्हि। एतऽ कविता खाली कागचपर कएल खोदाइ नहि रहैत अछि वरन् ओ मरघटक रखवाली करय लागैत अछि। शब्द विचारक हत्या कए फूटि निकलैत अछि, आ कवि स्वयं हत्याराक रूप मे चित्रित होइत छथि, ई क्रान्तिकारी विडम्बना अछि। वएह सही कवि अछि जे अक्षर पर शक करैत अछि, ओकर सही उपयोग जानैत अछि। सभ ग्रह पृथ्वीकेँ आ सभ अवगुण मनुक्खकेँ प्रभावित करबा लेल घुमैत रहैत अछि। एकरासँ मात्र हत्या बचैत छैक जे बिनु शोनितक होइत छैक, खाली दाग छोड़ैत छैक। ई भ्रष्ट मानसिकता आ नैतिक पतनक प्रतीक अछि। ण्ड-२ कऽ अन्तिम सत्य ई अछि जे मानवता चाहे प्रकृति मे हो वा विकृति मे। ई खण्ड खाली कविता नहि, बल्कि एकटा विद्रोही चीत्कार अछि- जे काठक घोड़ा (नकली सत्ता) कऽ खुर तर थकुचाइत मनुक्खक अन्तिम साँसक आवाज अछि।- गजेन्द्र ठाकुर नग्नमुनिक तेलुगु काव्य 'काठक घोड़ा' (कोया गुर्रम) खण्ड-२ २ कविता कागत पर वर्णक खोदाइ करैत अछि मरघटक रखवाली करैत अछि कविक आत्मासँ निकलैत सब शब्द विचारक भ्रूण हत्या कऽ फूटि निकलैत अछि कविकेँ हत्यारा चित्रित करैत अछि। सुच्चा कवि ओ छथि जे अक्षर पर शक करैत ओकर सही उपयोग करैत छथि। मनुक्खक सब अवयव हैवान बनक लेल जिनगी भरि प्रयास करैत अछि। प्रकृतिक सब ग्रह पृथ्वी केँ प्रभावित करक हेतु सदिखन चक्कर कटैत रहैत अछि अंत मे बचैत छैक मात्र वैह हत्या जे बिनु घाव आ बिनु खूनक होइत अछि सिर्फ आ सिर्फ धब्बा मात्र बचैत छैक। -मानेश्वर मनुज आदर्श नगर कॉलोनी गोशाला रोड मधुबनी पिन - 847211 मो. - 9920674861 / 7464077106 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। 2 || विदेह ४४० विदेह ४४०|| 1
गए हाल TOME I-IV / VOLUMES -00 | A Parallel History of | Mithila & Maithili Literature with Critical Appreciations of Representative Maithili Writers 2 Reg = by | | GAJENDRA THAKUR | editor, Videha eJournal VIDEHA + PARALLEL LITERARY MOVEMENT se + ISSN 2229-547X - est. 2000 - Delhi - MMXXVI
FROM THE SERIES The Videha Parallel Library a centuries of Maithili letters — from the Buddhist Charyapadas | of the eighth century to the digital insurgency of the twenty-first — | gathered under a single critical lens. Across one hundred volumes the | Videha Parallel Library has assembled the suppressed, the neglected, | the folk, the Dalit, the women’s, and the diasporic traditions of Maithili literature into a counter-archive to the official canon curated by the Sahitya Akademi. This volume brings that project to its threshold. Applying Bharata’s rasa-theory, Anandavardhana’s dhvani, Kuntaka's vakrokti, Gahgesa Upadhyaya’s Navya-Nyaya pramana system, Bakhtinian dialogism, Spivak’s subaltern historiography, and the Videha Parallel History Framework, it offers sustained critical appreciations of one hundred contemporary and historical Maithili writers — poets, novelists, dramatists, essayists, theorists, and translators — whose work constitutes the living parallel tradition. “The parallel is not the marginal but the truthful, in long delay.” WHAT THIS VOLUME CONTAINS, >> One hundred chapter-length critical appreciations, each paired with a portrait image »® A historical synthesis from 8th-century Charydpadas to contemporary digital publishing >> Indigenous theory (Navya-Nyaya, rasa, dhvani) alongside Western and postcolonial lenses >> Archival recovery of the Dooshan Panji records on Gafigesa Upadhyaya of Mithila pes ABOUT THE AUTHOR | GAJENDRA THAKUR — Maithili author, editor, and literary scholar — founder | of the Videha Parallel Literary Movement and founded the Videha eJournal in | | 2000 and has edited it without interruption since. He writes in Maithili, Hindi, ‘i and English, and has authored scholarly monographs on Gangesa Upadhyaya’s Navya-Nyaya and the parallel history of Mithila’s literary cultures. SON 978-93-5832-486-6 VIDEHA | | till | | | | | Fe AEE nee > हि, ISSN 2229-547X - videha.co.in
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। THE VIDEHA PARALLEL LIBRARY | TOME I-IV / VOLUMES -00 A Parallel History of Mithila & Maithili Literature with Critical Appreciations of Representative Maithili Writers रु be Vv ¥ by GAJENDRA THAKUR editor, Videha eJournal VIDEHA - PARALLEL LITERARY MOVEMENT videha.co.in - ISSN 2229-547X - est. 2000 - Delhi - MMXXVI
) FROM THE SERIES ) The Videha Parallel Library Thirteen centuries of Maithili letters — from the Buddhist Charyapadas of the eighth century to the digital insurgency of the twenty-first — gathered under a single critical lens. Across one hundred volumes the Videha Parallel Library has assembled the suppressed, the neglected, the folk, the Dalit, the women’s, and the diasporic traditions of Maithili literature into a counter-archive to the official canon curated by the Sahitya Akademi. This volume brings that project to its threshold. Applying Bharata’s rasa-theory, Anandavardhana’s dhvani, Kuntaka's vakrokti, Gangesa Upadhyaya’s Navya-Nyaya pramana system, Bakhtinian dialogism, Spivak’s subaltern historiography, and the Videha Parallel History Framework, it offers sustained critical appreciations of one hundred contemporary and historical Maithili writers — poets, novelists, dramatists, essayists, theorists, and translators — whose work constitutes the living parallel tradition. “The parallel is not the marginal but the truthful, in long delay.” WHAT THIS VOLUME CONTAINS >> One hundred chapter-length critical appreciations, each paired with a portrait image >> A historical synthesis from 8th-century Charyapadas to contemporary digital publishing >> Indigenous theory (Navya-Nyaya, rasa, dhvani) alongside Western and postcolonial lenses >> Archival recovery of the Dooshan Panji records on Gangesa Upadhyaya of Mithila ee ABOUT THE AUTHOR GAJENDRA THAKUR — Maithili author, editor, and literary scholar — founder of the Videha Parallel Literary Movement and founded the Videha eJournal in 2000 and has edited it without interruption since. He writes in Maithili, Hindi, Sanskrit, and English, and has authored scholarly monographs on Gangesa Upadhyaya’s Navya-Nyaya and the parallel history of Mithila’s literary cultures. ) ISBN 978-93-58I2-486-6 V I D E H A parallel literary movement | 9 Magssal24866!> ISSN 2229-547X - videha.co.in