विदेह ४४१ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। [विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X Videha e-Journal (since 2000) at www.videha.co.in ] ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। कॉपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- २०२६. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. It is a platform for scholars, researchers and writers to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, prose and verse in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili and from Maithili into English. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. (c)२०००- २०२६. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA. सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@zohomail.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@zohomail.in. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover design: AUM GAJENDRA THAKUR VIDEHA:441 समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा। for the writers, readers, and listeners of Mithilā, who have kept the lamp of Maithilī burning through a thousand years of storms ………………………….. "The Parallel is not the marginal but the truthful, in long delay." Mānuṣīm iha saṃskṛtām मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। मिथिलाक ओइ लेखक, पाठक आ श्रोता लोकनि लेल, जे सहस्र वर्षक झंझावात मे सेहो मैथिलीक दीप प्रज्वलित रखने छथि। समानांतर कात-करोट मे हएब नै अछि, वरन् ई अछि असल सत्य, जे अपन समय लेलक अछि। अनुक्रम विदेह ४४१ म अंक ०१ मई २०२६ (वर्ष १९ मास २२१ अंक ४४१) ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय [पृष्ठ २-९०] १.२.अंक ४४० पर टिप्पणी [पृष्ठ ९१-९१] गद्य Prose २.१. हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२० [पृष्ठ ९३-११३] २.२. प्रीति कुमारी- श्रम संसाधन [पृष्ठ ११४-११५] २.३. प्रणव कुमार झा- मिथिला के विकास मे सहकारिता के मॉडल [पृष्ठ ११६-१२०] २.४. प्रणव कुमार झा- अविश्वासक चिकित्सा (लघु कथा) [पृष्ठ १२१-१२३] २.५. प्रीति कुमारी- अस्वजन आ दोगरमिया व्यवस्थाके दुरूपयोग 'क दुष्प्रभाव [पृष्ठ १२४-१२६] २.६. कंचन कंठ- स्व. पापा डा. नित्यानन्द लाल दासक डायरी सं [पृष्ठ १२७-१३०] २.७. लाल देव कामत- पोथी चर्चा : मिथिलाक माटिक सुगन्ध / पोथी चर्चा : प्रेम और विरह [पृष्ठ १३१-१३४] २.८. आचार्य रामानंद मंडल- मलंगिया महोत्सव बनाम मलंगिया नाट्य महोत्सव [पृष्ठ १३५-१३६] २.९. रबीन्द्र नारायण मिश्र- जयतु जानकी (धारावाहिक उपन्यास) [पृष्ठ १३७-१६६] २.१०. आशीष अनचिन्हार- इच्छा मृत्यु: स्वतंत्र भारतक पहिल वैध उदाहरण (संशोधित) [पृष्ठ १६७-१६९] २.११. आचार्य रामानंद मंडल- महाकवि विद्यापति अनुसंधान [पृष्ठ १७०-१७२] २.१२. बद्रीनाथ राय अमात्य-वेदज्ञ मैथिलक मर्म/ घवाह मैथिलक व्यथा/ वेदज्ञ मैथिलक व्यथा;हमर सारि; विमर्शक विषय [पृष्ठ १७३-१७५] २.१३. गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली लेल दलित साहित्य समीक्षाशास्त्र-२ [संदर्भ: प्रभास कुमार चौधरीक 'इन्द्रधनुष', अशोकक 'प्रतिलोम' आ रमेशक 'कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो'/ दलित साहित्य समीक्षाशास्त्र, भारतीय समीक्षाशास्त्र, पाश्चात्य समीक्षाशास्त्र, गंगेशक नव्य न्याय आ विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्कक परिप्रेक्ष्यमे] [पृष्ठ १७६-२०४] पद्य Poetry ३.१. प्रदीप पुष्प- दुर्गंध [पृष्ठ २०६-२०८] ३.२. रामशंकर झा 'मैथिल'- पाग [पृष्ठ २०९-२११] ३.३. जगदानन्द झा "मनु"- २ टा गजल [पृष्ठ २१२-२१३] ३.४. बद्रीनाथ राय अमात्य- ११ टा कविता [पृष्ठ २१४-२३०] ३.५. रामकृष्ण परार्थी- ९ टा पद्य [पृष्ठ २३१-२३८] ३.६. बिन्देश्वर राय"विवेकी"- लुप्त होईत "मिथिला" [पृष्ठ २३९-२४२] ३.७. तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम'] मूल तेलुगु: नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव) मैथिली अनुवाद: मानेश्वर मनुज [खण्ड ३] [पृष्ठ २४३-२४६] ३.८. राजदेव मंडल- खाली पन्ना/ भीतरिया कानब [पृष्ठ २४७-२४८] 4.Gajendra Thakur- A Parallel History of Mithila & Maithili Literature (TOME I-IV VOLUMES- 1-100) APPENDIX: METHODOLOGICAL NOTE The Nepal Bikram Samvat years cited have been converted to approximate CE years using the standard offset of BS minus 56–57 years. Web sources consulted include the Videha digital archive (videha.co.in). All URLs were last accessed April 2026. This research was prepared using primary texts, and standard academic resources. All quoted material is from the cited sources. For the most current scholarship, consult the Videha Parallel History series at www.videha.co.in/gajenthakur.htm. ………………………………………………. A PARALLEL HISTORY OF MAITHILI LITERATURE: INTRODUCTION DALIT LITERARY CRITICISM: TELUGU, GUJARATI, AND ODIA DALIT LITERATURE IN MAITHILI TRANSLATION GANGESA UPADHYAYA: LIFE, LOGIC, AND LEGACY IN THE NAVYA-NYAYA TRADITION [NAVYA-NYAYA’S HIERARCHICAL USE OF LIMITORS IS COMPATIBLE WITH MODERN ARTIFICIAL INTELLIGENCE AND NATURAL LANGUAGE PROCESSING (NLP)] MITHILA & MAITHILI: CRITICAL ANALYSIS OF INSTITUTIONS THE MAITHILI GHAZAL VIDEHA (ISSUE 1-350) SADEHA SERIES (1-37) VIDEHA ISSUES 351-438 VIDEHA MAITHILI PARALLEL DRAMA THEATRE VIDEHA PARALLEL AUDIO VIDEO ARCHIVE VIDEHA PARALLEL CHILDREN'S LITERATURE ABDUR RAZZAK , ABHA JHA , ABHILASH THAKUR, ACHARYA RAMANAND MANDAL, ACHARYA RAMLOCHAN SHARAN, ACHHE LAL SHASTRI, AJIT KUMAR JHA, AMIT MISHRA, AMOD KUMAR JHA, AMRENDRA YADAV, ANAMIKA RAJ, ANAND KUMAR JHA, ANIL MALLIK, ANJANI KUMAR VERMA, ANMOL JHA, ARVIND THAKUR, ASHISH ANCHINHAR, ASHOK (KATHAKAR ASHOK), ASHRAF RAIN, BADRI NATH ROY 'AMATYA’ , BECHAN THAKUR, BINAY BHUSHAN, BINDESHWAR THAKUR, CHANDAN KUMAR JHA, DINESH KUMAR MISHRA, DR KAMINI KAMAYINI, DR KIRTINATH JHA, DR KISHAN KARIGAR, DR PRAFULL KUMAR SINGH ‘MAUN’, DR SHAMBHU KUMAR SINGH, DR SHIV KUMAR PRASAD, DR. KAILASH KUMAR MISHRA, DURGANAND MANDAL, GOPALJI JHA ‘GOPESH’, HARIMOHAN JHA, HITENDRA GUPTA, HITNATH JHA, HRIDAY NARAYAN JHA, ILARANI SINGH, JAGDANAND JHA ‘MANU’, JAGDISH CHANDRA THAKUR ‘ANIL’, JAGDISH PRASAD MANDAL, JITENDRA KUMAR JHA ‘JEETU’, KALIKANT JHA ‘BUCH’, KALPANA JHA, BOKARO; KALPANA JHA, DELHI; KALPANA JHA, PATNA, KAMESHWAR JHA ‘KAMAL’, KAMLA CHAUDHARY, KAPILESHWAR RAUT, KEDAR NATH CHAUDHARY, KRISHNA KUMAR KASHYAP, KUMAR MANOJ KASHYAP, KUMAR PAWAN, KUNDAN KUMAR KARN, KUSUM THAKUR, LAL DEV KAMAT, LALITA JHA, LALLAN PRASAD THAKUR, LAXMAN JHA ‘SAGAR’, MALA JHA, MEENA JHA, MUNNA JI, MUNNI KAMAT, NABO NARAYAN MISHRA, NAGENDRA KUMAR, NAND KUMAR MISHRA ‘NAND’, NAND VILAS ROY, NARAYANJI CHAUDHARY, NARENDRA JHA, NAVENDU KUMAR JHA, OM PRAKASH JHA, PANDIT BHAVNATH JHA, PANNA JHA, PHANISHWAR NATH RENU, PRABHAT RAI BHATT, PRADEEP PUSHPA, PRANAV JHA, PRAYAS PREMI MAITHIL, PREETI THAKUR, PREMLATA MISHRA ‘PREM’, PREMSHANKAR SINGH, PROF DR RAMAWATAR YADAV, PROF UDAYA NARAYANA SINGH ‘NACHIKETA’, PT. RAMJI CHAUDHARY, RABINDRA NARAYAN MISHRA, RAJDEO MANDAL, RAJEEV RANJAN MISHRA, RAJNANDAN LAL DAS, RAM BHAROS KAPARI 'BHRAMAR', RAM SOGARTH YADAV, RAMDEO PRASAD MANDAL ‘JHARUDAR’, RAMESH, RAMESH NARAYAN, RAMLOCHAN THAKUR, RAMVILAS SAHU, RAVI MISHRA BHARDWAJ, RAVIBHUSHAN PATHAK, RAVINDRA NATH THAKUR, S.C. SUMAN, SANDEEP KUMAR SAFI, SANJU DAS, SANTOSH KUMAR MISHRA, SANTOSH KUMAR ROY 'BATOHI', SATYANAND PATHAK, SHAIL JHA ‘SAGAR’, SHANTI LAKSHMI CHAUDHARY, SHARDINDU CHAUDHARY, SHASHI BALA, SHASHIDHAR KUMAR 'VIDEH', SHIV KUMAR JHA ‘TILLU’, SHIVSHANKAR SINGH THAKUR, SHIVSHANKAR SRINIWAS, SIYARAM JHA ‘SARAS’, SRIJAN SHEKHAR 'AJNEYA', SUBHASH CHANDRA YADAV, SUBHASH KUMAR KAMAT, SUBODH JHA, SUBODH KUMAR THAKUR, SUJIT KUMAR JHA, SUSHIL, SWETA JHA CHAUDHARY, TARANAND VIYOGI, UMESH MANDAL, UMESH PASWAN, VIBHA RANI, VIJAYNATH JHA, VINEET UTPAL, YOGANAND JHA, YOGENDRA PATHAK VIYOGI, YOGENDRA PRASAD YADAVA … AND MORE TO COME IN TOME 5. 23 Language Transliterator I. A PARALLEL HISTORY OF MITHILA & MAITHILI LITERATURE [TOME 1-4; VOLUMES 1-100] BY GAJENDRA THAKUR [Parallel History Series ISBN Number: 978-93-5812-486-6] GOOGLE PLAY BOOK [TOME 1-4; VOLUMES 1-100] https://play.google.com/store/books/details?id=uvjREQAAQBAJ AMAZON KINDLE [TOME 1-4; VOLUMES 1-100] https://www.amazon.in/dp/B0GX2XRKM7 POTHI HARDBACK POTHI TOME 1 [VOLUMES 01-25] https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-parallel-history-mithila-maithili-literature/ POTHI TOME 2 [VOLUMES 26-50] https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-parallel-history-mithila-maithili-tome-2/ POTHI TOME 3 [VOLUMES 51-75] https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-parallel-history-mithila-maithili-literature-volume-1-100-tome-3-volume-51-75-b/ POTHI TOME 4 [VOLUMES 76-100] https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-parallel-history-mithila-maithili-literature-volume-1-100-tome-4-volume-76-100-/ II. गद्य पद्य भारती खण्ड १ आ २ (विदेह सदेह २८ & विदेह सदेह ३७) [विभिन्न भाषासँ अनूदित गद्य आ पद्य रचना (खण्ड-१) & (खण्ड-२) (विदेह www.videha.co.in/ पेटार अंक १-३५० सँ)] [खण्ड १ ISBN No: 978-93-341-0402-8; खण्ड २ ISBN No: 978-93-5890-150-4] १ विदेह सदेह २८ GADYA PADYA BHARTI 1 विभिन्न भाषासँ अनूदित गद्य आ पद्य रचना (खण्ड-१) (विदेह www.videha.co.in/ पेटार अंक १-३५० सँ) https://store.pothi.com/book/editor-gajendra-thakur-gadya-padya-bharti-1/ २ विदेह सदेह ३७ GADYA PADYA BHARTI 2 विभिन्न भाषासँ अनूदित गद्य आ पद्य रचना (खण्ड-२) (विदेह www.videha.co.in/ पेटार अंक १-३५० सँ) https://store.pothi.com/book/translator-gajendra-thakur-gadya-padya-bharti-2/
१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.अंक ४४० पर टिप्पणी १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय सदेह १ सम्पूर्ण साहित्यिक समीक्षा [सभ साहित्यकारक रचनाक समीक्षा, भारतीय आलोचना, पाश्चात्य सिद्धान्त, गंगेशक नव्य न्याय, विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क] [विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका | वर्ष २, मास १३, अंक २५, १ जनवरी २००९ | सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर] १. आलोचना-फ्रेमवर्क सदेह १ केर सभ साहित्यकारक विवेचन एहि चतुष्पाद फ्रेमवर्कसँ हएत: (क) भारतीय काव्यशास्त्र: रस (भरतमुनि), ध्वनि (आनन्दवर्धन), वक्रोक्ति (कुन्तक), औचित्य (क्षेमेन्द्र)। (ख) पाश्चात्य आलोचना: नव समीक्षा, संरचनावाद, उत्तर-औपनिवेशिकता, स्त्रीवाद, मार्क्सवाद, पर्यावरण-समीक्षा। (ग) नव्य न्याय: गंगेश उपाध्यायक पक्षहेतुव्याप्तिदृष्टान्तनिर्णय तर्कशास्त्रक साहित्यिक अनुप्रयोग। (घ) विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क: मैथिलीक स्वतन्त्र, कात-करोटक बिनु कतियेने साहित्यिक इतिहासक निर्माण। १. प्रारम्भिक विवेचन: सदेह १ केर स्वरूप 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (www.videha.co.in) मैथिली साहित्यिक इतिहासमे एकटा क्रान्तिकारी डेग थीक। गजेन्द्र ठाकुरक सम्पादनमे जनवरी २००८ सँ प्रकाशित एहि पत्रिकाक २५ अंकक (वर्ष २, मास १३, अंक २५, १ जनवरी २००९) चुनल अंशसँ 'सदेह १' नामक मुद्रित संकलन तैयार भेल अछि। एहिमे १०० सँ अधिक साहित्यकारक कथा, कविता, निबन्ध, गजल, साक्षात्कार, अनुवाद, आलोचना आदि समाहित अछि। ई संकलन मैथिली साहित्यक एकटा समानान्तर इतिहासक निर्माण करैत अछि जाहिमे मुख्यधाराक संग लोक-परम्परा, नव्य न्याय, आधुनिकता आ उत्तर-आधुनिकताक समागम भेल अछि। आठम शताब्दीक सरहपादसँ लऽ कऽ एकविंश शताब्दीक राजकमल चौधरी, गंगेश गुंजन धरि मैथिली साहित्यक जे अखण्ड धारा अछि, ताहि धाराकेँ सदेह १ एकटा नव दृष्टिकोणसँ प्रस्तुत करैत अछि। एहि समीक्षामे हम भारतीय आलोचना (रस, ध्वनि, वक्रोक्ति, अलंकार), पाश्चात्य आलोचना (नव समीक्षा, संरचनावाद, उत्तर-औपनिवेशिकता, स्त्रीवादी आलोचना, मार्क्सवादी समीक्षा), मिथिलाक गंगेश उपाध्यायक नव्य न्यायशास्त्र आ विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्कक अनुप्रयोग करब। २. आलोचना सिद्धान्तक परिचय २.१ भारतीय आलोचना सिद्धान्त भारतीय काव्यशास्त्रमे चारि प्रमुख सिद्धान्त प्रतिष्ठित अछि: (क) रस सिद्धान्त (भरतमुनि): भरतमुनिक नाट्यशास्त्रमे 'विभाव-अनुभाव-व्यभिचारी भावसँ रसक निष्पत्ति' होइत अछि। श्रृंगार, करुण, वीर, रौद्र, हास्य, भयानक, वीभत्स, अद्भुत आ शान्त ई नव रस मैथिली साहित्यमे सेहो विद्यमान अछि। (ख) ध्वनि सिद्धान्त (आनन्दवर्धन): 'व्यंजनावृत्तिसँ प्रतीयमान अर्थ' ध्वनि थीक। काव्यमे व्यक्त अर्थसँ अतिरिक्त एक सूचित अर्थ होइत अछि जे आत्मा थीक। (ग) वक्रोक्ति सिद्धान्त (कुन्तक): 'वक्रोक्तिः काव्यजीवितम्' काव्यमे सामान्य उक्तिसँ हटिकऽ विशेष ढंगसँ कहल गेल बात काव्यक प्राण थीक। (घ) औचित्य सिद्धान्त (क्षेमेन्द्र): 'औचित्यं रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम्' प्रत्येक काव्य-तत्त्वक उचित प्रयोग काव्यक जीवन थीक। २.२ पाश्चात्य आलोचना सिद्धान्त (क) नव समीक्षा (New Criticism T.S. Eliot, I.A. Richards): पाठ स्वायत्त अछि। लेखकक अभिप्राय नहि, पाठ केर अर्थ-सम्भव महत्त्वपूर्ण। Intentional Fallacy आ Affective Fallacy सँ बचैत पाठक आत्मनिर्भर होइत अछि। (ख) संरचनावाद (Structuralism Saussure, L. Strauss): भाषाक संरचनामे अर्थक उत्पत्ति। Signifier-Signified सम्बन्ध, Binary Oppositions (विरोध-द्वन्द्व) आ Deep Structure सँ साहित्यक विश्लेषण। (ग) उत्तर-औपनिवेशिक समीक्षा (Postcolonialism Spivak, Bhabha): उपनिवेशी शक्तिसँ उत्पन्न सांस्कृतिक विस्थापन, Hybridity, Subaltern Voice आ Cultural Hegemonyक विरुद्ध प्रतिरोध। मैथिली साहित्यमे मिथिलाक उपेक्षा एहि सिद्धान्तक आलोकमे महत्त्वपूर्ण भऽ जाइत अछि। (घ) स्त्रीवादी आलोचना (Feminist Criticism Simone de Beauvoir, Elaine Showalter): पितृसत्तात्मक समाजमे स्त्री-दृष्टिकोण, लिंग-भूमिकाक प्रश्न आ स्त्री-लेखनक स्वतन्त्र परम्पराक खोज। (ङ) मार्क्सवादी समीक्षा (Marxist Criticism Luk, Althusser): साहित्य आ सामाजिक-आर्थिक सम्बन्ध, वर्ग-संघर्ष, Ideology आ Superstructureक आलोकमे साहित्यिक पाठक विश्लेषण। २.३ गंगेशक नव्य न्याय मिथिलाक महान दार्शनिक गंगेश उपाध्याय (१३म शती) तत्त्वचिन्तामणिक माध्यमसँ नव्य न्यायशास्त्रक स्थापना कएलनि। नव्य न्यायक प्रमुख अवधारणा थीक 'प्रमाण' (ज्ञानक साधन), 'प्रमेय' (ज्ञानक विषय), 'संशय' (सन्देह), 'प्रयोजन' (उद्देश्य), 'दृष्टान्त' (उदाहरण), 'सिद्धान्त', 'अवयव' (तर्क-संरचना), 'तर्क' आ 'निर्णय' (निष्कर्ष)। साहित्य-समीक्षामे नव्य न्यायक अनुप्रयोग अर्थ थीक (१) कोनो साहित्यिक दाबीक तार्किक परीक्षण करब, (२) Vyāpti (व्याप्ति) अर्थात् नियम-सम्बन्ध चिन्हब, (३) Paksha-Sadhana (पक्ष-साधन) अर्थात् कोनो रचनाक काव्यात्मकताक प्रमाण ताकब। २.४ विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क गजेन्द्र ठाकुर-प्रणीत एहि फ्रेमवर्कक मूल प्रस्थापना थीक जे मैथिली साहित्यक इतिहास हिन्दी वा संस्कृत साहित्यक इतिहाससँ समानान्तर (parallel) अछि, नहि कि अधीनस्थ। एहि फ्रेमवर्कमे: (१) सरहपादसँ आधुनिकता धरि एक स्वतन्त्र रेखा, (२) मिथिला भूगोलक केन्द्रीयता, (३) डिजिटल आर्काइव द्वारा इतिहासक लोकतान्त्रिकरण, (४) नेपाल-भारत दुनू भागक मैथिलीकेँ एकट्ठा राखब, (५) नव्य न्याय परम्पराक संग आधुनिकताक संवाद ई सभ तत्त्व महत्त्वपूर्ण अछि। २. सम्पादकीय: गजेन्द्र ठाकुर विदेह ई-पत्रिकाक सम्पादक गजेन्द्र ठाकुरक सम्पादकीयसँ सदेह १ क प्रारम्भ होइत अछि। सम्पादकीयमे जानकारी देल गेल अछि जे १ जनवरी २००९ धरि विदेहक ७० टा देशसँ १,३६,८७४ बेर दर्शन कएल गेल। नव्य न्यायक दृष्टिसँ: पक्ष विदेह मैथिलीक श्रेष्ठतम डिजिटल मंच अछि; हेतु- वैश्विक पाठक-संख्या; व्याप्ति जे पत्रिका ७० देशसँ पढ़ल जाइत अछि से प्रभावशाली होइत अछि; निर्णय विदेह मैथिलीकेँ वैश्विक बनौलक। विदेह फ्रेमवर्क: 'मैथिलीक मानक लेखन-शैली' (पृ. २४१) अनुभाग विदेहक भाषानीतिक आधारशिला थीक। मिथिलाक्षर आ देवनागरी दुनूमे प्रकाशन parallel history केर लोकतान्त्रिकरणक प्रतीक। २.१ 'मैथिलीक मानक लेखन-शैली' अनुभाग भाषाशास्त्र: Saussure केर Langue आ Parole मानक (Langue) आ व्यवहार (Parole) केर सन्तुलन। Chomsky केर Language Planning। नव्य न्यायक 'Pramāna' भाषिक नियमक प्रमाण-आधार। ३. सभ साहित्यकारक समीक्षा ३.१. गंगेश गुंजन रचना: 'राधा' (ग-पद्य मिश्रित), गजल, वैचारिक मंथन साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता गंगेश गुंजन (मूल नाम: गंगेश्वर झा) मैथिलीक सर्वाधिक बहुआयामी रचनाकार छथि। 'उचितवक्ता' कथा-संग्रह, 'बुधिबधिया' नाटक, आ 'राधा' हुनकर प्रमुख कृति थीक। रचनाक परिचय: 'राधा' (ग-पद्य मिश्रित), गजल, कविता: गंगेश गुंजन मैथिली साहित्यक सर्वाधिक बहुआयामी रचनाकार छथि। 'उचितवक्ता' कथा-संग्रहक हेतु साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त गुंजनजी मैथिलीक प्रथम चौबट्टिया नाटक 'बुधिबधिया'क लेखक छथि। एहि संकलनमे हुनकर मैगनम ओपस 'राधा' (ग-पद्य मिश्रित), कोसी-बाढि पर गजल आ वैचारिक मंथन समाहित अछि। भारतीय आलोचना: 'राधा'मे श्रृंगार-करुण रसक अद्भुत समागम 'बेचैनी राधाक, बेबस मनक प्रवाह मे, बहैत रहल, यमुना धार सन।' ध्वनि सिद्धान्तसँ राधा केवल भक्ति-काव्यक पात्र नहि, वैश्वीकरणक युगमे मैथिली-अस्मिताक रूपक थीक। वक्रोक्तिक सूक्ष्म प्रयोग 'कृष्ण निसाँमे छथि' सन पंक्तिमे शब्द-शक्तिक तीन स्तर एकसंग। 'राधा' रचनामे श्रृंगार-रस आ करुण-रसक अद्भुत समागम अछि। राधाक मानसिक विकलता ('बेचैनी राधाक, बेबस मनक प्रवाह मे, बहैत रहल, यमुना धार सन') मे करुण-रसक चरम अभिव्यक्ति अछि। ध्वनि सिद्धान्तक दृष्टिसँ 'राधा' केवल भक्ति-काव्यक पात्र नहि, बल्कि वैश्वीकरणक युगमे मैथिली-अस्मिताक रूपक थीक। गुंजनजीक वक्रोक्ति अत्यन्त सूक्ष्म अछि 'कृष्ण निसाँमे छथि। कृष्ण माने निसाँ' एहि पंक्तिमे शब्द-शक्तिक लक्षणा-व्यंजना अर्थक तीन स्तर एक सँग चलैत अछि। पाश्चात्य आलोचना: Stream of Consciousness शैलीमे राधाक आत्म-संभाषण Virginia Woolf केर तकनीकसँ मेल खाइत अछि। Postcolonial दृष्टिसँ 'मैथिलीक नामपर शहीद बनवाक उपकम' मैथिली-अस्मिताक हाशियाकरणक विरोध। Feminist दृष्टिसँ राधा स्वायत्त विचारशील स्त्री थीक। नव समीक्षाक दृष्टिसँ 'राधा' एकटा self-contained text थीक जेकर अर्थ पाठक-अनुभव पर निर्भर करैत अछि। Stream of Consciousness शैलीमे लिखल 'राधा'क आत्म-संभाषण ('राधा...! एं ई की भेल कतऽ सँ कोन आकाशवाणी') Virginia Woolf आ James Joyce केर स्मृति दियाबैत अछि। Postcolonial दृष्टिसँ राधाक लाचारी मैथिली-अस्मिताक हाशियाकरणक रूपक थीक 'मैथिलीक नामपर शहीद बनवाक उपक्रम। Feminist दृष्टिसँ राधा स्वायत्त विचारशील स्त्री अछि जे अपन मनसँ प्रश्न करैत अछि। नव्य न्याय: 'राधा' काव्य थीक पक्ष; रस+ध्वनि+वक्रोक्ति तीनू विद्यमान- हेतु; विद्यापति पदावलीक समान दृष्टान्त; अतः उत्तम काव्य निर्णय। नव्य न्यायक व्याप्ति-तर्कसँ देखल जाय तँ 'राधा'क काव्यात्मकताक प्रमाण: (पक्ष) ई रचना काव्य अछि, (हेतु) एहिमे रस, ध्वनि, वक्रोक्ति तीनू विद्यमान अछि, (दृष्टान्त) विद्यापतिक राधा-कृष्ण पदावलीक समान, (निर्णय) अतः ई उत्तम काव्य अछि। विदेह फ्रेमवर्क: सरहपादसँ आधुनिकता धरि मैथिली साहित्यक अखण्ड धाराक प्रतिनिधि। फणीश्वरनाथ 'रेणु'क उद्धृत शब्द 'किछु छिनार छौरा सभक ई साहित्यिक यत्न' राहुल सांकृत्यायन परम्पराक विद्रोही चेतनाक प्रतीक अछि। गुंजनजी नव्य न्यायक मिथिला-परम्पराकेँ आधुनिक साहित्यसँ जोड़ैत विदेहक parallel history क अंग बनैत छथि। ३.२. हृदय नारायण झा हृदय नारायण झा मैथिली कवितामे सामाजिक-राजनैतिक चेतनाक प्रतिनिधि। रचना: लुप्तप्राय मैथिली लोकगीत । आकाशवाणीक बी-हाई-ग्रेड कलाकार। परम्परागत योगक शिक्षाप्राप्त हृदय नारायण झाक लेख मैथिली लोकगीतक संरक्षणपर केन्द्रित। भारतीय आलोचना: लोक-रसक महान वर्गीकरण, एहि सभमे करुण, श्रृंगार, भक्ति रसक समागम। साहेबदासक पराती 'अजहुँ भजन चित चेत मुगुध मन' मधुरभक्ति रसक उत्कृष्ट उदाहरण। पाश्चात्य आलोचना: Ethnomusicology दृष्टिसँ मैथिली लोकगीतक दस्तावेजीकरणक माँग। 'फिल्मी गीतक धुनमे भगवती गीत सभक चलन' Popular Culture vs Authentic Culture केर संघर्ष। Walter Benjamin केर 'mechanical reproduction' सिद्धान्तक आलोकमे लोकसंगीतक संकट। भारतीय-पाश्चात्य समन्वय: वीर रस आ Protest Poetry क संयोग हिनकर विशेषता। सामाजिक न्यायक माँग मार्क्सवादी साहित्य-चेतनासँ सुसंगत। विदेह फ्रेमवर्क: मैथिली लोकगीतक Audio-Video दस्तावेजीकरणक आह्वान विदेहक Digital Archive प्रयासकेँ पूरक। ३.३. जितेन्द्र झा (जनकपुरधाम) रचना: अंशुमाला साक्षात्कार, मैथिली सांस्कृतिक कार्यक्रमपर / बाढ़ि पर रिपोर्ताज जनकपुरधाम, नेपालक जितेन्द्र झा मैथिली संगीतक वर्तमान अवस्थापर सूक्ष्म रिपोर्ताज तैयार कएने छथि। सम्पूर्ण विवेचन: अंशुमाला (दिल्ली विश्वविद्यालयमे संगीतमे एम.फिल) केर साक्षात्कारक माध्यमसँ 'हम सभ अपने भाषाकेँ हेय दृष्टिसँ देखैत छी तें हमर भाषा-साहित्य, गीतसंगीत आ संस्कृति पछुआ रहल अछि।' Parody बनाम Original Composition, आर्थिक संकट आ रंगमंचमे महिलाक स्थान तीनू प्रश्न उठाओल गेल। मैथिली लोकरंग मञ्च, नेपाल वन टेलीभिजन, मधेश स्पेशल एहि माध्यमसँ मैथिलीक Digital Reach विदेह फ्रेमवर्कक विस्तार। ३.४. जितमोहन झा (जन्म: ०२/०३/१९८५) रचना: 'कन्या भ्रूण हत्या कृतिक संग खिलवार' (लेख), भक्तिगीत मुम्बईमे एक लिमिटेड कम्पनीमे प्रतिष्ठित जितमोहन झाक लेख कन्या भ्रूण हत्याक समस्यापर। भारतीय + पाश्चात्य: Feminist + Marxist दृष्टिसँ '..पितृसत्ताक विरुद्ध इएह विद्रोहक स्वर थीक। 'कानून बनेलासँ निर्भयता निहि, स्वयं सामाजिक मानसिकता बदलब आवश्यक' Gramsci केर Hegemony सिद्धान्तसँ मेल। भक्तिगीत 'हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार' शान्त रसक उदाहरण। ३.५. ज्योति (ज्योति झा चौधरी, जन्म: ३० दिसम्बर १९७८) रचना: कविता (हाइकू सहित), मिथिला चित्रकला। लन्डनवासी ज्योति झा चौधरी www.poetry.com सँ 'सम्पादकक चॉयस अवार्ड' प्राप्त। मिथिला चित्रकलामे पारंगत। भारतीय आलोचना: अनेक हाइकू 'तारा दूरसँ बुझाइत कतेक शीतल, वास्तवमे जड़ैत' वक्रोक्तिक सूक्ष्म प्रयोग। 'गामक सूर्यास्त', 'विशाल समुद्र', 'आधुनिक जीवनदर्शन', 'बाल श्रम', 'विकास' करुण रस प्रधान। पाश्चात्य आलोचना: Imagism (Ezra Pound) केर आलोकमे ज्योतिक हाइकू- प्रत्येक हाइकू एकटा Image, एकटा Moment। 'पतझड़क आगमन', 'कोमल पंखुड़ी', 'नटखट समुद्र' Imagist कविताक मैथिली प्रतिनिधि। विदेह फ्रेमवर्क: लन्दनसँ मैथिली कविता विदेह parallel historyक वैश्विक विस्तार। ३.६. ज्योति प्रकाश लाल रचना: 'आजुक समयमे कम्प्यूटर शिक्षाक महत्व' (निबन्ध) जगतपुर, सुपौल (भारत)। विप्रो टेक्नोलोजी, हैदराबादमे सॉफ्टवेयर अभियन्ता। समीक्षा: 'यदि अहाँ कम्प्यूटर नहि जानैत छी तँ अहाँ निरक्षर छी' यैह निबन्धक मूल प्रतिपाद्य। Technology Determinism क भारतीय-मैथिली सन्दर्भमे अनुप्रयोग। ई-मेल, कुरियरसँ डाकक विस्थापन Cultural Change केर Marxist विवेचन। नव्य न्यायक दृष्टिसँ: कम्प्यूटर साक्षरता = आधुनिक जीवनमे प्रमेय। विदेह फ्रेमवर्कसँ सङ्गत मैथिली डिजिटल साक्षरता। ३.७. दिगम्बर झा 'दिनमणि' रचना: कविता आ गीत। समीक्षा: वीर रस आ सामाजिक प्रतिबद्धता हुनकर विशेषता। मैथिली काव्य-परम्परामे 'दिनमणि' नाम सार्थक प्रकाशक स्रोत। औचित्य सिद्धान्तसँ देखल जाय तँ जीवनक समस्या चित्रण हुनकर मुख्य विषय। ३.८. देवशंकर नवीन (जन्म: १९६२) रचना: 'अदद्दी पेनकँ मजगुत करबाक आवश्यकता' (निबन्ध), उदाहरण (सम्पादन), राजकमल चौधरी पर आलोचना। 'ओ ना मा सी', 'चानन-काजर', 'राजकमल चौधरी (१९२९-१९६७) का रचनाकर्म' आलोचना-ग्रन्थ। 'उदाहरण' मैथिली कथा-संकलनक सम्पादन। भारतीय आलोचना: मिथिलाक सांस्कृतिक विरासतक विश्लेषण 'अतिथि-सत्कारमे मिथिलाक लोक अपना घरक थाड़ी-लोटा धरि बँहकी राखि देलनि।' मैथिलीमे औचित्य सिद्धान्त परस्पर सम्मान, सेवाभावक परम्पराक सूक्ष्म विश्लेषण। पाश्चात्य आलोचना: Comparative Literature केँ जोड़ैत नवीनजी एक नव Critical Framework निर्मित करैत छथि। Intertextuality (Julia Kristeva) एक रचनाकेँ दोसरसँ जोड़ैत विश्लेषण। Postcolonial दृष्टिसँ लेखन मिथिलाक उपेक्षित जन-जीवनक Subaltern Voice थीक। नवीनजीक आलोचना Intertextuality (पाठान्तर्सम्बन्ध) क सिद्धान्तकेँ अपनबैत एक रचनाकेँ दोसरसँ जोड़ैत अछि। नव्य न्याय: 'मैथिलीमे प्रकाशनक अभावमे पत्र-पत्रिका छानि मारब कठिन' व्याप्ति-सिद्ध। नवीनजीक पद्धतिमे नव्य न्यायक 'अनुमान' (inference) क अनुप्रयोग स्पष्ट । ३.९. देवांशु वत्स रचना: चित्र-शृंखला (कॉमिक्स/ कॉमिक) नताशा, पहिने मैथिलीमे चित्रकथा छल, नाटकमे दू दृश्यक बीचबला हास्य कॉमिक सन हुनकर हास्य कॉमिक्सक आगमन। नव पीढ़ीक आलोचक। मैथिली साहित्यक नव दृष्टिकोण। विदेह फ्रेमवर्क डिजिटल माध्यमसँ मैथिली साहित्यक प्रसार। ३.१०. नागेन्द्र झा (पूर्णियाँ) रचना: मोदानन्द झा 'पञ्जीकार' पर शोध-लेख भारतीय + नव्य न्याय: पञ्जी-व्यवस्था मिथिलाक विवाह-सम्बन्धक तार्किक पद्धति। नव्य न्यायक 'Vyāpti' (व्याप्ति) केर व्यावहारिक उदाहरण वंश-सम्बन्धक नियमबद्ध ज्ञान। 'पञ्जीकारक राय बिना विवाह नहि' सामाजिक epistemology। DNA Research आ पञ्जी-व्यवस्थाक अद्भुत साम्य पाश्चात्य विज्ञानसँ मेल। ३.११. निमिष झा रचना: हाइकू। विद्यापतिपर आलेख। युवा कवि। नव संवेदनशीलताक काव्य। ३.१२ नीलिमा रचना: भानस-भात। मखानक खीर, मेथीक परोठा, मुगलई कोबी, केसर पुलाव, मूरक परोठा। स्त्री-सृजनशीलता, मिथिलाक खानपान आ विश्वक खानपानक मेल। स्त्रीवादी आलोचना: Gynocriticism (Showalter) मैथिलीमे स्वतन्त्र महिला-खानपान लेखन परम्पराक प्रतिनिधि। ३.१३. नूतन झा रचना: बराती-सत्कार। जानकी नवमीपर आलेख। ३.१४. पन्ना त्रिवेदी (गुजराती कविता) रचना: कविता, महिला कवि, गुजराती कवि। विदेह फ्रेमवर्कक व्याप्ति। ३.१४. परमेश्वर कापड़ि रचना: अपन-अपन माय। नेपाल-मैथिलीक साहित्यकार। खाँटी शब्दावली। ३.१५ पीयूष ठाकुर रचना: गुजराती कविता। ३.१६. प्रकाश झा रचना: बाल कविता। ३.१७ डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंह 'मौन' (जन्म: २० जनवरी १९३८) रचना: 'पञ्चदेवोपासक भूमि मिथिला' (शोध-निबन्ध)। साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार (२००४) प्राप्त। भारतीय आलोचना: पञ्चदेवोपासना (गणेश, विष्णु, सूर्य, शिव, भगवती) पर विद्वत्तापूर्ण निबन्ध। धार्मिक आस्थाक Anthropological विश्लेषण सप्तमातृका परम्परासँ दशमहाविद्या धरि मिथिलाक धार्मिक इतिहास। पाश्चात्य आलोचना: Cultural Anthropology + Religious Studies मिथिलाक पञ्चदेवोपासना भारतीय Syncretic Culture केर उत्कृष्ट उदाहरण। लौरियानन्दनगढ़, जनकपुर, कुशेश्वर स्थान Archaeological Evidence। विदेह फ्रेमवर्क: नेपाल-भारत दुनूक मैथिली परम्पराकेँ एकत्र रखबाक विद्वत् प्रयास विदेह parallel history केर आधारस्तम्भ। ३.१८. प्रीति ठाकुर मैथिलीमे चित्रकथाक जन्मदाता, मिथिला चित्रकला आ आधुनिक चित्रकला दुनूक समावेश। ३.१९ डॉ. प्रेमशंकर सिंह (जन्म: १९४२) रचना: शोध-लेख। मैथिलीक वरिष्ठ विद्वान-आलोचक। प्रेमशंकर सिंह मैथिलीक वरिष्ठ विद्वान छथि। सदेह १मे हिनकर शोध-लेख “बीसम शताब्दी मैथिली साहित्यक स्वर्णिम युग”। भारतीय आलोचना: निबन्ध-विधामे हिनकर ललित शैली मैथिली गद्यक सौन्दर्य-चेतनाकेँ प्रतिष्ठित करैत अछि। साहित्यिक शोधमे औचित्य सिद्धान्तक परिपालन। ललित निबन्ध-शैलीमे मैथिली गद्यक सौन्दर्य-चेतना। औचित्य सिद्धान्त सभ विधामे समुचित भाव-व्यञ्जना। ३.२१ बिनीत ठाकुर (ललितपुर, नेपाल) रचना: 'बाँकी अछि हमर दूधक कर्ज' (गीत-संग्रह) मिथिलाक्षर आ देवनागरी दुनूमे। मिथिलाक्षरमे प्रकाशन एहि पोथीकेँ विशिष्ट बनबैत अछि। नेपालक मैथिलीकेँ भारतीय धाराक संग जोड़बाक विदेह-प्रयास एहिसँ सिद्ध होइत अछि। मिथिलाक्षरमे प्रकाशन Script preservation + नेपालक मैथिलीकेँ भारतीय धारासँ जोड़बाक ऐतिहासिक प्रयास। ३.२२ बी.के. कर्ण (जन्म: १९६३) रचना: 'संकट गुणक आ मैथिल' (आलेख)। इण्डियन इन्स्टिट्यूट ऑफ पैकेजिंग, हैदराबादमे उपनिदेशक। समीक्षा: मिथिलाक आर्थिक विकासक Risk Analysis एकटा Data-driven आलेख। 'मैथिल पलायनसँ मैथिलीक आकस्मिक अन्त' Diaspora Studies। '५ जिलाक जनसंख्या' Census Data सँ Literary Sociology। Marxist दृष्टिसँ व्यापारी वर्गक अभावसँ मैथिल समाजक आर्थिक अवनति। नव्य न्यायक अनुमान Statistical Evidence सँ सामाजिक निष्कर्ष। ३.२३. भरत माँझी रचना: ओड़िया कविता, आदिवासी-दलित-चेतनाक कवि। समीक्षा: Dalit Aesthetics हाशियाक जनताक जीवन-संघर्षक काव्याभिव्यक्ति। Subaltern Voice (Spivak) मैथिली अनुवाद साहित्यमे आदिवासी-दलित अनुभवक सशक्त प्रस्तुति। ३.२४. मनोज मुक्ति रचना: 'स्मिताक लड़ाई' (कविता) नेपालक मैथिली राजनैतिक कवि। समीक्षा: 'पशुपतिनाथक देशमे होइछ व्यभिचार सब भेषमे' रौद्र रस आ सामाजिक विद्रोह। मधेश आन्दोलनक साहित्यिक प्रतिनिधित्व Subaltern Political Poetry। वीर रस 'सम्पूर्ण मैथिलमे नव चेतना भरैत, सबके लड़िहिटा पड़त।' ३.२५. महेन्द्र मलंगिया रचना: नाटक, रंगमञ्च-निदेशन 'मैथिली नाटककारक रूपमे हमर ऊँचाइ धरि किओ नञि पहुँचि सकैत अछि।' स्वघोषित मैथिलीक Shakespeare। मूलधाराक ब्राह्मणवादी व्यक्ति केन्द्रित नाटककार। भारतीय आलोचना: 'हम दर्शककेँ लक्षित कऽ नाटक लिखैत छी' जनरंजकता (लोकरस) क सिद्धान्त। नाट्यशास्त्रक दर्शक-चेतनाक व्यावहारिक प्रयोग, मुदा ओइमे जातिवादी व्यंग्य जातिवादी सीमित दर्शक वर्गकेँ ध्यानमे राखि। पाश्चात्य आलोचना: Bertolt Brecht केर Epic Theatre सँ तुलना दर्शककेँ सोचचा लेल मजबूर करैत रंगमञ्च। मुदा जनकपुरमे मिथिला नाट्य कला परिषदसँ सीमित दर्शक आ लक्ष्य समूह दिल्ली धरि। मूलधाराक मैथिली नाटक Community Theatre केर प्रसारमे बाधा। विदेह फ्रेमवर्क: जितेन्द्र झा जनकपुरक आलेखमे 'जावत धरि हमर कलम चलैत रहत ताधरि मैथिली नाटककारक रूपमे हमर सिंहासन अटल।' आदि मूलधाराक आत्ममुग्ध रचनाकारक विशेषता। नेपालमे मैथिली रंगमञ्चक parallel history जेना उपेन्द्र भगत नागवंशी, सरोज खिलाड़ी, भ्रमर आदि हुनकर मूलधाराक विरुद्ध ठाढ़। युवा कवि। नव काव्य-प्रयोग। ३.२६. मायानन्द मिश्र रचना: 'अहाँ की छी' (कविता), सदेह १ मे हिनकर साक्षात्कार (डॉ शिव प्रसाद यादव द्वारा) आ 'मिथि-मालिनी' पत्रिकाक प्रसंगमे हिनकर दृष्टिकोण प्रस्तुत भेल अछि अछि। विदेह फ्रेमवर्क: 'मिथि-मालिनी'सँ जुड़ल हिनकर दृष्टि 'स्थानीय लेखक-मण्डलकेँ अधिकाधिक प्रोत्साहन भेटक चाही' विदेह फ्रेमवर्कक लोकतान्त्रिक साहित्य-निर्माणक आदर्शसँ सुसंगत अछि। 'मिथि-मालिनी' पत्रिकाक माध्यमसँ स्थानीय साहित्यिक मञ्च विदेह parallel history केर पूर्ववर्ती प्रयास। ३.२७. डॉ. मित्रनाथ झा (जन्म: १९५६) रचना: 'विदेह-वैभव' (कविता)। मिथिला शोध संस्थान, दरभंगामे पाण्डुलिपि विभागाध्यक्ष। भारतीय आलोचना: 'विदेह-वैभव' 'विद्या-वैभव केर गरिमासँ सर्वथा पुक्त जे सिद्ध भूमि' वीर + शान्त रसक समागम। मिथिलाक दार्शनिक-साहित्यिक विरासतपर गर्व-गान। विदेह फ्रेमवर्क: 'भग्न चिन्तन' कविता 'लेखनीक आइ दुर्दशा देखि एकान्त मौन भए कनैत छी' लेखकक सामाजिक उत्तरदायित्वक स्वीकृति। ३.२८. मुखीलाल चौधरी (बुटवल, नेपाल) रचना: 'समझौता नेपाल भोर' गीति-एल्बमक समीक्षा, नेपाली मैथिली संगीत-आन्दोलनक समीक्षक। समीक्षा: नेपालक संघीय गणतन्त्रक प्रारम्भिक दौरमे मैथिली गीतक भूमिकाकेँ रेखांकित करैत 'भोर' एल्बमक समीक्षा। 'जतय हिन्दुओ राखि ताजिया, मान दिअए इस्लामके' साम्प्रदायिक सद्भावक गीत सहिष्णुता। Rupa Jha, Dhire Premershri, Rajendra Vimal आदिक गीतक तुलनात्मक विश्लेषण। ३.२९. डॉ पालन झा रचना- आध्यात्मिक निबन्ध, साहेब रामदास। भारतीय आलोचना: वैदिक दर्शन 'निष्काम कर्म' (गीता अध्याय १८) क सरल मैथिली व्याख्या संग साहेब रामदासक ४७८ पदक विश्लेषण भक्ति रसक सभ स्तर। 'मधुरं रस' कृष्ण-भक्तिक चरम अभिव्यक्ति। नव्य न्याय: वेद-उपनिषदक 'प्रमाण' (ज्ञानक साधन) विवेचन तत्त्वचिन्तामणिक दार्शनिक परम्पराक आलोकमे। मोक्ष-मार्गक तार्किक विश्लेषण। विदेह फ्रेमवर्क: मिथिलाक आध्यात्मिक परम्पराक संरक्षण parallel history मे धार्मिक-सांस्कृतिक आयाम। ३.३०. डा. रमानन्द झा 'रमण' रचना: 'बहुत दिनक बाद मिथिलाक ग्रामांचलमे सगर रातिक दीप जरयक आयोजन' मैथिलीक 'सगर रातिक दीप जरय' आन्दोलनक इतिहासकार। 'सगर रातिक दीप जरय' अद्यतन आन्दोलनक इतिहासकार आब छथि उमेश मण्डल। दुनू गोटेक 'सगर रातिक दीप जरय’ क इतिहास विदेह पेटारमे उपलब्ध अछि। समीक्षा: 'सगर रातिक दीप जरय' मैथिली कथाक सामूहिक उद्यम। Collective Memory (Maurice Halbwachs) सामुदायिक स्मृतिक साहित्यिक दस्तावेज, २००८ मे रहुआ संग्राम मे अशोक कुमार झा ’अविचल’ द्वारा एकर आयोजन भेल छल। विदेह parallel history एहि आन्दोलनकेँ कमजोर करयबला पक्षकेँ उजागर कएलक। [ई पुछलापर जे तखन विभूति आनन्द, हीरेन्द्र कुमार झा, दमन कुमार झा आ अशोक कुमार मेहता केना १११म सगर राति दीप जरयमे पहुँचला, तँ ओ सभ सूचित केलनि जे तइ लेल ऐ चारू गोटेक करार अशोक अविचलसँ भेलन्हि जे ओ एकरा ११२ म सगर राति दीप जरय लिखता, मुदा ओ कोनो आमंत्रणमे से नै केलन्हि आ बैनरपर ऊपरमे छोट सन 'क्रम ११२' लिखलन्हि। तइपर संचालक हीरेन्द्र कुमार झा क उसकेलापर अध्यक्ष विभूति आनन्द समेत दमन कुमार झा आ अशोक कुमार मेहता २-३ घण्टा बाद खा पी कऽ ओतऽ सँ प्रस्थान कऽ गेला, मुदा समानान्तर धाराक सभ कथाकार भोर धरि गोष्ठीमे रहि एकरा सफल बनबेलन्हि। एतऽ ई स्पष्ट कऽ दी जे ई कृत्य हीरेन्द्र कुमार झा पहिनहियो केने छथि जे विदेहमे अभिलेखित अछि [८९म सगर राति दीप जरय, औरहा (लौकही), १५.५.२०१३, संयोजक- उमेश पासवान; हीरेन्द्र झा द्वारा क्रमांक ९० नै केलापर गोष्ठीक बहिष्कार आ हुनका उसकेलापर अशोक कुमार मेहता सेहो बहिष्कार केलनि]। एतऽ ईहो स्पष्ट कऽ दी जे हीरेन्द्र कुमार झा लूज टॉक करैमे माहिर छथि आ अपना सङे आयल लोकक विषयमे, कनियो जँ ओ सभ एम्हर-ओम्हर गेला, तँ ढाकीक ढाकी विषवमन करै छथि। संगहि ईहो स्पष्ट कऽ दी जे समानान्तर धाराक लेखक लोकनिक सगर राति दीप जरयमे आगमनसँ पूर्व, जखन हीरेन्द्र कुमार झा सभक बोलबाला छलन्हि, गोष्ठीमे सभ खा पी कऽ सूति जाइ छला आ मात्र कथा पढ़निहार असगरे जागल रहै छला, जकर विरोधमे आशीष अनचिन्हार कथा पढ़बासँ मना कऽ देने रहथिन्ह, मुदा मूलधारा भोरमे जे न्यूज देलक तइमे ई गप नै आयल। ई सभटा खेरहा हमर पोथी प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना भाग-२ मे अभिलेखित कएल गेल अछि जे उपलब्ध अछि http://videha.co.in/pothi.htm पर। साहित्य अकादेमी द्वारा गत दस बर्खसँ समानान्तर धाराक एकमात्र स्थल सगर राति दीप जरय केँ गीड़ि लेबाक प्रयास कएल जा रहल अछि। आगामी ११२म 'सगर राति दीप जरय'क आयोजन श्री रामचन्द्र रायक संयोजकत्वमे हुनक पैतृक गाम- सहुरिया (अन्धराठाढ़ी) मे 'मार्च' २०२३ मासक अन्तिम शनि दिन हएत, से सर्वसम्मतिसँ निर्धारित भेल। हीरेन्द्र कुमार झा अपन ब्लैकमेलिंग आगाँ सेहो पूर्ण निष्ठासँ जारी राखलनि जखन ०२.०१.२०२३ केँ रामचन्द्र रायकेँ फोन कऽ आगामी गोष्ठीक क्रमांक ११२ नै ११३ करबाक दुष्टतापूर्ण ब्राह्मणवादी आग्रह केलन्हि आ डरेलन्हि, जइ सँ कोनो तरहेँ साहित्य अकादेमीक गोष्ठीकेँ सगर राति दीप जरयक मान्यता भेटि जाय, फेर ०५.०१.२०२३केँ घट्टी मानलन्हि। साहित्य अकादेमी हुनकर दस बर्खसँ जारी ऐ कुत्सित प्रयासक मेहनताना दैत हेतन्हि आ जँ नै देने छन्हि तँ आगाँ देतन्हि। विदेहक आगामी साहित्यिक भ्रष्टाचार विशेषांक मे सभ गपक खुलासा हएत। ऐ सम्बन्धमे ई स्पष्ट कऽ दी जे अशोक अविचल ऐ गोष्ठीक आयोजन पूर्ण रूपसँ व्यक्तिगत रूपेँ केने रहथि। दिल्लीक साहित्य अकादेमीक गोष्ठी जे टैगोरक १५० जयन्ती बर्खमे आयोजित भेल आ जकरा साहित्य अकादेमी अपन वार्षिक रिपोर्ट आ आय-व्यय खातामे अपन गोष्ठीक रूपमे वर्णित केलक आ तकर पाइक वितरण देखेलक आ ऑडिटरसँ अप्रूव करेलक, जे सही मदमे टैगोरक कार्यक्रम लेल खर्च भलै (सगर राति दीप जरय लेल नै) केँ सगर राति दीप जरयक रूपमे मान्यता देबा लेल मूल धाराक पुरस्कार/ असाइनमेण्ट लोलुप आ ब्राह्मणवादी लोक गत दस बर्खसँ अपस्याँत छथि, से एक बेर फेर असफल भेल। -(विदेह अंक ३६२ सम्पादकीय)] साहित्य अकादेमीक मैथिली विभाग आ आन सरकारी आ गएर सरकारी ब्राह्मणवादी संस्था सभसँ लाभान्वित आ ओकरा सभक शहपर हीरेन्द्र झा आदि द्वारा दरभंगामे २९.०६.२०२४ शनि ३०.०६.२०२४ (रवि) केँ एकर अपहरण कऽ लेल जेबाक एक बेर फेर साजिश भेल। जखन माला उठबै लेल प्रस्ताव अबै छै तखन ओइपर सभ कथाकारसँ मत मांगल जाइ छै, मुदा से नै भेलै एतऽ। ब्राह्मणवादी कथाकार सभ हीरेन्द्र झा केर संग साजिशमे शामिल भऽ गेला, वा रमेश आदि कथाकार सन बौक बनल रहला, जेना द्रौपदी चीरहरण मे भीष्म आ द्रोण बौक भऽ गेल रहथि। उमेश मण्डल रमेशक कथा “कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो” पढ़ने छथि [देखू विदेह अंक ४४१- गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली लेल दलित साहित्य समीक्षाशास्त्र-२ (संदर्भ: प्रभास कुमार चौधरीक 'इन्द्रधनुष', अशोकक 'प्रतिलोम' आ रमेशक 'कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो'/ दलित साहित्य समीक्षाशास्त्र, भारतीय समीक्षाशास्त्र, पाश्चात्य समीक्षाशास्त्र, गंगेशक नव्य न्याय आ विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्कक परिप्रेक्ष्यमे)] आ हुनका भ्रम रहन्हि जे कमसँ कम रमेश एकर विरोध करता; ओ हुनकासँ हस्तक्षेप करबाक आग्रहो केलन्हि, मुदा रमेश मूड़ी गोति लेलन्हि। [आचार्य रामानंद मंडल – (सगर राति दीप जरय दरभंगा विवाद) सगर राति दीप जरय दरभंगा आयोजन शुरूये से विवादित भे गेल रहल हय। कि ई कार्यक्रम दिन मे होय।अइला कि रात मे कुछ लोग बारह बजे के बाद सुत रहय हय।महिला आ वृद्ध पुरुष के भाग लेवै मे दीक्कत होइ हय। आउर कुछ लोग त पोथी लोकार्पण के बाद अपन घर चल जाइत हय। अंतोगत्वा सगर राति दीप जरय छौ बजे सांझ से छौव बजे सुबह तक आयोजित भेल। आगंतुक कथाकार के संयोजक द्वय साहित्यकार अशोक कुमार मेहता आ साहित्यकार हीरेन्द्र झा स्वागत करैत रहलन। कार्यक्रम के शुरूआत दीप प्रज्ज्वलन से भेल। दिवंगत मिथिला -मैथिली विभूति के श्रद्धांजलि अर्पित कैल गेल। पोथी लोकार्पण कैल गेल। साहित्यकार डॉ महेंद्र नारायण राम के अध्यक्षता में संचालन साहित्यकार कमल मोहन चुन्नू जी कैलन। साहित्यकार भीम नाथ झा उद्बोधन कैलन। महराजा कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति जी वैदिक कथा से लेके आधुनिक कथा पर प्रकाश डाल लैन।तीन गो पंजी बनल रहय।दू गो पर हस्ताक्षर आ एगो पर कथा पाठ के विवरण। परंपरागत रूप से पहिले एकैटा पंजी में उपस्थिति आ कथा पाठ दर्ज़ होइत रहल हय। कार्यक्रम के शुरूआत वरीय कथाकार के कथा बाचन से प्रारम्भ भेल। यथा -साहित्य अकादमी से पुरस्कृत जगदीश प्रसाद मंडल के कथा आदि। त्वरित समीक्षो भेल। कथा पाठ आ समीक्षा चलैत रहल। मध्यांतर मे भोजन भेल। भोजनोपरान्त कथा पाठ आ समीक्षा होइत रहल।कुल ४४ कथाकार ४५ कथा के पाठ कैलन। त्वरित कथा समीक्षा भेल। समीक्षा आ समीक्षा शैली आ हाव भाव से कुछ कथाकार असहमत आ रंज देखल गेल। अंत मे सगर राति दीप जरय के अगिला कार्यक्रम के लेल बिना प्रस्ताव पारित के अध्यक्ष द्वारा घोषणा कैल गेल कि अगिला कार्यक्रम साहित्यकार कमल मोहन चुन्नू जी के संयोजकत्व में पटना मे आयोजित होयत।वरीयतम साहित्यकार जगदीश प्रसाद मंडल जी अइसे असहमति जतैलन।परंच कार्यक्रम के संयोजक साहित्यकार हीरेन्द्र झा दीप साहित्यकार कमल मोहन चुन्नू के सौंप देलैन। दीप हस्तांतरण मे संयोजक साहित्यकार अशोक कुमार मेहता अनुपस्थित रहलन।साहित्यकार जगदीश प्रसाद मंडल अनेक साहित्यकार संग कार्यक्रम के बहिष्कार क देलन। कार्यक्रम आ साहित्यकार के अंतिम फोटो शेसन न भेल। सगर राति दीप जरय साहित्यकार के अखाड़ा बन गेल आ दीप बन गेल ट्राफी।- -आचार्य रामानंद मंडल, सीतामढ़ी।] मैथिली_साहित्यक_इतिहासक_लोकार्पण आ #सगर_राति_दीप_जरय_दरभंगाक_गोष्ठी आइ लगभग चालीस वर्षक बाद मैथिलीमे इतिहासक पोथी लिखल गेल अछि। डॉ. विजयेन्द्र झाकेँ ऐ पुनीत कार्य लेल कोटिश: धन्यवाद.. आभार...। विजयेन्द्र बाबू हमर पड़ोसी छैथ। हिनक गाम चिकना रेलवे स्टेशनसँ सटले बिरौल छिऐन। ओना ई पोथी किछु दिन पुर्वहि प्रकाशित भेल अछि आ केतेको ठाम ऐ पोथीकेँ देखबाक मौका सेहो हमरा भेटल अछि मुदा एकर लोकार्पण नहि भेल छेलै से 29.6.2024 केँ दरभंगामे भेलइ। ऐ पोथीक लोकार्पणमे हमरो रहबाक छल। ई पूर्व निर्धारित छेलै जे लोकार्पणक कतारमे पाँच गोटा रहता जइमे हमहूँ (राम विलास साहु) रहबै। मुदा से नहि भऽ सकल, किएक कार्यक्रमक संयोजनमे संकीर्णतावादी आ जातिवादी व्यवहार की की केलक से सर्वविदित अछिए। आइ 34 वर्षक सगर रातिक इतिहासमे सभ पोथीक लोकार्पण एकसंग माने एक सत्रमे होइत रहल अछि। हमरा दू दिन पूर्वहि सूचना भेटि चुकल छल जे डॉ. विजयेन्द्रबाबू द्वारा लिखित मैथिली साहित्यक इतिहास (आदिकाल आ मध्यकाल)क लोकार्पण दरभंगामे होएत आ लोकार्पणक कतारमे कुल पॉंच गोटा रहता। जइमे पहिल डॉ. भीमनाथ झा, द्वितीय श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, तृतीय श्री कमलेश झा आ नन्द विलास राय तथा पंचममे हमर नाओं माने राम विलास साहु। ‘सगर राति दीप जरय’क कथा गोष्ठीमे हम 2010 इस्वीसँ भाग लैत आबि रहल छी। आइ धरिक एकोटा आयोजन हम फोंक नहि जाए देलौं। आइ धरिक कुल मिला कऽ जोड़बै तँ 39-40 टा गोष्ठीमे भाग लेलौं अछि। बेरमा गाममे 71 आयोजन जगदीशबाबूक संयोजकत्वमे भेल छेलै। तहीठामसँ लगातार भाग लैत रहल छी। हम अपना संयोजनमे दू-तीन बेर ऐ कार्यक्रमक आयोजक सेहो करबौने छी। किनकौं प्रति कोनो दूजा-भाव नहि रखलौं आ हमरा खूब जश सेहो भेटल अछि। मैथिलीक सेवक सभकियो एक छिया, सहोदर छिया, एहेन भाव हमर आइ धरिक रहल अछि। हम जहिया कहियो अपना संयोजनमे कार्यक्रम केलौं तँ अही भावे केलौं जइसँ हमरा जशो खूब भेल। अहिना सभठाम होइतो आबि रहल अछि मुदा से दरभंगामे 29 जूनक शनि दिन जे गोष्ठी भेल तइमे हीरेन्द्रजी नहि होमए देलखिन। ‘सगर राति दीप जरय’क 111म कथागोष्ठीक पछाति जे आयोजन भेल सहुरिया-नवटोलीमे, ओतए सर्वसम्मतिसँ एकर गिनती (आयोजन क्रम)केँ गौन कएल गेल। ऐसँ एकटा ई फैदा भेलै जे सभकियो आबए-जाए लगला। अही तरहेँ गोष्ठी आगू बढ़ल आबि रहल छल। बिनु गिनतीक आयोजन हुअ लगल छल। सहुरिया-नवटोली (अन्धराठाढ़ी)क बाद नहरी (खुटौना)मे भेल, नरहिया (लौकही)मे भेल, बेरमा (लखनौर) आ निर्मली (सुपौल)मे सेहो अही तरहेँ आयोजन भेल। एक-पर-एक विद्वान साहित्यकार आ साहित्यप्रेमी लोकनि गोष्ठीमे भाग लेलैन, डॉ. अशोक अविचलजीक इच्छा रहैन जे अही तरहेँ गोष्ठी हुअए आ हएबो शुरू भऽ गेल छल। मुदा निर्मली बाद जखन दरभंगामे, हीरेन्द्रजीक संयोजनमे गोष्ठी भेल तँ ओ पुन: ई काज करए लगला। माने आयोजन क्रमक चर्चा शुरू कऽ देलैन। बैनरपर 118म आयोजन अंकित छल से सभकियो देखनहि हेबइ। उद्घाटन भाषण दैत डॉ. भीमनाथ झा एकर भर्त्सना सेहो केलैन। ओ स्पष्ट शब्दमे बजला- ‘सगर राति दीप जरयक गिनती नइ महत्व नहि रखैत अछि। मूल अछि जे कथागोष्ठी चलैत रहए, दीप जगमगाइत रहए’। खाएर जे किछु मुदा दरभंगामे तेतबे नहि भेल। सभठाम उद्घाटन सत्रक पछाति पोथी लोकार्पण सत्र आरम्भ होइत अछि। तैबीच जतबा जे पोथी आएल रहल सभकेँ पोथीकेँ मैथिलीक धरोहर बुझि क्रमश: सबहक लोकार्पण एकसंग होइए। दरभंगा से नहि भेल। गोष्ठीक संयोजक हीरेन्द्रजी कहलैन जे ऐ पोथी (मैथिली साहित्यक इतिहास)क लोकार्पण बादमे हेतइ। हम मेहताजीसँ पुछलयैन जे एना किए दू भागमे पोथीक लोकार्पण होएत? तैपर ओ कहलैन जे से सभ हीरेन्द्रेजी कहता। खाएर जे किछु। लगभग साढ़े आठ बजेसँ पूर्वहि पहिल फेजमे लगभग दर्जन भरि पोथीक लोकार्पण भेल। पछाति बहुत लोक चलि गेलाह। सभागारमे बैसल हम सोचैत रही जे आखिर इतिहासक पोथीक लोकार्पण कखन होएत, जनतबमे छल भीमबाबू सेहो रहता, मुदा ओ तँ आब जा रहल छैथ। लगभग 12 बजे रातिमे संयोजक अपनहि माने हीरेन्द्र कुमार झा, अमलेन्दु शेखर पाठक आ अध्यक्षक संग दू गोटा आर, पोथी लऽ कऽ ठाढ़ भऽ फोटो खिंचा लेलैन आ हॉंइ-हॉंइ अपना-अपना बैगमे पोथी राखि लइ गेलाह। ई क्रिया लगभग 30 सेकेण्डक पेसतरे सम्पन्न भऽ गेल..! ई दृश्य देखि हमरा छगुन्ता लागि गेल आ हम उमेश मण्डलकेँ कहलयैन जे देखि लेलिऐ ने। तैपर ओ (डॉ. उमेश मण्डल) उठि कऽ ठाढ़ होइत बजला, ‘एना केना लोकार्पण करबा देलिऐ इतिहासक पोथीकेँ।’ तैपर तथाकथित अध्यक्ष महिन्दर राम बजला- “कतेक सुन्दर तँ लोकार्पण भेल हेँ।” तैपर उमेश मण्डल कहलकैन जे “यौ श्रीमान ऐ पोथीक लोकार्पण हेतु लेखक स्वयं हमरा प्रतिनिधि बनौल अछि आ से जनतब संयोजककेँ सेहो लिखितमे देने छैन। ओ कहने छैथ जे मेल-पॉंच करि कऽ पॉंच गोटासँ लोकार्पण करबए लेल। तैठाम आयोजके-संयोजक आ मंच संचालके-सभ मिलिकऽ सभकियो अपनहिमे पोथी बॉंटि लइ गेलौं। कहू, एहेन दृश्य जे कियो देखता तँ की कहता?” तैपर ओ कहलखिन- “हँ तँ दू गोटाकेँ बजाउ ने आ हैया लिअ पोथी, अदैल-बदैल कऽ फोटो खिंचा लिअ।” ई कहैत ओ अप्पन हाथक पोथी बढ़ा देलखिन। तैसंग डॉ. सुरेन्द्र भारद्वाज सेहो अपना हाथक पोथी लऽ कऽ ठाढ़ भऽ बजला- “ईहो पोथी लेल जाए।” बड़बढ़ियॉं, लोकार्पणक ऐ विस्तृत क्रममे श्री कमलेश झा, श्री नन्द विलास राय आ हमर नाम (राम विलास साहु) ल बजौल गेल। हौ बाबू, फोटो तँ खिंचा गेल मुदा पोथी हमरा हाथसँ महिन्दर राम लऽ लेलैन। महिन्दरजीकेँ चुन्नूजी मोन पाड़ि कहलकैन- ‘सर पोथी लऽ लिअ।’ डॉ. सुरेन्द्र भारद्वाजजी मुदा अप्पन ओ प्रति कमलेशबाबूकेँ दऽ देलखिन। हम सभ रहि गेलौं छुच्छे। ओना, तइसँ हमर मन बेसीकाल छोट नहि रहल। थोड़े काल जरूर उदास जकॉं रहलौं। पछाति पूर्णरूपेँण ठीक भऽ गेलौं। हँ, गोष्ठी जखन उसरल, माने अन्तिम कथा पाठ आ तैपर त्वरित समीक्षा एलाक बाद जखन समापनक घोषणा भेल तेकर बादक बाद जे भेल आ तइसँ जे उदासी चढ़ल से आइ धरि चढ़ले अछि। ‘सगर राति दीप जरय’क गोष्ठीमे कहबे केलौं जे हम 2010 इस्वीसँ लगातार अबैत-जाइत रहलौं अछि। कोनौंठाम एहेन अप्रजातांत्रिक निर्णय लऽ ऐगला आयोजनक घोषणा नहि होइ छल, जे दरभंगामे भेल। आगामी आयोजनक लेल बिनु प्रस्ताव आमंत्रित केनहि, जनसमूहक सहमति बिनु लेनहि अध्यक्षसँ घोषणा करबा देल गेल जे ऐगला गोष्ठी डॉ. कमलमोहन चुन्नूक संयोजकत्वमे पटनामे होएत.! जगदीशबाबू (श्री जगदीश प्रसाद मण्डल)केँ ई नीक नहि लगलैन आ ओ ठाढ़ भऽ कऽ प्रतिवाद केलखिन। मुदा तैपर हिनका संग जे वर्ताव कएल गेल ओ अत्यन्त दु:खद अछि। ओइ समय लगभग 19 आदमी सभमिलाकऽ रहल हएब, जइमे करीब 15-16 आदमी उठि कऽ विदा भऽ गेलौं। तीन-चारि आदमी रहि गेला जे दीप आ पंजीकेँ कसकसाकऽ पकड़ने रहला। दीप-आ पंजी तँ पुन: कीनल जा सकैए तँए परिस्थिति देखि हमरालोकनि निर्णय लेलौं जे ऐगला आयोजन सितम्बरमे फुलपरासमे हमसभ करब। दरभंगा गोष्ठीक विसंगतिक समाचार समाजमे पसरल। अही क्रममे विजयेन्द्र बाबूकेँ सेहो अपन पोथी-लोकार्पण सम्बन्धि विसंगतिक पता लगलैन। ओ फोन केलाह। हमरा पुछलैन तँ हम हुनका सभ बात कहलयैन तैपर ओ कहलैथ जे हम शीघ्र एक प्रति पोथी पठा रहल छी। वएह पोथी आइये, अखने हमरा हाथ आएल अछि। मनमे बेहद खुशी भेल। सोचलौं जे ऐ खुशीमे अहूँसभकेँ साझी करी...। हम एकबेर पुन: विजयेन्द्रबाबूकेँ धन्यवाद आ साधुवाद दइ छिऐन। जय मैथिली। - राम विलास साहु] [बिल्कुल सही लिखलहुं ।आयोजकक मानसिक संकीर्णता देखल गेल मैथिली साहित्यक लोकार्पणमे आ अगिला आयोजन लेल । परम्परागत रूप सं दीप देल जाइछ अगिला संयोजक के ।से नहि भेल ।अहांक निर्णय सही अछि।- कमलेश झा] [दरभंगा कथागोष्ठी मे भेल विमर्श के प्रसंग मे सही तथ्यक लेखन नहि भेल अछि।जखन आंहां सब उठि क' विदा भ' गेलिऐक,हम आ.श्री जगदीश बाबू के आ उमेश जी के दोबारा बजा क' अनलियनि।फेर दू-तीन मिनट गप्प भेलै।श्री बर्णवाल जी आ दरभंगा कथागोष्ठी अध्यक्ष आ.महेंद्र ना राम जी,बैसले छलाह। मुदा, 'दुनू पक्षक अपन-अपन प्रस्ताव आ जिद्द पर अड़ल रहलाक चलतें', फेर चि.उमेश जी,अपन पिताजीक संग चलिए देलनि। आ एम्हरुको प्रस्ताव पर हम कोनो मोलायम रुखि नहि देखल। तें,एना भेल आ एकता भंग भ' गेल। हमर,एहना स्थिति मे कोनो भूमिका नहि रहल। तेँ,मौन...! अहाँ सब जाइ लेल बेसी हड़बड़ायल रहिऐक। बैसितिऐक,त'आर गप्प होइतै जरुर.....! श्री मेहता जी आ श्री हीरेन्द्र भाइ,त' एकताक प्रयास पहिने केनहि रहथि, तखने संयुक्त आयोजन दरभंगा मे भेल छल! बहुत बेसी पोथीक लोकार्पण, कथापाठ आ विमर्श के प्रभावित करिते अछि। दुनू दिसुक आयोजनक निरंतरता बनल अछि। एकताबद्ध भेनाइ त' नीक बात छैके। मुदा,जिद्द त' गुटबाजी के जन्म दैतहिं छै!- रमेश] [उत्तर: विदेह अंक ४४१ केर पूरा सम्पादकीय पढू, मेहता जी दीप चोरि मे शामिल नहि छला, साजिशक पता सभकें रहै अशोक अविचल, हीरेन्द्र झा आ कमल मोहन चुन्नू सोझे साजिश मे शामिल रहथि आ अहाँ मौन भऽ परोक्ष रूपे। अशोक अविचल आ हीरेन्द्र झा केर एक दशकक कुत्सित प्रयास की सफल भऽ गेलै? अहाँक उत्तर सऽ स्पष्ट अछि जे ओइ कुत्सित प्रयास कें अहाँ “जिद्द त ऽ गुटबाजी के जन्म दैतहि छै!” (विस्मयादि बोधक सहित) लिखि ऽ सामान्य करबाक प्रयास केने छी । अपन मूड़ी गोति लेलाक बाद भीष्म आ द्रोण सेहो एहिना केने रहथि।] [एकरा 'दीप चोरि'क विशेषण देब, एकदम उचित नहि।ई अहाँक तामस थिक। प्रस्ताव सबहक समक्ष, बहुमत स' पारित भेल छल,जाहि स' अहाँ सब,असहमत रही!- रमेश] [दीप देलाक बाद जखन बिना प्रस्ताव लेने ब्राह्मणवादी कथाकार द्वारा दीप चोरि भ ऽ गेल आ समानान्तर धारा द्वारा बहिष्कार भेल तकर बाद बचल ब्राह्मणवादी कथाकार सभक बहुमत नै सर्वमत छल । ओना ई पूर्व प्लानिंग रहै, आ तें बेचारे मेहता जी घसकि गेल छला, वा हटा देल गेल छला विदुर सन । पूरा विदेह अंक ४४१ केर संपादकीय पढू आ ओतऽ रेफर कएल विदेह पुरान संपादकीय पढू सभ साजिश स्पष्ट भ ऽ जायत। ओना की चुन्नू आ हीरेन्द्र सन ब्राह्मणवादी साहित्यकार केर कथा गोष्ठी “सगर राति दीप जरय” केर समानान्तर धारक संकल्पनाक संग चलि सकल, ज’ अहाँ ओइसऽ संतुष्ट छी त ऽ हमरो शुभकामना लिअ आ प्रसन्न होउ जे सगर राति अहाँ सभ लग अछि, ओना नव दीप आबि गेल छै, असल सगर राति कोन छै, एक जाति बला वा मिथिलाक सभ गोटेक से निर्णय अहाँ कें लेबाक अछि ।] [रमेश:अहांक पक्ष 'जिद्द आ अहं'बला अछि,तें अपने-स, अपने के 'पांडव' मानि लैत छी। तैओ,हम अपना भरि,'सफाइ' देलहुं। शेष, 'मुख्य कर्त्ता-धर्त्ता लोकनि',अध्यक्ष डा महेन्द्र ना राम,श्री मेहता जी,श्री हीरेन्द्र कु झा,आदि कहताह।आब,अइ स' बेसी किछु हमरा नहि कहबाक अछि। 'ओ सब' 'चुप्प' छथि,से ओ सब जानथि..!- रमेश] [उत्तर: मिथिला सृजन पूर्व नियोजित षड्यंत्रक विषय मे अहूँकें जानकारी हेबे करत, मेहता जी कें रहनि तें ओ घसकि गेला वा विदुर सन हटा देल गेला, महेंद्र नारायण राम/ अशोक कुमार मेहता तऽ रामसेवक सिंह जी सऽ बादमे सगर-तगर रातिक फेर मे पड़य लेल नहि कहने रहथिन से ओहो विदुरे रहथि से हीरेन्द्र आ चुन्नू रहय दुर्योधन आ दु:शासन आ अहाँ सभ कें कष्ट जे कैलाश मण्डल रेडियो बाहि पर लटका लेलक त ऽ अहम् बला भऽ गेल पांडव स्वयं कें मानि रहल अछि, मुख्य कर्ताधर्ता पर छोड़ि अहाँ बचि नै सकइ छी] सगर राति दीप जरय पहिल सँ अखन धरिक कथा यात्रा १. मुजफ्फरपुर, २१.०१.१९९०, प्रभास कुमार चौधरी; २. डेओढ़, २९.०४.१९९०, जीवकान्त; ३. दरभंगा, ०७.०७.१९९०, डॉ. भीमनाथ झा, प्रदीप मैथिली पुत्र, विजयकान्त ठाकुर; ४. पटना, ३.११.१९९०, गोविन्द झा, दमनकान्त झा; ५. बेगुसराय, १३.०१.१९९१, प्रदीप बिहारी; ६. कटिहार, २२.०४.१९९१, अशोक; ७. नवानी, २१.०७.१९९१, मोहन भारद्वाज; ८. सकरी, २२.१०.१९९१, प्रो. सुरेश्वर झा, डॉ. राम बाबू; ९. नेहरा, ११.१०.१९९२, ए.सी. दीपक; १०. विराटनगर, १४.०४.१९९२, जीतेन्द्र जीत; ११. वाराणसी, १८.०७.१९९२, प्रभास कुमार चौधरी; १२. पटना, १९.१०.१९९२, राजमोहन झा; १३. सुपौल- १, १८.१०.१९९३, केदार कानन; १४. बोकारो, २४.०४.१९९३, बुद्धिनाथ झा; १५. पैटघाट, १०.०७.१९९३, डॉ. रमानन्द झा 'रमण' ; १६. जनकपुर, ०९.१०.१९९४, रमेश रंजन; १७. इसहपुर, ०६.०२.१९९४, डॉ. अरविन्द कुमार 'अक्कू'; १८. सरहद, २३.०४.१९९४, अमिय कुमार झा; १९. झंझारपुर, ०९.०७.१९९४, श्यामानन्द चौधरी; २०. घोघरडीहा, २२.१०.१९९४, डॉ. नारायणजी; २१. बहेरा, २१.०१.१९९५, कमलेश झा; २२. सुपौल (दरभंगा) , ०८.०४.१९९५, कमलेश झा; २३. काठमांडू, २३.०९.१९९५, धीरेन्द्र प्रेमर्षि; २४. राजविराज, २४.०१.१९९६, रामनारायण देव; २५. कोलकाता (रजत जयंती, २८.१२.१९९६), प्रभास कुमार चौधरी; २६. महिषी, १३.०४.१९९७, डॉ. तारानन्द वियोगी/ रमेश प्रायोजित; २७. तरौनी, २०.०६.१९९७, शोभाकान्त; २८. पटना, १८.०७.१९९७, प्रभास कुमार चौधरी; २९. बेगूसराय, १३.०९.१९९७, प्रदीप बिहारी; ३०. खजौली, ०४.०४.१९९८, प्रदीप बिहारी; ३१. सहरसा, १८.०७.१९९८, रमेश; ३२ पटना, १०.१०.१९९८, श्याम दरिहरे; ३३. बलाइन; नागदह, ०८.०१.१९९९, पदम सम्भव; ३४. भवानीपुर, १०.०४.१९९९, डॉ. जिष्णु दत्त मिश्र; ३५. मधुबनी, २४.०७.१९९९, सियाराम झा 'सरस', डॉ. कुलधारी सिंह; ३६. अन्दौली, २०.१०.१९९९, कमलेश झा; ३७. जनकपुर, २५.०३.२०००, रमेश रंजन; ३८. काठमांडू, २५.०६.२०००, धीरेन्द्र प्रेमर्षि; ३९. धनबाद, २१.१०.२०००, श्याम दरिहरे एवं रामचन्द्र लालदास; ४०. बिटठो, २१.०१.२००१, डॉ. अक्कू, प्रो.विद्यानन्द झा; ४१. हटनी (घोघरडीहा), १९.०५.२००१, प्रो. योगानन्द झा/अजित कु.आजाद; ४२. बोकारो, २५.०८.२००१, गिरिजानन्द झा 'अर्धनारीश्वर', मिथिला सा. परिषद्; ४३. पटना, किरणजयंती, ०१.१२.२००१, अशोक, चेतना समिति, पटना; ४४. राँची, १३.०४.२००२, कुमार मनीष अरविन्द; ४५. भागलपुर, २४.०८.२००२, धीरेन्द्र मोहन झा; ४६. पटना, (विद्यापति भवन पटना), १६.११.२००२, अजित कुमार आजाद; ४७. कोलकाता, २२.०१.२००३, कर्णगोष्ठी, कोलकाता; ४८. खुटौना, ०७.०६.२००३, डॉ. महेन्द्र नारायण राम; ४९. बेनीपुर, २०.०९.२००३, कमलेश झा; ५०. दरभंगा, २१.०२.२००४, डॉ. अशोक कुमार मेहता; ५१. जमशेदपुर, १०.०७.२००४, डॉ. रवीन्द्र कुमार चौधरी; ५२. राँची, ०२.१०.२००४, विवेकानन्द ठाकुर ; ५३. देवघर, ०८.०१.२००५, श्याम दरिहरे एवं अविनाश; ५४. बेगूसराय, ०९.०४.२००५, प्रदीप बिहारी; ५५. पूर्णियाँ, २०.०६.२००५, रमेश; ५६. पटना, ०३.११.२००५, अजीत कुमार आजाद; ५७. जनकपुर (नेपाल) , १२.०८.२००६, रमेश रंजन; ५८. जयनगर, ०२.१२.२००६, नारायण यादव; ५९. बेगूसराय, १०.०२.२००७, प्रदीप बिहारी; ६०. सहरसा, २१.०७.२००७, किसलय कृष्ण; ६१. सुपौल-२, ०१.१२.२००७, अरविन्द ठाकुर; ६२. जमशेदपुर, ०३.०५.२००८, डॉ. रवीन्द्र कुमार चौधरी; ६३. राँची, १९.०७.२००८, कुमार मनीष अरविन्द; ६४. रहुआ संग्राम (मधुबनी), ०८.११.२००८, डॉ. अशोक अविचल; ६५. पटना, कथा गंगा-३, २१.०२.२००९, अजित कुमार आजाद/ चेतना समिति; ६६. मधुबनी, ३०.०५.२००९, दिलीप कुमार झा; ६७. समस्तीपुर, ०५.०९.२००९, रमाकान्त रय 'रमा'; ६८. सुपौल- ३, ०५.१२.२००९, अरविन्द ठाकुर; ६९. जनकपुर, ०३.०४.२०१०, राजाराम सिंह 'राठौर'; ७०. कबिलपुर (दरभंगा) , १२.०६.२०१०, डॉ. योगानन्द झा; ७१. बेरमा (झंझारपुर), ०२.१०.२०१०, जगदीश प्रसाद मण्डल, स्थानीय साहित्य प्रेमी; ७२. सुपौल, ०४.१२.२०१०, अरविन्द ठाकुर; ७३. महिषी, कथा राजकमल, ०५.०३.२०११, विजय महापात्र; ७४. हजारीबाग, १०.०९.२०११, श्याम दरिहरे; ७५. पटना, हीरक जयन्ती, १०.१२.२०११, अशोक एवं कमलमोहन 'चुन्नु'; ७६.चेन्नै, १४.०७.२०१२, विभा रानी; ७७. दरभंगा, किरण जयन्ती, ०१.१२.२०१२, अरविन्द ठाकुर ; ७८. घनश्यामपुर, ०९.०३.२०१३, कमलेश झा; ७९. औरहा (लौकही), १५.५.२०१३, उमेश पासवान; ८०. निर्मली (सुपौल), ३०.११.२०१३, उमेश मण्डल, स्थानीय साहित्य प्रेमी; ८१. देवघर, (बिजली कोठी, बम्पासटॉन, देवघर), २२.०३.२०१४, ओम प्रकाश झा; ८२. मेंहथ, (झंझारपुर), कथा बौध सिद्ध मेहथपा, ३१.०५.२०१४, गजेन्द्र ठाकुर; ८३. सखुआ-भपटियाही, ३०.०८.२०१४, नन्द विलास राय/फागुलाल साहु/सूरज नारायण राय 'सुमन'; ८४. बेरमा (मधुबनी), २०.१२.२०१४, शिवकुमार मिश्र, स्थानीय साहित्य प्रेमी; ८५. भागलपुर, (श्याम कुंज, द्वारिकापुरी भागलपुर), ०४.०४.२०१५, ओम प्रकाश झा ; ८६. लकसेना (मधुबनी), २०.०६.२०१५, राजदेव मण्डल 'रमण', सत्यदेव 'सुमन' ; ८७. निर्मली (सुपौल), १९.०९.२०१५, उमेश मण्डल, स्थानीय साहित्य प्रेमी ; ८८. मध्य विद्यालय- डखराम (बेनीपुर), ३०.०१.२०१६, कमलेश झा, अमर नाथ झा ; ८९. लौकही, २६.०३.२०१६, उमेश पासवान एवं प्रेम कुमार साहु; ९०. लक्ष्मीनियाँ (मधुबनी), १८.०६.२०१६, राम विलास साहु, स्थानीय साहित्य प्रेमी; ९१. गोधनपुर (मधुबनी) २४.९.२०१६, दुर्गानन्द मण्डल; ९२. नवानी (मधुबनी), ३१.१२.२०१६, अजय कुमार दास 'पिन्टु'; ९३. रतनसारा (घोघरडीहा), २५.०३.२०१७, राजदेव मण्डल, स्थानीय साहित्यानुरागी ; ९४. लौफा (मधेपुर), २४.०६.२०१७, डॉ. योगेन्द्र पाठक वियोगी, स्थानीय प्रेमी ; ९५. जलसैन डुमरा (मधुबनी), ०९.९.२०१७, नारायण यादव; ९६. धबौली (लोकही), १६.१२.२०१७, राधाकान्त मण्डल ; ९७. बेरमा (लखनौर), २४.३.२०१८, कपिलेश्वर राउत, बेरमा ग्रामवासी ; ९८. सिमरा (झंझारपुर), १६.६.२०१८, डॉ. शिव कुमार प्रसाद ; ९९. मुरहद्दी, (बड़की टोल), २२.९.२०१८, प्रो. प्रीतम निषाद , १००. निर्मली (तेरापंथ भवन), २२.१२. २०१८, उमेश मण्डल, नवरत्न वेंगानी, मनीष जालान ; १०१. झिटकी (मधुबनी), ३०.३.२०१९, भारत भूषण झा ; १०२. मझौरा, (मधुबनी), २९.०६.२०१९, जय प्रकाश मण्डल, आलोक कुमार; १०३. रामपुर (मधुबनी), २८.९.२०१९, उमेश नारायण कर्ण 'कल्प कवि' ; १०४. वलम नगर-महदेवा (लौकही), १४.१२.२०१९,प्रेम कुमार साहु,उमेश पासवान; १०५.दरभंगा (सीतायन सभागार), १३.०२.२०२१, कमलेश झा ; १०६. हटनी (घोघरडीहा, मधुबनी), २५.०९.२०२१, लालदेव कामत; १०७. बेलहा (फुलपरास), २५.१२.२०२१, जीवकान्तक स्मृतिमे, उमेश मण्डल, ई. शैलेन्द्र मण्डल; १०८. मधुरा (मधुबनी), २६.०३.२०२२, डॉ. श्रीशंकर झा; १०९. ननौर (मधुबनी), २५.०६.२०२२, प्रदीप पुष्प; ११०. सोनवर्षा (लौकही), २४.०९.२०२२, अच्छेलाल शास्त्री, स्थानीय साहित्य प्रेमी; १११. रहुआ संग्राम (मधुबनी) ३१.१२.२०२२, अशोक अविचल; ११२. नवटोली (शिवा पंचायत, अन्धरा ठाढ़ी) २५.०३.२०२३ श्री राम चन्द राय; ११३. नहरी (खुटौना), २५.०६,२०२३, श्री नारायण यादव, श्री ललन कु. सल्हैता; ११४. नरहिया (लौकही), ०१.१०.२०२३, श्री राम विलास साहु; ११५. बेरमा (झंझारपुर), ३०.१२.२०२३, श्री कपिलेश्वर राउत, श्री ब्रह्मानन्द प्रसाद; ११६. निर्मली (सुपौल), श्यामा कम्पलेक्स सह विवाह हॉल, २३.०३.२०२४, डॉ. उमेश मण्डल, श्री अखिलेश कु. चौधरी; ११७. दरभंगा, २९.०६.२०२४, हीरेन्द्र कुमार झा, डॉ. अशोक मेहता; ११८. रतनसारा (फुलपरास) २१.०९.२०२४, दुर्गानन्द मण्डल, राजीव कुमार, शिव कुमार राय; ११९. सहरसा (अभिनव विवाह भवन, विद्यापति नगर, सहरसा), २८.१२.२०२४, गोसाँई मण्डल, रामेश्वर प्रसाद मण्डल आ दिग्विजय कुमार सिंह; १२०. मधुबनी, स्थान: सुधीर मेमोरियल हॉल, रीजनल सेकेण्डरि स्कूल, ०५.०४.२०२५, प्रो. (डॉ.) शुभ कुमार वर्णवाल, डॉ. राज कुमार भारती, डॉ. राम शृंगार पाण्डेय; १२१. केवटना, स्थान: उत्क्रमित मध्य सह +2 उच्च माध्यमिक विद्यालय परिसर, केवटना, घोघरडीहा, मधुबनी (बिहार), २८.०६.२०२५, श्री नारायण प्रसाद सिंह, कुमार राजीव रंजन, घनश्याम चौधरी; १२२. निर्मली (सुपौल), २०.०९.२०२५, ई. आशुतोष कुमार, प्रो. (डॉ) जय प्रकाश साहु; १२३. शिवनगर (निर्मली), २७.१२.२०२५, प्रो. राम सेवक सिंह, श्री कपिलेश्वर प्रसाद सिंह; १२४. नरहिया (लौकही), २८.०३.२०२६, श्री उमेश पासवान; १२५. मझौरा, (राजनगर) [२७-२८ जून २०२६ मे प्रस्तावित] । ३.३१. राजेन्द्र पटेल रचना: गुजराती कविता ३.३२. राजेन्द्र विमल रचना: गीत ('जगमग ई सृष्टि करए, तखने दीवाली छि') वरिष्ठ साहित्यकार-गीतकार। समीक्षा: 'राम-शक्ति आगुमे, रावण ने टिकि सकत' वीर रस। 'प्रेम चेतना जागि पड़ए' सामाजिक आशावाद। भक्ति-काव्य परम्परासँ लोक-जागरणक गीत विद्यापति परम्पराक आधुनिक विस्तार। ३.३३. डा. राम दयाल राकेश रचना: 'छठ पाबनि' (सांस्कृतिक निबन्ध) संस्कृतिविद् आ मैथिली-हिन्दी लेखक। भारतीय + पाश्चात्य: छठ पाबनिक Anthropological विश्लेषण 'सूर्यकेँ अर्घ्य देबाक प्रथा जाति-धर्म समभावक सुरक्षा' सामाजिक समावेश। Cultural Anthropology (Clifford Geertz) Thick Description। नदीमे ठाढ़ भऽ सूर्यकेँ अर्घ्य Eco-spirituality। मधेसी सांस्कृतिक पहचानपर विद्वत्तापूर्ण विवेचन। Anthropology आ Cultural Studies क दृष्टिसँ महत्त्वपूर्ण। ३.३४. राम नारायण देव रचना: कविता ३.३५ राम भरोस कापड़ि 'भ्रमर' (जन्म: १९५१) रचना: अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन आ नेपाल, फ्लैश बैक (कथा) नेपालक जनकपुरधामक वरिष्ठ साहित्यकार रामभरोस कापड़ि 'भ्रमर' मैथिलीक महत्त्वपूर्ण स्तम्भकार छथि। विदेह फ्रेमवर्क: नेपाल-भारत दुनूक मैथिलीकेँ एक सूत्रमे पिरोएबाक प्रयास विदेहक नेपाली प्रतिनिधि। नेपाल-भारत दुनूक मैथिली साहित्यकेँ एक सूत्रमे पिरोएबाक जे विदेह-प्रयास थीक, 'भ्रमर'जी ओहि प्रयासक एकटा नेपाली प्रतिनिधि छथि। ३.३६. रामलोचन ठाकुर रचना: ’पास करबाक लेल’ कविता, किछु हाइकू वरिष्ठ मैथिली कवि। समीक्षा: क्षेमेन्द्रक औचित्य सिद्धान्त भावक उचित प्रस्तुति। काव्यात्मक स्वर। ३.३७. रामजी चौधरी रचना: विविध भजनावली। ३.३८. रामान्य झा 'रामरंग' (स्वर्गीय) प्रसिद्ध अभिनव भातखण्डे रचना: विद्यापति संगीत-परम्पराक साक्षात्कार 'रामरंग' जी मैथिली संगीत-परम्पराक महान ज्ञाता। गंगेश गुंजनजीद्वारा आ गजेन्द्र ठाकुर द्वारा मृत्युपूर्व लेल गेल अन्तिम साक्षात्कार। 'रामरंग' जी मैथिली संगीत-परम्पराक महान ज्ञाता छलाह। सदेह १ मे प्रकाशित हिनकर अन्तिम साक्षात्कार विद्यापति-संगीतपर अत्यन्त मूल्यवान दस्तावेज़ थीक। भारतीय आलोचना: श्रृंगार + भक्तिक अद्भुत समागम। रसक दृष्टिसँ 'विद्यापित संगीत लोकरंजनक हेतु उच्चकोटिक एवं गायन के वास्ते बनल छैक' यैह जन-रंजकता (लोकरस) क परिभाषा थीक। श्रृंगार आ भक्ति रसक अद्भुत समागम विद्यापतिमे मिलैत अछि। पाश्चात्य आलोचना: Ethnomusicology Regional Music परम्पराक संरक्षण। Globalisation ('भू-मण्डलीकरण') केर खतरासँ मैथिली संगीतकेँ बचेबाक आग्रह Cultural Preservation। Ethnomusicology क दृष्टिसँ विद्यापति-संगीत Regional Music परम्पराक उत्कृष्ट उदाहरण थीक। Globalization ('उपभोक्तावाद, बाजारवाद, भू-मण्डलीकरण') क खतरासँ मैथिली संगीतकेँ बचेबाक हिनकर आग्रह Cultural Preservation क पाश्चात्य आन्दोलनसँ मेल खाइत अछि। विदेह फ्रेमवर्क: 'रामरंग'जीक निधन सदेह १ क प्रकाशन दिवस (१ जनवरी २००९) पर भेल एकटा युग-अन्तक प्रतीक। विदेह एहि साक्षात्कारकेँ संरक्षित राखि parallel history क एक अनमोल पृष्ठ बचौलक। ३.३९. रूपा धीरू रचना: कविता अङ्गेजल काँट समीक्षा: सकारात्मक गीत। महिला स्त्री-प्रतिनिधित्व। Feminist Cultural । ३.४०. रूपेश कुमार झा 'त्योंथ' रचना: कविता- बूथ कैप्चरिंग ३.४१. डा. रेवती रमण लाल रचना: कविता- मधुश्रावणी। समीक्षा: ३.४२. रोशन जनकपुरी रचना: कविता- डर लगैए नेपाल-मैथिली काव्य-परम्पराक प्रतिनिधि। ३.४३. लक्ष्मी ठाकुर रचना: मिथिला चित्रकला स्त्रीवादी आलोचना: मिथिला चित्रकला + काव्य Visual Art आ Literary Art केर समागम। महिलाक सृजनात्मक स्वायत्तता। ३.४४. वासुदेव सुनानी रचना: उड़िया दलित कविता। ३.४५. विद्यानन्द झा रचना: कविता- सृष्टि चक्र ३.४६. विनीत उत्पल रचना: साक्षात्कार-पत्रकारिता (राजमोहन झासँ ऐतिहासिक संवाद) मैथिली Oral History Journalism केर उत्कृष्ट उदाहरण। समीक्षा: Journalism + Literature Oral History (Alessandro Portelli) केर सिद्धान्त। राजमोहन झाजीसँ साक्षात्कारमे मैथिली साहित्यक समीक्षाक समस्याकेँ उजागर कएल। ३.४७. विभा रानी रचना: नाटक- भाग रौ। मैथिलीक प्रमुख महिला नाटककार। स्त्रीवादी आलोचना: Gynocriticism स्त्री-दृष्टिकोणसँ लेखन। सामाजिक दबाव आ स्त्री-अनुभवक कथा। 'मैथिलीमे स्त्रीगण केँ साहित्य लेखनमे जरूर अएबाक चाही'[(राजमोहन झा)] एहि आह्वानकेँ विभा रानी साकार करैत छथि। Elaine Showalter केर 'Gynocriticism'क दृष्टिसँ विभा रानी मैथिलीक स्वतन्त्र महिला-लेखन परम्पराकेँ प्रतिष्ठित करैत छथि। स्त्री-अनुभव आ सामाजिक दबाव हिनकर कथाक प्रमुख विषय। विदेह फ्रेमवर्क: 'मैथिलीमे स्त्रीगण केँ साहित्य लेखनमे जरूर अएबाक चाही' (राजमोहन झा) विदेह एहि आह्वानकेँ विभा रानी सन लेखिकाक प्रकाशनसँ पूरा करैत अछि। विदेहक महिला-लेखन प्रोत्साहन नीतिक जीवन्त उदाहरण। ३.४८. वृषेश चन्द्र लाल (जन्म: २९ मार्च १९५५, 'विश्वेश्वर') रचना: 'फेकनाक दियाबाती' (कविता)। नेपालमे लोकतन्त्रक लेल १७ बेर गिरफ्तार, लगभग ८ वर्ष जेल। तराई-मधेश लोकतान्त्रिक पार्टीक राष्ट्रीय उपाध्यक्ष। भारतीय आलोचना: 'फेकनाक दियाबाती'मे फुलझड़ी-अनार भुइँपटका बीच एक भूखल बच्चाक दृश्य करुण रस। 'एकता माने सभलेल नै खाली एकटालेल' वक्रोक्ति। पाश्चात्य आलोचना: Revolutionary Poetry Pablo Neruda, Bertolt Brecht परम्पराक मैथिली प्रतिनिधि। Postcolonial Mao, Gramsci सँ मेल खाइत Political Verse। विदेह फ्रेमवर्क: नेपालक मैथिल राजनैतिक संघर्षक साहित्यिक दस्तावेज parallel history मे राजनैतिक आयाम। ३.४९. छवि झा / कुमुद सिंह रचना: 'मिथिला चित्रकला: अर्थक अधिकता आ साथर्कता' (शोध-लेख) भारतीय आलोचना: मिथिला चित्रकलाक 'पुरैन', 'कोहबर', 'अरिपन' सांकेतिक भाषाक विश्लेषण। पञ्जी-व्यवस्था आ कमल, वंश-वृद्धिक कामना। लोक-कलाक शास्त्रीय परम्पराक सम्बन्ध। पाश्चात्य आलोचना: Art History + Cultural Studies Vicomte (1977), Caroline Brown, Erickson आदि विदेशी विद्वानक मिथिला चित्रकलाक अर्थक गलत व्याख्याक खण्डन। 'पश्चिमक लोक एहि चित्रकलाकेँ परिभाषित नहि कऽ सकैत छथि' Cultural Authenticity। Feminist Art History महिला-कलाकारक स्वायत्त ज्ञान-परम्पराक रक्षा। नव्य न्याय + विदेह: चित्रकलाक अर्थ-विवेचनमे 'प्रमाण' (Authentic knowledge) केर स्रोत स्थानीय महिला। विदेह मिथिला चित्रकलाक Digital Documentation। ३.५०. आभाष लाभ (जनकपुरधाम) रचना: मैथिली गायन, संगीत मैथिलीक प्रसिद्ध गायक। 'रे छोड़ा तोरा बज्जर खसतौ' केर १५ लाख प्रतिक बिक्री। मैथिली गायन, संगीत-परम्परा। जनकपुरक प्रसिद्ध गायक आभाष लाभ मैथिली गीत-संगीतक प्रमुख स्वर थछथि। सदेह १मे हिनकर साक्षात्कार मैथिली संगीतक वर्तमान स्थितिपर प्रकाश दैत अछि। भारतीय आलोचना: जनरंजकता (लोकरस) बिक्रीक मेट्रिक्स कलाक लोकप्रियताक साक्ष्य। विद्यापति संगीत-परम्पराक आधुनिक विस्तार। 'रे छोड़ा तोरा बज्जर खसतौ' जेहन गीतक १५ लाख प्रतिक बिक्री यएह जन-रंजकता (लोक-रस) थीक। विद्यापति संगीत-परम्परासँ जोड़ैत आभाषजी मैथिली संगीतक अखण्ड धाराकेँ आगाँ बढ़बैत छथि। पाश्चात्य आलोचना: Popular Culture vs Authentic Culture 'प्यारोडी मौलिककेँ साफ-साफ खतम कऽ दैत अछि।' Cultural Preservation। Cultural Studies क दृष्टिसँ Parodic Culture क विरुद्ध Original Composition केर पक्षमे हिनकर स्पष्ट मत ('प्यारोडी मौलिककेँ साफ-साफ खतम कऽ दैत अछि') महत्त्वपूर्ण अछि। Popular Culture vs. Authentic Culture क द्वन्द्व स्पष्ट अछि। ३.५१. आशीष अनचिन्हार रचना: कविता, गजल। ३.५२. उदय नारायण सिंह 'नचिकेता' रचनाक परिचय: नाटक, केन्द्रीय भाषा संस्थानक निदेशक प्रो. उदय नारायण सिंह 'निचकेता' केन्द्रीय भाषा संस्थान मैसूरक निदेशक छथि। सदेह १ मे हिनक नाटक नो एण्ट्री: मा प्रविश ३.५३. मानक मैथिली भाषा-सिद्धान्त: Chomsky केर Generative Grammar + Saussure केर Structuralism मैथिली भाषाक मानकीकरण। साहित्यक माध्यमसँ भाषिक अधिकारक प्रश्न उठेनाइ। Chomsky केर Generative Grammar आ Saussure केर भाषा-सिद्धान्तक आलोकमे मैथिली भाषाक मानकीकरण यएह विदेहक क्षेत्र थीक। विदेह फ्रेमवर्क: 'मैथिलीक मानक लेखन-शैली' अनुभाग (पृ. २४१) विदेह फ्रेमवर्कक भाषा-नीतिक आधारशिला थीक। 'मैथिलीक मानक लेखन-शैली' (पृ. २४१) विदेह फ्रेमवर्कक भाषा-नीतिकेँ संस्थागत वैधता। ३.५४. उमेश कुमार महतो रचना: लोक कथा। ३.५५. तूलिका रचना: मिथिला चित्रकला। ३.५६. अंकुर काशीनाथ झा रचना: कविता युवा कवि। मैथिली नव काव्य-परम्पराक प्रतिनिधि। ३.५७ अजय सरवैया रचना: गुजराती कविता ३.५८. अजीत कुमार झा रचना: कविता ३.५९. अनलकांत रचना: लघुकथा ३.६०. अबू सुथार रचना: गुजराती कविताक मैथिली अनुवाद गुजराती-मैथिली सांस्कृतिक सेतु। पाश्चात्य: Comparative Literature + Translation Studies अनुवादक माध्यमसँ मैथिलीमे अन्य भारतीय भाषाक समागम। गुजराती कविताक मैथिलीमे समागम Comparative Literature आ Translation Studies क उदाहरण। ३.६०. अमरेश यादव रचना: कविता ३.६१. अमित कुमार झा रचना: लघुकथा। ३.६२. अयोध्यानाथ चौधरी रचना: लघुकथा। ३.६३. अशोक दत्त ३.६४. एन. अरुणा (जन्म: १९४९, निजामाबाद) रचना: 'ई सेहो अछि प्रवास' तेलुगुसँ अंग्रेजी (जयलक्ष्मी पोपुरी); अंग्रेजीसँ मैथिली (गजेन्द्र ठाकुर) तेलुगुमे पाँचटा कविता-संग्रह। ओस्मानिया विश्वविद्यालयमे अध्यापन। पाश्चात्य + भारतीय: 'ई सेहो अछि प्रवास मात्र अमेरिके-टामे प्रवासक नहि। नारीक जीवनेमे अछि एकटा प्रवास।' Feminist Poetry। Diaspora Literature 'अहाँ घुरि सकैत छी कखनो काल, मुदा बनि मात्र पाहुन।' Translation Studies अनुवादमे भाव-सम्प्रेषण। World Literature (Goethe) तेलुगु → अंग्रेजी → मैथिली। ३.६५. ओम प्रकाश झा रचना: आलेख। ३.६६. कमलानन्द झा (हिन्दी विभाग, सी.एम. कॉलेज, दरभंगा) रचना: 'मैथिली समस्याक टोह लैत कथा-संकलन: उदाहरण' समीक्षा मेडियोकर- साधारण। समीक्षामे ध्यान रखबाक वस्तु छल: 'मैथिलीमे श्रेष्ठ कथाक अभाव नहि' राजकमल चौधरी, धूमकेतु, गंगेश गुंजन, तारानन्द वियोगी, अशोकक कथाक सूक्ष्म विश्लेषण। 'यथार्थ कोनो कथाकेँ विश्वसनीयता देबाक बदलामे ओकरा भीतरसँ संवेदना निचोड़ि अनैत अछि।' स्त्री-चेतनाक दृष्टिसँ लिलीरेक 'विधिक विधान' आ देवशंकर नवीनक 'पेम्पी' Feminist Critique, सभटा दोख नवीनजी स्त्रीपर फेकि दैत छथि। अशोकक रचना: 'तानपूरा' (कथा)। 'तानपूरा'मे मध्यवर्गीय ढोंगकेँ तार-तार करबामे पूर्णतः सफल। समीक्षा: 'तानपूरा' — विनोद बाबूक संगीत-प्रेम आ हुनकर पुत्री-विरोध — Hypocrisy केर विश्लेषण। 'बिना कोनो उपदेश आ नैतिक आग्रहक कथा मध्यवर्गीय कुत्सित मानसिकताक दुर्ग भेदन करैत अछि।' — Marxist Critique। पाश्चात्य आलोचना: 'उदाहरण' समीक्षामे Comparative Literature — राजस्थानी कथाकार विजयदान देथा आ हिन्दी उदय प्रकाशसँ मैथिली कथाकेँ जोड़ैत एक नव Critical Framework निर्मित करैत। रमेश: रचना: कथा: 'नागदेशमे अयनाक व्यवसाय'- अतियथार्थ आ इतिवृत्तिक सीमातोड़ प्रयास। पाश्चात्य आलोचना: Magic Realism + Surrealism केर प्रयोग। Fantasy आ Realism केर मिश्रण - मैथिली कथामे नव प्रयोगशीलता। ३.६७. काशीकान्त मिश्र 'मधुप' डॉ पालन झा जी केर सौजन्यसँ हुनकर पद्यमय चिट्ठी। ३.६८. कुमार मनोज कश्यप रचना: लघुकथा, गजल। ३.६९. कुमार शुशान्त रचना: गद्य। ३.७०. कृपानन्द झा (जन्म: १९७०, मधुबनी) रचना: 'चौकपर आणविक समझौता' (व्यंग्य) मीरा बाई पोलिटेकनिक, दिल्लीमे पुस्तकाध्यक्ष। अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली परिषदक जेनरल सेक्रेटरी। समीक्षा: Indo-US Nuclear Deal पर गामक चौकपर बहस Vernacular Discourse। 'एहि समझौतामे किछु एहन प्रावधान जरूरी अछि' राजनीतिक चेतना। Marxist Critique 'आणविक इन्धनक सम्स्याक समाधान' बनाम वैकल्पिक ऊर्जा। नव्य न्यायक तर्क-पद्धति गामक साधारण जन द्वारा जटिल विषयक विश्लेषण। ३.७१. कृष्णमोहन झा रचना: कविता ३.७२. केदारनाथ चौधरी (जन्म: ३ जनवरी १९३६, नेहरा, दरभंगा) रचना: 'माहुर' (उपन्यास, अंश) 'चमेली रानी' (२००४), 'करार' (२००६), 'माहुर' (२००८) तीनटा उपन्यास। भारतीय आलोचना: 'माहुर' उपन्यासक अंश रंजना विधवाक त्रासदी। करुण रस + करुणाक चरम 'हे भगवान! हम ई की कएल? किएक हम मीट कीनल?' पश्चाताप आ ग्लानिक मार्मिक चित्रण। पाश्चात्य आलोचना: Realist Novel 'पानापुर' गामक सामाजिक यथार्थ। Gender + Power काली कान्त ओझा (पुजारी) केर घरक शोषणक सूक्ष्म चित्रण। Feminist Analysis कामिनीक विवशता। ३.७३. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र (जन्म: ८ फरवरी १९६७) रचना: 'यायावरी' नॉर्थ कछार हिल्स यात्रा-वृत्तान्त। 'मैथिली फोकलोर एन्थ्रोपोलोजी ऑफ म्यूजिक' पर पीएचडी। ४०० सँ बेशी निबन्ध प्रकाशित। भारतीय आलोचना: यात्रा-वृत्तान्त-विधाक मैथिली परम्परामे नव योगदान। नॉर्थ कछार हिल्सक ११ आदिवासी जनजातिक सांस्कृतिक विरासत। पाश्चात्य आलोचना: Ethnography ११ जनजाति (दीमासा, ह्मर, जेमी नागा, कुकी, बाइते, कार्बी, खासी, ह्रांगखाल, वैफी, खेलमा, रोङमेई)क जीवन। Eco-criticism जटिंगा पहाड़ीपर चिड़ैक सामूहिक आत्महत्याक रहस्य। 'Shoot these birds with your camera, not with bullets' पर्यावरण-संरक्षण। विदेह फ्रेमवर्क: असमक मैथिली Cultural Documentation विदेह parallel history केर भौगोलिक विस्तार। ३.७४. शंभु कुमार सिंह रचना: कविता, कथा ३.७५. शक्ति शेखर रचना: आलेख ३.७६. शिव प्रसाद यादव (भागलपुर) रचना: मायानन्द मिश्रसँ साक्षात्कार ३.७७. शीतल झा रचना: निबन्ध ३.७८. शीला सुभद्रा देवी रचना: तेलुगु कविता। ३.७९. शेख मोहम्मद शरीफ रचना: तेलुगु कथा। मैथिलीमे अनुवाद माध्यमसँ मुस्लिम साहित्यकारक प्रतिनिधित्व। समीक्षा: 'मिथिलाक लोक' सांस्कृतिक विविधता। 'जतय हिन्दुओ राखि ताजिया, मान दिअए इस्लामके' सद्भाव। Communal Harmony + Cultural Pluralism। ३.८०. शैलेन्द्र मोहन झा रचना: हास्य कविता। ३.८१. श्याम सुन्दर 'शशि' रचना: रिपोर्ताज, कतारक भेड़ चरवाहा। ३.८२. श्यामल सुमन रचना: कविता ३.८३. श्रीधरम् (जन्म: १९७४) रचना: कथा। ३.८४. सच्चिदानन्द यादव रचना: कविता ३.८५. सतीश चन्द्र झा रचना: कविता ३.८६. सन्तोष मिश्र रचना: कविता, गजल ३.८७. सुभाष चन्द्र यादव रचना: कथा हिनकर कथामे सामाजिक यथार्थवाद प्रमुख। मार्क्सवादी आलोचना: Gramsci क Subaltern अवधारणासँ यादवजीक कथा-संसार जाहिमे हाशियाक जनताक जीवन-संघर्ष केन्द्रमे अछि महत्त्वपूर्ण साहित्यिक-राजनैतिक हस्तक्षेप थीक। पाश्चात्य आलोचना:: Gramsci + Spivak Subaltern voice केर सशक्त अभिव्यक्ति। ३.८८. सुभाष साह रचना: रिपोर्ताज। ३.८९. सुशान्त झा रचना: बलिराजगढ़ पर आलेख, मिथिला मंथन। ३.९०. सूर्यनाथ गोप रचना: कविता ३.९१. हिमांशु चौधरी रचना: कविता युवा पीढ़ीक प्रतिनिधि कवि। हिमांशु चौधरी युवा पीढ़ीक प्रतिनिधि कवि छथि। पाश्चात्य आलोचना: New Generation Poetry क अर्थमे हिमांशु मैथिलीमे आधुनिक संवेदनशीलताकेँ अभिव्यक्त करैत छथि। New Generation Poetry आधुनिक संवेदनशीलता। Urban Experience केर काव्याभिव्यक्ति। ४. सामग्री-संश्लेषण ४.१ रस-सिद्धान्तसँ सदेह १ केर समीक्षा श्रृंगार: गंगेश गुंजन (राधा), काशीकान्त मिश्र 'मधुप'। करुण: राजमोहन झा, केदारनाथ चौधरी, रामभरोस 'भ्रमर', रामलोचन ठाकुर। वीर: मनोज मुक्ति, वृषेश चन्द्र लाल। रौद्र: बिनीत ठाकुर। भयानक: कोसी-बाढ़ि रचना। हास्य: काशीकान्त मिश्र। भक्ति-शान्त: मैथिलीपुत्र प्रदीप, प्रफुल्ल कुमार सिंह 'मौन'। अद्भुत: कैलाश कुमार मिश्र (जटिंगा)। नव्य न्यायक सिद्धान्त: सदेह १ पूर्णरसात्मक (नव रसयुक्त) संकलन थीक। सदेह १ मे सभटा नव रसक उपस्थिति अछि: गंगेश गुंजनक 'राधा'मे श्रृंगार-करुण-शान्त,हृदय नारायण झा केर गीतमे रस-माधुर्य, आ छठि पर्वक विश्लेषणमे भक्ति-शान्त रस। नव्य न्यायक 'सिद्धान्त' (established theorem) यएह अछि जे मैथिली साहित्य पूर्णरसात्मक (Full of all Rasas) थीक। ४.२ ध्वनि-वक्रोक्तिक दृष्टिसँ गंगेश गुंजनक 'राधा' ध्वनि सिद्धान्तक सर्वोत्कृष्ट उदाहरण। आभाष लाभक 'प्यारोडी' विरोध वक्रोक्तिक व्यावहारिक अनुप्रयोग। गंगेश गुंजनक 'राधा' ध्वनि सिद्धान्तक सर्वोत्कृष्ट उदाहरण थीक जाहिमे व्यक्त अर्थसँ परे मैथिली-अस्मिता, भूमण्डलीकरण आ प्रेम-दर्शनक व्यंजित अर्थ विद्यमान अछि। वक्रोक्तिक दृष्टिसँ राजकमल चौधरी मैथिलीमे सर्वाधिक 'वक्र' (unconventional) लेखक थिकाह, उदाहरण संकलन द्रष्टव्य। ४.३ Postcolonial-Feminist-Marxist त्रिकोण Postcolonial: मैथिली स्वयं एक Postcolonial Text हिन्दी राष्ट्रवादक विरुद्ध। Feminist: विभा रानी, नीलिमा, ज्योति, छवि झा, रूपा धीरू। Marxist: वृषेश चन्द्र लाल, सुभाष चन्द्र यादव, कृपानन्द झा, बी.के. कर्ण। मैथिली भाषा-साहित्य स्वयं एक Postcolonial text थीक हिन्दी राष्ट्रवादक दबावमे कइएक दशक धरि हाशियापर रहल मैथिली संविधानक आठम अनुसूचीमे शामिल भेलासँ अपन मुक्ति पेलक। विदेह ई-पत्रिका Digital Decolonization क माध्यम थीक। ४.४ स्त्रीवादी दृष्टिसँ सदेह १ मे महिला लेखन: विभा रानी, प्रीति, प्रीति ठाकुर, नीलिमा आदिक रचना स्त्री-दृष्टिकोणकेँ प्रतिनिधित्व करैत अछि। विभा रानी द्वारा महिला रंगमंच केर उत्थान सेहो उल्लेखनीय। ४.५ नव्य न्यायक दृष्टिसँ: सम्पादकीय-तर्क गजेन्द्र ठाकुरक सम्पादकीय नव्य न्यायक 'अनुमान' (inference) आ 'उपमान' (analogy) पर आधारित अछि: (पक्ष) विदेह मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ मंच थीक; (हेतु) एहिमे ७० देशसँ १,३६,८७४ बेर दर्शन भेल; (दृष्टान्त) इंटरनेटपर पछिला सभ पाक्षिक अंक उपलब्ध; (व्याप्ति) जे पत्रिका वैश्विक पाठकसँ जुड़ैत अछि से प्रभावशाली होइत अछि; (निर्णय) विदेह मैथिलीकेँ वैश्विक बनौलक। नव्य न्यायक समग्र मूल्यांकन: सदेह १ क सम्पादकीय तर्क नव्य न्यायक क्रमबद्ध अनुमान पर आधारित: पक्ष (विदेह श्रेष्ठतम मैथिली मञ्च) → हेतु (७० देशसँ पाठक) → दृष्टान्त (इन्टरनेटपर सभ अंक उपलब्ध) → निर्णय (विदेह मैथिलीकेँ वैश्विक बनौलक)। ४.६ विदेह समानान्तर इतिहास: सम्पूर्ण मूल्यांकन भौगोलिक विस्तार: मिथिला (बिहार-नेपाल), दिल्ली, मुम्बई, लन्दन, हैदराबाद, असम सभ ठामक मैथिली एक मञ्चपर। साहित्यिक विविधता: कथा, कविता, निबन्ध, गजल, नाटक, अनुवाद, लोकसंगीत, चित्रकला, यात्रावृत्तान्त, शोध-लेख सभ विधा समाहित। पीढ़ी-विस्तार: वरिष्ठ (गंगेश गुंजन, राजमोहन झा) सँ युवा (जितमोहन झा, हिमांशु चौधरी) धरि। लोकतान्त्रिक समावेश: ब्राह्मण-कायस्थसँ यादव-दलित धरि, पुरुष-महिला सभ। डिजिटल आर्काइव: इतिहास-निर्माणक नव माध्यम। विदेह समानान्तर इतिहास: मूल्यांकन: सदेह १ विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्कक सर्वश्रेष्ठ उदाहरण थीक: (१) सरहपाद-विद्यापति परम्परासँ आधुनिकता (गंगेश गुंजन) धरि अखण्ड रेखा; (२) भारत-नेपाल दुनूक मैथिलीकेँ एकट्ठा राखब; (३) १०० साहित्यकारक प्रजातान्त्रिक समावेश; (४) डिजिटल आर्काइव द्वारा इतिहास-निर्माण; (५) नव्य न्यायक मिथिला परम्पराकेँ आधुनिक साहित्यसँ जोड़ब। ५. उपसंहार 'सदेह १' मैथिली साहित्यक एक अभूतपूर्व संकलन थीक। एहिमे १०० सँ अधिक साहित्यकारक रचना समाहित अछि जे मिलिकऽ एक सम्पूर्ण साहित्यिक विश्व-दृष्टि बनबैत अछि। भारतीय काव्यशास्त्रक दृष्टिसँ नव रसक पूर्ण उपस्थिति, ध्वनि-वक्रोक्तिक सूक्ष्म प्रयोग। पाश्चात्य सिद्धान्तक दृष्टिसँ Postcolonial, Feminist, Marxist, Eco-critical आ Translation Studies केर अनुप्रयोग। गंगेशक नव्य न्यायक दृष्टिसँ प्रमाण-आधारित साहित्य-विवेचन। विदेह parallel history केर दृष्टिसँ मैथिली साहित्यक स्वायत्त, सम्पन्न, वैश्विक इतिहास। 'सदेह १' एक ऐतिहासिक दस्तावेज थीक जे आगूक पीढ़ीकेँ साहित्यिक विरासत, आलोचनात्मक दृष्टि आ भाषिक गर्वक त्रिवेणी सौंपैत अछि। युवा पीढ़ीक कवि-कथाकार मैथिलीक भविष्य थीक। हिनकर रचना सभमे शहरीकरण, विस्थापन, वैश्वीकरणक प्रभाव आ पहचान-संकटक अभिव्यक्ति भेटैत अछि। ई सभ साहित्यकार मैथिलीक भूगोल विस्तार (बिहार, नेपाल, दिल्ली, झारखण्ड) केर प्रतिनिधित्व करैत छथि। 'सदेह १' मैथिली साहित्यक इतिहासमे एक महत्त्वपूर्ण मील-पत्थर थीक। एहि संकलनमे भारतीय काव्यशास्त्रक नव रस, ध्वनि-वक्रोक्तिक परम्परा आ पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्तक नव समीक्षा, संरचनावाद, उत्तर-औपनिवेशिकता, स्त्रीवाद आ मार्क्सवाद दुनू परम्पराक संगम दृष्टिगत होइत अछि। मिथिलाक गंगेश उपाध्यायक नव्य न्यायशास्त्र एहि संकलनमे दुइ स्तरपर कार्य करैत अछि: (क) साहित्यिक तर्कशास्त्रक रूपमे रचनाक काव्यात्मकताक प्रमाण-मीमांसा; (ख) सम्पादकीय दृष्टिक रूपमे विदेहक वैधताक तार्किक प्रतिपादन। विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क जे मैथिली साहित्यकेँ हिन्दी वा संस्कृतक छाँहमे नहि, अपितु एक स्वतन्त्र धाराक रूपमे देखैत अछि सदेह १ मे पूर्ण रूपेण साकार भेल अछि। गंगेश गुंजनक 'राधा', राजमोहन झाक कथा-दर्शन, रामभरोस 'भ्रमर'क नेपाली-मैथिली परम्परा, आभाष लाभक संगीत-चेतना, विभा रानीक स्त्री-दृष्टि सभ मिलि कऽ एक सम्पूर्ण साहित्यिक विश्व-दृष्टि बनबैत अछि। अन्तमे, नव्य न्यायक 'निर्णय' यएह अछि: सदेह १ विदेहक मुद्रित संस्करण मैथिली साहित्यक वर्तमान-भूत-भविष्यक संगम-स्थल थीक। ई संकलन आगूक पीढ़ीकेँ साहित्यिक विरासत, आलोचनात्मक दृष्टि आ भाषिक गर्वक त्रिवेणी सौंपैत अछि। सन्दर्भ: विदेह (पाक्षिक), वर्ष २, मास १३, अंक २५, १ जनवरी २००९, सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर | तत्त्वचिन्तामणि गंगेश उपाध्याय (मिथिला, १३वीं शती) नाट्यशास्त्र भरतमुनि | ध्वन्यालोक आनन्दवर्धन | वक्रोक्तिजीवित कुन्तक Orientalism Edward Said | The Location of Culture Homi Bhabha The Theory of the Novel Georg Luk| Literary Theory: An Introduction Terry Eagleton A Literature of Their Own Elaine Showalter | The Second Sex Simone de Beauvoir .......... विदेह: सदेह: २ मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१० समग्र साहित्यिक समीक्षा: सभटा साहित्यकार भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य | पाश्चात्य आलोचना | गंगेशक नव्य-न्याय | विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर | विदेह ई-पत्रिका, अंक २६-५०, २०१० भूमिका: सदेह २ क स्वरूप विदेह: सदेह: २ (ISBN: ९७८-९३-८०५३८-०९-९) विदेह ई-पत्रिकाक २६म सँ ५०म अंकसँ बीछल मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचनाक संग्रह थिक। सदेह ३ (पद्य) क विपरीत एहि खण्डमे साक्षात्कार, आलोचना, इतिहास-लेखन, लोकगीत-शोध, यात्रा-वृत्तान्त, रंगकला-समीक्षा, भाषाशास्त्र सब गद्य विधाक समागम अछि। ४१ साहित्यकारक रचना एहिमे समाहित अछि। एहि समीक्षामे चारि frameworks उपयोग कएल गेल अछि: (क) भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य सिद्धान्त; (ख) पाश्चात्य आलोचना Gramsci, Bourdieu, Benjamin, Spivak, Bakhtin, Foucault, Luk, Freire; (ग) गंगेश उपाध्यायक नव्य-न्याय ज्ञान-मीमांसा; (घ) विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क। १. जीवकान्त साक्षात्कार विनीत उत्पल द्वारा (पृ. १-७) | साहित्य अकादेमी पुरस्कार विजेता, 'तकैत अछि चिड़ै' परिचय जीवकान्त (जन्म: २७ जुलाई १९३६, अभुआढ़, सुपौल) मैथिलीक सबसँ प्रतिष्ठित कवि सभमे छथि। 'तकैत अछि चिड़ै' (२००३) हेतु साहित्य अकादेमी पुरस्कार; मधुबनीक डेओढ़मे पालन-पोषण; ४० वर्षमे ६०-७० पोथीपर टिप्पणी। रस-ध्वनि विश्लेषण: एहि साक्षात्कारमे करुण + वीर + शान्त रसक त्रयी अछि। ध्वनि: 'हमर कविता आखिरमे टर्न लैत अछि' काव्य-संरचनाक deep structure क संकेत। वक्रोक्ति: 'सोनारक काज लोहारक हथौड़ीसँ नहि भऽ सकैत' मैथिली आलोचनाक वर्तमान दुर्दशापर एक devastating indictment। औचित्य: साक्षात्कार-विधाक माध्यमसँ आजीवन साहित्यसेवीक autobiography naturally emerge होइत अछि। पाश्चात्य आलोचना Gramsci क 'organic intellectual': जीवकान्त academy सँ नहि, गामक अनुभवसँ निकसल छथि। 'मार्क्सवाद उत्तम विचार, मुदा हिंसाक पक्षमे बेसी' एहिमे एक nuanced post-Marxist position अछि जे Gramsci आ Lohia दुनूकेँ synthesize करैत अछि। नव्य-न्याय गंगेशक 'व्याप्ति': 'जे ग्रामीण अनुभवसँ लिखैत अछि से authentic होइत अछि' ई व्याप्तिक 'दृष्टान्त' हुनकर अपन जीवन थिक। साक्षात्कारमे 'तर्क-वितर्क' (Navya-Nyaya debate format) सँ रामायणपर discourse क उल्लेख। विदेह समानान्तर इतिहास साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त करबाक बावजूद जीवकान्त कहैत छथि जे 'अकादेमीक politics नहि जनैत छी, गाममे रहैत छी' ई Videha Parallel History Framework क spirit थिक। विदेहे एहन कविकेँ canonical space देलक। २. राजमोहन झा (जन्म: २७ अगस्त १९३४) साक्षात्कार गजेन्द्र ठाकुर द्वारा (पृ. ८-१०) | साहित्य अकादेमी पुरस्कार 'आई-काल्हि-परसू' रस-ध्वनि शान्त + बौद्धिक जिज्ञासाक संगम। ध्वनि: मैथिली साहित्यक structural problems क पर्दाफाश जे कहल गेल तकर ध्वनि ओहिसँ बेशी। वक्रोक्ति: आलोचना-विधापर टिप्पणी करैत ओ स्वयं व्यवस्थाक हिस्सा छथि double-edged critique। बाख्तिन / Benjamin बख्तिन केर डायलॉग कल्पना: गजेन्द्र ठाकुरक साक्षात्कार पद्धति दू literary generations क transition document बनबैत अछि। Benjamin: digital archive मे preserve हेबाक बाद ई primary source बनि जाइत अछि। ३. रामान्य झा 'रामरंग' (जन्म: १९२८) गप-शप गजेन्द्र ठाकुर सँ (पृ. ११) | विद्यापति संगीत-परम्परा रस-ध्वनि शान्त + भक्ति रस विद्यापति संगीत-परम्पराक एक living embodiment। ध्वनि: 'रामरंग' नामे पूरा साहित्यिक-आध्यात्मिक identity गुम्फित अछि। Benjamin / Oral Tradition Benjamin केर 'aura' मौखिक परम्पराक जीवन्त आभा रामरंगजीक Vidyapati singing tradition मे सबसँ प्रत्यक्ष। १९२८ मे जन्मल संगीत-साधकक स्मृतिकेँ Videha archive मे स्थान देनाई literary archaeology थिक। ४. जितेन्द्र झा तीन लेख जनकपुरमे चक्काजाम कवि गोष्ठी; प्रिय पाहुन; आशाक किरण: सौभाग्य मिथिला (पृ. १२-१४) रस-ध्वनि वीर + शान्त रस। 'आशाक किरण' वक्रोक्ति: मिथिलाक present darkness केँ illuminate करबाक आकांक्षा। 'चक्काजाम', a poetic image) literary event report। Bourdieu / विदेह फ्रेमवर्क: जनकपुर (नेपाल) क कवि-गोष्ठी रिपोर्ट साहित्यक cross-border dimension देखबैत अछि। विदेहक core pan-Maithili mission केर प्रदर्शन। ५. अमरनाथ झा तीन लेख हाँ ई तँ कहियो नहि देखने रही; विष्णु भाकर जी सादगीक प्रतिमूर्ति; आचार्य पंकज (पृ. १५-१९) रस-ध्वनि करुण + शान्त रस स्मरण आ श्रद्धांजलि। 'हाँ ई तँ कहियो नहि देखने रही' ध्वनि: पहिलहि बेर भेल अनुभव सबहसँ precious। 'विष्णु भाकर जी सादगीक प्रतिमूर्ति' biographical meditation। Benjamin / Navya-Nyaya Benjamin: जे व्यक्ति गेल, हुनका याद रखनाई political act। गंगेशक 'प्रत्यक्ष': अमरनाथ झाक personal testimony एक valid pramaana किताबसँ बेशी। ६. तूलिका/ स्वास्तिका: रचना (पृ. २०-२१) | नारी-स्वर, चित्रकला। रस-ध्वनि शृंगार + करुण नव नारी-कण्ठक आवाज। 'तूलिका' (painter's brush) नाम स्वयं वक्रोक्ति: लेखनी painting करैत अछि। Showalter केर gynocriticism: बिना apology क नारी internal world express। ७. चन्द्रेश संवेदनशील मोनकेँ छुबैत हुगली ऊपर बहैत गंगा (पृ. २२-२८) रस-ध्वनि 'हुगली ऊपर बहैत गंगा' ध्वनि: गंगा केवल नदी नहि, सम्पूर्ण उत्तर-भारतीय civilisational memory। शान्त + करुण। वक्रोक्ति: 'हुगली' मे 'गंगा' देखनाई geography केँ metaphysics मे transform केनाइ। Benjamin / Navya-Nyaya Benjamin केर 'urban floor': Chandresh हुगलीक किनारसँ memory collect करैत। गंगेशक 'अनुव्यवसाय' (meta-cognition): ने केवल गंगा देखनाई बल्कि देखनाईकेँ सेहो observe केनाइ। ८. फूल चन्द्र झा 'प्रवीण' मैथिली शिशु साहित्य लोक (पृ. २९-४१) रस-ध्वनि वात्सल्य रस। वक्रोक्ति: 'शिशु साहित्य' एक serious literary category मात्र 'बच्चासभक गप' नहि। Benjamin केर childhood theory: बाल-साहित्य future citizens केर imagination shape करैत। विदेह फ्रेमवर्क Sahitya Akademi mainstream मे बाल-साहित्य secondary। Videha मे equal space मिलनाई parallel history framework केर democratic impulse। ९. केदार कानन जगदीश प्रसाद मंडलक कथा 'पछतावा'पर एक दृष्टि (पृ. ४२-४३) रस-ध्वनि शान्त + बौद्धिक precision। जगदीश प्रसाद मंडलक कथापर close reading। वक्रोक्ति: आलोचक कथाक 'पछतावा' थीम केँ अपन critical lens सँ deconstruct करैत छथि। New Criticism आ नव्य-न्याय T.S. Eliot केर New Criticism: text-focused, intention-independent। गंगेशक 'साध्य-सिद्धि': आलोचनाक assertion + हेतु + दृष्टान्त text सँ logically present। १०. प्रेमशंकर सिंह (जन्म: १९४२) जयकान्त मिश्र: जीवन आ साहित्य-साधना (पृ. ४४-६६) | २२ पृष्ठक विस्तृत जीवनी-आलोचना रस-ध्वनि वीर + शान्त रस। ध्वनि: 'साहित्य-साधना' (literary austerity) साहित्य तपस्या थिक। वक्रोक्ति: जयकान्त मिश्रक जीवन describe करब = मैथिलीक cultural history describe करब। Bourdieu / नव्य-न्याय Bourdieu केर literary field: Jaykant Mishra केर cultural capital केर detailed mapping। गंगेशक 'पञ्चावयवी अनुमान': literary biography एक extended argument पक्ष + हेतु + दृष्टान्त + उपनय + निर्णय। विदेह फ्रेमवर्क एक canonical figure केर counter-canonical lens सँ re-examination single-author monographक विकल्पक रूपमे long-form criticism। ११. डा. रमानन्द झा 'रमण' तन्त्रनाथ झा/सुभद्र झा जन्मशतवार्षिकी (पृ. ६७-७६) रस-ध्वनि करुण + शान्त। ध्वनि: 'शतवार्षिकी' सौ वर्ष पश्चात् याद केनाइ एक moral act। Benjamin केर messianic time: dead writers केँ याद रखनाइ 'redemption' थिक। विदेह आर्काइव 'सगर रातिक दीप जरय' आन्दोलनक इतिहासक संग रमण जी (आब ’सगर राति दीप जरय’क इतिहास डॉ उमेश मण्डल अद्यतन कऽ रहल छथि।) मैथिली literary history केर living archive छथि। १२. श्यामसुन्दर शशि श्रद्धांजलि आह उमा! वाह उमा!; डा. धीरेश्वर झा 'धीरेन्द्र'क ६ अम वार्षिकीपर (पृ. ७७-८०) रस-ध्वनि 'आह उमा! वाह उमा!' 'आह' (anguish) + 'वाह' (admiration) एक्के श्वासमे complicated grief। करुण प्रधान। वक्रोक्ति: 'वाह' श्रद्धांजलिमे celebration of life। Bakhtin / Carnival बाख्तिनक carnivalesque: 'आह-वाह' केर juxtaposition मे death + celebration एक संग। १३. नवेन्दु कुमार झा चेतना समितिक आम सभामे नव पदाधिकारी; भाषाई अकादेमीक विकास (पृ. ८१-८२) रस-ध्वनि वीर रस Maithili language activism केर reporting। 'चेतना समिति' वक्रोक्ति: institutionalised consciousness एक paradox। Gramsci केर civil society: counter-hegemonic institutions केर documentation। विदेह फ्रेमवर्क Maithili activism केर real-time documentation Videha कें एक 'living archive' बनबैत। १४. सुशान्त झा मैथिली भाषा-संस्कृतिक रक्षा; हमर सपनाक मिथिला; मैथिलीकेँ लऽ कऽ किछु असुविधाजनक प्रश्न (पृ. ८३-८७) रस-ध्वनि वीर + करुण। 'असुविधाजनक' सत्य बजनाई स्वयं वक्रोक्ति। गंगेशक 'संशय': title एक epistemic doubt केर state निश्चित तथ्य नहि, uncomfortable questions। Spivak Maithili केर 'subaltern' position 8th Schedule language मे गेलाक बादो; जे फेर वएह marginalized 'असुविधाजनक' truth-telling एहि subaltern voice केर articulation। १५. डॉ. शम्भु कुमार सिंह आलेख: आधुनिक मैथिली नाटकमे चित्रित: निर्धनताक समस्या (पृ. ८८-९०) रस-ध्वनि करुण + बौद्धिक vigour। वक्रोक्ति: 'निर्धनता' केवल economic condition नहि existential crisis। Luk/ नव्य-न्याय Luk केर critical realism: Maithili नाटकमे poverty केर representation। गंगेशक 'व्याप्ति-ग्रह': 'जे Maithili आधुनिक नाटक थिक से प्रायः poverty depict करैत अछि' evidence text सँ। १६. आशीष अनचिन्हार आलोचना: अन्हारपर इजोतक कहियो विजय नहि (पृ. ९१-९४) | रस-ध्वनि 'कहियो' (never) absolute negation existentialist statement। रौद्र + शान्त रसक unusual combination। Derrida केर deconstruction: 'अन्हार/इजोत' binary केँ deconstruct करनाई 'neither' position। विदेह फ्रेमवर्क Videha Parallel History Framework मे mainstream optimism (awards = 'light winning') केँ question केनाइ counter-canonical gesture। १७. हृदय नारायण झा मिथिलाक लुप्तप्राय गीत गर्भसँ छठिहार धरि; सोहर आ खेलउना; विआह संस्कारक गीत; विषहारा गीत (पृ. ९५-१०८) | १४ पृष्ठक संकलन रस-ध्वनि वात्सल्य + करुण + शान्त lifecycle songs। ध्वनि: 'लुप्तप्राय' cultural mortality केर metaphor। वक्रोक्ति: 'गर्भसँ छठिहार धरि' जन्मसँ पहिने मृत्युसँ बाद धरिक complete human lifecycle map। Benjamin / Feminist Benjamin केर 'Storyteller': traditional community केर voice संरक्षण। Spivak: सोहर, बिआह गीत मुख्यतया महिला गीत, ओइ महिला केर स्वर जे mainstream canon मे कहियो नहि आएल। विदेह समानान्तर इतिहास मैथिली मौखिक परम्पराक digital archiving सबसँ महत्त्वपूर्ण archival contribution। जे literary history books मे नहि आएत से Videha archive मे रहत। १८. डॉ. गंगेश गुंजन जयकान्त मिश्रपर विशेष; कविक आत्मोक्ति: कविताक अएना विनीत उत्पलक कविता संग्रहपर (पृ. १०९, ११४-११६) परिचय गंगेश गुंजन (साहित्य अकादेमी, 'उचितवक्ता', 'बुधिबधिया', 'राधा') मैथिलीक बहुआयामी रचनाकार। रस-ध्वनि 'कविताक अएना' (mirror) वक्रोक्ति: कविता mirror + ओ mirror खुद mirror mise en abyme; (फ्रेंच भाषा मे एकर अर्थ होइत छैक "अतल खधाइ मे खसाएब") कला आ साहित्य मे एकटा स्व-संदर्भित (self-referential) तकनीक छैक। एहिमे एकटा "दर्पण प्रभाव" (mirror effect) उत्पन्न कएल जाइत छैक, जतय कोनो चित्र, कथा, वा संरचनाक एकटा प्रति ओकरे भीतर समाहित रहैत छैक।। शान्त+बौद्धिक precision। गंगेशक 'परोक्ष प्रमाण': विनीत उत्पलक unrevealed intentions केँ texts सँ infer करैत। १९. विद्या मिश्र जयकान्त मिश्रपर विशेष; होलीपर विशेष (पृ. १०९, ११३) रस-ध्वनि: शान्त + श्रद्धा। 'होलीपर विशेष' मे हास्य + शृंगार। वक्रोक्ति: होली मे social hierarchies temporarily dissolved। Bakhtin केर carnival: Holi एकटा perfect carnivalesque घटना। २०. डा. चन्द्रेश शाह होलीक सन्देश (पृ. १११-११२) रस-ध्वनि: हास्य+शृंगार। 'सन्देश' (message) वक्रोक्ति: होली केर रंग सभ मे एकटा संदेश decode करबाक आमंत्रण। Saussure केर semiotics: होलीक रंग सभ= signifiers; सांस्कृतिक अर्थ= signifieds। २१. रामभरोस कापड़ि 'भ्रमर' (जन्म: १९५१) तीन लेख: संचार एवं साहित्य मे समावेशी स्वरूप; यात्रा प्रसंग; साझा प्रकाशनमे विद्यापति (पृ. ११७-१२५) रस-ध्वनि: वीर + शान्त। 'समावेशी' demand केनाइ= present situation exclusionary छैक वक्रोक्ति। Benjamin: 'साझा प्रकाशनमे विद्यापति' translation-as-afterlife। Gramsci / विदेह फ्रेमवर्क: ग्राम्शीक 'cultural hegemony': media केर Maithili exclusion counter करबाक अनुरोध। 'भ्रमर' Videha केर cross-platform experiment केर active participant छथि। २२. डा. कल्पना मणिकान्त मिश्र मातृभाषा (पृ. १२६-१२७) रस-ध्वनि वात्सल्य + वीर। 'मातृभाषा' भाषाक mortality = माँक mortality emotional intensity केर उच्चतम बिन्दु। Spivak केर 'mother tongue' politics: Maithili claim एक political assertion। नव्य-न्याय गंगेशक 'शब्द प्रमाण': 'मातृभाषा' शब्द स्वयं testimony मैथिली बाजयबला केर अपन भाषा संग maternal bond। २३. भीमनाथ झा मखानक खानि ई मिथिला; चन्दा झा, हरिमोहन झा मिलि कऽ (पृ. १२८-१३५) रस-ध्वनि वीर + शान्त। 'मखानक खानि' मखान (fox nut) मिथिलाक unique agricultural identity। वक्रोक्ति: 'खानि' (treasure) मिथिला स्वयं एकटा खानि। स्थान सिद्धांत (Place theory): भूदृश्य (landscape) साहित्यिक कल्पना केँ आकार दैत अछि। २४. प्रकाश चन्द्र रंगदृष्टि; दिल्ली; मिथिलामे रंगकलाक समकालीन दृष्टि (पृ. १३६-१४०) रस-ध्वनि अद्भुत + वीर। 'रंगदृष्टि' ध्वनि: देखबाक तरीका स्वयं ideology। Benjamin केर 'aura': मिथिला चित्रकलाक मूल ritual context versus mass-reproduced commodities। Semiotics: मैथिली साहित्य, कला, आ मिथिलाक सांस्कृतिक विन्यास मे माछ (fish), कमल (lotus), आ हाथी (elephant) मात्र प्रतीक नहि, बल्कि एकटा समृद्ध संकेत प्रणाली (sign system) केँ देखबैत अछि। १. माछ (Fish): प्रजनन आ शुभक प्रतीक: मिथिलाक लोक-संस्कृति मे माछ केँ अत्यंत पवित्र आ मंगलकारी मानल जाइत अछि। प्रजनन आ वंश-वृद्धि: माछ ढेर रास अण्डा दैत अछि, तें ई "प्रजनन क्षमता" (fertility) आ वंशक विस्तारक प्रतीक थिक। तांत्रिक महत्व: तांत्रिक साधना मे माछ केँ 'पञ्चमकार' मे सँ एक मानल गेल अछि, जे ज्ञान आ शक्तिक द्योतक अछि। साहित्यिक संदर्भ: मैथिली कविता आ कथा मे माछ केँ अक्सर "नयन" (मृगनयनी नहि, झषलोचनी) आ चंचलताक उपमा देल जाइत अछि। २. कमल (Lotus): पवित्रता आ अद्वैत दर्शन: कमल मिथिलाक पोखरि आ मिथिलाक दर्शनक अभिन्न अंग अछि। कादो मे निर्मलता: कमल कें "अलिप्तता" क प्रतीक मानल जाइत अछि- संसार रूपी कादो मे रहितो ओकर अपवित्रता सँ दूर रहब। अरिपन मे स्थान: मिथिलाक लोक-चित्रकला (मधुबनी पेंटिंग) मे 'अष्टदल कमल' केँ केंद्र मे राखल जाइत अछि, जे ब्रह्मांडीय ऊर्जाक केंद्र थिक। सौन्दर्यशास्त्र: मैथिली साहित्य मे नायिकाक मुख वा चरणक तुलना प्रायः कमल सँ कएल जाइत अछि, जे ईश्वरीय सौंदर्यक संकेत दैत अछि। ३. हाथी (Elephant): ऐश्वर्य आ स्थिरता: हाथी केँ शक्ति, बुद्धिमत्ता, आ मर्यादाक प्रतीक मानल जाइत अछि। राजकीय वैभव: प्राचीन मैथिली साहित्य आ लोक गाथा मे हाथी 'ऐश्वर्य' (prosperity) आ राजाक शक्तिक परिचायक अछि। कोहबरक प्रमुख हिस्सा: मिथिलाक 'कोहबर' (विवाह कक्ष) मे हाथीक चित्र अंकित कएल जाइत अछि, जे नवविवाहित जोड़ाक जीवन मे स्थिरता आ संपन्नताक कामना करैत अछि। धार्मिक जुड़ाव: गणेशक रूप मे हाथीक मस्तक बुद्धि आ विघ्ननाशक शक्तिक संकेत दैत अछि। निष्कर्ष: मैथिली संकेत प्रणाली मे ई तीनू तत्व मिलि क' जीवनक पूर्णता केँ परिभाषित करैत अछि: माछ (सृष्टि), कमल (अध्यात्म), आ हाथी (भौतिक संपन्नता)। ई चिन्ह सब मात्र सजावट नहि, वरन् मिथिलाक सामूहिक अवचेतनक भाषीय आ दृश्य लिपि थिक। २५. जगदीश प्रसाद मंडल संस्कार-लोकगीत आ गीतनाद (पृ. १४१-१४५) रस-ध्वनि वात्सल्य + शान्त। 'गीतनाद' (song-resonance) ध्वनि: sound जे human consciousness मे resonate करैत अछि। वक्रोक्ति: lifecycle songs = society केर moral philosophy केर sonic expression। भारतीय नाद-ब्रह्म concept: sound divine energy थिक। विदेह फ्रेमवर्क: Fiction writer = folklorist = cultural theorist Videha's interdisciplinary literary categories। २६. पंचानन मिश्र मऊ वाजितपुरसँ विद्यापतिनगर परिवर्तन-यात्रा; मिथिलाक कतिआएल सिद्ध पीठ (पृ. १४६-१५१) रस-ध्वनि वीर + शान्त। 'कतिआएल' (neglected) ध्वनि: sacred sites केर abandonment civilisation केर अवनतिक synecdoche। Lefebvre केर 'Production of Space': स्थानक नाम बदलब एकटा political act। २७. गोपाल प्रसाद फराक मिथिला राज्यक गठन किएक नहि?; हिन्दी, मैथिली, मिथिला, बिहार ओ मैथिल लोकनिसँ अपेक्षा (पृ. १५२-१५४) रस-ध्वनि रौद्र + वीर। 'फराक मिथिला राज्य' ध्वनि: 'फराक' मे पूरा separatist political philosophy। वक्रोक्ति: 'किएक नहि?' प्रश्न स्वयं manifesto। Fanon / नव्य-न्याय Fanon केर national consciousness: cultural nationalism → political nationalism। गंगेशक 'साध्य-साधन': 'फराक मिथिला' (साध्य) केँ प्राप्त करबाक 'साधन' केर तार्किक mapping। २८. प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी मिथिलाक इतिहास (पृ. १५५-१६६) | ११ पृष्ठक Maithili History रस-ध्वनि शान्त रस scholarly historical narrative। ध्वनि: मिथिला केर इतिहास वर्णित केनाइ= मैथिली साहित्यिक परम्पराक ऐतिहासिक grounding। Foucault केर power/knowledge: History writing is never neutral, इतिहास लेखन कहियो तटस्थ नहि होइत अछि। विदेह समानान्तर इतिहास Videha Parallel History Framework केर सर्वोत्कृष्ट explicit instantiation: मिथिलाक स्वतंत्र ऐतिहासिक trajectory, समानान्तर, not derivative of, हिन्दी वा संस्कृत मुख्यधारा। २९. अमन कुमार झा रिपोर्ट (काठमाण्डू) (पृ. १६७) रस-ध्वनि वीर + अद्भुत। वक्रोक्ति: नेपालक राजधानीमे मैथिली साहित्यिक रिपोर्ताज काठमाण्डू राजनीतिक केन्द्रमे, मैथिली कात-करोटमे। विदेह ओहि सत्यक दस्तावेजीकरण करैत अछि जे गप मुख्यधाराक मीडियासँ जुड़ल लोक अण्ठा दैत छथि। ३०. सुजीत झा सुनिल मल्लिक सफल व्यक्ति; ६ अम शताब्दीक लोक नायक वृत्तचित्रमे (पृ. १६८-१७१) रस-ध्वनि वीर + अद्भुत। 'सफल व्यक्ति' मिथिला आधारित व्यक्तिक सफलता एकटा counter-narrative। Bourdieu: मैथिलीक परिप्रेक्ष्यमे भाषिक+ सांस्कृतिक राजधानीक आर्थिक राजधानीमे परिवर्तन। ३१. रामलोचन ठाकुर समकालीन मैथिली-कथाक यथार्थ-उर्फ यथार्थक-कथा (पृ. १७२-१७६) रस-ध्वनि शान्त + बौद्धिक। वक्रोक्ति: 'यथार्थ-उर्फ यथार्थक-कथा' reality's story OR story's reality? दुनू व्याख्या वैध अछि। Luk केर critical realism versus naturalism। गंगेशक 'सामान्यलक्षण प्रत्यक्ष': literary realism = philosophical realism। ३२. बिपिन झा आवश्यकता अछि मैथिली शब्दतन्त्र निर्माणक (पृ. १७७-१७८) रस-ध्वनि: वीर। 'शब्दतन्त्र निर्माण' नव शब्द आ पुरान शब्दक तन्त्र। 'आवश्यकता' = urgent demand, मात्र सुझाव नहि। Chomsky केर language planning: कोन word accept, कोन reject। ३३. शीतल झा गामक अधिकारी....भैया....पोखरि....चम्पा फूल.... (पृ. १७९-१८१) रस-ध्वनि शीर्षक सेहो एकटा कविता चारिटा चित्र ellipsis (.....) लोप-चिन्ह वा शब्द-लोप Ellipsis एकटा एहन साहित्यिक आ भाषाई उपकरण थिक जाहि मे किछु शब्द वा वाक्यांश केँ जानि-बुझि क' छोड़ि देल जाइत अछि, मुदा पाठक ओकर अर्थ संदर्भ सँ बुझि जाइत छथि; सँ संयुक्त। शान्त + शृंगार। ध्वनि: ellipsis = unsaid space जाहिमे स्मृति जीवित रहैत अछि। Bakhtin केर chronotope: village space केर specific temporality। ३४. कुमार राधारमण पाकिस्तानमे सेक्स-विचार (पृ. १८२-१८४) रस-ध्वनि अद्भुत + बीभत्स। वक्रोक्ति: मैथिलीक साहित्यिक परम्परामे sexuality केर सोझाँ-सोझीं चर्चा taboo-breaking। Foucault केर 'History of Sexuality': sexuality discourse एकटा power-knowledge nexus। विदेह फ्रेमवर्क विदेह केर सामाजिक रूपसँ संवेदनशील विषय प्रकाशित करबाक willingness censorship-free editorial policy। ३५. श्रीमती कुमुद झा उच्चैठ भगवतीक महात्म्य (पृ. १८५-१८६) रस-ध्वनि: भक्ति + शान्त। 'महात्म्य' एक विशिष्ट मैथिली साहित्यिक विधा। वक्रोक्ति: नारी-लेखिका द्वारा female deity केर महात्म्य = gendered spiritual authority claim। भक्ति परम्परा केर feminist dimension। ३६. शम्भू झा 'वत्स' गार्हस्थ जीवनक समस्या (पृ. १८७-१८८) रस-ध्वनि करुण + शान्त। ध्वनि: गृहस्थ जीवन केर समस्या वर्णित करब = सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्थाक critique। वक्रोक्ति: व्यक्तिगत कष्टकेँ public discourse मे आनब। अम्बेडकर: गार्हस्थ समस्या। प्रायः जाति, लिंग, आ आर्थिक असमानता मे जड़ि जमेने। ३७. नागेन्द्र लाल कर्ण गायन, कथक, सितार वादन; सांस्कृतिक कार्यक्रम-गिटार-वादनक प्रस्तुति (पृ. १८९-१९०) रस-ध्वनि अद्भुत + शृंगार। गायन + कथक + सितार = मिथिलाक synesthetic सांस्कृतिक परम्परा। Benjamin केर 'aura': live performance केर unreproducible presence documentation मे आंशिक survival। ३८. डॉ. रवीन्द्र कुमार चौधरी विद्यापतिक फोटोकेँ लोक सभामे लगएबाक मांग (पृ. १९१) रस-ध्वनि वीर। ध्वनि: संसद मे एकटा मध्ययुगीन मैथिली कविक भाव-भंगिमा केँ प्रधानता दैत चित्र लगेबाक मांग। मिथिलाक राजनैतिक प्रतिनिधित्वक प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति। वक्रोक्ति: एक फोटो मैथिल समुदायक वैध राष्ट्रीय दृश्यताक प्रतिनिधित्व करैत। ३९. भालचन्द्र झा हमर शिक्षण-यात्रा (पृ. १९२-२०५) | १४ पृष्ठक शैक्षणिक आत्मचरित (Educational Autobiography) रस-ध्वनि शान्त + करुण। 'यात्रा' शिक्षण लक्ष्य नहि, यात्रा। वक्रोक्ति: 'हमर' आत्मकथात्मक अधिकार (autobiographical possession): एक खाढ़ीक कथा। Freire / विदेह फ्रेमवर्क Paulo Freire केर 'Pedagogy of the Oppressed': शिक्षाक चुनौती, साहित्यिक विधाक रूप मे शिक्षक-आत्मकथा, विदेहक साहित्यिक लोकतंत्रीकरणक ठोस उदाहरण। ४०. गजेन्द्र ठाकुर (सम्पादक) मैथिली समीक्षाक आवश्यक तत्व; सम्पादकीय-सन्देश (पृ. २०६-२५५) परिचय गजेन्द्र ठाकुर मैथिली मे एकर अर्थ आ संदर्भ एहि प्रकार अछि: "विदेहक संस्थापक-संपादक एकटा समालोचक (critic), संपादक (editor), आ मैथिली भाषा नियोजक, तीनू रूपमे। रस-ध्वनि शान्त + बौद्धिक अति-आवश्यकता। 'आवश्यक तत्व' जे नहि अछि ओकर माँग । सम्पादकीयमे वीर रस ७० देश, डिजिटल उपलब्धि, आत्मविश्वासी संपादकीय स्वर, साहित्यिक चोरिक विरोध। नव्य-न्याय गंगेशक 'प्रमाण-शास्त्र' criticism theory मे directly operative। 'आवश्यक तत्व' = valid criteria for criticism = pramana criteria। विदेह समानान्तर इतिहास सबसँ महत्वपूर्ण सम्पादकीय-सन्देश Videha Parallel History Framework केर living document थिक। ७० देश, २,१९,८९१ views, २०० लेखक एक counter-institution केर emergence document। साहित्य अकादेमीक उर्ध्वाधर hierarchy केर विरुद्ध विदेहक horizontal network। ४१. विनीत उत्पल साक्षात्कार-कर्ता; रस-ध्वनि शान्त रस empathetic listener। प्रश्न open-ended, non-leading जे Jivakant केँ authentic voice emerge करबाक space दैत अछि। Bakhtin / विदेह फ्रेमवर्क बाख्तिनक dialogic imagination: विनीत उत्पलक genuine curiosity ओहि Bakhtinian space create करैत अछि जाहिमे Jivakant स्वतंत्रतासँ बजैत छथि। विदेहक नव खाढ़ीक प्रतिनिधित्व। उपसंहार: सदेह २ क समग्र महत्व सदेह २ मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१० ४१ साहित्यकारक एकटा असाधारण संकलन थिक। सदेह ३ (पद्य) क विपरीत एहिठाम तर्क अछि, narrative अछि, documentation अछि, advocacy अछि। तीन प्रकारक स्वर: (क) Senior canonical figures जीवकान्त, राजमोहन झा, गंगेश गुंजन, परम्परा केर जीवंत प्रतिमूर्ति ; (ख) Mid-career scholars रामलोचन ठाकुर, आशीष अनचिन्हार, हृदय नारायण झा परम्पराकेँ आगाँ बढ़बैत; (ग) New voices विनीत उत्पल, नवेन्दु कुमार झा tradition केँ transform करैत। चारि फ्रेमवर्क केर संश्लेषण: भारतीय रस-ध्वनि सैद्धान्तिक गद्यमे सेहो लागू। पाश्चात्य सिद्धान्त (Gramsci, Bourdieu, Benjamin, Spivak, Bakhtin, Foucault, Luk, Freire)। प्रत्येक रचनाक राजनीतिक-सांस्कृतिक आयाम केँ देखार केनाइ। नव्य-न्यायक माध्यम सँ साहित्यिक समालोचनाक तार्किक संरचनाक परीक्षण। विदेहक समानांतर इतिहास ढाँचा (Parallel History Framework) सब रचना सभ केँ एकटा लोकतांत्रिक आ प्रति-मानक (counter-canonical) अभिलेखागार मे एकीकृत करैत अछि। विदेह: सदेह: ३ मैथिली पद्य २००९-१०: समग्र साहित्यिक समीक्षा: सभटा साहित्यकार भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य सिद्धान्त | पाश्चात्य आलोचना गंगेशक नव्य-न्याय | विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर | विदेह समानान्तर साहित्य आन्दोलन भूमिका: सदेह ३ क परिचय विदेह: सदेह: ३ (विदेह ई-पत्रिकाक २६म सँ ५०म अंकसँ बीछल आ सम्पादित कएल) मैथिली पद्यक एक अनुपम संकलन थिक जे २००९-१० क रचनाक प्रतिनिधित्व करैत अछि। एहिमे ७५सँ बेशी कविक रचना संग्रहित अछि जे मैथिली कवितاक विविध आयामकेँ प्रतिबिम्बित करैत अछि मधेश आन्दोलनसँ लऽ कऽ दलित चेतना धरि, नारी-मुक्तिसँ लऽ कऽ प्रगतिवादी भावना धरि, लोक-परम्परासँ लऽ कऽ अभिनव अक्षर धरि। एहि समीक्षामे प्रत्येक साहित्यकारक रचनाकेँ चारि पूरक दृष्टिकोणसँ देखल जायत: (१) भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य सिद्धान्त; (२) पाश्चात्य आलोचना, बूर्द्यू (Bourdieu) स्पिवाक, बाख्तिन, ग्राम्शी, बेन्यामिन, फानन, अम्बेडकर; (३) गंगेश उपाध्यायक नव्य-न्याय ज्ञान-मीमांसा; आ (४) विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क, जे साहित्य अकादेमीक प्रतिष्ठान-विरोधी समानान्तर साहित्यिक विमर्शकेँ रेखांकित करैत अछि। सदेह ३ केवल एक काव्य-संग्रह नहि ई विदेह आन्दोलनक एकटा घोषणापत्र थिक जाहिमे ७५ टा भिन्न-भिन्न आवाज मैथिली कविताक विविध रंग देखबैत अछि। १. महेन्द्र कुमार मिश्र रचना: राजनीतिक कविता | पूर्व सांसद, नेपाल परिचय महेन्द्र कुमार मिश्र नेपालक पूर्व सांसद छथि। हुनकर कविता मधेशक राजनीतिक आ सामाजिक पीड़ाकेँ व्यंग्यक भाषामे प्रस्तुत करैत अछि। 'चेला चन्द्राचार्य आ दलाल राखू अपनेटा संग' ई पंक्ति मधेशी नेतृत्वक पाखण्डकेँ सीधे उजागर करैत अछि। रस-ध्वनि विश्लेषण मिश्रजीक कवितामे वीर रस आ रौद्र रसक प्राधान्य अछि। ध्वनिक स्तरपर 'जनतामे रहत रंग' एक repetitive structure अछि जे सभ बेर नव अर्थ ग्रहण करैत अछि पहिने उपहास, तखन आक्रोश, अन्तमे चेतावनी। वक्रोक्ति स्पष्ट अछि लोकतन्त्र आ भोग-तन्त्रक आपसी प्रतिस्थापन एक कड़ु व्यंग्य थिक। पाश्चात्य आलोचना-दृष्टि ग्राम्शीक 'हेजेमनी' आ 'काउन्टर-हेजेमनी'क फ्रेमवर्कसँ मिश्रजीक कविता मधेशी जनताक वर्ग-चेतनाकेँ जागृत करबाक प्रयास करैत अछि। फाननक 'रेचड् ऑफ द अर्थ'क दृष्टिसँ हुनकर कविता ओहि लोकक अछि जिनका अपन देशमे 'दोसर' मानल जाइत छनि। नव्य-न्याय (गंगेश उपाध्याय) गंगेशक व्याप्ति (pervasion) क अवधारणा लागू करैत: मिश्रजीक कवितामे 'नेता = शोषण'क व्याप्ति अछि, आ 'गिरिजा झुकल, चन्द्र झुकल' एहि व्याप्तिक अनुमान (inference) अछि। नव्य-न्यायक पक्ष ई थिक जे जे अनुमान सही प्रमाणसँ समर्थित हो, से विद्या थिक कवितामे राजनीतिक सत्य एक प्रमाण जकाँ काज करैत अछि। विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क विदेह फ्रेमवर्कमे मिश्रजीक रचना एक अल्पसंख्यक/सबाल्टर्न आवाज थिक जे साहित्य अकादेमीक मुख्यधारा मैथिली कैनन सँ भिन्न अछि। नेपालक मधेश आन्दोलनक कविता भारतीय मैथिली साहित्यक अकादेमी-मान्य धारामे नहि अबैत अछि, विदेह एहि आवाजकेँ canonical space देलक। इएह विदेहक राजनीतिक आ साहित्यिक योगदान थिक। २. रोशन जनकपुरी रचना: चप्पल आ सड़क | जनकपुर, नेपाल कविताक सारांश। 'चप्पल आ सड़क' एक दलित-विरोधी शोषण-विरोधी कविता थिक जाहिमे 'चप्पलवाली माँ'क आँखिमे पहिने आशा फेर आक्रोशक यात्रा अछि। साधारण चप्पलक बिम्बमे वर्ग-संघर्षक पूरा दुनिया समाहित छैक। रस-ध्वनि करुण रस प्रधान अछि। 'आक्रोशक गीत लिखाइते रहबाक चाही' ई सक्रियताक आह्वान अछि। वक्रोक्ति: 'चप्पलवाली माँ' एक साधारण छवि थिक मुदा एहिमे वर्ग-पहचान आ प्रतिरोध दुनू समाएल अछि। स्पिवाक / अम्बेडकर गायत्री स्पिवाकक 'Can the Subaltern Speak?' क फ्रेमवर्कसँ जनकपुरीक कविता एक सबाल्टर्न महिलाक आवाजकेँ कवितामे स्थान दैत अछि। अम्बेडकरक सामाजिक न्यायक दृष्टिसँ 'चप्पल' एक दलित रूपक बनि जाइत अछि दलित अस्मिता आ प्रतिरोधक प्रतीक। विदेह फ्रेमवर्क जनकपुरी नेपालक मैथिली कवि सभमे छथि। विदेह नेपाल-भारत सीमापर बाजल मैथिलीकेँ एकटा unified literary space देलक। ई कविता विदेहक cross-border मैथिली पहचान-निर्माणमे योगदान करैत अछि। ३. ओम कुमार झा रचना: थर थर कापि रहल छौ तोहर पएर। मधेश आन्दोलन कविता रस-ध्वनि: वीर रस + रौद्र रसक संगम। 'थर थर कापि रहल' एक शक्तिशाली वक्रोक्ति थिक जे शत्रुकेँ डरपोक सिद्ध करैत अछि। ध्वनि: 'पच्चीस शहीदक खून कहि रहल छैक' मृत शहीदक आवाज ध्वनि-स्तरपर कवितामे उपस्थित अछि। फानन / ग्राम्शी फाननक colonial identity क फ्रेमवर्कसँ मधेशी जनताक 'दू सए अड़तीस बरखक गुलामी' एक colonial narrative थिक जे झाक कविता तोड़ि दैत अछि। ग्राम्शीक 'organic intellectual'क अवधारणा: झा ओहन आवाज छथि जे जनताक संग मिलिकऽ बजैत अछि। ४. प्रेम विदेह ललन रचना: एकइसम सदीक नाम | सामाजिक समीक्षा रस-ध्वनि बीभत्स रस + हास्य रसक मिश्रण। 'नाङट उघार ललन सदी अछि भऽ रहल' ललन (कवि-व्यक्तित्व) एहि सदीक 'नग्न सत्य' देखैत अछि। ध्वनि: नोर भीतर, हँसी बाहर बला satirical tone पूरा कवितामे बनल रहैत अछि। बेन्यामिन / बाख्तिन वाल्टर बेन्यामिनक 'Angel of History' जकाँ दृष्टि: ललनक कविता प्रगतिक विपरीत देखैत अछि। बाख्तिनक dialogism सँ: 'अनपढ़मे भाई ईमानदारी, पढ़लहबा जिलासँ देशधरि लूटि रहल' दू विरोधाभासी आवाज एक-दोसरकेँ चुनौती दैत अछि। ५. सुदीप कुमार झा रचना: दूटा पद | सौन्दर्य कविता रस-ध्वनि शृंगार आ करुणक द्वन्द्व पहिल कवितामे स्वप्न-सृष्टि, दोसरमे आँखिक भीजल पलकमे अनिर्वचनीय पीड़ा। ध्वनि पूर्णतः काज करैत अछि: लड़कीक आँखिक भिजनाइ कोनो हेरायल सम्बन्धक ध्वनि दैत अछि जे शब्दमे नहि कहल गेल। स्पिवाक नारीवादी दृष्टि स्पिवाकक postcolonial feminist दृष्टिसँ: दोसर कवितामे पहाड़सँ देखैत लड़की एक सबाल्टर्न gaze थिक जे प्रकृति आ समाज दुनूकेँ ऊपरसँ नहि, बराबरसँ देखैत अछि। ई 'the gaze from below' थिक। ६. अयोध्या नाथ चौधरी रचना: एक भूमि जोड़ एक सत्य। बराबर दू क्षण | एक परिवोधन आ शेष कविता रस-ध्वनि शान्त रस आ बीभत्स रसक असाधारण मिश्रण। 'विवेक कखनो कोनो खिड़कि दऽ उड़िया गेल' विवेकक अकस्मात प्रस्थान एकटा Kafkaesque image थिक। वक्रोक्ति: 'किताब बनाकऽ पढ़लहुँ' साधारण कार्य एतऽ existential self-examination क रूपक बनि जाइत अछि। नव्य-न्याय गंगेशक 'ज्ञान-लक्षण प्रत्यक्ष' (mediated knowledge) क अवधारणा एहि कवितामे लागू होइत अछि: जे 'जानि लेलहुँ'क अनुभव अछि से direct perception नहि, वरन् कवितामे mediated knowledge थिक। ७. प्रशान्त मिश्र रचना: क्षणिका रस-ध्वनि शान्त रस प्रधान। क्षणिकाक brevity स्वयं एक वक्रोक्ति थिक कम बाजिकऽ बेशी कहब। ई मैथिलीमे haiku सँ कने दूर आ तेलुगुक नन्नीलुसँ लग परम्पराक रचना थिक। ८. कुमार मनोज कश्यप रचना: वसन्ती दोहा; निहि सुति रहब अहाँ चद्दरि तानि | दोहा परम्परा रस-ध्वनि शृंगार रस आ वीर रस वसन्तमे सौन्दर्य, जागरणमे वीर-भाव। दोहा-फॉर्म अपन brevity सँ ध्वनिक शक्ति बढ़बैत अछि। वक्रोक्ति: 'चद्दरि तानि' एक रोमाण्टिक छवि थिक जे जागरणक urgent appeal क संग contrast मे अछि। विद्यापति परम्परा कश्यपक दोहा-रचना विद्यापतिसँ सोझ lineage देखबैत अछि। विदेह फ्रेमवर्कमे ई परम्पराक नवीनीकरण थिक, विद्यापतिक शृंगारिक पदावली आ कश्यपक सामाजिक-जागरण दोहा एक्के धारासँ अछि। ९. कल्पना शरण रचना: एकटा हेरायल सखी | नारी स्वर रस-ध्वनि करुण आ शृंगारक संगम वियोग-शृंगारक शास्त्रीय मैथिली परम्परामे। ध्वनि: 'हेरायल सखी' केवल एक व्यक्ति नहि ओ बचपन, निर्दोषता, वा कोनो हेरायल वस्तुक symbolic उपस्थिति थिक। नारीवादी दृष्टि स्पिवाकक 'Women's Voice'क फ्रेमवर्कसँ: सखी-कविता मैथिलीमे एक space थिक जाहिमे महिला अपन भावनात्मक वास्तविकताकेँ पुरुष-मध्यस्थता बिना व्यक्त करैत छथि। १०. बिनीत ठाकुर रचना: गीत | गीत परम्परा रस-ध्वनि बिनीत ठाकुरक गीत मैथिली गीत-परम्परामे अछि सुरीला, लयबद्ध, सांकेतिक। शृंगार रस प्रधान। वक्रोक्तिमे लोक-रूपकक प्रयोग। विदेह फ्रेमवर्क गीत परम्परा साहित्य अकादेमीक canonical prose/katha format सँ भिन्न अछि। विदेह गीतकेँ सेहो canonical space देलक जे मैथिली लोक-परम्परा आ आधुनिक साहित्यिक परम्पराक bridge थिक। ११. सतीश चन्द्र झा रचना: ई जीवन | जीवन-कविता रस-ध्वनि करुण आ शान्त रस, जीवनक क्षणभंगुरतापर ध्यान। शास्त्रीय मैथिलीमे जीवन-चर्चाक परम्परामे ई एक आधुनिक योगदान थिक। १२. बी.के. कर्ण रचना: मिथिलाक लेल एक ओलम्पिक मेडल | खेल-चेतना कविता रस-ध्वनि वीर रस प्रधान क्षेत्रीय गौरव आ खेल-महत्वाकांक्षा। ध्वनि: 'ओलम्पिक मेडल' केवल एक खेल-उपलब्धि नहि ओ मैथिली क्षेत्रीय पहचानक वैश्विक मान्यताक रूपक थिक। बूर्द्यू (Bourdieu)/ सांस्कृतिक पूँजी Pierre बूर्द्यू (Bourdieu) क 'cultural capital'क दृष्टिसँ: कर्णजीक कविता मिथिलाक लेल एक नव'capital' माँगैत अछि खेलमे मान्यता। ई मैथिली पहचान-राजनीतिक एकटा आयाम थिक। १३. सुबोध ठाकुर रचना: हम गामेमे रहबइ | ग्राम-प्रेम कविता रस-ध्वनि 'हम गामेमे रहबइ' मे वात्सल्य आ शान्त रस गाम सँ प्रेम आ प्रतिरोध दुनू। वक्रोक्ति: गाममे रहनाई शहरी-पलायनक युगमे एक राजनीतिक कार्य थिक। विदेह फ्रेमवर्क विदेहक core ideology मे मिथिलाक ग्रामीण आधारकेँ preserve केनाइ शामिल अछि। सुबोध ठाकुरक ई कविता विदेहक 'गाम-चेतना'केँ आवाज दैत अछि। १४. निमिष झा रचना: असमर्पित उन्माद; बुद्ध आ आतंक | अन्तर्संघर्ष कविता रस-ध्वनि 'असमर्पित उन्माद' मे शृंगार-वियोग + करुण। 'बुद्ध आ आतंक' मे शान्त रसक contrast रौद्र रसक संग बुद्धक शान्ति आ आजुक हिंसाक बीच तनाव। ध्वनि: बुद्धक 'आतंक' सँ सामना, की शान्तिक जवाब हिंसा थिक? बेन्यामिन / द्वन्द्वात्मकता वाल्टर बेन्यामिनक dialectical image क अवधारणा: बुद्ध (भूत) आ आतंक (वर्तमान) क छविमे एक 'dialectical flash' अछि जे इतिहासक continuity आ discontinuity दुनू एक संग देखबैत अछि। १५. कामिनी कामायनी रचना: चन्दा | नारी स्वर रस-ध्वनि 'चन्दा' मे शृंगार रस नारी काव्याभिव्यक्ति। वक्रोक्तिमे चन्दा एक प्रिय हेतु रूपकक रूपमे। औचित्य: मैथिली नारी कवितक शास्त्रीय परम्परामे ई सटीक बैसैत अछि। १६. डॉ. शम्भु कुमार सिंह रचना: लोरी; अतीत; आस | बाल साहित्य आ स्मृति कविता रस-ध्वनि 'लोरी' मे वात्सल्य रस, 'अतीत' मे करुण, 'आस' मे शान्त। तीनूमे एक continuity अछि बचपन, स्मृति, भविष्य। 'लोरी' मे मैथिली लोक-परम्पराक नवीनीकरण। ध्वनि: लोरी मात्र सुतएबाक गीत नहि ओ एक पीढ़ीसँ दोसरमे मूल्यक transmission थिक। १७. निशाप्रभा झा रचना: भगवती गीत (लोकगीत संकलन) | लोक परम्परा रस-ध्वनि निशाप्रभा झा भगवती लोकगीतक संकलन कएलनि जे मैथिली लोक-परम्पराक एक महत्वपूर्ण preservation थिक। ई केवल कविता नहि, एक सांस्कृतिक पुरालेखीय कार्य थिक। बेन्यामिन / मौखिक परम्परा बेन्यामिनक 'oral tradition' आ 'storytelling'क सिद्धान्तसँ: निशाप्रभा झाक लोकगीत-संकलन ओहि 'aura' कें preserve करैत अछि जे printed text मे हेरा जाइत अछि। विदेहक digital archiving एहि क्षतिकेँ minimize करैत अछि। १८. विवेकानन्द झा रचना: कविता आ की सुजाता; चान आ चारी | प्रेम आ सामाजिक कविता रस-ध्वनि 'कविता आ की सुजाता' मे एक interesting meta-literary प्रश्न अछि: कविता बेशी महत्वपूर्ण अछि वा 'सुजाता' (एक व्यक्ति/पहचान)? शृंगार + बौद्धिक जिज्ञासाक संगम। 'चान आ चारी' मे चान्दनी आ युवती/साथी (चारी) क बीच रोमाण्टिक क्रीड़ा। १९. मणिकान्त मिश्र 'मनिष' रचना: मिथिला वन्दना | वन्दना परम्परा रस-ध्वनि मैथिली वन्दना-परम्परामे 'मिथिला वन्दना' एक प्रशस्तिपरक रचना थिक शान्त आ भक्ति रस। वक्रोक्तिमे वन्दनाक शब्द मिथिलाक हेरायल वैभवक ध्वनि दैत अछि। विदेह फ्रेमवर्क मिथिला वन्दना मैथिली क्षेत्रीय पहचान-राजनीतिक एक महत्वपूर्ण अंग थिक। विदेह फ्रेमवर्कमे ई 'मिथिला = मैथिली' पहचानक affirming gesture थिक। २०. आशीष अनचिन्हार रचना: गजल; किछु गद्य कविता | गजल आ गद्य कविता परिचय आशीष अनचिन्हार विदेह आन्दोलनक सबसँ महत्वपूर्ण गजल-कविसभमे छथि। हुनकर मैथिली गजल 'अनचिन्हार आखर' आन्दोलनक नींव थिक। रस-ध्वनि गजलमे शृंगार + वियोग। प्रत्येक शेर एक सम्पूर्ण विचार थिक (औचित्य), आ रदीफ-काफियाक संरचनामे ध्वनि repetition क माध्यमसँ काज करैत अछि। 'गद्य कविता' मे शृंगारसँ परे एक राजनीतिक चेतना सेहो अछि। बाख्तिन / Dialogism बाख्तिनक dialogism सँ गजल स्वाभावतः dialogic form थिक मक्तामे कवि अपन नाम लऽ स्वयं सँ गप करैत छथि। अनचिन्हारक गजलमे ई self-referential dialogue मैथिली गजलक एक defining feature थिक। विदेह समानान्तर इतिहास अनचिन्हारक योगदान जे ओ मैथिली गजलक prosody (बहर, काफिया, रदीफ) कें systematize कएलनि आ विदेहक माध्यमसँ propagate कएलनि। ई साहित्य अकादेमीक institutionalised काव्य-रूपक एक शक्तिशाली विकल्प थिक। २१. वौएलाल साह रचना: मधेशक आवाज | मधेश आन्दोलन कविता रस-ध्वनि वीर रस + रौद्र रस मधेशक आवाज। वक्रोक्तिमे 'मधेशक आवाज' एक व्यक्तिक नहि, पूरा जनसमूहक आवाज थिक। फानन / सबाल्टर्न फाननक 'national consciousness'क फ्रेमवर्कसँ: साहक कविता मधेशक collective identity कें articulate करैत अछि जे colonial/brahmanical hegemony क विरुद्ध एक counter-narrative थिक। २२. सन्तोष कुमार मिश्र रचना: हमर मीत | मित्र-भाव कविता रस-ध्वनि 'हमर मीत' मे मधुर रस मित्रताक गर्मजोशी। सरल भाषा, गहींर उतरैत भावना। औचित्य: सरलता स्वयं एहिठाम काव्य-गुण थिक। २३. हेमांग आश्विनकुमार देसाइ रचना:गुजराती कविता: समीकरण | गुजराती-मैथिली आदान-प्रदान रस-ध्वनि 'समीकरण' एक गणितीय रूपकसँ जीवनक सामाजिक समस्याकेँ देखैत अछि। अद्भुत रस। ध्वनि: 'समीकरण' (equation) जीवनमे सब किछु balanced नहि अछि, ई imbalance ही समस्या थिक। बूर्द्यू (Bourdieu)/ Field Theory बूर्द्यू (Bourdieu) क 'field' अवधारणासँ: देसाइक मैथिलीमे लेखन एक inter-field exchange थिक गुजराती आ मैथिली literary fields क बीच। विदेह एहि inter-field dialogue कें institutionalise कएलक। २४. अशोक चौधरी रचना (शीर्षकहीन) | मौनक शक्ति रस-ध्वनि अशोक चौधरीक रचनाक कोनो शीर्षक नहि देल गेल जे स्वयं एक वक्रोक्ति थिक। Silence as statement. शान्त रस जे नहि कहल गेल से सेहो किछु कहैत अछि। नव्य-न्याय गंगेशक 'अभाव' क अवधारणा एहिठाम सोझे लागू होइत अछि: शीर्षकक अभाव एक विशेष प्रमाण थिक 'नाम-अभाव' स्वयं एक statement थिक। २५. उपेन्द्र भगत नागवंशी रचना: बुढ़वा | दलित स्वर रस-ध्वनि 'बुढ़वा' (बूढ़ा आदमी) एक दलित परिप्रेक्ष्यसँ लिखल कविता थिक जाहिमे एक वृद्ध गरीब व्यक्तिक जीवनक पीड़ा अछि। नागवंशीक दलित आवाज मैथिली कवितामे एक महत्वपूर्ण counter-canonical आवाज थिक। अम्बेडकर / फानन अम्बेडकरक सामाजिक न्यायक फ्रेमवर्कसँ: 'बुढ़वा' मे ओ system देखाइत अछि जाहिमे दलित लोकक बुढ़ापा सेहो dignity सँ नहि होइत अछि। फाननक 'decolonization of the mind'क दृष्टिसँ ई कविता दलित चेतनाक साहसी अभिव्यक्ति थिक। विदेह समानान्तर इतिहास साहित्य अकादेमीक मैथिली canonical space मे दलित आवाजक ऐतिहासिक हाशियाकरण रहल अछि। नागवंशीक space सबसँ महत्वपूर्ण counter-canonical gesture थिक। २६. डॉ. सुरेन्द्र लाभ रचना: इतिहास; इन्कलाब | ऐतिहासिक आ राजनीतिक कविता रस-ध्वनि 'इतिहास' मे वीर + करुण रस इतिहासक क्रूरता आ प्रतिरोध दुनू। 'इन्कलाब' मे रौद्र + वीर रस। वक्रोक्ति: 'इन्कलाब' कें मैथिलीमे कहनाई स्वयं एक राजनीतिक कार्य थिक। ग्राम्शी / बेन्यामिन ग्राम्शीक 'war of position'क फ्रेमवर्कसँ: लाभक कविता इतिहासकेँ एक contested terrain मानैत अछि। बेन्यामिनक 'brushing history against the grain' सँ: 'इतिहास' कविता मुख्यधारा narrative कें उलटा देखैत अछि। २७. सरस्वती चौधरी 'रचना' रचना: सम्बन्धक कोनो सूत्र | नारी दृष्टि रस-ध्वनि 'सम्बन्धक कोनो सूत्र' (सम्बन्धक कोनो ताग) एकटा dee personal कविता थिक ऋण्यता (relationships) क fragility आ continuity क बीच। वियोग-शृंगार प्रधान। ध्वनि: 'सूत्र' (ताग) एक thin thread थिक जे सब किछु प्रेम, सम्बन्ध, पहचान बान्हि कऽ रखने अछि। नारीवादी दृष्टि सरस्वती चौधरीक कविता मैथिली नारीक आन्तरिक जगतकेँ ओ भाषा दैत अछि जे domestic space मे सिमटि जाइत अछि। स्पिवाकक 'subaltern woman'क अवधारणासँ ओ नारी जे सम्बन्धक 'सूत्र' सँ बँधल अछि। २८. डॉ. अजित मिश्र रचना: मिथिला-धाम | तीर्थ आ परम्परा कविता रस-ध्वनि 'मिथिला-धाम' मिथिलाकेँ एक पवित्र तीर्थक रूपमे देखैत अछि भक्ति रस + शान्त रस। वक्रोक्ति: 'धाम' (पवित्र स्थल) मिथिलाक भौगोलिक वास्तविकता आ सांस्कृतिक पहचान दुनू थिक। २९. सुनीलकुमार मल्लिक रचना: घड़ी | समय-कविता रस-ध्वनि 'घड़ी' एक minimalist कविता थिक समयक existential महत्वपर। शान्त रस। ध्वनि: घड़ी केवल timepiece नहि ओ mortality क reminder थिक। ३०. राजकमल चौधरी रचना: बही-खाता; एकटा प्रेम-कविता | अप्रकाशित रचना (सौजन्य डॉ. देवशंकर नवीन) परिचय राजकमल चौधरी (१९२९-१९६७) मैथिली साहित्यक एक titan छथि हुनकर दू टा अप्रकाशित कविता डॉ. देवशंकर नवीनक सौजन्यसँ एहिठाम प्रस्तुत अछि। 'बही-खाता' हुनकर जीवन-दर्शनक एक concentrated expression थिक। 'बही-खाता' क विश्लेषण 'बही-खाता' मे जीवनकेँ एक 'लाल बही' (red ledger) मे दर्ज केनाइ जाहिमे पाप-पुण्य, इच्छा-वासना सब account मे अछि। ई Kafkaesque image थिक जीवन एक bureaucratic record बनि गेल। ध्वनि: 'कविता लिखबाक ई लाल-बही / थिक हमर जीवन-खाता' कविता आ जीवन एक्के अछि। 'एकटा प्रेम-कविता' मे वियोग-शृंगार आ अनिर्वचनीय emotional longing। 'एकटा म्लान-मुख स्त्री, अनचिन्हार' एक 'अपरिचित महिला'क छवि। ध्वनि: ई अनचिन्हार स्त्री की थिक? हेरायल प्रेम? मृत्यु? एक idealized feminine image? ई ambiguity कविताकेँ timeless बनबैत अछि। बाख्तिन / Polyphony राजकमल चौधरीक कवितामे बाख्तिनक 'polyphony' स्पष्ट अछि कइएक टा आवाज एक संग बजैत अछि। 'बही-खाता' मे व्यापारी, mystic, कवि, पापी सब एक्के speaking voice मे समाएल अछि। नव्य-न्याय 'बही-खाता' मे गंगेशक 'विशेषता' (particularity) क अवधारणा: ledger क सभ entry एकटा particular event थिक जीवनक कोनो moment universal नहि, सब specific आ named अछि। विदेह समानान्तर इतिहास राजकमल चौधरीक अप्रकाशित रचनाकेँ विदेहमे प्रकाशित केनाइ ई exactly Videha Parallel History Framework केर कार्य थिक। जे mainstream canon मे नहि आएल, ओकरा विदेह canonical space देलक। ई literary archaeology थिक। ३१. जीवकान्त (जीवकान्त झा, जन्म १९३६) रचना: वनदेवी; जन-जन याचक | साहित्य अकादेमी पुरस्कार विजेता (१९९८) परिचय जीवकान्त (पूर्ण नाम जीवकान्त झा, जन्म २५.०७.१९३६, अभुआढ़, सुपौल) मैथिलीक स्वतन्त्रता-पश्चात् सबसँ महत्वपूर्ण कवि सभमे छथि। साहित्य अकादेमी पुरस्कार (१९९८), किरण सम्मान (१९९८), वैदेही सम्मान (१९८५)। हुनकर काम ग्रामीण वास्तविकता, आदिवासी विस्थापन आ पर्यावरण चेतनाक संगम थिक। 'वनदेवी' क विश्लेषण 'वनदेवी' मैथिली कवितामे एक landmark रचना थिक। एक आदिवासी महिला जे जंगलमे भटकैत अछि, शहरमे हवेलीमे झाड़ू-पोछा दइ लेल जाइत अछि, आ एहि प्रक्रियामे अपन 'वन' हेरा दैत अछि। कविताक closing image: 'शहर ओकरा चिबा कए सुता दैत छैक / ओकर खून चाटि कए नेहाल होइत छैक' ई मैथिलीमे फाननक भाषा थिक। रस-ध्वनि करुण रस प्रधान मुदा ई मात्र sympathy नहि, ई political करुणा थिक जे action demand करैत अछि। ध्वनि: 'वनदेवी' (वन-देवी = forest goddess) ओ आदिवासी महिला थिक जे अपन natural world सँ torn अछि। एहि displacement मे एकटा cosmic grief अछि। वक्रोक्ति: 'Motor मे / तेल जकाँ जरैत अछि वनवासी-जन' human bodies as fuel for urban machinery। फानन / स्पिवाक / अम्बेडकर फाननक 'Wretched of the Earth': जीवकान्तक वनदेवी ओ व्यक्ति थिक जिनका modernity अपन धरतीसँ उखाड़ि देलक। स्पिवाकक subaltern theory सँ: ई आदिवासी महिला 'बाजि' नहि सकैत अछि ओ कवितामे सेहो मौन अछि; कविता हुनका विषयमे बजैत अछि, हुनकर आवाज नहि। अम्बेडकरक 'annihilation of caste' सँ: वनदेवीक दुर्दशा एक जाति-आधारित exclusion क natural result थिक। नव्य-न्याय गंगेशक 'परोक्ष अनुमान' (inference from unseen) एहिठाम लागू होइत अछि: हम वनदेवीकेँ सोझे नहि देखैत छी हम बोनमे कुहेस, खाली bucket, युवा पुरुषक अनुपस्थिति देखैत छी आ एहिसँ वनदेवीक story infer करैत छी। इएह एहि कविताक epistemological शक्ति थिक। विदेह समानान्तर इतिहास जीवकान्तक काज साहित्य अकादेमी award प्राप्त करबाक बादो विदेहमे प्रकाशित होइत अछि ई विदेहक non-exclusive approach देखबैत अछि। विदेह canonical आ counter-canonical दुनूकेँ space दैत अछि। ३२. रूपा धीरू रचना: सर्व-पीड़ा | नारी स्वर दर्द कविता रस-ध्वनि 'सर्व-पीड़ा' (सभक पीड़ा) एकटा collective pain केर कविता थिक नारीक, समाजक, सृष्टिक। करुण रस। वक्रोक्ति: 'सर्व' (all) ई केवल एक महिलाक दर्द नहि, ई universal pain थिक। ३३. अन्नावरन देवेन्दर रचना: पानि अछि, मात्र आँखिक नोर | अश्रु-कविता रस-ध्वनि 'पानि अछि, मात्र आँखिक नोर' एक minimalist कविता जाहिमे पानि/अश्रुक रूपक बहुत किछु कहैत अछि। करुण रस। ध्वनि: 'मात्र आँखिक' (only from the eyes) ई एक particular, personal grief थिक। ३४. अमरेश यादव रचना: आह्वान | आह्वान कविता रस-ध्वनि 'आह्वान' वीर रसक कविता थिक एक आह्वान, एक पुकार। वक्रोक्तिमे 'आह्वान' केवल एक शब्द नहि ओ एक political summons थिक। ओ.बी.सी. / यादव पहचान अम्बेडकरक framework सँ: हुनकर 'आह्वान' OBC communities कें अपन राजनीतिक पहचान reclaim करबाक call थिक। ३५. श्यामल सुमन रचना: मैथिली दोहा | दोहा परम्परा रस-ध्वनि 'मैथिली दोहा' कबीर आ विद्यापतिक दोहा परम्पराक नवीनीकरण थिक। शान्त रस। दोहाक brevity मे ध्वनिक maximum काज होइत अछि। विदेह फ्रेमवर्कमे दोहा परम्पराकेँ आधुनिक मैथिलीमे revive केनाइ Videha's folk-modernism project क हिस्सा थिक। ३६. हिमांशु चौधरी रचना: बाल गीत; तोँ स्वतन्त्र छेँ | बाल साहित्य रस-ध्वनि वात्सल्य रस बाल साहित्यक primary रस। 'तोँ स्वतन्त्र छेँ' मे एक interesting twist अछि: बच्चाकेँ freedom क सन्देश देनाइ एक liberatory pedagogy थिक। वक्रोक्ति: बच्चाक 'स्वतन्त्रता' केवल खेल नहि ओ future civic identity क बीज सेहो थिक। ३७. दयाकान्त रचना: पाँच लाख बौआक दाम | दहेज विरोधी कविता रस-ध्वनि 'पाँच लाख बौआक दाम' (बेटाक कीमत पाँच लाख) एक क्रूर दहेज-विरोधी satire थिक जाहिमे एक बेटाकेँ 'पाँच लाख क दाम' बला मानल जाइत अछि। बीभत्स + हास्य रस। वक्रोक्ति: 'बौआक दाम' एक commodity रूपक थिक। ध्वनि: जँ बेटाक कीमत 'पाँच लाख' अछि तँ बेटीक कीमत की? ई unspoken प्रश्न कविताक सबसँ powerful ध्वनि थिक। अम्बेडकर / नारीवादी अम्बेडकरक patriarchy क critique आ नारीवादी दृष्टि दुनूसँ ई कविता मैथिली समाजमे gender relationships क commodification कें expose करैत अछि। ३८. अजित कुमार झा रचना: ओ तँ मुहेँक बड़जोड़ छथि | राजनीतिक व्यंग्य रस-ध्वनि 'ओ तँ मुहेँक बड़जोड़ छथि एक political satire थिक एक नेता जे केवल बड़-बड़ वादा करैत अछि मुदा किछु करैत नहि। Refrain 'नेताजी किछु कऽ कऽ देखाबथि!' ई कवितामे एक वक्रोक्ति थिक। बाख्तिन / Carnivalesque बाख्तिनक carnivalesque क अवधारणासँ: ई कविता एक carnival थिक जाहिमे नेताक authority क मखौल उड़ाओल जाइत अछि। Refrain structure एक comic timing दैत अछि जे political mockery कें intensify करैत अछि। ३९. सुमित आनन्द रचना: जेम्हरे देखू तेम्हरे लाइन!! | व्यंग्य कविता रस-ध्वनि 'जेम्हरे देखू तेम्हरे लाइन!!' एक humorous-satirical कविता थिक जाहिमे आधुनिक भारतक 'queue culture' क मखौल अछि। अन्तमे 'सभसँ बड़का शमशानमे लाइन' ई last punchline एक sharp satirical dart थिक। हास्य + बीभत्स रस। ध्वनि: 'लाइन' केवल waiting नहि ओ bureaucratic dehumanization क symbol थिक। ४०. विजया अर्याल रचना: आजुक जीवन | नेपालसँ मैथिली कविता रस-ध्वनि 'आजुक जीवन' एक existential कविता थिक जाहिमे जीवनकेँ 'मृत्युसँ सापट माँगिकऽ' जिनाई बतायल गेल अछि। शान्त + बीभत्स रस। 'प्रतेक दिन मृत्युसँ सापट माँगिकऽ / बाँकी रूपमे बाँचि रहल अछि जीवन' life as perpetual debt to death। ४१. सरोज खिलाडी रचना: मनक बात मनमे | नारी अन्तरंग रस-ध्वनि 'मनक बात मनमे' एक confessional कविता थिक एक नारी जे अपन प्रिय सँ बात नहि कऽ सकलीह, अखन regret मे अछि। वियोग-शृंगार + करुण। 'अएनाक सोझाँ हम किए मुस्किआइ छी?' mirror as confidant। वक्रोक्ति: mirror ही ओ space थिक जाहिमे suppressed self बजैत अछि। नारीवादी मनोविज्ञान 'अएना' (दर्पण)क motif Lacan क 'mirror stage' क प्रयोग नारीक पहचान-निर्माण आ हुनकर सामाजिक रूपसँ लादल मौनक बीच tension देखबैत अछि। ४२. उमेश मंडल रचना: गनियारि पिसबाक गीत; तेलकसाय लगबैक गीत; दसमासी सोहर | लोक गीत परिचय उमेश मंडल विदेहक सहायक सम्पादक आ मैथिली लोक-साहित्यक एक महत्वपूर्ण compiler छथि। सदेह ३ मे हुनकर तीन टा लोक-गीत अछि पीसबाक गीत (गनियारि), तेल निकालबाक गीत (तेलकसाय), आ जन्म-माह गीत (दसमासी सोहर)। ई मैथिली मौखिक परम्पराक एकटा invaluable archive थिक। रस-ध्वनि वात्सल्य रस + शृंगार रस लोक-गीतक primary rasas। 'दसमासी सोहर' मे गर्भावस्थाक सभ मासक वर्णन एक unique narrative structure थिक। वक्रोक्ति: domestic काज (पिसनाइ, तेल निकालनाइ) महिला श्रमकेँ एक poetic act मे transform करैत अछि। बेन्यामिन / मौखिक परम्परा बेन्यामिनक 'The Storyteller' सँ: उमेश मंडलक लोक-गीत संकलन ओहि 'aura' केँ preserve करैत अछि जे printed text मे हेरा जाइत अछि। विदेहक digital archiving एहि क्षतिकेँ minimize करैत अछि। विदेह समानान्तर इतिहास उमेश मंडलक लोक-गीत preservation विदेहक सबसँ महत्वपूर्ण archival योगदानसभमे एक थिक। साहित्य अकादेमी canonical मैथिलीमे modernist poetry कें prefer करैत अछि विदेह लोक-साहित्यकेँ equally canonical position देलक। ४३. रूपेश कुमार झा 'थ्रेथ' रचना: खेली सप्पत जा भुइयाँ थान | बाल साहित्य रस-ध्वनि वात्सल्य रस बालकक खेल-दुनिया। 'भुइयाँ थान' (धरती/जमीन) मे खेल ई ग्रामीण बचपनक एकटा honest portrayal थिक। ४४. विनीत उत्पल रचना: मनुख आ माल; समाजक ई रूप | सामाजिक यथार्थ कविता रस-ध्वनि बीभत्स रस समाजक deterioration देखबाक disgust। वक्रोक्ति: 'मनुख आ माल' commodity form क human form सँ तुलना। ई Marx क commodity fetishism क मैथिली काव्य equivalent थिक। ४५. राजदेव मंडल रचना: आह; ज्ञानक झंडा; झाँपल अस्तित्व; रहब अहाँ सभक संग; नदीक माछ; बाट-बटोही; सीमा परक झूला; चीड़ीक जाति | सर्वाधिक कविता परिचय राजदेव मंडल सदेह ३ क सर्वाधिक prolific कवि छथि ८ टा कविता! ई स्वयं हुनकर प्रतिबद्धताक एक testimony थिक। हुनकर कविता राजनीतिसँ पर्यावरण, personal pain सँ social critique धरि पसरैत अछि। रस-ध्वनि विश्लेषण 'आह' मे करुण रस। 'ज्ञानक झंडा' मे वीर रस ज्ञानक विजय-यात्रा। 'झाँपल अस्तित्व' मे बीभत्स + करुण suppressed existence क दर्द। 'चीड़ीक जाति' मे एक असाधारण वक्रोक्ति: 'जाति' (caste/species) दुनू अर्थमे चिड़ियाक species आ मनुष्यक जाति एक संग। अम्बेडकर / पर्यावरण 'चीड़ीक जाति' मे अम्बेडकरक caste critique आ ecological consciousness क असाधारण संगम: चिड़ै सेहो 'जाति' मे बान्हल अछि? वा चिड़ै ओहि लोकसभक रूपक थिक जे caste system मे 'चिड़ै' (शक्तिहीन) छथि? विदेह समानान्तर इतिहास राजदेव मंडल मैथिलीक ओहन कवि छथि जे साहित्य अकादेमीक mainstream मे नहि आएल, विदेह हुनका एक prolific आवाजक रूपमे present कएलक। इएह exactly विदेहक parallel history mission थिक। ४६. शेफालिका वर्मा रचना: बाजी; अनबुझल; संग चाहे जे होइ; वचनक मास | नारी कवि परिचय शेफालिका वर्मा (जन्म ९ अगस्त, १९४३, भागलपुर) मैथिलीक सबसँ significant नारी कविसभमे छथि। 'बाजी' क विश्लेषण 'बाजी' एक philosophical कविता थिक 'ई हमर देश थिक' सँ शुरू भऽ कऽ समाजक deterioration आ मनुष्यक मनुष्यसँ दूरी धरि। 'आदमीक जंगल बढ़ि रहल / गाछ बृच्छ कटि रहल' ई ecological रूपक एक संग physical environment आ human social environment दुनूक लेल थिक। रस-ध्वनि बीभत्स रस प्रधान आधुनिक सभ्यताक decay पर। वक्रोक्ति: 'राम कतए चलि गेला' रामक गेनाइ एक symbol थिक सब किछु नैतिकताक जे हेरा गेल। ध्वनि: 'बाजी दुनूमे लागल अछि / के कतेकों आगू' जनसंख्या वृद्धि बनाम पेड़-कटाई, ई एक absurd 'race' थिक। स्पिवाक / Eco-Feminism स्पिवाकक eco-feminism क फ्रेमवर्कसँ: वर्माक कवितामे nature-destruction आ नारी-अवस्था एक linked condition थिक। 'सीता आइयो जरि रहल अछि' Sita एक eternal sufferer क रूपमे, अखनो जरैत अछि। ई feminist myth-critique मैथिलीमे rare थिक। नव्य-न्याय 'अनबुझल' (unexplained) मे गंगेशक 'संशय' (doubt/uncertainty) क अवधारणा central थिक: कविताक protagonist एक 'अनबुझल' थिक unresolved, unexplained presence। ४७. महाकान्त ठाकुर रचना: की चाहलौं; उदारीकरण | उदारीकरण-विरोधी कविता रस-ध्वनि करुण + बीभत्स रस आर्थिक हताशाक pathos। 'उदारीकरण' मे वक्रोक्ति: उदारीकरणक शब्दमे 'freedom' केर connotation अछि, मुदा कवितामे ई गरीबी आ विस्थापनक कारण थिक। ध्वनि: आर्थिक 'स्वतन्त्रता'क पाछाँ आर्थिक बन्धन थिक। ग्राम्शी / पूँजीवाद समीक्षा ग्राम्शीक 'cultural hegemony' सँ: उदारीकरण मात्र आर्थिक नीति नहि ओ एक ideological hegemony थिक जिनका हम 'प्रगति' कहैत छी। महाकान्त ठाकुरक कविता एहि hegemony क counter-narrative थिक। ४८. स्व. कालीकांत झा 'बुच' (१९३४-२००९) रचना: विरक्ति; पोताक अट्ठहास; दीनक नेना | स्मारक प्रस्तुति परिचय स्व. कालीकांत झा 'बुच' (१९३४-२००९) समस्तीपुर जिलाक करियन गामसँ छलाह महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि। हुनकर निधन २००९ मे भेलनि सदेह ३ मे ई एक posthumous tribute थिक। 'विरक्ति' क विश्लेषण 'विरक्ति' १९९० मे अपन अर्धांगिनीक मृत्युक पश्चात् लिखल गेल कवितामे नोट अछि: 'विशेष:- स्व. कवि एहि कविताक रचना सन् १९९० ई. मे अपन अर्धांगिनीक मृत्युक वियोगमे कएलनि।' ई एक personal elegy थिक जे शास्त्रीय मैथिली वियोग-कविताक परम्परामे fit बैसैत अछि। रस-ध्वनि करुण रस अपन गहनतममे personal loss universal statement मे परिवर्तित। 'पोताक अट्ठहास' मे contrast: एक दिस पोताक शैतानी हँसी, दोसर दिस बूढ़ दादाक ironic commentary। वात्सल्य + शान्त रस। 'दीनक नेना' (गरीबक बच्चा) मे करुण + वीर रस। विदेह समानान्तर इतिहास 'बुच' क posthumous inclusion विदेहक archival mission क एक poignant example थिक: हुनका academic posthumous anthology वा national anthology क इन्तजार नहि करऽ पड़लनि विदेह तत्काल preserve कएलक। ४९. मनीष ठाकुर रचना: विरह गीत | वियोग परम्परा रस-ध्वनि 'विरह गीत' मैथिली वियोग-कविताक परम्परामे अछि। शृंगार-वियोग रस प्रधान। गीत form मे melodic quality ध्वनिकेँ amplify करैत अछि। ५०. चन्द्रकान्त मिश्र रचना: जागु-जागु मैथिल | जागरण कविता रस-ध्वनि 'जागु-जागु मैथिल' एक political call-to-action कविता थिक वीर रस। ई मैथिलीक जागरण genre क कविता थिक जाहिमे लोककेँ अपन सांस्कृतिक आ राजनीतिक पहचानक लेल जागि उठबाक आह्वान अछि। विदेह फ्रेमवर्क विदेह आन्दोलनक एक core mission थिक मैथिली सांस्कृतिक आ भाषाई पहचानकेँ revive केनाइ। चन्द्रकान्त मिश्रक कविता सोझे एहि mission कें support करैत अछि। ५१. कुसुम ठाकुर रचना: चुल बुली कन्या बनि गेलहुँ; अभिलाषा | नारी जिज्ञासा रस-ध्वनि हास्य + शृंगार रस एक नारीक playful self-discovery। दुनूमे नारी agency क affirmation अछि। स्पिवाकक framework सँ ई 'claiming of agency' क gesture थिक। ५२. शिव कुमार झा 'टिल्लू' रचना: चश्माक बोखार; हिंसक नानी; कोप भवनमे कनियाँ; श्रेयसीक विलाप | विविध रंग रस-ध्वनि 'टिल्लू'क चारू कविता भिन्न-भिन्न world मे अछि: 'चश्माक बोखार' शृंगार रस; 'हिंसक नानी' हास्य + बीभत्स (dark comedy); 'कोप भवनमे कनियाँ' रौद्र + शृंगार (domestic conflict); 'श्रेयसीक विलाप' करुण (वियोग)। ई range देखबैत अछि जे टिल्लू एक versatile कवि छथि। ५३. धर्मेन्द्र विह्वल रचना: बाबाक अवसान; ओकरासभक अन्त होबाक चाही | सामाजिक आक्रोश कविता रस-ध्वनि 'बाबाक अवसान' (पिताक निधन) मे करुण रस। 'ओकरासभक अन्त होबाक चाही' मे रौद्र रस oppressors क विरुद्ध आक्रोश। दुनूमे एक moral urgency अछि। अम्बेडकर 'ओकरा सभक अन्त होबाक चाही' मे अम्बेडकरक annihilation of caste क भाषा resonate करैत अछि, ओहि लोकसभक 'अन्त' चाहब जे exploitation क system चलबैत छथि। ५४. रघुनाथ मुखिया रचना: अनुत्तरित प्रश्न; कविताक शीर्षक जकाँ | Meta-कविता रस-ध्वनि 'अनुश्रित' (Unannounced) आ 'कविताक शीर्षक जकाँ' दुनू meta-literary अछि: कविताक बारेमे कविता। ई मैथिलीमे एक rare postmodern gesture थिक। शान्त रस + बौद्धिक जिज्ञासा। बाख्तिन / Meta-Narration बाख्तिनक metafiction क अवधारणासँ: मुखियाक कविता अपन स्वयं केर कृतृमता पर comment करैत अछि, ई मैथिलीमे rare modernist self-awareness थिक। ५५. लक्ष्मण झा 'सागर' रचना: चुट्टीधारी | सबाल्टर्न कविता रस-ध्वनि 'चुट्टीधारी' करुण रस। वक्रोक्ति: चुट्टीधारीक wandering existence एकटा larger displacement क रूपक थिक। स्पिवाक / सबाल्टर्न स्पिवाकक subaltern framework सँ: 'चुट्टीधारी' ओ working-class figure थिक जिनका mainstream literature नहि देखैत अछि। समानान्तर धारा ओकरा canonical space देलक। ५६. विभूति आनन्द रचना: एक-दू-तीन...नओटा कविता; प्रतिपक्ष: १-९; मदारी युग; नब पीढ़ी आदि | साहित्य अकादेमी पुरस्कार २००६ 'प्रतिपक्ष: एक' क विश्लेषण 'प्रतिपक्ष: एक' एक deeply personal confession थिक घर आएल थाकल-हारल आदमीकेँ की चाही? Classical music, गर्म चाह, सुकून, कनियाँक तनावरहित चेहरा, मित्रक स्मृति, भविष्यक स्वप्न मुदा किछु नहि होइत अछि। 'हम यन्त्र-मानव बनल सन जीब लागल छी' machine-man बनब modernity क रूपक थिक। रस-ध्वनि 'प्रतिपक्ष' series मे शान्त रस + बीभत्स रस alienation क existential dread। 'प्रतिपक्ष: दू' मे राजनीतिक complexity: जखन 'पक्ष' आ 'प्रतिपक्ष' मे कोनो फर्क नहि तँ की करबाक चाही? 'मदारी युग' मे: हम सब एक circus मे perform कऽ रहल छी। नव्य-न्याय 'प्रतिपक्ष: दू' मे गंगेशक 'विपरीतव्यभिचारी हेतु' (counter-example) क अवधारणा central थिक: जखन पक्ष आ प्रतिपक्ष दुनू एक्के जगह ठाढ़ भऽ जाथि, तँ logic breakdown भऽ जाइत अछि। हीन भावना, मूलधाराक कन्नारोहट आ दोसरापर /खास कऽ महिलापर दोख देबाक मूलधाराक परम्परा विभूति आनन्द कवितामे अछि। ५७. रमण कुमार सिंह रचना: गुमशुदगी रिपोर्ट | Missing-Person कविता रस-ध्वनि 'गुमशुदगी रिपोर्ट' (Missing Person Report) एक unusual कविता थिक एक police report क form मे? वा एक metaphorical 'missing' report? ई ambiguity कविताक central move थिक। करुण + अद्भुत रस। ५८. मायानाथ झा रचना: मातृगिरा | मातृभाषा कविता रस-ध्वनि 'मातृगिरा' (माँक आवाज/मातृभूमि) मे शान्त + वात्सल्य रस मातृभाषा आ मातृभूमि दुनूक संगम। वक्रोक्ति: 'गिरा' (आवाज/वाणी) केवल language नहि ओ सांस्कृतिक पहचान आ वंश-परम्परा थिक। ५९. सच्चिदानन्द 'सौरभ' रचना: देखू नै...; भोरक आसमे; अन्हारक संग रहैत रहैत | काव्यात्मक Trilogy रस-ध्वनि तीनू कविता एक trilogy जकाँ: 'देखू नै', 'भोरक आसमे', 'अन्हारक संग रहैत रहैत'। तीन stages: avoidance, hope, resignation। ध्वनि: 'अन्हार' केवल रात नहि ओ राजनीतिक, भावनात्मक, existential darkness सेहो थिक। ६०. अशोक दत्त रचना: बाल गीत (३); ओधि उपाड़ | बाल साहित्य आ व्यंग्य रस-ध्वनि तीन बाल गीत मे वात्सल्य रस। 'ओधि उपाड़' मे हास्य रस satirical piece। वक्रोक्ति: बाल गीत सरल भाषामे complex मूल्य सिखबैत अछि। ६१. शीतल झा रचना: टी..ऽऽ..स | नेपालसँ गजल-प्रेरित कविता रस-ध्वनि 'हमरोमे अहूमे एकटा टी..स अछि' एक mystery: प्रेम? राजनीति? पहचान? ध्वनि deliberate रूपसँ ambiguous थिक। 'पुजारीक हाथमे अमृत कहाँ विष अछि' religious authority पर प्रश्न! ६२. शम्भु नाथ झा 'वत्स' रचना: मिथिलाक दशा; मोनसँ पढ़ू बढ़ू; मिथिला बचाउ; बेरोजगारीक समस्या। साहित्याचार्य, वेदविद् 'मिथिलाक दशा' क विश्लेषण 'मिथिलाक दशा' मे मिथिलाक सांस्कृतिक deterioration क एक vivid lament थिक मण्डन, विद्यापति, धोती, दुपट्टा, वैदिक धुन सब किछु 'डिस्को' खा लेलक। 'अहीं कहू हम जीबैत छी?' एक existential प्रश्न। रस-ध्वनि करुण रस + बीभत्स रस (cultural loss पर disgust)। वक्रोक्ति: 'डिस्कोक पाछाँ देश बिका गेलैए' एक hyperbole मुदा एक cultural truth। परम्परा बनाम आधुनिकता क tension। ६३. डॉ. योगानन्द झा रचना: घर | घर-कविता परिचय डॉ. योगानन्द झा (जन्म ११ जनवरी १९५५, दरभंगा) एक prolific writer आ researcher छथि। साहित्य अकादेमी पुरस्कार अनुवादक लेल (२००५)। 'घर' (Home/House) हुनकर philosophical कविता थिक। 'घर' क विश्लेषण 'घर' एक दीर्घ कविता थिक जाहिमे 'घर' deterioration क रूपक थिक जे केवल एक घरे टा नहि, बल्कि समाज, लोकतन्त्र, राष्ट्रीय अखण्डता सभक 'घर' थिक। 'यैह हमर घरक थिक नक्शा / हृदय हमर टूटल अछि' हृदय as home, टूटल। रस-ध्वनि करुण रस प्रधान ९ stanzas मे एक slow mounting grief। सभ stanza एक्के refrain सँ बन्द होइत अछि: 'यैह हमर घरक थिक नक्शा / हृदय हमर टूटल अछि'। ई refrain एक ध्वनि थिक सभ बेर वएह घाव। वक्रोक्ति: 'केओ नृप होय हमे का हानी / कखनो ई संवाद / हमर जातिक लोक थिका ई / कखनो उठय विवाद' राजनीतिक passivity क satirical critique। नव्य-न्याय 'घर' मे गंगेशक 'अव्यभिचारी सम्बन्ध' (invariable relation) क अवधारणा: 'घरक टूटनाइ' आ 'हृदयक टूटनाइ' मे एक अव्यभिचारी सम्बन्ध थिक एक संग दोसर अवश्य होइत अछि। ई काव्यात्मक व्याप्ति थिक। ६४. वीरेन्द्र मल्लिक रचना: गतिशीलता | परिवर्तन कविता रस-ध्वनि 'गतिशीलता' एक brief, minimalist कविता थिक। 'आब हम ओ नहि रहलहुँ / किछु आओर भऽ गेलहुँ / से की यौ? / ओ आने लोक कहत।' ई एक postmodern maneuver थिक: self-transformation जे outsider define करत। शान्त रस + existential openness। बाख्तिन बाख्तिनक dialogism सँ: 'ओ आने लोक कहत' हमर पहचान दोसरक आवाजसँ बनैत अछि। ई Bakhtinian insight थिक जे 'I am defined by the Other's gaze'। ६५. गंगेश गुंजन रचना: राधा-१६म खेप | महाकाव्य-श्रृंखलाक एक fragment रस-ध्वनि गंगेश गुंजनक 'राधा' शृंखलाक सदेह ३ मे 'राधाक १६म खेप' अछि। शृंगार-वियोग रस। ध्वनि: 'राधा' मात्र एकटा पौराणिक पात्र नहि ओ मिथिलाक नारीक universal condition क symbol थिक। वक्रोक्ति: birth itself a form of suffering ('माएक गर्भसँ आयल') परम्परागत Hindu कल्याण-दृष्टि नहि, ई existentialist questioning थिक। विदेह फ्रेमवर्क गंगेश गुंजनक 'राधा' series मैथिलीक विद्यापति-आधारित शृंगार परम्पराक एक आधुनिक continuation थिक मुदा एहिठाम राधा एक passive subject नहि, ओ अपन अस्तित्वपर प्रश्न करैत छथि। विदेहमे एहि feminist revision कें space भेटल। ६६. कीर्तिनारायण मिश्र रचना: अकाल | सामाजिक अकाल कविता रस-ध्वनि 'अकाल' एकटा hard-hitting कविता थिक: 'सड़कपर हाँड़ी चिबबैत / छौंड़ा सभ / कुकूर आ पुलिसकेँ / डण्डा देखा रहल अछि' street children कुकूर आ police दुनूकेँ एक्के डण्डा देखबैत। करुण + रौद्र रस। वक्रोक्ति: 'बाँझ सरकार / विदेशक आश्वासनसँ / विवाह रचा रहल अछि' निःसन्तान सरकार विदेशी वादासँ विवाह करैत। अम्बेडकर / Marx 'अकाल' मे भूख एक राजनीतिक category थिक, केवल natural disaster नहि। अम्बेडकर आ Marx दुनू कहलनि जे scarcity manufactured थिक। मिश्रक कविता एहि manufactured scarcity कें सोझे expose करैत अछि। ६७. स्व. प्रशान्त रचना: करू की वृद्ध अथबल छी | पूर्णियाँक कवि रस-ध्वनि करुण + हास्य रस एक वृद्ध व्यक्तिक ironic self-portrait। 'सुदमिया माय माय जे आयल छलथि / नैहरसँ महफापर चढ़िकऽ / तिनका साइकिलपर चढ़ि देखि / सड़कक कातमे दुबकल छी' पहिने palanquin, अखन bicycle ई generation gap क एक funny image थिक। नव्य-न्याय 'मोकामा पुल बनि गेने / सिमिरिया घाटक स्टीमर जकाँ / अकार्य भेल बैसल छी' जखन bridge बनल, ferry useless भेल। ई गंगेशक 'बाधा' (obstacle/replacement) क अवधारणा थिक: modernity एक नव'साधन' थिक जे पुरान 'साधन' कें irrelevant कऽ दैत अछि। ६८. कालिनाथ ठाकुर रचना: सून मिथिलाञ्चल..... | मिथिला आन्दोलन कविता परिचय कालिनाथ ठाकुर (जन्म २४-०६-१९४६, सर्वसीमा, मधुबनी) JK Synthetics Ltd., कानपुरमे १९७३ सँ १९९५ धरि काज कएलनि। अखन 'सारस्वत साधना' मे संलग्न। 'सून मिथिलाञ्चल' क विश्लेषण ई एक political call-to-action कविता थिक मिथिलाक खेती, लोक, नेता, सभक दशाक विविध चित्रण। 'पूँजीपति बाबू भैया / नेता मुखिया / कर्ता-धर्ता/ पालनकर्ता' ई power structure क एक sardonic portrait थिक। 'लाठि लगाकऽ / सादा कागत पर / औँठा निशान / लगबाबथि / महाजन सादा कागचपर औंठा लगबाबैत छथि, ई सूदखोरीक indictment थिक। रस-ध्वनि करुण + रौद्र रस। वक्रोक्ति: 'सून मिथिला चल' 'चल' आ 'चाल' (trick) दुनू अर्थमे मिथिला एक 'चाल' (scheme) थिक? ई ambiguity कविताकें richer बनबैत अछि। ६९. अरविन्द ठाकुर 'अरबिन' रचना: गजल १-४ | मैथिली गजल चारिटा गजल परिचय अरविन्द ठाकुर 'अरबिन' मैथिली गजलमे एक महत्वपूर्ण नाम छथि। चारि टा गजल सदेह ३ मे जे हुनकर range देखबैत अछि: व्यक्तिगत पीड़ा, राजनीतिक टिप्पणी, दार्शनिक चिंतन आ बाढ़िक बिम्ब। शास्त्रीय गजल संरचना: रदीफ-काफिया। मुदा बहरक अभाव। गजल १ क विश्लेषण 'कोना अजुका दिन ससरतै, राति कटतै हओ भजार' दिन एक अजीब numbness मे गुजरैत अछि। 'एक-एकटा पल हमरा लेल सूनामीक हार' हर पल एक tsunami जकाँ। शास्त्रीय गजल संरचना: रदीफ-काफिया। गजल २: दिल्ली व्यंग्य 'लगैए एहि ठामक सभ कान दिल्ली भऽ गेलै' repeated radif 'दिल्ली भऽ गेलै' सब किछु 'दिल्लीकृत' भऽ गेल। Powerful वक्रोक्ति: दिल्ली centralisation आ homogenisation क symbol थिक। गजल ४: बाढ़ि कविता 'बाढ़िमे छप्पर निप्पटा, भेटल तारपोलीन खराप' specific material details (तारपोलीन, दाल, चावल, मुखिया) संग बाढ़ि क छवि। ई social realist गजल थिक जे परम्परागत romantic/philosophical गजल form सँ unusual थिक। विदेह समानान्तर इतिहास साहित्य अकादेमी गजलकेँ मैथिलीमे officially recognize नहि कएलक विदेह केलक। ७०. कुमार पवन (डॉ. पवन कुमार झा) रचना: निहि बिसरैछ; काल्हि तँ रवि छै | प्रेम आ प्रकृति कविता परिचय डॉ. पवन कुमार झा (जन्म २७/१२/१९५८, मुरैठा, दरभंगा)। PGT हिन्दी, केन्द्रीय विद्यालय कटिहार। एक दशकक मौनक बाद २००८ मे लेखनक दोसर पारी शुरू। 'नहि बिसरैछ' क विश्लेषण 'नहि बिसरैछ' एक दीर्घ कविता थिक जाहिमे मुज़फ्फरपुर स्टेशनपर एक ट्रेन scene अछि एक १० बरखक दुबर-पातर बच्चा ट्रेन मे चढ़ल, बहैत नाक, फाटल शर्ट। कवितामे specific sensory details क कमाल: 'जाड़क ओ टिठुरैत कनकनायल भोर', 'अवध आसाम एक्सप्रेस'। रस-ध्वनि करुण रस मुदा ई नहि बिसरैबला करुण थिक। 'नहि बिसरैछ' memory as an ethical act: कवि ओहि बच्चाकेँ नहि बिसरत। वक्रोक्ति: 'नहि बिसरैछ'क की मतलब? केवल याद? वा एक political commitment to not forget the poor? बेन्यामिन वाल्टर बेन्यामिनक 'On the Concept of History' सँ: ई ट्रेनक यात्रा इतिहासक 'emergency brake' थिक भूतकालक पीड़ाकेँ याद रखनाइ ओ प्रायश्चित (redemptive act) थिक जे बेन्यामिनक theses मे central थिक। ७१. श्री विद्यानन्द झा रचना: कोशीक ताण्डव; दहेज दानव | प्रकृति आ सामाजिक कविता रस-ध्वनि 'कोशीक ताण्डव' कोसी बाढ़ि-आपदाक कविता थिक जे बिहारमे एक recurring tragedy थिक। 'ताण्डव' = शिवक मृत्यु-नृत्य ई elemental destruction थिक। रौद्र + करुण रस। वक्रोक्ति: 'ताण्डव' (नृत्य) एक positive शब्द थिक, मुदा एहिठाम death-dance थिक। 'दहेज दानव' straightforward दहेज-विरोधी कविता। करुण + बीभत्स रस। ७२. मो. गुल हसन रचना: सभटा चौपट भऽ गेल | मुसलिम मैथिली आवाज रस-ध्वनि 'सभटा चौपट भऽ गेल' एक satirical lament थिक जाहिमे सब किछु 'चौपट' (बरबाद) भऽ गेल। 'सभटा चौपट' refrain एक वक्रोक्ति थिक: 'चौपट' (ruined) एक लोक-शब्द थिक जे एहिठाम एक devastating political commentary बनि जाइत अछि। बीभत्स + हास्य रस। बूर्द्यू (Bourdieu)/ धार्मिक बहुलता बूर्द्यू (Bourdieu) क 'symbolic violence'क दृष्टिसँ: मो. गुल हसनक मैथिलीमे लिखनाई एक act of reclaiming belonging थिक एक एहन साहित्यिक परम्परामे जे ऐतिहासिक रूपसँ Hindu-brahmin dominated रहल अछि। विदेह फ्रेमवर्क विदेहक editorial policy मे Muslim, Dalit, OBC, नारी सब आवाजकेँ equal space देनाइ central रहल अछि। ७३. मनोज कुमार मंडल रचना: बहीन | भाई-बहिन कविता रस-ध्वनि 'बहीन'मे वात्सल्य + करुण रस भाई-बहिनक ऋण्यताक एक tender portrait। एहि ऋण्यताकेँ मैथिलीमे कवितामे आनब औचित्यक एक perfect example थिक ई topic एहि form मे naturally fit बैसैत अछि। ७४. आमोद कुमार झा रचना: मैथिल नइँ छोटका | पहचान कविता रस-ध्वनि 'मैथिल नइँ छोटका' (मैथिली नहि छोटका) एक पहचान कविता थिक ई 'छोटका' के थिक? जिनका 'मैथिली नहि' बुझाओल गेल? ई ambiguity कविताक central प्रश्न थिक। करुण + अद्भुत रस। भाषाई पहचान मैथिलीकेँ ८ म अनुसूचीमे शामिल करबाक पश्चात् सेहो पहचान-राजनीति complex अछि। आमोद कुमार झाक कविता एहि complexity कें पकड़ैत अछि। ७५. गजेन्द्र ठाकुर (सम्पादक) रचना: आकाश मध्य लिखल हमर लेख | सम्पादक-कवि परिचय गजेन्द्र ठाकुर विदेहक सम्पादक आ सदेह ३ क editor छथि। हुनकर अपन कविता 'आकाश मध्य लिखल हमर लेख' एहिमे शामिल अछि जे सम्पादक आ कवि दुनूक एक unique position थिक। 'आकाश मध्य लिखल हमर लेख' क विश्लेषण आकाशमे लिखनाई ephemeral लेखन। ई कविता ठाकुरक अपन साहित्यिक पहचानक एक meditation थिक। सम्पादक जे स्वयं सेहो कवि छथि, एहि dual role क tension कवितामे महसूस होइत अछि। रस-ध्वनि शान्त + अद्भुत रस। 'आकाश मध्य लिखल' sky-writing transient, unpreservable थिक। ध्वनि: की मैथिली साहित्य सेहो आकाशमे लिखल ephemeral? वा विदेह आ सदेहक archival project एक 'आकाश-लेखन'केँ 'preserve' करैत अछि? बाख्तिन सम्पादकक अपन कविता शामिल केनाइ एक meta-literary act थिक ठाकुर ई कहि रहल छथि जे विदेह/सदेह केवल archival project नहि, ओ एक living literary creation थिक जाहिमे सम्पादक सेहो participate करैत छथि। ई बाख्तिनक 'author as character'क अवधारणा थिक। नव्य-न्याय गंगेश उपाध्यायक नव्य-न्यायमे सम्पादक आ कवि दुनूक लेल एक प्रमाणक जरूरत अछि। ठाकुरक कविता हुनकर 'व्यक्तिगत प्रमाण' थिक- "संपादकीय आत्म-साक्ष्य- संकलनक नेपथ्य सँ संपादकक कथन" कहल जा सकैत अछि। [editor's personal testimony within the very anthology he has assembled.] विदेह समानान्तर इतिहास ठाकुरक सदेह ३ मे अपन कविता शामिल केनाइ Videha Parallel History Framework केर एक defining moment थिक: सम्पादक मात्र इतिहास केवल नहि लिखैत, ओ इतिहासक हिस्सा सेहो छथि। ई विदेह आन्दोलनक एक founding philosophical statement थिक। उपसंहार: सदेह ३ क समग्र महत्व सदेह ३ मैथिली पद्य २००९-१० ७५ कविक एक असाधारण संकलन थिक जे मैथिली कविताक पूरा range कें एक जगह present करैत अछि। एहिमे राजनीतिक आवाज (महेन्द्र कुमार मिश्र, ओम कुमार झा, कालिनाथ ठाकुर), पारिस्थितिकीय आवाज (जीवकान्त, कीर्तिनारायण मिश्र), नारीवादी आवाज (शेफालिका वर्मा, कल्पना शरण, सरोज खिलाडी), दलित आवाज (उपेन्द्र भगत नागवंशी, राजदेव मंडल), मुसलिम आवाज (मो. गुल हसन), गजल आवाज (आशीष अनचिन्हार, अरविन्द ठाकुर), लोक-परम्परा (उमेश मंडल, निशाप्रभा झा), बाल-साहित्य (हिमांशु चौधरी, अशोक दत्त), senior canonical कवि (जीवकान्त, राजकमल चौधरी) आ नव आवाज सब एक संग अछि। चारि framework क synthesis जे एहि समीक्षामे कएल गेल अछि से देखबैत अछि: (१) भारतीय रस सिद्धान्त मैथिली कविताक emotional-aesthetic DNA कें पकड़ैत अछि; (२) पाश्चात्य critical theory [बूर्द्यू (Bourdieu) , स्पिवाक, बाख्तिन, ग्राम्शी, बेन्यामिन, फानन, अम्बेडकर] social-political dimensions कें illuminate करैत अछि; (३) गंगेशक नव्य-न्याय epistemology कवितामे knowledge-construction क logic कें देखैत अछि; (४) Videha Parallel History Framework देखबैत अछि जे ई संकलन मैथिली साहित्यमे एक institutional counter-hegemony क हिस्सा थिक। विदेह आन्दोलनक सबसँ बड़ योगदान ई थिक जे ओ एहि ७५ कविकेँ एक single canonical space देलक जाहिमे साहित्य अकादेमी laureates (जीवकान्त, आदि) आ नव, अप्रकाशित, सबाल्टर्न आवाज दुनू एक संग अछि। ई 'inclusion without exclusion' विदेहक defining characteristic थिक आ सदेह ३ ओकर एक monument थिक। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.२.अंक ४४० पर टिप्पणी विदेह ४४० म अंक पर पाठकीय मन्तव्य प्रणव कुमार झा मैथिलीक मूर्धन्य रचनाकार जगदीश प्रसाद मण्डल केँ केंद्र मे राखि डॉ. उमेश मण्डलक लेख हुनक श्रम-संस्कृति आ उपेक्षित समाजक स्वर केँ बखूबी उजागर करैत अछि। ओहिना, श्री गजेंद्र ठाकुर अपन लेख मे तार्किक विश्लेषण सँ ई सिद्ध कयने छथि जे कोना 'विदेह आन्दोलन' आ तेलुगु-ओड़िया-गुजराती साहित्यक अनुवाद मैथिली मे एकटा 'समानान्तर चेतना' आ 'प्रतिरोधक स्वर' केँ जन्म देलक अछि। प्रीति कुमारीक नशामुक्ति अभियानक पहल सराहनीय अछि, मुदा बिहारक शराबबंदी केँ सफल मानब तथ्य सँ परे अछि। हमरा दृष्टि सँ, ई नीति 'नोटबंदी' जकाँ विफल बुझाइत अछि। यद्यपि एहि सँ घरेलू हिंसा मे किछ कमी आयल, मुदा दोसर दिस तस्करी, जहरीला शराबक त्रासदी, जुवेनाइल क्राइम, आ 'पुलिस-नेता-अपराधी'क नेक्सस मे भारी वृद्धि भेल अछि। राज्यक राजस्व (Revenue) क हानि सेहो एकटा पैघ चिंता अछि। अतः एहि नीतिक गहन पुनरीक्षण आ संशोधन अनिवार्य अछि। कल्पना झा द्वारा व्यास जीक बाद आब श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार' जीक जीवनी लिखब एकटा महत्वपूर्ण काज अछि। जेना कि ओ पुस्तक 'सेतुषाम' मे स्वीकार कयने छथि, 'विदेह'क प्रोत्साहन हुनक लेखनी मे उत्प्रेरक के काज केने अछि। एहि हेतु लेखक आ विदेह दुनू शुभकामनाक पात्र छथि। बद्रीनाथ राय 'अमात्य'क कविता मनोरंजक तँ अछि, मुदा ओकर अंतर्वस्तु 'पितृसत्तात्मक' संकीर्णता सँ ग्रसित अछि। कनियाँक कवयित्री भेला पर 'भोजन बनेबाक' चिंता करब प्रगतिशील सोचक परिचायक नहि थिक। एकर विपरीत, कपिल यादव 'निष्क'क कविता सभक विषयवस्तु प्रेरक आ सामयिक अछि। मिथिला मे 'गीतगाइन'क विलुप्त होइत परंपराक बीच शिव कुमार झा 'टिल्लू'क सोहर आ गीत-माला संगीत प्रेमी सभक लेल एकटा निक निधि अछि। आशीष अनचिन्हार प्रणव कुमार झाक आलेख "अर्थ आवर" एवं "सहकारिताक धागा सभसँ आगा" ज्ञानप्रद अछि। एहन-एहन आलेखक खगता मैथिली भाषाकेँ सदैव रहतै। विप्रकांत मंडल एवं कपिल यादव 'निष्क'जीक स्वागत छनि विदेहमे। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। गद्य Prose २.१. हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२० २.२. प्रीति कुमारी- श्रम संसाधन २.३. प्रणव कुमार झा- मिथिला के विकास मे सहकारिता के मॉडल २.४. प्रणव कुमार झा- अविश्वासक चिकित्सा (लघु कथा) २.५. प्रीति कुमारी- अस्वजन आ दोगरमिया व्यवस्थाके दुरूपयोग 'क दुष्प्रभाव २.६. कंचन कंठ- स्व. पापा डा. नित्यानन्द लाल दासक डायरी सं २.७. लाल देव कामत- पोथी चर्चा : मिथिलाक माटिक सुगन्ध / पोथी चर्चा : प्रेम और विरह २.८. आचार्य रामानंद मंडल- मलंगिया महोत्सव बनाम मलंगिया नाट्य महोत्सव २.९. रबीन्द्र नारायण मिश्र- जयतु जानकी (धारावाहिक उपन्यास) २.१०. आशीष अनचिन्हार- इच्छा मृत्यु: स्वतंत्र भारतक पहिल वैध उदाहरण (संशोधित) २.११. आचार्य रामानंद मंडल- महाकवि विद्यापति अनुसंधान २.१२. बद्रीनाथ राय अमात्य-वेदज्ञ मैथिलक मर्म/ घवाह मैथिलक व्यथा/ वेदज्ञ मैथिलक व्यथा;हमर सारि; विमर्शक विषय २.१३. गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली लेल दलित साहित्य समीक्षाशास्त्र-२ [संदर्भ: प्रभास कुमार चौधरीक 'इन्द्रधनुष', अशोकक 'प्रतिलोम' आ रमेशक 'कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो'/ दलित साहित्य समीक्षाशास्त्र, भारतीय समीक्षाशास्त्र, पाश्चात्य समीक्षाशास्त्र, गंगेशक नव्य न्याय आ विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्कक परिप्रेक्ष्यमे] २.१. हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२० हितनाथ झा (मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070) मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-20 'प्रभात'मे प्रकाशित रंगीन चित्रावली एहि अंकमे प्रस्तुत अछि 'प्रभात'मे प्रकाशित रंगीन चित्रावली। अठारह अंक जे उपलब्ध अछि, ओहिमेसँ एक-एक चित्र लेल गेल अछि। चित्र रंगीन अछि आ एखनहुँ धरि चमक ओहिना देखना जाइछ। चित्रकारक नाम चित्रसभमे अंकित अछि। 1) भवदतत झा कोइलख :-, श्री गणेशजी, सरस्वती ,काली एवं पंडितजी। 2) नारायण ठाकुर कोइलख :- शिवजी 3) जनार्दन झा रानीटोल :- गमलामे गाछ, श्रीसीता,रानी, जोकर, कुलवृक्ष, महाराजा प्रथ्वीराज चौहान आदि। 4) रामचन्द्र 'चन्द्र' :- बुद्धि परीक्षा। 5) राधाकान्त झा क्लास 7 :- M.R.S. A mistress गाँधीजी, रामावतार। 6) भुल्लू ठाकुर कोइलख :- श्रीकृष्ण। संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-7 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-8 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-9 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-10 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-11 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-12 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-13 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-14 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-15 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-16 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-17 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-18 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-19 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.२. प्रीति कुमारी- श्रम संसाधन प्रीति कुमारी श्रम संसाधन
पहिलुका पिढ़िक आर्थिक स्थितिक आधार पर सामाजिक आर्थिक स्थितिक आधार कायम रहल छैक। पछिला पिढ़ि देश आजादी सँ समाजक मुख्य धारामे पछुआईत आबि रहल अछि,से आरो बेसी अन्तर देखाए पड़ैत छैक। विकासक गति ग्रामीण क्षेत्रमे नगण्य बुझाए पड़ल अछि। तीन बरख पूर्व हमर गाममे सरकारी दरमाहा पाबैबाला औंगरी पर गनल - गुथल लोक रहथि। से अपन पड़ोसी गामक लोक सँ नै पछुआई , ताहि लेल परिवारिक जीवन उन्नतशील बनाबय केर आवश्यकता अछि। आब पढ़ल-लिखल युवा वर्ग सँ समाजकेँ आशा छै, ओ प्रतिभावान बनि प्रतियोगिता परीक्षामे अव्वल आबय। उदाहरणके लेल हमर गौंआँ - घरूआ एके ग्राम देवता केँ पूजैत हुनक कृपा सँ नौआबाखर - देवनाथपट्टीमे एखन सरकारी दरमाहा पाबैबाला औंगरी पर गनल गुथल लोकक रफ्तार सँ बढिकेँ संख्याँ बासैठ सँ ग्राफ ऊपर भऽ गेलैक अछि। यथा -: श्री उमाकांत कामत - बीएसएफ सँ भीआर एस, श्री महाकान्त प्रसाद+२ शिक्षक, सुभाष कुमार कामत - बीपीएससी शिक्षक, कैलाश कुमार आनंद - +२ बीपीएससी शिक्षक, जय प्रकाश कामत- एसआई बीएसएफ, उदय कांत वर्मा - प्राथमिक शिक्षक, राज कुमार वर्मा - प्राथमिक शिक्षक, रविन्द्र कुमार वर्मा - शासकीय शिक्षक, मंजू वर्मा स्वास्थ्य विभाग, रणबीर चौधरी - पीआरएस, आनन्दी चौधरी - आँगनबाड़ी केंद्र सेविका, राहुल कुमार चौधरी - प्रोफेसर पोलीटेक्निक कालेज, भानू प्रिया - असिस्टेंट प्रोफेसर पोलीटेक्निक कालेज, बलराम चौधरी - हाईस्कूल शिक्षक, अमन कुमार - दन्त चिकित्सक, अभिषेक कुमार - पशु चिकित्सक, बैजू मंडल - प्रा० शिक्षक, मो० शमशेर मंसुरी - ग्रामीण पुलिस, मो० मुस्लिम साफी - सेवानिवृत्त चौकिदार, मो० फिरोज आलम - प्रा० शिक्षक, मोहम्मद - शिक्षक, राम लोचन कामत - सेवा निवृत्त शिक्षक, शिव नारायण चौधरी - अध्यापक, मनोज कुमार मनुज - आरएम स्टेट बैंक लखनऊ, अवधेश कुमार साह - शिक्षक, रोहित कुमार केशरी- एई कटिहार, आशुतोष कुमार - सर्वे अमीन कटिहार, गुड्डू कुमार साहु - शिक्षक, चन्द्र मोहन साहू - एस एम रेलवे मध्य प्रदेश, छोटे लाल साहू - शिक्षक, राजेश कुमार सुमन - शिक्षक, अमलेश कुमार कामत - रेलवे एस एस ई, बिमलेश कुमार - ए एल पी रेलवे, शंकर कुमार कुमार - अमीन, बागेश्वरी भारती- सेविका, गीता देवी - सेविका, विशेश्वर कामत - प्रा० शिक्षक, देवेंद्र नाथ शर्मा - रेलवे अनुकम्पा, अमीत चौधरी - जेई वेस्ट बंगाल, रामदेव राम - डिलर, जय प्रकाश मंडल - शिक्षक, श्रीमती देवीजी - सचिव ग्राम कचहरी, सकलदीप कामत - वेल्टाउन डाटा आपरेटर, राम अभिलाष सिंह, सेवा निवृत्त सीआईएसएफ, मोहन कामत - शिक्षक, संजीव कुमार लाल - जेई बिहार , सत्य नारायण मंडल - शिक्षक, बिणा देवी - सेविका, रूबी देवी - शिक्षिका, रुबी कुमारी- शिक्षिका, जागेश्वर मंडल,- सेवानिवृत्त वाइस सरकार पीएच ईडी, सुनील कुमार मंडल - शिक्षक, गजेन्द्र प्रसाद हिमांशु - एई आर सी डी, महादेव मंडल - डिलर , शंकर कुमार निराला - अमीन, दया नन्द मंडल - अमीन, अमर कुमार कामत - शिक्षक, इन्द्र कुमार कामत - शिक्षक, सुरेन्द्र कुमार कामत - शिक्षक, शुभ नारायण कामत - सेवा निवृत्त शिक्षक, जीतेन्द्र कुमार कामत-एई पीएचईडी, ध्रुव कुमार कामत - जेई रेलवे, बाबूदाय देबी - सेविका, परमा नन्द शर्मा - वेल्टान आओर रघुनंदन कामत - सेवा निवृत्त कोसी प्रकल्प। दशौनी, पुरहीत आ पण्डा जी हमरा गामक ग्राम विकास कमिटीके पँच लोकनि लग आबि फकरा बजथिन " उत्यम खेती - मध्यम बनीज, नीखिद चाकरी - भीख निदान।" से एहि कवित् केँ सुनि खेतिहर आ श्रमिक लोक प्रशन्न होथि। श्रम संसाधन लेल २००५ सँ १० धरि आ २०१० सँ १५ धरि तथा २०१५ सँ २० धरि एवं २०२० ई० सँ एखन धरि प्रगति करैत रहलाह बिहारक पूर्व मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार जी । आब नेतृत्व परिवर्तन भेलासन्ता नवगठित सम्राट चौधरी एनडीए सरकार द्वारा ई विभाग चुनौती बनल रहत ताधरि , जाधरि बिहार प्रांत सँ पलायन नहिं रूकत। एखनो बेरोजगारी चरम पर छैक, मुदा प्रतियोगिता परीक्षामे अव्वल आबय खातीर युवा वर्ग केँ कुशलता आ कौशल देखबय पड़तनि। ओना आत्मनिर्भर बनय लेल मिथिलांचल केर उद्यमी परिश्रम करय सँ पाछु नहिं हटत! - प्रीति कुमारी, बी.ए., बीएड. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.३. प्रणव कुमार झा- मिथिला के विकास मे सहकारिता के मॉडल प्रणव कुमार झा मिथिला के विकास मे सहकारिता के मॉडल मिथिलाक इतिहास केवल ओकर संस्कृति, मिथिला पेंटिंग, आम-लीची आ मखानक लेल नै, अपितु कखनो ओकर औद्योगिक सहभागिताक लेल सेहो जानल जाइत छल। 90क दशक सँ पूर्व, उत्तरी बिहारक एकटा बड़का हिस्सा चीनी मिल,पेपर मिल, सूत, जूट उद्योग, अन्य लघु उद्योग आ कृषि आधारित प्रसंस्करण इकाई सभक एक्टिविटि सँ गूंजैत छल। मुदा, 90क दशकक बादक औद्योगिक सन्नाटा, पूँजी निवेश में कमी, आ कुप्रबंधनक कारणे मिथिलाक आर्थिक मेरुदंड टूटि गेल। बिहारक, आ विशेष कऽ मिथिलाक आर्थिक इतिहास मे 90क दशक एकटा एहन वाटरशेड (Water-shed) समय रहल, जतय सँ पूँजीक पलायन (Capital Flight) एकतरफा भऽ गेल। नीतीश कुमारक लंबा कार्यकालक बादो, जखन हम अन्य राज्यक तुलना करैत छी, तँ निवेशक मामला मे मिथिला बंजर बुझाइत अछि। कोनो भी क्षेत्रक विकास लेल निवेश अनिवार्य अछि, मुदा अपना ओतय स्थिति उलटा अछि। नै तँ कोनो पैघ सरकारी कारखाना आयल आ नै प्राइवेट प्लेयर सभ कोनो विशेष करामात देखौलक। विडंबना ई जे उच्च शिक्षा लेल गाम-गामक पाई दिल्ली, कोटा आ बंगलौर आदि शहर जा रहल अछि। एकटा निक इलाज लेल मिथिलाक लोग केँ अपन संचित पूँजी लऽ कऽ बाहर भागय पड़ैत छनि। अर्थशास्त्रक भाषा मे ई मल्टीप्लायर इफेक्ट (Multiplier Effect) केँ खत्म कऽ दय छैक। अपना ओतय जे पाई संयोजित होई अछि, ओकर एकटा पैघ राशिक उपभोग बाहर भऽ रहल अछि। बहुत रास प्रवासी आ समाजसेवी समूह आ संस्था सभ राजनैतिक मूवमेंट, इन्वेस्टर मीट, डिजिटल ट्रेंड आ अन्य माध्यम सभ सँ पूँजीपति सभ केँ गोहारि लगा रहल छथि, मुदा कोनो खास सफलता हाथ नै लागल। एकर मुख्य कारण अछि बुनियादी ढाँचाक अभाव आ परसेप्शन (छवि)क समस्या। एहन मे कखनो काल बाहरक पूँजीपति केँ जोहब मृगतृष्णा जकाँ बुझाइत अछि। बिहार मे सहकारिता (Co-operative) क इतिहास बहुत सुखद नै रहल अछि। बहुत बेर ई राजनीति आ भ्रष्टाचारक भेंट चढ़ि गेल। मुदा, विफलता सँ सीख कऽ पुनः एहि मॉडल केँ आत्मसात करब सरकार या पूंजीपति द्वारा निवेश के एकटा विकल्प भऽ सकय अछि। सहकारिताक मूल मंत्र अछि एकता मे बल। जखन एकटा व्यक्ति उद्यमी बनैत अछि, तखन जोखिम ओकर अपना पर होइत अछि, मुदा जखन एकटा सहकारी समूह उद्यमी बनैत अछि, तखन जोखिम बँटैत अछि आ संसाधन बढ़ैत अछि। देखल जाय तँ भारतक विकसित राज्य आ बिहार (विशेषकर मिथिला) क बीचक जे आर्थिक खाई अछि, ओकर एकटा कारण संसाधनक सामूहिकता (Collective Pooling of Resources) क अभाव रहल अछि। जखन हम गुजरातक दुघ्ध उत्पादक समिति, महिला सेल्फ हेल्प ग्रुप, महाराष्ट्रक चीनी सहकारी मिल वा कॉपरेटिव बैंक, पंजाबक कृषि कॉपरेटिव सोसायटि, तमिलनाडु के सहकारी समिति, कर्नाटक के यशस्विनी सहकारी बीमा योजना वा केरल के कुटुंबश्री केँ देखैत छी, तँ स्पष्ट होइत अछि जे ओहि राज्यक आम आदमी अपन छोट-छोट पूँजी केँ एकठाम कऽ कऽ ओकरा पैघ निवेश मे बदलबाक कला सीखि लेलक। एकर विपरीत, बिहार मे लोक के पूँजी बिखरल रहि गेल आ अंततः पलायनक शिकार भऽ गेल। बिहार मे सहकारिताक ढाँचा तँ अछि, मुदा ओ सरकारी बैसाखी पर टिकि गेल। राजनीति आ अफसरशाहीक हस्तक्षेप एकरा आम आदमीक आंदोलन नै बनय देलक। हम बिहारक पिछड़बाक पाछू पूँजीक विखंडन (Capital Fragmentation) देखैत छी। बिहारक किसान लग जे जमीन अछि, ओ एतेक छोट-छोट टुकड़ा मे अछि जे ओतय आधुनिक खेती (Commercial Farming) घाटाक सौदा भऽ जाइत छैक। जखन कि पंजाब मे सहकारी स्तर पर मशीनरी साझा कयल जाइत अछि। विकसित राज्यक आम आदमी को-ऑपरेटिव बैंक सँ सहजहि ऋण लैत अछि, जखन कि बिहारक आम आदमी आईयो साहुकार वा बैंकक जटिल प्रक्रिया मे फँसल भेटय अछि। वैल्यू एडिशनक अभाव - हम मखान, आम, लीची, मकै आदि जेहो कृषि उत्पाद उपजबैत छी, ओकर अधिकांश के प्रोसेसिंग आईओ बाहर भऽ रहल अछि। सहकारिताक अभाव मे सभ मात्र कच्चा माल क आपूर्तिकर्ता बनि कऽ रहि गेल। जखन हम नव-नव दिल्ली आयल रही, तँ शहरी चकाचौंधक बीच हमर नजरि किछ एहन अनौपचारिक आर्थिक ढाँचा पर पड़ल जेकर आधार पारस्परिक सहयोग छल। हम देखलहुँ जे प्रवासी मैथिल लोकनि अपन सीमित संसाधन केँ स्वयं सहायता समूह (SHG) क माध्यम सँ कै तरहें प्रबंधित करैत छथि। एकर मुख्य रूप सँ दू टा स्वरूप देखलहुँ - कमिटी आ सोसायटी। कमिटी - एकटा वित्तीय नीलामी (Auction Model): कमिटीक मूल कांसेप्ट बुझू जेना एकटा लघु पूँजी बाजार (Capital Market) होय। एतय सदस्य लोकनि पाई जमा करैत छथि आ फेर ओहि जमा राशि पर बोली (Bidding) लगैत अछि। जे सदस्य सब सँ बेसी रिटर्न दऽ कऽ पाई उठबैत छथि, ओ पूँजी हुनकर भऽ जाइत अछि आ बाद मे ओहि रिटर्न केँ सब मेम्बर मे बाँटि देल जाइत अछि। ई एक तरहक एग्रेसिव सेविंग थिक जे झटपट पूँजीक आवश्यकता केँ पूरा करैत अछि। सोसायटी - कल्याणकारी ऋण (Welfare Credit Model): कमिटीक विपरीत सोसायटीक दर्शन (Philosophy) बेसी उदार आ दीर्घकालिक छैक। एतय मासिक बचत केँ एकटा संचित कोष बनायल जाइत अछि। जखन कोनो सदस्य केँ आवश्यकता होइत छनि, तँ हुनका बहुत कम ब्याज आ फ्लेक्सिबल इंस्टालमेंट (लचील किश्त) पर ऋण देल जाइत अछि। हमरा याद अछि, मामाक एकटा जरूरी काज मे हुनकर ससुर जी कमिटी सँ पाई लै कऽ हुनकर सहायता कयने छलाह। आ ओहिना, बाद मे जखन घर बनेबाक लेल जमीन किनबाक बात भेल, तँ सोसायटी सँ भेटल ऋण हुनका लेल एकटा पैघ संबल बनल छल। ई मॉडल अनौपचारिक रूप से दिल्ली सहित विभिन्न मेट्रो शहर के अनेकों कालोनी मे बसल मैथिल सबहक बीच खूब प्रचलिल भेल अछि आ हुनकर जीवन के विभिन्न क्षण मे हुनकर संबल बानि रहल अछि। कतेको एहन सोसायटी औपचारिक रूप सेहो लेने अछि जेना रंगकर्मी शुभ नारायण झा के सोसायटी उत्तम नगर दिल्ली मे। नीक बात ई छैक जे आई ई मॉडल दिल्लीक कालोनी सभ स सँ निकल कऽ हमर-अहाँक गाम-घर धरि पहुँचि गेल अछि। अनेकों गाम मे आब एहन अनौपचारिक सेल्फ हेल्प ग्रुप सक्रिय अछि, जे बैंकक जटिलता सँ दूर मिथिलाक लोक केँ आर्थिक संबल दऽ रहल अछि। एखन धरि ई सोसायटी सभ आपत्ति-विपत्ति आ लगन-तिहार (consumption loans) धरि सीमित रहल अछि। मुदा हमरा लगैत अछि जे आब समय आबि गेल अछि जखन एहि पूँजी केँ उत्पादक निवेश (Productive Investment) मे बदलयक चाही। एहन समूह सब मात्र कर्ज दै वाला संस्था नै, अपितु लघु उद्योगक लेल पूँजी भागीदार (Seed Capital Partner) बनय। संगहि एकरा सभ के आर बेसी व्यवस्थित आ पारदर्शी बनाओल जाय ताकि गामक पैसा गामक विकास मे काज आबय।जँ गामक ई साख-सोसायटी सभ मजबूत होइत अछि, तँ कदाचित एहन समय आबि सकय अछि जे आत्मनिर्भर मिथिलाक लेल लोक सभ केँ कोनो पैघ वित्तीय संस्थानक बाट नै जोहय पड़त। आधुनिक अर्थशास्त्र मे को-ऑपरेटिव मॉडल तँ बहुत अछि, मुदा हम गाम-घरक अनौपचारिक सहकारिता के दु टा टिपिकल उदाहरण एतय देबय चाहय छी। 1. धरोहर क पुनरुद्धार: जनेऊ निर्माण आ डिजिटल मार्केटिंग - मिथिलाक गामक महिला सभक हाथ मे ओ हुनर अछि जेकर कोनो मोल नै। जनेऊ मात्र एकटा सूत्र नै, अपितु संस्कृति संस्कारक प्रतीक थिक। मुदा आजुक समय मे कम लाभ आ पलायनक कारणे ई कला दम तोड़ि रहल अछि। आ साधारण धागा के रेडीमेड जनेऊ बिकाइ के प्रचालन बढ़ल अछि। कै बेर हमरो कै ठाम विदाई मे ई रेडीमेड लो क्वालिटी जनेऊ से पाला पड़ल अछि। मानि लिअ गामक एकटा अनुभवी दादी (जे जनेऊ निर्माणक विशेषज्ञ छथि) केँ केंद्र मे राखि 10 टा महिला एकठा होइत छथि। सभ कियो 2-2 हजार टका जमा कऽ 20 हजारक एकटा सीड कैपिटल (Seed Capital) तैयार करैत छथि। दादी ओहि महिला सभ केँ जनेऊक प्रीमियम क्वालिटी तैयार करबक प्रशिक्षण दैत छथि। ओहि टोला-मोहल्लाक कोनो टेक-सेवी नवयुवक (जेना लाल बौआ) एहि उद्यम केँ एकटा ब्रांड दैत छथि। लोगो, सोशल मीडिया पेज, आ अमेज़न-फ्लिपकार्ट सन ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म सँ जोड़ि एकरा ग्लोबल मार्केट मे पहुँचा दैत छथि। परिणाम: विलुप्त होइत कला क बचाव, उत्तम गुणवत्ताक जनेऊक उपलब्धता आ गामक महिला सभक लेल घरहि बैसल स्वावलंबन के बाट फुजय अछि। 2. सहकारी खेती: छोट जोतक पैघ समाधान - मिथिला मे जमीनक टुकड़ा-टुकड़ा (Fragmentation) होनाइ खेतीक घाटाक सब सँ पैघ कारण मे से अछि। जँ 10 टा किसान मिलि कऽ अपन-अपन एक-एक बीघा जमीन केँ एकठाम कऽ लेथि, तँ तस्वीर बदलि सकैत अछि। कार्यप्रणाली (The Cooperative Approach): 10 बीघाक बिखरल खेत 4-5 टा पैघ प्लॉट मे बदलि जाइत। एतय अब मैकेनाइजेशन (टैक्टर आ आधुनिक मशीनक प्रयोग) संभव अछि। सभ सदस्य 50-50 हजार टका जोड़ि कऽ 5 लाखक कोष बना सकय छथि, जाहि सँ उत्तम खाद, बीया, आ आधुनिक औजार किनय मे सुविधा होइत छैक। कोनो सदस्य खेतक देखरेख मे माहिर छथि, तँ केओ संसाधन प्रबंधन मे, आ केओ मार्केटिंग (बाजार दर) क जानकारी राखय मे। लागत मे कमी आ उत्पादन मे वृद्धि। ई प्रोफेशनल फार्मिंग छोट किसानक आमदनी केँ लाभप्रद रूप से बढ़ा सकैत अछि। ई दुनू उदाहरण ई डेमोंस्ट्रेट करैत अछि जे जँ कौशल केँ सहकारिता आ तकनीकक साथ भेटि जाय, तँ गामक अर्थतंत्र केँ बाहरी बैसाखीक के बिना भी आगा बढ़ायल जा सकय अछि। शिक्षण-प्रशिक्षण आ स्वास्थ्य सेवा जेहन बुनियादी क्षेत्र मे सेहो सहकारिता आ सामूहिक प्रयास सँ लोकक जीवन बेहतर भऽ सकैत अछि। अर्थशास्त्रक दृष्टिकोण सँ देखल जाय तँ एहि क्षेत्र मे Human Capital Investment (मानव पूँजी मे निवेश) क असीम संभावना अछि। 3. शिक्षण-प्रशिक्षण: ज्ञान-कोष सँ डिजिटल साक्षरता धरि - गाम मे मेधाक कमी नै अछि, मुदा गाइडेंस आ रिसोर्सक अभाव मे अक्सर बहुत बच्चा सभ पाछू रहि जाइत अछि। सहकारी मॉडल: सामूहिक कोचिंग सेंटर - मानि लिअ, गामक लोक सभ मिलि कऽ एकटा शिक्षा कोष बनबैत छथि। गामक कोनो खाली घर वा दालान केँ कम्युनिटी लर्निंग सेंटर बनायल जाइत अछि। सभ कियो किछ राशि जमा कऽ 5-6 टा टैबलेट (Tablet), एकटा प्रोजेक्टर, आ निक इंटरनेट कनेक्शन लगबैत छथि। जे बच्चा अलग-अलग किताब वा गैजेट नै किनि सकैत छलाह, ओ आब सामूहिक रूप सँ स्मार्ट क्लासक लाभ उठा सकय छथि। गामक जे नवतुरिया लोकनि जे बाहर पढ़ि रहल छथि वा नौकरी कऽ रहल छथि, ओ छुट्टी मे एला पर ओहि सेंटर मे गेस्ट लेक्चर दैत छथि। ओ ऑनलाइन माध्यम सँ गामक बच्चा केँ नव स्किल सीखे मे वा प्रतियोगी परीक्षाक तैयारी करबै मे गाइड क सकय छथि। एहि सँ बच्चा केँ महग कोचिंग लेबाक जरूरत नै पड़त, आ गामक किछ शिक्षित युवक-युवती केँ ओतहि रोजगार भेटत। बेगूसराय के मोहनपुर गाँव के सरकारी विद्यालय मे ई मॉडल सफलतापूर्वक चलि रहल अछि। 4. हेल्थकेयर: आरोग्य सोसायटी आ टेली-मेडिसिन - गाम मे स्वास्थ्य सेवाक सब सँ पैघ समस्या छैक समय पर सही परामर्श नै भेटब आ इमरजेंसी मे टकाक अभाव। सहकारी मॉडल: - आरोग्य निधि (Health Fund): लग-पास के गामक परिवार मिलि कऽ अपन एकटा हेल्थ को-ऑपरेटिव बना सकय छथि। प्रत्येक परिवार प्रति मास एकटा निश्चित सब्स्क्रिप्शन राशि एकटा साझा कोष मे जमा करैत अछि। सैंकड़ों परिवार एक संगे होइत अछि तँ ओ बारगेनिंग पवार के प्रभाव से कोनो अस्पताल वा पैथोलॉजी लैब सँ कन्सेशनल रेट (छूट) लेल करार कऽ सकैत छथि। ओहि सोसायटीक कार्ड देखला पर सदस्य केँ सस्त इलाज भेट सकय अछि। सोसायटी अपन कोष सँ गाम मे एकटा छोट सन डिजिटल डिस्पेंसरी खोलि सकय अछि। ओतय एकटा प्रशिक्षित नर्स/कंपाउंडर राखल जा सकय अछि जे आधुनिक मशीन सँ बीपी, शुगर आ ईसीजी कऽ सकैत छथि। इंटरनेटक माध्यम सँ प्रशिक्षित डॉक्टर सँ वीडियो कंसल्टेशन कयल जा सकय अछि। सोसायटीक साझा कोष सँ एकटा ऑटो एम्बुलेंस राखल जा सकैत अछि, जे राति-बिराति मे भी कोनो मरीज केँ अस्पताल पहुँचा सकय। एहि दुनू मॉडल मे सब सँ बेसी महत्व छैक प्रिवेंटिव (निवारक) सोचक। जँ शिक्षण आ स्वास्थ्य मे सहकारिता अनैत छी, तँ गामक डिस्पोजेबल इनकम (बचत भेल पैसा) बढ़ि जेतैक, कियाक तँ बीमारी आ शिक्षा पर होमय वाला अनाप-शनाप खर्च कम भऽ जेतैक। नारायणा हृदयालय (देवी शेट्टी जीक मॉडल) सहकारिता आ वॉल्यूम क एकटा अद्भुत मेल थिक। हम एकरा इकोनॉमीज ऑफ स्केलक एकटा उत्कृष्ट उदाहरण मानैत छी। एकर मूल मंत्र अछि - सबहक अंशदान, गरीबक कल्याण। नारायणा हृदयालय (Narayana Health) स्वयं कोनो सहकारी संस्था (Cooperative Society) नै अछि, अपितु ई एकटा For-profit कॉर्पोरेट अस्पताल श्रृंखला थिक। मुदा ओ कर्नाटक सरकार संग मिलि सहकारी वित्तपोषण (Cooperative Funding) क ई ताकत देखौलक जे जँ गरीब लोक अपन छोट-छोट सहकारी अंशदान केँ एकठाम कऽ लैत छथि, तँ ओ महग कॉर्पोरेट अस्पताल सँ सेहो निक सेवा लऽ सकैत छथि। एहन नै छैक जे बिहार मे सहकारी संस्था सभ सक्रिय नै छैक। औपचारिक आ अनऔपचारिक रूप से हजारो संस्था सभ वर्तमान मे कागज पर व वास्तविक रूपे सक्रिय छैक। जौं पंडौल कोपरेटिव मिल एकर स्याह पक्ष छैक त सुधा एकर उज्जर पक्ष छैक। बिहार सरकारक सहकारिता विभाग आ भारत सरकारक सहकारिता मंत्रालयक हालिया रिपोर्ट के अनुसार बिहार मे औपचारिक सहकारिता समूह के किछ आंकड़ा निंम्न देल गेल अछि : आइटम आँकड़ा विवरण बिहार मे कुल निबंधित सहकारी समिति 27,387 एहि मे PACS सँ ल कए बुनकर, मत्स्य, आ आवास समिति सभ शामिल अछि। उत्तर बिहार (मिथिला) मे सक्रिय समिति 12,000 - 14,000 उत्तर बिहार मे कृषि आ डेयरीक प्रधानताक कारणे एतय सक्रियता दक्षिण बिहारक तुलना मे बेसी अछि। कुल PACS (पूरा बिहार) 8,463 ई बिहारक ग्रामीण अर्थव्यवस्थाक मेरुदंड अछि, जे प्रत्येक पंचायत स्तर पर काज करैत अछि। नवनिर्मित बहुउद्देशीय (M-PACS/डेयरी) 4,418 (नवंबर 2025 तक) केंद्र सरकारक "सहकार सँ समृद्धि" योजनाक तहत ई नव समितिक गठन कएल गेल अछि। कंप्यूटरीकृत PACS (ERP आधारित) 4,460 पारदर्शिता अनबाक लेल PACS क डिजिटल होनाइ एकटा पैघ उपलब्धि अछि। अतीतक पाठ: विफलता आ सुधार - हरिमोहन झाक एकटा प्रसिद्ध कथा अछि - ब्रहमाक श्राप। जेकर निचोड़ ई अछि जे मिथिला के लोक होइत त छैथ कुशाग्र बुद्धि मुदा हुनक विफलता के जड़ि मे रहय अछि हुनक साथ भऽ नै रहनाय आपसी अविश्वास आ द्वेष के भाव। मिथिला आ उत्तर बिहार मे सहकारिताक विफलताक मुख्य कारण राजनीतिक हस्तक्षेप, आपसी अविश्वास आ द्वेष के भावना आ पेशेवर प्रबंधन (Professional Management) क अभाव रहल अछि।कतेको सहकारी समितिक बोर्ड मे राजनीतिक नियुक्ति भेल, जकरा कारणे ओ संस्थाक आर्थिक स्थिति सँ बेसी अपन आ राजनैतिक लाभ-हानिक चिंता करए लागलि। सफलताक लेल सहकारिता केँ राजनीति आ आपसी द्वेष भाव आ अलगाववादी मानसिकता सँ मुक्त राखब अनिवार्य अछि। सहकारी समितिकें प्रोफेशनल लीडरशिप आ तकनीकी विशेषज्ञक देखरेख मे चलय पड़त। सहकारिता नै खाली औद्योगिक पतन कें रोकि सकैत अछि, अपितु एहि क्षेत्र कें एकटा सस्टेनेबल इकोनॉमिक हब बनय सकैत अछि। 90 क दशक सँ जे पूँजी बाहर गेल, ओकर भरपाई कोनो सरकार एक्के दिन मे नै कऽ सकत। मुदा सहकारिताक माध्यम सँ हम अपन आर्थिक भाग्य अपन हाथ मे लय सकैत छी। जनेऊ बनबै वाली दादी सँ लऽ कऽ मखान उपजबय वाला किसान धरि, जखन सभ कियो सहकारी सूत्र मे बंधि जएताह, तखन मिथिला केँ निवेश लेल कोनो पूँजीपतिक बाट जोहय के आवश्यकता नै पड़त। हमर मानब अछि जे मिथिलाक विकासक मार्ग पूंजीवाद सँ बेसी सहकारिताक बाट सँ होइत आगा बढि सकय अछि। बस आवश्यकता अछि जे लोक व्यक्तिगत लाभ सँ आगा बढ़ि सामूहिक समृद्धि क आधारशिला राखथि। बिहारक भविष्य एहि बात पर निर्भर करैत अछि जे हम अपन व्यक्तिगत मेधा (Individual Intelligence) केँ सामूहिक पूँजी (Collective Capital) मे केना बदलय छी। बिहार लग लेबर अछि, लैंड अछि, आ लिक्विडिटी (पूँजी) सेहो अछि, बस कमी अछि तँ एकटा सहकारी संकल्पक। -प्रणव कुमार झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.४. प्रणव कुमार झा- अविश्वासक चिकित्सा (लघु कथा) प्रणव कुमार झा अविश्वासक चिकित्सा (लघु कथा) नीमडीह गामक माटि के एकटा गुणी छलाह डॉक्टर रामनारायण बाबू। अपन क्लीनिक मे प्रेक्टिस करैत चश्माक मोट काँचक भीतरसँ जखन ओ मरीज के देखैत छलाह तँ आधा बेमारी तँ ओहिना भागि जाइत छल। गामक ओहि पुरान क्लिनिक में कखनो ताला नै लगैत छल। कोनो गंभीर मरीज अबैत छल तँ ओ ई नै कहैत छलाह कि बचबाक चांस 10 प्रतिशत अछि, बल्कि ओ मरीजक हाथ अपन हाथ में लैत कहैत छलाह अहाँ चिंता कियाक करैत छी? हम छी न! ई शब्द कोनो कानूनी गारंटी नै छल, मुदा ई एकटा भरोसा छल जे मरीज आ परिजन मे आशाक एकटा उम्मीद जगेने रहय छल। मुदा ओ समय दसको पहिने बीत गेल। आजुक भारत में ई शब्द बहुत कम डॉक्टरक मुँह सँ निकलैत अछि, किएकि आजुक डॉक्टरक मुँह पर कानून आ कॉर्पोरेटक ताला लागल अछि। रामनारायण बाबू के पोता आलोक आब दिल्लीक एकटा पैघ मल्टी-क्योर कॉर्पोरेट अस्पताल में इंटेन्सिविस्ट छैथ। आलोक अपन बाबाक आदर्श सुनिकेँ पैघ भेल छल, मुदा हुनकर ट्रेनिंग हुनका किछु औरे सिखौने छलैक। मेडिकल कॉलेज में ओकरा एनाटॉमी आ सर्जरीक संग-संग एकटा और चीज सिखाओल गेल छल - ब्रेकिंग बैड न्यूज़ (बुरा समाचार सुनायब)। मरीजक परिजन सँ बात करैत काल कखनो इमोशनल (भावुक) नै होएब। अहाँक आवाज सपाट होबक चाही। सांत्वना नै, प्रोग्नोसिस (पूर्वानुमान) दियौक। जेना कि कोनो मशीन खराब भऽ गेल होय। आलोक केँ याद अछि ओ समय, जखन पीजी (Post Graduation) के दौरान ओकरा कम्युनिकेशन स्किलक क्लास देल जाय छल। ओतय सिखाओल जाय छल - परिजन केँ सबसे पहिने सभसँ खराब स्थिति (Worst-case scenario) बता दियौक, ताकि जँ मरीज मरि जाय तँ अहाँक माथ पर दोष नै आबय। ओतय हीलिंग (उपचार) नै, डिफेंसिव मेडिसिन (बचाव वला चिकित्सा) सिखाओल गेल छल। विगत किछ दशक मे डॉक्टर मरीज आ परिजनकेँ एकटा इंसान नै, बल्कि एकटा पोटेंशियल लिटिगेंट (संभावित मुकदमा करय वाला) मानै लागल अछि आ मरीज सब हरेक डॉक्टर के संभावित लुटेरा मानय लागल अछि।। सुषेण वैद्य सूतल छलाह। हुनका सुतले मे खटिया सहित उठा कऽ आनल गेल, एकटा आपात स्थिति में, जखन लक्ष्मण जी मूर्छित छलाह। कते अजीब सलाह छलनि हुनकर - ओहि सुदूर पर्वत सँ चारि टा संजीवनी बूटी आनबाक। हनुमान जी ओकरा चीन्हि नै सकलाह तँ ओ ल़ड़लाह नै, नै ई कहैत वापस अयलाह कि 'नीक जकां कियाक नै कहलहुँ' - ओ तँ पर्वतहि उठा कऽ आबि गेलाह। ओहि सामर्थ्यवान योद्धा सभक बीच एहि वैद्यक सलाह मानल गेल, पूरा सम्मानक संग कियाक तँ ओतय नीयत आ प्राथमिक प्रेरणा मरीजक भलाई छल। कोनो 'कंसेंट' नै, कोनो 'poor prognosis explanation' (खराब भविष्यक व्याख्या) नै - मात्र एक-दोसर पर अटूट विश्वास। मुदा प्राचीन काल से चलि आबी रहल चिकित्सक आ मरीज के बीच के ई विश्वास के कड़ी आब टूटि रहल अछि । आलोकक जीवन में एकटा एहन घटना घटित भेल छल, जे ओकरा भीतर तक झकझोरि देने छलैक। दू साल पहिने, इमरजेंसी वार्ड में एकटा युवक केँ लाओल गेल छल, जेकर एक्सीडेंट भेल छल। आलोक आ हुनकर टीम अपन जान लगा देने छल, मुदा बहुत खून बहि गेल छल, ओ बचि नै सकल। जखन आलोक बाहर निकलल आ धीमा स्वर में कहलक, हम सब कोशिश कयलहुँ, मुदा ओ नै रहल... तखन ओहि युवकक परिजन सांत्वना क अपेक्षा नै कयलनि। भीड़ में सँ एकटा आदमी चिचियायल ई डॉक्टर लुटेरा अछि! पाइयो लूटि लेलक आ जान कऽ मारि देलक! अचानक भीड़ उग्र भऽ गेल। आलोक किछु समझितथीन, ओहि सँ पहिने एकटा भारी कुर्सी हुनक माथ पर बज्र खसल। हुनक चश्मा टूटि गेल, चेहरा लहू-लुहान भऽ गेल। ओही रात आलोक अस्पतालक बेड पर सुतल सोचि रहल छल डॉक्टर-मरीज के बीच नाता-रिश्ता में कड़वाहटक के की कारण भऽ सकय अछि। टोहैत टोहैत पेलखिन जे कारण एक नै, बहुत रास अछि, जइ पर पूरा एकटा थीसिस लिखल जा सकैत अछि। एहि में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आ निजी चैनलक बर्ताव सेहो एकटा मुख्य बिंदु छल,। टीआरपी के लेल संपादकक दबाब में खबरि खोजैत पत्रकार बिगड़ल चिकित्सकीय केस मे 'सॉफ्ट टारगेट' ताकैत अछि। ओहि दिन सँ आलोक बदलि गेल छल। हुनका भीतरक दयालु डॉक्टर मरि गेल आ एकटा सावधान प्रोफेशनल जन्मि गेल छल। आब ओ कोनो मरीज केँ छुबैत छैथ तँ पहिने ई देखैत छैथ कि हुनकर सुरक्षा कते अछि। आब ओ मरीजक इलाज सँ बेसी फाइल पर ध्यान दैत छैथ । हुनका पता अछि जे मारि-पीट आ केस-मुकदमा के हालात मे कोर्ट में हुनकर नीयत नै, कागज़ देखल जायत। ओ अनगिनत जाँच (Tests) लिखैत छैथ - ओहनों जांच सभ जेकर जरूरत नै अछि - मात्र अपन बचाव लेल, ताकि बाद में केओ ई नै कहय कि ई जाँच कियाक नै कयलहुँ? आलोक केँ कॉर्पोरेट अस्पतालक असली चेहरा तखन देखय लेल भेटल जखन हुनकर अपन संबंधी बीमार भेल। बीमा कंपनीक लोक सियार सन बैठल छल। प्रीमियम भरैत काल जे मक्खन सन गप्प बाजय छल, ओ क्लेम के समय टेक्निकल एररक छुरी लऽ कऽ ओहि मक्खन के काटय पर आतुर भेल छल। अस्पतालक मैनेजमेंट कहैत अछि - रेवेन्यू बढ़ाऊ। बीमा कंपनी कहैत अछि पेमेंट काटू। आ एहि चक्की में पिसैत अछि असहाय मरीज आ डरल-सहल डॉक्टर। किछु दिनक बाद, आलोक गाम गेल। बाबाक देहांतक बाद हुनकर गामक क्लिनिक बंद भऽ गेल छल। गामक लोक सब अपन गामक पुराण डॉक्टर के पोता से किछ किछ चिकित्सकीय सलाह लेल घेर लेलक। कोनो बुढ़िया अपन पोता केँ लैत एलैक -बाबू, देखू ने चारि दिन से ई बोखार सँ काँपैत अछि। आलोकक संग हुनकर लैपटॉप नै छल, हुनकर कागजी कारवाई वला फॉर्म नै छल। ओ अपन बाबा के पुरान बेंतक कुर्सी पर बैसल छल। ओ नाड़ी टटोललक। ओ देखलक कि बुढ़ियाक आँखि में वैह भरोसा छल, जे सुषेण वैद्य केँ देखि कऽ लक्ष्मणक पक्ष में वानर सेनाक आँखि में भेल हेतैक। ओकर आङ्खि केँ देखि आलोकक भीतरक डॉक्टर जागि उठल। ओ अपना लग से सैम्पल वला दवाई देलक आ कहलक - दादी, चिंता नै करू, हम छी न! ओहि चारि शब्द सुनैत बुढ़िक चेहरा पर जे चमक आएल, ओ आलोक केँ बड्ड संतोष देलक। हुनका लागल कि असली हीलिंग 'हॉस्पिटैलिटी' में नै, 'ह्यूमैनिटी' में अछि। गाम सँ दिल्ली वापस आबि आलोक देखलक कि हुनकर अस्पताल में एकटा नब तमाशा भऽ रहल छल। एकटा पत्रकार अपन कैमरा लैत चिचिया रहल छल - देखू एहि लुटेरा अस्पताल केँ! गरीब केँ इलाज नै कऽ कऽ ओकरा मरि जाय लेल छोड़ि देलक! आलोक ओहि पत्रकार केँ देखलक। ओ पत्रकार एकटा टीवी कार्यक्रम के लेल रिपोर्ट क रहल छल जेकर हेडिंग छल - "डॉक्टरक लापरवाही सँ गेल जान"। ई सॉफ्ट टारगेट छल। पत्रकार टीवी चैनल के मालिक के दबाब में अछि, अस्पताल मुनाफाक दबाब में अछि, आ एहि सबक बीच डॉक्टर-मरीजक पवित्र रिश्ता मृतप्राय भऽ रहल अछि। आलोक अंततः अपन बाबाक गामक ओहि क्लिनिक केँ पुनर्जीवित करबाक निर्णय लेलक। हुनक मति मे ई आबि गेल छल कि जँ छोटे-छोटे क्लिनिक आ पारिवारिक डॉक्टर खत्म भऽ जेतय, तँ आम आदमी अनाथ भऽ जायत। सरकार, पत्रकार आ समाज - सब सँ हुनकर एकटा बिनती छल - डॉक्टर केँ भगवान नै, इंसान रहय दियौक। ओकरा कंसेंट फॉर्म कऽ पाँज में एहन नै दबा दियौक कि ओ मरीजक आँखि में देखब छोड़ि कऽ बस फाइल में मुड़ी गोतने रहय। आजुक समाज केँ सेहो तय करबाक पड़त जे ओकरा प्रोफेशनल हेल्थकेयर प्रोवाइडर चाही या ओ डॉक्टर, जे माथ पर हाथ राखि कऽ कहि सकय - अहाँ चिंता नै करू, हम छी न! -प्रणव कुमार झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.५. प्रीति कुमारी- अस्वजन आ दोगरमिया व्यवस्थाके दुरूपयोग 'क दुष्प्रभाव प्रीति कुमारी अस्वजन आ दोगरमिया व्यवस्थाके दुरूपयोग 'क दुष्प्रभाव
हालहिमे मैथिलीक ३५ गोट नाटक'क मंचन दिल्लीमे भेलासन्ता गीनीज बुकमे नामीत श्री महेन्द्र मलंगिया जी चर्चित भेलाह अछि। ओ कविशेखराचार्य ज्योतिरीश्वर जीके वर्णरत्नाकर पोथीक भावानुवाद कय प्रवन्ध संग्रह लेल साहित्य अकादमी सँ २०२५ ई०मे पुरस्कृत भेल छथि। ताहि वर्ण रत्नाकर पोथीमे मिथिला'क चारि वर्णके अनेको उपजातिक चर्चा छन्हि। मातृभाषा मैथिलीमे आ मैथिली साहित्यमे सबसँ पुरान रचना ' वर्ण रत्नाकर ' केँ मानल ओ जानल जाइछ। से सवर्ण समाजके मुख्य कर्ण कायस्थ , मैथिल ब्राह्मण तथा राजपूत जातिमे वंशावलीक आधार पर पंजीकरण केर महौत देल गेल रहनि। राजपूत समाजमे ई मिथक कालान्तरमे अधिकतर टुटैत चलि गेल । मुदा ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थमे विशेष कय वियाहक योग्य जोड़ीक तलाश ओ मिलानमे पंजीप्रथा वेश मान्यतामे रहल अछि। एहि काजक निमित्त जे पंजियार लोकनि भेलाह,हुनका राज दरभंगा सँ आर्थिक बुतात आ आन तरहक संरक्षण भेटल हेबाक तथ्य सम्पादक आशिष अनचिन्हार जीक सद्यप्रकाशित पोथी "सेतु षाम" आ पूर्वमे छपल वृहत् पोथी ' प्रीति कारण सेतु बान्हल ' मेँ अनेकों लेखक दिशसँ तर्क देल गेल अछि। सबाल ई उठैत छै- वर्ण रत्नाकरके ओहि तीन जाइतिक अतिरिक्त जे मूलनिवासी सभ रहथिन आ तिनकर एखनो संततिक उपस्थिति व्यापक पैमाना पर गाम समाजमे छैक, हुनका वंश खानदान केर पाँच पिढ़ि पूर्वक इतिहास दुर्लभ छैक। से अभिलेखनक प्रभार आखिर किनका देल गेल रहनि! आ जौं कियो गोटे एहिक जिम्मेदारी नहिं लेलनि तँ तत्काल शासकीय व्यवस्था एहि ज्वलंत प्रश्नके अनुत्तरित कियाक बनौने रहलाह ? ओना सब वर्ग - जातीक श्रीमंत ( मातबर) लोक अपना पण्डा ओतय गया जी, हरिद्वार, जग्गनाथपुरी , देवघर आ सिमरिया गंगाकात जाए १८म् शताब्दीमे सूचिबद्ध करौने रहथि। एखनो शादी - वियाह सँ पूर्व कर्ण काइथ समाजमे सिध्यान्त लिखल जाईछ आ उत्सब पूर्वक बिनु दुल्हा-दुल्हन केर ई एक तरहक वरतुहारी - घरदेखी सन विध होईछ। एहिमे परपितामह केर मातृक सँ नीचा धरिक वंश कुर्सीनामा बावत सम्बन्ध दुरस्थ राखल जाईछ। समगोत्रीय वियाहकेँ निषेध कयल गेल छैक। बूजूर्ग लोकक अनुसारे किछ मुस्लिम समाजमे सेहो एहिक अपवाद रूपेँ भेल करई । वर्तमान मुस्लिम महाजमे ममियौत, मसियौत आ पितियौत भाय - बहिनक बीच निकाहके (शादी)अंजुमन कमेटी'क सामाजिक मान्यता रहल छैक। वशर्ते एहिमे लड़िकोरी दूध बारल जाईत छै, अर्थात् बालपनमे कियो बच्चा - बच्चीया अपन फूआ, खाला आ चाची जीके स्तनपान नहिं केयने होए। राजपूत समाजमे ललनाक कमीके कारणेँ बालकक वियाह जवानमे कमसम,अधवेसू अवस्थामे जाकय होय। जाती बंधन राजपूत (क्षत्रिय) आ कायस्थ समाजमे रहितो अन्तर्जातीय वियाह धरल्ले सँ हुअय लागल छै। आ से हिन्दू धर्म - मजहब केर आड़ि तोइर अनेको प्रेम विवाह केँ सामाजिक - राजनीतिक मान्यता देल जा रहल अछि। भारतीय संविधान अनुसारे देहात सँ बेसी शहरमे एहिक प्रचलन तीव्र गतिये बढ़ल अछि। समाजशास्त्रीय अध्ययन आ विश्लेषणमे पाबैत छी; भारतीय संविधानके दायरामे आबि अनेकों प्रौढ़ जुबक - जुबती स्वजातीय वियाह सँ इत्तर अदालती वियाह निवंधन कराबैत विजातीय सम्वन्धके खूब बढ़ावा दैत अछ। वैज्ञानिक अनुसंधान सँ वर्णशंकर वियाहकेँ अधिक शुद्ध मानैत अछि। पिछरल,अधिक पिछरल आ दलित समाजमे समगोत्रीय वियाहक अदौ सँ चलैन आबि रहलैक अछि। अखनो बिहार आ नेपाल'क मैथिल ब्राह्मण तथा कर्ण कायस्थमे अन्तरगोत्रीय वियाहक मर्यादा कायम छैक आ ताहिक निर्वहनमे सामाजिक जातियता प्रतिष्ठाक पाग नहिं खसय देबाक संकल्प मजगूत छैक। एहि पंजी प्रथा पर विस्तार सँ भाषाशास्त्री आ ई- विदेह 'पाक्षिक' केर सम्पादक श्री गजेन्द्र ठाकुर जी लिखकय एहिकेँ धरोहर रूपेँ ई - पुस्तकालयमे सजौने छथि। एहि तथ्यके मादे साहित्यकार ओ मैथिली वेब पत्रकारिताक इतिहास लेखक आशिष अनचिन्हार जी कहैत छथि - पंजीक विश्व इन्टरनेट पर आनयमे गजेन्द्र ठाकुर जीकेँ श्री नागेंद्र कुमार झा आओर पंजीकार विद्यानंद झा पूर्ण सहयोग कयने छन्हि । डिजिटल युगक महौतके समय रहैत समझय - सुंदर बालाके प्रथम परियास सँ आई आधुनिक कालमे मैथिली सन् २०००ई० मे याहू व्लाग पर आयल, आब ई- विदेह पर सुलभ भेल छै। २१म् शदीके वादक जे आबैबाला समय होएत ,ताहामे पंजीप्रथा इतिहास विषय रूपेँ मात्रे जानल जायत, कारण विगत १८ म् आओर १९म् शताब्दी धरि सय सालमे एक वंशके पांचम पीढ़ि क्रमिक रूपेँ अवतरीत होईत रहल। कियाक तँ आजादी सँ पूर्व १५-१६ साल सँ कमे उमेरमे वियाह - शादी'क चलैन समाजमे छल। से २० वीं शदीमे चारि पिढ़ि मात्रे हुअय लागल । कारण सरकारी स्तर पर वियाहक लेल उचित उम्र वालक लेल २१ वर्ष आ वालिकाक १८ वर्ष सँ कम उमेरक वियाह कानूनन अपराध मानल गेल । वर्तमान अवधिमे पढ़ल- लिखल युवक - युवती अपना मने वियाह ३०-३५ सालक भेलान्तरे प्रौढ़ अवस्थामे करैत अछि। तेँ २१ म् शताव्दीमे एक सर्वे मोताबिक मात्र तीन पीढ़ि जनमैत अछि। आगू इयह प्रवृत्ति रहल तँ , हम दू - हमर दू संतान बाला नारा मिटैत मात्र एक बच्चाक आकांक्षा मोनमे रहला सँ जनसंख्याँ नियन्त्रण स्वत: होइत जाएत। एहनो समय भविष्यमे विकराल रूपेँ आओत जे एक अदद शिशु लेल तमाशा ठाढ़ होयत आ कोनू नेनाकेँ देखि पर्यटक जेकाँ दम्पति कैमरा सँ तस्वीर खींच अपना घरक शोभा बढ़ाओत। नगरिय व्यवस्थामे वृद्धजन अपनाकेँ असहाय बूझि नोकर - चाकर भरोसे जीवन काटि रहलाह। अपन बेटा - पूतौह विदेशमे प्रवासी वा नागरिकता लैय छैक। बहुतों पुत्र अपन जन्मदाता (माय बाबू ) केँ वृद्धाश्रममे राख देने छै। इयह एक सोच केर कारणेँ नव युवा दम्पति बिलम्ब सँ सन्तान चाहैत ,मात्रे एक बच्चेक लालन-पालन केँ पहाड़ सन बोझ बुझि सिकरैत सनवंधके छोट करैत जा रहलैक अछि। हिन्दू समाजक अपेक्षा मुसलमान समाजमे अधिक बच्चाकेँ जन्म देबाक एक सामाजिक प्रथा बनि गेल छैक,जे पृथ्वी पर मानवक अकाल नहिं हुअ देत। परँच ओहू ठाम नव सोच पनैप रहलैक अछि आ एक साजीश केर तहत वैश्विक जनसंख्याँ नियन्त्रणक काज जाहि तरहेँ चलि रहल अछि से भविष्यमे जन्मदर बहुत कम रहि जायत। एखन खगता ऐ बातक छैक मिथिलाक आदि पंजी 'जीनोम मैटिंग ' आ " दूषण पंजीक " संरक्षण होय, जाहि सँ भविष्यमे एकटा सामाजिक मार्गदर्शकक रुपमे एहिक गणना होइत रहत। आओर मातृपक्ष ओ पितृपक्ष पुरखाक वंशावली आधार पर त्रिप्रवर आ पँचप्रवर अन्तर्गत मिथिलाक ह्रास होय सँ बाँचत । ओना एहेन गहिंरगर तितम्हा सँ मिथिलांचलक अधिकांश जाति बाँचल रहल आ वैज्ञानिक प्रणाली सँ जीवन खेपैत सबकेँ ताहि पथपर डेग बढाबय लेल अनुशरण करबाक सोझ डगर धरा देने होथि। ____ स्रोत-: १ ,प्रीति कारण सेतु बान्हल,वर्ष २०२४ आई एस एस न ९७८-९३-३४०-०९५६-९ २, सेतु षाम प्रकाशन वर्ष २०२६ आई एस एस एन ९७८-९३-५७१७- ३५८-२ ३, मारगेन स्टेनली संस्थाक सर्वेक्षण प्रकाशित दि१ पर. २०२५ लोकमत अखबार। - प्रीति कुमारी, बी.ए., बीएड. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.६. कंचन कंठ- स्व. पापा डा. नित्यानन्द लाल दासक डायरी सं कंचन कंठ स्वo पापा डाo नित्यानन्द लाल दासक डायरी सं जखन कलाम क किताब बंधक राखल गेलनि डाo ए पी जे अब्दुल कलाम 1954-57 में चेन्नई क मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में पढैत छलाह l घटना प्रायः दिसंबर 1955 के होयत l ताहि दिने ओ द्वितीय वर्ष क छात्र छलाह l छुट्टी में हुनक सब सहपाठी गण गाम चल गेल छलाह l ओ आगामी परीक्षा क लेल एवं विषयक नीक तैयारी क लेल छात्रावासे में रहि गेल छलाह l ओहि काल हुनका बहनोई अहमद ज़माल सं एकटा ट्रंक कॉल भेटलनि l रामेश्वरम में भयंकर चक्रवात सं तबाही मचल छल आ हुनक माता पिता हुनका सं शीघ्रे भेंट मंगने छलखिन्ह l ओ तत्काले रामेश्वरम जाय अपन माता पिता आ घर द्वार के देखबाक लेल व्यग्र भ गेलाह l महीना क अंत छल आ हाथ एकदम खाली छलनि l घर सं टाका मंगयबाक समय सेहो नहिं छलनि l ओ सोच में पड़ि गेलाह 'जे कोन उपाय करी जे यात्रा क पैसा क जोगाड़ होए' l ओहि काल में हुनका लग एके गोट संपत्ति उपलब्ध छलनि l ओ छल एम आई टी क गोवर्निंग काउन्सिल क चेयरमैन डाo लक्ष्मण स्वामी मुद्दालियार द्वारा हुनका द्वितीय वर्ष में एयरोडायनामिक्स विषय में उत्कृष्ट अंक क लेल पुरस्कार स्वरुप प्राप्त पुस्तक l टीमोंशेंको ओ गुडियर द्वारा लिखित 'दी थीयोरी ऑफ इलास्टिसिटी' क मूल्य ताहि दिने 400 टाका छल l जे पोथी हुनका पुरस्कार स्वरूप भेंटल छलनि तकरा बिक्री करबाक निर्णय बड्ड कठिन छलनि l मुदा गाम जयबाक लेल हुनका कम स कम साठि टाका क नितांत आवश्यकता छलनि l ओ इलेक्ट्रिक ट्रेन पकड़ि क्रोमपेट स मूर मार्केट गेलाह जे सेंट्रल स्टेशन क निकट छल l ताहि दिने मूर मार्केट एहन जगह छल जतय नव पुरान किताब मोनासिब दाम पर कीनल जा सकैत छल l पूर्व में ओ 'लाइट फ्रॉम मेनी लैम्पस' मात्र बीस टाका में कीनने छलाह जे हुनक जीवन क मार्गदर्शक बनल छल l जाहि ग्रंथालय स ओ किताब कीनने छलाह ओकर मालिक संस्कारी ब्राह्मण छल l ओ ओकरा लग गेलाह आ अपन समस्या स अवगत करौलनि l ओ पोथी देखयबाक आग्रह क संग जिज्ञासा कयलनि जे हुनका कतबा टाका क खगता छनि l ओ कहलैनि जे हुनका गाम जयबाक लेल कम स कम साठि टाका चाही यद्यपि हुनका भेलनि जे ओ कम सेहो द सकैत छथि l ओ पोथी देखलनि, खोललनि आ पहिल पृष्ठ पढ़िक' ई जनलनि जे ओ हुनका तात्कालीन मद्रास विश्वविद्यालय क कुलपति प्रोo लक्ष्मण स्वामी मुद्दालियार द्वारा प्राप्त प्रथम पुरस्कार छल l ओ तत्क्षण कहलनि जे ओ पोथी नहिं कीनि सकैत छथि, कलाम व्याकुल भ गेलाह जे हुनका टाका नहिं भेटि सकतैनि l मुदा ओ कहलैनि जे ई पोथी प्रोo लक्ष्मण स्वामी मुद्दालियार द्वारा प्रदत्त अछि तंय आहाँ के साठि टाका भेटि जायत l आ ओ ता धरि पोथी के जोगा क रखताह जा धरि ओ वापस आबि साठि टाका घुरता नहिं करताह l ओ प्रसन्न छलाह जे एकटा नीक लोक मोस्किल काल में हुनका मदति क' रहल छथिन आ ओ हुनक पोथी पढ़बाक रूचि के बुझेत छथि l कलाम टाका लय रामेश्वरम पंहुचलाह l प्राकृतिक विनाश लीला देखलनि मुदा हुनक मोन त पोथी वापस लेबा पर टांगल रहलनि l रामेश्वरम सं घुरला उत्तर ओ मूर मार्केट गेलाह टाका घुराय ओहि सज्जन विक्रेता सं करारक मोताबिक पोथी वापस लेलनि l ओकर बाद हुनका ओहि तरहक प्रसन्नता भेटलनि जाहि तरहक प्रसन्नता कोनो माय के किछु काल क पश्चात् अपन हेरायल नेना के भेटलाक बाद भेटैत छैक l 'पोथी सदिखन ज्ञान दैत छैक मुदा कौखन आपातकाल में ओ संपत्तियो बनि जायत अछि।' -डा नित्यानंद लाल दास, धर्मपत्नी श्रीमती मालती दास, गाम - बलाट, पोस्ट - औंसी, जिला मधुबनी, बिहार। जन्मतिथि 10/11/1938 ई -21/6/2014 ई, एम ए , अंग्रेजी 1960 ई, पटना,पीएचडी अंग्रेजी 1978 ई, मिथिला यूनिवर्सिटी, आचार्य आंग्ल विभाग,जे एन कालेज बाबू बरही, मधुबनी,1961 ई -1998 ई , अंग्रेजी विभागाध्यक्ष एवं विश्वविद्यालय प्राचार्य फारबिसगंज कालेज फारबिसगंज (भू ना म वि, मधेपुरा) साहित्य अंग्रेजी, हिंदी, मैथिली, गद्य-पद्य लेखन, शोध, गाइड, स्कूल -कालेज पत्रिका, बटुक - प्रयाग, कर्णामृत - कोलकाता, मिथिला मिहिर - पटना, स्वदेश - दरभंगा, पहुंच - पटना, परती पलार - अररिया, शैली - फारबिसगंज, अखिल भारतीय मैथिली परिषद दरभंगा क सदस्य, साहित्य अकादमी दिल्ली मैथिली परामर्शदात्री समिति सदस्य, अकादमी क मैथिली विनिबंध (हाली) , (कंबन) आदि क परीक्षक, प्रिय विधा: अनुवाद। सेवांत कृति- पुरस्कृत पुस्तक - पूर्व राष्ट्रपति डा ए पी जे अब्दुल कलाम- द इग्नाइटेड माइंड्स- प्रज्ज्वलित प्रज्ञा, (मैथिली अनुवाद) साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार 2010 ई। प्रकाशित पुस्तक - डा कलाम- विंग्स आफ फायरक - मैथिली अनुवाद- अग्निक पांखि, संत तिरुवल्लुवर - तिरुवकुरल(पद्य)- अनुवाद (तिरुक्कुरल पद्य), भारतक संविधान (मैथिली)। प्रकाशनाधीन (मृत्योपरांत प्रकाशित एवं राधाकृष्ण चौधरी क पत्नी द्वारा देवघर में विमोचन)। राधाकृष्ण चौधरी- साहित्य अकादमी दिल्ली, पाउलो कोएल्हो - द अल्केमिस्ट -ओ रसायनी(मैथिली), डा ब्रजकिशोर वर्मा मणिपद्म- नैका बनिजारा (साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत) - द लीजेंड ऑफ नैका (अंग्रेजी)। हुनक कथा सभ - मणिपद्माज स्टोरीज(अंग्रेजी), राधाकृष्ण चौधरी (साहित्य अकादमी) आदि। -कंचन कंठ, गाम - बलाट+ बघांत। संप्रति नवीं मुंबई, महाराष्ट्र मे रहैत छथि। मैथिली, हिंदी में लेखनी करै छथि । हिनक मैथिली में प्रकाशित पोथी "फाटल कुहेस"छन्हि । सामाजिक विषय सभ पर लेखनी चलबै छथि । विभिन्न पत्र-पत्रिकासभ मे विभिन्न विधा यथा: कविता, कहानी, आलेख, रिपोर्ट, बीहनिकथा, लघुकथा, संस्मरण आदि प्रकाशित होइत रहैत छन्हि । किछु साझांँ संकलन प्रकाशित छन्हि जाहिमे "मैथिली, मिथिलाक संस्कृति, आ ब्लिसफुल सोल, पितृपक्ष, सावन के झूले, झूठी मुस्कुराहट , वो देखती राहें, अन्नदाता, सझिया रोपनी, रिश्ते दिलों के रचनाकार, ग्राउंड रियैलिटी आफ इंडिया, वैदेही " आदि छन्हि। कर्णामृत, मिथिलांगन, विदेह, घर-बाहर, सृजनोन्मुख, देसिल बयना,अरूणोदय, सदीनामा, स्त्रीधर्म, समन्वय:, स्पर्श चातुर्मासिक पत्रिका, अप्पन मिथिला मासिक पत्रिका, जखन तखन , वाची पत्रिका आदि पत्रिकाओँ हिनक रचना सभ प्रकाशित छन्हि । ई-पत्रिका बेजोड़ इंडिया, मिथिलानी. कॉम, मैथिली पुनर्जागरण प्रकाश, सबमे रचना सभ प्रकाशित होइत रहैत छन्हि। सम्मान:- के के एम समूह के ललिता देवी काव्य आयोजन में प्रथम स्थान 2021ई , ललिता देवी काव्य आयोजन मे क्रमशः प्रथम -द्वितीय स्थान 2022 ई, काशी साहित्य सम्मान, कौशल्या मातृत्व सम्मान, सखिबहिनपा स्मृति विशेष आलेख सम्मान, सखि बहिनपा समूह द्वारा मैथिली जागृति सम्मान - आदि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.७. लाल देव कामत- पोथी चर्चा : मिथिलाक माटिक सुगन्ध / पोथी चर्चा : प्रेम और विरह लाल देव कामत पोथी चर्चा : मिथिलाक माटिक सुगन्ध / पोथी चर्चा : प्रेम और विरह १ पोथी चर्चा : मिथिलाक माटिक सुगन्ध
आशु कवि श्री झौली पासवान कृत ११९ पन्नाके मैथिली कविता संग्रह ' मिथिलाक माटिक सुगन्ध ' पल्लवी प्रकाशन निर्मली सँ सन् २०२५ मे बहराएल छैक, जाहिक दाम २९० टाका य। एहि पोथीके आई एस बी एन ९७८-९३-४८४६५- ३२-८ छै। ऐ पोथिमे कुल ६३ गोट नव कविता संग्रहित छैक। सात पृष्टक भूमिका लिखैत श्री पासवान जी बहुत बात स्पष्ट कयने छथि । एहि पोथीकेँ कविजी अपन पिता स्व० गरीब नाथ पासवान आ माय स्व० फुलेश्वरी देवी'क स्मृतिमे समर्पित कयने छथि। श्री पासवान जीक मातृभाषा मैथिली साहित्यमे " अक्षय पात्र" पोथीक अतिरिक्त राजभाषा हिंदीमे अनेकों पोथी प्रकाशित भेल छन्हि। सद्यप्रकाशित ' मिथिलाक माटिक सुगन्ध ' नव कविताक संग्रह मेँ मिथिलांचल क्षेत्र 'क रहन - सहन , रीति-रिवाज, खाएन -पीयन आ सामाजिक विषमता - विपणता आ मिथिलाक पाबनि- तिहार 'क महिमाके संग संस्कृतिक बखान कयल गेल छैक। मिथिला'क बाबा विद्यापति जीक आ दीनाभद्री जीक धरती पर सामाजिक समन्वय आबय ले बाबू - भईया आ बहिन लोकनि सँ संदेश,अपील कयल गेल छैक। स्वर्गहुँमे दुर्लभ पान, माछ,मौध आ मखानक संगहि एतय हरियर फूलबाड़ी - जलाशय छैक। एतुका मीठगर आम लिच्ची फल आकर्षित करैत छैक। जनक विदेहक धरतीकेँ मिथिला पेंटिंग कलाके माध्यम विश्व स्तरीय पहिचान दियेबामे पद्मश्री महासुन्दरी देवी एहन ग्रामीण स्त्री कलाकार 'क चर्चा बढ़ शिद्दत सँ केन्द्रीय कविता " माटिक सुगन्ध" मेँ भेल अछि। कविजीक सहज सोझ पाँतिक रचनाक गरहैन छन्हि,से एक वानगी देखल जाए -: ...... महमह महुआ मीठ चहटगर बढ़ तिलकोर धन्य ई धरती जकरा लागय देवतो गोड़ दीना भद्री आ भवानिक गाम अहाँ केँ बजा रहल अछि। कविवर श्री झौली जी ' चोंचा' कालजयी अपन काव्य धारामे कहैत छथि ,चंदा सूरज कायमे य,मुदा तारक गाछ पर लटकल चोंचाक खोता जाहिमे रातिकेँ भगजोगनिक चकमक इजोत होइत रहैत छल से छज्जा पर नजरि नहिं अबैत छैक। बगराक प्रति सेहो चिन्तित देखेलाह हेन। ओहि कलाकार सँ आगू नहिं भेला हेन आधुनिक कलाकार - मिस्त्री जिनक बनाओल पुल - पुलिया वर्खाक आ हवाके पहिल झोंका केँ नहिं झेल पबैत छै। हुनक रचल निशन पांति द्रष्टव्य य -: .......... चराउर करै छल दिन भरि कतौ गाम,घर,घर - चाँचरमे विश्राम करै छल रातिमे दम्पति चूजाक सँग अपन चोचामे । नहिं चुना, नहिं सीमेंट आ सुरखी देखल अछि चोंचाक खुबसूरती अन्हर , बिहारि सभ टा सहै छल छज्जामे बनाओल चोंचा नहीं गिरै छल। �..... कविजीक 'प्रेमक पांति' शिर्षक कविताक भाव जकर पति परदेश खटय गेल रहैछ,तकर परोछमे ओहि नारी'क मनोदशा कोना होईछ से सरस वृतांत बुझाईत छैक । यथा -: .......... जो जो रे कौआ जतय प्रियतम कमौआ रे। खाय ले देबौ पूड़ी गमकौआ रे नोरहिसँ लिखै छी प्रेमक ई पांति पढ़ि - पढ़ि आखर के दहलैए छाती। बटिया जोहैत पिया बीतल धनकटनी एक्केटा आश अछि फगुआ के एक्केटा आश अछि फगुआ के जो- जो रे कौआ जतय प्रियतम कमौआ रे खाय ले देबौ पूड़ी गमकौआ रे।........�..... कवि मैथिल प्रेमी ,समस्त मैथिली भाषी आ पाठक लोकनिकेँ प्रस्तुत पोथी पढ़ि प्रतिक्रिया ओ विचार सँ अवगत करेबा ले निवेदन करैत छथि। एकटा कचोट सालैत रहैत छैन जे प्राथमिक विद्यालयमे मैथिली साहित्य आ मातृभाषामे आनों विषयके पढौनी नहिं भ' रहलैक हेन। माइक ममता घोरल अइमे मिठगर माइक दूध जकाँ नेन्नो करय विचार मैथिलीमे ढ़िठगर कोनो विद्वान जकाँ। कविजी एक पर एक विलक्षण कविता सिरजलथि हेन। जहन पाठक ऐ पोथीक कविता ' नजरि लागल छै' ओ भेल बुढ़, अगराहीक धनछोहा , सांचमे ई लपेटल झूठ, अप्पन हाथ ई जगन्नाथ ,लहरल धधरा , सुनू भाय जनता , साक्षी, माटिक पुकार सुनू ,निस्तेज ,कड़ी ,अपन देशक माटि पानि आओर हम मधुकर मधुबनी छी आदि कविता पढ़ि मनन करब तँ बहुत रहस्य बूझिमे आओत। श्री पासवान जी शव्दक जादूगरी करबामे निपुण छथि। आश करैत छी जे हिनक बहुआयामी रचना एहि तरहेँ फेर आगूक समयमे पढ़य भेटत। कविता पोथीक बाढ़िमे हिनक सारगर्भित पोथीक पृथक पहिचान सुधिजन करताह,ताही मंगल कामनाक संग-: लाल देव कामत (समालोचक)मो. ७६३१३९०७६१
२ पोथी चर्चा : प्रेम और विरह आई एस एस एन ९७८- ९३- ४८८६५- १०-६ गगन कुमार कृत प्रेम और विरह 'पोथी' हिन्दी कविता संग्रह २०२६ ई० मे पल्लवी प्रकाशन निर्मली सँ निकलल अछि। एहि पोथीक' दाम दू सय टाका छै,जाहिमे ९४ पृष्ठ संख्याँ छैक। सद्यप्रकाशित 'प्रेम और विरह ' पोथी मादे भूमिकामे पूर्व प्रधानाचार्य डॉ० राम अशिष सिंहजी एचपीएस. कालेज निर्मली , सारगर्भित तथ्य परसलनि अछि। युवा कवि श्री गगन जी साहित्य क्षेत्रमे अपना रचनाके तराशय लेल आ पोथी प्रकाशन लेल प्रोत्साहित करय ले डा० उमेश मंडल जी, पल्लवी मंडल , गायत्री दीदी आओर अपन माता-पिताके प्रति आभार प्रकट करैत ऐ पोथीकेँ ओहन मानव मात्रकेँ समर्पित कयलनि अछि जे संवेदना सँ ओत- प्रोत छथि। नव उत्साह आ जागरूक युवा पीढ़ी बीच अपन रचनात्मक सेवा सँ उपस्थित भेनिहार गगन कुमार'क संक्षिप्त परिचय पाठक बीच होय; ताहि लेल पोथी समीक्षा सँ पूर्व जनतब दऽ रहल छी। मधुबनी जिला'क नरहिया थाना अन्तर्गत छजना गामक रहबासी माय श्रीमती रेखा देवी आ बाबूजी श्री शिवजी साह के घर दि० १२-८-२००६ ई०कें होनहार बालक गगन के जन्म भेलनि अछि। वर्तमानमे निरमली अनुमंडल मुख्यालयके नगर बैरियर चौक स्थित हिनक आबास छन्हि। शिक्षा -दीक्षा नरहिया सागर हाईस्कूल सँ मैट्रिक तथा सीएमबी. कालेज - घोघरडीहा (डेवढ़) सँ अन्तर स्नातक प्रथम श्रेणी सँ उत्तीर्ण भऽ बीएससी नर्सिंग केर पढ़ाय- लिखायमे लागल छथि। मैथिली कथा साहित्य दिश ' सगर राति दीप जरय ' कार्यक्रम सँ दू सालके नियमितता हिनकामे सृजन करबाक गुणके उत्प्रेरणा भरलकनि हय। टैगोर लिटरेचर अवार्ड आ साहित्य अकादमी सँ पुरस्कृत उपन्यासकार श्री जगदीश प्रसाद मंडल जीके मैथिली भाषा मेँ पोथी 'कुण्ठा' केर हिंदी अनुवाद "अन्तर्मन का पीड़ा " शिर्षक सँ कय अपन गम्भीर उपस्थिति बनेलनि हेन। अपन कवित्व मेँ भावनात्मक ईमानदारी सँ डेग आगू बढ़बैत सरल रूपेँ अभिव्यक्ति प्रस्तुत केलनि हेन। कविजी ' चल बंधू' शिर्षक कविताक माध्यम पाठककेँ एतय सँ चलबाक संदेश दैत चेतौनी करैत छथि। जगतमे आब स्नेह- प्रीत नहिं बाँचल रहल, प्रकृतिमे आब कोइली पंछीक मीठगर स्वर केँ ग्रहण लागि गेल छै। पहिले जकाँ आब खेत - खरिहान'क रहस्य नहिं बाँचल छैक। गहुँमक शीश धरि चुप्पी साधि लेने य। एकटा पांति द्रष्टव्य अछि -: आधुनिक युग में आकर फूल गया सुगन्धित रे , इस माया के मृत्यु लोक में केवट बचा ने परीक्षित रे।। संसारमे परस्पर प्रेम भाव नायक - नायिकाक बीच रहैत आयल छैक। हमसफर महबूब कें ई बूझय पड़तैन जे एहि धराधाम पर सब किछ छैक।
एक पाँति अएलैक हेन जे करूण रस में अछि।देखल जाए ,-: भोर की तुम भास्कर हो , रात की तुम चन्द्रमा , तेरे बिना सुना - सुना लगता है आसमाँ। अँखियों के काजल से दिन भी अंधेरा हुआ , जुल्फों की घटा तेरी झरती है कालिमा। पुनर्जन्म तँ एक दिलेशा आ भ्रम थीकैक। एक बेर जे असरकारी बरखा होईछ नेत्र सँ ,फेर जीवनमे ओहन साऊन कहाँ अबैत छैक। कविवर गगन जीके हिंदी भाषा मेँ पांतिक एक बानगी देखल जाए -: आज तक बिछड़ने वाला फिर कहाँ मिल पाया ? फूल जो मुरझा गया था , वो फिर से नहीं खिल पाया । एहि तरहेँ सद्यप्रकाशित पोथीमे कुल ५१ गोट कविताक संग्रह य,जे बढ़ सौष्ठव अछि। नवोदित युवा कवि सँ अपेक्षा रहत जे मैथिली काव्य दिस अपन रचनाधर्मिता केँ बढ़ाबैत पाठक बीच यश बटोरथि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.८. आचार्य रामानंद मंडल- मलंगिया महोत्सव बनाम मलंगिया नाट्य महोत्सव आचार्य रामानंद मंडल मलंगिया महोत्सव बनाम मलंगिया नाट्य महोत्सव
हाले मे मंलगिया महोत्सव -२०२६ दिल्ली मे मनायल गेल। पहिले त समझ मे न आयल कि इ मलंगिया महोत्सव कि हय ? आ कैला मनाएल जाइ छै। कहीं इ विद्यापति महोत्सव लेखा न त शुरू कैल गेल हय। बाद मे बात परत दर परत खुलैत गेल।अइमे ३५ टा महेंद्र मलंगिया कृत नाटक के अभिनित कैल गेल।वोहो दिल्ली अवस्थित मंच पर। पहिले त गाम गाम मे दूर्गा पूजा वा छठ पर्व पर गाम के युवा लरिका सभ करैत रहय।भर गाम मे चंदा मांग नाटक खेलैत रहय। जेते नाटक भेल एकै युवा नायक बनैत रहय। नाटक वीर राणा प्रताप,राजा सत्य हरिश्चन्द्र, सुल्ताना डाकू आदि होय।जौ गाम के कुछ युवा समाज को बदल डालो नाटक खेले के बात कैलक तब गाम मे दू गो युवा ग्रुप बन गेल। फारवर्ड आ बैकवर्ड ग्रुप।गाम मे आल्हा उदल, लोरिकायन, हंसराज वंशराज नाच सेहो आयोजित होय। रामलीला के आयोजन सेहो होय। सीतामढ़ी में रामनवमी आ विवाह पंचमी के अवसर ठेठर सेहो होय। जंहा तक याद हय दरभंगा थियेटर पार्टी।बड सुंदर अभिनय करय। हं।अब बात करय छी जोतिश्वर कृत नाटक धूर्त समागम आ विदापत नाच के जेकरा कहियो न देखल गेल। सीतामढ़ी क्षेत्र मे मैथिली नाटक आइ तक न भेल हय।रहल मलंगिया कृत नाटक सेहो भेल त दिल्ली के रंगमंच पर।जेकरा आम मैथिल के कोनो सरोकार न हय।इ नाटक से समाज पर केते प्रभाव पड़त इ त भविष्य के गर्त मे हय। फेसबुक पर एगो नाटक कोठी गिराय दिअ देखल गेल।इ भाव प्रधान नाटक रहय।मूक अभिनय कैल गेल हय।आम समझ से बाहर लागल। मलंगिया के मैथिली नाट्य विधा के सेक्सपियर कहल जाइत हय। परंच मैथिली साहित्य प्रबंध संग्रह गैर नाट्य विधा मे मलंगिया साहित्य अकादमी पुरस्कार से पुरस्कृत छतन। हां। मलंगिया जी के नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में आ गेल। नाटक के नाम चाहे न आयल हय।लगय सोच समझ के आयोजन के नाम मलंगिया नाट्य महोत्सव के बदले मलंगिया महोत्सव राखल गेल रहय।चलू नामे सही गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड में नाम त दर्ज त भे गेल कि मलंगिया संग मैथिली (नाट्य) साहित्य विश्वस्तरीय भे गेल।आब मैथिली साहित्य के नोबेल पुरस्कार के आस राखल जा सकय हय। -आचार्य रामानंद मंडल, सीतामढ़ी। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.९. रबीन्द्र नारायण मिश्र- जयतु जानकी (धारावाहिक उपन्यास) रबीन्द्र नारायण मिश्र जयतु जानकी (धारावाहिक उपन्यास) १५ अयोध्याक आसपास ओहि समय कैकटा घटना घटि रहल छल। लक्ष्मण रथपर जानकी संगे जंगल दिस जा रहल छलाह। ओमहर अयोध्यावासी सैकड़ोंक संख्यामे रामक राज महल दिस बढ़ि रहल छल। कोतबाल अपन दायित्वक निर्वाह करैत राजारामकेँ सूचना देबाक भरिसक प्रयास केलक,मुदा हुनकर स्थित बहुत गड़बड़ रहनि। ओ किछु करबासँ असमर्थ रहथि। जानकीकेँ जंगला पठा कए ओ आत्मग्लानिसँ भरि गेल रहथि। बातो सही छैक। ककरो कहलापर लोक अपन पत्नीकेँ दंडित कए देत,सेहो बिना ओकरा उचित अवसर देने। कमसँ राजारामकेँ जानकीसँ संवादक करबाक छलनि।हुनकासँ पुछितथिन जे एहन परिस्थितिमे की कएल जाए? मुदा ओ तँ सोझे आदेश दए देलनि। आब स्वयं ओहि आदेशक परिणाममे झड़कि रहल छथि। अयोध्या तँ जेना परमाणु बमपर बैसल होअए। शक्तिस्वरुपाक मार्गदर्शनमे मैथिलीपुत्र मिथिलाक सैकड़ों जानकीधुजावाहिनीक संगे अयोध्या बिदा भए गेल रहथि। “आब हमसभ की करी?” “आब अयोध्या गेलासँ किछु फएदा नहि होमए बला अछि। कारण जानकी ओहिठामसँ लक्ष्मणक संग रथपर जंगल दिस बिदा भए गेल छथि। फेर अयोध्यावासीलोकनि स्वयं राजारामक निर्णयसँ बहुत उत्तेजित छथि।ओ सभ राजारामक महल दिस बढ़ि रहल छथि। राजाराम किछु प्रतिकार करबाक स्थितिमे नहि छथि। ” “तखन?” “अहाँसभ लक्ष्मणक रथक पछोड़ करू। यदि संभव होइक तँ जानकीकेँ मनाउ आ हुनका लेने सोझे जनकपुर चलि जाउ।” “सही कहलहुँ। हमरसभक प्रथम लक्ष्य थिक जानकीक रक्षा,हुनकर सम्मानक रक्षा । जंगलमे एसगरि किएक आ कोना रहतीह? मिथिलाक घर-घर हुनकर स्वागत करबाक हेतु तत्पर अछि। फेर राजा जनक कोनो चुकि नहि गेलाह अछि। ओ जानकीकेँ अपना संगे राखि सकैत छथि। समस्या एतहि समाप्त भए जाएत। हमसभ अयोध्या जाइए कए आब करब की?जतए प्रेम नहि अछि,जाहिठामक महारानीकेँ केओ ओकर अधिकारसँ च्युत कए सकैत अछि,जाहिठाम अविश्वास एतेक प्रबल भए गेल अछि जे अग्निपरीक्षा देलाक बादो राजाराम सन लोक अपन पत्नीक त्याग कए देथि,ताहिठाम नीक लोक किएक जाएत,किएक रहत। अयोध्या आब ओ नहि रहि गेल।नहि रहि गेल ओहिठाम न्यायक शासन।लोकसभ स्वार्थी आ मदान्ध जखन भए जाए तखन ओ एहिना करए लगैत अछि। ” मैथिलीपुत्र अपन सहयोगीक संगे जानकीक रथक पछोड़ कए रहल छलाह। आकाशमे उड़ि रहल हुनकर वायुयान दिस लक्ष्मणक ध्यान जाइत छलनि।मुदा ओ ततेक परेसान रहथि जे किछु आर सोचबाक अवसर नहि होनि। जानकी आब थाकि गेल छलीह। तखनहि लक्ष्मण कहैत छथिन- “यदि अहाँक आज्ञा होअए तँ हमसभ आइ गोमती कातमे रात्रि विश्राम करी। काल्हि भोरे आगूक यात्रा कएल जाएत। “बहुत नीक विचार अछि। आइ हमसभ गोमती तीरक आनन्द ली।” जानकीक सरलता आ विश्वास देखि लक्ष्मण गुम छथि। मोने-मोन कष्ट भए रहल छनि जे ओ जानकीकेँ सही बात नहि कहि रहल छथि। मुदा ओ करथि तँ की करथि? राजारामक आदेश सर्वोपरि थिक। तकर बादे किछु आर। आखिर राजाराम हुनकापर पूर्ण विश्वास कए एहन दायित्व देलखिन। ओमहर कोतबाल भरतकेँ सभटा बात कहैत छथि। रामक स्थिति , हुनकासँ भेल गप्प सेहो हुनका बतबैत छथि। भरत से सभ सुनि जेना घोर संकटमे पड़ि जाइत छथि। ओ कहैत छथि- “राजाराम एना केना रहि सकैत छथि? हुनका अपन निर्वाहक लेल तत्पर होमए पड़तनि। जे किछु भेल किंवा भए रहल अछि ,से सभ हुनके आदेशक कारण भए रहल अछि। तकर बाद घटित भए रहल घटनाकेँ नियंत्रित करब तँ हुनकर कर्तव्य छनि। मुदा हुनका बुझाएत के? ओ तँ स्वयं ज्ञानी छथि,मुदा अखन परिस्थितिवश विषादग्रस्त भए गेल छथि।एहन हालतिमे की करी?किछु बुझा नहि रहल अछि।” भरत कनी काल सोचैत रहि जाइत छथि। फेर कोतबालकेँ कहैत छथिन- “ठीक छैक। हमरा अयोध्यावासी लग लए चलह । हम हुनकालोकनिकेँ बुझेबाक प्रयास करब । आगू भावी प्रबल। यदि ओ सभ नहि मानताह,अशांति करबाक लेल अड़ि जेताह तखन शक्तिसँ ओकर समाधान कएल जाएत।निश्चितरूपसँ ओ कोनो बढ़िआँ विकल्प नहि होएत। मुदा अयोध्याकेँ एना लुटैत तँ नहि देखल जा सकैत अछि। अखन तँ हमसभ जीवित छी।” भरत कोतबालक संगे राजारामक महलक लगीचमे चौबटिआपर पहुँचैत छथि। हुनकर पाछू-पाछू सैनिकसभ चलि रहल छल।सामनेमे सैकड़ोंक संख्यामे उपस्थित अयोध्यावासीकेँ उत्तेजित अवस्थामे देखि भरत छगुन्तामे पड़ि जाइत छथि। ओ कोतबालक कानमे कहैत छथिन- “एहन विशाल जनसमूहकेँ बलप्रयोग द्वारा नहि रोकल जा सकैत अछि। बहुत रक्तपात होएत-ओहो अपन लोकक। तेँ बुधिआरीसँ काज लेल जाए।” “जे अपने कहबैक सएह कएल जाएत।” “हमसभ धैर्य राखी। आखिर ओ सभ अपने प्रजा छथि आ जानकीक प्रतिए सहानुभूति रखैत छथि जे कतहुसँ गलत नहि कहल जा सकैत अछि। हमरा विश्वास अछि जे यदि हुनका लोकनिकेँ प्रेमपूर्वक बुझाएल जेतनि तँ ओ सभ मानि जेताह।”-एतक बाजि भरत विचारमग्न भए गेलाह। १६ सूर्यास्त होअए जा रहल छल। भगवान सूर्य जेना जल्दी सँ जल्दी पश्चिम दिस क्षितिजपार नुका जाए चाहैत छलाह। हुनकोसँ अयोध्यामे जानकी संग कएल गेल व्यवहार देखल नहि जा रहल छलनि। ऊपरसँ अयोध्यावासी लोकनिक विद्रोह आर दुखी कए देने छलनि।ओ साइत सोचैत रहल हेताह- “हे काल! अहाँ धन्य छी। की देखा कए की देखा रहल छी? कहाँ मर्यादापुरुषोत्तम राम कहाँ एहन दुर्दशा देखि रहल, भोगि रहल हुनकर समाज। नहि देखी एहन दृश्य सएह नीक।तेँ आइ ओ बहुत जल्दीमे बुझाइत छथि। साइत ओ अपन मदति लेल मेघकेँ बजा लेलनि। सौंसे आकाशमे अचानक मेघ पसरि गेल। अचानक जेना रातिक आगमन भए गेल होइक। भगवान सूर्य सोचने हेताह-“धन्यवाद मेघ! अहाँ हमर लाज रखलहुँ। अयोध्यामे जे किछु भेल ,जे किछु होअए जा रहल अछि से नहिए देखी सएह नीक। “की बात करैत छी। अहाँ तँ सभ दिन काल निरपेक्ष रहलहुँ। एहि पृथ्वीपर की की ने भेल। अहाँसभ किछु निर्लिप्त भावसँ देखैत रहलहुँ अन्यथा ई दुनिआ चलैत?नहि चलि सकैत। अहाँ अपन निरंतरतासँ ,निर्लिप्त भावसँ एहि शृष्टिक रक्षा करैत रहलहुँ । अपन कर्तव्यक निर्वाह करैत रहलहुँ । तकरे परिणाम अछि जे ई संसार थम्हल अछि,समस्त जीँव-जन्तुक प्राण बाँचल छैक,नहि तँ कहिआ ने प्रलय भए गेल रहैत।” आकाश मेघसँ भरि गेल छल।भगवान सूर्यकेँ नुकेबाक अवसर भेटि गेल छलनि। चारूकात अन्हार पसरि गेल छल। अयोध्या सहरमे घरे-घर सन्नाटा पसरल छल।ककरो घरमे इजोत नहि देखाइत छल। लोक जेना साँझो देखेबाक लेल उत्सुक नहि होअए। सभ जानकीक दुखसँ दुखी छल। स्त्री आ बूढ़सभ जे ओहि भीड़मे बाहर नहि जा सकल रहए से अपन-अपन घरक खिड़कीसँ उचकि-उचकि बाहर देखि रहल छल। ओ सभ देखलक जे अचानक भरत रथपर सबार भए लोकसभक अपार भीड़क आगू पहुँचि रहल छथि। भीड़ देखितहि भरत रथकेँ ठामहि रोकि लेबाक आदेश दैत छथि। “रोक रथ। हम एहिठामसँ आगू पैरे-पैरे जाएब।”-भरत बजलाह। “परन्तु …। ”-कोतबाल बीचेमे टोकलखिन। “की बजलहुँ?” “वर्तमान परिस्थितिमे अहाँकेँ पैरे चलब उचित नहि बुझाइत अछि।लोकसभ बहुत उत्तेजित अछि। कहीं किछु अनर्थ ने भए जाए।” “जे हेतैक। कएले की जा सकैत अछि। हमसभ तँ निमित्तमात्र छी। अपन कर्तव्य करी आ चली।” भरत रक्षाप्रमुख पैरे-पैर ओहि अपार जनसमूह लग पहुँचि जाइत छथि। ओ बजैत छथि- “अयोध्यावासी भाइ- बहिन लोकनिकेँ सादर प्रणाम! अपने लोकनि असमयमे एना किएक एकत्रित भेल छी?अहाँसभक कष्ट की अछि? की हम अपने लोकनिकेँ किछुओ मदति कए सकैत छी?” “अहाँ हमरासभसँ बुझऔलि नहि बुझाउ।अहाँकेँ सभ किछु बुझल अछि। अहाँ जनैत छी जे जानकीक की हाल होमए जा रहल छनि। तखनहु निचैन छी। जकरा जे होउ,अहाँकेँ की लेना-देना?” “अपने लोकनि एना नहि बाजू। कल्हुका राति हमसभ एक्को क्षण नहि सुति सकलहुँ। राजारामकेँ अपना भरि बुझेबाक प्रयास करैत रहलहुँ। एही प्रश्नपर लक्ष्मण तँ हुनका संगे बकझक सेहो भए गेलनि । राजाराम सभदिन हमरसभक आदर्श रहलाह अछि। सभ दिन हमसभक हुनकर आज्ञाकेँ देववाणी बुझि अनुपालन करैत रहलहुँ अछि। तेहन व्यक्तिक आदेशकेँ साफे कोना मना कए देतिऐक? अहींसभ बाजू। मुदा हम तीनू भाइ हुनका बुझेबाक कोनो प्रयास बाँकी नहि रखलहुँ। मुदा ओ अपन निर्णयपर अड़ि गेलथि। ओ तँ अयोध्याक राजो छोड़ि देबाक लेल इच्छुक छथि। मुदा फेर की होएत? के चलाओत ई राज-काज?हमरा तीनू भाइसँ से अपेक्षा केनाइ व्यर्थ। कारण हमसभ अपन प्राण दए देब,मुदा राजारामक विरुद्ध नहि ठाढ़ होएब।” “तखन अहाँ एहिठाम की करए अएलहुँ अछि? की अहाँ हमरालोकनिकेँ ठकबाक प्रयासमे छी?सभ झंझटिक जरि तँ राजारामे छथि अहाँ हुनका किछु कहिए नहि सकैत छिअनि,राजा ओएह बनल रहताह। तखन तँ जानकीकक संगे भेल अन्यायक निवारण के करत?” “अहाँसभक सोच सही नहि अछि। जे राजाराम एहन कठोर निर्णय लेलथि से की स्वयं निचैन छथि? नहि छथि। ओ तँ स्वयं अहुरिआ काटि रहल छथि। रातिभरि जागल छथि,किछु खेने नहि छथि। निठ्ठाह बौक भए गेल छथि। हमरा तँ चिंता भए रहल अछि जे कहीं हुनके ने किछू भए जानि।” “अहाँ एमहर-ओमहरक बात नहि करू। सोझे बाजू जे जानकीकेँ वापस अयोध्या अनबनि की नहि? रानीक बात तँ छोड़ू ,हुनका एहिठामक एकटा सामान्य नागरिकोक अधिकार देबनि की नहि?” भरत की बजितथि? एहिप्रश्नक उत्तर हुनका लग रहबे नहि करनि। ओ गुम्म पड़ि गेलाह। एताबतेमे आकाशसँ शक्तिस्वरुपा प्रकट भेलीह- “सुनि लिअ भरत आ सुनथु अयोध्यावासी लोकसभ। जानकी कोनो असहाय नहि छथि। ओ सर्वशक्तिमान छथि। अखन तँ हुनका किछु बुझले नहि छनि। मुदा यदि बुझलो रहितनि तू हुनकर आत्मसम्मान अयोध्यामे हुनका वापस नहि आबए दितनि।मुदा एकटा बात नीकसँ बुझि लिअ। जे किछु भए रहल अछि तकर प्रतिध्वनि आबए बला जुग-जुग धरि सुनल जाएत आ लोकसभ पुछबे करतनि-“राजाराम अहाँ ई की केलहुँ?जानकीक ऐहि भावनाक संप्रेषणक लेल चिरञ्जीवी आबि रहल छथि। ओ एहि काजकेँ अनन्त काल धरि मिथिलासँ अयोध्या धरि प्रेषित करैत रहताह। लोकक मोनमे जानकीक प्रतिए सद्बाव बनओने रहबामे सहयोगी बनल रहताह।” तखनहि हाथमे गदा लेने एकटा गौरवर्णक युवक प्रवेश करैत छथि। “हे लिअ। आबिए गेलाह चिरञ्जीवी।” १७ चिरञ्जीवी कल जोरि ठाढ़ छथि। “आदेश माते! हमरा एहिठाम किएक आनल गेल?” “देखि नहि रहल छी जे पृथ्वीपर अखन कोन-कोन अनर्थ घटित भए रहल अछि?जाहि तरहेँ जानकीकेँ अपन घरसँ निर्वासित कएल गेल अछि,जाहि तरहेँ अयोध्या आ मिथिलावासी एकर विरोध कए रहल छथि से जुग-जुग धरि लोककेँ मोनमे गड़ल रहत। लोक एहि घटनाकेँ बिसरि नहि सकत। एकरा बारेमे बहुत किछु जानए चाहत। केओ तँ चाही जे एहि घटनाक प्रत्यक्षदर्शी बनि एकर सही जनतब भावी पीढ़ीकेँ दिअए।अहाँकेँ इएह भार देल जाइत अछि।” “मुदा हम कतेक दिन जिअब। एहि पृथ्वीपर तँ लोक अबिते अछि मरि जेबाक लेल।हमहूँ आइ ने काल्हि चलि जाएब।तखन अहाँक काज आगू कोना बढ़त?के कहि सकत जे एना किएक भेलैक? जानकीक संगे भेल एहि अनर्थक प्रतिकार कोना होएत?की लोक एकरो समयक संगे आन अपराध जकाँ बिसरि जाएत?” “जकर चिंता अहाँकेँ करबेक नहि चाही से अहाँ कए रहल छी। अहाँकेँ बुझबाक चाही जे अहाँक प्रादुर्भाव कोनो साधारण घटना नहि थिक।सही मानमे अहाँ एहि युगक संवाहक थिकहुँ। एहि कालखण्डमे घटि रहल नीक बेजाएक एकटा प्रत्यक्षदर्शी बनि भावी पीढ़ीक मार्गदर्शन करी। ” “हम नहि बुझि सकलहुँ?” “अहाँक ध्यान कतए अछि? कनी साकंछ होउ। काल्हि जा कए मिथिलावासी पुछताह जे जानकीक संगे एहन अत्याचार किएक भेलनि? तकर उचित प्रतिकार किएक नहि भेलैक? की राजाराम सही मानमे जानकीकेँ दोषी मानैत छलाह?एहन-एहन बहुत रास प्रश्नसभ लोकक मोनकेँ उद्वेलित करैत रहतैक। तकर निवारण अहाँ करब।” “हम देखि रहल छी जे मिथिलासँ सैकड़ों जानकीधुजावाहिनी गोमतीक कात धरि पहुँचि गेल छथि। ओही आस-पासमे लक्ष्मणक रथ जानकीक संगे पहुँचि रहल छनि। एमहर अयोध्यावासी उत्तेजित भए राजारामक महल दिस बढ़ि रहल छलाह,मुदा भरत हुनका लोकनिकेँ शांत करबाक प्रयासमे लागल छथि। भरत किछु बाजिए रहल छलाह कि एकटा अधबयसु ओही भीड़सँ निकलि अपने गलामे तरुआरि लगा लैत अछि। ओकर गलासँ खून फब्बारा छह-छह निकलि रहल अछि। ओकर ई हालति देखि चारूकातसँ लोक ओकरा घेरि लैत अछि।देखिते-देखिते चारूकात ओकर खून पसरि जाइत अछि। खूनसँ लथ-पथ ओ स्वयं जमीनपर खसि पड़ैत अछि।” “आब अहाँ अपन काज करैत रहू। अखन एहि तरहक बहुत घटनासभ देखबाक अवसर अहाँकेँ भेटत। अहाँ धैर्यपूर्वक तकर अवलोकन करू।” खूनसँ लथपथ अधबयसुक पहिचान ओही धोबीक रूपमे भेल जकरा कारणेँ जानकीक वनबास भए रहल छलनि। मुदा ओ स्वयं नहि सोचने रहल होएत जे अपन घरक एकान्तमे ओकरा द्वारा बाजल गेल किछु शब्दक एहन भयाओन प्रतिक्रिया होएत। ओ तँ तामसमे बजैत-बजैत किछु बाजि गेल। बात खतम। मुदा ओएह शब्द की की केलक से तँ देखिए रहल छी ने। तेँ कहबी अछि जे बहुत सोचि-बिचारि कए बाजी। एक बेर जे शब्द मुँहसँ निकलि गेल से वापस नहि होएत आ ओकर प्रभाव कैक बेर जुग-जुग धरि बाँचल रहि सकैत अछि। भरतक ध्यान ओकरापर पड़ैत छनि। ओ तुरंत कोतबालकेँ इसारा करैत छथि। सैनिक सहित कोतबाल ओहि घायल व्यक्तिकेँ तुरंत अस्पताल लए जाइत छथि। पाछू-पाछू भरत सेहो ओमहरे बिदा होइत छथि। मुदा हुनकर अंगरक्षकलोकनि हुनका रोकि लैत छथि आ अपना संगे हुनका महल वापस आनि लैत छथि। परिस्थिति प्रतिकूल देखि अयोध्यावासीलोकनि राजारामक महल दिस जेबाक विचारमे तत्काल विराम देबाक घोषणा करैत छथि। ओहि भीड़मे सँ एकटा बृद्ध बजैत छथि- “हमसभ देखि रहल छी जे जानकीक वनबासक प्रत्यक्ष कारण धोबी स्वयं आत्मग्लानिसँ आत्महत्याक प्रयास कए लेलक अछि। ओकर प्राण संकटमे छैक। ओ जीबिओ सकत कि नहि तकर कोनो ठेकान नहि अछि। अखन राजाराम से बहुत कष्टमे छथि। भरत स्वयं एहिठाम आबि कए हमरालोकनिकेँ बौसबाक बहुत प्रयास केलनि अछि। फेर मूल बात तँ जानकीकेँ ससम्मान वापस अनबाक अछि ने कि अयोधयाक विनाश करबाक अछि। आखिर अयोध्या हमरा लोकनिक मातृभूमि थिक,एकरा प्रतिए हमरा लोकनिक कर्तव्य अछिए। अस्तु,हमसभ एहिठामसँ अखन वापस चली। ” “से सभ जे होइ,मुदा जाधरि जानकी वापस नहि अबैत छथि,हमसभ अपन-अपन घर वापस नहि जाएब।”-भीड़ सर्वसम्मति से बाजि उठल। “कोनो बात नहि।हमसभ ओमहरे चली जेमहर लक्ष्मणक रथ जा रहल छनि। जतहि जानकी भेटतीह , अपना भरि जानकीकेँ मनएबाक प्रयास करी। हुनका निहोरा कए वापस आनि लेबनि।” “सही बजलहुँ। चलू ओमहरे चलैत छी। बिना जानकीक अयोध्या श्रीहीन भए गेल अछि। एहिठाम रहनाइ उचित नहि अछि।” सभ केओ लक्ष्मणक रथक पछोड़ करैत ओमहरे बिदा भए जाइत छथि। १८ भरत स्वयं अस्पताल जा कए धोबीक चिकित्साक व्यवस्था केलनि। बहुत प्रयासक बाद ओकर जान बाँचि सकल। तकर बाद प्रहरीसभ ओकर देख-रेख करैत रहल। ओमहर राजारामक हालति चिंताजनक भए गेल रहनि। आइ कैकदिनसँ ओ अपन घरसँ बाहर नहि निकलल रहथि। ककरोसँ भेंट नहि करथि। राज-काज निठ्ठाहे ठप्प भए गेल छल। ककरो किछु फुरेबे नहि करैक जे राजारामकेँ कोना बुझाएल जाए। कारण तँ ओ स्वयं छलाह। केओ हुनका जानकीसँ पृथक नहि केने रहनि। धोबी किछु बाजल,केओ ओकर समर्थन केलक ,नहि केलक,मुदा अंतिम निर्णय तँ राजा रामे केलाह। हुनकर तीनू भाइ हुनकर निर्णयसँ सहमत नहि रहथि,अपना भरि बुझेबाक भरिसक प्रयासो करैत गेलाह। मुदा ओ अड़ल रहि गेलाह। तखन आब किएक अफसोच कए रहल छथि? एहन अंतर्द्वंदमे किएक फँसि गेल छथि? राजारामक महलक बाहर आर्तलोकसभक पाँति लागि गेल छल। सभ परेसान छल। ककरो कोनो तरहक मदति नहि भेटि रहल छल। असलमे जखन राजा स्वयं दुखी होअए तखन ओ जनताकेँ कोना सुखी राखि सकत? मुदा समाधान करत के? राजाराम स्वयंसँ बाहर होथि,महलक बाहरक दृश्य देखथि तखन साइत हुनका होस आबनि। अयोध्या आ राजमहलक हालति देखि भरत बहुत चिंतित रहथि । ओ शत्रुघ्न संगे विचार विमर्श केलनि। किछु समाधान फुरेबे नहि करनि। की कएल जाए? आखिर,ओ सभ राजारामसँ भेंट करबाक लेल पहुँचलाह। भरत सोझे हुनकर कोठरीमे प्रवेश करैत छथि।हुनका पाछू लागल शत्रुघ्न सेहो जाइत छथि। भरत राजारामकेँ प्रणाम करैत छथि। राजारामक दाढ़ी बढ़ि गेल रहनि। ओ कैकदिनसँ स्नान धरि नहि केने रहथि। भोजन करबाक तँ प्रश्ने नहि उठैत छल। भरत खिड़की खोलि दैत छथि। सामनेमे सैकड़ों लोकसभक करमान लागल छल। लोकसभ त्राहिमाम् कए रहल छल। राजाराम एहि दृश्यकेँ देखैत छथि।अपन महलक सामनेमे कष्टमे पड़ल एतेक भारी जनसमूहकेँ आएल देखि राजाराम बहुत चिंतामे पड़ गेलथि। कहीं हम गलत निर्णय तँ ने कए बैसलहुँ। भावावेगमे जानकीकेँ जंगल पठा कए हम अनेरे एकटा समस्या ठाड़ कए लेलहुँ। लोक तँ कहिते रहैत छैक,मुदा हमरो तँ सोचबाक चाहैत छल। आखिर जानकी हमर अर्धाङ्गिनी थिकीह। हुनको जीबाक,मर्यादासँ रहबाक पूर्ण अधिकार छनि। फेर जाहि बातक कोनो प्रमाण नहि अछि,जाहि परिस्थितिपर जानकीक कोनो नियंत्रण नहि रहि गेलनि, तकरा आधार बना कए निर्णय लेब, सेहो एतेक कठोर निर्णय जे गर्भवती जानकीकेँ ऊपरसँ अपन चार धरि छिनि लेलकनि,जे हुनका पूर्णतः अनाथ बना देलकनि,कतेक सही रहल। बहुत गलत भए गेल।हमरा भाइलोकनिक बातपर समय रहैत विचार करबाक चाहैत छल। राजारामकेँ रहि-रहि कए जानकी मोन पड़ैत छलखिन।हुनकर अनुपम छवि सदिखन आँखिक सामनेमे नचैत रहैत छलनि। केना ओ दिन-राति हुनका लेल व्यग्र रहैत छलखिन। राजाराम कोनो बात बजितथि ताहिसँ पहिने ओ जानकी बुझि जाइत छलीह। तकर उचित समाधानमे लागि जाइत छलीह। कैकबेर राति-राति भरि ओ लोककल्याणक काजमे लागल रहि जाइत छलाह,तखन जानकी हुनका विश्रामक लेल विनती करैत छलखिन। “अहाँ अपन जानक रक्षा नहि करब तखन ई राज-काज कतेक दिन चलि सकत?”-जानकी कहितथिन। राजाराम किछु नहि बजितथि,बस हँसि दितथि।कखनहु कए चुपचाप जानकी दिस देखैत रहि जइतथि। कतेक अनुराग,केहन अद्भुत प्रेम हुनका जानकीसँ छलनि। तेहनमे ई की भेल? ककर नजरि हुनकासभपर लागि गेल जे एहन दिन देखए पड़ रहल छनि। राजाराम इएहसभ सोचैत बड़ीकाल धरि खिड़की लग ठाढ़े रहि गेलाह। भरत कहैत छथिन-“देखिऔक बाहर की हाल छैक।”राजाराम खिड़की लग अबैत छथि। ओतहिसँ लोकसभक अभिवादन करैत छथि। हुनका बुझबामे देरी नहि भेलनि जे परिस्थिति कतेक खराप भए गेल अछि। ओ इसारासँ लोकसभक अभिवादन करैत छथि। तकर बाद सभ किछु बिसरि भरत आ शत्रुघ्नक संगे लोकसभक समस्याक निवारण लेल बाहर होइत छथि। राजारामकेँ बाहर आएल देखि ओतए उपस्थित लोकसभमे उत्साहक संचार होइत अछि। मुदा हुनकर दशा देखि ओ सभ बहुत दुखी भए जाइत छथि। “की हाल बना लेलनि अपन राजाराम?” “हमरासभकेँ अपन दुख बिसरि सभसँ पहिने राजारामक हालतिपर ध्यान देबाक चाही।” “पता नहि आब अयोध्याक की हाल होएत?हमरसभक रक्षा के करत?” ओहिठाम उपस्थित लोकसभ आपसमे चर्च कए रहल छल। १९ जानकीक संग लक्ष्मण गोमतीक कातमे रात्रि विश्राम करबाक हेतु रथसँ उतरैत छथि। सूर्यास्तक बाद आकाशमे तरेगनसभ चमकि रहल छल। ओहि समयमे गोमती नदीमे कलकल बहैत जलधारा देखैत बनैत छल। चारू कात हबा मंद-मंद बहि रहल छल। ओतए आगन्तुक लोकनि लेल धर्मशाला बनल छल। ओतहि सुमंत,लक्ष्मण जानकी फराक-फराक कोठरीमे रात्रिविश्राम करैत छथि। धर्मशालामे अतिथिलोकनिक लेल भोजनक उत्तम प्रबंध स्थानीय लोकसभ द्वारा कएल गेल छल। ओहिठामक व्यवस्था आ सुख-सुविधा देखि जानकी बहुत प्रसन्न रहथि। ओ लक्ष्मणसँ कहबो केलखिन-“हमसभ एहिठाम रुकि कए बहुत नीक केलहुँ। एहन सुंदर स्थान बहुत दुर्लभ होइत अछि। ऊपरसँ रहबाक लेल एतेक नीक धर्मशाला से अछि।हमरा तँ एहिठामसँ जेबाक मोने नहि भए रहल अछि।” लक्ष्मण कनीकाल चुप रहलाह,फेर बजैत छथि- “मुदा हमरासभकेँ तँ गंगा कातमे ऋषिलोकनिक आश्रम देखबाक अछि ने।” “कोनो बात नहि ,काल्हि भोरे ओमहरे चलल जेतैक।अखन एहिठामक अनुपम दृश्यक आनन्द ली।” सभ गोटे भोजन केलाक बाद अपन-अपन कक्षमे विश्राम करए चलि गेलथि। मुदा जानकीकेँ निन्न हेबे नहि करनि। ओ बड़ी काल धरि खिड़कीसँ गोमतीक प्रबाहकेँ देखबाक आनन्द लैत रहलीह। रातिक एकान्तमे कखनहुक फटकी कतहु लोकक आहट बुझाइत छल। जानकीकेँ बुझेबे नहि करनि जे एतेक राति बितलापर ई अबाज कएतसँ आबि रहल अछि। फेर भेलनि जे की पता ऋषि लोकनिक किछु विशेष कार्यक्रम होनि,किंवा लगपासक गामक लोकसभ तीर्थयात्रापर निकलल होथि। दूपहरसँ बेसी राति बीति गेल छल। जानकी आब सुतबाक व्योंतमे लागि गेलथि। भेलनि जे थोड़बो काल विश्राम कए ली। फेर तँ भोरे आगूक यात्रा करबाक अछिए।अस्तु,ओ ओछाओनपर चलि जाइत छथि। ओमहर लक्ष्मण आ सुमंत से राति भरि आपसमे गप्प करैत रहि गेलथि,राति भरि जगले रहि गेलथि। भोरुकबा उगि गेल।कौआ डाक दए देलक। “एहिसँ बढ़िआँ हमसभ गोमतीमे स्नान कए पूजा-पाठ कए ली आ तकर बाद अन्हरोखे आगूक यात्रापर प्रस्थान करी।”-सुमंत बजलाह। “मुदा जानकीकेँ के उठओतनि? ओ कहीं सुतले ने होथि।” “कोनो बात नहि। हमसभ तँ तैयार होइ।” लक्ष्मण सुमंत गोमतीमे स्नान करबाक लेल आगू बढ़ैत छथि कि जानकी हाक दैत छथिन- “केमहर जा रहल छी?” “गोमतीमे स्नान लेल जा रहल छी।” “हमहूँ नहा लितहुँ।” “पहिने अहीं नहा लिअ।तकर बाद हमसभ नहाएब।” “से किएक?” “केओ तँ डेरापर रहबाक चाही।” “ठीक छैक। ”-जानकी गोमतीमे स्नानक आनन्द लैत छथि। स्नानक बाद कनीके फटकी पूजा करैत छथि । डेरा वापस आबि जाइत छथि।तकर बाद लक्ष्मण आ सुमंत सेहो गोमतीमे स्नान-ध्यान करैत छथि । डेरापर वापस आबि सभ गोटे तैयार होइत छथि। “अहाँक आज्ञा होअए तँ हमसभ सबेर-सकाल एहिठामसँ आगूक यात्राक लेल प्रस्थान करी।” “अबस्स। जतेक जल्दी निकलि जाइ,ततेक बढ़िआँ। आगूक यात्रामे रौद-बसातसँ बाँचब।” थोड़े कालक बाद जानकी आ लक्ष्मण रथसँ आगूक यात्रापर बिदा होइत छथि। जानकीधामसँ चलल सैकड़ों जानकीधुजावाहिनी मैथिलीपुत्रक संपर्कमे रहथि। मैथिलीपुत्रक शक्तिस्वरुपासँ संवाद होइते रहैत छलनि। ओ अयोध्याक स्थिति देखि चुकल छलाह। हुनका आब एहि बातमे कनीको असमंजस नहि रहनि जे जानकीक संगे स्वयं अयोध्याक नागरिकसभ छथि,हुनकासँ सहानुभुति रखैत छथि । ओ सभ चाहैत छथि जे जानकी अयोध्यामे ससम्मान रहथि। तखन हुनकासभसँ कथीक विवाद रहि गेल। विवादक जड़ि तँ राजाराम स्वयं छथि किंवा जानकीक नियतिए इएह छनि जे सभ किछु अछैतो ओ रने-बने बौआइत रहथि। एकरे ने कहबैक दुर्भाग्य। सभ दिन नीके प्रयास भेलनि,नीक घरमे पालन-पोषण भेलनि,अयोध्या सन समृद्ध राजपरिवारक यशस्वी आ सामर्थ्यसंपन्न नरेश दसरथक पुत्र रामसँ बिआह भेलनि। सभकेँ ओ पसिंदो रहथिन। राजाराम तँ हुनका लेल पूर्ण समर्पित रहथि। मुदा भाग्य एहन पलटत से के सोचि सकैत छल? जानकीधुजावाहिनी गोमतीक कातमे पहुँचैत छथि। हुनकासभक संगे मैथिलीपुत्र सेहो हबाइ जहाजसँ ओतए उतरैत छथि।मैथिलीपुत्र हबाइ जहाजमे बैसल देखि रहल छलाह जे अयोध्यावासी सभ जानकीकेँ तकैत गोमती नदीक कातमे ओहि स्थानक बहुत लगीच पहुँचि रहल छथि। कहीं किछु गड़बड़ ने भए जाए?किछु अनट घटना ने घटि जाइ । एही बातक चिंता करैत ओ जल्दीए नीचाँ आबि गेलाह। हुनकासभकेँ ओतए अबितहि पता लागि गेलनि जे जानकी आ लक्ष्मण ओतएसँ जा चुकल छथि।आब की करी?- ई प्रश्नसभक मोनमे आबि रहल छलैक। मैथिलीपुत्रकेँ बुझल रहनि जे अयोध्यासँ बहुत रास लोक से ओमहरे आबि रहल छथि। “हिनका लोकनिक भेंट आपसमे नहिए होनि सएह नीक होएत।“ अस्तु,सभ गोटेकेँ अपना संगे लेने आगू बढ़ि गेलाह।जखन अयोध्यावासी सभ ओहिठाम पहुँचलाह तँ ओतए भम्ह पड़ि रहल छल। ने ओतए जानकी छलीह,ने लक्ष्मण। ओ सभ चिंतामे पड़ि गेलथि जे आब केमहर जाथि? २० शक्तिस्वरुपा,मैथिलीपुत्र आ चिरञ्जीवी तीनूगोटे मिथिलाक जानकी धामसँ हकासल-पिआसल आबि रहल सैकड़ों जानकीधुजावाहिनीक गोमती कातमे स्वागत करैत छथि। हुनका सभके समाद गेल रहनि जे जानकी गोमती कातमे लक्ष्मण सहित विश्राम करतीह। तकर बादे हुनकर रथ आगू बढ़तनि। तेँ ओ सभ एहिठाम जल्दी पहुँचबाक लेल बहुत उत्सुक रहथि। मुदा एतए पहुँचलाक बाद जखन पता लगलनि जे ओ सभ एहिठामसँ जा चुकल छथि तँ सभ गोटे बहुत निराश भए गेलथि। “हमसभ तँ बहुत उम्मीद लगओने छलहुँ जे एहिठाम जानकीसँ भेंट भए जाएत। तकर बाद देखबैक जे के हुनका तंग कए सकत?हमसभ सभ तरहेँ तैयार छी। अपन-अपन प्राणक बाजी लगा देने छी। मुदा आब की कएल जाए?”-जानकीधुजावाहिनी दिससँ अबाज आएल। “अहाँसभ बहुत थाकि चुकल छी। सभसँ पहिने एतए विश्राम करू। भोजन करू। तकर बाद सभ गोटे मिलि कए आपसमे आगूक योजनापर विचार-विमर्श करब।”-मैथिलीपुत्र बजलाह। “मुदा एतेक गोटेक भोजनक ओरिआन कोना होएत?एहिठाम तँ किछु नहि देखा रहल अछि।”-चिरञ्जीवी बजलाह। “अहाँसभ चिंता नहि करू।हम छी ने।जखन कखनहु कोनो समस्या होअए तँ हमरा स्मरण कए लेल करब। हम तुरंत आबि जाएब,समस्याक समाधान करब। ”-शक्तिस्वरुपा बजलीह। शक्तिस्वरुपाक बजबाक देरी छल कि थोड़बे कालमे बैलगाड़ी भरि -भरि भोजन सामग्रीसभ ओहिठाम पहुँचि गेल। जानकीधुजावाहिनी भरि मोन भोजन केलनि। भोजन केलाक बाद ओ सभ ठामहि सुति रहलाह। “ई सभ बहुत थाकि गेल छथि। ऊपरसँ जानकीसँ भेंट नहि हेबाक दुख से छनि। तेँ तुरंत निन्न पड़ि जाइत गेलाह।”-मैथिलीपुत्र बजलाह। “ठीके छैक। हम सभ एहि समयक उपयोग आपसी विचार-विमर्शमे करैत छी।”-शक्तिस्वरुपा बजलीह। “ठीके कहलिऐक।एतेकगोटे जानकीधामसँ आबि रहल छथि,मुदा जेताह कतए,करताह की? हिनका सभकेँ मार्गदर्शनक बहुत प्रयोजन छनि।“-मैथिलीपुत्र बजलाह। तकर बाद तीनूगोटे सामनेक धर्मशालामे चलि जाइत छथि। अचानक मैथिलीपुत्रकेँ अलनापर लाल रंगक नुआ सुखाइत देखाइत छनि। “ई नुआ ककर भए सकैत अछि?”-मैथिलीपुत्र बजलाह। “जानकीएक बुझाइत छनि। लगैत अछि जे हड़बड़ीमे छुटि गेलनि।”-चिरञ्जीवी बजलाह। “एकरा सम्हारि कए राखि लिअ। की पता जानकी किछु सोचिए कए एकरा छोड़ि देने होथि?”-मैथिलीपुत्र बजलाह। चिरञ्जीवी ओहि साड़ीकेँ सम्हारि कए राखि लैत छथि।मैथिलीपुत्र चिरञ्जीवी सेहो बहुत थाकि गेल रहथि। हुनका सभकेँ सामनेमे आल्मीरामे एकटा चंगेरा भेटलनि। ओहिमे तरह-तरहक भोजन सामग्रीसभ राखल छल। ओ सभ भरि मोन भोजन केलनि। शक्तिस्वरुपा ताबत पता नहि कतए चलि गेलथि? जखन भोजन कए ओ सभ निश्चिन्त भेलाह तँ शक्तिस्वरुपाकेँ स्मरण केलाह। ओ तुरंत ओहिठाम आबि जाइत छथि। “की बात? किछु परेसान बुझा रहल छी?”-शक्तिस्वरुपा पुछैत छथिन। “जानकीधुजावाहिनी आएल छथि। हिनकासभकेँ केना की मार्गदर्शन कएल जाए।” “हिनकासभकेँ कहिअनु जे धैर्यपूर्वक अपन काजमे लागल रहथि।ई समस्या कोनो एक दिन ,दू दिनक नहि अछि। जानकी कोनो एसगरे एहन अन्यायक सिकार नहि भेल छथि। ई तँ तत्कालीन सामाजिक दोषक परिचायक अछि। आखिर धोबी किएक चिंतामे पड़ल रहए? ओकरा अपन भविष्यक चिंता रहैक,अपन सामाजिक प्रतिष्ठाक चिंता रहैक। अयोध्या अथवा जानकीक चिंता नहि रहैक।” “ई सभ एतेक दूरसँ आबि रहल छथि।सभ भावनासँ ओत-प्रोत छथि। जानकीक जीवन आ सम्मानक रक्षा लेल कटिवद्ध छथि। आब एतेक दूर आगू आबि चुकल छथि,मुदा जानकीक कोनो अता-पता नहि छनि। तेँ हिनकालोकनिकेँ निराश होएब स्वाभाविक थिक। अखन तँ थाकि कए सुति गेल छथि,मुदा उठलाक बाद हिनका लोकनिकेँ की कहबनि?” “अहाँ छी कथी लेल?हिनकासभकेँ सभ दिन जानकीक संगे रहबाक छनि । ताधरि रहबाक छनि जाधरि एहि कथाक सार्थक अंत नहि होइत अछि। तदनुकुल व्यवस्था कएल जाए।” “मुदा ई सभ अपन घर-परिवार छोड़ि कए एना कतेक दिन पड़ल रहताह?” “से तँ ओ सभ जानथि। अहाँ कोनो व्यवहारिक समाधान निकालु जाहिसँ जानकीक संग हिनकर सभक रहबाक किछू अर्थ होअए। जे भावी छैक से तँ हेबे करतैक। अहाँकेँ की लगैत अछि जे जानकी आब वापस अयोध्या जा सकतीह?कदापि नहि। ई सभ नियति छैक। पूर्वनिर्धारित दिशामे स्वतः आगू बढ़ि रहल छैक। मुदा हम-अहाँ अपन कर्तव्य करी।जानकीक सम्मानक रक्षा करब हमरालोकमनिक कर्तव्य थिक ।हमसभ ताही दिशामे काज करी। ईहो सभ ओही दिशामे काज करथि। हमरसभक लक्ष्य एक्के अछि।हम सदति अहाँसभक लेल सभ तरहेँ तैयार छी आ रहब।तेँ विशेष चिंता नहि करी।हिनकासभकेँ जानकीकेँ लक्ष्य राखि आगू बढ़ए दिअनु।समयसँ अपने समाधान निकलतैक।” “ठीके कहलिऐक।जखन अहाँ हमरासभक संगे छी तखन चिंता कथीक । ई सभ उठैत छथि,तकर बाद हमसभ जानकीक पछोड़ करैत आगू बढ़ब। मुदा एहि विमानक की होएत?” “अहाँ जानकीधुजावाहिनीक संगे-संगे चलू। विमानक चिंता हमरापर छोड़ि दिअ। ई जतएसँ आएल छल ओतहि वापस चलि जाएत।” शक्तिस्वरुपाक बात सुनि मैथिलीपुत्र उत्साहित छलाह। ओ चौकीपर बैसल जानकीधुजावाहिनीक उठबाक प्रतीक्षा करए लगलाह। २१ जखने जानकी लक्ष्मणक संग अयोध्यासँ बाहर भेलीह,ओ सहर श्रीहीन भए गेल। चारूकात उदासी पसरि गेल। राजारामक कोठरी सुन्न भए गेलनि। हुनकर माथामे दिन-राति भूकम्प भए रहल छलनि। अयोध्यावासीसभ बेचेन छलाह। धोबी जे जानकीक वनबासक मूल कारण छल,स्वयं परेसान भए आत्महत्याक प्रयास केलक। निस्संदेह ओ कहुना कए जीबि गेल,मुदा स्थानीय लोकसभ ओकरा कहिओ क्षमा नहि कए सकल। सभक मोनमे ई बात रहबे कएल जे एकरे कारण जानकीक ओ हाल भेलनि। आब ओकरा अफसोच केनहि की होएत? अयोध्यावासीलोकनि राजारामक निर्णयक प्रतिरोध करबाक लेल बाहर निकलल रहथि अबस्स मुदा ओ सार्थक नहि भेल।ओकर सभक विरोध पानिक बुलबुला सिद्ध भेल।धोबीक दुर्घटनाक बाद भरतक आग्रहपर ओ सभ किंकर्तव्यविमूढ़ भए गेलाह। ओ सभ राजारामक महल दिस गेनाइ छोड़ि जानकीकेँ अयोध्या वापस अनबाक प्रयासमे लागि गेलाह। तकर बाद अयोध्यावासीसभ जानकीक वापसी लेल बिदा तँ भए गेलथि,मुदा अपन प्रयासमे सफल नहि भए सकलाह। नियतिओ केओ बदलि दैत? असंभव। जानकीकेँ वनबास लिखल छलनि,राजसुख भाग्यमे नहि रहनि,हुनकर संतानोकेँ अयोध्यामे जन्म होएब नहि लिखल रहनि तेँ ई सभ घटना घटित भेल। अयोध्यावासीसभ जानकीक खोजमे अयोध्यासँ बिदा जरूर भेलाह,मुदा बहुत दूर धरि नहि जा सकलहा। थोड़बे आगू गेल हेताह कि आपसेमे विवाद होमए लगलनि। केओ किछु,केओ किछु बाजए लगलाह। “राजारामक प्रति हमरालोकनिक कर्तव्यकेँ नहि बिसरबाक चाही। आखिर ओ हमरे लोकनिक लेल अपन सर्वस्व तिलांजलि देने छथि।जन भावनाक आदर करैत अपन पत्नी धरिक परित्याग कए देलनि अछि। एहन महापुरुषकेँ हमसभ कोना छोड़ि सकैत छी?” “बेसी फटर-फटर नहि करू। अहाँक बातमे जानकीक पक्षक कोनो विचार नहि कएल गेल अछि। जानकी कोनो अपन मरजीसँ लंकाक राजा रावण संग नहि गेल रहथि। हुनकर अपहरण कएल गेल रहनि। लंकामे ओ कतेक कष्ट सहलनि।दिन-राति राजारामक प्रतीक्षा कएलनि।जखन ओ युद्ध जिति लेलाह,तखन जानकी बहुत उम्मीदसँ हुनका लग आनल गेल रहथि। मुदा राजाराम की केलाह?अग्निपरीक्षा…। जानकीकेँ अपन पवित्रताक लेल अग्निपरीक्षा देबए पड़लनि। ई कोन महानता भेल से तँ कहू?सभ किछु बुझितो,जनितो जानकीक घोर अपमान कएल गेलनि आ ओ सेहो सहि गेलीह। अग्निपरीक्षामे सफल भेलाक बादे राजाराम हुनका फेरसँ स्वीकार केलथि। जखन से केलथि तकर बादो तँ अपन विचारपर अडिग रहितथि? कहाँ रहि सकलाह?राजारामक दुबिधा जानकीकेँ बहुत भारी पड़लनि अछि। एहि हद धरि जे छलपूर्वक ओ अपन अधिकारसँ वंचित कएल जा रहल छथि। बिना पूर्वसूचनाकेँ हुनका अयोध्याक सीमासँ बाहर पठाओल जा रहल छथि। ई तँ अपमानक पराकाष्ठा अछि। अछि कि नहि अहींसभ कहू?” “खबरदार जे राजारामक विरुद्ध एकोटा शब्द बाहर केलह। जान नहि बचतह। ई अयोध्या थिक,राजारामक राजधानी। एहिठाम हुनके चलतनि। हुनकर अपमान बरदास नहि कएल जाएत।” “तूँ मूर्ख छह।कनीको ज्ञान छहे नहि। बिना अर्धाङ्गिनीकेँ राजाराम कहिओ सुखी रहि सकताह की?कोनो यज्ञ कए सकताह?आर तँ छोड़ू,अपन राजकेँ उत्तराधिकारीओ नहि दए सकताह?शक्तिहीन,श्री हीन राजा केना शासन कए सकत? आब अयोध्याक तँ भगवाने मालिक।” एहि तरहेँ अयोध्यावासी लोकनिक बीचमे आपसी विवाद बढ़िते गेल। कहल जाइत अछि जे विपत्ति कखनहु असगरे नहि अबैत अछि। लोककेँ जखन समय प्रतिकूल भए जाइत अछि तँ ओकर छाँहो संग छोड़ि दैत अछि। देखिते-देखिते ओहिठामक परिस्थिति तनाओपूर्ण भए गेल। ओ सभ चलल छलाह की करए आ की कए रहल छथि? संयोग भेल जे अचानक भयाओन वर्षा शुरू भए गेल। ठनका खसए लागल।लगमे बहैत सरयू नदीमे पानि उफनि रहल छल। घंटा भरिमे ओहिठाम विपल्वक दृश्य उत्पन्न भए गेल।परिणामतः ओहिठाम उपस्थित लोकसभमे पड़ाहि लागि गेल।सभ जान बचा कए अपन-अपन घर दिस भागल।एहि तरहेँ अयोध्यावासीलोकनिक यात्रा अपूर्ण रहि गेल। जानकीधुजावाहिनी विश्रामक बाद आगूक आदेशक प्रतीक्षा कए रहल छलाह। मैथिलीपुत्र तँ पहिनेसँ ठाढ़ै रहथि। ओ शक्तिस्वरुपाक संगे भेल विचार-विमर्शक बारेमे हुनकालोकनिकेँ जानकारी देलखिन। “तखन तँ हमर सभक एतेक दूर आएब व्यर्थ भेल। हमसभ एना वापस नहि जाएब। एतहि अपन प्राण दए देब से बेसी बढ़िआँ होएत। कम सँ कम जानकीसँ एक बेर भेंट तँ भए जाइत। हुनकर हाल-चाल पुछि लितिअनि। तकर बाद ओ जे कहितथि से करितहुँ। बढ़िआँ तँ होइत जे यदि ओ अयोध्या वापस नहि जा सकतीह तखन हुनका अपना संगे जनकपुर लेने अबितिअनि।मिथिलाक घर-घर हुनकर स्वागत हेतु अपन आँचर पसारने अछि। ओ एकबेर अवसर तँ देथुन। ” “से की हुनका पति नहि छनि? की हुनका पिता नहि छनि? ओ कोनो अनाथ छथि जे जे-से हुनकर भविष्यक निर्णय करत?”-चिरञ्जीवी बजलाह। “ई के बीचमे टपकि गेलाह? हमसभ आपसमे विमर्श कए रहल छी। ताहिमे हिनका बजबाक की प्रयोजन थिक?” “ई कोनो आन नहि छथि। हमर सभक शुभचिंतक छथि। जुग-जुग धरि जानकीक समाद लोकधरि पहुँचैत रहनि ताहि हेतु शक्तिस्वरुपा हिनका हमरा सभक संग लगा देने छथिन। हिनकर बातपर तामस करबाक उचित नहि अछि। हमसभ जे करए चाहब ताहिमे ओ कहिओ हस्तक्षेप नहि करताह,मुदा रहताह हमरेसभक संगे।इतिहासक एकटा साक्षीक स्वरुपमे।” हिनकालोकनिक आपसी विमर्श चलिए रहल छल कि ओहिठाम शक्तिस्वरुपा प्रकट भेलीह। २२ “चिरञ्जीवी कोनो मामूली व्यक्ति नहि छथि। ओ सही मानेमे हनुमानक अंश छथि। जखने जानकी अयोध्यासँ बिदा भेलीह,तखनेसँ चिरञ्जीवी सक्रिय छथि। जानकीक छायाक समान हुनकर संगे छथि।“-शक्तिस्वरुपा बजलीह। “तखन ओ एहिठाम की करैत छथि? हुनका जानकीक संगे ने रहबाक चाहिअनि?हमसभ तँ एहिठाम छीहे।”-मैथिलीपुत्र बजलाह। “समाजमे भए रहल घटना सभक ओ साक्षी छथि ,निषपक्ष भावसँ देखि रहल छथि।जानकीक संग भए रहल अन्यायकेँ ओ शुरूएसँ देखि रहल छथि संगे अयोध्या,मिथिलाक तत्कालीन समाजमे घटित भए रहल घटनाक साक्षी सेहो छथि ओ । कोनो घटना ओहिना नहि घटित भए जाइत छैक,सालक-साल भए रहल सामाजिक परिवर्तन ओहिमे परिलक्षित होइत छैक ?आखिर राजाराम सन व्यक्तिकेँ जानकीक परित्याग सन कठोर आ दुखदायी निर्णय किएक लेबए पड़लनि?एहि प्रश्नक सही उत्तर जानबाक लेल तत्कालीन समाजक परिस्थितिपर,ओकर मान्यतापर ,ओकर नीति-अनीतिपर विचार करब जरूरी अछि। जुग-जुगसँ प्रताड़ित भए रहल स्त्रीसमाज संभवतः ओहू समयमे ओहिना छल। सामाजिक मूल्य आ मान्यताकक रक्षण आ पोषणक सभटा भार ओकरे पर रहलैक।तेँ ने एक दिस सभ तरहेँ पूजनीया जानकीकेँ ई दुर्दशा भेलनि। अग्निपरीक्षा देलाक बाद कोनो-कोन परीक्षा ने ओ दैत रहलीह। आर आब फेर की होमए जा रहल अछि?राजाक कर्तव्य एकटा पतिक कर्तव्यपर एतेक भारी किएक पड़ि गेल? से जानबाक प्रयोजन अछि। हे जे भेल से भेल,जानकी नैहर पर्यन्त नहि घुरलथि। तकर कारण? मिथिलावासीसभ एतेक उद्विग्न छथि,हुनका अपना संगे बहुत नीकसँ राखि सकैत छथि,मुदा जानकी से चाहबो करथि तखन ने?” “अहाँ चिरञ्जीवीक चिंता नहि करू। समयक संगे अहाँ हुनका नीकसँ चिन्हि सकबनि। अखन अहाँ जानकीधुजावाहिनीकेँ मनाउ।ओ सभ अपन-अपन घर वापस जाथि। किछुगोटे जानकी संगे रहि सकैत छथि जाहिसँ वनबासमे रहैत जानकीकेँ कोनो कष्ट नहि होनि।” “ओ सभ मानबो करथि तखन ने?” “प्रयास करबामे कोन क्षति ?यदि ओ सभ नहि मानैत छथि तखन वाल्मीकि आश्रम लेने चलबनि।” “ठीके कहलहुँ।हम हुनकासभकेँ बुझेबाक प्रयास करैत छी।” मैथिलीपुत्र गोमती कातमे उपस्थित सैकड़ों जानकीधुजावाहिनी संग चर्चा करबाक अवसर ताकि रहल छलाह। ओमहर जानकीधुजावाहिनी जानकीक अनुरागमे अपन भावनाक अभिव्यक्ति कए रहल छलाह- जानकी छथि हमर सभक प्राण नहि जीबि सकै छी हमसभ हुनका बिना एक्को क्षण हमसभ हुनके संगे रहब जतए कतए ओ रहतीह, अयोध्यावासी सभ केलनि जुलुम कहि नहि कतेक मंथरा ओहिमाटिमे भरल अछि जे जानकीक जीनाइ मोसकिल कए देलक हद तँ तखन भेल जे जानकी पतिक संग नहि रहि सकलीह भगा देल गेलीह अपन घरसँ राजधानीसँ एहनो कहीं न्याय होइ छै एकतरफा ई कोन आदर्श भेलै जे ककरो कहला पर बिना सुनबाइकेँ राजाराम सन मर्यादा पुरुषोत्तम बंचित करथि अपने पत्नीकेँ समस्त अधिकारसँ भए सकैत अछि जे ओहि जुगक मान्यता किछु भिन्न रहल होइक तकर माने की? मनुष्यतो कोनो चीज होइत अछि जानकी अहुरिआ काटि रहि गेलीह अयोध्यावासी एहन कठोर किएक भए गेलाह जे अपन पुतहु ओहो जानकीसनक सम्मान आ मर्यादाक रक्षा नहि कए सकलाह मिथिलावासी नहि सहताह ई अन्याय हमसभ जाएब ओहिठाम जतए जानकी छथि हुनका करबनि निवेदन हे हमर प्रिय बहिन! चलू वापस मिथिला घर-घर अहाँक स्वागतमे ठाढ़ अछि मुदा ओ मानबो करतीह तखन ने? ओहो तँ छथि सर्वशक्तिमान मिथिलावासी छाती पिटैत रहि जेताह देखैत रहि जेताह मूकदर्शक बनि अनरगल बातसभ जे भोगबाक लेल जानकी कए देल गेल छथि विवश हमसभ ताबे निचेन नहि होएब जाधरि अपन निवेदन जानकीसँ कए सकबनि कहबनि यदि अहाँ नहिए जाएब कतहु तखन हमहींसभ अहाँक संगे रहब जंगल-झाड़मे जेना अहाँ जिअब हमहूँसभ तहिना रहब मुदा संगे रहब ताधरि जहिआ धरि अहाँकेँ वापस नहि होइत अछि अपन मौलिक अधिकार हे जानकी क्षमा करू हमहूँसभ छी विवश अपन भावनाक आगू कोना बिसरि सकै छी जे हमहूँसभ छी अहींक संतान मैथिलीपुत्र जानकीधुजावाहिनीक कविता सुनि गद-गद रहथि।आब हुनका नहि रहल गेलनि। ओ बुझि गेलाह जे हिनका लोकनिकेँ बीच रस्तासँ वापस करब संभव नहि अछि। अस्तु,ओ शक्तिस्वरुपाककेँ स्मरण केलथि। “की भेल?”- शक्तिस्वरुपा पुछलखिन। “देखिऔ ने । ई सभ कतेक भावुक भेल छथि। हमरा विचारे तँ हिनकासभकेँ वाल्मीकि आश्रम धरि लेने चलू। ओहिठाम जानकीसँ भेंट भए जेतनि तँ हिनकासभकेँ संतोष हेतनि,मोनमे शांति भेटतनि। तकर बाद जेना जे हेतैक से देखल जेतैक।” “कोनो हरजा नहि। यदि मार्गमे कोनो परेसानी होअए तँ हमरा स्मरण कए लेब।चिरञ्जीवीकेँ सेहो संगे लेने जाउ। हिनकर आगू बहुत काज छनि।” से बाजि शक्तिस्वरुपा चलि जाइत रहलीह। मैथिलीपुत्र जानकी जानकीधुजावाहिनीक प्रशंसा करैत छथि- “जानकीक प्रति अहाँ लोकनिक सद्भाव आ सिनेह देखि हम मंत्रमुग्ध छी। हमरा विश्वास अछि जे अहाँसभ मिथिलाक यश आ प्रतिष्ठाक झंडा विश्वमे फहड़ा कए रहब। हमरा आब कनीको सक नहि रहि गेल जे अहाँसभ जानकीकेँ न्याय दिआ कए रहबनि।” “आगू की करबाक अछि से बाजू। जानकीसँ कतए कोना भेंट भए सकत से कहू। हमसभ आब एक्को क्षण बरबाद केने बिना जानकी लग जाए चाहैत छी जाहिसँ हुनका अपन निवेदन करिअनि, हुनकर दुख-सुखमे सहयोगी बनि सकिअनि,हुनका अपना संगे मिथिला आनि सकिअनि।” “जानकीक कष्ट निवारण लेल अहाँसभ अविलंब प्रस्थान करू।” मैथिलीपुत्रक एतेक कहबाक देरी छल कि सैकड़ों जानकीधुजावाहिनी धराधर रथसभमे सबार भए बिदा भए गेलाह। आगू-आगू ढोल-पिपही बाजि रहल छल। गबैआ सभ जानकीक सम्मानमे गीत गाबि रहल छलाह। माहौल बहुत उत्तेजक लागि रहल छल। लागि रहल छल जेना जानकीधुजावाहिनी जानकीकेँ सम्मानपूर्वक अयोधया वापसी लेल कृतसंकल्प छथि। २३ “गुरुजी! गुरुजी!” आश्रमक किछु विद्यार्थीसभ चिचिआइत वाल्मीकि ऋषि लग पहुँचल। ओहि समयमे ऋषिवर ध्यानस्थ छलाह। ओ ध्यानेमे सभ किछु देखि लेने रहथि,बुझि गेल रहथि जे किछु अनर्थ भए रहल अछि। मुदा किछु बाजि नहि रहल छलाह। बजबो की करितथि? भावीकेँ के टारि सकत?आश्रमवासी विद्यार्थीलोकनिक परेसानी बढ़िते जा रहल छल। ओ सभ सोचि नहि पाबि रहल छल जे की करए? ओ सभ फेर चिकरल- “गुरुजी! गुरुजी!” हल्ला सुनि कए आश्रमवासी लोकनि बाहर अबैत छथि। “की भेलैक ? तूँसभ एना किएक चिचिआ रहल छह?देखि नहि रहल छह जे गुरुजी ध्यानस्थ छथि?” बिद्यार्थीसभ हुनकासभकेँ जंगल दिस इसारा करैत छथि,मुदा किछु बाजि नहि पबैत छथि। ताबतेमे एकटा स्त्रीक करुण क्रन्दन हुनकासभकेँ सुनाइत छनि। “जंगल दिससँ ई ककर कनबाक अबाज आबि रहल अछि?” “हमसभ सएह तँ कहए चाहैत छलहुँ।” “की भेलैक?” “मौसम खराप होइत देखि हमसभ जारनि काटब छोड़ि कए वापस आश्रम दिस बढ़ले छलहुँ कि एकटा स्त्रीक करुण क्रन्दन सुनि ठमकि गेलहुँ। हमसभ बुझबाक प्रयास करैत रहलहुँ जे बात की छैक? बुझेबे नहि करए जे एहन घनघोर जंगलमे ई स्त्री कतएसँ पहुँचलीह? ओ एना किएक कानि रहल छथि?” “तखन?” “तखन की करितहुँ? कोनो उपाय नहि देखि भेल जे गुरुजीकेँ कहिअनि। मेघ से जोर-सोरसँ ढनढना रहल छल। रहि-रहि कए बिजलौका चमकि रहल छल। चारूकात अन्हारगुज्ज भए गेल छल। लगैक जेना आकाशसँ कोनो क्षण जलवृष्टि शुरू भए जाएत। टिपिर-टिपिर पानि पड़नाइ शुरू भइए गेल रहए। बीच-बीचमे ठनकासे खसि रहल छल,तकर गर्जन-तर्जनसँ ककर मोन ने डरा जाएत? हमसभ आश्रम दिस भगलहुँ। मुदा मोनमे तरह-तरहक आशङ्का भए रहल छल। हमसभ तँ अपन जान बचा कए भागि रहल छी,मुदा एहि स्त्रीक की होएत? एकर रक्षा के करत?”एही चिंतासँ व्याकुल भेल हमसभ गुरुजी लग पहुँचलहुँ। मुदा ओ तँ आँखि खोलिए नहि रहल छथि। हुनका देखलासँ लगैत अछि जेना ओ गंभीर चिंतन कए रहल छथि। जेना सभ किछु जनितो किछु बाजए नहि चाहि रहल छथि।” “एहनो कहीं भेलैक अछि। हमरालोकनिकेँ आश्रमवासी हेबाक धर्म निर्वाह करहि पड़त। गुरुजी एना मौन नहि रहि सकैत छथि। जरूर किछु विशेष बात हेतैक। हमरा सभकेँ धैर्य रखबाक चाही।” एतबेमे ऋषिवर आँखि खोलैत छथि। ओ पुछैत छथिन- “की बात? तूँसभ एना किएक परेसान छह? कोनो जानबर आक्रमण कए देलकह की?” “नहि,नहि। कोनो जानबर नहि आएल अछि। अपितु, हमसभ एकटा गंभीर मानवीय समस्यासँ परेसान छी,आहत छी आ अपनेक मार्गदर्शन चाहैत छी।” “साफ बाजह ने जे बात की छैक?” “ध्यान दए सुनिऔक। कोनो स्त्रीक चित्कार सुना रहल अछि ने। एहन विषम परिस्थितिमे एहि जंगलमे ई स्त्री कतएसँ आएलि? कहि नहि एकरापर कोन विपत्ति आबि गेल छैक?” “सही कहि रहल छह। तूँसभ अविलंब ओहिठाम जाह आ हुनका आदरपूर्वक अपन आश्रम लए आबह। तकर बादे किछु आर।” आश्रमवासी स्त्रीसभ किछु विद्यार्थीक संगे जंगल दिस बिदा होइत छथि। मौसम बहुत प्रतिकूल भेल अछि। कनीको फटकी देखा नहि रहल अछि। “एनामे हमसभ ओतए केना पहुँचि सकब?” “मुदा गेनाइ तँ जरूरी अछि। एसगरि एहि भयाओन जंगलमे ओहो एहन बिकराल समयमे ओ स्त्री कोना बाँचि सकति?” “हमहूँ बहुत चिंतित छी। पता नहि केना ओ एहि समयमे एसगरि जंगलमे बौआ रहल अछि?” वनदेबी ओहि घनघोर जंगलमे विलाप कए रहल छलीह। हुनकर करुण क्रन्दन सुनि कए लगपासक गाछक पातसभ मौला गेल छल।चिड़ै चुनमुन उड़नाइ छोड़ि गाछक डारिसभपर बैसि मौन साधि लेने छल। किछुए काल पूर्व लगीचेमे बहैत नदीक धाराक गति जेना मंद पड़ि रहल छल।आर तँ आर ,जेना भगवान भास्कर पर्यन्त शोक मना रहल छलाह,जेना हुनका ई दारुण दृश्य नहि देखल जा रहल छलनि,हुनकर रश्मि अपन तेजस्विता छोड़ि रहल छल। लगैत छल जेना दिनेमे रातिक दृश्य उपस्थित भए जाएत। कहि नहि समस्त जीव-जन्तु कोन अनर्थकारी परिस्थितिक गबाह बनि गेल छल? एतबहिमे बड़ी जोरसँ बिजलौका चमकल। ओकर इजोतमे ओहि स्त्रीक देह देखाएल। हुनकर देह भरिगर लागि रहल छलनि।ओ अखनहु कानिए रहल छलीह। बिजलौकाक इजोतमे ओहो आश्रमवासी लोकनिकेँ अपना दिस अबैत देखलथि। ओ आर जोरसँ चित्कार करए लागलि। “बचाउ! बचाउ! ” आश्रमवासी स्त्रीसभ विद्यार्थीसभक संगे झटकारि कए हुनका दिस बढ़बाक प्रयत्न करैत छथि। मुदा वायुक प्रचंड वेगक आगू कतबो प्रयासक अछैतो असमर्थ भए गेल छथि। फेर की भेल,की नहि। लागल जेना अन्हड़ उठल आ ओकरासभकेँ अचानक उठा-पुठा कए ओहि स्त्रीक लगीचमे पहुँचा देलक। सामनेमे ओहि स्त्रीकेँ अस्त-व्यस्त भेल देखि ओ सभ द्रवित भए गेलि। ओ स्त्री आश्रमवासीकेँ इसारासँ किछु कहैत छथि। आश्रमवासी स्त्री लोकनि हुनकर स्थिति बुझि जाइत छथि। ओ तँ कनिते जा रहल छलीह। कोनो सुधि-बुधि नहि रहि गेल छलनि। रहि-रहि कए अपन पेटमे पलि रहल संतानक चिंतासँ मोन आर दग्ध भए रहल छलनि। आश्रमवासी स्त्रीलोकनि हुनका देखि-देखि आश्चर्यचकित छलि। “एहन मूल्यवान वस्त्र पहिरने छथि ई।“ “सौंसे देहमे तरह-तरहक गहनासभसँ सुसज्जित छथि ई।” “ततबे नहि,गलामे आ माथपर सुहागिन हेबाक प्रमाणस्वरुप चेन्ह सद्यः विद्यमान छनि ।” “हे भगवान! ई की अनर्थ केलहुँ अपने?”-आश्रमवासी स्त्रीसभ रहि-रहि कए बाजि उठैत छलि। आश्रमवासी स्त्रीलोकनि ओहि पीड़िताक लगीच पहुँचैत छथि। हुनकासभकेँ जेना बड़ी जोरकेँ करेंट मारि देलकनि। सौंसे देह तरंगित भए गेलनि। ओहि स्त्रीक चारूकात जेना प्रकाश विकीर्ण भए रहल छल। एतेक कष्टमे रहितहुँ ओकर समस्त आनन अद्भुत आभासँ परिपूर्ण छल,तेजोमय भए रहल छल। “ई सामान्य स्त्री नहि छथि। कहीं स्वर्गलोकसँ कोनो विशेष कारणसँ पृथ्वी लोकपर खसा देल गेल होथि आ अपन लोकक वियोगमे ओ एतेक करुण क्रन्दन कए रहल होथि।” “से जे होइक,मुदा हिनका एहिठाम पाओल जाएब सामान्य वृतान्त नहि थिक।” “एहि रहस्यक अनावरण तँ गुरुएजी कए सकैत छथि।” “ओ तँ किछु बाजिए नहि रहल छथि। जेना बौक भए गेल छथि।” “भए सकैत अछि जे ओ स्वयं बहुत कष्टमे होथि,एहि स्त्रीक वृतान्त जनितहु परिस्थितिवश गबधी लाधि देने होथि,किंवा ककरो द्वारा कएल गेल एहि अमानवीय घटनाक मूल कारणपर चिंतन कए रहल होथि।” “से जे होउक,मुदा एहन संकटपूर्ण अवस्थामे एकटा स्त्रीकेँ देखिओ कए ऋषिवर कतेक काल धरि चुप रहि सकैत छथि?” आश्रमवासी स्त्रीसभ तरह-तरहक प्रश्नसँ स्वयंमे ओझराएल चलि जाइत छलीह। “सभ भार हुनके पर छनि। ओ सर्वज्ञाता छथि,जे चाहथि से कए सकैत छथि। यदि ओ किछु नहि बाजि रहल छथि अथवा किछु विशेष नहि कए रहल छथि तँ तकरो किछु अर्थ हेबे करत। हमरा लोकनिकेँ धैर्यपूर्वक उचित क्षणक प्रतीक्षा करैक चाही।“ “सएह कहू,हमसभ एतेक परेसान छी आ ऋषिवर किछु बाजि नहि रहल छथि।” “की रहस्य अछि हिनकर मौनक से किछु बुझा नहि रहल अछि।” ऋषिवर आश्रमवासी लोकनिक मोनक भाव तारि जाइत छथि। ओ पुछैत छथि- “की बात छैक? तूँ सभ एना परेसान किएक छह? ” “से अहाँसँ बेसी के बुझि सकैत अछि? ” “मुदा हमरा तँ अखन किछु आर सोचबाक समय नहि बुझा रहल अछि। अखन वनदेबी परेसानीमे छथि। हिनका आश्रम लए जाहुन। हिनकर देख-रेख करहुन,उचित सेवा-सत्कार करहुन।तकर बादे किछु आओर बात।” आश्रमवासी स्त्रीलोकनि वनदेबीक संग आश्रम दिस प्रस्थान करैत छथि। वनदेबी दुखी छथि,चलितो छथि,कनितो छथि। आश्रमवासी स्त्री लोकनि हुनका बौसबाक प्रयास करैत छथि। ऋषिवर ध्यानशक्तिसँ सभ बात बुझि गेल रहथि। ओ आगू बढ़ि हुनका प्रणाम करैत छथि आ कहैत छथि- “वनदेबी! अहाँक हमर आश्रममे ससम्मान स्वागत अछि। अहाँ निश्चिन्त भए एतए रहू। समस्त आश्रमवासी अहाँक स्वजन छथि। अहाँ निःसंकोच हिनकासभक संगे अपन सुख-दुख बतिआउ। आश्रमक समस्त संपदाक आनन्द उठाउ। ” वनदेबी किछु संकोचमे पड़ि जाइत छथि। पता नहि की चमत्कार भेल जे मौसम अचानक ठीक भए गेल। हबाक गति सामान्य भए गेल। भगवान भास्कर आब अस्ताचलमे विलीन होमए जा रहल छलाह। मुदा ओहो एहि दृश्यकेँ देखि लेबाक हेतु जेना कनी काल ठमकि गेल छथि। आगू-आगू ऋषिवर आ हुनकर पाछू-पाछू वनदेबीक संगे आश्रमवासी स्त्री लोकनि आश्रम दिस बिदा होइत छथि। २४ जानकीकेँ वाल्मीकि आश्रम लग छोड़ि अत्यंत दुखी आ उदास मोनसँ लक्ष्मण रथपर बैसि जाइत छथि। सुमंत रथ चलेबाक आज्ञा मांगि रहल छथि। मुदा हुनका होसे नहि छनि जे किछु उत्तर देथिन। ओ निरंतर जानकीकेँ देखि रहल छथि। जानकी नदीक ओहिपार एकसरि ठाढ़ भेल कानि रहल छथि। हुनकर हृदयविदारक करुणक्रन्दन सुनि लक्ष्मण पंगु भए गेल छथि।हाथ-पैर सुन्न भए गेल छनि। जानकी कनैत-कनैत बेहोस भए खसि पड़ैत छथि। लक्ष्मण पाथर भेल देखि रहल छथि जानकीकेँ।सुमंत बेर-बेर आग्रह करैत छथिन जे हुनका आगू बढ़बाक आज्ञा देल जानि। मुदा लक्ष्मण किछु बजिते नहि छथि।सुमंतकेँ बुझा नहि रहल छनि जे ओ की करथि, एहि विषम परिस्थितिसँ कोना उबरथि। ओ तरह-तरहसँ लक्ष्मणकेँ बुझेबाक प्रयास केलनि। जखन ओ किछु सुनबे नहि करथिन तँ सुमंत घोड़ाकेँ मारलनि चाबुक। मुदा घोड़ा हिहिआ कए रहि गेल,एक डेग आगू नहि बढ़ल। ओहो जानकीकेँ ताकि रहल छल।जानकी कहाँ छथि? हुनका बिना कोना वापस चलि जाउ?” लक्ष्मणक स्थिति देखि सुमंत बहुत दुखी भए गेलाह। चुपचाप रथपर बैसि गेलाह। एहि तरहेँ किछु समय बीति गेल।घोड़ासभ ठमकल रहल,सुमंत किकर्तव्यविमूढ़ रथपर बैसल रहलाह,प्रतीक्षा करैत रहलाह जे लक्ष्मण होसमे आबथि,सक्रिय होथि। जखन लक्ष्मण देखि लेलनि जे जानकी वाल्मीकि मुनि आ हुनकर आश्रमवासी लोकनिक संगे जा रहल छथि तखने ओ सुमंत दिस घुमलथि। ओ कहैत छथि- “ रथ आगू बढ़ाउ।” सुमंत रथ आगू बढ़बैत छथि। रथक घोड़ासभ सेहो आब विरोध नहि कए रहल अछि। मुदा ओकरासभमे ओ स्फूर्ति नहि छैक,ओ गति नहि आबि रहल छैक जे जानकीक रहलापर रहैक। तथापि,सुमंत आगू बढ़ि जाइत छथि। जेना-जेना ओ दृश्य फटकी होइत गेल,तेना-तेना रथक घोड़ा सामान्य होइत गेल,ओकर गति बढ़ैत गेलैक। लक्ष्मण से सुमंतक संगे गप्पमे लागि गेलाह।रथ आब पूर्ण गतिसँ आगू बढ़ि रहल छल। अचानक बड़ी जोरक हल्ला सुनबामे आएल। रथक दुनू घोड़ा ठाढ़ भए गेल,कतबो सुमंत प्रयास केलथि ओ एक्को डेग आगू नहि बढ़ि रहल छल। लक्ष्म्ण सुति गेल रहथि। ओहो हल्ला सुनि कए उठि बैसलाह। “की भए रहल अछि?एतेक हल्ला कथीक अछि?” “पता नहि की बात अछि?” ओहि समयमे रथ अयोध्या सहरसँ घंटा भरिक दूरीपर रहल होएत। मौसम से गड़बड़ छल। हबा बहुत तेज बहि रहल छल। रथकेँ ठामहि रोकि सुमंत रथपरसँ उतरि जाइत छथि। हुनका लागल लक्ष्मण सेहो रथसँ उतरि जाइत छथि।दुनूगोटे कनीके आगू बढ़ल हेताह कि लोकक हुजुम देखेलनि। ओ सभ जानकीक वनबासक बारेमे किछु-ने-किछु चर्च आपसमे कए रहल छलाह। “हमरा लोकनिक प्रयास तँ निठ्ठाहे बेकार भए गेल।” “करबे की करितहुँ? भरत स्वयं आबि कए हमरासभकेँ मनेबाक प्रयास केलथि।तथापि हमसभ नहि रुकलहुँ,आगू बढ़ गेलहुँ। भाग्यो संग नहि दए रहल अछि। हमसभ की करू?बिदा भेल रही जे जानकीकेँ वापस आनिए कए मानब। मुदा बीचे रस्तामे घोर संकटक स्थिति उत्पन्न भए गेल। तेहन अन्हड़ उठल जे एक्को डेग आगू बढ़ब मोसकिल भए गेल। अयोध्यावासीसभ बेचेन भए एमहर-ओमहर भागि गेलाह। संयोगे एहने बनि गेल। कएल की जाइत?” लोकसभक अबाज क्रमशः बढ़िते जा रहल छल। थोड़बे आगू बढ़लाक बाद चारू कात पसरल अयोध्यावासी सभ देखेलनि। ओ सभ वापस अयोध्या जाइत रहथि,मुदा अचानक मौसम ततेक गड़बड़ाएल जे जे जतहि छलाह से ततहि रहि गेलाह। एतबेमे किछुगोटेकेँ नजरि लक्ष्मणपर पड़ैत छनि। ओ सभ चिचिआ उठैत छथि- “अहाँ असगर किएक छी? जानकी कहाँ छथि?हुनकर की हाल छनि? हुनका कतए छोड़ि देलिअनि?” “अहींसभ तँ बजैत रही जे राजाराम जानकीकेँ कोना अपना संगे रखने छथि? जखन ओ रावणक अधीन राखल गेलथि तखन हुनका अयोध्याक रानी कोना बनाओल गेलनि। एहिसँ तँ समाज बिगड़ि जाएत। लोकमे गलत संदेश जाएत । एहिसँ परिवारक मर्यादा नष्ट होएत। राजारामकेँ एहि बातसभक जनतब भेलनि। तकरे परिणाम आब सामने अछि। तखन कोन मुँहे अहाँसभ जानकीक बात करैत छी?” “की बाजि रहल छी अहाँ? अहाँसभक बुद्धि खराप भए गेल अछि। केओ किछु कहतै तकर माने की? पतिक कर्तव्य थिक जे ओ अपन पत्नीक रक्षा करए । यदि रामके विश्वास छलनि जे जानकी निर्दोष थिकीह,जे सरिपहुँ छथि, तखन ककरो कहलापर हुनका एहन निर्णय नहि लेबाक चाहैत छलनि। सेहो बिना जानकीकेँ पुछने। ई तँ घोर अन्याय थिक।” एहि तरहेँ केओ किछु केओ किछु बाजि रहल छल।चारू कातसँ लोकसभ लक्ष्मणकेँ घेरि लेने छलनि। लक्ष्मणकेँ फुरेबे नहि करनि जे ओ की उत्तर देथि। ओ तँ स्वयं मर्माहत छलाह,जानकीक राजाराम द्वारा कएल गेल परित्यागसँ आहत छलाह।हुनकर वश चलनि तँ ओ तुरंत घुरि जाथि, जानकीकेँ वापस अयोध्या लेने आबथि। मुदा राजारामक आदेशकेँ कोना नहि मानल जाएत? से समस्या तँ बनले छल। आखिर ओ बहुत मोसकिलसँ ओहि भीड़सँ बचैत अयोध्या वापस पहुँचि सकलाह। २५ तमसा नदीक कातमे चारू दिस जंगलमे घेराएल वाल्मीकि आश्रममे अद्भुत शांति छल। आश्रम तीन भागमे बँटल छल।आश्रमवासी स्त्री लोकनि लेल अलग आवास छल। विद्यार्थीसभ सटले दोसर घरमे रहैत छलाह। वाल्मीकि मुनि स्वयं थोड़े फटकी बनल घरमे रहैत छलाह। ओहिमे ओ दिन-राति अपन साधनामे लागल रहैत छलाह,लिखैत-पढ़ैत रहैत छलाह। आश्रमवासी शिष्यलोकनिकेँ उत्तम सँ उत्तम संस्कार होनि ताहिमे लागल रहैत छलाह । आश्रममे तरह-तरहक फल-फूल लागल छल। शिष्यगण नित्य जंगलसँ अनेक प्रकारक फलसभ अनैत छलाह। ओहीसँ आश्रमवासीक काज चलैत छलनि। आश्रममे बहुत रास गायसभ छल।तकर शुद्ध दूध आश्रमवासी पिबैत छलाह। ओतए सभ केओ अपन-अपन काजमे व्यस्त रहैत छलाह,सभकेँ परस्पर प्रेम आ विश्वास छलनि। ककरोसँ कोनो प्रकारक प्रतिस्पर्धा नहि छल। असलमे ओ सभ अपन जीवनमे धर्मक रहस्यकेँ सही मानेमे प्रतिपादित करबाक लेल सतत प्रयत्नशील छलाह। आश्रमवासीसभ पूर्णतः स्वाबलंबी छलाह, अपन निर्वाहक लेल कोनो तरहसँ ककरोपर आश्रित नहि छलाह। रातिक एकान्तमे जखन सभ केओ सुति जाइत छलाह,तखन वाल्मीकि अपन रामायण महाकाव्यक रचना केरैत छलाह। ओ अपन तपबलसँ रामायणक भावी घटनाकेँ सेहो देखि रहल छलाह, तकर वर्णन सेहो केने जा रहल छलाह।तेँ जखन जानकी हुनकर आश्रम लग देखेलीह तँ ओ तुरंत ओकरा भविष्यमे घटित होमए बला घटनासँ जोड़ि सकलाह।हुनका किछु आश्चर्य नहि लागि रहल छलनि।जे हेबाक छलैक सएह भए रहल छलैक। अन्यथा राजारामक पत्नी होइतहुँ जानकी सभदिन दुखीए किएक रहि जइतथि,रने-बने किएक बौआइत रहतथि? सभ भावी छल, हेबेक छल,केओ ओकरा रोकि नहि सकैत छल,स्वयं रामो नहि। वनदेबीक वाल्मीकि आश्रमवासीसभ हृदयसँ स्वागत करैत छथि। आश्रममे रहि रहल स्त्रीलोकनि हुनकर आरती करैत छथि।ओहीमे सँ केओ जल्दीसँ जंगलसँ आनल गेल टटका फल अनैत छथि।केओ गिलासमे ठंढा जल अनैत छथि।केओ हाँइ-हाँइ पटिआ पसारैत छथि। जानकी हुनका लोकनिक भावुकतासँ चकित छथि। यद्यपि अयोध्यामे हुनका संग कएल गेल व्यवहारसँ ओ अखनहु भीतरे-भीतर छटपटाइत रहथि,तथापि आश्रमवासी लोकनिक सहृदयता हुनका लेल मलहम जकाँ काज केलकनि। सभसँ पहिने जानकी सभ गोटे केँ प्रणाम करैत छथि। तकर बाद ओ सामने ओछाओल पटिआपर बैसि जाइत छथि। आश्रमवासीसभ ततेक अपनत्वक भाव देखबैत छथि जेना ओ सभ जानकीसँ सालोंसँ परिचित होथि। एहन सुखद माहौलमे आश्रमवासीलोकनिक हार्दिक सिनेह पाबि जानकी बहुत आश्वस्त भेलथि। ओ बहुत भूखल रहथि। आश्रमवासी द्वारा आनल गेल फल ओ खाइत छथि। ततबेमे एकटा स्त्री हुनकर गलामे बेली फूलक माला पहिरा दैत छथि। ओकर सुगंधसँ संपूर्ण वातावरण महमह करए लगैत अछि। जानकीकेँ लागि रहल छलनि जेना ओ अपन लोकसभमे आबि गेल होथि। आब हुनकर मनोदशामे क्रमशः सुधार भए रहल छलनि। घंटाभरि एहि सुखद माहौलमे रहलाक बाद जानकी पहिल बेर मुस्कुरेलथि। हुनकर प्रसन्नता देखि आश्रममे चारूकात आनन्द पसरि गेल।आश्रमवासी सभ माहौलकेँ आर सुखद करैत भजन-कीर्तन करए लगलाह। जानकी जलखै केलीह,पानि पिलथि । ओ थाकल तँ रहबे करथि। कनीके सुखद माहौल देखि औंघी लागए लगलनि। हुनका औंघाइत देखि आश्रमवासीसभ एक-दोसरकेँ इसारा केलनि। सभ गोटे जानकीकेँ ओतए विश्राम करबाक आग्रह करैत ओहिठामसँ सहटि गेलथि। जानकी ठामहि पड़ि गेलथि। थोड़बे कालमे ओ फोंफ काटि रहल छलीह। हुनका सुतल देखि आश्रमक स्त्रीसभ बहुत प्रसन्न रहथि। ओहीमे सँ केओ जाइत-जाइत हुनका दिस देखलकनि। “हिनकर पेट भारी लागि रहल छनि।” “सेहो कनीटा नहि। बेस विकसित लागि रहल छनि।” “सएह कहू,एहनमे कोनो स्त्रीकेँ घरसँ बिदा कएल जाइत छैक? बहुत जुलुम भेल अछि।” ओ स्त्री इएहसभ सोचैत आगू बढ़ि गेलीह। आश्रमवासी स्त्रीसभमे क्रमशः ई बात पसरि गेल। सभ जानकीक प्रतिए बहुत संवेदनशील भए गेलथि।जखन वाल्मीकिकेँ ई बात आश्रमक स्त्रीक माध्यमसँ पता लगलनि तँ ओ कनीको चकित नहि रहथि। अपितु,ओ अपन हस्तलिखित रामायण दिस संकेत केलखिन- “ऐहिमे सभटा लिखि चुकल छी। सभ किछु तहिना घटित भए रहल अछि।”-से कहि वाल्मीकि फेरसँ ध्यानमग्न भए गेलथि। २६ शक्तिस्वरुपा,मैथिलीपुत्र आ चिरञ्जीवी वाल्मीकि आश्रमसँ सटले तमसा नदीक कातमे आपसमे विचार-विमर्श कए रहल छथि। मिथिलासँ चलल सैकड़ों जानकीधुजावाहिनी सेहो ओतए पहुँचि गेल छथि। ओ सभ कनीके फटकी विश्राम कए रहल छथि। हुनका लोकनिक अड्डामे दिन-राति जानकीक समर्थनमे चर्चा होइत अछि। जानकीक समर्थनमे तरह-तरहक गीत-नाद गाओल जाइत अछि । सभक मूलमे जानकीक प्रति मिथिलावासीक सिनेह भरल अछि,जानकीक रामसँ वियोगक कष्टक वर्णन अछि। जानकीक कोखमे पलैत अयोध्याक राजवंशक उत्तराधिकारीक चिंता सेहो कएल जा रहल अछि- कोना जीबि सकतीह जानकी एतेक अपमान सहि कए हृदय खंड-खंड भेल छनि रामक कठोर निर्णयसँ कोना रक्षा कए सकतीह ओ कोखमे पलि रहल अपन संतानकेँ जे छथि सूर्यवंशक उत्तराधिकारी केओ सोचि सकै छल जे जनकक दुलारी राजारामक अर्धाङ्गिनीक ई हाल हेतनि रावण केलक प्रपंच जबरदस्ती हरि लेलकनि जानकीकेँ बेसक ओ हुनका उठा-पुठा कए लए गेल लंका विमानसँ मुदा एहिमे जानकीक कोन दोष से बात ओ कहलखिन रामसँ जखन ओ लंका बिजयक बाद जानकीकेँ स्वीकार करबामे केलनि विलंब जानकी कहलथि- हम तँ सदिखन अहींक ध्यान केलहुँ हमर देह तँ भए गेल छल पराधीन मुदा मोनसँ हम सदिखन अहींकेँ ध्यान केलहुँ से बात राम नहि बुझलथि अड़ि गेलथि अग्निपरीक्षा हेतु तकर बादो कहाँ शांत रहि सकलाह ओ मामूली धोबीक कहलापर जानकीकेँ अयोध्यासँ निर्वासित कए देलाह बहुत भए गेल आब जरूरी अछि प्रतिकार कोनो मरुगतिक काज नहि छै शक्तिवानक आराधना सगतरि होइत छै अयोध्यावासी देखताह मिथिलाक शक्ति आ हेताह दंडवत मिथिलावासी छथि जानकीक समांग प्राण रहए की जाए मुदा वापस हेतनि जानकीक सम्मान जानकीक संतान जे छथि अयोध्याक राजकुमार अबस्स पओताह अपन जन्मसिद्ध अधिकार बनताह रामक उत्तराधिकारी “हमसभ वाल्मीकि आश्रम पहुँचि गेल छी,मुदा जानकी तँ कतहु नहि देखा रहल छथि। हमरा सभक संगे आएल जानकीधुजावाहिनी सैकड़ों लोकसभ व्याकुल छथि,अपन जीवन न्योछावर करबाक हेतु प्रस्तुत छथि। हुनकासभकेँ अहाँ मार्गदर्शन करिअनु।“-मैथिलीपुत्र बजलाह। शक्तिस्वरुपा कहैत छथि-“जानकी वाल्मीकि आश्रम पहुँचि गेल छथि। ओहिठाम वाल्मीकि मुनि आ हुनकर शिष्यलोकनि हुनकर बहुत स्वागत केलखिन।अखन ओ हुनके आश्रममे विश्राम कए रहल छथि।ओतए जानकी पूर्णतः सुरक्षित आ सम्मानित छथि।” “हमरा लोकनिकेँ हुनकासँ भेंट केना होएत?जानकीधुजावाहिनी सेहो आतुर छथि। हुनकासभक धैर्य आब टूटि रहल छनि। ओ सभ जल्दीसँ -जल्दी जानकीसँ भेंट करए चाहैत छथि।” “वाल्मीकि आश्रममे तँ जानकीक देह मात्र छनि। समस्त शक्तिसँ संपन्न हुनकर आत्मस्वरुप हम स्वयं अहाँक सामनेमे उपस्थित छी आ ताधरि रहब जाधरि जानकीक ससम्मान अयोध्या वापसी नहि होएत, जाधरि ओ अपन भावी संतानकेँ न्यायोचित अधिकार दिआ सकतीह। हमरसभक संघर्ष तँ अखन शुरूओ नहि भेल अछि। एहि लेल सभकेँ दीर्घकालीन योजना बना कए चलए पड़तनि। ई कोनो मामूली संग्राम नहि होएत।” “अहाँक मार्गदर्शनमे हमसभ अपन लक्ष्य अबस्स प्राप्त करब।” रातिमे जानकीधुजावाहिनी बहुत काल धरि भजन-कीर्तन करैत रहलाह। राजारामसँ जानकीक विरहसँ उत्पन्न कष्टक वर्णन करैत रहलाह। सभ गोटे बहुत भावुक छलाह। भावनामे निरंतर अश्रुपात भए रहल छलनि।ककरो कोनो चीजक सुधि-बुधि नहि रहि गेल छलनि। ओ सभ जल्दीसँ-जल्दी जानकीसँ भेंट करए चाहैत छलाह।शक्तिस्वरुपासँ गप्पक बाद मैथिलीपुत्र हुनका सभ लग पहुँचलाह । हुनका देखितहुँ ओ सभ एकस्वरमे पुछलखिन- “ जानकीसँ भेंट कोना होएत? ओ कतए छथि? कोन हालमे छथि?” “ओ ठीक छथि। अखन वाल्मीकि आश्रममे विश्राममे छथि। काल्हि भोरे अहाँसभसँ हुनका भेंट करेबाक ओरिआन कएल जाएत। ताबे अहाँसभ एतहि विश्राम करू।” ओमहर एकांत पाबि चिरञ्जीवी शक्तिस्वरुपाकेँ पुछलखिन- “हमरा की करबाक अछि?” “अहाँ वाल्मीकि आश्रम चलि जाउ। ओतए जानकीक संगे रहबनि। हुनकर दुख-सुखमे संग देबनि। संगे मैथिलीपुत्र संगे सेहो संपर्क बनओने रहब जाहिसँ ओ सभ जानकी मुक्ति संग्रामकेँ सही स्वरुप दए सकथि।” “वाल्मीकि आश्रमक नियम तँ बहुत कठोर अछि। ओतए हम जानकीक संगे कोना रहि सकबनि?हुनका कोना मदति कए सकबनि? हुनकर समाद अहाँसभ लग कोना पहुँचा सकबनि?” “अहाँ व्यर्थ चिंता नहि करू। हम जे कहि रहल छी से बुझबाक प्रयास करू। अहाँ कोनो मामूली नहि छी। अहाँकेँ बहुत शक्ति अछि। अहाँ की ने कए सकैत छी। जानकीक देख-रेखमे अहाँकेँ केओ कोनो तरहेँ बिदति नहि कए सकत।अहाँ निश्चिन्त भए ओतए जाउ।” २७ आइ भोरेसँ वाल्मीकि आश्रमक लगीचमे बहुत गहमा-गहमी अछि। शक्तिस्वरुपा ओजसँ भरल छथि। ओ लाल रंगक नुआ पहिरने छथि, माथपर पैघ-पैघ केस उड़िआ रहल छनि।हुनकर हाथमे अनेक प्रकारक अस्त्र-शस्त्र छनि। ओ अग्निपुंज समान लागि रहल छथि। लागि रहल अछि जेना कोनो क्षण हुनकामे सँ शक्तिक बिस्फोट होएत। दुनिआमे प्रलय भए जाएत। शक्तिस्वरुपा ओतए उपस्थित सैकड़ों जानकीधुजावाहिनीकेँ संबोधित कए रहल छथि। कहि रहल छथि अपन मोनक बात। “अहाँसभ जानकीक चिंता नहि करू। ओ वाल्मीकि मुनिक आश्रममे ससम्मान रहि रहल छथि। मुदा बात हुनके टा नहि अछि। जाहि तरहेँ एकटा स्त्रीक अयोध्यामे अपमान भेल अछि से संपूर्ण मानवताक हेतु कलंक थिक। हुनका लोकनिकेँ ई बात नीकसँ बुझल रहनि जे जानकी गर्भवती छथि। हुनका संतान होनहारी छनि। ओहि समयमे हुनका पतिक सानिध्यक काज छनि। हुनका भावात्मक समर्थनक काज छलनि जाहिसँ अयोध्याक भावी नरेशक छाती मजगूत होइतनि। मुदा भेल की? तरह-तरहक बहन्नासभ बना-बना कए हुनका अपन घरसँ निकालि देल गेलनि अछि। ओ तमसा नदीक कातमे कानैत रहि गेलीह,अहुरिआ कटैत रहि गेलीह,निहोरा करेत रहि गेलीह,मुदा लक्ष्मण हुनका ओही हालमे छोड़ि कए चलि जाइत रहलाह। धन्य कही वाल्मीकि मुनिकेँ,धन्यवाद अछि हुनकर आश्रमवासी लोकनिकेँ जे जानकीकेँ अपन संतान जकाँ अंगीकार केलनि अछि,हुनका आश्वस्त केलखिन अछि जे ओ कतहु आन ठाम नहि छथि। मुदा एहिसभक काजे कोन छलैक?एतेक हड़बड़ी कथीक छलैक?कम सँ कम संतानसभक जन्म तँ होमए दितथिन। तकर बाद देखल जइतैक। ई तँ घोर अनर्थ भेल अछि। अयोध्यामे एकसंगे कतेक अपराध कएल गेल अछि। हमरा लोकनि एही अन्यायक निवारण करबाक हेतु एहिठाम आएल छी। अहाँसभ सभ किछु बिसरि जाउ। बस अपन लक्ष्य दिस ध्यान करू।” “हमसभ सभ तरहेँ अहाँसँ सहमत छी। मुदा हमसभ कहिआ धरि प्रतिकार करब से नहि बुझा रहल अछि।” “अगुताएल काज ठीक नहि होइत छैक। अहाँसभ धैर्य राखब सीखू। जानकीकेँ जे भोगबाक छनि से भोगतीह।जे कष्ट लिखल छनि से हेतनि। मुदा हमसभ सही समयपर अपन काज करब। पहिने तकर तैयारी तँ कए ली।” “नहि बुझि सकलहुँ। कहि नहि अहाँ गोल-मोल गप्प किएक कए रहल छी?” “सभ किछुक समय होइत छैक। जानकीक अयोध्या वापसी हेतनि,हेबे करतनि,केओ तकरा रोकि नहि सकत। मुदा हमरासभकेँ जे कर्तव्य अछि से तँ पहिने करी।” शक्तिस्वरुपाक अभिवादन करैत मैथिलीपुत्र उठैत छथि- “सुनू सुनू हे मिथिलावासी ।अहाँ लोकनिक भावनाक अनुकुले काज होएत। जानकी बहुत थाकल रहथि। रातिभरिक विश्रामक बाद ओ आब स्वस्थचित्त छथि। शक्तिस्वरुपा हुनकर मोनक बात कहि चुकल छथि। ओ असलमे सदिखन हमरासभक संगे छथि। हमसभ एही जंगलमे डेरा देब आ एतए ताधरि रहब जा धरि जानकी फेरसँ अयोध्यामे ससम्मान स्थापित नहि भए जाइत छथि।” “ठीक छैक।हमसभ सेहो अपन संकल्पपर अड़ल छी।” “हमसभ गोटे वाल्मीकि आश्रमसँ दस कोस फटकी अपन डेरा राखब जाहिसँ आश्रमक गतिविधिमे कोनो दिक्कति नहि होइक । ओतहि सभ गोटेकेँ रहबाक व्यवस्था शक्तिस्वरुपा कए देलनि अछि।आगूक योजनाक बारेमे हमसभ ओतहि गप्प करब।” “एक बेर जानकीकेँ देखि लितिअनि तँ संतोष भए जाइत। फेर अहाँ जेना जे कहबैक सएह कएल जाएत।” “अहाँसभ शांत रहू। शक्तिस्वरुपा करतीह कोनो चमत्कार। अहाँसभ जल्दीए देखि सकबनि जानकीकेँ सदेह।”-मैथिलीपुत्र से बात बजले छलाह कि कनीके फटकी जानकी आश्रमवासी स्त्री लोकनिक संग आश्रमसँ बाहर निकलि रहल छलीह। ओ बहुत शांत लागि रहल छलीह। जेना कोनो अन्हड़क आगमनसँ पूर्वक संकेत होइक। हुनकर देहसँ जेना अग्निक ज्वाला निकलि रहल छलनि। हुनका एहि तरहेँ देखि जानकीधुजावाहिनी चकित भए गेलाह।सभ एक्के पैरपर ठाढ़ भए हुनकर वंदना करए लगलाह। पता नहि शक्तिस्वरुपा कोन चमत्कार केने छलीह जे ई दृश्य आश्रमवासी लोकनि नहि देखि रहल छलीह। मैथिलीपुत्र किछु बजितथि ताहिसँ पहिने जानकीधुजावाहिनी एकस्वरमे बाजि उठलाह- “जय जानकी!जय जनकनंदिनी! हमसभ धन्य भेलहुँ। आब कोनो चिंता नहि। जानकीकेँ देखि हमरसभक आधा कष्ट बिला गेल।” “आब अहाँसभ शिविरमे चलि जाउ।हमहूँ ओतहि आबि रहल छी। आगूक कार्यक्रमक बारेमे ओतहि चर्चा कएल जाएत। २८ जानकीकेँ वाल्मीकि आश्रममे आश्रमवासी स्त्री लोकनिक संगे देखि जानकीधुजावाहिनी बहुत प्रसन्न भेल रहथि। हुनका सभक इच्छा रहनि जे हुनकासँ सद्यः संवाद करी,हुनका आग्रह करिअनि जे यदि कोनो कारणवश अखन अयोध्या वापस नहि जा सकैत छथि तँ ओ नैहरे चलथि। नैहर जेबाक अधिकार तँ बेटीकेँ सदिखन रहिते छैक। जानकीधुजावाहिनी सभ ई बात मैथिलीपुत्रक माध्यमसँ हुनका धरि पहुँचा देबाक आग्रह केलनि। ताहि बातपर मैथिलीपुत्र कहैत छथिन- ”अहाँसभ अगुताउ नहि। हमसभ एहिठाम जानकीक कष्ट निवारण लेल आएल छी । रहल बात अयोध्या जेबाक,से तँ ओ जेबे करतीह,मुदा भीखमंगनी जकाँ नहि जेतीह। ओ रानी छथि रानीए जकाँ अयोध्या जेतीह आ ओतए रहतीह।आब जखन ओ वाल्मीकि मुनिक शरणमे पहुँचि गेलीह अछि तखन उचित अछि जे किछु करएसँ पहिने हमरालोकनि हुनको परामर्श ली। निश्चित रूपसँ ओ हमरासभकेँ सही मार्गदर्शन करताह आ करबे करताह। ओ त्रिकालदर्शी छथि,सर्वज्ञानी छथि आ सभसँ ऊपर जानकीक आ राजा रामोक शुभचिंतक छथि।“ “तखन हमसभ की करू?केमहर जाउ? बिना जानकीकेँ मिथिला वापस कोन मुँहे जाएब? लोकसभ हँसत नहि?अहीं कहू।” “अहाँसभक चिंता उचित अछि। मुदा ई बात बुझबा जरूरी अछि जे युद्ध ककरो लेल नीक नहि होइत अछि। परिणाम चाहे जे होइक,विजेता केओ होअए, एहिमे सभक निश्चित क्षति होइत अछि।फेर अयोध्याक संगे हमरा लोकनिक प्रेमक संबंध अछि। हमसभ तकर निर्वाह करैत अएलहुँ अछि। मुदा हुनको लोकनिकेँ अपन कर्तव्यक पालन करबाक चाहिअनि। ओहिमे कोताही भेल अछि। तकर प्रतिवाद हमसभ करब। अबस्स करब।अखन अहाँसभ शिविरमे चलू। ओतहि भविष्यक कार्ययोजनाक रूपरेखा तैयार कएल जाएत।” “ठीक छैक।हमसभ उचित अवसरक प्रतीक्षा ओतहि करब।” वाल्मीकि आश्रमसँ दस कोस फटकी बीच जंगलमे जानकीधुजावाहिनीक अड्डा तैयार कएल गेल। शक्तिवाहिनीक एक इसारापर ओहिठाम रहबाक लेल सभ आवश्यक समान उपलब्ध भए गेल। एहन जंगलमे एतेक ब्यवस्था भए जाएब बहुत आश्चर्यक बात छल। बाहरी लोककेँ किछु पता नहि रहैक जे ओतए की भए रहल अछि? एतेक लोकसभ ओहिठाम की करए आएल छथि? मुदा वाल्मीकि मुनिकेँ अपन योगबलसँ सभ किछु पता चलि गेल रहनि।मोने-मोन ओ बहुत प्रसन्न छलाह। एहि बातसँ पूर्णतः आश्वस्त छलाह जे जानकीक संग न्याय हेबे करतनि। हुनकर भावी संतानसभ पुरुषार्थी आ बीर हेताह। सभसँ आवश्यक छल जे जानकी स्वस्थ रहथु। हुनकर मनोदशा नीक रहनि जाहिसँ हुनकर भावी संतान मानसिक आ शारीरिक रूपसँ स्वस्थ होनि। तकर प्रयासमे आश्रममे सभ केओ दिन-राति लागल रहथि। जंगलमे बनल जानकीधुजावाहिनीक अड्डाक चारूकात विशेष प्रकारक चहरदिबारी बनाओल गेल छल जाहि कारण भीतरमे घठित भए रहल कोनो घटना बाहरसँ नहि देखल जा सकैत छल। चहरदेबारी सेहो अदृश्य छल। ओकर भीतरेमे सभ किछुक ओरीआन कएल गेल छल। शक्तिवाहिनी समय-समयपर मैथिलीपुत्रसँ संपर्कमे रहथि जाहिसँ ओहिठाम रहि रहल सैकड़ों जानकीधुजावाहिनीकेँ कोनो दिक्कति नहि होनि। ओकरासभके नाना प्रकारक अस्त्र-शस्त्रक प्रशिक्षण देबाक ब्यवस्था सेहो कएल गेल छल। भोरे उठि-सुठि ओ सभ अपन काजमे लागि जाथि आ दिन-भरि किछु-ने-किछु होइते रहैत छल। सायं काल भजन-कीर्तन होइत छल।जानकीकेँ स्मरण कएल जाइत छल। संगे आगूक कार्यक्रमक चर्चा सेहो कएल जाइत छल। एहि तरहेँ जानकीधुजावाहिनी एकटा प्रशिक्षित आ अनुशासित संगठन बनि गेल छल जकर एकमात्र उद्येश्य जानकीक सम्मानक रक्षा करबाक छल। हुनका अयोध्यामे फेरसँ स्थापित करबाक छल। वनदेबी आश्रमवासीसभक संगे लगपासक जंगल देखबाक लेल निकलल रहथि। चारूकातक मनोरम दृश्य देखि हुनकर मोन हल्लुक होइत छनि। संयोगसँ मौसम सेहो बहुत अनुकूल भए गेल छल। जंगल,पहाड़,नदीक कात आ चारू कात हरिअर कंचन गाछ-बिरिछ सभ मिलि कए अद्भुत आनन्द उत्पन्न कए रहल छल। आश्रमवासी स्त्री लोकनि वनदेबीकेँ आसपासक स्थान आ ओकर विशेषतासँ परिचित करा रहल छलाह। ओहिठाम शुलभ अनेक प्रकारक औषधीय जड़ी-बुटीसभक जानकारी दए रहल छलखिन। वनदेबी बहुत प्रसन्न छलीह। हुनका जंगलसँ आश्रम वापस जेबाक मोने नहि होनि। ओ बड़ी कालधरि नदीक कातमे बैसल रहि गेलीह। हुनकर संगीसभ सेहो लगेमे बैसि गेलथि। एहि तरहेँ बहुत समय बीति गेल। तखन आश्रमसँ शिष्यलोकनि हुनकासभकेँ बजबए आबि गेलखिन। “जलखै तैयार छैक। अहाँसभ चलिऔक।” वनदेबी आश्रमवासीलोकनिक संगे वापस आश्रम दिस बिदा भए गेलीह। (अनुवर्तते) लेखक परिचयः नाम : रबीन्द्र नारायण मिश्र पिताक नाम : स्वर्गीय सूर्य नारायण मिश्र माताक नाम : स्वर्गीया दयाकाशी देवी जन्म तिथिः२ जनबरी १९५४(प्रमाण पत्र) २४ अगस्त १९५२(जन्मपत्र) पैतृक ग्राम : अड़ेर डीह मातृक : सिन्घिआ ड्योढ़ी वृति : भारत सरकारक उप सचिव (सेवानिवृत्त)/ स्पेशल मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, दिल्ली(सेवानिवृत्त) शिक्षा : चन्द्रधारी मिथिला महाविद्यालयसँ बी.एस-सी. भौतिक विज्ञानमे प्रतिष्ठा : दिल्ली विश्वविद्यालयसँ विधि स्नातक श्री रबीन्द्र नारायण मिश्रक प्रकाशित कृति :मैथिलीमे:- प्रकाशन वर्ष:२०१७ १. भोरसँ साँझ धरि (आत्म कथा), २. �प्रसंगवश� (निवंध), ३. स्वर्ग एतहि अछि (यात्रा प्रसंग), प्रकाशन वर्ष:२०१८ ४. फसाद (कथा संग्रह) ५. नमस्तस्यै (उपन्यास) ६. विविध प्रसंग (निवंध ) ७.महराज(उपन्यास) ८.लजकोटर(उपन्यास) प्रकाशन वर्ष:२०१९ ९.सीमाक ओहि पार(उपन्यास)१०.समाधान(निवंध संग्रह) ११.मातृभूमि(उपन्यास) १२.स्वप्नलोक(उपन्यास) प्रकाशन वर्ष:२०२० १३.शंखनाद(उपन्यास) १४.इएह थिक जीवन(संस्मरण) १५.ढहैत देबाल(उपन्यास) १६.पाथेय(संस्मरण) प्रकाशन वर्ष:२०२१ १७.हम आबि रहल छी(उपन्यास) १८.प्रलयक परात(उपन्यास) प्रकाशन वर्ष:२०२२ १९.बीति गेल समय(उपन्यास) २०.प्रतिबिम्ब(उपन्यास)२१.बदलि रहल अछि सभकिछु(उपन्यास)22. राष्ट्र मंदिर(उपन्यास) २३. संयोग(कथा संग्रह) २४. नाचि रहल छलि वसुधा ( उपन्यास) प्रकाशन वर्षः२०२३ २५.दीप जरैत रहए(उपन्यास) २६.ठेहा परक मौलायल गाछ(उपन्यास) २७.पटाक्षेप(उपन्यास) प्रकाशन वर्षः२०२४ २८ माटि बजा रहल अछि(यात्रा प्रसंग) २९ जयतु जानकी(उपन्यास) ३० यज्ञसेनी(उपन्यास) प्रकाशन वर्षः२०२५ ३१.कथा अखन बाँकी अछि(संस्मरण) ३२. गाछ बजैत छैक(कथा संग्रह) ३३.सूर्यपुत्र(उपन्यास) प्रकाशन वर्ष ;२०२६ बिसरि जाएब जरूरी छै(कविता संग्रह)
In English: - Year of publication:2018 1. The Lost House (Collection of short stories) 2. Life is an art 3.The Ganges Whispers (English translation of my Maithili Novel,Ham Aabi Rahal Chhee (हम आबि रहल छी) हिन्दी में प्रकाशन वर्ष:२०१९ १.न्याय की गुहार
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१०. आशीष अनचिन्हार- इच्छा मृत्यु: स्वतंत्र भारतक पहिल वैध उदाहरण (संशोधित) आशीष अनचिन्हार (ई आलेख विदेहक अंक 439, 1 अप्रैल 2026 मे प्रकाशित भेल छल मुदा ओहिमे एक तथ्य गलत लिखा गेल छल हमरा दिससँ। जकरा एहि अंकमे संशोधित कऽ दोबारा प्रस्तुत कऽ रहल छी। अंक 439 मे प्रकाशित रचनामे वानप्रस्थकेँ अंतिम कहल छल जखन कि ई तेसर अछि एवं अंतिम संन्यास अछि। उम्मेद जे पाठक एहि सही रूपक स्वागत करताह) इच्छा मृत्यु: स्वतंत्र भारतक पहिल वैध उदाहरण (संशोधित) इच्छा मृत्यु केर माने एहन मृत्युसँ लगाओल जाइत छै जाहिमे आदमी अपन इच्छासँ इच्छित दिन, स्थान, मूहूर्त वा परिजनक सानिध्यमे मृत्युक वरण कऽ सकए। प्राचीन कालमे इच्छा मृत्युकेँ दैवी एवं अलौकिक वस्तु मानल जाइत छलै। इच्छा मृत्युकेँ शक्तिक रूपमे वर्णन छै माने ओहन लोक जकरा लग इच्छा मृत्युक शक्ति छै। एहन लोक प्राचीन कालमे अतिरिक्त आदरक पात्र होइत छलाह। भारतीय संदर्भमे भीष्म पितामह एकर नीक उदाहरण छथि जिनका इच्छा मृत्यु वरण करबाक वरदान भेटल छलनि। मुदा सभकेँ ने इच्छा मृत्युक वरदान भेटि पाबै छलै आ ने सभ लग ई शक्ति छलै। तँइ बादमे एकर अन्य रूप आनल गेलै। भारतमे संन्यास वा जैन धर्मक संथारा हमरा इच्छा मृत्युक एकटा बदलल प्रारूप लगैए। संन्यासकेँ आदमी जीवनक चारिम भाग माने एकदम अंतिम भाग मानल गेलैए जाहिमे लोक अपन पारिवारिक-सामाजिक दायित्वपूर्ण कऽ घर छोड़ि दैत छलाह एवं भिक्षाटन कऽ शेष जीवन बिता मरि जाइत छलाह। तहिना संथारामे जैनीकेँ बूझल रहै छै जे आब हमरा कम भोजन करबाक अछि आ क्रमशः हरेक दिन कम करैत जेबाक अछि। एक समयक बाद भोजन बंद भऽ गेलाक कऽ मृत्यु भऽ जाइत छलै। आनो प्राचीन धर्म सभमे एहन उदाहरण भेटत मुदा लेख नमहर करब हमर अभीष्ट नहि। आधुनिक कालमे ने संन्यासक काज छै आ संथारापर सरकार सभ बैन लगेने छै। इच्छा मृत्यु एवं आत्महत्या ऊपरसँ देखबामे इच्छा मृत्यु एवं आत्महत्या एकै लागै छै मुदा दूनूमे भेद छै। इच्छा मृत्यु संपूर्ण पारिवारिक ओ सामाजिक दायित्व पूरा भेलाक बाद प्रयोगमे आनल जाइत छलै तँइ इच्छा मृत्युकेँ दैवीय एवं सम्मानीय मानल गेलै, मुदा आधुनिक कालमे इच्छा मृत्युकेँ सेहो पाप मानल गेलै। जखन कि आत्महत्या जीवनक असफलता, हताशा, अथवा क्षणिक आवेगमे कएल जाइत छै तँइ आत्महत्याकेँ पाप ओ अपराधक श्रेणीमे राखल गेलै से प्राचीन एवं आधुनिक दूनू कालमे। सतीप्रथा, गंगालाभ एवं इच्छा मृत्यु सतीप्रथाक कोनो संबंध इच्छा मृत्युसँ नहि छलै। मुगलसँ पराजय भेलाक बाद ओकरासँ बलत्कृत हेबाक बदला राजपूतानी सभ जौहर (आगिमे स्वतः जरि कऽ मरि जाएब) चुनलक मुदा बादमे ई कुप्रथा बनि गेल आ स्त्रीक विधवा बेलाक बाद बिना ओकर इच्छाक ओकरा चितापर जरा देल जाइत छल। बादमे ई सतीप्रथा संगठित ओ सामूहिक खून कऽ देबाक उदाहरण बनि गेल, जकरा बंगालक समाज सुधारक राजा राममोहन राय खत्म करबेलाह। मिथिलामे एहने एकटा कुप्रथा भऽ गेल छलै 'गंगालाभ' नामसँ। ई प्रथा सरदीमासमे बूढ़ा-बूढ़ीकेँ धर्मक नामपर गंगामे डुबकी लगा-लगा कऽ मारि देल जाइत छलै। एहि कुप्रथाक असरि देखियौ जे 'हुनका गंगा-लाभ भऽ गेलनि' वाक्यसँ बुझा जाइत छलै जे अमुक लोक नहि रहलाह। बादमे क्रमशः ईहो कुप्रथा कम भेल। अंग्रेजक समयमे एवं स्वतंत्र भारतमे एहि सभ तमाम कुप्रथापर रोक लगलै आ इच्छामृत्यकेँ अवैध मानल गेलै। मुदा अवैध रूपें सही हमर अनुमान अछि जे इच्छा मृत्यु चलैत रहलै। ई कोना चलैत रहलै से जनबासँ पहिने आधुनिक युगमे इच्छा मृत्युक परिभाषा जानि लेब उचित। प्राचीन कालमे इच्छा मृत्यु लोक अपने निर्णय लैत छल। ओकरा बदला आन कियो नहि। मुदा आधुनिक युगमे लोक अपने लऽ सकैए, संगे परिवारक लोक सेहो लऽ सकैए मुदा कोर्टक आदेशक संग, पूर्ण रूपे कानूनी तरीकासँ। अन्यथा एकरा खून मानल जेतै। मुदा अनुमान अछि जे बहुत बेर असाध्य बेमारीक कारणे परिवारक सहमति आ किछु बेसी फीस देलासँ हास्पीटलमे इच्छा मृत्युक काज अवैध रूपे भऽ जाइत छै। तँइ हम शीर्षकमे लिखलहुँ "पहिल वैध उदाहरण"। हरीश राणा बर्ख 2013 मे हरीश राणा चंडीगढ़क एक यूनिवर्सिटी सँ सिविल इंजीनियरिंग पढ़ाइ कऽ रहल छलाह, एवं जाहि घरमे रहै छलाह तकर चारिम तल्लासँ खसि पड़लाह। परिवारक कहब छलनि जे आन छात्र सभ धक्का देलकै। मुदा ओहि घटनामे ओ कौमामे चलि गेलाह माने जिंदा तऽ छलाह मुदा ने चेतना छलनि आ ने अपन काज करबाक शक्ति। भोजन पाइप द्वारा देल जाइत छलनि। परिवार लगातार इलाज करबेलकनि मुदा सभ ठाम कहल गेलनि जे आब ई ठीक नहि हेताह। बर्ख 2024 मे हरीशक परिवार दिल्ली कोर्ट पहुँचलाह हरीशक इच्छा मृत्यु लेल मुदा कोर्ट मना कऽ देलकनि, तकर बाद सुप्रीम कोर्ट सेहो मना कऽ देलकनि। बर्ख 2025 मे दू मेडिकल बोर्ड गठित भेलै जाहिमे एकटा बोर्ड एम्स केर छलै। ई दूनू बोर्ड निर्णय देलक जे हरीश राणा कहियो ठीक नहि भऽ सकताह। आ तकर बाद फेरो परिवार सुप्रीम कोर्ट पहुँचल आ एहि बेर 11 मार्च 2026 केँ सुप्रीम कोर्ट हरीशक इच्छा मृत्युक निर्देश देलक एम्सकेँ। आ एम्सक निगरानीमे हरीशक सभ दवाइ बंद कएल गेलै, लाइफ सपोर्ट सिस्टम बंद कएल गेलै, भोजन बंद कएल गेलै आ 24 मार्च 2026 केँ हुनक निधन भेलनि एहि तरीकासँ। सोशल मीडियामे ई केस सुप्रीम कोर्टसँ एहि आदेशक बाद सोशल मीडियापर बहुर रास बात देखलबामे आएल जाहिमे एकटा छल जे कि कोर्ट परिवारकेँ खर्चा नहि दऽ सकैत छल। एहने सन बात। मुदा बात एकटा हरीश राणाक नै छै, एहन केस बहुत छै कोर्टमे। आ हरीश राणासँ पहिनेहो कोर्ट लग एहन केस गेल छलै मुदा हरीश राणामे मेडिकलसँ साबित भेलै जे आब ई ठीक नहि हएत तँइ ई देल गेलै। दोसर बात जे भारतीय मानस कोनो सुविधाक बहुत गलत प्रयोग करैत छै। आइ जँ कोर्ट एकटा लेल खर्चक व्यवस्था कऽ दितै तऽ फेर अगिले दिनसँ ओकरा लग एहन हजारो फर्जी केस आबि जइतै जाहिमे बेमार आदमीक सेहो सहमति रहितै। तँइ कोर्ट हरीश राणाक परिवारकेँ खर्चा नहि दऽ नीक केलकै। कोर्टक निर्णय एहि लिंकपर पढ़ल जा सकैए- https://www.verdictum.in/pdf_upload/harish-rana-v-uoi-verdictum-1773761.pdf निधनक बाद एम्स केर पुष्टि- अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.११. आचार्य रामानंद मंडल- महाकवि विद्यापति अनुसंधान आचार्य रामानंद मंडल महाकवि विद्यापति अनुसंधान
संयुक्त मिथिला मे अनेको कवि विद्यापति भेलन।परंच विभिन्न संपादक अपन संपादन मे अनेको कवि विद्यापति के पदावलि वा गीत के महाकवि विद्यापति के पदावलि मे शामिल कै लेलन आ अन्य कवि विद्यापति गण के नेपथ्य मे धकेल देलन। अधिवक्ता आ लेखक गौरी शरण झा के अनुसार - १.१०३४ ईस्वी मे पौरव वंश के ब्रह्मपुर मे सेहो एकटा विद्यापति भेल छलाह हुॅनका मोरध्वज के उपाधि प्रदान कयल गेल छल।ओ विद्यापति वरुणाश्रम मे आजीवन रहि कृष्ण राधा पर सैकड़ो कवितासब लिखलैन २.रैका वंश मे सेहो एक विद्यापति भेल छथि लेकिन ओ आजन्म अविवाहित छलाह।राईमल्ल के पुरालेख आ १४१० ईस्वी के ताम्रपत्र मे एक आऔर विद्यापति के जिक्र अछि। ३.कलका मंगल के सेहो विद्यापति कहल गेल अछि मौलिक दृष्टि सॅं देवी महात्म्य के सुन्दर अनुवाद विद्याकाव्य कहि क' लिखनें छथि। ४.कंकण के एक कवि के नाम सेहो विद्यापति छल जिनकर पत्नी के प्रभा देवी छल। ५.उज्जयिनी के धनपति के नाम विद्यापति जिनकर पत्नी सुधिरा आ लहना छल। ६.चन्द्रकला,विद्यापति के पुत्रवधू नञि रहथिन्ह ओ तॅं जयदेव के भार्या रहथिन्ह।आ ई विद्यापति के जयदेव कहि देल गेल तैं मैथिल के इतिहास गणपति ठाकुर के पुत्र विद्यापति के विषय मे किछ नञि कहैत अछि। ७.पंच गौड़ेश्वर यशोदाराज सेहो विद्यापति छलाह। विद्यापति के सदृश हु-ब-हु गीत लिखलैन। ८.एक अध्ययन के अनुसार हुसैन साह के सेहो विद्यापति कहल गेल अछि।आ ओ विद्यापति सन गीत लिखै छलाह। ९.एक अध्ययन के अनुसार नासिरसाह सेहो विद्यापति छलाह आ विद्यापति जकाॅं कविता,गीत लिखनें छथि। १०. राहुल महापण्डित राहुल सांकृत्यायन दक्षिणी हिन्दी काव्य धारा मे पृष्ठ संख्या ३ मे लिखनें छथि कि ख्वाजा बन्दानेवाज विद्यापति छलाह जिनकर जन्म १३४१ ईस्वी मे भेल छल। ११.बिसइवार-वंश के अनुसार जयदत्त ठाकुर के पुत्र गौरीपति ठाकुर उर्फ गोपाल ठाकुर आओर गणपति ठाकुर छथि एवं गणपति ठाकुर के एकमात्र पुत्र विद्यापति ठाकुर भेलाह।ई विद्यापति काल्पनिक लागै छथि। १२.ओइनवार राजवंश के अनुसार प्रजापति के पुत्र उमापति आ वाचस्पति छथि आ उमापति के तीन पुत्र मे मझिला पुत्र के नाम विद्यापति छल विद्यापति के पुत्र जयपति आ देवपति भेलाह। एक अध्ययन के अनुसार- 'शैवसर्वस्वसार' ग्रंथ विद्यापति के लिखल नहि थीक आओर ग्रंथ 'गंगावाक्यावली 'सेहो कोनो विद्यापति नञि अपितु विश्वास देवी लिखनें छथि। भनइ जसोधर नव कविशेखर पुहवी दोसर काहाँ । शाह हुसेन भड्गसम नागर मालति सेनिक ताहाँ ॥ एहि मे कवि यशोधर के हटाक' विद्यापति के नाम दय देल गेल अछि करीब दू हजार पदावली पंचानन- कवि लिखने छथि तालपत्र पर जकरा विद्यापति के पदावली कहि देल गेल अछि । उमापति के बालक के नाम सेहो विद्यापति छल आ उमापति,प्रजापति के पुत्र छलैथ ओहो एक महान कवि छलाह एवं गीत -मोराहि रे अंगनमा चाँदन केर गछिया ताहि चढि कूररए काग रे--यैह विद्यापति लिखनें छथि झारखण्ड पूर्व एकीकृत बिहार के अविनाशी घासी के सेहो विद्यापति - जयदेव कहल गेल अछि। विद्यापति के असली नाम वसंत राय छल-कल्पतरु। प्रो हीरा लाल कर्ण , नेपाल के अनुसार - विद्यापति।ओ सभ एके समयके नहि छथि । पहिल विद्यापति दशम शताब्दी के छथि । हुनकर संस्कृत पद्य सभ कश्मीरके अभिनव गुप्तके ईश्वरप्रत्याभिज्ञा विमर्शिनीमें संकलित अछि । दोसर विद्यापति कल्चुरी नरेश कर्णदेवके दरबारी कवि रहथि । हुनकर संस्कृत पद्य सभ श्रीधरदासके सदुक्तिकर्णामृतमें संकलित अछि । तेसर विद्यापति गणपति ठाकुरके पुत्र मैथिली के महाकवि छथि । चारिम सतरहम शताब्दी के उमापति के पुत्र छथि । पाँचम विद्यापति सोरहम सत्रहम शताब्दी दिस बंगालमें भेल रहथि । आचार्य रामानंद मंडल सीतामढ़ी के अनुसार- आदि कवि विद्यापति नाई -कविशेखर जोतिश्वर कृत वर्णरत्नाकर मे वर्णित विदापत नाच के जनक आदि कवि विद्यापति नाई के विदापत नाच के महाकवि विद्यापति के विदापत नाच कहल जा रहल हय जौं कि महान् साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु अपन एगो आलेख मे विदापत नाच के चर्चा करैत लिखैत छतन कि विदापत नाच से कुलिन वर्ग घृणा करैत हय आ वो वर्ग अइ नाच मे सम्मिलित नहि होइ छतन।विदापत नाच के मंगलाचरण -गननायकं फलदायकं पंडितं पतितं ..बतबैत छतन। अन्य कवि विद्यापति दोनवार सिरहा नेपाल मे भेल रहलन। हिनकर रचित पदावलि मिलल हय।परंच कवि चंदा झा हिनकर रचना के महाकवि विद्यापति के पदावलि मे शामिल कै लेलन। प्रसिद्ध आलोचक तारानंद वियोगी के अनुसार महाकवि विद्यापति के रचना जै जै भैरवि असुर भयावनि नहि हय। कवि रतन के लिखल अर्द्धनारीश्वर वंदना के महाकवि के रचना कह देल गेल। देखल जाय हय कि अनेको कवि विद्यापति के पदावलि के अनेको संपादक द्वारा महाकवि विद्यापति के पदावलि मे शामिल क लेल गेल।आ अनेको कवि विद्यापति के नेपथ्य मे ढ़केल देल गेल। -आचार्य रामानंद मंडल, सीतामढ़ी। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१२. बद्रीनाथ राय अमात्य-वेदज्ञ मैथिलक मर्म/ घवाह मैथिलक व्यथा/ वेदज्ञ मैथिलक व्यथा;हमर सारि; विमर्शक विषय बद्रीनाथ राय अमात्य वेदज्ञ मैथिलक मर्म/ घवाह मैथिलक व्यथा/ वेदज्ञ मैथिलक व्यथा;हमर सारि; विमर्शक विषय १ वेदज्ञ मैथिलक मर्म/ घवाह मैथिलक व्यथा/ वेदज्ञ मैथिलक व्यथा
दिल्ली प्रवाशक क्रममे एकटा विशिष्ट ,शिष्ट ,मर्मज्ञ मैथिल काका भेटल छला जे प्रात: वायुसेवनके लेल निकलल छला। ओ अपन भेष भूषा, चानन टिक्का आ टिकसँ वेदज्ञ विद्वान बझना जाइत छला ।टहलबाक क्रममे अपन पाँच वर्षीय पौत्रसँ मैथिलीमे बतियाइत छला। बाबा पोताक मैथिलीमे संभाषण सुनि हमरा मनमे अपन मातृ भाषाक प्रति आकर्षण जागल ।हम मैथिल काकाक ध्यान अपना दिस आकृष्ट करैत प्रणाम क' कहलियनि--काका अपने मैथिल थिकहुँ,हमहुँ मैथिल छी।काका हमरा जातिये दृष्टिकोणसँ अपन स्वजातीय बुझला आऔर प्रशन्न होइत बजला--हाँ हम विशुद्ध मैथिल छी। वार्तालापक क्रममे काकाक मैथिलत्व जागि गेल छलनि।काका अपन प्रशंसनीय प्रशंसा करैत बजला--हम बहुतो विद्यापति समारोह करौने छी,सब जाति धर्म वर्गसँ चन्दा लैत छलियैक मुदा स्वजातीय छोड़ि मंचमे केकरो सट' नञि दैत छलियैक।बाबा विद्यापतिजी हमर पूर्वज छथि हम हुनक वंशज छी।हमरा मैथिली मिथिलाक माटिसँ बहुत स्नेह अछि।हमरा एखनो मिथिलाक माटिपानिके उद्धार करबाक इच्छा रहैत अछि, मुदा पौरुष आब नञि बाँचल अछि।काकाक चतुर्थावस्था देखैत हम कहलियनि--काका अपनेक देह मिथिलाक माटिपानिसँ बनल अछि,ई देह पुन: मिथिलेक माटिपानिके सुपूर्त होमक चाही।एहि अवस्थामे अपनेके अपन माटिपानि पर रहक चाही। काका हमर बातके स्वीकृति दैत बजला--अवश्य!अवश्य!हमरो सएह इच्छा अछि। मुदा ई डकूबा सरकार सबटा सत्यानाश केलक। हम अकचकाइत पुछलियनि--काका से की?काका सरकार पर रुष्ट होइत बजला--ई डकूबा सरकार गाँव गाँव मे ततेक ईसकूल खोलि देलकै अछि जे आब सेवा टहल करबैक लेल गाँव मे रार रोइया नञि भेटैत छैक। हमर बेटा पुतौह सब दिल्लिए रहैत छथि। हम विधुर छी असगर गाँवमे रहब बहुत मोसकिल छैक।जखन हमरामे पौरुष बाँचल छल तखन हम एक टाकाक गोट बीसटा चोकलेटसँ बीसक रारक धिया पुत्ताके टहलूमे रखैत छलहुँ जे अपन बकरी चरबक लेल जाइत छल आऔर हमरा गायके लेल लतरल दूभि घास नोचिक' आनि दैत छल जे घास खाक' हमर गाय मस्त रहै छलि आऔर खूब दूध दैत छलि। किछु आँकड़ पाथर खुआ देलापर भरि दिनक लेल टहलू भेटैत छल ,खूब टहल करबैत छलहुँ आऔर साझमे अपन फेरन फारन फाटल पुरान कोनो वस्त्र दैत छलियैक, वस्त्र पावि ओहो खूब प्रसन्न होइत छल।एतबे नञि, ओ सब ताड़ी पीबि आपस मे खूब लड़ितो छल ,हमही ओकर सबहक झगड़ाक पंचैती करैत छलियैक ।पंचायत मे न्याय अन्याय देखबाक कोनो प्रयोजन नञि होइत छलैक,जेकरा प्रति विद्वेष रहैत छल तेकरे दोषी साबित करै छलियैक आऔर बेसी नञि,पचासक रुपया जरिबाना सेहो करैत छलियैक आऔर तत्क्षण पाइ सेहो ल' लैत छलियैक। होइत प्रात ओकरे टहल करबाक लेल बजबैत छलियैक भरि दिन इच्चानुकूल टहल करेलाक बाद ओकरे देल वएह पाइ ओकरे आपस क' दैत छलियैक। सत्यानाश हौ एहि सरकारक जे स्वर्ग सन मिथिलामे गाँव -गाँव ईसकूल खोलि हमर मिथिलाक संस्कृतिके नष्ट भ्रष्ट आऔर दुष्कृत केलक अछि।हम काकाक कथन सुनि अकचकाएल सन्न रहि गेलहुँ।
२ हमर सारि
हमर सारि सुपनेखिया सियान नञि भेलि छथि तथापि विवाहक लेल उताहुल रहैत छथि आऔर पुरुष वर्गके रिझेबाक लेल लोक संहारक शृंगार करैत छथि आऔर गर्धप स्वरमे गबितो छथि। ओ अपन लोक संहारक शृंगारसँ बहुतो के संहार केने छथि ओ पुरस्कारक लेल कखनो कवियित्री कखनो गायिका बनि जाइत छथि।मिथिलाक सुप्रसिद्ध रिलांगना भेलाक कारणे हुनका समस्त पुरुष समाज चिन्हैत छनि।मुदा कृष्णाभिसारिका सन गोर आऔर सुपनेखा सन सुन्दर रहलाक कारणे बुढ़ जुवान केओ मैथिल हुनकापर नञि रिझ रहल छनि, कारण अपन अंगप्रदर्शनक क्रममे ओ अपन किछुए अंग छोड़ि अपन अंग प्रत्यंग बुढ़ जुवान समस्त मैथिल समाजक पुरुष वर्गके देखा देने छथि।हमरा मैथिल समाजमे केओ नञि चिन्हैत छल से हमहूँ अपन सारि सुपनेखियाक परसादे समस्त मिथिला समाजमे चिन्हल जाइत छी।माला मंच सम्मान सेहो खूब भेटैत अछि।मन खूब प्रसन्न रहैत अछि मुदा भीतरसँ सन्न रहैत छी जे जँ कोनो बुढ़ जुवान सुपनेखियाके नञि गछलकै त' हमरे गाराक घेघ बनत।हमरा भूखल रहब बर्दास्त अछि मुदा ऐंठ अन्न नञि पचैत अछि।
३ विमर्शक विषय हमर सारि सुपनेखियाक क्रान्तिकारी आऔर बारुदी विचारसँ जखन सामाजिक विधान वाधित हुअए लगलैक तखन हमर सासुर पक्षक लोक ओकरा वैवाहिक बन्हनमे बान्हि देबाक विचार केलनि।ताहि क्रममे हमरो कहल गेल जे हिनका लेल सस्ता सुन्दर टिकाउ मजगूत वऽर देखल जाए।हमर सारि सुपनेखिया पाकल जामुन सन गोर कृष्णाभिसारिका सन सुन्नर छलि मुदा विचार शुक्लाभिसारिका सन देदिप्यमान रखैत छलि।हुनका द्रौपदी बनबाक इच्छा छलनि मुदा केकरो दशरथ बनब हुनका बर्दास्त नञि छलनि ।ओ बिच्चहिमे विरोधक स्वरमे बाजि उठली--मुदा वऽर बेरोजगार ,मैथिलीक लेखक वा अछरकटुआ कवि नञि होमक चाही।हम बेरोजगारो चला लेब मुदा लेखक कवि नहिञे टा चलत कारण कवि रवि होइत छथि,हुनक देह आऔर विचार बहुते अगियाह होइत छनि।हुनक वैचारिक ताप सहब हमरा लेल अस्हय हाएत। हमहूँ मौकासँ लाभ उठबैत जे बात कहियो नञि कहने छलियनि से कहलियनि जे अपनेक यौवनमे आकर्षण अवश्य अछि मुदा एनामे अपन मुँह रंग रुप देखि अपन यौवनपर नञि,अपन रंग रुपपर गंभीर विमर्श करब से हमर आग्रह।हमर कहल सत्य बात हुनका मिरचाइ सन लगलनि आऔर हमरापर बरसैत बजली--अहाँक प्रसिद्धिक लेल हमर अखण्ड कौमार्यके बेरि बेरि खण्ड-खण्ड काएल गेल, हमर यौवनक खूबे दुरुपयोग भेल अछि।हम बहुतो मैथिलक व्यंगवाण आऔर नयनवाणसँ विद्ध भेलि छी। आइ हमरे एहि यौवनक परसादे अहाँ कवि कहबै छी,मुदा हम सत्य बात कहबे करब, अहाँ व्याकरणहीन पौरुषहीन आऔर बेहाया छी,अहाँमे कनिञो कृतज्ञता नञि अछि।आइ हमहूँ अपन दग्धल मनसँ श्राप दैत छी जे कहियो अहाँ कवि नञि बनब, सब दिन अछरकटुए रहि जाएब।हमर नाक तऽ कटिये गेल अछि,जँ हमर विवाह नञि भेल तऽ आब अहाँक टीक काटब। -बद्रीनाथ राय अमात्य, ग्राम पोस्ट करमौली, भाया कलुआही, जिला मधुबनी बिहार ,फोन 6205190859 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१३. गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली लेल दलित साहित्य समीक्षाशास्त्र-२ [संदर्भ: प्रभास कुमार चौधरीक 'इन्द्रधनुष', अशोकक 'प्रतिलोम' आ रमेशक 'कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो'/ दलित साहित्य समीक्षाशास्त्र, भारतीय समीक्षाशास्त्र, पाश्चात्य समीक्षाशास्त्र, गंगेशक नव्य न्याय आ विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्कक परिप्रेक्ष्यमे] अनुलग्नक: ज्योत्स्ना फणिजा- कतिपय मैथिली कथा मे जातीय संघर्षक अन्वेषण [प्रभास कुमार चौधरीक “इन्द्रधनुष” “द रेनबो”, अशोक कुमार झाक “प्रतिलोम” “एंटीकरेंट” आ रमेश झाक “कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो”- कन्टेम्परेरी मैथिली शॉर्ट स्टोरीज (Contemporary Maithili Short Stories)। संपादक: ठाकुर, मुरारी मधुसूदन। नई दिल्ली: साहित्य अकादमी, २००५] (म्यूज इण्डिया नवम्बर- दिसम्बर २०१९, अंक ८८) १ गजेन्द्र ठाकुर मैथिली लेल दलित साहित्य समीक्षाशास्त्र- २ [संदर्भ: प्रभास कुमार चौधरीक “इन्द्रधनुष”, अशोकक “प्रतिलोम” आ रमेशक “कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो”] दलित साहित्य समीक्षाशास्त्र, भारतीय समीक्षाशास्त्र, पाश्चात्य समीक्षाशास्त्र, गंगेशक नव्य न्याय आ विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्कक परिप्रेक्ष्यमे भूमिका मैथिली साहित्यक आधुनिक कालखण्डमे कथाक स्वरूप आ उद्देश्यमे जे क्रान्तिकारी परिवर्तन आएल अछि, तकर प्रस्थान विन्दु सामाजिक यथार्थवाद आ दलित चेतना केर उद्भव मानल जाइत अछि। प्रभास कुमार चौधरीक 'इन्द्रधनुष', अशोकक 'प्रतिलोम' आ रमेशक 'कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो' मात्र तीनटा कथा नहि, अपितु मिथिलाक परिवर्तित सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य, वर्गीय द्वन्द्व आ दलित अस्मिताक संघर्षक एकटा विस्तृत आलेख थिक1। एहि कथा सभक अध्ययन जखन भारतीय आ पाश्चात्य समीक्षाशास्त्र, गंगेश उपाध्याय केर नव्य न्याय आ 'विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क' केर आलोकमे कएल जाइत अछि, तखन साहित्यक ओहि प्रच्छन्न स्तर सभक उद्घाटन होइत अछि जे बेशी काल अभिजात्य विमर्शमे उपेक्षित रहि जाइत अछि । मिथिलाक परम्परागत 'हवेली' संस्कृति आ 'खबास' परम्परा सँ निकलि कऽ आब कथा ओहि 'सुट्टा', 'मुनरा' आ 'कैलास' धरि पहुँचि गेल अछि, जे अपन पसीना आ अधिकारक हेतु संघर्षरत अछि । मैथिली साहित्यक आधुनिक कथा-परम्परामे तीन गोट कृति मैथिली दलित साहित्य समीक्षाशास्त्र लेल विशेष महत्त्व राखैत अछि- प्रभास कुमार चौधरीक “इन्द्रधनुष”, अशोकक “प्रतिलोम” आ रमेशक “कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो”। ई तीनू कथा मिथिलाक ग्रामीण समाजक आर्थिक शोषण, जाति-व्यवस्थाक दंश, सामन्ती सत्ताक क्रूरता आ तिरस्कृत मानवताक प्रतिरोधक जीवन्त दस्तावेज अछि। प्रस्तुत अध्ययन एहि तीनू कृतिकेँ पाँच गोट भिन्न-भिन्न आलोचनात्मक फ्रेमवर्कसँ परखैत अछि- (१) दलित समीक्षाशास्त्र- जे जाति-उत्पीड़न, अस्पृश्यता आ दलित प्रतिरोधकेँ केन्द्रमे राखैत अछि; (२) भारतीय समीक्षाशास्त्र- रस-सिद्धान्त, ध्वनि, वक्रोक्ति, अलङ्कार आ काव्यशास्त्रीय परम्पराक आलोकमे; (३) पाश्चात्य समीक्षाशास्त्र- मार्क्सवाद, उत्तर-औपनिवेशिकवाद, संरचनावाद, स्त्रीवाद आ नवइतिहासवादक परिप्रेक्ष्यमे; (४) गंगेशोपाध्यायक नव्य न्याय- प्रमाण, अनुमान, व्याप्ति आ शब्द ज्ञानक दार्शनिक उपकरणसँ; (५) विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क- मिथिलाक इतिहास, लोक-स्मृति, सांस्कृतिक अस्मिता आ समानान्तर आख्यानक आधारपर। खण्ड १ : कथा-परिचय आ पाठ-विश्लेषण १.१ प्रभास कुमार चौधरीक “इन्द्रधनुष” (नवम्बर १९८३मे प्रकाशित) इन्द्रधनुष मैथिलीक एकटा आन्दोलनधर्मी कथा अछि जे मिथिलाक एकटा ग्रामीण परिवेशमे सामन्ती व्यवस्थाक विरुद्ध जनजागरणक प्रक्रियाकेँ चित्रित करैत अछि। कथाक केन्द्रीय पात्र अनिल अछि, जे एकटा सचेत युवा संगठक अछि। हुनकर संगी सरोज आ महेश छथि। कथाक प्रतिपक्षमे काशी चौधरी (गाम-मालिक, सामन्त), नामी बाबू (पंचायत-प्रधान), सुट्टा (दलाल), आ मुनरा (किसान-नेता) अछि। कथाक कथावस्तु एहि प्रकारें अग्रसर होइत अछि- गाममे बाट-सड़क, स्कूल सभ काजक नामपर सरकारी पाइ ठिकेदार आ मुखिया लूटैत अछि। जनचेतना जागृत करबाक लेल अनिल आ ओकर दल ग्रामीण सभाक आयोजन करैत अछि। ई सभा काशी चौधरीक दरबज्जापर होइत अछि। सामन्ती वर्गक प्रतिरोधक बादो जनता एकजुट होइत अछि। अन्तमे लाठीचार्ज, गोली, दमन- किन्तु लोकक मनोबल नहि टूटैत अछि। कथामे इन्द्रधनुषक रूपक बड़ गहींर अछि- जेना बर्खाक बाद इन्द्रधनुष (पनिसोखा) उठैत अछि, तेना उत्पीड़नक बादो जनचेतनाक उदय होइत अछि। १.२ प्रतिलोम प्रतिलोम एकटा बड़ सघन, बहु-स्तरीय कथा अछि जे एकटा ब्राह्मण हवेलीमे श्राद्धक अवसरपर घटित होइत अछि। ई कथा जाति-व्यवस्थाक सूक्ष्मतम अत्याचारकेँ- छुआछूतसँ परंपराक आडम्बर तक- अत्यन्त तीक्ष्ण दृष्टिसँ उद्घाटित करैत अछि। अर्जुन कथाक केन्द्रीय पात्र अछि- एकटा आधुनिक, शिक्षित युवा जे अपन बौआ (बड़का भाइ) लग आयल अछि। बूढ़ा मालिक (पं. गणेश्वर झा) हवेलीक मालिक छथि, जे पुरातन व्यवस्थाक प्रतीक अछि। कपिलेश्वर झा खस्सीक तमाशाक मुख्य संयोजक अछि। प्रदीप (बेटा) परम्पराक विरोधी किन्तु असहाय अछि। मंजू बुच्ची स्त्री-दमनक प्रतीक अछि। कथाक 'प्रतिलोम' शीर्षक अत्यन्त अर्थपूर्ण अछि- ई वस्तुत: उनट अथवा विलोम थिक। समाजमे जे ’ऊपर' अछि से नैतिक रूपें 'नीचाँ' अछि- पण्डित, मालिक, ब्राह्मण सभ अपन आचरणसँ अपन तथाकथित श्रेष्ठताक खण्डन स्वयं करैत अछि। १.३ कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो (कथा-संवाद, दरभङ्गा, ७ जुलाई १९९०मे प्रकाशित) ई कथा कैलास मंडल नामक एकटा निम्नवर्गीय (शूद्र) व्यक्तिक चारू कात घूमैत अछि जे अपन पिताक असामयिक मृत्युक बाद आर्थिक आ सामाजिक रूपसँ एकदम असहाय अछि। ओ गामसँ पंजाब गेल छल, ओतयसँ लौटि आयल अछि- हाथमे एकटा फिलिप्स रेडियो लय। बौआ झा (हवेलीक ब्राह्मण मालिक), सुरीन्दर आ गजीन्दर (दुनू बौआ झाक लठैत) कथाक प्रतिनायक अछि। फिलिप्स रेडियो- जे आधुनिकताक, प्रगतिक, एकटा नव आकांक्षाक प्रतीक अछि- अन्तमे जातीय षड्यन्त्रक शिकार बनि जाइत अछि। कथाक अन्त अत्यन्त मार्मिक अछि- कैलाकेँ बौआ झा, सुरीन्दर आ गजीन्दर बेइज्जत करैत अछि, रेडियो छीनि लेइत अछि। किन्तु कैलाक माय- निरक्षर, वृद्ध, दरिद्र- तखनो डेग-डेग पर अपन पुत्रक संग ठाढ़ रहैत अछि। कथाक अन्तिम दृश्यमे ओ रेडियोपर समधानि कऽ प्रहार करैत अछि कारण रेडियो अनका देत तँ मायकेँ दाँती-चनरा लागि जेतै, तइसँ नीक जे ओकरा तोड़िये देल जाय। खण्ड २ : दलित समीक्षाशास्त्रक परिप्रेक्ष्यमे मैथिली कथाक दलित समीक्षाशास्त्र आ अस्मिता विमर्श मैथिलीमे दलित समीक्षाशास्त्रक आधार सहानुभूति नहि, अपितु 'स्वानुभूति' आ 'प्रतिरोध' अछि। दलित समीक्षाशास्त्रक सिद्धान्तक अनुसार साहित्य एहन हेबाक चाही जे वर्णवादी आ सामन्ती व्यवस्थाक जड़ि पर प्रहार करैत एकटा समतामूलक समाजक ओकालति कय सकय । एहि तीनू कथा मे दलित आ वंचित वर्गक चित्रण मात्र पात्रक रूप मे नहि, अपितु एकटा जाग्रत 'वर्ग' केर रूप मे भेल अछि। २.१ दलित समीक्षाशास्त्रक सैद्धान्तिक आधार डॉ. बी.आर. अम्बेडकरक विचार-परम्पराक आधारपर दलित समीक्षाशास्त्र ई प्रश्न पुछैत अछि- साहित्यमे दलित जीवनक चित्रण कतेक प्रामाणिक अछि? के लिखि रहल अछि? किनका लेल लिखि रहल अछि ? आ एहि लेखनसँ दलित मुक्तिमे कतेक योगदान भ' रहल अछि ? ई समीक्षाशास्त्र जाति-व्यवस्थाक भितरिया संरचनाकेँ उद्घाटित करैत अछि, साहित्यमे ब्राह्मणवादी प्रभुत्वकेँ चुनौती दैत अछि। २.२ इन्द्रधनुषमे दलित चेतना इन्द्रधनुषमे दलित जीवनक चित्रण अत्यन्त ठोस आ आर्थिक रूपसँ विश्लेषित अछि। खेतिहर मजदूर, धनुकटोली, मुसहरटोली- ई स्थान नाम सभ दलित समुदायक भौतिक विभाजनकेँ स्पष्ट करैत अछि। गाममे दू वर्गक लोकक बीच जे आर्थिक-सामाजिक खधाइ अछि तकरा कथाकार स्पष्टतासँ देखबैत छथि। दलित समीक्षाशास्त्रक दृष्टिसँ एहि कथाक महत्त्वपूर्ण पक्ष ई अछि जे दलित लोकनिकेँ खाली पीड़ित वर्गक रूपमे नहि, वरन् सक्रिय प्रतिरोधक वाहकक रूपमे चित्रित कयल गेल अछि। जखन काशी चौधरीक लठैत लोकनि लाठी लय अबैत अछि, तखनो मुनरा आ ओकर दल भागैत नहि अछि। ई 'प्रतिरोधक राजनीति' दलित साहित्यक केन्द्रीय चिन्ता अछि। किन्तु एकटा सीमा सेहो अछि- कथाकार जातिगत उत्पीड़नकेँ वर्गीय समस्यामे अपचयित करबाक प्रवृत्ति देखाबैत छथि। दलित समीक्षक एहि 'वर्ग-अपचयवाद'केँ समस्यापूर्ण मानैत छथि- जाति केवल वर्गीय शोषणक उपोत्पाद नहि, वरन् अपन स्वतन्त्र तार्किकता रखैत अछि। 'इन्द्रधनुष' मे दलित प्रतिरोधक स्वर अशोकक कथा 'इन्द्रधनुष' मे दलित जागरणक जे स्वरूप देखाइत अछि, ओ १९८० केर दशकक राजनीतिक चेतनाक प्रतिफल अछि । कथा मे 'सुट्टा', 'मुनरा' आ 'यदु' सन पात्र आब 'मालिक' केर आगू झुकबाक बदला मे अपन 'बोनि' (मजदूरी) केर माँग करैत छथि। दलित समीक्षाशास्त्रक दृष्टि सँ देखल जाय तँ एतय 'सुट्टा' केर विद्रोह ओहि सामन्ती दम्भक विरुद्ध अछि जेकर प्रतिनिधि 'काशी चौधरी' छथि। जखन सुट्टा कहैत अछि जे "कमा कऽ खाइ छी हम तँ छोटका जाति, आ ई बैठल खयता तँ बड़का जाति," तखन ओ श्रम केर प्रतिष्ठाक स्थापना करैत अछि । ई चेतना दलित समीक्षाशास्त्रक ओहि सिद्धान्त सँ प्रेरित अछि जतय 'जाति' केर श्रेष्ठता केँ 'श्रम' केर आधार पर चुनौती देल जाइत अछि। २.३ प्रतिलोममे अस्पृश्यता आ ब्राह्मणवाद प्रतिलोम दलित समीक्षाशास्त्रक लेल सर्वाधिक प्रासङ्गिक कथा अछि। एहिमे अस्पृश्यताक जे चित्रण अछि से अत्यन्त सूक्ष्म रूपमे देखाओल गेल अछि। श्राद्धक भोजमे पानि पीबाक दृश्य- 'पानि लेबैं ? पानि पीबैं मालिक ? पानि चाही ?' एकटा छोट प्रश्न किन्तु एहिमे हिन्दू जाति-व्यवस्थाक समस्त क्रूरता समाहित अछि। अर्जुनक विरोधक बादो ओकर असहायता दलित समीक्षाशास्त्रक एकटा केन्द्रीय प्रश्नकेँ उठबैत अछि- शिक्षित दलित वा जाति-विरोधी व्यक्ति की स्वयं सम्पूर्ण मुक्त भ' सकैत अछि ? अर्जुन चाहैत अछि किन्तु व्यवस्थाक समक्ष ओ एकाकी अछि। 'प्रतिलोम' नामक व्यञ्जना दलित दृष्टिसँ बड़ महत्त्वपूर्ण अछि- जाति-व्यवस्थामे जे 'उच्च' अछि ओ वास्तवमे नैतिक रूपसँ निम्न अछि, आ जे 'शूद्र' वा 'अस्पृश्य' कहाइत अछि ओ मानवीय गरिमामे श्रेष्ठ अछि। ई अम्बेडकरवादी विचारक साहित्यिक अभिव्यक्ति थिक। 'प्रतिलोम' ' मे संरचनात्मक शोषण अशोकक कथा 'प्रतिलोम' मे 'खबास' परम्परा केर जे चित्रण अछि, ओ दलित समीक्षाशास्त्रक हेतु एकटा गम्भीर शोधक विषय अछि । खबास जेकरा हवेलीक 'सम्पत्ति' मानल जाइत छल, ओ आब अपन 'जीह' (जीभ) बदलय चाहैत अछि । दलित समीक्षाशास्त्रक अनुसार 'जीह बदलब' मात्र एकटा शारीरिक क्रिया नहि, अपितु भाषिक आ सांस्कृतिक स्वाधीनताक घोषणा अछि। २.४ कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियोमे आर्थिक-जातीय शोषण ई कथा दलित समीक्षाशास्त्रक एकटा विशेष आयामकेँ जगजियार करैत अछि- आधुनिकताक वस्तु (रेडियो) आ परम्परागत जातिवादक टकराव। फिलिप्स रेडियो खाली एकटा यान्त्रिक उपकरण नहि, वरन् कैला आ ओकर माय लेल ई एकटा सांस्कृतिक सहभागिताक स्वप्न अछि। जखन रेडियो छीनि लेल जाइत अछि, तखन खाली एकटा वस्तु नहि, वरन् एकटा निम्नजातीय मनुष्यक आधुनिक विश्वमे भागीदारीक अधिकार छीनल जाइत अछि। बौआ झा आ ओकर लठैतक व्यवहारमे जातिगत घृणा आ आर्थिक लूट दुनू सम्मिलित अछि। कैलाकेँ ५०० रुपैयाक ऋणजाल आ रेडियोक छिनैकेँ दलित समीक्षाशास्त्र कृषि-दास प्रथाक आधुनिक रूपक रूपमे देखैत अछि। 'कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो' मे संरचनात्मक शोषण 'कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो' मे 'कैलास' (कैला) पंजाब सँ कमा कऽ अबैत अछि, मुदा गामक सामन्ती व्यवस्था ओकरा पुनः अपन जाल मे फँसा लैत अछि। एहि कथा मे रेडियो आधुनिकताक प्रतीक अछि, मुदा जखन ओकरा हरबाही (Bonded Labour) मे जोतल जाइत अछि, तखन ओही रेडियो पर 'आजादीक गीत' बजबाक क्रूर विडम्बना दलित विमर्शक मुख्य स्वर बनि कऽ उभरैत अछि । खण्ड ३ : भारतीय समीक्षाशास्त्रक परिप्रेक्ष्यमे भारतीय समीक्षाशास्त्र: रस आ औचित्य भारतीय काव्यशास्त्र मे 'रस' केर निष्पत्ति पाठक केर हृदय मे एकटा स्थायी भाव उत्पन्न करैत अछि। 'कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो' मे 'करुण रस' केर जे अनुभूति होइत अछि, ओ पाठक केँ व्यवस्थाक प्रति आक्रोश सँ भरि दैत अछि। 'औचित्य' सिद्धान्तक अनुसार, साहित्यक प्रत्येक अंग मे एकटा संतुलन हेबाक चाही। मुदा एहि कथा सभ मे 'अनौचित्य' (सामाजिक अन्याय) केर चित्रण कऽ कऽ कथाकार समाजक वास्तविक चेहरा देखबैत छथि। 'ध्वनि' सिद्धान्तक अनुसार, 'इन्द्रधनुष' केर शीर्षक स्वयं मे एकटा 'व्यंग्यार्थ' अछि, जे राजनीति केर अप्रभावी होइत रंग आ ओकर क्षणभंगुरता केँ ध्वनित करैत अछि । ३.१ रस-सिद्धान्त आ कथाक भावभूमि आचार्य भरतक नाट्यशास्त्रसँ प्रारम्भ भेल रस-सिद्धान्त गद्य-कथामे सेहो लागू होइत अछि। एहि तीनू कथामे प्रधान रस ई सभ अछि- इन्द्रधनुष- वीर रस (जनसंघर्षक उत्साह), करुण रस (दरिद्रताक चित्रण), रौद्र रस (सामन्ती दमनक विरुद्ध क्रोध)। प्रतिलोम- वीभत्स रस (अस्पृश्यताक घृणित चित्रण), करुण रस (अर्जुनक असहायता), हास्य-व्यङ्ग्य (श्राद्धक आडम्बरपर)। कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो- करुण रस (प्रधान), शान्त रस (अन्तमे कैलाक माइक धीरज), तीव्र क्रोध आ बिरह। ३.२ ध्वनि-सिद्धान्त : आनन्दवर्धनक आलोकमे ध्वनि-सिद्धान्तक अनुसार काव्यमे व्यञ्जनाशक्ति (Suggestive Power) सर्वोच्च होइत अछि। एहि कथासभमे ध्वनिक प्रयोग अत्यन्त कुशलतासँ कयल गेल अछि। 'इन्द्रधनुष'- नाममे प्रतीकात्मक ध्वनि अछि। इन्द्रधनुष सात रङ्गक होइत अछि- ठीक एहिना मिथिलाक समाजमे सात वर्ण-समुदाय अछि (ब्राह्मण, कायस्थ, यादव, धानुक, मुसहर, खतबे, अमात (अमात्य)। ई सात रङ्ग मिलिकेँ एकटा सुन्दर आकाशी दृश्य बनबैत अछि- जनचेतना सेहो एहिना एकताबद्ध होयबाक स्वप्न थिक। 'प्रतिलोम'- व्याकरण आ दर्शन दुनूमे 'प्रतिलोम' वर्जित क्रम थिक। एहि शीर्षकक ध्वनि अछि- जे समाज अपन स्वाभाविक नैतिक क्रम (न्याय, समता, प्रेम)केँ उलटा कय लेलक अछि, ओ प्रतिलोम भ' गेल अछि। 'कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो'- रेडियोक व्यञ्जना अछि आधुनिकताक, वर्गान्तरणक स्वप्नक। पश्चिमी ब्राण्ड 'फिलिप्स'- ई सेहो व्यञ्जित करैत अछि जे तथाकथित वैश्विक आधुनिकता सेहो दलितक लेल अप्राप्य अछि। ३.३ वक्रोक्ति आ व्यञ्ग्य : आचार्य कुन्तकक परम्परा कुन्तकक 'वक्रोक्तिजीवित'क आलोकमे तीनू कथामे वक्रोक्ति (oblique expression) बड़ कुशलतासँ प्रयुक्त अछि। प्रतिलोममे श्राद्धक क्रममे पाइन लेबाक विषयपर जे संवाद अछि- 'पाइन लेबैं ? पाइन पीबैं मालिक?' -ई प्रश्न सरलतासँ वक्र अछि। प्रश्न पाइनक अछि, किन्तु अर्थ अछि जाति-शुद्धताक, अपवित्रताक। एहि छोट संवादमे हिन्दू जाति-व्यवस्थाक सम्पूर्ण दर्शन व्यञ्जित अछि। इन्द्रधनुषमे जखन मुनरा कहैत अछि 'माफ करू हजूर'- ई विनम्रताक वाक्य वस्तुत: एकटा व्यङ्ग्यपूर्ण प्रतिरोध थिक। ओ भीतरसँ टूटल नहि अछि- बस परिस्थितिक दबावमे आनुष्ठानिक शब्द कहि रहल अछि। ३.४ लोककथा-परम्परा आ मैथिली कथाशैली तीनू कथामे मिथिलाक लोककथा-परम्पराक गहींर प्रभाव अछि। संवादक शैली, प्रतीकक चयन, ग्रामीण परिवेशक सजीव चित्रण- ई सभ मैथिली लोक-साहित्यसँ आयल अछि। विद्यापतिक पदावलीमे जेना श्रृंगार आ भक्तिक मिश्रण अछि, तेना एहि कथासभमे सामाजिक यथार्थ आ मानवीय करुणाक मिश्रण अछि। खण्ड ४ : पाश्चात्य समीक्षाशास्त्रक परिप्रेक्ष्यमे भारतीय आ पाश्चात्य समीक्षाशास्त्रक आलोक मे अध्ययन मैथिली कथाक एहि त्रयी केँ 'रस', 'ध्वनि' आ 'वक्रोक्ति' सन भारतीय सिद्धान्त आ 'मार्क्सवाद', 'विखण्डनवाद' आ 'अस्तित्ववाद' सन पाश्चात्य सिद्धान्तक कसौटी पर रगरला सँ ओइमे समाहित दार्शनिक गम्भीरता स्पष्ट होइत अछि। पाश्चात्य समीक्षाशास्त्र: मार्क्सवाद आ विखण्डनवाद पाश्चात्य समीक्षाशास्त्र मे 'मार्क्सवाद' वर्ग संघर्ष केर व्याख्या करैत अछि। 'इन्द्रधनुष' मे दलित टोलक लोक आ गामक मालिक वर्गक बीचक संघर्ष मार्क्सवादी 'सर्वहारा' आ 'बुर्जुआ' केर द्वन्द्व थिक। 'विखण्डनवाद' (Deconstruction) केर दृष्टि सँ देखल जाय तँ 'प्रतिलोम' कथा 'मालिक-चाकर' केर स्थापित बाइनरी (Binary) केँ तोडैत अछि । 'अस्तित्ववाद' (Existentialism) केर प्रभाव 'कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो' मे देखल जा सकैत अछि, जतय कैला अपन अस्तित्वक हेतु संघर्ष करैत अछि मुदा व्यवस्था ओकरा वस्तु (Object) बना दैत अछि। ४.१ मार्क्सवादी समीक्षाशास्त्र ग्राम्शीक 'सांस्कृतिक आधिपत्य' (Cultural Hegemony)क सिद्धान्तक आधारपर इन्द्रधनुषक व्याख्या बड़ स्पष्ट होइत अछि। गाममे काशी चौधरी खाली आर्थिक रूपसँ सर्वशक्तिमान नहि, बल्कि सांस्कृतिक रूपसँ सेहो शक्तिमान छथि। हुनकर दरबज्जापर सभा होइत अछि, हुनकर आशीर्वाद लेल जाइत अछि, हुनकर शब्दक 'वैधता' मानल जाइत अछि। ई सांस्कृतिक आधिपत्य थिक। लुकाचक 'यथार्थवाद' (Realism) क दृष्टिसँ तीनू कथामे सामाजिक यथार्थताक चित्रण अत्यन्त विश्वसनीय आ ऐतिहासिक रूपसँ ठोस अछि। ब्राह्मण-मालिकक दरबज्जा, खेतिहर मजदूरक टोल, पंजाबसँ घुरल युवाक असहायता- ई सभ '१९८०-१९९०'क मिथिलाक ऐतिहासिक यथार्थक साहित्यिक अभिव्यक्ति अछि। ४.२ उत्तर-औपनिवेशिक समीक्षाशास्त्र फ्रांज फाननक विचारक आलोकमे 'The Wretched of the Earth' कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियोमे एकटा 'उपनिवेशित मन' (Colonized Mind) क चित्रण अछि। कैला पंजाब जाइत अछि किन्तु अपन समुदायसँ टूटि नहि जाइत अछि। ओ रेडियो आनैत अछि, एकटा 'आधुनिकताक' वस्तु- किन्तु ओकर सामाजिक स्थिति नहि बदलैत अछि। गायत्री स्पीवाकक “कात-करोटक शक्तिहीन समूह” 'Subaltern'क अवधारणासँ तीनू कथामे 'सबाल्टर्न' बोली अछि। प्रतिलोममे अर्जुनक माय (गामवाली), इन्द्रधनुषमे धनुकटोलीक स्त्री सभ, कैलास मंडलमे कैलाक माय- ई सभ 'सबाल्टर्न' छथि जनिकर आवाज प्राय: मुख्यधारामे नहि सुनाइत अछि। किन्तु ई कथाकार सभ हुनका सभकेँ स्वर दैत छथि- ओना स्पीवाकक प्रश्न अखनो वैध अछि- की शोषित वर्गक लोक अपन आवाज उठा सकैत अछि?'Can the Subaltern Speak ?' ४.३ संरचनावाद आ उत्तर-संरचनावाद सोसुरक भाषा-विज्ञानक आधारपर तीनू कथामे 'मालिक' आ 'मजदूर', 'पण्डित' आ 'शूद्र', 'हवेली' आ 'टोल'- ई सभ द्विआधारी विरोध (Binary Oppositions) अछि जाहिपर सम्पूर्ण कथा-संरचना निर्भर करैत अछि। देरिदाक विखण्डनवाद'Deconstruction'क दृष्टिसँ प्रतिलोमक शीर्षक अपन पारम्परिक द्विआधारी विरोधकेँ विघटित करैत अछि। 'उच्च' आ 'नीच'- ई विरोध अर्थहीन अछि जखन 'उच्च' लोक नैतिक रूपसँ 'नीच' व्यवहार करैत अछि। ४.४ स्त्रीवादी समीक्षाशास्त्र सिमोन द बोउआरक "दोसर लिंग" 'The Second Sex'क आलोकमे तीनू कथामे स्त्री-पात्र बड़ महत्त्वपूर्ण किन्तु दोसर स्थानमे अछि। प्रतिलोममे गामवाली आ मंजू बुच्ची दुनू स्त्री अपन-अपन स्थानपर पितृसत्तात्मक प्रतिबन्धमे जीवन बितबैत अछि। कैलास मंडलमे कैलाक माय सबसँ अधिक धैर्यवान आ नैतिक रूपसँ दृढ़ अछि, किन्तु ओकर एजेन्सी सीमित अछि। इन्द्रधनुषमे स्त्री-पात्रक लगभग अनुपस्थिति सेहो एकटा आलोचनात्मक प्रश्न उठबैत अछि- की जनसंघर्षक आख्यानमे स्त्रीकेँ स्वाभाविक रूपसँ बाहर राखल जाइत अछि ? ४.५ नव-इतिहासवाद स्टीफेन ग्रीनब्लाटक नव-इतिहासवाद साहित्यकेँ ऐतिहासिक प्रक्रियाक भीतर राखि देखैत अछि। इन्द्रधनुष नवम्बर १९८३मे लिखल गेल, ई काल भारतीय राजनीतिमे उथल-पुथलक काल छल। बिहार आन्दोलन, नक्सलवाद, इन्दिरा गाँधीक अन्तिम काल, एहि सन्दर्भमे इन्द्रधनुषक जनसंघर्षाख्यान एकटा विशिष्ट ऐतिहासिक क्षणक उत्पाद अछि। कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो १९९०मे लिखल गेल- जखन पंजाबमे खालिस्तान आन्दोलन, मण्डल आयोगक विवाद, आ आर्थिक उदारीकरणक प्रारम्भ भ' रहल छल। एहि समयमे कैलाक पंजाब-यात्रा आ रेडियोक प्रतीक एकटा ठोस ऐतिहासिक सन्दर्भ रखैत अछि। खण्ड ५ : गंगेशोपाध्यायक नव्य न्यायक परिप्रेक्ष्यमे ५.१ नव्य न्यायक सामान्य परिचय गंगेशोपाध्यायक 'तत्त्वचिन्तामणि' (१३वीं शताब्दी) मिथिलाक सर्वाधिक प्रभावशाली दार्शनिक ग्रन्थ अछि। ई न्याय-दर्शनकेँ एकटा कठोर तार्किक आधार प्रदान करैत अछि। नव्य न्यायक चारि प्रमुख उपकरण अछि- (१) प्रत्यक्ष- प्रत्यक्ष अनुभवसँ ज्ञान (२) अनुमान- व्याप्ति (vyāpti) अर्थात् सार्वत्रिक सम्बन्धसँ निष्कर्ष (३) उपमान- तुलनासँ ज्ञान (४) शाब्द- विश्वसनीय वक्ताक वचनसँ ज्ञान ५.२ प्रत्यक्ष प्रमाणक रूपमे साहित्यिक साक्ष्य नव्य न्यायक 'प्रत्यक्ष' (Direct Perception) ज्ञानक उपकरण साहित्यिक समीक्षामे एहि रूपमे लागू होइत अछि- कथाकार जे देखलक, अनुभव कयलक, से ओ 'प्रत्यक्ष प्रमाण'क रूपमे प्रस्तुत करैत अछि। इन्द्रधनुषमे 'एहि गाममे लाठियो कखरो घरमे छैक।'- ई एकटा प्रत्यक्ष सामाजिक साक्ष्य थिक। प्रतिलोममे श्राद्धक भोजमे पाइन-पीबाक क्रम, अर्जुनक आँखिसँ देखल प्रत्येक दृश्य- ई सभ नव्य न्यायक 'निर्विकल्पक प्रत्यक्ष' (Indeterminate Perception)सँ 'सविकल्पक प्रत्यक्ष' (Determinate Perception) तक विकासक कथानक अछि। ५.३ अनुमान प्रमाण आ व्याप्ति-सम्बन्ध नव्य न्यायमे अनुमानक सर्वाधिक महत्त्व अछि। व्याप्ति (Universal Concomitance)- 'जतय धुआँ, ततय आगि' एहि तर्कपद्धतिक आधार थिक। इन्द्रधनुष एहि व्याप्ति-सम्बन्धकेँ सामाजिक स्तरपर स्थापित करैत अछि, 'जतय सामन्ती व्यवस्था छैक, ततय शोषण छैक।' ई व्याप्ति कथाक प्रत्येक प्रसङ्गमे सिद्ध होइत अछि, पंचायत फण्डक लूटि, बाट-घाटक बेइमानी, खेतिहरकेँ न्यूनतम मजदूरीसँ वञ्चित करब। प्रतिलोममे व्याप्ति अछि- 'जतय ब्राह्मणवादी आडम्बर, ततय मानव-अवमानना।' बूढ़ा मालिक, कपिलेश्वर झा, आ अन्य पात्र एहि व्याप्तिकेँ 'पक्ष' (Subject), 'साध्य' (Predicate), आ 'हेतु' (Reason)क नव्य न्यायिक त्रिकोणमे सिद्ध करैत अछि। ५.४ 'उपाधि' (Condition) आ समाजिक न्याय नव्य न्यायमे 'उपाधि' (Condition/Qualifier) एकटा महत्त्वपूर्ण अवधारणा थिक जे व्याप्तिकेँ सीमित वा परिष्कृत करैत अछि। कैलास मंडलक कथामे जँ देखी तँ 'जाति' एकटा 'उपाधि' थिक जे शोषणक व्याप्तिकेँ परिभाषित करैत अछि। एहि दार्शनिक विश्लेषणसँ एकटा महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकलैत अछि, तीनू कथामे सामाजिक यथार्थ एकटा तार्किक व्यवस्थाक रूपमे उपस्थित अछि, जे संरचनात्मक रूपसँ निर्धारित अछि। ई नव्य न्यायक 'ज्ञातता' (Knownness) आ 'अज्ञातता'क तर्कशास्त्रकेँ साहित्यिक धरातलपर प्रतिबिम्बित करैत अछि। ५.५ शाब्द प्रमाण आ लोक-साक्ष्य 'शाब्द प्रमाण' (Testimony) विश्वसनीय आप्त (Authority)क वचनसँ ज्ञान एहि कथासभमे 'लोक'क आवाज अछि। इन्द्रधनुषमे अनिल जे सभाक वक्ता अछि, ओकर वचन सभाक लेल 'आप्त वचन' बनि जाइत अछि। प्रतिलोममे प्रदीपक प्रश्नोत्तर, ई शाब्द प्रमाणक एकटा नव्य न्यायिक संवाद थिक। गंगेशक नव्य न्याय आ कथात्मक विश्लेषण मिथिलाक गौरव गंगेश उपाध्याय केर 'नव्य न्याय' मात्र एकटा दर्शन नहि, अपितु तर्कक एकटा सूक्ष्म औजार अछि जेकर प्रयोग साहित्यक विश्लेषण मे कएल जा सकैत अछि । नव्य न्याय मे 'प्रमाण मीमांसा' केर अन्तर्गत प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान आ शब्द प्रमाणक चर्चा भेल अछि । प्रत्यक्ष आ आभास केर द्वन्द्व गंगेशक अनुसार 'प्रत्यक्ष' ओ अछि जे इन्द्रिय सँ प्राप्त होइत अछि । 'इन्द्रधनुष' मे कथाक नायक जखन गाम अबैत अछि, तँ ओकरा गामक 'प्रत्यक्ष' स्वरूप मे एकटा 'भ्रान्ति' देखाइत छैक। ओकरा लगैत छैक जे गाम ओहिना अछि, मुदा ओकर 'आभास' (Pseudo-perception) तखने टूटैत अछि जखन ओ बम आ लाठीक गप्प सुनैत अछि। नव्य न्याय केर 'अतिव्याप्ति' दोष एतय देखाइत अछि, जखन गामक परम्परागत शान्तिक परिभाषा आब हिंसाक घेरा मे आबि जाइत अछि । अवच्छेदक आ प्रतियोगिता: कैलासक रेडियो नव्य न्याय मे 'अवच्छेदक' (Limitor) आ 'प्रतियोगिता' (Counter-positiveness) केर अवधारणा सूक्ष्म अछि । 'कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो' मे 'रेडियो' कैलासक हेतु 'आधुनिकता' केर अवच्छेदक अछि। मुदा बौआ झाक हेतु ई रेडियो कैलासक 'ऋण' केर प्रतियोगिताक आधार अछि । जखन कैला रेडियो केँ पेना सँ तोड़ैत अछि, तखन ओ 'अभाव' (Absence) क स्थापना करैत अछि- रेडियोक अभाव अर्थात् ओहि समस्त अपमान आ ऋणक प्रतीकात्मक अन्त। अनुमान आ व्याप्ति: 'प्रतिलोम' क तर्क 'प्रतिलोम' कथा मे अर्जुन केर तर्क 'अनुमान' (Inference) केर प्रक्रिया सँ जुडल अछि। ओ बउआ सन देखाय चाहैत अछि, किएक तँ ओकर 'व्याप्ति' (Universal Concomitance) ई अछि जे जकर ठोर लाल होइत अछि, जे स्वच्छ होइत अछि, वएह 'मालिक' होइत अछि। मुदा समाजक क्रूर 'उपाधि' (Limiting condition) ओकरा पुनः खबासक श्रेणी मे राखि दैत अछि। खण्ड ६ : विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्कक परिप्रेक्ष्यमे ६.१ विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क : परिचय मिथिलाक इतिहास-दर्शनमे 'विदेह समानान्तर इतिहास' एकटा अभिनव आलोचनात्मक उपकरण थिक। ई फ्रेमवर्क एहि मान्यतापर आधारित अछि जे मिथिलाक इतिहास राज्य, शासन, आ मुख्यधाराक ऐतिहासिक आख्यानसँ अलग एकटा समानान्तर इतिहास रखैत अछि जाहिमे लोक-स्मृति, दलित अनुभव, स्त्री-आख्यान, आ उपेक्षित समुदायक सत्य सुरक्षित अछि। 'विदेह' (जनकपुर-मिथिलाक प्राचीन नाम) शब्दमे एकटा 'देहातीत' (Beyond the Body / Beyond the Physical) अर्थ सेहो अछि, ई समानान्तर इतिहास ओहि सत्यकेँ सुरक्षित रखैत अछि जे सरकारी दस्तावेजमे, राजकीय इतिहासमे दर्ज नहि भेल। विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क: एकटा नव विमर्श गजेन्द्र ठाकुर द्वारा प्रवर्तित 'विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क' मैथिली साहित्यक स्थापित इतिहास केँ चुनौती दैत एकटा 'समानान्तर' विमर्शक स्थापना करैत अछि । ई फ्रेमवर्क मुख्य रूप सँ ओहि आवाज सभ केँ स्थान दैत अछि जेकरा दरभंगा राज वा अन्य संस्थागत ढाँचा मे उपेक्षित कएल गेल छल । वंचितक इतिहास (सबल्टर्न हिस्ट्री) आ मैथिली कथा 'विदेह' फ्रेमवर्क केर अनुसार, मिथिलाक वास्तविक इतिहास ओ नहि अछि जे राजदरबारक वर्णन मे अछि, अपितु ओ अछि जे 'नाराशंसी' (लोक-चरित्र) मे सुरक्षित अछि। अशोकक 'इन्द्रधनुष', गामक ओहि दलित टोलक इतिहास केँ चित्रित करैत अछि जे राजनीतिक इन्द्रधनुष क नीचाँ दबल अछि। 'प्रतिलोम' मे खबास कुलक खाढ़ीक वर्णन (मंशी मड़र सँ अर्जुन धरि) ओही 'समानान्तर इतिहास' केर अंग अछि जे मुख्य इतिहासक धारा सँ दूर रहल अछि। विदेह फ्रेमवर्कक मुख्य स्थापना आ कथात्मक प्रयोग १. कैनन केर विखण्डन: स्थापित साहित्यिक मानदण्ड केँ चुनौती देनाइ2। 'कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो' मे एकटा दलित पात्रक संघर्ष केँ केन्द्र मे राखब एहि फ्रेमवर्कक सफलता अछि। २. भाषाई स्वाधीनता: विदेह फ्रेमवर्क मे 'मैथिली' केर ओहि रूप केँ महत्व देल जाइत अछि जे जनसाधारण मे व्याप्त अछि6। एहि तीनू कथा मे गामक भाषा, मुहावरा आ 'गाएइ' केर प्रयोग साहित्यक लोकतंत्रीकरण करैत अछि। ३. दस्तावेजी यथार्थ: विदेह फ्रेमवर्क कथा केँ एकटा 'सामाजिक दस्तावेज' मानैत अछि। 'इन्द्रधनुष' १९८३ केर गामक राजनीतिक आ सामाजिक स्थिति केर एकटा गम्भीर दस्तावेज थिक। फ्रेमवर्क केर अंग कथा मे अभिव्यक्ति प्रभाव सबल्टर्न चेतना सुट्टा आ मुनराक विद्रोह परम्परागत सत्ताक ह्रास लोक-इतिहास खबास वंशावलीक चर्चा वंचित वर्गक इतिहासक पुनर्प्राप्ति यथार्थवादी चित्रण गामक बम-बारी आ हिंसा रोमानी मिथिलाक मिथकक अन्त दार्शनिक विश्लेषण नव्य न्याय केर तार्किक प्रयोग साहित्यक बौद्धिक गम्भीरता मे वृद्धि कथात्मक पात्र विश्लेषण आ सामाजिक संरचना एहि तीनू कथा मे पात्र सभक चयन आ हुनकर आचरण समाजक बदलैत मूल्य सभ केँ दर्शाबैत अछि। 'इन्द्रधनुष' क पात्र: संघर्ष आ भ्रम अनिल: मध्यमवर्गीय युवा, जे गामक परिवर्तन सँ डरायल अछि मुदा संघर्षक हेतु तैयार अछि। सुट्टा: दलित विद्रोहक प्रतीक, जे आब झुकबा लेल तैयार नहि अछि । सतीनाथ झा: राजनीतिक 'अवतरण' केर प्रतीक, जे दलित जागरण केँ अपन वोटक हेतु प्रयोग करैत अछि। 'प्रतिलोम' क पात्र: दासता सँ विद्रोह धरि अर्जुन: एकटा १४ वर्षक छौड़ा, जे खबास परम्परा मे जन्म लेलक अछि मुदा जकर भीतर अपन अस्मिताप्रेम अछि। गामवाली (अर्जुनक माय): परम्परागत विवशताक प्रतीक, जे गरीबीक कारण हवेली सँ जुडल रहबा लेल विवश अछि। जबहिरा: ओहि दलित युवा वर्गक प्रतिनिधित्व करैत अछि जे आब मालिक केँ 'जीह पकड़ि कऽ' चुनौती दैत अछि। 'फिलिप्स रेडियो' क पात्र: आधुनिकताक बलि कैलास (कैला): एकटा आशावादी युवा, जे बाहक दुनिया देखि कऽ आएल अछि मुदा गामक सामन्ती पेंच मे फँसि जाइत अछि। बौआ झा: सामन्ती शोषणक क्रूर चेहरा, जे मधुर वाणी सँ शोषण करैत अछि। सुरीन्दर आ गजीन्दर: सामन्ती शक्तिक 'लठैत' आ षड्यंत्रकारी, जे 'दोस्ती' केर आवरण मे शोषण करैत अछि। मैथिली कथाक भाषिक आ शिल्पगत सौन्दर्य मैथिलीक एहि कथा सभ मे शिल्प आ भाषा मात्र सम्प्रेषणक माध्यम नहि, अपितु स्वयं मे एकटा विमर्श अछि। इन्द्रधनुष केर भाषा: प्रभास कुमार चौधरी एतय वर्णनात्मक शिल्प केर प्रयोग करैत छथि। "बम तक आबि गेल छैक"सन छोट वाक्य गामक तनाव केँ सघन बना दैत अछि। प्रतिलोम केर भाषा: अशोक एतय मनोवैज्ञानिक शिल्प केर प्रयोग करैत छथि। "ठोर लाल भऽ गेलैए... बउआ सन भेलै की नहि?" अर्जुनक ई सोच ओकर आन्तरिक हीनभावना आ ओकरा सँ निकलबाक इच्छा केँ व्यक्त करैत अछि। फिलिप्स रेडियो केर भाषा: एतय भाषा मे व्यंग्य आ विडम्बना (Irony) केर प्रचुरता अछि। रेडियो पर 'आजादीक गीत' आ कैला केर 'हरबाही'- ई विरोधाभास मैथिली कथाक शिल्पगत ऊँचाई केँ प्रदर्शित करैत अछि। सांख्यिकीय सन्दर्भ आ ऐतिहासिक कालखण्ड मैथिली कथाक विकास क्रम मे एहि कथा सभक समय महत्वपूर्ण अछि। 'इन्द्रधनुष' १९८३ केर कालखण्डक अछि, जखन बिहारक ग्रामीण राजनीति मे हिंसा आ जातीय ध्रुवीकरण बढ़ि रहल छल। 'कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो' १९९० केर कथा अछि, जखन भूमण्डलीकरण आ बाहक दुनिया सँ सम्पर्क गामक आर्थिक ढाँचा केँ बदलि रहल छल। कथा प्रकाशन/पठन काल भौगोलिक परिवेश सामाजिक समस्या इन्द्रधनुष नवम्बर १९८३ ग्रामीण मिथिला जातीय हिंसा, वोट बैंक राजनीति प्रतिलोम आधुनिक काल हवेली आ दलित टोल खबास परम्परा, अस्मिता संघर्ष फिलिप्स रेडियो जुलाई १९९० पंजाब सँ गाम धरि ऋणक जाल, आधुनिकताक विद्रूपता ६.२ मिथिलाक ऐतिहासिक सन्दर्भ मिथिलाक इतिहासमे तीन स्तर अछि- (क) राजनीतिक इतिहास- राजा, जमींदार, सामन्त; (ख) सांस्कृतिक इतिहास- विद्यापति, गंगेश, लोकगाथा नायक; आ (ग) सामाजिक इतिहास- जाति-व्यवस्था, भूमि-सम्बन्ध, मिथिला-ब्राह्मणवाद। एहि तीनू स्तरपर साहित्य सेहो तीन प्रकारें लिखल गेल। विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क प्रश्न करैत अछि- मैथिली साहित्यमे 'चारिम आयाम' कतय अछि ? अर्थात् ओ इतिहास जे मुसहर, धानुक, यादव, कुर्मी, ततमा, दुसाध (दूधवंशी), अमात्य, एहि समुदायसभकेँ केन्द्रमे राखि लिखल गेल हो ? ६.३ इन्द्रधनुष आ मिथिलाक कृषि-इतिहास इन्द्रधनुषकेँ विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्कसँ पढ़ी तखन ई कथा केवल एकटा कथा नहि, वरन् १९७०-८० क दशकमे मिथिलाक भूमि-आन्दोलनक एकटा साहित्यिक अभिलेख बनि जाइत अछि। मिथिलामे भूमि-सुधार आन्दोलन, 'जोतहा जमीन जोतहाक' नारा, आ नक्सल प्रभावक समय- एहि कालखण्डमे 'इन्द्रधनुष' लिखल गेल। कथाक 'काशी चौधरी' एकटा साहित्यिक चरित्र मात्र नहि, वरन् ओ मिथिलाक तत्कालीन सामन्ती व्यवस्थाक ऐतिहासिक प्रतिनिधित्व करैत अछि। विदेह फ्रेमवर्कमे ई कथा मिथिलाक 'समानान्तर इतिहास'क एकटा अध्याय थिक- जे सरकारी गजेटियरमे दर्ज नहि, किन्तु लोक-स्मृतिमे जीवित अछि। ६.४ प्रतिलोम आ मिथिला-ब्राह्मणवादक इतिहास मिथिलामे ब्राह्मणवादक इतिहास बड़ पुरान आ जटिल अछि। मिथिला-ब्राह्मण पञ्जी (कुलपंजी) व्यवस्था- जे विवाह-सम्बन्धकेँ जातिक आधारपर नियन्त्रित करैत अछि- ई सम्भवत: विश्वमे सबसँ जटिल जातीय नौकरशाही थिक। प्रतिलोममे पं. गणेश्वर झाक श्राद्ध समारोह- ई वस्तुत: एहि ऐतिहासिक ब्राह्मणवादी व्यवस्थाक 'लाइव डॉक्यूमेन्टेशन' थिक। लूटन मड़र, थोलाइ मड़र, रौदी मड़र- ई सभ पात्र मिथिलाक तत्कालीन खानदानी संरचनाक प्रतिनिधि छथि। विदेह समानान्तर इतिहास दृष्टिसँ अर्जुनक प्रतिरोध मिथिलाक भीतरी सुधारवादी आन्दोलनक साहित्यिक प्रतिध्वनि अछि। चाहे ओ मिथिला विद्यापीठक प्रगतिशील आन्दोलन होउ, वा सामाजिक न्यायक लेल लड़ैत संगठन ई सभ इतिहासमे दर्ज कमे अछि, किन्तु प्रतिलोम जेका कथामे सुरक्षित अछि। ६.५ कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो : प्रवासी मजदूरक इतिहास मिथिलाक आधुनिक इतिहासक एकटा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अध्याय अछि प्रवासी श्रमिकक इतिहास। बिहार-मिथिलासँ लाखक लाख लोक पंजाब, दिल्ली, मुम्बई गेल। एहि आन्तरिक प्रवासक इतिहास मुख्यधाराक इतिहास-लेखनमे प्राय: अनुपस्थित अछि। कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो- ई कथा एहि समानान्तर इतिहासक एकटा अमूल्य दस्तावेज थिक। कैला पंजाब गेल, ओतय 'भग्गू मल्लाह'क संग काज कयलक, पाइ कमयलक, रेडियो किनलक- ई एकटा व्यक्तिगत कथा नहि, वरन् मिथिलाक प्रवासी मजदूरक सामूहिक अनुभवक प्रतीक थिक। विदेह फ्रेमवर्कमे ई कथा 'मिथिलाक प्रवासी श्रमिकक समानान्तर इतिहास'क एकटा अध्याय थिक जे ने सरकारी आँकड़ामे, ने शैक्षणिक शोध-पत्रमे, वरन् खाली साहित्यमे जीवित अछि। खण्ड ७ : तुलनात्मक विश्लेषण आ संश्लेषण ७.१ तीनू कथाक परस्पर सम्बन्ध तीनू कथामे एकटा गहींर परस्पर सम्बन्ध अछि- ई सभ मिथिलाक एकहि समाजक तीन भिन्न-भिन्न आयामकेँ प्रस्तुत करैत अछि। इन्द्रधनुष- राजनीतिक आयाम : जनसंघर्ष, संगठन, सामन्त-विरोध। प्रतिलोम- धार्मिक-सांस्कृतिक आयाम : श्राद्ध, जाति-पूजा, परम्पराक आडम्बर। कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो- आर्थिक-व्यक्तिगत आयाम : प्रवास, आकांक्षा, जातीय शोषण। तीनू मिलिकेँ मिथिलाक समकालीन जीवनक एकटा त्रिआयामी चित्र प्रस्तुत करैत अछि। ७.२ शैली आ भाषाक विविधता तीनू कथाक भाषा-शैली भिन्न अछि। इन्द्रधनुषमे बोलचालक मैथिली, समूह-संवाद, नारेबाजी- ई 'जनभाषा'क प्रयोग अछि। प्रतिलोममे अपेक्षाकृत साहित्यिक, संस्कृत-प्रभावित मैथिली जे ब्राह्मण पात्रसभक भाषा-व्यवहारकेँ सेहो दर्शाबैत अछि। कैलास मंडलमे मैथिली आ हिन्दीक मिश्रण, जे शहरी-ग्रामीण सम्पर्कक भाषाई यथार्थ थिक। ७.३ पाँचू फ्रेमवर्कक संश्लेषण ई पाँचू फ्रेमवर्क सभ एकहि सत्यक पाँच दिशासँ दर्शन करैत अछि। दलित समीक्षाशास्त्र कहैत अछि- जातीय उत्पीड़न प्राथमिक अछि। भारतीय समीक्षाशास्त्र कहैत अछि- रस, ध्वनि, अलङ्कारसँ एहि कथाक काव्य-सौन्दर्य निर्मित अछि। पाश्चात्य समीक्षाशास्त्र कहैत अछि- वर्ग, जाति, लिङ्ग, इतिहास सभ एक-दोसरमे गाँथल अछि। नव्य न्याय कहैत अछि- तर्कपूर्वक सिद्ध करू जे शोषण एकटा व्यवस्थागत सत्य थिक, मनमानी नहि। विदेह फ्रेमवर्क कहैत अछिमिथिलाक अपन विशिष्ट इतिहास अछि जे एहि साहित्यमे सुरक्षित अछि। समीक्षात्मक दृष्टिकोण मुख्य सिद्धान्त कथा मे प्रयोग भारतीय समीक्षाशास्त्र रस, ध्वनि, औचित्य सामन्ती विडम्बना आ करुणाक चित्रण पाश्चात्य समीक्षाशास्त्र मार्क्सवाद, विखण्डनवाद वर्ग संघर्ष आ स्थापित सत्ताक विखण्डन दलित समीक्षाशास्त्र स्वानुभूति, प्रतिरोध खबास परम्पराक विरोध आ अस्मिता रक्षा नव्य न्याय प्रत्यक्ष, अनुमान, अवच्छेदक सामाजिक तर्क आ प्रपञ्चक उद्घाटन उपसंहार इन्द्रधनुष, प्रतिलोम, आ कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो- ई तीनू कथा मैथिली साहित्यक ओ सुसोनहुल कड़ी थिक जे एकक्षणमे 'साहित्य'सँ उठि कऽ 'इतिहास' बनि जाइत अछि, 'इतिहास'सँ उठि कऽ 'दर्शन' बनि जाइत अछि। पाँचू समीक्षात्मक फ्रेमवर्कसँ जाँचि कऽ देखी तखन स्पष्ट होइत अछि- (१) एहि कथासभमे मानव गरिमाक प्रश्न सर्वोपरि अछि- चाहे ओ दलित हो, स्त्री हो, वा निम्नवर्गीय मजदूर। (२) मिथिलाक विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश एहि कथासभकेँ सार्वभौमिक बनबैत अछि, ई कथा केवल मिथिलाक नहि, भारतीय समाजक ओइ सभ कोणक कथा थिक जतय जाति-वर्ग-लिङ्गक त्रिकोणमे मनुष्य पिसाइत अछि। (३) साहित्यिक उत्कृष्टता आ सामाजिक प्रतिबद्धताक बीच एहि कथासभक सेतु अछि- —ई 'कला कलाक लेल' 'Art for Art's Sake' नहि वरन् 'कला जीवनक लेल' 'Art for Life's Sake' थिक। (४) विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्कक दृष्टिसँ ई तीनू कथा मिथिलाक ओ इतिहास लिखैत अछि जे आधिकारिक इतिहास-लेखन लिखबामे असमर्थ रहल। अन्तमे, गंगेशोपाध्यायक नव्य न्यायमे एकटा अवधारणा अछि 'सिद्धि' (Accomplishment through valid knowledge)। एहि तीनू कथाक पठन-मनन-विश्लेषणसँ जे 'सिद्धि' प्राप्त होइत अछि, ओ थिक- जाति, वर्ग, आ मानव-अवमानना एकटा तार्किक, ऐतिहासिक, आ नैतिक रूपसँ अन्यायपूर्ण व्यवस्था थिक आ साहित्य एकर विरुद्ध सबसँ सशक्त प्रतिरोध थिक। निष्कर्ष: मैथिली कथाक भविष्य आ समानान्तर धारा प्रभास कुमार चौधरी, अशोक आ रमेशक ई कथा सभ मैथिली साहित्य केँ 'अभिजात्य' घेरा सँ बाहर निकलि कऽ 'लोक' केर यथार्थ धरि लऽ जाइत अछि। 'इन्द्रधनुष' केर राजनीतिक यथार्थ, 'प्रतिलोम' केर अस्मिता संघर्ष आ 'फिलिप्स रेडियो' केर आर्थिक विडम्बना- ई तीनू मिलि कऽ मिथिलाक एकटा 'समानान्तर इतिहास' केर निर्माण करैत अछि। गंगेश उपाध्याय केर नव्य न्याय केर तर्क पद्धति सँ जखन एहि कथा सभक विश्लेषण कएल जाइत अछि, तखन साहित्य मात्र भावुकताक विषय नहि रहि जाइत अछि, अपितु ओ एकटा 'बौद्धिक विमर्श' बनि जाइत अछि। 'विदेह फ्रेमवर्क' एहि विमर्श केँ एकटा व्यवस्थित आधार प्रदान करैत अछि, जतय दलित विमर्श, वर्गीय चेतना आ आधुनिकताक द्वन्द्व एक संग समाहित अछि। मैथिली कथाक ई विकास यात्रा भविष्य मे ओहि 'इन्द्रधनुष' (पनिसोखा) केर खोज मे अछि जकर रंग उड़ि नहि जाय आ जतय सभ 'कैला' आ 'अर्जुन' केँ अपन 'फिलिप्स रेडियो' आ 'अस्मिता' बचेबाक पूर्ण अधिकार भेटय। एहि कथा सभक माध्यम सँ मैथिली साहित्य आब वैश्विक स्तरक 'सबल्टर्न' विमर्श केर संग डेग सँ डेग मिला कऽ चलि रहल अछि। सन्दर्भ-ग्रन्थ भारतीय ग्रन्थ भरत मुनि- नाट्यशास्त्र आनन्दवर्धन- ध्वन्यालोक कुन्तक- वक्रोक्तिजीवित गंगेशोपाध्याय- तत्त्वचिन्तामणि अम्बेडकर, डॉ. बी.आर.- जाति का विनाश अम्बेडकर, डॉ. बी.आर.- Annihilation of Caste पाश्चात्य ग्रन्थ— Marx, Karl- Capital (Vol. I) Gramsci, Antonio- Prison Notebooks Lukács, Georg- The Historical Novel Fanon, Frantz- The Wretched of the Earth Spivak, Gayatri- Can the Subaltern Speak? de Beauvoir, Simone- The Second Sex Derrida, Jacques- Of Grammatology Saussure, Ferdinand de- Course in General Linguistics Greenblatt, Stephen- Renaissance Self-Fashioning २ अनुलग्नक: ज्योत्स्ना फणिजा- कतिपय मैथिली कथा मे जातीय संघर्षक अन्वेषण [प्रभास कुमार चौधरीक “इन्द्रधनुष” “द रेनबो”, अशोक कुमार झाक “प्रतिलोम” “एंटीकरेंट” आ रमेश झाक “कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो”- कन्टेम्परेरी मैथिली शॉर्ट स्टोरीज (Contemporary Maithili Short Stories)। संपादक: ठाकुर, मुरारी मधुसूदन। नई दिल्ली: साहित्य अकादमी, २००५] (म्यूज इण्डिया नवम्बर- दिसम्बर २०१९, अंक ८८) ज्योत्स्ना फणिजा आंध्र प्रदेशक काईकलूर नामक शांत गामक डॉ. ज्योत्स्ना फणिजा, परिस्थिति द्वारा थोपल गेल मौन पर लिखित शब्दक शक्तिक एकटा गहीर प्रमाण छथि। ओ दिल्ली विश्वविद्यालयक एआरएसडी कॉलेजमे अंग्रेजीक सहायक प्रोफेसर छथि। ओ २०१६ मे मात्र २५ वर्षक अल्पायुमे अंग्रेजी आ विदेशी भाषा विश्वविद्यालय (EFLU), हैदराबाद सँ पीएचडीक उपाधि प्राप्त कएलनि। डॉ. फणिजाक कार्य कात-करोट मे रहि रहल समाजक सूक्ष्म अन्वेषण थिक। हुनकर शोध उत्तर-औपनिवेशिक साहित्यक हिलकोरक बीच अपन रास्ता बनबैत अछि, विशेष रूप सँ लिंग आ "उन्माद" (madness) क अंतर्संबंधक पड़ताल करैत अछि, जकरा ओ कोनो चिकित्सीय कमीक रूपमे नहि, वरन् प्रतिरोधक एकटा विद्रोही रूपक रूपमे देखैत छथि। पुनरुत्थानक ई स्वर हुनकर विविध साहित्यिक पोर्टफोलियोमे अछि: कविता आ अनुवाद: अपन पहिल कविता संग्रह सिरेमिक इवनिंग (२०१६) सँ ल' क' क्रिमसन लैंप (२०१५) आ स्टोन्ड सॉन्ग (२०१९) मे तेलुगु कविताक सूक्ष्म अनुवाद धरि, ओ भाषाई आ भावनात्मक दूरी कें पाटैत छथि। संपादकीय दृष्टि: निवेदिता एन. क संग ओ द वर्ल्ड आई राइट इन (२०१६) क संपादन कएलनि, जे दृष्टिबाधित लेखकक आवाज कें केंद्रमे राखय बला एकटा महत्वपूर्ण संकलन थिक। बहुआयामी पहुँच: हुनकर रचनात्मक प्रतिभा कथा, शैक्षणिक लेख आ निबंध धरि पसरल अछि, जे प्रायः हुनकर गायन जीवनक फुरसतिक क्षणमे रचल जाइत अछि। ओ ओहि संगमक साक्षात स्वरूप छथि जतय जाति, लिंग आ दिव्यांगताक उपनदी सभ आपसमे मिलैत अछि। डॉ. फणिजाक पहचान एकटा जटिल चौबटिया पर बनल अछि। एहन संसारमे जतय महिला, दृष्टिबाधित आ निम्न जातिक पहचानक मेल सँ प्रायः संसाधनक प्रणालीगत अभाव उत्पन्न होइत अछि, ओतय ओ मात्र सहैत नहि छथि; वरन् मुखर छथि। हुनकर जीवन आ साहित्य चुप रहबाक विरोध करैत अछि जे अपन अंतर्विभागीय वास्तविकताक समस्या सभ कें एकटा साहसी आ काव्यात्मक हुंकारमे बदलि दैत अछि। कतिपय मैथिली कथा मे जातीय संघर्षक अन्वेषण [प्रभास कुमार चौधरीक “इन्द्रधनुष” “द रेनबो”, अशोक कुमार झाक “प्रतिलोम” “एंटीकरेंट” आ रमेश झाक “कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो”- कन्टेम्परेरी मैथिली शॉर्ट स्टोरीज (Contemporary Maithili Short Stories)। संपादक: ठाकुर, मुरारी मधुसूदन। नई दिल्ली: साहित्य अकादमी, २००५] जाति लोक कें विशेषाधिकार प्राप्त आ सुविधाविहीन वर्गमे विभाजित करैत अछि, जे श्रेष्ठता आ हीनताक भेद उत्पन्न करैत अछि। ई दुनू एहन पृथक संसारक निर्माण करैत अछि जे कहियो एक नहि भ' सकैत अछि, आ एकटा पैघ समय सँ ई मानवक सोच-विचारक क्षमता पर शासन क' रहल अछि। साहित्य जातिगत दमनक शिकार भेलाक पीड़ा, जातीय भिन्नता सँ उत्पन्न आतंक आ हिंसा, तथा मानवता कें दुखित करय बला 'जाति रूपी संक्रमण' कें स्वर दैत अछि। अंग्रेजीमे अनूदित किछु मैथिली कथा जातिगत उत्पीड़न कें रूपकात्मक स्वरमे समेटने अछि। ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित ई कथा सभ जातिगत दमनक शिकार भेलाक स्थिति, आ लिंग तथा जातिकें 'दोबड़ उत्पीड़न' क रूपमे चित्रित करैत अछि, जतय काव्यात्मक बिंबक माध्यम सँ पीड़ा आ कष्टक अभिव्यक्ति होइत अछि। ई कथा सभ भौतिक स्थान, आर्थिक, राजनीतिक आ सांस्कृतिक चिंता सभ सँ उत्पन्न जातीय संघर्ष आ अस्तित्वक प्रतीकक रूपमे व्याप्त हिंसा कें रेखांकित करैत अछि। जातिक संबंधमे गप्प करब एकटा जटिल काज थिक, जतय पीड़ा आ कष्ट कें रेखांकित कएनाइ आ वर्तमान असमान समाजक निर्भीकतापूर्वक चित्रण कएनाइ चुनौतीपूर्ण अछि। जेना कि शर्मिला रेगे लिखैत छथि, जातिक विषयमे लिखब कहियो काल राष्ट्रक प्रति विश्वासघातक समान प्रतीत होइत अछि। हुनकर शब्दमे, “उत्तर-औपनिवेशिक कालमे सेहो, जातिक सार्वजनिक आ राजनीतिक अभिव्यक्ति कें एकटा पछुआएल विचारधाराक रूपमे देखल गेल, जे वर्ग संघर्षक गति कें कम करैत अछि आ राष्ट्रक संग गद्दारी सेहो मानल जाइत अछि।” (रेगे ३९)। जातिक विषयमे लिखब भारतीय सभ्यताक न्याय अथवा सद्गुणक भ्रम कें तोड़ब अछि। चयनित कथासभ- प्रभास कुमार चौधरीक “द रेनबो”, अशोक कुमार झाक “एंटीकरेंट” आ रमेश झाक “कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो”- एकटा उच्छृंखल सभ्यता अथवा जातिमे विभाजित समाजक संदर्भमे जातीय संघर्षक अन्वेषण करैत अछि। एहि तीनू कथाक एकटा सझिया दृष्टिकोण अछि- जातिकें वर्गक रूपमे चिन्हब, आ संगे ओहि विचारक लोक कें विभाजित करब जे जातिकें वर्गक बराबर मानैत छथि। उत्तर-औपनिवेशिक स्वरमे, वर्ग आ जाति अदलि-बदलि क' निवासी सभ कें प्रताड़ित क' रहल अछि। ओना कागच पर जातीय भिन्नताक उन्मूलन दर्ज अछि, मुदा वर्ग चेतना जे जातिक उपस्थिति कें बनौने अछि, ओ अखनो पीड़ित लोक कें अपन शिकार बना रहल अछि। ई कथासभ देखबैत अछि जे कोना एकटा विशिष्ट समूहक लोक कें स्वतंत्रता सँ वंचित कएल जाइत अछि, कोना हुनकर बाल्यकाल छीन लेल जाइत अछि, कोना हुनकर आत्म-स्वीकृतिक भावना पर प्रश्न उठाओल जाइत अछि, आ कोना ओ समाजक अन्यायपूर्ण व्यवस्थाक विरुद्ध संघर्ष करबाक लेल प्रयास करैत छथि। १ प्रभास कुमार चौधरीक कथा “द रेनबो” (इंद्रधनुष) क विश्लेषण राजनंद झा द्वारा अनूदित प्रभास कुमार चौधरीक कथा “द रेनबो” जातीय संघर्ष सँ प्रभावित एकटा गामक संपूर्ण रूपांतरणक उदाहरण थिक। ई कथा उच्च जातिक खसैत सामाजिक पहिचान कें रेखांकित करैत अछि, जतय कथावाचक अखन धरि अपन जातीय श्रेष्ठता आ ऊँच-नीचक संस्कार कें बिसरय (unlearning) क प्रक्रियामे अछि। ओ ओहि नव व्यवस्थाक संग तालमेल बनबैत अछि जतय हुनकर 'उच्च' होयब कें चुनौती देल जा रहल अछि। कथावाचक, जे अपन गाम सँ दूर रहैत अछि, अपन माए कें सांत्वना देबाक लेल वापस अबैत अछि। हुनकर माए गाममे असगर छथि आ उच्च आ निम्न जातिक बीच भ' रहल निरंतर झगड़ाक कारण असुरक्षित अनुभव करैत छथि। ई स्थिति गामक ओहि शांति लेल खतरा अछि जे कहियो ओतय विद्यमान छल। यद्यपि कथाक शीर्षक “द रेनबो” (इंद्रधनुष) सौंदर्य आ आनंदक प्रतीक अछि, मुदा वास्तवमे ई सामाजिक अशांति दिस संकेत करैत अछि। कथावाचकक माए कोनो राजनीति नहि जानैत छथि; ओ जातीय स्थितिक प्रति तटस्थ छथि, मुदा गामक भविष्यक खतराक प्रति चिंतित छथि। दोसर दिस, कथावाचक स्वयं कें उच्च जातिक वर्चस्व सँ अलग करबाक लेल तैयार छथि। मुदा अनिल, जे कथावाचकक संबंधी आ उच्च जातिक एकटा प्रमुख युवक अछि, समाजमे समानता कें स्वीकार करबाक लेल तैयार नहि अछि। ओ हिंसाक माध्यम सँ निम्न जातिक लोक कें दबेबाक प्रयास करैत अछि। अनिलक ई दृढ़ विचार अछि जे “वर्गहीन समाज कहियो प्राप्त नहि कएल जा सकैत अछि, ई मात्र एकटा भ्रम अछि।” कि अनिल सत्य कहि रहल अछि? कि वर्गहीन समाज मात्र एकटा कल्पना थिक? कथाक अन्य कारक एहि कठोर वास्तविकता कें पुष्ट करैत अछि। गामक विभाजन- शासक आ शासित, मालिक आ मजदूरक बीच आ प्रत्येक समूह द्वारा अपन आत्म-सम्मान कें सिद्ध करबाक चेष्टा, जातीय संघर्षक अनेक तह कें खोलैत अछि। एहिमे एकटा तेसर समूह सेहो अछि- जे धनीक जमींदार, सूदखोर, आ छद्म समाज सुधारकक थिक, जे अपन स्वार्थ लेल जातीय संघर्षक दुरुपयोग करैत अछि। अंतमे, एकटा चारिम समूह सेहो अछि, जाहिमे दुनू जातिक निर्दोष ग्रामीण छथि जे एहि व्यवस्थाक मारि सहि रहल छथि। ई कथा जातीय संघर्षक ओहि बहुआयामी आ जटिल स्वरूप कें साक्षात करैत अछि जाहिमे मानवता थकुचाइत रहैत अछि। ई कथा ओहि परिवर्तन कें चित्रित करैत अछि जतय उच्च जातिक लोक एहि वास्तविकता कें स्वीकार करबाक लेल संघर्ष क' रहल छथि जे कोनो व्यक्ति कें संपत्तिक समान अपन अधिकारमे नहि राखल जा सकैत अछि। जेना कि कथावाचक मोन पाड़ैत छथि जे एखन ओ ग्रामीण लोकनि द्वारा "मालिक" नहि कहल जा सकैत छथि। ई कथा अपन परिष्कृत रूपमे उच्च आ निम्न जातिक बीचक "स्वामी-दास" संबंधक अंतक घोषणा करैत अछि। एहि चित्रणक समानान्तर, ई कथा धनी लोकक द्वारा ओढ़ल गेल समानताक छद्म आवरणक विषयमे सेहो गप्प करैत अछि। महाकांत झा आ भुट्टा झा जेहन छद्म साम्यवादी मजदूर सभ कें समानताक पाठ पढ़ेबाक प्रयास करैत छथि। ओ मजदूर सभ कें अपन मालिकक विरुद्ध भड़का दैत छथि। हुनकर उद्देश्य गरीबक मदद कएनाइ नहि, वरन् समाज सुधारकक रूपमे पहिचान बना क' चुनाव लड़ब आ लोकक समर्थन प्राप्त करब अछि। हुनकर एहि योजनाक परिणामस्वरूप, मजदूर सभ सरोज भैयाक खेतमे तीन मास धरि काज करब बंद क' दैत छथि। जखन सरोज अपन मजदूर परबोधनक पत्नी कें अपन मजदूरी लेबाक लेल बेर-बेर अपन घर बजबैत छथि, तखन आंदोलन शुरू भ' जाइत अछि। जाति, विभाजनक एकटा अवैज्ञानिक पद्धति थिक जे संपूर्ण समाजक पूर्ण सहभागिता कें रोकैत अछि। एहि कथामे चित्रित गाम राष्ट्रक एकटा लघु रूप थिक, जतय जातिक राजनीतिक संघर्ष व्यक्ति लेल कहियो नहि खत्म होय वाला मनोवैज्ञानिक द्वंद्व उत्पन्न करैत अछि। गामक उच्च जातिक लोक निम्न जातिक "विद्रोही" व्यवहार सँ स्तब्ध छथि। ओ अनुभव करैत छथि जे ओहि सर्वोच्च स्थिति कें जे ओ कहियो उपभोग करैत छलाह, ओ आब मात्र एकटा परिकथा बनि क' रहि जायत। सरोजक विचार अछि जे उच्च जातिक बीच समन्वयक अभावक कारण निम्न जातिक लोक स्वतंत्र भ' गेलाह। हुनकर उच्च जातीय संस्कार हुनका श्रेष्ठताक अनुभव करबाक आ निम्न जाति पर अपन मालिक सन हक देखेबाक लेल विवश करैत छनि। ई कथा ओहि राजनीतिक संघर्षक चर्चा करैत अछि, जतय निम्न जातिक कूटनीतिक लोक अपनहि समाजक लोकक कष्टक अनुचित लाभ उठबैत छथि आ अपन आर्थिक लाभ लेल हुनकर उपयोग करैत छथि। सुत्ता खतबे आ मुनरा कें गाममे हिंसा पसारय आ गरीब सभ कें कष्ट देबाक लेल दोषी मानल जाइत अछि। खतबे-धानुक समुदायक सुत्ता खतबे, अपन हाथमे मोट लाठी लय क' काशी चौधरी कें डराबैत अछि। ओ अपन पूर्ण क्रोध देखबैत काशी बाबू कें चेतौनी दैत अछि जे जँ ओ हुनकर मजदूरी देबा सँ मना कएलनि त' परिणाम गंभीर हएत। ई घटनाक्रम नाटकीय प्रतीत होइत अछि, कियाक त' ई मात्र काशी बाबूक क्षणिक हारि देखबैत अछि। अगिला दिन सुत्ताक पिता काशी बाबू सँ क्षमा मंगैत छथि, जाहि सँ पता चलैत अछि जे पुरान खाढ़ी अखनो उच्च जातिक वर्चस्वमे विश्वास रखैत अछि। ई घटना गहीर स्तर पर निर्दोष लोकक उत्पीड़न कें सेहो रेखांकित करैत अछि। उच्च जातिक लोक क्रोध सँ हिंसक भ' जाइत छथि। सुत्ता अपन हाथमे लाठी लय क' अबैत अछि आ अपन पिता कें कहैत छनि जे ओ अनिलक आगू गिड़गिड़ाएब बंद करथि। अपन क्रोधमे ओ उच्च जातिक लोक पर प्रश्न उठबैत कहैत अछि- "हम 'बाभन' सभ कें गारी देनाइ जारी राखब।" ओ मारक प्रहार करैत पुछैत अछि, "हम सभ पसीना बहा क' कमाइत छी त' नीच जाति भ' गेलहुँ, आ ई कोढ़िया सभ जे बैसल रहैत अछि से ऊँच जाति भ' गेल?" (चौधरी १५३)। हुनकर ई प्रश्न अपन श्रम लेल समान सम्मान पेबाक अधिकार कें चिन्हित करैत अछि। कथा ओहि ठाम हिंसक मोड़ लैत अछि जखन अनिल द्वारा नियुक्त भीड़ सुत्ता कें पकड़बाक प्रयास करैत अछि, मुदा ओ भागि जाइत अछि। भीड़ सुत्ताक पिता यदुआ कें पकड़ि लैत अछि आ ओकरा ओधबाध कऽ दैत अछि। मुनरा काशी बाबू कें धमकी दैत अछि जे यदुआ कें भीड़ सँ मुक्त कएल जाय। ओ सभ यदुआ कें छोड़ि दैत छथि, मुदा जखन मुनरा नहि भेटैत अछि, तखन ओ सभ हुनकर पत्नी पर हमला करैत छथि आ हुनकर साड़ी फाड़ि दैत छथि। मुनरा घरमे नुकायल रहैत अछि। एहि स्थितिमे मुनराक पत्नी वास्तविक शिकार बनैत अछि, जखन कि ओकर पति सुरक्षित नुकायल रहैत अछि। ठीक ओहिना, वृद्ध यदुआ जातीय संघर्ष सँ उत्पन्न हिंसाक शिकार बनैत छथि, जखन कि हुनकर बेटा बचि जाइत अछि। तकर बाद निम्न जातिक लोक उच्च जातिक लोक पर हमला शुरू क' दैत छथि। "बेचारा असहाय विश्वनाथ मिश्र जे अपन दलानमे बैसल छलाह, हुनका ओहिना उठा क' फेकि देल गेल जेना कोनो बेंग कें। मंदिर सँ वापस अबैत काल पंडित मुसहर झा कें हाथमे फूलक डलिया सहित जमीन पर पटकि देल गेल।" (चौधरी १५३)। ई राजनीतिक संघर्ष निर्दोष लोक कें शिकार बनबैत अछि आ हुनका विवशताक स्थितिमे ल' जाइत अछि। दुनू समूहक 'चलाक' लोक सुरक्षित रूप सँ जातीय राजनीति खेलाइत छथि, आ निर्दोष ग्रामीण सभ कें कष्ट सहबाक लेल छोड़ि दैत छथि। नामी बाबू, जे गामक एकटा सूदखोर छथि, एहि स्थितिमे तटस्थ रहबाक ढोंग करैत छथि, जे गामक लेल आबय बला समयमे आइयो बड्ड खतरनाक अछि। उच्च जातिक कूटनीतिक लोक निम्न जातिक लोकक आशंकाक संग खेलाइत छथि, जइसँ ओ सतीनाथ झा सन समाज सुधारकक रूपमे जानल जा सकथि। सतीनाथ झा एकटा विधुर आ लोकदलक सदस्य छथि, जे उदारवादी होयबाक ढोंग करैत छथि आ अपन स्वार्थ लेल जातीय राजनीतिक उपयोग करैत छथि। कथावाचक, जे एकटा सचेत व्यक्ति अछि, एहि विभाजनकेँ देखि स्तब्ध भ' जाइत अछि। ओ पुछैत अछि, “ई सब की अछि? दलितक पुनरुत्थान? जातीय संघर्ष आ वर्ग संघर्ष? ई सब ककरा लेल? तथाकथित नेता लोकनि अपन वोट बैंक बनेबाक लेल जातिक नाम पर सामाजिक ताना-बाना मे जहर किएक घोरि रहल छथि?” (चौधरी १५५)। जाति वोट मांगय बला लोकक लेल एकटा हथियार बनि गेल अछि। एहि पंक्ति सभमे जातिक विषयमे गप्प करैत, राजनेता, छद्म साम्यवादी, धनीक, कूटनीतिक, शक्तिशाली आ तटस्थताक सुरक्षित खेल खेलय बला लोकक वास्तविक स्वरूप कें उघारैत, चौधरी लोकतंत्र कें मात्र एकटा सपनाक रूपमे देखना जाइत छथि। ई कथा जातीय संघर्ष सँ उत्पन्न गरीबक प्रताड़नाक आलोचना करैत अछि, जेना कि वैशंपवल्लिक पुतहु अपन स्थितिक विषयमे कड़गर टिप्पणी करैत छथि: सुत्ता शहरमे रिक्शा चलबैत अछि आ मुनरा गाम-गाम जा क' राजमिस्त्रीक काज करैत अछि। हुनका सभ कें कोनो चिंता नहि छनि। हमरा सभ कें बीचमे छोड़ि ओ सभ मौज कऽ रहल छथि। हमरा सभ कें खाय लेल किछु नहि अछि। हमर बच्चा सभ भूखल अछि! अहाँ लोकनि हमरा सभ पर कोनो दया नहि करैत छी। अहाँ हमरा सभ कें घरक काज सँ निकालि देलहुँ। हमर मालजाल बिना घासक मरि जायत। एहि बान्ह पर ओ सभ चरैत अछि कियाक त' हमरा सभ कें खेत आ कलम मे चरायब मना अछि। ओ सभ निश्चित रूप सँ मरि जायत। ई सब सुत्ता आ मुनराक कारण भ' रहल अछि। (चौधरी १६१) तहिना, जातीय संघर्ष उच्च जातिक मध्यम वर्गक बीच सेहो तनाव उत्पन्न करैत अछि, किएक त' हुनका अपन कृषि कार्य लेल मजदूरक आवश्यकता होइत अछि। उच्च मध्यम वर्गक मुन्ना बाबू एहि संपूर्ण संघर्षक निचोड़ एहि रूपमे रखैत छथि: काशी बाबूक रोटी पर अब दुनू तरफ सँ घी लागल छनि। ओ एहि माध्यम सँ पर्याप्त पाइ कमा लेताह, ई निश्चित अछि। नामी बाबू पहिनहि सँ हुनकर पक्षमे छथि। जतऽ धरि मुनरा आ सुत्ताक गप्प अछि, ओ हुनका काल्हि बजा क' हाथ मिला लेताह। ओ हुनकर अपनहि टोलक छथि। बाद बाकी हम सभ ग्रामीण मूर्ख बनब। काशी कें अपन खेत-पथारक कोनो चिंता नहि छनि। अहाँक जमीन परती रहि जायत जखन कि ओ एहि मे आनंद लेताह। (चौधरी १५९) अतः ई इंद्रधनुष एकटा अशांत इंद्रधनुष अछि, जाहिमे क्रूर पाँखि लागल अछि आ जे पूरा आकाश कें तोपने अछि, जतय राजनेता लोकनि द्वारा राष्ट्रीय हितक मशीनीकरण कएल जा रहल अछि। ई कथा प्रश्न उठाबैत अछि जे स्वतंत्रता वास्तविक अछि वा मात्र एकटा भ्रम, किएक त' निर्दोष लोक, जे कोनो समूह सँ नहि जुड़ल छथि, ओ अपन जीविका सँ वंचित भ' रहल छथि। जाति आ वर्गक अवधारणाक बीच चोरा-नुक्की खेलाइत ई कथा जातीय व्यवस्थाक जड़ि पर प्रहार करैत अछि। २ अशोकक कथा “एंटीकरेंट” (प्रतिलोम) क विश्लेषण अशोक कुमार झाक लघु कथा “एंटीकरेंट”, जकर अनुवाद संजीव कुमार चौधरी कएलनि अछि, जातीय संघर्ष आ छीनल गेल बाल्यकाल कें प्रस्तुत करैत अछि। धनमंतीक चौदह बर्खक बेटा अर्जुन अपन माय सँ उच्च जातिक प्रति समर्पणक भाव विरासतमे पौने अछि, कियाक त' अपनहि समाजक लोक द्वारा ओकर उपहास कएल जाइत अछि। ई ओ समय सेहो थिक जखन पुनरुत्थान भ' रहल अछि आ उच्च जातिक वर्चस्वक विरुद्ध आंदोलन तेज भ' रहल अछि। अर्जुन अपन पुरान मालिकक घरक उच्छिष्ट (छोड़ल गेल भोजन) लेबाक लेल तैयार अछि, यद्यपि हुनका अपन जातिक लोक द्वारा कहल जाइत छनि जे हुनका सभ कें उच्च जाति सँ उच्छिष्ट भोजन नहि लेबाक चाही। "खबासिन सभ आब उच्छिष्ट भोजन नहि लैत छथि। हुनकर जातिक लोक हुनकर हवेलीमे खबास आ खबासिनक रूपमे काज करबा सँ मना करैत छथि; एकरा अपमानजनक मानल जाइत अछि।" (झा २३९)। “द रेनबो” मे भूख आ भुखमरीक रूपमे चित्रित संघर्षक समान, एहि ठाम सेहो अर्जुन आ हुनकर असहाय माय अपन भूख मेटेबाक लेल अपनहि जातिक लोकक विरुद्ध जा क' काज करैत छथि। अर्जुन जखन अपन पुरान मालिक पंडित गणेश्वर झाक श्राद्धमे सम्मिलित होमय लेल जाइत छथि, जतय भारी मात्रामे स्वादिष्ट भोजन परसल जायत, तखन हुनका अपनहि जातिक लोक द्वारा उपहास कएल जाइत अछि। ओ सभ हुनकर उपहास उड़बैत छथि, जाहि सँ हुनकर निर्दोष मन प्रताड़ित होइत अछि। आर्थिक संघर्षक उदाहरण एहि कथामे देखल जा सकैत अछि जखन बौआ झाक परिवार आ हुनकर पैघ संख्यामे संबंधी भोजनक आनंद लैत छथि आ ओकरा बहुत बर्बाद करैत छथि, मुदा अर्जुनक घरमे चाह बनेबाक लेल रती भरि चिन्नी सेहो नहि अछि। अर्जुनक थाकल देह कें अनुभव होइत अछि जे एहि कड़कड़ाइत जाड़मे एक कप चाह जरूरी अछि, मुदा हुनकर वर्तमान परिस्थिति हुनका एक कप चाह पीबा सँ रोकैत अछि। हुनकर माय हुनका चाह नहि द' सकैत छथि किएक त' घरमे चिन्नी नहि अछि; हवेलीमे हुनका बेर-बेर अलग-अलग काज लेल पठाओल जाइत अछि, आ ओ एक कप चाह लेल संघर्ष करैत छथि। ई विकट स्थिति भूख आ ओकर क्रूर स्वरूप कें चित्रित करैत अछि। लोक कें जातिमे विभाजित करय बला एकटा भेद भोजनक आदति सेहो अछि। भोजनक आदति आ दोसर भोजनक आदति मे परिवर्तन कें एहि कथामे व्यंग्यात्मक रूप सँ चित्रित कएल गेल अछि। अर्जुनक पिता लूटन मरड़ मांस खायब छोड़ि देने छलाह। ओ एकटा तपस्वी सँ "कंठी" लेने छलाह। हुनकर पुरान मालिक आ मालकिन हुनका पर तमसायल छलाह मुदा ओ शाकाहारी बनल रहलाह। धनमंती हुनकर अकाल मृत्यु कें शाकाहारी भोजनक अभ्यास मे परिवर्तन सँ जोड़ैत छथि। किएक तँ शाकाहारी भोजनक सेवन एकटा विशिष्ट जाति आ ओकर पहचान कें चिन्हित करैत अछि, तें लूटन मरड़क अपन मूल स्वरूप बदलबाक लेल आलोचना कएल जाइत अछि। ई कथा रेखांकित करैत अछि जे परंपराक नाम पर लोक कें कोना अन्याय सहय लेल विवश कएल जाइत अछि। अर्जुन अपन मालिकक प्रशंसामे बौआ झाक सोचक नकल करैत अछि। प्रशंसाक एहि प्रक्रियामे अर्जुन अपन अस्थित्व हेरा जाइत छथि। एकर एकटा उदाहरण कथामे भेटैत अछि, जतय अर्जुन जोर दैत अछि जे चाह पीबाक बाद सभ कें हाथ धोबाक चाही, आ ओ पाहुन सभ कें हाथ धोबा लेल लोटा बढ़ाबैत रहैत अछि। ओतय उपस्थित लोक हुनका पंडित सन, उच्च जातिक सदस्य सन व्यवहार करबाक लेल आलोचना करैत छथि। दोसराक समान व्यवहार कएनाइ सेहो जातीय व्यवस्थाक दीर्घकाल धरि बनल रहबाक एकटा कारण अछि। प्रशंसा सँ आत्म-घृणा उत्पन्न होइत अछि, जाहि सँ अपन पहिचान नीचा खसैत अछि। ई कथा एहि मनोवैज्ञानिक द्वंद्व कें चिन्हित करैत अछि, जतय अर्जुन आ हुनकर माय एकटा जटिल चिंतामे फँसि जाइत छथि जतय ओ अपना सँ घृणा करैत छथि; मालिकक नकल करबाक वा हुनकर आदति सभक अभ्यास करबाक प्रत्येक छोट काज हुनका ओहि स्वीकृत समूहक सदस्य भेलाक एकटा अस्थायी दर्जा दैत अछि। जखन कि लूटन मरड़क भोजन परिवर्तनक आलोचना धनमंती करैत छथि, ओ स्वयं अपन बेटाक उच्चवर्गीय आदति सभ सँ मंत्रमुग्ध भ' जाइत छथि। तखने अपना कें स्वीकार करबाक असमर्थता हुनका मनोवैज्ञानिक रूपेँ खंडित क' दैत अछि। अर्जुनक गुलामीक एकटा आन कारण मालिकक प्रति हुनकर भय अछि। एकटा जवान लड़काक रूपमे ओ अपन जीवन, अपन मायक विवशता, अपन परिवार आ ओकर भूखक आवश्यकताक विषयमे सोचैत अछि। एकटा अशांत बालकक रूपमे जकरा आदेशक बदला स्नेहक गरमाहटि आ अपन छोट-छोट काजक लेल प्रशंसाक आवश्यकता अछि। अनेक स्तर पर एकटा सुविधाविहीन बालकक रूपमे अर्जुनक छीनल गेल बाल्यकाल राष्ट्रक भूल थिक। कथा तखन एकटा महत्वपूर्ण मोड़ लैत अछि जखन बौआ झाक अहंकार कें जवाहर द्वारा चुनौती देल जाइत अछि, जे एकटा एहन लड़का अछि जकरा अर्जुन २० टका मजदूरी पर श्राद्ध लेल अनने अछि। पानमे बेसी चूनक कारणें अर्जुनक जीह कटि जाइत अछि, आ जवाहर बौआ झा कें कहैत छनि जे ओ ओकर जीह बदलि दिअय। बौआ झाक उच्च जातिक सदस्य भेलाक दर्जा, पवित्र शास्त्र पढ़बाक क्षमता, पवित्रताक प्रति हुनकर दीर्घकालीन विश्वास कें चुनौती देल जाइत अछि। “...ई जवाहिरा, ई पिद्दी सन लड़का हमरा चुनौती द' रहल अछि। ओ हमरा अर्जुनक जीह बदलबय लेल कहि रहल अछि! जेना कि ई कोनो नट वा बोल्ट हो।” (झा २५५)। बौआ झा जानैत छथि जे अर्जुनक जीह बदलब असंभव अछि, तें ओ असहनीय क्रोध सँ भरि जाइत छथि। अर्जुनक कटल जीह ओहि खंडित पहिचानक रूपक थिक जकरा ओ सहबा लेल विवश अछि। ओ पिता चलि गेला, ओकर बाल्यकाल हेरा गेल, ओ आत्म-सम्मानसँ वंचित भऽ गेल; ओ अपन जातिक लोक सँ नहि जुड़ि सकैत अछि, नहिये ओ मालिकक सेवा जारी राखि सकैत अछि, जे जातिक नाम पर संपूर्ण प्रताड़नाक प्रतीक थिक। मुदा बौआ झा कें देल गेल चुनौती तेहनो समयमे समानता प्राप्त करबाक आशा कें प्रस्तुत करैत अछि। ई कथा एकटा एहन गाममे आधारित अछि जतय लोक कें विद्याक वर्चस्वमे विश्वास करय लेल विवश कएल जाइत अछि। किएक तँ सिखबाक अवसर खाली उच्च जाति लग अछि, तें निम्न जाति कें ज्ञानक नाम पर चुप कएल जाइत रहैत अछि। ई कथा विस्तार सँ कहैत अछि जे कोना गणेश्वर झाक व्यक्तित्व श्राद्ध मंत्रोच्चार, संगीत, विभिन्न प्रकारक भोजन परसब, खस्सी काटब, राजनीति, भाषा विज्ञान, साहित्य पर चर्चा, वेद, उपनिषद, कर्म, मृत्यु पर व्याख्या, शुद्धता आ अशुद्धता पर बहस, श्लोक उद्धृत कएनाइ अछि; मुदा ई मानवता, समानता आ न्याय पर कोनो विचार नहि कएनाइ- एहि सभ सँ सेहो चिन्हित अछि। ई श्रोत्रियक बौआ झा आ कार्यशील वर्गक जवाहरक बीचक संघर्ष कें प्रस्तुत करैत अछि, जतय जवाहर ओ काज करबा मे सक्षम अछि जे गामक बहुत रास लोक सोचबाक साहस सेहो नहि क' सकलाह। ई कथा जातीय व्यवस्थाक एकटा कड़गर आलोचना थिक जे पवित्रताक नाम पर समाज पर थोपल गेल अछि। धर्मक संदर्भमे जातीय संघर्षक अन्वेषण करबाक अशोक कुमार झाक ई हस्तक्षेप कोनो धर्म कें जीवन पद्धतिक बराबर मानबाक प्रस्तावना सभ लेल एकटा पैघ खतरा अछि। आधुनिक समयमे सेहो भारतीय सामाजिक जीवनमे जाति एकटा अटूट संरचना अछि, जेना कि वेलासेरी आ पात्रा नोट करैत छथि: ...जाति कें भ्रम आ कल्पना दुनू कहल जाइत अछि। ई एकटा भ्रम अछि किएक त' ई ओहि समाजक मानसिक रचना अछि जाहि मे हम रहैत छी; ई एकटा कल्पना अछि किएक त' एहि सँ विविध प्रकारक बौद्धिक उत्तेजनाक मार्ग प्रशस्त भेल अछि जाहि सँ भारतमे विभिन्न प्रकारक मानसिक विभ्रम उत्पन्न भेल अछि। यद्यपि जातिकें कोनो प्रकारक बौद्धिक वैधता वा वैज्ञानिक मान्यता नहि देल जा सकैत अछि, तथापि व्यक्तिक सामाजिक स्तरीकरणक रूपमे जाति आधुनिकताक एहि समयमे सेहो अपन राजनीतिक आ सामाजिक मान्यता रखैत अछि। (वेलासेरी आ पात्रा १) ३ रमेशक लघु कथा “कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो भैरत्वेश्वर झा द्वारा अनूदित रमेश झाक लघु कथा “कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो” एहि बातक उल्लेख करैत अछि जे कोना जाति एकटा भ्रम अछि, लोक कें चुप कराबय लेल एकटा अवैज्ञानिक सिद्धांत अछि, अथवा कोना जाति एकटा कल्पना थिक जे वास्तविकता कें चुनौती दैत अछि। ई कथा जातीय सोपान आ गामक राजनीतिक अंतर्संबंधक चित्रण अछि। कैलास एकटा मधुर स्वभावक लड़का अछि, एकटा स्नेही बेटा अछि, मुदा “...हवेलीक लेल आ ओहि ब्राह्मण टोलक लोकक लेल जे ओकरा 'शूद्र' मानैत छथि, ओ एकटा विद्रोही पिछड़ल लोक छल।” (रमेश झा ३००)। कैलास जातिगत प्रथासभक प्रति हारि मानयबला नहि अछि। “एंटीकरेंट” क अर्जुनक समान, कैलास अपन बाल्यकाल हेरा देने अछि, भूख ओकर परिवार पर अपन पाँखि पसारने अछि, आ ओ काज करबाक लेल पंजाब चलि जाइत अछि। ओकर पिताक मृत्यु कमला नदीक बाढ़िमे भ' गेल छल, जखन ओ खेतमे बाचल-खुचल अल्हुआ चुनि रहल छलाह। पिताक मृत्युक बाद कैलासक कष्ट शुरू भ' गेल। ग्रामीण लोकनि हुनका 'कैला' कहैत छथि, जे हुनकर नामक एकटा विकृत रूप थिक। ई हुनकर विकृत पहिचान कें चिन्हित करैत अछि। हवेलीक हुनकर मालिक बौआ झा कैलासक कतहु आन ठाम काज कएनाइ बर्दाश्त नहि क' सकैत छलाह। बौआ झाक मानब छनि जे कैलासक माय ओकरा दूर पठा देलक। बौआ झा हुनका सँ बदला लेबाक प्रतीक्षा करैत छथि। कथा तखन शुरू होइत अछि जखन कैलास पंजाब सँ घर वापस अबैत अछि, जाहि सँ हुनकर माय गदगद भ' जाइत छथि। जखन ओ बौआ झाक हवेलीमे काज लेल नहि अबैत छथि, तखन ओ खिसिया जाइत छथि। बौआ झा कें अपन वर्चस्व छीनि लेल जेबाक डर सतबैत छनि। “ओ किछु टका कमा लेलक आ ओकरा पर पंजाबक हवा लागि गेल, हँ? काल्हि धरि ओ दुआरि पर माड़ आ उच्छिष्ट भोजन लेल बैसल रहैत छल आ कहैत छलि; 'मालिक, ई ढोर कें नहि दियौक, हमरा द' दियौ', आ आi जखन ओकर बेटा घर आयल अछि त' ओ...” (रमेश झा ३०४)। बौआ झा कैलास आ हुनकर माय सँ गुलामीक अपेक्षा रखैत छथि, आ जखन ओकरा चुनौती भेटैत छनि, त' ओ हुनका सभ मे डर उत्पन्न करबाक नव तरीका सोचैत छथि। कैलास अपन माय कें खुश करबाक लेल पंजाब सँ एकटा रेडियो अनैत अछि, जे ओकर नव प्राप्त स्वतंत्रताक एकटा बिंब बनि जाइत अछि। बौआ झा कें ओकर स्वतंत्रता आ आत्म-सम्मान मे कोनो अर्थ नहि भेटैत छनि, आ ओ हुनका फेर सँ नीचा देखेबाक प्रयास करैत छथि। ओ गजेंदर आ सुरेंदर कें कैलास कें छलबाक लेल कहैत छथि, आ ओ सभ कैलास कें कर्ज लेबाक लेल विवश करबा मे सफल भ' जाइत छथि, जाहि सँ ओ कर्ज चुकाबय मे असमर्थ भ' जाइत अछि। कैलास फेर सँ गुलामीक स्थिति मे आबि जाइत अछि आ फेर सँ काज लेल पंजाब जेबाक प्रयास करैत अछि। मुदा बौआ झा ग्रामीण सभ कें धमकी दैत छथि जे जँ केओ कैलास कें कर्ज देत, त' ओकरा प्रतिकूल परिणाम लेल तैयार रहबाक चाही। कैलास फेर सँ बौआ झाक खेतमे हरवाह बनि जाइत अछि। ई कथा एकटा गंभीर स्थिति कें सोझाँ अनैत अछि, जतय अनेक प्रतिकूल कथा सभ अनकहल रहि जाइत अछि, जतय ग्रामीणक बीच डर उत्पन्न कएल जाइत अछि, आ उच्च जातिक दर्जा अखनो प्रश्नहीन बनल रहैत अछि। पिछड़ल लोकक उत्थानक आलोचना करैत बौआ झा कहैत छथि, “निश्चित रूप सँ सरकार बहुत प्रचार क' हुनका सभ कें बिगाड़ि देने अछि, एहिमे कोनो संदेह नहि। नहि त', कैला क भनसाघर अखन धरि अशुद्ध छै आ ओ छानल रोटी क नाश्ता कोना क' सकैत छै?" (रमेश झा ३०४)। अपन एहि डरक संग जे वर्गहीन समाजक स्थापना भ' जायत, ओ दोसर लोक मे डर उत्पन्न करैत छथि। वर्गहीन समाज एकटा भ्रम बनि जाइत अछि, किएक त' बौआ झा सन लोक वर्गहीन समाजक विचार कें थकुचबाक लेल अनेक उपाय करैत छथि। बौआ झा अपन टका आ बाहुबलक उपयोग दुइ निर्दोष व्यक्ति कें चुनौती देबा लेल करैत छथि, जाहि सँ हरिजन थाना वा पिछड़ल वर्ग लेल विशेष अदालत सन व्यवस्था सभ विफल प्रतीत होइत अछि। बौआ झा कैलासक पंजाब सँ आनल गेल नव विचार कें पिंजरा मे बंद क' दैत छथि। रेडियो सुननाइ कैलासक मायक जीवन मे स्वतंत्रताक एकटा नव संकेत बनि जाइत अछि। ओ शीघ्र दरभंगा रेडियो स्टेशन लगायब सीखि जाइत छथि आ लोकगीत सुनैत छथि। कैलास अपन मायक जीवन मे जे किछु अनलक, ओ हुनकर सपनाक दुनिया कें वास्तविकता मे बदलब छल। ओ रेडियो सँ जुड़ि जाइत छथि, अपन पूरा जीवन कें मोन पाड़ैत, एकटा नव 'स्व' (self) प्राप्त करैत छथि। जखन कैलास कर्ज चुकाबय मे विफल भ' जाइत अछि, त' रेडियो छीनि लेल जाइत अछि। ओहि सँ ओकर नव प्राप्त व्यक्तित्व खंडित भ' जाइत अछि। ओकर हृदय टूटि जाइत अछि किएक त' ओकर स्वतंत्रताक बोध मात्र एकटा अस्थायी स्थिति छल। मुदा कथा अंत मे एकटा प्रश्न छोड़ि जाइत अछि जे अंत मे ककर जीत होइत अछि? धनीक वर्चस्ववादी व्यवहारक वा एकटा स्नेही बेटाक अपन मायक प्रति विचार क। कैलास जखन अपन माय कें खेतमे अबैत देखैत अछि, तँ रेडियो बौआ झा लग चलि जेतै, ओ मायक तइ दुखक कल्पना करैत अछि। कैलास बौआ झाक खेतमे अपन हरवाहा लाठी सँ रेडियो कें फोड़ि दैत अछि। कैलास अपन माय कें शोक सँ बचेबाक लेल रेडियो कें नष्ट क' दैत अछि, आ बौआ झा कें सेहो ई बुझा दैत अछि जे ओकर पहिचान कें कहियो नष्ट नहि कएल जा सकैत अछि। एक बेर जखन रेडियो ओकर नहि रहल, तखन ओकरा सँ ओकर कोनो लगाव नहि अछि। ओ बुझैत अछि जे ओकर माय अखनो रेडियो सँ जुड़ल छथि। वस्तु सँ एहि मोह कें भंग करबाक ओकर काज, दार्शनिक रूप सँ असमान समाजक प्रति ओकर प्रतिरोध कें चिन्हित करैत अछि। एहि सभ कथा कें समानता लेल खतराक चिंतनक रूप मे बुझल जा सकैत अछि। एहि सभ मे राष्ट्रीय हित अछि। ई तीनू कथा गामक परिवेशपर आधारित अछि, जइसँ जातिगत प्रथा आ ग्रामीण जीवनक अंतर्संबंध पर जोर देल जा सकय। जखन कि “द रेनबो” क कथावाचक जाति व्यवस्थाक प्रति तटस्थ अछि आ अपन आँखि क आगू भ' रहल अन्यायक प्रतिरोध नहि करैत अछि, “एंटीकरेंट” क जवाहर उच्च जाति क प्रति अपन डर त्यागि दैत अछि आ ओकरा चुनौती दैत अछि, आ “कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो” मे कैलास, बौआ झा सँ हारलाक बादो, अपन सोचल-बुझल योजना कें अपन आंदोलनक प्रतीकक रूप मे चलबैत अछि। जखन कि “द रेनबो” राजनीतिक आधार आ दुनू समूहक लोकक उत्पीड़न कें प्रस्तुत करैत अछि, “एंटीकरेंट” आ “कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो” निम्न जातिक व्यक्तिगत संघर्ष कें प्रस्तुत करैत अछि। जखन कि अनेक लोकक सम्मिलित हिंसा “द रेनबो” कें चिन्हित करैत अछि, “एंटीकरेंट” आ “कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो” मे बाजि कऽ आ दोसराकेँ डरा कऽ चुप करा कऽ उत्पन्न हिंसा केँ स्पष्ट कएल गेल अछि। ई कथा सभ, मिश्रित बिंब सँ समृद्ध आ नव समाजक लक्ष्य रखैत, मैथिली साहित्यक रहस्यमय आ अप्राप्य स्वरूप कें बनौने अछि। संदर्भित कार्य चौधरी, प्रभास कुमार। "द रेनबो" (The Rainbow)। अनुवादक: राजनंद झा। कन्टेम्परेरी मैथिली शॉर्ट स्टोरीज (Contemporary Maithili Short Stories)। संपादक: ठाकुर, मुरारी मधुसूदन। नई दिल्ली: साहित्य अकादमी, २००५। मुद्रित। झा, अशोक कुमार। "एंटीकरेंट" (Anticurrent)। अनुवादक: संजीव कुमार चौधरी। कन्टेम्परेरी मैथिली शॉर्ट स्टोरीज (Contemporary Maithili Short Stories)। संपादक: ठाकुर, मुरारी मधुसूदन। नई दिल्ली: साहित्य अकादमी, २००५। मुद्रित। झा, रमेश। "कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो" (Kailash Mandal's Philips Radio)। अनुवादक: भैरत्वेश्वर झा। कन्टेम्परेरी मैथिली शॉर्ट स्टोरीज (Contemporary Maithili Short Stories)। संपादक: ठाकुर, मुरारी मधुसूदन। नई दिल्ली: साहित्य अकादमी, २००५। मुद्रित। रेगे, शर्मिला। राइटिंग कास्ट/राइटिंग जेंडर: नरेटिंग दलित वीमेन्स टेस्टीमोनीज (Writing Caste/Writing Gender: Narrating Dalit Women's Testimonies)। नई दिल्ली: जुबान बुक्स, २०१३। ई-बुक। वेलासेरी, सेबेस्टियन आ पात्रा, रीना। कास्ट आइडेंटिटीज एंड द आइडियोलॉजी ऑफ एक्सक्लूजन: ए पोस्ट-स्क्रिप्ट ऑन द ह्युमनाइजेशन ऑफ इंडियन सोशल लाइफ (Caste Identities and The Ideology of Exclusion: A Post-Script on the Humanization of Indian Social Life)। कैलिफोर्निया: ब्राउन वॉकर प्रेस, २०१८। मुद्रित। [सैद्धांतिक विवेचन लेल देखू- मैथिली समीक्षाशास्त्र- गजेन्द्र ठाकुर] अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। पद्य Poetry ३.१. प्रदीप पुष्प- दुर्गंध ३.२. रामशंकर झा 'मैथिल'- पाग ३.३. जगदानन्द झा "मनु"- २ टा गजल ३.४. बद्रीनाथ राय अमात्य- ११ टा कविता ३.५. रामकृष्ण परार्थी- ९ टा पद्य ३.६. बिन्देश्वर राय"विवेकी"- लुप्त होईत "मिथिला" ३.७. तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम'] मूल तेलुगु: नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव) मैथिली अनुवाद: मानेश्वर मनुज [खण्ड ३] ३.८. राजदेव मंडल- खाली पन्ना/ भीतरिया कानब ३.१. प्रदीप पुष्प- दुर्गंध प्रदीप पुष्प दुर्गंध
ओ पैघ विद्वान छथि - घोर तार्किक आ बौद्धिक व्यक्तित्व, पुरातन वा अर्वाचीन साइते कोनो ग्रंथ हएत, जे हुनक नजरिसँ रहल हएत कात आ ओ नहि केने हेताह ओकर रसपान, अनुशीलन आ चिंतन । हुनक गप्प - सप्पकेर हरेक पांति भरल रहैत अछि महान विचारकक 'कोटेशन' सँ आ ओ अपन कुर्ताक जेबीमे नुकौने रहथि छथि दर्जनो दार्शनिक लोकनिकें जकरा यथासमय करैत छथि उपस्थित अपन गप्पक पुष्टिकरणमे कथनक प्रासंगिकतामे सिद्दांतक मान्यतामे । एतबे नहि, अपन व्यापकता आ अति पांडित्यक प्रदर्शन करबाक लेल ओ सदति भेल रहैत छथि उताहुल आ हुनक सोशल मिडिआक पोस्ट कहैत रहैत अछि जे सत्ते अगस्त्य मुनि एक चुरूमे सुखा देने रहथिन क्षितिज धरि पसरल महासागरकँ आ, ठीके कोनो ब्रम्हर्षि समूल नष्ट केने रहथिन एकटा वर्ण - विशेषकँ संगहि, हुनक विश्वास छन्हि जे प्रतिमा बना एकलव्य सीखि सकैत अछि धनुर्विद्या आ प्रसन्नता सँ करैत छथि स्वीकार जे निमित्त मात्र गुरू सेहो भ' सकैत छथि कोनो कला - कौशलकें सम्पादक आदि-आदि। अपन वाक चातुर्य सँ ओ साबित क' दैत छथि जे अमुक राजनेताक कार्यकालमे भेल छल सर्वांगीण विकास देश आ राज्यक आ ओ राज नेताकें कहैत छथि विकास पुरुष आ तैं ओ हलसि क ' हुनक जयंती पर माला पहिराओल चित्र करैत छथि उजागर आ हुनका सहित हम सेहो नमन क' भ' जाइत छी भाव विभोर। एते भेला बादो हरेक वर्ष ओ महानुभाव अप्रैल मास अबितहि अपन सकल उर्जा लगा दैत छथि ई स्थापित करयमे जे कोनो एकटा लोक नहि छथि देशक संविधान निर्माता आ ओ अपन नमहर नमहर पोस्टमे कोनो व्यक्ति विशेषक भूमिकाकँ करैत छथि न्यून, अति न्यून आ ततबा न्यून जकर उल्लेख हुनका मने कोनो आवश्यक नहि। हुनक तर्क नै मानैत छन्हि जे प्रारुपण समितिक अगुआ भेने कोनो विधि-विशेषज्ञकें भेटैत अछि यश नियम- निर्माताकें । हुनका नै अरधै छन्हि जे देश - दुनियामे होइत अछि एकटा वंचित, शोषित आ पद दलित व्यक्तिक जयजयकार आ ओ लगैत छथि बोकरय अपन फेसबुक, व्हाट्सप्प, ट्विटर जकां बरतन बासनमे आ सगरो पसारि दैत छथि दुर्गंध बेस विकट आ घृणास्पद । अहाँ कहू जे की ओ दुर्गंध अहाँ महसूस करैत छी?
(अंबेडकर जयंती, 2023, 'अखन बजबाक समय अछि' कविता संग्रहसँ।) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.२. रामशंकर झा 'मैथिल'- पाग रामशंकर झा ’मैथिल’ पाग
आदि अनादि काल सँ मिथिला कें जीवंत सुच्चा प्रमाण अछि पाग अछि पाग अछि..! विरासत अछि धरोहर अछि मिथिलाक सोहनगर कलात्मक कुची सँ मांजल दाय माय कें स्नेह सँ साँठल पाग अछि पाग अछि...! जतह सिर माथा शोभेअ जतह माथ नहिं झुकाअ हजेंरक हजेंर बीच मे जें शान माअन बढ़ाबैय पाग अछि पाग अछि...! समस्त आर्यावर्त्त मे चाहे कथा विआह मे चाहे यज्ञगोपवित मे चाहे यज्ञ आयोजन मे चाहे तर्क शास्त्रार्थ मे चाहे ज्ञान कौशल्य मे सबहक माथा शुभे हे शुभे पाग अछि पाग अछि...! मैथिल जतह कतौह छि कोना छि केहन छि सुन्नर सँ सोहनगर समाजक बीच मे कुटुंब कें हजेर मे बढ़ चहटगर चोखगर छि ज्यों अन्हाक माथ शिरोधार्य ज्यों अन्हाक माथा शोभए पाग अछि पाग अछि...! समस्त आर्यावर्तक अपन अपन पहचान अछि ज्यों अन्हा मिथिला सँ अन्हा मैथिल समाज सँ जे सबकें बीच विशिष्ट जे सबकें सङ्ग उत्कृष्ट पाग अछि पाग अछि.. चाहे ऐतिहासिक होय चाहे पौराणिक होय चाहे वेद वेदांती होय चाहे लोकिक रीत होय ज्यों शुशोभित होय सबहक माथा अस्मिता पाग अछि पाग अछि..!! मिथिला महात्म्य सँ वृहद्विष्णु पुराण सँ तिरभुक्ति कें ज्ञान सँ मिथिला देशम सँ विविधकल्प सूत्र सँ रुद्रयामाला परमपावन शिव-शक्ति तैरभुक्तिक तंत्र साधनाक मठक सूक्तक ऋचा गान मे पाग अछि पाग अछि..! गण्डकी कें धार मे कोशी कें कछेर मे कमलाक दलान मे महानन्दाक आँगन मे मोक्षक गंगा लाभ मे हिमवानक आरण्य मे हुएन्-त्संग पंच भारत मे सबहक माथा भाल पाग अछि पाग अछि. मिथिला कें जीवंत सुच्चा प्रमाण अछि पाग अछि पाग अछि.!! -राम शंकर झा"मैथिल" उघरा, दरभंगा Mo -7970778787 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.३. जगदानन्द झा "मनु"- २ टा गजल जगदानन्द झा "मनु" दूटा गजल १ अहाँ कखनो तँ बाट हमर घरक धरबै अहाँ बिन हाथ नहि दोसर वरक धरबै निहारै राति दिन हम बाट खाली छी अहाँ कखनो कनी कोनो सड़क धरबै सगर सिंगार टुकली नाककेँ नथिया अहीँ सेनुर पियाजी सिथ परक धरबै मिलनकेँ आसमे साजनसँ हम चललौं गड़ी घोड़ा ज भेटल नहि टरक धरबै हमर जीवन सगर अछि ई अहीँ वास्ते अहाँ बिन छोरि जीवन ’मनु’ नरक धरबै (बहरे हजज, मात्राक्रम- 1222-1222-1222, मतलाक मिसरा-ए-ऊलामे दूटा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानक छूट लेल गेल अछि। मतलाक मिसरा-ए-ऊला सभार, ओम प्रकाश जी, लाइव मोशायरा विदेह फेशबूक ग्रूपसँ (03/03/2012)। २ अहाँ मुस्कैत रही हमरा देखैत रही अहाँकेँ प्रेम गजल नव-नव सुनबैत रही रुसल सजनी जँ रही प्रेमसँ बौसैत रही सगर गुणगान अहाँकेँ हम गाबैत रही मधुरगर बोल अहाँ सदिखन बाजैत रही अहाँकेँ सुनि क सिनेहे हम ताकैत रही अहाँ ढारैत रही डुबि हम पीबैत रही सुनरकी संग हिया रसमे तीतैत रही अहाँ जीतैत रही ’मनु’ हम हारैत रही पिया मनुहारसँ ई जीवन जीबैत रही (मात्राक्रम 1222-112-2222-112 सभ पाँतिमे) -जगदानन्द झा ‘मनु’, मो० न० +९१ ९२१२-४६-१००६ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.४. बद्रीनाथ राय अमात्य- ११ टा कविता बद्रीनाथ राय अमात्य ११ टा कविता १ झुठ बात आब बाज केओ जुनि, सत्य बात हम लिखबे करबौ। अनकर हिंस्सा जँ केओ खेलही, हाथ मचोड़ि हम छिनबे करबौ।।
दंतकथा गढ़ि बन महान नञि, हम चाकके तोड़बे करबौ। तुँहीं चोर आऔर हमरे डँटबें? तीर आँखिमे मारबे करबौ।। तीर तोरापर छोड़बे करबौ।
नोर किएक हमरे हिंस्सामे? हँसी तोहर हम छिनबे करबौ। बालबोध के बाप नञि छिनही, हम नञि ओहिना छोड़बे करबौ।।
नञि सधवाके विधवा करही, तोरा विधुर हम करबे करबौ। समतामूलक राख विचार निज, नञि तऽ बानर एकरबे बुझबौ।।
तुँ साहित्य नञि,घास लिखै छें हम महिंस?जे चरबो करबौ। हम महिंस नञि,चरबो करबौ। स्व हित नञि साहित्य लिख तुँ, तखने हमहूँ पढ़बो करबौ।। हम मनुष्य छी पढ़बो करबौ।
२ मिथिलाकेर महिमा गाबै छी,रखने उन्नत भाल हम। हम सूरज समतावादी छी,छी मिथिलाके लाल हम।। सलहेसक पौरूष रखने छी,लोरीक सन उन्मादी। रामफल मंडल के साहस अछि,सतके लेल विवादी।। वीर पुरुष हम दीना भद्री ,अन्हरिया के काल हम । हम सूरज समतावादी छी, छी मिथिलाके लाल हम।। धनिक लाल मंडल महान,कर्पूरी के छी अनुयायी। कवि कोकिल नागार्जुन के,साहित्यक हम भाषायी।। छी हरिमोहन झाजी हम ,निज दर्शन दी तत्काल हम। हम सूरज समतावादी छी, छी मिथिलाके लाल हम। जैन महावीर धर्मी छी,हम रेणु साहितमर्मी छी। हम मखान ओ लीची के,निर्यातक संङ कृषिकर्मी छी।। संकल्पित निर्भीक निडर छी, कालक लेल विकराल हम। हम सूरज समतावादी छी,छी मिथिलाके लाल हम। । माङनि खवासके खास छी हम, हम मधुर कण्ठ कहबै छी। हम संगीत कला कौशलके मधुर धार बहबै छी।। शिल्प हमर जीवन संसाधन, लम्पट लाल विशाल हम। हम सूरज समतावादी छी, छी मिथिलाके लाल हम। ।
३ मिथिला दर्शनमे निकलल छी, जनकक हम फुलवारी जाएब। चरण वन्दना चननिके करबनि, सलहेसक सान्निध्यके पाएब। । धनिक लाल धन्यसँ कहबनि, काका हमर अहीं प्रतिपाल। बाबूबरही जाय दुदाही, रामेश्वरसँ पुछबनि हाल।। दीना भद्रीक दूत बनब हम , बंठा वीरके फूल चढ़ाएब। कुशमासँ माला लेब कुसुमित, रामफल मंडलके पहिराएब। । लाल दाससँ लेखनी माङब, हुनक चरणमे शीश नमाएब। कहबनि बाबा विधा दियऽ नव, मिथिलाके झंण्डा फहराएब।। हरिहरदत्त हिमालयसँ हम, जनसेवाके सीखब सीख। अनुणय विनय सहित कहबनि हम, फेर जरबियौ शिक्षा दीप।। जगदीश नारायण चौधरीजी के वन्दन करब युगल कर जोड़ि। हुनक चरणमे शीश नमाक' पूजब चरण टटका फूल तोड़ि।। अनुप लाल मंडल महानसँ, जाय लेब साहित्यक ज्ञान। महा महाशयसँ कहबनि हम, दियऽ भीखमे शिक्षा दान।। लोरीक मिथिला लालके पूजब, हुनके लाठीके गोहराएब। हम किराइके किरिया खेलहुँ, लड़ब तखन अधिकारके पाएब। । माङनिसँ संगीत सीखब किछु, गीत विकासक लगनी गाएब। मङलासँ अधिकार भेटत नञि, छीनब तखने पूज्य कहाएब।। कर्पूरी काकासँ पूछबनि , कहू जे न्याय कोना हम पाएब? वी पी मण्डलसँ पुछबनि हम, कहिआ पुनी अहाँ अलख जराएब?
४ कौवाकेर पंचैती बैसल, पहीरि पाग अछि निर्णय भेल। जनसेवाकें काज करि किछु, सत्ता लेल शतरंजक खेल।। विष्ठा पर अधिकार हमर अछि, विष्ठा पौष्टिक च्यवनप्राश। लड़ि लड़ाक'खेलहुँ सब दिन गिद्ध नीति पर एखनो आश।। लोक कहाँ अछि बाँचल बुरिबक जे सुनि लितए बात हमर। बुझलक हमर चलाकी सबटा, सावधान अछि गाँव नगर।। एक मात्र मार्ग अछि बाँचल, भाषा पर किछु काज करी। हम चलाक छिहें पहिनहिसँ, मिथिला राजक नाम धरी।। हम कौवा मर्मज्ञ ज्ञानकेर, मुखिया मात्र रहब हमहीं। ज्ञानक मात्र एक ठिकेदार हम बाँकी सभ कनहा कनही।। गुदा मार्गसँ बाजि रहल छी, गुदा मार्ग अछि देवक देल। झुठ साँच किछुओ हम बाजब, करब चलाकी सत्ता लेल।। हम किनको मैथिल नञि मानब, मैथिल मात्र हमर खनदान। बाँचल आब प्रपंचेटा अछि, पापी पेटक करी निदान।। हम छी दागल साँढ़ प्रतिष्ठित, ढ़ेकरब अछि भाषाकेर मानक। हम जे लिखलहुँ सत्य शुद्ध अछि अछि अशुद्ध लिखल जे आनक।। हम मैथिल छी महा मनस्वी, मिथिला पर हमरे अधिकार। हमर दुष्टता जग जाहिर अछि, मिथिलाकेर हमहीं रखबार।। घर्मक आरि मे बैसि खेलहुँ हम , मलपुआ घृत आऔर मलाइ। दुरूपयोग केलहुँ क्षमताकेर, सत्ता छलि हमर भौजाइ।। धर्मक नेता मिथिला नेता, सभ दलकेर हम नेता छी। बुरिबक लोक बात नञि बुझए, हम ज्ञानक विक्रेता छी।। हम अनाथ छी,जगन्नाथ नञि, रूसली हमर अपन भौजाइ। एकबेरि पुनि चालि चलब हम, मिथिला राजक देब दोहाइ।।
५ अन्तर्व्यथा हमर दुखदारुण, मैथिल सुनब उदारे। वन-वन भटकि रहल छथि मैथिल, खाली देह उघारे।। मिथिलामे मैथिल नञि रहला, एहिसँ नीक बिहारे। सब मैथिल परदेशी बनला, दुर्गति लिखल कपारे।। केलहुँ विकास खुजल मधुशाला, सगरो भेल खिचारे। बिसरि गेलहुँ मैथिल मर्यादा, ब्रह्मा लिखल लिलारे।। सब घरमे अछि ताला लागल, मिथिला भूत विहारे। जागू यौ कर्पूरी काका, करियौ अहीं उद्धारे।। चेतनाशून्य मैथिल कहबैका, कुक्कुड़ भूकनि दुआरे साहित्यिक पुरस्कार छल एकटा, सेहो भेल बेकारे।। घर घरमे रवि शशि छथि सूतल, एहिसँ नीक अन्हारे। हमर प्रपंच हमरे अन्हरौलक, गामसँ नीक बहारे।। मंथन करब परम आवश्यक, मैथिल हमर नचारे। ओछ वुद्धि ओझरौलक बेसी, रखितहुँ उच्च विचारे।।
६ आउ शिष्ट मैथिलजन सुनियौ, हमरो उत्तम श्रेष्ठ विचार। दियौ समाजक सब वंचितकें, ओकर अपन पूरा अधिकार। । परिवर्तनकेर दीप जरइए, केकरो नञि लाचारी रहतै। जे प्रपंचसँ पैघ बनत आब, ओकरे मुँह टा कारी रहतै।। गुरु द्रोणके खोजि रहल छी, लेनदेन आब जारी रहतै। कपटके पाशा आब चलत नञि, शिष्य गुरुपर भारी रहतै।। आब तऽ प्राण लेबै वा देबै गुरुभक्ति हम छोड़ि देलहुँ। आब अंङुठा ओना देबै नञि, हमहूँ दृढ़ निश्चय केलहुँ।। मेटा देबै हम ओहि पापीके, धरती परसँ नाम निशान। भूशायी आब करबै ओकरा, जे माङत अंगुठा दान।। आब शिष्य दान लेत गरदनि, आब अंगुठा नञि भेटत। दुस्साहस जँ केलहुँ आब त', काटल गरदनि फेर कटत।। आब अंगुठा नञि छै सस्ता, विरोध नञि, प्रतिशोध हाएत। दलितक लिखल संविधान छै, आब अहाँके काँचे चिबाएत।। बाबा भीमराव बदलि देलखिन संविधान, आब नञि ओ चलत बात पुरान। दान लेनिहारक नञि हेतैक गुणगान, आब दान देनिहार हेतैक पूज्य आऔर महान। । आब छोड़ि दियौक प्रपंचसँ पाओल स्थान, आब उतरि आउ छोड़ि असमान। हम क लेब अपनामे समावेश, देब काका भैया सन सम्मान। । एहिसँ बेसी आब हमहुँ किछु नञि देब, जे दैत छी अन्यथा सेहो नञि देब। बिसरि जाउ ओ फुसिञाहिक मान गुमान, आब चलतैक देशमे समतामूलक संविधान। ।
७ कवियित्रीक आन्दोलन कनिञाक आन्दोलन आइ सकाले कनिञा कहली, हम सधवा सावित्री। सूर्पनखा सन सुन्दर हम छी, आब बनब कवियित्री।। शब्द चयन आऔर छन्द विधानक, सब मर्यादा तोड़ब। दोषारोपण सहज काज छै, से किनको नञि छोड़ब।। कनिके नाक कटल अछि बाँकी, सब अंग अछि ठीके। पुरुष कृपाण आब भोथ भेल छै, सब पुरुष स्त्रैन भेल छथि, से हमरा लेल नीके।। हमर काव्य प्रतिभा जागल अछि, एहिसँ लाभ उठावी। चमक धमक आऔर त्रिया चालिसँ कवियित्री कहबाबी।। पुरुष समाज सब दिनका बुरिबक, तेकरा किएक गुदानब? व्याकरणो के ताक राखिक' नव आन्दोलन आनब। । पुरुषक शोषण सहब आब नञि, सबके तामब कोरब। प्रेम समर्पण हम नञि जानी, मधुरेमे विष घोरब। । संचित जे अधिकार हमर अछि, लड़ब लेब,नञि छोड़ब। आइसँ चुल्हा हम नञि फूकब, सब विधान हम तोड़ब। । कुसुमासवके प्यासल पुरुषक, काटब हम भँवराके पाँखि। सब नारी हम जागि गेलि छी, निज कल्याणक लागल चाँकि।। मसलि करब व्याकरणके थौआ आऔर सामाजिक मर्यादा। नव व्याकरण गढ़ब अपन हम, गढ़ब नव निज परिभाषा।। पुरुष वर्ग देखितहिं जरि जेता, पहिरब आकर्षक परिधान। देश समाजके बदलि देब हम, गढ़ब अपन अनुकूल विधान। । महिषासुर ससुरके बूझब, भैंसुरके तोड़ब घर्सूर। साउस ननदिके ठाढ़े मर्दब, टोलपड़ोसक चानिके चूर। । खिड़की काटल जिंस के पहिरब, लेब अपन आधा अधिकार। मसलि देब हम पुरुष वर्गके, करब उचित पुरुषक प्रतिकार। । हम कालीके छी अवतार। शाड़ीमे नञि रहब समेटल, पहिरब लैला कट सलबार। सब विधान हम बदलि देब आब, वयस बरस अछि पचपन पार।। पुरुष वर्गके बारि देब हम, पुरुषक आब रहल नञि काज। रहथु उपेक्षित पुरुष वर्ग आब, भिन्नहि राखब अपन समाज। । पुरुषसँ पाग छिनिक' पहिरब, पागमे दाग लगाएब। गद्य पद्यमे भेद रहत नञि , उल्टे धार बहाएब।। अभिसारक नञि रहल प्रयोजन, नञि जाएब अभिसारक लेल । वयस वसन्तक जागल हमरो, पुरुषे टा लेल बनतै जेल।। पुरुषेके जाए पड़तै जेल। मारक मारल हम नारी छी, आब स्वछन्द हम करब विहार। रहब कतेक दिन मारक मारल? सक्षम बनल हमर सरकार। । सक्षम अछि नारीक संसार। ।
८ आउ शिष्ट मैथिलजन सुनियौ, हमरो उत्तम श्रेष्ठ विचार। दियौ समाजक सब वंचितके, ओकर अपन पूरा अधिकार। । विद्यावलसँ व्यक्तिके चिन्हूँ, विद्वानक करियौ सम्मान । ओछ तुच्छ विचार निज त्यागी, तखने मिथिला बनत महान। । अनकर हिंस्सा विष्ठा बुझियौ, अनकर हिंस्साके जुनि खाइ। अनुचित आऔर उचितके बुझियौ, नञि अनुचित आब करी कमाइ।। नञि केओ छोट,पैघ नञि केओ, समतामूलक गढ़ू समाज। सम्मानक आदान प्रदान हो, अन्यथा आब चलत नञि काज। । जे बराबरीक करत विरोध आब, ओ समाजमे बारल जाएत। हमर बातके बुझियौ मैथिल, देखबै वएह अछूत कहाएत।। आब प्रपंचसँ पैघ बनब जुनि, नञि भेटत समुचित सम्मान। असगर पैघ अहींटा सभसँ, लगले माङल जाएत प्रमाण। अहाँक घऽर घृत गंग बहै छल, नञि प्रमाण लेल सूँघब हाथ। पूर्वज अहाँक छला घृत खौका, के बुरिबक ई मानत बात। । आब प्रपंचक गढ़ी कथा जुनि, बेर बेर अपमानित हाएब। झुठ बाजि सम्मान लेब जँ, जे नञि चाही सेहो पाएब। । नञि विचार जँ सुन्दर राखब, फूटल माटिक बासन हाएब। समतामूलक अपन विचारसँ सोनासँ कुन्दन बनि जाएब। । अपन कुवुद्धिके करु नियंत्रित, सदवुद्धि सम्मान दियाउत। आब अन्हरिया नञि बाँचल छै, शिष्ट आचरण पूज्य बनाउत। ।
९ हम सम्मानक बेसी भूखल, कनिञासँ हम दान मङललियनि। करैत निवेदन हाथ जोड़ि हम, हम पैंच सम्मान मङलियनि।। रसवन्ती हम रससँ मातलि, सद्य: हम सावित्री। वेलना देखा डेराक' कहली, हम भेलहुं कवियित्री।। झरकल सनके मुँह अहाँके, छुतहर फूटल बासन। अभिसारोमे सार कहाँ अछि,? नञि सुनब हम भाषण।। दाँत टुटल देह महकैए, हमरासँ रहि दूरे। आब अहाँसँ बात करब तऽ, लोक करत दुर दुरे।। मनक मनोरथ जरले रहल, कहियो किछु नञि पूरा भेल। यौवनके किछु मोल रहल नञि यौवन हमर अकारथ गेल ।। हम यौवनके करब प्रदर्शन, हमर काव्यके भाषा ई। अपने सनक रचब हम रचना, रचनाके परिभाषा ई।। मिथिलामे आब वऽर कहाँ छै, बरद भेटइए गामे गाम। जिन्से नीक लगइए हमरो, हम एहिना आब रहब उदाम।। रिल बनाक' करबै नाम।। आँखिमे लाली गालमे काजर, दाँत रङब पैररङ्गगा। हम थालेमे खूब नहाएब नाम देबै हम गंगा।। अन्हरा डिठरा बनल समीक्षक एहिसँ लाभ उठाबी। कविता लेखनमे की राखल? पुरस्कार किछु पाबी।। हम सम्मानित कवियित्री छी, हमर बातमे जुनि दी झीक। अहूँ कोनो की मनुखे छी आब?, अहाँसँ कुकुड़ बिलाइए नीक। कोनाक' बुझब मनुख अहाँके यौवनके नञि अर्थ बुझै छी। हम भेलहुँ चीरकाल कवयित्री, हमरा किएक तदर्थ बुझै छी।। बनब द्रौपदी पाँच पतिके, हम पंचाली नारी। अहाँ बनी जुनि दशरथ कहियो, रहू राम व्रतधारी।। अहाँ वऽर नञि हम नञि कनिञा, नञि जाएब अभिसारे। घवहा कुकड़क संग रहब नञि, करब स्वछन्द विहारे।।
१० हमर सुकुमारि सारि बेस वुधियारि छथि, कामना अनन्त आऔर मन कलहन्त छनि। बिगड़ल बोलके ओ कविता कहैत छथि, मनमे दबल बात बहुते जिबन्त छनि।। मनमे मलाल मुदा बहुते जिबन्त छनि। हुनके अपान वायु कविता कहाइत छै, थूक आऔर खखार हुनक कविते भऽ जाइत छै। कखनो कहैत छथि कविता सलील हम, बिगड़ल बोल हुनक छन्द बनि जाइत छै।। हुनके अपान वायु कविता कहाइत छै, हुनके कहब हमर दग्धल अंग अछि। कखनो कहैत छथि कविता सलील हम, कखनो कहैत हमर अंग रास रंग अछि।। पोखैरमे नहाइत छथि माछ मरि जाइत छै, हुनका देखैत कमल फूल कुम्हलाइत छै। हुनक सौन्दर्य देखि दृष्टि चोन्हराइत छै, हुनके देखैत आइ सृष्टि ई लजाइत छै।। तावा सन तपैत देह माघमे घमाइत छनि, हुनका देखक लेल लोक ललचाइत छै। देह हुनक दावानल गर्मी बढ़ौने छै, देह हुनक आइ देवाहारमे गिनाइत छै।। गंडकी के गंड सन पौलनि पवित्र मुँह, लोक हुनक ऐंठ परसाद बुझि खाइत छनि। मनमे मकार पंच लाजो नञि लागैनि रंच, सब रस लेलाक बादो मन छुछुवाइत छनि।।
११ देश विकाशक;नगर समाजक, कथा मार्मिक सुनबै छी। केलहुँ अछि उपलब्धि हम जे, से सबटा हम गनबै छी।। राजनीतिक जल पेय रहल नञि, सुगरे नहा रहल अछि। जेम्हरे देखियौ राजनीतिमे, विष्टे दहा रहल अछि।। हेहर थेथर आँकड़ पाथर, भ्रष्टशिरोमणि मुखिया भेल। सुगरक खुँर के पूजा होइए, कुकड़क मुँह गमकौआ तेल।। कनहा कुत्ता प्रतिनीधि अछि, गिद्ध बिलाइ विचारक। हरियर-हरियर फसिल चरइए, साँढ़ समाज सुधारक।। नञि पौरूष नञि पाग माथ मे, ताञि राजनीति स्तरहीन। सत्ता सुन्नरि विलासिता मे, भाँङ खाय सूतलि अछि नीन।। सोलह सिङार कुतिया मुखमंडल, आँखि मे काजर लाली ठोर। अंगप्रदर्शन करैत चलइए, ऐंठि नगर मे पहीरि पटोर।। अनहरिया के जन्मल बालक, अनहरिया मे करइए खेल। अनहरिया के पूजा होइए, बिनु बाती दीपक ओ तेल।। साँढ़ पहिरने खाधी कुर्ता, कुम्भकरण सन ढ़ेकरि रहल अछि। जिन्दा पर अधिकार ओकर छै, मुर्दा खाक'अकरि रहल अछि।। कौआ मेना शिक्षक भेल अछि, गिद्ध सियार अधिकारी। शिक्षा क्षेत्र के करलक सभटा, भ्रष्ट साँढ़ सरकारी।। अर्थे टा सँ छनि अपेक्षा, कहबै छथि अध्यापक। ज्ञान अधुरा बाँटि रहल छथि, नञि विचार छनि व्यापक।। चोटी चानन हकन कनइए, दाढ़ी बैसल को कोड़ा मे। राम रहीमक राजनीति अछि, लागल लोक निहोरा मे।। मुक्ताचारी गगन विहारी, वाहन व्योम विहार मे। भ्रष्टाशिरोमणि उँच्चासन पर, बैसल अछि सरकार मे।। जाति धर्म आऔर भाषा क्षेत्रक, जन-जन पर अधिकार जमौने। चाटुकार हमहीं छी दोषी, प्रतिनिधि परिवेश घिनौने।। प्रतिनीधि पतित बनि बैसल, आँखि मे हुनका मोतियाबिन्द। नैतिकता के बेचि खेने छथि, सूतल छथि कुंभकर्णक निन्द।। चौंसठ आवरण अंगप्रदर्शन, विषवाला सन बनि घुमइए। प्रणय घड़ी मे प्रणय निमंत्रण, कुत्ता के ललकारैत दइए।। मंदिर -मस्जिद के झगड़ा मे, विद्या-वैभव भेल समाप्त। भ्रष्टाचारक मेघ लगइए, सगरो अछि अनहारे व्याप्त।। अर्थ प्रतिष्ठित अर्थक भूखल, पौरूष के ललकार दैत अछि। हम यदि किछु बाज' चाही, नञि बाजक अधिकार दैत अछि।। जनम-जनम के भूखल प्यासल, प्रतिनीधि आऔर पंच बनइए। नंगा ओ भीखमंगा मिलिक' बाढ़ि मे व्योम विहार करइए।। देह पेट जेकरे छै भूखल, बनल प्रमुख प्रखंडक। सतहन्ता सरपंच बनल अछि, ताञि विकाश अछि बन्धक।। पाप पचाब' मे जे सक्षम, पंचैतिया अछि भेल महान। वुद्धिजीबी विद्वान कात छथि, पायबला परसइए ज्ञान।। भ्रष्टाचारक भूसा खाक', भैंसा कागभुसुन्डी भेल। विधि विधान अछि विधवा बुढ़िया, नगरवधू सतवन्ती भेल।। आय अन्हार इजोत के घेरने, माङि रहल रंङदारी। शिखर शीर्ष पर रावण बैसल, सीता विकल बेचारी। लाठी पर अछि टिकल लोकतंत्र, जन-जन छथि लचरल लाचार। भारत भाग विधाता लिखलनि, ठुठ लेखनी हमर कपार।। राजनीति मे भेड़चार अछि, पृष्ठक पोषक धूर्त सियार। ध्वजा के वाहक बेचि खेलक अछि, सत्ता के चुनरी सलबार।। शिक्षा विभाग मे पात्र अशिक्षित, स्वास्थ्य विभाग बिमार पड़ल। चाटुकार आऔर चमचा चारण, चलबइए सरकार मरल।। राजनीति अछि सुगरक झगड़ा, विष्ठा पर अधिकारक। अपन पेट आऔर विलासिता लेल, संरक्षक संहारक।। जे पेटु अछि भरल प्रपंचे, उदरकुण्ड छै थाली। विष्ठा पर अछि घात लगौने ज्ञानक वैभवशाली।। निर्लज नीच जीभ कुक्कुर सन, अछि ज्ञानक पपियाहा। वएह समाजक शिरोमणि अछि, भोज खौका जिबलाहा।। हमर घर अनहारक राज मे, अछि इजोतक आशा। कहिया देखब पूर्ण चन्द्रमा, एतबे अछि अभिलाषा।। -बद्रीनाथ राय अमात्य, ग्राम पोस्ट करमौली, भाया कलुआही, जिला मधुबनी बिहार ,फोन 6205190859 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.५. रामकृष्ण परार्थी- ९ टा पद्य रामकृष्ण परार्थी १ सदा नहि रहत अहांक साहिबी त’ ई गौरव गुमान कथी लेल एक दिन जाएब निश्चित छैय एतेक स्वार्थक समान कथी लेल हिटलर हलाकु चंगेज खां सभकेँ रहैक विश्व विजेता’क दंभ दफन भ’ गेलै सभ एहि धरतीमे देहक अभिमान कथी लेेल जा धरि जीबैत छी लोककें सिक्त कैयने रहु प्रेम-करुणासँ काँहि कलह ईर्ष्यासँ बनौने छी हीयाकें रेगिस्तान कथी लेल मरिक’ जिअत रहबाक अछि त’ करहिं पड़त नीक कर्म फेर ठक-फूसियाहीमे करैत छी समय जिआन कथी लेल सत्य अहिंसा क्षमा दया करुणा यैह छैक सभ धर्म’क आधार धर्म रक्षाकें नाम पर करैत छी मानवताकें नुकसान कथी लेल जिनगी सफल अछि जँ हीयामे अछि सेवा परोपकार’क भाव फूसिओके अहां घूमि रहल छी चारु तिरथ धाम कथी लेल २ अहाँ पाखण्डवाद’क शिकार छी कोना कहबै अहाँ हम आमजनक साहित्यकार छी एखनो धरि अहाँ ब्राह्मणवादक परिधिमे ठाड़ छी दलित विमर्श’क नाम सुनि अहाँकें उठैत अछि तामस स्त्री विमर्श सुनबा लेल अहाँ कखिनो नहि तैयार छी लोक कहैत छैक धर्मसँ पैघ होइत छैक मनुक्खता धर्मरक्षाकेँ नाम पर अहाँ तरुआरि लेने ठाड़ छी अहाँ कोना लिख सकब शोषित-वंचित’क अधिकार शास्त्रानुसार अहाँ विशेषाधिकार”क पक्षमे ठाड़ छी अहाँ नहि लिख सकैत छी दलित-वंचितक दुख-व्यथा एखनो अहाँ ऊँच-नीच बला पाखण्डवाद’क शिकार छी अहाँमे हेबाक चाही छल वैज्ञानिक सोंच-बौद्धिक चेतना मुदा अहां गाय’क नागंरि पकडि वैतरणी पर ठाड़ छी आमजन”क साहित्य लिख’ लेल चाही समता’क भाव आ अहाँ जातीयदंभ छोड़’ लेल कथमपि नहि तैयार छी ३ ओकरा आरक्षणसँ चाकरी कि मिलल’य घमंड भ’ गेलै आब अपन लोक ओकरा लेल बुड़िबक उदंड भ’ गेलै जे ओकरा अछोप कही पहिने करैत रहैत छलै अपमान आइ-काल्हि ओकरेसँ ओकरा घनिष्ठ संबंध भ’ गेलै आब ओ जल्दी नहि बैसैति अछि अपना समाजमे थोड़ेक पढि-लिख’ कि लेलक विद्वानक दंभ भ’गेलै आब जय भीम कहयमे ओकरा लगैत छैय बड़ लाज मनुवादी-ब्राह्मणवादी लोकसँ आब ओकरा संग भ’ गेलै ओ लागल रहैत अछि अपन पहिचान छुपाबक व्योंतमे दु-चारि दिन मंदिर की गेलै ओ पूरा डपोरशंख भ’ गेलै “परार्थी” आब ओ मोजर कोना करत अपन समाजकें रिश्वत खा-खाक’ आब ओ एकदमसँ मुसडण्ड भ’ गेलै ४ ओ कुत्ताकें भैरव आ सुगरकें विष्णु भगवान कहैत छैय मुदा इंसानकें डोम दुसाध चमार कही अपमान करैत छैय अजीब विरोधाभास भरल छैय ओकरा व्यक्तित्वमे ओ सभसँ धृणित पोथीकें प्राचीनतम संविधान कहैत छैय ओ आडंबरकें बुझैत छैय अपन खानदानी कारोबार तइयो लाज नहि लगैत छैय अपनाकें विद्वान कहैत छैय शातिर छैय ओ अंधविश्वासकें जोड़ि दैत छैय विज्ञानसँ लोक नादान छैय गप-गपमे ओकरा प्रणाम कहैत छैय ओ बिनु मेहनतिएकें जिनगी गुजारैत छैय एशो-अरामसँ छल प्रपंच ठग फुसियाहीकें ओ अपन काम कहैत छैय ओ मानव हित लेल नहि केलकै एगो सुईयोकें अविष्कार मुदा अपनाकें एहि धरती’क सर्वोत्तम इंसान कहैत छैय अपना वर्चस्व लेल खँसि सकैत अछि ओ सिमानसँ नीचाँ “परार्थी” ओ धर्मक अढ़मे उल्टा-पुलटा काम करैत छैय ५ जे धरती पर नहि छलैय ओकर इतिहास लिख देलकै कलम हाथमे अबिते ओ झूठ-फूसि’क बात लिख देलकै दैत्य दानव राक्षस ई प्रवृति भ’ सकैत अछि इंसानक ओ आदमीकें सींग, सूँड़ देखबैत धर्मशास्त्र लिख देलकै गारंटी लैत छैय आकाशमे हम रजिस्ट्री करबा देब स्वर्ग जे संभव नहि छैय कहिओ ओ बकबास लिख देलकै ओ बेइमान अपना पुरखाकें देलकै देवता’क उपनाम आ अनका पुरखाकें राक्षस कही उपहास लिख देलकै अपना वर्चस्वकें ल’क ओ रचैत रहलै सभदिन प्रपंच स्वतंत्रता सामताकें दुश्मन न्याय-शास्त्र लिख देलकै ओकर अदखोइ-बदखोइ आब केतेक करत “परार्थी” आदमी रहितो ओ जानवर बला सभ स्वार्थ लिख देलकै ६ हरेक गमसँ हम अपनाकें आजाद रखैत छी जिंदाबाद छी अपनाकें जिंदाबाद रखैत छी मरबाक अछिए त’ कथिकें चिंता-फिकिर एहि सोचकें हम सदिखन आबाद रखैत छी डर-भय त’ अछि नहि हमरा मिसिओ भरि जुर्म’क विरोधमे हम बुलंद आवाज रखैत छी अपना विद्रोही तेवर पर गुमान अछि हमरा विचारमे हम सदिखन इंकिलाव रखैत छी हम नहि बनय चाहैत छी जीबैत जी लहास जीबैत छी अपनाकें जिंदाबाद रखैत छी ७ अहांक धर्म आस्था विश्वास ल’क हम की करब अहांक पुनर्जन्म बला बकवास ल’क हम की करब एकलव्य शंबूक’क प्रसंग बुझल अछि हमरा हमरा लेल उपहास अछि धर्मशास्त्र ल’क हम की करब हमरा नहि लोभ दिअ जे भ’ जेतौअक स्वर्गक प्राप्ति धरती पर नहि मिलल त’ आकाश ल’क हम की करब पितृपक्षमे पिंडदान हास्यप्रद बुझना जाइत अछि हमरा केतबो अहां कहब त’ अंधविश्वास ल’क हम की करब वैदिक सभ्यता-संस्कृति केर गौरव-गुमान हेत अहाकें हमरा लेल घृणित अछि ओ इतिहास ल’क हम की करब सभदिन हमरा अछोप कही प्रताड़ित करैत रहलहुं अहां हिन्नू कही कहब दंगा कर’ त’ फसाद ल’क हम की करब ८ धाराकें विरुद्ध लिखब छैय बड़ मुश्किल काम नहि मिलत मंच-माला-पाग आ नहि मिलत सम्मान साहित्य लिखतहुं अहां बारल रहब साहित्य समाजसँ षडयंत्र रचल जाएत एना, जेना दुश्मन छियै पुरान बड़ गोधियागिरी चलै छैय साहित्यकारक समाजमे वरिष्ठजनकें रहै छनि अपना जाति बला पर धिआन अहां अधलाहे सही मुदा लिखु मनुवादीए विचारधारा मिल जाएत मिथिला रत्न आ मिथिला विभूति सम्मान अहांक कलममे धार अछि मुदा नहि चिन्हत अकादमी परामर्श मंडलमे सेहो कब्जियौने छथिन वैह सभ स्थान मुदा मुख्य धारामे लिखलासँ हेरा जाएब अहां भीड़मे आ धाराकें विरुद्ध लिख’क बना सकैत छी पहिचान ९ जिनगी भरि जे करैत रहलहुं तेकर इनाम नहि मिल’ल मरैत रहलहुं जेकरा लेल ओकरोसँ सम्मान नहि मिल’ल मिल’ल मारिते रास धूर्त सभ जे दोस्त बनि’क लुटैत रहल जेकरा पर अपन हीया लुटबितहुं ओ समांग नहि मिल’ल सोचने रहुं फूल जका रखने रहब सदिखन ठोड़ पर मुस्की आँखिमे नोर मिल’ल मुदा ठोड़क मुस्कान नहि मिल’ल फूल बनलहुं मुदा रस्ताकें सदिखन होइत रहलहुं लतखुर्दन फूलदान’क फूल जका हमरा कहियो सम्मान नहि मिल’ल दुनिया छैय जीबहिं पड़त ई बुझैत छियै खूब नीकसँ हम्हुं मुदा जीबय लेल कम-सँ-कम धरि सरमजान नहि मिल’ल जिनगीकें प्रतियोगिता बु्झि सफलता’क रखलहुं लौल भाग-दौड़क जिनगीमे कहियो सुकून आराम नहि मिल’ल कि कैलहुं कतेक कैलहुं तेकर हमरा नहि चाही हिसाब दुख अछि पाँखि रहितहुं उड़ै लेल आसमान नहि मिल’ल -साहित्यिक नाम: रामकृष्ण परार्थी Ramkrishna Pararthi; मूल नाम: रामसिफीत पासवान Ramsiphit Paswan; पिताक नाम: स्व पशुपति पासवान; माताक नाम: श्रीमती मुनरी देवी; जन्म तिथि: 04-04-1977; शिक्षा: बीए प्रतिष्ठा (इतिहास); वृति:भारतीय रेल (जूनियर इंजीनियर); जाति:- दुसाध; स्थायी पता:- ग्राम- बिचखाना, पोस्ट -एकतारा, थाना- अरेड, जिला- मधुबनी (बिहार) 847222; पत्राचार पता:- रेलवे कालौनी रमना, जिला- गढवा, झारखण्ड; मोबाईल/ वाट्सेप:- 7766906778, 9153537731; ईमेल:- rkparthi04041977@gmail.com; साहित्य उपलब्धि:- कर्त्तव्य पथ (हिन्दी काव्य संग्रह)वर्ष 2019, अहिंसात्मक प्रतिशोध ( हिन्दी उपन्यास) 2019, दू पटरीक बीच (मैथिली काव्य संग्रह) वर्ष 2020, प्रतिकार एखन बाँकी अछि (मैथिली काव्य संग्रह वर्ष 2022), विद्रोही बसात ( मैथिली काव्य संग्रह वर्ष 2024); लहास अबिते रहत (मैथिली उपन्यास वर्ष 2025); सम्मान एवं पुरस्कार:-क) साहित्य शिल्पी सम्मान (नराकास, धनबाद), 2019; मैथिली साहित्यिक सांस्कृतिक समिति, मधुबनी द्वारा वर्ष 2021 केँ नवहस्ताक्षर पुरस्कार; मैथिल समाज, रहिका द्वारा वर्ष 2023 मे यात्री पुरस्कार। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.६. बिन्देश्वर राय"विवेकी"- लुप्त होईत "मिथिला" बिन्देश्वर राय"विवेकी" लुप्त होईत "मिथिला"
शामा, कौनी,मरुआ, मौनी ढकना,सरबा भेलै विलुप्त। अल्हुआ अभागल घर सऽभा गल चिक्कस,चाउर सब भेलै लुप्त।।
बाबाक पैंना,दायक बैना कोठी-भरली गेलै फुईट । सिक्का,सिक्की,चंगेरा-चंगेरी उख्खड़ि,समाठ सब गेलै टुईट।।
घैला,तौला,दहीक मटकुरी शनै: शनै: सब भेलै गायब। ढ़ेका-ढ़ेकी,ढ़किया,पथिया ई सगरो नहिं कतौ पायब।।
पौती,पेटारी ,बाबाक बखारी महफा,कहार के भेलै विदाई । टारा,टारी,डाली-हारी चित्ति सुपाड़ी ने आब कियो खाई।
बड़दक आंती,जाड़क गांती केथरी,चेथरी गेल पड़ाई । नवकी कनिया देहक अंगिया शाम-चकेवा गेल हेराई ।।
खापड़ि-खुड़पी,सिड़की-सुड़की जट-जटिन आब भेलै विरान। अरुआ,फरुआ,तरुआ,भरुआ आब ने कतौ तिलकोरक मान।।
तौनी,दौनी,पौनी,पसारी मेह,खुंटा ने कतौ कड़ाम। कनिया-पुतरा,चटिया-खटिया आब ने कतौ भेटय खड़ाम।।
बौआ-बुच्ची,लुच्चा-लुच्ची खुरलुच्ची के भेल अभाव। नांगट,भांगठ,सांकट ने कियो सगरो छोड़ल अपन स्वभाव।।
बुड़बक, काबिल,माझिल,साझिल आब ने कतौ भेटय अमोट। बिन आमिल तरकारी छमकै 'बड़ी' दिन-दिन भेलय छोट।।
ककरो घर ने जांत भेटय छै लोड़ही-सिलौट भेलै सुकुमार। चटगर-चटनी सौउस बनल छै सर-समाज में पड़ल दड़ार।।
गोनैर-डोरी,पेन्टक छोंड़ी सिपटीपीन आब गेलय चुईक। डिबिया-बाती,पिटै छाती मटियो तेल आब गेलय हुईक।।
हर-पालो आ लागनि टुटल संगहि छिटकल जोति-कनैल। बान्हल बड़द बौउख गेलय आब साउर-चड़क वा होई वो कैयल।।
कुसियारक ने रस चुबै छै दुद्धी भेटय ने कोनो ठाम। लबका-लबका आईटम भेटय जहड़क पुड़िया गामे-गाम।।
बथुआ-बिड़िया बातें सोन्हगर कुम्हरौरी के भेलय तालाक। चड़-चड़ौरी,बड़, अदौरी सबटा मनोरथ भेलय खाक।।
ठांऊ-पिड़ही,पाहुन-पड़क आ बाट-बटोही भेलय गौण। शेर-पशेरी,कनमा, शोरे लबादुआ ने जोखै मोन।।
ओरिका,तामा,दाईब दैईब गेल रह्हि रहि गेल ठारहि-ठाड़। नेना-भुटका भेलय अगत्ती डाबा,कोहा के फोड़ल कपाड़।।
ओरियानी,ओसारा हटलै खाम्ह,बड़ेड़ी करय किलोल। कोरो-बाती,बन्हन बाजल घर-दुआरि में छै बड्ड झोल।।
गोड़ा-गोड़हा,लोड़हा-ओड़हा सागक-भक्खा खाईथ आईर। सजबी-दहीक खौर पौड़ल अछि कलहा के सब परहैन गाईड़।।
बोगली,बटुआ,बिष्टी,धरिया डोरर,लंगोटी,नांगट भेल। डराडोईर ने डांर धरै आब अपनेहि में सब झंझट कयल।।
हेहर-थेथर,आगर-बागर छागर के फाटल छछनार। पाठा-पाठीक पीठ सैट गेल नार-पुआर आब भेल बीमाड़।।
चुल्ही,जाड़ैन,लाड़ैन लड़ि गेल मुरही संग भागल कंसार। बीचहि बांट में लाई भेट गेल जा बैसल सब हाट-बाजार।।
परतानक ने तान सुनै छी सुनी पराती नहिं भोरे-भोर। दाई-माई नहिं सांझ गबै छथि सगरो 'मिथिला' ढ़ारथि नोर।।
-बिन्देश्वर राय"विवेकी", गाम - नवकरही, भाया-अड़ेर, थाना-अड़ेर, जिला-मधुबनी(बिहार) पिनकोड:-847222 मोबाइल नं-7004765952 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.७. तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम'] मूल तेलुगु: नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव) मैथिली अनुवाद: मानेश्वर मनुज [खण्ड ३] तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम' केर लेखक छथि नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव)] मूल तेलुगु लेखक नग्नमुनि एक परिचय नाम: मानेपल्लि हृषीकेशवराव जन्म: 15 मई 1940 जन्म स्थान: शहर- तेनाली, जिला- गुंटूर (आंध्र प्रदेश) वृत्ति: चीफ ऑडिटर, आंध्र प्रदेश विधान सभा, तकर बाद डिप्टी सेक्रेटरी, ओतहि लिंक: पहिने साम्यवादी (कम्युनिस्ट), बादमे राष्ट्रवादी (नेशनलिस्ट) संस्था: अविभाज्यक जनतंत्र, 1990 आंदोलन: दिगम्बर कविता आन्दोलन 1965 लक्ष्य: नंगट, भूखल, दीन, दरिद्रक हित कृति: उदयिंचनि उदयलु (ओ उदय जे उदित नहि भेल) पूर्वा हवा जम्मि चेट्ट विशेष: 1977 ई. मे बहुचर्चित काव्य- 'कोय्या गुर्रम' (KOYA-GURRAM), जकर अर्थ अछि- 'काठक घोड़ा', भाव- 'नकली सरकार'। 19 नवम्बर 1977, शनि दिन बंगालक खाड़ीमे पचास-साठि फुट ऊँच लहड़ि उमड़ि कऽ कृष्णा जिलाक दिविसीमा क्षेत्रकेँ डुबा कऽ नष्ट कऽ देलक। हजारो लोक मारल गेलाह। ई घटना काव्यक वस्तु बनल। विषय आ परिस्थितिसँ उपजल ई काव्य हिन्दी कवि मुक्तिबोधक 'अंधेरे में' क बराबरीक अछि। मैथिली अनुवादक नाम: मानेश्वर मनुज जन्म: गाम- गम्हरिया (बेनीपट्टी) मधुबनी। जनवरी 1958 (प्रमाण पत्रक अनुसार)। वृत्ति: भारतीय नौसेनामे तकनीकी सहायक, तकर बाद भारतीय रेलक वाणिज्य विभाग सँ (रिटायर्ड)। कृति: 'सम्बन्ध', कथा संग्रह (मैथिली) 2007 'कि', कविता संग्रह (मैथिली) 2011 'परिवर्तन', कहानी संग्रह (हिन्दी) 2019 'बेघर', कविता संग्रह (हिन्दी) 2022 'तालाब', कहानी संग्रह (हिन्दी) 2024 अनुभव: विभिन्न भाषा सँ हिन्दी आ मैथिलीमे अनुवाद। हिन्दी आ मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिकामे लेख, कविता, कथा, कहानी इत्यादि प्रकाशित। अनुवादकक टिप्पणी: अनेक तेलुगुमित्र, स्वयं नग्नमुनि जी, हिन्दी तथा अंग्रेजी मे अनुदित पुस्तकक मदति सँ दीर्घ काल तक मंथन कयलाक बाद अनुवाद कयल गेल अछि। ई नग्नमुनिक प्रसिद्ध कविता अछि। नग्नमुनि सँ लगातार हमर पत्राचार होइत छल। ओ अंग्रेजी आ तेलुगुक विद्वान छलथि। हुनक किछु पत्र देसिल-बयना, हैदराबाद मे छपल अछि। -मानेश्वर मनुज सम्पादकीय टिप्पणी (खण्ड-३) खण्ड ३- कविक प्रतिज्ञा आ सत्यक खोज- प्रस्तुत खण्ड "काठक घोड़ा" काव्यक सबसँ छोट किन्तु अत्यन्त मार्मिक आ घोषणात्मक हिस्सा अछि। जतय पहिनेक खण्ड मे कवि झूठक पर्दाफाश, शोषणक चित्रण आ प्रलयक वर्णन कऽ रहल छलथि, ओतय खण्ड ३ मे कवि स्वयं अपन काव्य-साधनाक प्रतिज्ञा लैत छथि। ई कोनो बाहरी यथार्थक नहि,वरन् कविक अन्तरंग प्रतिबद्धताक उद्घोष अछि। "हम शाइत एक्के टा गीत गबैत छी�": ऐ पंक्तिमे 'एक्के टा गीत' शब्द कविक एकनिष्ठता, एकाग्रता आ अटूट समर्पणक प्रतीक अछि। ओ कहैत छथि जे शाइत हम जीवनभरि एकही गीत गाबैत रहब, एकहि सत्य, पीड़ा आ संघर्षक स्वर। ई संकेत अछि जे कवि अपन सम्पूर्ण रचनात्मक शक्ति कोनो फैशन वा बदलैत प्रवृत्तिक लेल नहि, अपितु शोषित-पीड़ितक पक्षमे समर्पित कऽ देबय चाहैत छथि। "पेट सँ एक अंतड़ी बाहर निकालि कऽ, एकतारा बनाकऽ�": ई अत्यन्त क्रूर आ जैविक बिम्ब अछि। अंतड़ी शरीरक भीतरक सबसँ गहीर, कोमल अंग। कवि कहैत छथि जे अपन भीतरक अंतड़ी निकालि कऽ ओकर एकतारा (एकतार वाद्य) बना लेब, आ ओकरा बजाबैत गली-कुच्ची घुमब। तात्पर्य ई जे सत्य कविता बाहर सँ उधार लेल भाव वा अलंकार नहि, वरन् अपन अंतरात्माक अंतड़ी सँ निकलल चीत्कार होइत अछि। अपन भीतरक वेदनाकेँ तार बना कऽ बजाएब तखने कवितामे प्राण अबैत अछि। ई दिगम्बर कविता आन्दोलनक मूल भावना अछि- नंगटे होइत, सब आवरण हटा कऽ रचना करब। "सत्य केँ सुनि सकऽवला कानक तलाश मे, हवा पर सवारी कऽ, सम्पूर्ण विश्व छानि मारब।": ई समापन पंक्ति कविक विराट खोजयात्राक घोषणा अछि। ओ सत्य केवल अपने कहबाक लेल नहि करता, ओ सुनयवला कानक तलाश करैत छथि। तात्पर्य ई जे सत्य बहुत लोक कहैत अछि, मुदा सुनयवला तैयार नहि अछि। कवि पाठक बा श्रोतामे ओही सत्य-ग्रहणक सामर्थ्य उत्पन्न करय चाहैत छथि। 'हवा पर सवारी कऽ' ई बिम्ब सीमाहीनता, निर्भौतिकता आ स्वतन्त्र आत्माक प्रतीक अछि- ओ कवि जे कतहु ठहरैत नहि, बन्धनमे बँधैत नहि, सत्यक खोजमे दुनिया छानि मारैत अछि। केन्द्रीय भाव: खण्ड ३ एकटा सङ्क्षिप्त काव्य-प्रतिज्ञापत्र छी। एहिमे कवि अपन स्थिति स्पष्ट करैत छथि: (१) हम एकनिष्ठ छी, (२) हम अपन अंतरात्माक अंतड़ी तक जाएब, (३) हम सत्य सुनयवला कान खोजब पूरा दुनियाँमे। यएह प्रतिज्ञा आगूक समस्त विध्वंस आ सृजनक धुरी बनैत अछि।- गजेन्द्र ठाकुर नग्नमुनिक तेलुगु काव्य 'काठक घोड़ा' (कोया गुर्रम) खण्ड-३ ३ हम शाइत एक्के टा गीत गबैत छी आ ताजीवन एक्के टा गीत गबैत रहब पेटसँ एक अंतड़ी बाहर निकालि कऽ एकतारा बनाकऽ ओकरा बजबैत गली कुच्ची गीत गबैत फिरैत रहब। सत्य केँ सुनि सकऽवला कानक तलाश मे हवा पर सवारी कऽ सम्पूर्ण विश्व छानि मारब। -मानेश्वर मनुज आदर्श नगर कॉलोनी गोशाला रोड मधुबनी पिन - 847211 मो. - 9920674861 / 7464077106 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.८. राजदेव मंडल- खाली पन्ना/ भीतरिया कानब राजदेव मंडल खाली पन्ना/ भीतरिया कानब १ खाली पन्ना
खाली पन्ना पूर्णत: उज्जर आगू मे राखल अछि । हाथ मे चुप्पी साधने कलम अछि आ हम उधियाइत विचारक समुन्दर मे हेलैत-डूबैत हथोरिया मारैत कते सँ कते पहुँच गेल छी उगि रहल छी डूमि रहल छी तखैन एकटा हाथ हमरा हाथ केँ सहारा दैत अछि । पुनः ओहो हाथ छूटि जाइत अछि धारा खैंच लैत अछि बेसहारा भए भसिया रहल छी देखि रहल छी आगाँ मे दोसर अनजान सहारा मुदा मध्य मे अछि कठिन बाट। लगाबै पड़त अपन तर्क आ बुइध पता नै ओते पहुँचब कखैन तक साँस बचत आकि डूमत तखैन तक। (१३.०२.२०२६) २ भीतरिया कानब हमरो मन होइए जे बोमियाक कानि बपराहाइड़ काटि अहीं जेकाँ खसाबी नोर । अहाँक नोर सब देखैत अछि अहाँक कानब सब सुनैत अछि अहाँक सब दैत अछि बोल -भरोस अहाँक कतेक स्वतंत्र छी कनवाक लेल मन हल्लुक होएत हैत करैत ई खेल समेटि लैत होएव सभक संवेदना । मुदा हमरा भीतरिया कानब के सुनत ? के जानत हमरा अन्तर्वेदना के कुहि होएत मन केँ? हम कतेक परतंत्र छी प्रत्यक्ष में कानियो नै सकै छी हिरदय खोलि केँ। अहाँक नोरक लेल सांत्वना हमरा नोरक लेल कठहंसी । हमरो कानल होएत अछि मुदा हम रोकने छी नोर अहाँक बचेबाक हेतु तैँ अहाँक लेल हम पत्थर सन । (१४.०२.२०२६) -राजदेव मंडल, मो:9199592920, ई-मेल:mandalraj@gmail.com
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गए हाल TOME I-IV / VOLUMES -00 | A Parallel History of | Mithila & Maithili Literature with Critical Appreciations of Representative Maithili Writers 2 Reg = by | | GAJENDRA THAKUR | editor, Videha eJournal VIDEHA + PARALLEL LITERARY MOVEMENT se + ISSN 2229-547X - est. 2000 - Delhi - MMXXVI
FROM THE SERIES The Videha Parallel Library a centuries of Maithili letters — from the Buddhist Charyapadas | of the eighth century to the digital insurgency of the twenty-first — | gathered under a single critical lens. Across one hundred volumes the | Videha Parallel Library has assembled the suppressed, the neglected, | the folk, the Dalit, the women’s, and the diasporic traditions of Maithili literature into a counter-archive to the official canon curated by the Sahitya Akademi. This volume brings that project to its threshold. Applying Bharata’s rasa-theory, Anandavardhana’s dhvani, Kuntaka's vakrokti, Gahgesa Upadhyaya’s Navya-Nyaya pramana system, Bakhtinian dialogism, Spivak’s subaltern historiography, and the Videha Parallel History Framework, it offers sustained critical appreciations of one hundred contemporary and historical Maithili writers — poets, novelists, dramatists, essayists, theorists, and translators — whose work constitutes the living parallel tradition. “The parallel is not the marginal but the truthful, in long delay.” WHAT THIS VOLUME CONTAINS, >> One hundred chapter-length critical appreciations, each paired with a portrait image »® A historical synthesis from 8th-century Charydpadas to contemporary digital publishing >> Indigenous theory (Navya-Nyaya, rasa, dhvani) alongside Western and postcolonial lenses >> Archival recovery of the Dooshan Panji records on Gafigesa Upadhyaya of Mithila pes ABOUT THE AUTHOR | GAJENDRA THAKUR — Maithili author, editor, and literary scholar — founder | of the Videha Parallel Literary Movement and founded the Videha eJournal in | | 2000 and has edited it without interruption since. He writes in Maithili, Hindi, ‘i and English, and has authored scholarly monographs on Gangesa Upadhyaya’s Navya-Nyaya and the parallel history of Mithila’s literary cultures. SON 978-93-5832-486-6 VIDEHA | | till | | | | | Fe AEE nee > हि, ISSN 2229-547X - videha.co.in
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ALL INDIA INSTITUTE OF MEDICAL SCIENCES ANSARI NAGAR, NEW DELHI ~—20029 MEDIA CELL 24/March/2026 PRESS RELEASE Mr. Harish Rana passed away at 4:0 PM on 24th March 2026 at AIIMS, New Delhi. He was under the care of a dedicated team of doctors and was admitted to the Palliative Oncology Unit (IRCH), led by Dr. (Prof.) Seema Mishra, HoD, Onco-Anaesthesia. AIIMS extends its heartfelt condolences to his family and loved ones during this difficult time. yen i Ot With regards, Dr.(Prof.) Rima Dada Media Cell AIIMS New Delhi
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। THE VIDEHA PARALLEL LIBRARY | TOME I-IV / VOLUMES -00 A Parallel History of Mithila & Maithili Literature with Critical Appreciations of Representative Maithili Writers रु be Vv ¥ by GAJENDRA THAKUR editor, Videha eJournal VIDEHA - PARALLEL LITERARY MOVEMENT videha.co.in - ISSN 2229-547X - est. 2000 - Delhi - MMXXVI
) FROM THE SERIES ) The Videha Parallel Library Thirteen centuries of Maithili letters — from the Buddhist Charyapadas of the eighth century to the digital insurgency of the twenty-first — gathered under a single critical lens. Across one hundred volumes the Videha Parallel Library has assembled the suppressed, the neglected, the folk, the Dalit, the women’s, and the diasporic traditions of Maithili literature into a counter-archive to the official canon curated by the Sahitya Akademi. This volume brings that project to its threshold. Applying Bharata’s rasa-theory, Anandavardhana’s dhvani, Kuntaka's vakrokti, Gangesa Upadhyaya’s Navya-Nyaya pramana system, Bakhtinian dialogism, Spivak’s subaltern historiography, and the Videha Parallel History Framework, it offers sustained critical appreciations of one hundred contemporary and historical Maithili writers — poets, novelists, dramatists, essayists, theorists, and translators — whose work constitutes the living parallel tradition. “The parallel is not the marginal but the truthful, in long delay.” WHAT THIS VOLUME CONTAINS >> One hundred chapter-length critical appreciations, each paired with a portrait image >> A historical synthesis from 8th-century Charyapadas to contemporary digital publishing >> Indigenous theory (Navya-Nyaya, rasa, dhvani) alongside Western and postcolonial lenses >> Archival recovery of the Dooshan Panji records on Gangesa Upadhyaya of Mithila ee ABOUT THE AUTHOR GAJENDRA THAKUR — Maithili author, editor, and literary scholar — founder of the Videha Parallel Literary Movement and founded the Videha eJournal in 2000 and has edited it without interruption since. He writes in Maithili, Hindi, Sanskrit, and English, and has authored scholarly monographs on Gangesa Upadhyaya’s Navya-Nyaya and the parallel history of Mithila’s literary cultures. ) ISBN 978-93-58I2-486-6 V I D E H A parallel literary movement | 9 Magssal24866!> ISSN 2229-547X - videha.co.in
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