VIDEHA — Issue 442 / अंक ४४२

Publication: VIDEHA · Issue: 442
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विदेह ४४२ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। [विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X Videha e-Journal (since 2000) at www.videha.co.in ] ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। कॉपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२६. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. It is a platform for scholars, researchers and writers to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, prose and verse in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili and from Maithili into English. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. (c)२०००- २०२६. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA. सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@zohomail.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@zohomail.in. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover design: AUM GAJENDRA THAKUR VIDEHA:442 समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा। for the writers, readers, and listeners of Mithilā, who have kept the lamp of Maithilī burning through a thousand years of storms ………………………….. "The Parallel is not the marginal but the truthful, in long delay." Mānuṣīm iha saṃskṛtām मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। मिथिलाक ओइ लेखक, पाठक आ श्रोता लोकनि लेल, जे सहस्र वर्षक झंझावात मे सेहो मैथिलीक दीप प्रज्वलित रखने छथि। समानांतर कात-करोट मे हएब नै अछि, वरन् ई अछि असल सत्य, जे अपन समय लेलक अछि। अनुक्रम विदेह अंक ४४२ — १५ मई २०२६ वर्ष १९ · मास २२१ · ISSN 2229-547X ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृष्ठ २-१३) १.२.अंक ४४१ पर टिप्पणी (पृष्ठ १४-१४) गद्य Prose २.१. हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२१ (पृष्ठ १६-२०) २.२. प्रीति कुमारी- चरित्र चित्रण : सूर्य पुत्र कर्ण एक अद्वितीय योद्धा (पृष्ठ २१-२३) २.३. प्रणव कुमार झा- डिजिटल दुनियाँ मे सायबर हाइजिन (पृष्ठ २४-३०) २.४. डॉ. योगानन्द झा- अभिनव पद्यविधा : इतिहास-काव्य (पृष्ठ ३१-३६) २.५. मोहन कुमार झा- बीहनिकथा १०० शब्दमे किएक? (पृष्ठ ३७-३८) २.६. लाल देव कामत- सेतुषाम: एक अनुशीलन (पृष्ठ ३९-४२) २.७. आचार्य रामानंद मंडल- समरसता बनाम समानता (पृष्ठ ४३-४३) २.८. रबीन्द्र नारायण मिश्र- जयतु जानकी (धारावाहिक उपन्यास) (पृष्ठ ४४-८१) २.९. संतोष कुमार राय 'बटोही'- कथा 'गैस सिलिंडर' (पृष्ठ ८२-८४) २.१०. विप्रकान्त मंडल- मायक बटबारा (पृष्ठ ८५-८६) २.११. अमरेश ठाकुर- मैथिली साहित्यमे उपन्यासक महत्व (पृष्ठ ८७-९१) २.१२. गजेन्द्र ठाकुर- दीयरि: एक समग्र साहित्यिक मूल्यांकन [रा. ना. सुधाकरक मैथिली कथा-संग्रहक बहुआयामी समीक्षा] (पृष्ठ ९२-१०६) २.१३. गजेन्द्र ठाकुर- गोपाल झा 'अभिषेक'क 'आउ स्वप्न साझी करी': साहित्यिक अनुशीलन (पृष्ठ १०७-११३) २.१४. गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली लेल एकटा नारी केन्द्रित समीक्षाशास्त्र [क्वीर-फेमिनिज्म सहित] [सन्दर्भ- कामिनीक "खण्ड-खण्ड मे बँटैत स्त्री" आ शान्ति लक्ष्मी चौधरीक"लेस्बियन कॉन्टिन्युअम"] (पृष्ठ ११४-१७३) पद्य Poetry ३.१. तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम'] मूल तेलुगु: नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव) मैथिली अनुवाद: मानेश्वर मनुज [खण्ड ४] (पृष्ठ १७५-१७९) ३.२. संतोष कुमार राय 'बटोही'- माए (कविता) [मदर्स डे पर] (पृष्ठ १८०-१८२) ३.३. अशोक कुमार ठाकुर- रीत भेल कतेक नीच यौ (पृष्ठ १८३-१८५) ३.४. जगदानन्द झा "मनु"- आजुक बरसाइत (पृष्ठ १८६-१८७) ३.५. आचार्य रामानंद मंडल- अश्रद्धा/ हिंदू आ मुसलमान/ जै हे जगजननी सीता (पृष्ठ १८८-१९१) ३.६. प्रणव कुमार झा- आदमी (पृष्ठ १९२-१९३) 4.Gajendra Thakur- A Parallel History of Mithila & Maithili Literature (TOME I-IV VOLUMES- 1-100) APPENDIX: METHODOLOGICAL NOTE The Nepal Bikram Samvat years cited have been converted to approximate CE years using the standard offset of BS minus 56–57 years. Web sources consulted include the Videha digital archive (videha.co.in). All URLs were last accessed April 2026. This research was prepared using primary texts, and standard academic resources. All quoted material is from the cited sources. For the most current scholarship, consult the Videha Parallel History series at www.videha.co.in/gajenthakur.htm. ………………………………………………. A PARALLEL HISTORY OF MAITHILI LITERATURE: INTRODUCTION DALIT LITERARY CRITICISM: TELUGU, GUJARATI, AND ODIA DALIT LITERATURE IN MAITHILI TRANSLATION GANGESA UPADHYAYA: LIFE, LOGIC, AND LEGACY IN THE NAVYA-NYAYA TRADITION [NAVYA-NYAYA’S HIERARCHICAL USE OF LIMITORS IS COMPATIBLE WITH MODERN ARTIFICIAL INTELLIGENCE AND NATURAL LANGUAGE PROCESSING (NLP)] MITHILA & MAITHILI: CRITICAL ANALYSIS OF INSTITUTIONS THE MAITHILI GHAZAL VIDEHA (ISSUE 1-350) SADEHA SERIES (1-37) VIDEHA ISSUES 351-438 VIDEHA MAITHILI PARALLEL DRAMA THEATRE VIDEHA PARALLEL AUDIO VIDEO ARCHIVE VIDEHA PARALLEL CHILDREN'S LITERATURE Abdur Razzak, Abha Jha, Abhilash Thakur, Achhe Lal Shastri, Ajit Kumar Jha, Amit Mishra, Amod Kumar Jha, Amrendra Yadav, Anamika Raj, Anand Kumar Jha, Anil Mallik, Anjani Kumar Verma, Anmol Jha, Arvind Thakur, Ashish Anchinhar, Ashok (kathakar Ashok), Ashraf Rain, Dr. Bacheshwar Jha, Badri Nath Roy 'Amatya', Pt. Bal Govind 'Arya', Bechan Thakur, Pandit Bhavnath Jha, Bibhuti Anand, Bijayendra Jha, Binay Bhushan, Bindeshwar Thakur, Chandan Kumar Jha, Dinesh Kumar Mishra, Durganand Mandal, Gajendra Thakur, Ghanashyam Ghanero, Gopalji Jha 'Gopesh', Gyanvardhan Kanth, Harimohan Jha, Hitendra Gupta, Hitnath Jha, Hriday Narayan Jha, Ilarani Singh, Jagdanand Jha 'Manu', Jagdish Chandra Thakur 'Anil', Jagdish Prasad Mandal, Jhauli Paswan, Jitendra Kumar Jha 'Jeetu', Dr. Kailash Kumar Mishra, Kalikant Jha 'Buch', Kalpana Jha, Kalpana Jha, Bokaro, Kalpana Jha, Delhi, Kalpana Jha, Patna, Kameshwar Choudhary, Kameshwar Jha 'Kamal', Dr. Kamini Kamayini, Kamla Chaudhary, Kapileshwar Raut, Kedar Nath Chaudhary, Dr. Kirtinath Jha, Dr. Kishan Karigar, Krishna Kumar Kashyap, Kumar Manoj Kashyap, Kumar Pawan, Kundan Kumar Karn, Kusum Thakur, Lal Dev Kamat, Lalita Jha, Lallan Prasad Thakur, Laxman Jha 'Sagar', Mala Jha, Manmohan Jha, Meena Jha, Mithilesh Kumar Jha, Munnaji, Munnaji, Munni Kamat, Nabo Narayan Mishra, Nagendra Kumar, Nand Kumar Mishra 'Nand', Nand Vilas Roy, Nanda Vilas Ray, Narayan Yadav, Narayanji Chaudhary, Narendra Jha, Navendu Kumar Jha, Neerja Renu, OM Prakash Jha, Panna Jha, Phanishwar Nath Renu, Prabhat Rai Bhatt, Pradeep Bihari, Pradeep Pushpa, Pranav Jha, Prayas Premi Maithil, Preeti Thakur, Premlata Mishra 'Prem', Premshankar Singh, Rabindra Narayan Mishra, Rajdeo Mandal, Rajeev Ranjan Mishra, Rajnandan Lal Das, Ram Bharos Kapari 'Bhramar', Ram Chandra Roy, Ram Sogarth Yadav, Ram Vilas Sahu, Acharya Ramanand Mandal, Prof. Dr. Ramawatar Yadav, Ramdeo Prasad Mandal 'Jharudar', Ramesh, Ramesh Narayan, Rameshwar Prasad Mandal, Pandit Ramji Chaudhary, Ramji Prasad Mandal, Acharya Ramlochan Sharan, Ramlochan Thakur, Ravi Mishra Bhardwaj, Ravibhushan Pathak, Ravindra Nath Thakur, S.C. Suman, Sandeep Kumar Safi, Sanju Das, Santosh Kumar Mishra, Santosh Kumar Roy 'Batohi', Satyanand Pathak, Shail Jha 'Sagar', Dr. Shambhu Kumar Singh, Shanti Lakshmi Chaudhary, Shardindu Chaudhary, Shashi Bala, Shashidhar Kumar 'Videh', Shiv Kumar Jha 'Tillu', Dr. Shiv Kumar Prasad, Shivshankar Singh Thakur, Shivshankar Sriniwas, Dr. Shubh Kumar Barnwal, Shyam Darihare, Siyaram Jha 'Saras', Srijan Shekhar 'Ajneya', Subhash Chandra Yadav, Subhash Kumar Kamat, Subodh Jha, Subodh Kumar Thakur, Sujit Kumar Jha, Sushil, Sweta Jha Chaudhary, Taranand Viyogi, Prof. Udaya Narayana Singh Nachiketa, Umesh Mandal, Umesh Paswan, Veena Thakur, Vibha Rani, Vibhuti Anand, Vijaynath Jha, Vineet Utpal, Yoganand Jha, Prof. Dr. Yogendra P. Yadava, Yogendra Pathak Viyogi A Parallel History of Mithila & Maithili Literature, Original Poem in Maithili, Translated into English, Children's Literature Theory, Children's Picture-Story Literature, Contemporary Mithila Artists, Contemporary Mithila Artists, Dalit and Subaltern Literature, Dalit Literary Criticism, Dalit Literary Criticism — Gujarati Dalit Literature in Maithili Translation, Dalit Literary Criticism — Odia Dalit Literature in Maithili Translation, Dalit Literary Criticism — Telugu Dalit Literature in Maithili Translation, Digital Maithili Children's Literature, Digital Maithili Literature, The Epistemology of Parallelism — Videha Sadeha Series and the Maithili Digital Renaissance, Gangeśa Upādhyāya / Navya-Nyāya, Gangesa Upadhyaya — Life, Logic, and Legacy in the Navya-Nyaya Tradition, Institution Critical Analysis, Language Transmission, Laprek vs Bīhani Kathā, Maithili Bīhani Kathā — The Seed Story Tradition in Maithili Literature, The Maithili Ghazal — History, Theory, Revival, and the Anchinhar Era, Maithili Micronarrative, Mithila & Maithili — Critical Analysis of Institutions, Awards and Recognition Frameworks, Mithila & Maithili Institution Critical Analysis, Parallel Literature Movement, Seed Story Tradition, Tirhuta / Mithilakshar, Videha 351–438 Critic, Videha Children Literature Expanded, Videha Children Literature Expanded — Parallel Children Literature in Maithili, Videha eJournal, Videha Issues 1–350, Videha Issues 351–438, Videha Issues 351–438 — Epistemological and Canonical Transformations, The Videha Maithili Parallel Drama Theatre, Videha Maithili Parallel Drama Theatre, The Videha Maithili Parallel Drama Theatre — Critical Historiography and Epistemological Analysis, The Videha Parallel Audio Video Archive, Videha Parallel Audio Video Archive, The Videha Parallel Audio Video Archive — Digital Remediation and Subaltern Historiography, Videha Parallel Audio Video Critic, Videha Parallel Children Literature, Videha Parallel Drama Critic, Videha Parallel History Framework, Videha Sadeha 1–37 / Issues 1–350 Critic, Videha Sadeha, Videha Sadeha Series 1–37, Vidyapati, the Primal Poet of Maithili (Pre-Jyotirishvara), Women’s Writing, Young Readers in Maithili … AND MORE TO COME IN TOME 5. 23 Language Transliterator विदेह लिपि परिवर्तक IPA · IAST · Tirhuta · Braille I. A PARALLEL HISTORY OF MITHILA & MAITHILI LITERATURE [TOME 1-4; VOLUMES 1-100] BY GAJENDRA THAKUR [Parallel History Series ISBN Number: 978-93-5812-486-6] GOOGLE PLAY BOOK [TOME 1-4; VOLUMES 1-100] https://play.google.com/store/books/details?id=uvjREQAAQBAJ AMAZON KINDLE [TOME 1-4; VOLUMES 1-100] https://www.amazon.in/dp/B0GX2XRKM7 POTHI HARDBACK POTHI TOME 1 [VOLUMES 01-25] https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-parallel-history-mithila-maithili-literature/ POTHI TOME 2 [VOLUMES 26-50] https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-parallel-history-mithila-maithili-tome-2/ POTHI TOME 3 [VOLUMES 51-75] https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-parallel-history-mithila-maithili-literature-volume-1-100-tome-3-volume-51-75-b/ POTHI TOME 4 [VOLUMES 76-100] https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-parallel-history-mithila-maithili-literature-volume-1-100-tome-4-volume-76-100-/ II. DECODING THE PANJI OF MITHILA: Surprising Insights from India and Nepal’s Oldest Social Network [ISBN: 978-93-5915-894-5] TABLE OF CONTENTS Part I — Theoretical Foundations Chapter 1 — Genome Mapping of Mithila: Pañjī System — Genealogical Theories (Volume I) Chapter 2 — Mithila's Pañjī-Prabandha: Genealogical Theories Study (Volume II) Chapter 3 — The Panji Prabandh: Genomic Mapping, Theoretical Frameworks, Socio-Historical Trajectories Part II — Comprehensive Analytical Reports Chapter 4 — Analytico-Genetic Report on the Mithila Panji Prabandh Chapter 5 — The Socio-Genetic Architecture of Mithila: Exhaustive Anthropological Analysis Chapter 6 — The Mithila Panji Prabandha: Anthropological, Legal, Socio-Historical Analysis Chapter 7 — Panji Prabandh: A Comprehensive Briefing and Study Guide Chapter 8 — Special Studies: Q&A; Women in the Pañjī; Dooshan Pañjī and the Political Economy of Status Part III — Prācīn Pañjī: Genome Mapping Volume I Chapter 9 — Khaṇḍa 1: Villages, Families, Lineages, and Gotras (Pages 1–65) Chapter 10 — Khaṇḍa 1 Continued (Pages 66–347): Villages, Lineages, Marriage Colophons Chapter 11 — Khaṇḍa 2 (Pages 348–690): Royal Records, Scholarly Titles, and Modernity Chapter 12 — Pañjī Prabandha Vol. I Section 2 (Uṭīp): Mithila's Living Genome Chapter 13 — Genome Mapping Vol. I: Mithilak Pañjee Prabandha Chapter 14 — Pampilā Pañjī, Khaṇḍa 3 — Nāgarāma: Analytical Report (Volume I) Chapter 15 — Pampilā-Varga Pañjikā, Khaṇḍa 3 (Nagramī): Entries 226–358 (Volume I) Chapter 16 — Pañjī Prabandha, Khaṇḍa 3 (Nagramā): Blocks 359–466 (Volume I) Part IV — Genealogical Mapping: Volume II Chapter 17 — Panji Prabandha: Genealogical Mapping (450 AD–2009 AD), Comprehensive Research Report Part V — Dooshan Pañjī: The Black Book of Mithila Chapter 18 — The Dooshan Pañjī: A Comprehensive Scholarly Report Chapter 19 — Dūṣaṇa Pañjī: A Complete Study from Genealogical Theories Chapter 20 — Dooshan Panji: An Interdisciplinary Research Report Bibliography & Tables GOOGLE PLAYBOOK Decoding the Panji of Mithila: Surprising Insights from India and Nepal's Oldest Social Network by Gajendra Thakur – Books on Google Play AMAZON KINDLE https://www.amazon.in/dp/B0H463RVT8 POTHI HARDBACK https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-decoding-panji-mithila/ III. गद्य पद्य भारती खण्ड १ आ २ (विदेह सदेह २८ & विदेह सदेह ३७) [विभिन्न भाषासँ अनूदित गद्य आ पद्य रचना (खण्ड-१) & (खण्ड-२) (विदेह www.videha.co.in/ पेटार अंक १-३५० सँ)] [खण्ड १ ISBN No: 978-93-341-0402-8; खण्ड २ ISBN No: 978-93-5890-150-4] १ विदेह सदेह २८ GADYA PADYA BHARTI 1 विभिन्न भाषासँ अनूदित गद्य आ पद्य रचना (खण्ड-१) (विदेह www.videha.co.in/ पेटार अंक १-३५० सँ) https://store.pothi.com/book/editor-gajendra-thakur-gadya-padya-bharti-1/ २ विदेह सदेह ३७ GADYA PADYA BHARTI 2 विभिन्न भाषासँ अनूदित गद्य आ पद्य रचना (खण्ड-२) (विदेह www.videha.co.in/ पेटार अंक १-३५० सँ) https://store.pothi.com/book/translator-gajendra-thakur-gadya-padya-bharti-2/ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका WWW.VIDEHA.CO.IN VIDEHA 23 LANGUAGE TRANSLITERATOR https://www.videha.co.in/new_page_101.htm विदेह लिपि परिवर्तक IPA · IAST · Tirhuta · Braille https://www.videha.co.in/script-converter.html विदेह आ सदेह सम्पूर्ण इंडेक्स https://www.videha.co.in/script-converter.html विदेह पेटार VIDEHA ARCHIVE https://www.videha.co.in/archive.htm विदेह मैथिली थेसॉरस — मैथिली-अंग्रेजी / अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोश https://www.videha.co.in/maithili-thesaurus.html विदेह मैथिली ↔ अंग्रेजी अनुवादक · Videha Maithili ↔ English Translator https://www.videha.co.in/maithili-translator.html विदेह पञ्जी प्रबन्ध — मैथिल ब्राह्मण वंशावली इंडेक्स https://www.videha.co.in/panji-mool-index.html विदेह गद्य https://www.videha.co.in/prose.htm विदेह पद्य https://www.videha.co.in/verse.htm विदेह स्त्री कोना https://www.videha.co.in/femcorner.htm A PARALLEL HISTORY OF MITHILA & MAITHILI LITERATURE https://www.videha.co.in/gajenthakur.htm विदेह मिथिला रत्न https://www.videha.co.in/ratna.htm विदेह मिथिलाक खोज https://www.videha.co.in/discovery.htm विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण https://www.videha.co.in/investigation.htm विदेह पुरान अंक https://www.videha.co.in/videha.htm विदेह पोथी https://www.videha.co.in/pothi.htm विदेह दृश्य-श्रव्य नाट्य उत्सव https://www.videha.co.in/Audio_Video.htm विदेह शिशु, बाल आ किशोर उत्सव https://www.videha.co.in/kids.htm विदेह ई-लर्निङ्ग/ विदेह ई-लर्निङ्ग क्विज https://www.videha.co.in/videha-elearning.htm Videha Converters- Thesaurus, Panji, Script Converters, Transliterators, Translators, eLearning Quizzes, Maithili Language Search and other Technical Tools https://www.videha.co.in/videha-converters.htm विदेह आ सदेह दुनू https://archive.org/details/VidehaAndSadeha TWITTER/ X https://x.com/videha FACEBOOK https://www.facebook.com/groups/videha/ Videha Googlegroups https://groups.google.com/g/videha

१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.अंक ४४१ पर टिप्पणी १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय विदेह: सदेह: ४ मैथिली कथा २००९-१० समग्र साहित्यिक समीक्षा: सभटा साहित्यकार भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य। पाश्चात्य आलोचना। गंगेशक नव्य-न्याय। विदेह समानान्तर इतिहास ढाँचा सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर । विदेह अङ्कीय पत्रिका, अंक २६-५०, २०१० । आइएसबीएन: 978-93-80538-07-5 भूमिका: सदेह ४ क स्वरूप विदेह: सदेह: ४ (आइएसबीएन: 978-93-80538-07-5) मैथिली कथाक एकटा विशिष्ट संकलन थिक। सदेह २ (निबन्ध-समालोचना) आ सदेह ३ (पद्य) सँ भिन्न ऐ खण्डमे मौलिक कथा, अनूदित कथा, लघुकथा, बाल-कथा आ उपन्यास-अंश सब समाहित अछि। ४० साहित्यकारक रचना। सम्पादकीयमे स्पष्ट उल्लेख: 'एहिमे लघुकथा, नाटक, व्यंग्य आ उपन्यास अंश सेहो अछि कारण ई सभ विधा मोटा-मोटी एक्के अछि। आ एतए मैथिलीमे दोसर भाषासँ अनूदित कथा सेहो अछि।' चारि ढाँचा: (क) रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य; (ख) बूर्द्यू, स्पिवाक, बाख्तिन, ग्राम्शी, बेन्यामिन, फानन, अम्बेडकर, लुकाच; (ग) गंगेश उपाध्यायक नव्य-न्याय; (घ) विदेह समानान्तर इतिहास ढाँचा। १. कुमार मनोज कश्यप कथा: चौबिटया पर। जन्म: १९६९, सलेमपुर, मधुबनी । केन्द्रीय सचिवालय कथाक सारांश: 'चौबिटया पर' एक युवाक कथा थिक जे सिविल सेवा परीक्षामे पास नै करैए। ककाक कठोर स्वर 'मैथिलक पछुएबाक कारण सरकारी नोकरीकेँ पाछु भागब' ओकरा तोड़ि दैत छैक। रस-ध्वनि विश्लेषण: करुण रस प्रधान। 'चौबिटया पर' ध्वनि: चौराहा केवल भूगोल नहि, अस्तित्वगत - कतऽ जाउ? वक्रोक्ति: 'मरीचिका बुझू सरकारी नोकरी' - मिथिलाक मध्य वर्गक शिक्षित वर्ग लेल विचित्र स्थिति उत्पन्न करैत अछि। औचित्य: मध्य वर्गक आकांक्षापर सटीक बैसैए। बूर्द्यू / सामाजिक संरचना: पियरे बूर्द्यू केर 'शैक्षणिक पूँजी' आ 'आर्थिक पूँजी' केर बीचक तनाव: मुख्य पात्र केर शैक्षणिक पूँजी (सिविल सेवा तैयारी) उचित पुरस्कार नहि भेटल। मैथिली समाज केर विशिष्ट सांस्कृतिक पूँजी - सरकारी नोकरी = प्रतिष्ठा - ई कथा व्यवस्थित रूपसँ ढाँचा-तोड़ैत अछि। नव्य-न्याय: गंगेशक 'अनुमान': कका क तर्क 'आब ककरो सरकारी नोकरी भेटैत' एक मिथ्या व्याप्ति (अति-सामान्यीकरण) थिक। मुख्य पात्र केर अनुभव एहि व्याप्ति केँ मिथ्या सिद्ध करैत अछि - ई कथा एक प्रति-उदाहरण (विपरीत-व्यभिचार) थिक। विदेह ढाँचा: मिथिलाक शिक्षित बेरोजगारी केर आख्यान मुख्यधारा हिन्दी/अङ्ग्रेजी कल्पित कथामे अनुपस्थित। विदेह केर कथा-संकलन एहि क्षेत्रीय विशिष्टता केँ मान्य-परम्परागत साहित्यिक स्थान दैत अछि। २. डॉ. शम्भु कुमार सिंह तीन अनुदित कथा + मौलिक कथा: एकटा आर रबि; अवसरक निमन्त्रण; सोंगर; नागपंचमी । जन्म: 18 अप्रैल 1965, महिषी, सहरसा 'पाखलो' (कोंकणी उपन्यास) क मैथिली अनुवाद सेहो हुनकर अछि। ऐ सम्पूर्ण खण्डमे हुनकर अनुवादकक-रूप-मे-साहित्यिक-अभ्यास सबसँ स्पष्ट अछि। 'एकटा आर रबि' रस-ध्वनि: करुण रस। ध्वनि: रबिवार केवल छुट्टी नहि, एक पुनरावर्ती शून्यता क प्रतीक। वक्रोक्ति: 'आर' (अन्य, फेर एक) - ई पुनरावृत्ति विषाद उत्पन्न करैत अछि। 'अवसरक निमन्त्रण' रस-ध्वनि: वीर रस + करुण। 'अवसरक निमन्त्रण' वक्रोक्ति: की अवसर निमन्त्रण पठबैत अछि? ई प्रश्न स्वयं एक व्यंग्यपूर्ण उलटफेर थिक। मुख्य पात्र केर सक्रियता बनाम संरचनात्मक भाग्य। 'सोंगर' आ 'नागपंचमी' अनुवाद-सिद्धान्त: बेन्यामिन केर अनुवाद सिद्धान्त: (कोंकणी मूल) क मैथिली अनुवाद। बेन्यामिन क 'पाठ केर परवर्ती जीवन' - अनुवाद मूल क एक नव जन्म थिक। डॉ. शम्भु कुमार सिंह केर अनुवाद-अभ्यास विदेह केर अन्तर-साहित्यिक आदान-प्रदान परियोजना केर केन्द्र थिक। नव्य-न्याय / विदेह: गंगेशक 'उपादान कारण' (भौतिक कारण): मूल पाठ हुनकर उपादान (कच्चा माल) थिक, आ मैथिली अनुवाद एक नव साहित्यिक वस्तु सृजित करैत अछि। विदेह केर समावेशी मान्य-परम्परा: कोंकणी + मैथिली = एक लोकतान्त्रिक साहित्यिक स्थान। ३. कुसुम ठाकुर कथा: प्रत्यावर्तन पहिल खेप (पृ. ९-१६) । नारी कथाकार कथाक सारांश: (फिर्ती) एक नारीक जीवन-यात्रा जाहिमे सामाजिक अपेक्षा, विवाह, अस्मिता सब प्रश्नगत होइत अछि। 'पहिल खेप' (पहिल किस्त) - ई श्रृंखलाबद्ध रूप सुझाव करैत अछि कि ई एक वृहद आख्यान क आरम्भ थिक। रस-ध्वनि: वियोग-शृंगार + करुण। ध्वनि: रूपान्तरण संग हानि सेहो होइत अछि। 'पहिल खेप' - डिकेन्सीय श्रृंखलाबद्ध संरचना। वक्रोक्ति: 'व्यावर्तन' (रूपान्तरण) केर अर्थ - आगू बढ़नाइ या पाछाँ मुड़नाइ? दुनू एक साथ। स्त्रीवादी/ स्पिवाक: स्पिवाक केर स्त्रीवादी उत्तर-औपनिवेशिक सिद्धान्त: मैथिली महिलाक 'प्रत्यावर्तन' - ओ रूपान्तरण थिक जे सामाजिक संरचना अनुमति दैत अछि बनाम जे ओ वास्तवमे प्राप्त कर सकैत अछि। ई अन्तर कथाक आख्यानिक तनाव थिक। नव्य-न्याय: गंगेशक 'प्रत्यभिज्ञा' (पुनः-पहिचान): एक पुरान आत्मा केर पुनः-पहिचान/स्वीकार होइत अछि जे नारी छलीह ओ घुरि कऽ देखैत अछि। ई एक नव्य-न्याय ज्ञान-मीमांसीय क्षण- आत्म-ज्ञान केर पुनः-प्राप्ति। ४. सुरेश किशोर झा कथा: साथी दुखमे न कोइ। मध्यमवर्गीय पारिवारिक कथा रस-ध्वनि: करुण रस। 'साथी दुखमे न कोइ' ध्वनि: - ई एकाकीपन अर्वाचीन/अर्ध-शहरी मैथिली जीवन केर मूलभूत दशा थिक। वक्रोक्ति: 'साथी' (सङ्गी) शब्द एक अनुपस्थिति (साथी केर अभाव) वर्णित करैत अछि। लुकाच / यथार्थवाद: लुकाच केर 'विशिष्ट परिस्थितिमे विशिष्ट पात्र': सुरेशजीक कथाक मुख्य पात्र एक 'विशिष्ट' मैथिली मध्यमवर्गीय व्यक्ति थिक - आकांक्षा, आर्थिक बाध्यता, पारिवारिक दायित्व सब विशिष्ट। ई समीक्षात्मक यथार्थवाद केर शक्ति थिक। नव्य-न्याय: गंगेशक 'व्याप्ति': 'दुखमे कोनो साथी नहि रहैत' - ई एक व्याप्ति (सार्वभौमिक नियम) केर रूप थिक। कथाक दृष्टान्त (आख्यानिक उदाहरण) एहि व्याप्ति केँ स्थापित करैत अछि। ५. अनमोल झा कथा: प्राथमिकता रस-ध्वनि: 'प्राथमिकता' वक्रोक्ति: जीवनमे की 'प्राथमिक' (प्राथमिकता) होएबाक चाही - ई प्रश्न एक सम्पूर्ण मूल्य-प्रणाली केर समीक्षा थिक। शान्त रस + बौद्धिक तनाव। ध्वनि: जे चुनैत छी तकरा प्राथमिकता कहाइत अछि, मुदा जे नहि चुनैत छी से सेहो एक विकल्प थिक। अस्तित्ववाद: सार्त्र केर 'अस्तित्व पहिले, तखन सार': 'प्राथमिकता' क विकल्प चुननाइ अस्मिता सृजित करैत अछि- ई अस्तित्ववादी अन्तर्दृष्टि कथामे अन्तर्निहित अछि। ६. मिथिलेश कुमार झा कथा: एडवांस युग मे । जन्म: 12-01-1970, मनपौर रस-ध्वनि: 'एडवांस युग मे' (अर्वाचीन/उन्नत युगमे) ध्वनि: 'एडवांस' (अर्वाचीन) शब्द अङ्ग्रेजी उधार-शब्द थिक जे अर्वाचीन मैथिली केर शाब्दिक वास्तविकता प्रतिबिम्बित करैत अछि। हास्य + व्यंग्य रस - अर्वाचीनता केर वादा बनाम मिथिलाक ग्रामीण वास्तविकता। बाख्तिन / बहुभाषिक विभिन्नता: बाख्तिनक 'विभिन्न-भाषात्व': एक पाठके भीतर अनेक भाषा - 'एडवांस युग' केर मैथिली केर भीतर अङ्ग्रेजी मिश्रण एक बाख्तिनीय कथन थिक। ई भाषिक मिश्रण मैथिली समाज केर संकर अर्वाचीनता केर प्रतीक थिक। विदेह ढाँचा: विदेह केर 'नव मैथिली' जे परम्परा संरक्षण करबाक संग अर्वाचीनता स्वीकार करैत अछि - मिथिलेश झाक कथा एहि सन्तुलन केर अन्वेषण करैत अछि। ७. पालन झा कथा: गरीबक जिन्दगी रस-ध्वनि: करुण रस - गरीबीक यथार्थ चित्रण। 'गरीबक जिन्दगी' ध्वनि: 'जिन्दगी' (जीवन) ई बहुवचन नहि, एकवचन- एक विशिष्ट गरीब व्यक्ति केर जीवन, जे अनेक केर प्रतिनिधि अछि। वक्रोक्ति: 'जिन्दगी' शब्द - उर्दू-मैथिली साङ्केतिक-परिवर्तन जे स्वयं वर्ग अस्मिता केर सूचक थिक। मार्क्स / अम्बेडकर: मार्क्स केर वर्ग-संघर्ष + अम्बेडकर केर जाति-वर्ग अन्तर्विच्छेद: मैथिलीक गरीबी प्रायः जाति-आधारित। पालन झाक कथा एहि दोबर-बोझ (गरीब + निम्न-जाति) केर आख्यान करैत अछि। नव्य-न्याय: गंगेशक 'अभाव' (वंचना/अनुपस्थिति) क सिद्धान्त: कथामे जे 'नहि अछि' (भोजन, सम्मान, अवसर) - ओकर व्यवस्थित गणना ऐ अभाव क सूची थिक। ८. कामिनी कामायनी कथा: लाल काकी। नारी कथाकार रस-ध्वनि: 'लाल काकी' ध्वनि। 'काकी' (चाची/पिताक भौजी) - गृहस्थी। दुनू केर संयोजन एक तनाव पैदा करैत अछि। करुण + शृंगार। वक्रोक्ति: 'लाल काकी' - एक साधारण गृहस्थीय व्यक्तित्व जाहिमे एक असाधारण अन्तरंग जीवन अछि। स्त्रीवादी / बोव्वार: सिमोन द बोव्वार केर 'द्वितीय लिंग': 'काकी'- चाची प्रायः पारिवारिक आख्यानमे अदृश्य। कामिनी कामायनी 'लाल काकी' केँ केन्द्र करैत छथि- अदृश्य महिला केर स्त्रीवादी पुनःप्राप्ति। विदेह ढाँचा: मैथिली मुख्यधारा कल्पित कथामे महिला प्रायः परिधीय। विदेह केर स्थान कामिनी कामायनी जिनका महिला-केन्द्रित आख्यान लिखबाक मञ्च दैत अछि। ९. जगदीश प्रसाद मंडल कथा: बहीन। दलित कथाकार रस-ध्वनि: 'बहीन'। ध्वनि: बहिनक प्रति भाइक सुरक्षात्मक प्रेम आ ओहि प्रेम केर सीमा- कथामे अन्वेषित। वात्सल्य + करुण। वक्रोक्ति: 'बहीन' एक व्यक्तिगत सम्बन्ध शीर्षक थिक जे एक साथ एक सामाजिक स्थिति (महिलाक रूपमे संरक्षित/असुरक्षित) वर्णित करैत अछि। अम्बेडकर / जाति: मंडल केर कल्पित कथा लगातार जाति केर प्रश्न करैत अछि। 'बहीन' कहानी- दलित महिला केर सम्मान, पारिवारिक बन्धन, सामाजिक बाध्यता एक संग। अम्बेडकर केर तर्क: दलित महिला दोबर उत्पीड़ित - जाति + लिंग। नव्य-न्याय: गंगेशक 'उपादान कारण': 'बहीन' कहानी केर कच्चा माल थिक, मुदा कथा ओहि सम्बन्ध केर सामाजिक निर्माण उजागर करैत अछि। १०. साकेतानन्द कथा: कृतं न् मन्ये रस-ध्वनि: संस्कृत-व्युत्पन्न शीर्षक - एक शास्त्रीय स्तर स्थापित करैत अछि। शान्त + करुण। वक्रोक्ति: संस्कृत शीर्षक + समकालीन मैथिली आख्यान - ई काल-वैषम्य स्वयं सार्थक थिक। पाठान्तर्सम्बन्ध: संस्कृत साहित्यिक परम्परा संग अर्वाचीन मैथिली कल्पित कथाक संवाद। बाख्तिन केर पाठान्तर्सम्बन्ध: 'कृतं' (जे कएल गेल) - कर्म केर दार्शनिक प्रतिध्वनि। ११. सुजीत कुमार झा कथा: प्रियंका रस-ध्वनि: 'प्रियंका' एक नारी-नाम शीर्षक। शृंगार + करुण। ध्वनि: 'प्रियंका' जे प्रिय अछि, केर जीवन-यात्रा। वक्रोक्ति: नाम केर अर्थ आ वास्तविक जीवन केर व्यंग्यपूर्ण विरोधाभास। स्त्रीवादी/ आख्यान-सिद्धान्त: नामकरणक रूपमे अस्मिता-राजनीति: कोनो नारीक नाम कि ओकर मूल्य प्रेम-वस्तु होबै पर निर्भर अछि? सुजीत कुमार झाक कथा एहि प्रश्न केर अन्तर्निहित अन्वेषण करैत अछि। १२. आशीष चमन कथा: पछता रोटी। रस-ध्वनि: 'पछता रोटी' ध्वनि। करुण + वीभत्स। वक्रोक्ति: 'रोटी' आर्थिक रूपक - आर्थिक लेनदेन। अस्तित्ववाद / पश्चाताप: सार्त्र केर 'दुर्भावना': 'पछता रोटी'- एक पात्र केर दुर्भावना जे विकल्प कएलक तकर परिणाम केर सामना करए नहि चाहैत। १३. आशीष कुमार चौधरी कथा: जीत गयो मोर काहा रस-ध्वनि: 'जीत गयो मोर काहा' ध्वनि: कथनक जीत - एक आख्यान कहल जएबाक लेल। वीर रस। वक्रोक्ति: 'जीत' (विजय) केर स्वामित्व दावा केनाइ - ई विजय सार्वजनिक विमर्श केर हिस्सा बनैत अछि। १४. दुर्गानन्द मंडल कथा: बकलेल। ओबीसी/दलित स्वर रस-ध्वनि: 'बकलेल' (अचम्भित/असमञ्जस) ध्वनि: असमञ्जस एक सामाजिक अवस्था थिक - जाहिठाम ओकर स्थान अछि ताहिठाम ओ उपयुक्त नहि बैसैत। करुण + रौद्र। वक्रोक्ति: 'बकलेल' ओहि व्यक्ति केर आन्तरिक अवस्था वर्णित करैत अछि जे बाह्य प्रणाली केर तर्क नहि बुझैत - मुदा वास्तवमे ओ प्रणाली अतार्किक अछि। फानन/ अम्बेडकर: फानन केर 'औपनिवेशिक विस्थापन' + अम्बेडकर केर जाति-बहिष्कार: 'बकलेल' भेनाइ ओबीसी/दलित व्यक्ति केर दैनिक अनुभव थिक - ओहि प्रणाली सभमे असमञ्जस भेनाइ जे ओकरा लेल अभिकल्पित नहि छैक। १५. कपिलेश्वर राउत कथा: छूआ-छूत रस-ध्वनि: 'छूआ-छूत' (अस्पृश्यता) ध्वनि: ई दू शब्द मैथिली समाज केर सबसँ पीड़ादायक वास्तविकता केर नाम थिक। रौद्र + करुण। दुर्गा पूजा केर पर्व पृष्ठभूमिमे शम्भू मंडल - दलित व्यक्ति केँ मन्दिरमे प्रवेशसँ रोकल जाइत अछि - ई सह-स्थापना विध्वंसकारी अछि। अम्बेडकर / दलित साहित्य: बी.आर. अम्बेडकर केर 'जाति का विनाश': 'छूआ-छूत' कथा सीधे अम्बेडकर केर परियोजना केँ सक्रिय करैत अछि। पर्वमे बहिष्कार - होली/दुर्गा पूजा जे 'एकता' क दावा करैत अछि - दलित बहिष्कार केर सबसँ कपटपूर्ण क्षण थिक। नव्य-न्याय: गंगेशक 'विपक्ष-बाधक तर्क': पुजारी केर तर्क 'सोलकन (दलित) देवी केँ नहि छू सकैत' - एक मिथ्या तार्किक दावा थिक। 'छूआ-छूत' कथा एहि मिथ्या दावा केँ उजागर करैत अछि - एक नव्य-न्याय शैली प्रति-तर्क। विदेह समानान्तर इतिहास: दलित साहित्य साहित्य अकादमी मान्य-परम्परागत मैथिलीमे ऐतिहासिक रूपसँ कम प्रतिनिधित्व भेटल। विदेह केर 'छूआ-छूत' केँ सम्मिलित करनाइ एक प्रति-मान्य-परम्परागत विकल्प थिक। १६. राजदेव मंडल कथा: रखबार रस-ध्वनि: 'रखबार' (संरक्षक) ध्वनि: सुरक्षा करबाक उत्तरदायित्व + ओकर बोझ। शान्त + करुण। वक्रोक्ति: 'रखबार' - ओ व्यक्ति जे दोसराकेँ रखवाली करैत अछि मुदा खुद कोनो रखवाली नहि पबैत। ग्राम्शी / कार्बनिक बुद्धिजीवी: ग्राम्शी केर 'कार्बनिक बुद्धिजीवी': राजदेव मंडल लगातार अपन समुदाय केर कहानी लिखैत छथि। 'रखबार' एक समुदाय-रखवाला व्यक्तित्व केर कहानी थिक। १७. शरदिन्दु चौधरी कथा: समय-संकेत रस-ध्वनि: 'समय-संकेत' ध्वनि: समय केर 'संकेत' - ई कालिक चेतना केर साहित्यिक रूपक थिक। शान्त रस। वक्रोक्ति: एक छोट कथा जे एक सम्पूर्ण 'युग' (समय) केर 'संकेत'क दावा करैत अछि। बेन्यामिन/ कालिक: बेन्यामिन केर 'वर्तमान-काल': 'समय-संकेत' ओहि क्षण थिक जतय अतीत आ वर्तमान एक संग चमकैत अछि। १८. विजय-हरीश किछु लघु कथा: छोट बला गमछा; किकिऔनी; भावी-रणनीति; तृष्णा। रस-ध्वनि: चारि रस: 'छोट बला गमछा' - हास्य+करुण; 'किकिऔनी' - हास्य; 'भावी-रणनीति' - अद्भुत+वीर; 'तृष्णा' - करुण। लघुकथा शैलीमे ध्वनि अधिकतम सान्द्रतापर काज करैत अछि - न्यूनतम शब्द, अधिकतम अनुनाद। अल्पतमवाद / चेखव: आन्तोन चेखव केर लघुकथा सिद्धान्त: लघुकथामे 'दीवार पर बन्दूक' सिद्धान्त – सभ तत्व सार्थक। विजय-हरीश केर चारि लघुकथा चेखव केर आख्यान-मितव्ययिता केर प्रदर्शन करैत अछि। नव्य-न्याय: गंगेशक 'तर्क-संक्षेप' (संक्षिप्त तर्क): लघुकथा एक संकुचित तार्किक तर्क थिक - न्यूनतम आधार, अधिकतम निष्कर्ष। १९. सुनीता ठाकुर कथा: अपहरणक सच। नारी कथाकार रस-ध्वनि: 'अपहरणक सच' रौद्र + करुण। ध्वनि: 'सच' (सत्य) - अपहरण केर 'वास्तविक कहानी' जे ऊपरसँ नहि देखाइत अछि। वक्रोक्ति: 'अपहरण' भौतिक अगवा नहि, एक व्यापक सामाजिक 'अपहरण' महिलाक सक्रियता केर। स्त्रीवादी/ अपराध कथा: स्त्री अपराध कथा एक स्त्रीवादी शैलीक रूपमे: अपहरण कहानी प्रायः महिलाकेँ पीड़ित/वस्तुक रूपमे पुनरुत्पादित करैत अछि। सुनीता ठाकुर ऐ शैलीमे महिलाक 'सच' उजागर करैत छथि- सक्रियता + प्रतिरोध। २०. राकेश कुमार रोशन कथा: पंचैति रस-ध्वनि: 'पंचैति' (ग्राम्य न्यायाधिकरण) ध्वनि: पञ्चायत एक संस्था थिक जे न्याय देवाक दावा करैत अछि मुदा वास्तविक न्याय? करुण + रौद्र। वक्रोक्ति: 'पंचैति' - न्यायिक प्रक्रिया केर अनुष्ठानिक प्रदर्शन बनाम वास्तविक न्याय। ग्राम्शी / स्थानीय सत्ता: ग्राम्शी केर स्थानीय वर्चस्व: ग्राम पञ्चायत वृहद सत्ता संरचना सभक सूक्ष्म जगत थिक। 'पंचैति' कहानी पञ्चायत संस्था केर समीक्षात्मक परीक्षण करैत अछि। २१. हेमचन्द्र झा कथा: बाट रस-ध्वनि: 'बाट' (पथ/रास्ता) ध्वनि: भौतिक पथ + जीवन-पथ। शान्त + करुण। वक्रोक्ति: 'बाट' (सड़क) रूपक - ई शाब्दिक यात्रा थिक या रूपकात्मक? दुनू एक संग। अस्तित्ववाद / हाइडेगर: हाइडेगर केर 'संसारमे-सत्ता': 'बाट' केर दृष्टिसँ मानव अस्तित्व- पथ केर रूपमे परिभाषित - कोन पथ चुनल, कोन छोड़ल। २२. सुभाष चन्द्र यादव कथा: पति-पत्नी संवाद। ओबीसी स्वर रस-ध्वनि: 'पति-पत्नी संवाद'- बाख्तिन केर संवादवाद केर सबसँ प्रत्यक्ष रूप। हास्य + शृंगार। वक्रोक्ति: 'संवाद' (वार्तालाप)- पति-पत्नीक बीच वास्तविक संवाद अछि या सत्ता-गतिकी? बाख्तिन/ संवाद: बाख्तिनक संवादवाद: वास्तविक संवाद समानता आवश्यक करैत अछि। 'पति-पत्नी संवाद' मे ई समानता अछि? सुभाष चन्द्र यादव केर कहानी एहि प्रश्न केर अन्वेषण करैत अछि। २३. मानेश्वर मनुज कथा: जीत रस-ध्वनि: 'जीत' (विजय) वीर + करुण। ध्वनि: 'जीत' एक आकांक्षात्मक शब्द - मुदा ककर 'जीत', किनका ऊपर? वक्रोक्ति: सभ 'जीत' केर सेहो हार होइत अछि जे ओ परास्त केलक। अम्बेडकर/ ग्राम्शी: अम्बेडकर केर 'सामाजिक गतिशीलता': मानेश्वर मनुज केर 'जीत' कहानी - एक हाशियाकृत व्यक्ति केर विजय कहानी। ग्राम्शी केर 'स्थिति-युद्ध': छोट-छोट विजय - संचयी परिवर्तन सृजित करैत अछि। २४. परमेश्वर कापड़ि कथा: धुमगिज्जर । नेपाल, मैथिली रस-ध्वनि: रौद्र + वीर। जीवनक संघर्ष केर रूपकात्मक तीव्रता। वक्रोक्ति: नेपाल पक्ष केर मैथिली जीवन केर विशिष्ट पारिस्थितिकीय आ सामाजिक दशा। विदेह अन्तर-सीमा: परमेश्वर कापड़ि नेपाल केर मैथिली लेखक छथि। विदेह केर अन्तर-सीमा समावेश- नेपाल मिथिला केर कहानी सेहो समान मान्य-परम्परागत स्थान पबैत अछि। २५. ऋषि वशिष्ठ कथा/व्यंग्य: जुआनी जिन्दाबाद रस-ध्वनि: 'जुआनी जिन्दाबाद' (युवा दीर्घजीवी!) हास्य + वीर। 'जिन्दाबाद' (उर्दू: दीर्घजीवी) एक राजनैतिक नारा थिक- युवा सक्रियता, क्रान्ति। वक्रोक्ति: युवा केर विद्रोह केर प्रशंसा + व्यंग्य एक साथ। बाख्तिन/ उत्सवी-लोकधर्मी: बाख्तिनक उत्सवी-लोकधर्मी: युवा विद्रोह एक उत्सव थिक - स्थापित व्यवस्था अस्थायी रूपसँ उलटल। 'जिन्दाबाद' नारा एक उत्सवी-लोकधर्मी संकेत थिक। २६. शिवशंकर श्रीनिवास कथा: पण्डित ओ हुनक पुत्र। जन्म: लोहना, मधुबनी । चर्चित कथाकार-आलोचक रस-ध्वनि: 'पण्डित ओ हुनक पुत्र' (विद्वान आ ओकर पुत्र) करुण + शान्त। ध्वनि: 'पण्डित' आ 'पुत्र' - पीढ़ी अन्तराल, पिता-पुत्र सम्बन्ध, जाति-आधारित ज्ञान-संचरण। वक्रोक्ति: 'पण्डित' (विद्वान व्यक्ति) केर पुत्र - हुबहू नहि - उत्तराधिकार भंग। बूर्द्यू/ सांस्कृतिक पूँजी: बूर्द्यू केर सांस्कृतिक पूँजी-संचरण: 'पण्डित' केर सांस्कृतिक पूँजी (संस्कृत ज्ञान, अनुष्ठानिक विशेषज्ञता) पुत्रमे संचरित होएत वा नहि? कहानी एहि अन्तर-पीढ़ीगत स्थानान्तरण पर प्रश्न करैत अछि। पुत्र बादमे दुखी होइत अछि। नव्य-न्याय: गंगेशक 'परम्परा' (परम्परा) बनाम 'नवता' (नवीनता): पण्डित केर पारम्परिक ज्ञान-प्रणाली - एहि तनाव नव्य-न्याय केर अपन ऐतिहासिक चुनौती (परम्परा बनाम नव ज्ञान-मीमांसा) केर दर्पण थिक। २७. श्यामल सुमन कथा/व्यंग्य: अथ तन्त्र लोकतन्त्रीय मुक्ति रस-ध्वनि: 'अथ तन्त्र लोकतन्त्रीय मुक्ति' ध्वनि: संस्कृत 'अथ' (आब शुरू) + 'तन्त्र' (प्रणाली) + 'लोकतन्त्रीय' (लोकतान्त्रिक) + 'मुक्ति' (मुक्ति) - ई चारि शब्द एक व्यंग्यात्मक घोषणापत्र बनबैत अछि। हास्य + रौद्र। वक्रोक्ति: संस्कृत स्तरमे राजनैतिक व्यंग्य - शास्त्रीय भाषा राजनैतिक समीक्षा केँ प्रवर्धित करैत अछि। बाख्तिन/ राजनैतिक व्यंग्य: बाख्तिनक उत्सव केर राजनैतिक आयाम: 'लोकतन्त्रीय मुक्ति' केर उपहास-महाकाव्यीय प्रस्तुति लोकतान्त्रिक प्रणाली केर कपटता केँ उजागर करैत अछि। २८. मनोज झा 'मुक्ति' कथा: इज्जतिक खातिर रस-ध्वनि: 'इज्जतिक खातिर' (सम्मान/प्रतिष्ठा खातिर) रौद्र + करुण। ध्वनि: 'इज्जत' (सम्मान) एक विवादित शब्द - सम्मान, ककरा द्वारा परिभाषित? वक्रोक्ति: 'मुक्ति' (मुक्ति) नाम केर लेखक सम्मान केर बाध्यता केर अन्वेषण करैत छथि। अम्बेडकर / सम्मान: अम्बेडकर केर सम्मान-संस्कृति केर समीक्षा: 'इज्जत' प्रायः जाति/लिंग पदानुक्रम केर प्रवर्तन करैत अछि। 'इज्जतिक खातिर' - सम्मान-आधारित हिंसा, सामाजिक दबाव, आत्म-बलिदान। २९. जगदीश प्रसाद मंडल बाल-किशोर लेल प्रेरक कथा: उत्थान-पतन; प्रतिभा; मर्म; अधखडुआ; समयक बरबादी; पहिने तप तखन ढलिहेँ। बाल-कथा रस-ध्वनि: वात्सल्य रस + वीर रस - बाल-प्रेरणा। 'प्रेरक कथा' ध्वनि: ई मात्र मनोरंजन नहि, निर्माण थिक। वक्रोक्ति: 'पहिने तप तखन ढलिहेँ'- आध्यात्मिक स्तरमे। बेन्यामिन / शिक्षाशास्त्र: बेन्यामिन केर शिक्षा-सिद्धान्त: कहानी पीढ़ी सभक बीच मूल्य संचरण केर एक विधा केर रूपमे। मंडल केर बाल-कथा मैथिली समुदाय मूल्य (अनुशासन, प्रतिभा, बलिदान) केर साङ्केतिकीकरण करैत अछि। विदेह ढाँचा: मिथिलाक अगिला खाढ़ी लेल मैथिली पठन-सामग्री - विदेह केर बाल-साहित्य पहल। ३०. डा. सुरेश लाभ कथा-नाटक/ एकांकी: माई गे! भूख लागल हए रस-ध्वनि: 'माई गे! भूख लागल हए' (माँ! भूख लागल अछि!) करुण रस अपन सबसँ प्रत्यक्ष रूपमे। ध्वनि: बच्चाक 'माई गे!' (माँ!) एक सार्वभौमिक पुकार। वक्रोक्ति: 'भूख'- केवल भोजन नहि, सम्मान, प्रेम, न्याय, अवसर केर भूख। मार्क्स/ अम्बेडकर/ भूख राजनीति: भूख एक राजनैतिक श्रेणी (मार्क्स + अम्बेडकर दुनू)। सुरेश लाभक कहानी भूख केर व्यक्तिगत/पारिवारिक स्तरसँ राजनैतिक स्तर धरि अनुरेखण करैत अछि। नव्य-न्याय: गंगेशक 'अन्वय-व्यतिरेक': जाहिठाम भोजन अछि ताहिठाम सम्मान अछि, जाहिठाम नहि ताहिठाम नहि - ई साधारण सह-अस्तित्व/अनुपस्थिति तर्क कथाक मूल तर्क थिक। ३१. श्री ललन प्रसाद ठाकुर कव्वाली: साढूनामा (तेसर कड़ी)। जन्म: ५ फरवरी १९५१, मुंगेर रस-ध्वनि: 'साढूनामा' (साढू केर गाथा) कव्वाली शैलीमे! हास्य + शृंगार। ध्वनि: 'साढू' (पत्नी केर बहिनक पति = सम्बन्धी) एक जटिल रक्त-सम्बन्ध शब्द जे मैथिली परिवार संरचना केर विशिष्टता देखबैत अछि। वक्रोक्ति: 'नामा' (आख्यान/इतिहास) - एक साधारण सम्बन्ध केर महाकाव्यीय रूप। बाख्तिन/ उत्सवी-लोकधर्मी: बाख्तिनक उत्सव: कव्वाली शैली स्वाभाविक रूपसँ उत्सवी-लोकधर्मी अछि- दर्शक सहभागिता, पुकार-आ-प्रतिक्रिया, सामाजिक सम्बन्ध केर उपहास। 'साढूनामा' मैथिली सामाजिक सम्बन्ध सभक हास्यपूर्ण ढाँचा-तोड़ैत अछि। लोक साहित्य / विदेह: कव्वाली मूलतः उर्दू-हिन्दी शैली मैथिलीमे: ई भाषिक संकरता विदेह केर समावेशी मान्य-परम्परा केर प्रदर्शन करैत अछि। मैथिली + उर्दू/हिन्दी = एक लोकतान्त्रिक लोक स्थान। ३२. उमेश मंडल कथा: परहेज। रस-ध्वनि: 'परहेज' (निवृत्ति/परिहार) शान्त + करुण। ध्वनि: 'परहेज' चिकित्सीय शब्द - चिकित्सक आदेश। वक्रोक्ति: सामाजिक 'परहेज' (किछु लोक/स्थान सभसँ परिहार) - दलित बहिष्कार केर चिकित्सीय भाषामे साङ्केतिकीकरण। अम्बेडकर/ अस्पृश्यता: चिकित्सीय भाषा केर सामाजिक अनुप्रयोग: 'परहेज' (चिकित्सीय परिहार) आ जाति-आधारित 'परिहार' (अस्पृश्यता) केर समानान्तरता। उमेश मंडलक कहानी एहि भाषिक समानान्तरता केर उपयोग करैत अछि। ३३. कमला चौधरी कथा: कथा-गुणनफल। नारी कथाकार रस-ध्वनि: 'कथा-गुणनफल' (अद्भुत रस। 'गुणनफल' एक गणितीय शब्द - ध्वनि: कहानी दोसर कहानी केँ जन्म दैत अछि। वक्रोक्ति: गणित + आख्यान = एक अप्रत्याशित संयोजन जे पठन केर बारेमे -रूपमे कहानी उत्पादक प्रक्रिया केर स्वयं-पाठ। आख्यान-सिद्धान्त :  बाख्तिन केर 'उपन्यासता': उपन्यास हमेशा स्वयं पर चिन्तन करैत अछि। कमला चौधरीक शीर्षक स्वयं एक साहित्यिक सिद्धान्त कथन थिक। नव्य-न्याय: गंगेशक 'व्युत्पत्ति' (व्युत्पत्ति): 'गुणनफल' - कहानी संख्या जकाँ गुणा होइत अछि। प्रत्येक कहानी केर पात्र होइत अछि – पाठान्तर्सम्बन्धक रूपमे गुणा। ३४. बेचन ठाकुर कथा-नाटक: छीनरदेवी परिचय: बेचन ठाकुर मैथिली नाट्य-परम्परामे ज्योतिरीश्वर ठाकुर केर समानान्तर नाटकक उत्तराधिकारी मानल जाइत छथि। 'छीनरदेवी' एक नाटकीय शैलीमे लिखल कथा थिक- पात्र सूची, वार्तालाप-आधारित आख्यान। रस-ध्वनि: 'छीनरदेवी' ध्वनि: एहि नाममे एक भयानक व्यंग्य अछि। रौद्र + करुण। पात्र: सुभाष ठाकुर, ललन ठाकुर, पवन, मटुक - एक पारिवारिक नाटक। वक्रोक्ति: देवी जे अछि - पितृसत्ता केर परम अपवित्रीकरण। भिखारी ठाकुर / नौटंकी: भिखारी ठाकुर केर लोक-नाट्य परम्परा: बेचन ठाकुर एहि परम्परा केर निरन्तरता करैत छथि। लोक रंगमञ्च- निम्न-जाति समुदाय सभक साहित्यिक स्थान थिक। अम्बेडकर / स्त्रीवादी: 'छीनरदेवी' - एक महिला/देवी ई स्त्रीवादी कथन आ दलित कथन दुनू थिक। अम्बेडकर केर दोबर समीक्षा: पितृसत्ता + जाति एक संग ई उल्लङ्घन सृजित करैत अछि। विदेह ढाँचा: लोक-नाट्य शैली केँ मान्य-परम्परागत विदेह स्थान देनाइ- साहित्य अकादमी केर पारम्परिक 'साहित्यिक कल्पित कथा' श्रेणी केर बाहर। विदेह केर समावेशी विधा-परिभाषा। ३५. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र कथा: सखी कुन्ती। जन्म: ८ फरवरी १९६७ । दिल्ली विश्वविद्यालय एम.एस. सी., एम.फिल.। रस-ध्वनि: 'सखी कुन्ती' करुण। ध्वनि: 'सखी' (महिला मित्र) एक अप्रत्याशित संयोजन। वक्रोक्ति: मित्रता केर शैली? ई सम्बन्ध केर जटिलता - प्रतिस्पर्धात्मक अन्तरङ्गता। बाख्तिन / संघर्ष: बाख्तिनक 'संघर्ष': 'सखी कुस्ती' एक संघर्षपूर्ण मित्रता थिक जतय प्रतिस्पर्धा आ स्नेह एक संग सह-अस्तित्व रखैत अछि। ई बाख्तिनीय संवादवाद केर भौतिक रूप थिक। ३६. गजेन्द्र ठाकुर उपन्यास अंश: सहस्रशीर्षा। विदेह सम्पादक । प्रयोगात्मक कल्पित कथा परिचय: गजेन्द्र ठाकुर विदेहक सम्पादक आ मैथिली प्रयोगात्मक कल्पित कथा केर प्रणेता। उपन्यासक एक अंश। ऋग्वेद केर पुरुष सूक्त। रस-ध्वनि: अद्भुत रस। ध्वनि: 'सहस्र' (हजार) - अनेकता, सामूहिकता, ब्रह्माण्डीय। वक्रोक्ति: वैदिक ब्रह्माण्डीय पुरुष (पुरुष) जे 'सहस्र शीर्ष' (हजार-शीर्ष) अछि - ई एक उपन्यास केर शीर्षक - वैदिक ब्रह्माण्डविद्या केर अर्वाचीन उपन्याससँ जोड़नाइ। जोइस / अर्वाचीनतावादी उपन्यास: जेम्स जोइस केर 'युलिसिस'/'फिननेगन्स वेक' केर पौराणिक ढाँचा: गजेन्द्र ठाकुर वैदिक ढाँचा केँ अर्वाचीन मैथिली उपन्यासमे प्रयुक्त करैत छथि- हुबहू जोइस केर होमर-डबलिन समानान्तरता। नव्य-न्याय: गंगेशक 'सामान्य-विशेष' (सार्वभौमिक-विशिष्ट): 'सहस्र शीर्ष' ओहि ब्रह्माण्डीय सार्वभौमिक रूप थिक जाहिमे प्रत्येक व्यक्ति (विशिष्ट) केर स्थान अछि। उपन्यास केर संरचना एहि दार्शनिक अन्तर्दृष्टि केर आख्यान करैत अछि। विदेह समानान्तर इतिहास: सम्पादक-केर-रूपमे-उपन्यासकार एहि खण्डमे ई दृष्टिकोण प्रस्तुत करैत छथि जे विदेह केर साहित्यिक परियोजना मात्र पुरालेखीय नहि, वरन् ओ स्वयं एक सृजनात्मक प्रयोग थिक। ३७. विद्यानन्द झा किशोर-कथा: किशोर लोकनिक लेल दूटा कथा। रस-ध्वनि: वात्सल्य + वीर रस किशोर पाठक लेल। ध्वनि: 'किशोर लोकनि' सामूहिक सम्बोधन - एक समुदाय केर गठन। वक्रोक्ति: भाषा-सम्पादक केर कथा-लेखन - व्याकरण + आख्यान एक व्यक्तिमे। विदेह ढाँचा: विद्यानन्द झा भाषा-सम्पादक + कथाकार दुनू - ई विदेह केर एकीकृत दृष्टिकोण थिक: साहित्यिक सृजन + भाषा संरक्षण एक संग। उपसंहार: सदेह ४ क समग्र महत्व सदेह ४ मैथिली कथा २००९-१० - ३७ अद्वितीय लेखकक ४० रचना। ई मात्र एक कथा-संग्रह नहि, ई मैथिली कथा केर एक सम्पूर्ण पारिस्थितिकी-प्रणाली थिक। विधा-विविधता: मौलिक कथा (मुख्य भाग) + अनुदित कथा (कोंकणी→मैथिली, डॉ. शम्भु कुमार सिंह द्वारा) + लघुकथा (विजय-हरीश) + बाल-कथा (जगदीश प्रसाद मंडल) + कव्वाली (ललन प्रसाद ठाकुर) + नाटक/ एकांकी (सुरेन्द्र लाभ बेचन ठाकुर) + उपन्यास-अंश (गजेन्द्र ठाकुर) + किशोर-कथा (विद्यानन्द झा)। आवाज-विविधता: दलित स्वर (कपिलेश्वर राउत, जगदीश प्रसाद मंडल, सुरेन्द्र लाभ, उमेश मंडल), ओबीसी स्वर (दुर्गानन्द मंडल), महिला लेखक (कुसुम ठाकुर, कामिनी कामायनी, सुनीता ठाकुर, कमला चौधरी), नेपाली मैथिली (परमेश्वर कापड़ि), शहरी पेशेवर (कुमार मनोज कश्यप), शैक्षणिक (डॉ. कैलाश कुमार मिश्र), प्रयोगात्मक (गजेन्द्र ठाकुर)। चारि ढाँचा केर संश्लेषण: भारतीय रस सिद्धान्त एहि कथा-संग्रहमे सबसँ प्रत्यक्ष रूपसँ सक्रिय अछि - करुण (सामाजिक यथार्थवादी कहानी), वीर (प्रतिरोधी कहानी), हास्य (व्यंग्य), रौद्र (विरोध) सब उपस्थित। पाश्चात्य सिद्धान्त सभ कथा केर राजनैतिक अर्थ-व्यवस्था उजागर करैत अछि। नव्य-न्याय तार्किक संरचना सभक परीक्षण करैत अछि। विदेह समानान्तर इतिहास ढाँचा - दलित, महिला, नेपाल, लोक साहित्य सब मान्य-परम्परागत स्थान पबैत अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.२.अंक ४४१ पर टिप्पणी मानेश्वर मनुज तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम'] मूल तेलुगु: नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव) मैथिली अनुवाद: मानेश्वर मनुज [खण्ड ३] अहाँक कविताक व्याख्या बेसी नीक अछि। अपूर्व। ई एकटा क्लासिक व्याख्या अछि।

रमेश कुमार राय बहुत नीक रचना सभ। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। गद्य Prose २.१. हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२१ २.२. प्रीति कुमारी- चरित्र चित्रण : सूर्य पुत्र कर्ण एक अद्वितीय योद्धा २.३. प्रणव कुमार झा- डिजिटल दुनियाँ मे सायबर हाइजिन २.४. डॉ. योगानन्द झा- अभिनव पद्यविधा : इतिहास-काव्य २.५. मोहन कुमार झा- बीहनिकथा १०० शब्दमे किएक? २.६. लाल देव कामत- सेतुषाम: एक अनुशीलन २.७. आचार्य रामानंद मंडल- समरसता बनाम समानता २.८. रबीन्द्र नारायण मिश्र- जयतु जानकी (धारावाहिक उपन्यास) २.९. संतोष कुमार राय 'बटोही'- कथा 'गैस सिलिंडर' २.१०. विप्रकान्त मंडल- मायक बटबारा २.११. अमरेश ठाकुर- मैथिली साहित्यमे उपन्यासक महत्व २.१२. गजेन्द्र ठाकुर- दीयरि: एक समग्र साहित्यिक मूल्यांकन [रा. ना. सुधाकरक मैथिली कथा-संग्रहक बहुआयामी समीक्षा] २.१३. गजेन्द्र ठाकुर- गोपाल झा 'अभिषेक'क 'आउ स्वप्न साझी करी': साहित्यिक अनुशीलन २.१४. गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली लेल एकटा नारी केन्द्रित समीक्षाशास्त्र [क्वीर-फेमिनिज्म सहित] [सन्दर्भ- कामिनीक "खण्ड-खण्ड मे बँटैत स्त्री" आ शान्ति लक्ष्मी चौधरीक"लेस्बियन कॉन्टिन्युअम"] २.१. हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२१ हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२१ हितनाथ झा (मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070) 'प्रभात'क नवम्बर 1934 अंक (वर्ष-2,अंक-11)मे प्रकाशित कोइलख (पुबारिटोल)क पं. श्रीनन्दन झाक निबन्ध जे अत्यन्त महत्वपूर्ण अछि। पं. जीक अनेक लेख अधिकांश अंकमे विविध विषयपर संस्कृतमे प्रकाशित छनि। मैथिलीमे सेहो चारि-पाँच निबंध प्रकाशित छनि। हिनक एक निबन्ध स्त्री-शिक्षा आ नारी सशक्तीकरणपर पूर्वमे विदेहमे प्रकाशित अछि, जे देल गेल लिंकपर तारानाथ झाक मैथिली साहित्यमे योगदान-09 मे देखल जा सकैछ। हिनक निबन्धमे सामाजिक सकारात्मक परिवर्तनपर विशेष जोड़ रहैत छलनि। हिनक निबन्ध सभमे आगाँक सोच परिलक्षित होइत छलनि। एहि अंकक आलेखमे सेहो साहित्य-शक्ति बिनु समाजमे सुधार नहि भ' सकैछ आ एहि हेतु शिक्षा आवश्यक अछि, मिथिलाक लोककेँ तुलनात्मक उदाहरणसँ साहित्य-शक्तिक उपयोग क' विश्वमे अपन स्थान प्रतिष्ठा सङ्ग पयबाक लेल आह्वान कयलनि अछि, जे साम्प्रतिक समयमे सेहो ओतबहि महत्वक अछि। पंडित जी सभठाम मिथिलाकेँ देश कहलनि अछि, आ देश कोना उत्थान करत ओकर उपाय बतौलनि अछि, भाषा और साहित्यक महत्व जनौलनि अछि आ समृद्धि साहित्ये अहाँकसर्वांगीण उन्नतिक मार्ग प्रशस्त करत। आजुक दिनमे ई आलेख ओहिना महत्वपूर्ण अछि, जहिना आइसँ करीब सय वर्ष पूर्व छल। वास्तवमे वैह साहित्य कालजयी होइत छैक, जे कोनो समयमे ओतबहि ध्यानसँ पढ़ल जाइत अछि आ सभ दिन पढ़ल जायत। वास्तवमे 1933-34मे कोइलखसँ श्री तारानाथ झाक सम्पादकत्वमे प्रकाशित प्रभातमे अनेक कालजयी रचना सभ अछि जे अद्यावधि विदेहमे 20 अंकसँ धारावाहिक छपल अछि आ आगाँ अंकमे सेहो महतवपूर्ण रचना सभ प्रकाशित होयत। ई क्रम एखन जारी रहत। सुधी पाठकसँ निवेदन जे अपन पूर्वजक अर्जित साहित्यिक धरोहरकेँ अधिकसँ अधिक पाठक धरि पहुँचयबाक प्रयास करथि, जाहिसँ आर अनेक महत्वपूर्ण धरोहर सभ अपनालोकनिक समक्ष आबि सकत। पिछला अंकक लिंक आलेखक नीचाँमे देल गेल अछि। साहित्य शक्ति श्रीनन्दन झा, साहित्यतीर्थ सम्प्रति समस्त संसारमे सुधारक सनसनी सूनि पड़ैछ। जाही भाग दृष्टि-पात करू सर्वत्र " सुधार ! सुधार !!"क समयोपयोगी सरस एवं सुन्दर शब्दक साम्राज्य बूझि पड़त। अपना-अपना देशक शीघ्रातिशीघ्र उन्नति करबाक हेतु तद्देशीय, समस्त जनता नाना प्रकारक पवित्र प्रयत्न कय रहल अछि। समस्त संसार पर गम्भीरता पूर्वक दृष्टि-पात कैलासँ प्रायः एको टा देश एहन नहि भेटत जे अपन सुधार करबाक हेतु बद्ध परिकर नहि हो। जखन कोनो देशक सुधार करबाक आवश्यकता पड़ैत छैक तखन सर्व प्रथम शिक्षाक प्रश्न उपस्थित होइ छैक। कारण जे अवनतिक प्रधान कारण थिक शिक्षाक अभाव। ई सर्व-मान्य विषय अछि जे, कोनो देशक अवनति तखनहि हयबाक विशेष सम्भावना जखन ओहि देशमे शिक्षाक अभाव भै जाइछ। अशिक्षित देशक जनता केँ ई ज्ञान कदापि नहि भै सकैत छै जे --- हमरा देशक शोचनीय अवस्था अछि, अतएव एकर उन्नति करव हमरा लोकनिक प्रधान कर्तव्य एवं पवित्र धर्म थिक।आ सव तँ यैह लोकोक्ति अक्षरशः चरितार्थ करबामे अपन महान गौरव बुझैछ जे " भोदू भाव न जाने, पेट भरयसँ काम।" अतएव बिना शिक्षा प्रचार कयने कोनो प्रकारक देशोन्नतिक यत्न करब ओहिमे अकार्यक थिक जेहने महिसिक आगू वीणा बजायव। अतएव सर्वप्रथम शिक्षा प्रचार दिशि समस्त मैथिल-समाजक ध्यान आकर्षित हयब परमावश्यक। यद्यपि सम्प्रति सुधार-सम्बन्धी नाना प्रकारक प्रश्न सव मिथिलहुमे उपस्थित भै रहल अछि।किन्तु ओहिसव सुधारक अंग प्रत्यंग पर पूर्ण विचार कैलासँ ज्ञान होइछ जे ई सव प्रकारक सुधारक नींव सुदृढ नहि रहबाक कारण एहि सवसँ सफलता प्राप्त हैब असम्भव नहि तँ कठिन अवश्य। अतएव एहि सव विषयपर, आंशिक प्रकाश राखब उचित बुझै छी। कारण जे, देशक वर्तमान वातावरणक अनुसार सुधारक प्रश्न एहन जटिल भै गेल अछि जे यदि एहि पर सात्विक दृष्टिसँ पूर्ण गम्भीरता पूर्वक बिचार नहि कयल जायत तँ सुधारक मार्ग अकण्टक हयब कठिन। जें हेतु सफलताक स्थानापन्न असफलतैक अधिक आशा। कारण जे सुधारक मार्ग सघन तीव्र कंटकाकीर्ण होइछ। सुधार करबाक कोनो एक मार्ग निश्चित नहि अछि। जिनका जे उचित बूझि पड़ै छन्हि, से ताही मार्गक अनुसरण कय सुधार करबा मे संलग्न देखि पड़ैत छथि।क्यो कहैत छथि जे जा पर्यन्त धार्मिक सुधार नहि हयत तापर्यन्त कोनो प्रकारक उन्नति कदापि नहि भै सकैछ, कारण जे हमर देश (मिथिला) धर्म-प्राण देश थिक, अतएव सनातन-धर्मक मर्यादा अक्षुण्ण रखलहि सँ उन्नतिक आकाशमे आनन्दित भै सकै छी। कोनो महानुभावक कथन छैन्ह जे सर्वप्रथम सामाजिक सुधार हैव अत्यावश्यक अछि। कारण जएं हेतु हमर सामाजिक संगठन शिथिल भै गेल अछि तेँ हेतु हमरालोकनि, यदि कोनो प्रकारक सामाजिक सुधार अथवा उन्नति करय चाहै छी, से कदापि नहि होइत अछि।अतएव समस्त समाजकेँ संगठनात्मक शृंखलाबद्ध कैलावाक अनन्तर हमरालोकनि सव प्रकारक उन्नति कय सकै छी। कारण जे काहलो जाइछ जे " सव सँ बड़ा समाज"। बहुतों महानुभाव लोकनिक-अटल सिद्धान्त छैन्हि जे बिना राजनैतिक उन्नति कयने कोनो आन प्रकारक उन्नतिक यत्न करब समय एवं शक्तिक सर्वथा दुरुपयोग करब थिक। कारण जे जखन हमरा लोकनि राजनैतिक सुधार द्वारा स्वतन्त्र भै जायब तखन सभ प्रकारक उन्नति हमरा सवाहि अनायास कय लेब, इत्यादि। परन्तु एहि सुधारक महानुभाव लोकनि सँ हमर विनीत प्रश्न ई अछि जे जापर्यन्त देशक जनता अशिक्षित रहत, जापर्यन्त जनताकेँ देशक प्रति कर्तव्याकर्तव्यक समुचित ज्ञान नहि हेतैक, तापर्यन्त अपने लोकनि की अपन-अपन अभिलाषा-पूर्ति कय सकैत छी। कदापि नहि। कारण जे धार्मिक, सामाजिक किंवा राजनैतिक सुधार करबामे जतेक कष्ट सहिष्णुता, दृढ़ निश्चय, त्याग एवं उत्साहक आवश्यकता छैक, तकर हैव विना शिक्षा प्रचारक असम्भव नहि तँ कठिन अवश्य अछि।ई सर्व-मान्य विषय थिक जे, जतबा उपकार देश के शिक्षित मनुष्य द्वारा भै सकैछ ततबा उपकार अशिक्षित मनुष्य द्वारा हयब असम्भव।इहो कहब प्रायः अप्रासंगिक नहि हैत जे अशिक्षित मनुष्य सँ देशक उपकारक स्थानापन्न अपकारे हैवाक सर्वथैव सम्भावना। अतएव समस्त सुधारक महानुभाव लोकनिसँ हमर करबद्ध प्रार्थना जे अपने लोकनि एकबेर समस्त संगठित शक्तिसँ सर्वप्रथम शिक्षा प्रचारमे सोत्साह निश्चयात्मक रूपेण संलग्न भै जाइत जाउ, तखन अनायास माता मिथिलाक कल्याणक सङ्ग-सङ्ग समस्त मैथिल समाजक सुकीर्ति पताका समस्त संसारमे अवश्य फहराय लागत, एहिमे विन्दु-विसर्ग मात्र संदेह नहि। 'शिक्षा' एक एहन व्यापक, विशाल एवं प्रभावोत्पादक पवित्र विषय थिक जाहिमे नाना प्रकारक शिक्षा सवहिक समावेश अछि। यदि एकर विशद व्याख्या कैल जाय तँ एहि क्षुद्र लेखकक कोन कथा, पैघ-पैघ प्रकाण्ड विद्वानहुँक चिरायु समाप्त भै गेनहुँ एकर विशद व्याख्या समाप्त नहि भै सकैछ। किन्तु ' शिक्षा' शब्दसँ हमर तात्कालिक अभिप्राय अछि- पठन-पाठन- प्रणालीक प्रचार।अर्थात साहित्यिक सुधार। शिक्षाक अनेकानेक अंग-प्रत्यंगमे साहित्यिक सुधार सेहो एक सर्वश्रेष्ठ एवं प्रधान अंग मानल जाइछ। साहित्यक प्रचार द्वारा जतेक शीघ्र सव प्रकारक शिक्षाक प्रचार भै सकैछ, ततेक आन कोनो साधन द्वारा नहि। साहित्य एक एहन अमूल्य रत्न थिक, जकर प्रचार द्वारा उन्नतिक समस्त साधन केन्द्रीय भूत भै समष्टि रूपसँ संगठित भै जाइछ। साहित्यमे एक एहन अकाट्य शक्तिक समावेश छैक जाहि द्वारा अवनति पंक-पतित देश अविलम्ब समुन्नति सिंहासनारूढ़ भै जाइत अछि। साहित्य एवं भाषामे परस्पर अप्रत्यक्ष विभिन्नता रहितहुँ तथापि दूनूमे घनिष्ठ अन्योन्याश्रय प्रत्यक्ष सम्बन्ध छैक। एकक अभावें दोसराक विकास हैव कदापि सम्भव नहि। अतएव हम साहित्यिक उन्नति करबहिमे भाषाक उन्नति बुझै छी। कारण साहित्य द्वारा भाषा परिमार्जित एवं सुसुंगठित भै ओकर जनतामे पूर्ण विकास होइत छैक।तेँ हेतु तद्देशीय - ज्योति जगमगाय लगैत छैक एवं नवजीवनक संचार भै जाइत छैक। जाहि भाषाक साहित्य नहि छैक, एकमात्र वजवा-भुकवाक व्यवहार मे अबैत अछि, ओ भाषा ग्रामीण किंवा असभ्य मानल जाइछ। ओहि भाषासँ देशक उपकार कदापि नहि भै सकैछ।कारण जे साहित्यिक भाषा व थिक जाहिमे पत्र-पत्रिका एवं पुस्तकादि प्रचुर परिमाणमे प्रकाशित हो। कोनो देशक अवनतिक प्रधान चिन्ह थिक, ओहि देशक भाषा,भेष एवं भोजनक प्राचीन परिपाटीमे परिवर्तन हैव।जाहि देशक भाषा, भेष एवं भोजन अन्यदेशीय परिपाटीक अनुसार भै गेल छैक ओहि देशक उन्नति हैव असाध्य नहि तँ कष्टसाध्य अवश्य। कारण जे भाषा, भेष एवं भोजनक समानता देशक हेतु सुदृढ़ एकताक परिचायक थिक। जाहि देशक ई तीनू वस्तुक क्रम स्वदेशक प्राचीन परिपाटीक अनुसार एक समान छैक, वैह देश सव प्रकारक उन्नति कै सकैछ। अथवा ओही देशक गणना उन्नतिशील देशमे भै सकैछ। प्रमाणार् बंगाल, पंजाब,गुजरात एवं महाराष्ट्र(मद्रास) हिकेँ राखू। एहिसव देशमे उपर्युक्त तीनू वस्तुमे अधिकांश समानता छैक, जै हेतु ओ देशसब उन्नति-प्रधान देश मानल जाइछ एवं शिक्षा तथा साहित्यक प्रचार सेहो अपना -अपना देशक अनुकूल पर्याप्त छैक। किन्तु अहू तीनू वस्तुमे सर्वप्रधान भाषा थिक। कारण जे जाहि-जाहि क्रमे भाषाक ह्रास किम्बा विकास भेल जेतैक ताहि-ताहि क्रमे भेष तथा भोजनहुक प्राचीन प्रणालीक ह्रास अथवा विकास भेल जेतैक। एहि तीनू वस्तुमे निर्बलता अवितहि सहसा एकताक अभाव भै जाइ छैक, एकताक अभाव होइतहि धार्मिक,सामाजिक, साहित्यिक, राजनैतिक, वैज्ञानिक, आध्यात्मिक एवं आर्थिक इत्यादि कोनो प्रकारक उन्नति अथवा विकास कदापि नहि भै सकैछ, ने कोनो प्रकारक शिक्षाहिक प्रचार हैवाक सम्भावना। कारण जे सब प्रकारक उन्नतिक प्रधान साधन थिक एकता तथा एकताक जननी थिक भाषा एवं भाषाक संगठित , सुव्यवस्थित एवं परिमार्जित रूपक विकासहिक नज़्म थिक साहित्य। जाहि द्वारा सब प्रकारक शिक्षा-प्रचार देशमे सुगमतापूर्वक शीघ्र भै सकैछ। साहित्य-प्रचार द्वारा जतेक शीघ्र देशमे सजीवता,देश-प्रेम, कर्तव्याकर्तव्य-ज्ञान, एकता, त्याग, दृढ़-निश्चय, उत्साह, कर्तव्यपरायणता, कष्ट-सहिष्णुता एवं स्वावलम्बन इत्यादि समस्त आवश्यकीय गुणक आविर्भाव होइ छैक, ततेक शीघ्र प्रायः अन्य कोनो साधन द्वारा नहि।साहित्य द्वारा जाहि विषयक प्रचार देशमे करय चाही से सब सुगमता एवं सफलतापूर्वक अनायास भै जा सकैछ, एहिमे कोनो मेष-वृष नहि। हम ऊपर कहि आयल छी जे देशक समस्त सुधार करबाक हेतु सर्वप्रथम शिक्षाक प्रचार करब आवश्यक, जाहिसँ अवश्यमेव देशक दुर्दशा दूर भै देशमे सुख-शान्तिक साम्राज्य स्थापित भै सकैछ। किन्तु शिक्षा प्रचार सेहो विना साहित्यक उन्नतिक हयब असम्भव। कारण जे हमरा जनैत सब प्रकारक शिक्षाक संदेश देशक समस्त जनताक सम्मुख पहुँचैबाक शक्ति साहित्यकेँ छोड़ि आन कोनो साधनकेँ नहि छैक। किन्तु साहित्यक प्रचारक प्रधान साधन थिक पुस्तकादि तथा पत्र-पत्रकादिक प्रकाशन। जापर्यन्त प्रचुर परिमाणमे समाचार-पत्रक प्रकाशन नहि होइ छैक, तापर्यन्त कदापि साहित्यक प्रचार नहि भै सकैछ, ने शिक्षित हैवाक ज्ञान देशक जनताकेँ भै सकैछ। कारण जे कोनो विषयक प्रचार करबाक जेहन शक्ति समाचार-पत्रकेँ छैक, तेहन शक्ति प्रायः अन्य कोनो वस्तुकेँ नहि। अतएव देशक दुर्दशा दूर करबाक हेतु सर्वप्रथम साहित्यक उन्नति करब असीम आवश्यक। संसारक सम्मुख वैह देश सगर्व ठाढ़ हयबाक साहस कै सकैछ जाहि देशक साहित्य-भण्डार सर्वथैव परिपूर्ण होइक। जे देश साहित्य-शून्य अछि ओ देश कदापि सभ्य देशक समानता नहि कै सकैछ तथा तद्देशीय जनताक शिरपर एहि बातक अमिट कलंक-कालिमा लागि जाइत छैक, जे ओलोकनि स्वदेशक प्रेमी नहि, प्रत्युत मातृभूमिक पतित सन्तान थिकाह। कारण जे जाहि मनुष्यसँ देश, एवं जातिक कल्याण नहि भेलैक -,ओकर जन्म दुर्भगा स्त्री (हिजड़नी)क भरण-पोषण करबाक समान निरर्थक थिक। अस्तु --- मिथिलाक सम्प्रति जेहन दुःखद अवस्था अछि से प्रायः कोनो मैथिल सन्तानसँ अविदित नहि अछि।हमरा जनैत मिथिलाक दुर्दशाक प्रधान कारण थिक मैथिली साहित्यक उन्नतिक अभाव।कारण जे देश-हित-सम्बन्धी जे कोनो कार्य देशमे होमय लागल अछि ताहि सबमे प्रायः पूर्ण सफलता प्राप्त नहि भेल अछि। साहित्य भण्डार पूर्ण रहने देशोन्नतिक मार्ग सुगम रहैत छैक, जाहि सौं सर्वसाधारणकेँ देशक सुधार करबामे सुविधा भै जाइत छैक। अतएव हमर समस्त मैथिल समाजसँ एतबे प्रार्थना जे अपने लोकनि आव समस्त सुसंगठित शक्तिसँ मैथिली साहित्य भंडार भरवामे लागि जाइत जाउ तखन निश्चय जानल जाय जे निकट भविष्यमे अवश्य मिथिलाक सब प्रकारक उन्नति भै जायत। कारण जे देशक उन्नति करबाक हेतु जे कोनो आवश्यक साधन अछि,ताहि सभमे सर्वश्रेष्ठ एवं ब्रह्मास्त्र थिक " साहित्य-शक्ति "। (प्रभात: संपादक-तारानाथ झा, वर्ष-2,अंक-11,1934) लेखक-श्रीनन्दन झा, साहित्य तीर्थ (कोइलख, पुबारिटोल) २५.१०.१९३४ संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-7 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-8 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-9 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-10 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-11 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-12 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-13 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-14 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-15 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-16 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-17 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-18 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-19 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-20 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.२. प्रीति कुमारी- चरित्र चित्रण : सूर्य पुत्र कर्ण एक अद्वितीय योद्धा प्रीति कुमारी चरित्र चित्रण : सूर्य पुत्र कर्ण एक अद्वितीय योद्धा

मैथिली'क उपन्यासकार श्री आर.एन. मिश्र जीके २० गोट उपन्यासमे सँ टटका पोथी 'सूर्य पुत्र ' धार्मिक ऐतिहासिक उपन्यास छन्हि। जाहि मैथिली भाषा'क पोथीक' केन्द्रीय पात्र सूतपुत्र कर्ण छथि। इ नाँउ बलशाली ( जैविक पुत्र - माय कुन्ती आ पिता सूर्य देव) कर्ण केँ जगजीयार भेलन्हि, मुदा पाल्यपिता शहिस अधिरथ आ माय राधेए पुकारू नाम रखलन्हि वसुषेण। महाभारतके कौरव पक्ष सँ पाण्डव पक्षके विवाद'क प्रसंगके चर्चा होइतहि एक बीर पुरुषके रुपमेँ दूर्योधन जीक परम मित्र कर्ण'क विरूदावली विज्ञ व्यासपीठ दिशसँ होइत आबि रहल अछि। प्रवचन सभामंच पर अनेको महाज्ञानी प्रवाचक सँ कथाक माध्यम श्रधालू श्रोतागणक बीच ; जीवनभरि विष पिबिकय उदारताक अमृत बँटैत रहय बालामे कर्ण जीक मादे व्याख्यान पाठक अवश्य सुनने हेयब। कर्ण सदिखन शत्रु केँ सेहो उचित सम्मान देबाक धर्मक निर्वाह कयनिहार भेलाह। कर्णक जन्म एक भावुक क्षणके रहस्य ,माय द्वारा शिशुक परित्याग आ तत्कालीन समाजक पक्षपातपूर्ण व्यवहार सँ हुनकर आत्मा पर अनन्त घावो उत्पन्न करैत रहल। युगानतक कथा पाठमे श्री मिश्रजी आरो एक मुख्य बात कहैत छथि - "तथापि ओ घाओ सभ हुनकर शौर्य आ पुरुषार्थ केँ दुर्वल नहिँ कऽ सकल ,अपितु तेज, तप आ संकल्पक प्रतीक बनि गेल।" कुलीन कुमारि कुन्तिक कोरामे जे नवजात शिशु हुनक राजभवनक एकान्त कक्षमे रहैन,ताहि बालककेँ जन्मेसँ कानमे कुण्डल आ देहमे कवच रक्षार्थ विद्यमान रहैक। अतिशय तेजस्वी मुखाकृति रहितो पुत्र मोहक त्याग करबा लेल लोक लज्जवश कुन्ती अपन धायक सहयोग सँ गोपनीय पूर्वक एक काज रताराति कयलीह। से उकरू काज रहैक काठक बाकसमे हस्तिनापुर लगेक अश्व नदीमे भसाएब। बाकस छोटछीन नाहे जहाँति नदी'क धारामे प्रवाहित होइत भासिया गेलैक। बच्चाके बेर - बेर दुलार आ स्वयंके दूध पियेनाई पुन: नहिं करा सकबाक कुहैन कुन्ती केँ जीवन पर्यन्त हुक जेकाँ उठैत रहलन्हि। ओहि जन्मौटी बच्चाक कानब बंद बाकसमे अधिरथ - राधा सुनैते मातैर भगवान - भगवतीकेँ धन्यवाद दैत मनचाहा फल बुझि बरखा बिहारि कम भेलापर सुरक्षित अपना ओहिठाम आनि मनोयोग सँ पालन- पोषणमे नि: संतान दम्पति लागि जाइए। वसुषेण क्रमशः पैघ होईत जाईत छथि आ हुनकर स्वाभाविक रुचि अश्त्र -शस्त्रमे होइत जाइछ। से हुनक पाल्यपिता आ माता अत्यंत हर्षित भऽ बुझि- गमि अपनामे विमर्श करैत छथि। वसुषेण उर्फ कर्णक ईच्क्षा अनुसारे अधिरथ अपन मित्र हस्तिनापुर'क राजा धृतराष्ट्र जी ओतय पठेबाक पकिया नियार भास करैत छथि । से मायके पुत्रक वियोग यशोदा जेकाँ होय छन्हि,जहन नन्दजी लग सँ कन्हैया गेल रहथि। मुदा धृतराष्ट्र जीक ओहिठामक आश्रित गुरु द्रोणाचार्य आचार्य लग प्रस्थान करय दूनू बापुत पंडितक ताकल दिनमे परिबारक पारंपरिक परिधान पहिरने रथ सँ जाइत छथि। ओहि आचार्य जीके ख्याति विश्व स्तर पर महान् विद्वानमे होइत रहनि , जिनका सँ अस्त्र - शस्त्र विद्या हासिल करबाक परम सौभाग्य प्राप्त भेलन्हि; संगहि पाण्डव आ कोरव आदि गुरूकुलक राजपुत्र सभक संगति भेलन्हि। आचार्य जीके पुत्र अश्वत्थमाक शिक्षण- प्रशिक्षण सेहो ओहिठाम भेलैक। अर्जुन सबसँ प्रिय विद्यार्थिमे सँ आचार्यक रहनि,अपनों बेटा सँ बेसी बढ़िकऽ हुनका मानैत छलाह। सुतपुत्र बूझि ओतय कर्णक अनदेखी आचार्य करथि से बात दुर्योधनोंकेँ बुझयमे आबैक। अर्जुन सँ आगू बढ़ैत प्रखर तेजस्विता देखि दूर्योधनकेँ खूशी होइन,आ कर्ण सँ मैत्रीभाव राखथिन। पाँचो पाण्डव - कौरव सहित विद्यार्थीगण आचार्य द्रोणाचार्य सँ शिक्षा प्राप्त करैत युद्ध कौशलमे निपुण होइत जाई गेलाह। एकदिन प्रदर्शन सँ औअलि (औबल) चुनय लेल सबहक प्रतियोगिता होइत छैक,ताहिमे दर्शक रूपेँ भीम,द्रोण, कृपाचार्य, विदूर आ महाराजा लोकनि जुमल छलथि। प्रथमत: भीम - दुर्योधनक' संग गद्दायुध्द शिर्षस्थ धरि पहुँच जाईछ। आखिरमे आचार्यक संकेत पाबि अश्वत्थामा मध्यस्थता कय दूनूकेँ छोरेलनि। अन्तमे अर्जून अपन करतब करैत,अस्त्र - शस्त्र भांजैत सर्वश्रेष्ठता पाबय चाहैथि; ताहि बीच तीर- धनुष संग कोनहु सँ भूचाल मचबैत कर्णक हटात् प्रवेश होईछ। आ कर्ण चुनौती दैत राजा - महराजाक बीच सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर देखेलथि से कृपाचार्यक घोषणा सँ जे ई रंगमंच राजपरिवार'क शिष्य लेल अछि। एहिक द्वंद्व युद्ध बीच कर्णक अपमान होईत देखि दुर्योधन जी अंगदेशक राजा घोषित करैत अपन मित्र कर्णक लेल उदारता देखेलन्हि। ऐ दृश्य केँ कुन्तीजी सेहो अवलोकन करैत सभागारमे मोनेमन असह्य दुखी छलीह। आचार्य जी कर्णक प्रतिभा सँ परेशान रहथि आ कर्ण कंसोह लैत अर्जून - द्रोणजीक शिक्षा केँ स्वत: ग्रहण कऽ लैथ। मुदा ब्रह्मास्त्र देवय आचार्य उचित नहिं बूझलन्हि। तेँ अगिला योग्य गुरु करय ओतय सँ कर्ण रातिमे बाहर चलि जाइ छथि । ओ एकलव्य जेकाँ अपन हाथक औंठा कटबय नहिं चाहैत छथि। अपन जाति आ वंश तँ कर्णकेँ बदलब पार नहिं लागैय छन्हि। मुदा ओ जतबे वीर ,ततबे दृढ़ संकल्पी रहथि। परशुराम जीके गुरुकुल पहुँचते कर्णक ललाटक आभा देखि गुरुवर अपन सब गुण सिखाएब उचित बुझैत अंक लागाबैत छन्हि। वनमे एक गायके बछरू केँ कर्णक धनुष वाण अभ्यास सँ अवघात पहुँच गेलैक ,से क्षमा याचना लेल गोउपालक छली ब्राह्मण माफी नहिं करैत श्राप दैत छन्हि। आचार्य हृदय फोलिकय आशिर्वाद देनहार शिष्यक उदासी हरैले फल खुआबैत रीझाबैत छन्हि। एहि क्रममे ओ कर्णक पलथामे माथ रखैत आलस पाबि निसभेर नींनमे सुति रहैत छथि। ता एकटा वीषकीट आबि कर्णके जांघमे भुर करैत शोणीतक फव्वारा बहा देलकैक। परंच शिष्य अपन गुरुक आराममे बाधा नहिं आबय दैत असीम कष्ट स्वंय भोगथि। अकस्मात् गुरुवरके नींन टुटला सँ रक्तधार चलैत देखि ,अचम्भित होइत शिष्य सँ कड़ा सबाल दागैत छन्हि। ओ आक्रोशमे बजैत छथि -" तोँ ब्राह्मण नहिं छें! बाज तोहर कुल मूल गोत्र की थीकौक ? ब्राह्मण तँ एतेक पैघ कष्ट सहन नहिंयेटा करत! हम श्राप दैत छियो, ब्रह्मास्त्र गुण तोरा शिथिल रहतौ। तैयो पुनः शेष गुण देलाक आशिर्वाद प्राप्त कयलाह अछि। जकरा डरे पराजित भऽ कृष्ण मथुरा छोड़िकय द्वारका परा चुकल रहथि, ताहि जरासंध सँ दूर्योधन केर अटूट मित्र श्री कर्ण केँ पछरा पड़ला पर हुनको सँ एक राज़ 'मालिन' उपहारमे पाबैत छथि। कलिंग देशक राजा अपन बेटी कनिकादेवी'क स्वयंवर विश्व स्तर पर आयोजित कयने रहैछ। ताहिमे दूर्योधनके लेल कर्ण बलपूर्वक उठा अपना रथ पर बसाबैत भरल सभा सँ आबि मित्रक धूमधाम सँ वियाह देखैत छथि। धरि अपने आजीवन अविवाहित रहलाह अछि। मित्रक आकांक्षा पुरा करय लेल महाभारत युद्धमे कृष्ण क' गप्प कर्ण नहिं मानलन्हि आ ने कुन्तीक बात मानलनि। मुदा सब जगह हिनका वीरता केँ डंका बजैत रहल आ ध्वजा फहराइत रहल। नियमवध्द कुरूक्षेत्रमे दूनू दलक सेनापति क' नेतृत्वमे घमासान युद्धमे सेना सहित योध्दा लोकनि मरल ,संगहि अश्वत्थामा नामक हाथी सेहो शंख ध्वनिकाल मुइल रहैक। एक समय एहन आबि जाईछ जे दूनू दल हिनका सेनापति मानैय लेल अपना - अपना पक्ष सँ लड़ाय जीतबाक उद्देश्यमे प्रस्ताव दैत रहल। विधिके लिखल आ समय अयलापर भाग्यमे दूनू दलक समर्थन सँ कर्ण महाराजा बनि जाईत छथि। सब प्रजा कर्णके श्रेष्टता लेल जय-जयकार कय उठल छल। - प्रीति कुमारी, बी.ए., बीएड. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.३. प्रणव कुमार झा- डिजिटल दुनियाँ मे सायबर हाइजिन प्रणव कुमार झा डिजिटल दुनियाँ मे सायबर हाइजिन आजुक समय मे मानव सभ्यता एहन मोड़ पर ठाढ़ अछि, जतऽ भौतिक दुनिया सँ बेसी सक्रियता डिजिटल दुनिया मे अछि। आजुक डिजिटल युग मे हम सब मोबाइल, लैपटॉप आ इंटरनेट सँ घिरल छी। बैंकक काज होअय वा पढ़ाई, किनल-बेचल होअय वा गप-सप, सब किछु ऑनलाइन अछि, सब किछु आब मोबाइलक एकटा क्लिक पर सिमटि गेल अछि। ई परिवर्तन केवल तकनीकी नै, बल्कि सामाजिक सेहो अछि। आजुक ई डिजिटल आंगन एतेक व्यापक भऽ गेल अछि जे जाहि मे समाजक हर वर्ग समाहित अछि। विद्यार्थीक शिक्षा आ भविष्य आब ऑनलाइन कक्षा आ इंटरनेटक ज्ञान-कोष पर निर्भर अछि। गृहिणी मोबाइलक बाट धेने घरक चौहद्दी सँ बाहर निकलि कऽ डिजिटल दुनिया सँ मनोरंजन, किचन पकवान, डोमेस्टिक काज आ ई-कॉमर्स मे साझेदारी कऽ रहल छथि। बूढ़-बुजुर्ग अपन एकाकीपन दूर करबाक लेल आ परिवार सँ जुड़ल रहबाक लेल वीडियो कॉल आ सोशल मीडियाक सहारा लय रहल छथि। बेरोजगार युवा रोजगारक नब अवसर आ फ्रीलांसिंग लेल एहि आभासी दुनिया मे अपन संभावना ताकि रहल छथि। मुदा जतय ई डिजिटल दुनिया संभावनाक द्वार खोललक अछि, ततय ई एकटा नव अदृश्य खतराक अड्डा सेहो बनल अछि। जहिना हम अपन देह केँ निरोग राखबाक लेल स्वच्छता (Hygiene) केँ जीवनक अंग बनबैत छी, तहिना इंटरनेट पर अपन डाटा, धन आ मान-सम्मान केँ सुरक्षित राखबाक लेल सायबर हाइजिन अनिवार्य अछि। विगत किछु वर्षक घटनाक्रम ई प्रमाणित कयलक अछि जे सायबर सुरक्षा केवल पासवर्ड लगा देब भरि नै, अपितु एकटा संस्कृति के रुप मे अपनेबाक बेगरता अछि। जहिना सभ्य समाज मे रस्ता पर चलैत काल बामाँ सँ चलब वा लालबत्ती देख चौबटिया पर ठाढ रहब छोट अवस्था से ही आदत मे घुसा देल जाय अछि, तहिना कोनो संदिग्ध लिंक पर क्लिक नै करब, इंटरनेट पर https:// आ Lock ताला चिन्ह देखब, विडियो या इंटेरनेशनल वीओपीआई कॉल के सोचि समझि उठायाब आ अपन निजी जानकारी गोपनीय राखब के अपने सभ के  डिजिटल संस्कार के रूप मे विकसित करय पड़त। जहिना कोरोना के दोसर लहरि के बाद साइते कोनो एहन लोक बांचल रहि गेल छलाह जिनक जानपहचान मे इ बिमारि ककरो ने ककरो लीलने नै होइ। तहिना आइ के तारिख मे आब साइते एहन कियौ बांचल हेता जिनका या हुनक सम्बंधि के इ सायबर अटैक से पाला नै पड़ल होइ। एकटा बात आरो जे खाली जानकारी भेने ऐ मकड़ जाल से कखन धरि बचब से नै कहल जा सकय अछि, ताहि दुआरे आवश्यक इ अछि जे सयबर हाइजिन के एकटा स्वभाविक आदति के रुप मे अपने सभ के ढालय पडत आ ताहि लेल ई विषय पर विचार - चर्चा आवश्यक अछि । हमर घर स्वयम  सायबर ठगी के शिकार बनि चुकल अछि। स्वाईत एहि लेख के माध्यम से हम सायबर हाइजिन केँ तकनीकी दृष्टि सँ नै, बल्कि एकटा रक्षा कवच केँ रूप मे प्रस्तुत करबाक प्रयास कय रहल छी। सायबर ठगीक मनोवैज्ञानिक त्रिकोण: जरूरत, लोभ आ डऽर (Need, Greed & Fear): सायबर हमलावर केवल कंप्यूटर कोड सँ नै, बल्कि मनुष्यक भावना सँ खेलैत अछि। हुनक हमलाक मूल मे तीनटा मुख्य कैटालिस्ट (Catalyst) होइत अछि - जरूरत (Need), लोभ (Greed) आ डऽर (Fear)।     लोभ (Greed): ई सब सँ बेसी प्रभावी अस्त्र अछि। "अहाँक 5 लाखक लॉटरी लागल अछि" वा "बिना कोनो मेहनत कऽ घर बैसल पैसा कमाउ" सन मैसेज लोकक विवेक केँ शून्य क दैत अछि। डर (Fear): अपराधी लोककें डराबैत छथि जे "अहाँक बैंक खाता तुरंत बंद भऽ जाएत" वा "बिजली कटि जाएत" वा “अहांक फलाना के पुलिस धऽ लेलक या की एक्सीडेंट भऽ गेल”। डरक मारे लोक बिना सोचने-बुझने संदिग्ध लिंक पर क्लिक कऽ दैत छथि वा संदिग्ध ट्रांजेकशन कऽ दैत छथि । जरूरत (Need): कखनो-कखनो अपराधी लोकक मजबूरीक फायदा उठबैत छथि, जेना सस्ता लोन वा सरकारी योजनाक लाभक फर्जी झांसा दऽ कऽ हुनकर निजी जानकारी चोरी कयल जाइत अछि। जखन एहि मे सँ कोनो एकटा भावना हावी होइत अछि, तखन लोकक सायबर हाइजिन शिथिल भऽ जाइत अछि आ हमलावर अपन जाल मे लोक सब केँ फँसा लैत अछि। CERT-In द्वारा चिन्हित किछु प्रमुख सायबर खतरा निम्नलिखित अछि: क. फिशिंग (Phishing) :  ई सब सँ बेसी प्रचलित खतरा अछि। एहि मे अपराधी अहाँकें कोनो नामी बैंक, फेसबुक, बिजली विभाग वा सरकारी संस्थाक नाम सँ फर्जी ईमेल वा मैसेज पठेबाक स्वांग रचैत अछि। भारत मे हाल मे बिजली बिल अपडेट करबाक नाम पर बहुतो लोक केँ मैसेज आयल जे "अहाँक बिजली कटि जाएत, एहि लिंक पर क्लिक कऽ पेमेन्ट करू।" लोक घबरा कऽ लिंक पर क्लिक कयलनि आ अपन बैंक डिटेल भरि देलनि, जाहि सँ हुनकर खाता खाली भऽ गेल। ख. विशिंग आ स्मिशिंग (Vishing & Smishing) : विशिंग (Vishing): फोन कॉल के माध्यम सँ ठगी। जेना- "हम बैंक सँ बाजि रहल छी, अहाँक ATM कार्ड बंद भऽ रहल अछि, OTP बताउ।" स्मिशिंग (Smishing): SMS के माध्यम सँ ठगी। "अहाँक 5 लाखक लॉटरी लागल अछि, क्लेम लेल एहि लिंक पर क्लिक करू।" ग. क्विशिंग (Quishing) : QR कोड के माध्यम सँ ठगी। अपराधी कोनो क्यूआर कोड पठेबाक बहाने अहाँ सँ स्कैन करबैत अछि आ अहाँक खाता सँ पैसा कटि जाएत अछि। मऽन राखू, QR कोड पैसा प्राप्त करय लेल नै, बल्कि पैसा देबाक लेल स्कैन कयल जाएत अछि। घ. सायबर ग्रूमिंग (Cyber Grooming) : ई विशेष रूप सँ किशोर (Adolescents) लेल खतरा अछि। कोनो अनजान व्यक्ति सोशल मीडिया पर बच्चा सँ दोस्ती करैत अछि, हुनकर विश्वास जीतैत अछि आ फेर हुनका गलत काज लेल मजबूर करैत अछि। सायबर हमलाक विभिन्न स्वरूपक विस्तृत विवेचना 1. मालवेयर (Malware): ई मैलिसियस सॉफ्टवेयर (Malicious Software) क संक्षिप्त रूप अछि। ई एकटा एहन प्रोग्राम अछि जे अहाँक अनुमति बिना कंप्यूटर वा मोबाइल मे घुसि कऽ डाटा चोरी करैत अछि वा डिवाइस केँ खराब कऽ दैत अछि। उदाहरण: कोनो फ्री मूवी डाउनलोड करबाक चक्कर मे अहाँक फोन मे वायरस आबि जाएब। 2. फिशिंग (Phishing): अपराधी असली संस्था (जेना बैंक) बनिक अहाँकें ईमेल वा मैसेज पठाबैत अछि। जहिना बंसीसँ माँछ पकड़ल जाइत अछि, तहिना लिंक सँ अहाँक पासवर्ड पकड़ल जाइत अछि। उदाहरण: अहाँक बैंक अकाउंट ब्लॉक भऽ गेल अछि, एहि लिंक पर क्लिक कऽ पासवर्ड अपडेट करू। 3. रैनसमवेयर (Ransomware): एहि हमला मे अपराधी अहाँक सब फाइल केँ लॉक (Encrypt) कऽ दैत अछि आ ओकरा खोलबाक लेल पैसा (फिरौती/Ransom) मांगैत अछि। उदाहरण: जुलाइ 2023 मे एम्स दिल्ली के सिस्टम पर भारि रैनसमवेयर अटैक भेल छल जाहि से कै दिन तक एम्स के काम-काज मे भारी अफरा-तफरि भेल छल। 4. डिनायल ऑफ सर्विस - DoS/DDoS : एहि मे कोनो वेबसाइट पर एकहि संगे एतेक फर्जी ट्रैफिक पठाओल जाइत अछि जे असली यूजर ओकरा समय पर खोलि नै सकैत अछि। उदाहरण: कोनो सरकारी रिजल्टक दिन वेबसाइटक क्रैश भऽ जाएब, जदि ओ अपराधी द्वारा कयल गेल होअय। 5. मैन-इन-द-मिडल - MitM (Man-in-the-Middle) : जखन दू व्यक्ति आपस मे गप/ट्रंजेक्शन करैत छथि, तऽ अपराधी बीच मे आबि कऽ ओहि जानकारी केँ चोरी-चुपके पढ़ि लैत अछि। उदाहरण: असुरक्षित सार्वजनिक वाई-फाई (Airport/Station) क प्रयोग करैत काल केओ अहाँक चैटिंग सुचना/ ट्रंजेक्शन पढ़ि सकाय अछि आ ओकर दुरुपयोग कऽ सकाय अछि। 6. एसक्यूएल इंजेक्शन (SQL Injection) :  ई वेबसाइटक डेटाबेस पर हमला अछि। अपराधी वेबसाइटक सर्च बॉक्स मे गलत कोड डालि कऽ ओकर पूरा डेटाबेस सँ जानकारी निकालि लैत अछि। 7. जीरो-डे एक्सप्लॉइट (Zero-day Exploit) : कोनो सॉफ्टवेयर मे कोनो एहन कमजोरी (Bug) जेकर पता ओहि यूजर संस्था या वर्गकेँ सेहो नै अछि, ओकर फायदा उठा कऽ अपराधी हमला करैत अछि। 8. ईव्सड्रॉपिंग (Eavesdropping) : ई डिजिटल कनसुई (चुपके सँ सुनब) अछि। कोनो नेटवर्क केँ हैक कऽ अपराधी अहाँक फोन कॉल वा मैसेज केँ चुपके सँ सुनैत/पढ़ैत अछि। 9. पासवर्ड हमला (Password Attack) : विभिन्न तरीका सँ अहाँक पासवर्डक अनुमान लगायब। ब्रूट फोर्स (Brute Force): सॉफ्टवेयर सँ हजारो पासवर्ड ट्राई करब। डिक्शनरी अटैक: आम शब्द (जेना: Password@123) क प्रयोग करब। 10. क्रॉस-साइट स्क्रिप्टिंग - XSS (Cross-site Scripting) : एहि मे अपराधी कोनो विश्वसनीय वेबसाइट मे खतरनाक स्क्रिप्ट डालि दैत अछि। जखन आम लोक ओहि साइट केँ देखैत छथि, तऽ हुनकर ब्राउज़र सँ डाटा चोरी भऽ जाइत अछि। 11. एडवेयर (Adware) : ई अहाँक स्क्रीन पर जबरदस्ती विज्ञापन (Ads) देखबैत अछि। बेसी विज्ञापन देखबा सँ मोबाइल सुस्त भऽ जाइत अछि आ व्यक्तिगत जानकारी लीक सेहो भऽ सकाय अछि, संगहि लोक पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव सेहो पड़े अछि। 12। रूटकिट (Rootkits) : ई सब सँ खतरनाक अछि। ई कंप्यूटर केँ रूट (जड़ि) सँ कंट्रोल करैत अछि आ एंटी-वायरस सँ सेहो नुकायल रहैत अछि। अपराधी अहाँक कंप्यूटर केँ रिमोट सँ चला सकैत अछि। सायबर हमला आ ओकर विशिष्ट बचाव उपाय 1 मालवेयर (Malware) o   सदिखन एकटा विश्वसनीय एंटी-वायरस सॉफ्टवेयरक प्रयोग करबाक चाही। o   अज्ञात स्रोत (Third-party sites) सँ कोनो फ्री सॉफ्टवेयर वा गेम डाउनलोड नै करबाक चाही। o   USB ड्राइव (पेनड्राइव) लगाबै सँ पहिने ओकरा स्कैन जरूर करबाक चाही। 2 फिशिंग (Phishing) o   ईमेल मे देल गेल कोनो Urgently कार्य करबाक लिंक पर बिना वेरिफ़ाई केने क्लिक नै करबाक चाही। o   प्रेषक (Sender) के ईमेल एड्रेसक स्पेलिंग ध्यान सँ जाँचू (जेना- bank.com क जगह bakk.com भऽ सकैत अछि)। o   CERT-In क सलाह अछि: रुकू, सोचू, फेर क्लिक करू। 3 रैनसमवेयर (Ransomware) o   अपन महत्वपूर्ण डाटाक नियमित बैकअप  बाहरी हार्ड ड्राइव वा क्लाउड पर राखू। o   अनजान ईमेल अटैचमेंट (जेना .zip वा .exe फाइल) कखनो नै खोलू। 4। DoS/DDoS हमला o   वेबसाइट लेल फायरवॉल (Firewall) आ लोड बैलेंसरक प्रयोग करबाक चाही। o   अनावश्यक पोर्ट (Ports) आ सेवा केँ बंद राखू। 5। मैन-इन-द-मिडल (MitM) o   सार्वजनिक वाईफाई पर बैंकिंग वा पासवर्ड वाला काज कखनो नै करबाक चाही। o   सदिखन HTTPS (Lock symbol 🔒) वाला वेबसाइटक टा प्रयोग करबाक चाही। o   संवेदनशील काज लेल VPN (Virtual Private Network) क प्रयोग उत्तम अछि। 6। एसक्यूएल इंजेक्शन (SQL Injection) o   वेबसाइट डेवलपर्स केँ Input Validation क कड़ा नियम अपनाबय पड़त। o   सॉफ्टवेयर केँ सदिखन नवीनतम पैच (Security Patches) सँ अपडेट राखू। 7 जीरो-डे एक्सप्लॉइट (Zero-day Exploit) o   अपन ऑपरेटिंग सिस्टम (Windows/Android/iOS) आ एप्स केँ सदिखन अपडेट राखबाक चाही। o   CERT-In द्वारा जारी Security Advisories पर नजरि राखबाक आ फॉलो करबाक चाही। 8 ईव्सड्रॉपिंग (Eavesdropping) o   अपन बातचीत आ डाटा लेल End-to-End Encryption वाला एप्सक प्रयोग करबाक चाही। o   वाईफाई राउटर मे WPA3 सुरक्षा प्रोटोकॉल आ मजबूत पासवर्ड लगेबाक चाही। 9 पासवर्ड हमला (Password Attack) o    टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन (2FA) अनिवार्य रूप सँ इनेबल करबाक चाही। o   अपन नाम, जन्मतिथि वा मोबाइल नंबरक पासवर्ड नै बनाउ। एकटा पासफ्रेज (Passphrase) क प्रयोग करबाक चाही (जेना: MyDog@Likes123#)। 10 क्रॉस-साइट स्क्रिप्टिंग (XSS) o   ब्राउज़र मे Content Security Policy (CSP) लागू करबाक चाही। o   अविश्वसनीय वेबसाइट पर अपन क्रेडेंशियल्स (Login details) नै भरबाक चाही। 11 एडवेयर (Adware) o   ब्राउज़र मे Ad-blocker एक्सटेंशनक प्रयोग कऽ सकैत छी। o   कोनो एप इंस्टॉल करैत काल ओकरासँ माँगल गेल Permissions (जेना कैमरा, कॉन्टैक्ट्स) केँ ध्यान सँ पढ़ू आ जे जरूरी नै होअय ओकरा बंद करबाक चाही। 12 रूटकिट (Rootkits) o   Secure Boot फीचर केँ BIOS मे इनेबल राखबाक चाही। o   CERT-In क M-Kavach 2 आ USB Pratirodh टूल क प्रयोग करबाक चाही जे रूट लेवलक खतरा सँ बचाव करैत अछि। विभिन्न वर्गक लेल सुरक्षा निर्देश किशोर आ युवा (Adolescents) : बच्चा आ किशोर प्रायः गेमिंग आ सोशल मीडियाक कारण खतरा मे रहैत छथि। अनजान सँ दूरी: कोनो भी अनजान लोकक Friend Request स्वीकार नै करबाक चाही निजी जानकारी: अपन स्कूलक नाम, घरक पता वा फोटो सोशल मीडिया पर सार्वजनिक नै करबाक चाही संवाद: यदि केओ ऑनलाइन डराबय वा असहज करय, त तुरंत अभिभावक केँ बताउ पढु CERT-In गाइड्लाइन   https://www.csk.gov.in/documents/Safer%20Internet%20day%20English%202026.pdf ख. वरिष्ठ नागरिक (Senior Citizens) : वरिष्ठ नागरिक प्रायः भावनात्मक हेरफेर (Emotional Manipulation) के शिकार होइत छथि। विश्वास नै करबाक चाही: कोनो भी कॉल जे लॉटरी वा आकस्मिक सहायताक बात करय, ओकरा सँ सावधान रहू । बैंकिंग सुरक्षा: अपन PIN वा OTP कखनो केओ अधिकारी केँ सेहो नै बताउ । सहायता: डिजिटल ट्रांजेक्शन लेल केवल विश्वसनीय स्रोत वा परिवारक सदस्यक मदति लिय पढु CERT-In गाइड्लाइन  https://www.csk.gov.in/documents/CERT-In-NCSAM-Book_2025-10-01.pdf ग. महिला सुरक्षा (Women Safety) प्राइवेसी: सोशल मीडिया प्रोफाइल केँ Private राखू । लोकेशन: अनजान या संदिग्ध लोक से अपन वर्तमान लोकेशन (Live Location) साझा करबा सँ बचू । रिपोर्टिंग: यदि केओ परेशान करय, त ओकरा तुरंत ब्लॉक करबाक चाही आ रिपोर्ट करबाक चाही। पढु CERT-In गाइड्लाइन   https://www.csk.gov.in/best-practices/Womens-Day2026.html सायबर हाइजिन के श्रेष्ठ अभ्यास (Best Practices) मजबूत पासवर्ड: पासवर्ड मे अक्षर, अंक आ विशेष चिन्हक प्रयोग करबाक चाही आ ओकरा समय-समय पर बदलैत रहू। टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन (2FA): अपन सब महत्वपूर्ण अकाउंट (Google, Facebook, Bank) पर 2FA जरूर लगाउ। सॉफ्टवेयर अपडेट: मोबाइल आ कंप्यूटरक सॉफ्टवेयर सदिखन अपडेट राखू, ई सुरक्षा कवचक काज करैत अछि । सार्वजनिक वाईफाई सँ बचू: फ्री वाईफाई पर बैंकिंग वा निजी काज नै करबाक चाही। CERT-In के मुफ्त सुरक्षा टूल्स : भारत सरकार द्वारा नागरिकक लेल सायबर स्वच्छता केंद्र (www.csk.gov.in) पर कतेको टूल्स मुफ्त मे उपलब्ध अछि: M-Kavach 2: मोबाइल सुरक्षा लेल उपयोगी एप USB Pratirodh: बाहरी पेनड्राइव सँ फैलै वाला वायरस केँ रोकैत अछि Free AntiVirus : मालवेयर के रोकय अछि। AppSamvid: केवल अधिकृत एप्स केँ चलबाक अनुमति दैत अछि Free Bot Removal Tools: कंप्यूटर सँ खतरनाक वायरस हटाबै लेल CSK वेबसाइट पर उपलब्ध अछि सहायता आ रिपोर्टिंग : यदि अहाँ सायबर अपराधक शिकार भऽ जाइत छी, तऽ घबराउ नै: कॉल 1930: कोनो भी वित्तीय या अन्य सायबर धोखाधड़ी लेल तुरंत एहि नंबर पर कॉल करबाक चाही। वेबसाइट: www.cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करबाक चाही । CERT-In: तकनीकी घटनाक रिपोर्ट incident@cert-in.org.in पर पठाउ । डिजिटल दुनिया मे सुरक्षाक कोनो शॉर्टकट नै अछि। सजगते सुरक्षा अछि। सायबर हाइजिन के अभ्यास सुरक्षित डिजिटल स्पेस के निर्माण करय अछि। जेना लोक घरसँ निकलैत काल केबाड़ मे ताला लगाबैत अछि, तहिना इंटरनेट पर अपन डाटा केँ पासवर्ड आ सावधानीक ताला सँ सुरक्षित राखबाक दरकार छैक। Pause. Think. Click. (रुकू, सोचू, फेर क्लिक करू)। संदर्भ (References): CERT-In Safe Internet: Best Practices Booklet for Digital Nagriks. CERT-In National Cyber Security Awareness Month (NCSAM) Guide 2025. Cyber Smart Kids: Suraksha Guide (CERT-In). Mobile Phone Security Guidelines (CERT-In). Phishing Attack Prevention Guide (CERT-In). Safer Internet Day 2026: Official Advisory. 7.     CERT-In Cyber Attack Definitions Guide. 8.     iGOT Karmayogi Learning Module on Cyber Security. 9.     NCSAM 2025 Best Practices. -प्रणव कुमार झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.४. डॉ. योगानन्द झा- अभिनव पद्यविधा : इतिहास-काव्य डॉ. योगानन्द झा अभिनव पद्यविधा : इतिहास-काव्य

इसवी सन् 1801 मे विदेशी विद्वान एच.टी कोलब्रुक भाषाक रूपमे सर्वप्रथम मैथिल किंवा तिरहुतिया शब्दक प्रयोग कयलनि। मुदा अज्ञानतावश हुनक भ्रान्त अवधारणा विज्ञापित भेल जे ई भाषा ने तँ विस्तृत क्षेत्रमे प्रयुक्त अछि आ ने कोनो उत्कृष्ट रचनाकारे एकर संपोषण कयने छथि, जखन कि कोलब्रुकक ई अवधारणा सर्वथा निरस्त करबा योग्य छल। वस्तुत: मैथिली नहि केवल मिथिला अपितु नेपालो तराइक विस्तृत क्षेत्रक भाषा रहल अछि। एकर विराट अस्तित्व आठमे शताब्दीसँ बनल रहलैक अछि। एहि भाषामे विद्यापति , जगज्ज्योतिर्मल्ल सन -सन अनेक वरेण्य कविलोकनिक विराट ओ निरन्तरगामी श्रृंखला वर्तमान रहल अछि। अवश्ये मिथिला भूमि संस्कृत विद्याक केंद्र रूपमे प्रख्यात रहल अछि आ एहि ठामक पंडित समाज अपन मातृभाषा साहित्यकेँ गौरवक वस्तु नहि बुझैत रहलाह, एकरा उपेक्षणीय दृष्टिसँ देखैत रहलाह तथा एकरा केवल लोकरंजनक वस्तु बुझैत रहला, रसिक सहृदय मात्रक वस्तु बुझैत रहलाह। परिणामत: 1854 ईसवीक एजुकेशनल डिस्पैचमे जखन अन्यान्य जनपदीय भाषासब लोकशिक्षणक भाषाक रूपमे स्वीकार्य भेल ,मिथिला जनपदमे मैथिलीक स्थान हिन्दी लऽ लेलक। परवर्ती कालमे खास कऽ युगप्रवर्तक चन्दा झाक आविर्भावक पश्चात् मैथिली भाषा-साहित्यक सञ्चयन-संवर्धन एकटा आन्दोलनक रूप धारण कयलक जकर परिणामस्वरुप आइ मैथिली समकालिक भारतीय भाषा सबहिक समकक्ष ठाढ़ भऽ सकल अछि आ संविधान-सम्मत भाषाक रूपमे समादृत अछि।मैथिलीक एहि अभ्युन्नतिमे आवासी -प्रवासी सकल मैथिली भाषी समुदायक निरन्तरगामी इच्छाशक्ति ओ कार्यशक्तिक अवदान रहलनि अछि। एहन अवदानी लोकनिमे मातृभाषानुरागी ओहू वर्गकेँ नहि अवडेरल जा सकैत छनि जे सभ वृत्या मैथिलीसँ सम्पृक्त नहियों रहलाक बाद अवसर पबैत देरी मातृभाषा भक्तिक भुम्हुरकेँ प्रज्वलित अग्निमे परिवर्तित कऽ अनुपम अवदान प्रदान करैत कृतार्थ भेलाह अछि। एहने किछु विशिष्ट अवदानी लोकनिक मध्य श्री राज किशोर मिश्रक नाम अत्यन्त आदरक संग लेल जा सकैत छनि जनिक लगभग दू दर्जन मैथिली ओ एक दर्जन हिन्दी कृति प्रकाशित छनि आ असीम ऊर्जा सम्पन्न ई प्रतिभा सदिखन मिथिला-मैथिल-मैथिलीक संगहि अखिल मानवताक हित -चिन्तनमे व्यस्त देखि पड़ैत छथि।

श्री मिश्र मूलत: कवि थिकाह । यद्यपि हिनक लेखन कर्म बहुआयामी छनि, तथापि पद्य-विधामे हिनक डेढ़ दर्जन पोथी हिनक कवित्व प्रतिभाक परिचायकक रूपमे क्रमश: समक्ष अबैत रहलनि अछि। हिनक रचनावलीक ई अन्यतम विशिष्टता छनि जे ओ नहि केवल लोकरंजनक सीमाटाक स्पर्श करैत अछि, अपितु प्रचुर लोकशिक्षणक साधनक रूपमे सेहो प्रस्तुत होइत रहल अछि। बानगीक रूपमे हिनक ' प्रलय -पाश , जँ जग जल नहि होइत, सभ्यताक भ्रम, ऊर्जस्विता' आदिकेँ परेखल जा सकैछ। आचार्य चाणक्य पर हिनक ऐतिहासिक विषयाधारित खण्ड-काव्य आबि चुकल छनि।सम्प्रति ई 'श्री मिथिला ' काव्य पोथी लऽ कऽ प्रस्तुत भेल छथि जाहिमे मिथिलाक इतिहासकेँ वस्तु रूपमे ग्रहण कऽ रचना कयल गेल अछि । एहि ग्रन्थकेँ ई इतिहास-काव्य विधाक अन्तर्गत रखलनि अछि जकरा हिनक नव्यता ओ भव्यताक अन्वेषण दिसुक प्रयत्न कहल जा सकैत छनि। वस्तुत: एहि पोथीक द्वारा श्री मिश्र एकटा अभिनव पद्यविधाक स्थापनाक दिशामे पदक्षेप करैत देखि पड़ैत छथि। श्री मिश्रक ई प्रयत्न परवर्ती रचनाकार लोकनिक हेतु मार्गदर्शक भऽ सकैत छनि, से अपेक्षा कयल जा सकैछ।

'श्री मिथिला'मे वस्तुत: मिथिलाक संक्षिप्त इतिहासकेँ पद्यबद्ध कयल गेल अछि। रचनाकार स्वयं कहने छथि जे 'एहि पोथीमे मिथिलाक विविध आयामकेँ संक्षिप्त, समेकित ओ समग्रतासँ पद्यविधामे प्रस्तुत कयल गेल अछि। इतिहास, दार्शनिक सम्वाद, शास्त्रार्थ, संस्कृति ,समाज, लोकगीत, लोकगाथा एहि सभ विषयपर एकसंग संक्षेपमे ,साङ्गोपाङ्ग काव्य -रचना करब चुनौतीपूर्ण लागल। ई काव्य-यात्रा वैदिक युगसँ चलि डिजिटल युग धरि आएल अछि। पोथीक विषय-वस्तुकेँ तीन काल-खंडमे बाँटल गेल अछि : प्राचीन काल, मध्य काल ओ आधुनिक काल। तदनुकूल सतरह गोट अध्यायमे विषय सभकेँ समावेशित कयल गेल अछि। ' ई लेखकीय वक्तव्य समीचीन होइतो एकर अनेक अंशपर असहमतिक संभावना बनैत अछि, तथापि एतबा तँ सर्वथा सत्य अछि जे रचनाकार मिथिला-मैथिल ओ मैथिलीक प्रति पूर्ण आस्थावान ओ गौरवान्वित छथि। द्रष्टव्य अछि हिनक किछु पाँती ,यथा -

'सीरध्वज सन शासक जतय, याज्ञवल्क्य विधि-निर्माता, गौतम सन नैयायिक, गार्गी नहि रचलनि फेर विधाता।'

'दू परम ज्ञानीक संवादसँ, जगत् पाओल बड़ ज्ञान, सौभाग्य छल एहि भूमिकेँ, जे एहन-एहन विद्वान ।'

'धन,बल,पौरुष, सम्पदा, मिलि सब असुर-समाज, डिगा सकल नहि सीताकेँ, नारी जातिक ओ नाज। '

एहि काव्यक प्रथम खंड प्राचीन काल नओ अध्यायमे विभक्त अछि जाहिमे क्रमश: विदेह ; गार्गी-याज्ञवल्क्य-संवाद ; मैत्रेयी-याज्ञवल्क्य-संवाद; अष्टावक्र; अष्टावक्र-जनक-सम्वाद ; वैदेही ; दर्शन, समाज, संस्कृति ओ अर्थतंत्र ; वज्जिमहाजनपद, मौर्य-वंश, गुप्तकाल, पाल-वंश, गुर्जर-प्रतिहार, चन्देल तथा अंतिम मंडन-शंकराचार्य-शास्त्रार्थ अनुस्यूत अछि।

रचनाकार पहिल अध्यायमे इतिहास ओ कल्पनाक आधार पर विदेह जनपदक निर्माण ओ वैशिष्ट्यक परिचय प्रस्तुत कयने छथि। दोसर ओ तेसर अध्यायमे क्रमश: गार्गी ओ मैत्रेयीक संग याज्ञवल्क्यक संवादक विवरण प्रस्तुत कऽ तत्कालीन ब्रह्मवादिनी मैथिलानी लोकनिक दृष्टांत प्रस्तुत भेल अछि। चारिम अध्यायमे अष्टावक्रक परिचय ओ पाँचम अध्यायमे अष्टावक्र-जनक-सम्वादक माध्यमे स्थितप्रज्ञता ओ आत्मतत्त्वक परिचय प्रदान कयल गेल अछि। छठम अध्यायमे मिथिलाक प्राकृतिक सौंदर्य, लोकवेद,जानकीक जन्म ओ अपूर्व शौर्य, जनकक प्रतिज्ञा, राम द्वारा धनुर्भंग ओ सीताराम विवाह, रामक वनगमन, सीताक पतिपरायणता आदिक अति संक्षिप्त विवरण देल गेल अछि। तत:पर सीताहरण, अशोकवाटिकामे रावण-सीता -संवाद, रावणक नाश, सीताक अग्निपरीक्षा ओ अयोध्या प्रत्यागमन ,सीताक पुन: वनवास, लव-कुश प्रसंग ओ जानकीक पाताल प्रवेश धरिक कथाकेँ समाहित कऽ लेल गेल अछि। सातम अध्यायमे मिथिलामे प्रचलित तद् युगीन दर्शन, सामाजिक व्यवस्था , धर्म, अर्थ-तंत्र आदिक परिचय प्रदान कयल गेल अछि। आठम अध्यायमे प्राचीन कालमे मिथिलाक शासन- पद्धति ओ शासक वर्गक परिचय प्रदान कयल गेल अछि। एहि खण्डक अंतिम अध्याय'मंडन-शंकराचार्य-शास्त्रार्थ'मे रचनाकार 'शंकर दिग्विजय'क सर्वथा अनुकरण कऽ लेलनि अछि।

मध्यकालक वर्णन सात अध्यायमे विभक्त अछि। तकर पहिल दशम अध्यायमे कर्णाट वंशक प्रशस्तिवाचन,राजा हरिसिंहदेवक नेपाल पलायन, हुनका द्वारा प्रचारित पञ्जी-व्यवस्था ओ हुनक वंशज लोकनिक समयमे कृत साहित्यिक-सांस्कृतिक कृति आदिक विवरण प्रस्तुत भेल अछि। एगारहम अध्यायमे ओइनवार-वंशक विरुदावली ,राजा शिवसिंहक पलायन एवं तदवधिमे रचित महाकवि विद्यापतिक किछु प्रमुख रचनाक उल्लेख भेलनि अछि। बारहम अध्याय विद्यापतिकेँ समर्पित छनि।कवि सहर्ष गर्वोन्नत भऽ उद्घोष कयने छथि -

'महाकविकेँ हम की आँकब? बाँसक लग्गीसँ हिमालय नापब?'

एहि अध्यायमे विद्यापतिक ज्ञान-गरिमा ,रचनावली आदिक उल्लेख करैत तत्कालीन मिथिलाक कतोक सामाजिक-सांस्कृतिक पक्षकेँ निरावृत कऽ प्रस्तुत कयल गेल अछि। तेरहम अध्याय लोकगाथामे गाथा-चक्रक उपयोगिता, ओकर शिल्प-विधान, सम्बद्ध वाद्य- यंत्र ,परिगणना,वर्णित वस्तु विशेष आदिक उल्लेख भेल अछि। चौदहम अध्यायमे खण्डवला कुलक राजप्राप्तिक कथाक संगहि एहि कुलक प्रमुख राजा लोकनिक विरुदावलीक सांकेतिक गायन भेल अछि। पन्द्रहम अध्यायमे मध्यकालीन मैथिल लोकनिक संस्कृति ओ संस्कार,,धर्म ओ उपासना,सामाजिक रीति-कुरीति ,शिक्षा-व्यवस्था ,महाजनी प्रथा,अर्थतंत्र, लोकनृत्य, लोकगीत, ओ विभिन्न ऋतुक वर्णन भेल अछि जे कविक संवेदनशीलताक अभिव्यंजक अछि। एहि खण्डक अंतिम सोलहम अध्यायमे कवि मैथिली भाषाक संक्षिप्त ऐतिहासिक विकास मार्गक निदर्शन प्रस्तुत करैत आधुनिक मैथिली लेखकक प्रति संतोष अभिव्यक्त करैत देखि पड़ैत छथि ,यथा -

'खूब लेखन भऽ रहल अछि, ओजस्वी ओ बहुआयामी, कतेको साहित्यकार लोकनि छथि यशस्वी आओर नामी।'

कविक उपरलिखित आकलन संख्याक दृष्टिएँ सत्य मुदा गुणक दृष्टिएँ सर्वथा शोचनीय कहल जा सकैत अछि। पोथीक अंतिम सतरहम अध्यायमे आधुनिक कालक मिथिलाक वर्णनक लाथे मिथिला जगतमे होइत क्रमिक विकासक एकटा चित्र उरेहल गेल अछि तथा मैथिलीक विभिन्न समस्यापर सेहो दृष्टिपात करबाक प्रयास भेल अछि। एहिमे डिजिटल युगक लाभ-हानि तथा प्रगति-पथपर अग्रेषित मिथिलाक प्रति उल्लासक वर्णन भेल अछि।संगहि एहिमे वैज्ञानिक युग ओ पाश्चात्य संस्कृतिक अन्धानुकरण जन्य विकृति सब पर सेहो ध्यान आकृष्ट कयल गेल अछि।

एहि तरहेँ समग्रतामे ई पोथी मिथिलाक राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक ओ साहित्यिक इतिहासकेँ सहेजने अछि आ से पद्य काव्यक माध्यमक कारणे अभिनव आस्वाद प्रदान करैत अछि। ओना घटना-उपघटनाक विवरण तँ प्रबंधकाव्यक अनिवार्य अंश रहिते अछि तथापि ई काव्य एहि लऽ कऽ विशिष्ट कहल जा सकैत अछि जे एहिमे शास्त्रीय विषयकेँ अत्यन्त रोचक ढंगसँ प्रस्तुत कयल गेल अछि।

श्री मिश्रक ई ध्वनिकाव्य थिकनि जकर लक्ष्य अछि मिथिलाक लोकजीवनमे अपन पूर्व पुरुष लोकनिक आदर्शक संरक्षण ओ संवर्द्धनक दिशामे उत्प्रेरण।

मात्रिक छंदमे आबद्ध एहि काव्यक प्रत्येक पद यति ,गति सँ समन्वित अछि। अवश्ये कतोक ठाम छन्दत्रुटि अखरैत अछि तथापि शब्द लालित्य ओ आलंकारिता एकरा श्रेष्ठ काव्यमे परिगणनीय बनौने अछि यथा -

'घोघ उठा कऽ चलथि जे नारी , लाजे मुँह अड़हुल समान । लागनि मुख जनु उगल नभमे , संग-संग दिनमणि ओ चान ।।'

मिथिलाक सम्पूर्ण इतिहासक विस्तीर्ण फलक पर रचित ई काव्य रचनाकारक निरन्तर चिन्तनक अवक्षेपण थिक। श्री मिश्र मिथिलाक गौरवशाली परम्परा दिस इंगित करैत अपन ओहि धरोहरक रक्षाक निमित्त आह्वान तँ करबे कयलनि अछि , संगहि आधुनिक सौविध्यपूर्ण जीवनमे अनायास प्रवेश करैत विकृति सभ दिस सेहो चिन्तन प्रस्तुत कयलनि अछि।ई हुनक नैसर्गिक प्रतिभा ,असाधारण व्युत्पत्ति ओ निर्मल अध्ययन- अनुभूतिसँ ओत-प्रोत काव्य-रचना थिकनि जे मिथिलाक प्रति राष्ट्रीय भावनाक उद्दीपनक लाथेँ भारतीयताक प्रति एकात्म भक्तिभाव ओ लोकमंगलक कामनापरक सिद्ध अछि। द्रष्टव्य अछि हिनक किछु समाजसापेक्ष ओ सुधारवादी पंक्ति जाहिमे ओजस्विता ओ सत्साहित्यक भाव -दर्शन विवेच्य काव्यक उत्कृष्टताक प्रतीक कहल जा सकैछ, यथा -

'साझी सँ एकल परिवार। भेल जा रहल ओहो भार।। टूटि रहल अछि वैवाहिक-संबंध। पाश्चात्य संस्कृति तँ अछिये अन्ध।। गामक जिनगीमे छल दुलार। इरखा दिस संतुलन भेल उलार।। विज्ञान बढ़ल आ पढ़ल समाज । मुदा, कला, संस्कृतिक अछि काज।। '

कवि आधुनिक वैज्ञानिक प्रगतिजन्य मानव जीवनमे आयल सुख -समृद्धि ओ सौविध्यक प्रति आश्वस्तिक संगहि ओकरासँ उत्पन्न दुष्प्रभावसँ सेहो परिचित करबैत चलैत छथि आ मानव मात्रकेँ सावधान करैत गुनलनि अछि -

'हमसभ आब ओहि युगमे छी लागल छै सुविधाकेँ अम्बार, मनुक्ख तकनीकक बलपर अछि रचने अपन कृत्रिम संसार। '

एहि कृत्रिम संसारमे मानव जीवन सरल ओ संरक्षित तँ भेल बुझना जाइछ मुदा प्रकृतिक निरन्तर दोहनक कारणे क्रमश: असंतुलन बढ़ले जा रहल अछि । लोककेँ वायु-प्रदूषण , जल-प्रदूषण, जलाभाव,जंगली जानवरक प्रकोप आदि सहबा लेल बाध्य होमऽ पड़ि रहल छनि । संचार क्रांति सकल विश्वकेँ एकटा गाम तँ बना देलक मुदा औपचारिकता बढ़ैत गेल अछि, मनुक्ख-मनुक्खक बीच आपकता घटैत चल गेल अछि। 'एआई' प्रत्येक काजक हेतु उपयुक्त तँ भऽ गेल अछि मुदा ओकरामे ओ संवेदना कोना भेटतैक जे मानव-मानवक बीच व्यवहारसँ सहजे भेटि जाइत छलैक।

एहि तरहेँ कवि मानव मात्रक भविष्यक चिन्तनमे लीन बुझना जाइत छथि।

कविक ई कृति महत् काव्यक अंतर्गत परिगणित नहि कयल जा सकैछ। एहिमे महत् काव्यक सदृश विराट चिन्तन तँ छैक, मुदा केंद्रीय बिन्दुक अभावे जकाँ छैक। लक्षणानुसारी महत् काव्यक छाँह-छूँह एहि काव्यमे यत्र-तत्र आकर्षणक कारण बनल अछि यथा - एहि काव्यक आरम्भमे तँ नमस्क्रिया किंवा मङ्गलाचरणक उद्योग तँ नहि भेल अछि मुदा अन्तमे भरत वाक्यक अनुगुम्फनक प्रयास देखल जा सकैछ-

'सभसँ ऊपर देश अपन थिक भारत अप्पन सबहक प्राण , नहि अछि जगमे कोनो देश एहन होअए जे एकर समान।

देशक प्रगतिमे ककरोसँ कम नहि रहय मिथिलाक अवदान, संस्कृति समुन्नत, अर्थ उन्नत तकनीक बढ़य, बढ़य विज्ञान। '

अन्तमे एहि लोकशिक्षणपरक काव्य रचनाक हेतु श्री मिश्रक सम्वर्द्धना करैत छियनि आ हिनक स्वर्णलेखनीक अजस्र रसधारक प्रति आश्वस्ति अभिव्यक्त करैत हिनक स्वस्थ, समृद्ध ओ कर्मयोगीक व्यस्त सारस्वत जीवन-पद्धतिक याचना सकल ब्रह्मांडनायकसँ करैत छियनि ।

-योगानन्द झा, ग्राम -कबिलपुर (प.), वार्ड संख्या -46 (द. न. नि), पो. -लहेरियासराय, जि.-दरभंगा (बिहार), पिनकोड-846001; मो. 9334493330 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.५. मोहन कुमार झा- बीहनिकथा १०० शब्दमे किएक? मोहन कुमार झा बीहनिकथा १०० शब्दमे किएक?

मैथिली साहित्यक एकटा विशिष्ट विधा बीहनिकथा एकरा बीज कथाक नामसँ सेहो जानल जाइत अछि , एहिमे एकटा छोट सन कथ्यक बीया पारल जाइत अछि , जे पाठकक मोन मे उपजल विवेक, संवेदना आओर कल्पनासँ स्वतः पूर्ण कथामे गढ़ि लैत छथि , ई ने कोनो ठेठ लघुकथा थिक आ ने अति-लघुकथा ई एकटा मुक्त, आ अत्यंत संक्षिप्त रचना अछि, जे प्रायः १०० शब्द धरि सीमित रहैत अछि , सवाल उठैत अछि अधिकतम १०० शब्द किएक?

ई मनमाना सीमा अछि वा साहित्यिक आवश्यकता ?

गहन विचार केलापर निष्कर्ष पहुँचलहुँ अछि जे ई सीमा कोनो व्यक्ति विशेषक मनमानी नहिं, अपितु कलाके गहींरगर पाठकके सक्रियता, आ आधुनिक समय के मांगक प्रतिबिंब अछि !

संक्षिप्तता एकटा प्राचीन साहित्यिक परंपरा रहल अछि, संस्कृत सूत्र साहित्य, जापानी हाइकु, या अंग्रेजी फ्लैश फिक्शन एहि सिद्धांत पर आधारित अछि , बीहनिकथा एहि परंपराक आधुनिक मैथिली अभिव्यक्ति थिक , १०० शब्दक सीमा रचनाकेँ अनुशासित करैत अछि!

लेखककेँ अनावश्यक शब्द, विस्तार, आ अलंकरणसँ बचबाक चाही , प्रत्येक शब्द सार्थक, स्तरित, आ सुझाव देबयवला हेबाक चाही , एहिसँ भाषाक स्तर मजगूत हेतैक , जेना बियामे पूरा गाछक सम्भावना होइत छैक तहिना बीहनिकथाक सार, द्वंद्व, चरित्र, आ निष्कर्ष १०० शब्द मे समाहित छैक , पाठक बियाके पोसैत छथि आ अपन कल्पनासँ कथाके पूरा करैत छथि ई निष्क्रिय पठन स बेसी सक्रिय सह-सृष्टि अछि !

दीर्घ कथा लेखक व्याख्या थोपैत छथि, जखन कि बीहनिकथा मे लेखक मात्र बिया पारित छथि , पाठकक मन, अनुभव, स्मृति, आ संवेदना कथाकेँ आकार दैत अछि , एकहि बीहनिकथा फराक-फराक पाठक लेल फराक-फराक अर्थ ल' सकैत अछि , ई बहुसंयोजकता साहित्यके समृद्ध करैत अछि, मुदा जँ १०० शब्दसँ बेसी भ' जाइत अछि त' ई गुण खतम भ' जाइत , विस्तार सँ लेखकक छाह बढ़ैत छैक आ पाठकक स्वतंत्रता कम होइत छैक, तेँ सीमा अनिवार्य अछि !

आजुक पाठक व्यस्त छथि। सोशल मीडिया, छोट-छोट स्क्रीन स्क्रोल, आ तत्काल जानकारी के युगमे लोकके नम्हर उपन्यास पढ़य के समय नहिं भेटैत छनि , बीहनिकथा एहि युगक साहित्यिक प्रतिक्रिया अछि , पूरा कहानी १०० शब्द में पढ़ल जा सकैत अछि-एक कप चाह, छोट-छोट बस के यात्रा पर, या मोबाइल फोन के स्क्रॉल करैत काल अपितु एकर गहींर छाप छोड़ैत अछि !

एहिसँ साहित्य लोकतांत्रिक भ' जाइत अछि; साधारण लोक सेहो साहित्यक उपभोग आ सृजन क' सकैत अछि दिल्ली सन महानगरमे रहय वाला मैथिली प्रेमी सेहो अपन व्यस्तता के बीच एहि विधा के अपनाबैत छथि कियाक त ई हुनकर समय के मांग के पूरा करैत अछि !

मैथिली सन क्षेत्रीय भाषा मे शब्द भाषाक मिठास आ शक्ति केँ कायम रखैत अछि, अनावश्यक विस्तार भाषाकेँ खिचड़ी बना दैत अछि , १०० शब्दक सीमा लेखक केँ सबसँ सटीक, मधुर, आ प्रभावशाली शब्द चुनबा लेल बाध्य करैत अछि, जाहि सँ मैथिलीक मौलिकता सुरक्षित रहैत अछि !

बीहनिकथा ठीक १०० शब्द मे लिखबाक चाही कारण एहि सीमा सँ रचना केँ बिया सन रूप भेटैत छैक , ई लेखक के अनुशासित करै छै, हर शब्द के सार्थक बनबै छै, आओर पाठकके सक्रिय सह-निर्माता बनै में सक्षम करै छै। आधुनिक व्यस्त जीवन मे त्वरित पठनीयता सुनिश्चित करैत अछि ,अनेक व्याख्या, आओर गहींर प्रभावशाली विचारक जन्म दैत अछि , अधिक शब्द विस्तार कमजोरी दिस ल' जाइत अछि, जखन कि ई सीमा साहित्य के सशक्त आ संक्षिप्त रखैत अछि , बीहनिकथाक सार ओकर संक्षिप्तता मे निहित अछि-जहिना छोट-छोट बीया मे नुकायल विशाल गाछ!

अंत मे एकटा बीहनिकथा मात्र १०० शब्द मे लिखल जेबाक चाही कारण संक्षिप्तता एकर ताकत होइत छैक , पाठक के सोचय लेल बाध्य करैत अछि, भाषा के परिष्कृत करैत अछि, आ समयके मांग के पूरा करैत अछि ई विधा साबित करैत अछि जे कममे बेसी कहल जा सकैत अछि ! साहित्यक असली परीक्षा ओकर प्रभाव होइत छैक, ओकर विस्तार नहि ,बीहनिकथा परीक्षा पास करैत अछि !

-मोहन कुमार झा, बेहट, झंझारपुर। कोहट एनक्लेव, दिल्ली अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.६. लाल देव कामत- सेतुषाम: एक अनुशीलन लाल देव कामत सेतुषाम : एक अनुशीलन अनचिन्हार आखर केर संस्थापक आ सम्पादक आशिष अनचिन्हार जीक सम्पादनमे प्रीति कारण सेतु बान्हल'क वाद आब ' सेतु षाम ' सद्यप्रकाशित मैथिलीमे पोथी एहि वर्ष २०२६ मे बहराएल छैक। श्री अनचिन्हारजी मैथिली गजल'क व्याकरण ओ इतिहास तथा मैथिली वेब पत्रकारिताक इतिहास सहित ११ गोट पोथीक' लेखक छथि। सेतु षाम १७५ पृष्ठक छैक जाहिके आई एस बी एन ९७८- ९३- ५७१७- ३५८ - २ य , जे सिरजनहार केँ समर्पित कयने छथि। आवरण पृष्ठसज्जा कुट गत्ता पर पौराणिक भवन'क एक झलक प्रथम दृष्ट्या देखमे अबैत छैक,मुदा ई एक सारगर्भित धरोहर थीकैक। प्रस्तुत पोथीक दू खण्ड अछि । खण्ड १. मे श्रीमती प्रीति ठाकुर जीके मादे दू महिला लेखिका सविस्तर अपन कलम चलेलनि अछि। पृष्ठ सँ० २६-३४ धरिमे बाल मनक सिद्धहस्त लेखिका 'शिर्षक' सँ श्रीमती मुन्नी कामत जी आ मैथिली चित्र कथामे प्रीति ठाकुरक योगदान 'शिर्षक' सँ इरा मल्लिक जी आलेख लिखलनि अछि। खण्ड २. पृष्ठ सँ० ३५ सँ १६६ धरिमे इन्टरनेट , भाषा, पंजी,लिपि, शव्द कोश , सम्पादन , अनुसंधान, साहित्य एवं अन्य विविध विषयमे श्री गजेन्द्र ठाकुर जीके मादे विस्तार सँ आलेख लिखलनि अछि। जाहिमे दू महिला लेखिका आ एक दर्जन पुरुष लेखक भाग लैत अपन कलमक धार तेज कयने छथि। उपरोक्त सभ सहयोगी लेखक - लेखिका'क परिचय लेल हुनक तस्वीरके संगहि सम्पादक आशिष जीके पृष्ठ सँ० १६८ सँ पृष्ठ सँ० १७१ धरिमे लौकैत अछि। पोथीक केन्द्रमे छथि इन्टरनेट मैन श्री गजेन्द्र ठाकुर जी, जिनक साहित्यिक योगदान आ विश्व भाषा मंच पर मैथिलीकेँ सेहो लोक जानय - बूझय ताहि लेल पछिला २६ साल सँ हुनक परियासक चर्चा संगहि हुनक धर्मपत्नी श्रीमती प्रीति ठाकुर जीक साहित्यिक अवदान केँ एहि पोथीमे लेल गेल छै। पाठक ई- विदेह पर हुनका दूनूप्राणीक सराहनीय परियासकेँ अवलोकन कय ज्ञानार्जनमे अभिवृद्धि करैत आबि रहल छथि। ‌ एहू पोथीमे हुनक दूनू व्यक्तिके मादे विशेष जनतब एक शोरे पाठमे वरेण्य रचनाकारक देल आलेखमे पढ़ि पाठक नेहाल होएत, से हमर अभिष्ट अछि। प्रथमदृष्टया पाठककेँ एहि पोथीक प्रायः सब शिर्षक संस्कृत भाषामे देखि अचरज लागत। संस्कृतकेँ जौं सब भाषाक जननी कहल जाय आ ताहिक प्राचिनताक इतिहासमे जाएब तँ धर्मग्रंथ'क स्वत: स्थान समक्ष देखाएत। से अहू पोथीक' रचना सँ अथवा अस्तित्वमे अयबा सँ पूर्व सम्पादकके मानस पटल पर सनातन धर्म ग्रन्थक अनेको सुनल आ अध्ययन कयल पाठ ओ खण्डके बावत आयल हेतैन। ताहि परिकल्पना'क उदाहरण रूपेँ श्री गजेन्द्र जीक तुलना करयमे संस्कृतक शव्द आ श्लोकमे गहिंरगर रुपेँ श्री आशीष जीके जाए पड़लनि हेन। चारू वेदमे सँ तीन वेदके सारांश चारिम वेद ' सामवेद' क निर्माण महर्षि वेदव्यास जी केने छथि। जे वेदपाठी लेल नहिं अपितु गायन लेल प्रयुक्त होईत आयल अछि। मानव जीवनमे अदौ सँ एहि वेद- पुराण , आ शास्त्रक प्रभाव पड़ल छैक ,आओर इयह हमरा भारतके मीशन थीक। पोथी 'क शुभ संज्ञा "सेतु षाम" रखबाक अभिप्राय जानबाक लेल एहिमे वेदवाणीक सहारा लैत पढ़ाकू पाठक बीच बढ़ विलक्षण तरहेँ सम्पादक जी समक्ष रखलनि य। श्री गजेन्द्र जीक मादे पहिल पाँतिक आरंभ करैत सम्पादक जी लिखैत छथि -"सामवेद केर अर्थ भेलैक - गानवेद अर्थात एहन वेद जकरा गायल जा सकै। ऋग्वेद, यजुर्वेद आ अथर्ववेद सँ ऋचा संकलन भेलै ,जकरा नव वेद अर्थात सामवेद कहल गेलैक। गीतामे श्रीकृष्ण जी स्वयं बांसुरी वादक,कला पारखी रहथि; जे सामवेद के गायन लेल विशेष कय तत्कालीन संस्कृत भाषा मेँ सोहर गीतक आरंभ मानलनि।" तेँ भारतीय शास्त्रीय संगीत'क मूल छलैक,से बात पाणिनि अपन महाभाष्यमे सूचित कयने छथि। परंच वर्तमानमे एकर तीनेटा मुख्य शाखा अछि - कौथुमीय ,राणायनीय आ जैमिनीय । मिथिला सहित अधिकांश उत्तर भारतमे कौथुमीय शाखा प्रचलित अछि। तैयो आनों शाखाके पाठ होइते छैक। सामवेदक कौथुम शाखामे आरण्य गानमे एकटा मंत्र छै,जकरा " सेतुषाम" कहल जाए छै। एहि मंत्रक स्वरूप देखू -: अहमस्मि प्रथमजा ऋतस्य पूर्व देवेभ्यो अमृतस्य नाम। यो मा ददाति स इदेवमावदहम न्नम न्नम दन्तमाझे ।। ई मन्त्र ब्रह्मांडक ओहि स्वरुपक वर्णन छैक जे सभमे समाहित छै। ब्रह्मांडमे ऋतु सँ पहिनहि सँ अर्थात देव - देवता सँ पहिले सँ हम मनुष जन्म लेबय बाला अमृत छी। हम अन्न खाईत छी आ अन्नकेँ खायबालाकेँ सेहो हमही खाइत छी। एहिक सरल भावे बुझल जाए- " चारिटा सेतु बनाऊ ,चारिटा बाधा पार करू।" ई बाधा छैक- क्रोध ,लोभ, अश्रद्धा आ फुसि(असत्य) । क्रोध नामक बाधाकेँ शांतिक सेतु सँ पार करू। अश्रद्धा नामक वाधाकेँ श्रधा सेतु सँ पार करु । असत्य (झूठ) नामक बाधाकेँ साँच (सच) सेतु सँ पार करू । अर्थात् स्वर्ग दिस जाए,इजोत दिस जाऊ। आब मूलमंत्र आ जोड़ल पाठ दूनू अर्थ मिलाकऽ देखबै तँ अपने बुझाए जाएत जे एहिमे चारि बाधाकेँ जे पार कऽ लेताह से ब्रह्माण्डक ओहने स्वरुप बनि जेताह, जे सबमे समाहित छथि आ जकरामे सभ समाहित छै। एहि शव्दकेँ महाभारतक ( उद्योग ३९/७३) एक श्लोकमे देखल जाऊ -: अक्रोधेन जयेत् क्रोधम । असाधुं साधुना जयेत्। जयेत् कदर्यं दानेन । जयेत् सत्येन चानृतम्।। तामश पर शांति सँ दुष्ट दुर्जन पर सदाचार सँ , कंजूस पर दान सँ आ ,झूठ- फुसियाह पर सत्य सँ विजय प्राप्त कयल जा सकैए । बौद्ध धर्म'क ग्रन्थ सेहो संपुष्ट करैत छै। आगू अनचिन्हार जी लिखैत छथि -" एहि संसारमे किछ लोक एहन होइत छैक ,जिनकर नैतिकता जीवनके हरेक परिस्थितिमे नैतिक बन्धनमे रहि अपन काज करैत छै । आ जँ दोसर शव्दमे कही तँ कहल जा सकैए जे ओहन लोक अपन नीजी जीवन आ सामाजिक जीवनकेँ यथा संभव एक समान रखैत छथि। जँ एहन लोक लेखन कार्य सँ जुड़ल होइथ तऽ हुनकर लेखन एवं आचरण एक समान रहैत छनि। एहने किछ लोक मे सँ एक छथि - श्री गजेन्द्र ठाकुर। श्री ठाकुर जी अपन जीवनमे सामवेदक सेतुषाम मन्त्रक चारिसेतु बना ,चारु बाधा पार कऽ लेने छथि आ अपना भरि आनों लोककेँ एहि लेल प्रेरित करैत छथि। मैथिली साहित्यमे मुख्य चारि बाधा अछि-: पहिल- मँच माला माइक,दोसर - पुरस्कार, तेसर - साहित्यिक रचना चोरी आ चारिम- दोसरकें आगू नहिं बढऽ देब ; सहायता नहिं करब। ऋचाक' पाँति .... महो अर्ण: सरस्वती प्र चेतयति केतुना । धियो विश्वा वि राजति ! ! सँ खण्ड १. श्रीमती प्रीति ठाकुर मादे आलेख लेखिका लेल आह्वान रूपेँ महौत देल गेलनि अछि । एहिमे श्रीमती मुन्नी कामत जीके पहिल आलेख " बाल मनक सिद्धहस्त लेखिका श्रीमती प्रीति ठाकुर" आ दोसर आलेख इरा मल्लिक के " मैथिली चित्र कथामे प्रीति ठाकुरक योगदान" शिर्षक सँ छपल छन्हि। दोसर खण्डमे श्री गजेन्द्र ठाकुर जीक मादे १२. गोटय अपना कलम सँ अग्रलेख लिखने छथि, हुनको सब लेल ऋचाक पांति -: पुनन्तु मा पितर: सोम्यास: पुनन्तु मा पितामहा: पुनन्तु प्रपितामहा: पवित्रेण शतायुषा। पुनन्तु मा पितामहा: पुनन्तु प्रपितामहा: पवित्रेण शतायुषा विश्वमायुर्व्यश्न्नवै।। सँ आह्वान कयल गेल छन्हि। एहि खण्ड लेल विस्तार सँ लेखन कार्य शिर्षक - 'मैथिलीक डिजिटल युगक निर्माता : गजेन्द्र ठाकुर ' मेँ कैलास कुमार ठाकुर जी जमलाह अछि, जे पृष्ठ सँ० ३६ सँ ५९ धरिमे वृतांत आयल छैक । दोसर गोटे छथि - विकास वत्सनाभ,जे पृष्ठ सँ० ६० सँ ७० धरिमे शिर्षक - डिजिटल युगमे मैथिली: विदेह आ गजेन्द्र ठाकुर ' रूपे आयल छैक। भैरव लाल दास जीक 'मिथिलाक पंजी संरक्षणमे गजेन्द्र ठाकुर'क योगदान ' विषय पृष्ठ सँ० ७१ सँ ८० धरिमे समाएल छैक। पुनम जा "सुधा" जीक डायवर्सिटी आ विदेह : आधुनिक मैथिली साहित्यक चेतनामूलक पुनर्जागरण ' पृष्ठ सँ० ८१ सँ ८६ धरिमे आयल छैक। डॉ० शिव प्रसाद जीक ' डायवर्सिटी आ विदेह ' पृष्ठ सँ० ८७ सँ १०९ धरिमे अनेको सहयोगी ई-विदेह'क लेखक मादे चर्चा कयल गेल छैक। एहि पाँतिक लेखक'क विषयमे अति संक्षिप्त रूपेँ पाठककेँ पढ़य ले भेटि जाएत -: विदेह - ई पत्रिकाक एकटा सहयोगी रचनाकार रूप मे श्री लाल देव कामत एखनधरि अपन समीक्षाक माध्यम सँ सहयोग द' रहल छथि। पोथी पर पाठकीय प्रतिक्रिया वा पोथी समीक्षा मादे हिनक नाम विदेह ई-पत्रिकाक अनेकों अंक मे सहज सुलभ अछि। अपन परिचित, आदरणीय व्यक्ति सभकें सेहो ई नीक परिचय उपस्थापित कयने छथि। मैथिली संस्कृति आ ग्रामीण समाज सँ सम्वध्द हिनक शोध 'हटनी' सँ प्रकाशित कोशी संदेश : मिथिलाक आवाज ' पत्रिका हित लेल सदैव तत्पर रहैत छथि। हिनक ' दिव्य दृष्टि ' (पल्लवी प्रकाशन, निर्मली) सँ २०२२ ई० मे निवन्ध - प्रवन्ध - समालोचनाक पोथी प्रकाशित छन्हि,जाहिमे कुल ४८ गोट निवंध , समीक्षा आ पाठकीय प्रतिक्रिया संकलित छनि। अपन सामर्थ्य अनुसार ई अपन लेखन काजमे सदैव लीन रहैत छथि।" कल्पना झा 'क पृष सं०११० सँ १२५ धरि शिर्षक - ' विदेह आ नव लेखक ' संदर्भमे छन्हि। मुन्ना जीक पृष्ठ सँ० १२६ सन्न १२८ धरिमे मैथिलीमे गैर सवर्ण लेखकक कमी आ श्री गजेंद्र ठाकुर' शिर्षक सँ छपल छन्हि। डा० धनाकर ठाकुर जीक पृष्ठ सँ० १२९ सँ १३३ धरिमे ' विदेह पत्रिकाक जनपक्षधरता ' पाठ सँ पाठक अवगत हेताह। श्री हितनाथ जा जी खूब लिखैत रहैत छथि ,एहू पोथीक पृष्ठ संख्या १३४ सँ १४० धरिमे ' गजेन्द्र ठाकुर आ मैथिली समीक्षा शास्त्र ' शिर्षक सँ उल्लेख परिमार्जित रुपेँ कयलनि अछि। प्रवीण कुमार झाजी पृष्ठ संख्या १४१ सँ १४६ धरिमे ' गजेन्द्र ठाकुर : लेखक , इतिहासकार आ आधुनिक मैथिली अध्ययनक शिल्पकार ' शिर्षक सँ पाठ लिखलनि अछि। कुन्दन कर्णजी पृष्ठ सँ० १४७ आओर १४८ मेँ शिर्षक ' अनुपम अतुल्य योगदान' नामे लिखलनि अछि। श्री जगदानंद झा 'मनु' पृष्ठ सँ० १४९ सँ १५२ धरिमे ' मैथिली साहित्यमे गजेन्द्र ठाकुर जीक योगदान ' शिर्षक सँ एक पाठ लिखने छथि। उज्ज्वल कुमार झा जीके पृष्ठ संख्या १५३ सँ १६० पर 'गजेन्द्र ठाकुर : मैथिली भाषा - साहित्यक नवजागरणक सेतु पुरूष ' शिर्षक मेँ पाठक केँ आकर्षित करैत छथि। आखरी लेखकमे मुकेश आनन्द पृ० सं० १६१ सँ १६६ धरि शिर्षक ' मिथिला - मैथिलीक मंच सँ गजेन्द्र ठाकुरक अनुपस्थिति : कारण एवं प्रभाव ' विषय सँ पाठकक धेयान आकृष्ट कयलाह हेन। सम्पादक रूपेँ जहिना ओ संस्कृत सँ प्रारम्भ करैत शिर्षक दू गोट देलाह हेन ,यथा - गणनां त्वा गणपति हवामहे....पृष्ठ सँ० ३-१६ आओर पृष्ठ सँ० १७-२५ धरिमे प्रस्तुति ऋजुनीती नो वरुणो मित्रो ..... मेँ अनेको अनोखा तथ्य रखलनि अछि, तहिना सहयोगी लेखक परिचय (फोटो पृ० १६७-१७० धरिमे) संस्कृतक श्लोक ' नमो गणेभ्यो गणपतिभ्यश्च ' देलाह अछि । पृष्ठ सँ० १७२ मेँ समस्त पाठको लेल संस्कृत श्लोक देलाह अहि ,जेना -: मधुमतीरोषधीर्घाव आपो मधुमन्नो भवत्वन्तरिक्षम् क्षेत्रस्य पतिर्मधुमान्नो अस्तवरिष्यन्तो अन्वेनं चरेम। शारांशत: कहब जे एहि सेतु षाम मे लेखकगण ठाकुर जीके विरूदावली नहिं , एक मैथिली तपस्वीके संदर्भमे आकलन करबामे समर्थ होईत गेल छथि। एगारह गोट पोथीक लेखक आ ४ गो पोथीक सम्पादक श्री आशीष कुमार झा जीक विशेष परिचय लेल एहि लिंक पर पाठक जा सकैत छी -: https://mai .wikipedia.org/s/si हुनक ई- मेल छन्हि -: ashish .anchinhar @ gmail.com हार्दिक शुभकामनाक संग बधाय होय! प्रकाशन .... दाम...टाका अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.७. आचार्य रामानंद मंडल- समरसता बनाम समानता आचार्य रामानंद मंडल समरसता बनाम समानता समरसता एकटा बर्चस्ववादी शब्द हय।अइ शब्द मे मिठास हय।ठकपाना हय। धूर्तता हय। बर्चस्ववादी प्रवृत्ति हय। समरसता मूलतः विषमता के पर्याय हय। असंवैधानिक हय।खास कर के असंवैधानिक लोग एकर ज्यादा प्रयोग करैत हय।समाज मे विषमता के अक्षुण्ण रखेवाला एकर प्रयोग करैत हय।अइ के कारण समाज में आजादी के बादो सामाजिक विषमता कायम हय। संविधान सामाजिक समानता के बात करैय छैय। समरसता अर्थात सभ समान । अर्थात समाज मे उच्च -नीच, छुआछूत, साधु -असाधु, इमानदार -बेइमान, चरित्रवान -चरित्रहीन सभके समायोजन, अलग अलग कानून। अर्थात मूह देखके मूंगवा देनाइ। एकता में अनेकता। परंच समानता के अर्थ भेल कानून के नजर मे सभ बराबर। भाषा,जाति,धर्म, स्थान,विचार, रूप रंग, लिंग भेद आदि के आधार पर कोनो भेद न कैल जात। अनेकता मे एकता। प्राचीन समाज समरसता के सिद्धांत पर चलैत रहय।जैमे एकता में अनेकता रहय। परंच आधुनिक समाज समरसता में छूपल विषमता के देखैत भारतीय संविधान वा विश्व संविधान समानता के सिद्धांत अपलैनक। अनेकता मे एकता एकर सूत्र अपनैलक। वर्तमान में मिथिला के कथित विद्वान समरसता में विषमता के हवा दे रहल हय।हिनकासभ के भारतीय संविधान पर विश्वास न हय। संविधान के उद्देश्यिका में अंकित सामाजिक न्याय से अंजान छतन आ सामाजिक समानता के सूत्र वाक्य से अनभिज्ञ।  आवश्यकता अइ बात से हय कि पौराणिक समरसता के सिद्धांत के छोड़ के संवैधानिक समानता के सिद्धांत के अपनायल जाय। -आचार्य रामानंद मंडल, सीतामढ़ी। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.८. रबीन्द्र नारायण मिश्र- जयतु जानकी (धारावाहिक उपन्यास) रबीन्द्र नारायण मिश्र जयतु जानकी (धारावाहिक उपन्यास) २९ वयोबृद्ध वाल्मीकि मुनिक सानिध्यमे आश्रमवासी संस्कार संपन्न बनैत छलाह। हुनकर मार्गदर्शनमे  निरंतर धर्मकार्यमे लागल रहैत छलाह। आश्रममे वनदेबीक आबि गेलाक बाद ओहिठामक हबे बदलि गेल। सभ केओ हुनकर सेवामे दिन-राति लागल रहैत छल। वाल्मीकि मुनि स्वयं नित्य प्रातः काल हुनकर दर्शन करैत छलाह,हुनका  नमस्कार करैत छलाह। तकर बादे आश्रमक काज शुरू करैत छलाह। वनदेबी!वनदेबी! कहि कए आश्रमवासी हुनका कतेको बेर बजबैत रहैत छलखिन।आश्रममे कोनो छोटसँ-पैघ काज होइत तँ वनदेबी ओहिठाम रहबे करतीह,बेसीकाल हुनकर रुचिक अनुसार आश्रमक गतिविधि निर्धारित कएल जाइत छल। एहि तरहेँ वनदेबी वाल्मीकि आश्रममे रहि कए बहुत आनन्दमे समय बितबैत छलीह। कखनो काल दुपहर रातिमे हुनकर निन्न टूटि जानि। तखन एकान्तमे हुनकर ध्यान बलात राजारामपर चलि जानि, अपन गर्भस्थ संतानसभपर चलि जानि। मोनेमे चिंता होमए लागनि- “कहि नहि एकर की भविष्य हेतैक? ई जीबिओ सकत की नहि?हमरा लग तँ किछु साधन नहि अछि। एकर शिक्षा-दीक्षा कोना हेतैक?” एकदिन एहिना पटिआपर पड़ल हुनकर आँखि लागि गेलनि। वनदेबी सपनाइत रहैत छथि अपन भावी संतानक लेल जकर पूर्वज  एहन प्रतापी तकर संतान जन्मत जंगलमे के करत ओकर छठिहार के करत ओकर पालन-पोषण शिक्षा-दीक्षाक नामपर एहिठाम हम की करब ओरिआन राज सिंहासनक बात छोड़ू ओकरा तँ अपन पिताक दुलारो नहि भेटि सकतै व्यर्थ अछि हमर जीनाइ नहि,नहि एना नहि सोची वाल्मीकि मुनिक बातपर भरोसा करू ओ छथि सर्वज्ञानी देखि चुकल छथि दिव्यदृष्टिसँ सभ किछु जे वनदेबीक संतान होएताह यशस्वी करताह राज रामे जकाँ हुनकोसँ बेसी शक्तिसंपन्न एही बोल-भरोसपर हम सहि रहल छी रामक वियोगसँ उत्पन्न असह्य कष्ट अयोध्यासँ निर्वासित हेबाक अपमान मोनमे अछि एकटा विश्वास जे समय पलटी लेत हमरा संग भए सकत न्याय हमर संतान पाबि सकताह अपन अधिकार वनदेबी सपनेमे देखैत छथि जे एक्के संगे दूटा संतानक जन्म होइत छनि। दुनू अनमन राजाराम सन छथि। वाल्मीकि मुनि ओहि संतानसभक शिक्षाक व्यवस्था करैत छथि। ओ सभ बेर-बेर अपन पितासँ भेंट करेबाक आग्रह करैत छथि।एहि बातसँ जानकी बहुत दुखी भए जाइत छथि। बच्चासभपर तमसाइत छथि।एतबेमे  हुनकर निन्न टूटि जाइत छनि । ताबत भोर भए गेल छल। जानकी बाहर होइत छथि। कनीके फटकी  वाल्मीकि मुनि ठाढ़ देखेलखिन। वाल्मीकि हुनकर मोनक बात बुझि गेलखिन। ओ कहैत छथिन- “वनदेबी अहाँ व्यर्थ चिंता करैत रहैत छी। हम भविष्यमे घटित होमए बला सभ बात रामायणमे लिखि चुकल छी।सभ किछु ओहिना होएत। जे भावी थिक सएह होएत।” “की हम ओ रामायण देखि सकैत छी।” “सभ किछुक समय होइत छैक। अखन तकर उपयुक्त समय नहि आएल अछि। समय अएलापर सभ किछु ओहिना प्रकट होमए लागत जेना कमलक पातसभ स्फुटित होइत अछि। अहाँकेँ प्रतीक्षा करबाक चाही।”-से कहि वाल्मीकि ओहुठामसँ बिदा भए गेलाह । वनदेबी बहुत प्रसन्न रहथि।वाल्मीकि मुनिक संदेश बहुत स्पष्ट छलनि। हुनकर कहबाक तात्पर्य छलनि जे वनदेबीक संतानक भविष्य उज्ज्वल हेतनि। एहि बातसँ कोनो माए प्रसन्न भए सकैत अछि। से ओ रहथि। वनदेबीक मोनमे रहि-रहि कए अपन भविष्य,अपन संतानक भविष्य लए कए चिंता होइत रहैत छलनि। ओ कैक बेर रातिमे चेहा उठैत छलीह। हुनका एना डराइत देखि आश्रममे हुनका संगे रहैत स्त्री लोकनि हुनका घेरि कए बैसो जाइत छलखिन। नीक-नीक खिस्सासभ सुनबैत छलखिन। ईहो बुझबैत छलखिन जे हुनका बेसी चिंता नहि करबाक चाहिअनि । कारण तकर दुष्प्रभाव हुनकर भावी संतानपर पड़तनि। वनदेबीकेँ बुझा-सुजा कए  सभ सुति जाइत छलीह। वनदेबी कैकबेर मातृत्वक संभावित सुखमे आनन्दित रहैत छलीह,कैक बेर चिंतामग्न भए जाइत छलीह।मुदा जखन कखनहु ओ जंगल दिस जइतथि,नदीक कातमे टहलितथि,तखन हुनकर मोन प्रफुल्लित भए जाइत छलनि। ओ नवऊर्जाक संगे आश्रम वापस वापस अबैत छलीह। एहि तरहँ वाल्मीकि आश्रममे वनदेबीक समय सुख-दुखमे बितैत छलनि।ओना आश्रमवासी अपना भरि हुनकर सेवामे जान लगओने रहैत छलथि। मुदा गुड़क मारि धोकड़े जनैत अछि। रहि-रहि कए हुनकर ध्यान राजारामपर चलि जाइत छलनि। चाहिओ कए ओ एक्को क्षण लेल हुनका नहि बिसरि पाबथि।हुनकर मोन ई कदापि मानबाक लेल तैयार नहि रहनि जे राजाराम हुनका छोड़ि देथिन। मुदा सत्य तँ ओएह छल। ओ राज-पाटसँ फराक जंगल-झाड़मे जीवन बितेबाक लेल विवश छलीह। ई तँ संयोगे कही जे लक्ष्मण हुनका वाल्मीकि आश्रम लग छोड़लथि आ वाल्मीकि मुनि हुनका प्रतिष्ठापूर्वक अपन आश्रममे शरण देलनि। मुदा एतेक पैघ राजक रानीकेँ एहन दिन देखए पड़लनि सएह ने बड़का अन्याय भेल। कैक बेर वनदेबीक मोनमे होनि जे लक्ष्मण राजारामक आज्ञा किएक मानलथि?कम सँ कम हमरा पहिने कहि दितथि? एना गुप्त रूपसँ किएक अनलथि आ जंगलमे छोड़ि कए चलि गेलथि? यदि ओ हमरा पहिने कहि देने रहितथि तँ हम रामकेँ अबस्स पुछितिअनि- “हे रघुकुल तिलक राजाराम ! अहाँसभ तँ अपन वचनक पक्का छलहुँ,वचनेक कारण चौदह वर्ष वनबासमे रहलहुँ,तखन हमरा देल गेल वचन किएक ने पालन कए सकलहुँ? अछि किछु उत्तर अपने लग?जखन बिआहक समयमे सपथ खेलहुँ जे हम दुनूगोटे संगे रहब,संगे सभ किछु  करब,हमर सभक सुख-दुख एक रहत,तखन एना किएक केलहुँ? यदि राजाक कर्तव्य बाधा बनि गेल छल तखन छोड़ि दितहुँ राज,मुदा रखितहुँ हमरा अपना संगे। मुदा अहूँ लोकक संगे भसिआ  गेलहुँ। जे लोक बाजल से भए गेल ब्रह्म बाक,हम भए गेलहुँ अयोध्यासँ निर्वासित।तखन रहिए की गेल?” ई सभ सोचिते रहतथि कि दोसरे क्षण मोनमे अबितनि- “शांत वनदेबी,शांत। अहाँक कोखिमे जे संतान अछि से सभ किछु बुझि रहल अछि। ओकरा बाहर अएबाक अवसर तँ  दिऔक। ओ अहाँक दुख अबस्स दूर होएत।” कैक राति इएहसब सोचैत ओ भोर कए देथि। कैक दिन गुम-सुम रहि जाथि। वाल्मीकि मुनिकेँ ई सभ पता लागनि। ओ तुरंत दौड़ल अबितथि,कहितथि- “वनदेबी धैर्य राखू। अहाँक कल्याण अबस्स होएत।” ३० चिरञ्जीवी निरंतर वनदेबीक सेवामे लागल रहथि। हुनकर अद्भुत सेवा भाव देखि ओ बहुत प्रभावित रहथि। हुनका कैकबेर पुछबो करथिन-“अहाँ एतेक मेहनति किएक कए रहल छी? अपनो ध्यान राखू।” “हे वनदेबी! हम तँ अहींक लेल एहिठाम आएल छी। अहाँक कष्टक निवारण होअए,अहाँक भावी संतान स्वस्थ आ सुखी रहथि सएह हमर मनोकामना अछि।” “मुदा अहाँ छी के? अहाँकेँ एहिठाम के पठओलक?” “वाल्मीकि आश्रममे हुनकर इच्छा आ आज्ञा बिना के रहि सकैत अछि?”एहिसँ बेसी ओ किछु नहि बाजथि। बस भोरसँ साँझ धरि वनदेबीक सेवामे लागल रहथि। जखन हुनका जाहि वस्तुक प्रयोजन होनि से आनि देथि। वनदेबी हुनकर सेवासँ बहुत प्रसन्न रहथि। बेर-बेर हुनका आशीर्वाद देथि। आश्रमवासी स्त्रीसभ आने दिन जेना ओहि दिन पूजा-पाठ कए वनदेबी लग आबि रहल छलीह कि चिरञ्जीवी रस्तेमे भेटि गेलखिन। हुनकासभकेँ देखितहि चिरञ्जीवी चिकरि उठलाह- “जल्दी जाउ, वनदेबी बहुत कष्टमे बुझाइत छथि।” “की भेलनि हुनका?” “हमरा किछु नहि कहलनि,मुदा ओ बहुत परेसानी मे बुझेलथि।” आश्रमवासी स्त्रीसभ जल्दीसँ वनदेबी लग पहुँचैत छथि। ओ प्रसवपीड़ासँ परेसान छलीह। जाबे ओ सभ किछु करितथि ताबे वनदेबी  बेरा-बेरी दूटा संतानक जन्म देलनि। एक्के संगे दूटा बच्चाक जन्मसँ आश्रमवासीसभ बहुत प्रसन्न रहथि। वाल्मीकि मुनिकेँ तुरंत सूचना देल गेलनि। ओ कहैत छथिन- “हम तँ जनिते रही जे आइ कुश आ लव नामक दूटा बालक वनदेबीकेँ जन्म लेथिन। अहाँसभ ओतहि जाउ आ हुनकर नीकसँ देख-रेख करू।” वनदेबीकेँ जौआँ बच्चा जन्मलेलाक बाद समस्त वाल्मीकि आश्रममे हर्षक माहौल छल।आश्रमवासी स्त्रीसभ सोहर गाबि रहल छलीह। केओ लड्डू बाँटि रहल छलीह। वाल्मीकि स्वयं अपन रामायणक अगिला दृश्यकेँ भूतलपर स्पष्ट होइत देखि अतिशय प्रसन्न छलाह। ओ फटकीएसँ वनदेबी आ हुनकर दुनू संतानकेँ बेर-बेर आशीर्वाद दए रहल छलाह। ऊपर आकाशसँ देवतालोकनि से पुष्पवर्षा कए रहल छलाह। ओमहर अयोध्यामे आइ भोरेसँ राजारामक दहिना आँखि बेर-बेर फरकि रहल छनि। “किछु शुभ जरूर होमए बला अछि।” “हमर जीवनमे आब तकर उम्मीद बाँकी अछि की?” -ई प्रश्न  स्वयं सँ ओ बेर-बेर पुछैत छलाह। अपन कोरामे दुनू पुत्रकेँ देखि वनदेबीक प्रसन्नताकेँ तँ अंते नहि छलनि। ओ एकटक दुनूबच्चाकेँ देखि रहल छलीह। बेरा-बेरी दुनू बच्चाकेँ दूध पिआ रहल छलीह। हुनका लागि रहल छलनि जे एहि पृथ्वीक सभ सुख भेटि गेल। दुनू बालक अनमन राजाराम सन लागि रहल छल। “राजाराम तँ अपन संतानसभकेँ देखिते बहुत प्रसन्न हेताह। सौंसे अयोध्यामे आनन्दक वर्षा होमए लागत। जकरा जे चाही से भेटतैक।मुदा हुनका पता कोना चलतनि?”-वनदेबी इएहसभ सोचैत रहैत छलीह। मुदा जखने बच्चासभपर ध्यान जानि सभ किछु बिसरा जानि। जनमौटी बच्चाक लेल नव वस्त्र कीनबाक हेतु चिरञ्जीवी जा रहल छलाह कि मैथिलीपुत्र भेटि गेलखिन। “की बात छैक? आइ बहुत प्रसन्न लागि रहल छी।” “प्रसन्नताकेँ तँ बाते छैक।” “की भेलैक?” “कोन दुनिआँमे रहैत छी अपने? सौंसे आनन्द मंगल भए रहल अछि। आश्रममे रसनचौकी बाजि रहल अछि आ अहाँकेँ किछु बुझले नहि अछि?” “कहबैक तखन ने बुझबैक।” “वनदेबीकेँ दूटा पुत्रक जन्म भेलनि अछि।” “बहुत सुखद समाचार। सभ गोटे स्वस्थ छथि ने?” “आनन्द,आनन्द।” “बहुत प्रसन्नताक बात कहलहुँ। बहुत दिनक बाद जानकीक जीवनमे किछु शुभ घटित भेलनि अछि। हमरो लोकनिक लेल ई बहुत प्रसन्नताक बात थिक।” चिरञ्जीवी जल्दीमे छलाह,  चलि जाइत रहलाह। एमहर मैथिलीपुत्र जानकीकेँ दूटा पुत्र जन्मक समाचार जानकीधुजावाहिनीकेँ  शिविरमे जा कए देलनि। कहि नहि सकैत छी जे ओसभ एहि समाचार पाबि कए कतेक प्रसन्न भेलथि। तुरंत गीतनाद शुरू भए गेल। वाल्मीकि आश्रममे बच्चासभक जन्मसँ छठिहार दिन धरि उत्सवक माहौल छल। वाल्मीकि मुनि बेर-बेर बाजथि- “वनदेबीक दुनू संतान बहुत प्रतिभाशाली हेताह। ओ सभ इतिहास रचताह आ वनदेबीक प्रतिष्ठाकेँ फेरसँ अयोध्यामे स्थापित करबामे सफल हेताह।” वनदेबीक जेठ पुत्रक नाम कुश आ छोटक नाम लव राखल गेल। वनदेबी भोरेसँ दुनू संतानक सुश्रुखामे लागि जाथि।हुनकासभकेँ दुग्धपान कराबथि। हुनका संगे आश्रमवासी सेहो बच्चासभक सेवामे लागल रहथि। दुनू बच्चाक जन्मक बाद वनदेबीकेँ एकटा लक्ष्य भेटि गेल छलनि । ओ सभ किछु बिसरि अपनाकेँ ओहीमे लगा देलनि। ३१ वनदेबीकेँ जौंआ बच्चा जन्म लेलकनि। वाल्मीकि मुनिक आश्रममे बच्चासभक जन्मसँ छठिहार धरि उत्सव मनाओल गेल।बच्चासभक कुश आ लव नाम राखल गेल। सभ किछु भेल। मुदा ने अयोध्यासँ केओ आएल ने जनकपुरसँ । पता नहि राजारामकेँ बच्चासभक जन्मक सूचना भेटलनि कि नहि? जखन बच्चासभक जन्म भेल तखन शत्रुघ्न वाल्मीकि आश्रमेमे ठहरल रहथि। ओ रातिएमे बच्चासभकेँ देखबो केलनि। प्रातःकाल ओ वाल्मीकि आश्रमसँ लबण बध करबाक हेतु  बिदा भए गेलाह। वनदेबीकेँ रहि-रहि कए एहि बातक बहुत कचोट होनि। रामसन प्रतापी राजाक संतानक जन्म भेल होअए आ तकर उत्सव अयोध्यामे नहि होइ से  कतहुसँ सही नहि कहल जा सकत। मुदा वनदेबी की  करथि? हुनका तँ चारूकात अनेक प्रश्नचिन्हसभ ठाढ़ छलनि। पहिने तँ स्वयंकेँ निर्दोष सिद्ध  करथि। फेर अपन संतानकेँ  सही सिद्ध करथि। एही बातपर तँ हुनका अयोध्यासँ बाहर कए देल गेलनि। कोन-कोन कष्ट ने ओ सहलनि। कोखिमे संतान छलनि तखनो अपन घरसँ निर्वासित कएल गेलीह। जंगलमे वाल्मीकि आश्रममे रहि कहुना कए अपन जीवनक रक्षा केलीह। जाहिसँ हुनकर संतान बाँचि जाथि आ राजारामकेँ अपन उत्तराधिकारी भेटनि। आब जखन दुनू संतानक जन्म भए गेलनि अछि तखन ओ की करथि?कोना हुनकासभक रक्षा करथि,कोना शिक्षा-दीक्षाक जोगार करथि? वाल्मीकि मुनि निरंतर वनदेबीक मनोबल बढ़बैत रहैत छलाह। वनदेबीकेँ चिंतित देखि  कहबो करथिन- “अहाँ बहुत चिंतित  रहैत छी।एकर किछु फएदा नहि अछि। जे हेबाक अछि से हेबे करत। सभ किछु ओहिना भए रहल अछि जे हम रामायणमे लिखि चुकल छी। अहाँक संतान प्रतापी हेताह,अपन वंशक कीर्तिकेँ  अबस्स आगू बढ़ेताह। मनुक्ख अपन भाग्य लिखा कए अबैत अछि। तेँ ओहि विषयसभपर बेसी घमरथन उचित नहि। फेर हम स्वयं एहि परिस्थितिसभकेँ देखि रहल छी। अहाँक मनोकामना अबस्स पूर्ण होएत वनदेबी। तेँ हमर आराधना स्वीकार करू आ निश्चिन्त भए अपन संतानक पालन-पोषण करू। माएक लेल एहिसँ सुखकर की भए सकैत अछि?” वनदेबी वाल्मीकि मुनिक आश्वासन सुनि कए  प्रफुल्लित भए जाथि। अपन संतानसभक सुरक्षित भविष्यक बात सुनि मोनमे बहुत उसास होनि। ओ मोने-मोन सोचथि- “ कोनो बात नहि। हमरा जे लिखल छल से भेल। कम सँ कम हमर संतानसभ तँ सुखी रहताह। वाल्मीकि मुनिक वचन व्यर्थ नहि जा सकैत अछि। तेँ हमरा सभ किछु बिसरि दुनू बच्चाक पालन-पोषणपर ध्यान देबाक चाही।” ओमहर जानकीधुजावाहिनी  शिविरमे जानकीक चर्चा निरंतर होइत रहैत छल। हुनकर दुनू संतानक जन्मक बाद ओ सभ कैकदिन भरि उत्सव मनओने रहथि। गीत-नाद गओने रहथि। मुदा ओ सभ एहिसभसँ संतुष्ट नहि छलाह। छठिहारक प्राते मैथिलीपुत्र हुनका लोकनिसँ भेंट करए गेल  रहथिन। तखन ओ सभ अपन मोनक बात हुनका सामनेमे खोलि कए राखि देलथि- “हमसभ जानकीक संतानक जन्मक उत्सव तँ मनओलहुँ,मुदा हुनका लोकनिक भविष्यक की हेतनि?की राजारामकेँ बच्चासभक जन्मक बारेमे जानकारी छनि  कि नहि? यदि नहि छनि तकर जिम्मेबार के अछि?जखन हुनका बुझल छलनि जे जानकी गर्भिणी छथि, तखनहु हुनका जंगल पठा देलनि।केओ हुनका संगे नहि रहलनि। तकर बादो ओ कहिओ हुनकर खोज-खबरि नहि लेलनि। अयोध्यावासी की बजलाह,हुनका की पता लगलनि ताहिसँ हमरासभकेँ की लेना-देना?” “जहिना अहाँ छी,तहिना हम छी। अयोध्यामे की भेल वा अखन की भए रहल अछि तकर हमरा कोनो जानकारी नहि अछि। ने हम हुनका लोकनिकेँ कोनो आदेश दए सकैत छिअनि।हमसभ मिथिलावासी छी,जानकीक शुभचिंतक छी,हुनके लेल अपन गाम-घर छोड़ि  एहिठाम धरि आएल छी ।” “यदि सएह हालति थिक तखन कथीक बाट ताकि रहल छी? हमसभ शीघ्र अयोध्या चली  आ हुनका लोकनिकेँ सही रस्तापर आनी ।” “एतेक अगुताउ नहि। एहि बातकेँ नहि बिसरू जे जानकी आब वाल्मीकि मुनिक आश्रममे छथि। ओ अपार शक्तिसंपन्न छथि। भूत,वर्तमान आ भविष्यक जानकारी रखने छथि। ओ रामायण लिखि चुकल छथि । जानकीकेँ वाल्मीकि आश्रम अएबासँ पहिने ओ अपन रामायणक रचना पूर्ण कए चुकल छथि। कहबाक माने जे हुनका भविष्यक घटनाक जनतब छनि। अस्तु, जरूरी थिक जे हमसभ हुनकासँ संपर्क करी।  हुनकर मार्गदर्शनक बादे आगूक रस्ता निर्धारित करी।” “बात तँ उचित कहि रहल छी अपने। मुदा जनक की कए रहल छथि? की हुनकर कर्तव्य नहि छनि जे जानकीकेँ मदति करथि?” “से जानकी चाहथिन तखन ने?” ई चर्चासभ भइए रहल छल कि शक्तिस्वरुपा ओतए प्रकट भए गेलथि। ३२ शक्तिस्वरुपाकेँ सामने अबितहि लागल जेना सैकड़ों बाटकेँ बिजली चमकि गेल होइक। हुनकर ओज फटकीएसँ देखा रहल छल।आत्मविश्वास आ शक्तिसँ परिपूर्ण ओ बाजि उठलीह- “अहाँसभ जानकीकेँ जनैत छिअनि। हुनकर शक्तिसँ पूर्ण परिचित छी। अहाँसभकेँ ई बात बहुत नीकसँ बुझल अछि जे जानकी जे चाहतीह से कए लेतीह। यदि  चाहितथि जे अयोध्येमे रही तँ हुनका के मना कए दैत?के  हुनकर विरुद्ध जाइत? मुदा ओ सभ किछु सहि रहल छथि?सोचियौक किएक?अपन दुनू संतानक लेल,अपन आत्मसम्मानक लेल।अहाँ शक्तिसँ एहि दुनिआपर राज तँ कए सकैत छी,मुदा ककरो हृदयपर राज नहि कए सकैत छी।जानकी अयोध्यामे रहथु कि नहि ,मुदा ओ अखनहु राजारामक हृदयपर राज कए रहल छथि। जानकीकेँ जंगल पठा राजारामक की हाल छनि?की ओ सुखी छथि?की ओ दोसर कनिआँ ताकि लेने छथि?की हुनकर मोनमे केओ आर बसि रहल छनि? नहि,नहि,नहि।तखन तँ ई बुझबाक काज अछि जे जानकीक असल शत्रु केओ आर छथि। ओ के छथि? पहिने तकर पहिचान होअए,तखने ने हमसभ हुनका परास्त करबाक बात सोचि सकब।” “शक्तिस्वरुपा! हमसभ अहाँक बातसँ अभिभूत छी। हमसभ कहाँ कहि रहल छी जे राजारामकेँ जानकीसँ सिनेह नहि छलनि कि नहि छनि। समस्या तँ ई अछि जे राजारामक जानकीसँ एतेक अथाह प्रेम रहितहुँ ओ हुनकर रक्षा नहि कए सकलाह। हुनका अपना संगे नहि राखि सकलाह। आइ जे कष्ट जानकी भोगि रहल छथि से किएक?एकर कोन औचित्य छल?ओ राजारामक राजमहलमे अपन संतानसभक संग निचेन रहितथि। राजाराम अपन राज-काज करितथि। अपन परिवारक उचित देख-रेख करबो तँ हुनके कर्तव्य छलनि। यदि परिस्थिति एहने भए गेल जे ओ हुनका संग राखि राजकाज नहि कए सकैत छलाह,तखन तँ हुनका जानकीकेँ संग देबाक चाहैक छलनि।छोड़ि दितथि राजाक पद। इएह अन्याय ओ केलनि जाहि कारण आइ जानकी रने-बने बऔ रहल छथि।सभ किछु अछैतो बेलल्ल भेल छथि।” “खबरदार! जे बजलहुँ से बजलहुँ। जानकी कखनहु बेलल्ल नहि छथि, ओ सर्वशक्तिमान छथि।एक क्षणमे संसारक विनाश कए सकैत छथि। इतिहास बताओत जे जानकी एहि दुखद परिस्थितिकेँ केना आ किएक सहलथि?केना हुनकर दुनू तेजस्वी संतान अपन शौर्यसँ जानकीक सम्मानकेँ पुनर्स्थापित  केलथि।” “हमहूसभ तँ ओही लेल परेसान छी। आब अहीं कहू जे वर्तमान परिस्थितिमे  हमसभ की करू?” “युद्ध कोनो समस्याक समाधान नहि अछि।  युद्धमे विजेता आ पराजित,दुनू पक्षकेँ क्षति निश्चित अछि। फेर अयोध्या होअए कि मिथिला,समाजमे मतान्तर सभ ठाम अछि। नीक-बेजाए लोक सभ ठाम अछि। समाजमे बहुत तरहक विकृतिक प्रसार भए गेल अछि। परिणामतः नीको लोककेँ परेसानी होइत छैक। घुन संगे  सातुओ पिसाइत अछि। असल युद्ध तँ लोकक मोनमे लड़ल जाइत अछि। यदि मोनकेँ शुद्ध कएल जाए,विचार सात्विक होअए तँ बहुत रास समस्या हेबे नहि करत आ यदि किछु बात भइए जाएत तँ ओकर समाधानो निकलबे करत। अखन समस्या जानकीकेँ भेलनि अछि। काल्हि जा कए अनको भए सकैत छैक। अस्तु,जरूरी अछि जे लोकक संस्कार बदलैक,सोचबाक तरीका बदलैक। तखने जा कए न्याय भए सकैत अछि। हमर अपेक्षा रहत जे जानकीधुजा वाहिनी वाल्मीकि आश्रमक लगीच रहि कए  एहि काजमे नीकसँ प्रशिक्षित होथि आ समाजमे सद्विचारकेँ विकीर्ण करथि। हुनकर एहि प्रयासक जुग-जुग धरि मोन राखल जाएत । रहल जानकीक बात तँ ई नीकसँ बुझि लिअ जे वाल्मीकि मुनि स्वयं एकर चिंता कए रहल छथि। राजारामक जीवनमे भविष्यमे की होएत से ओ लिखि चुकल छथि। जखन बीज बाओग कएल गेल अछि तँ फसिल हेबे करत। उचित समयक प्रतीक्षा कएल जाए। अहाँसभ अपन प्रयासमे धैर्यपूर्वक लागल रहू। कखनहु उदास नहि होउ। लव-कुशकेँ बढ़ए दिअनु। अहाँसभक मनोकामना अबस्स पूर्ण होएत।”-एतेक बाजि शक्तिस्वरुपा लुप्त भए गेलीह। मैथिलीपुत्र सहित जानकीधुजावाहिनीक  ध्यान अचानक वाल्मीकि आश्रमसँ आबि रहल मधुर संगीतपर चलि गेलनि। वाल्मीकि आश्रममे भोर-साँझमे संकीर्तन होइत छल। जहिआसँ लव-कुशक जन्म भेलनि ,आश्रमक माहौल आनन्दमय रहैत छल। समस्त आश्रमवासी दिन-राति वनदेबी  आ हुनकर दुनू संतानक सेवामे लागल रहैत छलाह। वाल्मीकि मुनि दैनिक पूजा-पाठक बाद स्वलिखित रामायणक गायन सुनैत छलाह। आश्रमवासी लोकनि ओकर गायनमे प्रबीण भए गेल रहथि।क्रमशः लव-कुश पैघ होइत गेलाह। जेना-जेना ओ सभ बढ़थि तेना-तेना हुनकरसभक शिक्षा-दीक्षाक प्रति वाल्मीकि मुनि सजग होइत गेलाह। आश्रमवासी बहुत छगुन्तामे छलाह जे ई बालकसभ एतेक जल्दी केना सभ किछु सिखने जा रहल छथि। नित्य नित्य सायंकालक वाल्मीकि लिखित रामायणक सस्वर गायन होइत छल।लव-कुश नियमित तकर अभ्यास करैत छलाह।हुनका लोकनिकेँ एतेक नीक रामायण गायन करैत देखि  वनदेबीक प्रसन्नताक अंते नहि छल। “जुग-जुग जीबथु लव-कुश। हमर सम्मानक रक्षा ओ सभ कए सकताह एहिमे कोनो सक नहि।”-वनदेबी मोने-मोन सोचथि। वाल्मीकि आश्रमसँ दस कोस फटकी बनल अड्डामे जानकीधुजावाहिनी  अपन संघर्षमे लागल रहैत छलाह। बीच-बीचमे शक्तिस्वरुपा हुनका लोकनिक मनोबल बढ़बैत रहैत छलखिन। जखन ओ सामने आबि जइतथि तखन के उदास रहि सकैत छल? सभ गोटेमे शक्तिक अपार संचार होइत छल।सभ फेरसँ उत्साहित भए जाइत छल।जाबे जानकी सुखी नहि हेतीह,अपन  राजधानीमे फेरसँ ससम्मान वापस नहि जेतीह ताबे ओ सभ निचेन कोना हेताह?ओ सभ सभ तरहेँ तैयार रहथि। बस आदेशक काज छल। देखा चाही ओ समय कहिआ अबैत अछि,अबितो अछि कि नहि। समय-समयपर जानकीधुजावाहिनीक  सदस्यसभ जरूरी काजसँ मिथिला जाइत रहैत छलाह। ओहिठामक हाल-चाल लैत रहैत छलाह। यदि ओ सभ ओमहर जइतथि तँ जनकपुर अबस्से जइतथि,जानकीधाम सेहो जेबे करितथि। ओहिठामक लोकक जानकीक जिज्ञासा देखि ओ सभ चकित भए जाइत छलाह। “एतेक दिन बीति गेल। मुदा अखनहु मिथिलावासी जानकीकेँ नहि बिसरि सकलाह।” 33 जानकीक वर्तमान परिस्थितिसँ जनक नीकसँ परिचित छलाह। परंतु ओ किछु कए नहि सकलाह। जखन रामकेँ वनबास भेलनि तखन तँ ओ सेना सहित चित्रकुट धरि चलि गेल रहथि। मुदा एहि बेर जखन जानकीकेँ वनबास भेलनि तँ ओ मूकदर्शक बनल रहि गेलाह। साइत ओ सोचने हेताह जे राजाराम स्वयं जानकीकेँ हुनका लग पठा सकैत छलाह,किंवा जानकी अपने नैहर आबि सकैत छलीह। मुदा से सभ किछु नहि भेल। ने राजाराम जानकीकेँ नैहर पठओलखिन ,ने जानकी स्वयं ताहि लेल किछु प्रयास केलथि।असलमे ओ मिथिलाक कन्या छलीह जतए परंपरा रहल अछि जे विवाहित बेटी एक बेर सासुर गेल तँ गेल। सासुरे ओकर सभ किछु  भए जाइत छलैक। जानकीधुजावाहिनीक सदस्यसभ जखन कखनहु अपन गाम घर लौटथि तँ जानकीक समाद सेहो अपना संगे लेने जाथि। लोकसभ बहुत उत्सुकतासँ जानकीक हाल-चाल पुछनि। एहि तरहेँ मिथिलामे घर-घर सभकेँ पता चलि गेल रहैक जे जानकीकेँ जौआँ पुत्र जन्म लेलकनि अछि आ ओ सभ स्वस्थ छथि आ वाल्मीकि आश्रममे मे शिक्षा प्राप्त कए रहल अछि। लोक तँ लोके होइत अछि चाहे अयोध्याक होइक वा मिथिलाक। गाहे-बगाहे ओ सभ आपसमे चर्च करबे करए-“सएह कहू। हे राम एहन भए गेलाह जे ककरो कहलापर जानकीकेँ घरसँ निकालि देलनि ,परंतु जनक तँ हुनकर पिता छलखिन,सभ तरहेँ संपन्न छलखिन। ओ किएक ने हुनका अपना संगे राखि लेलखिन।” “राखि कोना लितथिन। हमरा तँ केओ कहलक जे जनक एहि लेल बहुत प्रयास केलथि,अपन दूत वाल्मीकि आश्रमोमे पठओलनि। मुदा जानकी अड़ि गेलखिन। कोनो हालतिमे नैहर जेबाक लेल तैयार नहि भेलखिन।” “से अहाँ कोना जनैत छी?” “एहिसभ बातक की प्रमाण देल जा सकैत अछि। जनक कोनो मामूली आदमी तँ छथि नहि। एहिठामक राजा थिकाह,प्रकांड विद्वान थिकाह। ओ यदि किछु केनहु हेताह तँ मर्यादापूर्वके । लोककेँ ढोल बजा कए की कहितथिन?” “से जे बात होइक,मुदा जानकी संगे तँ भेलनि अन्याये। ने राजाराम सन प्रतापी पति काज देलखिन ,ने राजा जनक सन पिता। भए सकैत अछि जे ओहि समयमे राजा सभक छिज्जा एहने रहल होएत।” “राजाराम चाहे जे करथु,राजा जनकक विचार जे रहल होनि,मुदा हमसभ जानकीकेँ अपन घरमे रखबाक लेल तैयार छी। मिथिलाक सैकड़ों घर हुनकर अपन घर छनि।ओ निःसंकोच आबथु,  हमरासभकेँ जुड़ाबथु।” “जानकीधुजावाहिनी  गेले अछि। मैथिलीपुत्र हुनकासभक नायक छथि। हुनकर सभक इएह संकल्प छनि। देखा चाही जे ओ सभ कहिआ धरि अपन लक्ष्यमे सफल होइत छथि।” एहि तरहेँ जानकी प्रसंगक मिथिलावासीसभ आपसमे चर्च करैत रहैत छलाह। ओमहर वाल्मीकि आश्रममे जानकी लव-कुश संगे रमि गेलथि। दुनू बच्चाकेँ पालन-पोषणमे अपन समस्त शक्तिकेँ लगा देने रहथि। मुदा कैक बेर दुपहर रातिमे हुनकर निन्न टूटि जानि। ओतेक रातिमे केओ आर हुनका लग तँ छल नहि जकरा संगे अपन दुख-सुख बँटितथि। ओ अपन दुनू संतानकेँ निहारितथि,किछि-किछु बड़बड़इतथि- राजाराम भेलथि केहन कठोर जे अपन संतानक जन्मो पर उत्सव नहि मनाओलाह नहि देखलनि जनमौटी बच्चाक मुँह कहू तँ ओकरसभक कोन दोष छल ओ सभ तँ राजकुलक संतान अछि अयोध्याक उत्तराधिकारी अछि आइ समस्त अयोध्यामे बजैत रसनचौकी घर-घर होइत नाच-गान मुदा किछु नहि भेल। केओ पुछारी नहि केलक हमर नैहरसँ जरूर आएल समाद आबि जाउ हमर दुलारी बेटी रहू हमरे राजमे कोनो कमी नहि होएत लव-कुश रहताह राजा जकाँ मुदा हमरे साहस नहि भेल मिथिलाक लोकक मुँह कहिआ धरि बंद रहतनि की पता ? आइ ने काल्हि ओहोसभ अलापथि ओएह राग ओ तँ आओर अपमानजनक होएत एहिसभसँ बहुत नीक अछि वाल्मीकि आश्रम जतए नहि अछि केओ अपन बेसक हम एहिठाम अपरिचित छी वनदेबी कहाइत छी मुदा हम एतए सम्मानित छी वाल्मीकि स्वयं  रखै छथि आदर भाव नित्य करैत छथि प्रणाम तखने करैत छथि पूजा-पाठ लव-कुश सेहो पाबि रहल छथि उत्तम संस्कार हुनके सानिध्यमे समय-समयक बात छैक हमरो दिन पलटतै लव-कुश अबस्स प्राप्त करताह अपन जन्मसिद्ध अधिकार जेना सिंघक संतान ककरो दयापर नहि अपितु, अपन पुरषार्थसँ छिनि लैत अछि अपन अधिकार आ करैत अछि राज तहिना लव-कुश जरूर बनताह सामर्थय संपन्न आर अंत होएत हमर यंत्रणाक हमहूँ जीबि सकब गरिमामय जीवन अपन समाजमे। एहि तरहेँ जानकीकेँ कैक राति टकटकी लागि जानि। ओ ओछाओनपर एहि करोटसँ ओहि करोट करैत रहि जाथि,हारि कए कुर्सीपर बैसि जाथि,दुनू संतानकेँ देखैत भोर कए लेथि। ३४ अपन दुनू संतानक प्रतिभा आ तेजस्विता देखि जानकीक प्रसन्नताक अंते नहि छल। कोना भोर होइक  साँझ भए जाइक से ओ नहि बुझि नहि पाबथि। राजाराम द्वारा लंका विजयक बाद ओ किछु दिन सुखसँ बितओलीह।लगलनि जे ओ सचमुचकेँ राजपरिवारमे बिआहल गेल छथि। मुदा ओ समय बेसी दिन नहि ठहरि सकल। जानकी फेर दुखमय जीवन जेबाक लेल विवश भए गेलथि। मुदा अधलाह संगे किछु-ने-किछु  नीको नुकाएल रहिते छैक। सएह भेलनि हुनका संगे वाल्मीकि आश्रममे। एक तँ वाल्मीकि मुनि दोसर पिता भए ठाढ़ भए गेलखिन। ओ शुरूएमे अपन योगबलसँ हुनका नीकसँ चिन्हि गेल रहथिन,बुझि गेल रहथिन जे जानकी सभ तरहेँ निर्दोष छथि,हुनका अनेरे अयोध्यावासीसभ परेसान केलकनि अछि । यद्यपि राजाराम सेहो ई बात जनैत छलाह। दू-दूटा संतानक संग जानकी आश्रममे समय बिता रहल छथि। हुनकर संतानसभ अपन-अपन प्रतिभासँ हुनका आनन्दित केने रहैत छनि। जे किछु वाल्मीकि मुनि सिखबैत छथिन से ओ सभ तुरंत सिखि लैत छथि।नान्हिटा बच्चासभ बहुत तेजीसँ शक्तिसंपन्न भेल जा रहल छल,ताहि बातसँ जानकीक करेजा मजगूत भेल जा रहल छलनि। कोनो माएकेँ एहन संतानपर गर्व हेबे करितैक,हेबेक चाही। जानकी भोरे उठितथि। दुनू बच्चाकेँ पराती सुनबितथि। हुनका सभकेँ नीक-नीक भजन सभ सुनबितथि। तकर बाद स्नान कए दुनू बच्चा वाल्मीकि मुनि लग पठा दितथि। ओहिठाम अनेक प्रकारक शास्त्र आ शस्त्रक शिक्षा वाल्मीकि मुनि हुनकासभकेँ  देथि। ओहिठामसँ थाकल-झमारल लव-कुश जानकी लग अबितथि। जानकी अपना हाथे हुनकासभकेँ भोजन करबितथि। फेर दुनू बच्चा आपसमे खेलैतथि। बीच-बीचमे जानकी संगे किछु-किछु चौलो करितथि। जेना-जेना ओ सभ छेटगर होइत गेलाह,तेना-तेना हुनकासभकेँ अपन पिताक प्रति जिज्ञासा  बढ़ैत गेलनि। असलमे आश्रममे हुनकालोकनिक संगे पढ़ि रहल अन्य विद्यार्थीसभ अपन परिचयमे पिताक नाम लेथि,मुदा जखन लव-कुशक बेर अबैत तखन ओ सभ चुप रहि जइतथि। “हमसभ वाल्मीकि मुनिक शिष्य छी,वनदेबीक संतान छी। इएह थिक हमर परिचय।”- ओ सभ ई बात बेर-बेर दोहरबितथि। मुदा मोनमे कचोट तँ भइए जानि। आश्चर्य होनि जे माता हमरासभकेँ पिताक परिचय किएक नहि कहैत छथि,किएक ने हमरासभकेँ अपन परिवारक बारेमे बताओल जाइत अछि? एहन कोनो अवसर भेलापर जानकी एतबे कहितथिन- “अहाँसभकेँ पिता अबस्स भेटताह। पहिने अपन शिक्षा तँ पूर्ण कए लिअ।” जानकीक बात मानि लव-कुश अपन काजमे लागि जाथि। मुदा समयक संग हुनकर सभक जिज्ञासा बढ़िते गेलनि। आखिर एकिदन ओ सभ वाल्मीकि मुनिसँ पुछिए देलखिन- “गुरुजी एकटा प्रश्न पुछू।” “की?” “आश्रमवासी सभ शिष्यसभ अपन-अपन परिचयमे पिताक नाम बताबैत छथि। मुदा हमदुनू भाइ किछु नहि कहि पबैत छी।” “अहाँ सभ हमर लिखल रामायणक नियमित गायन करैत रहू। अहाँसभक प्रश्नक  उत्तर भेटि जाएत।” “जे आज्ञा गुरुवर!” तकर बाद लव-कुश भोर साँझ वाल्मीकि रचित रामायणक नियमित गायन करए लगलाह। हुनकर सभक रामायण गायन अद्भुत  छल। जे सुनैत से सुनिते रहि जाइत।लगपासमे लोकसभक मेला लागि जाइत। वाल्मीकि स्वयं सभ किछु छोड़ि हुनकरसभक रामायण गायन सुनैत रहितथि। एहिमे हुनका अपन प्रयासक सफलता देखाइत छलनि। जानकीकक  प्रसन्नताक तँ अंते नहि छल। जानकीक मार्गदर्शनमे लव-कुश उत्तम शिक्षा प्राप्त कए रहल छलाह। नीकसँ नीक संस्कार हुनका प्राप्त भए रहल छलनि। जानकी हुनका लोकनिक आत्मसम्मानकेँ सदति जगओने रहबाक प्रेरणा दैत रहैत छलीह। लव-कुश शक्ति संपन्न होथि,आत्मनिर्भर होथि, ताहि लेल जानकी दिन-राति तत्पर रहैत छलीह। निस्सन्देह ओ सभ बच्चा छलाह मुदा हुनकरसभक उपलब्धि अतुलनीय छलनि।दुनू बच्चा ओजसँ भरल छलाह। वाल्मीकि रचित रामायणकेँ ओ सभ कंठाग्र कए चुकल छलाह। एहि तरहेँ जानकीक जीवन वाल्मीकि आश्रममे बहुत नीकसँ कटि रहल छलनि। जेना-जेना लव-कुश पैघ होइत गेलाह,तेना-तेना हुनकर आनन्द बढ़ैत गेलनि। आब हुनका कोनो बातक चिंता नहि होनि। एकदिन शिविरमे  जानकीधुजावाहिनी आपसमे चर्चा  कए रहल छलाह कि शक्तिस्वरुपा मैथिलीपुत्रकेँ बजओलखिन। “किछु सुनि रहल छिऐक?” “हँ,हँ केओ बहुत मधुर संगीत गाबि रहल अछि।” “ओ केओ आर नहि अछि। जानकीक संतान लव-कुश छथि। ओ सभ वाल्मीकि मुनिक रामायण गाबि रहल छथि।” “ई तँ बहुत आनन्दक बात अछि।” “एकदिन हुनकासभक कार्यक्रम अपन शिविरोमे राखल जाए।” “सही विचार अछि। आखिर हमहूँसभ तँ हुनकेसभक प्रतीक्षामे छी।” “बढ़िआँ होएत जे चिरञ्जीवीकेँ एहि लेल संपर्क कएल जाए।” “अबस्स।” ३५ जानकीधुजावाहिनी  अपन प्रतिज्ञापर अड़ल छल।मैथिलीपुत्र निरंतर हुनका लोकनिक मार्गदर्शन करथि। बीच-बीचमे शक्तिस्वरुपा सेहो ओतए आबथि । हुनका अबितहि जानकीधुजावाहिनीमे प्रबल शक्तिसंचार भए जाइत छल। ओ सभ उत्साहमे किछु करबाक लेल उत्तेजित भए  जाइत छलाह। ओ सभ भावुक भए जाइत छलाह- कखनो-कखनो जानकीक मोनमे उठै छनि लहरि होइत छनि जे करी  विद्रोह अन्याय सहबोक होइत छैक सीमान एक बेर दू बेर नहि सहल जा सकैत अछि बेर-बेर पक्षपातपूर्ण व्यवहार केओ कहाँ कहलकनि रामकेँ जे ओ देथि अपन निष्ठाक प्रमाण बेसक जानकी रहलीह वनबास मोन मे जे  भेलनि से करैत  गेलाह सोनाक जानकी गढ़ि लेलनि अश्वमेध यज्ञ करबाक छलनि जाहिसँ बनि सकताह महाप्रतापी राजा हद भए गेल केहन छल बेदर्द अयोध्याक लोक-वेद केओ तँ कहितनि जखन जानकी जीवित छथिहे हुनका मानिते छिअनि अर्धाङ्गिनी तखन ई की कए रहल छी? किएक जीवित जानकीकेँ छोड़ि मुरुतकेँ पुजि रहल छी? कहू ई कोन बात भेलैक ओ मुरुत ने बाजि सकैत अछि ने कानि सकैत अछि नहि कहि सकैत अछि अपन मोनक बात ने अहाँक संग बाँटि सकैत अछि सुख-दुख तथापि ओ पसिंद अछि सद्यः जानकी नहि चाही हुनका देने छी वनबास से किएक? मुदा अहाँ राजा छी पुरुष छी के टोकारा देत? एकतरफा जानकी सहथु सभटा अन्याय यौ पाहुन! ई मिथिला छै हमसभ तँ अहाँक आदर करबाक लेल प्रतिवद्ध छी अपन संस्कारसँ परंपरासँ बान्हल छी मुदा नीक जकाँ सुनि लिअ आब कोनो जानकी नहि देतीह फेरसँ अग्निपरीक्षा नहि सहतीह अन्याय एकतरफा हे मिथिलावासी उठू जानकीक कष्ट हरबाक लेल हुनकर प्रतिष्ठाक लेल कतेक दिन मौन रहब आब बहुत भए गेल किछु करहि पड़त जाहिसँ बाँचि सकत जानकीक आत्मसम्मान तखन मैथिलीपुत्र हुनका सभक भाव बुझि कहलखिन- “अहाँसभ जानकीक सिनेहमे  अपन सभ किछु त्यागि एहिठाम धरि पहुँचि गेल छी। ई कोनो मामूली बात नहि अछि । मुदा सभ किछुक समय होइत छैक। अहाँसभ धैर्य बनओने रहू। जानकीक विजय अबस्स हेतनि  हेबे करतनि।” हुनकर बात सुनितहि केओ बाजल- “असलमे राम केबो केलनि बहुत अन्याय । अन्याय कोनो जानकीएटासँ भेलनि से बात नहि छैक। ई तँ समस्त मिथिलाक अपमान भेल,मिथिलाक संस्कृतिक अपमान भेल।एहन तँ कहिओ नहि सुनल गेल जे अछैत पतिकेँ ओकर स्त्री एकांतबास लेल विवश कएल जाए सेहो ओकरे द्वारा। ई तँ हद भए गेल। जानकीकेँ कम सँ कम संतान हेबा धरि तँ मोहलति देबेक चाहैत छलनि। कोनो मान्यता मनुष्यतासँ ऊपर नहि भए सकैत अछि। हमसभ पहिने मनुक्ख छी तखन किछु आर। मुदा से ने राम बुझलनि ने अयोध्यावासी। जकरा जे फुरेलनि से बजैत रहलाह। जे मोन भेलनि से करैत रहलाह।” उपरोक्त कथनकेँ जानकीधुजावाहिनी कस्वरसँ समर्थन केलनि। हुनकालोकनिकेँ उत्तेजित देखि मैथिलीपुत्र कहैत छथि “ ”शांत होइत जाउ। देखिऔ के आबि रहल छथि।“ सामनेसँ वाल्मीकि मुनि जानकी,हुनकर दुनू संतान लव-कुश आ चिरञ्जीवी आबि रहल छथि। वाल्मीकि मुनिकेँ संगे जानकीकेँ सद्यः देखि जानकीधुजावाहिनी  अत्यन्त प्रफुल्लित रहथि। जानकी लव-कुशक आंगुर पकड़ने बीचमे चलि रहल छथि।ओसभ एकस्वरसँ बाजि उठलथि- ”जानकीक जय होअए! लव-कुश अमर रहथु! अमर रहथु वाल्मीकि मुनि!“ वाल्मीकि मुनि इसारासँ हुनका लोकनिक अभिवादनक उत्तर दैत छथि।जानकीक प्रसन्नताक तँ अंते नहि अछि। ओ पुछैत छथिन- ”ई सभ के छथि? एहि जंगलमे ई सभ की कए रहल छथि?“ ”माते! ई सभ अहींक बंधु छथि। अहाँक कष्टक समाचार सुनितहि मिथिलासँ सभ किछु छोड़ि एहिठाम धरि आबि गेल छथि। मैथिलीपुत्र हिनकर सभक नायक छथि। ई सभ अहाँक समाचार सुनि अहाँक जन्मस्थान जानकीधाममे उपस्थित  भेल रहथि  ओतहि संकल्प केलनि जे अयोध्या जेताह आ अहाँकेँ वापस नैहर लेने अएताह। मुदा नियतिवश ई सभ एतए आबि गेलाह आ तखनसँ एतहि छथि।“- चिरञ्जीवी बजलाह। ”से किएक?“ ”हिनकर सभक कहब छनि जे जाधरि अहाँ अयोध्यामे अपन राजपर नहि लौटब,जाधरि अहाँक सम्मान नहि वापस होएत,ताधरि  सभ निचेन नहि हेताह। ।“ से सुनितहि जानकी जोरसँ अट्टहास केलनि। फेर  बजैत छथि- ”अहाँसभ दिनेमे सूर्यकेँ डिबिआ देखाबए लेल आतुर छी। अहाँकेँ बुझबाक चाही जे हम अपन सम्मानक रक्षाक लेल  स्वयं शक्तिसंपन्न छी। हमर दुनू संतान वाल्मीकि मुनिसँ उत्तम शिक्षा प्राप्त कए रहल छथि। ओ सभ निश्चित रूपसँ हमर स्वप्नकेँ साकार करताह। अपन जन्मसिद्ध अधिकारकेँ अबस्स  प्राप्त करताह। हमरा आर चाही की?किछू नहि।हम तँ ओही दिनक प्रतीक्षामे जीबि रहल छी।“ जानकीकेँ एना बजैत देखि वाल्मीकि मुनि  बजैत छथि- ”हे मिथिलावासी! अहाँसभ धन्य छी। अहाँसभक जानकीक प्रति अनुराग देखि हम आह्लादित छी।हम तँ सभ किछु पहिने लिखि चुकल छी। लव-कुश ओहि रामायणकेँ सस्वर गाएब सिखि चुकल छथि। जल्दीए ओ एहि मधुर संगीतक माध्यमसँ जानकीक बात जन-जन धरि  पहुँचेबामे सफल हेताह। ई युद्ध अस्त्रसँ नहि शास्त्रसँ जितल जाएत। एहिमे ककरो कनीको सक नहि हेबाक चाही जे जानकी  हुनकर दुनू संतान राजारामक विचारमे परिवर्तन करबामे सक्षम हेताह।हुनकर विजय हेबे करतनि।“ एतबा बाजि वाल्मीकि मुनि ओहिठामसँ प्रस्थान कए गेलाह।हुनका पाछू लागल जानकी,लव-कुश आ चिरञ्जीवी सेहो चलि  गेलाह। ३६ ओहिदिन  जंगलमे जानकीधुजावाहिनीक  उत्साह देखि जानकी अचंभित रहथि। हुनकर नैहरक लोकक हुनका प्रतिए सिनेह देखि बहुत प्रसन्नता भेलनि । धन्य छथि मिथिला ,धन्य अछि ओकर संस्कृति। जानकी अपन मोनोभाव चिरञ्जीवीकेँ कहलखिन- ”हमरा एहि बातक बहुत प्रसन्नता अछि जे हमर नैहरक सैकड़ों युवक हमरा लेल अपन गाम-घर छोड़ि कए एहिठाम धरि आबि गेल छथि। हुनका लोकनिक हमरा प्रति सिनेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए ततेक कम। मुदा कतबो व्यक्ति मिलि कए हमर भाग्य नहि बदलि सकैत छथि।हमरा की नहि छल? राजाराम सन पति,अयोध्याक राज,दसरथ सन ससुर,कौशल्या सन सासु। मुदा किछु काज आएल? नहि आएल। ई ककर दोष?हमर नियतिए इएह छल।नहि तँ हम राजाराम संग जंगल की करए जइतहुँ। यदि ओतए गेबो केलहुँ तखन लक्ष्मण सन दिओरक ऊपर अनेरे सक कए हुनका अपन रक्षासँ नहि हटबितहुँ। हमरे कहलापर सोनक हरिणक सिकार लेल जेबासँ पहिने  राजाराम तँ अपना भरि सभ ओरिआन कए गेल रहथि। हमही हुनका सोनक मृगाकेँ पकड़ि अनबाक लेल वाध्य केने रहिअनि। ओ तँ मना करैत छलाह। आखिर हमरा रावण हरि लेलक। तकर बाद तँ जे भेल से इतिहास थिक। दोष हमर तँ छलहे। तेँ बहुत विचारक प्रश्न अछि। एहि ठामक माहौल बहुत गड़बड़ लागि रहल अछि। अहाँ जाउ,मैथिलीपुत्रसँ गप्प करू जाहिसँ जानकीधुजावाहिनी  सीमाक अधीन रहथि,मर्यादाक पालन करथि। हमर सम्मानक आब कोन चिंता अछि। लव-कुश अपन अधिकार पाबि जाथि। हमरा लेल तँ माता पृथ्वी  छथिहे। हमर मोन आब फाटि गेल अछि। कतबो केओ प्रयास करत हमर  जीवनमे आब ओ भाव नहि आबि सकैत अछि। हमरा लेल ने अयोध्याक राज कोनो माने रखैत अछि ने मिथिला। हमर स्थान पूर्वनिर्धारित अछि। से वाल्मीकि अपन रामायणमे लिखि चुकल छथि।“ ”चिंतामे तँ हमहूँ छी। हमरा लेल तँ दूध आ माछ दुनू बाँतर अछि। हम ने रामक विरुद्ध जा सकैत छी ने अहाँक। हम तँ अहाँ दुनूक चाकर छी। ऊपरसँ चिरञ्जीवी हेबाक आशीर्वाद सेहो अहाँसँ भेटि चुकल अछि। हम की समाद देबनि भविष्यक पीढ़ीकेँ।  सभ तँ पुछबे करताह -अहाँ की केलहुँ? किएक ने रोकि सकलहुँ ई अनर्थ। एहन हालतिमे अहीं कहू जे हम की करू?“ ”अहाँ बेसी नहि सोचू। जे हम कहैत छी से करू। हिनकासभकेँ अपना संगे अयोध्या लेने जइअनु। ओहिठामक हालति एक बेर अपने आँखिए देखि लेताह ने तखन अपने सही रस्ता पकड़ि लेताह।समाधान एहन नहि हेबाक चाही जे समस्या आर गहींर भए जाए। अपितु,विचारशील व्यक्तिक कर्तव्य थिक जे ओ अपन आचरणसँ एकटा सुंदर भविष्यक रचना करए। भावी पीढ़ीक जीवन सुगम करए। एकटा बात नीकसँ बुझि लिअ जे युद्ध कोनो समाधान नहि अनैत अछि,अपितु,ओ नव-नव समस्या उत्पन्न कए दैत अछि।“ ”जे आदेश माते! हम तुरंत मैथिलीपुत्रसँ एकांतमे भेंट करैत छी  अहाँक मनोभावसँ हुनका अवगत करबैत छी। सत्य पुछैत छी तँ हमहूँ बहुत दुबिधामे छी।कखनो काल होइत अछि जे दीर्घजीवन एकटा अभिशापे थिक। बहुत नीक होइत जे राम राज्याभिषेकक बाद हमहूँ चलि गेल रहितहुँ।“ ”फेर ओएह बात। कालक गति महान अछि। जे हेबाक छैक से हेबे करतैक। ओकरा केओ बदलि नहि सकैत अछि,टारि नहि सकैत अछि। अहाँ वा हम निमित्त मात्र छी। मुदा मनुक्खकेँ अपन कर्तव्य तँ करबेक छैक।अहाँ आगू बढ़ू जाहिसँ कोनो नव अनर्थ नहि भए जाए से सुनिश्चित करू।“ जानकीक आज्ञा पाबि चिरञ्जीवी मैथिलीपुत्रसँ भेंट करबाक लेल बिदा भए गेलाह। ३७ वाल्मीकि आश्रमसँ कनीके फटकी तमसा नदीक कातमे चिरञ्जीवीक मैथिलीपुत्रसँ भेंट होइत छनि। शक्तिस्वरुपा सेहो हुनका लोकनिक चर्चामे सामिल भए जाइत छथि। जानकीधुजावाहिनीक  आब की करए? अचानक हुनका लोकनिकेँ मिथिला वापस गेनाइ संभव नहि अछि। ओ सभ सालक-साल ओहि दिनक प्रतिक्षामे कष्ट सहि रहल छथि,शक्ति संचय कए रहल छथि जाहिसँ जानकीक रक्षा होनि,हुनकर ससम्मान अपन घर वापसी होनि। मुदा जानकीसँ मुखापेक्षी भेलाक बाद ओ सभ चिंतामे पड़ि गेल छथि। जानकीसँ भेल चर्चक अनुसार चिरञ्जीवी कहलखिन- ”जानकीधुजावाहिनीक  ऊर्जाकेँ सकारात्मक दिशा देब जरूरी अछि। ओ सभ युद्ध-युद्ध चिचिआ रहल छथि। मुदा युद्ध करताह ककरासँ? एहिठाम तँ विचारक युद्ध अछि। खराप के छथि? केओ नहि। राजाराम स्वयं एहि घटनासभसँ बहुत दुखी छथि। सुनैत छी जे ओ जानकीक वियोगमे राति-राति भरि जगले रहि जाइत छथि,माटिपर पटिआपर पड़ल औनाइत रहैत छथि। हुनकर व्यक्तिगत जीवन नितांत दुखमय भए गेल छनि। ओ दिन-राति पश्चातापक आगिमे जरि रहल छथि। आब अहीं कहू जे हुनकासँ की कहल जा सकैत अछि। रहल बात अयोध्याक नागरिकक । से तँ कोनो एक गोटेक बात तँ छैक नहि। ओतहु पक्ष-विपक्ष अछि। समाजमे तरह-तरहक विचार चलि रहल अछि। सुनैत छी जे  ओ सभ जानकीक प्रश्नपर आपसेमे लड़ि जेबाक क्रममे छलाह। बहुत मोसकिलसँ हुनका लोकनिकेँ रोकल जा सकल। अयोध्यामे व्यक्ति-व्यक्तिक विचार अलग अछि। ओहिठामक समाजमे अखनहु राजारामक बहुत आदर छनि। तकर माने ई नहि जे हुनका सभक मोनमे जानकीक प्रतिए अनुराग नहि छनि। मुदा कोनो समाजमे सर्वसम्मति  होएब संभव नहि अछि। मुदा राजाराम तँ सर्वजन हितायक सिद्धांतक पक्षधर छथि। तेँ एहन घटना  भेल। जानकी स्वयं अयोध्या वापस जेबाक लेल उत्सुक नहि छथि। अखन हुनकर एकमात्र प्राथमिकता लव-कुशक पालन करब छनि। ओ सभ स्वस्थ रहथु, योग्य बनथु,शक्तिवान होथि,सएह हुनकर एकमात्र उद्येश्य छनि। ओ एहि लक्ष्यसँ कनीको एमहर-ओमहर जेबाक लेल तैयार नहि छथि। बुझलिऐक ने।“ ”तखन कएल की जाए?“ ”जानकीधुजावाहिनीकेँ  अयोध्या लेने जइअनु। ओ सभ अपने राजारामक हालति देखताह,ओहिठामक समाजसँ,लोक-वेदसँ मुखातिब हेताह। ओहिठामक परिस्थिति देखलाक बाद हुनकर सभक तामस अपने  कम भए जेतनि। तखन ओ सभ समस्याक भाग नहि बनताह,अपितु समाधान लेल प्रयास करताह।“ ”एहिमे समाधान की हेतैक?जखन जानकी ओतए वापस जेबे नहि करतीह तखन केओ की कए लेत?“ ”सभ किछु अखने किएक सोचि रहल छी? वाल्मीकि मुनि रामायणमे सभ किछु  लिखि चुकल छथि,भविष्यमे जे घटित होमए बला अछि तकरो वर्णन कए चुकल छथि। हमसभ अनेरे परेसान नहि रही। लव-कुश ओएह रामायणक गायन करए निकलि रहल छथि। हमहूँसभ ओहि रामायणक गायन सुनब। सभ किछु अपने स्पष्ट भए जाएत।“ चिरञ्जीवी  मैथिलीपुत्रकेँ आपसी चर्च शक्तिस्वरुपा बहुत ध्यानसँ सुनि रहल छलीह। ओ हिनका लोकनिक मार्गदर्शन करैत कहैत छथि- ”मिथिलावासीक भावनाक हम आदर करैत छी। हुनका लोकनिक भावनाक सम्मान  होनि से हमहूँ चाहैत छी,मुदा ताहि लेल धैर्य जरूरी अछि। कारण एक गलती दोसर गलतीक औचित्य नहि भए सकैत अछि। अस्तु,सभ किछु बिसरि अहाँसभ हिनका लोकनिकेँ अयोध्या लए चलू।“ ”मुदा एतेक गोटे जेताह कोना?“ ”हम सदति अहाँसभक संगे रहब। कोनो प्रकारक दिक्कति नहि होएत।“ ”अखन धरि जे किछु भेल अछि से अहींक बले भेल अछि। आगूओ अहींक उम्मीद अछि ।“ ”अहाँसभ निश्चिन्त भए आगू बढ़ू। हम छी ने।“ शक्तिस्वरुपाक आश्वासन पाबि मैथिलीपुत्र बहुत आश्वस्त रहथि। समस्त मुक्तिवाहिमीक संगे ओ सभ ब्राह्मी मुहुर्तमे अयोध्याक लेल प्रस्थान कए देलनि। ओहिठामसँ बिदा होएबासँ पूर्व ओ सभ जानकीक सम्मानमे प्रार्थना केलनि,वाल्मीकि मुनिकेँ स्मरण केलनि। बिदा होएबासँ पूर्व सभ गोटे  एकस्वरसँ बाजि उठलाह- ”जयति जानकी!“ ” जय मिथिला!“ सैकड़ों जानकीधुजावाहिनीक  काफिला चलि पड़ल। ओ सभ बहुत उत्साहमे छलाह। तरह-तरहक गीत-नाद कए रहल छलाह। ओहि गीतसभक प्रतिध्वनि जानकीक कान धरि पहुँचलनि- ”एतेक भोरे एतेक मधुर गीत  के गाबि रहल अछि? एहिमे हमर नाम,राजारामक नाम बेर-बेर लेल जा रहल अछि।“ ”ई सभ अहींक नैहरक लोक छथि । सालोंसँ एहि जंगलमे बाट ताकि रहल छलथि ओहि शुभ क्षणक जखन अहाँ फेर अयोध्याक रानी बनब। लव-कुश से अपन अधिकार प्राप्त करताह।“ ”हम फेर रानी बनब? “- से बाजि जानकी  जोरसँ अट्टहास करए लगलीह। ओ  कहैत छथि- ” लव कुश ककरो मदतिक मुखापेक्षी नहि छथि। ओ सभ अपन अधिकार प्राप्त करबामे सक्षम छथि। फेर वाल्मीकि मुनिक आशीर्वाद  हुनका संगे छनिहे।“ ”अबस्स,अबस्स।लव-कुश जे चाहताह से कए लेताह। एहिमे कोनो सक नहि।“-चिरञ्जीवी बजलाह। ओमहर जानकीधुजावाहिनी  अपन यात्रामे आगू बढ़ैत रहलाह। अयोध्या जेबाक क्रममे ओ  सभ फेर गोमतीक कातमे आबि गेल रहथि जाही बाटे ओसभ  गेल रहथि। साँझ पड़ि रहल छल। अस्तु,मैथिलीपुत्र कहलखिन- ”आजुक राति हमसभ एतहि विश्राम करब।“ ३८ मैथिलीपुत्रक नेतृत्वमे सैकड़ों जानकीधुजावाहिनी  भोरे गोमती नदीमे स्नान केलथि,पूजा-पाठ केलथि,किछु जलखै केलथि आ  भजन-कीर्तन करैत अयोध्या दिस बिदा भेलाह । ओसभ आनन्दमे छलाह जे अयोध्यामे राजारामसँ भेंट हेतनि । हुनका तँ एक्के बेरमे मना लेथिन , जानकी जल्दीए वापस अयोध्या लौटि जेतीह। राजाराम तँ हुनकर अपने छथिन तखन समस्या कथीक? अयोध्यासँ दस कोस फटकीए ओ सभ छलाह कि लोकक अपार भीड़ देखेलनि। सौंसे रस्ता लोकेसभ भरल छल। नाना प्रकारक वाहनसभमे लोकसभ नचैत-गबैत जा रहल छलाह। जकरे देखू सएह राजारामक प्रशंसामे जयगान कए रहल छलाह। मैथिलीपुत्रकेँ बुझेबे नहि करनि जे बात की छैक? एतेकगोटे सड़कपर कतएसँ आबि रहल छथि , कतए जा रहल छथि? ओना ओ सड़क तँ अयोध्ये  जा रहल छल। मुदा अयोध्यामे एहन कोन बात भेल जे ओकर आसपास एतेक लोक उपस्थित  भए रहल छथि?की राजाराम दोसर बिआह कए रहल छथि? कोन ठेकान?आखिर  राजा थिकाह । राज चलेबाक हेतु शांत मोन चाही,जीवनमे स्थिरता चाही। दिन-राति अशांत परिवेशमे रहनिहार राजा अपन जनताकेँ की सुख देत? भए सकैत अछि जे सलाहकारलोकनि हुनकापर  हाबी भए गेल होनि। अन्यथा,राजाराम तँ एहन नहि छथि।अछैत जानकीकेँ ओ दोसर बिआह करताह से विश्वास नहि भए रहल अछि। तखन समयक कोन ठेकान?ककर मोन कोन दिशामे पलटी लेत के जनैत अछि? मैथिलीपुत्र चिरञ्जीवी संगे विचार-विमर्श करैत छथि- ”की बुझा रहल अछि?अयोध्याक लगपासमे एतेक भीड़ किएक अछि?“ ”बात तँ सही कहि रहल छी। मुदा एहि प्रश्नक सही उत्तर के देत?“ ”ओएहसभ कहि सकैत अछि।“ ”सभ तँ नाच-गानमे मस्त अछि।ककरो होस छैक जे किछु बाजत,कोनो प्रश्नक उत्तर देत?“ ”सभटा अपने किएक सोचि लैत छी?एक बेर पुछि कए तँ देखिऔक।“ ”सही कहलहुँ।“ मैथिलीपुत्र सामनेसँ जा रहल लोकसभकेँ प्रणाम करैत छथि । फेर  विनयपूर्वक पुछैत छथिन- ”अहाँसभ कतए जा रहल छिऐक?“ ”सएह कहू। अहाँकेँ एतबो नहि बुझल अछि?एकर माने अहाँसभ अयोध्याक नहि छी।“ ”सही अनुमान लगओलहुँ।हमसभ मिथिलावासी थिकहुँ,जानकीक नैहरसँ आबि रहल छी।“ ”ओह तखन तँ अहाँसभ अत्यन्त आदरणीय पाहुन थिकहुँ। हमसभ अपनेलोकनिक कोन तरहेँ स्वागत करी से नहि बुझा रहल अछि?“ ”पहिने ई तँ बुझिऐक जे बात की छैक?हमसभ तँ घरबैए छी। स्वागतक कोन बात भेलैक।हमरसभक बहिनोइकेँ पता लगतनि तँ ओ अपने दौड़ि जेताह।“ ”अहाँ हमरालोकमनिकेँ लज्जित नहि करू।हमसभ एहिठाम छी तखन राजारामकेँ किएक परेसानी हेतनि।हमहीसभ अपनेकेँ हुनका लग लए चलब। मुदा ओ तँ “,” “कहू,कहू ।ओ की कए रहल छथि,कतए छथि?इएह तँ हमसभ जानए चाहैत छी।” “राजाराम अपन अनुजलोकनिक संगे अश्वमेध यज्ञ कए रहल छथि। हमहूँसभ ओतहि जा रहल छी।सड़कपर जे असंख्य जनसमुदाय अपनेसभ देखि रहल छी से सभ ओमहरे जा रहल अछि।” “मुदा हमसभ ओहि स्थानपर केना पहुँचि सकब? हमसभ छीहो बहुतगोटे । प्रहरीसभ अनठिआ बुझि कहीं रस्तेमे ने रोकि लिअए।” “अहाँसभ तकर चिंता नहि करू। बस हमरासभक संग भए जाउ।” “बहुत नीक बात कहलहुँ।” तकर बाद मैथिलीपुत्र आ चिरञ्जीवी  जानकीधुजावाहिनीक संगे  अश्वमेध यज्ञ मण्डप दिस बिदा भेलाह। मोने-मोन आश्चर्य होनि जे अयोध्याक लोकसभमे जानकीक प्रतिए एतेक अनुराग अखनहु छनि।तेँ ने हमरासभकेँ एतेक आदर कए रहल छथि। हमसभ अनेरे अनुरंजित छलहुँ। की की ने  सोचि रहल छलहुँ। नीके भेल जे हमसभ अयोध्या आबि गेलहुँ। एहिठामक तँ हबे बदलल लगैत अछि। अयोध्यासँ थोड़बे फटकी विशाल पण्डाल लागल छल। पण्डाल की छल ,अपना-आपमे ओ एकटा नगर छल। अनेक द्वारसँ तरह-तरहक लोकसभक आवागमनक सुविधा छल। ऋषिलोकनिक लेल फराके एकटा विशाल पण्डाल लगाओल गेल छल। सभकेँ  सुविधा संपन्न अलग-अलग कोठरी देल गेल छल। ऋषिलोकनि ब्राह्मी मुहुर्तमे उठि कए वेदमंत्रोच्चार करए लगैत छलाह। ओहिठामक वातावरण संस्कार आ भक्तिसँ भरल छल। अनेक देशक राजालोकनि अपन-अपन आबासमे सुव्यवस्थित छलाह। व्यवस्थापकलोकनिकेँ जखने पता लगलनि जे मिथिलासँ सैकड़ों लोकसभ अश्वमेध यज्ञस्थलीपर उपस्थित छथि तँ हुनका लोकनिक बहुत स्वागत केलकनि। सभ गोटे के रहबाक लेल पृथक पण्डाल लगाओल गेल। ओहिठामसँ मुख्य यज्ञस्थली ठीक सामनेमे छल। यज्ञमण्डप लग पहुँचि जानकीधुजावाहिनी चिंतामे पड़ि जाइत छथि- हो रामा! ई की देखि रहल छी? चारूकात सजल-धजल अयोध्या नगरिआ नचैत-गबैत लोक-वेद नगरमे चारूकात बजैत अछि बधैआ अश्वमेध यज्ञ कए रहल छथि चक्रवर्ती राजाराम मुदा जानकी बना देल गेल छथि सोनाक मुरुत हाय हो राम ई की  देखि रहल छी किए केने छी एहन अन्याय हे राजाराम छगुन्तामे अछि प्राण हमसभ मिथिलासँ ई देखबा लेल नहि आएल छलहुँ मोनमे आशा छल जे कतहु ने कतहु प्रेमक विजय होएत राजारामक हृदयमे सदति विराजित छथि जानकी से अश्वमेध यज्ञोमे बामाँ दिस रहतीह विद्यमान हे विधाता ! नहि बुझि सकलहुँ अहाँक विधान जानकी जीविते बनल छथि मुरुत समान “ई की देखि रहल छी? जानकीक सोनाक मुर्ति राजारामक बामाँ भागमे लगाओल गेल अछि। की जानकी यज्ञोमे नहि बजाओल जेतीह ?-मैथिलीपुत्र पुछलखिन।” “देखैत रहिऔक ने ,आगू की की होइत छैक। सामने दहिना कातक पण्डालमे वाल्मीकि मुनि देखा रहल छथि। देखा चाही ओ की करैत छथि?” “वाल्मीकि मुनि सेहो आएल छथि?” “हँ यौ। ऊपर दिस आउ ने।अपने देखबनि।” “आ जानकी,लव-कुश?की ओहोसभ आएल छथि?” “धैर्य राखू।अखन बहुत किछु देखबाक अवसर भेटत।” ३९ जानकीकेँ वाल्मीकि आश्रममे रहैत बारह वर्ष बीति गेलनि।लव-कुश आब छेटगर भए गेल छथि। वाल्मीकि मुनिक असीम कृपासँ ओ सभ सभ तरहक विद्यामे निपुण भए गेल छथि। संगीत गायनमे सेहो हुनकालोकनिकेँ महारत प्राप्त भए गेल छनि। वाल्मीकि मुनि स्वयं दुनू भाइकेँ साँझमे रामायण गायनक प्रशिक्षण दैत छलाह।परिणामतः संपूर्ण वाल्मीकि रामायण हुनकासभकेँ कंठाग्र भए गेल छनि। ओ सभ जखने रामायण गायन शुरू करैत छथि कि चारूकातक लोकसभ निःशब्द भए ओकरा सुनैत छथि। सभक आँखिसँ धाराप्रवाह अश्रु प्रवाह होमए लगैत छनि। केओ अपना वशमे नहि रहि जाइत छथि। वाल्मीकि रामायणमे रामक भविष्यक जीवनक वर्णन सेहो कएल गेल अछि। वाल्मीकि मुनि अपन दिव्यशक्तिसँ तकरा अपन शब्दमे रामायणमे उतारि देने छथि। अस्तु,जानकीक जीवनमे जे किछु घटित भए रहल छनि,किंवा राजारामक संगे भविष्यमे जे किछु होमए बला छनि से वाल्मीकि मुनि बुझि रहल छथि। आब बस लोकसभकेँ ओकरा बुझबाक छैक। तेँ ने वाल्मीकि मुनि दुनू बालककेँ रामायण गायनमे निपुण केलनि अछि। वाल्मीकि मुनिकेँ राजाराम द्वारा आयोजित अश्वमेध यज्ञक निमंत्रण भेटि चुकल छनि। ओ एहि अवसरक उपयोग किछु विशेष रुपमे करबाक योजना बना चुकल छथि। एहि विषयमे वाल्मीकि मुनि वनदेबीकेँ सूचना दैत छथि।परंतु,हुनका एहि यज्ञमे जेबाक कनीको मोन नहि होइत छनि।ओ वाल्मीकि मुनिसँ कहैत छथि- “जखन राजाराम स्वयं हमरा नहि बजओलथि तखन हम ओहिठाम आर अपमानित हेबाक लेल किएक जाउ?” “आब प्रश्न अहाँक मान-सम्मानक नहि अछि वनदेबी। लव-कुश छेटगर भए चुकल छथि।  सभ तरहेँ सुयोग्य छथि। उचित अछि जे राजाराम हुनका अपन संतानक रुपमे  स्वीकार करथि आ हुनकासभकेँ अपन अधिकार देथि। ताहि लेल हमरा जनैत ई बहुत उपयुक्त अवसर अछि। ओहिठाम अनेक ऋषि-मुनि आएल छथि। वशिष्ठ मुनि सहित अनेक विद्वान लोकनि सेहो उपस्थित छथि। हमरो निमंत्रण भेटि चुकल अछि।  हम जेबो करब। उचित अछि जे लव-कुश अहाँ संगे ओतए चलथि।” “मुदा यदि हमरा संगे सम्मानजनक व्यवहार नहि भेल तखन?” “हम छी ने अहाँक संगे। हमरा रहैत अहाँकेँ के किछु कहि सकत?” “तखन अहाँ जे कही।” “हमरा जे कहबाक छल से कहि चुकल छी।काल्हि भोरे हमसभ यज्ञस्थली लेल बिदा होएब। लव-कुश रस्ते-रस्ते रामायणक गायन करैत रहताह। देखबैक की हाल रहैत छैक। हिनकर सभक रामायण गायनमे से जादू अछि जे समस्त अयोध्याक लोक अहाँक दंडवत भए जेताह।” “यद्यपि अपनेक विचार उत्तम अछि,अपने हमरसभक कल्याण चाहैत छी,मुदा हमर मोन अखन अयोध्या जेबाक लेल तैयार नहि होइत अछि। अहाँ लव-कुश संगे जाउ। यदि ओतए गेलाक बाद हमर अएनाइ उचित बुझाए तखन हमरा समाद पठा देब। हम चिरञ्जीवीक संगे ओतए आबि जाएब।” वाल्मीकि मुनि  लव-कुशकेँ आदेश करैत छथि- “अहाँ दुनू भाइ यज्ञस्थलीपर जाउ आ राजारामकेँ हमर रामायण सुनाउ।” “जे आज्ञा आचार्यवर!” ४० वाल्मीकि मुनि लव-कुशक संग यज्ञमे भाग लेबाक लेल अपन आश्रमसँ प्रस्थान  कए चुकल छथि। जानकी हुनकासभक संगे नहि गेलीह,नीक नहि लगलनि अयोध्या जाएब ,ओहो एहि हालतिमे। आइ ओ महारानी बनि राजारामक बामाँ भागमे विराजित रहितथि। से जानकी कोन मुँहे ओतए जेतीह। ओ तँ ओहिठामसँ निर्वासित कए देल गेल छथि। जानकीक अयोध्या छोड़ला बारह वर्ष बीति गेल। तकर बाद सँ केओ ओहिठामसँ हुनकर हाल-चाल नहि लेलक। एहन परिस्थितिमे जानकी ओहिठाम कोना जइतथि। बितल बातसभ सोचि-सोचि  जानकी अखरे चौकीपर पड़ल-पड़ल कानि रहल छथि। चौकी नोरसँ भिजि गेल अछि। हुनकर ई दशा देखि आश्रमवासी स्त्री लोकनि परेसान भए गेलथि। की करथि से बुझेबे नहि करनि।लव-कुश लगमे रहथिन तखन तँ ओ दिन-राति हुनकेसभमे लागल रहैत छलीह। मुदा ओहोसभ चलि गेल छथिन। वाल्मीकि मुनि से चलि गेल  छथि। अन्यथा भोर-साँझ हुनकर आश्रमक आरती आ तकर बाद होमए बला भजन-कीर्तनमे जानकीक मोन बहटि जाइत छलनि। मुदा अखन तँ हुनका एकदम सुन्न लागि रहल छनि। स्वाभाविक रुपसँ ओ आत्मलीन भए गेल छथि। बिसरल बात सभ एक-एक कए मोन पड़ि रहल छनि। “केना राम संगे प्रथमे दृष्टिमे हुनका प्रेम भए गेलनि। कतेक नीक हुनकर व्यवहार छलनि। केना ओ स्वयंवरमे देखिते-देखिते शिव धनुषकेँ तोड़ि देलनि। जे धनुष रावण सन प्रतापी राजा उठा तक नहि सकल छल तकरा राम तर दए खंड-खंड कए देलनि। इएह तँ ईर्ष्याक कारण बनि गेल छल। रावण अवसर भेटितहि तकर बदला लेलक आ पंचवटीसँ जानकीकेँ छलपूर्वक हरि लेलक। तहिआसँ रावणक मृत्यु पर्यंत जानकी ओकर अधीन रहलीह। कुल एगारह महिना चौदह दिन लंकामे बिताओल गेल समय हुनका लेल सैकड़ों साल लगैत छलनि। एक-एक दिन बिताएब मोसकिल भए गेल रहनि। रावण हुनकर मनोबल तोड़बाक कोनो कसरि नहि छोड़ने छल। ओ साफे कहि देने रहनि- ”नीकसँ सुनि लएह। यदि साल भरिक भीतर सहर्ष हमरा संगे बिआह नहि करबह तँ ई राक्ष्सीसभ तोरा खंड-खंड कए तोहर माउसकेँ उसनि कए खाएत। कोनो हालतिमे तूँ बचि नहि सकबह। तेँ यदि अपन नीक चाहैत छह तँ यथाशीघ्र हमरासँ बिआह कए लएह आ लंकाक रानी बनि जेबाक सौभाग्य प्राप्त करह।“ मुदा जानकी तँ जानकी छलीह। ने जानक परिबाह छलनि ने रावणक राजक। हुनकर तँ बस एकमात्र आराध्य कही,प्रेमी कही,पति कही सभ राजा रामे छलाह आ छथिहो। ओ अपन विचारपर  अड़ल रहलीह । आखिर रावण मारल गेल। ओकर समस्त परिवार नष्ट भए गेल। राजारामक सहयोगी  रहबाक कारण मात्र विभीषण बाँचि सकलाह। राजाराम द्वारा लंका विजयक बाद ओएह राजा भेलाह। जानकीकेँ ई शुभ समाचार भेटलनि। हुनकर प्रसन्नताक तँ अंते नहि छल। आखिर राजारामसँ भेंट हेबाक समय आबि गेल। जानकीकेँ मोन पड़ रहल छनि ओ बात सभ।ओ फेर जोर-जोरसँ कानए लगैत छथि। लगपासमे ठाढ़ आश्रमवासी स्त्री लोकनि गुम्म छथि। की करथि की नहि से फुरा  नहि रहल छनि। ओ सभ जानकीकेँ थोड़े काल एकांतमे  छोड़ि देलनि जाहिसँ ओ शांत भए सकथि। जानकीकेँ मोन पड़लनि ओ क्षण जखन विभीषण अनेक सहयोगीक संगे हुनका सजा-धजा कए रामक सामने रथ सँ लए जेबाक ओरिआन केने छलाह  मुदा राजाराम कहलखिन- ”जानकीकेँ हमरा लग पैरे अनिअनु जाहिसँ अधिक सँ अधिक  लोक हुनका देखि सकनि। ओ सभ हुनकर दर्शन लेल व्याकुल छथि।“ राजारामक इच्छानुसार सभ तरहेँ सजल-धजल जानकी पैरे-पैरे राजारामक लगीच पहुँचैत छथि। जानकीक प्रसन्नता  अवर्णीय छल। हुनका एक-एक क्षण बिताएब मोसकिल भए रहल छलनि। आब राजाराम बहुत लगीच आबि गेल छलखिन कि ओ कहैत छथिन- ”हम ई युदध अहाँ लेल नहि केलहुँ। अपितु,हमर लक्ष्य छल अपन आत्मसम्मान आ रघुकुलक प्रतिष्ठाक पुनर्स्थापित  करब। रावणक मृत्यु आ लंका विजयक संग से हम प्राप्त कए चुकलहुँ। आब अहाँ स्वतंत्र छी। अहाँ जतए चाही जा सकैत छी।“ सोचिऔ, हमरा लेल राजारामक ओ शब्दसभ केहन घातक लागल छल। होअए जे तुरंत जहर-माहुर खा ली। आब जीबिए कए की करब,ककरा लेल जिअब? हम जिनका लेल एतेक दिनसँ सभ तरहक कष्ट सहलहुँ सएह राजाराम की कहि रहल छथि? खैर! ओहिठाम उपस्थित सभ गण-मान्य लोकनि राजारामकेँ मनओलखिन । तथापि,ओ हमर अग्निपरीक्षाक लेल अड़ि गेलथि। हम सेहो मानि लेलहुँ। हम सभ तरहेँ सही रही,सभ दिन राजारामकेँ समर्पित रही ,तेँ हम ओहि परीक्षोमे सफल भेलहुँ। हम सभ अपमान सहि गेलहुँ। भेल जे राजाराम सहज मानवीय त्रुटिक सिकार भए गेल छथि,कालांतरमे ताहि भावसँ उबरि जेताह। हुनका एकटा अवसर देल जेबाक चाही। बात यदि एतबे सँ बनि जाइक तँ हमरा मानि लेबाक चाही।” अग्निपरीक्षामे सभ तरहेँ शुद्ध घोषित भेलाक बादे हम राजारामक संग वापस अयोध्या अएलहुँ। हुनकर राज्याभिषेकक बाद हुनकर रानी बनलहुँ। मुदा दुर्भाग्य फेर हमर पछोड़ केलक। तकर बाद तँ जे भेल से देखिए रहल छी।“ ४१ अयोध्या सहर आइ नवकनिआँ जकाँ सजल अछि । चारूकात अनेक प्रकारक सामिआना लगाओल गेल अछि। सामिआनासभमे  तरह-तरहक चित्र सभ उकेरल गेल अछि। यज्ञस्थल दिस जा रहल मार्गसभपर गलैचा ओछाओल गेल अछि। रस्ताक दुनू दिस सुंदर सुगंधित फूलसभ मह-मह कए रहल छल। अयोध्या आ लगपासक वातावरण राममय भए गेल अछि। जतहि देखू,जकरे देखू से राजारामक प्रशंसामे गीत गाबि रहल अछि,हुनकर जयगान कए रहल अछि। ऋषि,मुनि लोकनि मंत्रोच्चार कए रहल छथि। राजाराम अपन तीनू भाइ,गुरु वशिष्ठ आ अन्य वरिष्ठ ज्ञानीलोकनिक संग यज्ञस्थलीमे विद्यमान छथि। ओही समयमे दूटा बालक वाल्मीकि रामायणक सस्वर पाठ करैत यज्ञस्थलीमे प्रवेश करैत छथि। हुनकर सभक गायन ततेक मधुर छनि,ततेक अर्थपूर्ण छनि जे यज्ञस्थलीमे उपस्थित लोकसभक  ध्यान तुरंत घिचि लैत छनि। ओहि समयमे चारूकात शांति पसरि जाइत अछि। जे जतहि अछि ओतहि मुरुत जकाँ ठहरि जाइत अछि। राजाराम स्वयं बहुत ध्यानसँ ओहि गीतकेँ सुनैत छथि। गीत सुनैत-सुनैत ओ मोनमे विचारैत छथि- ”एहि गीतमे तँ हमरे जीवनक कथा कहल गेल लगैत अछि?“ ”ई बालकसभ के छथि?हिनका ई सभ के सिखओलकनि?“ ”ई सभ तँ हमर जीवनकेँ अक्षरसः उकेरि कए राखि रहल छथि।“ ”अहाँसभ के छी?एहिठाम कोना अएलहुँ?एहि गीतक रचनाकार के छथि?हमरा से सभ विस्तारपूर्वक बताउ।“-राजाराम पुछलखिन। ”मान्यवर! अपनेक जय होअए। हमसभ वाल्मीकि मुनिक शिष्य छी। वनदेबी हमर माता छथि। हमर इएह परिचय थिक । आर किछु नहि। हम जे गीत गबैत छी तकर रचयिता गुरुदेव वाल्मीकि स्वयं छथि। ओएह हमरासभकेँ एकरा गेबाक अभ्यास करओलनि।  हुनके आज्ञासँ हमसभ आइ अपनेक सामने एकरा गाबि रहल छी।“ ”हम अहाँसभक गायनकलासँ,अहाँक प्रतिभासँ बहुत प्रभावित भेलहुँ । हम अहाँसभकेँ किछु पुरस्कार देबए चाहैत छी। अहाँ एकरा सहर्ष स्वीकार करू।“ राजारामक इसारा पाबि सोनासँ भरल झोरा हुनकासभक हाथमे देल जाइत छनि। मुदा लव-कुश ओहि झोराकेँ छुबितो नहि छथि। ”नहि,नहि। हमसभ  तँ जंगलमे रहैत छी,ओहीठामक फल-फूलपर जीबैत छी। हमरा सभकेँ एकर कोन काज?अपने एकरा वापस लेल जाओ।“ लव-कुशकेँ एना बजैत सुनि राजाराम चकित छलाह। हुनका बुझबामे देरी नहि भेलनि जे वाल्मीकि रामायण हुनके जीवन प्रसंगपर आधारित अछि। एहिमे हुनकर  जानकीक सेहो चर्च अछि। एहिसभ बातपर विचार कए ओ वाल्मीकि मुनिकेँ समाद पठबैत छथि। समदिआ वाल्मीकि मुनिकेँ हुनकर पण्डालमे भेंट करैत छथि आ विनयपूर्वक राजारामक समाद कहैत छथि- ”ऋषिवर! सादर प्रणाम! यज्ञस्थलीमे लव-कुशक रामायण गायनसँ राजाराम बहुत प्रभावित छथि।  अपनेक रचित रामायणक मर्म बुझि गेल छथि। ओ जानि गेल छथि जे रामायण वस्तुतः हुनके जीवनीपर आधारित  अछि। जानकी लेल हुनका मोनमे बहुत आदर छनि। मुदा लोकलाजोक किछु महत्व होइत छैक। अयोध्यावासीक आपत्ति उठओलेपर राजाराम जानकीकेँ निर्वासित करबापर विवश भेल रहथि। ताहि बातक दुख हुनका मोनमे बहुत छनि। ओ तहिआसँ पश्चातापक आगिमे जरि रहल छथि। हुनका लगैत छनि जे ओहि निर्णयक समीक्षाक लेल उपयुक्त समय आबि गेल अछि। राजारामक इच्छा छनि जे जानकी यज्ञशालामे आबथि आ सभक सामनेमे अपन सुचिताक लेल सपथ खाथि जाहिसँ ओ हुनका फेरसँ स्वीकार कए सकथि।“ ”कोनो हरजा नहि। पतिक इच्छाक सम्मान करब पत्नीक धर्म थिक। जानकी राजारामक आज्ञाक अनुसार काल्हि भरल सभामे उपस्थित हेतीह।“-वाल्मीकि मुनि बजलाह। समदिआ हुनका प्रणाम कए चलि जाइत रहल। ओ सोझे राजाराम लग पहुँचैत अछि। ओ हुनका वाल्मीकि मुनिसँ भेल सभटा बात हुनका एकांतमे कहैत छनि। ओ समदिआक बात सुनि कए बहुत प्रसन्न छथि। यज्ञशालामे लव-कुशक वाल्मीकि रामायणक मधुर गायन सुनि राजाराम विचार मग्न भए गेलथि। ओ वाल्मीकि मुनिकेँ निस्संदेह समाद पठा देलखिन ,लव-कुशकेँ अपना भरि प्रोत्साहितो केलखिन,मुदा बात ने एतबे रहैक ने राजाराम ओतहि रुकल छलाह। ओ राति भरि जगले रहि गेलाह,करोट बदलैत रहि गेलाह,जेना हुनकर इएह नियति होनि। ओ बुझि गेल छलाह जे लव-कुश के छथि,मुदा जानकीकेँ कोना मनाओल जा सकत से मूल प्रश्न छल। कारण जाहि तरहेँ हुनका बिना विश्वासमे लेने जंगल पठा देल गेलनि से ओ कोना बिसरि सकैत छलीह? ओहो कोनो मामूली स्त्री नहि रहथि। जनकक बेटी मिथिलाक सम्मानित बेटी छलीह। फेर हुनकर कोनो दोष नहि छलनि। ओ तँ सभदिन राजारामकेँ मोनसँ चाहैत रहलथि,हुनकेटा मानलथि। मुदा परिस्थिति कहिओ संग नहि देलकनि। पराधीन रहितहुँ ओ अपन निष्ठा आ आत्मसम्मानकेँ बचओने रहलथि। मुदा लोक के की कहि रहल अछि तकर ओ की करितथि? राजारामक निर्णय कतहुसँ न्यायपूर्ण नहि लगैत छलनि। तखन  कोन मुँहे जानकीसँ निवेदन करितथि? ओमहर वाल्मीकि मुनि चिरञ्जीवीकेँ सभ बात बुझा कए वनदेबी लग आश्रम पठबैत छथि। चिरञ्जीवी वाल्मीकि मुनिक समाद लए जानकी लग पहुँचैत छथि। ओ जानकीकेँ वाल्मीकि मुनिक समाद कहैत छथिन। मोनमे हुनको यज्ञ देखबाक इच्छा रहबे करनि । ओहिठाम लव-कुश द्वारा गाओल गेल रामायणक बारेमे नीकसँ बुझबाक उत्सुकता रहबे करनि। ऊपरसँ ओ आश्रममे एसगरि बहुत परेसान भए गेल रहथि।  ओ वाल्मीकि मुनिक आदेश मानि लेबेमे उचित बुझलनि। वाल्मीकि मुनिक आग्रहपर जानकी अहल भोरे चिरञ्जीवीक संग राजारामक यज्ञस्थली लेल बिदा भेलथि। जानकी आइ बहुत दिनक बाद एतेक नीकसँ सजल छथि। बहुत दिनसँ पेटीमे राखल गहनासभ पहिरि लेने छथि। लंकासँ अयोध्या अएलाक बाद जे साड़ी पहिरने रहथि सएह आइओ पहिरि लेने छथि। यज्ञस्थलीसँ कनीके फटकी बनल पण्डालमे वाल्मीकि मुनि ठहरल छलाह। जानकी चिरञ्जीवी संगे ओतए पहुँचैत छथि। वाल्मीकि मुनि जनाकीकेँ एहि-तरहेँ सजल-धजल देखि प्रसन्न होइत छथि। ओ जानकीकेँ सादर प्रणाम करैत छथि। जानकी वाल्मीकि मुनि संग हुनकर पण्डालमे रहैत छथि। हुनकर एतए आगमनक जनतब ककरो नहि देल जाइत छनि। वाल्मीकि मुनिक पण्डालमे जानकी चुपचाप बैसल छथि। एहन परिस्थितिमे एकांतमे जानकीक मोनमे तरह-तरहक प्रश्न-प्रतिप्रश्न उठि रहल छनि। ”आइ हमरा एहि यज्ञमे राजारामक बगलमे बैसल रहबाक छल। मुदा हमरा बदलामे हमर सोनाक मुरुत बना कए राखल गेल अछि। कहू ई केहन बात भेल? जीबैत आदमीक बदला ओकर मुरुतक पूजा कएल जाएत? ई तँ घोर अन्याय थिक।“ ”हमरा एहिठाम अएबेक नहि चाहैत छल। भने पड़ल छलहुँ जंगल-झारमे। मुदा वाल्मीकि मुनि हमरा एहिठाम बजा लेलनि। हमहूँ अपन संतानक मोहमे मना नहि कए सकलिअनि। जानकीक आब की बाँचले रहि गेल छनि। तखनतँ लव-कुशकेँ हुनकर न्यायोचित स्थान भेटि जानि। बस हमर दायित्व समाप्त भए जाइत। सएह सोचि सभ बातकेँ बिसरि बाल्मीकी मुनि बात मानि हम एहिठाम धरि आबि गेल छी। देखा चाही नियति की चाहैत अछि।“ ४२ यज्ञशालाक मध्यभागमे बनल मंचपर  राजाराम अपन तीनू भाइलोकनिक संग विराजमान छथि। हुनकालोकनिक दुनूकात प्रतिष्ठित ऋषि मुनि लोकनि आसन ग्रहण केने छथि। मुनि वशिष्ठ,विश्वामित्र सहित रघुकुलसँ जुड़ल अनेक संत-महात्मा अपन-अपन स्थानपर बैसि गेल छथि। मिथिलासँ आएल सैकड़ों जानकीधुजावाहिनी  मैथिलीपुत्रक संगे मंचक ठीक सामने बनल पण्डालमे बैसि गेल छथि। राजारामक सामने कनीके फटकी छोटसन मंच बनाओल गेल अछि जाहिठाम ठाढ़ भए लव-कुश रामायण गायन करताह। हुनकर पाछू वाल्मीकि मुनि ठाढ़ छथि। वाल्मीकि मुनिक पाछू जनकनन्दिनी जानकी मुँह नीचाँ केने ठाढ़ि छथि। सभ गोटे केँ एहि तरहेँ आएल देखि राजारामक सचिव हुनकासँ आज्ञा लैत छथि- ”अपनेक आज्ञा होअए तँ  आजुक कार्यक्रम प्रारंभ कएल जाए।“ ”आज्ञा अछि।“ सभामे सभक सहमति देखि वाल्मीकि मुनि वक्तव्य प्रारंभ केलनि- ”मंचपर विराजमान राजाराम,हुनकर भाइ लोकनि, ऋषि,मुनि सहित एतए उपस्थित समस्त श्रोतालोकनि ध्यानसँ सुनथि। हम अपन जीवन भरिक तपस्यासँ अर्जित पुण्यकेँ साक्षी मानि सपथपूर्वक कहैत छी जे जीवनमे हम कहिओ झूठ नहि बजलहुँ,जे हम जे किछु कहए जा रहल छी से परम सत्य अछि । एहि तरहेँ सपथपूर्वक हम कहैत छी जे लव-कुश राजारामक संतान छथि। ओ सभ हुनकर उत्तराधिकारी छथि।  राजाराम हुनका एहि तरहेँ सहर्ष स्वीकार करथि। हम ईहो स्पष्ट करैत छी जे जनकनन्दिनी जानकी परम पवित्र छथि। हम अपन दिव्यशक्तिसँ सभ तरहेँ जाँचि लेलाक बाद आ ई आश्वस्त भेलाक बादे जे जानकी सभ तरहेँ पवित्र आ निष्कलंक छथि,हुनका अपन आश्रममे रखने छलिअनि। ओ सभ तरहेँ राजारामकेँ समर्पित रहलीह आ छथिहो। हुनकर राजारामक प्रतिए निष्ठा अक्षुण छनि।राजाराम निश्चित रुपसँ हुनका अपन पत्नीक रुपमे ग्रहण करथि।“ वाल्मीकि मुनिकेँ एहि तरहेँ स्पष्ट रुपसँ जानकीक आ लव-कुशक समर्थनमे अपन बात रखलाक बाद सौंसे सभागार जय जानकी ! जय जानकी!क नारा लगबए लागल। जानकीधुजावाहिनी एकस्वरमे बाजि उठलाह- ”जानकीक सम्मानक रक्षा कएल जाए। हुनका ससम्मान सोनाक जानकीक मुरुतकेँ हटा कए राजारामक बामाँ भागमे मंचपर बैसाओल जाए। तखनहि ई यज्ञ सफल मानल जाएत।“ यज्ञस्थलीमे उपस्थित अयोध्यावासी सेहो जानकीक समर्थनमे उच्च स्वरसँ बाजि उठलाह- ”हमसभ सेहो जानकीक ससम्मान अयोध्या वापसी चाहैत छी। ओ  हमरसभक रानी थिकीह । जहिना राजाराम तहिना जानकी सेहो आदरणीया छथि। हुनका तुरंत अपन स्थान भेटनि। लव-कुश हमरसभक युवराज बनथु। आब बहुत भए गेल। हुनकासभकेँ आर कष्ट देब कतहुसँ उचित नहि होएत। जानकी संगे बहुत अन्याय केलथि अयोध्यावासी। अपन व्यवहार आ विचारमे उचित परिवर्तन आनि ओ सभ  जल्दीसँ एहि कलंकसँ मुक्ति होथु।“ राजाराम सभक बात सुनलनि। बहुत गंभीरतासँ ओहि बातसभपर विचार केलनि। कखनहु अपन भाइसभ दिस देखथि तँ कखनहु मंचपर विराजमान ऋषि-मुनि दिस । मुदा किछु बाजि नहि पाबथि। ओमहर जानकीक मनोदशा बहुत चिंताजनक भेल जा रहल छलनि। जखनसँ ओ यज्ञस्थलीमे पैर धेलीह आ राजारामकेँ सामने देखलीह तखनेसँ हुनका जेना लकबा मारि देलकनि। ओ आश्चर्यचकित छलीह जे राजाराम हुनका देखिओ कए मौन किएक छथि,किएक ने मंचसँ उतरि हुनका संगे लेने जाइत छथि। हुनकर मोनमे कतेक प्रश्नसभ हिलकोर दैत रहलनि ,मुदा उत्तर हुनका लग नहि रहनि,ने राजाराम किछु समाधान करथि। चारूकात जकरा जे मोन होइक से बजने जा रहल छल। निस्संदेह बेसी लोकसभ  जानकीक पक्षधरे बुझाइत छलाह। मुदा ई विवादे व्यर्थ छल,अनावश्यक छल। अश्वमेध यज्ञ कएले गेल छल रघुकुलक प्रतिष्ठाक लेल। से प्रतिष्ठा माटिमे मिलि रहल छल। भरल सभामे जानकी लज्जित,अपमानित ठाढ़ि छलीह,राजारामक आदेशक प्रतीक्षा कए रहल छलीह। हुनकर यंत्रणाक तँ अंते नहि छल। सभाक बीचमे सैकड़ों लोकक समक्ष ऋषि वाल्मीकि द्वारा सपथपूर्वक लव-कुशकेँ राजारामक संतान घोषित केलाक बाद आ जानकीकेँ सभ तरहेँ निर्दोष,निष्कलंक  प्रमाणित केलाक बादो राजारामकेँ चुप देखि यज्ञशालामे उपस्थित लोकसँ चकित छलाह। वशिष्ठ मुनि समेत अनेक श्रेष्ठ मुनिकेँ फुरेबे नहि करनि जे  ओ की करथि। सभक मोनमे एक्के बात उचरैत छलनि- ”जखन वाल्मीकि मुनि सन अंतर्यामी,रामायणक रचनाकार सद्यःसपथपूर्वक कहि रहल छथि तखनहु राजाराम की चाहैत छथि?किछु   बाजि किएक नहि रहल छथि?“ सभामध्य वाल्मीकि मुनिक पाछू ठाढ़ि जानकीकेँ तँ हाल-बेहाल छलनि। ओ ने किछु सुनि रहल छलीह ने सोचि पाबि रहल छलीह । जानकीक  सोनाक मुरुत मंचपर राजारामक बामाँ दिस विराजमान छल आ  दोसर जीबैत मुरुत सभामध्य ठाढ़ि छलीह। ककरो किछु नहि फुराइक,केओ किछु नहि बाजए। राजाराम तँ जेना बौक भए गेल रहथि। एहन परिस्थितिमे लक्ष्मणकेँ नहि रहल गेलनि । ओ एकाएक  जोरसँ चिकरि उठलाह- ”आदरणीय भैया! यज्ञशालामे एतेक महापुरुषलोकनिक उपस्थितिमे  बहुत अनर्थ भए रहल अछि। जे किछु भए रहल अछि से  कोनो तरहेँ रघुकुलक मर्यादाक अनुकूल नहि अछि। वाल्मीकि मुनि अत्यंत आदरणीय छथि,सत्य आ धर्मक प्रतीक छथि। ओ जे किछु कहलनि अछि से स्वयं प्रमाण अछि। तकरा तुरंत स्वीकार कएल जेबाक चाही। हम आब जानकीकेँ एहि हालमे एक्को क्षण नहि देखि सकैत छी। हमरा लगैत अछि जे अहाँ उचित निर्णयमे विलंब कए  सर्वनाशकेँ आमंत्रित कए रहल छी।“ मंचपर विराजमान भरत,शत्रुघ्न सहित अनेक ऋषि,मुनि लोकनि लक्ष्मणकेँ शांत करैत छथि- ”अहाँ अगुताउ नहि। राजाराम सभ किछु सुनि लेने छथि। ओ स्वयं भुक्तभोगी छथि। जानकीक कष्टसँ हुनका बेसी कष्ट छनि। हुनका विचार करबाक उचित समय देल जानि।“ ओमहर मंचक ठीक सामने बैसल सैकड़ों जानकीधुजावाहिनी  तनतना रहल छलाह। ओ सभ मैथिलीपुत्र दिस इसारा कए रहल छलाह। तात्पर्य जे अहाँ आदेश करू तँ अखने हिसाब-किताब भए जाएत। आब बात  बरदास्तसँ बाहर भए रहल अछि। परंतु परिस्थितिए तेहन छल जे मैथिलीपुत्रो की करितथि? राजारामक निर्णयक प्रतीक्षा करब उचित बुझेलनि। अस्तु,हुनकालोकनिकेँ शांत रहबाक हेतु इसारा केलखिन। माहौल अत्यन्त उत्तेजित लागि रहल छल। लगैत छल जे कखनहु किछु भए जाएत। ४३ जनाकीक मनोदशा देखि जानकीधुजावाहिनी उत्तेजनामे अपन-अपन स्थानपर सँ उठि गेलाह। ओ सभ मंच दिस बढ़बाक प्रयास करए लगलाह। मैथिलीपुत्र हुनका सभकेँ बुझेबाक बहुत प्रयास करथि,मुदा ओ सफल नहि भए रहल छलाह। ओ दौड़लाह चिरञ्जीवी लग। मुदा ई की भेल? ओ जतेक जोरसँ हुनकर लगीच जेबाक प्रयास करथि,ओ ततेक फटकी चलि जा रहल छथि। अंततः चिरञ्जीवी ठामहि बिला गेलाह। अखने तँ ओतहि छलाह। मैथिलीपुत्र चारूकात दृष्टि घुमबैत छथि,मुदा ओ कतहु देखा नहि रहल छथिन। अचानक ओ जानकीक पाछू दिस तकैत छथि। ”ई की देखि रहल छी? चिरञ्जीवीकक तँ रंग-ढ़गे बदलि गेल छनि। हुनकर एहन रौद्र रूप तँ कहिओ नहि देखने छलहुँ? हुनका हाथमे एतेकटा गदा कतएसँ आएल? की ओ“? ओ तँ कहिओ कोनो प्रकारक अनुभव  नहि होमए देलनि।सभ दिन सामान्य व्यवहार करैत रहि गेलाह। आइ पहिल बेर हुनकर एहन विकट,बिकराल रूप देखि रहल छी। ”हे भगवान! पता नहि की होमए जा रहलअछि? हमर बामाँ आँखि एतेक किएक फड़कि रहल अछि?“ चिरञ्जीवी इएहसभ सोचिते रहथि कि शक्तिस्वरुपाकेँ भयाओन रूप बनओने देखलथि। ओ राजारामक मंचक ठीक पाछू दुर्गाक अवतार लगैत छलीह। हाथमे चमकैत तरुआरि ,भाला ,बरछी आ कहि ने की की छलनि? लगैत छलैक जे ओ कखनहु ककरो छोपि देथिन। मैथिलीपुत्रकेँ तँ चारूकात प्रलयक दृश्य देखा रहल छलनि। ओ जोर-जोरसँ चिचिआ रहल छथि- ”जानकीधुजावाहिनी ! शांत होउ। अहाँसभकेँ अखन बहुत किछु करबाक अछि। जानकीक स्मृतिकेँ हुनकर संघर्ष गाथाकेँ, जुग-जुग धरि मिथिलाक घर-घर पहुँचेबाक अछि। अखन अहाँ सभ नियतिकेँ अपन काज करए दिऔक,अनेरे अयशक भागी नहि बनू। ई राजारामक दरबार छनि। यदि ओ न्याय नहि कए सकताह,ओहो अपन धर्मपत्नीक संगे, तखन आर के की करत? लव-कुश रामायण गायन केने जा रहल छथि। मंचपर राजाराम सुनैत जा रहल छथि। ओहिमे जानकीक भविष्य तँ कहि देल गेल । आब राजारामक भविष्य गाओल जाएत। सभ चुपचाप ओहि गीतकेँ सुनैत जा रहल छथि। गीतक मर्म बुझि राजारामकेँ तँ ठकबिदोर लागल छनि। की करथि?की बाजथि? अचानक लागल जेना ठनका खसि रहल अछि। भयाओन अन्हड़ उठि गेल अछि। राजारामक मंच कोनो क्षण धारासायी भए जाएत। लव-कुशक गायन एहन प्रलयंकारी सिद्ध होएत से संभवतः वाल्मीकि सेहो नहो सोचने रहल हेताह। ४४ यज्ञस्थलीमे सैकड़ों संत,महात्मा,विद्वानलोकनिक उपस्थितिमे राजाराम अपन मौन तोड़ि कहैत छथि- “एहि ठाम उपस्थित समस्त महानुभावलोकनि  सुनथु। अपने सभ गोटे  लव-कुशक वाल्मीकि रचित रामायणक गायन सुनलहुँ। वाल्मीकि मुनिक लव-कुश आ जानकीक संबंधमे देल गेल स्पष्टीकरण सेहो सुनलहुँ। एहि बातमे कोनो सक नहि रहि गेल अछि जे लव-कुश हमर संतान छथि। हुनका लोकनिक स्वागत छनि। ओ सभ निश्चय रघुकुलक भविष्य छथि,हमर उत्तराधिकारी छथि । रहल जानकीक बात से हम स्वयं जनैत छी जे ओ निष्कलंक छथि,हमरासँ बेसी हुनका के चिन्हि सकैत छनि। हम हुनका चलि गेलाक बाद जे कष्ट सहलहुँ,जेहन नारकीय जीवन जीलहुँ तकर की वर्णन करू?तखन अहाँ कहब जे हम एना किएक केलहुँ?ई जनितहुँ जे जानकी निर्दोष छथि,हुनकर हमरा प्रतिए निष्ठापर कोनो प्रश्नचिन्ह नहि लगाओल जा सकैत अछि,तथापि हम एकटा धोबीक बातपर  हुनका वनबास दए देलिअनि। मुदा हम की करितहु?हम तँ एहि राज्यक नीति आ नियमसँ बान्हल छी। हम मात्र तकर अनुसरण केलहुँ। हम नीकसँ जनैत छी जे आबए बला पीढ़ी हमरासँ पुछबे करत?हमरा जे से कहत। मुदा ओकरा तत्कालीन समाजक जनतब रहतैक तखन हमरो विवशतापर सोचत?एहि सभ बातपर बहुत विमर्श भेल अछि आ होइत रहत। हम व्यक्तिगत रूपसँ कहिओ जानकीक विरुद्ध ने छलहुँ ने अखनो छी। प्रश्न तँ अयोध्यावासी उठओने छलाह।एकर समाधानो ओएह करताह। जानकी एहि सभामे सभक सामने अपन निष्ठाक सपथ खाथु जाहिसँ ओ सभ हुनका बारेमे अपन मंतव्य बदलबाक लेल विवश होथि।” राजारामकेँ एना बजैत देखि जानकीक देहमे आगि लागि गेलनि। हुनकर क्रोधक अंत नहि छल।ई तँ हुनकर अपमानक पराकाष्ठा भए गेल । ओ एक बेर लव-कुश दिस देखलनि जरूर,मुदा मोन वितृष्णा भावसँ भरि गेल छलनि। भेलनि जे आब एहि दुनिआँमे रहिए कए की करब?व्यर्थ थिक एहन अपमानित जीवन जिअब। एक्के आदमी एक्के बातपर बेर-बेर यंत्रणा सहए,अपनाकेँ सही सिद्ध करैत रहए,ई कोन न्याय थिक? राजाराम सम्हारथु अपन राजगद्दी,पोषथु अपन संतानकेँ। हम आब चलब। हे शक्तिस्वरुपे! हमरा क्षमा करब। हमर देह आब नहि रहत। मुदा राजारामक प्रतिए हमर प्रेम भाव बनले अछि ,हुनका प्रतिए हमर सिनेह ओहिना अछि। अस्तु, हमर प्रार्थना अछि जे अहाँ फेरसँ हुनकामे समाहित भए जाउ ,हुनका शक्तिवान बनल रहए दिअनु जाहिसँ ओ यशस्वी होथि, एहन यज्ञ बेर-बेर  करैत रहथि।“ जानकीकेँ झहरि रहल छनि नोर केहन अभागलि  भेलहुँ सभ किछु  रहितहुँ छी अनाथ एहि यज्ञशालामे के नहि छथि वशिष्ठ मुनि जे छथि रघुकुलक सभदिनसँ माननीय आचार्य सेहो  छथि गुमसुम वाल्मीकि कहि गेलाह सभटा खेरहा सपथ पर्यन्त खेलथि जे लव-कुश छथि निस्सन्देह अहींक संतान हे श्री राम सुनू जानकी छथि परमपवित्र निष्ठावान छथि अहींक समर्पित करिअनु हुनकर सम्मान कहि ने विवशता की रहनि राजाराम नहि कए सकलाह न्याय लव-कुश गबैत रहि गेलाह वाल्मीकि रामायण जाहिमे लिखल छल रामक भविष्य से सुनैत रहि गेलाह हुनका अखने चाहिअनि जानकीक सपथ सभहक सामनेमे ओ गछथु कहथु जे ओ छथि निर्दोष जानकी नहि सहि सकलथि एतेक अपमान एहन अन्याय सोचै छथि लव-कुश छलाह हमर भार ओ कहुना बाँचि गेलथि भए  गेलथि शक्तिसंपन्न आब की? बहुत भए गेल आब चली छोड़ी एहि कुटिल संसारकेँ फाटह हे धरती अंत होअए हमर त्रासदीक ई सभ सोचैत-सोचैत  जानकी आँखि मुनि लैत छथि। माता पृथ्वीकेँ स्मरण करैत छथि । मोने-मोन कहैत छथि- ”हे माता पृथ्वी! हमर असली माए तँ अहीं छी। हम अहींक कोरमे  जन्मल रही। हम सभदिन रामक प्रतिए निष्ठावान रहलहुँ। हुनका छोड़ि कहिओ ककरो क्षणो भरि अपन मोनमे स्थान नहि देलहुँ । यदि ई सत्य होइक तखन  हमरा फेरसँ अपन कोरामे बैसबाक अवसर प्रदान करू। हमरा अपनेमे समाहित कए सभ दुखसँ मुक्त करू।“ जानकीकेँ एतेक बजितहि भयंकर विस्फोट भेल। चारूकात पृथ्वी काँपि रहल छल। लगैत छल जेना भयाओन भूकंप भए रहल अछि। जानकी जतए ठाढ़ि छलीह ताहिठाम दरारि फाटि गेल। देखिते-देखिते जानकी ओहि दरारिमे विलीन भए गेलीह। जानकीकेँ ओहि पृथ्वीमे  प्रवेश करितहि ओ स्थान फेरसँ ओहिना भरि गेल जेना किछु भेले नहि होइक। तकर बाद जानकीक किछु अता-पता नहि रहि गेलनि। लव-कुश गबैत रहथि रामायण ताबतमे भेल हाहाकार फाटि गेल धरती पता नहि कतए आ कोना बिला गेलीह जानकी सभ देखितहि रहि गेलाह अत्यन्त दुखी राजाराम मुरी नीचाँ केने कनैत रहि गेलाह जानकी बेसक चलि गेलीह मुदा अखनहु मिथिलाक समस्त नर-नारी छथि हतप्रभ गाबि रहल छथि दुखसँ भरल गीत जानकीक वियोगमे हुनकर स्मृतिमे बनल अछि गामे-गाम जानकी स्थान हे जनकसुता क्षमा करू हमसभ की कए सकब प्रतिकार से की कहू मुदा नहि करब बिआह  अगहनमे अपन कोनो बेटीक नहि करबै ककरो बिआह ओमहर अहाँक स्मृति समस्त नारीक आत्मसम्मानक लेल बनि जाएत दृष्टान्त जुग-जुग धरि। ४५ जानकीक रसातल गमनक पश्चात राजाराम,लव-कुश,वाल्मीकि,वशिष्ठ आ ओहिठाम उपस्थित अनेक श्रेष्ठलोकनि जानकी दिस दौड़लाह। राजाराम चिचिआ उठलाह- ”हे जानकी! एना नहि करू । हमरा क्षमा करू। हम अपन वचन वापस लैत छी। अहाँ वापस आबि जाउ। “ राजाराम बड़बड़ाइत रहि गेलाह। जानकी आब अपन माएक कोरामे समाहित भए गेल छलीह। ओ मुक्त भए गेल छलीह समस्त कष्टसँ, दुबिधासँ आ अयोध्यावासीक छल-प्रपंचसँ। मीथिलीपुत्र चिरञ्जीवीक संगे जानकीधुजावाहिनी  लग जाइत छथि। ओ सभ  हतप्रभ रहथि,बहुत उदास रहथि। हुनकर सभक मनोरथ माटिमे मिलि गेल छलनि। हुनकासभकेँ होनि जेना जानकी असगरे नहि अपितु समस्त मीथिलावासीक संगे रसातलमे विलीन भए गेलथि। एतेक दिनसँ सभ किछु छोड़ि ओ सभ जानकीक चिंतामे लागल रहथि। हुनकर सभक प्रयास व्यर्थ भए गेल छलनि। मोन टूटि गेल छलनि। आब की करताह?  हुनकर सभक मनःस्थितिकेँ बुझैत मैथिलीपुत्र कहैत छथिन- ”वंधुगण! हमरा सभक आब एहिठाम रहब अर्थहीन भए गेल अछि । जानकी अपन नश्वर शरीर छोड़ि चुकल छथि। मुदा तेँ की? हम सभ चैनसँ नहि बैसब। आत्मसम्मान आ निष्ठासँ जीबाक हुनकर सनेसकेँ आबए बला पीढ़ीकेँ पहुँचबैत रहब। ताहि लेल हमसभ जानकी  धाम  वापस चली। ओतए जानकीक स्मृतिमे भव्य मंदिरक निर्माण करी जाहिसँ भावी पीढ़ी हुनकर त्याग आ निष्ठासँ  प्रेरणा लए सकत। जानकीधुजावाहिनी   हुनकर बात मानि जानकीधाम  वापस आबि जाइत छथि । कहल जाइत अछि जे अखनहु माता जानकी मिथिलावासीक हृदयस्थलीमे ओहिना विद्यमान छथि आ हुनका लोकनिक प्रेरणा श्रोत बनल छथि। जानकी सन  केओ ने भेल ने होएत । ओ मिथिलाक नारीक आत्मसम्मानक प्रतीक छथि। सभ तरहेँ पूजनीया छथि। ४६ अचानक एहन घटना घटि जाएत,देखिते-देखिते जानकी एना पृथ्वीमे समाहित भए जेतीह  से के सोचि सकैत छल? भावी प्रबल होइत अछि सएह मानए पड़त। कालक प्रभावसँ के बाँचल अछि,राजा रामो नहि। ओ तँ स्वयं जानकीक हालतिसँ बहुत दुखी छलाह। जहिआसँ जानकी वनबास गेलीह ,हुनकर हृदय खंड-खंड भए गेल रहनि। तकर बाद सालक-साल ओ सुति नहि सकलाह, नहि भोगि सकलाह राज सुख। ओ मात्र अपन कर्तव्यक निर्वाह करैत रहि गेलाह। तीस वर्ष छओ मास धरि अयोध्याक राज केलाक बाद आब सभ किछु जबाब दए देलकनि। माथ-हाथ सभ किछु बैसि गेलनि। काल से आबि कए कानमे किछु कहि गेलनि- “आब कतेक कष्ट सहब एहि देहमे। अहाँक काज पूर्ण भए गेल अछि । चलू अपन धाम । विष्णुलोक अहाँक स्वागत करबाक लेल आतुर  अछि।” लक्ष्मण द्वारिपर रखबारी कए रहल छलाह। राजारामक आदेश रहनि “ ”अखन केओ भीतर नहि आएत,यदि से भेल तखन अहाँकेँ मृत्युदंड होएत।“ओही समयमे दुर्वासा मुनिक आगमन भेलनि। ओ तुरंत राजाराम लग जेबाक लेल अड़ि गेलाह,अन्यथा श्राप देथिन, रघुकुलकेँ बरबादीक। लक्ष्मण सोचलाह-”दुर्वासाक श्रापसँ रघुकुलकेँ बचाएब बेसी जरुरी थिक,भने हमरा मृत्युदंड भए जाए।“  ओ राजारामक आदेशक विरुद्ध दुर्वासाकेँ राजाराम लग जेबाक अनुमति दए देलखिन। तकर स्वाभाविक परिणाम भेल  लक्ष्मणकेँ राजाराम द्वारा मृत्युदंड। राजाराम एहि घटनाक्रमसँ बहुत परेसान भए गेलाह। ओ परामर्श लेल वशिष्ठ मुनि लग जाइत छथि। ”राजाराम लक्ष्मणसँ फराक रहताह। आब नहि  हेतनि हुनका लोकनिक आपसी  भेंट। तकरे मृत्युदंड मानल जाएत।“-वशिष्ठ कहलखिन। तकर बाद राजाराम लक्ष्मणक त्याग कए देलनि। ”रामसँ पृथक रहि हमर जीवनक कोनो अर्थ नहि अछि।“- लक्ष्मण सोचलाह । तकर बाद ओ सरयू कातमे प्राणायाम कए अपन प्राणत्याग कए देलनि। राजारामकेँ लक्ष्मणक मृत्यु असह भए गेलनि। ओ तँ पहिनेसँ परेसान रहबे करथि। तकर बाद जे भेल से की कहू?राजाराम, भरत आ शत्रुघ्न समस्त अयोध्यावासी समेत सरयू नदीमे समाहित भए गेलाह। गाछ-बिरछी,पशु-पक्षी,सभ किछु  राजारामक अनुसरण करैत सरयूमे विलीन भए गेल। नहि रहल अयोध्यामे किछू बाँचल। राजारामक दुनू पुत्र आ भातिज सभ अपन-अपन  राजधानी अयोध्या छोड़ि अन्यत्र बनओलथि। अयोध्यामे रहि की गेल?मात्र एकटा दुखद स्मृति।” राजारामक दुखान्त जीवनमे सुखद मोड़ आएल हुनकर मृत्योपरांत। विष्णुलोकमे राम विष्णुक अवतारमे रहथि। ओतहि जानकी लक्ष्मीक रुपमे भेटलखिन-प्रफुल्लित,प्रसन्न आ सभ तरहेँ संतुष्ट। जयतु जानकी! (समाप्त) लेखक परिचयः नाम : रबीन्द्र नारायण मिश्र पिताक नाम : स्वर्गीय सूर्य नारायण मिश्र माताक नाम : स्वर्गीया दयाकाशी देवी जन्म तिथिः२ जनबरी ‍१९५४(प्रमाण पत्र) २४ अगस्त ‍१९५२(जन्मपत्र) पैतृक ग्राम : अड़ेर डीह मातृक : सिन्घिआ ड्योढ़ी वृति : भारत सरकारक उप सचिव (सेवानिवृत्त)/ स्पेशल मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, दिल्ली(सेवानिवृत्त) शिक्षा : चन्द्रधारी मिथिला महाविद्यालयसँ बी.एस-सी. भौतिक विज्ञानमे प्रतिष्ठा : दिल्ली विश्वविद्यालयसँ विधि स्नातक श्री रबीन्द्र नारायण मिश्रक प्रकाशित कृति :मैथिलीमे:- प्रकाशन वर्ष:२०१७ १. “भोरसँ साँझ धरि” (आत्म कथा), २. “प्रसंगवश” (निवंध), ३. “स्वर्ग एतहि अछि” (यात्रा प्रसंग), प्रकाशन वर्ष:२०१८ ४. “फसाद” (कथा संग्रह) ५. `नमस्तस्यै“ (उपन्यास) ६. विविध प्रसंग (निवंध ) ७.महराज(उपन्यास) ८.लजकोटर(उपन्यास) प्रकाशन वर्ष:२०१९ ९.सीमाक ओहि पार(उपन्यास)१०.समाधान(निवंध संग्रह) ११.मातृभूमि(उपन्यास) १२.स्वप्नलोक(उपन्यास) प्रकाशन वर्ष:२०२० १३.शंखनाद(उपन्यास) १४.इएह थिक जीवन(संस्मरण) १५.ढहैत देबाल(उपन्यास) १६.पाथेय(संस्मरण) प्रकाशन वर्ष:२०२१ १७.हम आबि रहल छी(उपन्यास) १८.प्रलयक परात(उपन्यास) प्रकाशन वर्ष:२०२२ १९.बीति गेल समय(उपन्यास) २०.प्रतिबिम्ब(उपन्यास)२१.बदलि रहल अछि सभकिछु(उपन्यास)22. राष्ट्र मंदिर(उपन्यास) २३. संयोग(कथा संग्रह) २४. नाचि रहल छलि वसुधा ( उपन्यास) प्रकाशन वर्षः२०२३ २५.दीप जरैत रहए(उपन्यास) २६.ठेहा परक मौलायल गाछ(उपन्यास) २७.पटाक्षेप(उपन्यास) प्रकाशन वर्षः२०२४ २८ माटि बजा रहल अछि(यात्रा प्रसंग) २९ जयतु जानकी(उपन्यास) ३० यज्ञसेनी(उपन्यास) प्रकाशन वर्षः२०२५ ३१.कथा अखन बाँकी अछि(संस्मरण) ३२. गाछ बजैत छैक(कथा संग्रह) ३३.सूर्यपुत्र(उपन्यास) प्रकाशन वर्ष ;२०२६ बिसरि जाएब जरूरी छै(कविता संग्रह)

In English: - Year of publication:2018 1. The Lost House (Collection of short stories) 2. Life is an art 3.The Ganges Whispers (English translation of my Maithili Novel,Ham Aabi Rahal Chhee (हम आबि रहल छी) हिन्दी में ” प्रकाशन वर्ष:२०१९ १.न्याय की गुहार

अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.९. संतोष कुमार राय 'बटोही'- कथा 'गैस सिलिंडर' संतोष कुमार राय 'बटोही' कथा 'गैस सिलिंडर'

आधा देह जरि गेल छै आओर आधा देह अधजरल छै। भरि आँगन मे लोक भरल छै । सभ कियो एक-दोसर सँ पूछि रहल छै-''एना कोना भऽ गेलै ?" सभ दुखि छथि । सभ कियो कनिया केँ मुँह देखवाक लेल बेचैन छथि। एँड़ी उठा-उठा कऽ सभ कियो ओसारा पर मुइल कनिया केँ देखवाक यत्न कऽ रहल छथि । "ई मोदी सरकार केर किरतानी छियैय । देश चलौल नहि होयत छन्हि तँ गद्दी पर क्याक बैसल छथि ?" , सिधपावाली बजलीह ।

"मोदी की केलकौ ,गे बहिन ई तँ ईरान आओर अमरिका केँ बीच युद्धक कारणे भऽ रहल छै।", सांगीवाली बजलीह ।

एतबे मे कनिया केँ नैहर सँ कनिया केँ भाई आओर माय आबि गेलथिन्ह । बपहारि काटि कऽ कनियाक माय कानि रहल छलथिन्ह । आँगन मे हड़बड़ी मचि गेलै। सभ कियो कनिया केँ माय के देखि रहल छलथिन्ह । कनिया माय केँ दाँति लागि गेलैन्ह।

" हे ....हे मुँह पर पानि केँ छिंटा मारियौ ।" रतन काका बजलाह । " नाक केँ दाबि दहक ।" रौदी बाजि कऽ कनिया केँ माय दिस दौड़लाह ।

कनिया केर माय ओरियानी में चीत्ते गिर गेल छलथिन्ह । सभ कियो हुनका घेरने छलैन्ह।

दामोदर बजलाह , " हे कनी विएन देल जाउ ।"

पिंकू घर सँ विएन निकालि कऽ दामोदर दिस बढ़ौलाह । विएन सँ घंघौरवाली काकी कनिया माय के मुँह पर हवा देमऽ लगलीह । नाक दबेला सँ दाँती लगलाह छुटि गेलैन्ह ।

" गे जानकी गे जानकी .....नहि बुझलियै बेदरदा सभ मिलि कऽ तोरा गैस लेल मारि देतौ ....नहि तँ केकरो सँ करजा माँगि कऽ गैस सिलिंडर किन दैतियौ । .....बाप रौ....बाप .....हमरा बेटी केँ मारि कऽ ई गाम वाला नीक नहि केलाथि । "

जानकी केँ देह कारी भऽ गेल छलैन्ह । हुनकर मुइल देह सँ पीब जँका किछु निकैल रहल छै । दस दिन दरभंगा सँ इलाज भेलैन्ह, परञ्च ओ नहि बचलीह ।

हुनकर साउस-ससुर घर-बाड़ छोड़ि कऽणगाम सँ भागि गेल छथि। घरवाला परदेश कमैत छथि । ब्याह केर तीन बरख भेल छलैन्ह । कतेक नीक रहैत छलीह । गैस सिलिंडर लेल देश मे मारा-मारि भऽ रहल छेलै । एजेंसी पर एक-दु किलोमीटर लाईन लगैत छेलै । कतेक दिन तँ गैसक नहि भेटलाक कारणे चिउरा आओर दही खाय पड़लैन्ह कतेक लोक के । एजेंसी पर दु-सँ-तीन दिन चक्कर लगौला सँ थाकि कऽ कतेत लोक गोइठा आओर जरना केँ जुगाड़ केलाथि । कतेक दिन भूखे सुतऽ पड़लैन्ह लोक के । नेना-भुटकाक भूख सँ मुँह सुखा गेल छेलैक । अंधरावाली हवोडकार मारि कऽ अपन आठ महीना केर नेना केँ कोरा मे नेने कानैत छलीह ।

अमित पीबिकऽ राति मे घर ऐलाह । दु दिन सँ एजेंसी पर दौड़ैत-दौड़ैत तबाह छेलाह, परञ्च देश मे गैस सिलिंडरक संकट केँ कारणे हुनका गैस नहि भेटलैन्ह । तेसर दिन भौजी केँ दबाब डालि कऽ कहऽ लगलथिन्ह जे नैहरा सँ एकटा गैस भरवा कऽ भाई केँ कहियौ भेज देत । देवरक ई गप सुनि कऽ जानकी केर माथा घुमि गेलै। देवरक दबाब केँ कारणे वो हारि कऽ नैहर फोन केलीह ।

"माय गै ! एकटा गप कहियौ ?" " की ? ...कह ने ।" " हमरा ऐठन गैस सैध गेल छै ।" " त ?" " त, ....त एकटा भरलाहा गैस सिलिंडर भेज दैतही ऐठाम .....।"

" बउवा गै ! ...गै....गैस तऽ अहुठाम नहि भेट रहल छै.....। दु दिन सँ घरमे सभ उपासे छै । नवीन गैस एजेंसी केर तीन दिन सँ चक्कर काटि रहल छौ, परञ्च गैस हाथ नहि लगलउ ओकरा।" " देखिइएह, ....भेट जेतौ त......।"

फोन कटि गेलै ।

अगिला दिन जानकी केर देवर नशा मे धूत भौजी सँ बजलाह, " की भेल भ...भ...उ...जी....?"

"गैस तऽ ओतौ नहि भेट रहल छै बउआ।" " की...की...कहलियै ?" " गैस ओतौ नहि भेट रहल छै ।" "धूत तेरी की.....त अहाँ कथी केँ भ...उ..जीजीजी....।"

अमित दु दिन सँ ठीक सँ खाना नहि खेने छलाह ।

गोस्सा सँ तमतमैत बाजल, " अहाँ माय-बाप सँ दहेजो मे किछु नहि लेल गेल छल । आओर एकटा गैस सिलिंडर अहाँ केँ नैहरा सँ लौल नहि भेल ?"

अमित तमतमैत किचेन घर दिस गेल। चाह बनबै लेल जे पाँच लिटर केर गैस सिलिंडर छेलै ओकरा लऽकऽ भौजी केर बेड रूम मे पहुँचल । घरक सभ कियो खेत-पथार दिस गेल छेलै। अमित भउजी केँ घरक खाम मे बैन्ह देलकै । मुँह मे कपड़ा ठुसी देलकै आओर गैस आन कऽके आगि लगा देलकै। जानकी केँ देह मे आगि लागि गेलै । काँच आमक चेरा जकाँ चरचरैत ओकर देह जरऽ लगलै । संयोग छेलै जे अमित केँ खोजैत राहुल आबि गेलैक। अमित केँ नशा मे धूत देखलक । कतौ सँ कपड़ा जरै केँ गंध आबैत देखि कऽ ओ अमित केँ दिस दौड़ैत बजलाह, " की जरि रहल छौ भाय ?"

अमित सकपका गेलै। ओ हड़बरैत बाजलाह , " नहि किछु ।"

रोहित केँ बेड रूम सँ गंध आबैत सुंइघ कऽ ओ रोहितक बेड रूम दिस दौड़लाह। केबाड़ लग जैत मातर ओ बुझि गेलाह की किछु गड़बड़ भऽ रहल छै । खिड़की सँ ओ रूम मे देखैत छथि जे भौजी खाम सँ बानहल छै आओर देह मे आगि लागल छै। राहुल चिल्ला कऽ शोर केलाथि। लोक सभ जमा भेलै । केबाड़ तोरल गेलै । ताबेतक भौजी केर देह केर ज्यादा हिस्सा जरि गेल छेलैक । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१०. विप्रकान्त मंडल- मायक बटबारा विप्रकान्त मंडल मायक बटबारा

एगो कथा खतम होएत अछि आ दोसर शुरू । एगो कथाक शुरू आ दोसर कथाक खतम भेलाक बीच जीनगीक कथा अपन टेढ़-घोंच बाट धेनै चलि रहल अछि । जेना बुझि पड़ैत अछि समयक गति मंद भऽ गेल अछि । नहि सुरूज अपन गति कम केलक आ नहि चान रूकल । नहि तारा उगबा मे देरि केलक । रिटायरमेंटक पहिने जे दिन चिड़ैक पाॅंखि पर बसि फड़फड़ाएत उड़ि जाएत छल । वैह दिन-राति आब पहार बनि गेल । दूगो बेटा अपन-अपन परिवारक संगे अलग-अलग शहर मे बैसि गेल । पाबैने-तिहार गाम आबैत अछि । तेसर बेटा गाम मे खेति-पथारि करि जीवन जी रहल अछि। गरमीक छुट्टी मे दुनू बेटा अपन अपन परिवारक संग शहर सॅं गाम आयल । माय खुश भेलि । रंग बिरंगक तिमन-तरूआ बनेलक । रातिक खैनाएक बाद परिवारक सब गोटे एकठाम भेल - मुद्दा छल बॅंटबारा । जेठका बेटाः- " बाबू हमरा सभक बॅंटबारा कऽ दिय ? " बाबू:-" तु सब आपसी सहमति सॅं सबकिछ बाॅंटि ले । " जेठका बेटा:-" ठीक अछि खेत-पथारक तीन बराबर हिस्सा।" छोटका बेटा बीच मे टोकेत:-" आ माय-बाबू केकरा हिस्सा मे? " जेठका बेटा :-" बाबू हमरा हिस्सा मे। माय के अहां दूनू मे जे राखि ? " छोटका बेटा:-" हम माय के नहि राखि सकब ।" जेठका बेटा:-" कियक?" छोटका बेटा , चुप्प निरूत्तर । सभक आंखि मझिला बेटा दिस घूमल। मुड़ि झुकबैत मझिला बेटा -" हमरो बुतै नहि होएत । " जेठका बेटाक बाबू कहलक :-" बौआ , तू दूनू गोटेक राखि ले? " जेठका बेटाः- " हमहूॅं माय के नहि राखि सकब। " तीनू बेटा चुप्पी साधि एक दोसर दिस ताकि रहल अछि । चुपचाप बगल मे बैसल माय सॅं कियो नहि पूछलक- अहाॅंक इच्छा की ? सब बेराबेरी उठि अपन-अपन कमरा दिस सुतय लेल चैल देलक । पच्चीस -तीस साल सॅं चलि रहल कथा समाप्त भेल । भोर मे मायक कमरा खाली छल । तीनो बेटाक हृदय सन । माय राति मे अपन नव कथा शुरू कऽ देलक ।

नाम:विप्रकान्त मंडल, पिता: राजदेव मंडल, पता: गाम-मुसहरनिया , पो-रतनसारा ,भाया-नरहिया , जिला-मधुबनी(बिहार) , पिनकोड -847108

अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.११. अमरेश ठाकुर- मैथिली साहित्यमे उपन्यासक महत्व अमरेश ठाकुर मैथिली साहित्यमे उपन्यासक महत्व साहित्य की अछि? विद्वान लोकनिक मत छनि जे ओ सबटा बौद्धिक गतिविधि जे लेखनी द्वारा व्यक्त होइत अछि आ अपन पूर्ण विस्तारक संग राष्ट्रीय साहित्यमे समाविष्ट होइत अछि। मुदा किछु विद्वान लोकनिक मत छनि जे साहित्य एकटा कलात्मक साहित्यिक कृतिक समुच्चय अछि जे मुक्त प्रेरणा से कएल गेल प्रयासक देन होइत अछि- आओर एकटा एहन प्रयासक देन होइत अछि जे कलाक लेल जन्म लैत छथि आओर कलाक लेल जीवैत छथि हुनक सुन्दर कृतिमे अन्तरमनक गहराई, स्वभाविक अभिव्यक्ति, प्रकृत आ क्रमबद्ध नियोजन होइत अछि। “साहित्यकें सामान्यतः समाजक दर्पण कहल जाइत अछि। कारण साहित्यमे समाजक चिन्तन-मनन, क्रिया-कलाप, आशा-अभिलाषा, खान-पान, भेष-भूषा, विधि-व्यवहार आचार-विचार, व्यंग्य विद्रूप ओ सभ्यता-संस्कृति आदिक अभिव्यंजना कएल रहैत अछि वा प्रतिविम्बित होइत अछि । साहित्य समाजक यथावत रुप स्वरुपायित करैत एकर विसंगति, विद्रूप अभव्यक परिस्कारक मार्ग-दर्शन करैत अछि। समाजक अवाँछनिय स्थिति-मन स्थिति पर प्रहार करैत साहित्य एकर संशोधन संवर्द्धनक लेल समाजकें प्रेरित करैत अछि, सक्रिय करैत अछि ओ तँ हम साहित्यकें दर्पण सँ विशिष्ट मानैत छी, प्रभावोत्पादक मानैत छी, मुदा साहित्यक ई रुप स्मपूर्णतः स्वरुपायित होइत अछि वस्तुतः उपन्यासहि मे । साहित्य वैयक्तित्वक दुश्चिन्तन, समाजिक विसंगति ओ मानवीय दुर्बलताक उद्घाटन कए अपन विशिष्ट शैली सँ ओही पर प्रहार करैत सुधारक मार्गदर्शनक सर्वाधिक अवसर सुनियोजित करैत अछि।1 भारतीय साहित्यकार ओ आलोचक, लोकनिक दृष्टिमे उपन्यास साहित्यक एकटा महत्वपूर्ण अंग थीक । उपन्यास विद्याक बिना साहित्य अपूर्ण मानल जाइत । उपन्यास आओर महाकाव्यक बीच तुलना करैत विद्वान लोकनिक मत छनि जे उपन्यास आधुनिक समाजक उपज आदि मुद्रा महाकाव्य प्राचीन समाजक । उपन्यास बुर्जुआ साहित्यक श्रेष्ठतम रचना अघ्छि- जे साहित्य कलाक एकटा नव मुदा महत्वपूर्ण अंग अछि। महाकाव्य द्वारा समाजक पूर्ण अभिव्यक्ति होइत अछि मुदा उपन्यासक विषय होइत अछि व्यक्ति जे समाजक विरुद्ध, प्रकृतिक विरुद्ध व्यक्तिक संघर्षक महाकाव्य होइत अछि आओर वो ओहि समाजमे विकसित होइत अछि जाहिमे व्यक्ति आ समाजक बीचमे संतुलन नष्ट भऽ जाइत अछि आ व्यक्तिके अपन सहजीवी साथी वा प्रकृतिक बीच युद्ध ठनल होए। ”उपन्यास विश्वक कल्पना-प्रसूत सभ्यता-संस्कृतिक एकटा सबसँ महत्वपूर्ण देन अछि। विश्वकें महान उपन्यास- डॉन क्चिगजोट, गारगनतुआ आओर पान्तागुएल रौबिन्सन कुसो, जोनाथन वाइल्ड, जाक्चे ला फेटैलिस्त, ला रुज ए ला न्यावर, युद्ध और शांति, ला एजुकेशन सेन्टिमेटल, वुदरिंग हाइट्स, दी वे ऑफ फ्लैश- एहि कारणें महान अछि कियाक ओहिमे चिन्तनक गुण निहित अछि एवं जीवनक अत्यंत भावपूर्ण वा प्रेरणापूर्ण घटनाक्रमकें कलात्मक अभिव्यंजना कएल गेल अछि।2 पाश्चात्य विद्वान लोकनि ओ भारतीय विद्वान लोकनिक मान्यताक तुलनात्मक विवेचन कयलाक उपरांत एतबा बात स्पष्ट रुपें देखबामे आओत जे उपन्यास एकटा एहन नवीन ओ सशक्त विद्या अछि जाहि मध्य कथानकक-सघटना, चरित्र-निर्माण देश-काल सयोजन, अभिव्यक्ति भंगिमा अथवा भाषा-शैली, उद्देश्य वो वातावरणक शिल्पगत सयोजन कएल जाइत अछि जाहिमे मनोरंजकता ओ कलात्मक सौंदर्य होएब आवश्यक होएत अछि। उपन्यास साहित्यक एक गोट नवीन विद्या थीक जाहिमे कल्पनाक आधार पर मानव, जीवनक यथावत चित्रण कथानकक रुपमे रहैत अछि। कथानक तें एकर मुख्य अंग भेल किन्तु घटनाक संग-संग चरित्र वो वातावरणक सृष्टी सेहो ओहीमे आवश्यक होएत अछि। “कलाक दृष्टीसँ उपन्यासक उपादान कथानक, चरित्र वातावरण, कथोपकथन, भाषा-शैली, लेखकक अपन दृष्टिकोण प्रभृति सबहुँ स्वीकार करैत अछि। मैथिलीमे उपन्यास नव वस्तु थीक । वस्तुतः उपन्यास साहित्य पश्चिमसँ आएल अछि ओ एकर विकास भारतीय भाषा सभमे पश्चिमहिक प्रभावसँ भेल अछि ।3 भारतीय साहित्यमे आरंभमे बंगला भाषाक माध्यमसँ उपन्यासक अभिव्यक्ति भेल आ धीरे-धीरे सभ भाषामे एकर रचना होमए लागल। मिथिलाक सुशिक्षित साहित्यकार पाश्चात्य साहित्यक उपन्यासक परम्परामे लिखल बंगला उपन्यासक अनुकरण कए मैथिलीमे उपन्यास रचनाक प्रारम्भ कएलनि । मैथिली साहित्यमे उपन्यासक बहुत महत्व छैक किएक जखन एकबेर उपन्यासक रचना प्रारम्भ भेल ओ निरंतर नव-नव विषय-वस्तु समाजिक समस्या आ नव विचारधाराक संग चलैत आबि रहल अछि। मैथिलीक उपन्यासकार लोकनिमे पं. जर्नादन झा ”जनसीदन“ पं. रास बिहारी लाल दास, पं. पुण्यानन्द झा, पं. काञ्चीनाथ झा ”किरण“ बाबू लक्ष्मीपति सिंह ओ पं. ब्रजनन्दन आदि । ई लोकनि समाज-सुधार ओ मनोरंजक उद्देश्य से उपन्यासक रचना कएल। एहि सब उपन्यासक कथा रोमांटिक अछि जकर विकास संयोग आश्रित अछि। ”पाश्चात्य भाषा साहित्यक प्रत्यक्ष प्रभावमे पर मैथिलीक सर्वप्रथम उपन्यास लिखलनि अंग्रेजी शिक्षासँ दिक्षित प्रो. हरिमोहन झा। प्रो. हरिमोहन झाक ई उपन्यास थीक “कन्यादान”। “कन्यादान” क लोकप्रियता ओ प्रभावकें देखैत एकरा एकटा करिश्मा कहल गेल। एहि उपन्यासमे हास्य-व्यंग्यक आश्रय लए मैथिल समाजक बहुविध दोषक उद्घाटन कए ओकर सुधारक मार्गदर्शन कएल गेल अछि । एहिमे एकहि संग मिथिलामे स्त्री शिक्षाक अभावक कुपरिणाम अंग्रेजी शिक्षाक कुपरिणाम ओ अनमेल विवाहक कुपरिणामक विस्तारसँ वर्णन भेल अछि । “कन्यादानमे” मैथिल समाजक विसंगति ओ विकृतिक, समाजक व्यक्तित्व, पारिवारीक ओ समाजिक दोषक उद्घाटन कएल गेल अछि। प्रो. हरिमोहन झा मैथिल समाजके एहि समस्याक समाधान देखाओल अछि “द्विरागमनमे” जे वस्तुतः “कन्यादान क” दोसर भाग थिक । स्पष्ट अछि जे प्रो. झा ई कथा कहि मैथिल समाजमे स्त्री-शिक्षाक मार्गदर्शन कएल “कन्यादान” क लोकप्रियता सँ उत्साहित, प्रभावित ओ प्रेरित भए मैथिलीक साहित्यकार लोकनि नव-नव कथा लए नव-नव शिल्प-शैलीमे उपन्यासक रचना करए लगलाह।4 मैथिली उपन्यासक विकासक्रममे प्रो. हरिमोहन झाक पश्चात 1960 ई. धरिक अवधिमे सफल उपन्यास-रचयिताक रुपमे प्रमुख मानल जाइत छथि पं. योगानन्द झा, पं. वैद्यनाथ मिश्र “यात्री”, पं. उपेन्द्रनाथ झा “व्यास”, पं. मणीन्द्र नारायण चौधरी “राजकमल” डॉ. शैलेन्द्र मोहन झा, पं. चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” ओ प्रो. मायानन्द मिश्र। पं. योगानन्द झाक उपन्यास “भलमानुषमे” मिथिलाक कुलीन प्रथाक वैवाहिक दोषक उद्घाटन कएल गेल अछि। पं. वैद्यनाथ मिश्र “यात्री”, क “पारो” उपन्यासमे प्रेम ओ कोमल भावनाक चित्रांकन कएल गेल अछि। प्रो. मायानन्द मिश्रक उपन्यास “बिहाड़ी पात आ पाथर” अवस्थाजन्य अनमेल विवाहक समस्या आ नायिकाक दलित वासनाक, उष्णताक स्वभाविक चित्रांकन कएल गेल अछि। पं. उपेन्द्रनाथ झाक उपन्यास दू-पत्र जे साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत भेल। ई पत्रात्मक शैलीक उपन्यास थिक। एहि उपन्यासमे भारतीय वो पाश्चात्य नारी-समाजक मनस्थिति ओ आदर्शक चित्रांकन क संगहि दूहू देशक संस्कृतिक तुलनात्मक वर्णन सेहो कएल गेल अछि। प्रो. मायानन्द मिश्रक तेसर उपन्यास “मन्त्रपुत्र” जे 1988 ई मे साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत कएल गेल ओहीमे वैदिक युगक आर्य-अनार्यक समन्वयसँ परिवर्तित होइत समाजक संस्कृति चित्रांकन कएल गेल अछि। 1973 ई मे साहित्य अकादमी सँ पुरस्कृत ब्रजकिशोर वर्मा “मणिपदम” द्वारा रचित उपन्यास “नैका बनिजारा” लोकतत्व पर आधारित अछि । एहि मध्य तीन कथाक गुम्फन कएल गेल अछि हिमालय अंचलक कनकमंजरी, सागरक निजारा रत्नसेन आ महाभिक्षु देवपद्म कथा। 1976 ई. मे मैथिली अकादमीक स्थापनासँ मैथिली प्रकाशन तीव्रसँ तीव्रतर भेल। मैथिली अकादमीसँ मैथिली उपन्यासहुक प्रकाशन प्रारंभ भेल। 1960 ई. सँ एही रुपें प्रकाशित उपन्यासकार लोकनिक लोकप्रिय उपन्यास सभ थिक पं. सुधांश शेखर चौधरीक “तर पट्टा ऊपर पट्टा” “ई बतहा संसार” “दरिद्रछिम्मरि” “निवेदिता”। धीरेश्वर झा “धीरेन्द्रक ”भोरुकबा“ ”कादो आ कोयला“। पं. ललितेश मिश्र ”ललित“ क ”पृथ्वीपुत्र“ पं. जीवकान्त जीक ”पानीपत“ ”दू कुहेशक बाट“ पं. ब्रजकिशोर वर्मा ”मणिपद्म“क विद्यापति, अनलपथ, अर्द्धनारीश्वर, क्रोब्रागर्ल, लोरिक विजय, राजा सलहेश आदि। श्री प्रभास कुमार चौधरीक युगपुरुष, अभिशप्त, हमरा लग रहब?, नवारम्भ, राजा पोखरिमे कतेक मछरी, पं. मार्कण्डे प्रवासीक ”अभियान“ श्री मति लीलीरेक ”पटाक्षेप, मरीचिका, पं. विभूति आन्नदक “पराजित” “गाम सुनगै” श्री मति उषा किरण खाँक “अनूत्तरित प्रश्न” “दूर्वाक्षत” पं. गोविन्द्र झाक “विद्यापतिक आत्मकथा” ओ मदनेश्वर मिश्रक “एक छलीह महारानी” आदि। 1960 ई. पश्चातक प्रतिनिधि उपन्यासकार ख्याति प्राप्त कएल अछि डॉ. मायानन्द मिश्र, पं. सुधांसु शेखर चौधरी, डॉ. धीरेश्वर झा “धीरेन्द्र”, पं. ललितेश मिश्र “ललित”, पं. रामानन्द रेणु, पं. जीवकान्त, पं. प्रभाष कुमार चौधरी, डॉ. गंगेश्वर झा “गंगेश गुजन” आ श्रीमति लिली रे कारण ई लोकनि अंत होइत मध्यकालिन व्यवस्थाक पृष्ठभूमिमे आगत आधुनिक युगीन नवभावना, नवचेतना, नवजागरण, नव समस्या ओ तकर समाधानक नवतरीकाक सूक्ष्मतासँ परिदर्शन कएल अछि। नव-नव विषयक अभिव्यक्तिक लेल नव-नव शैलीक प्रयोग कएल अछि ओ समाजक नव-नव चरित्रक उद्घाटन कएल अछि।5 1980 ई0 मे साहित्य अकादमीसँ पुरस्कृत “ई बतहा संसार” मैथिली उपन्यासकें एक नव नूतन विषयसँ साक्षात्कार कराओल अछि। धीरेन्द्र जीक “भोरुकबा” ग्राम्य जीवनक परिवर्तित होइत परिवेशक कथा कहैत अछि। ललित जीक “पृथ्वीपुत्रमे” शोषित वर्गक चित्रण कएल एल गेल अछि। जीवकान्तजीक “दू कुहेसक बाटमे” संकोची, भावुक, कल्पनाशील, स्वाभिमानी ओ अर्न्तमुखी निर्धन नवयुवकक द्वन्दक संघर्षक चित्रांकन कएल अछि। प्रभाष कुमार चौधरी क “युगपुरुष” आ “अभिशप्त” उपन्यासमे समन्वयात्मक दृष्टिसँ एहि दुहू उपन्यासमे वर्तमान युगक समाजिक जीवनक दिशाहीनता, खण्डित, विश्वास, विषाद, अनास्था, असंतोष ओ नैतिकताक हास आदिक चित्रांकन कएल गेल अछि। गंगेश गुंजन जीक उपन्यास “पहिल लोकमे” विसंगति ओ असन्तुलन स अक्रान्त समाजक शिक्षित नवयुवकक अवसाद वो कुण्ठासँ उत्पीड़ित, विवश, हारल-थाकल ओ निष्क्रिय बनल मनस्थितिक कथा कहल गेल अछि। श्रीमती लिली रेक 1982 ई0 मे साहित्य अकादमी सँ पुरस्कृत उपन्यास “मरीचिका” दू खण्डमे प्रकाशित अछि। दूनू खण्ड मिलाए हजार पृष्ठक एहि उपन्यासमे सरलता, सहजता ओ रोचकता सर्वदा बनल रहल अछि। 1990 ई क पश्चात उपन्यास लेखन एवं प्रकाशनक गति अत्यंत मंधर भए गेल। धूमकेतुक उपन्यास “मोड़ पर” विषय वस्तु अछि स्वतंत्रता प्राप्तिसँ पूर्वापरक समाजिक चित्र । एकैसम शताब्दीक दू दशकक अंतरालमे आशाक किरण पुनः जागि रहल अछि । एहि अवधिक सर्वाधिक दीर्घकार्य उपन्यास थिक “हरि इच्छा गरीयसी” एही उपन्यासये इतिहास, भूगोल, राजनीति, ज्योतिष, दर्शन नीति इत्यादिक स्पष्ट आ सजीव चित्रण भेल अछि । 2010 ई0 साहित्य अकादमीसँ पुरस्कृत डॉ. उषाकिरण खाँ रचित उपन्यास “भामती” मिथिलाक पूर्व मध्यकालीन आ मध्यकालीन इतिहासक युग ओही समयक समाजिक परिस्थिति आ स्त्री दशा-दिशा ओ स्त्रीक शिक्षा व्यवस्थाकें उजागर करैत अछि। 2014 ई0 मे आशा मिश्रक “उचाट” के साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत कएल गेल। एही उपन्यासक आधार अछि टू गोट अर्न्तमनक ग्रन्थिक एक उचाटक कारण तँ दोसर परिणाम । मैथिली उपन्यासक उद्भव, विकास ओ अद्यतन स्थितिक निष्कर्षस्वरुप कहि सकैत छी जे दीर्घ कथाक रुपमे प्रादुर्भूत मैथिली उपन्यास अंग्रेजी भाषा साहित्यक प्रभावमे औपन्यासिक रुपमे स्वरुपायित भेल । मुदा 1960 ई धरि अपवाद-स्वरुप एक आधकं छोड़ि सकल उपन्यास मैथिल समाजक अनमेल विवाहक समस्या रचित होइत रहल। मिथिला मिहिर क प्रकाशन ओ मैथिली अकादमीक स्थापना मैथिली उपन्यासक रचना ओ प्रकाशनक गतिकें तीव्रतम कए देलक, फलस्वरूप 1960 ई0 सँ 1987 ई. क अवधिमे प्रायः शतावधि उपन्यास प्रकाशित भेल। विषय वैविध्यहुक दृष्टीसँ ई अवधि मैथिली उपन्यासक लेल महत्वपूर्ण कहल जाए सकैत अछि। एहि अवधिक उपन्यासमे प्रायः समस्त समाजिक समस्या ओ सम्पूर्ण वैयक्तिवक मनोदशाक कथा कहल गेल अछि। “उपन्यास साहित्यक सर्वोत्कृष्ट निधि थीक । समाजक हृदयमे आदर्श सदविचार एवं सदाचारकं दृढ़तापूर्वक स्थापित करबाक श्रेय मधुर उपन्यास विद्यार्के देल जा सकैत अछि जे सरल, रोचक एवं मधुर-शैलीमे पात्रक चरित्र-चित्रणकें दर्पण जकाँ समाजक समक्ष आनैत अछि जाहि मध्य कथानकक-सघटना, चरित्र निर्माण, देश-काल संयोजन, अभिव्यक्ति भंगिमा अथवा भाषा शैली, उद्देश्य वो वातावरण शिल्पगत रुपसँ संयोजन कएल रहैत अछि ।6 सन्दर्भ : 1) मिश्र, विश्वेश्वर 1996, मैथिली गद्य साहित्य, मैथिली विभाग, पटना विश्वविद्यालय पृ.- 86 2) फॉक्स, रेल्फ 1980, उपन्यास और लोकजीवन, पब्लिसिंग हाउस, नई दिल्ली 3) पाठक, अमरेश 2007, मैथिली उपन्यासक आलोचनात्मक अध्ययन, आलोक प्रकाशन, पटना, भूमिका 4) मिश्र, विश्वेश्वर 1996 मैथिली गद्य साहित्य मैथिली विभाग, पटना विश्वविद्यालय पृ.- 87 5) मिश्र, विश्वेश्वर 1996, मैथिली गध साहित्य मैथिली विभाग, पटना विश्वविद्यालय पृ.- 90 6) झा, किशोर कुमार 1996, मैथिली गद्य साहित्य, मैथिली विभाग, पटना विश्वविद्यालय पृ.- 164 -अमरेश ठाकुर, शोधार्थी, विश्वविद्यालय मैथिली विभाग, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, कामेश्वरनगर, दरभंगा अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१२. गजेन्द्र ठाकुर- दीयरि: एक समग्र साहित्यिक मूल्यांकन [रा. ना. सुधाकरक मैथिली कथा-संग्रहक बहुआयामी समीक्षा] गजेन्द्र ठाकुर दीयरि: एक समग्र साहित्यिक मूल्यांकन रा. ना. सुधाकरक मैथिली कथा-संग्रहक बहुआयामी समीक्षा प्रारम्भिक टिप्पणी: पोथीक स्वरूप आ महत्त्व रामनारायण सुधाकर (रा. ना. सुधाकर) लिखित "दीयरि" (मैथिली कथा-संग्रह) नेपालक विराटनगर केन्द्रित मैथिली साहित्यक एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज अछि। प्रकाशकीयमे उल्लिखित अछि जे लेखक लगभग साठि वर्षसँ लिखैत आबि रहल छथि, मुदा प्रकाशन आ प्रचार-प्रसारक अभावमे साहित्य जगतसँ ओझरायल रहलाह। ई संग्रह नेपाल विद्यापीठ मैथिली पाण्डुलिपि पुरस्कार-२०६५ सँ सम्मानित अछि। पोथीमे कुल बाइसटा कथा संकलित अछि। भाग एक: संग्रहक संरचनात्मक विश्लेषण १.१ संग्रहक भौगोलिक-सांस्कृतिक आधारभूमि सुधाकरजीक कथा-विश्व मुख्यतः तीन भौगोलिक क्षेत्रमे केन्द्रित अछि: क) बॉर्डर एरिया (जोगबनी-विराटनगर सीमा क्षेत्र): "संधि", "खुट्टी पर टाँगल ब्रा", "चान असोथकित अछि" सन कथामे ई सीमान्त क्षेत्रक जटिल सामाजिक-आर्थिक परिवेश प्रस्तुत भेल अछि। लेखक स्वयं एहि "बॉर्डर एरिया"मे रहैत साहित्य-साधना कयलनि, से कथाक प्रामाणिकतामे झलकैत अछि। ख) ग्रामीण मिथिला: "प्रदक्षिणा", "झखड़ल फूलक गाछ", "सुनगैत करेज", "थकुचल मासुक बुट्टी" आदि कथामे मैथिल ग्रामीण जीवनक विस्तृत चित्रण भेटैत अछि - पोखरि, ईनार, तुलसी चौरा, माटिक गंध, सरसोक फूल - ई सभ स्मृतिचित्र एकटा विस्थापित आत्माक नोस्टाल्जियाक अभिव्यक्ति थिक। ग) शहरी परिवेश (विराटनगर): "दीयरि", "घरमुँहा", "चिल्होड़ि उड़ि रहल अछि", "नुक्का चोरी", "कर्जखोर" - ऐ कथा सभमे औद्योगिक-शहरी जीवनक संघर्ष, आर्थिक दबाव, आ पारिवारिक विघटन केन्द्रमे अछि। १.२ कालक्रम आ रचनाकाल संग्रहक कथा सभक रचनाकाल व्यापक अछि: १९७६-७७ ई.। ई कालविस्तार (१९७६-२०२०, अर्थात् ४४ वर्ष) बतबैत अछि जे सुधाकरजीक लेखन-यात्रा कतेक दीर्घ आ निरन्तर रहल अछि। एकटा कथाकारक विकास-यात्रा एहि संग्रहमे दृष्टव्य अछि। भाग दू: कथा सभक विस्तृत समीक्षा २.१ "प्रदक्षिणा"- स्मृति, विस्थापन आ गामक मृत्यु कथासूत्र: बाहर बारह वर्ष रहि गाम आयल एक पुरुष (बचनू) गामक पूर्णतः बदललाह स्वरूप देखि आघात पबैत अछि। गामक लोक अनचिन्हार भ' गेल, मित्र बिसरि गेल, पोखरि सूखि गेल, भालसरी गाछ उखड़ि गेल। विस्तृत विश्लेषण: एहि कथामे Thomas Hardyक "The Return of the Native" सन भावभूमि अछि - घुरल व्यक्ति आ बदललाह परिवेशक बीचक टकराव। मुदा सुधाकरजीक दृष्टि अधिक मार्मिक अछि। बचनू जे गाम छोड़लक से अर्थनैतिक विवशतासँ, आ जखन घूमि आयल तखन गामक आत्मा मरि गेल छल। कथाक सर्वाधिक मार्मिक अंश - बचनूकेँ बुझेलै जेना ओकर गाम कतौ छुटि गेलै... ओकर मित्र कतौ भुतिया गेलै... आ भालसरीक फूल कतौ छिरिया गेलैए... आ स्वयं कोनो बियावानमे शनि गाछक टकुआ तान काँट जकाँ ठमकि गेल अछि। पौराणिक स्तर: कथामे प्रदक्षिणाक प्रतीक महत्त्वपूर्ण अछि। हिन्दू परम्परामे गाम वा मन्दिरक प्रदक्षिणा मांगलिक होइत अछि, मुदा एहि कथामे बचनूक गामक प्रदक्षिणा एक शोकयात्रा बनि जाइत अछि- ओ अपन अतीतक प्रदक्षिणा करैत अछि जे आब अस्तित्वमे नहि रहल। भारतीय साहित्यशास्त्रक दृष्टिसँ: करुण रस प्रधान एहि कथामे विप्रलम्भ श्रृंगार (बिछड़नक वेदना) सेहो अन्तर्धारा बनि प्रवाहित होइत अछि- बचनू आ ओकर बाल्यकालक मित्रमण्डलीक वियोग। २.२ "दीयरि" - पारिवारिक दबावक बीच स्त्री-अस्मिता कथासूत्र: एक मध्यवर्गीय परिवारमे बुढ़ा ससुर, पत्नी सुशीला (जे बीमार अछि), आ पतिक (कथाक प्रथम पुरुष वाचक) बीचक जटिल सम्बन्ध। बुढ़ा ससुर आर्थिक स्वच्छन्दता चाहैत छथि, सुशीला पीड़ामे जीबि रहली छथि, आ पति दुनू दिशाक दबावमे पिसाइत अछि। विस्तृत विश्लेषण: शीर्षक "दीयरि" (सागरमे दुनू दिशाक जल-प्रवाहसँ घेरायल रहैत अछि) एक सटीक रूपक अछि - पति दुनू दिशासँ आबैत दबावक बीचमे दीयरि जकाँ स्थित अछि। कथाक सर्वाधिक मार्मिक अंश: लालटेन भकभका रहल अछि, एक कात सुशीलाक आकांक्षाक महल, एम्हर बुढ़ाक वात्सल्यक टिम-टिमाइत दीप। ओही महलमे ओ दीप जरत? ने ओ महल बूढ़ाकेँ सोहाइत छनि आ ने ओहि दीपकेँ सुशीला पोसय चाहैत छथि। मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि: Sigmund Freud क Oedipus Complex क परिप्रेक्ष्यमे देखल जाय तँ सुशीलाक ससुरसँ मनोवैज्ञानिक द्वन्द्व एक सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक परत बनबैत अछि। मुदा सुधाकरजी एहि स्थितिकेँ कोनो रहस्यमय वा सनसनीखेज ढंगसँ नहि प्रस्तुत करैत छथि- वरन् सामान्य पारिवारिक जटिलताक रूपमे देखबैत छथि। स्त्री-विमर्श: सुशीला एहि कथाक केन्द्रीय शक्ति अछि, मुदा ओ मौन शक्ति अछि। ओकर रोग, ओकर निरुपाय स्थिति, आ पतिक असहायता - ई त्रिकोण एहि कथाकेँ स्त्री-यातनाक एक प्रामाणिक दस्तावेज बनबैत अछि। २.३ "चोलिया मे चोर बसे गोरी" - ग्रामीण यौवन आ देह-भाषा कथासूत्र: दू युवती (समतोलिया आ विलटा) घास काटैत-काटैत अपन प्रेम, ईर्ष्या, आकर्षण आ यौवनक उत्साहमे डुमल अछि। विस्तृत विश्लेषण: मार्च १९८४मे "माटि-पानि" पत्रिकामे प्रकाशित एहि कथामे एकटा मुक्त कथानक अछि, जे बाशी नहि अछि। ई कथा D.H. Lawrence क ग्रामीण यौवन-चित्रण सन मुक्त आ प्रकृतिसँ जुड़ल अछि। कथाक सौन्दर्य एहि पंक्तिमे- एक कात दूर धरि सरिसवक पीअर फूल सँ बाध गमकै छलै... दोसर दिस पाँच-पाँच हाथक पोरगर कुसियार रस सँ मातल-मदहोस भेल झुकि-झुकि कऽ बौरा रहल छलैक.. प्रकृति मात्र पृष्ठभूमि नहि, अपितु पात्रकेँ प्रभावित करएवाली शक्ति अछि- प्रकृतिक उर्वरता आ यौवनक उर्वरता एकात्म भ' जाइत अछि। लोक-साहित्यक सन्दर्भ: कथा शीर्षक स्वयं एक लोकगीतक पंक्ति थिक। सुधाकरजी लोक-परम्पराकेँ आधुनिक कथामे सहजतासँ बुनैत छथि। नारीवादी दृष्टि: विलटा आ समतोलियाक सम्बन्ध एक सशक्त female bonding (स्त्री-मैत्री) देखबैत अछि- जे पुरुष-केन्द्रित साहित्यमे प्रायः उपेक्षित रहैत अछि। २.४ "खुट्टी पर टाँगल ब्रा"- बाजारवाद आ स्त्री-देह कथासूत्र: बुचिया दोकानमे जाइत अछि। गंगबा (दोकानदार) विभिन्न वस्तु देखबैत-देखबैत अन्ततः एक ब्रा (ब्रसियर) बुचियाकेँ दैत अछि। बुचियाक मनोद्वन्द्व- ओकर आर्थिक विवशता आ शारीरिक आवश्यकता- कथाक केन्द्रमे अछि। विस्तृत विश्लेषण: अक्टूबर १९८४मे रचित ई कथा अपन रचनाकालक अत्यन्त साहसी कृति थिक। एहि विषयपर मैथिली साहित्यमे कोनो अन्य लेखक ओइ कालमे नहि लिखलनि। बाजारवादक आलोचना: बाजारक आलोचना एहि कथामे दर्शाओल गेल अछि। गंगबाक चरित्र बाजारवादक प्रतीक अछि- ओ स्त्री-देहकेँ व्यावसायिक दृष्टिसँ देखैत अछि। Marxist दृष्टिकोण: स्त्री-शरीरक commodification (वस्तुकरण) एहि कथाक केन्द्रीय थीम थिक। बुचियाक आर्थिक विवशता ओकरा गंगबाक जालमे फँसबैत अछि। वर्गीय शोषण आ लैंगिक शोषण एक संग काज करैत अछि। Foucault: Michel Foucault कहने छलाह जे "power operates on the body" - एहि कथामे गंगबाक नजरि, ओकर "व्यावसायिक मुस्की", आ अन्ततः खूँटीपर लटकल ब्रा- ई सभ शक्ति-सम्बन्धक दृश्यमान अभिव्यक्ति थिक। कथाक अन्तिम पंक्ति - .. ओकर नजरि ओइ टाँगल ब्रेसियरपर ठमकि जाइत छै। ओकरा लगैत छै जे भीतरक बकुटलहा... ब्रेसियरक दुनु धोकरी मे भरि कऽ ओ अपने हाथे लटका देने अछि.. - ई पंक्ति स्त्रीक निःसहाय अवस्था आ बाजारक निर्मम चरित्रकेँ व्यक्त करैत अछि। २.५ "चान असोथकित अछि" - वृद्धावस्था, काम-भावना आ सामाजिक पाखण्ड कथासूत्र: सुशील बाबू वृद्ध छथि, हाफी लगैत छनि, मुदा माया (ओकर देखभाल करनिहारि) ओकरा उत्तेजित करैत रहैत अछि। माया स्वयं यौन-असन्तोषसँ पीड़ित अछि- मनटूनमा (ओकर पति) नपुंसक प्राय अछि। सुशील बाबू अन्ततः मनटूनमाकेँ एक नव "सुतनाहर" (चौकीदार) राखि दैत छथि। विस्तृत विश्लेषण: ई कथा अत्यन्त जटिल मनोवैज्ञानिक भूमिमे स्थित अछि। "चान असोथकित अछि"- चन्द्रमा अशान्त/थाकल अछि- ई शीर्षक स्वयं एक कामुक व्यंजना थिक। Simone de Beauvoir: माया एक अर्थमे de Beauviorक "second sex"क प्रतिनिधि थिक- ओ अपन शारीरिक आवश्यकताक लेल पुरुष-केन्द्रित व्यवस्थापर निर्भर अछि। ओकर उत्सुकता, ओकर छटपटाहटि- ई मानवीय अभिव्यक्ति थिक जे समाज दमित करैत अछि। वृद्धावस्था आ काम-भावना: साहित्यमे प्रायः वृद्धजनक काम-भावनाकेँ हास्यास्पद वा निन्दनीय चित्रित कएल जाइत अछि। सुधाकरजी एहि विषयकेँ करुणा आ सहानुभूतिसँ देखैत छथि- सुशील बाबूक "हाफी" मात्र शारीरिक लक्षण नहि, अपितु वृद्धावस्थाक एक त्रासद अनुभव अछि। नैतिक जटिलता: कथाक नैतिक ढाँचा सरल नहि अछि।   मायाक आत्मत्याग आ.. दुनूकेँ कथाकार सुधाकर सहानुभूतिसँ देखैत छथि- निन्दाक दृष्टिसँ नहि। २.६ "झखड़ल फूलक गाछ"- बहुविवाह आ स्त्री-वेदना कथासूत्र: जीवछा, खनजनियाँ आ फुलिया। जीवछाक सतमाय खनजनियाँ संगे अवैध सम्बन्ध राखैत अछि। दुनू स्त्री बीचक द्वन्द्व आ जीवछाक नैतिक पतन उद्घाटित होइत अछि। विस्तृत विश्लेषण: ई कथा १४.११.७६ मे रचित- रचनाकालक हिसाबसँ सुधाकरजीक प्रारम्भिक रचनामे सँ एकटा, मुदा विषयक साहस अतुलनीय। खनजनियाँक चरित्र: खनजनिया कथाकेँ शक्ति दैत अछि। ओ कहैत अछि - "हमरा जीवछासँ दूर नहि करै... कोनो कोनमे हम पड़ल रहब।" ई पंक्ति एक स्त्रीक निरुपाय स्थिति उजागर करैत अछि- किएकि आर्थिक, सामाजिक आ मनोवैज्ञानिक निर्भरता ओकरा बान्हि कऽ राखने अछि। बूढ़ी खनजनियाँक प्रतीकार्थ: बूढ़ी खनजनियाँ (जीवछाक सतमाय)- झखड़ल फूलक गाछ जकाँ फुलिया बड़ा बेदर्दीसँ उखाड़ि कऽ आँगनमे फेक देलकैए। शीर्षकक सार्थकता: "झखड़ल फूलक गाछ" वार्धक्य आ परित्यागक एक सुन्दर रूपक थिक। २.७ "घरमुँहा"- शहरी एकाकीपन आ पारिवारिक विघटन कथासूत्र: कथावाचक (पति) आ ओकर पत्नी विराटनगरक एक छोट कोठलीमे रहैत छथि। संघर्ष, आर्थिक विपन्नता, पत्नीक बीमारी, आ एहि सभक बीच पतिक मनोयन्त्रणा। विस्तृत विश्लेषण: एहिमे एकटा परिवारक सम्पूर्ण जीवन-संघर्ष मात्र कनिया बिम्बसभमे देखाओल गेल अछि। चूल्हिक बिम्ब: कोठरीमे चूल्हिपर राखल भात-दालिक हंडी“ लोहियामे झाँपल आलू-अरिकोंचक तरकारी”  बेंचपर राखल थारी-कटोरी“ ई सभ वस्तुसूची मात्र विवरण नहि, ई एक जीवन-संघर्षक दृश्यमान चिह्न थिक। पहचान-संकट: कथावाचक ने शहरी जीवन बुझि-गमि-रमि सकला ने अपन ग्रामीण माटिक सुगन्ध बिसरि सकला... ने ओइ माटिक लसफसी सँ उबरि सकला। ई विराटनगरमे बसल मैथिलजनक सार्वभौमिक अनुभव थिक। २.८ "उपहार" - यशोधरा-प्रतीकमे आधुनिक स्त्री-यातना कथासूत्र: यशोधराक पति गौतम घरसँ भागि गेल छलनि- आआरोप-प्रत्यारोप, परिवारक अपेक्षा, आ ओकर एकाकीपन चित्रित अछि। विस्तृत विश्लेषण: मिथकीय सन्दर्भ: सुधाकरजी यशोधरा आ गौतम-बुद्धक मिथककेँ आधुनिक सन्दर्भमे पुनर्व्याख्यायित करैत छथि। गौतम (आधुनिक पुरुष) अपन आदर्शक पाछाँ भागि जाइत अछि, आ पाछू छोड़ि जाइत अछि यशोधराकेँ- अपन राहुलकेँ। विडम्बना: कथाक अन्तमे यशोधरा राहुल (बच्चा) केँ कोरामे उठबैत अछि- "गौतमक प्रथम आ अन्तिम उपहार।" ई पंक्ति एकटा व्यंग्य थिक - पुरुषक सर्वोच्च "उपहार" एक बच्चा अछि। २.९ "चिल्होड़ि उड़ि रहल अछि" - बेरोजगारी, पत्नी आ मित्र-विश्वासघात कथासूत्र: विनोद बेरोजगार अछि। चन्दाक व्यवहार ओकरा आहत करैत अछि। बेरोजगारीक समयमे  उपेक्षा, मित्रक विश्वासघात। विस्तृत विश्लेषण: आर्थिक नपुंसकता आ पुरुष-अस्मिता: पितृसत्तात्मक समाजमे पुरुषक पहचान ओकर कमाइसँ जुड़ल अछि। विनोदक बेरोजगारी मात्र आर्थिक समस्या नहि- ओकर पुरुष-अहंकार, ओकर सामाजिक प्रतिष्ठा, ओकर पत्नीक दृष्टिमे ओकर "मूल्य” - सभ एकसंग खतरामे पड़ि जाइत अछि। चन्दाक चरित्र: चन्दाक चरित्र एकआयामी नहि अछि। ओ कोनो खलनायिका नहि। ओकर फर्माइश, ओकर असन्तोष- ई मानवीय प्रतिक्रिया थिक एक एहन सिस्टमक प्रति जे स्त्रीक सपना आ आकांक्षाकेँ फजूल मानैत अछि। मुदा अन्ततः ओकर व्यवहार विनोदकेँ तोड़ि दैत अछि। कथाक शीर्षक: "चिल्होड़ि उड़ि रहल अछि"- विनोदक जीवनक रूपक थिक, जे बिना कोनो सहाराक उड़ि रहल अछि। २.१० "नुक्का चोरी"- वर्जित प्रेम आ सामाजिक बाधा कथासूत्र: चन्दन आ विभा दू युवा छथि, ओ "पाहुन" सम्बन्धमे छथि आ पारिवारिक संरचना ओकर प्रेमकेँ "अवैध"बनबैत अछि। विस्तृत विश्लेषण: सम्बन्धक जटिलता: "पाहुन" जेहन सम्बन्धमे कोनो रोमाण्टिक भावना वर्जित मानल जाइत अछि। मुदा चन्दन आ विभाक आकर्षण ऐ बाधाकेँ पार करैत अछि। चन्दनक द्वन्द्व: ई एकटा genuine emotional connection थिक जे सामाजिक संरचनाक विरुद्ध जाइत अछि। रोमाण्टिक-यथार्थवादी सन्तुलन: सुधाकरजी एहि सम्बन्धकेँ ने महिमामण्डित करैत छथि, ने निन्दित करैत छथि। ओ मात्र दूटा मानवीय हृदयक छटपटाहटि देखबैत छथि। २.११ "कर्जखोर"- ऋण-जाल आ मध्यवर्गीय यन्त्रणा कथासूत्र: दास जी एक बेरोजगार मध्यवर्गीय व्यक्ति छथि जे कतेक लोकसँ कर्ज लेने छथि - ध्रुवजी १५००, गोपाल (तकिया, जाजिम, चादर) वीरेन्द्र ५००, उमाशंकरजी ४००, प्रदीप ५९०, हरिशंकरजी १७०० लगभग- ई कर्जसूची जीवनक कारुण्यकेँ व्यक्त करैत अछि। विस्तृत विश्लेषण: यथार्थवादी विवरण: कर्जक फेहरिस्त एकटा literary device (साहित्यिक उपकरण) थिक - कागज-कलम ल' क' बनाओल सूची एक व्यक्तिक पूरा जीवन-संघर्षक लेखाजोखा बनि जाइत अछि। प्रदीपक प्रसंग: प्रदीप (महाजन जकाँ) आ दास जीक बीचक सम्बन्ध मार्मिक अछि। प्रदीप कहैत अछि - "देखु दास जी, अहाँ ले“ एते पाइ कोनो बड़का पहाड़ नहि छै... कनियो ध्यान देबै तँ इन्तजाम भ' जेतै।" ई पंक्ति एक जटिल power dynamic उजागर करैत अछि - जे कर्जदार हो ओकर dignity (प्रतिष्ठा) धीरे-धीरे क्षीण होइत जाइत अछि। Marx: ऋण एक एहन chain (जंजीर) थिक जे पूँजीवादी समाजमे मध्यवर्गीय व्यक्तिकेँ बन्धुआ बनबैत अछि। दास जीक स्थिति "debt bondage"क एक साहित्यिक उदाहरण थिक। २.१२ "रामपरी"- पत्र-साहित्य आ स्त्री-अन्तर्द्वन्द्व कथासूत्र: कथाक वाचक "सूर्यमुखी" (एक युवती) रामपरी (ओकर सखी) केँ पत्र लिखैत अछि। पत्रमे अपन जीवनक उल्लेख। विस्तृत विश्लेषण: Epistolary Form (पत्र-विधा): ई कथा epistolary form (पत्रविधा) मे लिखल गेल अछि- जे मैथिली कथा-साहित्यमे दुर्लभ प्रयोग थिक। पत्रक भाषामे एक आत्मीयता आ अनौपचारिकता होइत अछि जे सोझ वाचनसँ अलग होइत अछि। गीतक समावेश: कथाक मध्यमे एक गीत- एहि गीतक समावेश कथाकेँ एक अतिरिक्त भावात्मक आयाम दैत अछि। भारतीय साहित्यमे गीत-कथाक मिश्रण एकटा पुरान परम्परा थिक। २८.८.७६ क तिथि: पत्रक अन्तमे "तोरे सूर्यमुखी (२८.८.७६)" - ई तिथि-उल्लेख कथाकेँ एक ऐतिहासिक दस्तावेज बनबैतअछि। २.१३ "अस्तित्व" - तीन भाइ, एक बूढ़ बाप, आ सम्पत्ति-विवाद कथासूत्र: तीन भाइ (श्रीकान्त, शशिकान्त, सुधाकान्त) आ बूढ़ बाप। बूढ़ बापक देखभाल, भानस-भात, आ पत्नी-केन्द्रित अलगाव-प्रवृत्ति। विस्तृत विश्लेषण: संयुक्त परिवारक विघटन: "अस्तित्व" संयुक्त परिवार व्यवस्थाक पतनक आख्यान थिक। तीनू भाइ अपन-अपन पत्नीक दबावमे अलग-अलग घर बनेबाक सोचि रहल छथि। बूढ़ाक मार्मिक अवस्था: बूढ़ा सन्दूकपर पड़ल-पड़ल अचानक सचेत भ' जाइत छथि। एहि एक छोट विवरणमे एक बाप-बेटाक सम्पूर्ण मनोवैज्ञानिक सम्बन्ध व्यक्त भ' जाइत अछि। व्यंग्यात्मक आलोचना: गुड़ चाउर फाँकि रहल ई कथा एक व्यंग्यात्मक चित्र खींचैत अछि। २.१४ "सुनगैत करज" - बालमनोविज्ञान आ वयस्क-संसार कथासूत्र: महेशवा (एक छोट बच्चा) स्कूल छोड़ि गाछीमे खेलाइत अछि आदि आदि। विस्तृत विश्लेषण: बाल-दृष्टिकोण: सुधाकरजी एहि कथामे बाल-मनोविज्ञानकेँ अत्यन्त संवेदनशीलतासँ उजागर करैत छथि। महेशवाक भूख, ओकर जिज्ञासा, ओकर "विद्रोह", बीड़ी पीनाइ- ई सभ बालकेँ एक सम्पूर्ण मानव-सत्ता प्रमाणित करैत अछि। महादेवक सिक्का: महेशवा महादेवक लिंगपर राखल पाइ देखि ओकरा उठा लैत अछि। ई दृश्य गहींर प्रतीकात्मक अर्थ राखैत अछि। २.१५ "थकुचल मासुक बुट्टी" - कला, यौवन आ समाजक हिंसा कथासूत्र: ललनमा (एक प्रतिभाशाली बाँसुरी-वादक आ गायक) आ कथावाचक बच्चेसँ मित्र छथि। मुदा ललन आस्ते-आस्ते हिंसाक रस्ता पकड़ि लैत अछि । विस्तृत विश्लेषण: कलाकारक त्रासद नियति: ललनक बाँसुरी-प्रतिभा समाज द्वारा पोषित नहि, वरन् नष्ट क' देल जाइत अछि। ई कथा प्रश्न उठबैत अछि- कोन समाज अपन प्रतिभाशाली सन्तानकेँ हिंसक होइले विवश करैत अछि? ललन-कथावाचक: आँजुरमे भुज्जा आ गीत। २.१६ "खण्डित लोक" - पीढ़ी-संघर्ष आ परम्परा-आधुनिकताक टकराव कथासूत्र: लालचन बूढ़ा आ ओकर परिवारक बीचक पीढ़ीगत संघर्ष। बूढ़ा प्रेमचन्द-शरतचन्द-जयशंकर प्रसादक आदर्शवादसँ जीवन जीलनि, मुदा परिवार ओकर मूल्यकेँ नकारि देलक। विस्तृत विश्लेषण: माँछक प्रसंग: बूढ़ा मछरी किनि आनैत छथि। बूढ़िया कहैत छथि - "धौर! आब एत' मुनहारि साँझमे के बनेतै माँछ?"- ई एक साधारण घरेलू प्रसंग थिक, मुदा एहिमे दुटा पीढ़ीक दुटा दुनिया टकरा जाइत अछि। आदर्शवाद आ यथार्थवाद: वएह ओकर पाथेय छल- बूढ़ाक साहित्यिक आदर्शवाद। मुदा ई गमकौआ आदर्श कि ने बुझनाहर। आधुनिक वास्तविकता। दुनूक बीच बूढ़ा एकाकी अछि। २.१७ "छागर" - बहुसम्बन्ध आ स्त्री-प्रतिरोध कथासूत्र: चन्दन आ रूपम/ रूपाक विवाह भेलनि अछि। चन्दनक माय (सासु) निरन्तर रूपमकेँ प्रताड़ित करैत रहैत छथि। रूपम अन्ततः अपन प्रतिरोध व्यक्त करैत अछि। विस्तृत विश्लेषण: "छागर" शीर्षक एक व्यंग्यात्मक प्रतीक थिक - जे छागर (बकरी) बलि देबाक लेल पोसल जाइत अछि, से रूपा सासुरक लेल बलिपशु जकाँ थिक। सासु-बहूक सम्बन्ध: भारतीय साहित्यमे ई सम्बन्ध बारम्बार आयल अछि। मुदा सुधाकरजी ऐ विषयमे नहि तँ सासुकेँ खलनायिका बनबैत छथि, नहि रूपाकेँ एकमात्र पीड़िता। चन्दन (पति) कतहु बीचमे अछि - मुदा ओकर मौन सेहो एक प्रकारक सहयोग थिक शोषणमे। २.१८ "परिवेश" - राजनीति, व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा आ नैतिक पतन कथासूत्र: बच्चा भाइ (एक गाँवक प्रभावशाली व्यक्ति) आ मनोहरक पढ़ल-लिखल परिवार। चन्द्रकान्त (एक युवक) एहि झगड़ामे पड़ि जाइत अछि। चन्द्रकान्तकेँ बच्चा भाइक पक्षक लोक पिटैत अछि। विस्तृत विश्लेषण: राजनीतिक व्यंग्य: "जनकपुरसँ प्रकाशित संकेत मे, जनवरी, १९९१" मे प्रकाशित ऐ कथाक पृष्ठभूमि नेपालमे लोकतान्त्रिक परिवर्तनक पूर्वकाल थिक। बच्चा भाइक सत्ता-भोग, ग्रामीण राजनीतिक षड्यन्त्र- ई सभ एहि ऐतिहासिक काल-खण्डक दर्पण थिक। २.१९ "छाहरि तर”क काँट"- भाइचारा, स्त्री-प्रश्न आ न्याय कथासूत्र: शशिकान्त आ हेमकान्तक बीचक सम्बन्ध। सुमित्रा (शशिकान्तक पत्नी) आ श्यामा (हेमकान्तक पत्नी)- दुटा स्त्री। एक सम्पत्ति-विवाद, एकटा थापड़। विस्तृत विश्लेषण: खीराक रूपक: खीराक गाछ - दूटा खीरा एके बिया, एके माटि, एके बाँसक सहारापर बढ़ैत-बढ़ैत छीपधरि पहुँचि गेल- मुदा “। भाइचाराक टुटबाक मार्मिक विवरण। २.२०. ”संधि“- बोर्डर एरिया, दुनू बेकतीमे अट्ठाबज्जर। रसिया आदमी कबीरदासक बोली बाजैत अछि से दुनू बेकतीमे अट्ठाबज्जर खसलैए। दुनू कमाइए। मुदा सत्तैसमे दिन मेल भऽ गेलै। भारत नेपालक सन्धि टुटना २९ दिन भऽ गेल छै। २.२१. "स्वप्न-भंग" - प्रेम, कल्पना आ यथार्थक संघर्ष कथासूत्र: श्रीकान्त पद्माक प्रति अनुरक्त छथि। हिनक Diary सन आन्तरिक एकालाप। विस्तृत विश्लेषण: ई कथा सर्वाधिक Romantic (स्वच्छन्दतावादी) शैलीक अछि। "स्वप्न-भंग" नाम स्वयं Romantic आन्दोलनक एक महत्त्वपूर्ण थीम थिक। २.२२. "कोनो एक दिन" - कोविड-महामारी आ मानवीय एकाकीपन कथा ३ अक्टूबर, २०२०क रचित- कोविड-कालक लकडाउनक पृष्ठभूमिमे एक पति-पत्नीक रात्रि-वार्तालाप।  पुरान स्मृति, वर्तमानक असन्तोष। विस्तृत विश्लेषण: संग्रहमे ई एकमात्र कथा अछि जे महामारी-कालक अनुभवकेँ दर्ज करैत अछि। अन्तमे- पूर्णिमा छलै ओइ दिन.. - ई पंक्ति भूतक स्मृतिक वर्तमानमे पुनरागमनकेँ व्यक्त करैत अछि। भाग तीन: गंगेश उपाध्यायक नव्य न्यायक प्रकाशमे विश्लेषण ३.१ नव्य न्यायक मूलभूत प्रत्यय गंगेश उपाध्याय (१२म-१३म शतीक मिथिला-दार्शनिक) रचित "तत्त्वचिन्तामणि" नव्य-न्याय दर्शनक आधारभूत ग्रन्थ थिक। एहि दर्शनमे: व्याप्ति (Pervasion/Universal relationship) अनुमान (Inference/अनुमान) शब्द (Verbal testimony) प्रत्यक्ष (Direct perception) उपाधि (Condition/qualifier) ई सभ प्रमुख ज्ञान-माध्यम छथि। ३.२ "दीयरि"क नव्य न्यायिक विश्लेषण व्याप्ति (Universal Relation) क सन्दर्भमे: नव्य न्यायमे व्याप्ति अर्थात् कारण-कार्यक सार्वभौमिक सम्बन्ध - जेना "जतऽ धुआँ, ततऽ आगि।" सुधाकरजीक कथामे एक व्याप्ति स्पष्ट दृष्टव्य अछि: जतऽ आर्थिक विपन्नता, ततऽ पारिवारिक विघटन। "कर्जखोर", "घरमुँहा", "दीयरि", "चिल्होड़ि उड़ि रहल अछि"- एहि सभ कथामे ई व्याप्ति सुसंगत रूपमे प्रकट होइत अछि। नव्य न्यायक दृष्टिसँ ई "व्यापकता" सुधाकरजीक साहित्यिक जगत्-दर्शनक आधार थिक। अनुमान (Inference) क सन्दर्भमे: नव्य न्यायमे त्रिविध अनुमान होइत अछि- केवलान्वयी, केवलव्यतिरेकी आ अन्वयव्यतिरेकी। सुधाकरजीक कथामे पात्रसभ अनुमानक आधारपर निर्णय लैत छथि, मुदा ओ अनुमान प्रायः भ्रमपूर्ण होइत अछि - अनुमान कखनो काल त्रुटिपूर्ण निकलैत अछि। [कथा- परिवेश] उपाधि (Condition) क सन्दर्भमे: नव्य न्यायमे "उपाधि" अर्थात् ओ शर्त जे कोनो व्याप्तिकेँ सीमित करैत अछि। "नुक्का चोरी"मे चन्दन-विभाक प्रेमपर सामाजिक "उपाधि" लागि गेल अछि- जे ओकर प्रेमकेँ "अवैध" घोषित करैत अछि। ई उपाधि-मूलक बन्धन सुधाकरजीक कथामे बारम्बार अबैत अछि। भाग चारि: विदेह समानान्तर इतिहास-फ्रेमवर्कक सन्दर्भमे विश्लेषण ४.१ विदेह-परम्परा आ मिथिला-साहित्य "विदेह" मिथिलाक पुराना नाम थिक। राजा जनकक विदेह साम्राज्य मिथिला-सभ्यताक प्रतीक थिक। एहि "विदेह इतिहास-फ्रेमवर्क"मे नेपाल-तराईमे बसल मैथिलजनक समानान्तर इतिहासकेँ देखबाक प्रयास होइत अछि - ओ इतिहास जे आधिकारिक राष्ट्र-इतिहासमे प्रायः उपेक्षित रहैत अछि। ४.२ सुधाकरजीक कथा आ विदेह-इतिहास सुधाकरजी जन्मतः नेपालक मलहनी, कलैया (वीरगंज) केर निवासी, परन्तु विराटनगरमे बसि गेलाह। ई "प्रवासी-मैथिल" अनुभव एक समानान्तर इतिहास थिक: क) भारत-नेपाल सीमाक मैथिल पहचान: "संधि" कथामे नेपाल-भारत तेल-सन्धिक प्रसंग - ई मात्र एक कथा-तत्त्व नहि, ई ओइ मैथिल समाजक जीवन्त इतिहास थिक जे दुनू देशक बीच "दीयरि" जकाँ स्थित अछि। [बॉर्डर एरिया] ख) नेपालक राजनीतिक परिवर्तन आ मैथिल: "परिवेश" आ "खण्डित लोक" कथामे नेपालक लोकतान्त्रिक आन्दोलन आ माओवादी संघर्षक छाया स्पष्ट अछि। ई मैथिल समाजपर राजनीतिक उथल-पुथलक प्रभावकेँ दस्तावेज करैत अछि। ग) भाषाई पहचान: मैथिलीमे लेखन स्वयं एक राजनीतिक कार्य थिक - जतऽ मैथिली उपेक्षित रहल। सुधाकरजीक ६० वर्षक लेखन-साधना एहि "भाषाई प्रतिरोध"क एक अध्याय थिक। भाग पाँच: भारतीय, चीनी आ पाश्चात्य सिद्धान्तक दृष्टिसँ समग्र मूल्यांकन ५.१ भारतीय साहित्यशास्त्रक दृष्टि रस-सिद्धान्त (भरत मुनि ~ ३०० ईसा पूर्व): कथा  प्रमुख रस प्रदक्षिणा  करुण + बीभत्स दीयरि  करुण + शान्त झखड़ल फूलक गाछ  करुण + रौद्र चोलिया मे चोर बसे गोरी  श्रृंगार उपहार  करुण + वीर कर्जखोर  करुण थकुचल मासुक बुट्टी  करुण + रौद्र सुधाकरजीक कथामे करुण रस सर्वाधिक प्रबल अछि। भरतक नाट्यशास्त्रमे करुण रसक स्थायी भाव "शोक" थिक। अभिनवगुप्त कहने छलाह जे करुण रस तखनहि सम्भव होइत अछि जखन वाचक/दर्शक साधारणीकरणक माध्यमे पात्रक वेदनामे स्वयंकेँ देखैत अछि। सुधाकरजीक कथामे ई साधारणीकरण अत्यन्त सफल अछि - पाठक दासजी, विनोद, बचनू, आ ललनक पीड़ामे स्वयंकेँ देखि सकैत अछि। ध्वनि-सिद्धान्त (आनन्दवर्धन ~ ९वीं शती): सुधाकरजीक कथामे व्यंजना (ध्वन्यार्थ) अत्यन्त शक्तिशाली अछि। "दीयरि" शीर्षक स्वयं एक ध्वन्यर्थ थिक- नदीक दीयरि, पतिक स्थिति, स्त्री-अस्मिताक अनिश्चितता- ई सभ एक संग व्यंजित होइत अछि। "खुट्टी पर टाँगल ब्रा"- शीर्षकमे एक ध्वन्यार्थ अछि जे "बाजारू सभ्यता" आ "स्त्री-देहक वस्तुकरण"- दुनूकेँ एकसंगे व्यंजित करैत अछि। वक्रोक्ति-सिद्धान्त (कुन्तक ~ १०वीं शती): कुन्तकक "वक्रोक्ति" (बाँक/विशिष्ट भाषाप्रयोग) सुधाकरजीक भाषामे स्पष्ट दृष्टव्य अछि। ओ "पदवक्रता" (शब्द-स्तरपर), "वाक्यवक्रता" (वाक्य-स्तरपर) आ "प्रबन्धवक्रता" (रचना-स्तरपर) तीनू स्तरपर वक्रोक्तिक प्रयोग करैत छथि। ५.२ चीनी साहित्यिक सिद्धान्तक दृष्टि Liu Xie (४६५-५२१ ई.) क "Wenxin Diaolong"- "साहित्यक हृदयक ड्रैगन": Liu Xie क दृष्टिमे उत्कृष्ट साहित्य - (Qiáng, भावना) आ (Lǐ, तर्क/सिद्धान्त)- दुनूकेँ एकसंग समेटैत अछि। सुधाकरजीक कथामे ऐ दुनू तत्त्वक सुन्दर समन्वय अछि: Qiáng: ओकर पात्रसभक भावनात्मक प्रामाणिकता Lǐ: सामाजिक समस्याक तार्किक चित्रण Su Shi (सु शि, १०३७-११०१) क सौन्दर्यशास्त्र: सु शि कहने छलाह - साहित्यक सत्य प्रकृतिसँ प्रकट होइत अछि।" सुधाकरजीक कथामे ई "प्राकृतिक सत्य" अत्यन्त स्पष्ट अछि। ओ कृत्रिम भाषा आ ओझरी कथातन्त्रसँ दूर रहि, सीधे जीवन-सत्यकेँ पकड़ैत छथि। Bi Xing- चीनी काव्यशास्त्रक रूपक-सिद्धान्त: Bi अर्थात् उपमा/रूपक आ Xing अर्थात् भावोत्तेजन- ई दुनू सुधाकरजीक कथामे प्रबल रूपमे उपस्थित अछि: "दीयरि" (Bi) ” सागरक बीच दीयरि = पति/स्त्रीक स्थिति। "झखड़ल फूलक गाछ" (Bi)- उखड़ल गाछ= परित्यक्ता बूढ़िया। "सुनगैत करज" (Xing)- सुलगैत कर्ज भावनात्मक उत्तेजना जगबैत अछि। ५.३ पाश्चात्य सिद्धान्तक दृष्टि Mikhail Bakhtin (बाख्तिन, १८९५-१९७५)क "Dialogism" आ "Polyphony": बाख्तिन कहने छलाह जे महान उपन्यासमे (आ साहित्यमे) बहुस्वर (polyphony) होइत अछि- जतय लेखकक एकमात्र स्वर नहि, वरन् विभिन्न पात्रक विभिन्न आवाज एक संग गूँजैत अछि। सुधाकरजीक कथामे ई बहुस्वरता स्पष्ट अछि: "दीयरि"मे तीन स्वर- बुढ़ा, सुशीला, कथावाचक पति- तीनूक दृष्टिकोण वैध अछि "अस्तित्व"मे तीन भाइक तीन स्वर "घरमुँहा"मे घरेलू जीवनक अनेक अप्रत्याशित स्वर Georg Lukács (लुकाच, १८८५-१९७१)क "Critical Realism": लुकाच "Critical Realism" (आलोचनात्मक यथार्थवाद)क सिद्धान्त देलनि- जे बुर्जुआ समाजक विरोधाभासकेँ सत्य कलात्मक अभिव्यक्तिक माध्यमसँ उद्घाटित करैत अछि। सुधाकरजी ऐ अर्थमे Critical Realist छथि। ओ ने Socialist Realism (समाजवादी यथार्थवाद) क प्रोपेगण्ड करै छथि, नहिये पलायनवादी छथि। ओ मैथिल मध्यवर्गक विरोधाभासकेँ- एकटा कुशल शल्य-चिकित्सक जेकाँ- उघाड़ैत छथि। Antonio Gramsci (ग्राम्शी, १८९१-१९३७)क "Hegemony" आ "Organic Intellectuals": ग्राम्शीक "Hegemony" (सांस्कृतिक वर्चस्व) आ "Organic Intellectuals" (कार्बनिक बुद्धिजीवी)- सुधाकरजी एक organic intellectual छथि जे श्रमजीवी वर्गक भीतरसँ ओकर अनुभवकेँ साहित्यमे अभिव्यक्त करैत छथि। ओ विराटनगरक औद्योगिक क्षेत्रमे काज केनिहार- ओकर जीवन-संघर्ष ओकर लेखनकेँ organic authenticity (जैविक प्रामाणिकता) दैत अछि। Homi Bhabha (भाभा, जन्म १९४९) क "Third Space" आ Hybridity: Bhabha कहने छलाह जे उपनिवेशवाद (आ विस्थापन) एक "Third Space" उत्पन्न करैत अछि- नहिये पूर्णतः पुरान पहचान, ने पूर्णतः नव पहचान। नेपालक मैथिल सुधाकरजी एहि "Third Space"क निवासी छथि। ओकर पात्रसभ “ बेचना ("प्रदक्षिणा"), कथावाचक ("घरमुँहा"), कथावाचक ("संधि") - सभ  hybrid identity (संकर पहचान)सँ पीड़ित छथि। ने शहरी जीवनक उद्वलनमे शामिल हो'बाक समय के पकड़ि सकलहुँ... ने अपन ग्रामीण माटिक सुगन्ध हम बिसरि सकलहुँ - ई Bhabha क Third Space क साहित्यिक अभिव्यक्ति थिक। भाग छः: भाषा-शैली आ तकनीकक विश्लेषण ६.१ मैथिली भाषाक प्रयोग सुधाकरजी नेपाली मैथिलीक एक विशिष्ट प्रकारक प्रयोग करैत छथि। एहि भाषामे अछि: - मैथिलीक पूर्वी उपभाषा - नेपाली भाषासँ प्रभावित कतिपय शब्द - विराटनगरी बाजारी बोलीक प्रभाव - ग्रामीण मिथिलाक लोक-बोली ६.२ विवरण-शैली सुधाकरजीक कथाक विवरण कम शब्दमे अछि।" उदाहरण: चुल्हि पर राखल भात-दालिक हाँड़ी... चिनमार पर दूधक टोपिया... लोहियामे झाँपल आलू-अरिकोंचक तरकारी आ ओकर गंध... बेंच पर राखल थारी-कटोरी आ गिलासक गेंट... सिलौट पर पीसल-थोपल टमाटर, मिरचाइ आ धनीक चटनी आ सबसँ ऊपर जरैत दीप जनाँ शमशानक एकांतमे ककरो चिता सँ लहरि उठि रहल हो। ई विवरण imagist (बिम्बवादी) प्रभाव देखबैत अछि। ६.३ संवाद-शैली सुधाकरजीक संवाद अत्यन्त स्वाभाविक आ जीवन्त अछि। ओ अनावश्यक "literary" नहि होइत अछि। उदाहरण - "कर्जखोर" मे ई संवाद एक साधारण मैथिल परिवारक वार्तालापक सटीक प्रतिलिपि थिक। भाग सात: समग्र साहित्यिक मूल्यांकन ७.१ सुधाकरजीक शक्ति-पक्ष क) प्रामाणिकता: सुधाकरजीक सबसँ बड़ शक्ति ओकर प्रामाणिकता थिक। ओ लिखैत छथि जे ओ जीलनि, देखलनि, आ अनुभव कयलनि। ई "lived experience" (जीयल अनुभव) ओकर कथाकेँ एक literary manufactured fiction सँ अलग आ श्रेष्ठ बनबैतअछि। ख) सामाजिक प्रतिबद्धता: ओ सामाजिक असमानता, स्त्री-शोषण, आर्थिक विपन्नता - ऐ सभ विषयपर लिखैत छथि बिना कोनो वैचारिक दुराग्रहक। ओ ने "communist" propaganda लिखैत छथि, ने "Hindu conservative" moral lecturing। ओ मात्र मनुष्यकेँ ओकर सम्पूर्ण जटिलतामे देखैत छथि। ग) स्त्री-चरित्र चित्रण: सुधाकरजीक स्त्री-पात्र अत्यन्त सशक्त आ बहुआयामी छथि। सुशीला, खनजनियाँ, माया, रूपा, यशोधरा, समताली, विभा- ई सभ real women (वास्तविक स्त्री) छथि - ने ideal देवी, ने fallen woman (पतिता नारी)। घ) भाषाई माटि: भाषामे मैथिलीक माटिक गंध अछि। प्रदर्शनकारी "शुद्ध मैथिली"क बदला ओ जीवन्त मैथिलीमे लिखैत छथि। ७.२ सुधाकरजीक सीमा-पक्ष क) कथानक-संरचना: कतिपय कथामे (जेना "स्वप्न-भंग") कथानकक संरचना शिथिल भ' जाइत अछि। डायरी-फार्मेट कहियो-कहियो एकाकार नहि होइत अछि। ख) पुरुष-वाचक केन्द्रियता: अधिकांश कथामे कथावाचक पुरुष अछि। जखनकि ओकर स्त्री-पात्र अत्यन्त शक्तिशाली छथि। ग) resolution (समाधान)क अभाव: किछु कथामे (जेना "कर्जखोर") कथा बिनु सोझरेने छोड़ि देल जाइत अछि। ई यथार्थवादी दृष्टिसँ उचित अछि, मुदा पाठककेँ कहियोकाल निराश करैत अछि। भाग आठ: तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य ८.१ मैथिली साहित्यक परम्परामे स्थान सुधाकरजीक रचना परम्परा हरिमोहन झा (व्यंग्य), ललित (उपन्यास/ कथा), राजकमल चौधरी (आधुनिक गद्य) आ मणिपद्म (यथार्थवादी कथा) सँ प्रभावित देखाइत अछि, मुदा ओ अपन मौलिक स्वर विकसित कयलनि। नेपाली मैथिली कथा-परम्परामे ओकर स्थान अनन्य थिक - कियाकि ओ विराटनगरक "बॉर्डर एरिया"क ओहि अनुभवकेँ साहित्यमे आनलनि जे अन्यत्र उपलब्ध नहि। ८.२ हिन्दी साहित्यसँ तुलना प्रेमचन्द (१८८०-१९३६) सँ तुलना कयल जा सकैत अछि - दुनू ग्रामीण-शहरी संक्रमणकालक साहित्यकार, दुनू सामाजिक-आर्थिक समस्याक प्रति संवेदनशील। मुदा सुधाकरजी यौनिकताक प्रश्नपर प्रेमचन्दसँ अधिक साहसी छथि। मोहन राकेश (१९२५-१९७२) सँ तुलना - शहरी मध्यवर्गक असन्तोष, पारिवारिक विघटन - ई थीम दुनूमे अछि। मुदा सुधाकरजीक भाषा राकेशसँ अधिक माटिसँ जुड़ल अछि। उपसंहार: एक समग्र निर्णय "दीयरि" मैथिली साहित्यक एक बहुमूल्य निधि थिक। रा. ना. सुधाकरजी छः दशकक लेखन-यात्रामे एहन साहित्य-जगत् निर्मित कयलनि जे अछि: - प्रामाणिकतामे - मिथिलाक माटिसँ जुड़ल - सामाजिक-दायित्वमे - विपन्न, उपेक्षित, आ शोषित वर्गक पक्षमे - स्त्री-चेतनामे - अपन काल (१९७६-२०२०) सँ आगाँ - भाषाई सौन्दर्यमे- जीवन्त आ ताजा नव्य न्यायक व्याप्ति-दृष्टिसँ- "जतऽ सुधाकरजीक कथा, ततऽ मनुष्यक सत्य।" विदेह-परम्पराक इतिहास-दृष्टिसँ ई संग्रह नेपाल-तराईक मैथिल समाजक जीवन्त दस्तावेज थिक। भारतीय रस-सिद्धान्तक दृष्टिसँ- करुण रसक ई प्रबल साधना। चीनी Qing-Li सिद्धान्तक दृष्टिसँ- भावना आ सत्यक सुन्दर संयोग। आ पाश्चात्य Critical Realism-क दृष्टिसँ - एक organic intellectual-क सत्य। एहि कथा-संग्रहक समानान्तर मैथिली साहित्यमे व्यापक स्वागत कएल गेल अछि। ई स्वागत हेबाक चाही - ने केवल मैथिली पाठकद्वारा, वरन् भारत-नेपालक समग्र साहित्य-परिवारद्वारा। "दीयरि" -सागरमे दूनू दिशाक हिलकोरक बीच स्थित- सुधाकरजीक साहित्य सेहो ओहिना अछि- परम्परा आ आधुनिकताक बीच, ग्राम आ नग्रक बीच, मैथिली आ नेपाली दुनियाक बीच- मुदा अपन मौलिकतामे अटल। [सैद्धांतिक विवेचन लेल देखू- मैथिली समीक्षाशास्त्र- गजेन्द्र ठाकुर] अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१३. गजेन्द्र ठाकुर- गोपाल झा 'अभिषेक'क 'आउ स्वप्न साझी करी': साहित्यिक अनुशीलन गजेन्द्र ठाकुर गोपाल झा 'अभिषेक'क 'आउ स्वप्न साझी करी': साहित्यिक अनुशीलन मैथिली साहित्यक समकालीन परिदृश्यमे गोपाल झा 'अभिषेक' एकटा एहन सशक्त आ प्रखर हस्ताक्षरक रूपमे उभरल छथि, जिनका रचनामे गामक माटिक सोंधगर गंधक संग-संग वैश्विक चेतनाक प्रखर स्वर सुनाइत अछि। हिनक नवीन कविता-संग्रह 'आउ स्वप्न साझी करी' (२०२१) मैथिली काव्य-परम्परामे एकटा मीलक पत्थर थिक, जे पाठकक संवेदनशीलताकें झंकृत करैत ओकरा आत्म-मंथन लेल विवश करैत अछि। अनुप्रास प्रकाशन, मधुबनी द्वारा प्रकाशित एहि संग्रहमे संकलित कविता सभ मात्र शब्दक विन्यास नहि, अपितु अपन समयक विसंगति, मानवीय पीड़ा, राजनैतिक पाखण्ड आ भविष्यक स्वप्नक एकटा प्रामाणिक दस्तावेज थिक। कविक व्यक्तित्व आ काव्य-दर्शन गोपाल झा 'अभिषेक'क जन्म १५ अप्रैल १९६६ ई० कें मधुबनी जिलाक बिस्फी प्रखण्डक मुरलियाचक गाममे भेलनि। इतिहासक विद्यार्थी रहबाक कारणे हिनक काव्य-दृष्टिमे ऐतिहासिक बोध आ सामयिक यथार्थक सुंदर समन्वय पाओल जाइत अछि । 'आउ स्वप्न साझी करी' सँ पूर्व हिनक एकटा हिन्दी कविता-संग्रह 'एक आदिम गंध की तलाश' (२०११) आ मैथिली कविता-संग्रह 'कइएक अर्थमे' (२०१७) प्रकाशित भऽ चुकल छनि, जाहि सँ हिनक काव्य-शिल्पक परिपक्वता प्रमाणित होइत अछि । अभिषेकजीक काव्य-दर्शन 'मनुखताइ' कें केंद्रमे राखि कऽ चलैत अछि। हिनका लेल कविता कोनो आसनक वा महंथानक गुण-कीर्तन नहि, अपितु ओ प्रतिरोधी सम्प्रेषणक ओजार थिक। संग्रहक भूमिका 'लक्ष्य धरि पहुच'बैत अछि कविता' मे आलोचक मिथिलेश कुमार झा उचिते लिखने छथि जे अभिषेकजीक कविता पाठककें संवेदनशील बनबैत अछि, जाहि सँ सभ्यता आ संस्कृतिक बिचला खाम्ह 'मनुखताइ' कें बचा कऽ राखल जा सकय। गोपाल झा 'अभिषेक'क प्रमुख कृति आ परिचय विवरण   जानकारी जन्म स्थान          मुरलियाचक, बिस्फी, मधुबनी शिक्षा     एम०ए० (इतिहास) मैथिली कविता-संग्रह         कइएक अर्थमे (२०१७), आउ स्वप्न साझी करी (२०२१) हिन्दी कविता-संग्रह           एक आदिम गंध की तलाश (२०११) अप्रकाशित नाट्यकृति        मुक्तिपर्व, रूपनगर, एकटा आर अग्नि परीक्षा सम्मान   आचार्य सुरेन्द्र झा 'सुमन' राष्ट्रीय शिखर साहित्य सम्मान (२०१८) 'आउ स्वप्न साझी करी': शीर्षकक सार्थकता एहि संग्रहक शीर्षक 'आउ स्वप्न साझी करी' अपनामे एकटा आमंत्रण अछि। ई आमंत्रण छैक एकटा एहन समाजक निर्माण लेल, जतय दुःख-सुख सामूहिक होइक। स्वप्न देखब आ ओकरा साझी करब कविक दृष्टिमे भविष्यक प्रति आश्वस्त रहबाक प्रक्रिया थिक। जखन संसार हिंसा, स्वार्थ आ अलगाववादक अन्हारमे डूमल हो, तखन स्वप्न देखब एकटा बड़ पैघ प्रतिरोध अछि । 'वैह स्वप्न तँ अछि कविता' मे कवि स्पष्ट कहैत छथि जे कविता सपनाकेँ मरि जेबासँ रोकबाक एकटा उपक्रम थिक । कविता सभक विस्तृत साहित्यिक समीक्षा संग्रहमे संकलित प्रत्येक कविता अपन कथ्य आ शिल्पमे विशिष्ट अछि। नीचाँ प्रमुख कविता सभक विस्तृत विवेचना कएल जा रहल अछि: १. मानवीय संवेदना आ करुणाक स्वर 'अंतिम आस': ई कविता न्यूजीलैंडक प्रधानमंत्री जेसिंडा अर्डर्न कें समर्पित अछि। कवि एहिठाम नारीकें करुणाक अंतिम आश्रय मानैत छथि। जखन-जखन संसार ध्वंसक बाट पर चलल अछि, तखन नारीक उपस्थिति रक्षा कवच बनि कऽ सोझाँ आएल अछि। "अंतिम आस जँ जोगेलिऐ / अकारण तऽ नहिये"- ई पंक्ति वैश्विक स्तर पर नारीक नेतृत्व आ ओकर करुणाक महत्ता कें रेखांकित करैत अछि। 'कोना परतारब हे तथागत': मुजफ्फरपुरमे चमकी बोखार सँ मरल बच्चा सभक स्मृतिमे लिखल ई कविता गम्भीर दार्शनिक प्रश्न उठबैत अछि। कवि तथागत बुद्ध सँ पुछैत छथि जे जहिया सांत्वनाक एक मुट्ठी सरिसो कोनो काज नहि आबय, तहिया कोनो माएकें कोना बुझाएल जाय। ई कविता स्पष्ट करैत अछि जे मृत्युक विरुद्ध कोनो चमत्कार नहि, अपितु 'चिकित्सकीय अनुसंधान' आ 'यथोचित संसाधन'क आवश्यकता अछि। व्यवस्थाक पंगुता पर ई एकटा करुण प्रहार अछि। 'दोसरे दिन जकाँ': हैदराबादक प्रियंका रेड्डी हत्याकांडक पृष्ठभूमिमे लिखल ई कविता मानवक भीतर बसल 'भेड़िया'क चित्रण करैत अछि। कविक पीड़ा एहि बातमे अछि जे सभ दिन जकाँ निकलल एकटा लड़की कोना 'चतुर-चण्डाल'क जालमे फसि जाइत अछि। ई कविता मनुष्यताक लज्जित होयबाक क्षणक साक्ष्य थिक। २. राजनैतिक आ सामाजिक विसंगति 'साहेब': ई कविता मिथिलाक समाजमे व्याप्त जातिवादी मानसिकता पर कड़ा व्यंग्य अछि। झा, मिश्र, पाठक, यादव, पासवान, ठाकुर आदि उपनाम सभक माध्यम सँ कवि ई दर्शबैत छथि जे कोना लोक अपन-अपन जातिक साहेबक मुँह ताकैत अछि। 'साहेब'क पसंद-नापसंद सँ निर्धारित होइत भाग्योदय पर कवि तीक्ष्ण कटाक्ष केलनि अछि। 'पाग': मिथिलाक मान-सम्मानक प्रतीक 'पाग' आजुक समयमे मात्र प्रदर्शनीक वस्तु बनि गेल अछि। कवि सुझाव दैत छथि जे एकरा संग्रहालयमे राखि देल जाय, कारण माथ पर ई आब बेसी काल नहि टिकैत अछि। परम्पराक खोखलापन पर ई एकटा गम्भीर टिप्पणी अछि। 'कार्यकर्ता': राजनैतिक पतनक चित्रण करैत कवि पुछैत छथि जे आब कार्यकर्त्ता कतय छथि? आब तऽ मात्र नेता, दर्शक आ अन्धसमर्थक बचल छथि। "कार्यकर्त्ता माने एकटा लक्ष्य / एकटा संग्रामक समक्ष"- ई परिभाषा आब विस्मृत भऽ गेल अछि। 'सर्वसम्मति बनयबाक क्रममे': जनतंत्रमे सर्वसम्मतिक नाम पर जे वंचना होइत अछि, तकर कवि विरोध करैत छथि। ओकर मानब अछि जे सर्वसम्मति कखनो-कखनो जनतंत्रक कंठ मोकि देबाक एकटा कुटिल चालि थिक। ३. प्रतीक आ बिम्बक नवीनता 'ट्रान्सफर्मर': कवि आधुनिक बिम्बक प्रयोगमे सिद्धहस्त छथि। 'ट्रान्सफर्मर' कवितामे समाजक संतुलित समन्वय कें सुचालक आ कुचालकक माध्यम सँ बुझबैत छथि। चिनमाटिक साधारण कुचालक वस्तु (Insulator) कोना अवांछित प्रवाह सँ समाज कें सुरक्षित रखैत अछि, ई देखब कविक नवीन दृष्टि थिक। 'पहाड़ : एकटा संभावना': पहाड़ कें कवि मात्र एकटा अवरोध नहि, अपितु 'स्थापित प्रतिपक्षी' मानैत छथि। जखन कोनो बड़ पैघ विरोध सोझाँ होइत अछि, तखने ओकरा पार करबाक संभावना सेहो जन्म लैत अछि। 'फुकना': ई कविता लोकक खयाली पुलाव आ सपनाक टुटबाक प्रतीक थिक। जखन सभ कलाबाजी मात्र हवाक बले होइत अछि, तखन ओकर टुटब स्वाभाविक छैक। ४. गाम, प्रकृति आ भूगोल 'धार बसबैत रहलए गाम': मिथिलाक नदी आ ओकर धारक बदलबाक प्रक्रिया कें कवि जीवनक निरंतरता सँ जोड़ैत छथि। नदीक धार जतय गाम कें उजाड़ैत अछि, ओतय दोसर गाम सेहो बसाबैत अछि। "धार तँ बसबैत रहलए गाम / आ बसा विदा होइत रहलए" - ई पंक्ति मिथिलाक शाश्वत यथार्थकें उरेहैत अछि। 'पोखरि' (श्रृंखला ५-८): मिथिलाक प्राण पोखरि आब कूड़ा-करकट फेकबाक स्थान बनि गेल अछि। कवि एहि बात पर क्षोभ प्रकट करैत छथि जे प्रशासन आ जनता दूनू एकर प्रति चुप अछि। पोखरिक दुर्गति सँ गामक सभ्यताक अधोगतिक चित्रण कवि केलनि अछि। 'ई छोट-छिन गाछ': ई कविता भविष्यक प्रति कविक आश्वस्त रहबाक भाव अछि। जखन धरि गाछमे पात अछि, तखन धरि जीवनक चेन्ह सुरक्षित अछि। ५. वैश्विक आ दार्शनिक चेतना 'जेरुसलम': ई कविता वैश्विक संघर्षक प्रति कविक चिंता अछि। जेरुसलम ककर होयबाक चाही, एहि प्रश्न सँ ऊपर उठि कऽ कवि 'सभक हक लेल लड़बाक' बात करैत छथि। 'इतिहास कहलक' आ 'इतिहासक इजोतमे': इतिहास कें कवि कोनो रगड़ा वा झगड़ाक साधन नहि मानैत छथि। 'इतिहासक इजोतमे' ओ स्वीकार करैत छथि जे इतिहासक कठघरामे हमही ठाढ़ छी आ अपन गलती कें स्वीकार करब इतिहासक प्रति न्याय थिक। 'नैतिकताक देहरिपर': आधुनिक तकनीक आ मशीनी आँखि (CCTV आदि) कोना मानवक नैतिकता कें ताख पर धऽ देलक अछि, तकर चित्रण एहि कवितामे अछि। मशीनादि लग नैतिकताक कोनो प्रश्न नहि रहि जाइत अछि। ६. आपत्काल आ विस्थापनक व्यथा 'एहि आपत्कालमे' (१-२): ई कविता कोरोना कालक प्रवासी मजदूरक पीड़ाक महाकाव्य थिक। जखन महानगर सभ अपन निर्माता कें 'दूधक माछी' जकाँ निकालि देलक, तखन मजदूरक पएर अपन माटिक लेल कते क्लेश सहि कऽ चलल, तकर मार्मिक वर्णन अछि। "घरे रहू! / घरे रहू! घरे रहूके मंत्र" ओहि लोक लेल कतेक व्यंग्य छल जकर घर महानगरक 'खोली' छल जे किराया नहि देबाक कारणे धकिया देल गेल। 'हमहु रहब एतहि': ई कविता मानवक संग-संग अन्य जीव-जंतुक सेहो एहि धरती पर अधिकारक बात करैत अछि। विकासक नाम पर प्रकृति कें उजाड़ब अपन विनाश कें आमंत्रण देनाइ थिक। शिल्प, भाषा आ बिम्ब-विधान गोपाल झा 'अभिषेक'क काव्य-शिल्प अपन कथ्यक अनुरूप अछि। हिनक भाषा 'अकृत्रिम' अछि, जाहिमे कोनो पांडित्य-प्रदर्शनक प्रयास नहि अछि । ओ गामक आम बोलचालक शब्द सभकें एहन ढंग सँ प्रयोग करैत छथि जे ओ विशिष्ट बनि जाइत अछि। भाषाक वैशिष्ट्य: पक्ष       विशेषता शब्द चयन           अकृत्रिम, प्रचलित आ गामक शब्दावलीक सुंदर प्रयोग 1 छंद        अधिकांश कविता मुक्त छंदमे अछि, जे आधुनिक संवेदना कें व्यक्त करबा लेल उपयुक्त अछि बिम्ब      ट्रान्सफर्मर, फुकना, सड़कक खधिया, मेनहोल आदि नवीन बिम्बक प्रयोग व्यंग्य     सामाजिक आ राजनैतिक विसंगति पर तीक्ष्ण आ मारक व्यंग्य अभिषेकजीक कविताक एकटा बड़ पैघ विशेषता अछि ओकर 'सम्प्रेषणीयता'। ओ जटिल सँ जटिल विषय कें बड़ सरलता सँ पाठक धरि पहुँचैत छथि। हिनक कवितामे 'प्रसाद गुण'क प्रधानता अछि, जे पाठक कें झटपट अपन प्रभावमे लऽ लैत अछि। कविता संग्रहक विषयगत वर्गीकरण संग्रहक कविता सभकें अध्ययनक सुविधे लेल नीचाँ देल गेल श्रेणीमे बाँटल जा सकैत अछि: श्रेणी      प्रमुख कविता सभ मानवीय संवेदना   अंतिम आस, कोना परतारब हे तथागत, दोसरे दिन जकाँ, प्रद्युम्न सामाजिक यथार्थ  पाग, साहेब, जाति, भिन्ने बथान, व्यथा-कथा राजनैतिक चेतना  लाक्षागृह, कार्यकर्ता, सर्वसम्मति, अंतिम चरणक चुनाव प्रकृति आ भूगोल  धार बसबैत रहलए गाम, पोखरि, ई छोट-छिन गाछ प्रेम आ गृहस्थी     ताहि बीच, प्रेम संग, गृहस्थी, अहाँक बहन्ने आधुनिकता आ विसंगति    ट्रान्सफर्मर, दिल्ली दर्शन, नैतिकताक देहरिपर, सड़क-संवेद गम्भीर दार्शनिक आ वैचारिक विन्दु 'आउ स्वप्न साझी करी' संग्रह मात्र कविताक संकलन नहि, अपितु एकटा गम्भीर दार्शनिक विमर्श सेहो अछि। १. प्रतिरोधक कविता: अभिषेकजीक कविता अन्यायक विरुद्ध 'प्रतिरोधक दृढ़ स्वर' अछि। ओ अन्याय कें सहबाक पक्षमे नहि छथि। 'कोनो देवासुर संग्रामक नहि बनब साक्षी' मे ओ स्पष्ट कहैत छथि जे ओ कोनो थोपल गेल युद्धक हिस्सा नहि बनताह, अपितु केवल 'न्याय-अन्याय' क निकष पर अपन समर्थन तय करताह। २. स्त्री-चेतना: कवि अपन कवितामे नारीक विचार जानबाक आ ओकर भागीदारी सुनिश्चित करबाक आह्वान करैत छथि । 'एक बेर पूछि तँ लिऔ' कविता नारीक निर्णय-शक्ति कें सम्मान दैत अछि। ३. इतिहास बोध: इतिहासक विद्यार्थी रहबाक कारणे कवि जानैत छथि जे अतीतक गौरव मात्र सँ काज नहि चलत। 'तकरे हो जीर्णोद्धार' मे ओ अनुपयुक्त परंपरा सभ कें त्यागबाक आ उपयुक्त कें सँजोबाक बात करैत छथि। ४. लोकतंत्रक चिंता: 'जनता-फोरम' आ 'अंतिम चरणक चुनावसँ पहिने' जकाँ कविता सभ लोकतंत्रमे होयबाक चीरहरण आ लाक्षागृहक निर्माण पर कवि कें चिन्तित दर्शबैत अछि। मैथिली साहित्यमे अभिषेकजीक योगदानक मूल्यांकन मैथिली साहित्यक वर्तमान कालखंडमे गोपाल झा 'अभिषेक' एकटा एहन कवि छथि जे अपन भाषा कें वैश्विक चिन्ता सँ जोड़ैत छथि। जहिआ मैथिली कविता पर आरोप लागल जे ई मात्र गामक दलान आ पोखर धरि सीमित अछि, तहिआ अभिषेकजी जेरुसलम, न्यूजीलैंडक प्रधानमंत्री आ वैश्विक तकनीक कें अपन विषय बनेलनि। हिनक कविताक शैली विवरणात्मक अछि आ ओ सम्बद्ध विषयमे नीक जानकारी दैत अछि। हिनक पर्यवेक्षण-दृष्टि स्पष्ट छनि आ गामक अराजक स्थितिक सेहो ओकरा गम्भीर परिचय छनि। भाषाक स्तर पर ओ बड़ सजग आ सावधान छथि, जाहि सँ हिनक कवितामे एकटा 'आधुनिक दृष्टि' आ 'विश्व दृष्टि' पाओल जाइत अछि। उपसंहार 'आउ स्वप्न साझी करी' कविता-संग्रह मैथिली कविताक एकटा उज्ज्वल पक्ष कें सोझाँ अनैत अछि। ई संग्रह कविक संवेदनशीलता, वैचारिक दृढ़ता आ भाषाई कुशलताक परिचायक थिक। अभिषेकजीक कविता सभमे जतय वर्तमानक विसंगति पर कड़गर प्रहार अछि, ततय एकटा नीक भविष्यक लेल स्वप्न देखबाक आ ओकरा साझी करबाक संकल्प सेहो अछि। 'आउ स्वप्न साझी करी': दार्शनिक आ भाषाई मीमांसा गोपाल झा 'अभिषेक'क ई कृति मात्र संवेदनामक उच्छवास नहि, अपितु शब्द आ अर्थक एकटा जटिल 'संसर्ग' थिक, जतय मिथिलाक स्थानीयता आ वैश्विक चेतना एके ठाम 'समानान्तर' रूप सँ प्रवाहित होइत अछि । १. गंगेशक नव्य न्याय आ 'अवच्छेदकता'क निकष पर समीक्षा गंगेश उपाध्याय (१४अम शताब्दी) द्वारा प्रतिपादित नव्य न्यायक मुख्य उद्देश्य छल भाषाक अस्पष्टता कें दूर कऽ ओकरा 'परिष्कृत' करब। स्वप्नक अवच्छेदकता: संग्रहक शीर्षक 'आउ स्वप्न साझी करी' मे 'स्वप्न' मात्र एकटा काल्पनिक 'विषयता' (contentness) नहि अछि। न्यायशास्त्रक दृष्टि सँ देखल जाय तऽ एहि ठाम स्वप्न 'कर्तृत्व-अवच्छिन्न' (agency-limited) अछि। कविक लेल स्वप्न ओहि 'साध्य'क रूप मे अछि जे 'मनुखताइ' (humanity) रूपी हेतु सँ व्याप्त अछि । जखन कवि कहैत छथि जे "आउ स्वप्न साझी करी", तखन ओ 'स्वप्न' कें वैयक्तिक संकीर्णता सँ मुक्त कऽ ओकरा 'सामूहिकता-अवच्छिन्न' (limited by collectivity) बना दैत छथि। 'ट्रान्सफर्मर' आ 'संसर्गता': अभिषेकजीक कविता 'ट्रान्सफर्मर' मे समाजक संतुलन कें सुचालक आ कुचालकक माध्यम सँ बुझाओल गेल अछि। नव्य न्यायक 'संसर्गता' (relationship) सिद्धांतक अनुसार, समाजक अस्तित्व ओहि 'विशिष्ट' संबंध पर निर्भर अछि जतय 'कुचालक' (साधारण लोक) अवांछित 'प्रवाह' कें रोकबाक 'प्रतियोगी' (counter-positive) बनैत छथि। एहि ठाम उर्जान्वित समाजक 'विशेष्यता' ओहि संतुलित समन्वय मे निहित अछि। २. हरिमोहन झाजीक 'भाषाई विश्लेषण' (Linguistic Analysis) फ्रेमवर्क प्रो. हरिमोहन झाक अनुसार शब्दक तीनटा शक्ति होइत अछि: अभिधा, लक्षणा आ व्यंजना। लक्षणाक प्रयोग: 'साहेव' आ 'पाग' सन कविता मे देखल जा सकैत अछि । जखन कवि 'पाग' कें संग्रहालय मे राखबाक बात करैत छथि, तखन 'पाग' अपन मूल 'अभिधा' (शिरोवस्त्र) कें त्याग कऽ अपन 'लक्ष्यार्थ' (अतीतमुखी जडता) कें प्रकट करैत अछि। व्यंजनाक प्रखरता: 'अंतिम आस' कविता मे न्यूजीलैंडक प्रधानमंत्रीक प्रसंग मे नारी कें "अंतिम आस" कहब 'प्रयोजनवती लक्षणा' थिक, जाहि सँ 'व्यंजना' ई निकलैत अछि जे वैश्विक संकट मे करुणा एकमात्र रक्षक अछि । हरिमोहन झाजीक 'शाब्दिक बोध'क सिद्धांतक अनुसार, एहि ठाम शब्दक 'शक्ति' पाठक मे एकटा नूतन 'संस्कार' (impression) जागृत करैत अछि। ३. विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क (गजेन्द्र ठाकुर) 'विदेह'क फ्रेमवर्क साहित्य कें 'सत्ता' आ 'वंचित'क बीचक विचारधारात्मक संघर्षक रूप मे देखैत अछि। वंचितक स्वर: 'एहि आपत्कालमे' कविता श्रृंखला कोरोना कालक प्रवासी मजदूरक 'समानान्तर इतिहास' कें उरेहैत अछि । जखन मुख्यधाराक इतिहास 'आँकड़ा' लिखैत छल, तखन अभिषेकजीक कविता ओहि 'वंचित'क पीड़ा कें 'वास्तविक शब्दशास्त्र' (actual philology) मे परिवर्तित कऽ रहल छल। इतिहास बोध: 'इतिहास कहलक' आ 'इतिहासक इजोतमे' कविता मे कवि इतिहास कें कोनो 'झग्गड़क साक्ष्य' नहि, अपितु एकटा 'पुनरुत्थानक नव अध्याय' मानैत छथि। ई 'विदेह'क ओहि दृष्टिक अनुरूप अछि जे मानैत अछि जे ज्ञान आ सत्य 'बनाओल' जाइत अछि (Foucaultian perspective) आ कविता ओहि सत्य कें नव रूप दैत अछि। ४. भारतीय आ पाश्चात्य समीक्षा सिद्धांतक समन्वय भारतीय काव्यशास्त्र (रस आ ध्वनि): अभिषेकजीक कविता मे 'प्रसाद गुण' प्रधान अछि, जे पाठक कें सहजहि 'अर्थोपलब्धि' करबैत अछि । 'कोना परतारब हे तथागत' मे 'करुण रस' अपन चरमोत्कर्ष पर अछि । पाश्चात्य 'ट्रेजेडी'क विपरीत एहि ठाम करुणा केवल शोक नहि, अपितु 'चिकित्सकीय अनुसंधान'क तार्किक माँग करैत अछि, जे भारतीय 'न्याय' आ पाश्चात्य 'वैज्ञानिक तर्कवाद'क सुंदर मेल थिक। आधुनिकता बनाम परम्परा: पाश्चात्य समीक्षाक 'मॉडर्निटी' (modernity) अभिषेकजी लग कोनो नकल नहि, अपितु एकटा 'जीवन दृष्टि' थिक । 'पहाड़ : एकटा संभावना' कविता मे पहाड़ कें 'स्थापित प्रतिपक्षी' कहब हेगेलियन द्वंद्वात्मकता (Dialectics) कें भारतीय दर्शनक 'धैर्य' सँ जोड़ब थिक । निष्कर्ष 'आउ स्वप्न साझी करी' काव्य-संग्रह अपन 'शाब्दिक बोध' मे 'अखंड वाक्य स्फोट' जकाँ अछि, जतय प्रत्येक कविता अलग होइतहुँ एकटा पूर्ण 'मनुखताइ'क विमर्ष ठाढ़ करैत अछि । नव्य न्यायक सूक्ष्मता, हरिमोहन झाजीक भाषाई गहनता आ विदेहक समानान्तर ऐतिहासिक दृष्टि एहि पोथी कें मैथिली साहित्यक एकटा 'कालजयी' दस्तावेज सिद्ध करैत अछि। ई संग्रह मात्र मैथिली पाठक लेल नहि, अपितु कोनो सेहो साहित्यक अनुरागी लेल पठनीय अछि । अभिषेकजीक कविता अपन कथ्य सँ पाठक कें सहजहि जोड़ि लैत अछि आ ओकरा चिंतन करबा लेल बाध्य करैत अछि । संक्षेपमे कहल जाय तऽ 'आउ स्वप्न साझी करी' एकटा एहन 'साक्षी' थिक जे अपन समयक सत्य कें  निर्भीकता सँ कहैत अछि। Works cited 1.         बेनीपट्टी परिसरक लेखन-1 : : मिथिलेश कुमार झा - Maithil Manch, accessed on May 6, 2026, https://www.maithilmanch.in/ २.         विदेह पोथी - विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका, accessed on May 6, 2026, https://www.videha.co.in/ [सैद्धांतिक विवेचन लेल देखू- मैथिली समीक्षाशास्त्र- गजेन्द्र ठाकुर] अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१४. गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली लेल एकटा नारी केन्द्रित समीक्षाशास्त्र [क्वीर-फेमिनिज्म सहित] [सन्दर्भ- कामिनीक "खण्ड-खण्ड मे बँटैत स्त्री" आ शान्ति लक्ष्मी चौधरीक"लेस्बियन कॉन्टिन्युअम"] गजेन्द्र ठाकुर मैथिली लेल एकटा नारी केन्द्रित समीक्षाशास्त्र [क्वीर-फेमिनिज्म सहित] [सन्दर्भ- कामिनीक “ खण्ड-खण्ड मे बँटैत स्त्री” आ शान्ति लक्ष्मी चौधरीक"लेस्बियन कॉन्टिन्युअम"] १.खण्ड-खण्ड मे बँटैत स्त्री: कामिनीक काव्य-संग्रहक समीक्षा २. शान्ति लक्ष्मी चौधरीक "लेस्बियन कॉन्टिन्युअम": समीक्षा आ कामिनीसँ तुलनात्मक विश्लेषण १ खण्ड-खण्ड मे बँटैत स्त्री: कामिनीक काव्य-संग्रहक समीक्षा प्रस्तावना: शीर्षकक गहन अर्थ कामिनीक काव्य-संग्रह "खण्ड-खण्ड मे बँटैत स्त्री" (2017) आधुनिक मैथिली कवितामे स्त्रीवादी चेतनाक एकटा महत्त्वपूर्ण दस्तावेज अछि। शीर्षक स्वयं एकटा सशक्त काव्यात्मक कथन अछि - स्त्रीक अस्तित्व कोना पितृसत्तात्मक समाजमे विखंडित होइत जाइत छैक, कोना ओ अपन विभिन्न भूमिकामे (पत्नी, माय, बेटी, बहिन, बहु) विभाजित भ' क' अपन मौलिक अस्मिता हेरा दैत छथि। ई विखंडन खाली सामाजिक नहि, मनोवैज्ञानिक सेहो अछि। खण्ड-खण्ड मे बँटैत स्त्री (शीर्षक कविता) ई संग्रहक केन्द्रीय कविता अछि जे स्त्री-अस्तित्वक विखंडनक त्रासदी प्रस्तुत करैत अछि: "स्त्रीक देहक संग-संग / बिकाइत अछि आब / स्त्रीक कोखि आ दूध सेहो / स्त्री बेचि अबैत अछि / नहि जानि कोन खगता मे / अपन ममतो" प्रमुख विशेषता: विखंडनक बहुआयामिकता: कविता केवल शारीरिक विखंडनक नहि, मानसिक आ भावनात्मक विखंडनक सेहो चर्चा करैत अछि। आत्मसंघर्षक चित्रण: स्त्री अपन विभिन्न भूमिकामे कोना अपन मौलिक स्वरूप हेरा दैत छथि। करुण स्वर: "एहन कठोर तँ / ओ नहि छल पहिने / या बना देलियै" - ई पंक्ति समाजक जिम्मेदारी सेहो स्थापित करैत अछि नोर ई कविता स्त्रीक मौन पीड़ाक प्रतीक अछि: "जखन कखनो खसैत छै / कोनो स्त्रीक आँखि सँ नोर / ओ मात्र पानिक / किछु बुन्द नहि रहैत अछि / ओ रहैत अछि / अन्याय आ अत्याचारक विरुद्ध" साहित्यिक गुण: प्रतीकात्मकता: नोर मात्र नोर नहि, विद्रोहक प्रतीक सामाजिक टिप्पणी: पुरुषक असंवेदनशीलता ("एहन कठोर तँ / ओ नहि छल पहिने") प्रश्नाकुलता: "हिला देबाक ताकति / कोना बिला गेल" ई केहन विडम्बना स्त्री शिक्षाक विडम्बनाक शक्तिशाली व्यंग्य: "जे स्त्रीक आँचर मे मुँह छुपबैत अछि / जे स्त्रीक शरीर कें दोहन करैत अछि / जे स्त्रीक बिना जीवि नहि सकैत अछि / वैह स्त्रीक मान-सम्मान पर / उठबैत अछि सवाल" काव्य-शिल्प: अनुप्रासक प्रयोग: "मुँह छुपबैत", "कुलटा अछि", "नरकक खान अछि" समानांतर संरचना: तीनटा प्रश्नाकुल पंक्तिक पुनरावृत्ति तीव्र व्यंग्य: पुरुषक दुमर्जाक कटु आलोचना अन्तर्मन प्रेमक गहन मनोविश्लेषणात्मक कविता: "जँ अहाँ करैत छी / कोनो स्त्री सँ प्रेम / तऽ रातिक अन्हरिया मे नहि / दिनक इजोत मे" विशेष गुण: नैतिक स्पष्टता: प्रेम झाँपल नहि, खुला हेबाक चाही सामाजिक दायित्व: समाजक आगाँ उत्तरदायी प्रेम भावनात्मक गहनता: आत्मीयताक सत्य अर्थ ब्रह्मावाक्य पितृसत्तात्मक धार्मिक संरचनाक तीव्र आलोचना: "शकीना खातुन / आइ बड़ उदास अछि / बेर-बेर नोरा जाइत छै / ओकर आँखि" प्रमुख तत्त्व: ऐतिहासिक संदर्भ: शकीना खातुनक कथा धार्मिक आलोचना: "बाल-बच्चा सँ भरल-पुरल घर" वाला पुरुषक पाखंड स्त्रीवादी विमर्श: धर्मक नामपर स्त्री-शोषण पुनर्नवा आत्म-पुनर्निर्माणक सशक्त कविता: "आइ अहाँक नामे / तिल-कुश तऽ कें / नहा एलो हम / बीच धार सँ / आइ सँ अतीत भेलों अहाँ / हमरा लेल" काव्य-विशेषता: रूपकक प्रयोग: तिल-कुश, धार, स्त्रीत्वक प्रतीक आत्मसम्मानक घोषणा: पुरुष-केन्द्रितताक अस्वीकार भाषिक सौन्दर्य: लोक-परंपराक प्रयोग (तिल-कुश) अग्नि-परीक्षा रामायणक सीताक अग्निपरीक्षाक समकालीन पुनर्पाठ: "पुरुषक गलतीक सजा / स्त्री कियै भोगती / अग्नि-परीक्षा / बेर-बेर सीते कियै देती / सामाजक रीति-नीति" महत्त्वपूर्ण पहलू: मिथकीय पुनर्व्याख्या: सीताक अग्निपरीक्षाक प्रश्नांकन लैंगिक न्यायक माँग: पुरुष किएक नहि देलक अग्निपरीक्षा? सामाजिक आलोचना: दोहरा मानदंडक विरोध स्त्रीक नियति स्त्रीक सामाजिक नियतिक दार्शनिक विवेचन: "धरतीक कोखि मे / पुनः समाय / अहाँ नीक नहि केँलौं सीता / बन्द कऽ देलियै / सदा-सदाक लेल" दार्शनिक गहनता: नियतिवादक प्रश्नांकन: स्त्रीक नियति पूर्वनिर्धारित अछि की समाज द्वारा थोपल? मिथकीय संदर्भ: सीताक धरती-प्रवेश करुणा आ विद्रोह: मिश्रित भावक सुन्दर प्रस्तुति दू मुट्ठी धान आर्थिक शोषणक मार्मिक चित्रण: "छाती जुराइत अछि / ई हमरे बाबाक लगाओल / कलम-गाछी छी / ई हमरे पिताक बनाओल घर छी" प्रमुख विशेषता: आर्थिक अधिकारक प्रश्न: स्त्रीक सम्पत्तिमे अधिकार भावनात्मक तीव्रता: पैतृक सम्पत्तिक स्मृति सामाजिक यथार्थ: कन्या-दानक परंपराक आलोचना स्त्रीक धैर्य धैर्यक सीमाक सशक्त प्रस्तुति: "स्त्री हेब की कोनो कम पेष बात छी / नहि छी कम पैघ बात / तें तऽ / तें तऽ चुकबऽ पड़ैत छै / स्त्री कें स्त्री हेबाक दण्ड" साहित्यिक गुण: व्यंग्यात्मक स्वरूप: "चुकबऽ पड़ैत छै" तार्किक प्रवाह: क्रमिक तर्कक विकास भावनात्मक तीव्रता: धैर्यक टूटनाइ दोसर कृष्ण आधुनिक संबंधक जटिलताक चित्रण: "माधव! अहाँ केना बिसरि गेलियै / की हम अहींक राधा छी / जकरा कहियो अहाँ / अपन कहने छलियै" प्रमुख तत्त्व: मिथकीय समानता: राधा-कृष्णक आधुनिक संदर्भ प्रेमक विडम्बना: परित्यागक पीड़ा प्रश्नाकुलता: "ई वंशीवट / ई वृन्दावन / आइ सब मौन अछि" कन्यादान मने गंगा स्नान कन्या-दानक परंपराक तीव्र विरोध: "कन्यादान कैल जाइत अछि / एखनो हमरा ओतय / पिता! हाथ मे जव-कुश लऽ / अपन बेटीक हाथ/ कोनो दोसर पुरुषक हाथ मे दैत" विशेष गुण: परंपराक पुनर्परिभाषा: कन्यादानक संगहि गंगा-स्नान? पितृसत्ताक आलोचना: बेटीक वस्तुकरण आत्मसम्मानक घोषणा: हम करैतौं तँ की करितौं। “. तील-चाउर स्त्री-स्वातंत्र्यक प्रतीकात्मक कविता: माय कहियो नहि देलखिन तिला-सँकरैतपर तील-चाउर खेबाक लेल, टोल भरि बाँटि अबथिन, कहैत छलखिन जे बेटीक जीवन तँ ओनाहिये भारी छै, किए ओकरा तील खुआ कऽ ऋणी बनबियै। काव्य-शिल्प: लोक-परंपराक प्रयोग: तील-चाउरक प्रतीक सामाजिक टिप्पणी: स्त्रीक अधिकारक हनन प्रतीकात्मकता: तील-चाउर = स्त्री-स्वतंत्रता ”. हम क्रीतदासी नहि दासताक अस्वीकारक घोषणापत्र: -माय रहती जीवन भरि / बाबूजीक संग / हुनक बंधुआ मजदूर बनि कें प्रमुख विशेषता: आत्मसम्मानक घोषणा: "हम क्रीतदासी नहि" पीढ़ीगत अंतर: माँक बलिदान बनाम बेटीक विद्रोह सामाजिक परिवर्तनक आकांक्षा: नव युगक स्वप्न .. उत्स स्मृति आ वर्तमानक द्वन्द्व: -हम अहाँक पत्नीवेटा नहि / किछु आरो छी / जेना कि ककरो माय / ककरो बहिन / ककरो बेटी साहित्यिक विशेषता: बहुआयामी अस्मिता: स्त्रीक विविध भूमिका आत्मान्वेषण: हम जे कहि रहल छी भावनात्मक जटिलता: स्मृति आ वर्तमानक संघर्ष “ मोफलर शहरी जीवनक विडम्बनाक चित्रण: -आइ एकटा मोफलर खरीदलौं / आइ एकटा मोफलर देखलौं/ तऽ मोन पड़ि गेल प्रमुख तत्त्व: ”भौतिकवादक आलोचना: शहरी जीवनक खोखलापन स्मृतिक महत्त्व: गामक जीवनक मधुरता तुलनात्मक विश्लेषण: शहर बनाम गाम “ स्त्रीक रचना पुरुष स्त्री-पुरुष संबंधक दार्शनिक विवेचन: -जखन कखनो खसैत / पुरुषक माथ सँ घाम / स्त्री अपन आँचर सँ / पोछबै करतै दार्शनिक गहनता: सहअस्तित्वक दर्शन: स्त्री-पुरुषक परस्परावलंबन कोमलताक शक्ति: स्त्रीक स्नेहक महत्त्व समानताक माँग: "किये तऽ' पुरुष / स्त्रीयेक रचना छी" द्रौपदी-1 महाभारतक द्रौपदीक समकालीन पुनर्पाठ: -द्रौपदी! कतेक खण्ड मे / बँटल हेत / अहाँक भावना ओहि दिन / जहिया खण्ड-खण्ड मे विभक्त कऽ.. साहित्यिक गुण: मिथकीय पुनर्व्याख्या: द्रौपदीक आधुनिक दृष्टि बहुपतित्वक प्रश्नांकन: पाँच पति = विखंडन स्त्री-अस्मिताक संकट: विभाजित अस्तित्व द्रौपदी-2 द्रौपदीक चीरहरणक समकालीन प्रासंगिकता: -द्रौपदी! असहज लागि रहल अछि / अहाँक खुजल केशक भार हमरा" प्रमुख विशेषता: चीरहरणक प्रतीक: आधुनिक स्त्रीक शोषण कृष्णक अनुपस्थिति: रक्षकक अभाव आत्मबलक आवश्यकता: स्वयं लड़बाक संकल्प धरौआ साड़ी सामाजिक रूढ़िक तीव्र आलोचना: यशोदा जीक 'ओ' / सरकारी बाबू / सब दिन आँखि खोलितहि” विशेष गुण: व्यंग्यात्मक लहजा: "यशोदा जीक" सामाजिक पाखंडक भंडाफोड़: धार्मिक आडंबर स्त्री-विरोधी परंपराक विरोध: मृत्युक बाद सेहो नियंत्रण सम्बन्धहीन आधुनिक संबंधक खोखलापनक चित्रण: -अहाँक देलहा गुलाब / मुरझा गेल / सुखा गेलै ओकर पातो / गंध तऽ पहिनहिं बिला गेल रहै साहित्यिक विशेषता: प्रतीकात्मकता: गुलाब = प्रेम क्षयक चित्रण: संबंधक मृत्यु भावनात्मक शून्यता: "मुरझा गेल" समयक वेग समयक क्रूरताक मार्मिक प्रस्तुति: -क्षमा करब हे जननी / जीवनक एहि चारिमे अवस्था मे / जतय अहाँ कें बेगरता अछि प्रमुख तत्त्व: पीढ़ीगत संघर्ष: माँक वृद्धावस्था सामाजिक दायित्व: परिवारक उपेक्षा करुणा आ विवशता: "बिमारी आ चारिमपन" बड़ मोन पड़ैए हमरा अपन घर प्रवासक पीड़ाक भावुक अभिव्यक्ति: -एत्तै कत्तौ छल / हमर घर / जे आब नहि देखा रहल अछि काव्य-सौन्दर्य: नोस्टाल्जिया: घरक स्मृति विस्थापनक पीड़ा: परदेशी जीवन आत्मीयताक महत्त्व: घर = अपनत्व परित्यक्ता नियतिक क्रूरताक दार्शनिक विवेचन: -कियै सदैव परित्यक्ता / स्त्रीये होइत अछि / पुरुष कियै नहि होइत अछि परित्यक्त विशेष गुण: लैंगिक असमानताक प्रश्न: किएक स्त्रीए परित्यक्ता? दार्शनिक गहनता: नियति बनाम समाज प्रश्नाकुलता: तीव्र प्रश्नक श्रृंखला ई उचित नहि आर्य रामायणक पुनर्पाठक साहसी प्रयास: -प्रेम मे परित्याग / उचित नहि आर्य / अहाँ तऽ कहाइत छलहुँ प्रमुख विशेषता: मिथकीय चरित्रक पुनर्मूल्यांकन: रामक आलोचना स्त्रीवादी दृष्टि: सीताक पक्षधरता साहसी प्रश्नांकन: मर्यादाक पुनर्परिभाषा हम लड़ब आत्मबलक सशक्त घोषणा: -हम लड़ब / अन्त-अन्त धरि / जामे धरि बँचल रहत साहित्यिक गुण: संघर्षक संकल्प: जीवन-पर्यन्त लड़ाई आत्मविश्वासक घोषणा: एकटा स्त्री प्रेरणादायक स्वर: भविष्यक आशा चानदाइ लोक-परंपराक सुन्दर प्रयोग: -चानदाइ जखन चिंतित भेल रहथि / पहिल बेर सासुर विशेष गुण: लोक-काव्यक प्रभाव: चानदाइक कथा सामाजिक यथार्थ: परिवारक द्वन्द्व भावनात्मक सौन्दर्य: स्मृति आ वर्तमान एहनो कत्तौ भेलैए सामाजिक परिवर्तनक आकांक्षा: -हे भगवान! पुनमिया नहि बचतै / एहि बेर प्रमुख तत्त्व: पुनर्जन्मक अस्वीकार: ई जीवन बहुत करुण स्वर: पीड़ाक गहनता आध्यात्मिक प्रश्नांकन: भगवानसँ शिकाइत उपेक्षित उपेक्षाक मनोवैज्ञानिक प्रभाव: -जीवन सँ जुड़ि जाइत अछि / किछु चीज ऐना / जे ओ चीज भऽ जाइत अछि प्रधान साहित्यिक विशेषता: मनोविज्ञानक सूक्ष्म विश्लेषण: उपेक्षाक प्रभाव भावनात्मक गहनता: दाइ राखि देलथि हमर नाम आत्मान्वेषण: अपन पहचानक खोज गीता जीवन-दर्शनक काव्यात्मक प्रस्तुति: -जिम्मेदारीक पहाड़ तर / दबल अछि गीता / चारि-चारि गो बेटी प्रमुख विशेषता: सामाजिक दायित्व: स्त्रीक बोझ करुण चित्रण: जिम्मेदारीक पहाड़ तार-तार भेल जीवन जीवनक विघटनक मार्मिक चित्रण: -पहिल बेर जखन देने रही / अपना हाथ मे हमर हाथ साहित्यिक गुण: स्मृति आ वर्तमानक द्वन्द्व: प्रेमक स्मृति विघटनक पीड़ा: "तार-तार भेल जीवन" भावनात्मक तीव्रता: करुण रस एतेक भेलाक बादो सामाजिक रूढ़िक विरोध: -माथक घाम / जखन पैर दऽ खसैत अछि / कहाँ चलैत छैक पता एकटा स्त्री कें विशेष गुण: श्रमक मूल्यांकन: स्त्री-श्रमक उपेक्षा लैंगिक असमानता: पुरुषक विशेषाधिकार तीव्र प्रश्नांकन: "कोनो कहानी" मौन मौनक शक्तिक दार्शनिक विवेचन: -गुलाबक पत्ती नहि अछि / अहाँक प्रेम / आ नहि बगुरक काँट दार्शनिक गहनता: मौनक महत्त्व: शब्दातीत प्रेम सूक्ष्म भावक अभिव्यक्ति: "हमरा चाहैत" प्रतीकात्मकता: मौन = गहन प्रेम टूटल तार आधुनिक जीवनक विडम्बना: "महगाइ, बीमारी आ बेरोजगारी जकाँ / हमरा लेल.. प्रमुख तत्त्व: सामाजिक यथार्थ: महगाइक मार आर्थिक संकट: बेरोजगारी करुण चित्रण: जीवनक संघर्ष पारो स्त्री-स्वतंत्रताक सशक्त घोषणा: -पारो आब सियान भऽ गेली / अपनहिं लैत छथि निर्णय / अपना लेल साहित्यिक विशेषता: आत्मनिर्णयक अधिकार: स्वतंत्र निर्णय सामाजिक परिवर्तन: नवयुगक आगमन आशावादी स्वर: भविष्यक स्वप्न अल्हड़ हँसी मातृत्वक सुन्दर चित्रण: -कमलक फूल जकाँ / भभा कें हँसैत अछि 'प्राची'" काव्य-सौन्दर्य: प्रकृति-चित्रण: कमलक उपमा मातृत्वक आनंद: भभा कऽ हँसब कोमल भाव: स्नेहक अभिव्यक्ति स्त्री आ बुद्ध आध्यात्मिक समानताक प्रश्न: -एहि सए दुःख सँ नीक एक दुःख / नीक तऽ होइतए' / जे बुद्ध बनि जइतहुँ दार्शनिक गहनता: आध्यात्मिक खोज: मुक्तिक आकांक्षा लैंगिक प्रश्न: स्त्री किएक नहि बनत बुद्ध? समानताक माँग: आध्यात्मिक अधिकार आदि सँ अन्त धरि जीवन-चक्रक दार्शनिक विवेचन: -बर आ पीपरक जड़ि जकाँ / ततेक नै समायल छी हम.. प्रमुख विशेषता: प्रकृतिक प्रतीक: बर-पीपरक जड़ि आत्मान्वेषण: अस्तित्वक खोज दार्शनिक प्रश्नांकन: जीवनक अर्थ प्रतिकार विद्रोहक सशक्त घोषणा: "नील आसमानी चादरि सन / पसरल अछि / हमर सम्पूर्ण अस्तित्व पर.. साहित्यिक गुण: प्रतिकारक संकल्प: शोषणक विरोध आत्मबलक घोषणा: "हम की करी" आशावादी स्वर: भविष्यक विश्वास माय मातृत्वक करुण चित्रण: -कतेक नीक होइतए / की माय / कहियो बूढ़ि नहि होइतथि प्रमुख तत्त्व: माँक बलिदान: जीवन-पर्यन्त त्याग करुणाक गहनता: आत्मीयताक चित्रण सामाजिक टिप्पणी: माँक उपेक्षा पाखण्ड धार्मिक पाखंडक तीव्र आलोचना: -'त्रिया चरित्रम् पुरुषस्य भाग्यम्' / व्यंग्य सँ जपैत" विशेष गुण: धार्मिक आलोचना: शास्त्रक पुनर्पाठ स्त्री-विरोधी सोचक भंडाफोड़: पाखंडक पर्दाफाश व्यंग्यात्मक लहजा: तीव्र आक्रोश मुक्ति मुक्तिक आकांक्षाक काव्यात्मक अभिव्यक्ति: -बड़ मनोयोग सँ / पुनीता केलक अछि / अपन पिताक श्राद्ध साहित्यिक विशेषता: धार्मिक पुनर्परिभाषा: स्त्रीक अधिकार सामाजिक परिवर्तन: परंपराक तोड़ आत्मविश्वासक घोषणा: मुक्तिक मार्ग ओ पुरुषार्थ कौन काजक पुरुषार्थक पुनर्परिभाषा: -हे समाजक भोष्म पितामह / कते दिन धरि मौन रहबै“ प्रमुख तत्त्व: पुरुषार्थक प्रश्नांकन: कोन काजक पुरुषार्थ? सामाजिक उपेक्षाक आलोचना: मौन किएक? लैंगिक समानताक माँग: समान अधिकार विष सँ सविष जीवनक विषक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण: -झड़कलही! / एहि नाम सँ / परिचित अछि जो साहित्यिक गुण: मनोवैज्ञानिक गहनता: विषक प्रभाव आत्मान्वेषण: पहचानक संकट दार्शनिक प्रश्नांकन: जीवनक अर्थ अस्तित्व अस्तित्वक दार्शनिक विवेचन: -अहाँ लाख मेटायब / नहि मेटायत हमर अस्तित्व दार्शनिक गहनता: अस्तित्ववादी चिंतन: स्वतंत्र अस्तित्व आत्मबलक घोषणा: अमिट उपस्थिति विद्रोहक स्वर: शोषणक विरोध रजनीगंधाक हँसी काव्यात्मक सौन्दर्यक उत्कृष्ट उदाहरण: -आँखि जखन मुनैत छी / कतहु किछु नहि देखाइत अछि काव्य-सौन्दर्य: प्रकृति-चित्रण: रजनीगंधाक प्रतीक सूक्ष्म भावक अभिव्यक्ति: अंधकारमे हँसी रहस्यात्मकता: गहन अर्थ विश्वासक हथियार विश्वासक महत्त्वक दार्शनिक विवेचन: -एतहुका पुरुष आ वचनक / कोनो सम्बन्ध नहि प्रमुख विशेषता: विश्वासक संकट: पुरुषक वचन सामाजिक यथार्थ: झूठक प्रभुत्व करुण स्वर: विश्वासघात फूल आ डारिक सम्बन्ध संबंधक दार्शनिक विश्लेषण: -फूल पुछैत अछि डारि सँ / हमरा-अहाँक बीच.. दार्शनिक गहनता: संबंधक स्वरूप: फूल-डारिक प्रतीक परस्परावलंबन: सहअस्तित्व प्रकृतिक दर्शन: जीवनक सत्य मझधार जीवन-संघर्षक मार्मिक चित्रण: -विवाहक आइ / सोलहम बरख बीति रहल अछि साहित्यिक गुण: समयक क्रूरता: वर्षक गणना एकाकीपनक चित्रण: अकेलापनक पीड़ा करुण रस: गहन वेदना अजन्मी-1 अजन्मे शिशुक मार्मिक चित्रण: -ठुनकि-ठुनकि/ कनैत अछि देवकी.. प्रमुख तत्त्व: मातृत्वक पीड़ा: अजन्मे शिशुक हत्या सामाजिक यथार्थ: कन्या-भ्रूणहत्या करुण चित्रण: मार्मिक अभिव्यक्ति अजन्मी-2 कन्या-भ्रूणहत्याक तीव्र विरोध: -हे! हमर पिता / अगर अहाँक माथ पर” विशेष गुण: सामाजिक आलोचना: पुत्र-मोहक विरोध पितृसत्ताक भंडाफोड़: लैंगिक भेदभाव तार्किक प्रवाह: क्रमिक तर्क ________________________________________ स्त्री देहक मीना बाजार स्त्री-वस्तुकरणक तीव्र आलोचना: -बदलय पड़तै/ एहि समाज कें" साहित्यिक विशेषता: वस्तुकरणक विरोध: स्त्री-देहक व्यापार सामाजिक परिवर्तनक माँग: क्रांतिक आवश्यकता तीव्र आक्रोश: व्यंग्यात्मक स्वर मान आत्मसम्मानक सशक्त घोषणा: -जहिना लगबैत छियै / गमला मे तुलसी" प्रमुख विशेषता: आत्मसम्मानक महत्त्व: स्वाभिमानक रक्षा सामाजिक यथार्थ: मान-अपमानक द्वन्द्व प्रतीकात्मकता: तुलसीक पूजा समग्र मूल्यांकन खण्ड-खण्ड मे बँटैत स्त्री: बहुआयामी समीक्षात्मक विश्लेषण प्रस्तावना: अन्तर्विषयक दृष्टिकोणक आवश्यकता कामिनीक काव्य-संग्रह "खण्ड-खण्ड मे बँटैत स्त्री" (2017) केवल एकटा साहित्यिक कृति नहि, बल्कि ज्ञानमीमांसीय, सामाजिक-राजनीतिक आ सौन्दर्यशास्त्रीय प्रश्नक एकटा जटिल संजाल अछि। एहि कृतिक समुचित मूल्यांकन लेल चारि प्रमुख विश्लेषणात्मक ढाँचाक प्रयोग आवश्यक अछि: 1.गंगेशक नव्य-न्याय दर्शन: ज्ञानमीमांसीय आधार आ प्रमाण-सिद्धान्त 2.विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क: मैथिली साहित्यिक परंपरामे स्थान 3.भारतीय सौन्दर्यशास्त्र: रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य सिद्धान्त 4.पाश्चात्य आ चीनी सिद्धान्त: फेमिनिज्म, पोस्ट-कोलोनियलिज्म, ताओवादी दर्शन खण्ड १: गंगेशक नव्य-न्याय दर्शनसँ मूल्यांकन १.१ गंगेशक तत्त्वचिन्तामणि आ काव्य-ज्ञानमीमांसा गंगेश उपाध्यायक (१३२५ ई.) तत्त्वचिन्तामणिमे प्रमाण-सिद्धान्तक जे विकास भेल, ओकर प्रयोग काव्यिक ज्ञान-संरचनाक विश्लेषण लेल अत्यन्त प्रासंगिक अछि। गंगेशक अनुसार चारि प्रमाण अछि: १.१.१ प्रत्यक्ष प्रमाण (Perceptual Knowledge) गंगेशक परिभाषा: "इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानम् अव्यपदेश्यं व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम्" कामिनीक कविता प्रत्यक्ष अनुभवसँ उत्पन्न ज्ञान प्रस्तुत करैत अछि: "दू मुट्ठी धान" कवितामे: छाती जुराइत अछि ई हमरे बाबाक लगाओल कलम-गाछी छी ई केवल स्मृति नहि, साक्षात् प्रत्यक्ष अनुभव अछि। गंगेशक अनुसार निर्विकल्पक (अवधारणारहित) प्रत्यक्ष आ सविकल्पक (अवधारणासहित) प्रत्यक्षमे भेद अछि। कामिनीक कविता सविकल्पक प्रत्यक्ष प्रस्तुत करैत अछि - जतय इन्द्रिय-अनुभव संस्कार आ स्मृतिसँ युक्त भ' क' काव्यिक ज्ञान उत्पन्न करैत अछि। १.१.२ अनुमान प्रमाण (Inferential Knowledge) गंगेशक व्याप्ति-सिद्धान्त: "व्याप्तिर्हि अविनाभावः साध्यसाधनयोः" "अग्नि-परीक्षा" कवितामे: पुरुषक गलतीक सजा स्त्री किये भोगली अग्नि-परीक्षा बेर-बेर सीते किये देती ई एकटा अनुमानात्मक तर्क-संरचना अछि: हेतु (Reason): सीता सदिखन अग्निपरीक्षा देलनि व्याप्ति (Pervasion): जतय पुरुष-प्रधान समाज, ओतय स्त्री-शोषण पक्ष (Locus): मिथिला-समाज साध्य (Probandum): पितृसत्तात्मक शोषण गंगेशक पञ्चावयव-न्याय (Five-Membered Syllogism) अनुसार: 1.प्रतिज्ञा: स्त्री शोषित अछि 2.हेतु: किएक तँ सीता अग्निपरीक्षा देलनि 3.उदाहरण: जतय पितृसत्ता, ओतय स्त्री-शोषण (जेना द्रौपदी-चीरहरण) 4.उपनय: मिथिलामे पितृसत्ता अछि 5.निगमन: अतः मिथिलामे स्त्री शोषित अछि १.१.३ उपमान प्रमाण (Analogical Knowledge) गंगेशक उपमान-सिद्धान्त: "तत्त्वज्ञानम् उपमानं साधारणधर्मकथनात्" "स्त्रीक रचना पुरुष" कवितामे: जखन कखनो खसैत पुरुषक माथ सँ घाम स्त्री अपन आँचर सँ पोछबै करतै ई अर्ध-साम्य (Partial Similarity) पर आधारित उपमान अछि। स्त्री-पुरुष संबंध परस्पर-पूरकता (Complementarity) पर आधारित होबाक चाही, शोषण पर नहि। ई गंगेशक साधर्म्य-वैधर्म्य-विचार (Analysis of Similarity and Dissimilarity) क उत्कृष्ट उदाहरण अछि। १.१.४ शब्द प्रमाण (Testimonial Knowledge) गंगेशक आप्त-वचन सिद्धान्त: "आप्तवचनं शब्दः" कामिनीक कविता लोक-वचन आ धार्मिक-शास्त्र दुनूक प्रश्नांकन करैत अछि: "पाखण्ड" कवितामे: 'त्रिया चरित्रम् पुरुषस्य भाग्यम्' व्यंग सँ जपैत भरि तरहत्थीक सिनूरक ठोप ई शास्त्रीय शब्द-प्रमाणक खण्डन अछि। गंगेशक अनुसार शब्द-प्रमाण लेल आप्तता (Trustworthiness) आवश्यक अछि। कामिनी प्रश्न उठबैत छथि: की ई शास्त्र-वचन आप्त अछि? की ई यथार्थ-ज्ञान प्रदान करैत अछि? १.२ गंगेशक अनवधारण-सिद्धान्त आ स्त्री-अस्मिता गंगेशक अनवधारण-सिद्धान्त (Theory of Indeterminate Perception) अनुसार, प्रथम चरणक ज्ञान अवधारणा-रहित होइत अछि। ओही तरहें, स्त्री-अस्मिताक प्रथम अनुभव पुरुष-परिभाषित नहि, बल्कि स्व-निर्धारित होबाक चाही। "ई उचित नहि आर्य" कवितामे: प्रेम मे परित्याग उचित नहि आर्य अहाँ तऽ कहाइत छलहुँ मर्यादा पुरुषोत्तम ई पुरुष-परिभाषित मर्यादाक खण्डन अछि। गंगेशक भाषामे कहब तँ ई असत्-ख्याति (Erroneous Cognition) अछि - जतय सीताक स्वतः-प्रमाणत्व (Self-Validity) नकारल गेल आ राम-परिभाषित "पवित्रता" आरोपित भेल। १.३ गंगेशक व्याप्ति-ग्रह-उपाय आ काव्यिक तर्क-संरचना गंगेश व्याप्ति-ग्रह (Cognition of Pervasion) लेल तीन उपाय देने छथि: 1.अन्वय (Positive Concomitance) 2.व्यतिरेक (Negative Concomitance) 3.अन्वय-व्यतिरेक (Combined Method) "परित्यक्ता" कवितामे: किये सदैव परित्यक्ता स्त्रीये होइत अछि पुरुष किये नहि होइत अछि परित्यक्त ई व्यतिरेक-विधि (Method of Difference) सँ तर्क अछि: अन्वय: जतय स्त्री, ओतय परित्यक्त व्यतिरेक: जतय पुरुष, ओतय परित्यक्तक अभाव निष्कर्ष: परिस्थिति लैंगिक-विशिष्ट, सार्वभौमिक नहि १.४ गंगेशक ख्याति-वाद आ काव्यिक सत्य गंगेशक विपरीत-ख्याति-वाद (Theory of Erroneous Cognition as Contrary to Reality) अनुसार, भ्रम एकटा वस्तुमे दोसर वस्तुक आरोपण अछि। "खण्ड-खण्ड मे बँटैत स्त्री" शीर्षक कवितामे: स्त्रीक देहक संग-संग बिकाइत अछि आब स्त्रीक कोखि आ दूध सेहो समाजक भ्रमात्मक ज्ञान अछि जे स्त्रीक समग्र अस्तित्व नहि देखैत अछि, बल्कि ओकरा खण्डित भूमिकामे आरोपित करैत अछि: माँ = कोखि आ दूध पत्नी = देह आ सेवा बेटी = बोझ आ दान ई असत्-ख्याति अछि - स्त्रीक एकात्मक सत्ताक विखण्डन असत्य आरोपण थीक। १.५ गंगेशक अभाव-सिद्धान्त आ स्त्री-अनुपस्थिति गंगेश चारि प्रकारक अभाव मानने छथि: 1.प्राग्-अभाव (Prior Non-existence) 2.प्रध्वंस-अभाव (Posterior Non-existence) 3.अत्यन्त-अभाव (Absolute Non-existence) 4.अन्योन्य-अभाव (Mutual Non-existence) "हम क्रीतदासी नहि" कवितामे: माय रहती जीवन भरि बाबूजीक संग हुनक बंधुआ मजदूर बनि कें ई अत्यन्त-अभावक निषेध अछि - स्त्री-स्वतंत्रताक सार्वकालिक अनुपस्थिति स्वीकार नहि कएल जा सकैत अछि। आधुनिक स्त्री प्राग्-अभावक अन्त करैत छथि - जे स्वतंत्रता पहिने नहि छल, आब अछि। १.६ गंगेशक अनुपलब्धि-प्रमाण आ काव्यिक मौन गंगेशक अनुपलब्धि-सिद्धान्त (Non-Apprehension as Proof of Absence) अनुसार, सक्षम प्रमाणक अभावमे सेहो ज्ञान भ' सकैत अछि। "मौन" कवितामे: गुलाबक पत्ती नहि अछि अहाँक प्रेम आ नहि बगुरक काँट ई मौनक प्रमाणिकता अछि। जे नहि कहल गेल, ओकरो अनुपलब्धिसँ जानल जा सकैत अछि। गंगेशक भाषामे, "योग्य-अनुपलब्धिः अभाव-प्रतीतेः कारणम्" - उपयुक्त अनुपलब्धि अभावक ज्ञानक कारण अछि। खण्ड २: विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क २.१ विदेह आन्दोलनक स्वरूप आ उद्देश्य विदेह ई-पत्रिका (२००० सँ)  मैथिली साहित्यमे समानान्तर इतिहास (Parallel History) स्थापित करबाक प्रयास करैत अछि, जे साहित्य अकादेमीक संस्थागत कैननक विकल्प प्रस्तुत करैत अछि। विदेह समानान्तर इतिहासक मूल सिद्धान्त: 1.लोकतान्त्रिक साहित्य-सृजन: संस्थागत अनुमोदनक बिना प्रकाशन 2.बहुवर्गीय प्रतिनिधित्व: दलित, स्त्री, आदिवासी स्वर 3.प्रतिपक्षीय कैनन: साहित्य अकादेमीक समानान्तर मान्यता-प्रणाली 4.डिजिटल-समावेशिता: भौतिक सीमासँ मुक्त प्रसार २.२ कामिनी: विदेह-परंपराक प्रतिनिधि कामिनीक काव्य-संग्रह विदेह-परंपराक केन्द्रीय विशेषताक प्रतिनिधित्व करैत अछि: २.२.१ संस्थागत-विरोध आ स्वतन्त्र-स्वर "पाखण्ड" कवितामे: 'त्रिया चरित्रम् पुरुषस्य भाग्यम्' व्यंग्य सँ जपैत ई धार्मिक-संस्थागत ज्ञानक खण्डन अछि। विदेह-परंपरा शास्त्रीय-सत्ताक प्रश्नांकन करैत अछि, ठीक जेना कामिनी पुरुष-परिभाषित धर्मक विरोध करैत छथि। २.२.२ सबाल्टर्न (Subaltern) स्वरक प्रतिनिधित्व गायत्री स्पिवाकक प्रश्न "Can the Subaltern Speak?" (1988) क उत्तर विदेह "हँ" मे दैत अछि। कामिनीक कविता कात-करोटक स्वरक प्रमाण अछि। "दू मुट्ठी धान" कवितामे: किछु नहि छी हमर एतय ने घर ने अंगना ने खेत-खरिहान ई आर्थिक-सबाल्टर्नक स्वर अछि - ओ स्त्री जे सम्पत्तिसँ वंचित छथि। विदेह एहन स्वरक संस्थागतकरण करैत अछि। २.२.३ मिथकक पुनर्पाठ: विदेहक पद्धति विदेह-परम्परा मिथिला-मिथकक समानान्तर पाठ प्रस्तुत करैत अछि। साहित्य अकादेमी जतय वैदिक-पौराणिक मिथकक महिमा-गान करैत अछि, विदेह ओकर पुनर्व्याख्या करैत अछि। "अग्नि-परीक्षा" कवितामे: पुरुषक गलतीक सजा स्त्री किये भोगली अग्नि-परीक्षा बेर-बेर सीते किये देती ई सीता-मिथकक विदेहीय पुनर्पाठ अछि। साहित्य अकादेमीक कैननमे सीता "पतिव्रता" छथि; विदेह-पाठमे सीता शोषितक प्रतीक छथि। २.३ विदेह इतिहास-लेखनक चारि स्तम्भ गजेन्द्र ठाकुरक "A Parallel History of Mithila & Maithili Literature" (चलि रहल परियोजना) चारि पद्धति प्रस्तुत करैत अछि: २.३.१ रस-ध्वनि-वक्रोक्ति सौन्दर्यशास्त्र (भारतीय) २.३.२ पाश्चात्य समीक्षा-सिद्धान्त २.३.३ नव्य-न्याय ज्ञानमीमांसा २.३.४ विदेह समानान्तर-इतिहास फ्रेमवर्क कामिनीक कविता चारू स्तम्भक उदाहरण अछि: "द्रौपदी-1" कवितामे: रस: करुण (द्रौपदीक विखण्डित अस्तित्व) पाश्चात्य: फेमिनिस्ट पुनर्पाठ (बहुपतित्वक आलोचना) नव्य-न्याय: अनुमान-प्रमाण (पाँच पति = विखण्डन) विदेह: मिथकक समानान्तर व्याख्या २.४ विदेह बनाम साहित्य अकादेमी: द्वन्द्वात्मक संबंध साहित्य अकादेमी कैनन: मान्यता-प्रणाली: राज्य-समर्थित पुरस्कार प्रकाशन: भौतिक पुस्तक, सीमित प्रसार भाषा: परिष्कृत, शास्त्रीय मैथिली विषय-वस्तु: परंपरागत, राष्ट्रवादी, धार्मिक विदेह समानान्तर कैनन: मान्यता-प्रणाली: जन-समर्थित, विदेह सम्मान, विशेषांक, समानान्तर इतिहास अभिलेखन। प्रकाशन: डिजिटल, वैश्विक प्रसार भाषा: लोक-मैथिली, बोलचालक भाषा विषय-वस्तु: समकालीन, स्त्रीवादी, दलित-चेतना कामिनीक कविता विदेह-परंपराक आदर्श उदाहरण अछि: "समयक वेग" कवितामे: क्षमा करब हे जननी जीवनक एहि चारिमे अवस्था मे ई बोलचालक मैथिली अछि, वृद्ध माँक उपेक्षाक समकालीन यथार्थ प्रस्तुत करैत अछि। साहित्य अकादेमी एहन "साधारण" विषयक उपेक्षा करैत अछि; विदेह एकरा केन्द्रीय बनबैत अछि। २.५ विदेहक लोकतान्त्रिक सौन्दर्यशास्त्र विदेह-परंपरा लोकतान्त्रिक सौन्दर्यशास्त्र (Democratic Aesthetics) स्थापित करैत अछि, जतय: 1.पाठक = समीक्षक: संस्थागत समीक्षकक एकाधिकार टूटल 2.लेखक = प्रकाशक: बिचौलियाक समाप्ति 3.स्थानीय = वैश्विक: मैथिलीक विश्व-प्रसार कामिनीक कविता सर्वसुलभ अछि - ने संस्कृत शब्दावलीक बाढ़ि, ने अस्पष्ट प्रतीक। ई जन-सौन्दर्यशास्त्र अछि। २.६ विदेह आ स्त्री-लेखन: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य मैथिली साहित्य-इतिहासमे स्त्री-लेखन सदिखन कात-करोट पर रहल अछि: विद्यापति-युग (ज्योतिरीश्वर पूर्व): कोनो प्रमुख स्त्री-कवि नहि आधुनिक-युग (२०वीं सदी): लिली रे, शेफालिका वर्मा- सीमित मान्यता विदेह-युग (२००० सँ):- केन्द्रीय स्थान समानान्तर कैननमे स्त्री-लेखन मुख्यधारा बनल "खण्ड-खण्ड मे बँटैत स्त्री" विदेह-युगक मीलक-पाथर अछि - पहिल बेर स्त्री-अनुभव केन्द्रीय काव्य-विषय बनल। २.७ विदेहक अभिलेखीय पद्धति (Archival Method) विदेह समानान्तर इतिहासक लेल कठोर अभिलेखीय पद्धति अपनबैत अछि: 1.प्रत्येक रचनाक प्रकाशन-तिथि दर्ज 2.लेखकक जीवनी-सामग्री संग्रहीत 3.पाठक-प्रतिक्रिया सुरक्षित 4.क्रॉस-रेफरेन्सिंग: कवि-कविताक परस्पर-संबंध कामिनीक कविता विदेह अभिलेखमे सुरक्षित अछि। ई अभिलेखीय कठोरता भविष्यक साहित्य-इतिहासकार लेल आधार-सामग्री उपलब्ध करबैत अछि। खण्ड ३: भारतीय सौन्दर्यशास्त्र: रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य ३.१ रस-सिद्धान्त (Theory of Aesthetic Relish) भरतमुनिक नाट्यशास्त्र (२०० ई.पू. - २०० ई.) आ आनन्दवर्धनक ध्वन्यालोक (९म सदी) रस-सिद्धान्तक आधार अछि। ३.१.१ नवरस आ कामिनीक कविता भरतक रस-सूत्र: "विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः" कामिनीक कवितामे करुण रस प्रधान अछि, किन्तु अन्य रसक सेहो उपस्थिति अछि: ३.१.१.१ करुण रस (Pathos) "तार-तार भेल जीवन" कवितामे: पहिल बेर जखन लेने रही अपना हाथ मे हमर हाथ एकटा सुखद अनुभूति भेल रहय हमरा लागल रहए.. स्थायी भाव: शोक विभाव (Determinants): प्रेमक स्मृति, वर्तमान विछोह अनुभाव (Consequents): नोर, दीर्घ-श्वास (implied) व्यभिचारी भाव (Transitory Emotions): स्मृति, निर्वेद, ग्लानि। आचार्य मम्मट "काव्यप्रकाश" (११म सदी) मे कहने छथि: "रसो वा काव्यात्मा“- रस काव्यक आत्मा थीक। कामिनीक कविता रसात्मक अछि, केवल भावक सूखल विवरण नहि। ३.१.१.२ रौद्र रस (Fury) "हम क्रीतदासी नहि" कवितामे: माय रहती जीवन भरि बाबूजीक संग हुनक बंधुआ मजदूर बनि कें (किन्तु बेटी कहैत छथि:) हम क्रीतदासी नहि स्थायी भाव: क्रोध विभाव: माँक दासत्व देखि क' आक्रोश अनुभाव: प्रतिरोधक घोषणा, दृढ़ स्वर व्यभिचारी भाव: उग्रता, अमर्ष, आवेग ३.१.१.३ वीर रस (Heroic) "हम लड़ब" कवितामे: हम लड़ब अन्त-अन्त धरि जामे धरि बँचल रहत.. स्थायी भाव: उत्साह विभाव: शोषण-संरचना अनुभाव: संकल्प-घोषणा व्यभिचारी भाव: धैर्य, गर्व, मति ३.१.२ रस-साधारणीकरण (Universalization of Emotion) आचार्य अभिनवगुप्त (१०म सदी) साधारणीकरण-सिद्धान्त देने छथि - जाहिमे व्यक्तिगत भाव सार्वभौमिक बनैत अछि। "मझधार" कवितामे: विवाहक आइ सोलहम बरख बीति रहल अछि अहाँ ओहि घर आ हम एहि घर मे ई केवल एकटा स्त्रीक अनुभव नहि, सम्पूर्ण विवाहित स्त्री-समाजक अनुभव बनि जाइत अछि। आलम्बन (नायिका) सँ उद्दीपन होइत अछि, आ पाठक रस-स्वाद करैत छथि - ई साधारणीकरण अछि। ३.२ ध्वनि-सिद्धान्त (Theory of Suggestion) आचार्य आनन्दवर्धनक ध्वन्यालोक (९म सदी) ध्वनि (Suggestion) केँ काव्यक आत्मा मानैत अछि। ३.२.१ ध्वनिक तीन भेद आनन्दवर्धनक अनुसार: 1.वस्तु-ध्वनि (Suggestion of Fact) 2.अलंकार-ध्वनि (Suggestion of Figure) 3.रस-ध्वनि (Suggestion of Emotion) ३.२.१.१ वस्तु-ध्वनि "दोसर कृष्ण" कवितामे: माधव! अहाँ केना बिसरि गेलियै की हम अहाँक राधा छी जकरा कहियो अहाँ अपन कहने छलियै वाच्यार्थ (Explicit): नायिका प्रश्न करैत छथि व्यंग्यार्थ (Suggested): कृष्ण-राधाक मिथक आधुनिक संबंधमे दोहराएल जाइत अछि- पुरुष सदिखन परित्याग करैत अछि ३.२.१.२ रस-ध्वनि "मौन" कवितामे: गुलाबक पत्ती नहि अछि अहाँक प्रेम आ नहि बगुरक काँट अहाँक प्रेम सुसुप्त ज्वालामुखी जकाँ अविचल अछि स्थिर अछि वाच्यार्थ: प्रेम बाह्य-प्रदर्शनसँ मुक्त अछि व्यंग्यार्थ (रस-ध्वनि): गहन शान्त-प्रेम (शान्त रस), जे शब्दातीत अछि आचार्य मम्मट कहने छथि: "काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये सद्यः परनिर्वृतये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे" - काव्य केवल यश लेल नहि, परम-आनन्द (निर्वृति) लेल सेहो। ध्वनि-शक्ति परम-आनन्द प्रदान करैत अछि। ३.२.२ ध्वनि बनाम अभिधा-लक्षणा संस्कृत काव्यशास्त्रमे तीन शब्द-शक्ति अछि: 1.अभिधा (Denotation): प्राथमिक अर्थ 2.लक्षणा (Indication): गौण अर्थ 3.व्यञ्जना (Suggestion): ध्वनित अर्थ "चानदाइ" कवितामे: चानदाइ जखन विदा भेल रहथि पहिल बेर सासुर अभिधा: चानदाइ सासुर जा रहल छथि लक्षणा: नव-वधूक चिन्ता व्यञ्जना (ध्वनि): पितृसत्तात्मक परिवार-संरचनामे स्त्रीक विस्थापनक भय। आनन्दवर्धन कहने छथि: "यत्र वाचकः शब्दः वाच्यादर्थादन्यं व्यङ्क्ते तत्र व्यञ्जनेत्याख्या" - जतय शब्द अपन प्राथमिक अर्थसँ अतिरिक्त अर्थ व्यक्त करए, ओतय व्यञ्जना। कामिनीक कविता व्यञ्जना-प्रधान अछि। ३.३ वक्रोक्ति-सिद्धान्त (Theory of Oblique Expression) आचार्य कुन्तक (१०वीं सदी) वक्रोक्ति-जीवितम् मे वक्रोक्तिक छह भेद देने छथि: ३.३.१ वर्ण-विन्यास वक्रोक्ति (Phonetic Obliquity) "नोर" कवितामे: जखन कखनो खसैत छै कोनो स्त्रीक आँखि सँ नोर "नोर" शब्दक प्रयोग मैथिलीक लोक-ध्वनि अछि। "अश्रु" सँ भाव-गाम्भीर्य कम होइत। ई वर्ण-विन्यास वक्रोक्ति अछि। ३.३.२ प्रत्यय-वक्रोक्ति (Morphological Obliquity) "खण्ड-खण्ड मे बँटैत स्त्री" शीर्षक स्वयं वक्रोक्ति अछि: सामान्य अभिव्यक्ति: "विभाजित स्त्री" वक्र अभिव्यक्ति: "खण्ड-खण्ड मे बँटैत" - वर्तमान-काल, निरन्तरता "बँटैत" (present continuous) प्रत्यय सतत-प्रक्रिया सूचित करैत अछि - ई एक बेरक घटना नहि, बल्कि चलि रहल शोषण अछि। ३.३.३ वाक्य-वक्रोक्ति (Sentential Obliquity) "ई केहन विडम्बना" कवितामे: जे स्त्रीक आँचर मे मुँह छुपबैत अछि जे स्त्रीक शरीर कें दोहन करैत अछि जे स्त्रीक बिना जीवि नहि सकैत अछि वैह स्त्रीक मान-सम्मान पर उठबैत अछि सवाल ई अन्योक्ति-वक्रोक्ति अछि - प्रश्नाकुल वाक्य-संरचना। सीधे कहबाक बदला तीन समानान्तर वाक्यसँ क्रमिक तीव्रता बनाओल गेल अछि। ३.३.४ प्रकरण-वक्रोक्ति (Contextual Obliquity) "अग्नि-परीक्षा" कवितामे: मिथिलाक परिप्रेक्ष्यमे ई द्विअर्थी अछि: 1.रामायण-सन्दर्भ: सीताक अग्निपरीक्षा 2.समकालीन-सन्दर्भ: आधुनिक स्त्रीक सतत परीक्षा कुन्तक कहने छथि: "वक्रोक्तिर्विशिष्टा वागर्थव्यापारः" - वक्रोक्ति वाक् आ अर्थक विशिष्ट व्यापार अछि। कामिनीक कविता वक्रोक्ति-समृद्ध अछि। ३.४ औचित्य-सिद्धान्त (Theory of Propriety) आचार्य क्षेमेन्द्र (११वीं सदी) औचित्य-विचार-चर्चा मे औचित्यक महत्त्व स्थापित केलनि। ३.४.१ वस्तु-औचित्य (Propriety of Subject) "द्रौपदी-1" आ "द्रौपदी-2" कवितामे: मिथिला-संस्कृतिमे सीता आ द्रौपदी केन्द्रीय मिथक छथि। कामिनी एहि मिथकक पुनर्पाठ करैत छथि- ई वस्तु-औचित्य अछि। मिथिला-पाठक लेल ई मिथक स्वाभाविक संदर्भ अछि। ३.४.२ रस-औचित्य (Propriety of Emotion) स्त्री-शोषणक विषयमे करुण आ रौद्र रसक प्रयोग रस-औचित्य अछि। हास्य वा श्रृंगारक प्रयोग अनौचित्य होइत। ३.४.३ छन्द-औचित्य (Propriety of Metre) कामिनी मुक्त-छन्द (Free Verse) प्रयोग करैत छथि। समकालीन स्त्री-अनुभव लेल परम्परागत बरवै, सोरठा, दोहा उपयुक्त नहि। मुक्त-छन्द स्वयं मुक्तिक प्रतीक अछि - ई छन्द-औचित्य अछि। ३.४.४ देश-काल-औचित्य (Propriety of Time-Place) २१वीं सदीक मैथिली कवितामे स्त्रीवादी स्वर समयानुकूल अछि। ई काल-औचित्य अछि। मिथिलामे जतय सीता-जन्मभूमि अछि, ओतय सीताक पुनर्पाठ देश-औचित्य सेहो। ३.५ अलंकार-सिद्धान्त (Theory of Figures of Speech) आचार्य दण्डी (७वीं सदी) काव्यादर्श मे कहने छथि: "काव्यशोभाकरान् धर्मान् अलंकारान् प्रचक्षते" - अलंकार काव्यक शोभा-कारक धर्म छथि। ३.५.१ उपमा (Simile) "स्त्रीक रचना पुरुष" कवितामे: जखन कखनो खसतै पुरुषक माथ सँ घाम.. थाकल-हारल घर स्त्री एक थारी भात आ एक लोटा पानि तऽ परोसबे (परसबे) करतै उपमा: स्त्री = सेवक (अप्रत्यक्ष उपमा, लुप्तोपमा) ३.५.२ रूपक (Metaphor) "तील-चाउर" कवितामे: "तील-चाउर" स्वयं रूपक अछि: तील-चाउर = स्त्री-स्वतंत्रता बाँटब = समाजक विरोध ३.५.३ व्यतिरेक (Contrast) "हम क्रीतदासी नहि" कवितामे: माँ बनाम बेटीक व्यतिरेक: माँ: "बंधुआ मजदूर" बेटी: "क्रीतदासी नहि" ३.५.४ प्रश्न-अलंकार (Rhetorical Question) "परित्यक्ता" कवितामे: किये सदैव परित्यक्ता स्त्रीये होइत अछि पुरुष किये नहि होइत अछि परित्यक्त ई केवल प्रश्न नहि, आक्रोशक अलंकार अछि। उत्तरक अपेक्षा नहि, विरोधक घोषणा अछि। ३.६ काव्य-गुण (Qualities of Poetry) आचार्य वामन (८वीं सदी) काव्यालंकार-सूत्र-वृत्ति मे दश काव्य-गुण देने छथि। कामिनीक कवितामे मुख्य गुण: ३.६.१ ओज-गुण (Vigour) "हम लड़ब" कवितामे: हम लड़ब अन्त-अन्त धरि सरल, कठोर, द्रुत - ई ओज-गुणक लक्षण अछि। ३.६.२ प्रसाद-गुण (Lucidity) "नोर" कवितामे: जखन कखनो खसैत छै कोनो स्त्रीक आँखि सँ नोर सरल, स्पष्ट, तुरत बोधगम्य - ई प्रसाद-गुण अछि। ३.६.३ माधुर्य-गुण (Sweetness) "मौन" कवितामे: गुलाबक पत्ती नहि अछि अहाँक प्रेम कोमल, मधुर, हृदय-स्पर्शी - ई माधुर्य-गुण अछि। ३.७ काव्य-दोष (Blemishes in Poetry) आचार्य मम्मट काव्यप्रकाश मे काव्य-दोष गनने छथि। कामिनीक कवितामे सामान्यतः दोष-रहित अछि, किन्तु कतेको ठाम: ३.७.१ क्लिष्टता-दोष (Obscurity) सामान्यतः कामिनीक भाषा सरल अछि, किन्तु कतेको ठाम अति-संक्षिप्तता क्लिष्टता उत्पन्न करैत अछि। उदाहरण: "समयक वेग" कवितामे कतेको पंक्ति संदर्भ-हीन लागैत अछि। ३.७.२ ग्राम्यता-दोष (Vulgarity) कामिनी बोलचालक भाषा प्रयोग करैत छथि, जे कतेको आलोचकक दृष्टिमे "ग्राम्य" लागि सकैत अछि। किन्तु विदेह-परंपरामे ई गुण अछि, दोष नहि। खण्ड ४: पाश्चात्य समीक्षा-सिद्धान्त ४.१ फेमिनिस्ट साहित्य-सिद्धान्त ४.१.१ प्रथम-लहरि फेमिनिज्म: मेरी वुल्फस्टोनक्राफ्ट मेरी वुल्फस्टोनक्राफ्टक "A Vindication of the Rights of Woman" (1792) स्त्री-शिक्षा आ आर्थिक स्वतंत्रताक माँग केलक। "दू मुट्ठी धान" कवितामे: किछु नहि छी हमर एतय ने घर ने अंगना ने खेत-खरिहान ई आर्थिक-अधिकारक प्रश्न अछि - वुल्फस्टोनक्राफ्टक मुख्य माँग। स्त्री आर्थिक-रूपसँ परावलंबी रहलासँ राजनीतिक-स्वतंत्रता असंभव अछि। ४.१.२ द्वितीय-लहरि फेमिनिज्म: सिमोन द बोउवार सिमोन द बोउवारक "The Second Sex" (1949) क मुख्य थीसिस: "One is not born, but rather becomes, a woman." "खण्ड-खण्ड मे बँटैत स्त्री" कवितामे: स्त्रीक देहक संग-संग बिकाइत अछि आब स्त्रीक कोखि आ दूध सेहो ई बोउवारक थीसिसक काव्यिक प्रस्तुति अछि - स्त्री "बनाएल" जाइत छथि, जैविक-नियति नहि छथि। समाज स्त्रीक सम्पूर्ण अस्तित्व केँ "मातृत्व" मे समेटैत अछि - ई सामाजिक-निर्माण अछि। ४.१.३ तृतीय-लहरि फेमिनिज्म: जुडिथ बटलर जुडिथ बटलरक "Gender Trouble" (1990) जेंडर-परफॉर्मेटिविटी (Gender as Performance) क सिद्धान्त देलक। "स्त्रीक नियति" कवितामे: धरतीक कोखि मे पुनः समाय अहाँ नीक नहि केलौं सीता सीता नारीत्वक प्रदर्शन (Performance of Femininity) केलनि- "पतिव्रता" भूमिका निभेलनि। जखन ई प्रदर्शन असफल भेल (समाजक दृष्टिमे), तखन "धरतीमे समाय" गेलीह। ई बटलरक परफॉर्मेटिविटी-सिद्धान्तक उदाहरण अछि। ४.१.४ ब्लैक फेमिनिज्म: बेल हुक्स बेल हुक्सक "Ain't I a Woman?" (1981) प्रतिच्छेदी-उत्पीड़न (Intersectional Oppression) क सिद्धान्त देलक- स्त्री-उत्पीड़न जाति, वर्ग, नस्लसँ जुड़ल अछि। कामिनीक कवितामे सेहो वर्ग-आयाम स्पष्ट अछि: "दू मुट्ठी धान" कवितामे: गरीब ग्रामीण स्त्रीक अनुभव अछि। ई मध्यवर्गीय शहरी फेमिनिज्मसँ भिन्न अछि। हुक्सक अनुसार, सर्व-स्त्री समान नहि - वर्ग-भेद महत्त्वपूर्ण अछि। ४.२ मार्क्सवादी-फेमिनिस्ट सिद्धान्त ४.२.१ एंगेल्सक "The Origin of the Family, Private Property and the State" (1884) एंगेल्सक अनुसार, स्त्री-उत्पीड़न निजी-सम्पत्ति-प्रणालीसँ जुड़ल अछि। "कन्यादान मने गंगा स्नान" कवितामे: कन्यादान कैल जाइत अछि एखनो हमरा ओतय पिता! हाथ मे जव-कुश लऽ अपन बेटीक हाथ” "कन्यादान" = सम्पत्ति-हस्तान्तरण। पिता बेटीक "स्वामित्व" पतिकेँ सौंपैत छथि। ई एंगेल्सक थीसिसक प्रमाण अछि। ४.२.२ सिल्विया फेडेरीचीक "Caliban and the Witch" (2004) फेडेरीची "अवैतनिक घरेलू श्रम" (Unpaid Domestic Labour) केँ पूँजीवादक आधार मानैत छथि। "बड़ मोन पड़ैए हमरा अपन घर" कवितामे: एते कत्तौ छल हमर घर जे आब नहि देखा रहल अछि जकरा अंगना मे बैसि कऽ कएक बेर तेने रही हम अपना भाइ सँ नोत स्त्रीक घरेलू-श्रम अदृश्य अछि, अवैतनिक अछि। पूँजीवाद एहि अवैतनिक श्रमपर टिकल अछि - फेडेरीचीक मुख्य तर्क। ४.३ पोस्ट-कोलोनियल फेमिनिज्म ४.३.१ गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाकक "Can the Subaltern Speak?" (1988) स्पिवाकक प्रश्न: की सबाल्टर्न स्त्री बाजि सकैत छथि, वा हुनका लेल "बाजब" कोनो बुर्जुआ बुद्धिजीवी करैत छथि? कामिनीक कविता सबाल्टर्न स्त्रीक प्रत्यक्ष स्वर अछि, कोनो "प्रतिनिधित्व" नहि: "मझधार" कवितामे: बियाहक आइ सोलहम बरख बीति रहल अछि अहाँ ओहि घर आ हम एहि घर मे दुनू दू दिस छी ई मध्यवर्गीय शहरी बुद्धिजीवीक व्याख्या नहि, बल्कि स्वयं सबाल्टर्नक स्वर अछि। स्पिवाकक प्रश्नक उत्तर: हँ, सबाल्टर्न बाजि सकैत छथि - कामिनीक कविता प्रमाण अछि। ४.३.२ चंद्रा तल्पाडे मोहान्तीक "Under Western Eyes" (1984) मोहान्ती पाश्चात्य फेमिनिज्मक साम्राज्यवाद पर प्रश्न उठबैत छथि। पाश्चात्य फेमिनिस्ट तृतीय-विश्वक स्त्री केँ "एकरूप पीड़ित" मानैत छथि। कामिनीक कविता मैथिल-विशिष्ट अछि - सीता, द्रौपदी, चानदाइक संदर्भ सार्वभौमिक नहि, बल्कि स्थानीय-सांस्कृतिक अछि। ई मोहान्तीक माँगक अनुरूप अछि। ४.४ साइकोएनालिटिक फेमिनिज्म ४.४.१ सिग्मंड फ्रायडक Penis Envy सिद्धान्तक खण्डन फ्रायड मानैत छलाह जे स्त्री पुरुष-जननांगक ईर्ष्या (Penis Envy) सँ ग्रस्त छथि। "ई उचित नहि आर्य" कवितामे: प्रेम मे परित्याग उचित नहि आर्य कामिनी पुरुषक अनुकरणक इच्छा नहि, बल्कि पुरुष-प्रभुत्वक विरोध व्यक्त करैत छथि। ई फ्रायडक सिद्धान्तक खण्डन अछि। ४.४.२ लूस इरिगरेक écriture Féminine (स्त्री-लेखन) लूस इरिगरे (1974) स्त्री-विशिष्ट लेखन-शैली (Feminine Writing) क सिद्धान्त देलनि। स्त्री-लेखन: रैखिक नहि, वृत्तीय (Non-linear, Circular) तर्क-प्रधान नहि, भाव-प्रधान एकल-स्वर नहि, बहु-स्वर (Polyphonic) "खण्ड-खण्ड मे बँटैत स्त्री" संग्रहक संरचना देखू: रैखिक कथानक नहि - कविता स्वतन्त्र, क्रमिक कथाक अभाव भाव-प्रधान - तर्कसँ बेसी अनुभव बहु-स्वर - माँ, बेटी, पत्नी, विधवा - विविध स्वर ई इरिगरेक écriture Féminine क उदाहरण अछि। ४.५ एग्ज़िस्टेंशियलिस्ट फेमिनिज्म ४.५.१ सिमोन द बोउवारक "Ethics of Ambiguity" (1947) बोउवार अस्तित्ववादी स्वतंत्रता (Existential Freedom) स्त्रीक संदर्भमे लागू करैत छथि। मनुष्य स्वतंत्रताक निन्दा (Condemned to be free) अछि। "अस्तित्व" कवितामे: अहाँ लाख मेटायब नहि मेटायत हमर अस्तित्व जे छल-प्रपंच सँ छीन लेब अहाँ हमर एहि जीवन कें तऽ हम फेर सँ जन्म लेब अहाँक अँगना महक तुलसी बनि ई स्व-निर्धारित अस्तित्व (Self-Defined Existence) क घोषणा अछि। स्त्री पुरुष-परिभाषित (The Other) नहि, स्वयं-परिभाषित (The Self) छथि। बोउवारक अस्तित्ववादी फेमिनिज्मक काव्यिक रूप। ४.६ इको-फेमिनिज्म (Ecofeminism) ४.६.१ वंदना शिवाक "Staying Alive" (1989) वंदना शिवा स्त्री-प्रकृति समानता (Woman-Nature Analogy) क सिद्धान्त देलनि। पितृसत्ता स्त्री आ प्रकृति दुनूक शोषण करैत अछि। "तील-चाउर" कवितामे: "तील-चाउर" = प्रकृतिक उपहार, स्त्रीक अधिकार। दुनूकेँ पितृसत्ताक नियंत्रण अछि। इको-फेमिनिस्ट पाठमे, ई प्रकृति-स्त्री-स्वतंत्रताक प्रतीक अछि। ४.७ पोस्ट-स्ट्रक्चरलिस्ट फेमिनिज्म ४.७.१ मिशेल फूकोक Power/Knowledge सिद्धान्त फूकोक अनुसार, शक्ति आ ज्ञान परस्पर-संबद्ध अछि। "ज्ञान" तटस्थ नहि, बल्कि शक्ति-संरचनाक उत्पाद अछि। "पाखण्ड" कवितामे: 'त्रिया चरित्रम् पुरुषस्य भाग्यम्' व्यंग्य सँ जपैत ई शास्त्रीय-ज्ञान (Scriptural Knowledge) अछि, जे पुरुष-शक्तिक उत्पाद अछि। स्त्रीक "चरित्रहीनता" ज्ञान नहि, बल्कि शक्ति-प्रयोग अछि - फूकोक सिद्धान्त। ४.७.२ हेलेन सिक्सुसक "The Laugh of the Medusa" (1975) सिक्सुस स्त्री-लेखन (L'écriture Féminine) केँ पुरुष-भाषासँ मुक्ति मानैत छथि। "हम क्रीतदासी नहि" कवितामे: शीर्षक स्वयं नकारात्मक-परिभाषा अछि ("क्रीतदासी नहि"), जे सिक्सुसक अनुसार पुरुष-भाषाक सीमा अछि। स्त्रीकेँ सकारात्मक-परिभाषा चाही: "हम स्वतन्त्र छी", नहि "हम दासी नहि छी"। किन्तु कामिनी जनबैत छथि जे नकारसँ प्रारम्भ आवश्यक अछि - पहिने पुरुष-परिभाषाक खण्डन, तखन स्व-परिभाषा। ४.८ क्वीर थ्योरी आ फेमिनिज्म ४.८.१ मोनिक विटिगक "One is Not Born a Woman" (1981) विटिग कहैत छथि: "Lesbians are not women" - किएक तँ "स्त्री" विषमलैंगिक-संरचना (Heterosexual Matrix) क उत्पाद अछि। कामिनीक कवितामे विषमलैंगिकता (Heterosexuality) अनिवार्य मानल गेल अछि - क्वीर-विकल्पक अभाव अछि। ई सीमा अछि, जे शान्तिलक्ष्मी चौधरीक मैथिली काव्यमे अछि। खण्ड ५: चीनी दार्शनिक परंपरा ५.१ ताओवाद (Taoism) आ स्त्री-चेतना ५.१.१ लाओ-त्सुक "ताओ-ते-चिंग" (६ अम सदी ई.पू.) लाओ-त्सु यिन-यांग (Yin-Yang) द्वैत मानैत छथि। यिन = स्त्री-तत्त्व (Feminine Principle), यांग = पुरुष-तत्त्व (Masculine Principle)। ताओवादमे यिन-शक्ति (Feminine Power): कोमलता (Softness) > कठोरता ग्रहणशीलता (Receptivity) > आक्रमकता निष्क्रिय-सक्रियता (Wu Wei - Effortless Action) > बलपूर्वक कर्म "स्त्रीक रचना पुरुष" कवितामे: जखन कखनो खसतै पुरुषक माथ सँ घाम स्त्री अपन आँचर सँ पोछबै करतै ई यिन-शक्तिक उदाहरण अछि - कोमल, ग्रहणशील, पोषक। ताओवादमे ई शक्ति यांगसँ श्रेष्ठ मानल जाइत अछि। ५.१.२ "जल-तत्त्व" (Water Element) आ स्त्री-शक्ति लाओ-त्सु कहैत छथि: "Nothing in the world is softer than water, yet nothing is better at overcoming the hard and strong." "मौन" कवितामे: गुलाबक पत्ती नहि अछि अहाँक प्रेम आ नहि बगुरक काँट अहाँक प्रेम सुसुप्त ज्वालामुखी जकाँ जल-तत्त्व = मौन-शक्ति। बाहरसँ कोमल, भीतरसँ शक्तिशाली। ताओवादक परम-शक्तिक सिद्धान्त। ५.२ कन्फ्यूशियसवाद आ पितृसत्ता ५.२.१ कन्फ्यूशियसक "Analects" (५म सदी ई.पू.) कन्फ्यूशियस पुरुष-प्रधान समाज-व्यवस्था स्थापित केलनि: पिता-पुत्र संबंध सर्वोच्च स्त्री = सेवक (Three Obediences: पिता, पति, पुत्र) "कन्यादान मने गंगा स्नान" कवितामे: भारतीय पितृसत्ता चीनी कन्फ्यूशियसवादसँ समान अछि। "कन्यादान" = कन्फ्यूशियसक Three Obediences क भारतीय रूप। कामिनीक कविता कन्फ्यूशियसवादक विरोध अछि, ठीक जेना आधुनिक चीनी स्त्री-लेखिका (डिंग लिंग, बिंग जिन) कन्फ्यूशियसक आलोचना केलनि। ५.३ बुद्धवाद आ स्त्री-प्रश्न ५.३.१ महायान बुद्धवादमे स्त्री-मुक्ति "स्त्री आ बुद्ध" कवितामे: एहि सए दुःख सँ नीक एक दुःख नीक तऽ होइतए जे बुद्ध बनि जइतहुँ ई बुद्धक आष्ट-अंगिक मार्ग (Eightfold Path) क स्त्री-संदर्भमे प्रयोग अछि। किन्तु प्रश्न: की स्त्री बुद्धत्व प्राप्त कऽ सकैत छथि? थेरवाद बुद्धवाद: नहि, स्त्री पहिने पुरुष बनथु महायान बुद्धवाद: हँ, स्त्री स्वयं बुद्ध बनि सकैत छथि कामिनी महायानी दृष्टि अपनबैत छथि - स्त्री पुरुष-माध्यमक बिना मुक्ति पाबि सकैत छथि। ५.४ चीनी स्त्री-काव्य-परंपरा ५.४.१ ली किंग-झाओ (Li Qingzhao, १०८४-११५५) चीनी स्त्री-कवि ली किंग-झाओ व्यक्तिगत भावक काव्यीकरण केलनि। हुनक कविता विरह-वेदना प्रधान अछि। कामिनीक "तार-तार भेल जीवन" कवितामे: पहिल बेर जखन लेने रही अपना हाथ मे हमर हाथ ई ली किंग-झाओक परंपरामे अछि - व्यक्तिगत स्मृति आ विरह। ५.४.२ किउ जिन (Qiu Jin, १८७५-१९०७) चीनी क्रान्तिकारी कवि किउ जिन स्त्री-मुक्ति आ राष्ट्र-मुक्ति संयुक्त केलनि। हुनक कविता विद्रोही स्वर अछि। कामिनीक "हम लड़ब" कवितामे: हम लड़ब अन्त-अन्त धरि जामे धरि बँचल रहत ई किउ जिनक परंपरामे अछि - संघर्षक संकल्प। ५.५ चीनी मार्क्सवाद आ स्त्री-प्रश्न ५.५.१ माओ त्से-तुंगक "Women Hold Up Half the Sky" (१९५५) माओ स्त्री-श्रमिक-मुक्ति पर जोर देलनि। स्त्री श्रम-शक्ति छथि, केवल पुनरुत्पादक नहि। "ब्रह्मवाक्य" कवितामे: स्त्रीक श्रम अदृश्य अछि। माओक सिद्धान्त अनुसार, स्त्रीकेँ उत्पादक-श्रममे समान भागीदारी हेबाक चाही। कामिनीक कविता आर्थिक-मुक्तिक माँग करैत अछि। ५.६ चीनी "नारी-पत्र" (Women's Script) आ मैथिली चीनक हुनान प्रान्तमे "नू-शू" (Nüshu) नामक स्त्री-विशिष्ट लिपि छल, जे केवल स्त्री प्रयोग करैत छलीह। ई स्त्री-अलगावक प्रतीक अछि - स्त्रीकेँ मुख्य-भाषासँ बहिष्कृत कएल गेल छल, तेँ अपन लिपि बनेलनि। मैथिलीमे एहन स्त्री-विशिष्ट लिपि नहि छल, किन्तु स्त्री-बोली (Women's Dialect) छल - जे तिरस्कृत मानल जाइत छल। कामिनीक कविता स्त्री-बोली प्रयोग करैत अछि - लोक-मैथिली, जे शास्त्रीय-मैथिलीसँ भिन्न अछि। ई चीनी नू-शूक भारतीय समानता अछि। खण्ड ६: तुलनात्मक विश्लेषण आ समग्र मूल्यांकन ६.१ चारू दृष्टिकोणक संश्लेषण कामिनीक "खण्ड-खण्ड मे बँटैत स्त्री" चारू विश्लेषणात्मक ढाँचामे केन्द्रीय महत्त्व रखैत अछि: ६.१.१ गंगेशक नव्य-न्यायमे ज्ञानमीमांसीय योगदान: प्रत्यक्ष-प्रमाण: स्त्री-अनुभवक साक्षात् प्रस्तुति अनुमान-प्रमाण: सामाजिक-शोषणक तार्किक विश्लेषण शब्द-प्रमाणक खण्डन: शास्त्रीय-पितृसत्ताक अस्वीकार अनुपलब्धि-प्रमाण: मौनक प्रमाणिकता सीमा: काव्यिक-अनुभव तर्क-संरचनासँ परे अछि - गंगेशक तर्क-प्रधानता सब व्याख्या नहि कऽ सकैत अछि। ६.१.२ विदेह समानान्तर इतिहासमे साहित्यिक-ऐतिहासिक योगदान: समानान्तर-कैनन: साहित्य अकादेमीक विकल्प लोकतान्त्रिक-प्रकाशन: डिजिटल-समावेशन सबाल्टर्न-स्वर: हाशिएक केन्द्रीकरण मिथकक पुनर्पाठ: सीता-द्रौपदीक नव-व्याख्या सीमा: विदेह-परंपरा अभिलेखीय-कठोरता तँ अछि, किन्तु सैद्धान्तिक-ढाँचाक विकास अपूर्ण अछि। ६.१.३ भारतीय सौन्दर्यशास्त्रमे काव्यशास्त्रीय योगदान: रस: करुण-रौद्र-वीरक सुन्दर संयोजन ध्वनि: व्यंग्यार्थक गहनता वक्रोक्ति: अप्रत्यक्ष अभिव्यक्तिक कौशल औचित्य: विषय-रस-भाषाक समन्वय सीमा: परम्परागत काव्य-शास्त्र पुरुष-दृष्टिसँ निर्मित अछि - स्त्री-काव्यक स्वतन्त्र सौन्दर्यशास्त्र चाही। ६.१.४ पाश्चात्य-चीनी सिद्धान्तमे वैश्विक-साहित्यिक योगदान: फेमिनिस्ट सिद्धान्त: बोउवार, बटलर, स्पिवाकक भारतीय उदाहरण मार्क्सवादी-फेमिनिज्म: वर्ग-लिंग प्रतिच्छेदन ताओवादी-दर्शन: यिन-शक्तिक काव्यीकरण तुलनात्मक-परिप्रेक्ष्य: चीनी-भारतीय स्त्री-परंपराक संवाद सीमा: पाश्चात्य सिद्धान्तक यांत्रिक-प्रयोग खतरनाक - स्वदेशी-सैद्धान्तिकीकरण आवश्यक। ६.२ "खण्ड-खण्ड मे बँटैत स्त्री" क ऐतिहासिक महत्त्व ६.२.१ मैथिली स्त्री-काव्य-परंपरामे स्थान पूर्व-विदेह युग (२००० पूर्व): प्रेम-काव्य प्रधान। प्रकृति-चित्रण प्रधान। विदेह-युग (२००८-२०१७): प्रेम-विरह प्रधान, आत्मान्वेषण प्रधान। कामिनी: राजनीतिक-स्त्रीवाद प्रधान, मिथकक पुनर्पाठ केन्द्रीय, सामाजिक-यथार्थ मुख्य। कामिनी मैथिली स्त्री-काव्यकेँ व्यक्तिगत-भावसँ सामाजिक-राजनीतिक बनेलनि। ई युगान्तकारी परिवर्तन अछि। ६.२.२ अखिल-भारतीय स्त्री-काव्यमे तुलना हिन्दी: अनामिका, सविता सिंह - शहरी-मध्यवर्गीय स्वर बंगला: मल्लिका सेनगुप्ता - राजनीतिक-कविता मराठी: हिरा भास्कर - दलित-फेमिनिस्ट स्वर मलयालम: सुगाता कुमारी - इको-फेमिनिस्ट स्वर मैथिली: कामिनी - ग्रामीण-राजनीतिक-मिथक-पुनर्पाठक स्वर कामिनीक विशिष्टता: ग्रामीण-यथार्थ + मिथकीय-पुनर्पाठ + राजनीतिक-चेतना क संयोजन। ६.३ सीमा आ आलोचनात्मक प्रश्न ६.३.१ विषमलैंगिकताक अनिवार्यता सम्पूर्ण संग्रहमे विषमलैंगिक-संबंध (Heterosexual Relationship) अनिवार्य मानल गेल अछि। समलैंगिक, उभयलिंगी, ट्रान्सजेंडर स्वरक अभाव अछि। क्वीर-फेमिनिस्ट आलोचना: कामिनी विषमलैंगिक-मानदंड (Heteronormative) पुनर्स्थापित करैत छथि, खण्डित नहि। ६.३.२ वर्ग-विश्लेषणक सीमा "दू मुट्ठी धान" सन कविता वर्ग-प्रश्न उठबैत अछि, किन्तु वर्गीय-संघर्ष (Class Struggle) क कोनो रणनीति नहि प्रस्तुत करैत अछि। मार्क्सवादी आलोचना: भावनात्मक-आलोचना पर्याप्त नहि, संगठित-प्रतिरोध आवश्यक। ६.३.३ जाति-प्रश्नक अनुपस्थिति सम्पूर्ण संग्रहमे जाति-व्यवस्था (Caste System) क कोनो चर्चा नहि। की सीता सवर्ण छलीह? की द्रौपदी ब्राह्मणीय-पितृसत्ताक उत्पाद छलीह? दलित-फेमिनिस्ट आलोचना: कामिनी सवर्ण-स्त्रीवाद (Upper-Caste Feminism) प्रस्तुत करैत छथि, जे जाति-अन्धतासँ ग्रस्त अछि। ६.३.४ धार्मिक-आलोचनाक सीमा "पाखण्ड", "अग्नि-परीक्षा" सन कविता हिन्दू-धर्म आलोचना करैत अछि, किन्तु अन्य धर्म पर मौन अछि। सेक्युलर आलोचना: की मुस्लिम, ईसाई, बुद्ध स्त्रीक शोषण नहि अछि? धार्मिक-चयनात्मकता सीमा अछि। ६.३.५ आन्दोलनक अभाव कविता व्यक्तिगत-विद्रोह प्रस्तुत करैत अछि, किन्तु सामूहिक-आन्दोलन क कोनो संकेत नहि। सामाजिक-आन्दोलनक सिद्धान्त: व्यक्तिगत-चेतना पर्याप्त नहि, सामाजिक-संगठन चाही। ६.४ भविष्यक दिशा: कामिनी-परम्पराक विकास ६.४.१ अन्तर्विषयकता (Interdisciplinarity) भविष्यक मैथिली स्त्री-काव्यकेँ समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, राजनीति-विज्ञानसँ संवाद करबाक चाही। ६.४.२ बहु-स्वरता (Polyphony) दलित, आदिवासी, मुस्लिम, LGBTQ+ स्त्रीक स्वर सेहो सम्मिलित हेबाक चाही। ६.४.३ सैद्धान्तिकीकरण (Theorization) मात्र कविता नहि, स्त्रीवादी-सिद्धान्तक मैथिलीकरण सेहो आवश्यक। मिथिला-विशिष्ट स्त्रीवाद क विकास हेबाक चाही। ६.४.४ अनुवाद आ वैश्वीकरण कामिनीक कविताक अंग्रेजी, हिन्दी, अन्य भारतीय-भाषामे अनुवाद हेबाक चाही - वैश्विक स्त्रीवादी-संवाद लेल। समाहार (Conclusion) "खण्ड-खण्ड मे बँटैत स्त्री" मैथिली साहित्यक युगान्तकारी कृति अछि। ई: 1.ज्ञानमीमांसीय स्तरपर: गंगेशक नव्य-न्यायक काव्यिक प्रयोग - प्रमाण-सिद्धान्तसँ स्त्री-अनुभवक प्रमाणीकरण 2.साहित्यिक-ऐतिहासिक स्तरपर: विदेह समानान्तर-इतिहासक आदर्श उदाहरण - सबाल्टर्न-स्वरक लोकतान्त्रिक-प्रकाशन 3.सौन्दर्यशास्त्रीय स्तरपर: रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्यक समन्वय - भारतीय काव्यशास्त्रक स्त्रीवादी पुनर्पाठ 4.वैश्विक-सैद्धान्तिक स्तरपर: बोउवार, स्पिवाक, बटलर, फूको, लाओ-त्सुक भारतीय-मैथिली उदाहरण अन्तिम निष्कर्ष: कामिनी मैथिली स्त्री-काव्यकेँ राजनीतिक-हथियार बनेलनि। हुनक कविता केवल सौन्दर्यानुभूति नहि, बल्कि सामाजिक-परिवर्तनक उपकरण अछि। गंगेशक शब्दमे कहब तँ: "यथार्थज्ञानं प्रमाणम्" - सत्य-ज्ञान प्रमाण छी। कामिनीक कविता स्त्री-यथार्थक प्रमाण अछि - प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, अनुपलब्धि - चारू प्रमाणसँ प्रमाणित। विदेह-परंपराक भाषामे: समानान्तर-इतिहासक मील-पाथर। भारतीय सौन्दर्यशास्त्रक भाषामे: करुण-रौद्र-वीरक रसात्मक-संश्लेषण। पाश्चात्य-फेमिनिज्मक भाषामे: तृतीय-विश्वक प्रतिच्छेदी-स्त्रीवाद (Third World Intersectional Feminism)। चीनी-दर्शनक भाषामे: यिन-शक्तिक जागरण। "खण्ड-खण्ड मे बँटैत स्त्री" मैथिली साहित्यक अनिवार्य पाठ अछि - ने केवल स्त्रीवादी दृष्टिसँ, बल्कि सम्पूर्ण मानवीय-मुक्तिक दृष्टिसँ। ई विश्लेषण कामिनीक काव्य-संग्रहक समग्र, गहन, बहुआयामी मूल्यांकन प्रस्तुत करैत अछि - जे विदेह समानान्तर इतिहासक चारि-स्तम्भीय पद्धतिक वास्तविक प्रयोग अछि। "खण्ड-खण्ड मे बँटैत स्त्री" समकालीन मैथिली कवितामे स्त्रीवादी चेतनाक एकटा ऐतिहासिक दस्तावेज अछि। कामिनी केवल स्त्रीक पीड़ाक वर्णन नहि करैत छथि, बल्कि पितृसत्तात्मक संरचनाक गहन विश्लेषण प्रस्तुत करैत छथि। प्रमुख उपलब्धि: 1.मिथकीय पुनर्पाठ: सीता, द्रौपदी, यशोदाक समकालीन व्याख्या 2.सामाजिक यथार्थ: कन्या-दान, अग्निपरीक्षा, चीरहरणक प्रश्नांकन 3.भाषिक सौन्दर्य: मैथिलीक लोक-तत्त्वक सुन्दर प्रयोग 4.दार्शनिक गहनता: अस्तित्व, नियति, मुक्तिक विवेचन 5.काव्य-शिल्प: प्रतीक, रूपक, व्यंग्यक सफल प्रयोग सीमा: कतेको कविता केवल भावनात्मक स्तरपर रहि जाइत अछि, राजनीतिक विश्लेषण कम अछि। तथापि, ई संग्रह मैथिली स्त्री-काव्यमे मीलक पाथर अछि। २ शान्ति लक्ष्मी चौधरीक "लेस्बियन कॉन्टिन्युअम": समीक्षा आ कामिनीसँ तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तावना: मैथिली साहित्यमे क्वीर-क्रान्तिक ऐतिहासिक क्षण शान्ति लक्ष्मी चौधरीक "लेस्बियन कॉन्टिन्युअम" (विदेह १३६; १५ अगस्त २०१३ आ सदेह १५) मैथिली साहित्य-इतिहासक सर्वाधिक साहसिक आ सैद्धान्तिक रूपसँ परिष्कृत कविता अछि। पहिल बेर मैथिली कवितामे: 1.समलैंगिक-स्त्री-अनुभव (Lesbian Experience) केन्द्रीय विषय बनल। 2.पाश्चात्य क्वीर-फेमिनिस्ट सिद्धान्त (एड्रियन रिच, रैडिकल फेमिनिज्म) मैथिली-संदर्भमे प्रयुक्त भेल। 3.विषमलैंगिकता (Heterosexuality) केँ अनिवार्य-संरचना (Compulsory Institution) मानल गेल, स्वाभाविक नहि। 4.मैथिल लोक-परंपरा (सखी-बहिनपा) केँ क्वीर-सांस्कृतिक-स्मृति रूपमे पुनर्व्याख्यायित कएल गेल। ई कविता कामिनीक विषमलैंगिक-सीमाक पूर्ति करैत अछि आ विदेह समानान्तर इतिहासक क्वीर-समावेशी चरित्र सिद्ध करैत अछि। खण्ड १: काव्य-संरचना आ वैचारिक-स्थापत्य १.१ त्रिस्तरीय कथा-संरचना (Three-Tier Narrative Structure) कविता तीन स्पष्ट खण्डमे विभाजित अछि: खण्ड १: संघर्ष (Confrontation) ओही दुनू 'सिस्टर'केँ देखलहु लट फलकेनै ... कहलियन्हि अहाँलोकनि बुझाय तँ छी अभिजाति मुदा ऐँये, संस्कार कियै भ' गेल अपचालि इहो छियैक एकतरहक व्यभिचार खण्ड २: सैद्धान्तिक-शिक्षा (Theoretical Pedagogy) अहाँ सुनने छियैक एंड्रीन रिचक विचार? हुनक कहल "लेस्बियन कॉन्टिन्युअम" शब्दक सार? ... अहाँ सुननै होए वा नहि "रैडिकल फेमिनिनिज्म"क नाम खण्ड ३: सांस्कृतिक-पुनर्पाठ (Cultural Re-Reading) अपना सबहक ओहिठां रहै सखी-बहिनपा लगबैक रीत औंढ़नी बदलि, ऐंठ पानसुपारी खुआ ई संरचना ब्रेख्तीय शिक्षण-नाटक (Brechtian Lehrstück) क काव्यिक रूपान्तरण अछि - जतय पूर्वाग्रह → सिद्धान्त → परिवर्तन क क्रम अछि। १.२ पद्य-लेख विधा (Verse-Essay Form) ई कविता कविता आ सैद्धान्तिक-निबन्ध क संश्लेषण अछि। आचार्य भामह "काव्यालंकार" (७वीं सदी) मे गद्य-पद्य-मिश्रित काव्य (Champū) क चर्चा केलनि। ई आधुनिक पद्य-विमर्श (Verse-Discourse) अछि। विशेषता: “           काव्यिक-भाषा: "लट फलकेनै", "मुसकेलीह", "तामससँ हमर भृकुटि तन्तु गेल तरारि" ”           सैद्धान्तिक-भाषा: "लेस्बियन कॉन्टिन्युअम", "रैडिकल फेमिनिनिज्म", "सिस्टरहूड इज पावरफूल" तुलना - कामिनी: कामिनीक कविता शुद्ध-भाव-काव्य (Pure Lyric) अछि: जखन कखनो खसैत छै कोनो स्त्रीक आँखि सँ नोर शान्ति लक्ष्मी विचार-काव्य (Didactic Poetry) प्रस्तुत करैत छथि - जे ज्ञानोदय-परंपरा (Enlightenment Tradition) सँ प्रभावित अछि। खण्ड २: सैद्धान्तिक-आधार आ पाश्चात्य-स्रोत २.१ एड्रियन रिचक "Compulsory Heterosexuality and Lesbian Existence" (१९८०) कविता एड्रियन रिचक नाम स्पष्ट रूपसँ उल्लेखित करैत अछि: अहाँ सुनने छियैक एंड्रीन रिचक विचार? हुनक कहल "लेस्बियन कॉन्टिन्युअम" शब्दक सार? जकर अर्थ भेलय- 'सखि-बहिनपा भावक परिविस्तार' रिचक मुख्य सिद्धान्त: १. Compulsory Heterosexuality (अनिवार्य-विषमलैंगिकता): विषमलैंगिकता स्वाभाविक नहि, बल्कि संस्थागत-दबाव अछि। कवितामे: दुनियाँक सभ नारी नहि अछि भागक बली जकरा अपन नर संग मिलैत होइक अंतरमोनक नली २. Lesbian Continuum (लेस्बियन-निरंतरता): स्त्री-केन्द्रित संबंधक विविध रूप - यौनिकतासँ आगाँ: कवितामे: एहिमे बुझाओल गेल अछि दैहिक-संसर्गसँ बेशी आत्माक तालबंध दूई आत्माक तादात्मीय मिलन संबंध ३. Woman-Identified Women (स्त्री-केन्द्रित स्त्री): जे स्त्री पुरुषक बदला स्त्रीसँ प्राथमिक भावनात्मक-बौद्धिक-यौनिक संबंध रखैत छथि। कवितामे: सखी-बहिनपाय ओकरेसँ जुड़य जकरासँ बढ़य आत्मीय मनबंध २.२ Radical Feminism (कट्टरपंथी नारीवाद) कविता रैडिकल फेमिनिज्म सैद्धान्तिक-परिचय देलक: अहाँ सुननै होए वा नहि "रैडिकल फेमिनिनिज्म"क नाम ई छियैक पछमी नारीवादी आन्दोलनक विद्रोही शाखाक उपनाम रैडिकल फेमिनिज्मक मुख्य तर्क (कवितामे): १. पुरुष-नियंत्रण = स्त्री-देह-शोषण: पोर्नोग्राफी, वेश्यावृति, बलत्कार, घरेलू हिंसा, दहेजादिक आधार छै नारीदेह स्त्री हेतु तेँ आब महाक जरूरी जे ओ भ' जाउथ विदेह २. पितृसत्तामे स्त्री = यौनिक-वस्तु: बेसी पुरूख बुझै छथि स्त्रीकेँ केलीक्रियाक निष्क्रिय-साझीदार कोखि बढ़ावैक धारियित्री, गर्भ धारणक सुगढ़ औजार ३. लेस्बियनिज्म = पितृसत्ताक अस्वीकार: पुरूखगणक मोन तखने हेतै आब हेंठ आ स्त्रीकेँ भेटतैक मोल जखन नारी तोड़ि देती परिणय, परिणयपुर्व-कौमार्य, पतिव्रताक अधिमोल ४. Sisterhood is Powerful: रैडिकल फेमिनिनिस्टक नारा छैक "सिस्टरहूड इज पावरफूल" मतलब 'बहिनपायमे छैक बहुत बलबूत' २.३ पाश्चात्य-सिद्धान्तक मैथिली-अनुवाद: चुनौती आ सफलता चुनौती: "Lesbian Continuum" → "सखि-बहिनपा भावक परिविस्तार" "Sisterhood" → "बहिनपा" "Compulsory Heterosexuality" → (अप्रत्यक्ष - "दुनियाँक सभ नारी नहि अछि भागक बली") सफलता: शान्ति लक्ष्मी पाश्चात्य-सिद्धान्त केँ मैथिल-सांस्कृतिक-संदर्भमे अनुवादित केलनि - ई केवल भाषान्तर नहि, सांस्कृतिक-अनुवाद (Cultural Translation) अछि। तुलना - कामिनी: कामिनीक कवितामे पाश्चात्य-सिद्धान्तक कोनो स्पष्ट संदर्भ नहि - ओ अनुभव-केन्द्रित छथि, सिद्धान्त-केन्द्रित नहि। शान्ति लक्ष्मी सिद्धान्त-प्रधान काव्य लिखलनि। खण्ड ३: पुरुष-यौनिकताक समीक्षा ३.१ स्त्री-देहक संगीत-रूपक (Musical Metaphor) कविताक सर्वाधिक मौलिक आ शक्तिशाली अंश: स्त्रीदेहक संगीत होइत छै शास्त्रीय रचनाबंध पहिने ध्रुपद धमार आ आलाप तखन खयाल आओर तान तराना मुदा जँ अहाँ छी पॉप संगीतक ररधुस धुम-धड़ाकक दिवाना तँ एकर विद्रुपताकेँ देल जेतय सहजहि हरैरि तोड़िमरोरि विश्लेषण: १. शास्त्रीय संगीत = स्त्री-यौनिकता: ध्रुपद, धमार, आलाप = प्रारम्भिक आत्मीयता खयाल = गहन संवाद तान, तराना = यौनिक-आनन्द २. पॉप संगीत = पुरुष-यौनिकता: धुम-धड़ाका = त्वरित-संभोग विद्रुपता = स्त्री-देहक हिंसा तोड़िमरोरि = बलात्कार ई रूपक भारतीय शास्त्रीय संगीत-परंपराक प्रयोग स्त्री-यौनिकता-समीक्षा लेल करैत अछि- अद्वितीय काव्य-कौशल। ३.२ सहमति-केन्द्रित यौनिकता (Consent-Centered Sexuality) बेसी पुरूख रहैत छथि हरदम उग्रसंसर्गक अगुतायल नहि देखैत अछि ओकर दैहिकमित्र सहमति छथि वा डेरायल ई सहमतिक नैतिकता (Ethics of Consent) अछि - जे MeToo युगक केन्द्रीय प्रश्न। मनक एकात्मकता साधने बिना देह पर भ' जायब हावी कहु एहि बातकेँ कोना बुझाबी सत कही तँ ई छियैक एकटा भियावह अपराध बलत्कारेक सदियह दायभाग तुलना - कामिनी: कामिनीक "तार-तार भेल जीवन" कवितामे विरह-वेदना अछि, किन्तु यौनिक-हिंसाक चर्चा नहि। शान्ति लक्ष्मी विवाहेतर-बलात्कार (Marital Rape) क सीधा आरोप लगबैत छथि: परस्पर सुक्ष्मतम दुःख-सुखसँ एकाकार भेनय बिना एक-दोसरक मोनमे गहनतम सम्मान जगौने बिना सीधे दैहिक स्पर्श पर भ' जेबैक उतारू तँ अहीँ बुझाबु- नहि छियैक ई स्त्रीमोन संग क्रुरतम खेल खण्ड ४: मैथिल लोक-परंपराक क्वीर-पुनर्पाठ ४.१ सखी-बहिनपा: क्वीर-सांस्कृतिक-स्मृति कविताक सर्वाधिक मौलिक योगदान मैथिल सखी-बहिनपा परंपराक क्वीर-पुनर्व्याख्या अछि: अपना सबहक ओहिठां रहै सखी-बहिनपा लगबैक रीत औंढ़नी बदलि, ऐंठ पानसुपारी खुआ वा कँगुरिया आँगुर थुकथुका... कहु नेनपनमे कहियो जोड़ने छलहु एहन पीरीत बान्हल जाइत छलैक सखी-बहिनपाक एहने बन्हन मजगूत जे वियाहे बन्धन सनक होइत छलैक सुपवित्र अजगूत विश्लेषण: १. सखी-बहिनपा = विवाह-समतुल्य-संबंध: औंढ़नी बदलि = विवाह-संस्कार (वर-वधू औंढ़नी बदलैत छथि) ऐंठ पानसुपारी खुआ = विवाह-रस्म कँगुरिया आँगुर थुकथुका = शपथ-ग्रहण २. सखी-बहिनपाक विशेषता: कतैक कठिन छल एक-दोसरक गुप्तराजकेँ ताजीवन सहेजनाय जीनगीक डेग डेग पर तनमनधनसँ सखीक काज एनाय ३. गुप्त-नाम-प्रणाली: सखी-बहिनपायमे नहि लेल जाइछ एक-दोसरक असल नाम कहै जाइत छथि एक दोसरकेँ लौंग, पान, सुपारी, जरदा वा फूलक नामपर जुही, गुलाब, बेली, चंपा, गेंदा तुलनात्मक-प्रश्न: परणीतोतँ अपन ससूर, भैंसूर, वरक नहि लैत छथि नाम? ४.२ क्वीर-इतिहासलेखन (Queer Historiography) शान्ति लक्ष्मी क्वीर-इतिहासलेखनक मैथिली उदाहरण प्रस्तुत केलनि। पाश्चात्यमे Judith Butler, Eve Kosofsky Sedgwick, Adrienne Rich लोक-परंपरामे क्वीर-तत्त्व खोजैत छथि। उदाहरण: चीनमे "नू-शू" = स्त्री-विशिष्ट-लिपि (Women's Script) अफ्रीकामे "Woman-Woman Marriage" = स्त्री-स्त्री-विवाह मिथिलामे "सखी-बहिनपा" = क्वीर-सांस्कृतिक-स्मृति विदेह समानान्तर इतिहासमे महत्त्व: विदेह-परंपरा मिथिला-इतिहासक पुनर्पाठ करैत अछि। शान्ति लक्ष्मी सखी-बहिनपाकेँ विषमलैंगिक-संस्कार मानबाक बदला क्वीर-परंपरा मानलनि - ई समानान्तर-इतिहासक आदर्श अछि। खण्ड ५: कामिनीसँ तुलनात्मक विश्लेषण ५.१ विषय-वस्तु (Subject Matter) कामिनी: विषमलैंगिक-संबंध केन्द्रीय पुरुष-त्याग, पुरुष-शोषण मुख्य विषय कोनो LGBTQ+ संदर्भ नहि उदाहरण: माधव! अहाँ केना बिसरि गेलियै की हम अहाँक राधा छी ("दोसर कृष्ण") शान्ति लक्ष्मी: समलैंगिक-स्त्री-संबंध केन्द्रीय विषमलैंगिकताक आलोचना मुख्य विषय स्पष्ट LGBTQ+ स्वर उदाहरण: पुरूखक एहि क्रुरतम खेलक प्रतिक्रिया तीक्ष्ण जनम लेलकै हेँ आजुक लेस्बियनिज्म ५.२ सैद्धान्तिक-आधार (Theoretical Foundation) कामिनी: अनुभव-केन्द्रित (Experience-Based) भारतीय मिथक-पुनर्पाठ (सीता, द्रौपदी) कोनो पाश्चात्य-सिद्धान्तक स्पष्ट उल्लेख नहि शान्ति लक्ष्मी: सिद्धान्त-केन्द्रित (Theory-Based) पाश्चात्य-फेमिनिस्ट-सिद्धान्तक स्पष्ट उल्लेख (एड्रियन रिच, रैडिकल फेमिनिज्म) मैथिल-परंपराक सैद्धान्तिक-पुनर्व्याख्या ५.३ काव्य-रूप (Poetic Form) कामिनी: मुक्त-छन्द (Free Verse) भाव-प्रधान (Lyrical) संक्षिप्त, तीव्र (Concise, Intense) उदाहरण: जखन कखनो खसैत छै कोनो स्त्रीक आँखि सँ नोर ("नोर") शान्ति लक्ष्मी: पद्य-लेख (Verse-Essay) विचार-प्रधान (Didactic) विस्तृत, व्याख्यात्मक (Elaborate, Explanatory) उदाहरण: अहाँ सुनने छियैक एंड्रीन रिचक विचार? हुनक कहल "लेस्बियन कॉन्टिन्युअम" शब्दक सार? जकर अर्थ भेलय- 'सखि-बहिनपा भावक परिविस्तार' ५.४ रस-विधान (Aesthetic Emotion) कामिनी: करुण रस प्रधान (Pathos) रौद्र रस गौण (Fury) भाव-साधारणीकरण सफल (Universalization of Emotion) शान्ति लक्ष्मी: वीर रस प्रधान (Heroic) रौद्र रस सहायक (Fury) शान्त रस अंतिम (Peace) - "विश्वक चन्द्रधवल संस्कृतिक गालपर लेभरल हमरा अखरल दागकृष्ण" ५.५ ध्वनि-योजना (Suggestive Power) कामिनी: रस-ध्वनि (Suggestion of Emotion) व्यञ्जना-शक्ति गहन (Suggestive Power Deep) उदाहरण: गुलाबक पत्ती नहि अछि अहाँक प्रेम ("मौन") वाच्यार्थ: प्रेम बाह्य-प्रदर्शनसँ मुक्त अछि व्यंग्यार्थ: गहन शान्त-प्रेम शब्दातीत अछि शान्ति लक्ष्मी: वस्तु-ध्वनि (Suggestion of Fact) अभिधा-शक्ति प्रधान (Denotative Power Primary) उदाहरण: लेस्बियनिज्म जीवनढ़ंग संग जहिया ईलोकनि क' लेतीह आत्मसात वाच्यार्थ = व्यंग्यार्थ: सीधा सैद्धान्तिक-कथन, ध्वनि-योजना सीमित ५.६ पाठक-संबोधन (Reader Address) कामिनी: अप्रत्यक्ष-संबोधन (Indirect Address) सार्वभौमिक-पाठक (Universal Reader) लैंगिक-तटस्थ (Gender-Neutral) शान्ति लक्ष्मी: प्रत्यक्ष-संबोधन (Direct Address) - "अहाँ" विशिष्ट-पाठक (Specific Reader) - विषमलैंगिक स्त्री शैक्षणिक-स्वर (Pedagogical Tone) उदाहरण: अहाँ सुनने छियैक एंड्रीन रिचक विचार? ... कहु महिलाकेँ महिला संग सहवास सिनेहक ई कोनरूप केलकै नवविकास? खण्ड ६: गंगेशक नव्य-न्यायसँ मूल्यांकन ६.१ प्रत्यक्ष-प्रमाण (Perceptual Knowledge) गंगेशक परिभाषा: "इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानम्" कवितामे: ओही दुनू 'सिस्टर'केँ देखलहु लट फलकेनै उत्फुल्ल मुँह विहुँसेनै मटकल चलि आवैत ई प्रत्यक्ष-दर्शन अछि - लेस्बियन-युगलक सुखी अवस्थाक साक्षात् अनुभव। तुलना - कामिनी: कामिनी सेहो प्रत्यक्ष-अनुभव प्रस्तुत करैत छथि: छाती जुराइत अछि ई हमरे बाबाक लगाओल कलम-गाछी छी ("दू मुट्ठी धान") भेद: कामिनी स्वयंक अनुभव; शान्ति लक्ष्मी अन्यक अनुभव देखि क' प्रतिक्रिया। ६.२ अनुमान-प्रमाण (Inferential Knowledge) गंगेशक व्याप्ति-सिद्धान्त: "व्याप्तिर्हि अविनाभावः साध्यसाधनयोः" कवितामे तर्क-संरचना: प्रतिज्ञा (Thesis): लेस्बियनिज्म स्त्री-मुक्तिक मार्ग अछि हेतु (Reason): पुरुष-स्त्री-यौनिकतामे असमानता, हिंसा, शोषण अछि उदाहरण (Example): बेसी पुरूख बुझै छथि स्त्रीकेँ केलीक्रियाक निष्क्रिय-साझीदार कोखि बढ़ावैक धारियित्री, गर्भ धारणक सुगढ़ औजार उपनय (Application): पुरूखक एहि क्रुरतम खेलक प्रतिक्रिया तीक्ष्ण जनम लेलकै हेँ आजुक लेस्बियनिज्म निगमन (Conclusion): लेस्बियनिज्म जीवनढ़ंग संग जहिया ईलोकनि क' लेतीह आत्मसात ई पूर्ण पञ्चावयव-न्याय (Complete Five-Membered Syllogism) अछि। ६.३ शब्द-प्रमाण (Testimonial Knowledge) गंगेशक आप्त-वचन सिद्धान्त: "आप्तवचनं शब्दः" कवितामे: शान्ति लक्ष्मी एड्रियन रिच केँ आप्त (Authoritative Source) मानैत छथि: अहाँ सुनने छियैक एंड्रीन रिचक विचार? प्रश्न: की पाश्चात्य-फेमिनिस्ट मैथिल-संदर्भमे आप्त छथि? उत्तर: शान्ति लक्ष्मी सार्वभौमिक-ज्ञान मानैत छथि - जे स्थानीय-सांस्कृतिक-अनुभवसँ प्रमाणित हेबाक चाही। ओ सखी-बहिनपा परंपरासँ रिचक सिद्धान्तक मैथिल-प्रमाणीकरण करैत छथि। ६.४ उपमान-प्रमाण (Analogical Knowledge) गंगेशक उपमान-सिद्धान्त: "तत्त्वज्ञानम् उपमानं साधारणधर्मकथनात्" कवितामे: समानता (Similarity): सखी-बहिनपा = लेस्बियन-निरंतरता दुनू स्त्री-केन्द्रित-संबंध दुनू विवाह-समतुल्य-बन्धन दुनू ताजीवन-प्रतिबद्धता भेद (Dissimilarity): सखी-बहिनपा: यौनिक-तत्त्व अप्रत्यक्ष (विवादित) लेस्बियन-संबंध: यौनिक-तत्त्व केन्द्रीय शान्ति लक्ष्मी अर्ध-साम्य (Partial Similarity) स्थापित करैत छथि- ई गंगेशक उपमान-प्रमाणक उत्कृष्ट प्रयोग अछि। खण्ड ७: विदेह समानान्तर इतिहासमे स्थान ७.१ विदेहक क्वीर-समावेशी चरित्र महत्त्वपूर्ण तथ्य: "लेस्बियन कॉन्टिन्युअम" विदेह:१३६ आ सदेह:१५ मे प्रकाशित भेल। निष्कर्ष: विदेह-परंपरा LGBTQ+-समावेशी अछि, केवल विषमलैंगिक-स्त्रीवाद नहि। साहित्य अकादेमी बनाम विदेह: साहित्य अकादेमी: परम्परागत-मूल्य रक्षक विषमलैंगिकता अनिवार्य LGBTQ+-विमर्श अनुपस्थित विदेह: समानान्तर-मूल्य स्थापक यौनिक-विविधता स्वीकृत LGBTQ+-विमर्श उपस्थित ७.२ कामिनीसँ शान्ति लक्ष्मी: विदेह-विकास-क्रम विदेह-परंपराक विकास: चरण १: भाव-प्रधान स्त्री-काव्य; चरण २: राजनीतिक-स्त्रीवाद; चरण २ (विदेह १३६; २०१३): क्वीर-फेमिनिज्म, शान्ति लक्ष्मी चौधरी "लेस्बियन कॉन्टिन्युअम"। निष्कर्ष: विदेह-परंपरा गतिशील अछि, विकासशील अछि। कामिनीक विषमलैंगिक-सीमा केँ शान्ति लक्ष्मी हुनकासँ पहिनहिये पार केलनि। ७.३ समानान्तर-इतिहासक पुनर्परिभाषा विदेह समानान्तर इतिहासक अर्थ: 1.साहित्य अकादेमीक समानान्तर (कामिनी केलनि) 2.विषमलैंगिक-परंपराक समानान्तर (शान्ति लक्ष्मी केलनि)। खण्ड ८: भारतीय सौन्दर्यशास्त्रसँ मूल्यांकन ८.१ रस-सिद्धान्त प्रधान रस: वीर रस (Heroic) स्थायी भाव: उत्साह (Enthusiasm) विभाव (Determinant): विषमलैंगिक-यौनिक-हिंसा लेस्बियन-युगलक सुख अनुभाव (Consequent): तामससँ हमर भृकुटि तन्तु गेल तरारि ओकरा देखलहु नखशिख आँखिगुड़ारि व्यभिचारी भाव (Transitory Emotion): क्रोध, गर्व, धृति तुलना - कामिनी: कामिनी करुण रस प्रधान; शान्ति लक्ष्मी वीर रस प्रधान। कामिनी शोक (Sorrow) व्यक्त करैत छथि; शान्ति लक्ष्मी संघर्ष (Struggle) घोषित करैत छथि। ८.२ ध्वनि-सिद्धान्त वस्तु-ध्वनि (Suggestion of Fact): सखी-बहिनपायमे नहि लेल जाइछ एक-दोसरक असल नाम कहै जाइत छथि एक दोसरकेँ लौंग, पान, सुपारी, जरदा व्यंग्यार्थ: गुप्त-नाम-प्रणाली गुप्त-यौनिकताक संकेत अछि। सीमा: शान्ति लक्ष्मी अभिधा-शक्ति प्रधान छथि, व्यञ्जना-शक्ति सीमित अछि। कामिनी व्यञ्जना-शक्तिमे श्रेष्ठ छथि। ८.३ वक्रोक्ति-सिद्धान्त प्रश्न-वक्रोक्ति (Interrogative Obliquity): कहु महिलाकेँ महिला संग सहवास सिनेहक ई कोनरूप केलकै नवविकास? परणीतोतँ अपन ससूर, भैंसूर, वरक नहि लैत छथि नाम? ई व्यंग्य-वक्रोक्ति (Sarcastic Obliquity) अछि- प्रश्नक माध्यमसँ विरोधाभास उजागर कएल गेल अछि। ८.४ औचित्य-सिद्धान्त वस्तु-औचित्य (Propriety of Subject): की लेस्बियनिज्म मैथिली काव्यक उपयुक्त विषय अछि? पक्ष: विदेह-परंपरा सर्व-विषय-समावेशी अछि विपक्ष: मैथिल-समाजमे सामाजिक-स्वीकृति सीमित रस-औचित्य (Propriety of Emotion): वीर रस विद्रोही-विषयक लेल उपयुक्त अछि - औचित्य-युक्त। भाषा-औचित्य (Propriety of Language): "लेस्बियन कॉन्टिन्युअम", "रैडिकल फेमिनिनिज्म" जेहन अंग्रेजी-शब्द मैथिलीमे अनौचित्य मानल जा सकैत अछि। किन्तु: नव-अवधारणाक लेल नव-शब्द आवश्यक अछि - ई आधुनिक-औचित्य अछि। खण्ड ९: पाश्चात्य आ चीनी सिद्धान्तसँ मूल्यांकन ९.१ क्वीर-थ्योरी (Queer Theory) जुडिथ बटलरक Gender Performativity: बटलरक अनुसार, जेंडर = प्रदर्शन (Gender as Performance), जैविक-नियति नहि। कवितामे: एक देह तहन नै बुझैत छै दोसर देहक लिंगभेदी रूप खाहे एकरा अपन मापदण्डमे प्रेम बुझियोक वा प्रेमक विरूप ई बटलरक सिद्धान्तक काव्यिक-प्रस्तुति अछि - लिंग-भेद अप्रासंगिक बनैत अछि जखन आत्मिक-संबंध केन्द्रीय होइत अछि। ९.२ फूकोक Power/Knowledge सिद्धान्त मिशेल फूको: शक्ति आ ज्ञान परस्पर-संबद्ध अछि। कवितामे: विश्वक चन्द्रधवल संस्कृतिक गालपर लेभरल हमरा अखरल दागकृष्ण "चन्द्रधवल संस्कृति" = विषमलैंगिक-ज्ञान-शक्ति-संरचना (Heteronormative Knowledge-Power Structure) "दागकृष्ण" = लेस्बियनिज्म = ज्ञान-शक्ति-संरचनाक विरोध ई फूकोवादी-विश्लेषण अछि - ज्ञान-प्रणाली शक्ति-प्रणाली अछि। ९.३ पोस्ट-कोलोनियल क्वीर-थ्योरी गायत्री स्पिवाक बनाम शान्ति लक्ष्मी: स्पिवाक प्रश्न: "Can the Subaltern Speak?" शान्ति लक्ष्मीक उत्तर: हँ, क्वीर-सबाल्टर्न बाजि सकैत छथि। ओही दुनू 'सिस्टर'केँ देखलहु लट फलकेनै उत्फुल्ल मुँह विहुँसेनै लेस्बियन-युगल स्वयं बाजि रहल छथि (सिस्टर कवयित्रीकेँ उत्तर दैत छथि), कोनो बुर्जुआ-प्रतिनिधि नहि। किन्तु प्रति-प्रश्न: की शान्ति लक्ष्मी लेस्बियन-समुदायक प्रतिनिधि छथि, वा विषमलैंगिक-समर्थक छथि? कविताक अन्त: सभ गप सुनि हम मोने मोन भ' गेलहु अवाक प्रत्योत्पन्नमतिमे सहजहि नहि फुरल की हेतै एकर बौद्धिक जवाव ई खुलल-अन्त (Open-Ended) अछि - कवयित्री सहयोगी (Ally) छथि, समुदाय-सदस्य नहि। ई सीमा सेहो अछि, शक्ति सेहो। ९.४ ताओवाद आ यिन-शक्ति लाओ-त्सुक यिन-यांग: यिन = स्त्री-तत्त्व यांग = पुरुष-तत्त्व कवितामे: दूई आत्माक तादात्मीय मिलन संबंध दूई देह जखन सुनैत छै परस्पर अंरतात्माक दु:ख-सुख यिन-यिन संयोग = दोहरी यिन-शक्ति - ताओवादमे ई असंतुलन मानल जाएत। किन्तु: शान्ति लक्ष्मी ताओवादी-संतुलनक अस्वीकार करैत छथि - यिन-शक्तिक स्वतंत्रता घोषित करैत छथि। खण्ड १०: सीमाएँ आ आलोचनात्मक प्रश्न १०.१ वर्ग-जाति-अनुपस्थिति कामिनीक सीमा: जाति-प्रश्नक अभाव शान्ति लक्ष्मीक सीमा: जाति आ वर्ग दुनूक अभाव कविता "अभिजाति" सिस्टरक विषयमे अछि: कहलियन्हि अहाँलोकनि बुझाय तँ छी अभिजाति मुदा ऐँये, संस्कार कियै भ' गेल अपचालि प्रश्न: की दलित, आदिवासी, मुस्लिम, गरीब लेस्बियनक अनुभव अभिजाति-लेस्बियनसँ भिन्न अछि? दलित-क्वीर-फेमिनिज्म क अभाव- ई महत्त्वपूर्ण सीमा अछि। १०.२ बाइसेक्शुअलिटी, ट्रान्सजेंडर, इन्टरसेक्स अनुपस्थिति कविता केवल लेस्बियन (समलैंगिक-स्त्री) पर केन्द्रित अछि। LGBTQIA+ स्पेक्ट्रमक अन्य पहचानक अभाव: Bisexual (उभयलिंगी): अनुपस्थित Transgender (ट्रान्सजेंडर): अनुपस्थित Queer (क्वीर): अनुपस्थित Intersex (इन्टरसेक्स): अनुपस्थित Asexual (अलैंगिक): अनुपस्थित १०.३ यौनिक-अनिवार्यता (Sexual Essentialism) कविता यौनिक-तत्त्वक केन्द्रीयता पर जोर दैत अछि: तत्पश्चात देहोजँ भ' जाइत छै एक दोसरकेँ अर्पित ओही संसर्गसँ भेटैत छै मोनक तृप्ति प्रति-प्रश्न: की अलैंगिक-लेस्बियन (Asexual Lesbian) - जे यौनिक-आकर्षण नहि अनुभव करैत छथि किन्तु रोमान्टिक-आकर्षण करैत छथि - क स्थान कतय अछि? १०.४ सांस्कृतिक-साम्राज्यवाद (Cultural Imperialism) आलोचनात्मक-प्रश्न: की पाश्चात्य-क्वीर-सिद्धान्त (एड्रियन रिच) मैथिल-संदर्भमे यांत्रिक-प्रयोग अछि? पक्ष: एड्रियन रिच सार्वभौमिक-सत्य प्रस्तुत करैत छथि। विपक्ष: मैथिल-समाजक विशिष्ट-यौनिक-संस्कृति अछि, जे पाश्चात्यसँ भिन्न अछि। शान्ति लक्ष्मीक रणनीति: ओ सखी-बहिनपा परंपरासँ रिचक सिद्धान्तक मैथिल-प्रमाणीकरण करैत छथि- ई सांस्कृतिक-अनुवाद अछि, यांत्रिक-प्रयोग नहि। १०.५ रैडिकल-फेमिनिज्मक समस्याग्रस्त तत्त्व रैडिकल-फेमिनिज्मक कतेको विचार समस्याग्रस्त मानल जाइत अछि: १. ट्रान्स-बहिष्करण (Trans-Exclusion): कतेको रैडिकल-फेमिनिस्ट ट्रान्स-स्त्रीकेँ "वास्तविक-स्त्री" नहि मानैत छथि। २. यौन-कर्म-विरोध (Sex Work Opposition): रैडिकल-फेमिनिस्ट यौन-कर्मीक अधिकारक विरोध करैत छथि। ३. जैविक-निर्धारणवाद (Biological Essentialism): स्त्री हेतु तेँ आब महाक जरूरी जे ओ भ' जाउथ विदेह ई जैविक-देहक अस्वीकार सूचित करैत अछि- जे ट्रान्स-बहिष्कारी भ' सकैत अछि। शान्ति लक्ष्मी एहि समस्याग्रस्त तत्त्वक आलोचना नहि केलनि - ई सीमा अछि। खण्ड ११: ऐतिहासिक महत्त्व आ भविष्यक दिशा ११.१ मैथिली साहित्य-इतिहासमे स्थान युगान्तकारी योगदान: 1.पहिल क्वीर-काव्य: मैथिलीमे पहिल बेर LGBTQ+ विमर्श 2.सैद्धान्तिक-परिपक्वता: पाश्चात्य-सिद्धान्तक सफल-अनुवाद 3.सांस्कृतिक-पुनर्पाठ: सखी-बहिनपाक क्वीर-व्याख्या 4.विदेह-परंपराक विस्तार: विषमलैंगिक-सीमा पार तुलनात्मक महत्त्व: हिन्दी: रूथ वनिता, सलीम किदवई "Same-Sex Love in India" (२००८) बंगला: दीप्ति नवल "पुरुष प्रेम" (१८७०) - पुरुष-समलैंगिकता मराठी: दत्ता भगत - LGBTQ+ कविता मैथिली: शान्ति लक्ष्मी चौधरी "लेस्बियन कॉन्टिन्युअम" - पहिल लेस्बियन-काव्य ११.२ विदेह-परंपराक भविष्य-दिशा शान्ति लक्ष्मीक कविता विदेह-परंपराक नव-दिशा सूचित करैत अछि: १. क्वीर [विषमलैंगिक मानकसँ भिन्न]-समावेशिता (Queer Inclusion): विदेह केवल विषमलैंगिक-स्त्रीवाद नहि, क्वीर-फेमिनिज्म सेहो २. सैद्धान्तिक-विकास (Theoretical Development): विदेह केवल अनुभव-साझाकरण नहि, सैद्धान्तिक-विमर्श सेहो ३. वैश्विक-संवाद (Global Dialogue): विदेह पाश्चात्य-सिद्धान्तसँ संवाद करैत अछि, अलग-थलग नहि रहैत अछि ११.३ आवश्यक भविष्य-कार्य १. दलित-क्वीर-काव्य: मैथिलीमे दलित-समलैंगिक अनुभवक काव्य चाही २. ट्रान्सजेंडर-काव्य: मैथिलीमे ट्रान्सजेंडर-अस्मिताक काव्य चाही ३. गे-काव्य (Gay Poetry): मैथिलीमे पुरुष-समलैंगिकताक काव्य चाही ४. स्वदेशी-क्वीर-सिद्धान्त: पाश्चात्य-सिद्धान्तक यांत्रिक-प्रयोग नहि, मैथिल-विशिष्ट क्वीर-सिद्धान्त विकसित हेबाक चाही समाहार (Conclusion) अन्तिम मूल्यांकन शान्ति लक्ष्मी चौधरीक "लेस्बियन कॉन्टिन्युअम" मैथिली साहित्य-इतिहासक सर्वाधिक साहसिक कविता अछि। ई: १. सैद्धान्तिक-स्तरपर: पाश्चात्य-क्वीर-फेमिनिज्मक मैथिली-अनुवाद गंगेशक नव्य-न्यायक काव्यिक-प्रयोग रैडिकल-फेमिनिज्मक परिचय २. सांस्कृतिक-स्तरपर: मैथिल-परंपराक क्वीर-पुनर्पाठ सखी-बहिनपाक लेस्बियन-व्याख्या विषमलैंगिक-मानदंडक चुनौती ३. साहित्यिक-स्तरपर: पद्य-विमर्श विधाक विकास शैक्षणिक-काव्यक परंपरा वीर-रसक नव-प्रयोग ४. विदेह-इतिहासमे: कामिनीक विषमलैंगिक-सीमाक पूर्ति विदेहक क्वीर-समावेशिताक प्रमाण समानान्तर-इतिहासक पुनर्परिभाषा कामिनीसँ तुलना: संक्षेप कामिनी  शान्ति लक्ष्मी विषय     विषमलैंगिक-शोषण          समलैंगिक-मुक्ति रस        करुण (पैथोस)    वीर (हीरोइक) पद्धति     अनुभव-केन्द्रित     सिद्धान्त-केन्द्रित परंपरा    मिथक-पुनर्पाठ     लोक-पुनर्पाठ सीमा     विषमलैंगिकता     वर्ग-जाति-अभाव शक्ति    व्यञ्जना-शक्ति    अभिधा-शक्ति दुनू मिलि क': विदेह-परंपराक सम्पूर्ण स्त्रीवादी-दृष्टि - विषमलैंगिक आ समलैंगिक, दुनू। अन्तिम वाक्य गंगेशक शब्दमे: "यथार्थज्ञानं प्रमाणम्" - सत्य-ज्ञान प्रमाण छी। कामिनी विषमलैंगिक-स्त्री-यथार्थक प्रमाण प्रस्तुत केलनि। शान्ति लक्ष्मी समलैंगिक-स्त्री-यथार्थक प्रमाण प्रस्तुत केलनि। विदेह-परंपरा सम्पूर्ण स्त्री-यथार्थक प्रमाण बनि रहल अछि - विषमलैंगिक, समलैंगिक, उभयलिंगी, ट्रान्सजेंडर, क्वीर - सबहक। "लेस्बियन कॉन्टिन्युअम"- शान्ति लक्ष्मी चौधरी [स्त्री-सम्बन्ध, देह-राजनीति आ नारीवादी दृष्टिकोणक साहसिक कविता, विदेह १३६ आ सदेह १५] केवल कविता नहि, ई पद्य लेख अछि बल्कि मैथिली साहित्यमे LGBTQ+ आन्दोलनक घोषणा-पत्र अछि। [सैद्धांतिक विवेचन लेल देखू- मैथिली समीक्षाशास्त्र- गजेन्द्र ठाकुर] अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। पद्य Poetry ३.१. तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम'] मूल तेलुगु: नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव) मैथिली अनुवाद: मानेश्वर मनुज [खण्ड ४] ३.२. संतोष कुमार राय 'बटोही'- माए (कविता) [मदर्स डे पर] ३.३. अशोक कुमार ठाकुर- रीत भेल कतेक नीच यौ ३.४. जगदानन्द झा "मनु"- आजुक बरसाइत ३.५. आचार्य रामानंद मंडल- अश्रद्धा/ हिंदू आ मुसलमान/ जै हे जगजननी सीता ३.६. प्रणव कुमार झा- आदमी ३.१. तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम'] मूल तेलुगु: नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव) मैथिली अनुवाद: मानेश्वर मनुज [खण्ड ४] तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम' केर लेखक छथि नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव)] मूल तेलुगु लेखक नग्नमुनि एक परिचय नाम: मानेपल्लि हृषीकेशवराव जन्म: 15 मई 1940 जन्म स्थान: शहर- तेनाली, जिला- गुंटूर (आंध्र प्रदेश) वृत्ति: चीफ ऑडिटर, आंध्र प्रदेश विधान सभा, तकर बाद डिप्टी सेक्रेटरी, ओतहि लिंक: पहिने साम्यवादी (कम्युनिस्ट), बादमे राष्ट्रवादी (नेशनलिस्ट) संस्था: अविभाज्यक जनतंत्र, 1990 आंदोलन: दिगम्बर कविता आन्दोलन 1965 लक्ष्य: नंगट, भूखल, दीन, दरिद्रक हित कृति: उदयिंचनि उदयलु (ओ उदय जे उदित नहि भेल) पूर्वा हवा जम्मि चेट्ट विशेष: 1977 ई. मे बहुचर्चित काव्य- 'कोय्या गुर्रम' (KOYA-GURRAM), जकर अर्थ अछि- 'काठक घोड़ा', भाव- 'नकली सरकार'। 19 नवम्बर 1977, शनि दिन बंगालक खाड़ीमे पचास-साठि फुट ऊँच लहड़ि उमड़ि कऽ कृष्णा जिलाक दिविसीमा क्षेत्रकेँ डुबा कऽ नष्ट कऽ देलक। हजारो लोक मारल गेलाह। ई घटना काव्यक वस्तु बनल। विषय आ परिस्थितिसँ उपजल ई काव्य हिन्दी कवि मुक्तिबोधक 'अंधेरे में' क बराबरीक अछि। मैथिली अनुवादक नाम: मानेश्वर मनुज जन्म: गाम- गम्हरिया (बेनीपट्टी) मधुबनी। जनवरी 1958 (प्रमाण पत्रक अनुसार)। वृत्ति: भारतीय नौसेनामे तकनीकी सहायक, तकर बाद भारतीय रेलक वाणिज्य विभाग सँ (रिटायर्ड)। कृति: 'सम्बन्ध', कथा संग्रह (मैथिली) 2007 'कि', कविता संग्रह (मैथिली) 2011 'परिवर्तन', कहानी संग्रह (हिन्दी) 2019 'बेघर', कविता संग्रह (हिन्दी) 2022 'तालाब', कहानी संग्रह (हिन्दी) 2024 अनुभव: विभिन्न भाषा सँ हिन्दी आ मैथिलीमे अनुवाद। हिन्दी आ मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिकामे लेख, कविता, कथा, कहानी इत्यादि प्रकाशित। अनुवादकक टिप्पणी: अनेक तेलुगुमित्र, स्वयं नग्नमुनि जी, हिन्दी तथा अंग्रेजी मे अनुदित पुस्तकक मदति सँ दीर्घ काल तक मंथन कयलाक बाद अनुवाद कयल गेल अछि। ई नग्नमुनिक प्रसिद्ध कविता अछि। नग्नमुनि सँ लगातार हमर पत्राचार होइत छल। ओ अंग्रेजी आ तेलुगुक विद्वान छलथि। हुनक किछु पत्र देसिल-बयना, हैदराबाद मे छपल अछि। -मानेश्वर मनुज सम्पादकीय टिप्पणी (खण्ड-४) ई खंड कविताक स्वर आ दार्शनिक धरातल दूनू मे एकटा निर्णायक मोड़ थिक। ई चारिम खंड साक्षात हिंसा, विश्वासघात, आ काल-गणनाक प्रकृतिक गहीर दार्शनिक प्रश्न सभ सँ ढुइस लड़ैत अछि। कविताक आरंभ गृहस्थक एकटा जीवंत चित्र सँ होइत छै- राति फरीछ होबऽ सँ पहिने बड़द संगे हर-फार कन्हा पर लादल, खेत दिस पैर घसीटैत चलऽवाला गृहस्थ। ई चित्र एकटा आकस्मिक मोड़ लैत अछि: हमरा सूली पर लटकैत ईसा-मसीह लगैत छथि।, जेना ग्रामीण श्रम आ ब्रह्मांडिक पीड़ा कोनो गहीर स्तर पर एकहि छथि। ईसा केँ बुझल छलनि जे अंतिम आमंत्रण मे हुनका धोखा देबऽवला के छलनि? कवि आगू कहैत छथि: “हमरा बुझल अछि- नीक जकाँ बुझल अछि जे हत्यारा के?” ई अपन भीतरक अन्हार सँ साक्षात्कारक प्रक्रिया थिक। आ तइयो कवि ई स्वीकारैत छथि- “मुदा थोड़ेक कालकेँ लेल दोख सागर पर मढ़ैत छी।” ई ईमानदार स्वीकारोक्ति कविता केँ नैतिक उँचाई दैत अछि। तारीख (उन्नैस नवंबर) आ पंचांग एकटा स्थिर, वस्तुगत सत्ता जकाँ उपस्थित छल। कवि तारीखक ओहि मिथ्यात्व केँ उधेसि दैत छथि: कैलेंडर केँ हाड़-माँस नहि होइत छैक / ओ कालरूपी कुकरक मुँहक हड्डीक टुकड़ा अछि / ओ बुझू देवालसँ सटल गिरगिट अछि / ओ केवल कागतक टुकड़ा अछि। कैलेंडर- जे काल केँ टुकड़ी-टुकड़ी कऽ कऽ नापैत अछि, तिथि, सप्ताह, महीना बनबैत अछि- स्वयं काल नहि, मात्र कागच थिक। मुदा ई कागच- चद्दैर तानि कऽ पड़ि जाइत अछि- आ ओकर नीचाँ सँ- कुहरबाक आवाज- आबैत अछि। कवि स्पष्ट कहैत छथि: कैलेंडर मे प्रलय आ परिहास केँ छोड़ि नोरक निशान सेहो नहि होइत छैक। अर्थात्, कैलेंडर मानव-निर्मित समय-पत्र पर मात्र भाषाक खेल थिक- असल प्रलय, परिहास, वा नरक कैलेंडर सँ परे अछि। अंत कालक भयावह रूपक चित्रण सेहो अछि: “काल रात्रिक ओ कराल नेत्र / शनिक दिन काँट मे ओझड़ा कऽ / ताबड़तोड़ छटपटाइत रहल- मुदा एहि भयावह चित्रणक बीच कवि एकटा अडिग आस्था व्यक्त करैत छथि: मानवता, सब दिन, सब क्षण / जन्म लेबऽ आ मरऽवला / रोशनीक किरण थिक। अंतिम पाँति पूरा खंडक आँखि थिक। जन्म-मरणक नश्वर मानवता, सभ काल-दोष आ हिंसाक बीच, अंततः रोशनीक किरण थिक। काल भले कराल होइक, मानवीय चेतनाक दीपक ओहि करालताक पार देखऽ मे सक्षम थिक।- गजेन्द्र ठाकुर नग्नमुनिक तेलुगु काव्य 'काठक घोड़ा' (कोया गुर्रम) खण्ड-४ ४ अपना माथ पर राति फरीछ होबऽ सँ पहिनहे दुब्बर-पातर बड़द केँ साथ लऽ हऽर-फार कन्हा पर लदनें खेत दिस पैर घसीटैत, चलैत गृहस्थ हमरा सूली पर लटकैत ईसा-मसीह लगैत छथि हाँ, हम हत्याक विषय कहैत छी ईसा केँ बुझल छलनि जे- अंतिम आमंत्रण मे आखिरकार हुनका धोखा देबऽवला के छलनि? हमरा बुझल अछि- नीक जकाँ बुझल अछि जे हत्यारा के? -मुदा थोड़ेक कालकेँ लेल दोख सागर पर मढ़ैत छी। कैलेंडर केँ हाड़-माँस नहि होइत छैक ओ कालरूपी कुकरक मुँहक हड्डीक टुकड़ा अछि ओ बुझू देवालसँ सटल गिरगिट अछि ओ केवल कागतक टुकड़ा अछि। तारीख मुदै बनि कटघरा मे ठाढ़ रहैत अछि हाँ, तारीख कोनोटा भऽ सकैत छै इत्तिफाकसँ संभव अछि कि- ओ उन्नैस नवंबर अछि। कैलेंडर मे प्रलय आ परिहास केँ छोड़ि नोरक निशान सेहो नहि होइत छैक हफता भरि दुखिया जकाँ- चद्दैर तानि कऽ पड़ि जाइत अछि चद्दैर तर सँ कुहरबक आवाज केँ छिन्न करऽवला कागत तिथि आ सप्ताह, महीनाक रूप मे काल केँ टुकड़ी-टुकड़ी कऽ दैत अछि। तखन खूब बहल उज्जर खून दिन वा तारीख आखिर कोनो होऊक सप्ताह चाहे कोनो होउक लहुक पर्दा हटाकऽ काल सुनैत रहल - आह, आ कराह! काल रात्रिक ओ कराल नेत्र शनिक दिन काँट मे ओझड़ा कऽ ताबड़तोड़ छटपटाइत रहल। सत्य छै जे- प्रकृति मे होय वा विकृति मे मानवताक घोर अन्हार मनुज पर सदिखन, शासन करैत अछि। मानवता, सब दिन, सब क्षण जन्म लेबऽ आ मरऽवला रोशनीक किरण थिक। -मानेश्वर मनुज आदर्श नगर कॉलोनी गोशाला रोड मधुबनी पिन - 847211 मो. - 9920674861 / 7464077106 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.२. संतोष कुमार राय 'बटोही'- माए (कविता) [मदर्स डे पर] संतोष कुमार राय 'बटोही' माए (कविता) [मदर्स डे पर]

स्मृतिशेष रहि गेल छथि माए । अइ जनम मे आओर दोसर जनम मे पुन: तूहीं होइहैं माए हमर हे गै माए ! बड़ यत्न सँ खून अपन जरा कऽ अपन पेट काटि कऽ पोषलीहि हमरा कोशिश केलही बौआ केँ पेट कखनहुँ खाली नहि रहैए दाना सँ माए ! तूँ फेर नहि एबही? हमर माथ नहि सहलेबही ? मोन खराब भेला पर करूआ तेल सँ नहि ससारहबही ? इस्कूल सँ एला पर धिपल-धिपल सोहारी के बना कऽ हमरा देतै ? माए ! तोहर हाथक नोन आओर मिरचै अलू केँ चटनी रहरियाक आओर मटरक गोदिला सभ हमरा मोन पड़ैत अछि मूरही आओर बथुआ साग माए ! तोरा याद छौ तूँ बेमार पड़ि गेल छेलीह पूरा गाम निरैछ देने रहउ 'घंघौरवाली आब अइ दुनिया सँ' बिदा भेलीह सभ कहैत रहै परञ्च तूँ हमरा लेल फेर जीव गेलीह माए ! आब नहि एबही ? जखन अइ भवसागर मे हम अकेला भऽ गेलहुँ संग छोड़ि तूँ कतऽ नुका रहलीह आब ? जखन भीखमंगा अबैत छेलैह द्वार पर अपन नुञा सँ हमरा नुका कऽ ओकरा भगवैत छेलीह माए ! तूँ दिल्ली मे रहि गेलीह ? तेखण्ड के अशमशान मे ? की यमुना नदी मे ? एक बेर फेर तूँ एबही ? हम तोहर साँरा पर जुड़ि शीतल मे डाबा नहि टांगलियौ तुलसी नहि रोपलियौ पानि नहि देलियौ ! मुइला बाद हम जल चढ़ा कऽ की करबौ तोहर साँरा पर माए ! तूँ अबीहैं नीन मे । गप एकटा रहि गेल छै पूछवाक अछि तोरा सँ स्वर्ग लोक ऊपर छै या नीचा मे ?

-कवि - संतोष कुमार राय 'बटोही'; ग्राम - मंगरौना अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.३. अशोक कुमार ठाकुर- रीत भेल कतेक नीच यौ अशोक कुमार ठाकुर रीत भेल कतेक नीच यौ

देखू दुनियाँ के रीत भेल कतेक नीच यौ। हमरा कनिको निको नई लगईया मीत यौ।।

बेटिक बाप हाथ जोड़ी कानई। बेटाक बाप बातों नई मानई।। बाप भ बापक मरम नई जानई। धिया पिया के करम नई जानई।। बेटा-बाप के मुँह बड़ फरिच यौ, जेना जीर में रहई छै,मरिच यौ। देखू दुनियाँ के रीत भेल कतेक नीच यौ। हमरा कनिको निको नई लगईया मीत यौ।।

पीपड़ पूजई बेटी हर सोमवारी, सब सखी मिल क गाबई नचारी। माय बाबू के दुलारी बुझे लचारी, कोना क हटतई दहेजक बीमारी।। बेटा के होई छै आब कालाबाजारी।। धिया कहे बाबुल के घर बड़ा नीक यौ, हमरा विवाह में जेतई कोना बिक यौ। भ रहल छै दुनु तरफ खीचम खीच यौ।। जेना आव ब्याह नई होई छै,युद्ध शीत यौ, देखू दुनियाँ के रीत भेल कतेक नीच यौ। हमरा कनिको निको नई लगईया मीत यौ।।

वाह रे वाह केहन एलई जवाना, बर-बधु खोजई छै आब जनाना। बात भ जाई छै तय सोलहो आना, बुढिया फुईस बात लै भ जाई छै मना। नूईस भईर बात लै भ जाई छै माना।। हमरा ऊठी जाई यै अही लै खीष यौ। जेना हमरा मारई यै माथा में टीश यौ।। देखू दुनियाँ के रीत भेल कतेक नीच यौ। हमरा कनिको निको नई लगईया मीत यौ।।

बाबु जी गुजरि गेला बिना देखले जमाई , अंगना में कानई छै दाई-माई संग भाई। विधना के लिखल बिधि मिटलो ने जाई, समाजक कुरीति देख कऽ गेलऊ डराई। दहेज के लेल बेटाक बाप बनल कसाई। जेना लागई छै अंहार चारू दिस यौ, आब अमृतो लगईया हमरा विष यौ। देखू दुनियाँ के रीत भेल कतेक नीच यौ। हमरा कनिको निको नई लगईया मीत यौ।।

नाम:अशोक कुमार ठाकुर (नाई/हजाम); ग्राम+पोस्ट:-करमौली, जिला:-मधुबनी(बिहार); मोबाइल नंबर:-9576207983,जनसेवा:-एस.डी.आर.एफ. मे कार्यरत सिपाही [ई- विदेह'क लेल एक नव रचनाकारके आगमन: मैथिली साहित्यक एक सच्चा सिपाही जे वास्तविकमे सिपाही पद पर एस.डी.आर. एफ. विभागमे कार्यरत छथि। ओ अपन दू गोट मौलिक नव अप्रकाशित रचना अवलोकनार्थ पठेलाह अछि -: 'मां' शिर्षक कविता आओर रीत भेल कतेक नीच यौ। अपने पाठक केँ ई सौष्ठव रचना नीक लागत से हमरा दृढ़ विशवास जगैत य। ई युवा पीढ़ीक मैथिली सेबक " मैथिली पिछले दलित साहित्य..’' सँ जुटल रहैत छथि। जे अपन दू प्रकाशित रचना 'मैथिली लोक गीत ' साभार अपूर्वा जुलाई - सितम्बर २०२५ आओर दिसम्बर अंक हैं छनि । संगहि किए हिन्दी साहित्य लेल सेहो हिनक रचना नीक गरहैनमे भेल छैन। हिनका मोनमे एकटा कचोट रहनि जे पूर्वमे " देसील बयना" केँ प्रकाश नार्थ पठौने रहथि ,मुदा ओ रदिभंगाके एक स्वनामधन्य रचनाकारके नामे ऊपर देखलनि। तेँ पुनः कतौह दोसर खेप सँ छपय लेल पठेबा सँ परहेज भऽ गेलाह। ओना रचना'क चोरी तँ मातृभाषा मैथिली लेखन क्षेत्रमे कहियैकाल सुनबामे अबैत रहल य। तेँ श्री ठाकुरजी (नाई समाज) आब अपन रचना ई- विदेह कें नियमित प्रकाशनार्थ पठेताह से वार्तालाप भेल हेन। हिनक संक्षिप्त परिचय अपने लोकनिक बीच दऽ रहल छी -: मधुबनी जिलाक खजौली थाना अन्तर्गत करमौली गामक स्व० पिता राज कुमार ठाकुर जीक बालक - अशोक कुमार ठाकुर केर जन्म दि० १५-२-१९८६ ई० केँ भेलनि,जे स्नातक (कला) इतिहास प्रतिष्ठा कयने धरि छथि। -लाल देव कामत (साहित्य सेवी)] अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.४. जगदानन्द झा "मनु"- आजुक बरसाइत जगदानन्द झा "मनु" आजुक बरसाइत पतिकेँ अपन आंगुरपर नचबै बाली, सेहो आइ बरसाइत करै छथि। ठठड़ी बला कही-कही कऽ, जे ठठड़ी बना देलनि, सेहो आइ बरसाइत करै छथि। मॉडल युग मे, मॉडलो सभ आइ बरसाइत करै छथि। होकती कोना आँचरसँ बियनि, जिंसो बाली आइ बरसाइत करै छथि। पुरुषक राजमे बाहर सुरक्षित नहि छली स्त्री, स्त्री राजमे आइ घर-घरमे असुरक्षित अछि पुरुष। असुरक्षित पुरुषक, जोरगर सेहो आइ बरसाइत करै छथि। सत्य-निष्ठा पतिव्रताक पावनि, बनल जकर आइ मखौल अछि। किछु तँ नव साड़ी लेल, सेहो आइ बरसाइत करै छथि। एक सावित्री मुइल पति केर जियाबक सामर्थ्य रखैत छली, आइ लाखों जीबैतकेँ मरनासन्न लेस बरसाइत करै छथि। एक दिनक वर्तसँ नहि चिरंजीवी हेता आजुक सत्यवान, हुनका चाहियनि घरमे प्रेम, आदर आ सम्मान। हे मातृशक्ति! अहाँ श्रेष्ठ छलौं, श्रेष्ठ छी आ श्रेष्ठ रहब, काली, दुर्गा, रनचंडी अहीं छी। परञ्च एहि रूपकेँ राखू स्वधर्म रक्षा लेल, घरमे रहूँ लक्ष्मी बनि हँसैत अपन विष्णु संग। अहाँक हँसैत ई लक्ष्मी रूपक सौंझा, कोन यमराजक पावर विष्णुसँ लड़ता? पूज्य छथि सत्यवानक सावित्री, पूज्य छथि पतिक हियामे बसनाहरि स्त्री। -जगदानन्द झा ‘मनु’, मो० न० +९१ ९२१२-४६-१००६ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.५. आचार्य रामानंद मंडल- अश्रद्धा/ हिंदू आ मुसलमान/ जै हे जगजननी सीता आचार्य रामानंद मंडल अश्रद्धा/ हिंदू आ मुसलमान/ जै हे जगजननी सीता १ अश्रद्धा बने आबि लरकी। श्रद्धा न अश्रद्धा। एगो हय कहल। शीलवंत मरदाबा भिखार। शीलवंत मौगी छिनार। श्रद्धा रहे अहिले। कहल गेल छिनार। आ काटल गेले। जौं रहिते अश्रद्धा। न कहल जैते छिनार। न काटल जैते अश्रद्धा। काटल जैते काटेवाला। न चाही श्रद्धा । चाही आइ अश्रद्धा। रामा चाही अश्रद्धा। २. हिंदू आ मुसलमान सुरुज हिंदू के आ चान मुसलमान के केसरिया हिंदू के आ हरियरका मुसलमान के। पूरब हिंदू के आ पच्छिम मुसलमान के। गंगा हिंदू के आ जमजम मुसलमान के। काशी हिन्दू के आ कावा मुसलमान के । मंदिर हिंदू के आ मस्जिद मुसलमान के। ईश्वर हिंदू के आ अल्लाह मुसलमान के। समसान हिंदू के आ कब्रिस्तान मुसलमान के। आबि बांटि सकबे आ धरती आकाश के। आबि बांटि सकबे आ पानी हवा के। आबि बांटि सकबे सुरुज के गरमी के। आबि बांटि सकबे चान के चांदनी के। आबि बांटि सकबे आगि के तपिस के। आबि बांटि सकबे इंसान के इंसानियत के। ३. जै हे जगजननी सीता जै हे जगजननी माता। जै हे जगजननी सीता। जै हे मिथिला बहिना। जै हे मिथिला धिया। देखूं मिथिला नहिरा। बनल मैथिल सोलकन -बभना। बनल मैथिली अंगिका -बज्जिका। जै हे मिथिला बहिना। आउ संग राम पहुना। आउ मिथिला नहिरा। देखूं अपन भाई-भतिजा। मांगे आशीष मिथिला। मिटे भेद-भाव मिथिला। बोले मैथिली मिथिला। जै हे जगजननी सीता। बंदना करैय रामा भइया। जै हे मिथिला बहिना। जै हे मिथिला धिया। जै हे जगजननी सीता। जै हे जगजननी माता। -आचार्य रामानंद मंडल सामाजिक चिंतक सह साहित्यकार सीतामढ़ी। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.६. प्रणव कुमार झा- आदमी प्रणव कुमार झा आदमी छैक नै, मुदा कतेक नांगइर डोलाबै अछि आदमी भुरभुर माटि पर अट्टालिका बनाबै अछि आदमी। भीतर से धूसर अछि बाहर से मोती सन , झूठक बुलडोजर से सच के गिराबै अछि आदमी। भाषणक आँधरि में मुद्दा बिला जाय अछि, टूटल सपना पर महफ़िल जमाबै अछि आदमी। नारा गूँजय अछि  “विकास, विकास!” टीवी पर, आर राति में किछु भूखल रह जाय अछि आदमी। सब रोज होइत रहय छैक कोनो ने कोनो हादसा, गिनती मात्र बनिकऽ कत्तहु मरि जाय अछि आदमी। कागज़ पर बनैत शहर, सुनहरा सपना के नक्शा, माटिक झोपड़ी में अन्हरिया पाबै अछि आदमी। नीक दिनक गूंज में दबि जाय अछि ओकर कराह, खाली बर्तन बजाकऽ चुप रहि जाय अछि आदमी। छैक नै, मुदा कतेक नांगइर डोलाबै अछि आदमी, अपनहि हारि केर जश्न मनाबय अछि आदमी। सत्ताक गलियारा में झुकि के सलाम करय अछि, अपनहि स्वार्थ मे अपनाके भरमाबै अछि आदमी। वायदाक मोटरी कंधा पर लादने फिरय अछि, सभ दिन नव मुखौटा लगाबै अछि आदमी। एकटा रोटी के लेल दर-दर भटकय अछि ओ , मंच पर बैठल ओकरा “डेटा” बताबै अछि आदमी। छैक नै, मुदा कतेक नांगइर डोलाबै अछि आदमी, पैरक नीचा के ज़मीन अपने सरकाबै अछि आदमी। स्कूल में टूटल छत, अस्पताल में रेलमपेल, अछि खोखला मुदा हल्ला मचाबै अछि आदमी। आश्वासनक अम्बार मुदा परिणाम शून्य, हर बेर गैले गीत गाबय अछि आदमी। जे सवाल से डेराय नै छल  काल्हि तक ओ, आई चुप्पी के ही धर्म बताबै अछि आदमी। झूठक सीरक में लपेटायल अछि सुकून से, सचक सीटल हवा से काँपय अछि आदमी। आर जखन आईना सामने ठाढ़ होइत अछि, अपहि नज़र से नज़र चोराबय आदमी। -प्रणव कुमार झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। 2 || विदेह ४४२ विदेह ४४२|| 1

गए हाल TOME I-IV / VOLUMES -00 | A Parallel History of | Mithila & Maithili Literature with Critical Appreciations of Representative Maithili Writers 2 Reg = by | | GAJENDRA THAKUR | editor, Videha eJournal VIDEHA + PARALLEL LITERARY MOVEMENT se + ISSN 2229-547X - est. 2000 - Delhi - MMXXVI

FROM THE SERIES The Videha Parallel Library a centuries of Maithili letters — from the Buddhist Charyapadas | of the eighth century to the digital insurgency of the twenty-first — | gathered under a single critical lens. Across one hundred volumes the | Videha Parallel Library has assembled the suppressed, the neglected, | the folk, the Dalit, the women’s, and the diasporic traditions of Maithili literature into a counter-archive to the official canon curated by the Sahitya Akademi. This volume brings that project to its threshold. Applying Bharata’s rasa-theory, Anandavardhana’s dhvani, Kuntaka's vakrokti, Gahgesa Upadhyaya’s Navya-Nyaya pramana system, Bakhtinian dialogism, Spivak’s subaltern historiography, and the Videha Parallel History Framework, it offers sustained critical appreciations of one hundred contemporary and historical Maithili writers — poets, novelists, dramatists, essayists, theorists, and translators — whose work constitutes the living parallel tradition. “The parallel is not the marginal but the truthful, in long delay.” WHAT THIS VOLUME CONTAINS, >> One hundred chapter-length critical appreciations, each paired with a portrait image »® A historical synthesis from 8th-century Charydpadas to contemporary digital publishing >> Indigenous theory (Navya-Nyaya, rasa, dhvani) alongside Western and postcolonial lenses >> Archival recovery of the Dooshan Panji records on Gafigesa Upadhyaya of Mithila pes ABOUT THE AUTHOR | GAJENDRA THAKUR — Maithili author, editor, and literary scholar — founder | of the Videha Parallel Literary Movement and founded the Videha eJournal in | | 2000 and has edited it without interruption since. He writes in Maithili, Hindi, ‘i and English, and has authored scholarly monographs on Gangesa Upadhyaya’s Navya-Nyaya and the parallel history of Mithila’s literary cultures. SON 978-93-5832-486-6 VIDEHA | | till | | | | | Fe AEE nee > हि, ISSN 2229-547X - videha.co.in

Panii of Mithil ecoding the Bl, N J a \ 5 al pe | Panji of Mithila ee Surprising Insights from India and P a ) | n | | Nepal's Oldest Social Network The Panji system of Mithila is a remarkable example of how communities preserved, recorded and @ के transmitted social memory across generations. Spanning centuries, it functions as one of the world's oldest social networks—long before the के digital age. This book decodes the structure, a purpose and significance of Panji, bringing to light Surprising Insights from its value for understanding kinship, migration, India and Nepal's Oldest marriage alliances and societal organization in ae Social Network India and Nepal. ali का किक Bridging tradition with modern research, this work er ogi i —_ 5, ieee a offers surprising insights for scholars of sociology, ll eran : ss - i : anthropology and genomic genealogy. It opens new —— eT Us 5 Oe Gr pathways for interdisciplinary studies, showing how fe ¢ sao S \, \ — EEN ने, ५ We pahnn. ancient records can inform contemporary social न \ \ ‘a ES | ice Oey रे science and genealogical mapping. WAS ec \ e हे se सर दे BEd a =): Verges [aia Bt see EAS से Gajendra Thakur = y {eee ‘ कण a ca tbe aw) eo, Dh ० ect eh Acs & bp & Yeo B® si Ay x es a < eel it f | ty a i pe] < cas “6 f* \, For the Research Students of ae ‘ o % >) | र ae and ——— Dy; 7 EIN \\ है पृ i Dy} i 2) ९. enom eneological Mappin ISBN 978-93-595-894-5 www.videha.co.in PKC fe Wik EE, Fear हद Gajendra Thakur डिश [=] Editor ISBN videha.co.in Videha Maithili eJournal

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लाल 4 ” = — x = fade मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम्‌ tar Aly) Le x नल २३ A PA Pee é x TRI a सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर।

। THE VIDEHA PARALLEL LIBRARY | TOME I-IV / VOLUMES -00 A Parallel History of Mithila & Maithili Literature with Critical Appreciations of Representative Maithili Writers रु be Vv ¥ by GAJENDRA THAKUR editor, Videha eJournal VIDEHA - PARALLEL LITERARY MOVEMENT videha.co.in - ISSN 2229-547X - est. 2000 - Delhi - MMXXVI

) FROM THE SERIES ) The Videha Parallel Library Thirteen centuries of Maithili letters — from the Buddhist Charyapadas of the eighth century to the digital insurgency of the twenty-first — gathered under a single critical lens. Across one hundred volumes the Videha Parallel Library has assembled the suppressed, the neglected, the folk, the Dalit, the women’s, and the diasporic traditions of Maithili literature into a counter-archive to the official canon curated by the Sahitya Akademi. This volume brings that project to its threshold. Applying Bharata’s rasa-theory, Anandavardhana’s dhvani, Kuntaka's vakrokti, Gangesa Upadhyaya’s Navya-Nyaya pramana system, Bakhtinian dialogism, Spivak’s subaltern historiography, and the Videha Parallel History Framework, it offers sustained critical appreciations of one hundred contemporary and historical Maithili writers — poets, novelists, dramatists, essayists, theorists, and translators — whose work constitutes the living parallel tradition. “The parallel is not the marginal but the truthful, in long delay.” WHAT THIS VOLUME CONTAINS >> One hundred chapter-length critical appreciations, each paired with a portrait image >> A historical synthesis from 8th-century Charyapadas to contemporary digital publishing >> Indigenous theory (Navya-Nyaya, rasa, dhvani) alongside Western and postcolonial lenses >> Archival recovery of the Dooshan Panji records on Gangesa Upadhyaya of Mithila ee ABOUT THE AUTHOR GAJENDRA THAKUR — Maithili author, editor, and literary scholar — founder of the Videha Parallel Literary Movement and founded the Videha eJournal in 2000 and has edited it without interruption since. He writes in Maithili, Hindi, Sanskrit, and English, and has authored scholarly monographs on Gangesa Upadhyaya’s Navya-Nyaya and the parallel history of Mithila’s literary cultures. ) ISBN 978-93-58I2-486-6 V I D E H A parallel literary movement | 9 Magssal24866!> ISSN 2229-547X - videha.co.in