विदेह ४४३ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। [विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X Videha e-Journal (since 2000) at www.videha.co.in ] ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। कॉपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- २०२६. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. It is a platform for scholars, researchers and writers to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, prose and verse in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili and from Maithili into English. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. (c)२०००- २०२६. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA. सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@zohomail.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@zohomail.in. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover design: AUM GAJENDRA THAKUR VIDEHA:443 समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा। for the writers, readers, and listeners of Mithilā, who have kept the lamp of Maithilī burning through a thousand years of storms ………………………….. "The Parallel is not the marginal but the truthful, in long delay." Mānuṣīm iha saṃskṛtām मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। मिथिलाक ओइ लेखक, पाठक आ श्रोता लोकनि लेल, जे सहस्र वर्षक झंझावात मे सेहो मैथिलीक दीप प्रज्वलित रखने छथि। समानांतर कात-करोट मे हएब नै अछि, वरन् ई अछि असल सत्य, जे अपन समय लेलक अछि। अनुक्रम विदेह अंक ४४३ [०१ जून २०२६] वर्ष १९ मास २२२ ISSN 2229-547X ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृष्ठ २-१७) १.२.अंक ४४२ पर टिप्पणी (पृष्ठ १८-१८) गद्य Prose २.१. हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२२ (पृष्ठ २१-२६) २.२. कल्पना झा- मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-३ (पृष्ठ २७-३०) २.३. प्रणव कुमार झा-पुस्तक पाठकीय: ‘सेतुषाम’ लोक आ वेदक दार्शनिक सेतु (पृष्ठ ३१-३४) २.४. डॉ. योगानन्द झा- अभिनव पद्यविधा : इतिहास-काव्य (पृष्ठ ३५-४१) २.५. प्रमोद झा 'गोकुल'- पिरीतो(लघु एकांकी नाटिका) (पृष्ठ ४२-४६) २.६. लाल देव कामत- सूर्य पुत्र वा सुतपूत एक धनुर्धर : कनीन पुत कर्ण/ अरे त्तोरी के ! ...... धत् तोरी के? (पृष्ठ ४७-५२) २.७. आचार्य रामानंद मंडल- वर्तमान चोर संत कबीर/ हमरे सभके/ कटहर मटन/ परोपकार!/ सुबुद्धि (पृष्ठ ५३-५६) २.८. बद्रीनाथ राय ’अमात्य’- श्राद्ध (पृष्ठ ५७-६६) २.९. कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा- विधाते बाम (पृष्ठ ६७-६८) २.१०. विप्रकान्त मंडल- मशीन बनबाक उमेड़ (पृष्ठ ६९-७०) २.११. अमरेश ठाकुर- नैका बनिजारा उपन्यासक आलोचनात्मक अध्ययन (पृष्ठ ७१-७६) २.१२. प्रीति कुमारी- चुनाव आयोग आ राष्ट्रीय दल/ हरि बाबू केँ ८०म् वर्षगांठ 'क हार्दिक शुभकामना (पृष्ठ ७७-८२) २.१३. संतोष कुमार राय 'बटोही'- कथा- लल्ली (पृष्ठ ८३-८७) २.१४. डॉ अजय कुमार झा- पोथी समीक्षा : “ आचार्य चाणक्य” (मैथिली खंडकाव्य) (पृष्ठ ८८-८९) २.१५. रामकृष्ण परार्थी- जमाना बदलि गेलैं (पृष्ठ ९०-९७) २.१६. गजेन्द्र ठाकुर-साधु आ वेश्या [भगवदज्जुकम्]मूल संस्कृत प्रहसन - बोधायन द्वारा रचित; मैथिली अनुवाद: गजेन्द्र ठाकुर (पृष्ठ ९८-११७) २.१७. गजेन्द्र ठाकुर- परमेश्वर कापड़िक कथा-खिस्साकआलोचनात्मक समीक्षा (पृष्ठ ११८-१२६) २.१८. गजेन्द्र ठाकुर- परमेश्वर कापड़ि- पद्य-रचनाक आलोचनात्मक समीक्षा (पृष्ठ १२७-१३९) २.१९. गजेन्द्र ठाकुर- परमेश्वर कापड़िक रचना-संसार- विस्तृत मैथिली साहित्यिक समीक्षा (पृष्ठ १४०-१४८) २.२०. गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-१) सन्दर्भ- परमेश्वर कापड़ि- नाटक 'रेङ–रेङ' (पृष्ठ १४९-१५७) २.२१. गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-२) सन्दर्भ- परमेश्वर कापड़ि- नाटक 'गहन उगरास'(पृष्ठ १५८-१६८) २.२२. मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-३) सन्दर्भ- कुणाल-कृत “चालिस चोर आ गोनू झा उर्फ ज्ञान झाक खिस्सा” (पृष्ठ १६९-१९१) पद्य Poetry ३.१. तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम'] मूल तेलुगु: नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव) मैथिली अनुवाद: मानेश्वर मनुज [खण्ड ५] (पृष्ठ १९३-१९९) ३.२. आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल (पृष्ठ २००-२०१) ३.३. अशोक कुमार ठाकुर- माँ/ कोना फसौले तू अपन जाल मे (पृष्ठ २०२-२०५) ३.४. जगदानन्द झा "मनु"- २ टा गजल (पृष्ठ २०६-२०७) ३.५. संतोष कुमार राय 'बटोही'- हम फेर नहि भेटबैन्ह (पृष्ठ २०८-२०८) ३.६. प्रणव कुमार झा- तेलचट्टा के जिनगी जिबैत लोक (पृष्ठ २०९-२१०) ३.७. राम शंकर झा "मैथिल"- स्मृति शेष (भाग-०८) अधिकची निन/ डबरा (पृष्ठ २११-२१७) ३.८. सुभाष कुमार कामत- जनगणना (पृष्ठ २१८-२१९) ३.९. रबीन्द्र नारायण मिश्र- स्त्रीक अधिकार (पृष्ठ २२०-२२३) ३.१०. झौली पासवान- अगराहीक घनछोहा (पृष्ठ २२४-२२५) APPENDIX: METHODOLOGICAL NOTE The Nepal Bikram Samvat years cited have been converted to approximate CE years using the standard offset of BS minus 56–57 years. Web sources consulted include the Videha digital archive (videha.co.in). All URLs were last accessed April 2026. This research was prepared using primary texts, and standard academic resources. All quoted material is from the cited sources. For the most current scholarship, consult the Videha Parallel History series at www.videha.co.in/gajenthakur.htm. ………………………………………………. A PARALLEL HISTORY OF MAITHILI LITERATURE: INTRODUCTION DALIT LITERARY CRITICISM: TELUGU, GUJARATI, AND ODIA DALIT LITERATURE IN MAITHILI TRANSLATION GANGESA UPADHYAYA: LIFE, LOGIC, AND LEGACY IN THE NAVYA-NYAYA TRADITION [NAVYA-NYAYA’S HIERARCHICAL USE OF LIMITORS IS COMPATIBLE WITH MODERN ARTIFICIAL INTELLIGENCE AND NATURAL LANGUAGE PROCESSING (NLP)] MITHILA & MAITHILI: CRITICAL ANALYSIS OF INSTITUTIONS THE MAITHILI GHAZAL VIDEHA (ISSUE 1-350) SADEHA SERIES (1-37) VIDEHA ISSUES 351-438 VIDEHA MAITHILI PARALLEL DRAMA THEATRE VIDEHA PARALLEL AUDIO VIDEO ARCHIVE VIDEHA PARALLEL CHILDREN'S LITERATURE Abdur Razzak, Abha Jha, Abhilash Thakur, Achhe Lal Shastri, Ajit Kumar Jha, Amit Mishra, Amod Kumar Jha, Amrendra Yadav, Anamika Raj, Anand Kumar Jha, Anil Mallik, Anjani Kumar Verma, Anmol Jha, Arvind Thakur, Ashish Anchinhar, Ashok (kathakar Ashok), Ashraf Rain, Dr. Bacheshwar Jha, Badri Nath Roy 'Amatya', Pt. Bal Govind 'Arya', Bechan Thakur, Pandit Bhavnath Jha, Bibhuti Anand, Bijayendra Jha, Binay Bhushan, Bindeshwar Thakur, Chandan Kumar Jha, Dinesh Kumar Mishra, Durganand Mandal, Gajendra Thakur, Ghanashyam Ghanero, Gopalji Jha 'Gopesh', Gyanvardhan Kanth, Harimohan Jha, Hitendra Gupta, Hitnath Jha, Hriday Narayan Jha, Ilarani Singh, Jagdanand Jha 'Manu', Jagdish Chandra Thakur 'Anil', Jagdish Prasad Mandal, Jhauli Paswan, Jitendra Kumar Jha 'Jeetu', Dr. Kailash Kumar Mishra, Kalikant Jha 'Buch', Kalpana Jha, Kalpana Jha, Bokaro, Kalpana Jha, Delhi, Kalpana Jha, Patna, Kameshwar Choudhary, Kameshwar Jha 'Kamal', Dr. Kamini Kamayini, Kamla Chaudhary, Kapileshwar Raut, Kedar Nath Chaudhary, Dr. Kirtinath Jha, Dr. Kishan Karigar, Krishna Kumar Kashyap, Kumar Manoj Kashyap, Kumar Pawan, Kundan Kumar Karn, Kusum Thakur, Lal Dev Kamat, Lalita Jha, Lallan Prasad Thakur, Laxman Jha 'Sagar', Mala Jha, Manmohan Jha, Meena Jha, Mithilesh Kumar Jha, Munnaji, Munnaji, Munni Kamat, Nabo Narayan Mishra, Nagendra Kumar, Nand Kumar Mishra 'Nand', Nand Vilas Roy, Nanda Vilas Ray, Narayan Yadav, Narayanji Chaudhary, Narendra Jha, Navendu Kumar Jha, Neerja Renu, OM Prakash Jha, Panna Jha, Phanishwar Nath Renu, Prabhat Rai Bhatt, Pradeep Bihari, Pradeep Pushpa, Pranav Jha, Prayas Premi Maithil, Preeti Thakur, Premlata Mishra 'Prem', Premshankar Singh, Rabindra Narayan Mishra, Rajdeo Mandal, Rajeev Ranjan Mishra, Rajnandan Lal Das, Ram Bharos Kapari 'Bhramar', Ram Chandra Roy, Ram Sogarth Yadav, Ram Vilas Sahu, Acharya Ramanand Mandal, Prof. Dr. Ramawatar Yadav, Ramdeo Prasad Mandal 'Jharudar', Ramesh, Ramesh Narayan, Rameshwar Prasad Mandal, Pandit Ramji Chaudhary, Ramji Prasad Mandal, Acharya Ramlochan Sharan, Ramlochan Thakur, Ravi Mishra Bhardwaj, Ravibhushan Pathak, Ravindra Nath Thakur, S.C. Suman, Sandeep Kumar Safi, Sanju Das, Santosh Kumar Mishra, Santosh Kumar Roy 'Batohi', Satyanand Pathak, Shail Jha 'Sagar', Dr. Shambhu Kumar Singh, Shanti Lakshmi Chaudhary, Shardindu Chaudhary, Shashi Bala, Shashidhar Kumar 'Videh', Shiv Kumar Jha 'Tillu', Dr. Shiv Kumar Prasad, Shivshankar Singh Thakur, Shivshankar Sriniwas, Dr. Shubh Kumar Barnwal, Shyam Darihare, Siyaram Jha 'Saras', Srijan Shekhar 'Ajneya', Subhash Chandra Yadav, Subhash Kumar Kamat, Subodh Jha, Subodh Kumar Thakur, Sujit Kumar Jha, Sushil, Sweta Jha Chaudhary, Taranand Viyogi, Prof. Udaya Narayana Singh Nachiketa, Umesh Mandal, Umesh Paswan, Veena Thakur, Vibha Rani, Vibhuti Anand, Vijaynath Jha, Vineet Utpal, Yoganand Jha, Prof. Dr. Yogendra P. Yadava, Yogendra Pathak Viyogi A Parallel History of Mithila & Maithili Literature, Original Poem in Maithili, Translated into English, Children's Literature Theory, Children's Picture-Story Literature, Contemporary Mithila Artists, Contemporary Mithila Artists, Dalit and Subaltern Literature, Dalit Literary Criticism, Dalit Literary Criticism — Gujarati Dalit Literature in Maithili Translation, Dalit Literary Criticism — Odia Dalit Literature in Maithili Translation, Dalit Literary Criticism — Telugu Dalit Literature in Maithili Translation, Digital Maithili Children's Literature, Digital Maithili Literature, The Epistemology of Parallelism — Videha Sadeha Series and the Maithili Digital Renaissance, Gangeśa Upādhyāya / Navya-Nyāya, Gangesa Upadhyaya — Life, Logic, and Legacy in the Navya-Nyaya Tradition, Institution Critical Analysis, Language Transmission, Laprek vs Bīhani Kathā, Maithili Bīhani Kathā — The Seed Story Tradition in Maithili Literature, The Maithili Ghazal — History, Theory, Revival, and the Anchinhar Era, Maithili Micronarrative, Mithila & Maithili — Critical Analysis of Institutions, Awards and Recognition Frameworks, Mithila & Maithili Institution Critical Analysis, Parallel Literature Movement, Seed Story Tradition, Tirhuta / Mithilakshar, Videha 351–438 Critic, Videha Children Literature Expanded, Videha Children Literature Expanded — Parallel Children Literature in Maithili, Videha eJournal, Videha Issues 1–350, Videha Issues 351–438, Videha Issues 351–438 — Epistemological and Canonical Transformations, The Videha Maithili Parallel Drama Theatre, Videha Maithili Parallel Drama Theatre, The Videha Maithili Parallel Drama Theatre — Critical Historiography and Epistemological Analysis, The Videha Parallel Audio Video Archive, Videha Parallel Audio Video Archive, The Videha Parallel Audio Video Archive — Digital Remediation and Subaltern Historiography, Videha Parallel Audio Video Critic, Videha Parallel Children Literature, Videha Parallel Drama Critic, Videha Parallel History Framework, Videha Sadeha 1–37 / Issues 1–350 Critic, Videha Sadeha, Videha Sadeha Series 1–37, Vidyapati, the Primal Poet of Maithili (Pre-Jyotirishvara), Women’s Writing, Young Readers in Maithili … AND MORE TO COME IN TOME 5. I. A PARALLEL HISTORY OF MITHILA & MAITHILI LITERATURE [TOME 1-4; VOLUMES 1-100] BY GAJENDRA THAKUR [Parallel History Series ISBN Number: 978-93-5812-486-6] GOOGLE PLAY BOOK [TOME 1-4; VOLUMES 1-100] https://play.google.com/store/books/details?id=uvjREQAAQBAJ AMAZON KINDLE [TOME 1-4; VOLUMES 1-100] https://www.amazon.in/dp/B0GX2XRKM7 POTHI HARDBACK POTHI TOME 1 [VOLUMES 01-25] https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-parallel-history-mithila-maithili-literature/ POTHI TOME 2 [VOLUMES 26-50] https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-parallel-history-mithila-maithili-tome-2/ POTHI TOME 3 [VOLUMES 51-75] https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-parallel-history-mithila-maithili-literature-volume-1-100-tome-3-volume-51-75-b/ POTHI TOME 4 [VOLUMES 76-100] https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-parallel-history-mithila-maithili-literature-volume-1-100-tome-4-volume-76-100-/ II. DECODING THE PANJI OF MITHILA: Surprising Insights from India and Nepal’s Oldest Social Network [ISBN: 978-93-5915-894-5] TABLE OF CONTENTS Part I — Theoretical Foundations Chapter 1 — Genome Mapping of Mithila: Pañjī System — Genealogical Theories (Volume I) Chapter 2 — Mithila's Pañjī-Prabandha: Genealogical Theories Study (Volume II) Chapter 3 — The Panji Prabandh: Genomic Mapping, Theoretical Frameworks, Socio-Historical Trajectories Part II — Comprehensive Analytical Reports Chapter 4 — Analytico-Genetic Report on the Mithila Panji Prabandh Chapter 5 — The Socio-Genetic Architecture of Mithila: Exhaustive Anthropological Analysis Chapter 6 — The Mithila Panji Prabandha: Anthropological, Legal, Socio-Historical Analysis Chapter 7 — Panji Prabandh: A Comprehensive Briefing and Study Guide Chapter 8 — Special Studies: Q&A; Women in the Pañjī; Dooshan Pañjī and the Political Economy of Status Part III — Prācīn Pañjī: Genome Mapping Volume I Chapter 9 — Khaṇḍa 1: Villages, Families, Lineages, and Gotras (Pages 1–65) Chapter 10 — Khaṇḍa 1 Continued (Pages 66–347): Villages, Lineages, Marriage Colophons Chapter 11 — Khaṇḍa 2 (Pages 348–690): Royal Records, Scholarly Titles, and Modernity Chapter 12 — Pañjī Prabandha Vol. I Section 2 (Uṭīp): Mithila's Living Genome Chapter 13 — Genome Mapping Vol. I: Mithilak Pañjee Prabandha Chapter 14 — Pampilā Pañjī, Khaṇḍa 3 — Nāgarāma: Analytical Report (Volume I) Chapter 15 — Pampilā-Varga Pañjikā, Khaṇḍa 3 (Nagramī): Entries 226–358 (Volume I) Chapter 16 — Pañjī Prabandha, Khaṇḍa 3 (Nagramā): Blocks 359–466 (Volume I) Part IV — Genealogical Mapping: Volume II Chapter 17 — Panji Prabandha: Genealogical Mapping (450 AD–2009 AD), Comprehensive Research Report Part V — Dooshan Pañjī: The Black Book of Mithila Chapter 18 — The Dooshan Pañjī: A Comprehensive Scholarly Report Chapter 19 — Dūṣaṇa Pañjī: A Complete Study from Genealogical Theories Chapter 20 — Dooshan Panji: An Interdisciplinary Research Report Bibliography & Tables GOOGLE PLAYBOOK Decoding the Panji of Mithila: Surprising Insights from India and Nepal's Oldest Social Network by Gajendra Thakur – Books on Google Play AMAZON KINDLE https://www.amazon.in/dp/B0H463RVT8 POTHI HARDBACK https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-decoding-panji-mithila/ III. गद्य पद्य भारती खण्ड १ आ २ (विदेह सदेह २८ & विदेह सदेह ३७) [विभिन्न भाषासँ अनूदित गद्य आ पद्य रचना (खण्ड-१) & (खण्ड-२) (विदेह www.videha.co.in/ पेटार अंक १-३५० सँ)] [खण्ड १ ISBN No: 978-93-341-0402-8; खण्ड २ ISBN No: 978-93-5890-150-4] १ विदेह सदेह २८ GADYA PADYA BHARTI 1 विभिन्न भाषासँ अनूदित गद्य आ पद्य रचना (खण्ड-१) (विदेह www.videha.co.in/ पेटार अंक १-३५० सँ) https://store.pothi.com/book/editor-gajendra-thakur-gadya-padya-bharti-1/ २ विदेह सदेह ३७ GADYA PADYA BHARTI 2 विभिन्न भाषासँ अनूदित गद्य आ पद्य रचना (खण्ड-२) (विदेह www.videha.co.in/ पेटार अंक १-३५० सँ) https://store.pothi.com/book/translator-gajendra-thakur-gadya-padya-bharti-2/ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका WWW.VIDEHA.CO.IN VIDEHA 23 LANGUAGE TRANSLITERATOR https://www.videha.co.in/new_page_101.htm विदेह लिपि परिवर्तक IPA · IAST · Tirhuta · Braille https://www.videha.co.in/script-converter.html विदेह आ सदेह सम्पूर्ण इंडेक्स https://www.videha.co.in/script-converter.html विदेह पेटार VIDEHA ARCHIVE https://www.videha.co.in/archive.htm विदेह मैथिली थेसॉरस — मैथिली-अंग्रेजी / अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोश https://www.videha.co.in/maithili-thesaurus.html विदेह मैथिली ↔ अंग्रेजी अनुवादक · Videha Maithili ↔ English Translator https://www.videha.co.in/maithili-translator.html विदेह पञ्जी प्रबन्ध — मैथिल ब्राह्मण वंशावली इंडेक्स https://www.videha.co.in/panji-mool-index.html विदेह गद्य https://www.videha.co.in/prose.htm विदेह पद्य https://www.videha.co.in/verse.htm विदेह स्त्री कोना https://www.videha.co.in/femcorner.htm A PARALLEL HISTORY OF MITHILA & MAITHILI LITERATURE https://www.videha.co.in/gajenthakur.htm विदेह मिथिला रत्न https://www.videha.co.in/ratna.htm विदेह मिथिलाक खोज https://www.videha.co.in/discovery.htm विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण https://www.videha.co.in/investigation.htm विदेह पुरान अंक https://www.videha.co.in/videha.htm विदेह पोथी https://www.videha.co.in/pothi.htm विदेह दृश्य-श्रव्य नाट्य उत्सव https://www.videha.co.in/Audio_Video.htm विदेह शिशु, बाल आ किशोर उत्सव https://www.videha.co.in/kids.htm विदेह ई-लर्निङ्ग/ विदेह ई-लर्निङ्ग क्विज https://www.videha.co.in/videha-elearning.htm Videha Converters- Thesaurus, Panji, Script Converters, Transliterators, Translators, eLearning Quizzes, Maithili Language Search and other Technical Tools https://www.videha.co.in/videha-converters.htm विदेह आ सदेह दुनू https://archive.org/details/VidehaAndSadeha TWITTER/ X https://x.com/videha FACEBOOK https://www.facebook.com/groups/videha/ Videha Googlegroups https://groups.google.com/g/videha
१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.अंक ४४२ पर टिप्पणी १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय विदेह: सदेह: ५ मैथिली विहनि कथा (विदेह अंक ५१-१००) समग्र साहित्यिक समीक्षा: सभटा साहित्यकार भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य । पाश्चात्य आलोचना । गंगेशक नव्य-न्याय । विदेह समानान्तर इतिहास ढाँचा सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। आइएसबीएन: 978-93-80538-63-1 । आइएसएसएन: 2229-547X भूमिका: सदेह ५ क स्वरूप आ विहनि कथाक विधागत महत्व विदेह: सदेह: ५ मैथिली विहनि कथाक पहिल समग्र संकलन थिक। 'विहनि' = बीया (बीज)। विहनि कथा = बीज-कथा = तीव्र लघुकथा = एक एहन सूक्ष्म-शैली जाहिमे पूरा कथा न्यूनतम शब्दसँ अधिकतम अनुनाद सृजित करैत अछि। प्रथम मैथिली विहनि कथा गोष्ठी: २० फरवरी १९९५, चित्रगुप्त प्राङण, हटाढ़, मधुबनी - मुन्नाजी आ मलयनाथ मंडन द्वारा। विदेहक ६७म अंक विहनि कथा-विशेषांक एहि विधाकेँ मैथिलीमे स्वतन्त्र विधाक मान्यता देलक। एहि खण्डमे: (क) गजेन्द्र ठाकुरक विधागत निबन्ध; (ख) मुन्नाजीक सामाजिक समीक्षा निबन्ध; (ग) ५८ कविक कथा; (घ) डॉ. तारानन्द वियोगीसँ गप-सप; (ङ) देवशंकर नवीनक आलोचनात्मक निबन्ध। १. गजेन्द्र ठाकुर रचना: (क) गद्य साहित्य मध्य विहनि कथाक स्थान आ विहनि कथाक समीक्षाशास्त्र (आलोचना निबन्ध) (ख) शारदानगर (विहनि कथा) विधागत निबन्धक विश्लेषण: गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध विहनि कथाक पहिल मैथिली सैद्धान्तिक ढाँचा स्थापित करैत अछि। जेम्स जोइस केर 'डबलिनर' (आत्म-प्रकाश सिद्धान्त), खलील जिब्रान (गद्य-कविता), चेखव (आख्यान-मितव्ययिता) सबकेँ उद्धृत करैत ओ तर्क करैत छथि जे विहनि कथाक मानक 'त्वरित प्रस्तुति' नहि, बल्कि 'स्थायी तत्व' (प्रभावक स्थायित्व) थिक। रस-ध्वनि: 'शारदानगर' विहनि कथामे शान्त रस। ध्वनि: 'शारदा' (विद्या देवी, सरस्वती) + 'नगर' (सहर) - शिक्षा/संस्कृति पर निर्मित एक सहर केर पतन। वक्रोक्ति: 'शारदानगर' केर नाममे आकांक्षा आ वास्तविकताक अन्तर। नव्य-न्याय: गंगेशक 'प्रमाण-शास्त्र': ठाकुरक निबन्ध विहनि कथाक समीक्षात्मक मानदण्ड (मापदण्ड) स्थापित करैत अछि- ई प्रमाण-शास्त्र थिक साहित्यिक समीक्षा शैलीमे। विदेह समानान्तर इतिहास: विधा-सिद्धान्त+ सृजनात्मक लेखन एक्के खण्डमे: विदेह एहन साहित्यिक स्थान थिक जाहिमे सिद्धान्त आ व्यवहार सह-अस्तित्व रखैत अछि - साहित्य अकादमी केर विभागीकरण केर विरुद्ध। २. मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण) रचना: (क) सामाजिक सरोकार कें छुबैत विहनि कथा (निबन्ध) (ख) रेवाज/दरेग/भूख/विजातीय/राष्ट्रभक्ति (५ विहनि कथा) (ग) डॉ. तारानन्द वियोगीसँ गप-सप (साक्षात्कार-कर्ता) सामाजिक निबन्धक विश्लेषण: मुन्नाजीक निबन्ध समकालीन मैथिली समाज केर परिवर्तन सभक मानचित्रण करैत अछि: नारी-सशक्तिकरण, आर्थिक उदारीकरण केर विरोधाभास, प्रौद्योगिकी केर प्रभाव, दलित चेतना- ई सब अर्वाचीन मैथिली विहनि कथाक उपजाऊ भूमि थिक। रस-ध्वनि पाँच कथा: 'रेवाज' (रीति/परम्परा) - करुण+व्यंग्य। 'दरेग' (पश्चाताप) - करुण। 'भूख' - करुण+रौद्र। 'विजातीय' (अन्तर-जातीय) - रौद्र+अद्भुत। 'राष्ट्रभक्ति' - हास्य+व्यंग्य। सभ शीर्षक एक अवधारणा थिक - ध्वनि: एक शब्दक शीर्षक सम्पूर्ण कथा केर 'बीया' (बीज) थिक। बाख्तिन/ सामाजिक निबन्ध: बाख्तिनक संवादवाद: मुन्नाजीक सामाजिक निबन्ध अनेक स्वर केँ वार्तालापमे आनैत अछि। 'विजातीय' (अन्तर-जातीय/अन्तर-समुदायी) विवाह प्रसंग - बाख्तिन केर 'बहुभाषिक विभिन्नता'- प्रतिस्पर्धी सामाजिक स्वर सभक स्थल थिक। ग्राम्शी / विदेह: मुन्नाजी विहनि कथा आन्दोलन केर कार्बनिक बुद्धिजीवी छथि - सिद्धान्त + व्यवहार + आयोजन सब। ३. ज्योति सुनीत चौधरी रचना: नबका पीढ़ी / घर दिसका रस्ता / पानिमे खेती / मैथिल बिआह / हिमदूत (५ विहनि कथा) । लन्दन-निवासिनी; जन्म: ३० दिसम्बर १९७८, मधुबनी रस-ध्वनि: 'नबका पीढ़ी' (नव पीढ़ी) - करुण+वीर। ध्वनि: लिफ्टमे पीढ़ी अन्तराल - शहरी अर्वाचीनता केर प्रतीक। 'घर दिसका रस्ता' - शान्त+शृंगार - प्रवासी-लालसा। 'पानिमे खेती' - आश्चर्य+व्यंग्य - जलवायु परिवर्तन + कृषि संकट। 'मैथिल बिआह' - हास्य+करुण - विवाह संस्था। 'हिमदूत' - अद्भुत - हिमालय रूपक। प्रवासी / स्पिवाक: ज्योति सुनीत चौधरी लन्दन-स्थित मैथिली लेखिका छथि। स्पिवाक केर 'सांस्कृतिक विस्थापन': प्रवासी लेखिका लेल 'घर दिसका रस्ता' भौतिक आ आध्यात्मिक यात्रा दुनू थिक। 'नबका पीढ़ी' मे पीढ़ीगत विस्थापन - वैश्विक रूपसँ अनुनादित। विदेह ढाँचा: लन्दन सँ मैथिली लेखन - विदेह केर अङ्कीय स्थान एहि अन्तर-भौगोलिक लेखन केँ सक्षम करैत अछि। ज्योति झा चौधरी विदेह केर सबसँ वैश्विक-स्थित लेखिका छथि। ४. दुर्गानन्द मंडल रचना: पोस्टमार्टम / प्रदूषण / किसना मुजी (३ विहनि कथा) । रस-ध्वनि: 'पोस्टमार्टम' (शव-परीक्षा) - वीभत्स+करुण। चिकित्सीय शब्दक रूपमे रूपक: समाज केर 'शव-परीक्षा'- मृत्यु-निदान। 'प्रदूषण'- वीभत्स+रौद्र - पारिस्थितिकीय + सामाजिक प्रदूषण एक संग। 'किसना मुजी'- ध्वनि: 'मुजी' (मैथिली शब्द एक व्यक्ति लेल, प्रायः दलित/निम्न-जाति) - एक साधारण जीवन केर कथा। अम्बेडकर / पारिस्थितिकी: दुर्गानन्द मंडल लगातार दलित दृष्टिकोण आनैत छथि। 'प्रदूषण' मे पारिस्थितिकीय संकट + सामाजिक प्रदूषण (जाति भेदभाव) एक संग- दलित समुदाय पर्यावरणीय क्षीणता केर प्रथम शिकार छथि। ५. कपिलेश्वर राउत रचना: कलियुगक निर्णए (विहनि कथा) । रस-ध्वनि: 'कलियुगक निर्णए' (कलियुग केर निर्णय) - रौद्र+करुण। ध्वनि: 'कलियुग' (अन्धकार युग) केर 'निर्णए' (निर्णय) - ई सामाजिक अभियोग थिक। वक्रोक्ति: दैवी निर्णय बनाम मानवीय अन्याय। अम्बेडकर / फानन: राउत केर लगातार दलित दृष्टिकोण - 'कलियुग' केर रूपमे जाति-युग: अम्बेडकर तर्क केलनि जे जातिवाद भारत केर स्थायी 'अन्धकार युग' अछि। ६. धीरेन्द्र कुमार रचना: राम-कथाक समापन (विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'राम-कथाक समापन' (राम कथा केर अन्त) - शान्त+अद्भुत। उत्तर-अर्वाचीन संकेत: पौराणिक कथा केर 'अन्त' पुनर्लेखन। ध्वनि: 'समापन' - कहानी कहियो वास्तवमे समाप्त नहि होइत, ओकर पुनर्व्याख्या होइत रहैत अछि। देरिदा / मिथक: देरिदा केर 'पूरक': राम-कथा केर 'अन्त' लिखनाइ एक पूरक थिक - मूल पाठ केर रिक्त स्थान भरनाइ। ई मैथिली तीव्र लघुकथा केर पौराणिक पुनर्लेखनवाद अछि। ७. राजदेव मंडल रचना: बढ़िया गप्प / ठोकर (२ विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'बढ़िया गप्प' (बढ़िया कहानी)- हास्य+व्यंग्य। आत्म-कथात्मक: एक 'बढ़िया गप्प' केर विषयमे विहनि कथा। 'ठोकर' (गिरावट/लात) - करुण+रौद्र - जीवन केर अप्रत्याशित असफलता। ८. बेचन ठाकुर रचना: आत्महत्या / फुसिक फल (२टा विहनि कथा) । लोक-नाट्य परम्परा रस-ध्वनि: 'आत्महत्या' - करुण+रौद्र। चरम विषय लेल चरम संक्षिप्तता: तीव्र लघुकथा केर कर्तव्य अछि कार्य सँ पहिने केर क्षण केँ कब्जा करब। 'फुसिक फल' (झूठ केर फल) - हास्य+व्यंग्य। भिखारी ठाकुर परम्परा: लोक-नाट्य संवेदनशीलता मे नैतिक लोक-कथा। कामू / अर्थहीनता: कामू केर 'सिसिफस केर मिथक' आरम्भ होइत अछि: 'केवल एक वास्तविक गम्भीर दार्शनिक समस्या अछि, आ ओ अछि आत्महत्या।' 'आत्महत्या' तीव्र लघुकथा ई एक संकुचित दार्शनिक प्रश्न बनि जाइत अछि। ९. राम प्रवेश मंडल रचना: पछतावा / बुरबक / झगड़ा खतम / मूल-मन्त्र (४ विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'पछतावा' (पश्चाताप) - करुण। 'बुरबक' (मूर्ख/सीधा-सादा) - हास्य+करुण - 'मूर्ख' केर रूपमे सामाजिक टिप्पणी। 'झगड़ा खतम' (लड़ाई समाप्त) - हास्य+शान्त। 'मूल-मन्त्र' (मूल मन्त्र) - शान्त+व्यंग्य - संस्कृत शब्द केर व्यंग्यपूर्ण प्रयोग। बाख्तिन / उत्सवी-लोकधर्मी: 'बुरबक' व्यक्तित्व = बाख्तिन केर उत्सवी-लोकधर्मी 'मूर्ख' जे समाज केर सत्य देखैत + बजैत अछि। १०. भारत भूषण झा रचना: प्रेम (विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'प्रेम' - शृंगार रस। एक एकल शब्द शीर्षक - विभाव (रस केर उत्तेजक)। अधिकतम संक्षिप्तता, अधिकतम सुझाव: 'प्रेम' नामक विहनि कथामे प्रेम केर परिभाषित केनाइ विहनि कथाक चरम चुनौती। नव्य-न्याय: गंगेशक 'सामान्य' (सार्वभौमिक): 'प्रेम' केर सार्वभौमिक परिभाषा + विशिष्ट उदाहरण - ई ज्ञान-मीमांसीय तनाव विहनि कथामे सृजित होइत अछि। ११. मानेश्वर मनुज रचना: ई / स्त्री-लिंग / आप / लोरी / भूख-भूख भाकुर (५ विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'ई'- एक सर्वनाम शीर्षक! अस्पष्ट अस्मिता। 'स्त्री-लिंग' - व्याकरणिक लिंग केर सामाजिक श्रेणी केर रूपमे स्त्रीवादी टिप्पणी। 'आप' (तहँ, औपचारिक) - बाख्तिन संवादवाद: सम्बोधित-केर-रूपमे-शीर्षक। 'लोरी' - वात्सल्य। 'भूख-भूख भाकुर' - करुण+व्यंग्य। स्त्रीवादी भाषाशास्त्र: 'स्त्री-लिंग'- स्त्रीवादी भाषाविज्ञान: व्याकरणिक लिंग केर सामाजिक परिणाम। मानेश्वर मनुज केर शीर्षक-खेल स्वयं एक भाषावैज्ञानिक सिद्धान्त प्रदर्शन थिक। १२. उमेश मंडल रचना: दोस्ती / आधा भगवान / रुपैयाक ढेरी / जेहन मन तेहन जिन्दगी (४ विहनि कथा) । रस-ध्वनि: 'दोस्ती' - मधुर रस। 'आधा भगवान'- अद्भुत+व्यंग्य - दैवी अर्ध-उपस्थिति। 'रुपैयाक ढेरी'- वीभत्स+व्यंग्य। 'जेहन मन तेहन जिन्दगी' (जेना मन तेना जीवन) - शान्त+दार्शनिक। विदेह ढाँचा: उमेश मंडल ई विदेह केर सामूहिक उत्पादन प्रतिमान केर मूर्त रूप थिक। १३. डॉ. शेफालिका वर्मा रचना: आनक बड़ाइ (विहनि कथा) । साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता। रस-ध्वनि: 'आनक बड़ाइ' (दोसराक प्रशंसा) - हास्य+करुण। ध्वनि: दोसराक बड़ाई केनाइ अपन तुलनामे खुद केँ छोट बुझनाइक लक्षण। वक्रोक्ति: 'बड़ाइ' (प्रशंसा) - ई एक सामाजिक लेनदेन थिक। बूर्द्यू / सामाजिक पूँजी: बूर्द्यू केर 'प्रतीकात्मक पूँजी': 'आनक बड़ाइ' केर अर्थ-व्यवस्था - दोसराक प्रशंसा केनाइ एक प्रतीकात्मक पूँजी विनिमय थिक। डॉ. वर्माक मान्य-परम्परागत स्थिति केर बावजूद विदेहमे योगदान - समावेशी मञ्च। १४. जगदीश प्रसाद मंडल रचना: थल-कमल / घरडीह / खाता-खेसरा / सबूत / कौआक मैनजन (५ विहनि कथा) । रस-ध्वनि: 'थल-कमल' (जमीन-कमल)- शान्त+पारिस्थितिकीय। जमीनमे कमल = विरोधाभास। 'घरडीह' (घर-बास/खण्डहर) - करुण। 'खाता-खेसरा' - ग्राम भू-अभिलेख - राजनैतिक। 'सबूत' (प्रमाण) - रौद्र+करुण - दलित न्याय। 'कौआक मैनजन'- हास्य+व्यंग्य - लोक-रूपक। अम्बेडकर / पारिस्थितिकी: मंडल केर 'थल-कमल' + 'घरडीह' + 'खाता-खेसरा' - दलित भू-अधिकार त्रयी। अम्बेडकर: भू-स्वामित्व केर जाति-आधार उजागर। 'सबूत'- न्याय प्रमाण माँगैत अछि; दलित लोक सदा अपन मानवता केर 'प्रमाण' देवाक लेल बाध्य छथि। १५. रामकृष्ण मंडल 'छोटू' रचना: बाबूजी लेल (विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'बाबूजी लेल'- वात्सल्य रस उल्टा: ई बच्चा-द्वारा-पिता-लेल देखभाल थिक, पिता-द्वारा-बच्चा-लेल नहि। ध्वनि: भूमिका उलटफेर - बुढ़ापा, आश्रितता। १६. रामलोचन ठाकुर रचना: गिरगिट / भारत रत्न (२ टा विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'गिरगिट' - हास्य+व्यंग्य। राजनैतिक अवसरवाद केर प्रतीक। 'भारत रत्न'। व्यंग्य: भारत केर सर्वोच्च नागरिक सम्मान केर व्यंग्यपूर्ण सन्दर्भ। वक्रोक्ति: 'रत्न' केर व्यंग्यपूर्ण अनुप्रयोग। बाख्तिन/ व्यंग्य: 'गिरगिट' = बाख्तिनीय उत्सवी-लोकधर्मी व्यक्तित्व - आकार-परिवर्तक जे समाज केर प्रदर्शनशीलता उजागर करैत अछि। १७. परमेश्वर कापड़ि रचना: सतबरती (विहनि कथा) । नेपाल रस-ध्वनि: 'सतबरती' (वफादार) - शृंगार+करुण। विवाह-प्रतिज्ञा केर प्रश्न - सांस्कृतिक अनुबन्ध। नेपाल पक्ष केर मैथिली सामाजिक वास्तविकता। १८. अमरनाथ रचना: देह / पियास / स्विच ऑफ / गिरगिट / फोंफ (५ विहनि कथा) । मैथिली विहनि कथाक अग्रदूत 'क्षणिका' (१९७५)। परिचय: अमरनाथ मैथिली विहनि कथा केर स्थापक व्यक्तित्व सभमे छथि। 'क्षणिका' (१९७५) प्रथम मैथिली विहनि कथा संग्रह सभमे एक। रस-ध्वनि: 'देह' (शरीर) - शृंगार+वीभत्स। 'पियास' (प्यास) - करुण+शान्त। 'स्विच ऑफ' - अद्भुत+करुण - प्रौद्योगिकी रूपक। 'गिरगिट' - हास्य। 'फोंफ'- शान्त - अस्तित्वगत संक्षिप्तता। पाँचू शीर्षक एकल-शब्द/वाक्यांश: अधिकतम सङ्कुचन। चेखव / अल्पतमवाद: चेखव केर अल्पतमवाद: सभ शब्दकेँ अपन स्थान अर्जित करबाक चाही। अमरनाथ केर एकल-शब्द शीर्षक सभ पूर्णतया ऐ मितव्ययिता केर प्रदर्शन करैत अछि। विदेह समानान्तर इतिहास: साहित्यिक निरन्तरता केर पुरालेख। १९. चण्डेश्वर खाँ रचना: चेकिंग / कछमछी / बिसवास (३ विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'चेकिंग' - हास्य+व्यंग्य - निगरानी व्यंग्य। 'कछमछी' (कसमसाहट) - हास्य। 'बिसवास' (विश्वास/भरोसा) - शान्त+करुण। तीनू शीर्षक अर्वाचीन मैथिली शब्दावली - अङ्ग्रेजी उधार-शब्द ('चेकिंग') + शुद्ध मैथिली ('कछमछी') + मिश्रित ('बिसवास')। २०. रघुनाथ मुखिया रचना: इंडियन / जुलुम / नियति / मुँहलगुआ / ग्रीनहाउसमे कुकुर (५ विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'इंडियन' (भारतीय) - व्यंग्य: अस्मिता व्यंग्य। 'जुलुम' (अत्याचार) - रौद्र+करुण। 'नियति' (भाग्य) - शान्त। 'मुँहलगुआ' (मुँहलग्गू/चाटुकार) - हास्य+व्यंग्य। 'ग्रीनहाउसमे कुकुर' (हरितगृहमे कुक्कुर) - अद्भुत+व्यंग्य - जलवायु परिवर्तन व्यंग्य। फूको / सत्ता: 'जुलुम' (अत्याचार) आ 'मुँहलगुआ' (चाटुकारिता)- फूको केर सत्ता-ज्ञान: सत्ता स्वयं केर रखरखाव करैत अछि प्रत्यक्ष अत्याचार आ स्वेच्छिक अनुपालना दुनूक माध्यमसँ। २१. ऋषि वशिष्ठ रचना: प्रमाण-पत्र / मनमौजी (२ विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'प्रमाण-पत्र' (प्रमाणपत्र/सबूत) - व्यंग्य: नौकरशाही अस्तित्व - अस्तित्व केर 'प्रमाण' चाही। काफ्कीय अनुनाद। 'मनमौजी' (स्वच्छन्द) - हास्य+शान्त। काफ्का / नौकरशाही: काफ्का केर 'मुकदमा': अस्तित्व प्रमाणपत्र/प्रमाण माँगैत अछि। ऋषि वशिष्ठक 'प्रमाण-पत्र' एहि काफ्कीय चिन्ता केर मैथिली तीव्र लघुकथा शैलीमे। २२. शिव कुमार झा 'टिल्लू' रचना: फुसि नै बाजू (विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'फुसि नै बाजू'- हास्य+शान्त। आदेश रूप शीर्षक = आदेशात्मक विहनि कथा। ध्वनि: जिनका 'फुसि नै बाजू' कहाइत अछि, हुनका समाज स्वयं झूठ बजबैत अछि। २३. मिथिलेश कुमार झा रचना: झीक (विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'झीक'- शुद्ध मैथिली शब्द। शरीर-राजनीति रूपक। करुण रस। मैथिली शब्द-चयन स्वयं एक राजनैतिक कार्य - हिन्दी/अङ्ग्रेजी वर्चस्व केर प्रतिरोध। २४. सत्येन्द्र कुमार झा रचना: लेटेस्ट (विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'लेटेस्ट' (नवीनतम) - अङ्ग्रेजी शीर्षक मैथिली तीव्र लघुकथामे! हास्य+व्यंग्य। ध्वनि: 'नवीनतम' समाचार संस्कृति + सूचना अधिभार व्यंग्य। बाख्तिन / बहुभाषिक विभिन्नता: अङ्ग्रेजी शीर्षक मैथिली पाठमे= अधिकतम बहुभाषिक विभिन्नता - भाषिक संकरता केर रूपमे सामाजिक समीक्षा। २५. नवनीत कुमार झा रचना: गाम आबह (विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'गाम आबह'- शान्त+वात्सल्य। ध्वनि: वापसी केर निमन्त्रण- प्रवासी/शहरी पलायन प्रसंग। वक्रोक्ति: 'आबह'- आदेशात्मक तात्कालिकता निमन्त्रणमे। २६. कौशल कुमार रचना: दूमुँहा / प्रार्थना आ आस्था / अपन इज्जत (३ टा विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'दूमुँहा'- हास्य+व्यंग्य। 'प्रार्थना आ आस्था' (प्रार्थना आ विश्वास) - शान्त+आध्यात्मिक। 'अपन इज्जत' (अपन सम्मान) - वीर। तीनूमे एक क्रमशः: पाखण्ड → आध्यात्मिक यात्रा → सम्मान दृढ़ोक्ति। २७. अनमोल झा रचना: चेतना (विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'चेतना' (चेतना/जागृति) - वीर+शान्त। ध्वनि: चेतना = चेतना + सक्रियता दुनू संयुक्त। 'चेतना' एक एकल-शब्द शीर्षक जे एक सम्पूर्ण सामाजिक आन्दोलन केर बीज थिक। २८. कुमार मनोज कश्यप रचना: मरीचिका / परजा / बदलैत समए / जरल पेट / जीतक आगू (५ विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'मरीचिका' (मृगतृष्णा) - करुण+अद्भुत। 'परजा' (प्रजा/किसान) - करुण+रौद्र - सामन्ती-औपनिवेशिक सम्बन्ध। 'बदलैत समए' (बदलैत समय) - शान्त+दार्शनिक। 'जरल पेट' (जरल पेट) - करुण+रौद्र - भूख कल्पना-बिम्ब। 'जीतक आगू' (विजय सँ आगू) - वीर+शान्त। ग्राम्शी / अधीनस्थ: 'परजा' = ग्राम्शी केर अधीनस्थ किसान विषय जिनका अपन शर्त पर सुनल जएबाक चाही। कश्यपक 'मरीचिका' (मृगतृष्णा) - आकांक्षी मैथिली युवा केर कुण्ठित सपना। २९. विनीत उत्पल रचना: श्री गुरुवै नमः (विहनि कथा) । रस-ध्वनि: 'श्री गुरुवै नमः' (गुरु केँ नमस्कार) - शान्त+व्यंग्य। संस्कृत आवाहन केर रूपमे तीव्र लघुकथा शीर्षक- व्यंग्यपूर्ण ढाँचाकरण। ध्वनि: 'गुरु' अवधारणामे शिक्षक केर शक्ति + शिष्य केर दायित्व केर जटिल सम्बन्ध। ३०. डॉ. धनाकर ठाकुर रचना: हमरा एकर एक बायोडाटा चाही (विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'हमरा एकर एक बायोडाटा चाही'- हास्य+व्यंग्य। सबसँ नाम तीव्र लघुकथा शीर्षक! ई शीर्षक स्वयं एक लघु-कथा थिक। नौकरशाही अर्थहीनता: सभ चीज लेल जीवन-विवरण चाही। काफ्का / बेकेट: काफ्का केर नौकरशाही दुःस्वप्न + बेकेट केर अर्थहीनतावाद: 'बायोडाटा' (जीवन-विवरण) सभ स्थिति लेल - अस्तित्व प्रमाणित होएबाक लेल दस्तावेजीकरण चाही। ३१. आशीष अनचिन्हार रचना: नर्क / निशान / लक्ष्मी / अन्तर (४ टा विहनि कथा) । मैथिली गजल आन्दोलनी। रस-ध्वनि: 'नर्क'- शान्त+अस्तित्वगत। 'निशान' (चिह्न/निशाना)- अद्भुत। 'लक्ष्मी' (धन देवी)- शृंगार+व्यंग्य। 'अन्तर' - शान्त+करुण। देरिदा / अन्तर: देरिदा केर 'अन्तर': 'अन्तर' कालिक अन्तराल आ साङ्केतिक अन्तर दुनू थिक। अनचिन्हारक शीर्षक-चयन दार्शनिक सूक्ष्मता केर प्रति संवेदनशीलता देखबैत अछि। ३२. सतीश चन्द्र झा रचना: नोकरी (विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'नोकरी'- करुण। मैथिली मध्यवर्गीय चिन्ता केर एक-शब्द सारांश। ध्वनि: नोकरी = सम्मान, सुरक्षा, सामाजिक स्थिति - जे नहि भेटत तकर पीड़ा। ३३. भवनाथ झा रचना: ऊँचका डीह / हेराफेरी (२ विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'ऊँचका डीह'- शान्त+पारिस्थितिकीय। 'हेराफेरी' (धोखाधड़ी/छल) - व्यंग्य+रौद्र। स्थान-रूपक ('डीह') + सामाजिक समीक्षा ('हेराफेरी') - विरोधाभास। ३४. नबोनारायण मिश्र रचना: घमण्डक फल (विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'घमण्डक फल' (घमण्ड केर फल) - हास्य+व्यंग्य। लोक-नैतिक कथा संरचना तीव्र लघुकथामे। 'फल' (फल/परिणाम) = कर्म। औचित्य: लोक-नैतिक परम्परा स्वाभाविक रूपसँ तीव्र लघुकथामे उपयुक्त बैसैत अछि। ३५. राम विलास साहु रचना: परिश्रमक भीख (विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'परिश्रमक भीख' (परिश्रम केर भीख) - करुण+व्यंग्य। 'परिश्रम' (परिश्रम) केर 'भीख' - सम्मान उल्टा: जे कहैत अछि 'मेहनत करू' ओ भीख माँगि रहल अछि। अम्बेडकर / श्रम सम्मान: अम्बेडकर श्रम केर सम्मान पर: 'परिश्रमक भीख' - जखन परिश्रम स्वयं भीख केर एक रूप बनि जाइत अछि, तखन व्यवस्था मूलभूत रूपसँ भग्न अछि। ३६. मुस्नी कामत रचना: हमर संस्कार / करैलाक मीठ गुण (२ विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'हमर संस्कार' (हमर मूल्य/परम्परा) - शान्त+दार्शनिक। 'करैलाक मीठ गुण' (करेला केर मीठ गुण) - हास्य+व्यंग्य। 'करेला' (करेला) एक लोक-रूपक: कड़ू चीज सभमे सेहो मीठ गुण होइत अछि। ३७. डॉ. शम्भु कुमार सिंह रचना: जेठ आ पूस / सौदागर / गरमी (३ विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'जेठ आ पूस' (जेठ आ पूस - गर्मी आ जाड़ केर महीना) - शान्त+पारिस्थितिकीय। मैथिली पञ्चाङ्ग अन्तर्निहित: जेठ (सबसँ गर्म महीना) + पूस (सबसँ ठण्डा)। 'सौदागर' (व्यापारी) - व्यंग्य। 'गरमी' (गर्मी) - पारिस्थितिकीय+सामाजिक। पारिस्थितिकी / जलवायु: जेठ-पूस द्वैत: मिथिला केर चरम मौसमी जलवायु- सामाजिक चरम सीमा सभक साहित्यिक रूपक केर रूपमे। आरम्भिक-२०१० केर मैथिली तीव्र लघुकथामे जलवायु चेतना। ३८. संजय कुमार मंडल रचना: अनरेजिस्टर्ड घुसखोर (विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'अनरेजिस्टर्ड घुसखोर' (अपञ्जीकृत घूसखोर)- हास्य+व्यंग्य। 'अनरेजिस्टर्ड' (अङ्ग्रेजी उधार-शब्द) + 'घुसखोर' (शुद्ध मैथिली/हिन्दी) = भाषिक संकर शीर्षक। व्यंग्य: भ्रष्टाचार केर सेहो एक 'पञ्जीकरण' प्रणाली होइत अछि। ३९. डॉ. मिथिलेश कुमारी मिश्र रचना: वीरभोग्या वसुंधरा / अति सर्वत्र वर्जयेत् - दू संस्कृत विहनि कथा (अनुवाद: योगानन्द झा) परिचय: सदेह ५ केर सबसँ अद्वितीय योगदान: दू संस्कृत तीव्र लघुकथा! डॉ. मिथिलेश कुमारी मिश्र संस्कृतमे विहनि कथा लिखलनि आ योगानन्द झा मैथिलीमे अनुवाद कएलनि। रस-ध्वनि: 'वीरभोग्या वसुंधरा' (पृथ्वी वीर केँ भोगयोग्य अछि) - वीर रस। संस्कृत कहावत केर रूपमे तीव्र लघुकथा। 'अति सर्वत्र वर्जयेत्' (अति सर्वत्र वर्जित) - शान्त रस। शास्त्रीय भारतीय नैतिक दर्शन। बेन्यामिन/ अनुवाद + शास्त्रीय पुनरुत्थान: संस्कृत→मैथिली अनुवाद: बेन्यामिन केर 'परवर्ती जीवन' - संस्कृत ज्ञान-पाठ सभ नव जीवन पबैत अछि अर्वाचीन मैथिली तीव्र लघुकथामे। ई विदेह केर शास्त्रीय-अर्वाचीन सेतु मिशन केर चरम अभिव्यक्ति थिक। नव्य-न्याय: 'अति सर्वत्र वर्जयेत्' - नव्य-न्याय केर मध्यमता सिद्धान्त: ई सूक्ति गंगेश केर अपन ज्ञान-मीमांसीय पद्धतिमे प्रकट अछि। ४०. मिथिलेश मंडल रचना: विदेशी बाबू (विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'विदेशी बाबू' (विदेशी बाबू/साहब) - हास्य+व्यंग्य। 'बाबू' (सम्मानजनक सम्बोधन अभिजात वर्ग लेल) + 'विदेशी' (विदेशी) = औपनिवेशिक चिन्ता केर मैथिली संस्करण। ध्वनि: उत्तर-औपनिवेशिक भारतमे 'विदेशी' = आकांक्षात्मक आ समस्याग्रस्त दुनू। ४१. प्रदीप बिहारी रचना: सत्संगी / थापड़ (२ विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'सत्संगी' (सत्संगी/सज्जन) - शान्त+आध्यात्मिक। 'थापड़' (थप्पड़) - रौद्र+करुण। चरम विरोधाभास: आध्यात्मिक सङ्गति → शारीरिक हिंसा। ध्वनि: सत्सङ्ग (आध्यात्मिक सभा) सँ थापड़ तक - सामाजिक पाखण्ड। ४२. लक्ष्मी दास रचना: बूड़िबकक बूड़िबक / दाढ़ी (२ विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'बूड़िबकक बूड़िबक' (मूर्ख केर मूर्ख) - हास्य+करुण। अतिशयोक्तिपूर्ण रचना: 'बूड़िबक' केर 'बूड़िबक' - एक नेस्टेड मूर्ख। 'दाढ़ी' (दाढ़ी) - हास्य+व्यंग्य। दाढ़ी केर रूपमे सामाजिक सूचक - पुल्लिंगता, धर्म, फैशन। ४३. अमित मिश्र रचना: इशारा / सरधुआ (२ विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'इशारा' (संकेत/इशारा) - शान्त+अद्भुत। अशाब्दिक सञ्चार केर शक्ति। 'सरधुआ' (गंदला/मटमैला) - वीभत्स+करुण। जल-गन्दगी = सामाजिक गन्दगी रूपक। ४४. जगदानन्द झा 'मनु' रचना: मसोमात / रहस्य (२ विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'मसोमात' (विधवा) - करुण। विधवा केर सामाजिक स्थिति - पितृसत्ता केर सबसँ पीड़ित दृश्य। 'रहस्य' (रहस्य/गुप्त) - अद्भुत। आख्यानिक तनाव: रहस्य = जे अकथित रहैत अछि जे कहानी केँ जीवित रखैत अछि। स्त्रीवादी/ अम्बेडकर: 'मसोमात' - विधवा केर सामाजिक बहिष्कार - अम्बेडकर स्पष्ट रूपसँ समीक्षा केलनि 'हिन्दू नारी' मे। जगदानन्द झाक विहनि कथा एहि सामाजिक वास्तविकता केँ न्यूनतम शब्द, अधिकतम प्रभाव सँ कब्जा करैत अछि। ४५. चन्दन कुमार झा रचना: सङ्गति / अनकर दुर्गति (२ विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'सङ्गति' (सङ्गति/संगत) - शान्त+मधुर। 'अनकर दुर्गति' (दोसरक दुर्दशा) - करुण+व्यंग्य। व्यंग्यपूर्ण युगल: सज्जन सङ्गति → दोसरक दुर्दशामे आनन्द पावक। सामाजिक टिप्पणी। ४६. ओम प्रकाश झा रचना: कपारक लिखल / स्पेशल परमिट (२ विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'कपारक लिखल' (माथा पर लिखल = भाग्य) - शान्त+करुण। मैथिली मुहावरा भाग्य लेल। 'स्पेशल परमिट' (विशेष अनुमति) - व्यंग्य: नौकरशाही व्यंग्य - सेहो 'विशेष' चीज केँ 'अनुमति' चाही। ४७. सन्दीप कुमार साफी रचना: अन्ध विश्वास (विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'अन्ध विश्वास' - व्यंग्य+करुण। सामाजिक सुधार विषय। ध्वनि: 'अन्ध' + 'विश्वास' - जखन विश्वास अपन आँखि हारि दैत अछि। ४८. जवाहर लाल कश्यप रचना: हमर माय तोहर माय / अर्धसत्य / लहास / भगवानक भाग्य / गिफ्ट (५ विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'हमर माय तोहर माय' (हमर माँ तोहर माँ) - वात्सल्य+करुण। सार्वभौमिक मातृत्व। 'अर्धसत्य' (आधा-सत्य) - व्यंग्य। 'लहास' (लाश) - वीभत्स+करुण। 'भगवानक भाग्य' (भगवान केर भाग्य) - व्यंग्य+अद्भुत। 'गिफ्ट' (उपहार) - हास्य। बेन्यामिन / द्वन्द्वात्मकता: 'अर्धसत्य' (आधा-सत्य) = बेन्यामिन केर द्वन्द्वात्मक बिम्ब - आंशिक प्रकटीकरण जे सम्पूर्ण केँ प्रकाशित करैत अछि। पाँचू शीर्षक सम्पूर्ण भावनात्मक-दार्शनिक स्पेक्ट्रम केँ आवृत करैत अछि। ४९. मिहिर झा रचना: १०० टाका (विहनि कथा) रस-ध्वनि: '१०० टाका' (एक सय रुपैयाँ/टाका) - करुण+व्यंग्य। सटीक मौद्रिक राशि शीर्षक केर रूपमे। ई एकल शीर्षक मिथिला केर अस्मिता केर प्रदर्शन करैत अछि। ५०. रामदेव प्रसाद मंडल 'झारूदार' रचना: अल्लूक चुमौन (विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'अल्लूक चुमौन' - 'अल्लू’ + 'चुमौन'। शुद्ध मैथिली वाक्यांश: लोक-ज्ञान शीर्षक शैलीमे। हास्य+शान्त। लोक अस्मिता तीव्र लघुकथामे संरक्षित। ५१. प्रेमचन्द्र पंकज रचना: क्रमश:.... (विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'क्रमश:....' (जारी...) - अद्भुत+शान्त। एक शीर्षक जे स्वयं एक उपविराम अछि! तीव्र लघुकथा जे समाप्त करबाक अस्वीकार करैत अछि - चरम उत्तर-समापन-विरोध। ध्वनि: 'क्रमश:' = मैथिली श्रृंखलाबद्ध प्रकाशन परम्परा - कहानी जे चलैत रहैत अछि। देरिदा / खुला पाठ: देरिदा केर 'अन्तर केर खेल': 'क्रमश:....' एक पाठ थिक जे स्वयं केँ कहियो सम्पूर्ण नहि मानैत अछि। चरम उत्तर-अर्वाचीन तीव्र लघुकथा। ५२. अखिलेश कुमार मंडल रचना: टीटनेस (विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'टीटनेस' (धनुष्टंकार/टिटनेस) - वीभत्स+करुण। चिकित्सीय रोग केर रूपमे सामाजिक रूपक: टिटनेस = जकड़न, मुँह खोलबाक असमर्थता = सामाजिक पक्षाघात। मैथिली समाज केर 'टीटनेस' - रूढ़िवाद केर बन्द जबड़ा। ५३. मनोज कुमार मंडल रचना: बेमेल बिआह (विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'बेमेल बिआह' (बेमेल विवाह) - करुण+व्यंग्य। विवाह संस्था केर मूलभूत असंगति। ध्वनि: 'बेमेल'- समाजमे सभ विवाह केर अन्तर्निहित वास्तविकता अछि। स्त्रीवादी / अम्बेडकर: अम्बेडकर केर जाति-व्यवस्था-प्रवर्तन केर रूपमे वर्णाश्रम विवाह केर समीक्षा: 'बेमेल बिआह' ई जाति-व्यवस्था केर बेमेल असंगति केँ उजागर करैत अछि। ५४. सत्यनारायण झा रचना: सुटिया (विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'सुटिया'- शुद्ध मैथिली बोली शब्द। दलित/गरीब शरीर केरूपमे सामाजिक सूचक। करुण रस। शरीर राजनीति: निर्धनता = सामाजिक हाशियाकरण। ५५. पंकज चौधरी 'नवलश्री' रचना: ई नोर छै गरीबीक (विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'ई नोर छै गरीबीक'- करुण रस। सम्पूर्ण वाक्य शीर्षक केर रूपमे। ध्वनि: नोर केर पहिचान - ई नोर सुख केर नहि, गरीबी केर 'नोर' थिक। सीधा, बिना क्षमा गरीबी कथन। मार्क्स / गरीबी राजनीति: मार्क्स केर आर्थिक यथार्थवाद: गरीबी पीड़ा सृजित करैत अछि। पंकज चौधरीक शीर्षक एक राजनैतिक कथन केर रूपमे कार्य करैत अछि। ५६. रवि भूषण पाठक रचना: मुक्ति / बिदाइ / एकातबला (३ विहनि कथा) रस-ध्वनि: 'मुक्ति' (मुक्ति) - वीर+शान्त। 'बिदाइ' - करुण। 'एकातबला'- शान्त+करुण। अस्तित्वगत त्रयी: मुक्ति → विदाई → एकाकीपन। अस्तित्ववाद: हाइडेगर केर 'मृत्यु-सत्ता': 'मुक्ति' → 'बिदाइ' → 'एकातबला' = एक अस्तित्वगत क्रमशः चरम एकान्त तर्फ। ५७. डॉ. तारानन्द वियोगी विहनि कथाक सशक्त हस्ताक्षर मुन्नाजीसँ गप-सप । साहित्य अकादमी पुरस्कार (बाल साहित्य) विजेता साक्षात्कारक विश्लेषण: डॉ. तारानन्द वियोगी मैथिली साहित्यक एक वरिष्ठ व्यक्तित्व छथि - बाल साहित्य + कविता + आलोचना। मुन्नाजीसँ गप-सपमे ओ विहनि कथाक इतिहास, चुनौती, आ भविष्य पर विमर्श करैत छथि। रस-ध्वनि: 'विहनि कथा आत्यन्तिक रूपसँ एक सक्रिय विधा थिक' - वीर+शान्त। वियोगीक कथन: 'सरल रचना पाछाँ सबसँ बेसी परिश्रम' - ध्वनि: सरलता = अधिकतम प्रयास। नव्य-न्याय/ बेन्यामिन: गंगेशक 'प्रमाण': वियोगीक साक्ष्य विहनि कथाक साहित्यिक वैधता स्थापित करैत अछि। बेन्यामिन: एक साहित्यिक शैली केँ 'परवर्ती जीवन' तखन प्राप्त होइत अछि जखन ओकर समर्पित अभ्यासकर्ता सभ होइत अछि - वियोगी एहि परवर्ती जीवन केर साक्षी थिक। ५८. देवशंकर नवीन आलोचनात्मक निबन्ध: विहनि कथा लेखनमे अवरोधक तत्व निबन्धक विश्लेषण: देवशंकर नवीन मैथिली साहित्यिक समीक्षाक एक महत्वपूर्ण स्वर छथि। एहि अन्तिम निबन्धमे ओ विहनि कथा लेखन केर बाधा सभक पहिचान करैत छथि: हड़बड़ी रचना, सूत्र-लेखन, पुनरीक्षण केर अभाव, जाति/समूह पूर्वाग्रह। रस-ध्वनि: शान्त + बौद्धिक कठोरता। 'अवरोधक तत्व' ध्वनि: ई केवल साहित्यिक बाधा नहि, सामाजिक बाधा सेहो थिक। बूर्द्यू / साहित्यिक क्षेत्र: बूर्द्यू केर 'साहित्यिक क्षेत्र': नवीनक निबन्ध मैथिली साहित्यिक क्षेत्र केर आन्तरिक शक्ति-संघर्ष सभकेँ उजागर करैत अछि - समूह निष्ठा। नव्य-न्याय: गंगेशक 'बाधा' (बाधा): साहित्यिक बाधा सभक व्यवस्थित गणना - ई नव्य-न्याय केर समस्या-पहिचान पद्धति थिक। विदेह समानान्तर इतिहास: खण्ड-आरम्भ (सिद्धान्त) + खण्ड-समापन (बाधा) = एक सम्पूर्ण साहित्यिक घोषणापत्र। विदेह समानान्तर इतिहास परियोजनामे केवल उत्सव नहि, वरन् ईमानदार आत्म-समीक्षा सेहो शामिल अछि। उपसंहार: सदेह ५ क समग्र महत्व सदेह ५ मैथिली विहनि कथा - ५८ साहित्यकारक योगदान सँ मैथिली तीव्र लघुकथा केर एक सम्पूर्ण पारिस्थितिकी-प्रणाली सृजित करैत अछि। ई केवल संकलन नहि, ई एक शैली केर जन्म प्रमाणपत्र थिक। तीन स्तर पर सदेह ५ कार्य करैत अछि: (क) सिद्धान्त स्तर - गजेन्द्र ठाकुर + मुन्नाजी केर निबन्ध विहनि कथाक सौन्दर्यात्मक सिद्धान्त स्थापित करैत अछि; (ख) व्यवहार स्तर - ५८ लेखक अपन सृजनात्मक कार्य सँ सिद्धान्त केँ मूर्त रूप दैत छथि; (ग) इतिहास स्तर - अमरनाथ (१९७५) सँ लऽ कऽ वर्तमान धरिक परम्परा केर पुरालेख। विशेष उल्लेखनीय: संस्कृत तीव्र लघुकथा (डॉ. मिथिलेश कुमारी मिश्र), एकल-शब्द शीर्षक (अमरनाथ, भारत भूषण झा), प्रवासी तीव्र लघुकथा (ज्योति सुनीत चौधरी), उत्तर-अर्वाचीन शीर्षक (प्रेमचन्द्र पंकज केर 'क्रमश:....'), काफ्का/अर्थहीनता तीव्र लघुकथा (ऋषि वशिष्ठ केर 'प्रमाण-पत्र'), पारिस्थितिकीय तीव्र लघुकथा (ज्योति केर 'पानिमे खेती')। चारि ढाँचा केर संश्लेषण: रस सिद्धान्त विहनि कथामे ओतेक सान्द्र रूपमे कार्य करैत अछि जतेक कोनो अन्य शैलीमे नहि - एक वाक्यमे एक रस केर सम्पूर्ण चाप। पाश्चात्य सिद्धान्त (काफ्का, चेखव, जोइस, देरिदा, फूको, कामू, हाइडेगर) हर व्यक्तिगत कहानी केर दार्शनिक गहराई उजागर करैत अछि। नव्य-न्याय तर्क तीव्र लघुकथा केर सङ्कुचित तर्क संरचना केर परीक्षण करैत अछि। विदेह समानान्तर इतिहास ढाँचा ई सुनिश्चित करैत अछि जे दलित, महिला, नेपाल, प्रवासी, शास्त्रीय (संस्कृत) सब स्वर एक मान्य-परम्परागत स्थान पबैत अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.२.अंक ४४२ पर टिप्पणी विदेह ४४२ म अंक पर पाठकीय मन्तव्य प्रणव कुमार झा मोहन कुमार झा, अमरेश ठाकुर, डॉ योगानन्द झा आ गजेंद्र ठाकुर के लेख नीक लागल। संतोष राय बटोही के कथा गैस सिलिंडर मौजूदा समस्या पर प्रकाश दैत छैक, घरेलू हिंसा आ ओकरा पाछा आर्थिक दवाव के उद्धरित करय छैक, मुदा प्लॉट में कनि कमी लागि रहल छैक। कहानी में परिवेश कोनो गाम के देल गेल छैक मुदा ई बात गला से उतरय बला नै छैक जे कोनो गाम के कोनो घर के चूल्हा गैस के कारण नै जरय! ताहि दूआरे प्लॉट कोनो क़स्बा के रहबाक चाहि छल। अशोक कुमार ठाकुर आ आचार्य रामानंद मंडल के कविता ध्यानाकर्षण केलक। देश के वर्त्तमान स्थिति के परिप्रेक्ष्य में विदेह के पुरान अंक में छपल एकटा खिस्सा लीक - लीक स्वाभाविक रूप से मोन पड़ल। आशीष अनचिन्हार प्रणव कुमार झा केर आलेख "डिजिटल दुनियाँ मे सायबर हाइजिन" बहुत नीक आलेख अछि। वर्तमानमे लोक डिजिटल कचरासँ घेराएल अछि, ई आलेख पढ़ि पाठक ओहि कचराकेँ साफ कऽ लेताह तऽ एहि लेखक सार्थकता मानू। संगहि साइबर फ्राडसँ बचबाक सेहो युक्ति दैत अछि ई आलेख। उम्मेद अछि जे लेखक एहन आलेख लिखैत रहताह। हिनक कविता "आदमी" तुकान्त रूपमे नीक छनि। नव कवि अशोक कुमार ठाकुरक स्वागत छनि। मोहन कुमार झाक विदेहमे स्वागत छनि। रामेश्वर प्रसाद मण्डल (विदेह ऑडियो-वीडियोपर) सभ गीत आर गजल एक पर एक कर्नप्रिय लगल। मन होइत रहल जे सूनिते रहि, लाजवाब प्रस्तुति आ शानदार रचना। गजेन्द्र जी अहाँ केँ आ संगे सुर - संगीत भरैबला केँ दिल सँ बेसी रास बधाइ। जय मिथिला! जय मैथिली!! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। गद्य Prose २.१. हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२२ २.२. कल्पना झा- मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-३ २.३. प्रणव कुमार झा-पुस्तक पाठकीय: ‘सेतुषाम’ लोक आ वेदक दार्शनिक सेतु २.४. डॉ. योगानन्द झा- अभिनव पद्यविधा : इतिहास-काव्य २.५. प्रमोद झा 'गोकुल'- पिरीतो(लघु एकांकी नाटिका) २.६. लाल देव कामत- सूर्य पुत्र वा सुतपूत एक धनुर्धर : कनीन पुत कर्ण/ अरे त्तोरी के ! ...... धत् तोरी के? २.७. आचार्य रामानंद मंडल- वर्तमान चोर संत कबीर/ हमरे सभके/ कटहर मटन/ परोपकार!/ सुबुद्धि २.८. बद्रीनाथ राय ’अमात्य’- श्राद्ध २.९. कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा- विधाते बाम २.१०. विप्रकान्त मंडल- मशीन बनबाक उमेड़ २.११. अमरेश ठाकुर- नैका बनिजारा उपन्यासक आलोचनात्मक अध्ययन २.१२. प्रीति कुमारी- चुनाव आयोग आ राष्ट्रीय दल/ हरि बाबू केँ ८०म् वर्षगांठ 'क हार्दिक शुभकामना २.१३. संतोष कुमार राय 'बटोही'- कथा- लल्ली २.१४. डॉ अजय कुमार झा- पोथी समीक्षा : “ आचार्य चाणक्य” (मैथिली खंडकाव्य) २.१५. रामकृष्ण परार्थी- जमाना बदलि गेलैं २.१६. गजेन्द्र ठाकुर-साधु आ वेश्या [भगवदज्जुकम्]मूल संस्कृत प्रहसन - बोधायन द्वारा रचित; मैथिली अनुवाद: गजेन्द्र ठाकुर २.१७. गजेन्द्र ठाकुर- परमेश्वर कापड़िक कथा-खिस्साकआलोचनात्मक समीक्षा २.१८. गजेन्द्र ठाकुर- परमेश्वर कापड़ि- पद्य-रचनाक आलोचनात्मक समीक्षा २.१९. गजेन्द्र ठाकुर- परमेश्वर कापड़िक रचना-संसार- विस्तृत मैथिली साहित्यिक समीक्षा २.२०. गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-१) सन्दर्भ- परमेश्वर कापड़ि- नाटक 'रेङ–रेङ' २.२१. गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-२) सन्दर्भ- परमेश्वर कापड़ि- नाटक 'गहन उगरास' २.२२. मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-३) सन्दर्भ- कुणाल-कृत “चालिस चोर आ गोनू झा उर्फ ज्ञान झाक खिस्सा” २.१. हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२२ हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२२ हितनाथ झा (मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070) श्रीक्वैलख देव्यै नमः ।। क्वैलख श्री कार्तिकेय झा, कोइलख ई ग्राम मिथिलामे एहन प्रसिद्ध अछि जे एतद ग्रामवासि-महाशयवृन्दकेँ कतहु अपन ग्रामक विशेष परिचय देवाक कष्ट उठयबाक प्रयोजन नहि पड़ैत छैन्ह। प्रत्युत एतद ग्राम पार्श्व वर्ति-ग्रामवासि-महाशयवृन्द अपन-अपन ग्रामक परिचय देबामे सफलता प्राप्त करबाक हेतु एहि ग्रामक नार्मलय कृतार्थ होइत छथि। एतद ग्रामवासि-भूतपूर्व-विपश्चिद गण-प्रणीतानेक ग्रंथावलोकनसँ विदित होइत अछि जे ' मिथिला'मे एहन पुरातन, प्रतिष्ठित, विद्वज्जनमण्डल मण्डित, ग्रामान्तर अधिक नहि छलैक, अर्थात ई ग्राम आदर्श छल। एतद ग्रामवासि ब्राह्मणवृन्द एहन आदर्श स्वरूप,कर्मठ,अग्निहोत्री, चरित्रसम्पन्न तथा ऋषिगणवत सात्विक छलाह जे हुनका लोकनिक योग्यतानुसार उचित प्रतिष्ठा वितरण स्वरूप पंजीप्रवन्ध स्थापना करबाक हेतु नृप हरि सिंह देव मिथिलामे अद्यावधि प्रसिद्ध छथि। हिनका लोकनिक पारस्परिक स्नेह, सहानुभूति, आचार, व्यवहार तथा सन्तोष आदि सद्गुण सीखि ग्रामान्तरवासि-मैथिल सज्जनवृन्द हिनका लोकनिकेँ शिरोधार्य स्वीकार करबामे कनेको नहि हिचकैत छलाह। एहि ग्रामक पुरातन पण्डितक ग्रंथावलोकनहिसँ आइयो काल्हि धर्म निर्णय करबामे विद्वदगण समर्थ होइत छथि। एहि ग्राममे पढ़ि जगत्प्रसिद्ध महामहोपाध्याय गोकुलनाथोपाध्यय अनेक दर्शनक टीका लिखबामे तथा बंगाल आदि अनेक देशमे न्यायाद्यन प्रचार करबामे सफलता प्राप्त कयलैन्ह। प्रायः ओहि समयमे विना हिनका लोकनिक सम्मतिसँ धर्म्म निर्णय कतहु नहि होइत छलैक। हिनका लोकनिक जीविका अन्यानधीन छलैन्ह। जे विद्वान छलाह विद्यासँ धनोपार्जन कय निर्वाह करैत छलाह।अतिरिक्त जनसमुदाय अति कुलीनता प्राप्त कैओ कय स्वश्रम सँ धनोपार्जन कय जीवन निर्वाह करैत छलाह। याचना, वरकन्या विक्रय तथा वाणिज्यादि सदृश सदुपायसँ धनोपार्जन करबामे ओ लोकनि अनभिज्ञ छलाह।हुनका लोकनिक विद्याश्रमोपार्जित भूमिसम्पन्न-अनेक घर एहिग्राममे अद्यावधि वर्तमान अछि। यद्यपि ई लोकनि दैवयोगसँ कदाचित निर्धन भय जाथि तथापि स्वसंतोष द्वारा हिनका लोकनिकेँ दुःखानुभाव कहियो नहि होइन्हि। अतएव परमुखापेक्षी कहियो नहि होथि। हिनका लोकनिक सामाजिक व्यवस्था एहन समुचित तथा सुदृढ़ छलैन्हि जे केओ ओकरा उल्लंघन नहि कय सकैत छलाह। हिनका लोकनिक लाघव गौरव व्यवस्था धनाधन निवन्धन नहि छलैन्ह किन्तु आचार-विचार निवन्धन छलैन्ह। हिनका लोकनिक प्रतिष्ठा तथा सन्तोष एतेक बढ़ि गेल छलैन्हि जे राजा लोकनिकेँ हिनका लोकनिक सङ्ग वैवाहिक सम्बन्ध करबाक हेतु लालायित भय निराश होमय पड़ैत छलैन्ह। ई लोकनि स्व समाजसँ अन्य समाजमे वैवाहिक सम्बन्ध स्थापना कयनिहार व्यक्तिकेँ वक्त्यन्तर मानैत छलथिन्ह। अस्तु हिनका लोकनिक गुण वर्णन करब मानू सूर्यकेँ दीप सँ देखायब थिक।आइ काल्हि हमरालोकनिक जे किछु सामाजिक सुव्यवस्था शेष रूपमे वर्तमान अछि से ओही महानुभाव लोकनिक व्यवस्थाक अवशिष्ट परमाणु मात्र एक अंश थिक। पाठकवृन्द, एहिसँ अनुभव कय सकैत छी जे ओहि दिनुक सामाजिक सुव्यवस्था केहन छलैक। परन्तु बहुत दुखक विषय थिक जे आइ-काल्हि सब विपरीत भय गेल अछि।हमरा लोकनिक एहन कदाचार तथा कुविचार सुदृढ़ भेल जाइत अछि जे हमरा लोकनिक प्रतिदिन अधःपतन भय रहल अछि। हमरा लोकनिमे एतेक ईर्ष्या तथा द्वेष बढ़ि गेल अछि जे यदि नेपाल राज्यसदृश एहूठाम अभियोग (मोकदमा) करबामे द्रव्य व्यय नहि होयतैक तँ आवाल वृद्ध मधुबनीक न्यायालयक चौकठिक चुम्बन करैत रहितहुँ। यद्यपि हमरा लोकनि असदु पापसँ धनोपार्जन करबामे चतुर भय गेल छी।परन्तु बहुत दुखक विषय थिक जे तथापि बहुत व्यक्ति धनहीन दृष्टिगोचर होइत छी। की कारण ? से परमात्मा वेत्ति । एहन दुःस्थितिमे प्रति कार्यमे द्रव्य-व्यय करबाक व्यवहार एहन हमरा लोकनिमे सुदृढ़ भय गेल अछि जे धनहीन व्यक्तिक वास होयब असंभव भय गेल छैन्हि। दैवहत धनहीन व्यक्ति यदि सर्व रंच वेचि कार्यमे खर्च कयलैन्ह तँ नष्ट भेलाह,यदि नहि कयलन्हि तँ आजन्म असूयक जनवाग वाणाहत होयबाक कष्ट उठाबय पड़ैत छैन्ह। अर्थात उभयथा दुःख भागी बनैत छथि। अस्तु वर्त्तमान दशाक विशेष वर्णन करब केवल पृष्ठपोषण मात्र थिक। अतएव एहि गामक आधुनिक अवनातिक परिचय देवाक हेतु एक उदाहरण मात्र सज्जन पाठकक समक्ष उपस्थित कय हम अपन उद्देश्याभिमुख होयब। आइ काल्हि देशमे अनेक धार्मिक प्रश्न स्पृश्यास्पृश्य, तथा हरिजन मन्दिर प्रवेश आदि उपस्थित भय गेल अछि, जाहि हेतुक देश सम्प्रति दू दलमे विभक्त भय गेल अछि।एक दलक पक्ष स्थापना करबाक हेतु विश्वमान्य महात्माजी सदृश नेतृप्रवर कटिबद्ध भय सफलता प्राप्त करबाक हेतु देशभ्रमण कय रहल छथि। द्वितीय दलक पक्षरक्षार्थ धार्मिक शिरोमणि श्री मान महाराज बहादुर गिद्धौर अपन राज्य-कार्य त्यागि कय ओ एहि दलक नेतृत्व स्वीकार कय अमूल्य समय नष्ट कय रहल छथि। और एकर कार्य संचालनक हेतु बहुत मुद्रा प्रदान कयलैन्ह अछि। " बिहार प्रान्तीय देवालय संरक्षण समिति" स्थापित भेलि अछि। एकर शाखा सर्वत्र स्थापित भय चुकल अछि। अस्तु,जे ग्राम एहन-एहन देशव्यापी धार्मिक प्रश्न उपस्थित भेला पर स्वपक्ष रक्षार्थ अग्रसर होइत छल, से आइ काल्हि पृष्ठपोषको नहि होइत अछि एहिसँ बेसी दुःखक विषय की भय सकैत अछि ? अर्थात एहि ग्राममे एक शाखा मात्रो नहि अछि। प्रायः एहि गामक केओ सज्जन ओहि समितिक सदस्य मात्रो नहि बनल छथि। यदि बनलो होएताह तँ एक-दू व्यक्तिसँ बेसी नहि। कहू ? एहिसँ बेसी कतेक भय सकैत अछि। परन्तु नवयुवकगण, हताश होयबाक प्रयोजन नहि। यदि हमरा लोकनि चाही तँ यथा हमरा लोकनिक पूर्वजसव स्वसद्गुण बलें ईश्वरवत समाजमे सम्मान प्राप्त कय एहि क्वैलखकेँ वासुदेवपुर नामसँ पूर्वमे प्रसिद्ध कयने छलाह।तथैव हमरा लोकनि कय सकैत छी। कर्तव्य पालन कयने को महत्व नहि प्राप्त कय सकैत अछि ? आइयो काल्हि ई ग्राम दिग्विजयी, विश्वविख्यात पण्डित सँ रिक्त नहि भेल अछि। आइ ओ काल्हि एहि ग्राममे अति पुरातन, अनुपलब्ध प्रतीक मात्रा वशिष्टनिक ग्रन्थ नवीन जीवन दान कय प्रकाशित भय रहल अछि। आओर एहन संस्कृत भाषा आंग्ल भाषो भय पारदश्वा विद्वान एही ग्राममे उपलब्ध भय सकैत छथि, जनिक सदृश विद्वान सम्पूर्ण मिथिलामे प्रायः उपलब्ध हयब असम्भव। आओर बहुत दिन नहि वितल अछि जे एहन व्यवस्था पत्र एही ग्राममे लिखल गेल छल, जे देखि वैकुण्ठवासी श्रीमान महाराजाधिराज बहादुर सदृश विज्ञ निरोता महामहोपाध्याय लिखित व्यवस्था पत्रकेँ .तिरस्कृत कयलैन्ह। बहुत दिन नहि बीतल अछि जे 'नागेशोक्ति प्रकाश ' सदृश ग्रन्थ लेखक अमरत्व प्राप्त कयलन्हि अछि। यदि तत्पर भय अन्वेषण हमरा लोकनि करी तँ एहन-एहन व्यक्ति आइयो काल्हि एहि ग्राममे अवश्य उपलब्ध भय सकैत छथि, जे प्रतिदिन हवन करैत छथि स्वयंपाकी छथि, रात्रिंदिव पूजापाठ निरत रहैत छथि, ओ अपन नित्यकर्म कर्मवामे एहन दृढ़ ब्रत छथि जे गृह दाह सदृश भयानक विपत्ति उपस्थिति भेलहुँ पर अपन नित्य कृत त्याग नहि करैत छथि, अर्थात हिनका लोकनि प्राणहुं सँ बेसी स्वकर्तव्य मे प्रेम रखैत छथि। ई लिखबामे अत्यन्त आनन्द तथा गर्व होइत अछि जे क्वैलख तथा क्वैलख प्रान्तीय बालकगण केँ निःशुल्क शिक्षादायिनी, मन्दिर निर्मात्री, गंगावदाराध्या, धर्ममूर्ति श्रीमती रानी साहिबाक जन्मस्थान यैह ग्राम थिकैन्ह। जनिक लक्षक लक्ष मुद्रा धर्म्म विभागमे काशी आदि अनेक तीर्थमे व्यय भय रहल छैन्ह। हमरा लोकनिकेँ श्री 108 भद्रकाली सँ प्रार्थना करबाक चाही जे श्रीमती रानी साहिबा चिजीविनी होथि, जाहिसँ हिनका अपन जन्मस्थान मे उच्च शिक्षालय स्थापना करबाक सुयोग प्राप्त होइन्हि। नवयुवकगण, यदि हमरा लोकनि चाही तँ अतिश्लाघ्य एतद ग्रामीण आंग्ल भाषा विद्गणक सहायता सँ अनेक ग्रामोपकारिणी संस्था स्थापित कय सकैत छी। कारण जे राजकीय कार्यालय मात्र केँ ओ लोकनि रचावस्थितिसँ अलंकृत कय रहल छथि। एहन सुसंयोग प्राप्त कैओ कय जे एहि ग्राममे पोस्टऑफिस मात्रो एखन धरि स्थापित नहि भय सकल अछि से ग्रामक दुर्भाग्य थिक। अर्थात सवतरहक सुविधा प्राप्त कैओ कय जे उन्नति मार्गमे हमरा लोकनिक श्रेयसर नहि होइत छी से हमरा लोकनिक आलस्य अथवा दुर्भाग्य मात्र थीक। अतएव हमरा लोकनि केँ उचित थीक जे आलस्य त्यागि पूर्वजक गौरव रक्षार्थ स्वसदुन्नति द्वारा एहिग्रामकेँ पूर्व प्रतिष्ठा प्राप्त करयबाक चेष्टा करी। इति शुभम। कार्तिकेय झा कोइलख (प्रभात वर्ष-2, अंक-6, जून 1934) उपर्युक्त आलेखक लेखक कोइलखक गामक पहिल मुखिया प. कार्तिकेय झा प्रसिद्ध घुल्ली बाबू छलाह। नवतुरियाकेँ सम्बोधन क' अपन पूर्वजक आ गामक प्रतिष्ठाकेँ कोना आगाँ बढ़ाओल जाय, ओहि विषयमे प्रभावोत्पादक आलेख अछि। कोइलखसँ पहिने क्वैलख आ ओहूसँ पहिने कोइलखकेँ वासुदेवपुर नामसँ जानल जाइत छल। प. कार्तिकेय झाक विषयमे कोइलख पोथीमे जकर लेखक हितनाथ झा छथि, जे देल गेल अछि, ओ हू-बहू एतय प्रस्तुत क' रहल छी। पण्डित कार्तिकेय झा प. कार्तिकेय झा गामक प्रथम मुखिया छलाह। हिनक जन्म साओन कृष्ण अमावास्या उपरि प्रतिपदा 1899 ई.केँ भेल रहनि आ घर दछिनबारि टोलमे छलनि। ई संस्कृतक विद्वान एवं सामाजिक काजमे अग्रणी रहैत छलाह। नैष्ठिक रहथि, किन्तु दकियानूसी विचार- व्यवहारसँ जकड़ल नहि रहथि। हिनक प्रतिष्ठा गामसँ बाहर एहि लs कs अधिक रहनि जे शतरंजक ई नामी खेलाड़ी रहथि। बिहारक भीतरो आ बिहारसँ बाहरो, यथा जयपुर, ग्वालियरक राज- रजवाड़ा जाथि आ शतरंज प्रतियोगितामे विजयी भs आबथि।दरभंगा राज दिससँ आयोजित " धौत परीक्षा"मे हिनका शतरंजेक चैंपियनक रूपमे उत्तीर्ण घोषित कैल गेलनि आ सम्मानित कयल गेलनि। बहुत पुरना पत्रिका सभमे हिनक शतरंज-विजयक समाचार भेटैत अछि।दृष्टान्त लेल 'प्रभात' मासिक पत्रिकाक जून 1833क पृष्ठ संख्या 44पर लिखल गेल एक समाचार देखल जा सकैत अछि - " श्री कार्तिकेय झा उर्फ घुल्ली बाबू दरभंगाक हाईकौक क्लब द्वारा आयोजित सतरंजक खेलमे विजय प्राप्त केने छलाह। गत अठारह तरीखकें एक चाँदीक कप (कटोरा) तथा एक रजत पदक पारितोषिकमे देल गेलनि। कप तीन मासक अभ्यन्तर वापस करय पड़तैन्ह तथा पदक सर्वदाक वास्ते रहतनि।" हिनक निधन दि. 30 मार्च 1986 केँ भs गेलनि। (कोइलख-लेखक हितनाथ झा पृष्ठ -46.) संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-7 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-8 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-9 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-10 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-11 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-12 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-13 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-14 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-15 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-16 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-17 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-18 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-19 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-20 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-21 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.२. कल्पना झा- मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-३ कल्पना झा मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-३ माँ मैथीलीक सुच्चा सेवक/उन्नायक 'विद्यालंकार' "बहुतोकेँ इएह धारणा छनि जे, जे केओ कलम उठाए दस-पाँच पोथी खड़रलनि नहि, अपन ओजस्वी वक्तव्य आ सुक्खा वक्तव्य सँ मैथिलीक पत्र-पत्रिका भरलनि नहि, मंच पर कनफोड़ गर्जन-तर्जन कएलनि नहि, जय मिथिला जय मैथिलीक नारा लगबैत सड़क पर उतरलाह नहि, तनिका मैथिलीक सेवक/उन्नायक कोना कहबनि? सत्ते विद्यालंकार ई सभ कर्म नहि कएलनि। तथापि मैथिलीक हेतु जे ओ कएलनि, से आन जानओ वा नहि, हम तकर प्रत्यक्ष द्रष्टा छी।" ई लिखित वक्तव्य छनि पण्डित गोविन्द झा जीक। ("अनुचिन्तन" पोथी मे संकलित लेख "लेल महातरु तर बिसराम" सँ उद्धृत)। श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार' जीक मैथिली साहित्य मे योगदान संबंधित तथ्यपरक जनतब सभ जुटेबाक क्रम मे कइअक-टा गणमान्य सँ गप्प करैत रहलहुँ अछि एमहर दू मास सँ हम। किछु गणमान्यक मुहेँ ठीके एहन सुनबा लेल भेटल,"विद्यालंकार जी हिन्दी दैनिक 'आर्यावर्त'क सम्पादक छलाह आ बिहारक प्रसिद्ध हिन्दी साहित्यकार ओ शिक्षाविद छलाह। हिन्दीक लेल समर्पित रहलनि जीवन हुनकर। मैथिली लेल तँ किछु तेहन नहि केलनि।" संयोगवश किछु एहनो लोक सभ सँ सम्पर्क भेल, जे विद्यालंकार जीक सान्निध्य मे समय बिता चुकल छथि, हुनका संग काज कऽ चुकल छथि, माने प्रत्यक्षदर्शी रहि चुकल छथि विद्यालंकार जीक मैथिली भाषा-प्रेमक। आ मैथिली-भाषा प्रेमक अधीन भऽ कऽ कएल गेल हुनकर अथक प्रयास सभक। हुनकहि अथक प्रयासक परिणाम अछि मैथिली साहित्य केँ समृद्ध कएनिहार चारि प्रमुख संस्था मे सँ तीन संस्था। मैथिली भाषा ओ साहित्य सँ संबंधित चारि प्रमुख संस्था अछि- 1. न्यूज़ पेपर्स एण्ड पब्लिकेशन्स, पटना (जतए सँ मिथिला मिहिर छपैत छलए) 2. मैथिली अकादमी, पटना (जे मिथिला मिहिरक मंच पर पल्लवित पुष्पित भेल) 3. चेतना समिति, पटना (जे अनेक तरहेँ चेतना जगबैत रहल) 4. साहित्य अकादमी, दिल्ली (जे प्रकाशन, पुरस्कार, आदि द्वारा मैथिलीक लेखक लोकनि मे ऊर्जा भरि रहल अछि) जाहि मे सँ साहित्य अकादमी, दिल्ली केँ छोड़ि सभटा विद्यालंकार जी अपन खून-पसीना सँ सिंचित कऽ ठाढ़ कएने छलाह। विद्यालंकार जीक योगदानहिक प्रतिफल अछि न्यूज़ पेपर्स एण्ड पब्लिकेशन्स, मैथिली अकादमी आ चेतना समिति। संस्था सभक गठन, जमीन आवंटनक अतिरिक्त ओहि संस्था सभ मे सुचारू रूप सँ मैथिली भाषा ओ साहित्य-संबंधी चर्चा-परिचर्चा, शोध-कार्य इत्यादि होइत रहए ताहि लेल जे तत्परता विद्यालंकार जी देखओलनि, से बादक पदाधिकारी मे सँ विरले केओ देखा सकलाह। मातृभाषा मैथिलीक प्रचार-प्रसारक संग ओकर स्थिति मजगूत करबा लेल यथासाध्य सभ यत्न करैत रहलाह आजीवन। जा धरि विद्यालंकार मैथिली अकादमीक अध्यक्ष रहलाह, हुनक प्रेरणा, प्रोत्साहन आ अकादमीक प्रश्रय पाबि साहित्यकार लोकनिक लेखनी घोड़ा जकाँ दौड़ैत रहल आ मैथिली साहित्यक भण्डार भरैत रहल। जैं एहन समर्पण रहलनि अपन मातृभाषा लेल, तैं ने पण्डित गोविन्द झा लिखने छथि,"विद्यालंकारक योगदान मोन पड़ैत अछि, तँ मस्तक अनायासहि श्रद्धावनत भए जाइत अछि।" दुःखक गप्प अछि जे 17 मइ 1976 मे स्थापित मैथिली अकादमी, जे मैथिली भाषा, साहित्य आ शोधक केन्द्र छलए, से सरकारी उदासीनता, प्रशासनिक लापरवाही, स्टाफक कमीक कारणेँ तत्काल बन्द कऽ देल गेल अछि। आशा करैत छी शीघ्रातिशीघ्र मैथिली अकादमी सुचारू रूप सँ क्रियाशील होएत आ विद्यालंकार जीक आत्मा प्रफुल्लित हेतनि। ओना विद्यालंकारक मैथिली-सेवा मे सभ सँ मूल्यवान अछि साप्ताहिक मिथिला-मिहिरक पटना सँ पुन:प्रकाशन। मिहिर केँ पुनः चलएबाक महाराज कामेश्वर सिंहक इच्छा ठामहि रहि जाइत जँ विद्यालंकार ओकर दायित्व प्रसन्नता पूर्वक अपना उपर लए हुनका प्रोत्साहित नहि करितथि। महाराज हुनक बड़ आदर करैत छलाह। हुनक सहयोगक आश्वासन भेटलहि पर मिहिर केँ पुनः चलएबाक निर्णय भेल। सम्पादक तँ बनाओल गेलाह सुधांशु शेखर चौधरी, परन्तु पर्यवेक्षणक भार विद्यालंकार स्वयं उठओलनि। मिथिला-मिहिर, चेतना-समिति आ मैथिली अकादमीक उपलब्धि तँ सभ जनितहि छी। एक बात कम गोटे जनैत होएताह जे मैथिली भाषाक मानकीकरण मे विद्यालंकारक योगदान प्रायः सभ सँ अधिक रहलनि। ओ एक बेर मिथिला-मिहिरक हेतु मानक वर्तनी निर्धारित कएलनि। जखन मैथिली अकादमी मे अएलाह तँ पुनः एहि हेतु एक विज्ञ उपसमिति बनाए ओहि पर पुनर्विचार कराओल। निर्णय सूत्रबद्ध कएल गेल आ ताहि पर तीन गोटाक हस्ताक्षर भेल। विद्यालंकारक, प्रो. सुरेन्द्र झा 'सुमन' आ पण्डित गोविन्द झाक। एहि निर्णय केँ सभक समर्थन भेटल। एहि विषय मे अपन मत पर अड़ल रहलाह केवल दू विद्वान, आचार्य रमानाथ झा आ प्रो. सुभद्र झा। ज्ञातव्य जे एहि मानकीकरण सूत्र मे 'ए' तथा 'य' दुनू राखल गेल। किन्तु चलाओल गेल केवल य। ("अनुचिन्तन" पोथी मे संकलित लेख "लेल महातरु तर बिसराम" सँ उद्धृत) "लेल महातरु तर बिसराम" लेख केर समापन करैत पण्डित गोविन्द झा लिखलनि अछि,"चलैत-चलैत थाकल-तबधल बटोही कोनो महातरु तर विश्राम लैत अछि। हमरा हेतु विद्यालंकारे ओ 'महातरु' भेलाह।" उक्त दू टा वाक्य पढ़ि अपन महान पूर्वजक प्रति हृदय श्रद्धा-भाव सँ ओत-प्रोत होमए लागल हमर। वास्तव मे 'महातरु' तँ छलाहे ओ। "जे केओ हुनका सान्निध्य मे थोड़बो समय बितओलक, से स्वयं केँ भाग्यशाली बुझए" आदरणीय घनश्याम ठाकुर जी एक दिन गप्पक प्रसंग मे एहि तरहक बात कहने छलाह हमरा। हमर सौभाग्य जे ओहि 'महातरु'क एकटा शाखा/उप-शाखाक संग हमहूँ जीवन भरि लेल जुड़ि गेल छी। ओहि 'महातरु'क प्रति अपन टूटल-फूटल भाषा-शैली मे जएह-जेहने भाव-कुसुमाञ्जलि अर्पित कऽ पाबि रहल छी, से हमरा लेल संतोषक बात ! नोट: एहि लेख मे अधिकांश तथ्य पण्डित गोविन्द झा जीक पोथी "अनुचिन्तन"मे संकलित लेख "लेल महातरु तर बिसराम" सँ उद्धृत अछि। पण्डित गोविन्द झाक सुपुत्र आदरणीय अरविन्द 'अक्कू' जीक माध्यम सँ ई लेख हमरा प्राप्त भऽ सकल अछि। संपादकीय सूचना- एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-2 विद्यालंकारजीसँ पहिने विदेहपर व्यासजीक कृतित्वपर कल्पनाजी लीखि रहल छथि। पाठक व्यासजीपर प्रकाशित एखन धरिक सभ खंड निच्चा केर लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकै छथि- मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-7 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-8 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-9 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-10 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-11 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-12 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-13 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-14 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-15 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-16 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-17 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-18 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-19 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-20 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-21 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-22 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-23 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-24 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-25 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.३. प्रणव कुमार झा-पुस्तक पाठकीय: ‘सेतुषाम’ लोक आ वेदक दार्शनिक सेतु प्रणव कुमार झा पुस्तक पाठकीय: ‘सेतुषाम’ लोक आ वेदक दार्शनिक सेतु अवसर भेटला पर लोक केँ वेदक अध्ययन अथवा तकर संदर्भ-साहित्यक अनुशीलन अवश्य करबाक चाही। किछू दिन पहिने जखन सोशल मीडिया पर पुस्तक ‘सेतुषाम’क मुखपृष्ठ (कवर पेज) पर हमर नजरि पड़ल, त मोन मे स्वभाविक रूप सँ एकटा जिज्ञासा जागल जे आखिर ऐ ‘सेतुषाम’ शब्दक अंतर्निहित अर्थ की अछि? ऐ शाब्दिक कौतूहलक तार्किक आ प्रामाणिक उत्तर पुस्तकक संपादकीय मे संपादक आशीष अनचिन्हार जी देने छथि। ओ उल्लेख करैत छथि जे सामवेदक कौथुमीय शाखाक अंतर्गत ‘अरण्य गान’ मे एकटा विशिष्ट मंत्र अछि, जकरा ‘सेतुषाम’ (सेतुसाम) कहल गेल अछि। कोनो भी कृतिक आत्मा तकर शीर्षक मे निहित होइत अछि। ‘सेतुषाम’ शब्दक प्रथमावलोकन सँ साधारण पाठकक मोन मे कौतूहल जागब नितांत स्वाभाविक अछि। संपादकीय मे आशीष अनचिन्हार जी ऐ शब्दक जे भाषाई आ दार्शनिक विन्यास प्रस्तुत कएलनि अछि, ओ हुनकर गंभीर साहित्यिक निष्ठा केँ दर्शबैत अछि। संपादकीय मे लेखक अपन पूर्व प्रकाशित कृति ‘प्रीति कारण सेतु बान्हल’ सँ वर्तमान पुस्तकक वैचारिक तार जोड़ैत एकटा गंभीर आ मर्मस्पर्शी गप्प कहलनि अछि। ओ लिखैत छथि जे ‘लोक-वेद’ मिथिलाक महानतम सांस्कृतिक उक्ति (प्रतीक) अछि, जाहि मे ‘लोक’ क स्थान पहिने अछि आ ‘वेद’ क बाद मे। अक्सर ई मानल जाइत रहल अछि जे ‘लोक’ (जनसामान्यक मौखिक परंपरा, लोकगीत, लोकगाथा) आ ‘वेद’ (वैदिक वाङ्मय, ऋचा, शास्त्रीय संहिता) दुइटा भिन्न ध्रुव अछि। एक दिस जतय लोक केँ लौकिक, व्यावहारिक आ अनौपचारिक मानल गेल, ततय वेद केँ अलौकिक, शास्त्रीय आ आनुष्ठानिक मानि कए दुनू केँ अलग-अलग कोटि मे राखल गेल। मुदा ‘सेतुषाम’ एही पारंपरिक अवधारणा केँ चुनौती दैत अछि। ई पोथी मिथिलाक ओहि सनातन सत्य केँ उद्घाटित करैत अछि जाहि मे लोक आ वेद एक दोसराक विरोधी नहीं, बल्कि पूरक अछि। एकटा संपादकक रूप मे आशीष अनचिन्हार जीक ई मेधा, प्राच्य-विद्या (Indology) आ समाजशास्त्रक ओहि समन्वय केँ सोझाँ अनैत अछि, जाहि सँ मैथिली आलोचनाक क्षितिज बेसी पसरइत अछि। एही वैचारिक दर्शन केँ आत्मसात करैत, हुनकर पूर्व संपादित पोथीक प्रस्तुतीकरण जतय पूर्ण रूप सँ मैथिली लोकगीत पर आधारित छल, ततय ऐ दोसर पोथीक स्वरूप वेदक दिव्य आभा सँ आलोकित अछि। ऐ प्रकारे संपादकीय लेख ई स्पष्ट करबा मे सफल रहल अछि जे ई नव कृति अपन पूर्ववर्ती पुस्तकक एकटा पूरक (कम्पलीमेन्ट) अछि। संपादकीय मे विभिन्न वेदमंत्र आ ऋचा सभक सांगोपांग विवरण दैत, साधारण पाठक केँ किछू काल लेल वेदक ओहि वृहद् आ समृद्ध संस्कृति सँ जोड़बाक एकटा सराहनीय प्रयास कएल गेल अछि। निश्चित रूप सँ, लोक-संस्कृति केँ गम्भीरता सँ बुझबाक लेल जतय लोकगीत सभक संदर्भ अपरिहार्य अछि, ततय वेदक अध्ययन अथवा तकर प्रामाणिक संदर्भक अनुशीलन सँ पाठक केँ दुइटा पैघ लाभ भऽ सकैत अछि: पहिल लाभ: पाठक केँ ऐ बातक वास्तविक बोध होइत छैक जे आजु सँ हजारों वर्ष पूर्व अपन पूर्वजक चिंतन, साहित्य आ संस्कृति कालखंड के सापेक्ष मे कतेक उन्नत छल। ओहि कालखंडक जीवन-पद्धति, जीवन-दर्शन, आ संगीतक कतेक वैज्ञानिक विकास भऽ चुकल छल, ई गप्प प्रामाणिकता सँ सामने आबैत अछि। दोसर लाभ: ओ तथाकथित ‘पोंगा-पंडित’ आ अज्ञानी लोक, जे बिना कोनो ठोस आधारक वेदक नाम पर कखनो ओतय सँ हवाई जहाज उड़बैत छथि त कखनो कोरोनाक दवाई खोजबाक हास्यास्पद दावा करैत छथि; हुनका सभक ओहि थोथा ‘पोंगापंथ’ आ पाखंड केँ तार्किक रूप सँ खारिज कएल जा सकैत अछि। ‘सेतुषाम’ (वा सेतुसाम) मूलतः सामवेदक कौथुमीय संहिताक अरण्य गान मे समाहित एकटा अत्यंत पवित्र मंत्रक नाम अछि। सामवेद संगीत आ गायनकलक आदि स्रोत अछि। वैदिक परंपरा मे ‘साम’ क अर्थ होइत अछि गान, आ ‘सेतु’ क अर्थ अछि ओहि मार्ग वा माध्यम जे भवसागर सँ पार करैत अछि, वा दुइटा भिन्न तट केँ जोड़ैत अछि। संपादक ऐ मंत्रक संदर्भ दैत ई प्रतिपादित करबा मे सफल रहलाह अछि जे मिथिलाक जे संस्कृति अछि, ओ मूलतः ‘सामगान’ सँ अनुप्राणित अछि। मिथिलाक लोकधुन, जकरा हम सभ सोहर, समदाउन, वा बटगमनी आदि कहैत छी, तकर सूक्ष्म स्वर-लहरी कतहु ने कतहु सामवेदक ओहि अरण्य गानक ऋचा सभ सँ जुड़ल अछि। एही प्रकारे, शीर्षक ‘सेतुषाम’ केवल एकटा वैदिक संज्ञा मात्र नहीं अछि; ई ‘लौकिक संगीत’ आ ‘वैदिक स्वर’ क बीचक तादात्म्य केँ स्वरूपाकार देबबला एकटा शब्द-ब्रह्म अछि। पुस्तकक संरचनाक बात कएल जाए त ई मुख्य रूप सँ दुइटा वैचारिक खण्ड मे विभक्त अछि। खण्ड १ मे प्रीति ठाकुरक साहित्य आ कला संबंधी अवदान पर आधारित दुइटा विद्वानक आलेख संकलित अछि। ओतहि, खण्ड २ पूर्ण रूप सँ गजेंद्र ठाकुरक साहित्यिक एवं ऐतिहासिक धरोहर आ ‘विदेह’ (मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका) क लेल कएल गेल ऐतिहासिक काज सभ पर केंद्रित अछि, जाहि मे कुल १४ टा लेखकक आलेख समाहित अछि। ऐ आलेख सभक पैघ विशेषता ई अछि जे एकर लेखकगण मैथिली समाजक विभिन्न वर्ग, समुदाय, व्यवसाय आ भिन्न-भिन्न आयु वर्ग सँ आबैत छथि, जे ऐ विमर्श केँ बहुआयामी बनाबैत अछि। ऐ संपूर्ण संकलन मे श्री कैलाश कुमार ठाकुरक लेख “मैथिलीक डिजिटल युगक निर्माता: गजेंद्र ठाकुर” हमर विशिष्ट ध्यान आकर्षित केलक। ऐ आलेख मे नै खाली गजेंद्र ठाकुर आ संपूर्ण ‘विदेह’ टीमक भगीरथ प्रयास सभ पर वृहद् रूप सँ प्रकाश देल गेल अछि, अपितु एकटा निष्पक्ष समीक्षकक रूप मे हुनका द्वारा कोन-कोन काज अखन धरि अछूत रहि गेल अछि आ भविष्य मे हुनका सँ की-की अकादमिक अपेक्षा अछि, तकरो विस्तृत आ तार्किक विवेचन कएल गेल अछि। ई लेख पढ़ैत काल ई भान भेल जेना लेखक हमरहि अंतर्मनक सोच केँ शब्दक रूप दए रहल छथि। अस्तु, हमरो मोन मे कखन सँ ऐ तरहक विचार उमड़ि-घुमड़ि रहल छल जे मैथिली भाषा-साहित्यक व्यापक विस्तारक लेल आगा समय मे ई नितांत आवश्यक अछि जे ओकर उत्कृष्ट टेक्स्ट (पाठ) कए ऑडियो, संगीत, आ वीडियोक रूप मे बेसी सँ बेसी रूपांतरित कएल जाए, जाहि सँ ई आजूक समय के सर्वसाधारण आ नवतुरिया तक पहुंचय। उदाहरणक रूप मे, डॉ. शशीधर झाक बाल-कविता सभ अथवा अन्य कतेको मूर्धन्य लेखक सभक ‘विदेह’ मे प्रकाशित कविता, गजल आदिक सुमधुर संगीत मे संयोजन कएल जाए; अथवा प्रीति ठाकुरक उत्कृष्ट चित्रकथा (Comics/Illustrations) कए वीडियो माध्यम सँ नव जेनेरेशन (भावी पीढ़ी) तक पहुँचाओल जाए, त अपन भाषा आ संस्कृति निश्चित रूप सँ एकटा बेसी सुदृढ़ आ बेहतर स्थिति मे पहुँचि सकैत अछि। मुदा, ई गप्प सेहो शाश्वत अछि जे प्रत्येक संस्था वा टीमक अपन एकटा सीमित संसाधन आ सीमा (Limitation) होइत छैक आ ‘विदेह’ टीमक सेहो कदाचित ई एकटा सीमा थीक। ओना, ई संतोषक विषय अछि जे किछू अन्य सजग लोक आ टीम सभ एही दिशा मे निरंतर प्रयासरत छथि। जेना ‘मधुर-मैथिली’ यूट्यूब चैनलक टीम होइक, सौम्या झा द्वारा ‘मैथिली खिस्सा’ वाचनक सराहनीय प्रयास होइक, अथवा अन्य मैथिली कलाकार सभक व्यक्तिगत प्रयास। स्वयं आशीष अनचिन्हार जीक गजल सभ केँ सेहो सुरबद्ध करबाक कतेको गोट प्रयास हम देखल अछि। हालहि मे आदित्यनाथ ठाकुर द्वारा गाओल एकटा 'भक्ति गजल' सुनबाक सुयोग भेटल, जे अत्यंत आनंदमयी आ कर्णप्रिय छल। खैर, कैलाश कुमार ठाकुर जीक ई आलेख हमरा संगे-संग कदाचित पुस्तकक संपादकक ध्यान सेहो ओतबे प्रखरता सँ आकर्षित केने हेतैन, ताहि लेल लेख कए अंत मे एकटा विशिष्ट संपादकीय टिप्पणी सेहो कएल गेल अछि, जे ऐ विमर्श केँ एकटा तार्किक परिणति दैत अछि। डॉ. धनाकर ठाकुरक लेख ‘विदेह पत्रिकाक जनपक्षधरता’ सेहो ऐ पुस्तकक मूल प्रकाशन-लक्ष्य केँ बड्ड सार्थकता सँ सिद्ध करैत अछि। सीमित शब्दक परिधि मे डॉ. ठाकुर ‘विदेह’ क जनपक्षधरता केँ पाँच मुख्य बिंदु मे विभक्त कए बुjझेबा मे पूर्णतः स्पष्ट, बेबाक (स्ट्रेट फॉरवर्ड) आ सफल रहलाह अछि। हुनका अनुसार ई पाँचटा जनपक्षधरता अछि: १. भाषाई जनपक्षधरता २. लेखक वर्गक जनपक्षधरता ३. विषय एवं विधाक जनपक्षधरता ४. पुरस्कारक जनपक्षधरता ५. विशेषांकक जनपक्षधरता डॉ. धनाकर ठाकुरक ऐ वैज्ञानिक विश्लेषणक व्यावहारिक प्रमाण ऐ पोथी मे संकलित अन्य विद्वान लेखकगण जेना कल्पना झा, मुन्ना जी, डॉ. शिव कुमार प्रसाद, पूनम झा सुधा आदिक आलेख सभ सँ स्वतः भेट जाइत अछि। ओतहि, प्रवीण झा, भैरव लाल दास, कुन्दन कर्ण, उज्ज्वल झा, आ विकास वत्सनाभ आदि लेखकगण अपन-अपन शब्द आ समृद्ध अनुभवक माध्यम सँ आलेख मे पुस्तकक उद्देश्य सँ संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य आ प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत कएलनि अछि। पुस्तकक छपाईक गुणवत्ता आ फॉन्ट (Typographic Layout) सुघड़ आ स्पष्ट अछि, जाहि लेल ‘पोथी.कॉम’ निश्चित रूप सँ साधुवाद आ बधाईक पात्र अछि। ई १७५ पृष्ठक पुस्तक ओहि सुधी पाठक, शोधार्थी आ विद्ज्जन लेल एकटा उपयोगी पाठ्य (संदर्भ-ग्रंथ) भऽ सकय अछि, जे मैथिली साहित्य, कला, चित्रकथा, आ पंजी-व्यवस्था आदि क्षेत्र मे ‘ठाकुर दंपत्ति’ (गजेंद्र ठाकुर आ प्रीति ठाकुर) तथा ‘विदेह’ क अवदान केँ बुझबाक अभिलाषा रखैत छथि। संगहि, जे लोक मैथिली भाषा-साहित्यक भविष्य केँ एकटा आधुनिक आ वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य मे देखय चाहैत छथि, ओ ई पोथी के पढ़ि सकय छथि। -प्रणव कुमार झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.४. डॉ. योगानन्द झा- अभिनव पद्यविधा : इतिहास-काव्य डॉ. योगानन्द झा अभिनव पद्यविधा : इतिहास-काव्य
इसवी सन् 1801 मे विदेशी विद्वान एच.टी कोलब्रुक भाषाक रूपमे सर्वप्रथम मैथिल किंवा तिरहुतिया शब्दक प्रयोग कयलनि। मुदा अज्ञानतावश हुनक भ्रान्त अवधारणा विज्ञापित भेल जे ई भाषा ने तँ विस्तृत क्षेत्रमे प्रयुक्त अछि आ ने कोनो उत्कृष्ट रचनाकारे एकर संपोषण कयने छथि, जखन कि कोलब्रुकक ई अवधारणा सर्वथा निरस्त करबा योग्य छल। वस्तुत: मैथिली नहि केवल मिथिला अपितु नेपालो तराइक विस्तृत क्षेत्रक भाषा रहल अछि। एकर विराट अस्तित्व आठमे शताब्दीसँ बनल रहलैक अछि। एहि भाषामे विद्यापति , जगज्ज्योतिर्मल्ल सन -सन अनेक वरेण्य कविलोकनिक विराट ओ निरन्तरगामी श्रृंखला वर्तमान रहल अछि। अवश्ये मिथिला भूमि संस्कृत विद्याक केंद्र रूपमे प्रख्यात रहल अछि आ एहि ठामक पंडित समाज अपन मातृभाषा साहित्यकेँ गौरवक वस्तु नहि बुझैत रहलाह, एकरा उपेक्षणीय दृष्टिसँ देखैत रहलाह तथा एकरा केवल लोकरंजनक वस्तु बुझैत रहला, रसिक सहृदय मात्रक वस्तु बुझैत रहलाह। परिणामत: 1854 ईसवीक एजुकेशनल डिस्पैचमे जखन अन्यान्य जनपदीय भाषासब लोकशिक्षणक भाषाक रूपमे स्वीकार्य भेल ,मिथिला जनपदमे मैथिलीक स्थान हिन्दी लऽ लेलक। परवर्ती कालमे खास कऽ युगप्रवर्तक चन्दा झाक आविर्भावक पश्चात् मैथिली भाषा-साहित्यक सञ्चयन-संवर्धन एकटा आन्दोलनक रूप धारण कयलक जकर परिणामस्वरुप आइ मैथिली समकालिक भारतीय भाषा सबहिक समकक्ष ठाढ़ भऽ सकल अछि आ संविधान-सम्मत भाषाक रूपमे समादृत अछि।मैथिलीक एहि अभ्युन्नतिमे आवासी -प्रवासी सकल मैथिली भाषी समुदायक निरन्तरगामी इच्छाशक्ति ओ कार्यशक्तिक अवदान रहलनि अछि। एहन अवदानी लोकनिमे मातृभाषानुरागी ओहू वर्गकेँ नहि अवडेरल जा सकैत छनि जे सभ वृत्या मैथिलीसँ सम्पृक्त नहियों रहलाक बाद अवसर पबैत देरी मातृभाषा भक्तिक भुम्हुरकेँ प्रज्वलित अग्निमे परिवर्तित कऽ अनुपम अवदान प्रदान करैत कृतार्थ भेलाह अछि। एहने किछु विशिष्ट अवदानी लोकनिक मध्य श्री राज किशोर मिश्रक नाम अत्यन्त आदरक संग लेल जा सकैत छनि जनिक लगभग दू दर्जन मैथिली ओ एक दर्जन हिन्दी कृति प्रकाशित छनि आ असीम ऊर्जा सम्पन्न ई प्रतिभा सदिखन मिथिला-मैथिल-मैथिलीक संगहि अखिल मानवताक हित -चिन्तनमे व्यस्त देखि पड़ैत छथि।
श्री मिश्र मूलत: कवि थिकाह । यद्यपि हिनक लेखन कर्म बहुआयामी छनि, तथापि पद्य-विधामे हिनक डेढ़ दर्जन पोथी हिनक कवित्व प्रतिभाक परिचायकक रूपमे क्रमश: समक्ष अबैत रहलनि अछि। हिनक रचनावलीक ई अन्यतम विशिष्टता छनि जे ओ नहि केवल लोकरंजनक सीमाटाक स्पर्श करैत अछि, अपितु प्रचुर लोकशिक्षणक साधनक रूपमे सेहो प्रस्तुत होइत रहल अछि। बानगीक रूपमे हिनक ' प्रलय -पाश , जँ जग जल नहि होइत, सभ्यताक भ्रम, ऊर्जस्विता' आदिकेँ परेखल जा सकैछ। आचार्य चाणक्य पर हिनक ऐतिहासिक विषयाधारित खण्ड-काव्य आबि चुकल छनि।सम्प्रति ई 'श्री मिथिला ' काव्य पोथी लऽ कऽ प्रस्तुत भेल छथि जाहिमे मिथिलाक इतिहासकेँ वस्तु रूपमे ग्रहण कऽ रचना कयल गेल अछि । एहि ग्रन्थकेँ ई इतिहास-काव्य विधाक अन्तर्गत रखलनि अछि जकरा हिनक नव्यता ओ भव्यताक अन्वेषण दिसुक प्रयत्न कहल जा सकैत छनि। वस्तुत: एहि पोथीक द्वारा श्री मिश्र एकटा अभिनव पद्यविधाक स्थापनाक दिशामे पदक्षेप करैत देखि पड़ैत छथि। श्री मिश्रक ई प्रयत्न परवर्ती रचनाकार लोकनिक हेतु मार्गदर्शक भऽ सकैत छनि, से अपेक्षा कयल जा सकैछ।
'श्री मिथिला'मे वस्तुत: मिथिलाक संक्षिप्त इतिहासकेँ पद्यबद्ध कयल गेल अछि। रचनाकार स्वयं कहने छथि जे 'एहि पोथीमे मिथिलाक विविध आयामकेँ संक्षिप्त, समेकित ओ समग्रतासँ पद्यविधामे प्रस्तुत कयल गेल अछि। इतिहास, दार्शनिक सम्वाद, शास्त्रार्थ, संस्कृति ,समाज, लोकगीत, लोकगाथा एहि सभ विषयपर एकसंग संक्षेपमे ,साङ्गोपाङ्ग काव्य -रचना करब चुनौतीपूर्ण लागल। ई काव्य-यात्रा वैदिक युगसँ चलि डिजिटल युग धरि आएल अछि। पोथीक विषय-वस्तुकेँ तीन काल-खंडमे बाँटल गेल अछि : प्राचीन काल, मध्य काल ओ आधुनिक काल। तदनुकूल सतरह गोट अध्यायमे विषय सभकेँ समावेशित कयल गेल अछि। ' ई लेखकीय वक्तव्य समीचीन होइतो एकर अनेक अंशपर असहमतिक संभावना बनैत अछि, तथापि एतबा तँ सर्वथा सत्य अछि जे रचनाकार मिथिला-मैथिल ओ मैथिलीक प्रति पूर्ण आस्थावान ओ गौरवान्वित छथि। द्रष्टव्य अछि हिनक किछु पाँती ,यथा -
'सीरध्वज सन शासक जतय, याज्ञवल्क्य विधि-निर्माता, गौतम सन नैयायिक, गार्गी नहि रचलनि फेर विधाता।'
'दू परम ज्ञानीक संवादसँ, जगत् पाओल बड़ ज्ञान, सौभाग्य छल एहि भूमिकेँ, जे एहन-एहन विद्वान ।'
'धन,बल,पौरुष, सम्पदा, मिलि सब असुर-समाज, डिगा सकल नहि सीताकेँ, नारी जातिक ओ नाज। '
एहि काव्यक प्रथम खंड प्राचीन काल नओ अध्यायमे विभक्त अछि जाहिमे क्रमश: विदेह ; गार्गी-याज्ञवल्क्य-संवाद ; मैत्रेयी-याज्ञवल्क्य-संवाद; अष्टावक्र; अष्टावक्र-जनक-सम्वाद ; वैदेही ; दर्शन, समाज, संस्कृति ओ अर्थतंत्र ; वज्जिमहाजनपद, मौर्य-वंश, गुप्तकाल, पाल-वंश, गुर्जर-प्रतिहार, चन्देल तथा अंतिम मंडन-शंकराचार्य-शास्त्रार्थ अनुस्यूत अछि।
रचनाकार पहिल अध्यायमे इतिहास ओ कल्पनाक आधार पर विदेह जनपदक निर्माण ओ वैशिष्ट्यक परिचय प्रस्तुत कयने छथि। दोसर ओ तेसर अध्यायमे क्रमश: गार्गी ओ मैत्रेयीक संग याज्ञवल्क्यक संवादक विवरण प्रस्तुत कऽ तत्कालीन ब्रह्मवादिनी मैथिलानी लोकनिक दृष्टांत प्रस्तुत भेल अछि। चारिम अध्यायमे अष्टावक्रक परिचय ओ पाँचम अध्यायमे अष्टावक्र-जनक-सम्वादक माध्यमे स्थितप्रज्ञता ओ आत्मतत्त्वक परिचय प्रदान कयल गेल अछि। छठम अध्यायमे मिथिलाक प्राकृतिक सौंदर्य, लोकवेद,जानकीक जन्म ओ अपूर्व शौर्य, जनकक प्रतिज्ञा, राम द्वारा धनुर्भंग ओ सीताराम विवाह, रामक वनगमन, सीताक पतिपरायणता आदिक अति संक्षिप्त विवरण देल गेल अछि। तत:पर सीताहरण, अशोकवाटिकामे रावण-सीता -संवाद, रावणक नाश, सीताक अग्निपरीक्षा ओ अयोध्या प्रत्यागमन ,सीताक पुन: वनवास, लव-कुश प्रसंग ओ जानकीक पाताल प्रवेश धरिक कथाकेँ समाहित कऽ लेल गेल अछि। सातम अध्यायमे मिथिलामे प्रचलित तद् युगीन दर्शन, सामाजिक व्यवस्था , धर्म, अर्थ-तंत्र आदिक परिचय प्रदान कयल गेल अछि। आठम अध्यायमे प्राचीन कालमे मिथिलाक शासन- पद्धति ओ शासक वर्गक परिचय प्रदान कयल गेल अछि। एहि खण्डक अंतिम अध्याय'मंडन-शंकराचार्य-शास्त्रार्थ'मे रचनाकार 'शंकर दिग्विजय'क सर्वथा अनुकरण कऽ लेलनि अछि।
मध्यकालक वर्णन सात अध्यायमे विभक्त अछि। तकर पहिल दशम अध्यायमे कर्णाट वंशक प्रशस्तिवाचन,राजा हरिसिंहदेवक नेपाल पलायन, हुनका द्वारा प्रचारित पञ्जी-व्यवस्था ओ हुनक वंशज लोकनिक समयमे कृत साहित्यिक-सांस्कृतिक कृति आदिक विवरण प्रस्तुत भेल अछि। एगारहम अध्यायमे ओइनवार-वंशक विरुदावली ,राजा शिवसिंहक पलायन एवं तदवधिमे रचित महाकवि विद्यापतिक किछु प्रमुख रचनाक उल्लेख भेलनि अछि। बारहम अध्याय विद्यापतिकेँ समर्पित छनि।कवि सहर्ष गर्वोन्नत भऽ उद्घोष कयने छथि -
'महाकविकेँ हम की आँकब? बाँसक लग्गीसँ हिमालय नापब?'
एहि अध्यायमे विद्यापतिक ज्ञान-गरिमा ,रचनावली आदिक उल्लेख करैत तत्कालीन मिथिलाक कतोक सामाजिक-सांस्कृतिक पक्षकेँ निरावृत कऽ प्रस्तुत कयल गेल अछि। तेरहम अध्याय लोकगाथामे गाथा-चक्रक उपयोगिता, ओकर शिल्प-विधान, सम्बद्ध वाद्य- यंत्र ,परिगणना,वर्णित वस्तु विशेष आदिक उल्लेख भेल अछि। चौदहम अध्यायमे खण्डवला कुलक राजप्राप्तिक कथाक संगहि एहि कुलक प्रमुख राजा लोकनिक विरुदावलीक सांकेतिक गायन भेल अछि। पन्द्रहम अध्यायमे मध्यकालीन मैथिल लोकनिक संस्कृति ओ संस्कार,,धर्म ओ उपासना,सामाजिक रीति-कुरीति ,शिक्षा-व्यवस्था ,महाजनी प्रथा,अर्थतंत्र, लोकनृत्य, लोकगीत, ओ विभिन्न ऋतुक वर्णन भेल अछि जे कविक संवेदनशीलताक अभिव्यंजक अछि। एहि खण्डक अंतिम सोलहम अध्यायमे कवि मैथिली भाषाक संक्षिप्त ऐतिहासिक विकास मार्गक निदर्शन प्रस्तुत करैत आधुनिक मैथिली लेखकक प्रति संतोष अभिव्यक्त करैत देखि पड़ैत छथि ,यथा -
'खूब लेखन भऽ रहल अछि, ओजस्वी ओ बहुआयामी, कतेको साहित्यकार लोकनि छथि यशस्वी आओर नामी।'
कविक उपरलिखित आकलन संख्याक दृष्टिएँ सत्य मुदा गुणक दृष्टिएँ सर्वथा शोचनीय कहल जा सकैत अछि। पोथीक अंतिम सतरहम अध्यायमे आधुनिक कालक मिथिलाक वर्णनक लाथे मिथिला जगतमे होइत क्रमिक विकासक एकटा चित्र उरेहल गेल अछि तथा मैथिलीक विभिन्न समस्यापर सेहो दृष्टिपात करबाक प्रयास भेल अछि। एहिमे डिजिटल युगक लाभ-हानि तथा प्रगति-पथपर अग्रेषित मिथिलाक प्रति उल्लासक वर्णन भेल अछि।संगहि एहिमे वैज्ञानिक युग ओ पाश्चात्य संस्कृतिक अन्धानुकरण जन्य विकृति सब पर सेहो ध्यान आकृष्ट कयल गेल अछि।
एहि तरहेँ समग्रतामे ई पोथी मिथिलाक राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक ओ साहित्यिक इतिहासकेँ सहेजने अछि आ से पद्य काव्यक माध्यमक कारणे अभिनव आस्वाद प्रदान करैत अछि। ओना घटना-उपघटनाक विवरण तँ प्रबंधकाव्यक अनिवार्य अंश रहिते अछि तथापि ई काव्य एहि लऽ कऽ विशिष्ट कहल जा सकैत अछि जे एहिमे शास्त्रीय विषयकेँ अत्यन्त रोचक ढंगसँ प्रस्तुत कयल गेल अछि।
श्री मिश्रक ई ध्वनिकाव्य थिकनि जकर लक्ष्य अछि मिथिलाक लोकजीवनमे अपन पूर्व पुरुष लोकनिक आदर्शक संरक्षण ओ संवर्द्धनक दिशामे उत्प्रेरण।
मात्रिक छंदमे आबद्ध एहि काव्यक प्रत्येक पद यति ,गति सँ समन्वित अछि। अवश्ये कतोक ठाम छन्दत्रुटि अखरैत अछि तथापि शब्द लालित्य ओ आलंकारिता एकरा श्रेष्ठ काव्यमे परिगणनीय बनौने अछि यथा -
'घोघ उठा कऽ चलथि जे नारी , लाजे मुँह अड़हुल समान । लागनि मुख जनु उगल नभमे , संग-संग दिनमणि ओ चान ।।'
मिथिलाक सम्पूर्ण इतिहासक विस्तीर्ण फलक पर रचित ई काव्य रचनाकारक निरन्तर चिन्तनक अवक्षेपण थिक। श्री मिश्र मिथिलाक गौरवशाली परम्परा दिस इंगित करैत अपन ओहि धरोहरक रक्षाक निमित्त आह्वान तँ करबे कयलनि अछि , संगहि आधुनिक सौविध्यपूर्ण जीवनमे अनायास प्रवेश करैत विकृति सभ दिस सेहो चिन्तन प्रस्तुत कयलनि अछि।ई हुनक नैसर्गिक प्रतिभा ,असाधारण व्युत्पत्ति ओ निर्मल अध्ययन- अनुभूतिसँ ओत-प्रोत काव्य-रचना थिकनि जे मिथिलाक प्रति राष्ट्रीय भावनाक उद्दीपनक लाथेँ भारतीयताक प्रति एकात्म भक्तिभाव ओ लोकमंगलक कामनापरक सिद्ध अछि। द्रष्टव्य अछि हिनक किछु समाजसापेक्ष ओ सुधारवादी पंक्ति जाहिमे ओजस्विता ओ सत्साहित्यक भाव -दर्शन विवेच्य काव्यक उत्कृष्टताक प्रतीक कहल जा सकैछ, यथा -
'साझी सँ एकल परिवार। भेल जा रहल ओहो भार।। टूटि रहल अछि वैवाहिक-संबंध। पाश्चात्य संस्कृति तँ अछिये अन्ध।। गामक जिनगीमे छल दुलार। इरखा दिस संतुलन भेल उलार।। विज्ञान बढ़ल आ पढ़ल समाज । मुदा, कला, संस्कृतिक अछि काज।। '
कवि आधुनिक वैज्ञानिक प्रगतिजन्य मानव जीवनमे आयल सुख -समृद्धि ओ सौविध्यक प्रति आश्वस्तिक संगहि ओकरासँ उत्पन्न दुष्प्रभावसँ सेहो परिचित करबैत चलैत छथि आ मानव मात्रकेँ सावधान करैत गुनलनि अछि -
'हमसभ आब ओहि युगमे छी लागल छै सुविधाकेँ अम्बार, मनुक्ख तकनीकक बलपर अछि रचने अपन कृत्रिम संसार। '
एहि कृत्रिम संसारमे मानव जीवन सरल ओ संरक्षित तँ भेल बुझना जाइछ मुदा प्रकृतिक निरन्तर दोहनक कारणे क्रमश: असंतुलन बढ़ले जा रहल अछि । लोककेँ वायु-प्रदूषण , जल-प्रदूषण, जलाभाव,जंगली जानवरक प्रकोप आदि सहबा लेल बाध्य होमऽ पड़ि रहल छनि । संचार क्रांति सकल विश्वकेँ एकटा गाम तँ बना देलक मुदा औपचारिकता बढ़ैत गेल अछि, मनुक्ख-मनुक्खक बीच आपकता घटैत चल गेल अछि। 'एआई' प्रत्येक काजक हेतु उपयुक्त तँ भऽ गेल अछि मुदा ओकरामे ओ संवेदना कोना भेटतैक जे मानव-मानवक बीच व्यवहारसँ सहजे भेटि जाइत छलैक।
एहि तरहेँ कवि मानव मात्रक भविष्यक चिन्तनमे लीन बुझना जाइत छथि।
कविक ई कृति महत् काव्यक अंतर्गत परिगणित नहि कयल जा सकैछ। एहिमे महत् काव्यक सदृश विराट चिन्तन तँ छैक, मुदा केंद्रीय बिन्दुक अभावे जकाँ छैक। लक्षणानुसारी महत् काव्यक छाँह-छूँह एहि काव्यमे यत्र-तत्र आकर्षणक कारण बनल अछि यथा - एहि काव्यक आरम्भमे तँ नमस्क्रिया किंवा मङ्गलाचरणक उद्योग तँ नहि भेल अछि मुदा अन्तमे भरत वाक्यक अनुगुम्फनक प्रयास देखल जा सकैछ-
'सभसँ ऊपर देश अपन थिक भारत अप्पन सबहक प्राण , नहि अछि जगमे कोनो देश एहन होअए जे एकर समान।
देशक प्रगतिमे ककरोसँ कम नहि रहय मिथिलाक अवदान, संस्कृति समुन्नत, अर्थ उन्नत तकनीक बढ़य, बढ़य विज्ञान। '
अन्तमे एहि लोकशिक्षणपरक काव्य रचनाक हेतु श्री मिश्रक सम्वर्द्धना करैत छियनि आ हिनक स्वर्णलेखनीक अजस्र रसधारक प्रति आश्वस्ति अभिव्यक्त करैत हिनक स्वस्थ, समृद्ध ओ कर्मयोगीक व्यस्त सारस्वत जीवन-पद्धतिक याचना सकल ब्रह्मांडनायकसँ करैत छियनि ।
-योगानन्द झा, ग्राम -कबिलपुर (प.), वार्ड संख्या -46 (द. न. नि), पो. -लहेरियासराय, जि.-दरभंगा (बिहार), पिनकोड-846001; मो. 9334493330 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.५. प्रमोद झा 'गोकुल'- पिरीतो(लघु एकांकी नाटिका) प्रमोद झा 'गोकुल' पिरीतो(लघु एकांकी नाटिका)
दृश्य प्रथम
समय संध्याकालक। १४ १५ सालक छौंड़ा छौंड़ी सब हाथमे तिरंगा झंडा लेने जोर जोर सँ ' छात्र एकता जिंदाबाद! सीबीएसई मुर्दाबाद!! पेपर लीक बन्द करो! हम बच्चों को न्याय दो! न्याय दो!! इत्यादि नारा लगबैत मंच पर प्रवेश करैत अछि आ पुनः नारा लगबैत नेपथ्य में चल जाइत अछि। स्वर मुखरतर होइत मद्धिम भै जाइत छैक।रामबरन रिक्साक पैडिल पर पैडिल दैत घंटी टुन टूनबैत अपन झुग्गी बला घर पर अबैत अछि आ जोर जोर से रिक्साक घंटी टुनटुनब ' लगैत अछि।घंटीक आवाज सुनि घरवाली रानी आ बेटा मगन बाहर अबैत छैक। रिक्साके एक कातमे ठाढ़ कय मधूरक पैकेट बेटाक हाथमे दैत निर्देशात्मक स्वरमे बजैत अछि -
रामबरन-रौ मगना छेँ रौ! मगनाऽऽऽ !!! मगन --तोरे लग ते ठाढ़ छिअ हौ बाबू! देखबो नै करै छहक? रामबरन - बुरिवसन्त नैहतन रे! तेँ चोर जकाँ पाछाँमे किए खड़ा छेँ?आगाँ आ ने! मगन - हैया एलियह,कहह आब जे कहबाक छह! रामबरन -ले ई महावीजीक परसादी छियौ! दुनू भाइ बहीन बाँटि खोटिके खालिहेँ आ हमरो दुनू बेकतीके बचौते दीहेँ । रानी -(ऐँठैत)कथीक खुशीमे महावीरजीके लड़ू भोग लगौलकैये से? रामबरन -पिरितियाक परीच्छा नीक नहैंत खुशी खुशी समापत भ' गेलै तेँ कबूलने छलियै! रानी -बड दिब केलकै। महावीरजी कहुना नीक नहैंत पास करा देथून छौंड़ीके।दिन राति एकठाँड़ क' देने छलै छौंड़ी पढ़ैक खातिर। रामबरन -अच्छे ते ई कहौ जे प्रीतो छै कतऽ ? ओकरा नै देखै छियै! रानी- ( माथ पर हाथ रखैत चिंतामे) जैन नै की भ' गेलैए छनमे छौंड़ीके? अखने फोन पर किओ किछ कहलकैए ओकरा कि तखनसे मुरघोस लगौने बैठल छै। कतबो किछ पुछलिये ते कुछो बोलबे नै करै छै।तनी इहे जा के पुछौ ने मगना बाबू ! रामबरन -अच्छे चलौ देखै छियै। ( सब बिदा होइत अछि। आगाँ आगाँ रामबरन तकर पाछाँ रानी आ ओकर पाछाँ मगन। झुग्गीमे जयवाक लेल मंच पर चकभौर लगबैत मगन सँ कड़क आवाज मे रामवरन पूछैत छैक)- रामबरन - कहूँ तूँ ते कुछ्छो नै ने कहलहीहे रौ मगना!!! मगन - हम कुछ्छो नै कहलियैहे दिदियाके हौ बाबू! रामबरन - (उच्चस्वर मे) तहन की भेलैहे जे एना केने छै? मगन - से ओकरेसँ पूछि लहक! (किछ सोचि) साइत परीक्षामे कुछ्छो भेलैहे ! रामबरन -(अकचकैत) परिच्छामे की भेलै रौ? (पुनः अकानैत) हँ आइ मार्किटमे धियापुताक भाड़ी जुलूस देखने छलियै। सब जोर जोर से नारा लगबै छलै -सीबीएसई मुर्दाबाद! छात्र एकता जिन्दाबाद!! ( माथ पर वल दैत) आर किदन किदन ते कहै छलै •••••• हँ मोन पड़ल 'पेपर लिक लिक बन्न करो! चोरों को सजा दो!! आरो किदन किदन बोलै छलै। मगन - एकर मतलब दिदियाक पेपर केन्सिल भ' गेलै! रामबरन -शुभ शुभ बोल तहूँ ! मगन -तखन दिदियेसे पूछि लहक! रामबरन - चलै जल्दी ! बात तखने फरीछ हेतै। यवनिका पतन
दृश्य द्वितीय
स्थान -झुग्गीक भीतर। ढनमनैल वस्तु जात। खटुली पर बिछौन कयल। निचांमे पटिया बिछौल।ओकर कगनी पर दशवींक छात्रा प्रीतो मोन घोर घोर केने बैसलि भुइयाँ पर चीछ फाड़ि रहलि अछि आ मूड़ी डोला डोलाके ओकरा मेटाइयो रहल अछि।उजरल केश ओढ़नी अस्तव्यस्त आ आँखिमे भरल नोर ओकर मानसिक कथा सहजहिं व्यक्त कय रहल अछि।रामवरनक कोढ़ से देखि फाइट जाइत छैक।ओ दौड़िके बेटीके बेटीक मूहँ अपन दुनू हाथे उठाके पुछैत छैक -- रामबरन - की भोलौए तोरा जे एहेन भेख बनाके बैठल छेँ ?जत्ते दूरा तक पढ़बेँ से हम तोरा दुनू भाइ बहीनके पढ़ेबौ!! (कनैत अवरुद्ध गला सँ ) तोरा बापके बेटू किछ नै छौ। जनिते छेँ कोनाके गुजरबसेरा होइ छौ से। हँ तखन छौ मे छौ ई रिक्सा! देखै छिही ने ••••(इसारा करैत पुनः आत्मवल प्रदर्शन करैत) कोनो चिन्ता नै कर! कह की भेलौ? तोरा हमरे सप्पत! ( पिताक मार्मिक बात सुनि बेटी बापक गरदैन पकैरके कनैत बजैत अछि) प्रीतो -हँ •••• हम सबटा बात बुझहै छियै हौ बाबू! कोन धरानी तों हमरा आरूके पढ़बै लिखबै छह ! से ककरोसे छिपल नै छै। तखन••••(रुकि जाइत अछि) रामबरन - तखन की गै? प्रीतो --पेपर लीक भ' गेलाक कारणे परीक्षा केन्सिल भ' गेलै (कनैत अछि) रामबरन - आ धुर बताहि! ऐले तूँ चिन्ता बलौले करैछेँ ने! नोर पोछ आ बहादूर बन!फेनो पढ़ जमिके आ देखा दहीं दुनियाँके जे गरीवक बच्चामे कतेक दम होइ छै!(स्वगत आत्मविश्वासक प्रदर्शन पुनः प्रकाशमे) आँइ गै प्रीतो!एगो बात ते बुझबे नै केलियै। ई लिक लिक की होइ छै गै? प्रीतो --लिक लिक नै हौ बाबू! रामबरन - तहन की? प्रीतो - पेपर लीक भ' गेलैये! (बिहुंसैत) रामबरन - तैयो नै बुझहलियौ तोरा औरक ई अंरेजी बंरेजी! प्रीतो - (माथ ठोकैत) नै बुझलहक!प्राइभेट इसकूल बला सब अपन अपन खास बच्चा लग तीन घंटा पहिनहिं पहुँचा देलकै पेपर।बस्स, एक कान दू कान आ वाट्सएप पर खेला भ' गेलै। आब बुझलहक!! रामबरन - (चिंतित स्वर मे) बुझहलियै ते मुदा सरकार कुछ्छो नै कहलकै ओकरा आरूके? प्रीतो -हँ जाँच भ' रहल छै, जे पकरेतै से जहल जेतै। रामबरन - गरीवक बच्चा आरुक जीवनसे खेलवार केनिहारके इस्सर माफ नै करथीन।चल लैग जो बेटू फेनो अपन तैयारीमे।निसांस छोड़ैत बेटीक माथ पर हाथ फेरय लगैत अछि रामबरन। । यवनिका पतन।
दृश्य तृतीय
स्थान -झुग्गीक बाहर।एकटा फोल्डिंग खाट आ दूटा प्लास्टिकक स्टूल।फोल्डिं पर रामबरन चितंग भेल पड़ल अछि।प्रीतो आ मगन हाथ पयर दबा रहल छै। बीयैन डोलबैत रानीक प्रवेश। रानी -लौ पैहले चैह पीबिलौ,तहन जतबैत रहतै। रामरन - ऐ ले एकरा डाह किए होइ छै? सूतै कला हमहीँ एकरा जैँत पीच देबै! रानी - बेसी ठिठौली जुनि करौ! धिया पुता लगमे छैन से जेना बुझिते नै छथीन। रामबरन -( जीह कुचैत) लाबौ चैह ,आ परसादी सेहो सब खूटे बाँटि लौ! रानी --पहीले चैह ते पकड़ौ! लड़ू खाइये बेरमे लेतै (एतबा कहि भीतर जाय लगैत अछि कि रामबरन टोकार मारलकै) रामबरन -खेनाइ बनि गेलै की? रानी - हँ रामबरन -की सब बनौलकैहे? रानी - रोटी मौसरीक दालि आ अल्हुक चटनी! रामबरन - नेमो आ हरियरका मिरचाइ रखने छै ने! रानी -नेमो पियौज आ हरियरका मिरचाइ द'के तीसीक चटनी सेहो बनौने छियै! रामबरन - एह!!! तहनते आइ ई भोज क' देलकै! रानी - भोज एकरे कहै छै? रामबरन - ते आर की? गरिबहाक असली भोज यैह भेलै ने!(सब खिलखिलाके हँसय लगैत अछि आ रानी कोनो सोचमे डूबि गेल) रानी - (लगमे स्टूल पर बैसैत) एगो बात कहियै पिरीतो बाबू! ई बिगरतै नै ने!! -रामबरन - कहौने! एकरा हम कहिया बिगरलियैहे से? रानी- से ते नै तहन•••• रामबरन - की तहन? बोलौने निधोख! रानी -एगो कूलर ल' लैतै कौहना किस्तो पर। पंखा से काम नै चलै छै। रामबरन -हँ से ते लेबहि पड़तै। रानी - परीच्छा सेहो प्रीतोक कपार पर रहिये गेलैए तैपरसे। रामबरन -(दीर्घ श्वास छोड़ैत) से ते छैहे। पढ़तै फेनो जमिके की! जल्दीये कौहना डेट निकैल दौ सरकार प्रीतो - अही दश दिनुका भीतर मे निकलतै! रामबरन - कोनो चिंता नै! गदाधारी सबहक बेड़ा पार करथीन। यवनिका पतन दृश्य चतुर्थ
घरमे एक कात खटिया पर रामबरन त' दोसर कात निचामे पटिया पर रानी प्रीतो आ मगन पड़ल अछि।रानी बम्मा हाथ गाल पर टेकने दहिना हाथे बीयैन डोलाके गरमी भगा रहल अछि। रानी -जरलाहाके गर्मीयों ऐ बिरदा हद्दे कऽ देलकै।धैन कही मलिकिनीक देलहा मटकाके जे भैर छाक पानियों पिबै छी। रामबरन - साँचमे टंकीक पानिते जनु खौलके इनहोर बनल रहै छै। रानी - टंकीक बात करै छै। घरक पानि ते बड़ैकके आगि बनल रहै छै। रामबरन+आ पंखाके ने देखौ केहेन गरम हवा फेकै छै!जीनाइ मोश्किल भ' गेलैये गरीबक। रानी -चलौ कैलखिना कूलर आनियेँ लै छी! प्रीतो -चलै चल जे हेतै से हेतै आनियेँली दुनूटा! रामबरन - दुनूटाऽऽऽ!!! प्रीतो - हँ हौ! कूलरक संग एकटा छोटकी फ्रीज सेहो! रामबरन - आ, पाइ कोनाके चुकेबही एते रास? प्रीतो - तामे हमरो परीक्षाते भैये गेल रहतै । दू चैरगो ट्यूशन पकैर लेबै। सबटा भार तोरे पर नै रहतह।मिला जुलाके सधा देबै। रामबरन - आ तोहर पढ़ाइ लिखाइ? प्रीतो --जहन रिजल्ट निकलतै तहनने हौ! बीचमे देह धूनिके तोरा समहारि देबह आ बादमे देखल जेतै। रामबरन -देखल की जेतै? तोरा अपन पढ़ाइ पर खाली ध्यान देबाक छौ!आ मगनाके सेहो समहारैक छौ!देह धुनैले ते हम दुनू परानी छीहे! प्रीतो - हँ हौ! तोरा हमरा पर बिसबास नै होइ छह? रामबरन - तोरे दुनू भाइ बहीन पर ते आब हमर आसमान टिकल अछि। तूँ सभ कामयाब भेलेँ कि हमरा सब किछ भेट गेल। प्रीतो -- से हेतै हौ! मोन छोट नै करह ! सबटा दुख भगवान कि हमरे सबके देताह? रामबरन -देखही •••• मैलकक की किरपा होइ छै!(ऊपर निहारैत अछि) रानी - सुतबो करतै कि दुनू बाप बेटी अहिना फदर फदर करैत रहतै? देखौ मगना के फोंफ कटै छै। रामबरन - बेस ते सूतै जाइ जो जेना तेना। गरमीते असाधे छै। पटाक्षेप (यवनिका पतन) पात्र परिचय पुरुष पात्र 1 रामबरन (रिक्शा चालक अधेर वयसक) 2-मगन - आठवींक छात्र, रामवरनक बेटा स्त्री पात्र- रानी - करीब चालिसेक उमर, रामबरनक पत्नी प्रीतो - दशवींक छात्रा ,करीब पन्द्रहेक उमर नारा लगौनिहार छात्र छात्रा पाँच से दश । उम्र आठ से पंद्ह वर्षक। सबहक हाथमे तिरंगा झंडा।
-प्रमोद झा 'गोकुल', दीप,मधुवनी (बिहार), फोन -९८७१७७९८५१ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.६. लाल देव कामत- सूर्य पुत्र वा सुतपूत एक धनुर्धर : कनीन पुत कर्ण/ अरे त्तोरी के ! ...... धत् तोरी के? लाल देव कामत सूर्य पुत्र वा सुतपूत एक धनुर्धर : कनीन पुत कर्ण/ अरे त्तोरी के ! ...... धत् तोरी के? १ सूर्य पुत्र वा सुतपूत एक धनुर्धर : कनीन पुत कर्ण
मैथिली साहित्यमे चोटी'क उपन्यासकार श्री रविन्द्र नारायण मिश्रजी २१म् कृति 'सूर्य पुत्र ' केर महिमा मण्डित कयल नव पोथी ल' कऽ समक्ष अयलाह अछि। हिनक १४० पृष्ठक मैथिली भाषा मेँ नैका प्रकाशित उपन्यास एहि पोथीक दाम ४०० टाका छैक। सन् २०२५ मे एहि पोथीक प्रकाशकमे ग्रेटर नोएडा ( उ०प्र०) सँ श्रीमती आशा मिश्र जीके नाम छन्हि, जे भारतमे मुद्रीत भेल य। सद्यप्रकाशित ऐ आकर्षक रंगील कभर बाला पुस्तककेँ आई एस बी एन ९७८- ९३-३४४- २७७९- ० संख्याँ भेटल छैक। श्री मिश्रा जीके ३३ गोट मैथिली भाषा मेँ प्रकाशित पोथी अनेकों विधामे पाठक बीच आबि गेल छन्हि,जाहिमे ई एकटा हृदयांगम करय लायक पोथी छी- सूर्य पुत्र । जाहिमे बलशाली महाभारतके एक विशेष पात्र कर्णक' विषयमे अद्भुत लेखन कार्य भेल हेन। मिथिलाक मांटि - पानि पर रहि बहुत कम उपन्यासकार मैथिली भाषामे उपन्यास लिखलनि अछि। एतय हम हिंदी आ मैथिलीक अन्य विधामे अनेकों पोथीक सृजनहार श्री रविन्द्र नारायण मिश्र जी'क धार्मिक अध्ययनक आधार पर रचित महाभारत ग्रंथके एक अदम्य साहसी पात्र कर्णके मादे लिखल गेल " सूर्य पुत्र " नामक पोथीक चर्चा कय रहल छी। एहि पोथीक विशेषता ई छैक जे उपन्यासकार गद्यात्मक लेखनमे बहुतो ठाम यथा - पृष्ठ सँ० १९ सँ २२ धरि , पृष्ठ सँ० ५७ सँ ६० धरि, पृष्ठ ६८ आ ६९, पृष्ठ सँ० ८२ सँ ८६ , पृष्ठ सँ० १०१-१०३ धरि, पृष्ठ १०९ सँ ११२ धरि, पृष्ठ ०११८- १२२ धरि आओर श्रृद्धांजलि रूपेँ आखरिमे पृ ० सं ० १३४ - १३६ धरि काव्यात्मक शैली'क प्रयोग कयलनि अछि। तेँ पाठककेँ सम्पूर्ण पोथी कतोह - कतौह केर प्रकरण पुनः - पुनः दोहराएल जेकाँ संदर्भ अबैत बुझाएत। एहि पोथीके कथ्य ततेक ने गहींरपन सँ उल्लेख कयल गेल छैक ,जे लगैत छैक पोथीक एक - एक पन्नामे वर्णित तत्कालीन समाजक व्यवस्थाक संग - संग प्रत्यक्षदर्शी भेल छी। ओना कथावस्तुक गद्यांश आ पद्यांशक भाव - भंगिमा सँ भारतीय समाज पौराणिक समय सँ विज्ञ छथि। तैयो पोथी पढ़ैत आ मनन करैत काल नव तथ्य बुझाए य। एकबेर पढ़य लेल पोथी हाथ लगाएब तँ बिनु सम्पूर्ण पाठ पढ़ने रहि नै सकब। ई एतेक मनलगू होयबाक मूल कारण इयह रहल छै,जे प्रायः जन-मानस अपना सामाजिक आ संस्कृति रूपेँ ई विषय पंडित सँ प्रवचन सुनि आ टेलीविजन सिरियल देखि पूर्व सँ पात्रक परिचय ओ घटनाक्रम जानि गेल छथि। प्रवेशिका सँ निचा वर्गक विद्यार्थीगण अपन पाठ्य पुस्तकमे सेहो अध्यापक महोदय सँ प्रेरक प्रसंग बुझि अध्ययन कयने रहैत अछि। एहि बहुआयामी उपन्यास केँ पढ़ला सँ धार्मिक - अध्यात्मिक गूढ़ विषयमे अभिरुचि आरो बढ़ैत छैक। वृहद पोथी महाभारत आ आन ग्रन्थ मोटगर ओ भरिगर रहलाक कारणेँ समान्य हिन्दू वर्गक सदस्य खाशकय साकठ लोक पोथी'क पाठक नहिं बनय चाहैत छैक। अपवादमे किछु सेक्युलर लोक सेहो ऐ फेरमे नहिं परैत य ,तँ किछु सरभक्षी लोक खूब अध्ययन कय लोककेँ अपन प्रश्न सँ छकाबैत रहल हेन। किछु वैष्णो लोक सांगोपांग एहन ग्रन्थक अध्ययन नहिं कऽ अबूहवश कतवाह लागल रहैछ। तकर मुल कारण छैक , बहुत लोक साक्षर नहिं छैक; जाहिसँ स्वाध्याय वाबत फराके रहैत आयल छैक। मुदा पढ़ाकू - अध्ययनशील लोक पढ़ि लोकाचार आ लोक व्यवहारमे महाभारत ओ रामायण'क दृष्टांत बात - बात पर दैत ऐ महत्वपूर्ण विषयकेँ तरोताजा कयने रहैत छथि। प्रस्तुत 'सूर्य पुत्र ' प्रभावशाली उपन्यास एक धरोहर रूपेँ सहेजकेँ रखबाक चाही। जाहि कालजयी उपन्यासके मुख्य नायक कर्ण वीर पुरुष रूपेँ ख्यायति छथि,जे मरियोकेँ अमर छथि। हुनक जन्मक गाथा सँ महाभारत युद्धमे जीवनके अन्तिम धरिक व्यथा-कथा दुखान्त रहल अछि। मुदा हृदयपुत्र कर्णजी वचन केर पक्का रहलाह आ आश्वासन लेल बात सँ विमुख नहिं भेलाह। नि: संतान धोवी दम्पत्ति अधिरथ आ राधेय हुनक लालन-पालनेटा प्राणपन सँ नहिं करैत छैन, वरन अपन मित्र धृतराष्ट्र राजा ओतय विद्याभ्यास लेल कर्णक मोनमाफिक अस्त्र-शस्त्रक प्रशिक्षणार्थ जाए दियाबैत छैन। ओहिठाम राज्याश्रित गुरु द्रोणाचार्यक कथन सूत पुत्र हेबाक कारणेँ राजपुत्र संग कोना राखल जाय,एक वाधा नैतिक रूपेँ भेलैक। मुदा प्रदर्शनकारिगण बीच अर्जूनके श्रेष्ठ धनुर्धर होमय केँ ओ चुनौती देमय लेल जुमि जाईछ। कृपाचार्यक कथन जे अधिरत पुत्र राजकुमार नहिं छथि, तेँ ई ऐ महामुकाबला सँ अलग रहय! मुदा एहूठाम कुन्ती ओकरा कान्तेय कहै सँ लोक लज्जावश चुपे रहलीह। जन्मक मूल - गोत्र अनजान रहलाक कारणेँ कर्ण अपमानीत होईछ। मुदा हुनका तेजस्विता पर सहानुभूति राखि दूर्योधन जीक परम उदारता सँ कर्णकें तत्काले अंग देशक राजा घोषित कयल जाई छैन। अन्तर्राष्ट्रीय प्रदर्शनमे सब राजाके नजैरमे कर्ण कृपाचार्यक प्रश्नोत्तर बनि धनुष वाण प्रतियोगितामे अव्बल अबैत छथि। आचार्य द्रोणाचार्य जीके अनदेखी आ एकलव्य मादे अन्त:कथा केँ गमि अधरतियामे ब्रह्मास्त्र शिक्षा पाबै खातिर गुरु आश्रम सँ गुप्त रूपेँ निकलि जाईछ। निसीभाग रातिमे यात्रा निडर पूर्वक कर्णके सफल भेलनि आ ओ विश्व प्रसिद्ध विद्वान परशुराम जीके गुरुकुल पहुँचैत छथि। ओहिठाम असत्य'क सहारा लैत अपन शिषत्व परिचय दैत अपनाकें भृगुवंशी ब्राह्मण कहि गुरुवर कें प्रणाम निवेदीत कयल। ब्राह्मण कुल पर क्षत्रिय सम्राज्य विस्तार नहिं होय, ताहि लेल कोनू ब्राह्मणेंक योग्य संतानकेँ परशुराम जी अपन जीवन भरिक सब कला सिखेबाक लेल आह्वान कयने छलाह। हुनका सँ विद्या तँ कर्ण पाबि गेलाह,मुदा हाय रे! भाग्य ! अरण्यमे छल सँ एक ब्राह्मण गायके नवजात बछरू छोरि देने रहय। से धनुर्धर कर्ण विद्या अभ्यास करैत काल ओहि बच्छरूकेँ अनजानमे आघात पहुंचा देल! आब हत्या पापके प्रायश्चित करय गोपालक केँ खोज करैत पहुंचैत अहि। ओ छलि दोसर कियो नै इन्द्र रहथि,जिनक श्रापक कोपभाजन भेलाह। सूर्य भगवान केँ सुमरैत आश्रमक एक भाग पाथर पर उदास बैसल आत्मप्रिय शिष्य केँ देखि परशुराम जी रिझबय लागलनि आ पाकल फल अपना हाथे खुआबैत - उपदेश दैत अलसाए गेलाह। कर्णक पलथा पर मुड़ि राखि सुति रहलाह; ता विषकीट आबि कर्णकेँ जांघ तर पैसि भुर करैत शोणीतक फव्वारा बहा देलकैक। साहसी कर्ण गुरु कए निन नै टुटैन ताहिक सतत् धियान राखि कलमच स्थावर सन बनल रहला। जहन जगलाह गुरू तँ एहन दृश्य देखि चौंकैत तमशाइत कर्ण केँ जातीय फुसि लेल कठोर श्राप देलनि। विचरण करैत काल कर्ण केँ जरासंध सँ पछरा पड़ैत छैन। ओएयह जरासंध जिनका डरे श्रीकृष्ण जी पराए कें मथुरा चलि गेल छलाथि। से पुरस्कारमे कर्ण मालनि नामक नगर जरासंध सँ पबैत दू ठामक यशस्वी राजा बनलाह। महाभारत केर लड़ाईमे अपन युद्ध कौशल सँ सबकें चकित कयने छथि। दू दल कौरव आ पाण्डव बीच महायुध्दमे अपन मित्रताक निर्वाह दूर्योधन संग करयमे कतौह नहिं चुकलाह हेन। महाभारतमे एक स्वप्न कथामे इहो बात पाठक समक्ष आओत कृष्ण आ पाण्डबके माय कुन्ती बेराबेरी सम्पर्क कय महाबली कर्ण केँ हुनक जन्म रहस्य बुझाबैत जेष्ठ पाण्डव रुपेँ हुनका मान्यता दियेबाक प्रसंग छैक। तकर ओ प्रतिकार कयने रहथि। जाहिमे ओ एक दिन पाण्डव केर शिविरमे चलिए जाईछ आ दूनू पक्ष हुनका श्रेष्ठ मानि हस्तिनापुर 'क राजमुकुट धरि दैत राज्य बँटवारा रोकि लेल। मुदा बहुतों सेना ओ सेनापतिक वीरगति तथा विधवा ओ बच्चाक क्रन्दन सं कुरूक्षेत्रक परिवेश चिन्ता जनक रहलैक हेन। तेँ वनगमन केर दृश्य सँ कथाक पूर्णाहुति देखेबामे उपन्यासकार पारंगत भेलाह अछि। एहि पोथीमे रोचकताक संग श्री मिश्र जी बखान कयने छथि। ओ निष्णांत अनुभवी लेखक रहल छथि। तेँ कहलौं हिनक अद्वितीय पोथीक पाठकीय प्रतिक्रियामे वेसी किछु नहिं लिखैत, एतबे कहब जे कर्ण पर एक ब्राह्मण लेखक ब्राह्मणत्वक खिलाफ झांपल तथ्यकेँ उजागर करबाक साहस कयलाह अछि। किछु मुद्रण त्रुटि पाठककेँ अवश्य देखाएत। २ अरे त्तोरी के ! ...... धत् तोरी के ?
अधिकतर कलमजीवी रचनाकारमे कम्युनिस्ट समर्थक लेखक - साहित्यकार वामपंथी राजनीतिके पक्षधर रहल छथि। ओहि पथकें पकड़ि चलनिहार गद्य - पद्य विधाक' अनण्य सेवक श्रीमान विभुति आनन्द जी मैथिली भाषा 'क लेल अग्रसर रहैत अयलाह अछि। हिनक रचना सर्वहारा राजनीतिक - समाजीक विचारधारा केर तहत प्रवाहित काव्यधारामे एक शिर्षक ' अरे त्तोरी के ! ..... पर पाठक धियान देब तँ स्वत: पायब जकरा मुँह सँ बोल नहिं फुटैत छैक, तकर आवाज बनि मुखर भेल छथि - कविजी! से शोषणके विरुद्ध शोषक केँ हम कहैत छियैन -" धत् तोरी के?... हुनक सृजन एहि तरहेँ पाँति रचल गेल छन्हि :- तोहर हिस्सा खोआ - मिसरी, हमरा लागी मठ्ठा अरे तोरी के ! ......... हमरे बल पर सब फरफइसी, आ हमरे पर फट्ठा, अरे तोरी के!...... दिन दुपहरिया खटते रहली जिनगी की से बुझ न पइली तइयो कर तु ठठ्ठा ,अरे त्तोरी के!....... कल - करखाना हमे सजइली । सपना पुड़लइ गीतो गईली अब तु अँइठे गट्टा,अरे त्तोरी के!.......…. न सोचइ तू अब मनमानी , बन कर देबऊ दाना - पानी अबहो बूझ रे नट्ठा,अरे तोरी के!..... एकहतर वर्षीय मैथिली भाषाके अत्यंत प्रतिष्ठित आ बहुमुखी प्रतिभा बाला कवि-कथाकार श्री विभुति आनन्द जी एक समीक्षक सेहो छथि। हिनक पैतृक निवास :- रूद्रागंन ग्राम+ पो०- शिवनगर,जि०-मधुबनी आ वर्तमानमे बिहार क' राजधानी पटना स्थित एजी. कालोनी - शेखपुरामे रहैत छथि। ओतहि पटना विश्वविद्यालय सँ पीएचडी कयलनि।आर एन कालेज -पण्डौल'क मैथिली विभागाध्यक्ष आ प्राधानाचार्य पद पर सँ सेवा निवृत्त भेलाथि। पूर्वहि सँ साहित्य सृजनमे सतत् लागल रहैत चारि दर्जन सँ अधिक पोथीक लेखक भेलाह हेन। किछ पोथीक पाण्डुलिपी प्रकाशकक प्रतिक्षामे छैक ,तँ किछु प्रकाश्य कृति यन्त्रनालयमे छैन। श्री विभुति आनन्द सरकेँ सन् २००६ ई०मे कथा संग्रह 'काठ' लेल साहित्य अकादमी सँ पुरस्कृत कयल गेलनि। वैचारिक स्तर पर लोक चेतनाक पक्षधर रहि कतिपय वाम पक्षक कार्यकर्ता तँ रहले छथि,आ अपन परिवर्तनकामी सोचक कारणेँ बिहार छात्र आन्दोलनमे सेहो उपस्थिति धरि कयने रहथि। परिस्थितिवश जहलो गेल छथि। भाषा आन्दोलन सँ सेहो जुड़ल रहि अपन अभिनय कलाक अभिव्यक्ति लेल रंगमंच पर 'भंगिमा' केर माध्यमे समक्ष अयलाह । ओ दर्जनभरि पत्र - पत्रिका'क सम्पादन करैत साहित्य सेवामे अपन नांह बजेलनि हय। हिनक सम्पादित संग्रहमे १.-गीतनाद (संयुक्त), २.- विद्यापति पदावली आ ३.- विद्यापति पदावली (संयुक्त) छन्हि। मैथिली नव कविता संग्रहमे हिनक बहुचर्चित पोथी -: १.- डेग(सहयोगी), २.- उपक्रम, ३.- पुनर्नवा होईत ओ छौड़ी, ४.- नेहाई पर स्वप्न , ५.- अहाँ नहि, ओ दिवस चल गेल ,६.- उठा रहल घोघ तिमिर ,७.- झूमि रहल पाथर - मन , ८.- पीयर रंग पियरगर धरती, ९.- बाबा मोनक बस्ती सँ , १०.- शव्दके नहबैत, अन्य आरो नैका काव्य रचना छैन। प्रयोगधर्मी व्यक्तित्व , साहित्यक विविध विधामे गद्य लेखन कार्य मुख्य रुपेँ मनोयोग सँ कयने छथि। लाइट स्टोरी "इस्स" आ मनलगू कथाक पोथी -जिद्द ,जवर्दस्ती आ जिनगीमे श्री आनन्द जी अपना छात्राक वियाहमे भाग लेबाक आमन्त्रण फौन पर वार्तालाप सँ लालित्य पूर्वक प्रेम रस सँ सराबोर कथा लिखने छथि। गद्य विधामे फेर कहियो विमर्श करब। हिनक चर्चित पोथी -: १.-प्रवेश, २.-खापड़ि महक धान, ३.- काठ, ४.- एकटा उड़ल फुर्र ,५.- गोट सँ बाहर ,६.- कथा २१, ७.- गाम सुनगैत , ८. - परिजात- अपरिजात, ९.- बाबाक एकटा नाम रहनि, १०.- लय, ११.- अभिनय,१२.- रंगमंच पर नाटक , १३.- ललित,१४.- भाषा-टीका, १५.- स्मरणक संग, १६.- हरिमोहन झाक रचना क्रम ,१७.- अर्द्धविराम , १८.- फेसबुक डाइरी,१९.- लाॅक डाउन डाइरी, २०.- पहाड़ डाइरी आदि। दू दर्जन सँ फाजिल पाण्डुलिपि अद्यावधि अप्रकाशित कृर्ति छैन। श्री विभुति आनन्द जीक एक मैथिली भाषा मेँ प्रकाशित पोथी 'की चाही ,बोल न! ' कविता संग्रह हालहिमे पढ़बाक सौभाग्य भेटल। ई पोथी नवारम्भ प्रकाशन सँ वर्ष २०२१ मे बहराएल य। ऐहिमे ८० टा पृष्ठ छै ,जकर दाम २०० टाका छै। पोथीकें नीक पन्नामे मुद्रण काज आर .के. आफसेट प्रोसेस ,नवीन शाहदरा ,पुरना डिल्ली सँ छपल छै। ऐ पोथी पर अन्य पाठक सेहो पाठकीय प्रतिक्रिया देने होथि,से हमरा नहिं बूझल अछि। पोथीमे पूर्वी मिथिलाक अंगिका टोन आ पैछमि मिथिलाक वज्जिका टोन भेटैत अछि। दलित - पिछरल- अधिक पिछरल मैथिल इयह भाखा अपन बाणीमे बजैत य। मधुबनी जिलाक पछिमक भूभाग लगाएत सीतामढ़ी जिलाके मातृभाषा मैथिलीमे वज्जिका बोली अवश्य हुलकी देने छै। "भाषा के न बाँटियो" मैथिली पोथीक रचनाकार आचार्य रामानन्द मंडल जीक शव्द शैलीक निकट ऐ पोथीक शव्द विन्यास पबैत छी। नवारम्भ प्रकाशन केर कर्ता-धर्ता अजीत आजाद जी अपना भूमिका पृष्ठ पर श्री आनन्द जीक मादे लिखैत छथि -"भाषा - टोनक मास्टरपीस छथि आओर हिनक रचनाधर्मिता सूक्ष्मता आ स्थानिकता सँ भरल रहल छन्हि। ओ कवितामे रहस्यमयताक पक्षधर छथि।" पोथीक नामकरण "की चाही,बोल न! केर एक कविता 'चुनाव मे चुनाव हय' शिर्षक केर अंतरा पाँति छी । एहि केन्द्रीय कविताक चेतौनी भाव बिहार निर्वाचन सँ समादृत अछि। ई हिनक दूपनिया रचना कोरोना कालीन थीकैन। एक नागरिक ( मतदाता) कें कोन तरहेँ सब्जबाग देखाएल जाईछ आ निर्धन गरीब जनता कतेक अभावमे रोग- वियाधिक सामना करैत कैंचा लऽ बिकैत य से एक सजीब दृष्टांत देखाइत छै। एहि पोथीमे ७८ गोट कविताक सौन्दर्य उपरा - उपरी नीक गरहैनमे रचल गेल छै, जे पाठक वृन्धकेँ पढ़ैत आनन्द आओत। पहिल पाठमे ' चिल्का दे देलकै ' कविता'क भाव छै - तरुणी विधबाक पुर्नवियाह भेलासन्ता अपन सहेली जेकाँ ओहि विधबाकेँ सधबा बनला सँ कोरामे पतिक प्रतापे बच्चा आयल छै। पहिले खेप बियहुति नायिका अपन सासुर जाईछ आ ओहिठाम पतिक आकस्मिक निधन भेलापर समाजक लोक भुतसपा सँ स्वयं डसा देबाक कलंक थोपि दैत छैन। दुलहाक परिवारक लोकक कोपभाजन बनल कठिन जीवन पहाड़ सन कोना खेपत। से सती प्रथाक विरुद्ध ई काव्य धारा आधुनिकता सँ भरल समसामयिक य। कविवर महोदयके ऐ तरहक पाँति होय छनि। यथा -: विधबा छलियै सधबा भेलिऐ ,गे बहिना आब जिबै गऽ निमन जीवन ,गे बहिना भेलै शादी , ससुरा गेलिऐ ,अरे माई गे दुल्हाके भुँई सप्पा नै, इहे खेलकै हम तऽ धक,कुच्छो नै फुड़ले, गे बहिना......... सद्यप्रकाशित पोथीमे आखरी पाठ शिर्षक "जोगिरा" नामक काव्य प्रस्तुत कयने छथि,जे होरी- फगुआ केर सुअवसर पर एकटा अलगे संस्कृतिगत महौत रखैत होय । हास्य विनोदक पांति द्रष्टव्य -: ........जोगी जी सा रा रा रा ......... बाभण गोरी जँघिया पेन्हउ कैथिन साटउ टिकली जादव छउँरी जुलुम करई हऊ मारह धक्का हओ जी। जोगी जी जान बचा बऽ जोगी जी भागऽ - भागऽ ......... अपन सामाजिक चिंतन केँ श्री विभूती जी गद्यमे लिखैत आबि रहल छथि,मुदा जे विषय सब ओहिमे नहिं अँटि सकलनि तँ ; ताहिके पद्द द्वारा लेखन क्रम सतत् गतिशील बनौने रहलाह हेन। हिनक प्रकाशित पोथी झट दऽ शतक धरि पहुँचत जाहि सँ माय मैथिली'क अक्षय भंडार आरो भरय, से कामना! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.७. आचार्य रामानंद मंडल- वर्तमान चोर संत कबीर/ हमरे सभके/ कटहर मटन/ परोपकार!/ सुबुद्धि आचार्य रामानंद मंडल वर्तमान चोर संत कबीर/ हमरे सभके/ कटहर मटन/ परोपकार!/ सुबुद्धि
१. वर्तमान चोर संत कबीर
एकबेर संत कबीर बेटा संग चोरी करे गेल रहलन कारण कि साधु संत के सेवा करे के लेल हुनका घर मे अन्न न रहैय। वो सेंध खनलन।आ बेटा के कहलन कि एके बोरा अन्न के चुरा लाव। जौं दोसर बोरा लायब त हम हल्ला क के अन्न मालिक को बता देब।बेटा एक बोरा ले आयल आ दोसर बोरा लाबे सेंध मे प्रवेश करे लागल कि बाबू हल्ला थोड़े करतन।वो वोहिना कहैत हतन।परंच संतकबीर हल्ला क देलन कि घर मे चोर पैसल होव।जागा हो। अन्न मालिक जाग गेल देखलन कि संत कबीर हतन।सभ वृत्तांत जान के मालिक एक बोरा अन्न देके विदा क देलन। वर्तमान मे एगो चोर शिव मंदिर मे शिव लिंग पर के चांदी के सर्प चुराबे के लेल पैसल।चोर पहिले शिव लिंग के बार बार नमन कैलक आ चांदी के सर्प शिव लिंग से निकाल लेलक। पुनः नमन क के मंदिर से निकल गेल।वो शिव भक्त चोर रहय।आइयो संत कबीर जैसन संसार मे शिव भक्त चोर हय।
२. हमरे सभके
जाड़ा के भोर चौधरी बस मिथिला के सांस्कृतिक राजधानी दरभंगा तेजी से जा रहल हय। बस मे ऊनी चादर से देह झंपले केवल मुंह दिखाइत.. मिश्र जी बोललन-कि यौ झा जी।इ छोटका मे तेजका हमरे सभके न….. पिछला सीट पर बैठल महतो जी एगो वित्त रहित महाविद्यालय के प्राचार्य बोललन -कि यौ मिश्र जी —- बड़का सभ मे के बागड़ केकर…. हमरे सभ के न.. मिश्र जी बोललन - प्राचार्य महोदय अंहु एही बस मे..… मिश्र जी,झा जी आ महतो जी ठठ्ठा के हंस लैन.. हहा! हहा! हहा!
३. कटहर मटन
एक जमाना मे… सरकार! सरकार! जिरतिया बाजल -सरकार।अपना बीस बिघा खेत पर कौमनिस्ट लाल झंडा गाड़ देलक हय। महंत जी बजलन -अपन सिपाही कंहा हय।बुलाके जल्दी थाना पर भेजा। दरोगा जी के खबर दा। सिपाही साइकिल से थाना पहूंच के खबर देलन। दरोगा जी पांच पुलिस संग आ धमकल। जीप आवाज सुन के कौमनिस्ट सभ भाग गेल। आबि महंतजी मुस्लिम दरोगा जी के स्वागत मे जुट गेलन। दरोगा जी आ पांचों पुलिस भोजन कैलन। महंतजी पुछलैन -दरोगा जी भोजन केहन लागल। दरोगा जी बजलन -सभ चीज त ठीके रहल।परंच कटहर के तीमन त एकदम गोस्त लेखा लागल हय। महंतजी कुछ न बजलन।जौ पुलिस टीम चल गेल त मैनेजर के बोललन -आइ से मठ मे कटहर के तीमन न बनत।आ न कहियो बनल। परंच आइ होटल मे कटहर मटन मिलैत हय आ बैष्णव सभ कटहर के मटन खाइत हय। -आचार्य रामानंद मंडल सीतामढ़ी।
४. परोपकार!
एगो वित्त रहित महाविद्यालय के प्रबंधन समिति के अध्यक्ष राम लाल महतो आ सचिव प्रो चतुरानन झा रहलन। समिति के बैठक के तैयारी चल रहल हय। सचिव बोललन -बड़ा बाबू। डोनेशन वाला फाइल लाउ। बड़ा बाबू -जी। फाइल। सचिव बोललन -बताउ के सभ डोनेशन देले हतन। बड़ा बाबू मिश्र जी बोललन -प्रोफेसर मे दस गोरे। कर्मचारी में दस गोरे। सचिव -आरक्षित वाला सभ डोनेशन हमरा नाउ मे जाय दियौ। तबे अध्यक्ष जी पधारलैन। छौ गो सदस्यो आ गेलन। प्रबंध समिति के बैठक शुरू भेल। सचिव बोललन -अध्यक्ष जी।हम एगो बेइमानी कैली हय। आरक्षित प्रोफेसर आ कर्मचारी के डोनेशन हम अपना नाम से क ले ली हय। अंहा जनबे करैय छी कि हम गरीब छी। बिना डोनेशन के हम सचिव त न रह सकी छी।कि प्राचार्य जी!हम ठीक क रहल छी न! प्राचार्य अशरफ हसैन बोललन -जी। जी। सभ सदस्य बोले लगलन -हं।हं।हं। अध्यक्ष बोललन -सभ के तरफ से हं हय त हमरो तरफ से हं हय।इ कोनो गलत काज न हय। परोपकार मे त इ सभ चलबै करय छै। अध्यक्ष महोदय के अनुसार आइ के बैठक समाप्त कैल जाइ हय।
५. सुबुद्धि
एगो चाय के दुकान पर चाय सुरकैत …… सहर्ष मिथिला मे समाचार पढ़ैत.. कोशी कमला के बाढ से मिथिला तबाह। हजार लोग घर से बेघर।भूखल -पियासल लोग भटकैत। झा जी तमतमायैत बोललन- सरकार से कोनो तरह के सुविधा न मिल रहल हय। न बचाव।न राहत। अनर्थ हो रहल हय। नीतीश के भगवान सुबुद्धि देथुन। बेंच पर बैठल पासवान जी बोललन -कि भगवान के अपना सुबुद्धि न हय। ed09po -आचार्य रामानंद मंडल, सीतामढ़ी। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.८. बद्रीनाथ राय ’अमात्य’- श्राद्ध बद्रीनाथ राय ’अमात्य’ श्राद्ध
हम चित्ते चिन्तित भ' आकाश दिश तकैत निराश भ' सूतल छलहुँ।बोखार लागल छल, आँखिसँ दहो बहो नोर वेगसँ बहैत छल।पथ्य पाइनक कोनो ओरियान नञि।स्वस्थताक कामना केनिहार सेहो केओ नञि।परिवारक सब सदस्य हमर श्राद्धक भोजक भूखल छला।आँङनमे विमर्श करैत सब सदस्य बैसल छला।विमर्शक विषय छल जे श्राद्ध कोना होबक चाही?,श्राद्धक खर्चक इन्तजाम लेल गंभीर चिन्तन मंथन करैत सब चिन्तित छला।कर्ता के बनता?एहि निर्णायक बिन्दुपर विमर्श करैत सब केओ अँटकल छला।हम जाहि घरमे सूतल छलहुँ ताहिमे दूटा द्वार, एकटा पूरबसँ दोसर पश्चिमसँ जे द्वार आँङनमे प्रवेश करबाक लेल छल। रास्ता कातमे घर भेलाक कारणे रास्ताक सब गतिविधी स्पष्ट सुनना बुझना जाइत छल। हम सुनलहुँ जे हमर नाम पकड़िक' हमरा केओ बजा रहल छल। आवाज कोनो परिचितक छल।कोहुना उठबाक प्रयास केलहुँ मुदा प्रथम प्रयासमे नञि उठल भेल। फेर पुन: हिम्मत बान्हि दोसर प्रयासमे कोहुना उठि क बैसलहुँ। ताबत देखैत छी जे दरवाजा पर दूटा साइकिल ठार कएल अछि। आगन्तुक जे हमर मिडिल इसकूलक सहपाठी छला। पुन: हमर नाम पकड़ि जोरसँ आवाज देलनि।हम घुमिक' तकलहुँ, नजरिसँ नजरि मिलल।हमर मित्र सहटिक' लग आबि पुछलनि। की होइत छऽ?हमर मित्र हमर देह छुबैत बजला, हौ तोरा बहुत बेसी बोखार छऽ!दवाई दारू किछु लेलऽ की नञि?हमरा दिशसँ किछु जबाव नञि भेटलापर मित्रके बुझबामे किछु भाङठ नञि रहलनि।ओ बजला-हौ तोहर शरीर टुटि गेल छऽ,बहुत कमजोर भ गेल छऽ।मित्र पुछलनि-कतेक दिनसँ बोखार लगैत छऽ?मुदा हमरा जबाव देबाक किछु सामर्थ्य नञि बाँचल छल।मित्र पुन: बजला, हौ केकरो मार्फद कमसँ कम समादो पठेबाक चाही!रस्ता कातमे घर छऽ ,हमर ग्रामीणक एहि रस्तासँ बहुत अबरजात छै।मित्रक बेर बेर प्रश्न पूछब आऔर हमरा द्वारा जबाव देबाक नञि सामर्थ्य रहलाक कारणे हमर बहैत नोरक वेग आऔर बढ़ि गेल छल ।मित्र बजला कानऽ जुनि।हम सब बात बुझलियै, तोहर नोर हमरा सबटा कहि देलक।प्रेम न्याय परोपकार सदाचार लुप्त भेल जा रहल छै,मनुष्यमे स्वार्थपरता बहुत बेसी बढ़ि रहल छैक ,मनुष्यक विस्तारवादिता आऔर लालच के समक्ष प्रेम सदाचार लाचार आऔर सत्य सुस्त भ सूति रहल छैक जे देश समाज आऔर मानवताके लेल घातक छै, निष्ठा बिष्ठा सदृश उपहासित उपेक्षित भेल जा रहल छै।हमर सहपाठी मित्र अपन बेटा के हमर परिचय दैत कहलथिन बौआ राजेश इएह तोहर अस्सल पीत्ती छथुन।हम हिनके पैरक पुण्य प्रसादसँ मास्टर भेल छी।तोहर बाबा बोनिहार आऔर दा॓इ गोबर बिछनी छलखुन।गोबर बिछ चिपड़ी पाथि, ओकरे बेच कोहुना गुजर होइत छलै,बुछऽ जे गोबरे हमर जीवन छल। किताब किनबाक सामर्थ्य कहियो नञि भेल।हिनके किताबक भरोसे हम इसकूल अबैत छलहुँ।हमर अन्हार सनक जिनगी अही चरणक कृपासँ इजोड़ भेल अछि। ई चरण साधारण चरण नञि हमर चारूधाम थीक।तू गामक चौकपर जा आऔर हिनका लेल दोकानदारसँ बुझिक' बोखारक दवाई नेने आबऽ।बौआ राजेश साइकिलसँ चौक दिश बिदाह भेला। मित्र पुछलनि हौ भाइ कुर्ता साफ करबा लेबऽ से नञि!फटले छै ताँइ की!साफ रहक चाही।लाबऽ हम साफ कराक' नेने एबऽ।मित्र हमर घामसँ भीजल मैल महकैत कुर्ता के अपन झोड़ामे राखि लेलनि आऔर बजला --भाइ हम विवाहक निमित बजार करबाक लेल मधुबनी जा रहल छी,भतीजीक विवाह छऽ आऔर पीठेपर भतीजाक विवाह सेहो छऽ।दुन्नू दिन तोरा समधी मिलान करऽ पड़तऽ।काड सेहो छपा गेल छै,काडमे तोहर नाम क्रमश: वरिष्ठ समधी आऔर स्वागतकर्तामे छैक। राजेशके दोकानदार पुछलकनि जे किनक दवाई छैक?की उमर छै?राजेश हमर नाम दोकानदारके कहलकैन।हमर नाम सुनितहिं एकटा देहाती डाक्टर जे तखन दोकानेपर छला बजला -हुनका देखभाल केनिहारक अभाव छै।हम कतेको बेर हुनका लेल पूर्जा लिखने छी मुदा हुनका लेल दवाई किननाहर केओ नञि छैक।तखन राजेश बजला--श्रीमान एकबेर आऔर पूर्जा लिखल जाए,हम फीस दैत छी। डॉक्टर फटाफट पूर्जा लिखलनि,राजेश फीस देलखिन,दवाई लेला आऔर एक डिब्बा बिस्कुट ल' क' वापिस एला आऔर हमरा लऽग आबि कोन दवाई केना खेबाक छै से हमरा बुझबैत राजेश बजला --काका खाली पेट दवाई नञि खेबाक छै,बिस्कुट खाकऽ दवाई खाएब। हमर मित्र सहपाठी हमरा देखाक' दू सय रुपैया हमर बिछाबनक नीचाँ रखैत बजला --एकरा राखऽ ,हम बाजार जाइत छी।साझमे हम वापसीमे फेर भेंट करैत जेबऽ।तोरासँ हमरा बहुत विषयपर विमर्श करबाक अछि आऔर विशेष बात साझमे करब,एतबा कहि हमर मित्र बाजार प्रस्थान केलनि।हमर उदासीनता भरल मनमे अचानक आनंदक शीतल वसन्ती बसात बहए लागल, मित्रक स्नेह सिक्त भाव भरल आमंत्रण आऔर शीतल संभाषनसँ बोखारसँ जरैत देह सेहो शीतल होमए लागल।मित्रक देल विवाहक आमंत्रणसँ तत्काल त्रितापसँ मुक्ति भेटल।मरुस्थल भेल हमर मर्मस्थल थोड़ेक हरियर भेल आऔर कल्पनाक फलदार वृक्ष पुष्पित पल्लवित होमए लागल, मन हमर वृन्दावन बनि गेल। मन मयुर नृत्य करऽ लागल। समय कोन गतिमे कोना बीतल नञि बुझलियै।हम गीत गुनगुनाइत रहि।केओ बाजल बौआ राजेश !चमत्कार!चमत्कार!साक्षात हमर विधाता दहिन छथि। हम उनटिक' देखलौं हमर मित्र पुत्रक संङ प्रसन्न मुद्रामें मुसुकी दैत ठार छला आऔर बजला भाइ हम तोहर फटलाहा कुर्ता दर्जिये लग छोड़ि देलियै, बहुत फाटल छलैक, मित्र अपन झोरासँ जोड़ा भरि नव सियाओल कुर्ता आऔर जोड़ाभरि नव धोवा धोती हमरा समक्ष रखैत बजला हम त तोहर कुर्ता भजारक( नापक) बास्ते ल गेल छलियैक आब तुँ कोन दुखे ओहन फाटल कुर्ता पहिरबऽ।आब तोहर बेटा मास्टर पुतौह मास्टर बेटी जमाए मास्टर दुनू समधी सेहो मास्टर, समधीन सेहो एकटा पंचायत सेवक दोसर प्रखंड प्रमुख। सब दिन सब कष्ट की हमरे सब लेल रहतैक ?सब दिन विधाता वामे रहथिन?बिछाबन पर दवाई आऔर बिस्कुटक डिब्बा यथावत राखल देख राजेश बजला---काका दवाई ओहिना पड़लै अछि।मित्र सेहो दवाई के यथावत राखल देख अकचकाइत बजला---एकरे कहै छै चमत्कार जे हमरा लेल शुभ संकेत अछि।तुँ बिना दवाई खेने स्वस्थ भेलऽ आब हमर बहुत भार हल्लुक भेल।हमरा तोरे सनक एकटा मार्गदर्शन केनिहार चाही।कारण हम सोहल सुथनी छी मित्र पुन:प्रसन्न होइत बजला---हमर एकटा दरख्वास्त अछि से तुँ अपन मंजूरी दहक आइ कुमरम(कुंभ भरण)सेहो छैक। कुमरमक विद्धक सब समान झोरे मे छैक। हमर आग्रह जे तु एखने हमरा संङे प्रस्थान करितहक त बाते दोसरे रहितैक कारण तुँही एहि सब आयोजनके मुख्य विधिकर छहक।राजेशक दुनू मामा मामी मौसी सब आएल छैक। ओ सब तोरा भोरसँ खोज करै छथुन। तोरा गेलासँ वातावरण आनन्दमय भ जेतैक।तुँही हमर आनंद मूर्ति छहक , काल्हि एबऽ से एखने किएक नञि?आइ कुमरम छैक आऔर विद्धक सब समान बाजारसँ आएल झोरेमे छैक से सुनि हमरा आश्चर्य भेल आऔर छगुन्ता सेहो लागल, हम बात टारैत बजलहुँ--हम एखन चलबासँ असमर्थ छी, हम काल्हि भोरे पहुचब ।तुँ जतेक जलदी संभव हो विद्धक सब समानक साथ समयसँ पूर्व घर पहुँचबाक लेल साइकिल के रास्ता पकराबऽ'। मित्र हमर बातके गहियाक' पकरैत विरोधक स्वरमे बजला---हम गाड़ी भाड़ा करैत छी, काल्हि किएक?एखने किएक नञि?हम देखलहुँ मित्रक आँखि नोरसँ डबडबाएल।राजेश अपन पिताक स्वरक समर्थन करैत बजला--काका अपने एखने आऔर अवश्य चलियौक। बाबूजी दुखी छथि।हम देखलहुँ राजेशक आँखि सेहो डबडबाएल, जे हमरा लेल धर्म संकटक स्थिति छल, एहि धर्म संकटसँ तत्काल उबरब हमरा लेल कठिनाह बुझना गेल।हम सत्यमे झुठक चासनी मिलाक' बात के विश्वसनीय बनबैत मित्रके कहलियनि ---हमर अस्वस्थताक समाचार सुनि हमर सार हमरासँ भेंट करबाक लेल आबि रहल छथि,आइ हमर घर पर रहब बहुत जरूरी छैक ।हमर मित्र हारि थाकि मन मसोरि साइकिल पर चढ़ला, एक हाथसँ साइकिलक हेन्डिल धेने दोसर हाथसँ आँखिक नोर पोछैत आसते पैडिल दैत बेरि बेरि पाछू घुमि-घुमिक'हमरा दिश तकैत अपन गृहनगर लेल प्रस्थान केलनि। किछु दुर गेलापर राजेश साइकिल रोकि ठाढ़ भ आवाज दैत बजला---काका काल्हि सवेरे स्नान क नव वस्त्र पहिर तैयार रहब, हम दस बजे धरि गाड़ी पठा देब।मन जतबे आनन्दित छल मनमे ओतबे अन्हार, विवाहक चिन्तासँ तबाह छलहुँ।चिन्ता चितासँ तत्काल त्राण भेटब मुश्किल छल।अस्सल पित्तीक भूमिका निर्वहन करब कठिनाह बुझना गेल।राति भरि चिन्ता चिन्तनसँ संघर्ष करैत प्रात केलहुँ।तखने एकटा ग्रामीण मित्र आबि कहलनि----भाइ वृद्धा पेंशन आबि गेल छैक। दैनिक नित्य क्रियास निवृत्त भ' पेंशन आनक लेल बैंक गेलहुँ। कूल चारि सय रुपैया पेंशन भेटल छल। आब हमरा संङमे मित्रक देल टका मिलाक' छ सय रुपैया छल, आब थोड़ेक होस भेल। दरवाजापर एलहुँ,देखैत छी जे हमर प्रतिक्षामे राजेशक पठाओल चमचमाइत गाड़ी ठार छल। गाड़ी देखितहिं मन जे आनन्दित होमक चाही से हमरा ठक मुर्गी लागि गेल।हम सोचलहुँ हमर परिचय हमर मित्र अपना बेटी जमाएके अस्सल पित्तीक आऔर अस्सल ससुरक रुप मे देथिन। मुदा की हम अपन भूमिका अस्सल पित्तीक आऔर अस्सल ससुरक रुपमे राखि सकब?जमाए गोर लगता हम की आर्थिक आशिर्वाद देबनि?जेकरा हमर परिचय अस्सल पित्तीक रुपमे देल जेतैक ओकरा हम अस्सल पित्तीक की परिचय देबैक?समैध मिलनमे हम अपन अस्सल समैधक प्रतिष्ठा कोना बचा सकब? एहि सब प्रश्नक जबाव हमरा नञि भेटल। हमर दुनिया हमरा अन्हार सनक बुझना गेल। हम तत्काल जड़वत भ गेलहुँ। डरेबर हमरा देखितहिं गाड़ीक शीशा पोछैत बाजल---काका जलदी बैसियौ ,आब देरी नञि लगबियौ।हम मित्रक डरसँ डेराइत आऔर लजाइत डरेबर के प्रार्थनापूर्वक कहलियैक--बौआ हम शारीरीक दृष्टिकोणसँ पूर्णरूपेण स्वस्थ नञि ,अस्वस्थे छी।हम नञि जा सकब। पूर्ण स्वस्थ भेलापर शाझधरि अवश्य पहुँचब।गाड़ी आपस गेल आऔर हमर माथा हल्लुक भेल। पुन: चिन्ता भेल जे हमर अस्वस्थताक नाम सुनि जँ मित्र राजेशक संङ पुन: औता त हम की जबाव देबैक?हमर अस्वस्थताक बात आब सत्य त नञि छैक, हम त स्वस्थ छी। हम त आर्थिक दृष्टिकोणसँ अस्वस्थ छी।एहि असमंजसक स्थितिमे हमर दिन बीतल ,साझ भेल मुदा हमर असमंजस बनले रहल।चिन्तासँ हमर अंतरात्मा भुस्साक आगि जकाँ नहुँ नहुँ जरि रहल छल। अमावश्याक अनहरियामे हम चिन्तासँ आकण्ठ डूबल छलहुँ।सर्दियाएल साँझ पूर्णरूपेण अपन पैर पसारि लेने छल।भोजन करबाक इच्छा नञि छल आऔर परिवारिक उदासीनताक कारणे भोजन भेटबाक आशा सेहो नञि।एकटा नव कुटुम्ब एलाक कारणे आङनक वातावरण हास्यमय छलैक। कुटुम्बक व्यंजन विन्यासमय थारी सजाओल जा रहल छलैक।परिवारक हमहूँ एकटा सदस्य छी, परिवारक उत्थान उन्नतिमे हमरो किछु योगदान छैक से केकरो ध्यान नञि रहलैक। हमहूँ अपन फाटल चद्दरि ओढ़ि पानि पीबि शयनासन धेलहुँ।एक्कहि निने प्रात भेल।आइ हमरा किछु विशेष कार्यसँ बाजार जेबाक छल। दैनिक नित्य क्रियासँ निवृत्त भ स्नान केलहुँ। बाजार जेबाक लेल खाली पेट तीन कोस पैदल चलबासँ असमर्थ छलहुँ।राति भरिक भूखल छलहुँ ,स्नान केलाक वाद भूख तेज भेल। किछु जलपान करबाक इच्छा छल, मुदा केओ नञि टेरलक। हमरा बाजार जेबाक आवश्यक छल जेना कोहुना बाजार पैदले प्रस्थान केलहुँ।उठैत बैसैत बाजार पहुँचलहुँ।भूखल पेट पैदल चलबाक कारणे आऔर बोखारक कारणे कमजोर भेल शरीर घमा गेल छल। एकटा गाछक नीचा किछुकाल सुस्तेलाक बाद कपड़ा दोकान दिसक रास्ता धेलहुँ।हमर जे परिचित कपड़ा दोकानदार छला से दुरेसँ देखितहिं आवाज देलनि। दोकान पहुँचबसँ पहिले दोकानदार संङे प्रणाम पाती भेल। दोकानदार पूछला -----केमहर आएल छी?बहुत दिन वाद अपनेक दर्शन भेल। हमरासँ कोनो नाराजगी छै की?शरीर बहुत कमजोर भ गेल अछि ! दोकानदार अपन एकटा कार्य कर्ताके चाह बिस्कुट अनबाक आदेश देलखिन। चाह बिस्कुट खेलाक वाद मन आश्वस्त भेल। दोकानदार पुन: बजला--आब बाजु केमहर आऔर कोन काजसँ आएल छी?हम कहलियनि --एक खण्ड शाड़ी लेबाक अछि।दोकानदार बजला-- केहेन शाड़ी ?केकरा लेल ?हम कहलियनि---हमर एकटा मित्रक बेटाक विवाह छै, कनिञा लेल शाड़ी चाही।दोकानदार कहलनि--तहन नीक शाड़ी बनारसी होमक चाही।हम कहलियनि--मात्र हम छ सय अनने छी। दोकानदार बजला--अहाँ जे अनने छी से दियौक,नञि देबैक सेहो चलतै, खगता अछि त जे अनने छी सेहो आपस नेने जाउ ,नीक शाड़ी छैक ,एगारह सय दाम छैक, शाड़ी ल जाउ। शाड़ी लेलहुँ आऔर गामक रस्ता धेलहुँ।दोकानदार हमरा दिश इशारा करैत अपन एकटा कार्य कर्ताके आदेश दैत बजला जे हिनका लेने जाहुन गामक चौकपर उतारि दिहक।कार्यकर्ता दोकानक उधारी वसुलीक लेल जाइत छला ,हमरा अपन गाड़ीमे बैसौलनि आऔर हमरा अपन गामक चौकपर उतारि उधार वसुलीमे गेला।हम भूखल पेट मन्दे गतिसँ चलैत घर एलहुँ पता लागल जे हमर मित्र पिता पुत्र अपन भाग्यपर पश्चाताप करैत आएल छला आऔर बाजि गेलाह अछि जे हमरेपर पंचैती बैसौता आऔर हमहीं हुनक पंच रहबनि, मुदा राजेश हमर मित्रके बुझबैत बाजल छला जे जरुर कोनो विशेष कारणे बाजार गेल छथि,बेसी किछु चिन्ता करबाक प्रयोजन नञि छैक, काल्हि देखल जेतैक।साझ भेल किछु भोजन भेटल, भोजन केलहुँ भूखल पेट थाकल देह भोजन करिते निनसँ देह भसियाइत छल, बिछाबन करबाक होस नञि रहल अखड़े पटियापर निन आबि गेल।भोर भेलापर हमरा जगाओल गेल, आँखि खुजल देखलहुँ सामने हमर मित्र ठार छला। मित्र हँसैत बजला----- किएक भागल फिरै छहक?एखन आब तुँ पकड़ा गेल छ । काल्हि हम आएल छलहुँ केओ कहने छला जे ओ बाजार गेल छथि। बाजार जेबाक की प्रयोजन छलैक ?एखन हम तोरा नेनेहिं जाएब। हमरा घरके भीतरसँ मित्रके जबाव भेटलनि--ओ कतहु नञि जेता। हुनका भेंट करबाक लेल एकटा अपेक्षित आबि रहल छथि।हम मनमे मन्थन केलहुँ जे एहि उपेक्षा भरल उपेक्षित जीवनमे के अपेक्षित आबि सकैत छथि?हमर मित्रक फुलाएल मन सूखल फूल सन सुखा गेलनि आऔर बजला --भाइ हमरा आब की करबाक चाही?हम कहलियनि--हम निर्णय तोरे पर छोड़लहुँ , मुदा हमरा की करबाक चाही?मित्र बजला --हमर सब मनोरथ माटिमे मिलि गेल,बाँकी जे अछि सेहो माटिये मे मिलत तहिना बुझना जा रहल अछि।हम देखलहुँ मित्रक आँखिमे नोर छलनि।हुनक आँखि सावन भादब सन बरैस रहल छलनि।इ नोर हमरा लेल कोनो दृष्टिकोणसँ कल्याणकारी नञि छल आऔर दोषी हम छलहुँ ।मित्र आइ हमरा समक्ष दोसर बेर कानल छला।मित्रक नोर देखि हमरो कना गेल।हम कहलियनि---हम साझधरि जेना कोहुना अवश्य पहुँचबाक प्रयास करब। हमर आश्वासन सुनि हमर मित्र थोड़ेक आश्वस्त भेलापर हमरासँ निहोरा करैत बजला --भाइ तोहर देह देखबाक लेल सबहक मन लागल छैक। आइ राजेशक विवाह छैक, तोरा नञि एलापर हमर जीवन निरर्थक भ जाएत।मित्र अपन साइकिल धेलनि आऔर गृहनगरक लेल प्रस्थान केला।किछु कालक वाद हमर छोट सार एला जे शिक्षक छला अबितहिं पुछलनि---बोखार ठीक भेल?हम अहाँके लेबाक लेल आएल छी।हम एखन विभागीय कार्यसँ बहुत व्यस्त रहैत छी। एखन प्रभारी छी,प्रभारके भारसँ दबल छी।कतौ जेबाक एबाक लेल अवकाशक अभाव रहैत अछि।आकस्मिक अवकाशमे आएल छी।हम बेसी काल नञि थम्हिं सकैत छी।हम कहलियनि----हम एखन कत्तौ नञि जाएब। हमर सार अपन बहिनसँ भेंट करबाक लेल आँङन गेला, बहिनके अपन व्यस्ताक बात बुझबैत बजला -----हम पाहुनके लेबाक लेल आएल आएल छी।बहिन आग्रह केलखिन जे हमहूँ जाएब मुदा एखन नञि।सब शाड़ी फाटल अछि,कतौ एबाक जेबाक लेल एकोटा नीक शाड़ी नञि अछि।अन्तत: हमर सार निर्णय लेलनि जे तखन हम पाहुन के चारि दिनक वास्ते लेने जेबनि ।बहिन कहलथिन जे हुनक भाइ भातिज गार्जियन छथिन्ह, हमर किछु नञि चलैत अछि।केओ एखन गामपर नञि छैक,केकरासँ पूछल जेतैक?बिना हुनका सबके पूछने नञि ल जाहक। किछु कालक वाद हमर भातिज एला, हमर सार हमरा ल जेबाक आदेश हमर भातिजसँ लेलनि आऔर हमरा ल गेला।हम रास्तामे सार के कहलियनि जे हमरा साझधरि वापिस एबाक अछि,मुदा बहुत छटपटेलापर तीन दिन बाद हमर सार हमरा नाराज भेलापर फुर्सत देलनि।भोरे सात बजे विदाह भेल छलहुँ, बससँ आठ बजे अपन घर एलहुँ ।बहिनक लेल हमर सारक देल शाड़ी के हुनका बहिनके सुपूर्त करैत हम अपन गेरुआक(तकिया) नीचा नुकाक' राखल बनारसी शाड़ीके लेलहुँ आऔर यथावत मित्रसँ भेंट करबाक लेल तत्काल विदाह भेलहुँ।पहुँचलापर हमर मित्र जे दरवाजापर समैध संङे बतियाइत बैसल छला,हमरा देखितहिं अति प्रसन्न होइत बजला---राजेश दौड़ह!दौड़ह!तोहर काका एलखुन!राजेश आँङनसँ एला,हमरा देखितहिं ओहो खुबे प्रसन्न होइत प्रणाम केलनि।मित्रक दुनू समैध संङे प्रणाम पाती कुशल समाचार आऔर परिचय भेल। मित्र अपन दुनू समैधके हमर परिचय दैत बजला ---इएह छथि अहाँ लोकनीक अस्सल समैध आऔर राजेशक पीत्ती।हमरा आऔर दोसर कोनो भाइ बहिन नञि अछि।एकटा हमर छोट भाइ आऔर बहिन गरीबी के कारण दवाइके अभाबमे कालक गालमे समा गेल अछि ।हम देखलहुँ हमर मित्र कालक गालमे समाएल अपन भाइ बहिनके स्मरण करैत गंभीर छला ,हुनक आँखिमे नोर छलनि जेकरा ओ बेर बेर अपन गमछासँ पोछैत छला।राजेश आँङन गेला हमर एबाक सूचनासँ सबके सूचित केलनि।समैध आऔर लोकनियाक लेल जे जलपानक ओरियान होइत छल ओकरा तत्काल स्थगित काएल गेल। अंङनामे चहल-पहल बढ़ि गेल छल।सब केओ एकदोसरके जलदी करबाक आदेश आऔर परामर्श दैत छलथि।अंङनामे आनंदक बाढ़ि आबि गेल छल। सबहक व्यग्रता बेचैनी बढ़ल छल।किनको हमरा देखबाक लेल, केओ स्वागत करबाक लेल इच्छुक , किनको हास्य विनोद करबाक इच्छा,केओ किछु पूछबाक लेल , केओ रंग घोरि रंग देबाक लेल सब अपन अपन योजनाबद्ध तरीकासँ तैयार छलि।हड़बरीक कारण बर्तन बासन हाथसँ खसैत छल, सबहक दबल स्वरमे बजबाक ध्वनि दरवाजापरसँ साफ साफ सुनल जाइत छल।राजेश आबि बजला--काका आँङन चलियौक।हम राजेशक संङ अंङना गेलहुँ।मित्र पुरना घरारी छोरि दस कट्ठाक बीचमे पोखरिया पाटन सर्वतोभद्र पक्का पिटुआ मकान बनौने छलाह। मकानक पछबरिया ओसारापर बड़का गोल मेज जेकर चारूकात गोट आठ गद्दीदार आधुनिक कुर्सी लागल छल।आठो कुर्सीमे एकटा सब कुर्सीसँ अलग विशेषता युक्त विशेष कुर्सीपर राजेश हमरा बैसौलनि।राजेशक बड़की मामी जे लोक संहारक सिंङार केने आबि हमरा बगलमे बैसैत बजली---हमरा कतौ दोसर ठाम बैसबाक इच्छा छल मुदा के बैसाओत?हम कहलियनि से किएक?अहाँके जाहि ठाम जाहि कुर्सीपर बैसबाक इच्छा हो बैस सकैत छी,अपने कही त हम अपन कुर्सी छोड़ि दोसर कुर्सीपर बैसब।राजेशक छोटकी मामी हमरा समक्ष शर्बत रखैत बजली--हुनका अहाँक कोरामे बैसबाक इच्छा छनि।एतबा बाजि चङेरामे सजाक' गोट दसक प्लेटमे अलग अलग मिठाइ आऔर फल मेज पर हमरा समक्ष आनि रखली।हम कहलियनि-----एतेक राश मिठाइ आऔर फऽलक पहाड़ हमरा समक्ष लगेबाक की प्रयोजन?एहि पहाड़के के ढ़ाहत?मित्र आबि बजला---तोरा जे खेबाक छ से खा बाद बाँकी छोड़ि दहक, नोकसान नञि हेतैक सब हाथे हाथ प्रसाद बुझि खा लेतैक।राजेशक छोटकी मामी बजली---किएक छोड़ता?हिनका पाँच दिन पहिले एबाक चाही छलनि ,से आइ देह देखबक लेल एलाहा। हिनक हिंस्सा जे मिठाइ घर मे राखल छैक, खेलाक बादे एहिठामसँ ससरि सकैत छथि।नञि खेता त हम हिनका लेल काँरी रखने छी, काँरीसँ खुवेबनि। हम एकटा अलग प्लेट मंङा गोट चारि रसगुल्ला दु बर्फी निकालि खेलहुँ पानि पीबि हाथ धोलहुँ।हमर मित्र चाह अनबाक आदेश केलनि मुदा हमरा चाह पिबाक इच्छा नञि छल हमरा मनाही केलाक बादो एकटा सुशीला सुन्दरी शारीरीक चुस्ती चंचलता युक्त मुदा वैधव्यताक आगिमे जरैत चन्द्रमुखी चाह आनि हमरा समक्ष रखैत स्नेहमयी वाणीमे विनय आऔर विनोदपूर्वक हमरे समक्ष एकटा खाली कुर्सीपर बैसैत बजली--हम अपने हाथसँ अपने सन नोनगर चाह बनेलहुँ अछि, हम चन्द्रमुखीके देखितहिं निर्दय राहु बनि गेलहुँ।ओ शरीरसँ कृषकाय छलि मुदा शरीरसँ सट्टल वस्त्रमे पूर्णरूपेण युवती लगैत छलि।हुनक वस्त्रक रंङ आऔर पहिरबाक ढ़ंङसँ विरह विदग्धा विधवा वनिता बुझना जाइत छलि।हमर मित्र बजला ----भाइ चाह पीब लहक, हिनका नाराज नञि करहक।एहि चाहमे प्रेम समर्पण सबटा छैक। आइ इ प्रथम दिन प्रसन्न छथि। विवाहक चारि साल बादे इ विधवा भ गेली।विधवा भेलाक वादे नोकरी आऔर पुत्र रत्नक प्राप्ति भेल छलनि।अपन सासुर परिवारक जेठ पुतौह आऔर राजेशक छोटकी मौसी छथि।अपने गामक प्राथमिक विद्यालयमे शिक्षिका छथि।भरल पुरल परिवारक छैक। आइ हिनके बदौलत हिनक एकटा छोटका दियोर दरोगा छनि।दग्ध भेल दाम्पत्य जीवनके कारण इ रंगीन दुनिया हिनका लेल बेरंङ छैक। राधिका राजेशक मौसी जे एकटा साधिका रहितहुँ अपन परिवारक अभिभाविकाके रुपमे पालन करैत छलि, अपन आँखिक नोर पोछैत बजली--राजेशक मौसा सूर्य चन्द्रमा अग्णिके साक्षी राखि आजीवन भर्ता रुपमे संङ रहबाक वचन देने छला मुदा आइ ओ हमरा छोड़ि दोसर नायिकाक संङ महासेज पर महा निनमे सूतल छथि,हमहूँ पंच तत्वके साक्षी राखि सब सुखसँ वंचित रहि कोहुना जिबैत छी। इ पुरुष सत्तात्मक समाज हमरा संङे की न्याय केलक?जखन इ पुरुष समाज बुढ़मे दशरथ बनता तखन एकटा विधवा वनिता यौवनावस्थामे द्रौपदी किएक नञि?जखन एकटा नारीके विधवा भेलापर सांसारिक सब सुखसँ वंचित राखल जाइत अछि, तखन पुरुष विधुर भेलापर की त्याग करै छथि?इ एकटा प्रपंची लोकक बनाओल विधान थीक। चन्द्रमुखी राधिका हमरा समक्ष प्रश्नक पहाड़ लगबैत बजैत बजैत चन्द्रमखीसँ ज्वालामुखी भ गेलि छलि।हम हुनक चान सनक चेहराक चिन्तन करैत कहलियनि--इ रूढ़िवादी समाजक बनाओल विधान छियैक, एकरा के टारत?तखन संसोधन करबाक बहुत बेसी आवश्यक छै। संसोधनक नाम सुनि राधिका रमणी रिसियाइत बजली---संसोधन किएक?एहि विषमतामूलक विधानके पूर्णरूपेण बदलब जरुरी छैक। हमर वैधव्यताक आऔर दयनीय दशाक इ चेतना शून्य समाज एखन धरि की समीक्षा केलक?समाजके किछु परिवर्तनवादी क्रान्तिकारी विचार हमरा सनक विधवाक लेल अवश्य गढ़बाक चाही अन्यथा वैधव्यताक आगिमे जरैत देहक संङ इ पुरुष प्रधान समाज सेहो जरिक' भष्मीभूत भ जाएत।राधिका आइ अखाड़ामे उतरल छलि आऔर हमरा ओ अपन प्रतिद्वन्द्वी पहलवान बुझैत छलि।हम हारि मानि लेने छलहुँ मुदा ओ हमरा छोड़क लेल तैयार नञि छलि।राधिकाक एक तरफा वाकयुद्ध विराम लेबाक नाम नञि लैत छल।हमर मन आब उबि गेल छल।हम ओहिठामसँ उठबाक विचार करैत छलहुँ,ताबत एकटा नवयौवना नवविवाहिता आबि सबके प्रणाम करैत हमरो प्रणाम केलनि जे मिथिलाक संस्कारसँ युक्त नञि बेटी नञि पुतौह सनक बुझना जाइत छलि मुदा शाड़ीमे शिक्षित सुशीला आऔर सौम्य स्वभावक लगैत छलि।हमर मित्र बजला--कनिञा इएह छथि अहाँक अस्सल ससुर।हम कनिञाके आशीर्वाद दैत हम अपन लाओल बनारसी देलियनि।हमर मित्र अपन पुतौहके बुझबैत बजला--- कनिञा इ शाड़ी साधारण शाड़ी नञि,प्रसाद बुझियौक ,एहि शाड़ीक परसादे जीवनमे कहियो कोनो अवसाद नञि आओत ।शाड़ीके अवसाद निवारक बुझियौ। कनिञा हमर देल शाड़ीके आस्था श्रद्धासँ आनन्दित होइत स्नेहसँ हृदय आऔर माथसँ स्पर्श करैत बजली--हम अपन अस्सल साउसक दर्शन आऔर आशीर्वाद चाहैत छी।हम कहलियनि--समयानुकूल सेहो हेतैक। कनिञा प्रसन्न होइत अपन कोहबर गेली। किछु कालक बाद मित्रक बेटी जमाए आबि प्रणाम केलनि।हम आर्थिक आशिर्वाद देबाक लेल जेबीमे हाथ देलहुँ की जमाए पहिले बाजि उठला--जेबीमे हाथ देबाक प्रयोजन नञि छैक,हम शिक्षक छी हमरा जे भेटक चाही छल से भेटल,संभव हो त हमरा सेवा करबाक मौका भेटक चाही।हम दिनक पूर्वाहनमें गेल छलहुँ बातचीतक संदर्भमें अपराहन भ गेल छल। हम मित्रके कहलियनी जे हम आब चलब। मित्र अकचकाइत बजला--?किएक कोन जरुरी काज छैक? हमर पंचायत केलाक बादे एहिठामसँ तुँ ससरि सकैत छऽ। पंचायतो एक सप्ताह बादे हेतैक। हम कहलियनि--कोन पंचैती?केकरापर?की दोष आऔर के छथि मान्य पंच?हमर मित्र हँसैत बजला ----पंचैती तोरे पर बैसतै आऔर हमर मान्य पंच सेहो तुँही रहबहक।तोरा गेलापर हमर पंचैती के करत? हम मित्रके कहलियनि--मुदा हमर दोष की?मित्र एहिवेर नाराज होइत बजला--विवाहमे तोरा नञि एलाक कारणे हम असगर तबाह भ' गेलहुँ।हमर इच्छा छल जे सब दायित्व तोरापर थोइप सबठाम सब काज लेल तोरे अगुआ बनाबी आऔर हम अपने गौण रही,मुदा से नञि भेल। राजेशक विवाहमे तोरे मंचपर बैसाबी ।हम बरियाती संङ बैसी। कोनो बात या विचार हमरासँ नञि,तोरासँ पूछल जेबाक चाही।मित्रताक एकटा नव मजगूत इतिहास रचबाक इच्छा हमर नञि पूर्ण भेल।मित्रके हम माफी मंङैत निहोरापूर्वक कहलियनि--सब बात ठीक, हम दोषी छी। हमरा लेल की दण्ड छैक से बाजऽ।मित्र एहिवेर फेर हँसैत बजला----से निर्णय लेबाक क्षमता हमरा नञि अछि,इ निर्णय राजेशक मामी मौसीक अधिकार क्षेत्र मे अबैत छैक।किछु कालक बाद राजेशक मृगनयनी मामी आबि हमरा बातमे ओझरौलनि आऔर पिकबयनी मौसी एक बाल्टी रंङ घोरि माथपर ढ़ारि देलनि। हमर मित्र प्रशन्न होइत बजला--बस!बस!हमर पंचैती भ' गेल, हमरा न्याय भेटल। मुदा आब जलपान समय छैक। जलपान आएल, फेर नाना प्रकारक फल आऔर मधुरक पहाड़ हमरा समक्ष लगाओल गेल। मित्र हमर भीजल वस्त्रके बदलि लेबाक आग्रह करैत राजेशक मामीके नव वस्त्र जे हमरा लेल राजेशक विवाहमे विदाइ भेटल छलै अनबाक आदेश केलनि।राजेशक मामी विदाइमे भेटल सब वस्त्र हमरा समक्ष रखैत बजली-----धोती पहिरक लुरि अछि की नञि,कही त 'हम पहिरा दी।हम मर्दके शाड़ी पहिराक' नचेबाक लुरि रखैत छी।वस्त्र बदललाक बाद हम अपन विशेष आसनपर बैसलहुँ ।मित्र हरियर होइत बजला---आब तुँ लगैत छ' राजेशक अस्सल पीत्ती सनक।पूरा दिन हास्य विनोदमे कोना बीतल से नञि बुझलियैक। जलपान केलाक बाद मित्र अपन घर सब घुमौलनि राजेशक विवाहमे भेटल समान फल मधुरक भाड़ देखबैत बरियाती लेल बनल रसगुल्ला गुलाब जामुन जे बरियातीक भोजनोपरान्त उबरल छलै से देखैत बजला--पचासक किलो रसगुल्ला आऔर ओतबे गुलाब जामुन बाँचल छैक मुदा नोकसान नञि हेतैक, एखन खूब नमहर गोट पच्चीस आदमीक आश्रम छैक। मित्रक सब घर विभिन्न संसाधनसँ भरल देखि हमरो खूबे प्रसन्नता भेल। मित्र बजला ----राजेश आऔर कनिञा भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षा देलनि अछि,जँ चयनित भेली त' सोनामे सुगंध अन्यथा शिक्षक शिक्षिका त' छथिये। हम अभावमे अवश्य रहलौं मुदा अभावक कारण स्वभाव स्वाभिमान संस्कार कहियो नञि नष्ट केलहुँ।आब तोहर आशिर्वादक प्रसादे सबटा भेल ,कोनो किछुओ के कमी नञि रहलैक।कनिञाक वौद्धिक कुशाग्रतासँ बुझना जाइछ जे ओ अवश्य चयनित हेती मुदा राजेश पर नञि आशा अछि,आब देखक चाही किनकर भविष्य कतेक उज्जवल?मित्र हमर कर्मठ कर्मयोगी छला, विद्यालय जेबासँ पूर्व आऔर विद्यालयसँ एलाक बाद तरकारी खेतीमे खूब परिश्रम करैत छला जे हुनक समृद्धिक कारण छलनि मुदा हुनका बुझना जाइत छलनि जे इ सबटा आशिर्वादक प्रसादे होइत अछि। ओ अपन सब उपलब्धिक श्रेय हमरा आऔर हमर देल आशिर्वादके दैत छला।बीचहिमे राजेशक बड़की मौसी जे अनियंत्रित यौवन भारसँ दबल काम पिड़िता कामिनी रुप राशि सौन्दर्यसँ रम्भा सन छलि पाछूसँ अपन नरम हाथसँ हमर हाथक अंङुरी पकड़ि बजली---चाह बनि गेल छैक, आब चाहपर चर्चा हेतैक ।राजेशक मामी हम मौसी पहिलेसँ आबि बैसल छलि हम कहलियनि--चर्चाक विषय की राखल गेल अछि?राजेशक मामी हमर अंङुरी पकड़ि घिचने यथास्थान बैसबैत बजली----आजूक चर्चाक विषय अछि दगाबाज मर्द!हम कहलियनि---दगाबाज मर्दे किएक?नारी किएक नञि?नारियोक दगाबाजीक बहुत राश प्रमाण पाओल गेल अछि। नारीक दगाबाजीक नाम सुनितहिं राजेशक विधवा मौसी राधिका चण्डी बनि बजली---हम की दगाबाजी केलहुँ?हमरा किएक वैधव्यताक आगिमे पुरुष प्रधान समाज द्वारा जिबिते जराओल जा रहल अछि?हमर श्रीहीन देह कोन काजक ?हमहूँ कहियौ कोनो घरके लक्ष्मी छलहुँ।हम हुनक उग्र रुप देखि डेराइत कहलियनि---अहाँ एखनो लक्ष्मी छी मुदा विधवाक वेदनाके बुझैत पंडितक पुरान आऔर वेदक विधानके विशेष परिस्थितिमे गंभीर विमर्श करैत बदलब बहुत जरुरी छैक।फेर ओ खिसियाइत बजली ---इ भेल एकटा विधवाके नैतिक शोसण करबाक लेल तुष्टिकरण नीति।एखन धरि पुरुष प्रधान समाज विधवा देहक वैधव्यताक आगिमे मे अपन हाथ सुखबैत आएल अछि आऔर कलंकिनी मात्र नारीके कहल गेल अछि।हमर मित्र अपन सारि राधिकाके खिसियाएल सनक बजैत देखि बजला--मुदा सबटा दोष हमर भाइ पर थोपब उचित नञि,बहुत दिनक बाद आइ इहो कने प्रसन्न छथि। इहो संतानहीनताक आगि मे जरैत छथि।हिनको दुख ध्यातव्य आऔर श्रव्य छैक।संयुक्त परिवार मे चारि भाइक भैयारीमे भतीजा भतीजीक बीच गंजन सहैत कोहुना जिबैत छथि। एतबा सुनितहिं राजेशक विधवा मौसी राधिका पश्चाताप करैत डेराइत हमर पैर छुबि प्रणाम करैत हमरासँ माफी मंङैत (क्षमायाचना करैत)बजली ---हमरा आक्रोशमे बहुत बजा गेल।हम कहलियनि--अपनेक आक्रोश यथार्थ छल।हमर मित्र बजला ----सब केओ आगिमे जरैत अछि,केओ वैधव्यताक आगिमे, केओ संतानहीनताक आगिमे,केओ अनंत आकांक्षाक आगिमे,हमहूँ जरैत छी आगिमे ,हमरो जीवन कोनो जीवन थीक एहिसँ कुक्कुड़ बानरे नीक ।मित्रक व्यथा हमरा बुझल छल जेकर चर्चा करैत ओ हमरा समक्ष बेर बेर पश्चाताप करैत कनैत बजैत छला --भाइ हम जेकर संतान छी जे हमरा अपन गरीबीमे अपन पेट काटि पोसलक पढ़ौलक तेकरा हम की संतान सुख देलियैक?ओ लोकनि हमर विवाहक बादे साल भरिक भीतर किएक महा प्रस्थान केलनि?हमर बेटा बेटीके अपन दाय बाबाके देखबाक सपना कहिया पूर्ण हेतैक?हमर मित्रक मुखमंडल पर गंभीर भाव पसरल छलनि। हम हुनक गंभीरता भंग करैत कहलियनि--हे हम आब चलब कहि उठिक 'ठार भेलहुँ। एतबा कहितहिं हमर दुनू बाँहि दुनू दिशसँ राजेशक मौसी आऔर हमर मित्र पकड़िक ' बैसा देलनि।राजेशक विधवा मौसी कटाक्षक व्यंगवाण चलबैत अपन कोमल कंठसँ बजली--हमरा दासी रुपमे अपनेक चरणक सेवा करबाक लेल शरण भेटत?हुनक एहि कथनमे व्यंग कम वेदना बेसी छलनि।हम संतानहीनताक आगिमे जरैत संयुक्त परिवारमे भाइ भतीजा भतीजीक बीच गंजन सहैत जिबैत छी से सुनलाक बाद राजेशक विधवा मौसीके हमरा प्रति आकर्षण आस्था श्रद्धा बढ़ि गेल छलनि।हमर मित्र हमरा बलजोरी बैसबैत राजेशके बजौलनि।राजेश एला, हमर मित्र हुनका कानमे किछु कहलकनि राजेश अपन मायके सूचित केलनि।राजेशक मामा लोकनि जे भिनसरसँ हमर मित्रक समैधके स्वागतमे लागल छला सेहो एला। सब केओ हमरा घेरने ठार छला ।राजेश के विश्वास छलनि जे हमर काका हमर बात नञि कटता। राजेशो आबि बजला---काका आइ नञि जाउ।हम कहलियनि--बौआ राजेश हम संतानहीन संयुक्त परिवारमें भाइ भातिज पर आश्रित छी। हम आब अबैत रहब मुदा एखन जाएब।राजेशक मामा- मामी,मौसा-मौसीक मन बहुत मलीन छलनि।मित्र दुखी होइत बजला---तुँ वसन्त लेने आएल छलऽ' पतझड़ देने जाइत छ'।राजेशक माय संकोचसँ हमरा समक्ष नञि एली, ओ बेस नमहर मोटा बान्हि हमरा लेल तैयार केने छलि।साइकिलसँ मोटा पहुँचेबाक भार राजेशक मामाके भेटलनि।मित्र राजेशक कनिञा आऔर राजेशक हाथ हमरा पकड़बैत बजला ------इ दुन्नू हाथ तोहर, आइके बाद तुँ अपनाके संतानहीन नञि बुझहक।राजेशोके कहल गेलनि--बौआ हमर देल वचनके पालन दायित्व आऔर निष्ठापूर्वक हिनक प्रतिष्ठाक ध्यान रखैत होमक चाही।एहि देहपर फाटल बल्कल वस्त्र आऔर आँखिमे नोर देखब हमरा बर्दास्त नञि अछि ।कनिञा आऔर राजेश अपन दायित्वक स्वीकारोक्ति दैत बजला--- दायित्व निर्वहन करब कोनो बहुत बेसी कठिनाह नञि छैक, हम भीषण प्रतिज्ञापूर्वक दृढ़तासँ प्राथमिकतापूर्वक दायित्वक निर्वहन करब,अपनेक देल वचन निरर्थक नञि सत्य सार्थक रहत।मित्र राजेशक कथनसँ प्रसन्न भेला,हमरा धोती कुर्ता गंजी गमछा चद्दरि विदाइ देलनि।बीच्चहिमे राजेशक विधवा मौसी बाजि उठली---राजेशक हाथ पकड़ल गेल मुदा हमर हाथ के पकड़त?हम किएक उपेक्षित?ओ बजिते रहली मुदा हम चुप्पे रहलहुँ, कारण हुनक प्रश्नक अनुकूल हमर ज्ञानक कटोरीमे सक्षम नञि छल ओ फेर निवेदनपूर्वक एकटा शाल एक जोड़ धोती आऔर किछु टाका हमरा समक्ष रखैत बजली---हमर श्रद्धा सुमन छोटछीन प्रेमोपहार स्वीकार करियौक।हमर मित्र राधिकाक देल उपहार आऔर अपन देल विदाइके एकटा झोरामे दैत बजला----एकबेर चाह चलतै की?हम कहलियनि आब किछु नञि कहैत उठिक' ठार भेलहुँ।राजेशक कनिञा आबि एक जोर शाड़ी दैत बजली---इ हमर अस्सल साउसक वास्ते।मित्र शाड़ीके झौरामे राखि देलनि।हम ओसारसँ उतरि अंङनासँ बहरेबाक लेल डेग नमहर केलहुँ।पाछुसँ राजेशक माय थपरी पिटैत हमर मित्र के एक जोर शाड़ी देखबैत किछु इशारा केलखिन।मित्र ओहो शाड़ी के झोरामे कसलनि।मित्र विदाह केलनि मुदा बेटी विदाहक दृश्य छल। सब केओ दुखी छलथि।हम डेग नमहर करैत मित्रक कृतज्ञताक भारसँ दबल दलान पर एलहुँ।मित्रक दुन्नू समैध संङे प्रणाम पाती भेल। मित्र हमरा झोरा दैत बजला--हमरा बिसरिहक नञि।हमर मन गाम एबाक लेल औगताएल छल बिना किछु बजने प्रस्थान केलहुँ।झोरा भारी लागि रहल छल।बाटमे पियासल बटोही सन थाकिक'बैसि गेलहुँ आऔर बैसितहिं चिन्तनमे डूबि गेलहुँ।हम मित्रक कृतज्ञतासँ लज्जित छलहुँ।हुनक कृतज्ञताक अनुरूप हमरा द्वारा कएल उपकार बहुत छोट छल।एकटा छोटछीन उपकारक कृतज्ञताक स्वरूपे एतेक पैघ प्रतिफल भेटब अकल्पनीय छल जे हमरा प्रत्यक्ष रुपे भेटल छल।हमर मित्रमे देवत्व छलनि,ओ हमरा देवता बुझना जाइत छला ओ पूज्य वन्दनीय छला आऔर हम अपनाके अधम बुझैत छलहुँ। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.९. कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा- विधाते बाम कुमार मनोज कश्यप लघुकथा- विधाते बाम - " न्यायालय भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 के धरा 491 के अंतर्गत जमानतदार के अंतिम अवसर दैत आदेश दैत अछि जे भगोड़ा अपराधी के मृत्यु के साक्ष्य मे उचित दस्ताबेज अगिला तारीख पर प्रस्तुत करय, अन्यथा ई अदालत बॉन्ड मे उल्लिखित जुर्माना राशि ओकरा सs वसूल करय के आदेश पारित करबा लेल बाध्य होयत। सुनवाई के अगिला तारीख 20 मार्च नियत कयल जाईत अछि।" एकर वकील कतबो कहैत रहलै जे ओ अपराधी के जमानत ई जानि जे ओकर एहि शहर मे केयो नहिं छलै; मानवीय आधार पर देलकै। ओ सभ यत्न कs कs थाकि गेल मुदा ओकर मृत्यु प्रमाण-पत्र नहिं उपड़ा सकल। रियायत के सभ मिन्नत जज पर बेअसरि रहलै। कोर्ट उठि गेल छलै ...... लोक सभ जा चुकल छल। ओ ओतहि देवार दिस अपलक तकैत बैसले रहि गेल। सिनेमा जकाँ सभ किछु फेर सs साकार भs रहल छलै ....... गेल रहै थाना पर ओ अपन परिचित गिरधारी सs ओहिना भेँट-घाँट करय। ओतहि ओ बाते-बात मे कहलकै - "एकटा आदमी बस पर पथराव के आरोप मे जेल मे बरखो सs बन्न छै। केयो-कतहु छै नहिं एतs ओकरा जे जमानत करेतै ……… छोट-मोट केस छै, जमानत दs दही। बेचारा जेल सs छुटि जेतै आ हमरो उसास हैत ...... सभ तारीख पर एकरा कोर्ट लs जाय पड़ैत अछि।" ई मानि गेलै। जमानत पाबि ओ जे राजस्थान मे कतहु अपन गाम गेलै से फेर घुरि कs एलै नहिं! कोर्ट-कचहरी के मामला ...... एकरा पर दवाब पड़लै जे अपराधी के हाजिर करौ। पता लगबैत-लगबैत ई ओकर गामो तक गेल रहे। जनतब भेटलै जे नेनपने मे ओ कतहु सs भसिया-भुतिया कs ओहि गाम मे आबि गेल रहै। ओकरा अपन माय-बाप-नाम-गाम के कोनो सुधि नहिं! केयो कहियो तकबो ने केलकै। लोकक देल कौर-मुट्ठी पर पोसाईत रहलै। छेटगर भेला पर एक बेर दिल्ली गेल रहै गामे लोकक संगे। बहुत दिन तक कोनो अता-पता नहिं छलै। दू-तीन बरख पहिने बिमार भs घुरि ऐल रहै। दवाई-विर्रो किछु भेलै नहिं ....... किछुये दिन पश्चात् मरि गेलै। गामक लोक चंदा कs कs अंतिम-क्रिया करबा देलकै। ओकर के रहै जे मृत्यु प्रमाण-पत्र बनबबितै; सेहो कथी लेल? एतेक जानकारी तs लोक सभ एकरा देलकै; मुदा कोर्ट मे आबि कs यैह कहै लै तैयार नहिं भेलै। दरबान आबि कs एकरा बाहर निकालि कोर्ट रूम मे ताला बंद कs चलि गेलै। बाहर अन्हार मे ठाढ़ ओ कोर्ट रूम मे लटकल बड़का ताला के अपलक देखैत रहल ...... जेलक काल-कोठरी साक्षात् सोझाँ छलै! कोनधरानिये तs वकीलक फीस चुकबैत आबि रहल अछि ...... आब एक लाख रूपया जमानत राशि! ..... कपाड़ पर अहू सs पैघ ताला लटकल छै!! *** हम प्रमाणित करैत छी जे उपरोक्त लघुकथा हमर मौलिक आ अप्रकाशित कृति अछि आ प्रथम प्रकाशन हेतु विदेह ई-पत्रिका के देल जा रहल अछि । -कुमार मनोज कश्यप, निदेशक, भारत सरकार, संपर्क : सी-11, टावर-4, टाइप-5, किदवई नगर पूर्व (दिल्ली हाट के सामने), नई दिल्ली-110023, 9810811850, ईमेल: writetokmanoj@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१०. विप्रकान्त मंडल- मशीन बनबाक उमेड़ विप्रकान्त मंडल मशीन बनबाक उमेड़
गामक पुवरिया बाधक अन्तिम पुल पऽ कारी जिन्स आ उजर टी-शर्ट पहिरने बीस बरखक भोला बैसल आछि । ठरल पछिया हवा संग डूबैत गोसाईं आ खाली बाधक दिश ओ टकटकी लगौने देखि रहल अछि। बाध सन खालि मन मे गोसाईं सन रसे-रसे डूबि जाइत अछि । ओकरा मोन परैत अछि कोना शहरक 10×12 क छोट छीन कमरा मे ओ संकुचित जिनगी बिता रहल अछि । भोर होएते नित क्रियाक बाद खाना बनौनाइ, नहाई-खाई कतैको समस्यासॅं लरैत काज पर जएनाइ । भांति-भांतिक लोगसॅं मिलनाई । समयक अभाब मे दस मिनट मे नस्ता केनाई । राति मे थाकल-थहियाल रूम पऽ घूरि एनाइ , रूखल-सुखल खाई सुति रहनाइ। जेना साफ्टवेयर मे प्रोग्राम फीड अछि । भोर होएते क्लिक बटन दबा प्रोसेस शुरू । शहरक जगमगाईत इजोत मे ओ हेराय गेल अछि मुदा परिवारक स्थिति सॅं मजबूर अछि। प्रसाद पुल पऽ गाड़ी रोकत अछि। गाड़ीक आवाज सॅं भोलाक ध्यान खुइज जाएत अछि । ओ दुर सॅं आबि रहल लोचन केॅं देखि - " की यो लोचन भाई ? " लोचन -" हॅं-हॅं ! बहुते दिनक बाद एलो ? " प्रसाद -" तीन-चाइर महीना पऽ। " लोचन-" काम-काज ठीक चलि रहल अछि? " प्रसाद -" हॅं ! " शहर मे तऽ काज मशीने द्वारा होएत अछि आ मशीन संगे रहैत-रहैत आदमियों एगो उमड़क बाद मशीन बनि जाइत अछि । इच्छा कामना विहीन मशीन । लोचन-" ठीके कहलो । " प्रसादक गप सुनि भोलाक मन मे प्रश्न उठैत अछि की हमरो मशीन बनबाक उमेड़ भऽ गेल ? फेर हमर अन्तरक भावनाक की हेतइ ?
-सगर राति दीप जरय 20 सितंबर 2025, स्थान: आभा पब्लिक स्कूल निर्मली मे पठित। नाम:विप्रकान्त मंडल, पिता: राजदेव मंडल, पता: गाम-मुसहरनिया , पो-रतनसारा ,भाया-नरहिया , जिला-मधुबनी(बिहार) , पिनकोड -847108
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.११. अमरेश ठाकुर- नैका बनिजारा उपन्यासक आलोचनात्मक अध्ययन अमरेश ठाकुर नैका बनिजारा उपन्यासक आलोचनात्मक अध्ययन साहित्य एकटा कलात्मक साहित्यिक कृतिक समुच्चय अछि जे मुक्त प्रेरणा सँ कएल गेल प्रयासक देन होएत अछि– आओर एकटा एहन प्रयासक देन होएत अछि जे कलाक लेल जन्म लैत छथि आओर कलाक लेल जीवैत छथि हुनक सुन्दर कृतिमे अन्तरमनक गहराई, स्वाभाविक अभिव्यक्ति, प्रकृत आ क्रमबद्ध नियोजन होएत अछि । साहित्यकेँ सामान्यत: समाजक दर्पण कहल जाइत अछि । कारण साहित्यमे समाजक चिन्तन-मनन, क्रिया-कलाप, आशा-अभिलाषा, खान-पान, भेष-भूषा, विधि-व्यवहार, आचार-विचार, व्यंगय विद्रूप ओ सभ्यता संस्कृति आदिक अभिव्यंजना कएल रहैत अछि वा प्रतिबिम्बित होयत अछि । साहित्य समाजक यथावत रूप स्वरूपायित करैत एकर विसंगति, विद्रूप अभव्यक परिस्कारक मार्ग-दर्शन करैत अछि । "समाजक अवॉंछनिय स्थिति-मनस्थिति पर प्रहार करैत साहित्य एकर संसोधन-संवर्द्धनक लेल समाजकेँ प्रेरित करैत अछि, सक्रिय करैत अछि ओ तेँ हम साहित्यकेँ दर्पण सँ विशिष्ट मानैत छी, प्रभावोत्पादक मानैत छी, मुदा साहित्यक ई रूप स्मपूर्णत: स्वरूपायित होइत अछि वस्तुत: उपन्यासहिमे। साहित्य वैयक्तित्वक दुश्चितन्तन, समाजिक विसंगति ओ मानविय दुर्बलताक उद्घाटन कए अपन विशिष्ट शैली सँ ओही पर प्रहार करैत सुधारक मार्ग दर्शनक सर्वाधिक अवसर सुनियोजित करैत अछि ।"1 उपन्यास पश्चिमी संस्कृतिक देन थीक। मैथिलीमे एकर आगमन बँगलासँ भेल । अंग्रेजीमे एकरा नॉवेल आ मराठीमे कादम्बरी कहल जाइत अछि । एकर उत्पति 'उप' तथा 'नि' पूर्वक 'अस' धातुमे 'धञ' प्रत्यय लगलासँ बनल अछि जकर अर्थ होइत अछि राखब, स्थिर करब, प्रक्षेपण करब । अर्थात् एहन वस्तु वा कृति जकरा देखला वा पढ़ला सँ एहन सन प्रतित होइत अछि जे अमुक वस्तु वा कृति ओकरे थिक । भारतीय साहित्यकार ओ आलोचक लोकनिक दृष्टिमे उपन्यास साहित्यक एकटा महत्वपूर्ण अंग थीक । उपन्यास विधाक बिना साहित्य अपूर्ण मानल जाइत । उपन्यास एकटा एहन नवीन ओ सशक्त विधा अछि जाहि मध्य कथानकक सघटना, चरित्र-निर्माण, देश-काल संयोजन, अभिव्यक्ति, भंगिमा अथवा भाषा-शैली, उद्देश्य वो वातावरणक शिल्पगत संयोजन कएल जाइत अछि जाहिमे मनारंजकता ओ कलात्मक सौंदर्य होएब आवश्यक होएत अछि । उपन्यास साहित्यक एहन विधा जाहिमे कल्पनाक आधार पर मानव जीवनक यथावत चित्रण कथानकक रूपमे रहैत अछि । कथानक तँ तकर मुख्य अंग भेल किन्तु घटनाक संग-संग चरित्र वो वातावरणक सृष्टि सेहो ओहीमे आवश्यक होएत अछि । "कलाक दृष्टिसँ उपन्यासक उपादान कथानक, चरित्र वातारण, कथोपकथन, भाषा-शैली, लेखकक अपन दृष्टिकोण प्रभृति सबहूँ स्वीकार करैत अछि । मैथिलीमे उपन्यास नव वस्तु थीक। वस्तुत, उपन्यास साहित्य पश्चिमसँ आएल अछि ओ एकर विकास भारतीय भाषा सभमे पश्चिमहिक प्रभावसँ भेल अछि ।"2 मैथिली साहित्यमे उपन्यासक बहुत महत्व छैक किएक जखन एकबेर उपन्यासक रचना प्रारम्भ भेल ओ निरंतर नव-नव विषय-वस्तु समाजिक समस्या आ नव विचारधाराक संग चलैत आबि रहल अछि । उपन्यास "नैका बनिजारा'क रचनाकार डॉ० ब्रजकिशोर वर्मा 'मणिपद्म' दरभंगा जिलाक बहेड़ाक निवासी छलाह । हिनक जन्म 7 सितम्बर 1918 ई० मे भेल । ई शिक्षा-दिक्षा सँ नहि, अपन अध्यवसायक बलेँ विधालाभ कयलनि, तेँ हिनका स्वयम्भू विद्वान कहब उपयुक्त होयत। दस्तावेज लिखब हिनक कौलिक व्यवसाय छल । ई ताहि सँ ऊपर उठि होमियोपेथी चिकित्साकेँ अपन जीविकाक साधन बनओलनि, आ साहित्यकेँ अपन साधना । "मणिपद्मो हूँ स्वाहा" सँ लेल गेल 'मणिपद्म' उपनाम हिनक बौद्ध तान्त्रिक प्रवृतिक संकेत दैत अछि आ वर्मा प्रगतिशीलताक । ई मैथिली, हिन्दी बंगला आ अंग्रेजी भाषा जनैत छलाह साहित्यक व्यापक अध्ययन कएने छलाह, आ विविध शास्त्र चिखने छलाह । "ई मिथिलाक लोकसाहित्यक नीक-जकाँ अध्ययन कएने छथि आओर एकर कवित्व एवं बाग्भंगीकेँ तेना कए पचाए लेने छथि जे अन्य सकल लेखकक बीच ई अपनाकेँ एकदम भिन्न प्रकारक सिद्ध कए देलनि अछि । हिनक मुह साहित्यक वर्षा करैत अछि आ हिनक लेखनी सिद्धहस्त साहित्यकारक लेखनी जकाँ सरपट दोड़ैत अछि ।"3 पुरात्व, तन्त्रमंत्र, कलाकृति आदि अनेक विषयक अनुरागी छलाह । 19 जून 1986 ई० केँ स्वर्गवासी भेलाह । डॉ० ब्रजकिशोर वर्मा 'मणिपद्म' मिथिलाक जीवन संघर्ष, एक स्वर्णिम सांस्कृतिक परम्परा ओ वीरत्वक गोरवमय-उत्कर्ष महागाथा सभक रचना जीवन पर्यन्त करैत रहलाह । हिनक एहि साहित्य-साधनाक अन्यतम उपलब्धि भेल । हिनक प्रकाशित मैथिलीक मौलिक उपन्यास– (1) अनलपथ (सामाजिक) (2) विद्यापति (चरित्रात्मक) (3) लोरिक विजय (लोकमहागाथा पर आधारित) (4) राजा सलहेस (लोकमहागाथा पर आधारित) (5) नैका बनिजारा (लोकमहागाथा पर आधारित) (6) लवहरि कुशहरि (लोकमहागाथा पर आधारित) (7) राय रणपाल (लोकमहागाथा पर आधारित) (8) दुलरा दयाल (लोकमहागाथा पर आधारित) (9) क्रोब्रागर्ल (तांत्रिक) (10) कनकी (आंचलिक) (11) भारतीक बिलाड़ी (12) अर्द्धनारीश्वर (तांत्रिक) (13) नागभूमि (लोकगाथात्मक) (14) फूटपाथ। डॉ० मणिपद्म क ओजस्वी व्यक्तित्व छाप हुनक सम्पूर्ण साहित्य साधना पर नीक जकाँ अपन प्रभाव छोड़ने अछि आ जे प्राय: सभ विधामे एतेकरास सामग्रीसँ मैथिलीक भण्डारकेँ भरने छथि जे हुनका एहि श्रेणीक अद्वितिय साहित्य साधक सिद्ध करैत अछि । हिनका "नैका बनिजारा" उपन्यास पर 1972 ई० मे साहित्य अकादमीक द्वारा पुरस्कृत कएल गेल । साहित्यमे लोकरूचिकेँ सभसँ बेसी महत्व देल जायत अछि । लोकरूचि समाजक समान्य चिन्तनक प्रतिफल होयत अछि, संगहि जीवनक सातव्यक संग ओकर अभिन्न होयत छैक । लोकरूचि ध्यान राखि जे साहित्य लिखल जायत अछि ताहिमे युगसत्यक स्वभाविक विवेचनक संग पारम्परिक व्यवहार ओ संस्कृति ओ वर्तमान नवभावधाराक स्वर ध्वनित रहैत अछि । लोक रूचि लोक साहित्यक मात्र प्रतिनिधित्व नहि करैत अछि, अपितु समकालिन समाजिक प्रवृति ओ पारम्परिक सांस्कृतिक स्वभाविक चित्र ओहीमे उद्घाटित रहैत अछि । मणिपदम् "नैका बनिजारा" एहने समसामयिक भावधाराक संग लोक चेतनाक उद्घाटक ओ सांस्कृतिक स्वरूपक सम्मिलित रूप अछि । "नैका बनिजारा" मणिपद्म नीक सुप्रसिद्ध उपन्यास लोकत्व पर आधारित एवं महाकाव्यक सदृश प्रमाणिक उपन्यास अछि । एकर मुख्य पात्र अछि– लाजी, रमकी, तिलेश्वरी, राङगी मालिन, दस्युराज, धाङड़, उम्फा चण्डाल, काशीक, कुम्भा डोम, रानी फुलेश्वरी, तिलंगा बाछा आ गुल्ली गाय जकरा कपिला कामधेनु सेहो कहल जायत अछि । एहि उपन्यासमे अजन्ताक गुफा संख्या सत्रहमे एकटा विश्वमोहक चित्र अंकित अछि। एहि रचनाकालमे स्त्री, शूद्र, हवान आ गायकेँ 'अमृत'क संज्ञा देल जाइत छलै गुलामक स्थिति सोचनिय छल । ओकरा सभकेँ पशुक समान खरीदल आ बेचल जाइत छलै । एहि उपन्यासमे तीन तरहक कथाक समायोजन भेल अछि– (1) हिमालय अंचलक कनकमंजरी (2) सागरक बनिजारा रत्नसेन आ (3) महाभिक्षु देवपद्मक कथा । लेखक बड़ कुशलताक संग एहि तीनू कथाकेँ मूलकथासँ जोड़ि तात्कालिन समाजक सजीव चित्र प्रस्तुत कएलनि अछि । उत्तमक माय वृद्ध रमकी उपदेशक क्रममे बाजली जे– "संगति, सहानुभूति, अध्ययन, मनन आ भ्रमण यैह पांचोटा ज्ञान संग्रहक माध्यम अछि ।"4 यात्रा व्यापारक क्रममे महासार्थ आदित्य देव आश्वारोहण, अस्त्र शस्त्र चालन आ सैन्य संचालनक शिक्षा दैत रहलाह । संगहि महावाणिक नैका सदिखन याद दिअबैत छल जे– "संसारमे मनुक्ख लेल महाधन छैक ज्ञान, महासम्पदा छैक उत्तम स्वास्थ, महाशक्ति छैक श्रेष्ठ चरित्र, महाविभूति छैक विनय आ महाआन्नद छैक दिव्य-संगति । ई पॉंचो ऐश्वर्यक संग्रह जिनका भए जाइत अछि तनिके जीवन सफल मानल जाइत अछि ।"5 नैका बनिजारा उपन्यासमे एक तरफ नैकाक विशाल व्यापार यात्राक वर्णन अछि तऽ दोसर तरफ नैकाक सती-साध्वी पत्नी फूलेश्वरीक षड्यन्त्र रचि राजभवनसँ निकालि देल जाइत अछि । बौद्धकालिन मिथिलामे राजा व्यापारी होइत छलाह । नैका सेहो एहने व्यापारी छलाह जे अपन दलक सङ सबा लाख बड़दक सवारी पर दूर-दूर धरि बारह बरख तक घूमि-घूमिक व्यापार करैत छल आ अपार वैभवक संग वापस घुरैत छल । नैका विवाहक बारहे वर्षक उमरमे बापक सङ भ' व्यापार कऽर' चल गेल छलै । व्यापारक बाट आ महाहाट आर्यावर्तक प्रसिद्ध व्यापारिक महानगरकेँ स्पर्श करैत चलैत छल । ओहि समयक बौद्ध भिक्षु-लोकनि अभियानी महावैद्य, रसायनी, रत्नापारखी, ज्योतिर्विद, यान्त्रिक, वास्तुविद्य, तान्त्रिक, मूर्त्तिकार, चित्रकार, वादक, कवि, दार्शनिक, साहित्यकार आओर साधक होइत छलाह । मिथिलाक वीर तथा साहसी सार्थवाहक कथा देश-देशान्तरमे प्रसिद्ध छल । नैका बनिजारा उपन्यासक प्रकाशन मिथिला सांस्कृतिक परिषद् कलकत्ता द्वारा भेल छल । एहिमे वीर ऐतिहासिक कथाक वर्णन अछि । नैकाक विवाह चम्पा नरेशक एक मात्र सन्तान फुलेश्वरीसँ भेल छल । नैकाक जेठ बहिन तुलेश्वरीक विवाह द्रोणनगर राजा द्रोणेश्वरसँ भेल छल । ओ सासुरमे छली । आ तिलेश्वरी जे नैकासँ जेठ रहए ओकर विवाह भारी धाकरक बेटासँ भेल छलै । एक राति तिलेश्वरीक घरवालासँ कोनो बातपर झगड़ा भए गेलए ओइ दिनसँ नैहर अपन कमलपुरमे रहैत छै । आ घरोवला दुरागमनक नाम नहि लैत छै। नैकाक दुरागमनक दिन लऽ कऽ अछवा नौवा आ उत्तम गेलए । राजा लोमपाद दिन मानि दुरागमन क' दैलकै । दुरागमन कए नैका रानी फुलेश्वरीक राजक कार्य-भार सौंपि देलकै आ फुलेश्वरीक' देखभालमे उत्तमक माय, लाजी, एकमीकेँ राखि अपने बापक संग व्यापार पर चलि गेलै । आब ओ अपार सम्पतिक सङ चौबिस वरखक जवान भ' क वापस औतए । व्यापार यात्राक पहिल पड़ाव सात कोसक दूरीपर भेलै । रातिमे जखन थाकल सब सूति रहलै । रानी फुलेश्वरीक सङ्गे जे बाछा तिलंगा आ भूल्ली गाय दुरागमनमे सङ्गे आयल छलै ओ तिलंगा गारामे सवा पसेरीक सोनाक घंटी बान्हल छलै जे कोनो संकटक समय फुलेश्वरीक सहोदर भायक समान रक्षा करैत छलै। आ भुल्ली गाय सब दिन दूध दैत रहल छलै । दुरागमन रातिमे फुलेश्वरी ओहि गायक दूधसँ ऐश्वर्यमयी खीर नैकाकेँ खुओलनि जे यमुना तटपर महारासक उपरान्त माधवी निकुञ्जमे राधा माधवकेँ खुऔने रहथिन । पहिल पड़ावक निशीभाग रातिमे हिमालय पहाड़पर एकटा 'अग्निदूत' नामक चिड़ै जकरा लोक विध-विधिन सेहो कहैत छलै आपसमे दुनू बजैत छल । नैका पक्षी भाषाक विशेषज्ञ छल जे केओ अपना पत्नीक सङ करत आ ओ जँ गर्भ धारण करत त' ओकर सन्तान दिर्घायु, प्रफुल्ल स्वास्थ, अक्षय पराक्रम आ शीलक भागी होयत। नैका गुप्त रूपसँ तिलंगापर सवार भ' ओही राति समयपर पत्नीक संङ सम्पर्क कए आ एकटा महायन्त्र रानीक बॉंहिपर बान्हि देलक जे यंत्र महायान्त्रिकक देल सुरक्षा मन्त्र छल आ फुलेश्वरी सँ कहलनि जे अहाँ सन्तानोकेँ ई यन्त्र बान्हि देबए त' ओकरो ई रक्षा करतए। आ ओ पुन: बाघनपर सवार भ' अपना पड़ाव जगह पर राताराती चलि गेल। एम्हर तिलेश्वरी रानी फुलेश्वरी पर अनेक प्रकारसँ मालिन राङगीक सहयोगसँ उछन्नर कऽर' लागल। त्यभिचार नामपर औखरि समाठसँ धान कुटबौलक। गरम लौहाक पिंड हाथपर रखौलक। रानी सभमे उतरला तखन दस्यु-राज धवलसँ योजना बना राजभवनसँ निकालि दासी निवासमे जगह देलक। फुलेश्वरी गर्भवती भ' मास पूरलापर पुत्र रत्न पञ्चकौड़ीक जन्म देलक। आ नैकाक बान्हल यन्त्र खोलि बच्चाक बॉंहिपर बान्हि देलक। चमैन बच्चाक नारि-पुरैन काटि रानीक देखा ओही बच्चाक रमकी मैयाकेँ सौंपि देलक। वृद्धा रमकी जे नैकाक बाल सङ्गीक माय छली ओही बच्चाक ल' राजू कुम्हारक आवासमे राखि देलक जे नि:सन्तान छली। नैका व्यापार हाट होएत राजा द्रोणेश्वरक नगरमे पहुँचल। राजा द्रोणेश्वरक रानी तुलेश्वरी नैकाक जेठ बहिन छल। ओकरा एखन तक कोनां बच्चा नहि भेल छलै। उम्फा चण्डाल आ काशीक कुम्भा डोम नारी-सुन्दरी सबहक केन-दोन करैत छल। फुलेश्वरीक अपहरण करा तिलेसरी उम्फा चण्डालक माध्यमसँ कुम्भा डोमक हाथे बेचि देलक। राजा द्रोणेश्वर ओही दलमेसँ शीलवान सबक खरीद लए छल ओ जे घमिष्ठ रहैत छल तकरा अपन गृह कार्यक लेल राखि लैत छल। ओ रानी फुलेश्वरीक कुम्भा डोमसँ खरीद घरेलू काजक लेल राखि लेलक। एहि क्रममे नै रानी तुलेश्वरीक संतान भेल आ रानी फुलेश्वरीक नैकासँ मिलन भेल। तखन तुलेश्वरी अपन भाई नैकासँ परिचित भेली। भौजी फुलेश्वरीक दशापर बहुत अपसोच आ पाश्चाताप केलनि। नैका जखन व्यापारक पत्नी फुलेश्वरी सङ ल' वापस आयल त' महापंचैतीक आयोजन भेल। ताबत पुत्र पञ्चकौड़ी बारह वर्षक भ' गेल छल सँ मिलन भेलए। तिलेसरी आ मालिन रॉंगीक पंच फॉंसी देलक। नैका बनिजारा मैथिलीक ई महान लोकमहाकाव्य एक दिस नैकाक व्यापारिक अभियानक गाथा अछि तँ दोसर दिस हुनका अनुपस्थितिमे हुनक साध्वी पत्नी फुलेश्वरीक, पारिवारिक षड्यन्त्र द्वारा गृहसँ निष्कासित भऽ कऽ नारीक व्यापारी कुम्भा डोमक हाथेँ बेचल गेलहु पर ओकरा महादलमे अपन सतीत्वक रक्षा करैत, अपना पति नैकासँ पुर्नमिलनक रोमांचक गाथा अछि। ओई कालमे स्त्री, शूद्र, स्वान आ गायकेँ 'अमृत'क संज्ञा देल गेल छल। नारी मात्र भोग्या बुझल जाइत छली। हुनक केन-दीन अबाध गतियेँ चलैत छल। गुलामक स्थिति दयनीय छल आ ओ सभ पशु जकाँ कीनल आ बेचल जाइत छल। चाण्डाल, डोम आ धांगड़क वर्णन सेहो एहिमे विशद रूपेँ आएल अछि। हत्याक काज चाण्डालसँ कराओल जाइत छल। काशीक कुम्भा डोम नारिक व्यापारी छल आ सबा लाख सुन्दरीक महादल लऽ कऽ व्यापार करैत छल। धांगड़ सभ प्रचण्ड योद्धा होइत छल आ नागमणि धांगड़ अपना कालक प्रसिद्ध दस्युराज छल जकरा डरेँ ताम्रलिपिसँ पाटलिपुत्र धरिक मार्ग थरथर कॉंपैत छलइ। बौद्ध भिक्खु लोकनि अभियानी, महावैद्य, रसायनी, रत्नपारखी, ज्योतिर्विद, यान्त्रिक, वास्तुविध, तान्त्रिक, मूर्तिकार, चित्रकार, वादक, कवि, दार्शनिक, साहित्यकार आ साधक होइत छलाह। ई लोकनि व्यापारिक महादलक संग देश-देशान्तर जाइत छलाह आ सुगतक आलोककेँ लोक सुलभ करैत छलाह। मिथिलाक वीर तथा साहसी सार्थवाद सभहिक ख्याति देश-देशान्तरमे प्रसिद्ध छल। सागर-सार्थवाह आ थल-सार्थवाह फराक-फराक होइत छल। कश्मीरसँ गन्धार धरि मिथिलासँ सोझे एक सड़क आबैत छल जकरा मिथिलासँ उज्जैन, काशी, चम्पा, ताम्रलिपि, कपिलवस्तु, इन्द्रप्रस्थ, शाकल, कुसीबती आ पाटलीपुत्रक राजमार्गसँ सम्बन्ध छलइ। गोधन लोकजीवनक बड़का आधार छल आ कोनो-कोनो गाय-बाछाक चेतना अधिक विकसित रहैत छलैक। मैथिलीक ई महान लोकमहाकाव्य खोज, शोध आ उत्खननक अजस्त्र सम्भावना उपस्थित करैत अछि। "लेखक एहि रचनाक प्रसंग ओकर मुखपात' मे अपनहि कहने छथि जे 'नेका बनिजारा' एखन धरि अलिखित एकटा पैघ आ सम्मोहक महाकाव्य अछि। एकरा मैथिली लोक-कण्ठ युग-युगसँ जोगौने चल आबि रहल अछि। ई मिथिलाक परम्परागत स्वर्ण-संस्कृतिक महान सम्पादामेसँ अछि जाहिमे तात्कालिन मिथिलाक इतिहास, संस्कृति, समाजिक स्थिति, व्यापारिक क्रम आ लोक-भावना मणि मुक्ता जकाँ छविमय भए उठल अछि। बोद्धकालीन समाज विशेषत: मिथिलाक एहन कलात्मक अभिव्यक्ति देमएवला आ लोक-जीवनकेँ जगजगार करएवला साहित्य भरिसक्के आन कोनो भाषामे उपलब्ध अछि।"6 डॉ० वीणा कर्ण लिखने छथि– 'नैका बनिजारा' जाहि उत्कृष्ट उपन्यास पर मणिपद्मकेँ साहित्य अकादमी पुरस्कार सँ पुरस्कृत कएल गैलेन, एहि तांत्रिक सूक्ष्मताक अत्यन्त तीव्र आवेगकेँ अपनामे समेटने अछि। एहि उपन्यासक पूज्यवाद देवपद्म, नैका ओ हुनक व्यापारिक दलमे चौदहटा ज्योतिर्मय श्रमण आदिक सूक्ष्मतर तांत्रिक प्रवृति सँ एकर पाठकक अवश्य परिचित होएता। देवपद्मक मानविय चेतनाकेँ जाग्रत करैत रहबाक लेल सम्पूर्ण क्रियाकलाप देवयान तंत्रक विशद निर्देश दैत अछि।"7 निष्कर्षत:– लोकगाथाक आधारपर लिखल गेल ई उपन्यास अनेक दृष्टिएँ आकर्षक अछि। उपन्यासक प्रधान नायक नैका बनिजाराक जीवन-यात्रा अथवा व्यापारिक यात्रा, हुनक पत्नी फुलेश्वरीक संघर्ष ओ चरित्र आ तहिना तिलंगा आ कामधेनुक अलौकिक क्रिया-कलाप एहि उपन्यासक आकर्षक बिन्दु अछि। तहिना जँ एक दिस जीवनक विविध पात्र ओ घटना लोकमानव चित्र उपस्थित करैत अछि तँ दोसर दिस परिवारिक षड्यन्त्र ओ उत्पीड़नक सजीव चित्रण अंकन सेहो एहिमे अछि। सन्दर्भ सूची :– 1) मिश्र विश्वेश्वर 1996, मैथिली गद्य साहित्य, मैथिली विभाग, पटना विश्वविद्यालय पृष्ठ संख्या– 86 2) पाठक, अमरेश, 2007, मैथिली उपन्यासक आलोचनात्मक अध्ययन, आलोक प्रकाशन, पटना, भूमिका 3) मिश्र, जयकांत, 1998, मैथिली साहित्यक इतिहास, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली पृष्ठ संख्या– 232 4) वर्मा, ब्रजकिशोर, 1972, नैका बनिजारा, पृष्ठ संख्या– 12 5) तत्रैव, पृष्ठ संख्या– 26 6) हंसराज, 1996, भारतीय साहित्यक निर्माता मणिपद्म, साहितय अकादेमी, नई दिल्ली पृष्ठ संख्या– 31 7) झा, गोविन्द, 1992, शिखरणी, चेतना समिति, पटना पृष्ठ संख्या– 7 -अमरेश ठाकुर, शोधार्थी, विश्वविद्यालय मैथिली विभाग, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, कामेश्वरनगर, दरभंगा अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१२. प्रीति कुमारी- चुनाव आयोग आ राष्ट्रीय दल/ हरि बाबू केँ ८०म् वर्षगांठ 'क हार्दिक शुभकामना प्रीति कुमारी चुनाव आयोग आ राष्ट्रीय दल / हरि बाबू केँ ८०म् वर्षगांठ 'क हार्दिक शुभकामना १ चुनाव आयोग आ राष्ट्रीय दल
भारतीय संविधान अनुसारे कानून'क संचालन लेल अनेकों स्वतंत्र संस्था सभके प्रावधान कयल गेल छैक,जे देश'क शासन व्यवस्थामे अपन महत्वपूर्ण योगदान दैत छैक। भारतीय संविधानमे अनुच्छेद ३२४ केर मातहत राष्ट्रपति - उपराष्ट्रपति, लोकसभा आ विधानसभा लेल स्वतंत्र ओ निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया'क व्यवस्था लेल निर्वाचन आयोग केर प्रावधान कयल गेलैक। महामहिम राष्ट्रपति (श्रीमती द्रौपदी मुर्मु)जी द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त (ज्ञानेश कुमार) आ दू आरो चुनाव आयुक्त (क्रमश: डॉ० सुखबीर सिंह संधू आओर डॉ० विवेश जोशी) केर नियुक्ति कयल जाईछ। बिहार प्रांतमे मुख्य निर्वाचन अधिकारी (श्री विनोद सिंह गुंजियाल,आई ए एस.)- पटना पदधारी अछि। मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्तक' वेतन भारतके संचित निधि सँ देल जाइत छैक। मुख्य चुनाव आयुक्त आ अन्य चुनाव आयुक्तक' कार्यकाल पद सम्हारिते तिथि सँ ६ शाल धरि ओ ६५ सालक वयस होइत धरि लेल छै। मुख्य चुनाव आयुक्त आ आन चुनाव आयुक्त केर कार्यकाल सँ पहिले कदाचारके आधार पर संसदके दूनू सदन द्वारा पारित विशेष बहुमत सँ प्रस्ताव पारित कय हटाओल जा सकैछ। कार्य आ क्षेत्राधिकार -: भारतमे निर्वाचन आयोग केँ राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति लोकसभा - राज्य सभा आ विधानसभा - विधान परिषद'क लेल निष्पक्ष निर्वाचन संचालन करय लेल शक्ति भेटल छै। चुनाव क्षेत्रक सीमांकन/परिसीमन करबाक रहैछ,जे १० साल पर होमय वाला लोकगणना केर अनुसारे २० साल पर होईछ। राष्ट्रीय आ क्षेत्रीय राजनीतिक दलक मान्यता प्रदान करक होइत छैक। राजनीतिक दल सबकेँ विशेष प्रतीक आवंटन (चुनाव -चिन्ह ) प्रदान केनाई आ मतदाता सूची अद्यतन निर्माण करबाक होईछ। चुनावक व्यवस्था (अधिसूचना जारी) करनाई , चुनाव रद्द करनाई आ मध्यावधि उप चुनाव करौनाईक काज छै। राजनीतिक दल/ पार्टी सब लेल आदर्श आचार संहिता तैयार करैत, कर्मी आ वोटर केँ प्रशिक्षण देनाई सेहो मुख्य काज थीक। चुनाव याचिका पर सरकार केँ आवश्यक परामर्श देबाक रहैत छैक। मत पत्र (बैलैट) केर जगह इलेक्ट्रिक ईवीएम मशीन सँ बुथ पर मतदान काज पहिल खेप १९९८ ई०मे राजस्थान, मध्यप्रदेश आ दिल्ली राज्य केर किछ विधानसभा क्षेत्र 'क प्रयोग रूपेँ कयल गेलैक। गोवा मेँ सम्पूर्ण क्षेत्रमे वोटींग मशीन सँ सम्पन्न भेलैक। सन् २००४ मे संसदीय क्षेत्र सौंसे देशभरिमे ईवीएम सँ मतदान भेलैक । विधानसभा चुनाव म हरेक प्रत्याशी ४० लाख टका खर्चा व्यय विवरणी देखा सकैत छै। मुदा लोकसभा चुनाव केर अभ्यर्थी लेल २०१४ ई० क' अधिसूचना अनुसारे चुनाव खर्च ४० लाख सँ बढ़ाकय ७० लाख टाका कयल गेलैक। से २०२२ ई० सँ बढ़ल खर्च सीमा अध्यावधि ९५ लाख टाका निर्धारण कयल गेल छै। स्टार प्रचारक आ हेलीकॉप्टर सँ चुनाव प्रचार केँ अभ्यर्थी व्यय- लेखा विवरणीमे संधारणीय काज छै। आदर्श आचार संहिताक उल्लंघनमे नगद टाका या लोभ बाला विडियोग्राफी प्रमाणित भेलासन्ता चुनाव पर्यवेक्षक केर टिप्पणी पर मुकदमा ,बिनु परमिशन के वाहन आ डीजे - ध्वनि विस्तारक यंत्र (मैक-हार्न) समय सीमा उल्लंघन पर वाद दायर होईछ। ईवीएम. मशीनमे आखरी उम्मीदवार केर नीचा नोटा रहैछ,जे नापसंदगी जाहीर करबाक एक विकल्प नागरिक लेल रहैछ। 'द पीपल यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज ' नामक एक गैर सरकारी संगठन दिशसँ दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई उच्चतम न्यायालय द्वारा भेलाक वाद फैसला सँ मतदाता केँ ई अधिकार भेटलनि ,जौं स्वच्छ आ ईमानदार छवि बाला प्रत्याशी नहिं रहने अपना विवेक सँ नोटा केर प्रयोग करैत मतदाता मोन क' आ अन्तर आत्माक संकेत पाबि वोट खसा सकैत अछि। परंच मतदान अवश्य निर्भिक भऽ कयल जाएबाक चाही। वर्ष २००९ मे सुप्रीम कोर्ट निर्वाचन आयोग द्वारा मुद्दा पर विचारार्थ गुजारीश कयलापर २०१३ ई० म नोटा० केँ मान्यता भेटल रहय। आनों तरहक समय - समय पर निर्वाचन परिशोधन ले समिति गठित भेल जे अपन शिफारिश कयलनि अछि -: १९७४ म २१ वर्ष सँ घटाकय मतदाता केर आयु १८ वर्ष करबाक लेल वी एम तारकुंडे क'अध्यक्षतामे समिति बनल रहय। सन् १९८१ ई० म मतदाता कें परिचय -पत्र होय , ताहि लेल श्यामलाल शकधर केर अध्यक्षतामे समिति गठन भेल रहय जे १९९५ मे टी.एन शेषन जी वोटर कार्ड बनाके नागरिकक हाथमे दैत ,जै - जै कयलनि। शासकीय सेवा सँ निवृत्ति पाबि ओ राजनीति करय लेल शिव सेना क' संग लागि गेलाह। १९८३ मे राजस्थान मे न्यूनतम शैक्षिक योग्यता अनिवार्य लेल के.सन्थानम बाली अध्यक्षतामे एक समिति गठित भेल छल। १९८९ मे दिनेश गोस्वामी समिति , ईवीएम केर प्रयोग आरक्षणके लेल चक्रानुक्रम पद्धति लागू करबा पर अरल रहल। १९९२ मे टी एन शेषन समिति ,एक सँ अधिक क्षेत्र सँ चुनाव लड़बाक मनाही पर अमल करबा पर जोर लगेलक। १९९८ मे इन्द्रजीत गुप्त समिति चुनाव खर्चा लेल सार्वजनिक कोष निर्माण पर पुरजोर माँग रखलनि। राष्ट्रीय दलक मान्यता प्राप्त करय ले आवश्यक शर्त एहि तरहेँ छैक-: लोकसभा चुनाव वा विधानसभा चुनावमे कोनू चारि राज्य आ बेसियो राज्यमे कुल खसल वोटक ६./. वोटक आंकड़ा पूराएब आवश्यक छै। तकर वादो कोनू एक राज़ मे कमतीमे चारि सीट जीतनाई आवश्यक छै। लोकसभा मे २ प्रतिशत सीट होय से कम सं कम तीन राज्य सँ पुरय। ओहि दल केँ चारि राज्यमे राज्य स्तरीय मान्यता प्राप्त भेल होय। भारत देशमे चुनाव ले जन प्रतिनिधित्व अधिनियम १९५१ केर प्रयोग कयल जाइए। भारतवर्ष मे राष्ट्रीय दल आ चुनाव चिन्ह १. भारतीय जनता पार्टी - कमल फूल २. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस - हाथक पंजा ३. मार्क्सवादी साम्यवादी दल - हाँसु हथौरा तारा ४. बहुजन समाज पार्टी - हाथी ५. आम आदमी पार्टी - झाड़ू ६. नेशनल पीपुल्स पार्टी - पुस्तक नोट-: २०१९ ई० के आमचुनाव म V.V.P.A.T केर प्रयोग सब मतदान केंद्र पर भेल छलैक। २ हरि बाबू केँ ८०म् वर्षगांठ 'क हार्दिक शुभकामना दि० ५ - ५ - २०२६ ई० क' सुयोग्य पिताक सुपात्र पुत्रक ८१म् जन्मदिन श्री हरि बाबू केँ बहुत - बहुत बधाय होय! मधुबनी जिलाक घोघरडीहा प्रखंड अन्तर्गत एकटा एहेन चर्चित सरौती गाम जे कोसी तटबंधक बीच रहैत एक केवट (केउट) परिवारक सामाजिक प्रतिष्ठा उच्च कोटिक रहल अछि। खुशी बाबू आ हजारी बाबू केँ जोड़ा हाथी आ जोड़ा ट्रेक्टर ७० केर दशकमे रहनि ,तँ नागे बाबू लग शिकारी घोड़ा सँ तीनू बन्दूक सँ चापी - जंगलमे शिकार कयल जाईन। पुरान दरभंगा जिला परिषदके तत्कालीन उपाध्यक्ष स्व० खुशी लाल बाबू अपना घर सँ पूभर मिडिल स्कूल लेल नीजी भूमि दान कयलनि। आ भुदानमे सेहो संत विनोबा भावे जीकेँ जमीन दान कयने रहथि। हुनक परियास सँ हाईस्कूलमे मिलकय तीनू भाय जमीन दान दैत संस्था कोसी पिड़ित रहबासी जनकेँ १९७८ ई० मेँ जनसुलभ कयलन्हि। ओ कांग्रेस के गाय बछरु छाप सँ फुलप्राश क्षेत्रक विधानसभा सँ १९७२ मे चुनाव लड़ल रहथि। हुनक छोट भाय नागेश्वर बाबू गर्ल्स हाई स्कूल आ इन्टर आर्ट - साइंस कॉलेज गाममे खोललनि । हेल्थ इन्स्पेक्टर आ वादमे शाखा डाकघर केर पोस्ट मास्टर भेलाह। ओ कोसी क्षेत्रमे शिक्षाक अलख जगाबैत १९९० केर दशकमे निर्दलीय विधायक पद'क हाथी छाप सँ चुनावमे ठाढ़ भेल रहथि। हुनक आकस्मिक निधन हमरा गाममे (नौआबाखर) भेल रहनि। हुनक छोट पुत्र शम्भू नाथ जी पंचायतके मुखिया निर्वाचित भेल रहथि संगहि पुत्र वधू डिम्पल कुमारी सेहो मुखिया पद केँ शुसोभित करने रहथिन। खुशी लाल बाबूक मझिला भाय हजारी बाबू परिवार सँ पहिल मुखिया बनल रहथि,जिनक जेष्ठ पुत्र राज कुमार बाबू २९ शालधरि दू टर्म मुखिया बनल रहलाह। से ओ उगैत सूरज छाप सँ निर्दलीय प्रत्याशी फुलपरास विधानसभा क्षेत्र 'क भेल रहथि। ओ निघमा - सरौती नामे पंचायतक नामकरण संशोधित करबौने छलाह। हरिनाथ बाबु 'क पिताजीक यशोकृति ऐ दुर्गम कोसी प्रक्षेत्रमे चहुं दिस पसरल छन्हि। कयल गेल अनेकों काजक उपलव्धि नवका लोक पढ़ि कहियो बिसरत नहिं । ताहि हुनक छुटल कार्यके हुनक एकमात्र श्रवन पुत्र पूरा करबाक लेल आगु अयलाह अछि। हुनक चौथापनमे ६ बेडके अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र घरक पूभर अपना गाममे सरकारी स्तर सँ बनय ,ताहि लेल एक एकड़ जमीन बेसाहिकऽ भूदाता बनि बजाप्ता भूमि निवंधन कयलाह। दिनाँक २-४-१९९० ई० केँ दान पत्र सँ० ३६३२ एक एकड़ सँ बेशिये सड़क कातके जमीन ,जाहिमे एखन होस्पीटलके भव्य मकान बनलैक अछि। हरि बाबू अपन बाबूजीक तरहेँ कोनू यात्रा करय सँ पूर्व पंचांग देखैत छथि । कोनू शुभ काजक निमित्त पोथी - पतरानुसारे सोइच -विचारिके चलैत छथि। वार्षिक फल ,आ पंचक (भदवा) नक्षत्र - मौसम ,ऋतु परेखैमे तत्पर सदैव रहैत छथि। भविष्यक जनतब लेल वाराणसी सँ सबसाल चिन्ताहरण पोथी किनैत आयल छथि। अपन पैतृक गामक पूर्वक अनेकों घटना ( जन्म - मरन) तीथ वरखी सुखश्राध दियादि भरिक ओहि पतरा पर टिप० लेल करैत छथि। कोनू पुरान पत्र - पत्रिका, पोथी आदि कियो गोटे जुबताए कें राखथि वा नहिं,मुदा हिनक खुबी छन्हि जे ई ओरियाकेँ राखनहिटा रहता। इयह खासियत सँ ई बहुचर्चित व्यक्तित्वमे गनाईत छथि। शुक्ल पक्ष , कृष्ण पक्ष ,राशी अनुसारे दिशासुल ओ राहू काल आदि जनैत एक पंडित सन् ज्ञानी पुरुष अपना गाम समाजमे कहबैत मान्यजन छथि। जाहि वंशवृक्ष - कुर्सीनामा नेवालाल कामत पेसर लक्ष्मण कामत सँ सात पिढि उपरके पाठक लेल द्रष्टव्य अछि,ओहि बंशक हालधरिके रेखाचित्र अवलोकन कऽ सकैत छी। नीचा पाँच पिढ़िधरि सम्पूर्ण पारिवारिक बंशाबली वैवाहिक गाम सहित ऐ तरहेँ रहल छन्हि -: नेवालाल बाबुक मातृक मैनही गाम आ तीन विवाह भेल छलन्हि। बेला पंचगछियाके ठकनी देवी ,छरापट्टीक असेसरि देवी आ बथनाहाके राजाबती देवी सँ। हुनक जेष्ठ पुत्र खुशी लाल बाबुक वियाह मुसहरनियां गामक घुरनी देवी सं भेल रहनि । जाहिमे ५ पुत्री आ १ पुत्र भेलनि।उजान- लालपुर म दु बहिन वियाहल गेल रहनि, क्रमशः कालेन्द्री देवी आ इन्द्रकला देवी। चन्द्र कला देवीके वियाह बसुली गाममे भेलनि। त्रिवेणी देवी क' वियाह गरबा गाममे भेलनि। पुत्र हरि नाथ बाबू क' वियाह सुड़ियाहीक सीता देवी सँ भेलनि। सुशीला देवी क' वियाह परसा गाममे भेलनि। हरिवाबुकेँ एक पुत्री आ चारि पुत्र छन्हि ,यथा-: प्रमीला देवीक वियाह अधिवक्ता श्री अरुण भंडारी जीके संग झंझारपुर गाममे (नगर पंचायत) भेलनि। प्रमोद जीके वियाह मोकरई गाममे पुनम देवी सँ भेल छन्हि। बिनोद जीके वियाह पोखराम गामक नीरू देवीके संग भेलनि । रमेंद्र कुमार जीके वियाह रसियारी गामक आशा देवी सँ भेल छन्हि। विरेन्द्र कुमार जीके वियाह मैनही डीह टोलके श्री धनेश्वर बाबूक बेटी किरण देवी सँ भेल छन्हि। हजारी बाबू क' दू बियाह क्रमशः मधेपुर (भलनी) क' बसुन्धरा देवी आ ताजपुर (रतुपार) केर रामेश्वरी देवीक' संग भेल रहनि। बियाही पक्षमे एक पुत्र आ दू पुत्री भेलनि। पुत्र राजकुमार बाबु 'क वियाह सुड़ियाही'क सरस्वती देवी सँ भेल रहनि। पान कुमारीक' वियाह परसा गाममे आ मंदाकिनी देवीक' वियाह बसुली गाममे भेलनि। काशी बाबुक विवाह बथनाहा गाममे आ श्याम देवीक वियाह शाहपुर गाममे भेलनि। कृष्णकांत जीक बियाह अलोला गाममे भेलनि। राजकुमार बाबूकेँ दू पुत्र आ तीन पुत्री भेलनि , जेकि बैजन्ती देवीक वियाह झंझारपुर आ मनोज कुमार जीक वियाह परसा गाममे भेलनि। जयमाला देवीक वियाह जमुआरी आ प्रेमलता कुमारी'क वियाह पदमपुर गाममे आ मनी कामत जीके वियाह कछुआ मेँ भेल छन्हि। काशी बाबूक' वियाह जव्दि बथनाहामे भेल रहनि। हुनका तीन पुत्र आ दू पुत्री क्रमशः पारसनाथ जीके वियाह विराटनगर,हेमलता देवीक - राज सोनवर्षा , संजीव कुमार जीके वियाह शाहपुर, छोटकी बेटी (शिक्षिका) रेणु'क नेहरा आ चन्द्रिका जीके वियाह - मैनही गाममे भेल छनि। कृष्णकांत बाबूक वियाह अलोला गाममे बाबुनन्न कामत जीक सुपुत्री सँ भेल छन्हि। हुनका एक पुत्री इन्दू जे हरड़ीक जयप्रकाश शर्मा जीके संग वियाह भेल छन्हि। आ तीन पुत्र क्रमशः संतोष कुमार केर शुभ विवाह शाहपुर गाममे, मुन्द्रीका जीके वियाह बसुली गाममे आ अम्बेश कुमार 'क वियाह राजौरा गाममे भेल छन्हि। नेवालाल बाबूक पुत्री रामेश्वरी देवीके वियाह चन्द्रशयनपुर गाममे भेल छन्हि। नागेश्वर बाबूक प्रथम पत्नी सड़ियाहीक सरस्वती देवी सँ दू पुत्र आ एक पुत्री छन्हि। रामनारायण जीके वियाह झिटकी गाममे तारा देवी क' संग भेलनि, जाहि सँ एक पुत्र बासुकी , जिनक वियाह नवटोली परसामे भेल रहनि। बासुकीनाथ कें ४ गोट बहिन ससुरवास छथिन। क्रमशः रागनी- कदमाहा, कामनी- धोनहा, किरण- हैदरपुर आ छोटकी - कमलपुर। रामबाबूक बहिन सुनैना देवीके वियाह छरापट्टी गाममे भेल छन्हि। तुलसी कान्त जीक विवाह करौन्हा गाममे भेल छन्हि। तुलसी बाबुक बेमातरभाय शंभूनाथ जीक माय शकुंतला देवीक नैहर मूल गाम जयदेव पट्टी आ हाल - हरड़ी छन्हि। शंभू जीके विवाह सोनबरसा गामक डिम्पल कुमारी सँ भेलनि अछि। शंभू जीके सहोदर दू बहिन यथा-: सुलोचना कुमारी- चौड़ा महरैल आ चन्दा कुमारी - सुड़ियाही गाममे विवाहित छथिन। एतेक पैघ परिवारमे श्री हरिबाबू सबसँ जेष्ठ; थेहगर भैयारीमे छथि। हिनका सँ जेष्ठ दियादि भरिमे एक पित्ती श्री मार्कण्डेय बाबू बांचल छथि। जन्मदिन पर शतायु हेबाक मंगल कामना सतत अछि। - प्रीति कुमारी, बी.ए., बीएड. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१३. संतोष कुमार राय 'बटोही'- कथा- लल्ली संतोष कुमार राय 'बटोही' कथा- लल्ली
इस्कूल के लेल सजि-धजि केँ तैयार भऽ गेल छथि । कमरा मे टाँगल देबार घड़ी दिस ताकि कऽ ओ अपन हैण्ड बैग उठौललीह । गली सँ निकैल कऽ इस्कूल जाय वाला रस्ता दिस घुमलीह । फेर की ने की फुरेलैन्ह गली दिस आपिस दौड़लाथि । मने किछु छुटि गेल रहैन्ह की वा की किछु भूलि गेल छलथिन्ह ? कमरा पर पहुँचला पर हबर-हबर कऽ गेटक ताला खोललाथि । किचेन दिस दौड़लीह । किचेन मे घुसैत लल्ली हँकमअ लगलीह । हँकमैत ओ गैस केँ बन्न केलीह तामत दूध उधियाकऽ चुल्हा पर पसरैत टेबल पर पसरैत नीचा गिरअ लागल छेलैक ।
एहेन घटना पहिल बेर भेल हेतैन्ह से नहि छै । एक बेर अपन पति केँ रूम मे सुतल ताला मारिकऽ इस्कूल चलि ऐल छलीह । जखन विपिन केँ पेशाब लगलैन्ह तऽ उठिकऽ रूमक गेट खोललाह। खोलैत मातर ओ बुझि गेलाह जे बाहर सँ गेट बन्न केल गेल छै । पहिले तऽ लल्ली केँ हाक देलथिन्ह, परञ्च कोनहु चालि नहि पाबिकऽ । ओ माथा पर दुनू हाथ राखिकऽ धम्म स बेड पर गिर गेलाह ।
ओ बड़बरैत रूम मे ओइ कोना सँ दोसर कोना जाएत छलाह । किछु देर ओहिना करैत रहलाह । फेर बेड दिस आबिकऽ किछु खोजअ लगलाह । सिरहोना उठाकऽ दोसर दिस फेकलाह । फेर जाजिम के नीचा हाथ देलकीहिन । मोबाईल हाथ मे अभरलैन्ह ।
"हलो ! तू पागल है क्या ? तेरे को थोड़ा भी दिमाग है क्या ? " " बोलिए ! क्या हुआ ? " " तू तो गेट बन्द करके चली गई है ।"
लल्ली केर माथा चकरा गेलैन्ह । ओ इस्कूल मे हिन्दी केर क्लास लऽ रहल छेलथिन्ह । ओ अपन घंटी बीच मे छोड़िकऽ प्रधानाध्यापक केर चैंबर मे पहुँचलीह।
" सर, मुझे अभी घर जाना होगा, उनको घर में बंद करके आ गई हूँ। "
एत्ते हेडमास्टर साहब सँ कहिकऽ लल्ली गेट दिस भगलीह । हेडमास्टर कहैते रहि गेलाह, "....की.की..क्या हुआ मैडमजी ?"
लल्ली ताला खोलि विपिन केँ भरि पाँजिकऽ पकड़लीह। विपिन गोस्सा सँ हाथ-पैर फेकऽ लगलाह । ओ विपिन केँ भरि पाँजि पकड़िकऽ बेड पर सुता देलथिन्ह आओर विपिन केर देह पर चढ़िकऽ चुमऽ लगलथिन्ह । कनी देर बाद ओ पिघलि गेलाह । दुनू मे संबंध बनि गेलै। आब ओ शांत भऽ गेलाह अछि। एक-दोसर केँ देह पर हाथ रखने छथि । दुनू एक-दोसर केँ देखिकऽ मुसकी मारि रहल छथि । अपन-अपन वसन केँ समहारैत दुनू उठलाह ।
" हमरा लेट भऽ रहल अछि ।" लल्ली हबर-हबर अपन सूट केँ ठीक करैत बजलीह।
" अच्छा , ठीक है तुम जाओ ।" विपिन अपन टावेल पहनैत शौचालय मे घुसि गेलाह ।
लल्ली निछोहे इस्कूल दिस पड़ेलीह । स्वयं सँ बतिऐत ओ बजलीह -" बाप रे बाप ई तो बहुत बड़ा मिस्टेक हो गया था। ऐसा कोई करता है क्या ?"
इस्कूल मे पहुँचकऽ ओ पहिले शौचालय मे घुसलीह । सूट मे किछु उजरा लैग गेल छेलैन्ह। पानि सँ धोई देलथिन्ह। फेर शिक्षक सदन मे ओ पंखा केर नीचा मे बैस गेलीह ।
आइ दूध जरिकऽ पतिला केँ कारी कऽ देने छेलैक । ई त नीक भेलै जे पड़ोसी अंकल ड्यूटी नहि गेल छलाह । ओ किछु जरबाक गंध सुइंघकऽ कमरा सँ निकललाह। पहिने अपन किचेन मे घुसललाह। चुल्हा दिस नजर दड़ौललाह। चुल्हा पर किछु नहि चढ़ल छेलैन्ह । सोहारी बनेलाक बाद सतीशजी दूध औंटकऽ उतारि लेने छलाह । ओ आब लल्ली केँ किचेन दिस दौड़लाह । दूध जरै केर गंध आबि रहल छेलैक किचेन सँ । ओ खिड़की दिस गेलाह । बेड रूम मे किनको नहि देखलकीन्ह।
फेर फोन लगौलाह, " अरे, आप कहाँ हैं ? किचेन में दूध जल रहा है । "
" ओ..ओ...ह..., ठीक है आती हूँ.....।"
लल्ली केर माथा फेर चकरा गेलैक । अखन ओ इस्कूल पहुँचले छेलीह । हेडमास्टर अखन नहि आयल छलाह। ओ राधा केँ कहिकऽ रूम दिस पड़ेलीह । रूम पर पहुँचलाक बाद किचेन केँ ताला खोलिकऽ गैस केँ बन्न केलीह । पतिला जरिकऽ कारी भऽ गेल छेलैक।
लल्ली केर जनम गाम पर भेल छलैन्ह । परञ्च लल्ली केर पढ़ाई_लिखाई दिल्ली मे भेल छलैन्ह । दिल्ली सँ शिक्षाशास्त्र मे प्रशिक्षण लेलाक बाद ओ बिहार मे शिक्षिका भेलीह ।
" आप क्यों परेशान हैं ? मैं सही से पहुँच जाऊंगी घर ।" फोन पर विपिन केँ कहि रहल छलथिहीन लल्ली । पति सँ दूर बिहार मे अपन दुटा बेटा केँ पढ़ा रहल छथिन्ह । दिन भरि काजे मे लागल रहैत छथि । हुनकर काज खतमे नहि होएत छन्हि। विहंसर मे दुनू बालक केँ विद्यालय भेजबाक बाद खेलहा_पिललाह बरतन केँ धोइकऽ रखैत छथि । अपन कपड़ा संगैंह दुनू बेटाक कपड़ा धोइकऽ छत पर सुखबाक लेल डालैत छथिन्ह। फेर नहाकऽ इस्कूल लेल तैयार होइत छथि ।
असगरे काज केला सँ ओ थाकि जायत छथि। हुनकर देह जवाब देमऽ लगैत छन्हि । पहिने हुनका माथा नहि दुखाति छलैन्ह, परञ्च आब माथा मे हरदम दरद रहैत छन्हि । मोन होयत रहैत छन्हि बपहारि काटि कऽ कानि । फेसबुक पर अपन स्टेटस मे कृष्ण केर भक्ति सँ सानल गीत लगबैत छथि । ह्वाट्सअप पर सेहो राधा-कृष्ण केर फोटो स्टेटस मे टांगैत छथि । ज्यादातर स्टेटस मे फिलासफी रहैत छन्हि ।
" सुनिता मैं ठीक हो जाऊंगी ....।" " तूँ टेंशन नहीं लेना दीदी ....।"
स्त्री केर स्वतंत्रता केँ पक्षधर छथि लल्ली। कतेक बेर दिन भरि काज केला सँ थाकिकऽ राति केँ खायतो नहि छथि। मोन आधा दिल्ली मे रहैत छन्हि आधा बिहार मे ।
"बेटा आपने लंच बाक्स ले लिया, न ?" " हाँ जी मम्मा ...।" " पार्थ, आपने पेंसिल ले लिया, न ?" " जी , मम्मा ।"
दुनू लड़िका केँ इस्कूल लेल तैयार कके बस लग छोड़ि अबैत छथि लल्ली ।
दिल्ली मे सास पहिने फिरिशान केने रहैत छलथिन्ह। आब दिल्ली सँ फोन कके ओ कनैत रहैत छथि, " आपने बिना अच्छा नहीं लग रहा यहाँ। सोच रही थी यहीं रहती तो अच्छा था । नौकरी बड़ी नहीं होती, परिवार बड़ा होता है। मेरा देखभाल कौन करेगा। अब मैं बूढ़ी हो गयी हूँ। घुटना में दरद रहता है ।"
एके साँस मे लल्ली केँ हुनकर सास अपन मोनक गप कहि देलथिहीन ।
" आप चिंता नहीं कीजिए मम्मी, आपकी देखभाल मैं ही करूँगी । अभी वहाँ सुनिता है, न ?" "नहीं बेटा, वह मेरी एक भी बात नहीं मानती । दशहरा में आएगी ना ?"
" जरूर आऊंगी...।"
जखन लल्ली गृहिणी छलीह । सास-ससुर, देवर सभक घर मे देखभाल करैत छलीह ,त हुनकर सास हरदम बटगबनी गबैत रहैत छलीह । आइ दिन मे दस बेर फोन करैत छथि । लल्ली इस्कूल केँ अपन परिवार बुझि रहल छथि। इस्कूल केर शिक्षिका सभ सँ बहिनापा भ' गेल छन्हि। अइ साल ओ सभ अपन-अपन पति केँ छोड़ि कऽ गोवा टूर पर गेल छेलीह । ओ आब किनको नहि सुनैत छथि। अपन मोन केँ मालकिन ओ खुद भऽ गेल छथि।
" मेरे लिए आपने क्या भेजा ? ये सभी टॉफियाँ और गिफ्ट तो मैं भी आपको दे सकती हूँ ।" " तो भेजती क्यों नहीं मेरे लिए भी ? मैंने तो कभी नहीं कहा कि तुम मत भेजो .....।" " भेज दूंगी मैं भी....।" " अच्छा छोड़ो ये सब बात, मैं कह रहा था अपन सब इस बार 'वैष्णोदेवी' टूर पर चलेंगे ।" " ठीक है। मम्मी और पापा भी चलेंगे, ना ?" "हाँ , तुम कहती हो तो उनको भी साथ ले चलेंगे ।"
लल्ली आइ बड़ खुश छथि। गरमी छुट्टी केँ तीन दिन रहि गेल छै। ट्रेन केर टिकिट पहिने सँ बनल छै । इस्कूल मे सभ शिक्षक-शिक्षिका मे गरमी छुट्टी बीतेबाक प्लान पर चर्चा भऽ रहल छै । कियो शिमला जाएत छथि। कियो देहरादून, त कियो अपन गामक आम आओर जामुन खाऽकऽ गरमी छुट्टी बितौताह।
दरभंगा सँ 'बिहार संपूर्ण क्रांति' खुलि गेलै। लल्ली अपन माय केँ खिड़की सँ हाथ डोलबैत 'बाय-बाय' कऽ रहल छथि । अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१४. डॉ अजय कुमार झा- पोथी समीक्षा : “ आचार्य चाणक्य” (मैथिली खंडकाव्य) डॉ अजय कुमार झा पोथी समीक्षा : “ आचार्य चाणक्य” (मैथिली खंडकाव्य) लेखक: राजकिशोर मिश्र प्रकाशक: नवारंभ प्रकाशन, मधुबनी समीक्षक: डॉ अजय कुमार झा
श्री राजकिशोर मिश्र द्वारा लिखित खंडकाव्य “आचार्य चाणक्य” मैथिली साहित्यक एक अत्यन्त महत्वपूर्ण आ प्रभावशाली कृति अछि, जे इतिहास, काव्य-सौंदर्य आ नीति-दर्शनक अद्भुत संगम प्रस्तुत करैत अछि। नवारंभ प्रकाशन, मधुबनी द्वारा प्रकाशित ई खंडकाव्य भारतीय इतिहासक महान मनीषी चाणक्य केर जीवन, हुनकर संकल्प, संघर्ष आ राष्ट्रनिर्माणक दृष्टिकेँ काव्यात्मक रूपमे प्रस्तुत करैत अछि। ई कृति केवल ऐतिहासिक आख्यान नहि, बल्कि एक वैचारिक आ नैतिक मार्गदर्शिकाक रूपमे सेहो पाठक सभक समक्ष अबैत अछि। एहि खंडकाव्यक मूल कथानक चंद्रगुप्त मौर्य केर उत्कर्ष आ धनानंदक पतन पर केन्द्रित अछि। लेखक अत्यन्त सजीव आ प्रभावी शैलीमे ई दर्शेलनि अछि जे कोना चाणक्य मगधमे अपन अपमानकेँ व्यक्तिगत प्रतिशोध तक सीमित नहि राखि, ओकरा एक व्यापक राष्ट्रीय उद्देश्यमे रूपांतरित कएलनि। हुनक दूरदर्शिता, रणनीतिक कुशलता आ अडिग संकल्प एक साधारण बालक चंद्रगुप्तकेँ प्रशिक्षित कए ओकरा मगधक सिंहासन तक पहुँचबामे सहायक भेल। ई प्रक्रिया केवल राजनीतिक परिवर्तन नहि, बल्कि एक युगांतरकारी घटना बनि गेल, जकर चित्रण लेखक अत्यन्त सशक्त ढंगसँ केलनि अछि। खंडकाव्य होएबाक कारण एहि कृतिक संरचना संक्षिप्त होइतहुँ अत्यन्त प्रभावपूर्ण अछि। भाषा सरल, सरस आ लयात्मक अछि, जे मैथिली भाषाक स्वाभाविक मधुरताकेँ पूर्ण रूपेण व्यक्त करैत अछि। काव्यमे प्रयुक्त बिंब, प्रतीक आ उपमान पाठकक मनमे स्पष्ट दृश्य उत्पन्न करैत अछि। घटनाक प्रवाह स्वाभाविक आ रोचक अछि, जाहिसँ पाठक आरम्भसँ अन्त धरि जुड़ल रहैत अछि। संवादक सजीवता आ भावक गहराइ एहि काव्यकेँ मात्र पठनीय नहि, बल्कि अनुभूतिपरक सेहो बनबैत अछि। एहि कृतिक एक विशेषता ई अछि जे एहिमे चाणक्य नीति केर चयनित अंश सेहो समाविष्ट कएल गेल अछि। ई अंश काव्यक वैचारिक आधारकेँ सुदृढ़ करैत अछि आ एहि कृतिकेँ मात्र ऐतिहासिक वर्णन तक सीमित नहि रहए दैत अछि। एहि नीति-सूत्रक माध्यमसँ लेखक ई स्पष्ट करैत छथि जे एक आदर्श राजाकेँ कोना शासन करबाक चाही, राजवंशकेँ कोन-कोन नैतिक मूल्यक पालन करबाक चाही, आ समाजक सामान्य जनकेँ अपन विचार, वाणी आ व्यवहारमे संतुलन केना बनाकए राखबाक चाही। एहि तरहे ई कृति अतीतक घटनासँ वर्तमान समाज लेल सेहो उपयोगी दिशा-निर्देश प्रस्तुत करैत अछि। राजकिशोर मिश्रक लेखकीय गुण एहि कृतिमे अत्यन्त प्रभावशाली रूपमे प्रकट होइत अछि। ओ मात्र कथाकार नहि, बल्कि एक संवेदनशील चिंतक आ कुशल शिल्पकार सेहो छथि। ओ इतिहासकेँ मात्र तथ्यक रूपमे प्रस्तुत नहि कएलनि अछि, बल्कि ओहिमे भावनात्मक आ वैचारिक गहराई सेहो जोड़लनि अछि। चाणक्यक व्यक्तित्वक हुनक चित्रण बहुआयामी अछि—जहाँ ओ एक दिस कठोर, दृढ़ आ रणनीतिकार छथि, दोसर दिस ओ राष्ट्रहित लेल समर्पित, तपस्वी आ दूरदर्शी चिंतक सेहो छथि। पात्र सभक मनोवैज्ञानिक पक्षकेँ बुझबाक आ ओकरा काव्यात्मक रूपमे प्रस्तुत करबाक हुनकर क्षमता अत्यन्त प्रशंसनीय अछि। लेखकक भाषा पर पकड़ सेहो अत्यन्त सुदृढ़ अछि। मैथिली भाषाक प्रति हुनकर प्रेम आ समर्पण एहि कृतिमे स्पष्ट झलकैत अछि। ओ भाषाकेँ केवल संप्रेषणक माध्यम नहि बनौलनि अछि, बल्कि ओकरा सौंदर्य आ भावप्रवणताक प्रभावी साधन सेहो बनौलनि अछि। हुनकर शब्द-चयन, लय आ शैली काव्यकेँ एक विशिष्ट पहिचान प्रदान करैत अछि। ऐतिहासिक तथ्य आ काव्यात्मक कल्पनाक बीच संतुलन बनाक’ रखबाक हुनकर क्षमता एहि कृतिकेँ विश्वसनीय आ आकर्षक बनबैत अछि। राजकिशोर मिश्रक जीवन-परिचय सेहो एहि कृतिकेँ बुझबाक लेल महत्वपूर्ण अछि। ओ भारत संचार निगम लिमिटेड मे मुख्य महाप्रबंधकक पद पर कार्यरत रहि चुकल छथि। सेवामुक्तिक उपरांत ओ स्वयंकेँ पूर्ण रूपेण साहित्य-सृजन मे समर्पित कएने छथि। मैथिली भाषामे हुनकर एखन धरि कुल एक्कैस गोट कृति प्रकाशित भ’ चुकल अछि, जे हुनकर निरंतर सृजनशीलता आ साहित्यिक प्रतिबद्धताक प्रमाण थिक। हुनक प्रशासनिक अनुभव आ जीवन-दृष्टि सेहो एहि काव्यमे परोक्ष रूपेण परिलक्षित होइत अछि, जाहिसँ कृतिमे व्यावहारिकता आ गहराई दुनूक समावेश होइत अछि। ओना, किछु स्थान पर यदि घटनाक विस्तार आ पात्रक मनोवैज्ञानिक पक्ष पर आरो प्रकाश देल जाइत, तँ काव्यक प्रभावशीलता आरो बढ़ि सकैत छल। तथापि, खंडकाव्यक संक्षिप्तता एकर शक्ति अछि, जे एहि कृतिकेँ सहज, प्रवाहपूर्ण आ प्रभावशाली बनबैत अछि। समग्र रुपमे, “आचार्य चाणक्य” एक सशक्त, प्रेरणादायक आ ज्ञानवर्धक मैथिली खंडकाव्य थिक, जे इतिहास, काव्य आ नीति-दर्शनक सुंदर संगम प्रस्तुत करैत अछि। ई कृति मात्र मैथिली साहित्य लेल महत्वपूर्ण नहि, बल्कि ओहि सभ पाठक लेल सेहो उपयोगी अछि जे चाणक्य केर विचार, हुनकर जीवन-संघर्ष आ भारतीय इतिहासक गहराइकेँ बूझय चाहैत छथि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१५. रामकृष्ण परार्थी- जमाना बदलि गेलैं रामकृष्ण परार्थी जमाना बदलि गेलैं डीएसपी रामशरण पासवानकेँ नौकरी करैत पंदरह वर्ष भ' गेल छलैं, अहीं पंदरह वर्षक दरिमयान ओ पूरा बिहार घुमि-घामिक' पहिल बेर अपना गृह अनुमंडलमे ज्वाइनिंग कैएने छल से मोनमे कइक प्रकारकेँ उत्साह आ संकल्प छलैं, कानून व्यवस्थाकेँ ल' क' ओ जतेक शख्त छल ततेबे गरीब-गुरबा शोषित वंचित भेल ओकरा हीयामे करुणा भरल छलैं, दोसर अपन माटि-पानिकेँ प्रति लगाव ओकरा आम-आदमीकेँ लगिच आएल छलैं, पहिने जे एगो पुलिस अधिकारी आ आम-आदमीक बीच दूरी होइत छलैं से आब एकदमसँ समाप्त भ' गेल छलैं, लोकसभ बिनु डर-भगकेँ अपन फिरसानी ल'क' आंकरा समक्ष पहुँचैत छल आ ओ यथासंभव लोकक फिरसानीकेँ दूर करबाक चेष्टामे लागि जाइत छल, सच्च कही त' ओ जहियासँ अपन गृह अनुमंडलमे योगदान देने छल तहियासँ ओकरा अनुमंडलमे केस-फौदारिकेँ मामिला बहुत कम भ' गेल छलैं, पासवानजीकेँ दिशा-निर्देशसँ पुलिस छोट-छिन विवादकेँ ग्राम पंचायत स्तर पर सुलझाक' लोकक अनावश्यक आर्थिक नुकसानकेँ बचबयमे लागि गेल छल। डीएसपी साहब आने दिन जकाँ आइयो ससमय अपना ऑफिसमे पहुँचक' फाइल सभकेँ निरीक्षण करयमे लागल छल कि अचक्के अरदली आबिक' सूचना देलकैं—'सर कोई आपका ग्रामीण आपसे मिलना चाहता हैं, वह अपना नाम बेचन पाण्डे बता रहा हैं।' बेचन पाण्डेकेँ नाम सुनिते डीएसपी रामशरणकेँ मानस-पटल पर पाण्डेकेँ जातीय दंभ आ सामंती प्रवृतिबला मोचंड छवि स्पष्ट नजिर आबैय लगलैं ओ यादि करय लागल अभाव आ अपमानसँ भरल अपना बचपन के, जाति-वर्णक वैमनस्यतासँ भरल अपना गाम-समाजकेँ, बेचन पाण्डे गामक कोनो बहुत पैघ जमींदार निह छलैं, बाप शोभन पाण्डेकेँ माथ पर चौदह बीघा जमीन रहैं आ ओहि चौदह बीघा जमीनमे बेचन पाण्डे आ भूवन पाण्डे दू भाइ आनेकि दुनू भाइकेँ मात्र सात-सात बीघा हिस्सा बँटाएल रहैं मुदा दुनू भाइकेँ घमंड एतेक कि जेना दरभंगा महाराजा होथि, जौन-बोनिहारकेँ गारि-फजइत केनाय आ केकरो जातिसूचक शब्दसँ संबोधन केनाय ओकरा दुनू भाइ लेल शानक गप्प रहैय। एक दिनक गप्प छैय, ओहि समय रामशरणकेँ उमेर मात्र आठ-नौ बर्खँ होइत हेतैं, बेचन पाण्डेकेँ पितियौत बहिनकेँ बियाह रहैं, एहि बियाह ल'क' भिर गाममे चर्चा रहैं कि वीसीआर आबि रहल छय से वीसीआर देखबाक लालचमे भिर गामक बाल-बुतरू सभ साँझसँ ओतय जुटान लगौने रहैं, एम्हर पंडाल बिनाक' तैयार भ' गेल रहैं आ जयमाला बमा मंचकेँ टूटा कारीगर सजावयमे व्यस्त रहैं, पंडालक एक कोनमे कुर्सी सभ सैइंतक' सेहो राखल रहैं, अधिकांश बच्चा ओहि पंडालक बाहर धमाचौकरी मचौने रहैं मुदा किछु एहनो बच्चा सभ रहैं जे सैइंतलाहा कुर्सीमेसँ कुर्सी निकालि संच-मंच बैसिक' जयमालाबला मंचके सजावयबला कारीगरकेँ शिल्प कौशल देखयमे लागल रहैं ओहि समय बेचन पाण्डे दू-चारि आदमीकेँ ल'क' कुर्सीकेँ सुसज्जित ढंगसँ रखबाक लेल पंडालमे पहुँचल कि अचक्के ओकर नजिर कुर्सी पर बैसल रामशरण पर पड़ि गेलैं आ ओ आगि बबूला भ'क' रामशरणकेँ दुर्वचन कहैत बाजल—'सार दुसाध-मुसहर भ'क' कुर्सीए पर बैइसत, भगले कि निह भगले एत' से।' बेचन पाण्डेकेँ मोचंडपनी देखिक' आर बच्चा सभ पंडालसँ बाहरि निकलिक' पुनः खेल'-कुद'मे व्यस्त भ' गेल मुदा कुशाग्र-बुद्धि आ आत्मस्वाभिमानी रामशरण आत्मग्लानिसँ भिर गेल ओकरा संगे एतेबे उमेरमे जे जाति आधारित घटना सभ घटल छलैं एक-एक क' मोन पड़ैय लगलैं जाहिसँ हीयामे अनेको तरहक प्रश्न सभ हिलकोर मारय लगलैं, हमरा सभकेँ लोक सभ अछोप किएाक कहैं छैक? की हम सभ आदमी निह छीक'? की दुसाध-मुसहरकेँ कुर्सी पर बैस'क' अधिकार निह हइक? आ फेर मोने-मोने पछताय लागल, कतेक नीक बाबू कहैं छल बौआ रौ निह जो ओहि टोला, पढ़बे-लिखबे त' काम देतौ, इ वीसीआर देखला से पेट निह भरि जेतौ बेकार हम बाबूके बात काटिक' एत' अइली, निह आब निह रहब हम एत' बेचन पाण्डे दू थपड़ मारि दित त' कतौ अढ़ूमेसँ चोरा-नुकाक' वीसीआर देखिओ लिति मुदा एहन जहर जन बात सुनिक' आब एत' रहनाय बर्दाशत से बाहर बुझाय हैक', जाइ छी घरे सुति रहब ओ अपनाकेँ घोइंटक' कानन सन मुँह कैएने घर लेल विदा भ' गेल। घर आएल त' बाप जगले रहैं, लालटेनक मढ़िम इजोतमे बेटाक लटकल मुँह देखिक' पूछलक—'कि भेलौग', ककरो से झगड़-लड़ाइ केलहीग कि? रामशरण कोनो उतारा निह देलकैं चुपचाप रहि गेल, बाप बेसी पढ़ल-लिखल निह छलैं मुदा बेटाक भाव-भंगिमा पढ़ब खूब नीकसँ जानैत छलैं ओ बेटाकेँ कानन सन मुँह पढ़िक' बुझि गेल छल कि एकरा कोई मारि-पिट आनेत' गारि-फजहित जरूर कैलकेंग जाहि कारणे एकर मुँह लटकल हइ अहि बेर ओ बेटाकेँ पुचकारिक' पूछलक—'कह न बौआ की भेलौग व कैइला कानन सन मुँह कैएने छे? कोइ मारलकौग' की? किछु कहबे तबे ने हम्हु बुझबे।' बापक पिआर भरल दू बोलीसँ ओकरा हीयामे जे जमकल अपमान-अनादरक भाव रहैं से आँखि मेहे लगलैं ओ अवोड़्कार कानैत बापसँ कहय लागल—'कुर्सी पर बैसि गेल छिलअइ त' बेचन पाड़े गारि दिअ लागल आ कहलक सार दुसाध-मुसहर भ'क' कुर्सी पर बैसल छेक' भगले कि निह भगले एत' से।' बापक मोन तामसे बहीर भ' गेलैं, मोन भेलैं जे एखिनए दौड़क' जाइ आ बेचन पाण्डेक संग उठा-पटक करि मुदा अपन आर्थिक समाजिक आ दैहिक औकाति ओकरा नीकसँ बुझल छलैं ओ मजबूर भ' गेल बेचारा आ एगो मजबूर बाप सांत्वना-सहानुभूतिकेँ सिवाय अपना संतितकेँ दैये की सकैत छल अपना बेटाकेँ समझाबय लागल। चुप रह बौआ निह कान, हमरा बुझल छल जे ओहि टोलक लोकसभ धनटेड़ हइक', ओकरा सभकेँ अपना जाति पर घमंड हइ, ओ सभ एम्हरका लोकसभ के आदमीमे गीनती निह करय हइक, तही लेल तोरा हम ओहि टोला जाइसे मना करैं छिलओंग' मुदा हमर एगो गप्प सुनि ले बौआ ओकर सभसे हम तो' लाठीके बल पर मुकाबला निह क' सकैं छहीक' ओकरा सभकेँ पछाड़य लेल जी-जान लगाक' राति-दिन पढ़य पड़तौ बाबा साहब कहने छथिन शिक्षा शेरनी के दूध होइ हइ जे पीतैं से दहारतैं, आइ ऊ तोरा अपमानित क'क' कुर्सी परसँ उठेलकौग' लेकिन काल्हि जँ कहीं तो' पढ़ि-लिखक' उच्च पद पर चलि गेलैं त' वेह तोरा बैसिभ लेल सम्मान पूर्वक कुर्सी देतौ। डीएसपी साहब अपन अतीतक यादि कैएए रहल छय की आदेश लेबाक लेल प्रतिक्षारत ठाड़ अरदली फेरसँ टोकलकैं—'साहब क्या करें बेचन पाण्डे को भेज दे?' अरदलीकेँ टोकलासँ डीएसपी साहबकेँ धिआन भंग भेलैं आ ओ अतीतसँ घुमि-घामिक' वर्तमानमे अबैत बाजल—'हँ भेज दो।' किछुए देरमे बेचन पाण्डे डीएसपी साहबकेँ चेम्बरमे आएल आ निह चाहितो अपनासँ बीसो बर्खक छोट रामशरणकेँ हाथ जोड़ि अभिवादन कैएलक। रामशरण खूब नीकसँ बुझैत छल जे बिनु कारणे कौवा निह लगैं छैं, एकरा डमरासँ कोनो-ने-कोनो काम जरूर होतैं निह त' एकरा सन जातिय दंभ झखयबला लोक हमरा सन अछोप जातिकेँ एना हाथ जोड़िक' अभिवादन निह क' सकैं छय, थोड़े देर लेल मोनमे इहो खिआल एलैं कि एकरासँ बदला लेबाक लेल एगो नीक अवसरि भेटल अछि एकरो बिनु कुर्सी पर बैसिने ठाड़े राखिक' गप्प-सप कैल जाय मुदा संवैधानिक पदक गरिमाकेँ खिआल अबितो ओ व्यक्तिगत वैमनस्यताकेँ बिसरिक' ओकरा कुर्सी पर बैसिकेँ इशारा करैत मैथिलीएमे पूछलक—'की हमरासँ कोनो काम अछि पाण्डेजी?' पाण्डेजीकेँ काज लेबाक छलैं बड़ पुचकारिक' बाजल—'जी श्रीमान अपनेसँ काम अछि तेँ अयलहुँ अछि।' डीएसपी साहब सहज भावसँ बाजल—'की काम अछि से खुलिक' बाजु।' 'की बाजु श्रीमान, उल्टे चोरी आ ऊपरसँ सीना-जोरी बला जमाना चलि रहल छैय, काल्हिखन रमेसरा गबार हमर मसूरिओ चरा लेलक आ जखन हमर बेटा मना कैएलकैं त' ओकर हाथोँ तोड़ि देलकैं आ फेर वेह उल्टे झूठ-फूसके हमरा दुनू बापते पर केसो क' देलक, देखियौन' (कुर्ता ऊपर उठाक' पीठ देखबैत) बाँससँ मारि क' हमर पीठ जे फारि देने अछि।' डीएसपी रामशरणकेँ पुलिसगीरीकेँ नम्हर अनुभव छलैं, दोसर ओ बेचन पाण्डे'क मोचंड व्यक्तित्वसँ सेहो परिचित छल, ओकरा बुझवामे किनको भाडठ निह भेलैं कि ई एकदमसँ सफेद झूठ बाजि रहल अछि, तइयो ओकर पीठ निहारैत पूछलक—'आ अहाँ दुनू बापते ओकरा किछु निह कहलियैं।' पाण्डे अपन सफाई दैत बाजल—'ओ जखन ढाठमेसँ एगो बाँसक खुड़ा उखाड़िक' ओहिसँ मारि हमरा बेटाकेँ हाथ तोड़ि देलक त' हम्हुँ ओकरा पर एगो ढेला फेकिलियैं किनसाइत वेह ढेला ओकरा माथमे लागि गेलैं त' सुनैत छिये केस कैलक अछि जे बेचन पाण्डे दुनू बापते मारिक' कपार फोड़ि देलक।' बेचन पाण्डेक पीठ पर एक जगह बाँसक दाग छलैं वेह... डीएसपी साहब बाजल—'हँ पीठ त' एक जगह अहुँकेँ फूटल अछि, अहुँ एफ आइ आर करौलय'य की?' बेचन पाण्डे घमंडसँ बाजल—'त' छोड़ि कोना दिअइ श्रीमान ओकरा निह कोनो औकाति छैय से ओतेक कुदैत अछि आ हमरा त' केहुना भगवान छः बीघा जमीन देने अछि, बुझबैय एक डेढ़ बीघा ओकरे नासयमे बबाँद क' देलियैं।' रामशरण पुलिसया अंदाजमे पुचकारि-पुचकारिक' बेचन पाण्डेकेँ थाहि रहल छल, ओ अरदलीकेँ बजावय लेल टेबुल परहक घण्टीकेँ बजावैत पाण्डेसँ कहल— हमरा त' जनतब छल जे अपनेकेँ सात बीघा जमीन छैय।' 'जी अपनेकेँ सही बुझल छल, हमरा दुनू भाइमे सात-सात बीघाक' हिस्सा बँटायल रहैं मुदा एगो बेटीक बिआह आ देही-नेहीमे एक बीघा बेच देलियैं।' घण्टीक आवाज सुनि अरदली चेम्बरमे आबि अपन उपिस्थित दर्ज करौलक—'जी सर।' डीएसपी साहब अरदलीकेँ आदंश दैत कहलक—'जाओ पाण्डेजी के लिए एक कप चाय लेके आओ!' आ फेर पाण्डेसँ बतियाय लागल—'पाण्डेजी अहाँकेँ दुटा बेटा अछि किने।' 'जी श्रमान।' 'दुनू की सभ करैत अछि आ केते धरि पढ़ल-लिखल अछि?' 'बड़का सुजित सात-आठ किलास धरि पढ़लक आ फेर पढ़य-लिखयमे मोन निह लगलैं त' हमरा संगे खेती-बाड़ी करय लागल आ छोटका विक्रमजीत जे मैट्रिक पास कय क' घुमयकेँ नाम पर एक बेर दिल्ली गेल से आइ दू बर्खँ भ' गेलैं ओम्हरे कोनो फैक्ट्रीमे काम पकड़ि लेलक केतबो कहैत छिये रौ एखन पढ़य-लिखयकेँ उमेर छौ कोनो कॉलेजमे नाम लिखाले त' कहैत अछि यौ आब हमरा पढ़'-लिख'केँ मोन ने करैत अछि कमाही दिअ।' 'त' कमाइत अछि बढ़ियाँसँ।' 'धूर की कमाओत, केनाहिओ अपन पेट पालैत अछि।' अरदली किछुए देरमे चाय लाबिक' बेचन पाण्डेकेँ आगू राखि देलकैं, डीएसपी साहब पाण्डेकेँ चाय पीबाक आग्रह करैत बाजल—'पाण्डेजी अहाँ चाय पीबु, हम पाँच मिनटमे अबैत छीओ।' एतेक कही ओ ऑफिससँ बाहर चलि आएल आ सम्बन्धित थानाध्यक्षकेँ फोन लगाक' वाकस्थितिकेँ जानकारी लेबय लागल, थानाध्यक्षकेँ कथन रहैं—'सर मैं जानता था कि वह आपका गाँव हैं, कभी न कभी मामला आपके पास जाएगा ही, इसलिए मैं पूरी लगन और इमानदारीकेँ साथ तहकीकात किया हूँ, प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि अभियुक्त रमेसर यादव दिनकेँ करीब दस बजे अपने भैंस और परू को चराकर गाँव के पश्चिम में जो बांध है उस पर से वापस आ रहा था, उसी बांध से सटे बेचन पाण्डे का जमीन है जिसमे वर्तमानमें मसूरी की फसल लगी हुई है उसी खेत में बेचन पाण्डे अपने बड़े बेटे सुजित पाण्डे के साथ खढ़-पतवार बिन रहा था कि अचानक रमेसर यादव का पक बांध से नीचे उतरकर मसूरी चरने लगा, जिसे देखकर बेचन पाण्डे रमेसर यादव को भदूरी-भदूरी गालियां देना शुरू कर दिया। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि परू एक या दो झाड़ियां ही अपने मुँहमे लिया था तभी आकर यादव अपने परू को खेत से हटा लिया था ऑर पाण्डे से अपनी गलती भी मान लिया था लेकिन पाण्डे की गालियां देना बन्द नहीं हुआ, बात-बात में विवाद आगे बढ़ा और जवाब में रमेसर यादव भी गाली दे दिया जिससे आक्रशित होकर बेचन का पुत्र सुजित पाण्डे वहीं बगल के खेत से ढाठ बाला एक बाँस का खुंटा उखाड़ कर रमेसर यादव के सर पर मार दिया जिससे उसका सर फट गया, अपना खून बहता देख रमेसर यादव अपना आप खो दिया और वहीं बाँस छिनकर सुजित के हाथ पर दे मारा जिससे उसका दाहिना हाथ टूट गया और वह दर्द से छटपटाता हुआ वहीं बैठ गया, अपने बेटा को इस तरह पीटते देख बेचन पाण्डे रमेसर यादव पर हँसुआ से वार करना चाहा लेकिन उससे पहले रमेसर यादव पाण्डे के पीठ पर बाँस का एक जोरदार प्रहार कर दिया और वह छिटपिटाता हुआ पीछे हट गया इतने में आस-पास के लोग पहुँचकर दोनों पक्षों में बीच-बचाव कर दिया। यहीं मेरा तहकीकात का विस्तृत विवरण हैं सर।' जाहि प्रकारसँ दरोगाजी अपन तहकीकात विवरण सुनौलकैं ताहि हिसाबसँ डीएसपी रामशरणकेँ मोनमे कोनो तरहक संशय निह रहलैं तइयो ओ अपना भिर दरोगाक गप्पकेँ सत्यापन करबाक लेल अपन खाश मित्र शिवकृपाल महतोकेँ फोन कैएलक मुदा ओतहुँसँ लमसम वेह जानकारी प्राप्त भेलैं जे दरोगाजीकेँ कथन रहैं। ओ पूर्णरूपेण संतुष्ट भेलाक बाद अपना चेम्बरमे आकि बैसि गेल आ पाण्डेसँ कहलक—'पाण्डेजी हम कल्हुका घटनाकेँ पूरा जानकारी दरोगासँ प्राप्त केलहुँ अछि ओ कहि रहल अछि जे अहीं बेटा ढाठमेसँ एगो बाँसक खुड़ा उखाड़िक' रमेसरकेँ कपार पर मारलकैं जाहिसँ ओकर कपार फाटि गेलैं तखन ओ अहाँ बेटाकेँ हाथ तोड़लक।' पाण्डे चट द' बाजल—'धूर ओ दरोगा की बाजत, घूस खिएने होतैं।' एहिबेर डीएसपी साहब पुलिसया अंदाजमे बेचन पाण्डेकेँ जोरसँ डपटलक—'खबरदार पाण्डेजी ग्रामिन बुझिक' नीकसँ बतिया लेलहुँ त' एकर मतलब ई निह कि अहाँ हमरा लग अंट-शंट बाजय लागि आइ दरोगा सच्चकेँ सच्च कही देलकैं त' ओ घुसखोर भ' गेलैं काल्हि जँ वेह फाइल हमरा लग अओतैं आ हम उचित गप्प लिख देबैं तखन अहाँ कहबे डीएसपी साहब सोलकन छलैं सोलकनमाकेँ पक्ष लेलकैं मुदा हमर एगो गप्प सुनि लिअ देश आब वर्णाश्रम व्यवस्थासँ निह भारतीय संविधानसँ चलैत छैय आ संविधानक मुख्य आधारे छैय समता स्वतंत्रता आ भाइचारा आब ओ पुरनका गप्प बिसरि जाउ जे शुकना मलाहकेँ एगो सुखलका आमक डाड़ि तोड़बाक कारणे अहाँ दुनू भाइ ओकरा मेहमे बान्हिक' जुता-चप्पलसँ मारने रहिअइ आ ओ किछु निह कहलक आब जमाना बदलि गेल छैय अहाँकेँ केकरो एकटा गारि देबै त' ओ अहाँकेँ दसटा गारि देत, अहाँकेँ केकरो एक लाठी मारबै त' ओ अहाँकेँ दस लाठी मारत तेँ नीक रहत जे अपन जातीय दंभ आ सामंती सोचकेँ परित्यागिक' संवैधानिक व्यवस्था अनुरूपेँ अपना व्यक्तित्वकेँ विकास करि, तखनिह मान-सम्मान बाँचल रहत। डीएसपी साहब कने देर लेल चुप भेल त' बेचन पाण्डे डराइते बाजल—'उल्टे हमर मसूरिओ चरा...' डीएसपी साहब, बेचन पाण्डेक मुँहक गप्प छिनैत बाजल—'मसूरी चरा लेलक त' अहाँ दंड लितियैं, जुमाँना करितयैं मारि-गारि पढ़बाक अधिकार अहाँकेँ के देलक।' किछु देर चुप रहलाक पछाति डीएसपी साहब फेरसँ बाजल—'आ की कहैं छलियैं, बुझबैं एक-डेढ़ बीघा जमीन ओकरा नासयमे बबाँद क' देलियैं, अपन अरजलहा रहित ने पाण्डेजी त' ई गप्प निह फुराएत, बाप-दादाकेँ अरजलहा अछि तेँ एतेक फूटानी सुझैत अछि।' जकड़ियाएल सामंती प्रवृति बला सोच आ जातीय दंभ बड मसकिलसँ दुटैत छैय पाण्डे अपन घटिया सोचकेँ मान-सम्मानसँ जोड़ैत बाजल—'जखन इज्जत-प्रतिष्ठा निह रहत श्रीमान तखन जथा-जमीन ल'क' की हेतैं।' पाण्डेकेँ कुंठित सोच देखिक' डीएसपी साहब घृणाकेँ भावसँ बाजल—'जेहन अहाँकेँ सोच अछि पाण्डेजी आ जेहन बेटा सभकेँ संस्कार द' रहल छियैं तेहनामे जाहि जथा-जमीन पर अहाँकेँ एतेक घमंड अछि ओ बहुत जल्दीए समाप्त भ' जाएत, ओना अहाँ किहिओ रहल छियैं जे छः बीघा जमीन अछि ओहिमेसँ एक-डेड बीघा केस-मुकदमा लड़ैमे बेच देबैं त' बाँचल साढ़े चारि बीघा आ ओहिमे अहाँ बेटा दू भाइ ताहि हिसाबे ओकरा दुनूकेँ हिस्सा भेलैं सवा दू-दू बीघा आ जँ कहीं काल्हि अहाँ दुनू कोनो देही-नेही आकि केस-मोकदामे फँसि गेल त' ओ दिन दूर निह अछि पाण्डेजी जखन लोकसभ अहाँकेँ जीवैतें जिनगीमे कहत हइय ओ देखहीं बेचन बाबूकेँ बेटा-पोता राजिमस्त्रीक संगे मजूरी करैत छैय, तखन अपनेकेँ प्रतिष्ठा बढ़ि जाएत।' डीएसपी साहबक कड़ुगर गप्प पाण्डेकेँ लेल भविष्यक आइना जकाँ छलैं जाहिमे ओ थोड़ेक देर लेल अपन भविष्य निहारैय लागल, बुझना भेलैय जेना पूरा जथा-जमीन बिका गेल अछि, बेटा-पोता सभ लल्ल-लुच्च भेल एम्हर-ओम्हर भटकि रहल अछि आ अछि आर्थिक विपन्नताक जड़ि सभ हमरे मानिक' दुल्कारि रहल अछि वर्तमानमे लौटते मोन छुब्ध भ' गेलैं आ अकसमाते मुँहसँ निकलि गेलैं—'आब की कैल जा सकैत अछि श्रीमान।' डीएसपी साहब निढोख बाजल—'जँ हमरासँ पूछैत छी त' हम कहब दुनू कियो समाजिक स्तर पर एगो पंचायत बैसाक' मामिलाकेँ रफा-दफा करू, केस-मोकदमा कियोकेँ आर्थिक नुकसान होत आ शारीरिक-मानसिक फिरसानी बनल रहत से अलगे।' बेचन पाण्डे सशंकित भ' बाजल—'एहि लेल उहो तैयार होतैं तखिनए ने श्रीमान।' डीएसपी साहब पुलिसया रूआबसँ बाजल—'ओ किएक निह तैयार हेतैं, आइए हम ओकरा दरोगाकेँ कहबा दैत छियैं कि परसु चारि बजे समुदायिक भवन परिसरमे पंचायत हेतैं, उपिस्थत रहबाक लेल, हँ गामक पाँच-सातगो सम्मानित व्यक्तिकेँ जुटेनायक भार अहाँकेँ अछि, ओना गाम-समाजक गप्प छैय ताहि लेल हमर पूरा कोशिश रहत की थोड़बो देर लेल हम दरोगाकेँ संग क'क' ओतय उपिस्थत होय मुदा पंचायत वेह सम्मानित लोकिन करताह।' पाण्डे लग आब कहय लेल आर कोनो गप्प निह छलैं तेँ ओ डीएसपी साहबसँ आदेश मंगलक—'त' आब हम चलि श्रीमान।' डीएसपी साहब आदेश दैत आश्वस्त कैएलक—'हँ जाउ, परसु समुदायिक भवनमे मिलैत छी।' आ बेचन पाण्डे ओतयसँ उठिक' विदा भ' गेल। पंचायत बला दिन डीएसपी साहब दरोगा आ चारि-पाँचटा पुलिसकेँ ल'क' पहुँचल त' देखैत अछि समुदायिक भवन परिसरमे नीक भीड़ जुटल अछि ओ गाड़ीसँ उतरि दरोगाजीकेँ संग क'क' बैसका पर पहुँचल त' गामक मुखिया सरपंच आ सम्मानित पंच लोकिन दुनू आगन्तुककेँ सम्मान देबाक लेल, अपना कुर्सीपरसँ उठिक' ठाड़ भ' गेल, डीएसपी साहब सेहो हाथ जोड़िक' पूरा गाम-समाजक लोककेँ अभिवादन कैएलक आ एम्हर बेचन पाण्डे हुनका दुनू गोटेकेँ बैसबाक आग्रह करैत अपना गमछासँ कुर्सी झाड़य लागल, जाहिसँ डीएसपी रामशरणकेँ एकबेर पुनः ओ बचपन घटना यादि पड़ि गेलैं आ ओ मोने-मोन सोचय लागल, बाबूजी ठीके कहने रहथि 'आइ ऊ तोरा अपमानित क'क' कुसी परसँ कुसी, कुसी परसँ उठेलकौग' लेकिन काल्हि जँ तो कही पढ़ि-लिखक' उच्च पद पर चलि गेलैं त' वेह तोरा बैसिय लेल सम्मान पूर्वक कुर्सी देतौ।' ओ मोनिह-मोन अपन स्मृतिशेष पिताकेँ धन्यवाद ज्ञापित कैलक आ कुर्सी पर बैसि गेल फेर बितलहा गप्पके बिसरिक' वर्तमान पर धिआन केन्द्रीत करैत मुखियाजीसँ कहलक—'अखिन धरि तो सभ पंचायतक कार्यवाही निह शुरू केलहकग' की?' डीएसपी साहब गाम-घरक रिश्तामे मुखियाजीकेँ भाइ लगैत छल ओ डीएसपी साहबकेँ उतारा देलक—'भैया हमसभ अपनेकेँ प्रतिक्षा क'रहल छलहुँ।' डीएसपी साहब बाजल—'बेकार हमर प्रतिक्षा क'रहल छलह तोँ सभ, पंचायत तोँही पंच लोकिन करबहक हम त' अपन गाम-घर बुझिक' ओहिना एगो औपचारिकता निभावैय लेल आबि गेलहुँ कोनो दोसरा गामक गप्प रहितैं तखन हम थोड़बे जइतियैं, हुअ आब जल्दी तोँ सभ पंचायतक कार्यवाही शुरू कर'।' डीएसपी साहबकेँ आदेश मिलते पंच लोकिन पंचायतक कार्यवाही शुरू क'देलक, सभसँ पहिने वादी-प्रितवादी अपन-अपन पक्ष रखलक तेकर बाद गवाह सभक गवाही भेलैं आ अन्तमे निर्णय पर विचार-विमर्श करबाक लेल पाँच-सातगो पंच लोकिन कने दूर जाक' एकांती करय लागल आ जखन निर्णय पर सभिकयो एकमत भ' गेल त' समाजक बीचमे आबि सरपंच साहब पंचक निर्णय सुनौलक—'दुनू पक्षक गप्प आर गवाह सभक गवाही सुनलक पछाति पंच लोकिन निर्णय लेलक अछि जे गलतीमे बेचनजी ठहरैत छथि, कियाक कि प्रथमतः रमेसर जानि-बुझिक' हुनकर जानपर अपना परूकेँ निह छोड़लकैं दोसर माल-मवेशी निमूधन होइत छैय जँ दू-चारि झाड़ मसूरी चिरओ गेलैं त' गवाहक गवाही अनुसार रमेसर अपन गलती मानि रहल छलैं त' हुनका चुप भ' जेबाक चाहि छलनि आने त' फेर ओ एगो एनाहिते छोट-छिन पंचायती बैसाक' रमेसरसँ अपन हजाँना वसूल क' सकैत छलाह मुदा ओ अहि दुनूमेसँ किछु निह क' गारि-गरौबैल आ मारि-पीट पर उतरि गेलाह जे कतौसँ उचित निह छैय, रहलैय मारि-पीटकेँ पछाति दर-दवाइमे खर्चाक गप्प त' ओ लमसम दुनू पक्षकेँ बरोबिरए छिन आनेकि हरेक दृष्टिकोणसँ देखला-सुनलक बाद पंच लोकिनकेँ अन्तिम निर्णय अछि जे बेचनजी रमेसरसँ भरल समाजमे अपन गलती लेल क्षमा मांगथि आ दुनू कियो अपन-अपन केस मोकदमा समाप्त करथि।' बेचन पाण्डे आइ धरि कहिओ गामक पंच लोकिनकेँ महत्व निह देने छलैं आ आइ एकाएक पंचक निर्णय छलैं ओकरा गलती मनबायकेँ से ओ एतेक आसानीसँ कोना स्वीकार क' लितैं, गप्पकेँ घुमावैत बाजल—यदि अपने सभक वैह फैसला अछि त' हमर बेटा सुजित रमेसरसँ माफी माँग लैत छैय। पंच लोकिन ओकर घमंडी स्वभावसँ परिचित छल सभ एक सुरमे बाजल—'से हैत बेचनजी, गलती करबैं अहाँ आ माफी मंगबैय अपना बेटा पोतासँ, ई गप्प निह चलय बला अछि अहाँकेँ माफी मांगही पड़त।' पंचक समर्थनमे डीएसपी साहब सेहो बाजल—'पंचक निर्णयकेँ अवहेलना अहाँ निह क' सकैत छिये पाण्डेजी, उचित यैह अछि जे अहाँ अपन गलती मानि लियो।' गाम-समाज आ थाना-पुलिसकेँ दवाबमे पाण्डे विवश छल निह चाहितो ओ अपना जगह पर ठाड़ भ' क' मुड़ि झुकौने बाजल—'पूरे समाजक बीच हम रमेसरसँ क्षमा मांगैत छियैं हमरा गलतीकेँ माफ कैल जाओ।' बेचनकेँ गलती स्वीकारिते दरोगाजी बाजल—'वादी-प्रितवादी दोनों एक संयुक्त आवेदन बना कर थाना को दीजिए कि हमलोगों के बीच ग्राम पंचायत के माध्यम से सुलह-समझौता हो चुका है जिसके कारण हम दोनो अपना-अपना केस वापस ले रहें हैं।' दरोगाकेँ कथनानुसार सरपंच साहब एगो संयुक्त आवेदन लिखक' तैयार कैलक आर ओकरा दुनूसँ हस्ताक्षर करबाक' दरोगाजीकेँ लग जमा क' देलक, तेसर बाद मुखियाजी पंचायत समाप्तकेँ घोषणा क' देलक, आ सभिकयो ओतयसँ उठिक' विदा भ' गेल। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१६. गजेन्द्र ठाकुर-साधु आ वेश्या [भगवदज्जुकम्]मूल संस्कृत प्रहसन - बोधायन द्वारा रचित; मैथिली अनुवाद: गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुर साधु आ वेश्या [भगवदज्जुकम्] [भगवदज्जुकम् (संस्कृत प्रहसन)- भगवद् (संन्यासी); अज्जुकम् (वेश्या)] मूल संस्कृत प्रहसन - बोधायन द्वारा रचित; मैथिली अनुवाद: गजेन्द्र ठाकुर पात्र सूत्रधार विदूषक साधु (परिव्राजक) शाण्डिल्य (साधुक शिष्य) वेश्या (वसन्तसेना) २ टा परिचारिका माय प्रेमी वैद्य मृत्युक दूत [नान्दी (देवतासँ आशीर्वाद प्राप्त करै लेल) क बाद सूत्रधार प्रवेश करैत छथि।] सूत्रधार: शिवक चरण रक्षा करओ! ज्योतिषी तकर महत्त्व जनैत छथि - देवताक मुकुटपर नीलम तकरा स्पर्श करैत अछि - आ रावणक दुष्टता सँ तकर औंठा एक बेर झुकाओल गेल - शिवक चरण रक्षा करओ! (प्रवेश करैत) ई रहल हमर घर, हम भीतर जा रहल छी। विदूषक, कतए छह? विदूषक: हम एतए छी, स्वामी! सूत्रधार: जखन तक कियो नै छैक, हम तोरा किछु नीक गप कहबह। विदूषक: ठीक अछि, स्वामी। (बाहर जाइए, फेर अबैए) घरमे कियो नै अछि, स्वामी। कहियौ ने, किछु नीक गप! सूत्रधार: सुनह। आइ हम एकटा ब्राह्मण सँ भेँट केलौं; ओ बाहर सँ आयल छलाह- एकटा ज्योतिषी जिनकर भविष्यवाणी बड़ सटीक होइ छै- आ ओ भविष्यवाणी केलनि: "श्रीमान्," ओ बजला, "आइक सात दिन बादे राजमहलमे अहाँ नाटक देखाएब। राजा अहाँक प्रदर्शनसँ बड़ प्रसन्न हेता आ अहाँकेँ खूब धन देता।" ई सत्य होमयबला भविष्यवाणी हमरामे ऊर्जा भरि देलक, तेँ हम एकटा नाटक खेलाएब। विदूषक: कोन तरहक नाटक खेलाएब? सूत्रधार: ई बड़ नीक प्रश्न अछि। नाटकमे कोनो दस तरहक भावना देखा सकै छी, आ जहाँ धरि हमरा बुझाइए, हास्य सभसँ श्रेष्ठ अछि। तेँ हम एकटा प्रहसन खेलाएब। विदूषक: स्वामी? हमरा प्रहसनमे सेहो हास्य नै बुझाइए। सूत्रधार: तखन हमरा तोरा प्रशिक्षित करऽ पड़त। अप्रशिक्षित मन किछु नै पाबैए। विदूषक: स्वामी, तखन अहाँ हमरा प्रशिक्षित करू! सूत्रधार: अवश्य। जँ अहाँ ज्ञान पर मन लगौने छी तँ नीक मार्गपर चलयबलाक संग चलू- (पर्दाक पाछाँ सँ अबाज) पर्दा पाछाँ सँ अबाज: शाण्डिल्य, कतऽ छह हौ? सूत्रधार (अकानैत): हमर पाछाँ आउ, साधुक शिष्य बनि जेना दृढ़ योगीश्वरक शिष्य अनुसरण करै छथि! (दुनू प्रस्थान करैत छथि।) प्रस्तावनाक अन्त मुख्य नाटक (एकटा साधु प्रवेश करैत छथि।) साधु: शाण्डिल्य, कतऽ छह? (पाछाँ देखैत) अखनो कतौ नै देखा रहल अछि। ऐ छौड़ाक स्वभाव छै अनैतिकतासँ भरल। आ किए नै! देह बेमारीक खजाना अछि। बोखार तकरा हिलबै छै, मृत्युक छाह ओकरापर शासन करै छै, आ ओकर गति धारक कातक एहन गाछ सन होइ छै जे सदिखन फेकल समान सभसँ घेराएल रहैए। तखन गुणसँ प्राप्त शरीर पाबि कऽ तोँ चकित छह। आ जँ तोँ एकर दोषकेँ शक्ति, सौन्दर्य, स्वास्थ्य आदि गुणसँ झाँपल देखै छह, तँ तोँ पागल छह! तेँ शाइत ओ दुखी बौआ पूरापूरी दोखी नै अछि। हम एक बेर फेर बजबइ छिऐ। शाण्डिल्य, कतऽ छह! (शाण्डिल्यक प्रवेश।) शाण्डिल्य: तँ, शुरुए सँ कहू- हम ढंगसँ जनमल छलौं। हमर परिवार गीदड़क ऐंठ-कूठपर जिबै छलय, हमर जीह ओकरा पकड़ने सुखा गेल, हमर ब्राह्मण-जनौ गरदनिमे सटल रहल, आ हमसभ ब्राह्मण भेलापर बड़ सन्तुष्ट छलौं! तेँ घरमे खाइले किछु नै छलय। हम भूखसँ मरै छलौं। हम बौद्ध बनै लेल भागलौं जे जलखै भेटत। जलखै भेटल, मुदा ई बदमाश सभ दिनमे एक्के बेर मात्र खाइ जाइए। तेँ हम फेर भुखले रहलौं। हम गेरुआ वस्त्र फेकलौं, भिक्षापात्र तोड़लौं, आ मात्र एकटा धरिया पहीरि छत्ता लेने चलि एलौं। आ आखिरीमे ऐ दुष्ट गुरुक मोटा उठबैबला बनलौं। कतऽ छथि ओ पूज्यवर? ओ अपने भिक्षाटनपर गेल हेता आलसी। बेसी दूर नै गेल हेता। (मंचपर घुमैत देखैत अछि।) ओह्हो, ई रहला पूज्यवर! (नम्रतासँ) क्षमा करू, क्षमा करू, पूज्यवर! साधु: डरह नै, शाण्डिल्य, डरह नै! शाण्डिल्य: पूज्यवर, ऐ संसारमे- जतऽ सदिखन झगड़ा होइत रहैए, जतऽ सुखे सभ बौस्तु अछि- अहाँ भिक्षाटन केना करै छिऐ? साधु: सुनह। हमरा मान-सम्मानक कामना नै अछि; संकट सदिखन हमर पाछाँ रहत, आ हमरा खाइ लेल जे भिक्षा चाही से दुर्बल लोकसँ अबैए। हम ऐ व्यसन-ग्रस्त संसारमे समधानि कऽ चलै छी, जेना पनिडुम्मीसँ भरल पोखरि। शाण्डिल्य: मुदा पूज्यवर, हमर तँ नहिये परिवार अछि, नहिये भाई, ने बाप; अहाँ हमरापर एत्ते कृपा किए करै छी? हम साधुक लाठी ऐले नै पकड़लौं जे पुण्य भेटत, मुदा ऐले जे भूखे मरि रहल छलौं। साधु: शाण्डिल्य, एकर अर्थ की? शाण्डिल्य: सत्य कऽ अलाबे की? अहाँ सदिखन कहै छी जे झूठ बन्हन अछि। साधु: एकदम ठीक। जँ कियो झूठकेँ संगी बनबैए तँ बन्हनमे बन्हा जाइए। भूझऽ चाहै छह किए? जखन एकटा सचर लोक नीक प्रेरणासँ नीक काज करैए, देवता तकर फलकेँ एना राखै छथि जेना कोनो धरोहरि। शाण्डिल्य: मुदा ओ आपस कखन भेटत? साधु: जखन ओइ विरागसँ ओ श्रेष्ठ बनत। शाण्डिल्य: श्रीमान्, श्रेष्ठ केना बनल जाइए? साधु: चीजक इच्छा नै केला सऽ। शाण्डिल्य: पूज्यवर, ई प्रश्न उठैए जे इच्छा केना नै कएल जाय। साधु: प्रेम आ घृणासँ एकात भऽ। किए? "सुख-दुखमे सम रहब, भय-हर्षमे सन्तुलित रहब, मित्र-शत्रुकेँ समान दृष्टिसँ देखब - एकरे बुद्धिमान लोक एकात हएब कहै छथि।" शाण्डिल्य: मुदा ई अछि की? साधु: जे अखनो अस्तित्वमे नै आयल तकर नाम नै होइए। शाण्डिल्य: मुदा कहू, की एकरा कएल जा सकैए, पूज्यवर? साधु: कोनो सन्देह अछि? शाण्डिल्य: झूठ! झूठ! साधु: माने? शाण्डिल्य: श्रीमान्, अहाँ हमरापर किए तमसाइ छी? साधु: तोँ सीखबे नै करबह। शाण्डिल्य: हम सीखी आकि नै। अहाँकेँ की? अहाँ तँ स्वतन्त्र छी! साधु: एना नै बाजऽ! परम्परा अछि जे छड़ी छात्रक लेल पुष्टाइ होइ छै। तेँ पूर्ण तटस्थतासँ हम तोरा बड़ तरीकासँ सैंतबऽ। शाण्डिल्य: अहा! पूर्ण तटस्थतासँ दण्ड दै छी, हे पूज्यवर! आब ई संवाद बन्द करू; भिक्षाक समय बीतल जाइए। साधु: मूर्ख, अखन भोर-सकाले अछि, दुपहरिया नै। लिखल अछि: भिक्षा तखन मायगी जखन उक्खड़ि राखि देल जाय, चूल्हि मिझा जाय, आ सभ खा-पी लेथि। चलह, किछु काल कलममे बितबै छी। शाण्डिल्य: ओह ओह! अहाँक पावन व्यवहार अपन वचन तोड़ैए! साधु: माने? शाण्डिल्य: की अहाँक पावन व्यवहार एक रंग नै अछि, नीक आकि बेजाय? साधु: एकदम्म! हमर आत्मा एक रंगक अछि, नीक आकि बेजाय, मुदा हमर सक्रिय स्व केँ विश्राम चाहि। शाण्डिल्य: श्रीमान्, आत्मा की अछि? सक्रिय स्व की अछि? साधु: सुनह! अन्तर-आत्मा अछि जे सुतला पर स्वर्ग जाइए। फेर मात्र आत्मा अछि जे अपन कर्तव्य करैए आ जन्म-जन्मान्तर यात्रा करैए। आ तखन ईहो आत्मा अछि जकरा हम सक्रिय स्व कहै छी: "मनुष्य अपन देह अछि," आ ई आत्मा विश्रामक सुख चाहैए। शाण्डिल्य: ठीके, "ओ आत्मा, जे बूढ़ नै होइए, मरैए नै, अविनाशी अछि, अक्षय अछि- वएह आत्मा अछि। आ जे हँसैए, हँसबैए, सुतैए, मरैए- वएह सक्रिय स्व अछि।" साधु: जेना सिखेलौं, सएह सिखलौं। शाण्डिल्य: ओह ओह! चलू! अहाँ ठका गेलौं! साधु: माने? शाण्डिल्य: आत्मा जे अखन अछि, ठीक ने? जँ देह नै तँ किछु नै। साधु: जनसाधारण सन बजै छह। सभ प्राणी कइएक अवस्थासँ गुजरैए, बुझलहीं। तेँ हम सभ ओइ रूपमे बजै छी। शाण्डिल्य: आ अहाँ कोन अवस्थामे छी? साधु: सुनह। आकाश, वायु, जल आ अग्निक कणसँ बनल देह लेने, बाकी मात्र माटि, कान, आँखि, जीह, नाक आ स्पर्शसँ चेतन, हम श्वास लेबऽ बला प्राणी छी जकर नाम मनुष्य अछि। शाण्डिल्य: ओह ओह! एना अहाँ स्व केँ नै जानि सकब, अपन आत्मा तँ दूरक बात। (चारू दिश देखैत) श्रीमान्, ई देखू एकटा कलम अछि। साधु: तोँ पहिने जाह। ऐ एकान्तक आश्रय वन हमरा सभकेँ छाह दैत अछि। शाण्डिल्य: श्रीमान्, अहाँ श्रेष्ठ, पहिने जाउ, हम पाछाँ आएब। साधु: कोन प्रयोजन? शाण्डिल्य: हमर माय एक बेर एकटा पवित्र महिलासँ सुनलनि जे अशोकक फूलमे बाघ नुकायल रहैए। तेँ अहाँकेँ पहिने जाय पड़त, श्रीमान्! साधु: ठीक छै। (दुनू प्रवेश करैत छथि।) शाण्डिल्य: आह, बाघ काटि लेलक! बाघक मुँहसँ बचाउ! बिन मुक्तिए बाघ खा लेलक! हमर गरदनिसँ खून बहि रहल अछि! साधु: डरह नै, शाण्डिल्य। ई मात्र एकटा मोर अछि। शाण्डिल्य: तँ मोर अछि! साधु: हँ, मात्र मोर। शाण्डिल्य: तखन आँखि खोलै छी। साधु: खोलह। शाण्डिल्य: (कलमकेँ देखैत) हे! ओ बदमाश बाघ हमरासँ डेरा गेल, मोर बनि गेल आ आब भागि रहल अछि! (कलमकेँ देखैत) अहा! कतेक सुन्दर कलम! हम देखैत छी - अर्जुन, कदम्ब, आम, शाल, दूबि, चन्दन, अशोक आ साधारण केराक गाछ- सभ बसन्तमे सुन्दर लगैए! आ हम देखै छी अंकुर, पात, फूल, आ झोंझ, सभ एकटा कलममे जे चमेलीक लताक मंडपसँ सजल अछि, मोर, कोइरी आ मातल भौंराक मधुर गायनसँ गूँजि रहल अछि। ई एकटा कलम अछि जे ओइ युवती सभकेँ पश्चाताप दैए जे अपन प्रियतमक अनुपस्थितिमे कष्ट पबैए आ ओकरा सभकेँ सुख दैए जकर प्रियतम उपस्थित अछि! साधु: मूर्ख! दिन-प्रतिदिन इन्द्रिय नष्ट होइत अछि, से एतेक सुन्दर की अछि? सुनह, एकटा बच्चा कहैए, आह बसन्त आयल फूलक चद्दरिमे लेपटल! आ नव ऋतुमे आनन्द लैए: पतझाड़ आयल कमलक गुच्छमे हेलैत! मुदा ओ कथीमे आनन्द लऽ रहल अछि जखन जीवन छोट भेल जाइए? शाण्डिल्य: एकटा प्रश्न? सुन्दरता जखन आ जतऽ होइए ई होइते अछि। साधु: एक बेर फेर, कोनो शैक्षणिक पृष्ठभूमि नै! लोक- ओ सभ भविष्य लेल प्रार्थना करैए, अतीतपर शोक मनाबैए आ वर्तमानसँ घृणा करैए। शाण्डिल्य: ई रस्ताक अन्त अछि। हमसभ कतऽ बैसब? साधु: एत्तै बैसब। शाण्डिल्य: गन्दा, गन्दा! साधु: "बोन स्वच्छ अछि, धरती पवित्र अछि।" शाण्डिल्य: मुदा जँ थाकलापर बैसऽ चाहै छी तँ सदिखन पुछै छी, स्वच्छ अछि वा गन्दा? साधु: प्राधिकरण शास्त्र अछि, हम नै। किए? अपन आत्म-सम्मानसँ बताह लोकपर भरोस नै, जे कहैए जे खरापसँ नीक होइ छै- तिनकर प्राधिकरण मात्र सनकक सोंगर लेने अछि। शाण्डिल्य: तेँ अहाँक बेसी बजला पर भरोस नै। साधु: आबह, बेटा। किछु सीखह। शाण्डिल्य: हम आब आर नै सीखब। साधु: किए नै? शाण्डिल्य: बेसी सीखबाक की फाएदा? साधु: जे छात्र पाठ सीखैए से अन्तमे बुझिये जाइए। तेँ किछु सीखह। शाण्डिल्य: आर तखन की होइ छै? साधु: सुन: ज्ञानसँ विवेक बढ़ै छै, विवेकसँ आत्मनिग्रह, आत्मनिग्रहसँ तपस्या, तपस्यासँ योग, योगसँ भूत-वर्तमान-भविष्यक यथार्थक अन्तर्दृष्टि; आ ओइ अन्तर्दृष्टिसँ आठ गुणा प्रभुत्व प्राप्त होइ छै। शाण्डिल्य: हे गुरु, अहाँ हमर विचार पढ़ि कऽ बजै छी; मुदा हम ओकरा नुका सकै छी! तेँ बिना पाप केने दोसराक घरमे घुसब की सम्भव? साधु: माने? शाण्डिल्य: माने बौद्ध भिक्षु लेल बनाओल स्वादिष्ट भोजन मठसँ खाएब। साधु: तोहर सन पेटमधबा कोनो घड़ी नै मानि सकैए। शाण्डिल्य: ऐलेल अहाँसभ सभक चानि उड़ल अछि! हमरा आर कोनो कारण नै बुझाइए। साधु: एना नै बाजह! योगक फल महान अछि, सही, अडिग, अकल्पनीय, अक्षय, उच्च-मनस्क ब्राह्मण द्वारा आदर देल, देव आ दानव द्वारा अनुमोदित। शाण्डिल्य: तखन अहाँ अपन योगकेँ भक्तिसँ सोचू, आ एकान्तमे रहू। हम भक्तिसँ खिच्चड़िक बिखयमे सोचब। मुदा श्रीमान्, अहाँ सन साधु ऐ योगक विषयमे बड़ सोचैए, आकि नै? ई अछि की? साधु: सुनह तपस्याक सार, सभ ज्ञानक मूल, सत्यक परीक्षा, सभ विरोधाभास दूर करय, आ प्रेम-घृणासँ रहित - वएह अछि योग! शाण्डिल्य: धन्य पूज्य बुद्ध, जे भोजन छोड़ब, आ सभटा बौस्तु छोड़ब सिखाबै छथि! साधु: शाण्डिल्य! एकर माने की? शाण्डिल्य: श्रीमान्? मोन नै? हम पहिने जलखै लेल बौद्ध बनल छलौं। साधु: मुदा अखन अहाँ किछु सिखलौं? शाण्डिल्य: किछु? हम आब बहुत किछु जनै छी। साधु: ठीक अछि। सुनाउ। शाण्डिल्य: सुनू, श्रीमान्। "आठ कारण अछि, सोलह उत्पाद, मुदा आत्मा पाँच-वायुक अछि, मन तीन-सूत्रक, आ ओ भटकैए आ विलीन होइए।" ई पवित्र बुद्ध पिताका-ग्रन्थमे कहल गेल अछि। साधु: शाण्डिल्य! ई बौद्ध धर्म नै! ई सांख्य अछि। शाण्डिल्य: क्षमा करू, भूखमे हम खिच्चड़िपर ध्यान देलौं, तेँ एक बात सोचलौं आ दोसर कहलौं। आब सुनू, श्रीमान्। "आज्ञा अछि जे भिक्षु अदत्त वस्तु अस्वीकार करए। आज्ञा अछि जे भिक्षु प्राण हत्या नै करए। आज्ञा अछि जे भिक्षु बक-बक नै करए। आज्ञा अछि जे भिक्षु काम वासनासँ दूर रहए। आज्ञा अछि जे भिक्षु असमयक भोजन अस्वीकार करए। बुद्धक शरण जाइ छी, धर्मक शरण जाइ छी, संघक शरण जाइ छी!" साधु: शाण्डिल्य, अपन धर्म छोड़ि दोसर नै अपनाउ! अन्हार छोड़ू, लाल रंग छोड़ू, श्वेत रंग संग आ सतर्क रहू। शीघ्र ध्यान धरू, कारण ओ सभ ज्ञान आनत! शाण्डिल्य: आब अहाँ भक्तिसँ योगक चिन्तन करू, श्रीमान्। हम ओतबे भक्तिसँ खिच्चड़िक चिन्तन करब। साधु: ई संवाद बन्न करू। आत्माक बन्धन लेल, ऐ संसारकेँ स्थगित करू! इन्द्रियकेँ आत्मामे बान्हू! ज्ञानक सहायतासँ सत्य ताकू; पूरा आत्मासँ, सम्पूर्ण आत्मा ताकू! (एकटा वेश्या आ दूटा परिचारिका प्रवेश करैत छथि।) वेश्या: छोटकी मधुमाछी, प्रिये, प्रेमी कतय गेला? परिचारिका: मालकिन, "हम आइ छी," ओ कहलनि, आ फेर अहाँक प्रेमी नग्र चलि गेला! वेश्या: हे प्रिय, आब की? परिचारिका: नृत्य-मण्डप दिस दौगू आर की? वेश्या: आइ नृत्य-मण्डप नै बैसैए। परिचारिका: मालकिन, अहाँ एकदम सही कहलौं। मुदा नृत्य-मण्डप एकटा मदिरालये अछि आ महिला सभ, कतेको शालीन होथि, नशामे माति हँसै छथि! वेश्या: तखन तोँ जल्दी जाह! परिचारिका: आ अहाँकेँ सेहो जेबाक अछि, मालकिन! (प्रस्थान करैत।) वेश्या: छोटकी कोइरी, प्रिये, हमसभ कतऽ बैसब? परिचारिका: थोड़ेक काल ऐ पाथरक आसनपर बैसू। देखू, एकटा मोजरल आमक ठाढ़ि सँ सजाएल अछि, मुँह परहक सजावटि सन! आ तखन, मालकिन, अहाँकेँ एकटा गीत गेबाक चाही! वेश्या: छोटकी कोइरी, प्रिये, हम सएह करब। (दुनू बैसैत आ गाबैत छथि।) दुनू: आह, काम स्वयं एतय अछि! हम सुनै छी कोइरी आ भौंराक धनुषक डोरक गायनसँ आ आमक ठाढ़ि बाजि रहल अछि- आ अवश्य एक द्रष्टाक मन ललचाइत अछि! शाण्डिल्य: (सुनैत) आह, कोइरीक अबाज! नै, एकदम कोइरीक अबाज नै। नै, ई एकटा गीत अछि। (अनुमान लगबैत) मधुर गीत, जेना चीनीक दूधमे मक्खन! ठीक अछि, एकबेर देखै छी। (थोड़ेक चलि कऽ ऊपर देखैए।) ओह, ओह, ओह! ई कोन शुद्ध सौन्दर्य अछि जे कोनो नृत्यालयमे नुकायल नै अछि, वरन् हमर कलमकेँ अपन उपस्थितिसँ सुशोभित कऽ रहल अछि? परिचारिका: मालकिन! शाण्डिल्य: ओह, ओह, ओह! एकटा वेश्या! धन्य छथि धनिक लोकनि! परिचारिका: एकटा आर गीत गाउ, मालकिन! वेश्या: हम गाएब। (फेर गाबैत।) आह, काम फेर आयल अछि! आ बसन्त अपन गर्व उठेने अछि आ प्रेमिकाक दृष्टि ओकरा संग जाइत अछि! आह, काम फेर प्रेम जगाबैत अछि! आ प्रिय नवविवाहिताक हृदय सेहो ओकरा फेर फूलसँ गँथने अछि! शाण्डिल्य: कतेक मधुर गीत ओकर कण्ठसँ उठैए! सुनू, श्रीमान्! साधु: नै, कान सुनबाक लेल बनल अछि। हम एतेक दूर नै जाएब जे सुनी। शाण्डिल्य: जाउ ओतेक दूर, जँ खर्च करबाक पाइ हुअय, हा हा! साधु: जाह, तोँ। अपन व्यवहार ठीक करह। शाण्डिल्य: आब तामस नै करू। साधु लोकनिकेँ ई नै करबाक चाही, बुझै छी। साधु: हम मौन पालन कऽ रहल छी। शाण्डिल्य: हँ, की ई सोनहुल मौन नै अछि! (मृत्युक दूत प्रवेश करैत अछि।) दूत: आ हम आयल छी! हमरा ओ पठौलनि जे सभ प्राणीकेँ ल' जाइ छथि भाग्यसँ आहत, ओ जे देखै छथि नीक आ अधला काज, भगवान यम, शान्ति-दाता, आ आब हमरापर आरोप अछि हुनका मृत्यु देबाक, जइपर हुनकर अटल अधिकार अछि। तेँ, धरतीक सभ राज्य, धार, बोन आ पर्वत देखैत, वर्षाक बोझसँ निहुरल मेघसँ छाह भेल, हम वायुसँ हिलायल कुहेससँ भरल अकाशसँ भेल आयल छी, आ आब यम जइ ठाम पठौलनि से तर्कादिवाह नग्र पहुँचलौं! ओ कतय अछि! (चारू दिस देखैत) ओ रहल! ओ चमकैत अछि, ओइ सुन्दर सोन जड़ल अशोक गुच्छमे नुकायल, संध्याक रुद्र बादलक बीच अर्धचन्द्र सन सुन्दर! ठीक अछि, ओकर थोड़ेक कर्म बचल अछि, तेँ हम थोड़े काल प्रतीक्षा करब। परिचारिका: मालकिन, ई अशोकक फूल कतेक सुन्दर अछि? हम तोड़ब। वेश्या: नै नै नै, हम स्वयं तोड़ब! दूत: एकरा चुट्टी काटबाक आब समय अछि। हम आब सर्प बनि अशोकक डाड़िपर बैसि एकर प्राण लेब। जाइ छी, आ ऐ पिण्डश्याम, मनोरम-मुखी, सुकुमार-वाणी, उदार-वक्षा, सुगन्धित, लाल-कमल-आँखिवाली, हमर दृष्टिकेँ चोरबयवाली पर आब कूदब आ एकरा अपन स्वामी लग लऽ जाएब। (वेश्या फूल तोड़ैत।) दूत: आब कटबाक समय! वेश्या: आह, किछु काटि लेलक! परिचारिका: (डारि देखैत) मालकिन! ओइ डारिपर एकटा साँप अछि! वेश्या: साँप? ओह! (ओ खसि पड़ैए।) शाण्डिल्य: आब एतऽ की भऽ रहल अछि? परिचारिका: श्रीमान्, हमर मालकिनकेँ नाग काटि लेलक! शाण्डिल्य: ओह, ओह, ओह! गुरु, एकटा वेश्याकेँ नाग काटि लेलक। साधु: ठीके, समयकेँ थाम्हऽ पड़ैत अछि। कोनो शंका नै, लोक मात्र अपन समय पूरा करैले जनमैत अछि; जँ समय पूरा भेल, ओ सेहो पूरा भेल। परिचारिका: समयकेँ के रोकि सकैत अछि? वेश्या: हम देह झमारि कऽ खसैबला छी। साँस फूलि रहल अछि। हमरा पड़बाक अछि। परिचारिका: शान्तिसँ पड़ि रहू, मालकिन। वेश्या: मायकेँ हमर प्रणाम पहुँचा देबै, प्रिये। परिचारिका: ओह नै! अहाँ स्वयं जा कऽ प्रणाम करब! वेश्या: आ प्रेमी केँ हमरा लेल आलिंगन करब। (ओ चेतनाहीन खसि पड़ैत छथि।) परिचारिका: आह! मालकिन मरि रहल छथि! दूत: ठीक अछि, ओकर प्राण लऽ लेलौं आ आब रस्ता पकड़बाक अछि। अखनो गंगा पार करबाक अछि, आ विन्ध्य पर्वत, आ नर्मदा नदीक शुभ प्रवाह, सह्या, गोलेई, कृष्णवेणा, आ भगवान शिवक पवित्र नगर कांचीपुरम। आ तखन कावेरी, ताम्रपर्णी, मलय पर्वत आ अन्तमे समुद्र, जाधरि हम, वायुवेगसँ, लंकापर उड़ि मृत्युलोक नै पहुँचि जाइ। (प्रस्थान।) परिचारिका: आह! हमर मालकिन मरि गेली! शाण्डिल्य: गुरु! वेश्याक जान गेलनि? साधु: लोक अपन जान नै हेरबै अछि मूर्ख! जिनगी हुनका लेल बड़ मूल्यवान अछि। कहू जे जिनगी तिनका छोड़ि गेलनि! शाण्डिल्य: छि:, अहाँमे दया नै, प्रेम नै एक्कोरत्ती। कठोर हृदय, दुष्ट विलासी! क्रूर ठक बेलछिल्ला! साधु: एकर माने की? शाण्डिल्य: थम्हू, हम अहाँक हजार नाम शुरु मात्र केने छी! साधु: हमरा रोकैले विवश जुनि करह। शाण्डिल्य: श्रीमान्, हम शोकमे छी। साधु: कइ लेल? शाण्डिल्य: ओ हमर सम्बन्धी छली। साधु: सम्बन्धी? शाण्डिल्य: ओ कोनो साधु सन अछि; जकरामे प्रेम नै। साधु: हँ, ई ठीक! आस्ते-आस्ते प्रेम करी, हम उच्च उद्देश्यसँ प्रेम करै छी। वास्तवमे, हम जे निःस्वार्थ रूपसँ मोक्षक पथपर समर्पित छी आ शास्त्रक निर्धारित मार्गपर चलै छी, हम मात्र साधारण स्नेहसँ मुँह मोड़ै छी आ हमर हृदय मात्र सद्गुणकेँ देखैए। शाण्डिल्य: श्रीमान्, हम अपनापर काबू नै राखि सकै छी, हम घिसिया कऽ ओकरा लग जाएब आ कानब! साधु: ओह नै, से नै करह! शाण्डिल्य: तामस नै करू! साधुकेँ नै करबाक चाही। (वेश्याक लग जाइत) हे मालकिन! एतेक प्रेमी छल, एतेक नीकसँ झूमै छलौं! परिचारिका: श्रीमान्, अहाँकेँ की भेल? शाण्डिल्य: प्रेम, आर किछु नै। परिचारिका: (मन मे) ठीके; सन्त सभमे सभक लेल करुणा होइ छै। शाण्डिल्य: मालकिन, हमरा स्पर्श करऽ दिअ। परिचारिका: अहाँमे शक्ति अछि, श्रीमान्। शाण्डिल्य: ओह हँ! (ओ पएर छुबैए।) परिचारिका: पएर नै छुबियौ! शाण्डिल्य: ओह हँ, हम बड्ड भ्रमित छी। ऊपर-नीचाँ किछु पता नै। आह, ई रहल, नारिकेर सन दृढ़, केसर आ चन्दनसँ अनुलिप्त, ऊर्ध्वमुखी, हमर मालकिनक दिव्य वक्ष जे दुर्भाग्यसँ जीवित रहला पर हमरा कखनो उपलब्ध नै भेल। परिचारिका: (मन मे) सएह हमरा करबाक चाही। (जोरसँ) श्रीमान्, थोड़े काल प्रतीक्षा करू जाधरि हम ओकर मायकेँ लऽ आनै छी। शाण्डिल्य: देरी नै करिहह। माय विहीन सभक लेल हम माय छी। परिचारिका: (मन मे) ई दयालु ब्राह्मण हमर मालकिनकेँ नै छोड़ि कऽ जाएत; हमरा जेबाक चाही। (प्रस्थान।) शाण्डिल्य: ओ गेली। आब मोन भरि कऽ कानि सकै छी। ई बेचारी वेश्या जे एतेक नीकसँ चलै छली! (कानैत।) साधु: शाण्डिल्य, ई नै करह! शाण्डिल्य: जाउ, प्रेमहीन! अहाँ बुझै छी जे हम अहाँ सन छी। साधु: आउ, बेटा, थोड़ेक सीखह। शाण्डिल्य: श्रीमान्, ई बेचारी स्त्री केना ठीक हेती? साधु: कोनो दवाई जनै छह? शाण्डिल्य: पाप अछि अहाँक योगक फल! साधु: (मन मे) ई बेचारा अखनो नै बुझैए जे साधु हएब माने नै बुझब जे की करबाक अछि। एकटा निअम छै जे महान शैव योग-आचार्यकेँ प्रकट कएल गेल छै: "शिष्यक करुणा आसक्तिकेँ प्रबल करै छै।" तखन हम एकरामे एकटा अन्तर्दृष्टि उत्पन्न करब। ठीक, ई सही योग अछि। ऐ योगसँ हम ऐ वेश्याक शरीरमे प्रवेश करब। (वेश्या मुर्दासँ जिन्दा भऽ उठैत अछि। साधु अरड़ा कऽ खसि पड़ै छथि) वेश्या: शाण्डिल्य, शाण्डिल्य! शाण्डिल्य: (प्रसन्नतासँ) हँ! मालकिन, अहाँ जीवित छी, अहाँ पुनर्जन्म पेलौं! हम एतऽ छी, मालकिन! वेश्या: गन्दा हाथसँ हमरा नै छुबह! शाण्डिल्य: मुदा हम बहुत साफ छी! वेश्या: आबह, बेटा, थोड़ेक सीखह। शाण्डिल्य: एत्तहु सीखहे पड़त! ठीक अछि, एतऽ हम अहाँकेँ श्रेष्ठतासँ नम्रतासँ सम्पर्क करै छी। (साधुक शव लग जाइए।) श्रीमान्, दुखी छी, अहाँ मरि गेलौं। क्षमा करू, बक-बकिया, अति-योग-मनस्क गुरु! क्षमा करू, अध्यापक। ऐ तरहक प्रतिभाशाली सेहो मरैत अछि। (वेश्याक माय आ परिचारिका प्रवेश करैत छथि।) परिचारिका: ऐ रस्तासँ, माय। माय: हमर प्रिय कतऽ अछि? परिचारिका: ओ एतऽ अछि, ऐ कलममे, नागसँ काटल। माय: आह, हम बरबाद भऽ गेलौं! परिचारिका: शान्त होउ, माय, शान्त होउ! मालकिन ठीक छथि! माय: केना ठीक हेती? (लग जाइत) वसन्तसेना, हमर बेटी! की भऽ रहल अछि? वेश्या: छुबू नै, बुढ़िया! माय: अरे! एकर माने की? परिचारिका: बिख-माहुर माथमे पैसि गेल हएत। माय: फुर्तीसँ वैद्यकेँ बजाउ! परिचारिका: हँ, मालकिन! (परिचारिका जाइत अछि। प्रेमी आ दोसर परिचारिकाक प्रवेश।) परिचारिका: अहाँकेँ बेशी शक्ति भेटय, प्रेमी ! हमर मालकिन अहाँकेँ नै देखि कऽ तड़पै छथि। प्रेमी : आ हम सेहो ओइ मधुर गाबैबला, विशाल-आँखिबला मुँह देखऽ चाहै छी। ई मधुमाछीक प्रतिज्ञा छैक जे फुलायल सुन्दर कमलसँ पीबय। (लग जाइत) की! ओ हमरा देखि मुँह फेरै छथि! (ओ ओकर आँचर पकड़ैत।) हे वक्रांगी, अपन मुँह घुमाउ, पोखरिमे लहरिसँ थोड़ेक हिलायल कमल सन। अहाँक कहियो काल देखाइ दैत मुँह एहन प्रसन्नकारक अछि जेना हाथमे लेल अछिञ्जल। वेश्या: दुष्ट! हमर आँचर छोड़ू! प्रेमी : ई की अछि? परिचारिका: साँप काटलाक बाद सँ ओ असंगत बोल बाजि रहल छथि। प्रेमी : ओकर मन सत्ते बौरा गेल छै। बेचारी स्त्री शून्यमे डूमल, कोनो पवित्र मोनबला एकर शरीरकेँ अतिक्रमित केने बुझाइ छै। (वैद्य आ परिचारिकाक प्रवेश।) परिचारिका: ऐ दिस, श्रीमान्, हँ! वैद्य: (प्रवेश करैत) ओ कतऽ छथि? परिचारिका: हे ओ रहली। वैद्य: ओ अपनामे नै छथि। सत्ते ओ नाग द्वारा आक्रमण आ काटल गेल छथि। परिचारिका: अहाँ केना बुझलौं? वैद्य: जेना कहल जाइए, "माहुर-बिखसँ बड्ड फर्क पड़ै छै।" एकरा एतऽ आनू। हम माहुर-बिखक शास्त्रमे पारंगत छी। (बैसैए आ इशारासँ घेराबा बनबैए।) छोटका घेराबा, तोँ जे कानक झुमका सन स्वामिनीकेँ राखै छह, ऐ जादूबला घेराबामे प्रवेश करह, जादुबला घेराबामे! ठाढ़, साँपक बेटा, ठाढ़! शान्त-शान्त! (वेश्या दिस आंगुर देखबैत) हम एकरासँ खून बहार करब। हमर छोटकी हाँसू कतऽ अछि? वेश्या: मूर्ख, अपन काज बन्न करू! वैद्य: आह! पित्त सेहो। वायु, पित्त वा कफ, सभ ठीक करब। प्रेमी : प्रयत्न करू, श्रीमान्। अहाँ हमरा कृतघ्न नै पाएब। वैद्य: हम एकटा बिख-झारनहारकेँ आनब जे बड़ सुन्दर गोली रखैत अछि। (प्रस्थान।) (मृत्युक दूतक प्रवेश।) दूत: वाह, यम हमरा छाउर नै बना देलनि! "ई वसन्तसेना नै!" ओ गरजला। "तुरन्त ओकरा आपस आनू! दोसर वसन्तसेना, जकर जिनगी खत्म भेल अछि, आनू, आ जल्दी!" ठीक अछि, जाधरि शरीर जरल नै हो, हम ओकरा पुनर्जीवित करब। (चारू दिस देखैत) ओ तँ पहिनहिये उठि कऽ घूमि रहल छथि! उठि कऽ घुमि रहल छथि, मुदा ओकर जिनगी हमर हाथमे छल, एहन चमत्कार केना? (सभ दिस देखैत) ओह! ई कियो आन नै, महान योगी अपन खेल खेला रहल अछि। हम वेश्याक आत्माकेँ साधुक शरीरमे राखब, आ तखन वेश्याक जिनगी सही ठाम प्रवेश कराएब। (तहिना करैए।) देखू! स्त्रीक जीवनशक्ति ऐ पुण्यात्माक शरीरमे प्रवेश ऐ साधुकेँ खराप कऽ देत चरित्र, नैतिकता आ यशमे। साधु: (उठैत) छोटकी कोइरी! शाण्डिल्य: ओह, ओह, ओह! श्रेष्ठ फेर जी उठला! हम सदिखन सोचलौं ई बदमाश कखनो नै मरत। साधु: प्रेमी , तोँ कतऽ छह, कतऽ छह? प्रेमी : प्रेमी , हमर आलिंगन करू! शाण्डिल्य: जाउ ओइ गुलाबक झोँझक आलिंगन करू! साधु: हे हमर प्रेमी , हम कतेक मूर्ख! हम मातल छी! शाण्डिल्य: नै, अहाँ सोझे बताह छी! प्रेमी : अहाँक पवित्रता, अहाँक वाणी अहाँक पद लेल अनुचित अछि। साधु: चलू एक बेर आर पीबी। शाण्डिल्य: जाउ, माहुर खाउ। ठीक अछि, हम बुझि लेलौं जे प्रहसन की होइ छै। ने साधु, नहिये वेश्या, ओकरा साधु-वेश्या कहि सकै छी। ठीक छै। साधु: छोटकी कोइरी, छोटकी कोइरी, हमर आलिंगन करू! परिचारिका: दूर भागू! माय: बेटी वसन्तसेना! साधु: हम एतऽ छी, माय। नमस्कार, माय! माय: मुदा श्रीमान्, की भऽ रहल अछि? साधु: माय, अहाँ हमरा ठोकरा रहल छी! प्रेमी , अहाँ आइ बड्ड सुस्त छी। प्रेमी : श्रीमान्, हम नपुंसक! शाण्डिल्य: ठीक अछि, ठीक अछि! (वैद्यक प्रवेश।) वैद्य: हमरा आठटा गोली आ किछु जड़ी-बूटी भेटल। ई ठीक-ठीक जनै छी, ई या तँ तुरत्ते जीवन देत वा तुरत्ते मृत्यु। कियो पानि आनू, पानि! (परिचारिका लग जाइत।) परिचारिका: ई लिअ पानि। वैद्य: हम गोली पीस रहल छी। ओह, एकरा काटल नै गेल छै; ई वशमे अछि। वेश्या: मूर्ख, तोँ बड़ देरी सँ बूढ़ भेलह। अहाँके ईहो नै बूझल अछि जे के मरि रहल अछि। स्वीकार करू, हमरा साँप नै काटलक। वैद्य: तखन एतेक हल्ला किए? वेश्या: अहाँ लग पाठ्यपुस्तक अछि ने? वैद्य: अछि, कम सँ कम पाँच सय। वेश्या: तखन ओ सभ सुनाउ! वैद्य: मालकिन, सुनू। "वायु, पित्त आ कफ- कफ-" ओह ओह! एकटा पुस्तक, एकटा पुस्तक! शाण्डिल्य: आह, एकटा ठेठ वैद्य। ओ पहिनहिये बिसरि गेला। ठीक अछि, सहयोगी, एतऽ अछि पुस्तक। वैद्य: मालकिन, सुनू। "वायुजन्य, पित्तजन्य आ कफजन्य रोग, तीनू निकलैए माहुरसँ, चारिम अज्ञात अछि।" वेश्या: खराप भाषा। कहबाक चाही "तीनू उत्पन्न होइत अछि।" सदिखन कर्ता पहिले राखू। वैद्य: ओह, हम एकटा व्याकरणज्ञसँ काटल गेलौं! वेश्या: साँप दंशक कए टा लक्षण होइ छै? वैद्य: सए। वेश्या: नै, सात होइत अछि, जेना: "रोइयाँ ठाढ़ हएब, मुँह सुखाएब, थरथरी, पीअर पड़ब, हिचकी, तीव्र श्वास आ बेहोशी- ई साँप दंशक सात लक्षण अछि।" जे व्यक्ति ऐ लक्षणसँ परे चलि गेल हो ओकरा अश्विन सेहो ठीक नै कऽ सकत। जँ कोनो जवाब देबाक हो, बाजू। वैद्य: हम बिसरि गेल छी। शुभ विदा, मालकिन, हम जा रहल छी। (मृत्युक दूतक प्रवेश।) दूत: हँ, हम फेर आयल छी। देखू कोना मनुष्य सभ दौगैत अछि हमरा भेँट करय लेल - गर्भपात, फोका, बुखार, कान दर्द, पेट, हृदय, नेत्र रोग बेमारी आ साधारण माथ दर्द, आ आन मिश्रित रोग: देखू ई प्रसन्न मनुक्ख सभ कोना दौगै जाइए! आब हमर स्वामीक आदेश। (वेश्या लग जाइत।) श्रीमान्, ओ शरीर उतारू। वेश्या: खुशीसँ। दूत: से हम आत्माक अदलाबदली कऽ सकै छी आ जे पहिने करबाक छल से करै छी। (एना करैत प्रस्थान करैए।) साधु: शाण्डिल्य, शाण्डिल्य! शाण्डिल्य: हे, श्रेष्ठ बारम्बार जीबि उठै छथि। वेश्या: छोटकी कोइरी! छोटकी कोइरी! परिचारिका: आब ओ ठीकसँ बाजि रहल छथि। माय: बेटी वसन्तसेना! प्रेमी : आह, ओ होशमे आबि गेल छथि! मधुर वसन्तसेना, ऐ दिस! (वेश्या, प्रेमी , परिचारिका, अनुचर आ मायक प्रस्थान।) शाण्डिल्य: श्रीमान्, की भेल? साधु: ई नम्हर खिस्सा अछि, घर जा कऽ कहब। (अकास दिस देखैत) दिन गेल। सूर्ज अकासक कोर सँ बिला भेल, सोनाक ढेर चोरक नजरिसँ बिला गेल, ओकर आभा चलैत मेघकेँ लाल करैए, अकास अग्निक गर्भसँ अछि गर्भवती। (दुनूक प्रस्थान।) सभ चलैबला प्राणी सुखी रहए, आ हम एक-दोसरक भाग्यसँ प्रेम करी। सभ पापक विनाश हुअए। आ जगतमे सभठाम सुख रहए। समाप्त अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१७. गजेन्द्र ठाकुर- परमेश्वर कापड़िक कथा-खिस्साक आलोचनात्मक समीक्षा गजेन्द्र ठाकुर परमेश्वर कापड़िक कथा-खिस्साकआलोचनात्मक समीक्षा भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति सौन्दर्यशास्त्र • नव्य-न्याय (गंगेश उपाध्याय) • विदेह समानान्तर इतिहास भूमिका: परमेश्वर कापड़िक कथाकार-रूप परमेश्वर कापड़ि- जनकपुरधाम निवासी, मैथिलीक वरिष्ठ साहित्यकार- मुख्यतः नाटककारक रूपमे जानल जाइत छथि। मुदा हुनकर रचना-संसारमे कथा-खिस्साक एक समृद्ध संसार अछि जे आइधरि समुचित आलोचनात्मक ध्यान नहि पओलक अछि। कापड़िक कथा-संसार मुख्यतः चारि धारामे विभक्त अछि: (क) शुद्ध लोककथा- जाहिमे 'लछमिनिञा कनिञा' आ 'हनुमान नाम स्मरणके महिमा' उत्कृष्ट अछि। (ख) पौराणिक कथाक नव-व्याख्या- 'यज्ञ-सीता', 'छौंड़ी-छौंड़ा सुद्युम्न', 'लक्ष्मी-बलि', 'तप आ सत्संग', 'हृदयबासी ईश्वर'। (ग) बोधकथा (Didactic Tale)- 'शिक्षा आ दीक्षा', 'नम्बर'। (घ) कथा-खिस्सा- 'कुत्ता-बिलाइ-मूस', 'गोनूबाबू घरेपर'। (ङ) कथा-काव्य- 'दाम' (दीर्घ काव्यकथा, साक्षी)। हुनकर सभ कथाक केन्द्रमे दूटा बात अछि- मैथिली लोकभाषाक जीवन्तता आ मैथिलीक सामाजिक-सांस्कृतिक यथार्थ। अहि दुनूक मेल हुनकर कथाकेँ एक विशिष्ट भौगोलिक आ सांस्कृतिक पहचान दैछ। कथा-समीक्षा १. 'हनुमान नाम स्मरणके महिमा': १.अ. कथावस्तु: रावणक लंकामे नवग्रह देवता बन्दी अछि- शक्तिहीन, दीन-दुखी। हनुमानजी लंका-दहनक प्रसंगमे हुनका सभकेँ देखै छथि, पुछै छथि आ बन्धन तोड़ि मुक्त करै छथि। नवग्रह हनुमानसँ वर माँगैले कहै छथि, मुदा हनुमान कहै छथि- 'प्रभु राम छथिन्ह, कोनो वर मांगैके आवश्यकता नहि।' तैपर नवग्रह स्वयं वचन दै छथि: जे हनुमानक नाम जपत, तिनका नवग्रह कोनो दुख नहि देता। १.आ. भाषा-विश्लेषण: ई रचना मैथिलीक उत्कृष्ट नमूना थिक। 'रहए', 'हइ', 'अइ', 'अएला', 'हुनकासबके', 'ओकरासबके'- ई सभ मैथिलीक स्वाभाविक रूप थिक जे भारतक दरभंगा-मिथिला मैथिलीसँ किछु भिन्न नै अछि। 'लंकामे अगिलग्गीक', अगराही–पसाही लगबैत जाइत जे रहए, त' ओत' हनुमानजीके शक्ति सामर्थहीन, मुइल–विलाइ भेल, नवग्रह सब देखाइ देलकनि।' 'अगिलग्गी', 'अगराही-पसाही', 'मुइल-विलाइ'- ई शब्द-गुच्छ मैथिलीक जीवन्त प्रमाण थिक। 'मुइल-विलाइ' (मरल-विलाएल)- यएह द्विपदी समास मैथिलीक व्याकरण-सम्पदाक उदाहरण थिक। १.इ. रस-विचार: एहि कथामे भक्ति-रसक प्रधानता अछि। परन्तु मात्र भक्ति नहि- नवग्रहक दीनताक करुण रस आ हनुमानक वीरता (रावणक बन्धन तोड़ब)- एहि दुनूक मेलसँ एक सम्मिश्र रस-अनुभव होइछ। आनन्दवर्धनक ध्वनि-सिद्धान्तक अनुसार, रचनाक मुख्य ध्वनि थिक- 'ईश्वर-कृपा माँगएसँ नहि, स्वयं-समर्पणसँ भेटैछ।' ई ध्वनि वाच्यार्थसँ परे व्यञ्जनास्तरपर स्थित अछि। १.ई. वक्रोक्ति: कुन्तकक वक्रोक्ति-दृष्टिसँ देखने, कथाक सर्वाधिक वक्र उक्ति थिक- 'हुनका अछैतमे अहाँसबस' हमरा कोनो वर मांगके आवश्यकता नहि।' भक्त जखन वर माँगे, प्रभु देथि- ई सामान्य भक्ति-तर्क थिक। परन्तु एत' हनुमान उनटे भक्तिकेँ परिभाषित करै छथि- 'वर माँगनाइ भक्तिक कमजोरी थिक।' ई वक्रता सामान्य कथाकेँ दार्शनिक ऊँचाइ दैछ। १.उ. नव्य-न्यायिक दृष्टि: गंगेशक 'शब्द-प्रमाण' (आप्त-वाक्य) सिद्धान्तक अनुसार, नवग्रहक वचनवद्धता- 'जे हनुमानक नाम जपत तिनका दुख नहि'- एक आप्त-वाक्य थिक। नव्य-न्यायमे आप्त-वाक्यक प्रमाण-मूल्य अछि कारण वक्ता (नवग्रह) प्रामाणिक छथि। कापड़ि लोककथाक माध्यमसँ एहि शास्त्रीय तर्ककेँ सुलभ बनबै छथि। १.ऊ. विदेह फ्रेमवर्क: मैथिली साहित्यमे हनुमान-कथाक परम्परा बहुत पुरान अछि। परन्तु कापड़ि एहि कथाकेँ एक नव भौगोलिक-सांस्कृतिक लोकेशनमे प्रस्तुत करै छथि। नेपालक जनकपुरधामक मैथिली-कथाकार जखन राम-रावण-हनुमानक कथा कहै छथि, तखन ओकर लोकस्वर आ दृष्टि अपन होइत अछि। २. 'लछमिनिञा कनिञा': परमेश्वर कापड़िक सर्वश्रेष्ठ लोककथा २.अ. कथावस्तु: एक गाममे बुढ़बा-बुढ़िया रहैछ। बुढ़ियाक पुतौह (बहू)- 'लबकनिञा', 'छोटखुटिया भुटिया'- परन्तु 'काज-धन्धा आ बुइध-गियानमे बड़ चौतरी।' एक रातिमे नढ़िया (गीदड़-सियार) बजैछ- बहू पशुभाषा जनैछ। नढ़िया बतबैछ जे नदीमे बहल लाशक जांघमे जोड़ा लाल (माणिक) अछि। बहू साहस क' नदीसँ लाल निकाललक, लाशकेँ नढ़ियाके दैत घर घुरल। साउस नहि बुझलक- सोचलक बहू लाश खाइत अएल। उपद्रव भेल, बहूकेँ नैहर पठएल गेल। रास्तामे एक कौआ बाजल- कौआ-भाखाक ज्ञान बहूकेँ। कौआ बतेलक- आयके दिन साँप-दूध पियाओ त' साँप हीरा-मोती देखाओत। बहू ससुरकेँ बुझेलक। ससुर मानि गेल। साँपकेँ दूध-लावा पियाओलक, हीरा-मोती पेलक। घर धन-धाम भरि गेल। साउस-पुतौह मिलि-व्यवहरि सुख-आनन्दसँ रहए लागल। २.आ. लोककथाक संरचना-विश्लेषण: रूसी लोककथा-सिद्धान्तकार व्लादिमीर प्रोप (Vladimir Propp)क 'मोर्फोलॉजी ऑफ फोकटेल' (1928) क अनुसार, लोककथाक एक निश्चित संरचना होइछ। 'लछमिनिञा कनिञा' एहि संरचनाकेँ सटीक रूपसँ पालन करैछ: (अ) प्रारम्भिक अभाव-स्थिति (Initial Lack): गरीबी, बहूक अपमान। (आ) दानदाता (Donor): नढ़िया आ कौआ- जे बहूकेँ विद्या दैछ। (इ) सहायक तत्त्व (Helper Function): पशुभाषा-ज्ञान- बहूक विशेष शक्ति। (ई) संकट-परीक्षण (Test/Challenge): रातिमे नदीमे जेबाक साहस। (उ) अन्तिम विजय (Victory): हीरा-मोती, पारिवारिक मेल। परन्तु मैथिली-मिथिला परम्पराक एक विशेषता अछि जे ई साँप-दूध प्रसंग अन्तमे जोड़ैछ- यएह मैथिली लोककथाक अपन रचनात्मक अतिरिक्त विशेषता थिक। २.इ. भाषाक असाधारण सम्पदा: 'लछमिनिञा कनिञा' रचनाक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पक्ष थिक हुनकर लोकभाषाक शब्द-सम्पदा। निम्नलिखित शब्द-गुच्छ मैथिलीक अनमोल निधि थिक जे मैथिलीमे जीवन्त अछि: 'लबकनिञा', 'हड़हड़ही खटबनरी', 'छोटखुटिया भुटिया', 'छगुनाए', 'धतपताए', 'गुनधुनाए', 'पनिआए', 'लोभाए', 'झिसि-बुन्नीबला', 'बिकराल राइत', 'हुआं-हुआं', 'जुमुस बान्हिक'', 'हबक्का मारि', 'लत्तोपतो', 'हठि-बरदम', 'ढुक्का-फड़की', 'धीपल आइग-बाउल', 'छबकल दबकल', 'पिठिया-ठोक धमक्का', 'नङटिनिञा रकमसनी', 'ओधबाधक'', 'लोहछि झंटियाक'', 'पछमुड़िया कनडेरिया', 'हपैस-लपैकक'।' ई शब्दसभ मैथिली लोकभाषामे जीवन्त अछि। कापड़ि ई सहेज-समेटि एकरा साहित्यिक प्रतिष्ठा दै छथि- इएह हुनकर सभसँ पैघ योगदान अछि। २.ई. स्त्री-चरित्रक विशेषता: बहू 'लबकनिञा, छोटखुटिया भुटिया' थिक- देखएमे साधारण। परन्तु पशुभाषाक दुर्लभ ज्ञान हुनका लग अछि। ई ज्ञान- लोक-परम्परामे 'पशु-सिद्ध' कहल जाइछ- बहूकेँ असाधारण बनाबैछ। ओ एकाएकी रातिमे नदी जाइछ- साहस। लाशसँ लाल निकाललक- कर्मठता। साउसक क्रोधमे नहि टूटल- धैर्य। कौआक भाखा बुझिकऽ ससुरकेँ बुझेलक- बुद्धि। ई चरित्र मिथिलाक 'लछमिनिञा'- साहसी, बुद्धिमान, धनलक्ष्मी- स्त्री-आदर्शक प्रतीक थिक। २.उ. भक्ति-रस आ करुण-रसक समन्वय: कथाक मध्यमे बुढ़ियाक क्रोध (रौद्र रस) आ बहूक असहायता (करुण रस)- दुनूक सम्मिश्रण। परन्तु अन्तमे शान्त-रसमे परिणति- 'तेकर बाद त' साउस-पुतौह सबगोटे मिलि-व्यवहरिक' सुख आनन्दस' रह' लागल।' ई मैथिली लोककथाक परम्परागत 'सुखद अन्त' थिक जे गृहस्थ-जीवनक आदर्शकेँ प्रतिष्ठित करैछ। २.ऊ. तुलनात्मक दृष्टि: 'लछमिनिञा कनिञा' मैथिलीक 'सुनरी-बहुरिया' कथाक परम्परासँ जुड़ल थिक। परन्तु ओहि परम्पराक बहुसंख्य कथामे बहू केवल निष्क्रिय प्राप्तकर्ता होइछ- जादू अपने होइछ। एत' बहू स्वयं साहस करैछ, स्वयं बुद्धि लगाबैछ। ई अन्तर महत्त्वपूर्ण थिक- कापड़ि बहूकेँ 'एजेन्ट' (कर्ता) बनाबै छथि, केवल 'पेशेन्ट' (भोक्ता) नहि। ३. 'यज्ञ-सीता': पुराण-कथाक साहसी पुनर्पाठ: ३.अ. कथावस्तु: जहियासँ राजा राम यज्ञ करै छथि, स्वर्णमयी सीता-प्रतिमा निर्माण होइछ। एहि यज्ञ-सीताक एक समूह राम-निवासमे जमा भ' जाइछ। ओसभ दुखित, उपेक्षित। एकदिन सभ मिलि रामलग जाइछ- स्वीकार माँगैछ। राम एकपत्नी-व्रताक तर्क दै छथि- 'हम मिथिलाधिपति जनकक पुत्री सीताक पाणि-ग्रहण कएने छी।' यज्ञ-सीता प्रश्न करै छथि- 'यज्ञमे सहयोग देलहुँ, जीवनमे किएक नहि?' अन्ततः राम समाधान दै छथि- द्वापरमे कृष्णावतारमे ई सभ गोपी बनि ..। 'ओ सबहेटा यज्ञ-सीता ब्रजमे गोपीसब बनलथि।' ३.आ. साहित्यिक साहस: ई कापड़िक सर्वाधिक साहसी रचना थिक। मैथिली लोक-परम्परामे राम-सीता पवित्र- ओहिमे प्रश्न करब असामान्य थिक। परन्तु कापड़ि मिथिलाक सीता-केन्द्रित दृष्टिकोणसँ (जनक-पुत्री, मिथिलाक बेटी) राम-सीता-सम्बन्धकेँ पुनर्विचार करै छथि। 'यज्ञ करैत काल हम परमावश्यक रहलेटा छी ! / हमरा बिनु अपूर्णे छी ! / यज्ञाधिकारी यज्ञकर्ता हमरे सबके संगस' ने?' ई तर्क शास्त्रीय दृष्टिसँ अटूट अछि। यज्ञमे अर्धाङ्गिनी अपरिहार्य- ई वैदिक विधान थिक। कापड़ि यज्ञ-सीताक मुखसँ ई शास्त्रीय तर्क राखि रामकेँ उत्तर देबएले बाध्य करै छथि। ३.इ. लोक-स्त्रीवाद: ई रचना मैथिली लोक-साहित्यमे स्त्री-अधिकारक विमर्शक श्रेष्ठ उदाहरण थिक। यज्ञ-सीता केवल 'अबला' नहि- ओ तर्क करैछ, माँग राखैछ, अपन अधिकार बुझैछ। 'एहनमे अपनाके आदर्श मर्यादापुरुषोत्तम कहबैत छी?'- ई प्रश्न नेपालक मैथिली साहित्यमे एकटा नव अध्याय खोलैछ। ३.ई. ध्वनि-विश्लेषण: रचनाक वाच्यार्थ-स्तर थिक- यज्ञ-सीताक कथा। परन्तु व्यञ्जनास्तरपर कापड़ि एक गहन सन्देश दै छथि: 'जे समाज अपन स्त्रीकेँ काजमे उपयोग करैछ, परन्तु अधिकार नहि दैछ- ओ असन्तुलित थिक।' आनन्दवर्धनक दृष्टिसँ, ई ध्वनि रचनाक 'आत्मा' थिक। ३.उ. पुराण-पुनर्व्याख्याक परम्पराक सन्दर्भमे: मैथिली कवि विद्यापति (ज्योतेरीश्वर पूर्व विद्यापतिसँ भिन्न) 'भूपरिक्रमा' आ 'पुरुषपरीक्षा'मे पौराणिक कथाकेँ नव दृष्टिसँ देखने छलथि। कापड़ि ओहि परम्पराकेँ आगू बढ़बै छथि- परन्तु नव सामाजिक चेतनाक सँग। ई विदेह समानान्तर इतिहासक महत्त्वपूर्ण पक्ष थिक। ४. 'छौंड़ी-छौंड़ा सुद्युम्न'- लिङ्ग-परिवर्तनक पौराणिक कथा ४.अ. कथावस्तु: राजा विवस्वान् मनु आ रानी श्रद्धाक पुत-कामना। रानी पुतकरन यज्ञ करबैछ- परन्तु कहैछ 'जब होए तब बेटिए।' ऐ कामनाक प्रतापसँ बेटी जन्मैछ- इला। बेटी पाँच-सात वर्षमे मरदनमी व्यवहार। जाँच कएलापर पता लगैछ जे यज्ञमे पुरहितक जपसँ बेटा होएबाक छल- रानीक कामनाक कारण बेटी भेल, मुदा मरदनमी रहि गेल। वशिष्ठ तप-बलसँ बेटीकेँ लड़का (सुद्युम्न) बनेलक। सुद्युम्न जंगलमे जाइछ- शिव-पार्वतीक केलि-विहारसँ ओ वनमे स्त्री बनि जाइछ। बुध ऋषि प्रेम कएलक- पुरुरवा पुत्र भेल। वशिष्ठ देवीभागवत सुनाकऽ स्थायी पुरुष बनेलक। राज्याभिषेक भेल। ४.आ. लिंगभेद-विमर्श: ई कथा श्रीमद्देवी भागवत महापुराण (अध्याय ३)क आधारपर अछि। परन्तु कापड़ि एहि पौराणिक कथाकेँ मैथिलीक अपन लोकभाषामे पुनर्प्रस्तुत करै छथि। कथामे लिंग-परिवर्तन (Gender fluidity) क प्रश्न अछि- जे आधुनिक लिंगभेद-विमर्ससँ जुड़ल अछि। रानीक 'जब होए तब बेटिए'- ई कामना समाजक पुत्र-पक्षपातकेँ उलटाबैछ। ४.इ. भाषाक सजीवता 'ओकरा इला बेटी चारि–पांच बरखके भ' गेलै त' ओकर सबटा चालि–ढालि, बगय–बानि मरदनमी लगै! रहै छौंड़ी आ उ बेसी काज बात करै छड़ा जिका।' 'बगय-बानि', 'छड़ा जिका'- ई मैथिलीक अपन शब्द थिक। 'बगय-बानि' माने चाल-ढाल आ 'छड़ा जिका' माने लड़कापन जकाँ- ई शब्द मानक मैथिलीक शब्दकोशमे नहि भेटत। ४.ई. नव्य-न्यायिक दृष्टि: गंगेशक 'व्याप्ति' सिद्धान्तक अनुसार, कथामे एक तर्कशृंखला अछि: (अ) देवी भागवत सुनबासँ (हेतु) → (आ) सुद्युम्नक स्थायी पुरुष-रूप (साध्य)। परन्तु कापड़ि ऐ व्याप्तिकेँ अन्तिम सत्य नहि मानै छथि- कारण पुरुरवाजी (सुद्युम्नक पुत्र) माता-मातृत्वक प्रमाण थिक। ई नव्य-न्यायक 'व्याप्ति-खण्डन' तकनीकक नाट्यीय उपयोग थिक। ५. 'हृदयबासी ईश्वर' ५.अ. कथावस्तु: सृष्टिक आरम्भमे ईश्वर मनुष्यकेँ विशेष बुद्धि-ज्ञान देलखिन। मुदा मनुआ प्रत्येक छोट-बड़ समस्यामे ईश्वरकेँ खोजऽ लागल। ईश्वर परेशान- जंगल-पहाड़, खोला-कन्दरामे नुकाइथ, तैयो मनुआ खोजिए लैथ। अन्ततः ईश्वर एहन ठाम नुकएलथि जत' मनुआ खोज' नहि जाओत- हुनकर अपन हृदयमे। ५.आ. वेदान्त-लोक: तीनू परम्पराक मेल: ई कथाक बीजविचार तीन परम्परामे अछि: (अ) वेदान्त- 'तत् त्वम् असि', ब्रह्म अपन भीतर। (आ) मैथिली लोककथा- ईश्वरकेँ खोजैत-खोजैत हृदयमे पाबब। परन्तु कापड़ि ऐ तत्त्वज्ञानकेँ शुष्क दर्शन नहि, हास्यात्मक कथाक रूपमे प्रस्तुत करै छथि। 'घैहर गरजु, हेहर-थेथर मतलबी लोक'- ई ईश्वरकेँ खोजैत परेशान मनुआक चित्र हास्यरसक सुन्दर उदाहरण थिक। ५.इ. भाषाक खेल 'ईश कतबो चोरा–नुकाक' औढ़ कातमे चलि जाथि, घैहर गरजु, हेहर–थेथर मतलबी लोक हिनका ताकिए लनि।' 'औढ़ कात' (एकान्त कोना), 'घैहर गरजु' (अत्यन्त आग्रही), 'हेहर-थेथर' (हठी-जिद्दी)- ई शब्द-समूह मैथिलीक जीवन्तताक प्रमाण थिक। 'घैहर' आ 'हेहर'- दुनू ध्वन्यात्मक शब्द जे सुनितहि अर्थ स्पष्ट करैछ। ५.ई. हास्य-दर्शन: ईश्वर परेशान छथि- ई मानवीय छवि (Anthropomorphism) लोककथाक विशेषता थिक। परन्तु कापड़ि ऐ परेशानीकेँ दार्शनिक बनाबै छथि: ईश्वर जतए सहज उपलभ्य- हृदयमे- ओत' मनुआ कहियो नहि खोजैत। ई वक्रोक्ति (Irony)- लोककथाकेँ दर्शनक स्तरपर उठाबैछ। ६. 'लक्ष्मी-बलि खिस्सा' (रक्षाबन्धन-प्रसंग) ६.अ. कथावस्तु: विष्णु राजा बलिक द्वारपर दरबान छथि- वचनबद्धता चलते। लक्ष्मी प्रतीक्षित, चिन्तित। नारद कारण बतबै छथि- वामन-बलि प्रसंग। लक्ष्मी भेख बदलि राजा बलि ओहिठाम जाइ छथि, राखी बान्है छथि। बली दान देबए चाहै छथि। लक्ष्मी माँगै छथि- 'उ दरबान हमरा द’ दा'।' बली दैछ। तहिएसँ रक्षाबन्धन भाइ-बहिनक पावनि। ६.आ. कथाक लोक-पौराणिक सम्मिश्रण: ई कथा विष्णु-पुराण आ भागवत-परम्पराक आधारपर अछि। परन्तु कापड़ि एहिमे मैथिलीक लोकभाषाक जीवन्तता भरि दै छथि। 'अहर ताकय, पहर ताकय', 'बटजोहीमे आंइख खिया', 'तलबल-तलबल लाढ-दुलार', 'हलसल लहालोट'- ई सभ मुहावरेदार प्रयोग कथाकेँ सजीव बनाबैछ। 'लक्ष्मीजीके चालि–ढालि, बगय–बानिसब बलीके बड नीक लगलनि। हुनको उत्सुकता बढ़लनि आ हपसि–लपकिक', दुलारस' हुनका कहलकनि- हे ऐ, बौआ! अहां के छी?' 'हपसि-लपकिक''- मैथिलीक ई मुहावरा (प्रेमभावसँ आगू झपटब) बहुत सटीक अछि। लक्ष्मीक बहिन-रूप- ई प्रेमक सहज अभिव्यक्ति थिक। ६.इ. स्त्री-शक्ति-विमर्श ऐ कथामे लक्ष्मी निष्क्रिय नहि छथि- ओ स्वयं योजना बनबैछ, भेख बदलैछ, बलिकेँ जोड़तोड़ करैछ, विष्णुकेँ मुक्त करबैछ। धन-देवी स्वयं अपन पतिकेँ मुक्त करए मे सक्षम- ए एक सशक्त नारी-आख्यान थिक। ७. 'तप आ सत्संग' ७.अ. कथावस्तु: विश्वामित्र आ वशिष्ठक बीच विवाद- 'तप श्रेष्ठ या सत्संग?' ब्रह्मा आ विष्णु दुनू फेरी-फन्नामे नहि पड़ैछ। अन्ततः शेषनागक परीक्षा- पृथ्वीक भार उठायब। विश्वामित्र अपन समस्त तपसँ उठाबए गेल- नहि उठा सकल। वशिष्ठ 'एक दिनक सत्संगक पुण्य' दैत बजलाह- पृथ्वी अत्तमे लटकि गेल। तप हारल, सत्संग जीतल। ७.आ. दार्शनिक कथाक रूप: ई 'दार्शनिक-तर्क कथा' (Philosophical Fable) थिक- जाहिमे एक गूढ़ दार्शनिक प्रश्नकेँ कथाक रूपमे हल कएल जाइछ। 'तप' आ 'सत्संग'- ई व्यक्तिगत साधना आ सामाजिक-आध्यात्मिक सामुदायिकताक प्रश्न थिक। कापड़िक हास्य-दृष्टि सेहो जागृत रहैछ- 'बड बढिञा, बड नीक बात। शेष भगवान हिनका दुनूके सोहरदे आङे कहलखिन'- ई 'सोहरदे आङे' (सामनेसँ)- हास्यात्मक ढंगसँ शेषकेँ न्यायाधीशक भूमिकामे राखैछ। ७.इ. लोकभाषाक प्रयोग 'ई सुनि, ऋषि विश्वामित्रके ईख बिख लागि गेलैन आ पिनकले, फनकि बजलाह- एह, हमरा भुते ई एतनीटा भार केना नै उठत!' 'ईख-बिख लागब' (ईर्ष्यासँ जलब), 'पिनकले-फनकि' (क्रोधसँ गर्म होकऽ)- ई दुनू मुहावरा मैथिलीक अनमोल निधि थिक। ८. बोधकथा- 'शिक्षा आ दीक्षा' आ 'नम्बर' ८.अ. 'शिक्षा आ दीक्षा' गुरुकुल-परम्परामे एक गुरु राजकुमारकेँ विदाइसँ पूर्व जनसमक्ष अकारण मारैछ। अगले दिन कारण बतबैछ- 'अन्यायक अनुभव कराबए ले। राजा बनबापर न्याय करबाक काल अन्यायपीड़ितक वेदनाक ज्ञान होएतह।' ई बोधकथा भारतीय 'नैतिक-कथा' परम्पराक निकट थिक। परन्तु शिक्षाक ई 'experiential learning' (अनुभव-आधारित शिक्षा) पद्धति आधुनिक शिक्षाशास्त्रक सिद्धान्तसँ मेल खाइछ। 'ओहिस' सबके भितरका आंइख खुइज गेलनि'- ई वाक्य कथाक दार्शनिक सार थिक। ८.आ. 'नम्बर' रातिमे एक सेठ भटकि मन्दिरमे जाइछ। एक दुखित लोककेँ पैसा दैछ- अपन नम्बर-कार्ड सेहो दैछ। ओ लोक कहैछ- 'हमरा नम्बर बुझल छह।' सेठ अचम्भित- ओ कहैछ 'भगमानक नम्बर, जे अहाँकेँ हमरापास पठेलक।' ई कथा एक उत्कृष्ट 'twist ending' (चमत्कारी अन्त) बला बोधकथा थिक। मात्र एक पन्नाक रचना- परन्तु गहन दार्शनिक सन्देश। ईश्वर-विश्वासक ई चित्रण मैथिली बोधकथाक श्रेष्ठ उदाहरण थिक। ९. 'कुत्ता-बिलाइ-मूस' खिस्सा ९.अ. कथावस्तु: कुत्ता-बिलाइ-मूस- तीन मित्र। कुत्ता तीर्थयात्रापर जाइछ, सभ कागज-पत्र बिलाइकेँ देइछ। बिलाइ मूसकेँ राखएले देइछ। मूस खा-ओढ़ि नष्ट करि दैछ। कुत्ता फेरि आबएपर- कागज नष्ट। बिलाइ मूसकेँ मारए उद्यत होइछ। मूस भागैछ- बुझैछ नहि किएक सभ खेहारि रहल अछि। 'तहिएस' आइधरि कुत्ता बिलाइकेँ, बिलाइ मूसकेँ देखितेँ दौड़ैछ। ९.आ. आद्य-कथाक चरित्र: ई 'aetiological tale' (आद्य-कथा) थिक- जे कोनो सामान्य घटनाक मूल कारण बतबैछ। 'किएक कुत्ता बिलाइकेँ आ बिलाइ मूसकेँ खेहारैछ'- ऐ प्रश्नक मजेदार लोक-उत्तर। ई कथा-प्रकार विश्वक सभ लोककथाक परम्परामे थिक। 'जस्ट सो स्टोरीज' (Rudyard Kipling)- ई पाश्चात्य समकक्ष थिक। ९.इ. न्याय-विमर्श: मूस 'बुझबे नै करए जे सभ किएक खेहारि रहल अछि'- ई वाक्य गहन थिक। ओ कागज खाइत आ ओढ़ैत छल- ओकरालेल ई जरूरत थिक। परन्तु एकर परिणाम- सभक हानि। ई 'अनजान-कुकृत्य'क परिणामक कथा थिक। नव्य-न्यायक दृष्टिसँ, मूसक 'ज्ञान-अभाव' (absence of knowledge) हुनकर कर्मकेँ नैतिकतः अपराध नै बनाबैछ। १०. 'गोनूबाबू घरेपर' खिस्सा १०.अ. कथावस्तु: गोनूझा- 'धूर्तोमे धूर्त, महा चुस्त-चलाक।' दीर्घकाल बाहर रहि गाम घुरलखिन। सभ पुछैछ- 'कत' गेल छलिऐ?' उत्तर- 'बुझू, गामेपर।' सभ अकचकाइत। असल कारण: आसिन-कातिक महिनामे लोक सभ 'माँग-खाँग'पर आबैछ। एहन महिनामे घर नहि रहि गामसँ निकइल गेल छल। घुरलापर भी- 'बुझू, गोनूबाबू घरेपर।' १०.आ. गोनूझा-परम्परामे स्थान: मैथिलीक 'गोनूझा' एक विशिष्ट लोक-नायक थिक- चालाक, व्यंग्यकार, अपन लाभ बुझनिहार। अन्य भाषाओंमे ई 'नसरुद्दीन होजा' (तुर्की), 'अकलतम' (हिब्रू), 'बीरबल' (हिन्दी)- जेहन चरित्र थिक। कापड़ि एहि परम्पराकेँ जीवन्त रखै छथि। 'बुझू, गोनूबाबू घरेपर'- ऐ वाक्यक बहुस्तरीय अर्थ अछि: (अ) शाब्दिक- 'हम गामेपर छी।' (आ) व्यंग्यार्थ- 'कत' गेल छलहुँ से नहि बतेबै।' (इ) निहित- 'मांग-खाँग-बला लोकसभसँ बचए गामसँ भागल छलहुँ।' ई तीन स्तर कुन्तकक 'वक्रोक्ति' थिक। १०.इ. सामाजिक व्यंग्य: 'ऐ महिनामे आबि, केहनो घरेके कोठी, भम्ह भइए जाइछ'- ई आसिन-कातिकक आर्थिक तंगीक सटीक चित्रण थिक। गोनूझाक चालाकी एक जीवन-रणनीति थिक- हँसीमे थिक, तथापि यथार्थ थिक। मैथिल समाजक ग्रामीण आर्थिक चक्रक ई दर्पण थिक। समग्र आलोचनात्मक मूल्यांकन १२.अ. कापड़िक कथाकार-रूपक विशेषता मैथिलीक खाँटी स्वरूपक संरक्षण कापड़िक सभसँ विशिष्ट योगदान थिक- समानान्तर धाराक खाँटी मैथिली केँ साहित्यिक प्रतिष्ठा देनाइ। 'लबकनिञा', 'हड़हड़ही', 'छगुनाए', 'धतपताए', 'हपसि-लपकिक'', 'पछमुड़िया', 'हठि-बरदम', 'घैहर गरजु', 'हेहर-थेथर'- ई सभ शब्द यदि कापड़ि नहि लिखितथि त' साहित्यमे नहि अबितए। पशु-भाषा परम्पराक पुनरुद्धार 'लछमिनिञा कनिञा'मे पशुभाषा-ज्ञान, हनुमान नाम स्मरणके महिमा'मे दिव्य-बुद्धि- ई दुनूमे कापड़ि मैथिली लोककथाक प्राचीन 'पञ्चतन्त्र-जातक' परम्पराकेँ जीवन्त रखै छथि। आधुनिक मैथिली कथामे ई परम्परा लगभग लुप्त भऽ गेल छल। पौराणिक कथाक नव-पाठ (Counter-reading) 'यज्ञ-सीता'मे राम-सीता-सम्बन्धक प्रश्न, 'छौंड़ी-सुद्युम्न'मे लिंग-परिवर्तनक कथा, 'हाय राम!'मे रामक 'मर्यादा'पर प्रश्न- ऐ सभमे कापड़ि पौराणिक कथाकेँ आँखि बन्द कऽ स्वीकार नहि करै छथि। ओ 'critical engagement' (आलोचनात्मक संवाद) करै छथि- इएह हुनकर आधुनिकता थिक। हास्य-व्यंग्यक कुशल प्रयोग 'गोनूबाबू घरेपर', 'नम्बर', 'तप आ सत्संग', 'हृदयबासी ईश्वर'- सभमे हास्य-व्यंग्य अछि। परन्तु ई हास्य सरल मनोरंजनसँ आगू अछि- दर्शन आ सामाजिक टिप्पणी। १२.आ. सीमा (क) कथाक लम्बाइ: अधिकांश कथा अत्यन्त संक्षिप्त (फेसबुक-पोस्ट आकारक)- गहन चरित्र-विकास सम्भव नहि होइछ। (ख) पुनरावृत्ति: दोहराओल विषय बहुत अछि- सम्पादन-अभावक परिणाम। (ग) कथाक व्यापकता: सभ कथा धार्मिक-पौराणिक या लोकनीतिक अछि। समकालीन सामाजिक यथार्थपर आधारित कथा (जेना 'लछमिनिञा' जेहन) बहुत कम अछि। १२.इ. मैथिली लोककथाक इतिहासमे स्थान मैथिली लोककथाक इतिहासमे- मैथिली परम्परामे कापड़ि विरल छथि जे ग्रामीण मैथिलीकेँ साहित्यिक कथाक माध्यम बनाबै छथि। विदेह समानान्तर इतिहासक दृष्टिसँ- 'What the Canon Left Out'- कापड़िक कथा मुख्यधारा मैथिली साहित्य-इतिहाससँ 'छोड़ल गेल' अछि। नेपालक मैथिली कथाकारकेँ साहित्य-अकादेमी-केन्द्रित इतिहासमे ठाम नहि भेटैत छल। एहि समीक्षाक माध्यमसँ विदेह ओहि अन्यायकेँ सुधारए चाहैए। रचनाकारक प्रति समर्पित: परमेश्वर कापड़ि- मैथिलाक माटि-पानिक सच्चा सेवाधर्मी [सैद्धांतिक विवेचन लेल देखू- मैथिली समीक्षाशास्त्र- गजेन्द्र ठाकुर] अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१८. गजेन्द्र ठाकुर- परमेश्वर कापड़ि- पद्य-रचनाक आलोचनात्मक समीक्षा गजेन्द्र ठाकुर परमेश्वर कापड़ि- पद्य-रचनाक आलोचनात्मक समीक्षा (मूल रचना, अनुवाद, उद्धृत पद्य -सभ सम्मिलित) रस-ध्वनि-वक्रोक्ति • नव्य-न्याय • विदेह समानान्तर इतिहास भूमिका: परमेश्वर कापड़िक कविता-संसार परमेश्वर कापड़िक रचना-दस्तावेजमे पद्य-रचनाक विविध स्तर अछि- हुनकर मौलिक पद्य, हुनकर आलोचनामे उद्धृत अन्य कविक गजल, बालगीत, ऋग्वेदक अनुवाद, संस्कृत श्लोकक मैथिली भावानुवाद, आ विभिन्न लोकगीत-फकड़ा। पद्य-रचनाक श्रेणी निम्न प्रकारसँ अछि: (क) मौलिक मैथिली दोहा/मुक्तक (ख) ऋग्वेद नासदीय सूक्तक मैथिली अनुवाद -'तत्ववोध' (ग) संस्कृत श्लोकक मैथिली भावानुवाद -गीता, नासदीय, सीता-स्तोत्र (घ) बालगीत -'हमर जनकपुरधाम', 'सीता अवतार' (ङ) 'रेङ-रेङ'क गीत-फकड़ा (च) हिन्दी गजल (धीरेन्द्र प्रेमर्षि) -कापड़िक समीक्षा-सहित (छ) डा राजेन्द्र विमलक मैथिली गजल -कापड़िक विस्तृत समीक्षा (ज) कथा-काव्य 'दाम' १. 'तत्ववोध'- ऋग्वेदक नासदीय सूक्तक मैथिली अनुवाद ई सम्पूर्ण दस्तावेजक सर्वाधिक महत्त्वाकांक्षी पद्य-रचना थिक। ऋग्वेदक दशम मण्डलक १२९ म सूक्त -'नासदीय सूक्त'- जे सृष्टिक रहस्यपर विश्वसाहित्यक प्राचीनतम दार्शनिक प्रश्न उठाबैछ- तकर कापड़ि मैथिलीमे अनुवाद प्रस्तुत कएने छथि, राधाकृष्णन-मूर ग्रन्थक आधारपर। १.अ. पद्यांश केओ नहि तखन छल / नहि निर्जीवो / वायु नहि / नहि छल आकाश ओकर उपर / की छल गुप्त / कत ? / ककर संरक्षणमे / आ छल गहींर, अमाप्य सागर? मृत्यु तखनो नहि छल / नहि छल अमर जीवन / सांस लैत छल वायुहीनतामे / ओकर अतिरिक्त एत' कोनो वस्तु नहि छल। शुरुमे ओहिमे प्रवेश कएल इच्छा / ई सोचि / सर्जनक सर्वप्रथम बीज छल। के जनैत अछि निश्चित रुपस'? / के एकरा स्पष्ट करत? / कहिया जन्म लेलक / आ कहिया बनल ई सृष्टि? ईश्वरे ई जनैत छथि / आ शायद ओहो नहि जनैछ! १.आ. अनुवाद-कौशलक विश्लेषण ऋग्वेद मूलक 'नासदासीन्नो सदासीत्तदानीम्' (न सत् आसीत् न असत् आसीत्) -'तखन ने होइत छल ने नहि होइत छल'- यएह सृष्टि-पूर्व-अवस्थाक नेति (नकारात्मक नै) वर्णन कापड़िक अनुवादमे बदलि गेल 'केओ नहि तखन छल / नहि निर्जीवो।' ई छोट-छोट, खण्डित पंक्ति- अनुवादक नहि, पुनर्सृजनक लक्षण थिक। मूल संस्कृतक 'आनीदवातम् स्वधया तद् एकम्' (वायुहीनतामे ओएह एक साँस लैत छल)- कापड़ि लिखै छथि 'सांस लैत छल वायुहीनतामे।' ई एक पंक्ति मैथिलीक गहनतम विरोधाभास-काव्य (Oxymoron poetry) थिक। वायुहीनतामे साँस- यएह विरोधाभास सृष्टि-पूर्वक अकथनीयताकेँ व्यक्त करैछ। १.इ. रस-विश्लेषण भरत मुनिक नवरसमे 'अद्भुत' रस - जे आश्चर्यक भावसँ उत्पन्न होइछ - एहि कवितामे सर्वत्र व्याप्त अछि। 'सर्जनक सर्वप्रथम बीज छल'- यएह उक्ति अद्भुतरसक चरमोत्कर्ष थिक। परन्तु अन्तिम पंक्ति -'ईश्वरे ई जनैत छथि / आ शायद ओहो नहि जनैछ!' - अद्भुत रसकेँ 'करुण'मे बदलि दैछ - अज्ञानक करुणा। १.ई. नव्य-न्यायिक दृष्टि गंगेश उपाध्यायक 'प्रमाण-सीमा' (Epistemological Limit) सिद्धान्तक अनुसार -प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द -ई चारू प्रमाण सृष्टि-पूर्वक ज्ञान देबएमे असमर्थ अछि। 'के जनैत अछि निश्चित रुपस'?' - ऐ प्रश्नमे नव्य-न्यायक 'ज्ञान-सीमा' (Cognition Limit) स्वयं कापड़िक अनुवादक माध्यमसँ ध्वनित होइछ। १.उ. ध्वनि-विश्लेषण आनन्दवर्धनक ध्वनि-सिद्धान्तक अनुसार, एहि कवितामे तीन ध्वनि-स्तर अछि: (अ) शाब्दिक -सृष्टि-पूर्वक भौतिक वर्णन। (आ) रूपकात्मक- मानव-अज्ञानताक चित्रण। (इ) दार्शनिक व्यञ्जना -'ईश्वरो नहि जनैछ' -यएह अज्ञेयवादक (Agnosticism) गहनतम ध्वनि थिक। मैथिली साहित्यमे ऐ स्तरक दार्शनिक-काव्य अत्यन्त दुर्लभ अछि। १.ऊ. विदेह फ्रेमवर्क मैथिली कवितामे वैदिक दर्शनक ई साहसी अनुवाद-परम्परा दुर्लभ अछि। विद्यापतिक बाद -जे संस्कृत आ अवहट्ठक बीच सेतु बनेलथि - कापड़ि ऋग्वेदक सर्वाधिक रहस्यमय सूक्तकेँ मैथिलीमे उतारि एक नव परम्पराक आरम्भ करै छथि। ई विदेह समानान्तर इतिहासक महत्त्वपूर्ण अध्याय थिक। २. मौलिक दोहा/मुक्तक २.अ. राजनीतिक दोहा घंटी बाजल, राजनीति टनमन भेल। बहुते दलके देखू जीबिते मइर गेल।। ई दोहा कापड़िक राजनीतिक व्यंग्यक सर्वश्रेष्ठ काव्य-अभिव्यक्ति थिक। दुइ पंक्तिमे एक पूर्ण व्यंग्य-चित्र। 'घंटी बाजल' -चुनाव-घंटी। 'राजनीति टनमन भेल' - नव उत्साह। 'जीबिते मइर गेल' - राजनीतिक दलक नैतिक मृत्यु। ई तीन क्रम मात्र दुइ पंक्तिमे - इएह दोहाक क्षमता थिक। कुन्तकक वक्रोक्ति -'जीबिते मइर गेल' -जीवितावस्थामे मृत्यु - यएह विरोधाभास (Paradox) राजनीतिक नैतिकताक पतनकेँ एक चित्रमे बन्द करैछ। नेपालक राजनीतिक वास्तविकता - जतए दल चुनावमे हारल तखन नहि, आत्मा मरलापर 'जीबिते मइर' गेल -ई आधुनिक मैथिली दोहाक श्रेष्ठ उदाहरण थिक। २.आ. लोकोक्ति-मुक्तक भरि गाम ओझा चलब केकर सोझा! ई दुइ-पंक्तिक लोकोक्ति-मुक्तक शहीद-दिवसक सन्दर्भमे कहल गेल अछि। 'भरि गाम ओझा' - गाममे सभ अपनाकेँ विशेषज्ञ मानैछ। 'चलब केकर सोझा' -तखन मार्गदर्शन कत्तऽ सँ? कापड़ि एहि लोकोक्तिकेँ आन्दोलन-विमर्शमे प्रयोग करै छथि। नेपालमे अनगिन शहीद्-सभ 'आन्दोलन'क नेतागण- परन्तु वास्तविक नेतृत्व-शून्यता। ई उपमा-प्रयोग (Metaphorical Application) काव्यिक-राजनीतिक विमर्शक उदाहरण थिक। भरतक नाट्यशास्त्रक 'हास्य रस' - परन्तु उपर-हास्य, भीतर करुण -इएह मिश्रण 'भरि गाम ओझा'क रसनिष्पत्ति थिक। २.इ. माय-मुक्तक मायसन माय नै। मायसन केउ नै। मात्र छह-सात शब्दमे -'माय' (माँ) शब्दक अनन्त महिमा। ई लघुतम काव्य - परन्तु भावक सघनता सर्वाधिक। 'मायसन माय नै' - तुलनाक अनुपस्थिति (Absolute Uniqueness) - माँसँ बड़ कोनो माय नहि। करुण-रसक आधार - वात्सल्यक चरम। भरत मुनिक 'वात्सल्य स्थायी भाव' - जे भारतीय काव्यशास्त्रमे 'करुण' अन्तर्गत आबैछ - ई दुइ पंक्तिमे घनीभूत अछि। ई मातृ-दिवसक अवसरपर कहल गेल - परन्तु ओहिसँ परे, कालातीत सत्य थिक। २.ई. जन्मदिन-श्लोक आई छठि के पारण दियावाती (लक्ष्मीपूजा) मे माई के जनमदिन छठि परमेश्वरी के पारण मे बाउ के जनमदिन दुन्नूके नामो जन्मदिने अनुरूप, लक्ष्मीपूजामे भेने लक्ष्मी आ छठि पारणमे भेने परमेश्वर पुत्र (कुमार भास्कर) द्वारा पिता-माताकेँ जन्मदिन-श्रद्धा। ई रचना कापड़िकृत नहि, बरु हुनकर पुत्रकृत। एहि प्रसंगमे एक महत्त्वपूर्ण काव्यात्मक तथ्य अछि: लक्ष्मी (माँ) आ परमेश्वर (पिता) -नामानुसार पावनि - लक्ष्मीपूजापर माँक जन्म, छठि-पारणपर पिताक जन्म। ई संयोग-काव्य (Coincidence Poetry) मैथिली परम्परामे विशिष्ट थिक। ३. बालगीत -'हमर जनकपुरधाम'[(हमर मैथिली पोथी, तेसर किलास) ] आ 'सीता अवतार' [भुवनेश्वर प्रसाद 'अध्यापक' (मैथिली बाल रामायण)] ३.अ. 'हमर जनकपुरधाम' लवकुशके मामा गाम / सएह थिक हमर जनकपुरधाम धियासिया आदर्शे कएलनि / पुण्य ई मिथिला भूमिक नाम विदेह जनकक ई राजधानी / जनमौलक अगबे सज्ञानी मधुसन मीठ मैथिली भाषा / बजनिहार मैथिल स्वाभिमानी। ई बालगीत 'हमर मैथिली पोथी, तेसर किलास'मे संकलित अछि। कापड़ि एकरा उद्धृत करै छथि - इएह उनकर बालसाहित्य-चेतनाक प्रमाण थिक। 'लवकुश के मामा गाम' -जनकपुरकेँ लव-कुशक ननिहाल (मामाक घर) कहबाक काव्यिक परम्परा मैथिलीमे पुरान अछि। ऐ बालगीतमे ई परम्परा सहज रूपसँ आबैछ। 'मधुसन मीठ मैथिली भाषा' - ई उपमा अद्वितीय थिक। मधु (मध) सन मीठ- स्वरक माधुर्यकेँ खाद्य माधुर्यसँ तुलना- ई संवेदना-तन्त्रक अन्तर-विपर्यय (Synaesthesia) थिक। रस: वीर रस - 'मैथिल स्वाभिमानी' - स्वाभिमानक उद्बोधन बालमनमे वीरत्वक बीज रोपैछ। ३.आ. 'सीता अवतार' (भुवनेश्वर प्रसाद 'अध्यापक', मैथिली बाल रामायण) सीता लेल कोना अवतार / सुनू कथा अछि बड़ विस्तार जखन कैल निशिचर उतपात / धर्मकर्म सब भेल निपात मिथिलामे वर्षा नहि भेल / तखन जनक हर हाथहि लेल जखनहि जोतै लगला भूमि / तखनहि भेल प्रगट धतिभूमि गुंजित भेल गगनस' वाणी - जगदम्बा अवतार लेलनि दनुज बढ़ल धरतीपर -हरती भूमिक भार धरती माता नृपति जनककें देलनि नव उपहार कष्ट शोक दुखस' जग पाबि सकल उद्धार कापड़ि एहि बालगीतकेँ उद्धृत करै छथि -आ ई सटीक चयन थिक। 'सीता अवतार' मैथिली बाल-रामायणक एक महत्त्वपूर्ण गीत अछि जे रावणक रक्त-कलशसँ सीताक जन्मक पौराणिक कथाकेँ सरल-सुगम लयमे कहैछ। 'जखनहि जोतै लगला भूमि / तखनहि भेल प्रगट धतिभूमि' -यएह दुइ पंक्ति बालगीतक सर्वोत्तम भाग थिक। 'धतिभूमि' (धरातलसँ प्रकट) -ई मैथिलीक विशिष्ट शब्द-प्रयोग थिक। लय, तुक, आ भाव -तीनू संतुलित अछि। अन्तिम चतुर्दल (Quatrain) -'गुंजित भेल गगनस' वाणी' -दीर्घ पंक्तिमे भव्यता आबैछ। यएह लयक उत्थान-पतन (Rhythmic variation) बालगीतकेँ एकघेघाहपनसँ बचाबैछ। ४. 'रेङ-रेङ'क गीत-फकड़ा घेघहा भेम्ह बजनिञा, गिरगिट लोकनिञा कुदका बेङ कहरिया मूसा सजल बरियात हे! जुग जग हँसौनिञा बाप पगडी खसौनिञा लाढो मुसरी बियाहन बिल्लीमे चलल बरियात हे! ४.अ. फकड़ाक स्वरूप ई 'रेङ-रेङ' नाटकक गीत-फकड़ा थिक। मैथिलीक 'फकड़ा' परम्परा -लोकगीतक एक विशिष्ट रूप -जाहिमे जानवर-पात्रद्वारा मानव-समाजपर व्यंग्य कएल जाइछ। ४.आ. प्रतीक-विश्लेषण 'घेघहा भेम्ह' (गला फुलाएल) -राजनेताक आत्म-प्रशंसा। 'गिरगिट लोकनिञा' -रंग बदलनिहार राजनीतिज्ञ। 'कुदका बेङ' (छलांग लगाइत बेंग) -अवसरवादी। 'मूसा सजल बरियात' -माउस-बारात -मूसक बारात बिल्ली-घर जाइत! -ई परम्परागत मैथिली 'बिड़बंबनी' (Burlesque) थिक। 'बाप पगडी खसौनिञा' -पिताक प्रतिष्ठाकेँ नष्ट करनिहार। 'लाढो मुसरी बियाहन' -उच्छृंखल विवाह-बंधन। 'बिल्लीमे चलल बरियात' -बिल्लीक दरवाजेपर बारात -हास्य-रसक चरम। ४.इ. लोकनाट्य-परम्परासँ सम्बन्ध मैथिली लोकनाटकमे 'नटुआ' परम्परा -जाहिमे जानवर-मुखोटा पहीरि समाज-व्यंग्य कएल जाइछ -एहि फकड़ाक जड़ि ओहिसँ जुड़ल अछि। कापड़ि एहि प्राचीन परम्पराकेँ आधुनिक राजनीतिक थिएटरक सन्दर्भमे जीवन्त करै छथि। ५. धीरेन्द्र प्रेमर्षिक हिन्दी गजल -कापड़िक पाठकीय समीक्षासँ ५.अ. गजलक पाठ कि धीरज पाल रे बन्धु / जुरुरत टाल रे बन्धु खुशी हैं गमका साथी / समय को चाल रे बन्धु हैं जो भी दिया खुदाका / उसे संभाल रे बन्धु रखा हैं क्या रंजिश में / जहन से निकाल रे बन्धु बेखुदी की खुद में ही / खुदी खंगाल रे बन्धु डूबके प्रेम में हो जा / तू माला माल रे बन्धु हैं गर 'प्रेमर्षि' बनना / जिगर रख लाल रे बन्धु ५.आ. कापड़िक समीक्षा-दृष्टि -स्वयं एक काव्यात्मक गद्य कापड़ि एहि गजलकेँ पढ़िकऽ जे 'पाठकीय उहापोह' लिखलनि -जे स्वयं एक काव्यात्मक गद्य थिक। हुनकर पहिल प्रतिक्रिया -'तेसर पंक्तिपर पग दैते, मोह भंगसँ मन खटा गेल जे आहि रे वा, ई त' हिन्दी गजल अछि' -ई एक मैथिली-प्रेमीक स्वाभाविक प्रतिक्रिया थिक। परन्तु तत्पश्चात् कापड़ि अपन संकीर्णता स्वीकार करि, गजलकेँ वस्तुनिष्ठ दृष्टिसँ देखै छथि: 'हिनक रचनाक भाषा-साहित्यक सौष्ठवके समग्रताके निरेखने अवधारने, मान' पड़त जे एहि रचनाके माध्यमसँ हिनक भाषिक रवानी गजलक रचनागत विन्यास बेछप आ सरस अछि।' ई आत्म-सुधार (Self-correction) कापड़िकेँ एक ईमानदार समीक्षक साबित करैछ। ५.इ. गजलक काव्यगत विश्लेषण 'खुशी हैं गमका साथी' -यएह शेर (couplet) सूफी परम्पराक 'फना' (आत्म-विलोपन) दर्शनसँ जुड़ल अछि। खुशी आ गम -विरोधी -परन्तु साथी -ई विरोधाभास-सौन्दर्य (Paradoxical aesthetics) उर्दू गजलक मूल आत्मा थिक। 'बेखुदी की खुद में ही / खुदी खंगाल' -'बेखुदी' (Self-loss) मे 'खुदी' (Self) ढूंढ़ब -ई सूफी आत्म-साक्षात्कारक पद्धति थिक। मीरा, कबीर, रहीमक परम्परा -जाहिमे कापड़ि प्रेमर्षिकेँ राखि देलखिन -उचित थिक। कापड़िक तुलनात्मक टिप्पणी -'हिनकामे बहुते मीरा, तुलसीदास, आ सूरदासक निर्मल मनक युगसंचेतना देखाइ दैत अछि' -ई मैथिली आलोचनाक उत्कृष्ट उदाहरण थिक। ६. डा राजेन्द्र विमलक मैथिली गजल -कापड़िक विस्तृत समीक्षा ६.अ. गजल-१: क्रान्तिक आह्वान जोड़ि बाँहि बाँहस', जोरस' आवाज दियौ रोटी चोरओने अछि, पेट ओकर फाड़ि लिय। बहिरा करैत अछि, डँसैत रहत, पुजू नहि घेंटे छपटि दियौ, हाथमे तरुआरि लिय। हमर खून जे पीलक, कए देबै खून तकर अपन खून-खूनमे, धधरा पसारि लिय। रावण-बध धर्म थिक, जरत पापके लंका डंका से पीटि-पीटि, धर्म-ध्वजा गाड़ि लिय। शब्दक हुक्कालोली, भजिते हम रहब विमल चेतनाक दीपावली, सजा आ' सिङारि लिय। समीक्षा कापड़ि एहि गजलकेँ 'बहुत आक्रमक तथा विष्फोटक' कहै छथि -ई सटीक वर्णन थिक। 'घेंटे छपटि दियौ, हाथमे तरुआरि लिय' -ई रौद्र-रसक चरमोत्कर्ष थिक। भरत मुनिक रौद्र-रस -'क्रोध' स्थायी भाव -एहि शेरमे प्रचण्ड रूपसँ उपस्थित अछि। 'रोटी चोरओने अछि' -शोषण-विमर्श। 'पेट ओकर फाड़ि लिय' -रूपकात्मक प्रतिशोध -शाब्दिक हिंसा नहि, काव्यिक न्याय-माँग। वक्रोक्ति-दृष्टि: 'धर्म-ध्वजा गाड़ि लिय' -प्रतिरोधकेँ धर्म-युद्ध (Dharmic war) कहब -यएह वक्र-प्रतीकतन्त्र थिक। ६.आ. गजल-२: 'मार सार दोगलाके' -व्यंग्य-गजल ठाँय ठाँय गोली, मार सार दोगलाके दैत छौक बोली, मार सार दोगलाके। चास-बास, बेटी-पुतहुधरि ने छोड़तउ ओढ़ने छौ खोली, मार सार दोगलाके। पुरखा-दर-पुरखा, बस घेंट रेतलकौ छौ घेंटकट्टा-टोली, मार सार दोगलाके। ऐ गजलमे 'मार सार दोगलाके' -पाँचोपर एकहि रदीफ (Refrain) -यएह रिपीटिशन तकनीक रौद्र-रसकेँ प्रचण्ड करैछ। 'चास-बास, बेटी-पुतहुधरि' -अर्थात् जीवनक सभ कुछ -सर्वग्रासी शोषण। 'घेंटकट्टा-टोली' -गला काटनिहारक दल -ई मैथिलीक विशिष्ट गारि-शब्द जे काव्यमे प्रयुक्त होइछ -साहसिक भाषाई प्रयोग थिक। ६.इ. गजल-३: 'छै कोन लोकक बस्ती' छै कोन लोकक बस्ती, सभ लोक एतए घायल छै छै खोपरीपर ताला, आ जीभ सभक काटल छै। लटकि चलै लोक एतए, हेँज बान्हि सूलीपर छै कोन शहर, जतए लोक स्वेच्छास' टाँगल छै। बदलै छै संविधान रोज, वेश्याक नया लहङासन नूआ हमर मतारिके, एखनो धरि फाटल छै। ई गजल विमलक सर्वश्रेष्ठ थिक। 'बस्ती जतए सभ घायल' -ई उद्घाटन-शेर (Mataala) अद्भुत थिक। 'खोपरीपर ताला, जीभ काटल'- मानसिक-वाचिक दासताक रूपक। 'लटकि चलै हेँज बान्हि सूलीपर' -यएह सूली-उपमा (Crucifixion metaphor) आधुनिक मैथिली गजलमे नव थिक। 'संविधान बदलै रोज, वेश्याक नया लहङासन' -'वेश्या-संविधान' उपमा -अत्यन्त विवादास्पद, परन्तु काव्यिकतः अत्यन्त प्रभावशाली। 'नूआ हमर मतारिके एखनो धरि फाटल' -गरीबीक यएह व्यक्तिगत-सार्वजनिक बिम्ब (Personal-Universal image) विमलकेँ महान बनाबैछ। ६.ई. गजल-४: 'तखने दीवाली थिक' जगमग ई सृष्टि करए, तखने दीवाली थिक चेतनाक दीप बरए, तखने दीवाली थिक। जीर्ण आ पुरातनकें, हुक्कालोली बनाउ पलपल नव दीप जरए, तखने दीवाली थिक। तमिस्राकेर सूत्रधार! सावधान! सावधान! राकेट बम उड़ि लड़ए, तखने दीवाली थिक। ऐ गजलमे 'तखने दीवाली थिक' -रदीफ -प्रत्येक शेरमे दीवाली-उत्सवकेँ एक नव शर्तसँ जोड़ैछ। 'चेतनाक दीप' -बौद्धिक जागरण। 'हुक्कालोली' -लोकभाषाक ई शब्द (खुलेआम उपहास) गजलमे दुर्लभ थिक -लोकभाषा आ उर्दू-गजल परम्पराक मेल। 'राकेट बम उड़ि लड़ए, तखने दीवाली थिक' -दीवालीक आनन्द-पर्वमे बम-विस्फोटक प्रतीक -ई रचनाक सबसँ वक्र उक्ति थिक। 'अन्धकारक सूत्रधार' कें सावधान करब -क्रान्तिकारी चेतनाक काव्यिक उद्बोधन। ६.उ. गजल-५: 'इनकिलाब गगनमे' इनकिलाब गगनमे के लीखि टङै छै सोनितसँ धरती-आसमान रङै छै। हमर चान-ताराकेर कविताकेर खून कए के जीवनमे नफरतकेर ग्रन्थ तगै छै? भूखलसँ नीक मरय गोली खा लोक इएह सत्य बूझि ओ मृत्यु चुगै छै। 'इनकिलाब गगनमे के लीखि टङै छै' -ई उद्घाटन-शेर मैथिली गजलक इतिहासमे स्मरणीय थिक। 'सोनितसँ धरती-आसमान रङै छै' -खूनसँ आकाश-धरती रंगाएल -ई बिम्ब क्रान्ति-काव्यक उत्कर्ष थिक। 'कविताक खून' -कविताकेँ जीवित प्राणी मानिकऽ हुनकर हत्याक आरोप -ई Personification आधुनिक मैथिली कवितामे विरल थिक। 'भूखलसँ नीक मरय गोली खा' -यएह निर्दयी यथार्थवाद (Brutal realism) -जे जीवनक गरीबी-त्रासदीकेँ बिना अलंकारक कहैछ -महान काव्य-उक्ति थिक। परमेश्वर कापड़ि जकड़ा गजल संग्रह ['सूर्यास्तसॅ पहिने' स'- राजेन्द्र विमल] कहि रहल छथि से अछि गीत संग्रह। दोहा, कुण्डलिया, रोला सन गजल सेहो विधा थिक जे नहिये राजेन्द्र विमल सीखि सकलाह नहिये धीरेन्द्र प्रेमर्षि। आब देखू ई तथाकथित बाल गजल राजेन्द्र विमलक संग्रहसँ: अओ हजूर खाउ खजूर अपने मालिक हम मजदूर सत्ताक दारू चूरमचूर हमरे नोकर हमहीं दूर हमरा दगैए हमरे घूर पाॅच बरखधरि कानमे तूर अबै छौ फेरो पकडिक' थूर गरीबक मन नइ होएतै पूर पोंपों गडीमे करियौ टूर भोंटक बक्सा क' देत भूर अओ नेताजी आएब जरूर एमरी धासब लाठीक हूर आ रे कौआ आ रे कौआ आ'- आ'- आ' उडि उडि आ, दौड दौडि आ आ रे चिडैया उडि -उडि आ हमरा बौआके नाचि क देखा आ रे सुगा आ'- आ' - आ' आ रे मैना आ'- आ' - आ' सुगा मैना उडि - उडि आ आम लताम खोधि खसा मैना आएल सिलोरिया सुगा आएल हरियरिया जामुन गिरएलक करिया बौआ बिछलक झोरिया बौआ पोती हम्मर ई बौआ पोती हरख आनन्दक ज्योती खाएत परौठा रोटी देत ने केकरो खोंटी देख'मे बड छोटी बात बाजत पकठोसी चट खेलत पट कानत हॅसत त' हीरा - मोती डिजिटल गेम खेल खेलौना 'टच' 'क्लीक' के गोटी ई एकटा नीक बालगीत भऽ सकैए बाल गजल नै। ७. संस्कृत श्लोकक मैथिली भावानुवाद ७.अ. गीताक श्लोक -'पिता हमस्य जगतो' (रचना-क्र. ८६) पिता हमस्य जगतो माता धाता पितामहः। वेद्यं पवित्र ओंकार ऋक्सामयजुरेव ॐ।। मैथिली भावानुवाद: 'हमही सम्पूर्ण जगतके धाता अर्थात् धारण-पोषण कएनिहार एवं कर्म सबके फल देनिहार तथा पिता, माता आ पितामह छी आ जानबायोग्य पवित्र ओंकार तथा ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद हमहीं छी!' कापड़िक अनुवाद-पद्धति: संस्कृतक संक्षिप्तता -एक श्लोकमे विश्वव्यापी सत्य -मैथिलीमे विस्तारपूर्वक व्याख्यात। 'धारण-पोषण कएनिहार' -'धाता'क अनुवाद -'धाता' शब्दक तीन-स्तरीय अर्थ (Dhata = Creator + Sustainer + Karma-giver) कापड़ि सभकेँ समाहित करै छथि। ७.आ. सीता-स्तोत्र -'त्वं विद्या परमात्रैलोक्य जननी' त्वं विद्या परमात्रैलोक्य जननी स्वर्गापवर्ग दायिनी। त्रैलोक्या कर्षणी देवी सीता देवी नमस्तुते।। मैथिली भावानुवाद: 'अहाँ परम तथा तीनू लोकक माता परम विद्या छी। अहीं स्वर्ग तथा अन्य विशिष्ट लोक प्रदायिनी छी। अहीं तीनू लोकके आकर्षणके केन्द्र छी। हे सीते अहांके प्रणाम अछि!' 'त्वं विद्या' -'अहाँ... परम विद्या' -संस्कृतक तात्कालिक पहचान-उक्ति मैथिलीमे विस्तृत। 'त्रैलोक्या कर्षणी' -'तीनू लोककेँ आकर्षित करनिहारी' -'कर्षणी' शब्द चुम्बकीय शक्तिक अर्थमे -कापड़ि एहि जटिल शब्दकेँ सरल मैथिलीमे 'आकर्षणके केन्द्र' कहिकऽ सुलभ बनबै छथि। ७.इ. नारद-वचन -श्लोकक भावानुवाद धर्माधर्म विवेकेन वेदमार्गानुसारिणी। सर्वलोकहितासक्ता: साधव: परिकीर्तिता:।। -नारद, १६(२९-३१) मैथिली भावानुवाद: 'जे आदमी धर्म आ अधर्मके विवेक क', वेदोक्त मार्गपर चलैछ, हुनका साधु कहल जाइछ।' ई भावानुवाद कापड़िक अनुवाद-सिद्धान्तकेँ स्पष्ट करैछ -ओ शब्द-प्रति-शब्द अनुवाद नहि करैछ। 'सर्वलोकहितासक्ता' -'सभ लोककेँ हित चाहनिहार' -ऐ एक पदक विस्तार कापड़ि तत्काल नहि करै छथि, कारण अनुवादक लक्ष्य -मैथिली पाठककेँ 'साधु' शब्दक परिभाषा बुझेनाइ -पूरा भ' जाइछ। ७.ई. गंगासागर-स्तोत्र (पुराण) गङ्गाद्य: सरित: सर्वाधिक स्त्रिषु लोकेषु विश्रुता। ता सर्वा अनपायिन्यो गङ्गसागर मण्डलले।। मैथिली भावानुवाद: 'हे पार्वती! त्रिभुवनमे विख्यात गंगादिक जतेक महापवित्र नदी सब अछि ओ सब श्री मिथिलाके गंगासागर सरोवरमे निरन्तर निवास करैत अछि!' ऐ श्लोकक उद्धरण कापड़ि जनकपुरक गंगासागर सरोवरक पौराणिक महत्त्वकेँ प्रतिपादित करैबाक लेल करै छथि। 'अनपायिन्यो' (निरन्तर बहैत) -कापड़ि 'निरन्तर निवास करैत' अनुवाद करै छथि -'निवास' आ 'बहब'क बीच अर्थ-विस्तार आश्चर्यजनक थिक। नदी बहैत नहि, निवास करैछ -ई अनुवाद-सृजन थिक। ८. सुरेश पण्डितक हनुमान चालीसा आ 'दाम'- कथा-काव्य (साक्षी) [परमेश्वर कापड़ि द्वारा प्रस्तुत](विस्तृत पद्य-विश्लेषण) 'दाम' (साक्षी, अर्पण: विद्यापति सेवा संस्थान, २०१२) -मात्रावृत्त कथा-काव्य -पहिनेसँ समग्र कथाक रूपमे विश्लेषित भेल अछि। एत' केवल पद्य-शिल्पक दृष्टिसँ किछु महत्त्वपूर्ण पंक्ति: छला एक लम्वोदर बाबू, पेट हुनक छल खत्ते। काजक नाम मारथि न माछी, हुरथि भरि थार तुरते।। 'खत्ते' (खाली/भूखल) + 'तुरते' (तुरन्त) -तुकबन्दी सटीक। 'काजक नाम मारथि न माछी' -हास्य मुहावरा जे 'कोनो काज नहि करब'क लेल प्रयुक्त। मुदा, एक दिन भेटलनि जखने, भेल राजाक फरमान। साजल गेल संग्राम-साज, हरु अरिदलक प्राण।। 'साजल गेल संग्राम-साज' -स-पंक्ति अनुप्रास (Alliteration: स, ज, ज, ज) - छन्द-चेतनाक प्रमाण। वैह रोटी देखौलक खेल, हरलक बघबाक जान। गलै प्राण अपटी सहजे, तें लम्वोदर महान।। अन्तिम पंक्ति -'तेँ लम्वोदर महान' -व्यंग्यात्मक महानता-स्थापना। इएह विडम्बना (Irony) कापड़िक हास्य-व्यंग्यक शैली थिक। : 'दाम' दीर्घ काव्य अछि परन्तु कथात्मक प्रधान अछि। तहिना सुरेश पण्डितक हनुमान चालीसापर परमेश्वर कापड़ि कहै छथि: “उछनरहा उपदरिया बच्चा त’ होइते अछि, ओकर बालसाहित्यमे सेहो बहुते हंसी–मजाक कोनो कम नै छै आ सुरेश पण्डितक हनुमान चालीसा ओना छै त’ कने बेसी पुरान तैयो अपूर्व आ रोचक अछि।“ सुरेश पण्डितक हनुमान चालीसाक प्रारम्भिक पंक्ति: जय हनुमान ज्ञान गुण सागर । मम्मी हंसए, कानए फादर ।। ९. समग्र मूल्यांकन -कापड़िक कवि-व्यक्तित्व ९.अ. शक्ति (क) दार्शनिक गहराई: ऋग्वेद अनुवादमे -मैथिली काव्यमे अपूर्व। अज्ञेयवादक काव्यिक अभिव्यक्ति। (ख) लोक-काव्य-परम्पराक जीवन्त उपयोग: फकड़ा, लोकोक्ति-मुक्तक - मैथिलीक जड़िसँ जुड़ल। (ग) अनुवाद-सृजन: संस्कृत श्लोकक मैथिली भावानुवादमे हुनकर 'रचनात्मक स्वतन्त्रता' -जे अनुवादकेँ पुनर्सृजन बनाबैछ। (घ) समीक्षक-कवि: प्रेमर्षिक आजाद हिन्दी गजलपर हुनकर टिप्पणी/ राजेन्द्र विमलक गीत संग्रह (गजल संग्रह कहि कऽ प्रकाशित) पर टिप्पणी स्वयं एक काव्यात्मक गद्य थिक। (ङ) राजनीतिक व्यंग्य-काव्य: 'घंटी बाजल' दोहा -आधुनिक मैथिली दोहाक उत्कृष्ट नमूना। ९.आ. सीमा (क) स्वयंकृत पद्य अत्यन्त अल्प: अधिकांश पद्य अन्य कविक- विमल, प्रेमर्षि, 'अध्यापक'- जकर समीक्षा कापड़ि करै छथि। (ख) दीर्घ मौलिक कविताक अभाव। (ग) बिम्ब-विधान: कापड़िक बिम्ब (imagery) लोककथा-परम्पराक बिम्ब थिक -भव्य आधुनिक बिम्ब-सृजनक अभाव। ९.इ. विदेह समानान्तर इतिहासमे स्थान परमेश्वर कापड़ि प्राथमिक रूपे कथाकार आ नाटककार, द्वितीयतः समीक्षक-कवि। तथापि हुनकर ऋग्वेद-अनुवाद ('तत्ववोध'), राजनीतिक दोहा, आ 'रेङ-रेङ'क फकड़ा - मैथिली पद्य-इतिहासमे हुनकर उल्लेखनीय योगदान थिक। विदेह समानान्तर इतिहास -'What the Canon Left Out' - एहि कवि-आलोचक-अनुवादककेँ समुचित मान दैछ। [सैद्धांतिक विवेचन लेल देखू- मैथिली समीक्षाशास्त्र- गजेन्द्र ठाकुर] अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१९. गजेन्द्र ठाकुर- परमेश्वर कापड़िक रचना-संसार- विस्तृत मैथिली साहित्यिक समीक्षा गजेन्द्र ठाकुर परमेश्वर कापड़िक रचना-संसार- विस्तृत मैथिली साहित्यिक समीक्षा भूमिका: परमेश्वर कापड़ि आ हुनकर रचना-संसार परमेश्वर कापड़िक ६०० सँ बेसी रचना - लोककथा, आख्यान, पौराणिक कथा, व्यंग्य, सांस्कृतिक निबन्ध, भाषा-विमर्श, आत्मकथात्मक प्रसंग, पुरस्कार-विमर्श, राजनीतिक टिप्पणी, आ नाट्य-समीक्षा ई सभ मिलिकऽ हुनकर एक विशाल, बहुआयामी रचना-संसारक निर्माण करैछ। विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्कक दृष्टिसँ कापड़ि ओहि 'छोड़ल गेल' मैथिली साहित्यकारक श्रेणीमे अबैछ जिनका मुख्यधारा साहित्यिक संस्था प्रायः उपेक्षित कएने अछि। ई समीक्षा हुनकर प्रत्येक रचना-विधाक विस्तृत विश्लेषण भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति सौन्दर्यशास्त्र, पाश्चात्य आलोचना सिद्धान्त, गंगेश उपाध्यायक नव्य-न्याय ज्ञानमीमांसा, आ विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्कक चार स्तम्भपर कएल गेल अछि। भाग १: लोककथा आ लोकाख्यान १.१ 'हनुमान नाम स्मरणके महिमा': ई रचना मैथिली लोकआख्यानक शुद्ध परम्परामे रचित अछि। रावण-हनुमान-नवग्रहक प्रसंग कापड़ि अपन विशिष्ट 'बजैया-बोल' शैलीमे प्रस्तुत कएलनि अछि। रचनाक भाषा 'बजैया-बोल' मैथिलीमे अछि । रस-विचार: एहि रचनामे भक्ति-रसक प्रधानता अछि। हनुमानजीक करुणामय स्वभाव (नवग्रहपर दया), वीरत्व (रावणक लंका-दहन), आ दास्य-भक्ति - तीनू रसक सुन्दर समन्वय कएल गेल अछि। आनन्दवर्धनक 'ध्वनि' सिद्धान्तक अनुसार, हनुमानकेँ 'वर मांगबाक आवश्यकता नहि' - इ उक्ति गूहार्थ शक्तिक व्यञ्जना करैछ - जे ईश्वरकृपा माँगएसँ नहि, स्वयं-समर्पणसँ भेटैछ। नव्य-न्यायिक दृष्टि: गंगेशक 'शब्द-प्रमाण' (Testimonial Knowledge) सिद्धान्तक अनुसार, नवग्रहक वचनवद्धता 'आप्त-वाक्य' (Authoritative Testimony) थिक। नव्य-न्यायमे आप्त-वाक्यक वैधता - प्रामाणिक वक्ताक उक्ति - ई भाव कापड़ि लोककथाक रूपमे प्रस्तुत कएने छथि। विदेह फ्रेमवर्क: मैथिली लोकसाहित्यमे रामायणी आख्यानक ई परम्परा - जाहिमे राम-हनुमानक स्थानपर नवग्रहक मोक्ष केन्द्रमे अछि - मिथिलाक अपन दृष्टिकोण थिक। ब्राह्मणी मुख्यधाराक बजाय लोकक हनुमान - ई विदेह समानान्तर इतिहासक महत्त्वपूर्ण अंश थिक। १.२ 'लछमिनिञा कनिञा': ई रचना मैथिली लोककथाक सर्वोत्तम नमूना थिक। बुढ़बा-बुढ़िया-पुतौह-नढ़िया-कौआ-सांपक श्रृंखलाबद्ध आख्यान एक बुद्धिमती स्त्रीक साहस, चतुराई, आ अन्ततः पारिवारिक मेलक कथा कहैछ। भाषाक विशेषता: 'लबकनिञा', 'हड़हड़ही खटबनरी', 'पिठिया-ठोक धमक्का', 'नङटिनिञा रकमसनी', 'धीपल आइग-बाउल' - ई सभ 'बजैया-बोल' मैथिलीक अनमोल शब्द-सम्पदा थिक। कापड़ि ऐ शब्दसभकेँ साहित्यिक प्रतिष्ठा दै छथि- यएह हुनकर सबसँ पैघ योगदान अछि। रस-विचार: प्रारम्भमे भयानक रस (कनिञाक रातिमे नदी जेबाक दृश्य), तत्पश्चात् हास्य रस (बुढ़ियाक क्रोध आ गलतफहमी), आ अन्तमे शान्त रस (परिवारक मेल) - ऐ तीन रसक सफल क्रमिक प्रवाह अछि। भरत मुनिक 'विभाव-अनुभाव-व्यभिचारी' भावत्रयीक आधारपर ई रचना परिपूर्ण अछि। वक्रोक्ति: कुन्तकक वक्रोक्ति सिद्धान्तक अनुसार, 'मुर्दाके खाएला नढ़ियाके द'क'' - ई पंक्ति लोककथाक सबसँ वक्र कथन थिक। पुतौह न मुर्दाखोर अछि, न डाइन - ओ एक साहसी, लोभमुक्त स्त्री अछि। परन्तु ओकर साउसक दृष्टिमे सभ विकृत देखाइछ। ई वैपरीत्य वक्रोक्तिक सार थिक। स्त्री-विमर्श: पुतौह कनिञा- ओ तन्त्र-मन्त्र नहि जनैछ, ओ डाइन नहि- ओ एक साहसी, कार्य-कुशल स्त्री थिक जे पारिवारिक सुखक लेल असम्भव काज कएलक। मैथिली लोककथामे स्त्री-शक्तिक ई प्रतिच्छाया अनुपम अछि। १.३ 'यज्ञ-सीता': 'यज्ञ-सीता' कापड़िक सर्वाधिक साहसिक, विवादास्पद एवं दार्शनिक रचना थिक। यज्ञकालमे निर्मित स्वर्णमयी सीता-प्रतिमासभक जीवन्त भ' रामसँ स्वीकृति माँगबाक कथा - ई मैथिली साहित्यमे विरल साहस थिक। मिथकक पुनर्व्याख्या: कापड़ि राम-एकपत्नीव्रताक मर्यादाकेँ प्रश्न करै छथि। यज्ञ-सीता बजैछ- 'एहनमे अपने हमरा ग्रहण किए नै करब?' ई पंक्ति मैथिली साहित्यमे स्त्री-अधिकार-विमर्शक एक नव अध्याय थिक। नव्य-न्यायिक दृष्टि: गंगेशक 'व्याप्ति' (Invariable Concomitance) सिद्धान्तक अनुसार: 'जे यज्ञमे सहयोग दैत अछि, ओ अर्धाङ्गिनीक अधिकार रखैछ'- ई यज्ञ-सीताक तर्क थिक। राम ऐ व्याप्तिकेँ स्वीकार करै छथि परन्तु तकर विकल्प- द्वापरमे गोपी-रूपमे कृष्णसँ प्रेम – दै छथि। ई दार्शनिक समाधान उत्कृष्ट थिक। ध्वनि-विश्लेषण: रचनाक अन्तिम पंक्ति - 'ओ सबहेटा यज्ञ-सीता ब्रजमे गोपीसब बनलथि' - ई व्यञ्जना-स्तरपर एक महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक संदेश दैछ: हर उपेक्षित स्त्री अन्ततः अपन मोक्ष पबैछ। १.४ 'पुण्यात्मा बाउ प्रसंग': ई रचना कापड़िक सबसँ मार्मिक, आत्मकथात्मक रचना थिक। मरणासन्न पिताक संग पुत्रक अन्तिम क्षणक वर्णन - ई मैथिली गद्यमे भावनात्मक उत्कर्षक उदाहरण अछि। भाषाक सजीवता: 'जखैन हम पोताके क'र घुमैलिऐ', 'छटपटाइछै', 'बड़ीकाले', ई सभ मैथिलीक अपन शब्द थिक जे हृदयकेँ सोझे छूबैछ। बाउक वाक्य - 'मर' कालमे अहिना कछमछी जुआरि अबैहइ' - ई मृत्युक मुँहमे बैसि कएल व्यंग्य-प्रेम-प्रकाशन अद्भुत थिक। करुण रस: अभिनवगुप्तक 'करुण रसक परिणति' (Ultimate Resolution of Pathos) सिद्धान्तक अनुसार, पिताक मृत्यु - करुणाक उत्कर्ष - पुत्रकेँ यएह बोध दैछ: 'बाप शब्दक अर्थ भाव डिक्शनरीमे नहि ताकल जा' सकैछ!' ई वाक्य भारतीय साहित्यक श्रेष्ठ उक्तिसभमे गनले जाएत। 'बाउ प्रसंग' मे लेखक अपन प्रमोशनक चिन्तामे पिताक मृत्युकाल बिताबैछ - यएह मानवीय दुर्बलताक स्वीकार्यता 'यथार्थवादी' साहित्यक लक्षण थिक। १.५ 'लिम्मविनिञा कविनिञा': ई लोककथा नढ़िया-कौआ-साँप- जानवरसभक भाखा बुझैनिहारि बुतौहक कथा - मैथिली 'बीहनि कथा' (seed story) परम्पराक उत्तम उदाहरण थिक। कापड़ि एहि कथामे पशु-भाषा-विज्ञान (Zoolinguistics) आ लोक-परम्पराक अद्भुत समन्वय कएलनि अछि। भाग २: पौराणिक आ दार्शनिक निबन्ध २.१ 'तत्ववोध' – आदिकाव्य: ऋग्वेदक नासदीय सूक्तक (10.129) मैथिली अनुवाद/पुनर्रचना थिक। 'केओ नहि तखन छल / नहि निर्जीवो / वायु नहि / नहि छल आकाश ओकर उपर' - ई पंक्तिसभ मैथिली कविताक दार्शनिक उत्कर्षक उदाहरण थिक। भारतीय दार्शनिक परम्परामे नासदीय सूक्त सृष्टि-रहस्यक सबसँ गूढ़ अन्वेषण थिक। कापड़ि एकरा मैथिली पाठक लेल सुलभ बनेने छथि। 'ईश्वरे ई जनैत छथि / आ शायद ओहो नहि जनैछ!' - ए अन्तिम पंक्ति भारतीय दर्शनक अज्ञेयवाद (Agnosticism)क मर्म थिक। नव्य-न्यायिक दृष्टि: गंगेशक 'प्रत्यक्ष' (Perception) आ 'अनुमान' (Inference) दुनू सृष्टि-ज्ञानमे अपर्याप्त अछि- इएह नासदीय सूक्तक ध्वनि थिक। 'के जनैत अछि निश्चित रुपस'?'- ई प्रश्न नव्य-न्यायक 'प्रमाण-सीमा' (Limits of Valid Knowledge)क स्वीकारोक्ति थिक। २.२ 'पुराणोक्त परिभाषा': नारद-स्मृतिसँ उद्धृत 'सत्य', 'धर्म', 'अहिंसा', 'असत्य', 'साधु' - ऐ पाँच तत्त्वक व्याख्या कापड़ि मैथिलीमे प्रस्तुत कएलनि अछि। 'धर्माधर्म विवेकेन वेदमार्गानुसारिणी: / सर्वलोकहितासक्ता: साधव: परिकीर्तिता:' - नारदक श्लोकक समावेश समीचीन थिक। ई रचना कापड़िक पाण्डित्यक प्रमाण थिक। ओ केवल लोककथाकार नहि, बरु शास्त्रीय परम्पराक ज्ञाता सेहो छथि। विदेह फ्रेमवर्कमे, ई शास्त्र-परम्परा आ लोकपरम्पराक समन्वय कापड़िक विशेषता थिक। २.३ 'छिन्नमस्ता भगवतीक तान्त्रिक स्वरूप': ई कापड़िक सर्वाधिक विद्वत्तापूर्ण रचना थिक। मिथिला चित्रकलाक आधारपर छिन्नमस्ताक तान्त्रिक व्याख्या- सृष्टि-ध्वंस-पुनर्निर्माणक दार्शनिक व्याख्या- अत्यन्त गहन थिक। 'प्रकाश आ ध्वनिक अन्तर्प्रक्रिया एतेक भयानक आ प्रचण्ड होइत अछि जे सृजनक सम्वन्ध सर्जकस' एके झटकामे विच्छिन्न भ' जाइछ।'- ई वाक्य भारतीय तान्त्रिक दर्शनक मर्म थिक। 'माता आ शिशुक बीचक नाभिनालकेँ जाधरि काटल नहि जाइछ ताधरि नवजात शिशु स्वतन्त्र अस्तित्वमे आबि नहि सकैत अछि।' - ई जैविक रूपक छिन्नमस्ताक तान्त्रिक प्रतीकतन्त्रकेँ अद्वितीय तरीकासँ स्पष्ट करैछ। कापड़ि मिथिला-चित्रकलाक तान्त्रिक आधारकेँ वैज्ञानिक-दार्शनिक दृष्टिसँ व्याख्यायित करै छथि। ई मैथिली साहित्यमे दुर्लभ अछि। २.४ 'आयुर्वेद आ धनतेरस': ब्रह्माजीक आयुर्वेद-रचना, त्रिसूत्र, आत्रेय-धान्वन्तर सम्प्रदाय, आ क्षीरसागर-मन्थनक वर्णन - ई रचना कापड़िक शास्त्रीय ज्ञानक प्रमाण थिक। 'तिलासंक्रान्ति मनक पावनि अछि', 'फगुआ मनक पाबनि', 'दुर्गापूजा आत्माक' - ऐ तीन-भागक वर्गीकरण कापड़िक दार्शनिक दृष्टिक परिचायक थिक। २.५ 'विवाह-संस्कार आ अधिकार': विवाहक व्युत्पत्ति - 'वि+अव+हार' - आ कन्यादान-पाणिग्रहण-होमक दार्शनिक व्याख्या कापड़ि बहुत विद्वत्तापूर्वक कएलनि अछि। 'आब एहिमे जहियास' आय आ अधिकार तत्व ढुकलैए जीवन भार आ भाउर भ' गेल अछि' - ऐ अन्तिम वाक्यमे आधुनिक विवाह-विमर्शक व्यंग्यात्मक टिप्पणी अछि। भाग ३: सांस्कृतिक निबन्ध आ समकालीन टिप्पणी ३.१ 'भारु की मोरु?!': ई कापड़िक सांस्कृतिक-ऐतिहासिक निबन्धक उत्कृष्ट उदाहरण थिक। भारु (भारतीय रुपैया) आ नेरु (नेपाली रुपैया)क अर्थ-विस्तार करैत ओ विद्यापति आ मलंगियाजीक नेपाल-भारत द्विधाक प्रसंगमे मैथिली साहित्यिक इतिहासकेँ पुनर्विचारक निमन्त्रण दैछ। 'विद्यापति नेपालमे आबि, घर-घरारी अरजि, पोखरि इनार खना, कृतकार्य क' ध', आजीवन विद्यापति एतहि मरि-खपि गेलाह, तैयो उ भारु?' - ई प्रश्न मैथिली साहित्यिक राष्ट्रवादक मर्मकेँ छूबैछ। कापड़ि मैथिली-नेपालक पहचानकेँ स्वतन्त्र आ स्वाभिमानी रूपमे स्थापित करबाक पक्षमे छथि। महेन्द्र मलंगियाजीक गिनिज-बूक प्रमाणपत्र-प्रसंगमे कापड़ि एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठबै छथि: 'मलंगियाजीके नाट्य माइजन' कहल जाओ तखन कि हुनका 'नेपालक मैथिली नाटककार' कहब अनुचित अछि? ई मैथिली-नेपाल राजनीतिक पहचानक विमर्श थिक। ३.२ 'मैथिली लोकरंगमंच: मैथिली लोकनाट्यपर कापड़िक निबन्ध मैथिलीक रंगमञ्च-इतिहासक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज थिक। 'मैथिली संस्कृतिक अपन विभिन्न अवयव आ उपादानसब छै, माने लोकभाषा, लोक नाच नाट्य, गीत गाथादि' - ई वाक्य मैथिली सांस्कृतिक समग्रताक दृष्टि प्रकट करैछ। 'परबहा' गामक वर्णन: 'परबाह अहा'- ई नामव्युत्पत्ति रोचक आ सांस्कृतिक दृष्टिसँ महत्त्वपूर्ण अछि। जे लोक अपन भाषा-साहित्य-संस्कृति-रंगमञ्चक परबाह करैछ - ओ 'परबहा' थिक। शब्द-विलासक ई उदाहरण कापड़िक भाषा-चेतनाक परिचायक थिक। ३.३ 'लोकभाषा मैथिली की जय!': ई कापड़िक भाषा-चिन्तनक श्रेष्ठ उदाहरण थिक। 'वेद-पुराण, धर्म-दर्शन आ कला-विज्ञानक भाषा देववाणी... एतेक ने सकबेधक' गछेरल रहैक, जे मरि गेलै' - ई संस्कृतक मृत्युक समाजशास्त्रीय व्याख्या थिक। कापड़ि मैथिलीक भविष्यकेँ लोकभाषाक रूपमे देखैछ, ने कि 'बभन-भाषा' (मानक मैथिली)क रूपमे। ऐ रचनामे कापड़ि डा रामावतार यादवक 'मानक मैथिली' आन्दोलनपर सूक्ष्म व्यंग्य करै छथि - 'बोङपादी ऐंठलक बभन-भाषा'। विदेह समानान्तर फ्रेमवर्कक दृष्टिसँ ई विमर्श महत्त्वपूर्ण थिक: मैथिलीकेँ लोकक भाषा रहबाक चाही, ने कि पण्डित-शास्त्रीक। ३.४ 'सीतासखी गंगासागर': जनकपुरक गंगासागर सरोवरक दुर्दशाकेँ कापड़ि पौराणिक-काल्पनिक कथाक रूपमे प्रस्तुत करै छथि। गंगासागर 'झखरी बुढ़ियाक रूप धऽ' महाकुम्भ जाइछ - ई प्रतीकात्मक कल्पना अद्भुत थिक। ओत' गंगाजलक शुद्धतासँ आत्मग्लानि होइछ आ जनकपुरवासी सभकेँ कोसै छहि। ई व्यंग्य-कथन सहर-नगरपालिकाक उपेक्षापर टिप्पणी थिक। भाग ४: व्यंग्य-रचना ४.१ 'एहने जनकपुर?': जनकपुर उपमहानगरपालिकाक बदहाल सड़क, मच्छर-पालन, आ नेताक उदासीनतापर ई व्यंग्य अछि। 'महान उपमहानगरपालिकाक वडा नं. १६ पुलचौकक, २०५१ सालमे... बिलटू पजियारक बिकट पालीमे धाके-धौसे... मटिया सड़क निर्माण भेलै, तकर किछु छेंट... ऐ तीस बरखक अभ्यन्तरमे, एको छौ/टेलर माटि नै पड़ने' - ई लेखन स्थानीय पत्रकारिताक श्रेष्ठ उदाहरण थिक। 'तब, हे यौ जनकपुर्र! विकास नामक सूरदासके घीउ, पातपर गड़गरएनहि बूझब!?' - ई 'सूरदासके घीउ' मुहावरा मैथिली व्यंग्य-साहित्यमे एक मणि थिक। विकासक घीउ - जे अन्धकेँ नहि देखैछ - ई नकारात्मक राजनीतिपर अद्वितीय व्यंग्य थिक। ४.२ राजनीतिक व्यंग्य-श्रृंखला: कापड़िक व्यंग्य-श्रृंखला 'हगना-पदना', 'धोती-गमछा', 'बगड़िया-सङहतिया' - ई काल्पनिक संवाद-रूपमे लिखल गेल अछि। नेपाली राजनीति - जेन-जी आन्दोलन, मधेशी दलक पतन, बालेन शाह, उपेन्द्र यादव, केपी ओली – ऐ सभपर व्यंग्य सटीक अछि। भाषाक बहुलता: ई नेपालक भाषाई यथार्थकेँ जीवन्त रूपमे प्रकट करैछ। 'रे, बुझ'बला बात ई छै जे ओकर काठमाडौंबाली कनिञा मैडम...' - ई भाषाई मिश्रण (Code-mixing) कापड़िक रचनाशैलीक महत्त्वपूर्ण लक्षण थिक। व्यंग्य-रसक दृष्टि: भरत मुनिक हास्य-रसमे छह प्रकारक हास्य वर्णित अछि - आत्मस्थ, परस्थ, उभयस्थ, श्लील-अश्लील-सामान्य। कापड़िक राजनीतिक व्यंग्य 'परस्थ' हास्यक श्रेणीमे अबैछ - जे दोसरक मूर्खता आ दुर्बलतापर हँसैछ। ऐ हास्यक उद्देश्य मात्र मनोरंजन नहि, बरु सामाजिक जागरण थिक। ४.३ 'जनकपुर नगरपालिका-विमर्श': रामभरोस कापड़ि 'भ्रमर'क दुइ पुस्तकक विमोचन कार्यक्रमपर व्यंग्य कापड़िक निर्भीक आलोचनात्मक दृष्टिक उदाहरण थिक। 'मधेश प्रज्ञा प्रतिष्ठानक अपने अध्यक्ष होइतो मैथिली विकास कोषमे विमोचन किए?' - ई प्रश्न मैथिली साहित्यिक संस्थागत राजनीतिपर सोझ प्रहार थिक। ऐ रचनामे कापड़िक व्यक्तित्वक एक महत्त्वपूर्ण पक्ष प्रकट होइछ - ओ संस्थागत भ्रष्टाचार आ अवसरवादिताक विरुद्ध स्पष्टवादी छथि। 'अपनेके साँच बोलबाक साहस लोकमे घटि गेल अछि' (अरुण आर्यक उक्ति) - ई कापड़िपर सटीक लागू होइछ। भाग ५: साहित्यिक समीक्षा आ आलोचना-लेखन ५.१ 'धीरेन्द्र प्रेमर्षिक हिन्दी गजलक पाठकीय उहापोह': ई कापड़िक सर्वश्रेष्ठ समीक्षात्मक लेखन थिक। प्रेमर्षिक हिन्दी गजलकेँ पढ़ैत हुनकर प्रतिक्रिया - 'आहि रे वा, ई त' हिन्दी गजल अछि!' - ई एक मैथिली साहित्यकारक भाषाई प्रतिबद्धताक उदाहरण थिक। परन्तु कापड़ि व्यापक दृष्टिसँ ओहि गजलक मूल्यांकन करै छथि: 'हिनक रचनाक भाषा-साहित्यक सौष्ठवके समग्रताके निरेखने अवधारने, मान' पड़त जे एहि रचनाके माध्यमस' हिनक भाषिक रवानी गजलक रचनागत विन्यास बेछप आ सरस अछि।' - ई निष्पक्ष समीक्षाक आदर्श नमूना थिक। आलोचना-सिद्धान्त: 'कोनहुं रचनाक समीक्षा, निष्पक्ष भाव आ उदार दृष्टिए बिना व्यामोहस' कएने स्वच्छ समालोच्य होइछ' - ई वाक्य कापड़िक आलोचना-दर्शनक सूत्र थिक। मैथिली समीक्षामे ई 'निर्व्यामोह' (bias-free) दृष्टि अत्यन्त दुर्लभ थिक। ५.२ 'डा विमलक गजलक आन्दोलनी ताव-तेवर': ई कापड़िक सर्वाधिक विस्तृत समीक्षात्मक लेखन थिक। डा राजेन्द्र विमलक गजलक वैचारिक पक्ष, भाषाई शक्ति, आन्दोलनकारी ऊर्जा - तीनूक समग्र मूल्यांकन कापड़ि कएलनि अछि। 'जोड़ि बाँहि बाँहस', जोरस' आवाज दियौ / रोटी चोरओने अछि, पेट ओकर फाड़ि लिय।' उपर्युक्त शेरपर कापड़िक टिप्पणी: 'हिनक ई आक्रोश बहुत आक्रमक तथा विष्फोटक अछि' - ई सूक्ष्म आलोचनात्मक मूल्यांकन थिक। कापड़ि रस-निष्पत्तिक भारतीय आलोचना-परम्पराक उपयोग अन्तर्निहित रूपमे करै छथि। कापड़िक विमल-समीक्षामे विशेष महत्त्वपूर्ण पक्ष थिक हुनकर 'वैचारिक गजल' (Ideological Ghazal) सिद्धान्त। कापड़ि कहै छथि जे विमलक गजलक वैचारिक पक्ष 'सामाजिक-सांस्कृतिक संचेतना, जीवनमूल्य, अपन संस्कृति प्रतिक निष्ठा भाव आ लोक प्रतिवद्घताक राग गजि-गजिक' भरल' - ई विशेषता सामान्य गजलकेँ 'महान गजल' बनाबैछ। भाग ६: आत्मकथात्मक आ स्मृति-प्रसंग ६.१ 'हमरो घरमे मैथिलीक बड़ मान': 'सराइन' प्रसंग: कापड़ि अपन घरनीकेँ 'सराइन' (सर + स्त्रीलिङ्ग) कहै छथि। ई भाषाई नवनिर्माण मैथिलीक विशिष्ट उदाहरण थिक। 'जेना - मास्टरक स्त्रीलिङ्ग मास्टरनी, तहिना डागडरक डागडरनी, सिंहक सिंहनी!'- ई सादगी बला हास्य कापड़िक व्यक्तित्वक परिचायक थिक। ऐ रचनामे घरक जीवनक माधुर्य, 'जंतसारी गीत गबैत अदौरीक घाइट पिसैत बौआमाय' - ई चित्र मैथिली गद्यमे ग्राम्य जीवनक अनुपम दस्तावेज थिक। ६.२ 'पहिने जनि-जति... अदौरीके घाइट': पुरान आ नव घरनीक तुलनापर ई लघु रचना - 'लिखिया लिखिक' चिक्कन-ढुढुर' बनाम 'फैन्सी डेकोरेसन' - ई सांस्कृतिक परिवर्तनपर मार्मिक टिप्पणी थिक। 'अदौरीके घाइट आ तिसियौरीके बेसन पिसैत, जंतसारी गीत गबैत, हमर ई बौआमाय!' - ई चित्र मैथिलीक श्रेष्ठ गद्य-काव्यमे स्थान रखैछ। ६.३ बौआ-बाबू-पोताक जनमदिन-प्रसंग: 'चिन्नीके लडू टेंढ़ो, केहुना मीठे होइछ!' - कापड़िक दाइक ई उक्ति लोकज्ञानक उत्तम उदाहरण थिक। 'जे ननू से गर्भे ननू!' बौआ प्रभुकेँ 'पृथु' नाम राजा पृथुक आधारपर देबाक कारण बतेबाक शैली कापड़िक परम्पराबोधक परिचायक थिक। ६.४ 'जनकपुरधाम विकास-विमर्श': कापड़ि मिथिला आन्दोलनी शहीद दिवस: जनकपुर उपमहानगरपालिकाक बदहाली, परबहा महोत्सव- ऐ सभपर सतत लेखन करै छथि। ई समाज-प्रतिबद्धताक उदाहरण थिक। 'मिथिला शहीद अमर रहए!' - ई आह्वान-वाक्य मात्र नारा नहि, कापड़िक जीवन-दर्शन थिक। ओ मिथिला राज्य-संघर्ष समितिक संयोजक रहिचुकल छथि - ई प्रतिबद्धता हुनकर साहित्यमे सर्वत्र दृष्टिगोचर होइछ। भाग ७: नाट्य-विमर्श आ रंगमञ्च-चिन्तन ७.१ 'रेङ-रेङ' नाटक-प्रसंग: अयोध्यानाथ चौधरीजीक 'रेङ-रेङ' पढ़िक' दएल प्रतिक्रिया - 'रंग-रेखाके अपन दर्शन आ मनोविज्ञान होइछ' - ई मिथिला-चित्रकलाक रसदर्शनकेँ नाट्य-शिल्पसँ जोड़बाक प्रयास थिक। 'ई मौगीआनी कचनी-भरनी लिखियाटा नहि, बरु आधुनिक चित्र-विद्या कलाक सबटा उर्जा आवेगस' महिमा-मण्डित अछि' - ई टिप्पणी 'रेङ-रेङ'केँ दृश्यकला आ नाट्यकलाक संगमपर स्थापित करैछ। ७.२ मैथिली नाट्यक विकास-विमर्श: विराट मैथिली नाट्य कला परिषद्, जनकपुरधाम अन्तर्राष्ट्रिय नाट्य महोत्सव, परबहा सांस्कृतिक महोत्सव - ऐ सभपर कापड़िक लेखन मैथिली नाट्य-इतिहासक समकालीन दस्तावेज थिक। ओ केवल दर्शक नहि, सक्रिय सहभागी आ आलोचक छथि। कापड़िक महत्त्वपूर्ण नाट्य-चिन्तन: 'जनकपुरमे अभिनेता/अभिनेत्री बहुते छथि, धरि आधुनिक वैश्विक रंगमंच, रंग-दर्शन, नाट्य-संचेतना, कलावाद, एकर मुख्य प्रवृत्ति...क अभाव' - ई सटीक निदान थिक। ७.३ 'टटकाल दर्शन' नाटक-प्रसंग: 'टटकाल दर्शन'क कथ्य-शिल्प, डा वीरेन्द्र पाण्डेक अंग्रेजी समीक्षा-प्रकाशन - ई प्रसंग कापड़िक नाट्य-लेखनकेँ अन्तर्राष्ट्रिय स्तरपर मान्यता भेटबाक आह्लादक दृष्टान्त थिक। 'एहि नाटकके कथ्य-शिल्प आ रंगमंचीय प्रविधिक संगहि एकर प्रदर्शनीय जोगार भजार'- कापड़ि व्यावहारिक नाट्यकर्मी छथि, मात्र सैद्धान्तिक नहि। भाग ८: ऐतिहासिक-पौराणिक आख्यान: ८.१ 'आल्हा-रुदल': पाण्डवक पाँचोभाइक कलियुगमे आल्हा-रुदल-ब्रह्मानन्द-लाखन-वीर मलखान रूपमे अवतरणक कथा - ई पौराणिक-लोकगाथाक सुन्दर समन्वय थिक। युधिष्ठरक अतृप्त अभिलाषाकेँ - 'महाभारतमे हम कहां एकौटा कौरव मार' पइली!' - कृष्ण कलियुगमे पूरा करैछ। ई आख्यान मैथिली लोकगाथा-परम्पराकेँ दार्शनिक आधार दैछ। आल्हा-रुदल लोकगायनक ब्रह्माण्डीय सन्दर्भ - पाण्डव-पुनर्जन्म - एकरा केवल मनोरंजनसँ उपर उठाबैछ। ८.२ 'सीतासखी गंगासागर': पौराणिक-काल्पनिक एवं समकालीन सामाजिक व्यंग्यक अद्भुत सम्मिश्रण। गंगासागर सरोवरकेँ 'झखरी बुढ़िया' रूपमे मानवीय कएल गेल अछि जे महाकुम्भ जाइछ। ई 'Personification' (व्यक्तीकरण) क उत्कृष्ट मैथिली प्रयोग थिक। भाग ९: बालसाहित्य आ बालगीत: ९.१ 'आनन्द मनोरंजनस' उमटाम भरल-पूरल बाल लोकसाहित्य': कापड़ि मैथिली बाल-लोकसाहित्यक महत्त्वकेँ रेखांकित करै छथि। 'ई कहियो नै सठ', निङहट'बला अकूत अनमोल नैसर्गिक सम्पदा अछि' - ई वाक्य बालसाहित्यक प्रति हुनकर गम्भीर दृष्टिक परिचायक थिक। रोशन जनकपुरीजीक नातिक खेलगीत - 'रे बौकला, रे बौकला! / किए टोकले?' - ई बालगीतक रिदम, अटर-पटर-पन मैथिली बालगीतक विशेषता थिक जे कापड़ि सहेज रखलनि अछि। ९.२ गीत-फकड़ा परम्परा: 'रेङ रेङ'क गीत-फकड़ा (घेघड़ा देम्ड बजनिञा) - ई लोकशैलीमे नाटकक सांस्कृतिक ऊर्जाकेँ प्रकट करैछ। कापड़ि लोकगीत-परम्पराकेँ आधुनिक नाट्य-रचनाक अंग बनबैछ। भाग १०: समग्र आलोचनात्मक मूल्यांकन १०.१ रचनाकारक शक्ति: परमेश्वर कापड़िक रचना-संसारक सबसँ पैघ शक्ति थिक - हुनकर मैथिलीक शुद्धता आ जीवन्तता। 'लबकनिञा', 'हड़हड़ही', 'धतपताए', 'छगुनाए', 'हपसि-लपकि', 'कुथरैत-भथरैत' - ई सभ शब्द मैथिलीक जीवित परम्पराक प्रमाण थिक। दोसर शक्ति - साहस आ स्पष्टवादिता। राजनीतिक व्यंग्यमे, साहित्यिक संस्थागत आलोचनामे, भ्रष्टाचार-विरोधमे - कापड़ि कहियो 'चौरनिया लोकप्रियता'क लोभमे नहि पड़ला। तेसर शक्ति- बहुविधावादिता। लोककथा, पौराणिक आख्यान, व्यंग्य, आत्मकथात्मक प्रसंग, साहित्यिक समीक्षा, नाट्य-लेखन, दार्शनिक निबन्ध - सभमे सहज गति। १०.२ सीमा आ आलोचना-बिन्दु: (क) सोशल मीडिया-संरचनाक सीमा: अधिकांश रचना फेसबुक-पोस्टक रूपमे लिखल गेल अछि। ई माध्यमक सीमाबद्धता - संक्षिप्तता, तात्कालिकता – कखनो काल विषयक गहराईकेँ सीमित करैछ। दीर्घ निबन्ध आ शोध-लेखमे हुनकर प्रतिभा अधिक निखरि सकैत छन्हि। (ख) व्यंग्यमे व्यक्तिगत आक्रमण: कखनो व्यंग्य व्यक्तिगत स्तरपर उतरि आबैछ - रामभरोस कापड़ि 'भ्रमर'पर आलोचना, अन्य साहित्यकारपर टिप्पणी - ई कखनो-कखनो साहित्यिक आलोचनाक बजाय व्यक्तिगत विवादक रूप लैछ। (ग) एकसूत्रता: कखनो-कखनो एक्के विषय - जेन-जी आन्दोलन, मैथिली-भाषा-संघर्ष - बेर-बेर दोहराओल जाइछ। रचनात्मक वैविध्य आरो बढ़ि सकैत अछि। १०.३ विदेह समानान्तर इतिहासमे स्थान: परमेश्वर कापड़ि विदेह समानान्तर साहित्य आन्दोलनक एक महत्त्वपूर्ण स्तम्भ थिकाह। ओ नेपालक मैथिली साहित्यकेँ भारत-केन्द्रित मुख्यधारासँ स्वतन्त्र पहचान दै छथि। मैथिलीक खाँटी रूपकेँ साहित्यिक प्रतिष्ठा दै छथि। लोककथा, लोकनाट्य, लोकगीतकेँ उच्चसाहित्यक समकक्ष स्थापित करै छथि। मिथिला-राज्य-संघर्षकेँ साहित्यिक-राजनीतिक अभियानक रूपमे एकजुट करै छथि। संस्थागत पुरस्कार-तन्त्रसँ बाहर रहिकऽ अपन रचना-धर्म जारी रखै छथि। १०.४ तुलनात्मक स्थान: मैथिली साहित्यमे कापड़िक तुलना - सांस्कृतिक संरक्षण, नाट्यधर्म, राजनीतिक यथार्थवाद, आन्दोलनी ऊर्जा- ऐ सभसँ सभ धाराकेँ अपन एक व्यक्तित्वमे समाहित करै छथि। ओ ने मात्र साहित्यकार, बरु एक सम्पूर्ण सांस्कृतिक आन्दोलनकर्मी थिकाह। उपसंहार परमेश्वर कापड़िक रचना-संसार मैथिली साहित्यक एक बहुमूल्य अध्याय थिक। लोककथाक जीवन्त भाषा, पौराणिक आख्यानक दार्शनिक तत्त्व, व्यंग्यक निर्भीक कलम, आत्मकथात्मक प्रसंगक मार्मिकता, साहित्यिक समीक्षाक निष्पक्षता - ई सभ हुनकर बहुआयामी प्रतिभाक प्रमाण थिक। 'मिनाप बहुत बडका अभियान छी' – ई कापड़िक अपन उक्ति हुनकर जीवन-दर्शनकेँ सारभूत रूपमे प्रकट करैछ। मैथिला/मिथिला अभियान - भाषा-साहित्य-संस्कृति-रंगमञ्च - ई सभ मिलिकऽ एक सम्पूर्ण मिथिला-चेतनाक निर्माण करैछ। कापड़ि ऐ चेतनाक जीवित प्रतिनिधि छथि। भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति सौन्दर्यशास्त्र, पाश्चात्य आलोचना सिद्धान्त, गंगेश उपाध्यायक नव्य-न्याय-ज्ञानमीमांसा, आ विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क - ऐ चारू दृष्टिसँ कापड़ि एक महत्त्वपूर्ण, बहुआयामी, साहसी आ प्रतिबद्ध मैथिली रचनाकार थिकाह जिनका विदेह समानान्तर साहित्य इतिहासमे केन्द्रीय स्थान प्राप्त होएब उचित आ आवश्यक अछि। [सैद्धांतिक विवेचन लेल देखू- मैथिली समीक्षाशास्त्र- गजेन्द्र ठाकुर] अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.२०. गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-१) सन्दर्भ- परमेश्वर कापड़ि- नाटक 'रेङ–रेङ' गजेन्द्र ठाकुर मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-१) सन्दर्भ- परमेश्वर कापड़ि- नाटक 'रेङ–रेङ' विस्तृत साहित्यिक समीक्षा [भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति सौन्दर्यशास्त्र • पाश्चात्य आलोचना सिद्धान्त • गंगेश उपाध्यायक नव्य-न्याय • विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क] १. साहित्यकार परमेश्वर कापड़िक जीवन-परिचय १.१ जीवन-वृत्त परमेश्वर कापड़ि - नेपालक जनकपुरधामसँ सम्बद्ध एक बहुविधावादी, प्रयोगशील एवं सामाजिक-सांस्कृतिक प्रतिबद्धतासँ ओतप्रोत मैथिली साहित्यकार, शिक्षाविद् एवं मिथिला-मैथिली अभियानी छथि। ओ राराब (त्रिभुवन विश्वविद्यालय) क्याम्पस जनकपुरधामक मैथिली विभागक पूर्व विभागाध्यक्ष रहल छथि। त्रिभुवन विश्वविद्यालयक केन्द्रीय मैथिली विभागक सेहो पूर्व विभागाध्यक्षक रूपमे हुनकर सेवा मैथिली भाषाशिक्षण, साहित्यिक अनुसन्धान एवं लोकसाहित्य-सञ्चयनमे अतुलनीय योगदान देलक अछि। हुनकर व्यक्तित्वक विशेषता ई अछि जे ओ एकधारे- साहित्यकार, लोकसाहित्यक खाँटी अध्येता, मिथिला राज्य संघर्ष समितिक संयोजक, तथा मैथिली विकास कोषक पूर्व सदस्य-सचिव रहल छथि। समकालीन मैथिली साहित्यमे हुनकर स्थान प्रयोगधर्मी एवं यथार्थवादी नाटककारक रूपमे विशेष उल्लेखनीय अछि। हुनकर साहित्यिक उत्पादनमे लोककथा, नाटक, निबन्ध, आलोचनात्मक लेखन, सामाजिक टिप्पणी एवं सांस्कृतिक विमर्श सम्मिलित अछि। १.२ साहित्यिक विधा एवं प्रकाशित कृति परमेश्वर कापड़िक साहित्यिक कर्म बहुविध अछि। हुनकर ज्ञात रचनामे सम्मिलित अछि: (क) नाटक: 'रेङ–रेङ' - समकालीन राजनीतिक-सामाजिक व्यंग्य नाटक (नेपाल, जनकपुरधाम, अवन्तिका मैथिली नाट्य संस्था) (ख) लोककथा (ग) सांस्कृतिक निबन्ध (घ) सामाजिक टिप्पणी (ङ) गीत-फकड़ा। ऐ विविधतासँ स्पष्ट होइछ जे कापड़ि केवल विद्वान नहि, बरु एक सृजनशील, बहुआयामी सांस्कृतिक कर्मी थिकाह। हुनकर मूल चिन्ता लोकभाषा, लोकसमाज एवं मिथिलाक सांस्कृतिक अस्मिता अछि। २. नाटक 'रेङ–रेङ' - कथावस्तु एवं रंगशिल्प २.१ नाटकक परिचय 'रेङ–रेङ' परमेश्वर कापड़ि द्वारा रचित मैथिली नाटक थिक जे अवन्तिका मैथिली नाट्य संस्थाक रिहर्सल स्थानपर केन्द्रित अछि। नाटकक शीर्षक 'रेङ–रेङ' एक ध्वन्यात्मक प्रतीक थिक - जे रङ्गमञ्चक रङ्गभेद, जीवनक रङ्गपरिवर्तन एवं सामाजिक-राजनीतिक चरित्रक बहुस्तरीय रूपांकन करैछ। नाटकक मुख्य पात्रसब: श्रीधर (निर्देशक), अनवर, हमाल, अक्षरा, छौंड़ा, लक्ष्मी/ऐश्वर्या, विष्णु/विवेक, बम बहादुर, नूनूकाका। इएह पात्रमण्डल नाटकक सामाजिक वर्ग-संरचनाक प्रतिनिधित्व करैछ - कलाकार, श्रमिक, दैवी शक्ति, पुलिस, एवं लोकनाट्यक आत्मा। २.२ कथावस्तुक संक्षेप नाटकक आरम्भ होइछ एक पुरान जिमिदारी भवनमे जतए अवन्तिका नाट्य संस्था रिहर्सल कऽ रहल अछि। श्रीधर एक कविता पढ़ैत तन्मय अछि - एक आह्वानगीत जाहिमे रङ्गमञ्चपर सक्रिय होयबाक, समाजक पुनर्निर्माणक आकांक्षा व्यक्त कयल गेल अछि। तत्पश्चात नाटककेर मध्यमे लक्ष्मी (धन-देवी) प्रकट होइ छथि। तथापि ई प्रकटीकरण कोनो दैवी वरदान नहि, बरु एक कटु सत्यक उद्घाटन थिक - जे लक्ष्मी समाजमे वास्तवमे कतए अछि, आ भ्रष्टाचारी शासन-व्यवस्था ओकरा कोना हरण करैछ। गरीबी सभ पापक जड़ि थिक - इएह नाटकक केन्द्रीय सत्य थिक। विष्णु (देवता) प्रकट होइछ - परन्तु ओ सेहो लक्ष्मीक सोना बाँटि नहि पबैछ। बम बहादुर (पुलिस) प्रकट होइछ आ कलाकारगणकेँ गिरफ्तार करैछ। अन्तमे नूनूकाका (लोकधर्मी प्रतीक) प्रकट होइछ जे लोकनाट्यक माध्यमसँ सत्यक उद्घाटन करैछ। नाटकक समाप्ति विवाह-संस्कारक दृश्यसँ होइछ - जे नवसृजनक, नवजीवनक प्रतीक थिक। २.३ रङ्गशिल्प एवं नाट्यतकनीक 'रेङ–रेङ' एपिक थिएटरक शैलीमे रचित अछि। स्वर-भङ्गिमामे परिवर्तन, तन्मय-भावसँ राजनीतिक नारा-लगावटि, नृत्य एवं गायन - इएह ब्रेख्टियन 'वर्फ्रेम्डुङ्स्इफेक्ट' (अपरिचयीकरण) तकनीकक निकट अछि। नाटकमे पाँच प्रमुख नाट्यतकनीक व्यवहृत अछि: (१) स्वर-भङ्गिमा परिवर्तन (Voice Modulation as Alienation Effect) (२) रङ्ग-तरङ्ग - दृश्य-परिवर्तनक रूपकात्मक प्रयोग (३) एपिसोडिक संरचना - खण्डित दृश्यविधि (४) लय-परिवर्तन - लोकगीत, हुमरी, नाराशैली (५) मेटाथिएटर - नाटकक भीतर नाटकक आत्म-सन्दर्भिता। ३. चतुर्धा विश्लेषण-पद्धति विदेह समानान्तर साहित्य इतिहास फ्रेमवर्कक अनुसार, समीक्षाक चार स्तम्भ अछि: (अ) भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति सौन्दर्यशास्त्र, (आ) पाश्चात्य आलोचना सिद्धान्त, (इ) नव्य-न्याय (गंगेश उपाध्याय), (ई) विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क। ३.१. भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति सौन्दर्यशास्त्र ३.१.१ रसविचार - नाटकमे प्रभावी रस भरत मुनिक नाट्यशास्त्र (नाटकमे नवरस) एवं अभिनवगुप्तक अभिनवभारती (रसास्वादन-सिद्धान्त)क प्रकाशमे 'रेङ–रेङ'क रसिक विश्लेषण निम्नलिखित रूपमे होइछ: मुख्य रस: करुण गरीबीक त्रासदी, बेरोजगार कलाकारक यातना, लक्ष्मी (धनदेवी)क खाली हाथ जेबाक दृश्य - इएह समग्र नाटकमे करुण रसक स्थायी भावका आधार थिक। 'गरीबी रोग' - यएह रुदनोक्ति समग्र नाटककेँ करुणाक आद्र वातावरणमे राखैछ। व्यंग्य-रस (हास्य + रौद्र): द्वैत रसानुभव भरतक हास्यरस एवं रौद्र रसक बीच नाटककार एक अजगुत तनाव स्थापित करैछ। बम बहादुर प्रहरीक प्रवेश, लक्ष्मीक प्रस्थान - इएह दृश्यमे हास्य आ रौद्रक सम्मिश्रण अछि। अभिनवगुप्तक 'रसाभास' सिद्धान्तक अनुसार, एतऽ रसक पूर्ण उद्रेक नहि, बरु एक अपूर्ण, विक्षुब्ध अनुभव होइछ - से स्थिति 'रेङ–रेङ'मे बेर-बेर आबैछ। वीर रस: अन्तिम प्रतिरोध जेल-दृश्यमे अनवर आ विवेक केर निर्भय प्रतिरोध, लोकनाट्यक माध्यमसँ सत्य-उद्घाटनक दृश्य - इएह वीर रसक अभिव्यक्ति थिक। 'ॐ खम्ब्रह्मन् - सुग ऋतस्य पन्था' - यएह उद्घोष वीर रसक चरमोत्कर्ष थिक। ३.१.२ ध्वनि-सिद्धान्त - आनन्दवर्धनक परिप्रेक्ष्यमे आनन्दवर्धनक 'ध्वन्यालोक' (८५० ई.) अनुसार, उत्तम काव्यमे 'ध्वनि' - अर्थात् वाच्यार्थसँ परे व्यङ्ग्यार्थक स्तर - मुख्य होइछ। 'रेङ–रेङ'मे ध्वनिक तीन स्तर स्पष्ट अछि: प्रथम ध्वनि-स्तर: शाब्दिक - 'रेङ–रेङ' रङ्गकेर ध्वनि थिक। द्वितीय ध्वनि: रूपकात्मक - जीवनक रङ्गपरिवर्तनक संकेत। तृतीय ध्वनि: राजनीतिक - भ्रष्टाचारी शासनमे लोकसंस्कृतिक विखण्डन। नाटकक शीर्षक 'रेङ–रेङ' स्वयं एक बहु-ध्वन्यात्मक संकेत थिक - जाहिमे रङ्ग (colour/stage), रोग (disease as poverty), रण (struggle) तथा रेङ (the sound of a suppressed cry) सभ एक संग अनुगुञ्जित होइछ। ३.१.३ वक्रोक्ति - कुन्तकक परिप्रेक्ष्यमे कुन्तकक 'वक्रोक्तिजीवित'क (१०म शती) अनुसार, उत्कृष्ट काव्य-नाटकमे 'वक्रोक्ति' - सरल अभिधेयसँ भिन्न, विचलित, वक्र अभिव्यक्ति - मूल थिक। 'रेङ–रेङ'मे वक्रोक्तिक कएटा उदाहरण अछि: (क) देवता विष्णुक प्रवेश - दैवी नहि, बरु व्यंग्यात्मक: ओ मात्र 'दू-टप्पी' बात करैछ आ चलि जाइछ। (ख) लक्ष्मी (धन-देवी) खाली हाथ जाइछ- यएह सर्वाधिक वक्र कथन थिक। (ग) सत्यनारायण पूजाक पाठ - गरीबीमे व्यंग्यात्मक धार्मिक अनुष्ठान। (घ) सोनाक असरफी- स्वर्णस्वप्न जे खाक होइछ - यएह वक्र प्रतीकतन्त्र थिक। ३.२. पाश्चात्य आलोचना सिद्धान्त ३.२.१ ब्रेख्टियन एपिक थिएटर (Brechtian Epic Theatre) बर्टोल्ट ब्रेख्ट (१८९८–१९५६) क एपिक थिएटर सिद्धान्त 'रेङ–रेङ'क निकटतम पाश्चात्य समकक्ष थिक। ब्रेख्टियन 'Verfremdungseffekt' (अपरिचयीकरण प्रभाव) एहि नाटकमे निम्न रूपमे अभिव्यक्त होइए: (अ) दर्शककेँ भावनात्मक तादात्म्यसँ दूर राखि तर्क-चिन्तनमे प्रवृत्त करबाक उपाय - स्वर-भङ्गिमा परिवर्तन, नाटकक भीतर गान-नृत्य - इएह ब्रेख्टियन 'Gestus' थिक। (आ) 'गरीबी रोग'क नारा-स्वरूप दोहरायब - ब्रेख्टियन 'Song' तकनीक। (इ) जेलक दृश्यमे 'मोबाइल'पर अनवर-अक्षराक लटपटाइ - दर्शककेँ वास्तवकतासँ जोड़ैछ। ३.२.२ मार्क्सवादी नाट्य-आलोचना रेमण्ड विलियम्स ('Drama from Ibsen to Brecht', 1952) एवं टेरी ईगलटन ('Marxism and Literary Criticism', 1976) क प्रकाशमे 'रेङ–रेङ'क वर्ग-संघर्ष विश्लेषण: नाटकमे शासक-वर्ग (प्रहरी, सरकार, विष्णु/यथास्थितिवादी देवत्व), कला-वर्ग (श्रीधर, अनवर, हमाल, अक्षरा - बेरोजगार कलाकार), तथा लोकवर्ग (नूनूकाका, छौंड़ा) - इएह त्रिभुजीय संघर्ष मार्क्सवादी वर्गसंघर्षक नाट्य रूपान्तरण थिक। सोना (पूँजी)क संचय, वितरण आ अन्ततः निराशाजनक अन्तर्धान - यएह पूँजीवादी संचय-तन्त्रक रूपक थिक। ३.२.३ उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि (Postcolonial Theory) होमी भाभा ('The Location of Culture', 1994) एवं गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक ('Can the Subaltern Speak?', 1988) क प्रकाशमे: 'रेङ–रेङ'क भाषा-विमर्श (मैथिली बनाम नेपाली/हिन्दी/अंग्रेजी/संस्कृत/उर्दू - विष्णुक असरफीपर कोन भाषामे लिखबाक विवाद) एक उत्कृष्ट उत्तर-औपनिवेशिक 'हाइब्रिडिटी' (संकरता) दृश्य थिक। नाटककार भाभाक 'Third Space'- तृतीय आकाश - निर्मित करैछ जतए कोनो एक भाषा/संस्कृति प्रभुत्वशाली नहि। नूनूकाकाक प्रवेश - लोकनाट्यक आत्मा - भरत मुनिक 'पञ्चमवेद' तर्कक माध्यमसँ उपनिवेशी (ब्राह्मणी-संस्कृत) वर्चस्वकेँ चुनौती दैछ। ३.२.४ नारीवादी आलोचना (Feminist Theory) जूडिथ बटलर ('Gender Trouble', 1990) एवं सिमोन द बोउव्वार ('The Second Sex', 1949) क आलोकमे अक्षरा-चरित्रक विश्लेषण: अक्षरा एकमात्र महिला-पात्र थिक जे नाटकमे मुखर एवं साहसी अछि। ओ हमाल (नायक) केँ प्रेमविवाहक प्रस्ताव करैछ, पुलिससँ निर्भय वार्तालाप करैछ। तथापि, लक्ष्मी-दृश्यमे महिलाक आर्थिक शक्ति (धनदेवी) एवं पुरुषवादी आर्थिक सत्ताकेर बीच एक तनावपूर्ण 'परफॉर्मेटिविटी' (बटलर) स्पष्ट होइछ। ३.२.५ चीनी साहित्यिक सिद्धान्त (Chinese Literary Theory) चीनी 'जिङ जिए' (Aesthetic Realm/Realm of Experience) सिद्धान्त - वाङ गुओवेइ ('Renjian Cihua', 1908-1910) एवं 'फेंग' (Satire in traditional Chinese theatre) परम्पराक प्रकाशमे: 'रेङ–रेङ'क राजनीतिक व्यंग्य चीनी 'जाजू' (Yuan Dynasty Musical Drama) एवं 'कुंकू' (Kunqu Opera) परम्पराक व्यंग्यात्मक तत्त्वसँ तुलनीय अछि- जतए शासक-वर्गक मूर्खतापर व्यंग्यात्मक हास्य, कथा-भीतर-कथाक संरचना, एवं लोक-सुर (Folk Tunes) क काव्यात्मक प्रयोग केन्द्रमे रहैछ। गरीबी-बोध (Pínkùn yìshí) एवं सामाजिक न्यायक आकांक्षा - इएह दुनु परम्पराक साझा केन्द्रबिन्दु थिक। ३.३.नव्य-न्याय - गंगेश उपाध्यायक ज्ञानमीमांसा ३.३.१ प्रत्यक्ष-ज्ञान (Direct Perception) एवं नाट्य-सत्य गंगेश उपाध्याय (मिथिला, १३म शती)क 'तत्त्वचिन्तामणि' (प्रत्यक्ष-खण्ड)क 'प्रत्यक्ष' (प्रत्यक्ष ज्ञान)क सिद्धान्तक आलोकमे 'रेङ–रेङ'क ज्ञानमीमांसा: नाटकमे गरीबीक प्रत्यक्ष अनुभव- 'भूखसँ मरल छी' (अनवर) - एक 'निर्विकल्पक प्रत्यक्ष' (Indeterminate Perception) थिक। लक्ष्मीक प्रत्यक्षीकरण - सोनाक बरसनाइ - एक 'सविकल्पक प्रत्यक्ष' (Determinate Perception) थिक जे अन्ततः मिथ्या सिद्ध होइछ। यएह गंगेशक 'प्रत्यक्ष-भ्रम' (Perceptual Illusion) तन्त्रक नाट्य अभिव्यक्ति थिक। ३.३.२ अनुमान-तन्त्र (Inference) एवं नाटकक तर्कशृंखला गंगेशक 'व्याप्तिग्रह' (Invariable Concomitance) - जे व्याप्तिक आधारपर अनुमान सम्भव होइछ - 'रेङ–रेङ'क केन्द्रीय तर्कक आधार थिक: व्याप्ति: 'गरीबी रहतइ तँ सब रोग रहतइ।' (Poverty persists → All misery persists) - यएह नाटकक 'हेतु' (Logical Reason) थिक। साध्य: 'सब रोगक कारण गरीबी।' (All disease's cause is poverty) - यएह नाटकक 'पक्ष' (Subject of Inference) थिक। नव्य-न्यायक 'परामर्श' (Subsumptive Reflection) तकनीकसँ नाटककार श्रीधरम् क भाषणकेँ एक दार्शनिक-तार्किक घोषणाक रूपमे प्रस्तुत करैछ। ३.३.३ शब्द-प्रमाण एवं भाषा-विवाद नाटकक एक महत्त्वपूर्ण दृश्य - सोनाक असफरीपर भाषाक प्रश्न (मैथिली? नेपाली? हिन्दी? अंग्रेजी? संस्कृत? उर्दू?) - गंगेशक 'शब्द-प्रमाण' (Testimonial Knowledge) सिद्धान्तक नाट्य परीक्षण थिक। गंगेशक अनुसार, 'शब्द-प्रमाण' तखने वैध थिक जखन वक्ता आप्त (प्रामाणिक) हुअय। नाटकमे भाषा-वर्चस्वक प्रश्न इएह जिज्ञासा उठाबैछ: कोन भाषाक शब्द 'आप्त' (Authoritative) थिक? के वक्ता 'आप्त' थिक? ३.४. विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क ३.४.१ प्रति-कैनन (Counter-Canon) एवं परमेश्वर कापड़ि विदेह समानान्तर साहित्य इतिहास आन्दोलनक मूल तर्क थिक जे साहित्य अकादेमी (नई दिल्ली) एवं नेपाल प्रज्ञाप्रतिष्ठान-केन्द्रित 'मुख्यधारा' मैथिली साहित्यक इतिहासमे बहुत किछु 'छोड़ि देल' गेल - विशेषतः नेपालक मैथिली साहित्यकार, सीमान्त लेखक, एवं लोकनाट्य-परम्परा। परमेश्वर कापड़ि एहि 'छोड़ल गेल' समूहक प्रतिनिधि थिका। हुनकर 'रेङ–रेङ' – (क) नेपालक जनकपुरधाम-केन्द्रित मैथिली रङ्गमञ्चक प्रतिनिधित्व करैछ (ख) साहित्य अकादेमीक संस्थागत वर्चस्वकेँ प्रत्यक्षतः व्यंग्य-विषय बनाबैछ (ग) लोकनाट्य (नूनूकाका-प्रसंग) केँ शास्त्रीय नाट्यक समकक्ष स्थापित करैछ (घ) बेरोजगार कलाकारक संघर्षकेँ केन्द्रमे राखैछ - जे मुख्यधारा साहित्यिक इतिहासमे अनुपस्थित अछि ३.४.२ मैथिली रङ्गमञ्चक समानान्तर इतिहासमे 'रेङ–रेङ' मैथिली नाट्य-इतिहासमे 'रेङ–रेङ' एक विशिष्ट स्थान रखैछ। अयोध्यानाथ चौधरी (यशस्वी मैथिली साहित्यकार)क प्रतिक्रिया सँ स्पष्ट होइछ जे ई नाटक अपन युग-सत्य, लोकयथार्थ एवं जेन-जी आन्दोलन ('जेन-जी' - युवा पीढ़ीक विद्रोही आन्दोलन) सँ प्रेरित राजनीतिक परिवेशकेँ सटीकतासँ रेखांकित करैछ। ४. तुलनात्मक अध्ययन - मैथिली नाटककार/साहित्यकारसँ जतए मूलधारा ऐतिहासिकता एवं सांस्कृतिक पुनरुद्धारमे निमग्न अछि, ततए कापड़ि समकालीन राजनीतिक यथार्थपर केन्द्रित छथि। नाट्यतकनीकमे मूलधारा शास्त्रीय त्रि-ऐक्य (स्थान, काल, क्रिया) केर अधिक पालन करैछ, मुदा 'रेङ–रेङ' एपिक थिएटरक खुजल संरचना अपनाबैछ। महेन्द्र मलंगियासँ तुलना महेन्द्र मलंगिया लोकनाट्यकेँ सौन्दर्यशास्त्रीय धरातलपर मात्र उठा सकला, ततए कापड़ि ओकरा राजनीतिक प्रतिरोधक अस्त्रमे बदलि देलथि। दुनु नाटककार मैथिली साहित्यमे व्यंग्यकेँ प्राथमिक साहित्यिक उपकरणक रूपमे व्यवहार करै छथि। मलंगिया सीमित रूपमे, मुदा कापड़ि मुक्त नाट्यरूपमे। दुनूक केन्द्रीय चिन्ता फराक अछि, मलंगिया एकटा सीमित वर्गक समस्या लेल मुदा कापड़ि बेचन ठाकुर सन बेरोजगारी, भ्रष्टाचारी व्यवस्थाक विरुद्ध एवं मैथिली अस्मिता लेल लिखै छथि। नाटकक पात्र 'श्रीधरम्' (निर्देशक) सम्भवतः एक व्यंग्यात्मक संकेत थिक - नेपालक मैथिली संस्थागत साहित्यिक व्यवस्थापर। ज्योतिरीश्वरक धूर्त समागम आ विद्यापतिक (ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिसँ भिन्न) 'गोरक्षविजय' क नाट्य-परम्परामे नूनूकाका-प्रसंगमे अनुगुञ्जित होइछ। 'भरत मुनिक नाट्यशास्त्र' एवं नाटकमे 'पञ्चमवेद' तर्क - अही परम्परासँ प्रत्यक्ष सम्बन्ध अछि। कापड़ि ऐ परम्पराकेँ समकालीन राजनीतिक संदर्भमे पुनर्स्थापित करै छथि। ५. समीक्षात्मक मूल्यांकन - शक्ति एवं सीमा ५.१ नाटकक विशिष्ट शक्ति (क) लोकनाट्य-परम्परा एवं आधुनिक राजनीतिक थिएटरक सफल सम्मिश्रण। 'रेङ–रेङ'क सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि यएह थिक जे ओ मैथिली लोकनाट्यक फकड़ाकेँ समकालीन राजनीतिक थिएटरक अस्त्रमे बदलै छथि। ई ब्रेख्टक एपिक थिएटरसँ सेहो आगू जाइत अछि- किएकि एतए सौन्दर्यशास्त्रक जड़ि स्थानीय, लोकपरम्परामे अछि। (ख) भाषा-बहुलता एवं सांस्कृतिक संवाद। नाटकमे मैथिली, नेपाली, हिन्दी, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी - इएह बहुभाषिक समांगता स्वयं एक सांस्कृतिक-राजनीतिक वक्तव्य थिक। नेपालक मैथिली अस्मिता - जे बहुभाषिक प्रदेशमे रहैछ - तकर यथार्थ अनुभव नाटकमे सजीव थिक। (ग) मेटाथिएटर - नाटकक भीतर नाटक। 'रेङ–रेङ' स्वयं एक मेटाथिएटर थिक - यएह एक नाट्यसंस्थाक नाट्यरिहर्सलक कथा थिक जे स्वयं एक सामाजिक नाटकमे परिणत होइछ। ई नाटकक भीतर नाटक संरचना (Play-within-a-Play) मैथिली नाटकमे दुर्लभ अछि। (घ) ऐश्वर्या/लक्ष्मी-दृश्य - अर्थशास्त्रक रूपक। लक्ष्मीक सोना-वर्षण, लोभग्रस्त पात्रगणद्वारा ओकर हरण, एवं अन्ततः शून्यहस्त विदाई - यएह पूँजीवादी अर्थव्यवस्थाक एक उत्कृष्ट रूपकात्मक चित्रण थिक जे मार्क्सवादी आलोचनाक सभ अपेक्षा पूरा करैछ। ५.२ नाटकक सीमा एवं आलोचना-बिन्दु (क) अन्तिम विवाह-दृश्य - हमाल-अक्षराक विवाह - नाटकक राजनीतिक तेवरसँ किछु असंगत प्रतीत होइछ। यएह परिणति वाणिज्यिक रङ्गमञ्चीय समझौताक लक्षण थिक। (ख) नूनूकाकाक 'पञ्चमवेद' तर्क - जे नाटकक दार्शनिक उत्कर्ष थिक - ओकरा अधिक विस्तार देल जा सकैत छल। (ग) पात्रमे मनोवैज्ञानिक गहराई असमान अछि- श्रीधरम् एवं अनवर सुविकसित, मुदा छौंड़ा एवं बम बहादुर कतहुँ-कतहुँ अतिसरलीकृत रूढ़ि (stereotype) मे बदलि जाइछ। ६. नाटककार एवं नाटकक साहित्यिक महत्त्व ६.१ मैथिली रङ्गमञ्चमे योगदान 'रेङ–रेङ' नेपालक मैथिली रङ्गमञ्चकेँ एक नव आयाम दैछ। ओ प्रमाणित करैछ जे - (क) मैथिली नाटक विश्वस्तरीय राजनीतिक थिएटरक प्रसंगमे रखल जा सकैछ (ख) लोकनाट्य-परम्परा 'आदिम' नहि, बरु 'आधुनिकतम' विचार-माध्यम थिक (ग) बेरोजगार, सीमान्त मैथिली कलाकारक संघर्ष साहित्यिक विषयक रूपमे गम्भीर अछि (घ) जनकपुरधाम - नेपालक मैथिली रङ्गमञ्चक केन्द्र – दरभंगा केन्द्रित इतिहाससँ स्वतन्त्र अपन परम्परा रखैछ ६.२ विदेह समानान्तर इतिहासमे स्थान विदेह समानान्तर साहित्य आन्दोलनक फ्रेमवर्कमे, परमेश्वर कापड़ि – एहन रचनाकार छथि जे- (अ) संस्थागत तन्त्रसँ बाहर रहिकऽ, अपन साहित्यिक कर्म जारी रखै छथि। (आ) लोकसाहित्य-परम्पराकेँ आधुनिक राजनीतिक थिएटरसँ जोड़ै छथि। (इ) नेपालक मैथिली अस्मिता-संघर्षकेँ साहित्यिक अभिव्यक्ति दै छथि। (ई) मिथिलाक सांस्कृतिक वैभवकेँ आधुनिक चिन्तनसँ समन्वित करै छथि। यएह सभ विशेषता 'What the Canon Left Out' - विदेह समानान्तर इतिहासक उपशीर्षक - कें चरितार्थ करैछ। ७. उपसंहार परमेश्वर कापड़िक 'रेङ–रेङ' मैथिली साहित्यमे एहन नाटक थिक जे जीवनकेँ देखबैत अछि, जेना रङ्गमञ्चपर। गरीबी, भ्रष्टाचार, कलाकारक बेरोजगारी - ई सभ रोग थिक। तथापि नाटककार निराशावादी नहि छथि- लोकनाट्यक माध्यमसँ, पञ्चमवेदक शक्तिसँ, नवविवाहक प्रतीकसँ- ओ एकटा दुर्दमनीय आशावादिताक संदेश देबऽ चाहै छथि। भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति सौन्दर्यशास्त्र, पाश्चात्य एपिक थिएटर, चीनी व्यंग्य-नाट्य-परम्परा, गंगेशक नव्य-न्यायिक ज्ञानमीमांसा - ऐ चारू परम्पराक प्रकाशमे 'रेङ–रेङ' एक बहुस्तरीय, समृद्ध रचना थिक जे मैथिली नाट्य-परम्पराकेँ एक नव आयाम प्रदान करैत अछि। विदेह समानान्तर साहित्य इतिहासक फ्रेमवर्कमे, कापड़ि - मुख्यधारा साहित्यिक इतिहासद्वारा 'कतिआयल' एक महत्त्वपूर्ण नाटककार छथि- जिनकर 'रेङ–रेङ' मैथिली रङ्गमञ्चक इतिहासमे अपन अविस्मरणीय स्थान रखैत अछि। [सैद्धांतिक विवेचन लेल देखू- मैथिली समीक्षाशास्त्र- गजेन्द्र ठाकुर] अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.२१. गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-२) सन्दर्भ- परमेश्वर कापड़ि- नाटक 'गहन उगरास' गजेन्द्र ठाकुर मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-२) सन्दर्भ- परमेश्वर कापड़ि- नाटक 'गहन उगरास' गहन उगरास - परमेश्वर कापड़ि बहुआयामी नाट्यशास्त्रीय समीक्षा 'गहन उगरास'क ऐतिहासिक आ प्रकाशनक पृष्ठभूमि समकालीन मैथिली नाट्य-परम्परा आ रंगमंचीय प्रयोगशीलताक क्षेत्रमे परमेश्वर कापड़िक नाटक 'गहन उगरास' एकटा ऐतिहासिक आ मीलक पत्थर थिक। प्रस्तुत नाट्य-कृतिक प्रथम संस्करणक प्रकाशन फागुन २०७३ मे पृथु प्रकाशन, जनकपुरधाम सँ भेल। एकटा विशुद्ध आ मौलिक नाट्य-कृतिक रूपमे लिखल गेल एहि पुस्तकक आवरण चित्र सुप्रसिद्ध मिथिला चित्रकार एस. सी. सुमन द्वारा आ सेटिङ तथा डिजाइन कुमार भास्कर द्वारा कयल गेल। परमेश्वर कापड़ि अपन एहि विशिष्ट नाटक कें मैथिलीक सुप्रसिद्ध आ ऐतिहासिक रंगकर्मी कुणालजी कें समर्पित कयलनि अछि, जिनकर रंगमंचीय सक्रियता आ नाट्य रचनाशीलता पर मैथिली भाषा आ साहित्य कें अनन्त गौरव अछि। नेपाली रंगमंचक मूर्धन्य विद्वान डा. अभि सुवेदी एहि नाटकक संरचना कें "प्रयोगशील" घोषित करैत लिखने छथि जे नाटककार कापड़ि पारम्परिक दृश्य-विधान वा कृत्रिम सेनोग्राफी (scenography) क स्थान पर मानवीय सम्वाद आ सम्वादक आन्तरिक सम्बन्ध सँ रंगमंचक निर्माण कयलनि अछि। नाटकक मुख्य पात्र जिमदार अछि आ ओकर चारू कात सामाजिक सम्बन्धक बनब आ भथब चलैत रहैत अछि। नाटककार परमेश्वर कापड़ि व्यवस्था सँ ढुइस लैले जानल जाइत छथि। ओ स्वयंमे मैथिलीक एकटा जीवन्त शब्दकोश छथि, जकर प्रकर प्रमाण 'गहन उगरास'क खाँटी आ समृद्ध मैथिली शब्दावलीमे देखल जा सकैछ। ऐतिहासिक रूप सँ, नेपालक सीमामे अवस्थित मिथिलांचलक रंगमंचीय आ सांस्कृतिक राजधानी जनकपुरधाम थिक। जकर आभाक मूल शक्ति वर्ष १९७९ मे स्थापित 'मिथिला नाट्यकला परिषद' (मिनाप) रहय, जकर उष्मा सँ मैथिली नाट्य चेतना जाग्रत रहैत छल। मुदा बीसम शताब्दीक अन्त होइत-होइत धीरेन्द्र-धूमकेतुजीक असामयिक निधनसँ जनकपुरक रंगमंच कने सेराए लागल। ताही समय भारतक पटनाक रंगमंच सेहो निष्क्रियताक शिकार भ' गेल, गाउँ-घरक पारम्परिक मंच पर अश्लील ऑर्केस्ट्राक कब्जा भ' गेल, आ विद्यापति पर्वक नाम पर चन्दा-चिट्ठाक व्यापार करैबला लोक पागक स्थान पर योग्य लोक कें दाग दै लागल। महेन्द्र मलंगियाक ’स्लैपस्टिक ह्यूमर’ सर्वहारापर उपहास करैत रहल। एहेन भीषण अन्हारमे जनकपुरमे 'मिनाप', 'आकृति', 'अछिंजल' आ 'भंगिमा' सन संस्था सभक प्रयास सँ मैथिली नाटकक पुनरुत्थान भेल। ठीक ताही समय नेपालक १० वर्षक माओवादी जनयुद्ध आ दोसर जनआन्दोलनक विभीषिका सँ उपजल यथार्थ सँ प्रेरित भ' क' रमेश रंजन 'सखी' नाटकक संग अएलाह आ परमेश्वर कापड़ि 'गहन उगरास'क संग। नाटकक कथ्य संरचना, प्रतीक योजना आ सामाजिक-राजनैतिक यथार्थ 'गहन उगरास'क कथानक मुख्य रूप सँ दू भागमे विभक्त अछि, जे नेपालक सामन्ती संक्रमणकाल, जनयुद्धक सामाजिक प्रभाव आ सांस्कृतिक औपनिवेशीकरणक ऐतिहासिक विमर्श कें रूपकात्मक ढंग सँ प्रस्तुत करैत अछि। नाटकक आरम्भिक कालखण्ड नेपालक दोसर जनआन्दोलन (विक्रम संवत २०६२-६३) क बादक प्रतिगमन कालक राजनैतिक संकट थिक। राजशाही आ निरंकुश पंचायती व्यवस्थाक दमन शिथिल भ' रहल अछि, मुदा ज्ञानेन्द्रक सरकार बल-जबरदस्ती सत्ता कें अपन वशमे रखबाक अन्तिम चेष्टा क' रहल अछि, जखन कि दोसर दिस संविधान सभाक माध्यम सँ संघीय गणतन्त्रक लेल नव आन्दोलनक लहरि देशमे पसरल अछि। प्रथम भागक सूक्ष्म कथ्य विश्लेषण नाटकक प्रथम भागक आरम्भ सामन्ती अवशेषक प्रतीक राजपूत जिमदार फुलगेन सिंहक ढहल-ढनमनाएल घर सँ होइत अछि, जकर एको टा बखारीमे अन्नक दाना नहि अछि। जिमदारक बाल-बच्चा सभ बाहरे रहैत अछि आ गामक धानुक (मनेजरा) ओकर सेवा-टहल आ भन्सा-भात करैत अछि। खौझाह बूढ़बा जिमदार फुलगेन सिंह ठेहुना-पिट्ठीमे गमछा लपेटने माछी मारैत अपन पुरान सामन्ती धाक कें स्मरण करैत अछि। गामक ढीठ आ पिङल धियापूता (टुनमा आ मुसना) जिमदारक ओसारी पर "हाथी अगत्त, घोड़ा अगत्त, अइ बाबा बियाहमे पोता चलत" आ "रेङ-रेङ-रेङ, तोरा पतलीमे बेङ" जकाँ पारम्परिक लोक-गीत गाबि क' ओकर उपहास करैत अछि। दू टा छौड़ी जट-जटिन खेलैत जिमदार कें "गामके अधिकारी ई जिमदरबा छै गे ना, कनही तराजू घटबी सेर छै गे ना" कहि क' ओकर शोषक चरित्र कें नंगा करैत अछि। एहि बीच सती नामक एकटा मध्य-वयस्क महिलाक प्रवेश होइत अछि, जे जिमदार कें गारी-गलौज करबा सँ रोकैत अछि आ चेतबैत अछि जे आब सामन्ती दमनक युग समाप्त भ' गेल अछि आ "लात जुत्ता" लागब निश्चित छैक। तखनिए रंगमंच पर पाँच टा क्रान्तिकारी युवा लोकनिक प्रवेश होइत अछि: फुलो खतबे: एकटा जुझारू दलित मानवाधिकार कार्यकर्ता। दुखिया सादा: एम्नेस्टी इन्टरनेशनलक प्रतिनिधिक रूपमे शोषितक आवाज। सुभद्र मंडल: एकटा सक्रिय राजनैतिक कर्मी। ज्वाला प्रसाद सिंह (ज्वाला): माओवादी जनयुद्धक भूमिगत लड़ाकू, जे शोषकक अन्त लेल हथियार उठाने अछि। विद्यापति यादव: प्रखर पत्रकार आ संचारकर्मी, जे कलम बले शोषक वर्ग कें नाङट करैत अछि। जिमदार जखन अपन पुरान सामन्ती शोषणक घमण्ड देखाबैत कहैत अछि जे "बाप-दादा हवेलीमे गाइ चराबैत रहे आ कनियाँ सभ हवेलीक दासी बनैत छलीह", तखन क्रुद्ध भ' क' माओवादी लड़ाकू ज्वाला सिंह ओकरा एक झाप (एड़) मारैत अछि, जाहिसँ बूढ़ जिमदार थुरथुर काँपैत भूइँ पर खसि पड़ैत अछि। सभ युवा प्रतिगमनक विरुद्ध भ' रहल पैघ राजनैतिक सभामे रिपोर्टिङ आ सहभागिताक लेल चलि जाइत छथि। कनी कालक बाद सेवक दौड़ैत अबैछ आ बुढ़बा खोखना आ बुढ़िया कें रोइत-कनैत जानकारी दैत अछि जे स्कूलक राजनैतिक सभामे पुलिस अन्धाधुन्ध गोलीबारी कयलक, जाहिमे सतीक छातीमे दू टा गोली लागल आ ओ मरी गेलीह, ज्वाला सिंहक तत्क्षण मृत्यु भ' गेलै, फुलो अन्तिम साँस लेइत अछि, आ सुभद्र तथा विद्यापतिक स्थिति अत्यन्त गम्भीर अछि। द्वितीय भागक रूपकात्मक आ सांस्कृतिक विमर्श नाटकक द्वितीय भाग एकटा अतियथार्थवादी (Surreal) आ रूपकात्मक यात्राक रूपमे आरम्भ होइत अछि। बाबा अभेलबा आ ओकर लकवा-ग्रस्त बकलेलबा चेला (जे धान कुटैत सन थरथराइत चलैत अछि) हाथमे तुमरी-कमण्डल आ कम्मल लेने जनकपुरधामक दिश "लटक सटक सियारामा" भजन गाबैत जा रहल छथि। चेला अपन माथक मोटरी खसबाक बादो जोगिरा गाबैत अछि। जनकपुरधाम पहुँचि क' ओतय सूत'क लेल जमा भेल लोक सभ (लखना, बेचना, मंगला, जनका) जुटि जाइत छथि। जनका मल्लाह विवाह पंचमीक प्रसंगमे राम-सीताक बिआहक आख्यान सुनाबैत छथि। ओ कहैत छथि जे विवाहक बाद दशरथ दहेजक लेल हठ क' लेलक, तखन जनक अपन मूड़ी दशरथक आगूमे राखि देलनि। ई आख्यान मिथिलाक अनन्त सांस्कृतिक शोषणक रूपक थिक। एहि बीच गेनमा आ फगुनी कें धरतीक रोदन सुनाइ दैत छै। सभ गोटे धरती खनैत छथि त' ओतय डगडग लाल खूनक धारा भेटैत अछि। विद्यापति स्पष्ट करैत छथि जे ई खून गोरखा राजा शाहवंश द्वारा २३०-२४० वर्ष पूर्व कयल गेल दमनक अछि। माटिक भीतर मैथिली भाषा, संस्कृति आ कलाक अवशेष भेटैत अछि, जे "एक भाषा एक भेष"क दमनकारी नीति सँ नष्ट कयल गेल रहय। बुलन्ती आ दुखियाक आह्वान पर महिला लोकनि पुनर्जीवनक गीत (छठि गीत, चैतावर, जट-जटिन) गाबैत छथि। अन्तमे विद्यापति मैथिलीक "गहन उगरास" (ग्रहण मुक्ति) आ नव संघीय नेपालमे स्वायत्त मिथिला प्रदेशक स्थापनाक लेल महाक्रान्तिक जुलुश निकालैत छथि। १. पोथीक सामान्य परिचय आ संरचना परमेश्वर कापड़िक मैथिली नाटक गहन उगरास (अर्थात् 'ग्रहण उग्रास'क अपभ्रंश) गहन समाजिक पीड़ाक उद्गार अछि जे २०७३ फागुनमे पृथु प्रकाशन, जनकपुरधामसँ प्रकाशित भेल। ई नाटक दू भागमे बँटल अछि - प्रथम भाग आ द्वितीय भाग - जाहिमे नेपालक मिथिला क्षेत्रक सामाजिक-राजनैतिक परिस्थितिकेँ केन्द्रमे राखि नाट्य-कथानक विकसित कयल गेल अछि। पात्र-योजनाक विचारसँ नाटकमे अनेक वर्गीय प्रतिनिधि उपस्थित छथि - जिमदार फुलगेन सिंह (शोषक सामन्त), टुनमा-मुसना (हास्यकर बालक पात्र), छौड़ी-१ आ छौड़ी-२ (विद्रोही स्त्री-स्वर), फेकुआ (युवा पात्र), हिरोइन (नव-सांस्कृतिक विकृतिक प्रतीक), बुलन्ती, सुवंश, सुभद्रा, ज्वाला, दुखिया, फूलो, सती (सर्वहारा जनसमूह), बुढ़बा-बुढ़िया (वृद्ध दम्पती), विद्यापति (सांस्कृतिक चेतनाक प्रतीक-पात्र), जनका, बेचना, लखना (मिथिलाक सामाजिक जीवनक विभिन्न वर्ग), आ फोनबला (आधुनिक संचार-माध्यमक प्रतीक)। पात्र-सूचीक विविधता स्वयं सिद्ध करैत अछि जे नाटककार समाजक कोनो वर्गकेँ दृश्यसँ बाहर नहि राखल चाहलनि। २. भारतीय नाट्यशास्त्रक दृष्टिएँ भारतीय नाट्य सिद्धान्त आ 'थिएटर ऑफ द रूट्स'क परिप्रेक्ष्यमे तुलना भारतीय नाट्यशास्त्रक रस सिद्धान्त (विशेषतः करुण, वीर आ रौद्र रस) गहन उगरासमे पूर्णतः अनुप्राणित अछि। सुरेश अवस्थीक 'थिएटर ऑफ द रूट्स' (जड़ि सँ जुड़ावक रंगमंच) आन्दोलनक सिद्धान्त औपनिवेशिक पाश्चात्य यथार्थवादी रंगमंचक विरुद्ध देसज लोक-विधाक पुनर्जीवनक आन्दोलन थिक। हबीब तनवीर, रतन थियम, बी. वी. कारंत आ के. एन. पणिक्कर लोक-अनुष्ठान आ देसज परम्परा कें आधुनिक राजनैतिक चेतना सँ जोड़ने छलाह। मैथिली नाट्य आन्दोलनमे परमेश्वर कापड़ि 'गहन उगरास'मे एहि रूट्स आन्दोलनक दर्शन कें नवीन रूपमे प्रस्तुत कयलनि अछि। मैथिली रंगमंचमे पारम्परिक 'नाच' (यथा जट-जटिन, झिझिया, लोकगीत) कें केवल मनोरंजनक साधन मानल जाइत रहय, जकर कोनो लिखित आलेख नै होइत रहय। मुदा रामभरोस कापड़ि ’भ्रमर’ आ परमेश्वर कापड़ि एहि लोक-नाच कें वर्ग-संघर्ष आ औपनिवेशिक दमनक विरुद्ध एकटा प्रखर राजनैतिक हथियार बना देलनि। नाटकक द्वितीय भागमे जखन जट-जटिनक गीत बजैत अछि, त' ओकर सम्वाद प्रवासी जीवनक दारुण यथार्थ कें अभिव्यक्त करैत अछि। ई लोक परम्परा कें जीवन्त आ गतिशील बनबायब थिक, जे 'थिएटर ऑफ द रूट्स'क मूल मान्यता अछि। (क) पञ्चसन्धि आ वस्तु-संरचना भरतमुनिक नाट्यशास्त्रमे वस्तुकेँ मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श आ निर्वहण - एहि पाँच सन्धिमे विभाजित कयल गेल अछि। गहन उगरासकेँ एहि साँचामे देखी तँ मुखसन्धि नाटकक आरम्भिक दृश्यमे प्रस्तुत होइत अछि जखन जिमदारक आँगनमे धान-भण्डार रिक्त अछि आ बालक टुनमा-मुसना खेल करैत जिमदारपर व्यंग्यात्मक गीत गाबैत अछि। प्रतिमुखसन्धि तखन उभरैत अछि जखन जनआन्दोलनक लहरि आबि जिमदारक सत्ता-व्यवस्थाकेँ चुनौती देबय लगैत अछि। गर्भसन्धिमे हिरोइनक प्रवेशसँ सांस्कृतिक विघटनक आ आर्थिक पलायनक समस्या उठैत अछि। विमर्शसन्धि ओहि दृश्यमे अभिव्यक्त होइत अछि जखन विद्यापतिक प्रतीकात्मक उपस्थितिमे सर्वहारा जनसमूह अपन मुक्तिक मार्ग खोजैत अछि। निर्वहणसन्धि - अर्थात् समाधान-बिन्दु - एहि नाटकमे सुस्पष्ट रूपेँ अनुपस्थित अछि, जे एकटा महत्त्वपूर्ण नाट्यशास्त्रीय न्यूनता थिकैक। (ख) रस-विचार नाट्यशास्त्रमे आठ वा नव रसक संकल्पना प्रतिपादित अछि। गहन उगरासमे करुण रस सर्वाधिक प्रभावी रूपेँ प्रवाहित होइत अछि - वृद्ध दम्पतीक विलापमे, महिलाक परदेश-गमन सम्बन्धी गीतमे, आ बुलन्तीक एकमात्र पुत्रविरह-वेदनामे। वीर रस द्वितीय भागक जनआन्दोलन-दृश्यमे उभरैत अछि। बीभत्स रस जिमदारक शोषणक वर्णनमे अनुभव होइत अछि। हास्य रस टुनमा-मुसनाक बालसुलभ व्यंग्यात्मक संवादमे प्रकट होइत अछि। किन्तु शृंगार रस - जे भरतमुनिक मतेँ रसराज थिकैक - एहि नाटकमे प्रायः अनुपस्थित अछि। भाष्यकार अभिनवगुप्तक रसध्वनि-सिद्धान्तक दृष्टिएँ नाटकक भाषा व्यंजनात्मक शक्तिसँ समृद्ध अछि, किन्तु साहित्यिक परिष्कारक अभावमे ध्वनि पूर्णतः विकसित नहि भऽ सकल अछि। (ग) नायक-प्रकार आ पात्र-वर्गीकरण नाट्यशास्त्र धीरोदात्त, धीरोद्धत, धीरललित आ धीरप्रशान्त - चारि प्रकारक नायकक उल्लेख करैत अछि। गहन उगरासमे कोनो एकटा केन्द्रीय नायक नहि अछि। विद्यापति प्रतीकात्मक रूपेँ धीरप्रशान्त नायकक भूमिकामे आबैत छथि - सांस्कृतिक चेतनाक आह्वाहक। जनसमूह नायक थिक, जे भारतीय लोकनाट्य-परम्परासँ अधिक मेल खाइत अछि बजाय शास्त्रीय संस्कृत नाट्यपरम्पराक। ई एकटा सचेत नाट्यशास्त्रीय चयन कहल जा सकैत अछि। (घ) अंकसंख्या आ नाट्यविधान नाट्यशास्त्रमे दशरूपकक वर्णन अछि - नाटक, प्रकरण, भाण, व्यायोग, समवकार आदि। गहन उगरास शास्त्रीय नाटकक लक्षणसँ भिन्न, प्रकरणक अधिक निकट अछि कियाक तँ एहिमे सामाजिक जीवनक यथार्थ चित्रण अछि, राजकीय कथानक नहि। किन्तु लोकनाट्यक परिप्रेक्ष्यमे ई नाटक विदापत नाच, जट-जटिन, आ सामा-चकेवाक सामूहिक गायन-परम्परासँ बेशी सम्पर्क राखैत अछि। जाहि प्रकारसँ महिला-पात्र लोक मुरेठा बान्हि एवं सांस्कृतिक गीत गबैत मंचपर आबैत छथि, ओ मिथिलाक लोकनाट्य-परम्पराक सजीव निरन्तरता थिकैक। ३. पाश्चात्य नाट्यशास्त्रक दृष्टिएँ पाश्चात्य आ चीनी नाट्य सिद्धान्तक संग तुलनात्मक मीमांसा पाश्चात्य नाटककार बर्टोल्ट ब्रेख्तक 'महाकाव्यात्मक रंगमंच' (Epic Theatre) आ 'विमुखता प्रभाव' (Verfremdungseffekt/Alienation effect) दर्शक कें कथानक सँ भावुकताक स्तर पर विलग राखि क' तार्किक विवेचनक अवसर दैत अछि। ब्रेख्तक ई सिद्धान्त पारम्परिक चीनी नाट्य शैली (विशेषतः मेई लानफांगक अभिनय) सँ प्रभावित रहय। चीनी रंगमंचमे 'चतुर्थ देबाल' (Fourth Wall) कें तोड़ि क' दर्शक सँ सोझ संवाद कयल जाइत अछि। चीनी स्पोकन ड्रामा (Huaju) क प्रणेता हुआंग जुओलिन एहि पद्धति कें 'शिएयी' (Xieyi / Essentialist Theatre) रंगमंचक नाम सँ प्रस्तुत कयलनि, जाहिमे प्रवाहिता (Fluidity), लचीलापन (Flexibility), त्रिविमता (Sculpturality), आ संकेतात्मकता (Conventionality) मुख्य अछि। 'गहन उगरास'क नाट्य-शिल्प पूर्णतः 'शिएयी' आ ब्रेख्तक सिद्धान्तक मैथिली रूपान्तरण अछि। डा. अभि सुवेदीक अनुसार, नाटकमे कोनो यथार्थवादी दृश्य-विधान (Scenography) केर स्थान पर पात्रक सम्वाद आ सम्बन्ध मंचक निर्माण करैत अछि नाटकक दृश्य परिवर्तन अत्यन्त प्रवाहमयी आ लचीला अछि; दृश्य बिनु पर्दा खसने समकालीन समय सँ सोझे २४० वर्ष पूर्व सिमरौनगढ़क दमन आ ऐतिहासिक विस्थापनक दिश चलि जाइत अछि। चेला बकलेलबाक थरथराइत चलब आ जिमदारक लाठी लपेटि क' बैसब प्रतीकात्मक रूढ़िवादिता (Conventionality) कें स्पष्ट करैत अछि। यहूदी (Yiddish) नाट्य सिद्धान्तक संग तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य आ विस्थापन विमर्श यहूदी यिडिश रंगमंच (Yiddish Theatre) क विकास पूर्वी यूरोपमे अशकेनाजी यहूदी लोकनिक यिडिश भाषामे भेल रहय। एकर मूल जड़ि 'पूरीम' पर्वक अवसर पर खेलल जायवला प्रहसन 'पूरीमश्पिल्स' (Purimshpils) मे रहय, जाहिमे समकालीन सामाजिक विसंगति आ धनी वर्ग पर तीक्ष्ण प्रहार कयल जाइत रहय। मैथिलीक 'विवाह पंचमी झाँखी' आ मिनापक 'महामूर्ख सम्मेलन'क व्यंग्यात्मक नाटक पूरीमश्पिल्क यथार्थवादी आ हास्यात्मक शैलीक अत्यन्त निकट अछि। यिडिश रंगमंचमे 'ब्रोडर सिंगर्स' (Broder Singers) घुमक्कड़ संगीतकार छलाह, जे वेशभूषा बदलि क' व्यंग्यात्मक आ हास्यास्पद प्रहसन प्रस्तुत करैत छलाह, जकरा सँ अब्राहम गोल्डफाडेन व्यावसायिक यिडिश रंगमंचक नीव रखलनि। 'गहन उगरास'क आरम्भिक दृश्यमे जिमदार फुलगेन सिंहक दुआरि पर धियापूताक प्रहसन आ द्वितीय भागमे अभेलबा बाबा आ बकलेलबा चेलाक प्रहसन ब्रोडर सिंगर्सक देसज आ हास्यात्मक नाट्य-पद्धति सँ मेल खाइत अछि। यिडिश रंगमंचमे 'शुंड' (Shund / Popular trash theatre) बनाम 'साहित्यिक रंगमंच' (Literary Theatre) क जे संघर्ष रहय, तकर विश्लेषण करैत Itsik Manger लिखने छलाह जे शुंड रंगमंच वास्तवमे बिना कोनो एकेडेमीक अभिनय कयल जायवला 'मुक्त मंच' थिक, जाहिमे लोक-इच्छाक स्वतन्त्र प्रस्फुटन होइत रहय। मैथिली नाट्य आन्दोलनमे सेहो 'शुंड' (लोक नाच, कीर्त्तनिया) आ शिष्ट साहित्यिक रंगमंचक मध्य संघर्ष रहल अछि, जकरा 'गहन उगरास'मे लोक-संस्कृतिकेँ राजनैतिक मुक्ति सँ जोड़ि क' पाटि देल गेल अछि। विस्थापन, वैदेशिक रोजगारी आ स्मृति-दंश (Nostalgia) यिडिश रंगमंचक सर्वाधिक पैघ आधार 'विस्थापन' (Diaspora), पलायन (Migration) आ स्मृति-दंश (Nostalgia) रहय। पूर्वी यूरोप सँ पलायन क' अमेरिका पहुँचल गरीब यहूदी लोकनि अपन 'श्तेतल' (Shtetl - यहूदी ग्राम) क स्मृतिमे नाटक आ 'मेइन श्तेतल बेल्ज' जकाँ गीत गाबि क' अपन दुःख बिसरैत छलाह। 'गहन उगरास' आधुनिक मैथिल विस्थापनक एहि tragedy कें अत्यन्त प्रखरता सँ प्रस्तुत करैत अछि।1 खाड़ी देश (कतार, सऊदी अरब) मे 'कफाला' (Kafala) प्रथाक दमनकारी चंगुलमे फँसल मैथिल प्रवासी (मुण्ढा) आ ओकर घर पर एकल जीवन जी रहल 'खाड़ी विधवा' (Hiroine) क मध्य पीसिओक सम्वाद यिडिश विस्थापन नाट्य-सिद्धान्तक मैथिली रूपान्तरण थिक। एतय एड्सक आशंका, कण्डमक प्रयोग आ चारित्रिक संशयक दंश प्रवासी जीवनक स्मृति-दंश (Nostalgia) आ विस्थापनक भयंकर यथार्थ कें स्पष्ट करैत अछि। नाट्य सिद्धान्तक धारा प्रमुख प्रणेता / मूल दर्शन 'गहन उगरास' मे एकर यथार्थ प्रयोग आ विश्लेषण भारतीय 'थिएटर ऑफ द रूट्स' सुरेश अवस्थी, हबीब तनवीर, रतन थियम।8 पारम्परिक जट-जटिन, झिझिया, छठि गीत आ लोक आख्यानकें (जनकक आत्मोसर्ग) वर्ग-संघर्ष आ राजनैतिक क्रान्तिक माध्यम बनाओल गेल अछि। पाश्चात्य महाकाव्यात्मक रंगमंच बर्टोल्ट ब्रेख्त। चतुर्थ देबालक भ्रम कें तोड़ब; दर्शक कें भावुकताक स्थान पर तार्किक आ वैचारिक क्रान्ति सँ जोड़ब; प्रतीकात्मक अभिनय। चीनी 'शिएयी' रंगमंच मेई लानफांग, हुआंग जुओलिन। प्रवाहिता, लचीलापन, त्रिविमता आ रूढ़िवादिता; समकालीन समय सँ सोझे सिमरौनगढ़क २५० वर्ष पूर्व दमनक समयमे संक्रमण। यहूदी यिडिश रंगमंच अब्राहम गोल्डफाडेन, इट्सिक मंगर। 'पूरीमश्पिल्स' आ 'ब्रोडर सिंगर्स' जकाँ देसज प्रहसन; खाड़ी विस्थापनक स्मृति-दंश आ यिडिश विस्थापनक त्रासदीक सादृश्यता। (क) अरस्तूक अनुकरण-सिद्धान्त आ त्रय-एकता अरस्तू अपन काव्यशास्त्रमे कहलनि जे त्रासदी उत्तम मनुष्यक अनुकरण थिकैक जे कातार्सिस - अर्थात् दर्शकक भावशुद्धि - उत्पन्न करैत अछि। गहन उगरासमे अरस्तूक त्रय-एकताक (समय, स्थान, कर्म) स्थूल अनुपालन नहि होइत अछि - नाटकक स्थान गाम, पी सी यो (पुलिस चौकी), मेला-मैदान, जुड़शीतल-घाट, इत्यादि बदलैत रहैत अछि आ समय-विस्तार बर्खक बर्ख धरि बुझाइत अछि। किन्तु एकक सर्वश्रेष्ठ अरस्तूवादी तत्त्व - कर्म-एकता - एहिमे आंशिक रूपेँ उपस्थित अछि, किएक तँ सभ घटना शोषण-मुक्तिक एकटा केन्द्रीय संघर्षक चारूकात घूमैत अछि। अरस्तूक महान त्रासदी-सिद्धान्तक दृष्टिएँ एहि नाटकमे पेरिपेटिया (भाग्य-परिवर्तन) जिमदारक पतनमे देखल जा सकैत अछि - जे एकबेर सर्वशक्तिमान छल तेकरा अन्तमे बालकसभ 'कुत्ता हुलका दू, बिलाइ लुधका दू' कहैत खेहाड़ैत अछि। किन्तु अनागनोरिसिस (सत्य-साक्षात्कार) स्पष्टतया अनुपस्थित अछि, जे नाटककेँ पूर्ण क्लासिकल त्रासद संरचनासँ रोकैत अछि। (ख) ब्रेख्त-प्रभाव: दूरीकरण-नाट्य गहन उगरास पर सर्वाधिक स्पष्ट प्रभाव जर्मन नाटककारक वैयक्तीकरण-विरोधी नाट्य-पद्धतिक देखाइत अछि। डा. अभि सुवेदीक भूमिका स्वयं स्पष्ट करैत अछि जे ई नाटक 'प्रयोगशील' अछि आ 'मानुष नैं दृश्यविधान आ "सेनोग्राफी" का निर्माता हुन् र तिनले नैं "गहन उगरास" को नाट्यकलेवर बनाएको छ।' ब्रेख्तक महाकाव्यात्मक नाट्य-परम्पराक अनुरूप एहिमे कथासूत्र बारम्बार टूटैत अछि, पात्र सभ जनगीत गबैत नाट्य-भ्रम (theatrical illusion) तोड़ैत छथि, आ दर्शककेँ भावनात्मक तादात्म्यक स्थानपर बौद्धिक प्रतिक्रिया दिअ लेल प्रेरित कयल जाइत अछि। टुनमा-मुसनाक हास्यपूर्ण गीत - 'हाथी अगत, घोड़ा अगत, अइ बाबा बियाहमे पोता चलत' - एकटा स्पष्ट ब्रेख्तीय हस्तक्षेप थिकैक जे दर्शककेँ यथार्थक विद्रूपताकेँ सचेतनतासँ देखय लेल बाध्य करैत अछि। (ग) स्तानिस्लावस्कीक मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद स्तानिस्लावस्की जे पात्रक आन्तरिक जीवनक गहन खोजपर बल दैत छलाह, ओहि दृष्टिएँ गहन उगरासमे पात्रक मनोवैज्ञानिक गहराई न्यून अछि। बुलन्तीक पुत्र-विछोहक पीड़ा, हिरोइनक दोहरा जीवनक अन्तर्द्वन्द्व - एहि ठाम किञ्चित् संवेदनशील नाट्य-क्षण उपस्थित अछि, किन्तु पात्रक व्यक्तित्व-निर्माण (characterisation) समग्रतामे अपूर्ण रहल अछि। एहि दृष्टिएँ नाटककार सामाजिक उद्देश्यकेँ पात्रक व्यैक्तिक विकासक उपर प्राथमिकता देबऽ चाहलनि अछि। (घ) अस्तित्ववादी नाट्यधारा काम्यू आ सार्त्रक अस्तित्ववादी दृष्टिकोणसँ देखी तँ नाटकक आभ्यन्तरिक शोक - लोक जीवैत अछि मुदा व्यवस्था ओकर जीवनक अर्थ छीनि लैत अछि - एकटा अनुगूँज सुनाइत अछि। बुलन्तीक एकटा उद्गार एहि जखन ओ कहैत छथि जे पुत्र घरसँ पड़ायल, मुह नहि देखल - एहिमे एकटा असम्बद्ध, नियतिहीन जीवनक अस्तित्ववादी पीड़ा ध्वनित होइत अछि। ४. इजरायली नाट्य-चिन्तनक परिप्रेक्ष्यमे इजरायली नाटककार हनोक लेविन (१९४३-१९९९) जे आधुनिक इजरायली रंगमंचक केन्द्रीय स्तम्भ छलाह, ओ राजनैतिक व्यंग्य आ जनसामान्यक यन्त्रणाकेँ नाट्य-रूप देबामे सिद्धहस्त छलाह। गहन उगरासक जिमदार-विरोधी व्यंग्यात्मक संवाद, बालपात्रक मुखसँ सत्ताक उपहास, आ सामूहिक विरोध-गीत - एहि सभमे लेविनेस्क कटुता आ प्रत्यक्षतासँ साम्य देखल जा सकैत अछि। इजरायली रंगमंचमे जाहि प्रकारेँ साधारण नागरिकक आर्त-स्वर नाट्य-मंचक भाषा बनैत अछि, कापड़ि ओही परम्पराक समानान्तर कार्य मिथिलाक माटि-पानिसँ कयल अछि। किन्तु इजरायली नाट्य-परम्परामे जे दर्शनात्मक घनत्व देखाइत अछि, ओहि गहराईकेँ गहन उगरास सम्पूर्णतया प्राप्त नहि कऽ सकल अछि। ५. चीनी नाट्य-परम्पराक दृष्टिएँ चीनी नाट्यपरम्पराक - विशेषतः युआन ओपेराक आ माओ-युग-परवर्ती राजनैतिक रंगमंचक - केन्द्रीय विशेषता थिकैक गीत, नृत्य, आ संवादक एकत्रीकरण, जाहिमे सामूहिक चेतनाक स्वर मुखरित होइत अछि। गहन उगरासमे लोकगीतक बारम्बार प्रवेश - जुड़शीतलक गीत, होरीक गीत, पगरी-गीत, दहेज-विरोधी स्वर - एहि अर्थमे चीनी नाट्य-शैलीसँ कार्यात्मक साम्य राखैत अछि। विद्यापतिक पात्रक रूपेँ मिथिलाक ऐतिहासिक-सांस्कृतिक प्रतीककेँ मंचपर प्रस्तुत करब चीनी नाट्य-परम्पराक ओहि प्रवृत्तिक स्मरण दिअबैत अछि जाहिमे ऐतिहासिक-मिथकीय पात्र समकालीन राजनैतिक सन्देशक वाहक बनैत अछि। ६. नाटकक प्रमुख विशेषतासभ प्रथम - राजनैतिक स्पष्टवादिता: नाटक नेपालक राजशाही, माओवादी जनयुद्ध, दोसर जनआन्दोलन, प्रतिगमनी ज्ञानेन्द्र शासन, संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्रक स्थापना - एहि सभ ऐतिहासिक घटनाकेँ सोझे मंचपर आनैत अछि, ओ एकटा स्पष्ट राजनैतिक साक्ष्य थिकैक। आब मिथिलाक भारतीय भाग एहि इतिहाससँ बाहर भऽ एकर नाट्य-प्रस्तुति देखैत अछि- ई एकटा विशेष भू-सांस्कृतिक स्थितिमे नाट्य-साहित्यक निर्माण थिकैक। द्वितीय - भाषिक स्तरीकरण: जिमदारक भाषा आ मजदूरसभक भाषामे स्पष्ट अन्तर अछि। स्त्री-पात्रक भाषा आ पुरुष-पात्रक भाषामे सेहो स्वर-भेद देखाइत अछि। विद्यापतिक संवाद साहित्यिक-उद्बोधक स्वरमे अछि। फोनबलाक माध्यमे आधुनिक संचार-संस्कृतिपर व्यंग्य कयल गेल अछि। ई बहुस्तरीय भाषिक संरचना एकटा प्रौढ़ नाट्यशिल्पकारक पहचान दैत अछि। तृतीय - स्त्री-स्वरक महत्त्व: नाटकमे छौड़ी-१ आ छौड़ी-२ जिमदारकेँ खुलेआम गाली दैत खेहाड़ैत छथि - 'ऐ बाबाके ताबामे नेर गुरका दू, कुत्ता हुलका दू, बिलाइ लुधका दू।' बुलन्ती आ सुभद्रा सेहो प्रतिरोधक स्वर उठबैत छथि। महिला-पात्रक एहि सशक्त उपस्थितिसँ नाटक मिथिलाक पितृसत्तात्मक सामाजिक ढाँचाकेँ नाट्य-भाषामे चुनौती दैत अछि। चतुर्थ - सांस्कृतिक-अनुष्ठानिक तत्त्वक समावेश: जुड़शीतलक जल-छिटाइ, होरी-उत्सव, लोकगीत, पगरी-बन्धन - एहि सभ लोकानुष्ठानिक तत्त्वकेँ नाट्य-कथानकमे सहजतापूर्वक बुनल गेल अछि। ई गहन उगरासकेँ केवल राजनैतिक नाटकसँ उठा साँस्कृतिक स्मृतिक दस्तावेज बनाबैत अछि। पञ्चम - दहेज-प्रथाक आलोचना: नाटकक एकटा महत्त्वपूर्ण अंशमे लखना, जनका, बेचना - तीनू मिलि दहेज-प्रथाकेँ व्यंग्यात्मक रूपेँ उठबैत छथि। 'बूझ जे रजा जनके पालीस’, अपना सब ओत’, दहेज-परथा शुरू भेल हौ' - एहि संवादमे राजा जनकक सांस्कृतिक प्रतापकेँ सामाजिक कुरीतिसँ जोड़बाक एकटा व्यंग्यात्मक दृष्टि देखाइत अछि। ७. नाटकक प्रमुख सीमासभ प्रथम - कथानकक शिथिलता: नाटकमे घटना-प्रवाहक कोनो कसल संरचना नहि अछि। एक दृश्यसँ दोसर दृश्यक सम्बन्ध प्रायः संयोगात्मक अछि, कार्य-कारण-सम्बन्ध नहि। भरतमुनिक सुत्रधार-परम्परा वा ब्रेख्तक स्पष्ट दृश्य-विभाजन - किछुओ नहि अछि। दर्शक वा पाठककेँ कथाक सूत्र स्वयं जोड़य पड़ैत छनि। द्वितीय - पात्रक अपूर्ण विकास: विद्यापतिक प्रतीकात्मक उपस्थिति महत्त्वाकांक्षी अवश्य अछि, किन्तु ओकर नाट्यात्मक सम्भावना पूर्णतः उपयोग नहि भेल अछि। हिरोइनक पात्र सांस्कृतिक विकृतिक प्रतीक बनाओल गेल अछि किन्तु एकर सामाजिक-आर्थिक मूल-कारणक गहन अन्वेषण अनुपस्थित अछि। जिमदारक पात्र एकायामी शोषक थिक, ओहिमे मानवीय जटिलताक अभाव अछि। तृतीय - अन्तकेँ लऽ कऽ अस्पष्टता: नाटकक अन्तिम दृश्यमे जुलूस, नारा, आन्दोलन - सभ किछु एकत्रित अछि किन्तु कोनो स्पष्ट नाट्य-परिणति नहि अछि। 'समाज-संस्कृतिपर लागल गहनके, उगरास कर' - एहि संवादसँ नाटकक शीर्षककेँ सार्थक कयल गेल अछि, किन्तु ई काव्यात्मक समापन नाट्यात्मक समापन नहि थिकैक। भारतीय नाट्यशास्त्रमे आवश्यक निर्वहण-सन्धि आ पाश्चात्य नाट्यशास्त्रमे आवश्यक परिणाम (denouement) - दुनूक अभाव एकटा रचनात्मक सीमा थिकैक। चारिम - मंचनक जटिलता: नाटकमे अनेक स्थान, बहुसंख्यक पात्र, लोकसंगीत-प्रस्तुति, दूर-दूरसँ आबैत जनआन्दोलनक ध्वनि - एहि सभक मिथिलाक सीमित साधन-सम्पन्न रंगमंचपर मंचन करब अत्यन्त कठिन अछि, मुदा असम्भव नहि अछि। डा. अभि सुवेदी भूमिकामे लिखैत छथि जे 'नाटक निर्देशकक कसबट्टी पर सए प्रतिशत सही उतरत, दर्शकक कसबट्टी पर त सहजिहिं' - नाटकक मंचनीयता एकर सीमा नहि थिकैक। ८. नाटकक ऐतिहासिक महत्त्व नेपालीय मिथिलाक मैथिली नाट्यसाहित्यक सन्दर्भमे गहन उगरास एकटा महत्त्वपूर्ण कृति थिकैक। जनकपुरमे मिथिला नाट्यकला परिषद (१९७९) केर स्थापनाक परवर्ती नाट्य-परम्पराक एकटा विशिष्ट प्रतिनिधि-कृतिक रूपमे एकरा देखल जा सकैत अछि। ९. समेकित नाट्यशास्त्रीय तुलासँ निष्कर्ष गहन उगरास एकटा राजनैतिक-सामाजिक उद्देश्यसँ प्रेरित, लोकनाट्य-परम्पराकेँ आधुनिक राजनैतिक नाट्यसँ जोड़बाक महत्त्वाकांक्षी प्रयास थिकैक। भारतीय नाट्यशास्त्रक रस-सिद्धान्तमे करुण रसक सफल प्रवाह, लोकनाट्य-परम्पराक सजीव उपयोग, आ सामूहिक नायकत्वक संकल्पना - एहि तत्त्वसभमे ई नाटक उल्लेखनीय सफलता प्राप्त करैत अछि। ब्रेख्तीय दूरीकरण-पद्धतिक आंशिक उपयोग आ राजनैतिक स्पष्टवादिता एकर आधुनिकताक प्रमाण अछि। किन्तु कथानकक संरचनात्मक शिथिलता, पात्रक मनोवैज्ञानिक गहराईक अभाव, निर्वहण-सन्धिक अनुपस्थिति, आ मंचनक व्यावहारिक जटिलता - एहि सीमासभसँ नाटककेँ मुक्त नहि कहल जा सकैत अछि। तथापि मैथिली नाट्यसाहित्यक सन्दर्भमे परमेश्वर कापड़िक एहि कृतिक ऐतिहासिक महत्त्व आ सांस्कृतिक योगदान निर्विवाद अछि। निष्कर्ष आ दूरगामी सांस्कृतिक प्रभाव परमेश्वर कापड़िक 'गहन उगरास' मैथिली रंगमंचक केवल एकटा प्रयोगशील नाटक नहि थिक, अपितु ई समकालीन विश्वक प्रमुख नाट्य सिद्धान्तक व्यावहारिक समन्वय क्षेत्र थिक। भारतीय 'थिएटर ऑफ द रूट्स'क देसज ऊष्मा सँ युक्त रहितो ई ब्रेख्तक वैचारिक दूरी आ चीनी 'शिएयी' शैलीक प्रवाहिता कें सहजता सँ आत्मसात करैत अछि। यहूदी यिडिश रंगमंच जकाँ ई विस्थापनक आन्तरिक टीस आ 'शुंड' तत्वक लोक-सामर्थ्यकें साहित्यिक आन्दोलनक मुख्यधारा मे समाहित करैत अछि। नाटककार कापड़ि अपन शब्दकोशीय समृद्धता आ लोक-जीवनक मर्मज्ञताक बले एक एहेन रंगमंचक सृष्टि कएलनि अछि जे क्षेत्रीय स्तर पर नेपालक मधेश आन्दोलन आ जनयुद्धक विसंगति पर प्रहार करैत वैश्विक स्तर पर भाषायिक आ अस्मिताक संकट सँ जूझि रहल सम्प्रदाय कें मुक्ति-चेतनाक नव मार्ग दर्शबैत अछि। 'गहन उगरास'क ई प्रयोगशीलता मैथिली नाट्य साहित्यक इतिहासमे एकटा चिरस्थायी कीर्त्तिमान प्रमाणित होइत अछि। [सैद्धांतिक विवेचन लेल देखू- मैथिली समीक्षाशास्त्र- गजेन्द्र ठाकुर] अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.२२. मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-३) सन्दर्भ- कुणाल-कृत “चालिस चोर आ गोनू झा उर्फ ज्ञान झाक खिस्सा” गजेन्द्र ठाकुर मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-३) सन्दर्भ- कुणाल-कृत “चालिस चोर आ गोनू झा उर्फ ज्ञान झाक खिस्सा” १ कुणाल-कृत- “कुसमा-सलहेस आ अन्य छओ गोट नाटक” एक विस्तृत साहित्यिक समीक्षा लोकनाट्य आ शास्त्रीय रंग-परंपराक संधि-स्थल पर ठाढ़ मैथिली नाट्य अंतिका प्रकाशन प्रा. लि., गाजियाबाद · पहिल संस्करण (सजिल्द) २०२१ · ISBN 978-93-88799-77-5 १. प्रास्ताविक : संग्रहक परिचय आ प्रकाशन-वृत्त कुणालक “कुसमा-सलहेस आ अन्य छओ गोट नाटक” समकालीन मैथिली नाट्य-साहित्यक एक एहन संग्रह थिक जे अपना मूल अंतर्वस्तु आ रूप-विधान, दुनू दृष्टिसँ, मंच-केन्द्रित अछि- अर्थात ई कोनो ‘पाठ-नाटक’ (पढ़बाक लेल लिखल नाटक) नहि, अपितु बेर-बेर मंचित, परीक्षित आ परिमार्जित प्रयोग-सिद्ध नाटकक संकलन थिक। संग्रहक प्रकाशकीय सूचना एहि बातक साक्ष्य दैत अछि- सातो नाटक पहिने पटनाक विद्यापति भवनमे मंचित भेल आ तकर बाद ‘भंगिमा’ तथा ‘अंतिका’ सन पत्रिकामे प्रकाशित भेल। यएह कारण थिक जे एहि संग्रहक समीक्षा करैत काल मात्र ‘पाठ’क विवेचन पर्याप्त नहि; एकर रंगमंचीय सम्भावना (theatricality / मंचनीयता) सेहो आलोचनाक केन्द्रमे आबि जाइत अछि। संग्रहक समर्पण-पृष्ठ अपनेमे एक नाट्य-घोषणापत्र थिक- “गाम-गाम मे नाटक (‘नाच’) कर’वला ज्ञात-अज्ञात लोक आ कलाकार लोकनि आ ‘भंगिमा’क विश्वकर्मा जे. ब्रह्मानंद केँ”। ई समर्पण कुणालक समस्त नाट्य-दृष्टिक बीज-वाक्य थिक। एक दिस ओ अनाम ग्रामीण ‘नाच’-कलाकार लोकनिकेँ नमन करैत छथि- सएह परम्परा जे शताब्दीसँ मिथिलाक माटिमे जीवित अछि मुदा संस्थागत साहित्येतिहासमे जकर नाम अनुपस्थित अछि; आ दोसर दिस ओ अपन रंगमंडली ‘भंगिमा’क प्रति आभार व्यक्त करैत छथि, जकर अनेक कलाकार- जेना जे. ब्रह्मानंद- स्वयं एहि नाटक सभक मूल मंचनमे सहयोगी रहलाह। आवरण-चित्र विनय अंबरक थिक, जाहिमे मिथिला-शैलीक लोकचित्रण-परम्पराक अनुगूँज स्पष्ट अछि। २. संग्रहक स्थापत्य : दू वृत्तक रचना-योजना सातो नाटककेँ एकठाम राखि देखला पर ओ दू स्पष्ट वृत्तमे विभाजित भ’ जाइत अछि- यद्यपि लेखक एहि विभाजनकेँ कतहु अभिधामे नहि कहैत छथि, तथापि रूप, स्रोत आ कालक्रमक आधार पर ई विभाजन स्वयं उद्घाटित भ’ जाइत अछि। (क) लोकनाट्य-मूलक त्रयी- ‘चालिस चोर आ गोनू झा’, ‘बिदापत’ आ शीर्षक-नाटक ‘कुसमा-सलहेस’। ई तीनू मिथिलाक अपन लोक-आख्यान आ लोक-रंगमंच (‘नाच’, ‘सलहेस नाच’, ‘बिदापत नाच’) पर आधारित विस्तृत, बहु-पात्रीय, गीत-नृत्य-बहुल नाटक थिक। ई तीनू १९९०सँ २००६ धरिक रचना-काल देखबैत अछि। (ख) प्रेम-चतुष्टय- ‘प्रेम-प्रतिज्ञा उर्फ श्रुवावतीक जय!’, ‘विश्वासक शक्ति उर्फ सुकन्याक विवाह’, ‘प्रेमक विस्तार उर्फ श्वेताक आविष्कार’ आ ‘प्रेमक परीक्षा उर्फ सुप्रभा आ अष्टावक्र’। ई चारू अपेक्षाकृत लघु, मितव्ययी पात्र-विधानवला, पौराणिक/आख्यानमूलक नाटिका थिक, जे २०१३–२०१४ मे ‘अंतिका’मे प्रकाशित भेल। एकरा सभक शीर्षक-विधान एक्के साँचमे ढलल अछि-एक अमूर्त भाव-मूल्य (प्रेम/विश्वास)। चारू नाटकक केन्द्रमे एक आत्मनिर्णयकारी नारी-चरित्र अछि। एहि दू वृत्तकेँ जोड़’वला सूत्र थिक-‘प्रेम’क जीवन-तत्त्वक रूपमे प्रतिष्ठा। ‘कुसमा-सलहेस’क समापन-गीतक टेक-“बिनु मकरंदक कुसुम हो तहिना, प्रेम बिना की जीवन”- लगभग शब्दशः ‘श्वेताक आविष्कार’मे पुनः प्रतिध्वनित होइत अछि। तात्पर्य ई जे लोकनाट्य-त्रयीसँ प्रेम-चतुष्टय धरि एक वैचारिक तार लगातार ताणल अछि। ३. नाटकक सभक मोटा-मोटी सर्वेक्षण ३.१ चालिस चोर आ गोनू झा उर्फ ज्ञान झाक खिस्सा संग्रहक प्रथम आ सर्वाधिक प्रयोगधर्मी नाटक यएह थिक। एकर आरम्भे आत्म-संदर्भी (self-referential) रंगमंचक एक श्रेष्ठ उदाहरण थिक। तीन गोट ‘भाँट’ मंच पर अबैत छथि आ अपन मरैत कलाक विलाप करैत छथि-“हमरा लोकनिक विद्या आब बेकार भ’ गेलए”। जखन हुनकर पारम्परिक ‘कवित’ आ यशोगानक कोनो असरि श्रोता पर नहि पड़ैत छनि, तखन ओ निर्णय करैत छथि जे आब ‘नाटक’ करबाक चाही। एहि एक्के दृश्यमे कुणाल मैथिली बारदिक-परम्पराक (भाँट-संस्कृति) ह्रास, राज्याश्रित कलाक संकट आ रंगमंच दिस लोक-कलाकारक संक्रमण-तीनू ऐतिहासिक यथार्थकेँ एक्के संग नाटकीय बना दैत छथि। एहि बाह्य-वृत्तक भीतर मिथिलाक चिर-परिचित ‘गोनू झा’-चक्रक कथा अबैत अछि। नरेश गोनूकेँ ‘धूर्त-शिरोमणि’क उपाधिसँ विभूषित कएने छथि; अपमानित कविराज लोकनि गोनू लग न्यायक गोहारि लगबैत छथि; आ अंततः चालिस चोरक एक टोली गोनूक घर लूटबाक उपक्रम करैत अछि। गोनू बल-प्रयोग नहि, अपितु ‘बुद्धि’-प्रयोगसँ चोर सभकेँ परास्त करैत छथि-ओ चोर सभक आपसी प्रतिद्वंद्विताकेँ ‘सरदारीक मुरेठा’क प्रतीकात्मक लोभ द’ क’ भड़काबैत छथि आ एक कूट अभिषेक-विधिक प्रहसन रचि क’ हुनका सभकेँ ठकि लैत छथि। एतय हास्य-रस आ वीर-रसक एक विरल मिश्रण अछि, जतय ‘वीरता’ शस्त्रक नहि, युक्तिक धर्म बनि जाइत अछि। नाटकक वैचारिक उत्कर्ष ओकर समापनमे अछि, जतय भाँट लोकनि पुनः अपन भूमिकासँ बाहर आबि क’ कथाक अंत पर परस्पर वाद-विवाद करैत छथि-“एहि तरहे तँ नाटकक अंत बदलि ने गेल भाइजी?”। एहि एक संवादमे कुणाल रंगमंचीय यथार्थक तरलता, वैकल्पिक अंत (alternative endings) आ दर्शकक सोझाँ रचना-प्रक्रियाक पारदर्शिताकेँ उजागर करैत छथि। आर तखन एक प्रखर सामाजिक टिप्पणी अबैत अछि- चोरीकेँ “अशिक्षा आ गरीबी सँ उत्पन्न” सामाजिक व्याधि कहल जाइत अछि, जकर समाधान दण्ड नहि, समुचित व्यवस्था थिक। अंतमे भाँट लोकनि ‘गमछा’ ओछा क’ दर्शकसँ दान मँगैत छथि-ई मात्र लोक-कलाकारक पारिश्रमिक-संग्रहक यथार्थ-चित्रण नहि, अपितु कला आ जीविकाक सम्बन्धक एक मार्मिक स्वीकृति थिक। समापन-गीतक पंक्ति-“बुद्धि सँ नईँ पैघ कोनो बल होइ छै”-समग्र नाटकक थीसिस-वाक्य थिक, जे शीर्षकक ‘ज्ञान झाक खिस्सा’केँ सार्थक करैत अछि। नव्य-न्यायक कोणसँ देखी तँ एहि नाटकक केन्द्रीय मूल्य ‘बुद्धि’ वस्तुतः ‘प्रमा’ (यथार्थ-ज्ञान) आ ‘युक्ति’क महिमा थिक- गोनूक प्रत्येक विजय कोनो भौतिक बलक नहि, अपितु अनुमान, ऊह आ तर्कक विजय थिक। हास्यक आवरणमे एतय ज्ञान-मीमांसाक एक देशज प्रतिष्ठापन अछि। ३.२ बिदापत ‘बिदापत’ (अर्थात विद्यापतिक लोकोच्चारित रूप) कुणालक रचना-कौशलक सर्वाधिक परिष्कृत उदाहरण थिक। शीर्षक-पृष्ठ एकरा “लोकनाट्य शिल्प-आधारित नाटिका” कहैत अछि, मुदा एकर शिल्प वास्तवमे शास्त्रीय आ लोक-दुनू नाट्य-परम्पराक संश्लेषण थिक। नाटक ‘पूर्वरंग’सँ आरम्भ होइत अछि, सूत्रधार-नटीक शास्त्रीय संवाद-विधि अपनाओल गेल अछि, आ संग-संग समाजी (कोरस), विदूषक-सदृश ‘विपटा’ आ ‘नटुआ’ सन लोक-रंगमंचक पात्र सेहो उपस्थित छथि। एहि नाटकक सर्वाधिक उल्लेखनीय शिल्प-विशेषता थिक स्वयं विद्यापतिक पदक सघन, सावधान आ अर्थपूर्ण प्रयोग। शिवस्तुति, भैरवी-वंदना, वसंत-वर्णन (“नव वृन्दावन, नव-नव तरुगण... विहरइ नवल किशोर”), विरह-पद (“चाँद सार लए मुख घटना करू, लोचन चकित चकोरे”) आ अवहट्ट-शैलीक समापन-पद-ई सभ कथाक प्रवाहमे एना गूँथल अछि जे नाटक एक प्रकारे विद्यापति-पदक रंगमंचीय भाष्य बनि जाइत अछि। कथा-वस्तु विद्यापतिक जीवनकेँ तीन सम्बन्ध-तन्तुक माध्यमसँ बुनैत अछि-आश्रयदाता-मित्र शिवसिंह, हुनक रानी लखिमा आ सेवक उगना (जे स्वयं महादेव छलाह)क प्रसिद्ध लोक-कथा। नाटकक अंतिम अंश अत्यंत मार्मिक अछि-ओइनीक युद्धमे शिवसिंहक अंतर्धान, लखिमाक ओ हठ जे ओ पतिकेँ मृत मानबासँ अस्वीकार करैत प्रतीक्षारत रहैत छथि, आ विद्यापतिक आजीवन शोक। एतय लखिमा सती-छविमे नहि, अपितु एक दृढ़, स्वाभिमानी प्रतीक्षारत स्त्रीक रूपमे प्रस्तुत भेल छथि-ई पारम्परिक आख्यानक एक सूक्ष्म पुनर्पाठ थिक। नाटकक ध्वनि-व्यंजना (काव्यशास्त्रीय ‘ध्वनि’) एकर समापनमे चरम पर पहुँचैत अछि-विद्यापति कहैत छथि जे ओ अपन ‘पद’मे जीवित रहताह, आ संग-संग शिवसिंह, लखिमा, विपटा, नटुआ-उगना सेहो अमर रहताह। एतय करुण-रसक तल नीचाँ शान्त-रसक एक गहींर धारा बहैत अछि-मृत्यु-शोकक ऊपर काव्यक चिरंजीविताक प्रतिष्ठा। समग्रतः ‘बिदापत’ विद्यापतिकेँ संस्थागत साहित्येतिहासक ‘महाकवि’क प्रतिमासँ उतारि क’ लोक-रंगमंचक जीवित नायकक रूपमे पुनः-प्रतिष्ठित करैत अछि-ई विदेह समानांतर-इतिहास-दृष्टिक एक उत्कृष्ट नाट्य-निदर्शन थिक। ३.३ कुसमा-सलहेस शीर्षक-नाटक होएब एकर केन्द्रीयताक मात्र संयोग नहि-कलात्मक आ वैचारिक, दुनू दृष्टिसँ ई संग्रहक हृदय थिक। शीर्षक-पृष्ठ एकरा “महागाथा (राजा सलहेस) आ लोक-नाट्य (सलहेस नाच) पर आधारित नाटक” कहैत अछि। राजा सलहेस मिथिलाक दुसाध (दलित) समुदायक लोक-देवता-नायक थिकाह आ ‘सलहेस नाच’ ताहिसँ जुड़ल लोक-रंगमंच। एहि स्रोत-चयने स्वयं एक सांस्कृतिक-राजनीतिक वक्तव्य थिक-कुणाल मिथिलाक अभिजन-केन्द्रित साहित्य-परम्पराक बदला एक सबाल्टर्न (अधीनस्थ/वंचित) महागाथाकेँ अपन सर्वाधिक महत्त्वाकांक्षी नाटकक आधार बनबैत छथि। नाटकक पात्र-विधान एक पूर्ण महाकाव्यात्मक विस्तार लैत अछि-नायक सलहेस (महिसौथाक राजा), नायिका कुसमा (मालिन), कथा-संवाहक सूग्गा हिरामन, नाचक विदूषक विपटा, सलहेसक पशु-सहचर बाघ ‘ठनका’ आ भालु ‘बनका’, योगिनी मालिन-बहिनी, मोरंग-भोट-बाघगढ़-समदागढ़ सन अनेक राज्य, आ साक्षात देवी दुर्गा। ई विस्तार सलहेस-नाचक मूल लोक-संरचनाकेँ-पूर्वरंग, सुमिरन, समाजी-गायन, दृश्य-दर-दृश्य भौगोलिक यात्रा-यथावत संजोगि क’ राखैत अछि। नाटकक आरम्भिक ‘सुमिरन’ एक अद्भुत समन्वयवादी (syncretic) घोषणा थिक-एहिमे देवता, बाबा-डीहबार, गुरु-गोसाँइ, उगैत सूर्य, गंगा, गोरा-पार्वतीक संग-संग पछिम दिस ‘मीरा-सुलतान’ (एक मुस्लिम पीर)केँ सेहो सुमिरल जाइत अछि, आ अंतमे “सकल समाज” तथा “जन-गन-मन”केँ। दर्शककेँ कएल अभिवादन सेहो ओतबे समावेशी अछि-“परिनाम, नमस्ते, आदाब, गुड इवनिंग, सलाम”। ई समन्वयवाद दुसाध सलहेस-परम्पराक अपन सांस्कृतिक चरित्र थिक, जकरा कुणाल पूर्ण निष्ठासँ रंगमंच पर अनैत छथि। नायिका कुसमाक आत्म-परिचय-जे राजकन्या भेलहुँ मुदा महल छोड़ि वन-वासिनी मालिन बनलहुँ-गहींर लोक-काव्यात्मक छटासँ भरल अछि; जनकपुर, कमरू-कामाख्या, विसुनपुरक तीर्थ-यात्राक स्मृति आ बारह बरखक अवस्थामे देखल दुर्गाक स्वप्न-वचन एकर भाव-भूमि बनबैत अछि। मुदा नाटकक केन्द्रीय द्वन्द्व प्रेमक नहि, अपितु प्रेम बनाम सत्ता-लोलुपताक थिक। एहि द्वन्द्वक चरम तखन अबैत अछि जखन विस्तारवादी सम्राट सूचोंग सलहेसकेँ रंगीलागढ़क कारागारमे लोहाक बेड़ीमे बान्हि लैत अछि आ समस्त मिथिला पर एकछत्र राजक स्वप्न देखैत अछि। सलहेसक उत्तरमे एहि नाटकक आत्मा बाजैत अछि-“हमर प्राण अहाँक मुट्ठी मे भ’ सकैए सम्राट। मुदा हमर विचार आ भावना केँ बान्हल नईँ जा सकैए। नहि रहता सलहेस मुदा भयमुक्त जीवनक मंत्र सँ भरल जनता रहतै।” एहि एक संवादे सलहेसक दुसाध लोक-देवताकेँ कुणाल एक जन-नायक, अभय आ स्वातंत्र्यक प्रतीक बना दैत छथि, आ मालिन-बहिनी लोकनिकेँ शान्ति-करुणा-स्नेह-आनन्दक तथा ‘लोक-कल्याण’क मूर्ति। नाटकक समापन एक समवेत गायन-नृत्यमे होइत अछि आ ओ अमर टेक उभरैत अछि-“प्रेम सत्य छै, प्रेम छै सौरभ, प्रेमक भाव चिरंतन, बिनु मकरंदक कुसुम हो तहिना, प्रेम बिना की जीवन।” एतय शृंगार-रस अपन लौकिक तलसँ ऊपर उठि क’ एक विश्वव्यापी मानवीय-तत्त्व बनि जाइत अछि-प्रेम एतय व्यक्ति-राग नहि, सृष्टिक शक्ति थिक। ई नाटक संग्रहक सर्वाधिक सबल कृति थिक-लोक-स्रोतक प्रामाणिकता, राजनीतिक चेतना आ काव्यात्मक उत्कर्ष-तीनू एकठाम। ३.४ प्रेम-चतुष्टय : चारि पौराणिक नायिका अंतिम चारि नाटक एक सुसंगठित विचार-शृंखला थिक। चारू एक्के नाट्य-व्याकरण साझा करैत अछि-मितव्ययी पात्र, बहु-भूमिका-अभिनय (एके अभिनेता द्वारा अनेक पात्रक अभिनय), स्तरित वा रिक्त मंच, सूत्रधार/उद्घोषकक कथन-शैली आ बीच-बीचमे विद्यापति-पदक प्रयोग। चारू पौराणिक/आख्यानमूलक नायिकाक माध्यमसँ आधुनिक मूल्य-स्त्री-कर्तृत्व, आत्मनिर्णय आ प्रेमक गरिमा-प्रस्थापित करैत अछि। प्रेम-प्रतिज्ञा उर्फ श्रुवावतीक जय! महर्षि भारद्वाजक पुत्री श्रुवावती विवाहक पारम्परिक मानदण्ड-सुन्दर, सम्पन्न, शौर्यवान वर-केँ अस्वीकार क’ कहैत छथि जे ओ विवाह तखने करतीह जखन कियो हुनका लेल साँचमे ‘अर्थवान’ भ’ जैताह। ओ अपनाकेँ “स्वतंत्र आ स्वावलंबी” व्यक्ति घोषित क’ परम्पराक ‘अपवाद’ बन’ चाहैत छथि। इन्द्र (वशिष्ठ-वेशमे) हुनका एक फलकेँ सूर्यास्तसँ पूर्व सिद्ध करबाक परीक्षा दैत छथि; फल पाथर बनि जाइत अछि, मुदा प्रेम-स्मृति-विहीन जीवनकेँ निरर्थक मानि श्रुवावती स्वयं चितामे प्रवेश करबाक संकल्प लैत छथि-आ ओकर एहि आत्मबले इन्द्रकेँ झुकाबैत अछि। नाटकक थीसिस-“आत्मबल, मनुष्यक सब सँ पैघ संपत्ति अछि”। यद्यपि अग्नि-प्रवेशक रूढ़ि एहि नारीवादी पाठक संग किछु तनाव उत्पन्न करैत अछि (, तथापि एतय बलि नहि, संकल्पक शक्ति केन्द्रमे अछि। विश्वासक शक्ति उर्फ सुकन्याक विवाह। महाभारतक सुकन्या-च्यवन-आख्यानक एहि रंगमंचीय रूपमे चपल, क्रीड़ामग्न राजकुमारी सुकन्या आ बामी-भीड़मे (वल्मीक) समाधिस्थ वृद्ध ऋषि च्यवनक प्रसंग अछि। आरम्भ विद्यापतिक वसंत-पद ‘आयल रितुपति राज बसंत’सँ होइत अछि। रानीक चिन्ता आ राजा शर्यातिक मुग्ध-वात्सल्यक बीच एक सूक्ष्म दार्शनिक संवाद अबैत अछि-“जैँ आहाँ आँखि मुनि ली तैँ ओ वृक्ष आहाँ केँ नईँ देखायत... परंतु सब किछु उपस्थित अछि।” ई संवाद ज्ञान आ ज्ञेयक भेदकेँ रंगमंच पर अनैत अछि-अनुपलब्धि सत्ताक अभाव नहि थिक। नाटकक मर्म ‘विश्वास’ थिक-सुकन्याक निष्ठे च्यवनकेँ नव यौवन दिआबैत अछि। प्रेमक विस्तार उर्फ श्वेताक आविष्कार। ई चतुष्टयक सर्वाधिक मौलिक कल्पनावला नाटक थिक। राजनर्तकी श्वेता सात बरखक कठोर साधनाक बाद राजा अतिरथक प्रति अनुरक्त भ’ जाइत छथि। मुदा अतिरथ कलाक प्रति ‘निरपेक्ष’ (विरक्त) रहैत छथि-ओ कलाकेँ देहसँ फराक क’ देखबाक ‘नीर-क्षीर विवेक’क पक्षधर छथि आ घोषणा करैत छथि जे “प्रेम करब तँ नितांत मूर्खता थिक”। श्वेता प्रत्युत्तरमे कवि-वचन उद्धृत करैत छथि-“कुसुम बिना मकरंद तहिना प्रेम बिना की जीवन” (ध्यातव्य: यैह सूत्र ‘कुसमा-सलहेस’क समापन-टेक छल), आ संकल्प लैत छथि जे ओ ‘निरपेक्ष’ राजाकेँ स्वयं प्रेमक प्रस्ताव करबाक लेल बाध्य करतीह। ‘आविष्कार’ शब्दक द्व्यर्थता एतय सटीक अछि-श्वेता प्रेमक आविष्कार करतीह आ अपन कर्तृत्वक सेहो। नर्तकी सन परम्परासँ ‘वस्तु’ बनाओल चरित्रकेँ कुणाल एतय ‘कर्ता’ बना दैत छथि-ई एकर प्रमुख उपलब्धि थिक। प्रेमक परीक्षा उर्फ सुप्रभा आ अष्टावक्र। अष्टावक्र (अष्ट-वक्र-आठ ठाम वक्र शरीरवला) ऋषि आ महर्षि वदन्यक पुत्री सुप्रभाक गाढ़ अनुरागक एहि कथामे ‘परीक्षा’ केन्द्रमे अछि। वदन्य अष्टावक्रकेँ स्वर्गमे उर्वशीक सान्निध्यमे पठा क’ सुप्रभाक निष्ठाक परीक्षा लैत छथि-सुप्रभा अन्य राजासँ स्वयंवरक प्रस्ताव अस्वीकार करैत मात्र “अष्टावक्रक प्रतीक्षा” करबाक हठ रखैत छथि। अष्टावक्र उर्वशीकेँ अस्वीकारि क’ लौटैत छथि आ दुनूक विवाह होइत अछि। समापन-दोहा एकर मर्म कहैत अछि-“जहिना स्वर्ण मे आगि सँ आबए आर निखार / प्रेम, परीक्षा दैत अछि, तेँ होइछ आर प्रगाढ़।” ४. कुणालक नाट्य-शिल्प : लोकनाट्य, शास्त्र आ आधुनिकता कुणालक रंगमंचीय भाषाक सब सँ बड़का विशेषता थिक तीन परम्पराक सायास संश्लेषण। एक दिस ओ शास्त्रीय संस्कृत-नाट्यक उपकरण-पूर्वरंग, सूत्रधार-नटी, नांदी-सदृश वंदना-अपनबैत छथि; दोसर दिस मिथिलाक लोक-रंगमंचक (‘नाच’) तत्त्व-समाजी (कोरस), विदूषक ‘विपटा’, सूग्गा-कथावाचक, समवेत गायन-नृत्य, दर्शककेँ सोझ सम्बोधन आ रिक्त/स्तरित मंच-केँ केन्द्रमे रखैत छथि; आ तेसर दिस आधुनिक रंगमंचक आत्म-संदर्भिता आ ‘अलगाव’क प्रविधि उपस्थित अछि। एहि अंतिम बिन्दु पर पश्चिमी नाट्य-चिन्तनक संदर्भ प्रासंगिक अछि। ब्रेख्तक ‘महाकाव्यात्मक रंगमंच’ (एपिक थिएटर) आ ओकर ‘विरचन/अलगाव-प्रभाव’-जाहिमे दर्शककेँ बेर-बेर स्मरण कराओल जाइत अछि जे ओ नाटक देखि रहल छथि- कुणालक रंगमंचमे लोक-रूपक स्वाभाविक अंग बनि क’ अबैत अछि। ‘चालिस चोर’क भाँट-वृत्त, भूमिका-त्याग आ वैकल्पिक-अंतक वाद-विवाद; ‘बिदापत’मे विपटाक बेर-बेरक टोकाटोकी “गड़ी आगाँ बढ़ाउ!”; आ ‘कुसमा-सलहेस’मे हिरामन-विपटाक मेटा-कथन-ई सभ ‘चतुर्थ भित्ति’केँ निरन्तर तोड़ैत अछि। उल्लेखनीय ई जे ब्रेख्त एहि प्रविधिकेँ पश्चिममे जतय अवांगार्द-प्रयोगक रूपमे प्रस्तुत कएलनि, ओतय मिथिलाक ‘नाच’मे ओ सदासँ अंतर्निहित छल- कुणाल यएह देशज-आधुनिकताकेँ उद्घाटित करैत छथि। मंचनीयताक प्रति कुणालक सजगता असाधारण अछि। ‘चालिस चोर’क अंतमे ओ लिखैत छथि जे एहि नाटकक ४५-मिनट, ६०-मिनट आ एक-घंटा-तीन रूप अछि, आ एकर एक चारिम ‘ध्वनि-नाट्य’ (रेडियो-नाटक) शृंखलाक तेरह प्रकरण सेहो प्रसारित भेल। ओ ईहो सुझबैत छथि जे एक अभिनेता एकाधिक पात्रक अभिनय करथि। एहि सूचना सभसँ स्पष्ट अछि जे ई आलेख रंगमंचक व्यावहारिक आवश्यकताकेँ ध्यानमे राखि लिखल गेल-ई ‘अभिनय-योग्य’ पाठ थिक, ‘अभिनेय’क मात्र कल्पना नहि। ५. भाषा, छंद आ काव्य-सौंदर्य : रस-ध्वनि-वक्रोक्तिक कोण कुणालक भाषा एकल नहि, अपितु बहुस्तरीय अछि। लोकनाट्य-त्रयीमे ओ ठेठ ग्रामीण मैथिली लोक-मुहावरा, अनुप्रास-बहुल तुकबन्दी आ गीत-शैलीक प्रयोग करैत छथि-जतय ‘हास्य’ आ ‘शृंगार’क लोक-रूप प्रधान अछि। प्रेम-चतुष्टयमे ओ अपेक्षाकृत तत्सम-प्रधान, संस्कृत-निष्ठ, परिनिष्ठित मैथिली अपनबैत छथि-जे आश्रम-वातावरण आ पौराणिक गरिमाक अनुकूल अछि। एहि भाषिक-कौशलमे कुणालक पात्र आ परिवेश-बोध स्पष्ट झलकैत अछि। वक्रोक्ति-दृष्टिसँ लोकनाट्य-नाटक सभमे शब्द-वक्रता (कुन्तकोक्त ‘वक्रोक्ति’) चरम पर अछि-‘सरदारीक मुरेठा’ आ कुसमाक ‘लहठी’ (बेड़ी बनाम चूड़ी), ‘चुमाओन बनाम श्राद्ध’, ‘धूर्त-शिरोमणि’क उपाधि-एतय अर्थक दोहरापन आ श्लेष नाटकीय ऊर्जाक स्रोत थिक। ध्वनि-दृष्टिसँ ‘बिदापत’क समापन (‘पद’मे जीवन) आ ‘कुसमा-सलहेस’क प्रेम-टेक-दुनू अभिधासँ ऊपर उठि व्यंग्यार्थ (सूचित अर्थ)मे प्रतिष्ठित होइत अछि, जतय करुणक नीचाँ शान्त आ शृंगारक ऊपर अध्यात्म ध्वनित होइत अछि। विद्यापति-पदक प्रयोग कुणालक एक सायास काव्य-नीति थिक-ई मात्र अलंकरण नहि, अपितु मिथिलाक काव्य-स्मृतिकेँ रंगमंचक जीवित अंग बना देबाक उपक्रम थिक। ‘बिदापत’मे ओ विद्यापति-पदक नाट्य-भाष्य रचैत छथि, तँ ‘सुकन्या’मे वसंत-पद वातावरण-निर्मितिक उपकरण बनैत अछि- एहि प्रकारे पद-परम्परा आ नाट्य-परम्परा एक-दोसरमे विलीन भ’ जाइत अछि। ६. नव्य-न्यायक दृष्टि : प्रमा, अभाव आ प्रामाण्य एहि संग्रहमे ज्ञान-मीमांसाक अनेक सूत्र नाटकीय रूपमे विद्यमान अछि, जकर पाठ नव्य-न्यायक उपकरणसँ कएल जा सकैत अछि। ‘चालिस चोर’मे गोनूक प्रत्येक विजय अनुमान आ युक्तिक-अर्थात ‘प्रमा’क-विजय थिक; बल बनाम बुद्धिक द्वन्द्वमे नाटक प्रमाण-व्यापारकेँ सर्वोपरि घोषित करैत अछि। ‘सुकन्या’क ओ संवाद-“आँखि मुनि लेला पर वृक्ष नईँ देखायत, मुदा सब किछु उपस्थित अछि”-नव्य-न्यायक एक केन्द्रीय अन्तर्दृष्टिकेँ रंगमंच पर अनैत अछि-ज्ञानक अभाव विषयक सत्ताक अभाव नहि थिक (अनुपलब्धि ≠ अभाव)। इन्द्रिय-सन्निकर्षक अभावमे प्रत्यक्ष नहि होइत, मुदा वस्तु तँ रहिते अछि-ज्ञान आ ज्ञेयक ई भेद नाटकमे यथार्थ-स्वीकृतिक नैतिक तर्क बनि जाइत अछि। ‘श्रुवावती’क ‘अर्थवत्ता’-तर्क आ ‘अतिरथ’क ‘नीर-क्षीर विवेक’-दुनू वस्तुतः सम्बन्ध आ विशेषण-ज्ञानक प्रश्न उठबैत अछि- कोन गुण-धर्म कोन सम्बन्धमे ‘अर्थवान’ वा ‘ग्राह्य’ होइत अछि, ताहि पर। एहि अर्थमे कुणालक नाटक मनोरंजनक आवरणमे एक देशज ज्ञान-मीमांसाक संवाहक सेहो थिक। एक वृहत्तर स्तर पर समग्र संग्रह ‘प्रामाण्य’क प्रश्न उठबैत अछि- लोक-ज्ञान आ लोक-स्मृतिक प्रामाणिकता। सलहेस-गाथा, गोनू-चक्र आ बिदापत-नाच-ई सभ ‘अप्रामाणिक’ लोक-वृत्तांत नहि, अपितु एक समानांतर ज्ञान-परम्पराक प्रमाण थिक- यएह एहि संग्रहक मौन प्रतिज्ञा थिक। ७. वैचारिक धरातल : विदेह समानांतर-इतिहासक परिप्रेक्ष्य विदेह समानांतर-साहित्य-दृष्टिक परिप्रेक्ष्यमे एहि संग्रहक महत्त्व विशेष रूपसँ उद्घाटित होइत अछि। संस्थागत साहित्येतिहास जतय अभिजन-केन्द्रित, मुद्रित आ ‘शिष्ट’ परम्पराकेँ केन्द्रमे रखैत आएल अछि, ओतय कुणाल अपन सम्पूर्ण नाट्य-कर्मकेँ लोक-रंगमंच आ लोक-आख्यानक भूमि पर ठाढ़ करैत छथि-आ ओहि अनाम ‘नाच’-कलाकार लोकनिकेँ अपन समर्पणमे साहित्येतिहासक केन्द्रमे अनैत छथि जिनकर नाम कतहु अंकित नहि। ‘कुसमा-सलहेस’क दुसाध (दलित) लोक-देवता-नायककेँ एक जन-नायक, अभय आ स्वातंत्र्यक प्रतीक बना क’ प्रस्तुत करब एहि दृष्टिक सर्वाधिक प्रखर अभिव्यक्ति थिक- ई सबाल्टर्न-स्वरक रंगमंचीय प्रतिष्ठापन थिक। ‘बिदापत’मे महाकवि विद्यापतिकेँ संस्थागत प्रतिमासँ उतारि लोक-रंगमंचक जीवित नायक बनाएब; आ प्रेम-चतुष्टयमे पौराणिक नायिका सभकेँ-श्रुवावती, सुकन्या, श्वेता, सुप्रभा-आत्मनिर्णयकारी, कर्ता-स्त्रीक रूपमे पुनर्पाठ करब- ई सभ एक्के समानांतर-इतिहास-दृष्टिक विभिन्न आयाम थिक। एहिमे जातीय (दलित-सबाल्टर्न), लैंगिक (स्त्री-कर्तृत्व) आ सांस्कृतिक (हिन्दू-मुस्लिम समन्वय) तीनू स्तरक प्रतिरोध एक्के संग सक्रिय अछि-मुदा कतहु नारेबाजीक रूपमे नहि, अपितु लोक-रूपक स्वाभाविक प्रवाहमे विलीन भ’ क’। यएह कुणालक वैचारिक परिपक्वताक प्रमाण थिक। ८. सीमा आ जिज्ञासा सातो नाटकक सीमा, कमी आ वैचारिक तनाव प्रास्ताविक : आलोचनाक आवश्यकता एक सन्तुलित साहित्यिक विवेचना केवल गुणगानसँ पूर्ण नहि होइत। कुणालक ‘कुसमा-सलहेस आ अन्य छओ गोट नाटक’ मैथिली नाट्य-साहित्यक एक उल्लेखनीय संग्रह थिक- यएह सिद्ध होइत अछि एहि तथ्यसँ जे सातो नाटक बेर-बेर मंचित भेल, ‘भंगिमा’ आ ‘अंतिका’मे प्रकाशित भेल, आ अंततः एक पुस्तक-संग्रहमे आएल। मुदा यएह प्रतिबद्धता पाठक-समीक्षककेँ उत्तरदायी सेहो बनाबैत अछि- नाटकक उपलब्धि जतेक तीव्र, ओकर सीमाक स्वीकृति ओतबे ईमानदार होएबाक चाही। सातो नाटकक कमजोरी, वैचारिक तनाव, शिल्प-सीमा आ पुनरावृत्ति-दोषकेँ नाटकक आलोचनाक उद्देश्य खण्डन नहि, भावी नाट्य-लेखनक लेल रचनात्मक परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत केनाइ थिक। संरचनागत सीमा- संग्रहक असमान स्केल आ लय-भंग संग्रहक सर्वाधिक स्पष्ट संरचनागत समस्या थिक- सातो नाटकक आकार-वैषम्य। ‘कुसमा-सलहेस’ लगभग ७० पृष्ठक विराट नाटक थिक; ‘प्रेम-प्रतिज्ञा उर्फ श्रुवावतीक जय!’ मात्र १४ पृष्ठमे समाप्त भ’ जाइत अछि। पाठक/ भावी निर्देशक जखन ‘कुसमा-सलहेस’क बाद ‘श्रुवावती’ उठाबैत अछि, तखन ओकरा एक ‘महाकाव्यात्मक संसार’सँ एकाएक एक ‘लघु-चेम्बर पीस’मे जाए पड़ैत अछि। ई संक्रमण सुखकर नहि। तुलना कएल जाए- ‘चालिस चोर आ गोनू झा’ = ७४ पृष्ठ · ‘बिदापत’ = ४८ पृष्ठ · ‘कुसमा-सलहेस’ = ७० पृष्ठ · ‘श्रुवावती’ = १४ पृष्ठ · ‘सुकन्या’ = २६ पृष्ठ · ‘श्वेता’ = १८ पृष्ठ · ‘सुप्रभा-अष्टावक्र’ = २८ पृष्ठ। संग्रहक आरम्भिक तीन नाटकक औसत ६४ पृष्ठ आ अंतिम चारिक औसत २१ पृष्ठ थिक। ई एक पुस्तक-रचना (book-architecture)क समस्या थिक-ई दुनू समूह किछु भिन्न पुस्तकक विषय-वस्तु लगैत अछि, एकहि लाटमे भेलासँ पाठ-अनुभवमे अटपट लगैत अछि। ‘उर्फ’ शीर्षक-साँचाक एकरसता प्रेम-चतुष्टयक चारू नाटकक शीर्षक एक्के साँचमे ढलल अछि-‘[अमूर्त-भाव] उर्फ [नायिकाक नाम]क [क्रिया-शब्द]’। ई साँच पहिले तीन नाटकमे नवीन लगैत अछि (शास्त्रीय भाव + लोक-उद्घोष), मुदा चारिम बेर दुहराएब एक यांत्रिकता उत्पन्न करैत अछि। पाठक शीर्षक पढ़िते ‘फॉर्मूला’ बुझि लैत अछि; विस्मय नहि होइत अछि। तुलना करू-‘बिदापत’ (एक शब्द, अनेक अर्थक सघनता) - ‘कुसमा-सलहेस’ (दू पात्रक नाम, महाकाव्यात्मक)- ई दुनू शीर्षक अपन नाटकक जीवन्तता धारण करैत अछि। ‘प्रेमक विस्तार उर्फ श्वेताक आविष्कार’ एक अपेक्षाकृत नाम आ सूत्र-बद्ध शीर्षक थिक। ई शीर्षक-क्रमिकता प्रेम-चतुष्टयमे एक सीमा थिक। नाटक-वार कमी आ वैचारिक तनाव चालिस चोर आ गोनू झा क. मेटाथिएटरक अतिरेक एहि नाटकक मेटाथिएटरीय उपकरण-भाँटक वाद-विवाद, वैकल्पिक-अंत, दर्शककेँ सम्बोधन-नाट्य-शिल्पक दृष्टिसँ प्रशंसनीय थिक। मुदा नाटकक अंतिम दृश्यमे भाँट लोकनि जखन ‘चोरी एक सामाजिक व्याधि थिक, अशिक्षा आ गरीबीसँ उत्पन्न’ कहैत छथि, तखन ई सन्देश नाटकीय रूपसँ ‘बताएब’मे बदलि जाइत अछि। भरतमुनि जे कहलाह-नाटक ‘देखाबैत’ अछि, ‘कहैत’ नहि- एहि मानदण्डपर ई अन्तिम दृश्य कमजोर पड़ैत अछि। सन्देश-निहित पाठ स्वयं रंगमंचीय क्रियासँ स्पष्ट भ’ जएबाक चाही; एहि लेल भाँटक मुखर व्याख्या अनावश्यक थिक। ख. चोर-पात्रक द्वि-आयामिता गोनू झाक तुलनामे चालिस चोर (विशेषतः दुरमतिया आ देबहा) मात्र हास्य-साधन बनि रहि जाइत छथि। हुनकर गरीबी-अशिक्षाक ओ ‘सामाजिक व्याधि’, जकरा नाटकार स्वयं अन्तमे स्वीकार करैत छथि, नाटकक भीतर कोनो नाट्यात्मक गहराई नहि पाबैत अछि। ई एक विरोधाभास थिक- अंतमे एक प्रगतिशील सामाजिक व्याख्या दैत नाटककार, परंतु पूरा नाटकमे चोर लोकनि केवल ‘हँसाओल जाएवला वस्तु’ बनल रहि जाइत छथि। सामाजिक-यथार्थवादी नाट्य-लेखन एहि विरोधाभासकेँ दूर करैत, चोरक दारिद्र्यकेँ कोनो दृश्यमे मानवीय बनाबैत अछि। ग. गमछा-प्रसंग द्विअर्थीय गमछा ओछा क’ दान माँगबाक दृश्य एकहि संग दू अर्थमे कार्य करैत अछि- एक ब्रेख्तीय ‘पारदर्शिता’ (कलाकारक आर्थिक भेद्यता उजागर करनाइ) आ दोसर एक ‘राजकीय कला-संरक्षण’क आलोचना। मुदा नाटककार एहि दुनू अर्थमे सँ कोनो एककेँ पूर्ण रूपेण नहि विकसित करैत छथि- ई प्रसंग लोक-परम्पराक यांत्रिक पुनरावृत्ति जेकाँ लागैत अछि, एक सायास नाट्य-निर्णय जेकाँ नहि। बिदापत क. विपटाक ‘गड़ी आगाँ बढ़ाउ’ : हास्यसँ व्याघातक ओर विपटाक ‘गड़ी आगाँ बढ़ाउ’ उद्घोष-विधि सबसँ पहिले एकटा टटका लोकनाट्य-युक्ति थिक। मुदा ई वाक्य नाटकभरि एत्ते बेर दोहराओल गेल अछि जे ओ एक ब्रेख्तीय ‘विरचन-प्रभाव’ रहबाक बदला एक यांत्रिक व्यवधान बनि जाइत अछि। दर्शक जखन जनैत अछि जे विपटा बेर-बेर यएह कहत, तखन ओहि कथनक आश्चर्य-तत्त्व समाप्त भ’ जाइत अछि। ब्रेख्तक विरचन-प्रभाव तखने काज करैत अछि जखन ओ अनपेक्षित होए- एहि नाटकमे ओ अत्यन्त प्रत्याशित भ’ जाइत अछि। ख. उगना-महादेव प्रसंगक अपूर्णता उगना वास्तवमे महादेव छलाह- एहि महत्त्वपूर्ण लोक-कथाकेँ नाटकमे एक केन्द्रीय भावात्मक क्षण हेबाक चाही। मुदा एहि नाटकमे उगनाक महादेव-पहचान एक अन्य चरित्रक मुखसँ ‘रिपोर्ट’ (अमियकरक कथन) क रूपमे अबैत अछि, प्रत्यक्ष नाट्य-क्रियाक रूपमे नहि। एहि कारणे एहि क्षणक भावात्मक प्रभाव (जे विद्यापति-भक्तिमे एक दिव्य-क्षण थिक) सम्पूर्ण रूपसँ उभरि नहि पाबैत अछि। ग. ऐतिहासिकता-काव्यता द्वन्द्व नाटक ई.सं. १४००–१४५० धरिक ‘ऐतिहासिक’ समय-सीमा घोषित करैत अछि, मुदा नाट्य-संरचना सर्वत्र काव्यात्मक-लोक-शैलीमे अछि। एहि दुनूक मध्य तनाव कखनो-कखनो प्रकट होइत अछि- जेना जौनपुर-दरबारक दृश्य एक ऐतिहासिक यथार्थ थिक मुदा ओकरा अमियकरक ‘स्वाँग’ (हास्य-अभिनय)मे प्रस्तुत केनाइ एहि यथार्थकेँ हल्लुक कऽ दैत अछि। नाटककारक ऐतिहासिक-काव्यात्मक संतुलन कखनो-कखनो डोलैत अछि। कुसमा-सलहेस क. खलनायक-वर्ग (सूचोंग-चूहड़)क एकआयामिता संग्रहक सर्वाधिक महत्त्वाकांक्षी नाटकमे खलनायक-वर्गक चित्रण एकआयामी भ’ गेल अछि। सूचोंग, चूहड़मल्ल, तरुमल्ल- तीनू मात्र ‘दुष्ट-गुण’क संकलन मात्र थिकाह, कोनो अन्तर्द्वन्द्व, कोनो मानवीय जटिलता हुनका सभमे नहि अछि। जखन बुधेसरकेँ ओ लोकनि यातना दैत छथि, तखन समवेत-हँसी (हो... हो...) आ क्रूरताक एक सतही चित्रण अछि। महाकाव्यात्मक नाटकमे उत्कृष्ट खलनायक वएह होइत अछि जे दर्शककेँ अपन नजरिसँ सहमत भ’ जाएपर विवश करए; एहि नाटकमे एहन जटिलता अनुपस्थित अछि। ख. भूगोल-विस्तारसँ नाट्य-केन्द्रीयताक क्षय नाटकमे स्थान-परिवर्तन अत्यधिक अछि- महिसौथा, मोरंग, भोट, बाघगढ़, समदागढ़, रेवा-दाह, रंगीलागढ़। ई भौगोलिक विस्तार महागाथाक प्रामाणिकता प्रकट करैत अछि, मुदा नाट्य-रचनाक दृष्टिसँ एहिसँ कथाक केन्द्रीयता-कुसमा-सलहेसक प्रेम-कथा-प्रायः पृष्ठभूमिमे चलि जाइत अछि। मोरंग-राजाक युद्ध-प्रसंग आ भोट-आक्रमणक विवरणक कारणे नायिका कुसमा बेसी काल तक मंचसँ अनुपस्थित रहैत छथि। महाकाव्यात्मक विस्तार आ नाट्यात्मक केन्द्रीयताक बीच संतुलन पूर्णतः साधल नहि गेल। ग. समन्वयवादी सुमिरन आ सांस्कृतिक विसंगति नाटकक आरम्भमे ‘मीरा-सुलतान’केँ सुमिरल जाएब एक सुन्दर समन्वयवादी भाव थिक। मुदा ओहि सुमिरनमे जे दुसाध सलहेस-परम्पराक अपन सांस्कृतिक तत्त्व (वनदेवी, पशु-मित्र, दुसाध लोक-कथाक विशिष्ट शब्दावली) थिक, ओ ‘जन-गण-मन’क सन्दर्भसँ किञ्चित असंगत लागैत अछि। समन्वयवाद अत्यन्त सुन्दर उद्देश्य थिक, मुदा एहि नाटकक संदर्भमे ओकर विस्तार सुमिरनके ‘सर्व-धर्म-समभाव प्रदर्शन’क रूपमे बनाबैत अछि, एक प्रामाणिक दुसाध-धार्मिक-आह्वानक रूपमे कम। प्रेम-प्रतिज्ञा उर्फ श्रुवावतीक जय! क. अग्नि-प्रवेश : नारीवादी पाठक संग संरचनात्मक तनाव एहि नाटकक सबसँ गम्भीर वैचारिक तनाव अछि- श्रुवावती एक दिस ‘स्वतंत्र-स्वावलम्बी व्यक्ति’ घोषित करैत छथि अपनाकेँ, आ दोसर दिस जखन फल सिद्ध नहि होइत तखन ‘प्रियक स्मरण करैत आग्नि-प्रवेश करब’क संकल्प लैत छथि। नाटक एहि अग्नि-प्रवेशकेँ ‘आत्मबल’क प्रकटीकरण कहैत अछि, मुदा बलिदान-केन्द्रित प्रतीक स्वयं एक पितृसत्तात्मक रूढ़िक अनुसरण थिक। स्वाधीन स्त्री जीवनक माँग करैत अछि, मृत्युक नहि। ई वैचारिक विरोधाभास नाटकमे नहि सोझरल अछि। तुलना करू : सुकन्या (नाटक-५) अपन पिताक श्राप-परिणामक जिम्मेदारी लैत छथि आ जीवनक मार्ग चुनैत छथि; अष्टावक्र (नाटक-७) उर्वशीकेँ अस्वीकार क’ जीवित प्रेमकेँ चुनैत छथि। एहि दुनूक तुलनामे श्रुवावतीक चिता-संकल्प एक कमजोर नाट्य-समाधान थिक। ख. इन्द्रक तीन वेश : दोहराव आ विश्वसनीयता-क्षय इन्द्र पहिले ‘प्रत्यक्ष’ आबैत छथि (परिचय देबैत छथि), तखन ‘वृद्ध’ बनिक’ अबैत छथि, तखन ‘वशिष्ठ’ बनिक’। ई तीनू वेश दोहराओल संरचनामे (श्रुवावती हर बेर अस्वीकार करैत छथि) एक नाट्य-लय उत्पन्न करैत अछि जे अत्यन्त पूर्वानुमेय भ’ जाइत अछि। तेसर वेश-दृश्य (वशिष्ठ) मूलतः दोसर वेश-दृश्यक (वृद्ध) दुहराव थिक। दुनूमे श्रुवावती अस्वीकार करैत छथि, दुनूमे इन्द्र क्रुद्ध होइत छथि। एहि दोहरावसँ नाट्य-तनावमे विस्तार नहि, क्षय होइत अछि। ग. दुष्यन्त कुमारक उर्दू शेर : बाहरी तत्त्व-सम्मिलनक दिक्कत नाटकक समापनमे दुष्यन्त कुमारक हिन्दी-उर्दू शेर (‘कौन कहता है कि आसमाँ में सुराख हो नहीं सकता’) सांस्कृतिक-भाषाई समृद्धिक एक अभिव्यक्ति थिक। मुदा एहि मैथिली पौराणिक नाटिकाक संदर्भमे ओ किञ्चित असंगत सेहो लागैत अछि। जँ कोनो काव्य-पंक्ति उद्धृत करबाक आवश्यकता छल, तँ मैथिली काव्य-परम्परामे एहन शेर उपलब्ध अछि। ई एक छोट मुदा विशिष्ट शिल्प-प्रश्न थिक। विश्वासक शक्ति उर्फ सुकन्याक विवाह क. वय-भेद आ नैतिक असुविधा नाटकक भीतरसँ स्वयं एहि तनावकेँ स्वीकार कएल गेल अछि- कोरसक गायन-“सोरह बरिसक अलकेसरि धीआ, च्यवनक वयस हैजार”। ई गायन वय-भेदक नैतिक असुविधाकेँ मनोरंजक ढंगसँ प्रकट करैत अछि, मुदा एहि असुविधाक कोनो समाधान नाटकमे नहि अछि। च्यवन अपन वयस आ क्षमताक समक्ष आश्वस्त छथि; राजा विवशतासँ सहमत छथि; सुकन्या स्वेच्छासँ स्वीकार करैत छथि। मुदा एहि सहमतिक नैतिक आधारकेँ नाटक पर्याप्त रोपेँ विकसित नहि करैत अछि। ख. अश्विनी कुमार-दृश्यक अत्यधिक लम्बाई अश्विनी कुमारक प्रथम प्रवेश, तकर बाद पुनः प्रवेश, क्षमा-याचना, उर्वशी-तुलना, श्रापक धमकी, पुनः भेंट, आ सोमरस-प्रसंग-ई सम्पूर्ण क्रम नाटकक कुल लम्बाईक एक पैघ भाग ल’ लैत अछि। मुख्य प्रेम-कथा (सुकन्या-च्यवनक सम्बन्ध-विकास) एहि हास्य-प्रसंगसँ अपेक्षाकृत कम स्थान पाबैत अछि। नाट्यात्मक अर्थव्यवस्थाक दृष्टिसँ अश्विनी-प्रसंगक एक दृश्य हटा क’ मुख्य-दम्पती-सम्बन्धकेँ अधिक विस्तार दैत तँ नाटक अधिक सन्तुलित होइत। ग. ‘च्यवनप्राश’ टिप्पणी : समय-विभाजनक खतरा सूत्रधारक ‘च्यवनप्राश बला च्यवन’ टिप्पणी एक पल हास्यपूर्ण लागैत अछि। मुदा ई आधुनिक-उपभोक्ता-संस्कृतिक सन्दर्भ पौराणिक वातावरणमे एक ‘टाइम-रिफ्ट’ (समय-विभाजन) उत्पन्न करैत अछि। यदि ई सायास छल-एक ब्रेख्तीय विरचन-प्रभाव-तँ ओहि नाट्य-उद्देश्यकेँ नाटकक भीतर अधिक सुसंगत रूपसँ प्रयोग भेबाक चाहियनि। प्रेमक विस्तार उर्फ श्वेताक आविष्कार क. अतिरथक परिवर्तन : गतिशास्त्रक समस्या नाटकक सर्वाधिक गम्भीर शिल्प-सीमा थिक-अतिरथक मनोवैज्ञानिक रूपान्तरण अत्यन्त शीघ्र होइत अछि। एक दिस नाटककार अतिरथकेँ ‘सात-आठ बरखसँ’ निरपेक्ष, ‘सब स्वयंवरसँ एकसरे घुरनिहार’ राजा चित्रित करैत छथि; दोसर दिस श्वेताक जल-समाधिक समाचार पाबिते ओ नदी-तट दिस दौड़ि पड़ैत छथि आ अरण्यमे भेंट होइतहि मुकुट उतारि दैत छथि। दशकों-पुरान ‘निरपेक्षता’ एक्के दृश्यमे विघटित भ’ जाइत अछि। एहि रूपान्तरणकेँ तैयार करएवला पर्याप्त नाट्य-आधार (psychological groundwork) नाटकमे नहि अछि। ‘बेमन भ’ गेलाह अतिरथ’, ‘सब कृत्रिम सन’, ‘सब प्राणहीन कठपुतरी सन’- उद्घोषकक ई भाष्य अतिरथक परिवर्तनक ‘कारण’ बताबैत अछि, मुदा ई ‘बताएब’ थिक, ‘देखाएब’ नहि। इब्सेनक ‘हेड्डा गेब्लर’ वा चेखवक ‘थ्री सिस्टर्स’मे पात्रक मनोवैज्ञानिक परिवर्तन आस्ते-आस्ते, दृश्य-दर-दृश्य सिद्ध होइत अछि। ‘श्वेताक आविष्कार’मे अतिरथक परिवर्तन-यात्रा उद्घोषकक वर्णनपर अत्यधिक निर्भर अछि, प्रत्यक्ष नाट्य-क्रियापर कम। ख. मूल-कथाक स्रोत-अभाव श्वेता-अतिरथक कथाक कोनो पौराणिक वा ऐतिहासिक स्रोत नहि अछि-ई सर्वथा कुणालक स्वतंत्र कल्पना थिक। ई अपनेमे एक गुण थिक (मौलिकता)। मुदा एहिसँ उत्पन्न एक कमजोरी सेहो अछि-नाट्य-कथाकेँ जे ‘भार’ आ ‘विश्वसनीयता’ एक पौराणिक स्रोत दैत अछि (जेना अन्य छह नाटकमे), ओ एहिमे अनुपस्थित अछि। ‘राजनर्तकी’ आ ‘निरपेक्ष राजा’क कथा एक लोकप्रिय नाट्य-साँचा (trope) थिक जे अनेक भारतीय भाषाओंमे पहिनहियो लिखाएल अछि। प्रेमक परीक्षा उर्फ सुप्रभा आ अष्टावक्र क. वदन्यक प्रेरणा : अव्याख्यायित अस्वीकार महर्षि वदन्यक अष्टावक्र-अस्वीकारक वास्तविक कारण नाटकमे कहियो स्पष्ट नहि होइत अछि। ओ कहैत छथि-“स्पष्टीकरण देब हमर बाध्यता नहि”। एहि ‘रहस्य’केँ नाटककार एक उपकरण बनाबैत छथि, मुदा एहिसँ वदन्यक चरित्र मनोवैज्ञानिक रूपसँ ‘खोखला’ रहि जाइत अछि। अस्वीकारक कारण ज्ञात नहि भेलासँ दर्शककेँ परीक्षाक ‘दाँव’ पूर्ण रूपसँ बुझाइत नहि अछि। वदन्य एक कार्यकारी (functional) पात्र बनि जाइत छथि, एक जीवित चरित्र नहि। ख. सुप्रभाक नाट्य-उपस्थिति : असमान शीर्षकमे सुप्रभाक नाम अष्टावक्रसँ पहिने अछि (‘सुप्रभा आ अष्टावक्र’), मुदा नाटकक पहिल अर्धांश अष्टावक्रकेँ समर्पित अछि। सुप्रभा दशम-एकादश दृश्यमे (बारह दृश्यमेसँ) मात्र मंचपर अबैत छथि। बारहम दृश्य (उर्वशी-प्रसंग) मे ओ अनुपस्थित छथि। यदि नाटकक शीर्षक सुप्रभाकेँ प्राथमिकता दैत अछि, तँ नाट्य-संरचना ओहि प्राथमिकताकेँ प्रतिबिम्बित नहि करैत अछि। ग. वंदी-रहस्य : एक महत्त्वपूर्ण नाट्य-अवसरक क्षय वंदी वास्तवमे वरुण-पुत्र छथि, आ ‘जल-समाधि’ वस्तुतः विद्वान लोकनिकेँ यज्ञक लेल जल-देवताक आश्रयमे राखनाइ छल-यैह रहस्य एहि नाटकक सर्वाधिक आश्चर्यजनक नाट्य-मोड़ (plot-twist) थिक। मुदा नाटककार एहि रहस्यकेँ एक हास्य-प्रसंगमे पर्यवसित क’ दैत छथि (“पानिए तँ हमर घर-दुआरि अछि”)। एहि क्षणकेँ यदि एक ‘नाट्य-उद्घाटन’ (theatrical revelation) बनाओल जइतए, तँ ओ नाटकक सर्वोत्तम दृश्यमे एक होइत। संग्रह-स्तरीय साझा सीमा स्त्री-कर्तृत्व आ पितृसत्तात्मक अनुमोदन-क्रम प्रेम-चतुष्टयक चारू नाटकमे एक साझा संरचनात्मक विशेषता अछि जे एक साझा सीमा सेहो थिक- प्रत्येक नायिकाक स्वाधीन निर्णय अंततः एक ‘पुरुष-प्राधिकारक अनुमोदन’सँ पूर्ण होइत अछि। श्रुवावतीक जय-इन्द्रक ‘अहाँ विजयी भेलहूँ’ उद्घोषसँ; सुकन्याक विवाह-राजा शर्याति-च्यवनक सहमतिसँ; श्वेताक मुक्ति-अतिरथक पलायन-अनुगमनसँ; सुप्रभाक विवाह-वदन्यक अनुमतिसँ। ई चारू उदाहरण बतबैत अछि जे नाटककार नायिकाकेँ ‘कर्ता’ बनाबैत छथि मुदा हुनकर नाट्य-विजयक अंतिम पुष्टि एक पुरुष-चरित्रक मुँहसँ होइत अछि। एहि सूक्ष्म पुनर्उत्पादनसँ (subtle reproduction) नाटककारक नारीवादी विचार किञ्चित सीमित होइत अछि। उद्घोषक-निर्भरता : ‘बताएब’ बनाम ‘दिखाएब’ प्रेम-चतुष्टयक चारू नाटकमे उद्घोषक (narrator) पात्रकेँ एक ‘भावना-व्याख्याकर्ता’क भूमिका दैल गेल अछि- ‘श्वेताक अवसाद हेरा गेलै...’, ‘अतिरथ बेमन भ’ गेलाह...’, ‘बीतल रजनी, ज्यों युग बीतए...’ ई वर्णन कखनो-कखनो पात्रकेँ अपन भावना स्वयं प्रकट करबाक नाट्य-अवसरसँ वंचित क’ दैत अछि। रंगमंचमे सर्वोत्तम भावनात्मक क्षण ओ होइत अछि जखन पात्र ‘जीबैत’ अछि, वर्णनकर्ता ‘बताबैत’ नहि अछि। एहि नाटकमे उद्घोषक-निर्भरता एक व्यापक शिल्प-सीमा थिक। दैवी हस्तक्षेपक वैचारिक विरोधाभास संग्रहक कतिपय नाटकमे नायिका-कर्तृत्वक एक उच्च घोषणा होइत अछि, मुदा नाट्य-कथामे एक देवता वा दैवी शक्ति आखिर हस्तक्षेप करैत अछि। श्रुवावतीक ‘आत्मबल’ इन्द्रक स्वीकृतिसँ ‘सिद्ध’ होइत अछि; सुकन्याक ‘विश्वास’ अश्विनी कुमारक औषधि-ज्ञानसँ च्यवनकेँ यौवन दैत पुरस्कृत होइत अछि; अष्टावक्रकेँ पितृ-श्राप नदी-स्नानसँ दूर होइत अछि। एहि दैवी-पुरस्कार-क्रमसँ एक अनायास संदेश उत्पन्न होइत अछि- ‘प्रेम-निष्ठाकेँ दैवी पुरस्कार भेटिते अछि’। ई मानव-कर्तृत्वकेँ स्वायत्त नहि, दैव-निर्भर प्रमाणित करैत अछि। विद्यापति-पद : अत्यधिक प्रयोगक जोखिम विद्यापतिक पदक प्रयोग ‘बिदापत’ आ ‘सुकन्या’ दुनूमे अछि। ‘बिदापत’मे ई पूर्णतः सार्थक एवं सुसंगत अछि- विद्यापति स्वयं नाटकक नायक छथि। मुदा ‘सुकन्या’मे विद्यापतिक वसन्त-पद (‘आयल रितुपति राज बसंत’) वातावरण-निर्माणक लेल अछि। एहि उपयोगसँ एक प्रश्न उठैत अछि- की संग्रहकेँ एकटा विद्यापति-पदक संरक्षण-प्रयोजन अछि? यदि ‘सुकन्या’क वसन्त-वर्णन हेतु मैथिली काव्य-परम्पराक कोनो अन्य पदक प्रयोग कएल जाएत, तँ ‘बिदापत’मे विद्यापति-पदक विशिष्टता आरो अधिक निखरैत। रंगमंचीय निर्देश : असमान विवरण-स्तर लोकनाट्य-त्रयीमे मंच-निर्देश (stage directions) अत्यन्त विस्तृत आ विशिष्ट अछि-“गबैत, कुसमा सामर, ठनका-बनका...कुनटा, बुधेसरकेँ दुलार मलार करैए”। मुदा प्रेम-चतुष्टयमे मंच-निर्देश प्रायः न्यूनतम अछि-“प्रकाश परिवर्तन”, “संगीत”, “फ्रीज”। ई अन्तर नाट्यकारक दू भिन्न कालक रचना-पद्धतिकेँ दर्शाबैत अछि, मुदा एहिसँ छोट नाटिकासँ अभिनेताकेँ कम मार्गदर्शन भेटैत अछि। उपसंहार : सीमाक संग सम्भावना प्रथमतः, प्रेम-चतुष्टयमे कतहु-कतहु सन्देश-प्रधानता (उपदेशात्मकता) नाट्य-तनावक स्थान ल’ लैत अछि-विशेषतः समापन-दोहा आ उद्घोषकक टिप्पणी कखनो-कखनो ओहि अर्थकेँ मुखर क’ दैत अछि जे ध्वनित रहितहुँ अधिक प्रभावी रहितैक। नाट्य-कलाक मर्म ‘देखाबए’मे अछि, ‘कहि देब’मे नहि- एहि कसौटी पर लोकनाट्य-त्रयी प्रेम-चतुष्टयसँ पुष्ट होइत अछि। द्वितीयतः, ‘श्रुवावतीक जय’मे स्त्री-स्वातंत्र्यक प्रखर पाठक संग अग्नि-प्रवेशक रूढ़िक प्रयोग एक वैचारिक तनाव उत्पन्न करैत अछि- यद्यपि नाटक एकरा ‘आत्मबल’क संकल्पक रूपमे प्रस्तुत करबाक प्रयास करैत अछि, तथापि बलिदान-केन्द्रित प्रतीक आधुनिक नारीवादी पाठक संग पूर्ण रूपसँ संगति नहि बैसाबैत अछि- ई प्रश्न खुजल रहैत अछि। तृतीयतः, संग्रहमे स्केल (परिमाण)क असमानता अछि- ‘कुसमा-सलहेस’ सन महाकाव्यात्मक विस्तार आ प्रेम-चतुष्टयक चेम्बर-नाटिका एक्के लाटमे राखल गेल अछि; ई वैविध्य एक दृष्टिसँ संग्रहक सम्पन्नता थिक, मुदा एकर पाठ-अनुभवमे लय-भंग सेहो उत्पन्न करैत अछि। एहि सभ सीमाक बादहुँ ई स्वीकार’ पड़त जे ई कमी कुणालक नाट्य-दृष्टिक मूल बल-मंचनीयता आ लोक-संप्रेषणीयता-क सोझाँ गौण अछि। संग्रहक सीमा मुख्यतः तीन श्रेणीमे आबैत अछि- (क) शिल्प-सीमा : उद्घोषक-निर्भरता, ‘बताएब’ बनाम ‘देखाएब’, कतिपय पात्रक एकआयामिता। (ख) वैचारिक तनाव : अग्नि-प्रवेश-रूढ़ि, पितृसत्तात्मक अनुमोदन-क्रम, दैवी-पुरस्कार-निर्भरता। (ग) संरचनात्मक सीमा : आकार-वैषम्य, शीर्षक-एकरसता, दोहराओल नाट्य-ढाँचा। महत्त्वपूर्ण ई जे ई सीमा संग्रहक मूल्यकेँ नष्ट नहि करैत अछि। कोनो सीमा-रहित रचना-संग्रह नहि अछि- महाकवि विद्यापतिक पदमे सेहो परम्परागत नायिका-साँचाक पुनरावृत्ति अछि; भिखारी ठाकुरक नाटकमे सेहो भाषिक असमानता अछि। कुणालक सीमा बहुधा ओहि स्थानमे अछि जाहिठाम हुनकर महत्त्वाकांक्षा सर्वाधिक उड़ान भरैत अछि-ई एक रचनाकारक सजीव चिह्न थिक। एहि सीमाकेँ चिन्हित करबाक एक व्यावहारिक उद्देश्य सेहो अछि-नाटकक भविष्यक निर्देशक लोकनि एहि सीमाकेँ मंचन-प्रक्रियामे सम्बोधित कऽ सकैत छथि। अतिरथक परिवर्तन-यात्राकेँ एक समक्ष निर्देशक मूक-दृश्यसँ विस्तारित क’ सकैत छथि; श्रुवावतीक चिता-संकल्पकेँ एक शक्ति-उद्घोषक रूपमे पुनः-अभिनीत कएल जा सकैत अछि; वंदीक रहस्य-उद्घाटनकेँ एक विराट नाट्य-क्षणमे पर्यवसित कएल जा सकैत अछि। यएह जीवित रंगमंचक गुण थिक- प्रत्येक मंचन एक नव ‘संस्करण’ थिक। उपसंहार ‘कुसमा-सलहेस आ अन्य छओ गोट नाटक’ समकालीन मैथिली रंगमंचक एक महत्त्वपूर्ण अवदान थिक-ई लोकनाट्य आ आधुनिक रंगमंचक बीच एक सेतु थिक, जे मिथिलाक ‘नाच’-परम्पराकेँ मात्र संरक्षित नहि करैत, अपितु ओकरा समकालीन वैचारिकतासँ अनुप्राणित क’ पुनर्जीवित करैत अछि। बुद्धि (‘चालिस चोर’), काव्य-चिरंजीविता (‘बिदापत’), अभय-स्वातंत्र्य आ प्रेम (‘कुसमा-सलहेस’) आ स्त्री-कर्तृत्व (प्रेम-चतुष्टय)- एहि चारि स्तम्भ पर ठाढ़ ई संग्रह अंततः एक्के थीसिस दिस अभिमुख अछि- ‘प्रेम’ (व्यापक मानवीय करुणा आ जीवनासक्तिक अर्थमे) सृष्टिक मूल-तत्त्व थिक, आ ‘बुद्धि’ ओकर रक्षक। लोक-स्रोतक प्रति निष्ठा, सबाल्टर्न आ स्त्री-स्वरक प्रति संवेदनशीलता, शास्त्र-लोक-आधुनिकताक संश्लेषण आ रंगमंचीय व्यावहारिकता-एहि गुण सभक कारणे ई संग्रह विदेह समानांतर-साहित्य-दृष्टिक एक उपयुक्त निदर्शन थिक आ मैथिली नाट्य-समीक्षाक एक अनिवार्य संदर्भ-बिन्दु। एकर अध्ययन-अध्यापन आ पुनर्मंचन मैथिली रंगमंचक जीवंतताक लेल समान रूपसँ आवश्यक अछि। २ कुणाल-कृत नाट्य-समीक्षा शृंखला · प्रथम नाटक चालिस चोर आ गोनू झा उर्फ ज्ञान झाक खिस्सा एक चतुर्भुज नाट्य-समीक्षा भारतीय · पाश्चात्य · चीनी · इजरायली नाट्य-सिद्धांतक परिप्रेक्ष्यमे पहिल मंचन : ४-५ अगस्त १९९३, विद्यापति भवन, पटना · प्रकाशन : भंगिमा, अंक-२२, अगस्त १९९५ १. परिचय आ कथा-संरचना कुणालक प्रथम नाटक ‘चालिस चोर आ गोनू झा उर्फ ज्ञान झाक खिस्सा’ मैथिलीक नाट्य-इतिहासमे एक विलक्षण स्थान रखैत अछि। ई नाटक अपन कथा-वस्तुसँ बेसी अपन ‘कथा कहबाक ढंग’क कारणे महत्त्वपूर्ण अछि। नाटकक आरम्म्भे एक मेटाथिएट्रिकल (आत्म-संदर्भी) युक्तिसँ होइत अछि- तीन गोट ‘भाँट’ (यशोगायक/परम्परागत कवि-गायक) मंच पर अबैत छथि, दर्शकक समक्ष अपन निरर्थकताक विलाप करैत छथि, आ जखन ओ बुझैत छथि जे हुनकर पारम्परिक कवित-पाठसँ कतहु असरि नहि पड़ैत, तखन ओ निर्णय करैत छथि-“जैं हमरा लोकनि नाटक करी तँ केहन रहतै!” एहिसँ आरम्भ होइत अछि एक दोसर कथा-भाँटक कथा (बाहरी वृत्त) आ मिथिलाक चिर-परिचित लोक-तर्कशास्त्री गोनू झाक कथा (भीतरी वृत्त)। भीतरी कथाक प्रमुख अवयव-प्रारम्भमे एक बाल-परीक्षा दृश्य (जाहिमे हरबाह चतुरतासँ सिद्ध करैत अछि जे बच्चा केकर अछि); तकर बाद ‘भुनभुनादेव’ सुबेदारक दरबारमे बुद्धिक अपमान; फेर कविराज लोकनिक गोनू-शरण; गढ़ घुसकियाहीमे न्याय-यात्रा; चोरक टोलीक आपसी सत्ता-संघर्ष (दुरमतिया बनाम देबहा); गोनूक काली-माता स्वप्न; आ अंतमे एक कुटिल अभिषेक- विधिसँ चोर सभकेँ परास्त करबाक दृश्य। नाटककारक एक विशेष टिप्पणी महत्त्वपूर्ण अछि- एहि नाटककेँ एक अभिनेता द्वारा बहु-पात्रीय अभिनयमे खेलल जा सकैत अछि, आ एकर तीन टा काल-संस्करण (४५/६०/९० मिनट) आ एक ध्वनि-नाट्य शृंखला (१३ प्रकरण रेडियो पर प्रसारित) सेहो अछि। नाटकक मूल प्रश्न-कलाकेँ के पोसत? राज्य, समाज, वा स्वयं कलाकार? आ एहि जीवन-संघर्षमे ‘बुद्धि’ (ज्ञान) की अन्तिम आ सर्वोच्च शक्ति थिक?- यएह प्रश्न चारू नाट्य-परम्पराक समीक्षाक केन्द्रमे रहत। २. भारतीय नाट्य-सिद्धांत २.१ नाट्यशास्त्र : रस-निष्पत्ति आ पात्र-प्रकार भरतमुनिक ‘नाट्यशास्त्र’ (अनुमानित द्वितीय शती ईसापूर्व–द्वितीय शती ईसवी) रसकेँ नाट्यक आत्मा कहैत अछि-“रसो नाट्यस्य जीवनम्”। एहि नाटकक प्रधान रस ‘हास्य’ थिक, मुदा ओ एकल नहि अछि। भरत हास्यक छह विभेद देखबैत छथि जाहिमे ‘परस्थ हास्य’ (दोसर पर निर्देशित हँसी) एतय केन्द्रीय अछि- बुड़िराज, भुनभुनादेव, दुरमतिया आ चोर-दलक मूर्खताक चित्रण एहि वर्गमे आबैत अछि। संग-संग ‘आत्मस्थ हास्य’ (स्वयं पर हँसब) सेहो अछि- भाँटक आत्म-विडम्बना एकर उदाहरण अछि। हास्यक आलम्बन विभाव थिक- भुनभुनादेव आ बुड़िराजक विसंगत आचरण (“राजन्, अहाँक नाम ‘बुड़िराज’ रखैत छी किऐकि हमरा अधिक नीक लगैए”), दुरमतियाक हठधर्मिता आ रनूभनूक असहाय प्रहसन। ‘वात्स्यायन’क कामसूत्र-परम्पराक ‘शृंगार’ एतय नहि- ई हास्य-प्रधान नाटक अछि। मुदा ‘वीर-रस’क एकटा अद्भुत संस्करण अवश्य अछि- गोनूक वीरता शस्त्र-बलक नहि, युक्ति-बलक थिक। भरत ‘धीर-ललित’ नायकक लक्षण कहैत छथि- शांत, विनोदी, बुद्धिमान-यएह गोनूक प्रकृति थिक। विदूषक-परम्परा- भरतक नाट्यशास्त्रमे ‘विदूषक’ (vidūṣaka) एक विशिष्ट पात्र-प्रकार थिक- बहुधा ब्राह्मण, हास्यास्पद वेश, परंतु बुद्धिमान आ नायकक मित्र। गोनू झा आंशिकतः एहि परम्पराक उत्तराधिकारी थिकाह- मुदा कुणाल एकरा लोक-वास्तवाद (folk realism) मे पुनर्परिभाषित करैत छथि। गोनू न्यायालयी विदूषक नहि, अपितु माटिसँ जुड़ल जन-तर्कशास्त्री छथि। २.२ प्रहसन/भाण आ लोकधर्मी शिल्प संस्कृत-नाट्यक ‘प्रहसन’ विधा (हास्य-प्रधान एकांकी/बहुअंकी नाटक) एहि रचनाक निकटतम शास्त्रीय समकक्ष थिक। भरत प्रहसनकेँ ‘त्रिविध हास्य’ (मन, वचन, शरीर) क सम्मिश्रणसँ निर्मित बताबैत छथि। कुणालक नाटकमे तीनू उपस्थित अछि- भाँटक वाक्-क्रीड़ा (वचन-हास्य), चोरक असंगत क्रिया (शरीर-हास्य), आ गोनूक काली-माता-प्रसंगक मानस-विनोद। नाट्यशास्त्रक ‘लोकधर्मी’ (लोक-परम्पराक अनुसरण) बनाम ‘नाट्यधर्मी’ (शास्त्रीय अभिनय-रीति) क भेद एहि नाटककेँ स्पष्टतः ‘लोकधर्मी’ शिविरमे राखैत अछि। दर्शककेँ सीधा सम्बोधन, गीत-प्रयोग, सपना-दृश्य, नाम-विडम्बना (भुनभुनादेव, बुड़िराज, दुरमतिया)- ई सभ लोकधर्मी प्रविधि थिक जे नाट्यशास्त्रक शास्त्रीय मानदण्डसँ भिन्न मुदा ततबे वैध आ परम्परा-सम्मत अछि। २.३ ध्वनि आ वक्रोक्ति आनन्दवर्धनक ‘ध्वन्यालोक’ (नवम शती) क ‘ध्वनि-सिद्धांत’-जाहिमे शब्दक व्यंजनार्थ (ध्वनित/सूचित अर्थ) अभिधा आ लक्षणासँ उत्कृष्ट घोषित होइत अछि- एहि नाटकमे अनेक स्तर पर क्रियाशील अछि। शीर्षकक ‘ज्ञान झाक खिस्सा’- अभिधातः एक व्यक्तिक कथा, परंतु ध्वनि-अर्थमे ‘ज्ञान/बुद्धि’क कथा। नाटकक समापन-गीत यएह ध्वनिकेँ मुखर करैत अछि-“बुद्धि सँ नईँ पैघ कोनो बल होइ छै।” एहि शब्द-ध्वनिमे समग्र नाटकक तात्पर्य संग्रहित अछि। कुन्तकक ‘वक्रोक्ति-जीवित’ (दशम शती) जे वक्रता-सिद्धांत प्रस्तुत करैत अछि- अभिधेय-वस्तुक चमत्कारपूर्ण, आह्लादक अभिव्यक्ति-ओ एतय बहुल मात्रामे उपस्थित अछि। भुनभुनादेवक पूरा चरित्र एक ‘नाम-वक्रोक्ति’ थिक। गोनूक काली-माताक संग संवाद- "हे माता! जखन आहाँ केँ सर्दी लगैत हैत तँ... सब हाथ केँ अस्त्र-शस्त्र मे बझौने छी। तखन नाक सँ पोटा कोना पोछैत हैब!" -एहि वाक्यमे आस्था आ हास्यक, भक्ति आ बुद्धिक, देवत्व आ मानवीयताक जे वक्र मिश्रण अछि, ओ ‘वक्रोक्ति’क उत्कृष्ट उदाहरण थिक। एतय भय कहियो नहि आबैत- अभयक वक्रोक्ति थिक ई। ३. पाश्चात्य नाट्य-सिद्धांत ३.१ अरस्तू : अनुकरण, विप्रतिसार आ परिशोधन यूनानी दार्शनिक अरस्तू (३८४–३२२ ईसापूर्व) अपन ‘काव्यशास्त्र’ (Poetics)मे नाटकक आत्मा ‘अनुकरण’ (μίμησις / अनुकृति) कहैत छथि, आ उत्कृष्ट त्रासदीक लेल ‘विप्रतिसार’ (περιπέτεια / परिस्थिति-परिवर्तन) आ ‘पहचान’ (ἀναγνώρισις / अभिज्ञान)क महत्त्व बतबैत छथि। कुणालक ई नाटक अरस्तूक मानदण्डसँ एक अर्थमे ‘विरोधी’ थिक-ई एकलरेखीय त्रासदी नहि, बहुरेखीय हास्य-प्रहसन थिक। अरस्तू ‘एपिसोडिक’ कथा-संरचनाकेँ त्रुटिपूर्ण मानैत छलाह; मुदा लोक-परम्परामे यएह एपिसोडिकता ओकर प्राण थिक। तथापि अरस्तूक परिशोधन/कैथार्सिस- दर्शकक दमित भावनाक मोचन-एतय एक कॉमिक रूपमे उपस्थित अछि। चोरी, दारिद्र्य, राज्यक भ्रष्टाचार-एहि तीनू सामाजिक भयक विरुद्ध जे हास्य-कैथार्सिस एहि नाटकमे होइत अछि, ओ सामाजिक-मनोवैज्ञानिक स्तर पर अरस्तूक सिद्धांतसँ समर्थनीय अछि। नाटकमे ‘अभिज्ञान’-दृश्य उलटा रूपमे अछि- गोनू (अर्द्धनिद्रा) चोर सभकेँ पहिने काली माताक रूप ‘चिन्हैत’ छथि (“काली माता पुरुखक भेष मे आबि गेलीहए!”), तखन ओ ‘नहि-पहचानैत’ छथि। ई ‘reversed anagnorisis’ थिक- पहचानक हास्यात्मक प्रयोग, जाहिसँ भयक स्थान हँसी लैत अछि। ३.२ ब्रेख्त : महाकाव्यात्मक रंगमंच आ विरचन-प्रभाव जर्मन नाटककार-विचारक बेर्टोल्ट ब्रेख्त (१८९८–1९५६) अपन ‘महाकाव्यात्मक रंगमंच’ (Episches Theater / एपिक थिएटर) सिद्धांतमे ‘विरचन-प्रभाव’ (Verfremdungseffekt / अलगाव-प्रभाव) कहलाह- अभिनेता दर्शककेँ बेर-बेर स्मरण करबाबथि जे ओ एक ‘निर्माण’ देखि रहल छथि, कोनो ‘वास्तविकता’ नहि, जाहिसँ दर्शकक आलोचनात्मक बुद्धि जागृत रहए। कुणालक नाटक ब्रेख्तीय विरचन-प्रभावक एक देशज संस्करण थिक। तीन भाँट मंच पर निर्णय लैत छथि जे ‘नाटक करब’- ई स्वयं विरचन-प्रभावक आरम्भ थिक। पूरा खेलमे ओ कतहु ‘भावमग्न’ नहि होइत छथि, सदा अपन कलाकार-अस्तित्वसँ सचेत रहैत छथि। अंतमे ओ पुनः मंच पर आबि नाटकक वैकल्पिक अंत पर वाद-विवाद करैत छथि आ दर्शककेँ सामाजिक व्याख्या प्रस्तुत करैत छथि-“अशिक्षा आ गरीबी सँ उत्पन्न एहि सामाजिक व्याधि”। ई ब्रेख्तक ‘Gestus’ (भाव-मुद्रा/प्रदर्शन-क्रिया) क उत्कृष्ट उदाहरण थिक-अभिनेता ‘दिखाबैत’ अछि (zeigen), अनुभव नहि करैत अछि। ब्रेख्त कलाक आर्थिक आधारकेँ सेहो मुद्दा बनबैत छलाह। ‘गमछा-प्रसंग’-जाहिमे भाँट लोकनि स्पष्ट रूपसँ दर्शकसँ पेट भरबाक लेल दान माँगैत छथि- यएह ब्रेख्तीय पारदर्शिता थिक। ब्रेख्त सदा चाहैत छलाह जे कलाक उत्पादन-शर्त (conditions of production) नुकाओल ने जाए- एहि नाटकमे ओ उजागर अछि। ३.३ लायनल एबल : मेटाथिएटर अमेरिकी आलोचक लायनल एबल (Lionel Abel) अपन ‘मेटाथिएटर’ (Metatheatre, १९६३) ग्रन्थमे ओहि नाट्य-विधाकेँ परिभाषित कएलनि जाहिमे पात्र अपनाकेँ ‘नाटकमे’ जनैत छथि। एहि परिभाषाक अनुसार ‘चालिस चोर’ एक परिपूर्ण मेटाथिएटर थिक- तीन भाँट मंच पर नाटक करबाक निर्णय लैत छथि, नाटकक कथा छाँटैत छथि, आ अंतमे रचना-प्रक्रियाक पारदर्शिता प्रदर्शित करैत छथि। एबल कहलनि जे मेटाथिएटर जीवनकेँ सपना आ नाटककेँ जागरण मानैत अछि- एतय ठीक उल्टा अछि- भाँटक जीवन-संकट ‘असल’ थिक आ गोनूक कथा ‘सपना’ (नाट्य), मुदा दुनूकेँ एक्के रंगमंच धारण करैत अछि। ३.४ बाख्तिन : कार्निवालेस्क रूसी चिन्तक मिखाइल बाख्तिन (१८९५–1९७५) अपन ‘कार्निवालेस्क’ सिद्धांतमे ओहि सांस्कृतिक क्षणक विश्लेषण कएलनि जाहिमे स्थापित सामाजिक पदक्रम उनटि जाइत अछि, मर्यादाक बान्ह टूटैत अछि, आ लोक-हास्यमे अधिकारक उपहास होइत अछि। एहि नाटकमे कार्निवालेस्कक अनेक छटा अछि- बुड़िराज नामक ‘बुद्धिहीन मंत्री’, भुनभुनादेव ‘गुनगुनाबएवला-देव’ सुबेदार-दुनूक नाम स्वयं हुनकर सत्ता-पद पर कार्निवालेस्क टिप्पणी थिक। चोर-दलमे जखन नेतृत्वक लेल लोकतांत्रिक मत-गणना होइत अछि- एहि बर्बर समूहमे सेहो ‘राजनीति’ चलैत अछि- ई एक कार्निवालेस्क समानांतर-राज्य थिक। गमछा-प्रसंग बाख्तिनक दृष्टिसँ ‘श्रेणी-उत्क्रमण’ (inversion of hierarchy) थिक- राजाधिराज आ हुनकर दरबारक उपहास करैत, भाँट-कलाकार दर्शकसँ सोझे आर्थिक सम्बन्ध स्थापित करैत छथि, बिना कोनो मध्यस्थक। ई ‘राज्याश्रय’ बनाम ‘जनाश्रय’क द्वन्द्वकेँ कार्निवालेस्क रूपमे सोझराइत अछि। ४. चीनी नाट्य-सिद्धांत ४.१ ली यू : नाटक-संरचनाक तत्त्व चीनी नाटककार-विचारक ली यू (१६११–1६८०), जिनकर ‘शियान-चिंग-ओउ-चि’ (‘फुरसतिमे मनक बात’) चीनी नाट्य-समीक्षाक आधार-ग्रन्थ मानल जाइत अछि, एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत देलनि-‘झू-नाओ’ (मुख्य-मस्तिष्क / केन्द्रीय विचार-सूत्र)- प्रत्येक उत्तम नाटकमे एक ऐसी केन्द्रीय धुरी होएबाक चाही जाहिसँ समस्त कथा-धागा बन्हाएल हुअए। एहि नाटकक ‘झू-नाओ’ थिक- ‘बुद्धि बनाम बाहुबल’, तथा एहिसँ जुड़ल ‘लोक-कला बनाम राज्य-शक्ति’। ली यू कहलनि जे झू-नाओ पहिल अंकेमे स्थापित होएबाक चाही- आ कुणाल यएह करैत छथि (भाँटक पहिल दृश्य)। ली यूक दोसर सिद्धांत ‘मि-झेन-शियान’ (सूक्ष्म-सीवन / stitching) थिक- नाटकक सब अंग एना सूतल होए जे अंतमे सब ताग अपन स्थान पर हो। गमछा-प्रसंग आ भाँट-वृत्तक अंतमे प्रत्यावर्तन एहि ‘मि-झेन-शियान’क उदाहरण थिक- नाटकक बाहरी वृत्त (भाँटक संकट) ठीक ओही स्थल पर समाप्त होइत अछि जाहिठाम आरम्भ भेल छल। ४.२ चोउ पात्र-प्रकार चीनी शास्त्रीय रंगमंचमे (जिंग-जू/पेइचिंग ओपेरा तथा अन्य रूप) पाँच मूल पात्र-प्रकार होइत अछि-शेंग (पुरुष-नायक), तान (नारी), चिंग (रंगीन मुख), मो (वृद्ध), आ चोउ (विदूषक)। ‘चोउ’ ओ एकमात्र पात्र-प्रकार थिक जे सोझे दर्शकसँ गप करैत अछि, मंच-परम्पराकेँ तोड़ैत अछि, आ देशज लोकभाषाक प्रयोग करैत अछि। एहि नाटकक तीन भाँट ‘चोउ’क एक त्रिमूर्ति संस्करण छथि। हुनकर दर्शक-सम्बोधन, भूमिका-परित्याग, गीत-प्रयोग आ स्व-उपहास-सभ ‘चोउ’क चिरपरिचित गुण थिक। एहि समानांतरसँ प्रकट होइत अछि जे लोक-रंगमंचक एक वैश्विक तर्क अछि- प्रत्येक सभ्यताक लोक-रंगमंच एक विदूषक-पात्र रचैत अछि जे ‘चतुर्थ भित्ति’ केँ तोड़ैत अछि आ समाजक आत्म-दर्शन करबैत अछि। ४.३ श्यू-शी: रिक्त-पूर्ण सिद्धांत चीनी सौन्दर्यशास्त्रमे ‘श्यू-शी’ (खाली-भरल, empty-full) क सिद्धांत मूलभूत अछि। मंच पर जे ‘रिक्त’ (श्यू) होइत अछि- दृश्य-सामग्रीक अभाव-ओ कल्पनाद्वारा ‘पूर्ण’ (शी) बनि जाइत अछि। चीनी अभिनेता एक छड़ीसँ ‘नाव’ आ एक कदमसँ ‘यात्रा’ बनबैत छथि। कुणालक नाटकमे ‘श्यू-शी’क सर्वाधिक मार्मिक उदाहरण अछि- गोनूक कर्पास-बीज वटी। एक मुट्ठी बेकार कपास-बीजकेँ गोनू दावा करैत छथि जे ई प्रति भरी दस अशर्फीमे बिकाइत अछि। ‘रिक्त’ वस्तु (worthless seed) एक ‘पूर्ण’ (valued commodity) बनि जाइत अछि- ई गोनूक बुद्धि-शक्तिक श्यू-शी-प्रयोग थिक। एहिसँ प्रकट होइत अछि जे कुणालक सौन्दर्य-बोध चीनी लोक-रंगमंचक ‘रिक्तता-सम्पन्नता’क मर्मसँ संगत अछि। ४.४ यी-चिंग: वांग गुओवेई चीनी काव्यशास्त्री वांग गुओवेई (१८७७–१९२७) अपन ‘रेन-झियान-ची’ ग्रन्थमे ‘यी-चिंग’ (emotion-situation-fusion / भाव-स्थिति-संलय) क सिद्धांत दैत छथि- उत्कृष्ट कलामे भाव आ परिवेश एना मिज्झर होइत अछि जे एक स्वतंत्र सौन्दर्य-लोक (aesthetic sphere) सृजित होइत अछि। एहि नाटकक ‘यी-चिंग’ थिक-भाँटक मरैत कलाक नस्टाल्जिया आ गोनूक अपरास्त बुद्धिक उल्लासक संयोग। एहि दुनूक मिलन एक विशिष्ट रंगमंचीय भाव-क्षेत्र रचैत अछि जाहिमे विषाद आ उत्साह एकहि संग उपस्थित छथि। वांग ‘यू-वो-झी-चिंग’ (landscape-with-subject) कहैत छलाह-जाहिमे रचनाकारक भाव स्वयं सृष्टिमे विलीन भ’ जाइत अछि। एहि नाटकमे लेखकक मैथिली-कलाकारत्वक संकटक प्रति प्रेम ओहिना संग्रह-रूपमे व्यक्त होइत अछि। ५. इजरायली नाट्य-सिद्धांत ५.१ एली रोज़िक : प्रतिमा-सिद्धांत (Theatrical Iconicity) इजरायली नाट्य-विद्वान एली रोज़िक (Eli Rozik, जन्म १९३४) अपन ग्रन्थ ‘थिएट्रिकल इमेज’ (Theatrical Image) आ बाद’क लेखनमे एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत प्रस्तुत कएलनि- रंगमंचक मूल इकाई ‘प्रतिमा’ (iconic image) थिक, ने पाठ आ ने कथा। अभिनेताक शरीर-स्वर-क्रिया एक काल्पनिक संसारक ‘प्रतिमा’ (icon, Peirce-अर्थमे) सृजित करैत अछि- नाटक ई प्रतिमा-प्रणाली थिक। एहि नाटकमे रोजिकक सिद्धांतक एक विशेष आयाम थिक- भाँट-प्रतिमा। तीन भाँट मंच पर जे छवि उत्पन्न करैत छथि, ओ मात्र ‘तीन व्यक्ति’क प्रतिनिधित्व नहि, अपितु ‘मरैत भाँट-परम्परा’क समग्र रूपमे एक प्रतिमा थिक। रोजिक कहलनि जे प्रतिमा ‘symbolic’ (प्रतीक) नहि, ‘iconic’ (प्रतिरूप) होइत अछि- ओ अपन संकेतित विषय-वस्तुसँ समानता (resemblance) आधारित सम्बन्ध रखैत अछि। भाँट अपना कलाक ह्रासकेँ ‘देखाबैत’ छथि- ई देखाएब प्रतिमा थिक। नाटककेँ अपने विषय बनाएब- जखन भाँट निर्णय लैत छथि जे ‘नाटक करब’-एतय रोजिकक ‘थिएटर-अबाउट-थिएटर’ (theatre about theatre) सिद्धांत लागू होइत अछि। रंगमंच अपन माध्यमकेँ विषय बनबैत अछि- ई एक उत्कृष्ट ‘प्रतिमात्मक आत्म-प्रतिफलन’ (iconic self-reflexion) थिक। ५.२ शिमोन लेवी : पुरालेख-रंगमंच इजरायली नाट्य-विद्वान शिमोन लेवी (Shimon Levy, १९३९–2०१७) अपन अनेक ग्रन्थमे ओहि नाट्य-कार्यकेँ रेखांकित कएलनि जाहिमे रंगमंच एक ‘सांस्कृतिक पुरालेख’ (cultural archive) बनैत अछि- ओहि परम्परा, स्मृति आ अभ्यासक जीवित संग्रहस्थल जे अन्यथा विस्मृत भ’ जैत। लेवीक परिप्रेक्ष्यमे, रंगमंच मात्र ‘वर्तमानक घटना’ नहि, अपितु ‘अतीतक स्मृतिक प्रदर्शन’ (performance of remembered past) सेहो थिक। एहि नाटकमे भाँट-परम्परा- जे मिथिलाक यशोगायक कुलक शताब्दी-पुरान जीविका-परम्परा थिक-अपन ह्रास-क्षणकेँ रंगमंच पर ‘पुरालेखित’ करैत अछि। दर्शक जे देखैत छथि, ओ भाँटक एक ‘जीवित-मृत्यु-क्षण’क प्रतिमा थिक। एहि नाटकक मंचन (पटना, १९९३) भाँट-परम्पराक एक जीवित नमूना संरक्षित करैत अछि- भलेँ भाँट मंच पर विलाप कर’ रहल होथि। ५.३ हिब्रू रंगमंचक भाषा-पुनरुद्धार-समानांतर इजरायली रंगमंचक इतिहासक सब सँ महत्त्वपूर्ण आयाममे एक थिक-हिब्रू भाषाकेँ जीवित रंगमंचक माध्यम बनाएब। ‘हबीमा’ (Habima, मास्को, १९१७; बादमे इजरायलक राष्ट्रीय रंगमंच) हिब्रू भाषामे प्रयोग करैत एक मृत-प्रायः भाषाकेँ नाट्य-भाषाक रूपमे पुनर्स्थापित कएलक। कुणालक नाटक आ ‘भंगिमा’ रंगमण्डलीक पटना-मंचन (१९९३) एकर समानांतर थिक। हिन्दी-प्रभुत्ववला पटनाक सांस्कृतिक वातावरणमे मैथिलीमे नाट्य-प्रस्तुति एक भाषा-राजनीतिक कार्य थिक- मैथिलीकेँ ‘बोलीमात्र’ नहि, एक ‘रंगमंच-योग्य’, ‘दर्शक-योग्य’, ‘साहित्यिक भाषा’क रूपमे प्रतिष्ठित करबाक सांस्कृतिक-राजनीतिक प्रयास। एहि दृष्टिसँ भंगिमाक भूमिका हबीमाक भूमिकासँ सादृश्य रखैत अछि। ५.४ साक्षी-रंगमंच (Witness Theatre) : गमछाक अर्थनीति इजरायली नाट्य-परम्परामे ‘साक्षी-रंगमंच’ (Witness Theatre / עדותएदुत) एक महत्त्वपूर्ण विधा बनल-जाहिमे रंगमंच एक कठोर सामाजिक यथार्थक ‘गवाह’ बनैत अछि आ दर्शककेँ ओहि यथार्थक प्रति उत्तरदायी बनाबैत अछि। नाटकक अंतिम गमछा-प्रसंग-जाहिमे भाँट लोकनि स्पष्ट रूपसँ कहैत छथि जे “हमरा लोकनिक पेट तखने भरत जखन दर्शकगण कृपा करताह”-एक ‘साक्षी-क्षण’ थिक। ई रंगमंचक आर्थिक भेद्यताकेँ (economic vulnerability of performing artists) सार्वजनिक करैत अछि आ दर्शककेँ ‘गवाह’ बनबैत छथि। ई क्षण मात्र हास्य नहि-एहिमे कला-जीवनक एक कठोर सत्यक स्वीकृति अछि। एहि दृष्टिसँ देखला पर नाटकक अंत एक ‘राजनीतिक कार्य’ बनि जाइत अछि- दर्शककेँ ‘साक्षी’ बनेबाक आ उत्तरदायित्वक ‘आमंत्रण’। ६. चतुर्भुज-संश्लेषण : एक तुलनात्मक मूल्यांकन चारू परम्पराक आलोककेँ एक साथ धरि राखि देखी तँ ‘चालिस चोर आ गोनू झा’ एक बहुस्तरीय रचना थिक-ओ समान रूपसँ भारतीय रस-वक्रोक्ति, ब्रेख्तीय विरचन-प्रभाव, चीनी श्यू-शी, आ इजरायली साक्षी-रंगमंचक मानदण्ड पर उत्तीर्ण होइत अछि। भारतीय दृष्टि-हास्य + वीर रसक असाधारण मिश्रण; विदूषक-परम्पराक लोक-रूपान्तरण; ध्वनि-सिद्धांत द्वारा ‘बुद्धि’ शब्दक अर्थ-विस्तार। पाश्चात्य दृष्टि-परिपूर्ण ब्रेख्तीय ‘एपिक थिएटर’; मेटाथिएटरक क्लासिक उदाहरण; बाख्तिनीय कार्निवालेस्क। चीनी दृष्टि-चोउ-पात्र-प्रकारसँ भाँटक उत्कृष्ट साम्य; श्यू-शी सौन्दर्य-दर्शन; यी-चिंगक विषाद-उल्लास संयोग। इजरायली दृष्टि-रोजिकक प्रतिमात्मक आत्म-प्रतिफलन; लेवीक पुरालेख-रंगमंच; हबीमा-सादृश भाषा-राजनीति; गमछाक साक्षी-क्षण। चारू परम्पराक एक साझा निष्कर्ष अछि- यएह नाटक मात्र ‘गोनू झाक खिस्सा’ नहि, अपितु ‘रंगमंचक खिस्सा’ थिक- ओकर संकट, ओकर अर्थनीति, ओकर जीवन-शक्ति, आ ओकर सामाजिक कर्तव्यक कथा। एहि अर्थमे ई नाटक एक नाट्य-घोषणापत्र (theatrical manifesto) सेहो थिक- जे ‘बुद्धि’केँ, लोक-कलाकारक हास्य-तर्ककेँ, समस्त बाधाओंक विरुद्ध ठाढ़ होएबाक शक्ति घोषित करैत अछि। अगिला अंकमे : बिदापत [सैद्धांतिक विवेचन लेल देखू- मैथिली समीक्षाशास्त्र- गजेन्द्र ठाकुर] अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। पद्य Poetry ३.१. तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम'] मूल तेलुगु: नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव) मैथिली अनुवाद: मानेश्वर मनुज [खण्ड ५] ३.२. आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल ३.३. अशोक कुमार ठाकुर- माँ/ कोना फसौले तू अपन जाल मे ३.४. जगदानन्द झा "मनु"- २ टा गजल ३.५. संतोष कुमार राय 'बटोही'- हम फेर नहि भेटबैन्ह ३.६. प्रणव कुमार झा- तेलचट्टा के जिनगी जिबैत लोक ३.७. राम शंकर झा "मैथिल"- स्मृति शेष (भाग-०८) अधिकची निन/ डबरा ३.८. सुभाष कुमार कामत- जनगणना ३.९. रबीन्द्र नारायण मिश्र- स्त्रीक अधिकार ३.१०. झौली पासवान- अगराहीक घनछोहा ३.१. तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम'] मूल तेलुगु: नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव) मैथिली अनुवाद: मानेश्वर मनुज [खण्ड ५] तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम' केर लेखक छथि नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव)] मूल तेलुगु लेखक नग्नमुनि एक परिचय नाम: मानेपल्लि हृषीकेशवराव जन्म: 15 मई 1940 जन्म स्थान: शहर- तेनाली, जिला- गुंटूर (आंध्र प्रदेश) वृत्ति: चीफ ऑडिटर, आंध्र प्रदेश विधान सभा, तकर बाद डिप्टी सेक्रेटरी, ओतहि लिंक: पहिने साम्यवादी (कम्युनिस्ट), बादमे राष्ट्रवादी (नेशनलिस्ट) संस्था: अविभाज्यक जनतंत्र, 1990 आंदोलन: दिगम्बर कविता आन्दोलन 1965 लक्ष्य: नंगट, भूखल, दीन, दरिद्रक हित कृति: उदयिंचनि उदयलु (ओ उदय जे उदित नहि भेल) पूर्वा हवा जम्मि चेट्ट विशेष: 1977 ई. मे बहुचर्चित काव्य- 'कोय्या गुर्रम' (KOYA-GURRAM), जकर अर्थ अछि- 'काठक घोड़ा', भाव- 'नकली सरकार'। 19 नवम्बर 1977, शनि दिन बंगालक खाड़ीमे पचास-साठि फुट ऊँच लहड़ि उमड़ि कऽ कृष्णा जिलाक दिविसीमा क्षेत्रकेँ डुबा कऽ नष्ट कऽ देलक। हजारो लोक मारल गेलाह। ई घटना काव्यक वस्तु बनल। विषय आ परिस्थितिसँ उपजल ई काव्य हिन्दी कवि मुक्तिबोधक 'अंधेरे में' क बराबरीक अछि। मैथिली अनुवादक नाम: मानेश्वर मनुज जन्म: गाम- गम्हरिया (बेनीपट्टी) मधुबनी। जनवरी 1958 (प्रमाण पत्रक अनुसार)। वृत्ति: भारतीय नौसेनामे तकनीकी सहायक, तकर बाद भारतीय रेलक वाणिज्य विभाग सँ (रिटायर्ड)। कृति: 'सम्बन्ध', कथा संग्रह (मैथिली) 2007 'कि', कविता संग्रह (मैथिली) 2011 'परिवर्तन', कहानी संग्रह (हिन्दी) 2019 'बेघर', कविता संग्रह (हिन्दी) 2022 'तालाब', कहानी संग्रह (हिन्दी) 2024 अनुभव: विभिन्न भाषा सँ हिन्दी आ मैथिलीमे अनुवाद। हिन्दी आ मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिकामे लेख, कविता, कथा, कहानी इत्यादि प्रकाशित। अनुवादकक टिप्पणी: अनेक तेलुगुमित्र, स्वयं नग्नमुनि जी, हिन्दी तथा अंग्रेजी मे अनुदित पुस्तकक मदति सँ दीर्घ काल तक मंथन कयलाक बाद अनुवाद कयल गेल अछि। ई नग्नमुनिक प्रसिद्ध कविता अछि। नग्नमुनि सँ लगातार हमर पत्राचार होइत छल। ओ अंग्रेजी आ तेलुगुक विद्वान छलथि। हुनक किछु पत्र देसिल-बयना, हैदराबाद मे छपल अछि। -मानेश्वर मनुज सम्पादकीय टिप्पणी (खण्ड-५) खण्ड ५ कविक गहन सामाजिक चेतना आ तीक्ष्ण व्यंग्यक जीवंत दस्तावेज छी। कविताक आरंभ धार्मिक-सामाजिक संस्थानसभक बाह्य आडंबर सँ होइत अछि- जिनिवा शांति सम्मेलन, मंदिर-मस्जिदक कर्मकांड, अन्नदान। मुदा एहि सभक बीच विसंगति ई जे शांतिक प्रतीक पड़बा अंततः बिलाड़िक शिकार बनैत अछि, आ क्षुधा ठठाकऽ हँसैत अछि। "भूख बगावत कऽ बैसाए" आ "ट्रिगर दवऽवऽला आँगुर" सन पंक्ति सत्ता आ हिंसाक अंतर्संबंध केँ उद्घाटित करैत अछि। कवि स्वयंकें "हत्यारा पहिचानऽ मे माहिर" बतबैत मुदा दोख प्रकृति पर मढ़ि देबाक प्रवृत्ति पर चोट करैत छथि। ई आत्म-व्यंग्य नहि, अपितु समाजक सामूहिक पाखंड पर प्रहार अछि। "समुद्रक नोनगर पानि" सँ जीवनराशिक गड़दनि ममोड़ि देबाक क्षमताक उल्लेख, पेट्रोल बिना भस्म करबाक संकेत- ई आधुनिक विकासक विनाशकारी स्वरूप केँ रेखांकित करैत अछि। "दीन-हीन-दरिद्रक लाशक ढेरी" सन शब्द-चित्र अत्यंत हृदयविदारक अछि। "शव कैफियत मांगि नहि सकतै"—ई एक पंक्ति न्याय-व्यवस्था, मानवाधिकार आ संवेदना पर प्रश्नचिन्ह लगा दैत अछि। गामक चित्र, हरियर खेत, उड़ैत चिड़ै-चुनमुन, स्नेह-प्रेमक अनुराग, एकटा हेराएल स्वर्गक स्मृति छी जे समकालीन विनाशक विपरीत ठाढ़ अछि। "कालचक्र केँ लाजो नहि, इतिहास केँ दया नहि" कहि कवि नियति आ सत्ता दुनूक निर्ममता पर अंतिम मोहर लगबैत छथि। अनुवाद: मैथिलीक लोक-रंग आ आंचलिक शब्दावली (जेना- बिलाड़ि, ठठाकऽ, गड़दनि, हकमैत, ढेरी आदि) अनूदित कविता केँ जमीन सँ जोड़ने रखैत अछि आ अभिव्यक्ति केँ अद्भुत तीव्रता प्रदान करैत अछि। ई खण्ड एकटा दार्शनिक अभियोग-पत्र अछि- विकास, धर्म, राजनीति आ मानवीय संवेदनाक नाम पर होइत ढोंगक विरुद्ध। कवि निराश नहि, अपितु अत्यंत सचेत आ जागरूक नागरिकक रूप मे पाठक केँ झमारैत छथि। - गजेन्द्र ठाकुर नग्नमुनिक तेलुगु काव्य 'काठक घोड़ा' (कोया गुर्रम) खण्ड-५ ५ जेनीवा मे शांति सम्मेलन होइत छै मंदिर मे भजन-पूजन होइत छै धर्मशाला मे अन्नदान होइत छै मस्जिद मे नमाजक थौर-दौर चलैत छै अनेक भाषाक भूत-प्रेत्य सस्वर वेद मंत्रक पाठ करैत अछि आकाश मे जे शांति कबूतर उड़ाओल जाइत अछि ओ अंत मे बिलाड़िक शिकार बनैत अछि भजन-पूजन आ अन्नदानक रंग-ढंग देखि कऽ क्षुधा ठठाकऽ हँसि पड़ैत अछि। यदि भूख बगावत कऽ बैसाए तँ ओकरा काबू मे कऽ लेब भरल पेटवला केँ नीक जकाँ बुझल छैक ट्रिगर (बंदूकक) दवऽवऽवला आँगुर केँ बुझल छै कि दमदार गोली कोन करेजा केँ छेद देलक। हमरा बुझल अछि- असली हत्यारा के? कवि छी आ पहिचानऽ मे माहिर छी तँ थोड़ेक देरी काल पर दोख मढ़ि दैत छी। रंग-बिरंग कपड़ा सँ सुसज्जित, सुन्दर नागरिकता आब नंगापन दिस भागि रहल अछि केवरे नृत्य देखऽवला मैल आँखिमे छुपक प्रयास ओ कऽ रहल अछि ओतौ क्षुधा आ व्यथा छै फराक-फराक रूप मे ओ मनुजक शिकार कऽ रहल अछि जीवनक ढलान मे खाधिए खाधि अछि सरिपों लोक जी नहि रहल छथि जिनगी सँ मुँह मोड़ि भागि रहल छथि सम्पूर्ण विश्व दूर-बहुत दूर भागि रहल थिक थाकल-हारल, हकमैत कुहरैत बुझू कोनो हाथ तलवार लऽ खेहारि रहल छै मनुक्ख केँ प्राण हरण करऽलाए तलवारक जरूरति नहि छैक जिनगी केँ तहस-नहस करऽ लाए तोप आ बंदूकक सेहो जरूरत नहि छै दिन दुन्ना, राति-चौगुन्ना तरक्की करैत हँसैत-खेलैत रोशनीक किरण के छिड़अबैत सहस्रदल वला कुसुम सन जीवन केँ जरा कऽ भस्म कऽ देवऽ लाए पेट्रोलक जरूरत नहि ओकरा लेल समुद्रक नोनगर जल प्रयाप्त छै। प्यास मिटा कऽ प्राणक रक्षा करक काबिल नहि समुद्रक नोनगर पानि जीवनराशिक गड़दनि ममोड़ऽ मे सक्षम अछि मनुजक अत्याचार आ प्रकृतिक प्रलय केँ शिकार बनि कऽ टूटि जाए वला हड्डी दीन-हीन-दरिद्र, अभागले लोकक तँ छनि ढेड़ीक-ढेड़ी पड़ल काया हुनके लोकनिक छनि भले ही हेलीकॉप्टर मे बैस कऽ देखाए या अखबार सबहक नोर वहाएब मे देखाए पैघ पगड़ीक दोग सँ देखाए या लऽग जाए कऽ लाश केँ हिला-हिला कऽ देखाए छलकपट छोड़ि त्यागक मुद्र मे देखाए सबठाम एक्के दृश्य देखाई दैत छै ओ छै, उफान परक विषाद, उमड़ैत मौन शोक। तैओ चिन्ताक कोनो बात नहि कियाक कि शव कैफियत मांगि नहि सकतै। ईसा-मसीह केँ बुझल छलनि कि अंतिम आमंत्रण मे आखिर हुनका धोखा देवऽवला के छलनि? हमरो बुझल अछि जे असली हत्यारा के? मुदा थम्हि जाउ ओ दोख प्रकृति पर मढ़ि दैत छी। एक समय एतऽ एक गाम बसल छलै हरियर-हरियर, फलल-फूलल एतुक्का हवा, एतुक्का माटि तथा एतुक्का गमक मे राग-रंग, हँसी-खुशी वा स्नेह-प्रेमक अनुराग छलै गाछक पात हरियर हवा मे हेलैत छलै डाँरि पाड़ि उड़ैत छलै चिड़ै-चुनमुन, सुन्दर सन! डारि पर बैस कऽ पाँखि सहलबैत छल लोल सँ काना-फुसकी करैत, फेर चहचहाइत उड़ि जाइत ताहि समय ओतुक्का खेत सोना उगलैत छल हरियर-हरियल फसिल थिरकैत नचैत छल कालचक्र केँ लाजो नहि इतिहास केँ दया नहि सृष्टि केँ रतिओ भरि दुःख नहि समाज केँ परवाह नहि। कमजोर आ परिश्रमी लोक संपतिक शृजन करैत छथि मजगूत आ चालाक लोक ओकरा गटकि, दरिद्र सब मे बँटैत अछि इतिहासक सब पन्ना मे दीन-हीन-दरिद्रक लाशक ढेड़ी लागल छै। -मानेश्वर मनुज आदर्श नगर कॉलोनी गोशाला रोड मधुबनी पिन - 847211 मो. - 9920674861 / 7464077106 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.२. आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल आशीष अनचिन्हार २ टा गजल
१
खाली जेबी लोक लग छुच्छे थारी लोक लग
दिन दुपहरिया हम कहब रातुक पारी लोक लग
सिस्टम सेहो चुप रहल सिस्टमशाली लोक लग
किम्हर गेलै फूल सभ छै फुलडाली लोक लग
ई सभ बुझलक अंतमे संकट भारी लोक लग
सभ पाँतिमे 22-22-212 मात्राक्रम अछि।
२
गतिहत संगत झंझट डेरा मतिहत पंगत अगबे फेरा
अपने पुरखा कहने रहथिन करनी जनिअह मरनी बेरा
एना मरतै आलू कोबी ओना मरतै झिमनी घेरा
बहुते नखरा राँगल जंतुक शेरक मुद्रा बैसल शेरा
एकै पेटक तीनू संतति सरदर तख्ता खुहरी चेरा
सभ पाँतिमे 22-22-22-22 मात्राक्रम अछि। ई बहरे मीर अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.३. अशोक कुमार ठाकुर- माँ/ कोना फसौले तू अपन जाल में अशोक कुमार ठाकुर माँ/ कोना फसौले तू अपन जाल मे १ माँ
माँ अहाँ बिन हम नई रहब अहीं मन के भावैई छी, आँचर तर माँ दूध पिया क छाती सॅऽ लगाबई छी।। हम अहाँ मन के पैईढ़ नई पावी, अहाँ हमर कवयित्री छी, माँ अहाँ हमर प्रेम,प्यार,स्नेह, लगाव,अनुराग छी। माँ अहाँ बिन हम नई रहब अहीं मन के भावैई छी, आँचर तर माँ दूध पिया क छाती सॅऽ लगाबई छी।।
माँ अहाँ सुती भुईया में, हमरा आँचर पर सुताबई छी, माँ अहाँ माँये टा नई छी, भगवानो सॅ ऊपर आबई छी। वासी आँगन में नंगा पाँव, अंगुली पकईर घुमावई छी, माँ अहाँआँगन टा नई तीनो लोक भ्रमण करावई छी। माँ अहाँ बिन हम नई रहब अहीं मन के भावैई छी, आँचर तर माँ दूध पिया क छाती सॅऽ लगाबई छी।।
माँ कोईली सॅ मधुर स्वर में, जखन लोड़ी सुनावई छी, माँ व रस,भेटत कत शहद चटलों पर नहि पावई छी।। हमरा खातिर माँ कतेक कष्टमय जीवन बिताबई छी, माँ के हम पोसल-पालल माँ पर नई लिख पावई छी।। माँ अहाँ बिन हम नई रहब अहीं मन के भावैई छी, आँचर तर माँ दूध पिया क छाती सॅऽ लगाबई छी।। २ कोना फसौले तू अपन जाल मे कोना फसौले तू अपन जाल मे, गे गोरिया कोना फसौले तू अपन जाल मे, उमर सोलहे शाल मे ना। गे गोरिया कोना फसौले तू अपन जाल मे, उमर सोलहे शाल मे ना।। गे दिखा क रसगर मधुगर ठोर, तूँ खिंचले हमरा अपना ओर। गे गजबे जादू भरल छऊ तोहर मुस्कान मे, उमर सोलहे शाल मे ना।। रे तूँ त लागई छै बेजोर, बईन जों हमर चितचोर। रे हमरा सन नई भेटतौ,तोरा अहि जहान मे, उमर सोलहे शाल मे ना।। गे तोहर लाल गुलाबी गाल, ताहिपर तिलवा करौ कमाल। गे गोरिया कोना घुमेबऊ हम तोरा नैनीताल मे, उमर सोलहे शाल मे ना।। रे हमर देख क मोड़नी सन चाल, कतेक छोड़ा भेलई वेहाल। रे बिजुली गिरा देबई हम जाक वीच पंडाल मे, उमर सोलहे शाल मे ना।। गे हम नई जानई छी प्रेम रीत, आई तक भेल नई ककरो जीत। गे सबटा बिसईर जेबे तू ,जाक ससुराल मे, उमर सोलहे शाल मे ना।। रे अशोक प्रेमी लिखई गीत, रे जॅ हेतै एहन अनुचित, खाई छिऊ कसम धरती अम्बर के बीच। रे खुद के मिटा देबई हम जा कऽ ससुराल मे, उमर सोलहे शाल मे ना।। गे गोरिया कोना फसौले तू अपन जाल मे, उमर सोलहे शाल मे ना। गे गोरिया कोना फसौले तू अपन जाल मे, उमर सोलहे शाल मे ना।। -अशोक कुमार ठाकुर ग्राम - करमौली, जिला:-मधुबनी(बिहार), मोबाइल नंबर:-9576207983, जनसेवा:-एस.डी.आर.एफ. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.४. जगदानन्द झा "मनु"- २ टा गजल जगदानन्द झा "मनु" २टा गजल १ सजल कन्हाइ रूपक रस बहाबैए हरिक ई रूप दुनियाकेँ रिझाबैए मुकुटपर पैंख मोरक मोहनी सोहै हियामे रस सिनेहक ई जगाबैए जखन बाजै मधुर मुरली मुरारीकेँ तखन ई संग राधाकेँ नचाबैए सलोना श्याम हे चितचोर मोहन छी करेजक चैन ई गोपिक चुराबैए मनोहर रूप ‘मनु’ ई देख कान्हाकेँ चरणमे शीश अप्पन आ झुकाबैए (बहरे हजज, मात्राक्रम 1222-1222-1222) २ ई संसार अछि खाली बसेरा बुझि क आयब भाइ लेलहुँ जन्म जगमे एक दिन सभ छोरि जायब भाइ साँसक डोर टूटत दूर तखने सभ भ जायत भाइ माटिक मूरती ई देह सुख कोना क पायब भाइ हरिकेँ नाम जगमे जे भजत फल ओ तँ पायत भाइ धन-बल मोहमे जीवन कते आरो गमायब भाइ जायत संग कृत टा तुच्छ बाँकी सब कहायत भाइ काल्हिक अछि ककर जगमे भरोसा की बसायब भाइ सत अछि ‘मनु’ कहै जगमे कतय हरि छोरि जायब भाइ माया सभसँ रहि बड़ दूर हरि हरि मनसँ गायब भाइ (बहरे रूप, मात्राक्रम 2221-2221-2221-2221) -जगदानन्द झा ‘मनु’, मो० न० +९१ ९२१२-४६-१००६ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.५. संतोष कुमार राय 'बटोही'- हम फेर नहि भेटबैन्ह संतोष कुमार राय 'बटोही' हम फेर नहि भेटबैन्ह
जिनगी फुँही जकाँ बरीश जाएत छै । ठिठुरैत ई दुनियाक आवोहवा बड़ गहनैत छै आब नाक आओर फेफड़ा फाटि जाएत छै । हक्कन कनैत आँखि पाथर होयत ओकर करेज मसुआइत हमर दिल गिन रहल अछि अपन अवसानक दिवस हम फेर नहि भेटबैन्ह जखन करेज मे आगि लगतैन्ह हुनका सचक आगि नहि बुझायत छै । आइ हम मुआयल छी अपन अंतर्मन मे अंतर्द्वन्द्व मे सभ बन्न भऽ गेल छै अर्पण-तर्पण ! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.६. प्रणव कुमार झा- तेलचट्टा के जिनगी जिबैत लोक प्रणव कुमार झा तेलचट्टा* के जिनगी जिबैत लोक
हम देखैत छी सगर रोज, तेलचट्टा के जिनगी जिबैत लोक रासन के, भाषण के, कथित सुशासन के लाइन मे लगैत लोक परीक्षा परिणाम लेल, रोजगार लेल, लाठी खाइत छाती पिटैत लोक हम देखैत छी सगर रोज, तेलचट्टा के जिनगी जिबैत लोक।
सड़कक गड्ढा मे, हत्ता मे, अवैध नाव पर डूबि मरैत लोक दूषित पानि पीबि, तड़पैत, प्राण छोड़इत ‘घंटा’ खबर बनैत लोक मिलावटी, भोजन, मिलावटी दवाई के सेवन से दम तोड़इत लोक हम देखैत छी सगर रोज, तेलचट्टा के जिनगी जिबैत लोक।
मेला के, ठेला के क्रिकेट, सिनेमा के भीड़ मे पिचाइत, दबैत लोक रेलक गाड़ी, बसक सवारी मे, जड़इत, मरइत, बचैत गाम पहुंचइत लोक ढोंगी मुल्ला-बाबा के दरबार मे, तन-मन-धन खपत करैत लोक पेट पर लात खाइत, कर्मक लेख बुझि सब सहन करैत लोक हम देखैत छी सगर रोज, तेलचट्टा के जिनगी जिबैत लोक।
रिल्स के नशा मे नचनियाँ पर लाइक कमेन्ट करैत लोक पाँच किलो अनाजक झोरा लय, सगरो जग ढ़ोल पिटैत लोक जाम मे फसैत, टॉक्सिक वर्ककल्चर से खिसियैल घर घुरइत लोक नगरक दूषित हवा मे चैन केर सांस लेल हाँफैत लोक हम देखैत छी सगर रोज, तेलचट्टा के जिनगी जिबैत लोक
बच्चा के भविष्य बेचि, मंचक मदारी लेल ताली पिटैत लोक गाँव मे लगल होई आगि, मुदा अपन घर मे सुरक्षित सुतैत लोक अन्याय देखि आंखि मुनिने, हमरा की लेब-देब कहि बचैत लोक रौशनी से मतलब नै रखलक, गंद अनहरियाके जिनगी बुझैत लोक हम देखैत छी सगर रोज, तेलचट्टा के जिनगी जिबैत लोक।
*सनकिरबा -प्रणव कुमार झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.७. राम शंकर झा "मैथिल"- स्मृति शेष (भाग-०८) अधिकची निन/ डबरा राम शंकर झा "मैथिल" स्मृति शेष (भाग-०८) अधिकची निन/ डबरा १ स्मृति शेष (भाग-०८) अधिकची निन
अधिकची निन मे छलहूँ कनियां!कनियां सुनैत छि आई जन्माष्टमी अछि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी तें आई सिधहा नहिं निकाललहूँ अछि टाअट परका पोरो आ साग नहिं कटलहूँ अछि आई घर मे सब गोटे उपवास करब न......? अधिकची निन मे छलहूँ..! आँखि खुजी गेल बाअ आँगन निपैत बाजैत छलीह बड़की माअ बाउ कें लेल जलखैय तअ बनत हअम आँखि मिरैत बजलहूँ हमहूँ उपवास करब "बाअ"जोर सँ बजलीह बाउ कें दूध मखान खुवाउ "बाअ"दौड़क एअलिह नहिं बाउ उपवास अंहाँ नहिं गायक गोबर हाथ लागल अपन आंचरक खुट सँ हअमर दुनू डोका सनक नयन कें पोछैईथ बजलीह पुरुख उपवास नहिं करैत छैथि कनियां धिया करतीह अधिकची निन मे छलहूँ..! हअम विस्मित भए बजलहूँ से कियाअक.....? पुरुख आ धिया कनियां मे कोउन अंतर अछि....? "बाअ"हअमर मुँह पोछैईथ बजलीह अंहाँ पहिले उठु तअ हअम हड़बड़ी मे बाजि उठलहुँ ज्यों घर मे कनियां बड़की माअ उपवास करतीह हअम कियाक नहिं "बाअ"कनियां धिया कें उपवासक फल पूरखो कें भेटैत अछि अधिकची निन मे छलहूँ..! हअम किंकर्तव्य विमूढ़ छलहूँ स्त्रीक समर्पण आ कर्म भाव एहि भौतिक जगत स्त्री कें सब काज पुरुख कें समर्पित अछि मुदा ओहि अलौकिक जगतो मे स्त्रीक पुण्य पुरुखे कें भेटअत...? तखन कौनो पुरुख आ मनसा कोना काए मोंछ टेरैत छैथि अधिकची निन मे छलहूँ...! आई फेर आँखि खुजल ठाकुरवाड़ी सँ आबाज आबि रहल हाथी घोड़ा पालकी जय जय कन्हैयालाल की...... चाअर कें कोरो मे लटकल बाअक घिसाअल फोटो झूलैथ बस एकटक हुनका निहारैत निहारैत आई फेर उपवास अछि मुदा "बाअ"नहिं छैथि बस हुनकर.. स्मृति... अधिकची निन मे छलहूँ.. स्मृति शेष स्मृति शेष......!! २ डबरा
ठमकल जमकल सरल हअम डबरा छि...! गेनहायत महकैत करिछियौन हअम डबरा छि..! सगरों टोलक सगरों गामक धोईन मांअर बारैन सोहारैन अपन उदर मे ठुसँने हअम डबरा छि..! चाहे सोयरी घरक जनमौटी सअर समांगक जनमलक टट्टी हअमरा मुँह मे ठुसल गेल चाहे नीक भेटल चाहे बेजाअ अँखि बन्न लैत गेलहूँ कियाक कि हअम डबरा छि..! दोगे दोग गतर गतर गोहे गोहे करिया झामंर भेलहूँ अपन मुँह देह झाँपि लैत छलहूँ हरियर पात कुमहीं सङ्ग करमी मुदा ह्रदय जुराईत छल अपन सर समाज पाहून पुरुख घर आँगना खेत सँ खारिहान चिकन चुनमुन झळकैत हअमरे बदौळत सदिखन हअम डबरा छि..! फरिक दियाअद जोन बोन कहैत छल बहुरु काअ कें डबरा भिगो बाबाक डबरा तेलिया मन्याँक डबरा मरनी माअक डबरा जानि नहिं कतेक नाम कोन कोन पहचान ऐका पअर एक उपाधि सँ अलंकृत शोभित होईत हअम डबरा छि..! कतेको बेर पड़ल अकाल मरुआक बिया तकर डिभी कियारीये कियारी भरल पुरल तरकारीक गाछ सङ्ग मिर्चाय हमरे पईन सँ पटाओळ जाईत वज्रसन रौदी वरखा नहिं आस तखनहुँ भरैत खेत खरिहान अपने सन कारि कारि मरुआ मरुआक रोटी सङ्ग मिर्चाय घर घराअन सङ्गहिं सर कुटुंब सब कियौ करैथ भरि पेट लबान हअम डबरा छि..! कि कि कहु कि कि सुनाउ भरि जीवन भरल जुआनी जकर जकर गुरु-नुर हग पाद अपन उदर सम्माहरलहुँ अपन समांग धिया-पुता बुझि ने कोनो मान आ नहिं अपमान बुझलहूँ भरि भरि वरख अपन ओद भरि भरि डांअर भरि भरि छाति पईन-जल भरि कोख रखलहूँ पताल भू-जल भरल रहाय हअम डबरा छि..! बेर कुबेर चूल्हा सँ निकलल आगि धह-धह जरैत गामक गाम अगिळगी सँ बताह अपसिँआत हमरे सरलाहा महकल पईन सँ कियौ अपन गोसाँई घर मिझाबैय कियौ भगवतीक आंचर बचाबैय कियौ बाबा डीहबार पर झोँकाअ कियौ अपन ठाकुरबाड़ी बचाबैय हअम डबरा छि..! कतेको दिन राति दलाने दलान हमरे किस्सा हमरे पिहानी सबहक मुँह एकहिं जुबान आय ज्यों ई नहिं रहिंता डबरा नहिं बचिंता ई गाम घर नहिं बचिंता ई गामक डीहबार हअम डबरा छि..! कि सब कहु कि सब सुनाउ भरि टोल कि भरि गाम हेंजक हेंज लोक सङ्ग कौआ, मैना,चिंराई-चुनमुनी कतेको दिन कतेको मास मामूर, कबैय सङ्ग गरैय चखना तरकारी करैथ जलखैय किछ हाट किछु बाट बिकाअ बढ़ शान सँ बढ़ गुमाअन सँ लोक बाजैथ ई मांछ फलांह बाबाक अपन पहचान सँ अपन मान सँ हमहूँ करैत छलहूँ गुमाअन मुदा आब अपनहिं सर समांग हअमरा छाति चढि मर-मराबैत ढ़ाकिये ढ़ाकि छिठे छिठा मारि मुंगरी मारि कोदाईरक पसाठ भरि भरि टेलर मांटिक प्रसाद हअमर जुआनी हअमर जीवनक इति श्री कथा मे समेटैथ हअम डबरा छि..! लबका नाम भेटल बौआ डीह सोनदाय भराठ मिथिला रिसोर्ट हअमर स्तित्व हअमर पहचानक सदिखन कें लेल सुध-श्राद्ध हअमरे छाति बैसि भरि गाम भरि टोल खाईथ खुआबैथ भोज सङ्ग बरात आ ताहि पअर करैत सर समांग सङ्ग नागिन डांस हअमर नोर हअमर व्यथा कें सुनत ककरा सुनाबि हअम डबरा छि..! भरळ जुआनी हअम मारल गेलहूँ मुदा एखनहुँ हअमर टीस ज्यों भूजल नहिं बांचत ज्यों किड़ा-मकोड़ा चाली सितुआ नहिं बांचत ज्यों भांति-भांति कें जैव विविधता नहिं बांचत कोना कए लोक देताह आशीष शतम जीवु शतम जीवु हअम डबरा छि..! हअम डबरा छि..!! -राम शंकर झा "मैथिल", उघरा, दरभंगा, मो-7970778787, Mail- jharam1977@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.८. सुभाष कुमार कामत- जनगणना सुभाष कुमार कामत जनगणना
रहूं देशक कोनों कोण मे भारतक जनगणना 2027कें याद राखब मोन मे जनगणनाक थीम थीक जनगणना सं जनकल्याण तक
विकास आओर प्रगति अहाँ सँ पूछताह ३३ टा प्रश्न
घर सॅं संबंधित ७ टा परिवार सॅं संबंधित ८ टा घरक बुनियादी सँ संबंधित १० टा घरेलू उपकरण सँ संबंधित ८ टा
सभटा प्रश्नक देबै अहाँ निसंकोच जबाब जुनि घबराबि गुप्त राखल जाएत अहाँ के सभटा जबाब
भारतक जनगणना २०२७ के याद राखब मोन मे। विकास आओर प्रगतिक करबै सहयोग खूब मोन सँ
-सुभाष कुमार कामत, उच्च माध्यमिक विद्यालय नौआबाखर (हटनी) घोघरडीहा अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.९. रबीन्द्र नारायण मिश्र- स्त्रीक अधिकार रबीन्द्र नारायण मिश्र स्त्रीक अधिकार बहुत सताओल गेल छै जुग-जुगसँ समाजक सभटा प्रतिबंध सहैत रहि गेल छै आर तँ छोड़ू पहिने तँ हाल ई छल जीबिते मृत पतिक संग जराओल जाइत छल एहनो कहीं भेल अछि जे जीबिते व्यक्ति धधरामे पड़ि कए चिकरतै नहि प्रतिरोध करतै नहि से ओ करै जरूर करै चिकरै,भोकरै मुदा ओकर स्वरकेँ दाबि देबाक लेल प्रचंड शंखनाद करै महिलाकेँ मृत पतिक संग तेना ने गतानि देल जाइ जे ओ नहि भागि सकए प्राणक रक्षाक लेल प्रयत्नशील चुट्टिओ रहैत छै मुदा ओ ताहूसँ वंचित कए देल जाइत छलि जरि कए जखन खाक भए जाइत छलि तखन ओकरा नामपर सतीमाता कहाइत छल सती मंदिरमे लोकक ढबाहि लागि जाइत छल समय-साल बदललै सती प्रथा बंद भेलै की अत्याचार खतम भेलै? नहि,नहि नव-नव रूपमे बढ़िते गेलै,पसरिते गेलै कानूनसँ भेटल अधिकारो दुर्लभ भेल छै माए-बाप,भाइ छिनि लैत छै एहनो कही भेलै अछि? आन नहि,बापे कहै छै जे बिआहल बेटी नैहरमे किएक घुरिआइ छै? बेटीक अधिकारपर अखनो बहुत बात छै जकरे देखू सएह करैत वज्रपात छै समाज मूक दर्शक बनल लाचार छै अहीं कहू बराबरीक कहाँ विचार छै? की गाम की सहर मचल अत्याचार छै समाचार पढ़ि मोनमे होइत हाहाकार छै दुर्घटना तेहन-तेहन होइत वारंबार छै समानताक बातसभ झूठक प्रचार छै मनुष्यता बिलाएल छै केहन समय -साल छै असुरक्षित घरोमे बेटीक जानमाल छै यद्यपि समाजमे भए रहल सुधार छै बेटीओ लेल इस्कुलक खुलि गेल द्वारि छै अखनहु बेटीक लेल समस्याक पहाड़ छै बेटा-बेटीमे भेद मिटै तकर दरकार छै। २९।८।२०२३ रबीन्द्र नारायण मिश्र M-9968502767 Email:mishrarn@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.१०. झौली पासवान- अगराहीक घनछोहा झौली पासवान अगराहीक घनछोहा काज ने धन्धा व्यस्त रहै छैथ बैस चौकपर गप्प लड़बै छैथ। लवका-पुरना सभटा बात सबहक पोटरी रखने साथ। बात ओ मिसरी घोरल बजता, राजनीतिसँ बोरल बजता। गामक जेतेक छहरिया लप्पा सभिकयो सुनतैन हुनकर बात। कतय भेलै केकरासँ झगड़ा। किए भेलै केकरासँ झगड़ा। आँगुरपर ओ कारण गनता मध्यस्थताक जोगार ओ करता। सभक बात ओ सभ सन कहता नोनगर, तेलगर, चहटगर बात। झूठक पोटरी खोलि बैसल छैथ सांच ने एक्को बजता बात। बात एमहुरका ओमहर कहता अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। 2 || विदेह ४४३ विदेह ४४३|| 1
गए हाल TOME I-IV / VOLUMES -00 | A Parallel History of | Mithila & Maithili Literature with Critical Appreciations of Representative Maithili Writers 2 Reg = by | | GAJENDRA THAKUR | editor, Videha eJournal VIDEHA + PARALLEL LITERARY MOVEMENT se + ISSN 2229-547X - est. 2000 - Delhi - MMXXVI
FROM THE SERIES The Videha Parallel Library a centuries of Maithili letters — from the Buddhist Charyapadas | of the eighth century to the digital insurgency of the twenty-first — | gathered under a single critical lens. Across one hundred volumes the | Videha Parallel Library has assembled the suppressed, the neglected, | the folk, the Dalit, the women’s, and the diasporic traditions of Maithili literature into a counter-archive to the official canon curated by the Sahitya Akademi. This volume brings that project to its threshold. Applying Bharata’s rasa-theory, Anandavardhana’s dhvani, Kuntaka's vakrokti, Gahgesa Upadhyaya’s Navya-Nyaya pramana system, Bakhtinian dialogism, Spivak’s subaltern historiography, and the Videha Parallel History Framework, it offers sustained critical appreciations of one hundred contemporary and historical Maithili writers — poets, novelists, dramatists, essayists, theorists, and translators — whose work constitutes the living parallel tradition. “The parallel is not the marginal but the truthful, in long delay.” WHAT THIS VOLUME CONTAINS, >> One hundred chapter-length critical appreciations, each paired with a portrait image »® A historical synthesis from 8th-century Charydpadas to contemporary digital publishing >> Indigenous theory (Navya-Nyaya, rasa, dhvani) alongside Western and postcolonial lenses >> Archival recovery of the Dooshan Panji records on Gafigesa Upadhyaya of Mithila pes ABOUT THE AUTHOR | GAJENDRA THAKUR — Maithili author, editor, and literary scholar — founder | of the Videha Parallel Literary Movement and founded the Videha eJournal in | | 2000 and has edited it without interruption since. He writes in Maithili, Hindi, ‘i and English, and has authored scholarly monographs on Gangesa Upadhyaya’s Navya-Nyaya and the parallel history of Mithila’s literary cultures. SON 978-93-5832-486-6 VIDEHA | | till | | | | | Fe AEE nee > हि, ISSN 2229-547X - videha.co.in
Panii of Mithil ecoding the Bl, N J a \ 5 al pe | Panji of Mithila ee Surprising Insights from India and P a ) | n | | Nepal's Oldest Social Network The Panji system of Mithila is a remarkable example of how communities preserved, recorded and @ के transmitted social memory across generations. Spanning centuries, it functions as one of the world's oldest social networks—long before the के digital age. This book decodes the structure, a purpose and significance of Panji, bringing to light Surprising Insights from its value for understanding kinship, migration, India and Nepal's Oldest marriage alliances and societal organization in ae Social Network India and Nepal. ali का किक Bridging tradition with modern research, this work er ogi i —_ 5, ieee a offers surprising insights for scholars of sociology, ll eran : ss - i : anthropology and genomic genealogy. It opens new —— eT Us 5 Oe Gr pathways for interdisciplinary studies, showing how fe ¢ sao S \, \ — EEN ने, ५ We pahnn. ancient records can inform contemporary social न \ \ ‘a ES | ice Oey रे science and genealogical mapping. WAS ec \ e हे se सर दे BEd a =): Verges [aia Bt see EAS से Gajendra Thakur = y {eee ‘ कण a ca tbe aw) eo, Dh ० ect eh Acs & bp & Yeo B® si Ay x es a < eel it f | ty a i pe] < cas “6 f* \, For the Research Students of ae ‘ o % >) | र ae and ——— Dy; 7 EIN \\ है पृ i Dy} i 2) ९. enom eneological Mappin ISBN 978-93-595-894-5 www.videha.co.in PKC fe Wik EE, Fear हद Gajendra Thakur डिश [=] Editor ISBN videha.co.in Videha Maithili eJournal
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व्िएनद AIH HVA शाशिक ot HAST nnn SOOO co ठ0000000000022002020220002 VIDEHA e-Journal | ISSN 2229-547X ०१ जून २०२६ | वर्ष १९ मास २२२ मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् igo | Sa a eee | सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर www.videha.co.in
itor ae a eos =Pete fade मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् (fe i है Re AN fi} f रद गे NEN fa iw Se 202 SS OY, She Af सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर।
TOME I-IV / VOLUMES ।-00 ; A Parallel History of Mithila & Maithili Literature eit 5 with Critical Appreciations of i Ba ai i Representative Maithili Writers t Ye la. f y t GAJENDRA THAKUR i i editor, Videha eJournal VIDEHA - PARALLEL LITERARY MOVEMENT pet > videha.co.in ISSN 2229-547X - est. 2000 - Delhi - MMXXVI i Seti. i
FROM THE SERIES The Videha Parallel Library | Thirteen centuries of Maithili letters — from the Buddhist Charyapadas | हर the eighth century to the digital insurgency of the twenty-first — gathered under a single critical lens. Across one hundred volumes the | Videha Parallel Library has assembled the suppressed, the neglected, the folk, the Dalit, the women’s, and the diasporic traditions of Maithili literature into a counter-archive to the official canon curated by the Sahitya Akademi. This volume brings that project to its threshold. Applying Bharata’s rasa-theory, Anandavardhana’s dhvani, Kuntaka’s vakrokti, Gahgesa Upadhyaya’s Navya-Nyaya pramana system, Bakhtinian dialogism, Spivak’s subaltern historiography, and the Videha Parallel History Framework, it offers sustained critical appreciations of one hundred contemporary and historical Maithili writers — poets, novelists, dramatists, essayists, theorists, and translators — whose work constitutes the living parallel tradition. “The parallel is not the marginal but the truthful, in long delay.” WHAT THIS VOLUME CONTAINS >> One hundred chapter-length critical appreciations, each paired with a portrait image >» A historical रा from 8th-century Charyapadas to contemporary digital publishing »® Indigenous theory (Navya-Nyaya, rasa, dhvani) alongside Western and postcolonial lenses >» Archival recovery of the Dooshan Panji records on Gangesa Upadhyaya of Mithila & ABOUT THE AUTHOR GAJENDRA THAKUR — Maithili author, editor, and literary scholar — founder of the Videha Parallel Literary Movement and founded the Videha eJournal in 2000 and has edited it without interruption since. He writes in Maithili, Hindi, Sanskrit, and English, and has authored scholarly monographs on Gahgesa Tu Navya-Nyaya and the parallel history of Mithila’s literary cultures. VIDEHA parallel literary movement ISSN 2229-547X - videha.co.in
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एहि अंकक सहयोगी रचनाकार eu) a lit o wee Fy La जल a a|| @ (i aS ee = pay First Maithili Fortnightly e-Journal सम्पादक: TAG ठाकुर www.videha.co.in editorial.staffvideha@zohomailin OF 0) cae O) ie | fia ISSN 2229-547X videha.co.in