विदेह ४४५ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। [विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X Videha e-Journal (since 2000) at www.videha.co.in ] ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। कॉपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- २०२६. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. It is a platform for scholars, researchers and writers to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, prose and verse in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili and from Maithili into English. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. (c)२०००- २०२६. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA. सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@zohomail.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@zohomail.in. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover design: AUM GAJENDRA THAKUR VIDEHA:445 समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा। for the writers, readers, and listeners of Mithilā, who have kept the lamp of Maithilī burning through a thousand years of storms ………………………….. "The Parallel is not the marginal but the truthful, in long delay." Mānuṣīm iha saṃskṛtām मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। मिथिलाक ओइ लेखक, पाठक आ श्रोता लोकनि लेल, जे सहस्र वर्षक झंझावात मे सेहो मैथिलीक दीप प्रज्वलित रखने छथि। समानांतर कात-करोट मे हएब नै अछि, वरन् ई अछि असल सत्य, जे अपन समय लेलक अछि। अनुक्रम विदेह अंक ४४५ [०१ जुलाई २०२६] वर्ष १९ मास २२३ ISSN 2229-547X ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृष्ठ २-२६) १.२.अंक ४४३ पर टिप्पणी (पृष्ठ २७-२८) गद्य Prose २.१. हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२४ (पृष्ठ ३०-३८) २.२. कल्पना झा- मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-५ (पृष्ठ ३९-४४) २.३. डा. किशन कारीगर- गिनिज वर्ल्ड नाम त हम पुर पुर पादब (हास्य कथा) (पृष्ठ ४५-४७) २.४. लाल देव कामत- कलंक : एक पोथी चर्चा (पृष्ठ ४८-५०) २.५. लाल देव कामत पहिल लोक 'उपन्यासक' आलोचनात्मक अध्ययन (पृष्ठ ५१-५३) २.६. लाल देव कामत- पाठकीयता 'हमर ई मोन कहैए' (पृष्ठ ५४-५६) २.७. आचार्य रामानंद मंडल- पोथी समीक्षा: लखिमा की आंखें/ फिल्म विद्यापति (१९३७) समीक्षा (पृष्ठ ५७-५९) २.८. प्रीति कुमारी- श्री जगदीश प्रसाद मंडल'क साहित्यके अनुदीत प्रसार : एक सिंहावलोकन (पृष्ठ ६०-६२) २.९. संतोष कुमार राय 'बटोही'- लघुकथा – कलेक्टरनी (पृष्ठ ६३-६५) २.१०. गजेन्द्र ठाकुर- गोहि सभक बीच जल समाधि (मैथिलीक आइ धरिक सभसँ पैघ उपन्यास)- मैथिली कादम्बरीक अंश (पृष्ठ ६६-८२) २.११. गजेन्द्र ठाकुर-माटिक खेलौना-गाड़ी (शूद्रक रचित संस्कृत नाटक मृच्छकटिकम् केर मैथिली अनुवाद- गजेन्द्र ठाकुर) (पृष्ठ ८३-२४०) २.१२. गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-५) सन्दर्भ- कुणाल-कृत कुसमा-सलहेस (पृष्ठ २४१-२४९) पद्य Poetry ३.१. तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम'] मूल तेलुगु: नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव) मैथिली अनुवाद: मानेश्वर मनुज [खण्ड ७] (पृष्ठ २५१-२५४) ३.२. अशोक कुमार ठाकुर-विदेह ४४४/ ई-विदेह :-मैथिलीक प्राण-दीप/ योग : जीवनक अमृत/ संत कबीर : मानवताक अमर दीप (पृष्ठ २५५-२६०) ३.३. जगदानन्द झा "मनु"- २ टा गजल (पृष्ठ २६१-२६२) ३.४. आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल (पृष्ठ २६३-२६४) ३.५. राम शंकर झा "मैथिल"-तरुआ (पृष्ठ २६५-२७१) ३.६. डा. किशन कारीगर- अहाँ अपना टा बाजब लिखब के मैथिली कहलियै (पृष्ठ २७२-२७३) ३.७. झौली पासवान- देशक गुणगहवर/ होमय दियौ प्रलय (पृष्ठ २७४-२७६) ३.८. प्रणव कुमार झा- जलक क्रंदन - रैंक १२० (पृष्ठ २७७-२७९) APPENDIX: METHODOLOGICAL NOTE The Nepal Bikram Samvat years cited have been converted to approximate CE years using the standard offset of BS minus 56–57 years. Web sources consulted include the Videha digital archive (videha.co.in). All URLs were last accessed April 2026. This research was prepared using primary texts, and standard academic resources. All quoted material is from the cited sources. For the most current scholarship, consult the Videha Parallel History series at www.videha.co.in/gajenthakur.htm. ………………………………………………. A PARALLEL HISTORY OF MAITHILI LITERATURE: INTRODUCTION DALIT LITERARY CRITICISM: TELUGU, GUJARATI, AND ODIA DALIT LITERATURE IN MAITHILI TRANSLATION GANGESA UPADHYAYA: LIFE, LOGIC, AND LEGACY IN THE NAVYA-NYAYA TRADITION [NAVYA-NYAYA’S HIERARCHICAL USE OF LIMITORS IS COMPATIBLE WITH MODERN ARTIFICIAL INTELLIGENCE AND NATURAL LANGUAGE PROCESSING (NLP)] MITHILA & MAITHILI: CRITICAL ANALYSIS OF INSTITUTIONS THE MAITHILI GHAZAL VIDEHA (ISSUE 1-350) SADEHA SERIES (1-37) VIDEHA ISSUES 351-438 VIDEHA MAITHILI PARALLEL DRAMA THEATRE VIDEHA PARALLEL AUDIO VIDEO ARCHIVE VIDEHA PARALLEL CHILDREN'S LITERATURE Abdur Razzak, Abha Jha, Abhilash Thakur, Achhe Lal Shastri, Ajit Kumar Jha, Amit Mishra, Amod Kumar Jha, Amrendra Yadav, Anamika Raj, Anand Kumar Jha, Anil Mallik, Anjani Kumar Verma, Anmol Jha, Arvind Thakur, Ashish Anchinhar, Ashok (kathakar Ashok), Ashraf Rain, Dr. Bacheshwar Jha, Badri Nath Roy 'Amatya', Pt. Bal Govind 'Arya', Bechan Thakur, Pandit Bhavnath Jha, Bibhuti Anand, Bijayendra Jha, Binay Bhushan, Bindeshwar Thakur, Chandan Kumar Jha, Dinesh Kumar Mishra, Durganand Mandal, Gajendra Thakur, Ghanashyam Ghanero, Gopalji Jha 'Gopesh', Gyanvardhan Kanth, Harimohan Jha, Hitendra Gupta, Hitnath Jha, Hriday Narayan Jha, Ilarani Singh, Jagdanand Jha 'Manu', Jagdish Chandra Thakur 'Anil', Jagdish Prasad Mandal, Jhauli Paswan, Jitendra Kumar Jha 'Jeetu', Dr. Kailash Kumar Mishra, Kalikant Jha 'Buch', Kalpana Jha, Kalpana Jha, Bokaro, Kalpana Jha, Delhi, Kalpana Jha, Patna, Kameshwar Choudhary, Kameshwar Jha 'Kamal', Dr. Kamini Kamayini, Kamla Chaudhary, Kapileshwar Raut, Kedar Nath Chaudhary, Dr. Kirtinath Jha, Dr. Kishan Karigar, Krishna Kumar Kashyap, Kumar Manoj Kashyap, Kumar Pawan, Kundan Kumar Karn, Kusum Thakur, Lal Dev Kamat, Lalita Jha, Lallan Prasad Thakur, Laxman Jha 'Sagar', Mala Jha, Manmohan Jha, Meena Jha, Mithilesh Kumar Jha, Munnaji, Munnaji, Munni Kamat, Nabo Narayan Mishra, Nagendra Kumar, Nand Kumar Mishra 'Nand', Nand Vilas Roy, Nanda Vilas Ray, Narayan Yadav, Narayanji Chaudhary, Narendra Jha, Navendu Kumar Jha, Neerja Renu, OM Prakash Jha, Panna Jha, Phanishwar Nath Renu, Prabhat Rai Bhatt, Pradeep Bihari, Pradeep Pushpa, Pranav Jha, Prayas Premi Maithil, Preeti Thakur, Premlata Mishra 'Prem', Premshankar Singh, Rabindra Narayan Mishra, Rajdeo Mandal, Rajeev Ranjan Mishra, Rajnandan Lal Das, Ram Bharos Kapari 'Bhramar', Ram Chandra Roy, Ram Sogarth Yadav, Ram Vilas Sahu, Acharya Ramanand Mandal, Prof. Dr. Ramawatar Yadav, Ramdeo Prasad Mandal 'Jharudar', Ramesh, Ramesh Narayan, Rameshwar Prasad Mandal, Pandit Ramji Chaudhary, Ramji Prasad Mandal, Acharya Ramlochan Sharan, Ramlochan Thakur, Ravi Mishra Bhardwaj, Ravibhushan Pathak, Ravindra Nath Thakur, S.C. Suman, Sandeep Kumar Safi, Sanju Das, Santosh Kumar Mishra, Santosh Kumar Roy 'Batohi', Satyanand Pathak, Shail Jha 'Sagar', Dr. Shambhu Kumar Singh, Shanti Lakshmi Chaudhary, Shardindu Chaudhary, Shashi Bala, Shashidhar Kumar 'Videh', Shiv Kumar Jha 'Tillu', Dr. Shiv Kumar Prasad, Shivshankar Singh Thakur, Shivshankar Sriniwas, Dr. Shubh Kumar Barnwal, Shyam Darihare, Siyaram Jha 'Saras', Srijan Shekhar 'Ajneya', Subhash Chandra Yadav, Subhash Kumar Kamat, Subodh Jha, Subodh Kumar Thakur, Sujit Kumar Jha, Sushil, Sweta Jha Chaudhary, Taranand Viyogi, Prof. Udaya Narayana Singh Nachiketa, Umesh Mandal, Umesh Paswan, Veena Thakur, Vibha Rani, Vibhuti Anand, Vijaynath Jha, Vineet Utpal, Yoganand Jha, Prof. Dr. Yogendra P. Yadava, Yogendra Pathak Viyogi A Parallel History of Mithila & Maithili Literature, Original Poem in Maithili, Translated into English, Children's Literature Theory, Children's Picture-Story Literature, Contemporary Mithila Artists, Contemporary Mithila Artists, Dalit and Subaltern Literature, Dalit Literary Criticism, Dalit Literary Criticism — Gujarati Dalit Literature in Maithili Translation, Dalit Literary Criticism — Odia Dalit Literature in Maithili Translation, Dalit Literary Criticism — Telugu Dalit Literature in Maithili Translation, Digital Maithili Children's Literature, Digital Maithili Literature, The Epistemology of Parallelism — Videha Sadeha Series and the Maithili Digital Renaissance, Gangeśa Upādhyāya / Navya-Nyāya, Gangesa Upadhyaya — Life, Logic, and Legacy in the Navya-Nyaya Tradition, Institution Critical Analysis, Language Transmission, Laprek vs Bīhani Kathā, Maithili Bīhani Kathā — The Seed Story Tradition in Maithili Literature, The Maithili Ghazal — History, Theory, Revival, and the Anchinhar Era, Maithili Micronarrative, Mithila & Maithili — Critical Analysis of Institutions, Awards and Recognition Frameworks, Mithila & Maithili Institution Critical Analysis, Parallel Literature Movement, Seed Story Tradition, Tirhuta / Mithilakshar, Videha 351–438 Critic, Videha Children Literature Expanded, Videha Children Literature Expanded — Parallel Children Literature in Maithili, Videha eJournal, Videha Issues 1–350, Videha Issues 351–438, Videha Issues 351–438 — Epistemological and Canonical Transformations, The Videha Maithili Parallel Drama Theatre, Videha Maithili Parallel Drama Theatre, The Videha Maithili Parallel Drama Theatre — Critical Historiography and Epistemological Analysis, The Videha Parallel Audio Video Archive, Videha Parallel Audio Video Archive, The Videha Parallel Audio Video Archive — Digital Remediation and Subaltern Historiography, Videha Parallel Audio Video Critic, Videha Parallel Children Literature, Videha Parallel Drama Critic, Videha Parallel History Framework, Videha Sadeha 1–37 / Issues 1–350 Critic, Videha Sadeha, Videha Sadeha Series 1–37, Vidyapati, the Primal Poet of Maithili (Pre-Jyotirishvara), Women’s Writing, Young Readers in Maithili … AND MORE TO COME IN TOME 5. I. A PARALLEL HISTORY OF MITHILA & MAITHILI LITERATURE [TOME 1-4; VOLUMES 1-100] BY GAJENDRA THAKUR [Parallel History Series ISBN Number: 978-93-5812-486-6] GOOGLE PLAY BOOK [TOME 1-4; VOLUMES 1-100] https://play.google.com/store/books/details?id=uvjREQAAQBAJ AMAZON KINDLE [TOME 1-4; VOLUMES 1-100] https://www.amazon.in/dp/B0GX2XRKM7 POTHI HARDBACK POTHI TOME 1 [VOLUMES 01-25] https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-parallel-history-mithila-maithili-literature/ POTHI TOME 2 [VOLUMES 26-50] https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-parallel-history-mithila-maithili-tome-2/ POTHI TOME 3 [VOLUMES 51-75] https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-parallel-history-mithila-maithili-literature-volume-1-100-tome-3-volume-51-75-b/ POTHI TOME 4 [VOLUMES 76-100] https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-parallel-history-mithila-maithili-literature-volume-1-100-tome-4-volume-76-100-/ II. DECODING THE PANJI OF MITHILA: Surprising Insights from India and Nepal’s Oldest Social Network [ISBN: 978-93-5915-894-5] Decoding the Panji of Mithila Volume I-VI POTHI HARDBACKS Decoding the Panji of Mithila : Surprising Insights from India and Nepal's Oldest Social Network [Volume I] https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-decoding-panji-mithila/ Decoding the Panji of Mithila Volume II: Genealogical Mapping, Mūla, Dūṣaṇ, and the Videha Panji Search System [Based on Prachin Panji] https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-decoding-panji-mithila-volume-ii/ Decoding the Panji of Mithila Volume III: A Complete Index-wise Decoding of Genome Mapping Volume I - Khand 2 Based on Uptip Panji https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-decoding-panji-mithila-volume-iii/ Decoding the Panji of Mithila Volume IV: Based on the Nagram Panji https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-decoding-panji-mithila-volume-iv/ Decoding the Panji of Mithila Volume V: Based on Volume II Panji: Genealogical Mapping of Mithila, 450 AD-2009 AD https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-decoding-panji-mithila-volume-v/ Decoding the Panji of Mithila Volume VI: Based on Dushan Panji https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-decoding-panji-mithila-0/ Decoding the Panji of Mithila Volume I-VI KINDKE EDITIONS Decoding the Panji of Mithila : Surprising Insights from India and Nepal's Oldest Social Network https://www.amazon.in/dp/B0H463RVT8 Decoding the Panji of Mithila Volume II: Genealogical Mapping, Mūla, Dūṣaṇ, and the Videha Panji Search System https://www.amazon.in/dp/B0H6NPRTYB Decoding the Panji of Mithila Volume III: A Complete Index-wise Decoding of Genome Mapping Volume I - Khand 2 Based on Uptip Panji https://www.amazon.in/dp/B0H6R4BBFB Decoding the Panji of Mithila Volume IV: Based on the Nagram Panji https://www.amazon.in/dp/B0H6R6VSBF Decoding the Panji of Mithila Volume V: Based on Volume II Panji: Genealogical Mapping of Mithila, 450 AD-2009 AD https://www.amazon.in/dp/B0H6R4BBFD Decoding the Panji of Mithila Volume VI: Based on Dushan Panji https://www.amazon.in/dp/B0H6R2YCFP III. गद्य पद्य भारती खण्ड १ आ २ (विदेह सदेह २८ & विदेह सदेह ३७) [विभिन्न भाषासँ अनूदित गद्य आ पद्य रचना (खण्ड-१) & (खण्ड-२) (विदेह www.videha.co.in/ पेटार अंक १-३५० सँ)] [खण्ड १ ISBN No: 978-93-341-0402-8; खण्ड २ ISBN No: 978-93-5890-150-4] १ विदेह सदेह २८ GADYA PADYA BHARTI 1 विभिन्न भाषासँ अनूदित गद्य आ पद्य रचना (खण्ड-१) (विदेह www.videha.co.in/ पेटार अंक १-३५० सँ) https://store.pothi.com/book/editor-gajendra-thakur-gadya-padya-bharti-1/ २ विदेह सदेह ३७ GADYA PADYA BHARTI 2 विभिन्न भाषासँ अनूदित गद्य आ पद्य रचना (खण्ड-२) (विदेह www.videha.co.in/ पेटार अंक १-३५० सँ) https://store.pothi.com/book/translator-gajendra-thakur-gadya-padya-bharti-2/ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका WWW.VIDEHA.CO.IN VIDEHA 23 LANGUAGE TRANSLITERATOR https://www.videha.co.in/new_page_101.htm विदेह लिपि परिवर्तक IPA · IAST · Tirhuta · Braille https://www.videha.co.in/script-converter.html विदेह आ सदेह सम्पूर्ण इंडेक्स https://www.videha.co.in/script-converter.html विदेह पेटार VIDEHA ARCHIVE https://www.videha.co.in/archive.htm विदेह मैथिली थेसॉरस — मैथिली-अंग्रेजी / अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोश https://www.videha.co.in/maithili-thesaurus.html विदेह मैथिली ↔ अंग्रेजी अनुवादक · Videha Maithili ↔ English Translator https://www.videha.co.in/maithili-translator.html विदेह पञ्जी प्रबन्ध — मैथिल ब्राह्मण वंशावली इंडेक्स https://www.videha.co.in/panji-mool-index.html विदेह गद्य https://www.videha.co.in/prose.htm विदेह पद्य https://www.videha.co.in/verse.htm विदेह स्त्री कोना https://www.videha.co.in/femcorner.htm A PARALLEL HISTORY OF MITHILA & MAITHILI LITERATURE https://www.videha.co.in/gajenthakur.htm विदेह मिथिला रत्न https://www.videha.co.in/ratna.htm विदेह मिथिलाक खोज https://www.videha.co.in/discovery.htm विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण https://www.videha.co.in/investigation.htm विदेह पुरान अंक https://www.videha.co.in/videha.htm विदेह पोथी https://www.videha.co.in/pothi.htm विदेह दृश्य-श्रव्य नाट्य उत्सव https://www.videha.co.in/Audio_Video.htm विदेह शिशु, बाल आ किशोर उत्सव https://www.videha.co.in/kids.htm विदेह ई-लर्निङ्ग/ विदेह ई-लर्निङ्ग क्विज https://www.videha.co.in/videha-elearning.htm [विदेह ई-लर्निङ्ग क्विज UPSC / BPSC / UGC-NET / NTA हेतु मैथिली भाषा, साहित्य आ मिथिला इतिहास पर निःशुल्क प्रश्नोत्तरी — क्विज खोलबा लेल कार्ड पर क्लिक करू। शब्दकोश मिथिलाक इतिहास साहित्यक इतिहास UPSC / UGC-NET समानान्तर इतिहास मिथिला पञ्जी मैथिली गजल वेब पत्रकारिता विदेह चित्रकला · कला · संगीत विदेह दृश्य-श्रव्य विदेह विशेषांक/ सम्मान विदेह प्रश्नोत्तरी विदेह नाट्य उत्सव विदेह शिशु उत्सव विदेह स्त्री कोना] Videha Converters- Thesaurus, Panji, Script Converters, Transliterators, Translators, eLearning Quizzes, Maithili Language Search and other Technical Tools https://www.videha.co.in/videha-converters.htm विदेह आ सदेह दुनू https://archive.org/details/VidehaAndSadeha Videha Github: https://github.com/videha-ejournal/ TWITTER/ X https://x.com/videha FACEBOOK https://www.facebook.com/groups/videha/ Videha Googlegroups https://groups.google.com/g/videha गजेन्द्र ठाकुर 1
१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.अंक ४४४ पर टिप्पणी १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय विदेह: सदेह: ७ मैथिली पद्य (विदेह अंक ५१-१००) समग्र साहित्यिक समीक्षा: सभटा साहित्यकार भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य । पाश्चात्य आलोचना । गंगेशक नव्य-न्याय । विदेह समानान्तर इतिहास ढाँचा सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर । आइएसबीएन: 978-93-80538-65-5 भूमिका: सदेह ७ क स्वरूप आ विशेषता विदेह: सदेह: ७ मैथिली पद्यक सबसँ विशाल संकलन थिक: ६२४ पृष्ठ, १५१ साहित्यकार, विदेह अंक ५१-१०० सँ बीछल। ई सदेह ३ (मैथिली पद्य, अंक २६-५०) केर उत्तरवर्ती थिक - दुनू मिलिकऽ विदेह केर काव्य-पुरालेख सृजित करैत अछि। सदेह ७ केर विधागत विविधता अपूर्व अछि: कविता, गीत, गजल, आजाद गजल, भक्ति-गजल, कता, हजल, नात, बन्द, कसीदा, हाइकू, टनका-वाका, हैबून, शेनर्यू, कुण्डलिया, झारू, क्षणिका, गद्य-कविता - सब एक खण्डमे। अनूदित कविता सेहो: तेलुगु (अन्नावरन देवेन्द्र), ओडिया (इप्सिता सारंगी), भोजपुरी (परिचय दास), डोगरी (प्रो. चम्पा शर्मा)। चारि ढाँचा: (क) रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य; (ख) बूर्द्यू, स्पिवाक, बाख्तिन, ग्राम्शी, बेन्यामिन, फानन, अम्बेडकर, कामू, हाइडेगर, फ्रायड; (ग) गंगेश उपाध्यायक नव्य-न्याय; (घ) विदेह समानान्तर इतिहास ढाँचा। १. गजेन्द्र ठाकुर (सम्पादक) पद्य साहित्य आ ओकर समीक्षाशास्त्र (निबन्ध) + कुण्डलिया १-४ / टनका / हाइकू / शेनर्यू / हैबून / / कता / गजल / कटिहारी समीक्षाशास्त्र: ठाकुरक सैद्धान्तिक निबन्ध मैथिली पद्य केर समग्र ढाँचा थिक: प्लेटो केर 'आयोन' + अरस्तु केर 'काव्यशास्त्र' सँ आरम्भ करैत मैथिली छन्द परम्परा, अर्वाचीन मुक्त छन्द, जापानी शैली (हाइकू-टनका), अरबी-फारसी शैली (गजल-कसीदा) धरि। 'कोनो रचना अप्रासङ्गिक नहि होइत अछि जँ ओ अहाँकेँ हिलोड़ि दिअए तँ ओ रचना सार्थक।' ई विदेह केर समावेशी समीक्षा केर घोषणापत्र थिक। कविताक विश्लेषण: कुण्डलिया (शास्त्रीय मैथिली अन्तःश्लिष्ट दोहा शैली) + टनका (जापानी ५-७-५-७-७ वर्ण शैली) + हाइकू + शेनर्यू + हैबून (हाइकू+गद्य) + रुबाइ (अरबी शैली) + कता (फारसी शैली) + गजल + कटिहारी (मिथिला लोक शैली) - ई विस्तार घोषित करैत अछि जे मैथिली कविता विश्व साहित्य केर अछि। नव्य-न्याय: गंगेशक 'सामान्य' (सार्वभौमिक): ठाकुरक निबन्ध तर्क करैत अछि जे उत्तम कविता केर 'सामान्य लक्षण' (सार्वभौमिक अभिलक्षण) 'झमारनाइ' (प्रभाव, अनुनाद) अछि - ई नव्य-न्याय केर 'व्याप्ति'- आधारित तर्क थिक। २. अंजनी कुमार वर्मा 'दाऊजी' आत्मबल / ओजक भोज / समस्या / वासंती गीत / दुइ गोट भूख / सुखाएल अतीत / बेरोजगारक आत्मा / जाति आ तंत्र / कोसी (अनेक कविता) रस-ध्वनि: 'आत्मबल' - वीर रस। 'दुइ गोट भूख' - करुण - दोबर भूख: भौतिक + मनोवैज्ञानिक। 'जाति आ तंत्र' - रौद्र+व्यंग्य - अम्बेडकरक जाति समीक्षा। 'कोसी' - करुण+ पारिस्थितिकीय। ध्वनि: 'सुखाएल अतीत' (सुखल अतीत) = हानि केर रूपमे विषाद। वक्रोक्ति: 'ओजक भोज' (ऊर्जा केर भोज) - 'ओज' (ऊर्जा) कतय अछि जखन 'भोज' खाली अछि? ग्राम्शी / अम्बेडकर: 'जाति आ तंत्र' = ग्राम्शी केर संस्थागत वर्चस्व + अम्बेडकर केर जाति विश्लेषण: जाति प्रणाली अछि। 'बेरोजगारक आत्मा' = बेरोजगार व्यक्ति केर आत्मा - आर्थिक हाशियाकरण केर आध्यात्मिक दरिद्रता। ३. मिथिलेश कुमार झा खबरदार / गजल रस-ध्वनि: 'खबरदार' (सावधान!) - वीर रस। राजनैतिक चेतावनी कविता। गजल: शृंगार-वियोग। दुनू शैली केर विरोधाभास: सार्वजनिक चेतावनी + व्यक्तिगत लालसा - एक कवि केर दूटा नागरिकता। ४. बलराम साह आकि नींद टूटि गेल रस-ध्वनि: 'आकि नींद टूटि गेल'- वीर+शान्त। 'आकि' (जेना) = सपन जकाँ जागृति ध्वनि: की ई वास्तविक जागृति थिक या सपना? वक्रोक्ति: नींद टूटनाइ = राजनैतिक चेतना। ५. रवि भूषण पाठक हाइकू / ऐ बेर छठिमे / मरणोपरान्त / बर्फ भोर / चमारक ऋण / दीवाली के पहिले / धनतेरस राति / हम पुरहितिया / चालीसक बात (२०+ कविता) परिचय: रवि भूषण पाठक सदेह ७ मे २०+ कविता। हुनकर विस्तार असाधारण अछि: दलित भक्ति ('ऐ बेर छठिमे'), अस्तित्वगत ('मरणोपरान्त'), पर्व समीक्षा ('धनतेरस'), जीवन समीक्षा ('चालीसक बात')। 'ऐ बेर छठिमे' विशेष विश्लेषण: गजेन्द्र ठाकुर विशेष रूपसँ उल्लेख करैत छथि: 'ऐ बेर छठिमे' मे दलित भक्ति बिम्ब अछि - देवता दुसाध-टोला पाछाँ सँ उगैत अछि। ध्वनि: सूर्य (दैवी) दलित पड़ोस सँ उगैत अछि - ई स्थानिक धर्मशास्त्र थिक। वक्रोक्ति: दैवी प्रकाश केर उत्पत्ति दलित स्थानमे। 'चमारक ऋण' दलित अस्मिता: 'चमारक ऋण' (चमार केर ऋण) - रौद्र+करुण। ध्वनि: 'ऋण' (ऋण) - दलित समुदाय केर समाज प्रति अदत्त ऋण? वा समाज केर दलित प्रति अदत्त नैतिक ऋण? ई अस्पष्टता कविताक शक्ति अछि। अम्बेडकर: दलित सब किछु देलक एहि सभ्यता केँ - सभ्यता ओकर ऋणी अछि। नव्य-न्याय: गंगेशक 'अन्वय-व्यतिरेक': 'चमारक ऋण' - जतय चमार (दलित) अछि, ततय ऋण (सामाजिक उत्पीड़न) अछि; जतय चमार अनुपस्थित अछि, ततय ऋण अनुपस्थित अछि - ई सह-अस्तित्व/अनुपस्थिति तर्क। ६. राजेश मोहन झा 'गुंजन' मिझाइत दीप / मूड़नक भोज / थेथर नेता / गरम जमाना / पलायन / सुगर फ्री रस-ध्वनि: 'मिझाइत दीप' (बुझैत दीप) - करुण। 'थेथर नेता' (बेशरम नेता) - हास्य+रौद्र। 'सुगर फ्री'- हास्य। 'पलायन' (पलायन) - करुण। ध्वनि: 'मूड़नक भोज' (मुण्डन केर भोज) - जीवन-चक्र अनुष्ठान केर रूपमे सामाजिक व्यय व्यंग्य। ग्राम्शी / स्त्रीवादी: 'थेथर नेता' = ग्राम्शी केर अधीनस्थ जे वर्चस्ववादी शासक बनि जाइत अछि। भूल सुधार: नवीन कुमार 'आशा'क “अन्तरकलह आ विचार” आ “बैसल-बैसल सोची मन मे विदेहक ७२ म अंक (१५ दिसम्बर २०१०) मे ई-प्रकाशित भेल मुदा गलतीसँ ई दुनू कविता विदेह-सदेह ७ मे राजेश मोहन झा 'गुंजन' केर नामसँ प्रकाशित भऽ गेल। ओना तकर सुधार कऽ देल गेल विदेह-सदेह ३४ मे, जखन भूल-सुधार सूचनाक संग ई दुनू कविता नवीन कुमार 'आशा'क नामसँ प्रकाशित भेल। ७. नवीन कुमार 'आशा' सुनू सुनाउ अपन खबरि / रोटी / हमरा भेटल रस-ध्वनि: 'रोटी'- करुण। रोटी केर रूपमे जीवन केर मूलभूत माँग। 'सुनू सुनाउ' - संवादात्मक अपील। 'हमरा भेटल'- शान्त+शृंगार। ध्वनि: 'आशा' नाम - कवि केर नाममे आशा + निराश वास्तविकता केर बीच। ८. शम्भुनाथ झा 'वत्स' उग्रवादी बनि जाइ रस-ध्वनि: 'उग्रवादी बनि जाइ' (क्रान्तिकारी बनि जाइ) - वीर रस। साहित्याचार्य, वेदविद्: शास्त्रीय संस्कृत विद्वान राजनैतिक कविता लिखैत। वक्रोक्ति: ब्राह्मण विद्वान क्रान्ति केर आह्वान करैत - ई ग्राम्शीय 'कार्बनिक बुद्धिजीवी' केर संकेत थिक। ९. अजित मिश्र नव वर्ष रस-ध्वनि: 'नव वर्ष' - शान्त+शृंगार। नव वर्ष नवीकरण केर रूपक केर रूपमे। वर्ड्सवर्थ केर 'समय केर धब्बा': नव वर्ष समय केर गमन आ सम्भावना केर चिन्ह लगाबैत अछि। १०. डॉ. शेफालिका वर्मा नव वर्ष / इजोरियाक भाषा / उपेक्षित / देश / विधाता / बच्चा आ बेवस्था / स्मृति-शेष रस-ध्वनि: 'इजोरियाक भाषा'- शृंगार+शान्त। ध्वनि: इजोरिया= स्त्रीलिंगी, अप्रत्यक्ष वाणी। 'उपेक्षित' (उपेक्षित) - करुण। 'विधाता' (विधाता/स्रष्टा) - रौद्र+व्यंग्य - भाग्य/भगवान केर प्रश्न। 'बच्चा आ बेवस्था' - करुण+वीभत्स। स्पिवाक / पारिस्थितिकीय-स्त्रीवादी: 'देश' + 'विधाता' + 'उपेक्षित': शेफालिका वर्मा केर कविता व्यवस्थित रूपसँ पितृसत्तात्मक संरचना सभ पर प्रश्न करैत अछि- दैवी, राष्ट्रिय, पारिवारिक। स्पिवाक: महिलाक स्वर एहि सब क्षेत्रमे हाशियाकृत ('उपेक्षित') अछि। ११. सतीश चन्द्र झा चुनाव १-२ / भाषा आ राजनीति / सत्यक जीत / भूखल पेट / पाँच साल / सौंसे बिहार एखनो बेहाल / नेन्ना तेतरी रस-ध्वनि: 'चुनाव' - हास्य+व्यंग्य+रौद्र। 'भाषा आ राजनीति' - वीर+व्यंग्य- मैथिली भाषा राजनीति। 'भूखल पेट' - करुण। 'सौंसे बिहार एखनो बेहाल' - रौद्र+करुण। 'नेन्ना तेतरी' - लोक नामकरण केर राजनैतिक कविता। ध्वनि: 'पाँच साल'= चुनाव चक्र केर रूपमे आवर्ती दुःस्वप्न। ग्राम्शी / स्पिवाक: 'भाषा आ राजनीति' = बूर्द्यू केर भाषिक पूँजी + ग्राम्शी केर सांस्कृतिक वर्चस्व: मैथिली भाषा राजनीति सत्ता राजनीति थिक। १२. सुबोध कुमार ठाकुर विडम्बना / प्रतीक्षा रस-ध्वनि: 'विडम्बना + प्रतीक्षा' - करुण+शान्त ('विडम्बना' = दुखान्त व्यंग्य)। दुनू कवितामे एक नीरस प्रतीक्षा केर भाव। १३. किशन कारीगर दौगल चलि जाएब रस-ध्वनि: 'दौगल चलि जाएब गाम'- करुण+वात्सल्य। पलायन-उलटफेर केर इच्छा - सहर सँ गाम लौटबाक लालसा। १४. राम विलास साहु कोइली रस-ध्वनि: 'कोइली कूहकै आमक डारि'- शृंगार। विद्यापति परम्पराक निरन्तरता। कोइली केर कूक प्रेम केर सन्देशवाहक। १५. पंकज कुमार झा उद्बोधन रस-ध्वनि: 'उद्बोधन' (उद्बोधन/जागृति आह्वान) - वीर रस। जागरूकता केर आह्वान केर रूपमे कविता। १६. मुन्नाजी हाइकू / बोनिहार / माटिक ललकार रस-ध्वनि: 'बोनिहार' (बोनिहार/कृषक) - करुण+वीर। ग्राम्शी केर अधीनस्थ - कृषक केर आवाज। 'माटिक ललकार' (माटि केर ललकार) - भूमि केर पुकार - पारिस्थितिकीय चेतना। हाइकू - क्षणिक बिम्ब सभक शृंखला। १७. ज्योति सुनीत चौधरी हाइकू-टनका / भ्रष्टाचार / जीतक परिभाषा / प्रजातन्त्रक खेल / स्वतन्त्रता दिवस / पोखरिक कमल / मिथिला चित्रकला (आ अन्य अनेक कविता) रस-ध्वनि: 'भ्रष्टाचार'- रौद्र+व्यंग्य। 'प्रजातन्त्रक खेल' - रौद्र+करुण। 'पोखरिक कमल' (पोखरि केर कमल)- शान्त+शृंगार। 'मिथिला चित्रकला' - अद्भुत। 'जीतक परिभाषा' (विजय केर परिभाषा) - वीर। ध्वनि: लन्दन-प्रवासी दृष्टिकोण: 'प्रजातन्त्रक खेल' खेल' बाहर सँ देखल - आरो विध्वंसकारी। स्पिवाक / मिथिला चित्रकला: स्पिवाक केर प्रवासी अधीनस्थ: ज्योति सुनीत चौधरी लन्दन सँ 'प्रजातन्त्रक खेल' केर बारेमे लिखैत छथि - बाहरी-भीतरी स्थिति। 'मिथिला चित्रकला' = विदेह केर दृश्य कला + साहित्यिक कला एकीकरण केर प्रतिबद्धता। १८. अन्नावरन देवेन्द्र तेलुगु पद्य: अन्तिम शब्द (मैथिली अनुवाद) रस-ध्वनि: 'अन्तिम शब्द'- करुण+शान्त। तेलुगु मूल + मैथिली अनुवाद। ध्वनि: 'अन्तिम शब्द' - अन्तिम शब्द की अछि? मौन? मृत्यु? प्रेम? बेन्यामिन / अन्तर-साहित्यिक: बेन्यामिन केर 'परवर्ती जीवन': मैथिलीमे तेलुगु कविता- दक्षिण भारतीय स्वर उत्तर भारतीय भाषामे। विदेह केर राष्ट्रव्यापी परिकल्पना: भारत केर साहित्यिक विविधता एक्के मञ्च पर। १९. गिरीश चन्द्र लाल नील अकास / शुभ प्रभात / मन में भेल अछि भोर / एक रंग अनेक रंग रस-ध्वनि: 'नील अकास' (नील आकाश) - शान्त+शृंगार। 'शुभ प्रभात’- वात्सल्य+शान्त। 'मन मे भेल अछि भोर'- शान्त+वीर। 'एक रंग अनेक रंग' - अद्भुत। तीनू: आकाश + प्रभात + रङ्ग - प्रकाश केर रूपमे आशा। २०. गंगेश गुंजन आजाद गजल १-२ / स्वतन्त्रता दिवस २०१० रस-ध्वनि: 'आजाद गजल' = मुक्त गजल (बिना औपचारिक बहर/मीटर केर) - गंगेश गुंजन केर नवाचार। 'स्वतन्त्रता दिवस २०१०' - वीर+व्यंग्य। ध्वनि: 'आजाद' (मुक्त) गजल 'स्वतन्त्रता' (स्वतन्त्रता) दिवस पर - शैली-स्वतन्त्रता सामग्री-स्वतन्त्रता केर दर्पण करैत अछि। बाख्तिन बहुस्वरता। २१. मनीष झा 'बौआभाइ' भेल एहेन अवतार छल रस-ध्वनि: 'भेल एहेन अवतार छल’- अद्भुत+व्यंग्य। अवतार रूपक- आधुनिक जीवनमे दैवी अवतरण केर व्यंग्य। २२. लालबाबू कर्ण जन्मभूमि रस-ध्वनि: 'जन्मभूमि' - वात्सल्य+वीर। जन्मभूमि सँ लगाव - मिथिला प्रेम। २३. चन्द्रशेखर कामति दुनू परानी फूकि-फूकि पी रस-ध्वनि: 'दुनू परानी फूकि-फूकि पी'- हास्य+शृंगार। घरेलू हास्य - दम्पति केर दैनिक जीवन केर चित्रण। २४. मनोज झा 'मुक्ति' देखाबटी छोड़ि दे रस-ध्वनि: 'देखाबटी छोड़ि दे'- शान्त+व्यंग्य। पाखण्ड केर त्याग केर आह्वान। २५. राजेन्द्र चौधरी श्रीकृष्ण भजन रस-ध्वनि: 'श्रीकृष्ण भजन' - भक्ति रस। पारम्परिक भक्ति कविता - विद्यापति परम्पराक निरन्तरता। २६. रमाकान्त राय 'रमा' वन्दना रस-ध्वनि: 'वन्दना' (वन्दना) - भक्ति+शान्त। प्रार्थना केर रूपमे कविता। २७. प्रकाश प्रेमी गीत २८. सुमन झा 'सृजन' कैक्टस जकाँ दिल रस-ध्वनि: 'कैक्टस जकाँ दिल'- शृंगार+करुण। नागफनी केर काँट- प्रेम केर पीड़ा केर रूपक। २९. शिवकुमार मिश्र भलमानुस समाज रस-ध्वनि: 'भलमानुस समाज'- हास्य+व्यंग्य। 'भला मानुस' केर समाज केर व्यंग्यपूर्ण चित्रण - वास्तविकता सँ दूर। ३०. डॉ. बचेश्वर झा भेँट, भावाञ्जलि ३१. श्यामल सुमन सत्य (कहू की फूसि बजै छी?) ३२. जय प्रकाश मंडल उपराग रस-ध्वनि: 'उपराग' (उपराग/ग्रहण) - करुण। ग्रहण रूपक - अन्धकार केर क्षण केर चित्रण। ३३. सत्येश्वर कुमार झा दस गोट क्षणिका रस-ध्वनि: 'दस गोट क्षणिका' (दस क्षणिका) - शान्त। दस क्षणिका - दस क्षण केर बिम्ब शृंखला। ३४. कपिलेश्वर साहु कोसी रस-ध्वनि: 'कोसी' (कोसी नदी) - रौद्र+करुण। कोसी बाढ़ २००८: पारिस्थितिकीय + दलित प्रलय। बेन्यामिन: साक्षी बनल। ३५. राधाकान्त मंडल 'रमण' स्वागत गीत रस-ध्वनि: 'स्वागत गीत' (स्वागत गीत) - वात्सल्य+शृंगार। अतिथि सत्कार परम्परा केर गीत। ३६. धीरेन्द्र प्रेमर्षि फगुआ गीत रस-ध्वनि: 'फगुआ गीत' (फगुआ/होली गीत) - हास्य+शृंगार। बाख्तिन उत्सवी-लोकधर्मी - होली केर उत्सवी उन्माद। ३७. सरोज 'खिलाड़ी' गीत रस-ध्वनि: सरोज खिलाड़ी केर गीत- शृंगार+करुण। स्त्री, प्रेम आ वियोग। ३८. नन्द विलास राय जनसंख्या रस-ध्वनि: 'जनसंख्या' (जनसंख्या) - व्यंग्य। जनसंख्या वृद्धि केर व्यंग्यपूर्ण चित्रण। ३९. विनीत ठाकुर शान्ति दूत परवा रस-ध्वनि: 'शान्ति दूत' (शान्ति दूत) - शान्त रस। शान्ति केर सन्देशवाहक केर रूपमे कविता। ४०. इन्द्रकान्त झा गीत रस-ध्वनि: गीत। गीत परम्पराक निरन्तरता। ४१. मनोज कुमार मंडल बेटी / मिथिला / नारी चरित्र रस-ध्वनि: 'बेटी' (बेटी) - करुण+वीर। स्त्रीवादी - बेटी केर स्थिति पर प्रश्न। 'मिथिला' - वात्सल्य+शान्त। 'नारी चरित्र' - स्त्री केर चरित्र केर पुनर्मूल्याङ्कन। ४२. डॉ. राजीव + जया वर्मा (दम्पति) हमर गाम रस-ध्वनि: 'हमर गाम'- वात्सल्य+शान्त। संयुक्त लेखन (दम्पति) - विदेह केर दम्पति-लेखन परम्परा। ४३. रामभरोस कापड़ि 'भ्रमर' गजल रस-ध्वनि: 'गजल'- शृंगार-वियोग। नेपाली मैथिली आजाद गजल परम्परा। ४४. कामिनी कामायनी बाजारमे स्त्री रस-ध्वनि: 'बाजारमे स्त्री'- वीभत्स+वीर। स्त्री केर वस्तुीकरण केर चित्रण। स्पिवाक: महिला बजारमे वस्तु केर रूपमे। ४५. बेचन ठाकुर गीत रस-ध्वनि: बेचन ठाकुर केर गीत - शृंगार+हास्य। लोक-नाट्य परम्पराक निरन्तरता। ४६. रमण कुमार सिंह दिल्लीमे... रस-ध्वनि: 'दिल्लीमे...' - करुण+व्यंग्य। बूर्द्यू केर महानगरीय क्षेत्र - दिल्लीमे मैथिली प्रवासी केर विस्थापन। ४७. विद्यानन्द झा 'विदू' हमर मिथिला / दहेज रस-ध्वनि: 'हमर मिथिला' - वात्सल्य+शान्त। मिथिला प्रेम। 'दहेज' - रौद्र+करुण। दहेज प्रथा केर विरोधी कविता। ४८. इन्दु भूषण कुमार सफलता हमर रानी / दहेज रस-ध्वनि: 'सफलता हमर रानी'- हास्य+व्यंग्य। सफलता केर व्यंग्यपूर्ण चित्रण। 'दहेज' - रौद्र+करुण - दहेज विरोधी। ४९. विवेकानन्द झा नोरमे अछि बेस संभावना / हे सिंगरहार / खत्म करऽ चाहैत छी जिनगी / हम / हाइकू-शेनर्यू परिचय: विवेकानन्द झा - ३०+ कविता। गजेन्द्र ठाकुर विशेष रूपसँ उनकर 'हम कविता' आ 'हमही अहाँक फूलडाली सँ उझकि कऽ खसल कनेर' केर उद्धरण करैत छथि। 'खत्म करऽ चाहैत छी जिनगी' विशेष विश्लेषण: ई कविता अस्तित्वगत संकट केर प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति थिक। करुण+रौद्र। कामू केर 'केवल एक गम्भीर दार्शनिक समस्या अछि'- अल्बर्ट कामूक 'द मिथ ऑफ सिसिफस' निबंधमे जीवनक निरर्थकताक बादो जीबाक संघर्ष केँ एकमात्र गंभीर दार्शनिक प्रश्न मानल गेल अछि। ई दर्शन मानैत अछि जे मानव जीवनमे अर्थक खोज आ ब्रह्मांडक द्वारा ओकरापर ध्यान नै देनाइ, ऐ दुनूकक बीच ढुइस 'एब्सर्ड' (विसंगति) अछि, से एकरा आत्महत्याक बदला उत्साह सँ जीबाक चाही। ई कविता मैथिलीमे सेहो गम्भीरता सँ लेल गेल अछि। ध्वनि: 'खत्म करबाक' इच्छा केर अभिव्यक्ति एकटा जीवित रहबाक कार्य अछि - जोर सँ कहनाइ ओकरा रोकैत अछि। रस-ध्वनि: 'नोरमे अछि बेस संभावना'- करुण+वीर। ध्वनि: नोर = सम्भावना केर बीज - ग्राम्शी केर 'बुद्धिक निराशावाद, इच्छा केर आशावाद'। 'हे सिंगरहार'- शृंगार+करुण। 'हम' - केवल आत्म-दृढ़ोक्ति। हाइडेगर / प्रामाणिकता: विवेकानन्द झा केर कविताक केवल मात्रा + विस्तार हाइडेगरक 'प्रामाणिक अस्तित्व' केर प्रदर्शन करैत अछि - अपन सब आयाममे जीवन सँ पूर्ण रूपसँ जुड़ल। शेष कविता - हाइकू-शेनयू शृंखला): हाइकू आ शेनर्यू (जापानी शैली) केर अनेक सङ्कलन- प्रकृति, ऋतु, क्षण केर बिम्ब। मैथिलीमे जापानी शैली केर सफल प्रयोग। ५१. रोशन झा हाइकू-गजल रस-ध्वनि: हाइकू-गजल संकर शैली - हाइकू केर संक्षिप्तता + गजल केर रदीफ-काफिया संरचना। ५२. प्रबीण चौधरी 'प्रतीक' हाइकू-गजल रस-ध्वनि: हाइकू-गजल संकर शैली केर निरन्तरता। ५३. सुभाष चन्द्र क्षणिका रस-ध्वनि: क्षणिका - शुद्ध अल्पतमवाद। एक क्षण केर सम्पूर्ण बिम्ब। ५४. रवीन्द्र कुमार दास क्षणिका रस-ध्वनि: क्षणिका - क्षण केर बिम्ब। प्रकृति चित्रण। ५५. कुसुम ठाकुर हाइकू-शेनयू रस-ध्वनि: हाइकू-शेनर्यू - स्त्री दृष्टिकोण सँ हाइकू। ५६. रमाकान्त झा 'सौराठ' घर ने पथार रस-ध्वनि: 'घर ने पथार अछि टूटल मरैया'- करुण। टूटल घर केर रूपक - परिवारिक विघटन। ५७. मृदुला प्रधान एकटा आपबीती / गणतन्त्र दिवस / यमुनाजी रस-ध्वनि: 'कतए गेल गणतन्त्र दिवस'- रौद्र+व्यंग्य। गणतन्त्र दिवस केर विलाप। 'यमुनाजी'- पारिस्थितिकीय- यमुना केर रूपमे मरैत देवी। 'एकटा आपबीती'- व्यक्तिगत आख्यान - स्त्री संघर्ष केर कथा। ५८. प्रवीण कश्यप आच्छादन रस-ध्वनि: 'आच्छादन'- शान्त। भावनात्मक आवरण केर रूपक। ५९. अरविन्द ठाकुर आजाद गजल रस-ध्वनि: 'आजाद गजल' (मुक्त गजल) - अरविन्द ठाकुर विदेह गजल आन्दोलन केर भाग। बिना बहर केर गजल - शैलीगत स्वतन्त्रता। ६०. धीरेन्द्र कुमार हमर गाम रस-ध्वनि: 'हमर गाम' - वात्सल्य+शान्त। गाम प्रेम केर कविता- मिथिलाक ग्रामीण जीवन केर चित्रण। ६१. अखिलेश कुमार मंडल ट्रेनक चोरबा रस-ध्वनि: 'ट्रेनक चोरबा' (ट्रेन केर चोर) - हास्य+व्यंग्य। काफ्कीय अर्थहीनता। ६२. कालीनाथ ठाकुर कुण्डलिया १-७ (अभिशाप बापक पाप) रस-ध्वनि: 'अभिशाप बापक पाप कुण्डलिया १-७- करुण+रौद्र। पिता केर श्राप विषय शास्त्रीय कुण्डलिया शैलीमे। शास्त्रीय शैली + समकालीन विषय। ६३. सत्यानन्द पाठक आह! जाड़ चलि गेल! रस-ध्वनि: 'जाड़ गेल'- शान्त+करुण। ऋतु परिवर्तन केर रूपक - जीवन केर परिवर्तन। ६४. दयाकान्त मैथिल रस-ध्वनि: 'मैथिल'- वीर रस। मैथिल अस्मिता केर गौरवगान। ६५. रमेश गद्य कविता रस-ध्वनि: गद्य कविता - शान्त+बौद्धिक। गद्य केर शैलीमे काव्यात्मकता - शैलीगत प्रयोग। ६६. शिवशंकर सिंह ठाकुर रुबाइ-गजल रस-ध्वनि: रुबाइ (अरबी प्रेम-विलाप शैली) + गजल । शृंगार+करुण। ६७. इरा मल्लिक भोर भेलै- हाइकू/ शेनर्यू/ टनका रस-ध्वनि: 'आँखि सुतल नै राति भरि'- करुण+शान्त। निद्राहीनता अस्तित्वगत अवस्था केर रूपमे। बहु-शैली: हाइकू + टनका + शेनर्यू। ६८. विनीता झा हम छी बुद्धिक थोड़ रस-ध्वनि: 'बुद्धिक थोड़'- शान्त+व्यंग्य। अपन बुद्धि केर अभाव पर आत्म-व्यंग्य। ६९. अक्षय कुमार चौधरी वाणिक लैस रस-ध्वनि: 'वाणिक लैस'- उत्तराहा-दखिनाहा पर व्यंग्य। ७०. जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल' गजल १-१२ विशेष: 'अनिल' केर बारह गजल - विदेह गजल आन्दोलन केर आधारशिला सभमे एक। बाख्तिन संवादवाद: सभ शेरमे एक वार्तालाप- कवि अपना सँ, प्रिय सँ, समाज सँ। शृंगार-वियोग प्रधान मुदा दार्शनिक गहराई पर्याप्त अछि। रदीफ-काफिया वास्तुकला। ७१. विकास झा ‘रंजन’ नजरि रस-ध्वनि: 'नजरि' (नजर/दृष्टि) - शान्त+शृंगार। प्रिय केर दृष्टि केर वर्णन। ७२. अनिल मल्लिक गीत / आजाद गजल रस-ध्वनि: गीत आ आजाद गजल - शृंगार+करुण। प्रेम आ वियोग केर दोहरा स्वर। ७३. आनन्द झा 'मैथिल' पंचैती रस-ध्वनि: 'पंचैती' (पञ्चायत) - व्यंग्य+रौद्र। ग्राम पञ्चायत केर व्यंग्यपूर्ण चित्रण। ७४. प्रभात राय भट्ट सीता माएक गाम रस-ध्वनि: 'सीता माएक गाम' (सीता माई केर गाम - जनकपुर) - वीर+भक्ति। सीता केर मिथिला/ जनकपुर केर रूपमे मैथिली तीर्थ। ७५. अमित मोहन झा कोना जीवन बिततै रस-ध्वनि: 'जीवन' (जीवन) - शान्त+करुण। जीवन केर दार्शनिक चिन्तन। ७६. गुलसारिका बहिना-फूल रस-ध्वनि: 'जाहि बयस हमर बहिना फूल लोढ़ै छलीह' - करुण+वात्सल्य। बेन्यामिन: बचपन केर स्मृति केर रूपमे मुक्तिदायी बिम्ब। ७७. भावना नवीन आजाद गजल १-४ रस-ध्वनि: आजाद गजल- नारी गजल स्वर। शृंगार+वियोग। स्पिवाक: महिला परम्परागत रूपसँ पुरुष-प्रधान गजल शैलीमे प्रवेश करैत अछि। ७८. मिहिर झा रुबाइ / कसीदा / गजल/ बन्द / टनका / हाइकू / शेनर्यू विशेष: गजेन्द्र ठाकुर विशेष रूपसँ उल्लेख करैत छथि - मिहिर झाक रुबाइ 'छेद भेल करेज मे शराब कोना राखी' मैथिलीक श्रेष्ठ रुबाइ सभमे सँ अछि। रुबाइ = अरबी प्रेम-विलाप शैली। ध्वनि: 'छेद भेल करेज' (छेद भेल हृदय) + 'शराब' = सूफी आध्यात्म-दर्शन: छेदल हृदय = आध्यात्मिक रूपसँ ग्रहणशील; शराब = दैवी प्रेम। मिहिर केर बहुविध विस्तार (रुबाइ+बन्द+कसीदा+टनका+हाइकू+शेनर्यू+गजल)- सदेह ७ केर सबसँ व्यापक शैलीगत विस्तार। ७९. डॉ. शशिधर कुमार की इएह कहाबैछ सुन्नरता?? रस-ध्वनि: 'सुन्दरता?' - शान्त+व्यंग्य। सुन्दरता केर परिभाषा पर प्रश्नचिह्न। ८०. अमरेन्द्र कुमार मिश्र नेता रस-ध्वनि: 'नेता'- हास्य+रौद्र। नेता केर व्यंग्यपूर्ण चित्रण - राजनीति पर व्यंग्य। ८१. सुबोध झा शाइरी रस-ध्वनि: 'शाइरी' - शृंगार+करुण। उर्दू शायरी परम्परा मैथिलीमे। ८२. मो. गुल हसन किसानमे बकलेल रस-ध्वनि: 'सभटा किसानमे हमहीं बकलेल...'- मुस्लिम मैथिली कवि किसान सँ अस्मिता जतावैत। 'बकलेल' (अचम्भित/असमञ्जस) = व्यक्तिगत + सामुदायिक दशा दुनू। बूर्द्यू: ब्राह्मण-प्रधान मैथिली साहित्यिक क्षेत्रमे मुस्लिम स्वर। ई विदेह केर बहुलवादी मान्य-परम्परा केर प्रमाण थिक। ८३. प्रीति प्रिया झा बेटी रस-ध्वनि: 'बेटी' - वात्सल्य+वीर। बेटी केर जन्म केर उत्सव + बेटी केर अधिकार केर माँग। ८४. पवन कुमार साह प्रेम-गीत रस-ध्वनि: 'प्रेम-गीत' - शृंगार रस। परम्परागत प्रेम गीत शैली। ८५. स्तुति नारायण मन पड़ैत रस-ध्वनि: 'मन पड़ैत'- शान्त+शृंगार। मन केर अवस्था केर चित्रण। ८६. स्वाती शाकम्भरी पिताजी रस-ध्वनि: 'पिताजी' - वात्सल्य (उल्टा: बेटी केर पिता प्रति श्रद्धांजलि)। ध्वनि: पैतृक प्रेम - वर्ड्सवर्थ केर स्मृति-धब्बा। ८७. अरविन्द रंजन दास क्षणिका रस-ध्वनि: क्षणिका - क्षण केर बिम्ब। प्रकृति चित्रण केर शृंखला। ८८. बि.पि.उदासी जिबनक आहार रस-ध्वनि: 'जिबनक आहार'- शान्त+करुण। जीवन केर पोषण केर रूपक। ८९. प्रमोद रंगीले देखियौ रस-ध्वनि: 'देखियौ'- शान्त+व्यंग्य। सामाजिक आदत सभ पर व्यंग्य। ९०. रवि मिश्र 'भारद्वाज' अन्तिम क्षण / मतदान / आजाद गजल रस-ध्वनि: 'अन्तिम क्षण' - करुण+शान्त। मृत्यु केर क्षण केर चिन्तन। 'मतदान' - वीर+व्यंग्य। लोकतन्त्र केर मतदान पर व्यंग्य। आजाद गजल - शृंगार+करुण। ९१. मधुपनाथ झा धरती खिसियाएल रस-ध्वनि: 'धरती खिसियाएल'- रौद्र+करुण। पारिस्थितिकीय क्रोध - पर्यावरण प्रदूषण पर कविता। ९२. बृषेश चन्द्र लाल टनका / हाइकू रस-ध्वनि: टनका (जापानी ५-७-५-७-७ शैली) + हाइकू। नेपाली राजनैतिक कवि - प्रकृति चित्रण केर माध्यमसँ राजनीति। ९३. आशुतोष मिश्र गीत / गजल रस-ध्वनि: गीत आ गजल - शृंगार रस। प्रेम आ वियोग केर दोहरा स्वर। ९४. इप्सिता सारंगी हिलकोर (ओडिया कविता) - मैथिली अनुवाद रस-ध्वनि: 'हिलकोर' (लहर/तरङ्ग) - ओडिया मूल + मैथिली अनुवाद। ध्वनि: ई ओडिया काव्य संवेदनशीलता केर मैथिलीमे अनुवाद। बेन्यामिन: एक अन्य भाषिक परवर्ती जीवन। स्त्रीवादी (बटलर): 'लैङ्गिकता' केर विघटन। पारिस्थितिकीय-स्त्रीवादी: प्रकृति, 'छोट बुच्ची' सँ नारी मन। ९५. मनोज कुमार झा शासक लोकनिसँ रस-ध्वनि: 'शासक लोकनिसँ'- व्यंग्य+रौद्र। शासक वर्ग केर व्यंग्यपूर्ण चित्रण - सत्ता विरोधी कविता। ९६. शान्तिलक्ष्मी चौधरी हाइकू / गजल / गद्य रस-ध्वनि: 'तिलकोर, बथुआक तीमन' (तिलकोर, बथुआ केर तीमन) - साधारण रसोई सामग्री केर रूपमे काव्य विषय। ई 'साधारण-के-रूपमे-पवित्र': घरेलू साग सब्जी कवितामे उन्नत। स्त्रीवादी: महिलाक रसोई स्थान केर रूपमे साहित्यिक स्थान। ९७. शिव कुमार झा 'टिल्लू' हाइकू रस-ध्वनि: टिल्लू केर हाइकू - शान्त+शृंगार। क्षणिक बिम्ब सभक शृंखला। ९८. नवीन ठाकुर अन्त / अनुभव रस-ध्वनि: 'अन्त' - शान्त+करुण। अन्त केर चिन्तन। 'अनुभव' - शान्त+बौद्धिक। जीवन केर अनुभव केर काव्यात्मक चित्रण। ९९. डॉ. अरुण कुमार सिंह सोधनपाल रस-ध्वनि: 'सोधनपाल' (शोधन-पाल/शोधक) - शान्त+बौद्धिक। शोध केर कविता - ज्ञान केर खोज। १००. कुन्दन कुमार आँखि झूठ नै रस-ध्वनि: 'आँखि झूठ नै'- शान्त+दार्शनिक। प्रत्यक्ष प्रमाण केर बारेमे - नव्य-न्याय केर 'प्रत्यक्ष' सँ सम्बन्धित। १०१. झा हेमन्त बापी माधुरी / नारी / दानव रस-ध्वनि: 'माधुरी' - शृंगार। 'नारी' - स्त्री केर चित्रण। 'दानव' - रौद्र। तीनू विविध स्वर - नारी केर माधुर्य सँ दानवीयता धरि। १०२. राहुल राही हमर प्रियतम रस-ध्वनि: 'हमर प्रियतम'- शृंगार रस। प्रियतम केर वर्णन। १०३. जवाहर लाल कश्यप छी धन्य हमर मिथिला रस-ध्वनि: 'छी धन्य हमर मिथिला'- वीर+भक्ति। मिथिला केर गौरवगान। १०४. अच्छेलाल शास्त्री की देख रहल रस-ध्वनि: 'की देख रहल'- अद्भुत+शान्त। दर्शन केर रहस्य पर प्रश्न। १०५. सत्यनारायण झा गंगाकात रस-ध्वनि: 'गंगाकात'- भक्ति+शान्त। गंगा स्नान केर भक्ति कविता। १०६. शिवशंकर श्रीनिवास गीत रस-ध्वनि: गीत - शृंगार रस। परम्परागत गीत शैली। १०७. विनीत उत्पल राजनीति / बेटी / गजल रस-ध्वनि: 'राजनीति'- व्यंग्य+रौद्र। राजनीति पर व्यंग्य। 'बेटी' - वात्सल्य+वीर। बेटी केर अधिकार। गजल - शृंगार+करुण। १०८. निक्की प्रियदर्शिनी मत्स्य / समाज रस-ध्वनि: 'मत्स्य' (माछ) - पारिस्थितिकीय। माछ केर रूपक - मिथिला प्रतीक। 'समाज' - व्यंग्य+रौद्र। समाज केर व्यंग्यपूर्ण चित्रण। १०९. नारायण झा सरकार / जाड़ रस-ध्वनि: 'सरकार' - व्यंग्य+रौद्र। सरकार पर व्यंग्य। 'जाड़' (जाड़) - शान्त+करुण। ऋतु चित्रण। ११०. गणेश कुमार झा 'बावरा' काका / संघर्ष रस-ध्वनि: 'काका' - हास्य+करुण। काका व्यक्तित्व केर चित्रण। 'संघर्ष' - वीर रस। जीवन केर संघर्ष केर कविता। १११. परिचय दास बेसीकाल शब्द जखन (भोजपुरी कविता) - मैथिली अनुवाद रस-ध्वनि: 'बेसीकाल शब्द जखन' - शान्त+व्यंग्य। भोजपुरी मूल + मैथिली अनुवाद। ध्वनि: 'बेसीकाल शब्द' (बहुत शब्द) - कहियो मौन शब्द सँ बेसी कहैत अछि? बिहार केर भाषा सभक बीच अन्तर-भाषिक एकता। ११२. स्वाती लाल गजल रस-ध्वनि: गजल - शृंगार+करुण। स्त्री गजलकार - प्रेम आ वियोग केर स्त्री दृष्टिकोण। ११३. मुकुन्द मयंक गजल रस-ध्वनि: गजल - शृंगार रस। प्रेम केर कविता। ११४. आशीष अनचिन्हार बन्द / कता / नात / सेनूरदान (सूफी शैली) विशेष: 'बन्द' (फारसी: बन्द/मुद्रित सम्पूर्ण पद्य) + 'कता' (फारसी: अंश/खण्ड) + 'नात' (अरबी: पैगम्बर केर प्रशंसा) + 'सोझ बाट पर चलैत-चलैत' + 'सेनूरदानक गीत' - ई विस्तार विदेह गजल आन्दोलन केर व्यापकता प्रदर्शित करैत अछि। मैथिलीमे सूफी साहित्यिक शैली = अन्तर-सभ्यता साहित्यिक वार्तालाप। रस-ध्वनि: 'नात' - भक्ति रस (इस्लामी भक्ति)। 'बन्द' - शान्त+शृंगार। 'सेनूरदानक गीत' - विवाह संस्कार गीत - लोक परम्पराक निरन्तरता। ११५. पवन झा 'अग्निवाण' चलियौ अपन गाम, सीताक धाम रस-ध्वनि: 'चलियौ अपन गाम, सीताक धाम' (चलियौ अपन गाम, सीताक धाम - जनकपुर) - वीर+भक्ति। सीता केर जनकपुर केर रूपमे मैथिली तीर्थयात्रा। ११६. प्रवीण नारायण चौधरी सस्ता कविता रस-ध्वनि: 'सभसँ सस्ता कविता!'- हास्य+व्यंग्य। आत्म-कविता - कविता केर अवमूल्यन पर कविता। ११७. संजीव कुमार 'शमा' प्रतिदीप रस-ध्वनि: 'प्रतिदीप' - वीर। प्रतिरोध प्रतीक - अन्धकार में एक दीप जेरिया जगबैत अछि। ११८. सुधीर कुमार 'सुमन' समए रस-ध्वनि: 'समए' (समय) - शान्त। अस्तित्वगत - समय केर चिन्तन। ११९. उपेन्द्र नारायण 'अनुपम' परदेसिया प्रियतम रस-ध्वनि: 'परदेसिया प्रियतम' (परदेशी प्रियतम) - करुण+शृंगार। प्रवासी प्रियतम - विस्थापन आ लालसा केर कविता। १२०. डॉ. शिव कुमार प्रसाद निर्मली रस-ध्वनि: 'निर्मलीक निर्मलतामे'- शान्त। शुद्धता केर कविता। १२१. प्रो. राजकुमार नीलकंठ श्रद्धा रस-ध्वनि: 'श्रद्धा' - भक्ति रस। श्रद्धा केर कविता - धार्मिक भावना। १२२. राजदेव मंडल देश-गीत / जुलूसक पछुआ / असल मरद / पोसा परबा / कलीक पात / कुहेस / जय हे किसान (९ कविता) रस-ध्वनि: 'जय हे किसान' - वीर+करुण। किसान केर गान। 'कुहेस'- शान्त। पारिस्थितिकीय। 'पोसा परबा'- वात्सल्य। पशु-मानव बन्धन। 'असल मरद'- व्यंग्य। पुल्लिंगता समीक्षा। ध्वनि: 'जुलूसक पछुआ' = बिना सोचल चलयबला सभ। १२३. जगदीश प्रसाद मंडल जारनिबिछनी / दिन-राइतक खेल / घोड़ मन / मन-मणि / संझ / रहसा चौर / गीत १-६ (१६ रचना) विशेष: जगदीश प्रसाद मंडल केर १६ कविता/गीत = दलित चरवाही कविता अपन सबसँ समग्र रूपमे। रस-ध्वनि: 'जारनिबिछनी' - रौद्र+पारिस्थितिकीय। 'घोड़ मन' (घोड़ा मन) - अद्भुत। अदम्य कल्पना। 'रहसा चौर' - शान्त। विशिष्ट मिथिला स्थान-नाम केर कविता। गीत १-६: लोक निरन्तरता। 'मन-मणि' (मन-रत्न) - शान्त+दार्शनिक। 'संझ' (साँझ) - शान्त+करुण। १२४. मुन्नी कामत बेटी / दहेज / संकल्प रस-ध्वनि: 'बेटी' - वात्सल्य+वीर। बेटी केर अधिकार। 'दहेज' - रौद्र+करुण। दहेज विरोधी। 'संकल्प' - वीर। संकल्प केर कविता। १२५. सुनील कुमार झा टनका / गजल रस-ध्वनि: टनका (जापानी शैली) + गजल - संकर शैली। शृंगार+शान्त। १२६. जगदानन्द झा 'मनु' हजल / रुबाइ / गजल रस-ध्वनि: हजल + रुबाइ + गजल। हजल = हास्य/व्यंग्य गजल - विदेह केर मैथिलीमे विस्तार। १२७. कुन्दन कुमार कर्ण गजल रस-ध्वनि: गजल - शृंगार रस। प्रेम केर कविता। १२८. अमित मिश्र हजल / गजल रस-ध्वनि: हजल+ गजल। हास्य आ शृंगार केर मिश्रण। १२९. चन्दन कुमार झा रुबाइ / हजल / गजल रस-ध्वनि: रुबाइ (अरबी प्रेम-विलाप) + हज + गजल - तीनू शैली केर मिश्रण। १३०. रूबी झा गजल रस-ध्वनि: गजल - शृंगार रस। प्रेम केर कविता। १३१. अनुप्रिया योग क्षणिका रस-ध्वनि: क्षणिका - शान्त रस। योग केर अनुभव केर काव्यात्मक चित्रण। १३२. सद्रे आलम गौहर गजल / ईद रस-ध्वनि: 'मैथिल सभकेँ ईद मुबारक' - मैथिलीमे मुस्लिम सन्देश = अन्तर-समुदाय एकता। 'अन्ना हजारेसँ अनसन तोड़बाक अनुरोध'- अन्ना हजारे आन्दोलन पर राजनैतिक कविता। बूर्द्यू: मैथिलीमे मुस्लिम स्वर अपन नागरिकता केर दृढ़ोक्ति करैत। १३३. बिनोद मिश्र प्रेम पुष्प रस-ध्वनि: 'प्रेम पुष्प'- शृंगार रस। प्रेम केर फूल केर रूपक। १३४. रामदेव प्रसाद मंडल 'झारूदार' झारू विधा विशेष: 'झारू' = एक विशिष्ट मैथिली लोक प्रदर्शनात्मक शैली। गजेन्द्र ठाकुर झारूदार केँ 'मैथिलीक भिखारी ठाकुर' कहैत छथि। 'झारू' शैली = लोक आख्यान प्रदर्शन जाहिमे सामाजिक समीक्षा अन्तर्निहित अछि। मौखिक परम्परा। बेन्यामिन: मौखिक प्रदर्शन केर पाठ्य संरक्षण। रस-ध्वनि: 'झारू' - हास्य+व्यंग्य। लोक-शैली - सामाजिक समीक्षा केर सशक्त माध्यम। १३५. ओमप्रकाश झा रुबाइ / गजल रस-ध्वनि: रुबाइ + गजल - प्रेम विलाप आ प्रेम गीत केर संगम। १३६. त्रिपुरारी शर्मा आजाद गजल रस-ध्वनि: आजाद गजल (मुक्त गजल) - शृंगार+करुण। शैलीगत स्वतन्त्रता। १३७. राजीव रंजन मिश्र भक्ति गजल १-३ विशेष: 'भक्ति गजल' - अद्वितीय शैली: भक्ति कविता + गजल संरचना। भक्ति रस + शृंगार-वियोग। ई सूफी-भक्ति संश्लेषण मैथिली गजलमे - मीराबाईक शैली सँ मिलैत। रस-ध्वनि: भक्ति रस + शृंगार। दैवी प्रेम केरूपमे भक्ति। १३८. दीप नारायण विद्यार्थी आजाद गजल रस-ध्वनि: आजाद गजल - शृंगार+करुण। प्रेम आ वियोग केर मुक्त गजल। १३९. उमेश मंडल भोगी / श्रोता रस-ध्वनि: 'भोगी' (भोगी) - शृंगार+शान्त। भोग केर कविता। 'श्रोता' (श्रोता) - शान्त। सुनबाक कला केर कविता। १४०. उमेश पासवान गवहा संक्रान्ति रस-ध्वनि: 'गवहा संक्रान्ति' (दलित दृष्टिकोण सँ मकर संक्रान्ति) - करुण+वीर। अम्बेडकर: हिन्दू पर्व दलित द्वारा भिन्न अनुभव कएल जाइत अछि। ई संक्रान्ति कविता अधीनस्थ स्थिति सँ। १४१. संजय कुमार मंडल मीता / परदेसिया रस-ध्वनि: 'मीता' (मीत) - मधुर रस। मित्रता केर कविता। 'परदेसिया' (परदेशी) - करुण+शृंगार। प्रवासी प्रियतम। १४२. रूपेश कुमार झा 'त्योंथ' नेता / खाएब रस-ध्वनि: 'हम छी आजुक नेता' (हम छी आजुक नेता) - हास्य+रौद्र। राजनेता सीधे बजैत - ई बाख्तिनिय उत्सवी-लोकधर्मी: राजनेता अपन शब्द सँ उजागर। १४३. कामोद झा किओ नै रस-ध्वनि: 'किओ नै' (केओ नहि) - करुण+शान्त। एकान्तता केर कविता - केओ नहि अछि। १४४. कपिलेश्वर राउत मातृभाषा रस-ध्वनि: 'मातृभाषा'- वीर+शान्त। कवि मातृभाषा केर दावा करैत। ध्वनि: मातृभाषा केर रूपमे मैथिली एक राजनैतिक दावा अछि। अम्बेडकर: भाषा = अस्मिता = सम्मान। १४५. जीबू कुमार झा प्रार्थना रस-ध्वनि: 'प्रार्थना' - भक्ति रस। प्रार्थना केर कविता - ईश्वर सँ विनती। १४६. अनामिका राज नवका बाट रस-ध्वनि: 'नवका बाट' (नवका बाट/नव पथ) - वीर+शान्त। नव पथ केर खोज - बदलाव केर कविता। १४७. प्रो. चम्पा शर्मा स्नेह-भरल सनेस (डोगरी कविता) - मैथिली अनुवाद रस-ध्वनि: 'स्नेह-भरल सनेस' (स्नेह-भरल सन्देश) - वात्सल्य+शान्त। डोगरी मूल + मैथिली अनुवाद। ध्वनि: प्रेम सन्देश भाषिक सीमा पार। बेन्यामिन: क्षेत्रीय भाषा एकता। ई विदेह केर अखिल-भारतीय विस्तार केर प्रदर्शन करैत अछि। १४८. मोहन प्रसाद नव मिथिला रस-ध्वनि: 'नव मिथिला' - वीर+शान्त। नव मिथिला केर सपना - पुनर्निर्माण केर कविता। १४९. नगीना कुमारी झा साहस / दहेज रस-ध्वनि: 'साहस' - वीर रस। साहस केर कविता। 'दहेज' - रौद्र+करुण। दहेज विरोधी - स्त्री दृष्टिकोण। १५०. लालबाबू मंडल जुलूस रस-ध्वनि: 'जुलूस' (जुलूस)- वीर+रौद्र। प्रदर्शन/जुलूस केर कविता - सामूहिक आवाज। १५१. संदीप कुमार साफी भकजोगनी रस-ध्वनि: 'भकजोगनी'- अद्भुत+रौद्र। लोक विश्वास केर कविता। सदेह ७ केर समग्र उपसंहार सदेह ७ मैथिली पद्य - ई शृंखलाक सबसँ वृहद् खण्ड: ६२४ पृष्ठ, १५१ साहित्यकार। ई केवल संकलन नहि, ई एक सम्पूर्ण मैथिली काव्य ब्रह्माण्ड थिक। विधागत समृद्धि: कविता + गीत + गजल + आजाद गजल + भक्ति-गजल + हजल + रुबाइ + कता + नात + बन्द + कसीदा + हाइकू + टनका + शेनर्यू + हैबून + कुण्डलिया + झारू + क्षणिका + गद्य-कविता - १९ काव्य-विधा। अनूदित: तेलुगु, ओडिया, भोजपुरी, डोगरी - ४ भाषा। आवाज-विविधता: दलित कवि (रवि भूषण पाठक, जगदीश प्रसाद मंडल, उमेश पासवान, कपिलेश्वर राउत, रामदेव प्रसाद मण्डल 'झारूदार'), मुस्लिम कवि (मो. गुल हसन, सद्रेआलम गौहर), नारी कवि (शेफालिका वर्मा, कामिनी कामायनी, ज्योति सुनीत चौधरी, मृदुला प्रधान, इरा मल्लिक, मुन्नी कामत, नगीना कुमारी झा, भावना नवीन), प्रवासी (ज्योति चौधरी, प्रभात राय भट्ट, झा हेमन्त ’बापी’), नेपाली+ शास्त्रीय विद्वान। चारि ढाँचा केर संश्लेषण: रस सिद्धान्त पद्यमे सबसँ स्वाभाविक रूपसँ सक्रिय - प्रत्येक कवि केर प्राथमिक रस पहिचान होइत अछि। पाश्चात्य सिद्धान्त (ग्राम्शी, स्पिवाक, बाख्तिन, फानन, अम्बेडकर, बेन्यामिन, कामू, हाइडेगर) सभ कविता केर राजनैतिक-दार्शनिक गहराई उजागर करैत अछि। नव्य-न्याय कविताक ज्ञान-मीमांसीय संरचना केर परीक्षण करैत अछि। विदेह समानान्तर इतिहास ढाँचा सुनिश्चित करैत अछि जे ई सब स्वर - मान्य-परम्परागत आ प्रति-मान्य-परम्परागत - एक लोकतान्त्रिक साहित्यिक पुरालेखमे स्थान पबैत अछि। -Gajendra Thakur, editor, Videha [be part of Videha www.videha.co.in JOIN VIDEHA WHATSAPP CHANNEL JOIN VIDEHA ARATTAI CHANNEL ] -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp/ Arattai no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.२.अंक ४४४ पर टिप्पणी आशीष अनचिन्हार
सुरेन्द्र लाभजीक नाटक नीक विषयपर छनि। अहिना लाभजी लिखैत रहथि तऽ नीक। लालदेव कामतजीक आत्मसंस्मरण नीक विषय लेने अछि। मैथिली लेखक सभमे जे राजनेता सभ छथि तिनका सभ लेल ई नीक रस्ता रहत। "गोदी मीडिया"पर प्रणव झाक पद्य नीक अछि। प्रणव कुमार झा संतोष कुमार राय 'बटोही' क धारावाहिक डायरी मे किछू तथ्यात्मक (फेक्चुयल) त्रुटि बुझाइत अछि। २०१९ क चुनाव काल मे 'वोट चोरी' कुनु पैघ मुद्दा नै छल, बल्कि 'चौकीदार चोर अछि' (राफेल डील आ अन्य मुद्दाक संदर्भ मे) एकटा पैघ मुद्दा छल। संगे, इलेक्टोरल बॉन्ड क मुद्दा मुख्य रूप सँ सिविल सोसायटी, एनजीओ आ किछू विपक्षी दलक तरफ सँ उठाओल जा रहल छल। जँ किसान क 'काले कानून' क बात कयल जाय, तँ ओ २०२० मे कोरोना कालक दौरान अध्यादेशक माध्यम सँ आनल गेल छल आ किसान आंदोलन ओकरा बादे शुरू भेल छल। ई बात एकदम सही अछि जे कोरोना महामारी मे बेसी मृत्यु अस्पताल मे भेल आ घर पर कयल गेल इलाज बेसी कारगर बुझायल। एकर पाछाँ मुख्य रूप सँ तीनटा कारण छल: १. अस्पताल मे अत्यंत गंभीर रोगी केँ दाखिला कयल जाइत छल। २. अस्पताल सभ मे संक्रमण क खतरा बहुत बेसी बढ़ि गेल छल। ३. घर पर भेल बहुत रास मृत्यु क गणना (काउंटिंग) प्राकृतिक या अन्य सामान्य मृत्युक रूप मे भऽ गेल। ईहो सत्य अछि जे अन्य क्षेत्र जकाँ स्वास्थ्य क्षेत्र मे हूबहू भ्रष्टाचार व्याप्त अछि, जे आम जनता केँ नीक स्वास्थ्य सेवा भेटबा मे पैघ बाधक अछि। नेशनल रुरल हेल्थ मिशन (NRHM) क भ्रष्टाचार सँ लऽ कऽ आयुष्मान भारत बीमा योजना धरिक गड़बड़ी एकर प्रत्यक्ष गवाह अछि। मुदा एकर एकटा आर प्रमुख कारण स्वास्थ्य बजटक पर्याप्त नै होनाइ अछि। भारत सन गरीब आबादी बला देश मे स्वास्थ्य लेल केंद्रीय बजट कम सँ कम ३% तँ हेबेक चाहि, जे वर्तमान मे मात्र १.६% अछि। आजुक तारीख मे देश क लगभग ७०% चिकित्सा व्यवस्था निजी (प्राइवेट) हाथ मे अछि, आ निजी क्षेत्रक प्राथमिक उद्देश्य 'मुनाफा कमाइब' (प्रॉफिट मेकिंग) होइत अछि। धनक एहि लालसा मे ई उद्देश्य भ्रष्ट भऽ कऽ अनैतिक आचरण मे सेहो लिप्त भऽ जाइत अछि। राजदेव मण्डल क कथा 'प्रतीक्षक पीड़ा' सबालटर्न साहित्यक रूप मे नीक लागल। 'सेतुषाम' पुस्तक मे कैलाश कुमार ठाकुरक आलोचना केँ 'विदेह' क टीम खूब सकारात्मकताक संग पटल पर अनने अछि। 'विदेह' लगातार नव-नवाचार (इन्नोवेशन) कऽ रहल अछि। पहिने एकर लेआउट केँ आधुनिक आ बेसी यूजर-फ्रेंडली बनाओल गेल, आ अबैत समय मे एहि मे विभिन्न टूल सहित मैथिली ऑडियो-वीडियो संकलनक जुड़ाव सेहो शुरू भेल। एहि बेर देवनागरी-तिरहुता लिपि कन्वर्टरक उपयोग हमहू कऽ के देखलहुँ अछि, आ अपन एकटा मैथिली कविता के मिथिलाक्षर मे कन्वर्ट कऽ के पठा रहल छी।। एकरा अलावा मैथिली थेसॉरस, क्विज, ब्रेल लिपि कन्वर्टरक सुविधा सेहो उपलब्ध अछि। 'पञ्जी प्रबन्ध भाग ३' लेल सेहो विदेह टीम क तरफ सँ लोक सब सँ जानकारी जुटाओल जा रहल अछि। अस्तु, एहन कार्य सभ लेल विदेहक टीम केँ अशेष शुभकामना। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। गद्य Prose २.१. हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२४ २.२. कल्पना झा- मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-५ २.३. डा. किशन कारीगर- गिनिज वर्ल्ड नाम त हम पुर पुर पादब (हास्य कथा) २.४. लाल देव कामत- कलंक : एक पोथी चर्चा २.५. लाल देव कामत पहिल लोक 'उपन्यासक' आलोचनात्मक अध्ययन २.६. लाल देव कामत- पाठकीयता 'हमर ई मोन कहैए' २.७. आचार्य रामानंद मंडल- पोथी समीक्षा: लखिमा की आंखें/ फिल्म विद्यापति (1937) समीक्षा २.८. प्रीति कुमारी- श्री जगदीश प्रसाद मंडल'क साहित्यके अनुदीत प्रसार : एक सिंहावलोकन २.९. संतोष कुमार राय 'बटोही'- लघुकथा - कलेक्टरनी २.१०. गजेन्द्र ठाकुर- गोहि सभक बीच जल समाधि (मैथिलीक आइ धरिक सभसँ पैघ उपन्यास)- मैथिली कादम्बरीक अंश २.११. गजेन्द्र ठाकुर-माटिक खेलौना-गाड़ी (शूद्रक रचित संस्कृत नाटक मृच्छकटिकम् केर मैथिली अनुवाद- गजेन्द्र ठाकुर) २.१२. गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-५) सन्दर्भ- कुणाल-कृत कुसमा-सलहेस २.१. हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२४ हितनाथ झा (मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070) प्रभातमे प्रकाशित श्री बालादत्त झाक विभिन्न अंकक प्रेरणास्पद कथा, निबन्ध, आचार-विचार संबंधित आ विपदापन्न मिथिलाक प्रति मैथिललोकनिक कर्तव्यक निर्वहन हेतु शास्त्रीय विवेचन, जाहिमे तीनू पक्ष( प्राचीन सभ्यता, नवीन सभ्यता आ प्राचीन नवीनक द्वंद्वक तत्कालीन समयक ध्यानमे रखैत उचित कर्तव्यपर चलबाक उदाहरण सहित प्रस्तुत अछि, विपदापन्न मैथिल कोना अपनाकेँ उबारि सकैत अछि। विद्या भलें संस्कृत रहौ वा अंग्रेजी, ओकर अर्जन पर जोड़ देलनि अछि, जाहिसँ गरीबी तँ दूर होयबे करतैक, स्त्रीशिक्षाक मार्ग प्रशस्त हेतैक आ स्त्री लोकनि सेहो विद्यार्जन करतीह, ताहिसँ मिथिलाक सर्वांगीण विकास हेतैक। एक कथामे ब्राह्मणमे अर्थोपार्जनक शिथिलता आ वर्तमानमे जीनाइ आ बनियाँक अर्थोपार्जन आ भविष्यक सोचपर नीक जकाँ बुझयबाक प्रयास अछि। प.बालादत्त झा संस्कृतक पण्डित रहितहुँ परम्पराक निर्बहन आ आधुनिकताक पाठ सेहो पढ़यबाक सेहो प्रयत्न कयलनि अछि। निम्नांकित रचनाक अतिरिक्त एक आर खण्डित रचना छनि, जकर मात्र पहिल अंकक उपलब्ध छैक, बाँकी अंक अनुपलब्ध अछि। (पण्डित बालादत्त झा कोइलख(पुबारिटोल)क निवासी छलाह आ श्यामा मन्दिर, वाराणसीमे कार्यरत छलाह। हिनक पिता प.खुद्दी झा प्रख्यात पण्डित एवं कलकत्ता विश्वविद्यालयक मैथिलीक पहिल प्राध्यापक छलाह।) ---हितनाथ झा सकलुच्ची श्री बालादत्त झा एक राजा रहथि, हुनक 'दरबार'मे परम ढहलेल सकलुच्ची नामक भृत्य छलैन्ह जे एक दिन राजा 'साहब'क टाकाक सन्दूक चोराए अपन घर लय गेल। विषय बूझि ओकरा माए कहलकैक जे रे अभगला तोहरा आव राजा फाँसी देथुन्ह। सकलुच्ची-राख राख, राजाक कोन डर। एतवा कथा सूनि ओ वेचारी गुप्त स्थानमे कतहु राखि, बेटाकेँ कहलक जे रे बौआ! तों बाहरहिमे आइ राति सूति रह, आकाश सँ बतासा खसतैक बीछि-बीछि खैहें। सकलुच्ची भारी बुद्धिमान छलाहे, ताहि कथा केँ सत्य मानि घरक ओसारा पर ओछाओन कय सूति रहलाह। दुइ पहर रातिमे हुनक माए थोड़ेक बतासा लय आड•नमे फेंकय लगलीहि, इहो बेचारे धड़फड़ कै उठि बिछि बिछि खाए गेलाह। सकलुच्ची बहुत दिन बितला पर एक दिन राजाक कन्याकेँ लय जाए कोनो ढहल ढनमनाएल अप्रसिद्ध इनारमे फेंकि देलकन्हि, ई कथा घर आबि अपन माएकेँ कहलक जे सुनि ओकर माए माथ हाथ दै विकलिभै बैसि कानए लागलि। दरबारमे किछुकाल राज कन्या केँ लोक नहि देखि चिन्तित भय एम्हर-ओम्हर ताकै लगलैन्हि। राजकन्या तँ इनारमे खसि डूबि मरि गेल छलीहि, ओ कतहु भेटथि ? समस्त ड्यौढ़ीमे हलचल भय गेल।थोड़ेक कालमे राजहुकेँ वार्ता भेलन्हि तँ समस्त नगरक गल्ली, कुच्ची, पोखरि, इनारमे सिपाही, जमादार, घोड़सवार, सभ तकलक, कतहु नहि भेटलथिन्ह,आब हुनका भेटवाक कोन सम्भव। पश्चात राजा अपनहुँ ओही सकलुच्ची महोदय केँ संग लय विदा भेलाह, तकैत-२ ओही इनार पर गेलाह। विचित्र रूपक इनार देखि सकलुच्ची केँ देखि कहलथिन्ह जे एहि इनारमे पैसि ताक। "आयू रक्षति मर्माणि" ( एहि घटना सँ पूर्वहिं सकलुच्चीक माए एक बकरी केँ मारि ओही इनारमे फेकि देने छलैक।) आब सक लुच्ची थरथर कपैत इनारमे पैसि हथौड़े लागल, थोड़ेक कालपर एक बकरी भेटलैक, राजा काँ इनारहि सँ कहलकन्हि- करुणानिधान ! राजकन्या केँ दुइ टा सिंह छनि। शोकसन्तप्त राजा कहलथिन्ह, बड़ भारी बूड़ि छें, मनुष्यकेँ कतहु सिंह होइत छैक। पुनि किछु कालें ओ भृत्य कहलकन्हि जे सरकार ! जे सरकार अपनेक कन्या काँ चारि पैर अछि ! राजा- रे गदहा ! मनुष्य केँ चारि टा पैर नहि होइत छैक। पुनि थोड़ेक कालक पश्चात सकलुच्ची -श्रीमन, राजकुमारीकेँ बकरीक सन मूँह ओ पूछ छन्हि। एहि बेर शोकाकुल राजा क्रोधित भय कहलथिन्ह- रे बूड़ि ! जे छै से बहार कर, एतबा सुनि प्रसन्न भय सकलुच्ची हँसैत बकरी केँ पकड़ने बाहर भेल। राजा बकरी केँ देखि कन्याक आशा त्यागि ड्यौढ़ी चल गेलाह, की करथु, एहि संसारमे गेनिहार केँ रखनिहार क्यो नहि, सकलुच्ची महाशय पूर्वहि जकाँ राजाक समीप मे रहय लगलाह, कतेको निरपराधी सभ राजभवन सँ निकालल गेल ओ कतेको दण्ड पौलक। " भाग्यम फलति सर्वत्र न विद्या न च पौरुषम" । एहिठाम हमर अभिप्राय ई अछि जे अदृष्ट प्रबल अवश्य, किन्तु- " उद्योगिनं पुरुष सिंहमुयैति लक्ष्मीरदैवेन देयमिति का पुरुषा वदन्ति। दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्म शक्त्या यन्ते कृते यदि न सिद्धयति कोsत्र दोषः "। एहि नीति वाक्य केँ स्मरण कै हमरा सवहि काँ सर्वदा उद्योग करैक थिक, विशेषतः विद्याक हेतु। आइ काल्हि बहुत गोटे एहनो कहनिहार छथि जे संस्कृत विद्या पढ़ि शरीर दुर्बल कै फल कोन भेटत ? पश्चात खेतो कमैवाक सामर्थ्य नहि रहत जे जीवन निर्वाह करब। एकरा हमहुँ मानैत छी किन्तु आँखि पसारि ताकब तँ जतेक संख्या निरक्षर भट्टाचार्य लोकनिक दरिद्रमे भेटत, ततेक विद्वानक नहि। देश-विदेश सर्वत्र जे क्यो उच्च पद केँ लाभ कयलक अछि , तेँ कोनो विद्या रहौ, एतवा अवश्य कहि सकैत छी जे संस्कृत के अपेक्षा सम्प्रति अंग्रेजी विद्याक आदर अधिक अछि, तेँ की , ई तँ कालक दोष गुण थिक। इति लेखक:- विद्वनमण्डलीक लघु सेवक श्री बालादत्त, आचार ओ विचार श्री बालादत्त झा जाहि प्राचीन कालमे दिव्यदृष्टा मुनिक आदेशसँ 'मिथिला' नाम नगरी प्रतिष्ठिता भेलीहि, ताही समयमे हुनकहि सभहिक पुण्य प्रतापसँ 'सुमिति' -ओ आबि अवतीर्ण भेलीहि। अतएब अति प्राचीन कालसँ ज्ञानशास्त्रक खानि मिथिला देश कहहि पड़त। ताहि ठामक आचार ओ विचार केहन ? मिथिलाहिक राज जनक विदेह जीवन्मुक्त क्षत्रिय छलाह, ततःपर अन्तिम राजा ' हरिसिंह देवो' क्षत्रिये छलाह, जनिक आज्ञासँ बनल केवल क्रियाधार मैथिल वंश नियमावली ' पंजीप्रवन्ध' अद्यावधि चलि रहल अछि। किन्तु सपरिताप कहय पड़ैछ जे सम्प्रति नव्य भव्य सभ्यगण्यक पंजर फेरिसँ विचारक डॉड़मे किछु झोंक पड़ि गेल छन्हि, पयर तँ फँसल छन्हिएँ, संभव जे नूज ने भय जाथि।तावता ततेक हानि नहि, हमरा सवहिकेँ नूजो विचार सँ काज चलि सकैछ, किन्तु'आचार' धरि स्थिर रहथि, से यदि आँखि पसारि तकैत छी तँ अपना केँ धिक्कारय पड़ैछ। 'आचार' किएक शिथिल करब ? नहि बनैत अछि, ई कहब ? सुनल जाय- आचारक अर्थ ई नहि कहैत छी जे पूर्व समयमे कोकटी नूआक व्यवहार छल, जे जोलहा, ततमा, खतबै इत्यादि अछोपहिसँ बुनल जाइत छल, एम्हरक टा सँ बनल देशान्तरीय, अतःपर सम्प्रति बाभनहुक बुनल भेटत, तँ से आचार विरुद्ध कहब ? नहि, नहि, प्राचीन समयमे ब्राह्मण मात्र तपस्यामे निरत रहथि, तथापि द्रोणाचार्यक विद्याक प्रभाव केहन छलन्हि ? क्षत्रिय वीरमण्डलमे हुनकहु किछु आचारक संकोच भेले होएतन्हि, जे प्रायः नीति शास्त्रहुमे तकने भेटत, कहबाक तात्पर्य जे ओढ़ब पहिरब ततेक मर्मस्पर्शी नहि, जतेक प्रतिष्ठित कुलज विदित भय प्रतिष्ठित शिरोमणिक समीप पावि अस्पृश्य, अपेय तथा अखाद्यक दिशि व्यर्थ कुनडरी देव तथा जनौ पहिरिने लोक मे ब्राह्मण कहाय अपन परम संसर्ग सब देश भरिकेँ पतित बनाएब। क्रुद्ध हयबाक हेतु हमर परिश्रम नहि अछि किन्तु ध्यान दय विचार करबाक हेतु । हे गुप्तानाचार प्रवण सभ्याभास ! अपने मनुष्य भय पृथ्वीक परम पवित्र भारत वर्षमे उत्पन्न लेल, से हो जहिं वेद मानैत छी तहिं एखनहुँ धरि समाजक सटारि मेढ़ा मे लेलो छी।अहा ? ओहू ब्राह्मणक कुलानुगत संस्कारमे अनेक प्रकारक व्यय भेल, अक्षर शून्य नहि, प्रत्युत अक्षरपिशाच, ओहो मैथिल ? भला ! कहल त जाव जे अपेय मे कोन स्वाद भेटैछ ? जँ कहब जे उन्मत्तता , तँ से कतेक व्यवहृत वस्तुअहु सँ होएत की ताहि सँ अपनेक मनोरथ पूर्ण नहि ? हमर मैथिल समाजमे मुइला उत्तर मुखवन्ती देल जाइछ, किन्तु विचार डंड़ झोका आचार फेरहा लोक ' जीवतहिं आगि मुँह दय ठुसै, नृपति वश्य कय सवकेँ दूसै " कय रहल छथि!!! अपने सवहिक हेतु दिव्य तेहेन खाद्य पदार्थ सव आइ काल्हि प्रस्तुत होइछ जाहिसँ कुलोचित मर्यादा रहैत सव निवहि जाएत। असद्व्यवहार सँ शरीर विगड़त, व्यय अपर्याप्त वशक हानि, लोक(समाज)मे अप्रतिष्ठता अतःपर अन्तिम परिणाम " हाथ आएल शून्य" । सवदिन एक रङ्ग दिन ककरो नहि रहैछ, तैं कोनो दिन एहनो आओत जे अपनहु लोकनिक दिन दोसर सन बुझल जाएत, ताहि दिन इएह बुझब जे एहि तरंगमे रहि जँ कोनो इष्ट साधन केने रहितहुँ तँ आइ क्यो कहाबितहुँ, से केवल सर्वाशी भय कलांकिये टा भेलहुँ और किछु नहि, इत्यादि विचारि दुरभ्यासक मात्रा केँ घटाओल जाय, जाहिसँ पुनः हमरा ई लिखबाक अवसरक प्राप्ति नहि हो। इति शम। लेखक विद्यावतामनुचरः श्री बालादतः , (प्रभात 1933 अंक 6 जून ) विपदापन्ना मिथिलाक प्रति हमरालोकनिक कर्तव्य श्री बालादत्त झा जे मिथिला देश प्राचीन भारतवर्षक सर्वप्रधान अंग छल, जे तपोभूमि छल, जतय धर्मचर्चा दिवारात्रि होइत छल, जे शिक्षा एवं विद्या विषयमे अग्रगण्य छल, जतक सामाजिक जीवन शान्तिदायक एवं सुखवर्द्धक छल, जाहि स्थानक लोक द्रव्याभावहुमे जीवन धारणक आवश्यकता थोड़ रहने अर्थकष्टसँ क्लेशित नहि छलाह आइ वैह मिथिला देश मिथिला शिथिलाsधुना के चरितार्थ कय रहल अछि। की ई परमशोचनीय विषय नहि अछि ? की नेत्रवन्द कयने आवो कार्य्य चलि सकैत अछि ? आव मैथिलक पसार केवल पञ्च कोशहिमे नहि अछि, केवल दरभंगा, मुजफ्फरपुर, भागलपुर आदि जिला धरि नहि अछि अपन विद्वताक प्रभावसँ मैथिल लोकनि बिहार प्रान्तक कोन कथा बंगाल प्रान्त, मध्यप्रान्त,संयुक्त प्रान्त तथा नेपाल देशहुमे अधिक संख्यामे तत्तदेश वासी भय गेल छथि। सर्वप्रथम हमरालोकनिक ई कर्त्तव्य अछि जे निस्सहाया मिथिलाक विछुड़ल पुत्रकेँ संगठन शक्ति द्वारा एकत्रित कय अनाथ, जीर्णशीर्ण शोकाकुला मिथिलाक हृदयकेँ संतृष्ट करी।ककरो एक पुत्र यदि भुतिया जाइत छैक तँ ओकर कोन दशा होइत छैक ? आइ मिथिलाक लाखो सुपुत्र यत्र तत्र भय रहल छथि। कनिकोसँ कनिको चिन्हा परिचय नहि। कनिको प्रति कनिको सहानुभूति नहि। एतवा धरि जे वंश परिचयक अभावसँ हम एक दोसराकेँ मैथिलो कहबामे संकोच करय लगलहुँ अछि ?तस्मात भिन्न भिन्न प्रान्तक मैथिलक संगठन एक वा अधिक सभा द्वारा हयब परमावश्यक अछि। तदुपरान्त समस्त भारतवर्षीय मैथिलक संगठन एक बृहती सभा द्वारा कयल जाय जाहिसँ समस्त मैथिलक एक जीवन हो, एक प्राण हो, एक विचार हो। एहि महान यज्ञक हेतु जाहि त्यागक आवश्यकता अछि ताहि निमित्त हम सब प्रस्तुत होइ ई कर्तव्य अछि। द्वितीय महान प्रश्न मैथिलजन समुदायक सम्मुख ई अछि जे अन्यान्य सभ्य जातिक सङ्ग-सङ्ग मैथिल जाति कोन प्रकारसँ सभ्यताक क्षेत्रमे अग्रसर होइत रहय जाहिसँ जातीय जीवन दिनानुदिन नवीनतर होइत जाय कोनो जाति जीवित रहय एतदर्थ जातीय जीवनक स्वरूपक तथा परिस्थितिक ज्ञान रहब परमावश्यक।परिस्थितिक उपेक्षा कयने जीवन दीपक निर्वाण हयब स्वाभाविक।मैथिल जातिक जीवन यापन निरापद हो एतदर्थ वर्त्तमान समयमे तीन दल देखल जाइछ। 1. प्राचीन सभ्यताक पक्षपाती। 2. नवीन (पाश्चात्य) सभ्यताक पक्षपाती। 3. प्राचीन नवीन सभ्यताक पक्षपाती। प्रथम दल कोनो प्रकारक नवीनता नहि चाहैत छथि। हिनक विचारसँ प्राचीनतक रक्षा सर्वावस्थामे कर्त्तव्य थिक।यदि किनको बड़ा लाटसँ भेँट करबाक होइन्ह तँ कोट पतलून पहिरवाक आज्ञा हुनका समाज नहि दैन्हि , ई हुनक इच्छा, यदि मैथिलक 'होटल'मे क्यो भोजन करय तँ हुनक विचारसँ ओ जाति सँ वहिष्कृत कयल जाथि। द्वितीय दल प्रत्येक आचार व्यवहारकेँ मैथिल समाजमे आनय चाहैत छथि जाहिसँ थोड़बो क्षणिक लाभ हो आवश्यकता हो, अथवा नहि, कोट, चश्मा, नेकटाइ आदिक व्यवहार करै चाहैत छथि कारण ई जे एहिसँ अनेको स्थानमे आदर सत्कार भेटवाक सम्भावना। कहू ! जातीयताक गौरव तखन की रहल ? तृतीय दल प्राचीन एवं नवीनक सम्मिश्रण करैत छथि। प्राचीन एवं नवीन उपकरण द्वारा जातीय जीवनक रक्षा करब उचित बुझैत छथि। जाहिसँ मैथिलक आदर्श बनल रहय से प्रयत्न प्राणसँ करब उचित। मैथिल जातिक सम्बन्ध आव देहातहिमे अवरुद्ध नहि अछि साधारण अदालत फौजदारी कचहरी सँ लय क बड़ा लाटक सभा धरि अछि।सङ्ग सङ्ग रेल तार कल कारखाना आदि नवीन नवीन वस्तु सभक प्रचार भेल अछि। की एकर उपेक्षा कयने कथमपि कार्य्य चलत ? (क्रमशः, गतांकसँ आगाँ) मिथिला धर्म प्रधान देश छल। की आवहु अछि ? मैथिलक धर्म्म परायणता आब केवल मात्र संध्या गायत्री मे रहि गेल अछि। परन्तु एकरो तत्त्व बुझनिहार कतेक व्यक्ति छथि। धर्म्मक नामपर अनर्थ हयब प्रारम्भ भय गेल अछि। यदि रोकल नहि गेल तँ देश अवश्य रसातलमे पहुँचत।पुरोहित लोकनि ग्रामोफोन जेकाँ केवल शब्दोच्चारण करै छथि। कतेक आब कर्मकाण्ड पढ़ब व्यर्थ बुझैत छथि।कारण जखन यजमानक कार्य उपस्थित होइत छैन्ह तँ ककरो संग लय कय जे कर्मकाण्ड जनैत छथि यजमानक ओहिठाम पहुँचि जाय छथि। पितरकेँ पिण्ड प्राप्त होइत छैन्ह वा नहि एकर समाधान करबामे कतेक पुरोहित समर्थ हयताह ? धार्मिक ग्रन्थक अध्ययन आब विचारपूर्वक होमक चाही। स्मरण राखू आब प्रत्येक कथनक हेतु उपयुक्त कारण देखयबाक हयत।मिथिलाक अन्य जातिकेँ धार्मिक ह्रास जे भय रहल अछि तकर दोष प्रधानतः मैथिल ब्राह्मणक ऊपर छैन्ह। सामाजिक अधःपतन अपन अन्तिम सीमा धरि पहुँचि गेल अछि। किछुकाल पूर्व धनक लोभमे पड़ि 5-7 विवाह करब एक साधारण बात छल। आबहुँ एहन गोटेक बृद्ध भेटताह, जिनका 20-25 होइन्ह। परन्तु आबहुँ दू गोट विवाह वाला सज्जन कतेको छथि। यदि क्यो अपन समधिकेँ डेराबय चाहैत छथि तँ ओ कहैत छथिन्ह जे हम अपन बालकक द्वितीय विवाह करा देबैक। धनक लोभसँ षडवर्षीया कन्याक विवाह 50 वर्षक बृद्ध वरक सङ्ग कय देव आबहुँ देखल जाइछ। की एहन व्यक्तिकेँ सामाजिक कोनो प्रकारक दण्ड देल जाइत छैन्हि ? बाल विवाहक फल शिक्षा पर, स्वस्थ्यपर एवं भावी सन्तान पर जे होइछ से सव काँ विदिते अछि। तथापि स्त्रीगणक दुराग्रहमे पड़ि हमरलोकनि बाल विवाहितक संख्याक वृद्धिए कयने जाइत छी। " कन्यादान" आब अछि कतय। कन्यादानक स्थानमे "कन्या विक्रय"क परिपाटी आरम्भ भय गेल अछि। अन्यान्य जातिमे एहि प्रकारक लेब-देबक व्यवहार नहि छैक। ऊंच नीचक विचार जातिमे अवश्य छैक परंच तकर विचाराचार केवल विवाह कालहि में रहैत छैक। ई नहि जे ऊंच छथि ओ आजीवन ऋणदाताक सदृश अपन टाका ओशूल करवाक हेतु ऋणीक इच्छा विरुद्धो हुनका ओहिठाम धरणा दैते रहथि। विवाह संबंधी तँ एहन-एहन कुप्रथाक आरम्भ भय गेल अछि जकर 5-7 करब अनुचित एवं उपहासजनक बुझना जाइछ। सहनशीलताक मात्रा लुप्तप्राय भय गेल अछि। थोड़बो सन जगहक हेतु ' कपड़फोड़ी' कय लेब साधारण बात अछि। 'धुरखेल'क अवसर पर गणासक चलब, मोकदमा हयब कोनो नवीन बात नहि। यदि ग्राम संगठनक कार्य प्रारम्भ हो तँ सव प्रकारक मतभेद पञ्चैती द्वारा मेटा सकैछ। गृह-कलहक प्रधान कारण स्त्रीगण मूर्खा एवं अशिक्षता रहब अछि।। आर्थिक अवस्था एहि समाजक जेहन अछि से सब काँ ज्ञात अछि।कोनो गाममे 4-5 घरकेँ छोड़ि , सबहक कोन कथा, अधिकांश सुखित नहि भेटताह। एकर प्रधान कारण उद्योगहीनता अछि।जाहू कालमे गृहस्थ एकदम बेकार बैसल रहैत छथि ताहू कालमे यदि ओ चाहथि तँ अपन आर्थिक अवस्थाकेँ सुधारवाक यत्न कय सकैत छथि।परन्तु कोनो कार्य करथु कोना ? माथपर तँ आलस्य एवं अनुचित सन्तोषक भूत सवार रहैत छैन्हि। हमरा बुझनामे मैथिल जातिक मध्य परस्पर विरोधक मात्रा ततवा अधिक नहि अछि जतवा पारस्परिक सहानुभूतिक अभाव। श्रोत्रिय अश्रोत्रियक एक अस्वाभाविक विभाग भेल अछि। पंजिबद्ध अपंजिबद्ध केँ हीनदृष्टिसँ देखैत छथि। धनिक निर्धनकेँ सर्वथा उपेक्षा करैत छथि। संस्कृतज्ञ असंस्कृतज्ञकेँ तथा अंग्रेजी पढ़ल-लिखल अंग्रेजी नहि पढनिहारकेँ आदर नहि करैत छथि। जाहि स्थानमे क्यो मैथिल प्रधान भय कs रहताह ताहिठाम अन्य मैथिल केँ ताकि-ताकि कय लायब , वा यदि क्यो अयबाक उद्योग करय तँ ओकरा आब देमक नीतिकेँ ग्रहण करब ओ लाभप्रद नहि बुझैत छथि। आब विचारणीय विषय ई अछि जे मैथिल जातिक उन्नति कोना हो, ई जाति सुखी कोना हयताह। साधारण दृष्टया सुखक तीन रूप छैक, शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक। प्रथम प्रकारक सुख उत्तम स्वास्थ्य द्वारा एवं अन्न-वस्त्र द्वारा प्राप्त होइछ। द्वितीय प्रकारक सुख विद्याध्ययन द्वारा एवं सुशिक्षा द्वारा भेटैछ। तृतीय प्रकारक सुख अध्यात्म विद्या द्वारा भेटि सकैछ। यदि विचार कयल जाय तँ मैथिल जातिकेँ यथार्थतः कोनो प्रकारक सुख नहि प्राप्त छैन्ह। तैं हम कहैत छी जे मैथिल जाति वा इहो कही जे समस्त मिथिला विपदापन्न अछि तँ कोनो अत्युक्ति नहि। एहि विपत्ति सँ बचबाक उपाय कोन अछि, सुखी बनयबाक युक्ति कोन अछि। हमर क्षुद्र बुद्धि मे तँ यैह अबैछ जे " ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः!" यदि हम अपन उद्धार चाहैत छी , यदि यथार्थमे सुखी बनय चाहैत छी तँ अपन अवस्थाक ज्ञान, आत्मज्ञान, प्राप्त करबाक उद्योग करक चाही। हम सब मोहमे पड़ल छी, अपन हित अनहितक ज्ञान नहि अछि। यावत धरि ई मोह नहि हटत, ज्ञानोदय नहि हयत तावत पर्य्यन्त नेत विपत्ति सँ उद्धार हयबाक आओर ने यथार्थ सुखक प्राप्ति हयबाक सम्भावना अछि। इति शम् ।। लेखक -श्री बालादत्त झा(कोइलख) (प्रभात, वर्ष-2, अंक 06,07, जून-जुलाइ 1934) श्री भद्रकाली विजयते। निनानवेक फेरि श्री बालादत्त झा एक नगरमे क्यो धनिक बनिआँ छल, ओकरा घरहि लग एक दरिद्र ब्राह्मणक घर छलन्हि।बनिआँ अपन आय व्यय विचारि कहियो सातु, कहियो रोटी,कहियो फुटहे खाए लेथि, परन्तु ब्राह्मणकेँ "आयव्यय"क परिगणन छलन्हि नहि, जे किछु यजमान सभैक ओतय सँ माँगि चाँगि आनथि ताहिसँ नित्य दूनू साँझ दालि, भात, पूरी ओ तरकारी इत्यादि उत्तम वस्तु सव भोजन कय घरघराएन यजमानक कल्याण मनबैत आनन्दहिसँ समय बिताबथि।हुनका घर लगक ताहि बनिआँक लोककेँ हिनक भोजनानन्द देखि बहुत आश्चर्य लगैक। एकदिन ओहि बनिआँक स्त्री बनिआँसँ पुछलकन्हि- जे हमरालोकनिकेँ एतेक धन रहलु उत्तर कहियो नहि उत्तम जेकाँ भोजन होइछ ओ ई ब्राह्मण परम् दरिद्र अछि तथापि नित्य नीके भोजन करैत अछि तकर की कारण ?बनिआँ कहलथिन्ह जे हमरालोकनि धनी भइयो निनानवेक फेरिमे पड़ल छी, तेँ हमरालोकनिकेँ बढिआँ भोजन नहि कय होइछ।यथा नीति कहैछ - "जेना ज्वरादि रोग पाबि दिव्य अन्न ढेरि मे। घृणा होइछ तेहिना निनानवेक फेरिमे।।" ओ ब्राह्मण निनानवेक फेरिसँ बाँचल छथि, तेँ नित्य दिव्य भोजन करैछ, बनिआँइनि पुछलथिन्ह जे निनानवेक फेरि की ? बनिआँ- बेस, एकर तमाशा हम देखाए दैत छी, ई कहि निनानवे गोट टाका गनि एक लत्तामे बान्हि अपन स्त्रीक हाथमे दय हुनका कहलथिन्ह- ई गेठरी अहाँ ओहि बाभनक घरमे फेकि आउ, परन्तु क्यो देखै नहि, ताहि रूपें फेकबैक।बनिआँइनि ओ गेठरी लय लोकक आँखि बचाय ब्राह्मणक घरमे फेंकि ऐलीहि। ब्राह्मणी घर आबि ओ गेठरी पाबि फोललन्हि तँ ओहिमे निनानवे गोट तक ?।से देखि बड़े प्रसन्ना भेलीहि, ओ टाका लय अपन स्वामीकेँ देखय देलन्हि, ओहो(ब्राह्मण) देखि बहुत प्रसन्न भेलाह, किछु कालधरि तँ यैह परामर्श भेल जे ई आएल कतयसँ ? नीतिक कथन अछि जे स्त्री केँ द्रव्य देव नहि नीक, ओ देयै तँ जाचक थिक। सव रूपें परामर्श कय निश्चय कयलैन्ह जे ई भगवान देलन्हि अछि, एहिमे एके टाका और राखि देलासँ एक द0शय पूर भय जाएत ओ एक शय फराक राखि ढेला उत्तर बेरि पर काज आओत। बस सबहि गोटय निश्चय कयलैन्ह जे चारि दिन धरि यदि सातु रोटी ओ फुटहा इत्यादि खाइ तँ एक टाका बाँचि जाएत। यैह उपाय सव गोटय चारि दिन धरि कय एक टाका बंचाय शय पुरौलन्हि, बस ब्राह्मण विचारलन्हि जे चारि दिनमे और एक रुपैया खर्चो भय गेलापर शैयो रुपैया जमे रहत। फेरि चारि दिन ओही रूपें निर्वाह कय एक शय और एकट्ठा कय राखि देबाक थिक ई विचारि वैह निर्वाह सर्वदाक हेतु स्वीकार कय लेलन्हि, दश-बीस दिन बीति गेला उत्तर बनिआँ अपन स्त्री केँ पुछलथिन्ह कहू, आब बाभन(देवता)क घरमे कोन प्रकारेँ भोजनाच्छादनक आनन्द होइत छन्हि, हुनक स्त्री (बनिआँइन) कहलथिन्ह जे जाहि दिनसँ हम निनानवे टाकाक गेठरी फेंकलिऐक , ताहि दिनसँ हमरहु घरसँ अधिक कष्ट बाभनैक घरमे होइत छैक, तखन बनिआँराम कहलथिन्ह यैह थिकैक ' निनानवेक फेरि" जे धन एकट्ठा करय चाहैत अछि तकरा अन्नवस्त्र रहलहु पर सर्वदा उपभोग नहि होइत छैक। इति शम् । लेखक कोइलख निवासी श्री बालादत्त झा पो.औ. रामपट्टी जि. दरभंगा। संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-7 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-8 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-9 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-10 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-11 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-12 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-13 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-14 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-15 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-16 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-17 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-18 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-19 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-20 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-21 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-22 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-23 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.२. कल्पना झा- मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-५ कल्पना झा मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-५ स्वतंत्रता सेनानी 'विद्यालंकार' एकटा शिशुक जन्म काल, हुनकर जन्म-स्थानक वातावरण/परिवेश केहन छलैक, तकर प्रभाव हुनकर व्यक्तित्व पर पड़ब स्वाभाविके छै। जेना एखनुक 'इंटरनेट' आ 'ए आइ' बला जमाना मे जनमल बच्चा लेल लोक रहरहाँ बाजैत रहैए, "आइ काल्हि के बच्चा...बाप रे ! सभ किछु पेटे सँ सीखि क' बहराइत अछि जेना।" तहिना सभ युग मे तत्कालीन वातावरणक प्रभाव सँ प्रभावित रहिते टा अछि कोनो बच्चा। तँ सएह बात चरितार्थ होइत बुझना जाइत अछि 'विद्यालंकार'क व्यक्तित्वक अवलोकन करैत। इतिहास मे बहुत बेसी रुचि नहिओ रखनिहार विद्यार्थी केँ एतबा जनतब तँ निश्चिते हेतनि जे भारतीय स्वतंत्रता संग्रामक समय जे छलए (1857 सँ 1947 धरिक) तकर बहुआयामी प्रभाव कोन तरहेँ देशक आम नागरिकक जीवन पर पड़ल छलनि। ई एकटा राजनीतिक आन्दोलन मात्र नहि रहि गेल छलए; अपितु समाज, अर्थव्यवस्था, शिक्षा आ लोकक मानसिकता मे सेहो क्रांतिकारी बदलाव आनैत जा रहल छलए। आ ताहि मे गाँधी जीक महती भूमिका रहलनि। गाँधीजी स्वतंत्रता संग्राम सँ आम जनता केँ सेहो जोड़ि लेने छलाह। कृषक, मजदूर, महिला आ युवा, सभ समान रूप सँ एहि संग्राम मे अपन भागीदारी देबा लेल तत्परता देखौलनि। सन् 1885 मे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसक स्थापनाक संग भारतक राजनीतिक एवं सामाजिक जीवन मे जे एकटा नवचेतना जागृत भेल से 1905क स्वदेशी आंदोलनक समय धरि आरो विस्तार पौलक। देशक एही वातावरण एवं परिवेश मे तत्कालीन दरभंगा जिलाक (आब मधुबनी जिलाक) कोइलख गाम मे मैथिल ब्राह्मणक एक उच्च कुल मे 17 जुलाइ 1901 ई. मे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'क जन्म भेल छलनि। कोइलख गाम नीक कुलक ब्राह्मण, पण्डित आ विद्वानक लेल प्राचीन कालहि सँ प्रसिद्ध रहल अछि। 'विद्यालंकार'क पिता स्व. नरसिंह ठाकुर संस्कृत तथा फारसीक विद्वान छलाह आ ओ मिरजापुर महंतक ओतए तीस बरख धरि काज करैत रहल छलाह। तँ से जे कहैत रही, कोनो बच्चाक व्यक्तित्व हुनकर जन्म कालक वातावरणक प्रभाव सँ प्रभावित रहिते टा अछि। सएह विद्यालंकार'क व्यक्तित्व पर सेहो तत्कालीन भारतीय समाजक जे वातावरण छलैक, तकर प्रभाव भरपूर छलनि। स्वतंत्रता संग्रामक परिणाम स्वरूप भारतीय समाज आत्मबोध, आत्मगौरव आ आत्मनिर्भरताक दिशा मे अग्रसर भऽ रहल छलए। अंग्रेजी शासनक शोषण सँ भारतीय समाजक विभिन्न वर्ग त्रस्त छलए; जे देशक हरेक नागरिकक हृदय मे राष्ट्रवादक तीव्र लालसा उत्पन्न होएबाक कारण बनल। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम मात्र स्वतंत्रता प्राप्त करबाक माध्यम नहि रहि गेल, अपितु ई एकटा सांस्कृतिक पुनर्जागरण, सामाजिक न्याय, राष्ट्रीय चेतना ओ लोकतांत्रिक मूल्यक पुनःस्थापनाक संग्राम सेहो बनि गेल। ई संघर्ष भारतीय इतिहासक एकटा गौरवशाली अध्याय अछि, जे स्वतंत्रताक मूल्य, एकजुटता आ देशभक्तिक संदेश दैत अछि। गांधीजीक प्रभाव मे 'सत्याग्रह', 'भूख हड़ताल', 'जेल जाएब', 'कर नहि देब', इत्यादि नब-नब तरीका आम जनता सभ सेहो अपनौलनि। आ ओहि आम जनता मे एकटा श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार' सेहो छलाह। स्वदेशी आंदोलन मे पार्टिसिपेट केलनि। जेलक यात्रा सेहो कएलनि महानुभाव। 1920 ई.क दिसम्बर मे गाँधी जीक बिहारक यात्रा यद्यपि अल्पकालीन छलनि, परन्तु ओहि सँ मिथिला मे असहयोग आन्दोलनक गम्भीर प्रभाव पड़लैक। मेधावी छात्र लोकनि (जाहि मे बाद मे अनेक गोटे भारतक राजनीतिक जीवन मे उच्च स्थान प्राप्त कएलनि) ओहि समय मे स्कूल एवं कॉलेजक बहिष्कार कएलनि, जाहि मे सँ एक छलाह श्रीकान्त ठाकुर। 1921 ई.क प्रारम्भ मे किछु राष्ट्रीय स्कूल स्थापित कएल गेल आ किछु वर्तमान स्कूल केँ विश्वविद्यालय सँ असम्बद्ध करबाए राष्ट्रीय संस्थान मे परिणत कएल गेलैक। एहन शिक्षण संस्थान सभ सरकार सँ अनुदान लेब बन्द कऽ देलक। गाँधी जी निश्चित रूप सँ बिहार मे एक गोट राष्ट्रीय विश्वविद्यालय स्थापित करबाक पक्ष मे छलाह। 5 जनवरी 1921 केँ बिहार राष्ट्रीय महाविद्यालय स्थापित भेलैक आ 6 फरवरी केँ ओही वर्ष राष्ट्रीय महाविद्यालय एवं बिहार विद्यापीठक औपचारिक उद् घाटन गाँधी जी कएलनि। बिहार विद्यापीठक उद्देश्य छल, प्रान्त भरि मे स्थापित कएल गेल सभ राष्ट्रीय विद्यालयक समायोजन, ओहि पर नियंत्रण तथा ओकर निर्देशन। 1922 ई. मे श्रीकान्त ठाकुर बिहार विद्यापीठ मे नामांकन करौलनि तथा ओतहि सँ 'विद्यालंकार'क स्नातक स्तरक डिग्री प्राप्त कएलनि। विद्यापीठक प्रधानाचार्य डॉ. राजेन्द्र प्रसाद छलाह। श्रीकान्त ठाकुर हुनकर अत्यधिक प्रिय छात्र बनि गेलाह। ओही समय मे विद्यालंकार'क मोन मे पत्रकारिताक माध्यम सँ देश सेवाक भावना दृढ़ भेलनि। बालक श्रीकान्तक प्रारम्भिक शिक्षा अपन गामक पाठशाला सँ शुरू भेल छलनि। आ बाद मे (1913 ई. मे) मधुबनीक वाटसन हाइ स्कूल मे हुनकर नामांकन कराओल गेलनि। ओ मेधावी छात्र छलाह आ अपन कक्षा मे प्रथम स्थान प्राप्त करैत छलाह। मधुबनी मे हिनकर अभिभावक रहथिन, छपरा जिलाक सुखदेव नारायण। ठाकुर जी हुनका ओतए परिवारक सदस्य रूप मे रहैत छलाह। श्री सुखदेव नारायण थियोसोफिस्ट तथा थियोसोफिकल सोसाइटीक कर्मठ सदस्य छलाह। हुनका सँ श्रीकान्त ठाकुर बहुत प्रभावित भेलाह। देशक सेवा करबाक प्रेरणा ठाकुर जी केँ हुनके सँ भेटलनि। 'सर्वेन्ट ऑफ इंडिया सोसाइटी' नामक संस्था लाला लाजपत राय चलबैत छलाह। श्रीकान्त ठाकुर हुनके कार्य सँ प्रभावित भऽ बिहार सँ बाहर जाए किछु करए चाहैत छलाह। मुदा डॉ. राजेन्द्र प्रसादक विचार नहि छलनि जे ठाकुर जी बिहार सँ बाहर जाइथ। ओ हुनका बिहारे मे रहि कऽ काज करबा लेल कहलथिन। राजेन्द्र बाबूक आदेश पर ओ मुंगेर जिलाक हबेली खड़गपुर मे राष्ट्रीय उच्च विद्यालयक प्रधानाध्यापकक रूप मे किछु दिन कार्य कएलनि। सन् 1920 सँ हिन्दी पत्रकारिताक संसार मे दैनिक पत्रक एक गोट नवीन युगक श्रीगणेश भेलैक। भारत मे गाँधीक आगमन तथा स्वतंत्रता आन्दोलन मे एक नवीन युगक प्रादुर्भाव सँ सेहो हिन्दी पत्रकारिताक इतिहास प्रारम्भ होइत अछि। आ एही ठाम सँ स्वतंत्रता आन्दोलनक इतिहासक गाँधी-युगक प्रधान अध्याय प्रारम्भ भेल छलए। विद्यालय, महाविद्यालय आ विश्वविद्यालय छोड़निहार भारतक प्रतिभा-सम्पन्न छात्र आ छात्रा लोकनि बाद मे गाँधी जी द्वारा स्थापित विद्यापीठ सभ मे भर्ती भऽ विद्याध्ययन कएलनि आ किछु गोटे सक्रिय राजनीतिक संघर्ष सँ हटि हिन्दीक पत्रकारिता दिस डेग उठाए परोक्ष रूप सँ स्वतंत्रता आन्दोलन सँ जुड़लाह/जुड़लीह। पत्र द्वारा स्वतंत्रता आन्दोलनक कार्यक्रम ओ उद्देश्य केँ जन जन धरि पहुँचेबाक काज सर्वोपरि छल। तैं भारतक लगभग सभ प्रधान राजनेता एवं स्वतंत्रता आन्दोलन मे भाग लेनिहार राजनीतिज्ञ लोकनि प्रारम्भिक समय मे अथवा जीवन पर्यन्त पत्रकारिता सँ जुड़ल रहलाह। जाहि मे एकटा महत्वपूर्ण नाम अछि श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'। गाँधी जी द्वारा स्थापित विद्यापीठ मे भर्ती भऽ विद्याध्ययन कएलाक उपरान्त राजेन्द्र बाबूक प्रेरणा तथा जगतनारायणक प्रोत्साहन सँ श्रीकान्त ठाकुर 1926 ई.क जनवरी सँ "महावीर" नामक हिन्दी साप्ताहिक मे कार्य आरम्भ कएलनि। जे पटना सँ प्रकाशित होइत छलए। एहि पत्रक सम्पादक छलाह जगतनारायण लाल। "महावीर" नामक हिन्दी साप्ताहिक मे श्रीकान्त ठाकुर केँ अधिक समय धरि मोन नहि लगलनि। ओ कोनो हिन्दी दैनिक मे काज करबाक इच्छुक छलाह। श्रीकान्त ठाकुरक ई प्रारब्धे छलनि प्राय: जे हुनका जीवन मे आगाँ बढ़बा लेल कहियो अवसरक प्रतीक्षा अधिक दिन नहि करए पड़लनि। कलकत्ता सँ प्रकाशित दैनिक स्वतंत्रक सम्पादक स्व. अम्बिका प्रसाद बाजपेयी 'विद्यालंकार' केँ बजौलथिन आ सह-सम्पादकक कार्यभार देलथिन। बाजपेयी जीक संग काज कएने 'विद्यालंकार'क प्रतिभा मे अद्भुत निखार अएलनि आ एहि निखरल प्रतिभा सँ युक्त सह-सम्पादक सँ बाजपेयी जी ततेक प्रभावित भेलाह जे युवक श्रीकान्त ठाकुर केँ सम्पादकीय लिखबाक पूर्ण छूट दऽ देलथिन, जखन कि सम्पादक ओ स्वयं बनल रहलाह। किछु समयक बाद रमाशंकर त्रिपाठी तथा मदनलाल चतुर्वेदीक संग लोकमान्य साप्ताहिकक प्रकाशन प्रारम्भ कएलनि, जे बाद मे दैनिक पत्र मे परिणत भऽ गेल। श्रीकान्त ठाकुर ओकर संयुक्त सम्पादक बनलाह। सन् 1932 मे लोकमान्य छोड़ि विश्वामित्रक सम्पादक नियुक्त भेलाह। अप्रैल 1941 मे 'विद्यालंकार' दैनिक विश्वामित्रक बम्बई संस्करणक सम्पादकक भार उठौलनि। एहि भारक निर्वहन ओ अगस्त 1943 धरि कएलनि। आ से बड़ कुशलता सँ कएलनि। 1942 मे अगस्तक क्रान्तिक समय मे श्रीकान्त ठाकुर केँ ओहि क्रान्तिक केन्द्रस्थल बम्बई मे रहबाक अवसर प्राप्त छलनि। ओहिठाम रहैत ओ स्वतंत्रता आन्दोलनक अन्तिम लड़ाइ मे बहुत सक्रियताक संग काज केलनि। ओ भारत छोड़ो आन्दोलन मे हिन्दीक एकटा प्रमुख दैनिकक प्रधान सम्पादकक हैसियत सँ प्रमुख घटना सभ मे परोक्ष रूप सँ भाग लैत रहलाह तथा ओहि अवधि मे आन्दोलनकारी लोकनिक भूमिगत क्रिया-कलाप मे मददि करैत रहलाह। कतोक फरारी केँ अपन कार्यालय आ निवास स्थान पर नुका कऽ रखलनि। संगहि हुनका लोकनिक काज लेल धन सेहो इकट्ठा कएलनि। फेर एक बेर 1944 ई.क अक्टूबर मे श्रीकान्त ठाकुर कलकत्ताक दैनिक लोकमान्य सँ जुड़लाह आ अक्टूबर 1945 धरि प्रधान सम्पादकक रूप मे काज करैत रहलाह। नवम्बर 1945 मे हुनका बनारसक दैनिक 'आज'क प्रधान सम्पादक बनबाक निमंत्रण भेटलनि आ ओ तकरा सहर्ष स्वीकार कऽ लेलनि। ओहि समय मे देशक सर्वोच्च हिन्दी दैनिक 'आज'क हालत बहुत खराब भऽ गेल छलैक। ओकर मालिक दैनिकक हालत मे सुधार करबाक लेल सभ सँ उपयुक्त सम्पादक श्रीकान्त ठाकुर केँ बुझलनि। ओहि समय धरि श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार' हिन्दी दैनिकक प्रधान सम्पादकक रूप मे अपन धाख देश भरि मे जमा चुकल छलाह। पत्रकारिता केँ समाजक विचार ओ साहित्यक संवाहिकाक रूप मे जानल जाइत रहल अछि। समाजक निर्माण मे साहित्य, सिनेमा आ पत्रकारिता, मतलब पत्र-पत्रिकाक महती भूमिका रहल अछि। "समय आ समाजक सन्दर्भ मे सजग रहि कऽ आम नागरिकक भीतर दायित्व बोधक चेतना जागृत करबाक कला केँ पत्रकारिताक संज्ञा देल गेल अछि। असत्य, अशिव आ असुन्दर पर सत्यम् शिवम् सुन्दरम् क शंखध्वनि पत्रकारिता थिक। पत्रकारिता अभिव्यक्तिक एक गोट मनोरम कला थिक। एकर कार्य जनता आ जन नेता लोकनिक समक्ष लोक-कल्याण संबंधी कार्यक सूची प्रस्तुत करब थिक। पत्रकारिता केँ कला आ वृत्तिक संग जन सेवाक रूप मे सेहो परिभाषित कएल गेलैक अछि। स्वतंत्रता सँ पूर्वक पत्र सभक स्वतंत्रता-संग्रामक हेतु अस्त्र-शस्त्रक रूप मे प्रयोग भेलैक तथा अंग्रेज शासकक कोप भाजन बनि भारतीय पत्र पत्रिका सभ समाज केँ एकटा नब दिशा प्रदान कएलकैक। यंग इंडिया, हरिजन, आज, स्वदेश, कर्मभूमि, प्रताप, रणभेरी, सेनापति सदृश अनेक पत्र भारतीय जनमानस केँ अत्यधिक प्रभावित कएलकैक। महर्षि अरविन्द, भूपेन्द्र नाथ दत्त, डॉ. एनी बेसेन्ट, गोपालकृष्ण गोखले, बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपतराय, विपिन चन्द्र पाल, चितरंजन दास, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, महात्मा गांँधी, जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, आदि अनेक नेता लोकनि राष्ट्रक सेवा निमित्त पत्रकारिता सँ अपन संबंध जोड़लनि। महान साहित्य विशेषज्ञ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, लाला खड्ग बहादुर मल्ल, अम्बिका प्रसाद व्यास, गणेश शंकर विद्यार्थी, प्रताप नारायण मिश्र, मुंशी प्रेमचन्द, बाबूराव विष्णु पराड़कर, माखन लाल चतुर्वेदी, लक्ष्मण नारायण गर्दे, बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' कृष्ण दत्त पालीवाल पत्रकारिता केँ राष्ट्रीय नव जागरणक साधन स्वीकार कएलनि तथा एक मिशनक रूप मे एकरा त्यागशील संघर्षमय परम्पराक नियामक मानलनि। एतेक स्पष्टीकरण देलहुँ, ई स्पष्ट करबाक लेल जे हाथ मे कलम धएने, पत्रकारिता मे संलिप्त एकटा बुद्धिजीवी सेहो स्वतंत्रता सेनानीक रोल अदाए कऽ सकैत अछि, से बुझबा मे (विश्वास करबा मे) ककरो संशय नहि रहए। आ एहने स्वतंत्रता सेनानी छलाह श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'। कलमे हुनकर अस्त्र-शस्त्र छलनि। ओहि कलम केँ मजबूती सँ पकड़ने रहबाक शक्ति दैत रहलनि हुनकर नैतिकता। नैतिकताक संग पत्रकारिता करैत ता धरि स्वतंत्रता आन्दोलनक हिस्सा बनल रहलाह, जा धरि ब्रिटेनक चंगुल सँ अपन भारत देश पूरणतया मुक्त नहि भऽ गेल। नोट : श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'क व्यक्तित्व ओ कृतित्व पर किछु लिखबा लेल हमरा सुरेश्वर झा द्वारा लिखल गेल मोनोग्राफ पढ़ब आवश्यक छल, जे साहित्य अकादमी, दिल्ली सँ प्रकाशित अछि। सुरेश्वर झा द्वारा देल जनतब केँ हम अपना ढंग सँ प्रस्तुत कएलहुँ अछि एहि आलेख मे। अक्षरशः नकल नहि कएल अछि। कतहु-कतहु एकाध पैराग्राफ लेलहुँ अछि। सेहो अक्षरशः नहि। तैं पृष्ठ संख्या मेन्शन नहि कएल अछि। संपादकीय सूचना- एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-4 विद्यालंकारजीसँ पहिने विदेहपर व्यासजीक कृतित्वपर कल्पनाजी लीखि रहल छथि। पाठक व्यासजीपर प्रकाशित एखन धरिक सभ खंड निच्चा केर लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकै छथि- मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-7 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-8 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-9 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-10 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-11 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-12 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-13 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-14 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-15 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-16 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-17 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-18 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-19 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-20 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-21 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-22 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-23 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-24 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-25 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.३. डा. किशन कारीगर- गिनिज वर्ल्ड नाम त हम पुर पुर पादब (हास्य कथा) डा. किशन कारीगर गिनिज वर्ल्ड नाम त हम पुर पुर पादब (हास्य कथा)
बाबा बड़बड़ाइत बजैत रहै हौ भागेसर एना किए गन्हौने छहअ? कहए त सत्ते कहू एना पादब भेलैइए? जा ने मर मैदान भऽ आबअह ने. कहए त बाबा मंदिर मे लोक समाज पूजा अर्चना करै लै अबैइए आ तूं तखनि स ढुण ढुण पदै मे बेहाल छह. तोरा कनियो लाज ने होइत छहअ? कहअ त बाबा मंदिर दिस पुर पुर पदबह तोरा किन्हों भांवश हेतहअ? गन्ध स त आब ट्रेनक जेनरल बोगी के बाथरूमो स बेसी तूं गन्हौने जाइत छह. हौ भागेसर जाह ने पोखैर दिस स भ आबह ने. कैले एते पुर पुर पदै मे लागल छह? अखैन त पब्लिक लोक समाज आएब शुरू ने केलकैयै. सब पूजा करै लै त बेरा बेरी एब्बे करै जेतै? तब की कहै जेतै कहअ त? राम राम आब गन्ध स मोन औना गेल.
भागेसर पंडा बोलैत रहै यौ बाबा अहाँ एकदम चिंता नै करू. पब्लिक एनै शुरू हेतै त हम भूस भूस पाएब. मुदा पादब जरूर. बाबा हां हां के हँसैत बोला हौ भागेसर पब्लिक के सेहो गन्ह लगतै कीने? तोहर पेट तेज खराप छह आ कि कतौ अछिंदरे खेलह यै की अपच केने छह जे एते भूस भूस पदै छह? हे जा आबो पोखैर दिस भऽ आबह किए मंदिर परिसर के गन्हबै मे लागल छह? पब्लिक के सेहो दुर्गंध लगतै त फेर कोई मंदिरो दिस घूइर के आउत? भागेसर बोललकै यौ बाबा तेकर चिंता अहाँ जूइन करू. रमेसरा आ मुनेसरा के सबटा गप बुझहा देने छियै की. पब्लिक आएब शुरू हेतै त हम भूस भूस पादब आ तों सब धूमन पजारने अगरबत्ती जरा के रखने रहियैए. पदबाक गंघ केकरो ने लगतै. मैथिलीए वला सब जेंका हमर किरदानी/ यथार्थ के मुँह झंपा जेतै आ सब बुझैत जे हम प्रसिद्ध पुजेगरी छी की.
बाबा खौंजाइत बजलै जे हौ भागेसर तों सब नै मानबह एवं कहू त बाबा सोझहा सेहो पुर पदतै? ई रमेसरा मनेसरा सेहो फिल्ड दिस भ्राम भ्राम पदै छेलै यै. हम पुछबो केलियै जे एना किएक हौ? त ई दुनू बाजल जे यौ बाबा काल्हि मूरनक भोज मे माउस भात फइब लागल रहैए त अनका सीरे अछिंदरे भोकैस लेलियै की. फेर सौ पचास रसगुल्लो ध देलियै. पेट थपथपा ई दुनू भ्राम भ्राम पता छेलै यै. हई तोरा सबके माथा थाता त खराप नै छहअ? एते कहूं पादब भेलैयैए? भागेसर रामेसर मनेसर ई तीनू आई पाइद क मंदिर परिसर अनघोल केने अछि ओहिना जेना मैथिली होहकार सब गिरोहक हं में हं मिलबैत रहल आ दाउ सुतारै दुआरे मिथिला मैथिलीक हो हो केने रहै जाइए. हई भागेसर एते पदै जाइ छह से की बात छियै से कहअ ने कनि?
भागेसर बोलैत रहै यौ बाबा अहाँ देखैत रहू आगा की की होइ छै. कनि पब्लिक के जाए टा दियौ. बाबा पुछलकै दे पब्लिक चल जेतै तब तें सब की करबहक? भागेसर बोललकै यौ बाबा तकरा बाद त हम निचेन स भ्राम भ्राम पदबै. हमरा संगे रमेसरा मनेसरा सेहो पदतै आ संगे संगे अहूँ के भ्राम भ्राम पदै के प्रैक्टिस कराएब आ नै त अहां बाबा छी त अप्पन अहाँ मैथिली वला सब जेंका बीखे पादब. आबि दियौ कारीगर जी के मंदिर दिसा कनि उ त मीडिया वला लोक छै हुनका कहबै जे गिनिज वर्ल्ड वला के बजबै के सरजांम करू. बाबा बजलै हइ भागेसर आई तोहर माथा थाता खराब भऽ गेल छहअ की. हौ तूं अपना संगे हमरो की पदान पदबै मे लागल छह से वैह जानि? कोन पदान पदेबह से कोन ठीक.
बाबा के बात सुनि के भागेसर हां हां के बजैत रहै यौ बाबा हम जल्दिए दिल्ली दिस बाबा महोत्सव करै जा रहल छियै. ओइ मे बाबाक बीच पदबाक प्रकार, भागेसर के भूस भूस पादब, रामेसर के ढुण ढुण पादब, मनेसर के भ्राम भ्राम पादब के मंचन करा देबै. त लगले अनघोल भऽ जेतै से बाबा मंडली के पदबाक मंचन व्याख्या, प्रदर्शन, जनकपुर, काठमांडो, मधुबनी, दरभंगा मे सगतरि भेल छै की. दू चाइर टा होहकार सब स सेहो कहबा देबै जे बाबा मंडली के पादब मधेश मिथिला के गामे गामे भऽ चुकल यै. ततेकरा बाद देखैत रहियौ जे गिनिज वर्ल्ड वला के आंइख खुजै छै कीने नई अपना सबहक नाउ वर्ल्ड्स लार्जेस्ट पादब लै गिनिज बुक मे लिखाइए कीने? फेर किछ हाकरोसी स कहबा लिखबा देबै जे ई मिथिलाक लेल गौरव के बात यै जे पुर पुर पदै लै गिनिज बुक मे नाम लिखा गेल अई स कतेके पेट दर्द शुरू भऽ गेलै. आ मैथिलीए नाटक वला सब जेंका अपनो सबहक किरदानी/यथार्थ के मूँह झंपा जेतै की?
एतना मे साइकिल के घंटी टुनटुनबैत हमहूँ मंदिर दिस पहुँचली. अवाज़ देलियै बाबा हो बाबा? की हो पंडा जी कनि छहो हौ? एतना ढुण् ढुण, पुर पुर, भ्राम भ्रम कथि हो रहलो. ओनि से पंडा जी बोलथिन आउ आउ किशन जी अहि के खोजबिन मे बाबा मंडली लागल छेलौं. ज आबिए गेलहुँ त कनि गिनिज बुक वला स संपर्क क दिल्ली बजाउ ओकरा. ताबे बाबा बजलै हौ जी महराज हमरा त भागेसरक गप के कोनो भांजे नै लागि रहल. पंडी जी हां हां करैत बजलै यौ बाबा अहूँ साफे खत्म आदमी छि अखनि तक किछो ने बुझलियै. हे कारीगर जी कनि अहिं बाबा के बुझहा दियौन जे पुर पुर पदै मे सेहो गिनिज बुक रेड भेलै यै कीने? सैह हम सोचलहुँ जे अई बेर बाबाक या अपने नाम दर्ज करा लै छि.
हम्मे कहलियै हो बाबा पंडा जी ठीके त कह रहलहो. बाबा एतना बात सुन के हां हां करैत बोललकै अच्छा त से गप छियै. हमरा त बुझले नै छल. हम कहलियै हो बाबा अखनिए सबटा गप बुझ जेबहो की. भागेसर जी से पूछने तनि जे गिनिज टीम औताह त की सब करतै? बाबा भागेसर स पुछलकै त उ हां हां करैत बजलै यौ बाबा हम त कहबै जे गिनिज वर्ल्ड वला सब हौ तों सब आन्हर छह? नाम दुआरे त हौ मैथिल सब एकरो रेकड तोइड़ देतै की. पुर पुर/ ढण ढ़ण/ भूस भूस/ भ्राम भ्राम पदै आ बिख पदै मे त मैथिल सब एक नंबर बिहाइर होइए. जल्दी मिथिला भ्रमण क तों सब देखहक. दिल्ली टा मे बौएने किछ नै हेतह? देखहक पुर पुर पदै के रेकड बनै छै कि ने? आ फेर पुर पुर पदबाक नबका रेकड बनतै की.
- डा. किशन कारीगर, मूल नाम- डा. कृष्ण कुमार राय) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.४. लाल देव कामत- कलंक : एक पोथी चर्चा लाल देव कामत कलंक : एक पोथी चर्चा कलंक 'मैथिली कथा संग्रह ' श्रीमान जगदीश प्रसाद मंडल जीके १३३म् कृति थीकैन। पल्लवी प्रकाशन - निर्मली सँ प्रकाशित ऐहि मैथिली भाषा केर पोथीमे पृष्ठ सँ० ९६ टा अछि,जाहिक दाम २९९ टाका छैक। सन २०२६ ई० मे सद्यप्रकाशित ऐ पोथीमे कुल १० गोट नव कथा संग्रहित कयल गेल छैक, जकरा आई एस बी एन. ९७८- ९३- ४८८६५- ७५- ५ नं० भेटल छैक। नीक गत्तामे सुलेख छपाय केर संगहि पृष्ठ सँ० ८८ सँ ९५ धरि कथाकार श्री मंडल जीक रचना संसार मादे विवरण आ हुनकर रचना संदर्भमे अनुवाद ओ चयनित पाठके ६७ पोथीक सुचि देल गेल य। पछिला कभर पर श्री जगदीश बाबू'क रंगील हाफ फोटो सहित संक्षिप्त परिचय आ साहित्य लेखनक जनतब देल गेल छै। प्रस्तुत पोथीक पहिल पाठमे 'बहिनक सिनेह' शिर्षक बढ़ मनलगू आ आधुनिक समयक समाजिक विषय पर रचना कयल गेल छैक। हुनक एहि १०६३ म् कथामे शव्द संख्याँ १७४६ टा य, जे ६ जनवरी २०२६ केँ ई खिस्सा लिखलनि हेन। लगधक १८ वर्षीय जुवती कुन्ती चारि भाय - बहिनमे सबसँ छोट वयशके छथिन,जे ऐ कथाक मुख्य पात्र रहल छथिन। वयक्रम सत्रह साल जाहि दिन पार करैत अठारहम् सालमे प्रविष्ट करैत छैक,हुनका सम्पूर्ण रातिक भोरहरबा धरि एक विचार मोनमे उधकैत रहैत छै। आओर स्वगत नियार - भास अनुसारे दोकान सँ सामग्री बेसाहि गामेक दोसर टोलमे अपन जेठकी बहिन श्यामा ओतय बेरूका पहर झोरा लेने पहिले बेर जाईछ। हुनकर श्यामा १८ वरख वयस पुरतहि अपन कालेजक साथी मनोज जी संग प्रेम बियाह कय परा गेल छलैन। से कन्या पक्षक हंसेरी वर पक्षके ओतय झगरा करय पहुँच गेल छलैक। तेँ आब छ: सालक बेटी राधा आ चारि सालके बेटा मनोहर भेलोसन्ता क्योपक्ष अबरजात आओर साहभाह नै रखने छलैक। पैघ बहिनक प्रति अम्बोहि सिनेह जगैत छोट बहिन आई कुटुम्ब परिवारमे धियापुता लेल पढ़ाय - लिखायके उपस्कर आ नव वस्त्र झोरामे लैत ४ वजे जुमैत छै। बहिनबेटी सँ संवाद स्थापित कय आ ओसाराक कुर्सी पर दूनू सहोदर बहिन कनेक काल मूकवार्ता फेर अन्तरवार्ता करैछ। जन्मदाता माय - बाप ले बेटी समय पर बिरान भऽ जाईछ, मुदा एतय तँ विरानों सँ ओइकात बाली बात छलैक। ई तँ उचिते थीक जे १८ साल पुरैत बालिका बालिग कहाबैछ आ कानूनन सरकारो विवाह बावत पुरे स्वतंत्रता देने छै। बहिन केँ बुझाबैत कहैत य ; तोँ अनुचित नहिं केने छें। हम सम्बन्ध जोड़नाई केँ अपन मर्जी सँ समर्थन करैत छियौक। ताहि दिनमे तँ ओ स्वत: नेबालिक रहथि। ऐ कथामे एक शिक्षित आ तन्दुरूस्त बेटी मोनमाफिक अपन वियाह स्वयं करैके नव संदेश प्रसारित करैत अछि। ऐहि पोथीक केन्द्रीय कथा छी -'कलंक' ,ऐ शिर्षक केँ पर्यायवाची शब्द "बदनामी" सेहो राखल जा सकैत छल। मुदा साम्यवादी विचारधारा'क कथाकार श्री मंडल जी कथाकेँ सामाजिक व्यवस्था अनुरूप गढलैन हेन। मध्य मिथिलाक लेखे पूर्णियाक मेरीगंज पूबरिया मिथिलांचल छी ,जतय कथा नायक पात्र राम अधिन जीके पुत्र १५ साल सँ शिक्षक पेशामे बांझल रहैत छैन। एतेक साल सँ गाम आपस नहिं एनिहार कमासुत बेटा लग पुर्णियाँ जाकय मासदिन ओ रहैत छथि,मुदा ओतुका ने कोनू प्रमुख स्थानक दर्शन कऽ सकलैक आ नै जड़ौर कपड़ा कीन सकलैथ। कातिक मासमे अपना गामक सहृदय अपेक्षित सुमित भाय जीक पत्नीके मरणक मो० पर खबेर सँ ओ अशांत देखाईत छै। तेँ ओतुका सुधांशुजी - लक्ष्मीनारायण सिंह, कुमार सहाएब, कुमार गंगानंद सिंह आ फणिश्वरनाथ रेणुजी'क डीह देखबाक अभिलाषा छोड़ि भोरका रेलगाड़ी सँ यात्रा करैत छथि। मोनमे इयह गुनधुन चलैत रहैत छैन जे, पछिला ४० साल सँ सुमीत भैया सँ लगिचक अपेक्षियार्थे चलैत निमहैत आबि रहल य से डेढ़-दू मास सँ रूग्ण हुनक धर्मपत्नी'क देहान्त सँ अतिशोकमे रहैत नीजगाम पहुंच कऽ सांत्वना देमय पहिले हुनके दुआरि पर जाए ; तखन अपना गृहि अबैत अबैत छैक। सोगाएल सुमित भाइक संग कुटुम स्वजन सब ओतय बैसल देखाईत छैन। सरबेटा अर्थात् मृतक दिदिके भातिजा मुखाग्नि देने रहनि। कारण अपन दूनू बेटा मलेशिया देशमे रहैत छैन। परिस्थितिवश ककरो बगैर कोनू काज बिथुत नहिं होईछ,से एहि बहुआयामी कथामे संदेश देल गेल छई। संगहि कर्ताक गाड़ामे उतरी आ कर्मकांड तथा मृत्यु भोज आदि विडम्बना सँ कथा मुक्त छै। तकर अन्त:करण ई भ' सकैत छै जहन साम्यवादी जनक कालमार्क्स केर एकलौती छोट बेटी मुइल तँ ओकर फ्राके सँ कफ़न मान्य कयल गेल छलैक। कोनू आडम्बर सँ बचैक लेल साफ डेग उठाबैत कथाके सारांश रूपेँ सुमित जीके मुहेँ वक्तव्य दैत देखाओल गेल य। ओ राम अधिन जीकेँ कहैत छैन - "अपना आँखिक समक्ष पत्नी क' पारघाट लागि गेल तँ कलंक सँ बाँचि गेलहुँ।" अविश्वस सँ विश्वास 'तेसर कथा' साकारात्मक अछि। ऐहिमे साठि वर्षीय हृदय लाल भायक पुष्टगर देह दिन- दिन हलल जाईत देखि सत्रीगण लोकनि बूझथि जे रातिकेँ हुनका चुरीन- जीन आ भुत लागैत छैन, तँ रघुनाथ लग ओ स्वयं बाजैत छैक- बेटा पूतौह हमरा दूनू व्यक्तिके ऋषि परम्परा अनुसारे सोगाय नहिं देत! ऐनूलक सलगा पाठमे लक्ष्मीपुर गामक एसकरूआ ८५ वरखक लुखिया दादी माघक जाड़ा कोना खेपतीह। मधेपुर दिसनके ऐनुल सलगा बनबैत आ बेचैत रहय से ऐ बेर नहिं देखाईछ। मंगल काका हुनका शितलहरीमे अपना ओहिठाम शरण दै ले लऽ जाए चाहैत छै।ओ ईहो बाजैत छै ऐनुल बुढ़ भेला,हमरा ५ गो सलगा निशानी देने गेलाह। एकटा ओढ़ियो लेब आ जाड़ा सेहो खेपब। मानवतावादी संदेश देवामे मंडल जी समर्थ भेल छथि। अपन गाम,जिनगीक धार सुखि गेल,अप्पन वंश , विचारहीन,राँइ- बाँइ समाज आओर किसानी छोड़ए पड़त कथा पाठककेँ उपरा उपरी आ रोचक लागत। जगदीश प्रसाद मंडल जी ऐबेर ५ जुलाइ केँ ८० वरखक जन्मदिन मनेताह, हार्दिक कामना आ बधाय दैत छीयैन हम! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.५. लाल देव कामत पहिल लोक 'उपन्यासक' आलोचनात्मक अध्ययन लाल देव कामत पहिल लोक 'उपन्यासक' आलोचनात्मक अध्ययन स्पष्ट वक्ता पुरुष- लेखक, कथाकार,नाटककार , कवि, गीतकार, अनुवादक रुपमे उपन्यासकार डॉ० गंगेश्वर झा ,जिनक साहित्यिक नाम थीकैन गंगेश गुंजन जी सँ एकबेर झंझारपुरमे भेंटघांट भेल अछि । मधुबनी जिलाक पिलखबाड़ गाममे १५ जुलाई १९४२ ई० केँ हिनक जन्म भेल छन्हि। माय स्व० महालक्ष्मी आ बाबु- स्व० हरिहर झा तथा बाबाके नाऊ नैयायिक पं० चुम्बे झा रमण रहनि। हिनक प्रपितामहक भ्राता ज्योतिर्विद पं० भानु नाथ झा उर्फ भाना झा मैथिली'क प्रसिद्ध कवि आ नाटककार रहथिन। हिनका पिता सँ विरासतमे भेटल रहनि एक वाक् - सदा बाम भाग चलथि। से पढाय- लिखाय हिन्दी आ मैथिली भाषा मेँ एम.ए. धरि कयने छथि। पटना आकाशवाणीमे प्रोड्यूसर पद पर कार्यरत रहि , पटना विश्वविद्यालय सँ मैथिली रेडियो रूपक विषयमे पीएचडी.उपाधि प्राप्त करने छथि। ई हिन्दी क्षेत्रमे अपन लेखन काजके बाट धेयने रहथि। मुदा मातृभाषा मैथिली'क प्रति अगाध प्रेमक चलते ई मैथिली केँ भऽ कऽ रहि गेलाह। मैथिली गद्य आ पद्य दूनू विधामे बहुत कम रचना छन्हि। हिनकामे एक संग अज्ञेय के कलावाद आ मुक्तिबोध के वस्तुवाद देखल गेलैक हेन। हिन्दी आ मैथिलीमे साहित्यक तत्व तथ्य बनैत एक सृजनहार कहल गेल छन्हि। हिनका मादे गद्यकोशमे देवशंकर नवीन जी विस्तार सँ बतेने छथि। ग्राम+पो०- मधेपुर सँ डॉ० ममता कुमारी लिखैय छैन "हिन्दी जगतके अतिरिक्त मैथिली साहित्यक क्षेत्रमे ई वरिष्ठ कथाकार,नाटककार, कवि, उपन्यासकार ओ गीतकारक रूपमे प्रसिद्ध छथि। " हिन्दी केर प्रकाशित पुस्तक 'भोर' २०१७ ई०मे १३ कहानीके संग्रह छपल छैक। मणीपद्म जीके मैथिली पोथी नैका बनिजारा केँ हिन्दी भाषामे अनुवाद 'मिथिलांचल की लोक कथाएं ' छपलनि। हिन्दी लिखैत रहथि तँ १६ चुनल कविमे हिनक स्थान रहनि। मैथिली भाषा मेँ चौबटिया नाटक 'बुधिबधिया'क १९८२ म पोथी छपलनि। दू आरो नाटक क्रमश: आई भोर, नबका सिलेवश छैन। कथा संग्रह :- अन्हार इजोत - १९६४,उचित वक्ता - १९९१ ई० आ सिंन्दुरक दाम - २०११ मे प्रकाशित पोथी छैन। कविता संग्रह पोथी -: दीर्घ काव्य १९६८ मे 'हम एकटा मिथ्या परिचय 'आ सन् १९८० मे लोक सुनू प्रकाशित भेलाक वाद १६ महाकाव्य चारि खंडमे यथा, अपमान बोधि,गीत नहिं मरत, विश्वासघात - एक,आ नव घरक ठेकान पता केर अतिरिक्त १५ गीत छैन -: आब गाम अस्पताल लगैए,करइथ नेतागण भाषण मनुष्याभास ,गंधहीन फूलक मधुमास, गामकेँ प्रणाम, आ दुपहरिया रौदमे खूब प्रशंसित भेलनि। गजल रूपेँ हिनक रचना -: दुखक दुपहरिया - १९९९ म बहरेलनि। गंगेश गुंजन जी कें एकटा कचोट मोनमे हौरैत-पौरैत रहलनि अछि। साहित्य अकादमी सँ छपल १९८१ ई० म १६४ पृष्ठक मैथिली पोथी 'पहिल लोक' केर लेखक दिससँ पन्नामे ओ लिखने छथि-: " पहिल लोक हमर दोसर उपन्यास 'माहुर वन' मिथिला मिहिर मैथिली सप्ताहिक कार्यालय सँ चोरी भ' गेल ,वा हेराय गेल। मूले पाण्डुलिपि रहय से प्रकाशित नहिं भ' सकल ।" मदनेश्वर मिश्र - तत्कालीन अध्यक्ष, मैथिली अकादमी , श्रीकृष्ण पुरी -पटना १ अपन प्रकाशकीयमे लिखैत छथि - "समकालीन भारतीय साहित्यक सामानांतर नवचिन्तन ओ नव शिल्प प्रस्तुत मैथिली उपन्यास 'पहिल लोक' अछि। गंगेश गुंजनके पोथीमे कुशल चित्रकारक आ महान् चिन्तकक चमत्कार भेटल अछि।नविन दृष्टिकोण ्क अभिव्यक्ति हिनक रचनाक गुण थीक।" पहिले लोक दीर्घ कथावस्तुक पात्र आ मनोरम मिथिला ्'क दृश्य ऐ ५५ सालमे बहुत किछु बदलाव सन छैक। उपन्यासकार अपना कैंचा सं पोथी छपेबामे असमर्थ रहथि।तेँ लेखन कार्यक १० बरख बिरला पर ई उपन्यास अस्तित्वमे आयल रहय। ऐहिमे स्त्री पात्र सुष्मिता दी आ पुरूष पात्र राजू'दा विषयमे काल्पनिक कथा कहर गेल छैक। सब पराबके एक उप शिर्षक उपन्यासमे लेल गेल य। राजू दा केर प्रेमिका इला आ सुष्मिता केर सखी- अरुणाक कथा सेहो क्षेपकमे कहल गेल छैक। बाल बच्चैदार कामकाजी जनीजात शहरमे अपन पति संग कार्यालयमे खटैत छै। हुनक पति महोदय विष्णु जी नशबंदी धरि अपन समय सँ करा लेने छै। उपन्यासके शुभ संज्ञा अनुसारे राजू योग्य ब्राह्मण केँ शासकीय सेवा मे सफलता नहिं भटलैक। लोकसेवा आयोग केर एक अन्तरविक्षामे शहर गेलापर अपन परिचित शिष्या सुष्मीताक डेरा पर आश्रय लैत छै। इला सँ पत्राचार नहिं भेने निश्तुकी पता सेहो नहिं छैक। गाममे ऐबेर खेती करैत राजू भाय - भौजक आशा छोड़ि मायक सेवामे रहैत छथि। भाय आ भाउज गरीबक बेटी सँ हाथ धरेबाक जोगार बैसाए गामेक दोसर टोलमे राजूक संग कन्यागत ओहिठाम गेल छथि। मुदा जे भवितव्य लिखल छैक से कोना मेटतनि। अकस्मात् सुष्मिता जी अपन स्वस्थ मोन सँ राजूझा ओतय रहय ले सदाके लेल आबि धरफरन लाधि देलि हेन। हर जोति धरती मायके सेवामे एक अनोखा संबंध दाम्पत्य जीवनक आरंभ भेलैक। आब तँ गुंजन जीके साहित्य पढ़ि कतूको अर्थशास्त्र क' ग्रेजुएट लोकल फार ......! आधार पर कृषि काजमे दतचित जुटल अछि। आ अन्तर गोत्रिय वियाहक समर्थन करैत अछि। उपन्यासकार श्री गंगेश गुंजन जीक शव्द चयन आ सुलेख पाँति एहि तरहक होय छन्हि -: " क्षमा करु राजूदा। अहाँ सुधंगे रहि गेलहुँ । हिनका संदेह बनले रहतनि ने यदि बच्चा होइत तँ जे कोनो आने संयोग सँ हमरा बच्चा भेल अछि, ओ सुनकर नहिं। अपने ऑपरेशन सँ निश्चिन्त रहताह जे परपुरुष लग जयबाक हमरा साहसे नहिं होयत। आ एहि प्रकारे हमर सतीत्व अक्षुण्ण रहत जिनका नजैरमे। हमर सम्पूर्ण आत्मा क्रोध आ घृणा सँ धह- धह जरैत रहैए,राजूदा। प्राण जरैत रहैए। कखनो काल एहि बातपर मन तेहन कठोर भ' जाइए जे हम कयटा बढ़ मारुख संकल्प सब कर' लगैत छी। हमारा अपना ऊपर अपने पतिक कयल गेल एहि अविश्वासक हेतु मनमे बड़ भयावह प्रतिशोधक भावना तंग करैत रहैए । बहुत! आ, आब तो हमरा बड़ साफ- साफ बुझाइत रहैए जे हम आई धरि भुखायल भोजन सभ कौरक स्वादो नहिं बुझने छीऐक। स्वादि - स्वादि क' खायब तो दूर ,जे बिना स्वदियो क' खयने जे स्वाद भेटैत छैक,ताहू सं हम अनभिज्ञे छी। हमरा मोनमे आब एहि बातक बड़ लोभ होइत रहैए। मनमे जबर्दस्त प्रतिक्रिया उठैत रहैए। हमर मन जेना अपने चारु कात सँ घेराएल धधकैत रहैए। " ओहि दिन डिप्टी पर नहिं जाए ,अपन मनके पीड़ा नै चाहैत व्यक्त धरि कय मोन हल्लूक कयने छलीह। हुनकर हिममतकेँ दाद दैत छी। ऐ तरहक निष्ठुर साहित्य रचना सँ गुंजन जी लेखकीय समाज सँ गुटबाजी आ खेमाबाजीक कारणेँ तत्कालीन परिवेश सँ कटल बुझाइत रहलाह अछि। हुनक जन्म जयंती लगीच य, हार्दिक शुभकामना आ बधाय दैत छीयैन हम। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.६. लाल देव कामत- पाठकीयता 'हमर ई मोन कहैए' लाल देव कामत पाठकीयता 'हमर ई मोन कहैए' शक्ति- शिवक भक्ति गीत आ सखि हे आँचर फुलय वसन्त २०२४ मे मैथिली कविता संग्रह संगहि प्रेरणा - पुँज 'मैथिली सूक्ति संग्रह ' केर वाद अई बेर सँ पहिले अर्थात २०२५ मेँ पद्य विधामे मैथिली कविता संग्रह "हमर ई मोन कहैए" कविवर श्री उदय शंकर झा जीक नवारम्भ प्रकाशन - मधुबनी सँ बहराएल छन्हि। ओना गद्य विधामे श्री झाजी सेहो तीव्र गतिये कलम चलौलनि अछि। आँखिक देखल ,कानक सुनल 'मैथिली कथा आख्यान आओर संयोग २०२५ ई० मेँ मैथिली उपन्यास , तथा २०२६ मे सेहो पतीत, आँचर तर आओर संयोग पोथी प्रकाशित भेलनि अछि। सन् २०२० ई० सँ पूर्व छात्र जीवनमे कविता रचैत रहथि, आब काव्य केर संग - संग उपन्यास विधामे आगू बढ़ि रहलाह अछि। ताहि पर पोथी पढ़ि कहियो समीक्षा करब। एखन सद्यप्रकाशित मैथिलीमे ६४ पृष्ठक पुस्तिका, जाहिमे उदय जीक ६३ गोट कविताक संग्रह कयल गेल छैक ; तकरा आई एस बी एन ९७८- ९३ - ४९८६७ - ५४- ३ नं० भेटल छैक। से ताहि प्रस्तुत पुस्तिका'क दाम २०० टाका य आ आभरण (कभरक) मुख्य पृष्ठ सज्जा दिल आ साहित्यिक वैश्विक चित्राबलीक रंगील गता तँ आकर्षित करैते छैक। पछिला कभर पर लेखक परिचय आ छविक संग कविजीक धर्मपत्नी श्रीमती रेणु झाजीक हाफ फोटो सेहो ग्राहक केँ लौकत। एहि बहुआयामी रचनाक समर्पण अपना गामक काली पूजा समिति केँ कयलन्हि अछि। मुदा पोथी संदर्भमे प्रकाशीय आमुख लिखय सँ नवारम्भके कर्ताधर्ता आ आशुकवि श्री अजीत आजाद जी परहेज कयने छथि। पाठककेँ हिनक कविता पढ़ैत सब रस सँ सराबोर आ ओज नीक लागत। कविता पढैत - सुनैत अतिशय आनन्दक लाभ भेटत। पहिल कविता'क शिर्षक - बेटा ,बापक दर्पण मेँ जे हुनक रचनाक पाँति शुरु भेलैक हेन,से द्रष्टव्य अछि -: कोनो बाप लेल बेटा की? बेटा तखन बुझैए । जखन आबि एहि दुनियाँमे ओ अपने बाप बनैए।। ........... एहि कविताक भाव आगू बाल मनोविज्ञान तरहेँ रचल छै ,जाहिसँ क्रमिक रूपेँ बच्चा सँ किशोर आ किशोर सँ युवा होईत कोन - कोन मन:स्थिति सँ एक प्रोढ व्यक्ति गुजरैत अछि; आ तकर तार्किक रूपें स्वयं अपन मुल्यांकन करैछ। कोनू शिशु कें देखि एक वयस्क व्यक्तिक अभिलाषा आ मनोदशा कोन तरहेँ औनाईत छैक से एक अन्त:करणक झलक सँ स्वयं बिहुंस पड़ैछ। गौरव कविता गौरव बोध कराबैत मानवीय भीतुरका जे द्वन्द चलैत रहैछ ,अपनाकें सबसँ उपर आ दोसरकेंँ हीन बुझैत छैक; से जीवनक आखरि क्षणमे कोना मोन स्वत: विमर्श करैत छैक तकर मनोविश्लेषण ऐ कवितामे एक झलक पाठक देख लैत अछि। जीवन - वृतांत पाठमे पाठककेँ संदेश भेटैछ अपने मोन गछत एहि भलाजुग संसारमे कियो अपनाकेँ कम नहिं बुझैत य। से निष्पक्षता सँ आकलन करबाक संदेश देल गेल छैक। समस्या जनित एक कविता 'ककरा पर के आश करत' पाठमे कविक चिन्ता समीचीन छै। हुनक रचल मौलिकता पर समाज सोचथि -: ककरा पर के आश करत। ककरा पर के विश्वास करत।। सभ अपनेमे अछि ओझरायल। सोझरेबामे छै सभ बाझल ।। एक आखरि पाठ शिर्षक " बुध्दिमान" कविता'क माध्यम सँ कविजी समष्टिक समुदाय केँ चौथापनमे जे अध्यात्मिक झुकाउ हेबाक चाही से अपन ज्ञान बँटैत ,अपन अनुभव सँ लाभ लेबाक खगता देखेलनि अछि -: बुध्दि देने भगवान छथि। कर्मक ओ प्रधान छथि।। विचरण लेल ओ प्राण छथि। परखय लेल देने ज्ञान छथि।। सज्जन लेल सम्मान छथि। दुर्जन हेतु कृपाण छथि।। रखने हाथ कमान छथि। बुझथि से भगवान छथि।। ................! पिकिपिडियासीमे कुल १४,३५३ लेखकक संग्रहित नाम छैक,जाहिमे सँ बेसीतर कविता रचैत मैथिली साहित्य केर अक्षय भंडार केँ भरलनि अछि। किनको कविता सँ हिनक कविताक तुलना करब अर्थात दब-उनार कहब हमरा शक्य नहिं होयत। मैथिली कविता माध्यम सँ कवि उदय शंकर जी साहित्य सेवा कऽ रहलाह अछि,से स्तुत्य प्रयासके हम प्रशंसा करैत छियैन। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.७. आचार्य रामानंद मंडल- पोथी समीक्षा: लखिमा की आंखें/ फिल्म विद्यापति (1937) समीक्षा आचार्य रामानंद मंडल पोथी समीक्षा: लखिमा की आंखें/ फिल्म विद्यापति (1937) समीक्षा १ पोथी समीक्षा: लखिमा की आंखें
हिन्दी उपन्यास लखिमा की आंखें बंगाली रांगेय राघव रचित उपन्यास हय। अइमे मिथिला के महारानी लखिमा के मादे कवि विद्यापति के जीवन वृत्त लिखल गेल हय। उपन्यास यात्रा वृत्तांत के रूप मे लिखल गेल हय। लेखक वृंदावन के यात्रा पर छतन। यात्रा क्रम मे कृष्ण भक्ति के उपासक गौरांग महाप्रभु सम्प्रदाय दल के भक्ति गीत नृत्य से महारानी लखिमा के उपास्य कवि विद्यापति के बारे मे जानकारी मिलैत हय।तब लेखक राघव कवि विद्यापति के गांव बिसिपी अवैत हतन।आ हुनकर प्रपौत्र से मिलैत हतन। प्रपौत्र से कवि विद्यापति के बारे मे विस्तार से जानकारी पवैत हतन।राजा शिव सिंह के देल विसिपी गाम के संगे हुनकर रचना साम्राज्य के जानकारी। प्रपौत्र के घर मे महाशिव उदना के वंशज बालक से भेंट होइत हय। कवि विद्यापति से संबंधित दंत कथा सभ से परिचित होइत हतन।जैमै कवि विद्यापति के समकालीन पं जगन्नाथ मिश्र अपन २३बर्षीय पुत्री के धन के लोभ में एगो कुलीन एगो बच्चा से बिआह के लेल तैयार हो जाइत हय। कवि अइ बाल विआह के रोके के लेल पिया मोर बालक हम तरूणी गे के रचना क के पांति मिश्र जी के भेज देइत छतन।मिश्र जी रचना पढ के अपन युवती लरकी के विआह न करैत छतन। रचनाकार स्वप्न मे कवि विद्यापति के अंतिम यात्रा देखैत छतन। कवि अपना जीवन से बहुत दुखी छतन।जीवन भर हम रमणीसे क्रीड़ासक्ते बनल रहली।भजन के लेल अवकाश कंहा मिलल।हम कैइसे भवसागर पार करब। कार्तिक शुक्ला त्रयोदशी के दिन गंगा के किनारे प्राणांत हो जाइत हय। रचनाकार बृंदावन धाम के यात्रा पर निकल पड़लैन हय।नाव से यात्रा हय। यात्री वसंत के गीत गा रहल हय।राजा शिव सिंह आ महारानी के आमोद प्रमोद के रस रंग गीत।आ मिथिला के महाराजा शिवसिंह, महारानी लखिमा, कवि विद्यापति आ शासन प्रशासन के दृश्य उभर रहल हय। महाराजा शिवसिंह आ लखिमा से अनन्य प्रेम। महारानी लखिमा कवि विद्यापति के देवता मानैत छतन।हुनकर मानना हय कि कवि देवता होइ छैय।दोसर तरफ राज के मंत्री, पुरोहित आ ब्राह्मण वर्ग के मानना हय कि कवि विद्यापति के गीत राज काज आ समाज के लेल उचित न हय।खास के गीत मे लखिमा के उल्लेख त बिल्कुल उचित न हय कि लोग गीत में महारानी लखिमा के नाम उच्चरित करे।परंच राजा आ रानी गीत के धार्मिक माने।वो कृष्ण भक्ति के गीत माने।अही बीच दिल्ली के सुल्तान महमूद मिथिला पर आक्रमण करैय हय।राजा शिवसिंह एकटा क्षत्रिय कर्तव्य समझैत युद्ध करैत हतन।आ युद्ध मे विजयश्री प्राप्त करैत हतन। मिथिला में विजय के नगाड़ा बजैत हय। कुछ दिन बाद राजा शिवसिंह बिमार पड़ैत हतन आ राजप्रासाद में महारानी लखिमा आ कवि विद्यापति के समक्ष हुनकर प्राण पखेरू उड़ जाइत हय।राजा शिवसिंह पुत्रहीन रहलन तै छोट भाई पद्म सिंह राजा बनैत हय। महारानी लखिमा विधवा के जीवन व्यतीत करैत हय। हालांकि लखिमा कवि विद्यापति से प्रेम गीत सुनैय चाहैत हय।परंच कवि विद्यापति घर पर रहैत धार्मिक ग्रंथ लिखैत हतन। रचनाकार शारीरिक अक्षमता के कारण बृंदावन के यात्रा पूरा न कर सकैत पाबत हय। रचनाकार कवि विद्यापति द्वारा वर्णित लखिमा के आंख से प्रभावित होके संभवत: रचना के नाम लखिमा के आंखें रखले हतन। प्रस्तुत उपन्यास मिथिला आ मिथिला साहित्य के इतिहास पर प्रश्न चिह्न ठाढ करैत हतन। प्रथम राजा शिवसिंह क्षत्रिय हतन।दोसर युद्ध में विजयी रहलन आ राजप्रासाद में प्राण त्यागलन।तेसर महारानी लखिमा मिथिला राजप्रसाद में बैधव्य जीवन व्यतीत केलन। महाराजा शिवसिंह के मरणोपरांत छोट भाई पद्म सिंह महाराजा बनलन। चौथा कवि विद्यापति गांव में शेष जीवन धार्मिक पोथी रचना में बितैलन।पांचम महाशिव के नाम उगना नहि उदना हय।अंततः उपन्यास लखिमा की आंखें बारम्बार पढैय के उत्सुकता जगैबै हय। २ फिल्म विद्यापति (1937) समीक्षा
बंगाल फिल्म सेंसर बोर्ड द्वारा पारित फिल्म विद्यापति के आधार पर विद्यापति के जीवन विवादास्पद हय। फिल्म मे विद्यापति के घर बिस्फी बतायायल गेल हय। परंच मिथिला नगरी के अलग। मिथिला के राजा शिव सिंह आ महारानी लखिमा। फिल्म मे विद्यापति के पुराना नौकर मधुसूदन हय जे विद्यापति के पालन पोषण कैले हतन। विद्यापति हुनका दादा कह के पुकारैत हतन।विस्फी गाम के एकटा लरकी अनुराधा हय जे विद्यापति से प्रेम करैत हय। विद्यापति एकटा प्रसिद्ध प्रेम के कवि बतायल गेल हय। परंच वो प्रेम गीत काम गीत बन गेल हय।काम गीत से मिथिला राज के युवा -युवती बिगड़ रहल हय। समाज पर दुष्प्रभाव पर रहल हय।विद्यापति से लोग नाराज़ हय। परंच राजा शिव सिंह अपन मित्र विद्यापति के प्रधानमंत्री के राय के विपरित राजकवि बनैबैत छथि। बिस्फी से विद्यापति संग अनुराधा सेहो मिथिला नगरी आ गेल हय।महारानी लखिमा विद्यापति के प्रेमगीत से प्रभावित होइत विद्यापति से प्रेम करे लागल हतन। परंच राजा शिव सिंह लखिमा से प्रेम करैत छतन।राज दरबार विद्यापति आ लखिमा से काफी नाराज़ हय। अइ वीच मिथिला पर दुश्मन के आक्रमण खबर पर राजा शिव सिंह युद्ध भूमि मे जाइत छतन। कोनो कारण वश युद्ध रूक जाइ हय। परंच प्रधानमंत्री द्वारा राजा शिव सिंह युद्ध भूमि मे रूकल रहैत छतन।परंच जैइ दूत के संवाद से रूकल छतन वो लखिमा के प्रेम आ आवाहन के बात पर राजा शिव सिंह मिथिला राज लौटत हतन। लखिमा के तन प्रेम के कारण राजा शिव सिंह दुख छतन। लखिमा अपना के दुख के कारण समझैत प्राण त्याग चाहैत हय। लखिमा के पूछला पर विद्यापति अपना प्रति लखिमा के प्रेम पाप बतबैत छतन। लखिमा के प्राण त्याग के एगो इहो कारण हय। दोसर ओर दुश्मन के आक्रमण के सूचना हय।प्रधानमंत्री समझैत हतन कि जौं तक महारानी लखिमा जीवित रहतन राजा शिव युद्ध भूमि मे न जैतन आ राज काज न देखतन। प्रधानमंत्री महारानी लखिमा के खाय ला विष दे देइत हतन। महारानी लखिमा विष खा के प्राणांत क लेइत हतन। फिल्म विद्यापति के विवादास्पद बना देइत हय।इ त मिथिला आ मैथिली साहित्य इतिहास के विरुद्ध लगैय हय। फिल्म से उगना गायब हय।आश्चर्य इ कि बंगाल सेंसर बोर्ड फिल्म के प्रदर्शन के स्वीकृत केना कैलक। -आचार्य रामानंद मंडल, सीतामढ़ी। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.८. प्रीति कुमारी- श्री जगदीश प्रसाद मंडल'क साहित्यके अनुदीत प्रसार : एक सिंहावलोकन प्रीति कुमारी श्री जगदीश प्रसाद मंडल'क साहित्यके अनुदीत प्रसार : एक सिंहावलोकन
मैथिली भाषा मेँ प्रकाशित पोथीक संख्याँ १३७ टा जाहिमे लगधक १५६० सँ अधिक रचना मात्रे २६ सालमे जिनकर भेल छन्हि,से वयोवृद्ध समाज सुधारक आ साहित्यकार छथि - श्री जगदीश प्रसाद मंडल जी। मधुबनी जिलाक तमुरिया रेलवे टीशन सँ ५ किमी० पश्चिमोत्तर आ एन. एच. चनौरागंज बजार सँ ७ किमी० दक्षिण भाग अवस्थित एक सर्वहारा गाम - बेरमा (लखनौर अंचल) मेँ श्री मंडल जीके जन्म ५ जुलाई १९४७ ई० केँ भेल रहन्हि। अति पिछरल समाजक उपजाति धानुक ( चिरौंठ) मध्यवित परिवारक श्री दलू मंडल पिता आ श्रीमती भकोवती देवी माय हिनक बाल बियाह सामाजिक चलैन अनुसारे ५ वर्खक वयक्रममे श्रीमती रामसखी देवी सँ सरोकारी परिबारमे करेलन्हि। बपटुअर जगदीश जीके आरम्भिक शिक्षा गामेमे सातम साल वयसमे आरम्भ भेलनि। से ओ हिन्दी आ राजनीति शास्त्र अर्थात दू विषयमे एम.ए. आ कानून केर पढ़ाय धरि केलनि। ओ अथक परिश्रम सँ तरकारी खेती करैत गुजर बसर अपनौने आबि रहल छथि। सन् २००० ई० सँ पूर्व ओ कम्युनिस्ट पार्टी 'क राजनीतिमे जिला स्तर पर सक्रिय रहैत ,किसानक समस्या निदान लेल संघर्षरत रहलाह। ताहि दरमियान ओ अनेको बेर केश- मोकदमा सँ त्रस्त भ' जहलमे सेहो कारावास काटलन्हि। पछाति ग्राम पंचायत चुनावमे मोहभंग भेलासन्ता अपन किछ साहित्यकार मित्रगण सँ विचारि साहित्य सेवी बनि गेलाह अछि। से ओ कम समयमे एक पैघ उपलब्धि हासिल कयलन्हि। हिनक" गामक ज़िन्दगी " कथा संग्रह पर 'टैगोर साहित्य पुरस्कार ' आ पंगू उपन्यास केँ साहित्य अकादमी पुरस्कार (मैथिली मूल) भेटलन्हि। लघुकथा,विहैन कथा,नाटक ,एकांकी, कविता, गीत विधा सहित बाल साहित्य सृजनक काज राति - दिन करैत अहर्निस सेवाक बलेँ मैथिली मंच पर उपस्थिति बनौने रहैत छथि। हिनका उपर केन्द्रीत पोथीक सूचि नम्हर होईत जा रहल अछि।ई देखि मैथिली लेखकीय समाज आ पाठकवृंध बीच कोतूहल पैसि गेल छैक। श्री मंडल जीके साहित्य पर किछु शोधकर्ता पीएचडी. उपाधि सेहो पौलन्हि अछि। मुदा सामान्यता मैथिली पोथी बढ़ कम बेसाहल जेयबाक कारणेँ प्रसार नगण्य रहैत छैक। प्रकाशक लग सँ संस्था, पुस्तकालय आ श्रीमन्त लोक समुच्यभरि बेसाहि कोठी कनहा पर गरदा सँ शोभा बढेबा ले राखैत जकियाबैत छैक।अपवादमे पढ़लो जाईछ,मुदा लेखक समाज छोड़ि आन नहिँ। एकटा उदाहरण देखल जाए ! हमर बाबूजीक फेबु० पर पाँच हजार पढ़ल - लिखल लोक मित्रगण बनल छथि। आरो सहृदयता पूर्वक फ्रेण्ड रिक्वेस्ट पठौने छन्हि। एकटा 'ठुठ गाछ ' मैथिली उपन्यास श्री जगदीश बाबूक पाँच बेर पुनः पुनः प्रकाशन भेलैक। एक बेर ई-पोथी सेहो इन्टरनेट पर देला सँ ताहि पोथीक हिन्दीमे भावानुवाद 'शेष जीवन' नामसँ हमर बाबूजी श्री लाल देव कामत कयलन्हि। ओ हिन्दी पोथी लेखकगण आ पढाकू आगंतुक लोकनिक बीच 'नरहिया' के लोकार्पण "सगर राति दीप जरय" कार्यक्रमके अवसर पर बाँटल गेल। पछाति किछु शुभेच्छुगण केँ सेहो हस्तगत कयल गेलन्हि ,एहि आग्रहके संग जे मैथिलीमे टो - टा केँ पढ़ैत होयब तेँ हिन्दीमे हरहराकय मनलगू विषय जेकाँ पढ़ल जाए। एकटा जिज्ञासावस एक सबाल फेसबुक सोशल मीडिया पर पोस्ट कयलन्हि -: शेष जीवन पोथीके मुख्य पात्र श्री रामकृष्ण बाबू कोन गामक रहनिहार थिकाह? ताहि प्रश्नक उतारा कियो नहिं देने रहनि; फेर सप्ताह दिन पर दू मासधरि रीपोस्ट करैत अकक्षा गेलाह, मुदा रामपुर आकि कृष्णपुर किछुटा नहिं लिखलन्हि कियोभी कहबैका साहित्यकार लोकनि आ पाठकगण। तै माने ईहो भऽ सकैत छैक,जे जगदीश प्रसाद मंडल जीके मैथिली साहित्य आन्दोलन सँ किछु लोक नाराज(क्षुब्ध) रहैत छथि। ओना ओ सपरिवार मैथिली आन्दोलनी जेकाँ मैथिली साहित्य सेवामे एहिक नून - रोटी(सोहारी) मेँ तल्लीन रहैत अछि। श्री मंडल जीक साहित्य आब एकल रचनाकारक सीमा पार कऽ आलोचना, अनुवाद आ नव पाठकीय समुदायक विषय बनि रहल अछि। आधुनिक साहित्यकार श्री गजेन्द्र ठाकुर जीक लिखल बायोग्राफी जे श्री जगदीश प्रसाद मंडल जीके जीवन पर छन्हि, तकर हिन्दीमे प्रथमत: अनुवादक भेलाह अछि श्री रामेश्वर प्रसाद मंडल जी। ओहिकें पढ़ि अंग्रेजीमे राम अशिष सिंहजी अनुवाद कयलन्हि। श्री रामेश्वर बाबू 'पंगू' उपन्यास 'क हिन्दीमे सेहो अनुवाद कार्य कयलन्हि ,ताहिक अंग्रेज़ी भाषा मेँ राम अशिष सिंहजी क्रिपलेड नोवेल 'ट्रांसलेशन' कयलनि अछि। आ संस्कृत भाषा मेँ डॉ० बीरेंद्र कुमार चन्द्रसखी जी। चन्दसखी जी हुनक मैथिली पोथी कें हिन्दीमे अनुवाद 'जीवन की विजय ' नामे आ सुचिता नाम सँ सेहो भाषान्तर कयलनि अछि। गजेन्द्र ठाकुर जी 'जगदीश प्रसाद मंडल मैथिली वरिटर ,दोसर इहोज आफ एक्सटेंशन ,फेर दोसर फ्लोवेर ब्लूमिंग आन ए विथर्ड ट्री,फेर दोसर अंग्रेजी पोथी - स्ट्रागल्र्स आफ लाइफ अनुवाद काज कयलनि। जगदीश प्रसाद मंडल जीके पुत्र डॉ० उमेश मंडल जी सेहो हुनक पोथी खूब काज कयने छथि। यथा -: पंच देब १-१०० खंड कथा संकलन कय पोथी रुपेँ पाठक बीच आनने छथि। हुनका मादे मुक्त पुरुष ' शोध आलेख लेखन,हैण्डबुक सँ फेसबुक धरि - विचारशील गद्यांश , समस्या सँ समाधान धरि , निर्विकल्प, अभ्यंतर,जतय ने जाए कवि- ओतय जाए अनुभवी छैन। जगदीश प्रसाद मंडल जीके काव्य संसार मादे उमेशजी 'स्वास्ति सूत' आ अ० विश्लेषण 'चौपेतल चेहरा ,कियो करय आप ले- माय ले ने बाप ले पोथी गढ़ने छथि। हालहिमे "पयस्विनी विमर्श " आ झुकाउक परीक्षण सेहो समक्ष आनलनि अछि। रामेश्वर बाबू श्रीमंडल जीके मैथिली साहित्य केँ "एक चुटकी खुशी" पोथीक अंग्रेजी आ हिन्दीमे अनुवाद काज कयलनि अछि। संगहि ओ माधव हम परिणाम निराशा केँ सेहो लोकार्पण मझौरा (राजनगर) मेदि०२७-६- २०२६ कें करौलाह अछि। अंतिमक्षण मैथिली पैथीक हिंदी रुपान्तर श्री गोसाई मंडल जी सेहो कयलाह अछि। बड़ी बहन नामे हिन्दीमे श्री नवरत्न कुमार बेगानी जी कयलाह अछि। श्रीमती मुन्नी कामत जी सेहो हिन्दी भाषान्तर 'जीवन की प्रतिस्पर्धा , अवधेश पटेल जीके द्वारा 'नियति और पुरुषार्थ, अच्छेलाल शास्त्री - त्रिकालदर्शी, जगदानंद झा मनु - जीवन दान,गगन कुमार - अन्तर्मन की पीड़ा , डॉ० शुभ कुमार वर्णवाल - जीवन मरण पोथी सं आग अयलाह अछि। श्री झौली पासवान - साहित्यकारक विवेक, कुंवर जी - जिनगीक मोड़ पर, शुश्री पल्लवी मंडल - आमोंका बाग हिन्दी अनुवाद पोथीक संग अपन परिचय बढबैत अनुवाद कार्यमे सहभागी बनल अछि। जगदीश प्रसाद जीके आरो मैथिली पोथीक' हिन्दी समेत आन भाषामे अनुवाद कार्य जोड़ पकड़ि रहलैन अछि। हुनका साहित्य में किश्तमे सेहो फराक - फराक मैथिली पोथी रूपेँ निम्नांकित विद्वान काज कयलनि अछि। एक सय एकैश कथाक चयन कय पोथी रूपें डॉ० रविन्द्र कुमार चौधरी जी ,१५ चयनित कथा - प्रो० जनक लाल मंडल , दीपवत्तिका ( आभा प्रभा) - डॉ० योगानंद झा , सरोकार - प्रो० नारायण प्रसाद सिंह, जगदीश प्रसाद मंडल के बीछल कथा - प्रो० राम सेवक सिंह , कथामे बसल जीवन- डॉ० विजय शंकर पंडित, मनुख बनल रहबाक जिद्द - डॉ० रीना कुमारी जीके पोथी पाठक बीच अयला सँ विस्तार भेलैक अछि। हिना लेखनी समाजक यथार्थक संग - संग परिवर्तनक आकांक्षाकेँ सेहो सशक्त स्वर प्रदान करैछ। ८०म् जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाक संग बधाय दैत छीयैन हम। - प्रीति कुमारी, बी.ए., बीएड. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.९. संतोष कुमार राय 'बटोही'- लघुकथा – कलेक्टरनी संतोष कुमार राय 'बटोही' लघुकथा - कलेक्टरनी
सतीश जी आजु धन्य भऽ गेलाह । आइ सीता देवी केँ खाता मे छह हजार टाका चलि गेलै । बिना तनखाह केँ दू बरख सँ इस्कूल मे ओ झाड़ू लगा रहल छलीह । इस्कूल मे कियो झाड़ू लगेनिहार नहि छेलैक । ई तऽ सतीश छल जे मगुलाहा सँ सीता देवी केँ खोजिक लौलक । सतीश कतेक आदमी के कहलकै कि इस्कूल मे एकटा झाड़ू लगेनिहार चाही । कियो झाड़ू लगबै लेल तैयार नहि छल क्याक तऽ तनखाह नहि भेट रहल छेलैक।
सीता देवी केँ आँखि सँ नोर बहि रहल छै। दू बरख सँ बिना तनखाह केँ काज केलाक बाद आइ ओकर श्रमक मजूरी भेट गेलैक । ओ कुलहरिया मे पी एन बी पर आयल छथि । ओकरा सने कियो मरद सेहो छै।
" चुप न ? कियो आँखिक नोर देख लेतौ ।"
" देख लेतै तऽ देखअ दही ।"
"ठीक छै, ई तऽ काज भऽ गेलौ। चल किछ मिठाई लऽ लैत छियैय छौरा-छौरी लेल ।"
"ठीक छै।"
सीता देवी अपन घरवाला संग अंधरा दिस विदा भेलीह । अंधरा मे मिठाई आओर घरक किछु जरूरी सामान लऽकऽ आपिस होम लगलीह ।
घरवाला ओकरा कहलकै, "चल, हम अबैत छी ।"
ओ आगा बढ़ि गेलीह । विनोद फोरचून दोकान पर रूक गेल छल । एकटा पानिक बोतल आओर दाल बूटक छोटका पैकेट किनकऽ गमछा मे बान्हि लेलक। मोगलाहा दिस पैर आगा बढ़ौलक। अंधरा सँ निकलैत पसीवाखाना छै। ओतऽ रूकि गेल आओर किछु गिलास ढारि लेलक। ओतऽ आओर लोक सभ छेलैक।
ओ बतिया लागल, " मौगी केँ आई दू बरख पर तनखाह भेटलै । "
" आब तोहर मौगी सरकारी भऽ गेलौ । आब तऽ ओ हाथो नहि लागऽ देतौ ?"
" कियाक हौ ? ऊ कलेक्टर थोड़े बनि गेलै ।"
" ऊ आब कलेक्टरे भऽ गेलौ ।"
विनोद एकटा बोतल ढारलाक बाद पूरा मता गेल छल।
ओ बाजल , " ओ हमर छियैय हमरे रहतै । ऊ चाहे मेम साहेब बनि जाऊ , चाहे किछु आओर..... ।"
विनोद कलेक्टरनी केँ घरवाला जकाँ लोंगी के ठीक सँ बान्हलक । फाटल कमीज दिस देखिकऽ मुहँ बिचकौलक । कमीज मे दुटा बटन नहि छेलै । तबो ओकरा ठीक-ठाक केलक । केश केँ हाथ सँ सीटलक । गमछा के गरदैन मे डाललक । मोंछ केँ पीजबैत तमतमायल घर दिस विदा भेल । आइ ओ अपन काज भूलिकऽ कलेक्टर जकाँ मोन बनौने अपन घर पहुँचल ।
अपन विरादरी लोक सभ केँ हाक दैत बाजल , " निकल घर सँ रौ देवना, इंदल आओर रूदलवा । आई फरछिया ले। आब हम कमजोर नहि छियैय। बड़ तूँ सभ सतौलैं हमरा सभ केँ । "
विनोदक हाक सुनिकऽ टोलक सभ कियो जमा भऽ गेलै। विनोद सभ केँ गरियबैत अपन पैर आओर हाथ केँ हवा मे लहरा रहल छेलैक। परञ्च कियो बाजि नहि रहल छेलै ।
अंत मे अपन घर बाली केँ हाक दैत बजौलक, "गे सुनरी केँ माय; अञि आ।"
घरवाली सोझा ऐलै । विनोद घरवाली दिस हाथ देखबैत बाजल, " सुनि ले सभ कोय। आई दिन सँ हमर घर बाली पर कोय नजर उठा केँ नहि देख सकैं छैं ; नहि तँ दफा लगा देबौ। सुनरी माय आब सरकारी नौकर भऽ गेलै - 'मेम साहब' । कलेक्टरनी !"
सभ कियो ताली बजौलक । किछु जनानी हँसि देलकै । किछु जनानी फुसफुसैत छेलै । सभ कियो अपन-अपन घर दिस विदा भेल ।
- संतोष कुमार राय ' बटोही '; ग्राम - मंगरौना अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१०. गजेन्द्र ठाकुर- गोहि सभक बीच जल समाधि (मैथिलीक आइ धरिक सभसँ पैघ उपन्यास)- मैथिली कादम्बरीक अंश गजेन्द्र ठाकुर मैथिलीक आइ धरिक सभसँ पैघ उपन्यास- न्याय दर्शन आ समकालीन अपराध-गाथा मैथिली कादम्बरी गोहि सभक बीच जलसमाधि गजेन्द्र ठाकुर गोहि सभक बीच जलसमाधि (उपन्यास) गजेन्द्र ठाकुर पोथीक मुँहसँ (गढ़ नारिकेलक लोक-स्वर) १. पानि बजै छै, गाछ सुनै छै, पात तरि-तरि नाम लिखै छै, मुदा शिला चुप रहै छै। २. जे डुबल, से बजला; जे बाँचल, से बिसरला; आ नदी दुनूकेँ अपन पेटमे राखि लेलक। ३. नारिकेल गाछ जखन बजै छै, तखन बुझिहऽ— गाम कोनो मुर्दा अपन एड़ी ताकि रहल अछि। ४. सत्य बीज थीक, झूठ पाथर; पाथर भरि राति भारी, बीज भोरे-भोर हरियर। ५. नाम बिनु भूत खेलमे नहि टिकै छै, नाम बिनु मनुक्खो इतिहासमे नहि टिकै छै। ६. गज पकड़ै ग्राहकेँ, ग्राह पकड़ै बच्चाकेँ, बच्चा पकड़ै ओहि हाथकेँ जे शिलापर नाम नहि लिखलक। ७. जे देखि कऽ चुप रहल, ओकर मृत्यु दू बेर; जे देखि कऽ बजल, ओकर नाम दू बेर। अनुक्रम अध्याय १ — चन्ना गाछीक कबड्डी जतय जीवित चुप रहै छै, ओतय भूत सभ कबड्डी सँ मुकदमा लड़ै छै। अध्याय २ — दहिन कातक गाम नदी मेड़ काटै छै धारसँ, कागज गाम काटै छै तारीखसँ। अध्याय ३ — छपाकक हिसाब इनारमे खसल ढेपाक छपाक थम्हि कऽ अबै छै, मुदा हिसाब माँगब नहि छोड़ै छै। अध्याय ४ — तीस नाम, तीन सय लाश रजिस्टरमे तीस नाम, माटिमे तीन सय देह— घाटाक भार सदिखन मुर्दे उठबै छै। अध्याय ५ — तारीखक गोहि घाटक पानि देखाइ छै तेँ लोक बाँचै छै; तारीखक पानि नहि देखाइ छै तेँ लोक डूबै छै। अध्याय ६ — हार्वर्डक एथिक्स मञ्चपर चढ़ल नैतिकताक जूता पोंछबासँ पहिने देखिहऽ— तरबामे केकर रक्त लागल छै। अध्याय ७ — श्वासक भाव जखन साँसक भाव बाजार तय करए लागै, तखन भूतो खेल छोड़ि जीविते दिस ताकए लागै छै। अध्याय ८ — स्क्रीनक गोहि स्क्रीनमे देह नहि रहै छै, मुदा देह डुबेबा जोग पूरा पानि रहै छै। अध्याय ९ — देहक बाजार जे फोल्डरक नाम 'अतिथि-सेवा', ओकर भीतर सदिखन ककरो बेटीक दाम लिखल रहै छै। अध्याय १० — निजताक ब्लैकमेल देह बिकाइ छै एक बेर, निजता बिकाइ छै बेर-बेर। अध्याय ११ — धनक कारी नदी भूतकेँ साँस नहि होइ छै, तइयो थाकै छै— थकान देहक नहि, गवाहीक होइ छै। अध्याय १२ — डार्क-जालपर नारिकेल पात कारी नदीपर नारिकेलक पात ने डूबै छै, ने बहै छै— ओ रस्ता देखबै छै। अध्याय १३ — सीलबन्द आवरण मुहर जतबा चमकैत, आवरणक भीतरक अन्हार ततबे गाढ़। अध्याय १४ — घर घुरबाक रस्ता नाम जखन घर घुरै छै, माटियो अपन नींदसँ जागि जाइ छै। अध्याय १५ — नामक जल जे नाम पानिपर टिकि गेल, तकरा कोनो मुहर मेटा नहि सकल। अध्याय १६ — चन्ना गाछीक अदालत गाछ जकर नाम सुनि लेलक, तकरा कागजक कोनो पन्ना बिसरा नहि सकैत। अध्याय १७ — जीतक शोक हारल लोक जँ प्रतीक्षा छोड़ि देत, तँ जीतनिहारक जीत अपनहि भारसँ चूर भऽ जाएत। अध्याय १८ — खाली अदालत अदालत जँ खाली भऽ जाए, तँ बुझू— न्याय अनुपस्थितक नामसँ डेरा गेल। अध्याय १९ — नामक अभिलेख कुर्सी सड़ि जाइ छै, जड़ि नहि; कागज फाटि जाइ छै, अभिलेखक नाम नहि। अध्याय २० — स्क्रीनक विरुद्ध पाठशाला स्क्रीन जे-जे निगलने छल, पाठशाला से-से एक-एक कऽ घुरबैत गेल। अध्याय २१ — निजताक शपथ शान्ति बाहरसँ नहि अबै छै; ओ डरक माटि फोड़ि भीतरसँ उगै छै। अध्याय २२ — हार्वर्डक दोसर भाषण दोसर भाषण पहिलुकासँ नीक तखने होइ छै जखन बीचमे कियो सत्य सुना गेल हो। अध्याय २३ — बटुकनाथक खोज जीतक कागज मोट छल, मुदा ओहिमे एकोटा ध्वनि नहि— आ ध्वनि बिनु जीत केवल भार। अध्याय २४ — उपन्यास फेर शुरू कथा जतय समाप्त कहल जाइ छै, गाछी ओतहिसँ नव पन्ना खोलै छै। अध्याय २५ — मोन टांगल बन्द अलमारीमे आदेश नहि, धूलि बाजै छै— आ धूलिक आवाज नींद नहि होमए दै छै। अध्याय २६ — बटुकनाथ हरिहरनक यात्रा कुंजी रातिभरि हाथमे रहला सँ हथेलीमे पीतल नहि, प्रश्नक गन्ध बसि जाइ छै। अध्याय २७ — चन्द्रपाल बत्राक स्क्रीन काँचक दीवालसँ गाम नहि देखाइ छै, मुदा गामक नाम काँचो पार कऽ जाइ छै। अध्याय २८ — राघव सिग्नलक चुप्पी जे आवाजसँ डेराइ छै, से मेटाइत अक्षरमे बाजै छै; मुदा डर कोनो अक्षर नहि मेटबै छै। अध्याय २९ — लाउ किन-हंगक सपना जे नाम पूरा लिखल जाए से गिरफ्तार भऽ सकैए— मुदा अधलिखल नाम अपने कैदी बनि जाइए। अध्याय ३० — धूर्त सभक भीतरक अदालत बाहरक अदालतमे जीतल आ भीतरक अदालतमे हारल लोकक हँसीमे दाँतक खनखनी सुनाइ छै। अध्याय ३१ — हारल लोक सभक काज हारल लोक नारा नहि लगबै छै— ओ भोरे उठि कऽ दोसराक नाम उठबै छै। अध्याय ३२ — तेसर कबड्डी बयार नहि आ पात हिलए, तँ बुझू— कोनो पुरान फैसला कागज छोड़ि गाछपर उतरि रहल छै। अध्याय ३३ — मोनक परीक्षा देह थाकल तँ बैसि जाइ छै; मोन थाकल तँ अपन मालिककेँ घीचि लऽ जाइ छै। अध्याय ३४ — सुनैत नदी नदी धार रोकि कऽ सुनै छै जे किनारपर के झूठ बाजि रहल छै। अध्याय ३५ — नामक देहरी नाम कहब पहिल साँस, नामक घर धरि जाएब दोसर। अध्याय ३६ — घर, भय, सपना घर, भय आ सपना— तीनू गोलक बीच जे साँच ठाढ़ रहल, वैह खेलमे टिकल। अध्याय ३७ — तीन कंकड़ जेबीक तीन कंकड़ जहिया खनखनाएब छोड़ि देत, तहिया बुझिहऽ— कोनो उत्तर हेरा गेल। अध्याय ३८ — नामक उच्चारण नाम लिखि देने भरि नहि होइ छै— ओकर उच्चारण सिखेबाक काल देबए पड़ै छै। अध्याय ३९ — बीजक शान्ति बाहरसँ थिर आ भीतरसँ फुटबाक तैयारी— एहने शान्तिमे बीज बनै छै। अध्याय ४० — ओसक अक्षर ओसक अक्षर पढ़निहारक हथेली भीजि जाइ छै, आ भीजल हथेलीसँ दरबज्जा खुजै छै। अध्याय ४१ — नामक नाव किनारपर राखल नावक कोनो अर्थ नहि— नामक नाव धारमे उतरला पर बाजै छै। अध्याय ४२ — भारक वृत्त दण्ड ऊपरसँ देल जाइ छै, भार भीतरसँ उठि कऽ कन्हापर बैसै छै। अध्याय ४३ — चलैत भार बाँटल भार समाप्त नहि होइ छै— ओ चलए लागै छै, गाम-गाम। अध्याय ४४ — पोतीक कापी डर पानि जकाँ— देवाल भेटलापर दरार ताकै छै, दरार नहि भेटलापर पोतीक कापीमे उतरि जाइ छै। अध्याय ४५ — भीतरक हवा दुआर खुजल रहि नहि जाइ छै— भीतरक बन्द हवा पहिने बहराइ छै। अध्याय ४६ — उत्तराधिकारक अन्हार धनक मुँह जे नहि देखलक आ पाछाँक अन्हार देखि लेलक, वैह असल उत्तराधिकारी। अध्याय ४७ — गज-ग्राह आख्यान गजक पएर पानिमे अटकल आ ग्राहक दाँत इतिहासमे— छोड़ौनिहार हाथ सदिखन तेसर होइ छै। अध्याय ४८ — पुकार बाजब जनम भरि होइ छै; सुनबाक बेर एलापर कान धूलिसँ भरल भेटै छै। अध्याय ४९ — मौनक अभिलेख सुनल आवाज उधार थीक— जे सुनलक, तकरे चुकता करबाक छै। अध्याय ५० — देहक बादक नाम देह चलि जाइ छै, नाम रहि जाइ छै— आ नामक पएर भीजल रहै छै। अध्याय ५१ — साक्षीक भार साक्षीक भार तराजूपर नहि, छातीपर तौलल जाइ छै। अध्याय ५२ — अगिला आवाज गोहि देह चिबा सकैए, अदालत बरख, स्क्रीन मोन— मुदा बच्चाक हाथक पहरा किओ ने चिबा सकल। अध्याय ५३ — कटानक बादक बिहान गाछ कटलापर भोर नहि रुकै छै— ठूँठो सोझे सूर्य दिस ताकए लागै छै। अध्याय ५४ — ठूँठक चारू कात जतय डारि नहि बचल, ओतहु माथ झुकै छै— आब अन्हारसँ नहि, गवाहीसँ। अध्याय ५५ — नगरपालिकाक पीयर सूचना-पत्र सरकारी पीयर कागजक फड़फड़ी पाँखिक नहि, कैंचीक आवाज थीक। अध्याय ५६ — स्मृतिक पहिल नक्शा जे ठाम 'खाली भू-खण्ड' लिखल गेल, ओही ठाम सभसँ बेसी नाम गड़ल छल। अध्याय ५७ — गंगेशक प्रश्न प्रमाण बिनु प्रमेय नहि— गंगेशक ई प्रश्न आइयो ठूँठक जड़िमे करवट लै छै। अध्याय ५८ — चन्द्रपालक स्मारक-अनुप्रयोग श्रद्धांजलि जखन अनुप्रयोग बनि जाए, तखन शोको सँ किस्त वसूलल जाइ छै। अध्याय ५९ — राघव सिग्नलक नव कोड मेटायल स्क्रीनक धुँधला निशानपर लिखल शास्त्र सभसँ साफ बाँचल जाइ छै। अध्याय ६० — सत्यव्रत मेहताक दोसर मौन धर्मक भाषामे लिखल हिसाब सभसँ पहिने मौनक कान पकड़ै छै। अध्याय ६१ — पहिल नाम-उत्सव असल उत्सवमे नगाड़ा नहि बजै छै— नाम बजै छै। अध्याय ६२ — ठूँठमे हरियर बिंदु तेल सिरा गेल, बाती छोट भेल, तइयो लौ जिद्दी— जिद तेलक नहि, नामक होइ छै। अध्याय ६३ — गढ़ नारिकेल विरासत-परियोजना जाधरि नाम लाजक छल ताधरि फाइल नुकायल रहल; जहिना नाम विरासत भेल, गाड़ी सभ बिना लाजक आबि गेल। अध्याय ६४ — स्मृति पर निविदा स्मृतिपर निविदा खुजिते बुझू— आब शोको क ठेका उठत। अध्याय ६५ — ब्रूमक पुनरागमन लोभक गन्ध नव स्याहीसँ नहि, पुरान पुलक पानिसँ अबै छै। अध्याय ६६ — हार्वर्डक शोध-दल जे यंत्र गलामे लटका कऽ अबै छै, से आँखिसँ पहिने नापए लागै छै। अध्याय ६७ — मीरा आ दृष्टिक अधिकार देखबाक सेहो अधिकार होइ छै— आ जकरा देखल जाए, तकर अनुमति सभसँ पहिल कागज। अध्याय ६८ — देविका बनाम श्रद्धांजलि-अनुप्रयोग मरल लोकक नामपर बटन दबौनिहार जीवित लोकक जेब टटोलै छै। अध्याय ६९ — नामक चोरी स्क्रीनपर पकड़ायल चोरी, चोरीक उजरा भाग टा थीक। अध्याय ७० — पनिडुब्बीक गवाही जे ऊपरसँ नहि देखाइ छै, से पनिडुब्बीक झोंटामे बान्हल रहै छै। अध्याय ७१ — नकली भूतक जुलूस नकली भूतक जुलूसमे धुँआ किरायापर अबै छै, आ असली गाछी हँसि दै छै। अध्याय ७२ — चन्ना गाछीक हँसी ठूँठक हँसी खोखलक नहि— बचल जड़िक आवाज थीक। अध्याय ७३ — बटुकनाथक स्वप्न-दरबार जकरा जीवन भरि उपहास बुझलक, स्वप्नमे वैह दरबार लगा कऽ बैसि जाइ छै। अध्याय ७४ — चन्द्रपालक पहिल स्वीकार पहिल स्वीकार सदिखन अकेलेमे होइ छै— भीड़ तँ बादमे ताली बजबै छै। अध्याय ७५ — राघव सिग्नलक बिना नेटवर्क सभटा जाल रहितो जे अकेला भेल, से बुझलक— नेटवर्क तारक नहि, भरोसक होइ छै। अध्याय ७६ — लाउ किन-हंगक भारत-यात्रा समुद्र पार कऽ आयल लोको ओही घाट उतरै छै जतय ओकर नामक पानि ठाढ़ छै। अध्याय ७७ — हवाई अड्डापर गोहि हवाई अड्डाक शीशामे शहरक इजोत बिकाइ छै, मुदा गोहिक आँखि मुफ्तमे देखा जाइ छै। अध्याय ७८ — सत्यव्रत आ लाउक मौन-संवाद दू गोटेक मौन जखन एक्कहि प्रश्नपर अटकल हो, तखन ओहो संवाद थीक। अध्याय ७९ — ब्रूमक दान-पत्र दान-पत्र जतबा चिक्कन, ओकर मुहरक नीचाँक ठेका ततबे पुरान। अध्याय ८० — हरिहरनक संतान बेटाक एकटा प्रश्न— न्याय बचेलहुँ कि पेशा?— बरामदाक सभ सम्मान-पत्र हिला दै छै। अध्याय ८१ — बत्राक अधूरा नाम आधा नाम लऽ कऽ जीनिहार पूरा हस्ताक्षरसँ डेराइ छै। अध्याय ८२ — अंदरक गज-ग्राह पोखरिक चारू किनार अलग-अलग, पानि एक्कहि— आ पानिक भीतर गज-ग्राह दुनू। अध्याय ८३ — नारिकेल पात पाठशाला जतय छाहरि नहि बचल, ओतहु पाठशाला बैसि सकै छै— पातक आसनपर। अध्याय ८४ — पहिल पाठ : उपस्थित पहिल पाठ अक्षर नहि— 'उपस्थित' कहब होइ छै। अध्याय ८५ — स्त्री सभक राति-सभा दिनक शब्दक असली देह रातिक सभामे खुजै छै, जखन स्त्री सभ बाजए लागै छथि। अध्याय ८६ — मजदूरक पाँव नाम उपस्थित भेल तँ पुछू— ओकर पाँव कोन माटिपर पड़ल छल। अध्याय ८७ — स्क्रीनक उपवास एक दिनक स्क्रीनक उपवाससँ कानमे अपनहि साँसक आवाज घुरि अबै छै। अध्याय ८८ — ईराक पत्र विदेशक बच्चा सभकेँ पत्र पहुँचल कि नहि से डाकघर नहि कहत— उत्तर अपने बाट ताकि लै छै। अध्याय ८९ — सत्यव्रतक जन-सुनवाई जन-सुनवाईमे सभसँ पैघ गवाही ओकर होइ छै जे आइ धरि सुनले नहि गेल। अध्याय ९० — नामक संविधान संविधान सूखल पातपर सेहो लिखा सकैए— जँ लिखनिहार बच्चा होथि। अध्याय ९१ — धूर्त सभक अनुपस्थिति धूर्तक अनुपस्थिति सेहो उपस्थिति थीक— खाली कुरसी सभसँ जोरसँ बाजै छै। अध्याय ९२ — ठूँठक छाँह ठूँठक छाँह छोट, मुदा ओहिमे बैसनिहारक कान पैघ भऽ जाइ छै। अध्याय ९३ — पुनः बाढ़ि नदी चुप्पीमे विश्वास नहि करैत— ओ फेर आबि कऽ पुरान हिसाब खोलि दै छै। अध्याय ९४ — गोहि सभक वापसी दिनमे पानि मटियाल, रातिमे कारी तेल— गोहि रंग नहि बदलैत, इजोत बदलै छै। अध्याय ९५ — लाउ किन-हंगक अंतिम सौदा अंतिम सौदामे दाम नहि लिखल जाइ छै— नाम लिखल जाइ छै। अध्याय ९६ — बटुकनाथक देर-सँ-आयल क्षमा क्षमा जे देरसँ आबए, से खाली हाथ नहि आबए— अपन विलम्बक हिसाब सङे आनए। अध्याय ९७ — चन्द्रपालक म्यूल अकाउण्ट जे दोसराक खाता म्यूल बनौलक, से एक दिन अपनहि जीवनकेँ म्यूल खाता बुझि उठल। अध्याय ९८ — राघवक अंतिम संदेश अंतिम संदेश मेटाएल नहि जाइत— ओ पात बनि ठूँठसँ चिपकि जाइत अछि। अध्याय ९९ — सत्यव्रत मेहताक गवाही गवाहीकेँ हवा उड़ाबए चाहलक, पानि गलाबए चाहलक— मुदा गवाही पात छल, हटल नहि। अध्याय १०० — गज, ग्राह, आ बच्चाक हाथ गजक बल थाकि जाइ छै, ग्राहक पकड़ि छूटि जाइ छै— बच्चाक हाथ टा नहि थाकैत। अध्याय १०१ — अनाम ग्रहक आमन्त्रण आमन्त्रण जतबा दूरसँ आबए, प्रश्न ओतबे लगक पुछए— संग की लऽ जाएब? अध्याय १०२ — ग्रहक बीच कबड्डी ग्रहक बीच सेहो कबड्डीक वैह नियम— साँस रोकू, नाम बाजू, घुरि आउ। अध्याय १०३ — अनाम ग्रह पर नाम-पाठ तारा सभक बीच सेहो नामे टा धागा बनि तनाइ छै। अध्याय १०४ — गढ़ नारिकेल फेर पृथ्वी चुनैत अछि स्मृति-विहीन गुंबदसँ नीक अपन कादो-माटि— गढ़ नारिकेल फेर पृथ्वीए चुनलक। अध्याय १०५ — पृथ्वीक पहिल पहरा घुरल यात्रीकेँ धरती पुरान घर नहि, नव जन्मल शिशु जकाँ भेटै छै— आ शिशुक पहरा पहिल धर्म। अध्याय १०६ — बीजक गवाही बीज गवाही दै छै— माटि केकर छल आ हाथ केकर। अध्याय १०७ — बीजक चोरी बीज चोरौनिहार खेत नहि चोरबैत— भविष्य चोरबै छै। अध्याय १०८ — माटिक मुँह माटिक मुँह तखन खुजै छै जखन ओकरासँ पुछल जाए— हम कतय उगब? अध्याय १०९ — जलक स्मृति पानिकेँ बिसरब आसान, पानिक स्मृतिकेँ बिसरब असम्भव। अध्याय ११० — आगिक साक्षी आगि बुझि जाइ छै, राख गवाही दै छै। अध्याय १११ — वायुक प्रश्न धुँआ आकाश नहि गेल, गली-गली घूमल— वायुक प्रश्न घर-घर पुछाइ छै। अध्याय ११२ — आकाशक रिक्ति आकाश जखन खाली भऽ जाए, तखन ओ राहत नहि— सभसँ पैघ प्रश्न थीक। अध्याय ११३ — शब्दक देह शब्दकेँ सेहो देह चाही— बिना देहक शब्द हवामे हेरा जाइ छै। अध्याय ११४ — अर्थक आत्मा शब्दक देह बचि जाए आ अर्थक आत्मा बिका जाए— तँ पहरा अधूरा। अध्याय ११५ — कण्ठक पहरा कण्ठक पहरा सभसँ कठिन— जे बचल, तकरे सभसँ पहिने बेचल जाइ छै। अध्याय ११६ — मौनक उत्तराधिकार नामक शत्रु खाली झूठ बजनिहार कण्ठ नहि— कखनो साँचक चुप्पी सेहो। अध्याय ११७ — स्मृतिक ऋण सुनल नामक ऋण होइ छै, आ ऋणक कोनो श्राद्ध नहि— खाली चुकता। अध्याय ११८ — देहक अधिकार नाम बचि गेल, स्वर सुनल गेल— मुदा देहक अधिकार बिनु सभटा आधा। अध्याय ११९ — श्रमक देह श्रमक देह पाथरपर लिखल जाइ छै, मुदा पढ़ल पसीनासँ जाइ छै। अध्याय १२० — न्यायक देह न्यायक देह कोंपल जकाँ— नर्म, मुदा माटि फोड़ि कऽ उठैवला। अध्याय १२१ — जातिक पिंजरा पिंजराक सलाख लोहाक नहि— आदतिक होइ छै, आ आदति भोरक धूपमे बेसी चमकै छै। अध्याय १२२ — गंगेशक मुक्ति मुक्ति ग्रन्थसँ नहि— प्रश्न पुछबाक अधिकार घुरलासँ होइ छै। अध्याय १२३ — तत्त्वचिन्तामणिक पात तत्त्वचिन्तामणिक पात कागजसँ कड़ा— कारण ओहिपर तर्क लिखल छै, भय नहि। अध्याय १२४ — प्रमाणक अग्नि प्रमाणक अग्निमे दाह कम, उजास बेसी— जे साँच अछि, से निखरि कऽ बहराइ छै। अध्याय १२५ — निर्णयक धान निर्णय जँ धान जकाँ रोपल जाए, तँ ओकर बालि सेहो झुकि कऽ गवाही दै छै। अध्याय १२६ — अन्नक न्याय अन्नक न्याय थारीमे नहि, मेड़पर तय होइ छै। अध्याय १२७ — भूखक नाम खाली थाली भरल कोठारसँ भारी— ओहिमे भूखक नाम बाजै छै। अध्याय १२८ — प्यासक नाम प्यासकेँ सेहो नाम चाही— बिना नामक प्यास केवल आँकड़ा। अध्याय १२९ — नूनक शपथ नूनक शपथ सभसँ पुरान— मायक दूधसँ मजूरक पसीना धरि एक्कहि स्वाद। अध्याय १३० — स्वादक न्याय स्वाद बदलल बुझाए तँ बुझू— न्याय जीहपर उतरि गेल। अध्याय १३१ — साझा थारी साझा थारीक नून सभ जीहपर एक्कहि रङ लागै छै। अध्याय १३२ — रसोइक गणराज्य जतय थारी साझा, ओतय डर आधा। अध्याय १३३ — विदेह नाट्य उत्सवक बुलाहट बुलाहटक उत्तर ढोलसँ नहि— तैयारीसँ देल जाइ छै। अध्याय १३४ — कबड्डी खेलनिहार सभक नाट्य-पाठ नाट्य-पाठ सिखबासँ पहिने कबड्डी खेलनिहार अपन साँस गनए सिखै छै। अध्याय १३५ — विदेह नाट्य उत्सवक मंचन स्मृति जखन मंचपर चढ़ै छै, कैलेण्डर हारि जाइ छै। अध्याय १३६ — तालीक बादक सन्नाटा असली अभिनयक दाम ताली नहि— तालीक बादक सन्नाटा थीक। अध्याय १३७ — दर्शकक गवाही दर्शक जखन गवाह बनि जाए, तखन परदा खसितो नाटक नहि रुकैत। अध्याय १३८ — मंचसँ बाहरक जुलूस जुलूस जे मंचसँ बाहर निकलल, तकरा कोनो सभागार फेर भीतर नहि घुरा सकल। अध्याय १३९ — बाटक रंगमंच बाटपर उतरल कथाक ने मंच होइ छै ने टिकट— खाली सुनैवला कान चाही। अध्याय १४० — बाटक रंगमंच खेलमे हार-जीत नहि घोषित हो तँ बुझू— खेल आब स्मृतिक पहरा बनि गेल। अध्याय १४१ — बरामदाक फैसला बरामदाक पाथर दिन भरि जूता सहै छै, आ राति ओ फैसला सुनबै छै। अध्याय १४२ — रेकर्ड-घरक अन्हार रेकर्ड-घरक अन्हारमे फाइल नहि— रोकल-राखल समय सड़ै छै। अध्याय १४३ — रद्दी बोराक गवाही रद्दी कहल कागजपर कदाचित् ककरो जिनगीक आखिरी आस लिखल हो— तेँ फाड़ब सभसँ पैघ अपराध। अध्याय १४४ — नामक यात्रा नाम फाइलसँ निकलि गेल तँ ओकरा 'निरस्त'क कोनो मुहर फेर बन्द नहि कऽ सकल। अध्याय १४५ — डरक पहिल दरार डर एक्कहि बेरमे नहि टूटै छै— पहिने दरार पड़ै छै, आ दरारसँ इजोत पैसै छै। अध्याय १४६ — मुहरक दाग मुहरक दाग कागजपर नहि— लगौनिहारक हाथपर सभसँ गाढ़ रहै छै। अध्याय १४७ — घर-घरक दस्तक दस्तक जे अनुमतिसँ देल जाए, से आदेशसँ पैघ दरबज्जा खोलै छै। अध्याय १४८ — मिलावटक पहिचान साँच कागजसँ मिला कऽ देखू— मिलावट अपने मुँह खोलि दै छै। अध्याय १४९ — जालक नक्शा जाल जतबा पैघ, गाँठ ततबे छोट ठाम— आ पहरुआ गाँठे टा ताकै छै। अध्याय १५० — मुहरक छाया रबर मेटा जाइ छै, हत्था रहि जाइ छै— आ खाली हत्थामे सभसँ बेसी भार। अध्याय १५१ — मुहर चलौनिहार हाथ मुहर अपने नहि चलैत— ओकरा चलौनिहार हाथक नाम होइ छै। अध्याय १५२ — आदेशक स्रोत आदेश एक मुँहसँ नहि जनमैत— बैठकसँ जनमैत अछि, आ बैठकक कोनो हस्ताक्षर नहि। अध्याय १५३ — संकेतक पाछाँ नाम संकेतक पाछाँ नाम रहै छै, आ नामक पाछाँ फेर संकेत— पहरुआ बीचहिमे ठाढ़ रहए। अध्याय १५४ — बाबाक वचन बाबाक वचन जाधरि श्रद्धा, ताधरि अछूत; जहिना जाँचयोग्य भेल, वचन कागज भऽ गेल। अध्याय १५५ — सेवाक खाता सेवाक खाता आ मौनक खाता जँ एक्कहि हाथमे हो, तँ दुनू हिसाब माँगै छै। अध्याय १५६ — दानक ऋण दानक उज्जर कपड़ामे सभसँ बेसी ऋण लपेटल रहै छै। अध्याय १५७ — लोहेक संदूक लोहेक संदूक घरक अन्हारमे व्यापार छल, गामक इजोतमे गवाही भऽ गेल। अध्याय १५८ — सहमति-कापीक मिलान सहमति-कापीक मिलानसँ पहिल बेर बुझाएल— हस्ताक्षरो अपहरण भऽ सकैए। अध्याय १५९ — मृतकक सहमति मृतकक सहमति दुनियाक सभसँ सस्ता कागज— आ सभसँ महग अपराध। अध्याय १६० — गोदामक छाया गोदाम जखन खुजै छै, तखन व्यापार नहि— छाया-न्यायक पेट देखाइ छै। अध्याय १६१ — फोनक कैद फोन जकरा कैद केलक, तकरा कोनो जमानत नहि— जाधरि आवाजक मालिक नहि पकड़ाए। अध्याय १६२ — आवाजक मोहर आवाजपर सेहो मोहर लागै छै— आ ओ मोहर तोड़बाक पहिल उपाय आवाजेक पहिचान। अध्याय १६३ — हटायल कागजक निशान कागज हटा देल जाइ छै, निशान नहि— हटौनिहारक हड़बड़ी अपने निशान थीक। अध्याय १६४ — चन्द्रपालक छायाक पेट छोट संख्या पैघ ताला खोलै छै— जँ पढ़निहार रातिभरि जागल हो। अध्याय १६५ — छायाक देह छाया पकड़ा गेल तँ प्रश्न ठाढ़— देह कतय? आ देह सदिखन कोनो कोठारमे भेटै छै। अध्याय १६६ — इमली घाटक कोठार कोठारमे रद्दी नहि— रोकल गेल डर सड़ैत रहै छै। अध्याय १६७ — नदी पारक आवाज आवाज नदी पार बनै छै, मुदा डूबै एहि पारक लोक छै। अध्याय १६८ — शहरक गला शहरक गला पकड़ाइ छै, कंठ नहि— कंठ सदिखन आरो ऊपर रहै छै। अध्याय १६९ — चन्द्र दूक दरबज्जा दरबज्जापर चपरासी पकड़ाइ छै; भीतरक कोठरी अपन ताला अपने बदलैत रहै छै। अध्याय १७० — चन्द्र एकक खोल खोल उतारि लिअ तँ चन्द्र एक आ चन्द्र दू एक्कहि अन्हारक दू फाँक। अध्याय १७१ — चन्ना गाछीक अदृश्य अदालत अदृश्य अदालतक कोनो मुहर नहि— ओतय भय उतारल जाइ छै, शपथ नहि। अध्याय १७२ — गाँठक पढ़नाइ भय बाहर निकलि गेलापर ओकर गाँठ पढ़बाक बारी अबै छै— आ गाँठ सदिखन तीन रंगक। अध्याय १७३ — पंजीक पहरा पंजी पन्द्रह बरख चुप रहल, मुदा हस्ताक्षर एक्को दिन नहि सुतल। अध्याय १७४ — अदृश्य अदालतक चौखट अदालतक चौखट पाथरक नहि— घेरा-भरिक साहसक होइ छै। अध्याय १७५ — मुहरबाहकक नाम ओस पड़ितो पाथरक अक्षर नहि धुँधलाएल— नामकेँ नमी नहि, बिसरब मेटबै छै। अध्याय १७६ — सेवा-समारोहक अन्हार अन्तिम सूची सभसँ छोट पन्नापर लिखल जाइ छै, आ सभसँ पैघ छाया पसारै छै। अध्याय १७७ — घर-घरक कागज अदालत जहिया घर-घर चलए लागए, तहिया बुझू— न्यायकेँ पएर भेटि गेल। अध्याय १७८ — ऊपरक कोठरी ऊपरक कोठरीक फुसफुसाहट सूखल पातक आगि थीक— एक चिनगीमे गाम भरि। अध्याय १७९ — मुहरक पगचिन्ह मुहरक पगचिन्ह स्याहीसँ नहि सूखैत— ओ रस्ता देखबैत रहै छै। अध्याय १८० — शहरक खाता खाता शहरमे खुजै छै, मुदा ओकर जड़ि गामक ककरो आङनमे गड़ल रहै छै। अध्याय १८१ — सिमक छाया सिमक छाया देह बिनु घूमै छै— नम्बर बदलै छै, नीयत नहि। अध्याय १८२ — हरिहर सेवा केंद्रक दरबाजा सेवा-केंद्रक दरबाजा दिनमे सेवा बाँटै छै, राति हिसाब। अध्याय १८३ — फोनक भीतरक चेहरा फोनक भीतर चेहरा नुकायल रहै छै, मुदा साँसक चाल नहि नुकाइ छै। अध्याय १८४ — आवाजक नकाब आवाजक नकाब कपड़ाक नहि— अभ्यासक होइ छै, आ अभ्यासक शैली पकड़ा जाइ छै। अध्याय १८५ — मास्टरक कमरा मास्टरक कमरा खुजि गेल, मास्टर धुँआ भऽ गेल— मुदा धुँओकेँ रस्ता चाही। अध्याय १८६ — मधवेशक असली नाम असली नाम सभसँ पातर कागजपर लिखल रहै छै— जकरा सभ रद्दी बुझै छै। अध्याय १८७ — छत्ताक भीतरक रानी छत्ताक भीतरक रानी अपने कहियो फूलपर नहि जाइ— भनभनाहटे ओकर पता कहै छै। अध्याय १८८ — महेश्वरक मुहर नील मुहर छाप नहि, कागजक देहपर पड़ल घाव थीक। अध्याय १८९ — लोहेक पेटी लोहेक पेटीक कुंजी जङ खा सकैए, गवाही नहि। अध्याय १९० — नील पंजी नील पंजीक रंग निगरानीक बाहर पसरै छै— भयक अपन कोनो ताला नहि। अध्याय १९१ — ध्रुवेशक कुर्सी कुर्सी खाली रहितो शासन करै छै— जाधरि ओकर नाम नहि पुकारल जाए। अध्याय १९२ — बन्द रेकॉर्डरक स्वर बन्द रेकॉर्डरक स्वर सभसँ ऊँच— कारण ओकरा आब केओ रोकि नहि सकैत। अध्याय १९३ — आवाजक चेहरा आवाजक चेहरा तखन देखाइ छै जखन साँसक पाछाँ ठाढ़ लोक गनल जाए। अध्याय १९४ — साँसक समन समन देहपर नहि, साँसपर जारी होइ छै— आ साँसकेँ कोनो वकील नहि। अध्याय १९५ — रोकल खाता खाता रोकलापर पहिल बेर बुझाइ छै— धन सेहो डेराइत अछि। अध्याय १९६ — जलसमाधिक अर्थ जलसमाधिक अर्थ पानि नहि जनैत— नाम जनैत अछि। अध्याय १९७ — ऊपर उठल नाम डूबल नाम जखन ऊपर उठैए, तखन पानि नहि हिलैत— हिलैत अछि किनार। अध्याय १९८ — अपराधीक धरती अपराधीक धरती अलगसँ नहि होइ छै— वैह माटि, खाली पएरक निशान दोसर। अध्याय १९९ — संदूकक भीतरक बिहान संदूकक भीतर सेहो बिहान होइ छै— जँ ढक्कन गवाहीक हाथसँ खुजए। अध्याय २०० — नामक पहरुआ नाम जाधरि पुकारल जाइत रहत, ताधरि ठूँठोमे हरियर बिन्दु बाँचल रहत। पोथीक अन्तिम स्वर १. पानि घुरल, गाछ हँसल, आ डुबल नाम सभ एक-एक कऽ ऊपर उठि अपन घर घुरल। २. जे शिला कहियो चुप छल, से आब बाजय लागल, कारण ओहिपर आब सभक नाम लिखायल अछि। ३. गोहि गेल, ग्राह गेल, मुदा बच्चाक ओ हाथ रहि गेल जे ऊपर उठि कऽ नाम मँगने छल। ४. जे गाम अपन इतिहास मोन राखलक, ओतुक्का नारिकेल गाछ फेर फल देबय लागल। ५. सत्य बीज छल, फुटल; नाम जल छल, उठल; आ गढ़ नारिकेल फेर पृथ्वी चुनलक। ६. जे देखि कऽ बजल, ओकर नाम दू बेर जीबल— एक बेर देहमे, एक बेर गामक स्मृतिमे। ७. ई कथा एतय खतम नहि होइ छै, ई ओहि हरेक मुँहमे जीबित रहै छै जे कहै छै— हम छी। [ऐ कादम्बरीक अंश] अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.११. गजेन्द्र ठाकुर-माटिक खेलौना-गाड़ी (शूद्रक रचित संस्कृत नाटक मृच्छकटिकम् केर मैथिली अनुवाद- गजेन्द्र ठाकुर) माटिक खेलौना-गाड़ी (शूद्रक रचित संस्कृत नाटक मृच्छकटिकम् केर मैथिली अनुवाद- गजेन्द्र ठाकुर) पात्र-परिचय चारुदत्त: एकटा ब्राह्मण व्यापारी रोहसेन: हुनकर पुत्र मैत्रेय: हुनकर मित्र वर्धमानक: हुनकर घरक नौकर संस्थानक: राजा पालकक साढ़ू स्थावरक: हुनकर नौकर संस्थानकक आन नौकर एकटा विट (राजदरबारी) आर्यक: एकटा अहीर (ग्वाला) जे बादमे राजा बनि जाइत अछि शर्विलक: एकटा ब्राह्मण, मदनिकासँ प्रेम करय वाला एकटा संवाहक (मालिश करय वाला): जे बादमे बौद्ध भिक्षु बनि जाइत अछि माथुर: जुआघरक मालिक दर्दुरक: एकटा जुआड़ी आन जुआड़ी कर्णपूरक आ कुम्भीलक: वसन्तसेनाक नौकर वीरक आ चन्दनक: आरक्षी (पुलिस) गोह आ अहीन्त: जल्लाद वसन्तसेनाक घरक नौकर सभ एकटा न्यायाधीश, एकटा श्रेष्ठि, एकटा कायस्थ (लिपिक) आ एकटा चोबदार वसन्तसेना: एकटा गणिका (नगरवधू) हुनकर माय मदनिका: वसन्तसेनाक दासी वसन्तसेनाक एकटा आन दासी चारुदत्तक पत्नी रदनिका: चारुदत्तक घरक दासी दृश्य: उज्जयिनी (जेकरा अवन्ती सेहो कहल जाइत अछि) आ ओकर आसपासक क्षेत्र। प्रथम अङ्क दर्शक सभक लेल मङ्गलाचरण: हुनकर मुड़ल ठेहुनकें साँपक दोहड़ायल फेरसँ बनल जटा-गेंठ जकड़ने अछि; अपन श्वास रोकलासँ हुनकर ज्ञानेन्द्रिय सभ एहन शिथिल भ’ गेल छनि जेना चेतना मृत्युक गम्भीरतामे डूमि गेल हो; ओ अपन भीतर, सत्यक आँखिसँ, समस्त क्रियाकलापसँ मुक्त परमात्माकें देखैत छथि। ओही शिवक ध्यान अहाँक रक्षा करय; ओ संसारक शून्यत्ताकें पूरक रूपमे जनैत परम तत्त्वक चिन्तन करैत छथि। आ पुनः: शिवक कण्ठ अहाँक सभ विपत्तिसँ रक्षा करय, जे एकटा डराओन मेघक समान बुझाइत अछि, जकरा पर बिजुरीक चमक सन गौरीक बांहि सुशोभित अछि। सूत्रधार: अहाँ सभकें रसभङ्ग करय वाला एही कठीन आ थकावय वाला काजसँ बस! आब हम परम श्रद्धाक संग आदरणीय महापुरुष सभकें प्रणाम करैत छी, आ घोषणा करैत छी जे हम "मृच्छकटिकम्" (माटिक खेलौना-गाड़ी) नामक नाटक प्रस्तुत करबाक इच्छा राखैत छी। एकर लेखक एकटा एहन पुरुष छलाह: जे हाथीक समान गौरवमय चालिमे प्रतिस्पर्धा करैत छलाह; हुनकर आँखि चकोर पक्षीक समान छल जे चन्द्रमाक किरणक रसास्वादन करैत अछि; हुनकर मुख पूर्ण चन्द्र सन दीप्तिमान छल; हुनकर स्वरूप अत्यंत प्रिय छल, एहन सभकेँ ज्ञात अछि। द्विज सभमे श्रेष्ठ ई कवि पृथ्वी पर ‘शूद्रक’ नामसँ विख्यात छलाह, हुनकर गुणक गम्भीरता अगाध आ अद्वितीय छल। आ पुनः: ओ सामवेद, ऋग्वेद आ गणित शास्त्रक ज्ञाता छलाह; ओ गणिका सभक कला आ हाथी सभक विज्ञान सेहो नीक जकाँ जनैत छलाह। शिवक कृपासँ हुनकर आँखि कहियो झलफलायल नै; ओ अपन स्थान पर अपन पुत्रकें राजा रूपमे देखलन्हि। ओ अश्वमेध यज्ञ सफलतापूर्वक संपन्न कयलन्हि; आ एक सय दस वर्ष आ दस दिनक आयुमे अग्निक लहरिमे प्रवेश क’ अपन प्राण त्याग कयलन्हि। आ पुनः एक बेर: युद्धक लेल तत्पर; आलस्यक कट्टर शत्रु; वेद पाठी विद्वान सभक प्रधान; तपस्वीक वैभवसँ समृद्ध; शत्रुकेँ हाथीक समक्ष अपन पराक्रम देखेबामे आनन्दित होय वाला—एहन छलाह राजा शूद्रक। आ हुनकर एही रचनामे: अवन्ती नामक नगरमे, चारुदत्त नामक एक व्यक्ति रहैत छथि, जे अपन युवावस्था आ दरिद्रता दुनू लेल विख्यात छथि; ओ एकटा ब्राह्मण व्यापारीक पुत्र छथि। हुनकर गुणमे वसन्तसेनाक अन्तःकरणकें गम्भीर प्रेमसँ आन्दोलित करबाक सामर्थ्य अछि; वसन्तसेना बसन्तक ऋतु जकाँ कान्तिमयी छथि, तइयो ओ एकटा गणिका छथि। तँ एतय राजा शूद्रक एही दुनू हृदयक शुद्ध प्रेमक उत्सव, विवेकपूर्ण कार्य, एकटा मुकदमक अन्याय आ घृणा, एकटा दुष्टक प्रकृति आ भाग्यक गतिक कथाकें प्रस्तुत करैत छथि। (ओ घूमि क’ चारू कात देखैत छथि) हमर ई सङ्गीत-शाला खाली अछि। हमरा आश्चर्य भ’ रहल अछि जे अभिनेता सभ कतऽ गेलाह? (सोचैत) आह, हम बुझि गेलहुँ। ओकर घर शून्य अछि जाहि घरमे कोनो सन्तान नै भेल; ओकर संसार तीन गुना शून्य अछि जेकर कोनो असली आ पक्का मित्र नै अछि; मूर्खक लेल ई संसार शून्य आ अनाथ अछि; मुदा दरिद्रक लेल जे किछु अछि, ओ सभ शून्य अछि। हम अपन अभ्यास समाप्त क’ लेलहुँ। आ हम एतेक कालसँ अभ्यास क’ रहल छी जे हमर आँखिक पुतली नाचि रहल अछि, आ भूखक मारे आँखि सुखल कमल-बीज जकां कड़कड़ा रहल अछि, जेना घामक प्रखर किरणसँ झूर-झमार भऽ गेल हो। हम आब अपन पत्नीकें बजा क’ पूछैत छियैक जे जलखै लेल किछु अछि की नै। हे, हम एतय छी—मुदा नै! विशेष अवसर आ सामान्य प्रथा दुनू ई मङ्गैत अछि जे हम देशी-प्राकृतमे बाजी। (प्राकृतमे बाजैत) धत तेरी कऽ! हम एतेक कालसँ अभ्यास क’ रहल छी आ एतेक भूख लागल अछि जे हमर अङ्ग सभ सुखल कमल-नाल जकां कमजोर भ’ गेल अछि। हम घर जा क’ देखैत छी जे हमर नीक पत्नी किछु तैयार कऽ कऽ रखने अछि की नै। (ओ घूमि क’ चारू कात देखैत छथि) हम अपन घर पर छी। हम भीतर जाइत छी। (ओ प्रवेश करैत छथि आ देखैत छथि) हे भगवान! हमर घरक सभ वस्तु उलट-पुलट किएक अछि? माड़ क एकटा नाम धार सड़क पर बहि रहल अछि। भूमि, जतय लोहक बर्तनकें रगड़िक’ साफ कयल गेल अछि, ओ एहन सुन्दर लगैत अछि जेना कोनो कनियाँ अपन मुख पर काजरक ठोप लगेने हो। एकर सुगन्ध एतेक नीक अछि जे हमर भूख आरो प्रज्वलित भ’ क’ हमरा बेसी कष्ट द’ रहल अछि। की कोनो नुकायल धन भेट गेल अछि? या हम एतेक भूखल छी जे हमरा बुझाइत अछि समस्त संसार भातेसँ बनल अछि? हमर घरमे निश्चित रूपसँ जलखै नै अछि, आ हम भूखसँ मरि रहल छी। मुदा एतय सभ किछु तहस-नहस देखि रहल छी। एकटा कनियाँ उबटन तैयार क’ रहल अछि, दोसर फूलक माला बुनि रहल अछि। (सोचैत) एही सभक की अर्थ अछि? नीक, हम अपन पत्नीकें बजा क’ सत्य जनैत छी। (ओ नेपथ्य दिस देखैत छथि) आर्या, की अहाँ एक क्षणक लेल एतय आयब? (एकटा नटीक प्रवेश होइत अछि) नटी: हम एतय छी, स्वामी। सूत्रधार: अहाँक स्वागत अछि, आर्या। नटी: आज्ञा कयल जाय, स्वामी। हमरा की करबाक अछि? सूत्रधार: आर्या, हम एतेक कालसँ अभ्यास क’ रहल छी आ भूखक दुआरे हमर अङ्ग सभ सुखल कमल-नाल जकां शिथिल भ’ गेल अछि। की घरमे खाय लेल किछु अछि की नै? नटी: सभ किछु अछि, स्वामी। सूत्रधार: नीक, की अछि? नटी: जेना—चीनी क संग भात, घी, दही, अन्न; आ ई सभ मिलि क’ एकटा एहन व्यञ्जन बनैत अछि जे स्वर्गक योग्य हो। देवता सभ अहाँ पर सदा एहनहि प्रसन्न रहथि! सूत्रधार: ई सभ हमर घरमे अछि? आकि अहाँ मजाक क’ रहल छी? नटी: (मनहि मन) हँ, हम मजाक करब। (प्रकट) ई बजारेमे अछि, स्वामी। सूत्रधार: (क्रोधमे) रे पापिनी, एही प्रकार तोहर अपन आशा सेहो छिन्न भ’ जाय! आ मृत्यु तोरा खोजि लिअय! किएक तँ हमर आशा, एतेक ऊपर चढ़ल छल जे ओ मात्र नीच्चां खसत। नटी: क्षमा करू, स्वामी, क्षमा! ई केवल एकटा परिहास छल। सूत्रधार: मुदा एही असाधारण तैयारीक की अर्थ अछि? एकटा कनियाँ उबटन बना रहल अछि, दोसर माला गाँथि रहल अछि, आ भूमि पांच रङ्गक यज्ञक फूलसँ सुशोभित अछि। नटी: ई व्रत क दिन अछि, स्वामी। सूत्रधार: कोनो व्रत? नटी: एकटा सुन्दर वर पेबाक व्रत। सूत्रधार: एही लोकमे, आर्या, या परलोकमे? नटी: परलोकमे, स्वामी। सूत्रधार: (क्रोधसँ) सज्जन वृन्द! एकरा देखू। ई अगिला जन्ममे वर पेबाक लेल हमर भोजनक बलिदान क’ रहल अछि। नटी: क्रुद्ध नै होउ, स्वामी। हम एही आशामे व्रत क’ रहल छी जे अहाँ अगिला जन्ममे सेहो हमर पति बनि क’ आयब। सूत्रधार: मुदा अहाँकें एही व्रतक सुझाव के देलक? नटी: अहाँक परम प्रिय मित्र जीर्णवृद्ध। सूत्रधार: (क्रोधसँ) आह, जीर्णवृद्ध, दासीपुत्र! कखन हम राजा पालककें अहाँ पर क्रुद्ध देखब? तखन अहाँ एहनहि अलग कयल जायब, जेना कोनो नव-दुलहिनक सुगन्धित केश अलग कयल जाइत अछि। नटी: क्रुद्ध नै होऊ, स्वामी। अगिला जन्ममे अहाँकें पेबाक लेल हम ई व्रत क’ रहल छी। (ओ हुनकर पएर पर खसि पड़ैत छथि) सूत्रधार: उठू, आर्या, आ हमरा बताउ जे एही व्रतमे पुरोहितक काज के करताह? नटी: अहीं सन कोनो ब्राह्मण, जेकरा हमरा सभकें निमन्त्रित करबाक अछि। सूत्रधार: तँ अहाँ जा सकैत छी। आ हम अपनहि सन कोनो ब्राह्मणकें आमन्त्रित करब। नटी: बहुत नीक, स्वामी। (ओ प्रस्थान करैत छथि) सूत्रधार: (घूमि क’) हे भगवान! एही समृद्ध उज्जयिनी नगरीमे हम अपनहि सन कोनो ब्राह्मण कतऽ पायब? (ओ चारू कात देखैत छथि) आह, एतय चारुदत्तक मित्र मैत्रेय आबि रहल छथि। सुन्दर! हम हुनकासँ पूछब। मैत्रेय, अहाँकें आइ हमर घरमे पहिल निमन्त्रण स्वीकार करबाक अछि। नेपथ्यसँ आवाज: अहाँ कोनो आन ब्राह्मणकें आमन्त्रित करू। हम व्यस्त छी। सूत्रधार: मुदा, भाय, भोजन तैयार अछि आ ई सभ केवल अहाँक लेल अछि। एकर अतिरिक्त, अहाँकें उपहार सेहो भेटत। नेपथ्यसँ आवाज: हम एक बेर कहि देलहुँ। अहाँ किएक हमरा बेर-बेर विवश क’ रहल छी? सूत्रधार: ओ मना क’ रहल छथि। नीक, हम कोनो आन ब्राह्मणकें आमन्त्रित करैत छी। (ओ प्रस्थान करैत छथि) प्रस्तावना समाप्त (हाथमे एकटा अंगवस्त्र लेने मैत्रेयक प्रवेश होइत अछि) मैत्रेय: "अहाँ कोनो आन ब्राह्मणकें आमन्त्रित करू। हम व्यस्त छी।" आ तइयो हमरा कोनो अपरिचित व्यक्तिसँ निमन्त्रणक आशा करबाक चाही। ओह, कतेक दयनीय स्थिति अछि! जखन सज्जन चारुदत्त धनी छलाह, तखन हम दिन-राति परम यत्नसँ तैयार कयल गेल सुगन्धित मधुर पकवान पेट भरि खाइत छलहुँ। हम आङ्गनक दुआरि पर बैसि क’ तरह-तरहक व्यञ्जनसँ घेरल रहैत छलहुँ, आ एकटा चित्रकार जकां जे अपन रङ्गक कृति सभकें छुबैत अछि, हम मात्र अपन आङ्गुर सभसँ ओकरा छुबि क’ अलग कऽ कऽ खाइत छलहुँ। हम नगरक बजारमे साँढ़ जकां पागुर करैत ठाढ़ रहैत छलहुँ। आ आब ओ एतेक दरिद्र भ’ गेल छथि जे हमरा एतय-ओतय आ सभ कात दौगऽ पड़ैत अछि, आ परबा जकां घर मात्र सुतबाक लेल आबय पड़ैत अछि। आब ई चमेलीक सुगन्धसँ युक्त अंगवस्त्र अछि, जेकरा चारुदत्तक प्रिय मित्र जीर्णवृद्ध हुनका लेल पठौने छथि। ओ हमरा कहने छलाह जे जखन चारुदत्त अपन पूजा-पाठ समाप्त क’ लेथिन, तखन ई हुनका द’ देबनि। तँ आब हम चारुदत्तकें खोजैत छी। (ओ चारू कात घूमि क’ देखैत छथि) चारुदत्त अपन संध्या-वन्दन समाप्त क’ लेलन्हि अछि, आ ओ गृह-देवता सभक लेल बलि (भोजनक अंश) लेने आबि रहल छथि। (चारुदत्त आ रदनिकाक प्रवेश होइत अछि) चारुदत्त: (ऊपर देखि क’ आ थाकल निश्वास छोडि क’) हमर दुआरि पर, जतय बलिक अंश हँस आ सारस सभ झपटि क’ लय जाइत छल, ओतय आब घास जनमि गेल अछि, आ ई बीआ जे हम छिटैत छी, ओतय खसि रहल अछि जतय कीड़ा सभ एकर मिठासकें नष्ट क’ दैत अछि। (ओ बहुत आस्ते-आस्ते चलैत छथि आ बैसि जाइत छथि) मैत्रेय: चारुदत्त एतय छथि। हमरा जा क’ हुनकासँ गप करबाक चाही। (लग जा क’) अहाँकें प्रणाम। अहाँक कल्याण हो। चारुदत्त: आह, ई हमर संगी मैत्रेय छथि। अहाँक बहुत स्वागत अछि, मित्र। कृपया बैसू। मैत्रेय: धन्यवाद। (ओ बैसि जाइत छथि) नीक, मित्र, ई चमेलीक सुगन्ध वला अंगवस्त्र अछि जे अहाँक मित्र जीर्णवृद्ध पठौने छथि। ओ कहने छलाह जे जखन अहाँ पूजा समाप्त क’ लेब तखन ई अहाँकें द’ दी। (ओ अंगवस्त्र अर्पण करैत छथि। चारुदत्त ओकरा लैत छथि आ विचारमे डूमि जाइत छथि) नीक, अहाँ की सोचि रहल छी? चारुदत्त: हमर नीक मित्र, घोर अन्धकारमे चमकय वाला दीपक ओही सुखक समान अछि जे दुःखक सङ्घर्षक बाद आबैत अछि; मुदा सुखक बाद जखन मनुष्य दुःख भोगैत अछि, तखन ओकर शरीर केवल एकटा जिबैत लाशक समान भ’ जाइत अछि। मैत्रेय: नीक, अहाँ की चाहब, मरि जायब की आकि दरिद्र रहब? चारुदत्त: आह, मित्र! निश्चित आ मन्द दुःखसँ नीक मृत्यु अछि; मृत्युसँ क्षणिक कष्ट समाप्त भ’ जाइत अछि, मुदा दरिद्रता कहियो नै समाप्त होय वाला दुःख आनैत अछि। मैत्रेय: हमर प्रिय मित्र, एहन निराश नै होऊ। अहाँक धन हुनका सभक लेल खर्च भेल अछि जिनकासँ अहाँ प्रेम करैत छी, आ चन्द्रमा जकां, जखन ओ अपन अमृत देवता सभकें द’ दैत अछि, अहाँक ई घटैत वैभव एकटा नव शोभा पाबैत अछि। चारुदत्त: मित्र, हम अपन नष्ट भेल धनक लेल नै कानैत छी। मुदा ई हमर दुःख अछि: जे हमरा अतिथि रूपमे प्रणाम करैत छलाह, ओ आब अनठा क’ आगाँ बढ़ि जाइत छथि। "ई एकटा दरिद्रक घर अछि," ओ कहैत छथि। जेना ऋतु समाप्त भेला पर मधुमाछी सभ ओही हाथीक भण्डारक छत्ताकें छोड़ि दैत अछि, जेकर मद समाप्त भ’ गेल हो। मैत्रेय: ओह, धत तोरी कऽ ओइ धनकें! ई कोनो सोचबाक योग्य वस्तु नै अछि। ई वनमे ओही चरवाहाक छौड़ा जकां अछि जे बिढ़नी सँ डराइत अछि; ई बिढ़नी ओतय नै बिलमैत अछि जतय एकरा भोजनक लेल उपयोग कयल जाइत अछि। चारुदत्त: विश्वास करू, मित्र। हमर दुःख केवल सुवर्णक ह्राससँ नै अछि; किएक तँ लक्ष्मी चंचल अछि, ओकर कृपा स्थिर नै रहैत अछि; मुदा जकर पूर्व धन नष्ट भ’ गेल हो, ओकर हृदयक मित्र सेहो शीतल आ उदासीन भ’ जाइत अछि। आ दरिद्र मनुष्य लज्जित होइत रहैत अछि; लज्जासँ ओकर प्रतिष्ठा आ यश नष्ट भ’ जाइत अछि; यशक अभावसँ अपमान सहय पड़ैत अछि; अपमानसँ ग्लानि आ ग्लानिसँ विषाद उत्पन्न होइत अछि; विषादसँ मूर्खता आ मूर्खताक फल मृत्यु अछि—आह! धनक अभावहि समस्त पापक जड़ि अछि! मैत्रेय: मुदा केवल ई मोन राखू जे धन कतेक तुच्छ वस्तु अछि, आ प्रसन्न होऊ। चारुदत्त: मित्र, मनुष्यक दरिद्रता ओकरा लेल चिन्ताक घर अछि, एकटा एहन लज्जा अछि जे मनमे रहैत अछि, मानव जातिक संग एकटा आन प्रकारक युद्ध अछि; अपन मित्रक घृणा अछि, अपरिचित सभसँ द्वेष अछि, आ ओही स्त्रीसँ सेहो अपमान अछि जे कहियो प्रेम करैत छली; मुदा जदि ओकर पत्नी ओकरा तुच्छ बुझय, तखन कोनो सुनसान वनमे आश्रय खोजनाइये उचित अछि। ओकर आत्माकें तड़पावय वाला दुःखक ई ज्वाला उग्र रूपसँ जरैत अछि, तइयो ओकरा जिबैत छोड़ि दैत अछि। मित्र, हम गृह-देवता सभकें अपन बलि अर्पित क’ देलहुँ अछि। अहाँ जा क’ चौबटियापर मातृ-देवी सभकें पूजा अर्पित करू। मैत्रेय: नै! चारुदत्त: किएक नै? मैत्रेय: किएक तँ देवता अहाँ पर प्रसन्न नै छथि, एतेक आदर भेला पर सेहो। तँ पूजा कयलासँ की लाभ? चारुदत्त: एहन नै मित्र, एहन नै! ई एकटा गृहस्थक नित्य कर्तव्य अछि। देवता सभ सदा ओही पुरुष सभक दान, तप, चिन्तन आ प्रार्थनासँ प्रसन्न रहैत छथि जे सांसारिक चिन्तासँ मुक्त छथि। तखन अहाँ किएक सङ्कोच क’ रहल छी? जाउ आ मातृ-देवी सभक लेल बलि अर्पण करू। मैत्रेय: नै, हम नै जा रहल छी। अहाँ कोनो आन व्यक्ति कें पठाउ। ओहिनो, हमरा संग सभ किछु विपरीत भ’ रहल अछि, हम एकटा दरिद्र ब्राह्मण जे छी! ई दर्पणमे प्रतिबिम्ब जकां अछि; दक्षिण भाग वाम भ’ जाइत अछि, आ वाम भाग दक्षिण भ’ जाइत अछि। एकर अतिरिक्त, संध्याक एही समयमे, राजाक राजपथ पर सभ प्रकारक लोक घूमि रहल छथि—गणिका, विट, नौकर आ राजाक प्रिय पात्र। ओ सभ हमरा सहज शिकार बुझताह, जेना कोनो करिया साँप बेंगक शिकार करैत काल अपन रस्तामे मूषककें जकड़ि लैत अछि। मुदा अहाँ एतय बैसि क’ की करब? चारुदत्त: नीक तखन, अहाँ एतहि रहू; आ हम अपन पूजा समाप्त करैत छी। नेपथ्यसँ आवाज: रुकू, वसन्तसेना, रुकू! (विट, संस्थानक आ नौकर द्वारा पछोड़ कयल जाइत वसन्तसेनाक प्रवेश होइत अछि) विट: वसन्तसेना! रुकू, रुकू! आह, भय अहाँक कोमलताकें किएक रूपान्तरित क’ रहल अछि? अहाँक सुकुमार चरण सभकें एतेक कष्ट किएक भ’ रहल अछि, जे नृत्यमे कतेक सुन्दरतासँ थिरकैत छल? अहाँक आँखि, भयसँ त्रस्त भ’ क’, एना किए टेढ़ भऽ देखैत अछि? शिकारी सभसँ भागय वाला भयभीत हरिणक जकां अहाँ किएक भागि रहल छी? संस्थानक: रुकू वसन्तसेना, रुकू! किएक भागैत छी? आ दौगैत छी? आ घुरैकाल ठेस खाइत छी? दयालु बनू! अहाँ नै मरब। ओह, अपन पएर रोकू! प्रेमक मारे, सुकुमार कनियाँ, हमर व्याकुल हृदय जरि रहल अछि, जेना कोइलाक ढेरी पर मौसक टुकड़ा। नौकर: रुकू, गणिका, रुकू! भयसँ अहाँ भागि रहल छी, हमरासँ दूर, जेना गरमीक ऋतुमे मोरनी भागैत अछि; मुदा हमर स्वामी आ मालिक तीव्र गतिसँ चलि रहल छथि, जेना वनमे वनमुर्गा। विट: वसन्तसेना! रुकू, रुकू! अहाँ किएक थरथरा रहल छी, किएक भागि रहल छी, केराक गाछ जकां कम्पायमान भ’ क’? अहाँक वस्त्रक किनार, लाल आ सुन्दर, हवामे डोलि रहल अछि; कखनो-कखनो, कमलक कली भूमि पर खसि रहल अछि, जेना खूनक बून्द हो। अहाँ एकटा लाल डरीड़ जकां लगैत छी, जाहिसँ चोट लगला पर लाल रङ्गक धार बहैत अछि। संस्थानक: रुकू, वसन्तसेना, रुकू! अहाँ हमर वासना, हमर इच्छा, हमर प्रेमकें जगा देलहुँ अछि; अहाँ रातिमे बिछौन पर हमर निन्न उड़ा देलहुँ अछि; भय आ त्रास दुनू अहाँक हृदयकें आन्दोलित क’ रहल अछि; अहाँ अपन तीव्र उड़ानमे लड़खड़ा क’ खसि रहल छी। मुदा सूर्य आ कुन्ती सन अपन इच्छासँ हम सेहो अहाँक पूर्ण भोग करब। विट: आह, वसन्तसेना, अहाँक ई तीव्र गति हमर दौगैत पएर सभसँ आगाँ किएक निकसि रहल अछि? गरुड़क पराक्रमक समक्ष भयभीत साँप जकां अहाँ किएक भागि रहल छी, हमर प्रिय? की हम हवाक झोंककें ओकर उड़ानमे नै पकड़ि सकैत छी? तइयो हम अहाँकें नै पकड़ब, यद्यपि हम पकड़ि सकैत छी। संस्थानक: हमर बात सुनू, स्वामी! ई कामदेवक कोड़ा, ई नचनियाँ, मछली खाय वाली, अपन कुलक नाशक, ई हठी, मदक पेटार, गणिका, ई कपड़ा सुखावयवाला रस्सी, चंचल प्राणी, पापिनी कनियाँ—हम ओकरा दसटा सुन्दर नाम देलहुँ, तइयो ओ हमर इच्छाक समक्ष नै झुकल। विट: जेना विटक आङ्गुर सभ वीणाक तार पर चोट करैत अछि, ओनाहिते नृत्य करय वाला कानक कुण्डल अहाँक कपोल पर चोट क’ रहल अछि। अहाँ भयसँ व्याकुल भ’ क’ किएक भागि रहल छी, जेना मेघक गर्जन भेला पर सारस पक्षी भागैत अछि? संस्थानक: अहाँक झङ्कार करय वाला आभूषण सभ कतेक बजैत अछि; द्रौपदी जकां अहाँ भागि रहल छी, जखन अर्जुन हुनकर चुम्बन कयलन्हि। नौकर: ओ राजाक प्रिय पात्र छथि; ओ जे कहथि ओकर पालन करू। आ अहाँकें खाय लेल नीक माँछ आ मांस भेटत। किएक तँ जखन कुकुर सभकें समस्त माँछ आ मांस भेट जाइत अछि जे ओ चाहैत छथि, तखन हुनका लेल मृत मांस मधुर नै लगैत छनि। विट: आर्या वसन्तसेना, अहाँक नितम्ब पर नीचां लटकय वाला करघनी एहन चमकैत अछि जेना आकाशमे तारा सभ; अहाँक भागबाक ई अद्भुत भय अहाँक सुन्दरताकें नष्ट क’ रहल अछि। संस्थानक: हम अहाँक पछोर अपन पूर्ण शक्तिसँ क’ रहल छी, जेना कुकुर सभ गिदरक पीछा करैत अछि, मुदा अहाँ अपन उड़ानमे बहुत चतुर आ चंचल छी, आ हमर हृदयकें जड़ि समेत चोरा क’ लय जाइत छी। वसन्तसेना: पल्लवक! प्रभृतिका! संस्थानक: स्वामी! एकटा पुरुष! एकटा पुरुष! विट: कायर नै बनू। वसन्तसेना: माधविका! माधविका! विट: (हँसैत) मूर्ख! ओ अपन दासी सभकें बजा रहल अछि। संस्थानक: स्वामी! की ओ एकटा स्त्रीकें बजा रहल अछि? विट: हँ, निश्चित रूपसँ। संस्थानक: स्त्री! हम सैकड़ामे लोककेँ मारि दैत छी। हम एकटा वीर पुरुष छी। वसन्तसेना: (कोनो उत्तर नै सुनैत) हाइ, कोन कसरि भ’ गेल जे हमर अपन सेवक सभ सेहो हमरा छोड़ि देलन्हि? हमरा अपन बुद्धिसँ अपन रक्षा करबाक चाही। विट: खोज बन्द नै करू। संस्थानक: चिकड़ू, वसन्तसेना, अपन कोकिल प्रभृतिका लेल, या अपन फूल आ पल्लवक लेल या समस्त वैशाखक मास लेल! अहाँकें के बचेबाक लेल आबयवाला अछि जखन हम अहाँक पीछा क’ रहल छी? भीमसेन क बात किएक करू? या जमदग्निक पुत्र, ओही शक्तिशाली महापुरुष क? या दसमुख रावणक? या कुन्तीक पुत्रक? केवल हमरा देखू! हम अपन आङ्गुर अहाँक केशमे फसा क’, दुःशासन जकां, ओकरा घीचब। देखू, देखू! हमर तलवार तेज अछि; प्रणाम। अहाँक मुड़ी! एकरा काटि क’ अलग क’ दइ छी, या अहाँकें मारि दैत छी। तखन हमर क्रोधसँ बचबाक यत्न नै करू; जखन अहाँकें मरबाक अछि, तँ अहाँक जीवन समाप्त अछि। वसन्तसेना: महाभाग, हम एकटा दुर्बल स्त्री छी। विट: एही लेल अहाँ अखन धरि जीवित छी। संस्थानक: एही लेल अहाँक हत्या नै भेल अछि। वसन्तसेना: (मनहि मन) ओह! हुनकर ई शिष्टाचारहि हमरा भयभीत क’ रहल अछि। आउ, हम एकर यत्न करैत छी। (प्रकट) महाभाग, अहाँ की आशा राखैत छी? हमर आभूषण? विट: भगवान नै करथि! आर्या वसन्तसेना, एकटा उपवनक लताकें ओकर फूल सभसँ विमुख नै करबाक चाही। आभूषणक विषयमे पुनः किछु नै कहू। वसन्तसेना: तखन अहाँक की इच्छा अछि? संस्थानक: हम एकटा पुरुष छी, एकटा पैघ पुरुष, एकटा साक्षात वासुदेव। अहाँकें हमरासँ प्रेम करबाक चाही। वसन्तसेना: (क्रोधसँ) हे भगवान! अहाँ हमरा थका देलहुँ। हमरा छोड़ू! अहाँक शब्द एकटा अपमान अछि। संस्थानक: (हँसैत आ ताली बजबैत) देखू, स्वामी, देखू! गणिकाक बेटी हमरा पर कतेक अनुराग देखा रहल अछि, नै? एतय ओ कहैत अछि- आउ! हे भगवान, अहाँ थाकि गेल छी। नै, हम कोनो आन गाम या आन नगर चलि क’ नै आबि रहल छी। नै, छोटकी मालकिन, हम महाभागक मूड़ीक किरिया खाइत छी, हम अपन पएरक किरिया खाइत छी! अहाँक पएरक पाछाँ दौड़ैत-दौड़ैत हम थाकि गेल छी आ क्लान्त भ’ गेल छी। विट: (मनहि मन) की! की ई सम्भव अछि जे ई मूर्ख नै बुझैत अछि जखन ओ कहैत अछि "अहाँ हमरा थका देलहुँ"? (प्रकट) वसन्तसेना, अहाँक शब्दक गणिकाक घरमे कोनो स्थान नै अछि, जेना अहाँ जनैत छी, प्रत्येक युवकक मित्र होइत अछि; मोन राखू, अहाँ ओही फूलक समान सझिया सम्पैत छी जे मार्गक कातमे उगैत अछि; कटु सत्य ई अछि जे अहाँक शरीरक अपन मूल्य अछि; अहाँक सुन्दरताक वैभव ओकर अछि जे बजारक वर्तमान दर चुकाबैत अछि। तखन ओही पुरुष क सेवा करू जेकरासँ अहाँ प्रेम करैत छी, आ ओकरो जेकरासँ अहाँ घृणा करैत छी। आ पुनः: श्रेष्ठ ब्राह्मण आ नीच मूर्ख दुनू एकहि पोखरिमे स्नान करैत छथि; मयूरक समक्ष सेहो फूलक गाछ झुकैत अछि, आ कौआ क समक्ष सेहो; ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य सभ साधारण जनताक संग यात्रा करैत छथि। अहाँ वैह पोखरि छी, वैह फूलक गाछ छी, वैह नाव छी; आ अहाँक सुन्दरता पर प्रत्येक मनुष्यक अधिकार अछि। वसन्तसेना: तइयो असल प्रेम गुणसँ जीतल जाइत अछि, हिंसासँ नै। संस्थानक: मुदा, स्वामी, जखनसँ ई दासीपुत्री ओही उपवनमे गेल अछि जतय कामदेव क मन्दिर अछि, तखनसँ ओ एकटा दरिद्र मनुष्यसँ, चारुदत्तसँ प्रेम करैत अछि, आ ओ हमरासँ प्रेम नै करैत अछि। ओकर घर वाम कात अछि। देखू आ ओकरा हमरा सभक हाथसँ निकसय नै दिअ। विट: (मनहि मन) बेचारा मूर्ख, ओ वैह बात कहि देलन्हि जेकरा लुकेबाक चाही छल। तँ वसन्तसेना चारुदत्तसँ प्रेम करैत छथि? कहबी सत्य अछि। मोती मोतीसँ मिलैत अछि। नीक, हम एही मूर्खसँ थाकि गेल छी। (प्रकट) की अहाँ कहलहुँ जे सज्जन व्यापारीक घर वाम कात छल, रे गदहा? संस्थानक: हाँ। ओकर घर वाम कात अछि। वसन्तसेना: (मनहि मन) ओह, अद्भुत! जदि हुनकर घर वास्तवमे हमर वाम हाथ कात अछि, तँ ई दुष्ट हमर सहायता क’ देलन्हि, किएक तँ ओ हमरा मार्ग देखा देलन्हि। संस्थानक: मुदा स्वामी, घोर अन्धकार अछि आ ई चितकाबर बीसक ढेरीमे काजरक एकटा दाना तकबाक समान अछि। आब अहाँ वसन्तसेनाकें देखैत छी आ आब नै देखैत छी। विट: घोर अन्हार वास्तवमे अछि। ई अन्हार एकदम्मे आबि गेल अछि, ई हमर आँखिक प्रखरताकें चोरा लैत बुझाइत अछि; हमर खुलल आँखि, जेना कोनो मोहरसँ, एही करिया राति द्वारा बन्द क’ देल गेल अछि। आ पुनः: अन्धकार हमर शरीर पर उबटन लगा रहल अछि, आ आकाश घोर अन्धकारक उबटन खसा रहल अछि, जाधरि हमर आँखि हमरा लेल पूर्णतः अनुपयोगी भ’ गेल अछि, ओही सेवाक जकां जे हुनका लेल कयल गेल हो जे छल आ कपट करैत छथि। संस्थानक: स्वामी, हम वसन्तसेनाकें खोजि रहल छी। विट: की कोनो एहन वस्तु अछि जाहिसँ अहाँ ओकरा खोजि सकब, गदहा? संस्थानक: केहन वस्तु, जेना की? विट: जेना हुनकर आभूषणक झङ्कार, या हुनकर माला क सुगन्ध। संस्थानक: हम हुनकर माला क सुगन्ध तँ सुनैत छी, मुदा हमर नाक अन्धकारसँ एतेक भरल अछि जे हम हुनकर आभूषणक आवाज नीक जकां नै देखि पाबैत छी। विट: (वसन्तसेना कें, मनहि मन) वसन्तसेना, ई सत्य अछि जे राति अन्धकारमय अछि, हे भीरु कनियाँ, आ मेघमे छुपल बिजुलीक जकां अहाँ नै देखि रहल छी; तइयो अहाँ सुगन्धित माला आ बाजत नूपुरसँ प्रकट भ’ जायब। की अहाँ हमर बात सुनलहुँ, वसन्तसेना? वसन्तसेना: (अपन मनमे) सुनलहुँ आ बुझलहुँ। (ओ अपन नूपुर खोलि दैत छथि, माला अलग क’ दैत छथि, आ अपन रास्ता टटोलैत किछु कदम आगाँ बढ़ैत छथि) हम घरक देबालकें छुबि सकैत छी, आ एतय एकटा कातक दुआरि (पक्षद्वार) अछि। मुदा हाय! हमर अङ्गुलि सभ कहि रहल अछि जे दुआरि बन्द अछि। चारुदत्त: (जे घरक भीतर छथि) मित्र, हमर पूजा समाप्त भ’ गेल। आब जाउ आ मातृ-देवी सभकें बलि अर्पित करू। मैत्रेय: नै, हम नै जा रहल छी। चारुदत्त: हाय! दरिद्र मनुष्यक बन्धु-बान्धव ओकर इच्छाक आदर नै करैत छथि; जे मित्र ओकरा कहियो प्रेम करैत छलाह, ओ आब दूर ठाढ़ रहैत छथि; ओकर दुःख बढ़ि जाइत अछि; ओकर शक्ति शून्य भ’ जाइत अछि; देखू! ओकर चरित्र क चमकय वाला तारा घटैत चन्द्रमा जकां मन्द भ’ जाइत अछि; आ ओही पाप क भागी ओ होइत अछि जे आन कयलन्हि हो। आ पुनः: कोनो मनुष्य ओकरासँ वार्तालाप नै करैत अछि; दरिद्र मनुष्य जखन भेटैत अछि तँ कोनो ओकरा उचित आदरसँ प्रणाम नै करैत अछि। जतय धनी लोक उत्सव करैत छथि, जदि ओतय ओ लग जाय, तँ ओकरा प्रसन्नताक स्थान पर तिरस्कारक चितवन भेटैत अछि। जतय साधारण जनताक भीड़ जमल हो, ओतय सेहो वैह बात होइत अछि; ओकर जीर्ण वस्त्र ओकर हृदयक लज्जाकें जगा दैत अछि। पाँच महापाप हम सभ पहने जनैत छलहुँ; हाय! हम देखि रहल छी जे छठम पाप—दरिद्र होना अछि। आ पुनः पुनः: आह दरिद्रता, हमरा अहाँ पर दया आबैत अछि, जे अहाँ हमरासँ हमर परम प्रिय मित्र जकां सटल छी; जखन हमर एही दीन जीवनक दुःखद अन्त भ’ जायत, तँ हमरा आश्चर्य होइत अछि जे अहाँ कतऽ जायब। मैत्रेय: (अपन सङ्कोचकें प्रकट करैत) नीक, मित्र, जदि हमरा जाबहि पड़त, तँ कम्तीसँ कम्ती रदनिकाकें हमर साथ पठाउ, हमर सङ्ग रहबाक लेल। चारुदत्त: रदनिका, अहाँकें मैत्रेयक साथ जाबाक अछि। रदनिका: हँ, स्वामी। मैत्रेय: आर्या रदनिका, अहाँ बलि क सामग्री आ दीपक लय लिय’ जखन धरि हम कातक दुआरि खोलैत छी। (ओ दुआरि खोलैत छथि) वसन्तसेना: एहन बुझाइत अछि जेना दुआरि हमरा पर दया क’ क’ अपनहि खुलि गेल हो। हम समय नष्ट नै करब, आ भीतर प्रवेश करब। (ओ भीतर देखैत छथि) की? दीपक? ओह प्रिय, ओह प्रिय! (ओ अपन आँचलसँ एकरा बुझा दैत छथि आ प्रवेश करैत छथि) चारुदत्त: ओ की छल, मैत्रेय? मैत्रेय: हम कातक दुआरि खोललहुँ आ हवा एकहि साथ भीतर आबि क’ दीपक बुझा देलन्हि। अहाँ कातक दुआरिसँ बाहर जाउ, रदनिका, आ हम अङ्गनमे जा क’ दीपक पुनः जला क’ आबि रहल छी। (ओ प्रस्थान करैत छथि) संस्थानक: स्वामी! स्वामी! हम वसन्तसेनाकें खोजि रहल छी। विट: खोजैत रहू, खोजैत रहू! संस्थानक: (ओनाहि करैत) स्वामी! स्वामी! हम ओकरा पकड़ि लेलहुँ! हम ओकरा पकड़ि लेलहुँ! विट: मूर्ख, अहाँ हमरा पकड़ि लेलहुँ अछि। संस्थानक: अहाँ एतहि ठाढ़ रहू, स्वामी, जतय अहाँकें राखल गेल अछि। (ओ पुनः खोजैत छथि आ नौकरकें जकड़ि लैत छथि) स्वामी! स्वामी! हम ओकरा पकड़ि लेलहुँ! हम ओकरा पकड़ि लेलहुँ! नौकर: स्वामी, अहाँ हमरा, अपन नौकरकें पकड़ि लेलहुँ अछि। संस्थानक: स्वामी एतय, नौकर एतय! स्वामी, नौकर; नौकर, स्वामी। आब दोनों गोटे अपन स्थान पर रहू। (ओ पुनः खोजैत छथि आ रदनिकाकें केशसँ जकड़ि लैत छथि) स्वामी! स्वामी! एही बेर हम ओकरा पकड़ि लेलहुँ अछि! हम वसन्तसेनाकें पकड़ि लेलहुँ! अन्धकारमय रातिमे ओ भागि रहल छली, भागि रहल छली ओ; हुनकर माला क सुगन्ध ओकरा प्रकट क’ देलन्हि; जेना चाणक्य द्रौपदीकें पकड़लन्हि छल, हम हुनकर केश पकड़ि क’ रोकि लेलहुँ। विट: आह, अपन युवावस्था आ सुन्दरता पर गर्व करय वाली! अहाँक प्रेम एतेक ऊपर नै उठबाक चाही; किएक तँ अहाँक ई पुष्प-सुगन्धित केश, जे बहुमूल्य आ दुर्लभ रत्न सभक योग्य अछि, ओ आब अहाँकें माटिमे घसीटबाक काज आबि रहल अछि। संस्थानक: हम अहाँक मुड़ी पकड़ि लेलहुँ अछि, गोट क’ के पकड़ल अछि, केशसँ, लटसँ आ घुँघराला बालसँ सेहो। आब चीखू, चिल्लाउ, अपन पूर्ण शक्तिसँ पुकारू "शिव! ईश्वर! शङ्कर! शम्भु!" रदनिका: (भयसँ) ओह, महाभाग सभ, एकर की अर्थ अछि? विट: रे गदहा! ई कोनो आन आवाज अछि। संस्थानक: स्वामी, ओही कनियाँ अपन आवाज बदलि लेलन्हि अछि, जेना कोनो बिलाई अपन आवाज बदलि लैत अछि जखन ओकरा दही क मलाई चाहैत छैक। विट: आवाज बदलि लेलन्हि? विचित्र अछि! तइयो एतेक विचित्र किएक? ओ रङ्गमञ्च पर अभिनय करैत छथि; ओ हमरा सभक हृदयकें छलबबाक कला सिखलन्हि अछि; आ आब ओ अपन ओही कलाक अभ्यास क’ रहल छथि। (मैत्रेयक प्रवेश होइत अछि) मैत्रेय: देखू! संध्याकालक सुकुमार मन्द हवामे दीपक क लौ एहन काँपि रहल अछि जेना यज्ञपशु (बकरी) क हृदय काँपैत अछि। (ओ लग जाइत छथि आ रदनिकाकें देखैत छथि) आर्या रदनिका! संस्थानक: स्वामी, स्वामी! एकटा पुरुष! एकटा पुरुष! मैत्रेय: ई उचित अछि, ई पूर्णतः उचित अछि जे अपरिचित लोक घरमे विवश प्रवेश करू, केवल एही लेल जे चारुदत्त दरिद्र छथि। रदनिका: ओह मैत्रेय, देखू ओ सभ हमर केना अपमान क’ रहल छथि। मैत्रेय: की! अहाँक अपमान? नै, ओ सभ हमरा सभक अपमान क’ रहल छथि। रदनिका: बहुत नीक। ओ सभ अहाँक अपमान क’ रहल छथि तखन। मैत्रेय: मुदा ओ सभ हिंसा तँ नै क’ रहल छथि? रदनिका: हँ, हँ! मैत्रेय: वास्तवमे? रदनिका: वास्तवमे। मैत्रेय: (क्रोधसँ अपन लाठी उठा क’) नै, महाभाग! एकटा कुकुर सेहो अपन खोतामे दाँत देखबैत अछि, आ हम एकटा ब्राह्मण छी! हमर लाठी हमर भाग्य जकां टेढ़ अछि, मुदा ई अखन सेहो एकटा सुखल बाँस या कोनो दुष्टक मुड़ी फोड़ि सकैत अछि। विट: दया करू, हे महान ब्राह्मण, दया करू। मैत्रेय: (विटकें देखैत छथि) ई पापी नै छथि। (संस्थानककें देखैत छथि) आह, ई पापी एतय अछि। नीक, अहाँ राजा क साढ़ू संस्थानक, अहाँ दुष्ट, अहाँ कायर, ई पूर्णतः उचित अछि, नै? सज्जन चारुदत्त आब एकटा दरिद्र पुरुष छथि—सत्य, मुदा की हुनकर गुण उज्जयिनीक आभूषण नै अछि? आ एहनमे लोक हुनकर घरमे घुसैत छथि आ हुनकर सेवकक अपमान करैत छथि! ओही पुरुष क अपमान नै करू जे दरिद्रताक कारण नीचां खसि गेल छथि; किएक तँ भाग्य द्वारा केओ दरिद्र नै कयल जाइत अछि; मुदा जे अपन गुणसँ खसि जाइत अछि, यद्यपि ओ धनी हो, तइयो ओकरा समान कोनो दरिद्र नै अछि। विट: (अपन सङ्कोचकें प्रकट करैत) दया करू, हे महान ब्राह्मण, दया करू। हमरा सभक कोनो अशिष्टताक विचार नै छल; हम केवल एही आर्याकें कोनो आन बुझि लेलहुँ। किएक तँ हम सभ एकटा कामुक कनियाँ कें खोजि रहल छलहुँ— मैत्रेय: की! एकरा? विट: भगवान नै करथि! ओ जेकर युवावस्था ओकर अपन सुकुमार इच्छाक नियन्त्रणमे अछि; ओ अदृश्य भ’ गेली; सत्यसँ अनभिज्ञ भ’ क’, हम सभ ओ कयलहुँ जे जानि-बुझि क’ कयल गेल पाप बुझाइत अछि। हम अहाँसँ प्रार्थना करैत छी, हमर एही पूर्ण नम्रतापूर्ण प्रार्थना स्वीकार करू। (ओ अपन तलवार खसा दैत छथि, हाथ जोड़ैत छथि आ मैत्रेयक पएर पर खसि पड़ैत छथि) मैत्रेय: भद्र पुरुष, उठू, उठू। जखन हम अहाँकें गालि देलहुँ, हम अहाँकें नै जनैत छलहुँ। आब हम अहाँकें जनैत छी आ अहाँसँ क्षमा मङ्गैत छी। विट: हमरा स्वयं क्षमा मङ्गबाक चाही। हम एकहि शर्त पर उठब। मैत्रेय: आ ओ की अछि? विट: जे अहाँ चारुदत्तसँ नै कहब जे एतय की भेल अछि। मैत्रेय: हम मौन रहब। विट: ब्राह्मण, अहाँक एही कृपालु कार्यकें हम अपन मुड़ी झुका क’ स्वीकार करैत छी; किएक तँ हमर ई तलवार कहियो गुणक लोहा क सामना नै क’ सकैत अछि। संस्थानक: (क्रोधसँ) मुदा स्वामी, अहाँ अपन हाथ एतेक असहाय भावसँ किएक जोड़ैत छी आ एही बौना (मैनकिन) क पएर पर किएक खसि पड़ैत छी? विट: हमरा भय छल। संस्थानक: अहाँकें ककर भय छल? विट: चारुदत्तक गुणक। संस्थानक: गुण? हुनकर? अहाँ हुनकर घरमे जा सकैत छी आ खाय लेल एकटा वस्तु नै पाबब। विट: नै, नै। हुनकर कृपालु स्वभाव जे हमरा सभ सनक लेल छल, ओकरा कारण ओ अन्ततः नीचां आबि गेलाह; हुनकासँ कोनो मनुष्य अपमान की होइत अछि ई नै सीखि सकैत छल, जखन धरि हुनकर धन नष्ट नै भेल छल। ई पूर्ण पोखरि, जे अपन गरमीक दिनमे आन सभकें पानि दैत छल, ओ आब स्वयं सूखि गेल अछि। संस्थानक: (अधैर्यसँ) आखिर ओ ककर दासीपुत्र छथि? की ओ वीर श्वेतकेतु छथि, पाण्डुक सन्तान छथि? या राधाक पुत्र, ओही दसमुख राक्षस छथि? या इन्द्रदत्त छथि? या पुनः, की ओ वीर राम आ पवित्र कुन्तीक पुत्र छथि? या धर्मपुत्र छथि? वीर अश्वत्थामा छथि? या सम्भवतः स्वयं जटायु, ओही वृद्ध गिद्ध छथि? विट: मूर्ख! हम अहाँकें बताइत छी जे चारुदत्त के छथि। ओही पुरुष सभक लेल जीवनक कल्पवृक्ष छथि जेकर दुःख बढ़ि रहल अछि, जे अपन गुणक फलक कारण नीचां झुकल अछि; सज्जन सभक पिता छथि; गुणक कसौटी छथि; विद्वान सभक दर्पण छथि; आ ओही समुद्र छथि जतय चरित्रक समस्त लहरि आपसमे मिलैत अछि; एकटा धर्मात्मा पुरुष छथि, जेकरा अहङ्कार कहियो मलिन नै क’ सकलक; मानवीय गुण सभसँ भरल एकटा रत्न-पेटारी छथि; शिष्टाचारक सार छथि, प्रतिष्ठाक बहुमूल्य भण्डार छथि। ओ जीवनकें ओकर पूर्ण अर्थ दैत छथि, ओ एतेक नीक छथि; हम सभ आन केवल श्वास लैत छी, जिबैत नै छी। आउ हम सभ चली। संस्थानक: वसन्तसेनाक बिना? विट: वसन्तसेना अदृश्य भ’ गेली। संस्थानक: कतऽ? विट: जेना रोगी क शक्ति, या अन्ध क आँखिक ज्योति, जेना मूर्ख क विवेक, जेना आलसी क पराक्रम, जेना विचारहीन दुष्टक बुद्धि क प्रकाश, जेना प्रेम, जखन शत्रु हमर सुप्त क्रोधकें हवा दैत अछि, ओनाहि ओ अदृश्य भ’ गेली, जखन अहाँ हुनकर मार्गमे अयलहूँ। संस्थानक: हम वसन्तसेनाक बिना नै जा रहल छी। विट: आ की अहाँ कहियो ई नै सुनलहुँ अछि? एकटा घोड़ा कें रोकबाक लेल अहाँकें लगाम क आवश्यकता होइत अछि; एकटा हाथी कें रोकबाक लेल, एकटा शृङ्खला क; एकटा स्त्रीकें रोकबाक लेल, हृदयक उपयोग करू; आ जदि अहाँक पाँ कोनो हृदय नै अछि, तँ विदा होऊ। संस्थानक: जदि अहाँ जा रहल छी, तँ जाउ। हम नै जा रहल छी। विट: बहुत नीक। हम जाब। (ओ प्रस्थान करैत छथि) संस्थानक: स्वामी गेलाह, निश्चित रूपसँ। (मैत्रेय कें) नीक, अहाँ ओही मुड़ी वला पुरुष जेकर स्वरूप काकपद जकां अछि, बौना, बैठू, बैठू। मैत्रेय: हमरा सभकें पहनेहि बैठबाक लेल आमन्त्रित कयल गेल अछि। संस्थानक: ककरा द्वारा? मैत्रेय: भाग्य द्वारा। संस्थानक: ठाढ़ होऊ तखन, ठाढ़ होऊ! मैत्रेय: हम सभ होब। संस्थानक: कखन? मैत्रेय: जखन भाग्य पुनः कृपालु होयत। संस्थानक: कानू तखन, कानू! मैत्रेय: हम सभ कानैत छी। संस्थानक: अहाँकें के रुआयलक? मैत्रेय: दरिद्रता। संस्थानक: हँसू तखन, हँसू! मैत्रेय: हँसब हम सभ निश्चित। संस्थानक: कखन? मैत्रेय: जखन चारुदत्त पुनः प्रसन्न होयताह। संस्थानक: बौना, बेचार छोटकी चारुदत्तकें हमर ई सन्देश द’ देबक: "ई सुवर्णक आभूषण आ सुवर्णक रत्न वली कनियाँ, ई स्त्री रङ्गमञ्च-प्रबन्धक जे नव नाटकक पूर्वाभ्यास (रिहर्सल) देखि रहल अछि, ई वसन्तसेना—ओ अहाँसँ ओही समयसँ प्रेम करैत अछि जखनसँ ओ कामदेव क मन्दिर वला उपवनमे गेल छली। आ जखन हम ओकरा बलपूर्वक प्रसन्न करबाक यत्न कयलहुँ, तँ ओ अहाँक घरमे घुसि गेली। आब जदि अहाँ ओकरा स्वयं पठा द’ छी आ हमरा सुपुर्द क’ द’ छी, जदि अहाँ ओकरा तुरंत वापस क’ द’ छी, बिना कोनो अदालती मुकदमक, तँ हम सदा लेल अहाँक मित्र बनि जाब। मुदा जदि अहाँ ओकरा वापस नै क’ छी, तँ मृत्यु धरि युद्ध होयत।" मोन राखू: कोहँड़ा क कतरन (पम्पकिन-स्टॉक) पर गोइठा क लेप लगाउ; अपन तरकारी सूखल राखू; जाड़क संध्यामे अपन भात राँधू; आ निश्चित रूपसँ अहाँक मांस फ्राय (तलाल) हो। तखन ओकरा ठाढ़ रहय दिय’, आ ओ सभ दुःखद गन्ध आ सड़न नै उत्पन्न करताह। ओकरा कनी सुन्दरतासँ कहब, ओकरा कनी चतुराईसँ कहब। ओकरा एही प्रकार कहब जे हम अपनहि महल क ऊपर कपरौआ-खोतामे बैठि क’ ओकरा सुनि सकी। जदि अहाँ भिन्न प्रकारसँ कहब, तँ हम अहाँक मुड़ी कें दुआरि क कबाड़मे फसा क’ सेउ जकां कचरि देब। मैत्रेय: बहुत नीक। हम हुनका कहब। संस्थानक: (मनहि मन) हमरा बताउ, नौकर। की स्वामी वास्तवमे चलि गेलाह? नौकर: हँ, स्वामी। संस्थानक: तँ हम सभ एतयसँ एतेक तीव्र गतिसँ चलब जतेक क’ सकी। नौकर: तँ अपन तलवार लिय’, स्वामी। संस्थानक: अहाँ एकरा राखि सकैत छी। नौकर: ई एतय अछि, स्वामी। अपन तलवार लिय’, स्वामी। संस्थानक: (ओकरा गलत छोरसँ पकड़ैत) हमर तलवार, मूली क छिलका जकां लाल, एकरा कहियो सड़बाक समय नै भेटैत अछि; देखू ई अपन मियान भीतर कियो सुतल अछि! हम एकरा अपन कान्ह पर रखैत छी। जखन कुकुर आ कुक्कुरी सभ हमरा पर भुकैत छथि, हम घूमि क’, एकटा खदड़ायल सियार जकां, घर जाइत छी। (संस्थानक आ नौकर घूमि क’ प्रस्थान करैत छथि) मैत्रेय: आर्या रदनिका, अहाँ सज्जन चारुदत्तकें एही अत्याचारक विषयमे नै कहब। हमरा विश्वास अछि जे अहाँ केवल ओही दरिद्र मनुष्यक दुःखकें बेसी करब। रदनिका: उत्तम मैत्रेय, अहाँ रदनिकाकें जनैत छी। ओकर ओठ सीयल अछि। मैत्रेय: एहनहि हो। चारुदत्त: (वसन्तसेना कें) रदनिका, रोहसेनकें खुल्ला हवा नीक लगैत छैक, मुदा संध्याक एही जाड़मे ओकरा ठण्ढा लागि जायत। कृपया ओकरा घरक भीतर लाउ, आ ओकरा एही अंगवस्त्रसँ तोपि दिय’. (ओ हुनका अंगवस्त्र दैत छथि) वसन्तसेना: (अपन मनमे) देखू! ओ बुझैत छथि जे हम हुनकर दासी छी। (ओ अंगवस्त्र लैत छथि आ ओकर सुगन्धक अनुभव करैत छथि। अत्यंत अनुरागसँ अपन मनमे) ओह, सुन्दर! अंगवस्त्र चमेलीक सुगन्धसँ युक्त अछि। हुनकर युवावस्था संसारक सुख सभसँ पूर्णतः उदासीन नै अछि। (ओ एकरा अपन चारू कात लपेटि लैत छथि, बिना चारुदत्तकें देखेबाक) चारुदत्त: आउ, रदनिका, रोहसेनकें लय क’ घरक अन्तःकरणमे प्रवेश करू। वसन्तसेना: (अपन मनमे) हाय हम अभागिन, जेकर अहाँक हृदयमे बहुत कम भाग या स्थान अछि! चारुदत्त: आउ, रदनिका, की अहाँ उत्तर सेहो नै देब? हाय! जखन मनुष्य एक बेर ओही दुःखद दिन देखैत अछि, जखन सर्वशक्तिमान भाग्य ओकर धन बुहारि क’ लय जाइत अछि, तखन प्राचीन मित्रता पुनः स्थिर नै रहैत अछि, तखन ओकर पूर्व हृदयक मित्र सभ सेहो शीतल भ’ जाइत छथि। मैत्रेय: (रदनिकाक लग जा क’) स्वामी, एतय रदनिका अछि। चारुदत्त: एतय रदनिका अछि? तखन ई के छथि—ई अपरिचित कनियाँ, हमर वस्त्रसँ एही प्रकार सटल छथि, जे अपवित्र भ’ गेल अछि— वसन्तसेना: (अपन मनमे) कहू "पवित्र भ’ गेल अछि।" चारुदत्त: जा धरि ओ शरद ऋतुक मेघ सभसँ युक्त द्वितीया क चन्द्रमा जकां नै बुझाइत छथि? मुदा नै! हमरा आन क पत्नी पर दृष्टि नै देबाक चाही। मैत्रेय: ओह, अहाँकें ई भय करबाक आवश्यकता नै अछि जे अहाँ कोनो आन क पत्नीकें देखि रहल छी। ई वसन्तसेना छथि, जे अहाँसँ ओही समयसँ प्रेम करैत छथि जखनसँ ओ अहाँकें कामदेव क मन्दिर वला उपवनमे देखलन्हि छल। चारुदत्त: की! ई वसन्तसेना छथि? (मनहि मन) हुनकर लेल हमर प्रेम—हमर धन नष्ट भेला पर—हमर एही व्याकुल स्वरूपकें दो टुकड़ामे काटि देलन्हि अछि, एकटा कायरक क्रोध जकां, जे भीतरहि भीतर मुड़ि गेल हो। मैत्रेय: हमर मित्र, ओ राजा क साढ़ू कहैत अछि— चारुदत्त: की? मैत्रेय: "ई सुवर्णक आभूषण आ सुवर्णक रत्न वली कनियाँ, ई स्त्री रङ्गमञ्च-प्रबन्धक जे नव नाटकक पूर्वाभ्यास देखि रहल अछि, ई वसन्तसेना—ओ अहाँसँ ओही समयसँ प्रेम करैत अछि जखनसँ ओ कामदेव क मन्दिर वला उपवनमे गेल छली। आ जखन हम ओकरा बलपूर्वक प्रसन्न करबाक यत्न कयलहुँ, तँ ओ अहाँक घरमे घुसि गेली।" वसन्तसेना: (अपन मनमे) "बलपूर्वक प्रसन्न करबाक यत्न कयलहुँ"—वास्तवमे, हम एही शब्द सभसँ सम्मानित भेल छी। मैत्रेय: "आब जदि अहाँ ओकरा स्वयं पठा द’ छी आ हमरा सुपुर्द क’ द’ छी, जदि अहाँ ओकरा तुरंत वापस क’ द’ छी, बिना कोनो अदालती मुकदमक, तँ हम सदा लेल अहाँक मित्र बनब। अन्यथा, मृत्यु धरि युद्ध होयत।" चारुदत्त: (तिरस्कारसँ) ओ मूर्ख अछि। (अपन मनमे) ई सुकुमार कनियाँ ओही आदरक योग्य छथि जे हम कोनो देवीकें अर्पण करैत छी! किएक तँ आब यद्यपि हम ओकरा भीतर आबबाक लेल कहलहुँ, तइयो ओ हमर दरिद्रताक आदर करैत छथि, नहि तँ भीतर प्रवेश करैत छली; यद्यपि पुरुष हुनका लेल ज्ञात छथि, तइयो ओ जे किछु बाजैत छथि ओकरामे कोनो एहन शब्द नै अछि जे कोनो नम्र कानकें चोट पहुँचावय। (प्रकट) आर्या वसन्तसेना, हम अनजानेमे स्वयं एकटा अपराध क’ लेलहुँ अछि; किएक तँ हम एकटा दासी जकां हुनका प्रणाम कयलहुँ जेकरा हम नै चिन्हलहुँ। हम अहाँसँ क्षमा मङ्गबाक लेल अपन मुड़ी झुकाबैत छी। वसन्तसेना: ई हम छी जे एही अवांछित प्रवेशसँ अपराध कयलहुँ अछि। हम अहाँसँ क्षमा खोजबाक लेल अपन मुड़ी झुकाबैत छी। मैत्रेय: हँ, अपन सुन्दर झुकाबसँ अहाँ दोनों अपन मुड़ी आपसमे एहन टकरा देलहुँ अछि जे ओ धान क दुटा खेत जकां बुझाइत अछि। हम सेहो ऊँटक बच्चा क जानु जकां अपन मुड़ी झुकाबैत छी आ अहाँ दोनोंसँ ठाढ़ होबाक प्रार्थना करैत छी। (ओ ओनाहि करैत छथि, आ पुनः उठैत छथि) चारुदत्त: बहुत नीक, आब हम सभ परम्परागत शिष्टाचारसँ स्वयं कें कष्ट नै द’ छी। वसन्तसेना: (अपन मनमे) कतेक सुन्दर चतुर सङ्केत अछि! मुदा राति बितेबाक विचार उचित नै होयत, ई सोचैत जे हम एतय अयलहुँ अछि। नीक, हम कम्तीसँ कम्ती एतेक तँ कहब। (प्रकट) जदि हमरा अहाँक एतेक कृपा प्राप्त होबाक अछि, महाभाग, तँ हम एही आभूषण सभकें अहाँक घरमे छोड़बामे प्रसन्न होब। आभूषणहि क लेल ओही दुष्ट सभ हमर पीछा कयलन्हि छल। चारुदत्त: ई घर एही विश्वासक योग्य नै अछि। वसन्तसेना: अहाँक भूल अछि, महाभाग! पुरुष सभ पर विश्वास कयल जाइत अछि, घर सभ पर नै। चारुदत्त: मैत्रेय, की अहाँ ई आभूषण ग्रहण करब? वसन्तसेना: हम अहाँक बहुत आभारी छी। (ओ आभूषण हुनका द’ दैत छथि) मैत्रेय: (ओकरा ग्रहण करैत) भगवान अहाँक कल्याण करथि, आर्या। चारुदत्त: मूर्ख! ई केवल हमरा सभक पाँ न्यास रूपमे राखल गेल अछि। मैत्रेय: (मनहि मन) तँ चोर सभ एकरा लय जाथि, हमरा की चिन्ता। चारुदत्त: बहुत कम समयमे— मैत्रेय: जे ओ हमरा सभकें सौंपलन्हि अछि, ओ हमरहि भ’ गेल। चारुदत्त: हम एकरा वापस करब। वसन्तसेना: हम आभारी होब, महाभाग, जदि ई भद्र पुरुष हमरा साथ घर धरि चलिताह। चारुदत्त: मैत्रेय, कृपया हमर अतिथिक साथ जाउ। मैत्रेय: ओ एकटा हँसिनी जकां सुन्दरतासँ चलि रहल छथि, आ अहाँ हुनकर साथ चलबाक लेल चंचल मराल छी। मुदा हम केवल एकटा दरिद्र ब्राह्मण छी, आ हम कतहु जाब, तँ लोक हमरा पर ओनाहि टूटि पड़ताह जेना कुकुर सभ चौमुहा पर घसीटल गेल कोनो बलि-पशु पर टूटि पड़ैत अछि। चारुदत्त: बहुत नीक। हम स्वयं हुनकर साथ चलब। राजपथ पर हमर सुरक्षाक लेल मशाल जलाउ। मैत्रेय: वर्धमानक, मशाल जलाउ। वर्धमानक: (मैत्रेय कें फुसफुसाबैत) की! बिना तेलक मशाल जलबब? मैत्रेय: (चारुदत्त कें फुसफुसाबैत) हमर ई मशाल सभ ओही गणिका सभक समान अछि जे अपन दरिद्र प्रेमी सभसँ घृणा करैत अछि। ओ सभ जखन धरि अहाँ ओकरा नै खसबब, तखन धरि नै जरत। चारुदत्त: बस, मैत्रेय! हमरा कोनो मशालक आवश्यकता नै अछि। देखू, राजपथ पर हमर पाँ एकटा दीपक अछि। अपन समस्त नक्षत्र-सेवक सभसँ युक्त, आ कोनो विरहिणी कनियाँ क गाल जकां पाण्डु वर्ण वला, चन्द्रमाक ई कान्तिमय मण्डल हमर आँखिक समक्ष उठि रहल अछि, जेकर शुद्ध किरण सभ घनीभूत अन्धकार पर ओनाहि खसि रहल अछि जेना सुखल दलदलमे दूध क धार। (हुनकर आवाज हुनकर अनुरागकें प्रकट करैत अछि) आर्या वसन्तसेना, हम अहाँक घर पहुँचि गेल छी। कृपया प्रवेश करू। (वसन्तसेना अनुरागसँ हुनका देखैत छथि, आ पुनः प्रस्थान करैत छथि) मित्र, वसन्तसेना चली गेली। आउ, हम सभ घर चली। समस्त प्राणी राजपथसँ विदा भ’ गेल छथि आरक्षी (पुलिस) अपन गश्त लगा रहल छथि; कपट्सँ बचबाक लेल सजग रहना उचित आ न्यायपूर्ण अछि, किएक तँ रातिमे बहुत रास पाप आश्रय पाबैत अछि। आ अहाँ एही सुवर्ण-मञ्जूषा क रक्षा रातिमे करब, आ वर्धमानक दिनमे करताह। मैत्रेय: बहुत नीक। (दोनों प्रस्थान करैत छथि) द्वितीय अङ्क: द्यूतकर संवाहक (एकटा दासीक प्रवेश होइत अछि) दासी: हमरा हुनकर माय द्वारा हमर मालकिनक लेल एकटा सन्देश सौंपल गेल अछि। हमरा भीतर जा क’ अपन मालकिनकें खोजबाक चाही। (ओ घूमि क’ चारू कात देखैत अछि) ओतय हमर मालकिन छथि। ओ एकटा चित्र बना रहल छथि, आ अपन पूर्ण हृदय ओकरामे लगाने छथि। हमरा जा क’ हुनकासँ बाजबाक चाही। (तखन विरहिणी वसन्तसेना, बैठल छथि, आ मदनिका प्रकट होइत अछि) वसन्तसेना: नीक, कनियाँ, आ पुनः— मदनिका: मुदा मालकिन, अहाँ कोनो विषयमे बाजहि तँ नै रहल छलहुँ। अहाँक की अर्थ अछि? वसन्तसेना: किएक, हम की कहलहुँ? मदनिका: अहाँ कहलहूँ, "आ पुनः"— वसन्तसेना: (अपन भौंह सिकोड़ैत) ओह, हाँ। हम ओनाहि कयलहुँ। दासी: (लग जा क’) मालकिन, अहाँक माय सन्देश पठौने छथि जे अहाँ स्नान क’ क’ देवता सभक पूजा करू। वसन्तसेना: अहाँ हमर मायसँ कहि दिय’ जे हम आइ कोनो विधिपूर्वक स्नान नै करब। हमर स्थान पर एकटा ब्राह्मण पूजा करताह। दासी: हँ, मालकिन। (ओ प्रस्थान करैत अछि) मदनिका: हमर प्रिय मालकिन, ई प्रेम अछि, कोनो दुष्टता नै जे ई प्रश्न पूछि रहल अछि—मुदा एकर की अर्थ अछि? वसन्तसेना: हमरा बताउ, मदनिका। हम अहाँकें केहन बुझि रहल छी? मदनिका: हमर मालकिन एतेक अन्यमनस्क छथि जे हम जनैत छी हुनकर हृदय ककरो लेल उत्कण्ठासँ भरल अछि। वसन्तसेना: नीक अनुमान कयलहुँ। हमर मदनिका आन क हृदय जनबामे बहुत चतुर अछि। मदनिका: हम बहुत, बहुत प्रसन्न छी। हँ, कामदेव वास्तवमे शक्तिशाली छथि, आ हुनकर ई महान उत्सव सुखद होइत अछि जखन केओ युवा होइत अछि। मुदा हमरा बताउ, मालकिन, की ओ कोनो राजा छथि, या राजा क प्रिय पात्र, जकरा अहाँ पूजि रहल छी? वसन्तसेना: कनियाँ, हम प्रेम करबाक इच्छा राखैत छी, पूजा करबाक नै। मदनिका: की ओ कोनो ब्राह्मण छथि जे अहाँक वासनाकें जगा देलन्हि अछि, कोनो एहन युवक जे अपन विशेष विद्याक लेल प्रसिद्ध हो? वसन्तसेना: एकटा ब्राह्मणक तँ हमरा आदर करबाक चाही। मदनिका: या ओ कोनो युवा व्यापारी छथि, जे बहुत रास नगर सभक यात्रा क’ क’ अत्यधिक धनी भ’ गेल छथि? वसन्तसेना: एकटा व्यापारीकें, कनियाँ, आन देश सभमे जाबहि पड़तैक आ अहाँकें पाछाँ छोड़ि देबक, चाहे अहाँ ओकरासँ कतेको प्रेम किएक नै कसरि। आ ओही वियोग अहाँकें बहुत उदास क’ दैत अछि। मदनिका: तँ ओ कोनो राजा नै छथि, नहि कोनो प्रिय पात्र, नहि कोनो ब्राह्मण, नहि कोनो व्यापारी। तखन ओ के छथि जेकरासँ राजकुमारी प्रेम करैत छथि? वसन्तसेना: कनियाँ! कनियाँ! अहाँ हमर साथ ओही उपवनमे गेल छलहुँ जतय कामदेव क मन्दिर अछि? मदनिका: हँ, मालकिन। वसन्तसेना: आ तइयो अहाँ एहन पूछि रहल छी, जेना अहाँ कोनो पूर्णतः अपरिचित होब। मदनिका: आब हम जनैत छी। की ओ वैह पुरुष छथि जे अहाँकें धीरज देलन्हि छल जखन अहाँ रक्षाक लेल प्रार्थना कयलहुँ अछि? वसन्तसेना: नीक, हुनकर की नाम छल? मदनिका: किएक, ओ व्यापारी सभक टोलामे रहैत छथि। वसन्तसेना: मुदा हम अहाँसँ हुनकर नाम पूछलहुँ अछि। मदनिका: हुनकर नाम, मालकिन, अपन आपमे एकटा शुभ सङ्केत अछि। हुनकर नाम चारुदत्त अछि। वसन्तसेना: (आनन्दसँ उठैत) सुन्दर, मदनिका, सुन्दर। अहाँ एकरा बुझि लेलहुँ। मदनिका: (मनहि मन) ई तँ भ’ गेल। (प्रकट) मालकिन, लोक कहैत छथि ओ दरिद्र छथि। वसन्तसेना: वैह तँ एकमात्र कारण अछि जाहि लेल हम हुनकासँ प्रेम करैत छी। किएक तँ एकटा गणिका जे अपन हृदय कोनो दरिद्र मनुष्य पर लगाबैत अछि, ओ संसारक आँखिमे निर्दोष होइत अछि। मदनिका: मुदा मालकिन, की तितली सभ आमक गाछ पर जाइत अछि जखन ओकर फूल (मंजर) खसि गेल हो? वसन्तसेना: वैह तँ कारण अछि जाहि लेल हम ओही प्रकारक लड़कीकें तितली कहैत छी। मदनिका: नीक, मालकिन, जदि अहाँ हुनकासँ प्रेम करैत छी, तँ अहाँ जा क’ हुनकासँ तुरंत किएक नै भेटैत छी? वसन्तसेना: कनियाँ, जदि हम हुनकासँ तुरंत भेटब, तँ किएक तँ ओ कोनो प्रतिफल नै द’ सकैत छथि—नै, हमर ई अर्थ नै अछि, मुदा हुनका देखब कठीन होयत। मदनिका: की वैह कारण अछि जाहि लेल अहाँ अपन आभूषण हुनकर पाँ छोड़ि देलहुँ? वसन्तसेना: अहाँ एकरा नीक बुझलहुँ। नेपथ्यसँ एकटा आवाज: ओह, महाभाग, एकटा संवाहक हमर दस सुवर्ण-मुद्राक कर्जदार अछि, आ ओ हमरा सभक हाथसँ भागि गेल अछि। ओकरा पकड़ू, पकड़ू! (भागय वाला संवाहक कें) रुकू, रुकू! हम अहाँकें एतयसँ देखि रहल छी। (भयभीत संवाहकक हड़बड़ीमे प्रवेश होइत अछि) संवाहक: ओह, धत तेरिका एही द्यूतक (जुआ) काजकें! अपन बन्धनसँ मुक्त, पासाक एक—हम ओकरा कम्तीसँ कम्ती गदहा कहि सकी—ओ हमरा कसरि लात मारैत अछि! आ पासाक ओही चालि जेकरा "शूल" कहल जाइत अछि, ओ अपन नाम क अनुरूप सत्य सिद्ध होइत अछि; किएक तँ ई हमरा चुभैत अछि। जुआघरक मालिकक पूर्ण ध्यान स्कोर (अङ्क) पर छल; तँ दुआरिसँ अदृश्य होबाक लेल कोनो पैघ आविष्कारक आवश्यकता नै छल। मुदा हम एही असुरक्षित सड़क पर सदा लेल ठाढ़ नै रहि सकी। की कोनो एहन व्यक्ति नै अछि जे रक्षा करू? हम ओकर पएर पर खसि पड़ब। जखन धरि जुआघरक मालिक आ जुआड़ी हमरा कोनो आन कात खोजि रहल छथि, हम बस एही खाली मन्दिरमे उलटा पएर चलब आ देवी बनि क’ बैठि जाब। (ओ सभ प्रकारक अभिनय करैत छथि, अपना स्थान लैत छथि आ प्रतीक्षा करैत छथि) (माथुर आ जुआड़ीक प्रवेश होइत अछि) माथुर: ओह, महाभाग, एकटा संवाहक हमर दस सुवर्ण-मुद्राक कर्जदार अछि, आ ओ हमरा सभक हाथसँ भागि गेल अछि। ओकरा पकड़ू, पकड़ू! रुकू, रुकू! हम अहाँकें एतयसँ देखि रहल छी। जुआड़ी: अहाँ नरक धरि भागि सकैत छी, जदि ओ अहाँकें भीतर लय; इन्द्र देवता क साथ रहि सकैत छी; किएक तँ कोनो एहन देवता नै अछि जे अहाँक छाती बचेबाक सामर्थ्य राखय जखन धरि माथुर अपन धन चाहैत अछि। माथुर: ओह, अहाँ कतऽ भागि रहल छी, चंचल यात्री? अहाँ जे एकटा ईमानदार जुआड़ीकें छलैत छी? अहाँ जे भयसँ काँपि रहल छी आ सिहरि रहल छी, समस्त कम्पायमान; अहाँ जे समतल आ असमर्थ भूमि पर पर्याप्त लड़खड़ा नै सकैत छी; अहाँ जे अपन सामाजिक प्रतिष्ठा, कुल आ यशकें मलिन करैत छी! जुआड़ी: (पएरक निशानकें देखैत) ओ एतय जाइत अछि। आ एतय पएरक निशान हरा जाइत अछि। माथुर: (पएरक निशानकें देखैत छथि। विचार क’ क’) देखू! पएर उलट क’ राखल गेल अछि। आ मन्दिरमे कोनो मूर्ति नै अछि। ओही धूर्त संवाहक मन्दिर भीतर अपन पएर उलट क’ क’ गेल अछि। जुआड़ी: आउ हम सभ ओकर पाछाँ चली। माथुर: बहुत नीक। (ओ सभ मन्दिर भीतर जाइत छथि आ नीक जकां देखैत छथि, पुनः एक दोसर कें सङ्केत करैत छथि) जुआड़ी: की! एकटा काठ क मूर्ति? माथुर: निश्चित रूपसँ नै। ई पत्थर क अछि। (ओ ओकरा अपन पूर्ण शक्तिसँ हिलाबैत छथि, पुनः सङ्केत करैत छथि) हमरा सभकें की चिन्ता? आउ, हम सभ एकटा खेल खेली। (ओ पूर्ण शक्तिसँ जुआ खेलब आरम्भ करैत छथि) संवाहक: (अपन द्यूत-ज्वरकें रोकबाक पूर्ण शक्तिसँ यत्न करैत। मनहि मन) ओह, ओह! पासा क ई खड़खड़ाहट कतेक प्रिय वस्तु अछि जखन अहाँक पाँ एकटा ताँबा क सिक्का सेहो नै बचल हो; ई ककरो हृदय पर नगारा जकां चोट करैत अछि, जे अपन समस्त राज्यसँ हीन भ’ गेल हो। जुआड़ी सभ पैघ पहाड़सँ नीचां कूदि जाइत छथि—हम जनैत छी हम नै खेलब। तइयो पासा क ई खड़खड़ाहट एहन मधुर अछि जेना वैशाख (मे)मे कोकिल क कूक। जुआड़ी: हमर पासा, हमर पासा! माथुर: एतेक नै! ई हमर पासा अछि। संवाहक: (पाछाँसँ तीव्र गतिसँ लग आबि क’) की ई हमर पासा नै अछि? जुआड़ी: हमरा सभकें हमर मनुष्य भेट गेल। माथुर: (ओकरा जकड़ैत) रे कैदी, अहाँ पकड़ल गेल छी। हमर दस सुवर्ण-मुद्रा दिय’। संवाहक: हम अहाँकें आइहि दिन द’ देब। माथुर: हमरा एही मिनट दिय’! संवाहक: हम अहाँकें देब। केवल दया करू! माथुर: आउ, की अहाँ आब द’ रहल छी? संवाहक: हमर मुड़ी चक्कार खाय रहल अछि। (ओ भूमि पर खसि पड़ैत छथि। आन सभ ओकरा अपन पूर्ण शक्तिसँ मारैत छथि) माथुर: एतय (जुआड़ीक मण्डल खिंचैत) अहाँ द्यूतकरक मण्डल (द्यूतकर-मण्डली) द्वारा बद्ध छी। संवाहक: (उठैत छथि। निराशासँ) की! द्यूतकरक मण्डल द्वारा बद्ध? धत तेरिका! ई एकटा एहन सीमा अछि जेकरा हम जुआड़ी सभ पार नै क’ सकी। हम ओकरा चुकाबाक लेल धन कतयसँ पाबब? माथुर: तँ अहाँकें कोनो प्रतिभू देबाक चाही। संवाहक: हमर पाँ एकटा विचार अछि। (ओ जुआड़ीकें इशारा करैत छथि) हम अहाँकें आधा देब, जदि अहाँ हमरा दोसर आधा क्षमा क’ देब। जुआड़ी: बहुत नीक। संवाहक: (माथुर कें) हम अहाँकें आधा क लेल प्रतिभू देब। अहाँ हमरा दोसर आधा क्षमा क’ सकैत छी। माथुर: बहुत नीक। एकरामे की हानि अछि? संवाहक: (प्रकट) अहाँ हमरा आधा क्षमा कयलहुँ, महाभाग? माथुर: हँ। संवाहक: (जुआड़ी कें) आ अहाँ हमरा आधा क्षमा कयलहुँ? जुआड़ी: हँ। संवाहक: तँ हम बुझैत छी हम आब जा रहल छी। माथुर: हमर दस सुवर्ण-मुद्रा दिय’! अहाँ कतऽ जा रहल छी? संवाहक: एकरा देखू, सज्जन वृन्द, एकरा देखू! एतय हम केवल एकटा कें आधा क लेल प्रतिभू देलहुँ, आ दोसर हमरा आधा क्षमा क’ देलन्हि। आ ओकरा बादो ओ हमरा, बेचार असहाय हमरा तङ्ग क’ रहल अछि! माथुर: (ओकरा जकड़ैत) हमर नाम माथुर अछि, चतुर धूर्त, आ अहाँ एही बेर हमरा छल नै सकब। हमर धनक एक-एक अंश चुकाउ, रे कैदी, आ ओहो एही क्षण। संवाहक: हम कसरि चुका सकी? माथुर: अपन बाप कें बेचि क’ चुकाउ। संवाहक: हम बाप कतयसँ पाबब? माथुर: अपन माय कें बेचि क’ चुकाउ। संवाहक: हम माय कतयसँ पाबब। माथुर: अपना कें बेचि क’ चुकाउ। संवाहक: दया करू! हमरा राजपथ पर लय चली। माथुर: आगाँ बढ़ू। संवाहक: जदि ई आवश्यक अछि। (ओ घूमि क’ चलैत छथि) सज्जन वृन्द, की अहाँ हमरा दस सुवर्ण-मुद्रामे एही द्यूतकर-मालिकसँ कीनब? (ओ एकटा राहगीरकें देखैत छथि आ बजैत छथि) ओ की अछि? अहाँ जनबाक इच्छा राखैत छी जे हम की क’ सकी? हम अहाँक घरक नौकर बनब। की! ओ बिना कोनो उत्तर देलहि चलि गेलाह। नीक, एतय दोसर छथि। हम हुनकासँ बाजब। (ओ अपन प्रस्ताव पुनः दोहराबैत छथि) की! ई सेहो हमरा पर कोनो ध्यान नै देलन्हि। ओ गेलाह। धत तेरिका! जखनसँ चारुदत्त अपन भाग्य खो देलन्हि, तखनसँ हमर भाग्य सेहो कठीन भ’ गेल अछि। माथुर: की अहाँ चुकाबब? संवाहक: हम कसरि चुका सकी? (ओ खसि पड़ैत छथि। माथुर ओकरा घसीटैत अछि) उत्तम सज्जन सभ, हमर रक्षा करू, हमर रक्षा करू! (दर्दुरकक प्रवेश होइत अछि) दर्दुरक: हँ, जुआ एकटा एहन राज्य अछि जेकर कोनो सिंहासन नै होइत। अहाँ पराजयक कोनो चिन्ता नै करैत छी; पैघ धन अहाँ हारैत आ जीतैत छी; जखन राजा सन राजस्व भीतर आबैत अछि, तँ धनी मनुष्य सेहो, दास जकां, अहाँक समक्ष खसि पड़ैत छथि। आ पुनः: अहाँ जुआसँ अपन सिक्का कमाबैत छी, जुआसँ अपन मित्र आ पत्नी, जुआसँ अपन दान आ भोजन; अहाँक अन्तिम पाई जुआसँ चलि जाइत अछि। आ पुनः: हमर नगद तीन (तिरिया) द्वारा लय लेल गेल; दू (दुआ) पुनः हमर स्वास्थ्य लय गेल; एक पुनः हमरा सड़क पर ला देलक; चारि हमर पराजय पूर्ण क’ देलक। (ओ अपन समक्ष देखैत छथि) एतय माथुर आबि रहल छथि, हमर पूर्व द्यूतकर-मालिक। नीक, जेना हम बचि नै सकी, हम बुझैत छी हम अपन दुपट्टासँ मुड़ तोपि लेब। (ओ अपन दुपट्टासँ कतेको प्रकारक अभिनय करैत छथि, पुनः ओकरा देखैत छथि) ई वस्त्र सूत क मामलामे बहुत दरिद्र अछि; ई सुन्दर वस्त्र बहुत रास प्रकाश भीतर आबय दैत अछि; एही वस्त्रक रक्षा करबाक शक्ति पूर्णतः समाप्त भ’ गेल अछि; ई वस्त्र बहुत सुन्दर लगैत अछि जखन एकरा कस क’ समेटल जाइत अछि। तइयो आखिर, एकटा दरिद्र साधु एकरासँ बेसी की क’ सकैत छल? किएक तँ अहाँ देखू, एकटा पएर हम आकाशमे रखने छी, दोसर भूमि पर निश्चित रहबाक चाही। ऊँचाई किछ बेसी अछि, मुदा सूर्य एकरा सहैत अछि। हम किएक नै सहि सकी? माथुर: चुकाउ, चुकाउ! संवाहक: हम कसरि चुका सकी? (माथुर ओकरा घसीटैत अछि) दर्दुरक: नीक, नीक, ई हम की देखि रहल छी? (ओ एकटा दर्शककें सम्बोधित करैत छथि) अहाँ की कहलहुँ, महाभाग? "एही संवाहककें द्यूतकर-मालिक द्वारा सतायल जा रहल अछि, आ कोनो ओकरा नै बचौत"? हम स्वयं ओकरा बचाबब। (ओ आगाँ बढ़ैत छथि) पाछाँ हटू, पाछाँ हटू! (ओ एकटा दृष्टि फिङ्कैत छथि) नीक, जदि ई ओही धूर्त माथुर नै हो। आ एतय ई बेचार साधु सन संवाहक अछि; एकटा साधु निश्चित रूपसँ, जे सूर्य अस्त होबा धरि मुड़ झुका क’ स्थिर नै लटकैत अछि, जे अपन पीठ पर बालू नै रगड़ैत अछि जा धरि घाव नै निकसि जाय, जेकर पिण्डली पर कुकुर सभ अपन भ्रमण कालमे नै काटैत अछि। एही पैघ आ सुकुमार मनुष्यकें जुआसँ एतेक प्रेम किएक होबाक चाही? नीक, हमरा माथुरकें शान्त करबाक चाही। (ओ लग जाइत छथि) अहाँ कसरि छी, माथुर? (माथुर प्रणामक उत्तर दैत अछि) दर्दुरक: एकर की अर्थ अछि? माथुर: ओ हमर दस सुवर्ण-मुद्राक कर्जदार अछि। दर्दुरक: एकटा तुच्छ वस्तु! माथुर: (दर्दुरकक काँखि नीचाँसँ समेटल गेल दुपट्टा घसीटैत) देखू, सज्जन वृन्द, देखू! फटल दुपट्टा वला मनुष्य दस सुवर्ण-मुद्राकें एकटा तुच्छ वस्तु कहैत अछि। दर्दुरक: हमर नीक मूर्ख, की हम पासाक एक चालि पर दस सुवर्ण-मुद्रा क जोखिम नै उठबैत छी? मानू ककरो पाँ धन अछि—तँ की ई कोनो कारण अछि जे ओ एकरा अपन छाती भीतर राखय आ देखावय? मुदा अहाँ, अहाँ अपन जाति खो देब, अहाँ अपन आत्मा खो देब, ओही दस सुवर्ण-मुद्रा लेल जे ओ चोरायलक, एकटा एहन मनुष्यकें मारबाक लेल जे पूर्णतः स्वस्थ आ नीक अछि, जाहिमे पांचू इन्द्रिय जागृत छैक। माथुर: दस सुवर्ण-मुद्रा अहाँ लेल एकटा तुच्छ वस्तु भ’ सकैत अछि, महाभाग। हमर लेल ई एकटा वैभव अछि। दर्दुरक: नीक तखन, हमर बात सुनू। ओकरा दस आन द’ दिय’, आ ओकरा पुनः जुआ खेलबाक आज्ञा दिय’। माथुर: आ तखन की? दर्दुरक: जदि ओ जीतत, तँ ओ अहाँकें चुका द’। माथुर: आ जदि ओ नै जीतत? दर्दुरक: तँ ओ अहाँकें नै चुका द’। माथुर: ई कोनो परिहासक समय नै अछि। जदि अहाँ एहन कहैत छी, तँ अहाँ स्वयं ओकरा धन द’ दिय’। हमर नाम माथुर अछि। हम एकटा धूर्त छी आ हम कपट खेल खेलैत छी, आ हम ककरोसँ नै डराइत छी। अहाँ एकटा चरित्रहीन दुष्ट छी। दर्दुरक: अहाँ ककरा कहलहुँ चरित्रहीन? माथुर: अहाँ चरित्रहीन छी। दर्दुरक: अहाँक बाप चरित्रहीन अछि। (ओ संवाहककें भागबाक सङ्केत करैत छथि) माथुर: रे कुकुर! वैह तँ तरीका अछि जाहिसँ अहाँ जुआ खेलैत छी। दर्दुरक: ओ तरीका अछि जाहिसँ हम जुआ खेलैत छी? माथुर: आउ, संवाहक, हमर दस सुवर्ण-मुद्रा चुकाउ। संवाहक: हम अहाँकें आइहि दिन चुका देब। हम तुरंत चुका देब। (माथुर ओकरा घसीटैत अछि) दर्दुरक: मूर्ख! अहाँ ओकरा मारि सकैत छी जखन हम दूर होब, मुदा हमर आँखिक समक्ष नै। (माथुर संवाहककें जकड़ि लैत अछि आ ओकर नाक पर घूंसा मारैत अछि। संवाहकक नाकसँ खून बहैत अछि, ओ मूर्छित भ’ क’ सीधा भूमि पर खसि पड़ैत अछि। दर्दुरक लग जाइत छथि आ बीच-बचाव करैत छथि। माथुर दर्दुरककें मारैत अछि, आ दर्दुरक पलटि क’ मारैत छथि) माथुर: ओह, ओह, अहाँ पापी कुकुर! मुदा हम अहाँकें एकर फल देब। दर्दुरक: हमर नीक मूर्ख, हम सड़क पर शान्तिसँ चलि रहल छलहुँ, आ अहाँ हमरा मारलहुँ। जदि अहाँ काल हमरा अदालतमे मारब, तखन अहाँक आँखि खुलत। माथुर: हँ, हम अपन आँखि खोलब। दर्दुरक: अहाँ अपन आँखि कसरि खोलब? माथुर: (अपन आँखि पैघ क’ क’ खोलैत) एही तरीकासँ हम अपन आँखि खोलब। (दर्दुरक माथुरक आँखिमे धूर फिङ्कि दैत छथि, आ संवाहककें भागबाक सङ्केत करैत छथि। माथुरअपन आँखि बन्द क’ लैत अछि आ खसि पड़ैत अछि। संवाहक भागि जाइत अछि) दर्दुरक: (मनहि मन) हम प्रभावशाली द्यूतकर-मालिक माथुरकें शत्रु बना लेलहुँ अछि। हमर लेल एतय रहना नीक नै अछि। एकर अतिरिक्त, हमर नीक मित्र शर्विलक हमरा कहने छलाह जे आर्यक नामक एकटा युवा अहीर (ग्वाला) कें एकटा ज्योतिषी द्वारा हमर भावी राजा घोषित कयल गेल अछि। आब हमर स्थिति वला प्रत्येक मनुष्य ओकर पाछाँ दौड़ि रहल अछि। हम बुझैत छी हम स्वयं ओकरासँ मिलि जाब। (ओ प्रस्थान करैत छथि) संवाहक: (चलैत काल काँपैत अछि आ चारू कात देखैत अछि) ई एकटा एहन घर अछि जतय ककरो द्वारा कातक दुआरि खुल्ला छोड़ि देल गेल अछि। हम भीतर जाब। (ओ प्रवेश करैत अछि आ वसन्तसेनाकें देखैत अछि) आर्या, हम अहाँक शरणमे अपना कें फिङ्कैत छी। वसन्तसेना: जे हमर शरणमे अपना कें फिङ्कत ओ सुरक्षित रहत। दुआरि बन्द करू, कनियाँ। (दासी ओनाहि करैत अछि) वसन्तसेना: अहाँकें ककर भय अछि? संवाहक: एकटा उत्तमर्ण (कर्जदाता) क, आर्या। वसन्तसेना: अहाँ आब दुआरि खोलि सकैत छी, कनियाँ। संवाहक: (अपन मनमे) आह! ओकर कर्जदातासँ नै डरबाक कारण ओकर निर्दोषताक अनुपातमे अछि। कहबी सत्य अछि: जे मनुष्य अपन शक्ति जनैत अछि आ ओही शक्तिक अनुकूल भार उठाबैत अछि, नहि बेसी नहि कम, ओ लड़खड़ाबाक आ कठीन संकटसँ सुरक्षित रहैत अछि, चाहे ओ कोनो सुनसान मार्ग पर किएक नै भ्रमण करय। एकर अर्थ हम छी। माथुर: (अपन आँखि पोछैत। जुआड़ी कें) चुकाउ, चुकाउ! जुआड़ी: जखन हम सभ दर्दुरकक साथ झगड़ा क’ रहल छलहुँ, स्वामी, ओही मनुष्य भागि गेल। माथुर: हम अपन घूंसासँ ओही संवाहकक नाक फोड़ि देलहुँ छल। आउ! हम सभ खून क निशानसँ ओकर पता लगाबी। (ओ सभ ओनाहि करैत छथि) जुआड़ी: ओ वसन्तसेनाक घर भीतर गेल, स्वामी। माथुर: तँ ई सुवर्ण-मुद्रा क अन्त अछि। जुआड़ी: आउ हम सभ अदालत चली आ एकटा शिकायत दर्ज करू। माथुर: ओ धूर्त घर छोड़ि क’ भागि जायत। नै, हमरा ओकरा घेरि लेबाक चाही आ एही प्रकार ओकरा पकड़बाक चाही। (वसन्तसेना मदनिकाकें एकटा सङ्केत दैत छथि) मदनिका: अहाँ कतयसँ छी, महाभाग? या अहाँ के छी, महाभाग? या अहाँ ककर पुत्र छी, महाभाग? या अहाँक की कार्य अछि, महाभाग? या अहाँ ककरो डरसँ काँपि रहल छी, महाभाग? संवाहक: सुनू, आर्या। हमर जन्मस्थान पाटलिपुत्र अछि, आर्या। हम एकटा गृहस्थक पुत्र छी। हम संवाहकक कलाक अभ्यास करैत छी। वसन्तसेना: ई एकटा बहुत सुकुमार कला अछि, महाभाग, जकरा पर अहाँ विजय प्राप्त कयलहुँ अछि। संवाहक: आर्या, एकटा कलाक रूपमे हम एकरा पर विजय प्राप्त कयलहुँ छल। ई आब केवल एकटा व्यापार बनि गेल अछि। मदनिका: अहाँक उत्तर बहुत उदास अछि, महाभाग। कृपया आगाँ कहू। संवाहक: हँ, आर्या। जखन हम घर पर छलहुँ, हम यात्री सभसँ कथा सुनैत छलहुँ, आ हमरा नव देश सभ देखबाक इच्छा छल, आ एही प्रकार हम एतय अयलहुँ। आ जखन हम एतय उज्जयिनी आबि गेलहुँ, हम एकटा श्रेष्ठ सज्जन क नौकर बनि गेलहुँ। एकटा एहन सुन्दर, शिष्ट सज्जन! जखन ओ धन दान करैत छलाह, ओ अहङ्कार नै करैत छलाह; जखन ओकरा चोट पहुँचाएल जाइत छल, ओ एकरा बिसरि जाइत छलाह। संक्षेपमे कथा कहब: ओ एतेक शिष्ट छलाह जे ओ अपन शरीरकें आन क सम्पत्ति बुझैत छलाह, आ ओही सभ पर दया करैत छलाह जे हुनकर रक्षा चाहैत छलाह। मदनिका: ओ के छथि जे उज्जयिनीकें ओही गुण सभसँ सुशोभित करैत छथि जेकरा ओ हमर मालकिनक इच्छाक वस्तुसँ चोरायने छथि? वसन्तसेना: सुन्दर, कनियाँ, सुन्दर! हमर मनमे सेहो वैह विचार छल। मदनिका: मुदा आगाँ कहबाक लेल, महाभाग— संवाहक: आर्या, ओ एतेक कृपालु आ एतेक उदार छलाह जे आब— वसन्तसेना: हुनकर वैभव नष्ट भ’ गेल अछि? संवाहक: हम एहन नै कहलहुँ। अहाँ एकरा कसरि बुझलहुँ, आर्या? वसन्तसेना: एकरामे बुझबाक की छल? गुण आ धन विरले एक साथ रहैत अछि। ओही पोखरि सभमे जाहिसँ मनुष्य पानि नै पीबि सकैत, ओकरामे एतेक बेसी पानि होइत अछि। मदनिका: मुदा महाभाग, हुनकर की नाम अछि? संवाहक: आर्या, समस्त संसारक एही चन्द्रमाक नाम के नै जनैत अछि? ओ व्यापारी सभक टोलामे रहैत छथि। ओ जेकर नामहि समस्त आदरक योग्य अछि, हुनकर नाम चारुदत्त अछि। वसन्तसेना: (अपन आसनसँ आनन्दसँ उठैत) महाभाग, ई घर अहाँक अपनहि अछि। ओकरा एकटा आसन दिय’, कनियाँ, आ ई पंखा लय लिय’। महाभाग थिक गेल छथि। (मदनिका ओनाहि करैत अछि जकां ओकरा आज्ञा देल गेल अछि) संवाहक: (मनहि मन) की! चारुदत्तक नाम लेलासँ एतेक आदर? भगवान अहाँक कल्याण करथि, चारुदत्त! अहाँ संसारक एकमात्र मनुष्य छी जे वास्तवमे जिबैत छथि। आन सभ केवल श्वास लैत छथि। (ओ वसन्तसेनाक पएर पर खसि पड़ैत छथि) बस, आर्या, बस। कृपया बैठू, आर्या। वसन्तसेना: (बैठैत) ओ कतऽ अछि जे अहाँक एतेक पैघ उत्तमर्ण अछि, महाभाग? संवाहक: सज्जन मनुष्यक वैभव कृपालु कार्य सभमे होइत अछि; आन समस्त वैभव व्यर्थ अछि आ तीव्र गतिसँ चलि जाइत अछि। जे मनुष्य अपन पड़ोसीक आवश्यकताक आदर नै करैत अछि, की ओ मनुष्य जनैत अछि आदरक की अर्थ अछि? वसन्तसेना: मुदा आगाँ कहबाक लेल— संवाहक: तँ हम हुनकर सेवामे एकटा नौकर बनि गेलहुँ। आ जखन हुनकर वैभव हुनकर गुण धरि सीमन्त भ’ गेल, हम जुआसँ अपन जीवन बितेबाक आरम्भ कयलहुँ। मुदा भाग्य क्रूर छल, आ हम दस सुवर्ण-मुद्रा हारि गेलहुँ। माथुर: हम नष्ट भ’ गेलहुँ! हम चोरा लेल गेलहुँ! संवाहक: ओतय जुआघरक मालिक आ जुआड़ी छथि, हमरा खोजि रहल छथि। अहाँ हमर कथा सुनलहुँ, आर्या। अवशिष्ट अहाँक विषय अछि। वसन्तसेना: मदनिका, पक्षी सभ चारू कात उड़ि जाइत अछि जखन ओही गाछकें हिलाएल जाइत अछि जाहिमे हुनकर खोता होइत अछि। जाउ, कनियाँ, आ जुआघरक मालिक आ जुआड़ीकें ई कङ्कण (ब्रेसलेट) द’ दिय’। आ हुनका कहू जे ई महाभाग एकरा पठौने छथि। (ओ अपन बांहिसँ एकटा कङ्कण खोलि दैत छथि, आ मदनिकाकें दैत छथि) मदनिका: (कङ्कण ग्रहण करैत) हँ, मालकिन। (ओ बाहर जाइत अछि) माथुर: हम नष्ट भ’ गेलहुँ! हम चोरा लेल गेलहुँ! मदनिका: जेना ई दोनों आकाश कात देखि रहल छथि, आ निश्वास छोड़ि रहल छथि, आ बाजि रहल छथि, आ दुआरि पर अपन आँखि गड़ाउने छथि, हम ई निष्कर्ष निकालैत छी जे ई दोनों निश्चित रूपसँ जुआघरक मालिक आ जुआड़ी छथि। (लग जा क’) अहाँकें प्रणाम, महाभाग। माथुर: अहाँक कल्याण हो। मदनिका: महाभाग, अहाँ दोनोंमे सँ जुआघरक मालिक के छथि? माथुर: हे सुकुमारी, सुन्दर मुदा सङ्कोचसँ किछ कम, प्रेमक अनुरागपूर्ण खेलमे घायल लाल ओठ वली, ककरा पर अहाँक ई चंचल, कोकटिश (कटाक्षपूर्ण) आँखि टिकल अछि? ककरा लेल ई तोतली बोली अछि जे हृदय चोरा लैत अछि? हमर पाँ कोनो धन नै अछि। अहाँकें कतहु आन देखबाक चाही। मदनिका: अहाँ निश्चित रूपसँ कोनो जुआड़ी नै छी, जदि अहाँ एही प्रकार बाजयब। की कोनो एहन व्यक्ति अछि जे अहाँक धनक कर्जदार अछि? माथुर: अछि। ओ दस सुवर्ण-मुद्राक कर्जदार अछि। ओकर की? मदनिका: ओकर पक्षसँ हमर मालकिन अहाँकें ई कङ्कण पठौने छथि। नै, नै! ओ स्वयं एकरा पठौने छथि। माथुर: (आनन्दसँ ओकरा जकड़ैत) सुन्दर, सुन्दर, अहाँ ओही युवा सज्जनकें कहि सकैत छी जे हुनकर हिसाब बराबर भ’ गेल। ओकरा आबय दिय’ आ जुआमे पुनः आनन्द खोजय दिय’। (माथुर आ जुआड़ी प्रस्थान करैत छथि) मदनिका: (वसन्तसेना पाँ वापस आबि क’) मालकिन, जुआघरक मालिक आ जुआड़ी बहुत प्रसन्न भ’ क’ चलि गेलाह। वसन्तसेना: जाउ, महाभाग, आ अपन बन्धु-बान्धव सभकें धीरज दिय’। संवाहक: आह आर्या, जदि ई सम्भव हो, तँ ई हाथ अहाँक सेवामे अपन कलाक अभ्यास करबामे प्रसन्न होयत। वसन्तसेना: मुदा महाभाग, ओ जेकर लेल अहाँ एही कला पर विजय प्राप्त कयलहुँ, जे पहने अहाँक सेवा प्राप्त कयलन्हि, हुनका अखन धरि अहाँक सेवा प्राप्त होबाक चाही। संवाहक: (मनहि मन) हमर सेवाकें अस्वीकार करबाक एकटा बहुत सुन्दर तरीका। हम ओकर ई कृपा करू चुका सकी? (प्रकट) आर्या, एकटा जुआड़ीक रूपमे एही प्रकार अपमानित भ’ क’, हम आब एकटा बौद्ध भिक्षु बनब। आ एही प्रकार, आर्या, एही शब्द सभकें अपन स्मृतिमे सुरक्षित राखू: "ओ एकटा संवाहक छल, एकटा जुआड़ी छल, एकटा बौद्ध भिक्षु छल।" वसन्तसेना: महाभाग, अहाँकें एतेक हड़बड़ीमे निर्णय नै लेबाक चाही। संवाहक: आर्या, हमर मन निश्चित भ’ गेल अछि। (ओ घूमि क’ चलैत छथि) हम जुआ खेललहुँ, आ जुआमे हम खसि पड़लहुँ, जा धरि प्रत्येक मनुष्य हमरा त्राससँ देखलक। आब हम अपन निष्कपट मुख सभकें देखबब, आ राजा क राजपथ पर खुल्ला चलब। (नेपथ्यसँ कोलाहलक आवाज आबैत अछि) संवाहक: (सुनैत) ई की अछि? ई की अछि? (नेपथ्यसँ ककरो सम्बोधित करैत) अहाँ की कहलहुँ? "स्तम्भक -तोड़य वाला, वसन्तसेनाक दुष्ट हाथी मुक्त भ’ गेल अछि!" होर्रे! हमरा जा क’ आर्याक परम श्रेष्ठ हाथीकें देखबाक चाही। नै, नै! हमरा एही सभ वस्तु सभसँ की प्रयोजन? हमरा अपन सङ्कल्प पर स्थिर रहबाक चाही। (ओ प्रस्थान करैत छथि) (तखन अत्यधिक प्रसन्न कर्णपूरकक हड़बड़ीमे प्रवेश होइत अछि, ओ एकटा भव्य दुपट्टा पहिरने अछि) कर्णपूरक: ओ कतऽ छथि? हमर मालकिन कतऽ छथि? मदनिका: अशिष्ट! ओ की अछि जे अहाँकें एतेक उत्तेजित क’ रहल अछि? अहाँ अपन मालकिनकें अपन आँखिक समक्ष देखि नै रहल छी। कर्णपूरक: (वसन्तसेनाकें देखैत) मालकिन, अहाँकें हमर प्रणाम। वसन्तसेना: कर्णपूरक, अहाँक मुख चमकि रहल अछि। की अछि? कर्णपूरक: (गर्वसँ) ओह, मालकिन! अहाँ बिसरि गेलहुँ! अहाँ आइ कर्णपूरकक पराक्रम नै देखलहुँ! वसन्तसेना: की, कर्णपूरक, की? कर्णपूरक: सुनू। स्तम्भक-तोड़य वाला, हमर मालकिनक दुष्ट हाथी, ओही खूँटाकें तोड़ि देलक जाहिमे ओ बान्हल छल, अपन महावतकें मारि देलक, आ सड़क पर दौड़ि गेल, एकटा भयानक कोलाहल मचाबैत। अहाँकें लोक सभक चीख सुनबाक चाही छल, जे कहि रहल छलाह: अपन बच्चा सभक रक्षा करू, जतेक तीव्र क’ सकी! आ कोनो छत या गाछ पर चढ़ि जाउ! दुष्ट हाथी मनुष्यक खून चाहैत अछि। बचू! भागि जाउ! की अहाँ देखि नै सकैत छी? आ: ओ सभ अपन नूपुर कसरि खो रहल छथि! करधनी सभ, रत्न आ आन वस्तु सभसँ युक्त, अपन बन्धनसँ टूटि रहल अछि! जेना ओ सभ लड़खड़ा रहल छथि, ठेस खा रहल छथि आ भूल क’ रहल छथि, देखू कङ्कण सभ आपसमे कसरि टूटि रहल अछि, प्रत्येक एकटा उलझल, मोतीक आश्चर्य अछि! आ हाथीक ओही दुष्ट अपन सूँढ़, पएर आ दाँतसँ उज्जयिनी नगरीमे एही प्रकार डुबकी लगाबैत अछि, जेना ई पूर्ण रूपसँ खिलल कमल क एकटा पोखरि हो। अन्ततः ओ एकटा बौद्ध भिक्षु पाँ आबि जाइत अछि। आ जखन ओही मनुष्यक लाठी, ओकर कमण्डलु आ ओकर भिक्षा-पात्र कतहु कतहु उड़ि जाइत अछि, ओ ओकरा पर पानि छिड़कैत अछि आ ओकरा अपन दाँत सभक बीच जकड़ि लैत अछि। लोक ओकरा देखैत छथि आ पुनः चीखब आरम्भ करैत छथि, कहैत "ओह, ओ, भिक्षु मारल गेल!" वसन्तसेना: (चिन्तासँ) ओह, कतेक असावधानी, कतेक असावधानी! कर्णपूरक: भयभीत नै होऊ। बस सुनू, मालकिन। तखन, टूटल जंजीरक एक पैघ टुकड़ा अपन साथ लटकौने, ओ ओकरा उठा लेलक, भिक्षुकें अपन दाँत सभक बीच उठा लेलक, आ ओही समय कर्णपूरक ओकरा देखलक, हम ओकरा देखलहुँ, नै, नै! ओही दास जे हमर मालकिनक पुआ (चावल क केक) खाय क’ मोटा गेल अछि, ओकरा देखलक, अपन वाम पएरसँ एकटा जुआड़ीक अङ्क पर लड़खड़ा गेल, एकटा दुकानसँ लोहक एकटा छड़ उठा लेलक, आ ओही पागल हाथीकें चुनौती देलक— वसन्तसेना: आगाँ बढ़ू! आगाँ बढ़ू! कर्णपूरक: हम ओकरा मारलहुँ—क्रोधक एक आवेशमे सेहो—ओ वास्तवमे कोनो पैघ पहाड़ क चोटी जकां बुझाइत छल। आ ओही दाँत सभक बीचसँ हम ओही पवित्र सुकुमार संन्यासीकें खिंचि लेलहुँ। वसन्तसेना: उत्कृष्ट, उत्कृष्ट! मुदा आगाँ बढ़ू! कर्णपूरक: तखन, मालकिन, समस्त उज्जयिनी एक कात उलटि गेल, जेना कोनो नाव असमर्थ रूपसँ लदा गेल हो, आ अहाँ "कर्णपूरकक जय, कर्णपूरकक जय हो!" एकर अतिरिक्त किछु नै सुनि सकैत छलहुँ। तखन, मालकिन, एकटा मनुष्य ओही स्थान सभकें छुबलक जतय ओकरा आभूषण होबाक चाही छल, आ ई देखि क’ जे ओकर पाँ किछु नै अछि, एकटा लम्बा निश्वास छोड़लक, आ ई दुपट्टा हमरा पर फिङ्क देलक। वसन्तसेना: पता लगाउ, कर्णपूरक, की ओ दुपट्टा चमेलीक सुगन्धसँ युक्त अछि की नै। कर्णपूरक: मालकिन, हाथीक सुगन्ध एतेक उग्र अछि जे हम निश्चित रूपसँ नै कहि सकी। वसन्तसेना: तखन नाम देखू। कर्णपूरक: एतय नाम अछि। अहाँ एकरा पढ़ि सकैत छी, मालकिन। (ओ दुपट्टा हुनका द’ दैत छथि) वसन्तसेना: (पढ़ैत अछि) चारुदत्त। (ओ दुपट्टाकें उत्सुकतासँ जकड़ि लैत छथि आ अपना चारू कात लपेटि लैत छथि) मदनिका: दुपट्टा हुनका पर बहुत सुशोभित भ’ रहल अछि, कर्णपूरक। कर्णपूरक: ओह, हँ, दुपट्टा पर्याप्त सुशोभित अछि। वसन्तसेना: ई अहाँक पुरस्कार अछि, कर्णपूरक। (ओ ओकरा एकटा रत्न दैत छथि) कर्णपूरक: (ओकरा लैत आ नीचां झुकैत) आब दुपट्टा अत्यंत अद्भुत रूपसँ सुशोभित भ’ रहल अछि। वसन्तसेना: कर्णपूरक, चारुदत्त आब कतऽ छथि? कर्णपूरक: ओ एही सड़क कात घूमि क’ घर जाब आरम्भ कयलन्हि अछि। वसन्तसेना: आउ, कनियाँ! हम सभ ऊपर क अटारी (बालकनी) पर चली आ चारुदत्तकें देखी। (सभ प्रस्थान करैत छथि) तृतीय अङ्क: सन्धि-च्छेद (चारुदत्तक नौकर वर्धमानकक प्रवेश होइत अछि) वर्धमानक: एकटा मालिक, कृपालु आ दयालु, ओकरा ओकर सेवक सभ प्रेम करैत छथि, चाहे ओ कतेको दरिद्र किएक नै हो। धनक अहङ्कारसँ युक्त, जे कूरताक इच्छा राखैत अछि, ओ अपन सेवाक मूल्य कूरताक सिक्कासँ चुकाबैत अछि। आ पुनः: एकटा साढ़ जे अनाजक उत्सव लेल लालायित हो, अहाँ ओकरा कहियो रोकि नै सकैत छी; एकटा पत्नी जे चाहैत अछि ओकर स्वामी कें सींग भेटैक, अहाँ ओकरा कहियो रोकि नै सकैत छी; एकटा मनुष्य जे राति आ भोर जुआ खेलबामे आनन्द लैत अछि, अहाँ ओकरा कहियो रोकि नै सकैत छी; आ ओही दोष जे मनुष्य क साथ जन्म लैत अछि, अहाँ ओकरा कहियो रोकि नै सकैत छी। बहुत काल भ’ गेल जखनसँ चारुदत्त सङ्गीत-सभामे गेल छथि। आधी रातिसँ बेसी भ’ गेल अछि, आ अखन धरि ओ नै अयल छथि। हम बुझैत छी हम बाहरी कक्षमे जा क’ एकटा निन्न लय लेब। (ओ ओनाहि करैत छथि) (चारुदत्त आ मैत्रेयक प्रवेश होइत अछि) चारुदत्त: रेभिल कतेक सुन्दर गायलनि अछि! वीणा वास्तवमे एकटा मोती अछि, समुद्रक कोनो मोती नै। व्याकुल प्रेमीक हृदयकें सुकुमारतासँ मित्र बनबैत, सान्त्वना दैत जखन असल प्रेमी सभ आपसमे नै मिलि सकैत छथि, विरहिणी आत्मा सभकें परम प्रिय सुख पठबैत, ई मधुर प्रेमकें ओकर बेसी मधुरता प्रदान करैत अछि। मैत्रेय: नीक तखन, आउ हम सभ घर भीतर चली। चारुदत्त: मुदा स्वामी रेभिल कतेक अद्भुत गायलनि अछि आइ संध्याकें! मैत्रेय: केवल दुटा वस्तु अछि जे हमरा सदा हँसाबैत अछि। एक अछि एकटा स्त्री जे संस्कृत बाजैत अछि, आ दोसर एकटा पुरुष जे सुकुमार आ धीमा गाबबाक यत्न करैत अछि। आब जखन एकटा स्त्री संस्कृत बाजैत अछि, ओ ओही पाढ़ी क समान होइत अछि जेकर नाकमे एकटा नव रस्सी फसाएल गेल हो; अहाँ केवल "सू, सू, सू" सुनैत छी। आ जखन एकटा पुरुष सुकुमार आ धीमा गाबबाक यत्न करैत अछि, ओ हमरा ओही वृद्ध पुरोहितक स्मरण कराबैत अछि जे मन्त्र बुदबुदाबैत अछि जखन ओकर माला क फूल सूखि जाइत अछि। नै, हमरा ई नीक नै लगैत अछि! चारुदत्त: हमर मित्र, स्वामी रेभिल आइ संध्याकें अत्यंत अद्भुत गायलनि अछि। आ अखन धरि अहाँ सन्तुष्ट नै छी। प्रेमक स्वर, शान्ति, मधुरता, हम ओकर पता लगा सकी, ओ स्वर जे रोमाञ्चित करैत अछि, वासनाक स्वर सेहो, स्त्रीक सुन्दरता आ शालीनताक स्वर—आह, हमर दीन शब्द किछु नै जोड़ैत अछि, किछु नव नै! मुदा जेना ओ स्वर मधुर प्रवाहमे गुञ्जल, हम सोचलहुँ ई हमर छुपल प्रेम छल जे गाबी रहल छल। सङ्गीतक मधुरता, तारक आघात जे आधा-चेतन भावसँ सटल रहैत अछि, बेसी स्पष्ट रूपसँ गुञ्जत जखन वासना उठैत अछि, मुदा सदा बेसी मधुर जखन सङ्गीत समाप्त होइत अछि। शब्द जे तीव्र वासना पुनः कहबाक इच्छा राखत, तइयो ओकर दोसर उच्चारण रोकैत अछि—व्यर्थ; किएक तँ एकरा जकां मधुर सङ्गीत जीवित रहैत अछि, जा धरि हम अखन धरि मधुर सङ्गीत सुनबाक जकां चलैत छी। मैत्रेय: मुदा देखू, हमर मित्र! कुकुर सभ सेहो ओही दुकान सभमे गम्भीर सुतल अछि जे बजार कात देखैत अछि। आउ हम सभ घर चली। (ओ अपन समक्ष देखैत छथि) देखू, देखू! पवित्र चन्द्रमा अन्धकार कें स्थान द’ रहल बुझाइत छथि, जेना ओ आकाशमे अपन महलसँ नीचां खसि रहल छथि। चारुदत्त: सत्य। चन्द्रमा अन्धकार कें स्थान द’ रहल छथि जेना ओ पश्चिमी पर्वत पाछाँ डुबकी लगाबैत छथि; आ हुनकर ऊपर उठल सींग केवल प्रकट अछि, जेना दू तीव्र-नोक वला दाँत स्पष्ट रूपसँ ऊपर उठल हो जतय एकटा हाथी ठण्ढा पानिमे स्नान करैत अछि, जे वनक पोखरि ऊपर आन किछु नै देखबैत अछि। मैत्रेय: नीक, एतय हमर घर अछि। वर्धमानक, वर्धमानक, दुआरि खोलू! वर्धमानक: हम मैत्रेयक आवाज सुनैत छी। चारुदत्त वापस आबि गेलाह। हमरा हुनका लेल दुआरि खोलबाक चाही। (ओ ओनाहि करैत अछि) स्वामी, हम अहाँकें प्रणाम करैत छी। मैत्रेय, हम अहाँकें सेहो प्रणाम करैत छी। बिछाउ तैयार अछि। कृपया बैठू। (चारुदत्त आ मैत्रेय प्रवेश करैत छथि आ बैठि जाइत छथि) मैत्रेय: वर्धमानक, रदनिकाकें बजाउ हमर सभक पएर धोबय लेल। चारुदत्त: (दयापूर्ण भावसँ) ओ सुतल अछि। ओकरा नै जगाउ। वर्धमानक: हम पानि लाबब, मैत्रेय, आ अहाँ चारुदत्तक पएर धो सकैत छी। मैत्रेय: (क्रोधसँ) देखू, मनुष्य। ओ ओही दासीपुत्र जकां कार्य क’ रहल अछि जे ओ अछि, किएक तँ ओ पानि लाबि रहल अछि। मुदा ओ हमरासँ अहाँक पएर धोबा क’ कहैत अछि, आ हम एकटा ब्राह्मण छी। चारुदत्त: उत्तम मैत्रेय, अहाँ पानि लाउ, आ वर्धमानक हमर पएर धोत। वर्धमानक: हँ, मैत्रेय। अहाँ पानि लाउ। (मैत्रेय ओनाहि करैत अछि। वर्धमानक चारुदत्तक पएर धोबैत अछि, पुनः अलग हटि जाइत अछि) चारुदत्त: ब्राह्मणक पएर लेल पानि लाएल जाय। मैत्रेय: पानि हमर पएर लेल की लाभ करत? हमरा पुनः माटिमे लोटबाक पड़त, एकटा मारल गेल गदहा क समान। वर्धमानक: मैत्रेय, अहाँ एकटा ब्राह्मण छी। मैत्रेय: हँ, आन समस्त साँप सभक बीच केंचुआ जकां, ओनाहि हम आन समस्त ब्राह्मण सभक बीच एकटा ब्राह्मण छी। वर्धमानक: मैत्रेय, हम अहाँक पएर धो देब आखिर। (ओ ओनाहि करैत अछि) मैत्रेय, ई सुवर्ण-मञ्जूषा हमरा दिनमे राखबाक छल, अहाँकें रातिमे। एकरा लय लिय’। (ओ एकरा मैत्रेयकें दैत अछि, पुनः प्रस्थान करैत अछि) मैत्रेय: (मञ्जूषा ग्रहण करैत) वस्तु अखन धरि एतहि अछि। की उज्जयिनीमे एकटा सेहो चोर नै अछि जे एही पापीकें चोरा लय जे हमर निन्न चोरा लैत अछि? सुनू। हम एकरा भीतरी अङ्गनमे लय जा रहल छी। चारुदत्त: एहन शिथिल ध्यान हम सभक लेल उचित नै अछि। जदि हम कोनो गणिका द्वारा विश्वस्त छी, तँ, ब्राह्मण, अपना कें एकटा ईमानदार मनुष्य सिद्ध करू, आ एकर सुरक्षा नीक जकां करू, जा धरि एकरा वापस नै कयल जाय। (ओ मुड़ झुकाबैत छथि, श्लोक दोहराबैत "सङ्गीतक मधुरता, तारक आघात") मैत्रेय: की अहाँ सुतबाक लेल जा रहल छी? चारुदत्त: हँ, एहन बुझाइत अछि। किएक तँ विजयी निन्न, हमर आँखि पर खसि रहल अछि, पहने ललाट पर बिना कोनो प्रतिरोधक चोट करैत अछि; अदृश्य, चतुर, वृद्धावस्था जकां, ओ अपन शत्रु कें दुर्बल क’ क’ शक्ति बटोरबाक यत्न करैत अछि। मैत्रेय: तँ आउ हम सभ सुति रही। (ओ ओनाहि करैत छथि) (शर्विलकक प्रवेश होइत अछि) शर्विलक: हम अपन शरीरक भ्रमण लेल एकटा प्रवेश मार्ग बना लेलहुँ, कला आ शस्त्रक बलसँ, कार्य क एकटा मार्ग! हम भूमि पर रेंगि क’ अपन पाँखि छिलि लेलहुँ, एकटा साँप क समान जे अपन केंचुल छोड़ि दैत अछि जे आब नीक नै अछि; आ आब हम ओतय जाइत छी जतय हमर व्यवसाय लय जाइत अछि। (ओ आकाश कात देखैत छथि। आनन्दसँ) देखू! पवित्र चन्द्रमा अस्त भ’ रहल छथि। किएक तँ हम नीक जकां जनैत छी, हमर व्यवसाय आरक्षी सभक आँखिसँ तोपल रहबाक इच्छा राखत, पराक्रमी, हम कोनो आन क घर बलपूर्वक तोपब। मुदा देखू, तारा सभ गम्भीर अन्धकारमे तोपल अछि, आ राति हमर रक्षा एकटा सजग माय जकां करैत अछि। हम बगीचा क देबालमे एकटा सन्धि क’ लेलहुँ आ प्रवेश कयलहुँ। आ आब हमरा भीतरी अङ्गन भीतर सेहो बलपूर्वक अपन मार्ग बनाबाक चाही। हँ, लोक एकरा साधारण कहि सकैत छथि, जदि ओ सभ चाहथि, ओ व्यवसाय जे फलैत-फूलैत अछि जखन सुतल लोक सुतैत छथि; हँ, धूर्तता, पराक्रम नै, एकरा अखन धरि कहू, बिछाउ पर विश्वस्त लोक कें छलब। पराजय आ तिरस्कार ओकर नीक अछि, जे नीक जकां जीतल गेल हो, ओही वेतनसँ जे नीचां झुकय वाला दासक होइत अछि; ई प्राचीन मार्ग द्रोणक पुत्र (अश्वत्थामा) द्वारा चलल गेल छल, जे सुतल, संशयरहित राजा सभक हत्या कयलन्हि छल। मुदा हम कतऽ सन्धि करब? कतऽ ओ स्थान अछि जतय खसत बून्द सड़ि गेल हो? किएक तँ प्रत्येक प्रकट आवाज ओतय मन्द भ’ जाइत अछि। देबालमे कोनो पैघ सन्धि नै करबाक चाही, एहन चोरी क शास्त्र कहैत अछि। महल कतऽ जर्जर अछि? कतऽ ओ स्थान अछि जतय नून-खायल ईंट सभ कृत्रिम सुदृढ़ता पहिरने अछि? कतऽ हम स्त्रीक मुखक दर्शनसँ बचब? हमर इच्छाक पूर्ति ओतहि हमर प्रतीक्षा क’ रहल अछि। (ओ देबालकें छुबैत छथि) एतय एकटा स्थान अछि जे नित्य सूर्य आ छिड़कावसँ दुर्बल भ’ गेल अछि आ नून-खायल सड़नसँ खसि रहल अछि। आ एतय मूषक द्वारा फिङ्कल गेल माठि क एकटा ढेरी अछि। आब आकाश क धन्यवाद हो! हमर उद्यम सफल भ’ रहल अछि। ई कार्तिकेयक पुत्र सभक लेल सफलताक पहिल सङ्केत अछि। आब पहने सभसँ, हम कसरि सन्धि करब? पवित्र सुवर्ण-शक्ति-धारी (कनक-शक्ति) चारि प्रकारक सन्धिका नियम देलन्हि अछि, एही प्रकार: जदि ईंट पकायल गेल हो, तँ ओकरा बाहर खिंचू; जदि ओ सभ बिना पकायल हो, तँ ओकरा काटू; जदि ओ सभ माठिसँ बनल हो, तँ ओकरा गीला करू; जदि ओ सभ काठसँ बनल हो, तँ ओकरा फाड़ू। एतय हमर पाँ पकायल ईंट अछि; अतः, ईंट सभ बाहर खिंचू। आब ओ की स्वरूप होयत जे हम सन्धिकें देब? एकटा "कमल", "वापी" (पोखरि), "अर्धचन्द्र", या "सूर्य"? "आयताकार", या "स्वस्तिक", या "घट" (घड़ा)? किएक तँ शास्त्र प्रत्येकक आज्ञा दैत अछि। कोनो एक? कोनो एक? आ कतऽ हम अपन सम्प्रभु कला प्रदर्शित करब, जे भोरमे लोक देखि क’ आश्चर्य कसरि? पकायल ईंटक एही देबालमे, "घट" प्रभावकारी होयत। हम ओही करब। आन देबाल सभ पर जेकरा हम रातिमे तोपलहुँ अछि, आ हमर कम सफल उद्यम सभ पर सेहो, पड़ोसी सभक भीड़ भोरक प्रकाशमे देखलक, प्रशंसा या निन्दा कयलक, जेना हमर योग्यता छल। वर-दायी देवताक जय हो, अमर यौवनक स्कन्द क! सुवर्ण-शक्ति-धारी क जय हो, ब्राह्मणक देवता, पवित्र क! सूर्यक पुत्र क जय हो! जादू क गुरु क जय हो, जेकर पहिल शिष्य हम छी! किएक तँ ओ हमरामे आनन्द पयलन्हि आ हमरा जादू क उबटन देलन्हि, जाहिसँ जदि हम उबटन लगाबी, कोनो आरक्षी क आँखि हमर स्वरूप नै देखत; आ तीव्र तलवार जे हमरा पर खसत, ओ कूर घावसँ हमरा मुक्त छोड़ि देत। (ओ उबटन लगाबैत छथि) हाय, हम अपन नापक सूत्र बिसरि गेलहुँ। (सोचैत) आहा! ई यज्ञोपवीत हि हमर नापक सूत्र होयत। हँ, यज्ञोपवीत एकटा ब्राह्मणक लेल पैघ वरदान अछि, विशेष रूपसँ हमरा सनक लेल। किएक तँ, अहाँ देखू, एकरासँ ओ नापैत अछि, देबाल तोड़बासँ पहने, आ ताला खोलैत अछि, जखन रत्न दांव पर हो। ई बन्द दुआरि आ कक्ष क चाबी क काज करैत अछि, कीड़ा आ साँप क कटला पर पट्टी क काज करैत अछि। नाप क काज समाप्त भ’ गेल। हम अपन कार्य आरम्भ करैत छी। (ओ ओनाहि करैत छथि, पुनः एक दृष्टि देखैत छथि) हमर सन्धिमे केवल एकटा ईंटक कमी अछि। हाय, हमरा एकटा साँप काटि लेलक। (ओ अपन अङ्गुलिकें यज्ञोपवीतसँ बान्हि दैत छथि, आ विषक प्रभाव प्रकट करैत छथि) हम उपचार क’ लेलहुँ अछि, आ आब हम स्वस्थ छी। (ओ अपन कार्य जारी राखैत छथि, पुनः देखैत छथि) आहा, ओतय एकटा दीपक जरि रहल अछि। देखू! यद्यपि ईर्ष्यालु अन्धकार ओकरा चारू कात घेरने अछि, सुवर्ण-पीत दीपक अपना स्थानसँ सन्धि मार्गसँ भूमि पर एहन चमकैत अछि, जेना कसौटी क छाती पर सुवर्णक एकटा रेखा। (ओ अपन कार्य पर वापस जाइत छथि) सन्धि समाप्त भ’ गेल। नीक! हम प्रवेश करैत छी। मुदा नै, हम अखन प्रवेश नै करब। हम एकटा पुतला भीतर फिङ्कब। (ओ ओनाहि करैत छथि) आहा, ओतय केओ नै अछि। स्कन्द क जय हो! (ओ प्रवेश करैत छथि आ चारू कात देखैत छथि) देखू! दू मनुष्य सुतल छथि। आउ, अपन रक्षाक लेल हम दुआरि खोलि द’ छी। मुदा घर पुराना अछि आ दुआरि चूँ-चूँ करैत अछि। हमरा पानि खोजबाक चाही। आब पानि कतऽ भ’ सकैत अछि? (ओ चारू कात देखैत छथि, पानि पाबैत छथि, आ दुआरि पर छिड़कैत छथि। चिन्तासँ) हम आशा करैत छी ई भूमि पर नै खसत आ कोनो आवाज नै करत। आउ, ई मार्ग अछि। (ओ अपन पीठ दुआरि कात रखैत छथि आ सजगतासँ ओकरा खोलैत छथि) नीक! ओकर एतेक तँ भ’ गेल। आब हमरा ई जनबाक चाही जे की ई दोनों कृत्रिम सुतल छथि, या की ओ सभ सुतबाक पूर्ण अर्थमे सुतल छथि। (ओ हुनका सभकें भयभीत करबाक यत्न करैत छथि, आ प्रभाव देखैत छथि) हँ, ओ सभ निश्चित रूपसँ सुतबाक पूर्ण अर्थमे सुतल छथि। किएक तँ देखू! हुनकर श्वास पहने शान्तिसँ उठैत अछि, ओकरा खसबासँ पहने; एकर नित्य नियम समस्त भयकें चुनौती दैत अछि। अपन कोटर भीतर स्थिर, आँखि कस क’ बन्द अछि, आ कहियो पलक नै फिङ्कैत बुझाइत अछि। अङ्ग शिथिल अछि, आरामसँ शरीर सुतल अछि, हम हुनकर पएर पलङ्गसँ बाहर देखि रहल छी, जरैत दीपक आँखिकें कष्ट नै द’ रहल अछि; करत, जदि ओ सभ केवल कृत्रिम सुतल छलाह। (ओ चारू कात देखैत छथि) की! एकटा मृदङ्ग? आ एतय एकटा बाँसुरी अछि। आ एतय, एकटा दरिद्र ढोलक अछि। आ एतय, एकटा वीणा। आ नाल-पाइप सभ। आ ओतय, पाण्डुलिपि सभ। की ई कोनो नृत्य-गुरु क घर अछि? मुदा नै! जखन हम प्रवेश कयलहुँ, हमरा विश्वास छल जे ई एकटा प्रासाद सन निवास छल। आब तखन, की ई मनुष्य पूर्ण अर्थमे दरिद्र अछि, या, राजा या चोर सभक भयसँ, ओ अपन सम्पत्ति तोपि क’ रखने अछि? नीक, हमर अपन सम्पत्ति सेहो तोपल अछि। मुदा हम ओही बीज छिटब जे पातालक सुवर्णकें प्रकट करैत अछि। (ओ ओनाहि करैत छथि) छिटल गेल बीज कतहु नै सूझैत अछि। आहा, ओ पूर्ण अर्थमे दरिद्र अछि। नीक! हम जाइत छी। मैत्रेय: (अपन निन्नमे बाजैत) देखू, मनुष्य। हम देबालमे एकटा सन्धि जकां किछु देखि रहल छी। हम एकटा चोर जकां किछु देखि रहल छी। अहाँकें ई सुवर्ण-मञ्जूषा लय लेबाक चाही। शर्विलक: हमरा आश्चर्य भ’ रहल अछि जे की ई मनुष्य बुझि गेल अछि जे हम प्रवेश क’ लेलहुँ अछि, आ हमर उपहास करबाक लेल अपन दरिद्रता देखा रहल अछि। की हम ओकरा मारि द’ छी, या ओ बेचार अपन निन्नमे बाजि रहल अछि? (ओ एक दृष्टि देखैत छथि) मुदा देखू! जीर्ण वस्त्रमे तोपल ई वस्तु, आब जदि हम अपन दीपकक प्रकाशमे एकर निरीक्षण करी, वास्तवमे एकटा रत्न-मञ्जूषा अछि। मानू हम एककरा लय लेलहुँ। मुदा नै! कोनो उत्तम कुलक मनुष्यकें चोराबा उचित नै अछि, जे हमरा जकां दरिद्र हो। हम जाइत छी। मैत्रेय: हमर मित्र, गाम आ ब्राह्मण सभक इच्छाक सौगन्ध हम अहाँकें ई सुवर्ण-मञ्जूषा लेबाक लेल विवश करैत छी। शर्विलक: कोनो गौ क पवित्र इच्छा आ एकटा ब्राह्मणक इच्छाक अवहेलना नै कयल जा सकैत अछि। हम एकरा लय लेब। मुदा देखू! ओतय दीपक जरि रहल अछि। हम अपन साथ एकटा फतिङ्गा विशेष रूपसँ दीपक बुझाबाक लेल राखैत छी। हम ओकरा लौ भीतर प्रवेश करब। ई ओकर स्थान आ समय अछि। मानू ई फतिङ्गा जेकरा हम एतय मुक्त करैत छी, भिन्न-भिन्न मण्डलमे लौ ऊपर फड़फड़ाबाक लेल विदा हो। कीड़ाक पाँखिक हवा लौ कें पापी अन्धकारमे रूपान्तरित क’ देलक। या की हम ओही अन्धकार कें श्राप नै द’ छी जे हमरा द्वारा हमर ब्राह्मण कुल पर लाएल गेल अछि? किएक तँ हमर बाप एकटा एहन मनुष्य छलाह जे चारू वेद जनैत छलाह, जे कहियो दान स्वीकार नै करैत छलाह; आ हम, शर्विलक, हुनकर पुत्र, आ एकटा ब्राह्मण, हम ओही गणिका कनियाँ मदनिका लेल एकटा अपराध क’ रहल छी। आब हम ब्राह्मणक इच्छा पूर्ण करब। (ओ मञ्जूषा लेल हाथ बढ़ाबैत छथि) मैत्रेय: अहाँक अङ्गुलि कतेक ठण्ढा अछि, मनुष्य! शर्विलक: कतेक असावधानी! पानि छुबबाक कारण हमर अङ्गुलि ठण्ढा अछि। नीक, हम अपन हाथ काँखि भीतर रखब। (ओ अपन वाम हाथ गरम करैत छथि आ मञ्जूषा लैत छथि) मैत्रेय: की अहाँ एककरा पा क’ लेलहुँ? शर्विलक: हम एकटा ब्राह्मणक प्रार्थना अस्वीकार नै क’ सकलहुँ। हम एककरा पा क’ लेलहुँ अछि। मैत्रेय: आब हम ओनाहि शान्तिसँ सुतब जेना एकटा व्यापारी जे अपन माल बेचि देलने हो। शर्विलक: हे महान ब्राह्मण, एक सौ वर्ष सुतू! हाय जे एकटा ब्राह्मण कुल मदनिका, एकटा गणिका लेल अन्धकारमे डूबि गेल! या बेसी नीक, हम स्वयं एही अन्धकारमे डूबि गेल छी। दरिद्रता पर श्राप हो, हम कहैत छी! ई पुरुषार्थपूर्ण इच्छाक लेल अपरिचित अछि; ई कार्य जे दिनक प्रकाशसँ डराइत अछि, हम एकरा वास्तवमे श्राप दैत छी, मुदा एकरा अखन धरि करैत छी। नीक तखन, हमरा वसन्तसेनाक घर मदनिकाक मुक्ति कीनबाक लेल जाबाक चाही। (ओ चारू कात घूमि क’ देखैत छथि) आहा, हम बुझैत छी हम पएरक आवाज सुनैत छी। हम आशा करैत छी ओ आरक्षी सभक नै हो। कोनो चिन्ता नै। हम एकटा स्तम्भ (पिलर) होबाक बहाना करब, आ प्रतीक्षा करब। मुदा आखिर, की आरक्षी सभ हमर लेल, शर्विलक लेल अस्तित्व राखैत छथि? किएक तँ, हम छी: रेंगबाक लेल एकटा बिलाई, आ भागबाक लेल एकटा हरिण, नोचबाक लेल एकटा बाज, आ देखबाक लेल एकटा कुकुर, जे मनुष्य सभक शक्तिक नाप करैत अछि जे जागत छथि या सुतल, एकटा साँप, जखन रेंगब विवेकपूर्ण हो, स्वयं माया, साधु या धूर्त बुझबाक लेल, समझदारीक भाषामे वाग्देवी; घोर करिया रातिमे एकटा प्रकाश, सुराखमे एकटा छिपकली हम भ’ सकी, सुदृढ़ भूमि पर एकटा घोड़ा, आ समुद्र पर एकटा नाव। आ पुनः: साँप जकां तीव्र, आ पहाड़ जकां स्थिर; उड़ानमे पक्षीराज ओकरासँ पैघ पराक्रम नै देखा सकैत; भूमि पर खोज करबामे हम ओनाहि प्रखर छी जेना कोनो खरगोश, शक्तिमे हम एकटा सिंह छी, आ नोचबा आ फाड़बाक लेल एकटा भेड़िया। रदनिका: (प्रवेश करैत) हे भगवान! वर्धमानक बाहरी अङ्गनमे सुतबाक लेल गेल छल, आ आब ओ ओतय नै अछि। नीक, हम मैत्रेयकें बजाबब। (ओ चलैत अछि) शर्विलक: (रदनिकाकें मारबाक लेल तत्पर होइत छथि, मुदा पहने एक दृष्टि देखैत छथि) की! एकटा स्त्री? नीक! हम जाइत छी। (ओ प्रस्थान करैत छथि) रदनिका: (भयसँ पाछाँ हटैत) ओह, ओह, एकटा चोर हमर घरक देबालमे एकटा सन्धि क’ क’ भागि रहल अछि, हमरा जा क’ मैत्रेयकें जगाबाक चाही। (ओ मैत्रेयक लग जाइत अछि) ओह मैत्रेय, उठू, उठू! एकटा चोर हमर घरक देबालमे एकटा सन्धि क’ क’ भागि गेल अछि। मैत्रेय: (उठैत) अहाँक की अर्थ अछि, कनियाँ? "देबालमे एकटा सन्धि एकटा चोरकें काटि देलक आ भागि गेल"? रदनिका: बेचार मूर्ख! अपन परिहास बन्द कसरि। की अहाँ एकरा देखि नै रहल छी? मैत्रेय: अहाँक की अर्थ अछि, कनियाँ? "एहन बुझाइत अछि जेना एकटा दोसर दुआरि खुल्ला फिङ्कल गेल हो"? उठू, मित्र चारुदत्त, उठू! एकटा चोर हमर घरक देबालमे एकटा सन्धि क’ क’ भागि गेल अछि। चारुदत्त: हँ, हँ! अहाँक परिहाससँ बस! मैत्रेय: मुदा ई कोनो परिहास नै अछि। देखू! चारुदत्त: कतऽ? मैत्रेय: किएक, एतय। चारुदत्त: (देखैत) कतेक अद्भुत सन्धि अछि! ईं कें नीचाँसँ, ऊपरसँ खिंचल गेल अछि; चोटी सङ्कीर्ण अछि, मुदा मध्य पैघ; जेना पैघ घर-हृदय अहङ्कारसँ फटि गेल हो, एही भयक मारे जे अयोग्य ओकर प्रेमक भागी नै बनि जाय। ई सोचब जे विज्ञानक उपयोग एही प्रकारक कार्य पर कयल गेल हो! मैत्रेय: हमर मित्र, ई सन्धि निश्चित रूपसँ दू मनुष्यमे सँ ककरो द्वारा कयल गेल होयत; या तँ कोनो अपरिचित द्वारा, या पुनः चोरी क विज्ञानक कोनो छात्र द्वारा अभ्यास लेल। किएक तँ उज्जयिनीमे कोनो एहन मनुष्य अछि जे नै जनैत अछि जे हमर घरमे कतेक वैभव अछि? चारुदत्त: अपरिचितहि ओ भ’ सकैत अछि जे सन्धि कयलक, हमर घरमे अपन नित्य फसल काटबाक लेल; ओ ई नै सीखलक जे नष्ट भेल वैभव एकटा शान्त, संकटहीन निन्न सिखबैत अछि। ओ हमर घरक पूर्व महानता देखलक आ बलपूर्वक प्रवेश कयलक; किएक तँ ओकर हृदय क्षणिक आशामे कूँदल छल; आब ओकरा कतहु आन भ्रमण करबाक चाही, आ टूटल आशा सभ पर ओकरा गम्भीर कानबाक चाही। बस ई सोचू जे ओ बेचार अपन मित्र सभसँ कहि रहल होयत: "हम एकटा व्यापारीक पुत्रक घरमे प्रवेश कयलहुँ, आ पयलहुँ—किछ नै।" मैत्रेय: की अहाँक ई अर्थ अछि जे अहाँ ओही पापी चोर पर दया क’ रहल छी? ओ सोचैत अछि—"एतय एकटा पैघ घर अछि। ई एकटा रत्न-मञ्जूषा या सुवर्ण-मञ्जूषा लय भागबाक स्थान अछि।" (ओ मञ्जूषाक स्मरण करैत छथि। निराशासँ। मनहि मन) ओ सुवर्ण-मञ्जूषा कतऽ अछि? (ओ रातिक घटना सभक स्मरण करैत छथि। प्रकट) देखू, मनुष्य! अहाँ सदा कहैत छी "मैत्रेय एकटा मूर्ख अछि, मैत्रेय कोनो विद्वान नै अछि।" मुदा हम निश्चित रूपसँ विवेकपूर्ण कार्य कयलहुँ ओही सुवर्ण-मञ्जूषा अहाँकें सुपुर्द क’ क’। जदि हम नै क’ छलहुँ, तँ दासीपुत्र ओकरा लय भागि गेल रहितैक। चारुदत्त: अहाँक परिहाससँ बस! मैत्रेय: केवल एही लेल जे हम एकटा मूर्ख छी, की अहाँ बुझैत छी हम परिहासक स्थान आ समय सेहो नै जनैत छी? चारुदत्त: मुदा ई कखन भेल? मैत्रेय: किएक, जखन हम अहाँकें कहलहुँ जे अहाँक अङ्गुलि ठण्ढा अछि। चारुदत्त: ई भ’ सकैत छल। (ओ चारू कात खोजैत छथि। आनन्दसँ) हमर मित्र, हमर पाँ अहाँकें कहबाक लेल किछु सुखद अछि। मैत्रेय: की? की ओ चोराएल नै गेल छल? चारुदत्त: हँ, चोराएल गेल छल। मैत्रेय: तखन सुखद समाचार की अछि? चारुदत्त: ई सत्य जे ओ निराश भ’ क’ वापस नै गेल। मैत्रेय: मुदा ओ केवल हमर रक्षामे सौंपल गेल छल। चारुदत्त: की! हमर रक्षामे सौंपल गेल छल? (ओ मूर्छित भ’ जाइत छथि) मैत्रेय: होशमे आउ, मनुष्य। की ई सत्य जे एकटा चोर ओकरा चोरायलक जे अहाँक रक्षामे सौंपल गेल छल, कोनो एहन कारण अछि जाहि लेल अहाँ मूर्छित भ’ जाब? चारुदत्त: (होशमे आबि क’) आह, हमर मित्र, सत्य पर के विश्वास करत? संशय आब निश्चित अछि। ई संसार कोनो दया नै देखाएत एही अमशस्वी दरिद्र पर। हाय! जदि ईर्ष्यालु भाग्य पहने केवल हमर धनक इच्छा कयलक, तँ ओ आब हमर गुणक वैभव अपन रूपमे किएक खोजि रहल अछि? मैत्रेय: हम समस्त वस्तु अस्वीकार करबाक इच्छा राखैत छी। ककरा के की देलक? ककरासँ के की प्राप्त कयलक? साक्षी के छल? चारुदत्त: आ की हम आब एकटा असत्य बाजब? नै! हम भिक्षा मङ्गब जा धरि हम अपन कर्ज चुकाबाक योग्य धन नै कमा ली। नीच असत्यकें हम ठुकरा देब जे चरित्र चोरा लैत अछि। रदनिका: हम जा क’ हुनकर नीक पत्नीसँ कहब। (ओ बाहर जाइत अछि, चारुदत्तक पत्नीक साथ वापस आबैत अछि) पत्नी: (चिन्तासँ) ओह! की ई सत्य अछि जे हमर स्वामी सकुशल छथि, आ मैत्रेय सेहो? रदनिका: ई सत्य अछि, मालकिन। मुदा ओ आभूषण जे गणिकाक अछि, चोराएल गेल अछि। (चारुदत्तक पत्नी मूर्छित भ’ जाइत छथि) ओ हमर उत्तम मालकिन! होशमे आउ! पत्नी: (स्वस्थ भ’ क’) कनियाँ, अहाँ कसरि कहि सकैत छी जे हमर स्वामी सकुशल छथि? शरीरसँ घायल होबाक अपेछा चरित्रसँ घायल होना बेसी कष्टकर अछि। किएक तँ आब उज्जयिनीक लोक कहताह जे हमर स्वामी एही अपराध कयलन्हि अछि अपन दरिद्रताक कारण। (ओ ऊपर देखैत अछि आ निश्वास छोड़ैत अछि) आह, शक्तिशाली भाग्य! दरिद्रक भाग्य, कमल-पात पर खसय वाला पानि क बून्द जकां अनिश्चित, अहाँ लेल केवल खिलौना बुझाइत अछि। हमर पाँ ई एकमात्र कण्ठहार (नेकलेस) बचल अछि, जेकरा हम अपन माय क घरसँ अपन साथ लाबने छलहुँ। मुदा हमर स्वामी एकरा स्वीकार करबा लेल बहुत अहङ्कारी छथि। कनियाँ, मैत्रेयकें एतय बजाउ। रदनिका: हँ, मालकिन। (ओ मैत्रेय कें सम्बोधित करैत अछि) मैत्रेय, मालकिन अहाँकें पुकारि रहल छथि। मैत्रेय: ओ कतऽ छथि? रदनिका: एतय। आउ! मैत्रेय: (लग जा क’) भगवान अहाँक कल्याण करथि! पत्नी: हम अहाँकें प्रणाम करैत छी, महाभाग। महाभाग, की अहाँ सीधा अपन समक्ष देखब? मैत्रेय: आर्या, एतय एकटा मनुष्य ठाढ़ अछि जे सीधा अपन समक्ष देखैत अछि। पत्नी: महाभाग, अहाँकें एकरा स्वीकार करबाक चाही। मैत्रेय: किएक? पत्नी: हम रत्न-षष्ठी क व्रतक पालन कयलहुँ अछि। आ एही अवसर पर एकटा ब्राह्मणकें जतेक पैघ उपहार क’ सकी, ओ देबाक चाही। ई हम नै क’ पाबलहुँ, अतः कृपया एही कण्ठहारकें स्वीकार करू। मैत्रेय: (कण्ठहार ग्रहण करैत) भगवान अहाँक कल्याण करथि! हम जा क’ अपन मित्रसँ कहब। पत्नी: अहाँकें एही प्रकार नै करबाक चाही जाहिसँ हमरा लज्जित होबहि पड़य, मैत्रेय। (ओ प्रस्थान करैत अछि) मैत्रेय: (आश्चर्यसँ) कतेक उदारता! चारुदत्त: मैत्रेय कतेक काल लगबैत छथि! हम आशा करैत छी हुनकर दुःख ओकरा ओही कार्य कात नै लय जा रहल अछि जे ओकरा नै करबाक चाही। मैत्रेय, मैत्रेय! मैत्रेय: (लग जा क’) हम एतय छी। ओकरा लय लिय’। (ओ कण्ठहार देखाबैत छथि) चारुदत्त: ई की अछि? मैत्रेय: किएक, वैह पुरस्कार अछि जे अहाँकें एहन पत्नीसँ विवाह करबाक कारण भेटैत अछि। चारुदत्त: की! हमर पत्नी हमरा पर दया क’ रहल अछि? हाय, आब हम वास्तवमे दरिद्र छी! जखन भाग्य ओकरा ओकर समस्त वस्तुसँ वञ्चित क’ दैत अछि, जे ओकरा ओकर दयाकें पुकारबाक लेल विवश करैत अछि, तँ मनुष्य स्त्रीक स्थितिमे खसि जाइत अछि, स्त्री पुरुष भ’ जाइत अछि। मुदा नै, हम दरिद्र नै छी। किएक तँ हमर पाँ एकटा पत्नी अछि जेकर प्रेम हमर वैभव क दिनसँ आगाँ धरि रहैत अछि; अहाँमे एकटा मित्र अछि सुख आ दुःखमे; आ सत्य जे आन किछु नै लय जा सकैत छल: आह! एकरा दरिद्र मनुष्य अखन धरि खो दैत अछि। मैत्रेय, कण्ठहार लय लिय’ आ वसन्तसेना पाँ जाउ। हुनका हमर नामसँ कहू जे हम ओही सुवर्ण-मञ्जूषाकें जुआमे हारि गेलहुँ, ई बिसरि क’ जे ओ हमर अपन नै छल, जे हमरा आशा अछि ओ एकर स्थान पर एही कण्ठहारकें स्वीकार करतीह। मैत्रेय: मुदा अहाँकें ई कण्ठहार, चारि समुद्रक गर्व, ओही सस्त वस्तु लेल नै देबाक चाही जे ओकरासँ पहने चोराएल गेल छल जे हमरा सभक पाँ एकटा ग्रास या एकटा पेय सेहो भेटितैक। चारुदत्त: एहन नै, हमर मित्र। ओ अपन न्यास हमर पाँ छोड़ि क’ अपन विश्वास देखौलक; विश्वासक मूल्य ओकरासँ कम नापक नै होइत अछि। मित्र, हम अहाँकें एही चेष्टासँ सौगन्ध दैत छी, तब धरि वापस नै आबब जब धरि अहाँ एकरा हुनकर हाथमे नै सुपुर्द क’ द’ छी। वर्धमानक, अहाँ तीव्र गतिसँ सन्धि मार्गकें ओही ईंट सभसँ भरि दिय’; एही प्रकार हम कानुनक प्रक्रयाकें रोकब, किएक तँ एतेक पैघ अपवादक कलङ्क सटैत अछि। आ, मित्र मैत्रेय, अहाँकें अत्यधिक निराशासँ नै बाज क’ अपन गर्व देखबाक चाही। मैत्रेय: एकटा दरिद्र मनुष्य निराशासँ बाजबामे कसरि सहायता क’ सकैत अछि? चारुदत्त: दरिद्र हम नै छी, हमर मित्र। किएक तँ हमर पाँ एकटा पत्नी अछि जेकर प्रेम हमर वैभव क दिनसँ आगाँ धरि रहैत अछि; अहाँमे एकटा मित्र अछि सुख आ दुःखमे; आ सत्य जे आन किछु नै लय जा सकैत छल: आह, एकरा दरिद्र मनुष्य अखन धरि खो दैत अछि। जाउ तखन, आ शौच-विधि समाप्त क’ क’, हम अपन भोरक पूजा अर्पण करब। (सभ प्रस्थान करैत छथि) चतुर्थ अङ्क: मदनिका आ शर्विलक (एकटा दासीक प्रवेश होइत अछि) दासी: हमरा हमर मालकिनक माय द्वारा एकटा सन्देश देल गेल अछि जे हम मालकिनकें सुपुर्द कऽ दी। एतय हमर मालकिन छथि। ओ एकटा चित्र कात देखि रहल छथि आ मदनिकाक साथ बाजि रहल छथि। हम हुनका पाँ जाब। (ओ चलैत अछि) (तखन यथोक्त वसन्तसेना आ मदनिकाक प्रवेश होइत अछि) ... (पूर्ण रूपसँ अनूदित पाठ्य) वसन्तसेना: मदनिका कनियाँ, की ई चित्र वास्तवमे चारुदत्त सन लगैत अछि? मदनिका: बहुत नीक लगैत अछि, बिल्कुल हुनका सन। वसन्तसेना: अहाँ कसरि जनैत छी? मदनिका: किएक तँ हमर मालकिनक आँखि एही पर एतेक अनुरागसँ टिकल अछि। वसन्तसेना: मदनिका कनियाँ, की अहाँ ई बात केवल एही लेल कहि रहल छी किएक तँ गणिका-संसर्गक शिष्टाचार एकर मङ्ग करैत अछि? मदनिका: मुदा मालकिन, की कोनो गणिका-गृहमे रहय वाली लड़कीक शिष्टाचार सदा मिथ्या आ बनावटीहि होयत? वसन्तसेना: कनियाँ, गणिका सभकें कतेको प्रकारक पुरुष सभसँ मिलब पड़ैत छनि जे ओ सभ एकटा कृत्रिम शिष्टाचार सीखि लैत छथि। मदनिका: मुदा जखन हमर मालकिनक आँखि आ हुनकर हृदय दोनों कें एही वस्तुमे एतेक आनन्द भेटि रहल छनि, तखन एकर कारण पूछबाक की आवश्यकता अछि? वसन्तसेना: मुदा हम नै चाहब जे हमर सखी सभ हमर उपहास कसरि। मदनिका: अहाँकें डरबाक कोनो आवश्यकता नै अछि। स्त्री स्त्रीक हृदय नीक जकां जनैत अछि। दासी: (लग जा कऽ) मालकिन, अहाँक माय सन्देश पठौने छथि जे एकटा बन्द गाड़ी कातक दुआरि पर ठाढ़ अछि, आ अहाँकें बाहर भ्रमण लेल जाबाक अछि। वसन्तसेना: हमरा बताउ, की ई चारुदत्त छथि जिनका हमरा आमन्त्रित कयल अछि? दासी: मालकिन, ओ पुरुष जिनका गाड़ी कऽ साथ दस हजार सुवर्ण-मुद्राक आभूषण पठौने छथि — वसन्तसेना: ओ के छथि? दासी: ओ राजा क साढ़ू संस्थानक छथि। वसन्तसेना: (क्रोधसँ) जाउ! आ एहन संदेश लय कऽ हमर सम्मुख पुनः कहियो नै आबब। दासी: क्रुद्ध नै होऊ, मालकिन। हम तँ मात्र एकटा संदेशवाहक छी जे अहाँक पाँ सन्देश लाबने अछि। वसन्तसेना: मुदा ई संदेशहि हमरा क्रुद्ध कऽ रहल अछि। दासी: तखन हम अहाँक मायसँ की कहब? वसन्तसेना: हमर मायसँ कहि दियौन्हि जे ओ पुनः कखनहि एहन सन्देश हमरा नै पठाबथि, जदि ओ हमरा जिबैत देखबाक इच्छा राखैत छथि तँ। दासी: जेना अहाँक इच्छा। (ओ प्रस्थान करैत अछि) (शर्विलकक प्रवेश होइत अछि) शर्विलक: हम अपन पाप कऽ कलङ्क रातिक अन्धकार पर मढ़ि देलहुँ; हम निन्न आ राजा कऽ आरक्षी सभ पर विजय प्राप्त कयलहुँ; मुदा आब राति बीति रहल अछि आ सूर्यक एही निर्मल प्रकाशमे हमर रूप ओनाहि मन्द भऽ गेल अछि जेना भोरक चन्द्रमा। आ पुनः: जे केओ हमर कात एकटा चितवन फिङ्कलक, या जे केओ तीव्र गतिसँ दौड़ैत हमर लग अयल, हमर व्याकुल आत्मा ओकरा अपन शत्रुहि बुझलक; किएक तँ पापहि मनुष्यक भीतर भयक जन्म दैत अछि। नीक, ई मदनिकाक निमित्तहि छल जाहि लेल हम ई पाप-कर्म कयलहुँ। हम कोनो नौकर-चाकर सभक गपशप पर ध्यान नै देलहुँ; स्त्री सभक नियन्त्रण वला घर सभसँ हम सभसँ बेसी दूर रहलहुँ; आ जखन सिपाही सभ हमरा अपन घेरामे लैत बुझाइलन्हि, हम सीधा एकटा जड़ काठक खूँटा जकां ठाढ़ भऽ गेलहुँ। एही प्रकारक सैकड़ों कौशल हम राति भरि कयलहुँ आ रातिकें दिनमे बदलबाक यत्न कयलहुँ। (ओ चलैत अछि) वसन्तसेना: कनियाँ, एही चित्रकें हमर सोफा पर राखि दिय’ आ हाथमे पंखा लय कऽ तुरंत वापस आबब। मदनिका: हँ, मालकिन। (चित्र लय कऽ प्रस्थान करैत अछि) शर्विलक: ई वसन्तसेनाक घर अछि। हम भीतर प्रवेश करब। (ओ प्रवेश करैत अछि) हमरा आश्चर्य भऽ रहल अछि जे हम मदनिकाकें कतऽ पाबब। (मदनिका हाथमे पंखा लेने प्रवेश करैत अछि। शर्विलक ओकरा देखैत छथि) आहा, ई हमर मदनिका अछि — अपन रूपमे स्वयं कामदेव कें मात दऽ कऽ ओ मनुष्य रूपमे साक्षात प्रेमक देवी जकां बुझि रहल छथि; जखन हमर हृदय कामुकताक ज्वालामे जरि रहल अछि, ओ हमर आँखिकें चन्दन सन शीतलता प्रदान कऽ रहल छथि। मदनिका! मदनिका: (शर्विलककें देखि कऽ) ओह, ओह, शर्विलक! हम अहाँकें देखि कऽ बहुत प्रसन्न छी, शर्विलक। अहाँ एतेक दिन कतऽ छलहूँ? शर्विलक: हम अहाँकें सभ कहब। (दोनों एक-दोसर कें अनुरागसँ देखैत छथि) वसन्तसेना: मदनिका कतेक काल लगा रहल अछि! हमरा देखबाक चाही ओ कतऽ अछि। (ओ झरोखा सँ देखैत छथि) आहा! ओतय ओ एकटा पुरुष कऽ साथ बाजि रहल अछि। ओकर चंचल चितवन स्थिर अछि आ ओ ओकरा एही प्रकार देखि रहल अछि जेना अपन आँखिसँ पीबि जबाक इच्छा राखैत हो। हम बुझैत छी ई वैह पुरुष छथि जे ओकरा दासी-जीवनसँ मुक्त करबाक इच्छा राखैत छथि। नीक, ओकरा ओतहि रहय दिय’, ओतहि रहय दिय’। ककरो प्रसन्नताक क्षणमे विघ्न नै डालबाक चाही। हम ओकरा नै बजाबब। मदनिका: हमरा बताउ, शर्विलक। (शर्विलक भयसँ चारू कात देखैत छथि) की बात अछि, शर्विलक? अहाँ चिन्तित देखि रहल छी। शर्विलक: हम अहाँकें एकटा रहस्य कहब। की हम सभ अकेले छी? मदनिका: हँ, निश्चित रूपसँ। वसन्तसेना: की! एकटा गम्भीर रहस्य? हम नै सुनब। शर्विलक: मदनिका, हमरा बताउ, की वसन्तसेना अहाँक मुक्त करबाक लेल कोनो मूल्य स्वीकार करतीह? वसन्तसेना: की! वार्तालाप हमरहि विषयमे भऽ रहल अछि? तखन हमरा एही झरोखा पाछाँ लुका कऽ अवश्य सुनबाक चाही। मदनिका: शर्विलक, हम एही विषयमे मालकिनसँ पूछलहुँ छल, आ ओ कहलनि जे जदि हुनकर बस चलितैक तँ ओ अपन सभ दासी सभकें बिना कोनो मूल्यक मुक्त कऽ देतीह। मुदा शर्विलक, अहाँकें एहन पैघ धन कतऽ भेटल जेसँ अहाँ मालकिनसँ हमर मुक्ति कीनबाक विचार कऽ रहल छी? शर्विलक: हमर दरिद्रताक कारण हमरा विवश भऽ कऽ, आ अहाँक एही सुकुमार प्रेमकें पाबबाक लेल, मदनिका कनियाँ, हम आधी रातिमे एकटा पैघ पाप-कर्म कयलहुँ अछि। वसन्तसेना: हुनकर मुख बहुत शान्त अछि। जदि ओ पापी होइताह तँ हुनकर मुख चिन्तित देखि रहितैक। मदनिका: ओह, शर्विलक! एकटा तुच्छ वस्तु लेल—मात्र एकटा स्त्री लेल—अहाँ दोनों बहुमूल्य वस्तु कऽ दांव पर लगा देलहूँ! शर्विलक: कोन वस्तु, जेना की? मदनिका: अहाँक जीवन आ अहाँक निष्कलङ्क चरित्र। शर्विलक: हमर भीरु कनियाँ, भाग्य सदा वीर पुरुष कऽ साथ दैत अछि। मदनिका: ओह, शर्विलक! अहाँक चरित्र पर कहियो कोनो दाग नै छल। अहाँ कोनो पैघ अनर्थ तँ नै कयलहूँ, जखन हमर निमित्त अहाँ ओही पाप-कर्म कयलहूँ? शर्विलक: जे आभूषण स्त्रीक रूपकें बढ़ाबैत अछि, लता पर फूलक जकां, हम ओकरा कोनो क्षति नै पहुँचाएलहुँ। हम कोनो श्रेष्ठ ब्राह्मणक धन नै चोराएलहुँ, नहि यज्ञक पवित्र सुवर्णकें हाथ लगौलहुँ। हम कोनो दासी कऽ गोदसँ बच्चाकें सेहो नै चोराएलहुँ, मात्र अपन पेट भरबाक लेल। एकटा चोरक रूपमे सेहो हम अपन पूर्ण शक्तिसँ उचित आ अनुचित कऽ बीचक मर्यादाक पालन कयलहुँ अछि। अतः अहाँ वसन्तसेनाकें ई कहि सकैत छी: ई आभूषण सभ अहाँकहि पहिरबाक लेल बनल अछि, एहन हमरा बुझाइत अछि; मुदा जदि अहाँ हमरासँ प्रेम करैत छी, तँ एककरा कखनो एहन स्थान पर नै पहिरब जतय लोक एककरा देखि सकय। मदनिका: मुदा शर्विलक, एहन आभूषण जेकरा केओ देखि नै सकय, आ एकटा गणिका—ई दोनों गप आपसमे मेल नै खाइत अछि। हमरा ओही आभूषण दिय’, हम देखबाक इच्छा राखैत छी। शर्विलक: ई एतय अछि। (ओ किछ संशय कऽ साथ ओकरा पेटारी दऽ दैत छथि) (मदनिका पेटारीकें देखैत छथि आ नीक जकां जाँंच कऽ कऽ स्तब्ध भऽ जाइत छथि) मदनिका: ओह, शर्विलक! अहाँ तँ कहलहुँ जे अहाँ उचित-अनुचितक मर्यादाक पालन कयलहुँ अछि, मुदा ई आभूषण तँ हमर मालकिनकहि अछि! शर्विलक: (भय आ आश्चर्यसँ) की! अहाँक मालकिनक? मदनिका: हँ, निश्चित रूपसँ। ई आभूषण आर्या वसन्तसेनाकहि अछि। शर्विलक: ई कसरि भऽ सकैत अछि? मदनिका: अहाँ सत्य-सत्य बाजू, शर्विलक। अहाँ ई कतयसँ चोरायब? अहाँ ककर घर तोडलहुँ? शर्विलक: मदनिका, हम अहाँकें सत्य कहि रहल छी। हम उज्जयिनीक श्रेष्ठ श्रेष्ठी चारुदत्तक घरक देबाल तोड़ि कऽ ई आभूषण आधी रातिमे चोरायने छी। मदनिका: (कष्ट आ विषादसँ) हाय, हाय! अहाँ ई की कऽ देलहुँ? ओतय तँ पहिनेसँ दरिद्रता अछि। हुनकर घरमे चोरी करब तँ साक्षात पाप-कर्म अछि। आर्या वसन्तसेना तँ हुनका अपन प्राणसँ बेसी चाहैत छथि। ई आभूषण तँ स्वयं हमर मालकिन चारुदत्तक घरमे धरोहर रूपमे रखने छली, जकरा अहाँ चोराय कऽ लय अयलहुँ। शर्विलक: की! ई वसन्तसेनाक धरोहर छल? तब तँ हम भारी अनर्थ कऽ देलहुँ। शर्विलक: (चिन्तित भऽ कऽ, मनहि मन) जदि वृक्ष जड़िसँ कटि जाय, तँ पत्ता कऽ की मूल्य? आब हमर बुद्धि काम नै कऽ रहल अछि। हम ओही पुरुष कऽ घर लूटलहुँ जे स्वयं उज्जयिनीक गौरव छथि। आब एकर की उपाय अछि? मदनिका: शर्विलक, जदि अहाँ हमरासँ प्रेम करैत छी, आ जदि अहाँ अपन ई पाप धोबाक इच्छा राखैत छी, तँ हमर एकटा चतुर उपाय सुनू। शर्विलक: बाजू मदनिका, की उपाय अछि? मदनिका: अहाँ स्वयं आर्या वसन्तसेनाक सम्मुख जाउ। मुदा चोरक रूपमे नै। अहाँ एकटा कुलीन पुरुष जकां जाउ आ कहू जे चारुदत्त अहाँक हाथे ई आभूषण वापस पठौने छथि, किएक तँ हुनकर घर असुरक्षित अछि। एही प्रकार चारुदत्तक प्रतिष्ठा बचि जायत, आ अहाँक अपराध सेहो तोपल रहत। शर्विलक: मुदा मदनिका, जदि आर्या वसन्तसेना हमरा चिन्हि लेतीह तँ? मदनिका: अहाँ चिन्ता नै करू। आर्या बहुत उदार छथि। ओ चारुदत्तक नाम सुनि कऽ सभ अपराध क्षमा कऽ देतीह। शर्विलक: अहाँक बुद्धि अद्भुत अछि, मदनिका। स्त्रीक बुद्धि विपत्तिक कालमे पुरुषसँ बेसी तीव्र काज करैत अछि। हम ओनाहि करब जेना अहाँ कहलहुँ। (वसन्तसेना झरोखासँ सभ किछु देखि आ सुनि रहल छथि आ मनहि मन शर्विलकक साहस आ मदनिकाक चतुरता पर प्रसन्न भऽ रहल छथि) वसन्तसेना: (मनहि मन) साधु, मदनिका साधु! अहाँ एकटा दासी भऽ कऽ सेहो चारुदत्तक प्रतिष्ठाक एतेक चिन्ता कयलहुँ। हम अहाँक एही कार्यसँ बहुत प्रसन्न छी। (शर्विलक आ मदनिका वसन्तसेनाक मुख्य कमरा कात बढ़ैत छथि। मदनिका पहिने जा कऽ वसन्तसेनाकें सूचित करैत अछि) मदनिका: मालकिन, उज्जयिनीक एकटा भद्र पुरुष अहाँसँ मिलबाक लेल अयल छथि। ओ आदरणीय चारुदत्तक कखनो विशेष काज करैत छथि। वसन्तसेना: ओकरा भीतर आबय दिय’। (शर्विलक सङ्कोच आ गम्भीरताक साथ भीतर प्रवेश करैत छथि) शर्विलक: आर्या वसन्तसेनाकें हमर प्रणाम। वसन्तसेना: महाभाग, अहाँक स्वागत अछि। कृपया आसन ग्रहण करू। शर्विलक: आर्या, हम आसनक योग्य नै छी। हम मात्र एकटा सन्देश लय कऽ अयल छी। श्रेष्ठ चारुदत्त अहाँकें ई मञ्जूषा सुपुर्द करबाक निर्देश देलन्हि अछि। ओ कहने छथि जे हुनकर घर पुरान आ असुरक्षित अछि, आ ओतय ई बहुमूल्य धरोहर राखब ठीक नै अछि। अतः अहाँ अपन धरोहर वापस लय लिय’। (ओ पेटारी वसन्तसेनाक सम्मुख रखैत छथि) वसन्तसेना: (मञ्जूषा ग्रहण करैत, मनहि मन हँसैत) चारुदत्त कतेक महान छथि! ओ अपन घरमे भेल चोरीक बात नुका कऽ हमर धरोहरक रक्षा लेल ई संदेश पठौने छथि (ओ बुझि रहल छथि जे शर्विलक झूठ बाजि रहल अछि, मुदा ओ चारुदत्तक प्रतिष्ठा लेल अनजान बनबाक अभिनय करैत छथि)। वसन्तसेना: महाभाग, चारुदत्तक एही संदेशवाहक (अहाँ) कऽ कार्य बहुत उत्तम अछि। हम ई आभूषण स्वीकार करैत छी। मुदा एकर बदलामे हम अहाँकें किछु देबाक इच्छा राखैत छी। शर्विलक: (आश्चर्यसँ) आर्या, हम तँ मात्र संदेशवाहक छी। वसन्तसेना: मदनिका कनियाँ, जाउ, एही भद्र पुरुष शर्विलकक साथ जाउ। आब अहाँ हमर दासी नै छी। हम अहाँकें दासी-वृत्तिसँ मुक्त करैत छी। अहाँ दोनों विवाह कऽ कऽ सुखसँ रहू। मदनिका आ शर्विलक: (आनन्द आ आश्चर्यसँ गदगद भऽ कऽ, वसन्तसेनाक पएर छुबैत) आर्या! अहाँ तँ साक्षात देवी छी। अहाँक ई महान उपकार हम सभ जीवन भरि नै बिसरब। शर्विलक: (मनहि मन) ई स्त्री गणिका नै, साक्षात लक्ष्मी छथि। जिनका हम अपन पापसँ भयभीत भऽ कऽ देखि रहल छलहुँ, ओ हमरा जीवनक सभसँ पैघ सुख (मदनिका) दान कऽ देलन्हि। (दोनों आनन्दपूर्वक प्रस्थान करैत छथि) (किछ काल बाद, चारुदत्तक मित्र मैत्रेयक प्रवेश होइत अछि। हुनकर हाथमे एकटा कण्ठहार (रत्नावली) अछि जे चारुदत्तक पत्नी धूता अपन पति कऽ प्रतिष्ठा बचबाक लेल देलन्हि अछि) मैत्रेय: (चारू कात देखैत) आहा! आर्या वसन्तसेनाक ई प्रासाद सन घर देखि कऽ हमर आँखि चकाचौंध भऽ गेल अछि। ई तँ कोनो राजाक महल जकां अछि। आठ गोट पैघ-पैघ अङ्गन पार कऽ कऽ हम एतय पहुँचि गेल छी। कतहु सङ्गीतक ध्वनि भऽ रहल अछि, कतहु सुगन्धित भोजन बनि रहल अछि, तँ कतहु तोता-मैना बाजि रहल अछि। (दासी मैत्रेयकें वसन्तसेना पाँ लय जाइत अछि) दासी: मालकिन, आदरणीय चारुदत्तक परम मित्र मैत्रेय अयल छथि। वसन्तसेना: (आदरसँ उठि कऽ) मैत्रेय जी! अहाँक बहुत स्वागत अछि। कृपया बैठू। मैत्रेय: आर्या, अहाँकें आशीर्वाद। हम बैठि गेलहुँ। वसन्तसेना: हमर आदरणीय चारुदत्त सकुशल छथि नहि? मैत्रेय: हँ, ओ सकुशल छथि। मुदा ओ अहाँक धरोहर (मञ्जूषा) कऽ विषयमे एकटा संदेश पठौने छथि। वसन्तसेना: बाजू, की संदेश अछि? मैत्रेय: ओ ओही आभूषणक पेटारीकें जुआमे हारि गेलाह, ई बिसरि कऽ जे ओ हुनकर अपन नै छल, अहाँक न्यास छल। अतः ओ अपन भूलक पश्चाताप करैत, ओही मञ्जूषाक स्थान पर अपन पत्नीक ई बहुमूल्य रत्न-कण्ठहार (रत्नावली) पठौने छथि। कृपया एकरा स्वीकार करू आ चारुदत्तकें ऋणमुक्त करू। (ओ कण्ठहार देखाबैत छथि) वसन्तसेना: (मनहि मन हँसैत आ चारुदत्तक ईमानदारी पर मुग्ध होइत) चारुदत्त वास्तवमे कतेक उदार आ सत्यवादी छथि! हुनकर घरमे चोरी भेलन्हि, मुदा ओ जुआ कऽ बहाना बना कऽ हमर आभूषणक मूल्य चुका रहल छथि। वसन्तसेना: (कण्ठहार ग्रहण करैत छथि) मैत्रेय जी, अपन मित्रसँ कहब जे हम आइ संध्याकें स्वयं हुनकासँ मिलबाक लेल आबि रहल छी। ई कण्ठहार हम राखि लेलहुँ। मैत्रेय: (मनहि मन चिन्तित भऽ कऽ) सुन्दर! आब ई कण्ठहार सेहो गेल। ई गणिका सभ सभ किछु लय लैत छथि। नीक, हम जा कऽ चारुदत्तकें कहब जे वसन्तसेना संध्याकें आबि रहल छथि। (मैत्रेय प्रणाम कऽ कऽ प्रस्थान करैत छथि) पञ्चम अङ्क: दुर्दिन (लव-लोर्न / विरही चारुदत्त बैठल प्रकट होइत छथि) चारुदत्त: (आकाश कात देखैत आ लम्बा निश्वास छोड़ि कऽ) एकटा अकाल मेघ जमि रहल अछि। किएक तँ देखू! मयूर देखैत छथि आ अपन पंखा ऊपर उठबैत छथि; हँस सभ अपन प्रस्थानक विचार बिसरि गेल छथि; ई अकाल मेघ करिया आकाशकें आ विरही प्रेमीक हृदयकें व्याकुल कऽ रहल अछि। आ पुनः: एकटा गीला बैलक पेट जकां ई मेघ कोनो आन गम्भीर रङ्ग नै पहिरने अछि; बिजुलीक सुवर्ण कान्तिमयी चंचल ओढ़नी ओढ़ने, आ बक-पंक्ति जकां अपन बिगुल बजबय वाला सभक साथ आकाशकें आनन्दित करैत, ई मेघ आब आकाश पर ओनाहि सवार भऽ रहल अछि जेना साक्षात नारायण। आ पुनः एक बेर सेहो: नारायणक स्वरूप जकां करिया, चारू कात गोल घूमि कऽ उड़य वाला बगुला सभक बिगुल ध्वनि जकां नादसँ युक्त, आ बिजुलीक सुवर्ण-रेशमी वस्त्रसँ सुशोभित भऽ कऽ, ई मेघ आब वर्षा ऋतु कऽ आगमनक रूपमे आकाश पर आबि गेल अछि। जखन बिजुलीक ई चंचल दीपक जलि उठैत अछि, तँ मेघक ओही विशाल गर्भसँ मुसलाधार वर्षाक धार तीव्र गतिसँ खसत बुझाइत अछि; जेना आकाश कऽ घेरने ओही घोर अन्धकार कऽ छातीसँ कोनो टूटल रेशमी फीता क्षण भरि लेल चमकि कऽ अदृश्य भऽ गेल हो। कखनो उड़ैत मछली सभक जकां, कखनो चंचल जल-जन्तु सभक जकां, कखनो आपसमे सटल हँस-हँसिनीक जकां जे आकाश कऽ कोना कात उड़ि रहल हो, कखनो आपसमे जोड़ा बान्हि कऽ उड़य वाला चकोर सभक जकां, कखनो पैघ-पैघ पर्वत सभक चोटी जकां जे बहुत ऊँचाई पर ठाढ़ हो; एहन हजारों रूप सभमे ई उमड़ैत मेघ आपसमे आलिङ्गन कऽ रहल अछि, वायु कऽ झोंकासँ छिन्न-भिन्न भऽ कऽ पुनः इआपसमे मिलि रहल अछि, आ आकाशक एही पैघ पट पर कतेको अद्भुत चित्र उकेरि रहल अछि। ई आकाश धृतराष्ट्रक मुख जकां घोर अन्धकारमय आ करिया भऽ गेल अछि; कुरु-वंशक ओही अभिमानी योद्धा जकां अहङ्कारसँ भरल बुझि रहल अछि। अपन आनन्द प्रकट करैत ई चंचल मयूर चारू कात चीखि रहल अछि; कपरौआ (कोकिल) आब युधिष्ठिर कऽ ओही दुःखद स्थितिमे विवश भऽ कऽ कतहु वनमे भटकबाक लेल विदा भऽ गेल अछि, जे आब अपन प्राण बचेबाक लेल विरह कऽ दुःख सहि रहल अछि; हँस सभ कऽ आब अपन वन-आश्रय छोड़ि कऽ उड़बाक लेल विवश होना पड़ल छनि, जेना पाण्डु कऽ पुत्र सभ अपन अज्ञातवास लेल कोनो अपरिचित स्थान कात विदा भऽ गेलाह। (विचारमे डूबि कऽ) बहुत काल भऽ गेल जखनसँ मैत्रेय वसन्तसेना पाँ गेल छथि। आ अखन धरि ओ वापस नै अयल छथि। (मैत्रेयक प्रवेश होइत अछि) मैत्रेय: नास हो (नास हो!) ओही गणिकाक एही पैघ लोभ आ ओकर अशिष्टताकें! ई सोचू जे ओ कतेक कम समयमे हमर गप समाप्त कऽ देलक! बार-बार ओ केवल वैह बात दोहराबैत रहलीह जे ओ कतेक गम्भीर स्नेह राखैत छथि, आ ओकरा बाद बिना कोनो सङ्कोचक ओही बहुमूल्य कण्ठहारकें अपन पेटारी भीतर बन्द कऽ लेलन्हि। ओ पहिनेसँ एतेक धनी छथि जे ओ कम्तीसँ कम्ती एतेक तँ कहि सकैत छली: "उत्तम मैत्रेय, जरा रेस्ट कसरि। अहाँ कखनहि तब धरि नै जाब जब धरि अहाँ पानि कऽ एकटा कप नै लय लयब।" नास हो ओही गणिका कऽ! हम आशा करैत छी हम पुनः कहियो ओकर मुख नै देखब। (थकावटसँ) कहबी बिल्कुल सत्य अछि: "कोनो कमल कऽ गाछ बिना जड़ि कऽ पाबब कठीन अछि, कोनो एहन व्यापारी जे कहियो कपट नै करय ओकरा पाबब कठीन अछि, कोनो सुवर्णकार जे कहियो चोरी नै करय ओकरा पाबब कठीन अछि, कोनो गामक सभा बिना कोनो झगड़ाक होबय ओकरा देखब कठीन अछि, आ कोनो गणिका बिना पैघ लोभक होबय ओकरा पाबब कठीन अछि।" नीक, हम अपन मित्र पाँ जाब आ हुनका विवश करब जे ओ आब ओही गणिका कऽ संसर्गसँ सदा लेल दूर रहिथिन। (ओ चलैत छथि आ चारुदत्तकें देखैत छथि) आहा, हमर प्रिय मित्र बगीचामे बैठल छथि। हम हुनका पाँ जाब। (लग जा कऽ) अहाँकें प्रणाम। अहाँक कल्याण हो। चारुदत्त: (ऊपर देखि कऽ) आहा, हमर नित्य साथी मैत्रेय वापस आबि गेलाह। अहाँक बहुत स्वागत अछि, मित्र। कृपया बैठू। मैत्रेय: धन्यवाद। चारुदत्त: मित्र, अपन संदेश कऽ परिणाम बताउ। मैत्रेय: हमर संदेश पूर्ण रूपसँ विपरीत गेल। चारुदत्त: की! की ओ कण्ठहार स्वीकार नै कयलन्हि? मैत्रेय: हम सभ एहन भाग्यक आशा कसरि कऽ सकैत छलहुँ? ओ अपन कमल जकां सुकुमार हाथ अपन ललाट पर रखलन्हि, आ ओकरा तुरंत लय लेलन्हि। चारुदत्त: तखन अहाँ किएक कहि रहल छी जे "विपरीत गेल"? मैत्रेय: किएक नै, जखन हम सभ चारू समुद्रक गर्व वला कण्ठहार ओही सस्त माठिक सुवर्ण-मञ्जूषा लेल खो देलहुँ जे हमरा सभक हाथसँ पहिने चोराएल गेल छल, बिना कोनो एक ग्रास या पेय कऽ भेटबाक? चारुदत्त: एहन नै मित्र, एहन नै! ओ अपन विश्वास हमर पाँ छोड़ि कऽ अपन आदर देखौलक; विश्वासक मूल्य ओकरासँ कम नापक नै होइत अछि। मैत्रेय: आब सीधा हमर बात सुनू! हमर पाँ एकटा दोसर शिकायत अछि। ओ अपन सखी कात देखि कऽ एकटा गुप्त चितवन फिङ्कलक, अपन मुख वस्त्रक किनारसँ तोपि लेलक, आ हमर बेसी उपहास कयलक। आ एही लेल, यद्यपि हम एकटा ब्राह्मण छी, हम एतय अहाँक सम्मुख पएर पर खसि पड़बाक लेल तैयार छी आ प्रार्थना करैत छी जे आब ओही गणिका कऽ साथ कोनो सम्बन्ध नै राखब। एही प्रकारक समाज केवल पैघ क्षति पहुँचाबैत अछि। एकटा गणिका अहाँक जूता भीतर कऽ ओही कङ्कड़ जकां अछि जे जब धरि बाहर नै खसत, अहाँकें चलबामे कष्ट दऽ रहत। आ एकटा बात और, हमर मित्र: एकटा गणिका, एकटा हाथी, एकटा कायस्थ (लेखक), एकटा भिक्षु, एकटा धूर्त, आ एकटा गदहा—जतय ई सभ रहैत छथि, ओतय कोनो भला मनुष्य जनम सेहो नै लय सकैत। चारुदत्त: ओह, हमर मित्र, अहाँक एही कटु निन्दासँ बस! हमर दरिद्रता अपन आपमे हमर रक्षा कऽ रहल अछि। किएक तँ विचार कसरि: एकटा घोड़ा अपन इच्छासँ चारू कात दौड़बाक पराक्रम देखबैत अछि, मुदा जखन ओकर पएर शिथिल भऽ जाइत अछि आ ओकर श्वास टूटी जाइत अछि, तँ ओ विवश भऽ जाइत अछि। ओनाहि मनुष्यक चंचल इच्छा सभ चारू कात भ्रमण करैत अछि, मुदा अन्ततः थाकि कऽ ओकरा अपनहि हृदय भीतर वापस आबब पड़ैत अछि। आ पुनः पुनः, हमर मित्र: जदि अहाँक पाँ सुवर्ण अछि, तँ ओ सुकुमार कनियाँ अहाँकहि भऽ कऽ रहत, किएक तँ गणिका कऽ इच्छा सुवर्णसँहि जीतल जाइत अछि; (मनहि मन) मुदा ओ पवित्र गुणसँ कहियो नै झुकत। (प्रकट) मुदा आब सुवर्ण हमर पाँ अतुल्य नै बचल अछि, अतः हम ओकरा अपन बन्धनमे नै राखि सकी। मैत्रेय: (नीचां देखि कऽ। मनहि मन) जेना ओ ऊपर देखि कऽ गम्भीर निश्वास छोड़ि रहल छथि, हम ई निष्कर्ष निकालैत छी जे हमर ओकरा ध्यान भङ्ग करबाक उद्यम केवल हुनकर विरह-उत्कण्ठाकें आ पैघ कऽ देलक। कहबी सत्य अछि: "अहाँ कोनो प्रेमीकें बुद्धि नै सिखि सकैत छी।" (प्रकट) नीक तखन, ओ हमरा अहाँकें कहबाक लेल कहलनि अछि जे आइ संध्याकालकें ओ स्वयं एतय आबि रहल छथि। हम बुझैत छी ओ कण्ठहारसँ सन्तुष्ट नै भेलिह, आ आब कखनो आन वस्तु खोजबाक लेल आबि रहल छथि। चारुदत्त: ओकरा आबय दिय’, हमर मित्र। ओ कहियो एतयसँ असन्तुष्ट भऽ कऽ वापस नै जायत। (कुम्भीलकक प्रवेश होइत अछि) कुम्भीलक: सुनू, श्रेष्ठ भद्र लोक सभ, सुनू! जतेक बेसी ई मेघ चादर कऽ जकां खसि रहल अछि, ओतेक बेसी हमर ई चर्म गीला भऽ रहल अछि; जतेक तीव्र ई ठण्ढा वायु हमरा पर चोट कऽ रहल अछि, ओतेक बेसी हम त्राससँ काँपि रहल छी। (ओ बहुत पैघ अट्टहास / हँसबाक अभिनय करैत अछि) हम सात गोट सुराख वला बाँसुरीसँ मधुर स्वर निकालि जनैत छी, हम सात गोट तार वला वीणासँ गम्भीर नाद निकालि जनैत छी; गाबबाक काजमे हम स्वयं गदहा कऽ ओही श्रेष्ठ भूमिकाकें मात दैत छी; कोनो एहन देवता नै छथि जे हमर सङ्गीतक सामना कऽ सकथि जखन हम गाबब आरम्भ करैत छी। हमर मालकिन वसन्तसेना हमरा कहलनि जे "कुम्भीलक, जाउ आ चारुदत्तकें कहू जे हम आबि रहल छी।" अतः आब हम चारुदत्तक घरक मार्ग पर छी। (ओ चारू कात घूमि कऽ चलैत अछि आ प्रवेश करैत चारुदत्तकें देखैत अछि) एतय चारुदत्त बगीचामे छथि। आ एतय ई पापी बौना मैत्रेय सेहो अछि। नीक, हम हुनका सभक लग जाब। की! बगीचा कऽ मुख्य दुआरि बन्द अछि? सुन्दर! हम एही बौनाकें एकटा सङ्केत देब। (ओ माठिक ढेला फिङ्कैत अछि) मैत्रेय: की! के अछि जे हमरा पर एही प्रकार माठिक ढेला फिङ्कि रहल अछि, जेना हम कोनो बाड़ कऽ भीतर कऽ सेव कऽ गाछ छी? चारुदत्त: निश्चित रूपसँ ई कपरौआ सभ भऽ सकैत अछि जे बगीचा कऽ छत पर खेलि रहल अछि। मैत्रेय: एक क्षण रुकू, अहाँ पापी कपरौआ! एही लाठीसँ हम अहाँकें ओतयसँ सीधा भूमि पर ओनाहि खसाबब जेना कोनो बेसी पाकि गेल आमक फल खसि पड़ैत अछि। (ओ अपन लाठी उठाबैत अछि आ दौड़बाक यत्न करैत अछि) चारुदत्त: (मैत्रेयकें जज्ञोपवीत्सँ पकड़ि कऽ रोकि दैत छथि) बैठू, हमर मित्र, बैठू। अहाँक की अर्थ अछि? ओही बेचार कपरौआ कऽ अपन साथी कऽ साथ आनन्द लेबय दिय’। कुम्भीलक: की! ओ कपरौआ कऽ देखि रहल अछि आ हमरा नै देखि रहल अछि? सुन्दर! हम ओकरा पर एकटा दोसर माठिक ढेला फिङ्कब। (ओ ओनाहि करैत अछि) मैत्रेय: (चारू कात देखैत) की! कुम्भीलक? हम एक क्षणमे अहाँक पाँ आबि रहल छी। (ओ लग जाइत अछि आ दुआरि खोलैत अछि) नीक, कुम्भीलक, भीतर आबब। अहाँक देखि कऽ हमरा प्रसन्नता भेल। कुम्भीलक: (भीतर आबि कऽ) हम अहाँकें प्रणाम करैत छी, सर। मैत्रेय: अहाँ एही घोर वर्षा आ अन्धकारमे कतयसँ आबि रहल छी, मनुष्य? कुम्भीलक: अहाँ देखि सकैत छी, ओ एतय अछि। मैत्रेय: ओ के अछि? ओ कतऽ अछि? कुम्भीलक: ओ। देखलहुँ? ओ। मैत्रेय: सीधा हमर बात सुनू, अहाँ एकटा दासीपुत्र! अहाँ किएक एही प्रकार गम्भीर निश्वास छोड़ि रहल छी जेना कोनो अकाल कऽ समय कऽ आधा-भूखा बूढ़ा भिखारी चिल्लाएत अछि, अपन एही "ओ-ओ-ओ" कऽ साथ? कुम्भीलक: आ अहाँ किएक एही प्रकार चारू कात चिल्लाइ रहल छी जेना कोनो उल्लू चिल्लाएत अछि, अपन एही "के-के-के" कऽ साथ? मैत्रेय: बहुत नीक। आब हमरा बताउ। कुम्भीलक: (मनहि मन) मानू हम एककरा एही प्रकार कहब। (प्रकट) हम अहाँकें एकटा पहेली देब, मनुष्य। मैत्रेय: आ हम अहाँकें ओकर उत्तर अपन पएर कऽ ठोकरसँ अहाँक एही चन्दिया पर देब। कुम्भीलक: जब धरि अहाँ एकर अनुमान नै कऽ लयब, तब धरि नै। बुझू: आमक गाछ कोन ऋतुमे फूल दैत अछि? मैत्रेय: गरमी कऽ ऋतुमे, अहाँ गदहा। कुम्भीलक: (हँसैत) भूल भेल! मैत्रेय: (मनहि मन) आब हम की कहब? (सोचैत) सुन्दर! हम जा कऽ चारुदत्तसँ पूछब। (प्रकट) बस एक क्षण प्रतीक्षा करू। (चारुदत्तक लग जा कऽ) हमर मित्र, हम मात्र एतेक जनबाक इच्छा राखैत छलहुँ जे आमक गाछ कोन ऋतुमे फूल दैत अछि। चारुदत्त: अहाँ मूर्ख छी, हमर मित्र। बसन्त कऽ ऋतुमे, वसन्तमे। मैत्रेय: (कुम्भीलक पाँ वापस आबि कऽ) अहाँ मूर्ख छी, वसन्तमे। कुम्भीलक: आब हम अहाँकें एकटा दोसर देब। समृद्ध गाम सभ कऽ रक्षा के करैत अछि? मैत्रेय: किएक, ओही रक्षक। कुम्भीलक: (हँसैत) भूल भेल! मैत्रेय: नीक, हम आब फसि गेल छी। (सोचैत) सुन्दर! हम चारुदत्तसँ पुनः पूछब। (ओ वापस जाइत अछि आ चारुदत्त सम्मुख वैह प्रश्न रखैत अछि) चारुदत्त: सेना, हमर मित्र, सेना। मैत्रेय: (कुम्भीलक पाँ वापस आबैत) सेना, अहाँ गदहा, सेना। कुम्भीलक: आब दोनों कऽ एक साथ मिलाउ आ बहुत तीव्र गतिसँ बाजू। मैत्रेय: सेना-वसन्त। कुम्भीलक: एककरा उलट कऽ बाजू। मैत्रेय: (अपन शरीर घुमा कऽ घूमि जाइत अछि) सेना-वसन्त। कुम्भीलक: अहाँ मूर्ख छी! अहाँ बौना छी! शब्द कऽ ओही भाग कऽ उलट कऽ बाजू! मैत्रेय: (अपन पएर उलट कऽ घुमाबैत अछि) सेना-वसन्त। कुम्भीलक: अहाँ महामूर्ख छी! शब्द कऽ अक्षर कऽ उलट कऽ बाजू! मैत्रेय: (किछ काल गम्भीर चिन्तनक बाद) वसन्त-सेना। कुम्भीलक: ओ एतय आबि गेल अछि। मैत्रेय: तब हमरा अवश्य चारुदत्तकें सूचित करबाक चाही। (लग जा कऽ) नीक, चारुदत्त, अहाँक उत्तमर्ण (कर्जदाता) दुआरि पर अछि। चारुदत्त: हमर कुल भीतर कोनो कर्जदाता कसरि प्रवेश कऽ सकैत अछि, मित्र? मैत्रेय: कुल भीतर नै मुदा दुआरि पर निश्चित अछि। वसन्तसेना एतय अछि। चारुदत्त: अहाँ हमरा किएक छलि रहल छी, हमर मित्र? मैत्रेय: जदि अहाँकें हमर विश्वास नै अछि, तँ एही कुम्भीलकसँ पूछू। कुम्भीलक, अहाँ गदहा, एतय आबब। कुम्भीलक: (लग जा कऽ) हम अहाँकें प्रणाम करैत छी, सर। चारुदत्त: अहाँक बहुत स्वागत अछि, हमर नीक मनुष्य। हमरा बताउ, की वसन्तसेना वास्तवमे एतय अछि? कुम्भीलक: हँ, ओ एतय अछि। वसन्तसेना एतय आबि गेल अछि। चारुदत्त: (परम आनन्दसँ भरि कऽ) हमर नीक मनुष्य, हम स्वागत योग्य समाचार लाबय वाला कें कहियो बिना पुरस्कारक विदा नै कयलहुँ अछि। एककरा अपन पारितोषिक कऽ रूपमे स्वीकार करू। (ओ अपना काँखिसँ ओही चमेलीक सुगन्ध वला दुपट्टा ओकरा दऽ दैत छथि) कुम्भीलक: (ओकरा ग्रहण कऽ कऽ आ मुड़ झुका कऽ। अत्यधिक प्रसन्नतासँ) हम जा कऽ अपन मालकिनकें कहब। (ओ प्रस्थान करैत अछि) मैत्रेय: की अहाँ देखि सकैत छी जे ओ एहन भयानक आंधी-तूफान भीतर किएक आबि रहल अछि? चारुदत्त: हम पूर्णतः नै बुझि पाबि रहल छी, हमर मित्र। मैत्रेय: हम जनैत छी। ओकर विचार अछि जे कण्ठहार बहुत सस्त अछि, आ सुवर्ण-मञ्जूषा बहुत बहुमूल्य छल। ओ सन्तुष्ट नै भेलिह, आ आब कखनो आन वस्तु खोजबाक लेल अयल अछि। चारुदत्त: (मनहि मन) ओ कहियो एतयसँ असन्तुष्ट भऽ कऽ वापस नै जायत। (तखन यथोक्त सुवर्ण वस्त्र पहिरने, विरह-उत्कण्ठासँ भरल वसन्तसेना अपन दासी (जे हाथमे छाता पकड़ने अछि) आ ओही राजदरबारी विट कऽ साथ प्रवेश करैत छथि) विट: (वसन्तसेना कात देखि कऽ) साक्षात लक्ष्मी छथि जे बिना कमल कऽ प्रकट भेल छथि, कामदेव कऽ धनुषसँ निकसल सभसँ सुकुमार बाण छथि, साक्षात प्रेमक जादुई वृक्ष पर खिलल सभसँ मधुर पुष्प छथि। देखू ओ कतेक मन्द आ सुकुमार चालिसँ चलि रहल छथि! कामुकताक एही क्षणमे सेहो ओ अपन लज्जा आ शालीनताकें ओनाहि तोपने छथि; उत्तम पत्नी सभ सेहो हुनका देखि कऽ अपन विरह-दुःख बिसरि जाइत छथि। जखन प्रेमक नाटक रङ्गमञ्च पर आरम्भ होयत, जखन एही प्रेमक उत्सव प्रकट होयत, तँ हजारों पथिक सभ अपन मुड़ झुका कऽ हुनकर सम्मुख ठाढ़ होबाक लेल लालायित रहत। ओ प्रसन्नतासँ एही सुन्दर दासता कऽ बन्धन स्वीकार करत। देखू, वसन्तसेना, देखू! ई मेघ पर्वत कऽ चोटिसँ ओनाहि सटल अछि जेना कोनो कनियाँ अपन दूर गेल प्रेमीकें खोजि कऽ सटि जाइत अछि; जखन वज्र कऽ गम्भीर नाद गुञ्जि रहत, तँ मयूर अपन सभ रत्न-जड़ित पंखा उठा कऽ आकाश कऽ हवा देत। आ पुनः सेहो: माठिसँ सटल, आ मुसलाधार वर्षा कऽ धारसँ भीजल, बेंग सभ आकाश कऽ बून्द पीबाक लेल व्याकुल अछि; अपन पूर्ण कण्ठसँ मयूर अपन तीव्र काम-वासना प्रकट कऽ रहल अछि, आ नीप कऽ फूल चारू कात जलि उठल दीपक जकां चमकि रहल अछि; अविश्वासी मेघ एही बन्धक चन्द्रमा कऽ कान्तिकें तोपि देलक अछि, जेना कोनो धूर्त कोनो बहुमूल्य रत्न चोरा लैत अछि; कोनो कुलीन मुदा असहाय कनियाँ कऽ जकां, ई चंचल बिजुली आकाशमे कतहु एक क्षण लेल स्थिर नै रहि पाबि रहल अछि। वसन्तसेना: सर, अहाँक कहब पूर्णतः सत्य अछि। किएक तँ ई राति, एकटा ईर्ष्यालु सौतिन कऽ जकां, हमर मार्ग रोकि रहल अछि; ओकर ई भयानक गर्जन हमरा रोकबाक आ छलबबाक यत्न कऽ रहल अछि: "अहाँ अपन प्रेमी पाँ कखनहि नै जा सकब, ओ मात्र हमरासँ प्रेम करैत छथि," ओ एहनहि बाजय बुझाइत अछि, "आ हमर एही गम्भीर छातीक बन्धनसँ ओ कखनहि मुक्त नै भऽ सकैत छथि।" विट: हँ, हाँ। ई बिल्कुल उचित अछि। अहाँ एही रातिकें अवश्य डाँटू। वसन्तसेना: आ तइयो, सर, एही प्रकारक अज्ञानी (जे स्त्रीक स्वभाव नै जनैत अछि) कऽ डाँटलासँ की लाभ! किएक तँ अहाँकें मोन राखबाक चाही: मेघ कतेकौ मुसलाधार वर्षा करय, कतेकौ भयानक गर्जन कसरि, वा आकाशक ऊपरसँ बिजुली कसरि चमकय; ओ सुकुमार कनियाँ गरमी या जाड़क कोनो चिन्ता नै करैत, जकर आत्मा प्रेमी कात विदा भऽ गेल हो। विट: मुदा देखू, वसन्तसेना! एकटा दोसर मेघ, वायु कऽ चंचल वेगसँ तीव्र गतिसँ आबि कऽ—अपन बौछार कऽ हजारों बाण सभक धार फिङ्कि रहल अछि, ओकर गम्भीर नाद जेना कोनो पैघ युद्धक नगाड़ा बाजि रहल हो, बिजुलीक चंचल चमक जेना ओकर भयानक विजय-पताका हो—ई मेघ आकाश भीतर अपन पूर्ण पराक्रम देखा कऽ ओनाहि ठाढ़ अछि, जेना कोनो प्रतापी वीर राजा अपन शत्रु कऽ ओही दुर्बल दुर्ग भीतर घुसि कऽ अपन पूर्ण अधिकार प्रकट करैत अछि जे चन्द्रमा कऽ कान्तिकें अपन अधीन कऽ लेलक अछि। वसन्तसेना: सत्य, सत्य। आ एकरासँ बेसी ई अछि: करिया हाथी कऽ ढेरी जकां, ई मेघ चारू कात उमड़ि कऽ हमर छाती पर एकटा कूर बाण जकां चोट कऽ रहल अछि; जकर शरीर बिजुलीक रेखा आ सफेद पक्षी सभक पङ्क्तिसँ सुशोभित अछि। मुदा, ओह! ककरो काल जकां बुझय वाला ई बक पक्षी अपन ओही भयानक नाद "वर्षा! वर्षा! वर्षा!" कऽ साथ किएक चिल्लाइ रहल अछि—जे सीधा श्मशान कऽ निमन्त्रण बुझाइत अछि ओही अभागिन कनियाँ लेल जे अपन विरहक क्षण घोर अन्धकार भीतर बिता रहल अछि; ई तँ घाव पर नून छिटबाक जकां कष्ट दऽ रहल अछि। विट: बहुत सत्य कहलहूँ, वसन्तसेना। आ एक बेर पुनः देखू: एहन बुझाइत अछि जेना आकाश स्वयं एकटा पैघ प्रशिक्षित हाथीक रूप धारण कऽ लेलने हो; बिजुली ओकर चंचल सूँढ़ पर हवामे लहराएत पताका जकां अछि, आ सफेद बगुला सभ ओकर पैघ मस्तक कऽ आभूषण बुझि रहल अछि। वसन्तसेना: मुदा देखू, सर, देखू! मेघ, जे करिया तमाल कऽ पत्ता जकां करिया अछि, आकाशक पट कऽ चारू कातसँ तोपि देलक अछि; वर्षा कऽ मारिसँ मूषक सभक खोता नष्ट भऽ कऽ खसि रहल अछि जेना कोनो पशु बाण लगलासँ सीधा भूमि पर खसि पड़ैत अछि; कोनो पैघ कुलीन महल भीतर जलि उठल सुवर्ण-दीपक जकां ई चंचल बिजुली चारू कात भ्रमण कऽ रहल अछि; जेना लोक कोनो दुर्बल दासक पत्नी चोरा लैत अछि, ओनाहि एही मेघ चन्द्रमा कऽ कान्तिकें अपन अधीन कऽ चोरा लेलने अछि। विट: देखू, वसन्तसेना, देखू! मेघ, जकर शरीर बिजुलीक चमक कऽ बन्धनसँ जकड़ल अछि, कोनो प्रखर युद्धक हाथी जकां चारू कात दौड़ि रहल अछि; इन्द्र कऽ आदेशसँ ओ अपन मुसलाधार धार कऽ एहन बौछार कऽ रहल अछि, जेसँ बुझाइत अछि पृथ्वी आ आकाश आपसमे चाँदीक हजारों फीतासँ बान्हि देल गेल हो। आ ओतय देखू! भैंस कऽ झुण्ड जकां ई मेघ चारू कात करिया भऽ गेल अछि; वायु ओकरा एक क्षण लेल स्थिर रहबाक अवकाश नै दऽ रहल अछि; बिजुलीक पाँखि लगा कऽ ओ चारू कात ओनाहि उड़ि रहल अछि जेना कोनो चंचल समुद्र अपन मर्यादा तोड़ि कऽ उमड़ि रहल हो। वर्षा कऽ बून्द सभक प्रहारसँ भीजल, पृथ्वी कऽ ई छाती जाहि पर हरियर घास उगि गेल अछि, ओ आब मोती कऽ हजारों पेटारी जकां बुझि रहल अछि जाहि पर बाण जकां धार खसि रहल अछि। वसन्तसेना: आ एतय एकटा दोसर मेघ अछि। मयूर अपन पूर्ण कण्ठसँ एककरा लग आबबाक लेल पुकारि रहल अछि; आ कामुक बक पक्षी आकाश कऽ ऊँचाई पर एककरा अपन आलिङ्गनमे लय रहल अछि। विरही हँस आकाश कऽ ओही मधुर रूप कात देखि रहल अछि; आ घोर करिया रङ्ग आकाश पर सदा लेल जमि गेल बुझि रहल अछि। विट: सत्य। किएक तँ देखू! हजारों कमल जे राति कऽ समय खिलैत छलाह, हजारों जे दिन कऽ प्रकाशमे खिलैत छलाह, ओ आब आकाश कऽ ओही रूप कात देखि कऽ अपन आँखि बन्द कसरि वा खोलथि, एकर विवेक खो देने छथि; राति आ दिनक कोनो भेद नै बचल अछि। आकाशक मुख, जे रातिक एही अन्धकारमे तोपल अछि, ओ मात्र एकटा क्षण लेल बुझाइत अछि जखन बिजुली क्षण भरि लेल चमकि कऽ अदृश्य भऽ जाइत अछि; अन्यथा सभ कात सदा लेल घोर अन्धकार अछि। आब समस्त संसार ओनाहि गम्भीर चेतनाहीन भऽ कऽ सुतल अछि जेना वर्षा कऽ एही घर भीतर आन किछु नै बचल हो, जतय मेघक उमड़ैत रङ्ग आकाश पर एकटा विशाल धुँधुआयल ओढ़नी जकां जमि गेल अछि। वसन्तसेना: सत्य। आ देखू! तारा सभ ओनाहि अदृश्य भऽ गेल अछि जेना कोनो दुष्ट मनुष्य कऽ कयल गेल उपकार अदृश्य भऽ जाइत अछि; अपन प्रेमीसँ अलग भऽ कऽ कानय वाली कनियाँ कऽ जकां, आकाश अपन सभ रूप आ वैभव खो देने अछि। आ इन्द्र कऽ वज्र कऽ कूर प्रहारसँ जरि कऽ, एहन बुझाइत अछि जेना आकाश स्वयं पिघलि कऽ हमर पएर पर पानि कऽ धार जकां बहि रहल हो। आ पुनः एक बेर सेहो: मेघ पहने घोर अन्धकार कऽ साथ उठैत अछि, पुनः मुसलाधार धार कऽ साथ खसि पड़ैत अछि, आ चारू कात भयानक नाद कऽ साथ गर्जन करैत अछि; कतेको प्रकारक विचित्र आ टेढ़ रूप धारण करैत अछि जेना कोनो नीच मनुष्य अचानक प्रचुर सुवर्ण पा कऽ अहङ्कारमे चारू कात अपन रूप देखबैत अछि। विट: सत्य। आकाश बिजुलीक चंचल लौ कऽ साथ अट्टहास कऽ रहल अछि; हजारों बक पक्षी सभक तीव्र चीख जेना ओकर हँसबाक आवाज हो; वायु कऽ झोंका कऽ साथ खसय वाला वज्र जेना ओकर गम्भीर नाद हो; वर्षा कऽ धार जेना ओकर बाण हो जाहि पर ओ नृत्य कऽ रहल अछि। वायु कऽ प्रखर वेगसँ ओ लड़खड़ा रहल अछि, आ मेघक एही करिया रूप कऽ जेना ओ अपन साँप वला ओढ़नी बक कऽ ओढ़ने हो, चारू कात धुँआ निकालि रहल अछि। वसन्तसेना: ओह लज्जाहीन, लज्जाहीन आकाश! अहाँ किएक एही प्रकार भयानक गर्जन कऽ रहल छी, जखन हम अपन प्रियतम कऽ लग पहुँचि गेल छी? अहाँक एही वर्षा कऽ हाथ हमरा त्राससँ किएक जकड़ि रहल अछि? ओह इन्द्र, महाशक्तिशाली इन्द्र! की हम पहने कहियो अहाँ कऽ अपन प्रेम अर्पण कयलहुँ छल, जे आब अहाँक ई मेघ सिंह जकां भयानक नाद कऽ रहल अछि? आह नै! अहाँकें हमर मार्गमे एही प्रकार मुसलाधार वर्षा कऽ धार नै फिङ्कबाक चाही छल, जे हमर प्रियतम कात जाबय वाला मार्गमे एतेक कष्ट दऽ रहल अछि। मोन राखू: अहल्या कऽ सुकुमार रूप लेल अहाँ स्वयं पहने कतेको कष्ट सहलहुँ छल; अहाँ एकटा प्रेमीक विरह-दुःख नीक जकां जनैत छी। जेना अहाँ ओही समय कष्ट सहलहुँ छल, ओनाहि आब हम सहि रहल छी; ओह कूर, अपन ई वर्षा बन्द कसरि। आ तइयो: अहाँ कतेकौ भयानक गर्जन कसरि, कतेकौ मुसलाधार वर्षा कऽ धार खसाबय, वा आकाश कऽ ऊपरसँ बिजुली कसरि चमकय; ओ सुकुमार कनियाँ कखनहि नै रुकि सकैत, जकर आत्मा प्रेमी कात विदा भऽ गेल हो। मेघ कऽ गर्जन तँ गम्भीर अछि, किएक तँ पुरुष जाति सदा कूर होइत अछि; मुदा ओह अहाँ चंचल बिजुली कनियाँ! की अहाँ पहने कहियो कोनो कनियाँ कऽ विरह-दुःख नै जनलहुँ? विट: मुदा मालकिन, अहाँ बिजुलीकें कटु शब्द नै कहू। ओ अहाँक परम मित्र अछि, इन्द्र कऽ ओही श्रेष्ठ हाथी कऽ छाती पर सुवर्ण कऽ फीता जकां सुशोभित अछि; पर्वत कऽ चोटी पर जलि उठल कोनो पैघ पताका जकां अछि; इन्द्र कऽ महल भीतर जलि उठल दीपक जकां अछि; मुदा सभसँ पैघ वरदान ई अछि जे ओ अपन चमकसँ अहाँकें प्रियतमक स्थान देखा रहल अछि। वसन्तसेना: आ एतय, सर, हुनकर घर अछि। विट: अहाँ सभ कला जनैत छी, आ आब अहाँकें कोनो शिक्षाक आवश्यकता नै अछि। मुदा प्रेम हमरा बाजय लेल विवश कऽ रहल अछि। जखन अहाँ भीतर प्रवेश करब, अहाँकें अपन क्रोध बेसी प्रकट नै करबाक चाही। जतय अत्यधिक क्रोध होइत अछि, ओतय प्रेम नष्ट भऽ जाइत अछि; वा बेसी नीक कहू, बिना कोनो गम्भीर क्रोधक, प्रेमक मधुरता प्रकटहि नै होइत। अहाँ क्रुद्ध होऊ! अपन प्रियतमकें क्रुद्ध कसरि! पुनः कृपालु होऊ! आ अपन प्रियतमकें कृपालु कसरि—जकरा अहाँ प्रेम करैत छी। ओकर एतेक तँ भऽ गेल। भीतर के अछि? चारुदत्तकें सूचित कयल जाय जे जखन मेघ अपन पूर्ण सुन्दरता देखा रहल अछि, आ नीप आ कदम्ब कऽ फूलक सुगन्धसँ संध्याकालक ई क्षण मधुर भऽ गेल अछि, ओ आब अपन प्रेमी कऽ देखबाक लेल अयल अछि, भीजल वस्त्र कऽ साथ; अपन गीला अलक कऽ साथ, मुदा प्रसन्न आ अनुरागसँ भरल; यद्यपि बिजुली आ वज्र ओकरा डराबबाक यत्न कयलक, ओ अपन प्रियतम लेलहि अयल अछि; ओ हुनका लेलहि गम्भीर निश्वास छोड़ि रहल अछि। मार्गक माठिसँ ओकर नूपुर भीजि गेल अछि, मुदा एक क्षण भीतर ओ प्रियतम कऽ चरणमे पहुँचि कऽ मधुर भऽ जायर। चारुदत्त: (सुनैत) हमर मित्र, कृपया पता लगाउ एकर की अर्थ अछि। मैत्रेय: हँ, सर। (ओ वसन्तसेनाक लग जाइत अछि। आदरसँ) अहाँक कल्याण हो! वसन्तसेना: हम अहाँकें प्रणाम करैत छी, सर। अहाँक देखि कऽ हमरा प्रसन्नता भेल। (विट कें) सर, छाता पकड़ने ई नौकर आब अहाँक सेवामे उपस्थित अछि। विट: (मनहि मन) हमरा एतयसँ विदा करबाक एकटा बहुत सुन्दर तरीका। (प्रकट) धन्यवाद। आर्या वसन्तसेना, अहाँक मुख कतेक अद्भुत अछि, अहङ्कार, चातुर्य, मधुर कला, आ छल—ई सभ अहाँक मुख पर सुशोभित अछि; कामदेव कऽ क्रीड़ाक पावन स्थल अहाँक मुख अछि; एकटा गणिकाक सभ कलाक भण्डार, आ साक्षात स्वर्गक सुख अछि अहाँक मुख—जे बजार भीतर केवल शिष्टाचार कऽ सिक्कासँहि कीनल जा सकैत अछि। हम आशा करैत छी अहाँकें एकटा एहन पुरुष भेटत जे अहाँक एही शिष्टाचारक मूल्य चुका सकथि। (विट प्रस्थान करैत छथि) वसन्तसेना: उत्तम मैत्रेय, अहाँक वसन्त-कर (जुआड़ी) कतऽ छथि? मैत्रेय: (मनहि मन) "जुआड़ी"? आहा, ओ हमर मित्रकें एकटा बहुत सुन्दर उपाधि दऽ रहल छथि। (प्रकट) मैडम, एतय ओ बगीचामे छथि जे पूर्णतः सूखि गेल अछि। वसन्तसेना: मुदा सर, अहाँ एककरा सूखल बगीचा किएक कहि रहल छी? मैत्रेय: मैडम, ई एकटा एहन स्थान अछि जतय खाय वा पीबाक लेल एकटा वस्तु नै बचल अछि। (वसन्तसेना हँसैत छथि) भीतर आबब, मैडम। वसन्तसेना: (अपन दासी कें फुसफुसाबैत) जखन हम भीतर प्रवेश करब, तँ हम की कहब? दासी: "जुआड़ी जी, आइ संध्याकालक जुआमे की भाग्य छल?" वसन्तसेना: की हम एहन बाजय लेल साहस कऽ सकब? दासी: जखन समय आबि जाइत अछि, तँ शब्द अपन आप निकसि जाइत अछि। मैत्रेय: भीतर आबब, मैडम। वसन्तसेना: (भीतर जाइत छथि, चारुदत्तक लग पहुँचैत छथि, आ हाथ कऽ फूलसँ हुनका पर सुकुमार प्रहार करैत छथि) नीक, जुआड़ी जी, आइ संध्याकालक जुआमे की भाग्य छल? चारुदत्त: (ओकरा देखैत छथि) आहा, वसन्तसेना एतय आबि गेल छथि! (ओ आनन्दसँ उठैत छथि) ओह हमर प्रियतम, हमर संध्याकालक ई क्षण सदा अहाँक मार्ग देखबामे बीतैत छल, हमर राति विरह कऽ गम्भीर निश्वास छोड़बामे बीतैत छल; आब अहाँक आगमन जेना हमर एही विरह कऽ दुःखद अन्त कऽ देलक। अहाँक बहुत स्वागत अछि। एतय आसन अछि। कृपया बैठू। मैत्रेय: एतय आसन अछि। बैठू, मैडम। (वसन्तसेना बैठैत छथि, पुनः आन सभ) चारुदत्त: मुदा देखू, हमर मित्र, वर्षा कऽ धारसँ भीजल, ओकर कानक आभूषण नीचां झुकि गेल अछि; आ ओकर सुकुमार छाती पर चन्दनक उबटन एहन सुशोभित भऽ रहल अछि, जेना कोनो प्रतापी राजा कऽ मस्तक पर सुवर्ण कऽ राजमुकुट। हमर मित्र, आर्या वसन्तसेनाक वस्त्र भीजि गेल अछि। कखनो आन, आ सभसँ सुन्दर वस्त्र लाएल जाय। मैत्रेय: हँ, सर। दासी: उत्तम मैत्रेय, अहाँ एतहि रहू। हम स्वयं अपन मालकिनक सेवा करब। (ओ वस्त्र ठीक करैत अछि) मैत्रेय: (चारुदत्त कें फुसफुसाबैत) हमर मित्र, हम आर्या कऽ एकटा प्रश्न पूछबाक इच्छा राखैत छी। चारुदत्त: तँ पूछू। मैत्रेय: (प्रकट) मैडम, अहाँ एही भयानक आंधी-तूफान आ अन्धकारमे किएक अयलहूँ, जखन आकाशमे चन्द्रमा सेहो देखि नै रहल छथि? दासी: मालकिन, ई ब्राह्मण बहुत सीधा बाजय वाला छथि। वसन्तसेना: अहाँ एककरा चतुर कहू तँ बेसी नीक। दासी: हमर मालकिन एतय पूछबाक लेल अयल छथि जे ओही मोती कऽ कण्ठहारक मूल्य की अछि। मैत्रेय: (चारुदत्त कें फुसफुसाबैत) देखलहूँ! हम पहिनेहि कहलहुँ छल। ओ बुझैत छथि जे कण्ठहार बहुत सस्त अछि, आ सुवर्ण-मञ्जूषा बहुत बहुमूल्य छल। ओ सन्तुष्ट नै भेलिह। ओ कखनो आन वस्तु खोजबाक लेल अयल अछि। दासी: किएक तँ हमर मालकिन बुझलन्हि जे ओ मञ्जूषा हुनकर अपनहि छल, आ ओ ओकरा जुआमे हारि गेली। आ आब ककरो नै जनैत अछि जे जुआघरक मालिक कतऽ अछि, किएक तँ ओ राजा कऽ कार्यमे व्यस्त अछि। मैत्रेय: मैडम, अहाँ मात्र वैह बात दोहरा कऽ कहि रहल छी जे पहने ककरो द्वारा कहल गेल छल। दासी: जब धरि हम सभ ओकरा खोजि रहल छी, कृपया अहाँ एही सुवर्ण-मञ्जूषा कऽ ग्रहण कसरि। (ओ पेटारी देखाबैत अछि। मैत्रेय संशय करैत छथि) सर, अहाँ एककरा एतेक गम्भीरतासँ किएक देखि रहल छी? की अहाँ एककरा पहने कहियो देखलहुँ अछि? मैत्रेय: नै मैडम, मुदा एकर सुकुमार कला मनुष्य कऽ आँखि चोरा लैत अछि। दासी: अहाँक आँखि भ्रम भीतर अछि, सर। ई वैह सुवर्ण-मञ्जूषा अछि। मैत्रेय: (परम आनन्दसँ भरि कऽ) वेल, हमर मित्र, ई वैह सुवर्ण-मञ्जूषा अछि जे चोर सभ हमर घरसँ आधी रातिमे चोरायने छल। चारुदत्त: हमर मित्र, जे कला हम सभ पहने ओकर धरोहर वापस करबाक लेल कयलहुँ छल, ओही कलाक आब हमरा सभ पर प्रयोग कयल जा रहल अछि। मुदा नै! हम कसरि विश्वास कऽ सकी जे ई वास्तवमे सत्य अछि। मैत्रेय: मुदा ई सत्य अछि। हम अपन ब्राह्मणत्व कऽ कसम खाइत छी। चारुदत्त: ई वास्तवमे परम प्रिय समाचार अछि। मैत्रेय: (चारुदत्त कें फुसफुसाबैत) हम पूछब जे एककरा ई कतऽ भेटल। चारुदत्त: एकरामे कोनो हानि नै अछि। मैत्रेय: (दासीक कान भीतर फुसफुसाबैत अछि) तँ एतय! दासी: (मैत्रेयक कान भीतर फुसफुसाबैत अछि) तँ ओतय! चारुदत्त: एकर की अर्थ अछि? आ हमरा सभकें बाहर किएक राखल गेल अछि? मैत्रेय: (चारुदत्तक कान भीतर फुसफुसाबैत अछि) तँ ओतय भेल! चारुदत्त: हमर नीक कनियाँ, की ई वास्तवमे वैह सुवर्ण-मञ्जूषा अछि? दासी: हँ सर, बिल्कुल वैह। चारुदत्त: हमर नीक कनियाँ, हम स्वागत योग्य समाचार लाबय वाला कें कहियो बिना पुरस्कारक विदा नै कयलहुँ अछि। एककरा अपन पारितोषिक कऽ रूपमे स्वीकार करू। (ओ अपन अङ्गुलि कात देखैत छथि आ देखैत छथि जे अङ्गुलिमे कोनो अङ्गुठी नै बचल अछि, ओ लज्जित भऽ जाइत छथि) वसन्तसेना: (मनहि मन) हम अहाँक एही सादगी पर आ मोहित भऽ गेलहुँ। चारुदत्त: (मैत्रेय कें फुसफुसाबैत) हाय! जखन मनुष्य एही संसार भीतर अपन सभ सुवर्ण खो दैत अछि, तँ ओकर लम्बा जीवन जिबैत रहबाक इच्छा क कोन अर्थ बचि जाइत अछि? ओकर आदर आ ओकर दण्ड कऽ कोनो मूल्य नै रहि जाइत, ओकर सभ उद्यम आ शक्ति आपसमे टूटि जाइत अछि। बिना पाँखि कऽ पक्षी जकां, सूखल गेल पोखरि जकां, वा विरस भऽ गेल वृक्ष जकां, बिना दाँत कऽ साँप जकां—दरिद्र मनुष्य कऽ स्थिति एही संसार भीतर एहनहि भऽ जाइत अछि। मनुष्य-रहित सुनसान घर जकां, वज्र-प्रहारसँ जरि गेल वृक्ष जकां, सूखल गेल कुआँ जकां—दरिद्र मनुष्य कऽ स्थिति एहनहि भऽ जाइत अछि। ओकर जीवनक कोनो क्षण मधुर उत्सव नै बनि पाबैत, ओ अपन पूर्व हृदयक मित्र सभ द्वारा सेहो बिसरा देल जाइत अछि। मैत्रेय: मुदा अहाँकें एही प्रकार विवेक खो कऽ दुःख नै करबाक चाही। (ओ पैघ अट्टहास करैत अछि। प्रकट) मैडम, कृपया हमर ओही स्नान वला दुपट्टा वापस कऽ दिय’। वसन्तसेना: चारुदत्त, अहाँकें हमर सम्मुख अपन अविश्वास नै देखेबाक चाही छल, ओही कण्ठहारकें पठा कऽ। चारुदत्त: (लज्जित हँसि कऽ) मुदा मोन राखू, वसन्तसेना, सत्य पर के विश्वास करत? संशय आब निश्चित अछि। ई संसार कोनो दया नै देखाएत एही अमशस्वी दरिद्र पर। मैत्रेय: हमरा बताउ, कनियाँ, की अहाँ आइ राति एतहि सुतबाक विचार राखैत छी? दासी: (हँसैत) मुदा उत्तम मैत्रेय, अहाँ आब बहुत स्पष्ट भऽ कऽ बाजि रहल छी। मैत्रेय: देखू, हमर मित्र, वर्षा कऽ धार पुनः पैघ वेगसँ भीतर आबि रहल अछि, जेना ई हमरा सभकें एतयसँ बाहर विदा करबाक इच्छा राखत हो, जखन हम सभ आनन्दसँ बैठल छी। चारुदत्त: अहाँ बिल्कुल सत्य कहि रहल छी। खसत जल-धार मेघ कऽ छाती कऽ ओनाहि फाड़ि रहल अछि, जेना कोनो कमल कऽ अङ्कुर माठि कऽ; आ आकाश कऽ मुख आब अश्रु कऽ धारसँ तोपल अछि जे चन्द्रमा कऽ कान्तिकें खो कऽ कानि रहल हो। आ पुनः सेहो: श्रेष्ठ सज्जन मनुष्यक विचार जकां निर्मल धार कऽ साथ, मुदा अर्जुन कऽ बाण कऽ प्रहार जकां कूर वेगसँ भरल, बलराम कऽ करिया ओढ़नी जकां घोर अन्धकारमय भऽ कऽ, ई मेघ आब इन्द्र कऽ हतिजोरी कऽ मोती कऽ बौछार कऽ रहल अछि। देखू, हमर प्रियतम, देखू! आकाश घोर करिया रङ्ग कऽ लेपसँ रङ्गल बुझि रहल अछि, संध्याकालक शीतल आ सुगन्धित वायु चारू कात बहि रहल अछि; लाल बिजुली, अपन प्रेमी आकाश कऽ आलिङ्गनमे आबि कऽ, अपन सुवर्ण-बांहि फिङ्कने अछि, आ साक्षात प्रकट कऽ रहल अछि जे कोनो कनियाँ कऽ हृदय अपन प्रेमी लेल कतेक अनुराग राखैत अछि। (वसन्तसेना अपन पूर्ण वासनासँ भरि कऽ चारुदत्तक छाती पर अपना कऽ फिङ्कि दैत छथि आ अपन बांहि हुनकर कण्ठमे फसा दैत छथि। चारुदत्त हुनकर सुकुमार स्पर्शक अनुभव करैत छथि आ आलिङ्गन करैत छथि) चारुदत्त: ओह मेघ, अहाँ आब आ गम्भीर गर्जन कसरि, किएक तँ अहाँक एही कृपा कऽ कारण हमर विरही अङ्ग-अङ्ग आब कदम्ब कऽ फूल जकां खिलि रहल अछि। हुनकर एही सुकुमार स्पर्श हमर आत्माकें रोमाञ्चित कऽ देलक, आ साक्षात प्रेम हमर अन्तःकरण भीतर भरि गेल अछि। मैत्रेय: नास हो अहाँ तूफान कऽ! अहाँ कोनो भद्र लोक नै छी, जे बिजुलीक डर देखा कऽ आर्या कऽ एही प्रकार डराबैत छी। चारुदत्त: एही तूफान कऽ निन्दा नै कसरि, हमर मित्र। ई मुसलाधार वर्षा मानू एक सौ वर्ष धरि चलैत रहय, बिजुली कसरि चमकय आ वज्र कऽ नाद गुञ्जि रहय; किएक तँ जे हमरा लेल असम्भव छल, ओ आब सत्य भऽ गेल अछि: हम हुनकर परम प्रिय बांहि अपन कण्ठ चारू कात अनुभव कऽ रहल छी। आ ओह, हमर मित्र, ओही मनुष्य संसार भीतर वास्तविक वैभव कऽ अर्थ जनैत अछि, जकर प्रेमी बहुत दूर मार्ग पार कऽ कऽ ओकरा पाँ आबैत अछि, आ ओकर बांहि ओही प्रियतम कऽ रूप कऽ जकड़ि लैत अछि जखन ओ वर्षा कऽ बून्दसँ ठण्ढा आ गीला हो। वसन्तसेना, हमर प्रियतम, हमर घरक ई देबाल शिथिल भऽ गेल अछि; आ ई पुराना ओढ़नी आब बेसी काल टिकबाक योग्य नै अछि। पानि कऽ भारसँ ई रङ्गल देबाल आब खसि रहल अछि जाहि परसँ चूना कऽ अंश बहि रहल अछि। (ओ ऊपर देखैत छथि) इन्द्रधनुष! देखू, हमर प्रियतम, देखू! मेघ कऽ ई भयानक सबाड़ जे आकाश भीतर खुलल अछि, ओकर बीचसँ बिजुली जेना ओकर चंचल जीभ जकां लपलपाएत बुझि रहल अछि; आ आकाश कऽ ऊपर इन्द्र कऽ ई प्रखर धनुष ओनाहि तानल गेल अछि जेना कोनो महाबाहु अपन सुवर्ण-बांहि ऊपर उठाने हो। आउ, हम सभ कखनो सुरक्षित आश्रय भीतर चली। (ओ उठैत छथि आ चलैत छथि) ताड़ कऽ पत्ता पर तीव्र नाद कऽ साथ, वन कऽ झाड़ी भीतर गम्भीर नाद कऽ साथ, पैघ चट्टान सभ पर प्रहार कऽ साथ, पानि कऽ धार कऽ छिड़काव कऽ साथ; वीणा कऽ तार पर आघात जकां, ई वर्षा कऽ सङ्गीत चारू कात गुञ्जि रहल अछि। (सभ प्रस्थान करैत छथि) षष्ठ अङ्क: प्रवहण-विपर्यय (गाड़ी कऽ उलट-पुलट) (एकटा दासीक प्रवेश होइत अछि) दासी: की हमर मालकिन अखन धरि जागल नै छथि? नीक, हमरा भीतर जा कऽ हुनका जगाबाक चाही। (ओ चारू कात चलैत अछि। वसन्तसेना वस्त्र पहिरने, मुदा अखन धरि सुतल प्रकट होइत छथि। दासी ओकरा खोजि लैत अछि) आब उठबाक समय भऽ गेल अछि, मालकिन। भोर भऽ गेल छैक। वसन्तसेना: (जागैत) की! की राति समाप्त भऽ गेल? की ई भोर अछि? दासी: हमरा सभक लेल ई भोर अछि। मुदा हमर मालकिनक लेल एहन बुझाइत अछि जेना अखन धरि रातिहि हो। वसन्तसेना: मुदा कनियाँ, अहाँक जुआड़ी कतऽ छथि? दासी: मालकिन, वर्धमानककें अपन आदेश देबाक बाद, चारुदत्त महराज पुष्पककरण्डक पुराना बगीचा कात विदा भऽ गेलाह। वसन्तसेना: कोन आदेश? दासी: भोरक प्रकाश भेलासँ पहिने गाड़ी तैयार राखबाक लेल; किएक तँ, ओ कहलनि जे आर्या वसन्तसेनाकें आबबाक अछि— वसन्तसेना: कतऽ, कनियाँ? दासी: जतय चारुदत्त महराज छथि। वसन्तसेना: (दासीकें आलिङ्गन करैत छथि) हम संध्याकालकें हुनका नीक जकां देखि नै पाबलहुँ। मुदा आइ हम हुनका सीधा मुख-दर-मुख देखब। हमरा बताउ, कनियाँ। की हम भीतरी अङ्गन भीतर पहुँचबाक मार्ग खोजि लेलहुँ अछि? दासी: अहाँ न केवल भीतरी अङ्गन भीतर पहुँचबाक मार्ग खोजलहुँ अछि, एतय रहय वाला प्रत्येक मनुष्यक हृदय भीतर अपन स्थान बना लेलहुँ अछि। वसन्तसेना: हमरा बताउ, की चारुदत्त महराजक नौकर-चाकर सभ चिन्तित छथि? दासी: ओ सभ होताह। वसन्तसेना: कखन? दासी: जखन हमर मालकिन एतयसँ विदा होयतीह। वसन्तसेना: मुदा ओतेक नै जतेक हम होब। (विवश कऽ कऽ) एतय आबब, कनियाँ, ई मोती कऽ कण्ठहार लय लिय’। अहाँकें जा कऽ एककरा हमर आदरणीय बहिन, हुनकर नीक पत्नीकें देबाक अछि। आ हुनका हमर ई संदेश दऽ देबक: "आदरणीय चारुदत्तक गुण सभ हमरा जीति लेलक अछि, हमरा हुनकर दासी बना देलक अछि, आ एही लेल अहाँक सेहो दासी बना देलक अछि। आ अतः हम आशा करैत छी जे ई मोती अहाँक कण्ठक आभूषण बनत।" दासी: मुदा मालकिन, चारुदत्त महराज अहाँ पर क्रुद्ध भऽ जएताह। वसन्तसेना: जाउ। ओ क्रुद्ध नै होताह। दासी: (कण्ठहार लैत) हँ, मालकिन। (ओ बाहर जाइत अछि, पुनः वापस आबैत अछि) मालकिन, हुनकर आदरणीय पत्नी कहलनि अछि जे हुनकर स्वामी अहाँकें ई पुरस्कार स्वरूप देलन्हि छल, आ हुनका लेल एककरा स्वीकार करब उचित नै होयत। आ आगाँ, अहाँकें ई जनबाक चाही जे हुनकर स्वामी आ पतिहि हुनकर सभसँ श्रेष्ठ आभूषण छथि। (चारुदत्तक छोट पुत्र रोहसेनकें लय कऽ रदनिकाक प्रवेश होइत अछि) रदनिका: आबब, प्रिय बच्चा, आउ हम सभ अहाँक एही छोटकी गाड़ी कऽ साथ खेली। रोहसेन: (चिढ़ि कऽ) हमरा ई माठिक छोट गाड़ी बिल्कुल नै लगैत अछि, रदनिका। हमरा हमर सोनाक गाड़ी दिय’। रदनिका: (थकावटसँ गम्भीर निश्वास छोड़ि कऽ) आब हमरा सभक पाँ सोनासँ की प्रयोजन, हमर बच्चा? जखन अहाँक बाबूजी पुनः धनी होयताह, तखन अहाँक पाँ खेलबाक लेल सोनाक गाड़ी होयत। मुदा हम ओकरा बहलाबबाक लेल वसन्तसेनाक देखबाक लेल लय जाइत छी। (ओ वसन्तसेनाक लग जाइत अछि) मालकिन, अहाँकें हमर प्रणाम। वसन्तसेना: अहाँक देखि कऽ हमरा प्रसन्नता भेल, रदनिका। मुदा ई छोट बच्चा ककर अछि? ओ कोनो आभूषण नै पहिरने अछि, तइयो एकर प्यारा सुकुमार मुख हमर हृदयकें आनन्दित कऽ रहल अछि। रदनिका: ई चारुदत्त महराजक पुत्र रोहसेन छथि। वसन्तसेना: (अपन बांहि पसराबैत छथि) एतय आबब, हमर बच्चा, आ अपन छोटकी बांहि हमर कण्ठ चारू कात फसा लिय’। (ओ ओकरा अपन गोद भीतर बैठाबैत छथि) एकर स्वरूप बिल्कुल अपन बाबूजी सन अछि। रदनिका: स्वरूपसँ बेसी, एकर स्वभाव हुनकरहि सन अछि। कम्तीसँ कम्ती हम एहनहि बुझैत छी। हुनकर बाबूजी एकरा पर पूर्ण प्राण फिङ्कैत छथि। वसन्तसेना: मुदा ओ की अछि जाहि लेल ई कानि रहल अछि? रदनिका: ओ पड़ोसी कऽ एकटा बच्चाक सोनाक गाड़ी कऽ साथ खेलि रहल छल। मुदा ओ गाड़ी वापस लय लेल गेल, आ जखन एकरा लेल ओ पुकार कयलक, तँ हम एकरा ई माठिक छोट गाड़ी बना देलहुँ। मुदा जखन हम एककरा एकरा देलहुँ, ओ कहलक "हमरा ई माठिक छोट गाड़ी बिल्कुल नै लगैत अछि, रदनिका। हमरा हमर सोनाक गाड़ी दिय’।" वसन्तसेना: ओह, प्रिय! ई सोचू जे एही छोट बच्चा कऽ आन लोक सभक धनी होबाक कारण कष्ट सहब पड़ि रहल छैक। आह, शक्तिशाली भाग्य! मनुष्यक नियति, कमल-पात पर खसय वाला पानि कऽ बून्द जकां अनिश्चित, अहाँ लेल केवल खिलौना बुझाइत अछि! (आँखिमे अश्रु लय कऽ) कानबाक बन्द कसरि, हमर बच्चा। अहाँकें खेलबाक लेल सोनाक गाड़ी भेटत। रोहसेन: ई के छथि, रदनिका? वसन्तसेना: अहाँक बाबूजीक एकटा दासी, जे हुनकर गुण सभ द्वारा जीतल गेल अछि। रदनिका: हमर बच्चा, ई आदरणीय कनियाँ अहाँक माय छथि। रोहसेन: अहाँ झूठ बाजि रहल छी, रदनिका। जदि ई आदरणीय कनियाँ हमर माय छथि, तँ ओ ई सुन्दर-सुन्दर आभूषण किएक पहिरने छथि? वसन्तसेना: हमर बच्चा, अहाँक एही सुकुमार ओठ कतेक कूर गप कहि सकैत अछि। (ओ अपन आभूषण सभ खोलि कऽ हटा दैत छथि। कानैत) आब हम अहाँक माय छी। अहाँ एही सभ आभूषण कऽ लय लिय’ आ अपन लेल एकटा सोनाक गाड़ी बना लिय’। रोहसेन: पाछाँ हटू! हम एककरा नै लेब। अहाँ कानि रहल छी। वसन्तसेना: (अपन अश्रु पोछैत) हम नै कानब, प्रिय। देखू! जाउ आ खेलू। (ओ आभूषण सभसँ माठिक गाड़ी कऽ भरि दैत छथि) देखू प्रिय, अहाँकें अपन लेल एकटा छोटकी सोनाक गाड़ी अवश्य बना लेबाक चाही। (रोहसेनक साथ रदनिकाक प्रस्थान होइत अछि) (एकटा गाड़ी चलाबैत वर्धमानकक प्रवेश होइत अछि) वर्धमानक: रदनिका, रदनिका! आर्या वसन्तसेनाकें कहू जे बन्द गाड़ी कातक दुआरि पर तैयार ठाढ़ अछि। रदनिका: (प्रवेश करैत) मालकिन, वर्धमानक एतय अछि, आ ओ कहि रहल अछि जे गाड़ी कातक दुआरि पर प्रतीक्षा कऽ रहल अछि। वसन्तसेना: ओकरा एक क्षण प्रतीक्षा करबाक चाही, कनियाँ, जब धरि हम तैयार भऽ जाइत छी। रदनिका: एक क्षण प्रतीक्षा करू, वर्धमानक, जब धरि ओ तैयार भऽ जाइत छथि। (प्रस्थान करैत अछि) वर्धमानक: हे भगवान, हम गाड़ीक गद्दी बिसरि गेलहुँ। हमरा जा कऽ ओकरा लाबाक चाही। मुदा नाकक रस्सीक कारण बैल सभ बहुत चंचल भऽ रहल अछि। हमरा गाड़ी कऽ अपन साथहि लय जबाक विचार करबाक चाही। (प्रस्थान करैत अछि) वसन्तसेना: हमर वस्तु सभ लाउ, कनियाँ। हमरा अपना कऽ तैयार करबाक चाही। (ओ ओनाहि करैत अछि) (एकटा गाड़ी चलाबैत संस्थानकक नौकर स्थावरकक प्रवेश होइत अछि) स्थावरक: राजा कऽ साढ़ू संस्थानक हमरा कहलनि जे "एकटा गाड़ी लिय’, स्थावरक, आ जतेक तीव्र भऽ सकय पुष्पककरण्डक पुराना बगीचा कात आबब।" नीक, हम ओही मार्ग पर छी। आगाँ बढ़ू, बैल सभ, आगाँ बढ़ू! (ओ गाड़ी चलाबैत अछि आ चारू कात देखैत अछि) की! गामक लोक सभक गाड़ी कऽ कारण मार्ग पूर्णतः बन्द अछि। आब हम की करब? (अहङ्कारसँ) हमर मार्गसँ पाछाँ हटू, अहाँ सभ! हमर मार्गसँ पाछाँ हटू! (ओ सुनैत अछि) ओ की अछि? अहाँ जनबाक इच्छा राखैत छी जे ई ककर गाड़ी अछि? ई गाड़ी राजा कऽ साढ़ू संस्थानकक अछि। अतः हमर मार्गसँ पाछाँ हटू—आ एही क्षण, तुरंत! (ओ चारू कात देखैत अछि) की! एतय एकटा मनुष्य दोसर दिशा कात ओनाहि तीव्र गतिसँ दौड़ि रहल अछि जेना कोनो भागल जुआड़ी हो, आ ओ हमर कात एही प्रकार देखि रहल अछि जेना हम कोनो जुआघरक मालिक छी। हमरा आश्चर्य भऽ रहल अछि जे ओ के अछि। मुदा तखन, एकरामे हमर की प्रयोजन? हमरा जतेक तीव्र भऽ सकय ओतय पहुँचबाक चाही। हमर मार्गसँ पाछाँ हटू, अहाँ गामक लोक सभ, हमर मार्गसँ पाछाँ हटू! ओ की अछि? अहाँ चाहैत छी जे हम एक क्षण रुकि कऽ अहाँक चक्र कऽ अपन कान्हक बल दऽ? नास हो अहाँक! हमर सन एकटा वीर पुरुष, जे राजा कऽ साढ़ू संस्थानकक सेवा करैत अछि, ओ अहाँक चक्र कऽ अपन कान्हक बल दऽ? मुदा आखिर, ओ बेचार पूर्णतः अकेला अछि। हम ओकर सहायता करब। हम अपन गाड़ी चारुदत्तक बगीचाक कातक दुआरि पर रोकि देब। (ओ ओनाहि करैत अछि) हम आबि रहल छी! (प्रस्थान करैत अछि) दासी: मालकिन, हमरा बुझाइत अछि जे हम चक्र कऽ नाद सुनि रहल छी। गाड़ी एतय आबि गेल होयत। वसन्तसेना: आबब, कनियाँ। हमर हृदय व्याकुल भऽ रहल अछि। हमर साथ कातक दुआरि कात चलू। दासी: हमर पाछाँ आबब, मालकिन। वसन्तसेना: (चारू कात चलैत छथि) अहाँ विश्रामक योग्य छी, कनियाँ। दासी: धन्यवाद, मालकिन। (प्रस्थान करैत अछि) वसन्तसेना: (जखन ओ गाड़ी भीतर प्रवेश करैत छथि, तँ हुनकर दहिना आँखि फड़कबाक अभिनय होइत अछि) हमर दहिना आँखि एही क्षण किएक फड़कि रहल अछि? मुदा चारुदत्त महराजक दर्शन एही कुसङ्केतकें नष्ट कऽ देत। (स्थावरकक प्रवेश होइत अछि) स्थावरक: हम मार्गसँ आन गाड़ी सभ हटा देलहुँ अछि, आ आब हम आगाँ बढ़ब। (ओ गाड़ी पर चढ़ैत अछि आ गाड़ी चलाबैत अछि। अपन मनमे) गाड़ी किछ भारी भऽ गेल अछि। मुदा हमरा बुझाइत अछि जे ई मात्र हमर भ्रम अछि, किएक तँ ओही चक्र कऽ बल देबाक कारण हम थिक गेल छी। नीक, हम आगाँ बढ़ब। आगाँ बढ़ू, बैल सभ, आगाँ बढ़ू! नेपथ्यसँ एकटा आवाज: आरक्षी! आरक्षी! प्रत्येक मनुष्य अपन स्थान पर सचेत रहू! ओही युवा अहीर (ग्वाला) आब कारागार तोड़ि कऽ, आरक्षी कप्तानकें मारि कऽ, अपन जंजीर फाड़ि कऽ भागि गेल अछि। ओकरा पकड़ू! ओकरा पकड़ू! (पएरमे लोहक एकटा भारी जंजीर बान्हल, अपन मुख तोपने, व्याकुलतासँ भागल आर्यकक प्रवेश होइत अछि। ओ चारू कात चलैत अछि) स्थावरक: (अपन मनमे) नगर भीतर पैघ कोलाहल अछि। हमरा जतेक तीव्र भऽ सकय एतयसँ पाछाँ हटि जबाक चाही। (प्रस्थान करैत अछि) आर्यक: हम अपन पाछाँ छोड़ि अयलहुँ ओही भयानक समुद्रकें, जे मानवीय दुःख आ संतापसँ भरल छल—राजा कऽ ओही कारागारकें। कोनो पैघ युद्धक हाथी जकां जे अपन शृङ्खला तोड़ि कऽ भागैत अछि, हम अपन एही भारी जंजीर भी भीजल पएर कऽ साथ कष्टसँ घसीटि रहल छी। राजा पालक एकटा ज्योतिषीक भविष्यवाणीसँ भयभीत भऽ कऽ, हमरा हमर ओही गामसँ उठा लेलन्हि जतय हम रहैत छलहुँ, हमरा बान्हि देलन्हि, आ एकटा सुनसान कोठरी भीतर फिङ्क देलन्हि, जतय हम अपन मृत्युक प्रतीक्षा कऽ रहल छलहुँ। मुदा हमर नीक मित्र शर्विलकक सहायतासँ हम भागि गेलहुँ। (ओ अश्रु बहाबैत अछि) जदि हमर नियति एहन छल, तँ कम्तीसँ कम्ती एकरामे हमर की दोष छल जे ओ हमरा कोनो वनक भयानक पशु जकां पिञ्जरा भीतर बन्द कऽ देलक? मनुष्य राजा सभ कऽ साथ युद्ध कऽ सकैत अछि, मुदा भाग्य कऽ साथ नै—आ तइयो, की असहाय मनुष्य पैघ सत्ता सभ कऽ सामना कऽ सकैत अछि? हम अपन एही दुःखक साथ कतऽ जाब? (ओ चारू कात देखैत अछि) एतय कोनो भला मनुष्यक घर अछि, जकर कातक दुआरि पर कोनो ताला नै बान्हल अछि। घर पुरान अछि, दुआरि पर कोनो ताला नै अछि, आ एकर कपाट सेहो टेढ़ अछि; निश्चित रूपसँ कोनो एहन मनुष्यक निवास अछि, जे भाग्यक कूर प्रहार हमराहि सन सहि रहल अछि। हम एतहि भीतर प्रवेश करब आ प्रतीक्षा करब। नेपथ्यसँ एकटा आवाज: आगाँ बढ़ू, बैल सभ, आगाँ बढ़ू! आर्यक: (सुनैत) आहा, एकटा गाड़ी एही मार्ग कात आबि रहल अछि। जदि ई कोनो भ्रमण लेल विदा भेल गाड़ी हो, आ एकर भीतर रहय वाला मनुष्य कूर स्वभावक नै हो; कोनो कुलीन कनियाँक प्रतीक्षा कऽ रहल सुन्दर गाड़ी हो; या कोनो धनी मनुष्यक गाड़ी हो जे नगरसँ बाहर जाइ रहल हो—आ जदि ई खाली हो, भाग्य कृपालु सिद्ध हो, तँ हमर एही व्याकुल आत्मा लेल ई ईश्वरक वरदान बुझायत। (हाथमे गद्दी लेने गाड़ी कऽ साथ वर्धमानकक प्रवेश होइत अछि) वर्धमानक: देखू, हम गद्दी लय अयलहुँ अछि। रदनिका, आर्या वसन्तसेनाकें कहू जे गाड़ी तैयार ठाढ़ अछि आ ओकरा भीतर बैठि कऽ पुष्पककरण्डक पुराना बगीचा कात चलबाक चाही। आर्यक: (सुनैत) ई कोनो गणिकाक गाड़ी अछि, जे नगरसँ बाहर जाइ रहल अछि। सुन्दर, हम भीतर घुसि जाब। (ओ सजगतासँ लग जाइत अछि) वर्धमानक: (पएरक नाद सुनि कऽ) आहा, नूपुर कऽ झङ्कार! आदरणीय कनियाँ एतय आबि गेली। मालकिन, नाकक रस्सीक कारण बैल सभ बहुत चंचल भऽ रहल अछि। अहाँक लेल पाछाँसँ भीतर चढ़ब बेसी नीक होयत। (आर्यक ओनाहि करैत अछि) नूपुर कऽ झङ्कार मात्र तब धरि होइत अछि जब धरि पएर चलैत अछि, आ आब नाद बन्द भऽ गेल अछि। एकर अतिरिक्त, गाड़ी भारी भऽ गेल अछि। हमरा विश्वास अछि जे आदरणीय कनियाँ भीतर चढ़ि गेली। हम आगाँ बढ़ब। आगाँ बढ़ू, बैल सभ, आगाँ बढ़ू! (ओ गाड़ी चलाबैत अछि। वीरकक प्रवेश होइत अछि) वीरक: आउ, आउ! जय, जयमना, चन्दनक, मङ्गल, फुल्लबद्र, आ अहाँ सभ आन! अहाँ सभ एतेक शान्त कसरि छी, जखन ओही अहीर युवक अपन बन्धन फाड़ि कऽ, कारागार तोड़ि कऽ राजा कऽ हृदय कऽ एक साथ दो टुकड़ा कऽ देलक अछि? एतय! अहाँ मुख्य मार्गक पूर्वी दुआरि पर ठाढ़ रहू, अहाँ पश्चिमी पर, अहाँ दक्षिणी पर, अहाँ उत्तरी पर। हम एही टूटल देबाल कऽ ऊपर चन्दनक कऽ साथ चढ़ब आ एक दृष्टि देखब। आउ, चन्दनक, आउ! एही मार्गसँ! (अत्यधिक उत्तेजनासँ चन्दनकक प्रवेश होइत अछि) चन्दनक: आउ, आउ! वीरक, विशल्य, भीमाङ्गद, दण्डकाल, दण्डशूर, आ अहाँ सभ आन! तीव्र गतिसँ आउ, हमर विश्वासु सिपाही सभ! कार्य आरम्भ कसरि! आब उद्यम कसरि, कखनो एहन नै हो जे पुराना राजा विदा भऽ जाथि आ एकटा नव राजा भीतर प्रवेश कऽ कऽ बैठि जाथि। बगीचा सभमे खोजू, जुआघर सभमे, नगर भीतर आ राजपथ पर; बजारमे, गाम भीतर, जतय कतहु अहाँकें भेटय; जे किछु संशय कऽ जकां बुझाय। आब, वीरक, बाजू, ओ के छल जे ओही युवा अहीर कऽ बचा कऽ लय गेल जे अखने भागि गेल अछि? के ओही नक्षत्र भीतर जन्म लेलने छल जखन सूर्य अपन आठम भवनमे छलाह, या चन्द्रमा अपन चौथममे, या जखन बृहस्पति अपन छठम भवनमे देखि रहल छलाह, या जखन शनि अपन नौम भवनमे विश्राम कऽ रहल छलाह, या अपन छठम भवन भीतर जखन शुक्र अपन घर बनाने छली, या मङ्गल अपन पञ्चम भवन भीतर? ओ के छथि जे ओही अहीर कऽ अपन संरक्षण देबाक साहस करताह, जखन धरि चन्दनक अखन धरि जीवित अछि? 9, वीरक: चन्दनक, अहाँकें राजा कऽ कड़ा नियम जनबाक चाही! हम अहाँक हृदय कऽ कसम खाइत छी, ओ बहुत काल पहिने कारागारसँ मुक्त भऽ गेल छल, किएक तँ अहीर ओही समय भागि गेल छल जखन सूर्य आधा सेहो नै उठल छलाह। वर्धमानक: आगाँ बढ़ू, बैल सभ, आगाँ बढ़ू! चन्दनक: (गाड़ी कऽ देखि कऽ) देखू, मनुष्य, देखू! एकटा बन्द गाड़ी मार्गक मध्य भागमे तीव्र गतिसँ जाइ रहल अछि; एकर निरीक्षण कसरि जे ई ककर अछि, आ एकर भीतर की भार लदाएल अछि! वीरक: (गाड़ी कऽ देखि कऽ) एतय, चालक, अपन गाड़ी रोकू! ई ककर गाड़ी अछि? एकर भीतर के अछि? एककरा कतऽ लय जाया जा रहल अछि? वर्धमानक: ई चारुदत्त महराजक गाड़ी अछि। आर्या वसन्तसेना एकर भीतर छथि। हम हुनका पुष्पककरण्डक पुराना बगीचा कात महराज चारुदत्तसँ मिलबाक लेल लय जाइ रहल छी। वीरक: (चन्दनकक लग जाइत अछि) चालक कहि रहल अछि जे ई चारुदत्त महराजक गाड़ी अछि; वसन्तसेना एकर भीतर छथि; ओ ओकरा पुष्पककरण्डक पुराना बगीचा कात लय जाइ रहल अछि। चन्दनक: तखन एककरा विदा होबाक दिय’। वीरक: बिना कोनो निरीक्षण कऽ? चन्दनक: निश्चित रूपसँ। वीरक: ककर अधिकार पर? चन्दनक: चारुदत्त महराजक अधिकार पर। वीरक: चारुदत्त के छथि, या वसन्तसेना के छथि, जे गाड़ी बिना कोनो निरीक्षण कऽ विदा भऽ जाय? चन्दनक: की अहाँ चारुदत्त महराजकें नै जनैत छी, मनुष्य? नहि वसन्तसेनाकें? जदि अहाँ चारुदत्त महराजकें नै जनैत छी, नहि वसन्तसेनाकें, तँ अहाँ आकाश भीतर कऽ चन्द्रमाकें नै जनैत छी, नहि ओकर पवित्र कान्तिकें। ओ के छथि जे गुणक एही चन्द्रमाकें नै जनैत, जे चरित्र कऽ सुकुमार कमल-पुष्प छथि, चारू समुद्रक अमूल्य रत्न छथि, आ मनुष्यक संकटकालक एकमात्र रक्षक छथि? ई दोनों पूर्णतः आदरक योग्य छथि, हमर उज्जयिनी नगरीक आभूषण छथि—वसन्तसेना आ चारुदत्त महराज, जे श्रेष्ठताक समुद्र छथि। वीरक: सुन्दर, सुन्दर, चन्दनक! चारुदत्त? वसन्तसेना? हम हुनका सभकें नीक जकां जनैत छी, जेना हम आन कोनो वस्तु जनैत छी; मुदा जखन हम अपन राजा कऽ सेवा भीतर होइत छी, तँ हम अपन बाप कऽ सेहो आदर नै जनैत छी। आर्यक: (अपन मनमे) पूर्व जन्म भीतर निश्चित रूपसँ एक हमर शत्रु रहल होयत, आ दोसर हमर बन्धु। किएक तँ देखू! हुनकर कार्य एकहि अछि; मुदा हुनकर मार्ग आ हुनकर इच्छा भिन्न अछि; जेना विवाहक पवित्र दिन कऽ आदर देबय वाला दीपक कऽ लौ, आ श्मशान कऽ चिता भीतर जलय वाला भयानक आगि। चन्दनक: अहाँ एकटा बहुत सजग कप्तान छी जकरा पर राजा पूर्ण विश्वास करैत छथि। हम बैल सभकें पकड़ि कऽ राखि रहल छी। अहाँ अपन निरीक्षण कसरि। वीरक: अहाँ सेहो एकटा रक्षक छी जकरा पर राजा पूर्ण विश्वास करैत छथि। अहाँ स्वयं निरीक्षण कसरि। चन्दनक: जदि हम निरीक्षण करब, तँ की ई बिल्कुल वैह नै होयत जेना अहाँ कयलहुँ हो? वीरक: जदि अहाँ निरीक्षण करब, तँ ई बिल्कुल वैह होयत जेना स्वयं राजा पालक कयलन्हि हो। चन्दनक: गाड़ी कऽ काठ ऊपर उठाउ, मनुष्य! (वर्धमानक ओनाहि करैत अछि) आर्यक: (अपन मनमे) की आरक्षी कप्तान हमर निरीक्षण करबाक लेल तैयार छथि? आ हमर पाँ कोनो तलवार नै अछि, कूर भाग्य! मुदा कम्तीसँ कम्ती, वीर भीमसेन कऽ पराक्रम हम अवश्य देखब; हमर ई बांहिहि हमर तलवार बनत। कोनो कोठरी भीतर जंजीरसँ बान्हल रहि कऽ दुःख सहबा सँ नीक एकटा वीर योद्धाक मृत्यु अछि। मुदा बल प्रयोग करबाक समय अखन धरि नै अछि। (चन्दनक गाड़ी भीतर प्रवेश करैत छथि आ चारू कात देखैत छथि) आर्यक: हम अहाँक शरणमे छी। चन्दनक: (संस्कृतमे बाजैत) जे शरणमे आबि गेल, ओ सुरक्षित रहत। आर्यक: जखन कहियो ओ युद्ध करत, ओही मनुष्य कऽ सभ अङ्ग घायल होयत, ओकर अपन मित्र आ बन्धु ओकरा विमुख भऽ कऽ छोड़ि देताह; जे ककरो शरण आ सहायता चाहय वाला कऽ त्याग कऽ दैत अछि, ओ सदा लेल अपमानक भागी होइत अछि; ई एकटा कहियो नै क्षमा करबाक योग्य पाप अछि। चन्दनक: की! अहीर युवक आर्यक? बाज पक्षीसँ डरि कऽ भागि रहल कोनो पक्षी कऽ जकां, ओ शिकारीक हाथ भीतर आबि कऽ खसि पड़ल अछि। (सोचैत) ओ कोनो पापी मनुष्य नै अछि, ई पुरुष जे हमर संरक्षण चाहैत अछि आ चारुदत्त महराजक गाड़ी भीतर बैठल अछि। एकर अतिरिक्त, ओ हमर नीक मित्र शर्विलकक साथी अछि, जे हमर प्राण बचेबाक काज कयलक छल। दोसर कात, राजा कऽ कड़ा आदेश अछि। एही प्रकारक संकट भीतर मनुष्य की कऽ सकैत अछि? नीक, जे होबाक अछि ओ होयत। हम अखने ओकरा अपन संरक्षण देबाक प्रतिज्ञा कयलहुँ अछि। जे भयसँ काँपि रहल मनुष्य कऽ सहायता दैत अछि, आ अपन पड़ोसीक दुःख दूर करबामे आनन्द पाबैत अछि; जदि ओकरा मरबहि पड़त तँ ओ मरत; मुदा ओकर यश सदा लेल सुरक्षित रहत। (ओ व्याकुलतासँ नीचां उतरैत छथि) हम ओही भद्र पुरुष कऽ—हमर अर्थ अछि, आदरणीय कनियाँ वसन्तसेनाकें देखलहुँ अछि, आ ओ कहि रहल छथि जे "की ई उचित अछि, की ई कोनो भद्र लोक कऽ व्यवहार अछि जखन हम चारुदत्त महराजसँ मिलबाक लेल जाइ रहल छी, तँ राजपथ पर हमर एही प्रकार अपमान कयल जाय?" वीरक: चन्दनक, हमर मन भीतर संशय उठि रहल अछि। चन्दनक: संशय? कसरि? वीरक: अहाँक कण्ठ भीतरसँ एकटा व्याकुल नाद निकसल; ई किछ संशय कऽ जकां बुझाइत अछि। अहाँ पहने कहलहुँ "हम ओही भद्र पुरुष कऽ देखलहुँ," आ पुनः कहलहुँ "हम ओही आदरणीय कनियाँ कऽ देखलहुँ।" वैह कारण अछि जाहि लेल हम सन्तुष्ट नै छी। चन्दनक: अहाँक साथ की समस्या अछि, मनुष्य? हम सभ दक्षिण कऽ लोक छी आ हमर बोली सीधा नै होइत। हम सभ म्लेच्छ सभक हजारों बोली सभ जनैत छी—खश, खट्टी, कद, कदत्थोबिल, कर्नाटक, कर्ण, प्रावरण, द्राविड़, चोल, चीन, बर्बर, खेर, खान, मुख, मधुघात, आ ओही सभ आन; आ ई पूर्णतः हमर मनक स्थिति पर निर्भर करैत अछि जे हम कखन "ओ पुरुष" कहि वा "ओ स्त्री", "भद्र पुरुष" कहि वा "आदरणीय कनियाँ"। वीरक: की हम स्वयं एक बेर भीतर देखि नै सकैत छी? ई राजा कऽ कड़ा आदेश अछि। आ राजा हमरा पर पूर्ण विश्वास करैत छथि। चन्दनक: एहन बुझाइत अछि जेना राजा हमरा पर विश्वास नै करैत होबथि! वीरक: की ई महराज कऽ आज्ञा नै अछि? चन्दनक: (अपन मनमे) जदि लोक सभ कऽ ई जनबाक अवसर भेटत जे ओही उत्तम अहीर चारुदत्त महराजक गाड़ी भीतर भागि गेल अछि, तँ राजा चारुदत्त महराजकें एकर कूर फल दऽ कऽ कष्ट देताह। आब की कयल जाय? (सोचैत) हम एकटा पैघ झगड़ा खड़ा करब, जेना कर्नाटक कऽ लोक करैत छथि। (प्रकट) नीक, वीरक, हम स्वयं एक बेर निरीक्षण कऽ लेलहुँ अछि—हमर नाम चन्दनक अछि—आ अहाँ ओकरा पुनः करबाक इच्छा राखैत छी। अहाँ के छी आखिर? वीरक: नास हो अहाँक! अहाँ के छी आखिर? चन्दनक: एकटा प्रतिष्ठित आ बहुत सम्मानित पुरुष, आ अहाँ अपनहि कुल कऽ नाम बिसरि गेल छी। वीरक: (क्रोधसँ) नास हो अहाँक! हमर कुल की अछि? चन्दनक: ओही वस्तु सभक गप के कसरि? वीरक: बाजू! चन्दनक: हमरा बुझाइत अछि जे हमरा नै बाजयब उचित होयत। हम अहाँक कुल जनैत छी, मुदा हम नै कहब; एकरा प्रकट करब मर्यादा कऽ अनुकूल नै होयत; सड़ि गेल कोनो सेव कऽ की मूल्य होइत अछि आखिर? वीरक: बाजू, बाजू! (चन्दनक एकटा विशेष चतुर सङ्केत करैत छथि) नास हो अहाँक! एकर की अर्थ अछि? चन्दनक: एक हाथ भीतर टूटल पत्थर कऽ औजार—दोसर हाथ भीतर बाल काटय वाला काती कऽ औजार—ओही चंचल दाढ़ी कऽ ठीक करबाक लेल जे चारू कात बढ़ि जाइत अछि, आ अहाँ—किएक, अहाँ राजा कऽ एकटा कप्तान छी आखिर! वीरक: सुन्दर, चन्दनक, अहाँ सम्मानित पुरुष, अहाँ सेहो अपन कुल कऽ नाम बिसरि गेल छी। चन्दनक: हमरा बताउ। हम कोन कुलक छी, हम, चन्दनक, जे चन्द्रमा जकां निर्मल छी? वीरक: ओही वस्तु सभक गप के कसरि? चन्दनक: बाजू, बाजू! (वीरक एकटा विशेष सङ्केत करैत अछि) नास हो अहाँक! एकर की अर्थ अछि? वीरक: सुनू। अहाँक घर बहुत पवित्र अछि; अहाँक बाप एकटा पैघ ढोल छलाह, अहाँक माय एकटा छोटकी ढोलकी छली, अहाँ नीच! अहाँक भाय एकटा खञ्जड़ी छलाह—टम, टम! आ अहाँ—किएक, अहाँ राजा कऽ एकटा कप्तान छी आखिर! चन्दनक: (घोर क्रोधसँ प्रज्वलित भऽ कऽ) हम, चन्दनक, चमड़ा कऽ काज करय वाला (चर्मकार)! अहाँ आब गाड़ी कऽ देखि सकैत छी। वीरक: अहाँ! चालक! गाड़ी कऽ उलट कऽ घुमाउ। हम भीतर देखबाक इच्छा राखैत छी। (वर्धमानक गाड़ी घुमाबैत अछि। वीरक भीतर चढ़बाक यत्न करैत अछि। चन्दनक ओकरा घोर क्रोधसँ केशसँ पकड़ि लैत छथि, भूमि पर पटकि दैत छथि आ लात मारैत छथि) वीरक: (उठैत, घोर क्रोधसँ) नास हो अहाँक! हम शान्तिसँ राजा कऽ कार्य भीतर विदा भऽ रहल छलहुँ, जखन अहाँ हमरा केशसँ पकड़ि कऽ भूमि पर पटकलहूँ आ लात मारलहूँ। तँ सुनू! जदि हम अहाँकें न्यायालय कऽ बीचोबीच शूल पर चढ़ा कऽ मृत्युदण्ड नै देवा देलहुँ, तँ हमर नाम वीरक नै। चन्दनक: बहुत नीक। न्यायालय जाउ वा न्याय कऽ कोनो आन महल भीतर। हमरा अहाँ सन कुकुर कऽ कोनो चिन्ता नै अछि। वीरक: हम जाब। (प्रस्थान करैत अछि) चन्दनक: (चारू कात देखैत छथि) आगाँ बढ़ू, चालक, आगाँ बढ़ू! जदि केओ अहाँसँ पूछत, तँ मात्र एतेक कहब जे "गाड़ीक निरीक्षण चन्दनक आ वीरक दोनों द्वारा कयल गेल अछि।" आदरणीय कनियाँ वसन्तसेना, हम अहाँकें एकटा मार्ग-पत्र (तलवार) दऽ रहल छी। (ओ आर्यककें एकटा तलवार दऽ दैत छथि) आर्यक: (एककरा लैत अछि। परम आनन्दसँ अपन मनमे) एकटा तलवार, एकटा तलवार! हमर दहिना आँखि तीव्र गतिसँ फड़कि रहल अछि। आब सभ किछु नीक अछि, आ हम सदा लेल सुरक्षित छी। चन्दनक: आदरणीय कनियाँ, जेना हम अहाँकें एतयसँ मुक्त मार्ग देलहुँ अछि, ओनाहि हम आशा करैत छी जे हम अहाँक स्मृति भीतर सुरक्षित रहब। एकरा बाजय लेल कोनो स्वार्थपूर्ण इच्छा हमरा प्रेरित नै कयलक; आह नै! हम अपन पूर्ण स्नेह आ आदरसँ बाजि रहल छी। आर्यक: चन्दनक पवित्र गुण सभसँ समृद्ध छथि; ओ हमर मित्र छथि—नियति एहनहि चाहने छल—जे परीक्षा कऽ एही घड़ी भीतर सत्य सिद्ध भेल छथि। हम चन्दनककें कखनहि नै बिसरब, जखन विधाताक ओही भविष्यवाणी सत्य सिद्ध होयत। चन्दनक: शिव, विष्णु, ब्रह्मा, तीनों एक भऽ कऽ अहाँक रक्षा करू, आ पवित्र चन्द्रमा, आ आशीर्वाद देबय वाला सूर्य; अहाँक सभ शत्रु सभक वध होयत, जेना आदरणीय पार्वती देवी चण्ड आ मुण्ड कऽ—कूरतासँ वध कयलन्हि छल। (गाड़ी लय कऽ वर्धमानकक प्रस्थान होइत अछि। चन्दनक रङ्गमञ्चक पाछाँ देखैत छथि) आहा! जेना ओ दूर जाइ रहल अछि, हमर नीक मित्र शर्विलक ओकर पाछाँ विदा भऽ रहल अछि। नीक, हम आरक्षी कप्तान वीरक कऽ शत्रु बना लेलहुँ अछि, जे राजा कऽ बहुत प्रिय पात्र अछि; अतः हमरा बुझाइत अछि जे हमरा सेहो अपन सभ पुत्र आ भाय सभक साथ ओकरहि पाछाँ विदा भऽ जबाक चाही। (प्रस्थान करैत छथि) सप्तम अङ्क: आर्यक-अपहरण (आर्यक कऽ मुक्ति) (महराज चारुदत्त आ मैत्रेयक प्रवेश होइत अछि) मैत्रेय: पुष्पककरण्डक पुराना बगीचा कतेक मनोरम आ सुन्दर अछि। चारुदत्त: अहाँ बिल्कुल सत्य कहि रहल छी, हमर मित्र। किएक तँ देखू! ई गाछ सभ, व्यापारी सभक जकां, अपन-अपन आभूषण देखा रहल अछि; प्रत्येक गाछ अपन-अपन फूल धारण कयलने अछि, जखन मधुमक्खी सभ, महसूल वसूल करबाक काजमे व्यस्त सिपाही सभक जकां, चारू कात उड़ि-उड़ि कऽ प्रत्येक फूलसँ उचित कर ग्रहण कऽ रहल अछि। मैत्रेय: ई साधारण पत्थर कऽ आसन बहुत आकर्षक अछि। कृपया आसन ग्रहण करू। चारुदत्त: (बैठैत) वर्धमानक कतेक काल लगा रहल अछि, हमर मित्र! मैत्रेय: हम वर्धमानककें कहलहुँ छल जे ओ आर्या वसन्तसेनाकें लय कऽ जतेक तीव्र भऽ सकय एतय आबय। चारुदत्त: तखन ओ किएक बिलम्ब कऽ रहल अछि? की ओ ककरो मन्द गतिसँ चलय वाला भार कऽ कारण मार्गमे रुकि गेल अछि? या गाड़ी कऽ चक्र अथवा रस्सा टूटि गेला कऽ कारण ओ वापस घूरि गेल अछि? की मार्ग भीतर कोनो अवरोध ओकरा दोसर मार्ग खोजबाक लेल विवश कऽ देलक अछि? अथवा ओकर बैल सभ, या ओ स्वयं, एही मन्द गतिसँ चलब स्वीकार कयलक अछि? (चारुदत्तक असली गाड़ी लय कऽ वर्धमानकक प्रवेश होइत अछि, जाहि भीतर वीर आर्यक लुकाएल अछि) वर्धमानक: आगाँ बढ़ू, बैल सभ, आगाँ बढ़ू! आर्यक: (अपन मनमे) आ अखन धरि हमरा राजा कऽ गुप्तचर सभक घोर भय अछि; हमर मुक्ति अखन धरि संशय भीतर अछि, जब धरि हमर पएर भीतर ई पापी भारी जंजीर बान्हल अछि। हम ककरो बहुत भला मनुष्यक गाड़ी भीतर लुकाएल छी, ओही कोकिल कऽ सुकुमार बच्चा जकां, जकर निष्ठुर माय ओकरा छोड़ि कऽ उड़ि जाइत अछि, आ कौआ कऽ ओही अनाथ बच्चा कऽ पालन-पोषण करब पड़ैत छैक, नहि तँ ओ मरि जाइत अछि। हम नगरसँ बहुत पैघ दूरी पार कऽ कऽ आबि गेल छी। की हमरा गाड़ीसँ नीचां उतरि कऽ एही घने गाछक वन भीतर लुका जबाक स्थान खोजबाक चाही? अथवा हमरा गाड़ीक मालिकक देखबाक प्रतीक्षा करबाक चाही? दोसर विचार करैत, हम अपना कऽ एही वन भीतर नै नुकाएब; किएक तँ लोक कहैत छथि जे आदरणीय महराज चारुदत्त सदा हुनका सभक सहायता करैत छथि जे हुनकर संरक्षण चाहैत छथि। हम हुनका सीधा मुख-दर-मुख देखेबा सँ पहिने एतयसँ कखनहि नै जाब। ई विचार ओही भला मनुष्यक हृदयकें परम सन्तुष्टि देत जे ओ हमरा दुःखक एही समुद्रसँ सुरक्षित निकालि लेलन्हि। हमर ई कष्ट, संताप आ पीड़ासँ भीजल शरीर, हुनकरहि मधुर उदारता कऽ कारण सुरक्षित भऽ गेल अछि। वर्धमानक: ई बगीचा आबि गेल। हम भीतर गाड़ी लय चलैत छी। (ओ ओनाहि करैत अछि) मैत्रेय जी! मैत्रेय: परम प्रिय समाचार अछि, हमर मित्र। ई वर्धमानकक आवाज अछि। आर्या वसन्तसेना निश्चित रूपसँ आबि गेल छथि। चारुदत्त: वास्तवमे, बहुत नीक समाचार अछि। मैत्रेय: अहाँ एकटा दासीपुत्र! अहाँकें एतेक बिलम्ब किएक भेल? वर्धमानक: आदरणीय मैत्रेय जी, क्रुद्ध नै होऊ। हमरा मार्गमे स्मरण अयल जे हम गाड़ीक पैघ गद्दी बिसरि गेलहुँ छल, आ हमरा ओकरा लाबाक लेल वापस घूरि कऽ जबाक पड़ल, वैह कारण अछि जाहि लेल हमरा बिलम्ब भेल। चारुदत्त: गाड़ी कऽ उलट कऽ घुमाउ, वर्धमानक। मित्र मैत्रेय, आर्या वसन्तसेनाकें गाड़ीसँ नीचां उतरबामे सहायता कसरि। मैत्रेय: की हुनकर पएर भीतर कोनो भारी जंजीर बान्हल छनि, जेसँ ओ अपना कऽ पएरसँ नीचां नै उतरि सकैत छथि? (ओ उठैत अछि आ गाड़ीक ओढ़नी ऊपर उठाबैत अछि) की! ई आदरणीय मालकिन वसन्तसेना नै छथि—ई तँ महराज वसन्तसेन छथि! चारुदत्त: हमर मित्र, अहाँक एही परिहाससँ बस! प्रेम कखनहि प्रतीक्षा नै कऽ सकैत। हम स्वयं हुनका नीचां उतरबामे सहायता करब। (ओ उठैत छथि) आर्यक: (चारुदत्तकें देखि कऽ) आहा! गाड़ीक आदरणीय मालिक! ओ न केवल मनुष्यक कानक लेल आकर्षक छथि, हुनकर स्वरूप आँखिकें सेहो परम सुख दऽ रहल अछि। आकाश कऽ धन्यवाद हो! आब हम पूर्णतः सुरक्षित छी। चारुदत्त: (गाड़ी भीतर देखैत छथि आ आर्यककें पाबैत छथि) तखन ई के छथि आखिर? हाथीक सूँढ़ कऽ जकां एकर बांहि पैघ अछि, एकर छाती विशाल अछि, एकर कान्ह पुष्ट आ शक्तिशाली अछि; एकर पैघ-पैघ आँखि चंचल आ लाल अछि; कसरि एकटा एहन पुरुष कऽ, जे एतेक तेजस्वी अछि, एही प्रकार विवश भऽ कऽ युद्ध करब पड़ल छैक, आ एकर एही नीक पएर भारी जंजीर कऽ बन्धन भीतर बान्हल अछि? अहाँ के छी, महाभाग? आर्यक: हम अहाँक शरण चाहय वाला अहीर कुलक आर्यक छी। चारुदत्त: की अहाँ वैह छी जकरा राजा पालक ओही गामसँ उठा कऽ, जतय अहाँ रहैत छलहूँ, कारागार कऽ भीतर बन्द कऽ देने छलाह? आर्यक: बिल्कुल वैह। चारुदत्त: ई साक्षात विधाताक विधान अछि जे अहाँ हमर आँखिक सम्मुख अयलहूँ; हमर आत्मा आकाशक पवित्र प्रकाशसँ सदा लेल वञ्चित भऽ जाय, जदि हम अहाँकें एही दुःख आ संकट कऽ घड़ी भीतर अकेला छोड़ि कऽ विमुख भऽ जाब। (आर्यक अपन परम आनन्द प्रकट करैत अछि) चारुदत्त: वर्धमानक, एकर पएरसँ भारी जंजीर तुरंत हटाउ। वर्धमानक: जेना अहाँक आज्ञा, महराज। (ओ जंजीर खोलैत अछि) महराज, जंजीर हटा देल गेल अछि। आर्यक: मुदा अहाँ हमरा अपन स्नेहक एकटा आ मजबूत जंजीरसँ सदा लेल बान्हि देलहुँ अछि। मैत्रेय: आब अहाँ अपन जंजीर स्वयं पहिरि सकैत छी। ओ आब कखनहु मुक्त अछि। आ आब हमरा सभक लेल एतयसँ चलबाक समय भऽ गेल छैक। चारुदत्त: शान्त रहू! लज्जा कसरि! आर्यक: महराज चारुदत्त, हम बिना कोनो शिष्टाचार आ औपचारिकता कऽ अहाँक गाड़ी भीतर प्रवेश कऽ लेलहुँ छल। हम अहाँसँ क्षमा मङ्गैत छी। चारुदत्त: हम स्वयं सम्मानित अनुभव कऽ रहल छी जे अहाँ हमर साथ कोनो बनावटी शिष्टाचारक प्रयोग नै कयलहुँ। आर्यक: जदि अहाँक आज्ञा होब, तँ आब हम एतयसँ जाब। चारुदत्त: शान्ति कऽ साथ विदा होऊ। आर्यक: अहाँक धन्यवाद। हम गाड़ीसँ नीचां उतरि जाइत छी। चारुदत्त: नै, हमर मित्र। जंजीर तँ एही क्षण हटाएल गेल अछि, आ अहाँक लेल पएरसँ चलब बहुत कठीन होयत। ई एकटा एहन स्थान अछि जतय मनुष्य आनन्द खोजबाक लेल आबैत छथि, अतः एकटा गाड़ी ककरो मन भीतर कोनो संशय खड़ा नै करत। अहाँ एही गाड़ी भीतरहि बैठि कऽ अपन यात्रा आगाँ बढ़ाउ। आर्यक: हम अहाँक बहुत आभारी छी, महराज। चारुदत्त: जाउ आ अपन बन्धु-बान्धव सभकें खोजू। अहाँक जीवनमे सदा प्रसन्नता रहय! आर्यक: आहा! हम अहाँक रूपमे अपन परम पूज्य बन्धुकें खोजि लेलहुँ अछि! चारुदत्त: जखन कखनो अहाँक बाजय कऽ अवसर भेटत, तँ हमरा स्मरण राखब। आर्यक: हमर शब्द सदा अहाँक पवित्र नाम खोजत, हमर अपन नाम नै। चारुदत्त: अमर देवता सभ सदा अहाँक मार्गक रक्षा करथि! आर्यक: अहाँ स्वयं हमर रक्षा कयलहुँ, जखन हमर जीवन सभसँ पैघ सङ्कट कऽ घड़ी भीतर छल। चारुदत्त: नै, ई तँ भाग्य छल जे हमरा एही मधुर संरक्षण देबाक अवसर देलक। आर्यक: मुदा अहाँ भाग्य कऽ हाथक साक्षात माध्यम बनलहूँ। चारुदत्त: राजा पालकक सिपाही सभ सजग भऽ गेल छथि, आ संरक्षण देब आ कठीन होयत। अहाँकें तुरंत एतयसँ विदा भऽ जबाक चाही। आर्यक: जब धरि हम सभ पुनः नै मिलि जाइत छी, तब धरि विदा। (आर्यक गाड़ी लय कऽ प्रस्थान करैत अछि) चारुदत्त: राजा कऽ घोर क्रोधसँ आब हमरा बहुत भय अछि; हमर लेल एही स्थान पर आ बिलम्ब करब विवेकपूर्ण नै होयत। अतः एही जंजीरकें कतहु पुराना कुआँ भीतर फिङ्क दिय’; किएक तँ गुप्तचर सभ राजाक लेल बहुत तीव्र आ दूर कऽ देखय वाला आँखि कऽ जकां कार्य करैत छथि। (चारुदत्तक वाम (बाँया) आँखि फड़कबाक अभिनय होइत अछि) मित्र मैत्रेय, हमर हृदय आब वसन्तसेनाक देखबाक लेल बहुत व्याकुल भऽ रहल अछि। किएक तँ आब, जे हमरा सभसँ प्रिय अछि, जकरा हम सभसँ बेसी प्रेम करैत छी, हम ओकरा नै देखि पाबलहुँ अछि; हमर बाँया आँखि तीव्र गतिसँ फड़कि रहल अछि, आ हमर ई छाती बिना कोनो प्रकट कारणक व्याकुल आ संकटसँ भरल बुझि रहल अछि। आउ, हम सभ चली। (ओ चारू कात चलैत छथि) देखू! एकटा बौद्ध भिक्षु एही मार्ग कात आबि रहल अछि, आ एकर दर्शन एही क्षण कोनो नीक सङ्केत नै अछि। (सोचैत) ओकरा ओही मार्गसँ भीतर आबय दिय’, जखन कि हम सभ एही दोसर मार्गसँ बाहर विदा भऽ जाइत छी। (दोनों प्रस्थान करैत छथि) अष्टम अङ्क: वसन्तसेना-मोटन (वसन्तसेनाक गला दबाएब) (हाथमे एकटा भीजल वस्त्र लेने, एकटा बौद्ध भिक्षु (पूर्व मसाज करय वाला संवाहक) कऽ प्रवेश होइत अछि) भिक्षु: अहाँ अज्ञानी लोक सभ, अपन परलोक लेल पुण्यक सञ्चय करू! पेट पर नियन्त्रण राखू; चिन्तन आ ध्यानक नगाड़ाक नाद सुनि कऽ सदा जागृत रहू; किएक तँ जदि एहन नै करब, तँ ई इन्द्रिय सभ बहुत भयानक चोर छथि, जे अहाँक पुण्यक समस्त सञ्चित पेटारी चोराय कऽ लय जएताह। आ पुनः: हम देखि लेलहुँ अछि जे संसारक समस्त वस्तु अनित्य आ चंचल अछि, अतः आब हम एकमात्र पुण्य आ गुणक निवासस्थान बनि गेल छी। जे मनुष्य अपन पाँचू आन्तरिक शत्रु (इन्द्रिय सभ) कऽ वध कऽ दैत अछि, आ अविद्या रूपी ओही स्त्री-शत्रुक अन्त कऽ दैत अछि जाहि द्वारा एही नगर कऽ रक्षा कयल जाइत अछि, आ जे ओही अहंकार रूपी चाण्डालक पराजित कऽ दैत अछि, ओ निश्चित रूपसँ स्वर्ग भीतर प्रवेश करबाक योग्य होइत अछि। जदि मुड़ मुड़ाएल हो आ मुख सेहो मुड़ाएल हो, मुदा जकर हृदय भीतर वासनाक बाल नै मुड़ाएल हो, तँ एहन मनुष्यक मुड़ मुड़ौनासँ की लाभ? मुदा जकर अन्तःकरण पूर्णतः वासनासँ मुक्त भऽ गेल अछि, ओकरा मोक्षक लेल कोनो बाहरी मुड़ मुड़ौनाक आवश्यकता नै अछि। हम अपन एही वस्त्रकें पीला (गेरुआ) रङ्गमे रङ्गि लेलहुँ अछि। आ आब हम राजा कऽ साढ़ू संस्थानकक एही बगीचा भीतर जाब, एककरा पोखरिमे धोब, आ जतेक तीव्र भऽ सकय एतयसँ विदा भऽ जाब। (ओ चारू कात चलैत अछि आ वस्त्र धोबैत अछि) नेपथ्यसँ एकटा आवाज: रुकू, अहाँ पापी भिक्षु, रुकू! भिक्षु: (बाजय वाला कऽ देखि कऽ, भयसँ) ईश्वर हमर रक्षा करथि! ई राजा कऽ साढ़ू संस्थानक अछि। मात्र एकटा भिक्षुक कोनो अपराध कऽ कारण, आब ओ जतय कतहु कोनो भिक्षुकें देखैत अछि, चाहे ओ अपराधी होबय वा नै, ओकर नाक भीतर सुराख कऽ दैत अछि आ ओकरा बैल जकां चारू कात घसीटैत अछि। एकटा असहाय मनुष्यकें एहन संकटमे कतऽ रक्षक भेटत? मुदा आखिर, परम पूज्य भगवान बुद्धहि हमर एकमात्र रक्षक छथि। (हाथमे तलवार लेने राजदरबारी विट, आ संस्थानकक प्रवेश होइत अछि) संस्थानक: रुकू, अहाँ पापी भिक्षु, रुकू! हम अहाँक मुड़ एही प्रकार कचरि देब जेना कोनो मदिरा-गोष्ठी भीतर लाल मूली कऽ कचरल जाइत अछि। (ओ ओकरा मारैत अछि) विट: अहाँ मूर्ख छी, अहाँकें कोनो एहन भिक्षु पर प्रहार नै करबाक चाही जे वैराग्यक गेरुआ वस्त्र धारण कयलने अछि। एकरा छोड़ू। एकरा बदला एही बगीचा कात देखू, जे अहाँकें आनन्द लेबाक लेल आमन्त्रित कऽ रहल अछि। आन अनाथ प्राणी सभ लेल वनक गाछ सभ साक्षात दयाक कार्य करैत अछि, हुनका प्रसन्नता आ शीतलता दैत; कोनो पापी मनुष्यक हृदय जकां ई बगीचा बिना ककरो पहरेदारीक खुल्ला ठाढ़ अछि, कोनो नव-स्थापित राज्य कऽ जकां, एकटा सहज शिकार बुझाइत अछि। भिक्षु: ईश्वर अहाँक कल्याण करथि! दया करू, परम पूज्य भगवान बुद्धक सेवक! संस्थानक: सर विट, अहाँ सुनलहुँ? ई हमर अपमान कऽ रहल अछि। विट: ओ की कहि रहल अछि? संस्थानक: कहैत अछि जे हम सेवक छी। अहाँ हमरा की बुझैत छी? कोनो ठाकुर (हज्जाम)? विट: ओ अहाँकें परम पूज्य बुद्धक सेवक कहि रहल अछि, आ ई अहाँक कटु निन्दा नै पैघ प्रशंसा अछि। संस्थानक: हमर आ प्रशंसा कसरि, भिक्षु! भिक्षु: अहाँ पवित्र गुण सभसँ समृद्ध छी! अहाँ साक्षात परोपकारी पुरुष छी! संस्थानक: देखलहूँ, सर विट? ओ कहैत अछि जे हम गुणवान छी। ओ कहैत अछि जे हम परोपकारी छी। अहाँ हमरा की बुझैत छी? कोनो नास्तिक दार्शनिक? या पानि पिलाबय वाला नाद? या कोनो कुम्हार? विट: अहाँ मूर्ख छी, ओ अहाँक प्रशंसाहि कऽ रहल अछि जखन ओ कहैत अछि जे अहाँ गुणवान छी, अहाँ परोपकारी छी। संस्थानक: नीक सर, मुदा ई एतय किएक अयल अछि आखिर? भिक्षु: एही वस्त्रकें धोबाक लेल। संस्थानक: नास हो एही भिक्षुक! हमर बहिनक पति (राजा पालक) हमरा सभसँ श्रेष्ठ बगीचा देने छथि, पुष्पककरण्डक बगीचा। कुकुर आ सियार सभ एही पोखरक पानि पीबैत अछि। आ आब हम एकटा पैघ कुलीन पुरुष छी। हम एकटा पैघ मनुष्य छी, आ हम स्वयं कहियो स्नान धरि नै करैत छी। आ अहाँ अपन ई दुर्गन्धित वस्त्र, जाहि पर बासी दालि कऽ रङ्ग लागल छैक, एतय आनि कऽ धोइ रहल छी! हमरा बुझाइत अछि जे हमर एकहि कड़ा प्रहार अहाँक जीवन समाप्त कऽ देत। विट: अहाँ मूर्ख छी, हमरा विश्वास अछि जे ई बहुत पहिनेसँ भिक्षु नै अछि। संस्थानक: अहाँ कसरि कहि सकैत छी, सर? विट: एकरा जनबामे कोनो पैघ बुद्धि नै चाही, देखू! एकर केश अखने मुड़ाएल गेल छैक; एकर ललाट अखन धरि सफेद अछि; एकर काँखि भीतर कऽ टेढ़ वस्त्र अखन धरि कान्ह पर कोनो घावक कलङ्क नै छोड़ने छैक; ओ एककरा बहुत अशिष्टतासँ पहिरने अछि; वस्त्र शरीरसँ कस कऽ सटल नै छैक; आ ऊपरसँ एकर नाप बिल्कुल टेढ़-मेढ़ बुझाइत छैक। भिक्षु: सत्य कहलहूँ, परम पूज्य बुद्धक सेवक। हमरा भिक्षु बनला मात्र किछ कालहि भेल अछि। संस्थानक: तखन अहाँ अपन पूरा जीवन पहिनेसँ भिक्षु बनल किएक नै रहलहूँ? (ओ ओकरा मारैत अछि) भिक्षु: भगवान बुद्धक जय हो! विट: एही बेचार असहाय मनुष्य कऽ मारब बन्द कसरि। एकरा अकेला छोड़ू। एकरा विदा होबाक दिय’। संस्थानक: बस एक क्षण प्रतीक्षा करू, जब धरि हम मन्त्रणा (सलाह) नै कऽ ली। विट: ककर साथ? संस्थानक: अपनहि हृदय कऽ साथ। विट: (अपन मनमे) बेचार असहाय भिक्षु! ओ एतयसँ भागि किएक नै गेल? संस्थानक: हमर सुकुमार छोटका हृदय, हमर बच्चा आ हमर मालिक, की ई भिक्षु विदा भऽ जाय, या की ई भिक्षु एतहि रुकय? (अपन मनमे) नहि विदा होबाक दिय’, नहि रुकबाक दिय’। (प्रकट) नीक सर विट, हम अपन हृदयसँ मन्त्रणा कऽ लेलहुँ अछि, आ हमर हृदय कहैत अछि— विट: की कहैत छैक? संस्थानक: ओ नहि विदा भऽ सकैत अछि, नहि एतहि रुकि सकैत अछि। ओ नहि ऊपर श्वास लय सकैत अछि, नहि नीचां श्वास छोड़ि सकैत अछि। ओ एही क्षण एतहि भूमि पर खसि पड़त आ अहाँक "बस" कहबा सँ पहिने मरि जायत। भिक्षु: भगवान बुद्धक जय हो! हम अहाँक शरणमे छी। विट: एकरा विदा होबाक दिय’। संस्थानक: नीक, मात्र एकहि शर्त पर। विट: आ ओ की अछि? संस्थानक: ओकरा एही पोखरि भीतर माठि फिङ्कबाक चाही, बिना पानि कऽ गन्दा कयलने। या एकरासँ बेसी नीक, ओकरा पानिकें एकटा गोल लड्डू बना लेबाक चाही, आ ओकरा ओही सूखा माठि भीतर फिङ्कबाक चाही। विट: कतेक पैघ महामूर्खता अछि ई! ई सहनशील पृथ्वी एतेक मूर्ख आ एतेक निकम्मा मनुष्य सभक भार सहि रहल अछि, जकर विचार आ जकर कर्म सभ पूर्णतः टेढ़ अछि—ई सभ केवल मांसक गाछ आ पत्थर कऽ मूर्ति जकां छथि। (भिक्षु संस्थानक कात देखि कऽ विचित्र मुख बनाबैत अछि) संस्थानक: एकर की अर्थ अछि? विट: ओ अहाँक प्रशंसा कऽ रहल अछि। संस्थानक: हमर आ प्रशंसा कसरि! पुनः प्रशंसा कसरि! (भिक्षु ओनाहि करैत अछि, पुनः प्रस्थान करैत अछि) विट: देखू ई बगीचा कतेक सुन्दर अछि, अहाँ मूर्ख। यौ गाछ सभक देखू, जे फल आ फूलसँ सुशोभित अछि, जाहि पर चंचल लता सभ आपसमे आलिङ्गन कऽ रहल अछि; राजा कऽ पहरेदार सभ राजा कऽ बलसँ एकर रक्षा कऽ रहल छथि; एहन बुझाइत अछि जेना प्रेमी पत्नी सभ अपन पति सभकें आलिङ्गनमे लेने हो। संस्थानक: बहुत सुन्दर वर्णन कयलहुँ, सर विट। भूमि चारू कात फूल सभसँ रङ्गीन भऽ गेल अछि; फूलक भारसँ पैघ-पैघ गाछ सभ नीचां झुकि गेल छैक; आ गाछक हरियर पत्ता सभक बीचसँ, ई बानर सभ हवामे ओनाहि उछलि रहल छैक, जेना कटहर कऽ फल हवा कऽ झोंकासँ हिलैत अछि। विट: की अहाँ एही पत्थर कऽ आसन पर बैठब, अहाँ मूर्ख? संस्थानक: हम बैठि गेलहुँ। (दोनों बैठि जाइत छथि) अहाँ जनैत छी, सर विट, हमरा आदरणीय वसन्तसेनाक स्मरण अखन धरि आबि रहल अछि। ओ एकटा अपमान कऽ जकां अछि जे हमर मनसँ बाहर नै निकसि पाबि रहल अछि। विट: (अपन मनमे) एतेक पैघ तिरस्कारक बादो एकरा ओकर स्मरण आबि रहल छैक। किएक तँ कहबी अछि, जे नीच मनुष्य होइत अछि, ओकरा जदि कोनो स्त्री ठुकरा दऽ, तँ ओ ओकरा आ बेसी चाहैत अछि; मुदा जे विद्वान आ बुद्धिमान होइत अछि, ओकर वासना या तँ शान्त भऽ जाइत अछि, या सदा लेल समाप्त भऽ जाइत अछि। संस्थानक: बहुत काल बीति गेल, सर विट, जखनसँ हम अपन नौकर स्थावरककें गाड़ी लय कऽ जतेक तीव्र भऽ सकय आबबाक आदेश देलहुँ छल। आ ओ अखन धरि एतय नै पहुँचल अछि। हमरा बहुत कालसँ भूख लागल अछि, आ दोपहर कऽ एही कड़ा घाममे कोनो मनुष्य पएरसँ चलि नै सकैत। किएक तँ देखू! सूर्य आकाशक बिल्कुल मध्य भाग भीतर अछि, आ एकरा कात देखब ओतेकहि कठीन अछि जेना ककरो घोर क्रोधसँ भरल बानरक मुख देखब हो; सौ पुत्र सभक मरि जबाक बाद गान्धारी कऽ जकां, ई पृथ्वी आब घोर संताप भीतर जलि रहल अछि आ संकटसँ मुक्त नै भऽ पाबि रहल अछि। विट: सत्य कहलहूँ। समस्त पशु सभ अपन पागुर करब बन्द कऽ कऽ गाछक शीतल छाया भीतर सुति रहल छैक; कड़ा गरमी कऽ कारण अपन ओठ ठण्ढा करबाक लेल, हरिण सभ वनक पोखरि कात दौड़ि रहल छैक; प्रखर घामक कारण नगरक सुनसान मार्ग सभ पथिक सभकें भयभीत कऽ रहल छैक; गाड़ी कऽ निश्चित रूपसँ दोपहर कऽ एही कड़ा सूर्यसँ बचबाक चाही छल, आ वैह कारण अछि जाहि लेल एककरा बिलम्ब भेल होयत। संस्थानक: हँ सर विट, सूर्यक ई प्रखर किरण हमर मुड़ पर सीधा चोट कऽ रहल छैक; पक्षी, उड़य वाला समस्त जीव आ पाँखि वला प्राणी सभ गाछक डालि भीतर विश्राम कऽ रहल छैक, जखन कि मनुष्य, लोक आ व्यक्ति सभ गम्भीर निश्वास पर निश्वास छोड़ि रहल छथि; अपन घर भीतर ओ सभ तोपल छथि, अपन आवास भीतर सुतल छथि, एही कड़ा गरमी आ दोपहर कऽ भार सहबाक लेल। नीक सर, ओ नौकर अखन धरि एतय नै अछि। हम समय बितेबाक लेल किछु गाबब। (ओ गाबैत अछि) देखू सर विट, अहाँ सुनलहुँ जे हम की गयलहुँ? विट: हम की कहब? आहा, कतेक सुरीला अछि! संस्थानक: एकरा सुरीला आ सुगन्धित किएक नै होबाक चाही आखिर? नागरमोथा आ जीरा कऽ हम एकटा नीक अचार बनाबैत छी, हीङ्ग, अदुआ, वच आ चीनी कऽ रस एकरामे मिलाबैत छी; वैह सुगन्धित व्यञ्जन हम बहुत चावसँ खाइत छी; तँ हमर स्वर एतेक मधुर आ श्रेष्ठ किएक नै होयत आखिर? नीक सर विट, हम एक बेर पुनः गाबब। (ओ पुनः गाबैत अछि) देखू सर, अहाँ सुनलहुँ जे हम की गयलहुँ? विट: हम की कहब? आहा, कतेक सुरीला अछि! संस्थानक: एकरा सुरीला आ सुगन्धित किएक नै होबाक चाही आखिर? कोकिल कऽ सुकुमार मांस कऽ हम एकटा नीक सूप बनाबैत छी, हीङ्ग आ करिया मरिच कऽ गोटा एकरामे मिलाबैत छी; तेल आ घी कऽ धारसँ हम ओही मांसकें छिटैत छी; तँ हमर स्वर एतेक मधुर आ श्रेष्ठ किएक नै होयत आखिर? मुदा सर विट, ओ नौकर अखन धरि एतय नै अछि। विट: अपन मन शान्त राखू। ओ आब कम्ती समय भीतर एतहि होयत। (संस्थानकक बन्द गाड़ी चलाबैत स्थावरक, आ भीतर वसन्तसेनाक प्रवेश होइत अछि) स्थावरक: हम बहुत भयभीत छी। दोपहर भऽ गेल छैक। हम आशा करैत छी जे राजा कऽ साढ़ू संस्थानक क्रुद्ध नै होताह। हमरा गाड़ी आ तीव्र गतिसँ चलाबाक चाही। आगाँ बढ़ू, बैल सभ, आगाँ बढ़ू! वसन्तसेना: (भीतरसँ) हाय! ई वर्धमानकक आवाज नै अछि। एकर की अर्थ भऽ सकैत अछि? हमरा आश्चर्य भऽ रहल अछि जे की महराज चारुदत्त एही विचारसँ भयभीत भऽ गेलाह जे बैल सभ थाकि जेताह, आ अतः ओ कोनो दोसर मनुष्यकें दोसर गाड़ी कऽ साथ पठाय देलन्हि। हमर दहिना आँखि फड़कि रहल अछि। हमर हृदय चारू कात काँपि रहल अछि। एतय चारू कात कोनो मनुष्य देखि नै रहल अछि। सभ वस्तु जेना हमर आँखिक सम्मुख नाचि रहल हो। संस्थानक: (चक्र कऽ नाद सुनि कऽ) गाड़ी आबि गेल, सर विट। विट: अहाँ कसरि जनैत छी? संस्थानक: अहाँ देखि नै सकैत छी? ई कोनो बूढ़ा सूअर कऽ जकां चूँ-चूँ कऽ रहल छैक। विट: (गाड़ी कऽ देखि कऽ) बिल्कुल सत्य। गाड़ी एतहि आबि गेल अछि। संस्थानक: स्थावरक, हमर बच्चा, हमर नौकर, की अहाँ एतय आबि गेलहूँ? स्थावरक: हँ, महराज। संस्थानक: की गाड़ी एतय अछि? स्थावरक: हँ, महराज। संस्थानक: की बैल सभ एतय अछि? स्थावरक: हँ, महराज। संस्थानक: आ की अहाँ सेहो एतय छी? स्थावरक: (हँसैत) हँ, मालिक, हम स्वयं सेहो एतहि छी। संस्थानक: तँ गाड़ी कऽ भीतर लय आबब। स्थावरक: कोन मार्गसँ? संस्थानक: सीधा एतहि सँ, जतय ई देबाल नीचां खसि रहल छैक। स्थावरक: ओह मालिक, बैल सभ मरि जएताह। गाड़ी कऽ एक-एक अङ्ग टूटि कऽ अलग भऽ जएतैक। आ हम, अहाँक नौकर, स्वयं सेहो मारल जाब। संस्थानक: हम राजा कऽ साढ़ू छी, मनुष्य। जदि बैल सभ मरि जएताह, तँ हम कखनो आन कीन लेब। जदि गाड़ी टूटि जएतैक, तँ हम दोसर बना लेब। जदि अहाँ मरि जाब, तँ कोनो दोसर चालक आबि जायर। स्थावरक: संसारक सभ वस्तु दोबारा आबि सकैत छैक—मुदा हमर बदला कोनो दोसर स्थावरक नै आबि सकैत। संस्थानक: सभ वस्तु कऽ टूटि कऽ अलग भऽ जबाक दिय’। देबाल कऽ ऊपरसँ गाड़ी भीतर लाउ। स्थावरक: तँ टूटि जाउ, गाड़ी, अपन चालक कऽ साथहि टूटि जाउ। दोसर गाड़ी आबि जएतैक। हमरा जा कऽ अपन मालिकक सम्मुख उपस्थित होबाक चाही। (ओ गाड़ी भीतर लाबैत अछि) की! की गाड़ी नै टूटल? मालिक, देखू अहाँक गाड़ी एतय सुरक्षित अछि। संस्थानक: बैल सभक शरीर दो टुकड़ामे नै फाटल? आ रस्सा सभ नै मारल गेल? आ अहाँ स्वयं सेहो नै मारल गेलहूँ? स्थावरक: नै, महराज। संस्थानक: आउ, सर विट। आउ हम सभ गाड़ी कऽ देखी। अहाँ हमर आचार्य छी, सर, हमर सभसँ श्रेष्ठ आचार्य। अहाँ एकटा एहन मनुष्य छी जकर हम परम आदर करैत छी, हमर अभिन्न मित्र, एकटा एहन पुरुष जकर सम्मान करबामे हमरा आनन्द भेटैत अछि। कृपया अहाँ गाड़ी भीतर पहिने प्रवेश करू। विट: बहुत नीक। (ओ भीतर जाब आरम्भ करैत छथि) संस्थानक: ओतेक नै! रुकू! की ई अहाँक बाप कऽ गाड़ी अछि जे अहाँ एकरामे पहिने प्रवेश करब? हम एही गाड़ीक मालिक छी। हम एकरामे पहिने प्रवेश करब। विट: हम तँ मात्र वैह कयलहुँ जे अहाँ कहलहूँ छल। संस्थानक: जदि हम एहन कहि सेहो देलहुँ, तइयो अहाँकें एतेक शिष्ट अवश्य होबाक चाही छल जे अहाँ कहि सकिताह "अहाँक बाद, मालिक।" विट: अहाँक बाद, तखन। संस्थानक: आब हम प्रवेश करब। स्थावरक, हमर बच्चा, हमर नौकर, गाड़ी कऽ उलट कऽ घुमाउ। स्थावरक: (ओनाहि करैत) प्रवेश करू, मालिक। संस्थानक: (भीतर प्रवेश करैत अछि आ चारू कात देखैत अछि, पुनः घोर भय आ त्राससँ तुरंत बाहर आबि जाइत अछि, आ विटक कण्ठसँ सटि जाइत अछि) ओह, ओह, ओह! अहाँ एकटा मृत मनुष्य छी! एतय एकटा डायन अछि, या कोनो चोर अछि, जे हमर गाड़ी भीतर बैठल अछि आ जिबैत अछि। जदि ई डायन अछि, तँ हम सभ लूटल जाब। जदि ई चोर अछि, तँ हम सभ जिबैत चबा कऽ खायल जाब। विट: भयभीत नै होऊ। एकटा डायन कसरि कोनो गाड़ी भीतर यात्रा कऽ सकैत अछि आखिर? हम आशा करैत छी जे दोपहर कऽ एही कड़ा घाम अहाँक आँखिक ज्योति मन्द नै कऽ देलक हो, जेसँ अहाँ स्थावरकक छाया कऽ ही कोनो विचित्र रूप बुझि लेलहूँ। संस्थानक: स्थावरक, हमर बच्चा, हमर नौकर, की अहाँ जिबैत छी? स्थावरक: हँ, महराज। संस्थानक: मुदा सर विट, एतय एकटा स्त्री बैठल अछि आ गाड़ी भीतर जिबैत अछि। देखू आ सत्य जानू! विट: एकटा स्त्री? तँ आउ हम सभ अपन मुड़ तुरंत झुका कऽ एतयसँ विदा भऽ चली, ओही बैल सभक जकां जकर आँखि ऊपरसँ खसय वाला वर्षा कऽ बून्द मन्द कऽ दैत छैक; सार्वजनिक स्थान सभ पर हम अपन प्रतिष्ठा देखेबामे हिचकिचाबैत छी; आ कोनो कुलीन कनियाँ कात देखबामे हमरा सङ्कोच होइत अछि। वसन्तसेना: (आश्चर्यसँ, अपन मनमे) ओह, ओह! ई तँ हमर आँखिक सम्मुख ओही काँटा कऽ जकां अछि, राजा कऽ साढ़ू संस्थानक। हाय! संकट बहुत पैघ अछि। असहाय स्त्री! हमर एतय आबब ओतेकहि व्यर्थ सिद्ध भेल जेना कोनो सूखा नून वला माठि भीतर पानि कऽ बून्द खसबाक जकां हो। आब हम की करब? संस्थानक: ई बूढ़ा नौकर भयभीत अछि आ ओ गाड़ी भीतर नै देखत। की अहाँ गाड़ी भीतर देखब, सर विट? विट: एकरामे हम कोनो हानि नै देखि रहल छी। हँ, हम देखब। (ओ देखैत छथि) संस्थानक: की ओ सियार सभ छथि जे हमरा आकाशमे उड़ैत देखि रहल छथि, आ की ओ कौआ सभ छथि जे चारू पएरसँ चलि रहल छथि? जब धरि ओही डायन ओकरा अपन आँखिसँ चबा कऽ खायब आरम्भ करत, आ अपन दाँत सभसँ देखत, हम एतयसँ अपन प्राण बचेबाक लेल भागि जाब। विट: (वसन्तसेनाकें देखि कऽ, उदासीसँ अपन मनमे) की ई सम्भव अछि आखिर? एकटा सुकुमार हरिण स्वयं बाघक पाछाँ चलि अयल अछि। हाय! ओकर अपना साथी शरद ऋतुक चन्द्रमा जकां सुन्दर अछि, जे रेत कऽ ढेरी पर ओकर मार्ग देखि रहल अछि; आ तइयो ई हँसिनी ओकरा छोड़ि कऽ चलि अयल अछि? आ एकटा साधारण कौआ कऽ सम्मुख नृत्य करबाक लेल तैयार अछि? (वसन्तसेना कऽ कान भीतर फुसफुसाबैत छथि) आह वसन्तसेना! ई बिल्कुल उचित नै अछि, नहि अहाँक मर्यादा कऽ अनुकूल अछि। अहाँक अहङ्कार पहने एकरा ठुकरा देने छल, मुदा आब मात्र सुवर्ण लेल, आ अपन माय कऽ इच्छाक वश भऽ कऽ— वसन्तसेना: नै! (ओ अपन मुड़ हिलाबैत छथि) विट: अहाँक स्वभाव आब अहाँक प्रतिष्ठाकें नै जनैत अछि; अहाँ एकर सम्मान कऽ रहल छी, एकटा साधारण स्त्री कऽ जकां। की हम पहने अहाँकें नै कहलहुँ छल जे "ओही पुरुष कऽ सेवा कसरि जकरा अहाँ प्रेम करैत छी, आ ओकरो जकरासँ अहाँ घृणा करैत छी"? वसन्तसेना: हमरासँ गाड़ी पहिचानबामे भूल भऽ गेल, आ वैह कारण अछि जाहि लेल हम एतय आबि गेलहुँ। हम अहाँक शरणमे छी। विट: भयभीत नै होऊ। आबब, हमरा एककरा अवश्य छलबबाक चाही। (ओ संस्थानक पाँ वापस आबैत छथि) अहाँ मूर्ख, भीतर वास्तवमे एकटा डायन अछि जे गाड़ी कऽ अपन घर बना लेने अछि। संस्थानक: मुदा सर विट, जदि भीतर कोनो डायन रहि रहल अछि, तँ अहाँ लूटल किएक नै गेलहूँ आखिर? आ जदि ओ कोनो चोर अछि, तँ अहाँकें जिबैत चबा कऽ खायल किएक नै गेल? विट: एही विषय भीतर गम्भीर विचार करबाक की आवश्यकता अछि? मुदा जदि हम सभ पएरसँ चलि कऽ बगीचाक मार्गसँ उज्जयिनी नगरी कात वापस चली, तँ एकरामे की हानि होयत आखिर? संस्थानक: आ जदि हम सभ ओनाहि कयलहुँ, तँ तखन की? विट: तखन हमरा सभक किछु व्यायाम भऽ जएत, आ बैल सभ कऽ थकावट्सँ बचाओल जा सकत। संस्थानक: बहुत नीक। स्थावरक, हमर नौकर, गाड़ी आगाँ बढ़ाउ। मुदा नै! रुकू, रुकू! हम साक्षात देवता सभ आ ब्राह्मण सभक सम्मुख पएरसँ पैदल चलब? बिल्कुल नै! हम अपन गाड़ी भीतर बैठि कऽ जाब, जाहिसँ लोक सभ हमरा बहुत दूर मार्गसँ देखि सकथि, आ कहि सकथि "ओतय देखू, ओ जाइ रहल छथि हमर मालिक, राजा कऽ साढ़ू संस्थानक।" विट: (अपन मनमे) जहरकें अमृत भीतर बदलना बहुत कठीन अछि। एहनहि होबय तखन। (प्रकट) अहाँ मूर्ख, ई वसन्तसेना छथि, जे अहाँसँ मिलबाक लेल अयल छथि। वसन्तसेना: ईश्वर कखनो एहन नै करथि! संस्थानक: (परम प्रसन्नतासँ आनन्दित भऽ कऽ) ओह, ओह! हमरासँ मिलबाक लेल, एकटा पैघ कुलीन पुरुषसँ, एकटा असली मनुष्यसँ, साक्षात वासुदेवसँ? विट: हाँ। संस्थानक: ई एकटा एहन अद्भुत भाग्य अछि जे पहने कहियो नै सुनल गेल छल। ओही दोसर समय हम ओकरा क्रुद्ध कऽ देने छलहुँ, अतः आब हम ओकर पएर पर खसि पड़ब आ ओकर सम्मुख क्षमा मङ्गब। विट: बहुत सुन्दर! संस्थानक: हम स्वयं ओकर पएर पर खसि पड़ब। (ओ वसन्तसेनाक लग जाइत अछि) हमर सुकुमार दुलहिन, हमर सुकुमार माय, हमर प्रार्थना सुनू। हम अपन हाथ जोड़ैत छी आ अहाँक पएर पर खसि पड़ैत छी—अहाँक आँखि पैघ अछि, अहाँक दाँत बिल्कुल साफ आ सुन्दर अछि, अहाँक अङ्गुलि कऽ दस गोट नख अछि—अपन एही सेवक कऽ क्षमा कऽ दिय’ जे प्रेमक वासनामे पागल भऽ कऽ अपराध कऽ देलक छल, हमर प्रियतम। वसन्तसेना: (घोर क्रोधसँ) हमरा छोड़ू! अहाँक शब्द एकटा अपमान अछि! (ओ संस्थानककें अपन पएरक ठोकरसँ पाछाँ फिङ्कि दैत छथि) संस्थानक: (घोर क्रोधसँ प्रज्वलित भऽ कऽ) ई मुड़ जेकरा हमर माय आ आदरणीय कनियाँ चुम्बन कयलन्हि छल, जे कहियो कोनो देवताक सम्मुख आदरसँ नै झुकल छल, हम एकरा जनैत छी, एही मुड़ ऊपर एकटा गणिकक बेटी अपन पएर रखबाक पराक्रम देखौलक, ओही सियार सभक जकां जे कोनो मृत मांस ऊपर उछलैत अछि। स्थावरक, अहाँ पापी नौकर, अहाँ एककरा कतयसँ उठा कऽ लाबने छी आखिर? स्थावरक: मालिक, गामक लोक सभक गाड़ी कऽ कारण मुख्य मार्ग पूरे बन्द छल। अतः हम गाड़ी महराज चारुदत्तक बगीचाक दुआरि पर रोकि कऽ बाहर गेल छलहुँ। आ जखन हम एकटा गामक मनुष्यक ओही चक्र कऽ बल दऽ रहल छलहुँ, हमरा बुझाइत अछि जे ओकरासँ गाड़ी पहिचानबामे भूल भऽ गेल, आ ओ एककरा दोसर गाड़ी बुझि कऽ भीतर चढ़ि गेली। संस्थानक: ओहो! ओकरा हमर गाड़ी पहिचानबामे भूल भऽ गेल? आ ओ हमरा देखबाक लेल एतय नै अयल अछि? निकसू हमर गाड़ी भीतरसँ, बाहर आबब! अहाँ अपन ओही दरिद्र व्यापारीक पुत्र पाँ जाइ रहल छी, की अहाँ नै? ई हमर बैल छथि जेकरा चालक आगाँ बढ़ा रहल अछि। बाहर आबब, बाहर आबब, अहाँ दासी! बाहर आबब, बाहर आबब! वसन्तसेना: वास्तवमे, अहाँ हमर सम्मानहि कऽ रहल छी जखन अहाँ कहि रहल छी जे हम चारुदत्त महराजकें देखबाक लेल अयलहुँ अछि। आब जे विधाताक विधान अछि, ओ होयत। संस्थानक: हमर ई दोनों हाथ, जकर दस गोट सुन्दर नख अछि, हमर ई हाथ जे कमल-पात कऽ जकां सुकुमार अछि, आब बहुत व्याकुल भऽ रहल अछि, अहाँक रूप कऽ नोचबाक लेल; आ हम एकहि क्षण भीतर अहाँक एही सुकुमार रूपकें केशसँ पकड़ि कऽ गाड़ी भीतरसँ नीचां घसीटब, जेना ओही कूर रावण सीता कऽ अपन साथ लय जबाक लेल ओकर रूपकें नोचने छल। विट: कोनो कुलीन आ पवित्र स्त्रीक एही प्रकार कूरतासँ अपमान नै कयल जा सकैत; नहि बगीचाक कोनो सुकुमार लताक पत्ता कऽ एही प्रकार नष्ट कयल जा सकैत। ठाढ़ होऊ, मनुष्य। हम स्वयं हुनका नीचां उतरबामे सहायता करब। आबब, वसन्तसेना! (वसन्तसेना नीचां उतरैत छथि आ एक कात अलग ठाढ़ भऽ जाइत छथि) संस्थानक: (अपन मनमे) क्रोधक ई ज्वाला ओही समय जलि उठल छल जखन ओ हमर प्रस्ताव ठुकरा देने छली, आ आब ई घोर रूपसँ प्रज्वलित भऽ गेल अछि जखन ओ हमरा लात मारलन्हि। अतः आब हम एकर हत्या अवश्य करब। सुन्दर! एही मार्गसँ। (प्रकट) नीक, सर विट, अहाँ की चाहैत छी आखिर? एकटा पैघ ओढ़नी जकर किनार चारू कात लटकैत हो, आ जे सैकड़ों रस्सा कऽ साथ बान्हल हो? या एकटा बहुत सुगन्धित मधुर मांसक व्यञ्जन, जेकरा देखि कऽ अहाँ अपन ओठ चबा कऽ चीखब आरम्भ कसरि आ कहि सकि "चूहु, चूहु, चक्कु, चूहु, चूहु"? विट: की अर्थ अछि एकर? संस्थानक: हमर एकटा उपकार कसरि। विट: निश्चित रूपसँ। जे किछु हो, मुदा कोनो पाप-कर्म नै होबाक चाही। संस्थानक: एकरा भीतर पाप कऽ कोनो सुगन्ध धरि नै अछि, सर विट। कोनो दुर्गन्ध नै छैक! विट: बाजू तखन। संस्थानक: वसन्तसेनाक हत्या कऽ दिय’। विट: (अपन दोनों कान बन्द करैत छथि) एकटा सुकुमार स्त्री, जे हमर उज्जयिनी नगरीक अमूल्य रत्न छथि, एकटा गणिका जकर स्नेह कहियो कलङ्कित नै भेल—जदि हम एही निर्दोष स्त्रीक बिना कोनो दयाक हत्या कऽ देब, तँ क कोन नाव हमर आत्माकें वैतरणी (भयानक नदी) कऽ पार लय जएतैक? संस्थानक: हम अहाँकें एकटा पैघ नाव देब। आ एकर अतिरिक्त, एही सुनसान बगीचा भीतर, अहाँकें ओकर हत्या करैत के देखत आखिर? संस्थानक: ई दसों दिशा सभ, वनक देवता सभ, आकाश, वायु, चन्द्रमा, अपन प्रखर किरण सभक साथ सूर्य, पुण्य, हमर अपन अन्तःकरण—हम एही सभसँ भागि कऽ कतहु नै जा सकी, नहि एही पृथ्वीसँ जे प्रत्येक पाप आ पुण्यक साक्षात साक्षी अछि। संस्थानक: नीक तखन, अपनहि ओढ़नी एकर मुख ऊपर तोपि दिय’ आ एकर हत्या कऽ दिय’। विट: अहाँ मूर्ख छी! अहाँ पापी छी! संस्थानक: ई बूढ़ा सूअर पापसँ डरि रहल अछि। कोनो चिन्ता नै। हम स्थावरक, अपन नौकरकें विवश करब। स्थावरक, हमर बच्चा, हमर नौकर, हम अहाँकें सोनाक कङ्कण देब। स्थावरक: आ हम ओकरा अपन हाथ भीतर पहिरब। संस्थानक: हम अहाँक लेल सोनाक एकटा पैघ आसन बना देब। स्थावरक: आ हम ओकरा ऊपर बैठब। संस्थानक: हम अपन भोजनक बचाएल समस्त श्रेष्ठ अंश अहाँकें देब। स्थावरक: आ हम ओकरा बहुत चावसँ खाब। संस्थानक: हम अहाँकें अपन सभ नौकर-चाकर सभक प्रधान बना देब। स्थावरक: मालिक, हम सभसँ पैघ प्रधान बनब। संस्थानक: अहाँकें मात्र वैह करबाक चाही जे हम कहि रहल छी। स्थावरक: मालिक, हम सभ किछु करब, मुदा कोनो पाप-कर्म नै होबाक चाही। संस्थानक: एकरा भीतर पाप कऽ कोनो गन्ध धरि नै अछि। स्थावरक: बाजू तखन, मालिक। संस्थानक: वसन्तसेनाक हत्या कऽ दिय’। स्थावरक: ओह मालिक, दया करू! हम अपन अयोग्यता भीतर सेहो एही पवित्र आदरणीय कनियाँकें एतय लाबलहुँ, किएक तँ ओकरासँ गाड़ी पहिचानबामे भूल भऽ गेल छल। संस्थानक: अहाँ पापी नौकर, की हम अहाँक मालिक नै छी आखिर? स्थावरक: अहाँ हमर शरीरक मालिक छी, हमर चरित्रक नै। दया करू, मालिक, दया करू! हमरा बहुत भय भऽ रहल अछि। संस्थानक: अहाँ हमर नौकर छी। अहाँकें ककर भय अछि? स्थावरक: परलोकक, मालिक। संस्थानक: के अछि ई "परलोक आखिर"? स्थावरक: मालिक, ओ पुण्य आ पाप कऽ फल देबय वाला परम सत्ता अछि। संस्थानक: पुण्यक की फल होइत छैक आखिर? स्थावरक: हमर मालिक कऽ जकां होना, प्रचुर सुवर्ण आ आभूषण सभक साथ। संस्थानक: पापक की फल होइत छैक? स्थावरक: हमर जकां होना, ककरो दोसर मनुष्यक अन्न खायब। वैह कारण अछि जाहि लेल हम कोनो पाप-कर्म नै करब। संस्थानक: तँ अहाँ एकर हत्या नै करब? (ओ ओकरा अपन पूर्ण शक्तिसँ मारैत अछि) स्थावरक: अहाँ हमरा मारि सकैत छी, मालिक। अहाँ हमरा मारि सेहो सकैत छी, मालिक। मुदा हम कोनो पाप-कर्म नै करब। एकटा अभागा, जीवन भरि कऽ दास छी हम, दास भऽ कऽ जियैत छी, दास भऽ कऽ मरब हम; मुदा आगाँ कोनो आन परलोकक दुःख हम नै कीनब, हम कोनो पाप नै करब, नै करब। ... (विस्तृत आ पूर्ण संवादक प्रवाह) वसन्तसेना: सर विट, हम अहाँक शरणमे छी। विट: एकरा क्षमा कऽ दिय’, अहाँ मूर्ख! बहुत सुन्दर, स्थावरक! की ई बेचार असहाय दास परलोक भीतर पुण्यक फल खोजि रहल अछि? आ की एकर मालिक एतेक उदासीन अछि? तँ कोन कारण अछि जे एहन मनुष्य सभकें तुरंत नरक भीतर नै फिङ्कल जाइत, जकर पाप कऽ पेटारी दिन-रात बढ़ि रहल छैक, आ जे कखनहु पुण्यकें नै जनैत? आ पुनः एक बेर: आह कूर, कूर अछि हमर भाग्य, जे सभसँ सङ्कीर्ण दुआरिसँ भीतर प्रवेश करैत छैक; किएक तँ ई एकटा दास अछि, आ अहाँ मालिक छी; किएक तँ ई अहाँक सुवर्णक भोग नै कऽ सकैत, आ अहाँ एकर शब्दक आदर नै करैत। संस्थानक: (अपन मनमे) ई बूढ़ा सियार पापसँ डरि रहल अछि, आ ई "जीवन भरि कऽ दास" परलोकसँ डरि रहल अछि। हमरा ककर भय अछि, हम, राजा कऽ साढ़ू, एकटा पैघ कुलीन पुरुष, एकटा असली मनुष्य? (प्रकट) नीक नौकर, अहाँ "जीवन भरि कऽ दास", अहाँ जा सकैत छी। अपन कक्ष भीतर जाउ आ विश्राम करू आ हमर मार्गसँ दूर रहू। स्थावरक: जेना अहाँक आज्ञा, मालिक। (वसन्तसेना कें) आदरणीय कनियाँ, आब हमर पाँ कोनो आन शक्ति नै बचल अछि। (प्रस्थान करैत अछि) संस्थानक: (अपन कमर कसैत अछि) बस एक क्षण रुकू, वसन्तसेना, एक क्षण रुकू। हम अहाँक हत्या करबाक इच्छा राखैत छी। विट: अहाँ एकर हत्या हमर आँखिक सम्मुख करब? (ओ ओकरा कण्ठसँ पकड़ि लैत छथि) संस्थानक: (भूमि पर पटकल भऽ कऽ खसि पड़ैत अछि) सर विट, अहाँ अपन मालिकहि कऽ हत्या कऽ रहल छी। (ओ क्षण भरि लेल चेतना खो दैत अछि, पुनः होशमे आबैत अछि) हम सदा एकरा बहुत मांस खवाबैत छलहुँ, घी कऽ धार सेहो देबैत छलहुँ खाय लेल; आब जखन संकट कऽ घड़ी भीतर हम मित्र खोजि रहल छी, तँ ओ हमरा बीच भँवर भीतर छोड़ि कऽ भागि रहल अछि? (किछ काल चिन्तनक बाद) सुन्दर! हमर पाँ एकटा चतुर विचार अछि। ओही बूढ़ा सियार एकरा अपन मुड़ हिला कऽ एकटा गुप्त सङ्केत देने छल। अतः हम पहिने ओकरा एतयसँ दूर पठा देब, आ ओकरा बाद हम वसन्तसेनाक हत्या करब। वैह चतुर विचार अछि। (प्रकट) सर विट, हमर जन्म एकटा एहन पैघ कुल भीतर भेल अछि जे कोनो बहुमूल्य सुवर्ण कऽ मदिरा-पात्र जकां विशाल अछि। हम ओही पाप कसरि कऽ सकी जकर हम गप कयलहुँ छल? हम तँ मात्र एककरा अपना कात आकर्षित करबाक लेल एहन बाजल छलहुँ। विट: अहाँ अपन एही पैघ कुल कऽ अहङ्कार किएक देखि रहल छी आखिर? चरित्रहि मनुष्यकें श्रेष्ठ बनाबैत अछि; मुदा काँटा आ कूर घास सभ सेहो बहुत उपजाऊ माठि भीतर प्रचुर रूपसँ उगि जाइत छैक। संस्थानक: अहाँक एतय ठाढ़ होबाक कारण ओ अपन स्नेह स्वीकार करबामे लज्जित भऽ रहल अछि। कृपया अहाँ एतयसँ विदा होऊ। हमर नौकर स्थावरक सेहो मारि खायला कऽ बाद चलि गेल छैक। ओ भागि रहल होयत। ओकरा पकड़ू, सर विट, आ ओकरा अपन साथ वापस लाउ। विट: (अपन मनमे) वसन्तसेना अपन अहङ्कार कऽ कारण अपन स्नेह स्वीकार नै करत जब धरि हम एतय लग ठाढ़ छी; अतः आब हमरा एककरा एतय एकरहि साथ अकेला छोड़ि देबाक चाही; प्रेमक रहस्य सदा एकान्तक आकाङ्क्षा राखैत छैक। (प्रकट) बहुत नीक। हम जाइ रहल छी। वसन्तसेना: (विटक वस्त्रक किनार जकड़ि लैत छथि) की हम अहाँक शरणमे नै अयलहुँ छल आखिर? विट: भयभीत नै होऊ, वसन्तसेना। अहाँ मूर्ख, वसन्तसेना अहाँक हाथ भीतर एकटा धरोहर कऽ रूपमे सौंपल गेल छथि। संस्थानक: बहुत नीक। एककरा हमरहि हहाथ भीतर सौंपल रहय दिय’। ई एकटा एहन धरोहर अछि जेकरा हम अवश्य पूरा करब। विट: की अहाँ सत्य बाजि रहल छी? संस्थानक: सत्य। विट: (किछ कदम आगाँ बढ़ैत छथि। अपन मनमे) नै! जदि हम चलि गेलहुँ, तँ ओ पापी एकर हत्या कऽ देत। हम एक क्षण लेल एतहि ककरो ओत तोपि जाब, आ देखब जे ओ की करबाक विचार राखैत अछि। (ओ एक कात तोपि जाइत छथि) संस्थानक: सुन्दर! आब हम एकर हत्या करब। मुदा नै! कखनो एहन नै हो जे ई चतुर कपटी, ई ब्राह्मण, ई बूढ़ा सियार कतहु लुकाएल हो; ओ अपन सियार वला स्वभाव कऽ जकां चारू कात चीखब आरम्भ कऽ देत। हम एककरा छलबबाक लेल मात्र ई करब। (ओ फूल सञ्चय करैत अछि आ अपना कऽ सजाबैत अछि) वसन्तसेना, हमर प्रियतम, हमर प्रियतम! आबब! विट: हँ, ओ आब प्रेमीक रूप धारण कऽ लेने अछि। सुन्दर! हम सन्तुष्ट छी। आब हम जाब। (विट प्रस्थान करैत छथि) संस्थानक: हम अहाँकें सुवर्ण देब, हम अहाँकें प्रियतम कहब; हमर मुकुट वला मुड़ अहाँक पएर कऽ पूजा करैत छैक। अहाँ हमरा किएक प्रेम नै करैत छी, हमर साफ दाँत वला कनियाँ? अहाँ ओही दरिद्र मनुष्यक कसरि पूजा कऽ सकैत छी आखिर? वसन्तसेना: अहाँ एहन पूछबाक साहस कसरि कयलहुँ आखिर? (ओ अपन मुड़ झुकाबैत छथि आ नीच श्लोक सभक पाठ करैत छथि) ओह नीच आ अधम! ओह पापी! अहाँकें आ की जनबाक चाही? अहाँ हमरा आब सुवर्ण आ सत्ता कऽ लोभ किएक देखाइ रहल छी आखिर? मधु कऽ खोजी कपरौआ सदा ओही सुकुमार कमल-पुष्प कऽ पूजा करैत अछि जे पूर्णतः निर्मल आ निष्कलङ्क हो। चाहे दरिद्रता कोनो भला मनुष्य कऽ कतेकौ नीचां किएक नै खसाय, मुदा ओकर दुःख भीतर सेहो एकटा विशेष सम्मान सुरक्षित रहैत छैक; आ एकटा गणिकाक सभसँ पैघ गौरव एकहि बात भीतर अछि जे ओ अपन स्नेह कोनो ईमानदार पुरुष ऊपर अर्पण कसरि। आ हम, जकरा आमक गाछ (चारुदत्त) सँ स्नेह भऽ गेल हो, हम कखनो कोनो बबूल कऽ गाछ (अहाँ) सँ आलिङ्गन नै कऽ सकी। संस्थानक: अहाँ दासी, अहाँ ओही बेचार छोटका चारुदत्तकें आमक गाछ कहि रहल छी, आ हमरा अहाँ बबूल कऽ गाछ कहलहुँ, कोनो सुगन्धित गाछ सेहो नै! वैह तरीका अछि जाहिसँ अहाँ हमर अपमान कऽ रहल छी, आ अखन धरि अहाँक अन्तःकरण भीतर चारुदत्तहि तोपल अछि। वसन्तसेना: हम ओही पुरुष कऽ अपन स्मृति भीतर किएक नै तोपि कऽ राखब जे हमर हृदयक भीतरी महल भीतर निवास करैत छथि? संस्थानक: एही क्षण हम ओही "अहाँक हृदय भीतर निवास करय वाला" कऽ गला दबा देब, आ अहाँक सेहो। ठाढ़ रहू, अहाँ ओही दरिद्र व्यापारीक प्रेमी! वसन्तसेना: ओह बाजू, ओह एक बेर पुनः बाजू एही शब्द सभकें जे हमर सम्मान कऽ आ बढ़ा दैत अछि! संस्थानक: आब ओही चारुदत्त कऽ—ओही दासीपुत्र कऽ—अहाँक रक्षा करबाक लेल आबय दिय’ आखिर! वसन्तसेना: ओ हमर रक्षा अवश्य करिताह, जदि ओ हमरा देखि सकिताह तँ। संस्थानक: की ओ देवता सभक राजा छथि आखिर? कोनो वनक वीर बानर छथि? कोनो अप्सराक पुत्र छथि? या कोनो राक्षसक रूप धारण कयलने छथि? की ओ वायु आ वर्षा कऽ परम पूज्य देवता छथि? या पाण्डु कऽ पुत्र सभक वंशक नाशक छथि? कोनो ज्योतिषी छथि? कतहु दूर देखय वाला गिद्ध छथि? कोनो मन्त्री छथि? कोनो नक्षत्र छथि आखिर? मुदा जदि ओ एहन कोनो छिताह सेहो, तइयो ओ अहाँक रक्षा नै कऽ सकैत छलाह। जेना ओही महाभारत भीतर सीता कऽ वध ओही कूर चाणक्य द्वारा कयल गेल छल, ओनाहि आब हम अहाँक गला दबा देब, जेना जटायु द्रौपदी कऽ गला दबोचने छल। (ओ प्रहार करबाक लेल अपन बांहि उठाबैत अछि) वसन्तसेना: माय! अहाँ कतऽ छी? ओह चारुदत्त! हमर हृदयक आकाङ्क्षा अखन धरि अधूरहि रहि गेल, आ आब हम मरि रहल छी! हम रक्षाक लेल चीखब। नै! जदि वसन्तसेना रक्षाक लेल चीखत, तँ एकरामे ओकर प्रतिष्ठाक अपमान होयत। ईश्वर महराज चारुदत्तक कल्याण करथि! संस्थानक: की ई दासी अखन धरि ओही पापी कऽ नाम जपि रहल अछि आखिर? (ओ ओकरा कण्ठसँ पकड़ि लैत अछि) ओही पुरुष कऽ स्मरण कसरि, अहाँ दासी, ओकरहि नाम जपि कऽ मरू! वसन्तसेना: ईश्वर महराज चारुदत्तक कल्याण करथि! संस्थानक: मरू, अहाँ दासी! (ओ ओकर गला दबाबैत अछि। वसन्तसेना चेतना खो दैत छथि, आ बिना कोनो हलचलक भूमि पर खसि पड़ैत छथि) संस्थानक: (परम प्रसन्नतासँ आनन्दित भऽ कऽ) पाप कऽ ई पैघ पेटारी, ई दासी, अशिष्टता कऽ ई दुर्गन्धित निवास—ओ स्नेह करबाक लेल अयल छली, मुदा आब मृत्युक आलिङ्गन ओकर समस्त चेतना चोरा लेलक छैक। मुदा हम अपन पुष्ट आ शक्तिशाली बांहि कऽ अहङ्कार किएक देखि रहल छी आखिर? ओ तँ मात्र वैह कारणसँ मरि गेल किएक तँ ओकर श्वास बाहर निकसि कऽ समाप्त भऽ गेल छैक। जेना ओही महाभारत भीतर सीता मरि गेली, ओ एतय सुतल अछि। आह हमर माय! कतेक सुन्दरतासँ ई मरि गेल छैक। ओ हमरा कहियो स्नेह नै कयलक, यद्यपि हम एककरा कतेक चाहैत छलहुँ; हम एही सुनसान बगीचाक देखलहुँ, एकटा जाल बिछौलहुँ, एककरा भयभीत कयलहुँ, आ बेचार असहाय लड़कीक चेतना खो देलहुँ। हमर भाय! ओह हमर बाप! अहाँ सभ एही क्षण एतय हमर वीरताक ई अद्भुत दृश्य देखबा सँ वञ्चित भऽ गेलहुँ; अहाँक भाय आ अहाँक पुत्र आब एकटा असली पराक्रमी पुरुष बनि कऽ सामने अयल अछि; आदरणीय द्रौपदी माय कऽ जकां, अहाँ सभ एतय उपस्थित नै छलहूँ, हमर एही पराक्रम देखबाक लेल। सुन्दर! ओही बूढ़ा सियार कखनो एकहि क्षण भीतर एतहि होयत। हमरा एक कात अलग हटि कऽ प्रतीक्षा करबाक चाही। (ओ ओनाहि करैत अछि) (स्थावरक कऽ साथ विटक प्रवेश होइत अछि) विट: हम ओही नौकर स्थावरककें वापस आबबाक लेल विवश कऽ कऽ लाबने छी, आ आब हम ओही मूर्ख कऽ खोजब। (ओ चारू कात चलैत छथि आ देखैत छथि) मुदा देखू! मार्गक कात भीतर एकटा पैघ गाछ नीचां खसि पड़ल छैक, आ ओकर खसबासँ एकटा स्त्री मारल गेल छैक। ओह कूर नियति! अहाँ एही कलङ्क वला कार्य कसरि कऽ सकलहुँ आखिर? आ जखन हम देखि रहल छी जे अहाँक एही भयानक प्रहारसँ एकटा स्त्री मारल गेल छैक, तँ हम स्वयं सेहो भूमि पर खसि पड़ैत छी। वास्तवमे, हमर हृदय भीतर वसन्तसेना लेल जे भय छल, ओ एकटा बहुत कूर कुसङ्केत छल। ओह ईश्वर, प्रार्थना अछि जे आब सभ किछु नीक होबय! (ओ संस्थानकक लग जाइत छथि) अहाँ मूर्ख, हम अहाँक नौकर स्थावरककें वापस लाबने छी। संस्थानक: अहाँ कसरि छी, सर विट? स्थावरक, हमर बच्चा, हमर नौकर, अहाँ कसरि छी आखिर? स्थावरक: हम ठीक छी, धन्यवाद। विट: हमर ओही धरोहर हमरा वापस दिय’। संस्थानक: कोन धरोहर आखिर? विट: वसन्तसेना। संस्थानक: ओ चलि गेली। विट: कतय आखिर? संस्थानक: बिल्कुल अहाँक पाछाँ। विट: (संशयसँ) नै, ओ ओही दिशा कात कखनहि नै गेली। संस्थानक: अहाँ कोन दिशा कात गेल छलहूँ आखिर? विट: पूर्व कात। संस्थानक: नीक, ओ दक्षिण कात गेली। विट: हम सेहो ओही कात गेल छलहुँ। संस्थानक: ओ उत्तर कात गेली। विट: ई सभ महामूर्खता कऽ गप अछि। हमर मन एही गपसँ सन्तुष्ट नै अछि। सत्य बाजू। संस्थानक: हम अहाँक मुड़ कऽ कसम खाइत छी, सर विट, आ अपन पएर कऽ। अहाँ अपन मन शान्त राखि सकैत छी। हम ओकर हत्या कऽ देलहुँ अछि। विट: (निराशासँ गदगद भऽ कऽ) अहाँ वास्तवमे ओकर हत्या कऽ देलहुँ? संस्थानक: जदि अहाँक हमर शब्द ऊपर विश्वास नै अछि, तँ देखू राजा कऽ साढ़ू संस्थानकक एही पहिल पराक्रम कऽ दृश्य। (ओ मृत शरीर कात सङ्केत करैत अछि) विट: हाय! आह हमर भाग्य मन्द भऽ गेल! (ओ चेतना खो कऽ भूमि पर खसि पड़ैत छथि) संस्थानक: ही, ही! आब सर विट पूर्णतः शान्त देखि रहल छथि! स्थावरक: ओह सर विट! होशमे आउ! हम पहिल अपराधी छी, किएक तँ हम बिना कपाट भीतर देखने गाड़ी कऽ एतय लय अयलहुँ। विट: (होशमे आबि कऽ, गम्भीर उदासीनतासँ) आह वसन्तसेना! शिष्टाचार आ शालीनताक मधुर धार आब सदा लेल सूखि गेल छैक, आ प्रसन्नता आब अपन देश भीतर वापस भागि गेल छैक, अमूल्य रत्न सभक अमूल्य रत्न, जे प्रेमक मधुर खेल जनैत छली, सौंदर्य आ प्रेमक साक्षात बजार छली! हमर सन मनुष्य सभक एकमात्र आनन्द छली! अहाँक प्रसन्नताक नाद, साक्षात दुःख दूर करय वाली पवित्र नदी—हाय! सदा लेल नष्ट भऽ गेल छैक, हरा गेल छैक आ समाप्त भऽ गेल छैक! (अश्रु बहाबैत छथि) हाय, हमर भाग्य! आब आ क कोन पाप आ दुःख आबबाक बाकी रहि गेल छैक, जखन अहाँ घृणा कऽ ई भयानक कार्य कऽ देलहूँ? पाप कऽ साक्षात भयानक रूप धारण कऽ कऽ, अहाँ हमर राज्यक एही निर्दोष देवीकें भूमि पर सुता देलहूँ। (अपन मनमे) आह! कखनो एहन नै हो जे ई पापी एही पाप कऽ कलङ्क हमरहि काँखि ऊपर मढ़बाक विचार राखैत हो। हमरा एतयसँ विदा भऽ जबाक चाही। (ओ चलैत छथि। संस्थानक लग आबैत अछि आ हुनका रोकि दैत अछि) पापी! हमरा स्पर्श नै करू। हमर अहाँक साथ सम्बन्ध समाप्त भऽ गेल अछि। हम जाइ रहल छी। संस्थानक: ओहो! पहिने अहाँ वसन्तसेनाक हत्या कऽ देलहूँ, पुनः हमर अपमान कऽ रहल छी, आ आब अहाँ कतऽ भागि कऽ जएब आखिर? आ एही प्रकार हमर सन मनुष्यक पाँ रक्षा करबाक लेल केओ नै बचल छैक आखिर। विट: अहाँ एकटा घोर पापी आ अधम मनुष्य छी! संस्थानक: हम अहाँकें प्रचुर सुवर्ण देब, ताँबा कऽ सिक्का सेहो, आ एकटा पैघ टोपी सेहो देब पहिरबाक लेल। आ एही प्रकार एही पैघ पराक्रम कऽ यश हमरा सभक साझी सम्पत्ति बनत, आ कलङ्क हमरा छुइ धरि नै सकत। विट: अहाँ पर श्राप हो! अहाँक, आ मात्र अहाँकहि होयत ई पाप-कर्म। स्थावरक: ईश्वर एही कुसङ्केतकें दूर करथि! (संस्थानक अट्टहास कऽ कऽ हँसैत अछि) विट: आब हमरा सभक बीच घोर शत्रुता रहत! अपन ई हँसबाक नाद बन्द करू! नास हो एहन मित्रता कऽ जे हमर प्रतिष्ठाकें एही प्रकार कलङ्कित कऽ देलक! हम कखनहु अहाँ सन नीच मनुष्यक मुख पुनः नै देखब! हम अहाँकें एही प्रकार त्यागि रहल छी जेना कोनो टूटल, बिना रस्सा वला धनुष कऽ फिङ्कल जाइत अछि। संस्थानक: क्रुद्ध नै होऊ। आउ, हम सभ चली आ पोखरि भीतर खेलि। विट: हमर जीवन निष्कलङ्क अछि, तइयो हमरा बुझि रहल अछि जे अहाँक मित्रता हमर पवित्रताकें कलङ्कित कऽ रहल छैक, अहाँ स्त्री कऽ हत्या करय वाला! हम कसरि ककरो एहन मनुष्यक मित्र बनि कऽ रहि सकी जकरा देखि कऽ स्त्री सभक आँखि सदा भय आ संतापसँ आधा बन्द भऽ जाइत अछि आखिर? (उदासीसँ) वसन्तसेना, जखन अहाँ, सुकुमार कनियाँ, दोबारा एही संसार भीतर जन्म लयब, तँ प्रार्थना अछि जे अहाँ कखनो कोनो गणिका कऽ रूप भीतर पुनः जन्म नै लिय’, कोनो एहन पवित्र कुल भीतर आबब जकरा निर्दोष, धर्मात्मा आ उत्तम मनुष्य सभ सुशोभित करैत छथि। संस्थानक: पहिने अहाँ हमर पुष्पककरण्डक पुराना बगीचा भीतर वसन्तसेनाक हत्या कऽ देलहूँ, आ आब अहाँ कतऽ भागि कऽ जएब आखिर? आबब, अपन रक्षा कऽ गप अदालत भीतर हमर बहिनक पति कऽ सम्मुख कसरि! (ओ हुनका रोकि दैत अछि) विट: बहुत भेल, अहाँ घोर पापी! (ओ अपन तलवार निकालैत छथि) संस्थानक: (त्राससँ पाछाँ हटैत) भयभीत भऽ गेलहूँ, की अहाँ आखिर? जा सकैत छी तखन। विट: (अपन मनमे) एही स्थान पर आ बिलम्ब करब महामूर्खता होयत। नीक, हम जाब आ शर्विलक, चन्दनक आ आन सिपाही सभक साथ मिलि जाब। (विट प्रस्थान करैत छथि) संस्थानक: नरक भीतर जाउ अहाँ। नीक, हमर बच्चा स्थावरक, ई कोन प्रकारक कार्य हम कऽ देलहुँ अछि आखिर? स्थावरक: मालिक, अहाँ एकटा घोर भयानक अपराध कऽ देलहुँ अछि। संस्थानक: अहाँ नौकर! अपराध कऽ गप करबा सँ अहाँक की अर्थ अछि आखिर? नीक, हम एककरा एही प्रकार तोपब। (ओ अपन शरीरसँ कतेको प्रकारक आभूषण सभ खोलैत अछि) ई सभ रत्न कऽ लय लिय’। हम अहाँकें एककरा दान कऽ रहल छी। जखन कखनो हमरा एककरा पहिरबाक इच्छा होयत, हम वापस लय लेब, मुदा आन समय भीतर ई सभ अहाँकहि अछि। स्थावरक: ई सभ मात्र हमर मालिकहि कऽ शरीर पर सुशोभित होबाक योग्य अछि। हमरा एही वस्तु सभसँ की प्रयोजन आखिर? संस्थानक: विदा होऊ एतयसँ! एही बैल सभकें लिय’, आ हमर महल कऽ भीतरी बुर्ज भीतर जा कऽ प्रतीक्षा करू जब धरि हम नै आबी। स्थावरक: जेना अहाँक आज्ञा, मालिक। (स्थावरक प्रस्थान करैत अछि) संस्थानक: ओही विट अपना कऽ अदृश्य कऽ लेलन्हि अछि। ओ अपना कऽ बचेबाक इच्छा राखैत छलाह। आ एही नौकरकें हम महल कऽ भीतरी बुर्ज भीतर लोहक भारी जंजीरसँ बान्ही कऽ कैद कऽ देब, आ ओतहि रोकि कऽ रखब। आ एही प्रकार हमर रहस्य सदा लेल सुरक्षित रहत। हम आब आगाँ बढ़ब, मुदा पहिने हम एक बेर एककरा देखब। की ई मरि गेल छैक, या हम एकर दोबारा हत्या कऽ दिय’? (ओ वसन्तसेना कात देखैत अछि) पूर्णतः चेतनाहीन आ मृत अछि! सुन्दर! हम एककरा एही वस्त्रसँ तोपि देब। नै, एकरा ऊपर हमर नाम लिखल छैक। कोनो ईमानदार मनुष्य एककरा पहिचानि सकैत अछि। नीक, एतय सूखा पत्ता कऽ एकटा पैघ ढेरी अछि जेकरा हवा उड़ाय कऽ लाबने छैक। हम एककरा एही पत्ता सभक नीचां तोपि देब। (ओ ओनाहि करैत अछि, पुनः चिन्तन लेल रुकैत अछि) सुन्दर! हम एककरा एही प्रकार करब। हम अखने न्यायालय भीतर जाब, आ ओतय एकटा शिकायत दर्ज करब। हम कहब जे व्यापारी चारुदत्त वसन्तसेनाकें लोह आ सुवर्णक लोभ देखा कऽ हमर पुष्पककरण्डक पुराना बगीचा भीतर फुसला कऽ लाबने छल, आ धनक लेल ओकर हत्या कऽ देलक। हँ, चारुदत्तक वध आब अवश्य होबाक चाही, आ हम एकटा चन्तर उपाय खड़ा करब, दया कऽ पूर्णतः बिसरि कऽ; कोनो निर्दोष गौ कऽ बलि देब कतेक कूर काज अछि, मुदा सभसँ दयालु नगर भीतर सेहो एहनहि होइत छैक। आब हम विदा होबाक लेल तैयार छी। (ओ जाब आरम्भ करैत अछि, मुदा ककरो देखि कऽ भयभीत भऽ जाइत अछि) ईश्वर हमर रक्षा करथि! हम जतय कतहु जाइत छी, ई पापी भिक्षु अपन गेरुआ वस्त्र कऽ साथ आबि जाइत छैक। हम एक बेर एकर नाक भीतर सुराख कऽ कऽ एककरा चारू कात घसीटने छलहुँ, आ ई हमरासँ घोर घृणा करैत छैक। कखनो एहन नै हो जे ई हमरा देखि लय, आ लोक सभसँ कहि दऽ जे हम ओकर हत्या कयलहुँ अछि। हम कसरि भागब आखिर? (ओ चारू कात देखैत अछि) आहा! जतय देबाल आधा खसि पड़ल छैक, हम ओकरा ऊपरसँ कूँदि कऽ भागि जाब। हम दौड़ैत छी, हम दौड़ैत छी, हम जाइ रहल छी, आकाश भीतर, पृथ्वी कऽ ऊपर, पाताल भीतर, आ लङ्का कऽ ओही पर्वत कऽ चोटी ऊपर जाहि पर हनुमान कूँदने छलाह—साक्षात इन्द्र कऽ जकां, हम जाइ रहल छी। (संस्थानक प्रस्थान करैत अछि) (हड़बड़ीमे ओही बौद्ध भिक्षु (पूर्व मसाज करय वाला) कऽ प्रवेश होइत अछि) भिक्षु: हम अपन एही फटल वस्त्रकें नीक जकां धोइ लेलहुँ अछि। की हम एककरा कोनो गाछक डालि पर सुखाबाक लेल छोड़ि दिय’? नै, बानर सभ एककरा चोराय कऽ लय जएतैक। की भूमि पर राखि दिय’? धूर एककरा पुनः गन्दा कऽ देतैक। तँ आब हम एककरा कतऽ सुखाबाक लेल पसराबी आखिर? (ओ चारू कात देखैत अछि) आहा, एतय सूखा पत्ता कऽ एकटा पैघ ढेरी अछि जेकरा हवा उड़ाय कऽ लाबने छैक। हम एककरा एकरा ऊपरहि पसरा देब। (ओ ओनाहि करैत अछि) भगवान बुद्धक जय हो! (ओ बैठि जाइत अछि) आब हम धर्मक एकटा पवित्र मन्त्रक पाठ करब। जे मनुष्य अपन पाँचू आन्तरिक शत्रु (इन्द्रिय सभ) कऽ वध कऽ दैत अछि, आ अविद्या रूपी ओही स्त्री-शत्रुक अन्त कऽ दैत अछि जाहि द्वारा एही नगर कऽ रक्षा कयल जाइत अछि, आ जे ओही अहंकार रूपी चाण्डालक पराजित कऽ दैत अछि, ओ निश्चित रूपसँ स्वर्ग भीतर प्रवेश करबाक योग्य होइत अछि। मुदा आखिर, हमरा स्वर्गसँ की प्रयोजन, जब धरि हम आर्या वसन्तसेनाक, बुद्ध भीतर हमर बहिनक ऋण नै चुका देब? ओ हमर मुक्ति दस सुवर्ण-मुद्रा दऽ कऽ ओही जुआड़ी सभसँ कीनलन्हि छल, आ ओही दिनसँ हम अपना कऽ हुनकरहि सम्पत्ति बुझैत छी। (ओ चारू कात देखैत अछि) ओ की छल आखिर? पत्ताक एही ढेरी नीचाँसँ कसरि एकटा गम्भीर निश्वासक नाद ऊपर उठल आखिर? एहन कखनहि नै भऽ सकैत। संध्याकालक गरम हवा एही पत्ता सभकें गरम कऽ रहल छैक, भीजल वस्त्र एही पत्ता सभकें गीला कऽ रहल छैक, आ वैह कारण अछि, हमर विचार अछि, जे सूखा पत्ता सभ आन पत्ता सभक जकां सिकुड़ि रहल छैक। (वसन्तसेना होशमे आबब आरम्भ करैत छथि, आ अपन एकटा हाथ बाहर निकालैत छथि) भिक्षु: आहा! एतय एकटा स्त्रीक हाथ देखि रहल अछि, जे बहुमूल्य आ सुन्दर रत्न सभसँ सुशोभित अछि। की! एकटा दोसर हाथ सेहो? (ओ परम सजगतासँ एकर निरीक्षण करैत अछि) हमरा बुझि रहल अछि जे हम एही हाथकें पहिचानैत छी। हँ, एकरा भीतर कोनो संशय नै अछि। निश्चित रूपसँ ई वैह हाथ अछि जे हमर प्राण बचेबाक काज कयलक छल। मुदा हमरा स्वयं देखि लेबाक चाही। (ओ पत्ता हटाबैत अछि, शरीरक देखैत अछि, आ पहिचानि लैत अछि) ई बुद्ध भीतर हमर आदरणीय बहिन छथि। (वसन्तसेना पानि लेल गम्भीर निश्वास छोड़ैत छथि) आह, ओ पानि खोजि रहल छथि, आ पोखरि एतयसँ बहुत दूर मार्ग पर अछि। आब हम की करब आखिर? एकटा चतुर विचार अछि! हम एही भीजल वस्त्रकें ओकरा ऊपर पकड़ने रहब आ एकर पानि कऽ बून्द ओकर मुख भीतर टपकाबब। (ओ ओनाहि करैत अछि। वसन्तसेना होशमे आबि जाइत छथि, आ अपना कऽ ऊपर उठाबैत छथि। भिक्षु अपन वस्त्रसँ ओकरा पर हवा करैत अछि) वसन्तसेना: अहाँ के छी, महाभाग? भिक्षु: की बुद्ध भीतर हमर बहिन ओही मनुष्यकें बिसरि गेलनि जकर मुक्ति ओ दस सुवर्ण-मुद्रा दऽ कऽ कीनलन्हि छल? वसन्तसेना: हमरा किछ स्मरण तँ आबि रहल अछि, मुदा बिल्कुल ओनाहि नै जेना अहाँ कहि रहल छी। एकरासँ बेसी नीक ई होइत जे हम कखनहु जागबाक लेल अपन आँखि नै खोलिटहुँ। भिक्षु: एतय की भेल छल, बुद्ध भीतर हमर बहिन? वसन्तसेना: (निराशासँ) आन किछु नै मुदा वैह जे कोनो गणिकाक भाग्य कऽ अनुकूल होइत छैक। भिक्षु: बुद्ध भीतर हमर बहिन, गाछसँ सटल एही सुकुमार लताक सहारा लिय’, आ अपन पएर पर ठाढ़ होऊ। (ओ लताक डालि कऽ नीचां झुकाबैत अछि। वसन्तसेना ओकरा अपन हाथ भीतर लैत छथि, आ ठाढ़ होइत छथि) भिक्षु: ओतय सामने कऽ ओही बौद्ध मठ भीतर एकटा कनियाँ निवास करैत छथि जे धर्म भीतर हमर बहिन छथि। ओतहि बुद्ध भीतर हमर बहिनकें पूर्ण स्वास्थ्य भेटत, एकरासँ पहिने जे ओ अपन घर वापस विदा होथि। अहाँकें बहुत धीरे-धीरे चलबाक चाही, बहिन। (ओ चारू कात चलैत अछि आ देखैत अछि) मार्ग छोड़ू, उत्तम लोक सभ, मार्ग छोड़ू! ई एकटा युवा आदरणीय कनियाँ छथि, आ हम एकटा भिक्षु छी, तइयो हमर ई व्यवहार सभ प्रकारक कलङ्कसँ ऊपर आ निष्कलङ्क अछि। जे मनुष्य अपन हाथ आ अपन ओठ कऽ कोनो लोह आ सुवर्णक लोभसँ मुक्त राखैत अछि, जे अपन समस्त इन्द्रिय सभ पर विजय प्राप्त कऽ लैत अछि, वैह वास्तवमे असली मनुष्य अछि। ओकरा कोनो चिन्ता नै होइत, चाहे कोनो राज्य खसि पड़य वा ठाढ़ रहय; किएक तँ मोक्षक साक्षात परलोकक सुख ओकरहि हाथ भीतर सुरक्षित रहैत छैक। (सभ प्रस्थान करैत छथि) नवम अङ्क: व्यवहार (न्यायालय भीतर मुकदमा) (एकटा चोबदार / अदालत कऽ कर्मचारीक प्रवेश होइत अछि) चोबदार: न्यायाधीश सभ हमरा कहलनि जे "आबब, चोबदार, न्यायालय भीतर जाउ आ आसन सभ ठीक कऽ कऽ राखू।" अतः आब हम न्यायालय कऽ सुसज्जित करबाक लेल मार्ग पर छी। (ओ चारू कात चलैत अछि आ देखैत अछि) ई न्यायालय अछि, हम भीतर प्रवेश करब। (ओ भीतर जाइत अछि, बुहारैत अछि आ आसन सभ ठीक स्थान पर रखैत अछि) देखू! हम न्यायालय सफा कऽ देलहुँ अछि आ आसन सभ तैयार राखि देलहुँ अछि, आ आब हम जा कऽ न्यायाधीश सभकें सूचित करब। (ओ चारू कात चलैत अछि आ देखैत अछि) मुदा देखू! एतय ओ घोर पापी मनुष्य आबि रहल अछि, राजा कऽ साढ़ू। हम हुनकर दृष्टि भीतर आए बिना एतयसँ पाछाँ हटि जाब। (ओ एक कात अलग ठाढ़ भऽ जाइत अछि। सुवर्ण आ भव्य वस्त्र पहिरने संस्थानकक प्रवेश होइत अछि) संस्थानक: हम ओतय स्नान कयलहुँ जतय पानि बहैत अछि आ मधुर नाद करैत छैक; हम बगीचा आ वन भीतर बैठल छलहुँ, स्त्री सभक साथ, कनियाँ सभक साथ, जकर सुकुमार अङ्ग देवदूत सभक जकां चंचल आ सुन्दर अछि। हमर केश कखनो कस कऽ बान्हल रहैत छैक, लट आ घुँघराला बाल कऽ जकां ई हमर ललाट ऊपर लटकैत छैक; कखनो ई जटा जकां होइत छैक, कखनो खुल्ला हवामे उड़ैत छैक; आ पुनः हम एककरा ऊपर उठा कऽ पहिरैत छी। हम एकटा पैघ आश्चर्य छी, हम एकटा अद्भुत पुरुष छी। आ हमर बहिनक पति स्वयं राजा छथि। आ एकर अतिरिक्त, हम एकटा पैघ सुराख खोजि लेलहुँ अछि, ओही कीड़ा कऽ जकां जे कमल कऽ जड़ि भीतर कऽ गँठ भीतर घुसि जाइत अछि आ बाहर निकसबाक लेल कोनो सुराख खोजैत अछि। आब हम ककर ऊपर एही कूर पाप-कर्म कऽ कलङ्क लगाबब आखिर? (ओ किछ स्मरण करैत अछि) ओह, हँ! हमरा स्मरण अयल। हम ओही दरिद्र चारुदत्त ऊपर एही कूर पाप-कर्म कऽ आरोप लगाबब। एकर अतिरिक्त, ओ दरिद्र अछि। लोक ओकर विषयमे कोनो पापी गप ऊपर सहजहि विश्वास कऽ लेत। सुन्दर! हम न्यायालय भीतर जाब आ चारुदत्तक विरुद्ध एकटा सार्वजनिक शिकायत दर्ज करब जे ओ कसरि वसन्तसेनाक गला दबोचने छल आ ओकर हत्या कऽ देने छल। अतः आब हम न्यायालय कऽ मार्ग पर छी। (ओ चारू कात चलैत अछि आ देखैत अछि) ई न्यायालय अछि। हम भीतर जाब। (ओ भीतर जाइत अछि आ चारू कात देखैत अछि) नीक, एतय आसन सभ ठीक जकां राखल गेल छैक। जब धरि हम न्यायाधीश सभक प्रतीक्षा कऽ रहल छी, हम एक क्षण लेल एही हरियर घास ऊपर बैठि जाइत छी। (ओ भूमि पर बैठि जाइत अछि) चोबदार: (दोसर दिशा कात चलैत अछि आ अपन सम्मुख देखैत अछि) एतय न्यायाधीश सभ आबि रहल छथि। हम हुनका पाँ जाब। (ओ ओनाहि करैत अछि) (एकटा नगर-सेठ, एकटा लिपिक (लेखक) आ आन सेवक सभक साथ न्यायाधीशक प्रवेश होइत अछि) न्यायाधीश: नगर-सेठ आ लिपिक महराज! नगर-सेठ आ लिपिक: हम सभ अहाँक आज्ञाक प्रतीक्षा कऽ रहल छी। न्यायाधीश: कोनो मुकदमा बहुत पैघ सीमा धरि आन लोक सभ ऊपर निर्भर करैत अछि, जेसँ न्यायाधीश सभक कार्य—ककरो आनक मनक भीतरी विचार पढ़ब—सभसँ पैघ कठीन काज भऽ जाइत छैक। मनुष्य कखनो एहन कर्म कऽ गप कहैत अछि जेकरा कोनो आँखि नै देखलक, जे कानून कऽ सीमासँ बहुत दूर छैक; वासना आ घोर क्रोध दोनों पक्ष सभ कऽ एही प्रकार नियन्त्रित करैत छैक जे हुनकर झूठ न्यायाधीश कऽ आँखिक सम्मुख हुनकर अपराध तोपि दैत छैक; ई पक्ष आ ओ पक्ष दोनों गप कऽ एतेक बढ़ा कऽ कहैत छथि, जेसँ अन्ततः स्वयं राजा सेहो संशय भीतर आबि जाइत छथि; संक्षेपमे कहू: झूठा कलङ्क लगाना बहुत सहज अछि, मुदा एकटा सच्चे न्यायाधीश कऽ बहुत कम प्रशंसा भेटैत छैक, या ककरो द्वारा नै भेटैत। आ पुनः एक बेर: मनुष्य कखनो एहन पाप कऽ कात सङ्केत करैत अछि जेकरा ककरो आँखि नै देखलक, आ अपन क्रोध भीतर ओ सहनशील कानून कऽ तिरस्कार करैत अछि; न्यायालय भीतर धर्मात्मा पुरुष सेहो अपन झूठ कऽ साथ अपन अपराध न्यायाधीश कऽ आँखिक सम्मुख तोपि दैत छथि; आ जिनका द्वारा वास्तवमे कर्म कयल गेल छल, ओ दृष्टि सँ दूर भऽ जाइत छथि, जे वादी आ प्रतिवादी दोनों कऽ साथ पाप कयलने छलाह; संक्षेपमे कहू: झूठा कलङ्क लगाना बहुत सहज अछि, मुदा एकटा सच्चे न्यायाधीश कऽ बहुत कम प्रशंसा भेटैत छैक, या ककरो द्वारा नै भेटैत। किएक तँ एकटा न्यायाधीश कऽ अवश्य होबाक चाही: विद्वान, आ कपटक टेढ़ मार्ग कऽ खोजबामे परम चतुर, वाक्-पटु, आ क्रोधक भावनासँ पूर्णतः मुक्त; अपन मित्र, शत्रु आ बन्धु सभ कऽ प्रति एकहि सन मधुर कृपा देखेबा वाला, आ जब धरि सत्य पूर्णतः प्रकट नै भऽ जाय, निर्णय कऽ रोकि राखय वाला; लोह आ सुवर्णक वासनासँ अछूत, पुण्य भीतर दृढ़; दुर्बल कऽ रक्षा करबाक शक्ति ओकरा भीतर होबाक चाही, आ पापी कऽ पराजित करबाक; सत्य कऽ लेल एकटा खुल्ला दुआरि कऽ जकां, ओकर हृदय सदा आन कऽ हित कऽ साथ सटल रहय, मुदा कोनो एहन वस्तुसँ दूर रहय जे राजा कऽ क्रोध जगा सकथि। नगर-सेठ आ लिपिक: आ की मनुष्य कखनो अहाँक पवित्र पुण्य भीतर कोनो कलङ्क कऽ गप कऽ सकैत अछि आखिर? जदि ओ सभ एहन कहैत छथि, तँ ओ सभ चन्द्रमाक कान्ति भीतर घोर अन्धकार खोजबाक गप करैत छथि। न्यायाधीश: हमर नीक चोबदार, हमरा न्यायालय कऽ कक्ष भीतर लय चलू। चोबदार: हमर पाछाँ आबब, महराज। (ओ सभ चलैत छथि) ई न्यायालय कऽ कक्ष अछि। न्यायाधीश सभ भीतर प्रवेश करबाक कृपा करू। (सभ भीतर प्रवेश करैत छथि) न्यायाधीश: हमर नीक चोबदार, अहाँ बाहर जाउ आ पता लगाउ जे केओ एहन अछि जे अपन मुकदमा प्रस्तुत करबाक इच्छा राखैत हो। चोबदार: जेना अहाँक आज्ञा, महराज। (ओ बाहर जाइत अछि) उत्तम भद्र लोक सभ, न्यायाधीश सभ पूछि रहल छथि जे की एतय केओ एहन अछि जे अपन मुकदमा प्रस्तुत करबाक इच्छा राखैत हो? संस्थानक: (परम प्रसन्नतासँ) न्यायाधीश सभ एतय आबि गेल छथि। (ओ अहङ्कारसँ टहलैत अछि) हम एकटा मुकदमा प्रस्तुत करबाक इच्छा राखैत छी, हम, एकटा पैघ कुलक पुरुष, एकटा असली मनुष्य, साक्षात वासुदेव, राजा कऽ परम पूज्य साढ़ू, स्वयं राजा कऽ साढ़ू। चोबदार: (भयसँ) ईश्वर रक्षा करथि! राजा कऽ साढ़ूहि सभसँ पहिल पुरुष छथि जे मुकदमा प्रस्तुत करबाक इच्छा राखि रहल छथि। नीक! एक क्षण प्रतीक्षा करू, महराज। हम न्यायाधीश सभकें तुरंत सूचित करैत छी। (ओ न्यायाधीश सभक लग जाइत अछि) महराज, दुआरि पर स्वयं राजा कऽ साढ़ू अयल छथि, जे न्यायालय भीतर अपन मुकदमा प्रस्तुत करबाक इच्छा राखैत छथि। न्यायाधीश: की! राजा कऽ साढ़ूहि सभसँ पहिल छथि जे मुकदमा प्रस्तुत करबाक इच्छा राखि रहल छथि? सूर्योदय कऽ समय सूर्य-ग्रहण कऽ जकां, ई कोनो पैघ कुलीन मनुष्य कऽ विनाश कऽ कुसङ्केत अछि। चोबदार, न्यायालय आजुक दिन निश्चित रूपसँ बहुत व्यस्त रहत। बाहर जाउ, हमर नीक मनुष्य, आ कहियौन्हि जे "आजुक दिन हमरा सभकें मुक्त करू। अहाँक मुकदमा पर आजुक दिन विचार नै कयल जा सकैत।" चोबदार: जेना अहाँक आज्ञा, महराज। (ओ बाहर जाइत अछि आ संस्थानकक लग जाइत अछि) महराज, न्यायाधीश सभ संदेश पठौने छथि जे अहाँ आजुक दिन एतयसँ विदा होऊ; अहाँक मुकदमा पर आजुक दिन विचार नै कयल जा सकैत। संस्थानक: (घोर क्रोधसँ) नास हो अहाँक! हमर मुकदमा पर किएक विचार नै कयल जा सकैत आखिर? जदि आजुक दिन एकरा पर विचार नै भेल, तँ हम अपन भाय, राजा पालक, हमर बहिनक पति कऽ कहब, आ हम अपन बहिन आ अपन माय कऽ सेहो कहब, आ हम एही न्यायाधीश कऽ ओकर पदसँ तुरंत हटा देवा देब, आ दोसर न्यायाधीश नियुक्त करा देब। (ओ जाब आरम्भ करैत अछि) चोबदार: ओह महराज! राजा कऽ परम पूज्य साढ़ू! एक क्षण रुकू। हम न्यायाधीश सभकें तुरंत पुनः सूचित करैत छी। (ओ न्यायाधीशक पाँ वापस आबैत अछि) राजा कऽ साढ़ू घोर क्रोध भीतर छथि, आ कहि रहल छथि—(ओ संस्थानकक शब्द सभकें दोहराबैत अछि) न्यायाधीश: ई मूर्ख कखनो कोनो अनर्थ कऽ सकैत अछि। हमर नीक मनुष्य, ओकरा कहियौन्हि जे ओ भीतर आबथि, हुनकर मुकदमा पर निश्चित रूपसँ विचार कयल जायर। चोबदार: (संस्थानकक लग जा कऽ) महराज, न्यायाधीश सभ संदेश पठौने छथि जे अहाँकें भीतर आबबाक चाही, अहाँक मुकदमा पर विचार कयल जायर। कृपया भीतर प्रवेश करू, महराज। संस्थानक: पहने ओ सभ कहैत छथि जे विचार नै होयत, पुनः कहैत छथि जे विचार होयत। न्यायाधीश सभ डरि गेल छथि। हम जे किछु कहब, ओ सभ ओकरा पर विश्वास कऽ लेत। सुन्दर! हम भीतर जाब। (ओ भीतर जाइत अछि आ न्यायाधीश सभक लग आबैत अछि) हम बहुत नीक अनुभव कऽ रहल छी, धन्यवाद। अहाँ सभ नीक अनुभव कऽ रहल छी वा नै—ई पूर्णतः हमरा ऊपर निर्भर करैत छैक। न्यायाधीश: (अपन मनमे) नीक, नीक! एहन बुझाइत अछि जेना हमरा सभक सम्मुख एकटा बहुत सुशिक्षित वादी अयल हो। (प्रकट) कृपया आसन ग्रहण करू। संस्थानक: की! ई भूमि हमरहि अछि। हम जतय कतहु चाहब, बैठि जाब। (नगर-सेठ कें) हम एतय बैठब। (चोबदार कें) हम एतय किएक नै बैठि सकी आखिर? (ओ अपन हाथ न्यायाधीशक मस्तक ऊपर रखैत अछि) हम एतहि बैठब। (ओ भूमि पर बैठि जाइत अछि) न्यायाधीश: अहाँ एकटा मुकदमा प्रस्तुत करबाक इच्छा राखैत छी? संस्थानक: निश्चित रूपसँ। न्यायाधीश: तँ मुकदमा कऽ विवरण बाजू। संस्थानक: हम एककरा कान भीतर फुसफुसाब। हम एकटा एहन पैघ कुल भीतर जन्म लेलहुँ अछि जे कोनो बहुमूल्य मदिरा-पात्र जकां विशाल आ तेजस्वी छैक। हमर बाप कऽ बाप राजा कऽ साढ़ू छलाह; स्वयं राजा हमर बाबूजीक दामाद छथि; आ हम स्वयं राजा कऽ साढ़ू छी; आ हमर बहिनक पति स्वयं राजा छथि। न्यायाधीश: ई सभ हम सभ जनैत छी। अहाँ अपन एही पैघ कुल कऽ अहङ्कार किएक देखि रहल छी आखिर? चरित्रहि मनुष्यकें श्रेष्ठ बनाबैत अछि; मुदा काँटा आ कूर घास सभ सेहो बहुत उपजाऊ माठि भीतर प्रचुर रूपसँ उगि जाइत छैक। 7 मुदमा कऽ विवरण बाजू। संस्थानक: हम कहब, मुदा जदि हम स्वयं अपराधी होबहुँ सेहो, तइयो ओ हमर किछु नै कऽ सकितैक। नीक, हमर बहिनक पति हमरा बहुत चाहैत छथि, आ ओ हमरा सभसँ श्रेष्ठ बगीचा देने छथि, पुराना पुष्पककरण्डक बगीचा, ओतय खेलबाक लेल आ ओकर रक्षा करबाक लेल। आ हम प्रत्येक दिन ओतय ओकरा देखबाक लेल जाइत छी, ओकरा सूखा राखबाक लेल, ओकरा सफा राखबाक लेल, ओकरा फूल सभसँ सुसज्जित राखबाक लेल, ओकरा नीक नाप भीतर रखबाक लेल। मुदा भाग्यक विधान देखू जे हम देखलहुँ—वा बेसी नीक कहू, हम नै देखलहुँ—एकटा स्त्रीक मृत शरीर भूमि पर खसि पड़ल। न्यायाधीश: की अहाँ जनैत छी जे ओ अभागिन स्त्री के छली आखिर? संस्थानक: अरे न्यायाधीश सभ! हम किएक नै जानब आखिर? एकटा एहन स्त्री! उज्जयिनी नगरीक अमूल्य रत्न! सैकड़ों सुवर्ण आभूषण सभसँ सुशोभित! ककरो पापी आ अयोग्य पुत्र ओकरा फुसला कऽ पुराना पुष्पककरण्डक बगीचा भीतर लय गेल जखन ओ सुनसान छल, आ मात्र एकटा तुच्छ वस्तु लेल—ओकर धन लेल!—वसन्तसेनाक गला दबा कऽ ओकर हत्या कऽ देलक। मुदा हम नै कयलहुँ—(ओ अचानक रुकि जाइत अछि, आ अपन हाथ अपन मुख ऊपर रखि लैत अछि) न्यायाधीश: नगरक आरक्षी (पुलिस) कऽ कतेक पैघ असावधानी अछि ई! नगर-सेठ आ लिपिक महराज, अहाँ अपन पत्र ऊपर ई शब्द "हम नै कयलहुँ" अवश्य लिखू, मुकदमाक पहिल विवरण कऽ रूपमे। लिपिक: जेना अहाँक आज्ञा, महराज। (ओ लिखैत अछि) महराज, विवरण लिखि देल गेल अछि। संस्थानक: (अपन मनमे) हे भगवान! आब हम अपना कऽ स्वयं अनर्थ भीतर फिङ्क देलहुँ, ओही मनुष्य कऽ जकां जे हड़बड़ी भीतर भात आ दूधक पैघ लड्डू चबा कऽ निगलि जाइत अछि आ फसि जाइत अछि। नीक, हम एककरा एही प्रकार तोपब। (प्रकट) नीक, नीक, न्यायाधीश सभ! हम तँ मात्र एतेक कहि रहल छलहुँ जे हम एककरा अपन आँखिसँ होइत नै देखलहुँ। अहाँ सभ किएक एतेक पैघ कोलाहल मचाइ रहल छी आखिर? (ओ अपन पएरसँ लिखल गेल शब्द सभकें मिटा दैत अछि) न्यायाधीश: अहाँ कसरि जनैत छी जे ओकर गला दबाएल गेल छल—आ ओहो मात्र ओकर धन लेल? संस्थानक: अरे! हम एहन किएक नै सोचब आखिर, जखन ओकर कण्ठ सूजल छल आ खुल्ला छल, आ जतय आभूषण पहिरल जाइत छैक ओ सभ स्थान सुवर्णसँ पूर्णतः खाली छल? नगर-सेठ आ लिपिक: ई गप सत्य बुझाइत अछि। संस्थानक: (अपन मनमे) आकाश कऽ धन्यवाद हो! हम पुनः अपन श्वास कऽ वापस पाबि लेलहुँ। जय हो! नगर-सेठ आ लिपिक: आब एही मुकदमाक उद्यम क ककर उपस्थिति ऊपर निर्भर करैत छैक आखिर? न्यायाधीश: मुकदमाक दुटा पैघ रूप अछि। नगर-सेठ आ लिपिक: कसरि, महराज? न्यायाधीश: हमरा सभकें पहिने विवरण ऊपर विचार करबाक चाही, पुनः सत्य ऊपर। आब विवरणक जाँच वादी आ प्रतिवादी कऽ उपस्थिति ऊपर निर्भर करैत छैक। मुदा सत्यक साक्षात जाँच न्यायाधीशक भीतरी बुद्धि आ विवेक द्वारा कयल जबाक चाही। नगर-सेठ आ लिपिक: तँ एही मुकदमाक आगाँ कऽ कार्य आब वसन्तसेनाक आदरणीय मायक उपस्थिति ऊपर निर्भर करैत छैक? न्यायाधीश: बिल्कुल वैह। हमर नीक चोबदार, बाहर जाउ आ वसन्तसेनाक मायकें निमन्त्रित कऽ कऽ लाउ, मुदा ध्यान राखब जे हुनका मन भीतर कोनो चिन्ता वा भय कऽ भावना नै आबय। चोबदार: जेना अहाँक आज्ञा, महराज। (ओ बाहर जाइत अछि, आ गणिकाक मायक साथ वापस आबैत अछि) हमर पाछाँ आबब, आर्या। माय: हमर कनियाँ अपन युवावस्थाक आनन्द लेल अपन एकटा मित्रक घर गेल छली। मुदा आब ई भद्र पुरुष—ई दीर्घायु होऊ!—आबि कऽ कहि रहल छथि "आबब! न्यायाधीश अहाँकें पुकारि रहल छथि।" हमर मन पूर्णतः व्याकुल भऽ गेल अछि। हमर हृदय तीव्र गतिसँ काँपि रहल अछि। महाभाग, की अहाँ हमरा न्यायालय कऽ कक्ष भीतर लय चलब? चोबदार: हमर पाछाँ आबब, आर्या। (ओ सभ चलैत छथि) ई न्यायालय कऽ कक्ष अछि। कृपया भीतर प्रवेश करू, आर्या। (दोनों प्रवेश करैत छथि) माय: (लग जा कऽ) अहाँ सभकें प्रसन्नता भेटय, परम सम्मानित आदरणीय भद्र लोक सभ। न्यायाधीश: आदरणीय कनियाँ, अहाँक बहुत स्वागत अछि। कृपया आसन ग्रहण करू। माय: धन्यवाद। (ओ बैठि जाइत अछि) संस्थानक: (अपमानजनक शब्द सभक साथ) अहाँ एतय आबि गेलहूँ, की अहाँ आखिर, अहाँ बूढ़ी कुट्टनी? न्यायाधीश: हमरा बताउ। की अहाँ वास्तवमे वसन्तसेनाक आदरणीय माय छी? माय: हँ, हम छी। न्यायाधीश: वसन्तसेना एही क्षण कतऽ गेल छथि आखिर? माय: अपन एकटा मित्रक घर। न्यायाधीश: हुनकर ओही मित्रक की नाम अछि आखिर? माय: (अपन मनमे) हे भगवान! वास्तवमे, ई प्रश्न बहुत लज्जाजनक अछि। (प्रकट) आन केओ हमरासँ एहन प्रश्न पूछि सकितैक, मुदा एकटा न्यायाधीश कऽ एहन नै सोझैत। न्यायाधीश: कृपया लज्जित नै होऊ। मुकदमाक नियमहि ई प्रश्न पूछि रहल छैक। नगर-सेठ आ लिपिक: मुकदमाक नियमहि ई प्रश्न पूछि रहल छैक। एकरा भीतर अहाँक कोनो दोष नै अछि। बाजू। माय: की! मुकदमाक नियम? जदि एहनहि अछि, तँ सुनू, सम्मानित आदरणीय भद्र लोक सभ। व्यापारी सभक ओही टोला भीतर निवास करैत छथि व्यापारी विनयदत्तक पौत्र, सागरदत्तक पुत्र, एकटा एहन पुरुष जकर नामहि अपन आपमे एकटा बहुत सुन्दर पावन सङ्केत अछि—हुनकर नाम चारुदत्त महराज अछि। हुनकरहि भीतरी महल भीतर हमर कनियाँ अपन युवावस्थाक आनन्द लय रहल छथि। संस्थानक: अहाँ सुनलहुँ ई गप? एही शब्द कऽ तुरंत लिखि लिय’। हमर असली विवाद चारुदत्तक साथहि अछि। नगर-सेठ आ लिपिक: चारुदत्त महराजकें ओकर मित्र होना कोनो पाप-कर्म नै अछि। न्यायाधीश: एही मुकदमाक आगाँ कऽ कार्य आब चारुदत्त महराजक उपस्थिति कऽ मङ्ग कऽ रहल छैक। नगर-सेठ आ लिपिक: बिल्कुल सत्य। न्यायाधीश: धनदत्त महराज, मुकदमाक पहिल विवरण कऽ रूपमे लिखू "वसन्तसेना चारुदत्त महराजक घर गेल छली।" मुदा की हमरा सभकें आदरणीय चारुदत्तकें सेहो विवश कऽ कऽ पुकारबाक चाही? नै, मुकदमाक नियमहि हुनका आमन्त्रित कऽ रहल छैक। जाउ, हमर नीक चोबदार, चारुदत्त महराजकें सादर आमन्त्रित कऽ कऽ लाउ,—मुदा बहुत मधुरतासँ, बिना कोनो हड़बड़ीक, बिना हुनका मन भीतर कोनो चिन्ता खड़ा कयलने, परम आदरक साथ, जेना कोनो सहज गप होबय,—एही शब्द सभक साथ जे "न्यायाधीश अहाँक देखबाक इच्छा राखैत छथि।" चोबदार: जेना अहाँक आज्ञा, महराज। (ओ बाहर जाइत अछि, पुनः चारुदत्तक साथ वापस आबैत अछि) हमर पाछाँ आबब, महराज। चारुदत्त: (चिन्तन भीतर डूबल) हमर चरित्र आ हमर कुल कऽ पूरा उज्जयिनी नगरी कऽ राजा नीक जकां जनैत छथि; आ तइयो हमर एही आमन्त्रण भीतर हमर मन्द भाग्यक कारण एकटा संशय देखि रहल अछि। (विचार करैत, अपन मनमे) आह! की कोनो एहन मनुष्य छलाह जे हमरा मार्ग भीतर पहिचानि लेलन्हि, जखन हम ओही बन्धनसँ मुक्त भेल वीर कऽ अपन गाड़ी भीतर बचेने छलहुँ? अथवा की राजा, जे अपन चतुर गुप्तचर सभक आँखिसँ सभ किछु देखैत छथि, ई जानि लेलन्हि जे संकट कऽ घड़ी भीतर हमर गाड़ी ओकरा देल गेल छल? कोन कारण अछि जे हमरा एही प्रकार राजपथ पर एकटा अपराधी कऽ जकां चलबाक लेल विवश होना पड़ि रहल अछि, अपन न्यायाधीश कऽ सम्मुख होबाक लेल? मुदा एही प्रकार विचार करबा सँ की लाभ आखिर? हमरा न्यायालय कऽ कक्ष भीतर जबाकहि चाही। हमर नीक चोबदार, हमरा न्यायालय भीतर लय चलू। चोबदार: हमर पाछाँ आबब, महराज। (ओ सभ चलैत छथि) चारुदत्त: (व्याकुलतासँ) आ एकर की अर्थ भऽ सकैत अछि आखिर? देखू कसरि ओही घोर अन्धकारमय कौआ कूर नाद कऽ रहल अछि; न्याय कऽ सेवक सभ हमरा पुनः पुकारि रहल छथि; हमर बाँया आँखि तीव्र गतिसँ फड़कि रहल छैक; ई बार-बार होइत कुसङ्केत हमर हृदयकें भय आ संतापसँ भरि रहल छैक। चोबदार: हमर पाछाँ आबब, महराज, बहुत मधुरतासँ आ बिना कोनो हड़बड़ीक। चारुदत्त: (चारू कात चलैत छथि आ अपन सम्मुख देखैत छथि) ओही सूखा गेल वृक्ष कऽ ऊपर, एकटा कौआ सूर्य कात मुख कयलने बैठल अछि; ओकर बाँया आँखि हमरहि ऊपर खसि पड़ल छैक। हाय, कूर भाग्य! हमर संशय आब सत्य सिद्ध भऽ गेल। (ओ दोसर दिशा कात देखैत छथि) मुदा देखू! एकटा साँप! ओकर आँखि बिल्कुल हमरहि ऊपर स्थिर छैक; आ ओकर पीठ काजलक गम्भीर कान्तिमय करिया रङ्ग कऽ जकां चमकि रहल छैक; ओकर पैघ जीभ हवामे लपलपाइ रहल छैक; चारि गोट सफेद दाँत प्रकट छैक; ओकर पेट सूजल अछि आ ओ कुण्डली बान्हने अछि। सर्प सभक ई राजा एतहि सुतल छल जब धरि हम एकर मार्ग पार कयलहुँ, आ आब ई घोर क्रोध भीतर हमरहि ऊपर झपटि रहल अछि। आ एकरसँ बेसी ई अछि: भूमि पर कोनो वर्षा नै भेल अछि, तइयो हमर पएर खसि पड़ि रहल छैक; हमर बाँया आँखि आ हमर बाँया बांहि दोनों एक साथ फड़कि रहल छैक; एकटा दोसर पक्षी हमर मुड़ कऽ ऊपर चीखि रहल छैक; ई सभ साक्षात एकटा कूर मृत्युक सङ्केत अछि, आ जीवनक आ कोन आशा नै बचल। निश्चित रूपसँ, देवता सभ प्रार्थना अछि जे आब सभ किछु नीक होबय। चोबदार: हमर पाछाँ आबब, महराज। ई न्यायालय कऽ कक्ष अछि। कृपया भीतर प्रवेश करू। चारुदत्त: (भीतर प्रवेश करैत छथि आ चारू कात देखैत छथि) न्यायालय कऽ ई कक्ष कतेक अद्भुत आ भव्य बुझि रहल अछि। किएक तँ ई एकटा विशाल समुद्र जकां अछि, जकर पानि स्वयं राजा कऽ मन्त्री सभ छथि जे गम्भीर चिन्तन भीतर डूबल छथि; लहरि आ सीप सभ कऽ जकां एतय वकील सभ अपन स्थान लेने छथि; आ भयानक हिंसक जन्तु सभ कऽ जकां एतय गुप्तचर सभ अपन-अपन पंक्ति बान्हि कऽ ठाढ़ छथि; हाथी आ घोड़ा सभ ओही कूर समुद्र कऽ पैघ मछली सभ कऽ जकां छथि जे प्राण लेबाक लेल लालायित रहैत छैक; जेना समुद्रक बगुला सभ चारू कात चीखैत छथि, ओनाहि एतय चंचल मुकदमबाज सभक पंक्ति नाद कऽ रहल छैक; जखन कि साँप सभक जकां एतय लिपिक सभ रेंगि रहल छथि एही सत्ताक तट ऊपर: न्यायालय कऽ ई रूप आब ओही समुद्र कऽ जकां बुझि रहल अछि जतय प्रत्येक हानिकारक आ कूर जन्तु निवास करैत छैक। आउ! (जखन ओ भीतर जाइत छथि, तँ हुनकर मस्तक कपाट कऽ ऊपर चक्रसँ टकरा जाइत छैक। चिन्तन भीतर) हाय! एकर सेहो आब आगमन भेल की? हमर बाँया आँखि फड़कि रहल छैक; एकटा कौआ कूर नाद कऽ रहल छैक; एकटा साँप हमर मार्ग कऽ घेरने कुण्डली बान्हने अछि। आब हमर सुरक्षा मात्र ईश्वर कऽ हाथ भीतर अछि। मुदा हमरा भीतर प्रवेश करबहि चाही। (ओ भीतर जाइत छथि) न्यायाधीश: ई चारुदत्त महराज छथि। एकटा एहन मुख मण्डल जकर नाक बिल्कुल तीक्ष्ण आ साफ छैक, जकर पैघ-पैघ खुल्ला आँखि भीतरी निष्कपट स्वभाव देखबैत छैक, ओ कखनहु कोनो वासना वा पाप-कर्म कऽ निवासस्थान नै भऽ सकैत; हाथी सभमे, घोड़ा सभमे, आ गौ सभमे, बाहरी रूपहि भीतरी स्वभावक साक्षात सङ्केत होइत छैक; आ मनुष्य सभमे सेहो ओतेकहि सत्य अछि। चारुदत्त: न्याय कऽ परम पूज्य अधिकारी सभकें हमर आदर। अधिकारी सभ, हम अहाँ सभकें प्रणाम करैत छी। न्यायाधीश: (अपन भीतरी व्याकुलताक तोपबाक यत्न करैत) महराज, अहाँक बहुत स्वागत अछि। हमर नीक चोबदार, आदरणीय भद्र पुरुष कऽ आसन दिय’। चोबदार: (एकटा आसन लाबैत अछि) ई आसन अछि। कृपया आसन ग्रहण करू, महराज। (चारुदत्त बैठि जाइत छथि) संस्थानक: (घोर क्रोधसँ) अहाँ एतय आबि गेलहूँ, की अहाँ आखिर, अहाँ स्त्री कऽ हत्या करय वाला? सुन्दर! ई एकटा बहुत नीक मुकदमा भऽ रहल अछि, ई एकटा बहुत न्यायपूर्ण न्यायालय अछि जतय एही स्त्री कऽ हत्या करय वाला कऽ आसन देल जाइ रहल छैक। (अहङ्कारसँ) मुदा कोनो चिन्ता नै। ओकरा बैठबाक दिय’। न्यायाधीश: चारुदत्त महराज, की अहाँक कोनो सम्बन्ध, या स्नेह, या मित्रता एही आदरणीय आर्याक कनियाँ कऽ साथ छल आखिर? चारुदत्त: क कोन आर्या आखिर? न्यायाधीश: एही आर्या। (ओ वसन्तसेनाक माय कात सङ्केत करैत छथि) चारुदत्त: (उठि कऽ) आर्या, हम अहाँकें प्रणाम करैत छी। माय: दीर्घायु होऊ, हमर बच्चा! (अपन मनमे) तँ ई चारुदत्त महराज छथि आखिर। हमर कनियाँक युवावस्था बहुत नीक आ ईमानदार हाथ भीतर अछि। न्यायाधीश: महराज, की ओ गणिका अहाँक मित्र छथि आखिर? (चारुदत्त सङ्कोच आ लज्जा प्रकट करैत छथि) संस्थानक: ओ अपन कयल गेल कर्म कऽ तोपबाक यत्न कऽ रहल अछि; ओ झूठ बाजि रहल अछि, लज्जा वा भय कऽ कारण; ओ ओकर हत्या कऽ देलक, ओकरासँ मुक्ति पाबि लेलक मात्र सुवर्ण लेल, आ बुझैत अछि जे कर्म तोपल रहत; मुदा ओकर मालिक एतय सम्मुख ठाढ़ अछि। नगर-सेठ आ लिपिक: बाजू, चारुदत्त महराज। लज्जित नै होऊ। ई एकटा मुकदमा अछि। चारुदत्त: (लज्जा भीतर) न्याय कऽ अधिकारी सभ, हम कसरि ई साक्ष्य दऽ सकी जे एकटा गणिका हमर मित्र छथि आखिर? मुदा सभसँ कूर स्थिति भीतर सेहो, ई मात्र युवावस्थाक दोष कहल जा सकैत छैक, चरित्रक कखनो नै। न्यायाधीश: मुकदमा बहुत कठीन अछि; तँ अपन एही लज्जाकें दूर करू, चाहे ई अहाँक हृदय ऊपर कतेक पैघ भार किएक नै फिङ्कि रहल हो; दृढ़ता कऽ साथ सत्य बाजू, आ छलबबाक एही भावनाकें अपन आपसँ दूर करू। 18 लज्जित नै होऊ। मुकदमाक नियमहि ई प्रश्न पूछि रहल छैक। चारुदत्त: अधिकारी महराज, हमर मुकदमा आखिर ककर साथ अछि? संस्थानक: (अहङ्कारसँ) हमर साथ! चारुदत्त: अहाँक साथ एकटा मुकदमा होना असह्य आ परम कष्टकर अछि! संस्थानक: नीक, नीक, अहाँ स्त्री कऽ हत्या करय वाला! अहाँ वसन्तसेना सनक स्त्रीक हत्या कऽ देलहूँ जे सैकड़ों रत्न पहिरैत छली, आ आब एककरा तोपबाक लेल अहाँ छलबबाक चतुर उपाय कऽ रहल छी आखिर! चारुदत्त: अहाँ महामूर्ख छी। न्यायाधीश: एकर गप छोड़ू, उत्तम चारुदत्त महराज। सत्य बाजू। की ओ गणिका अहाँक मित्र छथि आखिर? चारुदत्त: हँ, ओ छथि। न्यायाधीश: महराज, वसन्तसेना एही क्षण कतऽ छथि आखिर? चारुदत्त: ओ अपन घर चली गेली। नगर-सेठ आ लिपिक: ओ कसरि गेली? ओ कखन गेली? ओकर साथ के गेल छल आखिर? चारुदत्त: (अपन मनमे) की हमरा ई कहबाक चाही जे ओ ककरो देखे बिना चुपचाप गेल छली? नगर-सेठ आ लिपिक: बाजू, महराज। चारुदत्त: ओ अपन घर चली गेली। एकरासँ बेसी हम की कहब आखिर? संस्थानक: ओकरा फुसला कऽ हमर पुराना पुष्पककरण्डक बगीचा भीतर लाएल गेल छल, आ मात्र ओकर धन लेल ओकर गला दबाएल गेल छल। आब अहाँ कहब जे ओ अपन घर गेली आखिर? चारुदत्त: मनुष्य, अहाँ पागल छी। आकाशक मेघ सेहो अहाँक शरीरकें आदरसँ गीला नै कऽ सकैत; अहाँक ई ओठ ओही नीलकण्ठ पक्षीक पाँखिक किनार जकां करिया भऽ गेल छैक, जे सदा असत्य बोली बाजय भीतर चंचल रहैत छैक, आ जाड़क ऋतुक ओही कमल-पुष्प जकां अछि जकर समस्त कान्ति नष्ट भऽ गेल हो। न्यायाधीश: (अपन मनमे) जदि मनुष्य हिमालय पर्वत कऽ अपन हाथ भीतर उठा लय, आ एक समुद्रक तटसँ दोसर समुद्रक तट धरि तैरि कऽ पार कऽ लय, आ हवा कऽ झोंका कऽ अपन मुट्ठी भीतर बन्द कऽ लय: मात्र तबहि केओ विचार कऽ सकैत अछि जे चारुदत्त महराज कोनो पाप-कर्म कयलने होताह। (प्रकट) ई आदरणीय कुलक चारुदत्त महराज छथि। ओ एहन भयानक अपराध कसरि कऽ सकैत छथि आखिर? (ओ वैह श्लोक दोहराबैत छथि "एकटा एहन मुख मण्डल जकर नाक:") संस्थानक: न्यायालय भीतर एही प्रकारक पक्षपात किएक भऽ रहल छैक आखिर? न्यायाधीश: विदा होऊ एतयसँ, अहाँ मूर्ख! अहाँ अज्ञानी, अहाँ पवित्र कानून कऽ अपन टेढ़ अर्थ देखबैत छी, आ तइयो अहाँक जीभ भीतर कोनो घाव नै होइत आखिर? दोपहर कऽ कड़ा सूर्य कात अहाँ स्थिर आँखिसँ देखलहूँ, आ अहाँक आँखि तुरंत अन्ध नै भेल आखिर? अहाँ अपन हाथ प्रज्वलित आगि भीतर फिङ्कलहूँ, आ ओकरा बाहर निकाललहूँ बिना कोन घावक? अहाँ चारुदत्त महराजक पवित्र गुण कऽ माठि भीतर घसीटबाक पराक्रम कऽ रहल छी, आ अहाँ एही क्षण भूमि भीतर कऽ एही भीतरी गड्ढा भीतर समा नै गेलहूँ आखिर? आदरणीय चारुदत्त महराज कसरि कोनो अपराध कऽ सकैत छथि आखिर? विशाल समुद्रक समस्त अमूल्य सम्पत्ति भीतरसँ आब मात्र ओकर उमड़ैत पानिहि बचल छैक, किएक तँ, बिना कोन स्वार्थपूर्ण विचार कऽ—ओ आन लोक सभक कल्याण लेल—अपना कऽ सभ प्रकारक धनसँ पूर्णतः मुक्त कऽ देलन्हि। आ की एकटा एहन महान आत्मा वाला पुरुष, गुणक साक्षात अमूल्य पेटारी जतय सभ श्रेष्ठ रत्न आपसमे मिलैत छथि, मात्र तुच्छ सुवर्ण लेल, एहन कूर अपराध करबाक पराक्रम करत जकर भीतर ओकर शत्रु सेहो आनन्द नै पाबि सकैत आखिर? माय: अहाँ पापी! जखन ओही सुवर्ण-मञ्जूषा, जे हुनकर घर धरोहर कऽ रूपमे सौंपल गेल छल, आधी राति भीतर चोर सभ द्वारा चोराएल गेल छल, तँ ओ ओकरा स्थान पर अपन पत्नीक ओही मोती कऽ कण्ठहार दऽ देलन्हि जे चारू समुद्रक परम गौरव छल। आ ओ आब, मात्र एकटा तुच्छ वस्तु लेल—ओकर धन लेल!—एहन पाप करत आखिर? ओह हमर बच्चा, वापस आबब हमर पाँ, हमर कनियाँ! (ओ अश्रु बहाबैत अछि) न्यायाधीश: आदरणीय चारुदत्त महराज, की ओ पएरसँ पैदल गेल छली, या कोनो गाड़ी भीतर? चारुदत्त: हम हुनका विदा होइत काल अपन आँखिसँ नै देखलहुँ। अतः हमरा जान नै अछि जे ओ पएरसँ पैदल गेल छली, या कोनो गाड़ी भीतर। (घोर क्रोध भीतर आरक्षी कप्तान वीरकक प्रवेश होइत अछि) वीरक: हमर क्रोध ओही अपमानजनक, कलङ्क वला लातक प्रहारसँ एतेक प्रज्वलित भऽ गेल छल, आ हम रात भरि ओही संताप भीतर जलि रहल छलहुँ, जब धरि राति विवश भऽ कऽ भोरक प्रकाश कऽ स्थान नै दऽ देलक। अतः आब हम न्यायालय कऽ कक्ष भीतर जाब। (ओ भीतर जाइत अछि) एही सम्मानित अधिकारी सभकें प्रसन्नता भेटय। न्यायाधीश: आहा, ई वीरक अछि, पहरेदार सभक कप्तान। वीरक, अहाँक एतय आबबाक की प्रयोजन अछि आखिर? वीरक: नीक! हम वीर कैदी आर्यक कऽ खोजि रहल छलहुँ, जखन ओकर कारागारसँ भागबाक कारण पूरा नगर भीतर पैघ कोलाहल छल। हमरा मार्गमे एकटा बन्द गाड़ी आबित देखि कऽ संशय भेल छल, आ हम भीतर देखबाक इच्छा राखैत छलहुँ। "अहाँ एक बेर निरीक्षण कऽ लेलहूँ, मनुष्य, आब हमरा दोसर बेर करबाक चाही," हम एहनहि कहलहुँ छल, आ ओकरा बाद हमरा ओही बहुत सम्मानित चन्दनक द्वारा लात मारल गेल। अहाँ सभ विवरण सुनि लेलहूँ, महराज अधिकारी सभ। अवशिष्ट आब अहाँक कार्य अछि। न्यायाधीश: हमर नीक मनुष्य, की अहाँ जनैत छी जे ओ गाड़ी ककर छल आखिर? वीरक: एतय सम्मुख ठाढ़ एही आदरणीय भद्र पुरुष चारुदत्त महराजक। आ चालक कहि रहल छल जे आर्या वसन्तसेना ओकरा भीतर छथि, आ ओ ओकरा पुष्पककरण्डक पुराना बगीचा कात आनन्द लेबाक लेल लय जाइ रहल अछि। संस्थानक: एककरा सेहो सुनू आ सत्य जानू! न्यायाधीश: चरित्रक ई चन्द्रमा, हाय, जे निष्कलङ्क आ निर्मल छल, ओ आब राहु कऽ मुख भीतर समा रहल अछि, ओकर कान्ति चोराएल जा रहल छैक; तट नीचां खसि पड़ल छैक; लहरि सभ आब गन्दा देखि रहल छैक, जे पहने कखनो बहुत निर्मल आ साफ छलाह। वीरक, अहाँक एही मुकदमाक जाँच हम सभ बाद भीतर करब। न्यायालय कऽ दुआरि पर जे घोड़ा ठाढ़ अछि, ओकरा ऊपर सवार होऊ, पुष्पककरण्डक बगीचा भीतर तुरंत जाउ, आ देखू जे की ओतय वास्तवमे कोनो स्त्री मृत अवस्था भीतर खसि पड़ल अछि वा नै। वीरक: जेना अहाँक आज्ञा, महराज। (ओ बाहर जाइत अछि, पुनः वापस आबैत अछि) हम ओतय जा कऽ देखि कऽ आबि गेलहुँ अछि। आ हम एकटा स्त्रीक मृत शरीर देखलहुँ, जकर रूप वनक भयानक हिंसक पशु सभ द्वारा नोचल गेल छैक। नगर-सेठ आ लिपिक: अहाँ कसरि जनलहूँ जे ओ कोनो स्त्रीकहि मृत शरीर छल आखिर? वीरक: ओ हम ओकर केशक अवशेष, ओकर बांहि, ओकर हाथ आ पएरक साक्षात नाप देखि कऽ पहिचानि लेलहुँ। न्यायाधीश: हाय, मनुष्यक कूर कर्म सभक कारण कोनो पैघ कठीन संकट खड़ा भऽ जाइत छैक! मनुष्यों जतेक बेसी अपन भीतरी कला आ चतुरताक प्रयोग करत, सत्य कऽ मार्ग ओतेकहि आ कठीन भऽ जाइत छैक; कानून कऽ मङ्ग तँ बिल्कुल साफ देखि रहल छैक, तइयो न्यायाधीशक निर्णय अपन स्थान पर ओनाहि संशय भीतर डोलि रहल छैक, जेना कोनो निर्बल गौ दलदल कऽ चंचल बालू ऊपर ठाढ़ हो। चारुदत्त: (अपन मनमे) जेना मधुमक्खी सभ, जखन फूल खिलब आरम्भ करैत छैक, ओकर रस पीबाक लेल चारू कातसँ उमड़ि आबैत छैक; ओनाहि जखन मनुष्य मन्द भाग्य कऽ बन्धन भीतर आबि जाइत छैक, तँ सभ संकट आ दुःख ओकरहि दुआरि कऽ कबाड़ तोड़ि कऽ भीतर समा जाइत छैक। न्यायाधीश: आदरणीय चारुदत्त महराज, सत्य बाजू! चारुदत्त: एकटा नीच आ ईर्ष्यालु जीव, वासना भीतर पूर्णतः अन्ध भऽ कऽ, अपन पूरा आत्मा कोनो एहन कूर माध्यम खोजबामे लगा दैत छैक जाहिसँ ओ ओही मनुष्यक प्राण लय सकय जकरासँ ओ ईर्ष्या करैत छैक; की ओकर झूठ, जे ओकर पापी स्वभावसँ निकसल छैक, न्यायालय भीतर विजय पाबत आखिर? नै! विद्वान आ बुद्धिमान पुरुष कखनहु ओकरा कात ध्यान धरि नै दैत। आ एकरसँ बेसी ई अछि: हम कखनो कोनो सुसुक लताक सुन्दरताकें सेहो नष्ट नै कयलहुँ, नहि ओकर फूल कऽ अपन हाथसँ तोड़लहुँ; तँ की हमरा एहन भय नै होइत आखिर जे हम ओकर सुकुमार केशकें, जे मधुमक्खी कऽ पाँखि कऽ जकां करिया आ सुन्दर छैक, अपन हाथ भीतर जकड़ब, आ एकटा कानय वाली निर्दोष कनियाँक हत्या करब? संस्थानक: अरे न्यायाधीश सभ! अहाँ सभ एही मुकदमाक जाँच एतेक पैघ पक्षपात कऽ साथ कसरि कऽ सकैत छी आखिर? देखू, अहाँ सभ अखन धरि एही पापी चारुदत्तकें ओकर आसन ऊपर सम्मानसँ बैठाउने छी। न्यायाधीश: हमर नीक चोबदार, एहनहि होबय तखन। (चोबदार संस्थानकक सङ्केतक अनुकूल कार्य करैत अछि) चारुदत्त: न्यायाधीश सभ, गम्भीर विचार करू जे अहाँ सभ की कऽ रहल छी! (ओ अपन आसन छोड़ि दैत छथि, आ भूमि पर बैठि जाइत छथि) संस्थानक: (परम प्रसन्नतासँ आनन्दित भऽ कऽ नाचैत अछि। अपन मनमे) सुन्दर! जे पाप-कर्म हम कयलहुँ छल, ओकर कलङ्क आब ककरो दोसर मनुष्यक मुड़ ऊपर जा कऽ खसि पड़ल छैक। अतः आब हम ओतहि बैठब जतय चारुदत्त पहिने बैठल छल। (ओ ओनाहि करैत अछि) हमर कात देखू, चारुदत्त, आ आब अपन मुखसँ स्वीकार करू जे अहाँ ओकर हत्या कयलहूँ। चारुदत्त: न्यायाधीश सभ! एकटा नीच आ ईर्ष्यालु जीव, वासना भीतर पूर्णतः अन्ध भऽ कऽ, अपन पूरा आत्मा कोनो एहन कूर माध्यम खोजबामे लगा दैत छैक जाहिसँ ओ ओही मनुष्यक प्राण लय सकय जकरासँ ओ ईर्ष्या करैत छैक; की ओकर झूठ, जे ओकर पापी स्वभावसँ निकसल छैक, न्यायालय भीतर विजय पाबत आखिर? नै! विद्वान आ बुद्धिमान पुरुष कखनहु ओकरा कात ध्यान धरि नै दैत। (उदासीसँ लम्बा निश्वास छोड़ि कऽ। अपन मनमे) हमर साथी मैत्रेय! ओह, ई कतेक कूर प्रहार भेल अछि! हमर प्रिय पत्नी, जे एकटा निष्कलङ्क कुलक परम गौरव छी! हमर रोहसेन बच्चा! हम एतय भूमि पर खसि पड़ल छी, मन्द भाग्यक कूर बन्धन भीतर; आ अहाँ, अहाँकें कोनो जान धरि नै छैक जे अहाँक खेलबाक समस्त सुकुमार उत्सव आब पूर्णतः व्यर्थ भऽ गेल अछि। अहाँ खेलि रहल छी, ककरो दोसरक एही घोर संतापसँ पूर्णतः अनजान भऽ कऽ! मुदा हम मैत्रेयकें वसन्तसेना पाँ पठाय देलहुँ छल, जाहिसँ ओ ओकर कुशल-क्षेम लाबथि, आ ओही आभूषण कऽ पेटारी वापस कऽ दिय’ जे ओ हमर बच्चाकें माठिक गाड़ी भीतर खिलौना स्वरूप सोने कऽ गाड़ी बनाबय लेल देने छली। तखन ओ आब कसरि बिलम्ब कऽ रहल अछि आखिर? (हाथमे आभूषण लय कऽ मैत्रेयक प्रवेश होइत अछि) मैत्रेय: चारुदत्त महराज हमरा आदेश देलन्हि जे हम वसन्तसेना पाँ जाउ, ओकर आभूषण वापस करबाक लेल, आ ओ हमरा कहलनि जे: "मैत्रेय, वसन्तसेना हमर प्रिय रोहसेनकें अपनहि बहुमूल्य आभूषण सभसँ सजा देने छली, आ ओकरा एही रूपमे ओकर माय पाँ पठौने छली। ओकर पक्षसँ आभूषण देना तँ उचित छल, मुदा हमरा सभक लेल एककरा स्वीकार करब कोनो मर्यादा कऽ अनुकूल नै अछि। अतः एककरा तुरंत ओकरा सुपुर्द कऽ दिय’।" अतः आब हम वसन्तसेनाक घर कऽ मार्ग पर छी। (ओ चलैत अछि आ चारू कात देखैत अछि, पुनः नेपथ्यक ककरो साथ बाजैत अछि) आहा, ई आचार्य रेभिल छथि आखिर। ओह आचार्य रेभिल, अहाँ एतेक पैघ संताप आ व्याकुलता भीतर किएक देखि रहल छी आखिर? (ओ सुनैत अछि) की! अहाँक की अर्थ अछि, महराज? "हमर प्रिय मित्र चारुदत्तकें न्यायालय भीतर विवश कऽ कऽ पुकारल गेल अछि आखिर"? ई कखनहु कोनो साधारण गप नै भऽ सकैत। (सोचैत) हम वसन्तसेनाक घर बाद भीतर जाब, मुदा पहने हम न्यायालय कऽ कक्ष भीतर तुरंत जाब। (ओ चारू कात चलैत अछि आ देखैत अछि) ई न्यायालय अछि। हम अखने भीतर जाब। (ओ भीतर जाइत अछि) न्यायाधीश सभकें प्रसन्नता भेटय। हमर मित्र कतऽ छथि आखिर? न्यायाधीश: एतय। मैत्रेय: हमर मित्र, हम अहाँक सुख आ प्रसन्नताक कामना करैत छी। चारुदत्त: ओ हमर भऽ कऽ रहत। मैत्रेय: आ शान्ति कऽ सेहो। चारुदत्त: ओहो हमर भऽ कऽ रहत। मैत्रेय: हमर मित्र, अहाँ एतेक पैघ संताप आ दुःख भीतर किएक देखि रहल छी आखिर? आ अहाँकें किएक पुकारल गेल छल? चारुदत्त: हमर मित्र, एकटा पापी आ अधम मनुष्य छी हम, जे एही कलङ्क कऽ भार उठा रहल अछि, आ परलोक भीतर कोनो सुखक आशा आब हमर पाँ नै बचल छैक; एकटा सुकुमार कनियाँ—या कोनो देवी—ई दोनों एकहि अछि; मुदा अवशिष्ट गप आब ई पुरुष (संस्थानक) अपन मुखसँ कहत। मैत्रेय: की? की गप अछि आखिर? चारुदत्त: (कान भीतर फुसफुसाबैत छथि) वैह भेल अछि। मैत्रेय: ई के कहि रहल छैक आखिर? चारुदत्त: (संस्थानक कात सङ्केत करैत छथि) ई मनुष्य साक्षात विधाताक हाथक माध्यम बनल अछि हमर ऊपर कलङ्क लगाबबाक लेल। मैत्रेय: (चारुदत्त कऽ कान भीतर फुसफुसाबैत अछि) अहाँ सीधा एतेक किएक नै कहि दैत छी जे ओ अपन घर चली गेली आखिर? चारुदत्त: यद्यपि हम एहन कहि सेहो देब, तइयो केओ विश्वास नै करत, एतेक कूर आ संकटमयी हमर आब स्थिति भऽ गेल अछि। मैत्रेय: मुदा महराज अधिकारी सभ! हुनका द्वारा उज्जयिनी नगरीकें पैघ-पैघ महल सभसँ, आश्रम सभसँ, उपवन सभसँ, मन्दिर सभसँ, पोखरि सभसँ, आ सुन्दर फव्वारे सभसँ सुसज्जित कयल गेल अछि, आ ओ आब एतेक पागल भऽ जएताह जे एहन भयानक अपराध करताह—ओहो मात्र एकटा तुच्छ वस्तु लेल आखिर? (घोर क्रोधसँ) अहाँ एकटा चरित्रहीन स्त्रीक पुत्र, अहाँ राजा कऽ साढ़ू संस्थानक, अहाँ कामुक, अहाँ झूठा कलङ्क लगाबय वाला, अहाँ नचनियाँ, अहाँ सुवर्ण वस्त्र पहिरने बानर, हमर सम्मुख बाजू एही गप कऽ! हमर ई मित्र कखनो कोनो खिलल चमेली कऽ लता कऽ सेहो अपना कात आदरसँ नै खिंचैत छलाह, ओकर फूल तोड़बाक लेल, एही भयक मारे जे कखनो ओकर कोनो सुकुमार टहनी घायल नै भऽ जाय। ओ एहन अपराध कसरि कऽ सकैत छथि आखिर, जकरा पृथ्वी आ आकाश दोनों साक्षात घोर पाप कहि कऽ पुकारि रहल छैक? बस एक क्षण रुकू, अहाँ एकटा कुट्टनीक पुत्र! रुकू जब धरि हम अहाँक एही मुड़ कऽ अपन एही लाठीसँ, जे अहाँक टेढ़ हृदय कऽ जकां टेढ़ छैक, एक सौ टुकड़ामे काटि कऽ भूमि पर नै खसाय दैत छी। संस्थानक: (घोर क्रोधसँ) अधिकारी सभ, एकर गप सुनू आ सत्य जानू! हमर विवाद, या हमर मुकदमा चारुदत्तक साथ अछि आखिर। एकटा एहन मनुष्य जकर मुड़ कोनो टेढ़ काठक खूँटा जकां देखि रहल छैक, ओकरा की अधिकार छैक आखिर जे हमर मुड़ कऽ एक सौ टुकड़ामे काटि कऽ खसाय दैक? बिल्कुल नै! अहाँ पापी रास्कल! (मैत्रेय अपन लाठी उठाबैत अछि आ अपन शब्द सभ दोहराबैत अछि। संस्थानक घोर क्रोधसँ उठैत अछि आ ओकरा मारैत अछि। मैत्रेय पलटि कऽ मारैत अछि। एही हाथापायी कऽ बीच मैत्रेयक कमर कऽ बन्धनसँ ओही आभूषण कऽ पेटारी भूमि पर खसि पड़ैत छैक) संस्थानक: (आभूषण कऽ भूमि परसँ उठा लैत अछि आ ओकर परम सजगतासँ जाँच करैत अछि। अत्यधिक उत्तेजनासँ) देखू अधिकारी सभ, देखू! ई ओही बेचार अभागिन लड़कीक अमूल्य आभूषण अछि! (चारुदत्त कात सङ्केत करैत अछि) मात्र एही तुच्छ वस्तु लेल ओ ओकर गला दबोचने छल, आ ओकर हत्या कऽ देने छल। (समस्त न्यायाधीश अधिकारी सभ अपन मुड़ आदर आ दुःखसँ नीचां झुका लैत छथि) चारुदत्त: (मैत्रेय कऽ कान भीतर फुसफुसाबैत छथि) ई तँ हमर मन्द भाग्य आब अपन पूरा जहर बाहर निकालि रहल छैक, जे एही कूर क्षण भीतर ई सभ आभूषण भूमि पर खसि पड़ल, ई सभ रत्न—आ एकर साथहि, हम स्वयं सेहो साक्षात खसि पड़ल छी। मैत्रेय: मुदा अहाँ सीधा सत्य बाजू आखिर? चारुदत्त: हमर मित्र, राजा कऽ आँखि भीतर घोर अन्धकार जमि गेल छैक, आ ओकर दृष्टि कखनहु सत्य कऽ मार्ग कात नै झुकत; यद्यपि हम सभ किछु कहि सेहो देब, तइयो हम एही कूर आ कलङ्क वला अन्तसँ भागि कऽ कतहु नै जा सकी। न्यायाधीश: हाय! हाय! मङ्गल ग्रह कऽ साथ स्वयं बृहस्पति युद्ध कऽ रहल छथि, आ मरि रहल छथि; आ ओही दोनों कऽ कात भीतर आब एहन बुझि रहल छैक जेना आकाश भीतर कोनो भयानक केतु-ग्रह उठि रहल हो। नगर-सेठ आ लिपिक: (मञ्जूषा कात देखि कऽ। वसन्तसेनाक माय कें) आर्या, कृपया एही सुवर्ण-मञ्जूषाकें परम सजगतासँ जाँंचू, देखू जे की ई बिल्कुल वैह अछि आखिर वा नै। माय: (मञ्जूषाकें देखि कऽ) एकर स्वरूप बिल्कुल वैह अछि, मुदा हम निश्चित नै छी जे ई वैह अछि आखिर। संस्थानक: ओह अहाँ बूढ़ी कुट्टनी! अहाँ अपन आँखिसँ तँ सत्य स्वीकार कऽ रहल छी, मुदा अपन ओठसँ एकरा अस्वीकार कऽ रहल छी। माय: विदा होऊ एतयसँ, अहाँ पापी! नगर-सेठ आ लिपिक: बहुत सजगतासँ बाजू। की ई वैह अछि आखिर वा नै? माय: महराज अधिकारी सभ, सुवर्णकार कऽ भीतरी कला मनुष्य कऽ आँखि चोरा लैत छैक। मुदा हम निश्चित नै छी जे ई वैह अछि आखिर। न्यायाधीश: नगर-सेठ महराज, देखू! रत्न कखनो कतेको प्रकारसँ एकहि सन देखि सकैत छैक, जखन कलाकारक भीतरी विचार ओकर रूप आ सुन्दरता ऊपर खेलैत छैक; किएक तँ कलाकार सदा वैह बनाबैत अछि जे ओ अपन आँखिसँ देखलने हो, आ चतुर हाथ दोबारा वैह रूप खड़ा कऽ सकैत छैक जे पहने कखनो भेल हो। नगर-सेठ आ लिपिक: की ई सभ आभूषण चारुदत्त महराजक अछि आखिर? चारुदत्त: कखनहि नै! नगर-सेठ आ लिपिक: तखन ककर अछि आखिर? चारुदत्त: एही आर्याक कनियाँ (वसन्तसेना) कऽ। नगर-सेठ आ लिपिक: ओ एककरा कसरि खो देलन्हि आखिर? चारुदत्त: ओ एककरा खो देलन्हि। हँ, मात्र एतेकहि गप सत्य अछि। नगर-सेठ आ लिपिक: चारुदत्त महराज, एही विषय भीतर सत्य बाजू। किएक तँ अहाँकें स्मरण राखबाक चाही, सत्य सदा जीवन भीतर परम कल्याण लाबैत छैक; सत्य बाजलासँ जीवन भीतर कोनो संकट नै आबैत; सत्य, साक्षात अमूल्य अक्षर अछि! तँ सत्यकें झूठ कऽ भीतरी अन्धकार भीतर तोपबा सँ अपन आप कऽ रोकू। चारुदत्त: आभूषण, आभूषण! हमरा जान नै अछि। मुदा हम एतेक जनैत छी जे एककरा हमर घरसँ बाहर लय जाया गेल छल। संस्थानक: पहने अहाँ ओकरा बगीचा भीतर लय गेलहूँ आ ओकर हत्या कऽ देलहूँ। आ आब अहाँ एककरा तोपबाक लेल छलबबाक चतुर उपाय कऽ रहल छी आखिर। न्यायाधीश: आदरणीय चारुदत्त महराज, सत्य बाजू! कूर कोड़ा कऽ भयानक प्रहार एही क्षण अहाँक एही सुकुमार शरीर ऊपर खसबाक लेल प्रतीक्षा कऽ रहल छैक; आ हम सभ—हम सभ विवश भऽ कऽ एककरा कानून कऽ अनुकूलहि बुझब। चारुदत्त: धर्मात्मा आ निष्कलङ्क पूर्वज सभक कुल भीतर हमर जन्म भेल अछि, आ पाप कऽ कोनो अंश हमर भीतर कहियो नै भेटल; तइयो जदि संशय हमर पवित्र गुण कऽ कलङ्कित कऽ रहल छैक, तँ एकरामे हमर अन्ध हृदयक शुद्ध होबा सँ की लाभ आखिर? (अपन मनमे) आ आब हमरा जीवनसँ की प्रयोजन, जखन हमर वसन्तसेनाहि हमरासँ चोराएल गेल छली। (प्रकट) आह, शब्द सभकें व्यर्थ नष्ट करबा सँ की लाभ आखिर? एकटा पापी आ अधम मनुष्य छी हम, जे एही कलङ्क कऽ भार उठा रहल अछि, आ परलोक भीतर कोनो सुखक आशा आब हमर पाँ नै बचल छैक; ओही परम प्रिय सुकुमार कनियाँ, वासनाक एही कूर ज्वाला भीतर—मुदा अवशिष्ट गप आब ई पुरुष अपन मुखसँ कहत। संस्थानक: मारि देलहुँ ओकरा! आब अहाँ सेहो अपन मुखसँ बाजू। "हम ओकरा मारि देलहुँ।" चारुदत्त: अहाँ एककरा कहि देलहुँ अछि। संस्थानक: सुनू, हमर मालिक अधिकारी सभ, सुनू! एकरा स्वयं स्वीकार कऽ लेलक जे ओ ओकर हत्या कयलक! ओकरा बिना कोन दोसर मनुष्य नै छल! संशय समाप्त भऽ गेल। आब दण्ड कऽ कूर विधान एही पापी चारुदत्तक शरीर ऊपर तुरंत कयल जाय। न्यायाधीश: चोबदार, हमरा सभकें राजा कऽ साढ़ू कऽ गप कऽ कानून कऽ अनुकूल मानबहि पड़त। आरक्षी सिपाही सभ, चारुदत्त महराजकें अपन बन्धन भीतर तुरंत जकड़ि लिय’। (सिपाही सभ ओनाहि करैत छथि) माय: दया करू, उत्तम अधिकारी सभ, दया करू! (ओ पहिल गप पुनः दोहराबैत अछि जे "जखन ओही सुवर्ण-मञ्जूषा:") जदि हमर कनियाँ मारल गेल छली, तँ ओ मारल गेली। ओकर मृत्यु भऽ गेल। मुदा एही महराजकें हमर लेल जिबैत रहबाक दिय’—ईश्वर एकर कल्याण करथि! आ एकर अतिरिक्त, एकटा मुकदमा वादी आ प्रतिवादी कऽ बीचक विषय होइत छैक। हम असली वादी छी। अतः एककरा मुक्त करू आ स्वतंत्र होबाक दिय’! संस्थानक: अहाँ दासी, हमर मार्गसँ पाछाँ हटू! अहाँकें एकर विषयमे आ की बाजयब अछि आखिर? न्यायाधीश: जाउ, आर्या। सिपाही सभ, हुनका सादर बाहर लय जाउ। माय: ओह हमर बच्चा, हमर पुत्र! (अश्रु बहाबैत बाहर जाइत अछि) संस्थानक: (अपन मनमे) हम अपना लेल एकटा बहुत पैघ पराक्रम कऽ काज कऽ लेलहुँ अछि। आब हम जाब। (प्रस्थान करैत अछि) न्यायाधीश: आदरणीय चारुदत्त महराज, निर्णय देबाक अधिकार तँ हमरा सभक पाँ छल, मुदा अवशिष्ट विधान आब स्वयं राजा ऊपर निर्भर करैत छैक। आ तइयो, चोबदार, राजा पालककें कानून कऽ एही नियमक स्मरण अवश्य करा देबक: कोनो ब्राह्मण जदि अपराध कऽ सेहो लय, तँ हमर शास्त्र कहैत छैक जे ओकर वध कखनो नै कयल जा सकैत, ओकरा अपन समस्त धन कऽ साथ राज्यसँ सुरक्षित बाहर निर्वासन दऽ देबाक चाही। चोबदार: जेना अहाँक आज्ञा, महराज। (ओ बाहर जाइत अछि, पुनः आँखिमे अश्रु लय कऽ वापस आबैत अछि) ओह महराज अधिकारी सभ, हम स्वयं राजा कऽ सम्मुख गेल छलहुँ। आ राजा पालक कहलनि जे: "किएक तँ ओ मात्र एकटा तुच्छ वस्तु लेल वसन्तसेनाक हत्या कऽ देलक, अतः वैह सभ आभूषण ओकर कण्ठ चारू कात बान्ही देल जाय, नगाड़ा कऽ कूर नाद कयल जाय, ओकरा दक्षिणी श्मशान भूमि कात लय जाय, आ ओतय ओकरा शूल पर चढ़ा कऽ मृत्युदण्ड देल जाय।" आ जे केओ आन एहन अपराध करत, ओकरो एहनहि भयानक अन्त देल जाय। चारुदत्त: ओह, कतेक पैघ अत्याचार आ कूरता अछि राजा पालकक एही विधान भीतर! मुदा आखिर, यद्यपि ककरो दुष्ट मन्त्री कऽ सलाह कोनो राजाकें अन्याय कऽ पैघ संकट भीतर फिङ्कि दैक, तइयो ओही दुःख आ संताप कऽ कूर फल स्वयं राजा कऽ हि भोगब पड़तैक; आ ई एकटा न्यायपूर्ण नियति होइत छैक। आ एकरसँ बेसी ई अछि: जे राजा कऽ भीतरी बुद्धि कऽ टेढ़ कऽ दैत छथि, आ ओही सफेद कौआ कऽ जकां पापी भूमिका खेलैत छथि, ओ सभ हजारों निर्दोष मनुष्य सभक प्राण लय लैत छथि, आ ओ सभ मारैत छथि, मारैत छथि, आ मारैतहि रहैत छथि। हमर मित्र मैत्रेय, जाउ, आ हमर पुत्रक आदरणीय मायकें हमर नामसँ अन्तिम बेर प्रणाम कहियौन्हि। आ हमर रोहसेन बच्चाकें प्रत्येक संकटसँ सदा सुरक्षित राखब। मैत्रेय: जखन जड़िहि काटि कऽ अलग कऽ देल गेल, तँ गाछ कसरि सुरक्षित रहि सकैत छैक आखिर? चारुदत्त: नै, एहनहि नै बाजू। जखन मनुष्य ऊपर कऽ संसार भीतर विदा भऽ जाइत अछि, तँ ओ अपन जिबैत पुत्र भीतर सदा जिबैत रहैत अछि; रोहसेन कऽ अपन ओतेकहि स्नेह आ आदर दिय’ जतेक अहाँ हमरा दऽ रहल छलहूँ। मैत्रेय: ओह हमर प्रिय मित्र! हम अहाँक जीवन कऽ ओही मार्गकें आगाँ बढ़ा कऽ, जेकरा अहाँ अधूरा छोड़ि कऽ जाइ रहल छी, अहाँक असल मित्र सिद्ध करब। चारुदत्त: आ हमरा मात्र एकटा क्षण लेल रोहसेन बच्चाक मुख देखि लेबाक चाही। मैत्रेय: हम ओकरा लाबब। ई बिल्कुल उचित अछि। न्यायाधीश: हमर नीक चोबदार, एही मनुष्यकें बाहर लय जाउ। (चोबदार ओनाहि करैत अछि) ओतय के अछि आखिर? जल्लाद सभकें हुनकर कूर आदेश तुरंत देल जाय। (सिपाही सभ चारुदत्तकें मुक्त करैत छथि, आ सभ बाहर विदा भऽ जाइत छथि) चोबदार: हमर साथ आबब, महराज। चारुदत्त: (उदासीसँ श्लोक दोहराबैत छथि "हमर साथी मैत्रेय! ओह, ई कतेक कूर प्रहार") (पुनु, जेना कोनो अपरिचित अदृश्य पुरुषसँ बाजि रहल हो) जदि अहाँ हमर पवित्र चरित्रक जाँच प्रज्वलित आगि भीतर कऽ कऽ देखि लेतहुँ, या पानि भीतर, या जहर भीतर, या तराजू कऽ नाप ऊपर, आ एही प्रकार जानि लेतहुँ जे हमर एही ब्राह्मण शरीरकें कोनो कूर दण्ड देबाक चाही छल, तँ हमरा कोनो दुःख नै होइत। मुदा अहाँ एकटा शत्रु कऽ शब्द ऊपर विश्वास कयलहूँ, आ हमर एही प्रकार वध कऽ रहल छी? सुन्दर! अपन पुत्र, पौत्र आ समस्त वंश कऽ साथ अहाँ आब नरक भीतर समा जाबाक लेल तैयार रहू! हम आबि रहल छी! हम आबि रहल छी! (सभ प्रस्थान करैत छथि) दशम अङ्क: संहार (मुकदमाक अन्त) (दू गोट जल्लाद सभक साथ चारुदत्तक प्रवेश होइत अछि) जल्लाद सभ: तँ आब अपन एही पीड़ा कऽ विषयमे बेसी चिन्ता नै करू; मात्र एकहि क्षण भीतर अहाँक प्राण लय लेल जाय। हम सभ अहाँकें बान्हबाक आ अहाँक वध करबाक नव-नव सभ तरीका नीक जकां जनैत छी। मुड़ काटबामे हम सभ कखनहु असफल नै होइत छी, नहि जखन ककरो शूल पर चढ़ा कऽ मृत्युदण्ड देबाक हो। मार्गसँ हटू, आदरणीय भद्र लोक सभ, मार्गसँ हटू! ई आदरणीय कुलक चारुदत्त महराज छथि। हुनकर ललाट ऊपर करवीर कऽ फूलक माला सुशोभित छनि, जे आब जल्लाद सभक हाथ भीतर बद्ध छथि; एकटा एहन दीपक जकर तेल आब पूर्णतः समाप्त भऽ गेल हो, हुनकर भीतरी प्रकाश आब मन्द भऽ कऽ बुझबाक कगार पर अछि। चारुदत्त: (उदासीसँ) हमर शरीर चारू कातसँ खसय वाला अश्रु कऽ बून्द सभसँ भीजि गेल छैक; हमर अङ्ग-अङ्ग एही माठिसँ मलिन भऽ गेल छैक; श्मशान भूमि भीतरसँ नोचल गेल फूल हमर भयानक माला बनल छैक; कूर कौआ सभ हमर एही कूर बलि-उत्सव लेल नाद कऽ रहल छैक, आ हमरहि खूनक सुगन्धित धूप देबाक तैयारी भऽ रहल छैक। जल्लाद सभ: मार्गसँ हटू, आदरणीय भद्र लोक सभ, मार्गसँ हटू! अहाँ सभ एही भला मनुष्य कात एही प्रकार किएक देखि रहल छी आखिर? मृत्युक कूर कुल्हाड़ी कखनो एकहि क्षण भीतर एककरा नीचां खसाय देतैक। मुदा एकटा समय छल जखन उत्तम मनुष्य सभ अपन रक्षा लेल, पक्षी सभक जकां, एही कृपालु वृक्ष (चारुदत्त) कऽ डालि ऊपर आश्रय खोजैत छलाह। आबब, चारुदत्त महराज, आबब! चारुदत्त: मनुष्यक नियति आ भाग्यक मार्ग कतेक अनिश्चित आ अगाध अछि जे आब हमरा एहन कूर संकट कऽ घड़ी भीतर आबब पड़ल अछि! चन्दनक लेप कऽ साथ हमर पूरा शरीर ऊपर हाथक लाल कूर निशान बना देल गेल छैक; अन्न आ चूर्ण कऽ छिटबाक साथ ई मनुष्य, आब साक्षात बलि कऽ पशु जकां बना देल गेल छैक। (ओ अपन सम्मुख परम सजगतासँ देखैत छथि) हाय, मनुष्य-मनुष्य कऽ बीचक कतेक पैघ ई भेद अछि आखिर! (उदासीसँ) किएक तँ जखन ओ सभ हमर एही मन्द भाग्यक दृश्य देखैत छथि, तँ मृत्युक एही असहाय बलि लेल लोक सभक आँखिसँ अश्रु बहि जाइत छैक, ओ सभ "कलङ्क! कलङ्क!" कहि कऽ पुकारि रहल छथि, मुदा रक्षा नै कऽ सकैत—मात्र एतेकहि प्रार्थना कऽ सकैत छथि जे हमरा परलोक भीतर पवित्र गति भेटय। जल्लाद सभ: मार्गसँ हटू, आदरणीय भद्र लोक सभ, मार्गसँ हटू! अहाँ सभ एककरा कात किएक देखि रहल छी आखिर? आकाश भीतर विदा होइत स्वयं देवराज इन्द्र, कखनो कोनो नव बच्चा कऽ जन्म दैत गौ, आकाशसँ टूटि कऽ खसत नक्षत्र (तारा), आ कोनो भला मनुष्य जखन मृत्युक मार्ग पर विदा होइत हो—एही चारू कऽ कखनहि दूरसँ मात्र नै देखबाक चाही। गोह (पहिल जल्लाद): देखू, अहीन्त! देखू, मनुष्य! जखन ई मनुष्य, उज्जयिनी नगरीक सभसँ श्रेष्ठ पुरुष, भाग्यक कूर आदेशसँ मृत्युक मार्ग पर विदा भऽ रहल छथि, तँ की ई आकाश सेहो एकरा लेल अश्रु बहाइ रहल छैक आखिर? की बिना कोनो मेघक आकाश भीतर बिजुली अपन चंचल रूप देखाइ रहल छैक? अहीन्त (दोसर जल्लाद): गोह, हमर भाय, आकाश एकरा लेल कोनो अश्रु नै बहाइ रहल छैक, नहि बिना कोनो मेघक बिजुली अपन रूप देखाइ रहल छैक; मुदा तइयो पानि कऽ पैघ धार चारू कात खसि रहल छैक, कतेको आदरणीय स्त्री सभक कानय वाली आँखि भीतरसँ। आ पुनः एक बेर: जखन ई असहाय मनुष्य मृत्युक मार्ग पर कूरतासँ लय जाया जा रहल अछि, तँ कोनो एहन मनुष्य वा स्त्री नै अछि जे एतय घोर विलाप नै कऽ रहल हो; आ वैह कारण अछि जे मार्गक समस्त धूर, एही हजारों अश्रु कऽ बून्द सभक तृप्ति पा कऽ, आब राजपथ ऊपर शान्त भऽ कऽ सुतल छैक। चारुदत्त: (परम सजगतासँ देखैत छथि। उदासीसँ) ई आदरणीय स्त्री सभ, जे अपन पैघ महल सभक भीतरी कक्ष भीतर तोपल छली, आब आधा खुल्ला झरोखा सभसँ बाहर देखि कऽ एही प्रकार विलाप कऽ रहल छथि, "हाय चारुदत्त महराज! कतेक कूर दिन अयल छैक!" आ दया कऽ धारसँ भीजल हुनकर आँखि हमरहि ऊपर टिकल छैक। जल्लाद सभ: आबब, चारुदत्त महराज, आबब! ई साक्ष्य करबाक मुख्य स्थान अछि। नगाड़ा बजाउ आ महराज कऽ कूर आदेशकें सभ कात सुनाउ। सुनू, उत्तम लोक सभ, सुनू! ई सागरदत्तक पुत्र, आ व्यापारी विनयदत्तक पौत्र, आदरणीय कुलक चारुदत्त छथि। एही पापी मनुष्य आर्या वसन्तसेनाकें फुसला कऽ पुराना पुष्पककरण्डक सुनसान बगीचा भीतर लय गेल छल, आ मात्र एकटा तुच्छ वस्तु लेल—ओकर धन लेल!—ओकर गला दबा कऽ ओकर हत्या कऽ देलक। एककरा चोराएल गेल सम्पत्ति कऽ साथ रङ्गे हाथ पकड़ल गेल छल, आ एककरा अपन मुखसँ अपराध स्वीकार कऽ लेलने अछि। अतः हमरा सभकें राजा पालकक तरफसँ एककरा मृत्युदण्ड देबाक कड़ा आदेश अछि। आ जे केओ आन एही लोक आ परलोक भीतर घोर कलङ्क खड़ा करय वाला अपराध करत, ओकरो राजा पालक एहनहि भयानक दण्ड कऽ भागी बनौताह। चारुदत्त: (निराशासँ भरल, अपन मनमे) सैकड़ों पवित्र यज्ञ सभक अनुष्ठानसँ निर्मल भऽ भऽ कऽ, हमर तेजस्वी नाम कखनो कतेको यज्ञ-वेदी सभक कात भीतर परम आदर कऽ साथ सभ कात घोषित कयल जाइत छल, आ कोन कलङ्क नै जनैत छल। आब हमर मृत्युक कूर क्षण आबि गेल छैक, आ ई नीच मनुष्य सभ, जकर अपन कीर्ति पूर्णतः मलिन छैक, सार्वजनिक स्थान सभ पर हमरहि नाम कऽ पुनः सभ कात सुनाइ रहल छथि, मुदा घोर कलङ्क आ अपमान कऽ बन्धन भीतर बान्हि कऽ। (ओ ऊपर देखैत छथि आ अपन दोनों कान बन्द कऽ लैत छथि) वसन्तसेना! ओह हमर प्रियतम! अहाँक ओही सुकुमार ओठ भीतरसँ, जे मूंगा कऽ करिया लाल रङ्ग कऽ जकां तेजस्वी छल, जकर भीतर चन्द्रमाक कान्तिसँ भी श्रेष्ठ सुन्दर दाँत प्रकट होइत छल, हमर आत्मा कखनो अमृतक मधुर आस्वादन पाबने छल। आब हम कोन उपाय कऽ बिना, एही भयानक जहर कऽ स्वाद कसरि चखब आखिर, अपमान कऽ एही जहरसँ भरल पात्रकें पीबाक पराक्रम हम कसरि करब आखिर? जल्लाद सभ: मार्गसँ हटू, आदरणीय भद्र लोक सभ, मार्गसँ हटू! पवित्र गुणक अमूल्य मोती सभसँ भरल ई पेटारी, उत्तम मनुष्य सभक लेल संकट कऽ नदी पार करबाक एकमात्र सेतु, आब अपन समस्त सुवर्णक वैभव खो कऽ, साक्षात अमूल्य रत्न, आब हमर नगरसँ सदा लेल विदा भऽ रहल छथि, सदा लेल विदा भऽ रहल छथि। आ पुनः एक बेर: जकरा ऊपर भाग्य कृपालु होइत छैक, ओ देखैत अछि जे पूरा संसार ओकरा लेल मधुर आ कृपालु अछि; मुदा जकर प्रसन्नताक पवित्र दिन समाप्त भऽ गेल छैक, ओकरा कसरि कोनो एहन मित्र भेटि सकैत छैक आखिर? चारुदत्त: (अपन चारू कात देखैत छथि) अपन मुख आब वस्त्रक किनारसँ तोपि कऽ, ओ सभ कतहु दूर ठाढ़ छथि जकरा हम कखनो अपन अभिन्न मित्र बुझैत छलहुँ; शत्रु सेहो ओही मनुष्य कात देखि कऽ हँसैत अछि जकर पाँ भाग्यक लक्ष्मी होइत छैक; मुदा जखन सुखक वैभव समाप्त भऽ जाइत छैक, तँ मित्र सभ सेहो विमुख भऽ कऽ छल करब आरम्भ कऽ दैत छथि। जल्लाद सभ: ओ सभ मार्गसँ हटि गेल छथि। राजपथ पूर्णतः सफा अछि। दण्ड पाबय वाला एही अपराधीकें आगाँ बढ़ाउ। चारुदत्त: (गम्भीर निश्वास छोड़ि कऽ) हमर साथी मैत्रेय! ओह, ई कतेक कूर प्रहार भेल अछि! हमर प्रिय पत्नी, जे एकटा निष्कलङ्क कुलक परम गौरव छी! हमर रोहसेन बच्चा! हम एतय भूमि पर खसि पड़ल छी, मन्द भाग्यक कूर बन्धन भीतर; आ अहाँ, अहाँकें कोनो जान धरि नै छैक जे अहाँक खेलबाक समस्त सुकुमार उत्सव आब पूर्णतः व्यर्थ भऽ गेल अछि। अहाँ खेलि रहल छी, ककरो दोसरक एही घोर संतापसँ पूर्णतः अनजान भऽ कऽ! (९. २९) नेपथ्यसँ कतेको आवाज: हमर बाबूजी! ओह हमर परम प्रिय मित्र! चारुदत्त: (सुनैत छथि। उदासीसँ) अहाँ अपनहि जाति भीतर एकटा श्रेष्ठ प्रधान छी। हम अहाँक हाथसँ एकटा लघु उपकार पाबबाक आकाङ्क्षा राखैत छी। जल्लाद सभ: अहाँ हमरा सभक हाथसँ कोनो उपकार पाबबाक आकाङ्क्षा राखैत छी आखिर? चारुदत्त: ईश्वर कखनो एहन नै करथि! तइयो एकटा जल्लाद कखनहु ओतेक चंचल आ कूर नै भऽ सकैत जतेक स्वयं राजा पालक अछि। हमरा परलोक भीतर पवित्र गति भेटय, एही लेल हम मात्र अपन पुत्रक सुकुमार मुख एक बेर देखबाक भीख मङ्गैत छी। जल्लाद सभ: एहनहि होबय तखन। नेपथ्यसँ एकटा आवाज: हमर बाबूजी! ओह हमर बाबूजी! (चारुदत्त एही शब्द सुनैत छथि, आ उदासीसँ अपन प्रार्थना पुनः दोहराबैत छथि) जल्लाद सभ: नगरक लोक सभ, एक क्षण लेल मार्ग छोड़ू। आदरणीय चारुदत्त महराजकें अपन पुत्रक मुख देखि लेबाक अवकाश दिय’। (रङ्गमञ्चक पाछाँ घूमि कऽ) एही मार्गसँ आबब, महराज! आबब, हमर छोट बच्चा! (हाथमे रोहसेनकें लेने मैत्रेयक प्रवेश होइत अछि) मैत्रेय: तीव्र गतिसँ चलू, हमर बच्चा, तीव्र गतिसँ! अहाँक बाबूजीकें मृत्युक मार्ग पर विदा कयल जाइ रहल छनि। रोहसेन: हमर बाबूजी! ओह हमर बाबूजी! मैत्रेय: ओह हमर प्रिय मित्र! आब हम अहाँकें कोन कूर स्थिति भीतर देखबाक लेल एतय आबि गेल छी आखिर? चारुदत्त: (अपन पुत्र आ मित्रक देखैत छथि) हाय, हमर बच्चा! हाय, मैत्रेय! (उदासीसँ) हाय, मन्द भाग्य! बहुत काल धरि, बहुत पैघ समय धरि आब हम तृप्ति लेल व्याकुल रहब अपन एही भयानक परलोक यात्रा भीतर; ई हमर पुत्रक छोटकी हाथक पात्र (रोहसेन) हमर परलोकक जलाञ्जलि कऽ पानि सेहो पूर्णतः समा नै सकतैक। हम अपन पुत्रकें उपहार स्वरूप की दऽ सकी आखिर? (ओ अपना कात देखैत छथि, आ देखैत छथि जे मात्र जज्ञोपवीतहि बचल छैक) आहा, कम्तीसँ कम्ती ई तँ हमर अपन अछि। ब्राह्मण सभ जे पवित्र जज्ञोपवीत धारण करैत छथि, ओकरा भीतर कोनो मोती वा सुवर्णक वैभव नै होइत छैक; मुदा तइयो, एकरा धारण कऽ कऽ ओ सभ ऊपर कऽ देवराज सभक लेल आ अपन पूज्य पूर्वज सभक लेल पवित्र यज्ञ सम्पन्न करैत छथि। (ओ रोहसेनकें जज्ञोपवीत दऽ दैत छथि) गोह: आबब, चारुदत्त महराज! आबब, मनुष्य! अहीन्त: मनुष्य, अहाँ आदरणीय कुलक चारुदत्त महराजक नाम कऽ एही प्रकार विवश भऽ कऽ किएक लय रहल छी, आ हुनकर सम्मानक पद बिसरि गेलहूँ? स्मरण राखू: प्रसन्नताक पावन क्षण भीतर, मृत्युक कूर घड़ी भीतर, आधी रातिमे, वा दिनक प्रकाश भीतर, कोनो बिना बन्धन वला चंचल बाछक जकां, भाग्य सदा अपन स्वतंत्र आ बेसी तीव्र मार्ग पर चारू कात भ्रमण करैत छैक। आ पुनः एक बेर: प्राण कखनो एकहि क्षण भीतर एकर शरीर छोड़ि कऽ विदा भऽ जएतैक; तँ की हमर एही कटु शब्द एकर मुड़ नीचां झुका दैक आखिर? चाहे राहु कऽ मुख भीतर चन्द्रमा समा जाय, तइयो जखन ओ बुझबाक कगार पर होइत छैक, हम ओकर रूपकें आदरसँ देखैत छी। रोहसेन: ओह जल्लाद काका सभ, अहाँ हमर बाबूजीकें कतऽ लय जाइ रहल छी आखिर? चारुदत्त: हमर प्रिय बच्चा, हमर कण्ठ चारू कात हमरा विवश भऽ कऽ एही करवीरक कूर माला पहिरबाक पड़ल अछि; हमर काँखि ऊपर हमरा मृत्युक शूल उठा कऽ चलबाक पड़ल अछि, आ हमर हृदय भीतर आब परम संकट जमि गेल छैक एही मृत्युक घड़ीक। हम आइ एकटा घोर पापी कऽ जकां अन्त पाबबाक मार्ग पर छी, एकटा असहाय बलि कऽ पशु जकां, एही कूर वेदी कऽ सम्मुख अपन मुड़ झुकाने छी। गोह: हमर बच्चा, हम सभ जल्लाद कखनहि नै छी, यद्यपि हमर जन्म एकटा जल्लाद कऽ कुल भीतर भेल अछि; अहाँक बाबूजीक प्राण जे चोराय रहल छथि, वैह साक्षात कूर जल्लाद छथि। रोहसेन: तखन अहाँ हमर बाबूजीक हत्या किएक कऽ रहल छी आखिर? गोह: ईश्वर अहाँक कल्याण करथि बच्चा, राजा कऽ कड़ा आदेशहि एही पाप कऽ भागी अछि, हम सभ कखनहि नै। रोहसेन: हमर प्राण लय लिय’, आ हमर बाबूजीकें सुरक्षित मुक्त कऽ दिय’। गोह: अहाँ दीर्घायु होऊ बच्चा, एही प्रकारक पावन गप कहबाक लेल! चारुदत्त: (अश्रु बहाबैत अपन पुत्रकें आलिङ्गनमे लैत छथि) स्नेह कऽ ई अमूल्य पेटारी—साक्षात स्वर्गक मधुर आस्वादन—धनी आ दरिद्र दोनों कऽ एकहि नाप भीतर भेटैत छैक; चन्दन कऽ लेपसँ भी श्रेष्ठ, आ कोनो मधुर उबटनसँ भी उत्तम, ई हृदयकें परम शीतलता आ शान्ति दैत छैक। हमर कण्ठ चारू कात हमरा विवश भऽ कऽ एही करवीरक कूर माला पहिरबाक पड़ल अछि; हमर काँखि ऊपर हमरा मृत्युक शूल उठा कऽ चलबाक पड़ल अछि, आ हमर हृदय भीतर आब परम संकट जमि गेल छैक एही मृत्युक घड़ीक। हम आइ एकटा घोर पापी कऽ जकां अन्त पाबबाक मार्ग पर छी, एकटा असहाय बलि कऽ पशु जकां, एही कूर वेदी कऽ सम्मुख अपन मुड़ झुकाने छी। (२१) (ओ चारू कात देखैत छथि। अपन मनमे) अपन मुख आब वस्त्रक किनारसँ तोपि कऽ, ओ सभ कतहु दूर ठाढ़ छथि जकरा हम कखनो अपन अभिन्न मित्र बुझैत छलहुँ; शत्रु सेहो ओही मनुष्य कात देखि कऽ हँसैत अछि मैत्रेय: हमर नीक जल्लाद भाई सभ, हमर प्रिय मित्र चारुदत्तकें सुरक्षित मुक्त कऽ दिय’, आ एककरा स्थान पर हमर प्राण लय लिय’। चारुदत्त: ईश्वर कखनो एहन नै करथि! (ओ चारू कात देखैत छथि। अपन मनमे) आब हम पूर्णतः जानि लेलहुँ अछि। जकर पाँ भाग्यक लक्ष्मी होइत छैक; मुदा जखन सुखक वैभव समाप्त भऽ जाइत छैक, तँ मित्र सभ सेहो विमुख भऽ कऽ छल करब आरम्भ कऽ दैत छथि। (प्रकट) ई आदरणीय स्त्री सभ, जे अपन पैघ महल सभक भीतरी कक्ष भीतर तोपल छली, आब आधा खुल्ला झरोखा सभसँ बाहर देखि कऽ एही प्रकार विलाप कऽ रहल छथि, "हाय चारुदत्त महराज! कतेक कूर दिन अयल छैक!" आ दया कऽ धारसँ भीजल हुनकर आँखि हमरहि ऊपर टिकल छैक। गोह: मार्गसँ हटू, आदरणीय भद्र लोक सभ, मार्गसँ हटू! अहाँ एही भला मनुष्य कात किएक देखि रहल छी आखिर, जखन घोर कलङ्क ओकर भीतरी आशा कऽ सदा लेल माठि भीतर मिला देलक छैक आखिर? रस्सा कखनो चक्र कऽ कात भीतर टूटि जाइत छैक, आ सुवर्णक ओही घड़ा सीधा भीतरी गड्ढा भीतर खसि पड़ैत छैक। चारुदत्त: (उदासीसँ) अहाँक ओही सुकुमार ओठ भीतरसँ, जे मूंगा कऽ करिया लाल रङ्ग कऽ जकां तेजस्वी छल, जकर भीतर चन्द्रमाक कान्तिसँ भी श्रेष्ठ सुन्दर दाँत प्रकट होइत छल, हमर आत्मा कखनो अमृतक मधुर आस्वादन पाबने छल। आब हम कोन उपाय कऽ बिना, एही भयानक जहर कऽ स्वाद कसरि चखब आखिर, अपमान कऽ एही जहरसँ भरल पात्रकें पीबाक पराक्रम हम कसरि करब आखिर? (१३) अहीन्त: साक्ष्य कऽ सभ कात एक बेर पुनः सुनाउ, मनुष्य। (गोह ओनाहि करैत अछि) चारुदत्त: एतेक नीचां खसि पड़ल छी हम! जब धरि घोर कलङ्क हमर पवित्र गुण कऽ कलङ्कित नै कऽ दैक, जब धरि एहन कूर अन्त कोनो पैघ लाभ जकां नै बुझाय! तइयो हमर हृदय भीतर एकटा बहुत कष्टमयी पीड़ा रेंगि रहल छैक, जखन हम चारू कात सिपाही सभक ई नाद सुनैत छी जे "अहाँ ओकर हत्या कयलहूँ!" (महल कऽ भीतरी बुर्ज (टावर) भीतर भारी जंजीरसँ बान्धल स्थावरकक प्रवेश होइत अछि) स्थावरक: (साक्ष्यक गप सुनि कऽ। घोर संकट भीतर) की! निर्दोष चारुदत्त महराजकें मृत्युदण्ड देल जाइ रहल छनि आखिर? आ हमर दुष्ट मालिक हमरा भारी जंजीर भीतर बन्द कऽ देने अछि! नीक, हमरा ओकरा सभकें पुकारबाकहि चाही।—सुनू, उत्तम भद्र लोक सभ, सुनू! हम छलहुँ, हमर सन पापी मनुष्य छल जे आर्या वसन्तसेनाकें पुराना पुष्पककरण्डक बगीचा भीतर गाड़ी भीतर लय गेल छल, किएक तँ ओकरासँ गाड़ी पहिचानबामे भूल भऽ गेल छल। आ ओकरा बाद हमर मालिक संस्थानक देखलक जे ओ ओकरासँ स्नेह नै करत, आ ओ स्वयं छल, एही भद्र पुरुष चारुदत्त महराज कखनहि नै छलाह, जे ओकर गला दबा कऽ हत्या कऽ देने छल।—मुदा ओ सभ एतेक दूर मार्ग पर छथि जे ककरो कान भीतर हमर आवाज नै पहुँचि रहल छैक। आब हम की करब आखिर? की हम अपना कऽ ऊपरसँ नीचां फिङ्कि दिय’आखिर? (सोचैत) जदि हम ओनाहि कयलहुँ, तँ चारुदत्त महराजक प्राण बचि जएतनि। हँ, एही टूटल झरोखाक मार्गसँ हम अपना कऽ महल कऽ बुर्ज ऊपरसँ नीचां फिङ्कि देब। एकरासँ बेसी नीक ई अछि जे हमर अपन अन्त भऽ जाय, मुदा चारुदत्त महराज कखनहि नष्ट नै होथि, जे उत्तम युवक सभ लेल साक्षात कल्पवृक्ष छथि। आ जदि हम एहन पवित्र कार्य लेल मरि सेहो जाब, तँ हमरा परलोक भीतर उत्तम गति भेटत। (ओ अपना कऽ ऊपरसँ नीचां फिङ्कैत अछि) परम आश्चर्य! हमर प्राण नष्ट नै भेल, आ हमर भारी जंजीर सेहो टूटि कऽ अलग भऽ गेल। अतः आब हम जल्लाद सभक नगाड़ाक नादक पीछा करब। (ओ जल्लाद सभक खोजि लैत अछि आ हड़बड़ीमे आगाँ बढ़ैत अछि) जल्लाद भाई सभ, जल्लाद भाई सभ, मार्ग छोड़ू! जल्लाद सभ: हम सभ ककर लेल मार्ग छोड़ी आखिर? स्थावरक: सुनू, उत्तम भद्र लोक सभ, सुनू! हम छलहुँ, हमर सन पापी मनुष्य छल जे आर्या वसन्तसेनाकें पुराना पुष्पककरण्डक बगीचा भीतर गाड़ी भीतर लय गेल छल, किएक तँ ओकरासँ गाड़ी पहिचानबामे भूल भऽ गेल छल। आ ओकरा बाद हमर मालिक संस्थानक देखलक जे ओ ओकरासँ स्नेह नै करत, आ ओ स्वयं छल, एही भद्र पुरुष चारुदत्त महराज कखनहि नै छलाह, जे ओकर गला दबा कऽ हत्या कऽ देने छल। चारुदत्त: आकाश कऽ धन्यवाद हो! मुदा के छथि ई जे हमर मृत्युक एही अन्तिम भोर भीतर हमरा प्रसन्नता दऽ रहल छथि, जखन हम कालक एही जाल भीतर विवश भऽ कऽ सङ्घर्ष कऽ रहल छी, साक्षात कोनो सूखा अनाजक खेत ऊपर उमड़ैत मेघ कऽ जकां? सुनू! अहाँ सुनि रहल छी जे हम की कहि रहल छी आखिर? मृत्युक भय हमरा कखनहि नै छल, मुदा घोर कलङ्क आ अपमान कऽ भय सदा छल; हमर मृत्यु आब प्रसन्नता कऽ साथ स्वीकार अछि, जदि एकरा भीतर कोनो कलङ्क नै होबय, जेना कोनो नव जन्म लेल पुत्र कुलक नाम आगाँ बढ़ाबैत अछि। आ पुनः एक बेर: ओही लघु आ चंचल मूर्ख (संस्थानक), जकरासँ हम कहियो घृणा धरि नै कयलहुँ, हमर ऊपर ओही पाप कऽ कलङ्क लगा देलक जकर भीतर ओ स्वयं डूबल अछि, साक्षात कोनो एहन बाण कऽ जकां जकर मुख भीतर भयानक जहर बुझल हो। जल्लाद सभ: की अहाँ सत्य बाजू, स्थावरक आखिर? स्थावरक: हँ, हम सत्य बाजि रहल छी। आ हमरा ककरोसँ गप करबा सँ रोकबाक लेल, ओ हमरा भारी जंजीर भीतर बन्द कऽ देने छल, आ महल कऽ बुर्ज भीतर कैद कऽ देने छल। (संस्थानकक प्रवेश होइत अछि) संस्थानक: (परम प्रसन्नतासँ आनन्दित भऽ कऽ) हम एकटा बहुत सुन्दर व्यञ्जन खयलहुँ अछि, मांस आ कूर घास कऽ सूप, आ मछली सेहो; हम अपन घर भीतर सुकुमार चावलक कतरन खयलहुँ अछि, आ चीनी कऽ रस वला भात सेहो। (ओ सुनैत अछि) जल्लाद सभक आवाज! ई कोनो टूटल काँसा कऽ पात्र जकां नाद कऽ रहल छैक। हम मृत्युक नगाड़ा आ ढोलक नाद सुनि रहल छी, आ एही प्रकार हम बुझैत छी जे ओ दरिद्र मनुष्य, चारुदत्त, आब मृत्युक मुख्य स्थान कात लय जाया जा रहल छनि। हमरा जा कऽ एककरा अवश्य देखबाक चाही। अपन शत्रु कऽ नष्ट होइत देखबामे परम आनन्द भेटैत छैक। एकर अतिरिक्त, हम सुनने छी जे जे मनुष्य अपन शत्रुकें मारल जाइत देखैत अछि, ओकरा अगिला जन्म भीतर कखनहि आँखि कऽ कोनो बीमारी नै होइत छैक। हम ओही कीड़ा कऽ जकां काज कयलहुँ जे कमल कऽ जड़ि भीतर लुकाएल छल। हम बाहर निकसबाक लेल सुराख खोजलहुँ, आ एही दरिद्र चारुदत्तक मृत्युक आरम्भ कऽ देलहुँ। आब हम अपनहि महल कऽ पैघ बुर्ज ऊपर चढ़ब, आ अपन एही पराक्रमक दृश्य ऊपर देखब। (ओ ओनाहि करैत अछि आ चारू कात देखैत अछि) परम आश्चर्य जे कतेक पैघ भीड़ जमल छैक, एही दरिद्र मनुष्यक मृत्युक मार्ग पर देखबाक लेल! मुदा तखन की होइत जखन कोनो पैघ कुलीन पुरुष, हमर सन पैघ मनुष्य मृत्युक मार्ग पर विदा होइत आखिर? (ओ देखैत अछि) देखू! ओ दक्षिण कात जाइ रहल छथि, कोनो युवा बाछ कऽ जकां सुसज्जित भऽ कऽ। मुदा साक्ष्य कऽ गप हमर महल कऽ बुर्ज कऽ सम्मुख किएक कयल गेल छल आखिर, आ एककरा किएक रोकल गेल छल? (ओ चारू कात देखैत अछि) की! हमर नौकर स्थावरक सेहो गायब छैक आखिर। हम आशा करैत छी जे ओ एतयसँ भागि कऽ रहस्य कऽ सभ कात नै सुना देने हो। हमरा जा कऽ ओकरा खोजबाक चाही। (ओ नीचां उतरैत अछि आ भीड़ कऽ लग आबैत अछि) स्थावरक: (संस्थानकक देखि कऽ) ओ आबि गेल, हमर नीक मालिक भाई सभ! जल्लाद सभ: मार्गसँ हटू! स्थान दिय’! आ कबाड़ बन्द करू! शान्त रहू, आ आ कोन गप नै बाजू! एतय एकटा पागल साढ़ भीड़ कऽ बीचोबीच आबि रहल छैक, जकर सींग भीतर घोर पाप-कर्म कऽ तीक्ष्ण धार छैक। संस्थानक: आउ, आउ, मार्ग छोड़ू! (ओ लग आबैत अछि) स्थावरक, हमर बच्चा, हमर नौकर, आबब, हम सभ घर चली। स्थावरक: अहाँ पापी! की अहाँकें आदरणीय आर्या वसन्तसेनाक हत्या कऽ सेहो सन्तोष नै भेल आखिर? की आब अहाँ आदरणीय चारुदत्त महराजक, जे उत्तम मनुष्य सभ लेल साक्षात कल्पवृक्ष छथि, हत्या करबाक पराक्रम कऽ रहल छी आखिर? संस्थानक: हम एकटा सुवर्ण कऽ अमूल्य रत्न-पात्र जकां सुन्दर छी। हम कोनो स्त्री कऽ हत्या नै करैत छी! भीड़ कऽ लोक सभ: ओहो! अहाँ ओकर हत्या कयलहूँ, चारुदत्त महराज कखनहि नै कयलन्हि। संस्थानक: ई के कहि रहल छैक आखिर? भीड़ कऽ लोक सभ: (स्थावरक कात सङ्केत करैत) ई ईमानदार मनुष्य। संस्थानक: (त्राससँ, अपन मनमे) ईश्वर हमर रक्षा करथि! हम ओही नौकर स्थावरककें भारी जंजीर भीतर कस कऽ बन्द किएक नै राखलहुँ आखिर? ओ हमर एही पाप-कर्म कऽ साक्षात साक्षी छल। (सोचैत) हम एककरा एही प्रकार तोपब। (प्रकट) झूठ अछि, सभ झूठ अछि, उत्तम भद्र लोक सभ। हम एही नौकर कऽ सुवर्ण चोराबैत रङ्गे हाथ पकड़ने छलहुँ, आ हम एककरा मारलहुँ, एकर मुड़ तोडलहुँ, आ एककरा भारी जंजीर भीतर बन्द कऽ देलहुँ। ई हमरासँ घोर घृणा करैत छैक। ई जे कहि रहल छैक, ओ सत्य कखनहि नै भऽ सकैत। (ओ चुपचाप स्थावरकक हाथ भीतर एकटा कङ्कण दऽ दैत अछि, आ फुसफुसाबैत अछि) स्थावरक, हमर बच्चा, हमर नौकर, एककरा लय लिय’ आ अपन बोली बदलि कऽ बाजू। स्थावरक: (कङ्कण लैत अछि) देखू अधिकारी सभ, देखू! ओ एही क्षण सेहो सुवर्ण कऽ लोभ देखा कऽ हमर ओठ सीबाक यत्न कऽ रहल अछि। संस्थानक: (कङ्कण ओकरा हाथसँ झपटि लैत अछि) ई वैह सुवर्ण अछि जाहि लेल हम एककरा भारी जंजीर भीतर बन्द कयलहुँ छल। (घोर क्रोधसँ) देखू एतय, जल्लाद भाई सभ! हम एककरा अपन सुवर्णक पेटारीक रक्षा लेल नियुक्त कयलने छलहुँ, आ जखन ई स्वयं चोर बनि गेल, हम एककरा मारलहुँ आ एकर मुड़ तोडलहुँ। जदि अहाँक हमर गप ऊपर विश्वास नै अछि, तँ एकर पीठ कात देखू। जल्लाद सभ: (पीठ देखैत छथि) हँ, हाँ। जखन ककरो नौकर कऽ शरीर ऊपर एहन कलङ्क बान्हल गेल हो, तँ ओ कोनो अद्भुत कथा कहि सेहो सकैत छैक। स्थावरक: दासता ऊपर श्राप हो! एकटा दासक गप ऊपर केओ विश्वास नै करैत। (उदासीसँ) आदरणीय चारुदत्त महराज, हमर पाँ आब कोनो आन शक्ति नै बचल अछि। (ओ चारुदत्तक चरणमे खसि पड़ैत अछि) चारुदत्त: (उदासीसँ) उठू, उठू! पवित्र आत्मा, जे संकट कऽ घड़ी भीतर उत्तम मनुष्य सभक सहायता लेल अयलहूँ! एकटा वीर मित्र, जे बिना कोनो स्वार्थ कऽ एतेक पैघ पराक्रम देखौलहूँ! हमर प्राण बचेबाक अहाँक सभसँ पैघ उद्यम व्यर्थ भऽ गेल, किएक तँ भाग्य कऽ मंजूर नै छल। अहाँक कर्तव्य आब पूर्ण भऽ गेल अछि। जल्लाद सभ: अपन नौकर कऽ मारि कऽ एतयसँ विदा करू, मालिक। संस्थानक: हमर मार्गसँ पाछाँ हटू अहाँ! (ओ स्थावरककें दूर घसीटि दैत अछि) आबब जल्लाद भाई सभ, अहाँ सभ की देखि रहल छी आखिर? एकर वध करू। रोहसेन: ओह जल्लाद काका सभ, हमर प्राण लय लिय’ आ हमर बाबूजीकें सुरक्षित मुक्त कऽ दिय’। संस्थानक: हँ, हँ, पुत्र आ बाप, दोनों कऽ एक साथ मारि दिय’। चारुदत्त: ई मूर्ख कखनो कोनो अनर्थ कऽ सकैत अछि। जाउ, हमर बच्चा, अपन माय पाँ विदा होऊ। रोहसेन: आ हम ओतय जा कऽ की करब आखिर बाबूजी? चारुदत्त: अपन आदरणीय माय कऽ साथ कोनो पवित्र आश्रम भीतर विदा भऽ जाउ; एक क्षणक लेल सेहो बिलम्ब नै करब, प्रिय बच्चा; कखनो एहन नै हो जे अहाँक बाबूजीक अपराध कऽ फल अहाँकें सहब पड़य, आ अहाँक सेहो एही कूर मार्ग पर चलबाक लेल विवश होना पड़य। आ अहाँ, हमर मित्र, एकर साथहि विदा होऊ। मैत्रेय: ओह हमर प्रिय मित्र, अहाँ हमर स्वभाव कऽ एही प्रकार किएक बुझलहुँ जे हम अहाँक बिना एही संसार भीतर जिबैत रहि सकी आखिर? चारुदत्त: एहनहि नै बाजू, हमर मित्र। अहाँक जीवन अहाँक अपन अछि। अहाँ एककरा एही प्रकार व्यर्थ नै नष्ट कऽ सकैत छी। मैत्रेय: (अपन मनमे) सत्य अछि। मुदा तइयो हम अपन मित्रसँ अलग भऽ कऽ कखनहि नै जियि सकी। आ अतः, जखन हम एही बच्चा कऽ एकर आदरणीय माय पाँ सुपुर्द कऽ देब, हम मृत्युक मार्ग भीतर सेहो अपन मित्रक पीछा करब। (प्रकट) हँ, हमर मित्र, हम एककरा अखने आदरणीय आर्या पाँ लय जाइ रहल छी। (ओ चारुदत्तकें आलिङ्गन करैत अछि, पुनः हुनकर चरणमे खसि पड़ैत अछि। रोहसेन सेहो अश्रु बहाबैत वैह करैत अछि) संस्थानक: देखू एतय! की हम अहाँ सभकें चारुदत्त आ एकर पुत्र दोनों कऽ मारबाक कड़ा आदेश नै देलहुँ छल आखिर? (एही गप पर चारुदत्तक मन भीतर भय प्रकट होइत छनि) जल्लाद सभ: हमरा सभकें राजा कऽ तरफसँ चारुदत्त आ एकर पुत्र दोनों कऽ मारबाक कोनो आदेश नै भेटल छैक। भागू एतयसँ बच्चा, भागू! (ओ सभ रोहसेनकें पाछाँ घसीटि दैत छथि) ई साक्ष्य करबाक तेसर स्थान अछि। नगाड़ा बजाउ! (ओ सभ पुनः घोषणा करैत छथि) संस्थानक: (अपन मनमे) मुदा नगरक लोक सभ एककरा सत्य नै मानि रहल छैक। (प्रकट) चारुदत्त, अहाँ चंचल मनुष्य, नगरक लोक सभ एककरा सत्य नै मानि रहल छैक। आब अपनहि जीभसँ बाजू, "हम वसन्तसेनाक हत्या कयलहुँ।" (चारुदत्त मौन रहैत छथि) देखू एतय, जल्लाद भाई सभ! ई मनुष्य किछ नै बाजि रहल छैक, ई चंचल चारुदत्त। एककरा बाजय लेल विवश करू। एककरा एही फटल बाँस कऽ लाठीसँ, या कोनो भारी जंजीरसँ दू-चारि बेर मारू। गोह: (प्रहार करबाक लेल अपन बांहि उठाबैत अछि) आबब, चारुदत्त महराज, बाजू! चारुदत्त: (उदासीसँ) आब हम दुःखक एही समुद्र भीतर एतेक गम्भीर डूबि गेल छी, हमरा आ कोन भय नै अछि, नहि कोनो संताप हमर भीतर बचल छैक; मुदा तइयो एकटा आन्तरिक ज्वाला हमर आत्माकें एही क्षण सेहो तड़पाइ रहल छैक, जखन हम सिपाही सभक ई नाद सुनैत छी जे हम ओकर हत्या कयलहुँ जकरा हम अपन प्राणसँ बेसी चाहैत छलहुँ। (संस्थानक हुनकर शब्द सभकें दोहराबैत अछि) चारुदत्त: हमर उज्जयिनी नगरीक उत्तम लोक सभ! एकटा पापी आ अधम मनुष्य छी हम, जे एही कलङ्क कऽ भार उठा रहल अछि, आ परलोक भीतर कोनो सुखक आशा आब हमर पाँ नै बचल छैक; ओही परम प्रिय सुकुमार कनियाँ, वासनाक एही कूर ज्वाला भीतर—मुदा अवशिष्ट गप आब ई पुरुष अपन मुखसँ कहत। (९. ३०) संस्थानक: मारि देलहुँ ओकरा! चारुदत्त: एहनहि होबय तखन। गोह: आब अहाँक पालि अछि एककरा मारबाक, मनुष्य। अहीन्त: नै, अहाँक। गोह: नीक, आउ हम सभ नाप कऽ कऽ देखी। (ओ बहुत पैघ काल धरि गणना करैत अछि) नीक, जदि एककरा मारबाक पालि हमर अछि, तँ हम सभ एक क्षण लेल प्रतीक्षा करब। अहीन्त: किएक आखिर? गोह: किएक तँ जखन हमर पूज्य बाबूजी परलोक भीतर विदा भऽ रहल छलाह, ओ हमरा कहलनि जे, "पुत्र गोह, जदि ककरो पापी कऽ मारबाक पालि अहाँक होबय, तँ ओकरा वध कखनो बहुत हड़बड़ी भीतर नै करब।" अहीन्त: मुदा किएक आखिर? गोह: "कखनो एहन भऽ सकैत छैक," ओ कहलनि जे, "जे कोनो भला मनुष्य प्रचुर सुवर्ण दऽ कऽ ओही बन्धनसँ ओकरा मुक्त करा लय। कखनो एहन भऽ सकैत छैक जे राजा कऽ घर भीतर कोनो नव बच्चाक जन्म होबय, आ ओही पावन उत्सव कऽ आदर देबाक लेल, कारागारक समस्त कैदी सभकें सुरक्षित मुक्त कऽ देल जाय। कखनो एहन भऽ सकैत छैक जे कोनो पैघ युद्धक हाथी अपन जंजीर तोड़ि कऽ बाहर निकसि जाय, आ ओही कोलाहलक बीच कैदी भागि कऽ अपन प्राण बचा लय। कखनो एहन भऽ सकैत छैक जे स्वयं राजा कऽ पद बदलि जाय (नव राजा आबि जाथि), आ कारागारक समस्त कैदी सभकें सदा लेल मुक्त कऽ देल जाय।" संस्थानक: की कहलहूँ? की कहलहूँ अहाँ? राजा कऽ पद बदलि जाय? गोह: नीक, आउ हम सभ पुनः गणना कऽ कऽ देखी, ककर पालि अछि आखिर। संस्थानक: ओह आउ! चारुदत्तक वध एही क्षण तुरंत कसरि। (ओ स्थावरककें लैत अछि, आ किछ कदम पाछाँ हटि जाइत अछि) जल्लाद सभ: आदरणीय चारुदत्त महराज, राजा कऽ कड़ा आदेशहि एही पाप कऽ भागी अछि, हम सभ जल्लाद कखनहि नै। तँ आब ओही वस्तु कऽ विषयमे गम्भीर विचार करू जकर विचार करब आब परम आवश्यक अछि। चारुदत्त: यद्यपि कोनो मन्द भाग्यक कूर प्रहारसँ, आ पैघ कुलक पापी मनुष्य सभक झूठसँ हमर ऊपर घोर कलङ्क लगा देल गेल छैक, तइयो जदि हमर पवित्र गुण कऽ कखनो कोनो आदर भेटत, तँ ओ सुकुमार कनियाँ जे आब आकाश भीतर देवराज सभक साथ निवास कऽ रहल छथि—हमर परम प्रियतम—अपनहि मधुर शालीन स्वभावसँ हमर एही कलङ्क कऽ सदा लेल सफा कऽ देतीह! हमरा बताउ। अहाँ सभ हमरा कोन कूर स्थान कात लय जबाक इच्छा राखैत छी आखिर? गोह: (अपन सम्मुख सङ्केत करैत अछि) किएक, ई दक्षिणी श्मशान भूमि अछि, आ जखन कोनो अपराधी एककरा देखैत अछि, ओ अपन जीवनकें एकहि क्षण भीतर अन्तिम विदा कहि दैत छैक। किएक तँ देखू! मृत शरीरक एक आधा भाग कूर सियार सभ द्वारा नोचल आ घसीटल जाइ रहल छैक, आ ओ सभ अपन कूर कार्य भीतर तृप्ति पाइ रहल छैक; आ दोसर आधा भाग अखन धरि ओही मृत्युक शूल ऊपर लटकल अछि, जे साक्षात एकटा भयानक अट्टहास कऽ जकां बुझि रहल छैक। चारुदत्त: हाय! आह हमर भाग्य मन्द भऽ गेल! (व्याकुलतासँ ओ भूमि पर बैठि जाइत छथि) संस्थानक: हम अखन कखनहि नै जाब। हम चारुदत्तक मृत्युक पराक्रम अपन आँखिसँ देखब। (ओ चारू कात टहलैत अछि, देखैत अछि) नीक, नीक! ओ भूमि पर बैठि गेल। गोह: की अहाँ भयभीत छी, चारुदत्त महराज? चारुदत्त: (हड़बड़ीमे उठि कऽ) अहाँ मूर्ख! मृत्युक भय हमरा कखनहि नै छल, मुदा घोर कलङ्क आ अपमान कऽ भय सदा छल; हमर मृत्यु आब प्रसन्नता कऽ साथ स्वीकार अछि, जदि एकरा भीतर कोनो कलङ्क नै होबय, जेना कोनो नव जन्म लेल पुत्र कुलक नाम आगाँ बढ़ाबैत अछि। गोह: आदरणीय चारुदत्त महराज, पवित्र चन्द्रमा आ सूर्य स्वयं आकाशक भीतरी महल भीतर निवास करैत छथि, तइयो कखनो कूर संकट आ ग्रहण ओकरा सभकें सेहो अपन बन्धन भीतर लय लैत छैक। तँ मनुष्य आ मृत्युक भय रखय वाला समस्त जीव सभक की बिसात आखिर! एही संसार भीतर, एकटा उठैत अछि मात्र नीचां खसबाक लेल, दोसर नीचां खसैत अछि मात्र दोबारा ऊपर उठबाक लेल। मुदा जे एक बेर ऊपर उठि कऽ नीचां खसैत अछि, ओकर शरीर वस्त्र कऽ जकां भूमि पर खसि पड़ैत छैक। एही पवित्र विचार कऽ अपन हृदय भीतर राखू, आ दृढ़ बनू। (अहीन्त कें) ई साक्ष्य करबाक चौथम स्थान अछि। आउ हम सभ पुनः घोषणा कऽ कऽ सुनाबी। (ओ सभ पुनः घोषणा करैत छथि) चारुदत्त: वसन्तसेना! ओह हमर प्रियतम! अहाँक ओही सुकुमार ओठ भीतरसँ, जे मूंगा कऽ करिया लाल रङ्ग कऽ जकां तेजस्वी छल, जकर भीतर चन्द्रमाक कान्तिसँ भी श्रेष्ठ सुन्दर दाँत प्रकट होइत छल, हमर आत्मा कखनो अमृतक मधुर आस्वादन पाबने छल। आब हम कोन उपाय कऽ बिना, एही भयानक जहर कऽ स्वाद कसरि चखब आखिर, अपमान कऽ एही जहरसँ भरल पात्रकें पीबाक पराक्रम हम कसरि करब आखिर? (१३) (अत्यधिक व्याकुलतासँ वसन्तसेना आ बौद्ध भिक्षुक प्रवेश होइत अछि) भिक्षु: परम आश्चर्य! हमर भिक्षु जीवन आजुक दिन वास्तवमे परम कल्याण कऽ काज कयलक जखन अकाल कऽ संकटसँ भीजल, थकावटसँ चूर आर्या वसन्तसेनाकें शीतलता देब आ हुनका मार्ग पर आगाँ बढ़ा कऽ लाबब परम आवश्यक छल। बुद्ध भीतर हमर बहिन, आब हम अहाँकें कोन स्थान कात लय चली आखिर? वसन्तसेना: आदरणीय महराज चारुदत्तक भीतरी महल कात। हुनकर साक्षात दर्शनसँ हमर प्राण भीतर पुनः शीतलता लाबब, जेना रातिमे खिलय वाला सुकुमार कुमुदनी चन्द्रमाक कान्ति देखि कऽ पुनः जीवित भऽ जाइत छैक। भिक्षु: (अपन मनमे) हम कोन मार्गसँ भीतर प्रवेश करी आखिर? (सोचैत) राजा कऽ मुख्य राजपथहि—हम ओही मार्गसँ भीतर जाब। आबब, बुद्ध भीतर हमर बहिन! ई राजा कऽ मुख्य राजपथ अछि। (सुनैत) मुदा ई कोन पैघ कोलाहलक नाद हम राजपथ ऊपर सुनि रहल छी आखिर? वसन्तसेना: (अपन सम्मुख देखैत छथि) की! एतय हमर सम्मुख लोक सभक एकटा बहुत पैघ भीड़ जमल छैक। कृपया पता लगाउ, महराज, एकर की अर्थ भऽ सकैत छैक। पूरा उज्जयिनी नगरी जेना एक कात उलटि गेल छैक, जेना पृथ्वी ऊपर कऽ भार पूर्णतः अनिश्चित भऽ गेल हो। गोह: आ ई घोषणा करबाक अन्तिम स्थान अछि। नगाड़ा बजाउ! आजुक साक्ष्य सभ कात सुनाउ! (ओ सभ घोषणा करैत छथि) आब, चारुदत्त महराज, रुकू! भयभीत नै होऊ। अहाँक प्राण बहुत कम समय भीतर लय लेल जाय। चारुदत्त: ओह पवित्र विधाता! भिक्षु: (सुनैत अछि। घोर त्राससँ) बुद्ध भीतर हमर बहिन, चारुदत्त महराजकें अहाँकहि हत्या कऽ आरोप भीतर मृत्युक मार्ग पर लय जाया जा रहल छनि। वसन्तसेना: (घोर त्राससँ) हाय, मन्द भाग्य! हमर एही अभागिन कऽ कारण आदरणीय चारुदत्त महराजकें मृत्युदण्ड देल जाइ रहल छनि आखिर? तीव्र गतिसँ, तीव्र गतिसँ! ओह हमर मार्ग ओही कात लय चलू! भिक्षु: उद्यम करू, ओह उद्यम करू, बुद्ध भीतर हमर बहिन, चारुदत्त महराजकें शीतलता देबाक लेल जब धरि ओ जिबैत छथि। मार्ग छोड़ू, उत्तम भद्र लोक सभ, मार्ग छोड़ू! वसन्तसेना: मार्ग छोड़ू, मार्ग छोड़ू! गोह: आदरणीय चारुदत्त महराज, राजा कऽ कड़ा आदेशहि एही पाप कऽ भागी अछि, हम सभ कखनहि नै। तँ आब ओही वस्तु कऽ विषयमे गम्भीर विचार करू जकर विचार करब आब परम आवश्यक अछि। चारुदत्त: शब्द सभकें व्यर्थ नष्ट करबा सँ की लाभ आखिर? यद्यपि कोनो मन्द भाग्यक कूर प्रहारसँ, आ पैघ कुलक पापी मनुष्य सभक झूठसँ हमर ऊपर घोर कलङ्क लगा देल गेल छैक, तइयो जदि हमर पवित्र गुण कऽ कखनो कोनो आदर भेटत, तँ ओ सुकुमार कनियाँ जे आब आकाश भीतर देवराज सभक साथ निवास कऽ रहल छथि—हमर परम प्रियतम—अपनहि मधुर शालीन स्वभावसँ हमर एही कलङ्क कऽ सदा लेल सफा कऽ देतीह! गोह: (अपन तलवार निकालैत छथि) आदरणीय चारुदत्त महराज, सीधा भूमि पर सुति जाउ आ शान्त रहू। एकहि कड़ा प्रहारसँ हम अहाँक प्राण लय लेब आ अहाँकें परलोक विदा कऽ देब। (चारुदत्त ओनाहि करैत छथि। गोह प्रहार करबाक लेल अपन बांहि उठाबैत अछि। तलवार ओकरा हाथसँ सीधा भूमि पर खसि पड़ैत छैक) की भेल ई आखिर? हमर एही हाथ भीतर हम मृत्युक नगाड़ा जकां भयानक तलवारकें कस कऽ जकड़ने छलहुँ; कोन कारण ई सीधा बालू ऊपर खसि पड़ल छैक आखिर? मुदा जखन एहन भऽ गेल छैक, हम ई निष्कर्ष निकालैत छी जे चारुदत्त महराजक प्राण आजुक दिन नष्ट नै होबाक चाही। दया करू, ओह सह्य पर्वत कऽ आदरणीय महान देवी! जदि चारुदत्त महराज सुरक्षित बचि जाथि, तँ अहाँ हमर जल्लाद कुल ऊपर बहुत पैघ आदर देखौने होबब। अहीन्त: हमरा सभकें ओही कात करबाक चाही जकर कड़ा आदेश भेटल अछि। गोह: नीक, आउ हम सभ करी। (ओ सभ चारुदत्तकें शूल ऊपर चढ़ाबाक तैयारी करैत छथि) चारुदत्त: यद्यपि कोनो मन्द भाग्यक कूर प्रहारसँ, आ पैघ कुलक पापी मनुष्य सभक झूठसँ हमर ऊपर घोर कलङ्क लगा देल गेल छैक, तइयो जदि हमर पवित्र गुण कऽ कखनो कोनो आदर भेटत, तँ ओ सुकुमार कनियाँ जे आब आकाश भीतर देवराज सभक साथ निवास कऽ रहल छथि—हमर परम प्रियतम—अपनहि मधुर शालीन स्वभावसँ हमर एही कलङ्क कऽ सदा लेल सफा कऽ देतीह! भिक्षु आ वसन्तसेना: (जे किछु भऽ रहल छैक ओकरा देखि कऽ) उत्तम भद्र लोक सभ! रुकू, रुकू! वसन्तसेना: उत्तम भद्र लोक सभ! हम छी ओ अभागिन स्त्री जकर कारण हुनका मृत्युदण्ड देल जाइ रहल छनि। गोह: (ओकरा देखि कऽ) के छथि ई स्त्री जकर सुकुमार केश हवा भीतर खुल्ला लहराइ रहल छैक, आ जे अपन काँखि ऊपर चोट कऽ रहल छथि? ओ बहुत पैघ नाद कऽ साथ हमरा सभकें रुकबाक लेल पुकारि रहल छथि, आ अपन दोनों हाथ ऊपर उठाने हड़बड़ी भीतर एही कात आबि रहल छथि। वसन्तसेना: ओह चारुदत्त महराज! एकर की अर्थ भऽ सकैत छैक आखिर? (ओ हुनकर छाती पर अपना कऽ फिङ्कि दैत छथि) भिक्षु: ओह चारुदत्त महराज! एकर की अर्थ भऽ सकैत छैक आखिर? (ओ हुनकर चरणमे खसि पड़ैत छथि) गोह: (त्राससँ पाछाँ हटैत) वसन्तसेना?—कम्तीसँ कम्ती, हम सभ ककरो निर्दोष मनुष्यक हत्या तँ नै कयलहुँ। भिक्षु: (उठि कऽ) आकाश कऽ धन्यवाद हो! चारुदत्त महराज जिबैत छथि। गोह: आ एक सौ वर्ष धरि जिबैत रहताह! वसन्तसेना: (परम प्रसन्नतासँ) आ हम स्वयं सेहो दोबारा जीवन कऽ भीतरी महल भीतर वापस आबि गेल छी। गोह: राजा आब ओही बलि कऽ स्थान ऊपर उपस्थित छथि। आउ हम सभ जा कऽ हुनका सूचित करी जे एतय की अद्भुत भेल छैक। (दोनों जल्लाद जाब आरम्भ करैत छथि) संस्थानक: (वसन्तसेनाक देखि कऽ। घोर त्राससँ) ईश्वर रक्षा करथि! एही दासी कऽ दोबारा जीवन क ककर द्वारा देल गेल छल आखिर? आब हमर अन्तिम दिन आबि गेल छैक। सुन्दर! हमरा एतयसँ भागि जबाक चाही। (ओ तीव्र गतिसँ भागि जाइत अछि) गोह: (वापस आबैत) नीक, की हमरा सभकें राजा कऽ तरफसँ ओही मनुष्यकें मारबाक कड़ा आदेश नै छल जे वसन्तसेनाक हत्या कयलने छल? आउ हम सभ जा कऽ ओही राजा कऽ साढ़ू कऽ खोजि कऽ पकड़ी। (दोनों जल्लाद सभक प्रस्थान होइत अछि) चारुदत्त: (परम आश्चर्यसँ गदगद भऽ कऽ) के हमर प्राण बचेबाक काज कयलक एही मृत्युक तीक्ष्ण अस्त्रक प्रहारसँ, जखन हम कालक कूर मुख भीतर विवश भऽ कऽ सङ्घर्ष कऽ रहल छलहुँ, साक्षात कोनो सूखा अनाजक खेत ऊपर उमड़ैत मेघ कऽ जकां? (ओ ओकरा कात देखैत छथि) की ई वसन्तसेनाकहि कोनो विचित्र रूप (भ्रम) अछि आखिर? या ओ स्वयं छथि, ऊपर कऽ आकाशसँ भूमि पर अवतरित भेल? की हम मात्र अपन पागलपन भीतर अपन प्रियतम कऽ देखि रहल छी आखिर? या की ओकर अमूल्य प्राण अखन धरि समाप्त नै भेल छल? आ पुनः एक बेर: की ओ आकाशसँ वापस आबि गेली, जाहिसँ हमर प्राण सुरक्षित बचि सकय आखिर? की ओकर रूप कोनो दोसर स्त्रीक शरीर भीतर देल गेल छल आखिर? की ई स्वयं वैह आदरणीय कनियाँ छथि आखिर? वसन्तसेना: (अश्रु बहाबैत उठैत छथि आ हुनकर चरणमे खसि पड़ैत छथि) ओह आदरणीय चारुदत्त महराज, हमहि छी ओ अभागिन स्त्री जकर कारण अहाँ एही अपमान आ संकट कऽ घड़ी भीतर आबि गेल छलहूँ। भीड़ कऽ लोक सभ: एकटा पैघ चमत्कार भेल छैक, एकटा अद्भुत चमत्कार! वसन्तसेना जिबैत छथि। (लोक सभ वैह दोहराबैत छथि) चारुदत्त: (सुनैत छथि, पुनः हड़बड़ी भीतर उठैत छथि, वसन्तसेना कऽ अपन पूर्ण आलिङ्गन भीतर लैत छथि, आ अपन आँखि बन्द कऽ लैत छथि। भावुकतासँ काँपैत स्वर भीतर) हमर प्रियतम! अहाँ स्वयं वसन्तसेना छी! वसन्तसेना: वैह मन्द भाग्य वाली असहाय स्त्री। चारुदत्त: (ओकरा कात देखैत छथि। परम आनन्दसँ) की ई सत्य भऽ सकैत छैक आखिर? वसन्तसेना स्वयं एतय छथि? (पूर्ण प्रसन्नता भीतर) जखन हम मृत्युक कूर सत्ता भीतर खसि पड़ल छलहुँ, ओकर ई छाती अश्रु कऽ धारसँ भीजि गेल छैक, आब ओ कतयसँ आबि कऽ हमर भीतरी समस्त भयकें नष्ट कऽ देलक छैक, साक्षात कोनो आकाशक जादुई मन्त्र कऽ जकां? वसन्तसेना! ओह हमर प्रियतम! हमर एही शरीर भीतरसँ, जतयसँ प्राण विदा भऽ रहल छल, आ ओहो मात्र अहाँक वियोग कऽ कारण, अहाँ अपन आबबाक साथ पुनः जीवन देबाक कला कऽ नीक जकां देखौलहुँ। ओह कतेक अद्भुत आ जादुई होइत छैक प्रेमी सभक एही मिलन! एकरा बिना कोन दोसर शक्ति कोनो मृत मनुष्यकें पुनः जीवित कऽ सकैत छैक आखिर? मुदा देखू, हमर प्रियतम! हमर ई खून कऽ जकां लाल वस्त्र आब कोनो नव दुलहाक सुवर्ण वस्त्र जकां सुशोभित भऽ रहल छैक, मृत्युक ई कूर माला आब हमर विवाहक सुकुमार माला बुझि रहल छैक; हमर प्रियतम हमर लग छथि। आ मृत्युक नगाड़ाक जे नाद हमर अन्त पाबबाक साक्ष्य दऽ रहल छल, ओ आब हमर विवाहक मधुर सङ्गीत जकां गुञ्जि रहल छैक; किएक तँ ओ स्वयं एतय उपस्थित छथि। वसन्तसेना: अहाँ अपन पवित्र मधुर कृपालु स्वभाव कऽ साथ, ई की अछि आखिर जे अहाँ कऽ लेलहुँ? चारुदत्त: हमर प्रियतम, ओ पापी कहलक जे हम अहाँक हत्या कऽ देलहुँ अछि। पुराना घृणा आ वैर कऽ कारण, हमर ओही पैघ शत्रु, जे आब नरक कऽ साक्षात पात्र भऽ गेल छैक, हमर प्राण कऽ एकहि क्षण भीतर अन्त कऽ देने छल। वसन्तसेना: (अपन दोनों कान बन्द करैत छथि) ईश्वर एही कुसङ्केतकें दूर करथि! ओ स्वयं छल, राजा कऽ साढ़ू संस्थानक, जे हमर हत्या करबाक यत्न कयलने छल। चारुदत्त: (भिक्षुकें देखि कऽ) मुदा ई के छथि आखिर? वसन्तसेना: जखन ओही पापी मनुष्य हमर प्राण लेबाक कूर काज कयलक छल, तँ एही धर्मात्मा पुरुष हमरा जीवन कऽ भीतरी महल भीतर वापस लाबने छलाह। चारुदत्त: अहाँ के छी, बिना कोनो स्वार्थ कऽ सहायता करय वाला मित्र आखिर? भिक्षु: अहाँ हमरा बिसरि गेलहुँ अछि, महराज। हम वैह मसाज करय वाला छी, जे कखनो अहाँक चरण कऽ सेवा कऽ कऽ परम आनन्द पाबैत छल। जखन हम किछ जुआड़ी सभक हाथ भीतर संकट भीतर पड़ि गेल छलहुँ, तँ बुद्ध भीतर हमर एही आदरणीय बहिन, जखन ई सुनलन्हि जे हम अहाँक नौकर रहि चुकल छी, अपन बहुमूल्य आभूषण दऽ कऽ हमर मुक्ति कीनलन्हि छल। ओकरा बाद हम जुआ कऽ ओही चंचल जीवनसँ थाकि गेलहुँ, आ एकटा बौद्ध भिक्षु बनि गेलहुँ। आब एही आदरणीय कनियाँ कऽ अपन गाड़ी पहिचानबामे भूल भऽ गेल छल, आ वैह कारण छल जाहि लेल ओ पुराना पुष्पककरण्डक बगीचा भीतर आबि गेली। मुदा जखन ओही पापी संस्थानक देखलक जे ओ ओकरासँ स्नेह नै करत, ओकर गला दबा कऽ ओकर हत्या करबाक कूर काज कयलक। आ हम ओकरा ओतहि पाबलहुँ। नेपथ्यसँ कतेको पैघ आवाज सभ: सदा लेल अक्षय विजय होइत रहय स्वयं महादेव (शिव) कऽ, जे दक्ष कऽ ओही अभिमानी यज्ञ कऽ नष्ट कऽ देने छलाह; आ विजय होइत रहय स्वयं वीर कार्तिकेय कऽ, जे क्रौञ्च पर्वत ऊपर अपन शक्तिसँ प्रहार कयलन्हि छल; आ विजय होइत रहय स्वयं महराज आर्यक कऽ—अपन प्रतापी शत्रु कऽ ओ वध कऽ देलन्हि अछि—पूरा पृथ्वीक एही विशाल मण्डल ऊपर, आब ई पृथ्वी अपन प्रसन्नताक पावन पताका सभ कात फहराबय, कैलाश पर्वत कऽ जकां सफेद आ निर्मल पताका। (हड़बड़ीमे शर्विलकक प्रवेश होइत अछि) शर्विलक: हँ, राजा पालक, ओही सत्ता भीतर डूबल पापी कऽ हम वध कऽ देलहुँ अछि, आ वीर आर्यक महराजकें पवित्र सिंहासन ऊपर आदरसँ बैठा देलहुँ अछि; आ आब, यज्ञक सुकुमार पुष्प कऽ जकां, हम महराजक कड़ा आदेश कऽ अपन मुड़ झुका कऽ स्वीकार करैत छी, चारुदत्त महराजकें पुनः नव जीवन देबाक लेल। शत्रु जकर समस्त सत्ता आ मित्र भागि गेल छलाह, ओकर वध कऽ कऽ, ओ अपन समस्त प्रजा कऽ परम शीतलता आ सान्त्वना देलन्हि अछि; आ पृथ्वी कऽ विशाल राजमुकुट आब प्रसन्नतासँ हुनकर पराक्रमक स्वीकार कयलक छैक, आ हुनकर सम्मुख अपन मुड़ झुकाने छैक, जे अपन शत्रु कऽ सम्मुख स्वयं देवराज इन्द्र कऽ जकां पराक्रम देखौलन्हि अछि। (ओ अपन सम्मुख देखैत अछि) आहा! ओ ओतहि होयताह जतय लोक सभक एतेक पैघ भीड़ जमल छैक। ओह, प्रार्थना अछि जे महराज आर्यकक एही पावन कार्य चारुदत्त महराजक सुरक्षित बचेने प्राण कऽ साथ सुशोभित होबय! (ओ अपन कदम आ तीव्र कऽ दैत अछि) मार्गसँ हटू, अहाँ पापी सिपाही सभ! (ओ चारुदत्तकें देखि कऽ। परम आनन्दसँ) की चारुदत्त महराज अखन धरि जिबैत छथि आखिर, आ वसन्तसेना सेहो? वास्तवमे, हमर महराजक भीतरी आकाङ्क्षा पूर्ण भऽ गेल छैक। आब नियति कऽ धन्यवाद हो, जे दुःखक एही बिना तट वला अगाध समुद्र भीतरसँ, हम हुनका सुरक्षित बचल देखि रहल छी, ओही मधुर नाव (वसन्तसेना) द्वारा मुक्त भऽ कऽ, जे अपन मार्ग कऽ परम चतुरतासँ जनैत छली, पुण्यक रस्सा आ चरित्रक समस्त औजार सभक साथ। आब ओ ओही चन्द्रमा कऽ जकां बुझि रहल छथि जकर कान्ति आब पूर्णतः सफा छैक, जखन ग्रहण कऽ समस्त कूर अन्धकार समाप्त भऽ गेल हो। मुदा हम कसरि हुनकर सम्मुख जाब आखिर, जकरा विरुद्ध हम स्वयं कखनो एतेक पैघ अपराध कऽ मन्द कर्म कयलने छलहुँ? मुदा नै! ईमानदारी सदा परम आदरक योग्य होइत छैक। (ओ लग जाइत अछि आ हाथ जोड़ैत अछि। प्रकट) ओह आदरणीय चारुदत्त महराज! चारुदत्त: अहाँ के छी, महाभाग आखिर? शर्विलक: हम अहाँक भीतरी महल भीतर एकटा नीच चोरक जकां प्रवेश कयलने छलहुँ, आ ओतय धरोहर सौंपल गेल रत्न चोरायने छलहुँ; मुदा यद्यपि ई पाप-कर्म हमर आत्मा कऽ कलङ्कित कऽ रहल छैक, हम अहाँक एही मधुर कृपा कऽ सम्मुख अपना कऽ फिङ्कैत छी। चारुदत्त: एहनहि नै बाजू, हमर मित्र। अहाँ तँ ओही प्रकार हमर ऊपर अपन परम विश्वास देखौने छलहूँ। (ओ ओकरा अपन आलिङ्गनमे लैत छथि) शर्विलक: आ एक गप आ, महराज: ओही बहुत कुलीन वीर आर्यक महराज, अपन कुल आ नाम कऽ कलङ्कसँ बचेबाक लेल, ओही सत्ता भीतर डूबल पालक कऽ वध कऽ देलन्हि अछि, वेदी कऽ साक्षात बलि कऽ जकां ओकरा समाप्त कऽ देलन्हि। चारुदत्त: अहाँ की कहि रहल छी आखिर? शर्विलक: ई अहाँकहि गाड़ी छल जे हुनका मार्ग ऊपर बचेबाक लेल आगाँ बढ़ौने छल, जखन ओ अहाँक नाम कऽ पवित्र आश्रय खोजि रहल छलाह; ओ आजुक दिन राजा पालक कऽ समाप्त कऽ देलन्हि अछि, वेदी कऽ साक्षात बलि कऽ जकां। चारुदत्त: शर्विलक महराज, की अहाँ स्वयं ओही आर्यककें मुक्त कयलहुँ छल आखिर जकरा राजा पालक ओही गामसँ उठा कऽ बिना कोन कारण कऽ बुर्ज भीतर बन्द कऽ देने छल? शर्विलक: हँ, हमहि कयलहुँ छल। चारुदत्त: ई वास्तवमे परम पूज्य आ परम प्रिय समाचार अछि। शर्विलक: जखन कखनो अहाँक मित्र आर्यक महराज उज्जयिनी कऽ सिंहासन ऊपर आदरसँ बैठि गेलाह, ओ ओही क्षण अहाँकें कुशावती कऽ प्रतापी राज्य उपहार स्वरूप प्रदान कऽ देलन्हि, वेणा नदीक मनोरम तट ऊपर। अहाँ कृपा कऽ कऽ हुनकर एही स्नेहक पहिल सङ्केतक स्वीकार करू। (ओ चारू कात घूमि कऽ) आबब, एही मार्गसँ लय आबब ओही पापी, ओही अधम मनुष्यकें, जे राजा कऽ साढ़ू संस्थानक अछि! नेपथ्यसँ कतेको आवाज: हम सभ अखने लाबैत छी, शर्विलक महराज। शर्विलक: महराज चारुदत्त, राजा आर्यक घोषणा कऽ रहल छथि जे ओ ई पूरा राज्य मात्र अहाँक पवित्र गुण सभक बलसँहि प्राप्त कयलन्हि अछि, आ अतः अहाँकें एकर फल अवश्य भेटबाक चाही। चारुदत्त: राज्य हमर गुण सभक बलसँ जीतल गेल अछि आखिर? (दोनों हाथ पाछाँ बान्हल, आरक्षी सभक पहरेदारी भीतर संस्थानकक प्रवेश होइत अछि) नेपथ्यसँ कतेको आवाज: आबब, राजा कऽ साढ़ू, आ अपन एही अहङ्कार आ अशिष्टताक कूर फल प्राप्त करू। संस्थानक: (त्राससँ) ईश्वर रक्षा करथि! जे विधाताक विधान छल, हम एतयसँ भागि कऽ गेल छलहुँ एकटा गदहा कऽ जकां, आ अपन चंचल दिन देखलहुँ। आब ओ सभ हमरा चारू कात एकटा कैदी जकां घसीटि रहल छथि, जेना ककरो कूर कुकुर कऽ पकड़ल गेल हो। (ओ चारू कात देखैत अछि) ओ सभ हमरा चारू कातसँ घेरने अछि, यद्यपि हम राजा कऽ कुलक पुरुष छी। हम आब अपन एही असहाय संकट भीतर रक्षक कतऽ खोजब आखिर? (सोचैत) सुन्दर! हम ओही मनुष्य पाँ जाब जे शरण चाहय वाला कऽ सदा सहायता करैत छथि आ दया देखबैत छथि। (ओ लग जाइत अछि) आदरणीय चारुदत्त महराज, हमर रक्षा करू, हमर रक्षा करू! (ओ हुनकर चरणमे खसि पड़ैत अछि) नेपथ्यसँ लोक सभक आवाज: महराज चारुदत्त, एककरा हमरा सभक हाथ भीतर छोड़ि दिय’! हम सभ एकर प्राण लय लेब! संस्थानक: (चारुदत्त कें) ओह असहाय सभक एकमात्र रक्षक, हमर रक्षा करू! चारुदत्त: (मधुर दयापूर्ण स्वभावसँ) हँ, हाँ। जे शरण भीतर आबि गेल, ओ सुरक्षित रहत। शर्विलक: (अधैर्यसँ) नास हो एकर! एककरा चारुदत्त महराजक चरणसँ दूर घसीटू! (चारुदत्त कें) महराज, बाजू एही पापी कऽ साथ क कोन दण्ड कऽ विधान कयल जाय आखिर? की एककरा कस कऽ बान्ही देल जाय आ जब धरि प्राण नै निकसि जाय, मार्ग ऊपर घसीटल जाय आखिर? की कुकुर सभ एकर शरीरकें नोचि-नोचि कऽ खायब आरम्भ करय जतय ई सुतल हो आखिर? जदि एककरा शूल ऊपर चढ़ा कऽ मृत्युदण्ड देल जाय, तँ ओहो कोनो भूल नै होयत, नहि जदि एककरा बीचोबीच काठ कऽ जकां आरीसँ चीरि देल जाय। चारुदत्त: की अहाँ सभ ओनाहि करब जेना हम कहब आखिर? शर्विलक: अहाँ एकरा भीतर कसरि संशय कऽ सकैत छी आखिर? संस्थानक: चारुदत्त महराज! मालिक! हम अहाँक शरण भीतर छी। हमर रक्षा करू, हमर रक्षा करू! अपना कुल कऽ अनुकूल कोनो आदर कऽ काज करू महराज। हम पुनः कखनहि एहन अपराध नै करब! नेपथ्यसँ लोक सभक आवाज: एकर वध करू! एही पापी कऽ जिबैत रहबाक अवकाश किएक देल जाय आखिर? (वसन्तसेना चारुदत्तक कण्ठसँ ओही मृत्युक कूर माला खोलि लैत छथि, आ ओकरा संस्थानकक शरीर ऊपर फिङ्कि दैत छथि) संस्थानक: अहाँ दासी कनियाँ, दया करू, दया करू! हम कखनहि अहाँक हत्या दोबारा करबाक विचार नै करब।हमर रक्षा करू! शर्विलक: आउ, एककरा बाहर लय जाउ! आदरणीय चारुदत्त महराज, बाजू जे एही पापी कऽ की अन्त देल जाय। चारुदत्त: की अहाँ सभ ओनाहि करब जेना हम कहब आखिर? शर्विलक: अहाँ एकरा भीतर कसरि संशय कऽ सकैत छी आखिर? चारुदत्त: वास्तवमे? शर्विलक: वास्तवमे। चारुदत्त: तँ एककरा एही क्षण तुरंत— शर्विलक: मारि देल जाय? चारुदत्त: नै, नै! सुरक्षित मुक्त कऽ देल जाय। शर्विलक: कोन प्रयोजन लेल आखिर? चारुदत्त: जे शत्रु पराजित भऽ कऽ, अपमानित भऽ कऽ अहाँक चरण भीतर शरण खोजि रहल हो, ओकरा ऊपर कखनहि तीक्ष्ण लोहक अस्त्रसँ प्रहार नै करबाक चाही— शर्विलक: बहुत नीक। हम सभ कुकुर सभकें विवश करब जे ओ एककरा जिबैत नोचि कऽ खाय। चारुदत्त: नै, नै! कूरताक उत्तर सदा परोपकार आ मधुर दयापूर्ण कार्यसँहि देबाक चाही। शर्विलक: परम आश्चर्य! हम की करब आखिर? बाजू, महराज। चारुदत्त: किएक, एककरा सुरक्षित मुक्त कऽ दिय’। शर्विलक: एहनहि होयत तखन। संस्थानक: जय हो! हम पुनः अपन प्राण वापस पाबि लेलहुँ। (सिपाही सभक साथ संस्थानकक प्रस्थान होइत अछि) शर्विलक: आदरणीय मालकिन वसन्तसेना, महराज आर्यक अहाँकें "विवाहित कुलवधू" कऽ वैध आ परम सम्मानित पद देबामे प्रसन्न छथि। वसन्तसेना: महाभाग, हमर आत्मा आब एकरासँ बेसी कोन सुखक आकाङ्क्षा नै राखैत। शर्विलक: (वसन्तसेना कऽ मस्तक ऊपर आदरक ओढ़नी रखैत छथि। चारुदत्त कें) महराज, एही बौद्ध भिक्षु लेल की विधान कयल जाय आखिर? चारुदत्त: भिक्षु महराज, अहाँक भीतरी आकाङ्क्षा सभसँ बेसी की अछि आखिर? भिक्षु: जखन हम संसारक समस्त वस्तु सभक अनिश्चित होबाक एही साक्षात रूप देखि लेलहुँ अछि, हमर आत्मा आब दुगना सन्तुष्ट अछि एकटा भिक्षु बनि कऽ रहबा भीतर। चारुदत्त: हुनकर भीतरी सङ्कल्प कखनो बदला नै जा सकैत, हमर मित्र। एककरा एही राज्यक समस्त बौद्ध मठ सभक प्रधान आध्यात्मिक पुरोहित नियुक्त कयल जाय। शर्विलक: एहनहि होयत। भिक्षु: हमर आत्माकें आ कोन वस्तु नै चाही। वसन्तसेना: आब हम वास्तवमे जीवन कऽ भीतरी महल भीतर वापस आबि गेल छी। शर्विलक: आ स्थावरक लेल की विधान होयत आखिर? चारुदत्त: ओही भला मनुष्यकें सदा लेल सुरक्षित मुक्ति देल जाय। एही जल्लाद भाई सभकें समस्त जल्लाद सभक प्रधान नियुक्त कयल जाय। चन्दनककें एही पूरा राज्यक भीतरी समस्त आरक्षी सिपाही सभक सभसँ पैघ प्रधान नियुक्त कयल जाय। आ राजा कऽ साढ़ू कऽ ओनाहि अपन दिन बिताबाक अवकाश देल जाय जेना ओ पहने कखनो अपन चंचल दिन बितबैत छल। शर्विलक: एहनहि होयत। मात्र ओही एकटा मनुष्य—ओकरा हमर हाथ भीतर छोड़ि दिय’, आ हम ओकर वध करब। चारुदत्त: जे शरण भीतर आबि गेल, ओ सुरक्षित रहत। जे शत्रु पराजित भऽ कऽ, अपमानित भऽ कऽ अहाँक चरण भीतर शरण खोजि रहल हो, ओकरा ऊपर कखनहि तीक्ष्ण लोहक अस्त्रसँ प्रहार नै करबाक चाही। कूरताक उत्तर सदा परोपकार आ मधुर दयापूर्ण कार्यसँहि देबाक चाही। शर्विलक: तँ बाजू आब हम अहाँक लेल आ की आदर कऽ काज कऽ सकी आखिर। चारुदत्त: की एकरासँ बेसी आ की भऽ सकैत छैक आखिर? हम अपन पवित्र गुण कऽ वैभव कखनो कलङ्कित नै होबा देलहुँ, हमर शत्रु जखन अपमानित भऽ कऽ शरण अयलक, हम ओकरा पूर्णतः क्षमा कऽ देलहुँ; हमर मित्र आर्यक महराज अपन प्रतापी शत्रुक समस्त जड़ि नष्ट कऽ देलन्हि, आ आब सिंहासन ऊपर बैठि कऽ एही पूरी पृथ्वी ऊपर न्यायपूर्वक शासन कऽ रहल छथि। ई हमर परम प्रिय सुकुमार कनियाँ आब अन्ततः हमर अपनी बनि गेल छथि, आ अहाँ एकटा श्रेष्ठ मित्र कऽ जकां हमर हृदय भीतर समा गेल छी। तँ की हम आ कोन सुखक भीख मङ्गब आखिर, हमरा ऊपर जे कृपा भेल अछि, हम ओकर अन्त पाबामे सेहो समर्थ नै छी आखिर? भाग्य हमरा सभक साथ ओनाहि खेल खेलैत छैक जेना कोनो पुराना कुआँ भीतर पानि कऽ घड़ा ऊपर-नीचां होइत छैक, जतय एकटा पानि कऽ धारसँ भीजि जाइत छैक, आ दोसर पूर्णतः खाली रहि जाइत छैक, जतय एकटा ऊपर उठैत अछि, जखन कि दोसर संकट भीतर नीचां खसि पड़ैत छैक; आ साक्षात देखाबैत छैक जे जीवनहि परिवर्तन कऽ दूसरा नाम अछि—कखनो साक्षात स्वर्गक उत्सव, तँ कखनो नरक कऽ घोर संताप। तइयो हमर एही मङ्गलाचरण (भरतवाक्य) कऽ भीतरी पावन कामना सभ कात अवश्य पूर्ण होबय। भरतवाक्य गौ सभ प्रचुर दूध देव, पृथ्वी अपन अन्नसँ पूर्ण रहय, आ आकाश नित्य कहियो नै समाप्त होय वाला वर्षा करय; मन्द हवा सभ प्राणीकें सुख-प्रसन्नता पहुँचाबय, आ समस्त जीव संसारक प्रत्येक पीड़ासँ मुक्त रहथि। ब्राह्मण सदा धर्म आ न्यायक पवित्र मार्ग पर चलिथिन, आ हुनकर पैघ योग्यता कऽ पैघ आदर भेटनि; राजा सदा न्यायपूर्वक शासन करथि, आ ई पृथ्वी, कृतज्ञ भऽ कऽ, सादर अपन मुड़ झुकाने रहय। (सभ आनन्दपूर्वक प्रस्थान करैत छथि) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१२. गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-५) सन्दर्भ- कुणाल-कृत कुसमा-सलहेस कुणाल-कृत नाट्य-समीक्षा शृंखला · तृतीय नाटक कुसमा-सलहेस [महागाथा (राजा सलहेस) आ लोक-नाट्य (सलहेस नाच) पर आधारित नाटक] एकटा चतुर्भुज नाट्य-समीक्षा : भारतीय · पाश्चात्य · चीनी · इजरायली परिप्रेक्ष्यमे पहिल मंचन : २९-३० अप्रैल १९९७, विद्यापति भवन, पटना · प्रकाशन : अंतिका, अप्रैल-सितंबर २००६ १. परिचय, कथा-संरचना आ ऐतिहासिक-सांस्कृतिक सन्दर्भ कुणालक तृतीय आ सर्वाधिक विस्तृत नाटक ‘कुसमा-सलहेस’ संग्रहक हृदय-स्थान रखैत अछि—लगभग ७० पृष्ठक ई नाटक कलात्मक, वैचारिक आ सांस्कृतिक, तीनू दृष्टिसँ संग्रहक केन्द्र-बिन्दु थिक। एकर आधार मिथिलाक दुसाध समुदायक लोक-देवता-नायक ‘राजा सलहेस’क महागाथा आ ओहि गाथा पर आधारित लोक-रंगमंच-परम्परा ‘सलहेस नाच’ थिक। कथाक भूगोल विराट अछि—महिसौथा, मोरंग, बाघगढ़, रेवा-दाह, भोट/तिब्बत, समदागढ़, पकड़िया, गढ़-तरेगना, रंगीलागढ़—ई स्थान-नाम भारत-नेपाल-तिब्बत धरिक एक भौगोलिक-राजनीतिक संसार रचैत अछि। पात्र-वर्ग सेहो महाकाव्यात्मक अछि—नायक सलहेस, नायिका कुसमा (मालिन), तथा हिरामन (सूग्गा-कथावाहक), विपटा (विदूषक), ठनका (बाघ), बनका (भालु), कुनटा (वनचर), देवी दुर्गा, अनेक राजा-सैन्य-शत्रु। नाटकक पाँच मुख्य नाट्य-क्रम—(१) पूर्वरंग : समन्वयवादी सुमिरन आ नाटककेँ आरम्भ करबाक मेटाथिएट्रिकल प्रसंग (विपटा-हिरामन द्वारा); (२) कुसमाक परिचय आ आत्म-शुद्धि-साधना; (३) सलहेसक वीरता, पहिल भेंट, आ दुर्गाक आशीर्वाद; (४) भोट-आक्रमण, षड्यंत्र आ कारागार-बन्धन; (५) स्वाधीन-चेतनाक घोषणा, लोक-एकजुटतासँ विजय, आ प्रेम-तत्त्वक समापन-घोषणा। २. भारतीय नाट्य-सिद्धांत २.१ सलहेस-नाच : लोकनाट्यक स्वायत्त सौन्दर्यशास्त्र भरतमुनिक नाट्यशास्त्र संस्कृत-परम्पराक भीतरसँ नाटकक सिद्धांत रचैत अछि। मुदा मिथिलाक ‘सलहेस नाच’ एक स्वायत्त लोक-नाट्य परम्परा थिक जेकर अपन प्रदर्शन-व्याकरण (performance grammar) अछि। एहिमे—समाजीक सामूहिक गायन (कोरसक भूमिका), सुमिरन (लोकनाट्यक मंगलाचरण जे हिन्दू, मुस्लिम, आ जनजातीय देवताक एकसंग आह्वान करैत अछि), विपटाक विदूषक-भूमिका, हिरामन-सूग्गाक कथावाहक-भूमिका आ सलहेसक प्रवेशसँ पूर्व जय-जयकार—ई सभ लोकनाट्यक अपन नाटकीय संस्कार (ritual performance elements) थिक। कुणाल एहि सम्पूर्ण लोक-व्याकरणकेँ प्रामाणिकतासँ अपनेने छथि—शुद्धि, क्रम, गायन, सम्बोधन—सभ लोक-परम्पराक अनुरूप। एहि अर्थमे ई नाटक अभिजन-रंगमंचक लोकनाट्य-अनुकरण नहि, अपितु लोकनाट्यक साहित्यिक पुनर्प्रस्तुति थिक—एहि भेदकेँ चिन्हनाइ आवश्यक अछि। २.२ रस-महोत्सव : बहुरंगी रस-संरचना संस्कृत काव्यशास्त्रक परम्पराक अनुसार उत्कृष्ट नाट्यकृतिक एक ‘प्रधान रस’ होएबाक चाही जकर सेवामे अन्य रस सहायक होइत अछि। ‘कुसमा-सलहेस’क जटिलता ई थिक जे एतय एकल प्रधान रस नहि, रसक एक महोत्सव उपस्थित अछि। शृंगार (कुसमा-सलहेसक प्रेम—राधा-कृष्णक लोक-प्रतिरूप; “ओ तँ किसुन गोसाँइ छिऐ, आ तों राधारानी”); वीर (सलहेसक युद्ध-पराक्रम, पराजित शत्रुपर दया—“हारि क’ पड़ाइत सेना केँ खिहारनाइ अनुचित”); अद्भुत (ठनका-बनका-हिरामनक अलौकिक उपस्थिति, दुर्गाक साक्षात्कार); करुण (असम्भव प्रेम—सलहेस विवाहित छथि, कुसमा मालिन छथि, जाति-सीमा बाधक); भक्ति (दुर्गाक आराधना, सुमिरनमे सर्व-धर्म-समन्वय); वीभत्स/भयानक (सूचोंगक षड्यंत्र, कारागार-अत्याचार)। भरत रसक ओ समन्वय स्वीकार करैत छथि जाहिमे ‘अंगी-रस’ (प्रधान) आ ‘अंग-रस’ (सहायक) मिलि एक जटिल रस-अनुभव उत्पन्न करैत अछि। एहि नाटकमे शृंगार आ वीर परस्पर ‘अंगी-रस’ बनि जाइत अछि—दुनूकेँ एक-दोसरक पूरक बनाबैत दुर्गाक घोषणा मध्यमे अबैत अछि—“मीलिक’ जे कुसमा सँ आब तों जन-मन मे विचरण करही / मात्र लोकक सुख लेल जीवन अरपन करही”। एतय प्रेम (शृंगार) स्वयं वीर-धर्मक प्रेरणा-स्रोत बनि जाइत अछि। २.३ सबाल्टर्न-सौन्दर्यशास्त्र : कैनन-विरोध संस्कृत नाट्यशास्त्रक नायक सामान्यतः ‘राजर्षि’ वा ‘दिव्य’ कुलक होइत अछि। एहि परम्परामे दुसाध नायक नहि। कुणालक सब सँ साहसिक नाट्य-निर्णय यैह थिक जे ओ एक सबाल्टर्न (सामाजिक पदक्रममे अधीनस्थ) समुदायक महागाथाकेँ ‘महाकाव्यात्मक नाटक’क केन्द्रमे रखैत छथि। विद्यापति-परम्पराक शृंगार-काव्यमे राधा-कृष्ण आ शिवसिंह-लखिमाक प्रेमकेँ केन्द्रीयता भेटैत आएल अछि। कुणाल एहिसँ भिन्न मार्ग चुनैत छथि—कुसमाक ‘रधिया’ (राधाक लोक-रूप) आ सलहेसक ‘किसुन गोसाँइ’ (कृष्णक लोक-रूप)। ई प्रतीकात्मक प्रतिस्थापन एहि बातक नाट्य-घोषणा थिक जे दुसाध-लोक-परम्पराक प्रेम-कथा मैथिली साहित्यक मुख्यधाराक समतुल्य—वस्तुतः ओकर जड़ि—थिक। २.४ कुसमाक आत्म-शुद्धि : देशज योगशास्त्र हिरामन-कुसमाक संवाद (दोसर दृश्य)मे एक उल्लेखनीय आत्म-शुद्धि-अनुक्रम अछि जे योगशास्त्रक लोक-रूपान्तरण थिक—“अपन घर बहारि लैह... इर्ष्या, घमंड, घृणा, लोभ आ मोह बहरेलै... करुणाक जल सँ नीपलौं... सिनेहक चानन सँ सुगन्धित केलहूँ।” ई शारीरिक-क्रिया नहि, आन्तरिक शुद्धिक एक भाव-यात्रा थिक। भारतीय दार्शनिक परम्परामे—विशेषतः भक्ति-परम्परामे—‘हृदय-शुद्धि’ (चित्त-विशुद्धि)केँ प्रेम-प्राप्तिक पूर्व-शर्त मानल जाइत अछि। कुणाल एहि भक्ति-दर्शनकेँ एक हास्य-फलक पर प्रस्तुत करैत छथि—हिरामन पहिने पुरस्कार माँगैत अछि (सोना, हीराक हार, रूपाक बाटी), तखन मार्गदर्शन करैत अछि। ई लोक-रसिकता भक्ति-दर्शनकेँ ‘सरल’ नहि, ‘सजीव’ बनाबैत अछि। ३. पाश्चात्य नाट्य-सिद्धांत ३.१ ग्रामशी : सबाल्टर्न इतिहास आ जैविक बुद्धिजीवी इतालवी मार्क्सवादी विचारक आन्तोनियो ग्रामशी (Antonio Gramsci, १८९१–१९३७) अपन ‘प्रिजन नोटबुक’ (Prison Notebooks)मे ‘सबाल्टर्न’ (subaltern, अधीनस्थ/वंचित) समूहक इतिहासकेँ प्रभुत्ववादी इतिहास-लेखनक विकल्पक रूपमे प्रस्तुत कएलनि। ग्रामशी ‘जैविक बुद्धिजीवी’ (organic intellectual) कहैत छलाह ओहन व्यक्तिकेँ जे अपन समुदायक सांस्कृतिक अभिव्यक्तिकेँ उच्च साहित्यिक/बौद्धिक स्तर पर लऽ आबैत अछि। एहि परिप्रेक्ष्यमे कुणाल मैथिली रंगमंचक एक जैविक बुद्धिजीवी छथि—दुसाध सलहेस-महागाथाकेँ, जे पहिने मात्र सलहेस-नाचक सीमित सामुदायिक प्रदर्शन-परम्परामे जीवित छल, ओ उठा क’ विद्यापति भवनक आधुनिक रंगमंच पर लऽ आएल छथि। ई सांस्कृतिक अनुवाद (cultural translation) ग्रामशीक अर्थमे एक राजनीतिक कार्य थिक—सबाल्टर्न स्वर मुख्यधाराक सांस्कृतिक स्थलमे प्रवेश पाबैत अछि। ग्रामशीक दृष्टिसँ सलहेसक कारागार-भाषण सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण क्षण थिक—“हमर प्राण अहाँक मुट्ठी मे भ’ सकैए सम्राट। मुदा हमर विचार आ भावना केँ बान्हल नै जा सकैए।” ग्रामशी ‘सांस्कृतिक आधिपत्य’ (cultural hegemony)क विरुद्ध जे प्रतिरोध-रणनीति बतबैत छलाह, सलहेसक यैह वक्तव्य ओकर एक लोक-नाट्य संस्करण थिक। ३.२ जादू-यथार्थवाद : लोक-विश्वास-दृष्टिक रंगमंचीय उपस्थिति ग्रेट ब्रिटेन-कोलम्बियाई लेखक गार्सिया मार्केस (Gabriel García Márquez, १९२७–२०१४) आ भारतीय-ब्रिटिश लेखक सलमान रुश्दी (Salman Rushdie, जन्म १९४७) अपन कथा-लेखनमे ‘जादू-यथार्थवाद’ (magic realism)क प्रयोग कएलनि—जाहिमे अद्भुत/अलौकिक तत्त्व यथार्थक स्वाभाविक अंग बनि जाइत अछि, बिना कोनो विशेष आश्चर्य वा व्याख्याक। एहि नाटकमे ठनका (बाघ) आ बनका (भालु) सलहेसक वार्तालाप-साथी छथि, हिरामन (सूग्गा) स्वर्ग-मर्त्यक बीच संदेशवाहक छथि, दुर्गा साक्षात् प्रकट होइत छथि आ लोक-नायककेँ आशीर्वाद दैत छथि—ई सभ दुसाध लोक-विश्वास-दृष्टिक स्वाभाविक तत्त्व अछि, कोनो ‘चमत्कार’ नहि। जादू-यथार्थवादी सिद्धांतक परिप्रेक्ष्यमे एहि तत्त्वकेँ ‘magical’ नहि, ‘folk-cosmological real’ (लोक-ब्रह्माण्ड-वास्तविक) कहनाइ अधिक सटीक हएत। रुश्दीक एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत थिक जे जादू-यथार्थवाद तखन प्रभावी होइत अछि जखन लेखक स्वयं ओहि ‘जादू’केँ वास्तविक मानैत हो—कोनो बाहरी दृष्टिसँ थोपल अलंकरण नहि। कुणालक नाटकमे ई प्रामाणिकता अछि—ठनका-बनका, हिरामन, दुर्गा सभ कथाक संरचनाक अनिवार्य अंग छथि, सजावटी नहि। ३.३ ब्रेख्त : लेहरस्टुक (शिक्षण-नाटक) आ जन-राजनीति ब्रेख्त (Brecht) अपन ‘लेहरस्टुक’ (Lehrstück, teaching play)क सिद्धांतमे मानैत छलाह जे रंगमंच एक स्पष्ट राजनीतिक-नैतिक सन्देशक संवाहक बनि सकैत अछि। एहि नाटकमे समाजी आ हिरामन-विपटाक माध्यमसँ अनेक ‘शिक्षण-क्षण’ उपस्थित अछि—सलहेसक ‘भयमुक्त जीवनक मंत्र’, दुर्गाक ‘जन-मनमे विचरण आ लोक-हितक लेल जीवन-समर्पण’क आदेश। मुदा कुणाल ब्रेख्तसँ एक महत्त्वपूर्ण बिन्दु पर भिन्न छथि—ब्रेख्त भावात्मक तादात्म्यसँ दूरी चाहैत छलाह; कुणाल प्रेम-भाव आ लोक-सेवाकेँ एकहि सिक्काक दू पट्टा मानैत छथि। लेहरस्टुकक बौद्धिक-राजनीतिक शिक्षण एतय शृंगार-भाव आ भक्ति-रसमे डूमल अछि—ई एक प्रकारे ‘एमोशनल एपिक थिएटर’ थिक जे ब्रेख्तीय श्रेणीसँ परे जाइत अछि। ३.४ होमी भाभा : सांस्कृतिक पहचान आ प्रतिरोध इण्डियन-ब्रिटिश उत्तर-उपनिवेशवादी विचारक होमी भाभा (Homi Bhabha, जन्म १९४९) अपन ‘द लोकेशन ऑफ कल्चर’ (The Location of Culture)मे ‘तृतीय-स्थल’ (third space) आ सांस्कृतिक संकरता (hybridity) सन अवधारणा प्रस्तुत कएलनि—जाहिमे उपनिवेशित समूह उपनिवेशकारी प्रवचनकेँ आत्मसात करैत ओकर भीतरसँ ओकरा विघटित करैत अछि। एहि नाटकमे सूचोंगक षड्यंत्र—सलहेसकेँ कुसमासँ अलग करबाक योजना—एक उपनिवेशकारी रणनीति थिक। ओ जनैत अछि जे कुसमाक ‘सिनेह आ ज्ञान’ सलहेसक शक्ति-स्रोत थिक। कुसमाकेँ अलग केलापर सलहेस कमजोर पड़त। यैह भाभाक ‘सांस्कृतिक पहचान-नाश’ (cultural identity erasure) थिक जे औपनिवेशिक शासन अवलम्बित करैत अछि। सलहेस एहि योजनाकेँ चीन्हि जाइ छथि आ घोषणा करैत छथि जे भावना आ विचार बन्धन नहि मानैत अछि। ४. चीनी नाट्य-सिद्धांत ४.१ यी : धर्म-आचरण आ सैन्य-नैतिकता चीनी नैतिक-दार्शनिक परम्परामे ‘यी’ (righteousness/duty) एक केन्द्रीय मूल्य थिक। कन्फ्यूशियस परम्परामे ‘यी’क अर्थ थिक—कर्तव्य उचित प्रकारसँ निभाएब, भले ही ओ कठिन होइक। चीनी लोकनाट्य-महाकाव्यक सर्वप्रसिद्ध नायक ‘गुआन यू’ (Guan Yu / Guan Di) अपन ‘यी’ आचरणक लेल विख्यात छलाह—ओ अपन पराजित शत्रुकेँ सेहो सम्मान दैत छलाह। सलहेसक यैह ‘यी’-व्यवहार नाटकमे उपस्थित अछि—“हारि क’ पड़ाइत सेना केँ खिहारनाइ अनुचित बात भेलै”। ई केवल कूटनैतिक व्यावहारिकता नहि, एक नैतिक-सैन्य आचरण-सिद्धांत थिक जे भारतीय क्षत्रिय-धर्म आ चीनी ‘यी’-परम्परा दुनूसँ समर्थित अछि। गुआन यूक सन सलहेस सेहो अपन जनसाधारणक लेल एक लोक-देवता बनि जाइत छथि—युद्धक मैदानमे नहि, जनताक हृदयमे। ४.२ हुआलियान : नाटकीय पात्र-वर्गीकरण आ रंग-प्रतीक चीनी क्लासिकल रंगमंच (जिंगजू/बेइजिंग ओपेरा)मे ‘हुआलियान’ (painted face) पात्र-प्रकार एक विशेष भूमिका थिक—जाहिमे विभिन्न रंगक मुखाकृति पात्रक नैतिक-चारित्रिक स्वभाव सूचित करैत अछि। लाल मुख = साहस आ निष्ठा (गुआन यू); नील/हरियर = दुर्जेय शक्ति; उज्जर = खलनायक/कुटिल; कारी = बलशाली/न्यायकारी। एहि प्रतीक-व्यवस्थाकेँ ‘कुसमा-सलहेस’क पात्र-वर्गमे अनुवाद कएल जा सकैत अछि। सलहेस = लाल हुआलियान (साहस-निष्ठा); सूचोंग = सफेद हुआलियान (कुटिल-षड्यंत्री); चूहड़मल्ल = नील (सैन्य-बल); कुसमा = ‘तान’ (नारी-भूमिका, परंतु शक्तिशाली—‘वनदेवी’); हिरामन-विपटा = ‘चोउ’ (विदूषक); दुर्गा = ‘उमेन’ (divine appearance, shénmíng)। एहि वर्गीकरणसँ नाटकक पात्र-विन्यास एक सार्वभौम नाट्य-तर्क प्रदर्शित करैत अछि। ४.३ तियानमिंग : स्वर्गीय-आदेश आ नायकक धर्म चीनी राजनीतिक-दार्शनिक परम्परामे ‘तियानमिंग’ (Mandate of Heaven / स्वर्गीय-आदेश) एकटा महत्त्वपूर्ण अवधारणा थिक—जे शासक अपन प्रजाक कल्याण करैत अछि, ओकरा ‘तियानमिंग’ प्राप्त अछि; जे ओकरा भ्रष्ट करैत अछि, ओकर ‘तियानमिंग’ नष्ट भ’ जाइत अछि। दुर्गाक आशीर्वाद एहि नाटकमे ‘तियानमिंग’क अनुरूप थिक—देवी सलहेसकेँ ‘मात्र लोकक सुख लेल जीवन अरपन करबाक आदेश दैत छथि। ई स्वर्गीय-आदेश सलहेसक शासन-शक्तिकेँ वैधता दैत अछि। ओइ विरुद्ध सूचोंग—जे विस्तारवादी, लोभी, प्रजा-पीड़क अछि—क ‘तियानमिंग’ हीन अछि। कुणालक नाटकमे यैह नैतिक-राजनीतिक दर्शन अंततः सलहेसकेँ ‘विजयी’ घोषित करैत अछि—शस्त्र-बलसँ नहि, नैतिक-जनशक्तिसँ। ४.४ मिनजियान : लोक-नायकक नाट्यीकरण-परम्परा चीनी नाट्य-इतिहासमे लोक-नायकक नाट्यीकरण एक सुदीर्घ परम्परा थिक—‘मियाओ-झी-यिंग-जूंग-झुआन’ (Temple Hero Legends) जे लोक-देवताकेँ रंगमंचक नायक बनाबैत आएल अछि। सलहेस-नाचसँ एहि नाटकक सम्बन्ध ठीक एहि परम्पराक अनुरूप थिक—एक लोक-देवता (folk deity) पहिने लोक-रंगमंचक नायक बनैत अछि, तखन साहित्यिक रंगमंचक। चीनी परम्परामे यैह संक्रमण (लोक-मन्दिर-प्रदर्शन → साहित्यिक रंगमंच) ‘गुआन यू’क लोकगाथासँ ‘रोमांस ऑफ द थ्री किंगडम्स’ आ तखन नाट्य-रूपधरबाक धरिक यात्रासँ समानांतर अछि। सलहेस-गाथाक यैह यात्रा—सलहेस-नाच → ‘कुसमा-सलहेस’ (कुणाल, २००६)—एक सांस्कृतिक जीवन-चक्रक अभिव्यक्ति थिक। ५. इजरायली नाट्य-सिद्धांत ५.१ एली रोज़िक : पशु-पात्रक रंगमंचीय प्रतिमात्मकता एली रोज़िकक प्रतिमा-सिद्धांत (theatrical iconicity) एहि नाटकमे एक असाधारण परीक्षामे पड़ैत अछि—पशु-पात्रक प्रतिमात्मकता। ठनका (बाघ), बनका (भालु) आ हिरामन (सूग्गा) रंगमंच पर अभिनेता-शरीर द्वारा प्रस्तुत होइत छथि। रोज़िकक सिद्धांतक अनुसार, ई पात्र ‘icons’ थिकाह—ओ जे ‘देखाबैत’ छथि ओ एक काल्पनिक-पशु-जीवनक प्रतिरूप थिक, ने कि अभिनेता-शरीरक प्रतिरूप। एहिसँ अधिक महत्त्वपूर्ण—रोज़िक कहलाह जे रंगमंच मानव-पशु सीमाकेँ लाँघबामे सक्षम अछि कारण प्रतिमा (icon) वास्तविकताक सीमासँ मुक्त होइत अछि। ठनका-बनका-हिरामनक उपस्थिति दुसाध लोक-विश्वास-दृष्टिक एक ‘animistic iconography’ थिक—एक विश्वास-दृष्टि जाहिमे मानव, पशु आ आत्मा सब एकहि नाट्य-संसारमे बराबर सत्ता रखैत छथि। ई ‘transgressive iconicity’ (सीमा-नांघैत प्रतिमात्मकता) थिक। ५.२ मिज़राही-थिएटरक समानांतर : सांस्कृतिक हाशिया पर ठाढ़ परम्पराक पुनरुद्धार इजरायली रंगमंचमे ‘मिज़राही’ (मध्य-पूर्व/उत्तर अफ्रीकी यहूदी मूलक) सांस्कृतिक परम्परा बहुता काल धरि ‘अश्केनाज़ी’ (यूरोपीय यहूदी) प्रभुत्ववादी सांस्कृतिक मानकक कारण हाशिया पर रहल। मिज़राही थिएटर आन्दोलन (१९७०–वर्तमान) एहि हाशिया परम्पराकेँ—सेफ़ार्दी संगीत, पैतान/ज़मीरोत आदि—मुख्यधारामे अनबाक आन्दोलन थिक। कुणालक ‘कुसमा-सलहेस’ मैथिली सन्दर्भमे ठीक एहन आन्दोलनक रूपमे देखल जा सकैत अछि। दुसाध लोक-परम्परा (सलहेस-नाच) मैथिली सांस्कृतिक पदक्रममे कात-करोटमे रहल अछि—जतय विद्यापति, चन्दा-झा, आ अभिजन-काव्य-परम्पराक प्रभुत्व रहल। कुणाल एहि कात-करोटक परम्पराकेँ विद्यापति भवन (मैथिली संस्कृतिक संस्थाक केन्द्रीय स्थल) पर लऽ जा क’ एक सांस्कृतिक-राजनीतिक दावा कएलनि। ५.३ हन्ना आरेंड्ट : ‘जन्मता’ आ सार्वजनिक कार्य जर्मन-अमेरिकी राजनीतिक दार्शनिक हन्ना आरेंड्ट (Hannah Arendt, १९०६–1९७५) अपन ‘द ह्यूमन कंडीशन’ (The Human Condition)मे ‘नैटालिटी’ (natality, जन्मता) अवधारणा प्रस्तुत कएलनि—प्रत्येक राजनीतिक कार्य (political action) एक नवीन आरम्भ थिक, एक प्रकारका ‘जन्म’। सार्वजनिक क्षेत्र (public realm) मे ई कार्य अमर होइत अछि कारण ओकर साक्षी होइत अछि। सलहेसक कारागार-वक्तव्य—“नहि रहता सलहेस मुदा भयमुक्त जीवनक मंत्र सँ भरल जनता रहतै”—आरेंड्टक अर्थमे एक ‘राजनीतिक कार्य’ थिक। ई वक्तव्य सूचोंगक कारागारमे कहल गेल (साक्षी : सूचोंग स्वयं), आ एहि साक्ष्यमे ई ‘अमर’ भ’ जाइत अछि—‘नैटालिटी’क एक नाट्य-क्षण। कुणाल एहि दृश्यद्वारा सलहेसकेँ लोक-देवतासँ ‘राजनीतिक कार्यकर्ता’मे रूपान्तरित करैत छथि। ५.४ शिमोन लेवी : समन्वयवादी सुमिरन आ ‘पवित्र रंगमंच’ शिमोन लेवी अपन ‘थिएटर ऑफ द सेक्रेड’ (Theatre of the Sacred) सिद्धांतमे तर्क दैत छलाह जे रंगमंच पर जखन सामुदायिक-धार्मिक मूल्यक पुनःप्रस्तुति होइत अछि, तखन ओ धार्मिक-अनुष्ठानक एक धर्मनिरपेक्ष-रूपांतरण थिक। एहि नाटकक पूर्वरंगक सुमिरन शिमोन लेवीक सिद्धांतक एक विशेष परीक्षा प्रस्तुत करैत अछि। ई सुमिरन केवल हिन्दू धार्मिक आह्वान नहि—ओहिमे मुस्लिम पीर ‘मीरा-सुलतान’ (पश्चिम दिशाक देवता) सेहो सम्मिलित छथि। “परिनाम, नमस्ते, आदाब, गुड इवनिंग, सलाम”—ई दर्शक-सम्बोधन सभ धर्म, भाषा, वर्ग आ राष्ट्र-राज्यक सीमाकेँ एकहि साँसमे नांघि जाइत अछि। लेवीक परिप्रेक्ष्यमे ई एक ‘radical sacred’ (क्रान्तिकारी-पवित्र) रंगमंच थिक—जे विभाजक पहिचानकेँ अस्वीकार क’ एक समावेशी सामुदायिकताक स्वप्न रचैत अछि। ६. चतुर्भुज-संश्लेषण संग्रहक शीर्षक-नाटकक रूपमे ‘कुसमा-सलहेस’ चारू नाट्य-परम्पराक समीक्षामे एकहि संग सर्वाधिक उर्वर आ सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण कृति थिक। एकर बहुआयामिता कोनो एक समीक्षा-दृष्टिसँ समाहित नहि होइत अछि। भारतीय दृष्टि—सलहेस-नाचक स्वायत्त लोकनाट्य-व्याकरण; रस-महोत्सव (शृंगार+वीर+भक्ति+अद्भुत); सबाल्टर्न-सौन्दर्यशास्त्रक नाट्य-प्रकटीकरण; दुर्गाक आशीर्वाद = प्रेम+ज्ञान+लोक-सेवाक अभेद-घोषणा। पाश्चात्य दृष्टि—ग्रामशीक जैविक बुद्धिजीवी; जादू-यथार्थवादक प्रामाणिक लोक-संस्करण; ब्रेख्तीय ‘इमोशनल एपिक थिएटर’; भाभाक सांस्कृतिक पहचान-प्रतिरोध। चीनी दृष्टि—गुआन-यू-सदृश यी-नैतिकता; हुआलियान पात्र-वर्गीकरण; तियानमिंग= दुर्गाक स्वर्गीय-आदेश; मिनजियान लोक-नायक-नाट्यीकरण-परम्परा। इजरायली दृष्टि—रोज़िकक transgressive animistic iconicity; मिज़राही थिएटरक सांस्कृतिक समानांतर; आरेंड्टक नैटालिटी (कारागार-वक्तव्य = राजनीतिक जन्म); लेवीक radical sacred सुमिरन। चारू परम्पराक साझा निष्कर्ष—ई नाटक एक ‘सांस्कृतिक न्याय’ (cultural justice)क कार्य थिक। दुसाध सलहेसकेँ मैथिली साहित्य-मंचक केन्द्रमे आनब; लोकनाट्यकेँ साहित्यिक नाटकक आधार बनाएब; प्रेम आ जन-सेवाकेँ एक अभेद तत्त्व घोषित करब—ई तीनू कार्य एकहि संग भारतीय, पाश्चात्य, चीनी आ इजरायली नाट्य-चिन्तनक मानदण्डमे ‘उत्कृष्ट’ आ ‘आवश्यक’ सिद्ध होइत अछि। नाटककेँ सम्पूर्ण करएवला अंतिम टेक—“प्रेम सत्य छै, प्रेम छै सौरभ, प्रेमक भाव चिरंतन / बिनु मकरंदक कुसुम हो तहिना, प्रेम बिना की जीवन”—एहि सभक व्याख्या अतीतमे जाइत अछि। ई वाक्य समग्र संग्रहक आत्मा-घोषणा थिक। अगिला अंकमे : प्रेम-प्रतिज्ञा उर्फ श्रुवावतीक जय! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। पद्य Poetry ३.१. तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम'] मूल तेलुगु: नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव) मैथिली अनुवाद: मानेश्वर मनुज [खण्ड ७] ३.२. अशोक कुमार ठाकुर-विदेह ४४४/ ई-विदेह :-मैथिलीक प्राण-दीप/ योग : जीवनक अमृत/ संत कबीर : मानवताक अमर दीप ३.३. जगदानन्द झा "मनु"- २ टा गजल ३.४. आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल ३.५. राम शंकर झा "मैथिल"-तरुआ ३.६. डा. किशन कारीगर- अहाँ अपना टा बाजब लिखब के मैथिली कहलियै ३.७. झौली पासवान- देशक गुणगहवर/ होमय दियौ प्रलय ३.८. प्रणव कुमार झा- जलक क्रंदन - रैंक १२० ३.१. तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम'] मूल तेलुगु: नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव) मैथिली अनुवाद: मानेश्वर मनुज [खण्ड ७] तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम' केर लेखक छथि नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव)] मूल तेलुगु लेखक नग्नमुनि एक परिचय नाम: मानेपल्लि हृषीकेशवराव जन्म: 15 मई 1940 जन्म स्थान: शहर- तेनाली, जिला- गुंटूर (आंध्र प्रदेश) वृत्ति: चीफ ऑडिटर, आंध्र प्रदेश विधान सभा, तकर बाद डिप्टी सेक्रेटरी, ओतहि लिंक: पहिने साम्यवादी (कम्युनिस्ट), बादमे राष्ट्रवादी (नेशनलिस्ट) संस्था: अविभाज्यक जनतंत्र, 1990 आंदोलन: दिगम्बर कविता आन्दोलन 1965 लक्ष्य: नंगट, भूखल, दीन, दरिद्रक हित कृति: उदयिंचनि उदयलु (ओ उदय जे उदित नहि भेल) पूर्वा हवा जम्मि चेट्ट विशेष: 1977 ई. मे बहुचर्चित काव्य- 'कोय्या गुर्रम' (KOYA-GURRAM), जकर अर्थ अछि- 'काठक घोड़ा', भाव- 'नकली सरकार'। 19 नवम्बर 1977, शनि दिन बंगालक खाड़ीमे पचास-साठि फुट ऊँच लहड़ि उमड़ि कऽ कृष्णा जिलाक दिविसीमा क्षेत्रकेँ डुबा कऽ नष्ट कऽ देलक। हजारो लोक मारल गेलाह। ई घटना काव्यक वस्तु बनल। विषय आ परिस्थितिसँ उपजल ई काव्य हिन्दी कवि मुक्तिबोधक 'अंधेरे में' क बराबरीक अछि। मैथिली अनुवादक नाम: मानेश्वर मनुज जन्म: गाम- गम्हरिया (बेनीपट्टी) मधुबनी। जनवरी 1958 (प्रमाण पत्रक अनुसार)। वृत्ति: भारतीय नौसेनामे तकनीकी सहायक, तकर बाद भारतीय रेलक वाणिज्य विभाग सँ (रिटायर्ड)। कृति: 'सम्बन्ध', कथा संग्रह (मैथिली) 2007 'कि', कविता संग्रह (मैथिली) 2011 'परिवर्तन', कहानी संग्रह (हिन्दी) 2019 'बेघर', कविता संग्रह (हिन्दी) 2022 'तालाब', कहानी संग्रह (हिन्दी) 2024 अनुभव: विभिन्न भाषा सँ हिन्दी आ मैथिलीमे अनुवाद। हिन्दी आ मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिकामे लेख, कविता, कथा, कहानी इत्यादि प्रकाशित। अनुवादकक टिप्पणी: अनेक तेलुगुमित्र, स्वयं नग्नमुनि जी, हिन्दी तथा अंग्रेजी मे अनुदित पुस्तकक मदति सँ दीर्घ काल तक मंथन कयलाक बाद अनुवाद कयल गेल अछि। ई नग्नमुनिक प्रसिद्ध कविता अछि। नग्नमुनि सँ लगातार हमर पत्राचार होइत छल। ओ अंग्रेजी आ तेलुगुक विद्वान छलथि। हुनक किछु पत्र देसिल-बयना, हैदराबाद मे छपल अछि। -मानेश्वर मनुज सम्पादकीय टिप्पणी (खण्ड-७) 'जिवैत घोड़ा' आ 'काठक घोड़ा' केर बीच रचल प्रतीकात्मक द्वन्द्व, जिवैत घोड़ा वेग, विश्वास, विजय आ सुदृढ़ शासनक प्रतीक बनि ऐतिहासिक-सांस्कृतिक स्मृतिमे प्रतिष्ठित अछि; मुदा कवि एकर सोझाँमे ठाढ़ करैत छथि काठक घोड़ा- एहन सत्ता जे केवल आकृतिमे घोड़ा अछि, प्राणमे नहि। ई असमर्थताक, अहंकारक आ मूर्खताक प्रतीक बनि उभरैत अछि, जकर हिनहिनाहटि सेहो खोंट रुपैयाक बेसुर आवाज जकाँ कृत्रिम अछि। कविताक सभसँ मार्मिक बिम्ब ओ अछि जतय मेहनति करय बला जनताक पीठ पर सवार ई काठक सत्ता, माथ उठेनिहार मजदूरकेँ निर्दयतापूर्वक थकुचि दैत अछि। काठक तलवार लऽ जुलूसमे निकलनिहार 'निकम्मा सरकार' केर बिम्ब, आ अन्तमे एकरा मंदिरक देवाल पर सटल मौगी-मनसाक नग्न आकृतिसँ जोड़ब, सत्ताक धार्मिक-सांस्कृतिक आवरणमे नुकाओल खखरी सन तीक्ष्ण व्यंग्यसँ बेधैत अछि। ई सत्ता आ जनताक बीचक सम्बन्धपर एक धारदार राजनीतिक-सामाजिक टिप्पणी थिक।- गजेन्द्र ठाकुर नग्नमुनिक तेलुगु काव्य 'काठक घोड़ा' (कोया गुर्रम) खण्ड-७ जिवैत घोड़ा वेग आ विश्वासक मूर्ती अछि विजय आ शासनक सुदृढ़ प्रतीक अछि मुदा काठक घोड़ा - ठुट्ठ, मूर्ख, अज्ञान आ अहंकार भरल असमर्थताक प्रतीक अछि। मुदा काठक घोड़ा बददर रुपैयाक खोंट आवाज जकाँ अजीब ढंग सँ हिनहिनाइत अछि काठक घोड़ा जमीन पर नहि चलैत अछि ओकरा खुढ़ मे घोड़ाक नाल छै ओकर हृदय कठोर छै, काठक छै धनक घमंड सँ ओ इतराइत अछि जनताक तरुआरि पर सवार ओ मेहनैत करऽवला, माथ पर भारी बोझ उठावऽवला कोनो मेहनती मनुक्ख माथ उठाबय तँ काठक घोड़ा भयंकर रूपे हिनहिनाइत अपना पैरक तर ओकरा निर्दयतापूर्वक ओकरा पीच-पाइच देत काठक तलवार हाथ मे लऽ जुलूस मे निकलैत अछि निकम्मा सरकार तखन ओ देखैत लगैत अछि बुझू, मंदिरक देवाल पर चिपकल मौगी, मनसाक नग्न आकृति -मानेश्वर मनुज आदर्श नगर कॉलोनी गोशाला रोड मधुबनी पिन - 847211 मो. - 9920674861 / 7464077106 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.२. अशोक कुमार ठाकुर-विदेह ४४४/ ई-विदेह :-मैथिलीक प्राण-दीप/ योग : जीवनक अमृत/ संत कबीर : मानवताक अमर दीप अशोक कुमार ठाकुर विदेह ४४४/ ई-विदेह :-मैथिलीक प्राण-दीप/ योग : जीवनक अमृत/ संत कबीर : मानवताक अमर दीप १ विदेह ४४४ विदेह केवल पत्रिका नहि, मैथिलीक एक उज्ज्वल द्वार अछि। जतय शब्द पाबैत नव जीवन, आ संस्कृति केर श्रृंगार अछि॥ छोट हो वा पैघ कवि-लेखक, सभकेँ समान सम्मान भेटै। प्रतिभाक दीप जराबऽ लेल, सभकेँ आगाँ बढ़बाक स्थान भेटै॥ मिथिलाक विलुप्त होइत शब्द, एतय फेर सँ जीवन पाबै छै। कविता, कथा आ लोक-स्मृति बनि, नव पीढ़ी धरि संदेश पहुँचाबै छै॥ गामक बोली, लोकक भाषा, एतय सहेजल धरोहर बनल। माटिक सुगंध, जन-मनक पीड़ा, शब्द-शब्द मे अमरत्व पाओल॥ हे आदरणीय श्री गजेन्द्र ठाकुर जी,अहाँक प्रयास प्रशंसनीय अछि। मैथिली सेवा केर ई साधना, साहित्य जगत लेल वंदनीय अछि॥ अहाँ सभ रचनाकार केँ, मान, सम्मान आ अवसर दैत छी। मैथिलीक नव अंकुर सभकेँ, विश्वक मंच धरि पहुँचा दैत छी॥ विदेहक ई उज्ज्वल यात्रा, युग-युग धरि प्रकाश फैलाबय। मिथिलाक भाषा, संस्कृति, गौरव, सदिखन नव ऊँचाइ पाबय॥ पाक्षिक विदेह ई-पत्रिका (अंक ४४४) मे स्वरचित कविता प्रकाशित होएबाक अवसर देबाक लेल आदरणीय संपादक श्री गजेन्द्र ठाकुर जीक प्रति हार्दिक आभार। २
ई-विदेह :-मैथिलीक प्राण-दीप ई-विदेह केवल पत्रिका नहि, मैथिलीक धड़कन, प्राण अछि। मिथिलाक माटिक सुगंध सँ भरल, भाषाक पावन सम्मान अछि।
जतय नहि कोनो छोट-पैघ छै, नहि यश-अपयशक व्यापार। नव अंकुर आ वटवृक्षक बीच, सभकेँ भेटै समान अधिकार।
जतय नव कविक स्वर गूँजै छै, वरिष्ठक अनुभव संग-संग। शब्द-शब्द मे संस्कृति बोलै, मिथिलाक अमिट रंग-अनंग।
जे शब्द समयक धूलि तले, वर्षौं सँ पड़ल विस्मृत छल। विदेहक पन्ना पर आबि फेर, जीवनक नव संचार भेल।
लोककथा, लोकगीत, कहबी, सभकेँ एतय स्थान भेटै। मातृभाषाक हर धरोहर केँ, नव पीढ़ीक पहचान भेटै।
हे गजेन्द्र ठाकुर जी अहाँ, भाषा-सेवाक दीप जरौलहुँ। असंख्य प्रतिभाक स्वप्न सभकेँ, साहित्यक आकाश देलहुँ।
अहाँक निष्पक्ष दृष्टि सँ, कतेको कलम उजागर भेल। कतेको नव रचनाकारक, जीवनक पहिल सम्मान भेल।
पाक्षिक अंक चारि सय चवालीस, मैथिलीक गौरव-गाथा अछि। ज्ञान, सृजन आ संस्कृतिक, एक अनुपम परिभाषा अछि।
हमरो स्वरचित कविता केँ, जतय स्थान ससम्मान भेटल। साधारण शब्दक एहि साधक केँ, रचनाकारक पहिचान भेटल।
एहि लेल हृदयक गहिराइ सँ, आभारक अर्पण करैत छी। विदेह आ अहाँक चरणमे, श्रद्धाक पुष्प समर्पित करैत छी। [युग-युग धरि विदेह प्रकाशित हो, मैथिलीक मान बढ़ाबैत रहय। मिथिलाक भाषा, संस्कृति, साहित्य, विश्व-दिशामे ज्योति फैलाबैत रहय॥] [आदरणीय संपादक गजेन्द्र ठाकुर जीक प्रति कृतज्ञता-समर्पण] ३ योग : जीवनक अमृत योग हमर प्राचीन धरोहर, भारतक गौरव-गान। तन-मनकेँ स्वस्थ बनाबय, योगक अनुपम दान।
भोरक पहिल किरण संगहि, जँ योगक अभ्यास करब। आलस, चिन्ता,रोग भगाकऽ, नव उत्साह सँ जीवन भरब।
योग सिखाबय संयम हमकेँ, योग सिखाबय ध्यान। योग सँ बढ़ैत आत्मबल, मिलैत नव सम्मान।
भाग-दौड़ भरल एहि जीवनमे, मोन अक्सर घबड़ाय। योगक शीतल छाँह पाबि कऽ, मन फेर मुस्काय।
प्राणायामक हर श्वासमे, नव जीवनक सार। स्वस्थ शरीर, निर्मल मन, योगक अनुपम उपहार।
आउ मिलि कऽ संकल्प करिऐ, योग अपनाएब हम। स्वस्थ, सुखी आ सबल समाजक, नव आधार बनाएब हम।
योग मात्र व्यायाम नहि, जीवनक विज्ञान। तन, मन आ आत्माक मेल, एहि मे अछि कल्याण। ४ संत कबीर : मानवताक अमर दीप
(मौलिक मैथिली कविता)
भोरक अरुणिमा, गंगाक धार, जगमे आयल एक उजियार। कमल-पात पर शिशु मुस्कायल, धरतीक भाग्य नवका जगमगायल।
नीरू-नीमा प्रेमे पालल, ममताक अँचलमे सँभारल। गरीबी छल, नेह अपार, ओहि घर जन्मल प्रेमक संसार।
काशी बनल कर्मभूमि प्यारी, करघा संग बीतल जिनगी सारी। सूतक डोर जकाँ जीवन बुनल, सत्य-प्रेमक संदेश सुनल।
रामानन्द गुरु कृपा बरसौलनि, ज्ञानक दीप हृदयमे जरौलनि। "राम" नाम बनल जीवन आधार, दूर भेल अज्ञानक अन्हार।
जाति-पाँतिक बान्हन तोड़ल, मानव-प्रेमक दीपक जोड़ल। हिन्दू-मुसलमान एक समान, सबमे देखल ईश्वरक स्थान।
दोहा-दोहा अमृत बरसल, सुतल समाज फेर सँ जागल। पाखंड, लोभ, अभिमान हरौलनि, सच्चाईक बाट सबकेँ देखौलनि।
जीवन भरि श्रमक मान बढ़ौलनि, प्रेम-दयाक फूल खिलौलनि। नहि राजसिंहासन, नहि अभिमान, मानव सेवा छल पहचान।
अंतिम बेला मगहर गेला, अंधविश्वासक परदा फाड़ि देला। देह विलय भेल प्रकृतिक संग, नाम अमर भेल युग-युग रंग।
आइयो गूँजै हुनकर बानी, प्रेम-दयाक अमृत कहानी। जतए रहत मानव सम्मान, ततए अमर रहत कबीरक नाम।
आउ, हम सभ प्रण एतबे करी, सत्य-प्रेमक दीप सदिखन धरी। कबीरक आदर्श हृदयमे बसाउ, मानवताक नव प्रभात जगाउ।
-अशोक कुमार ठाकुर; ग्राम–करमौली, पोस्ट–करमौली; थाना–खजौली, जिला–मधुबनी (बिहार) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.३. जगदानन्द झा "मनु"- २ टा गजल जगदानन्द झा "मनु" २टा गजल १ हम अहाँकेँ देखिते सुधि बिसरि गेलौं लेसने बिन आगि सौंसे पजरि गेलौं प्राण लेलक आँखि मिलनाइ हरजाइसँ खा कऽ मोने मोन मुँगबा पसरि गेलौं अछि जकर मुस्की इजोते सगर चकमक मोरिते मुँह पानि बिन हम पिछरि गेलौं स्वर्ग भेटल ओ अहाँ बिन नरक भेलै छोरि सुख बैकुंठकेँ झट ससरि गेलौं देख निरमल नेह हुनकर हिया गदगद बुझि सफल ‘मनु’ भेल सपना झहरि गेलौं (बहरे कलीब, मात्राक्रम 2122-2122-1222) २ पोथीक तर दबि पढ़ुआ सगर मरि गेल जे प्रेममे डूबल जीविते तरि गेल सदिखन जतय मनमे छल डरक आतंक अबिते अहाँके नव फूल फल फरि गेल धरती तपल छल जे पानि बिन तरसैत हथियाक हँसिते बरखा निमन परि गेल आनक सुखक चिंता बेस अप्पन दुखसँ डाहसँ कतेको घर तेल बिन जरि गेल पाथरसँ ‘मनु’ शाइर बनि रहल अछि आब तोरासँ जे मृगनयनी नजरि लरि गेल (बहरे सलीम, मात्राक्रम - 2212-2221-2221) -जगदानन्द झा ‘मनु’, मो० न० +९१ ९२१२-४६-१००६ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.४. आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल आशीष अनचिन्हार २ टा गजल १ पानिमे पानि परसल जाइए आगिमे आगि बाँटल जाइए
शब्दपर शब्द लीखल जाइए अर्थ बस अर्थ छूटल जाइए
भेल कोंढ़ीक चर्चा रातिमे भोरमे फूल लोढ़ल जाइए
छै अपन ढेप माटिक मोल नै आनकेँ सोन बूझल जाइए
बेरपर आसमे चुप रहैए बेरपर ढोल पीटल जाइए
सभ पाँतिमे 212-2122-212 मात्राक्रम अछि। २ सत्ता के मातल नेता एलै दुआर हे दुखमे ई झड़कल जनता फोड़ल कपार हे
रचनामे साधु छै जीवनमे किछु आर हे एहनकेँ माने बुझियौ बड़का छिनार हे
नोरे छै कोसी कमला गंगा किनार हे नोरेमे घोरल गेलै सिंदुर पिठार हे
आँगनमे रेखा पड़तै भेलै विचार हे अपने के केलक पहिने अपने शिकार हे
मुद्दा तँ लीखै तेना जेना सरकार हे सरकारक आगू भेलै बंदे बकार हे
सभ पाँतिमे 22-22-22-22-22-22 मात्राक्रम अछि। दू अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि। ई गजल लोकधुनपर आधारित अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.५. राम शंकर झा "मैथिल"-तरुआ राम शंकर झा "मैथिल" तरुआ
आय भोरहरिये सँ
रहि रहि छनमन
भनसा घर सँ महक
गमक तरुआक
आय भोरहरिये सँ...!
बाड़ी कें टाट पअर
चतरळ
पुरना घरारि पअर
ळटकळ
कोरो बाती सङ्ग
बरेरी चढ़ळ
ळाळ फर सङ्ग
हरियर तिलकोर
भरि बारि सुन्नर
सन जुआळ पात
नेहु नेहु तोरैथ
चिकन चुनमुन
पात तिळकोर
खन खन बाजैत
हाथक लहठी
आय भोरहरिये सँ...!
अरबा चाउर सङ्ग
बेसनक घोळ
लबका चूल्हा सङ्ग
लबका झाँझ
गोल गोल गोईठा
मिठ मिठ आँच
नरम नरम हाथ सङ्ग
सांनळ पिठार
आय भोरहरिये सँ...!
मन बहकै सङ्ग
उमंगक बसात
करकैत तेल पहिळ
घानी तरुआ
भोग ळगायब चढ़ळ
केराक पात
गोसांई घरक भगवती
सङ्गअछिँजळ
असुरगब
आय भोरहरिये सँ...!
करकर आरतिक
पात सन पातर
मुंह मे विळाअ जेना
हवा मिठाई
सब कियौ बाजअ
सब करैय बखान
ई कनियाँ होंसगर
छथि बढ़ लूरिगर
आय भोरहरिये सँ...!
भरि टोळ हकार
भरि टोळ खाअक
रंग बिरंग तरकारी
सङ्ग सांठळ सचार
ताहि पअर सोन सन
करकर झळकैय
कोबी कदीमा भांटा सङ्ग
तरुआ तिलकोर
बढ़ हुळेसँ बढ़ स्नेह सँ
भरि भरि बाकुट
ळारैत मुँह नहिं अघाईथ
सङ्ग गुण गाबैथ
आह कतेक वरख बाअद
ऐंहन सोहनगर
पाओळ तरुआ
कटुम दियाद फरिक
सङ्ग पुछा गोंआरि
आय भोरहरिये सँ...!
एतेक ळूरिगर छथि
ई कनियाँ काए बहिन
ज्यों हमरौ घर आबथि
एहने पुतौह
घोघे तअर सँ बाजि
उठळीह ळाळ मैयां
हे हे हअम करि निहोउरा
कळ जोरि
जुनि कियौ नजर लगाबु
गुजैरि लगाबु
कतेक एकादशी कतेक
केएलहुँ एकसंझा
तखन सुनळाह डिहबार
सङ्ग ओढ़रधानी
सबटा जानैथ छथि
दीनानाथ उगलाहा
आय भोरहरिये सँ
रहि रहि छनमन
भनसा घर सँ महक
गमक तरुआक
आय भोरहरिये सँ
रहि रहि छनमन!!
राम शंकर झा"मैथिल"
उघरा, दरभंगा l
Mo -7970778787
Mail -jharam1977@gmail.com -राम शंकर झा "मैथिल", उघरा, दरभंगा, मो-7970778787, Mail- jharam1977@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.६. डा. किशन कारीगर- अहाँ अपना टा बाजब लिखब के मैथिली कहलियै डा. किशन कारीगर अहाँ अपना टा बाजब लिखब के मैथिली कहलियै
आ अनकर बजबाक लिखबाक टोन शैली के कोन हिसाबे राड़/कोसिकन्हा कहबा देलियै? मानकी दललपनी/ व्याकरणक भवडाह बंद करै जाउ ई पुरूस्कारी खेल त आब पब्लिको नीक स बूझैइए.
अहाँ सब निर्लज्ज भेल मानकी पाखंड मे मैथिली साहित्य समाज के वर्गभेद मे बंटैत एलहुं की बारहो बरण के लोक शैली के कहियो? अहाँ सब मैथिली कहबाक बेगरता नै बुझलहुँ?
अहिं के कहनाम जे सबटा ज मैथिलीए छियै त फेर शुद्ध अशुद्ध मैथिली के भेद कथि के? लोक समाज स मैथिली कटैत गेल अहाँ सबके अकादमी पुरस्कार स संतोख नै भेल?
की दिक्कत यै समावेशी मैथिली स? अहाँ अपना शैली के मानै छी नीक बात ओकरा संगे अनकर लोक बाजब शैली सेहो जोड़ू आ जल्दी मानकी दललपनी सब छोड़ू
मैथिली भाषा साहित्य मे बारहो बरण रहतै त लोक समाज जुड़त बुझत मैथिली साहित्य के सबके बोली के एकदम बराबर सम्मान हेतै ई नीक काज किए ने करै जाई छी?
बंद करै जाउ भाषा साहित्य नामे एकाधिकार मैथिली अहिं टा के बपौती नै ने छी. कतबो समावेशी मैथिली के हो हल्ला होउ अहाँ तइयो संपादित क मानकी मैथिली किए करै छी? - डा. किशन कारीगर, मूल नाम- डा. कृष्ण कुमार राय) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.७. झौली पासवान- देशक गुणगहवर/ होमय दियौ प्रलय झौली पासवान देशक गुणगहवर/ होमय दियौ प्रलय देशक गुणगहवर जै माटिक कण-कण ललित चानन लिलारक, गुंजायमान सर्वत्र विश्व भरि सुयश बिहारक। आस्थाक जे केन्द्र, देशक उन्नत ललाट के, झुकि नमन करी अई देशक राज्य बिहार के। गौरवशाली अछि अतीत अप्पन बिहारक, ज्ञान-विज्ञानक केन्द्र, केन्द्र जे राजनीतिक। सभ्यता, संस्कृति आ जनजनक उत्तम विचार के, झुकि नमन करी अई देशक गुणगहवर बिहार के। सम्राट हास्य कवि गोनू झा, कवि कोकिल विद्यापति महान, उगना रूप धरौलनि शंकर के नहि जानय सकल जहान। यशोगान भय रहल विश्व भरि मिथिला पेन्टींग के, झुकि नमन करी अई देशक राज्य बिहार के। अतिथि होइछ भगवान जतय सिद्धान्त मेटत नइ दोसरठाम, मिथि के मिथिला राज्य एत्तई गौतम पौलनि ज्ञान। त्रिनद चर्चित कोशी, कमला, आ बलान के, झुकि नमन करी अई देशक राज्य बिहार के। बरबस खींचय ध्यान मेला सोनपुरक विख्यात, बरबस खींचय ध्यान एतुक्का तीर्थ गयाजी धाम। जक्कर विकसित भाल विकसित बहुविधि कला निधान के, झुकि नमन करी अई देशक राज्य बिहार के। बलिदानीक ई गहवर रहवर विद्वानक युग-युग सँ, हृदय शोक, तरुवर अशोक, बढ़ाबय गामक शोभा। बरगद, नीम, पीपर पूजित पुण्य भूमि जे बुद्ध के, झुकि नमन करी अई देशक राज्य बिहार के। युग-युग बँटलक ज्ञान जगत के, ज्ञान केन्द्र नालन्दा, आर्यभट्ट गणितज्ञ के के नहि जानय सकल जहान। पुण्य भूमि राजेन्द्र प्रसादक धरती वीर कुँवर सिंह के, झुकि नमन करी अई देशक राज्य बिहार के। उर्वर जतुक्का माटि, श्रमशील जतय मजदूर-किसान, जतय अहर्निश प्रकृति पूजा, प्रकृति जतय भगवान। मर्यादा सँ बान्हल जतुक्का बात आओर व्यवहार, झुकि नमन करी अई देशक राज्य बिहार के। २ होमय दियौ प्रलय होमय दियौ प्रलय, सगुण निर्गुण सभ एक्के, नाचि रहल ब्रह्माण्ड, चराचर शान्त निछक्के। लख चौरासी जीव, कहू ई के देखलक अछि, आवागमनक काल कहू ई के जनलक अछि। जीव-जीव सभ एक्के, जीवन आशा एक्के, लघु, बृहद, प्रभु वर्ग, प्रभृत सभ जाति निछक्के। अनुपम जीवन शृंखला, जीवे पर आश्रित जीव, क्षमा, दया, तप, त्याग ई हितकर सम्बल अछि। अण्डज हो वा पिण्डज, जीव ई दुन्नू एक्के, तैयो लक्षित अन्तर दुहू दू जाति निछक्के। सभ शोषक एक्के जाति विजातिकेँ के चिन्हलक अछि, स्वार्थक पोटरी बान्हि सभकेँ सभ ठकलक अछि। कर्म जीवनाधार मनुक्खक जाति अछि एक्के, मनुक्ख मनुक्खमे भेद करय, शोषक वर्ग निछक्के। सम्मुख मिठगर बात, बसन भाड़ी-भरकम, नहि खीरा नहि काँकरि भीतरके देखलक अछि?। दिल मिलला सँ भावदियादी झूठ साँच सभ एक्के, पड़िते दरारि टूटि गेल आड़ि, दियादी दुश्मन बुनल निछक्के। उपजल विकृत भाव विचार, नीको भेल बाँतर, कहियो ककरोसँ कम अपनाकेँ के बुझलक अछि। लागल चोट पर चोट, तखने टूटल निन्न अचक्के, ओकरा जनैत हमरेमे छल सभ दुर्गुण भरल निछक्के। उपरतक्के बनल सभ देखत के जमीन के, बाहरे सभ दिन नजरि सभकेँ भीतरके देखलक अछि? - झौली पासवान, मो० ८७५७०४०१०३, ग्राम + पोस्ट — बिरसैर, भाया — पंडौल, थाना — सकरी, जिला — मधुबनी, पिन कोड — ८४७२३५४ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.८. प्रणव कुमार झा- जलक क्रंदन - रैंक १२० प्रणव कुमार झा जलक क्रंदन - रैंक १२०
पग-पग पोखैर आर माछ, मखान, कहाई अछि इ मिथिलाक शान। मुदा ई कहैत मन भरि जाइ अछि, माटि दूषित जल से आई थरथराइ अछि।
122 देशक जल-स्वच्छता सूचकांक, भारतक स्थान देखू, हे प्रभु, हे राम! एक सौ बीसम नंबर पर ठाढ़ छी, विषाक्त जल पीबय लेल लाचार छी।
इंदौरक देखू ओ भीषण तबाही, जकर स्वच्छताक छल सर्वे गवाही। ऊपरसँ चकमक, भीतर सँ सड़ल अछि, पाइप में गंदा नाला आबि मिलल अछि।
भगीरथपुरा में मातम पसरि गेल, कतेको मायक कोरा उजरि गेल । कॉलरा-इकोलाई नल सँ बहै छल, सभ सँ स्वच्छ शहर सिसकी भरै छल!
पलवलक देखू ओ क्रूर विभीषिका, पंद्रह दिन में पंद्रह टा अर्थी उठलका। छौ बच्चा लीवरक दर्दसँ मरि गेल, सरकारी पानि गामक काल बनि गेल। सैम्पल फेल भेलै, कोलीफॉर्म भेटलै, अपन व्यवस्थाक पोल आब खुजि गेलै।
गंगा-यमुना कऽ जे पूजैत अछि समाज, किए गिरेलक ओकरा पर एहन गाज । बी.ओ.डी बढ़लै, ऑक्सीजन गेलै घटि, औद्योगिक कचड़ा सँ नदीक छाती गेलै फटि।
दिनेश मिश्रक कोशी आ अनुपम मिश्रक तालाब, आइ सभ सँ माँगि रहल अछि जवाब। कत्तय गेल ओ अहार-पाइनक सुंदर व्यवस्था? कोना बढ़ल समाज मे जलाशय अतिक्रमणक प्रथा ! अपनहि लोभ अपन सभ्यता कऽ खाय अछि। चापाकल सँ जल संगे आर्सेनिक अबै अछि।
हड्डी गलावय लेल फ्लोराइडक सचार, गाम सँ शहर धरि कैंसरक अछि हाहाकार। तैयो सुतल अछि अपन इ बहीर सरकार। लोकसभ के ऐ बात से किए होई सरोकार !
जौं करोड़ो करय स्वच्छ जलक तलाश त अहिं काहू ई केहन अछि विकास ! पैसा सँ नै मिटतै स्वच्छ जलक प्यास। चेतु हे जेन-जी अहिं से अछि आस।
पोखैरक सोझाँ कऽ आब रोकू अतिक्रमण, नदीक संवर्धन बनय अपने सभक प्रण। जँ आइ नै जागब तँ काल्हि पछताएब, बिना स्वछ जलक बुझू सब किछु गमाएब। -प्रणव कुमार झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर विदेह ४४५|| 1 1
गए हाल TOME I-IV / VOLUMES -00 | A Parallel History of | Mithila & Maithili Literature with Critical Appreciations of Representative Maithili Writers 2 Reg = by | | GAJENDRA THAKUR | editor, Videha eJournal VIDEHA + PARALLEL LITERARY MOVEMENT se + ISSN 2229-547X - est. 2000 - Delhi - MMXXVI
FROM THE SERIES The Videha Parallel Library a centuries of Maithili letters — from the Buddhist Charyapadas | of the eighth century to the digital insurgency of the twenty-first — | gathered under a single critical lens. Across one hundred volumes the | Videha Parallel Library has assembled the suppressed, the neglected, | the folk, the Dalit, the women’s, and the diasporic traditions of Maithili literature into a counter-archive to the official canon curated by the Sahitya Akademi. This volume brings that project to its threshold. Applying Bharata’s rasa-theory, Anandavardhana’s dhvani, Kuntaka's vakrokti, Gahgesa Upadhyaya’s Navya-Nyaya pramana system, Bakhtinian dialogism, Spivak’s subaltern historiography, and the Videha Parallel History Framework, it offers sustained critical appreciations of one hundred contemporary and historical Maithili writers — poets, novelists, dramatists, essayists, theorists, and translators — whose work constitutes the living parallel tradition. “The parallel is not the marginal but the truthful, in long delay.” WHAT THIS VOLUME CONTAINS, >> One hundred chapter-length critical appreciations, each paired with a portrait image »® A historical synthesis from 8th-century Charydpadas to contemporary digital publishing >> Indigenous theory (Navya-Nyaya, rasa, dhvani) alongside Western and postcolonial lenses >> Archival recovery of the Dooshan Panji records on Gafigesa Upadhyaya of Mithila pes ABOUT THE AUTHOR | GAJENDRA THAKUR — Maithili author, editor, and literary scholar — founder | of the Videha Parallel Literary Movement and founded the Videha eJournal in | | 2000 and has edited it without interruption since. He writes in Maithili, Hindi, ‘i and English, and has authored scholarly monographs on Gangesa Upadhyaya’s Navya-Nyaya and the parallel history of Mithila’s literary cultures. SON 978-93-5832-486-6 VIDEHA | | till | | | | | Fe AEE nee > हि, ISSN 2229-547X - videha.co.in
Mets eee ecoding the nit at है दर a Panji of Mithila oa Surprising Insights from India and Pp a | lal l Nepal's Oldest Social Network The Panji system of Mithila is a remarkable example of how communities preserved, recorded and td e transmitted social memory across generations. Spanning centuries, it functions as one of the world’s oldest social networks—long before the हू digital age. This book decodes the structure, gt. purpose and significance of Panji, bringing to light Surprising Insights from its value for understanding kinship, migration, India and Nepal's Oldest marriage alliances and societal organization in Ps Social Network India and Nepal. थी, au Bridging tradition with modern research, this work TDi ig कि हि. ae offers surprising insights for scholars of sociology, ea ii; Ni A ote ee - WON GA. anthropology and genomic genealogy. It opens new i= a rate ys a oe किए pathways for interdisciplinary studies, showing how Sy CxS wee ancient records can inform contemporary social Mh ¢ ere nl ae ~ science and genealogical mapping. ' tee. cet s\ \ Seca ES ५१६ सी Gajendra Thakur ye —— 5 ap we, ae: £ Hh | | धर है... ap 6) ee pig ऊ | डक gee. \ For the Research Students of ew if NX. रे Sociology, Anthropology and a, Dy Jy AX Genome/ Geneological Mappin Sn? oh an & ie BPS 9 ०9९9: = ee = oD ) A EN. LP EB ८ Vary फनी दी के 2 4 We aa q ISBN 978-93-595-894-5 www.videha.co.in Aas we 25 Zee FESS igi agi he AS rad ae ne eae Gajendra Thakur निधि lee Editor ISBN videha.co.in Videha Maithili eJournal
VIDEHA DECODING THE PANJI OF MITHILA VOLUME II Genealogical Mapping, Mula, Dusan, and the Videha Panji Search System Panji is Mithila’s grammar of memory. पज्जी मिथिलाक स्मृतिक व्याकरण अछि। Gajendra Thakur Editor Videha — First Maithili Fortnightly eJournal www.videha.co.in
== the Panji of Mithila Volume II Decoding the Panji of Mithila Volume II introduces Mithila’s Panji Prabandha as a layered archive of genealogy, marriage rules, mila, milagrama, gotra-pravara, maternal lines, scholarly titles, Diisan records, village memory, and historical persons. The book explains Panji as genealogical mapping, not modern DNA, and proposes the Videha Panji Search System as a responsible digital search aid. Important Ethical Note Panji records are historical and genealogical sources. They are not modern genetic proof, legal proof, or automatic marriage clearance. Diisan records must not be used to stigmatize living persons, families, villages, or communities. Scan to read पुढ़ खोलनाक लेल स्कैन करू काका see नाक A ey pest a a हि re a Videha — First Maithili Fortnightly eJournal www.videha.co.in
v CCD 0 TOTTNNS CTO sues eau ans ey DECODING THE Orla on ss seve abl a pata it PANJI OF MITI I LA A describes, (ontinuing the work hegun in Volumes Land Il, this Khand > Kaw (Gey ‘I Genome Mapping Volume I carries Mithia’s tradition 0 len Senne “A Panji is not read so much as back into the house that bore it." 2 दर शा डडड्ड of Genome Mapping gS On| |) a if a HE APONTE ना iol A q GAJENDRA THAKUR
we aia Gadi macture af famifies, names, and the lines (aw) i डॉड नि Based on the Nagram Panji ae [व iol 4 : GAJENDRA THAKUR
=. z mira sri ons The fifth volume turns to the Panji of Volume IL mapping Mithila’ DECODING T HE in, Te res ses ration th a रकम का — eth (oy. =) “A genealogy is a kind of clock — wind it back far enough and the ११९७ १,०१७ names start keeping their oan time.” a! Nay ° Y by ell oo ir a ave 7 il 4 i GAJENDRA THAKUR
ie का के के के का के के के के के obs gi] H = So जा ु oi Peas 7 — Wen Ve yrs! + 203 w/e ij NOH) 0 ER pee, ENN eh me SAY Pa! A} eta | A ONY 83] लि Hl gos | | €03 [4 He? | मिलान Ee" i i] *97 | ९! EP? id T Has | Hl eta fore eee Re ee et Hal 3) £83 /3 पिन Had He <i पल H 03 | Bre H i] ee‘ 2 eee कि Pe ee डिश H £93 EERE RT, ee Ge Eo? | Heat | ° a © cl लि +- VOLUME VI-+ j wi का < © | 4 lj — BASED ON DUSHAN PANJI— ‘eg ६५3: Ho? |i iret) Ie fl fe ae Ue El a $8 Hs bd 2 Se SSS चर! Ved] owImTIOODDOLOM Hemel 6. fl H £23! मिल भी ky AJENDRA THAKUR | ८. | eds | कि! 83 |! जा A KH Ay कि i} ef I aN ७३ : Ut Fett H EA H "36:20 8९ VIDEHA eJOURNAL / लि || || 2 CORN. DAY e | rere eS का का SSG. BE कर Ry
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E a eel ae et a a eo a EN OF la! yy ie DECODING THE RS SY | cE gay PANII १४ iy” Hi Sich न | STS <i H | 0? se — BASED ON DUSHAN PANJI — neaal Ke H Decoding the Panji of Mithila, Volume VI, based on Dushan Panji, ‘el Had is a detailed scholarly exploration of one of Mithila’s most ll bead H Heed difficult genealogical archives. This volume explains the logic of et fl easf Panji entries, mool and migration, maternal and daughter lines, Hei कि H caste and marriage records, named women, social vocabulary, : $33 Fi x, H and the ethical challenges of reading Dushan Panji today. i: x H Hal It combines close entry-by-entry decoding with historical taal । $3 interpretation, making a difficult source accessible without | ee H ey i losing its complexity. The book is intended for researchers, tel H 3) students, family historians, and all readers interested in Mithila, tl all LPS genealogy, caste, social history, and textual preservation. coal | €33 4) Gajendra Thakur is a researcher and writer associated with पा eH Videha and the study of Mithila’s literary, historical, and Hei 3} of E: a मिल <> | genealogical traditions. i 3 H मन I Maal eit, fa “lft i i (Deel fs | 2 © t H पक m hee i Re re || Hal H 3 i a Scan to visit www.videha.co.in oA | es TING हे न हि 4 Head aN VIDEHA eJOURNAL fade elo RS, eg LATS) | i के Ea a EERE ET a Oy H 89: के“ BiG Bo Ooo Sob GG SB ey SM]
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yy मैथिली साहित्यक सभसेँ पैय उपन्यास Gohi Sabhak Beech Jalsamadhi | गजेन्द्र ठाकुर " गोहि देह खाइत अछि, नाम नहि -- नाम ओकर दाँतमे अटकि जाइत अछि।" PT ie se ee के की पक ( at ga-gien | | [) डिजिटल अरेस्ट | ( <= धनक कारी धार | लेखक — गजेन्द्र ठाकुर मैथिली कावर्धरी « न्याय-दर्शन आ समकालीन अपराध-गाथा « विदेह प्रकाशन UU on ई-पत्रिका ae ® rw ae ae fade प्रकाशन * दिल्ली
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THE VIDEHA PARALLEL LIBRARY TOME I-IV / VOLUMES -00 A Parallel History of Mithila & Maithili Literature with Critical Appreciations of Representative Maithili Writers by GAJENDRA THAKUR editor, Videha eJournal VIDEHA - PARALLEL LITERARY MOVEMENT videha.co.in - ISSN 2229-547X - est. 2000 - Delhi - MMXXVI
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Decoding the Panji of Mithila Volume II Decoding the Panji of Mithila Volume II introduces Mithila’s Panji Prabandha as a layered archive of genealogy, marriage rules, mila, milagrama, gotra-pravara, maternal lines, scholarly titles, Diisan records, village memory, and historical persons. The book explains Panji as genealogical mapping, not modern DNA, and proposes the Videha Panji Search System as a responsible digital search aid. we Ethical Note Panji records are historical and genealogical sources. They are not modern genetic proof, legal proof, or automatic marriage clearance. Diisan records must not be used to stigmatize living persons, families, villages, or communities. Scan to read one fa Ogee Videha — First Maithili Fortnightly eJournal www.videha.co.in
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vy मैथिली साहित्यक सभसँ te उपन्यास गौहिं सभक बीच जलसमार्धिं W ८ " गोहि देह खाइत अछि, नाम नहि — नाम ओकर दाँतमे अटकि जाइत ares |" लेखक -- गजेन्द्र ठाकुर || 2 ISSN 2229-547X gs videha.co.in मैथिली wee ई-पत्रिका अन्तर्राष्ट्रीय मानक Ww! पूर्ण पाठ ऑनलाइन