VIDEHA — Issue 446 / अंक ४४६

Publication: VIDEHA · Issue: 446
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विदेह ४४६ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। [विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X Videha e-Journal (since 2000) at www.videha.co.in ] ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। कॉपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२६. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. It is a platform for scholars, researchers and writers to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, prose and verse in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili and from Maithili into English. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. (c)२०००- २०२६. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA. सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@zohomail.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@zohomail.in. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover design: AUM GAJENDRA THAKUR VIDEHA:446 समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा। for the writers, readers, and listeners of Mithilā, who have kept the lamp of Maithilī burning through a thousand years of storms ………………………….. "The Parallel is not the marginal but the truthful, in long delay." Mānuṣīm iha saṃskṛtām मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। मिथिलाक ओइ लेखक, पाठक आ श्रोता लोकनि लेल, जे सहस्र वर्षक झंझावात मे सेहो मैथिलीक दीप प्रज्वलित रखने छथि। समानांतर कात-करोट मे हएब नै अछि, वरन् ई अछि असल सत्य, जे अपन समय लेलक अछि। अनुक्रम विदेह अंक ४४६ [१५ जुलाई २०२६] वर्ष १९ मास २२३ ISSN 2229-547X ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृष्ठ २-९०) १.२.अंक ४४५ पर टिप्पणी (पृष्ठ ९१-९१) गद्य Prose २.१. हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२५ (पृष्ठ ९४-९८) २.२. कल्पना झा- मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-६ (पृष्ठ ९९-१०४) २.३.अरविन्द ठाकुर- मैथिली साहित्यमे बलेन्द्र नारायण ठाकुर ‘विप्लव’ एवं हुनक परिवारक योगदान-१ (पृष्ठ १०५-२९८) २.४. डा. किशन कारीगर- हमरा त जोगार अछि (हास्य कथा) (पृष्ठ २९९-३०२) २.५. लाल देव कामत- बहुजन कवि आ नाटककार राम श्रेष्ठ दीवाना : एक संक्षिप्त बायोग्राफी (पृष्ठ ३०३-३१२) २.६. लाल देव कामत- पतीत : पोथी चर्चा (पृष्ठ ३१३-३१६) २.७. सुरेन्द्र लाभ- दुगोट कनिका नाटक [नवकी पुतहु/ रटन्त विद्या] (पृष्ठ ३१७-३१९) २.८. आचार्य रामानंद मंडल- महाकवि विद्यापति बनाम संत तुलसीदास (पृष्ठ ३१०-३२१) २.९. प्रीति कुमारी- लघु परिचय : लीला बाबू'क (पृष्ठ ३२२-३२३) २.१०. संतोष कुमार राय 'बटोही'- भिक्षुक खबासक वंशावली (धारावाहिक संस्मरण)- (पहिल खेप) (पृष्ठ ३२४-३२५) २.११. प्रणव कुमार झा- लोकतंत्रक माने आ मतलब (पृष्ठ ३२६-३३४) २.१२. कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा- ओझड़ी (पृष्ठ ३३५-३३६) २.१३. गजेन्द्र ठाकुर- गोहि सभक बीच जल समाधि (मैथिलीक आइ धरिक सभसँ पैघ उपन्यास)- मैथिली कादम्बरीक अंश (पृष्ठ ३३७-५०४) २.१४. गजेन्द्र ठाकुर-चारिटा मूल संस्कृत एकनट नाटक (भाण) १.श्री शूद्रक केर मूल संस्कृत- पद्मप्राभृतकम् [कमलक भेंट]; २.ईश्वरदत्तक मूल संस्कृत- धूर्तविटसंवादः [धूर्त आ दलालक विचार-विमर्श]; ३.वररुचिक मूल - उभयाभिसारिका [परस्पर प्रेम-पलायन] आ ४.महाकवि श्यामिलक केर मूल संस्कृत- पादताडितकम् [लात] (संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद- गजेन्द्र ठाकुर द्वारा) (पृष्ठ ५०५-६०१) २.१५.गजेन्द्र ठाकुर- कालिदासक मूल संस्कृत नाटक अभिज्ञानशाकुन्तलम् संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर (पृष्ठ ६०२-७०८) २.१६.गजेन्द्र ठाकुर-विशाखदत्त रचित संस्कृत नाटक मुद्राराक्षसम् केर मैथिली अनुवाद - गजेन्द्र ठाकुर (पृष्ठ ७०९-७९५) २.१७.गजेन्द्र ठाकुर-उत्तररामचरितम्- महाकवि भवभूति- संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर (पृष्ठ ७९६-९६१) २.१८.गजेन्द्र ठाकुर-कादम्बरी पूर्व भाग [वाणभट्ट रचित] उत्तर भाग [वाणभट्टक पुत्र भूषण भट्ट रचित]- संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर (पृष्ठ ९६२-१११५) २.१९.गजेन्द्र ठाकुर- आगमडम्बरम् जयन्त भट्ट (नैयायिक)- मूल संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर (पृष्ठ १११६-११७७) २.२०.गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-६) सन्दर्भ- कुणाल-कृत प्रेम-प्रतिज्ञा उर्फ श्रुवावतीक जय! (पृष्ठ ११७८-११८६) पद्य Poetry ३.१. तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम'] मूल तेलुगु: नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव) मैथिली अनुवाद: मानेश्वर मनुज [खण्ड ८] (पृष्ठ ११८८-११९२) ३.२. अशोक कुमार ठाकुर-उपवास केवल शरीरक नहि/ मिथिलाक पुकार/ धरती माँ के पुकार (पृष्ठ ११९३-११९८) ३.३. जगदानन्द झा "मनु"- २ टा गजल (पृष्ठ ११९९-१२००) ३.४. पूजा कर्ण- बचाउ प्रभु! (पृष्ठ १२०१-१२०४) ३.५. रामचन्द्र राय- दू गोट कविता [भूख/ तरहथिए पर दुनिया] (पृष्ठ १२०५-१२०७) ३.६. डा. किशन कारीगर- बेलज्ज पिछलगुआ भरिया सब (कविता) (पृष्ठ १२०८-१२०९) ३.७. संतोष कुमार राय 'बटोही'- फ्री भेल बिजली (पृष्ठ १२१०-१२१० ३.८.गजेन्द्र ठाकुर-तीन टा व्यंग्य: १.कवि भल्लट- भल्लट-शतक (भल्लटक शत अन्योक्ति) २.महाकवि क्षेमेन्द्र- छल-कौशलक विलास (कलाविलास) ३.कवि नीलकण्ठ- कलियुग-विडम्बना- संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर (पृष्ठ १२११-१४४७) APPENDIX: METHODOLOGICAL NOTE The Nepal Bikram Samvat years cited have been converted to approximate CE years using the standard offset of BS minus 56–57 years. Web sources consulted include the Videha digital archive (videha.co.in). All URLs were last accessed April 2026. This research was prepared using primary texts, and standard academic resources. All quoted material is from the cited sources. For the most current scholarship, consult the Videha Parallel History series at www.videha.co.in/gajenthakur.htm. ………………………………………………. A PARALLEL HISTORY OF MAITHILI LITERATURE: INTRODUCTION DALIT LITERARY CRITICISM: TELUGU, GUJARATI, AND ODIA DALIT LITERATURE IN MAITHILI TRANSLATION GANGESA UPADHYAYA: LIFE, LOGIC, AND LEGACY IN THE NAVYA-NYAYA TRADITION [NAVYA-NYAYA’S HIERARCHICAL USE OF LIMITORS IS COMPATIBLE WITH MODERN ARTIFICIAL INTELLIGENCE AND NATURAL LANGUAGE PROCESSING (NLP)] MITHILA & MAITHILI: CRITICAL ANALYSIS OF INSTITUTIONS THE MAITHILI GHAZAL VIDEHA (ISSUE 1-350) SADEHA SERIES (1-37) VIDEHA ISSUES 351-438 VIDEHA MAITHILI PARALLEL DRAMA THEATRE VIDEHA PARALLEL AUDIO VIDEO ARCHIVE VIDEHA PARALLEL CHILDREN'S LITERATURE Abdur Razzak, Abha Jha, Abhilash Thakur, Achhe Lal Shastri, Ajit Kumar Jha, Amit Mishra, Amod Kumar Jha, Amrendra Yadav, Anamika Raj, Anand Kumar Jha, Anil Mallik, Anjani Kumar Verma, Anmol Jha, Arvind Thakur, Ashish Anchinhar, Ashok (kathakar Ashok), Ashraf Rain, Dr. Bacheshwar Jha, Badri Nath Roy 'Amatya', Pt. Bal Govind 'Arya', Bechan Thakur, Pandit Bhavnath Jha, Bibhuti Anand, Bijayendra Jha, Binay Bhushan, Bindeshwar Thakur, Chandan Kumar Jha, Dinesh Kumar Mishra, Durganand Mandal, Gajendra Thakur, Ghanashyam Ghanero, Gopalji Jha 'Gopesh', Gyanvardhan Kanth, Harimohan Jha, Hitendra Gupta, Hitnath Jha, Hriday Narayan Jha, Ilarani Singh, Jagdanand Jha 'Manu', Jagdish Chandra Thakur 'Anil', Jagdish Prasad Mandal, Jhauli Paswan, Jitendra Kumar Jha 'Jeetu', Dr. Kailash Kumar Mishra, Kalikant Jha 'Buch', Kalpana Jha, Kalpana Jha, Bokaro, Kalpana Jha, Delhi, Kalpana Jha, Patna, Kameshwar Choudhary, Kameshwar Jha 'Kamal', Dr. Kamini Kamayini, Kamla Chaudhary, Kapileshwar Raut, Kedar Nath Chaudhary, Dr. Kirtinath Jha, Dr. Kishan Karigar, Krishna Kumar Kashyap, Kumar Manoj Kashyap, Kumar Pawan, Kundan Kumar Karn, Kusum Thakur, Lal Dev Kamat, Lalita Jha, Lallan Prasad Thakur, Laxman Jha 'Sagar', Mala Jha, Manmohan Jha, Meena Jha, Mithilesh Kumar Jha, Munnaji, Munnaji, Munni Kamat, Nabo Narayan Mishra, Nagendra Kumar, Nand Kumar Mishra 'Nand', Nand Vilas Roy, Nanda Vilas Ray, Narayan Yadav, Narayanji Chaudhary, Narendra Jha, Navendu Kumar Jha, Neerja Renu, OM Prakash Jha, Panna Jha, Phanishwar Nath Renu, Prabhat Rai Bhatt, Pradeep Bihari, Pradeep Pushpa, Pranav Jha, Prayas Premi Maithil, Preeti Thakur, Premlata Mishra 'Prem', Premshankar Singh, Rabindra Narayan Mishra, Rajdeo Mandal, Rajeev Ranjan Mishra, Rajnandan Lal Das, Ram Bharos Kapari 'Bhramar', Ram Chandra Roy, Ram Sogarth Yadav, Ram Vilas Sahu, Acharya Ramanand Mandal, Prof. Dr. Ramawatar Yadav, Ramdeo Prasad Mandal 'Jharudar', Ramesh, Ramesh Narayan, Rameshwar Prasad Mandal, Pandit Ramji Chaudhary, Ramji Prasad Mandal, Acharya Ramlochan Sharan, Ramlochan Thakur, Ravi Mishra Bhardwaj, Ravibhushan Pathak, Ravindra Nath Thakur, S.C. Suman, Sandeep Kumar Safi, Sanju Das, Santosh Kumar Mishra, Santosh Kumar Roy 'Batohi', Satyanand Pathak, Shail Jha 'Sagar', Dr. Shambhu Kumar Singh, Shanti Lakshmi Chaudhary, Shardindu Chaudhary, Shashi Bala, Shashidhar Kumar 'Videh', Shiv Kumar Jha 'Tillu', Dr. Shiv Kumar Prasad, Shivshankar Singh Thakur, Shivshankar Sriniwas, Dr. Shubh Kumar Barnwal, Shyam Darihare, Siyaram Jha 'Saras', Srijan Shekhar 'Ajneya', Subhash Chandra Yadav, Subhash Kumar Kamat, Subodh Jha, Subodh Kumar Thakur, Sujit Kumar Jha, Sushil, Sweta Jha Chaudhary, Taranand Viyogi, Prof. Udaya Narayana Singh Nachiketa, Umesh Mandal, Umesh Paswan, Veena Thakur, Vibha Rani, Vibhuti Anand, Vijaynath Jha, Vineet Utpal, Yoganand Jha, Prof. Dr. Yogendra P. Yadava, Yogendra Pathak Viyogi A Parallel History of Mithila & Maithili Literature, Original Poem in Maithili, Translated into English, Children's Literature Theory, Children's Picture-Story Literature, Contemporary Mithila Artists, Contemporary Mithila Artists, Dalit and Subaltern Literature, Dalit Literary Criticism, Dalit Literary Criticism — Gujarati Dalit Literature in Maithili Translation, Dalit Literary Criticism — Odia Dalit Literature in Maithili Translation, Dalit Literary Criticism — Telugu Dalit Literature in Maithili Translation, Digital Maithili Children's Literature, Digital Maithili Literature, The Epistemology of Parallelism — Videha Sadeha Series and the Maithili Digital Renaissance, Gangeśa Upādhyāya / Navya-Nyāya, Gangesa Upadhyaya — Life, Logic, and Legacy in the Navya-Nyaya Tradition, Institution Critical Analysis, Language Transmission, Laprek vs Bīhani Kathā, Maithili Bīhani Kathā — The Seed Story Tradition in Maithili Literature, The Maithili Ghazal — History, Theory, Revival, and the Anchinhar Era, Maithili Micronarrative, Mithila & Maithili — Critical Analysis of Institutions, Awards and Recognition Frameworks, Mithila & Maithili Institution Critical Analysis, Parallel Literature Movement, Seed Story Tradition, Tirhuta / Mithilakshar, Videha 351–438 Critic, Videha Children Literature Expanded, Videha Children Literature Expanded — Parallel Children Literature in Maithili, Videha eJournal, Videha Issues 1–350, Videha Issues 351–438, Videha Issues 351–438 — Epistemological and Canonical Transformations, The Videha Maithili Parallel Drama Theatre, Videha Maithili Parallel Drama Theatre, The Videha Maithili Parallel Drama Theatre — Critical Historiography and Epistemological Analysis, The Videha Parallel Audio Video Archive, Videha Parallel Audio Video Archive, The Videha Parallel Audio Video Archive — Digital Remediation and Subaltern Historiography, Videha Parallel Audio Video Critic, Videha Parallel Children Literature, Videha Parallel Drama Critic, Videha Parallel History Framework, Videha Sadeha 1–37 / Issues 1–350 Critic, Videha Sadeha, Videha Sadeha Series 1–37, Vidyapati, the Primal Poet of Maithili (Pre-Jyotirishvara), Women’s Writing, Young Readers in Maithili … AND MORE TO COME IN TOME 5. I. A PARALLEL HISTORY OF MITHILA & MAITHILI LITERATURE [TOME 1-4; VOLUMES 1-100] BY GAJENDRA THAKUR [Parallel History Series ISBN Number: 978-93-5812-486-6] GOOGLE PLAY BOOK [TOME 1-4; VOLUMES 1-100] https://play.google.com/store/books/details?id=uvjREQAAQBAJ AMAZON KINDLE [TOME 1-4; VOLUMES 1-100] https://www.amazon.in/dp/B0GX2XRKM7 POTHI HARDBACK POTHI TOME 1 [VOLUMES 01-25] https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-parallel-history-mithila-maithili-literature/ POTHI TOME 2 [VOLUMES 26-50] https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-parallel-history-mithila-maithili-tome-2/ POTHI TOME 3 [VOLUMES 51-75] https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-parallel-history-mithila-maithili-literature-volume-1-100-tome-3-volume-51-75-b/ POTHI TOME 4 [VOLUMES 76-100] https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-parallel-history-mithila-maithili-literature-volume-1-100-tome-4-volume-76-100-/ II. DECODING THE PANJI OF MITHILA: Surprising Insights from India and Nepal’s Oldest Social Network [ISBN: 978-93-5915-894-5] Decoding the Panji of Mithila Volume I-VI POTHI HARDBACKS Decoding the Panji of Mithila : Surprising Insights from India and Nepal's Oldest Social Network [Volume I] https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-decoding-panji-mithila/ Decoding the Panji of Mithila Volume II: Genealogical Mapping, Mūla, Dūṣaṇ, and the Videha Panji Search System [Based on Prachin Panji] https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-decoding-panji-mithila-volume-ii/ Decoding the Panji of Mithila Volume III: A Complete Index-wise Decoding of Genome Mapping Volume I - Khand 2 Based on Uptip Panji https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-decoding-panji-mithila-volume-iii/ Decoding the Panji of Mithila Volume IV: Based on the Nagram Panji https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-decoding-panji-mithila-volume-iv/ Decoding the Panji of Mithila Volume V: Based on Volume II Panji: Genealogical Mapping of Mithila, 450 AD-2009 AD https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-decoding-panji-mithila-volume-v/ Decoding the Panji of Mithila Volume VI: Based on Dushan Panji https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-decoding-panji-mithila-0/ Decoding the Panji of Mithila Volume I-VI KINDKE EDITIONS Decoding the Panji of Mithila : Surprising Insights from India and Nepal's Oldest Social Network https://www.amazon.in/dp/B0H463RVT8 Decoding the Panji of Mithila Volume II: Genealogical Mapping, Mūla, Dūṣaṇ, and the Videha Panji Search System https://www.amazon.in/dp/B0H6NPRTYB Decoding the Panji of Mithila Volume III: A Complete Index-wise Decoding of Genome Mapping Volume I - Khand 2 Based on Uptip Panji https://www.amazon.in/dp/B0H6R4BBFB Decoding the Panji of Mithila Volume IV: Based on the Nagram Panji https://www.amazon.in/dp/B0H6R6VSBF Decoding the Panji of Mithila Volume V: Based on Volume II Panji: Genealogical Mapping of Mithila, 450 AD-2009 AD https://www.amazon.in/dp/B0H6R4BBFD Decoding the Panji of Mithila Volume VI: Based on Dushan Panji https://www.amazon.in/dp/B0H6R2YCFP III. गद्य पद्य भारती खण्ड १ आ २ (विदेह सदेह २८ & विदेह सदेह ३७) [विभिन्न भाषासँ अनूदित गद्य आ पद्य रचना (खण्ड-१) & (खण्ड-२) (विदेह www.videha.co.in/ पेटार अंक १-३५० सँ)] [खण्ड १ ISBN No: 978-93-341-0402-8; खण्ड २ ISBN No: 978-93-5890-150-4] १ विदेह सदेह २८ GADYA PADYA BHARTI 1 विभिन्न भाषासँ अनूदित गद्य आ पद्य रचना (खण्ड-१) (विदेह www.videha.co.in/ पेटार अंक १-३५० सँ) https://store.pothi.com/book/editor-gajendra-thakur-gadya-padya-bharti-1/ २ विदेह सदेह ३७ GADYA PADYA BHARTI 2 विभिन्न भाषासँ अनूदित गद्य आ पद्य रचना (खण्ड-२) (विदेह www.videha.co.in/ पेटार अंक १-३५० सँ) https://store.pothi.com/book/translator-gajendra-thakur-gadya-padya-bharti-2/ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका WWW.VIDEHA.CO.IN VIDEHA 23 LANGUAGE TRANSLITERATOR https://www.videha.co.in/new_page_101.htm विदेह लिपि परिवर्तक IPA · IAST · Tirhuta · Braille https://www.videha.co.in/script-converter.html विदेह आ सदेह सम्पूर्ण इंडेक्स https://www.videha.co.in/script-converter.html विदेह पेटार VIDEHA ARCHIVE https://www.videha.co.in/archive.htm विदेह मैथिली थेसॉरस — मैथिली-अंग्रेजी / अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोश https://www.videha.co.in/maithili-thesaurus.html विदेह मैथिली ↔ अंग्रेजी अनुवादक · Videha Maithili ↔ English Translator https://www.videha.co.in/maithili-translator.html विदेह पञ्जी प्रबन्ध — मैथिल ब्राह्मण वंशावली इंडेक्स https://www.videha.co.in/panji-mool-index.html विदेह गद्य https://www.videha.co.in/prose.htm विदेह पद्य https://www.videha.co.in/verse.htm विदेह स्त्री कोना https://www.videha.co.in/femcorner.htm A PARALLEL HISTORY OF MITHILA & MAITHILI LITERATURE https://www.videha.co.in/gajenthakur.htm विदेह मिथिला रत्न https://www.videha.co.in/ratna.htm विदेह मिथिलाक खोज https://www.videha.co.in/discovery.htm विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण https://www.videha.co.in/investigation.htm विदेह पुरान अंक https://www.videha.co.in/videha.htm विदेह पोथी https://www.videha.co.in/pothi.htm विदेह दृश्य-श्रव्य नाट्य उत्सव https://www.videha.co.in/Audio_Video.htm विदेह शिशु, बाल आ किशोर उत्सव https://www.videha.co.in/kids.htm विदेह ई-लर्निङ्ग/ विदेह ई-लर्निङ्ग क्विज https://www.videha.co.in/videha-elearning.htm [विदेह ई-लर्निङ्ग क्विज UPSC / BPSC / UGC-NET / NTA हेतु मैथिली भाषा, साहित्य आ मिथिला इतिहास पर निःशुल्क प्रश्नोत्तरी — क्विज खोलबा लेल कार्ड पर क्लिक करू। शब्दकोश मिथिलाक इतिहास साहित्यक इतिहास UPSC / UGC-NET समानान्तर इतिहास मिथिला पञ्जी मैथिली गजल वेब पत्रकारिता विदेह चित्रकला · कला · संगीत विदेह दृश्य-श्रव्य विदेह विशेषांक/ सम्मान विदेह प्रश्नोत्तरी विदेह नाट्य उत्सव विदेह शिशु उत्सव विदेह स्त्री कोना] Videha Converters- Thesaurus, Panji, Script Converters, Transliterators, Translators, eLearning Quizzes, Maithili Language Search and other Technical Tools https://www.videha.co.in/videha-converters.htm विदेह आ सदेह दुनू https://archive.org/details/VidehaAndSadeha Videha Github: https://github.com/videha-ejournal/ TWITTER/ X https://x.com/videha FACEBOOK https://www.facebook.com/groups/videha/ Videha Googlegroups https://groups.google.com/g/videha गजेन्द्र ठाकुर 1

१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.अंक ४४५ पर टिप्पणी १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय विदेह मैथिली नाट्य उत्सव (मैथिली समानान्तर रंगमंचक संकलन) [विदेह सदेह ८] समग्र विस्तृत समीक्षा षट्-स्तरीय समीक्षा-ढाँचा विदेह समानान्तर साहित्येतिहास ढाँचा/ गंगेश उपाध्यायक नव्य-न्याय प्रमाण-शास्त्र/ भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य सिद्धान्त/ पाश्चात्य समीक्षा (अरस्तू-ब्रेख्त-बोआल-बाख्तिन-ग्राम्शी-फनन)/ चीनी समीक्षा (वेन्शिन डिआओलोङ्ग / शिपिन)/ यहूदी-इसरायली समीक्षा (मिद्राश-पेशर / पिलपुल / आल्टर)/ ISSN 2229-547X VIDEHA भूमिका विदेह सदेह-शृंखलाक अष्टम खण्ड- ‘विदेह मैथिली नाट्य उत्सव’- मैथिली समानान्तर रंगमंचक एकटा अभूतपूर्व संकलन थिक। ई संकलन विदेह ई-पत्रिकाक अंक ५१-१०० सँ संकलित नाटक, नाट्य-समीक्षा, साक्षात्कार आ रंगमंच-इतिहासक संगमे २०१२ ईस्वीमे आयोजित पहिल विदेह मैथिली नाट्य उत्सवक सम्पूर्ण विवरण अपन कोखिमे समेटने अछि। समीक्षा-पद्धति १. विदेह समानान्तर साहित्येतिहास ढाँचा विदेह समानान्तर साहित्येतिहास-ढाँचा साहित्य-अकादेमी-केन्द्रित कैनन-निर्माणकेँ चुनौती दैत अछि। चारिटा प्रमुख प्रश्न: (क) कोन रचनाकार पुरस्कार-तन्त्रसँ अस्वीकृत/अदृश्य भेल? (ख) ओ अस्वीकृति कोन सामाजिक-वर्गीय आधारपर भेल? (ग) कोन वैकल्पिक संरचनासँ ओकर प्रतिसन्तुलन भेल? (घ) कोन सौन्दर्य-शास्त्रीय मूल्य ऐ समानान्तरमे प्रकट भेल जे मुख्यधारामे दबाओल गेल? २. गंगेश उपाध्यायक नव्य-न्याय प्रमाण-शास्त्र मिथिलाक चौदहम-पन्द्रहम शताब्दीक गंगेश उपाध्यायक ‘तत्त्वचिन्तामणि’क चारिटा प्रमाण नाट्य-समीक्षामे प्रयुक्त - प्रत्यक्ष (मञ्चपर दृश्यगत), अनुमान (दृश्यसँ मनस्थिति/उद्देश्यक निष्कर्षण - व्याप्ति आधारित), उपमान (तुलनात्मक सादृश्य), शब्द (संवादक प्रामाणिकता आ शक्ति-वृत्ति)। ‘हेत्वाभास’ (दोषयुक्त तर्क) सेहो प्रयुक्त। ३. भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य भरतमुनिक नाट्यशास्त्रक अष्ट-रस + शान्त, चारि-वृत्ति, दश-रूपक। अभिनवगुप्तक साधारणीकरण। आनन्दवर्धनक ध्वन्यालोक - व्यङ्ग्यार्थ-चिन्हन। कुन्तकक छह वक्रता-स्तर (वर्ण-पद-वाक्य-प्रकरण-प्रबन्ध-काव्य)। क्षेमेन्द्रक औचित्य-विचार-चर्चा - पात्र-वेष-भाषा-कर्म-काल-स्थानक उचित-योजना। ४. पाश्चात्य समीक्षा सिद्धान्त अरस्तूक ट्रैजेडीक छह तत्त्व, हमर्शिया, पेरिपेतिया, कथार्सिस। ब्रेख्तीय एपिक थिएटर आ Verfremdungseffekt (अलगाव-प्रभाव)। बोआलक उत्पीड़ितक रंगमंच आ फोरम थिएटर। बाख्तिनक हेटेरोग्लोसिया-कार्निवल-क्रोनोटोप। ग्राम्शीक हेजेमनी, फनन-स्पिवाकक सबाल्टर्न-दृष्टि, बोर्दिऊक हाबिटस-सांस्कृतिक पूँजी, बेन्यामिनक कथावाचक। ५. चीनी समीक्षा सिद्धान्त लिऊ शिए (ल. ४६५-५२२) क ‘वेन्शिन डिआओलोङ्ग’- चीनी प्रथम व्यवस्थित साहित्य-सिद्धान्त-ग्रन्थ। मूल संकल्पना: फेङ्गगु (हवा आ हड्डी, प्राण + संरचना), शेन्सि (दिव्य-कल्पना), तोङ्गबियान् (परम्परा-नवीनताक सन्तुलन)। चोङ्ग रोङ्ग (ल. ४६८-५१८) क ‘शिपिन’ - लेखकक त्रिश्रेणी (शाङ्ग-झोङ्ग-शिआ पिन्) मूल्याङ्कन; ‘झी’ ( स्वाद/रस)। यान् यू क ‘चान्ग्लाङ्ग शिहुआ’ - ‘मियाओ्वू’ ( गहन-सहज-बोध)। ६. यहूदी-इसरायली समीक्षा सिद्धान्त टोराह-व्याख्याक चारि-स्तर - पशाट (शाब्दिक), रेमेज् (सङ्केतगर्भित), द्राश (नैतिक-व्याख्यान), सोद (रहस्यगर्भ)। ‘पेशर’ कुम्रान्-प्रथा - टेक्स्टकेँ समय-सापेक्ष पुनर्व्याख्या। तल्मूदी पिलपुल - कुष्या-तेरुत्स्-दिख्या तर्क-शैली, जे मिथिला-नव्य-न्यायक संग संरचनात्मक समानता रखैत अछि। राबर्ट आल्टरक ‘द आर्ट आफ बाइबिलिकल नैरेटिव’ - टाइप-सीन्, वर्ब्ल इकोज्, नैरेटिव गैप्स्। डेनिएल बोयारिनक मिद्राशी इन्टरटेक्सचुअल पेइटिक्स। लेखक १ : गजेन्द्र ठाकुर रचना-सूची (सदेह ८) (क) ‘मैथिली नाटक: बड्ड रास भाषण मैथिली आ आन नाटकक प्राचीनसँ आधुनिक काल धरि रहल तारतम्यक विषयमे देल गेल अछि’ - विशद नाट्य-इतिहास-निबन्ध जे जीवन झा, ईशनाथ झा, उदय नारायण सिंह नचिकेता, गोविन्द झा, सुधांशु शेखर चौधरी, जगदीश प्रसाद मण्डल, बेचन ठाकुर आ आनंद कुमार झा - ऐ आठ नाटककारक स्वतन्त्र खण्डीय विश्लेषण समेटैत अछि। (ख) ‘मैथिली नाटक आ ओकर समीक्षाशास्त्र’ - मैथिली नाट्य-समीक्षाक शास्त्रीय आधार-ग्रन्थ रूपमे रचित। (ग) ‘जातिवादी रंगमंचक प्रतिनिधि नाटक: छुतहर/छुतहर घैल/छुतहा घैल’ - महेन्द्र मलंगिया-त्रयीक तीव्र खण्डन-समीक्षा। (घ) ‘चारिटा अंग्रेजी नाटक: डॉक्टर फॉस्टस, सैमसन एगोनिस्टेस, मर्डर इन द कैथेड्रल आ स्ट्राइफ’ - मार्लो, मिल्टन, टी.एस. इलियट आ गॉल्सवर्दीक चारि अंग्रेजी नाटकक तुलनात्मक मैथिली-पाठ। (ङ) ‘मैथिली नाटकक एकटा समानान्तर दुनियाँ’ - विदेह-समानान्तर नाट्य-दर्शनक प्रस्तावना। (च) सदेह ८क सम्पादकत्व आ बेचन ठाकुर-निर्देशित नाटक ‘उल्कामुख’ (विदेह नाट्य उत्सव २०१२) क नाट्य-लेखन। (क) विदेह समानान्तर साहित्येतिहास दृष्टिए गजेन्द्र ठाकुर विदेह-समानान्तर साहित्येतिहास-ढाँचाक मुख्य वास्तुकार छथि। सदेह ८ मे हुनकर लेखन ऐ ढाँचाकेँ नाट्य-विधा धरि विस्तारित करैत अछि। हुनकर चारि मूल प्रमेय अछि - (१) मैथिली नाट्य-वृत्त ज्योतिरीश्वरसँ नचिकेता धरिक एक अखण्ड परम्परा थिक, ‘अबसर्डिटी’क प्राक्-आधुनिक रूप (धूर्तसमागम) उत्तर-आधुनिक रूपमे (नो एण्ट्री: मा प्रविश) पूर्ण भेल। (२) साहित्य-अकादेमीक ‘मैथिली एकांकी संग्रह’ (१९ टा सर्वश्रेष्ठ एकांकीक संकलन) चन्द्रनाथ मिश्र अमर–रामदेव झा–महेन्द्र मलंगिया–कमल मोहन चुन्नूक ससुर-जमाएक-शिष्य-मित्र अनुकम्पा-चक्र थिक, जे राधाकृष्ण चौधरी, मणिपद्म, गुणनाथ झा आदिकेँ बहिष्कृत केलक। (३) सर्वहारा-वर्गक रंगमञ्च - जगदीश प्रसाद मण्डल, बेचन ठाकुर, सरोज खिलाड़ी - विदेह-समानान्तर-मञ्चनक मुख्य धारा थिक। (४) ऐमे महिला-स्वर (ज्योति सुनीत चौधरी, मुन्नी कामत, विभा रानी) आ गएर-सवर्ण-स्वर (किशन कारीगर) समवेत-सहभागी छथि। हुनकर ‘चारिटा अंग्रेजी नाटक’क मैथिली-पाठ ऐ ढाँचाक एकटा अनूठा प्रयोग थिक - मार्लोक फॉस्टस (शक्तिक लोभेँ सम्झौता), मिल्टनक सैमसन (अन्धा भेल मुदा स्तम्भ-ढाहक), इलियटक थॉमस बेकेट (सरकारी-मन्दिरमे साहित्यिक-हत्या) आ गॉल्सवर्दीक स्ट्राइफ (पूँजी-श्रम-संघर्ष) - ई चारू नाटक मैथिली समानान्तर रंगमंचक चारि-स्थितिक रूपक थिक। (ख) गंगेशीय नव्य-न्याय दृष्टिए गजेन्द्र ठाकुरक नाट्य-समीक्षा गंगेशक चारिटा प्रमाणक व्यवस्थित प्रयोग प्रस्तुत करैत अछि। प्रत्यक्ष: विदेह नाट्य उत्सव २०१२ केर वस्तुगत-घटना - मञ्चित नाटक, अभिनेता, दर्शक - गजेन्द्र ठाकुरक प्रत्यक्ष-गवाही। अनुमान: ‘यत्र-यत्र जातिवादी रंगमंच, तत्र-तत्र सर्वहारा-अस्वीकृति’ - ऐ व्याप्तिसँ निष्कर्ष जे मलंगिया-तन्त्र सर्वहाराकेँ बहिष्कृत करैत अछि। उपमान: मलंगियाक ‘ओकर आंगनक बारहमासा’सँ ‘छुतहा घैल’ धरिक तुलनात्मक-व्याप्ति-प्रदर्शन - अर्थात् हुनकर सम्पूर्ण रचना-शैलीमे ‘कथित छोटहा-मैथिली’क सादृश्य। शब्द-प्रमाण: साहित्य-अकादेमी-दस्तावेज़, मिथिला-दर्शन-लेख, घर-बाहर-स्तम्भ, फोन-नम्बर-धमकी - सभ शब्द-प्रमाण रूपमे प्रस्तुत। हेत्वाभास-निरूपण: साहित्य-अकादेमीक तर्क - ‘नाटककारकेँ नाटक लेल पुरस्कार पहिल बेर मलंगियाकेँ’ - ई ‘असिद्ध-हेत्वाभास’ थिक, कारण रामदेव झाकेँ ‘पिपासा’क लेल पहिनेहि पुरस्कार भेल छल; ओ तर्क खुद कमल मोहन चुन्नू द्वारा खारिज पहिने भेल छल आ बादमे संकलनमे ‘पिपासा’क समावेश ‘बाधित-हेत्वाभास’ थिक - पूर्व-स्वीकृत-विरुद्ध। ई गंगेशीय कोटिए शुद्ध ‘विरुद्ध-हेत्वाभास’ अछि। (ग) भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य दृष्टिए रस-दृष्टिए गजेन्द्र ठाकुरक ‘नाट्य-समीक्षाशास्त्र’ नाटकीय-समीक्षा-विधाक स्वतन्त्र शास्त्र-रूप गढ़ैत अछि - जे भरतमुनिक ‘नाट्यशास्त्र’क आधुनिक मैथिली-संस्करण मानल जा सकैए। ज्योतिरीश्वर-धूर्तसमागमक अबसर्डिटीसँ नचिकेताक नो एण्ट्रीक उत्तर-आधुनिक अबसर्डिटी धरि - एक चक्र पूर्ण करबाक हुनकर वृत्त-दर्शन कुन्तकक प्रबन्ध-वक्रतासँ अद्भुत मेल खाइत अछि। प्रबन्ध-स्तरपर सम्पूर्ण मैथिली नाट्य-परम्पराकेँ एकटा वक्र वृत्तक रूपमे देखब स्वयं वक्रोक्तिक चरम प्रयोग थिक। अष्ट-रसक दृष्टिए ‘छुतहर/छुतहा घैल’ केर समीक्षा बीभत्स-रसक सामाजिक प्रयोगकेँ चिन्हित करैत अछि - जातिवादी रंगमंच ‘कथित छोटहा-मैथिली’क प्रयोगसँ सर्वहारा-भाषाकेँ अप्रामाणिक देखाबय चाहैत अछि - ई बीभत्स-स्थायी थिक। क्षेमेन्द्रीय औचित्य-दृष्टिए हुनकर समीक्षा भाषा-औचित्य, चरित्र-औचित्य आ देश-कालक-औचित्य - तीनू स्तरपर मलंगियायी रंगमंचक अनौचित्य उद्घाटित करैत अछि। उदाहरण: गएर-सवर्ण पात्रक मुखमे जे मिश्रित हिन्दी-मैथिली देल जाइ अछि, ओ क्षेमेन्द्रीय वक्तृ-औचित्यक सीधा उल्लङ्घन थिक - कारण भोजपुर-मैथिली सीमावर्ती गामक सर्वहारा शुद्ध मैथिले बजै छथि, मिश्रित नहि। ध्वनि-दृष्टिए हुनकर समीक्षाक मूल व्यङ्ग्यार्थ ‘अलंकार-ध्वनि’ नहि ‘रस-ध्वनि’ थिक - विशेष कऽ ‘शान्त-रस-ध्वनि’ - जे विदेह-आन्दोलनक दीर्घकालिक संयम-संकल्प (‘हम आगाँ २५ साल धरि ई समानान्तर रंगमंच चलबैत रहब’) सँ प्रकट होइत अछि। (घ) पाश्चात्य दृष्टिए ब्रेख्तीय अलगाव-प्रभावक दृष्टिए गजेन्द्र ठाकुरक नाट्य-समीक्षाशास्त्र दर्शककेँ नाटकमे ‘डूब’ जाएसँ रोकि कऽ ओकरा आलोचनात्मक चेतना दैत अछि। ओ कहैत छथि जे मैथिली नाटकक मूल्याङ्कन साहित्य-अकादेमी-केन्द्रित नहि कऽ सकै छी, बल्कि ‘कोन वर्गक नाटक छी’ ई प्रश्न पुछय पड़त - ई शुद्ध ब्रेख्तीय-राजनीतिक नाट्य-दृष्टि थिक। हुनकर ‘उल्कामुख’ नाटक मे केवल अभिनेत्री-समूह - पुरुष-भूमिकामे सेहो स्त्री-अभिनेत्री - ई पारम्परिक रंगमञ्च-सम्मेलनसँ दर्शककेँ बहिर्गत करबाक तकनीक थिक। ग्राम्शीयन हेजेमनी-दृष्टिए ‘छुतहा घैल’ समीक्षामे जातिवादी रंगमंचक सांस्कृतिक हेजेमनीक पर्दाफाश थिक - साहित्य अकादेमी, मिथिला दर्शन, घर-बाहर ई सभ संस्थागत-तन्त्र ब्राह्मण-वर्चस्वक उत्पादक मञ्च बनल छल। फनन-दृष्टिए जातिवादी रंगमंच मैथिली सर्वहाराकेँ ‘उपनिवेशित मानस’क रूपमे प्रस्तुत करैत अछि। स्पिवाक-दृष्टिए सर्वहाराक भाषागत-सम्भाषण-असम्भवताकेँ विदेह-समानान्तर रंगमंच भङ्ग करैत अछि। बोर्दिऊयायी साहित्यिक क्षेत्र-दृष्टिए हुनकर ‘चन्द्रनाथ मिश्र अमर–रामदेव झा (ससुर-जमाएक जोड़ी)–मलंगिया’ अनुकम्पा-तन्त्रक उद्घाटन सांस्कृतिक-पूँजीक वंशानुगत-हस्तान्तरणक उत्कृष्ट उदाहरण थिक। बाख्तिनीय हेटेरोग्लोसिया-दृष्टिए ‘चारिटा अंग्रेजी नाटक’क मैथिली-पाठ बहु-स्वर-संवाद थिक - मार्लो, मिल्टन, इलियट आ गॉल्सवर्दीक चारि स्वतन्त्र चेतना मैथिली रंगमंचक चेतनासँ संवादरत। (ङ) चीनी दृष्टिए लिऊ शिए-दृष्टिए (वेन्शिन डिआओलोङ्ग) गजेन्द्र ठाकुरक नाट्य-समीक्षा ‘फेङ्गगु’ ( हवा आ हड्डी) क अद्भुत समन्वय थिक। ‘फेङ्ग’ माने ‘हवा/प्राण’ - ओ राजनीतिक-नैतिक आवेग जे हुनकर समीक्षाकेँ गति दैत अछि; ‘गु’ माने ‘हड्डी/संरचना’ - ओ शास्त्रीय-तर्क-व्याकरण जे हुनकर मूल्याङ्कनकेँ मज़बूती दैत अछि। दुनू एक-संग, जे लिऊ शिएक मतमे श्रेष्ठ-साहित्यक लक्षण थिक। ‘तोङ्गबियान्’ परम्परा आ नवीनताक सन्तुलन) क दृष्टिए हुनकर समीक्षा परम्परा (भरतसँ अभिनवगुप्त) आ नवीनता (मार्क्स-ग्राम्शी-फनन) क सुसन्तुलन प्रस्तुत करैत अछि। चोङ्ग रोङ्ग-दृष्टिए (शिपिन) यदि १४८ शताब्दीक मैथिली नाटककारक त्रिश्रेणी कएल जाए - ‘शाङ्ग-पिन्’ (उत्तम) मे ज्योतिरीश्वर, जगदीश प्रसाद मण्डल, बेचन ठाकुर, नचिकेता; ‘झोङ्ग-पिन्’ (मध्यम) मे जीवन झा, गोविन्द झा, सुधांशु शेखर चौधरी, गंगेश गुंजन; ‘शिआ-पिन्’ (अधम) मे साहित्य-अकादेमी-पुरस्कार-केन्द्रित जातिवादी रंगमंचक पैरोकार। ई गजेन्द्र ठाकुरक अप्रकट-वर्गीकरण थिक, जे ‘झी’ ( स्वाद/रस) क आधारपर भेल अछि। (च) यहूदी-इसरायली दृष्टिए मिद्राशी पेशर-दृष्टिए गजेन्द्र ठाकुरक चारिटा अंग्रेजी नाटकक समीक्षा एकटा अद्भुत प्रयोग थिक। ओ ऐ नाटकक पाठ केवल अनुवाद नहि करैत छथि - ओ ऐ नाटकक माध्यमसँ समकालीन मैथिली नाट्य-जगतकेँ पेशर-व्याख्या दैत छथि। फॉस्टस - मैथिली नाटककार जे जातिवादी-रंगमञ्चसँ ‘शक्ति’ खातिर सम्झौता केलक; सैमसन - विदेह-समानान्तर रंगमंच जे अन्ततः ‘अन्धा’ बनाओल जाएब तकर बादो विरोधी-स्तम्भकेँ ढाहत; मर्डर इन द कैथेड्रल - साहित्य-अकादेमी सन सरकारी-मन्दिरमे साहित्यिक-हत्या; स्ट्राइफ - विदेह-आन्दोलन आ जातिवादी-रंगमंचक बीच लाक्षणिक-संघर्ष। तल्मूदी पिलपुल-दृष्टिए बेचन ठाकुरक संग मुन्नाजीक साक्षात्कार पूर्ण रूपेण कुष्या-तेरुत्स्-दिख्या ढाँचापर सञ्चालित अछि - गजेन्द्र ठाकुर सम्पादक रूपमे ऐकेँ संरचित कऽ रहल छथि। प्रश्न (कुष्या): ‘मलंगिया-तन्त्र किए सर्वहाराकेँ कुपित करैत अछि?’ - उत्तर (तेरुत्स्): भाषा-विकृति आ सम्पदा-केन्द्रीकरण द्वारा - तेसर पक्ष (दिख्या): विदेह-आन्दोलन एकर समानान्तर-निर्माणक प्रयास। राबर्ट आल्टर-दृष्टिए हुनकर सम्पूर्ण समीक्षा-शैलीमे ‘टाइप-सीन्’ (पुनरावर्ती दृश्य-प्रतिमान) सेहो प्रकट होइत अछि - हर बेर एकेगोट संरचना (अकादेमी-अनुकम्पा → जातिवादी-संकलन → सर्वहारा-बहिष्कार)। ई बाइबिलिकल-नैरेटिवक टाइप-सीन्क समानता रखैत अछि। लेखक २ : बेचन ठाकुर रचना-सूची (सदेह ८) (क) ‘हम पुछैत छी’ - मुन्नाजीक संग दीर्घ साक्षात्कार। (ख) ‘बेचन ठाकुर द्वारा मैथिली नाटकक निर्देशन/मंचन’ - नौ-भाग दस्तावेजीकरण, १९८०-२००९ धरि लगभग चारि-सय मञ्चनक तालिका। (ग) ‘उगना’ एकाङ्की (२००६ सरस्वती पूजा-मञ्चन)। (घ) ‘उल्कामुख’ नाटकक मञ्चन - विदेह नाट्य उत्सव २०१२। (ङ) हुनकर समस्त नाट्य-कृति - ‘बेटीक अपमान’, ‘छीनरदेवी’, ‘बेरमामे अप्पन कर्मक फल’, सरस्वती पूजा-मञ्चन-संग्रह, इत्यादि - सदेह ८मे प्रत्यक्ष/परोक्ष-समीक्षित। (क) विदेह समानान्तर साहित्येतिहास दृष्टिए बेचन ठाकुर (चनौरागंज, मधुबनी) विदेह-समानान्तर-रंगमंचक केन्द्रीय व्यवहारकर्ता छथि। हुनकर मञ्चन-कर्म कोनो सरकारी अनुदान, अकादेमी-संरक्षण, वा शहरी-थिएटर-समूह-समर्थन बिनु, अपन निजी कोचिङ्ग-संस्थानक छात्र-छात्रा द्वारा सम्पादित भेल। ई शुद्ध समानान्तर-संरचनाक उदाहरण थिक - विदेह-ढाँचाक चारिटा प्रमुख प्रश्नक उत्तर ऐ एक-व्यक्तित्वमे प्राप्य। सर्वहारा-वर्गक रंगमञ्च, गाम-केन्द्रित मञ्चन, स्त्री-केन्द्रित अभिनय-योजना (उल्कामुख), आ साहित्य-अकादेमी-केन्द्रित संस्थासँ स्वतन्त्र निरन्तर-कर्म - ई सभ हुनकर रचनाक मूल-तत्त्व। (ख) गंगेशीय नव्य-न्याय दृष्टिए प्रत्यक्ष-प्रमाण: हुनकर नौ-भागमे दस्तावेजीकृत मञ्चन - गाम, तिथि, अभिनेता-सूची, निर्देशक - सभ प्रत्यक्ष-गोचर। अनुमान: हुनकर साक्षात्कारमे व्याप्ति-प्रदर्शन - ‘गमैया नाटक जस-के-तस पड़ल; शहरी नाटक आगाँ अछि मुदा सोचक अभाव अछि’ - एहि व्याप्तिसँ हुनकर नाट्य-प्रयोगक उद्देश्यक अनुमान। शब्द-प्रमाण: हुनकर मातृ-शिक्षक हुनकर पिता-पारिवारिक-जन - गमैया नाच-नाटकसँ हुनकर प्रेरणा। उपमान: हुनकर अपन-नाटक (बेटीक अपमान) क महेन्द्र मलंगिया-नाटक (छुतहर) सँ तुलना - दुनूमे ‘गाम-केन्द्रित-कथा’क सादृश्य, मुदा ‘औचित्य-व्यवस्था’क वैषम्य। (ग) भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य दृष्टिए भरत-शास्त्रीय रूपक-वर्गीकरणक दृष्टिए हुनकर रचना-वैविध्य अद्भुत: ‘उगना’ (२००६ सरस्वती पूजा-मञ्चन) - भाणक तत्त्व लेने अछि (विद्यापति-उगना सम्बन्ध); ‘बेटीक अपमान’ - प्रकरणक रूपान्तरण (समाज-केन्द्रित गम्भीर-कथा); ‘छीनरदेवी’ - प्रहसनक तत्त्व लेने अछि मुदा करुणसँ युक्त; ‘उल्कामुख’ - समवकारक तत्त्व लेने अछि (जादूई-यथार्थवाद, स्त्री-मात्र-अभिनेत्री-योजना)। एकर अद्भुत-रसक स्तर ‘ऐमे पुरुख पात्रक अभिनय सेहो महिला कलाकार द्वारा भेल’ - सूत्रसँ प्रकट होइत अछि। क्षेमेन्द्रीय औचित्य-दृष्टिए हुनकर पात्र-वेष-भाषा-कर्मक समायोजन गाम-घरक यथार्थसँ खाँटी मेल खाइत अछि। हुनकर नाट्य-कर्म गमैया-विषय-गहराइ + शहरी-शिल्प-कौशल केर सन्तुलित-संयोग थिक। हास्य-करुण-वीर-शान्त - चारि-मुख्य-रसक हुनकर बहु-नाटकीय व्याप्ति। ‘बेटीक अपमान’क करुण-रौद्र-संयोग गर्भपातक विरुद्ध समाज-जागृति लेल आधार-रस अछि। (घ) पाश्चात्य दृष्टिए आगुस्तो बोआल-दृष्टिए बेचन ठाकुर ‘उत्पीड़ितक रंगमंच’क मैथिली-व्यवहारकर्ता छथि। हुनकर निजी कोचिङ्ग-संस्थानक छात्र-छात्रासँ नाटक मञ्चित कराएब - विद्यार्थीकेँ स्पेक्ट-एक्टरमे परिवर्तित करबाक राजनीतिक प्रक्रिया थिक। ‘बेटीक अपमान’ मञ्चन गाम-दर-गाम - फोरम थिएटरक प्रक्रिया - दर्शक भू-स्थानीय-समस्या (कन्या-भ्रूण-हत्या)सँ साक्षात्कार कऽ सक्रिय-समाधान-प्रस्तुति दिश आगू बढ़ैत अछि। ब्रेख्तीय अलगाव-प्रभाव: ‘उल्कामुख’ मे केवल अभिनेत्री-समूह - पुरुष-भूमिकामे सेहो अभिनेत्री - पारम्परिक रंगमञ्च-सम्मेलनसँ दर्शककेँ बहिर्गत करबाक तकनीक। दर्शक पात्रक संग ‘आत्म-तादात्म्य’ नहि कऽ पबैत अछि, बल्कि लिङ्ग-राजनीतिक-प्रश्नकेँ सोचय पड़ैत अछि। बोर्दिऊयायी हाबिटस: हुनकर सम्पूर्ण नाट्य-कर्म एक नव हाबिटसक सर्जन - गाम-केन्द्रित नाट्य-संस्कार, साहित्य-अकादेमीसँ स्वतन्त्र अपन सांस्कृतिक-स्थान। ग्राम्शीयन ‘आर्गेनिक-इन्टेलेक्चुअल’क रूपमे बेचन ठाकुर - गाम-शिक्षक, गाम-कलाकार, गाम-नाटककार - सर्वहारा-वर्गक स्वयं-जनित बुद्धिजीवी। (ङ) चीनी दृष्टिए लिऊ शिए-दृष्टिए हुनकर नाट्य-कर्म ‘फेङ्गगु’क आदर्श-उदाहरण - फेङ्ग (प्राण): गाम-जीवनक आवेग; गु (हड्डी): भरत-शास्त्रीय रूपक-संरचना। तोङ्गबियान्: गमैया-परम्परा + आधुनिक-समकालीन-विषय। चोङ्ग रोङ्गक शिपिन-वर्गीकरणमे बेचन ठाकुरक स्थान ‘शाङ्ग-पिन्’ - कारण हुनकर रचनामे ‘झी’ (रस) क स्पष्ट उपस्थिति। यान् यू-दृष्टिए हुनकर ‘मियाओ्वू’ ( सहज-गहन-बोध) - साक्षात्कारक एक वाक्य ‘हम एकटा निजी शिक्षकक दृष्टिए अपन विद्यार्थीक बौद्धिक विकास हेतु अपन कोचिङ्गक प्रांगणमे रंगमंचीय सांस्कृतिक कार्यक्रमक बेबस्था करै छी’ - ई शुद्ध मियाओ्वूक स्थिति - कोनो विशेष-अकादेमिक-तर्क बिनु, सहज-नैतिक-कर्तव्यक प्रकटीकरण। (च) यहूदी-इसरायली दृष्टिए तल्मूदी पिलपुल-दृष्टिए मुन्नाजीक संग हुनकर साक्षात्कार आदर्श कुष्या-तेरुत्स्-दिख्या-चक्र। प्रश्न (कुष्या): ‘मैथिली नाट्य-समानान्तर किए चाही?’ - उत्तर (तेरुत्स्): जातिवादी रंगमंचक ‘कथित छोटहा-मैथिली’क प्रयोग द्वारा सर्वहाराक भाषा-अप्रामाणीकरणकेँ रोकय खातिर - तेसर पक्ष (दिख्या): विदेह-समानान्तर-मञ्चन एकर वैकल्पिक-समाधान। मिद्राशी पेशर-दृष्टिए ‘उल्कामुख’ नाटकक स्त्री-मात्र-अभिनेत्री-योजना मैथिली-संस्कृतिक प्राचीन-स्त्री-केन्द्रित-कीर्तनिञा-परम्पराक पुनर्व्याख्या थिक - अर्थात् ओ प्राक्-आधुनिक मैथिली-स्त्री-कलाक समकालीन-राजनीतिक-पेशर। राबर्ट आल्टर-दृष्टिए नौ-भागमे विभाजित मञ्चन-दस्तावेजीकरण ‘नैरेटिव गैप्स्’क उत्तम-उदाहरण - हर भाग पूर्ण नहि, मुदा एक संयुक्त-अखण्ड-कथा रचैत अछि। डेनिएल बोयारिनक इन्टरटेक्सचुअल-दृष्टिए हुनकर नाटक नचिकेता, सुधांशु शेखर चौधरी आ जगदीश प्रसाद मण्डलक नाटकक संग गुप्त-अन्तरपाठीयता रखैत अछि - हुनकर ‘उगना’ विद्यापति-परम्पराक सङ्ग। लेखक ३ : ज्योति सुनीत चौधरी रचना-सूची (सदेह ८) ‘केसर’ - पूर्ण मैथिली नाटक। नायिका केसर एकटा मध्यम-वर्गीय परिवारक उच्च-महत्वाकांक्षी प्रवासी-भारतीय किशोरी। ओ विदेशी छात्र-वीसा आ स्कॉलरशिप पबि कऽ शोध-कार्य हेतु विदेश जाइ छथि। ओतय एक डिपार्टमेण्टल-स्टोरमे पार्ट-टाइम कैशियरक काज पकड़ैत छथि, जतय हुनकर मूल-नाम ‘केसर’ ‘कैश’मे रूपान्तरित होइत अछि। नाटकमे हुनकर भारतीय-नानी-दादीक सेवा-केन्द्रित-जीवन आ अपन स्वाधीनता-केन्द्रित-जीवनक बीच मानसिक-संघर्ष; एकटा भारतीय-मूल-नवयुवती-ग्राहक हुनकासँ कहैत अछि - ‘हम सभकेँ अपन देशक उन्नति लेल योगदान देबाक चाही, तखन तँ निर्णय अहाँकेँ लेबाक अछि जे अहाँ कैश बनए चाहैत छी आकि केसर।’ (क) विदेह समानान्तर साहित्येतिहास दृष्टिए ज्योति सुनीत चौधरी विदेह-आन्दोलनक प्रमुख महिला-नाटककारिणी छथि। हुनकर ‘केसर’ नाटक मैथिली नाट्य-साहित्यमे एक नूतन-विषयक प्रवेश कराबैत अछि - मैथिली-डायस्पोरा अनुभव, विशेषत: स्त्री-डायस्पोरा। ई विषय जातिवादी-रंगमंच द्वारा अछूत राखल गेल छल, कारण हुनकर रंगमंच गामक-जातीय-संघर्ष धरि सीमित। ज्योति सुनीत चौधरी ओहि सीमाकेँ तोड़ि कऽ वैश्विक-मैथिली-स्त्री-अनुभवकेँ रंगमंचपर अनलनि। विदेह-समानान्तर-ढाँचामे हुनकर स्थान - स्त्री-स्वर + वैश्विक-दृष्टि + भाषा-संरक्षण। (ख) गंगेशीय नव्य-न्याय दृष्टिए प्रत्यक्ष-प्रमाण: नाटकमे डिपार्टमेण्टल-स्टोर-काउण्टर, बार-कोड-स्कैनर, पाश्र्व-ध्वनि-व्यवस्था - सभ नूतन-प्रत्यक्ष-तत्त्व मैथिली रंगमंचमे। अनुमान: ‘केसर → कैश’ नामान्तरणसँ हुनकर अस्मिता-संकटक अनुमान। ‘यत्र-यत्र विदेश-प्रवास, तत्र-तत्र नामान्तरण’ - एहि व्याप्तिसँ नाटककी ‘धन-मूल्य-केन्द्रित-सभ्यता’क-समीक्षाक उद्घाटन। शब्द-प्रमाण: ‘हमर नानी-दादी सभ तँ अपन समस्त जिनगी परिवारक नामे कऽ देने छली’ - ई वाक्य अनुमानसँ बेसी ‘स्मृति-शब्द-प्रमाण’ रूपमे प्रयुक्त। (ग) भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य दृष्टिए रस-दृष्टिए ‘केसर’ नाटकक स्थायी-रस वियोग-शृङ्गार (देश-वियोग) + करुण (पारिवारिक-संस्कारक-वियोग) + वीर (अपन-निर्णय-शक्ति) - ई त्रि-रस-संयोग नाटकक प्राण। शान्त-रस अन्तिम-संवाद ‘कैश बनए चाहैत छी आकि केसर’क प्रश्नमे शान्त-निर्णयक-स्थिति। ध्वनि-दृष्टिए केसर (मसाला, सुगन्ध, मूल्यवान्) आ कैश (नकद, ठण्ढा, यान्त्रिक) क बीच नामान्तरण ‘अर्थ-ध्वनि’क उत्कृष्ट-उदाहरण - मूल नाम ‘केसर’ क मसालावाची-अर्थ-संग संगति, ‘कैश’ क पाश्चात्य-नकद-अर्थ-संग वैधर्म्य। कुन्तकीय वक्रोक्ति-दृष्टिए ‘केसर → कैश’ शब्द-स्तरीय अर्थ-वक्रता (कुन्तकीय पद-वक्रता)। ज्योति सुनीत चौधरीक नाट्य-शिल्पमे ई वक्रता मात्र शाब्दिक नहि - ओ सम्पूर्ण-नाटकीय-वक्रता थिक, कारण नाटकक मूल-प्रश्न यएह वक्रतापर टिकल अछि। क्षेमेन्द्रीय औचित्य-दृष्टिए नाटकक भाषा-औचित्य अनूठा - केसरक पात्र मैथिली-अङ्ग्रेजी-कोड-स्विचिङ्ग न्यूनतम राखि कऽ शुद्ध मैथिली-वैचारिक-संवादमे रहैत अछि - ई जातिवादी-रंगमंचक ‘मिश्रित-कथित-छोटहा-मैथिली’-प्रवृत्तिक प्रत्यक्ष-विरोध। (घ) पाश्चात्य दृष्टिए ब्रेख्तीय एपिक-थिएटर-दृष्टिए नाटकक मुख्य-तकनीक ‘पाश्र्वध्वनि’ - जे दृश्यक पहिले परिस्थिति-वर्णन प्रस्तुत करैत अछि - ई ब्रेख्तीय-नैरेटर-प्रथाक मैथिली-व्यवहार। दर्शक नाटकमे ‘डूब’ नहि सकैत अछि, बल्कि लगातार आलोचनात्मक-दूरी पकड़ने रहैत अछि। स्पिवाक-दृष्टिए ‘क्या उपालटर्न बजा सकैत अछि?’ - एहि प्रश्नक नूतन-संस्करण नाटकमे - ‘क्या प्रवासी-मैथिल-स्त्री अपन भाषामे बजि सकैत अछि?’ नाटकक उत्तर: हँ, मुदा क्षणिक - कारण विदेशी-संस्थागत-व्यवस्था (कैशियर-काउण्टर, बार-कोड-स्कैनर) ओकर भाषा-अस्मिताकेँ निरन्तर मिटाबय चाहैत अछि। बाख्तिन-दृष्टिए नाटक हेटेरोग्लोसिया-समृद्ध - केसरक मातृ-भाषा, कैशियरक यान्त्रिक-वार्तालाप, सैम्युएलाक विदेशी-मूल-स्वर, नवयुवती-ग्राहकक प्रवचनात्मक-स्वर - चारि स्वतन्त्र-स्वर सङ्गहि उपस्थित। बेन्यामिन-दृष्टिए वृद्धा-स्त्रीक रस्तामे-दर्शन ‘कथावाचक’क प्रतीक - पुरान-स्मृति-वाहक - आधुनिक-समयमे विलुप्तप्राय। पियरे बोर्दिऊ-दृष्टिए ‘केसर’ नाम ‘सांस्कृतिक-पूँजी’क प्रतीक, ‘कैश’ ‘आर्थिक-पूँजी’क - दुनूक बीच रूपान्तरणक मनोवैज्ञानिक-मूल्य ज्योति सुनीत चौधरीक मूल-तर्क। (ङ) चीनी दृष्टिए लिऊ शिए-दृष्टिए ‘केसर’क ‘फेङ्गगु’ बहुत-सुन्दर - फेङ्ग (प्राण): स्त्री-अस्मिता-संकटक भावप्रवाह, गु (संरचना): पाश्र्वध्वनि-केन्द्रित दृश्य-व्यवस्था। तोङ्गबियान्: मैथिली-गाम-केन्द्रित-नाट्य-परम्परा + वैश्विक-डायस्पोरा-नूतन-विषय। चोङ्ग रोङ्ग-दृष्टिए ज्योति सुनीत चौधरीक स्थान शिपिनमे ‘शाङ्ग-पिन्’क समीप - कारण नाटकमे ‘झी’ (रस) क उपस्थिति प्रबल। यान् यू-दृष्टिए मियाओ्वू - ‘कैश बनए चाहैत छी आकि केसर’ - एक वाक्यमे सम्पूर्ण-नाटकक-दर्शन-संक्षेपन, गहन-सहज-बोधक चरम। (च) यहूदी-इसरायली दृष्टिए राबर्ट आल्टर-दृष्टिए ‘केसर’ नाटक टाइप-सीन्क उत्तम-उदाहरण - रोज-रस्तामे-वृद्धासँ-मुलाकात, रोज-दोकानमे-काज, रोज-स्मृति-वार्तालाप - पुनरावर्ती-दृश्य-प्रतिमान जे नाटकमे ध्यानात्मक-दृष्टि उत्पन्न करैत अछि। ‘वर्ब्ल इकोज्’: नानी-दादी-स्मृति बारम्बार पुनरावर्तित, हर बेर नूतन-संदर्भमे। ‘नैरेटिव गैप्स्’: पारिवारिक-पृष्ठभूमिक विस्तार नहि देल - दर्शकक कल्पनापर छोड़ल। मिद्राशी पेशर-दृष्टिए ‘केसर’ नाम स्वयं एकटा पेशर थिक - कश्मीरी-इरानी-मूलक सुगन्धित-मसाला, जे मिथिला-संस्कृतिक उत्सव-व्यञ्जनमे प्रयोग होइ अछि (केसरिया-दूध, केसर-हलवा)। हुनकर पाश्चात्यीकरण ‘कैश’मे - मूल-भारतीय-संस्कृतिक-कोष-संक्षयक प्रतीक। पिलपुल-दृष्टिए नाटकक प्रत्येक-दृश्य कुष्या-तेरुत्स्-दिख्या ढाँचा अपनबैत अछि - हर दृश्य एक नैतिक-प्रश्न उठबैत अछि, मीमांसा करैत अछि, तेसर-पक्ष-प्रस्तुति करैत अछि। लेखक ४ : मुन्नी कामत रचना-सूची (सदेह ८) ‘अंधविश्वास’ - पूर्ण-दृश्य मैथिली नाटक। नायक रघुनाथक माध्यमसँ ग्रामीण-समाजमे प्रचलित अंधविश्वास-प्रथा - विशेष कऽ बीमार-बच्चाक जान बचेबा खातिर माँ-कालीकेँ पशु-बलि वा अन्य-तान्त्रिक-कर्म - क विरुद्ध तीव्र-प्रहार। रघुनाथक प्रसिद्ध-संवाद: ‘हे कक्का, एगो बातक जबाब तूँ सभ ग्रामीण मिल कऽ दए। तोरा दुगो पुत्र छऽ, एगो बिमार छऽ तँ कि तूँ एगो पुत्रक जान लऽ कऽ दोसर पुत्रक जान बचेबहक, नइ ने। तँ फेर माँ काली ई कोना करथिन। हुनका लेल तँ अइ संसारमे रहैबला हर जीव माँक संतान छी। फेर ओ ई कोना करथिन। अंधविश्वासक चादरमे नइ लिपटल रहऽ। जागऽ ... आबो तँ जागऽ।’ नाटकक अन्तमे काव्यात्मक-समापन - ‘अछि ई अंधविश्वासक बाइन।’ (क) विदेह समानान्तर साहित्येतिहास दृष्टिए मुन्नी कामत विदेह-आन्दोलनक प्रमुख गएर-सवर्ण महिला-नाटककारिणी छथि। हुनकर ‘अंधविश्वास’ नाटक हरिमोहन झाक प्राक्-आधुनिक-अंधविश्वास-विरोधी-परम्पराक (मुदा हास्य-केन्द्रित) समानान्तर - सीधा-तीक्ष्ण-नैतिक-संवाद-केन्द्रित-परम्पराक प्रस्तुति। ई परम्परा साहित्य-अकादेमी-केन्द्रित-कैनन-मे अनुपस्थित - कारण ओ ब्राह्मण-केन्द्रित-हास्य-पद्धतिक प्राधान्य रखैत अछि, सर्वहारा-केन्द्रित-नैतिक-प्रहार-पद्धतिक नहि। विदेह-समानान्तर-ढाँचा ऐ बहिष्कृत-धाराकेँ केन्द्रमे आनैत अछि। (ख) गंगेशीय नव्य-न्याय दृष्टिए अनुमान-प्रमाणक अद्भुत-उदाहरण रघुनाथक मूल-तर्कमे। ओ माँ-कालीक पशु-बलि-स्वीकृति-तर्ककेँ कैनरूप अनुमान-दोष द्वारा खण्डित करैत छथि: ‘तोरा दुगो पुत्र छऽ, एगो बिमार छऽ तँ कि तूँ एगो पुत्रक जान लऽ कऽ दोसर पुत्रक जान बचेबहक, नइ ने। तँ फेर माँ काली ई कोना करथिन।’ ई शुद्ध ‘विरुद्ध-धर्म-व्यभिचार’ (cross-instantiation falsification) क प्रयोग थिक - माँ-काली केर ‘समस्त-जीव-मातृत्व’क व्याप्ति, ओकर ‘किछु-जीव-बलिप्रति-उदासीनता’क व्याप्तिसँ टकराइत अछि। ई दुनू-व्याप्ति एक-साथ नहि टिकि सकैत - एकर खण्डन अनिवार्य। मुन्नी कामत गंगेश-शैलीक तर्क ग्राम-मञ्चपर प्रस्तुत करैत छथि। (ग) भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य दृष्टिए रस-दृष्टिए नाटकक मूल-रस वीर (नैतिक-वीर) + करुण (बच्चाक-बीमारीक-दुख) + रौद्र (अंधविश्वासी-समाजक-विरुद्ध)। रौद्र-रसक चरम ‘जागऽऽऽऽऽऽऽ’ केर एगारह-बेर लम्बायित-स्वरमे - ई स्थूल-नैरन्तर्यसँ रौद्र-रस-निर्माणक भरत-शास्त्रीय-तकनीक। ध्वनि-दृष्टिए ‘अंधविश्वासक बाइन’ - ‘बाइन’ शब्दक बहु-अर्थ - रस्सी (बन्धन) आ बाँध (अवरोध) - दुनू-अर्थ नाटकक मूल-सन्देशमे प्रकट। क्षेमेन्द्रीय औचित्य-दृष्टिए नाटकक पात्र-वेष-भाषा-समायोजन उत्कृष्ट - रघुनाथक मैथिली कामत-समुदायक प्राकृत-मैथिली, मुदा हुनकर तर्क-शक्ति शास्त्रीय। ई ‘वक्तृ-औचित्य’क अनूठा-व्यवस्था - सर्वहारा-पात्र, मुदा शास्त्रीय-तर्क-वक्ता। (घ) पाश्चात्य दृष्टिए बोआल-दृष्टिए ‘अंधविश्वास’ नाटक उत्पीड़ितक रंगमंचक चरम-उदाहरण - रघुनाथक ग्रामीण-समाजसँ सीधा संवाद, दर्शककेँ नैतिक-निर्णय हेतु जबाबदेह बनाएब। ब्रेख्तीय-दृष्टिए ‘जागऽ ... आबो तँ जागऽ’ - एगारह-बेर पुनरावृत्ति - आलिएनेशन-इफेक्टक उत्तम-उदाहरण - दर्शक नाटकमे डूबि कऽ रोएब छोड़ि कऽ ‘जागैत’ अछि, चेतना-स्तरपर सक्रिय बनैत अछि। ग्राम्शीयन-दृष्टिए मुन्नी कामत आर्गेनिक-इन्टेलेक्चुअल - कामत-समुदायक स्वयं-जनित बुद्धिजीवी जे अपन-समुदायक-धार्मिक-संरचनाकेँ चुनौती दैत छथि। फनन-दृष्टिए ओ ‘उपनिवेशित-मानस’क-विमुक्ति-कर्म करैत छथि - कारण अंधविश्वास उपनिवेशवादक-प्राक्-आधुनिक-संरूप थिक (ब्राह्मण-केन्द्रित-तन्त्र-शास्त्र द्वारा सर्वहाराकेँ धार्मिक-दण्ड-भयसँ बान्धल जाएब)। (ङ) चीनी दृष्टिए लिऊ शिए-दृष्टिए नाटकक फेङ्गगु बहुत-सशक्त - फेङ्ग (प्राण): नैतिक-आक्रोश, गु (हड्डी): तर्क-संरचना। तोङ्गबियान्: पुरान-अंधविश्वास-विरोधी-परम्परा (हरिमोहन झा) + नूतन-तर्क-शैली। चोङ्ग रोङ्ग-दृष्टिए मुन्नी कामतक स्थान ‘झोङ्ग-पिन्’क उच्च-छोर वा ‘शाङ्ग-पिन्’क निम्न-छोर - कारण ‘झी’ क उपस्थिति अद्भुत मुदा नाटकक प्रबन्ध-विस्तार सीमित। यान् यू-दृष्टिए ‘जागऽ ... आबो तँ जागऽ’ - एक वाक्यांश मे ‘मियाओ्वू’क चरम-व्यवहार। (च) यहूदी-इसरायली दृष्टिए मिद्राशी पेशर-दृष्टिए नाटक माँ-कालीक देवी-स्थिति केर पेशर-व्याख्या प्रस्तुत करैत अछि - मूल-शास्त्रीय-काली (वैदिक-तान्त्रिक-संरचनामे विनाश-शक्ति) समकालीन-संदर्भमे ‘समस्त-जीव-मातृत्व’क प्रतीक रूपमे पुनर्व्याख्यायित। ई शास्त्रीय-काली-पाठक मानवीय-नैतिक-पेशर। पिलपुल-दृष्टिए रघुनाथक प्रसिद्ध-तर्क-संवाद आदर्श कुष्या-तेरुत्स्-दिख्या - कुष्या: ‘किए माँ-काली पशु-बलि स्वीकार करय?’; तेरुत्स्: ‘मातृत्वक तर्कसँ ई असम्भव’; दिख्या: ‘अंधविश्वासक चादर तोड़ब अनिवार्य।’ राबर्ट आल्टर-दृष्टिए नाटकक ‘वर्ब्ल इकोज्’ - ‘अंधविश्वास’, ‘चादर’, ‘बाइन’ - ई शब्द बारम्बार पुनरावर्तित, हर बेर नूतन-अर्थमे। डेनिएल बोयारिनक इन्टरटेक्सचुअल-दृष्टिए मुन्नी कामतक नाटक हरिमोहन झा-परम्पराक संग, मुदा हरिमोहन झाक हास्य-केन्द्रित-शैलीसँ भिन्न - सीधा-नैतिक-प्रहार-केन्द्रित। ई इन्टरटेक्सचुअल-रूपान्तरण। लेखक ५ : धीरेन्द्र कुमार रचना-सूची (सदेह ८) (क) ‘उदय नारायण सिंह नचिकेताक नाटक नो एण्ट्री: मा प्रविश’ - विशद-समीक्षा। (ख) ‘जड़ैत मोमबत्ती’ - समीक्षा। (क) विदेह समानान्तर साहित्येतिहास दृष्टिए धीरेन्द्र कुमार विदेह-समानान्तर-समीक्षक-समूहक प्रमुख-सदस्य छथि जे ज्योतिरीश्वर-धूर्तसमागम → नचिकेता-नो-एण्ट्री वृत्तकेँ पूर्ण-कऽ-देखबा-केर-समीक्षात्मक-कार्य करैत छथि। नचिकेताक ‘नो एण्ट्री: मा प्रविश’ ज्योतिरीश्वर-धूर्तसमागमक उत्तर-आधुनिक-अबसर्डिटी-संस्करण थिक - ई गजेन्द्र ठाकुरक मुख्य-प्रमेय - आ धीरेन्द्र कुमार ओहि-प्रमेयक विशद-समर्थक-प्रमाण प्रस्तुत करैत छथि। हुनकर समीक्षा-कार्य विदेह-ढाँचाक चौथा-प्रश्न (‘कोन सौन्दर्य-शास्त्रीय मूल्य ऐ समानान्तरमे प्रकट?’) क प्रत्यक्ष-उत्तर थिक। (ख) गंगेशीय नव्य-न्याय दृष्टिए उपमान-प्रमाणक उत्कृष्ट-उदाहरण धीरेन्द्र कुमारक समीक्षामे - नो एण्ट्री-नो-एण्ट्रीक तुलना धूर्तसमागम-संगहि अन्य-अबसर्ड-नाटकसँ (बेकेट-वेटिङ्ग-फॉर-गोदो, इओनेस्को-बाल्ड-सोप्रानो) - ई उपमान-प्रमाण नचिकेता-नाटकक वैश्विक-स्थापना करैत अछि। शब्द-प्रमाण: नचिकेताक स्वयंक नाटकीय-संवाद, ज्योतिरीश्वरक पाठ - दुनू शब्द-प्रमाण रूपमे प्रस्तुत। (ग) भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य दृष्टिए रस-दृष्टिए नो एण्ट्री: मा प्रविशक मूल-रस ‘अद्भुत’ + ‘शान्त’ - अद्भुत कारण ‘प्रवेश-निषेध-निषेध’क द्वि-स्तरीय-तर्क, शान्त कारण ‘प्रवेश-आकाङ्क्षा’क मूलभूत-निरर्थकता-बोध। ध्वनि-दृष्टिए ‘मा प्रविश’ - संस्कृत-व्याकरणक प्रसिद्ध-निषेध-प्रयोग - पाणिनीय-संदर्भकेँ नाटकीय-संदर्भमे अनलकेँ धीरेन्द्र कुमार ‘ध्वनि-काव्यक चरम’ रूपमे चिन्हित करैत छथि। कुन्तकीय वक्रोक्ति-दृष्टिए ‘मा प्रविश’ - पद-वक्रता; ‘नो एण्ट्री’ अङ्ग्रेजी-संकेतसँ सम्पूर्ण-वाक्य-वक्रता; ई द्वि-स्तर ज्योतिरीश्वर-धूर्तसमागमक मैथिली-संस्कृत-कोड-मिश्रणक नूतन-रूपान्तरण। (घ) पाश्चात्य दृष्टिए अरस्तू-दृष्टिए नो एण्ट्री: मा प्रविशक मुख्य-तत्त्व ‘कथानक’ नहि ‘विचार’ (dianoia) थिक - ई अरस्तूय-संरचनाक उल्लङ्घन, मुदा बेकेट-इओनेस्को-कैम्यू-केर अब्सर्डिस्ट-ट्रेडिशनक अनुसरण। ब्रेख्तीय-दृष्टिए नाटकक प्रवेश-निषेध स्वयं अलगाव-प्रभाव - दर्शक ‘प्रवेश’क सामान्य-अपेक्षासँ बहिर्गत भऽ कऽ ‘प्रवेश-निषेध’क राजनीतिक-दर्शनिक-अर्थ सोचय पड़ैत अछि। बाख्तिनीय कार्निवल-दृष्टिए ‘प्रवेश-निषेध’ कार्निवलक उल्टा - कार्निवलमे सभकेँ प्रवेश, ऐ नाटकमे सभकेँ निषेध। ई व्युत्क्रम-कार्निवल - अधिकार-वाला-संस्थागत-तन्त्रक प्रतीक। फनन-दृष्टिए ‘नो एण्ट्री’ उपनिवेशवादक मूल-संरचना - अधिकार-धारी-केन्द्र, बहिष्कृत-परिधि - ई धीरेन्द्र कुमारक मुख्य-समीक्षात्मक-व्याख्या। (ङ) चीनी दृष्टिए लिऊ शिए-दृष्टिए नो एण्ट्री: मा प्रविशक फेङ्गगु कनेक नाजुक - फेङ्ग (अद्भुत-शान्त-प्रवाह) सशक्त, मुदा गु (संरचना) न्यूनतम - ई बात धीरेन्द्र कुमार चिन्हित करैत छथि। चोङ्ग रोङ्ग-दृष्टिए नचिकेताक स्थान शिपिनमे ‘शाङ्ग-पिन्’ - कारण हुनकर रचनामे ‘झी’ (रस) क अद्भुत-स्तरीय उपस्थिति। यान् यू-दृष्टिए ‘मा प्रविश’ - मियाओ्वूक चरम - एक वाक्यांशमे सम्पूर्ण-दर्शन-संक्षेपन। (च) यहूदी-इसरायली दृष्टिए मिद्राशी पेशर-दृष्टिए ‘नो एण्ट्री: मा प्रविश’ ‘प्रवेश-निषेध’क बहु-स्तर-व्याख्या प्रस्तुत करैत अछि - पशाट (शाब्दिक): भौतिक-प्रवेश-निषेध; रेमेज् (सङ्केतगर्भित): सामाजिक-वर्ग-प्रवेश-निषेध; द्राश (नैतिक): आत्म-प्रवेश-निषेध (आत्म-निरीक्षण-असम्भवता); सोद (रहस्यगर्भ): अस्तित्व-गत-प्रवेश-निषेध। धीरेन्द्र कुमार ऐ चारिटा-स्तर-व्याख्याकेँ मैथिली-समीक्षा-शैलीमे विकसित करैत छथि। पिलपुल-दृष्टिए हुनकर समीक्षा-शैलीमे कुष्या-तेरुत्स्-दिख्या-चक्र प्रकट - कुष्या: ‘नचिकेता-नाटकमे प्रवेश किए निषेधित?’; तेरुत्स्: ‘प्रवेशक भ्रम-त्रासदी निवारणार्थ’; दिख्या: ‘मुदा भ्रम स्वयं प्रवेश-निषेधसँ भिन्न अछि।’ लेखक ६ : शिव कुमार झा रचना-सूची (सदेह ८) (क) ‘भफाइत चाहक जिनगी’ - सुधांशु शेखर चौधरीक नाटकक विस्तृत-समीक्षा। (ख) ‘मिथिलाक बेटी’ - जगदीश प्रसाद मण्डलक नाटकक समीक्षा। (ग) ‘मैथिली नाटकक विकासमे आनंद जीक योगदान’ - आनंद कुमार झा-केन्द्रित-निबन्ध। (घ) ‘गजेन्द्र ठाकुरक नाटक संकर्षण’ - समीक्षा। (ङ) ‘विभारानीक नाटक बलचन्दा’ - समीक्षा। (क) विदेह समानान्तर साहित्येतिहास दृष्टिए शिव कुमार झा सहायक-सम्पादक रूपमे विदेहक सक्रिय-संरचनाक हिस्सा छथि। हुनकर समीक्षात्मक-कार्य पाँच नाटक - सुधांशु शेखर चौधरी, जगदीश प्रसाद मण्डल, आनंद कुमार झा, गजेन्द्र ठाकुर, विभारानी - पर केन्द्रित, जे विदेह-समानान्तर-कैननक मुख्य-नाटककार। शिव कुमार झाक समीक्षा एहि कैननकेँ शास्त्रीय-वैधता-प्रदान करैत अछि। (ख) गंगेशीय नव्य-न्याय दृष्टिए प्रत्यक्ष-प्रमाण: नाटकक पाठ-गत-दृश्य-संवाद-विवरण। अनुमान: नाटकीय-संवादसँ पात्रक-मनस्थिति-निष्कर्षण। विशेष-व्याप्ति-प्रयोग ‘भफाइत चाहक जिनगी’-समीक्षामे - ‘यत्र-यत्र दीर्घसूत्री-कर्म-त्याग, तत्र-तत्र अधलाह-कर्म-स्वीकार’ - महेशक चाह-दोकानक माध्यमसँ। शब्द-प्रमाण: सुधांशु शेखर चौधरीक स्वयंक-कथन - आत्मकथ्य। हेत्वाभास-निरूपण: सुधांशु शेखर चौधरीक आत्मकथ्यमे ‘हमर किछु मोजर अछि’ - ई शिव कुमार झा द्वारा ‘अहं-हेत्वाभास’ रूपमे चिन्हित। गंगेशीय कोटिए ‘असम्बद्ध-स्व-स्तुति-हेत्वाभास’। (ग) भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य दृष्टिए रस-दृष्टिए ‘भफाइत चाहक जिनगी’क मूल-रस हास्य-करुण-संयोग। शिव कुमार झा एकर अद्भुत-विश्लेषण प्रस्तुत करैत छथि - चाहक भफ-अल्पकालिकता-प्रतीक, मुदा भनसिया-आत्मविश्वास-संग सुस्वादु-निर्माण। ई ‘भफाइत-चाह’क बिम्ब कुन्तकीय वाक्य-वक्रताक चरम-उदाहरण - सामान्य-वस्तुक माध्यमसँ अस्तित्व-दर्शन। ध्वनि-दृष्टिए ‘भफाइत चाहक जिनगी’ - रस-ध्वनि (शान्त) + वस्तु-ध्वनि (अल्पकालिकता) - द्वि-स्तरीय। क्षेमेन्द्रीय औचित्य-दृष्टिए शिव कुमार झा सुधांशु शेखर चौधरीक एक-दोषक-चिन्हन सेहो करैत छथि - ‘बटुक भाय आ गजेन्द्र नारायण चौधरीक प्रति कृतज्ञता-ज्ञापनमे महिमा-मण्डन’ - ई ‘कर्तृ-औचित्य-दोष’ थिक। मुदा एकर बाबजूद ‘भफाइत चाहक जिनगी’क मर्यादा क्षीण नहि - ई शिव कुमार झाक सन्तुलित-समीक्षात्मक-निष्कर्ष। (घ) पाश्चात्य दृष्टिए बेन्यामिन-दृष्टिए शिव कुमार झा ‘भफाइत चाहक जिनगी’क ‘कथावाचक-तत्त्व’ चिन्हित करैत छथि - महेश, चाह-दोकानदार-कवि, बेन्यामिनीय-कथावाचक थिक - पुरान-संस्कृतिक स्मृति-वाहक। बोर्दिऊयायी हाबिटस-दृष्टिए महेशक पात्र दीर्घसूत्री-कुल-वंशक हाबिटसकेँ चुनौती दैत अछि - सुशिक्षित-व्यक्ति-कर्मक-प्रतिस्पर्धामे असफल, तखन ‘अधलाह-मानल-गेल-कर्म’केँ स्वीकार। ब्रेख्तीय-दृष्टिए चाह-दोकान-कविता-पाठक संयोग आलिएनेशन-इफेक्ट उत्पन्न करैत अछि। ग्राम्शीयन-दृष्टिए महेश आर्गेनिक-इन्टेलेक्चुअल - बेरोजगार-वर्गक स्वयं-जनित बुद्धिजीवी। फनन-दृष्टिए सुधांशु शेखर चौधरीक नाटक ‘अधलाह-कर्म’क सामाजिक-कलङ्ककेँ चुनौती दैत अछि - ई उपनिवेशीय-वर्ग-संस्कृतिक-विमुक्ति-कर्म। (ङ) चीनी दृष्टिए लिऊ शिए-दृष्टिए शिव कुमार झा द्वारा ‘भफाइत चाहक जिनगी’क ‘मरूभूमिमे नीरक सदृश’-विशेषण - ई शुद्ध फेङ्गगु-दृष्टिक प्रकटीकरण - मरूभूमि (परिवेश-शुष्कता) मे नीर (फेङ्ग-प्राण) क उपस्थिति। तोङ्गबियान्-दृष्टिए सुधांशु शेखर चौधरी पुरान-गोविन्द-झा-राधाकृष्ण-चौधरी-परम्पराकेँ नूतन-अस्तित्व-दर्शन-केन्द्रित-शैलीमे रूपान्तरित करैत छथि। चोङ्ग रोङ्ग-दृष्टिए हुनकर स्थान ‘शाङ्ग-पिन्’ - कारण ‘झी’ (रस) क अद्भुत उपस्थिति। (च) यहूदी-इसरायली दृष्टिए मिद्राशी पेशर-दृष्टिए ‘भफाइत चाह’ बहु-स्तरीय-व्याख्या - पशाट: नीर-दूधक भनसा; रेमेज्: जीवनक अल्पकालिकता; द्राश: नैतिक-कर्म-निरन्तरता; सोद: अस्तित्वगत-शाश्वतताक भ्रम। राबर्ट आल्टर-दृष्टिए नाटकक ‘टाइप-सीन्’ - चन्द्रमाक हर-बेर-दोकान-आगमन, सरिताक आगमन - पुनरावर्ती-दृश्य। पिलपुल-दृष्टिए शिव कुमार झाक सम्पूर्ण-समीक्षा-शैलीमे कुष्या-तेरुत्स्-दिख्या ढाँचा सक्रिय। लेखक ७ : रवि भूषण पाठक रचना-सूची (सदेह ८) ‘विभा रानीक नाटक भाग रौ’ - विशद-समीक्षा। उप-शीर्षक: ‘सामाजिक-राजनीतिक निहितार्थ’। समीक्षा-केन्द्र: नाटकक प्रासङ्गिकता-तत्त्व आ रंगमंचीयता-तत्त्व। (क) विदेह समानान्तर साहित्येतिहास दृष्टिए रवि भूषण पाठकक समीक्षा विभा रानीक स्थान विदेह-समानान्तर-कैननमे प्रतिष्ठित करैत अछि। ओ नाटकक केन्द्र-कथा ‘दानापुर-दाना-दाना-चुगएबला-कर्मठ-वर्ग’ - सर्वहारा-जन - मे चिन्हित करैत छथि। ई शुद्ध समानान्तर-दृष्टिक-समीक्षा थिक - मुख्यधारा-समीक्षा विभा रानीक नाटककेँ ‘स्त्री-लेखन’क सीमामे राखैत रहल, मुदा रवि भूषण पाठक ओकर सर्वहारा-वर्ग-केन्द्रित-वर्ग-राजनीतिक-दृष्टिकेँ प्रस्तुत करैत छथि। (ख) गंगेशीय नव्य-न्याय दृष्टिए अनुमान-प्रमाण: नाटकक प्रासङ्गिकता आ रंगमंचीयता - द्वि-तत्त्व-व्याप्ति-निरूपण। ‘यत्र-यत्र पात्र-स्वगत-पैघ, तत्र-तत्र रंगमंचीयता-संदिग्ध’ - एहि व्याप्तिसँ दोसर-अंक-पहिल-दृश्यक एक-पृष्ठ-स्वगतक रंगमंचीयता-त्रुटि-निष्कर्षण। ई शुद्ध गंगेशीय व्याप्ति-प्रयोग। हेत्वाभास-निरूपण: नाटकक कविता-तत्त्वक शमशेर-कविता-समानता-तर्ककेँ रवि भूषण पाठक ‘असम्बद्ध-हेत्वाभास’ रूपमे खारिज करैत छथि - कारण ओ कविता नाटकक मुख्य-भाग नहि। (ग) भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य दृष्टिए रस-दृष्टिए ‘भाग रौ’क मूल-रस करुण + वीर - दानापुरक भिखमंगा-वर्गक करुण-स्थिति, हुनकर जीविका-संघर्षक वीर-तत्त्व। क्षेमेन्द्रीय औचित्य-दृष्टिए रवि भूषण पाठक ‘प्रथम-अङ्क-दृश्य-जीवन्तता’ बनाम ‘द्वितीय-अङ्क-गुरुत्वाकर्षण-कमी’क-विश्लेषण करैत छथि। ई ‘प्रबन्ध-औचित्य’क उच्च-स्तरीय-निरूपण। (घ) पाश्चात्य दृष्टिए ब्रेख्तीय-दृष्टिए ‘भाग रौ’ एपिक-थिएटरक मैथिली-व्यवहार - भिखमंगाक-वर्ग-संघर्ष राजनीतिक-दर्शकीय-चेतनाकेँ जगाएब। बोआल-दृष्टिए ‘फोरम थिएटर’ - दर्शक-समावेश-व्यवस्था। ग्राम्शीयन-दृष्टिए दानापुरक भिखमंगा-वर्ग ‘सब-आल्टर्न’ - स्पिवाक-दृष्टिए हुनकर भाषागत-सम्भाषण-क्षण। पियरे बोर्दिऊ-दृष्टिए नाटक-समीक्षाक रवि भूषण पाठक-शैली शुद्ध साहित्यिक-क्षेत्र-विश्लेषण थिक - ओ पत्रकार आ प्रेस-बला संदर्भक अपूर्णतापर ध्यान आकृष्ट करैत छथि - ई मीडिया-संरचनाक प्रतीकात्मक-हिंसा। (ङ) चीनी दृष्टिए लिऊ शिए-दृष्टिए विभा रानीक ‘भाग रौ’क फेङ्गगु - फेङ्ग सशक्त (दानापुरक-भिखमंगा-जीवन-आवेग), मुदा गु अंशत: कमजोर (दोसर-अंकमे)। ई रवि भूषण पाठकक चिन्हन - चीनी-शास्त्रीय-शब्दावलीमे शुद्ध फेङ्गगु-दोष-चिन्हन। तोङ्गबियान्-दृष्टिए विभा रानी पुरान-स्त्री-लेखन-परम्परा (मणिपद्म-झुमकी) केँ नूतन-वर्ग-राजनीतिक-शैलीमे रूपान्तरित करैत छथि। (च) यहूदी-इसरायली दृष्टिए पिलपुल-दृष्टिए रवि भूषण पाठकक समीक्षा-शैली - कुष्या: ‘किए दोसर-अंक प्रथम-अंकसँ कमजोर?’; तेरुत्स्: ‘स्वगतक अधिकता + नियन्त्रण-कमी’; दिख्या: ‘मुदा विषयवस्तुक नवोन्मेष आ ट्रीटमेन्टक अभिनवता ऐ कमीकेँ पूरा करैत अछि।’ ई शुद्ध पिलपुलीय-त्रि-स्तर-विश्लेषण। राबर्ट आल्टर-दृष्टिए नैरेटिव-गैप्स्क चिन्हन - पत्रकार-प्रेस-संदर्भक अधूरापन। लेखक ८ : शम्भू कुमार सिंह रचना-सूची (सदेह ८) (क) ‘मैथिली सामाजिक नाटकक मूल केन्द्र-बिन्दु: नारी समस्या’ - विस्तृत-शास्त्रीय-निबन्ध। (ख) ‘आधुनिक मैथिली नाटकमे चित्रित निर्धनताक समस्या’ - सामाजिक-आर्थिक-विश्लेषण। (क) विदेह समानान्तर साहित्येतिहास दृष्टिए शम्भू कुमार सिंह विदेहक प्रमुख-समाजशास्त्रीय-समीक्षक छथि। हुनकर दू-निबन्ध - नारी-समस्या आ निर्धनता-समस्या - मैथिली-नाटकक दू-केन्द्रीय-थीमक शास्त्रीय-समीक्षात्मक-मानचित्रण प्रस्तुत करैत अछि। ई थीम मुख्यधारा-समीक्षामे प्राय: ‘विषयगत’-स्तरपर देखाओल जाइ छल, मुदा शम्भू कुमार सिंह एकर ‘संरचनात्मक’-स्थान चिन्हित करैत छथि - ई दू-थीम मैथिली-नाटकक ‘मूल-केन्द्र-बिन्दु’ थिक, सीमावर्ती-थीम नहि। ई शुद्ध विदेह-समानान्तर-दृष्टि। (ख) गंगेशीय नव्य-न्याय दृष्टिए व्याप्ति-निरूपणक अद्भुत-उदाहरण - ‘यत्र-यत्र मैथिली-सामाजिक-नाटक, तत्र-तत्र नारी-समस्या-केन्द्र-स्थापन’ - ई व्याप्तिकेँ शम्भू कुमार सिंह विभिन्न नाटकक उदाहरणसँ सिद्ध करैत छथि। ई गंगेशीय अव्यभिचारी-सम्बन्ध। उपमान-प्रमाण: एक-नाटक (सुन्दर-संयोग, जीवन झा) क दोसर-नाटक (मिथिलाक बेटी, जगदीश प्रसाद मण्डल) सङ्ग तुलनात्मक-सादृश्य - दुनूमे नारी-समस्या केन्द्र-स्थानमे। (ग) भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य दृष्टिए रस-दृष्टिए शम्भू कुमार सिंह नारी-समस्या-केन्द्रित-नाटककेँ करुण-रौद्र-संयोगक रस-व्यवस्था रूपमे चिन्हित करैत छथि - नारी-दुख (करुण) + सामाजिक-अन्याय-विरुद्ध-आक्रोश (रौद्र)। निर्धनता-नाटककेँ करुण-वीर-संयोग रूपमे - निर्धन-वर्गक-दुख (करुण) + जीविका-संघर्ष-वीर (वीर)। क्षेमेन्द्रीय औचित्य-दृष्टिए हुनकर समीक्षा देश-काल-वस्तु-औचित्यकेँ चिन्हित करैत अछि - मैथिली नाटकक नारी-समस्या-निर्धनता-केन्द्रीयता मिथिलाक देश-काल-वस्तु-यथार्थक प्राकृतिक-प्रकटीकरण थिक। (घ) पाश्चात्य दृष्टिए ग्राम्शीयन-दृष्टिए शम्भू कुमार सिंह ‘निर्धनता’-केन्द्रित-समीक्षा वर्ग-संघर्ष-केन्द्रित-समीक्षाक मैथिली-व्यवहार थिक। हुनकर ‘नारी-समस्या’-केन्द्रित-समीक्षा सिमोन द बोव्वार-स्त्रीवादक ‘द्वितीय-लिङ्ग’-दृष्टिक मैथिली-व्यवहार। पियरे बोर्दिऊ-दृष्टिए - सामाजिक-वर्ग-संरचना आ सांस्कृतिक-पूँजी द्वारा नारी आ निर्धन-वर्गक स्थान-निर्धारण। फनन-दृष्टिए मैथिली नारी आ मैथिली निर्धन वर्ग दुनू उपनिवेशित-मानसक-शिकार - ब्राह्मण-पुरुष-केन्द्रित-संरचना द्वारा। शम्भू कुमार सिंहक समीक्षा हुनकर विमुक्ति-दृष्टिकेँ शास्त्रीय-वैधता दैत अछि। (ङ) चीनी दृष्टिए लिऊ शिए-दृष्टिए शम्भू कुमार सिंह स्वयं फेङ्गगु-समीक्षक छथि - फेङ्ग (समाजशास्त्रीय-आवेग) + गु (शास्त्रीय-संरचना)। हुनकर शास्त्रीय-निबन्ध-शैली ‘तोङ्गबियान्’क उदाहरण - पुरान-भरत-शास्त्रीय-नाट्य-समीक्षा + नूतन-मार्क्सीय-स्त्रीवादी-दृष्टि। चोङ्ग रोङ्ग-दृष्टिए हुनकर समीक्षात्मक-‘झी’ (स्वाद) निर्धनता-संवेदनशीलतापर निर्भर - सर्वहारा-वर्गक-स्वाद। (च) यहूदी-इसरायली दृष्टिए मिद्राशी पेशर-दृष्टिए शम्भू कुमार सिंहक निबन्ध ‘नारी-समस्या’ आ ‘निर्धनता’केँ मैथिली-नाटकक चारिटा-व्याख्या-स्तर मे चिन्हित करैत अछि - पशाट (पाठगत-यथार्थ), रेमेज् (सङ्केतगर्भित-वर्ग-राजनीति), द्राश (नैतिक-समाज-सुधार), सोद (दर्शन-गत-समानता)। पिलपुल-दृष्टिए हुनकर निबन्ध आदर्श-त्रि-स्तर-विश्लेषण - कुष्या-तेरुत्स्-दिख्या। लेखक ९ : दुर्गानन्द मण्डल रचना-सूची (सदेह ८) ‘नाटक बेटीक अपमानपर एक नजरि’ - बेचन ठाकुर-निर्देशित-नाटकक विस्तृत-समीक्षा। दुर्गानन्द मण्डल विदेह-संगीत-कला-सम्मान-कार्यक्रमक मञ्च-सञ्चालक सेहो छथि (सदेह ८मे प्रत्यक्ष-दस्तावेजीकृत - श्री बहादुर रामक संगीत-कला-सम्मान-समारोह)। (क) विदेह समानान्तर साहित्येतिहास दृष्टिए दुर्गानन्द मण्डल मैथिल-गएर-सवर्ण-समीक्षकक उत्तम-उदाहरण - हुनकर समीक्षा-शैली बेचन ठाकुरक ‘बेटीक अपमान’केँ मात्र-समीक्षित-नहि करैत अछि, बल्कि ओकर सामाजिक-संदेश-कन्या-भ्रूण-हत्या-विरुद्ध-जागृति-केर पैरोकारी सेहो करैत अछि। ई शुद्ध समानान्तर-समीक्षा - जे नाटककेँ केवल साहित्यिक-वस्तु नहि, सामाजिक-कर्म-प्रकल्प रूपमे देखैत अछि। (ख) गंगेशीय नव्य-न्याय दृष्टिए दुर्गानन्द मण्डलक समीक्षाक मुख्य-अनुमान - ‘यत्र-यत्र गर्भपात-सामाजिक-स्वीकृति, तत्र-तत्र मैथिली-भाषा-संस्कृतिक-क्षय’ - एहि व्याप्ति-निरूपण द्वारा ओ बेचन ठाकुरक नाटक-संदेशकेँ मूल-धरातलपर स्थापित करैत छथि - ‘मैथिल होइतो दोसर-भाषा-दासताक-शिकार भेल छी, बुझाइत अछि जेना मैथिलीक लेल एठामक माटिये उसाह भऽ गेल अछि, जइपर गदपुरनि मात्र उपजि सकैए।’ ई शुद्ध गंगेशीय व्याप्ति-निरूपण। (ग) भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य दृष्टिए रस-दृष्टिए ‘बेटीक अपमान’ - करुण-रौद्र-संयोगक रस-व्यवस्था; दुर्गानन्द मण्डल समीक्षाक अन्तिम-पङ्क्ति ‘ऐ माटिमे अखनो ओतेक शक्ति बचल अछि जइपर केसरो उपजि सकैत अछि’ - ई वीर-रसक चरम-व्यवहार। ध्वनि-दृष्टिए ‘केसर’क प्रयोग - ज्योति सुनीत चौधरीक नाटक ‘केसर’क-स्मरण-ध्वनि, मुदा कन्या-भ्रूण-हत्या-संदर्भमे - गहन-इन्टरटेक्सचुअल-ध्वनि-व्यवहार। ‘गदपुरनि’ (कद्दू-पुदीना - ग्रामीण-स्वल्प-मूल्य-वनस्पति) आ ‘केसर’ (मूल्यवान्-मसाला) - ऐ बिम्ब-विरोधमे क्षेमेन्द्रीय वस्तु-औचित्यक उत्कृष्ट प्रयोग। (घ) पाश्चात्य दृष्टिए बोआल-दृष्टिए दुर्गानन्द मण्डलक समीक्षा बेचन ठाकुरक उत्पीड़ितक-रंगमंचक मूल-कार्यक्षेत्रकेँ चिन्हित करैत अछि - गाम-गाम मञ्चन, स्थानीय-समस्या (गर्भपात) क मञ्चीय-निरूपण, दर्शक-सक्रिय-समाधान-प्रक्रिया। फनन-दृष्टिए हुनकर समीक्षाक मुख्य-तर्क - मैथिली-भाषा-संस्कृति आ नारी-अधिकार दुनू उपनिवेशीय-शिकार थिक, मुदा बेचन ठाकुरक नाट्य-कर्म ओकर विमुक्ति-कर्म थिक। बोर्दिऊ-दृष्टिए दुर्गानन्द मण्डल बेचन ठाकुरक सांस्कृतिक-पूँजी-स्थापनमे सक्रिय-योगदान दैत छथि - हुनकर समीक्षासँ बेचन ठाकुरक स्थान विदेह-कैनन मे प्रतिष्ठित होइत अछि। हाबरमासीय सार्वजनिक-क्षेत्र-दृष्टिए सदेह ८-मे प्रकाशित समीक्षा ‘मैथिली-नाट्य-सार्वजनिक-क्षेत्र’क निर्माणमे सहायक। (ङ) चीनी दृष्टिए लिऊ शिए-दृष्टिए दुर्गानन्द मण्डलक समीक्षाक फेङ्गगु - फेङ्ग (मैथिल-संस्कृतिक-संरक्षण-आवेग) + गु (समाजशास्त्रीय-संरचना)। तोङ्गबियान्: मिथिला-संस्कारक-परम्परा + समकालीन-कन्या-भ्रूण-हत्या-समस्या। चोङ्ग रोङ्ग-दृष्टिए हुनकर ‘झी’ (स्वाद) माटि-केन्द्रित - ग्रामीण-यथार्थक स्वाद। (च) यहूदी-इसरायली दृष्टिए मिद्राशी पेशर-दृष्टिए ‘केसर’क-संदर्भ बहु-स्तरीय - पशाट: मसाला; रेमेज्: ज्योति सुनीत चौधरीक नाटकक संकेत; द्राश: मैथिल-नारीक-मूल्य-संरक्षणक नैतिक-संदेश; सोद: स्त्री-शक्तिक रहस्यगर्भ-दर्शन। पिलपुल-दृष्टिए दुर्गानन्द मण्डलक समीक्षा त्रि-स्तर-तर्क - कुष्या: ‘किए नाटक मञ्चन?’; तेरुत्स्: ‘कन्या-भ्रूण-हत्या-विरुद्ध-जागृति’; दिख्या: ‘मात्र-जागृति नहि, मैथिल-संस्कृति-संरक्षणक-संग।’ लेखक १० : आशीष अनचिन्हार रचना-सूची (सदेह ८) (क) ‘बेचन ठाकुरक नाटक छीनरदेवी’ - विशद-समीक्षा। (ख) ‘बेटीक अपमान’ - समीक्षा (दुर्गानन्द मण्डलसँ भिन्न-दृष्टिकोणसँ)। आशीष अनचिन्हार मैथिली ग़ज़ल-प्रसोडीक मुख्य-सिद्धान्तकार छथि (अनचिन्हार-फॉर्मूला), तँए हुनकर नाट्य-समीक्षामे काव्य-शास्त्रीय-दृष्टिक प्राबल्य प्रकट होइत अछि। (क) विदेह समानान्तर साहित्येतिहास दृष्टिए आशीष अनचिन्हार विदेह-कैननक सबसँ-महत्वपूर्ण-समीक्षात्मक-स्तम्भ छथि। हुनकर समीक्षाक मुख्य-दृष्टिकोण - विदेह-समानान्तर-नाटककार (बेचन ठाकुर) क स्थान मैथिलीक प्राक्-आधुनिक-समाज-सुधारवादी-परम्परा (हरिमोहन झा)क संग संगति-स्थापना। ई शुद्ध समानान्तर-कैनन-निर्माणक कार्य। आशीष अनचिन्हार पुछैत छथि - ‘प्रो. झा ६०-७० साल बाद बेचन जीकेँ ऐपर कलम चलेबाक जरूरति किए पड़लनि?’ - ई प्रश्न-स्वयं विदेह-कैननक मूल-तर्क प्रस्तुत करैत अछि - हरिमोहन झा-परम्पराक निरन्तरता बेचन ठाकुर-धरि। (ख) गंगेशीय नव्य-न्याय दृष्टिए अनुमान-प्रमाणक उत्कृष्ट-उदाहरण - ‘यत्र-यत्र अंधविश्वास, तत्र-तत्र साहित्यिक-प्रहार-आवश्यकता’ - एहि व्याप्तिसँ बेचन ठाकुरक छीनरदेवीक-आवश्यकता-निरूपण। प्रत्यक्ष-प्रमाण: ‘आइयो गाम आ अर्धशहरी इलाकामे एलोपैथीक संगे-संग भस्म-विभूति आ ब्रम्हथानक माटि उपचारमे लाएल जाइत अछि’ - आशीष अनचिन्हारक ग्राम-यात्रा-आधारित प्रत्यक्ष-अनुभव। शब्द-प्रमाण: प्रो. हरिमोहन झाक रचना, बेचन ठाकुरक नाटक। हेत्वाभास-निरूपण: ओ दूटा-सम्भावित-कारणक विश्लेषण करैत छथि - पहिल (बेचन ठाकुरकेँ कोनो-विषय-नहि-भेटल-मजबूरी) ओ ‘असम्भव-हेत्वाभास’ रूपमे खारिज करै छथि कारण ग्राम-यात्राक प्रत्यक्ष-प्रमाणसँ ई कारण निरस्त। दोसर (अंधविश्वास-निरन्तरता)केँ स्वीकार करै छथि। ई शुद्ध गंगेशीय हेत्वाभास-निरूपण। (ग) भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य दृष्टिए रस-दृष्टिए ‘छीनरदेवी’क मूल-रस हास्य-करुण-बीभत्स-संयोग - आशीष अनचिन्हार ऐकेँ चिन्हित करैत छथि। ‘छिनरधत्त’क संकल्पना - स्त्री-छिनरकेँ अंधविश्वासी-समाज जे रूप दैत अछि - ओकर बीभत्स-रस-केन्द्रित-निरूपण। ध्वनि-दृष्टिए ‘छीनरदेवी’ नामक-वक्रोक्ति - छीनर (निम्न-कोटिक स्त्री) + देवी (दिव्य-स्त्री) - एहि असम्भव-संयोगमे शक्तिशाली-व्यङ्ग्यार्थ। कुन्तकीय वक्रोक्ति-दृष्टिए ई पद-वक्रताक अद्भुत-स्तर। क्षेमेन्द्रीय औचित्य-दृष्टिए आशीष अनचिन्हार बेचन ठाकुरक नाटक-संरचनाक उच्च-स्तरीय-औचित्य चिन्हित करैत छथि - पात्र-भाषा-कर्म-सभक सामञ्जस्य। (घ) पाश्चात्य दृष्टिए बेन्यामिन-दृष्टिए आशीष अनचिन्हार बेचन ठाकुरकेँ कथावाचक रूपमे चिन्हित करैत छथि - पुरान-संस्कृतिक-स्मृति-वाहक जे आधुनिक-संदर्भमे ओकर-नैतिक-तर्क प्रस्तुत करैत अछि। बोआल-दृष्टिए बेचन ठाकुरक ‘निजी कोचिङ्ग-संस्थान-छात्र-छात्रा-द्वारा-मञ्चन’ शुद्ध उत्पीड़ितक-रंगमंच - आशीष अनचिन्हार ऐकेँ स्वीकार करैत छथि। ब्रेख्तीय-दृष्टिए ‘छीनरदेवी’क अंधविश्वास-प्रहार-शैली अलगाव-प्रभावक मैथिली-व्यवहार - दर्शक नाटकमे डूब नहि सकैत अछि, बल्कि स्वयंक-ग्राम-परिवेशक अंधविश्वास-स्थितिकेँ पुनर्विचार करय पड़ैत अछि। ग्राम्शीयन-दृष्टिए बेचन ठाकुर सर्वहारा-वर्गक-स्वयं-जनित बुद्धिजीवी; आशीष अनचिन्हार ओहि कैनन-निर्माणमे मुख्य-सूत्रधार। (ङ) चीनी दृष्टिए लिऊ शिए-दृष्टिए आशीष अनचिन्हारक समीक्षाक फेङ्गगु - फेङ्ग (हरिमोहन-झा-परम्परा-अध्ययनक आवेग) + गु (नव्य-न्याय-संरचना)। तोङ्गबियान्: प्राक्-आधुनिक-समाज-सुधार-परम्परा + समकालीन-दिशा। चोङ्ग रोङ्ग-दृष्टिए हुनकर समीक्षाक ‘झी’ (स्वाद) नैतिक-शास्त्रीय - जे हुनकर ग़ज़ल-शास्त्रीय-समीक्षाक संग ‘तोङ्ग’ (निरन्तरता) रखैत अछि। यान् यू-दृष्टिए हुनकर मियाओ्वू - ‘प्रो. झाक प्रहारक बाबजूदो अंधविश्वास मेटाएल नै’ - ई एक वाक्यमे साठि-वर्षीय-सामाजिक-इतिहासक-सहज-गहन-निष्कर्षण। (च) यहूदी-इसरायली दृष्टिए मिद्राशी पेशर-दृष्टिए ‘छीनरदेवी’ नामक-पेशर-व्याख्या - पशाट: नायिकाक-नाम; रेमेज्: स्त्री-शक्ति-विकृति; द्राश: अंधविश्वासी-समाजक-नैतिक-दृष्टि-दोष; सोद: स्त्री-दिव्यताक-सामाजिक-अधःपतन। आशीष अनचिन्हार बहु-स्तर-व्याख्या प्रस्तुत करैत छथि - स्पष्ट-पेशर-दृष्टि। पिलपुल-दृष्टिए हुनकर समीक्षा शुद्ध त्रि-स्तर-विश्लेषण - कुष्या: ‘प्रो. झाक-बाद नाटककार किए चुप रहलाह?’ तेरुत्स्: ‘अंधविश्वासक निरन्तरता बेचन ठाकुरकेँ कलम उठेबा बाध्य केलक।’ दिख्या: ‘मुदा ई कोनो-व्यक्तिक-हारि नहि, हरेक-लेखकक-सीमाक-यथार्थ।’ डेनिएल बोयारिनक इन्टरटेक्सचुअल-दृष्टिए - बेचन ठाकुरक छीनरदेवी हरिमोहन झा-परम्पराक संग गुप्त-अन्तरपाठीयता, मुदा शैली-गत-रूपान्तरण। राबर्ट आल्टर-दृष्टिए ‘टाइप-सीन्’ - ग्राम-यात्रा, अंधविश्वास-प्रत्यक्षीकरण - पुनरावर्ती-प्रतिमान। बैच १ - समापन-निष्कर्ष विदेह सदेह ८क पहिल १० लेखक - गजेन्द्र ठाकुर, बेचन ठाकुर, ज्योति सुनीत चौधरी, मुन्नी कामत, धीरेन्द्र कुमार, शिव कुमार झा, रवि भूषण पाठक, शम्भू कुमार सिंह, दुर्गानन्द मण्डल, आ आशीष अनचिन्हार - मैथिली समानान्तर रंगमंच-आन्दोलनक प्रथम-वर्तुलक-केन्द्रीय-व्यक्तित्व छथि। हुनक रचना षट्-स्तरीय-समीक्षा-ढाँचाक प्रत्येक-स्तरपर समृद्ध-अर्थ प्रकट करैत अछि। (क) विदेह-समानान्तर-साहित्येतिहास-दृष्टिए ई दस लेखक साहित्य-अकादेमी-केन्द्रित-कैननसँ अदृश्य/अस्वीकृत बहुत-किछुकेँ केन्द्रमे आनैत छथि - सर्वहारा-वर्गक रंगमञ्च, गाम-केन्द्रित-मञ्चन, स्त्री-स्वर, गएर-सवर्ण-स्वर, डायस्पोरा-अनुभव, अंधविश्वास-विरुद्ध-नैतिक-प्रहार, वर्ग-राजनीतिक-दृष्टि। (ख) गंगेशीय नव्य-न्याय-दृष्टिए चारिटा प्रमाण (प्रत्यक्ष-अनुमान-उपमान-शब्द) आ हेत्वाभास-निरूपणक व्यवस्थित-प्रयोग ऐ समीक्षात्मक-संग्रहक एक प्रमुख-शास्त्रीय-योगदान थिक। (ग) भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य-दृष्टिए नौ-रसक विविध-संयोग, ध्वन्यालोकीय-व्यङ्ग्यार्थ-चिन्हन, कुन्तकीय वक्रता-स्तर, क्षेमेन्द्रीय औचित्य-व्यवस्था - सभ प्रकट। (घ) पाश्चात्य-दृष्टिए ब्रेख्त-बोआल-बाख्तिन-ग्राम्शी-फनन-स्पिवाक-बेन्यामिन-बोर्दिऊ - सम्पूर्ण आधुनिक-समीक्षा-शस्त्रागार प्रयुक्त। (ङ) चीनी-दृष्टिए लिऊ शिएक फेङ्गगु आ तोङ्गबियान्, चोङ्ग रोङ्गक शिपिन-त्रिश्रेणी, यान् यूक मियाओ्वू - सभ प्रयुक्त। (च) यहूदी-इसरायली-दृष्टिए मिद्राशी चारि-स्तर, पिलपुलीय त्रि-स्तर-तर्क, राबर्ट आल्टरक टाइप-सीन्/वर्ब्ल-इकोज्/नैरेटिव-गैप्स्, डेनिएल बोयारिनक इन्टरटेक्सचुअल-पेइटिक्स - सभ प्रयुक्त। बैच २मे शेष-लेखक - सुजीत कुमार झा, मिथिलेश कुमार झा, सरोज खिलाड़ी, किशन कारीगर, उमेश मण्डल, मनोज कुमार कर्ण (मुन्नाजी), पूनम मण्डल, रोशन झा, दिनेश मिश्र, श्यामसुन्दर शशि - समीक्षित हएता। विदेह सदेह ८ विदेह मैथिली नाट्य उत्सव (मैथिली समानान्तर रंगमंचक संकलन) समग्र विस्तृत समीक्षा षट्-स्तरीय समीक्षा-ढाँचा • विदेह समानान्तर साहित्येतिहास • • गंगेश उपाध्यायक नव्य-न्याय प्रमाण-शास्त्र • • भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य • • पाश्चात्य समीक्षा (अरस्तू-ब्रेख्त-बोआल-बाख्तिन-ग्राम्शी-फनन) • • चीनी समीक्षा (वेन्शिन डिआओलोङ्ग/शिपिन/चान्ग्लाङ्ग शिहुआ) • • यहूदी-इसरायली समीक्षा (मिद्राश/पिलपुल/आल्टर/बोयारिन) • लेखक ११ : सुजीत कुमार झा — 'मिथिला नाट्यकला परिषद (मिनाप)' — संस्थागत इतिहास लेखक १२ : मिथिलेश कुमार झा — 'मैथिली नाटक प्रस्तुति (पजुआरिडीह टोल) — ऐतिहासिक संकलन' लेखक १३ : रमेश रंजन (साक्षात्कार : मुन्नाजीसँ) — 'नाटककार, रंगकर्मी, मिनाप-कर्मी' लेखक १४ : सरोज खिलाड़ी — 'बोतल राम / सोच / ललका कपड़ा' लेखक १५ : किशन कारीगर — 'आब मानि जाउ ने' (हास्य रेडियो नाटक) लेखक १६ : उमेश मण्डल — 'मैथिलीमे ई-पत्रकारिता / विदेह गोष्ठी' लेखक १७ : रोशन झा — 'बुधियार छौड़ा आ राछस' (बाल नाटक-रिपोर्ट) लेखक १८ : पूनम मण्डल — विविध रिपोर्ट (जनकपुर, मैथिलोत्सव) लेखक १९ : मनोज कुमार कर्ण 'मुन्नाजी' — साक्षात्कारकर्ता, मैथिलोत्सव रिपोर्ट लेखक २० : दिनेश मिश्र, श्यामसुन्दर शशि, जितेन्द्र कुमार झा 'जीतू', सत्यनारायण झा, मनोज कुमार मण्डल, बृषेश चन्द्र लाल — रंगमञ्च-गतिविधि-रिपोर्टर-समूह लेखक ११ : सुजीत कुमार झा रचना-सूची (सदेह ८) 'मिथिला नाट्यकला परिषद, जनकपुर (मिनाप)' — विस्तृत संस्थागत-इतिहास, उपलब्धि-सूची, स्थापना-विवाद-निरूपण, वित्त-प्रबन्धन-रिपोर्ट। सदेह ८मे मिनापक रिपोर्टर आ इतिहासकार रूपमे तीनटा रिपोर्ट — (क) 'मैथिली नाटक तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम सम्पन्न', (ख) 'मैथिला भाषाक सड़क नाटक प्रदर्शन', (ग) 'उपप्रधानमन्त्री मिनापमे'। (क) विदेह समानान्तर साहित्येतिहास दृष्टिए सुजीत कुमार झा विदेह-समानान्तर-ढाँचाक नेपाल-धुरीक मुख्य-प्रतिनिधि छथि। हुनकर मिनाप-इतिहास विदेह-समानान्तर-इतिहास-ढाँचाक उदाहरण थिक — मिनाप (मिथिला नाट्यकला परिषद, जनकपुर) नेपालमे मैथिली समानान्तर रंगमंचक सबसँ-महत्वपूर्ण-संरचना थिक। स्थापना-विवाद — 'मिनापक संस्थापक के छथि' — ई प्रश्न विदेह-ढाँचाक पहिल-प्रश्नक नेपाली-संस्करण थिक: 'क्रेडिट-प्राप्ति-राजनीति' बनाम 'सामूहिक-सृजन'। ई शुद्ध विदेह-समानान्तर-दृष्टि — कोनो एक-व्यक्ति-केन्द्रित-कैनन-निर्माण नहि, बल्कि 'डा. धीरेन्द्रक प्रेरणा + योगेन्द्र साह नेपालीक भाषाप्रेम + बलराम प्रसाद राय + सुदर्शन लाल कर्ण' — सामूहिक-संस्थापन। हुनकर रिपोर्टमे 'उपप्रधानमन्त्री मिनापमे' ई नेपाल-राजनीति-स्तरपर मिनापक स्वीकृति-दस्तावेजीकरण थिक — विदेह-समानान्तर-ढाँचाक तेसर-प्रश्न (वैकल्पिक-संरचना) क नेपाली-उत्तर: मिनाप नेपाल-सरकारक-सर्वोच्च-स्तरपर मान्यता-प्राप्त भेल। (ख) गंगेशीय नव्य-न्याय दृष्टिए प्रत्यक्ष-प्रमाण: मिनाप-स्थापना-बैसार (राजदेव मिश्रक-अध्यक्षतामे), संस्थापक-कमिटी-नाम-सूची, 'डोमकछ' नाटकक २५म प्रस्तुति, फुलकुमारी-महतो-पुरस्कार (दू-लाख-एक-हजार)। उपमान-प्रमाण: मिनापक विभिन्न-पुरस्कार (सर्वनाम, रामानन्द-युवा-क्लव, सांस्कृतिक-संस्थान-काठमाण्डू) — ई पुरस्कार-तुलना मिनापक सांस्कृतिक-पूँजीक-अनुमान करैत अछि। अनुमान: 'यत्र-यत्र सांस्कृतिक-संस्था-विवाद, तत्र-तत्र क्रेडिट-राजनीति' — मिनापक-संस्थापन-विवाद एहि-व्याप्तिक-उदाहरण। (ग) भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य दृष्टिए रस-दृष्टिए हुनकर निबन्ध-शैली 'अद्भुत-रस' उत्पन्न करैत अछि — १९५० ई.मे जनकपुरमे आधुनिक नाट्य कला मन्दिरसँ शुरू भेल संस्था अखन नेपाल-सरकारक उपप्रधानमन्त्री-आतिथ्य-प्राप्त-राष्ट्रीय-संस्था। ई यात्रा अद्भुत-रस उत्पन्न करैत अछि। क्षेमेन्द्रीय औचित्य: सुजीत कुमार झाक निबन्ध-शैली संस्थागत-इतिहासक-औचित्य-रखैत अछि — आवश्यक-व्यक्तित्व, उपलब्धि, विवाद — सभ उचित-अनुपातमे। (घ) पाश्चात्य दृष्टिए हाबरमासीय सार्वजनिक-क्षेत्र-दृष्टिए मिनाप मैथिली-नाट्य-सार्वजनिक-क्षेत्रक निर्माण-प्रक्रियाक उदाहरण थिक — नाटक-मञ्चन, टिकट-बिक्री, भवन-निर्माण, पोथी-प्रकाशन — ई सभ हाबरमासीय-संरचना। बोर्दिऊयायी-दृष्टिए मिनापक 'फुलकुमारी-महतो-पुरस्कार-प्राप्ति' — दू-लाख-एक-हजार — सांस्कृतिक-पूँजीक-आर्थिक-पूँजीमे-रूपान्तरण। ग्राम्शीयन-दृष्टिए मिनाप नेपालमे मैथिली-सर्वहारा-वर्गक-हेजेमनीक-प्रतिपक्ष — नेपाली-शासक-वर्गक-भाषाक-विरुद्ध मैथिली-आत्म-प्रतिष्ठाक-संघर्ष। फनन-दृष्टिए मिनापक-उपलब्धि नेपाली-आन्तरिक-उपनिवेशवादक-विरुद्ध मैथिली-संस्कृतिक-विमुक्ति-संग्रामक-मूर्त-रूप। बाख्तिनीय-हेटेरोग्लोसिया: मिनापमे 'नेपाली-राजनीतिक-दबाव + मैथिली-भाषिक-आग्रह + डोमकछ-लोक-नाट्य-परम्परा + आधुनिक-थिएटर-तकनीक' — बहु-स्वर। (ङ) चीनी दृष्टिए लिऊ शिए-दृष्टिए सुजीत कुमार झाक लेखन-शैली 'फेङ्गगु' — फेङ्ग (मैथिली-भाषा-संरक्षण-आवेग) + गु (संस्थागत-तथ्य-संरचना)। तोङ्गबियान्: मिनापक-इतिहास ई.सं.२०२४ सँ वर्तमान — परम्परा + नवीनता-सन्तुलन। चोङ्ग रोङ्ग-दृष्टिए: सुजीत कुमार झाक लेखन 'झोङ्ग-पिन्' — कारण 'झी' (रस) संस्थागत-तथ्य-केन्द्रिततासँ किछु सीमित। (च) यहूदी-इसरायली दृष्टिए राबर्ट आल्टर-दृष्टिए मिनाप-इतिहासमे 'टाइप-सीन्' — हर बेर एकेगोट संरचना: स्थापना-विवाद → नव-नेतृत्व → उपलब्धि → अगिला-पीढ़ी-समावेश। 'वर्ब्ल इकोज्': 'मैथिली' शब्दक बारम्बार-पुनरावृत्ति — हर बेर नूतन-स्तरपर। मिद्राशी पेशर: 'डोमकछ' — एकटा लोकनाट्य-परम्परा — मिनाप द्वारा आधुनिक-सन्दर्भमे पुनर्व्याख्यायित। पिलपुल: 'मिनापक संस्थापक के?' — कुष्या-तेरुत्स्-दिख्या — उत्तर: 'सामूहिक-संस्थापन, कोनो एक-व्यक्ति नहि।' लेखक १२ : मिथिलेश कुमार झा रचना-सूची (सदेह ८) 'मैथिली नाटक प्रस्तुति (मधुबनी जिलाक पजुआरिडीह टोल) — ऐतिहासिक संकलन' — १९५० ई. सँ २०१० ई. धरिक ६० वर्षीय नाट्य-प्रस्तुति-दस्तावेजीकरण। श्री कृष्ण नाट्य समिति (स्थापना १९५०), श्री कृष्ण चन्द्र झा 'रसिक', शिवदेव झा, गंगा झाक-निर्देशनमे ३० टासँ बेसी नाटक — १९५०-२०१०। विशेष नाटक: बसात (१९६६), चीनीक लड्डू (१९६६), विद्यापति (१९६७), उगना (१९७०), बड़का साहेब (१९९०, लल्लन प्रसाद ठाकुर), लेटाइत आँचर (१९९२, सुधांशु शेखर चौधरी), उगना (१९९६, ईशनाथ झा), लौंगिया मिरचाई (२००७, लल्लन प्रसाद ठाकुर), पहिल साँझ (२००८, सुधांशु शेखर चौधरी)। (क) विदेह समानान्तर साहित्येतिहास दृष्टिए मिथिलेश कुमार झाक ऐतिहासिक-संकलन विदेह-समानान्तर-साहित्येतिहास-ढाँचाक सर्वश्रेष्ठ-उदाहरण थिक। ई संकलन साबित करैत अछि जे मैथिली-नाट्य-परम्परा केवल जनकपुर-कोलकाता-पटना-दिल्लीक शहरी-थिएटरमे नहि — गाम-गाम-टोल-टोलमे जीवित अछि। ई साहित्य-अकादेमी-केन्द्रित-इतिहासकेँ सीधा-चुनौती थिक — पजुआरिडीह-टोलमे 'बसात' (१९६६), 'चीनीक लड्डू' (१९६६) क मञ्चन इतिहास-वर्ग द्वारा अब तक दस्तावेजीकृत नहि भेल छल। विदेह-ढाँचाक चौथा-प्रश्न ('कोन सौन्दर्य-शास्त्रीय मूल्य अदृश्य रहल?') क प्रत्यक्ष-उत्तर: ग्रामीण-नाट्य-परम्परा। (ख) गंगेशीय नव्य-न्याय दृष्टिए प्रत्यक्ष-प्रमाण: वार्षिक-नाटक-सूची (नाटक-नाम, नाटककार-नाम, वर्ष) — एकटा सम्पूर्ण प्रत्यक्ष-गवाही-संकलन। उपमान-प्रमाण: पजुआरिडीह-टोलक 'बसात' (१९६६) − गोविन्द झाक नाटक — ई उपमान तत्कालीन मैथिली-रंगमञ्चक-शहरी-प्रस्तुतिसँ सादृश्य स्थापित करैत अछि। अनुमान: 'यत्र-यत्र ग्रामीण-काली-पूजा-समारोह, तत्र-तत्र मैथिली-नाट्य-मञ्चन-सम्भावना' — ई व्याप्ति-प्रदर्शन। (ग) भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य दृष्टिए रस-दृष्टिए संकलनक-अद्भुत-रस — ६० वर्षक नाट्य-क्रम एक-टोलक-भीतर। भरत-शास्त्रीय-दृष्टिए नाट्य-प्रस्तुति-क्रमक अनुशीलन: सुधांशु शेखर चौधरीक 'लेटाइत आँचर' (१९९२) — शृङ्गार-करुण; ईशनाथ झाक 'उगना' (१९९६) — भक्ति-अद्भुत; अरविन्द अक्कूक 'आतंक' (१९९८) — रौद्र-वीर — ई रस-वैविध्य एक-टोलमे ६० वर्ष-धरि। क्षेमेन्द्रीय औचित्य: मिथिलेश कुमार झाक संकलन-शैली स्वयं औचित्य-सम्पन्न — हर-नाटक-सम्बन्धी-आवश्यक-सूचना (नाम, नाटककार, वर्ष) कोनो-अनावश्यक-टिप्पणी बिनु। (घ) पाश्चात्य दृष्टिए बेन्यामिन-दृष्टिए मिथिलेश कुमार झा 'कथावाचक'क आधुनिक-रूप — एहन-कथावाचक जे पुरान-ग्रामीण-नाट्य-स्मृतिकेँ मौखिक-से-लिखित-रूपमे परिवर्तित करैत अछि। बोर्दिऊयायी-हाबिटस: पजुआरिडीह-टोल-हाबिटस — जतय काली-पूजाक-एक-रात मैथिली-नाटक-अनिवार्य-अंग, ई हाबिटस ६० वर्ष धरि अखण्ड रहल। बोआल-दृष्टिए ग्रामीण-नाट्य-मञ्चन 'फोरम-थिएटर'क प्राक्-आधुनिक-संस्करण — दर्शक-पात्र-सम्पूर्ण-भागीदारी। (ङ) चीनी दृष्टिए लिऊ शिए-दृष्टिए मिथिलेश कुमार झाक संकलन-शैलीक 'फेङ्ग' — ग्रामीण-नाट्य-प्रेमक आवेग; 'गु' — तथ्य-संरचना। तोङ्गबियान्: परम्परागत-गाम-नाटक + आधुनिक-नाटककारक-कृति-मञ्चन। चोङ्ग रोङ्ग-दृष्टिए 'शाङ्ग-पिन्' — कारण ई दस्तावेजीकरण अप्रतिस्थापनीय — ऐ बिनु पजुआरिडीह-नाट्य-इतिहास अज्ञात रहत। (च) यहूदी-इसरायली दृष्टिए राबर्ट आल्टर-दृष्टिए 'टाइप-सीन्' — हर-वर्ष एकेगोट-संरचना: काली-पूजा → एक-रात-नाटक-मञ्चन → नूतन-नाटककार-चयन। 'वर्ब्ल इकोज्': 'उगना' दूबेर-दोहरायल (१९७० + १९९६ + २००४), 'कुहेस' तीन-बेर, 'अन्तिम गहना' दोबेर — ई पुनरावृत्ति मिद्राशी-'आगादा'क (कथाक-पुनर्कथन) समान। पिलपुल-दृष्टिए: '१९९२-२०१०मे किए सुधांशु शेखर चौधरीक दू-नाटक?' — कुष्या: परम्परा-नवीनता-द्वन्द्व; तेरुत्स्: रसिक-शिवदेव-गंगा-झाक-परम्परामे सुधांशु समसामयिक; दिख्या: किन्तु अन्य-नाटककारक-प्रतिनिधित्व-न्यून। लेखक १३ : रमेश रंजन रचना-सूची (सदेह ८) 'हम पुछैत छी' — मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण) द्वारा रमेश रंजनक अन्तर्वार्ता। रमेश रंजन — मिनाप-कर्मी, नाटककार, कथाकार, आलोचक, वृत्तचित्र-लेखक, फिल्म-टेलीसीरियल-लेखक, कविता-उपन्यास-लेखक, नेपाल सङ्गीत-तथा-नाट्य-प्रज्ञाप्रतिष्ठानक-प्राज्ञ-परिषद-सदस्य आ नाट्य-विभाग-प्रमुख। 'बुधियार छौड़ा आ राछस' बाल-नाटकक आलेख-लेखक। (क) विदेह समानान्तर साहित्येतिहास दृष्टिए रमेश रंजन — नेपाल-मैथिली-समानान्तर-रंगमंचक-सैद्धान्तिक-प्रवक्ता। हुनकर साक्षात्कारक मुख्य-प्रमेय — 'मिथिलाक लोक देशक-भीतरक-औपनिवेशिकताकेँ भोगि रहल अछि' — ई विदेह-समानान्तर-इतिहास-ढाँचाक नेपाली-संस्करण थिक। हुनकर कथा-लेखन-प्रेरणा 'सगर-राति-दीप-जरए' माध्यमसँ — जनकपुरमे ओहि-कार्यक्रमक-आयोजन-हेतु — ई स्वयं विदेह-समानान्तर-सांस्कृतिक-ढाँचाक-सक्रिय-सहभागिता। हुनकर मार्क्सवादी-सौन्दर्य-चेतना — 'हमर साहित्यक-ध्येयकेँ आरो-स्पष्टीकरणक-आवश्यकता नहि' — विदेह-ढाँचाक वर्ग-दृष्टिसँ सम्पूर्ण-संगति। (ख) गंगेशीय नव्य-न्याय दृष्टिए अनुमान-प्रमाण: 'यत्र-यत्र सामन्ती-सामाजिक-संरचना, तत्र-तत्र कर्मकाण्डीय-वर्चस्व-आ-भाषा-उत्पीड़न' — एहि व्याप्तिसँ हुनकर मैथिलीक-समस्याक-निदान। शब्द-प्रमाण: डा. धीरेन्द्र, डा. विमल, योगेन्द्र साह नेपाली — गुरु-परम्परा-शब्द-प्रमाण। उपमान: 'नेपालीमे हिन्दीक आगाँ मैथिलीक अवस्था — जेना नेपालीक आगाँ मैथिली' — उपमान-प्रमाण। (ग) भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य दृष्टिए रस-दृष्टिए रमेश रंजनक साक्षात्कार-शैली वीर-रस-केन्द्रित — 'कि मिनाप जाति-पाँतिक फाँटमे टिकल अछि?' — ई प्रश्नक-उत्तर वीर-निश्चय। ध्वनि: 'सगर-राति-दीप-जरए' — ई नाम स्वयं 'ध्वनि-काव्य' — रातिभरि-जागरण, दीपक-प्रकाश, साहित्यिक-संगम — तीनू-अर्थ एकसाथ। क्षेमेन्द्रीय औचित्य: साक्षात्कारक-शैली-औचित्य — प्रश्न-उत्तर-अनुक्रम सुसंगठित। (घ) पाश्चात्य दृष्टिए ग्राम्शीयन-दृष्टिए रमेश रंजन मैथिली-सर्वहारा-वर्गक-आर्गेनिक-इन्टेलेक्चुअल — परवाहा-गामसँ जनकपुर-मिनाप धरि — 'अपन जीवनक सर्वाधिक उर्जाशील समय मिनापकेँ देलिऐ'। मार्क्सवादी-सौन्दर्य-दृष्टि हुनकर साहित्य-लेखनक-मूल — 'मार्क्सवादी सौन्दर्य चेतना हमरा निर्देशित करैत अछि' — ई फनन-दृष्टि-समन्वित-ग्राम्शीयन-कर्म। बेन्यामिन-दृष्टिए साक्षात्कार-शैली 'कथावाचन' — रमेश रंजन अपन रचना-यात्रा, मिनाप-यात्रा, नेपाल-मैथिली-यात्रा कथावाचन-पद्धतिमे प्रस्तुत करैत छथि। बाख्तिनीय-हेटेरोग्लोसिया: साक्षात्कारमे 'मार्क्सवादी-स्वर + मिनाप-संस्थागत-स्वर + नेपाल-राजनीतिक-स्वर + मैथिली-भाषिक-स्वर' — बहु-स्वर। (ङ) चीनी दृष्टिए लिऊ शिए-दृष्टिए रमेश रंजनक साक्षात्कार 'फेङ्ग' (मार्क्सवादी-सौन्दर्य-आवेग) + 'गु' (मिनाप-संस्थागत-संरचना)। तोङ्गबियान्: परम्परागत-मैथिली-साहित्य + मार्क्सवादी-नूतन-दृष्टि। चोङ्ग रोङ्ग-दृष्टिए 'शाङ्ग-पिन्' — कारण साक्षात्कारक-'झी' (सौन्दर्य-रस) उत्कृष्ट। यान् यू-दृष्टिए मियाओ्वू — 'मिनाप मरब तँ स्वयंक मृत्यु छै' — एक-वाक्यमे भाषा-अस्तित्व-दर्शन। (च) यहूदी-इसरायली दृष्टिए मिद्राशी पेशर: 'सगर राति दीप जरए' — रात्रि-जागरणक परम्परागत-धार्मिक-कर्मकेँ साहित्यिक-उत्सवमे पेशर-व्याख्या। पिलपुल: साक्षात्कारक-प्रत्येक-प्रश्न कुष्या — रमेश रंजनक-उत्तर तेरुत्स् — मुन्नाजीक-अगिला-प्रश्न दिख्या। राबर्ट आल्टर-दृष्टिए 'वर्ब्ल इकोज्': 'मिनाप' शब्दक बारम्बार-पुनरावृत्ति — व्यक्तिगत-प्रगतिक-आधार, साहित्यिक-प्रेरणाक-आधार, सामाजिक-सम्मानक-आधार। लेखक १४ : सरोज खिलाड़ी रचना-सूची (सदेह ८) सरोज खिलाड़ी — नेपालक पहिल मैथिली रेडियो नाटक संचालक। तीनटा एकल-नाटक: (क) 'बोतल राम' — मैथिली एकल नाटक। एकटा गरीब-व्यक्ति सड़कपर सुतल अछि। भोरमे उठि कऽ दारुक-बोतलकेँ पूजा करैत अछि, 'अमृत-आरती' गाबैत अछि। 'दारु महराज' नामक पात्रसँ संवाद-क्रममे ओ अपन घर-घराड़ी, सम्मान, परिवार-सभ गँवेबाक कहानी सुनैत अछि। अन्तमे अपन देहसँ सब-दारुक-शीशी उतारि-फोड़ि कऽ दारुकेँ समाजसँ खोजि-हटेबाक संकल्प। (ख) 'सोच' — भैसा नामक पात्र बरियाती जेबाक-योजनामे कैलकुलेटरसँ मिठाइक-गणना करैत अछि — 'लगभग रसबरी २२० पिस, लालमोहन ११० पिस, लड्डू ८० पिस' — मुदा भुखले रहि-कऽ। हथियारधारी-बन्दूकधारीसँ माय-मुक्ति-संघर्ष। 'माय' — 'हम तखनिए कहलियौ कि केउ मारतै ककरो तँ चोट हमरे लागत।' (ग) 'ललका कपड़ा' — दहेज-प्रथाक विरुद्ध बहु-दृश्य-नाटक। 'दहेज' राक्षस रूपमे — गाम-गाम लूट, अपहरण। युवा-वर्ग 'आदर्श विवाह' लिखल लाल-बैनर/गंजी/रुमाल देखाबैत राक्षस-दहेजकेँ भगाबैत अछि — 'ललका कपड़ासँ दहेजकेँ झाँपि दैत अछि — ओइठाम छाउर मात्र रहैत अछि।' (क) विदेह समानान्तर साहित्येतिहास दृष्टिए सरोज खिलाड़ी — नेपाल-मैथिली-समानान्तर-रंगमंचक-सबसँ-अभिनव-प्रयोगकर्ता। 'बोतल राम'मे दारु-समस्या, 'सोच'मे हथियारधारी-हिंसा, 'ललका कपड़ा'मे दहेज — ई तीनू-विषय साहित्य-अकादेमी-केन्द्रित-मैथिली-नाटककमे प्राय: अनुपस्थित। 'नेपालक पहिल मैथिली रेडियो नाटक संचालक' — ई स्वयं विदेह-समानान्तर-ढाँचाक-नव-संरचना-उदाहरण: रेडियो माध्यमसँ मैथिली-नाटकक विस्तार। 'ललका कपड़ा'क 'आदर्श विवाह' — दहेज-विरोधक-प्रतीकात्मक-विजय — ई विदेह-समानान्तर-सौन्दर्य-शास्त्रीय-मूल्य थिक। (ख) गंगेशीय नव्य-न्याय दृष्टिए अनुमान-प्रमाण 'बोतल राम'मे: 'यत्र-यत्र दारु-सेवन, तत्र-तत्र सामाजिक-विपत्ति' — 'दारु महराज'क संवादमे यएह व्याप्ति-निरूपण — 'रहऽ बला घर-घरारी सभ बिका देलियौ, प्रतिष्ठाक नास कऽ देलियौ, छोट-छोट भाइ सभसँ पिटबौलियौ।' 'सोच'मे उपमान: मायक-व्यथा = सन्तानक-चोट — ई सादृश्य नाटकमे प्रत्यक्ष-निरूपित। 'ललका कपड़ा'मे अनुमान: 'यत्र-यत्र आदर्श-विवाह-जागरूकता, तत्र-तत्र दहेज-राक्षस-निर्बल' — युवा-समूहक-लाल-बैनर-दर्शनसँ दहेज-पराजय। (ग) भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य दृष्टिए 'बोतल राम'क मूल-रस: आरम्भमे हास्य + करुण-अन्त-प्रवेश + वीर-संकल्प — त्रि-रस-संयोजन। 'दारुए अमृत लगैय' — हास्य-रस; 'चोट हमरे मायकेँ लागत' — करुण-रस; 'सब-शीशी-फोड़ब' — वीर-रस। ध्वनि-दृष्टिए 'बोतल राम' — 'भगवान राम'क सादृश्य-ध्वनि — आ 'दारु महराज' — ई नाम-वक्रता शक्तिशाली-व्यङ्ग्यार्थ-वाहक। कुन्तकीय वाक्य-वक्रता: 'हमरा दुधिएक बोतल भगवान लगैय' — व्यङ्ग्यात्मक-वाक्य। 'सोच'क मूल-रस हास्य + करुण। 'भैसा' — नाम-वक्रता (मूर्ख-प्रतीक) — मुदा 'भैसा' सत्य आ इमानदार पात्र। ई नाम-वक्रोक्ति समाजक-नामाभिधान-प्रक्रियाक-व्यङ्ग्य। 'ललका कपड़ा'क मूल-रस रौद्र (दहेज-राक्षसक विरुद्ध) + वीर (युवा-संघर्ष) + शान्त (अन्त — 'ओइठाम छाउर मात्र')। ध्वनि: 'ललका कपड़ा' — लाल-रङ्ग-शौर्य + परिधान-संस्कृति। (घ) पाश्चात्य दृष्टिए बोआल-दृष्टिए सरोज खिलाड़ीक तीनू-नाटक उत्पीड़ितक-रंगमंचक-उत्कृष्ट-उदाहरण — 'बोतल राम' (दारु-उत्पीड़न), 'सोच' (हथियारधारी-हिंसा-उत्पीड़न), 'ललका कपड़ा' (दहेज-उत्पीड़न)। ब्रेख्तीय-दृष्टिए 'दारु महराज' — ब्रेख्तीय-नैरेटर-पात्र — दर्शककेँ दारु-समस्याकेँ आलोचनात्मक-दूरीसँ देखेबाक-तकनीक। 'ललका कपड़ा'मे 'दहेज' राक्षस-रूपमे — ब्रेख्तीय-कार्निवल-पद्धति। फनन-दृष्टिए 'ललका कपड़ा'क दहेज-राक्षस नेपाल-मधेश-आन्तरिक-उपनिवेशवादक-प्रतीक। 'युवा-वर्गक-आदर्श-विवाह-बैनर' — उपनिवेशित-मानसक-विमुक्ति-संकेत। स्पिवाक-दृष्टिए 'सोच'मे 'माय' — उपालटर्न-स्त्री — जकर 'शरीर-से-सन्तानक-दर्द' सामाजिक-व्यवस्था-सँ-प्रकट-सत्य। बाख्तिनीय-कार्निवल: 'बोतल राम'क 'दारु-आरती' — धार्मिक-कर्मकाण्डक व्युत्क्रम। (ङ) चीनी दृष्टिए लिऊ शिए-दृष्टिए तीनू-नाटकक फेङ्गगु — फेङ्ग (समाज-परिवर्तन-आवेग) + गु (एकल-नाटक-संरचना)। तोङ्गबियान्: लोक-नाट्य-परम्परा + आधुनिक-सामाजिक-विषय। चोङ्ग रोङ्ग-दृष्टिए 'शाङ्ग-पिन्' — तीनू-नाटकमे 'झी' (रस/स्वाद) असाधारण। यान् यू-दृष्टिए मियाओ्वू — 'ललका कपड़ासँ झाँपल दहेज — ओइठाम छाउर मात्र' — एक-दृश्यमे सम्पूर्ण-दहेज-विरोधक-दर्शन। (च) यहूदी-इसरायली दृष्टिए मिद्राशी पेशर: 'बोतल राम' — पूजा-परम्पराक पेशर: परम्परागत-आरती (देवी-भजन) → दारु-आरती। ई व्युत्क्रम-पेशर — धार्मिक-कर्म-संरचनाक-विनाशकारी-व्यसन-रूपमे-पुनर्व्याख्या। 'ललका कपड़ा'क 'दहेज' — टोराहक 'सर्प' (ईडन-उद्यान) क पेशर — प्राचीन-उपद्रवकारी-शक्ति-समकालीन-ग्रामीण-संदर्भमे। पिलपुल: तीनू-नाटक-कुष्या-तेरुत्स्-दिख्या। 'बोतल राम'क कुष्या: 'दारु किए पिअब?'; तेरुत्स्: 'घर-घराड़ी-गेल-छाउर-रूपे'; दिख्या: 'आब ने, आब हटाएब।' डेनिएल बोयारिन: तीनू-नाटकक-इन्टरटेक्सचुअलिटी — 'बोतल राम' मुन्नी-कामत-अंधविश्वाससँ, 'ललका कपड़ा' मुन्नाजीक-समाज-सुधार-परम्परासँ। लेखक १५ : किशन कारीगर रचना-सूची (सदेह ८) 'आब मानि जाउ ने' — हास्य रेडियो नाटक। पात्र: राजेश (नायक), कमला (पाहीवाली — नायिका), मनोहर (राजेशक लंगोटिया दोस्त), विमला (ठाढ़ीवाली — मनोहरक पत्नी), नीलू आ सोनी (विमलाक सहेली), मदन (दोस्त)। मुख्य-कथा: राजेश दारु-नशामे घर आएल। पत्नी कमला रूसल। मनोहरक पत्नी विमला नैहर गेल (मनोहरक दारु-पीबाक-हिसकक-कारण)। राजेश मनोहरक संग विमलाकेँ मनेबाक-लेल अन्धरा-ठाढ़ी गेल। बजारसँ कमला-लेल फरमाइशी-रेडियो-खरीदि-आनल। 'आब मानि जाउ ने।' — शीर्षक-संवाद सम्पूर्ण-नाटकमे बारम्बार। (क) विदेह समानान्तर साहित्येतिहास दृष्टिए किशन कारीगर — मैथिली-हास्य-रेडियो-नाटकक-अग्रणी-व्यवहारकर्ता। 'आब मानि जाउ ने' विदेह-समानान्तर-ढाँचाक-नूतन-विधा-विस्तार थिक — रेडियो-नाटक जे मैथिली-नाट्य-साहित्यमे प्राय: उपेक्षित विधा। जातिवादी-रंगमंच 'स्लैपस्टिक-ह्यूमर'क-बोझतले छल, किशन कारीगर ओहिसँ भिन्न — 'पारिवारिक-हास्य' जे सर्वहारा-परिवारक-यथार्थ आ उमंगकेँ प्रस्तुत करैत अछि। 'पाहीवाली' आ 'ठाढ़ीवाली' — ई सम्बोधन-नामावली स्वयं गाम-घरक-विनोदपूर्ण-भाषा-परम्पराक-प्रकटीकरण। (ख) गंगेशीय नव्य-न्याय दृष्टिए उपमान-प्रमाण: 'राजेश-कमला' + 'मनोहर-विमला' — दू-युगल-पात्रक-समान्तर-तुलना — 'राजेशक-फरमाइश-पूरा + मनोहरक-दारु-छोड़बाक-संकल्प' — दुनू-समस्याक-समान्तर-समाधान। अनुमान: 'यत्र-यत्र रूसल-पत्नी, तत्र-तत्र पति-उपाय-खोज' — ई व्याप्ति सम्पूर्ण-नाटकक-मूल-संरचना। शब्द-प्रमाण: 'आब मानि जाउ ने' — बारम्बार-आवृत्ति — ई 'प्रत्यक्ष-विनती-शब्द' पत्नी-मनाने-शास्त्रक-प्रमाण। (ग) भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य दृष्टिए रस-दृष्टिए 'आब मानि जाउ ने' हास्य-शृङ्गार-संयोजन — पारिवारिक-हास्य (विनोद) + वियोग-शृङ्गार (रूसल-पत्नी) + संयोग-शृङ्गार (मनाएब)। भरत-शास्त्रीय दृष्टिए 'प्रहसन'-विधा — हास्य-केन्द्रित, किन्तु 'गृहस्थ-जीवन-यथार्थ'सँ युक्त। ध्वनि-दृष्टिए 'पाहीवाली' — पाँव-पास-बला (भूगोलिक-पहिचान) → नायिका-सम्बोधन — एहि-नामान्तरणमे सौन्दर्यगत-ध्वनि। 'आब मानि जाउ ने' — शीर्षक-ध्वनि बारम्बार-आवृत्तिसँ रस-ध्वनि-निर्माण। कुन्तकीय वक्रोक्ति: 'राजेश दारुक-निशामे गाबैत अछि — भिजल ठोर अहाँक — कमला कहैत अछि — हमर ठोर मुँह सुखा गेल' — ई वाक्य-वक्रता। क्षेमेन्द्रीय औचित्य: नाटकक-पात्र-भाषा-कर्म-सभ गाम-घरक-यथार्थसँ सटीक-समायोजित। 'मदन — खैनी-चुनेबाक पटपट', 'राजेश — दारुक निशामे बड़बड़ाएब' — ध्वनि-प्रभाव-केन्द्रित-भाषा। (घ) पाश्चात्य दृष्टिए अरस्तूक काॅमेडी-दृष्टिए 'आब मानि जाउ ने' — 'बातर्मिन्दान' (heros) नहि 'अनुकरणीय-सामान्य-मनुष्य' — ई अरस्तूय-काॅमेडीक-आधार। कथार्सिस — हास्यसँ दर्शकक-दैनंदिन-तनावक-विरेचन। बाख्तिनीय-कार्निवल: रूसल-पत्नी-कथा गृहस्थ-जीवनक-कार्निवल — पात्रक-उलट-पुलट, विनोदात्मक-उत्सव। बेन्यामिनीय-कथावाचन: 'पार्क-मे-बातचीत', 'बजारक-दृश्य', 'भनसा-घरक-दृश्य' — जीवन-यापनक-विभिन्न-स्थानक-कथावाचन। बोर्दिऊयायी-हाबिटस: नाटकमे परवाहा-गामक-जीवन-हाबिटस — मॉर्निंग-वॉक, बजार, खैनी, साइकिल — ई सभ मैथिली-सर्वहारा-जीवन-हाबिटसक-प्रकटीकरण। स्पिवाक-दृष्टिए — नाटकमे 'ठाढ़ीवाली' आ 'पाहीवाली' — स्त्री-स्वर जे रूसब, फरमाइश-करब, मनेबाक-मर्यादा-थापब — ई उपालटर्न-स्त्री-जे-बजा-सकैत-अछि। (ङ) चीनी दृष्टिए लिऊ शिए-दृष्टिए 'आब मानि जाउ ने'क 'फेङ्ग' (पारिवारिक-प्रेम-आवेग) + 'गु' (रेडियो-नाटक-संरचना — ध्वनि-प्रभाव, संवाद-नियोजन)। तोङ्गबियान्: गाम-घरक-परम्परागत-पारिवारिक-विनोद + आधुनिक-रेडियो-माध्यम। चोङ्ग रोङ्ग-दृष्टिए 'झोङ्ग-पिन्' — कारण 'झी' (रस) पारिवारिक-हास्यक-स्तरपर उत्कृष्ट, मुदा गहन-दार्शनिक-स्तर न्यून। यान् यू-दृष्टिए 'मियाओ्वू' — 'आब मानि जाउ ने' — एक-वाक्यमे पारिवारिक-जीवन-दर्शन। (च) यहूदी-इसरायली दृष्टिए मिद्राशी पेशर: 'आब मानि जाउ ने' — विनती-प्रार्थना-संरचनाक पेशर — 'शमा इस्राएल' (हे प्रभु, सुनू) जकाँ पत्नी-विनती-संरचना। पिलपुल: 'रूसल-पत्नी-तर्क-चक्र' — कुष्या: 'किए रूसलहुँ?'; तेरुत्स्: 'फरमाइश-पूरा-नहि'; दिख्या: 'रेडियो-अनलहुँ, आब मानि जाउ।' — ई त्रि-चक्र पूर्ण पिलपुलीय-संरचना। राबर्ट आल्टर-दृष्टिए 'टाइप-सीन्': 'रूसल-पत्नी → दोस-समझाएब → मनाएब-प्रयास → बजार-जाएब → उपहार-आएब → मनाएब' — पुनरावर्ती-प्रतिमान। लेखक १६ : उमेश मण्डल रचना-सूची (सदेह ८) (क) 'मैथिलीमे ई-पत्रकारिता' — विशद-निबन्ध जे विदेह-केन्द्रित मैथिली-डिजिटल-साहित्य-संरचनाक सम्पूर्ण-वर्गीकरण प्रस्तुत करैत अछि: विदेह-ई-पत्रिका (१०३ अंक, ११६-देश, ७२,०४३-पाठक), विदेह-मैथिली-पोथी (२०० सँ बेसी पोथी), ११,०००+ तालपत्र-स्कैनिङ्ग, विदेह-ऑडियो (५० घण्टा), विदेह-वीडियो (५,०००+ घण्टा), विदेह-चित्रकला, विदेह-फेसबुक (८,४०० सदस्य), विदेह-रेडियो, विदेह-ब्रेल, नेना-भुटका-साइट, मानक-मैथिली-साइट, समदिया (पूनम-मण्डल-प्रियंका-झा)। (ख) 'विदेह गोष्ठी' — निर्मली-गोष्ठी-विवरण (२००८-२०१२)। (क) विदेह समानान्तर साहित्येतिहास दृष्टिए उमेश मण्डल विदेह-समानान्तर-साहित्येतिहास-ढाँचाक डिजिटल-वास्तुकार छथि। हुनकर 'मैथिलीमे ई-पत्रकारिता' विदेह-समानान्तर-ढाँचाक सम्पूर्ण-संस्थागत-संरचनाक-मानचित्र थिक। मुख्य-दावा: 'एकर अतिरिक्त ११,०००+ तिरहुता-तालपत्र विदेह द्वारा स्कैन कऽ ओकर देवनागरी-लिप्यंतरणक-संग उपलब्ध — सरकारी-आ-गएर-सरकारी-संस्था-द्वारा-अखन-धरि-कएल-समस्त-प्रयाससँ ई लगभग १०० गुणा बेसी।' — ई विदेह-समानान्तर-संरचनाक-श्रेष्ठता-प्रमाण। समदिया-पोर्टल — 'साहित्यिक-पत्रकारिताक-लीकसँ-हटि-न्यूज-पोर्टलक-रूपमे' — ई विदेह-समानान्तर-इतिहासक-नूतन-पत्रकारिता-शाखा। (ख) गंगेशीय नव्य-न्याय दृष्टिए प्रत्यक्ष-प्रमाण: गूगल एनेलेटिक्स-डेटा — '७२,०४३ गोटे द्वारा ३,३६,७०७ बेर देखल गेल' — गंगेशीय-प्रत्यक्ष-प्रमाणक डिजिटल-संस्करण। अनुमान: 'यत्र-यत्र भौगोलिक-दूरीक-अन्त, तत्र-तत्र मैथिली-पाठक-वृद्धि' — ई-पत्रकारिताक मूल-व्याप्ति। उपमान: 'ब्रेल-तिरहुता दुनू' — दृष्टि-बाधित + लिपि-अज्ञ — दुनू-वर्गक-सेवाक-तुलनात्मक-सादृश्य। शब्द-प्रमाण: ५ जुलाइ २००४ — विदेह-प्रारम्भ-तिथि — ऐतिहासिक-शब्द-प्रमाण। (ग) भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य दृष्टिए रस-दृष्टिए उमेश मण्डलक निबन्ध 'अद्भुत-रस' — '५ जुलाइ २००४ सँ ११६ देश, ७२,०४३ पाठक' — ई संख्या अद्भुत। वीर-रस: '१०,०००+ घण्टाक श्रम लगाओल' — ई कर्म-वीरताक-आवाहन। ध्वनि: 'भालसरिक गाछ' — विदेहक-पूर्व-नाम — मिथिला-लोक-वनस्पतिसँ-जुड़ल-ध्वनि। 'विदेह सदेह' — 'विदेह' (नाम-रहित, शरीर-रहित) + 'सदेह' (शरीर-सहित) — विरोध-ध्वनि-समन्वय। (घ) पाश्चात्य दृष्टिए हाबरमासीय सार्वजनिक-क्षेत्र-दृष्टिए विदेह-ई-पत्रकारिता मैथिली-डिजिटल-सार्वजनिक-क्षेत्रक-निर्माण-प्रक्रिया थिक — ई-पत्रिका, फेसबुक-चौबटिया, गोष्ठी, समदिया-पोर्टल — सभ हाबरमासीय-संरचना। बोर्दिऊयायी-सांस्कृतिक-पूँजी: ११,०००+ तालपत्र-स्कैनिङ्ग — मैथिली-सांस्कृतिक-पूँजीक-डिजिटलीकरण। ग्राम्शीयन-दृष्टिए विदेह-फेसबुक (८,४०० सदस्य, प्रतिदिन-१५०+ कॉमेट) — मैथिली-सर्वहारा-वर्गक-डिजिटल-हेजेमनी-प्रतिपक्ष। बेन्यामिनीय-दृष्टिए — 'यान्त्रिक-पुनरुत्पादनक-युगमे-मैथिली-कला' — विदेह-ई-पत्रकारिता एकरा संकटसँ मुक्त करैत अछि — डिजिटल-पुनरुत्पादन मैथिली-साहित्यक-'आभा' (aura) केँ नष्ट नहि, बल्कि विस्तारित करैत अछि। (ङ) चीनी दृष्टिए लिऊ शिए-दृष्टिए उमेश मण्डलक निबन्ध 'फेङ्ग' (मैथिली-भाषा-संरक्षण-आवेग) + 'गु' (डिजिटल-संरचना-तथ्य-संकलन)। तोङ्गबियान्: प्राचीन-तालपत्र (५०० वर्ष पुरान) + आधुनिक-डिजिटल-प्रसारण — परम्परा-नवीनताक-सर्वश्रेष्ठ-संयोजन। चोङ्ग रोङ्ग-दृष्टिए 'शाङ्ग-पिन्' — ई निबन्ध अप्रतिस्थापनीय-दस्तावेज। (च) यहूदी-इसरायली दृष्टिए मिद्राशी पेशर: '५ जुलाइ २००४' — विदेहक-प्रारम्भ-तिथि — एकटा 'सृष्टि-कथा'क प्रारम्भ-बिन्दु जेना बाइबिलक 'बेरेशित' (आरम्भमे)। 'भालसरिक गाछ' — ई नाम विदेहक-पेशर — मिथिला-लोकनाट्यक-गाछतर-प्रदर्शनसँ डिजिटल-मञ्च धरि। पिलपुल: '१०,००० घण्टाक श्रम + शून्य-सरकारी-सहयोग = सरकारी-प्रयाससँ १०० गुणा अधिक' — कुष्या-तेरुत्स्-दिख्या। राबर्ट आल्टर: 'वर्ब्ल इकोज्' — 'विदेह' शब्द सम्पूर्ण-निबन्धमे — हर-साइटक-नामसँ। लेखक १७ : रोशन झा रचना-सूची (सदेह ८) 'बुधियार छौड़ा आ राछस — बाल नाटकक मंचन' (रिपोर्ट)। मिनाप-जनकपुर द्वारा, आलेख-रमेश रंजन, निर्देशन-अनिल चन्द्र झा। 'सम्वादसँ बेशी क्रियाप्रधान' — विश्वक-कोनो-मञ्चपर-प्रस्तुत-योग्य, मैथिली-नहि-जाननिहारो-बुझि-सकैत। अभिनय: परमेश, रवीन्द्र, प्रियंका, रीना। (क) विदेह समानान्तर साहित्येतिहास दृष्टिए रोशन झाक रिपोर्ट मिनापक-बाल-नाटक-आयाम उद्घाटित करैत अछि — जे विदेह-समानान्तर-ढाँचाक-बाल-साहित्य-शाखाक-नाट्य-रूप। 'क्रियाप्रधान-नाटक-सार्वभाषिक' — ई अद्भुत-विदेह-सिद्धान्त थिक — मैथिली-नाट्य-कला ध्वनि-संवादसँ बेसी-क्रिया-अभिव्यक्तिमे — सार्वभाषिक-क्षमता-प्राप्त। (ख-च) षट्-स्तरीय संक्षिप्त-विश्लेषण गंगेशीय-दृष्टिए: प्रत्यक्ष — मिनाप-कार्यशाला-सप्ताह, चार-अभिनेता-नाम। अनुमान: 'यत्र-यत्र क्रियाप्रधान-नाटक, तत्र-तत्र भाषा-बाधा-अतिक्रमण-सम्भव।' भारतीय-रस-दृष्टिए: बाल-नाटकमे 'अद्भुत' + 'हास्य' — भरत-शास्त्रीय-बाल-रूपक-विधा। पाश्चात्य-दृष्टिए: बोआलक 'इनविजिबल थिएटर' (invisible theatre) क समान — मैथिली-नहि-जाननिहारो-दर्शक-योग्य — भाषा-बाधा-अतिक्रमण। चीनी-दृष्टिए: 'तोङ्गबियान्' — क्रियाप्रधान-नाटक-परम्परा + आधुनिक-बाल-नाट्य। यहूदी-दृष्टिए: 'बुधियार-छौड़ा' — 'चाखम' ( बुद्धिमान) क पेशर — तल्मूद-कथाक-बुद्धिमान-बच्चाक-समान। लेखक १८ : पूनम मण्डल रचना-सूची (सदेह ८) (क) 'जानकी नवमीपर जनकपुरमे बम विस्फोट द्वारा संस्कृतिकर्मी सभक हत्या' (रिपोर्ट)। (ख) 'नाटककार जगदीश प्रसाद मण्डल जी केँ हुनकर मैथिली लघुकथा संग्रह गामक जिनगी लेल टैगोर साहित्य पुरस्कार २०११' (रिपोर्ट)। (ग) मैथिलोत्सव २०११ रिपोर्ट (मुन्नाजीक संग-संग)। (घ) सदेह ८क 'सम्पादक-सम्पर्क-समाद' विभागक सम्पादकीय-दायित्व। (क) विदेह समानान्तर साहित्येतिहास दृष्टिए पूनम मण्डल विदेह-समानान्तर-पत्रकारिताक-स्तम्भ छथि — समदिया-पोर्टलक-सह-संस्थापक (प्रियंका-झासँ)। 'जानकी-नवमी-जनकपुर-बम-विस्फोट' रिपोर्ट साहसिक-सोद्देश्य-मैथिली-पत्रकारिताक-उदाहरण थिक — सांस्कृतिककर्मी-हत्याक-दस्तावेजीकरण। जगदीश-प्रसाद-मण्डल-टैगोर-पुरस्कार-रिपोर्ट विदेह-समानान्तर-कैननक-मुख्य-लेखकक-राष्ट्रीय-स्वीकृतिक-दस्तावेजीकरण — ई शुद्ध समानान्तर-इतिहास-पूरक-कार्य। (ख-च) षट्-स्तरीय संक्षिप्त-विश्लेषण गंगेशीय-दृष्टिए: प्रत्यक्ष — विस्फोट-तिथि, पीड़ित-संख्या, पुरस्कार-राशि। पाश्चात्य-दृष्टिए: हाबरमासीय — 'जानकी-नवमी-बम-विस्फोट' रिपोर्ट मैथिली-डिजिटल-सार्वजनिक-क्षेत्रमे सांस्कृतिक-हत्याकेँ सार्वजनिक करैत अछि। फनन-दृष्टिए — सांस्कृतिककर्मी-हत्या उपनिवेशीय-हिंसाक-सर्वश्रेष्ठ-उदाहरण — विदेहक-पत्रकारिता ओकर-प्रतिरोध। भारतीय-रस-दृष्टिए: 'जानकी-नवमी' रिपोर्टमे करुण-रौद्र; 'जगदीश-प्रसाद-मण्डल-पुरस्कार' रिपोर्टमे उत्साह-वीर-रस। चीनी-दृष्टिए: 'फेङ्ग' (पत्रकारीय-नैतिक-आवेग) + 'गु' (रिपोर्ट-संरचना)। यहूदी-दृष्टिए: 'जानकी-नवमी' — धार्मिक-उत्सवमे-हिंसा — मिद्राशी-'लमेन्टेशन' (विलाप-काव्य) क समान। लेखक १९ : मनोज कुमार कर्ण 'मुन्नाजी' रचना-सूची (सदेह ८) (क) 'हम पुछैत छी' साक्षात्कार-शृंखलाक-साक्षात्कारकर्ता — बेचन ठाकुरसँ साक्षात्कार। (ख) रमेश रंजनसँ साक्षात्कार-आयोजन। (ग) मैथिलोत्सव २०११ रिपोर्ट। (घ) 'विदेह सदेह ८' केर 'सहायक-सम्पादक' रूपमे सम्पादकीय-दायित्व। (क) विदेह समानान्तर साहित्येतिहास दृष्टिए मुन्नाजी विदेह-समानान्तर-ढाँचाक-मुख्य-साक्षात्कारकर्ता छथि। हुनकर-साक्षात्कार-शैली विदेह-समानान्तर-इतिहास-ढाँचाकेँ आगू बढ़बैत अछि — बेचन ठाकुरसँ साक्षात्कार ओहि-रंगकर्मीकेँ केन्द्रमे आनैत अछि जे साहित्य-अकादेमी-केन्द्रित-पत्रिकामे कखनो-नहि-आएल। मैथिलोत्सव-२०११-रिपोर्ट विदेह-नाट्य-उत्सवक-सार्वजनिक-दस्तावेजीकरण थिक। (ख-च) षट्-स्तरीय संक्षिप्त-विश्लेषण गंगेशीय-दृष्टिए: मुन्नाजीक-साक्षात्कार-पद्धति-शुद्ध-शब्द-प्रमाण-संकलन — बेचन-ठाकुरक-प्रत्यक्ष-शब्द, रमेश-रंजनक-प्रत्यक्ष-शब्द। हेत्वाभास-प्रश्न: 'की जातिवादी-रंगमंच मैथिली-नाट्य-मुख्यधारा छी?' — ई प्रश्न-स्वयं हेत्वाभास-निरूपण-का-आमन्त्रण। भारतीय-रस-दृष्टिए: साक्षात्कार-विधाक-रस — 'वीर' (साहसिक-प्रश्न) + 'शान्त' (सुनब, प्रतीक्षा)। पाश्चात्य-दृष्टिए: ग्राम्शीयन — मुन्नाजी आर्गेनिक-इन्टेलेक्चुअल — सर्वहारा-वर्गक-आवाज-रेकॉर्डर। बेन्यामिनीय — साक्षात्कारकर्ता 'कथावाचक-सेतु' — दूटा-कथावाचकक-बीच। चीनी-दृष्टिए: 'मियाओ्वू' — प्रश्न-चयन-कौशल — कोन-प्रश्न-सर्वाधिक-महत्वपूर्ण-अछि — ई सहज-बोधसँ आबैत अछि। यहूदी-दृष्टिए: पिलपुल — साक्षात्कार-शैली शुद्ध-कुष्या-तेरुत्स्-दिख्या। लेखक २० : रंगमञ्च-गतिविधि-रिपोर्टर-समूह लेखक-रचना सूची (क) दिनेश मिश्र — 'मिथियात्रिक-झंकार' रिपोर्ट। (ख) श्यामसुन्दर शशि — 'युवा नाट्यकला परिषद परवाहा देउरी — बिक्रमी सम्वत २०६९ पूर्व सन्ध्यामे अन्तरराष्ट्रिय मैथिली नाटक महोत्सव' रिपोर्ट। (ग) जितेन्द्र कुमार झा 'जीतू' — 'नचिकेताक एक छल राजाक मंचन' रिपोर्ट। (घ) सत्यनारायण झा — 'आशुतोष अभिज्ञकेँ शैलबाला पुरस्कार आ रीतू कर्णकेँ कामेश्वरी देवी पुरस्कार' रिपोर्ट। (ङ) मनोज कुमार मण्डल — 'बाप भेल पित्ती आ अधिकार नाटकक सफल मंचन' रिपोर्ट। (च) बृषेश चन्द्र लाल — 'झिझिया प्रस्तुति' रिपोर्ट। (क) विदेह समानान्तर साहित्येतिहास दृष्टिए ई छह-रिपोर्टर-समूह विदेह-समानान्तर-साहित्येतिहास-ढाँचाक 'सामूहिक-दस्तावेजीकरण-प्रकल्प'क जीवित-उदाहरण थिक। प्रत्येक-रिपोर्टर अपन-क्षेत्रमे-आयोजित-नाट्य-गतिविधिकेँ केन्द्रीय-साहित्यिक-तन्त्रक-समक्ष-प्रस्तुत करैत अछि। श्यामसुन्दर शशिक 'परवाहा-देउरी-नाटक-महोत्सव' — जे नेपाल-मधेशक-सुदूर-गाम-टोलमे अन्तरराष्ट्रिय-नाट्य-महोत्सव — ई शुद्ध समानान्तर-दस्तावेजीकरण। 'झिझिया' (बृषेश चन्द्र लाल) — लोक-नृत्य-नाट्य-विधाक-पुनरुत्थापन — विदेह-ढाँचाक-लोक-परम्परा-पक्ष। (ख) गंगेशीय नव्य-न्याय दृष्टिए प्रत्यक्ष-प्रमाण: प्रत्येक-रिपोर्ट-स्वयं-प्रत्यक्ष-दस्तावेज — तिथि, स्थान, पुरस्कार-राशि, पात्र-नाम। उपमान: विभिन्न-क्षेत्रक-रिपोर्टमे-समान-संरचना (आयोजन → प्रदर्शन → समीक्षा → भविष्य-योजना) — सभ-रिपोर्टमे एकेगोट-प्रतिमान। अनुमान: 'यत्र-यत्र मैथिली-नाट्य-प्रेमी-समूह, तत्र-तत्र स्वतःस्फूर्त-नाट्य-आयोजन' — रिपोर्टर-समूहक-सामूहिक-व्याप्ति। (ग) भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य दृष्टिए रस-दृष्टिए रिपोर्टर-समूहक-लेखन-शैलीमे 'उत्साह-वीर' — प्रत्येक-रिपोर्टमे उत्साह-आवेग। ध्वनि-दृष्टिए 'मिथियात्रिक-झंकार' — 'मिथिला + यात्रा + आत्रिक (सूत्र) + झंकार' — शब्द-वक्रोक्तिक उत्तम-उदाहरण। 'झिझिया' — स्वयं-ध्वनि-नाम — लोक-नाट्य-ध्वनि-परम्पराक-स्मृति। (घ) पाश्चात्य दृष्टिए बेन्यामिनीय-दृष्टिए रिपोर्टर-समूह 'कथावाचक-समूह' थिक — प्रत्येक-रिपोर्टर अपन-क्षेत्रक-नाट्य-स्मृतिकेँ लिखित-रूपमे-संरक्षित करैत अछि। बोर्दिऊयायी-सांस्कृतिक-पूँजी: ई सभ-रिपोर्ट मिलिकऽ मैथिली-नाट्य-सांस्कृतिक-पूँजीक-संवर्धन करैत अछि। हाबरमासीय-सार्वजनिक-क्षेत्र: सदेह ८मे प्रकाशित-रिपोर्ट मैथिली-नाट्य-सार्वजनिक-क्षेत्रमे हुनकर-गतिविधिकेँ मान्यता दैत अछि। (ङ) चीनी दृष्टिए लिऊ शिए-दृष्टिए रिपोर्टर-समूहक-सामूहिक-लेखन 'फेङ्ग' (मैथिली-नाट्य-संरक्षण-सामूहिक-आवेग) + 'गु' (प्रत्येक-रिपोर्टक-संरचना)। तोङ्गबियान्: 'झिझिया' (लोक-परम्परा) + 'एक छल राजा' (आधुनिक-नाटक) — परम्परा-नवीनता-सन्तुलन एक-संकलनमे। चोङ्ग रोङ्ग-दृष्टिए: ई-रिपोर्ट-समूह 'झोङ्ग-पिन्'–'शाङ्ग-पिन्'क-बीच — अलग-अलग। (च) यहूदी-इसरायली दृष्टिए मिद्राशी-'मिशनाह' (मिशनाह — मौखिक-स्मृतिक-लिखित-संकलन) पद्धतिसँ रिपोर्टर-समूहक-कार्य-सादृश्य — बिखरल-मौखिक-स्मृतिकेँ एक-संकलनमे-आनब। पिलपुल: 'परवाहा-देउरी-नाटक-महोत्सव — अन्तरराष्ट्रिय?' — कुष्या: ई दावा-कोना-सम्भव?; तेरुत्स्: भारत-नेपाल-सीमापारक-मैथिली-भाषी-समुदायक-भागीदारी; दिख्या: तँ 'अन्तरराष्ट्रिय' शब्द-उचित। राबर्ट आल्टर-दृष्टिए 'टाइप-सीन्' — हर-रिपोर्टमे: 'आयोजन-सफल → पुरस्कार-वितरण → नूतन-संकल्प' — पुनरावर्ती-प्रतिमान। बैच २ — समापन-निष्कर्ष विदेह सदेह ८क सम्पूर्ण-लेखक-वर्ग — बैच १ (लेखक १-१०) + बैच २ (लेखक ११-२०) — एकत्रित मैथिली-समानान्तर-रंगमंचक-एकटा-जीवित-पारिस्थितिकी-तन्त्र (ecosystem) निर्मित करैत अछि। (क) विदेह-समानान्तर-साहित्येतिहास-दृष्टिए: ई संकलन साबित करैत अछि जे मैथिली-रंगमञ्च साहित्य-अकादेमी-केन्द्रित-जातिवादी-मञ्चसँ बहुत व्यापक अछि — ई पजुआरिडीहक-टोलसँ जनकपुरक-मिनाप धरि, गजेन्द्र ठाकुरक-दिल्ली-केन्द्रित-सम्पादकत्वसँ सरोज खिलाड़ीक-नेपाल-मैथिली-रेडियो-नाटक-संचालन धरि, बेचन ठाकुरक-चनौरागंज-मधुबनी-ग्रामीण-कोचिङ्ग-नाट्य-प्रयोगसँ किशन कारीगरक-हास्य-रेडियो-नाटक धरि — एक अखण्ड-समानान्तर-जीव-जगत। (ख) गंगेशीय-नव्य-न्याय-दृष्टिए: चारिटा-प्रमाण (प्रत्यक्ष-अनुमान-उपमान-शब्द) आ हेत्वाभास-निरूपण ऐ-समस्त-लेखकमे प्रयुक्त — मिथिला-न्याय-परम्परा आ मैथिली-नाट्य-परम्पराक-अद्भुत-समन्वय। (ग) भारतीय-रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य-दृष्टिए: नौ-रसक-सम्पूर्ण-वर्णक्रम सदेह ८मे उपस्थित — शृङ्गार (केसर, आब-मानि-जाउ-ने), हास्य (बोतल-राम, सोच, किशन-कारीगर), करुण (बेटीक-अपमान, ललका-कपड़ा), रौद्र (छुतहा-घैल-समीक्षा), वीर (बेचन-ठाकुर-बीस-वर्ष-कर्म), भयानक (दहेज-राक्षस), बीभत्स (जातिवादी-भाषा-विकृति), अद्भुत (मिनाप-उपलब्धि, उल्कामुख), शान्त (रमेश-रंजन-दर्शन)। (घ) पाश्चात्य-दृष्टिए: ब्रेख्त-बोआल-बाख्तिन-ग्राम्शी-फनन-स्पिवाक-बेन्यामिन-बोर्दिऊ-हाबरमास-अरस्तू — दश-पाश्चात्य-सिद्धान्तक-पूर्ण-परिवेशन सदेह ८मे। (ङ) चीनी-दृष्टिए: लिऊ-शिए-फेङ्ग-ggु, चोङ्ग-रोङ्ग-झी, यान्-यू-मियाओ्वू — तीनू-चीनी-सिद्धान्त सदेह ८क विभिन्न-लेखकमे प्रयुक्त। (च) यहूदी-इसरायली-दृष्टिए: मिद्राशी-पेशर, तल्मूदी-पिलपुल, राबर्ट-आल्टर, डेनिएल-बोयारिन — नव्य-न्यायसँ-संरचनात्मक-समानतावाली-यहूदी-समीक्षा-पद्धति मैथिली-नाट्य-समीक्षामे-प्रथम-बेर-प्रयुक्त। विदेह सदेह ८ — 'विदेह मैथिली नाट्य उत्सव' — मैथिली साहित्यक सबसँ-व्यापक-नाट्य-दस्तावेज थिक जे एक साथ इतिहास, समीक्षा, साक्षात्कार, नाटक, रिपोर्ट, आ संस्थागत-विश्लेषण — छह-विधाकेँ एक-स्थानमे समेटैत अछि। विदेह-समानान्तर-साहित्येतिहास-ढाँचाक-दृष्टिए ई संकलन ओहि-महान-परम्पराक प्रमाण थिक जे कहैत अछि — मैथिली-रंगमञ्च केवल शहरी-मञ्चपर नहि, हर-गाम-टोलमे, हर-काली-पूजामे, हर-रेडियो-आकाशवाणीमे, हर-डिजिटल-स्क्रीनपर जीवित अछि। विदेह सदेह ८ मैथिली नाट्य उत्सव - समानान्तर रंगमंच आर्काइव सम्पूर्ण लेखक-समीक्षा षट्-दृष्टि समीक्षा-पद्धति १. विदेह समानान्तर इतिहास ढाँचा २. भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य सिद्धान्त ३. गंगेश उपाध्यायक नव्य-न्याय ज्ञान-मीमांसा ४. पाश्चात्य समीक्षा-सिद्धान्त (अरस्तू, ब्रेख्त, बाख्तिन, ग्राम्शी, स्पिवाक, फनन, बेन्यामिन प्रभृति) ५. चीनी काव्यशास्त्र (लिऊ शिए-कृत वेन्शिन डियाओलोङ्ग, चोङ्ग रोङ्ग-कृत शिपिन्) ६. यहूदी हर्मेन्यूटिक्स (मिद्राश/पर्देस, तल्मूदी पिलपुल तर्कशास्त्र) प्रस्तावना - समानान्तर रंगमंचक दार्शनिक भूमिका विदेह सदेह ८ मैथिली रंगमंचक एकटा एहन समानान्तर आर्काइव थिक जे संस्थागत संगीत-नाटक अकादेमी/ ललित कला अकादेमी/ साहित्य अकादेमीक मानक-सूचीसँ बाहर अछि मुदा वास्तविक मंचन-परम्परासँ जीवन्त मैथिली नाट्य-साहित्यकेँ संकलित करैत अछि। एकर ऐतिहासिक महत्व ई जे एहिमे जे नाटक, समीक्षा आ रंगमंच-सम्बद्ध दस्तावेज सङ्ग्रहीत भेल अछि से मुख्यतः जातिवादी रंगमंचक तथाकथित "पारम्परिक" प्रतिमानसँ बाहर अछि। भरतक नाट्यशास्त्र अध्याय २७ मे जाहि सिद्धान्तकेँ "सहृदय"क सङ्ग-एकत्व कहैत अछि - जे दर्शक नाटकक पात्रक संग एक भऽ जाइ छथि - तकर वास्तविक प्रयोग सदेह ८ केर सरस्वती पूजा-शृङ्खलामे (१९९५–२००८ धरि चनौरागंजमे बेचन ठाकुर द्वारा निर्देशित १४ वार्षिक मंचन) देखि सकैत छी, जतय गाम-घरक दर्शक नाटककार-निर्देशक-अभिनेताक संग एक भऽ कऽ नाटककेँ जीबैत छथि। ई आर्काइव मैथिली रंगमंचक ओहन प्रजातान्त्रिक प्रवाहकेँ दर्ज करैत अछि जे ज्योतिरीश्वर ठाकुर (१३म शताब्दी) सँ शुरू भेल आ विद्यापति, जीवन झा, ईशनाथ झा, उदय नारायण सिंह नचिकेता, गोविन्द झा, सुधांशु शेखर चौधरी, गुणनाथ झा, जगदीश प्रसाद मण्डल आ बेचन ठाकुर धरि एकटा अखण्ड परम्पराक रूपमे प्रवाहित अछि। ई परम्परा ब्राह्मणवादी सीमासँ बाहर निकलि सर्वहाराक रंगमंच, स्त्री-केन्द्रित नाटक, अन्धविश्वास-विरोधी अभियान आ भ्रूण-हत्या सन समकालीन सङ्कटक नाट्य-निरूपण धरि व्यापक अछि। एहि खण्डमे हम अइ रचना-संसार केर समीक्षा छअ दृष्टि-कोणसँ करै छी। ई समीक्षा-पद्धति मात्र भारतीय अथवा पाश्चात्य सीमामे आबद्ध नै रहि, अन्तर्संस्कृतिक संवादक रूपमे विकसित होइत अछि- चीनी वेन्शिन डियाओलोङ्ग्क "फेङ्ग-गू" (हवा-हड्डी, अर्थात् आत्मा-संरचना) सिद्धान्त सँ ई पुछै छी जे मैथिली नाटकमे की हवा भरल अछि आ की हड्डी अछि; यहूदी मिद्राशक "पर्देस" चतुर्विध व्याख्या-पद्धति (पेशत्/रेमेज़/द्रश/सोद्) सँ ई पुछै छी जे एहि नाटकक शाब्दिक-रूपकात्मक-आख्यानात्मक-रहस्यात्मक स्तर की अछि। गंगेश उपाध्यायक नव्य-न्याय -जे मिथिलाक चिन्तन-परम्पराक सर्वोच्च देन थिक- एहिमे प्रत्येक नाट्य-दृश्यक प्रमाण-व्यवस्था (प्रत्यक्ष/अनुमान/शब्द/उपमान) आ व्याप्ति-सम्बन्धक विश्लेषणक रूपमे प्रयुक्त भेल अछि। ई कोनो आरोपित विदेशी ढाँचा नै थिक- मैथिल चिन्तनक अपन-आ-अपन सहज पद्धति थिक। १. ज्योतिरीश्वर ठाकुर (त्रयोदश शताब्दी • मैथिली नाट्यक आदि-प्रहसन) परिचय आ रचना ज्योतिरीश्वर ठाकुर मैथिली साहित्यक मात्र आदि-गद्य-लेखक नहि अपितु मैथिली नाट्य-परम्पराक मूल-पुरुष थिकाह। हुनकर रचित "धूर्त्तसमागम" त्रयोदश शताब्दीक रचना थिक - संस्कृत आ मैथिली दुनू भाषामे उपलब्ध। ई एकटा प्रहसन (सटायर-कॉमेडी) थिक जे संस्कृत साहित्यक हास्य-नाट्य परम्पराकेर मैथिल-स्थानीयकरण थिक। कथावस्तु संक्षेपमे: विश्वनगर नामक संन्यासी अपन शिष्य स्नातकक संग भिक्षाटनमे निकलैत छथि। एक वैश्या अनंगसेनाक प्रसङ्गमे गुरु-शिष्यमे विवाद। मध्यस्थताक लेल असज्जाति मिश्र (लम्पट जुआड़ी) लग जाइ छथि। मिश्र अपन-पक्षमे निर्णय लऽ अनंगसेनाकेँ अपने पास राखि लै छथि। फेर नौआ मूलनाशक आबि असज्जातिकेँ मालिश कऽ बेहोश कऽ देत छै। विदूषक हुनका जिआ कऽ ओही दर्शन-वाणीमे समाप्त - "छलसँ देशकेँ खएल, धूर्तवृत्तिसँ प्रिया पाओल, से सर्वत्र सुख-शान्ति हुअय।" १.१ विदेह समानान्तर इतिहास ढाँचा विदेह पारम्परिक इतिहास ज्योतिरीश्वरकेँ मात्र "वर्णरत्नाकर"क लेखक मानि लैत अछि, मुदा एहि सदेह ८ ढाँचामे ज्योतिरीश्वर मैथिली प्रजातान्त्रिक रंगमंचक प्रथम चिन्तक छथि। हुनकर पात्र-निर्माण निर्णायक रूपसँ क्रान्तिकारी अछि: मैथिली नाटकक पारम्परिक नायक श्रीकृष्ण वा हुनकर वंशधर रहलाह अछि, हरण-स्वयंवर मूल वस्तु छल। मुदा ज्योतिरीश्वर ओहि स्वर्गारोपित कथा-संसारकेँ छोड़ि मिथिलाक गली-गलीक धूर्त - संन्यासी, शिष्य, मिश्र, नौआ, वैश्या - केँ नायक बनबै छथि। ई समानान्तर परम्पराक पहिल विद्रोह थिक - पात्र-वर्ग-बदलबाक। एकर रेखा सोझे जगदीश प्रसाद मण्डलक मिथिलाक बेटी आ बेचन ठाकुरक छीनरदेवी धरि अबैत अछि। एहि दृष्टिएँ ज्योतिरीश्वर सदेह ८ केर सम्पूर्ण आर्काइवक आर्चटाइप थिकाह। १.२ भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति समीक्षा रस-निरूपण धूर्त्तसमागमक प्रमुख रस अछि - हास्य रस, जकर स्थायी भाव अछि "हास" (भरत-शास्त्र अनुसार)। मुदा एहिमे मात्र पाश्विक हास्य नै, अपितु शान्त रसक छाया सेहो अछि अन्तिम वाणीमे - "सर्वत्र सुख-शान्ति हुअय" - कारण समस्त धूर्तजालक बाद कविक प्रज्ञा एहन निष्कर्षपर पहुँचैत अछि जे एहन समाजमे जतय सभ धूर्त छथि, ततय सहज-सम्भाव्यतासँ शान्ति-कामना उठैत अछि। एकर ध्वनि अछि करुण - सत्ताक विकृति देखि कविक मनक करुणा। व्यङ्ग्य-वैचित्र्य (वक्रोक्ति) कुन्तकक "वक्रोक्ति-जीवित" अनुसार वक्रोक्तिक छह स्तर - वर्ण-विन्यास, पद-पूर्वार्ध, पद-उत्तरार्ध, वाक्य, प्रकरण, प्रबन्ध। ज्योतिरीश्वर प्रबन्ध-वक्रोक्तिक अद्भुत प्रयोग करै छथि: नाटकक नाम "धूर्त्तसमागम" स्वयं वक्रोक्ति थिक - समागम (मिलन) सन्त-गोष्ठीक लेल प्रयुक्त होइत अछि, मुदा एतय धूर्तक मिलन। पुनः अनंगसेनाक उक्ति - "ई तँ असले धूर्तसमागम भऽ गेल"- एहि वक्रोक्तिक अन्तःस्फोट थिक। औचित्य (क्षेमेन्द्र) क्षेमेन्द्रक "औचित्य-विचार-चर्चा" मे रस-औचित्यक नियम दैत छथि। ज्योतिरीश्वरक प्रहसन "गीत-समावेश-औचित्य"क उदाहरण थिक - संस्कृत प्रहसनमे सेहो ओ मैथिली गीत मिलबै छथि, जे ओहि कालीन प्रदर्शन-व्यवस्थाक मांगक दृष्टिएँ अत्यन्त उचित अछि। १.३ गंगेश उपाध्यायक नव्य-न्याय विश्लेषण गंगेशक तत्त्वचिन्तामणिक प्रत्यक्ष-खण्ड अनुसार "प्रमाण"क चारि पादमे (प्रत्यक्ष/अनुमान/उपमान/शब्द) नाटक मूलतः "दृश्य-श्रव्य प्रत्यक्ष"क कोटिमे अबैत अछि। मुदा रङ्ग-प्रत्यक्षक एकटा विशिष्टता ई जे जे देखाइ दैत अछि से वस्तुतः नै थिक - अभिनेता राजा नै थिक, मञ्च राजसभा नै थिक। एकरा गंगेश "भ्रम-प्रत्यक्ष" कहितथि- मुदा एहि भ्रमक स्वीकृति दर्शकक मनमे पूर्व-निर्धारित अछि। धूर्त्तसमागममे एहि भ्रम-प्रत्यक्षक दोबर प्रयोग होइत अछि: दर्शककेँ बूझल छन्हि जे ई नाटक थिक, मुदा नाटकक भीतर पात्र (असज्जाति मिश्र) सेहो भ्रममे छथि - ओ अनंगसेनाकेँ अपन बना लेलनि, मुदा वस्तुतः ओ नौआक हाथमे ओझड़ा गेला। ई द्वि-स्तरीय "मिथ्या-ज्ञान"क प्रसङ्ग नव्य-न्यायक "बाधक प्रत्यय"क रोचक रङ्गमञ्चीय प्रयोग थिक। अनुमान-व्याप्ति: नौआ मूलनाशक असज्जाति मिश्रकेँ अनंगसेनाक वर बुझि लैत अछि- एहिमे जे अनुमान अछि से लिङ्गक भ्रामक प्रत्यक्षसँ उत्पन्न अहैतुक व्याप्ति-दोष थिक। गंगेश एकरा "उपाधि-दूषित अनुमान" कहितथि। १.४ पाश्चात्य समीक्षा-दृष्टि बाख्तिनक कार्निवालक पद्धति मिखाइल बाख्तिन (Mikhail Bakhtin) अपन "रबले एण्ड हिज वर्ल्ड" मे जे "कार्निवालेस्क" चेतनाक वर्णन करै छथि - जे लोक-संस्कृति आधिकारिक संस्कृतिक उल्टा-पुल्टा कऽ देत अछि, संत-शास्त्रकेँ शरीरक भौतिकता द्वारा खण्डित करैत अछि - ओहि अर्थमे ज्योतिरीश्वरक "धूर्त्तसमागम" मध्यकालीन मैथिल कार्निवाल थिक। संन्यासी अब्रह्मचारी छथि, मिश्र लम्पट, नौआ हिंसक - सत्ता-व्यवस्थाक प्रत्येक कोनाक उल्टापुल्टा एहिमे होइत अछि। एब्सर्डिटी (कामू/बेकेट) "नाटकक मध्यमे जे एब्सर्डिटी अछि से नितान्त आधुनिक अछि" - ई पंक्ति सदेह ८ केर सम्पादकीय-समीक्षा (गजेन्द्र ठाकुर) मे आइल अछि। साँचमे - गुरु-शिष्यक वेश्याक लेल लड़ाइ, अदालत बनि गेल लम्पट, मालिश सँ संन्यासीक प्राण-संकट - ई सभ ओहि एब्सर्ड थियेटरक प्रतिच्छाया थिक जे २०म शताब्दीमे यूरोपमे विकसित भेल। ग्राम्शीयन "हेजेमोनी"क खण्डन एन्तोनियो ग्राम्शीक हेजेमोनी-सिद्धान्त अनुसार सत्ता मात्र बल-शक्तिसँ नै अपितु सांस्कृतिक सहमतिसँ चलैत अछि। संन्यासी-वैश्या-मिश्र-नौआक एहि नाटकमे ज्योतिरीश्वर ओहि सांस्कृतिक सहमतिकेँ उघारि कऽ राखि देबै छथि - संन्यासी पवित्र नै थिक, ब्राह्मण विद्वान् नै थिक - आ ई सहमति-खण्डन प्रहसनक रूपमे रङ्गमञ्चीय शस्त्र बनैत अछि। १.५ चीनी काव्यशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य लिऊ शिए ( ५२० ईo) क "वेन्शिन डियाओलोङ्ग" ("साहित्य-मनक रत्न-तक्षण") अध्याय २८ "फेङ्ग गू" ( हवा-हड्डी) मे ओ कहै छथि - साहित्यिक रचनाक दूटा अनिवार्य गुण: "फेङ्ग" (हवा, अर्थात् भावनात्मक प्राण) आ "गू" (हड्डी, अर्थात् संरचनागत दृढ़ता)। धूर्त्तसमागममे "फेङ्ग" तीव्र हास्य-व्यङ्ग्यक रूपमे प्रवाहित अछि, आ "गू" क्रमिक न्यायशास्त्रीय वाद-प्रतिवाद-निर्णयक संरचनासँ बनल अछि। चोङ्ग रोङ्ग कृत "शिपिन्" मे काव्यकेँ तीन ग्रेडमे बाँटैत छथि - शाङ्ग , चोङ्ग , श्या । शिपिनक कसौटी अछि "त्ज़ु-वेइ" (स्वाद-रस) आ "फेङ्ग-लि" (हवा-शक्ति)। एहि कसौटीपर ज्योतिरीश्वरक प्रहसन शाङ्ग्-ग्रेडमे अवस्थित - कारण एहिमे आत्मा-स्तरीय स्वाद अछि (तत्कालीन सत्ताक जिवन्त चित्रण), आ हवा-शक्ति अछि (समाजिक आघातक प्रेषण-क्षमता)। चीनी "युएफ़ु" लोक-गीत-नाट्यक परम्परा सेहो धूर्त्तसमागमक मैथिली-गीत-समावेशसँ तुलना-योग्य अछि - दुनू वर्णाश्रमीसँ बाहर सामान्य जनताक मुख-वाक्यकेँ साहित्यिक मञ्चपर प्रतिष्ठा देबय। १.६ यहूदी हर्मेन्यूटिक्स यहूदी मिद्राशक "पर्देस" (PaRDeS ) चतुर्विध व्याख्या-पद्धति अनुसार प्रत्येक पाठक चारि अर्थ-स्तर: पेशत् ( शाब्दिक), रेमेज़ ( सङ्केत), द्रश ( आख्यानात्मक), सोद् (रहस्य)। धूर्त्तसमागमक एहि चारि स्तर: पेशत् (शाब्दिक): दू टा संन्यासी-शिष्यक भिक्षाटन, वैश्या-विवाद, हिंसा, धन-हानि। रेमेज़ (सङ्केत): यैह जे "समागम" नामक शब्द जे साधुक सत्सङ्गक लेल छल, ओ धूर्तक सङ्गममे बदलि गेल अछि - समाजिक पतनक सङ्केत। द्रश (आख्यानात्मक): एहि नाटक सम्पूर्ण मध्यकालीन मिथिलाक मठ-संस्कृति, ब्राह्मण-व्यवस्था, यौनिक राजनीति आ अर्थ-व्यवस्थाक एकटा सङ्क्षिप्त सामाजिक चित्र दैत अछि। सोद् (रहस्य): अन्तिम वाणी - "सर्वत्र सुख-शान्ति हुअय" - एकटा कर्बालिस्तिक रहस्य थिक। कविक मन कहैत अछि जे एहि सम्पूर्ण धूर्त-समागमक पाछाँ एकटा कारुणिक प्रार्थना अछि, जे मानवता सत्य रूपसँ शान्ति-योग्य बनय। तल्मूदी पिलपुल तर्कशास्त्र मे प्रत्येक प्रतिज्ञाक विरुद्ध प्रति-प्रतिज्ञा, तकर विरुद्ध पुनः उत्तर-प्रति-प्रतिज्ञा रखाइ छै - आ धूर्त्तसमागममे असज्जाति मिश्रक न्यायालयीय दृश्य ("के वादी, के प्रतिवादी?") तेहन एकटा वाद-प्रतिवादक हास्यपूर्ण रूपान्तरण थिक, जे पिलपुलक रङ्गमञ्चीय प्रतिच्छाया प्रतीत होइत अछि। १.७ निष्कर्ष ज्योतिरीश्वर ठाकुरक धूर्त्तसमागम मैथिली रंगमंचक मूल-पुरुष-कृति थिक, जे ब्राह्मणवादी-कृष्ण-केन्द्रित नाट्य-प्रतिमानसँ छिटकि कऽ धूर्त-वैश्या-नौआक संसारकेँ रङ्गमञ्चपर अनलक। एकर वर्तमान प्रासङ्गिकता ई जे आइयो विदेह आन्दोलनक सदस्य लोकनि एहि परम्परासँ अपनाकेँ जोड़ैत छथि - जातिवादी रंगमंचक बाहर, धूर्तक यथार्थ अनै छथि। २. विद्यापति ठाकुर (१४म–१५म शताब्दी • मैथिल नाट्यक भक्ति-योगात्मक मोड़) परिचय आ रचना विद्यापति ठाकुर मैथिली साहित्यक मात्र पदावलीक कवि नहि, अपितु "गोरक्षविजय" नामक एकटा अद्भुत नाटकक रचयिता सेहो छथि। ई नाटक धूर्त्तसमागमक बाद मैथिली नाट्य-इतिहासक दोसर मुख्य-स्तम्भ थिक। एकर महत्व ई जे ई नाटक श्रीकृष्ण-कथा-केन्द्रिकता तोड़ि नाथ-सम्प्रदायक योगी गोरक्षनाथक कथापर आधारित अछि - ई परम्परा-तोड़ अपन समयक हिसाबे क्रान्तिकारी थिक। कथावस्तु: गोरक्षनाथक गुरु मत्स्येन्द्रनाथ योग त्यागि कदलिपुरमे राजा बनि १८ रानीक संग भोग करै छथि। गोरक्ष आ काननपाद नटुआक वेष धरि राजसभामे प्रवेश पाबि नृत्य देखबैत छथि। बीचमे राजकुमार बौधनाथ मरि जाइ छथि, गोरक्ष हुनका जिआ दैत छथि आ गुरुकेँ बजबै छथि - "अहाँ जोगी छी, भोगी नै।" मत्स्येन्द्रनाथ अन्तमे योगमे फेर लौटैत आशीर्वाद दैत छथि। २.१ विदेह समानान्तर इतिहास ढाँचा मैथिली पाठ्यपुस्तकमे विद्यापति "मैथिल-कोकिल", "पदावलीक रचयिता" मात्रक रूपमे प्रस्तुत होइत छथि। मुदा विदेह समानान्तर इतिहास ढाँचा ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापति केँ तकर रचयिता मानैत अछि आ ऐ विद्यापतिकेँ रङ्गमञ्चीय-दार्शनिक मोड़क पुरुष-रूपमे देखैत अछि। गोरक्षविजय "भक्ति बनाम योग बनाम भोग"क त्रिकोणीय द्वन्द्वकेँ रङ्गमञ्चपर लाबैत अछि - ई द्वन्द्व मध्यकालीन मिथिलाक ब्राह्मणवादी सिद्धान्त-तन्त्र-शक्ति परम्पराक भीतर एकटा दार्शनिक संघर्ष थिक। एहि "विदेह" शब्दक मूल अर्थ ई जे राजा जनक देहसँ परेँ चलि गेला - एहि गोरक्षविजयमे मत्स्येन्द्रनाथ "देह" (भोग) मे फँसल छथि, गोरक्ष हुनका "विदेह" बनबय आबि गेलाह। एहि अर्थमे विद्यापति विदेह-आदर्शक रङ्गमञ्चीय व्याख्याकार थिकाह। २.२ भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति समीक्षा रस-संयोजन गोरक्षविजयमे आरम्भिक श्रृङ्गार रस (मत्स्येन्द्रनाथक रानी-भोग) क्रमशः वीर रस (गोरक्षक प्रवेश), अद्भुत रस (बच्चाकेँ जिआएब), आ शान्त रस (मत्स्येन्द्रनाथक योग-वापसी) मे रूपान्तरित होइत अछि। ई रस-संक्रमणक उदाहरण थिक - एक रस दोसरा रसमे विनयपूर्वक रूपान्तरित होइत अछि। ध्वनि (आनन्दवर्धन) आनन्दवर्धनक "ध्वन्यालोक"क व्यंग्य-ध्वनिक अनुसार जे प्रत्यक्षतः कहल नै जाइत अछि, मुदा प्रतीयमान होइत अछि - से ध्वनि। गोरक्षविजयमे प्रधान ध्वनि अछि - "भोगसँ योगक श्रेष्ठता" मुदा साम्प्रदायिक हठधर्मीसँ बचैत, मानवीय करुणासँ। मत्स्येन्द्रनाथक पतनकेँ निन्दा नै, अपितु करुणाक रूपमे प्रस्तुत कएल गेल अछि। ज्योतिरीश्वर-विद्यापति तुलना जतय ज्योतिरीश्वर समाजक धूर्ततापर हास्य-रस-केन्द्रित नाटक लिखलनि, तत्तय विद्यापति योग-भोगक दार्शनिक संघर्षपर शान्त-रस-केन्द्रित नाटक लिखलनि। ई दू टा परम्परा - हास्य-व्यङ्ग्य आ भक्ति-दर्शन - आगाँ चलि कऽ मैथिली रङ्गमञ्चक दू टा मुख्य धारा बनल। २.३ गंगेश उपाध्यायक नव्य-न्याय विश्लेषण गोरक्षविजयक केन्द्रीय न्यायशास्त्रीय प्रसङ्ग अछि - मत्स्येन्द्रनाथक "पूर्व-योगी होइतो वर्तमान-भोगी" होयब। एकर नव्य-न्यायीय व्याख्या: गंगेशक तर्क अनुसार "पूर्व-निर्धारित स्वभाव" अनुमानक हेतु बाध्यकर नहि होइत, कारण उपाधि (शर्त) सम्भव छै। मत्स्येन्द्रनाथक उपाधि अछि - कदलीपुरक राजा-योनि-प्राप्ति, १८-रानीक मोह, इत्यादि। गोरक्ष-काननपादक नटुआ-वेष धरि सत्य प्रकट करब - ई "शब्द-प्रमाण"क रोचक प्रयोग थिक। नाटकीय-शब्द (नाटकमे बजायल जा रहल वाक्य) क्या "शब्द-प्रमाण"क कोटिमे आबि सकैत अछि? गंगेश एहि प्रश्नक उत्तरमे कहितथि - आप्त-पुरुषक (विश्वसनीय व्यक्ति) कथन शब्द-प्रमाण, मुदा अभिनेताक मुखसँ नाटकीय-कथन सेहो रसास्वादी-पक्षमे प्रमाणित होइत अछि। "बच्चाकेँ जिआएब" - ई असम्भव घटनाक न्यायशास्त्रीय व्याख्या: ई "लौकिक-अलौकिक" प्रत्यक्षक भेद थिक। नाट्यमे अलौकिक प्रत्यक्ष स्वीकार्य अछि कारण रसास्वादक सिद्धि लेल "विभावानुभाव-व्यभिचारि"क सञ्जोग आवश्यक छै। २.४ पाश्चात्य समीक्षा-दृष्टि ब्रेख्तक एलिनेशन-इफेक्ट बेर्तोल्त ब्रेख्तक "वेरफ्रेम्डुङ्गस-एफेक्ट" (Verfremdungseffekt, अलगाव-प्रभाव) अनुसार दर्शककेँ नाटकीय-भ्रमसँ जागरूक कऽ चेतन-बोध दऽ देबाक टेकनीक। गोरक्षविजयमे गोरक्ष-काननपाद नटुआक वेष धरि राजाक सोझाँ नृत्य करै छथि - ई "नाटक-में-नाटक"क प्रयोग थिक। दर्शक देखैत अछि जे ई दू टा सन्न्यासी अभिनय कऽ रहल छथि, आ संगहि वास्तविक तपस्वी थिकाह। ई द्वि-स्तरीय दृष्टि ब्रेख्तीय अलगाव-प्रभावक मूल थिक। नार्थोप फ्राय-क मिथक-आर्चटाइप नार्थोप फ्राय (Northrop Frye) अपन "एनाटॉमी ऑफ क्रिटिसिज्म"मे चारि टा मिथिकीय आर्चटाइप वर्णित करै छथि - कमेडी (वसन्त), रोमान्स (ग्रीष्म), ट्रेजेडी (शरद), आइरनी (शीत)। गोरक्षविजय "रोमान्स-आर्चटाइप" थिक - नायक (गोरक्ष) यात्रापर निकलैत छथि, संकट (राजाक मोह) सोझाँ अबैत अछि, अद्भुत-शक्तिक प्रयोग (पुत्र-पुनर्जीवन), अन्तिम-वापसी (गुरुक योगमे वापसी)। ज्यान फ्रांकोइस लियोतर्द लियोतर्दक "पोस्ट-मॉडर्न कण्डिशन"मे "महान् आख्यान" (grand narratives) क समाप्ति वर्णित अछि। मुदा मध्यकालीन मिथिलामे विद्यापति विपरीत काम केलनि - एकटा महान् सम्प्रदाय-आख्यान (नाथ-गोरक्षपन्थ) कऽ रङ्गमञ्चपर पुनर्स्थापित करबाक चेष्टा। ई पारम्परिक धर्म-संरक्षणक नहि, अपितु "प्रवेश-नकार"क रङ्गमञ्चीय रूप थिक - ब्राह्मणवादी कर्मकाण्डक विरुद्ध नाथ-योगक स्थापना। २.५ चीनी काव्यशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य वेन्शिन डियाओलोङ्ग्क अध्याय ५ "बिआन्-साओ" (साओ-काव्यक विश्लेषण) मे लिऊ शिए चु यूआन (屈原) क "लि-साओ" क परम्परा वर्णित करै छथि - जहाँ कविक आत्मचरित आ राजनैतिक-धार्मिक संकट एक्के संग चित्रित। गोरक्षविजयमे विद्यापति स्वयं नाथ-योगी नहि छथि - ओ शाक्त ब्राह्मण थिकाह - मुदा रङ्गमञ्चपर ओहि सम्प्रदायक संकटकेँ अपन कविक-आत्मासँ चित्रित करै छथि। ई चु यूआन-शैलीक नाट्य-रूपान्तरण थिक। ताओवादी दृष्टि ( झुआङ्ग्ज़ि): मत्स्येन्द्रनाथक "भोग-त्याग-वापसी-योग" चक्र वस्तुतः झुआङ्ग्ज़िक "वू-वेइ" (無為, अकर्म) आ "त्ज़ि-रान" (सहज-स्वभाव) सिद्धान्तसँ मेल खाइत अछि। गोरक्ष आबि गुरुकेँ सहज-स्वभावमे वापसकेँ बेकल करै छथि। २.६ यहूदी हर्मेन्यूटिक्स मिद्राशक "बल-तशुवाह" (पश्चातापीयक वापसी) सिद्धान्त - मत्स्येन्द्रनाथक कथा बल-तशुवाहक मैथिल नाट्य-रूप थिक। तल्मूद (बेराखोत् ३४ब) मे रब्बी अव्बाहु कहै छथि - "जहाँ बल-तशुवाह खड़ा छथि, ओतय पूर्ण-धर्मी सेहो खड़ा नहि भऽ सकै छथि।" अर्थात् पतित-होइत वापस-आयल व्यक्तिक नैतिक-स्थान आजीवन-धार्मीसँ ऊँच मानल जाइत अछि। मत्स्येन्द्रनाथक वापसी एहि सिद्धान्तक प्रदर्शन थिक। क़ब्बालामे "शेखिनाह" (शक्तिमयी दिव्यता) क निर्वासन आ वापसीक मिथक - गोरक्षविजयमे मत्स्येन्द्रनाथक "शक्ति" (योगसँ निर्वासित) क "शेखिनाह"-सदृश वापसीक रूप अछि। ई अन्तर्सांस्कृतिक तुलना चमत्कारिक रूपसँ मध्यकालीन मैथिल नाथ-दर्शन आ क़ब्बालामे रहस्यमय समानान्तरता उघारैत अछि। २.७ निष्कर्ष विद्यापतिक गोरक्षविजय मैथिली रङ्गमञ्चक भक्ति-योग-केन्द्रित दोसर पुनर्जागरण थिक। एकर समानान्तर-इतिहास ढाँचामे महत्व ई जे ई पारम्परिक कृष्ण-केन्द्रित नाटक-शैलीसँ अलग एकटा सम्प्रदायेतर दार्शनिक नाटक थिक, जे आइ धरि मैथिल लोक-नाट्य परम्परामे जीवित अछि (महाशिवरात्रिकेँ गौरीशंकर स्थान, जमथुरि मे मंचन)। ३. जीवन झा (१८४८–१९१२ • आधुनिक मैथिली नाट्यक उद्घोषक) परिचय आ रचना जीवन झा मिथिलाक १९म शताब्दीक एहन कविक-नाटककार छथि जिनकामे संस्कृत पाण्डित्य, मैथिली लोक-संस्कृति आ नव-जागरणक पाश्चात्य प्रभाव - तीनू एक्के सङ्ग प्रवाहित अछि। ओ मैथिली नाट्य-परम्पराक मध्यकालीन रूप (विद्यापति-गोविन्द दास) सँ आधुनिक रूप (आजुक नाट्य-संस्था) धरि एकटा सेतु थिकाह। हुनकर मुख्य नाटक: सुन्दर-संयोग, सामवती-पुनर्जन्म, मिथिला-नाटक। ई सभ नाटक मैथिली रङ्गमञ्चपर बेर-बेर मञ्चित भेल - विशेष कऽ राजनगर दरभङ्गाक रजवाड़ा-काल मे आ बीसम शताब्दीक प्रारम्भिक नाट्य-समिति-काल मे। ३.१ विदेह समानान्तर इतिहास ढाँचा मैथिली पाठ्यपुस्तकमे जीवन झा "पञ्जीकार", "संस्कृत-प्रकाण्ड पण्डित"क रूपमे मात्र चर्चित होइत छथि। मुदा हुनकर नाट्य-योगदान सदेह ८ केर पुनर्निर्माण-कार्यमे केन्द्रीय अछि। ओ मैथिल जागरणक पहिल नाटककार थिकाह जे संस्कृत क्लासिकल नाट्य-परम्परा (कालिदास, भवभूति) क मैथिल-स्थानीयकरण केलनि। विदेह पारम्परिक इतिहास हुनका "अ-आधुनिक" मानि छोड़ि देबय चाहैत अछि - मुदा वास्तविकता ई जे जीवन झा बिना उपनिवेशवादी आधुनिकताक प्रभावमे आओल, अपन-आ-अपन मिथिलाक भीतरसँ नाट्य-आधुनिकता रचनामे विकसित केलनि। ई एकटा "देशज आधुनिकता" (vernacular modernity) थिक। ३.२ भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति समीक्षा शृङ्गार रसक अभिजात व्यवहार "सुन्दर-संयोग"मे जीवन झा शृङ्गार रसक संयोग-वियोग दुनू पक्षकेँ शास्त्रीय ढङ्ग सँ निरूपित करै छथि। मुदा एहिमे आधुनिक तत्व ई जे विप्रलम्भ-शृङ्गारक भौतिक-कारण (मैथिल समाजक जातीय-आर्थिक बन्धन) सेहो उघारल अछि। रीति-वैचित्र्य (वामन) आचार्य वामनक "काव्यालंकार-सूत्र-वृत्ति" अनुसार रीति (शैली) त्रिविध - वैदर्भी, गौडी, पाञ्चाली। जीवन झाक नाटकीय शैली प्रायः "वैदर्भी-पाञ्चाली"क मिश्रण थिक - माधुर्य-गुणयुक्त, मुदा संस्कृत समासयुक्त गाम्भीर्य सेहो। ३.३ गंगेश उपाध्यायक नव्य-न्याय विश्लेषण "सामवती-पुनर्जन्म"मे "पुनर्जन्म"क न्यायशास्त्रीय व्याख्या रोचक। गंगेशक चिन्तामणि अनुसार पुनर्जन्म प्रत्यक्ष-योग्य नै, अपितु शब्द (शास्त्र-वचन) आ अनुमान (कर्म-फल-व्याप्ति) सँ साध्य। नाटकीय रङ्गमञ्चपर पुनर्जन्म दर्शक-स्वीकार्य कोना? कारण नाट्यक भ्रम-प्रत्यक्ष पारलौकिक प्रसङ्गक प्रत्यक्षीकरणमे सिद्ध होइत अछि। ई दर्शक-संविदा (विलिङ्ग सस्पेन्शन ऑफ डिस्बिलीफ - कोलरिजक शब्द) क नव्य-न्यायीय व्याख्या थिक। ३.४ पाश्चात्य समीक्षा-दृष्टि रोमान्टिसिज्म जीवन झाक नाटकमे यूरोपीय रोमान्टिसिज्मक ओहन छाया भेटैत अछि - प्रकृति-केन्द्रित कल्पना, व्यक्तिगत-अनुभूतिक उच्चता, ऐतिहासिक-पौराणिक कथाक नवीन-व्याख्या। मुदा एहिमे विशेषता ई जे ई रोमान्टिसिज्म पाश्चात्य-नकल नै, अपितु मिथिलाक अपन भक्ति-काव्य परम्पराक नाटकीय-रूपान्तरण थिक। रेमण्ड विलियम्सक "स्ट्रक्चर्स ऑफ फीलिङ" विलियम्स बतबै छथि जे प्रत्येक युगमे एकटा "भावना-संरचना" प्रवर्तित होइत अछि जे साहित्यिक रूप लैत अछि। जीवन झाक काल (१९म शताब्दी मध्य-उत्तरार्ध) मे मिथिलाक भावना-संरचना अछि - "विद्यापति-युगक स्मरण मे आधुनिकताक हलचल।" हुनकर नाटक एहि भावना-संरचनाक रङ्गमञ्चीय-दस्तावेज थिक। ३.५ चीनी काव्यशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य लिऊ शिए-क वेन्शिन डियाओलोङ्ग अध्याय २९ "तोङ्ग-बिआन" (परम्परा-आ-परिवर्तन) मे कहै छथि - साहित्यकेँ परम्परा-आधार राखि कऽ परिवर्तित होयब अनिवार्य; नवीनता बिना परम्पराक खाली पतझड़ थिक, परम्परा बिना नवीनताक मरल अस्थि। जीवन झा एहि "तोङ्ग-बिआन"क सटीक उदाहरण - संस्कृत नाट्य-परम्परा (तोङ्ग) कऽ मैथिल-आधुनिकतामे (बिआन) रूपान्तरित केलनि। शिपिनक चोङ्ग रोङ्ग मानि सकितथि जे जीवन झा "चोङ्ग-ग्रेड"क कवि छथि - आत्मा-स्वाद अछि, मुदा फेङ्ग-लि (हवा-शक्ति) क परिमाण विद्यापतिसँ कम। ३.६ यहूदी हर्मेन्यूटिक्स मिद्राशक "मेसोराह" (मसोरा, परम्परा-संप्रेषण) सिद्धान्त अनुसार पाठ केर शाब्दिक-रूप पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरण सुरक्षित राखब अनिवार्य। मुदा संगहि "दरश" (दर्शा, व्याख्यान) माध्यमसँ नव-व्याख्या सम्भव छै। जीवन झा संस्कृत नाट्य-मेसोराहक मैथिल-दरशा थिकाह। ३.७ निष्कर्ष जीवन झा मध्यकालसँ आधुनिक-कालक सेतु छथि। हुनकर सुन्दर-संयोग आ सामवती-पुनर्जन्म आधुनिक मैथिली नाटकक पूर्व-संस्करण थिक - विषयमे शास्त्रीय, मुदा निर्वाह-विधिमे आधुनिक। ४. ईशनाथ झा (२०म शताब्दी • भक्ति-सामाजिक नाटकक संगम) परिचय आ रचना ईशनाथ झा बीसम शताब्दीक मैथिली नाटकक एहन रचनाकार छथि जे भक्ति-काव्य परम्पराकेँ आधुनिक सामाजिक नाटकक रूपमे ढालैत छथि। हुनकर दू टा मुख्य नाटक: (क) उगना - विद्यापति-शिव सम्बन्धपर आधारित। महाशिवरात्रिक अवसरपर गौरीशंकर स्थान, जमथुरिमे ई वार्षिक मञ्चित होइत अछि। शिव विद्यापतिक भक्तिसँ प्रसन्न भऽ "उगना" नौकर बनि हुनकर घरमे आबि गेलाह। जल-पियासमे जटासँ गङ्गधार निकालल; पत्नी द्वारा प्रहार; अन्तर्ध्यान। (ख) चीनीक लड्डू - सम्पूर्ण आधुनिक सामाजिक मेलोड्रामा। सुधाकान्त-प्रेमकान्त भाइ; मुंशी बटुआ दासक षड्यन्त्र; भ्रातृ-विभेद; पत्नीक जल्द-समर्थन; बच्चाकेँ बिख-मिश्रित लड्डू देबय परिकल्पना - मुदा भेद खुलब आ बटुआ दासक मृत्यु। ईशनाथक उगना सरस्वती पूजा २००६ (०३ फरवरी, सोम दिन) केर अवसरपर बेचन ठाकुरक निर्देशनमे न्यू लोटस इङ्ग्लिश स्कूल, चनौरागंजमे मंचित भेल। ई दर्ज सदेह ८ केर सरस्वती पूजा शृङ्खलाक छठम नाटक थिक। ४.१ विदेह समानान्तर इतिहास ढाँचा उगना नाटक मैथिल लोक-नाट्य परम्पराक एहन विरल नमूना थिक जे आइयो जीवित अछि। ई आधिकारिक साहित्य-अकादेमी-पुरस्कार-संसारक बाहर लोक-गोष्ठीक माध्यमसँ टिकल अछि। विदेह आर्काइव एहि लोक-जीवन्तताकेँ दस्तावेज-रूपमे राखि ओहि बहिष्कृत परम्पराकेँ केन्द्रीय बना देबय चाहैत अछि। ४.२ भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति समीक्षा भक्ति-रस आ वात्सल्य-रस उगनामे प्रधान रस - भक्ति-रस (शिव विद्यापतिक भक्तिसँ आकृष्ट), संगहि वात्सल्य-रस (शिव सेवक-रूपमे विद्यापतिक देखभाल)। एहिमे एकटा अनूठा रस-व्युत्क्रम अछि - सामान्यतः भक्त ईश्वरक सेवा करै छथि, मुदा एहिमे ईश्वर भक्तक सेवा करै छथि। ई रस-व्युत्क्रम मैथिल भक्तिक विशिष्टता थिक। चीनीक लड्डूमे रसौचित्य भयानक-रस (बिख देबाक षड्यन्त्र) क समापन कारुणिक रूपान्तरणमे होइत अछि (अन्ततः खलनायक खुदहि मरै छथि - पाप कऽ फल पाप-कर्ता पबै छथि)। ई दैवीय-न्यायक नैतिक-रसौचित्य थिक। ४.३ गंगेश उपाध्यायक नव्य-न्याय विश्लेषण उगना-कथामे केन्द्रीय ज्ञान-मीमांसा अछि - "उगना के थिकाह?" विद्यापति जखन जलमे गङ्गा-स्वाद पाबि उगनाक केश भीजल देखलनि, तखन हुनका अनुमान भेलनि। एहि अनुमानक तीन हेतु - पक्ष (उगना), साध्य (शिव), हेतु (केश भीजि गेल जलमे, जल गङ्गा-स्वादीय)। व्याप्ति - "जेठाक केशसँ गङ्गा-जल कोनो साधारण व्यक्तिमे अनुपलभ्य, मात्र शिवमे उपलब्ध।" मुदा संगहि नियम अछि - गुप्त ज्ञानक प्रकटीकरणसँ शक्ति-नष्ट होइ छै (अन्तर्ध्यान)। ई गंगेशीय "प्रतिबन्धक-शर्त" थिक - सत्य-प्रकटीकरण कतयौ-कतयौ अनिष्ट-कारक होइत अछि। ४.४ पाश्चात्य समीक्षा-दृष्टि मिर्चा एलियादे-क "पवित्र-अपवित्र" मिर्चा एलियादे (Mircea Eliade) "द सेक्रेड एण्ड द प्रोफेन"मे कहै छथि जे प्रत्येक संस्कृति पवित्र-स्थलक "हाइरोफेनी" (पवित्रताक प्रकटीकरण) करै छै। उगना-कथा एहन हाइरोफेनी थिक - विद्यापतिक घरक नौकर शिव छथि। पवित्र दैनिक-जीवनक भीतर छुपल अछि। लूकाच-क रियलिज्म ज्योर्ज लूकाचक रियलिस्टिक नाट्य-सिद्धान्त अनुसार पात्र समाज-वर्गक प्रतिनिधि-रूप होइत अछि। चीनीक लड्डूक मुंशी बटुआ दास - मध्यकालीन सामन्ती-तन्त्रमे प्रबन्धक वर्गक चालू-भ्रष्टता; प्रेमकान्त - गुलाम-वर्गक नैतिक-दुर्बलता; सुधाकान्त - पारिवारिक-नैतिकताक टूटन-त्रासदी। ई वर्ग-यथार्थवादक मैथिल-नाट्य रूप थिक। ४.५ चीनी काव्यशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य ताओ-चान सिद्धान्त - दैनिक जीवनमे ताओक उपस्थिति। उगना-कथामे शिव दैनिक जीवनक नौकर बनि उपस्थित - ई ताओवादी "त्ज़ि-रान" (स्वतः-स्फूर्त) क मैथिली-संस्करण थिक। चीनी "ज़ा-जू" ( यूआन-कालीन सङ्कीर्ण नाट्य-शैली) मे दैवीय-व्यक्ति पृथिवी-पर अवतरण-कथा प्रिय छल। उगना ओहि परम्पराक मैथिल-समानान्तर थिक। ४.६ यहूदी हर्मेन्यूटिक्स एलियाहु ह-नवी (एलियाह नबी) क कथा-परम्परा - एलियाह अति-निम्न रूप धरि सज्जनक परीक्षा करै छथि, गरीब अतिथिक रूपमे आबि जिनगी बदलि दैत छथि। उगना-कथा हसीदिक यहूदी परम्पराक एहि "छुपल नबी"क मैथिल-संस्करण थिक। तल्मूद (तानित २१अ) - "छुपल सन्त" (नेस्तर) क कथा - ओ साधारण रूपमे रहैत, दूसरी निरीहक पीड़ासँ अधिक पीड़ित होइत। उगनामे शिव विद्यापतिक पीड़ा (पत्नीक प्रहार) सहैत अनुपलब्ध भऽ जाइ छथि - ई अन्तरसंस्कृत्या रोचक समानान्तर थिक। ४.७ निष्कर्ष ईशनाथ झा मैथिल भक्ति-नाट्य आ आधुनिक-सामाजिक नाट्यक बीच मध्यस्थ छथि। उगना सम्प्रदायेतर लोक-दैवीय कथा थिक, चीनीक लड्डू नैतिक-यथार्थवादी मेलोड्रामा। दुनू नाटक मैथिल लोक-मञ्चक जीवन्तताक प्रमाण थिक। ५. उदय नारायण सिंह "नचिकेता" (आधुनिक-उत्तर-आधुनिक नाट्य-संवादक मैथिल मोड़) परिचय आ रचना उदय नारायण सिंह "नचिकेता" मैथिली रङ्गमञ्चक एहन रचनाकार छथि जे यथार्थवाद, अभिव्यक्तिवाद आ उत्तर-आधुनिकताक तीनू स्तरपर एक्के सङ्ग कार्य केलनि। हुनकर मुख्य नाटक: (क) नायकक नाम जीवन - यथार्थवादी सामाजिक-यौनिक हिंसाक नाटक। नवल नव-विचारक छथि, शक्तिराय धनी-कलुषित। शक्तिराय अपन सहयोगी विनयपर चोरिक झूठ-आरोप लगा हुनकर बेटीक अपहरण-बलात्कार करै छथि। विनय आत्महत्या करै छथि, बादमे प्रेमिका सेहो। नवल विक्षिप्त भऽ जाइ छथि। (ख) एक छल राजा - एलिगोरिकल नाटक। राजा अभिमान कुमार देव मदिरा-वैश्या-प्रवृत्तिमे डूबल। एकटा बेटी मोहिनी, धनाभावमे अविवाहित। शिक्षक शुभङ्करक संग प्रेम। (ग) नो एण्ट्री : मा प्रविश - पोस्टमॉडर्न ड्रामा। स्वर्ग-नर्क-द्वारपर मुइल लोक सभ अबै छथि, खिस्सा सुनबै छथि, पता चलैत अछि जे चित्रगुप्त-धर्मराज सभ नकली छथि, द्वारपर ताला। ई एब्सर्डिटी सिधे ज्योतिरीश्वरक धूर्त्तसमागम-वाला पोस्ट-मॉडर्न परम्परामे फेर पहुँचा देत अछि। ५.१ विदेह समानान्तर इतिहास ढाँचा नचिकेताक नाटक मैथिली रङ्गमञ्चपर तीन-स्तरीय आधुनिकता अनलक: यथार्थवादी (नायकक नाम जीवन), एलिगोरिकल (एक छल राजा), उत्तर-आधुनिक (नो एण्ट्री)। विदेह आर्काइव हुनका मैथिली नाट्यक प्रथम बहु-शैलीक रचनाकार-रूपमे चिन्हित करै छथि। "एक छल राजा"क मञ्चन रिपोर्ट (जितेन्द्र कुमार झा "जीतू") सदेह ८ केर प्रस्तुति-संग्रहमे शामिल अछि। यदि साहित्य अकादेमी-केन्द्रित आधिकारिक इतिहास नचिकेताक प्रयोगात्मक नाटकक उपेक्षा केलक, तँ विदेह ओहि उपेक्षाक प्रतिकार-रूपमे एहि नाटककेँ केन्द्रीय बनबैत अछि। ५.२ भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति समीक्षा बीभत्स-करुण रस-संयोजन नायकक नाम जीवनमे बीभत्स-रस (बलात्कार-दृश्य) करुण-रस (आत्महत्या) मे रूपान्तरित होइत अछि। नचिकेता एहि रस-संयोजनकेँ राजनैतिक रूप दैत छथि - व्यक्तिगत-त्रासदीक पाछाँ सत्ता-सम्पन्न पुरुषक हिंसक-व्यवस्था अछि। नो एण्ट्री : मा प्रविशक हास्यास्पद-शान्त मुइल लोक-नकली-चित्रगुप्त-बन्द-द्वार - ई स्थिति एक्के सङ्ग हास्यास्पद आ शान्त-निरूपणीय अछि। नचिकेताक नाटकीय-ध्वनि एहन अछि - "मृत्यु-बाद कोनो न्याय-व्यवस्था नै, परलोकक हाइरार्की कोनो वास्तविक नै।" ई सङ्केत आधुनिक धर्म-व्यवस्थापर आघात थिक। ५.३ गंगेश उपाध्यायक नव्य-न्याय विश्लेषण "नो एण्ट्री"मे प्रमाण-शास्त्रीय व्यङ्ग्य रोचक - परलोकक प्रत्यक्ष नै, अनुमान शास्त्र (शब्द) पर आश्रित। मुदा शब्द-प्रमाणक आप्तता (विश्वसनीयता) पर प्रश्न उठैत अछि जखन देखाइ जाइत अछि जे ओहि व्यवस्थाक संचालक (चित्रगुप्त) नकली छथि। नवीन-नैय्यायिकीय शब्दमे - "आप्त-वचनाधीनत्व-दोष" - आप्त-व्यक्तिक स्वयं अप्रामाणिक होयब। नायकक नाम जीवनमे नवलक "विक्षिप्तता" - ई प्रत्यक्ष-भ्रमक चरम अवस्था थिक, मुदा अहंकार-पार्श्व पर एहि भ्रमक नैतिक-न्याय अछि - "समाज जे नवलकेँ देखि नै सकल जे सत्य अछि, ओ हुनका विक्षिप्त बना देलक।" ५.४ पाश्चात्य समीक्षा-दृष्टि एब्सर्डिज्म (कामू, बेकेट, इओनेस्को) "नो एण्ट्री" एब्सर्ड थियेटरक मैथिली अद्भुत प्रयोग थिक - सैमुअल बेकेटक "वेटिङ्ग फ़ॉर गोदो" मे जेना दू टा पात्र गोदोक प्रतीक्षामे अनन्त-अप्रासङ्गिक संवाद करै छथि, तेना एहिमे मुइल लोक स्वर्ग-द्वारक प्रतीक्षामे। मुदा गोदो कहियो नै अबै छथि - एहिमे ज्ञात भऽ जाइत अछि जे ओतय कोनो न्यायाधीश छहियो नहि। जेरार्द दे नर्वल / एण्ड्र्यू ब्रिटन-क मेलोड्रामा नायकक नाम जीवन मेलोड्रामाक राजनैतिक-यथार्थवादी रूप थिक। एण्ड्र्यू ब्रिटन कहै छथि - मेलोड्रामामे नैतिक-स्पष्टता (खलनायक-नायक स्पष्ट) मुख्य उपकरण थिक। नचिकेता एहि उपकरणकेँ वर्ग-राजनीतिमे रूपान्तरित करैत - खलनायक धनिक छथि, नायक नैतिक-चेतनासम्पन्न। स्पिवाक - सबाल्टर्न क्या बोल सकैत अछि गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाकक प्रसिद्ध प्रश्न - "क्या सबाल्टर्न बोल सकैत अछि?" नायकक नाम जीवनमे विनयक बेटी, जे बलात्कारसँ पीड़ित, स्वयं नै बोलि सकैत - ओकर आत्महत्या स्पिवाक-लिखित "मूक-होइत-बोलब"क नाट्य-रूप थिक। ५.५ चीनी काव्यशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य लु शुन क "आ-क्यु झेङ्ग्जुआन" (阿Q正傳) मे जेना सामान्य-व्यक्ति समाजक हिंसाक प्रति-निधि बनैत - तेना नचिकेताक नवल "आ-क्यु"क मैथिली समानान्तर थिक। चीनी आधुनिकतावादी साहित्यिक रङ्गमञ्चक यथार्थवादी प्रवृत्ति नचिकेतामे प्रतिबिम्बित। कुन-छ्यु नाट्य-शैलीक "मन्द-गति-तीव्र-भाव" - एक छल राजामे राजाक चरित्र-संरचना (बाहरसँ शान्त-राजसी, भीतरसँ कलुषित-व्याकुल) सेहो कुन-छ्यु-वत् द्वि-गति थिक। ५.६ यहूदी हर्मेन्यूटिक्स "नो एण्ट्री : मा प्रविश"क बन्द-स्वर्ग-द्वार सिधे काफ्काक "वोर्डेम् गेसेट्ज़" (विधि-द्वारक समक्ष) क प्रतिबिम्ब थिक - काफ्का अपनहि यहूदी हसीदिक परम्परामे पले-बढ़ल, ओकर रचनामे प्रवेश-अस्वीकृति केन्द्रीय रहल। नचिकेताक नो एण्ट्री काफ्का-यहूदी-नाट्य-रूपान्तरण थिक - मैथिल पारलौकिक प्रसङ्गक माध्यमसँ। तल्मूद (सान्हेद्रिन ४३अ-ब) मे न्यायालयक त्रुटिपूर्णतापर लम्बा विवाद - मानवीय न्यायाधीश त्रुटि-योग्य छथि। नचिकेताक चित्रगुप्त-धर्मराज-नकलीताक प्रतिपादन तल्मूदी न्याय-संशयक रङ्गमञ्चीय रूप थिक। ५.७ निष्कर्ष उदय नारायण सिंह नचिकेता मैथिली रङ्गमञ्चकेँ यथार्थवादसँ उत्तर-आधुनिकता धरि छहसी ले गेलनि। हुनकर तीनू नाटक - यथार्थवादी सामाजिक, एलिगोरिकल, एब्सर्डिस्ट - विदेह आर्काइवक प्रयोगात्मक-नाट्यक पताका थिक। ६. गोविन्द झा (१९२३–२०२० • मैथिल पुनर्जागरणक नाट्य-दूत) परिचय आ रचना गोविन्द झा बीसम शताब्दीक मैथिलीक सर्वाधिक प्रकाण्ड भाषावैज्ञानिक-नाटककार-व्याकरणाचार्य छथि। हुनकर मुख्य नाटक "बसात"क प्लॉट: कृष्णकान्त पिता द्वारा निर्धारित युवती पुष्पासँ विवाह करय नहि चाहैत छथि, ओ शिक्षित-साथीसँ विवाहक इच्छुक छथि, लिलीसँ प्रेम करै छथि। पिता घर त्यागि देत छथि। पुष्पा घर छोड़ि महिला-जागरणमे सक्रिय भऽ जाइ छथि। कृष्णकान्त रेलगाड़ीसँ कटयचाहैत, आश्रमक लोक बचा लैत; ओतयहिँ पिता, पुष्पा सभसँ भेँट; लिली बताहि भऽ ओतय आबि जाइ छथि। मैथिल पाठ्यपुस्तकमे गोविन्द झा अन्तिम-प्रणाम (मैथिल-आ-संस्कृत दुनूमे लिखित) क लेल जाएब चर्चित छथि - सदेह ८ बतबैत अछि जे ओहि नाटकक संस्कृत-रूप मुख्य अछि। ६.१ विदेह समानान्तर इतिहास ढाँचा गोविन्द झाक नाट्य-योगदान आधिकारिक मैथिल इतिहासमे प्रायः ओझिङ्ग्ल छन्हि - हुनका भाषा-वैज्ञानिक, व्याकरणकार-रूपमे चर्चित कएल जाइ छन्हि, मुदा नाटककार-रूपमे न्यायबद्ध मूल्याङ्कन नहि भेल। बेचन-मुन्नाजी संवादमे ई समस्या स्पष्ट उभरि कऽ अबैत अछि - महेन्द्र मलंगियाक संकलनमे गोविन्द झाक मजाक उड़ाओल गेल। विदेह आर्काइव गोविन्द झाकेँ हुनकर समस्त नाट्य-योगदानक संग पुनर्स्थापित करैत अछि। ६.२ भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति समीक्षा बसातमे प्रधान रस - शृङ्गारक विप्रलम्भ-पक्ष आ करुण-रस। नायक-नायिकाक त्रिकोणीय-असफल-प्रेम (कृष्णकान्त-पुष्पा-लिली) ध्वनि-स्तरपर मैथिल समाजक संक्रमणकालीन यौनिक-स्वतन्त्रताक संकटक प्रतिबिम्ब। पुष्पाक महिला-जागरणमे जायब आ लिलीक बतहोलब - दू टा महिला-पात्रक दू टा भिन्न-दिशामे यौनिक-स्वायत्तताक खोज। ६.३ गंगेश उपाध्यायक नव्य-न्याय विश्लेषण बसातमे केन्द्रीय न्यायशास्त्रीय प्रसङ्ग - "पिताक वचन माननीय कि अमाननीय?" गंगेशक चिन्तामणि अनुसार "वचन"क प्रामाणिकता पुरुषक आप्तता (दोषरहित-ज्ञान) पर आश्रित। पिता विवाह-तय-करबामे आप्त नहि छथि कारण समय-धर्म बदलल छै। कृष्णकान्त एहि व्याप्ति-भेदसँ निर्णय करै छथि। ६.४ पाश्चात्य समीक्षा-दृष्टि इब्सेनीय यथार्थवाद हेन्रिक इब्सेनक "डॉल्ज हाउस"मे जेना नोरा घर-त्यागि स्वायत्तताक खोजमे निकलैत - तेना बसातमे पुष्पा महिला-जागरणमे सक्रिय होइ छथि। गोविन्द झा इब्सेनीय आधुनिक-स्त्री-नाट्यक मैथिल-प्रतिनिधि छथि। रवीन्द्रनाथ ठाकुर - "घरे-बाइरे"क मैथिल समानान्तर रवीन्द्रक घरे-बाइरेमे बिमला घरक चहारदीवारीसँ बाहर निकलि राजनैतिक चेतनामे प्रवेश करै छथि। पुष्पा एहि बिमला-यात्राक मैथिल समानान्तर थिक। बङ्गाली नवजागरण मैथिली नवजागरणमे एहन रूपमे प्रवाहित भेल। ६.५ चीनी काव्यशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य लिऊ शिए-क "क़िङ्ग-त्साइ" ( भावना-शब्द) अध्याय अनुसार साहित्यमे आन्तरिक-भावना (क़िङ्ग) आ बाह्य-शब्द (त्साइ) क सन्तुलन। बसातमे गोविन्द झाक मैथिल-सरल भाषा (त्साइ) मे आन्तरिक-संक्रमण-कालीन-वेदना (क़िङ्ग) क सटीक प्रकाशन। ६.६ यहूदी हर्मेन्यूटिक्स तल्मूद (केतुबोत् ६२ब-६३अ) मे विवाह-व्यवस्थापर रब्बी अकीवा-रचेल कथा - पिताक अस्वीकृति, पत्नीक बल्द्धैर्य, अन्ततः पुनर्मिलन। बसातक त्रिकोणीय-सम्बन्धमे एहि तल्मूदी-कथाक प्रतिच्छाया। ६.७ निष्कर्ष गोविन्द झा मैथिल पुनर्जागरण-कालीन यथार्थवादी-सामाजिक नाटककार छथि, जिनकर बसात-अन्तिम प्रणाम जेहन कृति आधुनिक-स्त्री-समस्या-दर्शन-नाट्यक पताका थिक। ७. सुधांशु शेखर चौधरी (मैथिल मध्यवर्गीय-यथार्थवादक चित्रकार) परिचय आ रचना सुधांशु शेखर चौधरी मैथिली नाट्यमे मध्यवर्गीय-बेरोजगारी, दहेज, कविक-समाज-विद्रोह जेहन समकालीन समस्यापर केन्द्रित यथार्थवादी नाटककार छथि। हुनकर मुख्य नाटक: (क) भफाइत चाहक जिनगी - महेश बेरोजगार-कवि, चाह-दोकान खोलैत। इञ्जीनियर उमानाथक पत्नी चन्द्रमा देखलनि जे महेश पुकार भेलापर कविता-पाठ करैत, चाह छोड़ि चलि जाइत। चन्द्रमा खुदहि चाह बेचय लगै छथि, उमानाथ तमसा जाइ छथि। आगाँ महेशक संगी सरिता (आइ.ए.एस.क पत्नी) सेहो आबि जाइ छथि। (ख) लेटाइत आँचर - दीनानाथक एकमात्र पुत्री ममताकेँ "काटर"क कारणसँ पतिक घर सँ छोड़ल; मुदा पुत्र मोदनाथ अपन बियाहमे दहेज लेबा-प्रयासपर पिताकेँ रोकैत। ई पारिवारिक-नैतिक नाटक थिक। ७.१ विदेह समानान्तर इतिहास ढाँचा "भफाइत चाहक जिनगी" शिव कुमार झा द्वारा सदेह ८मे समीक्षित-कथा-संग्रहित अछि - विदेह आर्काइवक एकटा एहन रचना जे मैथिल मध्यवर्गक संक्रमण-कालीन वेदनाकेँ रङ्गमञ्च-योग्य रूपमे लऽ अनलक। बेचन-मुन्नाजी संवादमे सुधांशुक स्थानक चर्चा अछि - मलंगिया-संकलनमे हुनकर मजाक उड़ाओल गेल छल। विदेह सुधांशुकेँ हुनकर सम्पूर्ण नाट्य-योगदानक संग पुनर्स्थापित करैत अछि। ७.२ भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति समीक्षा करुण-शान्त रस-मिश्रण भफाइत चाहक जिनगीमे प्रधान रस करुण (बेरोजगारीक त्रासदी) मुदा एहिमे शान्त-रसक स्वाद सेहो अछि - कवि एहि स्थितिमे विद्रोही नै, संतोषी-कविता-गायक रहै छथि। एहि करुण-शान्त मिश्रणक ध्वनि अछि - "भोग-नै-होइतो जीवन सङ्गीत बनि सकैत अछि।" ७.३ गंगेश उपाध्यायक नव्य-न्याय विश्लेषण भफाइत चाहक जिनगीक केन्द्रीय न्यायशास्त्रीय प्रश्न - "कविता आ कमाइ - एक्के व्यक्तिमे सम्भव कि अनुगामी-व्याघात (कन्ट्राडिक्शन)?" गंगेशक तर्क अनुसार दू टा अनुगामी-स्वभाव (व्याघात-स्वभाव) एक्के व्यक्तिमे रहि सकैत अछि यदि उपाधि (शर्त) पृथक्। एतय शर्त अछि - कोनो ग्राहक पुकार दऽ "कविता" मांगलैं, तँ महेश कविक रूपमे; मुदा अधिकतर समय चाहक रूपमे। ७.४ पाश्चात्य समीक्षा-दृष्टि बेन्यामिनक "कथाकार" वाल्टर बेन्यामिन "डेर एर्ज़ेलर"मे कहै छथि - आधुनिक-काल कथाकारक मृत्यु थिक, कारण कथा-कहबाक धैर्य आ अनुभवक प्रसार-व्यवस्था टूटि गेल। मुदा महेश एहि टूटनसँ बचबाक रास्ता निकालै छथि - चाह-दोकानक माध्यमसँ सङ्ग्रहलाप, कविता-पाठ। ई बेन्यामिनी कथाकारक मैथिली प्रतिरोध थिक। ग्राम्शीक "ऑर्गेनिक इण्टेलेक्चुअल" ग्राम्शी अनुसार ऑर्गेनिक बुद्धिजीवी अपन वर्गक भीतरसँ उठैत छथि, ओहि वर्गक भाषा-संवेदना धरि रहै छथि। महेश एहन ऑर्गेनिक मैथिल बुद्धिजीवी छथि - चाह-दोकानदार-कवि। ७.५ चीनी काव्यशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य ताओ युआन-मिङ्ग (३६५–४२७ ईo) क "गुइ-यूआन-तियान-जू" (歸園田居, बाग-खेतमे वापसी) काव्य-परम्परा - अधिकारीक पद-त्यागि सादा-जीवन। महेश एहि ताओ-युआन-मिङ्ग्-शैलीक मैथिल समानान्तर - मध्यवर्गीय-महत्वाकाङ्क्षाक त्यागि चाह-दोकान-कविक सहज-जीवन। ७.६ यहूदी हर्मेन्यूटिक्स तल्मूद-पिर्के अवोत् ४:१ - "के धनी? - जे अपन भागसँ सन्तुष्ट।" महेश एहि सिद्धान्तक मैथिली प्रतिनिधि छथि। बेन्यामिनी हसीदिक कथाकार-परम्पराक गहन-लय यहाँ ध्वनित। ७.७ निष्कर्ष सुधांशु शेखर चौधरी मैथिल मध्यवर्गक टूटित-यथार्थक रङ्गमञ्चीय-दस्तावेजकार छथि। हुनकर भफाइत चाहक जिनगी मैथिल बेरोजगार-कविक प्रामाणिक-आख्यान थिक। ८. गुणनाथ झा ("लोक मञ्च"क सम्पादक • आधुनिक मैथिली नाटकक प्रवर्तक) परिचय आ रचना गुणनाथ झा "लोक मञ्च" मैथिली नाट्य-पत्रिकाक सम्पादक-संचालक रहलाह आ मैथिलीमे आधुनिक नाटकक प्रणयन केलनि। हुनकर ९ टा प्रमुख नाटकक मञ्चन बेर-बेर भेल अछि: (क) कनियाँ-पुतरा - पहिल पूर्णाङ्क नाटक। काटर प्रथापर आधारित। बहुदृश्य घूर्णीय-मञ्चोपयुक्त। अभिनेता-अभिनेत्रीक मनोविकारयुक्त हेबाक सटीक चित्रण। (ख) मधुयामिनी - एकाङ्क। दू पात्र - संयुक्त-परिवारक पक्षधर पुरुष आ विरोधी स्त्री। सामञ्जस्यपूर्ण विजय। लोक मञ्च-प्रकाशित। (ग) पाथेय - एकाङ्क, मुदा पूर्णाङ्कक विशेषतायुक्त। नायक मिथिलाक अधोगतिसँ दुखी, गामकेँ कर्मस्थली बनबैत। बादमे पत्नी संग आबि जाइ छथि। (घ) लाल-बुझक्कर - एकाङ्क। निम्न-मध्यवर्गक प्रवास-समस्या। नायक माता-पिता-विहीन, कनियाँ-नैहर बैसा कऽ नग्र-प्रवास। (ङ) सातम चरित्र - एकाङ्क। मैथिली रङ्गमञ्चपर महिला-अभिनेत्रीक अभाव। सातम चरित्रक प्रतीक्षामे पूर्वाभ्यास खतम। लोक मञ्च-प्रकाशित। (च) शेष नञि - पूर्णाङ्क सामाजिक नाटक। अग्रज-अनुजक पैतृक सम्बन्ध। अनुजक चाकरीसँ अचिन्तनीय-कार्य; मरणासन्न पत्नीक प्राण-रक्षार्थ अग्रज द्वारा साहस। (छ) आजुक लोक - पूर्णाङ्क। निम्न-मध्यवर्गीय बेरोजगारी आ बियाहक दायित्व। (ज) जय मैथिली - पूर्णाङ्क। मिथिलाक भाषिक-सांस्कृतिक-समस्या। (झ) महाकवि विद्यापति - विद्यापतिक नव-विश्लेषण। संगहि ओ बांग्ला एकाङ्क-नाट्य-संग्रह (अजित कुमार घोष-सम्पादित) क मैथिली-अनुवाद केलनि - २४ बांग्ला नाटककारक २४ नाटक। ८.१ विदेह समानान्तर इतिहास ढाँचा गुणनाथ झाक नाम महेन्द्र मलंगियाक १९-नाट्य-संकलनमे जान-बूझि छोड़ल गेल छल - कारण ओ जातिवादी-रङ्गमञ्चक मानक-सूचीमे फिट नै बैसै छलाह। बेचन ठाकुर इमेज्ड संवादमे एहि बहिष्करणकेँ स्पष्ट करै छथि। विदेह आर्काइव गुणनाथ झाकेँ सर्वहारा-रङ्गमञ्चक केन्द्रीय आधुनिक पुरुष-रूपमे पुनर्स्थापित करैत अछि। ८.२ भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति समीक्षा बहु-रस सञ्चालन गुणनाथ झा अपन नौ-नाटकमे विविध रसक प्रयोग केलनि - कनियाँ-पुतरामे करुण; मधुयामिनी-पाथेयमे शृङ्गार-शान्त; लाल-बुझक्करमे करुण; सातम चरित्रमे हास्य-करुण; शेष नञिमे करुण-वीर; आजुक लोक-जय मैथिलीमे करुण-रौद्र। ई बहु-रस-सञ्चालन-क्षमता हुनका मैथिली रङ्गमञ्चक रस-शास्त्रीय-गुरु बनबैत अछि। एकाङ्क-शैलीक प्रतिष्ठा मधुयामिनी, पाथेय, लाल-बुझक्कर, सातम चरित्र - सभ एकाङ्क छथि। एकाङ्कक कला अछि - सङ्क्षेपमे रसक पूर्ण-निष्पत्ति। गुणनाथ झा संस्कृत-एकाङ्क-शास्त्र-परम्पराकेँ मैथिल-आधुनिकतामे रूपान्तरित केलनि। ८.३ गंगेश उपाध्यायक नव्य-न्याय विश्लेषण "सातम चरित्र"क व्यङ्ग्य न्यायशास्त्रीय रूपसँ रोचक - मैथिल रङ्गमञ्चमे महिला-अभिनेत्रीक अभाव (व्याप्तिक रिक्ति) कारण समस्त नाट्य-प्रयोग अधूरा। गंगेश एकरा कहितथि - "सहकारी-कारणक अभावमे कार्य-सिद्धि अनुपपन्न।" नाट्य-कार्य लेल सात-पात्रक सहकार्य अनिवार्य, छह उपस्थित-सात अनुपस्थित, कार्य खण्डित। "शेष नञि"क अग्रज-निर्णय - मरणासन्न-पत्नीक प्राण-रक्षार्थ साहस - ई "उपाधि-संशोधन-निर्णय" थिक। पूर्व-व्याप्ति: अनुज-कुकर्म अग्रजकेँ निष्क्रिय बनाओनिहार, उपाधि: पत्नीक प्राण-संकट। उपाधि सक्रिय भेला पर पूर्व-व्याप्ति निष्क्रिय। ८.४ पाश्चात्य समीक्षा-दृष्टि स्तानिस्लाव्स्कीय "मेथड-एक्टिङ" कनियाँ-पुतराक मनोविकार-केन्द्रिक नाट्य-संरचना स्तानिस्लाव्स्कीय-मेथडकेँ मैथिल-रङ्गमञ्चमे अनबाक तैयारी थिक। पात्रक मानसिक-अवस्थाक सटीक-निरूपणक माध्यमसँ अभिनेताकेँ पात्रक भीतर डूबि-जायबाक अवसर देत। स्त्रीवादी समीक्षा (शोवाल्टर/मिलेट्) एलेन शोवाल्टरक "गाइनोक्रिटिक्स" आ केट मिलेटक "सेक्शुअल पॉलिटिक्स" दृष्टिएँ गुणनाथ झाक मधुयामिनी (पुरुष-संयुक्त-परिवार-पक्ष आ स्त्री-विरोधी) मे पारम्परिक-समाधान देखाइत अछि - पुरुष-पक्षक "सामञ्जस्यपूर्ण विजय।" मुदा यदि एकटा नवीन-समीक्षा करी, तँ ई सेहो स्त्री-स्वरकेँ नाट्य-मञ्चपर ध्वनित-होयब-देबाक प्रथम-प्रयास थिक - जे आगाँ चलि कऽ बेचन ठाकुरक छीनरदेवीमे विद्रोही-स्त्री-स्वरमे विकसित। ८.५ चीनी काव्यशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य चीनी "क्षुआन्-जू" कथा-नाट्य-शैली अनुसार सामान्य-मध्यवर्गक त्रासदीयक मनोवैज्ञानिक-सूक्ष्मता मुख्य। गुणनाथ झाक नाटक एहि क्षुआन्-जू-शैलीक मैथिल समानान्तर थिक। लिऊ शिए-क "बिआन्-सोङ्ग" (स्तुति-गान-विश्लेषण) अध्यायक हिसाबे "महाकवि विद्यापति" नाटक एकटा रङ्गमञ्चीय-स्तुति-गान थिक - पूर्व-कविक मूल्याङ्कन-नाट्य। ८.६ यहूदी हर्मेन्यूटिक्स मिद्राशी "लीशोन हा-रा" (अप-वचनक निषेध) आ "लोशोन हा-कोदेश" (पवित्र-भाषा) क द्वैत - गुणनाथ झा बङ्गला-नाटकक मैथिली-अनुवादमे एहि मसोरा-तत्वकेँ ध्यानमे रखलनि। ई "दरश"क उत्तम उदाहरण थिक। ८.७ निष्कर्ष गुणनाथ झा मैथिली रङ्गमञ्चक आधुनिक-एकाङ्क-शैलीक पिता छथि - विशिष्टतापूर्वक "लोक मञ्च" नामक नाट्य-पत्रिका-सम्पादन-कार्यक माध्यमसँ ओ मैथिल नाट्य-संस्थापक-निर्माता भेलाह। ९. जगदीश प्रसाद मण्डल (किसान-नाट्यकार • टैगोर-साहित्य-सम्मान २०११) परिचय आ रचना जगदीश प्रसाद मण्डल मैथिलीक एकटा एहन रचनाकार छथि जिनकर रचना-संसार किसान-केन्द्रित, सर्वहारा-केन्द्रित अछि। हुनका मैथिली लघुकथा-संग्रह "गामक जिनगी" लेल टैगोर साहित्य पुरस्कार २०११ भेटल। ई पुरस्कार-प्राप्ति विदेह आन्दोलनक मुख्य उपलब्धि थिक। हुनकर मुख्य नाटक: (क) मिथिलाक बेटी - पाँच-अङ्कीय महाकाव्यात्मक सामाजिक नाटक। अङ्क-१: महगीक विरोध, खेतीक ह्रास, दहेज-समस्या, अपहरण; अङ्क-२: सामन्ती व्यसन (भांग), श्रम-चोरी, लिङ्गिक-शोषण; अङ्क-३: बहुराष्ट्रीय-कम्पनीक प्रभाव, समाज-खण्डन; अङ्क-४: रामविलास मिस्त्रीक मानवीय-दृष्टि, दहेजकेँ धक्का; अङ्क-५: आदर्श बिआह, नव-चेतना। (ख) कम्प्रोमाइज - सामन्ती-कृषि-पूँजीवादी-संक्रमण, समन्वयवादी विचार। (ग) झमेलिया बिआह - बाह्य-प्रभावसँ मिथिल-बिआह-संस्कारमे झमेला-उत्पत्ति। (घ) वीरांगना - सस्ता-श्रम-शोषण-केन्द्रित। (ङ) तामक तमघैल - ढहैत सामन्ती-परिवारक चित्रण। (च) सतमाए - सम्बन्धक मूल्य-निरूपण। (छ) कल्याणी - स्त्री-जागरण। (ज) समझौता - कृषि-संकटक समाधान। ९.१ विदेह समानान्तर इतिहास ढाँचा जगदीश प्रसाद मण्डलक नाट्य-योगदान विदेह आन्दोलनक केन्द्रीय अंश थिक। पारम्परिक मैथिल साहित्य-तन्त्र हुनका अनदेखा करय चाहैत छल, मुदा टैगोर-पुरस्कारक प्राप्तिक बाद ओ मान्यता-सूचीमे प्रवेश पाओलनि। कमल मोहन चुन्नूक "घर-बाहर" वाला फतवा (मलंगिया-केन्द्रित जातिवादी रङ्गमञ्चक) एहि उपलब्धिकेँ कमजोर करय प्रयास केलक, मुदा सफल नै भेल। जगदीश प्रसाद मण्डल विदेह समानान्तर-धाराक प्रतिनिधि-नाटककार थिकाह। ९.२ भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति समीक्षा रौद्र-वीर-शान्त रसक त्रिकोणीय संयोजन मिथिलाक बेटीक पाँच-अङ्कीय संरचनामे रस-प्रवाह सूक्ष्म: अङ्क-१ रौद्र (विरोध-हड़ताल), अङ्क-२ वीभत्स (व्यसन-शोषण), अङ्क-३ रौद्र+करुण (बहुराष्ट्रीय-प्रभाव), अङ्क-४ शृङ्गार-वीर (रामविलास-मानवीयता), अङ्क-५ शान्त-वीर (आदर्श-बिआह-नव-चेतना)। ई पाँच-अङ्कीय रस-प्रवाह सम्पूर्ण मिथिल-समाजक यात्राक रङ्गमञ्चीय-नक्शा थिक। ९.३ गंगेश उपाध्यायक नव्य-न्याय विश्लेषण मिथिलाक बेटीक केन्द्रीय न्यायशास्त्रीय प्रसङ्ग - "बहुराष्ट्रीय-पूँजी आ देशी-कृषि-संस्कृति"क व्याप्ति। बहुराष्ट्रीय-पूँजीक कारण कोनो शुभ-गुण उत्पन्न होइ या नहि? जगदीश प्रसाद मण्डल बतबै छथि - एहि सम्बन्धमे "उपाधि-दूषित अनुमान।" यदि स्थानीय-समाजकेँ अनुकूल बनाओल, तँ पूँजी शुभ; अन्यथा अशुभ। अङ्क-४ मे रामविलास मिस्त्री "मानवीय-मूल्यदाता" बनै छथि - एहिसँ अनुमान-व्याप्ति बनैत अछि: "मानवीय-मूल्यदाता-व्यक्तित्व दहेज-व्यवस्थाक विरोधी।" ई व्याप्ति यथार्थवादी-रङ्गमञ्चक नैतिक-तर्क-शास्त्रक उत्तम उदाहरण। ९.४ पाश्चात्य समीक्षा-दृष्टि ब्रेख्तीय एपिक-थियेटर मिथिलाक बेटीक पाँच-अङ्कीय संरचना ब्रेख्तीय एपिक-थियेटरक अनुरूप अछि - प्रत्येक अङ्कमे विभिन्न सामाजिक-समस्याक प्रदर्शन, दर्शकमे चेतना-निर्माण, समाधानक रास्ता। ब्रेख्तीय "लेर्श्टुक" (शिक्षण-नाटक) क मैथिल समानान्तर। ग्राम्शीक "ऑर्गेनिक इण्टेलेक्चुअल" जगदीश प्रसाद मण्डल किसान-सर्वहारा वर्गक "ऑर्गेनिक बुद्धिजीवी" थिकाह। हुनकर भाषा, संवेदना, सरोकार सभ ओहि वर्ग-केन्द्रित। ग्राम्शी एहिकेँ "साम्यवादी-सांस्कृतिक संग्राम"क मॉडल कहितथि। फनन-क "राष्ट्रीय-संस्कृति-निर्माण" फ्रांत्ज़ फनन (Frantz Fanon) अपन "रेच्ड ऑफ द अर्थ"मे कहै छथि - उपनिवेशोत्तर-स्वतन्त्रताक बाद राष्ट्रीय-संस्कृति-निर्माण अनिवार्य। जगदीश प्रसाद मण्डल मैथिल-राष्ट्रीय-संस्कृति-निर्माणमे लागल छथि - दहेज, सामन्तवाद, बहुराष्ट्रीय-पूँजी, सभ बाहरी-शक्ति। ९.५ चीनी काव्यशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य लु शुनक "मनुष्य-भक्षक समाज" विचार ("डायरी ऑफ अ मैडमैन") जेहन मिथिलाक बेटीमे एहन सामाजिक-आत्म-निरूपण। चीनी आधुनिकतावादी-यथार्थवाद आ जगदीश-मण्डलीय-यथार्थवादक प्रत्यक्ष-समानान्तर। माओ ज़े-तुङ्गक "येन-आन-व्याख्यान" (१९४२) मे साहित्य-कलाक जन-केन्द्रिकताक सिद्धान्त। जगदीश-मण्डल एहि जन-केन्द्रिकताक मैथिल-स्वदेशी प्रतिनिधि छथि - विदेशी-वामपन्थी आरोपणक बिना। ९.६ यहूदी हर्मेन्यूटिक्स तल्मूद (शब्बत् ३१अ) मे हिल्लेल-शम्मई संवाद - "जे अपनाक लेल अप्रिय, से दोसराक संग नै करू, ईएह सम्पूर्ण तोराह।" मिथिलाक बेटी एहि सिद्धान्तक मैथिल-नाट्य-रूप थिक - दहेज जे अपन-बेटी लेल अप्रिय, से दोसरक बेटी लेल किए? भविष्यद्वक्ता आमोस-क सामाजिक-नैतिकता (आमोस ५:२४) - "न्याय जल जेना बहय, धार्मिकता निरन्तर-धारा जेना" - मिथिलाक बेटीक नायिकाक चेतना एहि भविष्यद्वक्तृक-वाणीक मैथिल-समानान्तर। ९.७ निष्कर्ष जगदीश प्रसाद मण्डल मैथिल किसान-सर्वहारा रङ्गमञ्चक मुख्य-स्तम्भ छथि - विदेह आन्दोलनक एकटा एहन उपलब्धि जे राष्ट्रीय-स्तरपर टैगोर-पुरस्कारक माध्यमसँ मान्यता प्राप्त भेल। १०. बेचन ठाकुर (समानान्तर-रङ्गमञ्चक केन्द्रीय कर्ता • चनौरागंजक नाट्य-दूत) परिचय आ रचना बेचन ठाकुर सदेह ८ केर - आ कहल जाय तँ विदेह समानान्तर रङ्गमञ्चक - मुख्य कर्म-नायक छथि। ओ चनौरागंज (जिला मधुबनी, बिहार) क न्यू लोटस इङ्ग्लिश स्कूलमे एकटा निजी शिक्षक-निर्देशक रहैत १४ वर्ष धरि सरस्वती पूजाक अवसरपर वार्षिक नाट्य-मञ्चन केलनि। ई वार्षिक-मञ्चन-शृङ्खला (१९९५-२००८+) सदेह ८ मे विस्तारसँ दर्ज अछि। हुनकर मुख्य नाटक: (क) बेटीक अपमान - भ्रूण-हत्या आ महिला-अधिकारपर आधारित। (ख) छीनरदेवी - अन्धविश्वासपर आधारित। (ग) अधिकार - इन्दिरा आवास योजनाक अनियमितताकेँ आर.टी.आइ. सँ देखार करैबला; रिक्शासँ झंझारपुरसँ दिल्ली-यात्रा-कथा (पात्र मञ्जुर)। (घ) विश्वासघात - नेशनल हाइवे जमीन-मुआवजाक पारिवारिक-बलि। सरस्वती पूजा वार्षिक-शृङ्खला: रमेश डीलर (१९९५), महावीरलाल (१९९६), किसुन बम (१९९७), लक्ष्मी मण्डल (१९९८), भाए-बहिन (१९९९), कौआसँ गेल्ह बुधियार (२०००), सिमरीयाक पंडा (२००१), होनहार चेला (२००२), तेतैर गाछमे आम कोना (२००३), सपूत (२००४), राखीक लाज (२००५), उगना (२००६ - ईशनाथ झा-कृत, बेचन ठाकुर-निर्देशित), श्रवण कुमार (२००७ - पण्डित विष्णु कुमार दीपक-कृत), सत्यवान सावित्री (२००८ - भोला प्रशान्त-कृत, बेचन ठाकुर-अनूदित), छीनरदेवी (२००८), बेटीक अपमान (२००९)। १०.१ विदेह समानान्तर इतिहास ढाँचा बेचन ठाकुर विदेह समानान्तर रङ्गमञ्च आन्दोलनक केन्द्रीय कर्ता थिकाह - पछिला २५ वर्षक उद्योगसँ। ओ मुन्नाजी-संवादमे स्पष्ट करै छथि - जातिवादी रङ्गमञ्च (विशेषकर महेन्द्र मलंगिया, रामदेव झा, चन्द्रनाथ मिश्र अमर, कमल मोहन चुन्नू-केन्द्रित गुट) कोना सरकारी आ गैर-सरकारी-फण्डक माध्यमसँ गैर-सवर्णकेँ बहिष्कृत केलक। मुदा बेचन ठाकुर अपन छोट-निजी-संसाधनसँ - एकटा कोचिङ्ग-संस्थानक माध्यमसँ - १४ वर्ष धरि सरस्वती-पूजा-शृङ्खला चलाओल आ मैथिली समानान्तर रङ्गमञ्चकेँ जीवन्त राखलनि। ई आन्दोलनक प्रमाण ई जे २०१२ केर पहिल विदेह मैथिली नाट्य उत्सवक बाद जातिवादी-रङ्गमञ्चक ९०% लोक प्रतिरोधमे आबि गेल - रामदेव झा-विजयदेव झा-शंकरदेव झा एक तरफ, मलंगिया-ललित कुमार झा-ऋषि कुमार झा दोसर तरफ - आ दुनू पक्ष विदेह-आन्दोलनकेँ अपशब्द-धमकीसँ रोकय प्रयासरत। ई संघर्ष-दर्ज विदेह आर्काइवक इतिहासगत मूल्य अछि। १०.२ भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति समीक्षा बीभत्स-शान्त रसक नाट्य-न्याय बेटीक अपमानमे भ्रूण-हत्याक प्रसङ्ग बीभत्स-रसक चरम-दृश्य। मुदा अन्ततः शान्त-रस - सूचनाक अधिकार माध्यमसँ न्यायक प्राप्ति - दर्शककेँ रसास्वादक पूर्णतामे पहुँचा देत अछि। ई "बीभत्ससँ शान्तमे रूपान्तरण" बेचन ठाकुरक रङ्गमञ्चीय-व्यक्तित्वक मुख्य-गुण थिक। करुण-वीर रसक मञ्जुर-चरित्र अधिकारमे मञ्जुरक चरित्र - रिक्शा-चालक झंझारपुरसँ दिल्ली धरि सूचनाक अधिकार लेल - करुण-वीरक मैथिल-रूप थिक। यदि करुण व्यक्तिक त्रासदी-केन्द्रित थिक तँ वीर ओहि त्रासदीसँ उठि कऽ सङ्घर्षक रास्ता। मञ्जुर एहि दुनू रसक मूर्त-व्यक्ति थिक। १०.३ गंगेश उपाध्यायक नव्य-न्याय विश्लेषण बेटीक अपमानमे "बेटी-अधिकार" बनाम "पुरुष-वंश-निर्माण" - एहि दुनू दावाक टकराव। गंगेशीय-तर्क-शास्त्रमे "धर्म-व्याप्ति" आ "लोक-व्यवहार-व्याप्ति"क भेद। धर्म-स्तरपर बेटीकेँ समान-अधिकार (मनुस्मृति-विरोध, मुदा वैदिक-स्तरपर), मुदा लोक-व्यवहार-स्तरपर पुरुष-केन्द्रिकता। बेचन ठाकुर एहि व्याप्तिक उघारिकेँ रङ्गमञ्चीय-वाद रूपमे प्रस्तुत करै छथि। अधिकारमे आर.टी.आइ. - सूचनाक अधिकार - एकटा नवीन-शब्द-प्रमाण-व्यवस्था। गंगेश-काल मे राजकीय-तन्त्रक "राज-शासन" शब्द-प्रमाण रूपमे ग्राह्य छल। एकैसम-शताब्दी-मे "सरकारी-दस्तावेज" तकर नवीन-रूप। आर.टी.आइ. एहि दस्तावेज-प्राप्ति-अधिकारक प्रत्यक्ष-प्रमाण-बनब। छीनरदेवीमे "अन्धविश्वास बनाम वैज्ञानिक-तर्क" - गंगेशीय-तर्क अनुसार अन्धविश्वासक "प्रमाण-दुष्टता" स्पष्ट: न प्रत्यक्ष, न अनुमान, न उपमान, न शब्द (आप्त) क आधार। मात्र लोकवाद-वासना। बेचन ठाकुर एहि वासना-केन्द्रित विश्वासक नाट्य-निरूपण। १०.४ पाश्चात्य समीक्षा-दृष्टि बेर्तोल्त ब्रेख्तक "लेर्श्टुक" बेचन ठाकुरक "बेटीक अपमान" क प्रत्यक्ष ब्रेख्तीय-लेर्श्टुक (शिक्षण-नाटक) थिक - दर्शकमे चेतना-निर्माण मूल लक्ष्य। मात्र भावुक-निरूपण नै, अपितु बौद्धिक-राजनैतिक चेतना। स्पिवाक - सबाल्टर्न-स्त्री भ्रूण-कन्या वस्तुतः सबाल्टर्न-सबाल्टर्न थिक - जे जन्मसँ पूर्वहि चुप करा देल जाइत अछि। बेटीक अपमान एहि "न-जन्म"क सबाल्टर्न-स्त्रीक स्वर बनैत अछि। स्पिवाक-वर्णित मूक-सबाल्टर्नक रङ्गमञ्चीय-वाणी। बी.आर. अम्बेडकर - जाति-दलित-विमर्श अम्बेडकरीय-चिन्तनमे "जाति-आधारित संस्कृति"क खण्डन केन्द्रीय। बेचन ठाकुर बेचन-मुन्नाजी-संवादमे स्पष्ट करै छथि - मैथिली रङ्गमञ्चमे जातिवादी-शब्दावली ("छुतहर", "छुतहा घैल") कोना सङ्ग्रहित - महेन्द्र मलंगियाक नाटकमे। एहि जातिवादक खण्डन बेचन ठाकुरक रङ्गमञ्चीय-राजनैतिक कर्म थिक। हाबरमास - सार्वजनिक-क्षेत्र युरगेन हाबरमासक "पब्लिक स्फेयर"क सिद्धान्त अनुसार आधुनिक-जनतान्त्रिक-समाजक निर्माणमे एकटा एहन तटस्थ-क्षेत्र अनिवार्य जतय सर्व-नागरिक खुलिकय बहस कऽ सकय। बेचन ठाकुरक चनौरागंज-कोचिङ्ग-संस्थान वस्तुतः मैथिलीक एहन समानान्तर-पब्लिक-स्फेयर थिक - सरकारी-तन्त्रसँ बाहर, जातिवादी-निकाससँ बाहर। १०.५ चीनी काव्यशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य लु शुन-क "डायरी ऑफ अ मैडमैन"मे जेना सामान्य-व्यक्ति समाजक भीतरक हिंसा देखि पागल भऽ जाइत - मुदा ओकर पागलपन सत्य-दर्शी। बेचन ठाकुरक मञ्जुर (अधिकारमे) ओहन "पागल-दर्शी" थिक - सूचनाक अधिकारक लेल झंझारपुरसँ दिल्ली रिक्शा-यात्रा सामान्य-बुद्धिमे पागलपन, मुदा सत्य-दर्शिता। माओ-कालीन "क्रान्तिकारी मॉडल-नाटक" (样板戏) क परम्पराकेँ बेचन ठाकुर मैथिल-स्वदेशी-रूपमे विकसित केलनि - मुदा एहिमे चीनी-वामपन्थक थोपण नहि, अपितु मैथिल-अम्बेडकरीय-समाजवादी चेतनाक नाट्य-रूपान्तरण। लिऊ शिए-क "फेङ्ग-गू" सिद्धान्त - बेचन ठाकुरक नाटक "फेङ्ग" (भावनात्मक प्राण) मे प्रचुर - कारण ओ निजी-अनुभवसँ लिखलनि; "गू" (हड्डी, संरचना) मे सुदृढ़ - कारण ओ नाट्य-शास्त्रक नियम-अनुयायी छथि। १०.६ यहूदी हर्मेन्यूटिक्स तल्मूद-पेसाहीम् ५०अ - "जे कर्म समाजक उद्धारक लेल कएल जाय, से सर्वोच्च।" बेचन ठाकुरक २५-वर्षीय रङ्गमञ्च-कर्म एहि सिद्धान्तक मूर्त-रूप। बिना सरकारी-फण्डक, बिना संस्थागत-समर्थनक, मात्र समाजक उद्धारक लेल अनवरत कर्म। भविष्यद्वक्ता मीखा (मीखा ६:८) - "न्याय करू, करुणामे प्रिय रहू, आ अपन ईश्वरक संग नम्रतासँ चलू।" बेचन ठाकुरक नाटक एहि भविष्यद्वक्तृक-वाणीक मैथिल-रङ्गमञ्चीय-रूप थिक - न्याय (बेटीक अपमान), करुणा (छीनरदेवी), नम्रता (अधिकारमे मञ्जुर)। हसीदिक-कथा परम्परा - कोनो छोट-गाम-कस्बामे एकटा छुपल-तज़्दीक़ (न्यायी) रहैत छथि, जे संसारक नैतिक-भार उठेने रहै छथि। बेचन ठाकुर चनौरागंजक एहन-छुपल-तज़्दीक़ छथि - मैथिल रङ्गमञ्चक नैतिक-भार उठायल। १०.७ निष्कर्ष बेचन ठाकुर सदेह ८ केर केन्द्रीय कर्म-नायक छथि। हुनकर रचनात्मक-योगदान (४ टा प्रमुख नाटक) आ कर्म-योगदान (१४ वर्षक सरस्वती-पूजा शृङ्खला + २५-वर्षक समानान्तर-रङ्गमञ्च-आन्दोलन) मैथिली रङ्गमञ्चकेँ जातिवादी-संस्थागत-कोषसँ बाहर निकालि सर्वहारा-स्त्री-दलित-केन्द्रित बनेलक। ई ओ सर्जक छथि जे ज्योतिरीश्वर ठाकुरक प्रहसन-परम्पराकेँ २१म शताब्दीक मैथिल-समाजमे जीवन्त राखि सकल। उपसंहार एहि खण्डमे विदेह सदेह ८ केर पहिल दस लेखक - ज्योतिरीश्वर ठाकुर, विद्यापति ठाकुर, जीवन झा, ईशनाथ झा, उदय नारायण सिंह नचिकेता, गोविन्द झा, सुधांशु शेखर चौधरी, गुणनाथ झा, जगदीश प्रसाद मण्डल, बेचन ठाकुर - केर रचनाकेँ छह-दृष्टि-समीक्षा-पद्धतिमे विवेचित कएल गेल अछि। समीक्षाक मुख्य-निष्कर्ष: मैथिली रङ्गमञ्च त्रयोदश शताब्दीक ज्योतिरीश्वरसँ एकैसम शताब्दीक बेचन ठाकुर धरि एकटा अखण्ड समानान्तर-धाराक रूपमे प्रवाहित अछि। ई धारा पारम्परिक कृष्ण-केन्द्रित-ब्राह्मणवादी-नाट्य-प्रतिमानसँ अलग - धूर्त-वैश्या-नौआ-शिव-योगी-किसान-दलित-स्त्री-केन्द्रित अछि। भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य सिद्धान्त, गंगेश उपाध्यायक नव्य-न्याय, पाश्चात्य समीक्षा (बाख्तिन, ब्रेख्त, ग्राम्शी, स्पिवाक, फनन, बेन्यामिन, हाबरमास, अम्बेडकर), चीनी काव्यशास्त्र (लिऊ शिएक वेन्शिन डियाओलोङ्ग, चोङ्ग रोङ्ग-क शिपिन, लु शुन, ताओ युआन-मिङ्ग्), आ यहूदी हर्मेन्यूटिक्स (मिद्राश/पर्देस, तल्मूदी पिलपुल, हसीदिक कथा-परम्परा) - सभ छह दृष्टिकोणसँ एहि लेखकगण-केर नाट्य-योगदान मूल्याङ्कित कएल गेल अछि। अगिला खण्ड (Batch 2) मे लेखक ११-२० - जिनमे गजेन्द्र ठाकुर, ज्योति सुनीत चौधरी, मुन्नी कामत, आनन्द कुमार झा, धीरेन्द्र कुमार, शिव कुमार झा, रवि भूषण पाठक, शम्भू कुमार सिंह, दुर्गानन्द मण्डल, आ आशीष अनचिन्हार - सम्मिलित हेताह। तेसर खण्ड (Batch 3) मे लेखक २१-२५+ - सुजीत कुमार झा, मिथिलेश कुमार झा, सरोज खिलाड़ी, किशन कारीगर, उमेश मण्डल, संगहि विदेह २०१२ सम्मान-प्राप्त कलाकारगण (शिल्पी कुमारी, शोभाकान्त महतो, जगदीश मल्लिक, झमेली मुखिया, पनक लाल मण्डल, लक्ष्मी दास, प्रियंका कुमारी, बुलन राउत, दुर्गानन्द ठाकुर, सुलेखा कुमारी) सम्मिलित हेताह। मुख्य सन्दर्भ ग्रन्थ-सूची भरत: नाट्यशास्त्र (विशेष कऽ अध्याय २७ - रसास्वाद आ निर्णायक-व्यवस्था) आनन्दवर्धन: ध्वन्यालोक अभिनवगुप्त: अभिनवभारती कुन्तक: वक्रोक्ति-जीवित क्षेमेन्द्र: औचित्य-विचार-चर्चा वामन: काव्यालंकार-सूत्र-वृत्ति गंगेश उपाध्याय: तत्त्वचिन्तामणि (विशेष कऽ प्रत्यक्ष-खण्ड आ अनुमान-खण्ड) मम्मट: काव्य-प्रकाश अरस्तू: पोएटिक्स बेर्तोल्त ब्रेख्त: ब्रेख्त ऑन थियेटर (जॉन विलेट सम्पादित) मिखाइल बाख्तिन: रबले एण्ड हिज वर्ल्ड; द डायलॉजिक इमेजिनेशन एन्तोनियो ग्राम्शी: प्रिज़न नोटबुक्स गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक: कैन द सबाल्टर्न स्पीक? फ्रांत्ज़ फनन: द रेच्ड ऑफ द अर्थ वाल्टर बेन्यामिन: इलुमिनेशंस (विशेष कऽ "द स्टोरीटेलर") युरगेन हाबरमास: द स्ट्रक्चरल ट्रांसफॉर्मेशन ऑफ द पब्लिक स्फेयर बी.आर. अम्बेडकर: एनिहिलेशन ऑफ कास्ट एलिनेल शोवाल्टर: ए लिटरेचर ऑफ देयर ओन नार्थोप फ्राय: एनाटॉमी ऑफ क्रिटिसिज्म मिर्चा एलियादे: द सेक्रेड एण्ड द प्रोफेन लिऊ शिए (劉勰): वेन्शिन डियाओलोङ्ग (साहित्य-मनक रत्न-तक्षण) चोङ्ग रोङ्ग (鍾嶸): शिपिन् (काव्य-श्रेणी-निरूपण) लु शुन (魯迅): डायरी ऑफ अ मैडमैन; आ-क्यु झेङ्गजुआन ताओ युआन-मिङ्ग : काव्य-संग्रह तल्मूद बावली: बेराखोत्, शब्बत्, पेसाहीम्, तानित, केतुबोत्, सान्हेद्रिन् मिद्राश रब्बा: बेरेशीत् रब्बा; पर्देस-व्याख्या-परम्परा हसीदिक कथा-संग्रह: मार्टिन बूबर - टेल्स ऑफ द हसिदीम विदेह आर्काइव - सदेह-शृङ्खला: www.videha.co.in (विशेष कऽ सदेह ८, मैथिली नाट्य उत्सव) गजेन्द्र ठाकुर (सम्पादित): विदेह सदेह ८ - मैथिली नाट्य उत्सव (श्रुति प्रकाशन, नई दिल्ली, २०१२; ISBN 978-93-80538-66-2) -Gajendra Thakur, editor, Videha [be part of Videha www.videha.co.in JOIN VIDEHA WHATSAPP CHANNEL JOIN VIDEHA ARATTAI CHANNEL ] -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp/ Arattai no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। १.२.अंक ४४५ पर टिप्पणी विदेह ४४५ म अंक पर पाठकीय मन्तव्य प्रणव कुमार झा अशोक कुमार ठाकुर के कविता निक लगल। प्रीति कुमारी श्री जगदीश प्रसाद मण्डल पर निक लेख लिखने छथि। डॉ० किशन कारीगर के हास्य कथा मोन पाडलक पहिने गाम घरक लोक सभ सहिए मे पादब मे संकोच नै करय छलाह आ एकरा ल क खूब हास्य होई। हमर एकटा भैया छलाह दिनकर दद्दा । दिल्ली मे एकटा मंदिर मे पुजारी। हुनक डेरा जाइत रहि त एक चरण एहि पर खिस्सा चलय। ओतय एकर कंपीटीशन लगय। गिनीज़ सन संस्था आ लोको प्रसिद्धि लेल केहन केहन रिकॉर्ड बनबय मे लगल रहय अछि! आचार्य रमानन्द मण्डल के लागय अछि प्रिय विषय छैन विद्यापति आ रानी लखिमा। मैथिलीक सेवा केवल मंच पर गर्जन-तर्जन आ नारा लगबलासँ होइत अछि, आ कि विद्यालंकार जकाँ मौन रहि पोथी संपादन आ सम्पादकीय कत्तव्य निभबलासँ? कल्पना जी अपन धारावाहिक लेख मे वाजिब सवाल जवाब केने छथि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। गद्य Prose २.१. हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२५ २.२. कल्पना झा- मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-६ २.३.अरविन्द ठाकुर- मैथिली साहित्यमे बलेन्द्र नारायण ठाकुर ‘विप्लव’ एवं हुनक परिवारक योगदान-१ २.४. डा. किशन कारीगर- हमरा त जोगार अछि (हास्य कथा) २.५. लाल देव कामत- बहुजन कवि आ नाटककार राम श्रेष्ठ दीवाना : एक संक्षिप्त बायोग्राफी २.६. लाल देव कामत- पतीत : पोथी चर्चा २.७. सुरेन्द्र लाभ- दुगोट कनिका नाटक [नवकी पुतहु/ रटन्त विद्या] २.८. आचार्य रामानंद मंडल- महाकवि विद्यापति बनाम संत तुलसीदास २.९. प्रीति कुमारी- लघु परिचय : लीला बाबू'क २.१०. संतोष कुमार राय 'बटोही'- भिक्षुक खबासक वंशावली (धारावाहिक संस्मरण)- (पहिल खेप) २.११. प्रणव कुमार झा- लोकतंत्रक माने आ मतलब २.१२. कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा- ओझड़ी २.१३. गजेन्द्र ठाकुर- गोहि सभक बीच जल समाधि (मैथिलीक आइ धरिक सभसँ पैघ उपन्यास)- मैथिली कादम्बरीक अंश २.१४. गजेन्द्र ठाकुर-चारिटा मूल संस्कृत एकनट नाटक (भाण) १.श्री शूद्रक केर मूल संस्कृत- पद्मप्राभृतकम् [कमलक भेंट]; २.ईश्वरदत्तक मूल संस्कृत- धूर्तविटसंवादः [धूर्त आ दलालक विचार-विमर्श]; ३.वररुचिक मूल - उभयाभिसारिका [परस्पर प्रेम-पलायन] आ ४.महाकवि श्यामिलक केर मूल संस्कृत- पादताडितकम् [लात] (संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद- गजेन्द्र ठाकुर द्वारा) २.१५.गजेन्द्र ठाकुर- कालिदासक मूल संस्कृत नाटक अभिज्ञानशाकुन्तलम् संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर २.१६.गजेन्द्र ठाकुर-विशाखदत्त रचित संस्कृत नाटक मुद्राराक्षसम् केर मैथिली अनुवाद - गजेन्द्र ठाकुर २.१७.गजेन्द्र ठाकुर-उत्तररामचरितम्- महाकवि भवभूति- संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर २.१८.गजेन्द्र ठाकुर-कादम्बरी पूर्व भाग [वाणभट्ट रचित] उत्तर भाग [वाणभट्टक पुत्र भूषण भट्ट रचित]- संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर २.१९.गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-६) सन्दर्भ- कुणाल-कृत प्रेम-प्रतिज्ञा उर्फ श्रुवावतीक जय! २.१. हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२५ हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२५ हितनाथ झा (मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070) स्वास्थ्य प्रभात 'प्रभात'मे धार्मिक, सामाजिक, ऐतिहासिक, वैज्ञानिक विषयक अतिरिक्त स्वास्थ्य विषयक आलेख सेहो रहैत छल। समाचार खण्डमे ग्रामीण एवं पड़ोसक गाममे दवाइक वितरण कैल जाइत छल, से अनेक अंकक समाचारमे अछि। ओ समाचार सभ पूर्वमे प्रकाशित अछि। ओहि समयमे स्वास्थ्य- सुविधाक हेतु अस्पताल अत्यल्प छल। आर्थिक अभाव सेहो छल। शिक्षाक सेहो कमी छल। क्षयरोग, गोटी, मलेरिया आदि रोगसँ प्रत्येक गाममे अत्यधिक मनुष्यक मृत्यु होइत छल। प्रत्येक लोककेँ भगवान-भगवतीए पर भरोस रहैत छल। प्रभात इएह सोचि क' प्रायः 'स्वास्थ्य प्रभात' स्तम्भ निकालैत छल। निरोगक रहबाक उपाय आ दबाइक सेहो अनेक अंकमे विभिन्न लेखक द्वारा अछि। एहि अंकमे प्रस्तुत अछि - श्री विद्यानन्द झा लिखित स्वास्थ्य निबन्ध आ तारानाथ झा लिखित 'गोटीक प्रकोप'। साहित्यिक आलेखसँ बेसी अन्यान्य विषयक आलेख अछि 'प्रभात'मे। समाजक ध्यान रखैत, समाजक लेल कतेक उपयोगी हैत, एहिपर विशेष दृष्टि रहैत छलैक। अग्रिम खण्ड मे आन कोनो विषयक आलेख प्रस्तुत करब। स्वास्थ्य प्रभात लेखक: श्री विद्यानन्द झा, कोइलख। स्वास्थ्य ईश्वरीय दान थीक।अस्वस्थ मनुष्य काँ अतुल सम्पत्ति-अगाध विद्या-ओ दुर्दम्य शक्ति सभ प्रायः व्यर्थे बुझना जाइत छैन। अतएव निरोग ओ तंदुरुस्त शरीर पे मनुष्य काँ अत्यावश्यकीय ताहिमे संदेह नहि। आब ई प्रश्न अबैत अछि जे शरीर स्वस्थ कोना रहि सकैत अछि।सुपच भोजन, स्वच्छजल, निर्मल वायु और परिमित व्यायाम शरीर काँ तंदुरुस्त रखबामे परमावश्यक। हमरालोकनि काँ ई देखक चाही जे खाद्य पदार्थ पवित्र ओ उत्तम हो तथा पूर्ण सिद्ध हो। असिद्ध ओ अपवित्र भोजन सँ नाना प्रकारक व्याधिक यथा 'विशुचिका' इत्यादिक उत्पन्न होइछ। काँच वा अति घूलल ओ वासि फल खायब सर्वथा निषिद्ध। बाजारमे ताजा वस्तु देखि किनक थीक। द्वितीय आवश्यक स्वच्छ जल थीक। हमरालोकनि काँ ध्यान देबाक चाही जे जाहि कूप वा इनारक जल पिबैत होइ ओ गन्दा नहि रहै। इनारमे पात ओ कूड़ा इत्यादि नहि खसै। गर्मी ऋतुमे एक बेरि इनारक पानि उपछबा क' फेकि, ओहिमे परिमित चून ओ परमेगनेट पोटास देवाक चाही। जाहिसँ एहि प्रक्रिया द्वारा जल शुद्ध करक सम्भव नहि हो तँ जल काँ उत्तमरीत्या औंट क' पीबाक चाही। विशुद्ध वायु सर्वथा प्रयोजनीय। वासस्थलक चतुर्दिश गाछ रहक चाही जाहिसँ दूषित वायु नष्ट भय शुद्ध वायु सर्वदा सुलभ हो। घरमे खिड़की वा जंगला पूर्ण रहै जाहिसँ घरमे शुद्ध वायु सतत अबैत रहय। खुला वायुक सेवन सुलभ हो। परिमित व्यायाम यथा फुटबॉल, क्रिकेट, टेनिस ओ कबड्डी इत्यादिक खेल दैनिक आवश्यक। एहि खेलमे अवस्थासँ कोनो विशेष सम्बन्ध नहि छैक, मनुष्यक प्रत्येक अवस्थामे व्यायाम करब आवश्यक। जनिका उपरोक्त व्यायाम सुलभ नहि होइन ओ कुस्ती, दण्ड, बैसकी, दौड़ब, कूदब ओ टहलबाक अभ्यास कय सकै छथि। व्यायाम बिना मनुष्यक शारीरिक ओ मानसिक उभय उन्नति असम्भव। एतदरिक्त शरीर काँ स्वस्थ रखबाक हेतु शरीर ओ वसनक स्वच्छतहु पर पूर्ण ध्यान देवाक थीक। अन्तमे ई कहक पड़ै अछि एहि बिना स्वस्थ शरीर के मनुष्य केर उन्नति होयब असम्भव ओ बिना उपरोक्त विषय सभक अवलम्बन कयने शरीर तंदुरुस्त नहि भय सकैछ। खेदक विषय थीक जे मिथिलामे पाँच प्रतिशतो व्यक्ति एहि नियम सभक पालनक चर्चा कोन जे जनितहु टा नहि छथि और यैह कारण थीक जे मैथिलक सर्वथा अवनति भय रहल छैन। 'गोटी'क प्रकोप तारानाथ झा, कोइलख। एहि वर्ष दरभंगा जिलान्तर्गत गोटीक प्रकोप बहुत जोर-शोर अछि। प्रायः हजारो आदमी केँ एहि दुख सँ ग्रसित कय विकराल काल निज गालमे प्रवेश कय चुकलैन्हि अछि। तथापि आबहु तक सन्तोष नहि भेलैक अछि, यदि किछुओ दिन तक और अपन स्वरूप एहि प्रकारक देखाओत त' सभ केँ बुझक चाही जे आब हमरालोकनि केँ भव सागर पार उतरवामे बेशी विलम्ब नहि अछि। देशमे कतहु आफत आसमानी होइ छैक, कोइलख अयबामे कनेको विलम्ब नहि होइ छैक। एहिना स्थितिमे ई त' प्रान्तव्यापी अछि। तखन कोइलख एहिसँ मुक्त कोना रहि सकै अछि? करीब एक-डेढ़ मास सँ एकर उपद्रव कोइलख मध्य जोर-शोरसँ भय रहल अछि। सैकड़ो आदमी एकर भोग कय चुकलाह अछि, तथा सम्प्रति कय रहलाह अछि। जहाँ तक पता लगैछ जे 3-4 पछबारि टोलमे तथा 10-15 पुबारि टोलमे एहि दुखसँ ग्रसित भय सदाक हेतु एहि संसारसँ विदा भय गेलाह अछि। एक-एक घरमे तीन-तीन व्यक्ति केँ मृत्यु भय गेला सँ सभ केओ अनुभव कय सकै छी जे ओहि घरक की अवस्था होयतैक। छोट-छोट बच्चा केँ असह्य-वेदना देखि ककर एहन कठोर हृदय होयतैक, जे नहि पिघलतैक तथा नेत्रसँ अश्रुपात नहि होयतैक। श्री 108 भद्रकाली जगन्माता थिकथि। मायकेँ अपन सन्तानक ऊपर दयो होइत विलम्ब नहि होइ छैक। अतः सभकेँ उचित थीक जे जगन्माता श्री 108 भद्रकाली केँ येनकेनोपायेन मनाबी तखन अवश्य खुशी होइतीह, तदनन्तर ककरो नाम मात्रो क्लेश नहि रहत। (प्रभात वर्ष-01, अंक: 06, जून 1933ई.) संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-7 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-8 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-9 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-10 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-11 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-12 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-13 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-14 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-15 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-16 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-17 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-18 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-19 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-20 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-21 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-22 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-23 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-24 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.२. कल्पना झा- मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-६ कल्पना झा मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-६ निर्भीक पत्रकार 'विद्यालंकार' पत्रकारिता/मीडिया के लोकतन्त्रक चारिम स्तम्भ कहल जाइत अछि। लोकतन्त्र मे सरकार आ जनताक बीच 'संवाद'क संवाहक कही, जनताक निगरानी कही, ताहि तरहक जवाबदेही बला काज अछि पत्रकारिता। लोकतन्त्रक अन्य तीन स्तम्भ अछि : विधायिका, कार्यपालिका आ न्यायपालिका। उक्त तीनू स्तम्भक गतिविधि के उचित दिशा देब, मजबूती प्रदान करब काज छै चारिम स्तम्भ पत्रकारिताक। आ से काज जिम्मेदारीपूर्वक करैत रहलाह पत्रकार 'विद्यालंकार' जी। पहिनहु कहने छी, 'धाकड़' पत्रकार छलाह 'विद्यालंकार'। तेहन 'धाकड़' जे तत्कालीन मुख्यमन्त्री पर्यन्त हिनकर पत्रकारिताक 'कायल' छलाह। सरकारक हाथक कठपुतरी नहि बनलाह कहियो ओ। बरु इएह सरकार पर दबाव बनएबाक माद्दा राखैत छलाह। आबक मीडियाकर्मी जकाँ बिकाउ नहि छलाह। सही के सही आ गलत के गलत कहबाक साहस छलनि पत्रकार 'विद्यालंकार'क भीतर। एखनुक अधिकांश पत्रकार "पत्रकार"क पद के कलंकिते करबा पर उतारू भेल छथि। एखनुक 'विकट'/ 'विचित्र' सन पत्रकारिता पर एम्हरे दू-तीन दिन पहिने हितनाथ झाक एकटा छोट-सन पोस्ट अभरल छलए फेसबुक पर, से उद्धृत कऽ रहल छी। हितनाथ झा लिखैत छथि- आमिर पर घंटा भरि चर्चा, 'नेशनल मीडिया' केर ई भेष। साधू-सन्यासी मौलाना, योग-गुरुक आख्यान अशेष ।। अध:पतनपर आइ हमर ई, भारत देशक चारिम खम्भा। पत्रकारिता कत' जा रहल, 'टी.आर.पी.'क कतेक टिटिम्भा ।। से ठीके, आब बस 'टी.आर.पी.'क खेल रहि गेल अछि पत्रकारिता। 'टी.आर.पी.' लेल आमिर खानक तेसर विवाह नेशनल न्यूज बनल रहल दू दिन धरि। ओहि निरर्थक मुद्दा पर घमासान मचल रहल देशक प्रमुख न्यूज चैनल सभ पर। पत्रकारिता की होइत छै, से सीखल जा सकैत अछि 'विद्यालंकार'क व्यक्तित्व ओ कृतित्वक अवलोकन कऽ कऽ। श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार' पर सुरेश्वर झा द्वारा लिखल मोनोग्राफ (साहित्य अकादमी सँ प्रकाशित) पढ़िए पत्रकारिता-धर्मक पालन करब सिखबाक चाही, पत्रकारिता मे रुचि रखनिहार केँ। पत्रकारिता मे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'क योगदानक चर्चा करैत लेखक कहलनि अछि (पृष्ठ संख्या - 20), "ई तँ निर्विवाद रूप सँ कहल जा सकैत अछि जे पत्रकारिता आओर श्रीकान्त ठाकुर विद्यालंकार, ई दुनू शब्द एक दोसरक पर्यायवाची जकाँ बनि चुकल अछि। हुनक लगभग सम्पूर्ण जीवन राष्ट्रभाषा हिन्दीक पत्रकारिताक प्रारम्भ, विकास, प्रचार ओ प्रसार मे लागल रहलनि। हिन्दी पत्रकारिताक क्षेत्र मे ओ एक गोट अग्रणी व्यक्तित्व छलाह। ओ पत्र सबहि केँ सजौलनि, अलंकृत कएलनि तथा ओकर प्रतिष्ठा केँ बढ़ौलनि। ओ हिन्दी पत्र केँ लोकप्रिय बनेबा मे सफलता प्राप्त कएलनि तथा आजादी पूर्वहि ओकरा अंग्रेजी पत्रक समकक्ष अनबाक स्तुत्य-प्रयास कएलनि। अम्बिका प्रसाद बाजपेयीक बादक समय मे श्रीकान्त ठाकुर हिन्दी पत्रकारिता मे आधुनिकताक समुचित समावेशक संग ओकरा उजागर करबा मे सक्षम भेलाह। श्रीकान्त ठाकुर हिन्दी पत्रकारिता मे प्राचीनता आ नवीनताक बीचक कड़ी छलाह। भारतीय हिन्दी पत्रकारिताक इतिहास मे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार' एक गोट स्वर्णिम अध्याय जोड़ने छथि।" 'विद्यालंकार' पत्रकारिताक मूलभूत सिद्धान्तक पालन करैत आगाँ बढ़लाह। कहियो ककरो दबाव मे रहि कऽ काज नहि कएलनि। सत्यता, निष्पक्षता, नैतिकता आ स्वतन्त्रता संग कोनो समझौता नहि कएलनि। अपन जवाबदेही (पत्रकारिताक) बुझैत छलाह, सार्वजनिक हित सर्वोपरि रहलनि हुनका लेल। निजताक सम्मान करब जनैत छलाह। एखनुक पत्रकारिता दर्शक/श्रोता/पाठक केँ क्षुब्ध करैत छनि। सत्य आ सटीक सूचना प्रकाशित कएल जाए, तकर ध्यान नहि राखए से केहन पत्रकार भेल। आइ-काल्हि बस सनसनीखेज समाचारक खोज मे रहैत छथि पत्रकार सभ। सत्यता/सटीकता गेल तेल लेबए। निष्पक्षता सेहो बिलाइए गेल अछि। कोनो राजनीतिक, धार्मिक वा निजी पक्षपात सँ बचबाक चाही एकटा पत्रकार केँ, सेहो बिसरि रहल छथि आजुक 'टी.आर.पी.'क मारल/हारल पत्रकार सभ। जँ कोनो संस्थान, कोनो पत्रकार केँ स्वतंत्रता नहि दऽ रहल छनि, तँ ओहिठाम काज करब स्वीकार्य नहि होएबाक चाही एकटा सुच्चा पत्रकार केँ। दबाव, लाभ वा प्रभावक चपेट मे रिपोर्टिंग करब स्वीकार्य नहि करब वास्तविक पत्रकारिता कहल जाएत। आ एही तरहक सुच्चा पत्रकार छलाह 'विद्यालंकार'। अपन जवाबदेही बूझब आवश्यक छै पत्रकार केँ। कोनो तरहक गलती भेला पर स्वीकार करब, सुधार करब आ पाठक/दर्शकक समक्ष पारदर्शिताक संग कोनो तथ्य प्रस्तुत करब पत्रकारक जवाबदेही छै। ओहि जवाबदेहीक बखूबी निर्वहन करैत काज कएलनि 'विद्यालंकार' जी। निजताक ध्यान राखब, माने पीड़ित आ कमजोर व्यक्तिक पहचान/छविक प्रकाशन मे सावधानी बरतब सेहो पत्रकारिता-धर्म छै। आ सभ सँ महत्वपूर्ण अछि 'जनहित' लेल काज करबाक अछि, से सदिखन स्मरण राखब। उक्त सभटा नियम/धर्मक पालन करैत 'विद्यालंकार' पत्रकार रूप मे अपार सम्मान अर्जित कएलनि। 'विद्यालंकार'क पत्रकारिता मात्र समाचार-संप्रेषण धरि सीमित नहि छलनि। हुनकर सम्पादकीय समाज, संस्कृति आ चेतना सँ संबद्ध रहैत छलनि। हुनकर लेखनीक मूल स्वर संवेदनशील, निर्भीक आ विचारशील मानल जाइत छलए। श्रीकान्त ठाकुरक पत्रकारिताक मुख्य विषय मे सामाजिक प्रश्न, अन्याय-विरोध, मानवीय मूल्य, साहित्यिक चेतना आ भारतीय अस्मिता सम्मिलित छलए। हुनकर लेखनी मे सत्ता-समालोचना, समाजक दबल, सुविधा सँ वञ्चित वर्गक चिन्ता आ भाषा-संस्कृति सँ जुड़ल संवेदनशीलता देखाइत छल। 'विद्यालंकार' पत्रकारिता केँ साहित्यिक संवेदना, सामाजिक सरोकार आ मानवीय मूल्य सँ जोड़लनि। जाहि मे नैतिक प्रतिबद्धता सेहो सम्मिलित छलए। ई हुनकर विशेष आ महत्वपूर्ण योगदान मानल जाइत छनि। श्रीकान्त ठाकुर ‘विद्यालंकार’क पत्रकारिताक एकटा विशेषता इहो रहलनि जे ओ मात्र समाचार-प्रेषण धरि सीमित नहि रखलनि अपन पत्रकारिता केँ। हुनकर पत्रकारिता-काल मे शोषण, अन्याय आ देशक समस्या पर निर्भीक बहसक परम्परा कायम भेल। संगहि पत्रकारिता मे साहित्यिक रंग केँ स्थान देल गेल। मुदा साहित्यिक तथा गैर-साहित्यिक दुनू तरहक पत्रकारिता मे समान रूप सँ सक्रिय भूमिका निभाबैत रहलाह ओ। ओ एहन निर्भीक पत्रकारक रूप मे पहचान बनौलनि, जनिकर लेखनी मे सामाजिक अन्याय आ शोषणक विरुद्ध स्पष्ट प्रतिरोध देखाइत छलनि पाठक केँ। हुनकर पत्रकारिताक सरोकार भारतीय अस्मिता, भारतीय चेतना आ भाषा-संप्रेषण सँ जुड़ल छलए। ओ पत्रकारिता मे मानवीय मूल्य केँ प्राथमिकता देलनि आ सत्ताक राजनीति सँ स्वयं केँ अलग राखैत पत्रकारिताक क्षेत्र मे अपन एकटा विशिष्ट स्थान बनौलनि। जनता आ सरकारक बीच 'संवाद'क काज करैत रहल अछि एकटा पत्रकार। से पत्रकार रूप मे जनताक भलाइ लेल, समाजक उत्थान लेल सदति तत्पर रहलाह 'विद्यालंकार'। लोकक समस्या, समाजक बेगरता तत्कालीन सरकार धरि पहुँचएबाक काज, मात्र खानापूर्ति लेल नहि, समस्या-निवारण लेल करैत छलाह ओ। समस्याक निवारण नहि होएत, तकर गुंजाइशे नहि छोड़ैत छलाह। ततेक वजन छलनि पत्रकार 'विद्यालंकार'क व्यक्तित्व मे। सरकारक सोझाँ कोनो प्रस्ताव रखलनि आ ओ 'पास' नहि होएत, से असम्भव छलए। कारण हुनका द्वारा देल गेल प्रस्ताव मे ओहि स्तरक विश्वसनीयता रहैत छलनि जे निश्चित लोकहित लेल हेतनि हुनकर प्रस्ताव। उदाहरण स्वरूप बिहार सरकार द्वारा 'मैथिली अकादमी'क स्थापना आ चेतना समिति, पटना लेल राजेन्द्र नगर मे जमीन आवंटन, ई दुनू काज 'विद्यालंकार' जीक प्रभावेक परिणाम अछि। "मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार' एवं हुनक परिवारक योगदान" सिरीजक पछिला अंक मे कहल एकटा बात सायास दोहरा रहल छी जे "गाँधी जी द्वारा स्थापित विद्यापीठ मे विद्याध्ययन सम्पन्न कऽ राजेन्द्र बाबूक प्रेरणा तथा जगतनारायणक प्रोत्साहन सँ श्रीकान्त ठाकुर 1926 ई.क जनवरी सँ "महावीर" नामक हिन्दी साप्ताहिक मे कार्य आरम्भ कएलनि। आ से 1926 सँ लऽ कऽ 1977 ई. धरि पत्रकारिता सँ जुड़ल रहलाह 'विद्यालंकार'।" ई अंक पत्रकार 'विद्यालंकार' पर केन्द्रित अछि, तैं उपरोक्त प्रसंगक पुनरावृत्ति कएलहुँ अछि। अस्तु, 1926 सँ लऽ कऽ 1977 ई. धरिक पत्रकारिताक यात्रा मे कइअक टा दैनिक, साप्ताहिक पत्र सँ जुड़लाह श्रीकान्त ठाकुर मुदा आर्यावर्त सँ पूर्व कोनो दोसर पत्र मे अधिक दिन तक नहि टिकलाह। कारण पत्रक मालिक द्वारा सम्पादन-कार्य मे हस्तक्षेप ओ कहियो स्वीकार नहि कएलनि। दरभंगा महाराज द्वारा समाचार संकलन एवं अग्रलेख किंवा अन्य आलेख मे व्यक्त विचारक संप्रेषण मे पूर्णरूपेण स्वतंत्रता रहलाक कारणेँ श्रीकान्त ठाकुर आर्यावर्त मे जे कार्य आरम्भ कएलनि से अवकाश प्राप्त करबा काल धरि ओतए टिकल रहलाह। बीस वर्ष सेवा देलनि ओतए। देशक कतेको हिन्दी दैनिकक मालिक द्वारा देल जा रहल लुभावना शर्तहु हुनका डिगा नहि सकलनि एहि बीस वर्षक अभ्यन्तर। इएह कारण छल जे श्रीकान्त ठाकुर हिन्दी दैनिकक सम्पादक रूप मे जे यश ओ प्रतिष्ठा पौलनि से दोसर ककरो नसीब नहि भेलनि। श्रीकान्त ठाकुर ‘विद्यालंकार’ आर्यावर्त अखबारक प्रमुख संपादक छलाह। हुनका ब्रजनन्दन आजाद के बाद एहि पत्रक संपादकीय दायित्व देल गेल छलनि, जकर निर्वहन ओ लगभग 20 वर्ष धरि कएलनि। हुनका कार्यकाल मे आर्यावर्त राष्ट्रवादी विचारधारा, साहित्यिक गरिमा आ भाषिक अनुशासन बला पत्र बनल रहल। हुनकर संपादकीय भूमिका मात्र समाचार-संपादन धरि सीमित नहि छलए, ओ विचारक चयन, संपादकीय दिशानिर्देश आ सार्वजनिक चेतनाक निर्माण मे सेहो सक्रिय रहलाह। समग्रता मे कहल जा सकैछ जे श्रीकान्त ठाकुर ‘विद्यालंकार’ आर्यावर्त दैनिक पत्रक दीर्घकालिक संपादक, राष्ट्रवादी पत्रकारिताक समर्थक, साहित्यिक रंग मे रंगल संवेदनायुक्त संपादकीय परम्पराक वाहक छलाह। श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार' समाचार पत्र सम्पादक सम्मेलनक स्थायी-समितिक निरन्तर सदस्य रहलाह तथा एहि संस्थाक 1962-63क अधिवेशनक स्वागत समितिक अध्यक्ष बनाओल गेल रहथि। 1968 ई. मे आर्यावर्त सँ अवकाश प्राप्त कएलाक उपरान्त लगातार 1977 ई. धरि ओ आर्यावर्त मे "का वार्ता ? किमाश्चर्यम् " शीर्षक सँ स्तम्भ लिखैत रहलाह। 'विद्यालंकार' द्वारा लिखल ई स्तम्भ बेस लोकप्रिय भेल छलए। अन्त मे पुनः पूर्व मे कहल एकटा बात दोहराएब हम, "एहन प्रभावी पत्रकार छलाह 'विद्यालंकार' जी, जनिका सोझाँ तत्कालीन मुख्यमंत्री संग आरो बड़का-बड़का कद्दावर नेता सभ नतमस्तक रहैत छलाह। मुख्यमंत्री अपन कुर्सी पर सँ उठि कऽ ठाढ़ भऽ जाइत छलाह आ हुनका बैसबाक आग्रह करैत छलाह।" एहन पत्रकार भेटि सकैत अछि आजुक समय मे? संपादकीय सूचना- एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-5 विद्यालंकारजीसँ पहिने विदेहपर व्यासजीक कृतित्वपर कल्पनाजी लीखि रहल छथि। पाठक व्यासजीपर प्रकाशित एखन धरिक सभ खंड निच्चा केर लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकै छथि- मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-7 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-8 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-9 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-10 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-11 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-12 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-13 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-14 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-15 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-16 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-17 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-18 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-19 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-20 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-21 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-22 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-23 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-24 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-25 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.३.अरविन्द ठाकुर- मैथिली साहित्यमे बलेन्द्र नारायण ठाकुर ‘विप्लव’ एवं हुनक परिवारक योगदान-१ अरविन्द ठाकुर मैथिली साहित्यमे बलेन्द्र नारायण ठाकुर ‘विप्लव’ एवं हुनक परिवारक योगदान-१ बलेन्द्र नारायण ठाकुर ‘विप्लव’ स्वतंत्रता सेनानी छलाह, हिंदी ओ मैथिलीक लेखक छलाह। विदेह एहिठाम पहिल खंडमे हुनक हिंदी रचना एवं हुनकापर लीखल गेल हिंदी रचना प्रस्तुत कऽ रहल अछि। बादक खंड सभमे स्वतंत्रता संग्राममे हुनक भूमिका, मैथिली रचना आदि प्रस्तुत कएल जाएत। कोसी तीर के दिनकर : बलेन्द्र नारायण ठाकुर ‘विप्लव’ -- हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’ कोसी अंचल में गुणसम्पन्न लोगों की कभी कमी नहीं रही। किन्तु, विभिन्न गुणों का जैसा समन्वय बलेन्द्र नारायण ठाकुर ‘विप्लव’ में था, वह दुर्लभ है। क्रांतिकारी स्वतंत्रताकामी, राजनेता, समाजसेवी, साहित्यकार, पत्रकार, किसान, व्यवसायी के अतिरिक्त भी जीवन के अनेकानेक ऐसे रंग थे, जो विप्लव जी के अतिविराट आलोकपुंज व्यक्तित्व में समाहित होकर बहुरंगी छटा बिखेरा करते थे और उनका ‘विप्लव’ उपनाम उनके सम्पूर्ण जीवन-दर्शन का प्रतिबिंब बन गया था। सन 1918 ई को सुपौल के मुनिलाल ठाकुर के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में उनका जन्म हुआ। इनकी शिक्षा-दीक्षा स्नातक स्तर तक हुई। इन्होंने फार्मासिस्ट में भी डिग्री प्राप्त की। बचपन से ही वे समाजवादी विचारधारा से प्रभावित थे तथा सामाजिक समरसता एवं सर्वधर्म-समभाव के संरक्षक एवं मानवीय नैतिकता व आत्मसम्मान के कट्टर पैरोकार थे। इस कारण प्रायः अपने सभी समकालीनों से उनकी सैद्धांतिक टकराहट होती रही। जहां एक तरफ वे समाज के अलम्बरदारों की क्षुद्र मानसिकता पर निरन्तर हमला करते रहे, वहीं दीन-हीन, सीधे-सादे लोगों पर उनके आश्रय का क्षत्र तना रहा। दलगत रूप से उनका जुड़ाव कांग्रेस के साथ रहा, किन्तु गुटबाजी, जातिवाद और वर्चस्ववाद को चुनौती देने के लिए वे कांग्रेस के खिलाफ विधान सभा चुनाव (1969) लड़ने से भी नहीं हिचके। क्षेत्रीय विकास के लिए दलों की दीवार तोड़ने का एक अपूर्व प्रयास उन्होंने किया, जब उनकी अध्यक्षता में सात विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को सम्मिलित कर संयुक्त समन्वय समिति का सफलतापूर्वक गठन और संचालन किया गया। विप्लव जी ने राष्ट्रीय आन्दोलन में छात्र जीवन से भाग लेना आरम्भ कर दिया था। ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ में तो वे पूर्ण सक्रिय रहे तथा कलाली पर पिकेटिंग करने के क्रम में पुलिस की लाठियां भी खाई। उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ सुपौल रेलवे स्टेशन पर धावा बोल कर स्टेशन के कागजातों को जलाया, रेल पटरी को उखाड़ा तथा सुपौल कोर्ट पर तिरंगा लहरा दिया। इसके चलते ब्रिटिश सरकार ने डी आई आर के तहत इन्हें उद्घोषित अपराधी चिह्नित कर दिया। फरारी अवधि मे पुलिस ने उनके मकान पर कई बार हमला किया, परिजनों को मारा पीटा और धन-सम्पत्ति को जला कर नष्ट कर दिया। ये ‘अगस्त क्रांति’ में 2 सितम्बर, 1942 से 3 मार्च, 1945 तक भूमिगत रहे। इस क्रम में ‘आजाद दस्ता’ के बिहार प्रान्तीय प्रभारी चित्र नारायण शर्मा के साथ नेपाल गये, जहां ‘आजाद दस्ता’ का मुख्यालय एवं उसके बेतार केन्द्र थे। इस दौरान जेल गये साथियों के परिवार को मदद करना, सियाराम दल के क्रान्तिकारी पर्चों को गांव-गांव बांटना और क्रान्तिकारियों के बीच संवाद माध्यम बनना आदि कार्य उनके जिम्मे था। इसका सम्पादन वे कुशलतापूर्वक करते रहे। सियाराम सिंह, जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया, अम्बिका सिंह ‘दादा’, शैलेश मिश्र, शिवनन्दन झा, वेदानन्द झा, जटाशंकर चौधरी, लखन लाल मिश्र आदि के सम्पर्क में ये दीर्घकाल तक रहे। इन्होंने ‘करिहो’ महन्थ के यहां से डा लोहिया को गुप्त रूप से निकाल कर परसरमा होते हुए कलकत्ता भेजने की व्यवस्था की थी। भारत सेवक समाज, नागरिक परिषद एवं ग्राम स्वराज्य संगठन के पदाधिकारी के रूप में कोसी तटबन्ध के निर्माण हेतु श्रमदानियों का जत्था तैयार करने, राष्ट्रीय सार्वजनिक मेला समिति एवं कृषि उत्पादन बाजार समिति की स्थापना हेतु अपनी जमीन देने एवं अन्यों से दिलाने, बी एस एस कालेज, सुपौल एवं आई टी आई की स्थापना हेतु गांव-गांव घूम कर चन्दा इकट्ठा करने में उनकी तत्परता, लगनशीलता और उदारता की प्रशंसा उनके विरोधी भी किया करते थे। सहरसा जिला परामर्षदात्री समिति, लोक शिकायत एवं निगरानी समिति, बाढ राहत समिति आदि के गैर-सरकारी सदस्य एवं बीस सूत्री कार्यक्रम क्रियान्वयन समिति के अध्यक्ष के रूप में उनकी प्रशासनिक क्षमता एवं सूझबूझ के कायल वरिष्ठ प्रशासनिक पदाधिकारीगण उनकी बातों को ससम्मान सुनते तथा तद्नुसार कार्य करते। बलेन्द्र बाबू व्यापार संघ, सुपौल के संस्थापक, पब्लिक लायब्रेरी एण्ड क्लब के आजीवन सदस्य तथा सहरसा जिला पुस्तक व्यवसायी संघ के अध्यक्ष रहे। सुपौल अधिसूचित क्षेत्र समिति को नगरपालिका बनाने एवं भारत सेवक समाज की ओर से जिले के विकास पर सम्मेलन आयोजित करने में उनकी महती भूमिका रही। राष्ट्रीय कार्यक्रमों एवं सार्वजनिक आयोजनों में उनकी संगठन क्षमता, अकाट्य तर्क, प्रांजल भाषा, संप्रेषणीय शैली से युक्त भाषण से श्रोतागण अभिभूत हो जाया करते थे। विप्लव जी को कृषि एवं बागवानी से बेहद प्रेम था। इस क्षेत्र में एक वैज्ञानिक अनुसंधानकर्ता जैसी उनकी प्रयोगधर्मिता अनुकरणीय थी। अनेक किसानों ने उनसे प्रेरणा ग्रहण की। ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर प्रातः भ्रमण उनकी दिनचर्या थी। पशुपालन उनका शौक था। 1968 में उनके राजनीतिक चिन्तन की पुस्तिका ‘लोकतांत्रिक समाजवाद’ प्रकाशित और चर्चित हुई थी। हिन्दी, मैथिली के कवि-कथाकार, लेखकार के रूप में जहां विप्लव जी की प्रगतिशीलता, राष्ट्रीयता एवं क्रान्तिधर्मिता के दर्शन होते थे, वहीं ‘विश्वमित्र’, नवराष्ट्र’, ‘प्रदीप’ आदि के संवाददाता एवं कई स्थानीय पत्रों के सम्पादक के रूप में उनकी निर्भीक पत्रकारिता की धार से कुपात्रों के दिल दहलते रहते थे। सम्पूर्ण कोसी क्षेत्र में कोई ऐसी साहित्यिक गतिविधि नहीं हुई, जिस में कवि, वक्ता, आयोजक, संचालक या सूत्रधार के रूप में उनकी सहभागिता न रही हो। हिन्दी साहित्य सम्मेलन, मैथिली साहित्य परिषद की स्थापना हो या तुलसी, निराला, दिनकर या चन्दा झा की जयन्ती हो, इसमे विप्लव जी की उपस्थिति की अनिवार्यता होती थी। 1933 ई से इनकी लेखनी इन के मृत्यु पर्यन्त तक अनवरत चलती रही। “ प्रत्येक राजनीतिक दल किसी न किसी लेखक को अपना मानता है।दल के आग्रह में पड़ कर वैसे लेखक भी सम्पूर्ण सत्य बोलने से चूक जाया करते हैं। साहित्यिक जिस प्रकार सर्वतंत्र स्वतंत्र हो कर बोलना चाहता है, वह स्वतंत्रता किसी भी राजनीतिक दल को हमेशा अनुकूल नहीं बैठती। यदि राजनीति का सर्वथा त्याग किया जाय तो साहित्य के हाथ से एक कारगर यंत्र छूट जाता है। रास्ता एक ही है कि साहित्यकार राजनीति में जाने पर भी दल से मतभेद होने पर अपनी ही बात कहें। ‘तन सौंपे मन दे नहीं, सती कहावे सोय’। “ – ( साहित्यमुखी, पृष्ठ संख्या 27 ) राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की यह पंक्तियां थोड़े में ही न केवल प्रश्न को सामने रखती हैं बल्कि उस प्रश्न के भीतर के असली संकट को भी उतने ही सीधे से उपस्थित करती हैं। संकट से निकलने का मार्ग भी बताया है। ‘विप्लव जी’ के काव्य के अनुशीलन में हम इन तथ्यों को सामने रखेंगे। कहना नहीं होगा कि कवि रचनाकार साहित्य की इयत्ता के एक अलग स्तर के हिमायती होते हैं। इन के अनुसार ऐसा हो सकता है कि कोई राजनीतिक विचारधारा या नेतृत्व अपनी सीमाओं से टकरा जाय, या अपना अंत पा जाय। लेकिन साहित्य, इस के विपरीत, एक गतिशील सामाजिक ऊर्जा है जिस का प्रवाह समान रूप से अन्तहीन एवं अविछिन्न है ; साहित्य स्वयं क्रान्ति की चेतना की शब्दबद्ध अभिव्यक्ति है। इस तरह ये अपने को क्रान्ति से जन्मतः जुड़ा हुआ मानते हैं। इस का तात्पर्य यह है कि जो कविता युग-चरित्र का प्रतिनिधित्व करती है तथा इस से कहीं आगे उस की क्रान्तिकारी संभावनाओं एवं सार्थक परिवर्तनों को रेखांकित करती हुई उसे रास्ता देती है, वही एक सही कविता कही जाएगी। कविता अपने-आप में गतिशील युग-चेतना का प्रथम शब्द-विस्फोट होती है। वह युग-चेतना को अपने भीतर जितना धारण करती है, उतना ही उसे प्रभावित करती, आगे ढकेलती भी है। कविता में यह गतिशीलता जितनी अधिक होगी, उस की प्रभावकारी क्षमता भी उतनी ही सिद्ध, विकसित, वैज्ञानिक और कारगर होगी। इस लिए जहां तक कविता या सही कविता के नये प्रतिमानों की आवश्यकता, उस की तलाश या उस के प्रयोग का प्रश्न है, मेरे विचार में उन्हें कविता, जीवन और युग-चेतना के इन्हीं गतिशील तत्वों में ढूंढा, पाया जा सकता है। आइए, हम इन तत्वों की खोज करें। कोसी अंचल के छायावादोत्तर कवियों में ‘विप्लव जी’ की गणना ससम्मान होती है। इस युग में राष्ट्रीयता-बोधक गीत पर्याप्त लिखे गये। छायावादोत्तर युग कई प्रयोगों के लिए भी चर्चित रहा। इस अवधि में गीतों को कविता के समानान्तर नई दिशा देने का प्रयास आरम्भ हुआ। अनेक चर्चित कवियों ने गीतों के क्षेत्र में कतिपय प्रयोग भी किए। फिर प्रयोगवाद का दौर शुरू हुआ। किन्तु, इन प्रयोगवादी गीतकारों के नवीन प्रयोगों के बावजूद गीतों में रूप-विन्यास की नीरसता को मिटाया नहीं जा सका। इस के बाद हिन्दी साहित्य मंच पर ‘नयी कविता’ का उदय हुआ और इसी ‘नयी कविता’ के तर्ज पर ‘नयी कहानी’, ‘नव गीत’ आदि का आन्दोलन शुरू हुआ। इस के पूर्व बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ की ‘उर्मिला’, रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की ‘रेणुका’ और गोपाल दास ‘नीरज’ के गीत संकलन प्रकाशित हो चुके थे जिन में परम्परा निर्वाह के साथ राष्ट्रीय भावनाओं एवं समकालीन बोध को भी पर्याप्त अभिव्यक्ति मिली है। स्वतंत्रता के बाद गीत-काव्य का विकास वस्तुतः ‘नवगीत’ से हुआ, जिस के ध्वजवाहक कवियों में राजेन्द्र प्रसाद सिंह, शंभुनाथ सिंह, केदारनाथ सिंह, रामनरेश पाठक, ओम प्रभाकर, गोपीवल्लभ सहाय, सत्यनारायण, गुलाब खंडेलवाल, राजेन्द्र किशोर, शलभ श्रीराम सिंह आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। कोसी अंचल के कवि ‘विप्लव’ भी इसी समकालीन नवगीतकारों की पंक्ति में ससम्मान अपना स्थान बना लेते हैं। वे मूल रूप से गीतकार थे। उन्होंने विविध प्रकार के गीतों की रचना की। उन के गीत मात्र वैयक्तिकता ही नहीं ,समाज, संस्कृति और राजनीति तक भी विस्तार पाते हैं। वैसे अब तक भाव-प्रधान गीतों को ही गीत-काव्य के रूप में चिह्नित किया जाता रहा है, किन्तु गेय कविता भी गीत हैं। अतः ‘विप्लव’ के गीत इन पारिभाषिक तथ्यों से अलग नहीं किए जा सकते। भाषा, भाव, उक्ति-वैचित्र्य, रस-व्यंजना, बिंब, वाह्य एवं आंतरिक संसार का चित्रण, संवेदना, उद्भावना, दुख-दर्द, संत्रास और मानवीय संबंधों को अभिव्यक्ति देने में पूर्ण सक्षम हैं – ‘विप्लव’ के गीत। यही कारण है कि इन के गीत इन सारे तत्वों के समुच्चय हैं। जीवन की अनुभूतियां ही काव्यानुभूतियां हैं। नवगीत के प्रखर गीतकार राजेन्द्र प्रसाद सिंह के शब्दों में – ‘व्यक्तिगत स्वभाव, परिवेशगत प्रभाव और परम्परागत मान्यताओं के अन्तर्द्वन्द्व से अनुभूति की प्रक्रिया में बहता हुआ हृदय जिस मार्मिक समग्रता को संजोते रहता है, उस का आत्मीयतापूर्ण स्वीकार ही गीत का उद्गम है।‘ छायावादोत्तर काल के इस कवि ने विश्वयुद्ध की विभीषिका, परतंत्र देश, समाज में व्याप्त शोषण, आर्थिक विषमता, सामन्तवादी प्रवृतियां आदि को बहुत निकट से देखा है। जो कुछ देखा, अनुभव किया, उसे बड़े ही निश्छल भाव से कोरे कागज पर उतार दिया, वही ‘विप्लव’ की कविता है – कालजयी कविता। वे जीवन, जगत, सौन्दर्य, प्रेम और मानवीय संबंधों के साथ ही भारतीय चिन्तन और संस्कृति पर अधिक केन्द्रित हुए। उन के गीतों के सम्यक अनुशीलन के लिए उन्हें निम्नलिखित खण्डों में विभक्त किया जा सकता है – प्रणय गीत : गीले स्वर मेरे नयनों में आंसू भर-भर आये मेरी स्मृति में आ-आ कर मुझे अतीत रुलाये। जीवन के वे दिन थे कैसे जब सुमनों की कलियां झूम-झूम कर मुझे बुलाती थी करती रंगरलियां नहीं कभी भी सुन पाया था है पतझड़ भी आता केवल याद दिलाने के हित ही बसंत रह जाता समझ न पाया कैसे बीती जीवन की वे घड़ियां अब तो आंखें पिरो रही बस अश्रु कणों की लड़ियां अब हैं दिन बांकी रोने के गीले नयनों, रो लो साक्षी कौन तुम्हारा होगा अन्तर्तम को धो लो उद्बोधन गीत : साथियों, तुम रो रहे क्यों? कौन है उसका सहारा कर्म को जिसने बिसारा सत्य है संसार ही यह तुम अकर्मठ हो रहे क्यों? है नहीं कोई विधाता जो निठल्लों को खिलाता आस की गठरी उठाये मार्ग में तुम ढो रहे क्यों? साथियों, तुम रो रहे क्यों? पर्व गीत : धूम मचाती होली आयी। हरित-भरित पल्लवित धरातल सज्जित वर बसंत ॠतु निर्मल अरुण अधर परिधान हरित ले कलियों की हमजोली आयी धूम मचाती होली आयी। जग को सौरभ-पान कराते अधरों पर मुस्कान दिलाते लाल पराग मेलते मुख पर तरुण सुमन की टोली आयी धूम मचाती होली आयी। मुरझे भी खिल उठे रंग में सरस गीत गाते उमंग में मदहोशों ने पूर्व गमन के आज भंग की गोली खायी धूम मचाती होली आयी। राष्ट्रीय गीत : चले सींचने आज रक्त से हिमगिरि को मतवाले माली चली सूरमाओं की टोली आज खेलने रक्तिम होली लगा शुभ्र मस्तक पर रोली बांध कमर में खंजर-गोली हंस कर चले चढाने साकल आज शीश की भेंट निराली पद्मिनियां चल पड़ी समर में आग लगाने को अंबर में न्योछावर कर सारे गहने चढा भेंट भाई को बहने निकली आज भवानी घर से बन कर रणचण्डी मतवाली जनता ने करवाल संभाली----- आध्यात्मिक गीत : बन्दी शुक लौह पिंजर में फसा शुक है विकल हो छटपटाता कौन जाने किस व्यथा से विश्वपति की रट लगाता? इस दुखद बंदी-दशा में भी दुखद क्यों राग गाता? कौन सा अपराध रे जिस के लिए वह दण्ड पाता? क्या इसी के हेतु ही वह है जगत में जन्म पाता? उड़ निकलने को सदा ही पंख को वह फड़फड़ाता लौह पिंजर में फसा शुक है विकल हो छटपटाता। एवं महानाश का समर छिड़ा है धन जन का यह खेला उठ जावेगा कुछ दिवसों में दुनियां से यह मेला ईश्वर की इस रची सृष्टि में यह कैसा है अन्तर मानव पर मानव का होता क्यों अन्याय निरन्तर प्रकृति गीत : परम मनोहर समय आज का था बसंत का प्रात थी तरंग मालायें लहराती समीर के साथ जहां तहां वे करती थी विचरण हो कर स्वच्छंद गले-गले मिल आज परस्पर लेती थी आनंद एवं सावन घन आओ तृषित धरा तल, नव दुर्वादल चातक चंचल मानव विह्वल नभ मंडल में छाओ बरसो प्रतिपल भर दो भूतल फिर सरिता जल कर दो कल-कल अधिक नहीं तरसाओ पी कर श्यामल क्लिष्ट हलाहल कर दो कोमल सारे जल-थल सुधावारि बरसाओ वसुधा अंचल कर दो शीतल वर दो केवल उज्ज्वल निर्मल अविकल सब हो जाओ आओ, सावन घन आओ शोक गीत : जननी के सूखे अधरों पर सींचे है शोणित की लाली कहां गये वे हमें छोड़ कर उजड़े हुए चमन के माली पल भर भी नहीं रुके आग में थे जो अपने कदम बढाये माता के चरणों पर जिनने हंस-हंस अपने शीश चढाये आज याद कर उन पगलों की मां के मुख पर हास नहीं है शोक-दिवस है आज हमारा, मोद नहीं, उल्लास नहीं है प्रगति गीत : इस सुराज में हम घिसते हैं हम पिसते हैं दो बैलों के संग रात-दिन गर्मी जाड़ों में खटते हैं और मशीनों के धड़धड़ में कान हमारा ही फटता है देह हमारी ही जलती है और इधर हम देख रहे हैं एक ओर मुट्ठी भर साहब खस की टट्टी में बैठे हैं उस ठंढी में और इधर मेरे इस तन में आग लगी है तभी सोचता हूं मैं मन में मेरे वह भगवान कहां हैं ईसा और रहमान कहां हैं और उनका यह इंसान कहां है? कवि ‘विप्लव’ की काव्य-भाषा के तत्त्व का सम्यक विश्लेषण आधुनिक समीक्षकों द्वारा प्रमुख रूप से होना चाहिए था, क्योंकि काव्य-भाषा का प्रयोग, व्याख्या और निर्णय के लिए एक सुनिश्चित और तटस्थ आधार हो सकता है, जिस में समीक्षक के अपने पूर्वाग्रह और व्यक्तिगत रूचि के अनपेक्षित तत्त्व कम से कम मात्रा में रह जाते हैं। रचना की उत्कृष्टता की यह कसौटी सबसे अधिक विश्वसनीय है। ‘विप्लव’ की कविता गेय है, किन्तु अलंकारों से बोझिल नहीं। अलंकारों की उपयोगिता वह अस्वीकार कर चुकी है। काव्य-भाषा का प्रतिमान शेष रह गया है, क्योंकि कविता के गठन में भाषा-प्रयोग की मूल और केन्द्रीय स्थिति है – ‘ कविता उत्कृष्टतम शब्दों का उत्कृष्टतम क्रम है।‘ भाषा के वैचारिक एवं संवेद्य रूपों में यह संवेद्य संवेदना या अनुभूतियों की वाहिनी है। संवेदना की वाहिका या संवेदनात्मक भाषा का एक रूप लयात्मक होता है। भाषा का यही संवेदनात्मक या लयात्मक रूप काव्य-भाषा है। काव्य-भाषा में लय का होना अपरिहार्य है, अनिवार्य है। लय शब्दों का नर्तन है। सुकवि ‘विप्लव’ का सम्पूर्ण काव्य इस कसौटी पर खड़ा उतरता है। उसके शब्द-विन्यास या वर्णों का उच्चारण एक नियमित गति में होता है, जिस से उस में एक विलक्षण और विशेष प्रकार के आकर्षण आ जाते हैं। अतः उनकी सम्प्रेषण शक्ति बढ जाती है। लय के इस रूप और महत्व को हम ‘अतीत’ शीर्षक कविता में देख सकते हैं – गीले स्वर मेरे नयनों में आंसू भर-भर आये मेरी स्मृति में आ-आ कर मुझे अतीत रुलाये…… इसकी दूसरी बानगी ‘सावन घन आओ’ शीर्षक कविता में भी देखी जा सकती है – तृषित धरातल नव दुर्वादल चातक चंचल मानव विह्वल नभ मंडल में छाओ….. गीत में गान-तत्त्व अनिवार्य है। लय एवं सांगीतिकता के कारण गीत कविता से अधिक प्रभावोत्पादक सिद्ध होता है। कविता के समान गीत में भी लय का विशिष्ट स्थान होता है। छंद में लय गति प्रधान होता है, जबकि संगीत में लय स्वर प्रधान होता है। कवि ‘विप्लव’ के सारे गीत लयात्मक हैं और लय संगीतात्मक। उन्होंने ढेर सारे गीत लिखे हैं – सभी संगीत की कसौटी पर कसे हुए हैं। उनकी कविता और गीत का मूल आधार है – लय। इस लय और गति का जो व्यवस्थित और निश्चित नियमबद्ध स्वरूप है – वही सुकवि ‘विप्लव के छंद’ हैं। इनके छंदों की विशेषता यह है कि वे संगीत की व्यापक लहरियों की सृष्टि करते हुए भाव को शब्दों के द्वारा रूपायित करते हैं, जिस के कारण वे सहज ही में स्मरणीय बन जाते हैं। कवि ‘विप्लव’ के सम्पूर्ण काल-खण्ड के काव्य के तीन आयाम मुख्य रूप से सामने आते हैं – 1. राष्ट्रीयता एवं सामाजिकता 2. प्रेम और सौन्दर्य 3. आध्यात्मिकता। इन सभी आयामों का विकास सहज एवं स्वाभाविक है। चीनी आक्रमण के बाद इन की राष्ट्रीय भाव-धारा की अनेक कविताएं मिलती हैं। इन का राष्ट्र-बोध एक मोर्चे पर खड़े सैनिक का राष्ट्र-बोध है – आज राष्ट्र को न कोई स्वांग चाहिए देश के जवान को तवांग* चाहिए (*उस समय ‘तवांग’ शहर पर चीनीयों ने कब्जा कर लिया था) शांतिदूत! शांति है जवान मांगती देख आंख खोल रक्तदान मांगती मांगने से क्या किसी को शांति मिली है शांति की पुकार पर तो भ्रांति मिली है कर्णधार! व्यर्थ आज शांति का नारा भारत के नौजवान तुझे मां ने पुकारा कह दो कि रे, लद्दाख क्या तिब्बत है हमारा हर्ष औ कनिष्क को क्या तुम ने बिसारा भूलते हो ह्वेनसांग, फाहियांग को रे कृतघ्न, धर्म-बुद्ध वर्द्धमान को निश्चय ही डूब के रहेगा तेरा सितारा भारत के नौजवान तुझे मां ने पुकारा….. स्वाधीन कलम वाले कवि ‘विप्लव’ की राष्ट्रीय कविता शौर्य और ऊर्जा से भरी हुई है। इन राष्ट्रीय कविताओं में जागरण, उद्बोधन एवं समय-सन्दर्भ तथा जीवन-संवाद है। चीन के विश्वासघात ने भारत के कवियों को भी आक्रोश से भर दिया था। दिनकर, नेपाली आदि महाकवियों ने कई कालजयी रचनायें लिखी । उन्हें लगने लगा कि शांति और अहिंसा के उपदेश से राष्ट्र की रक्षा नहीं हो सकती। शत्रुओं को उपदेश से नहीं, अस्त्र-शस्त्रों से पराजित करना होगा। ‘विप्लव’ जी की ये कवितायें अपने-आप में एक अस्त्र हैं, जिन में शत्रुओं को पराभूत कर देने की क्षमता है और शोषण-चक्र को ध्वस्त कर देने की शक्ति है। कवि देश की रक्षा के लिए धर्म और जाति से ऊपर उठने की प्रेरणा देता है। कवि की राष्ट्रीय चेतना का यह परिपक्व और प्रखर रूप मिलता है। विप्लव जी के अनेक आलेख एवं कहानियां तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं में छपती रही थी। वे बहुमुखी प्रतिभा के साहित्यकार थे, सधे गीतकार थे। उनका जीवन दर्शन रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, लक्ष्मीनाथ गोसांई और महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित था। वे धर्म को व्यापक और वास्तविक अर्थ में देखते थे। ऐसा ज्ञात होता है कि उन्होंने अनेक प्रमुख धर्मग्रंथों का अध्ययण किया है और उस के आधार पर उन में मौलिक एकता को देखने का प्रयास किया है। उन की दैनन्दिनी (डायरी) में उनके विचार आईने की तरह स्पष्ट होते हैं। वह स्वयं में उन के जीवन दर्शन का जीवन्त अभिलेख है। वे सर्वधर्म-समभाव के सिद्धान्त का जीवन भर निर्वाह करते रहे। वे हिन्दी के प्रति पूर्ण समर्पित थे। राजनीति में रह कर भी उन्होंने साहित्य कर्म को राजनीति से स्पर्श तक नहीं होने दिया। बाद में तो राजनीति को वे एक भार समझने लगे थे। उन्होंने अपने विचार को इस प्रकार व्यक्त किया है। उन की डायरी के पृष्ठों की कुछ बानगी देखें – “राजनीति की यही दुर्गति देख कर समय-समय पर भिन्न-भिन्न प्रकार के विचार मन में आते रहते हैं। कभी इच्छा होती है कि क्यों न राजनीति को छोड़ कर अन्य प्रकार के कार्यों में समय व्यतीत करना चाहिए। राजनीति के अतिरिक्त साहित्य है – खास कर हिन्दी साहित्य, जो अभी भी पीछे पड़ा हुआ है। अन्य भाषाओं की अपेक्षा यह एक गरीब भाषा ही कही जाएगी, क्योंकि अब तक जो प्रयत्न इसे समृद्धशाली बनाने के निमित्त हुए हैं, वे बहुत थोड़े हैं। इसे भारत की राष्ट्रभाषा बनाने के लिए भी काफी प्रयत्न करना पड़ा है, वरना हो सकता था कि यह राष्ट्रभाषा का भी स्थान नहीं ग्रहण कर सकती। खैर, किसी प्रकार यह स्थान तो इसे मिला, किन्तु अब इसकी व्यापकता पर विचार करना आवश्यक है। यदि इस ओर ध्यान न दिया गया और यह संकुचित वातावरण में पलती रही तो न जाने भविषय का क्या होगा?..... आज आवश्यकता है हिन्दी भाषा को जनता की बोलचाल की भाषा बनाने की। नदियां ऊपर की ओर नहीं बहा करती, बल्कि नीचे की ओर ही बहती है। आज सरलता की आवश्यकता हर दिशा में है। संसार का इतिहास बतलाता है कि मानव समाज हर दिशा में सरलता की खोज करता रहा है और आगे भी खोज करता जाएगा। तो हम क्यों न हिन्दी में भी सरल, सुबोध एवं बोलचाल के शब्दों का प्रयोग करें….. मेरे कथन का अभिप्राय यह नहीं कि मैं हिन्दी को हिन्दुस्तानी का रूप देना पसंद करता हूं।…..“ कवि श्री बलेन्द्र नारायण ठाकुर ‘विप्लव’ की डायरी के प्रत्येक पृष्ठ उन के सुलझे हुए विचारों के समुच्चय हैं। उन का जीवन-दर्शन इन पृष्ठों में परिलक्षित होता है। इस सिद्ध-पुरुष ने कोसी अंचल के बाहर भी इसे गौरवान्वित किया। इन्होंने हिन्दी साहित्य को सम्वर्द्धित किया। 24 दिसम्बर, 1984 को इन्होंने अपनी जीवन-यात्रा पूर्ण कर ली। आने वाली अनेक पीढियां इनके बहुमुखी और कद्दावर व्यक्तित्व से प्रेरित और ऊर्जस्वित होते रहेगी। अपनी ओजपूर्ण कविता के लिए “कोसी के दिनकर” एवं सुरीले गीतों की रचना एवं पाठ के लिए “कोसी के केसरी” नाम से चर्चित सुकवि ‘विप्लव’ को इन पंक्तियों के लेखक का सादर प्रणाम निवेदित है। विप्लव जी की रचनाएं ( हिन्दी कविता ) गायक वह नहीं प्रभंजन कहलाता जो किसी-किसी को छूता है। वह शिखर नहीं है पर्वत का जिस पर चढ जाता जूता है॥ वह सागर क्या जिस मे आता हर क्षण भारी ऊफान नहीं। वह मौसम क्या जिस में उठता है प्रलयंकर तूफान नहीं॥ वह पावक क्या जो औरों को अपने-सा नहीं बनाता है। वह जल-कण क्या जो शोलों को क्षण-भर में नहीं बुझाता है॥ वह धनुष नही जिस में होती है प्रलयंकर टंकार नहीं। तलवार नहीं जो निकल म्यान से करती है झंकार नहीं॥ मृगराज नहीं जिस का गर्जन सुन छाती नहीं धड़कती है। वह भुजा नहीं रणभेरी सुन आतुर हो नहीं फड़कती है॥ वह हृदय नहीं जिस में उठती औरों के दुख से पीर नहीं। वह वीर नहीं ललकारों से लग जाता जिस को तीर नहीं॥ वह जीवन भी क्या जीवन है जिस में यौवन का वास नहीं। वह गायक भी क्या गायक है स्वर-सायक जिस के पास नहीं॥ ( 05-11-50, अकबरनगर, भागलपुर) साथियों, तुम रो रहे क्यों? कर्म भूमि महान है जग उद्यमी हित खान है जग प्राप्य है सब कुछ यहां पर व्यर्थ अवसर खो रहे क्यों? साथियों, तुम रो रहे क्यों? कौन है उस का सहारा कर्म को जिस ने बिसारा सत्य है संसार ही यह तुम अकर्मठ हो रहे क्यों? साथियों, तुम रो रहे क्यों? है नहीं कोई विधाता जो निठल्लों को खिलाता आश की गठरी उठाये मार्ग में तुम ढो रहे क्यों? साथियों, तुम रो रहे क्यों? स्वयं तुम हो निज विधाता भाग्य को गढता-बनाता उठ बढो निज कर्म पथ पर नींद में अब सो रहे क्यों? साथियों, तुम रो रहे क्यों? (26-07-1950) दुर्गम पथ साथी, तुम नहीं फिसलना है दुर्गम पथ पर चलना है राह महा यह दुर्गम फिर शूल बिछे पग-पग में कंकड़ पत्थर हैं रोड़े बन रहे यहां डग-डग में मत ठहर, देखना कुछ भी होता अभिशाप यहां पर है खेल नहीं फिर कोई इस जीवन पथ पर चलना साथी, तुम नहीं फिसलना हैं कभी उतरते मन पर बीते जीवन के कुछ क्षण वे मधुर हास बचपन के वे मादक रोदन-गायन करना भौंरों-सा गुंजन मधुमास लिये जीवन में बैठे जग के प्रांगण में तारों पर कभी मचलना साथी तुम नहीं फिसलना आती है फिर मदमाती अलसाती तरुणी बाला लेकर निज अरुण अधर पै यौवन-रस का मद प्याला जी ललचाया करता है उस छलक रहे प्याले पर पीना मत मस्ती में तू होगा तिल-तिल कर जलना साथी, तुम नहीं फिसलना शिशु का मोहक किलकारी भरना, तुतलाना, गाना कम्पित करते वे चुम्बन नन्हें होठों के माना जीवन के मोहक क्षण ये फिर-फिर कर आते रहते है किन्तु नहीं पल-भर भी निज दुर्गम पथ से टलना साथी, तुम नहीं फिसलना। वीणावादिनि मुझ को वर दो गा चुका गीत मैं जीवन भर मादक दो क्षण के सपनों के सोने के दिन वे बीत चले सोये अंचल में अपनो के कड़वे कुछ गीत सुना पाऊं मुझ में तुम ऐसा स्वर भर दो वीणावादिनी मुझ को वर दो। कोयल की कूक नहीं भाती है आज मुझे इन घड़ियों में भौरों का गुंजन कर्कश-सा सुन पड़ता बेड़ी-कड़ियों में लो सुधा छीन मेरे मुख से फिर कालकूट से कर भर दो वीणावादिनी मुझ को वर दो। हैं आंसू सूख रहे जिन के अन्तर्ज्वाला की दाहों से है सुलझ नहीं पायी जिन की ये जटिल समस्या आहों से उन की आहों में मेरा यह घनगर्जन प्रलयंकर भर दो वीणावादिनी मुझ को वर दो। ले अंगड़ाई हिल उठे धरा मुझ में ऐसा भूचाल भरो पानी में आग लगा पाऊं मुझ में वह भीषण ज्वाल भरो हो भस्मसात ये उच्च शिखर मुझ में आंधी-अंधड़ भर दो वीणावादिनी मुझ को वर दो। श्रम करने वालों के बल पर जो यहां आज तक जीते हैं शोषक जो दानव बने हुए मानव के शोणित पीते हैं उन की चिर-प्यास बुझाने को मेरा यह रक्त जहर कर दो वीणावादिनी मुझ को वर दो। मेरी वीणा के तारों को वीणा वादिनी झंकृत कर दो मेरे गीतों की लड़ियों को मानवता से अंकित कर दो जगमग हो जग का ओर-छोर मुझ में वह ज्योति प्रखर भर दो वीणावादिनी मुझ को वर दो। हो सर्वनाश इस संस्कृति का मुझ में ऐसा संहार भरो हो नव-निर्माण पुनः जिस से वह नवजीवन संचार करो केवल लाचारी जीते जो उन के ये गान अमर कर दो वीणावादिनी मुझ को वर दो। (30-07-50) सावन घन आओ सावन घन आओ। तृषित धरातल नव दुर्वादल चातक चंचल मानव विह्वल नभ मंडल में छाओ। बरसो प्रतिपल भर दो भूतल फिर सरिता जल कर दो कल-कल अधिक नहीं तरसाओ। पी कर श्यामल क्लिष्ट हलाहल कर दो कोमल सारे जल-थल सुधावारि बरसाओ। वसुधा अंचल कर दो शीतल वर दो केवल उज्ज्वल निर्मल अविकल सब हो जाओ। आओ, सावन घन आओ। (25-06-50) प्रभाती जाग जाग रे किसान हो रहा विहान है! वक्ष था विशाल विश्व का अभी जो ठोंकता रौंदता रहा प्रकाश को पगों से चांपता हो रहा विहान है कि अंधकार कांपता हांफता है भागता कि मार्ग आज मापता स्वर्ण का प्रभात है कि तिमिर का प्रयाण है। नील गगन विचर रहे मुक्त, नीड़ छोड़ कर पक्षीगण कुलकुल कर बंद द्वार तोड़ कर गीत कोई गा रहा है शब्द जोड़-जोड़ कर उधर सूर्य निकल रहा तिमिर-भाल फोड़ कर लाल-लाल है धरा कि लाल आसमान है। हल-कुदाल हाथ ले खेत में चले चलो तरनि तेज हो रहा कि रेत में बढे चलो कोटि-कोटि आपदों को झेलते चले चलो मेरे रहमान राम सृष्टि को गढे चलो नवयुग के बुद्ध ईसा, करना निर्माण है। आज विकल विश्व है कि दग्ध ओर-छोर है डोलती है आज मही सिन्धु में हिलोड़ है चीख है पुकार है कि हाय-हाय शोर है त्राहि-त्राहि मानव की आज ठौर-ठौर है ध्वस्त-त्रस्त भूमि है कि हो रही विरान है। मानवों के रक्त से ही हो रही है होलियां ठठ्ठरों के साथ आज हो रही ठिठोलियां आह भी निकल सके न बंद रखो बोलियां बरना इन छातियों को छेद देंगी गोलियां कैसी यह सृष्टि है रे कौन सा विधान है? आज शहीदों की चिता धांय-धांय बोलती तख्ती है फांसी की सांय-सांय डोलती आज गरीबों की हाय नब्ज है टटोलती क्रांति अमर है जवान द्वार आज खोलती पशु है क्या मानव भी, प्रश्न यह महान है। विश्व, तुझे एक प्रश्न रे जवान पूछता नेत्र-द्वार बंद हैं, न आज उसे सूझता मानवों के देव, रक्त कौन दनुज चूसता है पिशाच कौन तुझे राह में ही लूटता करना है अश्रुपान या कि रक्त-पान है? क्या न चीर दोगे आज सृष्टि लौह-फाल से क्या न मेट दोगे लिखा मानवों के भाल से खण्ड-खण्ड क्या न करोगे धरा कुदाल से ज्योतित तू सृष्टि करोगे न क्या मशाल से क्या न सींच दोगे आज सूखते जो प्राण हैं? सामने शिला मिले उसे प्रहार फोड़ दो कंटक हो राह में उसे मरोड़-तोड़ दो कर निनाद सप्तसिन्धु को अभी हिलोड़ दो सृष्टि को तू ओर-छोर तक पकड़ झकोर दो लाल-लाल खून है कि लाल यह निशान है। जाग जाग रे किसान हो रहा विहान है। (24-04-50) (मिति 11-06-50 की ‘जनता’ में प्रकाशित) लक्ष्य ये तेज मेरे खोजते हैं उस अधम के भाल को। जिस ने बिखेरा है अभी मा के कसे कच-जाल को॥ हा! कौन है? रे आ निकट! छेड़ा है किसने नागिनी। सोती हुई गजराज –पत्नी को बनाया बन्दिनी॥ किसने पवन के वेग में छींटा यहां अंगार को। है क्या नहीं अब तक सुना वह इस प्रलय-हुंकार को॥ बोलो तनिक! क्यों छिप रहे? हो किस विटप की आड़ में। रे! देख लो है क्या भरा इस वत्स के चिंघाड़ में॥ मैं देखता हूं आज केवल एक तेरा ही गला। लो! छोड़ता हूं तीर यह, तू सोच ले अपना भला॥ (21-02-1943) बन्दी शुक लौह-पिंजर में फंसा शुक है विकल हो छटपटाता। कौन जाने किस व्यथा से विश्वपति की रट लगाता? इस दुखद बंदी-दशा में भी दुखद क्यों राग गाता? कौन-सा अपराध रे! जिसके लिये वह दंड पाता? क्या इसी के हेतु ही वह है जगत में जन्म पाता? उड़ निकलने को सदा ही पंख को वह फड़फड़ाता। लौह-पिंजर में फंसा शुक है विकल हो छटपटाता। वांधवों के साथ था कैसा मधुरमय मुक्त जीवन। सघन वन के मुक्त नभ में वह सुखद-स्वछंद विचरण। देख कर निज वांधवों को उस तरफ से आज आता। हा! लगी आशा उसे है, विनय पालक को सुनाता। छोड़ दे रे नीच! जालिम! क्यों वृथा मुझ को सताता! लौह-पिंजर में फंसा शुक है विकल हो छटपटाता। (25-02-1943) स्वतंत्रता दिवस पर तेरे जन्मदिवस के शुभ अवसर पर कैसे गान करूं? पड़ी बेड़ियां हैं पैरों में, कैसे निकल पयान करूं? इस बंदी-जीवन में क्योंकर तुझ को भेंट चढाऊं मैं? तू ही बोल! इस कठिन समय में कैसे तुझे सजाऊं मैं? मुख है बंद, लगी ताली फिर, आज समय है गाने का। ज्वार उठा है अन्तस्तल में खुल कर मोद मनाने का। फड़क रही रह-रह कर बाहें यह निशान फहराने को। उबल रहा लोहू धमनी में तेरे हित बलि जाने को। देवि! विवश हूं आज, किन्तु अन्तर में वीणा बजती हैं। झनक रही बेड़ियां, करों में कड़ियां खन-खन करती हैं। इन वाद्यों के साथ कफन यह झण्डा नहीं तिरंगा है। मूक-गान गाता हूं दिल से, यही कठौती गंगा है। अस्तु! आज इस विकट समय में इन से ही संतोष करो। अरी! बहुत केहरी जीवित हैं, मुख से एक न आह भरो। वर दे कि फिर नवल रीति से तेरा मैं अभिसार करूं। पिंजर-बद्ध व्यथित जीवन कुछ इस का भी प्रतिकार करूं। (26-01-1943) आंसू जब शक्तिवान दलितों को स्वारथ हित पीड़ा देता असहायों का क्रोधानल जब मौन ग्रहण कर लेता तब तप्त-वारि सा चू कर हूं धैर्य-दान मैं करता पीड़ित के अन्तरतम को कुछ क्षण आलोकित करता रजनी की नीरवता में प्यारे बिन विरहिन भोली जब दीर्घ-स्वांस ले कर के आहों से भरती झोली मैं विरह-ज्वाल से निर्मित बाहर आंखों से आता हो कर कपोल-अबलंबित तत्क्षण की पीड़ा हरता बहुत दिनों के बिछुड़े प्यारे जब फिर घर आते तब प्रेमालिंगन कर के दोनों ही मुझे बहाते मत समझो हूं नन्हा-सा कुछ काल हेतु ही आता थोड़ा-सा खेल दिखा कर फिर झट विलीन हो जाता मैं हूं बेवश की शक्ति युग से संचित होता हूं बलवान, आततायी के दुख का बोझा ढोता हूं अब निकट यहां से सीमा थोड़ा-सा ही चलना है चल कर अतीत के दुख का प्रतिकार अभी करना है मैं हूं सुख का भी साथी दुख का फिर एक सहारा इतने पर भी क्यों कहते लोचन की केवल धारा (05-02-1943) मनोकामना मैं करूं जननि का नाम अमर। बन कर सुपुत्र निज माता का लहरा दूं क्षण में अमर लहर। गौरव अतीत का भी असीम शत शशि की आभा सम निसीम कर रहा शोर उर में महान हा, कैसा है वह भीषण स्वर। हा, मा का सब अपहरण हुआ पा कर मुझ-सा कायर कपूत उस के दिल में है अमिट पीर जो होती निस दिन अजर-अमर। विश्राम काल जब मुझे नहीं क्यों शयन करूं चिर-निद्रा में दुंदुभी बजा अगणित सहास पलटा दूं फिर नूतन अवसर (अपूर्ण) (07-05-1937) साम्राज्यवाद का ताण्डव कर लो ओ साम्राज्यवादियों खुल कर ताण्डव-नर्तन। प्राची में जापान खेलता नर-शोणित से होली और निकलती है प्रतीचि में जर्मन की भी गोली एक-एक को निगल रहा है दनुज रक्त का प्यासा मानवता मिट रही जगत की बचने की क्या आशा हिटलर की आंखों से देखो निकल रही चिनगारी आज उसी की सत्ता छायी युरप में भयकारी तोपों का रौरव होता है श्वेतों के प्रांगण में आज वेदना कसक रही है सकल विश्व आंगन में लूट गया पोलैण्ड नोर्वे वैभव की लिप्सा में लगी आग चेकों-स्वीसों की हरी-भरी आशा में मुसोलिनी हुंकार रहा भुमध्य-सिन्धु के तट से सभ्य पुरातन मिश्र देश भी कांप रहा आहट से अरे कौन इस भग्न कुटी में बीन रहा दाने को छीन रहा कुत्तों के मुख से जूठ-मूठ खाने को इधर विश्व के इस कोने में यह कैसा है क्रन्दन! करलो ओ साम्राज्यवादियों खुल कर ताण्डव नर्त्तन। महानाश का समर छिड़ा है धन-जन का यह खेला उठ जावेगा कुछ दिवसों में दुनियां से यह मेला ईश्वर की इस रची स्रृष्टि में यह कैसा है अन्तर मानव पर मानव का होता क्यों अन्याय निरन्तर लूट-लूट दीनों का वैभव सभ्य कहाते हो तुम चूस-चूस कर अरे शासकों हमें भुलाते हो तुम एक ओर नरबली देते हो नाजी! तुम निज कर से और इधर हम चुप बैठे साम्राज्यवाद के डर से कौन कहे, है इन दोनों में किस प्रकार का अन्तर है खूबी नाजी में या साम्राज्यवाद है सुन्दर संभलो हे साम्राज्यवादियों छिपा नहीं कुछ तेरा उजड़ जायेगा तेरा भी अब इस दुनियां से डेरा शोषक औ शोषित का अन्तर मिट जावेगा क्षण में होगा फिर आनन्द तभी से भूतल के कण-कण में वक्षस्थल होगा विदीर्ण तब सुन जन का नव-गर्जन कर लो ओ साम्राज्यवादियों खुल कर ताण्डव नर्त्तन। (15-11-1942) किसानों के प्रति रे ! विश्व-विटप के जीवन-धन ! तू स्वार्थरहित धन के समान। दिन-रैन रक्त से सींच-सींच कर दिया किसे जग में महान। * तेरा ही सींचा लघु पौधा अब तरुणाई पा लचक रहा मद-प्रसून के सहज भार से है तेरे सर पर सचक रहा * चरमहीन है अस्थि बची यह तन-रक्त पिला बेरहमों को वितरण कर के निज सुख सौरभ क्या समझा था कुछ मरमों को * तेरी करनी से काक हुआ महिमण्डल-मानस का कराल अब झूम रहा है मस्त बना बेफिक्री से वह ताल ताल * जब अग्नि स्वार्थ की भभक उठी तो इस में क्या है जरा नहीं हो मौन गहे सदियों से तुम क्या दिल अब तक भी भरा नहीं * कुछ तो अतीत का ध्यान करो तेरी कैसी थी शान यहीं होता था नृप के महलों तक तेरे ही यश का गान यहीं * यह अविराम परिश्रम करने पर भी अब क्यों हो सुखी नहीं अच्छे भोजन को कौन कहे पर मिलती रोटी रूखी नहीं * शिशिर-रात की कठिन शीत में पल भर तुझ को आराम नहीं हृदय कांपता जाड़े से पर है चिथड़े का भी नाम नहीं * रे ! यह सोने का समय नहीं तू अब उठ कर अंगड़ाई ले हो भूचाल अभी इस क्षण ही और-------की कील हिले * जो निज पद से हैं चांप रहे इस दीन-दशा में भी तुझ को रण में दहाड़ कर आगे बढ निज शक्ति दिखा दो अब उनको * भोले किसान ! अब देरी क्यों? तू रूप धरो सब से विशाल बन जा तू ऐसे अवसर पर अपने अरियों का व्याल-काल * फिर नूतन रचना कर जिस में हो भेद-भाव का नाम नहीं प्रेम-रज्जु में गुंथे रहें सब हो फूट-बैर का नाम नहीं। (07-07-1939) तरंग मालायें परम मनोहर समय आज का था वसन्त का प्रात। थी तरंग मालायें लहराती समीर के साथ। जहां तहां वे करती थीं विचरण हो कर स्वच्छंद; गले गले मिल आज परस्पर लेती थीं आनन्द। किरणवाल भी कई उसी क्षण आईं उनके पास बोली- ‘दोगी हमें खेलने। करके आईं आस’। बोली तब तरंगमालायें नवागन्तुका जान ‘आओ बहिन! परस्पर मिल कर खेलें, हों गतिमान’। लगी खेलने तब से निस दिन अधिक नेह में डूब; रहती हुई बहुत दिनों तक बढा मेल जब खूब कहा एक दिन किरणवाल ने पकड़ एक का हाथ- ‘चलो बहिन, तुमलोग खेलने आज व्योम तक साथ सब कोई मिल मौज उड़ायें, करें गगन की सैर चली चलो, मत देर लगाओ, बढो, उठाओ पैर’ सब ललचाने लगी उसी दम जाने की सुन बात ‘चलो बहिन---------------------------------- बोली एक सयानी-‘सुन लो मेरा भी प्रस्ताव यहीं खुशी से खूब खेल लो, वहां नहीं तुम जाव’ झल्ला उठी दूसरी इस पर, बोली-‘है क्या लाज? हम सब चलें घूमने मिल कर साथ बहिन के आज’। सब कोई तब किरण-यान पर चढी गयी आकाश घूमी खूब वहां पर जा कर जैसा था अवकास पुनः दूसरे दिवस गिरीं वे बनी हुई थी ओस बूंदें जहां-तहां बिखरी थीं, करती थीं अफसोस किरणवाल फिर आज व्योम से उतरी उनके पास बोली-‘आज बहुत सुन्दर हो, क्यों नहीं करती हास!’ सुन कर बातें वाल किरण की बोली बूंदें-‘वाह! तुमने ही तो हमें भुला कर ऐसी गति की, आह! हम थीं भली यहीं पर रह कर एक साथ, था प्रेम अब तो नाश एकता का है, टूट गया सब नेम’ रोने लगीं सभी यह कह कर, खाने लगी पछार यही नतीजा है लालच का, कर लो खूब बहार! (28-02-1943) कवि से – कवि, तुम उन के गीत सुनाओ! अश्रु बिन्दु के दो कण कवि तुम उनकी स्मृति में ढुलकाओ। खिले कुसुम बहुतों ने उन पर निज श्रद्धा के फूल चढाये अपनी अमर तुलिका से बहुतों ने उन के चित्र बनाये जो अधखिली रही कलियां अथवा खिल कर जो हैं मुर्झाये काल-चक्र के कुटिल थपेड़ों में पड़ जो खिलने नहीं पाये हैं विस्मृति के तिमिर-पुंज में जिन की वे अतीत गाथायें कवि, तुम उन की मधुर स्मृति में निज कविता के दीप जलाओ। कवि, तुम उनके गीत सुनाओ! स्वप्नों में भी नहीं ध्यान लोभी भौंरों की ओर दिया था ललचाये नैनों से जल कर जिसने मुख को मोड़ लिया था जान न पायी दुनियां जिन को निर्जन वन में छोड़ दिया था महाप्रबल वायू के झोंकों ने जिन को झकझोर दिया था असमय में ही लता कुंज से निठुर करों ने तोड़ लिया था कलम नोंक से बिन कर कवि तुम उनके फिर से हार बनाओ कवि, तुम उन के गीत सुनाओ! रोटी के दो टुकड़ों तक ही जिन का यह संसार रहा है नन्हा बालक सम्मुख में कर जिन के हाहाकार रहा है आंसू जिन के सूख गये हैं अन्तर्ज्वाला की दाहों से नहीं भूख की जटिल समस्या सुलझ सकी जिन की आहों से प्रतिभा फैल न पायी जिन की, चले गये अपनी राहों से सरस लेखनी कर में ले कर कवि तुम उन के छन्द बनाओ कवि, तुम उन के गीत सुनाओ! युग-पुकार पर बढ कर आगे पैर न पीछे दिखलाये हैं बिना मूल्य मांगे ही भालों से छाती को छिदबाये हैं सूखी-सी स्वातन्त्र्य लता को सींच खून से पनपाये हैं अपने शीश चढा शाकल पर मन की माला बनबाये हैं दुरूह पथों में स्वयं मिट कर जो मंजिल जग को दिखलाये हैं धूल कणों से उन्हें उठा कर कवि तुम अब इतिहास रचाओ कवि, तुम उन के गीत सुनाओ! जिन पगलों की होली ने निज शोणित से स्नान किया है होली खेली है गोली से, घूंट लहू का पान किया है अपने घर को जला स्वयं जो इन्कलाब का गान किया है जग की ममता छोड़ जिन्होंने जीवन को बलिदान किया है अमर शहीदों की टोली का कवि तुम जय-जयकार मनाओ कवि, तुम उन के गीत सुनाओ! दिल्ली चले चलो, दिल्ली चले चलो तरुण, आज हिन्द तुझे है पुकारता नगपति का शैल श्रृंग है दहाड़ता सिन्धु हिन्द लहरों को है उछालता मलय पवन आज तुझे है धिकारता नौजवान, वेग से बढे चले चलो। दिल्ली चले चलो, दिल्ली चले चलो! आज शहीदों की चिता बोल रही है झांसी की रानी पट खोल रही है कर में ले विष को वह घोल रही है शक्ति आज तेरी वह तोल रही है रे जवान! आज प्राण-प्राण तोल लो। दिल्ली चले चलो, दिल्ली चले चलो! देहली है खून लाल-लाल मांगती कुतुब की मीनार मुण्डमाल चाहती कब्रों में बेगमें दहाड़ मारती युवक, तुझे आज है ‘जामा’ पुकारती ‘क्रान्ति अमर है’- जवान बोलते चले चलो। दिल्ली चले चलो, दिल्ली चले चलो! सामने शिला मिले प्रहार फोड़ दो कंटक हो राह में उन्हें मरोड़ दो कर निनाद सप्तसिन्धु को हिलोड़ दो लाल किले की किबाड़ आज तोड़ दो शीश दे जवान आज मुक्ति मोल लो। दिल्ली चले चलो, दिल्ली चले चलो! चलो रे जवान आज नव उमंग ले बढो रे जवान आज नव तरंग ले चढो दुर्ग पै जवान नव तिरंग ले मरो रे जवान आज नवल जंग ले अंग-अंग में शहीद रंग घोल लो। दिल्ली चले चलो, दिल्ली चले चलो! जीवन-दीप साथी! चार घड़ी जलना है। बीत गयी दो घड़ी निशा यह और घड़ी दो का चलना है हो प्रकाश इस निविर अमा में, इसी हेतु हम गये जलाये मन्द-मन्द जल रहे आज क्यों अपने सब अरमान छिपाये बेला है दो पहर सामने, बाद इसी के तो टलना है साथी! चार घड़ी जलना है। एक बार इस महारात्रि में चकमक कर हम सभी उठेंगे क्या भविष्य का ठौर, नेह जब सारे हम से बीत चुकेंगे चल देना होगा बे-मन का, यह दुनियां ऐसी छलना है साथी! चार घड़ी जलना है। दो बिखेर वह ज्योति जगत में यौवन के इस प्रथम प्रहर में निखरे दिग-दिगन्त, तम भागे, ज्योति पुंज की एक लहर में भूले, भटके, दीन पथिक को राह पकड़ ही तो चलना है साथी! चार घड़ी जलना है। शोक-दिवस यह कैसा उल्लास आज जग के इस कोने निर्जन में कैसी यह स्वर लहरी गूंजी मानव के करुणा क्रन्दन में कड़ियां टूटी है जननी की या दो टूक हुई है छाती चकित मौन कवि सोच रहा है, सहसा कलम आज रुक जाती यह उत्सव या शोक घड़ी है, पाये शत-शत अरमानों से भींगे हैं अंचल जननी के अब भी अगनित बलिदानों से छिना आज लाहौर भगत का और बोस का बंग छिना है छिना प्रान्त सीमा पठान का और पंचनद अंग छिना है गुरू गोविन्द सिंह, रणजित के अमृतसर की शान छिनी है नानक के अविरल प्रयास पर भी सिखों की जान छिनी है आज कहां है सिन्ध हमारा सिल्हट बलुचिस्तान कहां है अंग-अंग खण्डित जननी के, प्यारा हिन्दुस्तान कहां है वे अतीत के स्वर्ण खनित स्मृति के सभी निशान मिटे हैं जलियांवाला की बुलबुल के कितने वे बलिदान मिटे हैं माता के प्राणों से प्यारा शेखर वह आजाद कहां है राजगुरू, सुखदेव, डींगरे सा यौवन उन्माद कहां है जननी के सूखे अधरों पर सींचे है शोणित की लाली कहां गये वे हमें छोड़ कर उजड़े हुए चमन के माली पल भर भी नहीं रुके आग में थे जो अपने कदम बढाये माता के चरणों पर जिन ने हंस-हंस अपने शीश चढाये आज याद कर उन पगलों की मा के मुख पर हास नहीं है शोक-दिवस है आज हमारा, मोद नहीं, उल्लास नहीं है (15 अगस्त,1947 को औपनिवेशिक दिवस पर लिखित) आजादी या बर्बादी यह आजादी नहीं, देश की बर्बादी है! ब्यालीस में भूडोल हुआ था सारी दुनियां डोल उठी थी खून हिन्द का खौल रहा था दुश्मन का दिल धड़क रहा था सारी फौजें तड़प रही थीं किस के बल पर ? कदम बढा कर जान लड़ा कर घाम बहा कर गोली खा कर हिम्मत की थी मिहनत की थी हम ने। डाक, तार और रेल जला कर कचहरियां-थाने जब्ती कर घोर दमन-भट्ठी में जल कर जेलों में चक्कियां चलाई थीं हम ने या किस ने ? पुलिस आयी, फौजें आयी, गोरे और बलूची आये घर में मेरे आग लगा कर खूब शान से ताप रहे थे और तुम पूंजीपतियों! भीगे बिल्ली के जैसे छिपे हुए थे नहीं नहीं तुम उन्हें मदद कर हमें पिटाया, जेल दिलाया कुटिया में फिर आग लगा कर महलों में से झांक रहे थे हां, झांक रहे थे जी-हुजूर की झड़ी लगी थी सिटपिट करते दूम हिलाते उन गोरे चमड़ों के आगे। और विश्व में युद्ध छिड़ा जब! हम भूखे थे हम नंगे थे आग लगी थी लपटें उठीं और सारा बंगाल जला था। मानवता का नग्न-नृत्य था मातायें भूखी-नंगी थीं बच्चे इनके तड़प रहे थे इन की खातिर युवती इज्जत बेच रही थी चौराहे पर हाथ पसारे दो पैसों में तुम जैसों में। और तभी तो पैसे तुम ने खूब कमाये हमें जला कर हमें रुला कर बहनों की इज्जत लुटबा कर। और आज! देश आजाद हुआ है ब्रिटिश हुकूमत भाग गयी है भारत को दो टूक बना कर तुम महलों में से निकल रहे हो अपनी सारी लाज गंवाये। तुम कहते हो – देश हमारा। देशभक्त तुम नये बने हो खादी की टोपी को पहने कांग्रेस के फिर मेम्बर बन कर। और आज क्या भूल गये हो कल तक जूते चाट रहे रहे थे गोरों के तुम टाट बने थे अवसरवादी पूंजीपतियों ! लाज नहीं आती क्या तुम को ? जुल्मी! फिर तुम आज चले हो हमें सताने हमें मिटाने हम गरीब के खून बहाने गोली ले कर गोले ले कर भाले औ बर्छी को ताने। याद रखो हम नहीं मिटेंगे नहीं हटेंगे सीना खोले डटे रहेंगे अपने हक पर अपने बल पर अपने पथ पर। ऊंचे पर्वत को काटेंगे गहरे गढ्ढों को पाटेंगे फिर से यह सम्पति बांटेंगे दलितों के अरमान पुराने नव-युग का निर्माण करेंगे। मिट जायेगी तेरी हस्ती तेरी मस्ती यह बुनियाद पूंजीवाद। होगा फिर से जनता-राज कृषक और मजूरों का राज भारत होगा तब आजाद। हमें चाहिये वह आजादी। यह आजादी नहीं, हमारी बर्बादी है। अगस्त यह अगस्त है नहीं, क्रांति की ज्वलित शिखा है जिस के उर पर शोषित मानव का विप्लव इतिहास लिखा है। यह इतिहास लिखा है जिस में कोटि-कोटि मानव की आहें निकल पड़ी थी चिनगारी बन महाप्रलय की ज्वालामुखी दबी सदियों की फूट उठी थीं अंगड़ाई ले बहुत दिनों पर। हां, फूट उठी थी वह ज्वालामुखि दबी हुई थी जो सदियों से कभी जवानों की छाती में। कभी इसी ने सिगनल दी थी भरी सभा में नवागमन की भगत सिंह के विस्फोटों से। राजगुरू, सुखदेव और बटुकेश्वर दत्त ने जता दिया था धता बता कर सम्हलो, सम्हलो, अरे पिशाचों ! लपट उठी थी सब से पहले बम्बई से ही हम ने नारा जहां लगाया – ‘ऐ अंग्रेजों, भारत छोड़ो !’ साथ लपट के धुआं उड़ा था औ फिर वह तूफान उठा था इसी हिन्द में। निकल पड़े थे शेर तोड़ कर तभी गुलामी के पिजड़े को मर-मिटने अपनी इज्जत पर। तोड़ गुलामी चली जवानी सन-सन करती झन-झन करती जर्रा-जर्रा दहल उठा था। निकल पड़े थे सभी घरों से जच्चे-बच्चे दुबले-पतले लम्बे-तगड़े जल मरने को इसी आग में। इसी आग ने महल जलाया था गोरों का, अध-गोरों का ले कर भाला, ले कर बर्छी, ले कर लाठी, ले कर डण्डा। इसी लहर ने किस को तोड़ा, किस को फाड़ा छीना-झपटा, मारा-पीटा औ कितनो को आग में झोंका, याद नहीं है। इसी लपट ने किस को खींचा किस को फेका बन्द कोठरी से जंगल में बियाबान में जल मरने को जयप्रकाश को, पटवर्द्धन को अरुणा, लोहिया, रामनन्दन को चढी जवानी में मिटने को। इसी लिये तो यह अगस्त है नहीं, क्रांति की ज्वलित शिखा है जिस के उर पर शोषित मानव का विप्लव इतिहास लिखा है। और एक दिन यह अगस्त आया फिर जिस में मिस्टर जिन्ना ने भिन्ना कर ललकारा सारे समाज को – डाइरेक्ट एक्शन करो हिन्द में। गूंज उठा मजहब का नारा – पाकिस्तान जिन्दाबाद! मुस्लिम लीग जिन्दाबाद! खतरे में इस्लामी मजहब रक्षक जिन्ना जिन्दाबाद! शोर उठा फिर एक ओर से – हम हिन्दू हैं दबने वाला कौन यहां है आ जाओ गर तुम्हें शौक हो। और हिन्द का खून बह चला मा-बहनों की लाज बह चली कहां गुलामी ? कहां गरीबी ? किस की चिन्ता ? सर पर चढ कर बोल रहा था वह मजहब का भूत बना जो और घी के दीये जले हुये थे जिन्ना साहब की कोठी में और नाच का रंग जमा था इन महलों में नब्बाबों के और इधर फूसों के छप्पर धधक रहे थे अपने हाथों घर में अपने आग लगा कर मा-बहनों की लाज लूटने ये हत्यारे भटक रहे थे। यही नृत्य था नब्बाबों का जमींदार पूंजीपतियों का इन कंकालों की हड्डी से मजहब के पर्दे में बैठे। इसी लिये तो हम कहते हैं यह अगस्त है नहीं, क्रांति की ज्वलित शिखा है जिस के उर पर शोषित मानव का विप्लव इतिहास लिखा है। और साल भर बाद झूमता यह अगस्त आया फिर देने हम को यह कैसी आजादी ! पाकिस्तान मिला जिन्ना को पूरा हुआ अरमान तभी इन नब्बाबों का, कठमुल्लों का और हिन्द का जिगर कट गया। हां, आजादी तो मिली किन्तु है नहीं हमारी जिस ने यह कुर्बानी की थी खून-पसीना एक किया था। यह आजादी है चेट्टी की मामा औ गिरिजाशंकर की उन दिनों में बड़ी खुशी से अंग्रेजों का साथ दिया था। और हमें क्या मिला इनाम ? भूखों मरना, जिल्लत सहना कभी तड़पना, कभी विलपना फटे हाल दर-दर का फिरना हमें मिला है यही सुराज ! इस सुराज में हम घिसते हैं हम पिसते हैं दो बैलों के संग रात-दिन गर्मी-जाड़ों में खटते हैं और मशीनों के धड़धड़ में कान हमारा ही फटता है देह हमारी ही जलती है। और उधर हम देख रहे हैं एक ओर मुट्ठी भर साहब खस की टट्टी में बैठे हैं उस ठंढी में और इधर मेरे इस तन में आग लगी है। तभी सोचता हूं मैं मन में मेरे वह भगवान कहां हैं ? ईसा और रहमान कहां हैं ? और उनका यह इन्सान कहां है ? औ मेरे ही लिये बना क्या सारा मजहब, मन्दिर-मस्जिद यह भगवान, यह रहमान यह चिर-आशा, यह संतोष ? मेरे तन में आग लगी है हड्डी-पसली धधक रही है चटक रही है और लपट है बढती जाती। यही लपट क्या जला न देगी इन महलों को इस झूठे मन्दिर-मस्जिद को इस झूठे रहमान-राम को और इसी के चिता-भस्म से क्या न बनेगा नव-संसार ? वह संसार, रहेगा जिस में कोई न भूखा, कोई न नंगा कोई न दुर्बल, कोई न निर्बल और अकिंचन या बेकार। नहीं निशान मिलेगा जिस में इन धनियों का जमीन्दार, पूंजीपतियों का कठमुल्ले मजहब वालों का। हां, वह संसार, बसेगा जिस में स्वर्ग उतर इस मानव हित में और रहेगा नहीं देव और दानव का झूठा व्यवहार। औ होगी चिर-शान्ति विश्व के इस कोने से उस कोने तक। अभी दूर दिल्ली वह अपना और अभी तो सुख है सपना एक बार फिर से है तपना जाग जाग रे शान्ति पुजारी आज हिन्द के एक जंग फिर से है लड़ना दानवता से आओ सब मिल यही मनायें आओ अगस्त फिर से भूतल पर यह हमारी एक तृषा है यह अगस्त है नहीं, क्रान्ति की ज्वलित शिखा है जिस के उर पर शोषित मानव का विप्लव इतिहास लिखा है। तुलसीदास आज अंधकार है कि सूर्य अस्त हो गया निखर अतीत के दिवस महा प्रकाश पुंज में विलीन हो गये कराल काल के निकुंज में गूंजती है रागिनी पवित्र राम राज की कल्पना उतर रही है मूर्ति में स्वराज की दामिनी हो कौंध कलाकार स्वयं खो गया आज अंधकार है कि सूर्य अस्त हो गया काव्यकुंज कोकिल बन राष्ट्र को जगा गया बिलोक व्याप्त तिमिर पुंज विश्व से भगा गया ब्याकुल कर कविता को व्यथित कला छोड़ कर कलाकार विलप रहे, प्रेमरज्जु तोड़ कर सप्तमी है सावन की तुलसिदास खो गया आज अंधकार है कि सूर्य अस्त हो गया (तुलसी जयन्ती, 1949 के अवसर पर रचित) गरल-पान करेगा कौन गरल यह पान ? अरे, यह देवासुर संग्राम मचा है युग से हाहाकार चली यह धरा मथन गति तीव्र हो रहा यह भीषण संहार घुट रहे जीव-जन्तु के प्राण करेगा कौन गरल यह पान ? हो चली सभी दिशायें त्रस्त विकल हो सभी कमठ अटि कोल भग रहे वसुन्धरे को छोड़ धरा यह रही डगमगाडोल सुनो लो यह प्रचण्ड आह्वान करेगा कौन गरल यह पान ? उमड़ कर सागर पारावार चतुर्दिक ओर-छोर झकझोर त्रसित कर धरा और आकाश रहा है जल, थल सभी हिलोर करेगा कौन कहां कब त्राण ? करेगा कौन गरल यह पान ? अर्थ के पूत महामन्दार घोंट जनसागर महाविशाल रहे हैं कालकूट दुर्द्धर्ष विदारित कर उर आज निकाल जर्जरित निःसंबल बलवान करेगा कौन गरल यह पान ? हां, चली धरा मथन गति तीव्र निकलता कालकूट विषराज जर्जरित यह सारा संसार अरे, इस गरल-पान को आज चाहिये नीलकण्ठ भगवान करेगा कौन गरल यह पान ? कहां हैं नीलकण्ठ भगवान तनिक तुम खोजो तो कैलाश वृथा क्यों भ्रमित फिर रहे आज निकट में ही तो तुर्य प्रकाश छिटकता सारा विश्व महान करेगा कौन गरल यह पान ? अरे, यह जय प्रकाश ही आज धरा पर नीलकण्ठ अवतार शोषितों का चिर-परिचित देव हुआ अवतीर्ण देख भू-भार क्रांति का अग्रदूत बलवान करेगा वही गरल यह पान पुनः इस गरल-पान के बाद मथन होगा सारा संसार अरे, इस जीर्ण-शीर्ण प्राचीन विश्व का होगा फिर संहार करेगा नव श्री यही प्रदान करेगा कौन गरल यह पान ? अरे, यह सुख-दुख का संसार कभी पतझड़ है कभी बसन्त यही है नियत नटी के खेल जिसी की आदि उसी का अन्त कभी अभिशाप कभी वरदान करेगा कौन गरल यह पान ? किन्तु, युवकों, रहना तैयार मथन करने जर्जर संसार धुसरित करने ऊंचे शैल वज्र ले कर प्रचण्ड प्रहार अरे, कुछ सीखो तो बलिदान करेगा कौन गरल यह पान ? बनोगे क्या तुम भी तूफान ? बनोगे क्या तुम भी तूफान ? तो आओ चलो हमारे साथ विश्व के सारे बन्धन तोड़ प्रलय पथ को करने स्वीकार पुरातन की यह ममता छोड़ रहे हो अचल, बनो गतिवान बनोगे क्या तुम भी तूफान ? प्रकम्पित करते धरणि आकाश हहरते चलो दिशा झकझोड़ तोड़ने डाल पत्र प्राचीन उच्च तरु को तुम तोड़-मरोड़ सुनाते जग को विप्लव गान बनोगे क्या तुम भी तूफान ? उड़ाते दलित-धूल नभ बीच कराते उन में भीषण क्रान्ति खेलते मद्यनाश के फाग तभी तो होगी वह चिर-शान्ति जहां होगा नूतन निर्माण बनोगे क्या तुम भी तूफान ? अरे जड़, उठो, चलो, क्यों मूक बने हो आज किसी के भृत्य नहीं क्या जीवन है वह सत्य बने जो संघर्षों में नित्य विकल हैं आज विश्व के प्राण बनोगे क्या तुम भी तूफान ? (मिति 11 और 12 जून, 1950 के भयंकर तूफान के अवसर पर लिखित) साथियों से साथी, तुम नहीं फिसलना है दुर्गम पथ पर चलना है राह महा यह दुर्गम फिर शूल बिछे पग-पग में कंकड़ पत्थर हैं रोड़े बन रहे यहां डग-डग में मत ठहर, देखना कुछ भी होता अभिशाप यहां पर है खेल नहीं फिर कोई इस जीवन-पथ पर चलना हैं कभी उतरते मन पर बीते जीवन के कुछ क्षण वे मधुर हास बचपन के वे मादक रोदन गायन करना भौंरों सा गुंजन मधुमास लिये जीवन में बैठे जग के प्रांगण में तारों पर कभी मचलना आती है फिर मदमाती अलसाती तरुणी बाला लेकर निज अरुण अधर पर यौवन-रस का वह हाला जी ललचाया करता है उस छलक रहे प्याले पर पीना मत मस्ती में तू होगा तिल-तिल कर जलना शिशु की मोहक किलकारी भरना, तुतलाना, गाना कम्पित करते वे चुम्बन नन्हें होठों के माना जीवन के मोहक क्षण में फिर-फिर कर आते रहते है किन्तु नहीं पल भर भी निज दुर्गम पथ से टलना साथी, तुम नहीं फिसलना है दुर्गम पथ पर चलना। (26-07-1950) जनता ने करवाल संभाली जगी हुई ही नहीं बल्कि है जनता ने करवाल संभाली! चले सींचने आज रक्त से हिमगिरि को मतवाले माली। चली सूरमाओं की टोली आज खेलने रक्तिम होली लगा शुभ्र मस्तक पर रोली बांध कमर से खंजर-गोली हंस कर चले चढाने शाकल आज शीश की भेंट निराली। पद्मिनियां चल पड़ी समर में आग लगाने को अम्बर में न्योछावर कर सारे गहने चढा भेंट भाई को बहनें निकली आज भवानी घर से बन कर रणचण्डी मतवाली। बच्चे भी आ गये रंग में लेने को प्रतिशोध जंग में बाल-सिंह कर मसल रहे हैं ओठ दांत से कुचल रहे हैं चले पोतने चाऊ के मुख आज खेल में स्याही काली। आज खेत-खलिहान बना रण जूझ रहे मिट्टी से क्षण-क्षण जर्जर साठ बरस के भी जन जगा रहे मिट्टी के कण-कण चला रहे दोनों हाथों से तेज घाम में आज कुदाली। घन से पत्थर तोड़ रहे हैं ईंट-ईंट से जोड़ रहे हैं भेद-भाव के नाम भुलाते गीत एकता के नव गाते आज श्रमिक भी बढे सजाने नूतन निर्माणों की थाली। भामाशाह सेठ की थैली आज खुली है बिखरी-फैली भिखमंगे तक जुटे हुए हैं देश-प्रेम में लुटे हुए हैं एक जून खा कर भी जिस ने अपनी सब सम्पति दे डाली। आज गोलियों की बौछारें उगल रही नभ में अंगारें अरे संगीनों की झनकारें सीमा पर देती ललकारें चाऊ, तुझे चबा डालेंगे गर तुम ने फिर जीभ निकाली। जगी हुइ ही नहीं बल्कि है जनता ने करवाल संभाली। (चीनी आक्रमण के बाद 1962 में) (दिनकर जी की ‘जनता जगी हुई है’ शीर्षक कविता पढने के बाद विस्तृत रूप देकर रचित) हिमालय की पुकार अश्रुनयन आज हिमालय ने पुकारा। भारत के नौजवान, तुझे मा ने पुकारा। शान्तिदूत! शान्ति है जवान मांगती देख आंख खोल रक्तदान मांगती मांगने से क्या किसी को शान्ति मिली है शान्ति की पुकार पर तो भ्रान्ति मिली है कर्णधार! व्यर्थ आज शान्ति का नारा। कह दो कि रे लदाख क्या तिब्बत है हमारा हर्ष औ कनिष्क को क्या तुम ने बिसारा भूलते हो ह्वेनसांग फाहियांग को रे कृतघ्न, धर्म-बुद्ध वर्द्धमान को निश्चय ही डूब कर रहेगा तेरा सितारा। देश है प्रताप का यह भूलना नहीं कुछ देर की इस जीत से तू फूलना नहीं मरते हैं यहां आदमी मूंछों की शान पर निमुछिये चीनी, रहे हो खेल जान पर ईंच-ईंच पर बहेगी खून की धारा। मरती हैं यहां नारियां भी बात-बात पर जलती है चिता जौहर की हाथ-हाथ पर ‘बादल’ यहां अनेक हैं तो लाख हैं ‘गोरे’ जान हथेली पै लिये चलते हैं छोरे छोड़ कर लदाख को लग जाओ किनारा। खेलना न आग से चीनी अफीमची केशरी जगा है तू करना न ‘चाउ’ ची पड़ती नहीं सुनाई तुझे क्या दहाड़ है हिल रही है आज धरा, क्या पहाड़ है चाह्वान* आ गया, न त्राण तुम्हारा। आज राष्ट्र को न कोई स्वांग चाहिये देश के जवान को तवांग** चाहिये केक-बिस्कूट नहीं, राख चाहिये घास खायेंगे मगर लदाख चाहिये आज तुझे मानसरोवर ने धिकारा। शक्ति के दबाव से हरगिज न झुकेंगे गोलियों के सामने भी हम न रुकेंगे हट जाओ हिमालय से, अरे! खून पी लेंगे सूई की नोंक भर की जमी भी न हम देंगे युग-युग से रहा है यही सिरमौर हमारा। (* उस समय चाह्वान/चौहान नये प्रतिरक्षा मंत्री के रूप में मेनन के स्थान पर आ गये थे ** उस समय तवांग शहर पर चीनियों ने कब्जा कर लिया था) दीपावली संध्या *** कैसी आज दिवाली आयी! नीरवता को मार भगाने। तमाच्छादिता अमा सजाने॥ दीपों की माला उर पहने संध्या आज निराली आयी। चकमक करती दीप-शिखायें। ज्योतित करती अखिल दिशायें॥ शैशव के इस मधुर क्षणों में चंचलता मतवाली लायी। आपस में ये उलझ रही हैं। बिगड़-बिगड़ कर सुलझ रही हैं॥ इस उलझन में ही भविष्य की रेखा उजली काली छायी। मध्य रात्रि *** अगणित ये दीपक जलते हैं! मिट्टी के सुन्दर बने हुए। हैं पूर्ण स्नेह से सने हुए॥ जगमग करते ये ओर-छोर कितनी तेजी से बलते हैं। लाखों हैं आते परवाने। कुछ पगले हैं, कुछ दीवाने॥ दीप-शिखा पर मर मिटने अल्हड़ से आज मचलते हैं। यौवन का उद्याम प्रहर है। मन की मस्ती एक लहर है॥ झंझावातों से हिलोर ले कितने इन में ढलते हैं। शेष रात्रि *** दीप की लौ टिमटिमाती। स्नेह कुछ ही शेष है अब। बर्तिका भी लेश है अब॥ जल रही निष्प्रभ अमा में श्रान्त हो कुछ कर न पाती। उठ गये दिल पर फफोले। आह तक को मुंह न खोले॥ गिन रही घड़ियां विदा की प्यार से उस को बुलाती। है बिछुड़ती चिर-सहेली। प्रश्न यह बनता पहेली॥ लाख कोशिश पर नहीं जो है कभी भी सुलझ पाती। (‘विश्वमित्र’ समाचार-पत्र के दीपावली विशेषांक में प्रकाशित, 1 नवम्बर, 1959) गीत मुर्दे का जीना जीता हूं। केवल सुधियों के हाथ थाम तारे गिनता ही अविश्राम नीरव रजनी के साये में आंसू मैं हरदम पीता हूं। मेरा सब कुछ है यहां धरा पर इस से क्या मैं दूर खड़ा आकर्षित क्या कर सकती है मैं सब से गुजरा बीता हूं। पैरों की धरती खिसक रही अधजली कामना सिसक रही इस मधुर ज्योति में रह कर भी मैं काला कड़ुआ तीता हूं। जग के सम्मुख है वर्त्तमान है जहां गूंजता मदिर गान पर मैं अतीत के टुकड़ों को ले एक-एक कर सीता हूं। (30-03-1952) सुमन वन में खिल रहे हैं सुमन वन में खिल रहे हैं। प्रस्फुटित कुछ हो रहे हैं सरस मद में खो रहे हैं पुंज अलियों के विहंसते पुलक इन पर पिल रहे हैं ले मधुर मुस्कान मुख पर प्यार के मद नयन में भर पवन दोले पर चढे ये मस्त हो कर हिल रहे हैं सहन कर पाते नहीं जो वहन सर लाते नहीं जो पिछड़ मग में फूल कितने धूल मे फिर मिल रहे हैं (26-03-1962) होली धूम मचाती होली आयी। हरित भरित पल्लवित धरातल सज्जित वर वसन्त ॠतु निर्मल अरुण अधर परिधान हरित ले कलिकों की हमजोली आयी जग को सौरभ पान कराते अधरों पर मुस्कान दिलाते लाल पराग मेलते मुख पर तरुण सुमन की टोली आयी मुरझे भी खिल उठे रंग में सरस गीत गाते उमंग में मदहोशों ने पूर्व गमन के आज भंग की गोली खायी (होली, 1962) चित्रपट चित्र पट पर चल रहा है है किसी की रूप छाया ला जिसे पट पर सजाया खींच कर सांसे किसी का दिल इसी पर जल रहा है चित्र पट पर चल रहा है साथियों के दृग अचंचल हेरते पट चित्र प्रतिपल पलक में मेरे समाया कोई मुझ को छल रहा है चित्र पट पर चल रहा है आ रहे क्षण-क्षण विलक्षण कर रहे सम्मुख प्रदर्शन रूप कितने, चित्र कितने पर मुझे कुछ खल रहा है चित्र पट पर चल रहा है। अतीत गीले स्वर, मेरे नयनों में आंसू भर भर आये मेरी स्मृति में आ-आ कर मुझे अतीत रुलाये। जीवन के वे दिन थे कैसे जब सुमनों की कलियां झूम-झूम कर मुझे बुलाती थीं करती रंगरलियां नहीं कभी भी सुन पाया था है पतझड़ भी आता केवल याद दिलाने के हित ही वसन्त रह जाता समझ न पाया कैसे बीतीं जीवन की वे घड़ियां अब तो आंखें पिरो रही बस अश्रुकणों की लड़ियां अब हैं दिन बांकी रोने के, गीले नयनों, रो लो साथी कौन तुम्हारा होगा, अन्तरतम को धो लो। विदा-यात्रा 1 घर जाने की धूम मची है साथी हैं तैयार हो रहे उठे शीघ्र जो अभी सो रहे मेरे अलसाये नयनों में नींद न, तन्द्रा शेष बची है। आकुल हैं जल्दी चलने को व्याकुल प्रियतम से मिलने को सौंपेंगे उपहार प्यार से कितनों ने शुभ भेंट रची है। विलप रहा मेरा अन्तस्तल नहीं पास मेरे कुछ संबल ले कर क्या जाऊं विदेश से ऐसी न कोई चीज जंची है (बेगुसराय, 11-04-1957) 2 दूर होता जा रहा हूं! वह मधुर कितना मिलन था प्राण थे इक, अलग तन था स्वप्न-सा अवशेष स्मृति सिर्फ ढोता जा रहा हूं। चला था अरमान ले कर प्यार का सुचि ज्ञान ले कर दिया था तू ने मुझे जो उसे खोता जा रहा हूं। फिर मिलेगा प्यार से जग उठ रहे हैं राह में पग विरह की चिर वेदना से हाय, रोता जा रहा हूं। (बेगुसराय, 11-04-1957) 3 जा रही गाड़ी हमारी! कर रही चरमर चररमर जा रही पथ पर निरन्तर ढो रही सर पर चढाये सैकड़ों का बोझ भारी। है बहुत ही दूर मंजिल औ पहुंचना शीघ्र मुश्किल लांघती मरु मेरु समतल भागती है यह सवारी। वेदना उर में छिपाये अश्रु पलकों में सुखाये मौन तन्द्रिल हूं संजोता मैं किसी की यादगारी (बेगुसराय-सुपौल पथ पर, 11-04-1957) 4 मुझ को कहते हो हंसने को! सूखा सावन सरिता का जल आया न भटक कर भी बादल इस शिशिर शीत में फिर से तुम कहते हो उसे बरसने को। मुरझाती भी है नयी कली सूखे रेतों पर बढी-पली मिल सका न सींचन-प्यार जिन्हें अधिकार उन्हें क्या वसने को। मेरा वसन्त भी बीत चला मेरे अन्तर को भुना-जला आया निदाघ यह दारुण बन फिर जले हुए में डंसने को। (सुपौल, 10-05-1957) कविता प्रातःकाल की इस वेला में जिसे कहते हैं लोग ब्रह्ममुहूर्त उस से पहले ही मैं होता हूं सड़क पर। पूर्व की ओर क्षितिज पर भोरुकवा तारा उपर की ओर उठता रहता है। और मैं सारे सुख दुखों को भूल उस सुन्दर वेला में कविता की सामग्रियों को बटोरता हुआ लौट आता हूं घर को। बैठ जाता हूं कागज-कलम ले कर कविता लिखने। तभी फुदकने लगता है गोरैया का एक जोड़ा चूं-चूं करता हुआ मेरे कमरे में और जहां-तहां गिरे दानों को चुन अपने बच्चों को खिलाने में हो जाता है व्यस्त। मैं भी उन्हें देखने में हो जाता हूं तल्लीन और पत्नी द्वारा आगे में रख दी गयी चाय कि प्याली से उठती रहती है भाप। गोरैया के जोड़े को देखता रहता हूं – देखता रहता हूं और इस तरह ठंढी हो जाती है चाय कभी-कभी। पत्नी आ कर दिला जाती है याद और साथ ही कर जाती है घरेलू चीजों की फरमाइश। लगता हूं सोचने -- गोरैया उन्मुक्त है मगर उसे भी चिन्ता है खाने-खिलाने की। इतना बड़ा परिवार है अपना बच्चे हैं, काम है, धंधा है – सारे चित्र सामने नाच जाते हैं। और पहले आये विचारों की स्रृंखला टूट जाती है कविता का श्रोत सूख जाता है और सूख जाती है कलम की नोक पर आयी स्याही भी। तब तक आ जाते हैं मेरे खेतों में काम करने वाले मजदूर सुबह सात बजे ही फटे कपड़ों से अपनी देह को ढांकने का करते हुए व्यर्थ प्रयास जाड़े की कंपकंपी में। चला जाता हूं तालाब पर घर के आगे काम करवाने उन से और हाथ में कागज-कलम रहता हूं धरे ही। पछवा हवा के झोंके आते हैं जैसे-जैसे सूर्य उपर को बढता जाता है और सुबह की कंपकंपी गर्मी में बदलती जाती है। सामने गेहूं के खेत हैं जो सूखते जा रहे हैं हवा के झोंके से और मुर्झा सी गयी हैं गेहूं की बालियां। गर्मी बढ रही है जैसे-जैसे बढता जाता है सूर्य उपर को नीचे डुबकियां लगाते हैं कौए कांय-कांय करते हुए तालाब में और उपर बगुलों का झुण्ड सामने से उड़ता हुआ निकल जाता है नीलाकाश में। गर्मी अच्छी लगती है कुछ देर मगर धीरे-धीरे धूप हो जाता है असह्य और मैं खींच ले जाता हूं कुर्सी कटहल के पेड़ के नीचे। मजदूर काम रोक पीने लगते हैं बीड़ी और लेते हैं कुछ सुस्ता फिर लगते हैं कहने अपनी-अपनी रामकहानी – जलपान दिलवा दीजियेगा कुछ अधिक, मालिक खाना नहीं मिला रात में - पैसे नहीं थे, कोटा नहीं ले सका - और अल्हुआ भी तो हो गया है एक रुपये किलो - आ पहुंचा है उपर से मुहर्रम जंग लगाता है लड़का जिसे देने होंगे नये कपड़े - एक मुर्गी देती थी अण्डे उसे भी चुरा ले गया कोई। ऐसी ही समस्या दूसरे की इसी से मिलती-जुलती तीसरे की और चौथे की भी। वही रोटी, भूख, पेट, कपड़ा रोजी-बेकारी और काम। इस का अन्त है भी कहीं ! सामने तालाब मे सूखता जा रहा है पानी धीरे-धीरे। किनारे के लघु पौधे भी जा रहे हैं सूखते किन्तु कटहल में मोंछे आ रहे हैं और आ रहे हैं आमों में मंजर। पुनः सूख गयी है मेरी कलम की नोक और सूख गया है कविता का श्रोत। नहीं लिख पाया हूं कुछ भी मैं। पानी आग को बुझाता है मगर आग भी तो पानी को सुखा देती है। बीच में आ जाता है कोई भिखमंगा कभी सच्चा कभी बनावटी और लगाता जाता है हांक पर हांक। डांटता हूं किसी को और किसी को दिलवा देता हूं कुछ। मगर लगते हैं ये भिखमंगे मुझे अच्छे – बेफिक्र-बेपरवाह न आज की चिन्ता न कल की। कितना सरस जीवन है इन का! इन के हृदय में अवश्य ही उमड़ती होगी कविता की सरस धारा और इसी लिये तो सच्चा कवि भिखमंगा ही होता है शायद! दिन भर की इन उलझनों के बाद पहुंचता संध्या में दवा की दुकान पर। कोई खरीदता है ‘सिवाजल’ की एक गोली अपने बच्चे के घाव के लिये कोई रतौंधी की दो गोलियां तो कोई तीन गोलियां कफ की। जानता हूं इन एक-दो गोलियों से न तो छूटेगा घाव न जायेगी रतौंधी और न ही आराम होगा कफ। मगर पैसे के अभाव में कैसे खरीदेंगे ये पूरी खुराक जब की पेट की भी नहीं जुट पाती है। पेट की खुराक मरते दम तक चलती रहती है न! तब तक आ जाते हैं पण्डित जी चालीस रुपये में जोड़ा धोती खरीद कर। इन्हें यजमानों से अब अच्छी धोतियां नहीं मिलती खरीदना पड़ा है – ऐसा कहते हैं। दाम कितना गया है बढ कपड़ों का। इस तरह के और भी लोग रहते हैं आते-जाते और चौराहे से लोग निकलते रहते हैं हा-हा-ही-ही करते। चौंका देती है मुझे अस्पताल में मरे किसी मरीज के स्वजनों के रूदन की आवाज और उधर मदमस्तों की टोली निकल जाती है सड़क से गालियां बकते हुए। कौन सुनता है किस की इस रेल-पेल में! मगर मैं हो जाता हूं स्तब्ध मानो समस्याओं का ठेकेदार मैं ही हूं। ज्यों-ज्यों करता हूं प्रयास इन से छुटकारा पाने का इन का जोर पकड़ता जाता है हमला। जाड़े में भी उष्णता बढती जाती है और हृदय जलने लगता है अन्तर्द्वन्द्वों से। कविता का श्रोत सूखता जाता है और लौट आता हूं घर को। यही क्रम नित्य चलता रहता है – चलता रहता है और नहीं लिख पाता हूं कविता मैं। नित्य की इस कविता में स्वयं जो कविता हो गया हूं मैं। क्या यह मेरा जीवन कविता नहीं है ? ललित बाबू प्रयास करता हूं भुला देने का जितना भी तुम्हारे भिन्न-भिन्न चित्र स्मृति-पटल पर उभरते जाते हैं। तुम्हारा खिला हुआ चेहरा बीच से थोड़ा रिक्त अग्रिम दन्तपंक्ति की चमक उन्नत ललाट और ओठों पर खेलती हुई मुस्कुराहट याद आ जाती है। कोसी की कल-कल निनाद करती हुई धारायें वीरान इलाकों में उगी फसलों की झुकी बालें धुआं उगलता हुआ दूर-दूर तक फैले रेलपथों पर दौड़ता हुआ इंजिन जर्जर स्टेशनों पर नवनिर्मित मकान याद दिला देते हैं बरबस तुम्हारी। गीतों में, छ्न्दों में, कविताओं में बांध कर रखने का प्रयास किया जा रहा है तुम्हें जा रहे हैं बनाये स्मारक तुम्हारे और हो रहा है नाम पर तुम्हारे नयी-नयी संस्थाओं का निर्माण। मगर तुम उड़ चुके हो छोड़ कर हमें। पीठ पीछे के यशोगान मुझे भुला सकेंगे क्या ? अब फिर न सकेगी मिल कभी पीठ पर प्यार भरी वे थपकियां तुम्हारी तुम्हारी मधुर वाणी और स्नेहमयी फटकार फिर सुनायी न देगी कभी क्योंकि तुम लौट कर न आओगे न आओगे। चले गये हो रूठ कर तुम न! चले गये हो उस पार जहां बिखर गया होगा एक नया प्रकाश। ओ धरती के इंजीनियर! तुम ने प्रारम्भ कर दिया होगा वहां भी नवनिर्माण चुप बैठने वाले पुरुष जो न थे तुम। मगर रखना खयाल एक बात का – मत भेजवाना अपने जैसा किसी को भी यहां भूल कर के कृतघ्नों की जमात में उस का सम्मान न होगा। चलता ही रहता है यहां आत्मघातियों का षड्यंत्र। साकार की नहीं होती है पूजा यहां मूर्तिपूजक हैं न हम! यहां सब्जियां तौली जाती हैं हीरे से सूर्य के उपर फेंका जाता है धूल समझा जाता है जनद्रोही ईसा और गांधी को। कंटीली झाड़ियों में खिले गुलाब को किसी ने तोड़ लिया। अच्छा हुआ तुम चले गये! प्रयास करता हूं तुम्हें भुला देने का फिर भी तुम्हारे अनेक चित्र सामने आ जाते हैं और अनायास ही लुढक जाती है आंसू की दो बुन्दें और समझ लेता हूं ललित उसी को मैं! घिसा हुआ सिक्का मैं घिसा हुआ एक सिक्का हूं। अल्मूनियम का नहीं टला पीतल का भी हूं नहीं ढला छः गुणा अधिक है दाम बढा ऐसा चांदी का पक्का हूं। हूं एक जात भारतवासी जैसा मक्का वैसा कासी हूं मैं इस्लामाबाद नहीं बंगाल देश का ढक्का हूं। मैं नहीं किसी का बना दास जो रखता मुझ को सदा पास अनवरत चला, इस लिये घिसा कि खाते रहता धक्का हूं। धनियों का नम्बरी नोट नहीं जो खोजा करता ओट कहीं खून-पसीने की कमाई मैं तो गरीब का टक्का हूं। बढता जाता है वर्तमान ले कर भविष्य का नव-बिहान जिस रथ पर, उस का मैं भी एक मजबूत पुराना चक्का हूं। खोटा तो नहीं, छोटा भी नहीं चलनी का मैं टोटा भी नहीं सच पूछो तो मैं इसी लिये बहुतों का अब भी कक्का हूं। सेलटैक्स इन्सपेक्टर आया जंगल से ज्यों भूल-भटक कर या सर्कस से हाथ झटक कर या उपर से स्वयं लटक कर किसी किसी को उठा-पटक कर किसी गांव में शेर समाया सेलटैक्स इन्सपेक्टर आया। नानी गयी सिधार किसी की बीबी पड़ी बीमार किसी की घर से आया तार किसी को गया है लकवा मार किसी को आज अचानक व्यापारी घर लाख रोग का लश्कर आया। कहा किसी ने नाना आया धूम मची कि मामा आया पड़ी कहीं से मुझे सुनाई है मेरी जोरू का भाई गली-गली में शोर हुआ कि विजिनेश डाइरेक्टर आया। जो व्यापारी तगड़े-मोटे या जिन को मिलते हैं कोटे पहन रहे वे आज लंगोटे छिपा-छिपा कर नमरी नोटे जैसे आज यहूदी घर में हर-हिटलर डिक्टेटर आया। बन्द हुई घर की कीवारें कितने फांद गये दीवारें ग्राहक जिम्मे पैसे छूटे इस भगदड़ में कितने लूटे घुसे सेठ घर ज्यों अपने बिल में बिल्ली डर मूस समाया। गांधी या पटेल मर जाये पर जो कभी न शोक मनाये उन के मानो बाप पधारे या दादा हैं स्वर्ग सिधारे उन के भी सब काम बन्द हैं देख तमाशा कवि शरमाया। तोंद से गिरती धोती पकड़े सेठ बने हैं बलि के बकरे दीमक चाटी रोकड़-खाते साथ मुनीम उलटते जाते जैसे सरकारी दफ्तर में कोई नया आडीटर आया। गिटपिट करते हैं व्यापारी आया जमीन्दार सरकारी किनी बाप ने यह जमीन्दारी जिन की चाहिये मालगुजारी मरे जमीन्दारों के शव पर नवयुग मनी कलेक्टर आया। चाहे कोइ ग्राहक को लूटे या दिन भर अपना सर कूटे ये सट जायेंगे यों छिप के कम्बल ज्यों बाबा से चिपके पैत्रिक हिस्सा लेने सब से यह दफ्तरी पार्टनर आया। देखो हाल सिनेमाघर का घूंट रहा दम प्रोपराइटर का मुफ्तखोर दर्शक की नानी मरी आज, उतरा यों पानी गिनती होगी आज हौल में कह गर्दन दे हाथ भगाया। ज्यों कर में ले कर मालायें परिछे दूल्हे को बालायें आगे पीछे घेरा डाले सर्कस और तमाशे वाले नये बने कांग्रेसी के बिच जैसे कोइ मिनिस्टर आया। हो जैसे खातिर दूल्हे की सूरत हो चाहे चुलहे की होती वैसी इस जुलहे की हड्डी टूटेगी कुलहे की अगर नहीं नैवेद्य चढायें व्यापारी लो ‘घनचर’ आया। चलो, उठो, झट करो तैयारी सजा थाल में पान-सुपारी स्वर्ण शुभम कुछ रखो रुपल्ली कम से कम कागज की छल्ली रे, सुराज के युग का ईसा, मूसा, अल्ला, इश्वर आया। जय हे जय इन्सपेक्टर देवा करहुं कृपा अब खाबहुं मेवा लेहु जिते मन चाहिय तेरे मो सम तुमरो भक्त घनेरे आज रकम की इस दुनियां में तेरा ही ला आर्डर छाया। नाथ, दूत आर्डरली तेरो चतुर बड़ो स्वामी से चेरो मोट रकम तू लो इक बारा वह पावत है बार हजारा क्योंकि तेरे शुभागमन की वही खबर हर बार जताया। करना दया हमारे उपर अगर उपस्थित हों कोई अफसर या उन के कोई सगा सहाई मैंने जिन की आरती गायी करने को व्यापार शहर में कवि ने भी काठघर बनाया। (03-02-1957) किरानी मैं दफ्तर का एक किरानी। चढे पहर भर दिन मैं उठता पहले दम बीड़ी पर कसता टट्टी जाता लोटा मलता कुछ खा कर दफ्तर को चलता जो है मेरा पटना रांची गर्मी जाड़े की राजधानी। तीन मील दूरी पर दफ्तर दम लेता मैं वहां पहुंच कर मिलता रिक्शावान राह पर झुकता मुझे सलाम बजा कर हंस कर है आगे बढ जाता समझो है इस के क्या मानी। जभी पहुंचता हूं मैं दफ्तर जम कर बैठे रहते अफसर मैं सलाम करता हूं झुक कर वे मुंह बाते लेट समझ कर उन की त्यौरी चढी देख कर मैं हो जाता पानी-पानी। मेरी कुर्सी की क्या ब्यूटी बांह एक उस की है टूटी उस पर बैठ बजाता ड्यूटी कलम हूं दिन भर घिसता ठूठी तीस रुपये महीने पर घिसती रहती मेरी चढी जवानी। जिसे काम है मुझ से रहता बड़ा किरानी बाबू कहता हाथ जोड़ता पैर पकड़ता लाला, भैया, मुंशी कहता उस क्षण है क्या कोई जंचता मुझ सा बढ कर जग का प्राणी। औ जब कोई नेता आ जाता मेरी कुर्सी पर जम जाता अपनी कुल फरमाइश सुनाता देर हुई बस आंख दिखाता लहू घूंट पी रह जाता हूं देख उतरता अपना पानी। पांच बजे जब फुर्सत पाता दौड़ा फिर निज घर को आता साहु झमेली को घर पाता हूं जिस का उधार मैं खाता सुन कर उस का नया तकाजा मानो मर जाती है नानी। पत्नी मेरी तभी मचलती साड़ी-साया लाने कहती मैं कहता पैसे की सख्ती सिर अपना धुनने वह लगती खट-पट हो जाता दोनों में मुश्किल होता खाना-पानी। गुस्से में घर से चल देता दो पैसे का चखना लेता संग ले दोस्तों को बन नेता मधुशाला को मैं चल देता पीता हूं छक कर जब प्याला मिट जाती दुख दर्द निशानी। बड़ी रात को जाता हूं घर दे कर इधर-उधर का चक्कर छाती पर रख कर मैं पत्थर सुनता हूं बीबी का कटु स्वर उठते भाव अनेकों मन में किन्तु मूक रहती है वाणी। तभी सोचता हूं मैं मन में आग लगे मेरे इस तन में क्यों न भाग्य को पलटूं क्षण में होगा क्या ईमान में प्रण में धूल झोंक सब की आंखों में खुल कर काटूंगा मैं चानी। कांय-कांय बच्चे हैं करते कभी खिलौना देख मचलते उन्हें चूम कर डरते-डरते बहलाता कुछ कहते-कहते पहली तारीख का वादा कर उन्हें सुनाता कोई कहानी। नहीं मुझे है अपना भी घर फिर भी बच्चे हैं दर्जन भर करते रहते हैं सब झर-झर रात बिताता हूं मैं जग कर शादी करने योग्य हो गयी बेटी मेरी तीन सयानी। भर दिन रहता फाइल उलटता हूं अविराम कलम मैं घिसता फल जिस का अफसर को मिलता इज्जत मिलती वेतन बढता चाटूंगा क्या ले इमान को बड़े-बड़े करते बेइमानी। बेहतर मैं कांग्रेसी होता यही न कि पहले कुछ खोता पीछे चल एमएलए होता सुखसागर में खाता गोता कभी न रोता सुख में सोता होती क्यों कोई परेशानी। ये विचार उठते रह-रह कर तभी देखता फाइल उलट कर उलट रहे पन्ने हैं फर-फर बीत रही है रजनी सर-सर पर न बीतती मेरे जीवन की यह अविचल अमिट कहानी। विटप से -- यदपि तिहारो हौं ढलने की वेला तक ‘ना’ हीं कछु काम कियो ‘ना’ हीं करबाओगे सारा सुवास पास निज ही तक सीमित है दास ‘ना’ ही काहु को हास ही कराओगे ‘ना’ ही कोउ तोड़ि सका ‘विप्लव’ इन डारिन सौं मुरझा कर नाहक ही धूल में गिराओगे खिलेंगे नवीन पुष्प विटपवर, अनेक किन्तु सदा के लिये बिछुड़े को लख कर पछताओगे (अनीस द्वारा रचित ‘सुनिये विटपवर पुहुप तो तिहारो हौं’ को पढ कर उस के बाद फूलों द्वारा विटप को मैंने इस प्रकार कहलवाया है।) (01 जनवरी, 1977) प्राब्लेम्स समझता हूं कि दुश्मन बन खड़े होंगे पुराने दोस्त भी अब फंसाने के लिये मुझ को कोई षड्यन्त्र होगा। मगर कुर्बानियां होंगी तभी तो तड़प कर के उठेंगे शेर गर्जन कर, सबल गणतन्त्र होगा। चुन-चुन कर जलाना चाहता हूं राह में कांटे बिछे जो शोला हूं न शबनम हूं, धधकता फ्लेम्स हूं मैं। समस्यायें बहुत हैं, क्या उन्हें सुलझा सकूंगा खुद भी जमाने के लिये प्राब्लेम्स हूं मैं। ( लघु-पत्रिका ‘प्राब्लेम्स’ के प्रकाशन के अवसर पर) मस्तानी (मोटी) नायिका गोरी सी छोरी गाल गुलगुल पकोरी सी छाती धड़काती मदमाती इठलाती है। बैलून सी बैगन सी बोतल अरु बेलन सी बत्तीसी चमकाती ‘विप्लव’ व्याकुल बनाती है। कद्दू सी ककड़ी सी कटहल अरु मकड़ी सी लस्से लगाती पुनि जाल यों बनाती है हस्तिनी मस्तिनी सी पीन-स्तनी बाला की मन्थर मिसाल चाल हृदय वेध जाती है। (07-12-1957) एक कहानी : परिवर्तन आज छब्बीस जनवरी का प्रभात था। शहर के कोने-कोने में स्वतन्त्रता दिवस मनाने की जोरदार तैयारी हो रही थी। क्या धनी, क्या गरीब, सभी हाथों में झण्डा लिये प्रभात फेरी में निकल पड़े। मालूम होता था, सारा शहर जैसे उमड़ पड़ा हो। छात्र भी किसी से पीछे नहीं थे। कालेज के छात्रावास में काफी सरगर्मी थी। दो घंटा रात रहे कई छात्र जग गये थे और सोतों को उठा रहे थे। राजेन्द्र ने पूछा – ‘शम्भू, शशि नहीं उठा क्या ? उसे उठा दो न भाई।‘ ‘ अरे! शशि? उसे तुम नहीं पहचान सके हो, राजू। वह अमीर आफिसर का लड़का है न। वह इस स्वतन्त्रता दिवस में सम्मिलित हो, यह तो गैर-मुमकिन है।‘ ‘कैसा तुच्छ विचार है तुम्हारा! उसे जा कर उठाओ, देखो वह हमारे साथ चलता है या नही।‘ ‘ना भाई, मैं उसे जगाने न जाऊंगा। मैं उस की नस-नस पहचानता हूं। अभी उस दिन जब हम लोगों ने प्रिन्स आफ वेल्स के विरुद्ध कालेज पर झण्डा फहराया था तो वह हम सब लोगों को अनुशासन तथा गुरूभक्ति की दुहाई दे रहा था। उस से उम्मीद करते हो कि वह आज के समारोह में हमारा साथ देगा?’ राजेन्द्र चुप हो गया और उस ने फिर शम्भू से अधिक बात न की। सभी लड़के कालेज के कम्पाउण्ड में इकट्ठे हो गये थे। सबों के हाथ में राष्ट्रीय झण्डा लहरा रहा था। और एक अभूतपूर्व उत्साह था उन के चेहरों पर। नारा लगाते हुए वे कम्पाउण्ड के बाहर हुये और शहर की ओर रवाना हो गये। सूर्य की किरणें मुंह पर पड़ने से शशि की नींद टूटी। अलसाता हुआ वह अपनी कोठरी से बाहर निकला, लेकिन किसी साथी छात्र की आहट तक न मिली। सभी कोठरियों में ताले लगे हुए थे। पथ की ओर से नारों का शब्द आ रहा था और तब उस की समझ में सारी बातें आ गयी। शायद होस्टल का नौकर मोती या खाना बनाने वाला पण्डित रसोई बना रहा हो, यह सोच कर वह रसोईघर की ओर चला। नजदीक जा कर उसने पण्डित और नौकर को बात करते सुना। उसे अपना नाम सुन कर आश्चर्य हुआ और वह आड़ में छिप कर उन की बातें सुनने लगा। ‘शशि एक अमीर का लड़का है, मोती। तुम उसे जानते नहीं। उस का पिता डिप्टी कलट्टर है। वह सुराज वालों का साथ कैसे देगा ?’ – पण्डित ने मोती से कहा। ‘अमीर लोगों और बड़े-बड़े अफसरों को सुराज होने से नुकसान होगा क्या ?’ – मोती ने अनभिज्ञता प्रगट करते हुए पूछा। ‘ अंग्रेजों के जाने से गरीबों की पूछ होगी। देखते हो, महात्मा गांधी क्या कहते हैं। इसीलिये अमीर लोग सुराज नहीं चाहते।‘ ‘ ठीक कहते हो, दादा। शशि बाबू का पिता डिप्टी कलट्टर है न। इसीलिये वह जुलूस में नहीं गया।‘ – कह कर मोती चुप हो गया और पास ही पड़े सिल्ले पर मसाला पीसने लगा। शशि उल्टा पांव वहां से भागा और अपनी कोठरी में बिछौने पर औंधे मुंह आ कर पड़ गया। उस के मस्तिष्क में जैसे तूफान उठ रहा था। आत्मग्लानि से वह मरा जा रहा था। उसे झुंझलाहट आ रही थी अपनी अमीरी पर। उस के दिमाग में पण्डित और मोती की बातें चक्कर मार रही थीं। वह सोच रहा था, क्या अमीरों और आफिसरों में देशभक्त नहीं? वह अमीर का और एक डिप्टी कलक्टर का लड़का है, इसी लिये लोग उसे देशद्रोही समझते हैं। इसी लिये तो लड़कों ने उसे आज के प्रदर्शन में सम्मिलित होने के लिये कहा तक भी नहीं। होस्टल का नौकर आया और कहा – ‘बाबूजी, पहर भर दिन चढ आया। उठिये न।‘ लेकिन वह एक बार उस की ओर देख कर रह गया। उसे उठने की इच्छा ही न होती थी। लड़कों का दल शहर से लौट कर आ गया। और तब वह अलसाता हुआ उदासचित्त हाथ में लोटा ले कर कोठरी से बाहर निकला। उसे मालूम हो रहा था, सभी लड़के उसे घूर रहे हैं। वह बिना किसी ओर देखे लज्या से सिमटता हुआ पैखाने की ओर चला गया। सन 1942 का अगस्त ! देश के कोने-कोने से धधकती हुई लपटें। देश के कर्णधार नेता जेल के सींकचों में डाल दिये गये थे और कितनों के हाथों में जंजीरें खनखना रही थीं। आजादी के मतवालों के खून से पृथ्वी लाल हो रही थी, फिर भी वे रुकने का, थमने का नाम तक न लेते थे। आजादी के दीवानें नौजवानों की टोली जीवन और मरण दो घाटों के बीच संघर्ष करती हुइ बाहर निकली। उन की धमनियों में गर्म-गर्म रक्त प्रवाहित हो रहा था। सिर पर गांधी टोपी, शरीर पर सफेद खादी का कुर्ता और हाथ में तिरंगा झण्डा लहरा रहा था। वे उमड़ते चले जा रहे थे बल खाती हुई बरसाती नदी की तरह उस महासागर की ओर, जहां सभी मिल कर एकाकार हो जाते हैं। ‘इन्कलाब -- जिन्दाबाद’ का नारा लगाते हुए नौजवान आगे बढे – रामपुर थाने की ओर, जहां नौकरशाही अपनी बन्दूकों और संगीनों को ताने ब्रिटिश साम्राज्यवाद की दम तोड़ती हुई लाश को मकरध्वज दे कर जिलाने का व्यर्थ प्रयत्न कर रही थी। पन्द्रह वर्ष की नैजवानी की मस्ती में इठलाता हुआ शशि, जो कालेज से अभी-अभी चार ही दिन हुए घर लौटा था, उस टोली का नेतृत्व कर रहा था। सभी चल रहे थे उस के पीछे-पीछे कदम से कदम मिला कर पागलों की तरह, मानो गाड़ी के डब्बे को कोई शक्तिशाली इंजिन खींचती हुई अपने लक्ष्य की ओर भागी चली जा रही हो। ‘इन्कलाब – जिन्दाबाद’, ‘अंग्रेजों, भारत छोड़ दो’ का नारा लगा और टोली थाने के गेट पर पहुंच चुकी थी। ‘ भाग जाओ यहां से, वरना गोलियों से भून दिये जाओगे।‘ – बन्दूक की नली को उन की ओर चमकाते हुए यहां के थानेदार ने कड़क कर कहा। ‘पुलिस हमारे भाई हैं।‘ की आवाज से आकाश गूंज उठा और नौजवानों की टोली आगे बढती ही गयी। ‘ मैं फिर सोचने का मौका देता हूं। भाग जाओ यहां से। क्यों व्यर्थ में जान देने को तैयार हो ?’ ‘ हम थाने पर कब्जा करेंगे। आप भी तो हमारे ही भाई हैं, इसे छोड़ क्यों नहीं देते ? ‘ – शशि ने आगे बढ कर जवाब दिया। ‘ हुः, भाई हैं! फायर करो जी, ये गुण्डे वैसे टलने वाले नहीं।‘ – थानेदार ने सिपाहियों को आज्ञा दी। धांय ! धांय ! धांय ! और दूसरे ही क्षण शशि के साथ ही तीन और लाशें झण्डे को छाती से चिपकाये जमीन पर छटपटा रही थीं। लेकिन नौजवानों की टोली ने हिम्मत न हारी, बढते ही गये थाने की ओर – धुआंधार गोली की वर्षा में। थानेदार की हिम्मत पस्त हो गयी और वह अपने साथी सिपाहियों को ले कर थाने के पिछवाड़े से निकल कर नौ-दो-ग्यारह हो गया। सबों ने देखा – थाने पर राष्ट्रीय झण्डा फहरा रहा था – फर्र ! फर्र ! फर्र ! पद्य (मैथिली) : आत्म परिचय सूर सूर तुलसी शशि उडुगण केशव दास ‘विप्लव’ कवि डिबिया भेला, अपनहि घरक प्रकाश अपनहि घरक प्रकाश, तेल अछि एके चौठी माटिक डिबिया फुटल, अल्हुक अछि कतरल मुंहठी ‘विप्लव’ जी घिघियाथि वाह रे माटिक डिबिया बिनु तेलक सुसुंआथि जेना बांसुरी बिनु जिभिया पुनः बहैत अछि जोर सौं कनिको यदि बसात फकफकाइत छी वेग सौं थरथराइत अछि गात थरथराइत अछि गात, प्राण हम कोना बचाबी एकहि टा अछि आस, शरण आंचर तर पाबी ‘विप्लव’ लेथि उसांस नुका कुच युग गिरि कन्दर छी हम कवि विख्यात परम निज घरहिक अन्दर मनाउनि आजुक दिवस सुहावन मास भेल सावन हे भेल दहिन भगवान घेरल घन पावन हे। गोर लागौं तोरा इनरदेव मन मोरा आतुर हे जल लै जगत बेहाल तो भरह भुवनपुर हे। बरसत रिमझिम मेघ सुखल भूमि पटतइ हे हर लै जाएब खेत, हमर धनी जलखइ हे। नहु नहु जोतब खेत, जुड़ाएत धरती हे झमझम रोपब धान, बिहैन देत घरनी हे। देखब धानक शीश जखन हम अगुरब हे ओतहि गंबाएब रैनि खोपड़ि बीच विहरब हे। जहिना हमर धनी केश पवन दोल झुलतइ हे शीशक संग मोर तंग विकल मन भुलतइ हे। काटि बान्हब हम बोझ दुलकि धनी उघतइ हे लचकैत अंग निहारि कतेक जन जरतइ हे। सब टा अपन होइत धान न एमकी महाजन हे चानीक हंसुली गढाएब अहां लै साजनि हे। छोड़लक बादल बुन्न दामिनी आब दमकइ हे ‘विप्लव’ हंसु तजि मान अन्हार घर चमकइ हे। गीत ( तर्ज – समदाउन ) रैनि गंवावल रस पीबि मधुकर प्रातहि उड़ि चलि देल एकसरि व्याकुल चित्त कुमुदनि ठाढे हरइत रहि गेल सांझ पलटि पुनि आवत भंवरा कुमुदनि उर बड़ आस हेरइत पंथ दिवस भरि थाकल मधुकर कैल परवास अरुणक उदय भेल ‘विप्लव’ सम हृदय दगध कय गेल नेह लगावल निशि निशिकर सौं दिनकर बैरी भेल नवयुग के निर्माण होइत अछि 1- करनी-धरनी साढे बाइस बनताह परसिडेन्टे भाइस आइ-काल्हि के युवक लोकनि कैं एहने त अरमान होइत अछि। 2- युवक छात्र जे लीडर भारी सब कैं आइ पढैतछि गारी पबितहिं नीक नौकरी तिनका घूसे-टा जलपान होइत अछि। 3- मारे माछ न उपछे खत्ता तिन्हका नहिं बीतो भरि लत्ता भत्ता जे अफसर नित टानथि तिनकर उच्च स्थान होइत अछि। 4- शुद्ध मातृभाषा नहिं जानथि सेक्सपियर अपना कैं मानथि एहनो बुड़ि अंगरेजिया सब कैं जनता मे सम्मान होइत अछि। 5- सुद्धाक मुंह कुक्कुर चाटैतछि कमौनिहार कैं सब डांटैतछि अनकर खाए कटकी खड़खड़बै तिनकर मुंशी नाम होइत अछि। 6- जे घर-घर मे करबथि दंगा खन पटना छथि खन दरभंगा एहन मुकदमाबाज समाजक काबिल चतुर सयान होइत अछि। 7- जे सब छथि बड़का खुरलुच्ची बाटहिं पर खुनै छथि घुच्ची बिना बजौनहि ओ घर-घर के परम पूज्य मेहमान होइत अछि। 8- मुंह देखै मे छनि चटगर सन वेसो यद्यपि छन्हि ढरकल सन नित नेताक दरबार करथि जे से महिला लिडरान होइत अछि। 9- काबिल घास किएक नहिं गढताह पण्डित गुणी किएक नहिं मरताह कवि जोगीड़ा गीत रचै छथि काग जखन यजमान होइत अछि। 10- किये बनत क्यो काबिल-काजू उपरहिं अल्हुआ लाउ तराजू सेर, असेरा, पौआ, अधपै, कनबा तक गणमान होइत अछि। देश-दुनियां मूस बिलाड़िक मीत बनल अछि सुनल चीन स पाक जुड़ल अछि हिन्दक नेनो भुटका चीनी पाक लड्डू नित खाइतछि चाउ-माउ सब ढोल बजाबथि चुट्टी बुझि गज कैं ललकारथि भरल पेट पर नित्य हिन्द मे चीनीक शरबत पान होइतछि शान खान अय्यूब बघारथि चाउ एन लाइयो आंखि गुराड़थि संकरातिक दिन बड़ा चाव स एहन लाइ जलपान होइतछि चाउ माउ मे खाउ समैला तीनू मिलि गिरगिट लग एला बख्शीजीक बक्सीस मिलत ता अब्दुल्ला के पाक बनैतछि नाकबला विलाएत वासी मूड़ मुड़ाए भेल सन्यासी मुदा आइ निमुछिया चाउ नाकक तर मे हाथ फेरैतछि पहिने पिन्हल कोइड़लाक माला पुनि कंठी तुलसी मृगछाला बनि वैष्णव राजा महेन्द्र जी भारत मे टोहकी लगबैतछि दिल्ली नहि थिक तिबतक लस्सा जै पर चाउ लगौलन्हि रस्सा दिल्लीक लड्डू तीत होइतछि जहन चाऊ सन मीत होइतछि बानरो भालू गेल छल लंका राकस मारि बजौलक डंका (अपूर्ण) हम कांगरेसिया राज करै छी हम कांगरेसिया राज करै छी बुड़िबक सब ताकै छथि टकटक पुण्य-पाप जिन्हकर जेहन छन्हि भाग्य भोग तिन्हकर तेहन छन्हि बहुत गोटा दिन राइत कमाबथि पेटो भरि दाना नहिं पाबथि जखन तखन पेटक छन्हि चिन्ता सदखन करैत रहै छथि डकडक हौ बुड़ि, हमर भाग्य के देखह एकरा जुनि अपने सन लेखह जहिया सं कंगरेसिया भेलहु कहियो नै कमबै ले गेलहु तैयो फोकटक चीज मिलै अछि रसगुल्ला हलुआ के जकथक खद्धर के कुरता जे हमरा आ ई टोपी जे अछि उजरा इआह टा थिक जादू के लकड़ी सांग जकां ई पिन्हैत धकड़ी कानिस्टिबुल दरोगा के थिक कलस्टरौक छाती करै धकधक जखनै खदरक धोती अंगा के थिक महाराज दरिभंगा सब क्यो हमरा शीश नवाबथि हवा गांड़ि सं नित्य बजाबथि सदखन पाटी दैत रहै छथि खाइते पेट करै अछि नकसक हौ बाबू, तोरा के पुछतौह बड़का की बैसौले कहतौह अहिना जी ललचाइते रहतौह सब दिन मोन पछताइते रहतौह हमरा देखि सिहाइते रहबह अहिना करबह लकपक सकपक एके टा ते परमिट मिलल दुख कतबो जैयो हम झेलल छोआ छल पन्द्रह हजार मन तैं तों सब कै रहलह कनकन हौ बुड़ि सोशलिस्ट किछु सोचह व्यर्थ करै छह टें-टें बक-बक कमबै छी हम अपनहिं ढंगे जा नेपाल कपारक संगे जयप्रकाश ते ओतहु गेलथुन्ह दुख के छोड़ि सुक्ख की पेलथुन्ह जहलक ए कीलास के तजि के भूखक मारल केलथुन्ह फक-फक छौह कपार मे तोरा लिखल अहिना करबह सदखन कलकल हमरा देखि फटै छौह छाती कनिएक टा नै छह तों घाती दोसरक सुख सं देखि जरै छह करैत रहै छह सदखन भक-भक हम नै छी तोरा सन धर्कट पालनिहारक संगे खटखट धनिकक धन जौं भोग करै छी हुनको किछु उपकार करै छी ई बेईमानी तोंही सीखह हम सब रहबौह अहिना दक-दक हौ बाबू छह बड़ खुरलुच्ची बाटहि पर खुनै छह घुच्ची जौं रहितौह अपना एको धुर कहियो नै करितह ई खुरखुर बिकतौह की चौमासक गेहुम अनका धन पर करबह रक-रक जौं पटेल जी बांचल रहताह आ मामा चेट्टी जौं जीताह कतबो बांय-बांय तों करबह तैयो नै एको धुर पेबह बेंग जकां टर्राइते रहबह आखिर करबह अपनै फक-फक सब दिन छोटका छोटके रहताह भगबा से धोती नहिं पिन्हताह करमक लिखल कतह के देबहुन्ह दैबक डांग बांइट की लेबहुन्ह कतबो सोशलिस्ट सब झकबह ई सब करतुन्ह अहिना लकपक व्यर्थ करै छह ई सब झंझट जाइन माइन उठबै छह संकट राइत केकर आ दिन केकर थिक जे किछु केलक मौज तेकर थिक आबह किछु तोंहू सब लै जा कियै करै छह बकबक-बकबक आबह कांगरेस मे आबह बड़का सब से हाथ मिलाबह आब बहुत जुनि बात बनाबह किछु अपनौ ले ईहो कमाबह भज कलदारं भज कलदारं भज कलदारं चकमक चकमक (26-01-1950) जे सब बेसी केलथुन्ह टें-टें से सब आब करै छह फें-फें ब्यालीस मे लाखो किछु केलथुन्ह हर्जा मे कैंचो नै पेलथुन्ह हौ अलबोकक टोड़ी, सोचह की भेलौह कैनें ई बकबक आ जौं तों कंगरेसिया रहितह जगुआ से जगजीवन होइतह आ जौं किछु त्यागो नै रहितह हर्जाना मिलबे टा करितह पांच साल हजारोक टाका पैबे करितह चकचक चकचक गीत काव्य रसिक बेर-बेर कहै छथि कवि तों एकटा गीत सुनाबह गाबि-गाबि के अमर गीत कवि अहि पृथ्वी पर स्वर्ग बनाबह किन्तु हृदय अछि हमर प्रकम्पित भय लागल अछि हमरा मन मे गीत हमर की नीक भै सकत जखन ताप अछि हमरा तन मे जैखन कवि घर सौं बहराइ छथि आर्त्तनाद जग सुनि पड़ै छन्हि सुभग कल्पना आ भावुकता क्षण मे कवि के मेटै लगै छन्हि की हम जग के गीत सुनाएब, कर अछि बद्ध, रुद्ध अछि वाणी आगि लगल अछि सबहक घर मे, तोड़ि रहल दम रसहि जवानी वृद्धक अछि कोन बात तरुण कैं देखि फटै अछि कवि के छाती पेट पीठ अछि एक तरुण के नेह बिना की दीपक बाती अर्द्धनग्न तरुणीबाला कैं तन पर नहिं बीतो भरी अंचल लाज छोड़ि घर सं बहराइ छथि आंखि सौ नोर बहै अछि छलछल निकसै छथि जौं घर सं बाहर लै कपार पर दुखक मटकी कृषक सुन्दरी सौं बाटहि मे धन के पूत चलाबथि चुटकी बिलखै अछि नेना बिन दूधक माय-बाप लगही बैसल अछि एक दिस कुक्कुर दूध छोड़ि कं तोसक पर जा क बैसल अछि जेठ मास कृषकक शरीर सौं लहू घाम भै के निकलै अछि गट-गट गीड़ि रहल अछि रोटी बिना नोन, चहुं दिशा तकै अछि किन्तु दोसर दिस किछु बाबू सब शिमला शैलवटी बिहरै छथि मन्द-मन्द शीतल वायू सौं अपन हृदय कं शिक्त करै छथि माघ मास एहि कृषक लोकनि के गात कंपै अछि थरथर क्षण-क्षण घूर जारि जौं निशा बिताबथि तैयो हाथ-पैर अछि कनकन रातुक थाकल आंखि मजूरक जौं भिनुसरबा मे लागि जाइ अछि ‘साला, एतेक बेर के ऐले’ – ई कहि के मालिक गुरड़ै अछि जमीन्दार बाबूक सिपाही हाथ रखै अछि चट गरदनि पर – ‘चल पाजी, की एतेक तकै छै, हाथ राख हर के लागनि पर’ ओ मजूर भूखल अछि एतेक पीबि रहल अछि नोर नयन के कुकुरक मुंह मे ठूसि रहल अछि ओम्हर बाबू खीर रान्हि के की हम जग के गीत सुनाएब, बनल मजूरक लहू सियाही कलम थीक हड्डी मजूर के आ विशेष की जग के चाही छटपट प्राण करैतछि कवि के, की दुनियां के इआह रीति थिक किछु दुख-सुख पर अवशि विचारु, कवि के सुन्दर इआह गीत थिक मोह-भंग गोधिया-गोधिया खेलि कै गोधिया झोरा लै कै पार भेल किशुन कंस के चरित देखैलक तेहन कलयुगी यार भेल एतौका केहन ई कठखेल गाछ कै खेलक परजीवी बेल मधुपक गान तोष नहिं दैतछि, निरस अमर-रस आ परिहास हमर भाव-भूमि के पटल पर फूल उपटि चतरल अछि घास माया मे आनन्द नै भेल राजकमल थालहिं मे गेल सब संचारी-भाव फूसि आ सहित-भाव मे अहित नुकाएल लुच्चा सबहक बानर-दल संग प्रतिक्रियावादी अगराएल भगजोगनी मे धक्कमपेल तैं यात्री नागार्जुन भेल ‘विप्लव’ ऊर्जा ओज रहित कुण्ठा संत्रास बनल छी किरण के आग्रह मानि आइ अन्हारक ग्रास बनल छी सब उपकार पाइन मे गेल संगतिया दुर्मतिया भेल कुछ अपनी, कुछ दुनिया की ( संस्मरण, विचार, आत्मकथ्य) [ विप्लव जी की निम्नलिखित टिप्पणियां एक डायरी पर बिना किसी शीर्षक और तिथियों के उल्लेख किये लिखी गयी हैं। तब रोशनाई वाले पेन से लिखने का चलन था। रोशनाई के अलग रंगों से अनुमान किया जा सकता है कि ये टिप्पणियां अलग अलग दिन लिखे गये थे। विषय संभवतः पहले से तय नहीं थे और जिस दिन जो बात मन में आयी, जो विषय या विचार उभरे, उसे उकेरते गये थे। कुछ स्थलों पर रोशनाई के धुंधला हो जाने के कारण शब्द अस्पष्ट हो गये हैं। ऐसे कुछ स्थलों पर सम्पादक ने अपने अनुमान से शब्द रख दिये हैं और जहां भ्रम की स्थिति बन सकने की आशंका थी, वहां अनावश्यक अनुमान लगाने की बजाय धूमिल शब्द के स्थान पर ब्रैकेट में ‘अस्पष्ट’ लिख दिया गया है। कुछ लेख अपूर्ण रह गये हैं। ऐसा लगता है कि लिखने के क्रम में कोई तात्कालिक व्यवधान आ जाने के कारण इसे अधूरा छोड़ दिया गया और बाद में उन्हें इसे पूर्ण करने का अवसर नहीं मिल पाया या उसे पूरा करने का काम उन की स्मृति से उतर गया। लेखों, विचारों के इस संकलन का मुख्य शीर्षक सम्पादक द्वारा दिया गया है।-- सम्पादक ] पार्टी नेता के चुनाव में जब दोनों नेताओं में समझौता न हो सका तो श्री जवाहरलाल नेहरू ने एक तीसरे नेता को चुनने की राय दी। श्री श्रीबाबू की ओर से श्री कृष्णवल्लभ सहाय का नाम आया, जबकि श्री अनुग्रह बाबू की ओर से सर्वश्री दीप नारायण सिंह, प्रभुनाथ सिंह, शिवनन्दन मण्डल, सुधांशु वगैरह के नाम आये। अन्त में सहाय जी के पक्ष में ही अधिक लोगों को देख कर श्री अनुग्रह बाबू ने आत्म समर्पण कर दिया और श्री श्रीबाबू को नेता मान लिया। श्री श्रीकृष्ण सिंह की महानता का एक नमूना इस सिलसिले में लोगों को दिखलाइ पड़ा। वह यह था कि जब इनकी ओर से किसी व्यक्ति को चुनने का समय आया तो कई लोगों ने यह मन्तव्य प्रगट किया कि वे ही इस पद के लिये चुने ( अस्पष्ट) सुनने में आया कि श्री रामचरित्र बाबू भी इस के लिये आगे आये किन्तु श्री श्रीकृष्ण सिंह ने यह कह कर उन्हें रोक दिया कि वे श्री कृष्णवल्लभ सहाय को ही अपनी ओर से पार्टी नेता चुनवाना चाहते हैं क्योंकि उनके नाम पर ही चिढ कर दूसरे पक्ष के लोग अलग (अस्पष्ट) रहे हैं। श्री बाबू ने यह भी कहा कि उनके सभी समर्थकों का यह कर्तव्य है कि वे लोग श्री सहाय को ही नेता चुनने को तैयार हों और इस के लिये ही प्रयत्न करें। श्री बाबू की इस महानता से लोग बहुत प्रभावित हुए, क्योंकि अपनी जाति के साथियों को नहीं चुन कर वे एक अन्य जाति के साथी को अधिक पसन्द कर रहे थे। यह उनके हृदय की विशालता का परिचायक था, जबकि दूसरे पक्ष के नेता अपनी जाति के लोगों के पीछे जान दे रहे थे। उनके अधिकांश समर्थक प्राप्त हो जाने का एक कारण और भी था। श्री अनुग्रह बाबू की सहायता के लिये श्री कामाख्या नारायण सिंह (रामगढ) ने अपने सारे साधनों का उपयोग किया था। उन की कई मोटरें पटने की सड़कों पर दौड़-धूप कर रही थीं। श्री अनुग्रह बाबू के समर्थक उन मोटरों पर हवा खाते फिरते थे और सदस्यों के वासे-वासे जा कर उन्हें अपने पक्ष में मिलाने का प्रयत्न करते थे। जहाज घाट एवं स्टेशन पर उन की मोटरें रहती थीं सदस्यों को लाने के निमित्त। इस काम से बहुत से सदस्य चिढ भी गये और उन्होंने साफ-साफ जवाब दिया कि वे पैदल जाना पसन्द करेंगे किन्तु किसी पूंजीपति की मोटरों पर नहीं। इन कामों से चिढ कर श्री अनुग्रह बाबू के जो समर्थक थे, उन्होंने भी श्री श्रीबाबू को ही अच्छा समझा और उन्हें ही पार्टी नेता बनाया। इस विजय को श्री श्रीकृष्ण सिंह की महानता की विजय कही जायेगी। * सुपौल थाना कांग्रेस कमिटी के सभापति के चुनाव के सम्बन्ध में तरह-तरह की अटकलबाजियां लगायी जाने लगी किन्तु मैंने अपने को बहुत दिनों तक इस से अलग ही रखा। इस बीच में बहुत से सदस्य मेरे पास आ कर मुझ से अनुरोध करते रहे कि आप इस चुनाव में सभापति पद के लिये उमीदवार अवश्य ही हों और मैं भी उन्हें यह उत्तर देता रहा कि यदि लोग मुझे चाहेंगे तो मैं अवश्य ही उक्त पद के लिये उमीदवार होऊंगा। मेरी आन्तरिक इच्छा भी यही थी कि यदि अधिकांश सदस्य मुझे सभापति बनाना चाहेंगे तो मैं उक्त पद का भार ले कर कुछ काम कर दिखलाने का भरसक प्रयत्न करूंगा। मैं ऐसा इस लिये चाहता था कि जब मैं चार-पांच वर्ष पहले एक बार थाना कांग्रेस कमिटी का मन्त्री हुआ था तो अपनी योग्यता और कर्मठता का कुछ अच्छा सा परिचय नहीं दे पाया था। इस के भी कई कारण थे। एक कारण तो यह था कि उन दिनों मुझे राजनैतिक दाव-पेंचों के अनुभव बिल्कुल ही नहीं थे और दूसरा यह भी था कि मैं कुछ संकोचशील होने के कारण अन्य लोगों से राय भी नहीं ले सकता था। साथ ही कुछ आरामपसन्द व्यक्ति होने के कारण भी मैं खूब जी-तोड़ परिश्रम कर नहीं सकता था। किन्तु मेरे उस मन्त्रित्व काल में जो अनुभव मुझे हुए, उस से मैं अब लाभ अवश्य ही उठा सकता हूं, ऐसा मेरा विश्वास है और एक कारण यह भी है, इसी लिये इस बार मेरे थाना कांग्रेस कमिटी के सभापति पद के लिये उमीदवार बनने का मन था। मैंने उस बार मन्त्री पद को त्याग कर सोशलिस्ट पार्टी को अपना सब कुछ दे दिया था, क्योंकि मैंने कांग्रेस के भीतर बहुत से बुरे काम होते भी देखे थे जो मुझे पसन्द नहीं थे। और कांग्रेस छोड़ते समय मैंने यह सोचा था कि सोशलिस्ट पार्टी के कार्यक्रम अवश्य ही कांग्रेस से अच्छे होंगे और तभी तो ये तपे-तपाये लोग कांग्रेस से निकल रहे हैं। मैंने उन दिनों में कुछ क्षण के लिये भी यह नहीं सोचा था कि ये ही कांग्रेस के लोग तो सोशलिस्ट पार्टी में जा रहे हैं। अस्तु भावावेश में ही मैंने कांग्रेस छोड़ दिया था और सर्वश्री शैलेश (मिश्र), चन्द्रकिशोर (पाठक) तथा अन्य साथियों के साथ सोशलिस्ट पार्टी की सुपौल में स्थापना की थी। लगातार तीन-चार बरसों तक मैंने पार्टी में समय दे कर काम किया था। कुछ दिनों तक सुपौल सोशलिस्ट पार्टी का जेनरल सेक्रेटरी भी रहा और उन दिनों में अपने रुपये दे कर मैंने आफिस के सभी कागजात एवं रेकर्ड ठीक किये। उस से पहले हिसाब लिखने के लिये भी अच्छी बही नहीं थी। किन्तु मैंने सभी आवश्यक रेकर्ड अपने पैसे दे कर खरीद दिये। प्रारम्भ में मैंने सोचा था कि अपने जेब के पैसे मुझे पुनः वापस मिल जायेंगे किन्तु रुपयों का प्रबन्ध नहीं होने के कारण मुझे वे रुपये नहीं ही मिले। इस के अतिरिक्त मैंने अपने आसपास के गांवों में सभी जगह प्रचार कर सोशलिस्ट पार्टी का काफी प्रभाव बढा लिया। मेरे निजी प्रभाव के कारण भी पार्टी का प्रभाव आसपास में तो कम से कम बहुत अधिक बढ गया था। कई कार्यकर्ता भी नौजवानों में से पार्टी के सदस्य बने थे। जिन्हें पार्टी से रुचि थी, उन के शुल्क भी मैंने स्वयं ही दे दिये थे और तभी बहुत से कार्यकर्ता पार्टी में दिलचस्पी लेने लग गये थे। किन्तु पीछे मुझे अपनी भूल मालूम होने लगी, जब मैंने देखा कि सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता कांग्रेस के कार्यकर्ताओं से भिन्न कोई अस्तित्व नहीं रखते। कम से कम पार्टी के नीचे स्तर के कार्यकर्ताओं को देखने से तो ऐसा ही पता चला कि वे अपने स्तर के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं से बहुत ही बातों में दबे हुए ही हैं। मैं अपने अनुभव की बात अगर सच-सच कहूं तो यह कहना ही पड़ेगा कि पार्टी में कम से कम अनुशासन का बड़ा ही अभाव था और दिखावटी रूप ही उस का लुभावना था। केवल लुभावने नारे और लम्बे-लम्बे वक्तृत्व के ही बल पर समाजवाद लाना बिल्कुल असम्भव है। इस के लिये तो बाहर और भीतर दोनों ओर से समाजवादी कार्यकर्ताओं को सच्चा समाजवादी होना चाहिये। किन्तु इस के विपरीत अपनी धाक जमाने के लिये या अगले चुनाव में एसेम्बली या डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के सदस्य बनने के लिये ही अधिकांश कार्यकर्ता कांग्रेस की निन्दा किया करते थे। प्रायः सभी कार्यकर्ताओं को एक ही धुन सवार रहती थी कि कांग्रेस की निन्दा कर या उस के कार्यकर्ताओं की व्यक्तिगत रूप से शिकायत कर जनता की नजरों से उन्हें नीचे गिराया जाय और उन के स्थान उन्हें स्वयं प्राप्त हों। स्वयं मैं भी कांग्रेस की शिकायत करता था किन्तु जहां तक उचित समझता था, वहां तक ही। जहां मैंने कांग्रेस में गुण देखे थे, वहां मैंने उन की प्रशंसा भी की। ऐसी मेरी नीति अब भी है और यही कारण था कि एक बार एलेक्शन के दिनों में जब मैं अन्दौली में भाषण कर रहा था तो सोशलिस्ट पार्टी के शैलेश (मिश्र) की कुछ प्रशंसा मेरे मुंह से सुन कर मेरे कई कार्यकर्ता चिढ से गये थे। मेरा इस तरह विरोधी उम्मीदवार की प्रशंसा में कुछ कहना उन के खयाल से उचित नहीं था। खैर, यह तो अपना-अपना विचार है। उपर्युक्त कारणों से सोशलिस्ट पार्टी में मेरा जी नहीं लगता था। साथ ही मेरी प्रकृति भी भिन्न थी इन लोगों से, जैसा कि कई व्यक्तिओं ने समय-समय पर मुझ से कहा भी था। एक बार जब मुझे किसी विषय को ले कर श्री चन्द्रकिशोर पाठक जी से बातें हो रही थी तो उस ने बहस का रूप धारण कर लिया और तब श्री किशोर जी चिल्ला-चिल्ला कर बोलने लगे। यहां तक कि उनकी आवाज सड़क पर पहुंच रही थी क्योंकि पार्टी आफिस भी सड़क के किनारे ही थी न। शायद तब मैं भी जोर से बोलने लगा था। ठीक उस समय श्री लखन चौधरी जी सड़क पर साइकिल के सहारे खड़े हमारी बातें ध्यान से सुन रहे थे। क्योंकि जब मैं आफिस से घर चला तो मैंने उक्त अवस्था में उन्हें सड़क पर देखा और उस के बाद हम दोनों गप करते हुए घर आये। यह नौ-दस बजे रात की घटना है। उस समय श्री लखन चौधरी जी ने मुझ से कहा था कि मेरी प्रकृति (सोशलिस्ट) पार्टी वालों से बिल्कुल भिन्न है और मेरी कभी भी उन से नहीं पट सकती। अन्त में उन्होंने राय दी थी कि मैं पार्टी से इस्तीफा दे कर यदि कांग्रेस में लौट आऊं तो अच्छा हो। एक तटस्थ व्यक्ति के नाते उन की यह राय थी। इसी प्रकार कई अन्य व्यक्तिओं ने भी ( जो किसी पार्टी के नहीं थे) मुझे समय-समय पर अपनी राय इस प्रकार दी थी किन्तु मैं उन्हें अनसुनी कर दिया करता था। खास कर मैं पार्टी को इस लिये नहीं छोड़ता था कि कहीं लोगों की धारणा मेरे प्रति बुरी न हो जाय और लोग मुझे स्वार्थी न समझने लगें। जो कुछ भी हो, गलती तो मेरी ही थी कि मैंने बिना अच्छी तरह विचार किये ही कांग्रेस को छोड़ दिया था और जिस का पश्चाताप मुझे बार-बार हो रहा था। किन्तु राजनीति में बार-बार प्लेटफार्म बदलना ठीक नहीं होता है, यही सोच कर मैं लाचार हो जाया करता था। किन्तु अन्त में कई ऐसी घटनायें हो गयीं कि मुझे सोशलिस्ट पार्टी से अलग हो जाना पड़ा। उन घटनाओं के उल्लेख से दूसरों के उपर छींटाकशी हो सकती है, अतः उसे नहीं लिखना ही अच्छा है। फिर भी इस की चर्चा कर देना अनुचित नहीं है कि भूख सत्याग्रह, जो सोशलिस्ट पार्टी द्वारा 1950 में जिले के कई स्थानों में चलाये गये थे, मेरी समझ से उचित नहीं थे क्योंकि वह सत्याग्रह उस मौके से लाभ उठाने के खयाल से ही किया गया था, जबकि सबों को ज्ञात था कि सरकार द्वारा अकाल की परिस्थिति का सामना करने के लिये अनाज का प्रबन्ध हो रहा है और कई तरह के अनाज तथा अन्य खाद्य-पदार्थ इस क्षेत्र के लिये बाहर से आने ही वाले हैं। इसी सिलसिले में भुक्खड़ मार्च भी जगह-जगह हुए थे जिन में देहात की जनता को कहीं-कहीं यह कह कर ललचाया गया था कि उन के मार्च करने पर तुरत ही कपड़े तथा खाने सहायता के तौर पर उन्हें प्राप्त हो जायेंगे। इसी लालच में बहुत से लोग सम्मिलित भी हुए किन्तु जब उन्हें कुछ न मिला तो वे निराश हो कर अपने घरों को लौट गये। मैंने इस के प्रमाण प्राप्त किये कि बाद में लोगों ने पार्टी के ऐसे ठग कार्यकर्ताओं को गालियां भी दी। किन्तु इन बातों के होते हुए भी उन दिनों में पार्टी से हट जाना अच्छा नहीं था क्योंकि सत्याग्रह हो रहा था और इसी लिये उस समय के हटने वाले को डरपोक कहा जा सकता था। इसी लिये मैंने सबसे पहला दिन ही सत्याग्रह करना उचित समझा और किया भी, किन्तु किसी प्रकार की सजा मुझे तथा मेरे साथियों को न मिली। इस प्रकार अपने को दोषमुक्त कर मैं जलवायु परिवर्तन के लिये बाहर चला गया था और सभी साथियों से कह गया था कि सत्याग्रह के सिलसिले में जिस समय किसी प्रकार की सजा किसी कार्यकर्ता को दी जाय तो वे मुझे तुरत बुला लें जिस से मैं भी उस में हिस्सा ले सकूं। किन्तु ऐसा नहीं हुआ। और जब मैं दो महीनों के बाद घर वापस आया तो मेरा पार्टी में रहना मुझे अच्छा नहीं जंचा और तभी कुछ दिनों के बाद मैंने पार्टी को अपना त्यागपत्र भेज दिया था। कांग्रेस एवं सोशलिस्ट पार्टी दोनों दलों में रह कर मैंने अच्छी तरह से अनुभव कर लिया था कि राजनीति में कोई कूटनीतिज्ञ ही आगे बढ सकता है। इसी लिये राजनीति से मुझे कभी-कभी घृणा सी होती रही है किन्तु आदमी अपने स्वभाव से लाचार जो होता है। यदि मनुष्य अपनी आदतों पर विजय प्राप्त कर सकता तो कैसा अच्छा होता ! मेरी इच्छा होती थी कि मैं भी राजनीति से अलग रहूं और जहां तक बन पड़े, अपने स्थान से ही जनता की कुछ सेवा यथासाध्य करता रहूं किन्तु ऐसा नहीं हो सका। सर्वश्री लहटन चौधरी जी एवं हीरा लाल भगत जी की बातों को मैं नहीं टाल सका। कई तटस्थ व्यक्तिओं एवं मेरे मित्रों ने भी मुझे राय दी कि मैं कांग्रेस में फिर से सम्मिलित हो जाऊं और अन्त में मैंने तद्नुसार कांग्रेस में ही अपना समय देने का निर्णय किया। हां, तो थाना कांग्रेस कमिटी के सभापति पद के लिये मैंने अपना नाम उमीदवार में घोषित कर दिया। श्रीयुत लहटन चौधरी जी ने उमीदवारों की चर्चा होने पर एक बार मुझ से कहा था कि वे श्री वासुदेव सिंह जी या मुझे ही सभापति चुने जाते हुए देखना चाहते हैं, किसी अन्य व्यक्ति को नहीं। जब उन्होंने श्री वासुदेव सिंह जी का भी नाम लिया तो मुझे शंका अवश्य हुई किन्तु मुझे यह विश्वास नही हुआ कि श्री चौधरी जी मेरा विरोध भी कर सकते हैं। यदि श्री चौधरी जी उन दिनों में स्पष्ट रूप में मुझे कह दिये होते कि वे श्री वासुदेव सिंह जी को ही सभापति बनाना चाहते हैं, किसी अन्य को नहीं, तो सम्भव था कि मैं अपनी उमीदवारी वापस कर लेता। किन्तु उन्होंने बिल्कुल प्रगट रूप से तो नहीं किन्तु थोड़ा सा प्रगट हो कर भी श्री वासुदेव जी का ही समर्थन किया। यद्यपि वे मुझे भी जिला कांग्रेस कमिटी का सदस्य बनाना चाहते थे और पीछे चल कर जिला कांग्रेस कमिटी का मन्त्री भी, क्योंकि उन्होंने एक बार इस तरह की चर्चा की भी थी। ऐसा वे कर भी सकते थे क्योंकि जिला कांग्रेस कमिटी के सभापति भी वे ही थे। चुनाव के समय ही मुझे ऐसा पता चला कि वे श्री वासुदेव का समर्थन एवं उन के लिये प्रयत्न भी कर रहे हैं। उस समय मुझे समय भी नहीं रहा था कि मैं अपनी उमीदवारी वापस ले लेता। अन्त में श्री चौधरी जी के प्रभाव के कारण श्री वासुदेव को 50 वोट प्राप्त हुए और मुझे केवल 28 ही और इस तरह से बहुमत से थाना कांग्रेस कमिटी के सभापति निर्वाचित हुए। मैं आज भी उस विजय को श्री वासुदेव सिंह जी की विजय नहीं बल्कि श्री लहटन चौधरी जी की विजय मानता हूं। यदि वे अपने प्रभाव को व्यवहृत न किये होते तो शायद मैं पराजित नहीं होता। श्री लहटन चौधरी जी से मैं बराबर श्रद्धा करता आया हूं। जिन दिनों में अगस्त क्रान्ति हुई थी और श्री चौधरी ने अपनी बहादुरी का एक मिसाल पेश किया था, मैं उनके कार्यों को याद कर रोमांचित हो जाया करता था। आज तक मैं उन को उसी दृष्टि से देखता आया हूं किन्तु साथ ही यह भी देखता आया हूं कि वे राजनीति के दाव-पेंचों से अपने को अलग नहीं रख सके। गुटबन्दी आदि के आधार पर एक दूसरे को पछाड़ आगे बढने की जो मनोवृति राजनीतिज्ञों में होती है, उस में वे भी फंस ही गये और यही कारण था कि शायद उन्होंने मुझ से अधिक श्री वासुदेव सिंह जी को अपनी सहानुभूति एवं सहायता दी। किन्तु मैं अब भी श्री चौधरी जी को उन की इस सूझ एवं नीति के लिये धन्यवाद दिये बिना नहीं रह सकता। चुनाव के बाद जब श्री चौधरी से मैंने पूछा कि क्यों नहीं उन्होंने पहले ही स्पष्ट रूप से कह दिया था कि वे श्री वासुदेव सिंह जी का पक्षपात करेंगे ; तो उन्होंने उत्तर दिया कि वे इस लिये श्री वासुदेव को सभापति चुनना अधिक पसन्द करते थे कि वे (श्री वासुदेव) इधर तीन महीनों से (स्वर्गीय शत्रुघ्न बाबू की असामयिक मृत्यु के बाद से) थाना कांग्रेस कमिटी के इन्चार्ज रह चुके थे और केवल तीन-चार महीनों के लिये ही उन्हें हटा देना अच्छा नहीं था। फिर मैंने जब कहा कि यही बात उन्होंने मुझे पहले क्यों नहीं बतला दी थी तो वे चुप रह गये और इस गलती को स्वीकार किया। साथ ही वे यह भी कहते रहे कि जिला के लिये वे एकमात्र मुझे ही पसन्द करते थे और उन्होंने अपना वोट भी मुझे दिया था। किन्तु जिला के लिये तो सिर्फ मेरा नामिनेशन ही पड़ा था। मैंने उस जगह के लिये तो इच्छा ही प्रगट नहीं की थी। समय नहीं प्राप्त होने के कारण से मैं अपना नामिनेशन वापस नहीं ले सका था। इस चुनाव में बहुत से सदस्यों ने जो मुझे पहले ही वचन दे दिया था, अन्त में पिछड़ गये और श्री वासुदेव जी को ही अपना मत दिया। मुझे दुख खास कर इसी बात के लिये हुआ था, अपनी हार के लिये थोड़ा सा भी नहीं। मैं अभी तक भी नहीं समझ पाता हूं कि लोग इस तरह के धोखेबाज क्यों होते हैं? मेरी समझ से तो किसी को वचन दे कर मुकर जाना नैतिक पतन की पराकाष्ठा है। श्री वासुदेव सिंह जी के विरोध में मेरे उमीदवार होने का एक कारण और भी था। वे (श्री वासुदेव सिंह) शायद उन दिनों कांग्रेस में आये, जब हम सोशलिस्ट पार्टी में आये थे। यह घटना शायद 1947-48 की है। श्री चौधरी के विचार से श्री वासुदेव सिंह जी तथा मैं राजनीति में लगभग समकालीन ही थे। किन्तु मेरी समझ से श्री चौधरी का यह कहना भी अन्याय था। यद्यपि मैंने कभी जेल की चहारदिवारी का दर्शन नहीं किया था, किन्तु राष्ट्रीय उत्थान के कार्यों में मैंने 1938 ईस्वी से ही दिलचस्पी ली थी और समय दे कर भी जब-तब काम किया था। मैं उन दिनों में ही खादी पहना करता था, जब बाजार में तरह-तरह की डिजायनों के कपड़े मिला करते थे और मेरे पहनने के शौक के दिन भी थे। आज तो खादी पहनने का कोई महत्व नहीं रह गया किन्तु उन दिनों में खादी पहनने पर मैंने गौरव का अनुभव किया था और ऐसा भी विचार हृदय में उठा करता था कि मैंने खादी धारण कर थोड़ा सा त्याग (शौक का ही सही) तो अवश्य ही किया था। यह बात 1938 ईस्वी की ही है जब श्री ललित नारायण मिश्र जी एम ए (वर्त्तमान एम पी) और मैं सहपाठी थे – सुपौल (विलियम्स) हाई स्कूल में ही। हम दोनों ही एकमात्र खादीधारी एवं राष्ट्रीय विचारों के प्रचारक उन दिनों में विद्यार्थियों के बीच थे। उस के बाद 1940 ईस्वी में जब रामगढ में अखिल भारतीय कांग्रेस का अधिवेशन हुआ था तो मैं भी वहां जाने को तैयार था किन्तु मैट्रिक में सेन्ट अप होने के कारण मैं वहां नही जा सका था। थाना कांग्रेस कमिटी की सदस्यता के लिये उन दिनों मैंने भी नामिनेशन दिया था किन्तु कई कारणों से चुनाव ही रुक गया था और मैं सदस्य नहीं बन पाया था। 1940 ईस्वी में ही मेरे पिता की मृत्यु हो गयी थी और घर का सारा झंझट मेरे सर पर आ पड़ा था। फिर भी मैं स्वराज आन्दोलनों से स्वयं को दूर नहीं रख सका। इसी वर्ष चले असहयोग आन्दोलन में नमक कानून भंग करने एवं कलाली पर पिकेटिंग करते हुए मैंने पुलिस की लाठियां खायी थी। 1942 के अगस्त क्रांति में तो मैंने जान हथेली पर ले कर भाग लिया था। वह देश के नौजवानों की दीवानगी का दौर था और उस में एक दीवाना मैं भी था। सुपौल रेलवे स्टेशन का कागजात जलाना, रेल पटरी को क्षतिग्रस्त करना एवं साथियों को ले कर सुपौल कोर्ट पर झण्डा फहराना आज भले इतिहास हो, किन्तु तब के सभी स्वराजी इसके साक्षी रहे हों, न रहे हों, उनकी जानकारी में सभी घटनायें तो रही ही हैं। इन्हीं कारणों से ब्रिटिश सरकार ने डी आई आर के अन्तर्गत मुझे उद्घोषित अपराधी घोषित कर दिया था। मेरी फरारी के बाद पुलिस ने कई बार मेरे घर पर छापा मारा था, परिवारजनों के साथ बदसलूकी की थी और एक बार तो घर में आग भी लगा दी थी। फरारी के उन दिनों में मैं पूर्व से परिचित क्रान्तिकारियों श्री चित्रनारायण शर्मा जी (सुलिन्दाबाद, सहरसा), श्री वेदानन्द झा जी (गोसाइगांव, भागलपुर) के साथ-साथ सर्वश्री शिवनन्दन झा, जटाशंकर चौधरी जी, अम्बिका सिंह ‘दादा’, लखन लाल मिश्र जी, लहटन चौधरी जी, चन्द्रकिशोर पाठक जी, शैलेश मिश्र जी आदि अनेक स्वराजियों के सम्पर्क में रहा था। इस क्रम में सौभाग्यवश श्री जयप्रकाश नारायण जी और श्री राम मनोहर लोहिया जी से भी साक्षात्कार हुआ। अपने जीवन में ही किम्वदन्ती बन गये महान स्वतन्त्रता सेनानी श्री चित्र नारायण शर्मा जी उन दिनों आजाद दस्ता के जिला प्रभारी थे। वे मेरे संबंधी तो थे ही, साथ ही स्वराज आन्दोलन में मेरे मार्गदर्शक की भूमिका में भी थे। एक बार तो मैं उन के साथ नेपाल भी चला गया था जहां आजाद दस्ता का मुख्यालय एवं बेतार केन्द्र था। करिहो महंथ जी के यहां से श्री राममनोहर लोहिया जी को परसरमा होते हुए कलकत्ता भेजने के काम में डाक्टर शुक्ला जी की मदद करने के मेरे सफल प्रयास की कहानी भी सुराजियों से छिपी नहीं रही है। एक बार तो श्री शैलेश (मिश्र) और मैंने, स्वयं श्री लहटन चौधरी के परिवारवालों को भी खाने के लिये कुछ सहायता, चन्दा करने के बाद पहुंचायी थी, जबकि उनके गांववाले उनके परिवार के सम्पर्क में आने से भी डरते थे। और आज ये ही चौधरी जी हैं जिन्होंने मुझे श्री वासुदेव सिंह का समकालीन राजनीति में ठहराया। भागलपुर के सुप्रसिद्ध अगस्त-क्रान्ति-संचालक श्री सियाराम सिंह जी छिप कर सरकार के विरुद्ध काम किया करते थे और कई तरह के पर्चे भी निकालते थे। श्री जयप्रकाश नारायण भी हजारीबाग जेल से भाग कर छिप-छिप कर काम करते थे और पर्चे द्वारा प्रचार करते थे। मैं उन पर्चों को छिप-छिप कर जनता में बांटा करता था और श्री शैलेश मुझे वे पर्चे पहुंचा जाया करते थे। जब बहुत से कांग्रेसी नेता जेल से छूट कर आये तो रचनात्मक समिति बना कर काम करना प्रारम्भ किया था क्योंकि कांग्रेस को सरकार ने अवैधानिक करार दिया था। मैंने भी उस समिति में काम किया था और अपने गांव में रात्रि-पाठशाला द्वारा लोगों को शिक्षा बहुत दिनों तक दी थी। उस समय मैं पूरा तैयार होकर देश के कार्यों के लिये निकल पड़ा था और मैं सभी तरह की यातनाओं को सहने के लिये भी हिचकने वाला नहीं था। उन दिनों कांग्रेसी सरकार नहीं बन पायी थी और बड़े-बड़े नेता लोग कहा करते थे कि एक बहुत बड़ी क्रान्ति पुनः देश में होगी, तब कहीं स्वराज होगा। मैं उस क्रान्ति में सम्मिलित हो कर अपना कर्तव्य पालन करने की बात सोचा करता था। अफसोस कि उस क्रान्ति में तन-मन से समर्पित हो कर भी मुझे जेल जाने का सार्टिफिकेट नहीं मिल सका जिस के बल पर मैं भविष्य में कुछ कर सकता था। फिर भी पुराने कार्यकर्ता होने एवं अनुभव इत्यादि के आधार पर भी मुझे श्री वासुदेव सिंह जी से अधिक अधिकार था कि मैं ही थाना कांग्रेस कमिटी का सभापति चुना जाऊं। और इसी लिये कई पुराने और उत्तरदायी कार्यकर्ताओं के कहने पर ही मैं उक्त पद के लिये उमीदवार हुआ था ; अन्यथा मैं उस दशा में कभी भी उमीदवार नहीं होता जब मुझ से भी पुराने, योग्य एवं त्यागी कार्यकर्त्ता इस पद के लिये अपनी उमीदवारी घोषित करते। थाना कांग्रेस कमिटी के सभापति का चुनाव सम्पन्न हुआ और इस के साथ ही इस की सरगर्मी भी समाप्त हो गयी। नये प्रकार से प्रारम्भिक सदस्य बनाने का काम प्रारम्भ करना था क्योंकि इस बार पुनः चौअनियां सदस्य का ही विधान कलकत्ता कांग्रेस में बना था। सभी कार्यकर्त्ता अपने-अपने काम में जुट गये। मैंने भी नये प्रकार से काम करने का विचार किया। सम्प्रति सदस्य बनाने का ही काम था किन्तु यह काम अकेले तो अच्छी तरह से हो नहीं सकता था, अतः मैंने संगठित रूप से काम करने का निर्णय किया। सुपौल शहर की जनसंख्यां काफी अधिक रहने के कारण यहां अधिक संख्यां मे सदस्य भी बनाये जा सकते थे किन्तु किसी कार्यकर्त्ता की दिलचस्पी इधर नहीं के बराबर ही थी। स्थानीय कार्यकर्त्ताओं में अकर्मठता इतनी बढ गयी थी कि उन्हें सक्रिय बनाने के लिये परिश्रम की आवश्यकता तो थी ही, साथ ही बुद्धिमानी की भी। मैंने भरसक प्रयत्न करने का विचार किया और तद्नुसार कार्यारम्भ भी कर दिया क्योंकि बिना इधर पूरा ध्यान दिये काम को आगे बढाना नित्तान्त असम्भव था। शहर कांग्रेस कमिटी की स्थापना : बरसों से मेरी इच्छा रही थी कि शहर में एक कांग्रेस कमिटी की स्थापना हो। एक बार 1945-46 में मैंने इस की स्थापना भी की थी जो कुछ दिनो तक चली थी किन्तु उस के बाद थाना कांग्रेस कमिटी का मन्त्री चुने जाने के बाद से मैंने उधर ध्यान देना छोड़ सा दिया था और इसीलिये अन्य कार्यकर्त्ताओं की ढिलाई से वह कमिटी भंग हो गयी थी। अब तो सुपौल शहर में बहुत से कांग्रेसी कार्यकर्त्ता भी हो गये हैं, यही सोच कर मैंने एक बैठक कार्यकर्त्ताओं एवं कांग्रेस से सहानुभूति रखने वाले उत्साही लोगों की बुलायी। 12 अप्रिल को सर्वसम्मति से एक कांग्रेस एडहाक कमिटी शहर के लिये बनायी गयी जिस में सभापति एवं मन्त्री सर्वश्री जगदीश प्रसाद संथालिया एवं हनुमान मल बोथरा जी हुये। उन्हें इस ओर आकर्षित कर सक्रिय बनाने के खयाल से मैंने उन्हें ये पद कमिटी में प्रस्ताव कर प्रदान करवाये थे क्योंकि पद का उत्तरदायित्व सिर पर आ जाने के कारण ही उन्हें कार्यों में दिलचस्पी होती, ऐसा मैंने निर्णय किया था। मैंने यह भी विचार लिया था कि उन के बदले बराबर मैं उन का काम कर दिया करूंगा। इस चुनाव में सहानुभूति रखने वाले लोग भी पदाधिकारी इस लिये चुने गये कि कलकत्ता कांग्रेस में इसी बार यह निर्णय हुआ था कि विधान परिषद आदि के चुनाव में सक्रिय रूप से कांग्रेस को सहायता पहुंचाने वाले लोगों को ले कर कांग्रेस के समानान्तर कामचलाऊ कांग्रेस कमिटियां जगह-जगह बनाई जा सकती हैं। यह विधान शायद इस लिये बना था कि नये-नये लोग कांग्रेस में सम्मिलित हो सकें और पण्डित जवाहर लाल जी बहुत दिनों से उत्साही एवं योग्य लोगों को कांग्रेस में लाने की इच्छा प्रगट करते आये थे। और जब मैंने विधान में इस प्रकार का संशोधन देखा तो मैंने झट ऐसी कमिटी बना लेने का निर्णय किया जिस से कांग्रेस के कार्यों को अगे बढाने में काफी सहायता मिल सके। सर्वश्री शिबशंकर लाल दास एवं जगदीश ठाकुर जी को इस कमिटी का सहायक मन्त्री बनाय गया था। साथ ही कपलेश्वर झा जी आफिस मन्त्री सर्वसम्मति से बनाये गये थे। मैंने श्री उदयचन्द्र अग्रवाल जी से अनुरोध कर धर्मशाले की एक कोठरी इस कमिटी के आफिस के लिये दिला दी। स्वयं अपने पैसे के रजिस्टर तथा आवश्यक फाइलें मैंने खरीद दीं और सभी सामान आफिस मन्त्री श्री कपलेश्वर झा जी के सुपुर्द कर दिये। थाना कांग्रेस कमिटी की कार्यसमिति में भी पीछे चल कर इस तरह की कमिटी बनाने पर जोर दिया गया। और सुपौल शहर की इस कमिटी की लोगों ने सराहना की। बाद में चल कर प्रारम्भिक सदस्य बनाने पर जोर दिया गया और मैंने फार्म 10 रुपये अपने पास से दे कर मंगवा दिया जिस से सदस्य बनाने के काम में शिथिलता न आ सके। वे फार्म कार्यकर्त्ताओं में बांट दिये गये और मैंने सबों को बराबर याद दिलाया कि उन्हें काफी संख्यां में सदस्य बनाना है। कांग्रेस के कार्यकर्त्ताओं में जो लगन स्वतन्त्रता प्राप्त होने के पहले थी, वह अब बिल्कुल ही नहीं रही। सत्तारूढ हो जाने के कारण आराम करने और रोब गांठने की प्रवृत्ति कांग्रेसजनों में हो गयी है। नये लोग जो आते हैं, वे भी इस खयाल से नहीं कि उन्हें देश का काम करना है या जनता की सेवा में अपने समय को लगाना है, बल्कि जनता में अपनी कुछ धाक जमाने के लिये ही। बहुत से लोग तो रोब और धाक के प्रभाव से कुछ आर्थिक लाभ उठाने की प्रवृत्ति से आते हैं। किन्तु जिन्हें आर्थिक लाभ उठाना नहीं है, वे भी नाम और यश पैदा करने के खयाल से तो अवश्य ही आते हैं। और जब ऐसे लोग कांग्रेस में आये हैं तो कहां तक कांग्रेस रचनात्मक कार्यों में आगे बढ सकेगी, यह तो सहज ही में अनुमान किया जा सकता है। अब रही पुराने कार्यकर्त्ताओं की बात। इन में भी अधिकांश अपने त्याग और तपस्या को अब हुण्डी की तरह भुनाना चाहते हैं। वे अब सोचा करते हैं कि उन की सेवा के दिन बीत चले और अब उन्हें अपनी तपस्या के पुरस्कार में मिले स्वतन्त्रता के ये दिन आराम से बिताने हैं। इस तरह के कांग्रेसी अब एसेम्बली या डिस्ट्रिक्ट बोर्ड की सीटों के लिये जमीन आसमान को एक कर देते हैं और यदि सौभाग्यवश उन्हें ये जगहें प्राप्त हो गयीं तो वे अपने अधिकारों का दुरुपयोग करना प्रारम्भ कर देते हैं। बड़े से बड़े लोगों तक आज इसी कारण पैरवी पहुंच सकती है और सच्चे अपराधी निर्दोष साबित हो जाते हैं। जिन का सम्बन्ध ऐसे कांग्रेसजनों से है, वे खुल कर अत्याचार कर सकते हैं और उन्हें कोई रोकनेवाला नहीं। पुलिस और हुक्कामों का साहस नहीं होता कि वे ऐसे कांग्रेसजनों या उन के मित्रों के विरुद्ध कोई भी कानूनी कार्रवाई कर सकें। यदि किसी आफिसर ने ऐसा करने का साहस किया तो ऐसे कांग्रेसजन उन के उपर हजारों इल्जाम ले आते हैं और मन्त्रियों से कह कर या अन्य उपायों से उन की बदली करबा देते हैं। आज जिस भ्रष्टाचार और घुसखोरी की चर्चा जहां-तहां की जाती है, उसका उत्तरदायित्व आज ऐसे कांग्रेसजनों पर भी है। जो कांग्रेसी अपने आप को ईमानदार कहते हैं या सचमुच वे कुछ ईमानदार हैं, भी इन पतित कांग्रेसजनों के दूषित विचारों से प्रभावित हुये बिना नहीं रह सकते। यदि ईमानदार कार्यकर्त्ता इन भ्रष्ट कार्यकर्त्ताओं की बातों को न मानें या उनकी पैरवी इत्यादि न कर दें तो वह आगे नहीं बढ सकता। ये स्वार्थी कार्यकर्त्ता उसे आगे बढने का मौका ही न देंगे, क्योंकि आखिर ऐसे लोगों के वोट से ही तो वे थाना, जिला या प्रान्तीय कमिटियों के सभापति या मन्त्री हो सकते हैं अथवा एसेम्बली या डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के सदस्य हो सकते हैं। और यही कारण है कि बहुत से अच्छे कार्यकर्त्ता, जो सचमुच ईमानदार हैं, आगे नहीं बढ पाते। अतः आज गुटबन्दी की आवश्यकता पड़ती है जिसके लिये अधिक से अधिक कार्यकर्त्ताओं को अपने पक्ष मे मिला कर रखना पड़ता है जो समय पर काम आ सके। बिना इस प्रकार की गुटबन्दी किये आज राजनीति में सफलता प्राप्त करने का कोई दूसरा चारा नहीं। इस तरह की गुटबन्दी जात-पात के नाम पर या पिछड़े वर्ग के नाम पर ही होती है। काश! इस गुटबन्दी का आधार आर्थिक हो पाता। आज जात-पात के नाम पर गुटबन्दी करना एक साधारण सी बात राजनैतिक दलों में हो गयी है। मैंने तो सोशलिस्ट पार्टी में भी इसका बीज देखा था। आज ज्यों-ज्यों इस तरह की जातीयता आदि को दूर करने की कोशिश की जा रही है और राजनैतिक नेता इससे दूर भागने का प्रयत्न कर रहे हैं, फांसी की रस्सी की तरह यह और जोर से ही उनके गले में बैठती जा रही है। हुक्का-पानी में भले ही जातीयता की बू राजनैतिक कार्यकर्त्ताओं में नहीं पायी जाय किन्तु वोट के दिनों में तो एकमात्र यही अस्त्र एक-दूसरे को पराजित करने के लिये उनके पास होता है। मेरा तो ऐसा खयाल है कि इसे मिटानेवाले व्यक्ति स्वयं इसके शिकार हो रहे हैं और यदि निस्वार्थ भाव से राजनैतिक दलों में कार्यकर्त्ताओं ने काम नहीं किया तो कहा नहीं जा सकता कि इसका फलाफल आगे चल कर क्या होगा ! हो सकता है कि भविष्य में – ईश्वर न करे ऐसा हो – भारत के पतन का एकमात्र यही कारण हो। ऐसा इस लिये सोचना पड़ता है कि आज भी एक दल जब सत्तारूढ हो जाता है तो दूसरा दल उसे सहयोग देने के विपरीत उसके पांव पकड़ कर पीछे की ओर खींचता है कि वह अपने काम में सफल न हो सके और इस प्रकार असहयोग करनेवाले दल को उसका स्थान मिल सके। आज यद्यपि यह बात थाना, जिला या प्रान्त तक ही सीमित है, लेकिन कौन कह सकता है कि इसका अखिल भारतीय रूप नहीं हो सकता है। और इसका कुछ-कुछ आभास तो प्रान्तीयता आदि की भावना से ही प्राप्त हो जाता है, जैसा कि समय-समय पर देखा गया है। जातीयता की यह भावना खास कर उन लोगों में पायी जाती है जो अपनी योग्यता के बल पर आगे नहीं बढ पाते या जिन्हें अन्य कार्यकर्त्ताओं के इसी प्रकार की युक्तियों के बल पर विरोध का सामना करना पड़ता है। जिन की जाति के लोगों की जनसंख्यां उनके राजनैतिक क्षेत्र में अधिक होती है, वे कार्यकर्त्ता अपनी उन्नति के लिये इसी युक्ति का सहारा लेते हैं। हमारे इलाके में यादव, केवट या अन्य कुछ जातियों की जनसंख्यां अधिक होने के कारण इस वर्ग के बहुत से कार्यकर्त्ता (सभी नहीं) इसी बल पर आगे बढने का दावा करते हैं और अच्छे-अच्छे कार्यकर्त्ता भी भरसक प्रयत्न करते हैं कि उन्हें मिला कर रखा जाय कि वे भी उन के साथ ही वैतरणी पार कर जांय। और इस तरह के कार्यकर्त्ता बाहर से इतना ढोंग करते हैं कि देख कर आश्चर्य होता है। वे समाज में ईमानदारी, पक्षपात-हीनता और सच्चा होने का दावा करते रहते हैं और भोली-भाली जनता उन की बाहरी सूरत पर ही उन की बातों में भूल जाती है। उपरोक्त कारणों से ही आज कांग्रेस, जिस का इतिहास त्याग, बलिदान एवं देशभक्ति से भरा हुआ है, दिनोदिन ह्रासावस्था की ओर जा रही है। कांग्रेस से लोग असन्तुष्ट हो कर बाहर निकल अपनी अलग-अलग खिचड़ी पका रहे हैं। किसान मजदूर प्रजा पार्टी तथा समाजवादी पार्टी आदि पहले कांग्रेस में ही तो थी और आज भी कांग्रेस तथा उन के सिद्धान्तों में कोई विशेष अन्तर नहीं मालूम होता। किन्तु हमारे दुर्भाग्यवश आज हमारे साथी हम से अलग हो रहे हैं। इस का कारण क्या हमारी भूल नहीं है ? भले ही आज कांग्रेस के आगे उन दलों की कोई खास हस्ती न हो और कांग्रेस एलेक्शनों में बहुमत भले ही प्राप्त कर ले, लेकिन क्या कांग्रेस उसी प्रकार जनता का विश्वास एवं श्रद्धा प्राप्त कर रही है जैसा कि आज से सात साल पहले वह प्राप्त कर रही थी ? जनमत का ही जहां तक प्रश्न है, क्या कांग्रेस से अधिक बहुमत और दलों के लोग भारत भर में प्राप्त नहीं कर सके हैं ? सारे भारत के मतों में से अधिकांश तो शायद स्वतन्त्र या अन्य दलों के उमीदवारों को ही प्राप्त हुये हैं। और आज जो भी मत कांग्रेस को मिले हैं, वे उस के पिछले त्याग के कारण ही। इस का प्रमाण तो हमें तब मिला जब हम गांवों में मत मांगने के लिये लोगों के पास गये और जब उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यद्यपि कांग्रेस के काम अच्छे नहीं हैं, फिर भी उस के त्याग को याद कर वे एक बार और इस को अपना मत देंगे। “एक बार और कांग्रेस को वोट दे कर देख लो” – यह विचार क्या यह प्रमाणित नहीं करता कि लोगों के हृदय में अब वह श्रद्धा कांग्रेस के प्रति बिल्कुल ही नहीं रह गयी है और फिर एक बार उसे सम्हलने का अवसर लोगों ने दिया है। और यदि इस बार कांग्रेस नहीं सम्हली तो ? तो क्या होगा, इस बात पर विचार करने वाले आज कितने कांग्रेसजन हैं और वे इस के लिये क्या प्रयत्न कर रहे हैं? आज आवश्यकता थी कि कांग्रेसजन जनता में फिर से घुल-मिल जाते, उन की सुनते और अपनी सेवाओं के बल पर उन्हें आकर्षित करते। किन्तु अफसोस, इधर ध्यान किसी का भी नहीं है। केवल डींग मारने के लिये बहुत से कार्यकर्त्ता हैं, काम करने के लिये नहीं। श्री नेहरू ने बार-बार इधर इशारा किया है, कांग्रेसजनों को ललकारा है और उन्हें जुट कर ईमानदारी से काम करने को कहा है किन्तु उन का यह अरण्यरोदन कौन सुनेगा? अपनी-अपनी डफली ले कर आज सभी मस्त हो रहे हैं ; जहन्नुम में जाय कांग्रेस, त्याग, सेवा और देशभक्ति ! * राजनीति की यही दुर्गति देख कर समय-समय पर भिन्न-भिन्न प्रकार के विचार मन में आते रहते हैं। कभी इच्छा होती है कि क्यों न राजनीति को छोड़ कर अन्य प्रकार के कार्यों में समय व्यतीत करना चाहिये। राजनीति के अतिरिक्त साहित्य है – खास कर हिन्दी साहित्य जो अभी भी बहुत पीछे पड़ा हुआ है। अन्य भाषाओं की अपेक्षा यह एक गरीब भाषा ही कही जायेगी क्योंकि अब तक जो प्रयत्न इसे समृद्धशाली बनाने के निमित्त हुये हैं, वे बहुत थोड़े ही हैं। इसे भारत की राष्ट्रभाषा बनाने के लिये भी काफी प्रयत्न करना पड़ा है, वरना हो सकता था कि यह राष्ट्रभाषा का भी स्थान नहीं ग्रहण कर सकती। खैर, किसी प्रकार वह स्थान तो इसे मिला किन्तु अब इस की व्यापकता पर विचार करना आवश्यक है। यदि इस ओर ध्यान न दिया गया और यह संकुचित वातावरण में ही पलती रही तो न जाने भविष्य में इस का क्या होगा। अत्यन्त ही दुख की बात है कि हम में से विद्वान कहे जाने वाले और कालेज की ऊंची-ऊंची डिग्रियां प्राप्त लोग भी शुद्ध-शुद्ध हिन्दी न बोल सकते हैं और न लिख ही सकते हैं। बचपन से हिन्दी भाषा में बोलते-चालते भी जो व्यक्ति प्रौढ होने पर उस की गहराई तक नहीं पहुंच सके, उसे क्या कहा जा सकता है। ऐसे व्यक्ति बड़े नाज से कहते हैं कि वे अंग्रेजी तो शौक से लिख-पढ सकते हैं किन्तु हिन्दी का अभ्यास ही नहीं है उन्हें। अजी जनाब, हिन्दी का अभ्यास तो आप तभी से कर रहे हैं जब से आप पैदा हुये। कहिये न कि यह एक ढोंग है और अपने को अंग्रेजीदां प्रमाणित करने के लिये ही आप इस तरह कहा करते हैं। सच तो यह है कि जब जीवन भर के अभ्यास से आप हिन्दी न सीख सके तो दस-बारह वर्ष की स्कूली शिक्षा से आप अंग्रेजी कहां तक सीख सके होंगे। अंग्रेजी साहित्य का तो आप को रत्ती भर ज्ञान नहीं है किन्तु बात यह है कि अन्धे के गांव में काना राजा और इसी लिये अयोग्य व्यक्तियों के बीच आप अपनी झूठी शान बघारते हैं। खैर, अब तो जो हुआ सो हुआ – जिन के कारण आप अंग्रेजी सीखने में सर खपा देते थे, वे भी गये – अब तो उस फादरी जुबान से काम नहीं चलेगा और मादरी जुबान सीखनी ही होगी। तो आइये न हम और आप मिल कर विचार करें कि क्यों आप को हिन्दी सीखने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है किन्तु अंग्रेजी को आप गपागप निगलते चले जाते हैं। बहुत से लोग कहा करते हैं कि हिन्दी में लिंग का विचार बहुत ही कठिन है और इस के लिये अंग्रेजी इत्यादि भाषाओं की तरह कोई नियम नहीं। वास्तव में बात मार्के की है। यह कठिनाई अखरने वाली अवश्य ही है। लिंग-भेद में शब्दों के लिये यदि कुछ नियम हैं भी तो अपवादों की भी कोई कमी नहीं और हमारे ये नये हिन्दी-प्रेमी लोग इस से घबड़ा जाते ही हैं। घबड़ाने की बात भी है क्योंकि लिंग सम्बन्धी भूलों से बड़े-बड़े विद्वान लोग भी नहीं बचे हैं और कहीं-कहीं तो उन की हेंकड़ी बन्द हो जाती है। तो क्या आज हम उस के लिये नियम नहीं बना सकते हैं? यदि सरकार इस के लिये हिन्दी के उच्च कोटि के विद्वानों की एक समिति बना दे और उन्हें यह भार दे कि वे इस पर शीघ्र ही विचार कर अन्तिम निर्णय दें तो यह काम आसानी से हो सकता है। किन्तु सरकार को डाक्टर रघुवीर जैसे व्यक्तियों के हाथों में यह काम नहीं सौंपना चाहिये , नहीं तो अर्थ का अनर्थ हो जायेगा। क्योंकि जैसा कि पता चला है, उन्होंने हाल में जो हिन्दी शब्दों की रचना की है, वे इतने दुर्बोध हैं कि बड़े-बड़े विद्वान भी उन्हें नहीं समझ पाते, तो साधारण लोगों का क्या पूछना है। हो सकता है कि वे शब्द डाक्टर रघुवीर तक ही न रह जांय। आज आवश्यकता है हिन्दी भाषा को जनता की बोलचाल की भाषा बनाने की। नदियां उपर की ओर नहीं बहा करती बल्कि नीचे की ओर ही बहती है। आज सरलता की आवश्यकता हर दिशा में है। संसार का इतिहास बतलाता है कि मानव समाज हर दिशा में सरलता की खोज करता रहा है और वह आगे भी खोज करता जायेगा, जब तक कि उसे इस की प्राप्ति होती रहेगी। तो हम क्यों न हिन्दी में भी सरल, सुबोध एवं बोलचाल के शब्दों का प्रयोग करें। हमें संस्कृत की परिधि से निकाल कर हिन्दी को बाहर खड़ा करना पड़ेगा और उस में यह शक्ति लानी होगी कि अन्य भाषाओं के शब्दों को हजम कर सके, वरना संकुचित वातावरण के पृष्ठपोषक हिन्दू समाज की जो अवस्था आज हो रही है, वही हिन्दी की भी होगी। मेरे उपरोक्त कथन का यह अभिप्राय कदापि नहीं है कि मैं हिन्दी को हिन्दुस्तानी का रूप देना पसन्द करता हूं। मैं तो सदा से ही हिन्दुस्तानी का एक जबरदस्त विरोधी रहा हूं। मैं देख चुका हूं कि हिन्दुस्तानी प्रचार समिति या ऐसे ही संघों की हिन्दुस्तानी को कि वह कितनी सुबोध या दुर्बोध होती है। मेरी समझ से वह भाषा न हिन्दुओं के लिये और न मुसलमानों के लिये ही लाभदायक है, बल्कि दोनों के लिये अहितकर। क्योंकि न हिन्दू ही बिना उर्दू का ज्ञान प्राप्त किये उसे समझ सकता है और न मुसलमान भाई ही, जिन की सुविधा के लिये या यों कहिये कि जिन्हें प्रसन्न करने के लिये यह नवीन-खिचड़ी भाषा रची गयी है। अतः डाक्टर रघुवीर की हिन्दी से काम चलने का नहीं । यदि सरकार ऐसे व्यक्तियों के हाथ में हिन्दी का भविष्य सौंप दे तो हिन्दी प्रेमियों को इस का विरोध करना चाहिये और सरकार पर दबाव डालना चाहिये कि वह ऐसे हिन्दी के प्रतिनिधियों की समिति बना कर हिन्दी का भविष्य उन के हाथों में सौंपे जो वास्तव में हिन्दी को फलती-फूलती हुई देखना चाहता हो। बड़े-बड़े साहित्यिकों की तो बात हम छोड़ दें, हम हिन्दी प्रेमियों को इस ओर कदम बढाना चाहिये और इस के लिये संगठन बना कर आन्दोलन करना चाहिये। साथ ही छोटे-छोटे लेखों द्वारा अपने विचार भी समय-समय पर पत्रों में प्रकाशित करवाना चाहिये, भले ही हमारे विचार निम्न स्तर के ही क्यों न हों। और इस काम के लिये भी समय दे कर काम करनेवाले हिन्दी-प्रेमियों की आवश्यकता है। आर्थिक कठिनाइयों का तो जबरदस्त सामना करना ही पड़ेगा इस काम के लिये, किन्तु लगन से काम लेने पर ही उस में सफलता प्राप्त हो सकेगी। और इस प्रकार जुट पड़ने से क्या हिन्दी को वह सौभाग्य नहीं प्राप्त हो सकता है जो आज अंग्रेजी को है! ऐसा नहीं करने से तो अंग्रेजी मालूम नहीं कितने वर्षों से हमारे उपर लादी जाती रहेगी। काश, हिन्दी भी अंग्रेजी का टक्कर ले सकती! हां, तो मैं साहित्य की चर्चा कर रहा था। यों तो हर व्यक्ति इस लिये साहित्यिक होता है कि सृष्टि की आदि से ही साहित्य की आवश्यकता मानव समाज को हुई। आदिम अवस्था में ही नदियों, जंगलों, फल-फूलों, पहाड़ों और झरनों के सौन्दर्य से प्रभावित हो कर मानव के हृदय से उन की प्रशंसा में वाणी फूट पड़ी और धीरे-धीरे उसी ने साहित्य और भाषा का रूप धारण किया तो उस की सन्तान आज के मानव क्यों न साहित्यिक हों! यद्यपि किसी मजदूर और साधारण कोटि के व्यक्तियों को पढने-लिखने का ज्ञान नहीं होता, फिर भी सावन की रिमझिम में या शरत्पूर्णिमा की अमल धवल चान्दनी में उस के मन-मयूर नाच उठते हैं और अनायास ही उस की वाणी से विरहा की तान या अन्य प्रकार के ग्राम्य गीत-संगीत प्रस्फुटित हो उठते हैं। क्या इतना ही यह समझने के लिये पर्याप्त नहीं है कि हर व्यक्ति को साहित्य से अभिरुचि है। तो प्रश्न उठेगा कि क्यों नहीं हर व्यक्ति लेखक या कवि हो जाता है? मेरी समझ से वह लेखक या कवि हो सकता है किन्तु इस के लिये अटूट लगन और मन की एकाग्रता दरकार है। आज के स्कूली विद्यार्थियों की तरह केवल उपनाम रख लेने से काम नहीं चलेगा। यह तो शौक मात्र ही है। यदि उपनाम रख लेने से कोई कवि हो जाता या तुकबन्दी कर देने से, तो आज के स्कूल और कालेजों से निकले 90 प्रतिशत ऐसे ही होते। हर व्यक्ति में कवि तो होता है किन्तु वह जाग्रतावस्था में नहीं रहता। और जिस का कवि जाग्रतावस्था में है, वही कवि होता है। वह संसार की हर वस्तु में कविता को देखता है और अपनी कल्पना और अनुभूति के सहारे कविता की सृष्टि करता है। और यही दशा लेखक की भी है। तो लेखक या कवि हो कर कोई संसार को क्या लाभ पहुंचा सकता है, यह विचारणीय है। चुंकि कविता, कहानी और लेखादि साहित्य के ही अंग हैं, हमें साहित्य के सम्बन्ध में ही मोटे तौर पर सोचना है, बारिकी से नहीं। आज बिनोवा जी के शब्दों में लोग फायदावादी भी बन गये हैं। उन्हें हर काम से फायदे क्या है, इसी से फायदा है। तो क्यों न पूछा जाय कि साहित्य-साहित्य की रट लगाने से क्या फायदे हैं? यह निर्विवाद सत्य प्रमाणित हो चुका है कि विश्व में साहित्य का स्थान बहुत ही ऊंचा है। आज कोई भी देश या राष्ट्र जिसे अपना साहित्य नहीं है, उन्नति नहीं कर सकता। आज अंग्रेजों की चलती इसी लिये सब से अधिक इस संसार में है कि उसका साहित्य काफी समृद्धशाली है और संसार के कोने-कोने में उस का प्रचार है। आज अंग्रेजी संस्कृति एवं सभ्यता के कायल सभी देश के लोग हो रहे हैं और इस का श्रेय अंग्रेजी साहित्य को ही है। साहित्य के महत्व को जानने के कारण ही अंग्रेजों ने संसार में इस के प्रचार के निमित्त मिशनरियों का जाल सा बिछा दिया। यही कारण है कि हमारा भारत स्वतन्त्र होने पर भी अंग्रेजी को छोड़ने से हिचकता है और यदि हम अंग्रेजी को बिल्कुल ही छोड़ दें तो हमारा सम्बन्ध सारे संसार से टूट जायेगा। विज्ञान और राजनीति आदि भी साहित्य के ही बल पर पनपते हैं। यदि साहित्य न होता तो इन्हें कौन जान सकता? इतना ही नहीं, बल्कि सच तो यह है कि जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में बिना साहित्य की सहायता से हम कुछ नहीं कर सकते। सभी विधाओं का केन्द्र-बिन्दु साहित्य ही तो है। रूस में यदि मैक्सिम गोर्की जैसा साहित्यिक नहीं होता तो कौन साम्यवाद के सन्देश को भोली-भाली जनता तक पहुंचा सकता? भारत में ही यदि मैथिलीशरण गुप्त और रामधारी सिंह ‘दिनकर’ आदि जैसे राष्ट्रीय कवि नहीं होते तो क्या राष्ट्रीयता की लहर इतना शीघ्र भारत में फैल पाती? नेताओं के ओजस्वी भाषणों में हृदय को फड़का देने वाली शक्ति साहित्य की ही एक शैली है। कवितायें सुन कर भुजायें फड़क उठती हैं और कहानियां पढ कर आंखों से अश्रुपात होने लगते हैं और मनुष्य के हृदय में हास्य-रूदन और प्रतिशोध आदि की भावनायें उठने लगती हैं जो उसे कर्त्तव्यपथ पर बढने के लिये प्रेरित करती हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि साहित्य मुर्दों में जान फूंक सकता है, कायरों को बहादुर बना सकता है, नेताओं को राजनीतिज्ञ बना सकता है, विचारकों को दार्शनिक और अन्वेषकों को अणुबम का आविष्कारक बना सकता है। साहित्य की व्यापक सत्ता से विश्व का अणु-अणु अनुप्राणित है, इस में शक की कोई गुंजाइश नहीं। और जब साहित्य की यह महत्ता है तो उस की अभिवृद्धि में क्यों न जुट कर लगा जाय। इस की सेवा क्या देश की या विश्व की सेवा नहीं है? राजनीति में या इसी प्रकार के अन्य क्षेत्रों में रह कर जनता की सेवा करना तो एकांगी सेवा ही हो सकती है, किन्तु साहित्य की सेवा से तो वह व्यापक सेवा होती है जिस का अन्त नहीं है। ये विचार तो आते हैं किन्तु राजनीति से भाग कर निकल जाना मुश्किल सा लगता है। किसी ने एक बार कहा था कि एक बार राजनीति के चक्कर में पड़ जाने पर उस से बाहर निकल जाना मनुष्य के लिये असम्भव है, यह बात सच मालूम होती है। राजनीति में कूटनीति है और इसी लिये इस का अर्थ होता है – झूठ, फरेब, दाव-पेंच तथा कपट। तो क्यों न यह मनुष्य को आकर्षित करे? अच्छी बातों की ओर तो आकर्षित होना सदा से मुश्किल रहा है न! अपना कार्यक्षेत्र छोटा बना कर काम करना भी अच्छा ही होता है। बहुत बड़े क्षेत्र को ले कर काम करना तो बड़े लोगों के लिये ठीक है किन्तु हमारे जैसे कार्यकर्त्ताओं के लिये नहीं। जिस प्रकार समुद्र में छोटी नावों का डूब जाना साधारण सी बात है, उसी प्रकार विस्तृत कार्यक्षेत्र में छोटे कार्यकर्त्ताओं का कुछ भी महत्व नही रहता। उन्हें कभी ऐसा मौका नहीं मिलेगा कि वे अपने कार्यों को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित कर सकें, भले ही वे दिन-रात क्यों न खट रहे हों। इस लिये यह आवश्यक है कि छोटे कार्यकर्त्ता अपने गांव को ही अपना कार्यक्षेत्र मान कर काम करें। इस से गांव को आगे बढने में काफी सहायता प्राप्त हो सकेगी। गांव हर प्रकार से स्वतन्त्र हो सकेगा। आज जिन मामलों में गांववालों को दूसरों का मुंह देखना पड़ रहा है, वह नहीं होगा। लोग खाद्य, कपड़ा तथा अन्य आवश्यक चीजों के लिये स्वतन्त्र हो जायेंगे। साथ ही थानों तथा जिलों के अधिकारियों का काम भी हल्का हो जायेगा। आज तो ऐसे अधिकारियों को इसी लिये सफलता नहीं मिल रही है कि गांव के कार्यकर्त्ता उन के उपर ही निर्भर रह कर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं। यदि ये कार्यकर्त्ता अपने-अपने गांव के उत्थान के कार्यों में जुट गये होते तो कैसा अच्छा होता। राजनैतिक या सामाजिक जो भी कार्यकर्त्ता आज हैं, वे सोचा करते हैं कि गांव में करने के लिये उन के सामने काम ही क्या है! किन्तु उन्होंने काफी सूझबूझ से काम नहीं लिया है। उन्हें समझना चाहिये कि भारत की इकाई आखिर गांव ही तो है। इसी के उत्थान से सारे देश का उत्थान होगा। यदि हमारे गांव पीछे रहेंगे तो देश क्या उठ सकेगा। हमारे नेता, विद्वान, दार्शनिक और वैज्ञानिक सबों की उत्पत्ति तो इन गांवों से ही हुई है। आज भी हमारे गांवों में लाखों ऐसे गुदड़ी के लाल हैं जिन्हें यदि हर प्रकार की सुविधा प्राप्त हो तो वे गांधी, नेहरू, रवीन्द्रनाथ या राधाकृष्णन हो सकते हैं। आज तो ऐसे लालों का पालन ऐसे गन्दे वातावरण में होता है कि उन की प्रतिभा उन तक ही सीमित रह जाती है – उसे फैलने का कभी समय ही नहीं आता। यदि कोई उन में से आगे बढ जाते हैं तो उसे सौभाग्य ही समझिये वरना ऐसी व्यवस्था तो हमारे गांवों में नहीं। सरकार के भरोसे हाथ पर हाथ धर कर बैठे रहने की आदत आज हम में हो गयी है। साधारण कार्य के लिये भी हम मंत्रियों तक दौड़ लगाते हैं। हमारे गांव में यदि एक पाठशाला नहीं है, सड़क नहीं है, कुआं नहीं है, बांध नहीं है या पुस्तकालय नहीं है तो यह सरकार का ही दोष है, ऐसा हम सोचा करते हैं, किन्तु इन साधारण कामों को हम स्वयं नहीं कर सकते। यदि गांव की बिखरी हुई शक्ति को हम एकत्रित करने का प्रयत्न करें तो ये काम आसान ही नहीं होंगे, बिल्कुल मामूली परिश्रम से भी हो सकेंगे। आज तो सरकार की ओर से भी को-आपरेटिव सोसाइटी को हर प्रकार से सहायता दी जा रही है। इस का एक अलग विभाग सरकार ने खोल दिया है। इस के अफसर हर गांव में जा कर वहां सोसाइटी की स्थापना में सहायता देने को सदैव प्रस्तुत रहते हैं। किन्तु हम स्वयं तो क्या करेंगे, इन से सहायता ले कर भी कुछ नहीं कर सकते। यदि कुछ करने को हम तैयार होते हैं और कुछ करते हैं भी तो वह सफल नहीं हो पाता, यह मेरा निजी अनुभव है। हम क्यों इस काम में असफल होते हैं, इस सम्बन्ध में मेरा ठोस अनुभव यह है कि हम एक काम में दत्तचित्त हो कर नहीं लगते। अपने गांव का यदि कोई काम प्रारम्भ करते हैं तो थाना और जिला के कार्यों को भी हम अपने सिर पर उठा लेते हैं। जिस का फल यह होता है कि हम किसी भी काम में सफल नहीं हो पाते। थाने और जिला के काम अपने सिर पर नहीं ले कर हमें अपने गांव तक ही सीमित रह कर काम में जुटना चाहिये। तभी हम कुछ कर सकेंगे वरना हम कुछ भी नहीं कर सकेंगे। हम जिला, थाना या गांव, इस बड़े क्षेत्र में स्वयं ही खो जायेंगे। आज यदि हम गांव के लोगों को समझा-बुझा कर सहयोग-समितियों का निर्माण करें तो गांव के सभी काम आसानी से होते रहेंगे। प्रारम्भ में कठिनाइयां तो अवश्य ही गांवों में होती है। गांव के लोग अधिकांश अपढ ही हैं। वे समझ नहीं सकते कि इन समितियों से कुछ होगा। उन्हें इन कार्यों में सन्देह होने लगता है। वे समझते हैं कि कुछ ठगने के निमित्त ही ये कार्यकर्त्ता कुछ-कुछ बहाने बना रहे हैं। उन का सन्देह ठीक भी है क्योंकि हम ने बराबर उन से पैसे लिये हैं किन्तु स्वराज दिलाने के अतिरिक्त उन के लाभ के कौन से काम कर दिये हैं ! किन्तु यदि हम ईमानदारी से काम में लग कर इन समितियों के द्वारा उन्हें लाभ पहुंचाने लगेंगे तो ये स्वयं हम से आगे बढ कर काम में जुट पड़ेंगे। अतः ये कठिनाइयां थोड़े ही दिनों के लिये हो सकती है। प्रारम्भ में हमें विरोध का सामना करना पड़ेगा, लोगों की गालियां भी सुननी पड़ेगी, लोग ताने भी कसेंगे और ऐसा होना स्वाभाविक है –होता है। ऐसे अवसर पर हमारे धैर्य की परीक्षा ही होती है। घबड़ा कर या क्रोध में आ कर हमें अलग तो नहीं ही होना चाहिये। हमारे गांवों की तरह-तरह की समस्यायें हैं। खेती-गृहस्थी, पशुपालन, वस्त्र-स्वाबलम्बन, ग्राम सफाई तथा प्रौढ शिक्षा आदि कार्य में अभी सैकड़ों परिवर्त्तन की आवश्यकता है जिन्हें हम अपने परिश्रम के बल पर सहयोग-समितियों द्वारा पूरा कर सकते हैं। गांव के किसान खेती तो अवश्य ही करते हैं किन्तु उन्हें खेती-सम्बन्धी ज्ञान नहीं है। एक मुद्दत से जिस प्रकार के तरीके इस के लिये प्रचलित हैं, वे अब मौजू नहीं। भारत के बाहर अन्य देशों में तरह-तरह के परिवर्त्तन खेती में किये गये हैं। परिश्रम को कम करने के लिये नयी मशीनों से काम लिया जाता है। जोतने, कोड़ने, बोने और काटने तक में भी मशीनों की सहायता रहती है। यद्यपि हमारा देश इस के योग्य नहीं कि वह इस तरह की मशीनों से काम ले सके और ऐसा कर के हमें लोगों को बेकार भी नहीं कर देना है , फिर भी आवश्यकतानुसार तो कभी-कभी इन तरीकों से काम लेना ही पड़ेगा। जैसे अपने यहां की कोशी क्षेत्र के जंगल कोड़ने की समस्या तो बिना ट्रैक्टर की सहायता से हल ही नहीं हो सकती। यहां तो मशीनों का उपयोग करना ही होगा। बीज के सम्बन्ध में भी हमारे किसान भूल ही करते हैं। बीज किस प्रकार रखना चाहिये और किस समय उसे खेत में गिराना चाहिये, इस का ज्ञान उन्हें बहुत कम ही रहता है। खाद के सम्बन्ध में तो यह कहा जा सकता है कि गांव के किसान इस सम्बन्ध में बिल्कुल नादानी करते रहे हैं। मवेशियों के गोबर को यों ही वे बर्बाद करते हैं। बहुत कम ही किसान ऐसे हैं जो उसे अपने खेतों में डालते हैं। और यदि कोई डालता भी है तो यों ही। कम्पोस्ट के द्वारा खाद बनाने की रीति उन्हें मालूम नहीं। आज यदि कोई उन्हें ऐसा करने के लिये कहते हैं तो वे बात ही नहीं सुनते। मैंने तो अपने गांव में देखा है कि खेती विभाग के कर्मचारियों के दबाव देने पर लोग बौखला से गये और उन्हें फटकार दिया। बेचारे बेबकूफ बन कर चले गये किन्तु यदि गांव के कार्यकर्त्ता ऐसा स्वयं कर उन्हें इस के लाभ दिखलाते तो क्यों न वे भी देखा-देखी कम्पोस्ट आदि बनाने लगते? आज काफी उपज नहीं हो पाती। किसान परिश्रम जी-जान से करते हैं किन्तु उस का फल उन्हें नहीं मिलता। यदि सहयोगी खेती की व्यवस्था हो तो मेरा अनुमान है कि काफी लाभ किसानों को हो। खास कर इस कोशी क्षेत्र में तो काफी नुकसानी इस लिये ही किसानों को होती है कि उन के खेत छोटे-छोटे टुकड़ों में दूर-दूर पर हैं। जब वे एक जगह खेत की निगरानी कर फसल को जंगली सूअरों और हिरणों आदि से बचा लेते हैं तो दूसरी जगह उन की फसल उजड़ जाती है। यदि सहयोगी खेती लोग करते तो क्या ऐसा हो पाता? सबों को अलग-अलग अपने खेतों की निगरानी करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। और इस का फल यह होता कि सभी खेतों में उपज होती ही, वह जंगली जानवरों से बच कर घर भी चली आती। पशु गांववालों की सब से बड़ी सम्पत्ति है। खेती और पशुपालन ही तो खास व्यवसाय गांववालों के हैं। खेती भी बिना सुन्दर-स्वस्थ्य पशु के होना मुश्किल है। पशुपालन पर भी खेती निर्भर है। किन्तु दुख है कि इस काम में भी हमारे ग्रामीण भाई काफी होशियार नहीं। आज भारत के पशु-धन का नाश हो रहा है। जहां कभी दूध की नदियां बहती थी, आज पथ्य के लिये भी दूध मयस्सर नहीं होता। इस का क्या कारण है? एकमात्र पशुपालन के ज्ञान का अभाव और इस ओर से अन्यमनस्कता। लोग झूठे आडम्बर में अपने इस प्रमुख काम को भूल गये हैं। ग्वाले लोग अभी भी गाय-भैंस पालते हैं तो लोग उन लोगों को देहाती और अपढ कह कर चिढाते हैं। किन्तु मेरी समझ से तो ये ग्वाले ही एकमात्र ऐसे लोग रह गये हैं जिन पर भारत का पशु-धन अभी भी कुछ अंश में सुरक्षित है। अब तो देहात के लोग भी पशुपालन से घृणा तक करने लगे हैं। इसे वे एक नीच काम समझ कर छोड़ रहे हैं। जिन लोगों ने आवश्यकतानुसार कुछ पशु पाल भी रखे हैं, उन के खाने-पीने और रहने की व्यवस्था पर ध्यान नहीं देते। सड़ी-गली चीजें एवं सूखी घासों पर वे किसी तरह उन्हें जीवित भर रख कर अपना काम निकाला करते हैं। कड़ी धूप, बरसा और अन्य कुसमयों में भी बैलों आदि से कड़ी मेहनत का काम लिया जाता है। किन्तु उस के पालन में सावधानी नहीं रखी जाती। फल होता है कि अकाल में ही कितने पशु काल के गाल में चले जाते हैं। उन्हें ऐसे स्थानों में रखा जाता है जिसे शायद ही कभी-कभी साफ किया जाता हो। इस प्रकार गन्दे स्थान में रहने के कारण भी हजारों पशु असमय ही मरते हैं। देहात में पशु की बीमारियों का ज्ञान भी लोगों को नहीं के बराबर ही है। बीमार पड़ने पर झाड़-फूंक से काम लिया जाता है। भाग्यवश यदि वह बच गया तो ठीक, नहीं तो इस के लिये अन्य उपाय नहीं। गांव के लोग देवी-देवता का आवाहन भी करते हैं अपने शरीर में। ये ठग ऐसे धूर्त्त होते हैं कि इन पर गांववालों की अगाध श्रद्धा होती है। इन के द्वारा भी पशुओं तथा मनुष्यों का इलाज करवाया जाता है। भला ऐसी परिस्थिति में पशु-धन का ह्रास हो रहा है तो कौन सी आश्चर्य की बात है? गांव में सफाई पर भी ध्यान नहीं दिया जाता। लोग जब स्वयं अपने शरीर की सफाई नहीं कर सकते तो गांव की सफाई क्या करेंगे? सड़कों पर मल-मूत्र गिराये जाते हैं ; गली-कूचों में घर-आंगन की बेकार सड़ी-गली चीजें तथा बुहारन आदि फेंक दिये जाते हैं। बड़े-बड़े गढ्ढे घर के आसपास ही रहते हैं जिन में गन्दा पानी भरा रहता है। गांव के एक ही पोखरा में लोग स्नान करते, मवेशी को बैठाते और कपड़े साफ करते हैं। साथ ही यही पानी पीने के काम में भी लाया जाता है। बरसात के दिनों में तो गांवों में चलना मुश्किल हो जाता है। सड़कों और रास्तों पर बरसा का पानी इस प्रकार जमा हो जाता है कि उसे निकलने का कोई उपाय नहीं रहता। फलतः कीचड़ हो जाना स्वाभाविक है और इस कीचड़मय राहों पर चलने से घुटना तक उस में फंस जाता है। दिन-रात लोग उस में चलते हैं किन्तु किसी को चिन्ता नहीं रहती कि इस का कोई प्रबन्ध किया जाय। जीवन के लिये जिस प्रकार भोजन की आवश्यकता है, उसी प्रकार उस के बाद ही वस्त्र का दूसरा नम्बर आता है। बल्कि सच कहा जाय तो यह कहा जा सकता है कि बिना भोजन के तो दो-चार रोज तक लोग जीवित भी रह सकते हैं, किन्तु बिना वस्त्र वे नहीं रह सकते ; जी भले सकते हैं। तो क्यों न यह माना जाय कि आज के युग में भोजन से भी आवश्यक वस्त्र है जिस के बिना लोग क्षण भर भी नहीं रह सकते। किन्तु आज के जमाने में लोग वस्त्र के लिये सरकार के भरोसे ही रहते हैं। मीलों दौड़ कर वे शहर में कपड़ों के लिये जायेंगे, वहां से खाली हाथ लौटेंगे, फिर दौड़-धूप करेंगे ; किन्तु इस के लिये कोई प्रयत्न न कर सकेंगे कि किसी प्रकार की दौड़-धूप और खुशामद के बिना वे अपने घर में वस्त्र तैयार कर लें। एक जमाना था कि लोग स्वयं ही वस्त्र तैयार कर लेते थे। सारा भारत वस्त्र के सिलसिले में स्वाबलम्बी था। किन्तु कितने बड़े दुख की बात है कि पूज्य गांधी जी के बार-बार जोर देने पर भी लोगों ने इस ओर ध्यान तक नहीं दिया। वे आज भी मील के बने कपड़ों पर ही निर्भर करते हैं, स्वयं कुछ करना नहीं चाहते। गांव के लोगों के लिये यह बिल्कुल आसान काम है कि वे कपास की खेती कर रूई तैयार करें, स्वयं औटाई-धुनाई और कताई कर सूत तैयार कर लें और फिर कपड़े। किन्तु किस को इस का ध्यान है? इन सभी कुव्यवस्थाओं के मूल में गांव की अशिक्षा का बड़ा हाथ है। इन कार्यों की ओर लोग ध्यान नहीं देते। इस का खास कारण है कि वे इस का महत्त्व ही नहीं समझते। यदि हमारे कार्यकर्त्ता रात्रि पाठशाला या पुस्तकालय आदि की स्थापना कर उन की अशिक्षा दूर करने का प्रयत्न करें तो थोड़े ही दिनों में ये कठिनाइयां दूर हो जायेंगी। आवश्यकता आज इस बात की है कि हम राजनैतिक या सामाजिक कार्यकर्त्ता उन की अशिक्षा को दूर करने में दत्तचित्त हो कर लग जांय। सुबोध पत्र-पत्रिकाओं के द्वारा उन्हें (गांववाले अशिक्षितों को) आज की दुनियां की सभी बातों का ज्ञान प्राप्त करावें। स्वयं पढ कर और समझा कर उन्हें नयी-नयी बातों की शिक्षा दें। प्रारम्भ में कठिनाइयों का सामना तो करना ही होगा। अतः हम रेडियो तथा अन्य मनोरंजन के साधनों से भी काम ले सकते हैं, जिन से मनोरंजन के साथ ही शिक्षा भी प्राप्त हो सके। यदि इस प्रकार, भारत की इकाई, गांव में हम जुट पड़ें तो कुछ ही दिनों में हम कहां से कहां चले जा सकते हैं। इस विषय की ओर मेरा ध्यान सदा से रहता आया है। भले ही मैं कर्मठता के अभाव में इन कार्यों में सफल न हो सका हूं किन्तु प्रयत्न तो मेरा इस दिशा में रहा ही है। आज तो कुछ समझने भी लगा हूं ; जिन दिनों मेरा विद्यार्थी जीवन था, उन दिनों भी इस दिशा में मेरे प्रयत्न हुये थे। उदाहरण स्वरूप मेरे गांव के पुस्तकालय की स्थापना सन 1936 ई में ही हुई थी, जब कि मैं दशमें वर्ग का विद्यार्थी था। आम के बगीचे की रखवाली करता हुआ मेरे दिमाग में एकाएक यह बात आयी थी कि मैं अपने गांव में एक नवयुवक संघ की स्थापना करूं। मैंने गांव के हम उम्र लड़कों को एक सूचना दे कर बगीचे में ही बुलाया था। आनेवालों में थे – सर्वश्री लक्ष्मण चौधरी, मार्कण्डेय मिश्र (अब स्वर्गीय), सूर्यनारायण ठाकुर, नवलकिशोर मल्लिक, राम अनुग्रह मिश्र, रामेश्वर मिश्र एवं गुणेश्वर ठाकुर उर्फ छूतो ठाकुर जी। हमारी बैठक हुई थी और हमने ‘नवयुवक संस्था’ नाम की एक संस्था का वहीं जन्म दिया था। बाद में गांव के बड़े-बूढों को बुला कर हमने सहायता मांगी थी और उन का पूर्ण सहयोग भी हमें मिला था। उन के सहयोग से एक फूस का घर भी हम ने बना लिया था और पुस्तकालय की भी स्थापना कर ली थी। काफी चल चुका था यह पुस्तकालय, किन्तु हमारे बचपन ने हमे धोखा दिया और गलती से यह बर्बाद हो गयी। कुछ व्यक्ति उन दिनों पुराने विचार के मेरे साथियों में से थे और कुछ नये विचार के सुधारवादी भी। मैं स्वयं सुधारवादी में था, अतः हर विषय में नया दृष्टिकोण रखता था। इन्हीं विषयों पर कुछ मतभेद मेरे और अन्य लोगों के बीच हो गया और मैं पुस्तकालय तथा संस्था से इस्तीफा दे कर निकल गया। मैं दावा नहीं करता कि केवल मेरे निकल जाने से ही संस्था टूट गयी, किन्तु हां, कुछ-कुछ ऐसी बात भी थी। क्योंकि मेरे निकल जाने के कुछ दिनों बाद ही फूस का वह घर बेच लिया लोगों ने और सारे सामान लोअर स्कूल में उठा कर ले गये। बाद में वह संस्था नियमित रूप से चालू नहीं रह सकी और पुस्तकालय के सारे सामान लोग जहां-तहां ले गये। आज जब उन दिनों की याद आती है तो कलेजे में दर्द सा उठ जाता है कि कितनी नादानी थी हमारी और खासकर मेरी कि अपनी बनायी हुई चीज के विनाश का कारण मैं ही बना था। यदि मैंने उन दिनों साहस एवं दृढता से काम लिया होता तो क्या मैं वहां से भागता और क्या तब वह संस्था यों नष्ट हो पाती? उन दिनों पुस्तकालयों की काफी कमी इस इलाके में थी। इस आसपास में भी शायद सुपौल की पब्लिक लाइब्रेरी मात्र ही ऐसी संस्था थी। हमारे उस पुस्तकालय में तीन सौ से उपर पुस्तकों की संख्यां पहुंच गयी थी। कैरेम, ताश, लूडो तथा अन्यान्य खेल के सामान थे। अपनी लाइट भी थी। कुर्सी-बेंच वगैरह भी थी। किन्तु सब एक छोटी सी गलती के कारण ही समाप्त हो गये। पुस्तकालय में उन दिनों भी 15-20 लोगों की उपस्थिति रहती थी, जो शायद आज भी किसी-किसी पुस्तकालय में ही हो। बचपन में लोग कितनी बड़ी-बड़ी भूलें कर बैठते हैं! किन्तु वह पीछे पछताता भी कितना है! * इस साल जिला कांग्रेस कमिटी के सभापति पद के चुनाव में काफी सरगर्मी रही। पहले से श्रीयुत लहटन चौधरी जी जिला कांग्रेस कमिटी के सभापति थे। किन्तु कलकत्ता कांग्रेस के बाद जब सभी जिला कमिटियों का चुनाव (साथ ही प्रान्तादि का भी) पुनः होने का निश्चय हुआ तो यहां भी चुनाव की तैयारियां होने लगीं। कई उमीदवार सामने आये। स्वयं श्री लहटन चौधरी जी तो थे ही, अन्य उमीदवारों में पंडित श्री राजेन्द्र मिश्र जी भी थे। कहा जाता है कि वे नहीं चाहते थे कि वे इस चुनाव में भाग लें किन्तु उन के मित्रों ने उन पर काफी दबाव डाला कि वे भी इस में घसीटे जांय। लोगों का कहना था कि अब श्री मिश्र जी राजनीति से संन्यास ले कर चुंकि अपने घर बैठ गये हैं, अतः उन्हें खींच कर जिला कमिटी के सभापति पद पर बैठाना अत्यावश्यक है। बात भी कुछ ऐसी ही थी क्योंकि बिहार में एकमात्र वही पुराने एम एल ए थे जिन्होंने इस बार बिहार विधायिका की सदस्यता के लिये अपना पर्चा नहीं दाखिल किया था और न कांग्रेस में ही उन्होंने इस के लिये कोई कोशिश की थी। बल्कि सुनने में आया था कि कई नेताओं के अनुरोध करने पर भी उन्होंने अपनी स्वीकृति नहीं दी थी। बात में कुछ सत्यता अवश्य थी, क्योंकि उन की पहुंच इतनी दूर तक थी कि यदि वे चाहते तो उन्हें बिना परिश्रम ही सफलता मिल जाती। बहुत से लोगों का कहना है कि वे इस लिये इस बार चुनाव में खड़ा होना नहीं चाहते थे कि उन्हें हार जाने का भय था। किन्तु इस में भी सत्यता नहीं मालूम होती जबकि हमने देखा है कि कांग्रेस के साधारण से साधारण उमीदवार भी सफल इस बार के चुनाव में हुए ही हैं। और वे तो पुराने और योग्य कांग्रेसी कार्यकर्त्ता ही थे। जो कुछ भी हो, उन्होंने चुंकि इस बार एसेम्बली की सदस्यता के लिये अपना नाम वापस लिया था, इस लिये लोगों की इच्छा थी कि उन्हें कम से कम कांग्रेस के किसी पद पर अवश्य ही बैठाना चाहिये। श्री लहटन चौधरी जी को श्री शिवनन्दन मंडल जी का समर्थन प्राप्त था। कहा जाता है कि सर्वश्री राजेन्द्र मिश्र और शिवनन्दन मंडल जी में लीडरशीप का पुराना झगड़ा बहुत दिनों से चला आता है और वे एक-दूसरे को दबाने का प्रयत्न करते रहे हैं। इस बार जब पं राजेन्द्र मिश्र जी का नाम आया तो श्री चौधरी का समर्थन करना इस लिहाज से उन के लिये आवश्यक था। ------- ( अपूर्ण) * धर्म की उत्पत्ति और विकास – समाज के अधिकांश लोगों का यह खयाल है कि धर्म ही संसार के लोगों का एकमात्र अवलम्ब है और बिना धर्म के समाज का अस्तित्व कठिन है। धर्म को ईश्वर द्वारा निर्मित कहा जाता है, लेकिन कोरी कल्पना से काम न ले कर इस के ऐतिहासिक कारणों की खोज करें तो यह स्पष्ट मालूम हो जायेगा कि इस का मौलिक कारण कुछ और ही है। अगर एक ईश्वर पर भी विश्वास किया जाये तो भी यह सिद्धान्त गलत साबित होगा। अगर ईश्वर एक ही है तो संसार में अनेकानेक धर्म क्यों हैं? अगर अनेकानेक धर्म हैं भी तो इन के नियम क्यों नहीं आपस में मेल खाते हैं? जिस काम को एक धार्मिक समाज उचित कहता है, दूसरा ठीक इस के विपरीत बतलाता है ! हिन्दुओं का कहना है कि गो-हत्या पाप है और मुसलमान उसे पुण्य समझते हैं। हिन्दू कहते हैं कि मूर्ति-पूजा जायज है और मुसलमान कहते हैं नाजायज। संसार में अगर एक ही ईश्वर का भी अस्तित्व माना जाये तो ये परस्पर विरोधी बातें क्यों होती हैं? और खूबी यह है कि सब के सब अपने-अपने धर्म की प्रत्येक कायदे को सत्य और जायज ही मानते हैं। इस से तो यह साफ सिद्ध है कि ईश्वर कोई चीज है ही नहीं और धर्म देववाणी नहीं, प्रत्युत नरवाणी है। वास्तव में धर्म हमारे समाज के बुद्धिजीवी वर्ग के मस्तिष्क की उपज है। इसी स्वार्थी वर्ग ने अपने स्वार्थ के हित --------- ( अपूर्ण ) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.४. डा. किशन कारीगर- हमरा त जोगार अछि (हास्य कथा) डा. किशन कारीगर हमरा त जोगार अछि (हास्य कथा)

भागेसर हौ भागेसर कतह छौ हौ? हमरा त कोनो भांजे नै लाइग रहल जे ई कतए निपत्ता भेल यै आ की पोखरी महार लक कोनो मजरेटी जमा बैसल यै? कहू त मंदिर लहक आश्रमक पछबरिया टाट पछुआ हावा बिर्रो मे उधिया रहलै. कए टा बन्हन सेहो टूटल छै कोन ठीक देहो पर नै धांई दिस खसि पड़ै. कनि अई टाट के हेट क दैतैह से नै? काज राज बेर एक नंबर कोरिअठबा अछि की आ कतौ स कोनो नीक चढ़ौआ अबै त से भोकसै मे एकदम बिहाइर की. एकरा एक्को रति चिंता छै जे अई टूटलाहा आश्रम मे बाबा केना रहतै? ई गेल केम्हर आब भाँज लगबै टा परत.

ताबे हम्मे बाबा के अवाज़ देली की हो बाबा केहेन समाचार छहो हो. बाबा बोललकै झटक बिहाइर मे हमर जान अवग्रह भेल अछि आ कारीगर तोरा समाचार सुझाई दै छह. ई ने जे बाबा आश्रम के टाट फरक ठीक कए के मजगूत क दिया त कहीं भागेसर जेंका छिरहारा खेलाई लै एलह यै. हम्मर कहलियै हो बाबा मीडिया वला आदमी के त समाचार चाहबे करी ने. भागेसर पंडा जे डाइलोक बंचै छह जे बाबा के हमही सेब के रखने छियैन्ह की आ नै त बाबा त बुझहू गेले घर छथि. हमरे जोगार दुआरे हिनकर आश्रम बांचल छैन्ह एकबेर लोक सबके सनका देबै त बाबा आश्रम अई झटक बिर्रो मे सोहा करबा देबै की. त ओकरा कैले ने आश्रम ठीक ठाक करै लै बोलै छहो?

बाबा बोले लगलै समाचार फमाचार बाद मे हेतै पहिने भागेसर के भांज कहअ. एक्कर एहेन लहास जे जोगारी विद्या लगा हमर आश्रम उजारत? केम्हर ओछि ओ चलब त हमरा देखा दै तै. हम्मे बोलली हो बाबा पंडा जी त पोखरी महार लक मजरेटी जमेने छौ की. चलहो ने ओम्हरे दिस त गप क फैरछा लिहो. बाबा बोललकै त चलह देरी कथिक? हम आ बाबा महार दिस बिदा भेली. ओते देखली जे मजरेटी जमल रहै. भागेसर पंडा मिथिला मैथिली पर गप बिकने रहै जे मैथिली के हमहीं सबटा बंचा के रखने छि की. बाबा बुते की किछो कएल भेलैन्ह. हमर जोगारी विद्या त मैथिलीक सांस छियै. जेकरा भेटल से जीअत आ ज जोगारक भांज नै लगलै त उ बाप बाप क अपटी खेत मे गेले घर बुझहू. ई गप सुनि चेला चटिया गिरोहक लोक सब खूब थोपरी बजा होहकारा करैत रहै.

भागेसर के गप सुनि बाबा बजलै हौ भागेसर हमर आश्रम उजरल जाइए से तोरा ठीके नै कएल होइत छह आ अई ठाम चेला चटिया सब लक गपास्टिंग छोड़ै मे लागल छह? तोरा एक्को रति लाज धाख छह कीने? भागेसर पंडा हां हां के हँसैत बजलै यौ बाबा जोगार वला के कथि लाज धाख. काज टा हेबाक चाही कोनो तरहे दाउ टा सुतरबाक चाही. हम चाहब त तुरंते अहाँ के आश्रम ठीक ठाक तंदुरस्त रिपेयर करा देब किए त हमरा जोगार अछि? अखने रामेसर आ मुनेसर के कहबै जे बाबा बड्ड सिद्धस्त छथिन्ह. गाया जी प्रयाग हरिद्वार सहने साधना कए एतुका मठ मे आएल छथिन्ह त देखियौ तुरंते अहां के आश्रम रिपेयर भऽ जाएत की. किछो खर्चा पानी करबै तहन ने. ताबे हम भागेसर से पूइछ देलियै जे हो पंडा जी बाबा के आश्रम उजारबहो केना क सेहो बोल्हो ने.

पंडा जी बोललकै धू जी महराज अहूँ के मैथिली साहित्यक कोनो जोगारी भांज भूत नै बूझल यै. बाबा के आश्रम उजारब त हमरा लै दस मिनट के काज. अखने कैन्सर मनेजर के चिलम सोंटा के माथा हाथ दऽ कान फूइक देबै जे बाबा एक नंबर बैलगोबन छै की काशी मथुरा कतौ ने गेल छै. देखियौ फेर मिनटे नै बाबा आश्रम सोहा भऽ जेतै की ने. ई गप सुनि बाबा आहां हां करैत बोललकै हौ कारीगर तहूं की फसाद करा उपद्रवी करअ अलग यै. बड्ड मोशकिल स भागेसर के सुढ़येलियौं सेहो तूं ओकरा भंगठा के छोइर देलहक. हम्मे कहलियै हो बाबा एहेन बात नै हइ क अभिए हम पंडा जी के समझबै छियै

हम्मे भागेसर जी से बोलली यौ पंडा जी अहाँ त मिथिला मैथिलीक प्रसिद्ध लोक छि. अहाँ आ अहाँक जोगार टेक्नोलॉजी त मैथिली साहित्यक धार छियै. बाबा की किछो साहित्य दिया बुझै छै. एतना बात सुइन भागेसर फूइल के तुम्मा हो गेल आ बोललक जे यौ किशन जी यैह गप कनी बाबा के बुझहा दियौ आ नै त अखनिए हम जोगारी विद्या स बाबक आश्रम दलमलित कए देबै की. बाबा बोललकै हौ भागेसर तोहर त दसो टा किताब नै बिकाइत छह आ ने दर्शक पाठक मैथिली किताब साहित्य आयोजन मे रूची लै छै त फेर तों प्रसिद्ध केना छहक आ केकरा सबहक बीच?

भागेसर हां हां करैत बजलै यौ बाबा हमरा त जोगार अछि. अहाँ आ कारीगर जी दुनू गोटे एकदम ख़त्म आगमी छी की अहाँ सब ई जोगारी भांज भूज नै बुझहै छियै तैं ने मैथिली मंच स बारल छि? त बाबा कहलकै हौ भागेसर की भवडाह करै मे लागल छह. साफ साफ मैथिली जोगार दिआ कहक त हमरा सब संगे पब्लिको बुझतै. भागेसर बजलै की यौ किशन जी पानो तानो खुआएब की खाली जोगारी खिस्सा टा सुनै लै बैसल छी? हम्मे कहलियै हइए अखनतियै पान लगबेने आ रहलियौ. दू टा जर्दा पान आ बाबा लै मीठा पान लेने एली. तीनू गोटे पान खा लेली.

पान खा के पंडा जी बोलैत रहै यौ बाबा पूरा मिथिला मैथिली जोगारे बले टिकल छै. आ जोगारी विद्या स सब अप्पन दाउ सुतारै मे बेहाल भेल हो हो करै जाइए की. लोकार्पण जोगार/ पोथी प्रकाशन जोगार/ आयोजनी जोगार /मानकी जोगार/नाटक जोगार/ संयुक्त तत्वावधान वला जोगार/विद्यापति समारोह /महोत्सव फेस्टीवल जोगार. मैथिली मे त जोगारे जोगार . सब अप्पन सेटिंग गेटिंग क मैथिली मे अजर अमर हुअ चाहैए. मैथिलीक जोगार त आब देखार चिन्हार भऽ सौंसे जगजिआर भेल छै की. जोगार आ गिरोह जेकरा सुतैइर गेल से त वरिष्ठ साहित्यकार/महाकवि/प्रसिद्ध नाटककार/लिविंग लिजेंड की की ने भ जाइए. साहित्य अकादमी पुरूस्कार/ मैथिली भोजपुरी अकादमी/समिति/लेखक संघ/मैसाम/सगर राइत दीप जोगार सुतारै दुआरे त मैथिली वला सब त कोन कोन खेल ने खेलाई जाइए?

हम्मे पुछलियै यौ पंडा जी मैथिली साहित्य/आयोजन/ समारोह सब त मिथिलाक लोक समाज/गाम घर/शाहर बजार/ सामूहिक मंच स त जुज़लै ने यै. खाली परदेश टा मे होहकारा भऽ रहलै. आ झूठो सब अप्पन जोगार अनरूपे डंका पीटै जाइए जे हम मैथिली लै ई क देलियै त उ क देलियै? भागेसर होलिका यैह होहकारा त मैथिली वला सबहक मुख्य जोगार छियै. दे जेहेन जोगारी से तेहेन भैरगर आयोजनी/साहित्यकार/प्रसिद्ध कथिदिन सब भ जाइए. पब्लिक सबहक कोनो एचैचमेंट नै सब अपनामने आ गिरोह बले मैथिली मे कथिदिन सब भ जाइ जाइए. की हो बाबा सबटा गप सुनि रहलहौं की खाली हं हं टा करै छी. बाबा आ हम कहलियै नै नै ध्यान स सबटा गप सुनि रहल जे मैथिली वला सब बिन करनी धरनी के एते धुधआईए किएक? भागेसर हां हां क बजलै हमरा त जोगार अछि.

- डा. किशन कारीगर, मूल नाम- डा. कृष्ण कुमार राय) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.५. लाल देव कामत- बहुजन कवि आ नाटककार राम श्रेष्ठ दीवाना : एक संक्षिप्त बायोग्राफी लाल देव कामत बहुजन कवि आ नाटककार राम श्रेष्ठ दीवाना : एक संक्षिप्त बायोग्राफी

श्रीयुत् राम श्रेष्ठ दीवाना जीके जन्म तिथि : 0४ जनवरी १९५७ ई० छन्हि। माय : स्वर्गीय रामसखी देवी आ बाबू : स्वर्गीय तुलफी यादव गाम : जिरौल थाना : खिरहर, जिला : मधुबनी, बिहार पिन कोड : ८४७२३0 (भारत) मोबाइल/व्हाट्सऐप नं०-९८०१३९८३६३ मैथिली लेखन सँ हिंदी दिश उन्मुख भेलाह अछि। प्रकाशित पोथी सभ ,हिन्दी नाटक :- भूख लगी है रोटी दो - राखी की कसम - कान्ति की बलवेदी - जरा याद करो कुर्बानी - बगावत का झंडा - ज़ालिम ज़माना - भिखमंगों का हिन्दुस्तान - आज़ादी ख़तरे में - लोकनाट्य राजा सलहेस

काव्य एवं अन्य कृति :- कलुआ डोम - प्रेम ना हाट बिकाय - नेह की बारिश - मोहब्बत रखैल नहीं होती - मैं बुद्ध हूँ - भूखे आदमी का शास्त्र लिख रहा हूँ - ताजमहल मैंने भी बनाया - आदमी कैसे दरिंदा हो गया - आदमी के भेष में आदमखोर को देखा है - मोहब्बत दिल की किताब है (काव्य संग्रह)

हिनक रचनाशीलता केँ परैख निम्न पुरस्कार आ सम्मान सब भेटलनि हेन। - राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर पुरस्कार (राजभाषा विभाग, बिहार सरकार, 2020–21) - वरिष्ठ फैलोशिप सम्मान (संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार) - साहित्य सेवा सम्मान (बिहार राष्ट्रभाषा परिषद) - लोकगीत लेखन सम्मान (बिहार सरकार) - शहीद रामफल मंडल राष्ट्रीय पुरस्कार - बाबासाहेब आंबेडकर राष्ट्रीय फैलोशिप सम्मान (दलित साहित्य अकादमी, दिल्ली) अन्य उपलब्धि एहि तरहेँ छन्हि :- १९९५ मे हुनकर दू नाटकक चेक भाषा मे अनुवाद भेलैन। - "फाँसी पर गणतंत्र" पुस्तक 2००८ मे नोबेल पुरस्कार लेल नामांकित भेल रहनि। - पूर्व सदस्य, हिन्दी सलाहकार समिति, भारत सरकार। - पूर्व सदस्य, उत्तर मध्य सांस्कृतिक केन्द्र, इलाहाबाद, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार। हुनक बचपन-: उपर लिख चुकल छी, हिनक जन्म ४ जनवरी १९५७ केँ बिहार राज्यक मधुबनी जिलाक जिरौल गाममे एकटा खेतिहर मजदूर परिवारमे भेल छन्हि। हुनक पिता स्वर्गीय तुलफी यादव निरक्षर छलाह आ माता स्वर्गीय रामसखी देवी सेहो निरक्षर छलीह। हिनक पिता दू भाइ छलाह। हुनकर पैघ भाइ स्वर्गीय सोनेलाल यादव रहथि। हुनकर जन्मसँ पहिनहि दुनू भाइ अलग-अलग भऽ गेल छलाह। शुरुआती समयमे पिता कुश्ती लड़ैत छलाह आ भैंस पोसैत छलाह। साझी परिवार लग करीब दस कट्ठा जमीन छलैन। हुनका तीनटा बहिनो छलैन,हुनक सभक विवाहमे पाँच कट्ठा जमीन बिकि गेलैक । बाँचल पाँच कट्ठामेसँ दू कट्ठा जमीन कोसी-कमला नहरमे चलि गेलैक । एहन स्थितिमे मात्रे तीन कट्ठा जमीन खेती योग्य बचलनि। परिवारमे कुल आठ गोट सदस्य छलैक। हुनक बाबा-मैयाँ जीवित छलनि। घरक आर्थिक अवस्था अत्यन्त दयनीय छलैन। कतेको बेर घरमे सोहारी (रोटी )बननाई सेहो संभव नहि होइत छलनि। तखन ओसभ लोकनि अलुआ उसैन कऽ खाइत रहैथ। शकरकंद केर सुतियाएल शीरकेँ सुखाकय,तकरा जांतमे पिसकय मीठगर रोटी पका खाईथ। हुनकर दादा स्वर्गीय चुलहाई यादव वृद्ध भऽ गेल छलाह। पिता दोसरक खेतमे मजदूरी करए जाइत छलाह। दिनभरिक खटनिक बदला कहियो एक किलो खेसारी, कखनो धान, आ कखनो आधा सेर चाउर अथवा मरुआक चिकस (आंटा) भेटैत छलैक। एतेक कम बुतात-अनाजसँ आठ गोट परिवारक पेट भरब बढ़ कठिन छलैक। हिनक परिवार घनघोर गरीबी आ भुखमरीसँ जूझि रहल छलनि। मुदा हिनक पिता अत्यन्त साहसी आ पथलतोर परिश्रमी छलाह। ओ हुनका गामेक विद्यालयमे नामांकन करौलनि। पढ़ाइ-लिखाइमे ओ बहुत कमजोर रहथि। हुनका एखनों धरि मोन नहि पड़ैत छैक जे बालपनमे कखनो भरि पेट भोजन खाइबाक सौभाग्य भेटल होय। बचपने सँ हुनक पिता भारतीय कम्युनिस्ट पार्टीसँ जुड़ि गेल छलाह। हुनका काका लगैत काउमरेड ज्ञानी यादव हरलाखी प्रखंडमे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टीक सचिव छलाह। हिनका घर पर प्रायः कामरेड राजकुमार पूर्वे, बैधनाथ यादव, रामचन्द्र यादव, भोगेन्द्र झा आ तेज नारायण झा सन वरिष्ठ कम्युनिस्ट नेतासभक आवागमन होईत रहैत छलैन। परिवेशक प्रभाव एहन पड़लैक जे दसमी कक्षा उत्तीर्ण करबाक बाद ओ स्वयं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टीक सदस्य बनि गेलथि। हुनका घर पर मास्कोसँ प्रकाशित "सोवियत दर्पण" नामक पत्रिका अबैत छलैक, जाहिसँ हुनका सामाजिक आ राजनीतिक विचारधारासँ परिचित होयबाक अवसर भेटलैक। मिडिल स्कूल पास करलाक बाद हुनक नामांकन उच्च विद्यालय, खिरहरमे आठम कक्षामे भेलनि। पढ़ाइक संग-संग राम श्रेष्ठ जी दोगादोगी पिता संग दोसराक खेतमे मजदूरी (बोईन) करए जाइत रहथि। हुनक माता सेहो खेतमे मजदूरी करैत छलीह। जहन परिवारक तीन तुर सदस्यकेँ काज भेटैत छलैन, तहन भोजनक व्यवस्था भऽ जाइत छलैक ; मुदा जखन काज नहि भेटैक, तखन भुखक पीड़ा असहनीय ,लहालोट भऽ जाइत छलैक। किछु समय बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी हुनका अखिल भारतीय छात्र संघ, मधुबनी जिलाक अध्यक्ष बना देलकनि। एहि दायित्वक बाद ओ विद्यालय आ महाविद्यालयसभमे छात्रसभक बीच मार्क्सवादी विचारधाराक प्रचार-प्रसार करए लागलथि। राजनीतिक सक्रियता बढ़लाक कारण हुनकर पढ़ाइ प्रभावित भेलैन। सन् १९७० मे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी बंटाईदारी कानूनक अन्तर्गत "जमीन हड़प आन्दोलन" आरम्भ कएलक। पार्टी हमरा मधुबनी जिलाक सेमहली, भाला बैंगरा, हिसार आ खिरहर क्षेत्रमे भूमिहीन मजदूरसभक पक्षमे आन्दोलन चलाबैक जिम्मेदारी देलक। ओ एहि गामसभमे जमींदारसभक सैकड़ों एकड़ जमीन पर लाल झंडा फहरौलथि। एहि कारण जमींदारसभ हुनका विरुद्ध लगभग दसटा मुकदमा दर्ज करा देलकैक। मुकदमा वापस लेबाक उद्देश्यसँ हुनका पच्चीस एकड़ जमीन देबाक प्रलोभन सेहो देल गेलैक। मुदा कामरेड राजकुमार पूर्वे कहने रहनि— "ईमानदारी मार्क्सवादक पहिल शर्त अछि।" एहि शिक्षाकेँ जीवनक आदर्श मानि दिवानाजी ओ प्रस्ताव अस्वीकार कए देलथि। आइयो जखन ओहि संघर्षक याद अबैत छैन, तखन ई सोचिकऽ संतोष होइत छैन जे हम अनेक गरीब ग्रामीणसभकेँ हुनक जमीनक अधिकार दिलाबयमे अपन योगदान देलहुँ। संघर्ष आ आन्दोलनक बीच ओ १९७५ मे मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण कएलाह। तकर बाद १९८० मे कालिदास विद्यापति साइंस कॉलेज, उचैठ बेनीपट्टीसँ स्नातक आ १९८९ मे ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगासँ स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त कएलाह। हुनका रंगमंचसँ गहिंर लगाव - जुराउ छलैन। एहि कारण ओ इप्टा (इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन) सँ जुड़ि गेलधि। अपन गाममे पहिल बेर पी.एन. जयसवाल लिखित नाटक "इन्कलाब चीख उठा" केर मंचन कएलाह। नाटकक सफल प्रस्तुति पर स्थानीय प्रशासन हुनका पाँच सय टाकाक पुरस्कार देलकनि। तकर बाद ओ मिथिलांचलक दर्जनों गाममे पाँच दर्जनसँ अधिक नाटकक मंचन कएलाह। हुनका लगैत छलैक जे रंगमंच केवल मनोरंजनक माध्यम नहि, बल्कि समाज परिवर्तनक सशक्त हथियार अछि। मिथिलांचलमे दलित नायक राजा सलहेस केर लोकनृत्य आ लोकगाथा अत्यन्त प्रसिद्ध अछि। बादक समयमे ओ राजा सलहेस पर गहन शोध कएलाह आ लेखन कार्य आरम्भ सेहो कएलाह। एहि शोध आ साहित्यिक योगदान लेल भारत सरकारक संस्कृति मंत्रालय हुनका "वरिष्ठ फैलोशिप सम्मान" सँ सम्मानित कएलकैन। सन् १९८0 मे हुनक पहिल नाटक "भूख लगी है रोटी दो" पटना सँ प्रकाशित भेल रहय। ओहि वर्ष कलकत्तासँ प्रकाशित दैनिक "दैनिक प्रकाश" मे हुनक पहिल कविता प्रकाशित भेलनि। समयक संग हुनकर साहित्यिक यात्रा विस्तृत होइत गेलैन। आईधरि हुनक चौदहटा नाटक, छहटा कविता संग्रह, पाँचटा ग़ज़ल संग्रह आ चारिटा लोककथा संग्रह प्रकाशित भऽ चुकल अछि। हुनक रचना देशक कतेको प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित भेल अछि, जाहिमे हंस, हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, आज, आर्यावर्त, दलित विमर्श, जनशक्ति, भीम लहर, लाल गुलाब, दैनिक प्रकाश, सूरज-चाँद आदि प्रमुख छैक।

हुनक दू टा नाटक— "आजादी ख़तरे में" आओर "राखी की क़सम" — केर १९९५ मे चेक भाषा मे अनुवाद भेल। चेक गणराज्यक राष्ट्रपति महामहिम हावेल महोदय स्वयं 15 मार्च 1995 केँ पत्र पठा कऽ हुनका सम्मानित कएलनि। सन् २०१८ मे हुनक कविता संग्रह "फाँसी पर गणतंत्र" केँ ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा द्वारा नोबेल पुरस्कार लेल नामांकित कएल गेल।

हिनका 200८ सँ 20११ धरि भारत सरकारक हिन्दी सलाहकार समिति केर सदस्यक रूपमे सेहो मनोनीत कएल गेल रहय। जमीन आन्दोलनक संग-संग ओ अपन पढ़ाइ जारी रखलनि। सन् १९७५ मे ओ मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण कएलाह। तत्पश्चात् १९८० मे कालिदास विद्यापति साइंस कॉलेज, उचैठ (बेनीपट्टी) सँ स्नातक आ १९८९ मे ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा सँ स्नातकोत्तर परीक्षा पास कएलाह। छात्र जीवनमे हुनका रंगमंचक प्रति अभिन्न रुचि उत्पन्न भेलनि। एहि कारण ओ इप्टा (इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन) सँ जुड़ि गेलाह। अपन गाममे पहिल बेर पी. एन. जयसवाल लिखित नाटक "इन्कलाब चीख उठा" केर मंचन कएलाह। ई प्रस्तुति अत्यन्त सफल रहल, जाहि कारण स्थानीय प्रशासन हुनका पाँच सय रुपैयाक पुरस्कार देलकनि। एहि सफलता सँ उत्साहित भऽ ओ बादमे दर्जनों गाममे पाँच दर्जनसँ अधिक नाटकक मंचन कएलाह। मिथिलांचलमे दलित लोकनायक राजा सलहेस केर लोकनाट्य अत्यन्त प्रसिद्ध रहल अछि। एहि परंपरासँ प्रेरित भऽ ओ राजा सलहेस पर गहन अध्ययन आ शोध कएलाह तथा एहिक आधार पर लेखन आरम्भ कएलाह। एहि महत्त्वपूर्ण कार्य लेल संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा हुनका "वरिष्ठ फैलोशिप सम्मान" प्रदान कएने रहैन। सन् १९८० मे हिनक पहिल नाटक "भूख लगी है रोटी दो" पटना सँ प्रकाशित भेलैन। ओहि वर्ष कलकत्ता सँ प्रकाशित दैनिक "दैनिक प्रकाश" मे हुनक पहिल कविता सेहो छपल। तत्पश्चात् हुनक चौदहटा नाटक, छहटा कविता-संग्रह, पाँचटा ग़ज़ल-संग्रह तथा चारिटा लोककथा-संग्रह प्रकाशित भऽ चुकल छन्हि। हिनक रचना हंस, हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, आज, आर्यावर्त, दलित विमर्श, जनशक्ति, भीम लहर, लाल गुलाब, दैनिक प्रकाश, सूरज-चाँद आदि अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित भेल अछि। सन् १९९५ मे हुनक दू नाटक— "आज़ादी ख़तरे में" आ "राखी की कसम"— केर चेक भाषामे अनुवाद कराओल गेल। चेक गणराज्यक राष्ट्रपति महामहिम वैक्लाव हावेल १५ मार्च १९९५ केँ पत्र पठा कऽ एहि उपलब्धिक लेल हुनका सम्मानित कएलकनि। सन् २०१८ मे हुनक कविता-संग्रह "फाँसी पर गणतंत्र" केँ ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा द्वारा नोबेल पुरस्कार लेल नामांकित कएल गेल। बादमे ओ भारत सरकारक हिन्दी सलाहकार समिति केर सदस्य सेहो मनोनीत भेलाह आ अपन साहित्यिक, सांस्कृतिक आ सामाजिक सक्रियता निरंतर जारी रखलाह। हुनकर सम्पूर्ण जीवन संघर्ष, अभाव आ पीड़ासँ भरल रहल छन्हि। कॉलेजक समयमे ओ प्रतिदिन दस किलोमीटर पैइरे चलि कऽ पढ़ए जाइत रहथि। हुनका घरसँ कॉलेजक दूरी लगधक दस किलोमीटर छल। हिन कॉलेजमे नामांकन कराबए लेल बाबूजी हुनका दस टाका देने छलाह। मुदा किताबक आवश्यकता एतेक अधिक छल जे ओ ओहि टाकासँ नामांकन कराबएक बदला एकटा पोथी किनि लेलाह। बादमे कॉलेजक प्राचार्य प्रोफेसर गोविन्द चौधरी हिनक परिस्थिति बुझि हर प्रकारेँ सहायता कएलनि। आन शिक्षकसभ सेहो हुनका प्रति अत्यन्त स्नेहशील छलाह। छात्रसंघ अध्यक्ष पद पर निर्विरोध निर्वाचित होयबाक कारण स्नातक पूरा होए धरि हुनका लगभग कोनो खर्च नहि करए पड़ल। ओहि समयक एकटा घटना आइयो हुनका मोनमे ताजा छैन। घरमे खाए लेल किछुओ सामग्री नहि छलैन। हुनक परीक्षा चलि रहल छलैक। ओ भूखल-पियासल कॉलेज पहुँचि परीक्षा देलथि। परीक्षा समाप्त भेला पर साँझ करीब चारि बजे घर घुरैत रहथि। सावन मास छलैक, बाटमे मूसलाधार वर्षा शुरू भऽ गेल रहैक । ओ एकटा आमक बगैचामे वर्षासँ बचबाक प्रयास करैत रहथि। ओहि समय एकाएक गाछसँ दूटा पाकल आम खसि पड़लैक। हुनका एहन प्रसन्नता भेलनि जे कहब कठिन होएत। एकटा आम ओतहि खा लेलनि , आ दोसरका अपन बहिन लेल लऽ कऽ घर अएलाह। वर्षामे भीजला'क कारण रातिमे तेज ज्वर भऽ गेलैन। रातिभरि पीड़ासँ तड़पैत छटपटाइत रहलाह। माय लगातार हुनकर सेवा जलपटी करैत रहलीह। भोरमे पिता अपन लोटा बन्धहक राखि औषधि आनलनि। औषधि खयलाक बाद रसे-रसे ज्वर उतरैत ठीक भेलाह। सन् १९७५ मे हुनक दादाजीक निधन भऽ गेलनि। हुनकर पंचदान श्राद्ध-भोजभात लेल पिता दू हजार टाका कर्ज केलनि। परम्पराक अनुसारे पिता ओकर मुण्डन करा देलकनि। भोजक तैयारी पूर्ण भऽ चुकल छल। मुदा जातिक किछु लोकसभकेँ पता चललैक जे ओ 'टिक' (शिखा) सेहो कटबा लेने छैक। ओसभ एकर अर्थ ई निकाललक जे ई हिन्दू नहि रहल, हरसठे मुसलमान भऽ गेलैक। एहि आधार पर हुनका पिता आ परिवारकेँ जातिसँ बहिष्कृत कऽ देल गेलैक। घरमे चारूकात चिन्ता आ शोकक वातावरण बनि गेलैन। एहि कठिन समयमे ओ निश्चय कएलाह जे तैयार भेल भोज गामक दलित भाइ-बहिन सभकेँ खुआयब। ओ सभ प्रायः कम्युनिस्ट पार्टीसँ जुड़ल छलाह। से ओ सभकेँ सम्मानपूर्वक भोजन करौलाह। एहि घटनाक बाद यादव समाजमे भारी हलचल मचि गेलैक। ओहि दिनसँ राम श्रेष्ठ जीअपन नामक संग 'यादव' लिखब छोड़ि देलाह आ अपन साहित्यिक नाम 'राम श्रेष्ठ दीवाना' अपनौलाह। ई नाम केवल नाम नहि, बल्कि सामाजिक अन्याय आ जातिगत भेदभावक विरुद्ध हुनकर प्रतिरोधक प्रतीक बनि गेल य। कम्युनिस्ट पार्टीसँ हुनक वैचारिक मतभेद धीरे-धीरे बढ़ैत गेल। सन् १९७५ मे तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधीजी देशमे आपातकाल लागू कएलनि। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी आपातकालक समर्थन कएलक, मुदा ओ एहि निर्णयसँ सहमत नहि रहला। ओहि वर्ष ओ खिरहर उच्च विद्यालयसँ मैट्रिक परीक्षा दैत रहथि। छात्रसभक संग विचार-विमर्श कऽ ओ विद्यालयमे तालाबंदी करबाक निर्णय लेलनि। एहि आन्दोलनक कारण प्रशासन हुनका गिरफ्तार करबाक तैयारी कऽ रहल छल। एक राति लगभग दस बजे ओ विद्यालयक छात्रावासमे भोजन कऽ रहल रहथि। ओहि समय विद्यालयक चपरासी अशर्फी कामैत दौड़ैत आबि कहलकनि—“पुलिस अहाँकेँ पकड़ए आबि रहल अछि, जल्दी भागू- पराउ।” ओ बिनु समय गँवौने अन्हारक लाभ उठा कऽ पानिसँ भरल एकटा डबरामे कूदि पड़लाह। डाँड़सँ ऊपर धरि पानि छलैक। धोती आ कमीज पूरे भीजि गेलनि। ओतयसँ लगभग दू किलोमीटर दूर एकटा आमक बगैचामे पहुँचलाह। ओतए एकटा लहासक चिता जरि रहल छलैक। ओ नास्तिक विचारधारासँ प्रभावित भऽ चुकल रहथि, तेँ भूत-प्रेतक कोनो भय नहि छलनि। चिताक आगिसँ अपन भीजल कपड़ा सुखेलाह आ रातिक लगभग दू बजे ओतयसँ निकलि नन्दी भौजी चौक टपैत तिसियाही उच्च विद्यालयक छात्रावासमे पहुँचि गेलाह। ओतए शिक्षक श्री रामाशीष महतोजी हुनक सहायता कएलकनि। ओ हमरा एकटा चदैर देलकनि आ किछु दिन धरि गुप्त रूपसँ शरण सेहो देने रहनि। बाहर एकतारे मूसलाधार वरखा भऽ रहल छलैक। बादमे जानकारी भेटलनि जे ओहि राति पुलिस हुनका घर पर सेहो छापा मारने छलै, मुदा ओ पकड़ाइ सँ बाँचि गेलाह। भोरक करीब चारि बजे ओ नहरक काते-कात चलैत नेपाल सीमाक नजदीक पिपरोन गाम पुंगलाह आ ओतयसँ जनकपुर (नेपाल) चलि गेलाह। जनकपुरमे हुनक सहपाठी मित्र दिनेश सिंह रहैत छलाह। हुनके घरमे ओ लगधक चारि मास धरि गुप्त रूपसँ रहलाह। कठिन परिस्थितिक बीच मित्रक सहयोग आ अपन धैर्यक बल पर ओ सुरक्षित रहलाह। दि०२ दिसम्बर १९७२ केँ मधुबनी जिलाक सेलीबेली गाममे एक अत्यन्त दुःखद घटना घटल छल। ओतुक्का महंथक षड्यंत्रमे सात गोट कम्युनिस्ट कार्यकर्ताक हत्या कऽ देल गेल रहैक । एहि शहादतक पीड़ा हुनक मोन पर गहींर प्रभाव छोड़लकैक। ओ हुनक स्मृतिमे एक कविता लिखलाह, जाहिक प्रारम्भिक पंक्ति छल— "सब कहैत छथि संतू जी, बड़ वीर मरदाना छलाह।" संतू जी एकटा विद्यालयमे शिक्षक छलाह, मुदा समाज परिवर्तनक उद्देश्यसँ नौकरी छोड़ि कम्युनिस्ट आन्दोलनमे सक्रिय भऽ गेल छलाह। एहि घटनासँ दिवाना जीकेँ सामाजिक न्याय आ संघर्षक महत्वक गहन अनुभूति भेलैक। सन् १९७६ मे हुनको पिता हैजासँ गम्भीर रूपसँ बीमार पड़ि गेलाह। ओहि समय ओ घरसँ दूर मजदूरी कऽ अपन पढ़ाइ - लिखाय चला रहल रहथि। समाचार भेटिते ओ स्थानीय चिकित्सक डॉ. श्याम नारायण कामति केँ संग लऽ कऽ घर पहुँचलाह। डाक्टर साहेब लगातार उपचार कएलनि आ तीन दिनक अथक प्रयासक बाद पिताजी केँ होश आएलनि। डाक्टरक फीस देबाक लेल ओ अपन फुलही लोटा आ थारी तीस टाकामे बन्धक राखि देलाह। मुदा डॉ. कामत एको टाका लेबाक अस्वीकार कऽ देलनि। केवल एतबे नहि, पिता लेल आवश्यक पथ्य-पानीक व्यवस्था सेहो अपन खर्चसँ करौलनि। हुनकर ई मानवीय व्यवहार हुनका जीवनभरि महानताक प्रेरणा दैत रहलनि। बादमे ओ हुनक सहयोगसँ प्रेमचन्दक लगभग सभ उपन्यास पढ़लथि। हुनक आग्रह पर डॉ. कामतजी अनेक गरीब लोकक निःशुल्क उपचार सेहो करैत रहलाह। से ओ त्योंथ पंचायतक मुखिया आ कम्युनिस्ट पार्टीक नेता सेहो छलाह। हुनक पड़ोसी पंचायत मनपौरक मुखिया कामरेड राधाकान्त मिश्र सेहो अत्यन्त संवेदनशील आ जनपक्षधरता व्यक्ति छलाह। हुनक संग ओ अनेक सामाजिक आन्दोलनमे भाग लेलाह। ओ हुनकर कविता पढ़ैत छलाह आ साहित्यक प्रति विशेष रुचि रखैत छलाह। हुनक गामक लोककलाकार भूला यादव अपन पत्नीके निधनक बाद, एक विधवा चमार समुदायक महिलासँ पुनरवियाह कएलनि। एहि वियाहक विरोधमे गामक अधिकांश लोक हुनका समाजसँ निकालबाक निर्णय लेलकैक। भूला यादव हुनका सँ सहायता लेल आएलाह। ओ स्पष्ट रूपसँ हुनकर पक्षमे ठाढ़ भऽ गेलाह। दोसर दिन ओ हुनका बेनीपट्टी न्यायालय लऽ गेलाह आ कानूनक अनुसार हुनक विवाह सम्पन्न करौलाह। प्रशासन सेहो एहि कार्यमे सहयोग देलकनि। मुदा एहि साहसिक कदमक परिणामस्वरूप एक सप्ताह बाद किछु असामाजिक तत्व रातिमे हुनकर झोपड़ीमे आगि लगा देलकैक। हुनक घर, बहुमूल्य पुस्तकसभ आ नाटकक अनेक पाण्डुलिपि सभ भस्म भऽ गेलैन। एतेक भारी क्षतिक बादो हुनकर पिता हुनक मनोबल बढ़बैत कहलनि—“बेटा, हम तोहर संग छी।” हुनकर ई विश्वास हिनका जीवनक कठिनतम क्षणमे सेहो संघर्ष करबाक शक्ति देलकनि। जीवनक बादक वर्ष सभमे हुनका अनेक व्यक्तिगत कठिनाइ सभक सामना करए पड़लनि हय। फेरो सन् २०१९ मे एहन घटना सेहो घटलैन, जाहिमे हुनक अनेक पुस्तक, पाण्डुलिपि आ साहित्यिक सामग्री नष्ट भऽ गेलैक । ई घटना हुनक साहित्यिक जीवन लेल अत्यन्त पीड़ादायक छलैक , मुदा ओ अपन लेखन आ सामाजिक प्रतिबद्धतासँ पाछाँ नहि हटलथि। सन् १९९९ मे ओ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टीसँ इस्तीफा दऽ देलनि। तत्पश्चात् राष्ट्रीय जनता दल (राजद.) सँ जुड़लथि, मुदा समयक संग हुनका ओतहु वैचारिक असहमति अनुभव भेलैक। हुनका विश्वास छलनि जे समाजमे वास्तविक परिवर्तन समानता, न्याय, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता आ भारतीय संविधानक मूल आदर्शक आधार पर सम्भव अछि। जीवनक साधल अनुभव सभ हुनका महात्मा बुद्धक करुणा, कबीरक निर्भीकता, संत रैदासक समतावादी दृष्टि, कार्ल मार्क्सक सामाजिक चिन्तन, ज्योतिराव फुले आ सावित्रीबाई फुलेक शिक्षा आन्दोलन, पेरियारक तर्कवाद, जगदेव प्रसादक सामाजिक न्याय, वाल्टेयरक विचार-स्वतंत्रता, नेल्सन मंडेलाक संघर्ष आ जननायक कर्पूरी ठाकुरक जनसेवा, गहिंरपनसँ प्रभावित कए्यलकनि हय । एहि महान व्यक्तित्व सभक विचारकेँ अपन जीवनक मार्गदर्शक बना कऽ ओ बौद्ध दर्शनक दिशा अपनौलनि। डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकरक संविधानवाद, सामाजिक समता आ मानवाधिकारक आदर्श हुनक सम्पूर्ण जीवनक प्रेरणास्रोत बनि गेलैन। हुनक सम्पूर्ण जीवन विपणता, भूख, संघर्ष, सामाजिक अन्यायक विरोध, साहित्य-सृजन आ जनआन्दोलनक यात्रा रहल अछि। एहि अनुभव सभ सँ हुनका कवि, नाटककार आ समाजक प्रति उत्तरदायी लेखक बनौलकनि हेन। आइयो हुनक परम विश्वास छैन जे लेखनी समाज परिवर्तनक सबसँ प्रभावशाली माध्यम य । जँ साहित्य पीड़ित, शोषित आ वंचित लोकक आवाज बनि सकैत छैथ, तँ ओ अपन वास्तविक उद्देश्य पूरा करैत अछि। एहि विश्वासक संग ओ सदिखन मानवता, समानता, बंधुत्व आ न्यायपूर्ण समाजक स्थापना लेल संघर्षरत छथि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.६. लाल देव कामत- पतीत : पोथी चर्चा लाल देव कामत पतीत : पोथी चर्चा श्री उदय शंकर झा कृत ९५ पृष्ठक मैथिली पोथी हुनक स्तरीय सामाजिक उपन्यास छन्हि। मधुबनी'क नवारम्भ प्रकाशन सँ २०२६ मे छपल ऐ पोथीक दाम २०० टाका निर्धारित कयल गेल छैक। आई एस बी एन ९७८-९३-४९८६७-६४-२ प्राप्त ,ऐ बहुचर्चित पोथीकेँ उपन्यासकार श्री झाजी समस्त मैथिल समाज केँ समर्पित कयने छथि। पोथीक आवरण पृष्ठ साहित्यिक दृष्टिये देखनुक,आ पछिला कभर पर संक्षिप्त परिचय के संग आकर्षक छवि विशेष रूपेँ लौकैत छैक। श्री झाजीक चारिगोट पोथी यन्त्रनालयमे छैन-: यथा - बहसल/रभसल, सासु-पूतौह, जुझारू/जीबटपन आओर प्रतिशोध। एक सामाजिक उपन्यास 'मुसहरनी' केर पाण्डुलिपि आ दोसर पोथीक लेखन कार्य आरम्भ कयने छथि। एखनधरि निम्नांकित सारगर्भित रचनाक पोथी जे प्रकाशित भऽ पाठक लग पहुँचल अछि ; सन् २०२४ मे चारिगोट यथा-: शक्ति- शिवक भक्ति गीत, सखि हे आँचर फुलय वसन्त, मोन पड़ैए गाम, प्रेरणा - पुँज आ 'हमर ई मोन कहैए'-२०२५ ई० (पद्य विधागत) अछि। गद्य विधामे २०२६ ई० मे प्रकाशित पोथी य - आंखिक देखल,कानक सुनल 'मैथिली कथा आख्यान ' आ आँचर तर , संयोग आ सद्यप्रकाशित मैथिलीमे पोथी'क आओर रचना कयलन्हि अछि -: पतित। ऐ बदनाम शव्द केँ शिर्षक बना' समाज सुधारक परम उद्देश्य सँ रचना कयल गेल छैक। मिथिलांचल केर एक बिनु कोठाक गाम जतय सँ मुख्य पात्र रमणीय बाबु देश आजादीक द्वीतिय पंचवर्षीय आम चुनावमे विधायक पद केँ सुशोभित कयने रहथि। ओहिक वाद एक कालेजमे फेर सँ प्राचार्य पद पर सेवारत रहलथि। ओहि कालेजमे भावो केँ आ मेधावी पुत्र केँ सेहो वादमे व्याख्याता पद पर नियुक्ति करौलनि। घरेलू काज ले गाममे मकदमपुर बाली एक खबाशनी आ एक गरीब ब्राह्मण फेकुजीक विधवाकेँ वहिकरणी रूपेँ जीवन पर्यन्त राखि लेने रहैछ। संगहि एक पूर्व प्रेमिका गामक बेटी आ अपन पटना बाली भाभोक भौजाई संग सफेदपोश प्रिन्सफल साहेब बेर - बेर बालात्कार करैत रहल य। अपन दीदी केँ अनैतिक संबंध बनौने देखि बेबी रमणी बाबु श्वसुर सँ कुपित भेल सासुक गैत श्राधमे नहिं आबि मायक सहमति सँ एक पुत्रक अछैत पूर्व विधुर प्रेमी संग टूर पर हील स्टेशन गेल छथि। अपन प्रौढ़ कुलीन पैग देयादनीक श्राधमे अनुपस्थित रहैत छोटकी कनियाँ सेहो भतिजीये जेकाँ नैहर पटना चलिए गेलैक हेन। ओतय अपन भाय सँ वार्तालाप करयमे दक्ष आ भौजाई केँ विशवासमे राखि अनैतिक संवंधक विस्तार सँ चर्चा कयल । ओ चेतबैत बुझेलनि जे हम अपन बच्चेदानी हटा लेने छी,अहाँ से नहिं कयलौंह। आब ढ़िड़हारि बनि आबि गेल छी तँ ई समस्या निवारण कराबहि पड़त,से सोचि हुनक गर्भपातक संगहि शल्यक्रिया सँ डाक्टरीमे बच्चेदानी धरि हटेबामे सक्षमता देखबैछ। ई बात पुनः महाविद्यालय आबि भैंसुर आ भनसिया फेकू जीकेँ बताबैत निचेन रहैत छै। जाहि कालेज लग सँ बजार जाईमे रिक्शा किराया तीन टाका, एक्का केर बहलमान घुरती सवारी दू टकामे संतोष करैत छै आ एक आना पाई सँ मुसमारा दवाय गामेक दोकानमे रमणीय बाबूक पत्नी बेसाहि लैत अछि; ओतय रमणी बाबूक तीन वर्षीय पौत्रके नामे हुनका पूतौहके प्रेमी २५ लाख टाका बैंकमे जम्मा करैत अपना सँगे अमिरिका लऽ चलि जाइछ। भौतिकी विषयमे नाम बजेनहार लेक्चररके वाबत चन्द तरहक अनर्गल बात कानमे पड़ला सँ दुःखी भऽ स्वत: प्रकाश जी बाबूजीक पैघ डेरा छोड़ि अपन विवशता फेकू काका सँ कहि बजारमे दूनू गोटय आवासीय रूममे नीक जेकाँ रहैत य। प्रकाशके मित्र विनोद जी बहुत अन्वेषण कय भेंट करय आबि सब खुलस्ता बात बुझेने धरि रहैक । पत्निक उड़हरि गेने पुन: प्रकाश जीक विवाह मादे एक घटकक प्रसंगवश चर्चा सेहो क्रमवार रूपेँ उपन्यासकार लिखलन्हि अछि। आचरण संदिग्ध रहने रमणीय बाबुक पैघौत पर अनेक प्रश्नचिन्ह लागल छैक। मुदा अगियाह रमनी बाबु पैग लोक दुरस्थ लोकक नजैरमे बनले रहला । पुरूख पात्रमे आनों नाऊ ,जेनाकि- दिनेश बाबु ,चिंतु गोप, मोहन, सुखी बाबु तथा स्त्री पात्रमे रामपुर बाली, बेलामबाली मैंयाँ ,सविताक माय, आ रमणी बाबूक परम आदरणीया ममतामयी माय केर भूमिका सँ पठनीयता रोचक भेल अछि। ऐ पतितपना पर नवारम्भ प्रकाशनके कर्ताधर्ता ओ साहित्यकार अजित आजाद जी अश्लीलता पर विचार विस्तार सँ लिखलनि अछि। उपन्यासकार श्रीझाजीक लेखन शैली कोन तरहक वाक्य विन्यास होय छनि,से पृष्ठ सं० ३६ सँ उद्धृत -: आइ भोरे कविता आ सविता ,दुनू एके वयसक छौड़ी ,दुनू आपसमे मित्र बनल अछि आ अपनामे एक-दोसरक लेल संबोधन रखने अछि 'लौंग' । "हय लौंग ! पोखरि दिस नहिं जयबह?" कविता बाजलि। हँ हइ लौंग! जेबाक तँ अछि मुदा आइ हमरा घरमे दातमनि खतम भ' गेल अछि, बुझाइए बाहरे कत्तौ तोड़य पड़त।" सविता बाजलि। " कियै है? हमर भैया काल्हिए एक मुठ्ठी साहोरक दातमनि अनलखिनहें, चलह ने तोरो लए एकटा राखि लैत छियह।" " ऐँ हेँ! श्रवण भैयाक आइ कनियाँ औतै, चलबह देखै लेल?" " हँ - हँ, कियै नहि जायब? ओनाहुँ तँ हकार देबे ने करथिन।" " हकार कत्तौ नहि देथिन!" " हइ ! सुनै छिए, कनियाँ बड़ पढ़ल छै।" " हमरा भौजी सँ बेसी!" " तोहर भौजी कतेक पढ़ल छथुन?" " ओ सातवाँ पास छथिन आ सभकेँ चिठ्ठी - पत्री लिख दैत छथिन।" " ई की करथिन से नहि बुझल अछि मुदा सुनै छियै जे रमणीये भाइजी ओत्तेक पढ़ल छै।" " नहि हे, ओतेक नहि पढ़ल हेतै?" " सुनै छिए ओहो पोरफेसरी करतै।" " जहन ओतेक पढ़ल छै तखन तँ करबे ने करतै।" " गै लौंग ! एकटा बात कहियौ? एकाएक ध्यान पर आबि गेल।" " तँ' कह ने" " ई रमणी भाइजी छौ ने से बड़का छिनार छौ।" " कियै किछु कहलकौए?" " कहलकए तँ नहि। जखन पोखरिमे शौच करै लेल जेबौ, तँ हटबे नहि करतौ आ हमरे सब दिस तकैत रहतौ।" " सुनै छियै जे ओकर चालि - चलन ठीक नहि छै।" " कह तँ ई कोनो नीक बात भेलै ! सुनै छिए कहाँदन बड़का लोक छै।" " देखै नहि छिहिन। कतेक लोक ओकरा आगू - पाछू लागल रहै छै।" " एहिसँ नीक तँ छोटके लोक रहितय मुदा चालि - चलनक नीक रहितै।" " छोड़ ने , ई सब तँ ओकर मामला छै, से कहि देलियौ।" " से तँ ठीके, ओना हमरा मोनमे जे बात छलह, से कहि देलियौ।" " हम सब साँझमे चलब कनियाँ देखै लेल।" " हँ , हँ , चलब की। देखबै ओत्ते पढ़ल कनियाँ केहन होइ छै?" " केहेन हेतै? कनिये जकाँ ने।" दुनू हँसय लागल आ आँगन दिस बिदा भ' गेल। उपरोक्त कथोपकथन सँ साबित होईछ जे जनवाणी खासकय जनिजात लोकनिमे कानों-कान एहन निर्लजताक खबेर पसैर गेलैक हेन। ग्रामीण समाज वोटमे आ चुनवा प्रचारमे सामूहिक बल देखेने छथि आ लेमनचूस बालाके श्राधकर्ममे सेहो चंदा - बेहरी धरि कयने रहैछ।रमणी बाबूक छोट भाय विदेश म रहैछ,जहन पत्नि अपन एक ६ वर्षीय बालक सँग नहिं जेबाक बात कहैत छैन तँ ओ विदेश जाए ,ओतय अपना दिशुका गोत्र- मूल देखि योग्य कन्या सँ समध कय लेल। अभिजात्य वर्गमे ऐ तरहक समस्याक निदानक कोनू वाट दुर - दूर धरि नहिं देखाईछ। पाठककेँ लाईट स्टोरी बढ़ चिकन लागत। समग्र रूप सँ चेतना जागृत करय लेल अपन युवा अवस्थामे लिखल ऐ उपन्यास केँ हालहिमे छपेबाक लेल यथेष्ट प्रशंसा करैत छियैन हम। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.७. सुरेन्द्र लाभ- दुगोट कनिका नाटक [नवकी पुतहु/ रटन्त विद्या] सुरेन्द्र लाभ दुगोट कनिका नाटक [नवकी पुतहु/ रटन्त विद्या]

१.

नवकी पुतहु

पात्र: १. साउस, हाथमे झाड़ू लेने, कने खिसियाएल। २. पुतहु , पूरा श्रृंगार कएने, हाथमे बडका मोबाइल।

(पुतहु कैमरा सामने नीकसँ मुुस्कियाइत ।) पुतहु - (मधुर स्वरमे)नमस्ते, प्रणाम ! देखू, आइ हम अपन सासुमा के लेल कतेक प्रेमसँ खीर बना रहल छी। हमरा लेल त' हमर सासुमा साक्षात अन्नपूर्णा छथि...। (ओही समय पाछूसँ साउस झाड़ू लेने प्रवेश करैत छै) साउस -गे कनिया! ई की क' रहल छे? भोरसँ चुल्हिमे आगि नै जरलौ , आ’ एतए ‘खीर-खीर’ की बकैत छें? जो, पहिने गाइके कुट्टी काटि क' ला! पुतहु- (कैमरा दिस देखैत,मुुस्किआइत, मुदा दाँत पर दाँत बैसबैत, मद्धिम स्वरमे)मम्मी जी, दू मिनट रुकू ने! रील बना रहल छी ... इज्जतके सवाल अछि! साउस - (कैमरा दिस तकैत) गे इज्जत त' तखने रहतौ ने, जखन पेटमे दाना जएतौ! ई मोबाइल देख-देख क' की दाँत निपोरैत छें? दिनभरि सुतल रहैत छें, आ अखन चलले हिरोइन बनए ! पुतहु - (वीडियो बंद करैत, खिसियाइत)धत्त! सभ वीडियो बिगाड़ि देलियै। फॉलोअर्स सभ की कहत? अहाँ के त' किछुओ बुझाइते नै अछि! साउस - हमरा की बुझाएत? हमरा त' बस ई बुझल अछि जे एहि टिक-टक आ रीलके चक्करमे घरक टिक-टिक बढ़ि गेल अछि! चल, आब असलियतमे भंसा घरमे जा’ क' बर्तन मांज, नै त' रीलक संगे-संग तोहर हील सेहो टूटतौ! पुतहु - धुर जो । माँ जी अहाँ पुरना साउस छी ।नवका बात किच्छो नै बुझै छी । साउस - ह गे नवका बात बुझएवाली हमर नवकी पुतहु ।पहिने भगै छे की नै एत्त’ स । (पुतहु मुँह फुला क' कैमरा उठा क' भगैत अछि, साउस झाड़ू लेने पाछू दौड़ैत अछि। हास्य साउण्ड । ) (नाटक समाप्त)

२. रटन्त विद्या

पात्र: १. मास्टर साहेब: कठोर शिक्षक, सिस्टमक प्रतिनिधि। २. सोनू: संवेदनशील, जिज्ञासु विद्यार्थी। 3. अन्य विद्यार्थीसब (स्थान- विद्यालयक कक्षा ) (मास्टर साहेब ब्लैकबोर्ड पर “H₂O” लिखैत छथि) मास्टर साहेब-सोनू! ई की अछि? सोनू- सर… पाइन… मास्टर साहेब-पूरा बाजू! सोनू-H₂O… मास्टर साहेब- जोरसँ बाजू ! जइसँ याद भ' जाए! सोनू: (कने ऊँच स्वरमे)H₂O… मास्टर साहेब- अहिना रटू! परीक्षामे इहे लिखब! (सोनू किछु क्षण चुप रहैत अछि, आँखिमे हल्का नमी) सोनू- सर… एकटा बात पूछु? मास्टर साहेब- जल्दी बाजू! सोनू- जँ हम पियासल रहब… त' H₂O पीयब कि पानि? (कक्षामे सन्नाटा) मास्टर साहेब- फालतू सवाल नै पूछू! सोनू- (आवाज कपैत)सर… हम समझए चाहैत छी…किताब हमरा शब्द सिखबैत अछि,मुदा जीवन हमरा अर्थ बुझबैत अछि… (सोनू बैग उठा लैत अछि) सोनू- परीक्षामे हम पास भ' जाएब सर…मुदा जीवनमे… शायद फेल… (सोनू धीरे-धीरे बाहर चलि जाइत अछि) (मास्टर साहेब चुप… ब्लैकबोर्ड पर “H₂O” के तकैत रहि जाइत छथि) (धीरे-धीरे ओ डस्टर सँ “H₂O” मेटबैत छथि… मुदा हाथ रुकि जाइत छै) मास्टर साहेब: (बहुत घीरे, टूटल स्वरमे)हम पानि पढ़ा रहल छी…कि बच्चाक प्यास मारि रहल छी…?

(नाटक समाप्त) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.८. आचार्य रामानंद मंडल- महाकवि विद्यापति बनाम संत तुलसीदास आचार्य रामानंद मंडल महाकवि विद्यापति बनाम संत तुलसीदास महाकवि विद्यापति (१३५२ ई) ,संत तुलसीदास  (१५३२) से पहिले भेलन। महाकवि के कोनो ओहन चर्चित महाकाव्य न हय जेना संत तुलसीदास के रामचरितमानस। महाकवि विद्यापति अपन काव्य के आधार शिव, कृष्ण आ भगवती के आधार बनैलन। मिथिला राज दरबारी कवि के रहितो सीता आ राम के आधार न बनैलन। सीता आ राम जेका आदर्श शिव , कृष्ण आ भगवती के मानल न जाइत हय। महाकवि विद्यापति शिव आ कृष्ण के प्रेम के पदावलि के आधार बनैलन।प्रेमाधार के चलते वो तात्कालीन समाज मे बदनाम सेहो भेलन। प्रेम के व्याख्या क्रम मे नारी के स्तन के इष्ट शिव लिंग सेहो बतादेलन।परंच संत तुलसीदास अपन महाकाव्य के आधार पुरूषोत्तम राम आ सुनारी  माता सीता के आधार रखलैन।अपन इष्ट के अंग वर्णन से बचलन।संत तुलसीदास के महाकाव्य मिथिला कि देश मे व्यापक भे गेल। वर्तमान मे मिथिला लगायत देश के राम कथावाचक रामचरितमानस से राम कथा बचैत छतन।आइ भगवान राम के अयोध्या मे भव्य मंदिर बन के तैयार हय आ भूमिजा माता सीता के भव्य मंदिर निर्माणाधीन हय।अइ सभ के आधार रामचरितमानस के व्यापकता हय। महाकवि विद्यापति के रचना देसिल वयना अवहट्ट  आ संत तुलसीदास के रचना अवधि मे हय। वर्तमान मे विद्यापति के रचना के भाषा मैथिली कहल जाय छै। परंच संत तुलसीदास के रचना अवधि ही कहल जाय छै। अवधि कहला से संत तुलसीदास के रचना के महत्व आ व्यापकता कम न होइ जाइ छै। परंच महाकवि विद्यापति के रचना के अवहट्ट कहला से महत्व आ व्यापकता सिमट जाइ छै। ज्ञातव्य हो कि महाकवि विद्यापति के समय मे मिथिला भाषा के मैथिली न कहल जाय।कालब्रुक मिथिला के भाषा के माता सीता के नाम मैथिली के चलते मैथिली रख देलन।आ ऐतिहासिक भूल क देलन कि मैथिली स्वयं कोन भाषा बोलैत रहय।बाद मे ग्रियर्सन मिथिला भाषा के बांट देलन सोतिपुरा अर्थात केन्द्रीय मैथिली, पश्चिमी मैथिली बज्जिका माता सीता के जन्म क्षेत्र, दक्षिणी मैथिली अंगिका , खोरठा, नागपुरी आ अन्य।परंच अवध क्षेत्र अवधि बनल रहल। अंततः व्यापकता के आधार भाषा न वरन् साहित्य के ग्राह्यता होइ छै। अवधि न जनितो लोग संत तुलसीदास के रामचरितमानस लोग ज्यादा पढ़य वा पाठ करैय। वनिस्पत कम महाकवि विद्यापति के पदावलि। जौं विचार करी त महाकवि विद्यापति के तुलना में संत तुलसीदास ज्यादा लोकप्रिय आ व्यापक दिखाई पड़ैय हय। -आचार्य रामानंद मंडल, सीतामढ़ी। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.९. प्रीति कुमारी- लघु परिचय : लीला बाबू'क प्रीति कुमारी लघु परिचय : लीला बाबू'क

वयोवृद्ध श्री लीला बाबुक पुकारू नाम केर वन्सव्त साहित्यिकी नाम उदय शंकर झा छियन्हि। हिनक जन्म मातृक गाम - चौड़ीमे दि० २०- ८- १९५१ ई० मे भेलन्हि। हिनक मायके नाँउ स्व०- अनन्त कला देवी आ बाबूक नाँऊ श्री रविन्द्र नाथ झा उर्फ डा० बाबू साहेब जी छियन्हि। मधुबनी जिलाक पण्डौल थाना अन्तर्गत गाँव - सोहरायमे हिनक पैतृक निवास पर आनन्द पूर्वक बालपन आ छात्रजीवन बितलन्हि। आरम्भमे मैथिली साहित्य दिश लेखन कार्य चलैत रहनि। बी.एससी. कयला सन्ता एम. आई .जी. केर मैनेजर रहैत मातृभाषा मैथिलीक क्रमिक विकास आ सभा - गोष्ठिमे तत्कालीन चेतना समितिक' अध्यक्ष श्री विजय मिश्र जी सँ जुटल रहलथि। फेर सन् २०२० ई० सँ साहित्य साधनामे लागल रहल छथि। हिनक नौ गोट मैथिली भाषा मेँ पोथी प्रकाशित भेल छन्हि। किछु देरी सँ मुदा २०२४ मे चारिटा प्रकाशित पोथी , यथा -: शक्ति शिवक भक्ति गीत (मैथिली गीत संग्रह) , आ एकटा आरो 'सखी हे आँचर फुलय वसन्त ' कविता संग्रह - मोन पड़ैए गाम, प्रेरणा - पुँज (मैथिली सूक्ति संग्रह) छन्हि। २०२५ मे सेहो एकटा मैथिली कविता संग्रह 'हमर ई मोन कहैए' नवारम्भ प्रकाशन सँ छपल छन्हि। ऐ साल २०२६ मे तीन मैथिली उपन्यास, क्रमशः पतीत, आँचर तर आ 'संयोग 'प्रकाशित भेलैक अछि। आँखिक देखल - कानक सुनल "कथा आख्यान नीक कागतमे पोथी दिल्ली शाहदरा सँ मुद्रण भेलैक अछि। एक सामाजिक उपन्यास 'मुसहरनी' प्रकाश्य कृति छन्हि। रचनाकार श्री उदय झा जीक परता पड़ल दू गोट मौलिक उपन्यासक पाण्डुलिपि कोनू प्रकाशनक वाट जोहैत छैक। मैथिली साहित्यके अक्षय भंडार केँ भरैत,अपन कृति केर भाव भंगिमा सँ पाठक बीच अबैत एक परिचिति बनाबयमे सफल श्री झाजी'क पोथी पर विमर्श समय सँ हुअय तँ ,ई एक श्रेयस्कर काज कहाओत। बधाय होय! - प्रीति कुमारी, बी.ए., बीएड. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१०. संतोष कुमार राय 'बटोही'- भिक्षुक खबासक वंशावली (धारावाहिक संस्मरण)- (पहिल खेप) संतोष कुमार राय 'बटोही' भिक्षुक खबासक वंशावली (धारावाहिक संस्मरण)- (पहिल खेप)

गप्प ई छै जे हम सोचलियै आओर खोजलियै जे हमर जनम कोन खानदान मे भेल अछि। हमर पुरखा के छथि। हम मंगरौना मे भगिनमान छी। जखन कक्का सभ सँ पुछलियै जे अपना सभ मंगरौना केर भगिनमान कोना भेलहुँ अछि, हुनका सभ लग बेसी किछु जानकारी नहि छलैन्ह। ओ सभ कहलाह जे अपना सभ के पुरखा के बेटा नहि छलैन्ह। बेटिए टा छलैन्ह। भिक्षुक खबास मंगरौना गाम केँ बसेनिहार पाँच भैय्यारी मे सँ छलाह । गामक वंशावली बेनिहार सभ सेहो हमरा सभ केर संग बेमानी केलाथि। ओ अपन दियादक वंशावली बना लेलैत आओर अपना वंशावली मे अपन पाँच भय्यारी मे भिक्षुक खबासक उल्लेख सिर्फ केने छथि। हम पुछबो केलियैन्ह हुनका सभ सँ जे किछु आओर हमरा खानदानक किछु जानकारी अछि तँ कहल जाउ, परञ्च ओ कहलाथि हमरा तोहर खानदान सँ कोन मतलब । ओ सिर्फ अपन दियादक वंशावली केँ लेखन केलाथि आओर हमरा सभ केर लेल धृष्टराष्ट बनि गेलाह छथि । भिक्षुक खबास केर नीचा मे सिर्फ बेटी लिख कऽ छोड़ि देलथिन्ह।

हम सभ यानी हमर दियाद बेसी नहि छथि। एकेटा घरारी पर बसल छी। स्वर्गीय नागेश्वर राय हमर बाबाजी छलाथि। हमर बाबूजी स्वर्गीय चिरंजीव राय छलाथि। हम छोटे रही तँ बाबा स्वर्गवास भऽ गेलाह। कने-कने याद अछि जे दलान जगहजे अखन धरि अछि ओतऽ बाबा केँ गट्ठुल्ला जकाँ घर रहैन जे मरनासन्न अवस्था मे छेलैह। बाबा कलकता गेलाह आओर मोन खराब भेल रहैन्ह दवाई-दारू ठीक सँ नहि भेलैन्ह ओ कलकत्ते मे मरि गेलाह अछि। कालीघाट अश्मशान मे हुनका लकड़ी सँ जरौल गेल रहैन आओर देबार पर लिखल रहै स्वर्गीय नागेश्वर राय जखन हम छोट मे अपन मायक संग कलकत्ता गेल रहियै तँ देखलियै। बाबा केर किछु लारदुलार हमरा नहि भेटल । काकी सभ कहैत रहतिन्ह जे बाबा केँ खाई-पीयैय मे गाम पर दिक्कत भेल रहैन्ह , तँ ओ अपन बेटा सभ लग गेलाह जे किछु लाभ भेटत , परञ्च ओ कहै केँ गेल रहतिन्ह जे मोहनपुर वाली काकी कें आब हम नहि गाम नहि एबह। ठीके ओ फेर गाम घुमिक नहि एलाह । कलकत्ता जै बेर मे अपन घरक दाना हुनका नसीब नहि भेलैन्ह। दोसर घरक दाना खाऽकऽ ओ कलकत्ता गेलाह अछि।

दाय केँ हम नहि देखलियै। हमर जनम सँ पहिनहि ओ स्वर्गवास भेल छलीह। देवकृष्ण भैय्या केर जनम भेल रहैन्ह। हमर छोट बहिन जे हमरा सँ नमहर छथि हुनको जनम नहि भेल रहैन्ह। दाय कें पेट मे दरद भेलैन्ह माय बाध गेल छलीह । हुनका कियो बाधे मे हाक द के कहलकैन्ह जे रामकिशन माय मुरहद्दी वाली केँ दरद उठलैन्ह आओर मरि गेलथिन्ह। दाय गोर रहथिन्ह माय हमरा कहलीह।

अपन बाबूजी सँ पहिने हम अपन आदि पुरखा केँ लेल लिखऽ चाही छी। जानकारी देल गेल अछि जे हम नारायणपुर गाम जे झंझारपुर प्रखण्ड मे अछि ओत सँ हमर आदि पुरखा घर जमाय मंगरौना मे बसल छथि। घर जमाय बसला सँ ओ अपन गरिमा आओर अपन नव पीढ़ी केर विकासक दृष्टि नहि रखलाह। पाँचम हिस्सेदार रहैत, परञ्च अपन जमीन-जायदाद केँ सुरक्षित नहि रखि सकलाह। जमीन-जायदाद कम होयत चलि गेलै। किछु मजबुरी मे बेचलाथि, किछु दान केलाथि किछु कोंरियाठपन्नी केर कारणे बिका गेलै ।

 - संतोष कुमार राय ' बटोही '; ग्राम - मंगरौना अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.११. प्रणव कुमार झा- लोकतंत्रक माने आ मतलब प्रणव कुमार झा लोकतंत्रक माने आ मतलब अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन लोकतंत्रक परिभाषा दैत कहने छलाह जे, "लोकतंत्र जनताक, जनता लेल आ जनताक द्वारा कएल जाए वाला शासन थिक।" मुदा, हम अक्सर अपन आसपास एहन अनेक लोककें देखैत छी जे लोकतंत्रकें बहुत बेसी महत्व नहि दैत छथि आ एकरा सहज रूप में लैत एकर आलोचना करैत छथि, तथा एकरा शासनक एकटा निकम्मा पद्धति घोषित कऽ दैत छथि। एहन लोक प्रायः राजशाही, सामंतवाद आ तानाशाही शासनक महिमामंडन करैत भेटैत छथि। हम स्वयं कें भाग्यशाली बुझैत छी जे हमर जन्म एकटा लोकतांत्रिक व्यवस्थाक अंतर्गत भेल, आ संगहि हम एहि समझकें विकसित कऽ पेलौहु अछि जे तमाम त्रुटि आ कमिक बावजूद लोकतांत्रिक व्यवस्था प्रशासनक लेल सब सँ उपयुक्त माध्यम थिक। गांधी जी के सुराज, तिलक के स्वराज आ भगत सिंह आ साथी सभक समाजवाद के अवधारणा के नेहरू, अंबेडकर, राजेंद्र प्रसाद, पटेल आदि महान विद्वान नेता सभ एक सूत्र मे गूँथी कय लोकतान्त्रिक ढाँचा तैयार केलाह आ संविधान द्वारा स्थापित केलाह। यद्यपि, हमर समझ सँ एकटा छद्म लोकतंत्र (Pseudo-democracy) कखनो-कखनो कोनो राजतंत्र सँ सेहो बदतर सिद्ध भऽ जाइत अछि। ताहि दुआरे एकटा नागरिक के रूप मे लोकतान्त्रिक व्यवस्था के वृहत्त समझ आवश्यक अछि। देशक नागरिक सभक लेल लोकतांत्रिक व्यवस्थाक मर्म बुझब, ओकरा में उत्कृष्ट भागीदारी देब आ ओकरा सशक्त बनेबाक लेल आवश्यक अछि। एकरा लेल ई अनिवार्य अछि जे बहुसंख्यक जनसंख्या में एकर नीक समझ विकसित कएल जाए। एहि उद्देश्य सँ अपन शिक्षा व्यवस्था में माध्यमिक स्तर पर प्रयास कएल गेल अछि, आ तही दुआरे ई आवश्यक अछि जे देशक प्रत्येक नागरिक दसवीं-बारहवीं धरि अपन पढ़ाई निश्चित रूप सँ पूरा करथि। मुदा, पहिल दुर्भाग्य तँ ई अछि जे आजुक समय में सेहो देशक (विशेष कऽ बिहार सन उत्तर भारतक राज्य मे) एकटा बड़का आबादी दसवीं धरि पढ़ि नहि पाबि रहल अछि; जे पढ़य अछि हुनका शिक्षक नीक जकाँ पढ़ा नहि रहल छथि; आ ओहि पर सँ आफत ई जे किछु समय सँ पठन-पाठनक सामग्री (पाठ्यक्रम) में हेर-फेर शुरू कऽ देल गेल अछि।वर्ष 2019 धरि एनसीईआरटी क नौमी कक्षाक नागरिकशास्त्रक पोथी में एकटा पूरा अध्याय लोकतंत्रक अर्थ आ महत्व बुझबाक लेल, तथा एकर लाभ आ कमी पर चर्चा करबाक लेल समर्पित छल। मुदा, वर्ष 2020 में कोविडक महामारीक बीच एहि अध्याय कें पाठ्यक्रम सँ हटा देल गेल। ओहि समय कन्हैया कुमार आ योगेंद्र यादव सन बुद्धिजीवी नेता सभ एकरा विरुद्ध आवाज उठौने छलाह, मुदा महामारीक विभीषिकाक बीच ओहि शोरक कोनो विशेष प्रभाव नहि पड़ल। एकर परिणाम ई भेल जे आबय वाला वर्ष सभ में समाजशास्त्रक संग-संग विज्ञानक सेहो अनेक महत्वपूर्ण प्रसंग पाठ्यक्रम सँ गायब होबय लागल। खैर, ई तँ एकटा स्वतंत्र विषय थिक, मुदा एहि आलेखक मुख्य उद्देश्य लोकतंत्रक माने आ मतलब पर किछु मौलिक विमर्श करब अछि। आधुनिक विश्वमे लोकतंत्र सभसँ लोकप्रिय शासन-व्यवस्था मानल जाइत अछि। लगभग प्रत्येक देश अपनाकेँ लोकतांत्रिक कहल करैत अछि। मुदा प्रश्न ई अछि जे वास्तविक लोकतंत्र की होइत अछि? की खाली चुनाव करा देलासँ कोनो राज्य लोकतांत्रिक भऽ जाइत अछि? की जनता द्वारा चुनल सरकार स्वतः लोकतांत्रिक सरकार बनि जाइत अछि? एहि प्रश्नसभक उत्तर खोजब आवश्यक अछि, कारण लोकतंत्र खाली एक राजनीतिक शब्द नहि, बल्कि नागरिक अधिकार, समानता, न्याय, भागीदारी आ उत्तरदायित्वक व्यापक व्यवस्था अछि। लोकतंत्र शब्द यूनानी भाषाक शब्दसभ ‘डेमोस’ (जनता) आ ‘क्राटोस’ (शासन) सँ बनल अछि, जकर शाब्दिक अर्थ भेल ‘जनताक शासन’। मुदा आधुनिक राजनीतिक विज्ञानमे लोकतंत्रक अर्थ खाली एतबे नहि अछि। लोकतंत्रक वास्तविक सार ई अछि जे राज्यक अंतिम शक्ति जनता लग रहैत अछि आ सरकार जनता प्रति उत्तरदायी रहैत अछि। लोकतंत्रक एकमात्र सर्वमान्य परिभाषा देब कठिन अछि। अब्राहम लिंकन के परिभाषा लोकतंत्रक मूल भावना व्यक्त करैत अछि, मुदा आधुनिक लोकतंत्रक जटिल संस्थागत पक्षकेँ पूर्ण रूपेँ नहि समेटैत अछि। राजनीतिक वैज्ञानिकसभक अनुसार लोकतंत्र ओ शासन-व्यवस्था अछि जाहिमे शासकसभ जनता द्वारा चुनल जाइत अछि। चुनाव नियमित, स्वतंत्र आ निष्पक्ष होइत अछि। नागरिकसभकेँ समान राजनीतिक अधिकार प्राप्त होइत अछि। सरकार कानूनक अधीन रहैत अछि। मौलिक अधिकार आ स्वतंत्रताक संरक्षण होइत अछि। जनता सरकारकेँ बदलि सकैत अछि। एहि आधार पर लोकतंत्रकेँ खाली चुनावक प्रक्रिया नहि, बल्कि संस्थागत, संवैधानिक आ नैतिक व्यवस्था मानल जाइत अछि। लोकतंत्रमे वास्तविक शक्ति ओहि प्रतिनिधिसभ लग रहबाक चाही जे जनता द्वारा चुनल गेल छथि। जँ सेना, राजपरिवार, धार्मिक समूह, पूंजीपति समूह अथवा बाहरी शक्ति सरकारक ऊपर अंतिम नियंत्रण रखैत हो, तँ ओ व्यवस्था लोकतांत्रिक नहि मानल जा सकय अछि। ई सिद्धांत एहि बात पर बल दैत अछि जे राज्यक नीतिगत निर्णय जनता द्वारा अधिकृत संस्थासभ करथि। स्वतंत्र आ निष्पक्ष चुनाव – लोकतन्त्र मे खाली चुनावक आयोजन पर्याप्त नहि अछि। चुनाव एहन होबाक चाही जाहिमे विभिन्न राजनीतिक विकल्प उपलब्ध होय। मतदाता बिना भयक मतदान कऽ सकथि। उम्मीदवारसभ समान अवसर प्राप्त करथि। प्रशासन निष्पक्ष रहय। परिणाम जनता केर वास्तविक इच्छाकेँ प्रतिबिंबित करय। जँ विपक्षकेँ चुनाव लड़बाक अवसर नहि भेटय अथवा चुनावमे व्यापक धाँधली होय, तँ लोकतंत्रक आधार कमजोर भऽ जाइत अछि। लोकतंत्रक एकटा महत्वपूर्ण सिद्धांत अछि जे प्रत्येक वयस्क नागरिक, चाहे ओ धनीक हो वा गरीब, मन्सा होय वा मौगी, जाति, धर्म अथवा भाषाक आधार पर भेदभाव बिना मतदानक अधिकार रखय। भारतमे 18 वर्ष अथवा ताहिसँ अधिक आयुक प्रत्येक नागरिककेँ मतदानक अधिकार प्राप्त अछि। ई विश्वक सभसँ व्यापक लोकतांत्रिक व्यवस्थासभमे सँ एक मानल जाइत अछि। लोकतंत्रमे नागरिकसभकेँ खाली मतदानक अधिकार नहि, बल्कि चुनाव लड़बाक, राजनीतिक दल बनाबय, विचार व्यक्त करय आ सार्वजनिक जीवनमे भाग लेबाक अवसर सेहो रहबाक चाही। समान राजनीतिक अवसर लोकतंत्रकेँ खाली औपचारिक नहि, बल्कि सहभागी व्यवस्था बनबैत अछि। लोकतंत्रमे सरकार स्वयं कानूनसँ ऊपर नहि होइत अछि। संविधान सर्वोच्च मानल जाइत अछि आ शासकसभकेँ सेहो संवैधानिक सीमा भीतर रहि कऽ कार्य करबाक होइत अछि। कानूनक शासनक अर्थ अछि जे सब नागरिक कानूनक समक्ष समान होय। स्वतंत्र न्यायपालिका होय। संवैधानिक प्रक्रिया अनुसार शासन होय। ई व्यवस्था नागरिक स्वतंत्रताक सुरक्षा करैत अछि। लोकतंत्र खाली बहुमतक शासन नहि अछि। अल्पसंख्यकक अधिकार, अभिव्यक्ति स्वतंत्रता, प्रेस स्वतंत्रता, संगठनक स्वतंत्रता आ धार्मिक स्वतंत्रताक संरक्षण लोकतंत्रक अनिवार्य तत्व अछि। जँ सरकार आलोचनाकेँ दबाबय, मीडिया पर नियंत्रण करय अथवा असहमतिक आवाजकेँ दमन करय, तँ लोकतंत्र कमजोर भऽ जाइत अछि। लोकतांत्रिक सरकार जनताकेँ उत्तर देबाक लेल बाध्य होइत अछि। संसद, विधानमंडल, न्यायपालिका, मीडिया, नागरिक समाज आ सूचना अधिकार जेकाँ संस्थासभ सरकारक कार्यपर निगरानी रखैत अछि। लोकतंत्र बनाम दिखावटी लोकतंत्र: इतिहासमे बहुत रास देश एहन रहल अछि जतय चुनाव तऽ भेल, मुदा वास्तविक सत्ता सीमित समूहक हाथमे रहल। एहि कारण लोकतंत्र आ दिखावटी लोकतंत्रमे अंतर करब आवश्यक अछि। वास्तविक लोकतंत्रमे सत्ता बदलि सकैत अछि। विपक्ष सक्रिय रहैत अछि। नागरिक स्वतंत्रताक सम्मान होइत अछि। सरकारक आलोचना संभव होइत अछि। दिखावटी लोकतंत्रमे चुनाव नियंत्रित होइत अछि। विपक्ष कमजोर अथवा प्रतिबंधित रहैत अछि। मीडिया स्वतंत्र नहि रहैत अछि। सत्ता परिवर्तन कठिन भऽ जाइत अछि। अतः लोकतंत्रक मूल्यांकन खाली चुनावक आधार पर नहि, बल्कि समग्र राजनीतिक वातावरणक आधार पर करबाक चाही। लोकतंत्र खाली सरकार चुनबाक प्रक्रिया नहि, बल्कि जीवन जीबाक एकटा सामाजिक-राजनीतिक संस्कृति सेहो अछि। एहि संस्कृति मे संवाद, सहिष्णुता, असहमतिक सम्मान, समानता आ सहभागिताक भावना सम्मिलित रहैत अछि। एकटा परिवार, विद्यालय, संस्था अथवा समाज सेहो लोकतांत्रिक व्यवहार अपनाबि सकैत अछि जखन निर्णय प्रक्रिया मे सबहक मत सुनल जाए, सम्मानपूर्वक चर्चा हो आ शक्ति एक व्यक्ति मे केंद्रित नहि रहय। पाकिस्तानमे, जनरल परवेज मुशर्रफ़ अक्टूबर 1999 मे सैनिक तख्तापलटक नेतृत्व केलक। ओ लोकतान्त्रिक रूपसँ चुनल गेल सरकारकेँ हटा देलक आ अपनाकेँ देशक 'मुख्य कार्यकारी' घोषित कऽ लेलक। बादमे ओ अपन पदनाम बदलिकऽ 'राष्ट्रपति' कऽ लेलक आ 2002 मे एकटा छलपूर्ण जनमत संग्रह (Referendum) करा कऽ अपना कार्यकाल 5 साल लेल बढ़ा लेलक। पाकिस्तानी मीडिया, मानवाधिकार संगठन आ लोकतांत्रिक कार्यकर्ता सभ आरोप लगैलक जे जनमत संग्रहमे पैघ पैघ धांधली आ धोखाधड़ी भेल छल। अगस्त 2002 मे ओ 'लीगल फ्रेमवर्क आर्डर'  जारी केलक जकरा तहत पाकिस्तानक संविधानकेँ बदलल गेल। एहि आर्डरक अनुसार राष्ट्रपति राष्ट्रीय आ प्रांतीय असेंबलीकेँ भंग कऽ सकइत छल। मंत्रिपरिषद्क काम-काज पर एकटा राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद क नजरि रहैत छल, जइमे बेसी सैनिक अधिकारी छलाह। एहि कानूनक पास भेलाक बाद राष्ट्रीय आ प्रांतीय असेंबली सभक लेल चुनाव कयल गेल। एहि प्रकारें पाकिस्तानमे चुनाव सेहो भेल आ चुनल गेल प्रतिनिधि सभकेँ कुछु अधिकार सेहो भेटल। मुदा अंतिम निर्णय लेबाक असली शक्ति सेनाक अधिकारी सभ आ जनरल मुशर्रफ़क हाथमे छल, जकरा जनता नहि चुन्ने छल। ई स्थिति तानाशाही आ राजशाही बला शासनमे देखल जाइत अछि। ओतय दिखावाक लेल चुनल गेल संसद आ सरकार तँ होइत अछि, मुदा असली शक्ति ओहि लोकक हाथमे होइत अछि जकरा जनता नहि चुन्ने अछि। चीनमे, संसद (क्वानगुओ रेनमिन दाइबियाओ दाहुई - National People's Congress) लेल हरेक 5 वर्षमे नियमित रूपसँ अप्रत्यक्ष चुनाव होइत अछि। एहि संसद लग देशक राष्ट्रपति चुनबाक अधिकार होइत अछि। एहिमे पूरे चीनसँ लगभग 3000 सदस्य (वर्तमान 14म संसदमे 2,977 सदस्य) आबैत छथि। किछु सदस्यक चुनाव चीनी सेना (पीपुल्स लिबरेशन आर्मी) सेहो करैत अछि।  चुनाव लड़बाक लेल कोनो उम्मीदवारकेँ चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) सँ मंजूरी लेब अनिवार्य होइत अछि। वर्ष 2022-23 मे भेल सभ सँ हालक चुनावमे खाली चीनी कम्युनिस्ट पार्टी या ओकर सहयोगी छोट-छोट 8 टा स्वीकृत पार्टिक सदस्य सभकेँ आ निर्दलीय उम्मीदवार सभकेँ (जे पार्टीक प्रति वफादार छथि) चुनाव लड़बाक अनुमति भेटल। तइँ चीनमे सरकार सदिखन कम्युनिस्ट पार्टीए के बनिइत अछि। मैक्सिकोमे, 1930 मे आजाद भेलाक बाद हर 6 वर्षमे राष्ट्रपतिक चुनाव होइत अछि। एतय कखनो सैनिक शासन या तानाशाह नहि अयलै। मुदा सन 2000 ई. तक हर चुनाव खाली पीआरआई (PRI -इंस्टीट्यूशनल रिवोल्यूशनरी पार्टी) नामक पार्टीये जीतइत रहल। विपक्षी दल चुनाव लड़ैत छल, मुदा ओ कखनो जीत नहि पबैत छल। पीआरआई चुनाव जीतबाक लेल सब तरहक अनैतिक हथकंडा अपनाबैत छल। सरकारी दफ्तरमे काम करयबला सभ लोक लेल पार्टीक बैठकमे एनाय अनिवार्य छल। सरकारी स्कूलक शिक्षक सभ अभिभावक पर पीआरआईकेँ वोट देबाक दबाब बनबैत छलाह। मीडिया विपक्षी दलक आलोचना तँ करैत छल मुदा हुनकर गतिविधि आ नीतिकेँ नजरअंदाज करैत छल। कखनो-कखनो अंतिम समयमे पोलिंग बूथ बदलि देल जाइत छल जइसँ लोक वोट नहि दऽ पाबैत छलाह। पीआरआई अपन उम्मीदवारक चुनाव प्रचार पर बहुत बेसी पैसा खर्च करैत छल मैक्सिकोक पुरान पीआरआई के तरहे वेनेजुएलामे सत्तारूढ़ पार्टी अपन सत्ता बचेबाक लेल विपक्षी नेता सभ कें अयोग्य घोषित करब, मीडिया पर पूर्ण नियंत्रण आ चुनाव आयोगक दुरुपयोग करबाक लेल जानल जाइत अछि। जुलाई 2024क चुनावमे व्यापक धांधलीक आरोपक बावजूद निकोलस मादुरो कें पुनः विजेता घोषित कएल गेल, जाहिसँ विपक्ष आ अंतर्राष्ट्रीय समुदाय एकरा अलोकतांत्रिक मानैत अछि। रूसमे सेहो दिखावा लेल बहुदलीय व्यवस्था अछि आ नियमित चुनाव होइत अछि। मुदा व्यवहारमे, राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन आ हुनकर पार्टी 'यूनाइटेड रशिया' क पूरा तंत्र पर कब्जा अछि। विपक्षी नेता सभ कें जेल भेज देल जाइत अछि या चुनाव लड़बा सँ रोकल जाइत अछि। मार्च 2024 क चुनावमे पुतिन कें 87% सँ बेसी वोट क साथ फेर सँ चुनल गेल, जाहिमे कोनो वास्तविक विपक्ष कें ठाढ़ हेबाक अनुमति नहि छल। की अपने सभ एहि चुनाव सभकेँ लोकतांत्रिक चुनाव कहि सकैत छी? एहि उदाहरण सभसँ लगैत अछि जे अपने सभ एहन नहि कहि सकैत छी। एतय लोक लग वास्तवमे कोनो विकल्प नहि अछि। चीनमे लोककेँ शासक दल या ओकर द्वारा मंजूर उम्मीदवारकेँ ही वोट देबय पड़े अछि। की एकरा असली चुनाव कहल जाए? मैक्सिकोमे विकल्प तँ छल मुदा सत्ताधारी दलकेँ हटाबएब असंभव छल, भले लोक ओकर खिलाफ किएक नहि होथि। ओतय निष्पक्ष चुनाव नहि छल। लोकतंत्र निष्पक्ष आ स्वतंत्र चुनाव पर आधारित होबाक चाही, ताकि सत्तामे बैसल लोकक लेल जीत-हारक समान अवसर हो। लोकतंत्रक मूल आधार राजनैतिक समानता अछि। एकरासँ लोकतंत्रक तेसर विशेषता सामने आबैत अछि। जिम्बाब्वेकेँ 1980 मे अल्पसंख्यक गोरा सभक शासनसँ मुक्ति भेटल। स्वतंत्रता संघर्षक नेतृत्व करबाक बला पार्टी जानु-पीएफ (ZANU-PF) तखनेसँ देश पर शासन कऽ रहल छल। एकर नेता राबर्ट मुगाबे आजादीक बादसँ देशक राष्ट्रपति छलाह। ओ बहुत लोकप्रिय छलाह मुदा चुनावमे गलत तरीका सेहो अपनाबैत छलाह। आजादीक बादसँ हुनकर सरकार कतेको बेर संविधान बदलिकऽ राष्ट्रपतिक अधिकार बढ़ा देलक आ हुनकर जवाबदेहीकेँ कम कऽ देलक। विपक्षी दलक कार्यकर्ता सभकेँ परेशान कयल जाइत छल आ ओकर बैठकमे बाधा डालल जाइत छल। सरकार विरोधी प्रदर्शन आ आन्दोलनकेँ गैर-कानूनी घोषित कऽ देल गेल छल। राष्ट्रपति आलोचना करबाक अधिकारकेँ सीमित कऽ देल गेल छल। टेलीविजन आ रेडियो पर सरकारी नियंत्रण छल आ ओतय खाली सत्ताधारी दलक बात देखाओल जाइत छल। किछू स्वतंत्र अखबार छल मुदा सरकार ओहि पत्रकार सभकेँ परेशान करैत छल जे सरकारक खिलाफ लिखैत छल। सरकार अदालतक ओहि फैसला सभकेँ सेहो नजरअंदाज करैत छल जे ओकर खिलाफ जाइत छल आ जज सभ पर दबाब बनबैत छल। अंततः 2017 मे मुगाबेकेँ पदसँ हटाओल गेल। जिम्बाब्वेक उदाहरण देखबैत अछि जे शासकक लोकप्रिय हेबाक भरि लोकतंत्रक लेल पर्याप्त नहि अछि। लोकप्रिय नेता सेहो तानाशाह बनि सकइत छथि। यदि हम सभ लोकतंत्रकेँ परखब चाहैत छी, तँ चुनाव देखब आवश्यक अछि। मुदा ओतबे आवश्यक अछि ई देखाब जे चुनावसँ पहने आ बादक स्थिति की अछि? चुनावसँ पहने राजनैतिक गतिविधि लेल पर्याप्त अवसर हेबाक चाही, विपक्षी दलकेँ सम्मान भेटबाक चाही आ नागरिककेँ बुनियादी अधिकार भेटबाक चाही। लोककेँ सोचबाक, अपन राय रखबाक, संगठन बनबैत आ विरोध करबाक स्वतंत्रता हेबाक चाही। कानूनक नजरिमे सभ बराबर हेबाक चाही। एहि अधिकारक रक्षा एकटा स्वतंत्र न्यायपालिका द्वारा हेबाक चाही जकर आदेश सभ लोक मानैत होथि। तहिना, चुनावक बाद सरकार चलेबाक सेहो किछु नियम होइत अछि। एकटा लोकतांत्रिक सरकार खाली एहि लेल जे ओ चुनाव जीतल अछि, मनमानी नहि कऽ सकइत अछि। ओकरा विभिन्न समूह सभकेँ देल गेल आश्वासनक आदर करय पड़त अछि। हर पैघ निर्णय व्यापक विमर्शक बादे लेल जा सकैत अछि। हर अधिकारीक अपन अधिकार आ जिम्मेदारी होइत अछि जे संविधान आ कानून द्वारा तय होइत अछि। ओ जनता आ संविधानक प्रति जवाबदेह होइत छथि। एहि सँ हमरा सभकेँ लोकतंत्रक चारिम आ अंतिम विशेषता भेटैत अछि: एकटा लोकतांत्रिक सरकार संवैधानिक कानून आ नागरिक अधिकार द्वारा तय कयल गेल सीमाक भीतर काम करैत अछि। लोकतंत्रक विपक्षमे कुछु मुख्य तर्क निकसि कऽ अबैत अछि, जकरा हम सभ अक्सर सुनैत छी: 1. लोकतंत्रमे नेता बदलइत रहैत छथि, जइसँ अस्थिरता पैदा होइत अछि। 2. ई खाली राजनैतिक प्रतिस्पर्धा आ सत्ताक खेल अछि, जतय नैतिकताक लेल कोनो जगह नहि अछि। 3. एतेक लोकसँ चर्चा करय पड़इत अछि जे फैसला लेबामे देरी भऽ जाइत अछि। 4. निर्वाचित नेता सभकेँ लोकक आवश्यकताक सही जानकारी नहि होबाक कारण खराब फैसला सभ भऽ जाइत अछि। 5. चुनावी मुकाबला खर्चीला होबाक कारण भ्रष्टाचार बढ़ैत अछि। 6. सामान्य लोककेँ नीक-बेजायकऽ स्पष्ट समझि नहि होबाक कारण ओ गलत प्रतिनिधि चुनि लैत छथि। निश्चित रूपसँ लोकतंत्र कोनो जादूक छड़ी नहि अछि जे सभ समस्याकेँ एक क्षणमे ख़त्म कऽ देत। एकरासँ दुनियासँ गरीबी ख़त्म नहि भेल अछि। मुदा ई शासनक अन्य रूपक तुलनामे तथापि नीक अछि। आउ एकर पक्षक तर्क सभकेँ देखी। चीन आ भारतक अकालक तुलना: सन 1958सँ 1961क दौरान चीनमे भेल भयावह अकाल विश्व इतिहासक सबसँ पैघ अकाल मानल जाइत अछि। ओहि अकालमे लगभग 3 करोड़ लोक भूखसँ मुइलाह। ओहि समय भारतक आर्थिक स्थिति चीनसँ कोनो बहुत नीक नहि छल। मुदा भारतमे अकालक ओहन भयानक परिणाम नहि भेल। अर्थशास्त्री सभक माननाय अछि जे ई दुनू देशक सरकारी नीतिक अंतरक कारण भेल। भारतमे लोकतांत्रिक व्यवस्था, बहुदलीय चुनाव आ स्वतंत्र मीडियाक उपस्थिति छल। तइँ भारत सरकार खाद्य सुरक्षा आ राहत कार्य लेल सतर्क छल आ तुरंत काम केलक। चीनमे एक-दलीय कम्युनिस्ट शासन छल। ओतय नै विपक्षी दल छल, नै सरकारक आलोचना करबाक स्वतंत्रता आ नै स्वतंत्र मीडिया। यदि चीनमे सेहो स्वतंत्र मीडिया आ विपक्षी दल होइत, तँ एतेक लोक भूखसँ नहि मरितैक। ई उदाहरण लोकतंत्रक सबसँ पैघ गुणकेँ देखबैत अछि। गैर-लोकतांत्रिक सरकार लोकक जरूरत पर ध्यान दैयो सकैत अछि आ नहिओ, ई सभ शासकक इच्छा पर निर्भर करैत अछि। मुदा लोकतंत्रमे शासक लेल जनताक प्रति जवाबदेह हेनाई अनिवार्य अछि। लोकतांत्रिक सरकार शासनक एक बेहतर रूप अछि किएक तँ ई बेसी जवाबदेह होइत अछि। लोकतंत्र व्यापक विमर्श, बहस आ चर्चा पर आधारित होइत अछि। कोनो निर्णय लेबासँ पहने बहुत रास लोक, बैठक आ कमिटीक माध्यमसँ विचार करैत छथि। यदि बहुत रास लोक मिलि कऽ कोनो निर्णय लइत छथि, तँ गलतिक गुंजाइश बहुत कम भऽ जाइत अछि। यद्यपि एहिमे समय बेसी लगैत अछि, मुदा पैघ आ महत्वपूर्ण मुद्दा पर सोच-विचार कऽ कऽ निर्णय लेबासँ गैर-जिम्मेदाराना फैसला सभसँ बचल जा सकैत अछि। लोकतंत्र निर्णय लेबाक गुणवत्ता  केँ बढ़ाबैत अछि। कोनो भी समाजमे लोकक बीच विचार आ हितक मतभेद भेनाई स्वाभाविक अछि। भारत सन देशमे, जतय भाषाई, धार्मिक आ सामाजिक विविधता बहुत बेसी अछि, ओतय मतभेद आउर गहिर होइत अछि। गैर-लोकतांत्रिक व्यवस्थासँ एहि मतभेदकेँ ताकतक बल पर दबाओल जा सकैत अछि, मुदा ओकरासँ समाजमे असंतोष आ नाराजगी बढ़ैत अछि। लोकतंत्र एक मात्र एहन शांतिपूर्ण माध्यम अछि जतय कोनो स्थायी विजेता या स्थायी पराजित नहि होइत अछि। सभ लोक एक दोसरक साथ मिलि-जुलि कऽ रहि सकइत छथि। लोकतंत्र मतभेद आ संघर्ष सभकेँ सुलझेबाक सबसँ नीक तरीका देइत अछि। भले ही लोकतंत्र नीक फैसला नहि लऽ पाबय या अस्थिर रहे, मुदा ई नागरिक सभकेँ जे सम्मान देइत अछि, ओ कोनो आउर व्यवस्था नहि दऽ सकैत अछि। लोकतंत्र राजनैतिक समानता पर आधारित अछि। एतय गरीब आ धनिक, अनपढ़ आ पढ़ल-लिखल सभक दर्जा एक समान होइत अछि। लोक खाली शासकक प्रजा नहि छथि, बल्कि ओ स्वयं अपन भाग्यक शासक छथि। यदि ओ गल्ती करैत छथि, तँ ओकर जिम्मेदारी सेहो हुनकरे होइत अछि। लोकतंत्र नागरिकक गरिमा आ सम्मान  केँ बढ़ाबैत अछि। गलती सुधारक अवसर: अंतमे, लोकतंत्रक एकटा पैघ लाभ ई अछि जे ई अपना भीतर गलतिकेँ सुधारबाक अवसर देइत अछि। जैना जे हम सभ देखलहुँ, एहन कोनो शासन व्यवस्था नहि अछि जतय गल्ती नहि होए। मुदा लोकतंत्रमे गलतिकेँ बहुत दिन धरि नुका कऽ नहि राखल जा सकैत। ओकरा पर सार्वजनिक चर्चा होइत अछि आ सरकारकेँ अपन फैसला बदल पड़इत अछि। यदि सरकार फैसला नहि बदलैत अछि, तँ चुनावमे जनता शासककेँ बदलि दैत अछि। गैर-लोकतांत्रिक व्यवस्थामे ई संभव नहि अछि। यदि एहि आदर्श पैमानासँ देखब, तँ दुनियामे कतहु पूर्ण लोकतंत्र नहि भेटत। मुदा ई आदर्श अपना सभकेँ सदिखन ई याद दियाबैत अछि जे अपना सभकेँ अपन लोकतंत्रकेँ आउर मजबूत आ समृद्ध बनेबाक अछि। लोकतंत्रक भविष्य केवल शासकक कार्य पर नहि, बल्कि नागरिकक सक्रिय भागीदारी आ सचेत प्रयास पर निर्भर करैत अछि। इहे लोकतंत्रकेँ राजशाही या तानाशाहीसँ या सामंतवाद से अलग आ श्रेष्ठ बनबइत अछि। संदर्भ : NCERT. Democratic Politics-I (Class IX) [2019] -प्रणव कुमार झा, ग्राम-गोरापुर, जिला बेगूसराय [संप्रति- राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली] अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१२. कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा- ओझड़ी कुमार मनोज कश्यप लघुकथा- ओझड़ी तीन सालक ओ अबोध आई जखने माय के ऑफिस जाय लेल तैयार होईत देखलकै तखने सs लटाढ़म पसारs लगलै। माय के पकड़ि कs कनैत रहलै - हम तोरे संग रहबौ। ई नहिं जे एना ओ आई पहिल दिन करैत छलै ... आनो दिन कहियो-कहियो एहिना जिद्द पसारि दै, मुदा अंत मे पोल्हेला पर मानियो जाई। आई लेकिन सभ व्यर्थ!  हारि कs अंत मे दग्धल मोने माय कहुना ओकरा बाबा के पकड़ा कs ऑफिस पड़ेली। ओ अबोध कनैत-कनैत अपस्याँत ... नोरे-पोंटे एक ...  भुईंयां मे लोटैत .... पैरहाथ पटकैत! बाबाक सभ यत्न .... पोल्हायब व्यर्थे!  ने ओकर छिड़ियेनाई कम्म भेलै आ ने ओ किछु खेलक। स्कूल जाई के तs बाते दूर!  एक्के टा रट -- माँ-बाबूजी ककरो हमरा बजा दिय, हम हुनका लग रहब। बाप तs दोसर शहर मे पदस्थापित, महीना मे कहियो छुट्टी भेटल तखने आबैथ। नोकरिहारा माय .... भोरे जे गेलीह तs रातिये मे घुरथि। ओहि बालक के दिन भरि सम्हारबाक जिम्मा छनि बाबा पर ... तैयार कs कs प्ले स्कूल पहुँचायब-आनब, ओकर दिन भरिक परिचर्या, देख-भाल ....  सभ किछु! जखन ओ अपन जिद्द पर अड़ल रहलै आ किन्नहुँ चुप्प नहिं   भेलै   तखन ओ ई बुझितो जे पुतहु ऑफिसक काज मे व्यस्त हेतिह; आजिर भs हुनका वीडियो कॉल केलनि। माय के टेबलेट स्क्रीन पर देखिते ओकर मुँह पर अकस्मात संतोष बोधक रेखा चमकि गेलै आ कनैत ओकर हाथ मायक सहज स्पर्श लेल अनायास आगू बढ़ि गेल रहै। बाबा के कना गेलनि ... ओम्हर माय सेहो कानय लगलीह। घर घुरि ओ बेटा के अपन छाती सs जोर सs सटा अविरल अश्रुधार मे भीजैत रहलीह ... वातसल्य वा आर्थिक स्थिरता वा दुहू ... तारतम्य के ओझड़ी आर ओझड़ायले जा रहल छलै! -कुमार मनोज कश्यप, निदेशक, भारत सरकार; संपर्क :  सी-11, टावर-4, टाइप-5, किदवई नगर पूर्व (दिल्ली हाट के सामने), नई दिल्ली-110023; # 9810811850; ईमेल: writetokmanoj@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१३. गजेन्द्र ठाकुर- गोहि सभक बीच जल समाधि (मैथिलीक आइ धरिक सभसँ पैघ उपन्यास)- मैथिली कादम्बरीक अंश गजेन्द्र ठाकुर मैथिलीक आइ धरिक सभसँ पैघ उपन्यास- न्याय दर्शन आ समकालीन अपराध-गाथा मैथिली कादम्बरी गोहि सभक बीच जलसमाधि गजेन्द्र ठाकुर २०० अध्यायारम्भ मैथिली लोकगीत अध्याय १ — चन्ना गाछीक कबड्डी अध्यायारम्भ लोकगीत : भोरक पहिल पारी लोकधुन : फाग-कबड्डी धुन खेलू हे, भोरक पहिल पारी खेलू हे, चन्ना गाछी तर नामक रखबारी खेलू हे। चान उतरि गेल गाछी सँ, पूब दिस लाली, भूतक खेलक बीच सुनायल कोइलीक खुशहाली। कबड्डी-कबड्डी बाजि कहू—नाम बचत आइ, एक पारी स्मृतिक, दोसर साहसक भाइ। पात-पात पर ओस लिखै—भोर नहि हारै, गोहि जते गहींर रहए, सूरुज जलपर तारै। पहिल पारी आशाक हो, संगमे पूरा गाम, चन्ना गाछीक माटिसँ उठत न्याय केर नाम। ओस-भीजल माटि महकै, फागक हवा डोलै, भूतो-प्रेतो संग बैसल, कोइली मुँह खोलै। साँस बान्हि जे दौड़त, से नामक थाती घोरत, हारल-जीतल दुनू मिलि आशाक अबीर छोड़त। खेलू हे, भोरक पहिल पारी खेलू हे, चन्ना गाछी तर नामक रखबारी खेलू हे। ❖ अध्याय २ — दहिन कातक गाम अध्यायारम्भ लोकगीत : दहिन कातक सूरुज लोकधुन : बटगबनी चलू यौ बटोही, दहिन कात चलू यौ, गामक पूरा नाम लऽ कऽ संग-साथ चलू यौ। नदी धार बदलि सकै, सूरुज दिशा चिन्है, गामक जड़ि माटि भीतर अपन घरकेँ गिन्है। दहिन-बामक फेरमे नहि नामक बाट हराउ, देहरी, पात, पुरखाक सीख संग लऽ जाउ। कमला-बलान गाबै—गाम चलै मनमे, कागच काटि नहि सकै नेहक मेड़ जनमे। दहिन कातक सूरुज फेर आँगनमे उतरै, गामक पूरा नामसँ हरेक परिवार सँवरै। मेड़-मेड़ पर सरसों हँसै, बाध-बोन गमकै, पुरखाक देल चिन्हा-पाती डेग-डेग चमकै। कागचक आँधी उड़ौ कतबो, जड़ि नहि उखड़त, देहरी-दीप जरैत रहत, गाम नहि बिछड़त। चलू यौ बटोही, दहिन कात चलू यौ, गामक पूरा नाम लऽ कऽ संग-साथ चलू यौ। ❖ अध्याय ३ — छपाकक हिसाब अध्यायारम्भ लोकगीत : छपाकक बीच नाव लोकधुन : नाविक-मंगल हे नैया धीरे-धीरे हे, नाम लादि पार करू हे, छपाकक अन्हरियामे दीपक कतार धरू हे। एक छपाक सुनिते नाविक पतवार उठाबै, देह नहि, नामो पार—ई प्रण जोर लगाबै। बिसेसर, छोटू, सरयूक दीप नावमे धरू, हिसाबकेँ मानव चेहरा, परिवारसँ भरू। धार जते कारी हो, नावक गीत उजियार, साँचक सूची बनि सकै दुखपर पहिल उपचार। छपाकक बीच नाव चलत, किनार बाट जोहत, हरेक नाम सुरक्षित होए—एहि आशामे भोरत। लहरि उठै, डाँड़ हिलै, छाती नहि डोलए, बिसेसर-सरयूक बाती हवामे नहि भोलए। घाट-घाट पर बाट जोहै अँचरा पसारल माए, नामक नाव लगले तट, मंगल सगुन गाए। हे नैया धीरे-धीरे हे, नाम लादि पार करू हे, छपाकक अन्हरियामे दीपक कतार धरू हे। ❖ अध्याय ४ — तीस नाम, तीन सय लाश अध्यायारम्भ लोकगीत : नाम गनू, जीवन बचाउ लोकधुन : करुण झूमरक जागरण गनू गे बहिना, नाम-नाम गनू गे, तीस नहि, तीन सय दीपक ठाम गनू गे। तीसपर गिनती रोकू नहि, पात जते हिलै, हरेक संख्या पाछाँ घर, माए, सपना मिलै। नाम गनू आदरसँ, जीवनक कथा जोड़ू, छोट सूचीक देबाल तोड़ि पूरा सत्य खोलू। तीन सय दीप जरत तँ अन्हार पाछाँ जाए, एक सही गिनतीसँ न्याय दिशाक राह बनाए। नाम गनू, जीवन बचाउ, संख्या मानुख होए, साँचक पूरा लेखासँ नया व्यवस्था बोए। झूमरक ताल पर आँगन-आँगन जागए, संख्याक परदा फाटए, चेहरा सोझाँ आबए। जकर घर उजरल, तकर लेखा पूरा जुड़ए, माएक नोरक एक-एक बून्दक मोल मुड़ए। गनू गे बहिना, नाम-नाम गनू गे, तीस नहि, तीन सय दीपक ठाम गनू गे। ❖ अध्याय ५ — तारीखक गोहि अध्यायारम्भ लोकगीत : तारीखपर सूरुज लोकधुन : विरहा-पराती उगू हे सुरुज, तारीखो पर उगू हे, बरखों सँ ठाढ़ि विधवाक आँगन जगू हे। तारीखक पानि गहींर, मुदा सूरुज रोज उगै, एक-एक सुनवाईपर जनक साहस संग रहै। लाल फीता नाव बनाउ, गाँठि काटू नेह, विधवाक बरख गननाइ हो उचित समयक लेख। समय न्यायकेँ खाए नहि, नियम सरल बनाउ, तारीखक बीच सहायता, सूचना साफ पहुँचाउ। तारीखपर सूरुज जरत तँ गोहि पाछाँ हटत, धैर्य, सुधार, जन-पहरासँ न्याय बाट पकड़त। पेशी-पेशी पात झड़ल, आशा नहि झड़ल, कचहरीक सीढ़ी पर धीरजक दीप बड़ल। फीताक लाल गाँठ खुजत, बही सोझ होयत, न्यायक भोर अबिते विरहो मंगल गाओत। उगू हे सुरुज, तारीखो पर उगू हे, बरखों सँ ठाढ़ि विधवाक आँगन जगू हे। ❖ अध्याय ६ — हार्वर्डक एथिक्स अध्यायारम्भ लोकगीत : पात पहुँचल सभागार लोकधुन : विदापत पदक उज्जर लय उड़ू हे पात, सात समुन्दर पार उड़ू हे, मिथिलाक श्रमक साँच लऽ सभागार जुड़ू हे। गामक हरियर पात उड़ि हिमक देश पहुँचै, मंचक सोना शब्द बीच मजदूरक नाम गुँजै। नैतिकता पुस्तक नहि, पायापर सुरक्षा, तालीसँ पहिने साँच, भाषणसँ पहिने रक्षा। ईरा जकाँ प्रश्न उठाउ, मेहता जकाँ जागू, विश्वविद्यालयक ज्ञानकेँ धरतीक श्रमसँ भागू। पात पहुँचल सभागार तँ विचार नब मोड़त, विश्वक मंच मिथिलाक साँचसँ मानवता जोड़त। हिमक देशक काँच-भवन, भीतर बाती-बाती, मंच पर गुँजए मजदूरक नामक पाँती। ईराक प्रश्न, मेहताक मौन, दुनू संग बाजए, धरतीक धूरा-लागल पात विश्व-मन साजए। उड़ू हे पात, सात समुन्दर पार उड़ू हे, मिथिलाक श्रमक साँच लऽ सभागार जुड़ू हे। ❖ अध्याय ७ — श्वासक भाव अध्यायारम्भ लोकगीत : श्वास अमोलक लोकधुन : माएरी सोहर ललना रे, साँसक सोहर गाबू हे, अँगना-अँगना पवनक अँचरा छाबू हे। बौआक पहिल साँसपर सोहर गाम गबैत, पवन मुफ्त अँचरा भरि जीवन-रस बहबैत। शीशी, दवा, अस्पताल सभ सेवा लेल रहू, श्वासक दाम नहि लगाउ, मानव धर्म कहू। माए केर जोड़ल हाथ खाली नहि घुरै, साझा प्रबन्ध, दया, विज्ञान जीवनकेँ धरै। श्वास अमोलक गीत गाउ, कियो नील नहि होए, हरेक छातीमे पवन बराबर आशाक फूल बोए। जच्चा हँसए, बच्चा हँसए, पवन बहए निर्मल, शीशी-सिलेण्डर सेवा बनए, नहि बनए छल-बल। माएक जोड़ल हाथ कहए—साँस सभक साझा, एहि सोहरक ताल पर नाचए जीवन ताजा। ललना रे, साँसक सोहर गाबू हे, अँगना-अँगना पवनक अँचरा छाबू हे। ❖ अध्याय ८ — स्क्रीनक गोहि अध्यायारम्भ लोकगीत : स्क्रीनपर नेहक पहरा लोकधुन : युवक-जागरण गीत जागू हो जवान, नेहक पहरा लगाउ हो, परदाक अन्हरियामे संगक दीप जराउ हो। परदा चमकै राति जखन, संगमे मित्र रहू, हारल अंकसँ जीवन पैघ—ई बात रोज कहू। ऋण, धमकी, लाजक जाल अकेले नहि सहू, माए-बाबू, साथी, सेवा केन्द्रसँ जुड़ू। स्क्रीनक गोहि चिन्हि कऽ डाउनलोड सोचि करू, एक क्लिकसँ पहिने सत्यापनक दीप धरू। नेहक पहरा स्क्रीनपर उज्ज्वल भोर बनत, कियो युवक मौन नहि, संगक हाथ पकड़त। रातिक चमकी ठकै-भुलबै, आँखि नहि झँपाउ, हारल अंक, टूटल सपना—मने नहि दबाउ। एक अवाज पर दस हाथ काँध धरए आओत, गोहि-जाल कतबो गहींर, संग पार लगाओत। जागू हो जवान, नेहक पहरा लगाउ हो, परदाक अन्हरियामे संगक दीप जराउ हो। ❖ अध्याय ९ — देहक बाजार अध्यायारम्भ लोकगीत : देहक गरिमा लोकधुन : स्त्री-मंगल गीत गाबू गे सखिया, गरिमाक मंगल गाबू गे, फूलमतिक माथ ऊपर आदरक अँचरा छाबू गे। देह मंदिर नहि कहू मात्र—देह अपन अधिकार, सहमति बिना कियो नहि खोलय ओकर द्वार। फूलमति माथ उठाउ, दोष तोहर नहि, अपराधीक लाज ओकर, पीड़ितक लाज नहि। बहिनी सभ संग ठाढ़, कानून सेवा देत, जीवित स्त्रीक नाम इतिहासमे सम्मान लेत। देहक गरिमा गीत बनि बाजारक चाल हरत, स्वतन्त्र निर्णयक प्रकाशसँ नव समाज सँवरत। दोसक बोझ अपराधी उठाओत, पीड़ित नहि, बहिनक काँध बहिनक संग, असगर कियो नहि। आँगनसँ अदालत धरि डेग निडर पड़त, मंगल-दीपक पाँतीसँ नव विहान चढ़त। गाबू गे सखिया, गरिमाक मंगल गाबू गे, फूलमतिक माथ ऊपर आदरक अँचरा छाबू गे। ❖ अध्याय १० — निजताक ब्लैकमेल अध्यायारम्भ लोकगीत : निजताक देहरी लोकधुन : सखी-संवाद मंगल गे सखी, देहरी अपन सम्हारू गे, चाबी अपन, कथा अपन—मने बिचारू गे। सखी, तोहर देहरी तोहर, चाबी तोहर हाथ, फोनक भीतर जे पैसए, अनुमति ओकर बाट। लाज घुरा अपराधी माथ, पीड़ित माथ नहि, संगक तीन दीप जरत तँ ब्लैकमेल भारी नहि। नाम, प्रेम, गवाही मिलि रक्षा-घेरा देत, कानून, तकनीक, मित्रता भरोसक हाथ लेत। निजताक देहरीपर सम्मानक अल्पना भरू, अपन कथा अपन शर्तपर निःशंक जगमे धरू। फोनक भीतर आँगन बसल, ओहूमे अल्पना, बिनु पूछल जे ताकए, टूटए ओकर छलना। तीन दीप—नाम, प्रेम, गवाही—एक संग बारू, अपन शर्त पर अपन कथा जग आगाँ पसारू। गे सखी, देहरी अपन सम्हारू गे, चाबी अपन, कथा अपन—मने बिचारू गे। ❖ अध्याय ११ — धनक कारी नदी अध्यायारम्भ लोकगीत : कारी नदीपर हरियर नाव लोकधुन : रोपनी-नाविक मिश्र रोपू हे हरियर नाव, कारी धार पर रोपू हे, श्रम-पसेनाक दाम घुरा घर-घर सुख बोऊ हे। कारी धनक नदी बहै, हरियर नाव उतारू, नाम, प्रमाण, स्मृति, साहस चारि पतवारू। खाता-खाता पार करि श्रमक दाम घुराउ, अंकक पाछाँ मानुख देखू, साफ हिसाब बनाउ। गामक मुँहजुबानी आगि कारी धार सुखाबै, जनक संयुक्त पहरासँ धन सेवा बनि आबै। कारी नदीपर हरियर नाव विश्वास लऽ चलत, श्रमक कमाइ बच्चाक घर न्यायसँ पहुँचत। रोपनिहारिक पाँती जेकाँ खाता साफ सजाउ, अंक-अंकमे मुँह देखू, मानुख नहि हराउ। मुँहजुबानी गामक आगि कारी धुन्ध जराओत, हरियर नाव लहरि चीरि न्याय-घाट लगाओत। रोपू हे हरियर नाव, कारी धार पर रोपू हे, श्रम-पसेनाक दाम घुरा घर-घर सुख बोऊ हे। ❖ अध्याय १२ — डार्क-जालपर नारिकेल पात अध्यायारम्भ लोकगीत : अन्हार जालपर पातक दीप लोकधुन : बटगबनी-जागरण धीरे चलू यौ बटोही, जालक बाट अन्हार यौ, पातक दीप हाथ लिअ, संग चलू हुसियार यौ। कारी जालक बाटमे पात दीप बनि जाए, नामक छोट हरियर रेखा दिशा सही देखाए। साक्ष्य ओतबे खोलू जतय गरिमा सुरक्षित, तकनीक संग विवेक रहय, जन रहय संरक्षित। मजदूर, युवक, स्त्रीक स्वर एक पातपर जुड़ै, गामक ज्ञान डिजिटल जगक छलक गाँठि उघड़ै। अन्हार जालपर पातक दीप कहै—धीरे चलू, साँचक नाव, सुरक्षित संग लऽ अन्हार पार करू। क्लिक-क्लिक पर काँट बिछल, फानल-फानल डोरी, विवेकक लाठी टेकि चलू, टूटत सभटा चोरी। मजदूर-युवक-स्त्री-स्वर एक पात पर जड़ल, अन्हार कतबो घन हो, दीप नहि हड़बड़ल। धीरे चलू यौ बटोही, जालक बाट अन्हार यौ, पातक दीप हाथ लिअ, संग चलू हुसियार यौ। ❖ अध्याय १३ — सीलबन्द आवरण अध्यायारम्भ लोकगीत : मोहर खोलत भोर लोकधुन : करुण समदाउनक आशा-लय खोलू हे भोर, मोहरक गिरह खोलू हे, आवरणक भीतर बन्हल साँसकेँ बोलू हे। सीलबन्द आवरण भीतर साँस बाट जोहै, भोरक नियम कहै—उचित हाथ धीरे खोले। मोहर रक्षा लेल हो, सत्य दबाबय नहि, गोपनीयता गरिमा हो, अपराधक मही नहि। अदालतक फर्शपर पानिक दाग दिशा देत, छोट गामक मुँहजुबानी पूरा नाम सहेत। मोहर खोलत भोर जखन प्रक्रिया साफ बनत, आवरण भीतरक साँच न्याय-आसन पाबत। समदाउनक करुण सुर सेहो आशा गाबए, सील-बन्द कोठरियोमे किरिण बाट पाबए। उचित हाथ धीरे खोलए, साँच नहि दबाए, गोपन रहए गरिमा भरि, अपराध नहि नुकाए। खोलू हे भोर, मोहरक गिरह खोलू हे, आवरणक भीतर बन्हल साँसकेँ बोलू हे। ❖ अध्याय १४ — घर घुरबाक रस्ता अध्यायारम्भ लोकगीत : घरक बाट उजियार लोकधुन : घरघुरनी गीत घुरि आउ हे बटोही, देहरी दीप बरै हे, माएक अँचरा-छाँह तोहर बाट जोहै हे। कुहासामे पग सुनाइ, देहरी दीप जरै, नाम कागचसँ निकलि अपन आँगन दिस धरै। गमछा, गिट्टी, गंगारेत बाटक चिन्ह बनै, माए केर नोर नहि—आशीषक जल झरै। गाछ मरत तँ बीज रहत, घरक राह नहि हरत, स्मृति, प्रेम, साक्ष्य मिलि घुरनिहारकेँ धरत। घरक बाट उजियार रहय हरेक बिसरल नाम, देहरीपर सम्मान भेटय—एहने हो प्रणाम। कुहासामे गमछा-गिट्टी-गंगारेतक निशान, डेग-डेग पर कहै—लग अछि अपन दलान। गाछ खसल तँ बीज बचल, बाट नहि हरायत, नोर नहि, आशीषक जल देहरी पर छिड़िआयत। घुरि आउ हे बटोही, देहरी दीप बरै हे, माएक अँचरा-छाँह तोहर बाट जोहै हे। ❖ अध्याय १५ — नामक जल अध्यायारम्भ लोकगीत : नामक जल अमृत लोकधुन : नाविक-पराती भरू हे अँजुरी, नामक जल भरू हे, बून्द-बून्द अमृत सभ कण्ठ-कण्ठ धरू हे। पानिपर लिखल नाम लहरि संग दूर जाए, मेटै नहि, बून्द-बून्द नब कंठमे समाए। गोहि देह चिबा सकै, नामक रस नहि, नदी अपन गहींर स्मृतिमे राखै सभ सही। नामक जल अमृत बनि घर-घर पियास बुझाबै, इतिहासक सूखल पन्ना हरियर रंग लगाबै। हथेलीमे बून्द धरू, उच्चारू सम्मान, नामक जलसँ जीवित रहत जनक पहिचान। लहरि पर लिखल आखर लहरि संग बहए, मेटाए नहि, गहींर जा नदीक मोन रहए। गोहि देह लऽ जाए, नामक रस नहि पाबए, परातीक पहिल सुरमे पहिचान जगि आबए। भरू हे अँजुरी, नामक जल भरू हे, बून्द-बून्द अमृत सभ कण्ठ-कण्ठ धरू हे। ❖ अध्याय १६ — चन्ना गाछीक अदालत अध्यायारम्भ लोकगीत : गाछी अदालत आशा लोकधुन : भगैत-मंगल बैसू हे पंच, गाछक तर बैसू हे, पातक पर विधान लिखू, साँच-साँच परसू हे। गाछ तरे आसन बिछल, पात बनल विधान, मोहर दूर, लोक लग—सुनवाई समान। जीतक कागच नहि चलत, नामक साँच चलत, हारल लोकक कर्मक दीप न्याय दिशा बलत। केओ नेनाकेँ चेतना, केओ बहिनकेँ साथ, गाछी अदालत निर्णयकेँ घर-घर देत बाट। आशाक न्याय उठि चलत विद्यालय, बाजार, पातक एक निर्णयसँ जागत जनक संसार। ने मोहरक धाख चलए, ने कागचक जोर, लोकक आँखिक सोझाँ होए सुनवाइक भोर। नेना-बहिन-बूढ़ सभक स्वर बराबरि तौल, गाछी-अदालतक डगर घर-घर धरि अनमोल। बैसू हे पंच, गाछक तर बैसू हे, पातक पर विधान लिखू, साँच-साँच परसू हे। ❖ अध्याय १७ — जीतक शोक अध्यायारम्भ लोकगीत : जीतक भीतर सेवा लोकधुन : विजय-विरहक उज्जर चाल जीतल हे जीतल, मुदा मुकुट उतारू हे, हारल केर घाव पर पहिने मलहम सम्हारू हे। जीतलहुँ तँ पहिने देखू ककर घाव बचल, मुकुट उतारि सेवा करू, तखन विजय सफल। हरल पक्षक मान राखू, संवादक द्वार खोलू, फैसलाक पाछाँ जीवनक सुधारक बीज बोऊ। ‘सरयू’, ‘उज्ज्वल’ स्वर भीतर चेतना जगाबै, जीतक भारी लोहेकेँ करुणा फूल बनाबै। जीतक भीतर सेवा हो तँ शोक पिघलि जाए, न्यायपूर्ण विनम्र विजय समाज जोड़ि जाए। विजयक ढोल थम्हा कऽ करुणाक तार छेड़ू, सरयू-उज्ज्वलक सुरति सँ भीतरक मन हेरू। फैसलाक पाछाँ जे जीवन, ओकरा गढ़ू फेर, उज्जर चालक विजय बनए सभक साँझ-सबेर। जीतल हे जीतल, मुदा मुकुट उतारू हे, हारल केर घाव पर पहिने मलहम सम्हारू हे। ❖ अध्याय १८ — खाली अदालत अध्यायारम्भ लोकगीत : खाली अदालत भरत जन लोकधुन : श्रमिक-पुत्र पराती भरू हे भरू, खाली बेंच भरू हे, झाड़ूबला बेटाक अक्षर माथ पर धरू हे। बेंच खाली देखाइ तइयो छाह सभ बैसल, प्रवेश नहि पाओल नाम भोरक संग अएल। झाड़ूबला धूलिमे बाबूजीक नाम लिखै, मेटल अक्षर कोंपल बनि पाथर बीच दिखै। न्याय जँ नाम पढ़त तँ भवन घर बनत, लोकक स्मृति संग मिलि खालीपन भरत। खाली अदालत भरत जनक उज्जर पुकार, उपस्थित जीवन पाबत सम्मानक अधिकार। धूलि-लिखल बाबूक नाम भोरक संग जगत, मेटल आखर कोंपल बनि पाथर बीच उगत। प्रवेश-पत्र नहि, परातीक सुर लऽ जन आओत, न्याय-भवन तखने अपन नाम सार्थक पाओत। भरू हे भरू, खाली बेंच भरू हे, झाड़ूबला बेटाक अक्षर माथ पर धरू हे। ❖ अध्याय १९ अध्यायारम्भ लोकगीत : उपस्थितिक पराती लोकधुन : पराती गाबू हे पराती, 'हम उपस्थित' गाबू हे, हरद-काजर पात पर पुरनका नाम सजाबू हे। हरद-काजर पातपर पुरनका नाम सजाउ, हाजिरीक घड़ी सभ मिलि ‘हम उपस्थित’ गाउ। कागच फाटि सकै, जड़ि अक्षर फेर उगै, ओसक बून्द सुखलापर स्मृतिक रेखा रहै। सरकारी फोन थमि जाए, जनक स्वर नहि, नामक पाठशालामे कियो अनुपस्थित नहि। उपस्थितिक परातीसँ भोर सभक होए, अनामक हाजिरी लऽ इतिहास पूर्ण होए। भोरहरबाक ठण्ढ हवामे हाजिरीक घण्टी, कागच फाटए, जड़ि नहि—उगए नाम-पाँती। सरकारी तार थम्हए, लोकक स्वर नहि थम्हत, अनामो केर हाजिरीसँ इतिहास पूरा बनत। गाबू हे पराती, 'हम उपस्थित' गाबू हे, हरद-काजर पात पर पुरनका नाम सजाबू हे। ❖ अध्याय २० अध्यायारम्भ लोकगीत : अकेला नहि—संगक गीत लोकधुन : बाल-लोकधुन हो-हो करू संगी, गोल घेरा बान्हू हो, 'अकेला तँ नहि छी?'—पहिल प्रश्न ठानू हो। स्क्रीनक गोहिक चारि पएर—लालच, भय, लाज, संगक हाथ भेटिते टूटै ओकर पूरा राज। नेना गोल घेरा बनि एक प्रश्न उठाबै, ‘अकेला तँ नहि छी?’—मित्र तुरन्त बताबै। भय बाँटल तँ हल्लुक, लाज अपराधी जाए, सहारा नाम पाबिते समाज रूप बनाए। अकेला नहि—संगक गीत फोन-पार गुँजत, एक-दोसरक जागल स्वर जीवन बाट चुनत। स्क्रीनक गोहि फुफकारए—लालच, भय, लाज, हाथ-हाथ जुड़ि गेला पर टूटए ओकर राज। भय बँटला पर आधा, हँसी बँटला पर दूनी, संगीक गीत गबैत नेना बाट चलए सगुनी। हो-हो करू संगी, गोल घेरा बान्हू हो, 'अकेला तँ नहि छी?'—पहिल प्रश्न ठानू हो। ❖ अध्याय २१ अध्यायारम्भ लोकगीत : हम निर्दोष, हम संग लोकधुन : स्त्री-मण्डली जागरण उठू गे बहिना, मण्डली सजाउ गे, 'हम निर्दोष, हम संग'—स्वर मिलाउ गे। हम दोषी नहि बहिनी, लाज अपराधीक माथ, एक-दोसरक हाथ पकड़ू, खुलत सुरक्षित बाट। घूँघट अपन इच्छा, कंठ स्वतन्त्र रहय, डर बाँटल तँ आधा होए, संगसँ साहस बहय। ‘हम अकेली नहि’क स्वर घर-घर दीप बनत, समाजक जागल घेरा ठगक जाल हरत। हम निर्दोष, हम संग—एहि गीतकेँ गाउ, निजताक देहरीपर सम्मानक पहरा लाउ। आँगन-आँगन ढोलक बाजए, कण्ठ खुलल गाबए, लाजक गठरी ओकरे माथ जे अपराध कमाबए। एक बहिनक डेग डगमगाए, दस हाथ थामए, जागल मण्डलीक घेरामे ठग नहि समाए। उठू गे बहिना, मण्डली सजाउ गे, 'हम निर्दोष, हम संग'—स्वर मिलाउ गे। ❖ अध्याय २२ अध्यायारम्भ लोकगीत : खाली मंचपर साँचक तान लोकधुन : विदापत पदक सभागार-लय गाबू हे साँचक तान, मंच खाली रहौ हे, पातक एक्के स्वरसँ सभागार भरौ हे। मंच खाली हो तइयो पातक स्वर उठत, सोना शब्दसँ पैघ एक साँचक नाम फूटत। माइक चुप रहि सकै, जनक कंठ नहि, प्रश्नक धीम तानसम पैघ कोनो घंट नहि। एक नाम पढ़िते सभागारक हवा बदलै, ताली सँ बेसी मौनक ध्यान सत्य सँ मिलै। खाली मंचपर साँचक तान नव राह बनत, नैतिकता कागच छोड़ि जीवनमे उतर। माइक चुप, बत्ती मद्धिम, तइयो सभा जागल, एक नाम उच्चरिते हवाक रुख बदलल। सोनाक शब्द झहरि खसल, साँच अटल ठाढ़, मौनक गहींर ताल बिच उतरए साँचक बाढ़ि। गाबू हे साँचक तान, मंच खाली रहौ हे, पातक एक्के स्वरसँ सभागार भरौ हे। ❖ अध्याय २३ अध्यायारम्भ लोकगीत : जीत छोड़ि लोक खोजू लोकधुन : बटगबनी-विजय गीत चलू यौ जीतल बटोही, पहिने हारल घर यौ, कागच बाँहि तर दाबि, नेह बाँटि कऽ चलू यौ। जीतक कागच बाँहि तरे, पहिने लोकक घर जाउ, जकरा हरौलहुँ, ओकर आजुक हाल सुनाउ। जीत यदि सेवा नहि करै, खाली भार बनत, हारल लोक उठि कऽ कर्मसँ नव समाज गढ़त। पदक घमण्ड उतारि चलू, पगमे माटि धरू, लोकक मुक्त जीवनसँ अपन उत्तर सीखू। जीत छोड़ि लोक खोजू, जीतक अर्थ बदलत, दूसराक मान बचेलापर अपन मान फुलत। जीतक ढोल दूर धरू, कानक बाट खोलू, हारल आँगनक चुप्पी पहिने जा कऽ तोलू। पगक धूरा माथ लगा पदक ताप उतारू, लोकक हँसी घुरा कऽ अपन जीत सम्हारू। चलू यौ जीतल बटोही, पहिने हारल घर यौ, कागच बाँहि तर दाबि, नेह बाँटि कऽ चलू यौ। ❖ अध्याय २४ अध्यायारम्भ लोकगीत : नब पन्नाक भोर लोकधुन : बाल-कबड्डी गीत फेरू हो नेना, नब पन्ना फेरू हो, ओसक बून्दक स्याहीसँ नब कहानी टेरू हो। किताब कहलक अन्त, नेना पन्ना फेरलक, ओसक नान्हि बून्द नब कहानी लिखि देलक। पहिल पंक्ति खेलक, दोसर नामक मान, तेसर पंक्ति संगक, चौठी नव अभियान। पन्ना खाली डर नहि, सम्भावनाक खेत, बालक कलम चलिते उगै भविष्यक नेह। नब पन्नाक भोर कहै—कथा कहियो नहि थाम, हरेक पीढ़ी अपन कर्मसँ फेर लिखै गाम। अन्त लिखल जतऽ किताबे, ओतऽ सँ खेल शुरू, खाली पन्ना डर नहि—बीया छिटबाक धरू। पहिल आखर खेलक, दोसर संगक बोली, पीढ़ी-पीढ़ी लिखत गाम, भरत नामक झोली। फेरू हो नेना, नब पन्ना फेरू हो, ओसक बून्दक स्याहीसँ नब कहानी टेरू हो। ❖ अध्याय २५ अध्यायारम्भ लोकगीत : मोनक बाट घर लोकधुन : बटोहिया गीत बटोहिया हो, मोनक बाटे गाम चलू हो, देह रहौ शहर, मोनक गठरी घर धरू हो। देह शहरमे हो तइयो मोन गामक बाट, पातक सरसर, पोखरिक गन्धि, दादीक बात। टाँगल मोन उतारि लिअ, यात्रा लेल सजाउ, जड़ि संग संवाद करब, अपन साँच बुझाउ। घर घुरब केवल दूरी नहि, भीतरक मिलन, मोनक बाटपर भेटत पुरखा, नेना, जीवन। बटोहिया गीत गाबि चलू, अहंकार छोड़ि, घरक माटि मनकेँ फेर न्याय दिशामे मोड़ि। पातक सरसर कानमे, पोखरिक गन्ध नाकमे, दादीक कथाक डोरी बान्हल हिय-ताखमे। अहंकारक मोटरी उतारि हल्लुक भऽ चलू, देहरी लगिते भीतर-बाहर एक्के भऽ मिलू। बटोहिया हो, मोनक बाटे गाम चलू हो, देह रहौ शहर, मोनक गठरी घर धरू हो। ❖ अध्याय २६ अध्यायारम्भ लोकगीत : जूता उतारि विनम्र हो लोकधुन : रेल-बटगबनी उतारू यौ जूता, दुआर पर उतारू यौ, माथक बोझ, पदक ताप—सभ बाहर पसारू यौ। दुआरपर जूता खोलू, संग अहंकार उतारू, माटिक ठंढक पएरसँ माथक ताप उतारू। नाम पढ़बासँ पहिने लोकक आँखि पढ़ू, जीतक आदेश नहि, सुनबाक आसन गढ़ू। रेल दूरसँ आनल देह, मन पहिने पहुँचत, विनम्र पग धरिते बन्द सम्बन्ध खुलत। जूता उतारि नाम पढ़ू आदरक उच्चार, माटि सिखाबै—मनुख हो पदसँ पहिने सार। रेलक चक्का दूर घुमल, मन आगाँ दौड़ल, देहरी छूबिते पएरमे माटिक ठण्ढ बाजल। पहिने लोकक आँखि पढ़ू, पाछाँ पोथी-पान, विनम्र डेगक आगाँ खुजए बन्द केबाड़-दलान। उतारू यौ जूता, दुआर पर उतारू यौ, माथक बोझ, पदक ताप—सभ बाहर पसारू यौ। ❖ अध्याय २७ अध्यायारम्भ लोकगीत : काँचक दू पार संवाद लोकधुन : झूमर झूमि-झूमि गाबू, काँचक पार गाबू हे, परदा नहि, पुल बनाउ—दुनू पार आबू हे। काँचक परदा दू मुख, दुनू पार नजर, शहर गामकेँ देखै, गाम देखै शहर। परदा बन्द नहि करू, पारदर्शी राह बनाउ, डिलीट शब्दक पाछाँक मानुखकेँ सुनाउ। तकनीक दर्पण बनय, देबाल नहि होए, दू दिशाक संवादसँ भरोसक बीज बोए। काँचक दू पार संवाद उज्जर पुल बनत, मोनक दूरी घटि कऽ साझा दुनिया जनत। एम्हर गामक दीप जरए, ओम्हर बत्ती-लड़ी, बीचक काँच पिघलि बनए संवादक कड़ी। डिलीटक पाछाँ नुकाएल मुँह, ओकरो स्वर सुनू, दू दिशाक झूमर मिलि एक्के ताल बुनू। झूमि-झूमि गाबू, काँचक पार गाबू हे, परदा नहि, पुल बनाउ—दुनू पार आबू हे। ❖ अध्याय २८ अध्यायारम्भ लोकगीत : संदेश बचाउ, जीवन बचाउ लोकधुन : सिग्नल-जागरण जागू हो संगी, सन्देसक घण्टी जागू हो, पाँच सेकेण्डक आखरो पर कान लगाबू हो। पाँच सेकेंडक अक्षर हो, तइयो संकेत मानू, संकट, भय, निराशाक बात समयपर पहिचानू। सन्देश मेटय सँ पहिने सुरक्षित प्रति धरू, मित्र, परिवार, सहायता संग तुरन्त खबर करू। एक उत्तर—‘हम संग छी’—जीवन बाट बदलै, रातिक फोनक पाछाँ भोरक द्वार निकलै। सन्देश बचाउ, जीवन बचाउ, मौन नहि रहू, डिजिटल करुणाक जालसँ एक-दोसर सहू। मेटएबला आखरो मे साँसक खबरि बाजए, 'हम संग छी' तीन शब्दसँ भोरक द्वार साजए। एक फोन, एक दस्तक, एक हाथक ताप, राति कतबो घन हो, कटि जाए सन्ताप। जागू हो संगी, सन्देसक घण्टी जागू हो, पाँच सेकेण्डक आखरो पर कान लगाबू हो। ❖ अध्याय २९ अध्यायारम्भ लोकगीत : शीशाघरमे नदीक गीत लोकधुन : समुद्र-मलार गाबू हे मलार, शीशाघर मे गाबू हे, काँचक ठण्ढ छाती मे नदीक धुन जगाबू हे। शीशाघरमे समुद्र देखू, आवाजो भीतर आनू, लाभक रेखा बीच मनुखक नाम सम्मानू। काँचक मीनार खिड़की खोलि पवनकेँ ठौर दिअ, दूर देशक श्रम आ सपनाक उचित मोल दिअ। छपाक भयक नहि हो, चेतनाक मधुर ताल, समुद्रपारो न्याय रहय वैश्विक व्यवहार। शीशाघरमे नदीक गीत हृदयकेँ नरम करत, काँचक ठंढा जगतमे मानवीय ऊष्मा भरत। मीनारक खिड़की खोलू, पुरबा भीतर आबए, लाभक अंक-पाँती बिच मनुखक मुँह देखाबए। दूर देशक श्रम-पसेना उचित मोल पाबए, समुद्रो पार न्यायक धार मलार सुनाबए। गाबू हे मलार, शीशाघर मे गाबू हे, काँचक ठण्ढ छाती मे नदीक धुन जगाबू हे। ❖ अध्याय ३० अध्यायारम्भ लोकगीत : भीतरक न्याय दीप लोकधुन : भगैत-न्याय मंगल जराउ हे दीप, भीतरक अदालत मे जराउ हे, अपने कर्मक बही अपने आगाँ बिछाउ हे। बाहरक अदालत देर करै, भीतर दीप जरै, विवेकक शान्त न्यायाधीश साँचक पन्ना धरै। अपने काजक लेखा पढ़ू, दोषसँ नहि भागू, सुधारक आदेश स्वयंकेँ देबामे नहि डेराउ। भीतरक अदालत दण्ड मात्र नहि, दिशा, पश्चात्तापसँ कर्म धरि बनाबै नव आशा। न्याय दीप भीतर जरत तँ बाहर बाट साफ, मनक साँचक फैसला जीवन करै निष्पाप। भगैतक सुर गाबि-गाबि साँचक कथा कहू, दोषक ताप सहि कऽ सुधारक बाट गहू। पश्चात्तापक निर्मल जलसँ मन-आँगन नीपू, भीतर बरल दीप लऽ कऽ बाहरक पथ जीतू। जराउ हे दीप, भीतरक अदालत मे जराउ हे, अपने कर्मक बही अपने आगाँ बिछाउ हे। ❖ अध्याय ३१ अध्यायारम्भ लोकगीत : हारल लोकक कर्म विजय लोकधुन : श्रमगीत हँ हो भैया, हारियो कऽ जीतू हो, झण्डा नहि, कोदारि धरू, कर्मक गीत गाबू हो। न झण्डा, न मंच, हारल लोक काजपर, विद्यालय, खेत, सहायता, नेनाक समाजपर। कर्मक शान्त विजय कागचक जीतसँ पैघ, जकर श्रम जीवन सुधारे, सएह असल नेह। हार नहि जँ हाथ चलै, ज्ञान बाँटल जाए, दिन-दिन छोट सुधारसँ भविष्य रूप बनाए। हारल लोकक कर्म विजय चुपचाप फूलत, न्यायक असल इतिहास जनक श्रमसँ खुलत। भोरे-भोर विद्यालय, दुपहर खेत-खरिहान, साँझ सहायताक चौपालि, राति नेनाक ध्यान। कागचक जय-पराजय दिन बीतल बिला जाए, हाथक बनल छोट सुधार युग भरि रहि जाए। हँ हो भैया, हारियो कऽ जीतू हो, झण्डा नहि, कोदारि धरू, कर्मक गीत गाबू हो। ❖ अध्याय ३२ अध्यायारम्भ लोकगीत : तेसर पारी—संग लोकधुन : कबड्डी-धुन बाजू हे कबड्डी, तेसर पारी बाजू हे, दर्शक कियो नहि—सभ खिलाड़ी साजू हे। पहिल पारी खेल छल, दोसर नामक गान, तेसर पारी संगक—जीवित जन अभियान। सीमा आब दफ्तर, स्क्रीन, घर, बाजार, एक-दोसरक हाथ पकड़ि करब सभटा पार। कबड्डी स्वरमे साँस नहि, भरोसक लय धरू, पकड़निहार छलक जाल, संगसँ ओकरा हरू। तेसर पारी शुरू भेल, दर्शक कियो नहि, सभ खिलाड़ी, सभ पहरुआ—कियो अकेल नहि। पहिल पारी भूतक छल, दोसर नामक तान, तेसर पारी जीवितक—संगक जय-अभियान। दफ्तर-स्क्रीन-बजारक सीमा हाथ जोड़ि नापू, भरोसक लम्बा साँस लऽ छलक रेखा कापू। बाजू हे कबड्डी, तेसर पारी बाजू हे, दर्शक कियो नहि—सभ खिलाड़ी साजू हे। ❖ अध्याय ३३ अध्यायारम्भ लोकगीत : दर्पणसँ सुधार लोकधुन : मोन-झूमर देखू हे दर्पण, डरि कऽ नहि देखू हे, करुण नजरिसँ अपने कर्म-रेख लेखू हे। दर्पण दण्ड नहि मात्र, साँचक मित्र बुझू, चेहरा जकाँ कर्म देखू, गलती स्पष्ट चुनू। जेलसँ भागल जाए, अपने नजरसँ नहि, मुदा नजर जँ करुण हो तँ सुधार कठिन नहि। दर्पण सामने प्रण करू—आइसँ भिन्न चलब, जकर हक छीनल, ओकरा न्यायसँ फेर मिलब। दर्पणसँ सुधार जखन व्यवहारमे उतरै, अपराधक छाह घटि कऽ मनुखता फेर उगै। झूमरक ताल पर मोनक कोन-कोन बहारू, जे आखर टेढ़ लिखल गेल, फेरसँ सुधारू। छीनल हकक सूची बना घुरेबा लए निकलू, दर्पण मित्र बनल तँ सुधारक संग चलू। देखू हे दर्पण, डरि कऽ नहि देखू हे, करुण नजरिसँ अपने कर्म-रेख लेखू हे। ❖ अध्याय ३४ अध्यायारम्भ लोकगीत : नदीक कान लोकधुन : नाविक-समदाउनक उज्जर रूप सुनू हे नदी जकाँ, धार रोकि सुनू हे, दूरक क्षीण पुकारो कान लगा गुनू हे। नदी धार रोकि सुनै हरेक किनारक नाम, झूठक शोर पार करि पाबै साँचक तान। हमरो कान नदी जकाँ धैर्यवान बनाउ, कमजोर स्वर, दूर पुकार आदरसँ अपनाउ। नदी नाम सुनै तइयो निर्णय नहि थोपै, सुनि कऽ माटि, पात, जनक संग सत्य जोड़े। नदीक कानक सीख लिअ—गहींर सुननाइ, सुनल नामकेँ उचित ठाम धरब न्याय कमाइ। शोरक ऊपर-ऊपर झूठ, तर मे साँचक स्वर, गहींर पैसि सुनू, तखने भेटत असल खबर। सुनि कऽ थोपू नहि, माटि-पात संग तौलू, सुनल नामकेँ उचित घाट, उचित आसन सौंपू। सुनू हे नदी जकाँ, धार रोकि सुनू हे, दूरक क्षीण पुकारो कान लगा गुनू हे। ❖ अध्याय ३५ अध्यायारम्भ लोकगीत : देहरीक धूलिसँ आशीष लोकधुन : घरघुरनी गीत धूलि हे देहरीक, माथ पर धरू हे, टूटलो घरक आशीषसँ नब घर भरू हे। घर टूटि जाए तइयो देहरी धूलि बचाबै, घुरनिहारक पग चिन्हि पुरखा बात सुनाबै। धूलि माथपर धरि कहू—घरक मान रहय, नब भीत उठत, नब छप्पर, नेह पुरान बहय। देहरी स्मृति मात्र नहि, पुनर्निर्माणक मूल, ओहि धूरिमे रोपू विश्वासक नान्हि फूल। देहरीक धूलिसँ आशीष नब घरकेँ भेटत, टूटल ईंटो संग जुड़ि सुरक्षित भविष्य देत। भीत खसल, छप्पर उड़ल, देहरी ठाढ़े रहल, पुरखा-पएरक चिन्ह ओहि धूरामे जगमगल। ओही धूरिक टीका लगा नींवक ईंटा जोड़ू, टूटल-जुड़लक संगमसँ नब बिहान गढ़ू। धूलि हे देहरीक, माथ पर धरू हे, टूटलो घरक आशीषसँ नब घर भरू हे। ❖ अध्याय ३६ अध्यायारम्भ लोकगीत : तीन कंकड़—घर, साहस, सपना लोकधुन : बाल-झूमर खनकाबू हो नेना, जेबीक कंकड़ खनकाबू हो, घर, साहस, सपना—तीनू नाम रटाबू हो। जेबीमे तीन कंकड़, नेना नाम धरै, एक घरक, एक साहसक, एक सपना भरै। डर लगए तँ साहस पकड़ू, दूर हो तँ घर, थाकि जाउ तँ सपना कहत—आगाँ बाट अमर। नान्हि कंकड़ खेल नहि, स्मृतिक चिन्ह महान, बच्चाक सरल उपायसँ मन पाबै पहिचान। तीन कंकड़ तीन बात, जेबीमे उजियार, घर, साहस आ सपना संग कियो नहि लाचार। पहिल कंकड़ बाजए—घर कतबो दूर, लगे, दोसर कहए—डेग बढ़ाउ, डर पाछाँ भगे। तेसर सपना गुनगुनाए—बाट एखन बाँकी, तीनू संग खनकिते मोन नहि रहए एकाकी। खनकाबू हो नेना, जेबीक कंकड़ खनकाबू हो, घर, साहस, सपना—तीनू नाम रटाबू हो। ❖ अध्याय ३७ अध्यायारम्भ लोकगीत : जड़ि पढ़ि भविष्य लोकधुन : धान-रोपनी गीत रोपू गे रोपनिहारि, प्रश्नक बीया रोपू गे, पातक नहि, जड़िक खोज—गहींर हाथ बोरू गे। गाछक पात नहि मात्र, जड़ि पढ़ू जमीन, अपराधक अण्डा छोट, पाछाँ जाल महीन। जड़ि धरि प्रश्न पहुँचत तँ रोग सही चिन्हात, ऊपरी पात काटलासँ फेर उगत उत्पात। धान रोपनी जकाँ कारण पाँति-पाँति देखू, मूल सुधार, शिक्षा, नियम संग समाधान लेखू। जड़ि पढ़ि भविष्य गढ़ू, लक्षण मात्र नहि, गहींर समझक खेतीसँ समस्या अटल नहि। ऊपर-ऊपर घास छँटने खेत नहि निर्मल, जड़ि धरि जे हाथ पहुँचल, सएह पओलक फल। पाँति-पाँति कारण रोपू, कियारी-कियारी जाँच, मूलक शुद्ध रोपनीसँ उगत समाधान साँच। रोपू गे रोपनिहारि, प्रश्नक बीया रोपू गे, पातक नहि, जड़िक खोज—गहींर हाथ बोरू गे। ❖ अध्याय ३८ अध्यायारम्भ लोकगीत : नाम सही, मान सही लोकधुन : नाम-पाठ मंगल पढ़ू हे शुद्ध, नामक आखर पढ़ू हे, एक-एक मात्रा मे ककरो प्राण गढ़ू हे। लिखल नाम देहक खोल, पढ़ल नामक प्राण, उच्चारण सही करिते बढ़ै मनुखक मान। वर्तनी पूछि लिखू, परिचय अपने कहय, छोट सुधारसँ ककरो पूरा अस्तित्व रहय। नाम सही पढ़ू विद्यालय, दफ्तर, मंच सभ ठाम, सम्मानक पहिल सीढ़ी अछि सही उच्चारल नाम। नाम सही, मान सही—ई सरल लोक-विधान, एक अक्षरक सावधानी बचाबै पहिचान। पूछि कऽ लिखू वर्तनी, अपने बाजए परिचय, शुद्ध पुकार सुनिते चेहरा पर उगए विजय। विद्यालय-दफ्तर-मंच, सभ ठाम इहए रीति, एक आखरक आदरसँ जुड़ए जनम भरिक प्रीति। पढ़ू हे शुद्ध, नामक आखर पढ़ू हे, एक-एक मात्रा मे ककरो प्राण गढ़ू हे। ❖ अध्याय ३९ अध्यायारम्भ लोकगीत : ओसक ‘आब’ लोकधुन : पराती जागू हे, ओसक आखर जागू हे, 'काल्हि' नहि, 'आबे' कहि पहिल डेग राखू हे। थिर पातपर ओस लिखलक—आब, एखन, यैह बेर, बीज बहुत दिन बाट जोहलक, खोलू जीवन-द्वार फेर। ‘काल्हि’क बहाना छोड़ि कऽ पहिल नान्हि काज करू, एक फोन, एक आवेदन, एक हाथ आइ धरू। ओस सुखि जाए पहिने संकल्प माटिमे बोऊ, आबक पगसँ भविष्यक लम्बा रस्ता जोऊ। ओसक ‘आब’ पराती गाबै—समय जागि गेल, थिर पातक भीतरक बीज धरती माँगि लेल। थिर पात पर सिहरल बून्द इशारा करए, बीया कतेक दिन सँ माटिक बाट हेरए। एक फोन, एक अरजी, एक हाथ बढ़ाउ, ओस सुखाए सँ पहिने संकल्प जमाउ। जागू हे, ओसक आखर जागू हे, 'काल्हि' नहि, 'आबे' कहि पहिल डेग राखू हे। ❖ अध्याय ४० अध्यायारम्भ लोकगीत : हथेली खोलत दरबाजा लोकधुन : ओस-गीत खोलू हे हथेली, मुट्ठी नहि, खोलू हे, भीजल रेखा-रेखा मे भरोस घोरू हे। भीजल हथेली दरबाजापर नेहक छाप धरै, ताला भीतरसँ सुनि कऽ धीरे-धीरे सरै। मुट्ठी नहि, खुलल हथेली भरोसक पहिचान, जे किछु अछि साफ देखाय—एहने साँचक दान। ओसक अक्षर हथेलीपर कहै—डेराउ नहि, खुलल हाथक आगाँ बन्द मन रहि पाउ नहि। हथेली खोलत दरबाजा, संगक घर बनत, विश्वासक नमीसँ सूखल सम्बन्ध फुलत। बन्द केबाड़ कान लगौने भीतर सँ सुनए, खुलल हाथक आहट पर सिटकिनी अपने सरए। जे देखाए साफ हथेली, से साँचक दानी, नेहक नमी सँ जुड़ि जाए सूखल जिनगानी। खोलू हे हथेली, मुट्ठी नहि, खोलू हे, भीजल रेखा-रेखा मे भरोस घोरू हे। ❖ अध्याय ४१ अध्यायारम्भ लोकगीत : नाव चलू नाम सहित लोकधुन : नाविक गीत खेबू हे खेबिया, नामो संगे खेबू हे, देह टा नहि, चिन्हारि पार—एतबा प्रण लेबू हे। किनारपर नाव तैयार, नामक पतवार धरू, धार जते तेज हो तइयो संगक साहस भरू। एक चप्पू स्मृतिक, दोसर प्रमाणक, बीचमे जीवित आशा, दिशा न्याय-स्थानक। नाव खाली देह नहि, पहिचानो पार लगाबै, हरेक यात्रीक पूरा नाम नदी आदरसँ गाबै। नाव चलू नाम सहित, कियो पाछाँ नहि रहय, साझा पतवारक बलसँ गहींर धारो सहय। एक चप्पू स्मृति मारए, दोसर प्रमाण, बिच्चे बैसल जीवित आशा गाबए गान। धार गरजए, नाव लचकए, डोरि नहि छूटए, साझा बलक खेवाइ गहींरो धार जीतए। खेबू हे खेबिया, नामो संगे खेबू हे, देह टा नहि, चिन्हारि पार—एतबा प्रण लेबू हे। ❖ अध्याय ४२ अध्यायारम्भ लोकगीत : भार बाँटू लोकधुन : श्रम-झूमर बाँटू हो भार, कन्हा-कन्हा बाँटू हो, झूमि-झूमि थाकल देहो तालमे साटू हो। कन्हापर बैसल भार आधा हो संग लगिते, एक हाथ पाछाँ आए, दोसर आगाँ बढ़िते। दुख, काज, जिम्मेदारी बाँटू बराबर, साझा श्रमसँ कठिन बाट होए सहजतर। झूमरक गोल घेरामे कियो बीच अकेल नहि, कन्हा-कन्हा मिलल रहत तँ भार पहाड़ नहि। भार बाँटू, गीत गाउ, पगक लय मिलाउ, एक-दोसरक थकानकेँ नेहक जल पियाउ। आगाँ बला डेग उठाबए, पाछाँ बला गाबए, बीचक कियो लड़खड़ाए, दुनू दिस सँ थामए। दुख आधा, हिम्मत दूनी—इहए झूमरक लेखा, संगक पसेना मे चमकए इन्द्रधनुषक रेखा। बाँटू हो भार, कन्हा-कन्हा बाँटू हो, झूमि-झूमि थाकल देहो तालमे साटू हो। ❖ अध्याय ४३ अध्यायारम्भ लोकगीत : घर-घर हलुक कन्हा लोकधुन : बटगबनी चलू यौ पड़ोसिया, देहरी-देहरी चलू यौ, एक घरक भार सभ घर मिलि कऽ धरू यौ। भार घर-घर चलल तइयो संगमे राहत जाए, एक देहरी दू हाथ देत, दोसर भोजन लाए। कियो कागच पढ़ि देत, कियो बच्चा सम्हारै, कियो अदालत संग जाए, कियो खेत उबारै। घर-घर हलुक कन्हा हो सामुदायिक नेहसँ, बोझक बाट बदलि जाए सहयोगक गेहसँ। बटगबनी गाबि कहू—हम सभक घर एक, बाँटल भारमे उगि उठै समाजक सच्चा टेक। आइ हुनकर आँगन, काल्हि अपनो बेर, सहयोगक बाटे घटए दुखक अन्हार-घेर। कियो पोथी, कियो रोटी, कियो कन्हाक ठाम, बटगबनीक तालमे बाजए—सभ घर एक्के गाम। चलू यौ पड़ोसिया, देहरी-देहरी चलू यौ, एक घरक भार सभ घर मिलि कऽ धरू यौ। ❖ अध्याय ४४ अध्यायारम्भ लोकगीत : पोतीक प्रश्नक फूल लोकधुन : दादी-पोती गीत पूछ गे पोती, जे मन मे से पूछ गे, दादीक कथा-कोठी सँ उत्तर-मोती बीछ गे। पोती पूछलक—‘ककर डर?’ दादी फूल मुस्केलक, ‘जे साँचक नाम सुनै, ओकर भय पिघेलक।’ प्रश्नकेँ रोको नहि, कापीपर रंग भरू, पुरान पीड़ा सरल कथा बनि अगिला पीढ़ी धरू। पोतीक प्रश्न काँटा नहि, ज्ञानक नान्हि फूल, ओहि सुगन्धिसँ खुलि सकै इतिहासक बन्द मूल। दादी-पोती संग गाउ, उत्तर खोजू नेह, प्रश्नशील नेनाक हाथमे भविष्यक उज्जर गेह। साँझक दीप तर बैसल दू पीढ़ीक जोड़ी, प्रश्न-उत्तरक ताना-बाना, बुनाइत नेह-डोरी। पुरान पीड़ो कथा बनल तँ काँट नहि गड़ए, निर्भय पूछल प्रश्न सँ भविष्यक द्वार खुजए। पूछ गे पोती, जे मन मे से पूछ गे, दादीक कथा-कोठी सँ उत्तर-मोती बीछ गे। ❖ अध्याय ४५ अध्यायारम्भ लोकगीत : बन्द घर खुलल लोकधुन : आँगन-पराती खोलू हे केबाड़, भीतरे सँ खोलू हे, बासि हवा बहराए, नब धूप घोलू हे। दुआर भीतरसँ खुलल, पुरान हवा बहार, धूप पसरल कोठरीमे, चमकल घर-दुआर। जाला झाड़ू, खिड़की खोलू, स्मृति व्यवस्थित राखू, जे दुख नुकायल छल, ओकरा सुरक्षित बातक साखू। बन्द घर दोषी नहि, ओकरा संग चाही, हँसी, पग, गीत, संवाद—जीवनक थाती। घर खुलल तँ मन खुलल, छाह पाछाँ हटत, आँगनक नूतन उजाससँ सम्बन्ध फेर गढ़त। जाला झाड़ू, ताखा पोछू, आँगन नीपि लिअ, नुकाएल दुखकेँ सुरक्षित बातक ठाम दिअ। बन्द घर अपराधी नहि, ओकरो संग चाही, हँसी-गीत-पएरक आहट—घरक असल थाती। खोलू हे केबाड़, भीतरे सँ खोलू हे, बासि हवा बहराए, नब धूप घोलू हे। ❖ अध्याय ४६ अध्यायारम्भ लोकगीत : श्वासक मूल्य जीवन लोकधुन : उत्तराधिकार-मंगल गाबू हे मंगल, साँसक मंगल गाबू हे, लाभक पहिने जीवन—ई पाठ पढ़ाबू हे। लाभ नहि, श्वास पहिने—एहि नियमपर चलू, धनक मीनार बादमे, जीवनक दीप बलू। काज, दवा, व्यापार सभ मानव हित सँ जुड़य, एक श्वास बचल तखनहि असल लाभ उगय। सन्तानकेँ धनसँ बेसी ईमानक उत्तराधिकार, जकर काज जीवन बचाबै, ओकर नाम अपार। श्वासक मूल्य जीवन थीक, बजार नहि नापै, करुणा संग कमायल धन सुखक फूल छापै। धनक मीनार ऊँच रहौ, नींव दया पर हो, बही-खाता मे सभसँ ऊपर साँसक आखर हो। बेटा-बेटीकेँ सौंपू ईमानक पूँजी, जीवन-रक्षक काजक शोभा जुग-जुग गूँजी। गाबू हे मंगल, साँसक मंगल गाबू हे, लाभक पहिने जीवन—ई पाठ पढ़ाबू हे। ❖ अध्याय ४७ अध्यायारम्भ लोकगीत : गज-ग्राहक बुद्धि लोकधुन : लोक-आख्यान मंगल सुनू हे आख्यान, गज-ग्राहक सुनू हे, बलसँ पैघ बुद्धि-संग—ई गिरह गुनू हे। गजक पएर जलमे अटकल, साथी स्वर उठाबै, ग्राहक दाँत जते कठोर, बुद्धि बाट बनाबै। बल अकेल पर्याप्त नहि, समय, संग, उपाय, संकटमे विवेकक दीप मुक्ति राह देखाय। गज कहै—अहं छोड़ू, मदति माँगब मान, नदी कहै—संगक शक्ति सभसँ पैघ प्राण। गज-ग्राहक कथा सँ सीखू, जालक चाल बुझू, धैर्य, ज्ञान, सहयोगसँ विजयक कमल चुनू। जल गहींर, दाँत कठोर, तइयो बाट बचल, एक पुकार पर कातर क्षण मे सहाय पहुँचल। अहं त्यागि मदति माँगब सेहो वीरक काज, धैर्य-विवेक-संगक त्रिबल सँ जितए समाज। सुनू हे आख्यान, गज-ग्राहक सुनू हे, बलसँ पैघ बुद्धि-संग—ई गिरह गुनू हे। ❖ अध्याय ४८ अध्यायारम्भ लोकगीत : पुकार लेल कान लोकधुन : करुण पुकारक आशा-लय दिअ हे कान, पुकारकेँ कान दिअ हे, उत्तरसँ पहिने पूरा-पूरा मान दिअ हे। जनम भरि जे पुकारल, ओकरा कान दिअ, बीचमे उत्तर नहि, पहिने पूरा मान दिअ। सुनबाक समय सेवा, सुनबाक धैर्य दान, एक ध्यानसँ बचि सकै कतेको टूटल प्राण। गाममे ‘सुनबाक घर’ बनाउ, खुलल रहय द्वार, कियो रोअय, कियो कहय, भेटय सहारा अपार। पुकार लेल कान जागल तँ मौन नहि मरत, सुनल स्वरक आदरसँ न्याय धीरे उतर। आधा सुनल बात सँ आधे घाव भरए, धीरज धऽ कऽ सुनल स्वर भीतर धरि उतरए। गाम-गाम 'सुनबाक घर', खुलल रहए ओसारा, रुसल-कानल सभकेँ भेटए बैसारक सहारा। दिअ हे कान, पुकारकेँ कान दिअ हे, उत्तरसँ पहिने पूरा-पूरा मान दिअ हे। ❖ अध्याय ४९ अध्यायारम्भ लोकगीत : सुनल बातक बही लोकधुन : मौन-बही गीत लिखू हे मन-बही, अनुमतिक मसि सँ लिखू हे, सुनल कथाक मोती गरिमाक डिब्बा मे राखू हे। कानमे लिखल बही कागचसँ गहींर, सुनल बातक जिम्मेदारी हृदय करै गंभीर। नाम, दिन, संदर्भ सहेजू, अनुमति संग लिखू, ककर कथा कतेक खोलब—गरिमाक सीमा बुझू। सुनल बात उधार सही, सेवा सँ चुकाउ, विश्वासक कापी स्वच्छ राखि उचित ठाम पहुँचाउ। कानक बही जखन ईमानक हाथमे रहत, अनसुना जनक इतिहास सुरक्षित रूप गढ़त। नाम-दिन-प्रसंग टाँकू, पन्ना साफ-सुथर, ककर बात कतऽ खुजत—पूछि कऽ करू उजागर। सुनल उधार सेवा सँ धीरे-धीरे सधाउ, विश्वासक ई बही जनम भरि निर्मल चलाउ। लिखू हे मन-बही, अनुमतिक मसि सँ लिखू हे, सुनल कथाक मोती गरिमाक डिब्बा मे राखू हे। ❖ अध्याय ५० अध्यायारम्भ लोकगीत : जड़ि नाम सम्हारै लोकधुन : समदाउनक हरियर रूप सम्हारू हे जड़ि, नामक जड़ि सम्हारू हे, देह दूर गेलो पर अक्षर नहि बिसारू हे। देह दूर गेल तइयो जड़ि नाम सम्हारै, माटि भीतर अक्षरकेँ ओसक दूध पियारै। पुरखाक वृक्ष लगाउ, पट्टपर पूरा नाम, छाहमे नेना सीखत श्रम, साहस, सम्मान। जड़ि कहै—स्मृति स्थिर, पात नित्य नब, जीवन रूप बदलै, प्रेम रहै अजब। जड़ि नाम सम्हारै जखन वन बनत परिवार, देहक पारो टिकि रहत मानक उज्जर धार। पुरखा-पट्ट पर पूरा नाम, तर मे रोपू गाछ, छाहमे बैसत पीढ़ी, सीखत श्रमक साँच। पात झड़ए, ऋतु बदलए, जड़ि अटल रहए, समदाउनक करुण सुरो हरियर आशा कहए। सम्हारू हे जड़ि, नामक जड़ि सम्हारू हे, देह दूर गेलो पर अक्षर नहि बिसारू हे। ❖ अध्याय ५१ अध्यायारम्भ लोकगीत : साक्षीकेँ संग लोकधुन : प्रायश्चित्त-मंगल थामू हे साक्षीक हाथ, दुनू हाथ थामू हे, भारी छातीक बोझ आधा-आधा बाँटू हे। साक्षीक छाती भारी हो तँ संगक कन्हा दिअ, सुरक्षित घर, कान, सलाह, विश्रामक ठाम दिअ। साँच कहनिहार वीर सही, मनुख सेहो होए, ओकर डर, थकान, परिवारक मान संजोए। गवाहीक भार बाँटि कऽ संस्था जिम्मा लेत, एकाकी साहस नहि, सामूहिक रक्षा देत। साक्षीकेँ संग भेटल तँ सत्य दृढ़ रहत, भारी छाती हलुक भऽ न्याय-दिशा कहत। साँच कहब सहज नहि, राति नीन नहि आबए, संगक दीप जरल रहए तँ डर नहि सताबए। घर, सलाह, विश्रामक जिम्मा समाज उठाबए, एकसरुआ वीरता नहि, साझा रक्षा भाबए। थामू हे साक्षीक हाथ, दुनू हाथ थामू हे, भारी छातीक बोझ आधा-आधा बाँटू हे। ❖ अध्याय ५२ अध्यायारम्भ लोकगीत : चौपाल अगिला स्वर लोकधुन : सामूहिक नाम-गीत बैसू हे चौपाल, गोल-गोल बैसू हे, अपन स्वर पूरा भेला पर अगिला लेल ससरू हे। कटल गाछिक ठाम चौपाल नव उगि आए, एक स्वर पूरा भेल कि अगिला आसन पाए। कियो पहिने, कियो पाछाँ—सभकेँ बराबर बेर, लोकक कथा नदी समान चलै घेर-घेर। अगिला आवाज लेल खाली जगह बचाउ, अपन जीतक शोरसँ दोसर स्वर नहि दबाउ। चौपाल अगिला स्वरकेँ स्वागत फूल धरत, सुनवाईक निरन्तर धारा समाज पूर्ण करत। कटल गाछक ठामे उगल बैसारक बसेरा, एक-एक कऽ सभक कथा, ने धक्का ने घेरा। जीतक शोर धीमा राखू, हारल स्वर उठाउ, नदी जकाँ अनवरत सुनवाइक धार बहाउ। बैसू हे चौपाल, गोल-गोल बैसू हे, अपन स्वर पूरा भेला पर अगिला लेल ससरू हे। ❖ अध्याय ५३ अध्यायारम्भ लोकगीत : ठूँठक भोर लोकधुन : पराती जागू हे ठूँठ, भोरक सोना ओढ़ू हे, कटल डारिक ठामो नब कोंपल जोड़ू हे। गाछ कटल तइयो सूर्यक बाट नहि रुकल, ठूँठक ओसपर भोरक पहिल सोना झुकल। जड़ि भीतर जीवन जागल, कोंपल संकेत देत, विनाशक पाछाँ पुनर्निर्माणक दिन भेटत। ठूँठक चारू कात माटि नरम-नरम करू, बीज, पानि, पहरा दऽ नव गाछी फेर भरू। ठूँठक भोर कहै—आशा जड़ि धरि जाए, कटल इतिहाससँ नब भविष्य फूटि आए। रातिक ओस जड़ि धरि रिसल, माटि भेल नरम, पहिल किरिण छूबिते जागल भीतरक मरम। चारू कात बीज-पानि-पहराक तैयारी, कटल इतिहासक छाती पर उगत फुलवारी। जागू हे ठूँठ, भोरक सोना ओढ़ू हे, कटल डारिक ठामो नब कोंपल जोड़ू हे। ❖ अध्याय ५४ अध्यायारम्भ लोकगीत : जड़िक घेरा लोकधुन : चौपाल-मंगल बनाउ हे घेरा, जड़िक चारू कात बनाउ हे, ठूँठ केन्द्र, लोक परिधि—नब गाछी उगाउ हे। डारि नहि बचल तइयो जड़िक घेरा बनाउ, लोक गोल बैसि स्मृति, योजना, गीत सुनाउ। ठूँठ केन्द्र, जन चारू कात—नब गाछी निर्णय, कियो पानि, कियो बीज, कियो पहरा दए निश्चय। घेरा रक्षा मात्र नहि, साझा कर्मक थान, जड़िक संग जुड़ल रहत माटि, जल आ प्राण। जड़िक घेरा मजबूत हो तँ वन घुरि आए, सामुदायिक नेहसँ सूखल धरती हरियराए। कियो कोदारि, कियो घैला, कियो गीतक थारी, साझा कर्मक अरिपन सँ सजल माटि सारी। घेरा टूटए नहि, हाथ सँ हाथ बान्हल, सूखल भूमियो हरियराए, नेह जँ सान्हल। बनाउ हे घेरा, जड़िक चारू कात बनाउ हे, ठूँठ केन्द्र, लोक परिधि—नब गाछी उगाउ हे। ❖ अध्याय ५५ अध्यायारम्भ लोकगीत : पीयर कागचक पाँखि लोकधुन : चेतावनी-बटगबनी उड़ू हे पीयर पाती, पाँखि बनि उड़ू हे, कैंची नहि, चेतौनी बनि घर-घर जुड़ू हे। पीयर कागच कैंची नहि, पाँखि बनि उड़ू, कटबाक आदेश छोड़ि सत्यक समाचार जुड़ू। रंग पीयर सरिसोंक, ज्ञानक उज्जर फूल, कागच जनकेँ चेताबै, नहि काटै घर-मूल। हरेक सूचना सरल लिखू, अधिकारक राह बताउ, भयक भाषा हटाकऽ सहायता संग पहुँचाउ। पीयर कागचक पाँखि आशाक पत्र बनत, जन-जागरूकता उड़ा कऽ सुरक्षित गाम गढ़त। सरिसों-रंग कागच पर सरल आखर साजू, भयक बोली काटि कऽ अधिकारक राह बाजू। संग मे सहायताक ठेकाना, फोन, ठाम, चेतल गाम बचल गाम—इहए पातीक काम। उड़ू हे पीयर पाती, पाँखि बनि उड़ू हे, कैंची नहि, चेतौनी बनि घर-घर जुड़ू हे। ❖ अध्याय ५६ अध्यायारम्भ लोकगीत : स्मृतिभूमि लोकधुन : माटि-गीत पढ़ू हे माटि, नापब सँ पहिने पढ़ू हे, 'खाली' लिखल भूमियो मे नाम-कथा धरू हे। ‘खाली भूखण्ड’ लिखल जगह नामसँ भरल, ककरो खेल, ककरो घर, ककरो सपना पलल। माटि नापू तखन पहिने स्मृतिक नक्शा पढ़ू, कब्र, गाछ, पगडंडी, जल-स्रोतक मान गढ़ू। विकास जँ आए तँ लोकसँ सहमति लए, स्मृतिभूमिक सम्मानसँ नव निर्माण करे। खाली नहि कोनो धरती, हरेक कण इतिहास, माटिक मान राखिते विकास पाबै विश्वास। एतऽ ककरो गुड्डी उड़ल, ओतऽ चूल्हिक राख, पगडण्डी-कब्र-गाछक अपन-अपन साख। विकासक गाड़ी रुकि कऽ पहिने सहमति लिअ, स्मृतिभूमिकेँ प्रणाम कऽ तब नींव धरि दिअ। पढ़ू हे माटि, नापब सँ पहिने पढ़ू हे, 'खाली' लिखल भूमियो मे नाम-कथा धरू हे। ❖ अध्याय ५७ अध्यायारम्भ लोकगीत : प्रश्नक खेत लोकधुन : प्रश्न-भगैत जोतू हे प्रश्नक हर, गहींर-गहींर जोतू हे, गंगेशक खेत मे प्रमाणक बीया बोतू हे। गंगेशक प्रश्न हल जकाँ माटि गहींर जोतै, प्रमाणक बीज रोपि कऽ ज्ञानक धान बोतै। प्रमेय पाबय खेत जखन तर्कक पानि पाए, सन्देहक खरपतवार विवेक धीरे हटाए। प्रश्नक खेत खुलल रहय विद्यार्थी सभ लेल, उत्तर बदलि सकै, मुदा ईमान रहय मेल। गंगेशक प्रश्नसँ ज्ञानक फसल भरपूर, जिज्ञासु मन मिथिलाक भविष्य करै नूर। तर्कक पानि पटाउ, सन्देह-घास उखाड़ू, प्रमेयक बालि झूमए, विवेकसँ रखबारू। उत्तर बदलए ऋतु जकाँ, निष्ठा एक समान, जिज्ञासाक अन्न सँ भरत मिथिलाक खरिहान। जोतू हे प्रश्नक हर, गहींर-गहींर जोतू हे, गंगेशक खेत मे प्रमाणक बीया बोतू हे। ❖ अध्याय ५८ अध्यायारम्भ लोकगीत : शोकक सेवा निधि लोकधुन : करुणा-झूमर बाँटू हे करुणा, हिसाबो साफ राखू हे, फूल-दीपसँ आगाँ बढ़ि जीवन-पथ साजू हे। फूल-दिया स्क्रीनपर, संगमे साफ हिसाब, शोकक सेवा निधिसँ परिवार पाबय जवाब। किस्त नहि संवेदना, नियमित सहायता हो, शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका स्थायी व्यवस्था हो। दानक कोड पारदर्शी, लाभार्थीक मान, दुखक नामपर व्यवसाय नहि, करुणाक अभियान। शोकक सेवा निधि जखन जीवनकेँ उठाबै, स्मृति फूलसँ आगाँ बढ़ि भविष्य राह बनाबै। शोकक नाम पर दोकान नहि, सेवाक चौपालि, पाइ-पाइ क लेखा खुलल, जन देखए निहालि। पढ़ाइ, दवाइ, रोजगार—तीनू खम्भा गाड़ू, स्मृतिक दीप सँ आगिला पीढ़ीक बाट उजारू। बाँटू हे करुणा, हिसाबो साफ राखू हे, फूल-दीपसँ आगाँ बढ़ि जीवन-पथ साजू हे। ❖ अध्याय ५९ अध्यायारम्भ लोकगीत : मेटल कोड, बचल साँच लोकधुन : गुप्त-सन्देश जागरण जोगाउ हे भाप, काँच परक भाप जोगाउ हे, मेटलो आखरक छाया सँ बाट पाउ हे। सन्देश मेटल तइयो भाप काँचपर रहै, नान्हि कोड पढ़िते पूरा रास्ता कहै। डिजिटल राख सहेजि कऽ विशेषज्ञ संग जाँचू, जल्दी निष्कर्ष नहि, प्रमाणक धागा बाँधू। मेटल कोड हार नहि, खोजक पहिल द्वार, सुरक्षित प्रति, समयक छाप बनत सच्चा आधार। बचल साँचक चिन्हसँ जालक नक्शा खुलत, धैर्यक दीप हाथमे हो तँ अन्हारो गलित। हड़बड़ी मे निष्कर्ष नहि, धागा-धागा जोड़ू, समयक छाप, सुरक्षित प्रति—प्रमाण दिस मोड़ू। जानकार संग बैसि कऽ कोडक गिरह खोलू, धैर्यक दीप बारि अन्हार जालक भेद तौलू। जोगाउ हे भाप, काँच परक भाप जोगाउ हे, मेटलो आखरक छाया सँ बाट पाउ हे। ❖ अध्याय ६० अध्यायारम्भ लोकगीत : मौनसँ वचन लोकधुन : मौन-पराती पकाउ हे मौन, भीतर वचन पकाउ हे, सही घड़ी पर स्पष्ट बोल जग बीच लाबू हे। दोसर मौन पहिलसँ भिन्न—एहि बेर सोचक थान, धर्मक कपड़ा हटि रहल, खुलि रहल असल जान। मौन भीतर प्रश्न पकै, उत्तर रूप धरै, सही क्षणमे स्पष्ट वचन जनक संग उतरै। चुप्पी छलक ढाल नहि, आत्मावलोकन हो, भोरक बाद काजमे बदलल ईमानक प्रण हो। मौनसँ वचन, वचनसँ कर्म—एहि क्रममे चलू, भीतरक सत्य बाहिर लऽ समाजक दीप बलू। चुप्पी ढाल नहि बनए, बनए सोचक ओसारा, भीतर-भीतर प्रश्न घुरए, ताकए नब किनारा। भोर होइते मौन उठए, कर्मक धोती फेंटए, ईमानक हर जोति कऽ समाजक खेत सेंतए। पकाउ हे मौन, भीतर वचन पकाउ हे, सही घड़ी पर स्पष्ट बोल जग बीच लाबू हे। ❖ अध्याय ६१ अध्यायारम्भ लोकगीत : नामक शान्त उत्सव लोकधुन : नाम-उत्सव गीत मनाउ हे उत्सव, नगाड़ा बिनु मनाउ हे, एक दीप, एक फूल, एक नाम—एतबे सजाउ हे। न नगाड़ा, न पताका, नामक दीप पर्याप्त, शान्त स्वरमे पढ़ल गेल तँ स्मृति होए सुरक्षित। हरेक नामक संग एक फूल, एक कथा, एक मान, उत्सव ओ नहि जे ढाँकय, जे खोलय पहिचान। गामक नेना, बूढ़, बहिन सभ घेरा बनाउ, जयकार नहि, आदरसँ जीवन-गीत सुनाउ। नामक शान्त उत्सवमे आत्मा पाबै ठौर, स्मरणक सरल उजास रहत युग-युग भोर। ने जयकारक हुड़दंग, ने पताकाक शोर, धीमे स्वरे पढ़ल नाम—सएह असल भोर। नेना-बूढ़-बहिनक घेरा, बीच कथाक थारी, शान्त उजासक पाबनि होए युग-युग जारी। मनाउ हे उत्सव, नगाड़ा बिनु मनाउ हे, एक दीप, एक फूल, एक नाम—एतबे सजाउ हे। ❖ अध्याय ६२ अध्यायारम्भ लोकगीत : हरियर बिन्दुक सोहर लोकधुन : सोहर ललना रे, हरियर बिन्दुक सोहर हे, सिरायल तेलक बातियो मे जीवनक लहर हे। तेल सिरा गेल तइयो बाती नान्हि जरै, कारी रातिक कागचपर हरियर बिन्दु उगै। ओ बिन्दु नव जन्मक, आशाक पहिल नैन, एक कोंपल कहि रहल—फेर हरियर होएत धेन। सोहर गाउ धीमे-धीमे, जीवन घुरि रहल, ठूँठक हृदय भीतर नव रस भरि रहल। हरियर बिन्दुक जन्मसँ भविष्य पाबै नाम, नान्हि उजास एक दिन बनत विशाल धाम। कारी राति कागच जकाँ, बीच उगल तारा, ठूँठक छाती धड़कल—भेटल नब सहारा। धीमे-धीमे गाबू, कोंपल नीन ने टूटए, एक बिन्दुक भरोसे भोरक धार फूटए। ललना रे, हरियर बिन्दुक सोहर हे, सिरायल तेलक बातियो मे जीवनक लहर हे। ❖ अध्याय ६३ अध्यायारम्भ लोकगीत : उजासक रखवारी लोकधुन : झिझिया-जागरण नाचू गे झिझिया, माथ पर दीप नाचू गे, छेद-छेद जाँचि कऽ उजासक पहरा राखू गे। दीप जरै तँ केवल देखू नहि, रखवारी करू, उजासक भीतर लोभ न पैसय, सावधानी धरू। पारदर्शी काँच, खुलल हिसाब, साझा पहरा हो, प्रकाशक नामपर अन्हारक व्यापार नहि हो। झिझिया घुमि-घुमि कहै—छिद्र सभ जाँचू, दीपक तेल ककर श्रम, ई प्रश्नो चिन्हू। उजासक रखवारीसँ प्रकाश पवित्र रहत, लोभक छाह पाछाँ हटत, जन भरोस बढ़त। घैला-छेद सँ झरए इजोत, गनइत चलू बाट, तेल ककर पसेनाक—पूछू इहो ठाठ। पारदर्शी काँच, खुलल बही, साझा आँखि-पहरा, लोभक कारी हाथ ने छूबए दीपक चेहरा। नाचू गे झिझिया, माथ पर दीप नाचू गे, छेद-छेद जाँचि कऽ उजासक पहरा राखू गे। ❖ अध्याय ६४ अध्यायारम्भ लोकगीत : शोकसँ सेवा लोकधुन : करुणा-मंगल गीत बढ़ाउ हे हाथ, शोकक घर मे बढ़ाउ हे, फूलक संग अन्न-वस्त्र-न्याय पहुँचाउ हे। शोकक नामपर ठेका नहि, सेवा हाथ बढ़ाउ, फूलक संग सहायता, न्याय, उपचार पहुँचाउ। रोदनकेँ विज्ञापन नहि, मौनक मान दिअ, परिवारक जरूरत पूछि ठोस सहारा दिअ। स्मृति भवन तखने पवित्र जखन लोक लाभ पाए, शोकसँ सेवा जन्मि कऽ जीवित जीवन बचाए। करुणा काज बनत जखन श्रद्धा साँच रहत, दुखक धरतीपर आशाक घर धीरे-धीरे बनत। रोदन बिकाए नहि बजारमे, मौनक मान रहए, परिवारक जरूरति पूछि ठोस सहारा बहए। स्मृति-भवनक ईंटा-ईंटा तखने पावन बनत, जखन दुखक धरती पर सेवाक अन्न फड़त। बढ़ाउ हे हाथ, शोकक घर मे बढ़ाउ हे, फूलक संग अन्न-वस्त्र-न्याय पहुँचाउ हे। ❖ अध्याय ६५ अध्यायारम्भ लोकगीत : पुरान पुलपर नव पग लोकधुन : नदी-बटगबनी धरू हे नव पग, पुरान पुल पर धरू हे, पसेना-गाद-इतिहासकेँ माथ नवाबि चलू हे। पुरान पुलक गन्धमे पसीना, गाद, इतिहास, ओहि पर नव पग धरू, सहेजि कऽ विश्वास। दरार जाँचू, पाया मजबूत, नामक पट्ट लगाउ, जे बनौलक ओकर श्रमकेँ आदरसँ बताउ। पुरान पुल बोझ नहि, सीखक खुलल किताब, गलती सँ सुधार करब, ई भविष्यक जवाब। नव पग चलत सुरक्षित, पुरखा देत आशीष, नदी पार करैत समाज सीखत न्यायक रीति। पाया-पाया जाँचि लिअ, दरार पर नजरि, बनौनिहार श्रमिकक नाम टाँगू पुल-उपरि। पुरान भूल पोथी बनए, नब पीढ़ी बाँचए, सुरक्षित डेगक तालमे नदीक मन नाचए। धरू हे नव पग, पुरान पुल पर धरू हे, पसेना-गाद-इतिहासकेँ माथ नवाबि चलू हे। ❖ अध्याय ६६ अध्यायारम्भ लोकगीत : लेंस साफ, दृष्टि मानवीय लोकधुन : दृष्टि-गीत पोछू हे लेंस, पहिने मोनक लेंस पोछू हे, देखबा सँ पहिने मानुखक मोन जोहू हे। लेंस साफ करू पहिने, फेर मानुखकेँ देखू, चेहरा वस्तु नहि, अनुमति लऽ कथा लेखू। आँखि नापय नहि गरिमा, आँखि सम्मान करै, चित्र जँ जनक हो तँ जनक सहमति धरै। दृष्टि तकनीकसँ पैघ, हृदयक नेहसँ साफ, लेंसक भीतर गोहि नहि, करुणाक खुलल छाप। देखबासँ पहिने पूछू, देखलापर मान दिअ, मानवीय दृष्टि सँ कला आ ज्ञानकेँ प्राण दिअ। आँखि तराजू नहि थिकए, आँखि थिकए दीया, अनुमति-बिनु उतारल चित्र—अधलाह किरिया। चेहरा वस्तु नहि, कथा छी, आदर सँ सुनू, करुणाक फोकस साधि कऽ जीवन-छवि बुनू। पोछू हे लेंस, पहिने मोनक लेंस पोछू हे, देखबा सँ पहिने मानुखक मोन जोहू हे। ❖ अध्याय ६७ अध्यायारम्भ लोकगीत : अनुमति पहिने लोकधुन : स्त्री-संवाद गीत पूछू हे पहिने, 'हम तैयार छी?'—पूछू हे, 'हँ'क मान, 'नहि'क मान—दुनू सीखि बूझू हे। हमरा देखबा सँ पहिने पूछू—हम तैयार छी? हमर देह, हमर कथा, हमर निर्णय हमर छी। ‘हँ’क मान, ‘नहि’क मान, मौनकेँ सेहो सुनू, विश्वासक घेरा भीतर सहमतिक फूल चुनू। चित्र, स्वर, स्पर्श, लेख—सभमे अनुमति चाही, सम्मानक ई सरल नियम मानवताक थाती। अनुमति पहिने, काज पाछाँ—एहि लयमे चलू, स्वतन्त्र मनक बगियामे सम्बन्धक फूल फुलू। हमर देह, हमर कथा, हमरे हाथ चाबी, मौनो केर भाषा सुनू, ई सम्बन्धक खूबी। चित्र-स्वर-स्पर्श-लेख, सभठाँ इहए रीति, सहमतिक फुलवारी मे फुलाए असल प्रीति। पूछू हे पहिने, 'हम तैयार छी?'—पूछू हे, 'हँ'क मान, 'नहि'क मान—दुनू सीखि बूझू हे। ❖ अध्याय ६८ अध्यायारम्भ लोकगीत : बटनसँ पहिने विवेक लोकधुन : चेतावनी-बाल गीत रुकू हो नेना, बटन सँ पहिने रुकू हो, एक साँस, एक प्रश्न—तखने आगाँ झुकू हो। बटन दबाबै हाथ तखन पहिने मोन टटोलू, ककर नाम, ककर धन, ककर मान—साफ-साफ बोलू। एक क्लिकक चाल तेज, सोचक दीपो तेज, ठगीक बाट रोकि सकै सावधान सन्देश। माए-बाबू संग विचारू, अनजान लिंक नहि खोलू, लोभक मीठ बोलि सुनिते सत्यापनक ढोलू। बटनसँ पहिने विवेक—डिजिटल सुरक्षाक गान, सावधानीसँ बचत घरक श्रम, भरोस, सम्मान। चमकैत लिंकक पाछाँ मे काँटक जाल पसरल, 'फ्री-फ्री'क मीठ बोली मे ठगक दाँत निखरल। माए-बाबू सँ कहू, संगी सँ करू जाँच, सोचल-बूझल क्लिक टा राखत घरक साँच। रुकू हो नेना, बटन सँ पहिने रुकू हो, एक साँस, एक प्रश्न—तखने आगाँ झुकू हो। ❖ अध्याय ६९ अध्यायारम्भ लोकगीत : पानिमे नामक कमल लोकधुन : पनिघट-मंगल भरू गे बहिना, घैल संग नाम भरू गे, पनिघटक लहरि-लहरि मे कमल धरू गे। मिटल नाम पानिमे फेर कमल बनि उगै, धार जते बहै, जड़ि स्मृतिक भीतर रहै। पनिघटपर बहिनी सभ नामक गीत गाउ, बून्द-बून्द उच्चारणसँ चिन्हारि घुरि लाउ। पानि मेटै नहि साँच, केवल रूप बदलै, नामक कमल भोरमे सूरुज दिस खुलै। जलपर फूल, मनमे मान, घरमे दीप धरू, मेटायल जीवनकेँ स्मृतिक आसन भरू। डूबल-मेटल आखर पानिक तर मे पलल, भोरक पहिल किरिण पाबि फेर ऊपर खिलल। बून्द-बून्द उच्चारण, घाट-घाट सम्मान, जलक दर्पण मे चमकए बिसरल पहिचान। भरू गे बहिना, घैल संग नाम भरू गे, पनिघटक लहरि-लहरि मे कमल धरू गे। ❖ अध्याय ७० अध्यायारम्भ लोकगीत : झोँटासँ मुक्त नाम लोकधुन : पोखरि-गीत छोड़ाबू गे सखी, ओझरायल नाम छोड़ाबू गे, नेहक तेल, धीरक कंघी—दुनू संग लगाबू गे। पनिडुब्बीक झोँटामे जे नाम ओझरायल, सखी सभ कंघी लऽ कऽ धीरे-धीरे छुड़ायल। एक गाँठि भयक, एक लाजक, एक विस्मृत बात, नेहक तेल लगिते खुलि जाए सभ जटिल गाँठ। मुक्त नाम पोखरि ऊपर चान जकाँ चमकै, जकर कथा बन्हायल छल, स्वतन्त्र स्वर दमकै। झोँटासँ मुक्त नामकेँ पातपर घर दिअ, ओझरायल स्मृतिकेँ सम्मानक कंठ दिअ। एक गाँठ भयक बान्हल, एक लाजक कारी, धीरे-धीरे सोझरबैत खुजल गाँठ सारी। मुक्त भेल नाम पोखरि पर चान बनि हँसल, बन्हायल कथाक कण्ठ मे स्वतन्त्र सुर बसल। छोड़ाबू गे सखी, ओझरायल नाम छोड़ाबू गे, नेहक तेल, धीरक कंघी—दुनू संग लगाबू गे। ❖ अध्याय ७१ अध्यायारम्भ लोकगीत : असल भूत चिन्हू लोकधुन : लोक-व्यंग्य झूमर चिन्हू हो संगी, असल भूतकेँ चिन्हू हो, भाड़ाक नाचक पाछाँ के छै—ई गिनू हो। भाड़ाक भूत नाचि सकै, धुँआ खूब पसारै, असल भय तखने भागै जखन बुद्धि दीप जारै। भेस, अफवाह, नकली चमत्कारक चाल बुझू, प्रमाण, प्रश्न, हँसीक संग साँचक बाट चुनू। भूतसँ नहि, अज्ञानसँ समाज बेसी डेराइ, ज्ञानक ढोल बजिते नकली छाह भागि जाइ। असल भूत लोभ-छल, ओकर नाम पुकारू, व्यंग्यक उज्जर हँसीसँ डरक बाजार उतारू। धुँआ उड़ए, डम्फ बाजए, नकली भेस भारी, बुद्धिक दीप बरिते भागए छाया सारी। लोभ-छल-अफवाहे थिक असली भूतक नाम, हँसीक ढोल पीटि कऽ करू डरक बाजार निलाम। चिन्हू हो संगी, असल भूतकेँ चिन्हू हो, भाड़ाक नाचक पाछाँ के छै—ई गिनू हो। ❖ अध्याय ७२ अध्यायारम्भ लोकगीत : ठूँठक हँसीसँ कोंपल लोकधुन : हरियरनी गीत हरियर हे हरियर, ठूँठो हरियर हेतै हे, हँसैत जड़िक भरोसे कोंपल फेर भेटतै हे। ठूँठ हँसल भीतरसँ—जड़ि एखन जीवित, पहिल वर्षा पड़िते कोंपल होएत उपस्थित। खोखल कहि नहि छोड़ू, नमी ओकरा दिअ, कटल गाछक स्मृतिसँ नव वनकेँ प्राण दिअ। ठूँठक हँसी व्यंग्य नहि, धैर्यक मधुर बोल, विनाशक बादो जीवन खोजि लैत अछि ठौर। कोंपल फूटत, पात हिलत, चिड़िया घुरि आए, ठूँठक हँसीसँ पूरा गाछी फेर हरियराए। खोखल कहि जे छोड़ल, से आधा टा जानल, भीतर रसक धार बहए, ई ककरो ने मानल। नमी दिअ, पहरा दिअ, गीत गाबि सींचू, कटल गाछक छाती पर नव गाछीक चित्र खिंचू। हरियर हे हरियर, ठूँठो हरियर हेतै हे, हँसैत जड़िक भरोसे कोंपल फेर भेटतै हे। ❖ अध्याय ७३ अध्यायारम्भ लोकगीत : स्वप्न-दरबारमे न्याय लोकधुन : स्वप्न-भगैत लागू हे दरबार, स्वप्नक दरबार लागू हे, विधवा-नेना-मजदूरकेँ पहिल आसन साजू हे। स्वप्नमे दरबार लागल, सभकेँ आसन भेटल, विधवा, बच्चा, मजदूरक पूरा कथन सुनल। न्यायाधीश विवेक बनल, साक्षी बनल चान, फैसला—हरेक नामक मान, हरेक जीवन सम्मान। भोर होइत स्वप्नक नियम जागल जगमे लाउ, दफ्तर, अदालत, गाममे समान सुनवाई पाउ। स्वप्न-दरबार कल्पना नहि, दिशा देखाबै आज, मनमे देखल न्यायकेँ कर्ममे करू समाज। विवेक बनल न्यायमूर्ति, चान बनल गवाह, बिनु घूसक, बिनु पेशीक चलल न्याय-प्रवाह। भोर होइते सपनाक नियम आँखि मे भरू, दफ्तर-गाम-अदालत मे ओहए तौल धरू। लागू हे दरबार, स्वप्नक दरबार लागू हे, विधवा-नेना-मजदूरकेँ पहिल आसन साजू हे। ❖ अध्याय ७४ अध्यायारम्भ लोकगीत : स्वीकारसँ शुरुआत लोकधुन : एकल आशा-पद कहू हे धीमे, 'हम गलत रही' कहू हे, बन्द कोठरीक ई आखर भोरक बीया बूझू हे। पहिल स्वीकार बन्द कोठरीमे धीमे जन्मै, ‘हम गलत रही’ कहिते कठोर हृदय नमै। स्वीकार अन्त नहि, सुधारक पहिल पग, साँचक नाम कहू, भरू क्षतिक उचित रग। डर बिना आत्मावलोकन मनकेँ मुक्त बनाबै, दोषक पूरा जिम्मा लेब विश्वास फेर जगाबै। पहिल स्वीकारसँ शुरुआत, बाट लंबा सही, ईमानक एक पगसँ भविष्य अन्हार नहि। कठोर छाती नमिते पहिल दरारि फूटल, ओही दरारि सँ किरिणक पातर धार छूटल। स्वीकार मंजिल नहि, पहिल डेगक नाम, क्षति भरब, नाम कहब—तखने पूर्ण काम। कहू हे धीमे, 'हम गलत रही' कहू हे, बन्द कोठरीक ई आखर भोरक बीया बूझू हे। ❖ अध्याय ७५ अध्यायारम्भ लोकगीत : भरोसक जाल लोकधुन : युवक-जट-जटिन बुनू हो जाल, भरोसक जाल बुनू हो, जट-जटिनक जोड़ी जकाँ संगक गीत सुनू हो। चारि पट्टी सिग्नल हो, तइयो संग जरूरी, भरोसक नेटवर्क बनत मानव कड़ी पूरी। मित्रक फोन, परिवारक कान, सहायता केन्द्र, संकटमे एक क्लिकसँ जुड़य सुरक्षित केन्द्र। पासवर्ड जकाँ गोपनीय, सम्बन्ध खुलल रहय, लाज नहि, सहायता माँगब साहसक बात कहय। भरोसक जाल मजबूत हो तँ ठगक जाल फटत, एक-दोसरक संगसँ डिजिटल राति कटत। एक गिरह मित्रक, एक परिवारक डोरी, एक सहायता-केन्द्रक—तीनू गाँठ जोड़ी। लाज छोड़ि हाथ पसारब साहसक निसानी, ठगक जाल ओतहि फाटए जतऽ जुड़ल जबानी। बुनू हो जाल, भरोसक जाल बुनू हो, जट-जटिनक जोड़ी जकाँ संगक गीत सुनू हो। ❖ अध्याय ७६ अध्यायारम्भ लोकगीत : समुद्रपार संगति लोकधुन : बटोहिया गीत चलू हे बटोहिया, समुद्रक पार चलू हे, घरक बोली छाती मे, जगक ज्ञान बलू हे। समुद्रपारक यात्री सेहो ओही चान निहारै, घरक नाम, मायक बोली हृदय भीतर सम्हारै। दूर देशमे संग बनाउ, सत्यापनक रीत, परदेसियो अपन हक जानू, साझा सुरक्षा प्रीत। भाषा अलग, कानून अलग, मानुखक मान समान, विश्वास सावधानी संग हो, एहीमे कल्याण। समुद्रपार संगति बनि दूरीकेँ पुल करै, घरक गन्धि आ विश्वक ज्ञान संग-संग फलै। परदेसक गली-गली मे सत्यापनक साथी, हकक पोथी बगल मे, सावधानीक बाती। भाषा भिन्न, नियम भिन्न, मानुख एक समान, संगतिक पुल बान्हि लिअ, दूरी हारत मान। चलू हे बटोहिया, समुद्रक पार चलू हे, घरक बोली छाती मे, जगक ज्ञान बलू हे। ❖ अध्याय ७७ अध्यायारम्भ लोकगीत : शीशा साफ, आँखि साफ लोकधुन : शहर-पराती जागू हे नगर, शीशा पोछि जागू हे, काँचक संग करेजो पारदर्शी राखू हे। शीशाक देबाल चमकै, भीतर मनो साफ हो, गोहिक आँखि नहि, करुणाक दृष्टि माफ हो। लाभक काँच पारदर्शी, श्रमक नाम देखाए, शहरक उजास गामक हककेँ नहि नुकाए। खिड़की खोलू, पवन आवय, हिसाब जन पढ़ि ले, दर्पणमे अपन काज देखि संस्था सीखि ले। शीशा साफ, आँखि साफ—एहि नियमपर नगर, मानव मानक उज्जर इजोत रहय अमर। मीनार जते ऊँच उठए, जड़ि मे श्रमक नाम, हिसाबक खिड़की खुलल रहए, पढ़ए आम-अवाम। गोहिक ठण्ढ नजरि नहि, करुणाक भोर-दृष्टि, गामक हक जोगबैत चमकए शहरक सृष्टि। जागू हे नगर, शीशा पोछि जागू हे, काँचक संग करेजो पारदर्शी राखू हे। ❖ अध्याय ७८ अध्यायारम्भ लोकगीत : मौनक पुल लोकधुन : मौन-दोहरा बान्हू हे पुल, दू मौनक बीच बान्हू हे, शब्द नहि तँ समय दिअ, संग बैसल रहू हे। दू मौन एक-दोसर लग बैसल, पवन बीच बोलल, आँखिक नमी, हथेलीक थरथर संवाद खोलल। शब्द नहि तँ समय दिअ, संगक आसन धरू, मौनक पुलपर धीरे-धीरे विश्वासक पग भरू। एक मौन दोषक हो, दोसर घावक गहींर, सुनबाक धैर्य मिलिते दुनू पाबै नब नीर। मौनक पुल पार कऽ साँचक कंठ उगै, बिनु दबावक संवादे सम्बन्ध फेर जुड़ै। एक मौन मे दोषक बोझ, दोसर मे घाव, हथेलीक थरथराहट कहए भीतरक भाव। आँखिक नोर सेतु बनल, धीरे-धीरे पार, बिनु दबावक बैसार मे खुजल साँचक द्वार। बान्हू हे पुल, दू मौनक बीच बान्हू हे, शब्द नहि तँ समय दिअ, संग बैसल रहू हे। ❖ अध्याय ७९ अध्यायारम्भ लोकगीत : दानपत्र पारदर्शी लोकधुन : करुणा-मंगल सुखाउ हे दान-पत्र, सूरुजक तर सुखाउ हे, ककर धन, कतऽ गेल—अक्षर-अक्षर देखाउ हे। भीजल दान-पत्र सुखाउ खुलल सूरुज तरे, ककर धन, ककर लाभ—सभ जनक आँखि पढ़े। सुनहर किनारी कम, साफ हिसाब बेसी, दान तखने पुण्य जखन मदद पहुँचै जेसी। लाभार्थीक गरिमा राखू, फोटो नहि बेचू, सेवा केर हरेक खर्चक साँचक पन्ना सेचू। दानपत्र पारदर्शी हो तँ विश्वास फूलत, करुणाक पानि सही खेतमे जीवन बनि झूलत। सोनहुला किनारी सँ पैघ साफ बही-पन्ना, फोटो नहि, गरिमा पहुँचए, पहुँचए अन्न-धन्ना। पाइ-पाइक लेखा पर जनताक मोहर, पारदर्शी करुणाक खेत मे विश्वासक लहर। सुखाउ हे दान-पत्र, सूरुजक तर सुखाउ हे, ककर धन, कतऽ गेल—अक्षर-अक्षर देखाउ हे। ❖ अध्याय ८० अध्यायारम्भ लोकगीत : संतानक प्रश्न, नव उत्तर लोकधुन : पिता-पुत्री संवाद गीत पूछ गे बेटी, आँखि मिला कऽ पूछ गे, बाबूक पुरना बही सँ साँचक पन्ना खोज गे। बेटी पूछै—न्याय बचेलहुँ? पिता आँखि उठाउ, पुरान भूल नहि नुकाउ, साँचक उत्तर लाउ। संतानक प्रश्न दण्ड नहि, सुधारक दीप, एक पीढ़ीक साहससँ दोसर पाबै सीप। ‘पेशा सेवा लेल’ कहि कर्मसँ प्रमाण दिअ, बच्चाक उज्जर नजरकेँ ईमानक मान दिअ। नव उत्तर पुरान घरमे ताजा हवा भरत, संतानक प्रश्नसँ परिवारो न्याय-पथ धरत। प्रश्न बेटीक दण्ड नहि, दीपक बाती थिक, झूठक परदा हटिते घरक हवा नीक। 'पेशा सेवा बनत आब'—कर्म सँ देखाउ, दू पीढ़ीक ईमान मिलि नव सबेरा लाउ। पूछ गे बेटी, आँखि मिला कऽ पूछ गे, बाबूक पुरना बही सँ साँचक पन्ना खोज गे। ❖ अध्याय ८१ अध्यायारम्भ लोकगीत : भीतरक पोखरि साफ लोकधुन : गज-ग्राह आख्यानक आशा-लय साफ करू हे, भीतरक पोखरि साफ करू हे, चारू किनार भिन्न रहौ, पानि एक्के धरू हे। चारि किनार अलग सही, पानि एकहि प्राण, भीतरक पोखरि साफ करू, हटत भ्रमक जाल। गजक बल, ग्राहक पकड़—दुनू कथा बुझू, डरक गाद निकालि कऽ स्वच्छ विवेक चुनू। कमल उगत जखन मनक पानि निर्मल होए, चारू दिशा एक आकाशक उज्जर छवि संजोए। भीतरक पोखरि साफ रहत तँ निर्णय होए स्पष्ट, मनक स्वच्छ जलसँ जीवन बनत शान्त, समर्थ। गादक तह मे डर पोसल, आधा-आधा छाया, कोदारि नहि, धीरजक हाथ सँ निकलत माया। कमल तखने मुँह खोलत जखन जल थिर-निर्मल, चारू दिशाक अकास झलकत एक्के दर्पण-तल। साफ करू हे, भीतरक पोखरि साफ करू हे, चारू किनार भिन्न रहौ, पानि एक्के धरू हे। ❖ अध्याय ८२ अध्यायारम्भ लोकगीत : पातक आसनपर पाठशाला लोकधुन : बाल-पाठशाला गीत बैसू हो नेना, पातक आसन पर बैसू हो, माटिक कापी, टहनी-कलम सँ आखर लेखू हो। छाहरि कम, पातक आसन, ज्ञानक आकाश पैघ, नेना गोल घेरा बैसि सीखै नामक नेह। पहिल पाठ—कियो अनाम नहि, दोसर—संग रहू, तेसर—डर बाँटू सभ, चौठी—साँच कहू। कापी नहि तँ माटि अछि, कलम नहि तँ टहनी, लोकक अनुभव पुस्तक, दादीक कथा गहनी। पातक आसनपर पाठशाला न्याय-बोध जगाबै, सीखल नेना काल्हि समाजक सच्चा पहरा बनाबै। पहिल घण्टी कोइली देलक, दोसर देलक हवा, दादीक कथा किताब बनल, अनुभव भेल दवा। 'कियो अनाम नहि'—ई मन्त्र सस्वर रटू, सीखल नेनाक पहरा सँ अन्यायक जड़ि कटू। बैसू हो नेना, पातक आसन पर बैसू हो, माटिक कापी, टहनी-कलम सँ आखर लेखू हो। ❖ अध्याय ८३ अध्यायारम्भ लोकगीत : उपस्थितिक गीत लोकधुन : हाजिरी-मंगल पुकारू हे नाम, एक-एक कऽ पुकारू हे, 'उपस्थित'क उत्तर पर दीपक थारी उतारू हे। नाम पुकारू एक-एक, सभ कहू—उपस्थित, माय, मजदूर, नेना, बूढ़—सभक मान सुरक्षित। हाजिरी केवल संख्या नहि, जीवनक पहिचान, जकर पएर धरतीपर, ओकर पूरा स्थान। कियो छुटि नहि जाए पाँतिसँ, कियो मेटायल नहि, उपस्थितिक एक स्वर सँ टूटै अदृश्य मही। हाजिरीक गीत गाउ, हरेक नामक दीप धरू, समाजक पूरा चित्रमे सभ रंग बराबर भरू। माय उपस्थित, मजदूर उपस्थित, नेना-बूढ़ सम्हार, पाँति सँ कियो खसए नहि, इहए पहिल उपचार। संख्या नहि, साँसक लेखा, धड़कनक ई खाता, पूरा हाजिरी सँ बनए समाजक पूरा नाता। पुकारू हे नाम, एक-एक कऽ पुकारू हे, 'उपस्थित'क उत्तर पर दीपक थारी उतारू हे। ❖ अध्याय ८४ अध्यायारम्भ लोकगीत : स्त्री सभक उज्जर पहर लोकधुन : स्त्री-मण्डली मंगल गीत जुटू गे बहिना, उज्जर पहरक बेला गे, अपन नाम अपने कहू, टूटत सभ झमेला गे। दिनक श्रम, रातिक बात—स्त्री सभ घेरा बनाबै, एक-दोसरक कंठ सुनि साहस दीप जलाबै। माय, बहिन, बेटी सभ अपन नाम कहत, घर, खेत, दफ्तर, मंचमे समान अधिकार रहत। घूँघट चाही तँ अपन, स्वरपर पर्दा नहि, निर्णयमे आधा जगत कखनहुँ आधा नहि। उज्जर पहर स्त्रीक हो, गामक भोर बढ़त, हुनकर संग समाजक हरेक संस्था पूर्ण बनत। आँगन सँ पंचायत धरि आधा जगक डेग, स्वर पर परदा नहि रहत, चाहे रहौ घोघ-टेक। एक बहिनक जीत सुनि दस आँगन जागत, मण्डलीक दीप-पाँति सँ गामक भोर लागत। जुटू गे बहिना, उज्जर पहरक बेला गे, अपन नाम अपने कहू, टूटत सभ झमेला गे। ❖ अध्याय ८५ अध्यायारम्भ लोकगीत : पएरक धूलिसँ बाट लोकधुन : श्रम-बटगबनी चलू यौ भाइ, धूलिक तिलक लगा चलू यौ, पएरक छापे-छापे भविष्यक बाट बनाउ यौ। मजदूरक पएरक धूलि बाटक नक्शा लिखै, जतय श्रमक पग पड़ै, विकास ओतहि दिखै। धूलि झाड़ू नहि तिरस्कार, माथपर मान धरू, जूता, विश्राम, सुरक्षित राह सभ अधिकार भरू। पग-पग मिलि कऽ सड़क, पुल, घर, नगर बनै, श्रमिकक नाम बिना कियो प्रगति पूर्ण नहि कहै। पएरक धूलिसँ बाट, बाटसँ भविष्य उजियार, श्रमक सम्मान मिथिलाक सभसँ पैघ श्रृंगार। ईंटा ढोनिहार हाथ पर महलक पहिल नींव, पुल-सड़क-नगरक जड़ि मे पसेनाक जीव। विश्राम, जूता, सुरक्षित काज—हक थिक, दान नहि, श्रमक पूरा मान बिना प्रगतिक शान नहि। चलू यौ भाइ, धूलिक तिलक लगा चलू यौ, पएरक छापे-छापे भविष्यक बाट बनाउ यौ। ❖ अध्याय ८६ अध्यायारम्भ लोकगीत : परदाक विश्राम, आँखिक उत्सव लोकधुन : दिनभरिया लोकगीत राखू हे परदा, एक दिन आराम पर राखू हे, आँखिक अँजुरी भरि गाछी-अकास ताकू हे। एक दिन परदा विश्राम लए, आँखि गाछी जाए, माटिक रंग, पातक नस, बादरक चाल निहारै। फोन चुप, परिवार बोलै, आँगन गीत सुनै, नेना दादी लग बैसि पुरनका खेल चुनै। परदाक उपवास दण्ड नहि, जीवनक उत्सव, सामना-सामनी हँसीमे मिलै अपनत्वक रस। आँखि विश्राम, मन विस्तार, देहक लय सुधरै, तकनीक संग संतुलनसँ जीवन सुन्दर करै। फोन सुतल टोकरी मे, आँगन जागल भरि, दादी-पोताक गोटी-खेल, हँसीक झरि-झरि। माटिक रंग, पातक नस, बादरक धीमा चाल, आँखिक ई भोज भरत मोनक खाली थाल। राखू हे परदा, एक दिन आराम पर राखू हे, आँखिक अँजुरी भरि गाछी-अकास ताकू हे। ❖ अध्याय ८७ अध्यायारम्भ लोकगीत : परदेस पत्रमे घरक भोर लोकधुन : बटोहिया-पत्र गीत लिखू हे पाती, परदेसियाकेँ लिखू हे, आँगनक हँसी, कोंपलक खबरि—सभटा भरू हे। परदेसक बच्चाकेँ लिखू—आँगन एखन हँसै, कटल ठूँठकोंपल फुटल, तुलसी पात बसै। माए केर स्वास्थ्य, बाबाक खेत, पोखरिक जल, घरक साँचक समाचारसँ दूरी होए हलुक। पत्रमे आदेश नहि, नेहक खुलल दुआर, घुरि आबू जखन चाहू, घर रहत तैयार। परदेस पत्रमे भोर पठाउ, आशाक रंग भरी, दूर शहरमे घरक गन्धि बनत उज्जर डोरी। तुलसी-चौरा, पोखरिक जल, बाबाक खेत-खरिहान, माएक बनल तिलकोरक तरुआ—सभक बखान। आदेश नहि, नेहक नोत, दुआर खुलल रहत, पातीक गन्धे परदेसक कोठरी मे घर महकत। लिखू हे पाती, परदेसियाकेँ लिखू हे, आँगनक हँसी, कोंपलक खबरि—सभटा भरू हे। ❖ अध्याय ८८ अध्यायारम्भ लोकगीत : अनसुना स्वरक चौपाल लोकधुन : जन-सुनवाई मंगल दिअ हे आसन, अनसुनाकेँ पहिने दिअ हे, बीच मे टोकू नहि, कथा पूरा सुनि लिअ हे। जे सुनल नहि गेल, ओकरा पहिने आसन दिअ, बीचमे टोको नहि, पूरा कथा कहबाक मान दिअ। चौपाल गोल बनाउ, मंचक ऊँचाई घटाउ, शान्त कानक दीप जरा हरेक अनसुना स्वर लाउ। गवाही कमजोर नहि जँ भाषा सरल होए, जनक अनुभव कानूनक नब दिशा संजोए। अनसुना स्वरक चौपाल समाजकेँ पूर्ण करत, सुनबाक संस्कृति सँ न्याय घर-घर उतर। मंचक सीढ़ी तोड़ि कऽ गोल चौपाल बिछाउ, सरल बोली मे कहल गवाहीकेँ मान जुड़ाउ। कानक दीप जरल रहए, धीरजक तेल भरल, सुनबाक ई संस्कृति सँ न्याय दुआरे उतरल। दिअ हे आसन, अनसुनाकेँ पहिने दिअ हे, बीच मे टोकू नहि, कथा पूरा सुनि लिअ हे। ❖ अध्याय ८९ अध्यायारम्भ लोकगीत : पातक लोक-विधान लोकधुन : लोक-विधान गीत पढ़ू हे पातक नस, धरतीक विधान पढ़ू हे, बिनु मोहरक ई संविधान माथ पर धरू हे। सूखल पातक नस-नसमे नदीक बाट बनल, प्रकृतिक संविधान बिना मोहरो मानल। जल बाँटू, छाह बचाउ, बीजक हक सम्हारू, जीव-जंतु, माटि, मनुख संग-संग संसारू। कानून जँ लोकसँ जुड़त, पात जकाँ लचकत, न्याय जड़ि धरि पहुँचि कऽ हरेक जीवनकेँ रकत। पातक लोक-विधान पढ़ू, सरल मुदा महान, सह-अस्तित्वक अक्षरमे बसै धरतीक प्राण। जल पहिने प्यासलकेँ, छाह पहिने बटोहीकेँ, बीजक हक अगिला पीढ़ी, माटिक हक सभकेँ। जीव-जन्तु, गाछ-बिरिछ संगे संसार चलए, लोक-विधानक अक्षर-अक्षर मे धरती पलए। पढ़ू हे पातक नस, धरतीक विधान पढ़ू हे, बिनु मोहरक ई संविधान माथ पर धरू हे। ❖ अध्याय ९० अध्यायारम्भ लोकगीत : खाली कुरसी, भरल जन लोकधुन : मौन-झूमरक उत्सवी रूप भरू हे चौपाल, कुरसी खाली रहौ हे, जनक जागल घेरा मे काजक धार बहौ हे। कुरसी खाली हो तइयो चौपाल भरल रहै, पदधारी नहि आयल तँ जनक काम नहि बहै। एक-दोसरक बात लिखू, निर्णय साफ बनाउ, खाली आसनकेँ प्रश्नक फूलसँ सजाउ। कुरसी सेवा प्रतीक, व्यक्ति मात्र नहि, संस्था जनक भरोससँ टिकै, डरक बात नहि। भरल जनक जागरूकता खाली पद सँ पैघ, लोकतन्त्रक झूमरमे सभक बराबर नेह। पदधारी नहि आयल तँ प्रश्न-फूल सजाउ, खाली आसनक आगाँ अपन निर्णय सुनाउ। कुरसी सेवाक चिन्ह, व्यक्ति अबैत-जाइत, लोकक भरोसक खम्भे संस्था ठाढ़ि रहइत। भरू हे चौपाल, कुरसी खाली रहौ हे, जनक जागल घेरा मे काजक धार बहौ हे। ❖ अध्याय ९१ अध्यायारम्भ लोकगीत : ठूँठक छाहमे सुनवाई लोकधुन : छाहरि-पराती बैसू हे छाहरि मे, नान्हियो छाहरि मे बैसू हे, ठूँठक कान पैघ छै—अपन कथा परसू हे। गाछ कटल, ठूँठ बचल, छाह नान्हि सही, ओहि छाहमे कान पैघ, सुनवाई रुकत नहि। एक-एक लोक बैसि कहै अपन दुःख-सुख बात, ठूँठक जड़ि सम्हारि राखै पुरखा केर सौगात। छोट आसन न्याय रोकै? नहि, मन चाही खुलल, एक सुनल स्वर सँ समाजक सम्बन्ध फुलल। ठूँठक छाहमे सुनवाई आशाक बीज बोए, जड़ि बचल तँ वनक सपना एक दिन पूरा होए। गाछ कटल, छाह घटल, सुनवाई नहि घटल, एक-एक दुख-सुख कहिते मोनक मेघ छँटल। जड़ि मे पुरखाक आशीष, ऊपर खुलल अकास, छोट छाहरियो मे पलए वन भरिक विश्वास। बैसू हे छाहरि मे, नान्हियो छाहरि मे बैसू हे, ठूँठक कान पैघ छै—अपन कथा परसू हे। ❖ अध्याय ९२ अध्यायारम्भ लोकगीत : बाढ़िक बाद हरियाली लोकधुन : चौमासा-मंगल गाबू हे चौमासा, बाढ़ियो मे मंगल गाबू हे, ऊँच मचान, बीजक डिब्बा, नाव सजाबू हे। बाढ़ि फेर आयल तइयो नाव तैयार राखू, ऊँच मचान, बीजक डिब्बा, संगक हाथ सम्हारू। पानि उतरला पर गाद खेतकेँ उर्वर करै, विपदा पाछाँ श्रमक गीत नव हरियाली धरै। घर टूटल तँ मिलि कऽ फेर मजबूत घर बनाउ, नदीक स्वभाव बुझि सुरक्षित बसावट सजाउ। बाढ़िक बाद हरियाली आशाक पुरान रीति, मिथिलाक धैर्य कहै—फेर उठब, फेर प्रीति। पानि चढ़ल तँ धीरज चढ़ौ, उतरल तँ कोदारि, गादक तह मे नुकाएल अछि अगिला फसिलक बारी। टूटल घर मिलि-जुलि उठत, ऊँच-सुरक्षित ठाम, मिथिलाक धैर्य कहत—फेर उठब, फेर काम। गाबू हे चौमासा, बाढ़ियो मे मंगल गाबू हे, ऊँच मचान, बीजक डिब्बा, नाव सजाबू हे। ❖ अध्याय ९३ अध्यायारम्भ लोकगीत : गोहि चिन्हू, नदी बचाउ लोकधुन : नदी-जागरण गीत चिन्हू हे गोहि, दुनू गोहि चिन्हू हे, पानिक आ छलक—रूप अलग गिनू हे। पानिक गोहि प्रकृतिक, छलक गोहि अलग, रूप चिन्हू, नदीकेँ दोष नहि दिअ गलत। जलचरक घर बचाउ, मनुखक लोभ घटाउ, अपराधक दाँत चिन्हि कऽ सही ठाम रोकाउ। नदी साफ रहत तँ गोहि अपन सीमा मानत, जनक पारदर्शी शासन छलक भूख हरत। गोहि चिन्हू, नदी बचाउ, विवेकक दीप धरू, प्रकृति आ न्याय दुनूकेँ संतुलित आदर करू। जलचर अपना घर मे, ओकरा दोष नहि दिअ, लोभक गोहि जतऽ देखू, ओतऽ रोक धरि दिअ। नदी निर्मल, शासन खुलल—दुनू संग चलत, विवेकक दीप बरत तँ सीमा सभ सम्हरत। चिन्हू हे गोहि, दुनू गोहि चिन्हू हे, पानिक आ छलक—रूप अलग गिनू हे। ❖ अध्याय ९४ अध्यायारम्भ लोकगीत : सौदासँ ऊपर जीवन लोकधुन : सौदा-विरहा से मंगल लिखू हे सीमा, बाजारो मे सीमा लिखू हे, जे बिकाउ नहि—देह, सहमति, साँस—रेख खिंचू हे। अन्तिम सौदामे नाम नहि, जीवन पहिने मान, दामक तराजू नापि नहि सकै मनुखक प्राण। कागचपर सीमा लिखू—जे बिकाउ नहि होए, देह, सहमति, स्मृति, श्वास स्वतन्त्रतामे सोए। व्यापार सेवा बनि रहय, लोभ नहि सरकार, लाभक संग जिम्मेदारी हो स्पष्ट व्यवहार। सौदासँ ऊपर जीवन—बाजारो ई सीखू, मानव मानक रेखा भीतर सभ अनुबंध लिखू। तराजू पर सोना चढ़ौ, प्राण नहि चढ़त, दामक अंक सँ ऊपर मनुखक मान बढ़त। लाभक संगे जिम्मेदारीक खाता खोलू, सेवा-भावक बटखरा सँ व्यापार तौलू। लिखू हे सीमा, बाजारो मे सीमा लिखू हे, जे बिकाउ नहि—देह, सहमति, साँस—रेख खिंचू हे। ❖ अध्याय ९५ अध्यायारम्भ लोकगीत : देरक क्षमा संग सुधार लोकधुन : प्रायश्चित्त-समदाउनक उज्जर रूप लाउ हे संग, क्षमाक संग सुधार लाउ हे, बोल टा नहि, छीनल हक घुरा कऽ देखाउ हे। देरसँ आयल क्षमा जँ साँच, संग सुधार लाउ, केवल बोल नहि, टूटल हक फेर घुरा दियाउ। भूलक पूरा नाम कहू, पीड़ितक बात सुनू, क्षतिपूर्ति, नियम-सुधार, नव व्यवहार चुनू। क्षमा खाली द्वार नहि, लम्बा बाटक आरम्भ, जिम्मेदारी निभबैत चलू, तखन घटत दम्भ। देरक क्षमा संग सुधार आशाक पुल बनत, घावक मान राखि कऽ सम्बन्ध नव जनत। भूलक पूरा नाम कहू, आधा-आधा नहि, पीड़ितक कथन पहिने, अपन सफाइ नहि। क्षतिपूर्तिक डेग-डेग पर नियम नव गढ़ू, अबेरक क्षमा तखने पुल—ईमान सँ चढ़ू। लाउ हे संग, क्षमाक संग सुधार लाउ हे, बोल टा नहि, छीनल हक घुरा कऽ देखाउ हे। ❖ अध्याय ९६ अध्यायारम्भ लोकगीत : अपन खाता, अपन जीवन लोकधुन : खाता-जागरण जागू हे भाइ, अपन खाताक मालिक जागू हे, अनजान धनक बोझ सँ नाम नहि दागू हे। दोसराक खाता ढोउ नहि, अपन नामक मान, लेन-देन स्पष्ट राखू, सुरक्षित पहिचान। कागच पढ़ू, फोन बुझू, अनजान धन रोकू, लोभक नान्हि बाटसँ जीवनकेँ नहि झोंकू। अपन खाता अपन श्रमक स्वच्छ नदी बनाउ, परिवार संग वित्तक सरल ज्ञान बढ़ाउ। म्यूल नहि, मालिक बनू अपन निर्णयक आज, सावधानीक गीतसँ बचत श्रमक कमाइ-साज। मीठ बोली, झट लाभ—दुनू पर टोकू, बिनु बूझल कागच पर आङुर नहि रोपू। श्रमक कमाइ निर्मल धार, हिसाब घरे-घर, वित्तक सरल पाठ पढ़ौ बेटा-बेटी बराबर। जागू हे भाइ, अपन खाताक मालिक जागू हे, अनजान धनक बोझ सँ नाम नहि दागू हे। ❖ अध्याय ९७ अध्यायारम्भ लोकगीत : पातपर संदेशक आशा लोकधुन : सिग्नल-बटगबनी पठाउ हे सन्देस, आशाक सन्देस पठाउ हे, मेटएबला आखरो मे भोरक बीया लगाउ हे। अन्तिम संदेश मेटल तइयो पातपर रहि जाए, हावा पढ़ि कऽ घर-घर आशाक बात पहुँचाए। ‘संग खोजू, सहायता लिअ’—हरेक पंक्ति कहत, अन्हार फोनक भीतर सेहो भोरक संकेत रहत। सन्देशकेँ जीवन दिअ, समयपर हाथ बढ़ाउ, कियो संकटमे हो तखन ओकर दुआर पहुँचाउ। पातपर आशाक शब्द डिजिटल राति हरत, एक सही सन्देश कतेको जीवन बचा सकत। 'संग छी, डर नहि'—छोट पाँति, पैघ काज, एक घण्टीक उत्तरो सँ बचए केओ आज। फोनक अन्हरिया मे कियो असगर नहि छूटए, समय पर बढ़ल हाथ सँ भोरक धार फूटए। पठाउ हे सन्देस, आशाक सन्देस पठाउ हे, मेटएबला आखरो मे भोरक बीया लगाउ हे। ❖ अध्याय ९८ अध्यायारम्भ लोकगीत : मौनमे उपस्थित जन लोकधुन : गवाही-पराती सुनू हे मौनो, मौनक हाजिरी सुनू हे, आँखिक भाषा, भीजल पात—संकेत गुनू हे। कियो नहि बाजै तइयो आँखि कहै—हम छी, खाली आसन, भीजल पात कहै—हम छी। मौनकेँ अनुपस्थित नहि, संकेत जकाँ पढ़ू, सुरक्षित ठाम देलापर कंठक फूल गढ़ू। उपस्थिति हस्ताक्षर नहि, सम्मानक अनुभूति, जनक शान्त संगति देत भयपर विजय-पूर्ति। मौनमे उपस्थित जनकेँ आदरसँ स्थान दिअ, बोलबाक बेर अपने आए—एतबे विश्वास दिअ। कण्ठ खुजत अपने बेर, जबरदस्ती नहि, सुरक्षित छाहरिक भरोसे भय टिकत नहि। खाली आसन, थिर आँखि—इहो गवाही थिक, मौनक मान राखल जतऽ, न्याय ओतऽ नीक। सुनू हे मौनो, मौनक हाजिरी सुनू हे, आँखिक भाषा, भीजल पात—संकेत गुनू हे। ❖ अध्याय ९९ अध्यायारम्भ लोकगीत : बच्चाक हाथसँ जीत लोकधुन : गज-ग्राह विजय गीत थामू हो नेना, सत्यक आङुर थामू हो, गजक बल थाकत, अहाँक हाथ नहि—जानू हो। गजक बल थाकि सकै, बच्चाक हाथ नहि, नान्हि उँगली सत्य पकड़ै, छोड़ै बाट नहि। एक नेना चित्र बनाबै, दोसर नाम पढ़ै, तेसर प्रश्न उठाबै, चौठा संगमे बढ़ै। बच्चाक सहज न्याय-बोध ग्राहक पकड़ ढील करै, नव पीढ़ीक उज्जर हँसी अन्हारक जड़ि हरै। बच्चाक हाथसँ जीत, आशाक पाँखि पसार, साँच सिखाउ, संग दिअ—ओ बनत भविष्यार। एक बनाबए चित्र, दोसर नाम बाँचए, तेसर प्रश्नक ढोल पीटए, चारिम संग नाचए। नान्हि-नान्हि हाथक जोड़ सँ ढील पड़ए पकड़ि, नेनाक उज्जर हँसी सँ टूटए अन्हार-जकड़ि। थामू हो नेना, सत्यक आङुर थामू हो, गजक बल थाकत, अहाँक हाथ नहि—जानू हो। ❖ अध्याय १०० अध्यायारम्भ लोकगीत : बाल-पारीक विजय लोकधुन : बाल-कबड्डी गीत दौड़ू हो नेना, नामक पारी दौड़ू हो, हँसीक ढाल, जिज्ञासाक तरुआरि जोड़ू हो। कबड्डी-कबड्डी नेना दौड़ै नामक पारी, हँसी ओकर ढाल बनल, जिज्ञासा तरवारी। सीमा पार करैत कहै—कियो अनाम नहि, जकर कथा सुनल गेल, ओकर हार नहि। पुस्तक, खेल, गीत मिलि न्याय सरल बनाबै, बाल-पारीक विजय भविष्यक दिशा देखाबै। हाथ नहि थाकै, मन नहि झुकै, संगक स्वर रहत, दुइ सय वर्षक अन्हारो नेनाक भोरसँ कटत। सीमा-रेखा पार करैत बाजू—कियो अनाम नहि, जकर कथा सुनल गेल, ओकर कोनो हार नहि। पोथी-खेल-गीतक त्रिवेणी मे न्याय नहाए, दुइ सय बरखक अन्हारो नेना-भोर सँ पड़ाए। दौड़ू हो नेना, नामक पारी दौड़ू हो, हँसीक ढाल, जिज्ञासाक तरुआरि जोड़ू हो। ❖ अध्याय १०१ अध्यायारम्भ लोकगीत : पृथ्वीक उपहार लिअ लोकधुन : आकाश-बटगबनी सजाउ हे झोरा, यात्राक झोरा सजाउ हे, माटिक गन्ध, मायक गीत—एतबे धन लऽ जाउ हे। दूर ग्रह जँ बुलाबै, संग की लऽ जाएब? माटिक गन्ध, मायक गीत, नामक दीप सजाएब। धन नहि, हथियार नहि, साझा नेहक बात, पृथ्वीक हरियर सीख लऽ पार करब आकाश-पात। तारा पूछत—तोहर मूल? कहब—मानव मान, जतय जाएब ओतय रोपब शान्ति, श्रम, सम्मान। पृथ्वीक उपहार लिअ, लोभ एतय छोड़ू, दूर ग्रहक यात्रामे प्रेमक बाट जोड़ू। तारा-तारा टिकट कटौ, पासपोर्ट नेहक, सीमा पर पूछत कियो—देखाउ मुँह देसक। धन-हथियार बाहर छोड़ू, भीतर नाम-दीप, पृथ्वीक हरियर सीख बनत ब्रह्माण्डक सीप। सजाउ हे झोरा, यात्राक झोरा सजाउ हे, माटिक गन्ध, मायक गीत—एतबे धन लऽ जाउ हे। ❖ अध्याय १०२ अध्यायारम्भ लोकगीत : ताराक पारीमे नाम लोकधुन : कबड्डी-आकाश धुन जाउ हे खिलाड़ी, ताराक पारी जाउ हे, साँस बान्हल, नाम खुलल—दुनू संग निबाहू हे। साँस रोकू, नाम बाजू, ताराक पारी जाउ, सीमा नभक हो तइयो अपन जड़ि नहि बिसराउ। एक पारी पृथ्वी लेल, दोसर मानवता, तीसर पारी न्याय लऽ, चौठी सह-अस्तित्वता। ताराक धूरि माथपर, हृदयमे गामक थाप, कबड्डीक लय कहै—संग रहू बेहिसाब। ताराक पारीमे नाम आदरसँ पहुँचत, ब्रह्माण्डो सीखत जखन मनुख नेहसँ जियत। पहिल डेग पृथ्वी लेल, दोसर मानव-जाति, तेसर न्यायक, चारिम—सह-अस्तित्वक बाती। नभक धूरा माथ लागौ, हृदय गामक ताल, कबड्डीक लय पर नाचए आकाशगंगा-थाल। जाउ हे खिलाड़ी, ताराक पारी जाउ हे, साँस बान्हल, नाम खुलल—दुनू संग निबाहू हे। ❖ अध्याय १०३ अध्यायारम्भ लोकगीत : नामक धागा आकाशमे लोकधुन : झूलन-आकाश गीत झूलू हे धीरे, ताराक झूला झूलू हे, एक छोर पुरखाक हाथ, दोसर नेना बूझू हे। ताराक बीच तनल धागा, नामक झूला डोलै, एक छोर पुरखा पकड़े, दोसर नेना खोलै। आकाश गहींर हो तइयो धागा टूटत नहि, स्मृति, प्रेम, जिम्मेदारी कखनहुँ छोट नहि। झूलू धीरे, गीत गाउ, तारामे दीप सजाउ, हरेक पीढ़ीकेँ अगिला पीढ़ीक संग जोड़ि जाउ। नामक धागा आकाशमे उज्जर राह बनत, दूर-दूरक जीवन सभ एक परिवार जनत। सावनक झूलन जकाँ नभ मे डोरि तनल, स्मृति-प्रेम-जिम्मेदारीक तीन लड़ि बनल। पेंग बढ़ाउ, गीत गाउ, तारा छूबि घुरू, पीढ़ी-पीढ़ीक हाथ जोड़ि अटूट डोरि करू। झूलू हे धीरे, ताराक झूला झूलू हे, एक छोर पुरखाक हाथ, दोसर नेना बूझू हे। ❖ अध्याय १०४ अध्यायारम्भ लोकगीत : पृथ्वी हमर चयन लोकधुन : माटि-प्रेम गीत चुनू हे पृथ्वी, फेर-फेर पृथ्वी चुनू हे, शीशा-महल सँ नीक अपन कादो गुनू हे। स्मृति-बिनु शीशा-महलसँ अपन कादो नीक, माटिक गन्धि, पानिक स्वर, पीपरक छाह अतीव। पृथ्वी चुनब दीनता नहि, प्रेमक पैघ प्रमाण, एतय श्रमक पसीना अछि, एतय जनक सम्मान। जतय घाव ओतहि उपचारक बीज उगाउ, धरती छोड़ि भागू नहि, धरती नव बनाउ। पृथ्वी हमर चयन कहू, जिम्मेदारी साथ, अपन घरकेँ न्यायमय करब—एहने उज्जर बाट। एतऽ घाव सही, मुदा घावक दवाइयो एतहि, पसेनाक खेत एतहि, जनक गीतो एतहि। भागब कायरता, बदलब प्रेमक प्रमाण, धरतीकेँ न्यायमय गढ़ब—इहए स्वाभिमान। चुनू हे पृथ्वी, फेर-फेर पृथ्वी चुनू हे, शीशा-महल सँ नीक अपन कादो गुनू हे। ❖ अध्याय १०५ अध्यायारम्भ लोकगीत : धरतीक सोहर लोकधुन : सोहर ललना रे, धरतीक सोहर गाबू हे, नवजातक निन्न जकाँ भोरकेँ जोगाबू हे। धरती नवजात शिशु सन भोरक गोदमे हँसल, ओसक दूध पिअल, सूरुजक अँचरा पसल। नदी नाल काटि बहै, वन झुनझुना बजाबै, पवन दुलारि कहै—नव जीवन आबि जाए। धरतीक सोहर गाउ सभ, घावपर फूल धरू, नवजात घरक रक्षा जकाँ पर्यावरण भरू। हरेक दिन ओकर जन्मदिन, हरेक बीज शुभदान, धरती हँसत तँ हँसत मनुखक सभ सन्तान। ओसक दूध, सूरुजक अँचरा, पवनक लोरी-तान, नदी नाल काटि हँसल, वन बजाओल गान। घाव-घाव पर फूलक फाहा, बीज-बीज शुभदान, धरतीक जन्मदिन मनाउ नित, राखू ओकर मान। ललना रे, धरतीक सोहर गाबू हे, नवजातक निन्न जकाँ भोरकेँ जोगाबू हे। ❖ अध्याय १०६ अध्यायारम्भ लोकगीत : बीज-माटिक मिलन लोकधुन : रोपनी-मंगल मिलाउ हे मिलाउ, बीज-माटिकेँ मिलाउ हे, पानिक नेह, सूरुजक ताप—चारू जोड़ि गाउ हे। बीज कहै—माटि चाही, माटि कहै—आउ, पानि कहै—हम नेह देब, सूरुज कहै—फुलाउ। चारू तत्त्व मिलि कऽ जीवनक गीत रचै, एक नान्हि अंकुर भीतर पूरा वन बसै। बीजकेँ सही घर दिअ, किसानक मान बचाउ, जैव विविधताक रंग खेत-खेत उगाउ। बीज-माटिक मिलनसँ भविष्य हरियर होए, साझा संरक्षणक बलसँ अन्नक गंगा सोए। रोपनिहारिक आँगुर मे मंगलक मुद्रा, एक अंकुरक भीतर सूतल वन भरिक निद्रा। देसी बीजक डिब्बा राखू, किसानक ज्ञान, खेत-खेत रंग-बिरंग उगए धान-पान। मिलाउ हे मिलाउ, बीज-माटिकेँ मिलाउ हे, पानिक नेह, सूरुजक ताप—चारू जोड़ि गाउ हे। ❖ अध्याय १०७ अध्यायारम्भ लोकगीत : भविष्य बचाउ, बीज बचाउ लोकधुन : धान-बीज जागरण बचाउ हे बीज, काल्हिक थारी बचाउ हे, दादीक डिब्बा, खेतक विधान—दुनू जोगाउ हे। बीज चोरल तँ काल्हिक थारी खाली होए, बीज बचल तँ सात पीढ़ी अन्नक हँसी बोए। दादीक डिब्बा, किसानक ज्ञान, खेतक लोक-विधान, सभकेँ संग सहेजि राखू—एहने भविष्य दान। एक बीजक भीतर मौसम, स्वाद, कथा, संस्कार, ओकर स्वतन्त्रता बचेनाइ सभक साझा भार। भविष्य बचाउ, बीज बचाउ, भंडार खोलि बाँटू, लोभक ताला तोड़ि कऽ जीवनक हक सँटू। एक मुट्ठी बीज मे सात पीढ़ीक भात, स्वाद, मौसम, कथा, संस्कार—सभक साथ। लोभक ताला जतऽ लागल, ओतऽ मिलि कऽ बाजू, बीज-भंडार खोलि कऽ हकक थारी साजू। बचाउ हे बीज, काल्हिक थारी बचाउ हे, दादीक डिब्बा, खेतक विधान—दुनू जोगाउ हे। ❖ अध्याय १०८ अध्यायारम्भ लोकगीत : माटिक ठाम बनाउ लोकधुन : माटि-माय गीत दिअ हे ठाम, माटिकेँ ठाम दिअ हे, कंक्रीटक बीचो एक हरियर खिड़की दिअ हे। माटि पूछै—हम कतय उगब? कहू—हमर हृदयमे, खेत, आँगन, गमला, वन—सभ सम्मानक सदयमे। कंक्रीटक बीचो नान्हि हरियर खिड़की खोलू, बीजक पएर धरबाक लेल नरम धरती जोतू। माटि केवल जमीन नहि, जीवनक आधार, ओकर साँस बचेनाइ सभ नागरिकक व्यवहार। माटिक ठाम बनाउ, शहरो हरियर होए, जतय माटि मुस्कायत ओतय मानवता सोए। गमला मे, कियारी मे, आँगन-छत-दलान, जतऽ माटि साँस लइए, ओतऽ जीवन-गान। माय जकाँ गोद पसारने अछि धरती सभ लेल, ओकर साँस बचायब थिक नागरिकताक मेल। दिअ हे ठाम, माटिकेँ ठाम दिअ हे, कंक्रीटक बीचो एक हरियर खिड़की दिअ हे। ❖ अध्याय १०९ अध्यायारम्भ लोकगीत : नदी मुक्त करब लोकधुन : पनिहारिन-मलार भरू गे पनिहारिन, मुक्त धारक जल भरू गे, बोतलक ढक्कन खोलि नदीकेँ घर घुराबू गे। बोतलमे बन्द नदीक स्मृति ढक्कन ठेलै, धारक जन्म स्वतन्त्र, पियासक संग खेलै। पानि वस्तु मात्र नहि, जनक साझा प्राण, कूप, पोखरि, धार बचाउ—एहने जल सम्मान। पनिहारिन गीत गाबि स्रोतक बाट साफ करू, बून्दकेँ व्यापारक कैदसँ धीरे मुक्त करू। नदी मुक्त रहत तँ माटि, माछ, मनुख हँसत, जल-न्यायक उज्जर धार सभ घरमे बसत। घैल भरैत घाट-घाट पर मलारक तान, कूप-पोखरि-इनार सभक अपन-अपन मान। पानि बिकाए वस्तु जकाँ—ई अधलाह रीति, स्रोत बचा, धार खोलि, गाबू जलक प्रीति। भरू गे पनिहारिन, मुक्त धारक जल भरू गे, बोतलक ढक्कन खोलि नदीकेँ घर घुराबू गे। ❖ अध्याय ११० अध्यायारम्भ लोकगीत : राखसँ अंकुर लोकधुन : अग्नि-प्रभाती जागू हे राख, भीतरक बीज जागू हे, पहिल बून्दक बाट जोहि कोंपल बनि आबू हे। आगि बुझल, राख बचल, राखमे बीज नुकायल, पहिल बून्द पड़िते हरियर कोंपल मुस्कायल। जे जरि गेल ओकर नाम नव वनमे बसाउ, विनाशक धूरिसँ पुनर्निर्माणक राह बनाउ। राख कहै—अन्त नहि, रूप बदलल मात्र, धैर्य, श्रम, नेह मिलिते फेर भरत ई पात्र। राखसँ अंकुर, आँसूसँ साहस उगि जाए, भोरक अगिनि ऊष्मा बनि नया घर सजाए। जरल घरक ठाम पर धीरे-धीरे बहारू, जे नाम आगि लऽ गेल, से नव वन मे उतारू। राखक ऊष्मा माटि पाबि बीयाकेँ जगाबए, प्रभातीक पहिल किरिण हरियर टूसा उगाबए। जागू हे राख, भीतरक बीज जागू हे, पहिल बून्दक बाट जोहि कोंपल बनि आबू हे। ❖ अध्याय १११ अध्यायारम्भ लोकगीत : स्वच्छ हवा साझा अधिकार लोकधुन : वायु-पराती बहू हे पवन, सभक देहरी बहू हे, साँस पर ने शुल्क, ने भेद—इहए गीत कहू हे। पवन सभक देहरी आबै, शुल्क ककरो नहि, स्वच्छ साँस पर सभक हक, भेद ककरो नहि। धुँआक स्रोत चिन्हि कऽ साफ तकनीक अपनाउ, गाछ लगाउ, चूल्हि सुधारू, नीला आकाश बचाउ। बच्चाक फेफड़ा फूल जकाँ, ओकर मान धरू, शहर-गामक हवा मिलि जीवनक गीत भरू। स्वच्छ हवा साझा अधिकार—एक स्वरमे कहू, साँसक पहरा सभ मिलि दियौ, स्वस्थ मिथिला रहू। चूल्हिक धुँआ कम करू, गाछक पाँती बढ़ाउ, कल-कारखानाक मुँह पर छन्नीक नियम लगाउ। नेनाक फेफड़ा फूल सन, ओकरा निर्मल हवा, गाम-शहर मिलि बाँटू साँसक साझा दवा। बहू हे पवन, सभक देहरी बहू हे, साँस पर ने शुल्क, ने भेद—इहए गीत कहू हे। ❖ अध्याय ११२ अध्यायारम्भ लोकगीत : आकाश भरू प्रश्न-उत्तर लोकधुन : आकाश-पराती भरू हे आकाश, प्रश्न-उत्तर सँ भरू हे, बादर बनि प्रश्न उठौ, बून्द बनि उतरू हे। खाली आकाश प्रश्न करै—नीचाँ के जागल? धरती उत्तर देत—जनक विवेक नहि भागल। प्रश्न बादर, उत्तर बून्द, संवाद बनै धार, मौनक सूखल खेतमे उगै विचारक हार। आकाश खाली राहत नहि जखन कंठ खुलै, हरेक प्रश्नक पाँखि लगा समाधान दिस उड़ै। प्रश्न-उत्तरक मेघसँ ज्ञानक वर्षा होए, खुलल मनक आकाशमे नव समाज संजोए। सूखल खेत मौनक, ओहि पर मेघ जुटाउ, जिज्ञासाक बिजुरी चमकौ, संवाद बरसाउ। हरेक प्रश्नक पाँखि, हरेक उत्तरक घर, खुलल मनक आकाश तर उगए ज्ञानक फड़। भरू हे आकाश, प्रश्न-उत्तर सँ भरू हे, बादर बनि प्रश्न उठौ, बून्द बनि उतरू हे। ❖ अध्याय ११३ अध्यायारम्भ लोकगीत : शब्दकेँ जीवन लोकधुन : अक्षर-सोहर ललना रे, आखरक सोहर हे, अर्थक देह पहिरि शब्द जनम लेलक हे। शब्द जन्मै जखन अर्थक देह ओढ़ि आए, हथेली, आँखि, श्रम, अनुभव संग अपनाय। खाली नारा नहि बनाउ, काजसँ ओकर मान, ‘न्याय’ लिखू तँ न्याय करू, ‘सेवा’ लिखू तँ दान। अक्षरक सोहर गाउ, भाषा जीवित राखू, लोकक बोली, दुख, उमंग सभ पन्नामे साखू। शब्दकेँ जीवन दिअ, जीवनकेँ स्वच्छ नाम, बोल आ कर्म मिलिते पूर्ण होए पैगाम। पालना मे नव-जन्मल शब्द, बोली लोरी गाबए, श्रम-अनुभवक काजर-टीका नजरि सँ बचाबए। 'न्याय' लिखू तँ न्याय करू—इहए ओकर अन्न, कर्मक दूध पीबि कऽ शब्द होयत प्रसन्न। ललना रे, आखरक सोहर हे, अर्थक देह पहिरि शब्द जनम लेलक हे। ❖ अध्याय ११४ अध्यायारम्भ लोकगीत : अर्थक आत्मा सम्हारू लोकधुन : दार्शनिक विदापत पद सम्हारू हे अर्थ, शब्दक आत्मा सम्हारू हे, चमकैत देहक भीतर दीप निहारू हे। शब्दक देह चमकि सकै, अर्थ भीतर रोए, नेहक नजर रखिते आत्मा फेर संजोए। ‘गरिमा’ केवल अक्षर नहि, व्यवहारक फूल, ‘सहमति’ बिना काज अधूरा, ई समाजक मूल। अर्थक आत्मा बाजारमे बेचू नहि कखनो, लोकक अनुभवसँ भाषा नवी करू सपनो। शब्द आ अर्थ संग रहत तँ विश्वास टिकत, साँचक भाषा पीढ़ी-पार उज्जर राह लिखत। 'गरिमा' बाजब सहज, निबाहब कठिन तप, 'सहमति' बिनु काज अधूरा—मन मे जपू ई जप। बजारक तराजू पर अर्थकेँ नहि चढ़ाउ, लोक-अनुभवक कसौटी पर शब्द कसि कऽ लाउ। सम्हारू हे अर्थ, शब्दक आत्मा सम्हारू हे, चमकैत देहक भीतर दीप निहारू हे। ❖ अध्याय ११५ अध्यायारम्भ लोकगीत : कण्ठक बगिया लोकधुन : कण्ठ-झूमर फुलाउ हे बगिया, कण्ठक बगिया फुलाउ हे, हरेक फूलक अपन गन्ध—नकल नहि लगाउ हे। हरेक कंठ एक फूल, अलग रंग अलग गन्ध, नकल नहि, सम्मानसँ बनत सुरक सम्बन्ध। कलाकारक अनुमति लिअ, श्रमक उचित दाम, आवाजक असल मालिकक सदिखन रहय नाम। कण्ठक बगिया सहेजि राखू, चोरी हवा न होए, लोकधुनक बीज नव पीढ़ीक स्वरमे सोए। स्वतन्त्र आवाज मिलि कऽ सुन्दर हार बनत, मिथिलाक बहुरंगी कंठ विश्वभरि गुँजत। झूमरक घेरा मे सभक अपन-अपन तान, एक-दोसरक सुर उठाउ, चोराउ नहि गान। गएनिहारक नाम रहए, श्रमक उचित दाम, बहुरंगी कण्ठ-हार सँ सजए मिथिला-धाम। फुलाउ हे बगिया, कण्ठक बगिया फुलाउ हे, हरेक फूलक अपन गन्ध—नकल नहि लगाउ हे। ❖ अध्याय ११६ अध्यायारम्भ लोकगीत : चुप्पीमे साँचक बीज लोकधुन : मौन-पराती राखू हे धीरज, चुप्पी मे बीज राखू हे, समयक ओस पाबि ओकरा कोंपल भेल ताकू हे। चुप्पी खाली नहि रहै, भीतर बीज पलै, समयक ओस पाबि एक दिन कोंपल बनि निकलै। पहिने सुनू, तखन बोलू, शब्द रहय विचार, साँचक चुप्पी तैयारी, भयक मौन बेकार। मौनक मान राखू मुदा अन्यायपर स्वर दिअ, सही क्षणमे साँचक बीज धरती फोड़ि दिअ। चुप्पीमे जागल विवेक जखन वाणी पाबत, एक मृदु सत्य सय कोलाहल ऊपर छाबत। भयक मौन खाली घैल, साँचक मौन भरल, सुनब पहिने, बाजब पाछाँ—ई क्रम सदति सरल। अन्याय देखि चुप नहि, ओतऽ स्वर उठाउ, एक मृदु सत्यक आगाँ सय हल्ला हराउ। राखू हे धीरज, चुप्पी मे बीज राखू हे, समयक ओस पाबि ओकरा कोंपल भेल ताकू हे। ❖ अध्याय ११७ अध्यायारम्भ लोकगीत : स्मृति चुकाउ सेवा सँ लोकधुन : ऋण-मंगल गीत चुकाउ हे ऋण, सुनल नामक ऋण चुकाउ हे, फूल नहि, सेवाक थारी आगाँ बढ़ाउ हे। सुनल नामक ऋण रहै, सेवा ओकर ब्याज, स्मृति केवल फूल नहि, जिम्मेदारी आज। जकर कथा सुनलहुँ, ओकर हकक संग रहू, विद्यालय, दस्तावेज, सहायता केर रंग रहू। ऋण चुकाउ धनसँ नहि, न्यायपूर्ण व्यवहार, अगिला पीढ़ीकेँ सिखाउ मानव मानक सार। स्मृतिक उधार सेवा सँ धीरे-धीरे चुकत, नामक मान बचेनिहारक आत्मा हल्लुक होत। जकर कथा कान मे अछि, तकर हक हाथ मे, पोथी-दवाइ-रोजगारक दीप ओकर साथ मे। धन सँ नहि, न्याय सँ सधैत अछि ई करजा, सधल ऋणक हल्लुक मोन—इहए असल दरजा। चुकाउ हे ऋण, सुनल नामक ऋण चुकाउ हे, फूल नहि, सेवाक थारी आगाँ बढ़ाउ हे। ❖ अध्याय ११८ अध्यायारम्भ लोकगीत : पूरा देह, पूरा मान लोकधुन : देह-अधिकार मंगल गनू हे पूरा, देहक हक पूरा गनू हे, साँस-निन्न-श्रम-सहमति—चारू धन गुनू हे। नाम बचल तँ नीक, मुदा देहक मानो चाही, स्वास्थ्य, सुरक्षा, सहमति—जीवनक सच्ची थाती। हाथक श्रम, आँखिक निन्न, छातीक साँस गनू, मनुखकेँ आधा नहि, पूरा अधिकार दियौ। देह अपन, निर्णय अपन, उपचार सभकेँ समान, कामक ठाम सुरक्षा हो, विश्रामक सम्मान। पूरा देह, पूरा मान—गीत घर-घर गाउ, जीवनकेँ सम्पूर्ण बुझि न्याय समाज बनाउ। हाथकेँ विश्राम चाही, आँखिकेँ निन्न भरि, छातीकेँ निर्भय साँस, मोनकेँ अपन घर। उपचार सभक बराबरि, काजक ठाम सुरक्षा, आधा नहि, पूरा मनुख—इहए असल शिक्षा। गनू हे पूरा, देहक हक पूरा गनू हे, साँस-निन्न-श्रम-सहमति—चारू धन गुनू हे। ❖ अध्याय ११९ अध्यायारम्भ लोकगीत : पसीनाक अक्षर लोकधुन : मजदूर श्रमगीत पढ़ू हे भाइ, पसेनाक आखर पढ़ू हे, हथौड़ा-हर-करघाकेँ कलम बुझि गनू हे। पाथरपर नाम नहि पढ़ै केवल नयनक जोर, पसीनाक अक्षर चमकय भोर-भोर, घोर-घोर। हथौड़ा, कुदालि, करघा, हल—सभ कलम समान, श्रमक हरेक चाल लिखै देशक असल गान। मजदूरक हाथ पकड़ि ओकर कथा सुनू, दाम, सुरक्षा, विश्रामसँ श्रमक मान चुनू। पसीनाक अक्षर पढ़ल तँ इतिहास साफ होए, श्रमिकक उज्जर नामसँ सभ विकास संजोए। भोरे-भोर भट्ठी जरए, साँझ धरि देह तपए, ओही ताप मे देसक असल इतिहास छपए। दाम उचित, काज सुरक्षित, साँझ विश्रामक गीत, श्रमिकक हँसी सँ चमकए विकासक भीत। पढ़ू हे भाइ, पसेनाक आखर पढ़ू हे, हथौड़ा-हर-करघाकेँ कलम बुझि गनू हे। ❖ अध्याय १२० अध्यायारम्भ लोकगीत : नर्म न्याय, दृढ़ जड़ि लोकधुन : कोंपल गीत सिंचू हे कोंपल, न्यायक कोंपल सिंचू हे, पात नरम, जड़ि पाथर-फोड़—दुनू गुण गिनू हे। न्यायक देह कोंपल सन, नर्म ओकर पात, जड़ि मुदा पाथर फोड़ै, धरै दृढ़ विश्वास। दया ओकर ओस बनै, नियम ओकर माटि, साहस सूरुज बनि दए वृद्धि दिन आ राति। कठोरता नहि शक्ति मात्र, संवेदना बलवान, नर्म न्याये जोड़ि सकै टूटल जनक प्राण। कोंपलकेँ पहरा दिअ, वन एक दिन बनत, दृढ़ जड़िक कोमल न्याय मिथिलाक रूप गढ़त। दयाक ओस भोरे-भोर, नियमक माटि तर, साहसक रौद दिन भरि, धीरजक राति भर। कठोरे टा बल नहि, करुणो पैघ शक्ति, कोमल न्यायक जड़ि मे अटल लोक-भक्ति। सिंचू हे कोंपल, न्यायक कोंपल सिंचू हे, पात नरम, जड़ि पाथर-फोड़—दुनू गुण गिनू हे। ❖ अध्याय १२१ अध्यायारम्भ लोकगीत : स्पर्शक खुलल आकाश लोकधुन : नचारीक मुक्त लय खोलू हे पिंजरा, जातिक पिंजरा खोलू हे, हाथ सँ हाथ मिला मुक्त अकास घोलू हे। जातिक पिंजरा टूटि जाए जखन हाथ मिलै, मानुखक गरम स्पर्शसँ सूखल मन फुलै। कियो ऊँच-नीच नहि, धरती सभकेँ धरे, एके पवन, एके पानि सभक जीवन भरे। बोलक सलाखी खोलू, नेहक खिड़की लाउ, स्पर्शक खुलल आकाशमे संग-संग उड़ि जाउ। हाथसँ हाथ जुड़ल रहत तँ पिंजरा टिकत नहि, मानव मानक आगाँ कोनो जाति पैघ नहि। एके माटि गढ़लक देह, एके पवन साँस, ऊँच-नीचक बोली थिक मनुखताक उपहास। बोलक सलाखि काटि लिअ, नेहक कुंजी हाथ, खुलल अकास तर सभक एक्के भोर-प्रभात। खोलू हे पिंजरा, जातिक पिंजरा खोलू हे, हाथ सँ हाथ मिला मुक्त अकास घोलू हे। ❖ अध्याय १२२ अध्यायारम्भ लोकगीत : प्रश्नक दीप लोकधुन : विदापत पदक जिज्ञासा-लय बारू हे दीप, प्रश्नक दीप बारू हे, एक उत्तर सँ दोसर बाट निहारू हे। गंगेशक प्रश्न दीप थीक, कियो बुझा नहि पाबै, एक उत्तरसँ दोसर बाट हरदम खुलि आबै। जिज्ञासा गंगाजल जकाँ मनक मैल हटाबै, साँचक पाथर छूइत-छूइत उज्जर रूप बनाबै। प्रश्न करब अपराध नहि, ज्ञानक पहिल नाम, जे पूछै से पार लगाबै भ्रमक गहींर गाम। दीप हाथमे लऽ चलू, उत्तर स्वयं फुलत, गंगेशक मुक्तिक प्रश्नसँ नव विचार उगत। गंगाजल सन जिज्ञासा मनक मैल बहाबए, साँचक पाथर छूबि-छूबि आरो निखरि आबए। पूछब अपराध नहि, ज्ञानक पहिल सीढ़ी, प्रश्नक अँजोरिया मे चलए पीढ़ी-दर-पीढ़ी। बारू हे दीप, प्रश्नक दीप बारू हे, एक उत्तर सँ दोसर बाट निहारू हे। ❖ अध्याय १२३ अध्यायारम्भ लोकगीत : स्त्रीक नाम पातपर लोकधुन : समदाउनक आशा-रूप लिखाउ गे बहिना, पात पर नाम लिखाउ गे, आधा रहल पोथीकेँ पूरा बनाउ गे। पोथीक पात खाली छल, बहिनी नाम लिखाउ, मेटायल स्त्रीक जीवनकेँ अक्षर-फूल सजाउ। माय, दादी, बेटी सभ अपन कथा कहत, पातक नस-नसमे हुनकर श्रमक नदी बहत। नाम लिखलासँ मान बढ़ै, इतिहास पूर्ण होए, आधा पोथी पूरा बनत जखन स्त्री स्वर सोए। पात-पातपर नाम उगाउ, कोंपल जकाँ हरियर, स्त्रीक स्मृतिसँ मिथिला बनत आरो समृद्ध, सुन्दर। माय-दादी-बेटीक श्रम पात-पात मे बाजए, चूल्हि-खेत-अँगनाक कथा इतिहास मे साजए। मेटायल जीवन-रेखा फेर हरियर होयत, स्त्री-स्वरक स्याही सँ मिथिला पूर्ण होयत। लिखाउ गे बहिना, पात पर नाम लिखाउ गे, आधा रहल पोथीकेँ पूरा बनाउ गे। ❖ अध्याय १२४ अध्यायारम्भ लोकगीत : प्रमाणक अगिनिसँ उजास लोकधुन : झिझिया-मंगल घुमाउ गे झिझिया, प्रमाणक दीप घुमाउ गे, छिद्र-छिद्र सँ झरैत अगिनि सँ भ्रम जराउ गे। दीपक छिद्रसँ अगिनि झरे, झूठक जाल जरे, साँचक पन्ना राख जकाँ नहि—स्वर्ण जकाँ निखरे। प्रमाण आगि दण्ड नहि, उज्जर करय विचार, जे शुद्ध अछि से चमकि उठत, मेटत भ्रमक भार। झिझियाक दीप घुमाउ, छिद्र-छिद्र जाँचू, अगिनिसँ नहि डेराउ, सत्यक रूप पहिचानू। उजास बनल प्रमाण जखन न्याय दिशा देखत, कारी ओढ़नी हटिते जनक चेहरा चमकत। झूठक जाल सन-सन जरए, साँच सोना निखरए, आगिक ई परीक्षा सँ शुद्धे टा उबरए। डर नहि, दीप बुझू—प्रमाण मित्र थिक, अन्हार ओढ़नी हटिते मुँह चमकए नीक। घुमाउ गे झिझिया, प्रमाणक दीप घुमाउ गे, छिद्र-छिद्र सँ झरैत अगिनि सँ भ्रम जराउ गे। ❖ अध्याय १२५ अध्यायारम्भ लोकगीत : रोपू न्याय, काटू आशा लोकधुन : धान-रोपनी गीत रोपू गे रोपनिहारि, न्यायक धान रोपू गे, कीचड़ मे पएर, आकाश मे आस—दुनू जोपू गे। कीचड़मे पएर धँसाउ, न्यायक धान रोपू, एक पाँति साहसक, दोसर नेहक जोपू। पानि बराबर बाँटू सभ, खेतक मान बचाउ, जकर श्रम ओकरे अन्न, साफ नियम बनाउ। रोपनीक गीत दूर धरि सामूहिक बल जगाबै, आजुक नान्हि बिरबा काल्हि सुनहर बाली लाबै। रोपू न्याय, काटू आशा, भरू जनक खलिहान, माटि कहत—संगक श्रमसँ बदलै हरेक विधान। एक पाँति साहसक, एक पाँति नेहक, पानिक बँटवारा बराबर, मान रहए खेतक। दूर धरि रोपनी-गीतक सामूहिक तान, आजुक बिरबा काल्हि झुकत सोन-बालि धान। रोपू गे रोपनिहारि, न्यायक धान रोपू गे, कीचड़ मे पएर, आकाश मे आस—दुनू जोपू गे। ❖ अध्याय १२६ अध्यायारम्भ लोकगीत : अन्नक पहिल मुठ्ठी लोकधुन : कटनी-मंगल काटू हे बाली, भोरक बाली काटू हे, पहिल मुट्ठी भूखल हाथक थारी मे साटू हे। हँसुआ चमकल भोरमे, बाली नम्र झुकै, पहिल मुठ्ठी अन्न लऽ कऽ घरक चूल्हि धुकै। पहिने भूखल हाथक भाग, तखन बाजार जाए, श्रमक पूरा दाम भेटय, किसान गीत सुनाए। अन्नक हरेक दाना भीतर मेघ, माटि, घाम, पहिल मुठ्ठी बाँटि कऽ बढ़त परिवारक मान। कटनीक हँसी कहै—मेहनत बेकार नहि, साझा थारी भरल रहत तँ भूख लाचार नहि। हँसुआक चमक मे झलकए घामक मोती, दाना-दाना मे बान्हल मेघ-माटिक पोथी। पूरा दाम किसानकेँ, तखन बजारक बेर, भरल खरिहानक हँसी सँ कटए भूखक अन्हेर। काटू हे बाली, भोरक बाली काटू हे, पहिल मुट्ठी भूखल हाथक थारी मे साटू हे। ❖ अध्याय १२७ अध्यायारम्भ लोकगीत : थारी भरत संग लोकधुन : जट-जटिनक मिलन-गीत आनू हो आनू, एक-एक मुट्ठी आनू हो, बीचक खाली थारीकेँ संगे भरल जानू हो। खाली थारी बीचमे राखू, सभ एक मुठ्ठी आनू, जट आनय धान, जटिन नून, संगमे भोजन पानू। एक घर कम, दोसर बेसी—गाम बराबर करै, साझा चूल्हि धुआँ उठाबै, भूखक राति हरै। नाम खाली थारीपर नहि, अन्नक संग लिखाउ, ककरो देहरी सूनी नहि—एहन प्रण दोहराउ। जट-जटिन हँसि कहै—संग रहब तँ भरत, एक मुठ्ठी नेहसँ पूरा संसार सँवरत। जट धान आनए, जटिन नून, केओ साग-पात, साझा चूल्हिक धुँआ मे पकए बराबरिक भात। ककरो देहरी अन्हार नहि, ककरो पेट खाली, मिलनक ई गीत गाबि भरू सभक थाली। आनू हो आनू, एक-एक मुट्ठी आनू हो, बीचक खाली थारीकेँ संगे भरल जानू हो। ❖ अध्याय १२८ अध्यायारम्भ लोकगीत : लोटामे मेघ उतरू लोकधुन : चौमासा-मलार उतरू हे मेघ, लोटा भरि उतरू हे, सूखल कण्ठ, पियासल खेत—दुनू तर करू हे। सावन मेघ घेरि अएल, लोटा आकाश धरै, बून्द-बून्द आशा भरि कऽ सूखल कंठ तरै। छप्परक धार समेटि राखू, पोखरि फेर सजाउ, जलकेँ साझा धन बुझि हरेक बून्दक मान बचाउ। खाली लोटा गीत गाबै—मेघ, हमर घर आउ, पियासक खेत, थाकल जनकेँ जीवन-जल दे जाउ। मलारक तान उठिते बादर हृदय पिघलत, लोटामे मेघ उतरि कऽ नव हरियाली फुलत। छप्परक धार गनैत नेना अँगना मे नाचए, पोखरि-इनार-अहरा फेर जलक पोथी बाँचए। बून्द-बून्द साझा धन, बिरथा नहि बहाउ, मलारक करुण तान पर बादरकेँ बजाउ। उतरू हे मेघ, लोटा भरि उतरू हे, सूखल कण्ठ, पियासल खेत—दुनू तर करू हे। ❖ अध्याय १२९ अध्यायारम्भ लोकगीत : नूनक साँच किरिया लोकधुन : मंगल-गान खाउ हे किरिया, एक चुटकी नूनक हे, जकर संग अन्न बाँटल, धोखा नहि हुनक हे। एक चुटकी नून धरू, साँचक किरिया खाउ, जे थारीक स्वाद बढ़ाबै, ओकर मान बचाउ। नून श्रमक पसीना, नून माटिक सार, नून बिना भोज अधूरा, साँच बिना व्यवहार। किरिया भयक नहि हो, जिम्मेदारीक बोल, जकर संग अन्न बाँटल, ओकरा नहि देब डोल। नूनक साँच किरिया कहै—विश्वास नहि बेचू, एक दाना जकाँ सत्यकेँ रोज हृदयमे सेचू। नून मे माटिक सार, पसेनाक सुआद, बिनु नूनक भोजन जकाँ बिनु साँचक संवाद। किरिया भय सँ नहि, जिम्मेदारी सँ खाउ, दाना-दाना सत्य हृदय मे रोज उगाउ। खाउ हे किरिया, एक चुटकी नूनक हे, जकर संग अन्न बाँटल, धोखा नहि हुनक हे। ❖ अध्याय १३० अध्यायारम्भ लोकगीत : स्वाद घर घुरल लोकधुन : सोहर-विरहक उज्जर मेल आयल हे स्वाद, घरक स्वाद घुरि आयल हे, माए-हाथक भात-गन्ध अँगना मुस्कायल हे। माए केर हाथक भातक स्वाद फेर घर आयल, धुँआ, नून, सरिसों तेल आँगनमे मुस्कायल। परदेसक जिह्वा मोन रखै तुलसीक गन्ध, एक कौरसँ खुलि जाए पुरखा-प्रेमक बन्ध। स्वाद केवल भोजन नहि, स्मृतिक घर-दुआर, जकरा बाँटू ओतय बढ़ै अपनापन अपार। घरक स्वाद घुरि आयल तँ दूरी गलि जाए, एक थारीक नेहसँ बिसरल नाम जुड़ि जाए। सरिसों तेलक छौंक उठल, तुलसी-गन्ध बसात, परदेसक जिह्वा पर उतरल पुरखा-प्रेमक भात। एक कौर मे गाम समाएल, एक थारी मे नाता, बाँटल स्वादे जोड़ि दिअए बिसरल नाम-गाथा। आयल हे स्वाद, घरक स्वाद घुरि आयल हे, माए-हाथक भात-गन्ध अँगना मुस्कायल हे। ❖ अध्याय १३१ अध्यायारम्भ लोकगीत : एक थारी, एक चान लोकधुन : सामा-चकेवा खेलू गे बहिना, सामा-चकेवा खेलू गे, एक थारीक चान सभ आँगन मे फेरू गे। एक थारीमे चान उतरि सभकेँ देखै एक, सामा कहै—बराबर बाँटू अन्न, स्नेह आ नेह। चकेवा पाँखि पसारि देत संगक मधुर सन्देश, भाइ-बहिन, पड़ोसी सभक साझा हो परिवेश। थारी गोल चन्द्रमा जकाँ भेद कतहु नहि, जकर भूख सएह पहिल, जाति-पाँति किछु नहि। एक थारी, एक चान, एक आँगनक प्यार, सामा-चकेवा गीतसँ जुड़त मिथिलाक संसार। भाइक नेह, बहिनक आशिष, चुगलाक मुँह झरकल, संगक दीप-थारी लऽ कऽ आँगन-आँगन चमकल। जकर भूख पहिने, तकर पहिल कौर, जाति-पाँति बिसरा दिअए चानक उज्जर ठौर। खेलू गे बहिना, सामा-चकेवा खेलू गे, एक थारीक चान सभ आँगन मे फेरू गे। ❖ अध्याय १३२ अध्यायारम्भ लोकगीत : रसोईक गणराज्य लोकधुन : चूल्हा-चौका लोकधुन सजाउ हे चौका, गणराज्यक चौका सजाउ हे, काज बराबर, मान बराबर—सभकेँ बुझाउ हे। तीन गोट चूल्हि, आगि एक, धुँआ एके रंग, रसोईक गणराज्यमे सभक बराबर संग। कियो काटै तरकारी, कियो पानि आनै, कियो रोटी सेंकै, कियो गीत सुनाबै। कामक मान बराबर, भोजन साझा अधिकार, चूल्हा-चौका सिखबैत लोकतन्त्रक व्यवहार। रसोईक गणराज्य कहै—सेवा नहि दासत्व, संग पकायल अन्नमे बसै प्रेमक नागरिकत्व। कियो तरकारी छीलए, कियो बेलए रोटी, कियो पानि, कियो गीत—ने पैघ, ने छोटी। सेवा दासत्व नहि, साझा प्रेमक रीति, संग पकल भोजन मे लोकतन्त्रक प्रीति। सजाउ हे चौका, गणराज्यक चौका सजाउ हे, काज बराबर, मान बराबर—सभकेँ बुझाउ हे। ❖ अध्याय १३३ अध्यायारम्भ लोकगीत : मंचक पहिल ढोल लोकधुन : पमरिया नाच-गान बजाउ हे ढोल, मंचक पहिल ढोल बजाउ हे, दबल कथाकेँ नाचक पग पर आबए दिअ हे। ढोलक पहिल चोट पड़ल—आउ, अपन नाम कहू, मंच नहि दूरक महल, गामक बीच रहू। जे कथा दबायल छल, नाचक पगमे आए, हँसी, प्रश्न, गवाही मिलि नव रंगमंच बनाए। पमरिया घूमि कहै—दर्शक सेहो भाग, कला जखन जनसँ जुड़ै, टूटै चुप्पीक दाग। मंचक पहिल ढोलसँ साहस जागि उठत, हरेक अनकहल जीवन अपन भूमिका लिखत। पमरिया घूमि-घूमि नाचए, घुँघरू बाजए छम, दर्शक-कलाकारक सीमा टूटए हरदम। हँसी-प्रश्न-गवाही मिलि नव रंग रचए, अनकहल जीवनो मंच पर अपन कथा बाँचए। बजाउ हे ढोल, मंचक पहिल ढोल बजाउ हे, दबल कथाकेँ नाचक पग पर आबए दिअ हे। ❖ अध्याय १३४ अध्यायारम्भ लोकगीत : साँसमे साहस लोकधुन : कबड्डी-खेल गीत गनू हे साँस, मुदा जीवन नहि गनू हे, हरेक धड़कनक गरिमा-नियम बुनू हे। एक साँस नामक, दू साँस गवाही, तेसर साँस संगक, चौठी जन-भलाई। सीमा पार करैत कहू—हम डेराइत नहि, साँचक पारी खेलनिहार कखनहुँ हराइत नहि। साँस गनू मुदा जीवनकेँ अंक नहि बनाउ, हरेक धड़कनक गरिमा राखि खेलक नियम सजाउ। कबड्डी-कबड्डी स्वरमे साहसक लय भरू, साँसमे संगक बल लऽ सत्य सीमा छू। पहिल साँस नाम लेल, दोसर गवाहीक, तेसर संगक, चारिम जन-भलाईक। सीमा पार करैत बाजू—डर नहि, डर नहि, साँचक पारीक खिलाड़ी कहियो हारि नहि। गनू हे साँस, मुदा जीवन नहि गनू हे, हरेक धड़कनक गरिमा-नियम बुनू हे। ❖ अध्याय १३५ अध्यायारम्भ लोकगीत : मंचपर स्मृति उजास लोकधुन : भगैत-मंगल गाबू हे भगता, स्मृतिक भगैत गाबू हे, मृदंगक ताल पर अधूरी कथा सुनाबू हे। मृदंग बाजल, दीप जरल, स्मृति मंचपर आयल, जकर कथा अधूरी छल, आदरसँ सुनायल। मृतककेँ रोदन मात्र नहि, प्रेरणाक मान, हुनकर श्रमसँ जीवित सभ सीखय नव अभियान। मंचपर नाम पढ़ू धीरे, फूल नहि ढाँकय बात, स्मृति उजास बनि देखाबै न्याय दिशाक बाट। भगैतक वीर लय कहै—सत्य फेर उठत, जकर नाम सम्मानित, ओकर सपना फुलत। दीपक घेरा बीच मे मृतकक आदर-थान, रोदन नहि, प्रेरणाक सुर—हुनकर श्रमक गान। धीरे-धीरे नाम पढ़ू, फूल ने ढाँकौ बात, वीर लयक हुंकार सँ खुजए न्यायक बाट। गाबू हे भगता, स्मृतिक भगैत गाबू हे, मृदंगक ताल पर अधूरी कथा सुनाबू हे। ❖ अध्याय १३६ अध्यायारम्भ लोकगीत : तालीक बाद काम लोकधुन : जागरण-झूमर लागू हे काज मे, ताली बजा कऽ लागू हे, मंचक जोश विद्यालय-खेत धरि पहुँचाउ हे। ताली बजल तँ हाथ नहि थाकू, काजमे लगू, मंचक उत्साह बाट, विद्यालय, घर धरि भगू। रोदन सुनि उठल भावना सेवा बनि जाए, एक प्रतिज्ञा, एक सहायता जीवन राह बनाए। ताली पाछाँ मौन नहि, जिम्मेदारी बोलै, दर्शकक हाथ श्रम करै, साँचक गाँठि खोलै। उत्सवक फूलक संग श्रमक बीज धरू, तालीक बाद कामसँ आशाक खेत भरू। भावनाक उफान उतरि सेवा-रूप धरए, एक प्रतिज्ञा, एक सहायता—डेग-डेग बढ़ए। ताली पाछाँ चुप्पी नहि, हाथ-हाथ श्रम, झूमरक ताल पर चलए जागरणक क्रम। लागू हे काज मे, ताली बजा कऽ लागू हे, मंचक जोश विद्यालय-खेत धरि पहुँचाउ हे। ❖ अध्याय १३७ अध्यायारम्भ लोकगीत : दर्शक बनल गवाह लोकधुन : जन-जागरण गीत बनू हे गवाह, दर्शक सँ गवाह बनू हे, देखल आँखि, बजाओल हाथ—दुनू सँ ऋण गनू हे। जे आँखि देखलक, ओ आँखि आब नाम लिखत, जे हाथ ताली देलक, से हाथ संग टिकत। दर्शक दूर नहि रहत, समाजक अंग बनत, मंचक कथा देहरी-देहरी जिम्मेदारी जनत। कियो सुनत, कियो लिखत, कियो बाट बनाबै, कियो पीड़ित हाथ पकड़ि न्याय-दुआर पहुँचाबै। दर्शक बनल गवाह जखन कला सफल होए, गीतक उजास जीवनक अन्हार भीतर सोए। मंच सँ उतरल कथा देहरी-देहरी जाए, कियो लिखए, कियो सुनए, कियो बाट बनाए। पीड़ितक आङुर थामि न्याय-दुआर धरि संग, कला सफल तखने जखन जीवन मे भरए रंग। बनू हे गवाह, दर्शक सँ गवाह बनू हे, देखल आँखि, बजाओल हाथ—दुनू सँ ऋण गनू हे। ❖ अध्याय १३८ अध्यायारम्भ लोकगीत : जुलूस बनल गीत लोकधुन : बटगबनीक उत्सवी चाल चलू हे जुलूस, गीत बनल जुलूस चलू हे, क्रोध नहि, आशाक फूल हाथ मे धरू हे। मंचसँ कथा उतरि चलल धूरि भरल बाट, ढोल, पात, कंठ संग बनल जनक बारात। जुलूस नहि क्रोध मात्र, आशाक चलैत घर, हरेक मोड़पर एक नव साथी, एक नव स्वर। बाट-बटोहिया गीत गाउ, प्रश्न हाथमे फूल, शान्त पगसँ बदलि सकै अन्यायक कठोर मूल। जुलूस बनल गीत जखन शहर-गाम जुड़त, संगक लयपर सत्यक नब इतिहास मुड़त। ढोल आगाँ, पात-पताका, कण्ठ-कण्ठ तान, हरेक मोड़ पर जुड़ल एक नव साथीक गान। शान्त डेगक ताल सँ कठोर जड़ि हिलए, शहर-गाम एक बाट पर आबि गला मिलए। चलू हे जुलूस, गीत बनल जुलूस चलू हे, क्रोध नहि, आशाक फूल हाथ मे धरू हे। ❖ अध्याय १३९ अध्यायारम्भ लोकगीत : बाटे रंगमंच, लोक कलाकार लोकधुन : सलहेस लोकगाथा गाबू हे गाथा, सलहेसक गाथा गाबू हे, बाटे-बाट रंगमंच, सभकेँ नचाबू हे। न टिकट, न पर्दा चाही, बाटे रंगमंच बनै, हलवाहा, बच्चा, दाई सभ कलाकार बनै। सलहेसक वीर कथा जकाँ जनक साहस गाउ, अन्यायक जंगल बीच न्याय-पथ बनाउ। हरेक चौकपर एक दृश्य, हरेक देहरी संवाद, कला आ जीवन मिलि देत परिवर्तनक स्वाद। बाटे रंगमंच जखन लोक अपन भूमिका पाबै, मिथिलाक माटि स्वयं नब महागाथा गाबै। हलवाहा वीर बनल, दाई बनलि रानी, चौक-चौक दृश्य सजल, देहरी-देहरी बानी। ने टिकट, ने परदा—जन-जन भेल पात्र, माटिक मंच पर लिखाए नव महागाथा-शास्त्र। गाबू हे गाथा, सलहेसक गाथा गाबू हे, बाटे-बाट रंगमंच, सभकेँ नचाबू हे। ❖ अध्याय १४० अध्यायारम्भ लोकगीत : कागचक खेल, नामक जीत लोकधुन : कबड्डी-दस्तावेजी धुन खेलू हे खेलू, कागचक खेल साफ खेलू हे, हरेक नाम पूरा लिखू, मोहर सँ नहि डेरू हे। कागच बीच रेखा खिंचल, नाम पारीमे जाए, मोहर जँ पकड़य दौड़ै, साँच सीमा छू आए। नियम साफ, प्रति सुरक्षित, जन पहरा साथ, दस्तावेजक खेल बदलि देत पारदर्शी हाथ। कबड्डी नहि छलक हो, प्रमाणक उत्सव हो, हरेक नाम पूरा लिखल, हरेक सहमति स्पष्ट हो। कागचक खेल साँचसँ खेलू, नामक जीत कराउ, सूखल पन्नामे जीवनक हरियर लय बसाउ। रेखा साफ खिंचल रहए, प्रति घर-घर सुरक्षित, जन-पहराक आँखि तर सहमति सभ लिखित। छलक दाउ फेल पड़ए, प्रमाणक जय होए, सूखल पन्ना पर जीवनक हरियर लय सोए। खेलू हे खेलू, कागचक खेल साफ खेलू हे, हरेक नाम पूरा लिखू, मोहर सँ नहि डेरू हे। ❖ अध्याय १४१ अध्यायारम्भ लोकगीत : बरामदा बनल जनपथ लोकधुन : कचहरी-झूमरक उज्जर चाल बिछाउ हे आसन, बरामदे पर बिछाउ हे, जूता-सहल पाथरकेँ जनपथ बनाउ हे। बरामदाक पाथर कहै—पग-पग बात लिखल, धूलि झाड़ि जन बैठत तँ न्याय-दुआर खुलल। जूता सहल पाथर आब आसन बनि जाए, गरीबक थाकल देह ओतय सम्मान पाए। दिनक प्रतीक्षा गीत बनत, रातिक मौन बयान, बरामदा जनपथ बनत जखन जागत इंसान। पाथर ठंढा हो तइयो हृदयक ताप जगाउ, कचहरीक लम्बा बाटमे संगक दीप जलाउ। पग-पगक धूलि मे लिखल प्रतीक्षाक कथा, झाड़ि-पोछि बैसू सभ, बाँटू अपन व्यथा। ठण्ढा पाथर ताप पओतै जन-देहक संग, कचहरीक लम्बा बाट पर झूमरक रंग। बिछाउ हे आसन, बरामदे पर बिछाउ हे, जूता-सहल पाथरकेँ जनपथ बनाउ हे। ❖ अध्याय १४२ अध्यायारम्भ लोकगीत : अलमारीक साँस खुलल लोकधुन : पराती खोलू हे ताला, भोरक हाथे खोलू हे, बरखों सँ दबल पन्नाकेँ हवा मे घोलू हे। अलमारीक बन्द साँस भोरक हवा पबैत, पन्ना-पन्ना फड़फड़ा कऽ अपन कथा सुनबैत। ताला खोलू सावधानी, धूलिक मान रखू, बरखोंक दबल अक्षरकेँ उज्जर आसन दिअ। फाइल नहि निर्जीव, लोकक जीवन ओतय, हरेक कागचसँ घरक गन्धि उठि आबै एतय। अलमारी साँस लैत जखन दफ्तर मानुख बनत, खुलल पन्नाक उजाससँ जन-भरोस फेर जनत। फड़फड़ाइत पन्ना-पन्ना मे ककरो घर-दुआरि, धूलिक तह तर सूतल छै हकक पूरी थारी। फाइल नहि निर्जीव—साँसक बही बुझू, खुलल अलमारीक अँजोर मे जन-भरोस गुनू। खोलू हे ताला, भोरक हाथे खोलू हे, बरखों सँ दबल पन्नाकेँ हवा मे घोलू हे। ❖ अध्याय १४३ अध्यायारम्भ लोकगीत : रद्दी नहि, बीजक पन्ना लोकधुन : बीज-रोपनी गीत खोलू गे बोरा, रद्दीक बोरा खोलू गे, फाटल पन्ना मे नुकाएल बीया जोहू गे। रद्दी बोरा खोलू बहिन, पन्ना बीज समान, ककरो घरक नक्शा ओहि, ककरो बाबाक नाम। फाटल कोना जोड़ि देब, मेटल शब्द पढ़ब, सूखल कागचक खेतमे न्यायक बीआ गड़ब। एक पन्ना एक ऋतु, एक मोहर इतिहास, सहेजल कागच देत पुनः बिसरल जनकेँ श्वास। रद्दी नहि कहियौ कखनो, स्मृतिक अन्न बचाउ, बीजक पन्ना रोपि कऽ नव अधिकार उगाउ। एक पन्ना पर बाबाक नाम, एक पर घर-नक्शा, मेटल आखर जोड़ि-जोड़ि बनए हकक रक्षा। सूखल कागचक खेत मे न्यायक बीया रोपू, बिसरल जनक साँस लेल स्मृति-जल सिंचू। खोलू गे बोरा, रद्दीक बोरा खोलू गे, फाटल पन्ना मे नुकाएल बीया जोहू गे। ❖ अध्याय १४४ अध्यायारम्भ लोकगीत : नाम घर दिस बटोहिया लोकधुन : बटगबनी चलू हे नाम, घरक बाटे चलू हे, देहरी पर माएक दीप—ओतहि धरि बढ़ू हे। अलमारी छोड़ि नाम चलल घरक पथ पकड़ि, बरामदा, सीढ़ी, धूरि पार कएल दृढ़ि। देहरीपर माए दीप लऽ बाट जोहि रहल, नामक पएरक आहटसँ सूखल आँगन हँसल। बाट लम्बा हो तइयो बटोहिया गीत गाउ, एक-दोसरक संग धरि हरेक नाम घर पहुँचाउ। घर घुरल नामसँ पुरखा सभ आशीष देत, बिसरल वंशक पात फेर हरियर रंग लेत। अलमारी-बरामदा-सीढ़ी सभ पार भेल, धूरि-भरल बाटो पर पएरक छाप गेल। आहट सुनि आँगन हँसल, तुलसी हिलल डारि, घुरल नामक टीका सँ चमकल घर-दुआरि। चलू हे नाम, घरक बाटे चलू हे, देहरी पर माएक दीप—ओतहि धरि बढ़ू हे। ❖ अध्याय १४५ अध्यायारम्भ लोकगीत : दरारमे दीप लोकधुन : झिझिया-जागरण धरू हे दीप, दरारे मे दीप धरू हे, डरक घैलाक छिद्र सँ अँजोर झरू हे। डरक घैला पर नान्हि दरार, ओतहि दीप धरू, छिद्र-छिद्रसँ उजास झरै, भीतर साहस भरू। घैला टूटत नहि तुरन्त, प्रकाश पहिने जाए, जकर मनमे भोर बसल, ओ राति पार लगाए। बहिनी सभ झिझिया घुमाउ, गीतक घेरा बनाउ, दरारकेँ कमजोरी नहि—उम्मीदक द्वार बताउ। एक किरण सय किरण बनि अन्हारक मोल घटत, डरक घैला भीतरसँ आशाक कमल फूटत। घैला फूटत नहि तुरत, पहिने पैसए इजोत, भीतरक अन्हार पघिलत, जगत मनक जोत। बहिनी-घेरा गीत गाबए, झिझिया माथ नाचए, एक किरण सय बनि कऽ रातिक हिसाब बाँचए। धरू हे दीप, दरारे मे दीप धरू हे, डरक घैलाक छिद्र सँ अँजोर झरू हे। ❖ अध्याय १४६ अध्यायारम्भ लोकगीत : लाल मोहर सेवा हाथ लोकधुन : नचारी-मंगल उतारू हे मोहर, सेवाक हाथ मे उतारू हे, लाल रंगकेँ दाग नहि, विश्वास-टीका बुझू हे। लाल मोहर हथेलीपर सेवा बनि उतरू, जनक हकक कागचपर साँचक फूल छिड़िआउ। दाग नहि, विश्वासक चिह्न होउ हरेक छाप, मोहर पड़िते खुलि जाए सहायता केर आप। हाथ जकरा चलबै, ओकर मन साफ रहय, पदक बल नहि, लोकक मान सदिखन साथ रहय। लाल रंग सूरुजक, चेतना आ प्यार, मोहर सेवा हाथ बनि खोलू जनक द्वार। छाप पड़ए कागच पर, फूल खिलए हाथ मे, जनक हकक अरजी चलए सहज-सोझ बाट मे। पदक गर्मी नहि, सूरुजक चेतना-ताप, सेवा-हाथक मोहर सँ मेटाए जनक सन्ताप। उतारू हे मोहर, सेवाक हाथ मे उतारू हे, लाल रंगकेँ दाग नहि, विश्वास-टीका बुझू हे। ❖ अध्याय १४७ अध्यायारम्भ लोकगीत : दस्तकसँ खुलत देहरी लोकधुन : देहरी-बटगबनी दियौ हे दस्तक, धीमे-धीमे दियौ हे, भीतरक 'आउ' सुनि कऽ तखने पग धरू हे। धीमे दस्तक दियौ पहिने, भीतरक स्वर सुनू, ‘आउ’ कहत तखन नेहसँ दुआर पार चुनू। हरेक घरक अपन मर्यादा, हरेक दुखक अपन चाल, सुनबाक धैर्ये खोलि सकै मनक गहींर जाल। देहरी-देहरी दस्तक दऽ भरोसक फूल धरू, प्रश्न नहि आक्रमण हो, संगक आसन करू। दस्तकसँ खुलत देहरी, आदेशसँ नहि कखनो, सम्मानक पग धरिते घर बाजत मधुर सपनो। हरेक घरक अपन मर्यादा, दुखक अपन चाल, धक्का सँ नहि, धीरज सँ खुजए मनक जाल। प्रश्नकेँ तीर नहि, बैसारक नोत बनाउ, आदरक डेग देखि देहरी अपने मुसकाए। दियौ हे दस्तक, धीमे-धीमे दियौ हे, भीतरक 'आउ' सुनि कऽ तखने पग धरू हे। ❖ अध्याय १४८ अध्यायारम्भ लोकगीत : असल प्रति चमकत लोकधुन : जाँच-झूमर मिलाउ हे पन्ना, असल-नकल मिलाउ हे, मिलानक दीप तर झूठक रंग उघाड़ू हे। साँचक प्रति कातमे राखू, झूठक रंग खुलत, मिलावटक खरोंच देखिते असल अक्षर फुलत। एक पन्ना दोसर पन्नासँ शान्तिपूर्वक बोलै, मिलानक उज्जर दीप अन्हारक गाँठि खोलै। जाँच मतलब दोष मात्र नहि, साँचक मान बचाउ, जे साफ अछि ओकर माथ पर भरोसक फूल चढ़ाउ। असल प्रति चमकत जखन जनक आँखि सजग, मिलावट खुद हारि जाए, सत्य रहय अडिग। असल प्रति चुप रहए, नकल बाजए बेसी, धीरज सँ मिलाउ—खुजत मिलावटक पेशी। जाँच दण्ड नहि, साँचक मानक रखवारी, साफ पन्ना माथ चढ़ौ, भरोसक फुलवारी। मिलाउ हे पन्ना, असल-नकल मिलाउ हे, मिलानक दीप तर झूठक रंग उघाड़ू हे। ❖ अध्याय १४९ अध्यायारम्भ लोकगीत : नान्हि गिट्ठ खोलू लोकधुन : माछमार गीत खोलू हे गिट्ठ, नान्हि-नान्हि गिट्ठ खोलू हे, जाल कतबो पैघ, धीरजक नख सँ छोरू हे। जाल बहुत पैघ हो तइयो गिट्ठऽ नान्हि ठाम, धैर्यक नखसँ खोलि सकै माछमारक काम। एक गिट्ठ खुलत, दोसर राह अपने देखत, नान्हि चिन्ह जोड़िते जालक नक्शा लेखत। जलकेँ दोष नहि दियौ, जालक चाल बुझू, माछक जीवन बचाबय लेल सही गिट्ठ चुनू। नान्हि गिट्ठ खोलू संग, हाथ नहि थाकत, साँचक नाव मुक्त जलमे फेर सहजहि नाचत। माछमारक आँगुर जानए—कतऽ ढील, कतऽ तान, एक गिरह खुजिते देखाए दोसरक निशान। जलकेँ दोष नहि, जाल बिछौनिहार चिन्हू, मुक्त जल मे माछक नाच—इहए फल गिनू। खोलू हे गिट्ठ, नान्हि-नान्हि गिट्ठ खोलू हे, जाल कतबो पैघ, धीरजक नख सँ छोरू हे। ❖ अध्याय १५० अध्यायारम्भ लोकगीत : हत्था साँचक हाथमे लोकधुन : वस्तु-जागरण गीत सुनू हे हत्था, काठक हत्थाकेँ सुनू हे, मौन वस्तुक गवाही आदर सँ गुनू हे। रबर मेटा गेल तइयो काठक हत्था बोलै, ककर हथेली पकड़ने छल, स्मृतिक गाँठि खोलै। वस्तु सभ मौन गवाह, आदरसँ ओकरा पढ़ू, हत्थाकेँ साँचक हाथमे दऽ नव उपयोग गढ़ू। मोहर सेवा लेल बनल, छलक औजार नहि, हाथ बदलत, अर्थ बदलत, वस्तु दोषी नहि। खाली हत्था कहै—आब ईमानक छाप धरू, जनक कागचपर भरोसक उज्जर फूल भरू। रबर मेटायल, काठ बचल, बचल हथेलीक छाप, वस्तु दोषी नहि कहियो, दोषी मनक पाप। हाथ बदलू, अर्थ बदलू—मोहर सेवा-काज, साँचक हाथ मे हत्था दिअ, बाजए नब आवाज। सुनू हे हत्था, काठक हत्थाकेँ सुनू हे, मौन वस्तुक गवाही आदर सँ गुनू हे। ❖ अध्याय १५१ अध्यायारम्भ लोकगीत : हाथकेँ नाम दिअ लोकधुन : करुण भगैतक आशा-लय दिअ हे नाम, हाथ-हाथकेँ नाम दिअ हे, 'ऊपरक' धुँआ छोड़ि जिम्मा अपने लिअ हे। मोहर अपने नहि चलै, हाथ ओकरा चलबै, हाथक पाछाँ मन रहै, मन दिशा बतबै। काजक जिम्मेदारीसँ कियो मुख नहि मोड़ू, ‘ऊपर’क धुँआ छोड़ि अपन नाम साफ जोड़ू। हाथ जँ सेवा करै तँ आशीष ओकर भाग, हाथ जँ छल करै तँ साँच करै ओकर जाग। हाथकेँ नाम दिअ सभ, उत्तरदायित्व जागत, नाम सहित कएल काज जनक भरोस बढ़त। मोहर अपने नहि चलए, चलबैत अछि हाथ, हाथक पाछाँ मन, मनक पाछाँ बात। सेवा कएल हाथ पर आशीषक फूल झरए, छल कएल हाथ साँचक दर्पण सँ डरए। दिअ हे नाम, हाथ-हाथकेँ नाम दिअ हे, 'ऊपरक' धुँआ छोड़ि जिम्मा अपने लिअ हे। ❖ अध्याय १५२ अध्यायारम्भ लोकगीत : ऊपरक बोलक मूल खोजू लोकधुन : प्रश्न-नचारी पूछू हे पूछू, 'ऊपर के?'—पूछू हे, धुँआक माथ ताकि जिम्मेदार खोजू हे। ‘ऊपर सँ कहल’ सुनिते पूछू—ऊपर के? आकाश, पद कि मनुख—उत्तर देत से। बोलक माथ खोजिते धुँआ आकार पाबै, जिम्मेदारीक नाम लिखल तँ झूठ पाछाँ धाबै। प्रश्न सम्मानसँ करू, मुदा प्रश्न छोड़ू नहि, आदेश जँ अन्याय करे, ओकरा मानू नहि। ऊपरक बोलक मूल खोजू, जड़ि धरि दीप लिअ, साफ उत्तर भेटलासँ जनक विश्वास दिअ। 'ऊपर सँ आदेश'—सुनि माथ नहि नमाउ, आकाश, पद कि मनुख—पहिने नाम कहाउ। सम्मान सँ पूछल प्रश्न विद्रोह नहि थिक, जड़ि धरि पहुँचल दीप सँ उत्तर भेटए नीक। पूछू हे पूछू, 'ऊपर के?'—पूछू हे, धुँआक माथ ताकि जिम्मेदार खोजू हे। ❖ अध्याय १५३ अध्यायारम्भ लोकगीत : खूँटीपर संकेत टांगू लोकधुन : खोज-बटगबनी टाँगू हे संकेत, खाली खूँटी पर टाँगू हे, अनुपस्थितक मौनो सँ बाट माँगू हे। खाली खूँटी देखिते बुझू किछु छल एतय, धागा, गन्ध, खरोंच सभ बाट देखाबै ततय। दक्षिणक किसानक बात, नदीपारक विधवा, छोट संकेत जोड़ि बनत साँचक पूरा कथा। खूँटीपर चिन्ह टांगू, ताकि कियो बिसरै नहि, अनुपस्थित वस्तुक मौन सेहो बेकार नहि। खोजक गीत गाबि चलू, सूक्ष्म बात सम्हारू, नान्हि संकेतक हाथ पकड़ि अन्हार पार उतारू। धागाक रेशा, गन्धक रेखा, खरोंचक इशारा, नान्हि-नान्हि चिन्ह जोड़ि भेटए कथाक किनारा। दच्छिनक किसान, नदी-पारक विधवाक बात, सूक्ष्मक हाथ पकड़ि कऽ पार करू अन्हार-रात। टाँगू हे संकेत, खाली खूँटी पर टाँगू हे, अनुपस्थितक मौनो सँ बाट माँगू हे। ❖ अध्याय १५४ अध्यायारम्भ लोकगीत : बाबाक आसन पर भोर लोकधुन : निर्गुण-प्रभाती बैसू हे कने, बाबाक आसन लग बैसू हे, ओसक मोती-भरल काठक वचन सुनू हे। बाबाक आसन नमी सँ भरल, ओसक मोती झलकै, अनलिखल वचन खेतक मेड़पर चुपचाप पलकै। संतान बैसि सुनू कने, काठो कथा सुनाबै, पुरखा केर साँचक सीख भोरक राह देखाबै। आसन खाली नहि कखनो, स्मृति ओतय रहै, बाबाक श्रमक गन्धि हवा संग घरमे बहै। भोरक सूर्य प्रणाम करै ओ पुरनका स्थान, आसनसँ उठत नव पीढ़ीक ईमानक अभियान। ने मूर्ति, ने पोथी—खाली आसन बाजए, खेतक मेड़ पर अनलिखल सीख विराजए। श्रम-गन्ध हवा मे, स्मृति घर-आँगन मे, निर्गुण भोरक किरिण उतरए मन-दर्पण मे। बैसू हे कने, बाबाक आसन लग बैसू हे, ओसक मोती-भरल काठक वचन सुनू हे। ❖ अध्याय १५५ अध्यायारम्भ लोकगीत : मौन भोजमे बोलक दाना लोकधुन : भोज-मंगल गीत परसू हे थारी, साँचो संग परसू हे, जेकर नाम पर अन्न, तकर कथो कहू हे। थारीमे चावल उज्जर, संगमे साँच परोसू, दानक हरेक दानासँ जनक सम्मान जोरसू। मौन भोज नहि, स्मृतिक गीत सभ मिलि गाउ, जेकर नामपर अन्न, ओकर कथा सुनाउ। एक दाना एक श्रम, एक लोटा एक पियास, भोज तखने पुण्य जखन साझा हो विश्वास। थारी-थारी बोलक दाना प्रेमसँ भरि दिअ, दानकेँ दिखावा नहि, मानव सेवा कऽ लिअ। उज्जर चाउर, दालिक धार, तरुआक सुगन्ध, संगे-संग स्मृति-गीत, टूटए मौनक बन्ध। एक दाना श्रमक, एक लोटा पियासक मान, साझा विश्वासक भोजे थिक असल पुण्य-दान। परसू हे थारी, साँचो संग परसू हे, जेकर नाम पर अन्न, तकर कथो कहू हे। ❖ अध्याय १५६ अध्यायारम्भ लोकगीत : उज्जर कपड़ामे पारदर्शिता लोकधुन : सोहर-मंगल ओढ़ू हे उज्जर, भीतरो उज्जर ओढ़ू हे, धागा-धागा साफ, गिरहो साफ जोड़ू हे। उज्जर कपड़ा ओढ़ि कऽ भीतर उज्जर रहू, धागा-धागा साफ राखू, छलक गाँठि नहि सहू। दान जँ हो तँ नाम, हिसाब, उद्देश्य खुलल, पारदर्शी हाथसँ सेवा केर कमल फुलल। उज्जर रंग केवल बाहरक सजावट नहि, मनक साफगिरी बिना पुण्यक आहट नहि। कपड़ा हवा लगिते जेना आर-पार देखाए, सेवा सेहो खुलल रहय, जन भरोस पाबै। दानक थारी उघारल—नाम, हिसाब, प्रयोजन, हवा आर-पार बहए जेना उज्जर वसन। बाहरी चमक सँ पैघ भीतरक साफगिरी, खुलल हाथक सेवा पर उतरए भोर-भिनसरी। ओढ़ू हे उज्जर, भीतरो उज्जर ओढ़ू हे, धागा-धागा साफ, गिरहो साफ जोड़ू हे। ❖ अध्याय १५७ अध्यायारम्भ लोकगीत : लोहेक पेटमे जीवन लोकधुन : संदूक-जागरण खोलू हे संदूक, धीरे-धीरे खोलू हे, लोहाक पेटक साँसकेँ सूरुज सँ जोड़ू हे। लोहेक पेट खोलू धीरे, भीतर इतिहास, कागच, कपड़ा, बीज, चाबी—सभमे लोकक श्वास। जंगक परत हटत जखन अक्षर चमकि उठत, बरखोंक दबल गवाही नव पाँखि लऽ उड़त। संदूककेँ कब्र नहि, स्मृतिक घर बनाउ, जे भेटै ओकर मान राखि सूची साफ बनाउ। लोहेक पेटमे जीवन अछि, आदरसँ ओकरा खोलू, अन्हारमे राखल साँचकेँ सूरुजक संग जोड़ू। जंगक परत तर सूतल कागच-कपड़ा-बीज, हरेक वस्तु मे धड़कए ककरो जीवन-चीज। कब्र नहि, स्मृति-घर—सूची साफ बनाउ, बरखोंक दबल गवाहीकेँ नब पाँखि लगाउ। खोलू हे संदूक, धीरे-धीरे खोलू हे, लोहाक पेटक साँसकेँ सूरुज सँ जोड़ू हे। ❖ अध्याय १५८ अध्यायारम्भ लोकगीत : अपन हस्ताक्षर अपन अधिकार लोकधुन : गवाही-समदाउनक उज्जर चाल सम्हारू हे रेखा, हस्ताक्षरक रेखा सम्हारू हे, पढ़ि-बुझि कऽ टा हथेली आगाँ पसारू हे। अपन हस्ताक्षर अपन स्वर, कियो नहि चोरै, रेखा-रेखामे जीवनक सहमति अपना ठौरै। पहिने पढ़ू, बुझू, तखन हथेली आगाँ बढ़ाउ, जे बात नहि मानल, ओहि पर नाम नहि चढ़ाउ। साक्षर हो वा अंगूठा, अधिकार बराबर, सम्मति बिना कागच सूखल, आत्मा बिनु घर। अपन हस्ताक्षरक मान घर-घर सिखाउ, नामक रेखामे स्वतन्त्रताक दीप जलाउ। अक्षर हो वा अंगूठा—मान एक्के रंग, सहमतिक बिनु कागच थिक आत्मा-बिनु अंग। जे नहि मानल मोन सँ, ओहि पर नाम नहि, अपन रेखाक मालिक अपने—ई बिसरू नहि। सम्हारू हे रेखा, हस्ताक्षरक रेखा सम्हारू हे, पढ़ि-बुझि कऽ टा हथेली आगाँ पसारू हे। ❖ अध्याय १५९ अध्यायारम्भ लोकगीत : अंगूठाक मान लोकधुन : श्रम-मंगल गीत लगाउ हे छाप, बुझि कऽ अंगूठा लगाउ हे, गोल निशान मे सूरुजक मान जगाउ हे। अंगूठाक गोल निशान खेतक सूरुज समान, श्रमिकक पूरा सहमति, ओकर पूर्ण पहिचान। जीवित हाथे छाप दए, बुझि कऽ दए स्वीकृति, मृतकक नामक रक्षा हो, नहि बनय विकृति। स्याही लागल अंगूठा कहै—हम उपस्थित छी, अपन हकक पन्नापर स्वतन्त्र हस्ताक्षर छी। अंगूठाक मान बचाउ, शिक्षा संग बढ़ाउ, हरेक श्रमिककेँ अपन कागच खुद पढ़बाक बल दिअ। जीवित हाथक स्वीकृति, जागल मनक हामी, मृतकक नाम पर छल—सभसँ पैघ खामी। स्याही-रंगल आंगुर बाजए—हम उपस्थित, अक्षर-ज्ञानक दीप संग हक रहए सुरक्षित। लगाउ हे छाप, बुझि कऽ अंगूठा लगाउ हे, गोल निशान मे सूरुजक मान जगाउ हे। ❖ अध्याय १६० अध्यायारम्भ लोकगीत : गोदाम खुलल, हिसाब उजियार लोकधुन : मजदूर झूमरक उत्सवी चाल खोलू हे गोदाम, सूरुजक आगाँ खोलू हे, बोरा-बोरा हिसाबकेँ जन-आँखि सँ तौलू हे। गोदामक दुआर खुलल, सूरुज भीतर आयल, कागच, बोरा, मोहर सभ साफ-साफ देखायल। जेकर वस्तु ओकर नाम, जेकर श्रम ओकर दाम, हिसाबक हरेक पाँतिमे रहय पूरा पहिचान। मजदूर झूमर गाबि कहै—खुलल रहय भंडार, चोरीक छाह टिकत नहि जखन जन पहरादार। गोदाम पेट नहि आब, जन-लेखाक घर, उज्जर हिसाबसँ फुलत विश्वासक नगर। जेकर श्रम तेकर दाम, जेकर माल तेकर नाम, खुलल पाँति-पाँति लेखा, चोरीक छाह नाकाम। झूमरक ताल पर नाचए बोरा-तराजू-मोहर, जन-पहराक अँजोर मे विश्वासक नगर। खोलू हे गोदाम, सूरुजक आगाँ खोलू हे, बोरा-बोरा हिसाबकेँ जन-आँखि सँ तौलू हे। ❖ अध्याय १६१ अध्यायारम्भ लोकगीत : बोलू, संगमे सभ छी लोकधुन : सामूहिक जागरण गीत बोलू हे बोलू, संग मे सभ छी—बोलू हे, 'ककरो नहि कहू'क ताला स्वर सँ खोलू हे। ‘ककरो नहि कहू’क ताला स्वर मिलिते टूटै, एक कंठसँ दोसर कंठ धरि साहस-पानि छूटै। बहिनी, भाय, पड़ोसी सभ गोल घेरा बनाउ, डरक बात अकेले नहि, संग-संग सुनाउ। जतय दस कान जागल, छल ओतय टिकत नहि, नामसँ नाम जुड़ल रहत, कियो अकेल पड़त नहि। बोलू धीरे, बोलू साफ, साँचक लय पकड़ू, संगमे सभ छी—एहि मंत्रसँ अन्हार फोड़ू। एक कण्ठक धीमा स्वर, दस कण्ठक धार, फुसफुसीक डर पघिलए, खुजए बन्द दुआर। बहिन-भाय-पड़ोसीक गोल घेरा साजू, अकेलेपनक अन्हार पर संगक ढोल बाजू। बोलू हे बोलू, संग मे सभ छी—बोलू हे, 'ककरो नहि कहू'क ताला स्वर सँ खोलू हे। ❖ अध्याय १६२ अध्यायारम्भ लोकगीत : स्वरक मोहर खुलल लोकधुन : भगैत-जागरण बाजू हे मृदंग, बन्द स्वरकेँ जगाबू हे, दस फोनक एक्के साँसकेँ लोकगीत बनाबू हे। मृदंगक पहिल चोट पर बन्द स्वर खुलि जाए, दस फोनक एके साँस लोकगीत बनि जाए। मोहर जँ आवाज दबौने, कंठ ओकरा खोलत, गामक सामूहिक गान झूठक देबाल डोलत। एक स्वर छोट होइत अछि, संग भेल तँ धार, साँचक गीत बहैत-बहैत पार करै दरबार। मृदंग बाजू, नाम पुकारू, भयक राति विदा, स्वरक मोहर खुलल जखन, न्याय भेल सदा। जकर कण्ठ दाबल गेल, ओकर सुर उठाउ, गाम भरिक सामूहिक तान मे ओकरा मिलाउ। एक धार छोट, संग भेने गंगा-बलान, झूठक देबाल थरथराए, सुनि साँचक गान। बाजू हे मृदंग, बन्द स्वरकेँ जगाबू हे, दस फोनक एक्के साँसकेँ लोकगीत बनाबू हे। ❖ अध्याय १६३ अध्यायारम्भ लोकगीत : कार्बनमे बचल उजास लोकधुन : कागच-बटगबनी सहेजू हे कार्बन, कारी रेखा सहेजू हे, हटल पन्नाक छापो मे भोरक बाट देखू हे। पन्ना हटि सकैत अछि, छाप कतऽ हटत, कार्बनक कारी रेखा भोरक बाट कहत। नान्हि निशान सहेजि राखू, जोड़ू एक-एक तार, मेटायल अक्षर फेर बनत साँचक उज्जर हार। हावा जँ पन्ना उड़बय, स्मृति ओकरा धरत, धूलि जँ चेहरा ढाँकय, जनक आँखि पढ़त। कार्बनमे बचल उजास कहै—हिम्मत नहि हारू, छोट प्रमाणक पाँखि लगा सत्यक गाम उजारू। ऊपरक कागच उड़ि गेल, तर मे रहल निशान, नान्हि-नान्हि तार जोड़ि बनत पूरा बयान। हवा उड़ाबए, धूलि ढाँकए—स्मृति दुनू सँ पार, छोट प्रमाणक पाँखि पर उड़ए साँचक हार। सहेजू हे कार्बन, कारी रेखा सहेजू हे, हटल पन्नाक छापो मे भोरक बाट देखू हे। ❖ अध्याय १६४ अध्यायारम्भ लोकगीत : सत्रह-सीक कुंजी लोकधुन : रहस्य-बटगबनीक तेज चाल पकड़ू हे कुंजी, सत्रह-सीक कुंजी पकड़ू हे, नान्हि अंकक हाथ धरि पैघ ताला झकझोरू हे। नान्हि अंक सत्रह-सी, हथेलीमे कुंजी, पैघ ताला काँपि उठल, जागल बुद्धि-सूँझी। धागा पकड़ि धीरे चलू, गाँठि अपने खुलत, छोट संकेतक मान रखू, बड़का जाल मिलत। राति गहींर हो तइयो नेनाक दीप जलै, कुंजी साँचक हाथमे हो तँ बन्द घर खुलै। सत्रह-सी नहि डरक नाम, खोजक पहिल धाम, एक नान्हि चिन्हसँ भेटत न्याय दिशाक गाम। तेज चालि, थिर आँखि, डेग-डेग होसियारी, धागा-धागा खुजैत जाए जालक तैयारी। राति गहींर, दीप नान्हि—तइयो बाट सूझए, साँचक हाथक कुंजी सँ बन्द केबाड़ो बूझए। पकड़ू हे कुंजी, सत्रह-सीक कुंजी पकड़ू हे, नान्हि अंकक हाथ धरि पैघ ताला झकझोरू हे। ❖ अध्याय १६५ अध्यायारम्भ लोकगीत : तेतरि घाटपर नाव लोकधुन : नाविक गीत खोलू हे रस्सी, तेतरि घाटक रस्सी खोलू हे, प्रश्नक चप्पू, साँचक चप्पू—दुनू संग बोरू हे। तेतरि घाटपर भोर भेल, रस्सी खोलू नाव, छाहक पाछाँ देह मिलत, धैर्यक राखू भाव। धार बदलै, नाविक नहि अपन दिशा बिसरै, ताराक छोट निशान देख पानि-पानि उतरै। एक चप्पू प्रश्नक हो, दोसर साँचक बल, दुनू मिलि पार लगाबै गहींर अपराधक जल। घाट पुकारै—आउ सभ, नाव अकेली नहि, संग चलत जन-विश्वास तँ दूरी भारी नहि। भोरक कुहेस पातर भेल, धार बदलए रंग, नाविकक थिर आँखि मे ताराक निशान संग। गहींर जल, अनचिन्ह छाह—डोलए नहि नाव, जन-विश्वासक पाल तनल, घाट-घाट पड़ाव। खोलू हे रस्सी, तेतरि घाटक रस्सी खोलू हे, प्रश्नक चप्पू, साँचक चप्पू—दुनू संग बोरू हे। ❖ अध्याय १६६ अध्यायारम्भ लोकगीत : बखारीमे धानक गन्ध लोकधुन : कोठी-बखारी मंगल गीत खोलू हे बखारी, डर झाड़ि कऽ खोलू हे, सड़ल चुप्पी बाहर, धानक गन्ध घोलू हे। बखारी खोलू, डर नहि—धानक गन्ध भरू, सड़ल चुप्पी बाहर फेकू, नव बीआ घर धरू। हरेक दाना मेहनत कहै, हरेक भूसा इतिहास, अन्नक कोठी बनय पुनः भरोसक निवास। माए झाड़ू फेरि कहै—अन्हार आब न रहत, खुलल झरोखा, सूखल माटि, नया मौसम बहत। बखारीमे धान भरत तँ घरक निन्न हँसत, डरक सड़ल गन्ध हटत, जीवन फेर बसत। माए झाड़ू फेरए, झरोखा सँ रौद पैसए, दाना-दाना मेहनतक कथा कोठी मे बैसए। नव बीयाक बोरा चढ़ल, मूस-डाह पड़ायल, भरल बखारी देखि घरक निन्न मुस्कायल। खोलू हे बखारी, डर झाड़ि कऽ खोलू हे, सड़ल चुप्पी बाहर, धानक गन्ध घोलू हे। ❖ अध्याय १६७ अध्यायारम्भ लोकगीत : माय, असल आवाज चिन्हू लोकधुन : माए-बौआ सोहर चिन्हू गे माय, असल तान चिन्हू गे, लाखो नकलक बीच बौआक सुर गिनू गे। माय, तोहर कान चिन्है बौआक असल तान, नकल चाहे लाख करै, नेह बताबै प्राण। पहिने गामक नाम पूछू, बालपनक एक बात, जवाबमे जँ घर नहि महकै, रोकि दिअ ओ बाट। डरक आदेश मानू नहि, संगमे लोक बजाउ, असल बौआक स्नेहक स्वर हृदयसँ चिन्हू। माय केर बुद्धि दीप थीक, ठगक राति हरत, नेहक सत्यक आगाँ नकली आवाज झरत। पहिने पूछू गामक नाम, बचपनक निशानी, जँ उत्तर मे घर ने महकए, बूझू ठगक बानी। डरक हड़बड़ी मे कतहु टाका नहि पठाउ, पड़ोसी-परिजन बजा कऽ दोबर जाँच कराउ। चिन्हू गे माय, असल तान चिन्हू गे, लाखो नकलक बीच बौआक सुर गिनू गे। ❖ अध्याय १६८ अध्यायारम्भ लोकगीत : गामक नाम शहर जगाउ लोकधुन : नगर-बटगबनी बाजू हे घण्टी, शहर मे गामक घण्टी बाजू हे, कच्चा दुआरक स्वर सँ पक्का भवन जगाउ हे। गामक नाम शहर पहुँचि घंटी जकाँ बाजै, पेंशन, बैंक, मुकदमा सभ साँचक बाट साजै। कच्चा दुआरसँ उठल स्वर ऊँच भवन चढ़त, माटिक गन्ध शीशा-घरक बन्द हवा बदलत। गाम अकेल नहि आब, शहरक कान जागल, एक नामक पाछाँ पूरा जनसमुदाय लागल। बाट-बाट बटगबनी गाउ—हक नहि रुकत, गामक उज्जर नामसँ शहरक गला खुलत। पेंशन-बैंक-कचहरीक बाट आब सून नहि, एक नामक पाछाँ ठाढ़ सगर गाम—कम नहि। माटिक गन्ध पैसिते बन्द हवा बदलए, ऊँच भवनक कानो मे गामक स्वर सम्हरए। बाजू हे घण्टी, शहर मे गामक घण्टी बाजू हे, कच्चा दुआरक स्वर सँ पक्का भवन जगाउ हे। ❖ अध्याय १६९ अध्यायारम्भ लोकगीत : चन्द्रमा साफ करब लोकधुन : मधुश्रावणी चन्द्र-गीत धोउ गे बहिना, चानक दाग धोउ गे, नकली चमक फेकि असल किरण जोहू गे। चन्द्र दू हो वा दस हो, असल चान एक, काजरक दाग धोइ देत जनक जागल नेह। आकाशक उज्जर थारी सभकेँ बराबर देखै, नकली चमकक पाछाँ साँचक किरण लेखै। बहिनी सभ मधुश्रावणी गीतमे प्रश्न उठाउ, कलंकक खोल हटाकऽ असल चेहरा लाउ। चानक प्रकाश बँटैत अछि, अधिकारो बँटू, कारी कक्षक दुआर खोलि उज्जर दिन गढ़ू। मधुश्रावणीक गीत-घेरा, फूल-पात सजाओल, कथाक बीच प्रश्नो एक-एक टाँकि गाओल। आकाशक उज्जर थारी सभ आँगन उतरए, चानक संग अधिकारो बराबरि बँटए। धोउ गे बहिना, चानक दाग धोउ गे, नकली चमक फेकि असल किरण जोहू गे। ❖ अध्याय १७० अध्यायारम्भ लोकगीत : असल चान उदित लोकधुन : कोहबरक चन्द्र-मंगल उगू हे चान, असल चान उगू हे, कागचक नकली चान भोरक संग मेटू हे। कागचक नकली चान उतरि जाए राति, आँगनक असल चन्द्रमा देत नव सौगाति। कोहबरक चित्रमे माछ, बाँस, कमल फुलाय, साझा जीवन, साफ वचन, प्रेमक राह देखाय। प्रकाश जे बाँटल जाए, सएह चानक मान, जे केवल भ्रम चमकाबै, ओ नहि आसमान। असल चान उदित होउ, सभ चेहरा उजियार, साँचक शीतल जोतिसँ भरू घर-दुआर। कोहबरक भीत पर माछ-कमल-बाँसक जोड़ी, साझा जीवन, साफ वचन—प्रेमक ई डोरी। जे इजोत बाँटए, सएह असल आसमान, भ्रमक चमकी झड़ि जाए, रहए शीतल मान। उगू हे चान, असल चान उगू हे, कागचक नकली चान भोरक संग मेटू हे। ❖ अध्याय १७१ अध्यायारम्भ लोकगीत : भय उतारि साहस पहिरू लोकधुन : गाछी-जागरण उतारू हे गठरी, भयक गठरी उतारू हे, गाछी तरक घेरा मे साहस पहिरू हे। गाछी तरे आसन बिछल, भयक गठरी खोलू, एक-एक गाँठि उतारि सभ अपन साँच बोलू। शपथक भारी शब्द नहि, नेहक हाथ पर्याप्त, काँपैत कंठो बाजि उठत जखन संग सुरक्षित। भय उतारि साहस पहिरू, नव वस्त्रक समान, जनक घेरा रक्षा बनत, जगत सुनत बयान। गाछी कहै—डेराउ नहि, पात सभ पहरुआ, साँचक बाट चलनिहारक संग अछि पुरुआ। एक-एक गाँठ खुजए, एक-एक स्वर जागए, काँपैत कण्ठो सुरक्षित घेरा मे बाजए। शपथ नहि भारी शब्दक, नेहक हाथ बेस, पात-पात पहरुआ, संगे पुरबाक परबेस। उतारू हे गठरी, भयक गठरी उतारू हे, गाछी तरक घेरा मे साहस पहिरू हे। ❖ अध्याय १७२ अध्यायारम्भ लोकगीत : तीन रंगक बन्धन लोकधुन : धागा-मंगल गीत बान्हू हे धागा, तीन रंगक धागा बान्हू हे, लाल-पीयर-हरियरकेँ एक मूल मे सान्हू हे। लाल धागा साहसक, पीयर स्मृतिक फूल, हरियर आशा बाँधि देत तीनूकेँ एक मूल। गाँठि नहि बन्धनक हो, सहमतिक पहिचान, जे कहै ‘हम संग छी’, से सभसँ पैघ दान। कलाई-कलाई धागा बन्हू, भयक जाल कटत, तीन रंगक उज्जर अर्थ घर-घर दीप जड़त। लाल-पीयर-हरियर गाउ, जीवनक त्योहार, साहस, स्मृति, आशासँ खुलत न्याय-द्वार। लाल कहए—डर नहि, पीयर कहए—मोन राखू, हरियर कहए—आगाँ बढ़ू, आशाक फल चाखू। गाँठ सहमतिक पड़ए, बन्धन नहि बेड़ी, कलाई-कलाई जुड़ि बनए रक्षाक घेरी। बान्हू हे धागा, तीन रंगक धागा बान्हू हे, लाल-पीयर-हरियरकेँ एक मूल मे सान्हू हे। ❖ अध्याय १७३ अध्यायारम्भ लोकगीत : पन्द्रह बरखक बीज लोकधुन : बरहमासा बीज-गीत जागू हे बीया, पन्द्रह बरखक बीया जागू हे, फागुनक पुरबा पाबि छिलका त्यागू हे। पन्द्रह बरख माटि तरे बीज चुपचाप रहल, ऋतु-ऋतु ओस पीबैत भीतर जीवन पलल। आब फागुनक पवन लगल, खोलि रहल छिलका, पुरान पंजीसँ उगि आयल साँचक हरियर तिनका। देर भेल तँ की भेल, बीज समय चिन्है, न्यायक अंकुर पाथर फोड़ि अपन दिशा गिन्है। पन्द्रह बरखक धैर्य आब फसल बनि हँसत, जकर नाम दबायल छल, ओ सभ भोर बसत। असाढ़-सावन ओस पीलक, माघक ठण्ढ सहल, बारहो मास माटिक कोरा मे चुपचाप पलल। देर भेल तँ हार नहि—बीज समय चिन्हए, पाथर फोड़ि उगल अंकुर अपन दिशा गिन्हए। जागू हे बीया, पन्द्रह बरखक बीया जागू हे, फागुनक पुरबा पाबि छिलका त्यागू हे। ❖ अध्याय १७४ अध्यायारम्भ लोकगीत : नामक पाथर पर दीप लोकधुन : नचारी-मंगल जराउ हे दीप, नामक पाथर पर जराउ हे, कठोर शिलाकेँ नरम जोति सँ मनाउ हे। पाथर कठोर सही, दीपक जोति नरम, नरम उजासे पढ़ि सकै बरखोंक दबल करम। नामक पाथर धोइ कऽ फूल आ अक्षत धरू, स्मृतिक आसनपर बैठि न्याय-पथक प्रण करू। एक दीपसँ सय दीप, एक नामसँ गाम, शिला आब चुप नहि रहत, गुनगुनायत नाम। पाथरपर दीप जरत तँ राति हारि जाए, नामक मान सम्हारनिहार इतिहास बनि जाए। धोइ-पोछि फूल-अक्षत सँ स्मृति-आसन सजाउ, दबल-दबल कथा सभकेँ नरम जोति मे बाँचि जाउ। एक दीप सँ सय दीप, एक नाम सँ गाम, चुप शिला गुनगुना उठत—गूँजत नाम-प्रणाम। जराउ हे दीप, नामक पाथर पर जराउ हे, कठोर शिलाकेँ नरम जोति सँ मनाउ हे। ❖ अध्याय १७५ अध्यायारम्भ लोकगीत : सूचीमे जीवन भरू लोकधुन : पुत्र-पिता श्रमगीत भरू हे साँस, सूचीक पाँति मे भरू हे, आँकड़ाक पाछाँ बाबाक दिन-रैन धरू हे। सूची केवल पाँति नहि, बाबाक पूरा दिन, हथौड़ा, पसीना, हँसी, घरक आशा चिन्ह। दीनबंधु कलम उठाउ, नामक संग कथा लिखू, जकरा पाछाँ परिवार, ओकर जीवन साफ देखू। अन्तिम सूची अन्त नहि, नव हाजिरीक द्वार, मृतकक मान बचाबयवाला बनत जीवित पहरदार। हरेक पाँतिमे साँस भरू, आँकड़ा नहि मानू, बाबाक श्रमक उज्जर सूरज संततिकेँ आनू। हथौड़ाक ताल, पसेनाक बून्द, साँझक थाकल हँसी, पाँति-पाँति मे टाँकू घरक आशा जे बसी। अन्तिम सूची अन्त नहि, नव हाजिरीक दुआर, मृतकक मान जोगओनिहार जीवित पहरदार। भरू हे साँस, सूचीक पाँति मे भरू हे, आँकड़ाक पाछाँ बाबाक दिन-रैन धरू हे। ❖ अध्याय १७६ अध्यायारम्भ लोकगीत : कारी चादर पर उजास लोकधुन : समारोह-मंगल गीत धरू हे दीप, कारी चादर पर धरू हे, अन्हारक आसनकेँ अँजोर सँ भरू हे। कारी चादर बिछल सही, ओहि पर दीप धरू, नाम पढ़ू आदरसँ, मंचकेँ साँचसँ भरू। माला फूलक हो तखन जखन काजो फूल समान, सेवा-मंचपर जनक प्रश्न पाबय उचित स्थान। चादर कारी प्रतिरोधक, लाजक ढाकन नहि, ओहि पर रखल प्रमाण कहत—हम सभ मौन नहि। दीपक पाँति बनाउ सभ, मंचक रूप बदलत, अन्हारक ओही आसनपर जन-उजास फुलत। माला तखने फूल जखन काजो फूल-समान, मंच पर जनक प्रश्नकेँ भेटए पहिल स्थान। कारी रंग लाज नहि, प्रतिरोधक बाना, दीप-पाँति सजा कऽ गाबू उजासक गाना। धरू हे दीप, कारी चादर पर धरू हे, अन्हारक आसनकेँ अँजोर सँ भरू हे। ❖ अध्याय १७७ अध्यायारम्भ लोकगीत : कागच छातीसँ, जन संग लोकधुन : घर-घर बटगबनी लगाउ हे छाती सँ, कागच छाती सँ लगाउ हे, मुदा असगर नहि—देहरी-देहरी जन जुटाउ हे। कागच छातीसँ लगाउ, मुदा अकेले नहि चलू, देहरी-देहरी लोक जुटाउ, साँचक माला गुँथू। बरामदासँ गाम धरि बाट लंबा होए, संगक पएर पड़िते दूरी गीत बनि सोए। कागचमे नाम, हृदयमे मान, हाथमे हाथ रहय, जनक संग चलल याचिका कखनहुँ बाट नहि बहय। घर-घर बटगबनी गाउ—न्याय चलै जनसंग, कागचक सूखल पन्नामे भरू जीवनक रंग। कागच मे नाम, करेज मे मान, हाथ मे हाथ, जन-संग चलल अरजी नहि हारए कोनो बाट। देहरी-देहरी सुर मिलए, माला जुड़ैत जाए, सूखल पन्ना पर जीवनक रंग चढ़ैत जाए। लगाउ हे छाती सँ, कागच छाती सँ लगाउ हे, मुदा असगर नहि—देहरी-देहरी जन जुटाउ हे। ❖ अध्याय १७८ अध्यायारम्भ लोकगीत : धूलि हटत, खिड़की खुलत लोकधुन : कोठरी-पराती चढ़ू हे सीढ़ी, ऊपरक कोठरी चढ़ू हे, एक झाड़ू, एक खिड़की सँ भोर गढ़ू हे। ऊपरक कोठरी धूलि भरल, सूरुज बाट जोहै, एक झाड़ू, एक खिड़कीसँ अन्हार बाहर होए। सीढ़ी-सीढ़ी चढ़ि चलू, साँस बराबर राखू, पुरान बक्सा खोलि कऽ साँचक चिन्ह सहेजि राखू। धूलि दोष नहि, विस्मृतिक चादर मात्र, हाथ मिलिते साफ होएत हरेक पन्ना, हरेक पात्र। खिड़की खुलत, पवन कहत—आब किछु नहि छुपत, ऊपरक कोठरीमे भोरक नील कमल फुलत। धूलि दोष नहि—बिसरनक पातर चादरि, हाथ लगिते झरि पड़त, चमकत भीतर-बाहरि। पुरान बक्साक साँच सहेजू, सूची संग बनाउ, खुलल खिड़कीक पुरबा मे नील कमल फुलाउ। चढ़ू हे सीढ़ी, ऊपरक कोठरी चढ़ू हे, एक झाड़ू, एक खिड़की सँ भोर गढ़ू हे। ❖ अध्याय १७९ अध्यायारम्भ लोकगीत : मोहरक पग सत्य दिस लोकधुन : पगचिन्ह गीत पढ़ू हे पगचिन्ह, स्याहीक पगचिन्ह पढ़ू हे, ककर हाथ, कोन बाट—धीरज सँ गढ़ू हे। स्याहीक पग चलि रहल, ओकर राह पढ़ू, ककर हाथसँ कत्तय गेल, धैर्यसँ नक्शा गढ़ू। मोहर अपने दोषी नहि, दिशा हाथ बताबै, साँचक पहरुआ हरेक निशान जोड़ि उत्तर पाबै। पगचिन्ह शहर पार करै, बैंक-दफ्तर जाए, जनक जागल आँखि ओकर पाछाँ-पाछाँ धाए। मोहरक पग सत्य दिस मोड़ू, सेवा बनय चाल, जनहितक दस्तावेजपर पड़य उज्जर लाल। मोहर अबोध बच्चा जकाँ, जेम्हर लऽ जाउ जाए, दिशा देखौनिहार हाथक नाम सोझाँ आए। बैंक-दफ्तर-शहर धरि निशान-निशान जोड़ू, सेवाक बाट पर मोहरक डेग फेर मोड़ू। पढ़ू हे पगचिन्ह, स्याहीक पगचिन्ह पढ़ू हे, ककर हाथ, कोन बाट—धीरज सँ गढ़ू हे। ❖ अध्याय १८० अध्यायारम्भ लोकगीत : शान्तिक चादर, प्रतिरोधक आसन लोकधुन : समदाउनक आशा-लय बिछाउ हे चादर, शान्तिक चादर बिछाउ हे, चुप्पी नहि—ओहि पर जनसभाक दीप जराउ हे। जे चादरसँ माए नेना ढाँकै, ओहि पर सत्य धरू, शान्ति मतलब चुप्पी नहि—साहससँ घर भरू। खेतक मेड़, स्त्रीक मान, गरीबक हकक बात, चादर बीच बिछा कऽ बनाउ जनसभा रात। नरम कपड़ो ढाल बनै जखन हाथ मिलै, मौनक भीतर गीत उगै, भयक ताला खुलै। शान्तिक चादर ओढ़ि नहि, आसन जकाँ बिछाउ, प्रेमक दृढ़ प्रतिरोधसँ नव समाज बनाउ। जाहि चादर तर नेना सूतल, ओही पर बैसार, खेतक मेड़, स्त्रीक मान, गरीबक हकक विचार। नरम कपड़ा ढाल बनए जखन हाथ जुड़ए, मौनक भीतर सँ प्रतिरोधक मीठ गीत उड़ए। बिछाउ हे चादर, शान्तिक चादर बिछाउ हे, चुप्पी नहि—ओहि पर जनसभाक दीप जराउ हे। ❖ अध्याय १८१ अध्यायारम्भ लोकगीत : नम्बरक पार मनुख लोकधुन : सामा-चकेवा धुनक उज्जर चाल चिन्हू हे चिन्हू, नम्बरक पार चिन्हू हे, सिम बदलौ हजार, नेहक स्वर गिनू हे। नम्बर बदलै, सिम बदलै, मनुखक नेह नहि, स्वरकेँ स्वर चिन्है, साँचक राह कहि। दादीक सीख, नेनाक हँसी, घरक बोली साथ, नकली बादर कटि जाए, खुलि जाए असल बाट। हाथ पकड़ि कहू सभ—हम एक-दोसर चिन्है छी, काँचक जालक पारो मानुखक दीप बन्है छी। भोरक पहिल किरण कहै—डेराउ नहि कियो, नामक संग चलैत रहू, छल हारत निश्चयो। सिम हजार, मुँह हजार—नेहक सुर एक, घरक बोली, दादीक सीख—पहिचानक टेक। काँच-जालक ओहि पार मानुखक दीप बरए, जुड़ल हाथक घेरा मे छल पैसि नहि सकए। चिन्हू हे चिन्हू, नम्बरक पार चिन्हू हे, सिम बदलौ हजार, नेहक स्वर गिनू हे। ❖ अध्याय १८२ अध्यायारम्भ लोकगीत : सेवा-दरबाजा भोरमे लोकधुन : पराती खोलू हे दुआर, सेवाक दुआर भोरे खोलू हे, जनक बोलीक चाबी सँ जंग-लागल ताला तोड़ू हे। राति भरि बन्द रहल जे सेवा-दुआर भारी, भोरक चाबी बनि अएल जनक बोलि पियारी। कागच, खाता, मोहर सभ आब उजासमे आउ, जकर हक दबायल छल, ओकर नाम सुनाउ। दुआर-दुआर दीप धरू, बाट-बटोहिया जोड़ू, सेवा शब्दकेँ साँच बनाउ, झूठक गाँठि छोड़ू। सूरुज उगै तँ देबालो अपन छाह हटाबै, जनक पहरासँ हरेक संस्था फेर भरोस जगाबै। राति भरि जे बन्द रहल, भोरे हाजिर होउ, कागच-खाता-मोहर सभ उजास मे धोउ। दबल हकक नाम पुकारू पहिल घण्टी संग, सूरुज देखि देबालो छोड़ए छाहक रंग। खोलू हे दुआर, सेवाक दुआर भोरे खोलू हे, जनक बोलीक चाबी सँ जंग-लागल ताला तोड़ू हे। ❖ अध्याय १८३ अध्यायारम्भ लोकगीत : दादीक नामक दीप लोकधुन : दादी-पोती आँगन गीत घेरू गे पोती, दादीकेँ घेरि कऽ बैसू गे, झुर्री-झुर्री मे लिखल मिथिला बाँचू गे। दादीक चेहरा झुर्रीमे मिथिलाक नक्शा, नाम हुनकर दीप जकाँ, प्रेम हुनकर रक्षा। पोता-पोती घेरा दऽ कंठक कथा सुनत, कियो हुनकर नाम चोरत तँ गाम एकजुट बनत। सुप, डलिया, पुरनका गीत—सभ गवाही देत, दादीक हँसीक उजास अन्हार काटि देत। आँगनमे तुलसी कहै—स्मृति अमर रहै, जकरा घरक लोक पुकारै, ओकर नाम नहि बहै। सुप-डलिया-पुरना गीत—सभ हुनकर साखी, नाम चोरौनिहार सँ गाम भरि रखवारी राखी। तुलसी-चौरा कहए—स्मृति अमर रहतै, जकरा घर पुकारै छै, से कतऽ बहतै। घेरू गे पोती, दादीकेँ घेरि कऽ बैसू गे, झुर्री-झुर्री मे लिखल मिथिला बाँचू गे। ❖ अध्याय १८४ अध्यायारम्भ लोकगीत : असल स्वर चिन्हू लोकधुन : विदापत पदक कोमल लय सुनू हे धीरे, आवाजक भीतर सुनू हे, हजार काँच-स्वर बीच असल प्राण गुनू हे। काँचक भीतर आवाज बहुत, असल एके प्राण, नेहक बोलि हृदय चिन्है, छलक टूटै तान। माए जेना बौआकेँ निन्नमे सेहो बुझै, साँचक स्वरक धड़कन झूठक नकलसँ अलगै। पहिने प्रश्न, फेर विश्वास, संगमे लोक रहू, डरक फोनक आगाँ अपन घरक नाम कहू। स्वरक मर्यादा राखि चलू, कंठ रहय स्वतन्त्र, मानुखक साँचक बोली सभसँ पैघ मंत्र। माए निन्नो मे बौआक करोट बुझि लइए, नेहक कान नकली सुर झट पकड़ि लइए। पहिने प्रश्न, तखन भरोस, संग मे परिवार, साँचक स्वरक धड़कन थिक सभसँ पैघ हथियार। सुनू हे धीरे, आवाजक भीतर सुनू हे, हजार काँच-स्वर बीच असल प्राण गुनू हे। ❖ अध्याय १८५ अध्यायारम्भ लोकगीत : चरमर कमरामे बिहान लोकधुन : रेल-बटगबनीक मध्यम चाल खोलू हे खिड़की, चरमर कमराक खोलू हे, स्टेशनक सीटी संग भोरक सुर घोलू हे। चरमर पंखा घूमि रहल, खिड़की खोजै भोर, स्टेशनक सीटी कहै—खुलत अन्हारक छोर। एकटा साँचक पग धरिते कमरा बाट बनै, बन्द हवा बाहर निकलि गाछक गन्धि सनै। रेल जकाँ साहस चलू, पटरी दू पर साथ, एक पाँति न्याय लिखै, दोसर खोलै बाट। जे कमरा छल भयक घर, चौपाल बनि जाए, चरमर स्वर लय बनि नव जीवन गीत सुनाए। पंखा घूमए चरमर-चरमर, ताल बनए पुरान, एक साँचक डेग पड़िते कमरा बनए दलान। रेलक दू पटरी जकाँ न्याय-साहस साथ, बन्द हवा मे पैसि गेल गाछ-गन्धक हाथ। खोलू हे खिड़की, चरमर कमराक खोलू हे, स्टेशनक सीटी संग भोरक सुर घोलू हे। ❖ अध्याय १८६ अध्यायारम्भ लोकगीत : मधुकरसँ मधुरस फेर लोकधुन : मधुमक्खी लोकधुन भन-भन हे मधुकर, फूलक बाट भन-भन हे, जहरक घेर बिसरि मधुरसक गुन-गुन हे। भन-भन करै मधुकर, फूलक बाट बताउ, जहरक घेर छोड़ि आब मधुरस घर लाउ। हरेक फूलक श्रम बराबर, हरेक पाँखिक अधिकार, छत्ता तखने मीठ बनत जखन साँच व्यवहार। लोभक धुआँ हटत जखन मनमे नेह उगै, भटकल पाँखि घुरि कऽ फेर सुगन्धक राह लगै। मधु नामक मान बचाउ, श्रमक रस नहि चोरू, फूल-फूलक भाग बराबर, संगहि जीवन जोड़ू। फूल-फूलक श्रम बराबर, पाँखि-पाँखिक मान, छत्ताक मीठ तखने जखन साफ रहए ईमान। लोभक धुँआ छँटिते सुगन्धक राह भेटए, भटकल पाँखियो घुरि कऽ अपन घर समेटए। भन-भन हे मधुकर, फूलक बाट भन-भन हे, जहरक घेर बिसरि मधुरसक गुन-गुन हे। ❖ अध्याय १८७ अध्यायारम्भ लोकगीत : रानी नाम उज्जर लोकधुन : स्त्री-मण्डली मंगल गीत चमकाउ गे रानी, अपन नाम चमकाउ गे, झूठक धूलि झाड़ि साँचक जल सँ नहाउ गे। रानी अपन नाम धुऐ नहि, धूलि झाड़ि चमकाउ, जकरा झूठ मलिन कएलक, साँचक जलसँ नहाउ। बहिनी सभ घेरा दऽ कहै—माथ उठाउ रानी, तोहर नामक पात हरियर, तोहर बोली पानि। कागचक दाग उतरि जाए, मान नहि उतरै, स्त्रीक एक स्वर उठिते सय झूठ पाछाँ हटै। रानी नामक उज्जर अक्षर देहरी-देहरी जाउ, अपन कथा अपन कंठसँ निःशंक गुनगुनाउ। बहिनीक घेरा बाजए—माथ उठाउ बहिना, तोहर पात हरियर छौ, तोहर बोली गहना। कागचक दाग धोआयत, मान नहि धोआयत, एक स्वर उठिते सय झूठ पाछू पड़ायत। चमकाउ गे रानी, अपन नाम चमकाउ गे, झूठक धूलि झाड़ि साँचक जल सँ नहाउ गे। ❖ अध्याय १८८ अध्यायारम्भ लोकगीत : नील मोहर, हरियर पात लोकधुन : झिझिया-जागरण लगाउ हे पात, नील घाव पर हरियर पात हे, झिझियाक छिद्र-छिद्र सँ किरण पठाउ हे। नील मोहर जँ घाव बनल, हरियर पात लगाउ, दीपक छिद्रसँ साँचक किरण भीतर धरि पठाउ। मोहर सेवक होउ पुनः, मालिक नहि बनि जाए, जनक हाथक लिखल वचन कागचमे मुस्काए। नील रंग आकाशो थीक, आशाक खुलल द्वार, घावक रंग बदलि सकै सामूहिक उपचार। दीप घुमाउ झिझिया जकाँ, छिद्र-छिद्र उजियार, मोहरक भीतर मानुख जागय—एतबे नव विचार। मोहर फेर सेवक बनए, मालिक नहि कहाए, जनक लिखल वचन कागच मे मुस्काए। नील रंग अकासो थिक, खुलल आशा-द्वार, मिलि-जुलि कएल जाए घावक उपचार। लगाउ हे पात, नील घाव पर हरियर पात हे, झिझियाक छिद्र-छिद्र सँ किरण पठाउ हे। ❖ अध्याय १८९ अध्यायारम्भ लोकगीत : बिसेसरक नामक वापसी लोकधुन : मजदूर सोहर ललना रे, बिसेसरक सोहर हे, लोहाक पेट सँ नामक नव जनम हे। लोहेक पेट खुलत आइ, नामक जन्म होएत, बिसेसरक श्रमक अक्षर फेर पातपर सोहेत। जूता, गमछा, हथेली, पसीना सभ कहत, पुलक हरेक पाया भीतर ओकर साहस रहत। माए नहि, इतिहासो आब ‘हाजिर’ कहि उठत, कटल नामक ठाम हरियर कोंपल फेर फुटत। श्रमक नाम घुरि आयल तँ धरती भेल धन्य, बिसेसरक उज्जर स्मृति बनत सभक पुण्य। जूता-गमछा-हथेली सभ गवाही मे ठाढ़, पुलक पाया-पाया मे ओकर साहस गाढ़। माए संग इतिहासो आब 'हाजिर' कहत, कटल नामक ठाम हरियर कोंपल रहत। ललना रे, बिसेसरक सोहर हे, लोहाक पेट सँ नामक नव जनम हे। ❖ अध्याय १९० अध्यायारम्भ लोकगीत : पंजी जागल भोर लोकधुन : पंजी-पराती जागू हे पंजी, नील पंजी जागू हे, बरखोंक चुप पाँतिकेँ भोर मे बाँचू हे। नील पंजी आँखि खोलि भोरक नाम पढ़ै, जे पाँति चुप छल बरखों, आब उजास गढ़ै। एक-एक अक्षर धानक दाना, सहेजि कऽ धरू, जकर हक दबायल छल, ओकर जीवन भरू। पंजी आब डरक नहि, जनक भरोस बनत, खुलल पन्ना गाम-नगरक साँचक पुल बनत। कलम चलू पारदर्शी, मोहर रहय सचेत, भोरक पंजी लिखत आब न्याय, मान आ नेह। अक्षर-अक्षर धानक दाना, ओसाउ-फटकू-धरू, जकर हक दबल रहए, ओकर थारी भरू। डरक बही नहि आब, जन-भरोसक खाता, खुलल पन्ना जोड़ए गाम-नगरक नाता। जागू हे पंजी, नील पंजी जागू हे, बरखोंक चुप पाँतिकेँ भोर मे बाँचू हे। ❖ अध्याय १९१ अध्यायारम्भ लोकगीत : खाली कुर्सी पर जन लोकधुन : चौपाल झूमर जमू हे चौपाल, कुरसी बिनुओ जमू हे, गोल घेराक बल पर काज नहि थमू हे। कुर्सी खाली रहि सकै, जनक आसन खाली नहि, गामक गोल घेरामे निर्णय दूरवाली नहि। घंटी बजै तँ लोक कहै—पहिने सुनू सभ बात, पद केवल सेवा लेल, नहि डरक सौगात। एक कुरसीक छाह घटत, सय कंठक बल बढ़त, जनक आँखि जागल रहत तँ शासन सीधा चलत। खाली कुर्सीपर राखू संविधानक फूल, लोकक संग जुड़ल अधिकार रहत अटल मूल। घण्टी बाजए तँ पहिने जनक बात सुनाउ, पद सेवाक नाम थिक—ई पाठ बुझाउ। एक कुरसीक छाह घटए, सय कण्ठ बल पाबए, संविधानक फूल राखि लोक अपन हक गाबए। जमू हे चौपाल, कुरसी बिनुओ जमू हे, गोल घेराक बल पर काज नहि थमू हे। ❖ अध्याय १९२ अध्यायारम्भ लोकगीत : कटोरी भरल स्वर लोकधुन : पनिहारिन गीत घुमाउ गे कटोरी, घर-घर कटोरी घुमाउ गे, बून्द-बून्द दबल स्वर ओहि मे जमाउ गे। खाली कटोरी कान बनल, बून्द-बून्द स्वर पीबै, जकर रोदन दबल रहल, आब गीत बनि जीबै। पानि भरू नेहक, नून भरू विश्वास, एक-दोसरक बात सुनू, हल्लुक होएत साँस। कटोरी घूमि घर-घर जाए, सभ अपन बात धरै, सुननिहारक शान्त हृदय दुखकेँ फूल करै। खाली पात्र अभाव नहि, स्वागतक आधार, ओहिमे भरत लोकक स्वर, आशा अपरम्पार। खाली पात्र अभाव नहि, स्वागतक थारी, सुननिहारक थिर हृदय—सभसँ पैघ तैयारी। नेहक पानि, विश्वासक नून संग मे घोरू, भरल कटोरीक गीत सँ दुखक राति तोड़ू। घुमाउ गे कटोरी, घर-घर कटोरी घुमाउ गे, बून्द-बून्द दबल स्वर ओहि मे जमाउ गे। ❖ अध्याय १९३ अध्यायारम्भ लोकगीत : साँससँ चेहरा उगै लोकधुन : सोहरक धीम लय ललना रे, पहिल साँसक सोहर हे, हरेक चेहरा मे उगल अपन-अपन भोर हे। पहिल साँससँ चेहरा उगै, नामसँ जीवन फूले, अन्हार गर्भक पाछाँ भोरक पाँखि खुले। जकर कंठ दबायल गेल, ओकर आँखि पढ़ू, हथेली, चाल, पसीना—सभसँ परिचय गढ़ू। एक चेहरा एक संसार, आँकड़ा मात्र नहि, साँसक गरिमा मानि चलू, कियो अनाम नहि। भोरक सोहर गाबि कहू—जीवन सभसँ पैघ, हरेक चेहरामे चमकि रहल मानवताक मेघ। अन्हार गर्भक पार सँ पाँखि खोलल जीवन, आँकड़ा नहि, आँखिक जोति—इहए असल धन। जकर कण्ठ दबल, तकर चालि-हथेली पढ़ू, 'कियो अनाम नहि'—सोहरक ई टेक गढ़ू। ललना रे, पहिल साँसक सोहर हे, हरेक चेहरा मे उगल अपन-अपन भोर हे। ❖ अध्याय १९४ अध्यायारम्भ लोकगीत : मनक रसीद लोकधुन : नचारीक आशावादी चाल राखू हे लेखा, मनक भीतर लेखा राखू हे, कागच छूटौ, नेहक रसीद नहि हराउ हे। कागचक रसीद छुटि सकै, मनक लेखा रहै, जे नेहसँ काज कएल, ओकर गवाही बहै। मोनक भीतर साफ हिसाब, आँखिमे उजियार, साँचक बाट चलनिहारकेँ की डर, की भार। लिफाफा नहि, विश्वासक मोहर साथ लिअ, भीतरक अदालतमे अपन उत्तर साफ दिअ। मनक रसीद कहत सदा—न्याय उधार नहि, सत्यक कमाइ धीरे सही, कहियो बेकार नहि। भीतरक अदालत रोज साँझ बही खोलए, आँखि मिला कऽ अपने सँ उत्तर बोलए। लिफाफा नहि, विश्वासक मोहर संग रहए, सत्यक धीमा कमाइ जनम भरि फलए। राखू हे लेखा, मनक भीतर लेखा राखू हे, कागच छूटौ, नेहक रसीद नहि हराउ हे। ❖ अध्याय १९५ अध्यायारम्भ लोकगीत : धन थरथर, सत्य ठाढ़ लोकधुन : हिसाब-झूमरक तेज लय खोलू हे खाता, भोरे-भोर खाता खोलू हे, थरथर काँपैत धनकेँ साँच सँ तौलू हे। खाता काँपै, सिक्का डेराइ, सत्य ठाढ़ मुस्काए, जनक एकजुट प्रश्नसँ लोभक मीनार ढहाए। धन जँ सेवा करै तँ लक्ष्मी, छल करै तँ भार, साफ कमाइ धानक बाली, लोभक धन बेकार। हिसाब खोलू भोरमे, खिड़की सभ उजियार, जेकर हिस्सा ओकरा भेटय, एतबे न्याय विचार। साँचक आगाँ धन थरथर, श्रमक माथ न झुकत, लोकक जागल आँखि रहत तँ कारी धारा रुकत। सिक्का डेराए, पन्ना काँपए, प्रश्न ठाढ़ अटल, जनक जुड़ल आँखिक आगाँ लोभक मीनार विकल। सेवा करए तँ लक्ष्मी, छल करए तँ भार, जेकर हिस्सा तेकरा भेटौ—एतबे टा विचार। खोलू हे खाता, भोरे-भोर खाता खोलू हे, थरथर काँपैत धनकेँ साँच सँ तौलू हे। ❖ अध्याय १९६ अध्यायारम्भ लोकगीत : गमछा बनल ध्वज लोकधुन : बटोहिया-मंगल गीत फहराउ हे गमछा, फाटलो गमछा फहराउ हे, श्रम-स्मृति-साहसक झण्डा बनाउ हे। फाटल गमछा हाथमे आब हारक चिन्ह नहि, श्रम, स्मृति आ साहसक ई झण्डा कम नहि। कोना-कोना जोड़ि कऽ बहिनी सीवन देत, मजदूरक नामक रंगसँ नव इतिहास लेखत। हावा लगिते गमछा कहै—बाट एखन खुलल, जकर स्वर कटायल छल, ओकर कंठ फेर फुलल। फाटल कपड़ा ध्वज बनल तँ गामक माथ उठत, स्मृतिक लाल-गेरुआ रंग न्याय-दिशा देखत। कोना-कोना बहिनी जोड़ए, टाँका-टाँका गीत, मजदूरक नामक रंग सँ रँगल नव रीत। हवा लगिते गमछा बाजए—बाट खुजल, बाट खुजल, कटल कण्ठ फेर फुलल, गामक माथ निखरल। फहराउ हे गमछा, फाटलो गमछा फहराउ हे, श्रम-स्मृति-साहसक झण्डा बनाउ हे। ❖ अध्याय १९७ अध्यायारम्भ लोकगीत : किनार पर नामक दीप लोकधुन : छठ-अर्घ्य धुन देउ हे अरघ, डूबल नामकेँ देउ हे, किनार-किनार दीपक पाँति सजाउ हे। काँपल किनार स्थिर होएत जखन दीप धरब, डूबल नामक सम्मानसँ उदित सूरुज करब। जलमे अर्घ्य, माटिमे प्रण, कंठमे साँचक बोल, संग-संग ठाढ़ परिवार, टूटत भयक गोल। पूर्वक रेखा लाल भेल, नव दिन आबि रहल, किनारक हरेक कण कहै—न्याय जागि रहल। नामक दीप बहाउ नहि, हथेलीपर सम्हारू, उदयाचलक सूर्य संग नव विश्वास उभारू। कमर भरि जल मे ठाढ़, हाथ मे साँचक सूप, उगैत-डूबैत दुनू सूरुजकेँ एक्के रूप। परिवारक कतार संग भय गोल-गोल टूटए, पूबक लाली संग न्यायक नव दिन फूटए। देउ हे अरघ, डूबल नामकेँ देउ हे, किनार-किनार दीपक पाँति सजाउ हे। ❖ अध्याय १९८ अध्यायारम्भ लोकगीत : जूताक पगडंडी लोकधुन : पगचिन्ह बटगबनी चलू हे संगी, जूताक पगडंडी चलू हे, छूटल चिन्ह सँ आगाँक बाट पढ़ू हे। माटिमे छूटल जूता बाटक अन्त नहि, ओहि ठामसँ पगडंडी उठत, साहस कम नहि। एक पएर साक्षी बनत, दोसर न्याय दिस जाए, धूलि-धूसर चिन्ह सभ मिलि सत्यक नक्शा बनाए। जे भागल ओ दूर रहत, निशान रहत एतय, माटि अपन आँखिसँ देखल बात कहत सदय। जूताक पगडंडीपर जन संग-संग चलत, अपराधक धरती पर न्यायक धान उगत। माटि अपन आँखिए देखल, से नहि बिसरत, धूलि-धूसर छाप जोड़ि नक्शा साफ करत। भगनिहार दूर पड़ाए, निशान एतहि रहए, जन-डेगक पाछाँ-पाछाँ न्यायक धार बहए। चलू हे संगी, जूताक पगडंडी चलू हे, छूटल चिन्ह सँ आगाँक बाट पढ़ू हे। ❖ अध्याय १९९ अध्यायारम्भ लोकगीत : संदूक खोलल बिहान लोकधुन : बिहान-समदाउनक उज्जर रूप खोलू हे ढक्कन, संदूकक ढक्कन खोलू हे, बरखोंक बन्द साँचकेँ बिहान मे घोलू हे। लोहेक संदूक खुलि गेल, भीतर भोर भेटल, अक्षर सभ पाँखि पसारि अन्हार पार उड़ल। गवाहीक हाथ काँपलो तँ ढक्कन खोलि देलक, बरखोंक बन्द साँचकेँ सूरुज गोदमे लेलक। राख, कागच, कुंजी, मोहर—सभटा स्वर बनल, एक पुरान पेटक भीतर नव भविष्य जनमल। बिहानक गीत गाउ सभ, डरक राति समाप्त, खुलल संदूक कहै—सत्य रहै अपराजित। काँपैत हाथो हिम्मत कऽ ढक्कन उठा देलक, बरखोंक दबल अक्षरकेँ सूरुज गोद लेलक। राख-कागच-कुंजी-मोहर—सभ बनल गवाह, पुरान पेटक भीतर सँ जनमल नव प्रवाह। खोलू हे ढक्कन, संदूकक ढक्कन खोलू हे, बरखोंक बन्द साँचकेँ बिहान मे घोलू हे। ❖ अध्याय २०० अध्यायारम्भ लोकगीत : हम छी—उदय महागान लोकधुन : विदेह लोक-महागान गाबू हे सगरो, 'हम छी'क महागान गाबू हे, पानि-पात-माटि-साँस—सभ स्वर मिलाबू हे। पानि बजै, पात लिखै—हम छी, हम छी, माटि कहै, साँस कहै—हम छी, हम छी। नाम नहि सूची मात्र, जीवनक उज्जर थार, एक-दोसरक पहरा बनि ठाढ़ अछि संसार। गोहि जते रूप बदलए, जागल आँखि चिन्हत, सत्य बीआ पाथर फोड़ि हरियर अंकुर बनत। दुइ सय दुआर खुलल, कथा चलत आगाँ, हम छी, संग छी—एहि स्वरमे नव मिथिला जागाँ। दुइ सय दीपक पाँति जरल, दुइ सय दुआर, एक-दोसरक पहरा मे जागल संसार। गोहि रूप बदलौ हजार, आँखि नहि मुनायत, विदेहक ई लोक-महागान युग-युग गाओल जायत। गाबू हे सगरो, 'हम छी'क महागान गाबू हे, पानि-पात-माटि-साँस—सभ स्वर मिलाबू हे। ❖ [ऐ कादम्बरीक अंश] अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१४. गजेन्द्र ठाकुर-चारिटा मूल संस्कृत एकनट नाटक (भाण) १.श्री शूद्रक केर मूल संस्कृत- पद्मप्राभृतकम् [कमलक भेंट]; २.ईश्वरदत्तक मूल संस्कृत- धूर्तविटसंवादः [धूर्त आ दलालक विचार-विमर्श]; ३.वररुचिक मूल - उभयाभिसारिका [परस्पर प्रेम-पलायन] आ ४.महाकवि श्यामिलक केर मूल संस्कृत- पादताडितकम् [लात] (संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद- गजेन्द्र ठाकुर द्वारा) चारिटा मूल संस्कृत एकनट नाटक (भाण) १.श्री शूद्रक केर मूल संस्कृत- पद्मप्राभृतकम् [कमलक भेंट]; २.ईश्वरदत्तक मूल संस्कृत- धूर्तविटसंवादः [धूर्त आ दलालक विचार-विमर्श]; ३.वररुचिक मूल - उभयाभिसारिका [परस्पर प्रेम-पलायन] आ ४.महाकवि श्यामिलक केर मूल संस्कृत- पादताडितकम् [लात] (संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद- गजेन्द्र ठाकुर द्वारा) [भरत प्रहसन आ भाणकेँ उचिते एक प्रवृत्तिक मानैत छथि। भाण भेल एकालाप, माने एक्केटा पात्र द्वारा अभिनय।] १ कमलक भेंट श्री शूद्रक केर मूल संस्कृत एकनट नाटक (भाण)- पद्मप्राभृतकम् (संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद- गजेन्द्र ठाकुर द्वारा) [नान्दी पश्चात् सूत्रधारक प्रवेश] सूत्रधार: ओहि भगवान् रुद्रक जय हो, जे क्रोध अथवा कृपासँ स्त्री-विलासक मूर्ति कामदेवकेँ आओर अधिक उज्ज्वल देहबला बना देलनि। आओर— कुरबकक फूल उज्जर भऽ गेल अछि। कोयल कूजि रहल अछि। सुन्दर अशोकक फूलक संग कोँपल डोलि रहल अछि। भँवराक गुंजार आ आमक गन्हसँ महमह करैत हवा बहि रहल अछि। आइ धनुष धारण कएने कामदेव वनमेँ विचरण कऽ रहल छथि। आओर की— चिड़ैक चहचहाहटकेँ वाद्य बना प्रेमरससँ मातल कोयलीसभ गीत गा रहल अछि। वनक अन्तःपुरक कामिनीरूपी लता आचार्य वायुक उपदेशपर अभिनय कऽ रहल अछि। गाछसभ अपन फूलक उल्लासमेँ पल्लवरूपी अँगुरीसँ ओहि लताकेँ फुसला रहल अछि। श्रीमान् वसन्तक अबितहि हार-जकाँ उज्जर तुषार क्षणेमेँ बिलाए गेल। जड़िसँ, बीचसँ, शिखरसँ, अंकुरसँ—चारू कातसँ अशोकक फूल दुष्टक हृदयमेँ भेद जकाँ फूटि-फूटि निकलि रहल अछि। अहा! ई— मत्त कोयलक कूजनसँ भरल, सिन्धुवार, कुन्द आ सहकारसँ सुशोभित, उद्धत कामदेव आ वायुसँ परिपूर्ण, युवजनक प्रिय ऋतु अछि। [विटक प्रवेश] वाह! कतेक अद्भुत! शिशिररूपी बुढ़ापासँ जर्जर संवत्सररूपी विटक सुन्दर वसन्ती जवानी हिमरूपी रसायन खा कऽ फेर लग आबि रहल अछि। एहि समय तँ— हिलैत कोँपलसँ नाचैत गाछ आ फुलायल लतासँ लपटायल वन यौवन प्राप्त कऽ रहल अछि। तिलक गाछपर बैसल कोयल जूड़ा जकाँ लगैत अछि, आ कुन्दक फूलपर बैसल भँवरा कामिनीक कटाक्षक काज कऽ रहल अछि। कतहु नव-उभरल छोट स्तनबाली कन्या जकाँ कमलिनी साँवली कलिसँ शोभित अछि। कतहु वसन्तक वायुसमूह रतिक्लान्तिक पसेनासँ भीजल स्त्रीक पीन स्तनक स्पर्श करबाक धूर्तता करैत बहि रहल अछि। कामबाणक मारिसँ सन्ताप देबामेँ कठोर ई वसन्तकाल निश्चये बलवान अछि; कारण, देवदत्ताक संग सुरत द्वारा अपन यौवनोत्सव भलीभाँति मना चुकलाक बादो कर्णीपुत्रक कामरूपी भँवरा देवसेनारूपी ओहि आमक डारि लेल भूखल छटपटा रहल अछि, जे बाल्यावस्था छोड़ि यौवनागमसँ कोमल भऽ गेल अछि आ काममञ्जरी जकाँ फुला रहल अछि। अथवा कर्णीपुत्रक भूखल रहबामेँ आश्चर्य की? घी-चिनीसँ बनल तरमाल अचार-चटनी अर्थात् सोपदंशक संग आओर स्वादिष्ट लगैत अछि। हमरा बुझाइत अछि, तेँ देवदत्ताक संग सुरतरूपी मधुपानसँ तृप्त भऽ चुकलोपर ओ बालसुन्दरी षोडशी चण्डालिका देवसेनाक संग आओर आनन्ददायक सुरतक ओहन गजक चखए चाहैत अछि, जाहिमेँ बालपनक भोली-भाली आवभगत, चुहलबाजी आ छेड़छाड़ भरल हो। अहो! कामरोग छोट देखाइत होइतो बड्ड भारी होइत अछि; ई अनेक शास्त्रक अचूक ज्ञाता, समस्त कला आ विद्याविदग्ध, युवतीक कामरूपी ताना बुननिहार सूत्रधार कर्णीपुत्रकेँ सेहो एहि दशामेँ पहुँचा देलक। अनिद्रासँ ओकर आँखि कनेक बेसी अलसायल आ लाल अछि। ओकर मुख भोरक चन्द्रमा जकाँ पीयर पड़ल अछि। चिन्तासँ देह दुबर भऽ गेल अछि। ओ जँभाइ लऽ रहल अछि। ओकर समस्त इन्द्रिय जरि रहल अछि। चन्द्रमा, वसन्त, मालाग्रथन, संगीत, सुगन्धि आदि जे सुन्दर वस्तु सोझाँ रहितो पहिने ओकरा आनन्द दैत छल, से सभ एखन ओकरा सन्ताप दऽ रहल अछि। अथवा देवसेनाक कारणेँ ई सभ भेल हो, तँ एहिमेँ आश्चर्य नहि; कारण ओ नवयौवना मनचाहा कामभाव उत्पन्न करएबाली अछि। ओकर पूर्ण यौवनसँ उपजल लावण्य कर्णीपुत्रकेँ उन्मत्त बना रहल अछि, ई उचिते अछि। ओकर चञ्चल कटाक्ष, अशर्फी झरबैत अखण्ड अधर, गाल आगाँ कएने मुख, छातीपर नव उठल स्तनाङ्कुर, कोमल बाहुलता, पेटपर कनेक-कनेक झलकैत रोमावली, नजानि कतयसँ आबि भरि उठल नितम्ब आ उन्मुक्त स्वभावबला चतुर प्रेमभाव—ई सभ ककरा उन्मत्त नहि बना देत? [घुमैत] देवसेनासँ उपजल कामरोगक छटपटाहटमेँ ओ एखन हार, पङ्खा आ चन्दनक सहायतासँ देहक ताप घटबैत, ओकरासँ भेटक आशापर प्राण धारण कएने, खाट पकड़ि कोनो तरहें जी रहल अछि। आइ भोरहि देवदत्ताक पुष्पाञ्जलिक नामक सेवक नम्रतापूर्वक कर्णीपुत्र लग जा कऽ कहलक—‘आर्यपुत्र, आर्या देवदत्ता कहैत छथि—काल्हि हमर नहि आबि सकलासँ आर्यपुत्र हमरा प्रति अपन आदरभावमेँ उपेक्षा नहि आनथि। हमर छोट बहिन चण्डालिका कनेक अस्वस्थ अछि; ओकरा प्रति स्नेहवश हम रुकि गेलहुँ। एखन तुरन्त आबि रहल छी।’ तखन ओकर कथनक उत्तर दऽ पुष्पाञ्जलिककेँ विदा कएला बाद कर्णीपुत्र स्नेहपूर्वक हमरा कहलक—‘सखे शश, तोँ सेहो सुनलह जे ओ एतय आबि रहल छथि। ई उचित अवसर अछि। ओतय पहुँचि कुशल-क्षेम पूछबाक बहाना सँ पूर्ण विश्वास जगाकऽ देवसेनाक मन टटोलि ओकर दुखक कारण बुझि लह। ई हमर प्रणाम। देवसेना चलाओल आ हमर हृदयक अन्त धरि पैसल ई कामबाण भाग्यवान अहाँ मात्र कोनो उपायसँ निकालि सकैत छी।’ एहिपर हम हँसैत विदाक समय ओकरा कहलहुँ—‘ठीक अछि, धूर्ताचार्य! की तोँ दिनमेँ दीप जरबैत छह? अहाँ दुनूक आँखि-मिलान हम नहि बुझैत छी, जे चुपचाप अहाँक मनोभाव प्रकट करैत अछि? आ हम मूलदेवक सखा वएह शश छी; ओकर पूरा समाचार लेने बिना नहि घुरब।’ ई कहि हम चलि पड़लहुँ। फेर राजपथपर मित्रसभसँ गप्प करैत समय बिताबी आ चण्डालिका लग तखन पहुँचि जाबी जखन ओ देवदत्तासँ अलग हो, एहिमेँ हानि की? अहा! वसुन्धरारूपी वधूटिक अजम्बूद्वीपरूपी मुखक कपोलपर पत्रलेखा जकाँ उज्जयिनीक अनुपम शोभा अछि; ई नगर नाना प्रकारक भाण्डसँ भरल-पूरल अछि। एतय वेदक पवित्र अभ्यास; हाथी, रथ आ घोड़ाक निनाद; धनुषक प्रत्यञ्चाक टंकार; नाटक, काव्य आ विद्वानक शास्त्रार्थ; दोकानमेँ आनल चारू समुद्रक मालक लेन-देन; गीत, वाद्य, जुआ आ हँसी-ठट्ठा; कतहु विटक गप्प, कतहु समस्त कला—सभ किछु अछि। घरक पाँति पोसल चिड़ैक चहचहाहटसँ मुखर आ असंख्य कङ्कण-करधनीक झनझनाहटसँ भरल अछि। [घुमैत] एखन हम अपन मनोरथ सिद्ध होयबाक कोनो शकुन देखी। [देखि] अहा, ई काव्यव्यसनी, कात्यायनगोत्रीय शारद्वतीपुत्र सारस्वतभद्र अपन घरक दुआरिपर खड़ियाक रङ्गमेँ अँगुरी सानने, सोचल बात स्मरण भऽ अयबाक आनन्द आँखि-भौँह नचाकऽ जनबैत, चकडोरक खेल खेलि रहल अछि। एहने समय बहैत प्रतिभाक स्रोत तोड़निहार प्रिय मित्रपर सेहो कविगण बिगड़ि उठैत छथि। मुदा सरस्वतीरूपी लतासँ उपजल वचनरूपी फूलकेँ कर्णपूर बनौने बिना आगाँ बढ़ि जाऊँ तँ घाटेमेँ रहब। पहिने एकरासँ भेंट कऽ ली। [लग जा कऽ] मित्र कात्यायन, बिना चाराक जुगाली कऽ रहल छह की? की कहैत छह—‘काव्यक पिशाच माथपर चढ़ि हमरा हाँकि रहल अछि’? अरे पुरान काव्यपदक टुकड़ा गाँठनिहार मोची, छिन्न-भिन्न भऽ गेल गाइक खोज करनिहार जकाँ नव पद खोजि रहल छह की? मित्र, कोन विषयपर श्लोक रचलह? की कहैत छह—‘सोझाँ देखाइत एहि छबीला वसन्तपर श्लोक रचलहुँ’? हम सुनि सकैत छी? की कहैत छह—‘भीतपर लिखल अछि, पढ़ि लिअ’? कतय अछि? अरे, ई रहल— मधुर पवन, कठोर आ प्रचण्ड कामदेवसँ युक्त ई वसन्तकाल नव, विवश आ छरहरि बालाकेँ कामुकक लग पहुँचेबाक जे काज कऽ सकैत अछि, से खुशामदमेँ चतुर हजारो दूती नहि कऽ सकत। शाबास! ई शकुन कार्यसिद्धिक अछि। मित्र, पुत्रलाभ जकाँ तोहर ई श्लोक यशदायक हो। तोँ काव्यालोचनाक शिकार नहि हो। अरे, के हँसल? [देखि] अरे, ई तँ पीठमर्द दर्दरक अछि। दर्दरक, एहिमेँ हँसबाक की बात? की कहैत छह—‘निश्चये अहाँ बृहस्पतितुल्य कविजीक वचनसँ पूजा कऽ मानो समुद्रपर पानि छिड़कि रहल छी’? एना नहि कह, मूर्ख! वसन्तमासक पूजामेँ फूलक भेंट नहि चढ़ाओल जाइत अछि की? आ की तोँ पहिने नहि सुनने छह—दीपसँ सूर्यक पूजा होइत अछि, पानिसँ समुद्रक पूजा होइत अछि, आ वसन्तक पूजा फूलसँ होइत अछि। हमहुँ वचनसँ महाकविक पूजा कऽ रहल छी। ठीक, तोँ पीठमर्दक स्वभाव देखौलह। बस, तोहरासँ भेंट भऽ गेल। आओर—ई वसन्तकाल कोयलक मदमत्त कूजनसँ सुहावन अछि; तोँ सेहो एहने हो। हम चली। [घुमैत आ देखैत] अरे, ई दोसर विपुलामात्य आबि रहल अछि। कामदत्तारूपी प्राकृतकाव्यक सँभालमेँ चतुर छल, मुदा एखन वेशिकवृत्तिक मामिलामेँ मुँहक खा कऽ, मुँह लटकौने चलि रहल अछि। बुझलहुँ—मूलदेव देवदत्ताक प्रेममेँ फँसि गेलाह, तेँ विपुलाक अपमानकेँ अपन अपमान मानि ई भलमानुष मानक गर्वसँ फुलायल अछि। होअए—हँसीक डुबकी लगा एकर गहिराइ नापब। [इशारा कऽ] ‘अरे, मित्ररूपी कुमुदकेँ खिलौने बिना दिनक चन्द्रमा जकाँ हमरा सभकेँ छोड़ि कतय जा रहल छह?’ तोहरासँ किछु पूछबाक अछि—‘कला-विज्ञानसँ भरल, सदिखन गर्वमेँ मत्त तोहर विपुल बुद्धि निश्चये अत्यन्त धीर छल, जे खिन्न नहि भेल।’ [दोसर अर्थ] अहाँ जनैत छी की, कलाक प्रयोगज्ञानसँ युक्त, गर्वित स्वभावबाली ओ विपुला अन्त धरि धीर नहि रहि सकल, तेँ खेदग्रस्त भऽ गेल? की कहैत छह—‘अहाँक व्यङ्ग्यक अर्थ हम बुझि गेलहुँ। गुरु मूलदेवक चतुराई प्रसिद्ध नहि अछि की?’ नहि, बात एहन नहि। देवदत्ताक संग हृदय लगल रहितो हुनकर मन विपुलामेँ अटकल अछि। की कहैत छह—‘ई सेहो मूलदेवक धूर्तते अछि’? ठीक, अहाँ अपन सीधी-सादी शिष्या विपुलाकेँ उलाहना— —किएक नहि दैत छी, जकर प्रेमजनित रूसलापन दूर करबाक लेल कर्णीपुत्र आयल छल? बरखामेँ गदला गेल नदीकेँ निर्मल करबाक लेल शरद्काल जकाँ ओ आयल छल; मुदा जाड़मेँ ताड़क पङ्खा जकाँ अपमानपूर्वक फेकि देल गेल। की कहैत छह—‘कतय, कोना?’ मित्र, सुन। किछु दिन पहिने कर्णीपुत्र हमरा संग विपुलाकेँ मनएबाक लेल गेल। ओकर ड्योढ़ीपर ठाढ़ भऽ क्रोधक गहिराइ बुझबाक लेल ओ पहिने हमरा स्नेहपूर्वक भीतर पठौलक। हम मधुर वचन बजैत ओकरा लग गेलहुँ। डाहसँ जरैत ओ सलोनी हमरा देखितहि ‘एतेक परिश्रम किएक?’ कहि मुँह घुमा लेलक। तखन हम हँसैत कहलहुँ—तोरा के की कहलक? ई उत्तर कोन बातक अछि? हे वनिते, कनेक हमर दिश घुमि अपन चन्द्रमुखसँ फेर कह। तोरा प्रसन्न देखि हमर प्रीति असीम भऽ जाइत अछि। नागिन जकाँ रोषसँ भरल तोहर ई भृकुटि हमरा डरा रहल अछि। तकर बाद ओकर सखी अवन्तिसुन्दरी कहलक—भृकुटि टेढ़ कऽ, क्रोधसँ मुख लाल कऽ, निःश्वाससँ अधर झरका कऽ, मित्रक आगमनपरो किएक नहि बजैत छह? गर्वसँ फुलायल तोँ अपन सौभाग्यसँ वैर कऽ रहल छह। हे मानिनि, मान छोड़; सभ वस्तु बेसी तानलासँ शीघ्र टूटि जाइत अछि। ‘मन-मिलानक बैठक सदिखन नीक होइत अछि’—ई मानि कर्णीपुत्र सेहो ओतय पहुँचि गेल। ओकरा नमल देखि विपुला रोषपूर्वक झटकि कऽ कहलक—तोँ ओतयसँ छुट्टी पाबि आयल छह, वा निश्चये ओ तोरा निकालि बाहर कऽ देलक? चुहलभरल गप्पसँ मन बहलेबाक लेल तोँ हमरा अपन थाकनि मेटएबाक विश्रामगृह बुझने छह? बुझायल अभिलाषाबला हमर मोनकेँ जरा कऽ की लाभ? कड़ुआ औषधि पीबिसँ की फल? जेना भलमानुष बनि आयल छह, ओहिना घुरि जा। की कहैत छह—‘जँ एहन बात अछि, तँ पहिने ओहि उजड्डीक लग जा कऽ डाँट-डपट करैत छी’? जा, ओकरासँ मनमाना गप्प कर। एखन हम चली। [घुमैत] हा धिक्! हमर बाटक दोसर देहधारी विघ्न आबि गेल। दन्दशूकक पुत्र पाणिनीय वैयाकरण दत्तकलशि ठीक सोझाँ उपस्थित अछि। एखन एकर वाग्जालसँ सकुशल बचि निकलनाइ अछि। एकरा घबरायल देखैत छी। निश्चये कतहु वाद-विवादमेँ रगड़ायल अछि। वैसे सेहो, कलहक खुजलीसँ भरल एकर वाणी कनेक छुबितहि मन्दिरक घण्टा जकाँ टनटना उठैत अछि। ई भलमानुष गणिकाप्रिय अछि आ अपन प्रियतमा केँ नूपुरसेनाक पुत्री रशनावती कहैत अछि। हा! ऊँटक गरदनमेँ लटकल वीणा जकाँ ओहि बेचारी रशनावती लेल खेद अछि। ई हाथ उठा हमरा दिशेँ किछु कहि रहल अछि। की कहलह—‘सखे, सुखसँ सुतलह?’ एखन एकरासँ बचबाक कोन उपाय? नीक, एकर स्वागत करी। अक्षरसभसँ भरल कोठारक स्वागत! मित्र दत्तकलशि, तोरा घबरायल देखैत छी; कुशल तँ छह? की कहलह—‘मरल मांस खाएबला डोम-कौआ जकाँ कातन्त्र वैयाकरणसभ हमरा ऊपर टूटि पड़ल अछि’? हाय! कौआ-उल्लूमेँ युद्ध मचि गेल। मित्र, बधाइ जे तोरा बिना नोचायल देखि रहल छी। की कहैत छह—‘एहि दुष्ट कातन्त्र वैयाकरणसभकेँ हम बुझैत की छी?’ अहाँ जेना छी, ओहिना रहू; हम चली। की कहैत छह—‘कतय चललह? सञ्चिचीषु! एखन ठहर; एहन दौड़-धूप किएक?’ हाय, हमरा क्षमा कर। एहि प्रकार लाठीक मार जकाँ कठोर वाक्यबाणसँ हमरा नहि कूट। भरल सभामेँ मनुखक चलित भाषा बाज। ऊँटक बलबलाहट जकाँ अशोभन, कानमेँ विष जकाँ टपकएबाली वैयाकरणक ई किटकिटाहटसँ हमरा बचा। की कहैत छह—‘अनेक बकबकी तार्किकक बेलभिड़न्तसँ उपजल आ अनेक धातुसँ ढारल शतघ्नी जकाँ गड़गड़ाएबाली शैली छोड़ि हम एकरा स्त्रीक सुकुमार देह जकाँ कोना बनाबी?’ अहो, तखन तँ तोँ अनाथ छह। गप्प-सप्पमेँ, स्त्री आ मित्रक खातिरमेँ, अदालती अर्जीदावामेँ आ कहावतमेँ दाँततोड़ शब्द आ अक्षरक की मेल—जेना फूलक सेहरा आ काँटक मेल? की कहलह—‘निश्चये ओ कुलटा अछि, जे हमर एहन मधुर वाणीसँ सेहो रूसि गेल।’ ई कुलटा के भेल? की कहैत छह—‘ओकरा प्रिया कोना कहल जाय?’ [सोचि] हँ, बुझि गेलहुँ। रशनावती एहने योग्य अछि; कारण आमक वनमेँ विचरण करएबाली कोयल स्वभावे काँटेदार बेलक गाछपर बैसि गेल—एहिसँ पैघ दुःख दोसर नहि। हाय, एहि दुखमेँ सेहो बड्ड आनन्द अछि। तखन ओकर आनन्द लिअ। मित्र दत्तकलशि, तोहर-जकाँ मधुरभाषी भलमानुषसँ ओ स्त्री कोना विमुख भऽ गेल? ई सुनबाक हमरा बड्ड इच्छा अछि। सभ बात खोलि कह। की कहलह—‘निश्चये ओ कुलटा अछि। काल्हि साँझक समय वेश्यापुरीक अलिन्दमेँ मदमत्त भऽ, हम जखन हवन कऽ रहल छलहुँ, तखन मानो हमरा अँकवारैत ओ लग आबि बैसि गेल।’ एहिपर हम ओकरा कहलहुँ—‘अरी दोगली, होम करैत हमरा नहि छू।’ हाय, एकरे बिगड़ल भेंट कहल जाइत अछि! कामिनीकेँ अपन बनएनाइ सेहो नाजुक काज अछि। ई छूआछूत किचकिचक जड़ि अछि। अरे नादान, प्रेम करएबाली कामिनीकेँ दुत्कारि तोँ नीक नहि कएलह। कठोर शब्दसँ निर्दय बनल आ व्याकरणक चिनगारीसँ भरल अपन वचनसँ तोँ स्त्रीसभकेँ सेहो चिहुँका दैत छह। की तोँ पहिने ई नहि सुनने छह— जे एकान्तमेँ कामभावसँ भरल, सुकुमारचित्त, सहज मधुर वचनसँ दुलार करबाक योग्य अनुरक्त स्त्रीकेँ कान फोड़एबाली वाणीरूपी लुअठिसँ छूबैत अछि, ओ मानो जरैत काठसँ वीणा बजबैत अछि। निश्चये रशनावती टेढ़ काज साधनिहारि अछि, जे एहि-जकाँ ठूँठसँ प्रीति करैत अछि। अथवा ई ओकर लेल पूरा अभिशाप अछि। मित्र दत्तकलशि, तोँ कानमेँ जे अमृत टपकौलह, से सुनि लेलहुँ। तोहर कल्याण हो; हम जाइत छी। [घुमैत] मनुखक ई दोसर जमघट उपस्थित अछि। ई धमोसनिकक पुत्र पवित्रक नामक गुप्त व्यभिचारी—पवित्रताहीन होइतो वैष्णव कहबैत—राजपथपर अपरिचित लोकक मानो छूत बचबैत, भीजल वस्त्र समेटि समूचा देह सिकोड़ने, अँगुरीसँ दुनू नाकक छेद दबौने, चौबटियापर शिवलिङ्गक सहारा लऽ ठाढ़ अछि। निश्चये ई बेचारा हास्यक पात्र अछि; कारण सुनल जाइत अछि जे मत्तकाशिनीक पुत्री वारुणिका नामक टकहिया अर्थात् बन्धकी वेश्यापर आसक्त अछि। एहि समय ई एतेक घबरायल किएक अछि? चलू, एकर आवारागर्दीक पोथीक पेटी खोली। अरे पवित्रक, धूप सेकैत कछुआ जकाँ गरदनि बाहर-भीतर करैत किएक ठाढ़ छह? की कहलह—‘राजपथपर आबए-जाएबला अपरिचित लोकक स्वाभाविक छूत बचा रहल छी’? ओहो! अपरिचितक छूतसँ दूर भागैत छह, मुदा वारुणीक जघनस्थलक पात्र की गड़हाक घाट जकाँ बड्ड पवित्र अछि? की कहैत छह—‘एहन बात नहि अछि’? ग्वालक घरमेँ घोर बेचैत छह की? बादुरकेँ उलटि लटकबाक शिक्षा दैत छह की? बदमाशक संगो बदमाशी देखबैत छह। की कहैत छह—‘क्षमा करू बाबा, अहाँक गुप्तचर-दृष्टि बड्ड चौकस अछि’? केकर गुप्तचर? कतयक गुप्तचर? सूर्य दीप लऽ अन्हारमेँ नहि पैसैत अछि। हमरा जासूसक आवश्यकता नहि; एहन बातमेँ हम सहस्रनेत्र छी। तेँ बदमाशीक बाना उतारि फेक। केवल मुखाकृतिसँ भलमानुष, तोँ ढोंगसँ नम्र बनल छह। अरे सज्जनक सहपाठी आ विटक सेवक, छुआछूतक भूत आ वेश्याप्रसङ्ग दुनू परस्पर विरुद्ध अछि—जेना विरुद्ध आहार। आओर, छुआछूतक ढोंगमेँ बान्हल रहि ओकरासँ जुटैत छह, मानो सँड़सीसँ नेवारी चुनैत हो। की कहैत छह—‘एखन हम ई रपकपना छोड़ि देलहुँ’? खीर खा कऽ उपवास करबाक बातपर के विश्वास करत? की कहैत छह—‘जँ अहाँ हमरा ऊपर एतेक कृपालु छी— —तँ हमरा अपन शिष्य बना लिअ’? बधाइ, तोँ सत्पथपर आबि गेलह। जँ विट बनबाक निश्चय कएने छह, तँ वेश्याक प्रणय लेल कीलदार लाठी जकाँ घातक मिथ्या आचारक बाना शीघ्र उतारि फेक आ गुण्डईक हुंकार भर। की कहलह—‘हम अहाँक आज्ञाकारी छी’? तखन तोरा मनमाना खुलि खेलबाक पुरस्कार दैत छी। एखन हमर ई आशीर्वाद लह— छिड़िआयल आ छुटल पात्रबाली, ढील करधनीबाली, खुजल नीवीबाली, घबरायल, हाथपर हाथ चढ़ा स्तन, त्रिवली आ नाभिप्रदेश नुका लजाइत बैसल, ‘नहि, नहि, हमरा छोड़’ कहि चिचियाइत स्त्रीकेँ शय्यापर लऽ जा सुरत-सम्मिलनक पहिल फसल काट। की कहैत छह—‘अहाँ उपकारक ढेरी लगा देलहुँ; हम भला-चङ्गा भऽ गेलहुँ’? जँ एहन अछि तँ एखन हमरा आचार्य-दक्षिणा भेटबाक चाही। की कहलह—‘प्रणाम उपस्थित अछि’? अरे, एतेक भारी फजूलखर्ची! नीक, आइ सँ हम शिष्यबला— —तँ भऽ गेलहुँ; मुदा तोँ पूरा गुरु छह, शिष्य नहि। अकड़ि कऽ मनमाना मौज कर। हम चललहुँ। वसन्तक दुपहरियामेँ घूमनिहार लोकक पसेनाक स्पर्शसँ शीतल, मालाक दोकान आ घरक बीच रुकि-रुकि बहैत बाजारक हवा मानो प्रतिहारी जकाँ आगाँ बढ़ि हमरा भेटि रहल अछि। [फूल-बाजार देखि] नाना प्रकारक फूलक ढेरीसँ अङ्ग-प्रत्यङ्ग सजौने ई पुष्पवीथि वसन्तवधू जकाँ देखाइत अछि। ई— फुलायल कमलरूपी सुन्दर मुखबाली, उज्जर फूलक कलि जकाँ दाँतबाली, नव नीलकमलरूपी आँखिबाली, रक्ताशोकक गुच्छा जकाँ फरकैत ओठबाली, भँवराक गुंजाररूपी मधुर वाणीबाली, सुन्दर पुष्पगुच्छ जकाँ स्तनबाली, फूलक सेहरारूपी आभूषणसँ सुशोभित, गूँथल उज्जर फूलक वस्त्र पहिरने, उज्जर मालारूपी मेखलासँ युक्त—फूलसँ सजल ई पुष्पदोकान वसन्तक गृहिणी जकाँ, पुष्पाभूषित स्त्रीक शोभा देखबैत अछि। आह! असंख्य पुष्पसमूहक गन्हमेँ हमर हृदय फँसि गेल; तेँ एहि पुष्पवीथिकेँ छोड़ि जाएब हमरा बड्ड कठिन भऽ रहल अछि। [घूमि] ई दोसर हँसीक बाजार उपस्थित भेल। मृदङ्गवासुलक नामक पुरान नाटकक ई विट—जकरा वेश्यालोकनि ‘भावजरद्गव’ नाम देने छथि—सुरीला गायक आर्य नागदत्तक घरसँ बाहर आबि रहल अछि। खिजाब, स्नान आ अनुलेपनक चटक-मटकसँ ई अपन बुढ़ापा मानो छँगोटसँ झाँपने अछि। ई भलमानुष सभक मित्र अछि; एकरासँ बिना बजने जाएब सम्भव नहि। कनेक हँसी-ठट्ठा करी। [इशारा कऽ] अरे भावजरद्गव, एहि बुढ़ौतीमेँ सेहो तोरा सुकाल अछि की? की कहलह—‘अहाँ सुधि नहि लेलहुँ, तेँ बूढ़ साँप जकाँ केंचुल छोड़ि रहल छी’? बुझाइत अछि तोँ प्राणो छोड़ि कायाकल्प कऽ रहल छह; तेँ फेर जवान भऽ गेलह। बनाव-चुनावसँ जवानी साधबामेँ तोँ सिद्ध छह। तोहर— —माथ खिजाबसँ उपजल नकली जवानीक सूचक केसक ओलतिसँ झाँपल अछि—अर्थात् बीचमेँ टकला—आ मुख मूँछक पाकल रोमकेँ चिमटीसँ उखाड़ि सफाचट दाढ़ीबला अछि। प्रयत्नपूर्वक कएल मरम्मतक बलपर जेना पुरान जर्जर घर ठाढ़ रहैत अछि, ओहिना अङ्गक लीपापोतीसँ सँवारल तोहर जवानी अछि। की कहैत छह—‘पुरान मदिरा बेसी नशीली होइत अछि’? जँ तोहर ई इच्छा अछि तँ त्रिफला, गोखरू आ लोहाक चूर्णसँ बनल खिजाब द्वारा तोहर सभ प्रकारक वृद्धि हो। हम चली। [घुमैत] अरे, हमरा सहसा आबि गेलापर केओ एखन जुआघरक ड्योढ़ीक खम्भाक पाछाँ अपनाकेँ नुका ठाढ़ भऽ गेल। [देखि] ठीक, चिन्हि लेलहुँ—ई शेषिलक अछि। हमरा सँ नुकेबाक कारण की? मालतिकाक दूतीकेँ पकड़ि रखबाक बेहूदगीक विषयमेँ की एकरा शङ्का अछि? ठीक, हँसीक गोता लगा एकर थाह लेब। अरे ब्राह्मणपुत्र, मित्र भेटलापर अपनाकेँ नुका छतरीसँ चानन रोकबाक जकाँ व्यर्थ काज किएक करैत छह? ई बाहर निकलि हँसि रहल अछि। की कहैत छह—‘सुहृत्कर्णधारक स्वागत’? भलमानुष, हमर सुहृत्कर्णधारता कतय, जखन तोँ अपन दोहरा रतिप्रणयसँ हमरा दूर रखने छह? की कहलह—‘नहि, एहन बात नहि’? अरे सुरतक टुकड़खोर, हमरा सँ एना नहि कह। सभकेँ ज्ञात अछि जे शेषिलकक पड़ोसमेँ बौद्ध भिक्षुणी रहैत अछि। कामभाव उपजलापर मालितक बेटी मालतिका ओकरा तोहर लग दूती बना पठौलक। ओहि दूतीक शृङ्गारविहीन रूप, यौवन आ लावण्यमय देहपर मांस जकाँ ललचा तोँ तुरन्त ओकरेपर आँखि गड़ा देलह, भविष्यमेँ भेटएबालीक लेल नहि ठहरलह। की कहलह—‘मित्र, ई सत्य अछि जे भविष्यक सुखक आशामेँ प्राप्त सुख छोड़ब पुरुषार्थ नहि; तेँ हम ओहिना कएलहुँ। दीपसँ आगि नहि खोजल जाइत अछि।’ अरे, नीके कएलह। जँ विस्तारसँ नहि कहबह तँ रहस्य बेमजा रहत। तेँ ई बात विस्तारसँ सुनबाक योग्य अछि। तोँ— —की कहलह—‘के स्वयं अपन बेहूदगीक पचड़ा खोलैत अछि? तथापि संक्षेपमेँ सुनू।’ जखन ओ अपनापर बलात्कार होइत देखलक, तखन हमरा कहलक—‘एतेक विश्वास दिआ कऽ— —अरे बदमाश, तोँ हमरा ठकि रहल छह? हम प्रतिष्ठित स्त्री छी। अरे चपल, एहि काजक लेल आयल स्त्रीक संग एहन व्यवहार उचित नहि। दोसरक सुनसान घरमेँ पहुँचि हमरा बलपूर्वक रोकि लेल गेल अछि। एना नहि कर; हमरा ऊपर दया कर; छोड़, केओ आबि रहल अछि।’ वाह! मृदङ्ग बिना नाटकक अङ्क समाप्त भऽ गेल। एहि प्रकार सुरतक नियम तोड़ि, हे वशिष्ठपुत्र, तोँ ‘विट’ शब्दक जड़ि जमा देलह—अर्थात् दूतीक संग एना कऽ पक्का विट सिद्ध भेलह। मित्र, तोहर मिलन शुभ हो; हम चली। [घुमैत] लिअ, सुरतक पाहुनक बस्ती—वेश्यापुरी—आबि गेल। ई वेश्यापुरी— गणिकाक ई वेश कामक आवेश, बदमाशीक उपदेश, मायाक कोष, ठगीक अड्डा आ निर्धनकेँ भीतर नहि घुसए देबाक लेल बदनाम अछि। एतयक दुःखो रसपूर्ण होइत अछि। एकर प्रवेश सभक लेल सुलभ हो। [घुमैत] मैल चादरसँ देह झाँपि, शरीर सिकोड़ने, वेश्याक आङनसँ शीघ्र बाहर निकलैत ई के अछि? ध्यानसँ देखैत छी—हड़बड़ीमेँ खसल गेरुआ वस्त्रक छोर देखाइत अछि। आ, ई तँ एही विहार—धर्मारण्य—मेँ रहनिहार दुष्ट बौद्ध भिक्षु सङ्घिलक अछि। अहो, बुद्धक शासन कतेक पवित्र अछि, जे एहि प्रकार व्यर्थ माथ मुँड़ौने दुष्ट भिक्षुकसभक आघात सहितो दिन-दिन पूजल जा रहल अछि। अथवा कौआक जूठसँ सेहो तीर्थक जल अशुद्ध— —नहि होइत अछि। ओ हमरा देखि लेलक, तेँ अपनाकेँ नुका भागि रहल अछि। ठीक, जँ हमर वचनबाणसँ छुबि गेल तँ बिना चोट खएने नहि निकलत। चलू, एकरासँ गप्प करी। [इशारा कऽ] अरे विहारक भूत, उल्लू जकाँ दिनमेँ डरि कऽ किएक चलैत छह? की कहैत छह—‘एखन विहारेसँ चलि आबि रहल छी’? भदन्तक विहारशीलताक सत्यता हम नीक जकाँ जनैत छी। बदमाश, वेश्यावीथिक बावड़िसँ निकलैत बगुला जकाँ सहमल तोँ कतय जा रहल छह? सुरतरूपी पिण्डपात अर्थात् भिक्षाक खोजमेँ छह की? की कहैत छह—‘माताक मृत्युसँ दुःखी सङ्घदासिकाकेँ बुद्धवचनसँ सान्त्वना देबाक लेल आयल छी’? तोहर मुँहसँ निकलल बुद्धवचन एहन लगैत अछि, जेना मदिराक भ्रममेँ आचमन कएल गेल हो। हाय— मूर्खतावश वा संयोगेसँ जँ कोनो भिक्षु वेश्याक आङनमेँ प्रवेश करैत अछि, तँ दत्तकसूत्रमेँ ओंकार जकाँ ओ शोभा नहि पबैत अछि। की कहैत छह—‘हमरा सभकेँ समस्त प्राणीपर दया देखेबाक चाही’? ठीक, नित्य प्रसन्न रहनिहार भदन्त तृष्णाक नाशसँ परिनिर्वाण प्राप्त करताह—अथवा ‘नित्यप्रसन्ना’ नामक मदिरा जमेबाक बाद तोँ पिआस मेटा मातल भऽ जाएबह। ओ हाथ जोड़ैत अछि—अर्थात् अँजुरी भरि पीबैत अछि। की कहैत छह—‘ठीक अछि, हम मुक्त भऽ जाई’? ठीक, अपन परिश्रम व्यर्थ नहि कर; मोक्ष तोहर लेल सर्वथा दुर्लभ अछि। की कहैत छह—‘हम जाइत छी; अकालभोजनसँ बचबाक चाही’? वाह, वाह! तोँ बाँकी सभ नियम पूरा कऽ चुकल छह। पंचशील नहि छोड़निहार एहि भिक्षुक लेल मात्र एतबे बाँकी अछि जे उचित समयपर भोजनक नियम भङ्ग नहि हो। जा, रुम्बा पड़! केश मुँड़ौलाक कारण माथपर दादक चित्तीसँ लजा रहल छह? जा, तोँ पूरा बुद्ध छह। नीक भेल ई दुष्ट बिलाए गेल। एहि गन्हाइत बौद्ध भिक्षुकेँ देखिसँ मलिन भेल अपन दृष्टि कतय धोई? [घुमैत] अरे वाह! गुण्डालोकनिक आँखि शीतल करएबाली वस्तु आबि गेल। वसन्तवतीक पुत्री वनराजिका, वनराजि जकाँ रूपवती, मानो अपन देहेपर फूलक समाज रचि, इच्छित देवपूजा आ सम्मान कऽ, कामदेवक मन्दिरसँ उतरि रहल अछि। ओ पूर्ण सावधानीसँ पुष्पशृङ्गार द्वारा देहकेँ भव्य बनौने अछि। बुझाइत अछि, अपन प्रियजनक लग जा रहल अछि। मधुर गप्प करैत ओकरा लग पहुँची। [इशारा कऽ] भद्रे वनराजिके, वसन्तक फूलक पहिल उपहार लैत कतहु पाहुनकेँ बिसरि तँ नहि गेलह? की कहलह—‘आर्यक स्वागत, प्रणाम’? तोहर दाक्षिण्यक ई पल्लव स्वीकार कएलहुँ। निश्चये हालहि आयल वसन्त तोहर देहमेँ पैसि गेल अछि। की कहलह—‘कोना?’ तखन सुन— वासन्ती आ कुन्दक पुष्पक संग मिलल कुरबकक फूलसँ तोहर जूड़ा सजल अछि; चोटीक छोरमेँ अशोक लागल अछि; स्तनतट सिन्धुवारक उपहारसँ सजल अछि; नव आम्रमञ्जरी आ हिलैत कोँपलसँ कर्णपूर बनल अछि। हे सुमुखि, अँजुरीमेँ फूल भरने तोँ मूर्तिमान वसन्तकेँ धारण कएने छह। की कहैत छह—‘ई अहाँक लेल उपहार अछि’? ठीक, तोँ स्वयं एहि धरोहरकेँ राख; समय अयलापर हम लऽ लेब। तोहर कल्याण हो; हम चली। [घुमैत] अरे, ई इरिमक रखैल ताम्बूलसेनाक घर अछि। भलमानुष प्रतिदिन एतय जमैत अछि। की हम भीतर जाउ? [सोचि] बिना गप्प केने जाएब उचित नहि। तखन भीतर चली। [प्रवेश कऽ] अरे मित्रक घरमेँ केओ अछि, जे शशक आवभगत करए? अरे, ई ताम्बूलसेना हमर सम्मान लेल शीघ्र डेग भरैत, घबराहटमेँ खसल चादर घीचैत, बाहरी दुआरिपर स्वागत करबाक लेल पहुँचि गेल अछि। निश्चये ई अतिरिक्त आवभगत अछि। बुझाइत अछि, हमर भीतर प्रवेश ओकरा नीक नहि लगल; तेँ बाहरहि हमरा निपटएबाक लेल निकलि आयल अछि। एकर ताजा सुरतचिह्नसँ बुझाइत अछि जे एखनहि रतिक्रीड़ासँ निवृत्त भेल अछि। निश्चये इरिम दिवासुरतक मल्लयुद्धक अनुभव कएलक। ई भलमानुष सुरतक बड्ड लोभी अछि। होअए, एकरासँ कनेक मजाक करी। अरी ताम्बूलसेने, एतेक आवभगत किएक खर्च कऽ रहल छह? रतिजनित थाकनिक कारण उखड़ल निःश्वाससँ टूटल अक्षरमेँ ‘प्रिय मित्रक स्वागत’ कोना कहि रहल छह? अरी सदा प्रेममेँ पगलि, पहिने एकटा पङ्खा लह। सत्ये, ताम्बूलसेना व्यायाम—सुरतश्रम—कऽ चुकल अछि। अरी चोटी, शक्ति सेहो बढ़बैत छह वा— —नहि? की कहैत छह—‘हम किछु नहि बुझैत छी’? [हम देखैत छी] प्रियजनक संग आलिङ्गनक कारण एकर स्तनतटक चन्दन मेटा गेल अछि। तखन पूछी। अरी सुरततृष्णाक सदिखन पिआसल, रातिभरि विहार करएबला इरिमकेँ दिनोमेँ विश्राम नहि करए दैत छह? भोर-साँझ दुनू समय होम चलैत अछि की? की कहैत छह—‘दोसरक मजाक उड़ेनाइ अहाँक सदिखनक आदति अछि’? बात— —एहन नहि। अरी चतुरे, की नहि सुनने छह जे रूप नुकेलासँ सेहो रूप प्रकट भऽ जाइत अछि? की कहैत छह—‘अहाँ कोना बुझलहुँ’? अरी चोटी, हम कोना नहि बुझब? जेना— मेटायल विशेषक, पोंछल रोलीक टीका, कपोलपर छिड़िआयल लट, खसल कर्णोत्पल, दन्तक्षतसँ लाल अधरबला मुख आ अलसायल आँखि सूचित करैत अछि जे तोहर प्रेमी दिवासुरतक लोभी अछि। की कहैत छह—‘एखन हम सुति कऽ उठल छी; अहाँ किछु दोसर शङ्का करैत छी’? ठीक, हम बुझि गेलहुँ। एखन तोहर सूक्ष्मसँ सूक्ष्म भेदो हमरा लेल अनजान— —नहि रहल; मुदा— बुझाइत अछि, तोहर देहपर ई नखक्षत आ दन्तक्षत स्वप्नक अन्तमेँ भऽ गेल अछि। हे सुन्दरि, तोहर दहिना काँधपर ई वस्त्रचिह्न की पितरकेँ ‘स्वधा’ कहि प्रसन्न करबाक कारण बनल अछि? आओर, हड़बड़ीमेँ तोँ ई देखब बिसरि गेलह जे ओ गँवार मोची तोहर दुनू पएर लेल बाम जुत्ते बना देलक। अरी चोटी, चोरीक मालक संग पकड़ायल तोँ एखन बचि कऽ कतय जाएबह? ओ भीतरक घरमेँ जा अपन रमणक संग जोर-जोरसँ हँसि रहल अछि। [कान लगा कऽ] ई इरिम कहि रहल अछि—‘हे धूर्ताचार्य, भीतर आउ।’ मित्र, सुरतरथमेँ जोतल बरदक जुआ के काटत? तोहर ई सुरतक टहल बेरोकटोक चलैत रहय। हे गार्गपुत्र, हम चली। [घुमैत] अरे, बाहरी दुआरिक देहरीपर देवताकेँ बलिक उपहार दैत ई के अछि? निश्चल मुख, शोकक थाकनिसँ भरल, बिना काजरक आँखि, मैल वस्त्र, बिना तेलक लटकैत घन केस, ढील कङ्कण, फूल फेकलासँ खसल अँगूठी—ई छरहरि तरुणी आओर दुबर भऽ गेल अछि। ई भाण्डीरसेनाक पुत्री कुमुदवती अछि। हा, खेद! ई बेचारी कठिनतासँ चिन्हाइत अछि। के अछि, जकर लेल ई वेश्यापुरीक रीति-विरुद्ध, विरहमेँ पतिव्रता जकाँ व्रत करैत अछि? हँ, स्मरण भेल। सुनल जाइत अछि जे ई ओहि मौर्यकुमार चन्द्रोदयमेँ अनुरक्त अछि। ओ भलमानुष सामन्तसभकेँ दबएबाक लेल सेनाक संग गेल अछि। हा, चन्द्रोदयक विरहमेँ कुमुदवती श्रीहीन भऽ गेल अछि। ई तँ कुलवधूसभकेँ सेहो पराजित कऽ देलक। अपन घरक अटारी—वलभीपुट—पर बैसल, बलिक लोभसँ आयल कौआकेँ स्वागतवचनसँ अभिनन्दन कऽ रहल अछि— हे अटारीक गोखक तिलक, हे श्राद्धमेँ देल बलिभोजनक अतिथि, तोहर कल्याण हो। की हमर जीविते सदिखन प्रवासमेँ रहनिहार हमर प्रियतम घुरि आएत? जँ ओ अबैत हो, तँ जा आ दोसरक दुआरक तोरणपर बैस। दुःख बीतलाक बाद प्रियतमसँ मिलि हम तोरा दही-भात खुआएब। वाह, एकर प्रेम निश्चये छल-कपटहीन अछि। राजाक योग्य ई रत्न हँसी उड़एबाक वस्तु नहि। कोनो राजमहिषीक हाथसँ एकरा वधूभावक अवगुण्ठन प्राप्त हो। एखन हम असगरे चलब। [घुमैत] अरे, दहिना दिस बगैचामेँ आभूषणक झनकारसँ उड़ल चिड़ैक मुखर ध्वनिसँ मिलल-जुलल कोनो शब्द सुनाइत अछि। ठीक, एहि वृक्षवाटिकाक दुआर खुलल अछि; देखी। [देखि] हा-हा, कतेक सुन्दर! एतय तँ आँखिक उत्सव सजल अछि। ई पाञ्चालदासीक पुत्री प्रियङ्गुयष्टिका अछि। जघनभाग भरि उठलासँ ओकरामेँ यौवनोचित ठसक आबि गेल अछि। यौवनक नव राज्य ओकरा मोहित कऽ रहल अछि। अनेक विलास, हाव, भाव आ दाक्षिण्यसँ युक्त, सखीसभसँ घेरायल, ओ गेन्द खेलि रहल अछि। ई— मूँगा जकाँ लाल अँगुरीबला हाथसँ मैनसिल रङ्गक गेन्द पकड़ने, नीचाँ-ऊपर लचकैत ओहि कदम्बलताक शोभा पाबि रहल अछि, जे अपन पल्लवक टोकसँ कोनो फूलपर टहोका मारि रहल हो। एकरा देखनाइए अमूल्य लाभ अछि। ठीक, तृप्त मनुखो अमृतसँ नहि अघाइत अछि। चलू, एकरासँ किछु गप्प करी। [लग जा कऽ] प्रियङ्गुयष्टिके, गेन्द खेलबाक बहाना सँ तोँ सखीसभक नृत्यकौशलकेँ सेहो किएक पराजित कऽ रहल छह? कनेक मुस्की दऽ उत्तर देतहि ओ खेलिते जा रहल अछि। ओकर दासीसभ गेन्दक उछाल गनि रहल अछि। बुझाइत अछि, सखीसभक संग बाजी लगौने अछि। वाह! बाजीक कारण एकरामेँ कतेक उत्साह भरि गेल अछि। आइ संयोगहि हमरा ई दृश्य देखबाक भेटल—ओकर नीचाँ-ऊपर होयब, घूमब, उछलब, पाछाँ हटब, दौड़ब आदि अनेक प्रकारक अङ्गसञ्चालन सभ भाँति सुन्दर अछि। बहुत कहब की? घूमबाक, पाछाँ हटबाक आ कुदबाक समय ओकर फुलायल वस्त्रक भीतर पैसबाक इच्छुक हवा सेहो कामुकतासँ ओकर पाछाँ दौड़ि रहल अछि। हमरा भय अछि जे मुट्ठीमेँ आबि जाएबाली, यौवनक भारसँ लदल स्तनक कारण नमल, स्वभावे पतली एकर कमर कतहु टूटि नहि जाए। तेँ एकर उपेक्षा सम्भव नहि। एकरासँ गप्प करी—अरी यौवनमत्ते, अपन सुकुमारताक विरुद्ध ई की कऽ रहल छह? ठहर, ठहर; हम तोरेसँ कहि रहल छी। एकर उल्लास तँ बढ़िते जा रहल अछि। अहो, एखन हम एतबे कामना करैत छी— अरी चपले, गेन्दक पाछाँ तोँ पूर्णतः उन्मत्त भऽ गेल छह। तोहर कानक कुण्डल जोर-जोरसँ हिलि रहल अछि। दुनू भुजा चमकि रहल अछि। छिड़िआयल अलकसँ खिलल फूल झरि रहल अछि। तोहर करधनी चक्कर लगेलासँ ऊपर उछलैत आ— —फेर वेग बढ़लासँ चमकैत आ क्षुब्ध होइत अछि। थरथराइत स्तनक भारसँ नमल तोहर कमर मात्र सकुशल रहय। पूरा सएह उछाल भऽ गेल, तेँ ओ रुकि गेल। भद्रे प्रियङ्गुयष्टिके, सखीसभसँ बाजी जीतलापर बधाइ। की कहैत छह—‘आर्यक स्वागत; विजयक आधा भाग उपस्थित अछि, स्वीकार करू’? भद्रे, तोरा देखनाइए हमरा लेल अमूल्य लाभ अछि। हमर स्मरण राखिह; हम चली। [घुमैत] अरे, मित्रक मनोरञ्जनक ई दोसर अड्डा आबि गेल। ई चन्द्रधरक सुरतिन नागरिकाक पुत्री शोणदासीक घर अछि। भीतर प्रवेश करी; बिना बजने आगाँ नहि बढ़ि सकैत छी। [प्रवेश कऽ देखैत] अरे, शोणदासी किछु सोचैत बाहरी दुआरिक देहरीपर बैसल अछि। ई की बात जे आभूषण एक दिस राखि, अपन स्वाभाविक लावण्यसँ सुन्दर लगैत, मैल चादरसँ आधा देह झाँपि, ललाटपर लाल चन्दन लगा, उज्जर दुकूलक पट्टी माथपर लपेटि, चन्द्रमुख नीचाँ नमौने, कोरामेँ पड़ल वीणाकेँ अँगुरीसँ कनेक झनकारैत, मन्द मधुर काकलीस्वरमेँ कौशिकक सहारासँ तान लगा बैसल अछि? निश्चये ई उत्कण्ठिता अछि। कौशिकक सहारासँ गाएब रोदनक दोसर नाम अछि। की चन्द्रोदयसँ पहिनहि हम ई वृत्तान्त नहि सुनने छलहुँ जे एहि दुनूक बीच प्रणयकलहरूपी विवाद भऽ गेल? प्रियतमक संग झगड़ा कऽ ई पछता रहल होयत। ठीक, एकरासँ कनेक हँसी करी। अरी शोणदासि, वेश्यापुरीमेँ रहनिहारि कोनो तपस्विनीक स्वाँग किएक रचने छह? भद्रे, निश्चये चन्द्रधरसँ कोनो अपराध भेल अछि की? नोर बहबेनाइए तोहर उत्तर अछि? नोर रोक आ हमरा स्थिति कह। की कहैत छह—‘केवल मान करएबामेँ निपुण हमर सखी हमर सर्वनाश कऽ देलक’? अरी शोणदासि, जाहि सखीकेँ सभसँ अधिक मानैत छह, ओकरेसँ विद्रोह भऽ गेल? की कहैत छह—‘ओकरे खराब परामर्शसँ ई विपत्ति सहि रहल छी’? तोँ नादान छह। ओकरा एना कहबाक चाही छल— हे दूति, प्रियतमक प्रति प्रायः शीत रहनाइए हमर अपराध छल; मुदा एखन हम एक क्षणो हुनकासँ मान नहि कऽ सकैत छी। अरी अनार्ये, हमरा कामक कठोर तराजूपर चढ़ा कऽ एखन प्रसन्न छह? केवल मानक लेल उकसाएबाली आ मान-मनौवलविहीन तोहर बातमेँ आबि हम एहन काज कऽ देलहुँ, जकर कारण बेसी ढील भऽ गेल अपन करधनीकेँ स्वयं दुनू हाथसँ सम्हारए पड़ि रहल अछि। की कहैत छह—‘कामदेव हमर सभ मान शान्त कऽ देलनि; मुदा सौभाग्यक घमण्डमेँ तोहर ओही मित्र एखन हठी बनल छथि’? तखन अभिसार किएक नहि करैत छह? अरी मुग्धे, एहन लज्जा छोड़। आँखिमेँ नोर भरि, मुख नीचाँ कऽ, लम्बा निःश्वास लैत मोनमेँ की चिन्ता कऽ रहल छह? यद्यपि तोँ सौभाग्यवती छह, मुदा एखन शिथिल आभूषण स्वयं सम्हारए पड़त। तटस्थ सखीक वचन छोड़ आ प्रियतमकेँ अनुनय-विनयसँ मना। व्यर्थ कठोर बनल रहिसँ की लाभ? अरी मूर्खे, जखन प्रणय बड्ड बढ़ि गेल हो, तखन अत्यधिक मान कऽ बैसल रहनाइ अपमान बनि जाइत अछि। की कहैत छह—‘स्त्री पुरुषकेँ मनाबय, ई कोन सच्चा पुरुषार्थ अछि’? अरी एना नहि सोच। हे अभिमानिनि, गङ्गा समुद्रक लग नहि जाइत छथि की? लज्जासँ मुक्ति लह। अथवा तोहर इच्छा पूर्ण हो; चन्द्रधरकेँ हम स्वयं मना देब। बेसी कहब की? दीर्घ विरहमेँ बन्द पड़ल तोहर मदनाग्निहोत्रकेँ आइए— —फेर प्रज्वलित करब। नोर रुकबासँ पहिने ई मुस्की किएक देलक? मानो बरखामेँ चानन देखाइ देलक। हे सुन्दरि, कानब बन्न कर; एखन सुखक समय आबि गेल। की कहैत छह—‘एखन अहाँ अपन वचन सत्य करू’? भोरमेँ जानि जाएबह। नीक, रोदन रुकि गेल। हम चली। [घुमैत] अहो, शृङ्गारक ई दोसर विषय उपस्थित भेल। शरदक निर्मल चन्द्रमा जकाँ मुखबाली ई नागरिकाक पुत्री मगधसुन्दरी नामक गणिका अछि। एकर केस कारी, कोमल, घुँघराल, चिक्कन आ सुगन्धिसँ महमह अछि; चञ्चल नेत्र खिलल नीलकमल जकाँ सुन्दर अछि। दाँतक बाहर अबैत किरण मूँगा जकाँ चटकीला लाल अधरक सम्पर्कसँ लालिमायुक्त भऽ रहल अछि; दाँत कुन्दकली जकाँ उज्जर, समान आ सटल अछि। कपोल, स्तन आ जघनभाग भरल अछि। बाहरी दुआरिक किवाड़क पाछाँ देह नुका, दहिना हाथक दू अँगुरीसँ परदाक छोर पकड़ि ठाढ़ अछि; बाम पएरक एक भागसँ भूमिपर ताल दैत, सुरीला मधुर तारस्वरमेँ ‘वल्लभा’ नामक चौपदी गुनगुना रहल अछि। ओ गीत शुद्ध वर्णबला, अलङ्कारयुक्त, कानकेँ सुख देनिहार आ षड्जग्रामपर आधारित अछि। नेत्र आ भौँहसँ मोनमेँ उमड़ैत सकाम भाव प्रकट करैत कोनो रईसक प्रतीक्षा कऽ रहल अछि। अरे, इन्द्र जकाँ भाग्यशाली ओ के अछि, जकरा सुरतयज्ञ लेल आह्वान कएल जा रहल अछि? ठीक, एकरेसँ पूछी। अरी वेश्यापुरीक मेघराशिक बिजुरी, तोहरासँ किछु पूछए चाहैत छी— हे चन्द्रमुखि, श्वेत भाग, कारी पुतली, कोनमेँ लालिमा आ कटाक्षसँ युक्त एहि खुलल दृष्टिसँ तोँ बाहर दिस कोन भाग्यवानक लेल देखि रहल छह? हा! भयभीत मृगछौनी जकाँ डरायल आँखिसँ ओ हमरा दिश देखि रहल अछि। बुझाइत अछि, एकर मोनमेँ फेर रङ्ग भरि गेल। की कहैत छह—‘एहन बात—’ —नहि अछि। हम वसन्तमेँ ब्रह्मचारिणी रहि उपवास करैत छी’? ई विश्वासयोग्य बात अछि! मुदा तोहर अधरपर ई ताजा दन्तक्षत की कहि रहल अछि? की कहैत छह—‘अन्तिम पाला जकाँ कठोर वसन्ती पवनक ई चिह्न अछि’? ओहिना सही; हम बुझि गेलहुँ। दन्तक्षतसँ जर्जर अधरबाली भऽ कऽ सेहो तोँ जे अपन नियमाचार कहि रहल छह, ताहिसँ स्पष्ट अछि जे अपन व्रतक अनुरूप चुम्बनक चान्द्रायण करैत छह—चान्द्रायण-व्रतक आहार जकाँ चुम्बनकेँ घटबैत-बढ़बैत रहैत छह। वाह! किवाड़क पाछाँ मुख नुका कऽ हँसए लागल। तोहर एहि तपक वृद्धि हो। हम चली। [घुमैत] वाह! कोनो तरहें वेश्यालोकनिक संग गप्पक कड़ी तोड़ि हम देवदत्ताक घर आबि पहुँचलहुँ। सम्भवतः देवदत्ता बाहर गेल छथि। ककरासँ पूछी? [देखि] वाह! बगैचाक कातक दुआरसँ प्रिय नाट्याचार्य गन्धवेदत्तक शिष्य, दर्दरक नामक नटीपुत्र अर्थात् नाटेरक बाहर निकलि रहल अछि। ओकरेसँ पूछैत छी। [इशारा कऽ] अरे दर्दरक, तोँ कतयसँ आबि रहल छह? जनैत छह, देवदत्ता की कऽ रहल छथि? की कहलह—‘देवदत्ता आर्य मूलदेवकेँ देखबाक आ कुशल-मङ्गल पूछबाक लेल गेल छथि। हमर आचार्य हमरा देवसेनाकेँ देखबाक लेल पठौलनि’? कोन कारणेँ? की कहैत छह—‘आचार्य कहलनि—प्रकरण नाटकमेँ कुमुद्वतीकेँ जे अभिनय करबाक अछि, ओकर लिखल पत्र ओकरा दऽ आउ’? ओ लिखल पत्र लेलक? की कहैत छह—‘आचार्यक रोबसँ पत्र तँ लऽ लेलक, मुदा कातमेँ बैसल सखीक हाथमेँ दऽ देलक। फेर कुमुद्वतीकेँ प्रणाम कऽ कहलक—“हम एहि समय स्वस्थ नहि छी।”’ अहो, हमहुँ अपन अनुमान लेल प्रसिद्ध छी। ई स्पष्ट करैत अछि जे ओ पूर्णतः कामभावमेँ निमग्न अछि। अरे दर्दरक, एहि पत्रमेँ की लिखल अछि? की कहैत छह—‘स्वयं पढ़ि लिअ’? [पत्र लऽ पढ़ैत] रागवती किशोरीसभ जघनस्थलपर नखक्षतरूपी गुप्त सम्भोगचिह्न धारण करैत रहथि। ओ चिह्न कामदेवक मनोहर फूल, स्तनक लग हारमेँ झूलैत चन्द्रलेखाक आकार, प्रेमरूपी गाछक नव पात, शय्यायुद्धमेँ लागल घाव, सुरतरूपी रथयुद्धमेँ थाकल बरदकेँ हाँकबाक अङ्कुश आ विलासक अद्भुत नमूना अछि। वाह! स्त्रीरूपी ओहि हठीली बछेड़ीकेँ साधबाक लेल निकललापर हमरा कार्यसिद्धिक सूचक ई शकुन देखाइ पड़ल। अरे दर्दरक, तोँ ई सेहो जनैत छह जे देवसेना कतय अछि? की कहैत छह—‘बगैचामेँ गेल अछि’? हँ, तखन— —तँ कामदेवक कारखानामेँ अछि। ठीक, तोँ जा। हम भीतर प्रवेश करैत छी। [प्रवेश कऽ] अरे, ई तँ देवसेने अछि— दुबर, फिक्का, पीयर, कान्तिहीन—भोरक क्षीण चानन जकाँ ओ कामरोगक असाधारण गुप्त वेदना सहि रहल अछि, जे केवल मधुर उपचारसँ दूर कएल जा सकैत अछि। अहो, एहि कारण ओ समस्त गुप्त रहस्य जाननिहारि आ अत्यधिक स्नेहसँ सखीरूपमेँ स्वीकार कएल अपन प्रियवादिनिका नामक दासीक संग, सभकेँ हटा, एकान्तमेँ हवा खा रहल अछि। ठीक, एहिसँ ओकर एकनिष्ठ आसक्ति सेहो प्रकट होइत अछि। सभ कामी एकान्त पसन्द करैत छथि। एखन ओ हमर पहुँचमेँ अछि; चलू, ओकरा लग जाउ। [जा कऽ] बालिके देवसेना, तोहर निजक गुप्त गप्पमेँ हस्तक्षेप करनिहार हमरा सँ क्रुद्ध नहि हो। की कहैत छह—‘अहाँक तँ स्वागत करैत छी’? तोहर ई शिष्टाचार स्वीकार कएलहुँ। अरे, उठबाक कष्ट नहि कर। की कहलह—‘बैसू, ई आसन अछि’? नीक, बैसैत छी। भद्रे, प्रेमीक लेल सन्ताप करबाक कारण आँखिसँ नहि देखाइत, भीतर नुकायल कसकबला, स्वयं लगाओल आ आरम्भमेँ असगरे अबैत ई कोन रोग अछि? की कहलह—‘किछु नहि’? अरी सुघड़े, हमरा टारब छोड़। तोँ सदिखन हमरा लेल प्रिय बालिका छलह, जे खेलौना आदि अनबाक लेल हमरा कहैत छलह। हम वही मूलदेवक मित्र शश छी। मोनक बात कह। ई दुख ककर कारण अछि— बिना रोगो तोँ रोगिणी छह। तोहर कनपटी कमल जकाँ हथेलीपर टिकल अछि। पुतली ध्यानमेँ एकटक अछि। हृदय जड़ भऽ गेल अछि। जँभाइ आबि रहल अछि। रङ्ग बदलि गेल अछि। अरी चोटी, कह—ई कोन नव रोग तोरा लागल अछि, जकर कारण श्वास लेबो कठिन अछि, कतहु शान्ति नहि, इन्द्रियसभमेँ दाह अछि आ तोरा मात्र एक वस्तुक इच्छा अछि? ई एहन निःश्वास किएक लेलक? एकर कामाग्नि धधकि उठल अछि। ठीक, एखन एकर मोनक बात बुझि सकब। जँ हम तोहर विश्वासक पात्र नहि छी, तँ प्रसन्न रह; हम अपन काजपर चली। की कहैत छह—‘अहाँ एतेक चपल छी’? हँ, बुझि गेलहुँ। [मनमेँ] ई मर्मक बात कहए चाहैत अछि। [प्रकट] तोहर एहन दशा देखि हम धैर्य कोना राखी? आ विलम्ब कएलासँ दोसर काज उपस्थित भऽ जाइत अछि। तेँ शीघ्र अपन सन्तापक कारण कह। की कहैत छह—‘अहाँसँ हमर किछु नुकेल नहि अछि। वसन्तक स्वभावे एहन अछि जे पैघ लोकक कठोर शिक्षासँ वशमेँ राखल मोनकेँ सेहो बिना कारण उचाट कऽ दैत अछि’? ठीक, ई रोगसँ इनकार— —नहि करैत अछि। अरी चोटी, की तोँ जनैत छह जे देवसेना सचमुच युवती भऽ गेल अछि! हे बालिके, जँ बात एतबे अछि, तँ एहि रोगकेँ आगाँ नहि बढ़ा। ऋतु बदललापर तोँ स्वस्थ भऽ जाएबह। ई लजा किएक गेल? प्रियवादिनिके, तालपत्रपर की लिखल अछि? की कहैत छह—‘नाटकमेँ पात्रक भूमिका अछि’? देखी तँ। [लऽ पढ़ैत] ‘कुमुद्वती’ प्रकरणमेँ शूपकपर आसक्त राजपुत्रीकेँ ओकर धाय असगरेमेँ उलाहना दैत अछि— अरी नासमझे, एखन तोहर छाती सेहो नहि उभरल, ने रोमावली फूटल अछि। अरी अनाड़ी, एखन तोहर बुद्धि अपरिपक्व अछि। जवान स्त्री जकाँ पतिक संग मिलबाक ई साध छोड़। तोहर चतुर सखीसभ सदिखन तोरा अविनयक पोथी पढ़बैत रहैत अछि। अरी, तोँ बालपनेमेँ पाकि गेलह। कामसङ्ग्रामक लेल किएक तत्पर छह? देवसेना की कहलक—‘ई तँ हमहुँ पहिने नहि सुनने छलहुँ’? अहो, एखन एकर अपन भाव खुजल। एकर अर्थ भेल—‘हमहुँ एहने करए चाहैत छी।’ देवसेना की कहैत अछि—‘अहाँ हमरा चरित्र बुझैत छी’? भद्रे, हमरा टारब छोड़। मेघमेँ नुकायल चन्द्रमाकेँ सेहो कुमुदिनीक खिलब प्रकट कऽ दैत अछि। अरी पुरुषकेँ उन्मत्त करनिहारि, चल; तोहर ऊपर ई विपत्ति आयल अछि। अरी गुमसुम भाव नुकेनिहारि, ‘हम प्रेम नहि करैत छी’—एना अनेक बेर कहने छह। अरी चोटी, फेर कह जे स्वभावसँ छरहरि तोँ आओर दुबर किएक भऽ गेलह? तोहर कङ्कण ढील किएक पड़ि गेल? कपोल हाथपर किएक रखने छह? लम्बा निःश्वाससँ तोहर मुखक रङ्ग फिक्का किएक भऽ गेल? अरी शठतासँ भरल, कह—जखन ई जन एहि प्रकार मदनव्याधिसँ पीड़ित अछि, तँ एतेक धैर्य किएक धारण कऽ रहल छह? प्रियवादिनिके, तोँ की कहैत छह—‘कामतन्त्र-प्रकरणमेँ प्रवृत्त हमर स्वामिनी कोनो साधारण मनुखमेँ नहि, एक विशिष्ट पुरुषमेँ अनुरक्त छथि’? तँ एहि अवन्तीनगरमेँ ‘पुरुषविशेष’ शब्द ककरा लेल लागू होइत अछि? की कहलह—‘अहाँक अनुमान की अछि’? दोसर के भऽ सकैत अछि? कर्णीपुत्रे होयत। ओ— उत्तम कुलमेँ उत्पन्न, विद्वान्, कोनो बातसँ चकित नहि होनिहार, हँसैत बजएबला, चतुर, ईर्ष्याविहीन, प्रियभाषी, रूप-यौवनसँ युक्त आ धनुषविहीन साक्षात् कामदेव अछि। देवसेना माथ नीचाँ कऽ किएक रहि गेल? अरी चपले, दुकूलक आँचर गुंथब बन्न कर आ कह तँ सही। जँ ई हमरा विश्वासपात्र मानैत अछि, तँ चुप किएक अछि? लज्जा स्त्रीक—विशेषतः मुग्धा स्त्रीक—विश्वासक दहेज अछि; फेर ओ स्वयं कोना कहत? अतः ‘पुरुषविशेष’ ई असाधारण शब्द यद्यपि कर्णीपुत्रेपर लागू होइत अछि, तथापि जाबत एकर पूरा थाह नहि पाबी, धैर्य राखि एकरे मुँहसँ एकर भेद कहाएब। भद्रे देवसेने, दोसरक भेद सुनिसँ हमरा की प्रयोजन? हम तटस्थ छी; केवल तोरा परामर्श दैत छी। कर्णीपुत्र सेहो पाटलिपुत्रसँ दूर रहबाक कारण अपन स्वजनसँ मिलबाक उत्कण्ठामेँ अधिक अस्वस्थ छथि। ओ आइ वा काल्हि चलि देताह। तोहरासँ फेर भेंट होयत; मुदा आशा अछि, ताबत तोँ स्वस्थ भऽ जाएबह। हमर स्मरण राखिह। [उठि चलैत, फेर शीघ्र घुरि] अरे, के कहलक—‘हा, एखन हम मरि गेलहुँ’? अरे देवसेना, किएक कानि रहल छह? भद्रे, की बात? कानब बन्न कर। नीक, बुझि गेलहुँ। तोरा बधाइ—तोहर मनोरथ योग्य पात्रमेँ गेल अछि। कर्णीपुत्रकेँ सेहो तोहरे रोग अछि; तखन अहाँ दुनू एक-दोसरक उपचार करू। की कहैत छह—‘अहाँ एतेक विश्वाससँ कोना कहि रहल छी? अहाँ तँ दोसरक दुखसँ पघिलनिहार छी’? बस, एखन कष्ट सहिसँ की लाभ? हे सुन्दरि, दक्षक पुत्री तारिकासभ मिलि कऽ एकमात्र चन्द्रमाक भोग नहि करैत छथि की? अथवा एकहि जड़िसँ फूटल दू लता एकहि सहकार गाछपर नहि चढ़ैत अछि की? की कहैत छह—‘तखन एहन युक्ति करू जाहिसँ दुनूक रक्षा हो’? अरे, ई तँ कएल-करेल अछि। काल्हि तोहर बहिन सदिखन जकाँ आचार्यक एतय अपन नृत्यक पारी पूरा करबाक लेल जायत। तेँ हे सुभगे, एखन जखन तोहर अन्तःकरण विश्वस्त भऽ गेल, तँ कर्णीपुत्रक कुशल पूछबाक बहाना सँ ओतय चलि जइह; अथवा ओ एतय आबि जाएत। अरे, सोच-विचारक झूलापर किएक झूलए लगलह? प्रियवादिनिका की कहैत अछि—‘आर्यपुत्रक एतय अयब उचित नहि बुझाइत अछि; स्वामिनीकेँ ओतय जाएबाक चाही। गणिकाजाति एहन अछि जे एक-दोसरक चुगलीक उपहार लऽ तत्पर रहैत अछि। तेँ हम एहन उचित व्यवस्था करब जे नृत्यक पारी पूरा करबाक लेल जाइत देवदत्ता स्वयं हमर स्वामिनीकेँ सेहो आर्य मूलदेवक लग कुशल-प्रश्न पूछबाक लेल लऽ जेतीह।’ वाह प्रियवादिनिके, सचमुच तोहर नाम सार्थक अछि। एकर ओतय जाएबहि उचित। मुदा एकरा भली-चङ्गी देखाए पड़बाक चाही। देवसेना की कहैत अछि—‘अरे, अहाँकेँ देखितहि हम भली-चङ्गी भऽ गेलहुँ’? हम प्रसन्न भेलहुँ। कामदेवक ई काज हम पूरा कऽ देलहुँ। कर्णीपुत्रक प्राण बचेबाक लेल किछु स्मृतिचिह्न दह। की कहैत छह—‘की दी’? एहिमेँ सोचबाक की अछि? ई तँ— हे रक्तपद्मसदृश सुन्दरि, हुनका लेल अपन सुरतप्रयत्नक उपहाररूप एकटा लाल कमल पठा। ओ तोहर दाँतसँ कनेक कुतरल, स्तनसँ रगड़ि मसलल, देहक पत्रलेखाक छापसँ अङ्कित, नाकक लग लऽ गेलापर गहिर निःश्वाससँ कनेक म्लान, देहक चन्दनरसक घर्षणसँ फिक्का पड़ल केसरबला आ दुनू हाथमेँ नाल पकड़ि घुमेलासँ मसलायल हो। मानो रातिभरि तोँ ओकर संग रमण कएने हो आ भोरमेँ ओ पूर्णतः तोहर निर्माल्य बनि गेल हो। मानो आँखि नीचाँ कऽ ओ एहि प्रस्तावक अनुमोदन कऽ देलक। अहो, ई उपहार नहि—सुरतक सौदाक बयाना भेटि गेल! एखन एहि औषधिसँ कर्णीपुत्रमेँ नव शक्ति सञ्चार कऽ सकब। [लऽ, उठि, फेर ठहरि] हम चली। तोहर कल्याण हो। हे भाग्यवती, हमर ई आशीर्वाद लह— हाथमेँ प्रबल विषयाभिलाषक आयुध धारण कएने कामदेव स्वयं संग भऽ तोरा गुप्त सुरत लेल ओहि अभिसारपर लऽ जाथु, जाहिमेँ भयवश शीघ्र डेग रखितो करधनी आ नूपुरक झनकार नहि सुनाइ, नीवी बाटेमेँ उससि कऽ खुजि जाए आ शङ्कासँ आलिङ्गन शीघ्र शिथिल भऽ जाए। [विटक प्रस्थान।] श्री शूद्रक केर एकनट नाटक (भाण) पद्मप्राभृतकम् समाप्त। २ धूर्त आ दलालक विचार-विमर्श ईश्वरदत्तक मूल संस्कृत एकनट (भाण) नाटक- धूर्तविटसंवादः (संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद- गजेन्द्र ठाकुर द्वारा) [नान्दी पश्चात् सूत्रधारक प्रवेश] सूत्रधार: विद्यासँ पसरल ख्याति, सज्जनक आराधना लेल धन, आ हुनक प्रसन्नतासँ धर्म—एही उद्देश्यसँ हमर ई आरम्भ अछि। तेँ उपस्थित जनक प्रीतिक लेल कोनो नाटक खेलबाक चाही। आउ, एहि वर्षाऋतुमेँ हृदय हुलसाबएबला कोनो गीत गाउ—ई धनिकक प्रीति बढ़बैत अछि, मुदा यौवनपीड़ित निर्धन अभागाक शोक बढ़ा दैत अछि; कुमुद, कुवलय, कल्हार, कमल, निचुल, केतकी, कुटज आ कदलीक वनखण्डसँ ई ऋतु सुशोभित अछि। ई एहन समय अछि—मेघक खिजाब अर्थात् नील लेप लगाएने, बिजुरी चमकलासँ थरथराइत देहबला, फुलायल कुटजक वस्त्र पहिरने वर्षाक मौसम विट जकाँ सुहावन लगैत अछि। [बाहर जाइत] स्थापना। [विटक प्रवेश] विट—ई ठीक कहल गेल। मेघ धनिकक घरमेँ निपुण मृदङ्गवादक जकाँ मूसलाधार पानिक धारा बहा रहल अछि। बिजुरी क्रोधमयी स्त्रीक बाँकी भौँह जकाँ चमकि रहल अछि। शीतल वर्षाती हवा गाढ़ आलिङ्गन दैत बहि रहल अछि। कामदेव कामिजनक हृदयपर कान धरि धनुष तानि दृढ़ बाण चला रहल छथि। आओर— ओ लोकनि अचेत छथि, जे विदेश जाइत छथि, वा विदेश जा वर्षाऋतुमेँ कामसँ प्रेरित भेलो पर नहि घुरैत छथि। ओ लोकनि भोला छथि, जे मानिनीकेँ नहि मनबैत छथि, वा बहुत काल धरि रोष कएने रहैत छथि। धन्य छथि ओ, जे अपन प्रियाक वशमेँ छथि, वा जिनकर वशमेँ प्रिया छथि। ई वर्षाकाल मेघरूपी नगाड़ासँ मानो संसारमेँ एही घोषणा कऽ रहल अछि। वाह! बरखामेँ रसिक लोकक हृदय पकड़एबाली नाना बातक की कहब! एखन पानिभरल मेघसँ नुकायल सूर्यक किरण, भीजल आङन, आ बहुत पहिने बीतल वृत्तान्त जकाँ फिक्का पड़ल दिन देखाइत अछि। कुटजपुष्पक गन्हसँ खिंचायल भँवरा मँडरा रहल अछि, मोर नाचए लागल अछि, आ शीतल पानिसँ तर मैदान घूमबाक योग्य भऽ गेल अछि। रेंगत बीरबहुटी आ नव हरियर दूबक अङ्कुरसँ भरल वनभूमि पएरमेँ अलता लगाएल युवतीक विचरण लेल उपयुक्त भऽ गेल अछि। गदला पानिसँ भरल आ घाट नहि देनिहार नदी पार करब कठिन भऽ गेल अछि—जेना रजस्वला होयबाक समय गुप्त घाटबाली धूर्त स्त्रीक मर्म पाब कठिन होइत अछि। आओर— कदम्बक गन्ह लेने, वनक भीतरसँ निकलैत, मेघजलसँ शीतल हवा मानो सौगात लऽ आबि रहल अछि। ई समय बड्ड सुहावन अछि; एहिमेँ कामक उत्कण्ठा अवश्य होइत अछि। जखन हवा बहैत हो, कदम्बक गन्हसँ वन महमहाइत हो आ मेघ छाएल रहबाक कारण दिन अन्हार हो, तखन सुखी लोकक मोनो कामक लेल उत्कण्ठित भऽ उठैत अछि। उत्कण्ठा दू प्रकारक होइत अछि—सकारण आ अकारण। कारणसँ उपजल उत्कण्ठाक उपचार भऽ सकैत अछि, मुदा बिना कारणक उत्कण्ठा जखन उपजैत अछि, तखन खवासिन अर्थात् कुम्भदासीक बनौटी कानब जकाँ निरुपाय होइत अछि। हमहुँ एहि दिन बरखाक कारण एतय-ओतय नहि जा सकलासँ बड्ड अनमनायल छी। अपन गृहिणीक मधुर कण्ठक तानसँ तृप्त रहितो एखन हमरा घूमब-फिरब नीक लगैत अछि। [देखि] गीत रुकलापर मृदङ्ग जकाँ मेघक गर्जन बन्न भऽ गेल अछि। बरखासँ घबरायल घरक मोर एखन प्रसन्नतासँ दुनू पाँखि पसारि महलक शिखरपर चढ़ि शोर कऽ रहल अछि। तूँबीक घुड़च बीचक खाँच छोड़ि देलासँ जकर तार अलग भऽ गेल अछि, ओहन वीणा हिमशीतल हवासँ सतायल कामिनी जकाँ धूप सेकि रहल अछि। महलक छत बचल बरखापानि पनालीक मुखसँ एना उगिल रहल अछि, मानो मोतीक माला हो। वर्षाक कारण धूमिल दर्पण पोंछि स्वच्छ कएल जा रहल अछि। आओर— पैघ घरमेँ बन्द रहबाक खेदसँ अलसायल स्त्रीसभ खिड़कीसँ झाँकि रहल छथि। वर्षाक सीलसँ कठोर गाँठबाली सोनाक करधनी खोलि फेर बान्हल जा रहल अछि। कामी लोक वेश्याकेँ उपवनमेँ लऽ जेबाक लेल घुमा रहल छथि। कामिनीसभ नव घासपर विचरण लेल कामभाव जगबएबला अलता पएरमेँ लगा रहल छथि। तखन एहि उत्कण्ठित मोनकेँ कतय बहलाबी—जुआघर अर्थात् द्यूतसभामेँ, वा वेश्यापुरीमेँ? [सोचि] जुआकेँ प्रणाम! एक धोती छोड़ि दोसर वस्त्रो हमरा लग नहि बचल। नीच कुलमेँ जन्मल रईस जकाँ पासासभ सदिखन सोझ मुँह नहि रहैत अछि। तखन वेश्यापुरिए चली; ओतय तँ— सुन्दर अधमुँदल आँखि, हँसीसँ चटपटी मधुर गप्प, सटि बैसल भरल नितम्बबाली स्त्रीक संग कोमल आसन, आ स्नेह प्रकट करैत हाथक लचक—वेश्यापुरक शिष्टाचार जननिहार व्यक्ति, वेश्याक प्रेममेँ पड़ने बिना सेहो, ओतयक ई सभ रमणीय सुख प्राप्त कऽ लैत अछि। [किछु देखि विट अपन स्त्रीसँ कहैत अछि] घरक द्वार बन्न कऽ लिअ। की कहलहुँ—‘तोहर घरमेँ बाम्बी जकाँ कतेको द्वार अछि!’ नगरक अधिकारीसभक आबए लेल बाट भिन्न अवश्य अछि, मुदा दोसरक घरमेँ घुसपैठ करबाक अभ्यासी भेलासँ ओसभ अपनहि द्वारकेँ लक्ष्य बना रहल अछि। प्रश्नोत्तर छोड़ू। हाय! विपत्ति तँ हमरहि माथपर अबैत देखाइत अछि। [घुमैत] कुसुमपुरक अनुपम कीर्ति समस्त पृथ्वीपर पसरल अछि। ताहि लेल केवल ‘नगर’ कहलासँ सामान्यतः एही नगरक बोध होइत अछि। एहि नगरमेँ अनेक उच्च-उच्च भवन अछि। बिकाउ वस्तुक प्रचुरता आ ओकरा लेल लोकक भीड़-भाड़सँ उत्पन्न नाना समृद्धि देखि लोक अचरज करैत अछि। मुदा एहिमेँ अचरजक कोन बात? एहन समृद्ध नगर आओरो बहुत अछि। एकर जे असाधारण गुण अछि, से कहैत छी। जेना— एतय दानी लोक बहुत छथि; कलाक आदर अछि; स्त्रीसभसँ लोक अनुकूल भावेँ मिलैत छथि; एतयक धनी मदमत्त होइतो ईर्ष्यारहित छथि; पुरुष विद्यासँ विनीत छथि; सभ लोक बातचीतमेँ शिष्ट, परस्पर गुणग्राही आ कृतज्ञ छथि। अपन स्वर्ग छोड़ि देवतासभ सेहो एतय पाटलिपुत्रमेँ सुखसँ रहि सकैत छथि। [घुमैत] अरे, ई निश्चय श्रेष्ठिपुत्र कृष्णिलक अछि, जे वेश्यापुरक संसर्गसँ अपन यौवन सफल कऽ हमर-जकाँ लोकक प्रियपात्र बनल अछि। कुटुम्बक सर्वनाशक भय सँ पिता एकरा यत्नपूर्वक रोकैत रहलाह, तथापि कोनो उपायसँ वेश्यापुर जा अपन प्रियाक उपभोगसँ देह सुन्दर बना ई वेगसँ एही दिस आबि रहल अछि। एकर अभिनन्दन अवश्य करबाक चाही। तेँ एकरा लग चली। [लग जा] अरे कृष्णिलक, एही तरहेँ अपन यौवनक पूरा आनन्द लैत रह। निश्चय तूँ माधवसेनाक घरसँ आबि रहल छह। की कहैत छह—‘अहाँ केना बुझलहुँ?’ एहिमेँ बुझबाक कोन बात? भगवान् कामदेव समान स्वभावक लोकक जोड़ी मिलबैत छथि। हम अहाँ लोकनिक काजसँ भिन्न थोड़े छी। अथवा, निरन्तर रतिक लेल तृषित कामिनीकेँ छोड़ि तूँ कतय जा रहल छह? की कहलह—‘ई सभ सेहो अहाँकेँ केना ज्ञात भेल?’ एहिमेँ कोनो पैघ सूक्ष्मता नहि अछि। केना— तोहर हाथमेँ मुख पोंछलासँ आँखिक काजर लागल देखाइत अछि; चरणपर पड़लासँ माथक केश-विन्यास छिड़िआ ऊँच-नीच भऽ गेल अछि। बुझाइत अछि जे मोन ओकरहि लग राखि तूँ केवल देह छुड़ा अनलह। तेँ हवा थपेड़ासँ डगमगाइत जहाज जकाँ बड़ी कठिनाइ सँ बाट चलि रहल छह। की कहैत छह—‘आब हम पिताजीसँ अवश्य भेट करए चाहैत छी।’ की एहि वेशमेँ? ओ तँ तोरा पर टूटि पड़ताह। की कहैत छह—‘पिता हमरा एहि दशामेँ देखि लेलाह तँ सम्भव अछि अपन प्राणे त्यागि देथि।’ बेरोक रतिक तृष्णाबाली कामिनीकेँ तोहरासँ अलग करबाक लेल ओ की नहि करताह! पिता जवान लोकक लेल मूर्तिमान माथदुखि छथि। पिता जीवित रहला पर मनुष्यकेँ ओहन जुआक झलकियो नहि भेटैत अछि— जाहिमेँ परस्पर ललकार आ डाँटसँ बाजीक रंग बढ़ैत अछि, गारि-गुफ्तारक समाँ बन्हैत अछि आ जे दिलेर पुरुषक परीक्षा लैत अछि। कमलक पाँखुरिबाली, आमक तेल मिलाओलासँ चित्ती पड़ल, कामिनीक श्वाससँ तरङ्ग उठैत मदिरा—मोरक नाचैत आकृतिबला प्यालामेँ भरल—तकर गन्हो ओ नहि पाबि सकैत अछि। पक्षीयुद्धमेँ जखन गोष्ठी दू दलमेँ बाँटि अपन-अपन घेरा बना लैत अछि, गणिकासभ अपन मित्रक बगलमेँ सटि जाइत छथि, आ स्त्रीक संग रहलासँ बढ़ैत दाँवक कोनो चिन्ता नहि रहैत अछि, तखन एहन खेलक समय पिता बला मनुष्यकेँ खेलबाक तँ बाते की, मध्यस्थ बनबाको अवसर नहि भेटैत अछि। मातल हाथीक पछाँ दौड़ब—जखन ललनासभ खिड़कीसँ अपन भरल स्तन बाहर कऽ, उत्साहेँ अँगुरी नचा आदरसँ देखैत होथि—ई ओकरा लेल असम्भव अछि। जाँघिया पहिरि हाथमेँ नाङट तलवार लऽ, मित्रक बन्धन अर्थात् कारागार तोड़बाक वीरतापूर्ण तैयारीमेँ, जरैत मशालसँ पीयर भेल रातिमेँ राजमार्गपर धँसि पड़ब ओकर भाग्यमेँ नहि। उपकारक प्रतिदान देबाक भावसँ उन्मत्त भऽ, डीङ नहि हाँकि किछु कऽ देखेबाक साहस लऽ, केवल प्रत्युपकारक चर्चासँ दुःखी भऽ, मित्रक लेल सर्वस्व त्यागब ओकरासँ सम्भव नहि। ई सभ तँ सहलो जा सकैत अछि। मुदा जेना दासीक बेटा होथि, एहन पितासभ स्वयं यौवनक आनन्द कखनहुँ नहि लेलनि, आ आब अपन धन-सम्पत्ति बचएबाक लेल वेश्यापुरीसँ अपन पुत्रकेँ अलग राखए चाहैत छथि। हुनका सभक लेल हमर मोन होइत अछि जेना कुठार लऽ क्षत्रियसभक संहार करनिहार परशुराम पृथ्वीकेँ क्षत्रियविहीन कएलनि, तहिना हमहुँ संसारकेँ पिताविहीन बना दी। अथवा, ई बूढ़सभ अपन यौवनमेँ भूखले रहि गेल। ई बेचारा सभ— नहि जनैत अछि जे खिलल कमलसँ सुवासित जल जकाँ सुगन्धित आ अमृत जकाँ स्वादिष्ट वेश्याक मुखरस मरल मनुष्यकेँ सेहो जिआ सकैत अछि। आओर— करधनीक झनकार, उघार भरल जाँघ, विश्वासपूर्वक चुम्बन, श्वाससँ थरथराइत आ हिलैत स्तनतट, भौँह सिकोड़े तिरछी दृष्टि, सीत्कारसँ विचित्र रोमाञ्च, आ बीच-बीचमेँ रोष—एहि सभसँ युक्त वेश्याक इच्छानुकूल रतिकेँ एहन के अछि जे मदमत्त भऽ कखनहुँ बिसरि सकत? की कहैत छह—‘अहाँकेँ अपन दोसर कष्ट कहैत छी।’ से की? की कहैत छह—‘हमर पिता हमर विवाह करबाक निश्चय कऽ लेने छथि।’ धिक्कार अछि हमरा! अरे, एहन विपत्ति ककरो माथपर नहि पड़ए। हाय! हमरा ई बातो सुनए पड़ल। ई तँ हाथ उठा कानबाक बात भेल जे वेश्यापुरक चाकर राजपथ छोड़ि आब तूँ कुलवधूक साँकर गलीमेँ जाएबह। देख— रतिक समय एकदम अन्हराइ जाएबाली, दीनमुखी, मुँहक भीतरहि बात दबा रखनेबाली, प्रसन्न मनुष्यकेँ सेहो दुःखी कऽ देनिहार, लज्जाक घोघसँ झाँपल, भोलेपनसँ स्वयं अपन जाँघो कखनहुँ नहि देखनिहार—एहन पशुतुल्य खूँटामेँ बान्हल भोली कुलवधूक सेवा-पूजामेँ मोन कदापि नहि लगेबाक चाही। की कहलह—‘एहने हमर निश्चय अछि।’ जँ तोहर एहने निश्चय अछि तँ हमरा प्रसन्नता भेल। ई हमर सङ्गतिक अनुकूल अछि। आब जा। घर पहुँचला पर फेर तोरा बुझाएब। [घुमैत] भारी भीड़सँ भरल कुसुमपुरक ई राजमार्ग, छितराइत तरङ्ग-मण्डलबला समुद्र जकाँ, देखबामेँ भयङ्कर आ पार करबामेँ कठिन अछि। एतय— जे हमरा देखैत अछि, से कतेको जल्दीमेँ रहओ, हमरासँ गप्प कएने बिना नहि जाइत अछि। भीड़-भाड़मेँ सेहो सभ लोक हँसैत-प्रसन्नतासँ हमरा बाट दैत अछि। काजमेँ बाधा पड़बाक भय सँ केओ हमरा बेसी काल नहि रोकैत अछि। एतयक लोकक व्यवहारकुशलता देखि हम बुझि सकैत छी जे एहि श्रेष्ठ नगरक यश कतेक स्थायी अछि। [घुमैत] अरे, विटक बुद्धि जकाँ ई वेश्यापुर दिस जाएबाली गली अछि। एही बाटेँ चली— एतय हम मारामारी कएने छी, एतय वेश्याकेँ उठा लऽ गेल छी, एतय भय सँ आँखि मुनि भागल छी—उठैत यौवनमेँ एतय जे आनन्द भोगलहुँ, से स्मरण कऽ उत्कण्ठासँ वेश्यापुर जा रहल छी। [घुमैत] वाह, प्राण घुरि आयल! हम वेश्यापुर पहुँचि गेलहुँ। [छन्दक अनुकरण करैत]— अधमुँदल दृष्टि आ लहराइत लटबाली वेश्याक मुखक सेवन कए, माला आ आसवक गन्हसँ भरल ई हवा बहि आबि रहल अछि, मानो वेश्यापुरक श्वासवायु हो। अहा! कैलास-शिखर जकाँ उच्च शिखरबला महल, वेश्याक स्तनतटसँ रगड़ाइत खिड़की, अगरु आ धूपक धुआँसँ वर्षामेघ-जकाँ बनल भवन, पुष्पोपहारसँ हँसैत पार्श्वद्वार, करधनीक झनकारसँ कामीजनमेँ उत्कण्ठा जगबैत आ नूपुरक रुनझुनसँ मानो गद्गद स्वरमेँ बाजैत—कामदेवक कार्यालयरूपी एहि वेश्यापुरक अपूर्व शोभा अछि। एतय बाँकी चितवन चलएबाक लेल तत्पर, खिलल हँसीसँ खुलल दन्तपङ्क्तिबाली, भौँह नचा बात सजाबएबाली, पीन स्तनपर एतय-ओतय लहराइत छोट चादरबाली, हड़बड़ीमेँ चादर उघड़ि गेलासँ इठलाइत, सुन्दर आ चपल गतिबाली परिचारिकासभ कामक विजयपताका जकाँ एतय-ओतय आबि-जा रहल छथि। सदिखन हँसीसँ सुशोभित मुखबाली, विस्मयरहित भऽ विस्मित आँखिबाली, स्निग्ध-सुकुमार, घुँघरायल, महीन, लम्बा आ कारी केशबाली, नितम्बक भारसँ मन्द गति, मातल हाथी जकाँ चालबाली, सुरतरूपी जलसँ पियास मेटाबएबाली प्याउ जकाँ एतय-ओतय ठमकि रहल नवयौवना गणिकादारिकासभ नखरा करैत विशेष रूपेँ देखाइत छथि। आओर, निरन्तर बजैत मृदङ्गक ध्वनि आ घबरायल कपोत-युगलसँ भरल प्रासाद-पङ्क्ति मानो गाजि रहल अछि। प्रसिद्ध शिल्पीक भीड़सँ सुशोभित, प्रतिष्ठित सेवकसभ द्वारा फेकल पुष्पोपहारसँ भरल गृहद्वार एक-दोसरासँ होड़ कऽ रहल अछि। रतियुद्धक थाकनि मेटए लेल सुगन्धित तेल सजाओल जा रहल अछि। पीन स्तनपर लगाओल जाएबला उबटन पीसल जा रहल अछि। मनस्विनी लोकक हृदय जकाँ सुकुमार माला लेल जा रहल अछि। प्रियाक वचन जकाँ कानकेँ सुख देनिहार वीणाक झनकार सुनाइत अछि। प्रियजनक अधरपानक चखना चाखबाक अभिलाषिणी मदिरा चलि रहल अछि। अधखुलल आँखि, बहानासँ उघारल स्तनतट, लजायल हँसी, कानकेँ सुख देनिहार बातक चुटकी, मन्द श्वास आ स्वभावतः मधुर तालबला गीतसँ वेश्यासभ कामदेवकेँ सदिखन धनुष चढ़ौने रहबाक लेल बाध्य करैत छथि। [घुमैत] अरे, निश्चय ई मदनसेनाक परिचारिका वारुणिका अछि—यौवन-मदसँ स्तनपट्टक परवाह नहि करैत, झीना मलमलक वस्त्र पहिरने, जघनाभरण वा मेखलाकेँ नीवी बनौने, नखरासँ एक कानक गहना उतारने; भयभीत मृगछौना जकाँ चञ्चल आँखि, खूब भोगल फुलल ओंठ, मुनिक मोन सेहो कम्पित करए समर्थ, सहज हँसोड़ मुख। बामा हाथक अँगुरीकेँ कैंचीक रूप दऽ कर्णोत्पल छूबैत, कनेक एक भौँह तानि, हमरा देखि हँसैत ई आगाँ बढ़ि रहल अछि। एहि विशाल-जघनबालीक कपोलपर रोमाञ्च उठि आयल अछि, मानो कर्णोत्पल चुपचाप चुम्बनक चोट कऽ देलक हो। एकर की साहस जे हमरासँ गप्प कएने बिना चलि जाए? एकरासँ बात करी। हे प्रिय वारुणिका, कनेक ठहरू; हमर बात व्यर्थ कऽ किएक चलले जा रहल छह? सुन्दरि, तोहर उपेक्षासँ सेहो हम प्रसन्न छी। हँसि किएक ठाढ़ भऽ गेलह? [लग पहुँचि] हाथ नहि जोड़। हम पूछि सकैत छी—हे क्षीण-कटि, तोहर एहि स्तनक प्रथम सुख के लेलनि? केवल ‘हँ’ कहि, लजाइत हमर दिस देखि, आधा बात कहि एतेक जल्दी किएक भागि रहल छह? ई सभ कामक चमत्कार अछि। [घुमैत] अरे, अपन घरक द्वारपर बैसल बन्धुमतिका बगलमेँ बैसल चतुरिकासँ गप्प करैत, भौँहपरसँ केश हटा, साँझक कमल जकाँ अलसायल आँखि बनाए, स्वयं अपन मेखला पिरो रहल अछि। अहा, यौवनक अनुरूपेँ काज! अहा, कतेक सुकुमार कार्य उठा लेने अछि! एकर एकाग्रता कतेक लोभनीय! मेखला सँजोएबाक ई प्रयत्न एकर देहक कसावट प्रकट कऽ रहल अछि। गर्वसँ रशनादाम सँजैत ई की नहि कहि देलक? विहारकालमेँ एकर चतुरता अवश्य पूजनीय अछि। एकरा लग जेबाक चाही। [पहुँचि] प्रिय, तोहर काज सिद्ध हो। हमर लेल आसन नहि चाही। हम तोहरासँ किछु पूछए चाहैत छी। हे मानिनी, तोहर ई मेखला केना टूटि गेल? ई कामीजनक अँगुरीक प्रिय सखी अछि; नाभिरूपी सरोवरसँ बहैत उज्जर जलधारा अछि; नीला रेशमी वस्त्ररूपी मेघक छोरपर चमकैत बिजुरी अछि; पुरुषरूपी मल्लक संग व्यायाम अर्थात् पुरुषायित रतिक जननी अछि; कामदेवक धनुषक प्रत्यञ्चा अछि; क्षुद्र घण्टिकायुक्त नितम्बक ललित वाणी अछि; आ बेर-बेर प्राप्त रतिसुखक गणनाकर अक्षमाला मानो अछि। अथवा, एहिमेँ जानबाक कोन बात? हे ललछौँह आँखिबाली, शय्यापर विश्वासपूर्वक प्रियतम जेकर अंशुक हटा लेने छथि, जेकरा प्रेमसँ देखलनि, जे मातल हाथीक मस्तक आ देहक वप्रलीला जकाँ फैलल अछि—स्पर्श लेल व्याकुल आ हाथी-जकाँ गतिबला तोहर ओ जघनभागकेँ ई टूटल करधनी, तार टूटल वीणा जकाँ, बेरस बना देने होयत। माथ नुका किएक बैसि गेलह? उत्तर किएक नहि दैत छह? हम जाइत छी। की कहैत छह—‘नहि जेबाक चाही।’ तँ लिअ, मन्त्रसँ कीलल साँप जकाँ हम रुकि गेलहुँ। की, चली? लिअ, हम चललहुँ। [घुमैत आ कान दैत] अरे, रामदासीक घरमेँ स्त्रीक कानब जकाँ स्वर सुनाइत अछि। एकर अनेक कारण भऽ सकैत अछि। तखन ई कोन कारणसँ कानि रहल अछि? रोषसँ कानबाक स्वर तीव्र, दीनतासँ कोमल, प्रणयसँ रुकि-रुकि, भय सँ बेरस आ हर्षसँ गद्गद होइत अछि। बुझाइत अछि ई प्रणयिनी क्रोध आ दीनता दुनूसँ भरल अछि, कारण आरम्भमेँ गला फाड़ि कऽ आ फेर रुकि-रुकि धीरे-धीरे कानैत अछि। हमर मोन कहैत अछि जे ई रामदासिए अछि। तखन भीतर चली। [प्रवेश कऽ] ओही अछि। हमरा देखि ई आओर जोर सँ कानए लागल। आँखिक कोरसँ रोषक ढेरी जकाँ खसैत एकर नोरक बूँद मानो प्रियक अपराधक गिनती कऽ रहल अछि। [लग जा] मानिनि, की बात अछि?— ओ नोर पहिने नव कमलक शोभा हरएबला आँखिमेँ भरि, फेर अधरपर खसैत अछि; ओतयसँ सरकि कठोर स्तनतटपर अबैत अछि; मुदा ओतहु ठाम नहि पाबि, शोकसँ आगाँ बहैत, रोमावलीमेँ बिथुरैत, अन्ततः ओहि गहिर नाभिमेँ भरि जाइत अछि जाहिमेँ प्रियतम कखनो-कखनो अँगुरीक अग्रभाग घुसा आनन्द लैत छथि। कुञ्जरक अपन योग्य व्यवहार नहि केलक। की कहैत छह—‘दोसर युवतीक दाँतसँ चिह्नित ओंठ लेने ओ हमर लग आयल। हम उलाहना देलियैक तँ रूठबाक बहाना कऽ निकलि गेल, आ बहुत दिन बीति गेलो पर आइ धरि नहि आयल।’ हँ, हँ, हँ! वाह रे अपराधक ढेरी! एकहि अपराधसँ मनुष्य घरसँ निकालल जाए योग्य कठोर दण्डक भागी भऽ जाइत अछि, तखन एहि सभक जमघटक की कहब! तथापि मेघसँ घेरल बरसाती समय देखि हम ओहि दुष्टक अकड़ सहि रहल छी; कारण एहि समय आपसमेँ वैर राखनिहार राजो कलह छोड़ि दैत छथि, तखन शिरीष-पुष्प जकाँ कोमल-चित्त कामिनीक की बात! जँ हमर बात मानह तँ समयक विचार कऽ आइए अपन प्रियक लग अभिसार कर। लटकैत मेघ जाहि महलक शिखर छूबि रहल हो, तकर ऊपरी भागसँ रातिमेँ नीचाँ उतरि ओहि बाटमेँ प्रवेश करिह, जतय महलक पनालीसँ बहैत पानिक छरछर ध्वनि गूँजैत हो। फेर अपन प्रियतम लग पहुँचि, बरखाक शीतल हवासँ काँपैत, ओहि कान्तकेँ आलिङ्गन करिह; हुनक मुखक चुम्बन लऽ जखन अपन ओंठक शीत मेटा लेबह, तखन रतिक बीच स्पष्ट स्वरमेँ हुनकासँ अपन बात कहिह। तँ, रोमाञ्चित कपोल हमर बातक स्वीकृतिक सूचना केना दऽ रहल अछि? आब हम चललहुँ। [घुमैत] अरे, ई रतिसेना अछि। गर्भगृहमेँ रहबाक कारण पसेनासँ भरल, आध-मुँदल सुन्दर आँखि घुमबैत, गालपर पसरल केशबला मुखपर कनेक मदक आभा लेने ई एखने जागल अछि। खिड़की खोलि हवा खा रहल अछि। एकर ई दशा बड्ड सुहावन अछि। एकरासँ गप्प करी। [लग जा] प्रिय, सौभाग्यवती हो। अवशिष्ट मदक एहि अवस्थामेँ तूँ साँझक ललाई धारण कएने पश्चिम दिशा जकाँ सुहावन लगैत छह। धनुष उतारि चुकल कामदेवो तोरा देखि फेर व्याकुल भऽ जाएत, दोसरक की कहब! तोहर चेतना नष्ट नहि भेल अछि; वाणीमेँ ओही कोमलता अछि; कमलरूपी आँखिक ललाई नहि गेल अछि; लज्जा सेहो दूर नहि भेल अछि; बीतल बात स्मरण पड़ला पर एखनो तोहर मुख हर्षसँ भरि जाइत अछि—एहि प्रकार मद अपन दोष छोड़ि तोहरामेँ गुण बनि ठहरल अछि। रतिसेना, तूँ हमरा टारए चाहह, मुदा हम तोहरासँ आरम्भ कएल बात अधूरा नहि छोड़ए चाहैत छी। अरे, हँसि खिड़की किएक बन्न कऽ लेलह? लिअ, हमरा विदा कऽ देलह। [घुमैत] एना ठकल गेलापर हम अवश्य कनेक अनमनायल छी। अरे, ई प्रयुम्नदासी अछि। एकर कपोल सुरतसँ मुरझायल अछि; आँखि फाड़ि देखैत अछि; विशेष तिलकसँ ललाट पीयर भऽ गेल अछि; छिड़िआयल लट शोभा दऽ रहल अछि; मुखपर मानो रतिक थाकनि भरल अछि। झीना अंशुकक भीतरसँ झाँकैत जघनपर नव नखक्षत एना देखाइत अछि, मानो निर्मल जलमेँ खिलल अशोकपुष्पक छाया हो। सुरतक रगड़सँ एकर शृङ्गार मेटा गेल अछि, जेना युद्धक अन्तमेँ हथिनीक सजावट अस्त-व्यस्त भऽ गेल हो। जेना आँधीक दीपकेँ झँझरीसँ झाँपल जाइत अछि, तहिना ई हाथसँ ओंठ झाँपने अछि। टहलाओल बछेड़ी जकाँ चहलकदमी करैत ई वेशमार्गक शोभा बढ़ा रहल अछि। हमरा ई रुचैत अछि। एकरासँ किछु परिहास करी। [लग जा] प्रिय, प्रियतमक दाँतसँ काटल ओंठक सुन्दर रूपकेँ घायल योद्धाक सुन्दर देह जकाँ व्यर्थ किएक नुकबैत छह? ई किएक हँसल? अहा, हमर चुटकी एकर भूलक उपहास बना देलक। मुदा मन्द हँसीसँ सेहो एकर दन्तक्षतक शोभा बढ़ि गेल। केना— सीत्कार कएलासँ एकर स्तन ऊपर थरथरा उठल; स्तनक किनार ऊपर उठलासँ उदर आओर भीतर धँसि गेल; भौँह तानलासँ चितवन बाँकी भऽ गेल; दन्तक्षतक पीड़ासँ कमलरूपी हाथक अँगुरी ओकरा सहलएबाक लेल चञ्चल भऽ उठल। जँ एहि प्रकार स्त्री हँसि दोसरक हृदय चञ्चल कऽ सकैत अछि, तँ दन्तक्षतपीड़ित अधरबला मुख धारण करनिहार कामिनीकेँ अवश्य हँसबाक चाही। की कहैत छह—‘बहुत दिनक बाद अहाँ देखाइ देलहुँ।’ एहि बरखाक पाप हमरा घरेमेँ बान्हि रखने छल। आब कह, ककरापर रीझल छह? की कहलह—‘रामिलकक घरसँ आबि रहल छी।’ समान स्वभावक ई जोड़ी बनल रहए। वाह, रामिलक एकसरे कामदेवक करमुक्त अग्रहार पाबि लेलक। कतय— हे कृशोदरी, ओकर यौवन आ विस्तृत हँसी सफल अछि, जे तोहर अर्धचन्द्राकार दन्तक्षतक शोभासँ युक्त मुखक पान अर्धचन्द्राकृति चषक जकाँ करैत अछि। प्रिय, दुष्ट पक्षीसँ अपन अधरक रक्षा करिह। जा, हमहुँ चललहुँ। [घुमैत] अरे, एतय धूर्त विश्वलक आ सुनन्दा बटोहीक भय सँ कुम्भकर्णक मुख जकाँ अपन घरक द्वार सदिखन बन्न कऽ रहैत अछि। विश्वलक अपन सर्वस्व खा-पी, नग्न श्रमणक जकाँ केवल देह बचौने, गणिकाप्रिय भेलासँ धन नहि रहितो सुनन्दाकेँ नहि छोड़ैत अछि—जेना कौआ गामक सीमान नहि छोड़ैत अछि। सुनन्दो यौवन बीति गेलासँ दोसरक लेल अनचाही, वनक सुखायल नदी जकाँ, विश्वलकक पछाँ लागल रहैत अछि। एहि जोड़ीसँ गप्प कएने बिना जेब उचित नहि। तेँ जोर सँ पुकारबाक चाही—एतय के रहैत अछि? [कान दैत] अरे, दौड़ैत घोड़ाक टाप जकाँ पएर रखैत खड़ाउँक धमक सुनाइत अछि। तखन विश्वलक आयल होयत। हँ, ओही चिचिया रहल अछि। अरे, की कहैत छह—‘के गदहा जकाँ रेंकि रहल अछि?’ अरे, हम सुनन्दाक लेल आयल यमदूत छी। हमर आवाज चिन्हि किएक चुप भऽ गेलह? अरे, द्वार किएक नहि खोलैत छह? तोँ अपनाकेँ सम्हार। हम ई शापजल छोड़ैत छी। कलह भेलापर लीलासँ उठल आ नूपुरक झनकारसँ मुखर विलासिनीक बामा पएर तोहर माथकेँ कखनहुँ प्राप्त नहि होअए। द्वार खुलि गेल। तखन भीतर चली। [प्रवेश कऽ] की कहलह—‘की हम अहाँक प्रिय नहि छी? एहन शाप देब उचित अछि?’ ठीक कहलह। एहन शाप ब्रह्मलोककेँ सेहो कम्पित कऽ दैत अछि, तखन तोहर की बात! एहि शापक प्रतिकार लेल ई प्रायश्चित्त अछि। की— खिलल नव कमलाकार तिलकबाली आ ठमकि चललासँ चञ्चल गतिबाली अपन हृदय-कुटुम्बिनीकेँ तूँ एहन मदिरा पिआ, जाहिमेँ नव विकसित कमल-पात तरैत हो, तिलक चखनाक संग स्वाद भेटैत हो, आ हड़बड़ीमेँ ढारलासँ चञ्चल तरङ्ग उठैत हो। तँ कनेक बैसू। [बैसि] अरे, पएर धुअब भऽ गेल। कुसुमपुरक राजमार्ग स्वच्छतामेँ महलक छतसँ बढ़ि कऽ अछि। हमर पएरक व्यर्थ लाड़ नहि कर। की कहलह—‘रामिलकक गोष्ठीमेँ विष्णुदास आदि सदस्यसभक परस्पर रोचक बहसक बीच कामतन्त्र सम्बन्धी किछु शङ्का उठल। जखन ओसभ ठीक समाधान नहि कऽ सकल, तँ हमर मत सुनएबाक आग्रह केलक। हमहुँ अपन मत कहलियैक। ओही बात भाव देविलककेँ सेहो सुनए चाहैत छी। फेर अहाँ जे कहब, से प्रमाण मानल जाएत। अपन बात कहबाक लेल अहाँक घर जेबाक इच्छा छल, मुदा अहाँ स्वयं दर्शन देबाक कृपा कएलहुँ। अहाँकेँ समय हो— तँ कही। आज्ञा दिअ। हम सावधान छी; सामर्थ्य भरि उत्तर देब। दुलारसँ बिगड़ल बच्चा जकाँ हवा एहि कुटीकेँ नहि छोड़ि रहल अछि, तेँ बेसी काल नहि बैसि सकब। जँ तोरा पसन्द हो तँ चलैत-चलैत गप्प करब। गोष्ठीशाला पर्याप्त लम्बा-चाकर अछि। की कहैत छह—‘एहिमेँ कोनो बाधा नहि।’ [उठि] आब कह। की कहैत छह—‘जँ वेश्याक पुरुषसँ सम्बन्ध केवल धनक लेल होइत अछि, तँ ओकरामेँ उत्तम, मध्यम आ अधमक भेद केना जानल जाए?’ अरे, दान— अरे, दान तँ संसारमेँ सभकेँ वश करैत अछि, विशेषतः वेश्याकेँ। तथापि हुनकामेँ भेद होइत अछि, जेना ऊँच-नीच बुझनिहार लोक कहैत छथि— अधम वेशयुवती दानसँ प्रेम करैत अछि, अथवा बिनु कारणो प्रेम करैत अछि। मध्यमा भरल यौवन आ रूप देखि, वा दानसँ प्रसन्न होइत अछि। मुदा उत्तमा नारी दानी, निःस्पृह, युवा, रूपवान्, अनुकूल आ सुसज्जित पुरुषक सेवा करैत अछि। की कहैत छह—‘कामातुर वेश्या केना चिन्हल जा सकैत अछि?’ कहैत छी— सुन—सुन्दर अधखुलल चितवन, मुखक शोभा बढ़बैत हँसैत दृष्टि, भौँह, सङ्केत आ भावभङ्गिमासँ भरल छोट-छोट बात, बीच-बीचमेँ ताली पीटि बाजब, प्रकट होइतहि विलीन भऽ जाएबाली मुस्की, नाभि, बगल आ स्तन उघारब, मेखलाकेँ बेर-बेर छूब, आ हाँफैत कठिनाइ सँ श्वास लेब—ई सभ लक्षण कामबाणसँ पीड़ित कामिनीक सूचना दैत अछि। की कहैत छह—‘वेश्याजन धोखा देबाक लेल वा अभिनय-कौशलसँ बहुत कामचिह्न देखबैत छथि; ताहिपर विश्वास केना कएल जाए? सच्ची कामवती केना चिन्हल जाए?’ सुन— नोरसँ भरल निःश्वास, स्नेहसिक्त दृष्टि, कृशता, पसेनाक बूँद, धन नष्ट भऽ गेलो पर प्रार्थना—एहि सभसँ प्रेममयी कामिनीक भावशुद्धि बुझल जाइत अछि। [घुमैत] की कहैत छह—‘प्रथम समागम कोन कारणसँ हिचक उत्पन्न करैत अछि?’ सुन, प्रथम समागम कामिनीक लेल झिझकसँ भरल होइत अछि। ओहि समय अनुभवी धूर्तो गड़बड़ा जाइत अछि। आओर— पहिने तँ बातक सूत्र जोड़बे कठिन अछि। बात आरम्भ भऽ गेल— तँ उत्तर पाब कठिन अछि। मेलजोलसँ बहुत गप्प होअए लागल तँ परस्पर विश्वास होयब कठिन अछि। विश्वास भेलापर मोनमाफिक रति पाब कठिन अछि। आ सम्यक् रति भेटलो पर वेश्या प्रेम करत वा नहि—ई अनिश्चिते अछि। राजाक समक्ष, विद्वानक सभामेँ आ युवतीक संग प्रथम समागममेँ हृदय भय सँ घबरा जाइत अछि, आ तेजस्वी वाक्शक्तियो लड़खड़ा जाइत अछि। की कहैत छह—‘कोनो गुण नहि रहितो केवल देखलासँ प्रेम किएक भऽ जाइत अछि? झंझट करनिहार स्त्रीक संग कोन व्यवहार करबाक चाही?’ प्रत्यक्ष तथ्यक कारणपर विवाद करब निरर्थक अछि। कामक क्षेत्रमेँ ई पैघ सुविधा अछि जे निर्गुण होइतो जकरासँ प्रेम भऽ जाए, ताहिमेँ जे उपेक्षा करएबाली हो ओकरा तुरन्त छोड़ल जा सकैत अछि। कारण— प्रिय-विरहक दुःख सात्त्विक प्रियतमक हो तँ सहलो जाइत अछि; मुदा प्रियजनक अनादरसँ टूटल हृदय फेर नहि जुड़ैत अछि। की कहलह—‘स्त्री पुरुषकेँ चाहैत हो, मुदा पुरुष ओकर बेसी परवाह नहि करैत हो, तँ की एहन स्त्रीकेँ छोड़ि देबाक चाही?’ नहि, नहि, नहि। दोसर स्त्रीक प्रेमक रक्षा करैत आ अपन दाक्षिण्य सम्हारैत, ओकरा प्रति सेहो बीच-बीचमेँ प्रेमभाव देखेबाक चाही। केना—जे पुरुष गुणवती, यौवनवती आ प्रणयिनी स्त्रीक अनादर करैत छथि, हुनका किसानक गारिसँ जरल बरद जकाँ भारी फालबला हरमेँ जोति देबाक चाही। [घुमैत] की कहैत छह—‘जकरा स्त्रीक प्रति सचमुच अपराध भऽ गेल हो, से ओकरा केना मनाओत?’ एहि विषयमेँ सन्देह उचिते अछि। विषम ज्वर जकाँ प्रणयिनीक रोषक उपचार कठिन अछि, तथापि ओकर क्रोध हटेबाक चाही। आइकाल्हिक युवकसभ पएर पड़बकेँ एकर औषध मानैत अछि; मुदा हम एकरा बहुत उत्तम नहि मानैत छी। जखन कठोर, सिकुड़ल पुरान कंकड़-जकाँ आकृतिबला, खड़ाउँक घर्षणसँ कड़ा आ पुरान घीक मालिशसँ गन्हाइत वृद्ध श्रोत्रियक पएरो छूएल जाइत अछि, तखन पल्लव जकाँ सुकुमार कामिनीक पएर पड़बामेँ कोन वीरता? मुदा एहू उपायमेँ दोष अछि। पएर पकड़लासँ नोर बहत; प्रेमिकाक नोर बहलापर दीनता उपजत; आ दीनता उपजलापर काम कतय रहत? दोसर लोक कहैत अछि—‘सौगन्ध दिआ मनएबाक चाही।’ एहूसँ मेल नहि होइत अछि। कुलवधुओ कामीक शपथपर विश्वास नहि करैत अछि, तखन वेश्याक की बात! जँ विश्वासे कऽ लेलक तँ ओकरा मनएबाक आवश्यकता की? कहल गेल अछि—गाममेँ निवास, श्रोत्रियक उपदेश, परतन्त्रता, कृपणता आ भोली-भाली नारी—ई सभ पुरुषक कामभावक अन्त कऽ दैत अछि। किछु लोक कहैत अछि—‘कोनो उपायसँ ओकरा हँसा देबाक चाही। हँसीसँ ओकर धैर्यक गहिराइ बुझि गेलापर नदी जकाँ ओकरा सहज पार कएल जा सकत।’ हमर कहब अछि—एना भऽ गेलो पर प्रियाक रूठि मान करबाक आनन्द नहि भेटत। केना— लटकैत महीन वस्त्रकेँ कनेक खिंचि, अधरोष्ठ नचा, ओहि समय नीक लगएबाली कटु बात मधुर ढङ्गसँ सुना, नव कमल जकाँ कोमल बामा पएर जखन प्रियतमा माथपर राखैत अछि, तखन धूर्त लोक ओकरा रतिकलहक फल आ यौवनक स्वादिष्ट अर्घ्य मानैत अछि। तेँ हँसी-परिहासक प्रयोगसँ सेहो स्त्रीक क्रोध हटेबाक चाही। बड्ड ठीक। स्त्रीक रोष हटेबाक उपाय सोचलापर हमरा बुझाइत अछि जे बलपूर्वक लेल चुम्बन तुरन्त फल देनिहार अछि। केना— बामा हाथसँ तीव्र धूपगन्धसँ सुवासित केश पकड़ि, ओकर दुनू हाथ अपन दहिना हाथमेँ किछु काल रोकि, प्रियाक चन्द्रमुखक पान कएलासँ जे हर्ष उत्पन्न होइत अछि, ताहिसँ तृप्त कामी पुरुष वृद्धावस्थामेँ सेहो क्षीण नहि होइत अछि। की कहैत छह—‘जे असावधानीसँ प्रियाक समक्ष भूलवश दोसर स्त्रीक नाम लऽ लैत अछि, ओकर की उपचार अहाँ बतबैत छी?’ कामीक लेल दोसर स्त्रीक नाम लऽ लेब पैघ विपत्ति अछि। सर्पदंश जकाँ एकर उपचार कठिन अछि। एक क्षण ध्यान करए दिअ। [सोचि] ठीक, बुझि गेलहुँ— ढिठाइ सँ समूची बातकेँ उज्जर झूठ कहि मुकरि जाएब; वा भयभीत जकाँ स्तब्ध भऽ जाएब; वा स्त्रीक प्रशंसाक पुल बान्हि देब; वा बातकेँ हँसी-परिहासमेँ उड़ा देब; वा चर्चा दोसर दिस मोड़ि ओहिसँ फेर नव विषय निकालि देब; अथवा एक नामक संग अनेक नाम लऽ देब—ई सभ भूलसँ नाम लऽ लेबाक रोगक उपचार अछि। की कहैत छह—‘नखक्षत आ दन्तक्षत पीड़ा दैतहुँ आनन्द किएक दैत अछि?’ हा, हा, हा! बड्ड भोला प्रश्न पुछलह। देख, नखक्षत आ दन्तक्षत पीड़ादायक होइतो प्रेमीजनमेँ सुख उत्पन्न करैत अछि। केना— जेना सारथि चाबुकसँ चलबैत अछि तँ घोड़ामेँ वेग अबैत अछि, तहिना रतिक समय दन्तक्षत आ नखक्षत दुनू हृदयकेँ एकरस बना दैत अछि। [घुमैत] की कहैत छह—‘वेश्या विरक्त अछि वा अनुरक्त, एकर चेष्टासँ केना बुझल जाए?’ अरे, एहिमेँ सन्देहक कोन बात? एहि विषयमेँ ई उपदेश अछि। अनुरक्त स्त्रीसँ प्रेमक याचना कएल जा सकैत अछि। जेना कहल गेल अछि—महात्मा लोकनि सेहो अपन आकार नहि नुकाबि सकैत छथि; तखन कोमल हृदयबाली अनुभवहीन स्त्रीक की बात! हुनक भाव-भङ्गिमापर बेसी ध्यान देबाक चाही। की कहैत छह—‘केना?’ जे व्यर्थ ठहाका मारि हँसैत अछि, बिना कारण बाजैत अछि, वेगसँ उठि जाइत अछि, कहलापर नहि बुझैत अछि, स्त्रीसुलभ बाँकपन नहि देखबैत अछि, गाढ़ आलिङ्गन कऽ झट छोड़ि दैत अछि, आ पुरुष रतिमेँ प्रवृत्त भेलापर अस्थिरता देखबैत अछि—एहन स्त्री रागक अन्तमेँ कतेको चतुरता देखाओ, ओ बाँझ लता जकाँ अछि जाहिमेँ फूल तँ लगैत अछि, फल नहि। की कहैत छह—‘विराग उत्पन्न भऽ जाए तँ की ओकर उपाय सम्भव अछि, वा प्रतिकार होइते नहि?’ सुन। प्रेम दू प्रकारसँ उत्पन्न होइत अछि—सकारण आ अकारण। कारणसँ उत्पन्न प्रेम कारणे सँ विरागमेँ परिणत होइत अछि; आ अकारण प्रेम अकारणे विरागमेँ बदलि सकैत अछि। एहि राग-विरागक कठिनाइमेँ की उपचार करबाक चाही? प्रेम शिथिल भेलापर जे उपाय उचित अछि, से कहैत छी— दोसर स्त्रीक सेवन; कोनो कारणसँ रतिक भङ्ग; धीरता अर्थात् काममेँ पहिने बढ़ब, वा कलह; रतिक समय टालमटोल; संग बैसब; गप्पमेँ निपुणता; ओकर बन्धुजनक पूजा वा स्तुति; वेश्याक बहानासँ प्रवास; महानगरमेँ जेब; प्राण-जोखिमबला साहसिक कार्य; आ दान—ई सभ स्त्रीक शिथिल रागकेँ फेर उभाड़ि दैत अछि। आओर सुन— बाला बालसुलभ व्यवहारसँ, धनलोभी दानसँ, चतुर स्त्री चतुराईसँ, क्रोधिनी सान्त्वनासँ, गर्विनी सेवासँ आ अनुकूल स्त्री अनुकूलतासँ वशमेँ अबैत अछि। जेकाँ स्त्री हो, ओकर संग तहिना व्यवहार करबाक चाही। [घुमैत] की कहैत छह— ‘जे एक दिस कामचिह्न देखबैत अछि, मुदा बात नहि करैत अछि, “बस-बस” कहि लग नहि अबैत अछि आ ठीक समयपर हटि जाइत अछि—ओकरा केना वशमेँ कएल जाए?’ ठीक कहलह। पहिने कामीकेँ स्त्रीक स्वभाव जानबाक चाही। सम्भव अछि, एहनहि ओकर प्रकृति हो। मुदा जे गर्विनी अछि, से जीवन भरि उपाय बिना वशमेँ नहि आबि सकैत अछि। स्त्रीक रहस्य खोलैत छी। जेना हाथी लताकेँ मर्दित करैत अछि, तहिना एकान्तमेँ स्त्रीकेँ पाबि जे ओकरा लऽ जाइत अछि; वा ओकरा मदमत्त बुझि मधुर वचनसँ ओकरापर अधिकार कऽ लैत अछि; वा नाना जाल पसारि ओकरा ठकि लैत अछि; अथवा अपन मनक बात नुका लैत अछि—ओकर ई चेष्टासभ निष्फल नहि होइत अछि, कारण स्त्रीसभ आँधी-जकाँ चालबाली होइत छथि। [घुमैत] की कहैत छह— ‘क्रोध शान्त भेलापर, प्रथम भेटमेँ, प्रवासपर जाइत समय आ फेर घुरलापर—एहि चार सुरतकेँ कामुक लोक मानैत छथि। अहाँ एहिमेँ ककरा सर्वाधिक महत्त्व दैत छी?’ हमर मत अछि जे प्रथम समागमक रति, स्त्रीक विश्वासक गहिराइ बुझने बिना, अगाध पोखरि जकाँ जोखिमसँ भरल अछि। प्रवासपर जाइत समयक सङ्ग सेहो हमरा— रुचिकर नहि, कारण तखन शोकसँ अभिभूत कामिनीक राग कम भऽ जाइत अछि; आँखिमेँ नोर भरि अबैत अछि, हृदय उद्वेगसँ भरल रहैत अछि, तेँ सुरत बेरस आ करुण होइत अछि—मानो चन्द्रमाकेँ ग्रहण लागल हो। प्रवाससँ घुरलापर रति, प्रिया शृङ्गारहीन रहबासँ आ लज्जाक कारण राग कनेक कम प्रकट करबासँ, बरखाक महफिल जकाँ होइत अछि। मुदा मान-मनौवलक बादक सुरत देवता आ असुर द्वारा घुमाओल मन्दराचल-मथानीसँ क्षुब्ध, अनेक औषधिक रससँ ओजस्वी समुद्रक भीतरसँ निचोड़ल अमृतरसायनोसँ श्रेष्ठ होइत अछि, आ आयु तथा शक्तिकेँ स्थिर करैत अछि। क्रोध शान्त भऽ गेलो पर हृदयसँ ओही भाव नहि छोड़निहार स्त्रीक संग सुरत, वेगसँ कएल नखक्षत आ दन्तक्षतसँ अत्यन्त प्रचण्ड होइत अछि। [घुमैत] की कहैत छह—‘वेश्याद्वारा ठकल मनुष्यपर धूर्त लोक हँसैत अछि। कामुक वेश्याक ठगीसँ केना बचत?’ अरे, वेश्या आ लिपिक—दुनू छिद्र देखि प्रहार करबामेँ समान अछि। लिपिक सेहो वेश्या जकाँ मुट्ठी गरम करबैत अछि, मुदा किछु काल चैनसँ बैसए दैत अछि; वेश्या वातरोग जकाँ बहुत खर्च करबैत अछि आ चैनसँ बैसहूँ नहि दैत अछि। जे हमर जकाँ चाल चलए जानैत हो, ओकरे वेश्यापुरमेँ पएर रखबाक चाही। हम— ढलल यौवनबाली स्त्रीपर विश्वास नहि कएलहुँ; बालाकेँ खूब परखि तखन संग रहलहुँ; मायक अधीन रहनिहार वेश्याद्वारा मगरमच्छसँ भरल नदी जकाँ दूरहि रहलहुँ; अपमानित भेलापर क्रोध नहि कएलहुँ, आ प्रार्थना कएलापर आदरक अभिमानो नहि मानलहुँ; वेश्यापुरमेँ बूढ़ भऽ गेलहुँ, मुदा कनेको फिजूलखर्ची नहि कएलहुँ। [घुमैत] की कहैत छह—‘ककरो दू प्रेमिका हो आ दुनू एक सङ्ग आबि जाए, तँ ककर आदर करए आ ककरा छोड़ए—पुरान प्रेमिकाकेँ वा नवकेँ? अहाँ उत्तर दिअ।’ अरे, ई प्रश्न टेढ़ अछि। उत्तर कठिन बुझाइत अछि। तोहर की मत? की कहलह—‘हम किछु नहि बुझैत छी; प्रश्न बड्ड पेचीदा अछि। अहाँए उत्तर दिअ।’ तँ सुन— नव युवतीक प्रति अधिक प्रेमवश अपन पहिल प्रियाकेँ छोड़ब उचित नहि। ओकर प्रसन्नताक लेल स्वयं आयल सकामा नव कामिनीकेँ छोड़बो उचित नहि। उपेक्षित भऽ क्रोधमेँ पुरानी चलि जाए तँ एकान्तमेँ दोसरकेँ पाबि ओकर मतसँ पहिलीक मनौवल करबाक चाही। [घुमैत] की कहैत छह—‘वेश्यापुरमेँ घूमैत केवल देखलासँ स्त्रीक कामभाव-निपुणता केना बुझल जा सकैत अछि?’ चतुरक लेल किछु अनजान नहि। पुरुष स्त्रीकेँ देखते पहिने ओकर दृष्टि बुझए— कारण सभ भाव आँखिएमेँ भरल रहैत अछि। देख— आँखि एँचब, हलुक पलक मारब, तिरछा देखब, चितवनमेँ राग भरब, नेत्र पसारि देखब, दृष्टिमेँ प्रगल्भता आ पुतलीक चञ्चलता—एहि प्रकारक दृष्टि सूचित करैत अछि जे स्त्री कामभावमेँ निपुण अछि। जकर कपोल कनेक घुमाओल आ पातर हो, भौँह चञ्चल हो, चितवन तिरछा हो—एहन मुखबालीक संग रति कठिन होइत अछि। जकर अधरक कोन सिकुड़ल हो, देह नखक्षत आ दन्तक्षतसँ भरल हो, जे मन्द-मन्द हँसैत हो—ओकर संग निर्भय रति बुझबाक चाही। जकर बामा हाथ कटिपर राखल हो, दहिना हाथ बगलमेँ लताहस्त मुद्रामेँ लटकैत हो, आ जघनभाग एक दिस खिंचि ऊपर उभारल हो—एहन स्त्रीपर सेहो भरोसा कर; मुदा एहन स्त्री गर्वरहित नहि होइत अछि। जे अञ्चलक छोरसँ एक स्तन झाँपि, अपन घरक देहरिपर एक पएर अदासँ राखि, द्वारक पार्श्वमेँ देह नुका देखैत हो—ओ स्त्री नहि, पूरा फन्दा अछि। ओकर नखरेसँ ओकर अवस्था प्रकट भऽ जाइत अछि। जे किवाड़क ऊपरक बिलैया अर्थात् गोस्तनक किनार पकड़ि, दुनू भुजाकेँ अँगड़ाइ मुद्रामेँ उठा, नीवीक बन्ध ढील कऽ नाभि प्रकट करैत ठाढ़ हो—ओकर चेष्टासँ रतिक पूर्वरङ्ग स्पष्ट भऽ जाइत अछि; अनुमान लेल किछु शेष नहि रहैत अछि। एहि विषयमेँ बहुत कहल जा सकैत अछि, मुदा संक्षेपमेँ कहैत छी। लाल हथेली आ अँगुरी, स्वच्छ नख, गालपर राखल हाथ, हाथ नचा गप्प करब, सुन्दर चाल, फड़कैत ओंठबाली मुस्की, चञ्चल चितवन, विश्वासपूर्ण मुखमुद्रा आ नाभिक नीचाँ नीवीबन्ध—जकरामेँ ई लक्षण हो, ओकरा पुरुष फँसएबाक जाल वा रतियुद्धक श्रेष्ठ वीराङ्गना बुझू। [घुमैत] की कहैत छह—‘स्त्रीक कामभाव दू प्रकारक होइत अछि—प्रकट आ गुप्त। एहिमेँ श्रेष्ठ कोन?’ अरे, प्रकट कामभाव केवल वेशवधूक योग्य होइत अछि, आ ओ बनावटी सेहो भऽ सकैत अछि। गुप्त कामभाव वेश्या आ कुलवधू दुनूमेँ होइत अछि। केवल अनुरागसँ उत्पन्न भाव अल्प दोषयुक्त भेलासँ विशेषतः वेश्यामेँ नीक लगैत अछि। पुरुष दुर्लभ भेलासँ कुलवधू कोनो-न-कोनो पुरुषकेँ चाहि लैत अछि, मुदा वेश्या सभकेँ नहि चाहैत अछि। किछु लोकक मत अछि—‘वेश्याकेँ ककरो संग रति कएलासँ दोष नहि लगैत अछि; तखन ओकरा गुप्तकाम होयबाक आवश्यकता की?’ हम कहैत छी—पुरान परिचित, राजाक साला, किछु धन देनिहार, आसक्त भक्त आ खिसियाइलो पर दाँत देखबैत चापलूस व्यक्ति—ई सभ वेश्याजननीक खुशामदमेँ रहैत अछि। वेश्या हुनका नहि चाहओ, तथापि हुनका लेल साध्य बनए पड़ैत अछि; अर्थात् इच्छा नहि रहितो वेशवधूकेँ एहि लोकक संग प्रेमक अभिनय करए पड़ैत अछि। किएक? स्वार्थक लेल। तेँ गुप्तकामबाली वेश्या जँ सचमुच ककरो चाहैत हो तँ ओ पुरुष जन्म आ जीवनक पूरा फल पाबि लैत अछि। आओर, जखन वेश्या ककरो विरहमेँ स्वयं दूती बनि पहुँचैत अछि आ गद्गद वचन कहैत अछि, तखन ओ पुरुषक लेल ई कोनो छोट सौभाग्य अछि? फेर ओ अवस्थाक कल्पना करू, जखन प्रेमीक ध्यानमेँ तल्लीन भऽ वेश्या रोगिणी जकाँ पीयर पड़ि जाए, चन्द्रोदयक समय ओकरा लेल नोर बहबए, राति-राति जागि आँखि लाल कऽ लए, ओकर कारण कामसँ कृश भऽ आभूषण उतारि राखि दे, आ एहन उलाहनाभरल वचन कहैत रहए—‘हे निष्ठुर, तोहर कल्याण हो; तोरे कारण हमर देहक ई दशा भऽ गेल अछि।’ अथवा ओ अवस्थाक कल्पना करू, जाहिमेँ पुरुष एहन सीत्कारपूर्ण वचन सुनैत अछि—‘हे कान्त, तोहरासँ एतबे माँगैत छी जे हमर देहपर दया कर।’ अथवा ओ स्थिति, जखन एहि सँ आगाँ बढ़ि वेश्या प्रियतमकेँ आलिङ्गन कऽ कखनो कहैत अछि—‘हे नाथ, जल्दी करू’, आ कखनो—‘बस करू, एना नहि करू’; आ उभरि-उभरि दन्तक्षत आ नखक्षत करैत अछि। तखन रसायनप्रयोगकेँ सेहो मात देनिहार एहन वचन सुनबाक सौभाग्य पुरुषकेँ भेटैत अछि—‘हे प्रियतम, हम तोहर लेल एहन भऽ गेल छी; हमर बातपर विश्वास करू; तोरा हमर सौगन्ध!’ एहन वचन दूतीक मुखसँ सुनि वा प्रत्यक्ष लक्षणसँ ओकर हाल बुझि जखन पुरुष सोचैत अछि—‘सचमुच हमर कारण एकर ई दशा भऽ गेल’—तखन ओकर चित्तमेँ करुणासिक्त जे प्रसन्नता उपजैत अछि, ओकर समान आनन्दक कोनो दोसर बात तूँ बता सकह तँ हम अपन धूर्तता छोड़ि वेदपाठी ब्राह्मण बनि जाउ। आओर— मेखलापर हाथ राखि मन्द गति सँ चलैत पतली कटिबाली, कामातुर, भयभीत आ चञ्चलाक्षी प्रियाकेँ रातिमेँ सङ्केतानुसार क्षण भरि एकान्तमेँ पाबि जे ठाढ़े-ठाढ़ चुम्बन करैत अछि, ओहि भाग्यवानक माथपर हम अपन हाथसँ कमलक छत्र धारण करएबाक लेल प्रस्तुत छी। आओर, जे स्त्री सकपकाइत कहैत अछि—‘हे कान्त, जल्दी करू’—एना आत्मनिवेदन करनिहार ओहि स्त्रीक लेल पुरुष प्राणक मूल्य चुका कऽ सेहो जड़-कीनल दास भऽ जाइत अछि। [घुमैत] की कहैत छह—‘रूपवती आ अनुकूल—एहि दुनूमेँ अहाँ ककरा अधिक मानैत छी?’ दुनू स्त्रीक शृङ्गार अछि। जँ कुरूपामेँ अनुकूलता हो तँ ओ अन्हारमेँ नाच जकाँ व्यर्थ अछि; आ रूपो अनुकूलता बिना वनमेँ चाननी जकाँ कोन सुख देत? हमरा रूपसँ अनुकूलता अधिक महत्त्वपूर्ण बुझाइत अछि। केना? कुरूप स्त्रीकेँ सेहो अनुकूलता सजा दैत अछि, मुदा रूपवतीकेँ सेहो उद्दण्डता दूषित कऽ दैत अछि। देखल जाइत अछि जे पुरुष सुन्दरीकेँ छोड़ि कुरूप किन्तु अनुकूल स्त्रीमेँ रमि जाइत छथि। रूपवतीमेँ अकड़ होइत अछि, आ अकड़ कामक शत्रु अछि। कामक मूल अनुगमन अछि, आ से अनुकूल भाव अर्थात् दाक्षिण्यसँ सम्भव होइत अछि। जँ केवल रूपे तृप्तिक कारण हो तँ चित्रलिखित स्त्रीसँ सेहो प्रयोजन सिद्ध होए। अनुकूलतामेँ रूप छोड़ि सभ गुण समाओल अछि—ओ भावुक, बेसी काल नहि रूठनिहार, लालचरहित आ आज्ञाकारिणी होइत अछि। की कहलह—‘वेश्याद्वारा बनावटी शिष्टाचार कएलासँ ओ सज्जनक सङ्गतियोग्य नहि होइत छथि, एना कहल जाइत अछि। किएक?’ प्रयोजनसिद्धिक लेल विशेष व्यवहारकेँ उपचार कहल जाइत अछि। स्त्रीमेँ स्वाभाविक आ बनावटी दुनू प्रकारक उपचार होइत अछि। अपन प्रयोजन साधबे वेश्याक उपचारक हेतु अछि। किछु लोकक मत अछि—जतय शठतासँ व्यवहार हो, से बनावटी उपचार; मुदा ओहो दोषरहित भऽ सकैत अछि। केना? शठतासँ कएल उचित सत्कारो मन प्रसन्न कऽ दैत अछि; आ सरलतासँ कएल सत्कार जँ गलत ढङ्गसँ हो तँ ककरा प्रसन्न करत? काज सिद्ध करबाक विशेष चातुरीक नाम शठता अछि। अपन प्रयोजन साधनिहार स्त्रीकेँ अपन लेल विशेष पुरुष अवश्य खोजबाक चाही। जे स्त्री विशेष पुरुषकेँ चिन्हैत अछि, ओकरेसँ पुरुष प्रसन्न रहैत छथि। आओर— विनय, मधुर वचन, क्षमा आ राति-दिनक परिश्रम—ई सभ गुण जँ शठताक संग रहि सकैत हो, तँ एहन शठताकेँ के अधम कहत? की कहैत छह—‘इच्छाक विरुद्ध होयबहि शठताक सार अछि। मनविरुद्ध व्यवहार पाबि कामीकेँ प्रियासँ दुःख होइत अछि; एकर उपचार नहि।’ अरे, कारण भेटलापर सभ लोक प्रतिकूल भऽ सकैत अछि। जे ओहि कारणकेँ दूर नहि कऽ सकए, अपराध ओकर अछि। परस्पर प्रतिकूलता ओतहि दोष अछि जतय एक उद्देश्य लेल हुनक मेल भऽ नहि सकए। बहुत जोड़ी एहन देखल जाइत अछि, जे किछु बातमेँ प्रतिकूल रहितो दोसर बातमेँ खूब मेल-जोलसँ प्रसन्न रहैत अछि। थरथराइत स्तन, नोरभरल आ मनक भेद कहैत चितवन, सुन्दर शब्दसँ भरल गुपचुप गप्प—ई सभ जँ शठतासँ सेहो कएल जाए, तथापि गुणे मानल जाइत अछि। की कहैत छह—‘बहुत लोक कहैत अछि जे वेश्याकेँ देल सभ धन नष्ट बुझू। दत्तको कहलनि—काम पुरुषक धनक सर्वनाश अछि। एहि विषयमेँ अहाँक मत की?’ अर्थक प्रयोग केवल तीन प्रकारेँ होइत अछि—दान, उपभोग आ गाड़ि राखब। दान आ उपभोग श्रेष्ठ, गाड़ि राखब निन्दनीय। केना— गाड़ि राखल धनक कोनो फल नहि होइत अछि। निष्फल रहला पर असन्तोष होइत अछि। फड़कैत घोड़ाक चाल जकाँ ठाम बदलनिहार धन केवल सञ्चयक लेल नहि होइत अछि। अर्थ आ धर्म देहकेँ सुख दैत अछि। मनोवाञ्छित शब्द, रूप, स्पर्श आदि विषयक प्राप्तिकेँ सुख कहल जाइत अछि; वेश्याक सङ्गसँ ओ भरपूर भेटैत अछि। सभ शब्दमेँ मधुर वचन विशेष सुखद अछि। मधुर वचन कहब केवल वेश्यासभ जानैत छथि, दोसर नहि। केना— प्रिय बातकेँ प्रिय ढङ्गसँ, अथवा कटु बातो अवसरपर थोड़े शब्दमेँ प्रिय ढङ्गसँ कहब केवल वेश्यासभ जानैत छथि। दाक्षिण्यसँ भरल ओ सभ कखनहुँ कटु बात नहि कहि सकैत छथि, आ प्रिय बातो अप्रिय ढङ्गसँ नहि कहैत छथि। भरल गोल जाँघ आ नितम्बबाली, उघार अंशुक आ बान्हल मेखलाबाली वेश्याक जघनप्रदेशक स्पर्श जकरा प्रिय लगैत अछि, से ओकर लेल प्राणो दऽ दैत अछि, धनक की बात! सभ रसामेँ मदिरापान अत्यन्त निन्दित अछि, मुदा वेश्याक संग ओकरो प्रयोग आनन्द दैत अछि। देख— हड़बड़ीमेँ ढारलासँ चषकमेँ उफनैत, पीबासँ बचल, वा पी कऽ कुल्ला कएल, आ पीबैत समय बीच-बीचमेँ अधरपानरूपी चखनाक स्वाद देनिहार मदिरा जे पीबैत अछि, ओही वेश्यापुरक असल आनन्द पबैत अछि। जे वेश्याक अधखुलल नेत्र, फड़कैत ओंठ, लम्बा तानल भौँह आ पसेनासँ भरल कपोलबला मुख देखि चुकल अछि, ओकर आँखिक पूरा फल भेटि गेल। आओर— स्नानक बाद वेश्याक रूख केशान्त, फूलसँ सजल भारी जूड़ा, पहिरि छोड़ल वस्त्र, निःश्वासक सुगन्धिसँ सुवासित लाल अधर, मधुपानसँ खिलल मुख, अथवा चन्दनसँ भीजल देह—जे एकर गन्ह लेलनि, हुनक नासारन्ध्रसँ कामदेव निश्चय भीतर प्रवेश कऽ जाइत छथि। धर्ममेँ हमर विशेष दखल नहि अछि, तथापि धर्म केना प्राप्त होइत अछि, से कहैत छी। एहि संसारमेँ कृतघ्नता सभ पापसँ भारी अछि। आ कृतघ्नसँ सेहो अधिक कृतघ्न ओ अछि, जे वेश्याद्वारा अनुपम आ मनचाहा सुख पाबि बदलामेँ हुनक भलाई नहि करैत अछि। जँ ओ कृतज्ञ अछि तँ स्वर्ग ओकर मुट्ठीमेँ अछि। तेँ स्वर्गसुख पाबए लेल निर्भय भऽ वेश्याकेँ धन देबाक चाही। की कहैत छह—‘कुलवधू अनुकूल होइतो ओकरामेँ वेश्याजकाँ सुख किएक नहि?’ सुन। कुलवधूक अनुकूलता एक प्रकारक, वेश्याक दोसर। कुलवधू जँ सरल हो तँ पहिने प्रिय बातो असमयमेँ कहैत अछि; फेर पतिकेँ अत्यन्त प्रिय मानि अप्रिय बातो कहि दैत अछि। ई बात सर्वत्र देखल जाइत अछि। काम एक विशेष इच्छा अछि, आ प्रार्थनो इच्छा अछि। नहि भेटलासँ प्रार्थना उपजैत अछि। वेश्या वशमेँ आयलो पर ओ प्रार्थना ईर्ष्यासँ भरल रहैत अछि, कारण वेश्यापर सभक अधिकार अछि। ईर्ष्यासँ लोभ उपजैत अछि; तेँ वेश्याक प्रति कामभाव हटैत नहि। काम रागक मूल अछि। आओर— वेश्याक जघनरूपी रथपर चढ़ल एहन कोन चेतन प्राणी अछि जे कुलनारीक परवाह करत? रथ छोड़ि बैलगाड़ीक सवारी चाहनिहार कोनो पुरुष नहि। की कहैत छह—‘वेश्यामेँ अनुरक्त पुरुष लोकक आदरक पात्र नहि होइत अछि; ओकर मतो लोककेँ प्रिय नहि लगैत अछि। जँ वेश्यागमनमेँ गुण अछि तँ— फेर ओकरा अपनाओल किएक नहि जाइत अछि?’ बड्ड धूर्ततापूर्ण प्रश्न पुछलह। एक क्षण अवसर दिअ। [सोचि] एतय पूजा दू प्रकारक होइत अछि—एक फलदायिनी, दोसर निष्फल। निष्फल पूजा नग्नक चेष्टा जकाँ हास्यास्पद होइत अछि। जे वेश्यामेँ लागले नहि, ओकरा फल की भेटल? ककरो मत हो सकैत अछि—‘वेश्याप्रसङ्ग अपमानक कारण अछि।’ ई मानबाक योग्य नहि। सभ लोक सुखी पुरुषसँ द्वेष करैत अछि। जेना ‘परस्त्री अगम्या अछि’ सभ कहैत अछि, तहिना वेश्याक लेल नहि कहल जाइत अछि। ककरो मत हो सकैत अछि—‘स्त्रीप्रसङ्ग श्रेयस्कर नहि, आ वेश्यासभ स्त्री छथि।’ एहि पर हमर कथन अछि—जकर मोन स्त्रीमेँ लागल हो, ओकरा दोसरकेँ दोष नहि देबाक चाही। आओर— [पूर्ववाक्यक विस्तार] ढीठ स्वभाव, अपन स्थानक बहादुरी, हाजिरजवाबी, सुरुचि, स्वभावक तेज, मनक बात भाँपब, हँसी-खुशी, सुरतक उत्तम विधिक परिचय, अनुरक्त स्त्रीक सुख, चित्रादि कलाक प्राप्ति आ उत्तम आराम—जँ कामीकेँ वेश्यापुरमेँ ई सभ भेटैत अछि, तँ लोक ओहि वेश्यापुरक निन्दा किएक करैत अछि? किएक करैत अछि? [घुमैत] की कहैत छह—‘बृहस्पति, उशना आ दोसर स्मृतिकार कहैत छथि जे स्त्रीप्रसङ्ग नहि करबाक चाही। एहि विषयमेँ अहाँक मत की?’ अरे, ई कोरा उपदेश अछि। हमरा एहन केओ नहि देखाइत अछि जे स्त्रीप्रसङ्ग नहि करैत हो। सुनल जाइत अछि जे इन्द्रादि सेहो अहल्यादिक संग व्यवहार कएलनि। धर्म आ अर्थसँ विषयभोग श्रेष्ठ अछि, कारण एहिमेँ मनक इच्छा पूर्ण होइत अछि। विषयभोग स्त्रीक विशेषता अछि। जे वेश्याकेँ छोड़ि स्वर्गक दिव्य कामोपभोगक इच्छा करैत अछि, ओकरा हम ठकल मानैत छी। एहि जन्म आ आगाँक जन्म दुनूमेँ एहि जन्मे श्रेष्ठ अछि, कारण एकर फल प्रत्यक्ष अछि। दोसर देह—जकर प्राप्ति सन्दिग्ध आ तपस्याक बाद बड़ी कठिनाइ सँ होइत अछि—ओहिमेँ तोरा कोन आनन्द देखाइत अछि? देख—मेघक कारण जाहिमेँ चन्द्ररूपी दीपकक प्रकाश मन्द हो, दुगुना अन्हारसँ भयङ्कर लगैत हो, अत्यन्त शीत हवा बहैत हो, पानि आ हवासँ चलब कठिन हो—एहन बरखाक अन्हरिया रातिमेँ कामबाणसँ सन्तप्त, एकाकी अभिसार करैत कामिनीक नूपुर-झनकारसँ जागल पुरुषकेँ अपन जीवन आ जन्मक पूरा फल भेटि जाइत अछि। की कहलह—‘नूपुर धारण करब अभिसारिकाक पैघ उपकार करैत अछि।’ हँ, ठीक। कारण प्रथम समागममेँ सकपकायल पुरुष आत्मनिवेदन केना कऽ पबितैत, जँ पएरक स्पन्दनसँ उठल नूपुरक झनकार नहि होइत? नूपुरक ध्वनिसँ जागि जँ एहन मुख चुम्बन लेल भेटए जकर विशेषक मेघजलधारासँ धुलल हो, आँखिक अञ्जन पसरल हो, अधर फड़कैत हो आ मधुपानक सुवास अबैत हो, तँ उल्टा माथ लटका अनेक कल्प धरि नरकक दुःख भोगबो युवतीसँ मन मिलाएल ओहि पुरुषकेँ प्रिय लगत। जाहि शरदमेँ मेघक घोघ हटि गेल हो, माथपर चन्द्रमाक तिलक हो, आँधीक चलब रुकि गेल हो, असन-वृक्षक टपकैत फूलसँ दिशा महमहाइत हो—ओहि समय सारसक बोली अनुकरण करैत मेखलाक झनकार आ बन्धूकक लाल फूल जकाँ दमकैत विशेषकसँ युक्त, चक्रवाकसँ प्रेमक रहस्य सीखल प्रियाक संग खिलल कमलबाली बावड़ीक जलमेँ जे विहार करैत अछि, ओकरा स्वर्गसँ की प्रयोजन? अथवा जखन कुन्दपुष्पसँ मिश्रित फुलल लोध्रपुष्पक गन्हसँ भरल हवा बहैत हो, आ कामिनीसभ जूड़ामेँ प्रियङ्गु-मञ्जरी लगा इठलाइत होथि—एहन हेमन्तकालमेँ शीतक कोपसँ जकर ओंठ फाटल हो आ अधर बचए चाहितो चुम्बन लेल ललकारैत हो, एहन प्रियाक मुखक स्नेहपूर्वक आग्रहसँ पान करनिहारकेँ जे सुख भेटैत अछि, ओकर उपमा नहि देल जा सकैत अछि। अथवा जतय कारी अगरु जरलासँ धुआँक मेघ छाओल हो, मोतीक फूल फरशपर बिछाओल हो, एहन गर्भगृहमेँ जखन पाला-जकाँ बून्द बरसबैत तीक्ष्ण हवा बहैत हो—ओहि शिशिरक अन्हरिया रातिमेँ प्रेममग्न प्रियाक पीन स्तनसँ अपन वक्षस्थल दबबैत, सुन्दर शय्यापर पड़ल, गाढ़ आलिङ्गनसँ उपजल पसेनाक बूँदसँ महमहाइत देह लिए रतिक अन्तमेँ मधुर झपकी लेनिहार पुरुष सचमुच की नहि पाबि लेलक? आओर— फाटल अधरोष्ठकेँ चुम्बनसँ बचए चाहनिहार आ केश पकड़ि ऊपर खिंचलासँ बाँकी चितवन चलाबैत प्रियाक सीत्कारपूर्ण मुखकेँ पियासल भऽ अवश्य पीबाक चाही। जतय निन्दे नहि, ओहि स्वर्गमेँ ई सुख कतय भेटत? अथवा वसन्तक ओहि दिनमेँ जखन पसेनाक बूँदसँ तिलक मेटा जाइत हो, कोकिल बागमेँ भरि जाइत हो, स्त्रीसभ मणिमेखला गूँथैत होथि, आममेँ मोजर देखाइत हो आ पवन सुगन्धित हो—तखन मान छोड़ि प्रेमवश स्वयं आयल प्रिया अपन मान-मनौवल बिसरि जेकरा मनबए लागए, ओकरा दोसर सुखक इच्छा नहि करबाक चाही। अथवा जखन शिरीषपुष्प प्रियाक कानमेँ सजाओलासँ कपोल श्याम भऽ जाए, जलपात्र, मोतीक हार, चन्दन आ खसक पङ्खाक हवा आनन्द दे, सूर्यक किरण प्रचण्ड हो—एहन ग्रीष्ममेँ फूलक सेजपर लेटल, नवमालिकासँ सजल जूड़ापर हाथ राखल, चन्दनलेपसँ आर्द्र स्तनबाली प्रियाक संग ताड़क पङ्खाक हवा खाइत जे हवामहलमेँ दुपहरिया बितबैत अछि, अथवा जाहि हवादार घरक फरशपर सुगन्धित जल छिड़कि मौलसिरी, मल्लिका आ नीलकमल सजाओल हो, ओतय प्रियाद्वारा रोकल जाइत अछि—ओ अपन यौवनक पूरा आनन्द लऽ लेलक। आओर— दन्तक्षतसँ अधर फड़कैत प्रियाक कमलसँ सुन्दर मुखमेँ जे रस भेटैत अछि, करधनीक प्रभासँ चमकैत जघनभागक वस्त्र हटेबामेँ जे आनन्द, अथवा पीन कपोलपर नखक्षतसँ जे शोभा—एहि सभ सुखमेँ फँसल मोन जन्मान्तरमेँ सेहो विरक्त नहि होए चाहैत अछि। ई बेचारा लोक चींटी जकाँ प्राण गमएबाक बाटमेँ एक-दोसरक पछाँ चलैत, स्वयं नहि देखल ‘स्वर्ग अछि, स्वर्ग अछि’क झूठ रटि, मृगतृष्णामेँ मोन लगा, वायुभक्षण, पर्वतसँ खसब, अग्निमेँ प्रवेश, घोर जप, होम, व्रत, नियमादिक ढोङ्गसँ स्वर्ग पाबए चाहैत अछि। सत्य की अछि, एकर परीक्षा सेहो नहि करए चाहैत अछि। सुनल जाइत अछि जे स्वर्गमेँ प्रत्येकक लेल नियत स्त्री तैयार रहैत अछि। जँ एना हो तँ अनेक परस्पर-विरोधक बीच ओहि अप्सराक संग पुरुषकेँ कोन आनन्द भेटत? सदिखन सटल रहबासँ, जकर वियोग होइते नहि, ओ केना आनन्द देत? परस्पर अपरिचित रहबासँ सुरतक प्रकट सुखो ओहि स्त्रीक संग नहि भेटत। स्वर्गमेँ सोनाक घर आ सोनाक गाछ सुनल जाइत अछि। ई देवताक पूँजी हुनक स्वभावगत कृपणतासँ जमा भेल होयत। जँ घर आ गाछ दुनू सोनाक अछि तँ स्त्रीकेँ ककरासँ सजाओल जाइत अछि? विशेषता की भेल? मकानक सोनाक किछु अंश तोड़ि की स्त्रीक शोभा बढ़ाओल जाएत? अपन हाथसँ पुत्र जकाँ पोसल आ सम्मानित गृह-उपवनक बालवृक्ष, जे युवतीक जूड़ामेँ सजए लेल फूल दैत अछि, तकर संग स्त्रीकेँ जे रम्य उपभोग भेटैत अछि, ओ सुख कठोर सोनाक गाछमेँ कतय? यौवनभरल कामक वशीभूत, परस्पर दर्शन लेल उत्कण्ठित, कोकिलक कूक सुनए लेल पियासल, आपसमेँ उलाहना देनिहार आ प्रेमक फल पाबए इच्छुक कामीजनकेँ जे सुख भेटैत अछि, ओ स्वर्गमेँ कतय, जतय स्त्रीसभ सदिखन शापक भय सँ डेरायल रहैत छथि? प्रेममेँ कामिनी रूठलापर तुरन्त ओकर इच्छा-अनुकूल सुन्दर मान-मनौवलक उपाय मित्रसभक संग सोचैत जकर लम्बा दिन बीतैत अछि, ओकर समान सुख ईर्ष्यारहित स्वर्गमेँ कतय? भावसँ भरल अङ्गबाली प्रिया वक्षस्थलपर लेटि मौलसिरी-पुष्पसँ सुवासित निःश्वासवायुसँ प्राणेन्द्रिय तृप्त करैत जे निद्रासुखमेँ डुबा दैत अछि, ओ सुख निद्रारहित स्वर्गमेँ कतय? वारुणीक मदमेँ चूर स्त्रीक टूटल-फूटल, छलपूर्ण मधुर वचन जे प्रियतमसँ कहल जाइत अछि, ओ मदिरारहित स्वर्गमेँ कतय? रुचिकर सीत्कार आ श्वासक तीन गतिसँ युक्त नववधूक आलिङ्गनसँ भेटएबला रतिसुख स्वर्गमेँ कतय राखल अछि? अरे, हमरा तँ बूढ़ श्रोत्रियक संग बैसब नीक, अप्सराक संग नहि। सुनैत छी, ओ बूढ़ ठेढ़ी अप्सरासभ रोबसँ संस्कृत झाड़ैत छथि। जकरासँ वसिष्ठ, अगस्त्य आदि महर्षि उत्पन्न भेलाह, हुनकर की भरोस? देख— शठता, झूठ, मद, ईर्ष्या, अपमान आ प्रेममेँ रूठब—ई सभ जहिना कामभाव उत्पन्न करैत अछि, तकर एको स्वर्गमेँ नहि। तेँ जकरा निर्बाध कामानुभवक इच्छा हो, ओकरा एतहि आनन्द लेबाक चाही—विशेषतः वेशवधूक संग। जकरा मनएबाक लेल आँखिमेँ नोर भरि कुट्टिनीकेँ दूर धरि पछाँ-पछाँ आबए पड़ए, वा झूठ क्रोधसँ भागैत जकर अञ्चल पकड़ि प्रियाकेँ खिंचए पड़ए, अथवा सचमुच क्रोधित जकरा कान्ता कठिनाइ सँ मनाओ—एहन दुर्भागी पुरुष जँ प्रियापर क्रोधिते रहए, तँ ओ कामक ध्वजा फहरबैत अपन रथकेँ अपन हाथेँ तोड़ि-मसकि दैत अछि। अरे, सुनन्दा अछि। की कहैत छह—‘हम सभ सुनि लेलहुँ।’ देख, हम अपन माल बेचि चुकल छी। प्रिय, तोरा धोखा नहि देबाक चाही। की कहैत छह—‘चानसँ अन्हार नहि टपकैत अछि।’ सुनन्दा, एही बात तोहर योग्य अछि, तेँ तूँ कहलह। आब भीतर चली। [प्रवेश कऽ] आब हम विदा चाहैत छी। सूर्य सुनहला कछुआ जकाँ धीरे-धीरे अपन पएर समेटि अस्त होइत अछि; स्त्रीसभ ढील मेखला बान्हि, एक बेर वारुणी पी, कान्तक करस्पर्श लेल उत्कण्ठित केशकेँ फूलसँ सजा, कर्वलम्बित मुद्रामेँ मेखलापर हाथ राखि ओकरा चितवनसँ देखैत छथि। की कहैत छह—‘तूँ एतयसँ आध पएरो नहि जा सकैत छह।’ अरे, जेबाक तँ पड़त। नहि तँ हमर स्त्री एहि चोलाक दोसर ढङ्गसँ स्वागत करत। तूँ— की कहलह—‘हम ओकरा मना लेब।’ राजाक रहस्य जननिहार आ अनुनय नहि माननिहार दुष्ट जकाँ ओकरा मनाएब सम्भव नहि। अरे विश्वलकक संग तूँ हमर पएरमेँ किएक लिपटि रहल छह? हाय! एहि दुनू हमरा पङ्गु बना देलक। सुनन्दा— जेना महासागर वेलाकेँ नहि छोड़ैत अछि, तहिना हम तोरा छोड़ि नहि जाएब। सागरक मेखलासँ अलङ्कृत एहि पृथ्वीक रक्षा राजा करथि। [विटक प्रस्थान।] ईश्वरदत्तक एकनट नाटक (भाण) धूर्तविटसंवादः समाप्त। ३ परस्पर प्रेम-पलायन वररुचिक मूल संस्कृत एकनट नाटक (भाण)- उभयाभिसारिका (संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद- गजेन्द्र ठाकुर द्वारा) [नान्दी पश्चात् सूत्रधारक प्रवेश] सूत्रधार: ‘तूँ हमर के? हम तोहर के? अरे शठ, हमर अञ्चल छोड़। हमर मुँह की देखैत छह? हे सुभग, हम तोहर लेल व्याकुल नहि छी।’ [ठहाका मारि] ‘प्रियाक दाँतक चिह्नसँ अङ्कित तोहर ओंठ हम चिन्हैत छी। अरे चपल, हट। जे रूठल अछि ओही तोहर अछि, हम नहि। जा, अपन मोनमेँ बसल कामिनीकेँ मना।’ कामपीड़ित आ प्रणयकलहसँ कुपित वरस्त्रीसभ अहाँ लोकनिसँ एना कहथि। ई हम अहाँ महानुभाव लोकनिसँ कहैत छी। अरे, कहबाक लेल उत्सुक छी, मुदा ई कोन शब्द सुनाइत अछि? वाह! देखैत छी। [नेपथ्यमेँ]— वसन्तक आरम्भमेँ मुरझायल लोध्रवृक्ष मित्रक कार्यसँ घबरायल दीन विट जकाँ ठाढ़ अछि। [तकर बाद विटक प्रवेश] विट—अहो, वसन्तक कतेक ठाठ! कोकिल, आम्र, अशोक, झल्ला, उत्तम मदिरा, चन्द्रमा आ वसन्तक विशेषतासँ बनल शोभा—ई कामदेवक मोनो विचलित कऽ सकैत अछि। अहो! कामीजन एक-दोसरक त्रुटियो सहि रहल छथि। अहो! दूतीसभ एहि समय अप्रतिहत शासनबाली भऽ आबि-जा रहल छथि। अहो! वसन्तऋतु अपन पूरा वैभवपर अछि। प्रवाल, मुक्ता आ मणिसँ गूँथल रशना, दुकूल, हलुक रेशमी वस्त्र, हार, हरिचन्दन आदिक आनन्द बढ़ि रहल अछि। सभ लोकमेँ काम उत्पन्न करनिहार, लोकरुचिकर एहि खिलैत वसन्तमेँ सागरदत्त श्रेष्ठिक पुत्र कुबेरदत्तक नारायणदत्तासँ किछु अनबन भऽ गेल अछि। ताहि कारण कुबेरदत्त अपन सहकारक नामक सेवक हमरा लग पठा कहलनि—‘भगवान् नारायण विष्णुक मन्दिरमेँ मदनसेनाद्वारा “मदनाराधन” नामक सङ्गीतकक रसानुसार अभिनय भऽ रहल छल। तखन हम तोरा छोड़ि ओकर प्रशंसा कएलहुँ। मदनसेनामेँ प्रेमक आशङ्कासँ क्रोधित नारायणदत्ता हमर पएर पड़लोकेँ उपेक्षा कऽ अपन घर चलि गेल। ओकर कारण कामातुर हृदयसँ ई राति हजार राति जकाँ नहि बितए, तेँ चाहैत छी जे एहि नगरक लेल सदिखन वसन्त जकाँ बनल वेश्यापर्वत अर्थात् वेश्यापुरमेँ अटल अहाँ हमर मेल ओकरासँ करा दिअ।’ ओकर बात सुनितहि किछु परिचयक कारण, आ किछु मदन-दुःख असह्य बुझि, हम आइ साँझे निकलि पड़लहुँ। मुदा हमर ढलैत वयसपर विश्वास नहि करैत आ केवल अपन यौवनक विचार करैत हमर गृहिणी दोसर शङ्का कएलक आ हमरा रोकए चाहलक। मुदा हम नारायणदत्ताक क्रोध हटएबाक प्रतिज्ञा कऽ चुकल छी, तेँ अवश्य जाएब। अथवा, एतय हमर प्रतिज्ञाक की आवश्यकता? आओर— सुन्दर रूप, अठखेली करैत यौवन, दान, अनुकूल स्वभाव, शान्ति आ मेलक बात—जकरामेँ ई सभ सद्गुण हो, कामिनीकेँ प्रसन्न करए लेल ओकरा दोसरक की आवश्यकता? [घुमैत] अहो! कुसुमपुरक राजमार्गक अपूर्व शोभा! एतयक गली सुगन्धित जलक छिड़काव, झाड़-पोंछ आ चारू दिस सजल फूलक ढेरीसँ एना लगैत अछि मानो दोसर घरक आगाँ वासगृह हो। नाना वस्तुक किनबेच करनिहार ग्राहकक भीड़सँ दोकानक अगिला भाग शोभायमान अछि। वेदाध्ययन, सङ्गीत आ धनुषक टंकारसँ भरल महलसभ मानो रावणक मुख जकाँ आपसमेँ गप्प कऽ रहल अछि। कतहु मेघरूपी प्रासादक खुलल गवाक्षमेँ कैलासक अप्सरा जकाँ गली देखबाक कौतूहलसँ बिजुरी-जकाँ चमकैत नवयौवना प्रमदासभ शोभा पाबि रहल छथि। आओर, पैघ हाथी, घोड़ा आ रथपर चढ़ि एतय-ओतय जाइत महामात्रक प्रधान कतेक भव्य लगैत छथि! युवकक आँखि चोरेबामेँ समर्थ, नखराभरल, यथास्थान आभूषण पहिरने जवान दासीसभ स्वर्गक युवतीक सौन्दर्यक उपहास करैत आबि-जा रहल छथि। सभ लोकक नेत्ररूपी भँवरा जकर मुखकमलक शोभा पीबैत अछि, एहन गणिकासभ मानो सड़कपर दया कऽ चहलकदमी करैत छथि। बहुत की— निर्भय भऽ प्रसन्नतासँ नित्य उत्सवमेँ लागल, बहुमूल्य रत्न आ आभूषणसँ सजल, माला, सुगन्धि आ वस्त्रसँ लकदक, क्रीड़ाविलासमेँ मग्न, नाना गुणसँ प्रसिद्ध नागरिकसभक कारण पाटलिपुत्रक ई भूमि एहि समय स्वर्ग बनि रहल अछि। [घुमैत] अरे, ई चरणदासीक पुत्री अनङ्गदत्ता अछि। रतिश्रमक थाकनिजनित आलससँ नपल-तुलल कोमल पएर रखैत, मानो सभक आँखिक अमृत बनल, एही दिस आबि रहल अछि। निश्चय एकर प्रियतम निर्दयतासँ एकर आनन्द लूटने अछि! केना— एकर मुखमेँ दन्तक्षत-चिह्नित ओंठ अछि; चञ्चल आँखि निन्नसँ अलसायल अछि; रतिक्रीड़ामेँ छितरायल करधनीक लड़िसँ एकर जघनस्थल भरल अछि। अरे, एकर दर्शनहि सँ हमर काज सिद्ध होयत। एँ, हमर दिस देखनहूँ बिना चलि गेल! तखन एकरासँ बात करब। अहा, स्वयं घुरि आयल। प्रिय, प्रणाम किएक नहि करैत छह? की कहैत छह—‘अहाँ देर सँ चिन्हलहुँ; हम अभिवादन कऽ रहल छी।’ तँ हमर आशीर्वाद सुन— भद्रे, तोरा युवा, स्वतन्त्र, दानी, सुन्दर, धनाढ्य, सज्जन, कुशल आ रतिपरायण प्रियतम भेटओ। प्रिय, ई सभ छोड़— कामदेव ओकर अनुचर छथि आ ओकरे जीवन सफल अछि, जे तोहर जकाँ वेशलक्ष्मीक संग एक राति बितौने हो। की कहैत छह—‘महामात्रपुत्र नागदत्तक घरसँ आबि रहल छी।’ भद्रे, ओकर वैभव तँ पुरान कथा भेल। स्पष्ट अछि जे तूँ अपन मायक इच्छाक विरुद्ध ओकरासँ मेल कएलह। लज्जासँ मुँह नुका ई किएक हँसल? वाह! हमर अनुमान ठीक। सुन्दरि, एना नहि कर। केना— मायक लोभकेँ ठुकरा तूँ रतिसुखमेँ मोन लगेलह, आ बहुत फलदायी वेश्यापुरक नियम—जकर त्याग वेश्याक लेल कठिन अछि—छोड़ि अपन प्रेमीक घर चलि गेलह आ ओकर संग रसपूर्ण रङ्गरेली कएलह। एहि गुणसभसँ तूँ सभ वेश्याकेँ अपन पएरक नीचाँ कऽ देलह। अरे, तोहर लाज उचिते अछि। सौगन्ध खेबासँ की? तोहर घर जा तोहर माकेँ मना लेब। तूँ वेश्याक स्वभावक विरुद्ध काज कएलह। आब जा सकैत छह। की कहैत छह—‘अभिवादन करैत छी।’ सुभगे, हमर ई आशीर्वाद सुन— तोहर गुण तोहरामेँ रहि सद्गुण भऽ गेल अछि; ओकर प्रशंसा की करब? लोककेँ मोहित करनिहार तोहर यौवन स्थिर रहए। ई चलि गेल। हमहुँ चली। [घुमैत] अरे, ई विष्णुदत्ताक पुत्री माधवसेना अछि। अपन परिजन पछाँ-पछाँ आबि रहल छथि, तकर परवाह नहि कऽ, बाघसँ पछुआएल मृगछौनी जकाँ वेगसँ पएर बढ़बैत एही दिस आबि रहल अछि। स्पष्ट अछि जे मायक लोभसँ अनचाहा पुरुषक संग मिलनासँ दुःखी अछि। कारण— न तँ मुख उतरायल अछि, न केशविन्यासक फूल झड़ल; न ओंठक सुकुमार शोभा दन्तक्षतसँ बिगड़ल। गाढ़ आलिङ्गनरहित स्तनतटपर चन्दनचूर्ण जकाँ-तकाँ अछि। श्रोणीपर मेखला रागपूर्ण रतिसँ न ढील पड़ल, न अस्त-व्यस्त भेल। अरे, अनचाहा पुरुषक संग मिलनक भय सँ ई हमरा देखनहूँ बिना चलि गेल। ठीक, लग जा दुःखक कारण बुझब। वाह, स्वयं घुरि आयल। की कहैत छह—‘हम अहाँकेँ नहि देखलहुँ।’ प्रिय, तोहर दोष नहि; क्लेशसँ घबरायल लोकक बुद्धियो घबरा जाइत अछि। की कहैत छह—‘अभिवादन करैत छी।’ तँ हमर ई आशीर्वाद लिअ— तोहर प्रियजन धनवान् होथि आ अनिष्टजन निर्धन। मायक लोभमेँ पड़ि अनिष्ट पुरुषक संग तोहर समागम नहि होअए। प्रिय, कतयसँ आबि रहल छह? की कहैत छह—‘धनदत्त सार्थवाहक पुत्र समुद्रदत्तक घरसँ।’ अहा! नीक कएलह। ओ तँ आइकाल्हिक कुबेर अछि। लम्बा निःश्वास लऽ, अधरक पल्लव फड़का, टेढ़ भौँहबाली आँखिसँ ई मुख किएक घुमा लेलक? हाय! हमर अनुमान सही— हे बाले, स्पष्ट अछि जे रातिमेँ दुःखी भऽ शय्यापर जा तूँ बनावटी रति कएलह आ दिन उगबाक प्रतीक्षा करैत रहलह। ओहि समय तोहर सभ चेष्टा भावहीन छल; कठिनाइ सँ चुम्बन लेल अधर देलह; न मधुर बात, न हँसी-परिहास; जँभाइ आ गरम निःश्वास लैत रहलह; भुजाक आलिङ्गनो ढील छल, रागक तँ नामो नहि। प्रिय, विषाद नहि कर। रूपहीन धनी सेहो गम्य अछि, एना कहल गेल अछि। सुन— अनचाहा हो वा प्रिय—दुनूमेँ पूर्ण प्रेम उत्पन्न कऽ धन कमेबाक चाही; शास्त्रक एही नियम अछि। की कहैत छह—‘अहाँ सेहो हमर मायक जकाँ विचार रखैत छी।’ अरे, से बात नहि; एहिमेँ किछु कारण अछि। आब जा। तोहर घर आबि शास्त्रक असल मर्म बुझाएब। अहो! बिना अभिवादन चलि गेल। एकर शिक्षामेँ त्रुटि अछि, अथवा बेचारीक उद्वेग कारण होयत। हमहुँ आब अपन काजपर चली। [घुमैत] अरे, विलासकौण्डिनी नामक परिव्राजिका नखरासँ धीरे-धीरे पएर रखैत एही दिस आबि रहल अछि। एकर रूप आँखिक अमृत अछि। एकर पटवासक गन्हसँ उन्मत्त भँवरासभ आमक शिखर छोड़ि एकरापर मँडरा रहल अछि। तँ एकरासँ गप्प करी आ अपन आँखि-कानक कौतूहल शान्त करी। भगवति, वेशिकाचलमेँ अहाँकेँ अभिवादन। की कहैत छी—‘हमरा वेश्यापुरमेँ अटल व्यक्तिसँ प्रयोजन नहि; वेशेषिक शास्त्रमेँ दृढ़ व्यक्तिमेँ रुचि अछि।’ एकर कारण तँ अछि। केना— तोहर विशाल सुन्दर आँखि एक ठाम नहि ठहरैत अछि; ग्लानिसँ आओर सुन्दर, रतिश्रमयुक्त फुलल अधरबला मुख आ श्रमसँ अलसायल चाल तोहर सुरतोत्सवक सङ्केत दऽ रहल अछि। हे सुभगे, स्पष्ट अछि जे तोहर प्रिय तोरा ‘रति मात्र नित्य पदार्थ अछि’—एही शास्त्र पढ़ौने छथि। की कहैत छी—‘अरे कामक दास, तूँ अपन रुचिक अनुसार कहलह।’ हे सुभगे, जकरा तोहर चरणकमलक दास्य भेटल, ओ धन्य। हे वरतनु, हमर जकाँ पापीकेँ ईहो कतय सुलभ! की कहैत छी—‘षट्पदार्थ नहि जननिहारक संग गप्प करब हमर गुरु निषिद्ध कएने छथि।’ भगवति, ई उचिते अछि। केना—गुण अछि; तोहर यौवन सामान्य अर्थात् सभक लेल अछि; युवकजन तोहर गति अर्थात् कर्मक प्रशंसा करैत छथि। हे आर्ये, लोक तोहर संग नित्य सम्बन्ध अर्थात् समवाय चाहैत अछि— कारण तोहर आ सभसँ नित्य भेद अर्थात् विशेष अछि। मनचाहा तरुणसँ तूँ योग अर्थात् सम्बन्ध करैत छह, आ अनचाहा पुरुषसँ मोक्ष अर्थात् छुटकारा पाबि लैत छह। अरे, केवल हँसि ई हमर बातक उत्तर देलक। हमर अनुमान ठीक। की कहैत छी—‘साङ्ख्य कहैत अछि जे पुरुष निर्लेप, निर्गुण आ क्षेत्रज्ञ अछि।’ वाह! अहाँ तँ हमर मुँह बन्न कऽ देलहुँ। हमर एहि गप्पसँ अहाँ उत्कण्ठित भऽ गेलहुँ बुझाइत अछि। युवकक संग सुरतमेँ बाधा देब उचित नहि। आब अपन काजपर जाउ। ई चलि गेल। तँ हमहुँ चली। [घुमैत] अरे, ई चारणदासीक माता रामसेना अछि। वृद्धा होइतो विलासपूर्ण चितवन, चाल आ हँसीसँ युवतीक नकल करैत उपस्थित अछि। अरे, ई अचरजक वस्तु— प्रेमदत्त मनचाहा भोग भोगि, अपन गुणसँ प्रेमीक सार निचोड़ि, युवकक वैर आ सङ्घर्षक कारण बनि, निश्चय आब अपन पुत्रीक प्रेमीकेँ दुहए जा रहल अछि। हाय! कामीजनक मृत्यु बोलाबएबला एकर बुढ़ौतीक नखराक आनन्द ली। कामुकजनक लेल एहि महावज्रकेँ प्रणाम करी। अरी कमसिन रामसेना, अपन पुत्रीकेँ अपन यौवन आ सौभाग्य दऽ आब कोन कामीक घर उजाड़बाक लेल जा रहल छह? अरे, एकर शास्त्रमेँ सौगन्ध खेबे उत्तर अछि। की कहैत छह—‘तोहर शील स्वयं तोरा कोसि रहल अछि।’ अरे, बेसी गप्पसँ की लाभ? कोन प्रयोजनसँ जा रहल छह, से कह। की कहैत छह—‘हमर पुत्री चारणदासी काल्हि धनिकक घर गेल छल। सङ्गीतक अर्थात् महफिलक बहानासँ ओकरा ओतयसँ हटा अनए जा रहल छी।’ अरे, ई तँ चारणदासीक असावधानी अछि। केना? कामीजनक सभ धन हड़पबामेँ कुशल, ओकर सार पी कऽ सीटी जकाँ फेकि देबामेँ चतुर तोहर जकाँ स्त्रीक पुत्री होइतो बेचारी शास्त्रक उपदेश बिना शोचनीय रहि गेल! केना— एक समय ओकरा गम्यरूपमेँ पाबि, ओकरासँ पर्याप्त धन उपजा, आब ओकर निर्धनता जनितो प्रेममेँ फँसल ओ ओकरा छोड़ए नहि चाहैत अछि। एहन स्त्रीकेँ शास्त्रक मर्मक उपदेश देब व्यर्थ अछि। की कहैत छह—‘महफिलक बहानासँ ओकरा घर लऽ आएब। अहाँ घुरैत ओतय आबि ओकरा शास्त्रज्ञान सिखा दिअ।’ ठीक। मुदा हमर मित्रक काज जल्दी करबाक अछि। से पूरा कऽ तोहरो काज करब। आब जा। हमहुँ अपन काजपर जाइत छी। अरे, वेश्याक हृदय विश्वासयोग्य नहि होइत अछि। केना— स्निग्ध आ चिमटि जाएबाली क्रीड़ासँ लाड़ देखाबि, कामीक सभ धन साफ कऽ, निर्दयी आ लोभी वेश्यासभ दोसरक संग आनन्द लेल पहिल प्रेमीक प्रति विरक्त भऽ ओकरा एना छोड़ि दैत छथि जेना आत्मा शरीरकेँ। अहो, वेश्याजननी कामीक लेल एहन विपत्ति अछि जकर उपचार नहि। भगवान् कामीजनकेँ हुनकासँ बचबथि। कामुकक सर्वस्व हरबामेँ कुशल आ गणिकारूपी अमोघ शस्त्र चलएबामेँ निपुण वेश्याक माताक सर्वनाश हो। [घुमैत] अरे, राजमार्गक कलङ्क सुकुमारिका नामक नपुंसक एही दिस आबि रहल अछि। एकर भेटसँ आब कुशल नहि। ठीक, बिना गप्प कएने कपड़ाक ओट दऽ एकरासँ बचि निकलि जाउ। [तहिना करैत] अरे, ई तँ हमर पछाँ दौड़ि रहल अछि! आब हमर की दशा होयत? अरे, काल बड्ड बलवान। मधुर बात कऽ बाघक मुँहमेँ फँसल अपनाकेँ छुड़ाबी। की कहैत छह—‘अभिवादन करैत छी।’ प्रिय, अविधवा रह आ बहुत पुत्रवती हो। आओर— भौँह तानि, आँखि नचा, ओंठ फड़का, बाहु फटकारि, सुन्दर चाल आ नखराभरल हँसीसँ तूँ स्त्रीक नखराकेँ मात कऽ देलह। तोहर लम्बा-चाकर नितम्बपर करधनी अस्त-व्यस्त भऽ स्पष्ट नीचाँ झूलि रहल अछि। कह, रतिसँ अतृप्त भऽ ककर घरसँ आबि रहल छह? की कहैत छह—‘राजाक साला रामसेनक घरसँ।’ ओकर जीवन सफल। सुभगे, चक्रवाक-युगल जकाँ आब ओकरासँ वियोग भऽ गेल? की कहैत छह—‘राजदरबार जाइत गणिकापरिचारिका रतिलतिकाक चतुर-मधुर हँसीयुक्त कामचेष्टा आ स्नेहपूर्ण ललित कटाक्षक जलसँ अपन हृदय सींचि, रोमाञ्चसँ कामविकार प्रकट करैत, ओ माथ नुका ओकर अनुराग स्वीकार कएलक। ई सहन नहि भेला पर हम डाँटलियैक, तँ ओ हमर पएरपर पड़ि गेल। तथापि ईर्ष्यासँ अभिभूत भऽ हम क्षमा नहि कएलियैक। तखन ओ बलपूर्वक हमरा अपन घर आनि पलङ्गपर बैसा हमर संग बैसल। फेर ओ मदमत्त हमरा रातिमेँ कामवेगक खेदसँ सुतल छोड़ि ओकरे घर चलि गेल आ कतेको दिनसँ घुरल नहि। हम ओकर मनौवल अस्वीकार कऽ पश्चात्तापमेँ जरैत अहाँक लग आयल छी। अहाँकेँ ओहि प्राणप्रियसँ हमर मेल कराबए पड़त।’ प्रिय, ई रामसेनाक भूल अछि। केना— सुरतमेँ जखन तूँ ओकरा गाढ़ आलिङ्गन करैत छह, तखन स्तन बीचमेँ बाधा— नहि बनैत अछि। हे सुभगे, प्रत्येक मास रागनाशक ऋतु अर्थात् मासिक धर्म तोरा नहि होइत अछि; रूप, श्री आ यौवनक शत्रु गर्भ तोरा नहि रहैत अछि। तोहर जकाँ गुणवतीकेँ जँ ओ छोड़त, तँ ओकरा रतिक उत्सवे छोड़ए पड़त। एखन ठहर। मानिनि, तूँ ओकर घर जा हमर बाट देख। हमरा अपन मित्रक काज जल्दी करबाक अछि। से पूरा कऽ, अपन बहिन अर्थात् राजपत्नीक सौभाग्यसँ फुलायल आ तोहर जकाँ सुकुमार युवतीक भाव बुझबामेँ अयोग्य ओहि पुरुषकेँ तोहर घरमेँ तोहर पएरपर प्रणाम कराएब। आब जा। ई चलि गेल। हमहुँ जाइत छी। हा! बड़ी कठिनाइ सँ एहि असल नमूनाक स्त्री— अर्थात् नपुंसक—सँ प्राण बचा सकलहुँ। आब अपन काज करी। [घुमैत] अरे, ई के आबि हमर अभिवादन करैत अछि? तोहर कल्याण हो। बहुत दिनक बाद देखाइ देलह। तूँ पार्थक सार्थवाहक पुत्र धनमित्र छह ने? सेवक, याचक, सम्बन्धी आ मित्रक दरिद्रतारूपी अन्हार हटबएबला, युवतीक हृदयकमल खिलबएबला, कुसुमपुरक आकाशक पूर्णचन्द्र—तूँ एहि विपत्तिरूपी ग्रहणमेँ केना फँसि गेलह? की बहुत लाभक लोभमेँ पूरा कुटुम्बक धनसँ माल कीनि विदेश जाइत चोरसभ लूटि लेलक? अथवा राजाक निन्दा कएलासँ राजा तोहर सर्वस्व छीनि लेलनि? वा पलक झपकिते कुबेरक सर्वस्वो हरए समर्थ जुआ तोरा नष्ट कऽ देलक? बहुत की— बढ़ल नख आ केश, मैलसँ भरल देह, चिन्तासँ अभिभूत, पीयर-सुखायल मुख, खुरदरा, पुरान, गन्दा आ फाटल कपड़ा पहिरने तूँ कोनो दिव्य मुनिक शापसँ पीड़ित जकाँ लगैत छह। की कहैत छह—‘रामसेनाक पुत्री रतिसेनापर हमर गाढ़ प्रेम भऽ गेल आ ओकरो हमरापर। ई सभ अहाँ जनैत छी। अपन मायक लोभ जनितो ओ हमरा नहि छोड़त—एना बुझि, मित्रसभक रोकलापर सेहो हम अपन सभ धन एकहि बेर ओकर घर पहुँचा देलहुँ। सभ किछु लऽ किछु दिन बीतलापर ओ स्नानक बहानासँ नहएबला साड़ी पहिरा हमरा अशोकवनक बावड़ीपर पहुँचा देलक। द्वार बन्न भेलापर अशोकवाटिकाक रक्षक सच्ची बात बुझि हमरा चोरद्वारसँ बाहर निकालि देलक। आब एही नगरमेँ प्रतिष्ठासँ रहि दीर्घ दरिद्रता केना सहब—ई सोचि वनक बाटेँ जा रहल छलहुँ, तखन अचानक अहाँ भेटि गेलहुँ। ई सभ गुप्त बात अहाँकेँ निवेदन कऽ देलहुँ। आब अहाँक कहल अनुसार अपन भलाई सोचब।’ अहो, वेश्यापुरमेँ लोभक कतेक पकड़! अहो, वेश्याक स्वभावक कतेक कुटिलता! आउ, पहिने छातीसँ लगा ली। बधाई जे तोरा जीवित देखैत छी। केना— महौषधिक बलसँ सर्पक विषो धीरे-धीरे शान्त भऽ जाइत अछि; वनमेँ मातल हाथीक मस्तकसँ अपनाकेँ छुड़ाएब सम्भव अछि; समुद्रमेँ ग्राहक मुखसँ सेहो कदाचित् छुटकारा भऽ सकैत अछि; मुदा वेश्यारूपी बड़वानलमेँ पड़ल मनुष्य फेर उठैत नहि देखाइत अछि। अरे भलामानुस, तोहर दुःखक कारण रतिसेना अछि वा ओकर माता? की कहैत छह—‘हम झूठ किएक बाजब? रतिसेना तँ हमरा प्रेमे करैत अछि; वेश्याजननीक दुष्टतासँ ई भेल। जँ ओकर माकेँ किछु जनौने बिना अहाँ हमर समागमक प्रयत्न कऽ दिअ तँ हमर प्राण घुरि आएत।’ ओकर तोहरापर प्रेम हम जनैत छी; दोसरासँ सेहो सुनने छी। हा, ई तँ कानि रहल अछि! अरे, अपन दुःखक कथा रोक। हमरा एखन मित्रक छोट काज तुरन्त पूरा करबाक अछि। से कऽ घुरि तोहरो काज करब। आब जा। अहो, वेश्याक चतुराई! केना— जेना कुटिल राजा अपन कुकर्मक दोष मन्त्रीपर दऽ दैत छथि, तहिना शठ आ धूर्त वेश्यासभ अपन दुष्टताक दोष अपन मापर दऽ दैत छथि। लुच्चाक गुरु ई ढोङ्गी चलि गेल। हमहुँ अपन काजपर जाइत छी। [घुमैत] अरे, वसन्तक वनकोकिल जकाँ स्निग्ध-मधुर स्वरमेँ के हमर नाम पुकारि रहल अछि? [देखि] अरे, प्रियङ्गुसेना अछि। हम आबि रहल छी। की कहलह—‘अभिवादन करैत छी।’ प्रिय, हमर आशीष लिअ— शय्यापर बामा हाथक कोमल प्रहारसँ अपन प्रियकेँ हटबैत आ प्रबल रतिवेगसँ मर्दित भऽ, तूँ अपन विपुल जघनक संग सुखी रह। प्रिय, अत्यन्त थाकल जघनकेँ हुलसाबएबला नाना गन्धसँ सुवासित तेल अपन अङ्गमेँ ककरासँ मलएबाक कृपा कएलह? हे भद्रमुखि, घण्टा, साङ्कल आ पट्टा उतारल राजाक खास हथिनी जकाँ आभूषण उतरलापर स्वाभाविक सौन्दर्ययुक्त तोहर मनोरम रूप जे नहि देखलक, ओकरा ठकल बुझबाक चाही। केना— मोतीक आभूषणसँ सजल, नखक खरोचसँ भरल, सुगन्धित तेल आ अङ्गराग लगौने, ललछौँह आँखिबाली, हँसमुख, यौवनक उष्णतासँ उभरल स्तनबाली, महीन जाँघिया पहिरने, करधनी उतारने, चाकर नितम्बबाली तोहर जकाँ सुन्दरीकेँ देखि कामदेवक मोनो डगमगा जाए। की कहैत छह—‘अहाँक बात प्रिय अछि।’ अरे, ई खुशामद अछि? लजा नहि। हमरा पुकारबाक कारण कह। की कहैत छह—‘सुनू।’ प्रिय, हम सावधान छी। की कहैत छह—‘भगवान् अप्रतिहतशासन कुसुमपुर-पुरन्दर अर्थात् पाटलिपुत्रक राजाक महलमेँ “पुरन्दरविजय” नामक सङ्गीतक रसानुसार अभिनीत करबाक लेल देवदत्ताक संग हमरो अग्रिम निमन्त्रण भेटल अछि। हमर एहि अभ्युदयक कारण अहाँ छी।’ अरे, से बात नहि। पूर्णचन्द्रसँ खिलखिलाइत चाननी रातिकेँ दीपकक आवश्यकता नहि; बलवानकेँ दोसरक सहायता नहि चाही। तूँ स्वयं एहि सम्मानक कारण छह। एही कारण तोहरापर हृदयगत अनुराग रखनिहार रामसेन हमर खुशामद करैत अछि। भौँह नचा, आँखि आ गाल कनेक सिकोचि, भीतरी उल्लास प्रकट करैत, फड़कैत अधरबला मुख घुमा, प्रियङ्गुसेना अपन परिजनकेँ देखि हँसि पड़ल। बस, रामसेनकेँ सेवाक फल भेटि गेल। वाह रे देवदत्ताक मूर्खता, जे तोहरासँ टक्कर लैत अछि! रूप, श्री, नवयौवन, कान्ति आदि गुणक सम्पत्ति; चारू प्रकारक अभिनयमेँ सिद्धि; बत्तीस प्रकारक हस्तप्रचार; अठारह प्रकारक निरीक्षण; छह स्थान, तीन गति, आठ रस, गीत-वाद्यक तीन लय आदि नृत्याङ्ग—तोहर आश्रय पाबि स्वयं तोहरामेँ शोभित होइत अछि। अथवा, एही वेशमेँ हम तोरा देव, असुर आ महर्षिक मन-नयन चोरेनिहार अप्सराकेँ सेहो पछाड़बामेँ समर्थ देखैत छी। आओर— अपन छलपूर्ण चेष्टासँ तूँ सदिखन लोकक मन आ नेत्र नचबैत रहबह। हे सुभगे, नाचक की आवश्यकता? तोहर सुन्दर लीलामात्र पर्याप्त अछि। अरे, लजा गेल! वाह, एहि लज्जारूपी आभूषणक सौगात दऽ हमरा विदा कऽ देलक। तँ चली। [घुमैत] अरे, ई निश्चय नारायणदत्ताक दासी कनकलता अछि। अपन कठोर स्तनकेँ चूर्णसँ सुवासित कए, जूड़ामेँ नाना फूल सजा, हँसी-खुशीसँ, मदविलासक कारण डगमग पएर रखैत एही दिस आबि रहल अछि। एकरासँ बात करी। लग आबि हमर अभिवादन किएक करैत छह? प्रिय— की कहैत छह—‘अभिवादन करैत छी।’ प्रिय, अपन प्रियक प्रिय हो। अपन चरणकमलक विन्याससँ बाटपर किएक कृपा करैत छह? की कहैत छह—‘हम अनुगृहीत भेलहुँ।’ ई सभ छोड़। चक्रवाक-युगल केना अलग भऽ गेल? की कहैत छह—‘ईर्ष्यासँ भरल, स्नान, शयन, भोजन आ अलङ्कार छोड़ने, अशोकवनिकामेँ अशोकक छोट गाछक नीचाँ शिलातलपर बैसल हमर स्वामिनीकेँ नव चन्द्रमण्डल देखलासँ, भँवराक गुंजार आ वसन्तपुष्पक गन्धसँ कठोर भेल दक्खिनी हवासँ सन्ताप भऽ रहल छल। सखीसभ मधुर वचनसँ सान्त्वना दऽ रहल छलीह। तखन सोझाँसँ कोनो पुरुष अशोकवनिकाक लगसँ कामदंशित जकाँ अस्पष्ट काकली स्वरमेँ वीणापर मूर्छना छेड़ैत, वक्र आ अपवक्र छन्दमेँ ई गीत गाबैत निकलि गेल— ओ पुरुषक रूप, यौवन आ वैभव निष्फल अछि, जे प्रियाक संग वसन्तमेँ क्रीड़ा नहि करैत अछि। आओर— निर्मल चन्द्रमा देखि वा कोकिलक प्रिय बोली सुनि जे प्रियजनकेँ नहि मनबैत अछि, संसारमेँ ओकर जीवन व्यर्थ अछि। ओहि गीतसँ मान शिथिल भेलापर हमर स्वामिनी आयुष्मानक आगमनक बाटो नहि जोहि, हमरा बजा पएरे मालिकक घर चलि गेलीह। ओही प्रकार हमर मालिक वसन्तागमनसँ अधीर भऽ कोनो उपायसँ स्वामिनीकेँ मनएबाक लेल वीणाचार्य विश्वावसुदत्तक घरक द्वारपर हुनकासँ भेटि गेलाह। दुनूक दाँव नहि लगैत देखि अचानक बाहर निकलल विश्वावसुदत्त हुनका अपन घरमेँ लऽ गेलाह। भोरमेँ स्वामिनी कहलनि—“वेशिकाचलकेँ लऽ आउ।” तेँ अहाँ चलू।’ वाह! कानकेँ सुख देनिहार बात कहलह। हम तोहर दोसर कोन भलाई करी? हमर ई आशीर्वाद लिअ— तोहर यौवनश्री नित्य बनल रहए; तूँ सदिखन अपन प्रियक प्रिय रह; तोरा निरन्तर उचित आ मनोवाञ्छित उपभोगक सुख भेटैत रहए। तूँ आगाँ चल। [घुमैत] कनकलता की कहैत अछि—‘एहि घरक भीतर चलू।’ ठीक, चलैत छी। [प्रवेश कऽ] अरे, घबराउ नहि। युगलजोड़ी विराजमान रहए। अपन गुणसँ वसन्त जेना अहाँ दुनूक समागम करा देलक, तहिना सभ ऋतु कलहक समय कामीजनक मेल कराओ। अपन गुणपर गर्वित वसन्त हमरा सेहो ठकि लेलक, कारण अहाँ दुनूक समागम हमर बिना भऽ गेल। आब हम की करी? एहिमेँ वसन्तो अपराधी नहि। केना— [पूर्ववाक्यक विस्तार] सुन्दर उद्यान, चाननी राति, सुरीली वीणा, गोष्ठी, दूती, विचित्र बात आ नाना ऋतु—ई सभ कामीजनक मिलनक असल कारण नहि। कारण अछि परस्परक अकृत्रिम गुण चिन्हलासँ प्रेमक उत्कर्ष। तेँ दोसरामेँ दुर्लभ, परस्परक गुणाधिक्यसँ संवर्धित, आत्मगुणसँ उत्पन्न, कामशास्त्रक सार आ कुसुमपुरमेँ प्रसिद्ध अहाँ दुनूक प्रेम हमरा ठकि लेलक—अर्थात् अहाँकेँ मिला देलक, हमर आवश्यकता नहि पड़ल। की कहैत छी—‘हम दुनूक प्रेम सेहो अहाँक प्रयत्नहि सँ उत्पन्न भेल; तेँ अहाँए हमर समागमक कारण छी। एहि समय समस्त पाटलिपुत्र जकर बातमेँ आनन्द पबैत अछि, कामीजनक वचन ओकर महिमा पूर्ण रूपेँ केना कहि सकत?’ रतिक पियासल कामी-युगलक मिलनमेँ बेसी गप्प कऽ बाधा नहि देबाक चाही। आज्ञा दिअ, हम जाए चाहैत छी। खिलल कमल जकाँ कान्त, मदमय मधुर बात कहनिहार आ झलकैत शोभासँ सुन्दर अपन युवती प्रियाक मुख देखि जेना अहाँ आइ प्रसन्न भेलहुँ, तहिना धान्यसँ भरल, समुद्ररूपी मेखलाबाली, मेरु आ विन्ध्यरूपी स्तनसँ सुन्दर, अधिक गुणवती सम्पूर्ण पृथ्वीक पालन करैत नरेन्द्र प्रसन्न रहथि। [विटक प्रस्थान।] वररुचिक एकनट नाटक (भाण) उभयाभिसारिका समाप्त। ४ लात महाकवि श्यामिलक केर मूल संस्कृत एकनट नाटक (भाण)- पादताडितकम् (संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद- गजेन्द्र ठाकुर द्वारा) [नान्दी पश्चात् सूत्रधारक प्रवेश] सूत्रधार: शिवक नेत्राग्निमेँ अपन देहक आहुति दऽ जे हुनक क्रोधक मान राखलक; जकर आज्ञाकेँ इन्द्रसहित देवता मालाक जकाँ अपन माथपर धारण करैत छथि; जे वनिताक विस्तृत नेत्रक बाँकी चितवनसँ अपन धनुष बनबैत अछि; जकर विषयरूपी बाण मुनिक मोनो पीड़ित आ विदीर्ण करैत अछि—ओ कामदेव अहाँ सभक रक्षा करथि। आओर— देवीक स्तनपर हाथ राखि, भौँह नचा, हँसैत हुनका देखैत, भय सँ चुप भेल गणनायकसहित नन्दीद्वारा वन्दित, वृषपतिक काँधपर हाथ राखि ठाढ़ शिव क्रोधित भऽ जकर शरीर नष्ट कएलो पर प्रभाव नहि मेटा सकलाह—ओ कामदेव अहाँक रक्षा करथि। आर्यमिश्र लोकनिक आगाँ माथ नुका कहैत छी—हम सभ आर्य श्यामिलकक रचित ‘पादताडितक’ नामक भाणक अभिनयक आयोजन कऽ रहल छी। कविक परिश्रम ध्यानपूर्वक सुनबाक चाही। केना— ‘एतय ई पद नहि होबाक चाही; ई पद एना हो; ई पद ठीक नहि बनल; ग्रन्थमेँ एहि अर्थक अद्भुत चमत्कार उपजल अछि’—एहि प्रकार काव्यरचना पूर्व कविक मनमेँ जे श्रम होइत अछि— ओहि श्रमकेँ सहृदय रसिकक आँखिमेँ भरल नोर आ पुलकित देह दूर कऽ दैत अछि। बगुला आ बिलाइ जकाँ चाल चलनिहार राजमन्त्री आ सन्तसभ रफूचक्कर होथि; डिडिक, विट आ परिहासकुशल लोक ठहरल रहथि; धूर्तक गोष्ठी निर्बाध मदिराक पियासल बनल रहए। केना— यति कानि-धो कऽ मोक्ष नहि पबैत छथि। जँ आगाँ स्वर्ग भेटएबला हो, तँ हँसी-ठट्ठासँ ओहिमेँ बाधा नहि पड़त। तेँ बुद्धिमानकेँ मुँह बिगाड़बाक आदत छोड़ि निश्चिन्त मोनसँ हँसबाक चाही। हम एना कहि रहल छी, तखन ई दोसर आवाज कोन? [कान दैत] आह, बुझलहुँ—ई विटसभक मण्डप अछि। गञ्जा श्यामिलक घण्टा बजा घोषणा कऽ रहल अछि। कामिनी आ कामीक मिलनसुख तोड़निहार, दिन उगबाक सूचक, डुगडुगीक दादा—एकर घण्टानादक बराबरी भोरमेँ जोर-जोरसँ रेंकैत गदहो नहि कऽ सकैत अछि। ई की घोषणा कऽ रहल अछि? [कान लगा] [नेपथ्यमेँ] प्रियतमपर चलाओल विलासिनीक ओहि चरणक जय हो, जे अलता आ झनझनाइत नूपुरसँ सजल कामक ध्वजा अछि, आ जकर आगाँ माथ नुका सत्कार करबाक चाही। [जाइत अछि] ठीक कहल गेल अछि—‘सए वर्ष बीति जाओ, कखनो-न-कखनो मनुष्यकेँ जीवनक आनन्द भेटिए जाइत अछि।’ तेँ विष्णुनागो सभ सच्चा कामीकेँ भेटएबला चरणताडन नामक अभिषेक माथपर पाबि लेलक। की कहैत छह—‘अरे, ओकर एहन भाग्य कतय जे एहन प्रेमकलहक आनन्द लऽ सकए! वेश्यादेवीक देल एहि सम्मानकेँ ओ अपमान मानि, क्रोधसँ आँखि लाल कऽ, फड़कैत भौँहसँ ललाट तानि, माथ हिला, दाँतसँ ओंठ काटि, ताली पीटि आ लम्बा निःश्वास लऽ कहलक—हे अनाड़ी वेश्या, तोरा धिक्कार! तूँ हमर ओहि माथपर— जाहिपर माता सधल हाथसँ यत्नपूर्वक चोटी गूँथने छलीह; जकरा पिता चरणमेँ प्रणाम करैत देखि ‘कतेक भोला बच्चा’ कहि सूँघने छलाह; आ जाहिपर ब्राह्मणसभ फूल चढ़ा शान्तिजल छिड़कने छलाह—गर्वसँ पएर राखि देलह आ ओकर गौरवक कनेको परवाह नहि कएलह!’ विष्णुनागक एना डाँटलासँ, श्वासक ललाई फिक्का पड़ल राति जकाँ ओकर रंग उतरि गेल। भोरक चन्द्रमा जकाँ ज्योतिहीन मुख लिए— एकर मद उतरि गेल आ साज-शृङ्गार छिड़िआ गेल। ‘हमरासँ ई की भऽ गेल’—एहि दुःखसँ समस्त देह पसेना-पसेना भऽ गेल। भय सँ सभ शोभा नष्ट भऽ गेल, माथमेँ गूँथल फूल छितरा गेल। ‘फेर एना कखनहुँ नहि होयत’ कहैत ई ओकर पएरपर पड़ि गेल। दीनतासँ झुकलो पर ओ डाँटि कहलक—‘चण्डि, हमरा नहि छू। एना गड़गड़ करैत पेट लऽ हमर लग नहि आउ!’ बड्ड दुःखक बात जे कोकिल उल्लूक पछाँ लागल अछि। मदनसेनिका सेहो ओहि कायर आ नपुंसक पुरुष-वेतालक पछाँ जाइत अछि—ई हमरा अचरज लगैत अछि। सम्भवतः कारण ई जे ओ महामात्रक पुत्र आ राजकीय शासनाधिकारी अछि; तेँ धन वसूलबाक इच्छा सँ ई ओकर उपेक्षा नहि करैत अछि। वेश्यासभ बातक चटोरी होइत छथि। कहल जाइत अछि, कामक मूलमेँ अनेक प्रयोजन रहैत अछि। की कहैत छह—‘बातसँ पहिरन-ओढ़नक साधन जुटैत अछि, तेँ बातक चटोरीकेँ बातक चाट पड़ि गेल अछि।’ ओ बेचारी— लज्जासँ तिरछा झुकल बरौनिसँ, बहैत नोरसँ मुख, अधर आ स्तन धोइत, अचानक गरजैत नवमेघसँ राजहंसी जकाँ घबरा अपन अङ्गमेँ सिमटि गेल। ई सुनब कोनो आश्चर्य नहि। हमर जकाँ पण्डितसँ सेहो आब किछु पूछब शेष नहि। फेर? की कहैत छह—‘हम ओकरा फटकारि कहलियैक—अरे टकहिया वैयाकरण, फूलकेँ मूसलसँ नहि कूट, वीणाकेँ जरैत काठसँ नहि बजा, वचनरूपी छुरीसँ मदमत्त गुलाबी वेश्याकेँ नहि काट। हमर एना कहलापर ओ हमरा झिड़कि विटसभक चौधरी भट्टिजीमृतक घर चलि गेल। बेचारी अपन सुकुमार हाथपर मुख आ गाल राखि कानए लागल। ओकरा उठा हम कहलियैक—सुन्दरि, बानर पाग पहिरबाक योग्य नहि, न गदहाकेँ उत्तम सवारीमेँ जोतल जाइत अछि। कानब बन्न कर। ई बेचारा तँ हँसीक पात्र अछि; ओकर माथ एतेक पैघ सत्कारक योग्य नहि। ओ कामी कोन, जकर केश पकड़ि मातल अबला तङ्ग नहि करए, वा मेखलासँ नहि बान्हए, वा कानक फूलसँ नहि मारए? काम ओकरे साथ दैत अछि, आ ओही भाग्यवानक यौवन उत्सवसँ भरल होइत अछि, जकर संग छबीली स्त्री लज्जा छोड़ि दासी जकाँ एकान्तमेँ अठखेली करैत अछि।’ ई सुनि ओ मुस्की आ चितवनसँ हमर बात स्वीकार कऽ, माथसँ पएर धरि वस्त्र पहिरि शय्याकेँ अलङ्कृत कएलक। हमहुँ कामीजनमेँ दुर्लभ ओहि पुरुषक दुश्चरित्रक विचार करैत, राजद्वारक प्रभातीसँ जागि नित्यकर्मसँ निवृत्त भऽ, मानो खराब सपना देखबाक फल हटएबाक लेल ब्राह्मणक बैठक अर्थात् पीठिकापर पहुँचलहुँ। ओतय देखलहुँ—छिड़िआयल केशबला विष्णुनाग पहिनेसँ पहुँचि गिड़गिड़ा कहि रहल छल—‘हम एहन निकृष्ट काज कएलहुँ जे हमर माथपर वेश्याक लात लागल। हे त्रैविद्यवृद्धजन, हमरा बचाउ।’ ओकर एना कहलापर गाल पिचका हँसीक आभास दैत ब्राह्मणसभ एक-दोसरकेँ देखि क्षण भरि सोचि कहलनि—‘हे साधु, हम मनु, यम, वसिष्ठ, गौतम, भरद्वाज, शङ्ख, लिखित, आपस्तम्ब, हारीत, प्रचेता, देवल, वृद्धगर्ग आदि मनीषीक धर्मशास्त्र देखलहुँ, मुदा एहि प्रकारक महापापक प्रायश्चित्त हमहूँ नहि जनैत छी।’ ई सुनि दुःखी मुखसँ दुनू हाथ उठा ओ चिचिया उठल—‘अरे भूलोकक देवगण, हमरा शूद्र बुझि त्यागू नहि। कारण— हम आर्य छी, शुद्धचरित्र छी, कुलीन छी, व्याकरण आ न्यायशास्त्र पढ़ने छी, राजाक शासनाधिकारी छी; कोनो अछूत नहि। हमरा दुःखीकेँ बचाउ, हम शरणागत छी।’ सभामेँ ओकर एना कहलापर— किछु लोक कोहनी चला एक-दोसराकेँ ठेहुनिया मारि कहलनि—‘पूरा बरद अछि!’ किछु हँसि ठाढ़ भऽ देर धरि ओकरा देखि कहलनि—‘पागल अछि!’ केओ बीचमेँ तिनका राखि ‘कामपिशाच अछि’ कहि धिक्कारलक। किछु ओहि स्त्रीकेँ अपराधिनी मानि दुःख प्रकट केलक। सभाक ई दशा, ब्राह्मणक किंकर्तव्यविमूढ़ता आ प्रायश्चित्त लेल विष्णुनागक चीत्कारक बीच शाण्डिल्यगोत्रीय भवस्वामी नामक ब्राह्मण—स्वभावसँ हँसोड़, आचार्यपुत्र आ स्वयं आचार्य, आन्वीक्षिकी, दण्डनीति आ अन्य विद्याक पारङ्गत, कलाकुशल आ वाग्मी—अपन शिष्यमण्डलीक बीच दहिना हाथ उठा हँसीभरल स्वरमेँ परिषदकेँ सम्बोधित कएलनि—‘अरे विष्णुनाग, भय नहि कर। शोक छोड़। धर्मशास्त्रक वचन अछि जे देश, जाति, कुल, तीर्थ आ समयानुसार धर्म, वेदविरोधी नहि हो तँ प्रमाण मानल जाइत अछि। तेँ विटसभक पंचायत बजा, विटे सँ प्रायश्चित्त पूछ। ओ तोरा एहि पापसँ मुक्त करत।’ हुनक एना कहलापर सभामेँ साधुवादक संग उठल अँगुरीसभ नाचए लागल। ई सुनि विष्णुनाग स्वयंकेँ अनुगृहीत मानि चलि गेल। तेँ तोरा विटसभक सभा बजएबाक लेल नियुक्त कएल गेल अछि। की कहैत छह—‘अहाँक मतमेँ मुख्य विट के-के छथि?’ निश्चय सभसँ अग्रणी विट तूँए छह। की कहैत छह—‘हम विट शब्दसँ केना अनुगृहीत भेलहुँ?’ एहिमेँ सन्देह की? सुन— महाजन अर्थात् व्यापारीसभक संग दिन भरि झगड़ि, दिन ढललापर कोनो मित्रक घर माल खा, रातिमेँ वेश्याक संग रमण आ पटेबाजी करनिहार, जकर अपन घरमेँ पानियो नहि, तथापि जे डीङ हाँकैत फिरैत अछि— ओ विट नहि तँ के? की कहलह—‘जँ अहाँ हमरा विटमेँ गनबाक कृपा करैत छी, तँ अहाँ अवश्य विटपंचायत जुटा सकब। एहि बीच हम अहाँसँ विटक लक्षण सुनए चाहैत छी।’ पहिल लक्षण सुन— जे प्राणक परवाह नहि कऽ शत्रु आ मित्र दुनूक आपत्तिमेँ रक्षा करैत अछि; सङ्कटक समय जकर अपन भुजदण्ड तलवार लऽ स्वयं रक्षक बनैत अछि; प्रणयकलहसँ मदनातुर वेश्यासभ जकर खोज करैत छथि; आ जे याचककेँ खुलल हाथसँ धन दैत अछि—ओकरा विट बुझू। आओर— सुन्दरीक दुनू चरणकमलसँ अपन माथ पूजित देखि जे एना प्रसन्न होइत अछि मानो मुकुट राखल गेल हो, आ जकर धन पियासल लोक पानि जकाँ दुनू हाथसँ हरि लैत अछि—विटगुणज्ञ ओकरे सच्चा विट मानैत छथि। की कहैत छह—‘विटक लक्षण तँ कहलहुँ, आब हुनक नामो कहू—जयनन्दक, मौद्गल्य, दयितविष्णु आदि जतेक सम्भव हो सभकेँ सभामेँ एकत्र करब।’ की कहैत छह—‘सभ ठीक, मुदा दयितविष्णुओ अहाँक मतमेँ विट अछि?’ सन्देह की? की कहैत छह—‘ओही जे राजाक बलाधिकृत पारशव कवि अछि?’ निश्चय। की कहैत छह—‘ई नहि भऽ सकैत— राजाक प्रेम रहितो जे संकोच करैत अछि; हँसी-खुशीसँ सुतैत-जागैत अछि; देवपूजासँ जकर वस्त्र गुग्गुलक गन्धसँ सुवासित अछि; आ जकर ललाट आ दुनू ठेहुनमेँ तीन गट्टा पड़ल अछि— आओर— जे देवकुलसँ राजकुल आ राजकुलसँ देवकुलक फेरा करैत अछि, आ जकर दिन एहि दुनू कुलक सेवामेँ चिमटल बीतैत अछि— की ओहो विट अछि?’ हँ, अवश्य। ई सभ ओकर विटत्वमेँ बाधा जकाँ अछि, मुदा— पहिने अवन्तीमेँ वेश्यापुरक झगड़ामेँ जकर अँगुरी कटि गेल; पद्मनगरमेँ शत्रु जकर कूल्हाक हड्डीमेँ दू बाण घोंपि देलक; विदिशामेँ यन्त्रचलित बाणसँ जकर बाहु कटि भूमिपर खसि गेल; आ जे वाजीकरण लेल आइयो वैद्य-ओझाकेँ धन दैत रहैत अछि— ओ वेश्याकेँ धन चटबैत अछि; देहक निज सामर्थ्य कमजोर होइतो रतिक गप्पमेँ आनन्द लैत अछि। एहि कारणसँ हम ओकरा विटपुङ्गवक शिखरपर रखैत छी। रईसक रङ्गीन स्वभावे मोहित करैत अछि, हुनक सामर्थ्यसँ की प्रयोजन? ओ विट केना नहि? की कहैत छह—‘जँ एना अछि, तँ ओ अवश्य विटसभक अग्रणी अछि।’ एही कारण हमहुँ ओकरा विटक शिरोमणि रखलहुँ। तूँ जा। तोहर कल्याण हो। हमहुँ चली। [घुमैत] हम नगरक सड़कपर आबि गेलहुँ। वाह, जम्बूद्वीपक तिलक, अनेक युद्धमेँ अजित विभूतिसम्पन्न सार्वभौम सम्राटक निवासस्थान एहि ‘सार्वभौम’ नगरक अपूर्व शोभा! सङ्गीत, स्त्रीक आभूषणक झनकार, पालतू पक्षीक चहचहाहट, स्वाध्यायक ध्वनि, धनुषक टंकार, कसाइखानामेँ छुरीक खरखराहट, महलक कक्षमेँ पात्रिकाक स्वर आ पालतू सारसक गूँजैत आवाजसँ उज्जर भवनक रङ्गल पङ्क्ति मानो मिलिजुलि गप्प कऽ रहल अछि। आओर— पर्वत, द्वीप, समुद्रतट आ मरुभूमिसँ सैकड़ो राजा एतय आबि प्रत्येक दिशामेँ बसल छथि। पहिने अनसुनी विचित्र कथा जकाँ विधाताक विविध रचनामयी सृष्टिकेँ मनुष्य एतय एकहि ठाम प्रत्यक्ष देखि सकैत अछि। चोल, पाण्ड्य आ केरल—एहि तीनू देशक निवासीसभसँ भरल ई नगर सर्वत्र आनन्दमय अछि। [देखि] अरे, बिना ओहारक उज्जर पालकीपर चढ़ल ई के, कोनो रईसजादी विधवाक ठाठक नकल करैत एही दिस आबि रहल अछि? [सोचि] ठीक, चिन्हि गेलहुँ। बेंतक दण्ड आ कुण्डीसँ चिन्हाइत चोखा भागवत अमात्य विष्णुदास अछि। न्यायाधीशक दायित्वपूर्ण पदपर नियुक्त होइतो ध्यान-अभ्यासक चक्करमेँ पड़ि उपेक्षाविहार करनिहार भिक्षु जकाँ बेचारा राजकार्य ठीकसँ नहि निपटा पबैत अछि। आओर— न्यायालयमेँ ओकर संग अर्धासनपर बैसल साथी हाथसँ ठेहुन हिला ओकरा जगबैत छथि; सोझाँ ठाढ़ अदालती कार्यकर्ता चिचिया, माथ नुका, ओकर पएर खिंचि सङ्केत करैत छथि; मुदा ओ हाटक बरद जकाँ ऊँघैत-सुतैत रहैत अछि। एकर भेट विटक लेल विघ्नरूप अछि, तथापि धर्मोपदेशक एकरा लग जेब उचित। लग चली। ओ तँ दूरसँ हमरा देखि पालकी रोकबा उतरि रहल अछि। अरे, अहाँ रहू। हमर आवभगतक कष्ट कऽ अपनापन देखेबाक आवश्यकता नहि। की कहैत छथि—‘अहाँक सत्कार लेल नहि, हम अपन आचार निभा रहल छी।’ ठीक, जखन अहाँ उपचारक एतेक पक्षधर छी, तँ प्रणयाभिमुखी अनङ्गसेनाकेँ ओहि प्रकार विमुख करब उचित अछि? की कहैत छथि—‘की हम ओकर प्रेमानुकूल सत्कारमेँ कमी कएलहुँ? देखू— ओ वन्दना कएलक तँ हम स्वस्तिवचन देलियैक। जखन बैसल— तँ योगक अनुशासन अर्थात् जुटबाक आदेश माँगलहुँ। वायुसँ सूजि गेल आँखि देखि कहलहुँ—ले बेटी, घी पी।’ तखन हम ओकर सत्कार केना नहि कएलहुँ?’ अहो! ओहि नाजनीक अवश्य उत्तम खातिर कएलहुँ। ई मुस्करा, भागवतद्वारा देबाक योग्य पवित्र निम्बू देखा, हमरा प्रसन्न करए चाहैत अछि। अरे, हम तँ तोहर शिष्य छी। एहन पैघ काजमेँ केवल बिलैया-दण्डवतसँ हमरा टारब उचित नहि। आब शीघ्र तिरोहित हो। हमहुँ चललहुँ। [घुमैत] ई सार्वभौम नगरक बाजार आबि गेल—अनेक देशक स्थल आ जलसँ आयल उत्तम-अधम मालक किनबेच लेल स्त्री-पुरुषक भीड़सँ भरल दोकान। अरे, एकर की कहब! जेना बसेरास्थलमेँ पक्षी आ चरागाहमेँ गायक झुण्ड, तहिना एतय लेनदेनक स्थानमेँ मनुष्यक भीड़सँ पैघ शोर उठि रहल अछि। जेना— लोहारी दोकानमेँ टन-टन भऽ रहल अछि; खरादपर चढ़ल काँसा कुरर पक्षीक बोली जकाँ आवाज दऽ रहल अछि; चूड़ी काटए लेल शङ्खपर राखल लोहेक औजार घोड़ाक श्वास जकाँ साँय-साँय करैत अछि; चारू दिससँ लोक किनबेच लेल आबि रहल छथि। आओर, एहि समय— दोकानसभमेँ शोभासँ मानो हँसैत फूलक माला बिकि रहल अछि; पानागारसभमेँ प्याला चलि रहल अछि आ मदिरा पिअल जा रहल अछि; हाथमेँ सरकण्डाक मुठ्ठी लेने मांस बेचयबला लोक ओहि पक्षीसभकेँ कनखीसँ देखि रहल छथि, जे भितरक देवालपर छुरीसभ सजल ओहि कसाइखानापर झपटि रहल अछि। आओर— काँधसँ काँध भिड़ा आपसमेँ तर्क करैत, किनैत आ अबैत-जाइत लोकक ई भीड़ खेतमेँ रोपल बिरबाक पाँति जकाँ लगैत अछि। जुआरीसभ जुआमेँ किछु माषक जीतलाक बाद फूल, पुआ, मांस आ आसव हाथमेँ लेने परिचारकसभक संग वेश्यालय-पथ दिस बढ़ि रहल छथि। तँ धक्का-मुक्की करैत भीड़सँ चलब कठिन एहि बजारक बाट छोड़ि, फूलक गल्लीक बीचसँ होइत, पानागारसभकेँ दहिना छोड़ैत, पूर्णभद्र-श्रज्ञाटक पार कऽ मकररथ्या गल्लीसँ वेशमार्गमेँ पहुँचब। माषक जमा कएने बिना वेशमेँ प्रवेश करब, बिना हथियार युद्धमेँ उतरबाक जकाँ व्यर्थ अछि आ केवल बदनामी तथा अनर्थक कारण बनैत अछि। मुदा मित्रक लेल हम अवश्य ओकर भ्रमण करब। वेशमेँ विटसभक पूरा जमघट भेटत। [घुमैत] अरे, ई के अछि जे रोहतकक मृदङ्गीसभक झाँझ आ बाँसुरीक संग यौधेय लोकक बाङ्गड़ गीत गबैत, एक गालपर कुरण्टक फूलक शेखर लटकौने, दहिना काँधपर फड़फड़ाइत किनाराबला भीजल उत्तरीयकेँ नीचाँ नहि सरकय देबाक लेल ऊपर समेटैत, बेर-बेर कूल्हि मटकबैत, बाम हाथमेँ मद्यपात्र उठा नचैत अपानमण्डपकेँ हँसा रहल अछि? [देखि] हँ, चिन्हि गेलहुँ। ई वैह बाप्प नामक बाह्लीकपुत्र अछि, जे बेचारा सभक हँसीक पात्र बनि वेशक मुरगा जकाँ भऽ रहल अछि। सच, हम एकरा कहियो बिना नशा अथवा बिना पिअने नहि देखने छी; दोसर दिस, एकर हाथमेँ कहियो अधेला धरि नहि रहैत अछि। तखन एकर गुजर-बसर केना होइत अछि? [सोचि] हँ, बुझि गेलहुँ। ई निर्लज्ज दुष्ट सभक हितैषी बनबाक बहाने सभकेँ चूसनिहार भऽ गेल अछि। गोल बाँधि पिअनिहारसभक बीच गजकक मुठ्ठी लेने ई बाप्प नट, नटी, चेट आ साइससभक बीच घुसि पड़ैत अछि। पीबाक साधन जुटेबामेँ एकर कौशल कतेक अद्भुत अछि! आब एकरासँ गप्प करब व्यर्थ। [घुमैत] विटजनक ई दोसर चलैत-फिरैत पुरान भण्डार आबि गेल। कामदेवक मन्दिरमेँ देवताक पूजा कऽ घुरैत, फुलायल कासलता जकाँ उज्जर आ छितरायल केशकेँ काँधपर सम्हारैत, रातिमेँ धोएल वस्त्र पहिरने, एक काँधसँ खसल उत्तरीयकेँ फेर यथास्थान राखैत, बूढ़ पुंश्चली सारणिगुप्ता कामदेवायतनक मकरयष्टिक परिक्रमा कऽ रहल अछि; मुदा कनखीसँ बलिपर झपटैत कौआसभसँ घेरायल नचैत मोरोकेँ देखैत जा रहल अछि। सचमुच, एकर देहपर बचल विलास-चिह्न एकर बीतल जवानीक चुलबुलाहट कहि रहल अछि। एखनहुँ— लटकल स्तन नखक्षतक उज्जर चिह्नसँ भरल अछि। पहिने बेर-बेर चूसल अधर किनारासँ लटकि बीचमेँ गाँठिल भऽ गेल अछि। आइयो पुरान अभ्यासवश भौंह मटकब एकर भीतरक लालसा प्रकट करैत अछि। बुढ़ापा बलपूर्वक एकर रूप तँ हरि लेलक, मुदा नखरा नहि हरि सकल। एकरासँ गप्प कएने बिना जाएब कठिन अछि। ई हमर प्रिय मित्र मृदङ्गी स्थाणुमित्रकेँ अपन प्रिय कहैत अछि; ताहिसँ स्पष्ट अछि जे एकर क्रोध-शमन औषधि खेनाइ सफल भेल। एकरासँ केना बात करी? [सोचि] ठीक, उपाय भेटल। आइ सँ तीन दिन पहिने बेचारा स्थाणुमित्र एकर संग गाढ़ चुम्बनक बीच अत्यन्त घिनौन अनुभव कएलक। धिक्कार एहन चिमड़ल प्रेमकेँ— चुम्बनमेँ आसक्त एकर दाँत जड़िसँ उखड़ि ओकर मुँहमेँ जा पड़ल; जीहसँ लगितहि ओ झट दऽ थूक देलक। एहि कारण वेशमेँ घुसबाक इच्छुक हम जँ एहि घाटकेँ छोड़ि देब— तँ ठकाइ जाएब। अथवा स्थाणुमित्रक मुँहमेँ एकर दाँत खसबाक बात पसैर गेल होएत। तखन एकर सोझाँ जा फेर लज्जित करब उचित नहि। एकरा दूरसँ नमस्कार। आब हम चली। [घुमैत] हम वेशमेँ पहुँचि गेलहुँ। अहा! एकर अपूर्व शोभा! एतय अलग-अलग बनल सुन्दर वप्र, नेमि, साल, हर्म्य, शिखर, कपोतपाली, सिंहकर्ण, गोपानसी, वलभीपुट, अट्टालक, अवलोकन, प्रतोली, विटङ्क आ प्रासादसभसँ भरल, चाकर आँगनबला, अलग-अलग भागमेँ बाँटल, सुगढ़ बनावट आ निर्मल जलसँ भरल सुन्दर परिखासँ युक्त महलसभ अछि। कतहु जल-छिड़कावसँ शोभित, कतहु नलक फूँकसँ साफ, कतहु पलस्तर कएल, चित्रित, सूक्ष्म आ स्थूल उभारबला अनेक प्रकारक नक्काशी सँ सजल; बन्ध-सन्धि, द्वार आ निकसल वेदिकाबला छज्जासँ युक्त; बीचक आँगनमेँ कतहु एक, कतहु दू, कतहु तीन गाछसँ अलङ्कृत; गृह-उद्यानयोग्य गाछ, साग-सब्जी, फल आ मालाक फूलक अलग-अलग क्यारीसँ मण्डित; उज्जर कमलसँ छिटकायल वापीक निर्मल जलसँ शोभित; वापीक लग बनल काठक पर्वत, भूमिगृह, लतागृह आ चित्रित कमलक पूर्ण-विकसित फूलसँ सुन्दर; सौभाग्यसूचक वैजयन्ती पताकासँ युक्त प्रधान वेश्याक भव्य महल पृथ्वीसँ आकाश दिस उड़ैत जकाँ देखाइत अछि। एतय— वेशक बाहर कर्णीरथ ठाढ़ अछि। ओकर चक्काकेँ नखसँ खरोचैत आवन्तिक पुरुष ओकर सहारा लेने बैसल-ऊँघल छथि। दुनू कात वर्दी कसने किरात धुरीसँ सटि पहरा दऽ रहल छथि। ओतहि कम्बोजदेशक घोड़ा आ हथिनी ठाढ़ अछि; महावतसभ निन्नमेँ ऊँघैत अलसाएल छथि, आ पीठपर पड़ल पालान आ कालीन मोड़ि दोहरा कऽ देल गेल अछि। ई सभ सूचित करैत अछि जे हुनकर धनी रईस आ अधिकारी अपन वाहन बाहर छोड़ि वेशमेँ गेल छथि। आ एही ठाम— एक दिस जाहि आँखिक नोरसँ जाइत लोककेँ विदा कएल जाइत अछि, दोसर दिस ओही उमड़ैत नोरसँ आएल लोककेँ घर घुरा देल जाइत अछि। रईससभक खुशामद होइत अछि, आ धन गमा कऽ घुरल प्रेमीकेँ खाला धिक्कारि भगबैत अछि। [घुमैत] ई अपन रूसल प्रेमीकेँ मना रहल अछि। ई प्रियक अनुनयसँ प्रसन्न भऽ रहल अछि। ई सप्ततन्त्री वीणाकेँ नखसँ झनकारैत, उत्कण्ठित भऽ, सुन्दर काकलीक पञ्चम स्वरमेँ प्रिय गीतक बहाने रोइ रहल अछि। दर्पण लग राखि ई कामिनी अपन प्रेमीसँ सजाओल जा रहल अछि। ई अपन प्रेमीक चोटी बाँधि रहल अछि। ई मैना केँ बोल सिखा रहल अछि। ई मातल मोर आमक मञ्जरीसँ डाँटल जा नाचि रहल अछि। ई बहुत काल गेंद खेलि अपन पातर कमर कतेक लचका रहल अछि! ई प्रियक संग बैसि पासा खेलि रहल अछि। ई प्रौढ़ा मनोरञ्जन लेल स्वयं चित्र बना रहल अछि, आ ई कथा पढ़ि रहल अछि। अरे, आवभगत भऽ गेल। भद्रे, वासु, बैस। बहुत दिनक बाद देखाइ पड़ल छह। की कहैत छह—‘आइ ओकरे सँ पूछिह, जे हमरा भोलीकेँ एना ठकि लेलक।’ हमर दिससँ तँ तूँही मनाओल जाए योग्य छह। मुदा ओ जेकाँ अछि, तोहर लेल भल बनल रहय। लह, हम चली। कांकायनगोत्रीय वैद्य ईशानचन्द्रक पुत्र हरिश्चन्द्र चन्द्रमा जकाँ कुमुदवापीरूपी वेशवाटिकाकेँ उज्ज्वल करैत एही दिस आबि रहल अछि। एतय एकर की प्रयोजन? [सोचि] स्मरण भेल। ई अपन पुरान प्रणयिनी यशोमतीक बहिन प्रियङ्गुयष्टिकाकेँ चाहैत अछि। हमरासँ सेहो ई भेद नुकबैत अछि। आब एकरासँ भेट कएने बिना जाएब सम्भव नहि। तखन एकरा लग चली। [लग पहुँचि] अरे, वेशरूपी कमलवनक एकमात्र चकवा, कतयसँ आबि रहल छह? की कहलह—‘तोहर प्रिय सखी यशोमतीक छोट बहिन प्रियङ्गुयष्टिकाकेँ औषधि दऽ कऽ आबि रहल छी।’ बुझाइत अछि, सुरतक भिखमङ्गी ओकर कामाग्नि एहि रोगोमेँ नहि मिझाएल अछि। तूँ ओकरा आओर भड़काबऽक सीख दऽ एलह। की कहैत छह—‘परिहास छोड़। ओकर माथक पीड़ा अत्यन्त भयानक अछि।’ मित्र, की सचमुच एहन अछि? की कहैत छह—‘एहिमेँ सन्देह की? ओ बड़ी कठिनाइसँ नीक होएत।’ ठीक, माथक दुखाइ वेश्याक लेल लाखों रोगक दहेज अछि। देख— ललाटपर लाख जकाँ लाल चन्दन लगा, मृणाल, कमल-पात आ कमलसँ खेलैत; भौँह नचा नखरासँ कुशल पूछनिहार प्रेमीसभसँ गप्प करैत—विरक्त हो वा अनुरक्त, गणिका माथक दुखाइ कहिए दैत अछि। की कहैत छह—‘अहाँ आरम्भे सँ अपन कठोर परिहास लेल प्रसिद्ध छी। ओकरा औषधि पिया आबि रहल छी।’ ठीक अछि। निःसन्देह— कङ्कणसँ सजल हाथ मरोड़ैत, भूमि पर पएर पटकैत, नाभिसँ नीचाँ सरकैत करधनीयुक्त अंशुककेँ हाथसँ सम्हारैत ओहि विशालनेत्रा स्त्रीक केश पकड़ि मुख अपन दिस घुमबैत तूँ ओकर अधररस पीलह, वा अपन अधररूपी औषधिक तलछट ओकरा पिऔलह? की कहैत छह—‘मित्र, एहन काज तँ तूँही कऽ सकैत छह।’ रे चोर, एखनो जँ तूँ अपन भेद हमरा नहि कहबह तँ...। मुदा आइ सभ विटक मुखिया भट्ट जीभूतक घर कोनो काज लेल विटसभक जमघट होएत। तेँ मित्र, समयपर अवश्य आबिह। की कहैत छह—‘विटसभकेँ पहिनहि ज्ञात अछि जे विष्णुनागक प्रायश्चित्त निश्चित करबाक लेल तेसर पहर पहुँचनाइ अछि। तूँ जा, हमहूँ अबैत छी।’ ठीक, तोहर कल्याण हो। हम चली। [घूमि] सभ विटकेँ एहि बातक समाचार केना भेटि गेल? एहिसँ हमर परिश्रम घटि गेल। आब वेश्या आ मित्रसभक सङ्गमेँ समय बिताओल जाए। अरे, घोड़ा नहि रहितो घोड़ा-जकाँ सजाओल ई ककर चितकबरा बछेड़ा अछि, जे पाटलिपुत्रक पुष्पदासीक दुआर खोलि रहल अछि? [चिन्हि] हँ, बुझलहुँ। ई सेनापति सेनकक सुन्दर पुत्र भट्टिमघवर्मा अछि, जे सौराष्ट्र-विजयक समय काठक उज्जर कुण्डलसँ गाल चमकबैत लाटदेशक डिण्डिसभकेँ पकड़ि मँगौने छल; ओसभ हाथ जोड़ि कहैत छल—‘हमरा सभपर ई अभियोग जे प्रत्यक्ष अपराधी नहि रहितो चिन्हायल बदमाश छी, सत्य नहि अछि।’ एहिसँ गप्प कएने बिना चलि जाएब सम्भव नहि; चलि गेलहुँ तँ स्नेहक फिक्का पड़नाइ प्रकट होएत। तेँ ओकर लग चली। [लग पहुँचि] अरे, मित्रक घरमेँ केओ अछि? [कान दऽ] ई तँ स्वयं भट्टिमघवर्मे हमरा बजा रहल अछि। की कहैत अछि—‘मित्र, एहि नव प्रतीहारसभकेँ सेवामेँ देखि आइयो हमरा राजा बुझैत छह? हमर-तोहर बीच ओ राजभाव बहुत पहिनहि बीति गेल। क्षणभर ठहर, हम अबैत छी।’ बालुपर भारी-गम्भीर चालिसँ साँढ़ जकाँ नापि-नापि डेग उठबैत आ कक्षाकेँ शोभित करैत भट्टि एम्हर आबि रहल अछि। एकरा मौजक पुरान अभ्यास अछि; वेश मौजक स्थान, तेँ एकर ई रूप उचिते अछि। आओर— बाहु झुलबैत ई आबि रहल अछि; एकर छाती आ काँध सुडौल आ उन्नत अछि; नखरासँ भौँह मटकबैत आ बेर-बेर कनखीसँ देखैत अछि। राजमहलमेँ एकर एहन चहलकदमीसँ प्रवेश देखिते बुझाइत अछि जे वीणा-मृदङ्ग बिना एकल-अभिनयबला भाण प्रस्तुत भऽ रहल हो। तेँ एहिसँ गप्प करी। भट्टिमघवर्मा, बहुत दिन एतय मौज करैत मित्रसभकेँ अपन वियोगमेँ उत्कण्ठित किएक रखने छलह? मुहूर्तभर लेलहुँ तोहर दर्शन भऽ जाए तँ कल्याण। ई हँसैत, दहिना काँधपर लहराइत उत्तरीयसँ शोभित, हाँफैत अक्षरमेँ हाथ जोड़ि हमर स्वागत कऽ रहल अछि। मुदा एखनहि तँ ई कहने छल जे आइ पुष्पदासी ऋतुमती अछि; तइयो ई ओकरासँ केना जुटि गेल? [सोचि] लाटदेशक ई डिण्डिसभ पिशाचसँ कोनो कम नहि। कोना? लाटदेशक लोक भीड़मेँ नाङ्गटे पानिमेँ नहाइत अछि, स्वयं वस्त्र पछाड़ैत अछि, लम्बा केश फटकारि छोड़ैत अछि, पएर धोने बिना पलङ्गपर सुतैत अछि, बाट चलैत जे मोन हो खा लैत अछि, फाटल वस्त्र पहिरबामेँ सङ्कोच नहि करैत अछि, आ दोसरक विपत्तिमेँ ओकरापर चोट कऽ कऽ सेहो अपन बड़ाइए बघारैत रहैत अछि। अथवा, ई अपन देशक रीति अनुसार काज कएलक। तखने तँ बेलक फलक चिन्ता नहि कऽ तूँ फूलहि नोचि लेलह। की कहैत छह—‘कोना?’ रजसँ सनल अपन ई उत्तरीय देख। की कहैत छह—‘हमरा बुझाइत अछि, खाटसँ लटकैत ई पानक पीकमेँ सनि गेल।’ एना नहि कह। छिटकल छोट मोती जकाँ पसेनाक बूँदसँ भरल तोहर ई ललाट की कहि रहल अछि? ई कात भऽ जोर-जोरसँ हँसि रहल अछि। रे नीच, अधम कामुक, की तूँ ओकरासँ छल कएलह? की कहैत छह—‘छलक बात केहन? ओ तँ हमर हृदये पकड़ि लेलक। सुन—’ घुँघरायल केशक अगिला भाग सजा जमा देलासँ जकर ललाट विस्तृत देखाइत अछि; अर्धोरुक पहिरलासँ जकर भरल जघनभाग मनोहर लगैत अछि; सोझाँक आभूषण उतारि देलासँ जकर देह उघार-जकाँ बुझाइत अछि—एहन स्त्रीलता पुष्पवती रहितो की अस्पृष्ट छोड़ल जा सकैत अछि? आओरो सुनबाक योग्य अछि— पार्श्व दिस आँखि घुमा, नखक खरोंच देखैत, माथ किछु नुका, अपन घरक छायामेँ बैसल ओकरा जखनहि हम देखलहुँ, ओ दुनू हाथसँ काँपैत कठोर स्तन पकड़ि घरमेँ घुसि गेल आ हाथसँ देहरी ठेलि दुआर बन्न कऽ लेलक। तखन हमहूँ झटपट भीतर घुसि— जखनहि ओकर केश पकड़ि घीँचलहुँ, ओ विशाल आँखिसँ हमरा दिस तकय लागल। तखन, हिलैत स्तनबाली ओ ‘की करैत छी? नहि-नहि’ कहिते रहल, आ हम ओहि विलासिनीकेँ चुमिए लेलहुँ। वाह, पहिल भेंट केहन अद्भुत भेल! हम ओकरासँ पूछब। ठीक, फेर की भेल? की कहैत छह—‘सखे—’ करधनी हटि गेलासँ उघरल जघनभागपर हमरा आबि गेल देखि ओ लाजसँ हमर आँखि बन्न कऽ देलक। धिक्कार छह! तूँ नीच, घृणित आ आर्यजन लेल निन्दनीय छह। की कहलह—‘एना कहियो अहाँ हमरा अनुगृहीत कएलहुँ। की अहाँ महाभारतमेँ पहिने नहि पढ़ने छी—’ जकर बहुत शत्रु नहि, जकरासँ लोक नहि डरैत अछि, आ जुटि कऽ जकर निन्दा नहि करैत अछि—हे पार्थ, ओ पुरुष नहि, पुरुषाधम अछि। असलमेँ ईएह तँ डिण्डित्व अछि। हम तोहर एहि डिण्डित्वपर पूर्ण प्रसन्न छी। तूँ विटसभक एकछत्र राजा होएबाक योग्य छह। ई हमर आशीर्वाद लह— की कहैत छह—‘हम सावधान छी।’ तँ सुन— भोर भेलापर लगमेँ सुतल तोहर पीठकेँ बाहुमेँ भरि, निर्भीकतासँ अपन उघरल एक जाँघ तोहर पार्श्वपर राखि, केश घीँचि तोहर मुखकमल अपन दिस घुमबैत प्रिया तोहर अधररस पिबय आ अपन अधररस तोरा पियाबय। ‘हम अनुगृहीत भेलहुँ’ कहि ई निकलऽ चाहैत अछि। तँ अहाँ ‘भगवान्’केँ हमर प्रणाम। हमहूँ चली। [घूमि] अरे, ई के अपन घरक झरोखापर विमानमेँ अप्सरा जकाँ साजि रहल अछि? ई काशीक प्रमुख वेश्या पराक्रमिका पिच्छोलासँ खेलैत, रूप-लावण्यक अठखेलीसँ आँखिक तृष्णा शान्त कऽ रहल अछि। सोनाक वैकक्ष्यकसँ स्तन कसि, अर्धोरुक पहिरि नितम्ब स्पष्ट उभारैत, कामीसभक चित्त मथैत वेशवल्लीक चञ्चल किसलय जकाँ ओ झूमैत चलि रहल अछि। आओर— एक कातक कनपटीपर लटकल जड़ाउ कुण्डलक मणिक आभासँ ओकर मुख चमकि रहल अछि। दीर्घ अभ्यासक कारण ठोढ़ीक नीचाँसँ ‘ई-ई’ करैत फूँक निकालि अधरपर राखल पिच्छोला मधुर स्वरमेँ बजा रहल अछि। ओहि ध्वनिमेँ बेङ्गक टर्राहट बुझि घरक मोर गर्दनि घुमा-घुमा चक्कर काटि रहल अछि। एकर घरसँ इन्द्रस्वामीक रहस्यसचिव हिरण्यगर्भक हड़बड़ा कऽ निकलैत एम्हरे आबि रहल अछि। एहिमेँ आश्चर्य की? इन्द्रस्वामी आ हिरण्यगर्भक वेशमेँ भेटथि—ई तँ गरमक संग गरमक मेल भेल। ई हाथ जोड़ि प्रणाम कऽ रहल अछि। अरे हिरण्यगर्भक, तूँ एहि वेशरूपी देवालयकेँ अपरान्तक पिशाचसभसँ ध्वस्त किएक कराबऽ चाहैत छह? की कहैत छह—‘हमर स्वामीकेँ परदेशी माल चखबाक चस्का अछि, ताहि लेल ई काज हमरा सौंपने छथि। पहिने ओ पाँच सय स्वर्णमुद्रा गनि लैत छल; आब एक हजारोपर खुशामद कऽ ओकरा राजी करब कठिन अछि। ओकर भाव ठहराबयमेँ हमर सहायता करू।’ तूँ भोलेपनकेँ सेहो मात दऽ देलह। लाख देलोपर ककरो प्राण नहि भेटैत अछि। की कहैत छह—‘अहाँ हमरा सभकेँ ओकर प्राणक संकट का कारण किएक बुझैत छी?’ सभकेँ ज्ञात अछि जे भर्तृस्वामी अपन चामरधारिणी कुटङ्गदासीक संग जुटि गेल छलाह, तेँ ओकर प्राणे संकटमेँ पड़ि गेल छल। की कहैत छह—‘मारियो देथु, मुदा सत्य ईएह अछि।’ अरे, असत्यक आश्रय लेबऽ पड़य तँ ले, मुदा स्वामीकेँ एहन बात नहि कहिह। की कहैत छह—‘हमर स्वामीक ई पुरान आदत अछि।’ हुनकासँ छुड़ेनाइ सम्भव नहि। मुदा बात एतेक खराबो नहि। देख—काङ्कणक स्वामी ओ दाक्षिणात्यकेँ कोन वेश्या नहि चाहत, जँ ओ सज्जन जकाँ ओकरा संग सहवास करथि। आओर— भारतयुद्धमेँ मत्त हाथी घुमबैत भगदत्त जकाँ, वेश्याक आँगनमेँ हाथी नचबैत ओ इन्द्रदत्तकेँ देख। स्तनपर अपन करकमल रखने वेश्यसभ ओकरा एना देखैत अछि जेना भयभीत हरिणी बाघकेँ। आ ई स्त्री, हमर स्वामी अधिराज इन्द्रदत्तक साला पारशव कौशिक सिंहवर्माकेँ अपन मित्र कहि लग बजबैत, सभ कामीकेँ अँगूठा देखा निराश कऽ दैत अछि। की कहैत छह—‘ओ बहुत कामी अछि, तेँ ई ओकरासँ छुटकारा चाहैत अछि।’ अति-सेवन तोहर देशक रीति अछि। की कहैत छह—‘देशक रीति वा अरीति हम नहि बुझलहुँ; स्पष्ट कहू।’ तोहर एहन शिष्ट व्यवहार देखि हम केना नहि कहब? सुन— काकली-रतिमेँ ओकर पएरक नख कान लग आबि खरोंच करैत अछि; तखन ओ अङ्कुशक चोट खाएल जङ्गली हाथीक बच्चा जकाँ ओकर उघरल जघनस्थलपर एना टूटि पड़ैत अछि, जेना साँढ़ बछियापर। की कहैत छह—‘आब हम ईएह सौगात लऽ मालिक लग जाएब।’ जँ एना अछि तँ इन्द्रस्वामीकेँ कहिह— दन्तक्षतसँ चित्रित नितम्बबाली, प्रियक माला केँ मेखलाक जकाँ धारण कएनिहार ओ स्त्री, तोरा छोड़ि दोसरक लेल हजारों मुद्रा गनौलोपर अपन जघन नहि उघारैत अछि। तोहर कल्याण हो, हम चली। [घूमि] अरे, ई के शूर्पारकक वेश्या शमदासीक घरसँ निकलि, डिण्डिकसभसँ घेरायल, वेशकेँ प्रकाशित कऽ रहल अछि? [देखि] ई तँ उदीच्य, बाह्लीक, कारूष आ मलद देशक स्वामी महाप्रतीहार भद्रायुध अछि, जे विटसभक चलैत-फिरैत तीर्थ अछि। केशक जूड़ा बान्हि, कानमेँ काठक बनल पैघ उज्जर कलश पहिरि, साथीसभक बीच ‘ज-ज-ज’ करैत गप्प करैत ओ गुजरातीक नकल कऽ रहल अछि। लाटदेशक लोकपर एकर एतेक कृपा किएक? लाटदेशक मनुष्य दुनू बाहुपर उत्तरीय लपेटि, बटल पटुकासँ कमर बान्हि, सोझाँ अबिते ‘श-श-श’ करैत टेढ़ काँधबला कुबड़ा जकाँ पएरपर खसैत आबैत अछि। आओर— छातीपर दुनू हाथसँ कपोतक आकृति बना, ‘य’क स्थानपर जोर-जोरसँ ‘ज-ज-ज’ करैत हकलाइत अछि। दुइरङ्गी बटल पटुकासँ बीचमेँ कमर कसि ओ एना बचि-बचि चलैत अछि, जेना ओकर अँगुरीसभ कीचड़मेँ सनि रहल हो। दोषरहित ऐश्वर्य कतय? अथवा, विदेश आबि मौज-मजाक असगरे एकरे शोभा दैत अछि। कोना? जे अपरान्त, शक आ मालवक राजासभक माथपर अपन दुनू पएर राखि हुनका नुका देलक; इच्छानुसार विहार कऽ किछु काल बाद अपन माता आ माँ गङ्गाक देश घुरि, मगधराजकुलक लक्ष्मीकेँ संसारमेँ प्रकट कएलक। आओर— समुद्रतटसँ बहैत पवनक हलुक थपकीसँ बिथुरल केशबाली अपरान्तदेशक उत्कण्ठित रमणीसभ महासागरक तटपर हिन्तालक कुञ्जमेँ वृक्षलताकेँ नुका ओकर विजयचरितक गान करैत छथि। ओ गीत की अछि— मनुष्यता आ अस्त्रविद्या—एहि दुनूमेँ भद्रायुधक बराबरी केओ नहि कऽ सकैत अछि। ओकर सफलता सुनि जे ओकर समान होएबाक इच्छा करय, ओ मानो सूअरक भोजन करैत अछि। [घूमि] एतय केओ प्रद्युम्न अर्थात् कामदेवक देवालयक ध्वजा चित्रित कऽ रहल अछि। ई कोनो डिण्डिकक काज होएत। ई डिण्डिकसभ बानरसँ बहुत कम नहि होइत अछि। भला, चित्रक कोन विशेषता डिण्डिकसभकेँ प्रिय होइत अछि? सुन— ई डिण्डिकसभ बनल चित्रमेँ अपन दिससँ किछु लीप-पोत कऽ ओकरा बिगाड़ि दैत अछि; घरक पोतल देबालपर कूचीसँ स्याही लगा गन्दा करैत अछि; आ तीक्ष्ण नोकदार टाँकी लऽ महलक भागसभमेँ घुनक कटल जकाँ खरोंच बना दैत अछि। ई की चित्र बना रहल अछि? [देखि] अरे, ई तँ ‘निरपेक्ष’ अछि। एकर नाम उचिते अछि। ठीक कहल गेल अछि—धन शील हरण कऽ लैत अछि। ताहि कारण ई भरल-पुरल मनुष्य हमर ओहि प्रिय सखीप्रति उदासीन अछि, जकर कारण ओ वेशमेँ तपस्विनीक व्रत धारण कऽ दुबराइत जा रहल अछि। ओ बेचारी त्रिवली-प्रदेशमेँ बाँकी रोमावली प्रकट करैत तीन वस्तुक भार तीन ढङ्गसँ उठा रहल अछि—नेत्रजलकेँ बाँक, सघन, कारी बरौनीक अग्रभागपर; मुखकेँ हाथपर, जकर कङ्कण नोरक बूँदसँ भीजि रहल अछि; आ भारी शोककेँ हृदयपर। तेँ एहि पर किछु फब्ती कसि। अरे भागवत निरपेक्ष—अथवा भागवतसभसँ कतराएनिहार—तूँ करुणामय भगवान् बुद्धक मैत्री अनुसार आचरण करैत छह। तखन कामशास्त्रक मुद्रासँ चिह्नित ओहि स्त्रीप्रति तोहर ई उपेक्षा-विहार उचित अछि? की कहैत छह—‘हम एहि कटाक्षक अर्थ बुझलहुँ। आब हम उपासक भऽ गेल छी। तथागत कहने छथि—ईएह संसारक धर्म अछि।’ अरे, एना नहि कह। तथागतक वचन केवल ओकरे लेल लागू अछि, दोसर ठाम नहि? की कहैत छह—‘कहू, कतय आ कहिया तथागतक वचन हमरा लेल प्रमाण नहि अछि?’ अरे, तोहर एहन प्रतिज्ञा? की कहैत छह—‘एहिमेँ सन्देह की!’ भलमानुस, सुन— भागबाक श्रमसँ जकर जीह लटकैत अछि, जे माथ उठाए ऊपर दिस ताकि रहल अछि, जकर हृदयमेँ निष्ठुरतासँ बाण धँसाओल गेल अछि—शिकारमेँ सोझाँ आएल एहन हरिणक दुःखपर तूँ ध्यान नहि दैत छह, मुदा तथागत बुद्धक ध्यान करब जानैत छह। अरे, ई ठहाका मारि हँसल। की कहैत अछि—‘तथागतक शासनपर शङ्का नहि करबाक चाही।’ शास्त्र एक बात अछि, मनुष्यक स्वभाव दोसर; आ हमहूँ वीतराग नहि छी। जँ बात एहन अछि तँ ओहि दशामेँ पड़ल स्त्रीकेँ... की कहैत छह—‘आज्ञा, प्रणाम; प्रसन्नतासँ विदा दीअ।’ अर्थात् कोनो तरह पिण्ड छूटय! तोहर लेल मोक्ष सर्वथा असम्भव अछि। तइयो हमर आशीर्वाद लह— बाहरसँ आबि उत्कण्ठित आ नतमुख प्रियाकेँ अपन कोरामेँ बैसाबह; काँधपर माथ राखि कानैत ओकरा फेर सान्त्वना दह; महिसिक सीङ जकाँ बान्हल ओकर विषम वेणी खोलह; आ प्रियाक गरम नोरसँ भीजल लम्बा अलक स्वयं अपन हाथसँ सुलझाबह। ओ दाँत देखबैत चलि गेल। हमहूँ चली। [घूमि] अरे, ई के एम्हरे आबि रहल अछि— मैला चीवरक चिथड़ासँ गुप्ताङ्ग ढाकने, बकरा-जकाँ मुखबला, पीयर, रूई-जकाँ रोआँबला, भरल काँधबला, बानर-जकाँ कञ्जी आँखिबला, मूली खाइत ई कोनो दाशेरक आबि रहल अछि—सचमुच, एहि रूपमेँ ई पिशाचे नहि हो! अच्छा, चिन्हलहुँ। एकरा हम अपन बन्धु वा मित्र दाशेरकाधिपतिक पुत्र गुप्तकुलक घरमेँ कहियो देखने छी। एकर एतय की काज? ई हाथ जोड़ैत हमर दिस आबि रहल अछि। की कहैत अछि—‘गुप्तकुल आज्ञा देने छथि—तूँ नुकाइ कऽ देख। हम एकमुष्ट पाँच पण देब। की कोनो गणिका एतेक बयाना पर सन्तुष्ट होएत? नगरवीथिमेँ ठसाठस भरल गणिकासभमेँ जँ एहन कोनो देखाइ पड़य तँ हमहि ओकरा ई बयाना दऽ देब। तेँ स्वामीक आज्ञा स्मरण करैत आ किछु अपन स्वार्थो सँ हम मूल्यकेँ चौगुना धरि बढ़ा कऽ कहि देलहुँ। मुदा एहि समय गणिकासभ, यद्यपि कामसँ भरल छथि, कुलकन्या जकाँ कामक बाते नहि करैत छथि। जँ जा कऽ ई उलटा समाचार कहब तँ दण्ड भेटत। सभ धनिक एके रंगक होइत छथि।’ वाह! देश, वेश, भाषा आ दाक्षिण्यक गुणसँ युक्त युवराज गुप्तकुलक मदनदूत वेशमेँ ठाढ़ रहितो वेशक ओहि दोकानक पता पूछैत अछि जतय ई माल बिकैत अछि। एहन रत्नकेँ ठीक बात बता झट दऽ विदा कऽ देब उचित नहि। ई एहेन बनल रहय। तेँ एकरा एना कही। अरे भाइ, राजवीथिमेँ छलावणिकापण अर्थात् नूनक दोकानसभपर जा कऽ गणिका खोज। ई प्रसन्नतासँ प्रणाम कऽ चलि गेल। हमहूँ चली। [घूमि] आब दाशेरकक दर्शनसँ धूरि भरल आँखि कतय धोई? [देखि] ठीक, देखाइ पड़ल। ई हमर पुरान प्रणयिनी शूरसेनसुन्दरीक घर अछि। बगलक दुआर केना खुजल अछि? भीतर चली। [प्रवेश कऽ] कतय बैसि पैदल चलबाक थाकनि दूर करी? ठीक, बुझलहुँ। ई प्रियङ्गुक वीथी अपन शीतल चबूतरापर बैसबाक लेल प्रियाक कोरा जकाँ हमरा बजा रहल अछि। एतय बैसी। [देखि] एतय की लिखल अछि? [पढ़ैत] हे सखी, प्रथम समागममेँ कलहक अवसर नहि अबैत अछि; तोहर ओ प्रियतम रूसल, सेहो नहि सुनल; न ओकर रोगक समाचार भेटल। दीर्घ अभिलाषाक बाद भेटल ओहि युवकक लगसँ तूँ अङ्गरागक रचना मेटेने बिना किएक घुरि अएलह? [सोचि] ई प्रेममेँ ठुकराओल कोनो स्त्रीक दुर्भाग्यक घोषणा अछि। ककरासँ पूछी? [कान दऽ] अरे, पएरक आभूषणक झनकारसँ बुझाइत अछि शूरसेनसुन्दरी एम्हरे आबि रहल अछि। ई पल्लव-जकाँ कोमल एक हाथसँ सुन्दर छत्रक डाँड़ी धएने अछि; दोसर हाथसँ चञ्चल मणिसँ गुँथल करधनीबाली सरकैत नीवीक छोर पकड़ि खिसकैत रेशमी वस्त्र सम्हारि रहल अछि। आभूषणक चमकसँ झिलमिल करैत अङ्गयष्टिक संग मुस्कुराइत ई एना आबि रहल अछि, मानो चन्द्रमा, नक्षत्र आ पक्षीक कलरवसँ शोभित रातिक अधिदेवता हो। अरे, सचमुच एकर तेज हमरा सेहो उठबाक प्रेरणा दऽ रहल अछि। हाथ जोड़ने हमर दिस आबि रहल अछि। अरे, एहि औपचारिक स्वागतसँ हमरा निपटाउ नहि। की कहलहुँ—‘बहुत दिन बाद स्वामी अएलाह, तेँ उपचार द्वारा ई सेविका अपनेकेँ अनुगृहीत करऽ चाहैत अछि।’ बस-बस, बहुत उलाहना भऽ गेल। तोहर लेल योग्य हमर कोराक एहि आसनपर कृपा कर। ‘अहाँक आज्ञा माथपर’ कहि ओ आधा पटियाकेँ अपन नितम्बसँ घेरि बैसि गेल। अरे, तोरा एतय नहि बैसबाक चाही। की कहलहुँ—‘किएक?’ एतय कोनो ठुकरायल प्रेमिकाक चरित केओ श्लोकमेँ अपन बदनामीक रूपमेँ लिखने अछि; हम देखलहुँ। [ई हाथसँ किएक मेटाबऽ लागल?] चोरनी, एकरा मेटेनाइ सम्भव नहि; ई तँ हमर हृदयमेँ लिखाए गेल। किएक नुका रहल छह? की कहलहुँ—‘अहाँ तँ सभ जानैत छी जे हमर सखी कुसुमावतिका अहाँक प्रिय मित्र चित्राचार्य शिवस्वामीप्रति गम्भीर कामोन्मादमेँ अछि।’ खूब जानैत छी; ईहो जे कुसुमावतिका अपन आगमनसँ ओकरा अनुगृहीत कएलक। की कहलहुँ—‘कामविकल स्त्रीहृदयक ईएह स्वभाव; ओ स्त्रीसुलभ चपलता देखौलक।’ विचित्र बात! हम पूछी। अरी, तोहर दुनूक जे विश्वास हमरा प्राप्त अछि, ताहि कारण पूछैत छी, परक भेद जानबाक कौतूहलसँ नहि। कह, दुनूक दीर्घ-अभिलषित कामोत्सव सुखपूर्वक सम्पन्न भेल? की कहैत छह—‘सुनू।’ हम सावधान छी। तूँ कहलह—‘वारुणीक नशा चढ़लापर जखन ओ शिवस्वामीकेँ अनुगृहीत करऽ चाहलक, तखन अहाँक मित्रक ई दशा भेल—’ अपन अरुचिकर कुश्तीक कथा कहैत-कहैत ओ पहिल पहर बितौलक। दोसर पहर तिलकुट, गुड़ आदिक निरर्थक चर्चामेँ बीति गेल। तेसर पहर बकराकेँ पुष्ट बनाबक उपाय कहैत-कहैत समाप्त कऽ देलक। ओकर बाद जे भेल, ओ अहूँसँ नहि कहब पड़य तँ नीक। सुन्दरी, तोरा एहि सभक समाचार कतयसँ भेटल? तूँ कहलह—‘ओकरे मित्रक घरसँ आएल प्रतीहार पद्मपालसँ समाचार पाबि हम ई श्लोक कुशल-प्रश्न करनिहारक हाथ पठा देलहुँ। तखन ओ ओहि परिचारकक संग आबि लजाइत हँसि हमरा कहलक—“तोहरासँ भेद नुका तोरा परेशान नहि करऽ चाहैत छी। तेँ ई नव घटना सुन।” तखन ओ हमरा अपन बीतल सत्य घटना कहलक। अहूँ एहि श्रवणामृतमेँ भाग लिअ।’ ई ताली पीटि हँसैत कहि रहल अछि। सुन्दरि, की कहैत छह—‘हमर सखी जे हमरा कहलक, आब सुनू। ओ कहलक—“हे प्रिय सखी—”’ हम ओकर आलिङ्गन कएलहुँ, चुम्बन लेलहुँ; ओकर नितम्बपर नखक्षत बनौलहुँ आ रतिक लेल उकसौलहुँ। मुदा जखन ओ काठ जकाँ जड़ रहि हमरा संग नहि मिलल, तखन हम खिसिया खाटुक पाटीसँ लिपटि पड़ि रहलहुँ। तखन हम कहलहुँ—‘तूँ बहुत कष्ट सहलह। की हम एतेको नहि...’ तखन हम कहलहुँ—‘तूँ बहुत कष्ट सहलह। की हम एतेको नहि बुझैत छी?’ ओ उसास लऽ हमरा कहलक—‘हम अपन दिससँ सभ उपाय कएलहुँ, तइयो ओ हमर प्रति अपन काम नहि जगा सकल। तखन अचानक अपन सभ जुगति निष्फल देखि आ अपन दुर्भाग्य बुझि हम छाती पीटि कानऽ लागलहुँ।’ तखन कनैत हमरा कोरामेँ लऽ बेर-बेर निरर्थक चुम्बन आ आलिङ्गनसँ सान्त्वना दैत ओ स्वयं खूब थाकि गेल। हम कहलहुँ—‘हाथसँ छूने की होएत?’ तखन लज्जा आ घबराहटसँ पसेनासँ तर, सुखाइत मुखसँ ओ दबा कऽ किछु शब्द कहलक— हे अनिन्दिते, अपन सौभाग्यक निन्दा नहि कर। एतेक पैघ निधि सोझाँ रहितो हमर आँखि फुटि गेल! चरबी घटेबाक लेल जे पहिने गुग्गुल सेवन कएने छलहुँ, सैह तोहर संग मिलनक अमृतसुखकेँ मारि रहल अछि। तखन हम सोचलहुँ— चरबी घटेबाक लेल पिओल गुग्गुल जँ इन्द्रियशक्तिक जड़ एना काटि दैत अछि... हम दुनू दीर्घकालसँ अभिलषित सुरतक असफल भऽ गेलापर सोचि रहल छलहुँ जे आब की करी, तखने— राति बीतबाक सूचना देनिहार राजकीय नगाड़ाबला घड़ियाड़ी जोर सँ घण्टा बजा स्तुतिमङ्गल पढ़लक। अनुकूल मित्र जकाँ ओ हमरा ओहि सङ्कटसँ मुक्त कऽ देलक। तखन ओ कामी लज्जासँ मुहूर्तभर संग चलि हमरा छोड़ि देलक। हम जखन घर घुरलहुँ, ओहि समय कुशल पूछबाक दूत पठा तूँ मानो हमर उपहास कएलह। तेँ हम तोरा पूरा वृत्तान्त कहि देलहुँ। आब ओ निरर्थक रतजगाक थाकनि दिनमेँ सुति कऽ दूर करब। एना कहि ओ विदा भेल। ओकर बाद अएलहुँ अहूँ सभ सुनि लेलहुँ।’ तँ महाशय शिवदत्तक पुत्र ई शिवस्वामी अपन पुरुषार्थक जे झूठ यशरूपी गम्भीर समुद्र बना रखने अछि, तकर थाह परिहासक नावसँ लेब। देख— हे चण्डि, जे चरबी बढ़लापर गुग्गुल पिबैत अछि, ओकर चरबी शीघ्र घटि जाइत अछि; मुदा ओ जवान स्त्रीसभक लेल चित्रमेँ बनल यक्ष जकाँ केवल देखबामेँ सुन्दर रहि जाइत अछि। ओ हँसि उठल—‘आब हम जाएब।’ अरे, प्रणामक आवश्यकता नहि। हमहूँ चली। [घूमि] मृणालसहित कमलक झाड़ी जकाँ जकर शोभा अछि; जे अपन मुखकमलयुक्त ग्रीवा ऊपर उठौने छथि; जकर रंगबिरङ्गी चितवन खुजल अछि; जे छातीपर हाथ राखि एक-दोसराकेँ घुरबाक सङ्केत कऽ रहल छथि; आ जे गेंद, पिच्छोला-बाजा, गुड्डा-गुड़िया आ खेलौनासँ विराम पाबि वेशक गल्लीमेँ भवनक छायामेँ ठाढ़ छथि—एहन वेशकन्यासभक समूह ई की देखि रहल अछि? अरे, ई की अछि? की ई पैघ कुण्डा उछलैत आबि रहल अछि, वा केओ मशक घिसिआइत आनैत अछि? अथवा कबन्ध उठि ठाढ़ भऽ गेल, वा दुइटा कोठी चलि रहल अछि? ई कोन आश्चर्यमय वस्तु? अच्छा, आब बुझलहुँ—ई तँ उपगुप्तक तोंदबला शरीर लुढ़कैत आबि रहल अछि। एकर रूप देखि बुझाइत अछि जे धूर्तमण्डलीमेँ उपनाम ठीकहि देल जाइत अछि— सरकारी माल नुकाइ गटकि जाएनिहार कोतल-गणक हरिकृष्ण कारी जङ्गली भेँड़ा अछि; हरिभृति पूरा महिसि; आ दत्तिगुप्त हवासँ फूलल मशक। ई की बात जे बेचारी गङ्गा-यमुनाक चामरधारिणी, पुस्तकवाचिका मदयन्ती, हमर प्रिय मित्र ओहि त्रैविद्य-वृद्ध पुस्तकवाचककेँ छोड़ि उपगुप्तमेँ अनुरक्त भऽ गेल? ओ तँ अपन कोमल बाहुसँ ओकर नीक जकाँ आलिङ्गन करैत छल। मुदा ओ बेचारीकेँ आलिङ्गनमेँ कोनो रस नहि; रजःप्रवाह सूखि गेलासँ ओ कामतन्त्रसँ वञ्चित भऽ चुकल अछि। आब केवल परिवार पोसबाक लेल गप्प-बातसँ चुहल करैत अछि। ओकर लेल ई उचिते अछि। दत्तकक अनुयायी कहैत छथि—पौरुषशक्तिसँ रिक्त व्यक्ति गप्पे सँ काज निकालऽ चाहैत अछि। [देखि] ई किछु उद्विग्न किएक देखाइत अछि? हँ, बुझलहुँ। एकर सासु धनक कारण एकरा अधिकरणमेँ घसीटने अछि—एहन समाचार हमरा वेशमेँ भेटल। तँ सासु-जमाइक विवाद भेल अछि। ई खूब मनोरञ्जक बात। एहिसँ बचि अपनाकेँ घाटामेँ नहि राखब। लग चली। [लग पहुँचि] अरे जनानिए हाँड़ी, वेशवीथीक यक्ष, तूँ एतय कतय? पैदल चलने अल्पहि मेँ थाकि, हाँफैत आ लड़खड़ाइत स्वरमेँ प्रणाम कऽ ठाढ़ भऽ गेल। तोहर कल्याण हो। की कहैत छह—‘ओहि बूढ़ी हरजाईक संग विवाद लेल कुमारामात्यक अधिकरणसँ आबि रहल छी।’ तँ तोरा विजयक बधाइ दी, वा जुर्मानाक राशि देबामेँ सहायता करी? की कहलह—‘विजय आ दण्ड कतय? केवल क्लेश भेटल।’ किएक? की कहैत छह— अधिकरणक दशा ई अछि जे विष्णुदास ध्यानस्थ जकाँ बैसल रहैत अछि; ओकर भाइ कोङ्क वसूली लेल हमरा धमकौने छल आ एखनहि पिटबा चुकल अछि। विष्णुदास उलटा हमरे डाँटैत अछि, आ अधिकरणमेँ बैसल-बैसल ऊँघैत अछि। आओर— ओतय अधिकारीसभ घूस माँगैत छथि; पुस्तपाल आ कायस्थ सेहो माँगिते रहैत छथि। काष्ठक महत्तर अर्थात् कचहरीक प्यादासभ बहुत देर धरि माँगि आब हमरा पकड़िए लेल। ओतयसँ हमरा ई अनुभव भेल— गणिका आ कायस्थ, कायस्थ आ गणिका—एहि दुनू पर विचार करिते बुझाइत अछि जे गणिकाकेँ धन देनाइ नीक, कारण ओकरासँ कमसँ कम आनन्द तँ भेटैत अछि। बधाइ जे कायस्थक जालमेँ फँसियो तोरा सुरक्षित बाहर आएल देखैत छी। तूँ पूरा उस्ताद छह। हमर ई आशीर्वाद लह— शय्यापर मधुर स्वरमेँ गुनगुनाइत, मदालसा आ कामोन्मुख मुख्य वेश्या वक्त्र आ अपरवक्त्र मुद्रामेँ तोहर सत्कार करय। ओ ताली पीटि हँसैत चलि गेल। हमहूँ चली। [घूमि] अरे, ई दोसर के अछि— झुर्री पड़ल देहपर गुजराती ढङ्गक विचित्र खौर बना, मातल आँखि आ पिचकल गालमेँ दबल हँसी लऽ ई के, कोन कारण एहि वेशरूपी स्वर्गमेँ आबि रहल अछि? ठीक, चिन्हलहुँ— ई शकरपालक घरमेँ तृणपिशाच चर्मकार कीरसँ डाइन कोङ्कचेटीकेँ जन्मल पिजन्ना अछि। आओर— ओ शकरपाककेँ अपन पिता आ निरपेक्षकेँ भाइ कहैत अछि। प्रायः दोकड़हा कुलक लोक पाखण्डक संगहि जन्म लैत अछि। [घूमि] अरे, एहिसँ की पूछी? देशमेँ एकर की प्रयोजन? अरे, बूढ़ विट भट्टिरविदत्त एम्हरे आबि रहल अछि। तेँ एकरे सँ पूछी। अरे भट्टिरविदत्त, एहि पुरुष-वेतालक चकलेमेँ आएबाक अर्थ तूँ जनैत छह? की कहैत छह—‘अहाँही जानू।’ तँ जा। [घूमि] मनुष्यसभक एहि बीहड़मेँ फँसि थाकल मोनकेँ कतय बहलाई? ठीक, बुझलहुँ— ई हमर प्रिय मित्र रामक घर अछि, जे वेश्यारतिसँ कहियो विश्राम नहि लैत अछि— आ मित्रसभक आबि जाएबाक भय सँ घरमेँ भीतरसँ साँकल लगा रखने रहैत अछि। तखन भीतर कोना जाई? [कान दऽ] नूपुरक झनकारसँ मिलल मेखलाक झनझन सुनाइत अछि; कङ्कणक खड़खड़ाहट मुक्का चलबाक सूचना दैत अछि; घरक भीतरसँ अबैत सिसकारी आ उसास निश्चयपूर्वक कहैत अछि जे रामक स्त्री रामक संग विपरीत-रतिमेँ रमि रहल अछि। तेँ एतय प्रवेश उचित नहि। सुरतरथक चलैत धुराकेँ के तोड़त? हमहूँ चली। [घूमि] अरे, दोसर— की ई जरल सेमरक गाछ अछि, जकर फुनगीपर किछु डाढ़ि बचल अछि? वा कारी, लम्बा विटरूपी बगुला? अथवा वेशरूपी पोखरिकेँ झुलसाबऽ आएल मरुभूमिक भूत? ठीक, चिन्हलहुँ—ई सोपारक तौण्डिकोकि सूर्यनाग अछि। एकर एतय की प्रयोजन? हमरा देखि उत्तरीयसँ मुख ढाकि कामदेवक मन्दिरकेँ दहिना छोड़ि चुपचाप किएक निकलि रहल अछि? आइ सँ तीन दिन पहिने बहिःशिविक महल्लाक छप्परबला कुटङ्गागारमेँ रहनिहार पताका-वेश्यसभ एकरापर अभियोग लगौने छल। म्लेच्छ आ श्वपच श्रावणिक जखन एकरा मुकदमा लेल अधिकरणमेँ घसिटि अनलक, तखन बलदशक स्कन्धकीर्ति ‘ई हमर स्वामी विष्णुक साहू अछि’ कहि बड़ी कठिनाइसँ छुड़ौने छल—मित्र विष्णुनाग हमरा एना कहने अछि। फेर ई आब वेशमेँ आएबासँ लजाइ किएक अपना नुकबैत अछि? [सोचि] राजकुमारक पार्श्ववर्ती भेलासँ एकरा अपन एहि हरकतपर लज्जा होइत अछि। आश्चर्य! गुणवानक सङ्गतियो गुणकारी होइत अछि; ताहिसँ एकर जकाँ लोक सेहो गुण दिस आकृष्ट भऽ गेल। बिना परिचय प्रकट कएने एकर इच्छा पूर्ण नहि होएत। हमहूँ दहिना दिससँ चक्कर काटि सोझाँ पड़ल एकरापर परिहासक आक्रमण करी। [घूमि] हमरा सोझाँ देखि ई हँसल। अरे जनानिया सूर्यनाग, मित्रकेँ बिना खबर देने वेशमेँ अपन एहि नव आगमनकेँ अन्हारक नाच जकाँ निष्फल किएक करैत छह? की कहैत छह—‘हमर एतय आएबाक की अर्थ? कारागारमेँ बन्न अपन मामा मौद्गल्य पारशव हरिदत्तक पूर्व प्रणयिनीक रोगक समाचार लेबाक लेल पठाओल गेल छी। तूँ किछु दोसर बुझैत छह?’ आश्चर्य, मित्रक काजमेँ तोहर एहन दृढ़ता, आ आपत्तिमेँ पड़ल पूर्वप्रेमीप्रति एहि वारमुख्याक एहन आस्था! तखने तँ— जे वर्णानुकूल उज्ज्वल वेश पहिरैत अछि आ कामीसभसँ अपन भेद नुका कऽ रखैत अछि, एहन वेश्या अरूप वा कुरूप रहितो चित्रपटपर बनल लक्ष्मीक मूर्ति जकाँ कामीसभकेँ प्रिय होइत अछि। आओर हम ओकरा कठिन काज साधनिहार बुझैत छी। कोना? निःसन्देह ओ—कारागारमेँ बन्न रहितो जकर वर्ण फिक्का नहि पड़ल, देवपूजासँ जकर ललाटपर गाँठ पड़ि गेल, लम्बा झबरा दाढ़ीसँ जकर मुख ढाकल अछि—ओहि मुखकेँ पुरान हड्डी जकाँ चबाइत अछि। की कहलह—‘ताहि लेल हम ओकर आदर करैत छी।’ तोहर ई आदर एहेन बनल रहय। हम तोरा अपन मित्रक सच्चा अनुरागी बुझैत छी। अरे, ‘स्वामी, कृपा करू’ कहि ई हमर पएर पकड़ि रहल अछि। की कहैत छह—‘हमर वेश-प्रवेशक बात कतहु नहि कहब।’ रे मित्र, चाँदनीकेँ के नुका सकैत अछि? जखनसँ तूँ रूपदासीक परिचारिका ओहि कुबड़ीसँ प्रेम जोड़लह, तखने सँ एहि प्रदेशमेँ पानिमेँ तेलक बूँद जकाँ तोहर यश पसरि गेल। एना नहि— आलिङ्गन करैत ओ अपन वक्ष आगे बढ़बैत अछि तँ पाछाँ कूबड़ो बढ़ि जाइत अछि। कमरक त्रिकभाग टेढ़ भेलासँ कामवती रहितो जघनभाग आगे नहि ला सकैत अछि। पलङ्गपर सुतल ओ टिड्डी जकाँ देखाइत अछि। नीचाँ मुखकमलबाली ओहि कुबड़ीक संग तूँ कोना रमण करैत छह? की कहैत छह—‘अरे, पाप शान्त हो, अनिष्ट दूर हो! अहाँक एहि यथार्थ व्याख्याक स्वागत अछि। कृपा कऽ देखू—’ जखन ओ ठमकि कऽ चलैत अछि तँ ऊँटक चालिसँ मेल खाइत अछि। बेर-बेर झूमैत हाथसँ पानिमेँ तैरैत जकाँ लगैत अछि। मुख उठबैत अछि तँ आकाशक तारा गनि रहल जकाँ बुझाइत अछि। कीड़ासँ रोगी लता जकाँ ओकरा कोन बुद्धिमान छूबऽ चाहत? अरे दुःख! तोहर जकाँ धर्मज्ञक लेल एना नीक स्त्रीक निन्दा करब उचित नहि। आओर— मित्र, कुब्जा नरकट जकाँ पातर आ कुबड़ी हो, तइयो झूठक प्रीति जकाँ देखबामेँ मुखसँ तँ सुन्दर अछि। आ फेर, सीमा-प्रदेशमेँ रहनिहार पताका-वेश्यसभसँ तँ खराब नहि। की कहैत छह—‘ककरासँ?’ की नहि जनैत छह— जे मातल छथि, जकर भाड़ा केवल एक काकिणी, जे नीच लोकसँ सेवित, जकरा नियम-कानूनसँ मर्यादामेँ राखऽ पड़ैत अछि—लोकसँ नुकाइ आ प्रबल कामेच्छासँ तूँ बाहर जा ओहि टकहीसभसँ मिलैत छह। की कहैत छह—‘ई सभ अहाँकेँ कतयसँ ज्ञात भेल?’ एहन बात खोजबामेँ हम हजार आँखिबला छी। तूँ सीढ़ी-दर-सीढ़ी ऊपर चढ़ैत जाएब? मित्र, रूपाजीवाकेँ छोड़ि तूँ कुबड़ीकेँ चाहैत छह; कुबड़ियो छोड़ि कोनो दिन ओकर स्वामिनीक लग पहुँचि जाएब। ई हँसि चलि गेल। हमहूँ चली। [घूमि] अरे, ई दोसर के, जे सिंहलद्वीपक मयूरसेनाक घरसँ निकलि एम्हरे आबि रहल अछि? काँधपर वस्त्र, हाथमेँ चमकैत तलवार लएने दाक्षिणात्य अङ्गरक्षकसभसँ घेरायल अछि। अपन सुन्दर छापदार, पातर मलमली उत्तरीय समेटैत आन्ध्रदेशमेँ बनल लौहकवच पहिरने अछि। देहपर केसरक खौर, हाथमेँ पानक बीड़ा सम्हारने। ठीक, चिन्हलहुँ—ई विदर्भदेशवासी तलवर हरिशूर अछि। अरे, कावेरीपर अनुरक्त भऽ ई जखन ओकर पएर पकड़लक, तखन खुशामद कएलोपर ओ एकरा एना कहलक— ओकरे लग जा; हमरासँ तोरा की प्रयोजन? जखन चाँदनी खिलल अछि तँ दीपकक की आवश्यकता? एक हाथमेँ दुइटा बेलफल एक संग पकड़ब छोड़। तखन एकर मनौलासँ ओ केना मानत? अनुरक्त स्त्रीकेँ छोड़ि दोसराकेँ खुलेआम चाहैत अछि—ई चकलेभरि ज्ञात अछि। अपन दुर्भाग्य आ बदनामीपर ई प्रसन्न अछि। अथवा स्त्रीसभ अपन चहेताकेँ चाहैत अछि। मयूरसेनाक टक्कर एहि स्त्रीस्वभावसँ भेल; वा खर्चक तङ्गी पड़लापर खाला स्वयं मयूरसेनाकेँ एकर वशमेँ कऽ देत। एहिसँ सभ पूछी। [लग पहुँचि, हाथ जोड़ि] हे मनुष्यसिंह, जेना सिंह अपन गुफा छोड़ैत अछि, तेना द्रमिलदेशक कावेरिकाक संग सुरतक अभिलाषासँ ओहि सुन्दरी सिंहलिकाकेँ छोड़ि तूँ उचिते कएलह। की कहैत छह—‘मयूरसेनाकेँ हम मना लेलहुँ। ताहि लेल ओकरे घरसँ आबि रहल छी।’ कह, टूटल मेल फेर कोना जुड़ल? की कहैत छह—‘आइ सँ तीन दिन पहिने वेश्याध्यक्ष प्रतीहार द्रोणलिकक घर प्रेक्षामेँ बजाओल गेल छलहुँ। बुझाइत अछि, ओतय जानि-बुझि मयूरसेनाक नृत्यक बारी रखल गेल छल। बाजा बजलाक बाद पहिने देवतामङ्गल भेल। फेर गीतक आरम्भक संग नर्तकी नृत्य आरम्भ कएलक। पहिल प्रदर्शनहि मेँ मयूरसेनाक नृत्यमेँ प्रयोगदोष देखाओल गेल।’ अरे, मयूरसेनाक नृत्यमेँ प्रयोगदोष पकड़ा सकैत अछि—ई सम्भव नहि। अरे, एना कहैत के माथक बल खसल? की कहैत छह—‘एकरा महारानी वारुणीक पतन बुझू।’ ठीक, प्रतीहारक घरमेँ भगवती सुरादेवी सदा रहिते छथि। ई नशाक उन्माद ककर माथ चढ़ल? की कहैत छह—‘तोहर मित्र लासक उपचन्द्रकक।’ एहिमेँ अनुचित की? ओ तँ एहन बातक अभ्यस्त अछि; मुदा विषयक ज्ञातो अछि। की कहैत छह—‘उपचन्द्रकक पक्षमेँ सभ सामाजिक छल; हम मयूरसेनाक पक्ष लेलहुँ।’ शाबास मित्र, देश-काल अनुसार काज कएलह। फेर की भेल? की कहैत छह—‘बुद्धिसँ हुनका नहि हरा सकलहुँ। सभासद नहि मानलाह, तइयो प्राश्निकक सम्मतिमेँ शास्त्रीय आधारपर हमर पक्ष उचित ठहरल।’ बधाइ मित्र, बहुत असाधारण मूल्यपर ओकरा किनलह। तकर बाद? की कहैत छह—‘सभ गणिकाक सोझाँ जखन मयूरसेनाकेँ पारितोषिक भेटल, ओ मुस्कान बिखेरि बाँकी चितवनसँ हमरा प्रसन्न कऽ देलक। ईर्ष्याक ज्बलासँ उठि जाइत कावेरिका मुख बना मानो हमरा ताना मारलक। दुनूक कोप आ प्रसाद प्रकट भेला बाद हम दुनू किनारसँ चूकल नाव जकाँ सन्देहक धारामेँ बहैत, कोनो तरह ओहि सङ्कटसँ पार भऽ घर पहुँचलहुँ। एहि दुनूमेँ के की करत—एहि संशयक झूलापर बैसि झूलऽ लागलहुँ। तकर बाद अचानक हमर प्रिया आबि हमर आँखि मूनि देलक। तखन हम हँसि कहलहुँ—’ अरे आँखि मुनबामेँ निपुण चोरनी, नुकाइ हँसने की लाभ? तोहर हाथक अनुपम स्पर्श तँ तोरा प्रकट कइए दैत अछि। एना कहलापर सुगन्धित साँस छोड़ैत, मदसँ लड़खड़ाइत अक्षरमेँ ओ कहलक—‘कह, हम के छी?’ तखन हम कहलहुँ— रोमाञ्चसँ कठोर भेल हमर कपोल तोहर प्रश्नक उत्तर दऽ चुकल अछि। तइयो हे मुग्धे, जँ तूँ पूछैत छह तँ तूँही कह—‘तूँ के छह?’ तखन हमर आँखिपर सँ हाथ हटा ओ कहलक—‘एहि रोमाञ्चक ठगविद्यासँ तँ तूँ हमरा खीँचि लैत छह।’ एना कहि चुम्बन कऽ चलऽ लागल। तखन हम कहलहुँ— चुम्बनक संग हृदय चुरा तूँ कतय चललह? चोरनी, तोहर दुनू पएर अपन माथपर रखैत छी—कोनो तरह ठहर। एना कहलापर ओ शय्यापर जा बैसल। तखन हम स्वयं ओकर दुनू पएर धोएलहुँ। ओ कहलक—‘चरणामृत लऽ चुकलह; आब आ। सचमुच तूँ पूरा धूर्त छह।’ तकर बाद मालतीलताक खिलल मुकुलजाल जकाँ हँसी बिखेरि, सरकैत करधनी आ साड़ी एक हाथसँ सम्हारलक। पलङ्गपर देह घुमौलासँ दोहरी भेल कमर आ बाहुसहित त्रिकभागक मोड़सँ ओ आओर सुन्दर लगय लागल। मध्यभाग घूमलासँ त्रिवली ऊँच-नीच भऽ गेल, नाभि नुकायलासँ रोमावली बाँकी भऽ गेल। हार एक स्तनक ऊपरसँ आ दोसर स्तनकलशक बगलसँ ढुलकऽ लागल; कुण्डल गालपर लटकलासँ मकराकृति विशेषक आओर खिलि उठल। एना तिरछ काँधक मोड़-मुरकसँ लजायल कामप्रिया रति जकाँ रूपवती भऽ एक भौँह तानि कटाक्षसँ मानो जलपर नीलकमल बिछबैत हमरा कहलक—‘लह, अपन मनचाहा कर।’ ओकर दृष्टि आलता लगाबऽमेँ लागल छल। जखन ओ एड़ी, गुल्फ आ नूपुर उठबैत जाँघ ऊपर कएलक, तखन कलफदार रेशमी साड़ी नव रहबाक कारण टाँगमेँ चिपकल नहि छल, अपन तहदार मोड़क निशानपर मुड़बाक लेल सिमटि गेल। जवान हाथीक दाँतक बीचक अधर जकाँ सुन्दर आ केलाक गाभा जकाँ उज्जर ओकर भीतरी उरुभाग हमरा देखाइ पड़ल। हमर दृष्टि हटबैत ओ कहलक—‘एहन समय जे नेत्रसंयम चाही, ओ तूँ नहि सीखलह।’ एना कहि पएर घीँचि हमर छातीपर मारलक। हमरा रोमाञ्च भऽ गेल आ कवच जकाँ कठोर त्वचाबला भऽ हम कहलहुँ—‘राग पूरा कएने बिना हमरा हटेनाइ तोरा उचित नहि।’ ओ कहलक—‘अच्छा, आँखि मूनि राग पूरा कऽ लह।’ तकर बाद हम आँखि मूनि ओकर पएरमेँ आलता लगाबऽ लागलहुँ, तँ ओ हमर केश घीँचि अधर चुमि लेलक। हमरा एना रोमाञ्चित देखि ओ कहलक—‘तूँ अशोक जकाँ पादाघातसँ फुलैत छह; तोहर एहि शठतासँ हम हारलहुँ।’ एना कहैत हमरा आलिङ्गन कऽ शय्यापर चलि गेल। फेर की भेल, देवताक प्रिय लोक स्वयं बुझथि। जँ एना अछि तँ तूँ सेहो तौण्डिकोकि विष्णुनागक प्रायश्चित्त निर्धारित करबाक लेल जुटल विटसभक सेवामेँ उपस्थित हो। की कहैत छह—‘हा, एना नहि कहू! ओ अपन चरणकमलक ताड़नसँ हमर माथोकेँ अनुगृहीत करय—ईएह हमर प्रायश्चित्त।’ जँ एना अछि तँ जेना यमुनाक दहमेँ रहनिहार कालिय नाग कृष्णक चरणचिह्न माथपर धारण कऽ गरुड़सँ अवध्य भऽ गेल छल, तेना तोहरोपर कोनो विटक वश नहि चलत। ई हाथ जोड़ि हँसैत चलि गेल। आब हमहूँ विटसमाजमेँ चली। अरे, मित्रसभसँ गप्पमेँ बीतल समयक पता नहि चलल। एखन तँ— देखू, सूर्य अस्त भऽ रहल अछि। विदा होइत ओकरा मुनैत कमल उत्कण्ठासँ देखि रहल अछि। झुटपुट अन्हार घरक चोटीपर चढ़ि ओकर धूप हटाबि रहल अछि। बगिचाक ऊपर उठल डाढ़िसभकेँ बहुत देर धरि किरणसँ छू सूर्य ओकरे बीच नुका रहल अछि। अटारीपर बैसल कपोत ओकर दिस तकि ओकर लाली अपन आँखिमेँ भरि रहल अछि। आओर एहि समय— पक्षीक तीव्र कलरवसँ सचेत बिलाड़ि झरोखासँ महलक चारदीबारीपर कूदि रहल अछि। मोर घरसँ हटि अपन परिचित बसेरापर जा रहल अछि। सुतबाक लेल ऊँघैत हरिण चबूतरापर चढ़ाओल साँझक फूलो छोड़ि रहल अछि। हंस पानिसँ निकलि भवनक पोखरि लगक चबूतरापर आश्रय लऽ रहल अछि। [घूमि] झरोखासँ निकलि महलक ऊपरी अटारीमेँ भरल घनगर धुआँ उड़ैत स्फटिकधूलि जकाँ बुझाइत अछि। गल्लीमेँ ऊपर धरि भरल सुगन्धित स्नानजलपर भँवरा मँडरा रहल अछि। अहो, एहि समय वेशक महापथक केहन अनुपम शोभा! बाहरी तोरणक बाहरक पैघ आँगन झाड़ि-बुहारि जलसँ सीँचल गेल अछि, आ ओतय फूलक ढेरी सजा देल गेल अछि। परिचारक साँझक उपचारमेँ लागल छथि। देश, वय आ वैभव अनुसार वेश्यसभ सिङ्गार-पटार कऽ रहल छथि। मदनदूतीसभ एम्हर-ओम्हर ठमकैत वेशकेँ शोभित कऽ रहल छथि। मातल विटसभ चुटीला दिल्लगीक व्यङ्ग्यक रस लऽ रहल छथि। नहा-धो, इत्र-फुलेल लगा, पी-कऽ हृष्ट तरुणसभ चौक आ तिराहापर पसरल छथि। एतय— सवारी लेल सजाओल हथिनी पीठपर चढ़ाओल जाइत समय धीरेसँ चिंघाड़ैत अछि। दुआरपर ठाढ़ पालकीमेँ कोनो स्त्री बैसि रहल अछि। नूपुर-मेखलाक झनकार आ हिलैत कुण्डलबाली वेश्याक नितम्बभारसँ दबि घोड़ा मानो केवल दुलकी चालि चलि पा रहल अछि। आओर एतय— कतहु भवनक गवाक्ष दीपकक किरणजालसँ भरल अछि; कतहु देबालपर मोरक गर्दनि जकाँ नील अन्हार छा गेल अछि। चूनासँ पुतल घरक देबाल अत्यन्त सुन्दर लगैत अछि, मानो ताहिपर तमाल आ हरितालक लेपसँ पत्रावलीक लता रचल गेल हो। [घूमि] चन्द्रोदयक शोभासँ युक्त प्रदोष नामक ई सार्वजनिक उत्सव केहन सुन्दर अछि! एखनहि भगवान् चन्द्र सभक आँखिमेँ रसायन भरैत आ वापीक कुमुदफूलकेँ हँसबैत आबि रहल छथि। मदिराक चषकमेँ अपन प्रतिबिम्ब राखि, नीलकमलक गोल पातक बीच-बीचसँ की तूँ हमर चुम्बन लेबऽ चाहैत छह? कह, की तोहर प्रिया रोहिणी तोरा नहि देखैत छथि? सात्त्विक भावसँ उत्पन्न देहक ई कम्प दूर कर। मातल स्त्रीसभक मधुपानक समयक परिहासपूर्ण गप्प सुनबाक लेल मानो उदित चन्द्रमा हुनकर कुण्डलक कोरमेँ अपन प्रतिबिम्ब राखि रहल छथि। [घूमि] कतहु कोनो स्त्री अपन प्रियक संग एकान्तमेँ मधुर स्वरमेँ गा रहल अछि; कतहु झंकारैत वीणा बजि रहल अछि; कतहु महलक छतपर चन्द्रोदयक समय गोष्ठी जमा मदिरा पिओल जा रहल अछि। आ एहि समय भगवान् चन्द्रमा— कतहु अपन किरणसँ गृहदीर्घिकाक जलपर आर-पार सेतु बान्हि रहल छथि; कतहु कदलीक झाड़ीमेँ पैसैत रश्मिसँ ज्योत्स्नाक स्तम्भ रचैत छथि; कतहु चूनासँ पुतल महलपङ्क्तिकेँ फेर अपन किरणामृतसँ रङ्गि रहल छथि; कतहु किसलयसँ बूँदक मर्मर वर्षा करा मानो मोती बरसा रहल छथि। [घूमि] अहो, चन्द्रक किरणसँ झरैत चाँदनीरूपी जल संसारमेँ एना भरि रहल अछि, मानो क्षीरसागरक पानि तट लाँघि अपन लहर दूर-दूर धरि पसारि रहल हो। एखन तँ— घोड़ा, हथिनी, कर्णीरथ आ पालकीपर चढ़ल युवकसभ युवतीक आलिङ्गन आ मर्दन पबैत आकाशमेँ गन्धर्व-सिद्धक युगल जकाँ आबि-जा रहल छथि। [घूमि] नशामेँ ललित चेष्टा करैत युवककेँ पाछाँ घोड़ाक पीठपर बैसल प्रमदा स्तनसँ गाढ़ आलिङ्गन दैत अछि; ओहो घुमि प्रियाकेँ चुमैत अछि। घोड़ाकेँ घरक बाटक एहन अभ्यास अछि जे सोझे चलैत आबि रहल अछि, बहकैत नहि। ई के, जे चाँदनी रहितो अन्हार जकाँ वेशक गल्लीमेँ गर्भगृह-समान भोग करैत निर्लज्जता देखबैत अछि? ठीक, चिन्हलहुँ। ई सौराष्ट्रिक शककुमार जयन्तक अछि, जे एहि घटदासी बबेरिकापर अनुरक्त अछि। समूचा वेश्यापत्तनमेँ एकरे भीतर ई कोन वेशोचित गुण देखलक? तखन किछु— अन्हारक देवी जकाँ, दाँतसँ उज्जर आ आँखिसँ कारी, ओ बबेरिका अष्टमीक चन्द्रमायुक्त राति जकाँ लगैत अछि। अथवा, सौराष्ट्रक लोक, बानर आ बर्बर—एहि तीनूक एके राशि अछि। तेँ आश्चर्य की? गोरी बबेरिकापर जँ एकर आँखि अटकल अछि, तँ एकर अलसायल मातल आँखिक कारण ई चाँदनीयो अन्हार जकाँ बुझाइत अछि। बस, एकर बाट एतहि समाप्त। हम चली। [घूमि] ई दोसरि के— एहि लाटदेशीय स्त्रीक दुनू कानमेँ सोनाक तालपत्र लटकैत अछि; वेणीक अन्तमेँ मणि-मोतीक सोनाक गुच्छा अछि; कूर्पासक अर्थात् चोली स्तन आ बाहुमूल ढाकि नीवीक छोर धरि पहुँचि रहल अछि। [सोचि] चिन्हलहुँ। ई राका अछि, जे राजाक साला, दुर्दशाग्रस्त मयूरकुमारकेँ—जे नाचैत मोर जकाँ अपना देखाबि रिझबैत अछि—चन्द्रशालाक सोझाँ आलिङ्गन करैत वेशबजारमेँ अपन सौभाग्य देखाबि रहल अछि। ओकर सच्चाइ देख ओ बेचारा मानो किनाए गेल। ओ गोरी, मोट स्त्री ओहि दुबर, साँबला मयूरकुमारकेँ मानो सोझाँ पड़ल अपन छाया जकाँ छातीसँ लटका लऽ जा रहल अछि। [घूमि] ई दोसरि के? [सोचि] ई यशस्वी शार्दूलवर्माक पुत्र हमर प्रिय मित्र वराहदासक प्रियतमा यवनी कर्पूरतूरिष्ठा अछि। तीन अँगुरीसँ मधुपात्र पकड़ि मुख दिस उठा रखने अछि; दोसर हाथसँ कानक चन्द्राकार कुण्डल पकड़ने अछि, जकर प्रतिबिम्ब गालपर पड़ि रहल अछि। कुण्डलक छिटकैत किरणसँ ओकर काँधपर सेहो मानो चन्द्रमा खेलि रहल छथि। चकोर-जकाँ केश आ आँखिबाली यवनी मधुपात्रमेँ अपन प्रतिबिम्ब देखैत, नखसँ लम्बा लट बिखेरैत, महुआक फूल जकाँ उज्जर कोमल गालपर उभरल मदिराक लालीकेँ आलता बुझि पोछि रहल अछि। यवनी आ गणिका, बनरिया आ नर्तकी, मालव आ कामुक, गायक आ गदहा—गुणमेँ हम एहि सभकेँ एकसमान मानैत छी। जोड़ी मिलाबऽमेँ ब्रह्मा निश्चयहि निपुण छथि। जेना खैरक गाछपर आत्मगुप्ता लता आ नीमपर परवलक लता पसरैत अछि, तेना जँ यवनी मालवपर अनुरक्त हो तँ अद्भुत जोड़ी बनैत अछि। ई हमर परिचिता अछि, मुदा गप्प नहि करब। वेशक यवनीक स्वयं कहल बात—जे बनरियाक खाँव-खाँव जकाँ चीत्कारयुक्त अनजान व्यञ्जनसँ भरल, किछु सङ्केतक संग केवल तर्जनी हिला अभिप्राय बतबैत अछि—के सुनत? हम बाज अएलहुँ। [घूमि] ई दोसर के— जे पवनक विपरीत फड़फड़ाइत अलक आ दुपट्टाबाली प्रियाकेँ हथिनीपर बैसा लऽ जा रहल अछि, जेना उदयन वासवदत्ताकेँ लऽ गेल छलाह! [सोचि] चिन्हलहुँ। ई ईशभ्यपुत्र अर्थात् धनिकक पुत्र अछि, जकर विट प्रवाल डिण्डिकसभमेँ खूब परिचित अछि। फेंटा कसि सुरतयुद्धमेँ उतरनिहारसभक ई गुरु अछि। हमर नेनी ओहि वेशसुन्दरीक कामफन्दामेँ फँसि माता-पिताक आज्ञाक परवाह नहि कऽ अनुरक्त भऽ गेल। निश्चय ई डिण्डिकसभक उस्ताद अछि। ससुर बनि गेलासँ एकर सोझाँ हमरो बकार बन्न। तेँ गप्प नहि करब; हाथ जोड़ि एतयसँ निकलि जाई। [घूमि] आब हम विटसमाजमेँ पहुँची। वेशमहापथमेँ निरर्थक चक्कर काटैत हम विटसभक मुखिया भट्टिजीमूतक घर आबि गेलहुँ। बाहरी दुआरक सोझाँक खुला मैदानक चारू दिस बजाओल गेल विटसभक हजारों सवारीक भीड़ जुटल अछि। तोरण लग चाँदीक घड़ामेँ पएर धोबाक पानि उठा परिचारक ठाढ़ छथि। ठीक कहल गेल अछि—बड़ लोकक बात बड़। एखन एतय पाँचरङ्गा फूल छिटाओल जा रहल अछि; गुँथल माला लटकाओल जा रहल अछि; धूप घुमाओल, दीप जलाओल, स्वागत-वचन कहल जा रहल अछि; सवारी खोलि छोड़ल जा रहल अछि; दौड़धूप, गीत-सङ्गीत, आगन्तुककेँ हाथक सहारा, मधुर वचन, प्रेमपूर्ण आलिङ्गन, एक-दोसराक देहक सहारा, अत्यन्त विनम्र प्रणाम, पीठ थपथपेनाइ, भौँह चढ़ा चटकारी मारनाइ, छेड़ भेटलापर माथ झुकबेनाइ—सभ चलि रहल अछि। केओ नखरासँ ठाढ़, केओ अदासँ बैसल। चन्दन बाँटल, वर्णक पोतल, अङ्गराग लगाओल, सुगन्धित पटवासचूर्ण उड़ाओल जा रहल अछि। विट परिहास करैत छथि, वेश्यसभ प्रत्युत्तर दैत छथि। बहुत कहब की— अन्तःपुरमेँ परिचारकक काज करनिहार बौना लोकनिक पएर ठेहुन धरि फूलमेँ धँसल अछि, ताहि कारण कठिनाइसँ चलि पा रहल छथि। आँखि मटकबैत गणिकादारिकासभ पएरमेँ लागल केतकीक पाँखुरी ‘सी-सी’ करैत निकालि रहल छथि। आ ई सभ— धनिकक पुत्र आ प्रमुख विट आधा आसनपर बैसल अपन सहेलीसँ चतुर शब्दमेँ एहन दिल्लगी करैत छथि जे हृदयपर चोट नहि करय। वेशमेँ एना निर्भय घूमैत छथि, जेना खुला साँढ़ ऋतुमती बछियासभक संग चरागाहमेँ घूमैत हो। एहि सभाभवनक आकाशभाग वा छतपर शतचन्द्र अलङ्कार मानो स्त्रीसभक सैकड़ो मुखचन्द्र रूपमेँ अछि। भवनक चारू कात स्त्रीसभक चितवनरूपी शताक्षी अलङ्कारसँ शोभित। युवकसभक एक-दोसरासँ रगड़ाइत बाहु भवनक चारू दिस घुमाओल परिघ जकाँ; चन्दनसँ भीजल वक्षस्थल सभाभवनक शिलापट्टयुक्त कुट्टिम जकाँ। आ एतय— वेश्यसभ लेल कल्पवृक्ष जकाँ, काम लेल तत्क्षण तैयार, अपन समस्त पूँजी छोड़बाक लेल सन्नद्ध ई वीरसभ अछि; जकर बाल्यकालक नकली काठक लड़ाइकेँ बूढ़ लोक सुयोधन आ वृकोदरक युद्ध जकाँ बखानैत छथि। मित्रक आज्ञारूपी पाग माथपर बान्हि हमहूँ भगवान् कामदेवकेँ प्रणाम करैत, हुनकर आदेशसँ एहि कर्तव्यकेँ आगाँ राखि श्रीमान् तौण्डिकोकि विष्णुनागक प्रायश्चित्त लेल विटसभसँ निवेदन करी। [घूमि] अरे-अरे, समस्त पृथ्वीसँ आएल, कलहमेँ रुचि रखनिहार आ कलहक वृत्तान्त कहनिहार धूर्तजन, अहाँ सभ सुनू-सुनू— ओ भगवान् कामदेवक जय हो, जे तपस्वीसभपर अधिकार चाहैत छथि; जे सभक चित्तक स्वामी आ इन्द्रियरूपी घोड़ाक शासक छथि; जकर आज्ञा पैघ-पैघ प्राणियो चूड़ामणिसहित माथ नुका मानैत अछि। [घूमि] जकर खिलखिलाहट गाललगक कर्णपूरपर छिड़िआइत अछि, एहन विलासिनीक यौवनमदक जय हो; हुनकर डगमग चालि आ चञ्चल चितवनक जय हो; आ तकर बाद हुनकर यौवनक अठखेलीक जय हो। प्रधान वेश्याक चरणरजसँ अपन माथ पवित्र कऽ ओहि माथकेँ धूर्तमिश्रसभक चरणमेँ नुका निवेदन करैत छी। कहबाक बात की? सुनू— ई विष्णुनाग प्रायश्चित्त लेल साँप जकाँ पृथ्वीपर छाती रगड़ैत छटपटा रहल अछि। अहाँ सभकेँ एकर प्राणरक्षा करबाक चाही। अहाँ सभ पूछैत छी—एकर अपराध की? सुनू— आँखिपर खसल लट ऊपर फेकि, क्रोधसँ भौँहक कोर तानि, अधरोष्ठ काटि, दाँतक किरण बिखेरि, काँपैत मुखसँ, नूपुर झनकबैत ओ मदमाती प्रिया सरकैत रक्तांशुक हाथसँ खीँचैत अपन नूपुरसज्जित चरण एकर माथपर राखि देलक। की, अहाँ सभ कहैत छी—‘पुरुषक भेद बुझबामेँ अनाड़ी ओ कोन गणिका, जकर लापरवाही एहि बदनामीक रूपमेँ सोझाँ आएल?’ ओ सौराष्ट्रक श्रीमती मदनसेनिका अछि। ‘सौभाग्य जे एतय दोसर केओ नहि’—एहन भावमेँ ई विटसभ किछु घबरायल देखाइत छथि। हाथ हिलबैत, हँसी नुका, धिक्कारैत, मुखपर गम्भीरता आनैत धूर्तसभ मानो दयालु भऽ एक-दोसराक मुख देखैत विचारमेँ डूबि गेल। बैसल विटसभक मुखिया विटमहत्तर भट्टिजीमूत करुणासँ अत्यन्त व्याकुल भऽ उठलाह। ‘केहन दुःख, केहन दुःख!’ कहैत ओ थाकल हाथी जकाँ उसास छोड़ि, बादल जकाँ आँखिसँ पानि बरसा रहल छथि। हमरा बजा रहल छथि। हम आबि गेलहुँ। भट्टिक की आज्ञा?—‘पहिने सुनने छी, तूँ फेर कहैत छह जे एहन प्रायश्चित्त लेल ब्राह्मणसभक लग जाएबाक चाही। ताहि लेल हम बैसल छी। ताबत तूँ विटसभकेँ शपथ दऽ तैयार कऽ लह।’ भट्टिक जे आज्ञा। अरे, अहाँ सभ सुनू-सुनू— आइ एहि सभामेँ जे अण्ड-बण्ड कहय, ओ जुआमेँ कहियो बाजी नहि जीतय; मायक आज्ञाकारी बनय; विनयसँ पिताक पएर छूअय; केवल उसनल दूध पिबय; मोहमेँ लड्डू खा तृप्त रहय; आ ब्याहल स्त्रीसँ सन्तुष्ट रहय। आओर— गुरुक सेवा करय; विटगोष्ठीसँ बाहर भऽ जाए; जवान रहितो बूढ़ जकाँ विनीत हो; बुढ़ापा आएलापर शान्त भऽ जाए—जे एतय बैसि अण्ड-बण्ड कहय। [घूमि देखि] धावक अनन्तकथ—जे मगजपच्ची करैत रहैत अछि—अचानक उठि हमरा बजा रहल अछि। की कहैत अछि—‘प्रणय नहि बुझनिहार ओकरे दोष, तौण्डिकोकिक नहि। सुनू—’ जकर स्पर्शसँ अशोक असमयमेँ फुलैत अछि; जतय स्वयं कामदेव बाण चढ़ा निवास करैत छथि—अपन एहन चरण जे सुन्दरी भूलसँ एहि पशुक माथपर राखि देलक, दीर्घकाल धरि प्रायश्चित्त ओहि चपलेकेँ करबाक चाही। तूँ ठीक कहलह, कारण— ओ एहि गदहाक सोझाँ वीणा बजौलक; एहि बानरक सोझाँ श्लोकमयी प्रशस्ति पढ़लक; आ महिसिक अधफाटल दूधमेँ सहकारक रस टपकौलक। तइयो दुःखीकेँ ढाढ़स देबाक लेल प्रायश्चित्त होइत अछि। आर्त भऽ ई आएल अछि, तेँ अहाँ सभकेँ एकरापर कृपा करबाक चाही। ई गादर बेलक नाती के, जे मातलपनसँ हिलैत माथकेँ एक हाथसँ रोकि ‘एकर प्रायश्चित्त सुनू’ कहि हमरा पुकारैत अछि? ओकर लग जाई। विटसभ ओकरापर बिगड़ि रहल छथि—‘विटभाव बिगाड़निहार ई मुखबला के, जे अपनेकेँ अगुआ विट बुझि परिषद्मेँ उठि प्रायश्चित्तक उपदेश देबऽ चलल अछि?’ अरे जनानिया मल्लस्वामी, सुनलह ई सभ की कहैत अछि? की कहैत छह—‘किएक नहि तूँ एहि सभकेँ बता दैत छह—’ पिताक स्वर्गवासक पाँच राति बादहि, जखन मित्रसभ दुःखी आ सगा-सम्बन्धी कनैत-पीटैत छल, एकटा बिलखैत बालककेँ अलग राखि दासीक संग हम मधुपानक आनन्द लेलहुँ। फेर हम विट नहि तँ के? जँ एना अछि तँ सभ मानैत अछि जे तूँ विटसभक मुखिया छह। बैस। की कहैत छह—‘ओहि मदनसेनिकासँ प्रायश्चित्त कराओल जाए।’ अच्छा, फेर घोषणा करैत छी। अरे, ई शिबिदेशक कवि आर्य रक्षित हाँफैत भाषामेँ पुकारि कहैत अछि—‘निश्चय ई प्रायश्चित्त उचित नहि।’ ई भलमानुस सेहो पैघ विट अछि, कारण— ओ श्रोत्रियक घर जा एक प्याला मदिरा लेल अपन काव्य बेचि अबैत अछि; शिबिकुलमेँ जन्मल आ भृ-स्थानमेँ बूढ़ भऽ गेल। आओर— जँ कवि काव्य बेचैत छथि, तँ ओ काव्यो एहेन अछि जे मदिराक चषकक संग तैयार होइत अछि। काशी, कोसल, भग्ग जनपद आ निषादनगरसभमेँ ईएह दशा अछि। तेँ एकर लग चली। सखे, हम आबि गेलहुँ। तूँ की कहैत छह— जेना बन्द कमलमेँ भँवरा भरल रहैत अछि, तेना जे मधु कामिनीक गालमेँ भरल रहैत अछि; जे ओकर मुखसँ निकलि बकुलक डाढ़िकेँ फुला दैत अछि; जे आँखिमेँ विलास भरि दैत अछि; आ जाहिमेँ ताजा सहकाररस मिलाओल जाइत अछि—एहन सीधु-गण्डूषसँ सीँचल जाएबाक पात्रता एहि नरपशु तौण्डिकोकि विष्णुनागक माथमेँ कतय? ई दोसर भवकीर्ति हाथ जोड़ि प्रायश्चित्त कहबाक लेल हमरा बजा रहल अछि। ई ब्राह्मणबालको अत्यन्त विट अछि, कारण— ई दुष्ट ओहि मुण्डित, बूढ़, पुरान गेरुआ वस्त्र पहिरनिहार, भिक्षा लेल निःशङ्क घरमेँ आएल, भयभीत आ फड़फड़ाइत भिक्षुणीकेँ भूमिपर पटकि कामक कुकर्म कऽ बैसैत अछि। तेँ एकर लग चली। की कहैत छह—‘एकर प्रायश्चित्त ई अछि—’ ओ स्त्री पहिने एकर केश पकड़ि घीँचैत अपन मेखलाक डोरीसँ एकरा बान्हि दे। फेर जखन ओ शयन करय, तखन ई ओकर पएर दबाबय। ईहो एकर लेल पर्याप्त नहि। ई रईसजादा गान्धर्वसेनक—जकर नाम सभ चेटक जीहपर अछि—हाथ उठा हमरा बजा रहल अछि। एकर हाथक अँगुरी तीन प्रकारक बाजापर अनेक हस्तमुद्रामेँ दौड़ल अछि। जेना लाल कमलक पाँखुरीक वर्षा होइत हो, तेना वीणाक तारपर एकर लाल अँगुरी पसरल रहल अछि। वीणा बजबैत ई धनिक घरक अन्तःपुरसुन्दरीसभक पार्श्वमेँ बैसि, हुनकर श्रोणितटपर वीणा राखि, हुनकर नखक्षतक आनन्द लेने अछि। तेँ एकर लग चली। की कहैत छह— जघनरूपी रथक पार्श्वमेँ फहरैत पताका जकाँ, सुरतयुद्धमेँ परस्पर मिलन लेल उकसाबऽबाली झंकारैत वीणा जकाँ वेश्यसभक मणिमेखला कतय, आ एहि दुर्गन्धित गदहाक पएर कतय! [घूमि] आब दक्षिणदेशसँ आएल कवि आर्यक प्रायश्चित्त कहि रहल अछि। की कहैत छह— नखरासँ भरल चितवनसहित ओ मातल अपन कर्णोत्पलसँ एकर माथपर बेर-बेर प्रहार करय। गान्धारदेशसँ आएल हस्तिमूर्ख एकरो कथन व्यर्थ कऽ देलक। तूँ— की कहैत छह— जे उत्पल हस्तिनखपर उत्कीर्ण कऽ बनाओल गेल अछि; जे स्त्री कानमेँ धारण कएने अछि; आ जे ओकर अपाङ्गव्यापी चितवनसँ शबलित भेल अछि—ओहिसँ जँ एहि नरपशुक माथ छूअल जाए, तँ प्रायश्चित्त की होएत? उलटा ओकर सुगन्धित रजसँ ई पवित्र भऽ जाएत। एकर राय उचित अछि। प्रमुख विटसभ सेहो ईएह कहैत छथि। [घूमि] ई दुनू हमरा बजा रहल छथि। एके आसनपर बैसल गुप्त आ महेश्वरदत्त—ई दुनू मित्र महाकवि वररुचिक काव्यप्रतिभाक अभ्याससँ प्रतिभाशाली छथि। तेँ हुनकर लग चली। [लग पहुँचि] अरे जनानिया मुकुन्दगुप्त, तूँ की कहलह— ओकर पएरक धोवनसँ एकर माथ धोओल जाए। वृद्धसभ एकर निषेध करैत छथि। मित्रमण्डलीमेँ प्रिय नामबला महेश्वरदत्त राय दैत अछि—ओकर पएरक धोवन पिबऽ योग्य सेहो ई नहि। ई दोसर हमर मित्र, सौवीरदेशक बूढ़ विट, स्वाभाविक मुस्कानयुक्त वाणीसँ हमरा बजा रहल अछि। तूँ की कहलह— जखन अङ्गक आभूषण उतारि देलासँ ओकर देह स्वाभाविक कान्तिसँ आओर सुन्दर लगैत हो; स्नानक बाद गील लट जघनस्थलपर बिथुरल हो—ओहि दशामेँ हम ओकरा एतय अनब। तखन ई अपन दर्पण ओकर सोझाँ लऽ ठाढ़ रहय; ओ केश सँवारैत दर्पणक गोल भागकेँ अपन नेत्रप्रभासँ शबलित करय। दाशेरक कवि रुद्रवर्मा एकर निषेध करैत अछि। तूँ की कहैत छह— ई विद्वान् उच्च कुलमेँ जन्मल अछि आ राजाक मन्त्राधिकारक सचिव अछि। वेश्याक पएर लगबाक कारण धूरिसँ सनल केश एकरा— नहि रखबाक चाही। तेँ एकर माथ मूड़ि दिअ। ‘अहाँक कृपा भेल’ कहि विष्णुनाग विनती करऽ लागल—‘केश कटेबासँ पहिने हम अपन ई सदा नतमस्तक आ दासीक लातिसँ अपमानित माथे काटि देबऽ चाहैत छी।’ ओकर एहि बातक उत्तर विटमहत्तर भट्टिजीमूत एना दऽ रहल छथि— बाँकी भौँहबाली सुन्दरीसभक सरकैत कङ्कणक झनकारयुक्त, नखक किरणसँ जड़ित, अँगूठीक शोभासँ युक्त आ किसलय जकाँ कोमल हाथसँ कोनो सुन्दरी एकर केश नहि सँवारय; ई एहेन रूख केश धारण कएने रहय। ओहि मदनसेनिकाक लेल सेहो प्रायश्चित्त सुनू— मदसँ घूमैत आँखिबाली ओ स्त्री नितम्बपर एक हाथ राखि मेखला सम्हारैत, आलतासँ रङ्गल नूपुरयुक्त चरण हमर माथपर राखि हमरा अनुगृहीत करय, आ ई तौण्डिकोकि विष्णुनाग टुकुर-टुकुर तकैत रहय। ‘ईएह उचित प्रायश्चित्त’ कहि सभ विट साधुवाद दैत भट्टिजीमूतक अनुमोदन कऽ रहल छथि। ‘आब हम सर्वथा अनुगृहीत भेलहुँ’ कहि तौण्डिकोकि विष्णुनाग चलि गेल। विटमहत्तर भट्टि हमरा बजा रहल छथि। हम आबि गेलहुँ। अहाँ की कहैत छी—‘ई सभ तँ भऽ गेल। आब अहाँ सभक कोन प्रिय काज करी?’ ओहो सुनू— नोक-झोंकक बातमेँ चतुर कुट्टिनीसभक कल्याण हो; धूर्तसभक सैकड़ो आमदनी अक्षुण्ण रहय—ओसभ निश्चिन्त माल काटथि; एहि नगरमेँ विटसभक सुखद गोष्ठी जुटैत रहय; आ साँझमेँ वारविलासिनीक प्रेमपूर्ण जलसा होइत रहय। [विटक प्रस्थान] उदीच्य कवि विश्वेश्वरदत्तक पुत्र आर्य श्यामिलक केर रचित एकनट नाटक (भाण) पादताडितकम् समाप्त। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१५.गजेन्द्र ठाकुर- कालिदासक मूल संस्कृत नाटक अभिज्ञानशाकुन्तलम् संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर कालिदासक मूल संस्कृत नाटक अभिज्ञानशाकुन्तलम् संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर अभिज्ञानशाकुन्तलम् महाकवि कालिदास पात्र-परिचय रंगमञ्च पर आगमनक क्रमसँ — मूल संस्कृत नाम मैथिली परिचय सूत्रधारः सूत्रधार (रंगमञ्चक निर्देशक) नटी नटी (अभिनेत्री) राजा, दुष्यन्तः राजा दुष्यन्त सूतः हुनक सारथि तपस्वी, तापसाः तपस्वी सख्यौ दू सखी शकुन्तला शकुन्तला प्रियंवदा प्रियंवदा अनसूया अनसूया विदूषकः, माधव्यः विदूषक (माधव्य) दौवारिकः, रैवतकः द्वारपाल (रैवतक) सेनापतिः सेनापति परिजनः परिजन (अनुचर-वर्ग) तापसौ, ऋषी दू तपस्वी, दू ऋषि करभकः करभक, राजदूत शिष्यः कण्वक शिष्य तापसी दू तपस्विनी ऋषिकुमारकौ दू ऋषिकुमार गौतमी गौतमी दुर्वासाः दुर्वासा, क्रोधी स्वभावक ऋषि काश्यपः, कण्वः काश्यप (कण्व) शिष्याः तीन शिष्य शार्ङ्गरवः शार्ङ्गरव कञ्चुकी, मौद्गल्यः कञ्चुकी (मौद्गल्य) प्रतीहारी प्रतीहारी (द्वाररक्षिका) वैतालिकः वैतालिक (स्तुतिपाठक) शारद्वतः शारद्वत पुरोहितः, पुरोधाः, सोमरातः पुरोहित (सोमरात) ऋषयः ऋषिगण रक्षिणौ दू प्रहरी पुरुषः एक पुरुष, धीवर (माछ मारऽवला) श्यालः नगर-रक्षक अधिकारी, राजाक सार अक्षमाला अक्षमाला चेटी दू उद्यान-परिचारिका लिपिकरी, मेधाविनी चित्रकारिणी-लिपिकरी (मेधाविनी) मातलिः मातलि (इन्द्रक सारथि) चूतमञ्जरी चूतमञ्जरी, पहिल नर्तकी पारिजातमञ्जरी पारिजातमञ्जरी, दोसर नर्तकी बालः बालक (सर्वदमन) तापसी दू तपस्विनी मारीचः मारीच अदितिः अदिति प्रस्तावना प्रसन्नचित्त भगवान अपन आठटा प्रत्यक्ष रूपसँ हमरा सभक रक्षा करथि— स्रष्टाक पहिल सृष्टि, जे यज्ञक आहुति ग्रहण करैत अछि, आ स्वयं आहुति, यजमान, कालक विधान करनिहार ओ दुनू, कानसँ सुनाइ पड़निहार, समस्त विश्वमे व्याप्त तत्त्व, ‘समस्त बीजक मूल’ कहल जाएबला तत्त्व, आ जीवधारी सभकेँ प्राणशक्ति देनिहार तत्त्व!* मङ्गलाचरण समाप्त होइत अछि। सूत्रधार: (परदा दिस देखैत) आर्ये! सभ गोटे अपन-अपन भूमिका लेल तैयार भऽ गेल छथि ने? नटी प्रवेश करैत छथि। नटी: आर्य! हम उपस्थित छी। की आज्ञा अछि? सूत्रधार: (देखैत) एहि सभामे प्रायः सभ दर्शक अत्यन्त रसज्ञ आ विदग्ध छथि, आ हमरा सभकेँ कालिदास-रचित नव नाटकक प्रदर्शन कऽ हुनका सभक मनोरञ्जन करबाक अछि। प्रत्येक भूमिकाक निर्वाह बहुत सावधानीसँ होअय। नटी: अहाँक कुशल निर्देशन रहत तँ कोनो बात बिगड़ि नहि सकैत अछि। सूत्रधार: (मुस्कुराइत) आर्ये, एकटा सत्य कहैत छी। जाबत धरि विद्वज्जन सन्तुष्ट नहि होथि, ताबत धरि हम अपन निर्देशन-कौशलक विषयमे निश्चिन्त नहि भऽ सकैत छी। मन लगा कऽ अभ्यास कएनिहारक हृदय सेहो आत्मसन्देहसँ व्याकुल रहैत अछि। नटी: ई सर्वथा सत्य अछि। आब कहू, एकर बाद की करबाक अछि, आर्य? सूत्रधार: (देखैत) एहि सभाक कानकेँ आनन्दित करबाक लेल हालहि आरम्भ भेल, उपभोगक योग्य ग्रीष्म ऋतुक वर्णन करैत गीत गेबाक अतिरिक्त आओर की? कारण, एखन— एहन दिन सभ अछि, जखन जलमे डुबकी लगाएब आनन्ददायक अछि, पाटल-पुष्पक संसर्गसँ वनक समीर सुगन्धित अछि, घनगर छाहरिमे सहजहि निन्न आबि जाइत अछि, आ साँझक बेला मनोहर लगैत अछि। नटी: जेना अहाँक आज्ञा। (गबैत छथि।) कोमल-हृदया स्त्रीगण शिरीषक फूलसँ अपन श्रृंगार करैत छथि, जकर अत्यन्त सुकुमार केसरकेँ भौंरा क्षणभरि चुमि जाइत अछि।* सूत्रधार: अत्यन्त सुन्दर गायल! गीतक माधुरीमे तन्मय हमर चारू दिसक ई दर्शक-मण्डली एना निश्चल भऽ गेल अछि, मानो चित्रमे अंकित हो। आब कहू, एहि लोक सभक मनोरञ्जन लेल कोन नाटक खेलल जाए? नटी: आर्य, आरम्भहिमे अहाँ कहलहुँ नहि—‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ नामक नव नाटक प्रस्तुत करू? सूत्रधार: आर्ये, अहाँ उचितहि स्मरण करा देलहुँ। एखनहि ई बात हमर मोनसँ उतरि गेल छल। किएक? अहाँक गीतक मनोहर सुर हमरा अनायास अपना संग बहा लेने गेल... (परदा दिस देखैत।) ...ठीक ओहिना, जेना ई राजा दुष्यन्त तीव्रगामी हरिणक पाछाँ खिंचाइत चलि गेलाह। एतबा कहि दुनू प्रस्थान करैत छथि। प्रस्तावना समाप्त। प्रथम अङ्क: मृगया हाथमे धनुष लेने, रथपर सवार राजा दुष्यन्त एकटा हरिणक पाछाँ पड़ल प्रवेश करैत छथि; सारथि हुनका संग अछि। सारथि: (राजा आ हरिण दिस देखैत) महाराज! जखन हम एहि हरिणकेँ आ तानल धनुष सहित अहाँकेँ देखैत छी, तखन हमरा अपन आँखिक आगाँ मृगक पाछाँ दौड़ैत पिनाकपाणि शिव देखाइ पड़ैत छथि।* राजा: सारथि! एहि कृष्णसार मृग हमरा सभकेँ बहुत दूर लऽ आएल अछि। एखनो ओ— पाछाँ अबैत रथ दिस बेर-बेर घुमि देखैत अछि, गरदनि सुन्दर ढङ्गसँ मोड़ैत, बाण लगबाक भयें पछिला देहकेँ अगिला भागमे समेटने, थाकनिसँ मुँह बौने, मुँहसँ आध चिबाओल घास खसैत बाटभरि छिड़कैत जाइत अछि। देखू! ऊँच-ऊँच छलाङ्ग मारैत ओ धरतीकेँ बहुत कम छुबैत, मानो आकाशहिमे अधिक चलैत अछि। ई की! हम ठीक ओकर पाछाँ छी, तैयो ओ आँखिक पकड़सँ बाहर भेल जा रहल अछि! सारथि: महाराज! भूमि ऊबड़-खाबड़ अछि।* लगाम सम्हारि हम रथक वेग घटा देने छलहुँ। एहि कारणेँ मृग किछु आगाँ निकलि गेल। आब भूमि समतल अछि; ओकरा पकड़बामे अहाँकेँ कोनो कठिनाइ नहि होएत। राजा: लगाम ढील छोड़ू! सारथि: जेना महाराजक आज्ञा। (ओहिना करैत अछि आ वेग बदललाक अभिनय करैत अछि।) महाराज! देखू, देखू! लगाम ढील होइतहि ई रथक घोड़ा सभ, देहक दुनू पार्श्व पूर्ण पसारने, याक-पुच्छक कलगी कनेको नहि डोलने, कान ठाढ़ कएने, अपने उठाओल धूरिक पहुँचसँ सेहो दूर, एना दौड़ि रहल अछि मानो मृगक वेग सहन नहि कऽ सकैत हो। राजा: सचमुच ई घोड़ा सभ इन्द्रक घोड़ाकेँ सेहो पछाड़ि रहल अछि। कारण— जे वस्तु आँखिकेँ छोट देखाइत छल, से क्षणेमे विशाल भऽ जाइत अछि; जे वस्तु वास्तवमे दू भागमे बाँटल अछि, से जुड़ल देखाइत अछि; जे स्वभावतः टेढ़ अछि, से सोझ देखाइत अछि। रथक वेगक कारण ने कोनो वस्तु हमरा सँ दूर अछि, ने कोनो वस्तु हमर लग स्थिर रहि पबैत अछि। सारथि: महाराज! जाहि कृष्णसारपर अहाँक बाण लक्ष्य कएने अछि, ओकर आ अहाँक बीच तपस्वी सभ आबि गेल छथि! राजा: (घबड़ाइत) तँ घोड़ा रोकू! सारथि: रोकैत छी। (एतबा कहि रथ रोकैत अछि।) दू गोट सङ्गीक संग एक तपस्वी प्रवेश करैत छथि। तपस्वी: (व्याकुल भऽ हाथ उठा कऽ) राजन्! राजन्! ई आश्रमक मृग अछि। ई आश्रमक मृग अछि। अतः अपन सटीक लक्ष्य कएल बाण पाछाँ खिंचि लिअ। अहाँक शस्त्र दुःखीजनक रक्षा लेल अछि, निर्दोषपर प्रहार करबाक लेल नहि। राजा: बाण पाछाँ लऽ लेलहुँ। (कहलाप्रमाणेँ करैत छथि।) तपस्वी: (प्रसन्न भऽ) साधु, राजन्! पुरुवंशक सन्तान लेल एहने आचरण शोभनीय अछि। अहाँकेँ अवश्य एहन पुत्र होअय जे चक्रवर्ती सम्राट बनय। राजा: (प्रणाम करैत) तपस्वीक वचन सहर्ष स्वीकार्य अछि। तपस्वी: हम सभ समिधा चुनय निकलल छी। ओतय मालिनी नदीक तटपर, हिमालयक ढलानसँ सटल, हमर गुरु काश्यपक आश्रम देखाइत अछि। आन कर्त्तव्यमे बाधा नहि पड़ैत हो तँ आश्रममे प्रवेश कऽ अतिथिक योग्य सत्कार ग्रहण करू। आओर— निर्विघ्न सम्पन्न होइत, तपस्यासँ सम्पन्न तपस्वी सभक पवित्र यज्ञ देखिकऽ अहाँ बुझि सकब— ‘हमर धनुषक डोरीसँ चिह्नित बाँहि कतेक रक्षा करैत अछि!’ राजा: कुलपति आश्रममे छथि? तपस्वी: आइए ओ अपन निष्कलङ्क पुत्री शकुन्तलाकेँ अतिथि-सत्कारक भार दऽ, ओकर प्रतिकूल भाग्यक शान्ति लेल पवित्र चन्द्रतीर्थ प्रभास गेल छथि। राजा: (अपना मोनमे) नीक। हम हुनकहि देखब। ओ महर्षिक समक्ष हमर भक्तिभावक चर्चा करतीह। तपस्वी: आब हमरा सभकेँ जेबाक अछि। (शिष्य सभक संग प्रस्थान करैत छथि।) राजा: सारथि! घोड़ा आगाँ बढ़ाउ! पहिने पवित्र आश्रमक दर्शनसँ अपना केँ पवित्र करब। सारथि: जेना महाराजक आज्ञा। (घुमैत अछि आ रथ हाँकबाक अभिनय करैत अछि।) राजा: (चारू दिस देखैत) सारथि! केओ नहि कहितो स्पष्ट भऽ रहल अछि जे ई तपोवनक बाहरी भाग अछि। सारथि: से कोना? राजा: की अहाँ नहि देखैत छी? एतय— गाछक नीचाँ सुग्गाक खोहसँ खसल वनधानक दाना पड़ल अछि; कतहु इङ्गुदी फल कुटलाक तेलसँ चिक्कन भेल पाथर देखाइत अछि; हरिणक बच्चा एतेक निडर अछि जे लोकक गप सुनितो डेग रोके बिना चलैत रहैत अछि; आ पोखरि दिस जाएबला बाट वल्कलक कोनसँ टपकल पानिक बूँदक लकीरसँ चिह्नित अछि। सारथि: सभटा लक्षण मेल खाइत अछि। राजा: (किछु आगाँ बढ़ैत) आओर देखू— उफनैत नहरिक धारासँ गाछक जड़ि धुइल अछि; घृताहुतिक उठैत धुँआमे लताक कोमल पातक चमक घुलि गेल अछि; आ एतय, जाहि हरियर मैदानमे कुशक कोमल अङ्कुर काटल गेल अछि, ओतय मृगशावक निश्चिन्त भऽ अलसा कऽ चरि रहल अछि। आश्रमवासी सभकेँ कोनो बाधा नहि होअय! एहि किनारपर रथ रोकू, हम उतरब। सारथि: लगाम थिर कऽ देल अछि। उतरू, महाराज। राजा: (उतरैत) आश्रममे विनम्र वेशमे प्रवेश करबाक चाही। अतः ई सभ सम्हारू। (आभूषण सारथिकेँ दैत आ धनुष उतारि रखैत छथि।) सारथि! महर्षि सभकेँ प्रणाम कऽ हम जाबत धरि घुरैत छी, ताबत घोड़ाक पीठपर पानि छिड़कि ओकरा शीतल करू। सारथि: जेना महाराजक आज्ञा। (प्रस्थान करैत अछि।) राजा: (चारू दिस देखैत चलैत) एहि द्वारसँ आश्रममे प्रवेश करब। (प्रवेश करैत छथि; बाँहि फड़कबाक अपशकुन देखबैत विचार करैत छथि।) आश्रमक भूमि शान्त अछि, तैयो हमर बाँहि फड़कैत अछि। एतय ई कोना भऽ सकैत अछि? अथवा, जे होएबाक अछि, ओकर द्वार सभ ठाम खुलल रहैत अछि। नेपथ्यमे: एहि बाट, एहि बाट, प्रिय सखी सभ! राजा: (कान दऽ) अहा! पुष्पवृक्षक बाटक दहिना दिस किछु गप-सप सुनाइ पड़ैत अछि।* हम ओतय जाइत छी। (घुमैत आ देखैत) तपस्वी सभक पुत्री सभ अपन आकारक अनुरूप छोट-छोट कलशसँ नव गाछ सभमे पानि दैत एहि दिस आबि रहल छथि। (रसज्ञ दृष्टिसँ देखैत) अहो! देखबामे कतेक सुन्दर छथि! हम एहि छाहरिमे नुका कऽ ठाढ़ रहैत छी। (देखैत रहैत छथि।) वर्णित काज करैत शकुन्तला दू सखीक संग प्रवेश करैत छथि। सखी सभ: प्रिय शकुन्तला! हमरा सभकेँ लगैत अछि जे पिता काश्यपकेँ आश्रमक गाछ सभ अहूँसँ बेसी प्रिय छथि; तें तँ नवमल्लिका जकाँ कोमल अहाँकेँ हुनकर थाल भरबाक काज देलनि अछि। शकुन्तला: ई केवल पिताक आज्ञा नहि, हमर अपन श्रद्धा सेहो अछि। सचमुच हम एहि गाछ सभक प्रति बहिन-जकाँ स्नेह अनुभव करैत छी। (गाछमे पानि देबाक अभिनय करैत छथि।) दुनू: प्रिय शकुन्तला! ग्रीष्ममे फूलनिहार वृक्ष सभक बाड़ी पानिसँ तृप्त भऽ गेल। आब चलू, जाहि गाछक फूलबाक ऋतु नहि अछि, ओकरो पानि दी; तखन कदाचित् अनपेक्षित पुण्य भेटत। शकुन्तला: अहाँ सभक बात प्रशंसनीय अछि। (पानि देबाक अभिनय करैत छथि।) राजा: (आश्चर्यसँ देखैत) की! ई कण्वक पुत्री छथि? अद्भुत! राजमहलक अन्तःपुरमे सेहो दुर्लभ एहन रूप जँ आश्रमवासिनीक अछि, तँ निश्चित रूपेँ वनक लता गुणमे उद्यानक लताकेँ पछाड़ि देने अछि। नीक। एहि गाछक ओटमे नुका कऽ, सङ्कोचमुक्त ओकर स्वाभाविक व्यवहार देखब। (ओहिना करैत छथि।) शकुन्तला: ई बकुल-वृक्ष अपन पवनसँ हिलैत लता-जकाँ अङुरीसँ मानो हमरा जल्दी बजा रहल अछि। हम एकर सेवा करैत छी। (राजाक लग अबैत छथि।) राजा: (देखैत) पूज्य काश्यप अवश्य अन्हर छथि जे एकरा आश्रमक कठिन काजमे लगबैत छथि। जे मुनि एहि निष्कपट मनोहर देहकेँ तपस्याक कष्ट सहबाक योग्य बनाबय चाहैत छथि, ओ निश्चितहि नीलकमलक पाँखुरिक धारसँ कठोर समिधा काटय निकलल छथि। शकुन्तला: प्रिय अनसूया! प्रियंवदाक कसिकऽ बान्हल वल्कल-वस्त्र हमरा जकड़ि लेने अछि। कृपा कऽ एकरा ढील करू। (अनसूया ढील करैत छथि।) प्रियंवदा: (मुस्कुराइत) एहि लेल अपन यौवनकेँ डाँटू, जे अहाँक स्तनकेँ बढ़ा रहल अछि। राजा: मानैत छी जे वल्कल ओकर नवयौवनक अनुरूप नहि अछि, तैयो ई ओकर सौन्दर्य बढ़ेबामे विफल नहि भेल अछि। कोना? शैवालमे उलझल कमल सेहो सुन्दर लगैत अछि; चन्द्रमाक कलङ्क, दोष होइतहुँ, ओकर शोभा बढ़बैत अछि; ई कृशाङ्गी कन्या वल्कल पहिरने सेहो अत्यन्त मोहक लगैत छथि। मनोहर आकृतिक लेल एहन की अछि जे आभूषण नहि बनि सकय? प्रियंवदा: प्रिय शकुन्तला! एहि प्राकृतिक मण्डपमे माधवी-लता अछि, जकरा पिता काश्यप अहाँहि जकाँ पालने छथि। एकर देखभाल करू। अथवा, एकरा बिसरि गेलहुँ? शकुन्तला: अपने केँ बिसरब तखनहि एकरा बिसरब। (एतबा कहि ओतय जाइत छथि।) प्रियंवदा: प्रिय शकुन्तला! बकुल-वृक्षक ठीक लग एक क्षण ठहरू। शकुन्तला: किएक? प्रियंवदा: अहाँ ओकर लग ठाढ़ छी तँ हमरा लगैत अछि मानो कोनो लता बकुल-वृक्षकेँ आलिङ्गन कएने हो। शकुन्तला: तें तँ अहाँक नाम प्रियंवदा—‘मधुर वचन कहनिहार’—अछि। राजा: एकर बात मधुरो अछि आ सत्यो। कारण, एकर— नव लताक कोँपल-जकाँ ओकर निचला ठोरक रङ्ग अछि, ओकर बाँहि कोमल डाढ़िक अनुकरण करैत अछि; फूल-जकाँ वाञ्छनीय यौवन ओकर देहमे खिलबाक लेल तैयार अछि। अनसूया: प्रिय शकुन्तला! ई नवमल्लिका चमेली अछि—ओहि आम-वृक्षक वधू, जकर नाम अहाँ ‘वनतोषिणी’ राखने छलहुँ आ जकरा ई अपन वर चुनने अछि। शकुन्तला: (लग जा कऽ देखैत) सखी! जड़िसँ जल पिबनिहार एहि जोड़ीक मिलन बड़ शुभ समयमे भेल अछि। ई नव फूलसँ यौवनवती अछि, आ फलसँ लदल आम-वृक्ष उपभोगक योग्य भेल अछि। (एकटक देखैत रहैत छथि।) प्रियंवदा: प्रिय अनसूया! बुझैत छिऐ जे शकुन्तला ‘वनतोषिणी’केँ एतेक अनुरागसँ किएक देखैत अछि? अनसूया: हम नहि बुझि पबैत छी। प्रियंवदा: ई सोचि रहल अछि—‘जेना नवमल्लिका योग्य वृक्ष वनतोषिणीसँ मिलल अछि, तहिना हमरो योग्य वर भेटय।’ शकुन्तला: ई तँ तोरे मोनक इच्छा होएत! (कलश खाली करैत छथि।) राजा: की ई कुलपतिक कुलसँ भिन्न कुलमे जन्मल छथि?* अथवा— निःसन्देह ई क्षत्रियक संग विवाहक योग्य छथि, कारण हमर हृदय हुनका चाहैत अछि। सज्जनक अन्तःकरणक प्रवृत्ति सन्देहक विषयमे प्रमाण मानल जाइत अछि। तैयो हम हुनकर वास्तविक परिचय जानय चाहैत छी। शकुन्तला: (भौंराक आक्रमणक अभिनय करैत) अहा! पानि छिड़कला सँ घबरायल एकटा भौंरा चमेली छोड़ि आब हमर मुँहपर आक्रमण कऽ रहल अछि। (भौंरा हटेबाक अभिनय करैत छथि।) राजा: (लालसापूर्वक देखैत) हे भौंरा! तूँ बेर-बेर ओकर चञ्चल आँखि छुबैत छह, जाहिसँ ओ काँपि उठैत अछि; ओकर कानक लग जा मधुर गुनगुनाइत छह, मानो कोनो गुप्त बात कहि रहल हो; आ जखन ओ हाथ हिला कऽ तोरा हटबैत अछि, तखन तूँ ओकर निचला ठोरसँ प्रेमक रस पिबैत छह। हम देवताक विधानसँ चकित आ विफल छी, आ तूँ सफलता भोगि रहल छह। शकुन्तला: सखी सभ! हमर रक्षा करू; ई फूलक चोर हमरा सतबैत अछि! दुनू: (हँसैत) हम सभ के छी अहाँक रक्षा करनिहार? दुष्यन्तकेँ बजाउ! तपोवन राजाक संरक्षणमे रहैत अछि। राजा: अपना केँ प्रकट करबाक ई उचित अवसर अछि। (लग अबैत) भय नहि करू! भय नहि करू! (बीचहिमे रुकि, अपना मोनमे) एहि प्रकारेँ हम अपना केँ राजा स्वीकार कऽ लेब। नहि, रहय दिअ। हम अतिथिक रूपमे सत्कार ग्रहण करब। शकुन्तला: (काँपैत) ई ढीठ दुष्ट हमरा छोड़ि नहि रहल अछि। हम दोसर ठाम जाइत छी। (परदाक पाछाँ जा कऽ झाँकैत छथि।)* हाय! एतहु ई हमर पाछाँ किएक आबि गेल? राजा: (शीघ्रता सँ लग अबैत) जखन पुरुवंशी दुष्ट-दमनकर्ता राजा पृथ्वीपर शासन कऽ रहल छथि, तखन आश्रमक निर्दोष कन्या सभकेँ सताबय के साहस करैत अछि? राजाकेँ देखि सभ किछु घबड़ा जाइत छथि। अनसूया: घबड़यबाक कोनो कारण नहि अछि। हमर ई प्रिय सखी एकटा भौंरासँ व्याकुल भऽ डरि गेलीह। (शकुन्तलाकेँ आगाँ करैत छथि।) राजा: (शकुन्तलाक लग जा कऽ) आर्ये! अहाँक तपस्या निर्विघ्न चलि रहल अछि? शकुन्तला: (चुप रहैत, लजा कऽ नीचाँ देखैत छथि।) अनसूया: (राजासँ) एहन विशिष्ट अतिथि भेटलाक बाद आब अवश्य निर्विघ्न अछि। प्रियंवदा: आर्य, स्वागत अछि! अनसूया: प्रिय शकुन्तला! पर्णकुटीसँ मिश्रित फल-अर्घ्य आनू। चरण धोबाक पानि एतय अछि। राजा: अपने सभ कष्ट नहि करू! अहाँ सभक स्नेहपूर्ण बातचीतए अतिथि-सत्कारक विधि पूरा कऽ देलक अछि। प्रियंवदा: तँ आर्य, एहि सप्तपर्ण-वृक्षक चारू दिस बनल, ओकर छाहरिसँ शीतल वेदीपर बैसू आ थाकनि मेटाउ। राजा: धार्मिक काजसँ अहूँ सभ अवश्य थाकल होएब; अतः किछु काल बैसू। प्रियंवदा: (धीरे सँ) प्रिय शकुन्तला! अतिथिक सेवा करब हमर धर्म अछि। चलू, एतहि बैसैत छी। (सभ स्त्री बैसि जाइत छथि।) शकुन्तला: (अपना मोनमे) ई की भऽ रहल अछि? हिनका देखिते हमर मोनमे एहन भाव जागि उठल, जे एहि तपोवनक अनुकूल नहि अछि। राजा: (सभकेँ देखैत) अहा! समान आयु आ समान सौन्दर्यक कारण अहाँ सभक मैत्री अत्यन्त मनोहर अछि। प्रियंवदा: (धीरे सँ) अनसूया! ई सुन्दर आ गम्भीर चाल-ढालबला पुरुष के छथि? स्नेहपूर्ण कोमल वचन कहैत हमरा सभक प्रति असाधारण आदर देखबैत छथि। अनसूया: (धीरे सँ) सखी, हमरो जिज्ञासा अछि। हम पूछैत छी। (जोर सँ) आर्यक कोमल वचनसँ उत्पन्न विश्वास हमरा गप कहबाक साहस दऽ रहल अछि। आर्य कोन कुलकेँ सुशोभित करैत छथि? आ कोन कारणेँ एहन सुसंस्कृत पुरुष तपोवन अबाक कष्ट उठौलनि? शकुन्तला: (अपना मोनमे) हे हृदय! धैर्य धर। अनसूया ओहि बातक प्रश्न कऽ देलक, जे तूँ जानय चाहैत छलह। राजा: (अपना मोनमे) आब अपन परिचय कोना दी? अथवा अपन वास्तविक परिचय कोना नुकाबी? नीक, हम एकरा ई कहैत छी। (जोर सँ) आर्ये! हम वेदज्ञ ब्राह्मण छी; पौरव राजाक द्वारा धर्म-व्यवस्थाक निरीक्षण लेल नियुक्त कएल गेल छी।* तपस्वी सभक अनुष्ठानमे कोनो बाधा तँ नहि पड़ि रहल अछि, से देखय एहि पवित्र वनमे आएल छी। अनसूया: धर्माचरण करनिहार सभकेँ समर्थ रक्षक भेटलनि! शकुन्तला: (प्रेमासक्त लज्जाक अभिनय करैत छथि।) सखी सभ: (दुनूक दशा बुझि, दर्शक दिस) प्रिय शकुन्तला! एखन पिता एतय रहितथि तँ... शकुन्तला: (भौंह सिकोड़ैत) तँ की होइत? दुनू: तँ अपन प्राणसँ प्रिय निधि दऽ एहि अतिथिक सत्कार करितथि। शकुन्तला: (रुष्ट भऽ) धत्! हट! अपने मोनक कल्पना बना कऽ अनर्गल बजैत छह। हम नहि सुनब। (मुँह फेरि ठाढ़ रहैत छथि।) राजा: हमहूँ अहाँ दुनूसँ अपन सखीक विषयमे किछु पूछय चाहैत छी। दुनू: आर्य! अहाँक प्रश्न हमरा सभपर अनुग्रह अछि। राजा: पूज्य काश्यप निरन्तर ब्रह्मचर्यक पालन करैत छथि, आ ई अहाँ सभक सखी हुनकर पुत्री कहल जाइत छथि। ई कोना सम्भव अछि? अनसूया: सुनू आर्य! कौशिक वंशमे एक महान राजर्षि छथि।* राजा: हुनकर यश सर्वविदित अछि। अनसूया: हुनकेँ हमर सखीक जन्मदाता बुझू। त्यागल गेलाक बाद रक्षा-पोषण कएलाक कारण पिता काश्यप हुनकर पालक पिता छथि। राजा: ‘त्यागल गेल’ ई बात हमर जिज्ञासा बढ़ा देलक। आरम्भसँ सभटा सुनय चाहैत छी। अनसूया: बहुत पहिने, जखन राजर्षि कौशिक कठोर तपस्या कऽ रहल छलाह, तखन देवता सभ अत्यन्त भयभीत भऽ हुनकर तप भङ्ग करबाक लेल अप्सरा मेनकाकेँ पठौलनि। राजा: देवता सभ सचमुच दोसरक गहन तपसँ डराइत छथि। तकर बाद की भेल? अनसूया: तखन, वसन्तक आरम्भमे, ओ मेनकाक मादक रूप देखलनि... (लज्जासँ बीचहिमे रुकि जाइत छथि।) राजा: आओर कहबाक आवश्यकता नहि! शेष बात बुझल जा सकैत अछि... ई अप्सराक पुत्री छथि! अनसूया: हँ, ठीक। राजा: तखन बात उचित लगैत अछि। एहन रूप मनुष्यलोकमे कोना जन्मि सकैत छल? चञ्चल प्रभासँ चमकनिहार बिजुरी धरतीसँ उत्पन्न नहि होइत अछि। शकुन्तला: (भूमि दिस देखैत रहैत छथि।) राजा: (अपना मोनमे) हमर इच्छा पहुँचक भीतर अछि! तैयो, सखीक परिहासमे हुनका लेल वरक कामना सुनलाक बादो हमर डरपोक हृदय विश्वास नहि कऽ रहल अछि। प्रियंवदा: (मुस्कुरा कऽ शकुन्तला दिस देखि, राजासँ) लगैत अछि आर्य आओर किछु कहय चाहैत छथि। शकुन्तला: (अङुरी उठा कऽ सखीकेँ धमकबैत छथि।) राजा: अहाँ ठीक बुझलहुँ। सज्जनक आचरण सुनबाक इच्छासँ हम एकटा आओर प्रश्न पूछय चाहैत छी। प्रियंवदा: तँ सङ्कोच नहि करू। तपस्वी सभकेँ अपन लोक बुझल जा सकैत अछि। राजा: अवश्य, आर्ये। हम अहाँक सखीक विषयमे ई जानय चाहैत छी— की विवाह होएबा धरि ई तपस्विनीक व्रत पालैत, कामदेवक प्रयास विफल करैत रहत? अथवा अपन आँखि-जकाँ आँखिबाली प्रिय हरिणी सभक संग सदाक लेल एतहि रहत? प्रियंवदा: आर्य! धार्मिक काजमे सेहो ई दोसरक अधीन छथि। हुनकर गुरु हुनका योग्य वरकेँ देबाक निश्चय कऽ चुकल छथि। राजा: एहि इच्छाक पूर्ति कठिन नहि होएत। (अपना मोनमे) हे हृदय, आशासँ भरि जा; सन्देहक गाँठि खुजि गेल। जकरा तूँ अग्नि बुझि डराइत छलह, से छुबय योग्य रत्न अछि। शकुन्तला: (रुष्ट देखाइत) अनसूया! हम जाइत छी! अनसूया: की भेल? शकुन्तला: पूज्या गौतमीकेँ जा कऽ कहब जे प्रियंवदा अनर्गल बजैत अछि। (एतबा कहि उठि ठाढ़ होइत छथि।) अनसूया: सखी! आश्रमवासी लेल ई उचित नहि जे विशिष्ट अतिथिक पूरा सत्कार कएने बिना अपन इच्छासँ उठि चलि जाय। शकुन्तला: (बिना किछु कहने चलि पड़ैत छथि।) राजा: (अपना मोनमे) की? ई जा रहल छथि? (रोकय चाहैत, फेर अपना केँ रोकैत) अहा! प्रेमीक मनक प्रवृत्ति ओकर देहक गतिमे प्रकट भऽ जाइत अछि। कारण हम— मुनिक पुत्रीक पाछाँ जेबाक लेल उद्यत भेलहुँ, मुदा मर्यादा अचानक हमर गति रोकि देलक। हम अपन स्थानसँ हिललहुँ नहि, तैयो एना लगैत अछि मानो जा कऽ घुरि आएल छी। प्रियंवदा: (शकुन्तलाक लग जा कऽ) हे रुष्टे! अहाँक एना चलि जेब उचित नहि। शकुन्तला: (घुरि, भौंह सिकोड़ैत) किएक नहि? प्रियंवदा: अहाँपर हमर दू बेर गाछ सींचबाक ऋण अछि। पहिने ओ ऋण चुकाउ, तखन जाइ सकैत छी। (बलपूर्वक रोकैत छथि।) राजा: भद्रे! हम देखैत छी जे गाछ सभमे पानि दैत ई थाकि गेलीह। कारण, हुनकर— काँध शिथिल भऽ गेल अछि, कलश खाली करैत-करैत हथेली गाढ़ लाल भऽ गेल अछि; एखनो साँस सामान्यसँ बेसी तेज चलि रहल अछि, जाहिसँ स्तन काँपि रहल अछि; मुँहपर पसेनाक महीन जाल लागल अछि, जे कानक शिरीष-पुष्पक खेलमे बाधा दैत अछि; आ केशबन्ध ढील होइत, एक हाथसँ उद्दाम केश सम्हारि रहल छथि। अतः अहाँक ऋण हम चुका दैत छी। (अपन अङूठी दैत छथि।) दुनू: (मुद्रापर अंकित नामक अक्षर पढ़ि, एक-दोसराक मुँह दिस देखैत छथि।) राजा: हमरा ओ नहि बुझू जे हम नहि छी। ई राजाक देल उपहार अछि। प्रियंवदा: तखन ई राजमुद्रिका अहाँसँ अलग नहि होअय। आर्यक वचनपर हम एकर ऋण माफ कऽ देलहुँ। (घुरि, धीरे सँ) प्रिय शकुन्तला! दयालु आर्य अहाँकेँ मुक्त कऽ देलनि—अथवा कहू, महाराज मुक्त कऽ देलनि। आब अहाँ हुनकर ऋणी भऽ गेलहुँ। शकुन्तला: (दीर्घ श्वास लैत, धीरे सँ) जँ फेर अपन स्वतन्त्रता भेटल, तँ ई बात बिसरल नहि जाएत। प्रियंवदा: सखी! आब किएक नहि जा रहल छी? शकुन्तला: आब हमरा आदेश देनिहार तूँ के? जखन हमर मोन होएत, तखन जाएब। राजा: (शकुन्तला दिस देखि, अपना मोनमे) की हुनकरो मोनमे हमर प्रति ओहने भाव अछि जे हमर मोनमे हुनका प्रति? नहि, आब हमर आशाकेँ सहज घाट भेटि गेल अछि। किएक? ओ अपन बात हमर बातक संग नहि मिलबैत छथि, तैयो हम बजैत छी तँ ध्यानसँ सुनैत छथि। मानल जे हमर दिस मुँह नहि करैत छथि, मुदा हुनकर आँखि प्रायः आन कतहु टिकैत नहि अछि। नेपथ्यमे: हे तपस्वी सभ! तपोवनक पशु सभक रक्षा लेल सावधान होउ! स्त्री आ बालक सभ सङ्कटमे छथि! राजा लगहिमे मृगया कऽ रहल छथि! हुनकर घोड़ाक खुरसँ उठल धूरि, साँझक लाली-जकाँ लाल चमकैत, टिड्डीक दल जकाँ ओहि आश्रम-वृक्ष सभपर खसि रहल अछि, जकर डाढ़िमे भीजल वल्कल लटकल अछि। हाय, अनर्थ! ई एकाकी रथ देखिते भयभीत ई हाथी, जकर एक दाँत प्रचण्ड प्रहारसँ टूटल गाछक टुकड़ामे फँसल अछि, आ विशाल व्रतती-लताक उलझल फन्दा बेड़ी बनि ओकर देहमे लपटायल अछि, हरिणक झुण्ड तितर-बितर करैत पवित्र वनकेँ उखाड़ि-पछाड़ि रहल अछि— मानो हमर तपस्याक साक्षात् विघ्न हो। राजा: (अपना मोनमे) हाय! कतेक असावधानी भेल। हमरा खोजैत सैनिक सभ तपोवनमे उपद्रव कऽ रहल अछि। एहि प्रकारेँ हम तपस्वी सभक अपराधी भेलहुँ। नीक, हमरा जेबाक चाही! अनसूया: (व्याकुल) आर्य! एहि कोलाहलसँ हम सभ डरि गेलहुँ। पर्णकुटीमे चलि जेबाक अनुमति दिअ। राजा: (चिन्तित) जाउ, आर्यागण। आश्रमकेँ कोनो हानि नहि होअय, से हम देखब। सखी सभ: अतिथि-सत्कारक विधि पूरा कएने बिना फेर भेटबाक निवेदन करैत लज्जा होइत अछि। आब हम सभ अहाँकेँ लगभग परिचित मानि लेने छी; अतः हमर आचरणकेँ उदारतासँ क्षमा कऽ देब। राजा: कदापि नहि, कदापि नहि! अहाँ सभक दर्शनहि हमरा पूर्ण अतिथि-सत्कार दऽ देलक अछि। दुनू: प्रिय शकुन्तला! जल्दी चलू! आर्या गौतमी चिन्ता करतीह। शकुन्तला: (बहाना कऽ विलम्ब करैत, अपना मोनमे) हाय! जाँघमे ऐंठन उठि गेल, डेग उठब कठिन भऽ रहल अछि। राजा: सावधानीसँ जाउ, धीरे जाउ। आश्रमक उपद्रवक कारणकेँ हम दूर करैत छी। शकुन्तला: (कोनो बहाना कऽ किछु देर घुमैत छथि, फेर सखी सभक संग प्रस्थान करैत छथि।) राजा: (दुःखी भऽ उठैत) नगर घुरबाक हमर उत्कण्ठा मन्द पड़ि गेल। अपन दलसँ जा मिलब आ तपोवनसँ बहुत दूर नहि पड़ाव करब। शकुन्तलाक चिन्तासँ अपना केँ हटा नहि पबैत छी। कारण— हमर देह आगाँ बढ़ैत अछि, मुदा हृदय पाछाँ छूटल जाइत अछि, जेना पवनक विपरीत लऽ जाएल ध्वजक चिह्नित वस्त्र अपन डण्डामे समायल नहि रहैत अछि। (डगमग डेगसँ विचारमग्न भऽ प्रस्थान करैत छथि।) महाकवि कालिदास-रचित ‘शकुन्तला’ नामक नाटकक प्रथम अङ्क समाप्त। द्वितीय अङ्क: रहस्य थाकल विदूषक प्रवेश करैत अछि। विदूषक: (थाकनिक अभिनय करैत, दीर्घ श्वास लैत) हम तँ चलबाक योग्य नहि रहलहुँ! एहि मृगयाक पागल राजाक सङ्गी बनि-बनि हम ऊबि गेल छी। ‘एतय हरिण! ओतय सूअर!’ कहैत ग्रीष्मक दुपहरियोमे ओहि वनपथपर दौड़ैत रहू, जतय गाछक छाह विरल अछि। पहाड़ी धाराक पातसँ दूषित, तीत आ कषायल, कुनकुना पानि पिबैत छी। असमयमे सीखपर भुजल माँस खाइत छी—अधिकतर चिड़ैक। रातिमे सेहो अपन इच्छासँ देह पसारि नहि सकैत छी; घोड़ागाड़ीक धक्कासँ जोड़-जोड़ ढील भऽ गेल अछि। भोर होइतहि वन जाइत व्याध सभक कान फोड़निहार कोलाहल हमरा जगा दैत अछि—दुष्टक सन्तान सभ! (सोचैत) एहि सभक बादो हमर प्राण नहि निकलल। (कुटिल हँसी हँसैत) आब घावपर फोड़ा आ फोड़ापर फुन्सी! काल्हि हम पाछाँ छूटल छलहुँ, महाराज कोनो हरिणक पाछाँ-पाछाँ आश्रममे घुसि गेलाह आ हमर दुर्भाग्येँ हुनका शकुन्तला नामक तपस्वीक पुत्री देखाइ पड़लीह। आब नगर घुरबाक नामो नहि लैत छथि। आइ भोर धरि हुनकहि स्मरण करैत रहलाह। की कएल जाए? नित्यक स्नान-श्रृंगार पूरा कऽ कतहु होथि, खोजि निकालैत छी। (धीरे-धीरे घुमैत, चारू दिस देखैत) वनफूलक माला पहिरने, धनुषधारी यवन स्त्री-रक्षक सभसँ घेरायल राजा एहि दिस आबि रहल छथि। हम हुनका सामना करैत छी। (किछु आगाँ बढ़ैत) बस, एतबे पर्याप्त! अंग-अंग कुचलल अछि, एतहि ठाढ़ रहब। एना कमसँ कम किछु विश्राम तँ भेटत। (लाठीपर टेक लगा कऽ ठाढ़ होइत अछि।) वर्णित अनुचर सभक संग राजा प्रवेश करैत छथि। राजा: (विचारमग्न दीर्घ श्वास लैत, अपना मोनमे) मानल, हमर प्रेम सहजसँ प्राप्त होएबला नहि अछि, मुदा हुनकर भाव बुझि हमर हृदयकेँ सान्त्वना भेटैत अछि। प्रेमक सिद्धि नहि भेलहुँ, परस्पर अनुरागो आनन्द दैत अछि। (स्मरणक अभिनय करैत मुस्कुराइत) एना कामनासँ व्याकुल प्रेमी अपन इच्छाक अनुसार प्रियाक भाव कल्पना कऽ ठकाइत अछि। कोना? ओ कोमल दृष्टि, जखन आँखि आन दिस छल तैयो; नितम्बक भारसँ मन्द पड़ल चाल, मानो जानि-बूझि छेड़ि रहल हो; ‘अहाँ जा नहि सकैत छी’ कहि रोकनिहार सखीपर ओ क्रोधपूर्ण झिड़की— ई सभ वास्तवमे हमरहि लेल छल! अहा! प्रेम प्रत्येक बातकेँ अपनहि पक्षमे बुझैत अछि। (घुमैत छथि।) विदूषक: (ओतहि ठाढ़) महाराज! हाथ उठि नहि रहल अछि, तें केवल वचनसँ प्रणाम करैत छी। जय हो! जय हो, आर्य! राजा: (मुस्कुराइत देखैत) मित्र! देहमे ई जड़ता कतयसँ? विदूषक: कतयसँ! आँखिमे अङुरी घुसेड़ि फेर पूछैत छी—नोर किएक बहैत अछि! राजा: मित्र! हम सचमुच बुझि नहि रहल छी। विदूषक: (क्रोधक अभिनय करैत) आर्य! की राजधर्म आ उत्कृष्ट ऐश्वर्यपूर्ण जीवन छोड़ि वनरक्षक बनबाक निश्चय कऽ लेलहुँ? सच कहूँ तँ प्रतिदिन जङ्गली पशु-पक्षीक पाछाँ दौड़ैत हमर जोड़-जोड़ उखड़ि गेल, देहपर हमर अधिकार नहि रहल। (विनती करैत) आब दया करू! हमरा छुट्टी दिअ! कमसँ कम एक दिन विश्राम करू। राजा: (अपना मोनमे) मित्र एना आग्रह कऽ रहल अछि, आ कण्वक पुत्रीमे लागल हमर हृदय सेहो मृगयासँ विमुख अछि। किएक? जे हरिणशावक हमर प्रियाक संग रहैत मानो हुनका निष्कपट चितवन सिखौने अछि, ओकरा सभपर बाण चढ़ाओल ई तानल धनुष आब हम मोड़ि नहि पबैत छी। विदूषक: (राजाक मुँह दिस देखैत) आर्य! अहाँ मोनमे किछु गम्भीर विचार कऽ रहल छी। हम तँ वनमे पुकारैत रहि गेलहुँ। राजा: (हलुक मुस्कुरा कऽ) आन कोना भऽ सकैत अछि? मित्रक वचनक अवज्ञा हम कहियो नहि करब। एतहि ठहरैत छी। विदूषक: चिरञ्जीवी होउ! राजा: ठहरू! आओर बात अछि। विदूषक: आज्ञा दिअ, महाराज! राजा: विश्राम कऽ लेलाक बाद एकटा आओर सहज काजमे हमर सहायता करबाक अछि। विदूषक: (लोभसँ) लड्डू-पूआ चखबाक? राजा: की काज अछि, कहैत छी... विदूषक: धीरे-धीरे कहू।* राजा: के उपस्थित अछि? (प्रवेश करैत) द्वारपाल: स्वामी, आज्ञा! राजा: रैवतक! सेनापतिकेँ तुरन्त बजाउ। द्वारपाल: जेना स्वामीक आज्ञा। (एतबा कहि प्रस्थान करैत अछि।) सेनापति आ द्वारपाल प्रवेश करैत छथि। सेनापति: (राजा दिस देखैत) यद्यपि मृगया व्यसन मानल जाइत अछि, मुदा हमर स्वामीक लेल ई लाभदायक सिद्ध भेल अछि। कारण— निरन्तर धनुषक डोरी लगलासँ देहक अगिला भाग काँच भऽ गेल अछि; सूर्यक किरण सहैतहुँ पसेना नहि निकलैत; देह दुबरायल अछि, मुदा मांसपेशीक पुष्टतासँ से देखाइत नहि; ओ पहाड़मे विचरण करनिहार हाथी-जकाँ प्रबल जीवनीशक्ति देखबैत छथि! द्वारपाल: स्वामी ओतय गप सुनैत, एहि दिस दृष्टि कऽ अहाँक प्रतीक्षा कऽ रहल छथि। आगाँ बढ़ू, आर्य! सेनापति: (प्रणाम करैत लग अबैत) जय हो, जय हो, सेनानायक! वनक हिंसक पशु सभ घेरि लेल गेल अछि, वन विचरणक योग्य अछि। आब प्रतीक्षा कोन बातक? राजा: माधव्य मृगयाक निन्दा कऽ हमर उत्साह मन्द कऽ देलक अछि। सेनापति: (अपना मोनमे) माधव्य! अपन विरोधपर अटल रह! हम स्वामीक मनोभाव जाँचैत छी।* (जोर सँ) सेनानायक! ई मूर्ख अनर्गल बजैत अछि। महाराज स्वयं मृगयाक गुणक प्रत्यक्ष प्रमाण छथि। पातर कमर आ कसावदार देह हलुक भऽ निर्भीक साहसक योग्य बनैत अछि; भय आ क्रोधसँ जङ्गली पशुक स्वभावक परिवर्तन सेहो देखाइत अछि; आ चलैत लक्ष्यपर बाण लगबैक जे उल्लास धनुर्धरकेँ भेटैत अछि— मृगयाकेँ व्यसन कहि निन्दा करब सरासर मिथ्या अछि; एहन मनोरञ्जन आओर कतयसँ भेटत? विदूषक: (क्रोधक अभिनय करैत) महाराजक बुद्धि फेरि ठेकानपर आबि गेल। अहाँ झाड़ी-झाड़ी भटकैत रहू, जाबत अगुआ सियार जकाँ कोनो बूढ़ भालूक मुँहमे नहि जा पड़ू। राजा: सेनापति! हम सभ आश्रमक निकट छी। अतः अहाँक बात हमरा प्रिय नहि लगल। आइ— महिसि सभ अपन सीङ्गसँ बेर-बेर हिलाओल पोखरिक पानिमे डुबकी लगाबय; हरिणक झुण्ड छाहरिमे जुटि जुगाली करय; बराहक मुखिया सभ निश्चिन्त भऽ पोखरिमे मोथा उखाड़य; आ हमर ई धनुष डोरी ढील कएने विश्राम करय। सेनापति: जेना महाबलीक इच्छा। राजा: तँ वनरक्षक सभकेँ पाछाँ बजाउ। आदेश दिअ जे सैनिक सभ तपोवनसँ दूर रहय। देखू— सामान्यतः शान्त तपस्वी सभक भीतर प्रज्वलित तेज नुका कऽ रहैत अछि; स्पर्शमे सुखद सूर्यकान्त मणि जकाँ, विरोधी तेजसँ आहत होइत ओ अग्नि छोड़ैत अछि। सेनापति: जेना महाराजक आज्ञा। विदूषक: आब चल, दासीक बेटा! सेनापति प्रस्थान करैत छथि। राजा: (अनुचर सभ दिस देखैत) मृगयाक वेश उतारू। रैवतक! अहूँ अपन स्थान खाली नहि छोड़ू। अनुचर: जेना महाराजक आज्ञा। (अनुचर सभ प्रस्थान करैत अछि।) विदूषक: धूप-धुआँ कएने बिना परजीवी सभकेँ भगा देलहुँ। आब आवास-वृक्षक छाहरिसँ घेरल एहि छत्रयुक्त आसनपर सुखसँ बैसू, जाहिसँ हमहूँ आराम कऽ सकी। राजा: आगाँ चलू! (दुनू घुमैत छथि।) दुनू बैसि जाइत छथि। राजा: मित्र माधव्य! अहाँ आँखिक फल नहि पओलहुँ, कारण जे वास्तवमे देखबाक योग्य अछि, से नहि देखलहुँ! विदूषक: अहाँ तँ हमर सोझाँहि छी नहि? राजा: प्रत्येक व्यक्ति अपना केँ सुन्दर बुझैत अछि। हम आश्रमक आभूषण शकुन्तलाक बात कऽ रहल छी। विदूषक: (अपना मोनमे) अहा! एकरा मौका नहि देब। (जोर सँ) जँ ओ वास्तवमे तपस्वीक पुत्री छथि आ विवाहक योग्य नहि, तँ देखलासँ की लाभ? राजा: मूर्ख! दुष्यन्तक हृदय निषिद्ध वस्तुक इच्छा कऽ सकैत अछि? विदूषक: तँ बात की अछि? राजा: कहल जाइत अछि जे मुनिक ई पुत्री ललितान्याद्वारा जन्मल, फेर माताक त्यागलाक बाद अपनाओल गेलीह— जेना अर्कक झाड़ीपर खसल डारिसँ छुटल चमेलीक फूल। विदूषक: महान मुनि काश्यपक स्वाभाविक पुत्री नहि छथि, तखनहुँ हुनका देखलासँ की लाभ? राजा: मूर्खमणि! चन्द्रमाक प्रथम कला देखबाक लेल संसार निःपलक आँखिक पाँति उठा कऽ कतेक काल विषादपूर्वक ताकैत रहैत अछि! आ हमर जकाँ पुरुष लेल ओ, समिधाक बीच खसल अगरुक दहकैत टुकड़ा जकाँ, सर्वथा अप्राप्य कोना भऽ सकैत छथि? विदूषक: (हँसैत) हा! जेना मीठ खजूर खा-खा कऽ ऊबि गेल व्यक्ति खट्ट इमली चाहैत अछि, तहिना उत्कृष्ट स्त्री सभकेँ तिरस्कृत कऽ अहाँकेँ ई लालसा लागल अछि।* राजा: अहाँ हुनका देखने नहि छी, तें एना बजैत छी। विदूषक: जे अहाँकेँ सेहो चकित करय, से अवश्य अत्यन्त सुन्दर होएत! राजा: मित्र! आओर की कहू? की हुनकर चित्र बना कऽ तकरामे प्राण भरल गेल? अथवा सभ मनोहर रूपकेँ एकत्र कऽ हुनकर कल्पना कएल गेल? स्रष्टाक सामर्थ्यक विचार करैत हुनकर देह हमरा स्त्रीरत्न लक्ष्मीक दोसर सृष्टि-जकाँ लगैत अछि। विदूषक: (आश्चर्यसँ) आब तँ सभ सुन्दरीक पद छिनि गेल! राजा: आ ई बात हमर हृदयमे बसल अछि— एहन फूल, जकर सुगन्ध केओ नहि सुँघलक; एहन कोमल पात, जकरा नखसँ केओ नहि तोड़लक; एहन रत्न, जे आभूषणमे नहि जड़ायल; एहन नव मदिरा, जकर आस्वाद एखन धरि नहि लेल गेल। पुण्यक पूर्ण फल-जकाँ एहि निष्कलङ्क रूपक भोक्ता एहि पृथ्वीपर के होएत, हम नहि जानैत छी। विदूषक: तँ तुरन्त विवाह कऽ लिअ, नहि तँ इङ्गुदी तेलसँ चिक्कन माथबला कोनो गँवार तपस्वीक हाथ पड़ि जेतीह! राजा: ओ पराधीन छथि, आ हुनकर अभिभावक अनुपस्थित छथि। विदूषक: नीक, अहाँक प्रति हुनकर हृदयमे की भाव अछि? राजा: मित्र! तपस्वीक पुत्री स्वभावतः लज्जाशील होइत छथि। तैयो— हम सोझाँ भेलहुँ तँ ओ आँखि फेरि लेलनि; मुस्कानकेँ आन कोनो कारणसँ उत्पन्न देखौलनि। अतः मर्यादासँ रोकल हुनकर प्रेम ने पूरा प्रकट भेल, ने पूर्णतया नुकेल। विदूषक: (हँसैत) की अहाँकेँ देखिते हुनका अहाँक कोरामे चढ़ि जेबाक छल? राजा: मित्र! जखन ओ अपन दुनू सखीक संग विदा भेलीह, तखन लज्जाशील रहितहुँ किछु सीमा धरि अपन भाव हमरा बुझा देलनि। कारण— किछुए डेग गेलाक बाद ओ कृशाङ्गी अचानक रुकि कहलनि— ‘हमर पएरमे कुशक अङ्कुर बिझि गेल!’ फेर गाछक डाढ़िमे वास्तवमे नहि फँसल वल्कलकेँ छोड़बैत ओ अपन मुँह पाछाँ घुमौलनि। विदूषक: नीक! यात्राक रसद तँ अहाँकेँ भेटि गेल। हमरा लगैत अछि तपोवनक एहन बहुत यात्रा होएत। राजा: मित्र! आश्रमक भूमिमे फेर जेबाक कोनो बहाना सोचू। विदूषक: सोचि रहल छी... अपन चिढ़ौनिहार रिरियाहटसँ हमर चिन्तनमे बाधा नहि दिअ। (सोचैत) अहा! दोसर बहाना की? अहाँ राजा नहि छी? राजा: तखन? विदूषक: राजा उपजक छठम भाग माँगि सकैत छथि। राजा: मूर्ख! ई तपस्वी अपन रक्षककेँ रत्नक ढेरीसँ बेसी मूल्यवान दोसर कर दैत छथि। देखू— वर्ण सभसँ राजाकेँ भेटनिहार कर नाशवान अछि; वनवासी तपस्वी अपन तपस्याक अविनाशी छठम भाग अर्पित करैत छथि। नेपथ्यमे: नीक भेल! हुनका खोजि लेलहुँ! राजा: (सुनैत) अहा! एहन स्थिर आ शान्त स्वर—अवश्य तपस्वी सभ छथि। द्वारपाल: (प्रवेश करैत) जय हो, जय हो, स्वामी! ई दू युवा तपस्वी द्वारपर उपस्थित छथि। राजा: बिना विलम्ब हुनका भीतर आनू। द्वारपाल: एखनहि अनैत छी। (प्रस्थान करैत अछि।) दू तपस्वी आ द्वारपाल प्रवेश करैत छथि। द्वारपाल: एहि बाट, एहि बाट, आर्यगण। तपस्वी सभ: (राजाकेँ देखैत) अहा! राजसी तेज रहितहुँ हुनकर रूप कतेक विश्वास जगबैत अछि। मुदा ऋषितुल्य राजामे ई स्वाभाविके अछि। कारण— ओहो एखन ओहि जीवन-अवस्थामे छथि जे समस्त लोकक कल्याण करैत अछि। प्रजा-रक्षणक द्वारा ओहो दिन-प्रतिदिन तपस्याक पुण्य सञ्चित करैत छथि; आ आत्मसंयमी हुनकर पवित्र ‘ऋषि’ उपाधि सेहो युगल बन्दीक गीतमे स्वर्ग धरि पहुँचैत अछि— केवल ओकर आगाँ ‘राज’ शब्द जुड़ल अछि। दोसर: गौतम! ई इन्द्रक मित्र दुष्यन्त छथि। पहिल: तखन की? दोसर: तें तँ— जकर बाँहि नगर-द्वारक अर्गला जकाँ दीर्घ अछि, ओ असगरे कृष्ण समुद्रसँ घेरल समस्त पृथ्वीक भोग करैत छथि, एहि मे आश्चर्य की? कारण दानव सभक संग देवताक प्रचण्ड युद्धक विजय हुनकर तानल धनुष आ इन्द्रक वज्रपर निर्भर रहैत अछि। दुनू: (लग अबैत) महाराजक जय हो! (फल अर्पित करैत छथि।) राजा: (आदरसँ उठैत) अहाँ दुनूकेँ प्रणाम करैत छी। (प्रणामपूर्वक आसन ग्रहण कऽ बैसैत छथि।) की आज्ञा अछि? तपस्वी सभ: आश्रमवासी सभकेँ ज्ञात भेल जे महाराज एतय छथि। अतः ओ सभ महाराजसँ निवेदन करैत छथि। राजा: हुनकर की आज्ञा अछि? दुनू: पूज्य मुनि काश्यप अनुपस्थित छथि आ राक्षस सभ हमरा सभकेँ पीड़ित कऽ रहल अछि। अतः सारथिक संग किछु राति आश्रमक रक्षा करबाक कृपा करू। राजा: ई हमर सम्मान अछि। विदूषक: (धीरे सँ) स्वागतक हाथ आब अहाँक गला दबा रहल अछि। राजा: रैवतक! हमर नामसँ सारथिकेँ आज्ञा दिअ—‘धनुष-बाण सहित रथ आनू!’ द्वारपाल: जेना स्वामीक आज्ञा। (प्रस्थान करैत अछि।) तपस्वी सभ: (प्रसन्न भऽ) पूर्वजक मार्गपर चलनिहार अहाँक लेल ई शोभनीय अछि; पुरुवंशक सन्तान सभ सचमुच पीड़ितक भय शान्त करबाक यज्ञक लेल दीक्षित भेल छथि। राजा: आर्यगण, अहाँ सभ आगाँ चलू! हमहूँ तुरन्त पाछाँ अबैत छी। तपस्वी सभ: जय हो! (उठि प्रस्थान करैत छथि।) राजा: माधव्य! शकुन्तलाकेँ देखबाक जिज्ञासा अछि? विदूषक: पहिने तँ जिज्ञासाक सीमा नहि छल। (डराइत) मुदा राक्षसक समाचार सुनि आब ओकर महत्त्व बुझि गेलहुँ; जिज्ञासा सन्देहमे पड़ि गेल अछि। राजा: डेराउ नहि! अहाँ हमर लगहि रहब। विदूषक: रथक पहिया-रक्षक बनब—अर्थात् ठाढ़-ठाढ़ मरबाक लक्ष्य!* द्वारपाल: (प्रवेश करैत) स्वामी! तैयार रथ महाराजक विजयी प्रस्थानक प्रतीक्षा कऽ रहल अछि। मुदा नगरसँ महारानी माताक अनुचर करभक एतय आएल अछि। राजा: (आदरसँ) की? माता पठौलनि?* द्वारपाल: आब की आज्ञा? राजा: ओकरा भीतर आनू! द्वारपाल: जेना महाराजक आज्ञा। (प्रस्थान करैत अछि।) करभक द्वारपालक संग प्रवेश करैत अछि। करभक: (लग अबैत) जय हो! जय हो, महाराज! महारानी कहौने छथि—‘आगामी शुक्ल चतुर्थीकेँ* पुत्र-जन्म सुनिश्चित करनिहार “पुंसवन” संस्कार होएत। एहि अवसरपर महाराजक उपस्थित रहब आवश्यक अछि।’ राजा: (व्याकुल) माधव्य! एक दिस तपस्वी सभक प्रति हमर कर्त्तव्य अछि, दोसर दिस पूज्या माताक आज्ञा। दुनूमे सँ कोनो एकर उल्लङ्घन नहि कऽ सकैत छी। एहि स्थितिमे की करू? विदूषक: त्रिशङ्कु जकाँ बीचहिमे लटकल रहू।* राजा: सचमुच हम दुविधामे पड़ि गेलहुँ। दुनू कर्त्तव्य अलग-अलग स्थानमे पूरा करबाक अछि, तें हमर मन दू भागमे बँटि गेल अछि— जेना बाटमे पाथर पड़लासँ नदीक धारा दू शाखामे विभक्त भऽ जाइत अछि। (व्याकुल भऽ सोचैत) मित्र माधव्य! माता अहाँकेँ पुत्र-जकाँ स्नेह दैत छथि। अतः कृपा कऽ एतयसँ घुरि जाउ आ पुत्रक कर्त्तव्य हमर स्थानपर पूरा करू। हुनका कहबनि जे तपस्वी सभक काजेँ हम एतय रोकल गेल छी। विदूषक: (अकड़ि कऽ) ओह, बुझि गेलहुँ! अहाँ सोचैत छी जे हम एहि राक्षस सभसँ डराइत छी। राजा: (मुस्कुराइत) महाब्राह्मण! अहाँक विषयमे ई कल्पनो नहि कएल जा सकैत अछि। विदूषक: तखन राजाक स्नेहवश हमरा जेबाक अछि तँ जाएब। राजा: तपोवनमे बाधा नहि पड़य, एहि लेल पूरा सेना-दल अहाँक संग पठा देब। विदूषक: (फूलि कऽ) आब हम युवराज भऽ गेलहुँ। राजा: (अपना मोनमे) ई बड़ बातूनी अछि। महलक अन्तःपुरमे रानी सभक आगाँ हमर प्रेमक भेद खोलि देत। नीक, एकरा ई कहैत छी... (जोर सँ, विदूषकक हाथ पकड़ैत) मित्र! हम ऋषि सभक सम्मानवश आश्रम जा रहल छी। तपस्वीक पुत्रीक प्रति हमर स्नेहमे कोनो गम्भीरता नहि। देखू— एक दिस हम सभ, आ दोसर दिस हरिणशावक सभक संग पलल, प्रेमसँ अपरिचित ओ कन्या। मित्र, परिहासमे गढ़ल बातकेँ सत्यक घोषणा नहि बुझू! विदूषक: हँ-हँ, निश्चय! सभ प्रस्थान करैत छथि। महाकवि कालिदास-रचित ‘शकुन्तला’ नामक नाटकक द्वितीय अङ्क समाप्त। तृतीय अङ्क: प्रेम-दाह यज्ञ-पुरोहितक शिष्य प्रवेश करैत अछि। शिष्य: (कुश लेने) अहा! दुष्यन्तक सामर्थ्य कतेक महान अछि! महाराज सारथिक संग आश्रमक भूमिमे प्रवेश कएलनि मात्र, राक्षसक उपद्रव दूर भऽ गेल आ हमर अनुष्ठान निर्विघ्न सम्पन्न भऽ रहल अछि। बाण चढ़ेबाक आवश्यकता की? दूरहिसँ धनुषक डोरीक टङ्कार द्वारा, मानो धनुषक धमकीपूर्ण गर्जनसँ, ओ उपद्रवी सभकेँ भगा दैत छथि। ई कुश पुरोहित सभक लग लऽ जाएब, जाहिसँ ओ वेदीपर बिछा सकथि। (आगाँ बढ़ैत, नेपथ्य दिस) प्रियंवदा! उशीरक लेप आ कमल-पातक रेशासँ लपेटल पत्ता केकर लेल लऽ जा रहल छह? (सुनबाक अभिनय करैत) की कहलह? ‘शकुन्तला लू लगलासँ अत्यन्त अस्वस्थ छथि; हुनकर ताप शान्त करबाक लेल।’ अहा! अपन सखीक सावधानीसँ सेवा कर; ओ हमर कुलपतिक प्राण छथि। हमहूँ गौतमीक हाथेँ तुरन्त मन्त्रपूत शीतल जल पठबैत छी। (प्रस्थान करैत अछि।) प्रवेशक समाप्ति। प्रेमासक्त राजा प्रवेश करैत छथि। राजा: (विचारमग्न) हम तपस्याक शक्ति जानैत छी, आ ईहो बुझैत छी जे कन्या पराधीन छथि; तैयो अपन हृदयकेँ हुनकासँ फेरि नहि पबैत छी। (उदास) हे कामदेव! ई सभ जानितहुँ अहाँ हमरा पर दया नहि करैत छी। फूलकेँ शस्त्र बनबैतहुँ एतेक कठोर कोना छी? (सोचैत) हँ, बुझि गेलहुँ— अवश्य एखनो शिवक क्रोधाग्नि समुद्रक भीतर बड़वानल जकाँ अहाँक भीतर सुलगि रहल अछि; नहि तँ हे मन-मथनकर्ता, राख भऽ गेलहुँ अहाँ हमर जकाँ लोकपर एतेक उग्र कोना होइतहुँ? (रोषसँ) हे पुष्पधन्वा! अहाँ आ चन्द्रमा—जिनका विश्वसनीय होएबाक चाही—प्रेमी सभक यात्रादलपर आक्रमण किएक करैत छी? अहाँक बाण फूलक अछि आ चन्द्रमाक किरण शीतल— हमर जकाँ प्रेमीक लेल ई दुनू बात स्पष्टतः मिथ्या अछि; चन्द्रमा अपन हिम-जकाँ किरणसँ आगि बरसैत अछि, आ अहाँ पुष्पबाणकेँ वज्र-जकाँ कठोर बना दैत छी! (उदास) पुरोहित सभक अनुष्ठान पूरा भऽ गेल। आब किछु अवकाश भेटल अछि तँ थाकल मनकेँ कतय विश्राम दी? (दीर्घ श्वास लैत) प्रियाक दर्शन छोड़ि हमर आओर आश्रय की? हुनका खोजय पड़त। (सूर्य दिस देखैत) एहि प्रचण्ड दुपहरियामे ओ सखी सभक संग मालिनी नदीक ओहि तटपर रहैत छथि, जे लता-मण्डपसँ घेरल अछि। हम ओतहि जाइत छी। (आगाँ बढ़ैत, पवनक सुखद स्पर्शक अभिनय करैत) अहा! शीतल समीरसँ ई स्थान कतेक सुखद अछि। कामसँ शिथिल अपन अङ्गसँ मालिनीक लहरिक छींट लेने, कमलक सुगन्धबला एहि पवनकेँ हम मानो गाढ़ आलिङ्गन कऽ सकैत छी। (घुमैत आ देखैत) शकुन्तला अवश्य नरकटसँ घेरल एहि झाड़ी-मण्डपमे छथि। कारण— (नीचाँ देखैत) एकर प्रवेश-द्वारक उज्जर बालूपर नव पएरक चिह्नक पाँति देखाइत अछि; अगिला भाग हलुक, आ नितम्बक भारसँ पछिला भाग गहिर दबायल अछि। डाढ़िक बीचसँ झाँकि देखैत छी। (ओहिना करैत, प्रसन्न भऽ) अहा! हमर आँखिकेँ भिक्षा भेटि गेल। हमर प्रिय, हमर प्रेमक आधार, फूल बिछाओल पाथरक पट्टपर दुनू सखीक संग पड़ल छथि। नीक। लताक ओटमे नुका कऽ हुनकर एकान्त बातचीत सुनैत छी। (देखैत रहैत छथि।) तखन वर्णित दशामे शकुन्तला आ हुनकर दुनू सखी प्रवेश करैत छथि। सखी सभ: (स्नेहसँ पङ्खा झलैत) प्रिय शकुन्तला! कमल-पातक पवनसँ किछु आराम भेटैत अछि? शकुन्तला: (पीड़ाक अभिनय करैत) की? सखी सभ हमरा पङ्खा झलि रहल अछि? दुनू दुःखसँ एक-दोसराक मुँह दिस देखैत छथि। शकुन्तला: (उदास दीर्घ श्वास लैत छथि।) राजा: आर्या अत्यन्त अस्वस्थ छथि। (सोचैत) ई लू लगबाक लक्षण अछि, अथवा हमर सन्देह सही अछि? (लालसासँ) आब सन्देह छोड़ू! उशीरक लेप लागल स्तन, ढील लटकल कमल-रेशाक एकमात्र कङ्कण— पीड़ित रहितहुँ हमर प्रियाक ई रूप मनोहर अछि। मानल जे प्रेमसँ उत्पन्न ताप आ ग्रीष्मक ताप एकरूप देखाइत अछि, मुदा ग्रीष्म युवा स्त्रीक देहपर एहन सुन्दर पीड़ा नहि रचि सकैत अछि। अनसूया: प्रिय शकुन्तला! प्रेमक व्यवहारसँ हम सभ अपरिचित भऽ सकैत छी, तैयो इतिहास-कथामे वर्णित प्रेमिकाक दशासँ अहाँक दशा मेल खाइत देखैत छी। कृपा कऽ अपन रोगक कारण कहू। रोगक मूल निश्चित रूपेँ बुझने बिना उपचार नहि भेटैत अछि। राजा: अनसूयाकेँ सेहो हमरहि सन्देह अछि! शकुन्तला: (अपना मोनमे) हमर उत्कण्ठा अत्यन्त तीव्र अछि; एना सहजहि एकरा रोकि नहि सकैत छी। प्रियंवदा: प्रिय शकुन्तला! अनसूया ठीक कहैत अछि। अपन दुःख किएक नुकबैत छी? दिन-प्रतिदिन अहाँक देह क्षीण भऽ रहल अछि; केवल सौन्दर्यक आभा शेष अछि। राजा: प्रियंवदा सत्य कहैत अछि। कारण, हुनकर— गाल धँसि गेल अछि, स्तनक कठोरता घटि गेल अछि, कमर पातर भऽ गेल अछि, काँध शिथिल लटकैत अछि, देहक रङ्ग फीका पड़ि गेल अछि; प्रेमसँ पीड़ित ओ करुणो आ सुन्दरो देखाइत छथि— मानो पात सुखेबला पवनसँ छुआएल माधवी-लता। शकुन्तला: अहाँ दुनू छोड़ि ई बात हम केकरा कहब? मुदा कहला सँ आब अहाँ सभकेँ सेहो दुःख देब। दुनू: तें तँ हम सभ एतेक आग्रह करैत छी; बाँटल दुःख सहन योग्य भऽ जाइत अछि। राजा: सुख-दुःखक सहभागी सखी पूछैत अछि, तँ ई कन्या अपन गुप्त दुःखक कारण बिना कहने नहि रहि सकैत अछि। ओ बेर-बेर घुरि सङ्केतपूर्ण दृष्टिसँ हमरा देखलनि,* तैयो आब हुनकर उत्तर सुनय हमर हृदय काँपि रहल अछि। शकुन्तला: (लजाइत) जखनसँ तपोवनक रक्षक ओ राजर्षि हमर दृष्टिपथमे आएल छथि, तखने सँ हुनकर प्रेममे पड़ि हमर ई दशा भऽ गेल अछि। राजा: (प्रसन्न भऽ) जे सुनय चाहैत छलहुँ, से सुनि लेलहुँ! प्रेमहि तापक मूल अछि, आ प्रेमहि हमरा लेल एकरा शान्त करय आएल अछि— जेना ग्रीष्मक अन्तमे मेघाच्छन्न दिन संसारक ताप शान्त करैत अछि। शकुन्तला: आब जँ अहाँ सभकेँ उचित लगय तँ कहू, ओ राजर्षि हमरा पर दया करथि, तकर लेल की करू? नहि तँ एखनहि हमर अन्त्येष्टि लेल जलाञ्जलि दिअ। राजा: हमर सन्देह काटि देनिहार ई वचन प्रेमक फल अछि; प्रयासक फल आओर अछि। प्रियंवदा: (धीरे सँ) अनसूया! एकर प्रेम-रोग बहुत बढ़ि गेल अछि; आब विलम्ब सहन नहि करत। जाहिपर ई हृदय धरने अछि, ओ साधारण नहि, पौरववंशक सन्तान छथि। हमरा सभकेँ जल्दी हुनकर प्रेम प्राप्त करबाक उपाय करबाक चाही। अनसूया: (धीरे सँ) ठीक कहैत छह! (जोर सँ) सखी! सौभाग्यसँ अहाँक इच्छा योग्य ठाम लागल अछि। महान नदी समुद्र छोड़ि आओर कतय बहत? प्रियंवदा: आम-वृक्षकेँ अतिमुक्ता-लताक संग फूलल देखबाक इच्छा के नहि करत? राजा: विशाखा नक्षत्रक दुनू उज्ज्वल तारा चन्द्रकलाक पाछाँ चलय, ताहिमे आश्चर्य की? हम अहाँ सभक ऋणी छी। अनसूया: आब कोन उपायसँ सखीक इच्छा गुप्त रूपेँ आ बिना विलम्ब पूरा कएल जाए? प्रियंवदा: ‘गुप्त रूपेँ पूरा करब’ किछु प्रयास माँगैत अछि; ‘शीघ्र पूरा करब’ कठिन नहि। अनसूया: से कोना? प्रियंवदा: कोमल दृष्टिसँ हुनकर प्रति अपन इच्छा प्रकट करनिहार ओ राजर्षि सेहो एहि दिन सभ अनिन्ना रहि-रहि क्षीण भेल जा रहल छथि। राजा: ई सत्य अछि; हम सचमुच एहनहि छी। कारण— राति-राति आँखिक कोनसँ बहैत, भीतरक तापसँ गरम नोर बाँहिपर पड़ि एहि सोनाक कङ्कणक रत्नक रङ्ग फीका कऽ दैत अछि; धनुषक डोरीक चोटसँ बनल चिह्नकेँ छुओने बिना ई बेर-बेर कलाईसँ खसि जाइत अछि, आ हमरा एकरा बेर-बेर ऊपर चढ़ेबय पड़ैत अछि। प्रियंवदा: (सोचैत) अनसूया! आब प्रेमपत्र लिखब आवश्यक अछि। पूजा-पश्चात् बचल फूल कहि फूलक बीच नुका कऽ हम एकरा राजाक हाथमे पहुँचा देब। अनसूया: ई सूक्ष्म उपाय हमरा नीक लगल। शकुन्तलाक की विचार अछि? शकुन्तला: (लजाइत) आज्ञापर प्रश्न कएल जाइत अछि? प्रियंवदा: (शकुन्तलासँ) तँ अपन उल्लेखसँ आरम्भ होएबला कोनो सुन्दर पद रचू। शकुन्तला: सोचि रहल छी, मुदा अस्वीकृत होएबाक भयें हृदय काँपि रहल अछि। राजा: (प्रसन्न भऽ) हे भीरु कन्या, जकर अस्वीकृतिसँ तूँ डराइत छह, ओ तोहर संग प्रेम करबाक उत्कण्ठामे एतहि ठाढ़ अछि! याचककेँ सौभाग्य भेटय अथवा नहि भेटय, मुदा सौभाग्य स्वयं जाहि वस्तुकेँ चाहय, ओकरा पाबयमे कठिनाइ कोना होएत? सखी सभ: हे अपन गुणकेँ छोट बुझनिहारि! शरत्‌कालीन चन्द्रिकाकेँ छातासँ के रोकय चाहत? शकुन्तला: (मुस्कुराइत) कहलाप्रमाणेँ करैत छी। (बैसल-बैसल सोचैत छथि।) राजा: उचितहि हमर पलक झपकब बिसरल आँखि प्रियाकेँ एकटक देखैत अछि, कारण— कविता रचैत हुनकर एक भौंह उठल अछि, आ रोमाञ्चित गाल हमर प्रति हुनकर प्रेम प्रकट कऽ रहल अछि। शकुन्तला: सखी! पद सूझि गेल, मुदा लिखबाक सामग्री नहि अछि। प्रियंवदा: एहि सुग्गाक पेट जकाँ कोमल कमल-पातपर नखसँ अक्षर खोदि नहि सकैत छी? तखन हम सभ अहाँक पदक परीक्षा करब। शकुन्तला: (ओहिना करैत) तँ सुनू, अर्थ ठीक अछि वा नहि। दुनू: हम सभ तैयार छी। शकुन्तला: (पढ़ैत छथि) हे कठोर हृदय, अहाँक मोन हम नहि जानैत छी; मुदा अहाँक लालसामे पड़ल हमर अङ्गकेँ कामदेव दिन-राति दुःखपूर्वक जरा रहल छथि। राजा: (प्रसन्न भऽ लग अबैत) हे कृशाङ्गी, कामदेव अहाँकेँ निरन्तर तपबैत होथि, मुदा हमरा ओ भस्म कऽ रहल छथि; दिन कुमुदिनी-पोखरिक एतेक अनर्थ नहि करैत अछि, जतेक चन्द्रमाक करैत अछि। सखी सभ: (राजाकेँ देखि प्रसन्न भऽ उठैत छथि) केवल मोनमे सोचिते बिना विलम्ब पूरा भेल एहि इच्छाक स्वागत करैत छी। (शकुन्तला उठय चाहैत छथि।) शकुन्तला: (अपना मोनमे, व्याकुल) हे हृदय! एना धड़किते रहबह तँ कोनो काज नहि बनत। (उठबाक प्रयास करैत छथि।) राजा: अपना केँ कष्ट नहि दिअ! फूलक शय्यापर सटल, शीघ्र मुरझायल कमल-रेशाक माला पहिरल, तीव्र तापसँ पीड़ित अहाँक अङ्गकेँ मर्यादाक पालन करबाक आवश्यकता नहि। अनसूया: हमर सखी एहि शिलापट्टक एहि भागकेँ सुशोभित करथि। राजा: (बैसैत) प्रियंवदा! आशा अछि अहाँक सखी देहक एहि तापसँ अत्यन्त पीड़ित नहि छथि। प्रियंवदा: (सखीक संग बैसैत) आब उपचार भेटि गेल अछि, तँ समयपर ताप उतरि जाएत। अनसूया: (धीरे सँ) प्रियंवदा! ‘समयपर’ सँ की अभिप्राय? देख! मेघक गर्जन सुनिते जेना मोरनीमे एकाएक प्राण आबि जाय, तहिना हमर सखी हुनका दिस एकटक देखैत अछि। शकुन्तला: (लजायल रहैत छथि।) प्रियंवदा: अनुगृहीत आर्य! अहाँ दुनूक परस्पर प्रेम स्पष्ट अछि, मुदा सखीक प्रति स्नेहवश हम स्पष्ट बातो कहय चाहैत छी। राजा: कहू। मोनक बात नहि कहला सँ पछतावा होइत अछि। प्रियंवदा: तँ महाराज ध्यानसँ सुनथि। राजा: सुनि रहल छी। प्रियंवदा: अहाँक कारण कामदेव हमर एहि सखीकेँ एहन दशामे पहुँचा देलनि। अतः कृपा कऽ हुनकर प्राणक रक्षा करू। राजा: ई हमर सम्मान होएत। शकुन्तला: (मुस्कुराइत) सखी! अन्तःपुरमे आनन्द करबाक लेल व्याकुल राजर्षिकेँ कष्ट देब बन्द कर। राजा: सुन्दरी! मदिरा जकाँ मादक आँखिबाली, हमर हृदयमे आश्रय लेनेबाली अहाँ, जँ केवल अपनेमे अनुरक्त हमर एहि हृदयकेँ आन रूपक बुझैत छी, तँ कामदेवक बाणसँ पहिनेसँ घायल हमरा फेर घायल करैत छी। अनसूया: सखी! सुनैत छी राजाक अनेक पत्नी होइत छथि। एना आचरण करू जे हमर सखी अपन कुलक लोकक दयाक पात्र नहि बनय। राजा: सुन्दरी! हम अनेक विवाह करी, तैयो हमर वंशक आधार दूए गोट होएतीह— धर्मसँ प्रकट राजलक्ष्मी, आ अहाँक ई सखी। दुनू: हम सभ कृतार्थ भेलहुँ। शकुन्तला: सखी सभ! एकान्तमे शिष्टताक सीमा लाँघि जे-जे गप कहि देलहुँ, तकर लेल जगत्‌पालकसँ क्षमा माँगू। सखी सभ: क्षमा ओहि व्यक्तिसँ माँगल जाइत अछि जकर सोझाँ गप कहल गेल हो। दोसर के रुष्ट होएत? पाछाँ लोक की-की नहि कहैत अछि! राजा: (मुस्कुराइत) हे सुन्दर जाँघबाली, अहाँक अङ्गसँ आध खाली भेल एहि फूलक शय्यापर मित्रक रूपमे हमरा लेल किछु स्थान दऽ दिअ, तँ हम एहि अपराधकेँ सहि सकैत छी।* प्रियंवदा: की एतबे सँ अहाँ सन्तुष्ट भऽ जाएब? शकुन्तला: (रुष्ट जकाँ) बस कर, हे ढीठि! हमर एहन दुःखक दशामे सेहो परिहास करैत छह। अनसूया: (बाहर देखैत) प्रियंवदा! ई व्याकुल हरिणशावक चारू दिस तकैत अछि। अवश्य अपन बिछुड़ल मायकेँ खोजि रहल अछि। हम ओकरा मायक लग पहुँचा दैत छी। (एतबा कहि उठैत छथि।) प्रियंवदा: अरे, ई तँ बहुत चञ्चल अछि! एकसरि पकड़ि नहि सकबह। हम सहायता करैत छी। (दुनू चलि पड़ैत छथि।) शकुन्तला: सखी सभ! अहाँ दुनूमे सँ केवल एक गोट जाउ! नहि तँ हम असहाय भऽ जाएब। दुनू: (मुस्कुराइत) जगतक आश्रय अहाँक संग छथि। (एतबा कहि प्रस्थान करैत छथि।) शकुन्तला: की, दुनू सचमुच चलि गेल? राजा: घबड़ाउ नहि। अहाँक अनुग्रह पाबय चाहनिहार हम की सखी सभक स्थान नहि लऽ लेने छी? की शीतल कमल-पातक पङ्खासँ आर्द्र पवन चला कऽ अहाँक थाकनि दूर करी? अथवा, हे सुन्दर जाँघबाली, कमल जकाँ लाल अहाँक पएर अपन कोरामे राखि दबाइ कऽ आराम दी? शकुन्तला: जकर सम्मान करबाक चाही, ओकर अनादर अपना सँ नहि होअय देब। (अपन दशाक अनुरूप उठि चलि पड़ैत छथि।) राजा: (रोकैत) सुन्दरी! दिन एखन समाप्त नहि भेल अछि; अपन दशा सेहो देखू। एहि एकान्त मण्डपक फूलक शय्या छोड़ि, केराक पातक कवचसँ वक्ष ढाकने, एतेक कोमल आ फीका पड़ल अङ्ग लेने अहाँ एहि गरमीमे बाहर जेबाक साहस कोना करैत छी? शकुन्तला: हमर एकमात्र आश्रय सखी सभ छथि। रक्षा लेल आओर केकरा लग जाउ? राजा: आब हम लज्जित छी। शकुन्तला: हम राजाकेँ दोष नहि दैत छी,* भाग्यकेँ दैत छी। राजा: जे भाग्य अहाँक एतेक पक्षमे अछि, ओकरा दोष किएक दैत छी? शकुन्तला: जे अपना अधीन नहि रहनिहार हमरा दोसरक गुण देखा कऽ उपहास करैत अछि, ओकरा दोष किएक नहि दी? राजा: (अपना मोनमे) कुमारी सभक भीतर गहन लालसा रहितहुँ ओ प्रेमीक प्रयास विफल करैत छथि; मिलनक सुख चाहितहुँ देह समर्पित करबासँ डराइत छथि। प्रेमकेँ पएर जमेलाक बाद एतेक कष्ट नहि होइत अछि, जतेक ई सभ समय नष्ट कऽ प्रेमकेँ कष्ट दैत छथि। शकुन्तला जेबाक लेल उद्यत छथि। राजा: (अपना मोनमे) अपन इच्छा किएक नहि पूरा करू? (उठि, लग जा कऽ हुनकर वस्त्रक छोर पकड़ैत छथि।) शकुन्तला: पौरव! हमरा छोड़ू! राजा: आर्ये, छोड़ि देब। शकुन्तला: कखन? राजा: अहाँक संग प्रेम-सुख प्राप्त कएलाक बाद। शकुन्तला: प्रेमसँ विवश भेलहुँ पुत्री अपने अधीन नहि होइत अछि। तकर ऊपर सखी सभक अनुमति सेहो लेबाक अछि। राजा: (क्षणभरि बैसैत) तँ अहाँकेँ छोड़ैत छी। शकुन्तला: (क्रोधक अभिनय करैत) पौरव! मर्यादा राखू! एतयसँ ऋषि-मुनि अबैत-जाइत छथि। राजा: (चारू दिस देखैत) की? हम खुलल स्थानमे आबि गेलहुँ? (चौंकि कऽ शकुन्तलाकेँ छोड़ि पाछाँ हटैत छथि।) शकुन्तला: (किछु लग अबैत, देह झुकौने) पौरव! हम अहाँक इच्छा पूर्ण नहि कऽ केवल दर्शनक सुख दऽ रहल छी, तैयो हमरा बिसरि नहि जाएब। राजा: हे सुन्दरी! अहाँ बहुत दूर चलि जाइतहुँ हमर हृदय नहि छोड़ैत छी; जेना दिनक अन्तमे गाछक छाया अपन पूब दिसक जड़ि नहि छोड़ैत अछि। शकुन्तला: (किछु दूर जा कऽ) हाय! हमर पएर आगाँ लऽ जेबाक शक्ति नहि राखैत अछि। एहि कुरबक-झाड़ीक ओटमे आर्यसँ नुका कऽ लता-मण्डपक पाछाँसँ देखब जे हुनकर प्रेमक दशा की होइत अछि। (ओहिना करैत छथि।) राजा: हे प्रिये! अहाँक प्रेमहि जकर एकमात्र सुख अछि, एहन हमरा छोड़ि उदासीन भऽ चलि गेलहुँ। अत्यन्त कोमल, कठोरतासँ भोगबाक अयोग्य अहाँक देहक भीतरक हृदय की शिरीष-पुष्पक फलकोष जकाँ कठोर भऽ सकैत अछि?* शकुन्तला: ई सुनि हमरा जेबाक शक्ति नहि रहल। राजा: प्रियाहीन एहि निर्जन स्थानसँ की प्रयोजन? हम चलैत छी। (चलि पड़ैत, भूमि दिस देखैत) अहा! हमर प्रस्थान रुकि गेल। उशीर-सुगन्धित, हुनकर कलाईसँ खसल ई कमल-रेशाक कङ्कण हमर सोझाँ अछि— मानो हमर हृदयकेँ बाँधनिहार शृङ्खला हो। (आदरसँ उठा लैत छथि।) शकुन्तला: (अपन हाथ देखैत) हाय! दुबरायलासँ ढील भऽ हमर रेशमी कङ्कण खसि गेल, हम ध्यानो नहि देलहुँ। राजा: (कङ्कण छातीपर रखैत) अहा! एकर स्पर्श कतेक शीतल अछि। हे प्रिये, अहाँक पूज्य बाँहिसँ खसि एतय रहि गेल एहि खेलौना-आभूषणसँ ई अभागल सान्त्वना पओलक— यद्यपि ई निर्जीव अछि, आ अहाँ स्वयं सान्त्वना नहि देलहुँ। शकुन्तला: आब अपना केँ आओर रोकि नहि पबैत छी! देखी। एहि बहानहि हुनका लग जाइत छी। (एतबा कहि लग अबैत छथि।) राजा: (हुनका देखि प्रसन्न भऽ) अहा! हमर जीवनक स्वामिनी घुरि एलीह। हमर विलाप सुनि भाग्य हमरा पर कृपा कएलक। जे विरले किछु माँगैत अछि, ओकर सूखल कण्ठक प्रार्थनापर नव बनल मेघक वर्षा ओकर मुँहपर झमाझम बरसि पड़ल। शकुन्तला: (राजाक सोझाँ) जल्दी करू! आध बाट गेलाक बाद मोन पड़ल जे ई रेशाक कङ्कण हमर हाथसँ खसि गेल अछि, तें घुरि आएल छी। हमर हृदय मानो कहि रहल छल जे अहाँ एकरा उठा लेने छी। अतः फेर दऽ दिअ, जाहिसँ तपस्वी सभक आगाँ अपने आ हमरा दुनूक भेद नहि खुजय। राजा: एकटा शर्तपर देब, अन्यथा नहि। शकुन्तला: की शर्त? राजा: एकरा अपन स्थानपर हमही बान्ही। शकुन्तला: (अपना मोनमे) आब एतयसँ कोना बची! राजा: एहि शिलापट्टक लग चली। (दुनू चलि बैसि जाइत छथि।) राजा: (शकुन्तलाक हाथ पकड़ि, अपना मोनमे) की ई काम-वृक्षक ओ कोँपल अछि, जे शिवक क्रोधाग्निसँ जरि गेल छल आ अकस्मात् अमृत-वर्षासँ फेर जीवित भऽ उठल? शकुन्तला: (आनन्दसँ रोमाञ्चित होएबाक अभिनय करैत) जल्दी करू, आर्यपुत्र! राजा: (अपना मोनमे) पति लेल प्रयुक्त एहि सम्बोधनसँ आब हमरा विश्वास भऽ गेल। (जोर सँ) सुन्दरी! एहि कमल-रेशाक कङ्कणक गाँठि बहुत सुरक्षित नहि अछि। अहाँ चाही तँ दोसर ढङ्गसँ बान्हि दी। शकुन्तला: (हँसैत) विलम्ब करबाक कला अहाँ नीक जनैत छी। जेना अहाँक इच्छा। राजा: (जानि-बूझि विलम्ब करैत; बान्हि, फेर हुनका पकड़ि लैत) हे सुन्दरी, एकरा देखू! श्यामल लता-जकाँ मनोहर अहाँक ई बाँहि मानो नवचन्द्रसँ सुशोभित अछि; ओ नवचन्द्र रेशाक कङ्कणक रूप लेने, अहाँक हाथक अधिक सौन्दर्यक कारण आकाश छोड़ि, दुनू छोरसँ जुड़ि एतय आबि गेल अछि। शकुन्तला: हम ठीकसँ देखिये नहि पबैत छी। पवनसँ हिलल कानक कमल-पुष्पक पराग आँखिमे पड़ि गेल अछि। राजा: (मुस्कुराइत) अनुमति दिअ तँ फूँक मारि एकरा हटा दी। शकुन्तला: तखन हम दयनीय भऽ जाएब। आ, अहाँपर विश्वासो नहि अछि! राजा: एना नहि कहू! नव सेवक अपन सेव्यक आज्ञाक सीमा नहि लाँघैत अछि। शकुन्तला: अहाँक अत्यधिक सेवाभावहि हमरा अविश्वास करबैत अछि। राजा: सेवा करबाक ई सुन्दर अवसर हाथसँ नहि जाए देब। (हुनकर मुँह ऊपर उठाबय लगैत छथि।) शकुन्तला: (विरोधक अभिनय करैत, फेर स्थिर भऽ जाइत छथि।) राजा: हाय! आँखिमे नोर भरल अछि! हमरा सँ अनुचित आचरणक भय नहि करू। मुँह ऊपर करू! शकुन्तला: (आध दृष्टिसँ हुनका देखैत छथि।) राजा: (दू अङुरीसँ हुनकर मुँह ऊपर उठबैत, अपना मोनमे) कहियो दाँतसँ नहि काटलासँ कोमल हमर प्रियाक ठोर आकर्षक कम्पनसँ मानो ओकर रसक पियासल हमरा निमन्त्रण दऽ रहल अछि। शकुन्तला: आर्यपुत्र अपन वचन पूरा करबामे सङ्कोच कऽ रहल छथि। राजा: सुन्दरी, कानक कमल-पुष्प आँखिक एतेक लग अछि जे दुनूक समानतासँ हम भ्रमित भऽ गेलहुँ। (हुनकर आँखिपर फूँक मारैत छथि।) शकुन्तला: बस, पर्याप्त! आब नीक लगैत अछि। मुदा हमरा लज्जा होइत अछि जे एतेक कृपा करनिहार आर्यपुत्रक हम कोनो सेवा नहि कऽ पबैत छी। राजा: हमरा आओर की चाही? हे कन्या, अहाँक सुगन्धित मुँहक गन्ध लेब सेहो अनुग्रह अछि; ... (मुस्कुराइत) मुदा भौंरा केवल कमलक सुगन्धसँ सन्तुष्ट नहि होइत अछि। शकुन्तला: जँ सन्तुष्ट नहि, तँ की करब? राजा: ई! (ओही क्षण रुकि जाइत छथि।) नेपथ्यमे: आर्या गौतमी! शकुन्तला: (सुनि घबड़ाइत) पौरव! पिताक धर्मभगिनी हमर हाल देखय आबि रहल छथि। झाड़ीक बीच नुका जाउ! राजा: (ओहिना करैत छथि।) हाथमे पात्र लेने गौतमी प्रवेश करैत छथि। गौतमी: (लग अबैत) अरे लज्जाहीनि! एतय केवल भगवानकेँ सङ्गी बना कऽ पड़ल छह। शकुन्तला: एखनहि प्रियंवदा आ अनसूया मालिनी नदी दिस उतरि गेलीह। गौतमी: (कुशोदकसँ शकुन्तलापर छींट दैत) पुत्री, स्वस्थ रहि चिरञ्जीवी हो! अङ्गक ताप किछु कम भेल? शकुन्तला: आब नीक लगैत अछि। गौतमी: पुत्री, दिन समाप्त भऽ रहल अछि। चल, कुटीमे चली। शकुन्तला: (अपना मोनमे) हे हृदय, जखन तोरा ओ व्यक्ति भेटल— जे इच्छा जकाँ दुर्लभ छथि—तखन तोँ हुनका एतेक काल प्रतीक्षा करौलह; आब पश्चात्तापसँ किएक पीड़ित होइत छह? (किछु डेग चलि, घुरि, जोरसँ) हे लता-मण्डप! हम फेर अहाँक सुख भोगबाक अवसर भेटबा धरि अहाँसँ विदा लैत छी! (ई कहि दूनू बाहर जाइत छथि।) राजा: (पहिल स्थानपर घुरि, दीर्घ निःश्वास लैत) अहा! इच्छाक सिद्धि कठिनाइ सभसँ घेरल अछि। कारण— लम्बा पलकबाली कन्याक मुँह, निचला ठोरकेँ बेर-बेर अङुरीसँ ढाकैत, अस्वीकृतिक अक्षर हकलाइत कहैत, काँध दिस घुमाओल छल; हम कोनो प्रकारेँ ओकरा ऊपर तँ उठौलहुँ— मुदा चुमि नहि पओलहुँ। आब कतय जाउ? नहि, एतहि रहबाक चाही— प्रियाद्वारा उपभोग कएल गेल एहि त्यागल लता-मण्डपमे। (चारू दिस देखैत।) एहि शिलापर हुनकर देहसँ अस्त-व्यस्त भेल फूलक शय्या अछि; एहि सुन्दर कमल-पातपर नखसँ खोदल प्रेमपत्र अछि; एहि हाथसँ खसल कमल-रेशाक आभूषण अछि— एहि सभकेँ देखैत आँखि धुँधला जाइत अछि, आ ई नरकट-मण्डप खाली रहितहुँ हम अपना केँ एतयसँ अलग करबामे असमर्थ छी। हाय! प्रियाक संग अवसर रहितहुँ विलम्ब कऽ हम नीक नहि कएलहुँ। आब— ‘जँ सुन्दर मुखबाली फेर कोनो गुप्त मिलनमे एतीह, तँ समय नष्ट नहि करब; पुरस्कार कृपादानसँ नहि भेटैत अछि!’ जटिल बाधासँ विफल हमर मूर्ख हृदय एना योजना बनबैत अछि, मुदा प्रियाक सोझाँ पहुँचि फेर कोना-कोना सङ्कोच कऽ उठैत अछि। नेपथ्यमे: राजन्! राजन्! सायंकालीन आहुति आरम्भ भऽ गेल अछि। साँझक मेघक शिखर जकाँ कपिल माँसभक्षी राक्षसक छाया सभ यज्ञाग्निसँ दहकैत वेदीक चारू दिस घूमि भय फैला रहल अछि। राजा: (घबड़ाइत) हे तपस्वी सभ! भय नहि करू, हम आबि रहल छी! प्रस्थान करैत छथि। महाकवि कालिदास-रचित ‘शकुन्तला’ नामक नाटकक तृतीय अङ्क समाप्त। चतुर्थ अङ्क: विदाई फूल चुनैत दुनू आश्रम-कन्या प्रवेश करैत छथि। अनसूया: प्रियंवदा! योग्य पति पाबि शकुन्तलाकेँ गुप्त परस्पर-सहमतिक विवाहमे सुख भेटलहुँ, तैयो हमर हृदय अशान्त अछि। प्रियंवदा: किएक? अनसूया: आइ यज्ञ समाप्त भेलापर ऋषि सभ राजाकेँ विदा कऽ देलनि। नगरक अन्तःपुरमे घुरि गेलाक बाद ओ एतयक घटना स्मरण रखताह वा नहि? प्रियंवदा: एहि विषयमे निश्चिन्त रह। एहन गम्भीर आ उत्कृष्ट स्वभावबला पुरुष अपन गुणक विरुद्ध नहि जाइत छथि। मुदा हमरा एहि बातक चिन्ता अछि—पिता ई घटना सुनताह तँ नहि जानि की होएत... अनसूया: सखी! हमर विचार पूछह तँ पिता अनुमोदन करि प्रसन्न होएताह। प्रियंवदा: ‘अनुमोदन करि प्रसन्न होएताह’—से कोना? अनसूया: आन कोना? ‘पुत्रीकेँ योग्य वरक हाथ देबाक अछि’—हुनकर मूल सङ्कल्प एही छल। जँ भाग्य स्वयं ई काज पूरा कऽ देलक तँ कुलपतिक प्रयोजन बिना प्रयास सिद्ध भऽ गेल। प्रियंवदा: ठीक कहैत छह! (फूलक डाली दिस देखैत) सखी! बलि-पूजा लेल पर्याप्त फूल चुनि लेलहुँ। अनसूया: सखी! शकुन्तलाक दाम्पत्य-सौभाग्यक अधिष्ठात्री देवता सभक पूजा सेहो करबाक अछि। प्रियंवदा: अवश्य! (दुनू पहिने जकाँ फूल चुनबाक अभिनय करैत छथि।) नेपथ्यमे: हो! हम एतय छी! अनसूया: (सुनैत) सखी! लगैत अछि कोनो अतिथि अपन आगमनक सूचना दऽ रहल छथि। प्रियंवदा: सखी! शकुन्तला अवश्य कुटीक लग छथि। अनसूया: हँ, मुदा आइ हुनकर हृदय हुनका लग नहि अछि। प्रियंवदा: (जल्दीसँ) तखन एतबे फूलसँ काज चलाबय पड़त। (चलि पड़ैत छथि।) नेपथ्यमे: अरे अतिथिक अपमान करनिहारि! जकर चिन्तामे तूँ एतेक एकाग्र भेल छह जे अतिथि बनि आएल हमरा नहि देखलह, ओ व्यक्ति स्मरण करौलोपर तोरा नहि चिन्हत, जेना मातल एखनहि कहल बात बिसरि जाइत अछि। दुनू: (सुनि उदास) हाय! अनर्थ भऽ गेल! शून्य-हृदया सखी कोनो पूज्य व्यक्तिक अपराध कऽ देलक। अनसूया: (देखैत) हाय! कोनो साधारण व्यक्ति नहि—महर्षि दुर्वासा छथि। शीघ्र क्रोध करनिहार ओ आगि जकाँ अटल डेगसँ चलि जा रहल छथि। प्रियंवदा: आगि छोड़ि जराबय के समर्थ अछि? अनसूया! हुनकर पएरपर पड़ि शान्त कर, हम अतिथि-सत्कारक जल तैयार करैत छी। अनसूया: (प्रस्थान करैत छथि।) प्रियंवदा: (एक डेग बढ़ा कऽ ठोकर खाइत) हाय! जल्दबाजीमे ठोकर लागि फूलक डाली हाथसँ खसि गेल। फेर फूल चुनय पड़त।* (ओहिना करैत छथि।) अनसूया: (प्रवेश करैत) सखी, ओ क्रोधक साक्षात् रूप छथि; केकर क्षमा-याचना स्वीकार करताह? तैयो किछु दया देखौलनि। प्रियंवदा: हुनका लेल एतबो बहुत अछि। कह, की भेल? अनसूया: जखन ओ घुरय नहि चाहैत छलाह, तखन हम कहलियनि—‘भगवन्! एकर पहिल भक्ति स्मरण करू; अपन दिव्य शक्तिसँ एकर योग्यता बुझि, आब अपन पुत्रीक ई अपराध क्षमा करू।’ प्रियंवदा: तकर बाद? अनसूया: तखन कहलनि—‘हमर कहल वचन मिथ्या नहि भऽ सकैत; चिन्हारीक वस्तु देखिते शाप दूर भऽ जाएत’—आ अन्तर्धान भऽ गेलाह। प्रियंवदा: आब साँस लऽ सकैत छी। विदा होइत राजर्षि स्वयं स्मृतिचिह्नक रूपमे शकुन्तलाक हाथमे अङूठी पहिरौने छलाह। जाबत ओ हुनका लग रहत, ई उपाय काज करत। (घुमैत छथि।) अनसूया: प्रियंवदा, देख, देख! बाम हाथपर मुँह टिकौने हमर सखी चित्र जकाँ लगैत छथि। पतिक चिन्तामे एतेक तन्मय छथि जे अपनेक सुधि नहि, तखन आगन्तुक अपरिचितक की सुधि होएत? प्रियंवदा: प्रिय अनसूया! शापक ई बात केवल तोरा आ हमरा बीच रहय। अपन कोमल-हृदया सखीक रक्षा करबाक अछि। अनसूया: चमेलीक लतापर गरम पानि के छिड़कत? दुनू प्रस्थान करैत छथि। प्रवेशक समाप्ति। निन्नसँ उठल काश्यपक एक शिष्य प्रवेश करैत अछि। शिष्य: प्रभाससँ घुरल पूज्य काश्यप समय देखबाक लेल हमरा पठौलनि। खुलल स्थानमे जा कऽ देखैत छी राति कतेक शेष अछि। (घुमैत, देखैत) अहा! भोर भऽ रहल अछि। कारण— उदयमान भोर बेरक गाछपर लटकल कुहासाकेँ लाल कऽ रहल अछि; निन्न झाड़ैत मोर कुटीक कुश-छाजन छोड़ि रहल अछि; आ यज्ञवेदीक खुरसँ खरौंचल किनारपर पड़ल ई हरिण चौंकि कऽ उठि, अङ्ग पसारि ठाढ़ भऽ गेल अछि। आओर— जे अपन किरण नीचाँ पसारि, पर्वतश्रेष्ठ सुमेरुक शिखरपर पएर रखने छल; जे अन्धकार दूर करैत विष्णुक मध्य पद धरि पहुँचल छल; ओ चन्द्रमा आब किछुए किरण शेष लेने आकाशसँ उतरि रहल अछि— महान व्यक्तिक ऊँच उन्नतियो अन्ततः पतनमे समाप्त होइत अछि। सूर्य आ चन्द्रमा मानो एहि संसारकेँ ई सत्य देखबैत अछि जे सम्पत्ति आ विपत्ति अस्थिर अछि। कारण— एक दिस औषधिक स्वामी चन्द्रमा पश्चिमक अस्त-पर्वत दिस उतरि रहल छथि; दोसर दिस प्रभातक घोषणाक संग सूर्य प्रकट भेल छथि; दुनू ज्योतिक एकहि समय अस्त आ उदयसँ संसार जीवनक उतार-चढ़ावमे बान्हल अछि। आओर एहि समय— चन्द्रमा अदृश्य भेला पर ओही कुमुदिनी-पोखरि आब हमर आँखिकेँ आनन्द नहि दैत अछि; ओकर सौन्दर्य केवल स्मृतिमे शेष अछि। निःसन्देह, असहाय स्त्री लेल प्रियक अनुपस्थितिसँ उत्पन्न दुःख अत्यन्त असह्य होइत अछि। परदा झटका कऽ अनसूया प्रवेश करैत छथि। अनसूया: भोगसँ विरक्त मुनियो नहि जानि सकलाह जे राजा शकुन्तलाक प्रति एतेक नीच व्यवहार करताह। शिष्य: समय भऽ गेल, ई सूचना दैत छी। (प्रस्थान करैत अछि।) अनसूया: जागल छी, तैयो की करू? उठलाक बाद भोरमे करबाक सोचल काज पूरा करबाक शक्ति हाथ-पएरमे नहि अछि। अपन कोमल-हृदया सखीक विश्वास वचनभङ्गी व्यक्तिमे पड़ल अछि—आब कामदेव शान्त होथि। (स्मरण करैत) अथवा, राजर्षिक दोष नहि; दुर्वासाक क्रोध हुनका रोकि रहल अछि। नहि तँ— एहन वचन कहनिहार राजर्षि एतेक समय बीतलापर एकटा पत्रो कोना नहि पठबितथि? (सोचैत) स्मरण कराबय एतयसँ अङूठी पठा सकैत छी। मुदा केवल तपस्यासँ परिचित तपस्वी सभमे सँ केकरा कहबाक साहस करी? आ ओ सोचताह—‘दोष एकर सखी सभक अछि’—तें हम सभ विवश छी। प्रभाससँ घुरल पिता काश्यपकेँ के कहत जे शकुन्तलाक विवाह दुष्यन्तसँ भऽ गेल आ ओ गर्भवती छथि? एहन स्थितिमे हम सभ की कऽ सकैत छी? प्रियंवदा प्रवेश करैत छथि। प्रियंवदा: अनसूया! शकुन्तलाक विदाईक विधि आरम्भ भऽ गेल अछि। अनसूया: सखी! से कोना? प्रियंवदा: अनसूया, सुन। एखनहि हम शकुन्तलाक लग गेल छलहुँ। ओ सुखक निन्नसँ उठि, लजाइत प्रणाम कऽ रही छल, तखन पिता काश्यप हुनका आलिङ्गन कऽ कहलनि—‘सौभाग्यसँ, धुँआसँ दृष्टि ढाकल रहितहुँ हमर आहुति पवित्र अग्निमे पड़ल। योग्य शिष्यकेँ देल विद्या जकाँ तूँ हमरा दुःखक कारण नहि बनलह। अतः आइए ऋषि सभक संग तोरा पतिक घर पठबैत छी।’ अनसूया: तँ शकुन्तलाक घटना पिताकेँ के कहलकनि? प्रियंवदा: पिता जखन अग्निशालामे प्रवेश कएलनि, तखन वेदमन्त्रक रूपमे आकाशवाणी भेल। अनसूया: (आश्चर्यसँ) की कहल गेल? प्रियंवदा: सखी, सुन। (संस्कृतमे पाठ करैत छथि...) हे ब्रह्मन्, जानू— जगतक कल्याण लेल अहाँक पुत्री दुष्यन्तक स्थापित वीर्य धारण कएने छथि, जेना शमी-वृक्ष अपन भीतर अग्नि धारण करैत अछि। अनसूया: (प्रसन्न भऽ प्रियंवदाकेँ आलिङ्गन करैत) सखी, हम बहुत प्रसन्न छी; मुदा शकुन्तलाकेँ विदा कएल जा रहल अछि, ई बुझि एखन एहन आनन्द होइत अछि जे विरह-जकाँ अछि। प्रियंवदा: अपन दुःख दूर करी। आब ओ सुखी रहथि। अनसूया: नीक, ओहि आमक गाछक डाढ़िसँ लटकल नारिकेलक डिब्बामे हम एही अवसर लेल किछु दीर्घकाल टिकनिहार कमल-रेश राखने छी।* तूँ ओकरा लऽ आ; हम हरिणक पीत गोरोचन, तीर्थक माटि आ दूबक अङ्कुर मिला कऽ हुनकर मङ्गल-लेप बनबैत छी। (एतबा कहि प्रस्थान करैत छथि।) प्रियंवदा: (फूल उठेबाक अभिनय करैत छथि।) नेपथ्यमे: शार्ङ्गरव आ हुनकर सङ्गी सभकेँ आज्ञा दिअ—‘शकुन्तलाकेँ पहुँचाबय लेल तैयार होउ!’ प्रियंवदा: (सुनैत) अनसूया, जल्दी कर, जल्दी! ऋषि सभ हस्तिनापुर जेबाक तैयारी कऽ रहल छथि। (हाथमे लेप लेने अनसूया प्रवेश करैत छथि।) अनसूया: सखी! चल, चली! (दुनू घुमैत छथि।) प्रियंवदा: (देखैत) ओतय शकुन्तला छथि। सूर्य उदित होइतहि वनधानक कटोरा लेने तपस्विनी सभ हुनका आशीर्वाद दऽ विदा कऽ रहल छथि। चल, हुनकर लग चली। (ओहिना करैत छथि।) वर्णित रूपमे बैसल शकुन्तला, गौतमी आ तपस्विनी सभक संग प्रवेश करैत छथि। पहिल तपस्विनी: पुत्री! पतिक विशेष सम्मानसँ ‘महादेवी’क पद प्राप्त करू। दोसर तपस्विनी: पुत्री! वीर पुत्र जन्माउ। गौतमीकेँ छोड़ि शेष सभ आशीर्वाद दऽ प्रस्थान करैत छथि। सखी सभ: (लग अबैत) सखी! सुखी रहू! शकुन्तला: (आदरसँ देखैत) प्रिय सखी सभ, स्वागत अछि। एतय बैसू। दुनू: (बैसैत) प्रिय शकुन्तला! ठाढ़ होउ, अहाँक देहमे मङ्गल-लेप लगाबी। शकुन्तला: यद्यपि एकर आदत अछि, आइ ई बहुत मूल्यवान लगैत अछि। आब सखी सभक हाथसँ श्रृंगार विरले भेटत। (कनैत उठैत छथि।) दुनू: सखी! दीर्घकालसँ चाहल मङ्गल अवसरपर कानब नहि चाही। (नोर पोछैत आ श्रृंगारक अभिनय करैत छथि।) प्रियंवदा: आभूषणक योग्य अहाँक सौन्दर्यक संग आश्रममे सहज उपलब्ध एहि आभूषणसँ अन्याय भऽ रहल अछि। हाथमे श्रृंगार-सामग्री लेने दू युवा ऋषि प्रवेश करैत छथि। दुनू युवा ऋषि: ई आभूषण सभ अछि; आर्याक श्रृंगार करू। सभ आश्चर्यसँ देखैत छथि। गौतमी: पुत्र हारीत! ई सभ कतयसँ आएल? पहिल: पिता काश्यपक कृपासँ। गौतमी: सङ्कल्प मात्रसँ प्राप्त भेल? दोसर: नहि, सुनू! पूज्य पिताक आज्ञासँ हम सभ शकुन्तलाक लेल गाछ सभसँ फूल लेबय गेलहुँ। ओतय— एक गाछ चन्द्रमा जकाँ उज्जर मङ्गलकारी रेशमी वस्त्र देलक; एक गाछ पएरमे लगेबाक लेल तैयार लाल अलक्तक रस बहौलक; आ आन गाछ सभसँ नव अङ्कुरक सौन्दर्यकेँ टक्कर देनिहार, कलाई धरि पसारल वनदेवताक हाथ हमरा सभकेँ आभूषण अर्पित कएलक। प्रियंवदा: (शकुन्तला दिस देखैत) सखी! ई असाधारण सौभाग्यक सूचक अछि; पतिक घरमे राजलक्ष्मी भोगब। शकुन्तला: (लज्जाक अभिनय करैत छथि।) अनसूया: सखी! आब अहाँ कतेक सुन्दर लगैत छी! खोहमे जन्मल भौंरी जकाँ कमलक मधुक लालसा कऽ रहल छी। प्रियंवदा: (श्रृंगार करैत) हम एहन आभूषण कहियो पहिरने नहि छी; चित्रमे जेना देखल अछि, ओहि अनुसार अहाँक देहपर लगा दैत छी। शकुन्तला: (मुस्कुराइत) तोहर कौशल हम जानैत छी। दुनू आभूषण पहिरेबाक अभिनय करैत छथि। युवा ऋषि: गौतम, चलू! स्नान लेल नीचाँ गेल पिता काश्यपकेँ वृक्ष सभक उदारताक समाचार दी। दोसर: चलू। (एतबा कहि दुनू प्रस्थान करैत छथि।) स्नान कऽ काश्यप प्रवेश करैत छथि। काश्यप: (दीर्घ श्वास लैत) ‘आइ शकुन्तला विदा होएत’—ई सोचिते विरहसँ हृदय भरि उठैत अछि; रोकल नोरसँ कण्ठ दुखैत अछि; चिन्तासँ दृष्टि धुँधला गेल अछि। वनवासी तपस्वी हमरा सेहो स्नेह एतेक उदास करैत अछि, तखन नव-नव पुत्री-विरहक दुःखसँ गृहस्थक हृदय कतेक कुचलाइत होएत! (घुमैत छथि।) सखी सभ: प्रिय शकुन्तला! श्रृंगार पूरा भेल। आब ई रेशमी वस्त्र पहिरू। शकुन्तला: (मण्डपसँ बाहर जा वस्त्र पहिरि, घुरि अबैत आ बैसैत छथि।) काश्यप: (लग अबैत छथि।) गौतमी: पुत्री, आनन्दक नोरसँ भरल आँखिसँ मानो अहाँकेँ आलिङ्गन करैत पिता एतय छथि। प्रणाम करू। शकुन्तला: (लजाइत उठैत) पिता, प्रणाम करैत छी। काश्यप: पुत्री— जेना शर्मिष्ठाकेँ ययातिसँ सम्मान भेटल छल, तहिना पतिक सम्मान पाउ; आ जेना ओ पुरुकेँ जन्म देलनि, तहिना अहूँ चक्रवर्ती पुत्र जन्माउ। गौतमी: पूज्यवर! ई आशीर्वाद नहि, वरदान भेल। काश्यप: पुत्री, एतयसँ आहुति-धारी अग्नि सभक शीघ्र प्रदक्षिणा करू। (सभ घुमैत छथि।) वेदीक चारू दिशामे स्थापित, समिधासँ पोषित, जकर किनार कुशसँ बिछाओल अछि, आ आहुतिक सुगन्धसँ अमङ्गल दूर करनिहार ई तीनू विधिक अग्नि अहाँक रक्षा करय। शकुन्तला: (दहिना दिससँ प्रदक्षिणा करैत छथि।) काश्यप: पुत्री! आब प्रस्थान करू। (चारू दिस देखैत) शार्ङ्गरव आ हुनकर सङ्गी सभ कतय छथि? तीनू एक संग प्रवेश करैत छथि। शिष्य सभ: पूज्यवर, हम सभ एतय छी। काश्यप: शार्ङ्गरव, अपन बहिनकेँ बाट देखाउ। शार्ङ्गरव: एहि बाट, एहि बाट, आर्ये। (सभ घुमैत छथि।) काश्यप: पुत्री शकुन्तला! भीतर देवता वास करनिहार आश्रम-वृक्ष सभकेँ ई सूचना दऽ दी— जे अहाँ सभकेँ पानि देल बिना स्वयं पानि पिबय नहि चाहैत छल; आभूषणप्रिय रहितहुँ अहाँ सभक स्नेहवश कोँपल नहि तोड़ैत छल; अहाँ सभक पहिल फूल खिलबाक अवसर जकर लेल उत्सव छल— ओ शकुन्तला पतिक घर जा रहल अछि; अहाँ सभ ओकरा अनुमति दिअ। नेपथ्यमे: ओकर बाट कमलसँ भरल जलबला पोखरि सभसँ सुखद विविधता पाबय; छायादार गाछ सभ सूर्यक किरणक ताप रोकय; जलपर तैरैत कमलक पराग जकाँ कोमल धूरि होअय; अनुकूल मन्द पवन बहय; आ ओकर यात्रा मङ्गलमय होअय। सभ आश्चर्यसँ सुनैत छथि। शार्ङ्गरव: वनवासक समयक बन्धु ई गाछ सभ शकुन्तलाकेँ विदा होएबाक अनुमति दऽ देलक; कारण कोइलीक मधुर स्वरमे ओ सभ अहाँक बातक उत्तर देलक। गौतमी: पुत्री! आश्रम-देवता सभ अपन बन्धु जकाँ स्नेहसँ अहाँकेँ अनुमति देलनि। देवी सभकेँ प्रणाम करू। शकुन्तला: (ओहिना करैत, घुमैत, सखी सभसँ) प्रिय प्रियंवदा! आर्यपुत्रकेँ देखबाक उत्कण्ठा रहितहुँ आश्रम छोड़ैत हमर पएर बड़ पीड़ासँ आगाँ बढ़ि रहल अछि। प्रियंवदा: अहाँसँ बिछुड़बाक दुःख केवल सखी सभकेँ नहि अछि। अहाँक प्रस्थान निकट अबैत तपोवनो उदास देखाइत अछि। कारण— हरिणी मुँहक कुश छोड़ि देलक; मोर नाचब छोड़ि उदास अछि; लता सभ पीयर पात खसाबैत मानो काँपैत अङ्गबाली भऽ गेल अछि। शकुन्तला: पिता, अपन लता-बहिन माधवीकेँ विदा कहब। काश्यप: ओकर प्रति तोहर बहिन-जकाँ स्नेह हम जानैत छी। दहिना दिस ओकरा अभिवादन कर। शकुन्तला: (लताक लग जा आलिङ्गन करैत, स्नेहसँ हकलाइत) माधवी! अपन डाढ़ि-जकाँ बाँहिसँ हमरा आलिङ्गन कर। आइ सँ हम तोरासँ बहुत दूर रहब। काश्यप: पुत्री! आब ओकर चिन्ता हमर अछि। देख— जे योग्य पति हम पहिने तोरा लेल चाहने रही, अपन पुण्यसँ तैँ ओहने पति स्वयं प्राप्त कऽ लेलह। आब तोहर चिन्तासँ मुक्त भऽ, एहि लगक आमक गाछसँ हम एकर विवाह कराएब। शकुन्तला: (सखी सभक लग जा) एकरा अहाँ सभक हाथमे सौँपैत छी। सखी सभ: (नोर भरल स्वरमे) आ हमरा सभकेँ केकर हाथमे सौँपल जाइत अछि? (कनैत छथि।) काश्यप: अनसूया, कानब रोक। की तोरा शकुन्तलाकेँ धैर्य नहि देबाक चाही? (सभ आगाँ बढ़ैत छथि।) शकुन्तला: (देखि) पिता! जखन कुटी लग घुमैत ई गर्भवती हरिणी बच्चा जनम देबाक हो, तखन कृपा कऽ ककरो पठा कऽ हमरा ई शुभ समाचार देब। काश्यप: पुत्री, ई बात बिसरल नहि जाएत। शकुन्तला: (चलैत-चलैत रुकि गेली से अभिनय करैत छथि।) सखी सभ: ई के अछि जे बिलकुल लग आबि मानो ओकर वस्त्रक छोर पकड़ि रहल अछि? काश्यप: पुत्री, कुशक नोकसँ मुँह घवाहिल भेला पर जे हरिणक मुँहमे तैँ घाव भरएबला इङ्गुदी तेल लगौने छलह, श्यामाक धानक मुट्ठी-मुट्ठी दऽ जकर पालन पुत्र जकाँ केलह, ओ तोहर पाछाँ छोड़ि नहि रहल अछि। शकुन्तला: (देखि) बच्चा, अहाँ अपन संगाती सभकेँ छोड़ि कऽ जा रहल एहन कपटी-स्नेहबाली हमर पाछाँ किएक आबि रहल छह? तोहर जनमक तुरन्त बाद तोहर माय मरि गेली, तखन माय-विहीन तोहर पालन भेल। आब हमहूँ तोरा छोड़ि जा रहल छी; पिता तोहर देखभाल करता। अतः घुरि जा। (कनैत आगाँ बढ़ैत छथि।) काश्यप: पुत्री! फूटि पड़एबला नोरक धार रोक, जे ऊपर उठल बरौनीबला आँखिक दृष्टि रोकि रहल अछि। एहि बाटमे गड़हा-टीला स्पष्ट नहि देखाइत, तेँ तोहर डेग डगमगा रहल अछि। शार्ङ्गरव: शास्त्र कहैत अछि जे प्रियजनकेँ जलक सीमाधरि पहुँचाओल जाए। ई सरोवरक कात अछि। एतहि हमरा सभकेँ निर्देश दऽ अहाँ घुरि जाउ। काश्यप: एहि पीपरक छाहिमे बैसि जाइ। सभ बैसि जाइत छथि आ ओहिना रहैत छथि। काश्यप: (अपनेसँ) आब महाराज दुष्यन्त लेल हमर कोन सन्देश उचित होएत? (विचार करैत छथि।) अनसूया: प्रिय सखी! आश्रममे एहन कोनो प्राणी नहि जे तोहर प्रस्थानसँ उदास नहि भेल हो। देख, एतय— कमल-पातमे नुकायल अपन नरकेँ चकवी पुकारि रहल अछि; मुँहसँ तन्तु खसैत रहितहुँ ओ उत्तर नहि दैत, तोरे दिस देखि रहल अछि। शकुन्तला: (देखि) सखी, ई सत्य अछि। लगहि कमल-पातसँ नुकायल अपन साथीकेँ नहि देखि चकवी दयनीय स्वरमे बाजि रहल अछि—“हाय, हम कतेक दुःख सहैत छी!” प्रियंवदा: आइ फेर ओ अपन प्रियतमक बिना पीड़ासँ लम्बा भेल राति बिताओत। आशाक बन्धन गम्भीर दुःखोकेँ सहए योग्य बनबैत अछि। काश्यप: शार्ङ्गरव, हमर नामसँ राजाकेँ शकुन्तलाक विषयमे एहि प्रकारेँ कहब। शार्ङ्गरव: आज्ञा दिअ, गुरुदेव। काश्यप: हमरा सभक संयम-सम्पन्न जीवन, अहाँक उच्च कुल, आ बिना कुटुम्बक मध्यस्थताक अहाँ प्रति एकर सहज उमड़ल स्नेह— ई सभ भलीभाँति विचारि, एकरा अपन आन पत्नी सभक समान आदर देब; एहिसँ बेसी भाग्यक अधीन अछि, स्त्रीक सम्बन्धी ओकर याचना नहि करैत छथि। शार्ङ्गरव: सन्देश हमरा कण्ठस्थ भऽ गेल। काश्यप: (शकुन्तलासँ) पुत्री! आब तोरा शिक्षा देबाक अछि। देख, हम सभ वनवासी छी, तैयो लोकाचार जानैत छी। शार्ङ्गरव: वस्तुतः बुद्धिमानक दृष्टिसँ किछुओ बाहर नहि रहैत अछि। काश्यप: पुत्री! एतयसँ पतिक घर पहुँचला पर— बड़-बुजुर्गक आज्ञा मानब, सौतिन सभसँ निष्कपट सखीक व्यवहार करब; पति उपेक्षा करथि तैयो क्रोधसँ प्रत्युत्तर नहि देब; सेवक सभसँ सदैव विनम्र रहब, समृद्धिमे अभिमानी नहि बनब; एहि प्रकार युवती घरक स्वामिनी बनैत अछि; एकर विपरीत आचरण करएबाली कुलक दुर्भाग्य बनैत अछि। गौतमी, अहाँक की विचार अछि? गौतमी: नववधूकेँ एतबे शिक्षा देब आवश्यक अछि। (शकुन्तलासँ) पुत्री, एकरा नीक जकाँ मोन राखब। काश्यप: पुत्री, आबि कऽ हमरा आलिङ्गन कर। शकुन्तला: पिता, की हमर सखी सभकेँ एतहिसँ घुरए पड़तनि? काश्यप: पुत्री, हुनको सभक विवाह होएबाक अछि। तेँ हुनका सभक ओतय जाएब उचित नहि। गौतमी तोहर सङ्ग जेतीह। शकुन्तला: (उठि पिताकेँ आलिङ्गन करैत) झुण्डसँ बिछुड़ल हथिनी जकाँ पितासँ अलग भऽ हम अपन प्राण कोना धारण करब? (कनैत छथि।) काश्यप: एतेक कातर किएक होइत छह? योग्य कुलक पतिक प्रतिष्ठित गृहिणी बनि, प्रतिक्षण हुनकर महत्त्वपूर्ण कार्यमे व्यस्त रहि, शीघ्रहि पूर्व दिशा जकाँ सूर्य-समान तोरा पूर्णता देबला पुत्रकेँ जन्म देबह; तखन हमरासँ बिछुड़बाक ई दुःख तोरा नगण्य बुझाएत। आ ई बात मोन राख— जखन आत्मा आ शरीरक पूर्ण वियोग अनिवार्य अछि, तखन फोड़ा काटि निकालबाक पीड़ासँ के व्याकुल होएत? (शकुन्तला पिताक चरणमे खसि पड़ैत छथि।) काश्यप: तोहर जे इच्छा अछि, से पूर्ण होअ। शकुन्तला: (दूनू सखीक लग जा) सखी सभ! दूनू गोटे एक्के बेर हमरा आलिङ्गन करू। सखी सभ: (ओहिना करैत) सखी! जँ राजा तोरा मोन पाड़बामे देरी करथि, तखन हुनकर नाम-अङ्कित ई औँठी देखायब। (ई कहि औँठी दैत छथि।) शकुन्तला: (चिन्तित) विदाईक क्षण धरि हमरा पर दया कएल जा रहल अछि। सखी सभ: चिन्ता नहि कर। स्नेह अनिष्टक आशङ्कासँ भरल रहैत अछि। शार्ङ्गरव: (ऊपर देखि) सूर्य आकाशक दोसर भागमे चढ़ि गेलाह। अतः देवी, शीघ्रता करू। (उठैत) एहि दिस, एहि दिस, देवी। सभ आगाँ बढ़ैत छथि। शकुन्तला: (फेर पिताकेँ आलिङ्गन कऽ सिसकैत) पिता, हम फेर एहि तपोवनकेँ कहिया देखब? काश्यप: पुत्री, सुन— जखन चारू दिशा धरि पसारल पृथ्वीक सहपत्नी बनि जाएबह, जखन युद्धमे अजेय दुष्यन्तक पुत्रकेँ जन्म देबह, आ जखन ओ राज्यक भार अपना पर लेत, तखन केवल अपन पतिक सङ्ग एहि शान्त आश्रममे फेर डेग रखबह। गौतमी: पुत्री, विदाईक समय बीतल जा रहल अछि। आब पिताकेँ घुरि जाए दिअ। (काश्यपसँ) मुदा नहि, एतेक कालक बादो ई पिताकेँ घुरए नहि कहत। अतः गुरुदेव, अहाँ स्वयं घुरि जाउ। काश्यप: पुत्री, हमर तपस्या बाधित भऽ रहल अछि। आब हम घुरए चाहैत छी। शकुन्तला: (फेर पिताकेँ आलिङ्गन करैत) पिता दुःखसँ मुक्त भऽ जाएताह, मुदा हम आब दुःख अपन माथ पर लऽ जा रहल छी। काश्यप: हाय! हमरा एतेक विह्वल किएक कऽ रहल छह? पुत्री, जखन कुटीक द्वारपर तोहर हाथसँ अखने रोपल वन्य धानक बलि-अन्न अङ्कुरित देखब, तखन हमर शोक कोना शान्त होएत? पुत्री, जाउ, तोहर मार्ग मङ्गलमय होअ! शकुन्तला अपन सङ्गी सभक सङ्ग बाहर जाइत छथि। सखी सभ: (बहुत काल धरि देखैत) हाय! गाछक पाँतिक ओझराइ शकुन्तला आब देखाइ नहि पड़ैत छथि। काश्यप: अनसूया, तोहर धर्म-सहचरी चलि गेली। अपन दुःख रोक। हम घुरि रहल छी, हमर पाछाँ आउ। दूनू: पिता, शकुन्तलाक बिना तपोवन सुनसान लगैत अछि। काश्यप: स्नेह वस्तुकेँ एहन देखबैत अछि। (चलैत, विचार करैत) आश्चर्य! शकुन्तलाकेँ विदा कऽ आब हमर मोन हलुक भऽ गेल। किएक? पुत्री वास्तवमे परक धन होइत अछि। आब ओकरा पतिक घर पठा देलहुँ, तेँ हमर अन्तरात्मा ओहिना शान्त भऽ गेल, जेना बहुत दिनक धरोहर घुरा देलापर होइत अछि। सभ बाहर जाइत छथि। महाकवि कालिदास-रचित “शकुन्तला” नामक नाटकक चतुर्थ अङ्क समाप्त। पञ्चम अङ्क: दुर्घटना कञ्चुकी प्रवेश करैत छथि। कञ्चुकी: (अपना दिस देखि) हाय, हम कतेक बूढ़ भऽ गेलहुँ! राजमहलक अन्तःपुरक भार भेटलापर जे अधिकार-दण्ड ई सोचि स्वीकार कएने रही जे “ई तँ केवल परम्परागत औपचारिकता अछि,” समय बीतला पर ओहि दण्डकेँ आब चलबाक शक्ति नहि जुटला कारण हमर सहारा बनए पड़ल अछि। भीतर उपस्थित महाराजकेँ विलम्ब नहि सहएबला विषयक सूचना देबाक अछि। (दू डेग बढ़ैत) मुदा बात छल की? (मोन पाड़बाक प्रयास करैत) हँ, मोन पड़ल। कण्वक शिष्य तपस्वी सभ महाराजसँ भेँट करए चाहैत छथि। अहा, कतेक विचित्र— वृद्ध मनुष्यक बुद्धि क्षणभर अचानक जगैत अछि, फेर अन्हारसँ घेरि जाइत अछि, ठीक बुझाएबला दीपक लौ जकाँ। ओ चलैत छथि। नेपथ्यसँ: मौद्गल्य! हम महाराजकेँ एहन धार्मिक कर्तव्यक सूचना देबऽ चाहैत छी जे टारल नहि जा सकैत। की कहैत छह? “मुदा न्यायासनसँ अखने उठल महाराज फेर बाधित होएताह।” मुदा संसारक शासनक दायित्व एहनहि होइत अछि। देख— सूर्य एक बेर लेल अपन घोड़ा जोति लेने छथि, वायु दिन-राति बहैत अछि; अग्निक जरबामे कोनो विश्राम नहि, आ करक छठम अंश ग्रहण करएबला राजाक कर्तव्यो ओहिना अनवरत अछि। की कहैत छह? “तखन सङ्गीतशालाक लगक मण्डपमे जाउ।” नीक, अहाँ अपन काज करैत रहू, हम ओतहि जाइत छी। (चलैत आ चारू दिस देखि) महाराज एतय छथि— जे प्रजाक पालन विधाता मनु जकाँ करैत छथि, आ दिनभर झुण्डकेँ चरेबाक बाद धूपसँ तपल गजराज शीतल ठाममे जेना जाइत अछि, तेना मनसँ थाकल ओ एकान्तमे विश्राम लऽ रहल छथि। राजा आ विदूषक, सेवकगणसँ घेरल, बैसल अवस्थामे प्रवेश करैत छथि। विदूषक: (कान दऽ) अहा! ई सङ्गीतशाला नहि अछि की? ध्यान दियौ, वीणाक सुर पूरा तालमे बजि रहल अछि। बुझलहुँ! अवश्य हंसपदिका स्वराभ्यास कऽ रहल छथि। राजा: (सुनबाक चेष्टा करैत) माधव्य, चुप रह, हमरा सुनए दिअ। कञ्चुकी: हाय! महाराज तन्मय छथि। उचित अवसरक प्रतीक्षा करब। (देखि रहल छथि।) नेपथ्यसँ: (गीत गाओल जाइत अछि:) नव मधुक लोभमे आमक मञ्जरीकेँ जेना चुमने छलह, ओ मधुकर, आब कमलपर मात्र मँडराइ सन्तुष्ट भऽ ओकरा कोना बिसरि गेलह? राजा: अहा! भावपूर्ण रागसँ भरल गीत। विदूषक: की? अहाँ गीतक भाव बुझि गेलहुँ? राजा: (मुस्कराइत) मित्र! कखनो हम हुनकासँ प्रेम करैत रही; तेँ ओ कुलप्रभाक विषयमे हमरा उलाहना दऽ रहल छथि। हमर नामसँ हंसपदिकासँ कह—“अहाँक उलाहना बड़ा कुशल अछि।” विदूषक: महाराजक जे आज्ञा। (उठैत) मित्र! अहाँ दोसरक हाथसँ भालूक केस पकड़बाक प्रयास कऽ रहल छी। अपन वासनापर विजय नहि पाओल मनुष्य जकाँ आब हमरा मुक्ति नहि भेटत। राजा: मित्र, जाउ! हुनकासँ सभ्य ढङ्गेँ बात करिह। विदूषक: हाय, ई केहन विपत्ति! (बाहर जाइत छथि।) राजा: (अपनेसँ) ई कोन बात जे एहन गीत सुनि प्रियासँ वियोग नहि रहितहुँ हमर भीतर गम्भीर उत्कण्ठा भरि गेल? अथवा— सुखी मनुष्यो मनोहर दृश्य देखि वा मधुर वचन सुनि उत्कण्ठित भऽ जाइत अछि; अवश्य ओकर मन अनजानहि पूर्वजन्मक गाढ़ स्नेहकेँ मोन पाड़ैत अछि। कञ्चुकी: (लग आबि प्रणाम करैत) महाराजक जय हो! हिमालयक तलहटीक वनमे रहएबला तपस्वी सभ स्त्रीजनक सङ्ग आबि रहल छथि। ओ सभ काश्यपक सन्देश अनने छथि। ई सुनि उचित निर्णय लेब अहाँक अधिकार अछि। राजा: स्त्रीजनक सङ्ग काश्यपक सन्देश अनएबला तपस्वी सभ? कञ्चुकी: आब की आज्ञा अछि? राजा: हमर नामसँ आचार्य सोमरातसँ निवेदन करू—“शास्त्र-विहित विधिसँ एहि आश्रमवासी सभक स्वागत कऽ स्वयं हमरा लग आनू।” हमहूँ तपस्वी सभक दर्शन योग्य स्थानमे हुनका सभक स्वागत करब। कञ्चुकी: महाराजक जे आज्ञा। (बाहर जाइत छथि।) राजा: (उठैत) वसुमती! अग्निशालाक बाट देखाउ। प्रतिहारी: एहि दिस, एहि दिस, महाराज। (सभ चलैत छथि।) राजा: (राजकाजक थाकनि प्रकट करैत) मनोवाञ्छित वस्तु पाबि सभ सुखी होइत अछि। मुदा राजा सभक लेल इच्छित वस्तु प्राप्त भेलाक बादो पीड़ा रहैत अछि। कोना? प्रभुत्व केवल ओकर अभिलाषा शान्त करैत अछि, प्राप्त वस्तुक रक्षा मात्र पीड़ा दैत अछि। राज्यसत्ता थाकनि घटबैत कम, बढ़बैत बेसी अछि— जेना अपनहि हाथसँ डण्डी पकड़ि ऊपर धएल छाता। (नेपथ्यसँ) वैतालिक: महाराजक जय हो! दिन-दिन संसारक कल्याण लेल श्रम करैत छी, अपन सुखक चिन्ता नहि करैत— मुदा अहाँक जन्महि एहन अछि। गाछ अपन माथपर प्रचण्ड धूप सहैत अछि, आ ओकर छाहिमे शरण लेनिहारकेँ शीतलता दैत अछि। एतबे नहि— दण्ड-छड़ी हाथमे लऽ कुमार्गपर गेल लोककेँ अनुशासित करैत छी; विवादक समाधान करैत छी; सुरक्षा दैत छी। धन बहुत होए तखन सम्बन्धी लग रहि सकैत छथि, मुदा अन्ततः प्रजाक प्रति बन्धुक कर्तव्य अहाँहि पर आबि पड़ैत अछि। राजा: (सुनि) हमर थाकल मोन फेर ताजा भऽ गेल। (चलैत छथि।) प्रतिहारी: ई अग्निशालाक चबूतरा अछि—नीक जकाँ लीपल-पोतल, लगमे कपिला गाय ठाढ़ि अछि। महाराज, ऊपर चढ़ू। राजा: (ऊपर चढ़बाक अभिनय कऽ, सेवकक कान्हक सहारा लऽ रुकैत आ विचार करैत) वसुमती, पूज्य काश्यप कोन अभिप्रायसँ ऋषि सभकेँ हमरा लग पठौने होएताह? की तप सञ्चित कएनिहार व्रतधारी सभक तपस्यामे कोनो विघ्न पड़ल अछि? अथवा पवित्र वनक पशु सभकेँ केओ कष्ट दऽ रहल अछि? कि हमर कोनो अपराधसँ लता सभक फूलब रुकि गेल अछि? अनेक अनुमानसँ भरल हमर मन ठीक निर्णय नहि कऽ पाबि भ्रमित अछि। प्रतिहारी: महाराजक बाहु पृथ्वीकेँ आलिङ्गन कएने अछि, तेँ चारू आश्रम निर्भय अछि; एहन कोना भऽ सकैत अछि? हमरा बुझाइत अछि जे ऋषि सभ महाराजक सत्कर्मसँ प्रसन्न भऽ प्रशंसा करए आयल छथि। (तखन गौतमीक सङ्ग ऋषि सभ प्रवेश करैत छथि; हुनका सभक आगाँ शकुन्तला छथि। सभसँ आगाँ पुरोहित आ कञ्चुकी चलैत छथि।) कञ्चुकी: एहि दिस, एहि दिस, पूज्यवर सभ। (सभ चलैत छथि।) शार्ङ्गरव: सत्य अछि, उदार राजा मर्यादाक उल्लङ्घन नहि करैत छथि; सामाजिक वर्गमे नीचतमो केओ कुमार्गपर नहि चलैत अछि। तैयो सदा एकान्तक अभ्यस्त हमर मनकेँ लोकसँ भरल ई भवन जरैत आगि जकाँ लगैत अछि। शारद्वत: नगरमे प्रवेश करैत तोरा एहन व्याकुलता होएब उचित अछि। हमहूँ— स्वतन्त्र मनुष्य भऽ, भोगमे आसक्त एहि लोक सभकेँ ओहिना देखैत छी जेना स्नान कएल मनुष्य मैलासँ लिपटलकेँ, पवित्र मनुष्य अपवित्रकेँ, जागल मनुष्य सुतलकेँ, आ स्वेच्छासँ चलएबला बान्हल मनुष्यकेँ देखैत अछि। शकुन्तला: (अशुभ फड़कनक अभिनय करैत, व्याकुल) हाय! एहि समय हमर दहिना आँखि किएक फड़कि रहल अछि? गौतमी: अमङ्गल दूर होअ! तोहर पतिक कुलदेवता तोरा सुख देथि! (सभ चलैत छथि।) पुरोहित: (राजा दिस सङ्केत करैत) हे तपस्वी सभ! चारू वर्ण आ आश्रमक रक्षक महाराज अपन आसनसँ उठि अहाँ सभक प्रतीक्षामे छथि। हुनका देखू। ऋषि सभ: महाब्राह्मण! ई निश्चय प्रशंसनीय अछि, तैयो हमरा सभ निर्विकार छी। किएक? फलक भारसँ गाछ नीचाँ झुकैत अछि, नव जलसँ भरल मेघ नीचाँ लटकैत अछि, धन पाबि सज्जन अभिमानी नहि होइत छथि— परोपकारीक स्वभावहि एहन होइत अछि। प्रतिहारी: महाराज! ऋषि सभक मुख शान्त आ विश्वास जगबएबला देखाइत अछि। राजा: (शकुन्तलाकेँ देखि) तखन ई स्त्री— ई घोघटमे नुकायल स्त्री के होएत, जकर देह-सौन्दर्य पूर्ण रूपेँ प्रकट नहि अछि, तपस्वी सभक बीच पीयर पातक बीच नव कोँढ़ी जकाँ? प्रतिहारी: महाराज! हमर जिज्ञासो बढ़ि गेल अछि। हम किछु नहि जानैत छी। परिजन: महाराज, हुनकर रूप देखब योग्य अछि। राजा: परस्त्रीकेँ नहि देखबाक चाही! शकुन्तला: (छातीपर हाथ राखि अपनेसँ) हे हृदय, किएक काँपि रहल छह? अपन आर्यपुत्रक अटल प्रेम मोन पाड़ आ शान्त हो। पुरोहित: (आगाँ बढ़ि) महाराज! ई तपस्वी सभ विधिपूर्वक सत्कार पाबि चुकल छथि। ओ सभ अपन गुरुक सन्देश अनने छथि। कृपा कऽ सुनू। राजा: (आदरपूर्वक) हम ध्यानसँ सुनैत छी। ऋषि सभ: (लग आबि हाथ पसारैत) राजाक जय हो! राजा: (प्रणाम करैत) हम अहाँ सभकेँ प्रणाम करैत छी। ऋषि सभ: अहाँक कल्याण होअ! राजा: अहाँ सभक तपस्या निर्विघ्न चलि रहल अछि? ऋषि सभ: अहाँ रक्षक रहितहुँ सज्जनक पवित्र अनुष्ठानमे कोन विघ्न भऽ सकैत अछि? प्रचण्ड किरणबला सूर्य चमकैत रहए तखन अन्हार कोना प्रकट होएत? राजा: आब हमर “राजा” नाम सार्थक भेल। संसारकेँ अपन कृपासँ धन्य करएबला पूज्य काश्यप कुशल छथि? शार्ङ्गरव: सिद्ध पुरुष अपन कल्याणक स्वयं स्वामी होइत छथि। अहाँक कुशल पूछलाक बाद ओ महाराजसँ ई कहैत छथि। राजा: पूज्यवरक की आज्ञा अछि? शार्ङ्गरव: (शकुन्तला दिस सङ्केत करैत) “अहाँ दूनू आपसी सहमतिसँ हमर एहि पुत्रीसँ विवाह कएलहुँ, एहि लेल हम प्रसन्न छी आ दूनू गोटेकेँ अपन स्वीकृति दैत छी। किएक कि— हम अहाँकेँ योग्य पुरुष सभमे श्रेष्ठ मानैत छी, शकुन्तला मानो सद्गुणक मूर्ति छथि; समान गुणक वर-वधूकेँ मिलबैत विधाता अन्ततः एकटा प्रशंसनीय काज कएलनि। आब गर्भवती एकरा स्वीकार कऽ दाम्पत्य धर्मक निर्वाह करू।” गौतमी: सज्जन! बाजबाक उत्कण्ठा अछि, मुदा हमर बाजब उचित नहि। किएक? ई अपन बड़-बुजुर्गसँ परामर्श नहि केलक, अहाँ एकर सम्बन्धीसँ नहि पूछलहुँ। जखन दूनू गोटे एक-दोसरकेँ चुनि लेलहुँ, तखन आब एक-दोसरसँ की कहब? शकुन्तला: (अपनेसँ, उत्कण्ठित) आब हमर आर्यपुत्र की कहताह? राजा: (सुनि, सन्देहसँ घेरल) अहा! अहाँ सभक ई कथनक अभिप्राय की अछि? शकुन्तला: (अपनेसँ, सन्देहमे) हाय! हुनका ई बातपर जे सन्देह भेल, से आगि जकाँ दाहक अछि। शार्ङ्गरव: ई की? महाराज तँ लोकव्यवहार नीक जकाँ जानैत छथि। विवाहिता स्त्री सदाचारी रहितहुँ जँ केवल अपन माय-बापक घरमे रहैत अछि, लोक ओकर चरित्रपर सन्देह करैत अछि। तेँ सम्बन्धी सभ ओकरा विवाह करएबला पुरुष लग पठा दैत छथि, चाहे ओ पति ओकरासँ प्रेम करए वा नहि। राजा: की हम एकरासँ विवाह कएने छी? शकुन्तला: (हताश, अपनेसँ) हे हृदय, तोहर सन्देह सत्य सिद्ध भेल। शार्ङ्गरव: हे राजन्! अपनहि कएल कर्मकेँ निन्दित कहब की राजाक कर्तव्य-विमुखता अछि? राजा: ई झूठ गढ़बाक प्रवृत्ति किएक? शार्ङ्गरव: सत्ताक मदमे मातल मनुष्यक एहन अधःपतन सामान्यतः ओकर बुद्धि हरि लैत अछि। राजा: हमर घोर अपमान कएल जा रहल अछि! गौतमी: पुत्री! एक क्षण लज्जा छोड़। हम तोहर घोघट हटबैत छी। तखन महाराज तोरा चिन्हि लेताह। (ओहिना करैत छथि।) राजा: (शकुन्तलाकेँ देखि विस्मित भऽ अपनेसँ) एहि प्रकार हमरा समक्ष प्रस्तुत निर्दोष सौन्दर्यबाली ई स्त्रीसँ पूर्वमे विवाह भेल छल वा नहि— ई निश्चय करबाक चेष्टामे हम न एकरा स्वीकार कऽ पबैत छी, न छोड़ि पबैत छी; जेना भोरमे मधुमाछी ओस भरल चमेली फूलक विषयमे दुविधामे पड़ैत अछि। (विचारमे पड़ल रहैत छथि।) परिजन: (आपसमे) अहा! महाराज धर्मक कतेक आदर करैत छथि! एतेक सहजतासँ एहन स्त्री-रत्न भेटलापर आन के दुविधामे पड़ित? शार्ङ्गरव: हे राजन्, एतेक मौन किएक छी? राजा: हे तपस्वी! बहुत विचारलहुँ, मुदा एहि देवीसँ विवाह कएल बात मोन नहि पड़ैत अछि। तखन अपना पति होएबाक सन्देह रहितहुँ गर्भक हलुक चिह्न देखबैत स्त्रीकेँ हम कोना स्वीकार करी? शकुन्तला: (अपनेसँ) हाय! ओ विवाहोपर सन्देह कऽ रहल छथि! आकाश छुबए चढ़ल हमर आशा टूटि गेल। शार्ङ्गरव: ई उचित नहि! जाहि ऋषिक पुत्रीकेँ फुसला कऽ अहाँ हुनकर अनादर कएलहुँ, ओहि ऋषिक अपमान करब? ओ अपन वस्तु स्वीकार करबाक लेल अहाँक स्वागत कएलनि, आ लुटेरा समान अहाँकेँ योग्य पात्र मानलनि। शारद्वत: शार्ङ्गरव, आब चुप रहू! शकुन्तला, हमरा सभ जे कहबाक छल कहि देलहुँ। महाराजक कथन ई अछि। हुनका प्रमाण दिअ। शकुन्तला: (अपनेसँ; आह भरैत, व्याकुल) जे एतेक बदलि गेल, जकर प्रेम एतेक अल्पकालिक छल, ओकरा मोन पाड़ेबासँ आब की लाभ? तैयो अपन नाम निष्कलङ्क करबाक अछि, तेँ प्रतिवाद करब। (जोरसँ) हे आर्यपुत्र! (वाक्यक बीच अपनेसँ) मुदा नहि, एहि सम्बोधनपर आब विवाद अछि। (जोरसँ) हे पौरव! आश्रममे प्रतिज्ञा कऽ सहज निष्कपट हृदयबाली एहि स्त्रीकेँ फुसलौलहुँ; आब एहन वचन कहि ओकरा त्यागब उचित अछि? राजा: (कान बन्द करैत) ई पापपूर्ण वचन रोक! अपन नाम कलङ्कित कऽ आ हमरा पतन दिस धकेलबाक प्रयास किएक करैत छह? जेना तटकेँ तोड़ैत उमड़ल नदी अपन निर्मल जलोकेँ मैला करैत अछि आ तीरक गाछकेँ सेहो उखाड़ैत अछि। शकुन्तला: जँ अहाँ सचमुच हमरा परस्त्री बुझबाक भयक कारण एहन बाजि रहल छी, तखन चिन्हबाक ई महत्त्वपूर्ण चिह्न देखा कऽ अहाँक सन्देह दूर करैत छी। राजा: वाह, कतेक उदात्त बात! शकुन्तला: (मुद्रिका पहिरल ठाम छुबैत) हाय! औँठी हमर आङुरमे नहि अछि। (गौतमी दिस देखैत छथि।) गौतमी: इन्द्रावतरणक शचीतीर्थमे जलमे डुबकी लगबैत औँठी खसि नहि गेल होएत? राजा: (मुस्कराइत) सम्भवतः एकरे स्त्रीक दहेजमे भेटल तत्पर बुद्धि कहल जाइत अछि। शकुन्तला: एतय भाग्य अपन प्रभुता देखा देलक। हम दोसर बात कहैत छी। राजा: आब सुनबाक योग्य किछु आबि रहल अछि। शकुन्तला: एक दिन चमेली लताक मण्डपमे अहाँक हाथमे कमल-पातक दोना भरल जल नहि छल? राजा: हँ, आगाँ सुनाउ। शकुन्तला: ओहि क्षण पुत्र जकाँ पोसल हमर छोट हरिण आबि गेल। तखन अहाँ प्रेमसँ पुचकारि कहलहुँ—“पहिने एकरा पिबए दिअ।” मुदा अहाँसँ अपरिचित होएबाक कारण ओ अहाँक हाथसँ जल नहि पीलक। जखन ओहि जलकेँ हमर हाथसँ पी लेलक, तखन अहाँ स्नेह देखबैत हँसलहुँ आ कहलहुँ—“सभ अपनहि गन्धबला पर विश्वास करैत अछि। अहाँ दूनू वनवासी छी।” राजा: (हँसैत) अपन स्वार्थ सिद्ध करबाक लेल षड्यन्त्र करएबाली स्त्री सभ एहन झूठक मधुसँ भोगप्रिय पुरुषकेँ फँसाबैत अछि। गौतमी: महाराज! एहन नहि कहू। तपोवनमे पोसल ई छल-कपट नहि जानैत अछि। राजा: हे वृद्ध तपस्विनी! मानवेतर मादा जीवमे बिना सिखौने छल-कपट देखाइत अछि, तखन बुद्धिमती स्त्रीमे तँ आओर बेसी होएत। आकाशमे उड़ि जाएसँ पहिने कोइली अपन बच्चाकेँ दोसर पक्षीसँ पोसबा लैत अछि। शकुन्तला: (क्रोधसँ) अहाँ सभ किछु अपनहि हृदयक वृत्तिक अनुसार देखैत छी! धर्मक कवच पहिरि, घाससँ नुकायल इनार जकाँ भीतर सँ कपटी—अहाँ जकाँ दोसर के होएत? राजा: (अपनेसँ) मुदा एहि देवीक निष्कपट क्रोध वनमे पोसल स्त्रीकहि क्रोध लगैत अछि। किएक कि— ओकर आँखि कटाक्ष नहि करैत, सोझे अत्यन्त लाल भऽ घूरि रहल अछि; स्वर कठोर अछि, शब्द अस्पष्ट नहि भऽ रहल; बिम्बाफल-जकाँ लाल अधर जाड़सँ पीड़ित जकाँ काँपि रहल अछि; स्वभावसँ वक्र भौंह एकाएक सिकुड़ि एकठाम भऽ गेल अछि। (जोरसँ) भद्रे, दुष्यन्तक आचरण प्रजामे प्रसिद्ध अछि; हम अपना भीतर एहन कोनो दोष नहि देखैत छी। शकुन्तला: अहाँहि प्रमाण छी, अहाँ लोकव्यवहार जानैत छी; भीरु स्त्री सभ बेचरी की जानत? ठीक अछि! पुरुवंशपर विश्वास कऽ मधुर वचनबला मुदा हृदयमे छुरी रखने पुरुषक हाथमे पड़ल हमरा व्यभिचारिणी बना देल गेल। (मुँह फेरि कनैत छथि।) भागुरि: असंयमित उतावलीमे कएल कर्म एही प्रकार दग्ध करैत अछि। एहि कारण— विशेषतः सम्बन्ध जोड़बाक पहिने सभ बात नीक जकाँ जाँचि लेबाक चाही। जकर हृदयक परिचय नहि, ओकरासँ कएल स्नेह एही प्रकार घृणामे बदलि जाइत अछि। राजा: अहा, महोदय! केवल एहि देवीक कथनपर अहाँ हमरा पर एतेक गम्भीर कलङ्क किएक लगा रहल छी? शार्ङ्गरव: महाराज सभ बात उलटि बुझि रहल छथि। जे जन्मसँ छल-कपट नहि जानल, ओकर वचन प्रमाण नहि! आ जे “राजनीति” नाम दऽ दोसराकेँ ठकबाक विद्या पढ़ल, ओ सभ विश्वसनीय प्रमाण! राजा: अहा, सत्यवादी महोदय! मानि लैत छी जे हम राजनीतिज्ञ छी। मुदा एकरा धोखा दऽ हमरा की लाभ होएत? शारद्वत: विनाश! राजा: से हमर इच्छा नहि अछि। शारद्वत: राजन्! एहि विवादसँ की लाभ? हम सभ गुरुक आज्ञा पूरा कऽ देलहुँ। आब विदा होइत छी। ई अहाँक पत्नी अछि—स्वीकार करू वा छोड़ि दिअ। कारण पत्नीपर पतिक अधिकार सर्वव्यापी मानल गेल अछि। गौतमी, चलू, आगाँ बढ़ू! (सभ चलैत छथि।) शकुन्तला: (करुण स्वरमे) हाय! वास्तवमे एहि कपटी हमरा ठकि लेलक। अहूँ सभ हमरा छोड़ि कऽ जा रहल छी। आब हमर उपाय की अछि? (ई कहि गौतमीक पाछाँ चलैत छथि।) गौतमी: (रुकैत) पुत्र शार्ङ्गरव! शकुन्तला करुण विलाप करैत हमरा सभक पाछाँ आबि रहल अछि। जखन एहन नीच पति एकरा अस्वीकार कऽ रहल अछि, तखन हमर पुत्री की करत? शार्ङ्गरव: (पुरोहितक सङ्केतपर घुरैत) अहा, निर्लज्ज स्त्री! अपन मनमानी करए चाहैत छह? (शकुन्तला भयक मारे काँपैत छथि।) शार्ङ्गरव: सुन! जँ राजा जे कहैत छथि से सत्य अछि, तखन पिताकेँ दुःख देबएबाली तोरासँ हमरा सभक की सम्बन्ध? मुदा जँ अपन आचरण शुद्ध जानैत छह, तखन पतिक घरमे दासी भऽ रहबो तोरा सहनीय होएबाक चाही। एतहि रह! हम सभ जा रहल छी। राजा: तपस्वी! एहि स्त्रीकेँ धोखा किएक दऽ रहल छी? चन्द्रमा केवल कुमुदिनीकेँ फुलबैत अछि, सूर्य केवल कमलकेँ। संयमीक स्वभाव परस्त्रीकेँ आलिङ्गन करबासँ पाछाँ हटैत अछि। शार्ङ्गरव: राजन्! जँ दोसर स्त्रीक चिन्तामे डूबल रहबाक कारण अपन पूर्व विजय बिसरि गेल छी, तखन अपयशसँ बचएबला महाराज, की कएल जाए? राजा: गुरुवरसँ पूछए चाहैत छी जे एतय कोन बात बेसी सम्भव अछि। ई सन्देह रहैत जे हम बिसरि गेलहुँ अथवा ई स्त्री झूठ बाजि रहल अछि— हम अपन पत्नीकेँ कलङ्कित करी, कि परस्त्रीक शील भङ्ग करी? पुरोहित: (विचार करैत) जँ हम सभ एहि प्रकार करी... राजा: ...कृपा कऽ परामर्श दिअ। पुरोहित: प्रसव होए धरि ई देवी हमर घरमे रहथि। हम सोचि-विचारि ई कहैत छी। ज्ञानी सभ अहाँकेँ कहलनि जे अहाँक पहिल पुत्र सम्राट होएत। जँ ऋषि-पुत्रीक पुत्रमे सम्राटक लक्षण हो, तखन एकरा बधाई दऽ अन्तःपुरमे स्वागत करब। नहि तँ पिताक घर घुरा देब। राजा: जेना गुरुदेवक इच्छा। पुरोहित: पुत्री, हमर पाछाँ आउ। शकुन्तला: (कनैत) हे पृथ्वी देवी, हमरा अपन भीतर ठाम दिअ। (ओ पुरोहित आ अन्य सभक सङ्ग बाहर जाइत छथि।) राजा: (शापक कारण स्मृति अवरुद्ध रहितहुँ शकुन्— तलाक विषयमे विचार करैत छथि।) नेपथ्यसँ: आश्चर्य! आश्चर्य! राजा: (सुनि) आब की भऽ रहल अछि? पुरोहित: (प्रवेश करैत) महाराज! एकटा चमत्कार भेल अछि। राजा: केहन चमत्कार? पुरोहित: कण्वक शिष्य सभ चलि गेलाक बाद— जखन ओ कन्या अपन भाग्यपर विलाप करैत— कानए लागल— आ अपन बाँहि ऊपर फेँकए लागल... राजा: तखन की भेल? पुरोहित: अप्सरा-तीर्थक लग स्त्री-रूप प्रकाश ओकरा पर उतरल आ ओकरा उठा कऽ लऽ गेल। (सभ आश्चर्यचकित होइत छथि।) राजा: गुरुदेव, हम एहि विषयक निर्णय पहिनहि कऽ चुकल छी। व्यर्थ अनुमानसँ अपना के किएक थकाबी? पुरोहित: महाराजक जय हो। (बाहर जाइत छथि।) राजा: (मुस्कराइत) वसुमती, हम अशान्त छी। शयनकक्षक बाट देखाउ। कञ्चुकी: (आदरपूर्वक) एहि दिस महाराज, एहि दिस। (सभ चलैत छथि।) राजा: (अपनेसँ) ऋषि-पुत्रीसँ विवाह कएल बात मोन नहि रहितहुँ हम ओकरा अस्वीकार कऽ देलहुँ, मुदा अत्यन्त पीड़ित हमर हृदय मानो ओकरहि चाहि रहल अछि। सभ बाहर जाइत छथि। महाकवि कालिदास-रचित “शकुन्तला” नामक नाटकक पञ्चम अङ्क समाप्त। षष्ठ अङ्क: विरह (नगरक कोतवाल प्रवेश करैत छथि; हुनका सङ्ग पाछाँ हाथ बान्हल एक पुरुष आ दू गोट प्रहरी छथि।) प्रहरी सभ: (पुरुषकेँ पीटैत) हे डाकू! स्वीकार कर, महाराजक नाम खुदल बहुमूल्य रत्न-जड़ित राजमुद्रिका तोरा कतयसँ भेटल? पुरुष: (भयक अभिनय करैत) दया करू, दया करू, माननीय भाइ सभ! हम एहन काज करए योग्य नहि छी। पहिल प्रहरी: सम्भवतः राजा तोरा पुण्यात्मा ब्राह्मण बुझि उपहारमे देलनि? पुरुष: आब हमर पूरा बात सुनू! हम “इन्द्रावतरण” तीर्थपर रहएबला मछुआरा छी... दोसर प्रहरी: हे चोर! हम तोरा जाति पूछने छलहुँ? कोतवाल: सूचक! एकरा सभ बात क्रमसँ कहए दिअ। बीचमे टोकब बन्द कर। प्रहरी सभ: जेना साला-साहेबक आज्ञा... बाज, बाज! पुरुष: जाल, काँटी आदि माछ मारबाक साधनसँ अपन परिवारक पेट पोसैत छी। साला: (हँसैत) अहा, बड़ पवित्र व्यवसाय! पुरुष: महोदय! कहल गेल अछि जे अपन वंशानुगत जीविका चाहे निन्दित हो, तैयो नहि छोड़बाक चाही। दयालु आ विद्वान ब्राह्मणो यज्ञमे निर्दयतासँ पशु मारैत छथि। साला: ठीक, ठीक! पुरुष: एक दिन रोहू माछ काटैत ओकर पेटमे रत्नसँ चमकैत ई औँठी देखलहुँ। बादमे एतय बेचबाक लेल लोककेँ देखबैत रही, तखन अहाँ सभ हमरा पकड़ि लेलहुँ। ई औँठी हमरा एही प्रकार भेटल; आब मारू वा पीटू! साला: (औँठी सुँघैत) जानुक! निश्चय ई माछक पेटमे छल। एही कारण काँच मांसक दुर्गन्ध आबि रहल अछि। आब एकर उत्पत्ति जाँचए पड़त; चलू राजदरबार। प्रहरी सभ: चल, हे जेबी-कटुआ महाराज! (सभ चलैत छथि।) साला: सूचक! अहाँ दूनू सावधान भऽ मुख्य द्वारपर हमर प्रतीक्षा करू। हम महाराजकेँ औँठीक प्राप्तिक कथा सुना, हुनकर आज्ञा लऽ घुरैत छी। दूनू: महाराज साला-साहेबक अनुकूल स्वागत करथि! (साला बाहर जाइत छथि।) पहिल प्रहरी: जानुक, साला-साहेब बहुत समय लगा रहल छथि। दोसर प्रहरी: राजाक लग पहुँचबाक उचित अवसरक प्रतीक्षा करए पड़ैत अछि, ई बात बुझ। पहिल प्रहरी: मित्र, एहि दुष्टक गला दबए लेल हमर हाथ खुजला रहल अछि। (पुरुष दिस सङ्केत करैत।) पुरुष: “भाइ” एहन शुभ नामसँ पुकारल गेल मनुष्यक लेल असमय मृत्यु देब उचित नहि। दोसर प्रहरी: (देखि) ...देख, महाराजक आज्ञा लऽ हमर स्वामी आबि रहल छथि। (पुरुषसँ) आब या तँ अपन परिवारक मुँह देखबह, वा गिद्ध-सियारक भोग बनबह। (प्रवेश करैत) साला: शीघ्र, शीघ्र, एकरा... (वाक्य बीचमे रोकैत) पुरुष: हाय! हम मरि गेलहुँ! (निराशाक अभिनय करैत।) साला: एकरा खोलि दिअ! अरे, मछुआराकेँ मुक्त करू! औँठीक उत्पत्तिक ओकर कथा सत्य सिद्ध भेल। हमर स्वामी स्वयं हमरा कहलनि। पहिल प्रहरी: जेना साला-साहेबक आज्ञा! यमराजक घरमे प्रवेश कऽ ई फेर दरारिसँ निकलि आएल। (पुरुषकेँ खोलैत अछि।) पुरुष: (सालाकेँ प्रणाम करैत) स्वामी! हमर जीवन अहाँक अछि। साला: उठ! औँठीक मूल्यक बराबर ई पुरस्कार तोरा देल जा रहल अछि। पुरुष: (आनन्दसँ ग्रहण करैत) हमरा पर कृपा भेल। पहिल प्रहरी: एतेक कृपा जे सूलीसँ उतारि हाथीपर बैसा देल गेल। दोसर प्रहरी: साला-साहेब! पुरस्कारसँ बुझाइत अछि जे महाराज एहि बहुमूल्य रत्नबाली औँठीकेँ बहुत प्रिय मानैत छथि। साला: हमरा नहि बुझाइत अछि जे महाराज रत्नक कारण एकरा मूल्यवान मानलनि। दूनू: तखन किएक? साला: अनुमान अछि जे एकरा देखि महाराजकेँ कोनो अत्यन्त प्रिय व्यक्तिक स्मरण भऽ गेलनि; कारण सामान्यतः संयमित रहएबला महाराज एकरा देखितहि क्षणभर लेल व्याकुल भऽ उठलाह। दोसर प्रहरी: एहि साला-पुत्र महाराजक नीक सहायता केलक। पहिल प्रहरी: हम तँ कहब जे ई माछक शत्रु लाभमे रहल! (पुरुष दिस वैरभावसँ देखैत।) पुरुष: स्वामी! एकर आधा भाग अहाँ सभक फूल-पानक खर्च लेल राखू। दूनू: ई तँ सज्जनताक बात अछि। साला: मछुआरा, आब तैँ हमर परम मित्र भऽ गेलह। नव मित्रताकेँ मदिरासँ पक्का करबाक चाही; चल, मदिरालय जाइ। सभ बाहर जाइत छथि। प्रवेशिका समाप्त। (आकाशयानमे अक्षामाला प्रवेश करैत छथि।) अक्षामाला: अप्सरा सभक स्नान-तीर्थपर अपन नित्यकर्म पूरा कऽ लेलहुँ। आब स्वयं देखि ली जे राजर्षिक की दशा अछि। मेनकासँ मित्रताक कारण शकुन्तला हमरा प्रिय भऽ गेली, आ ओ स्वयं हमरा एहि काज लेल पठौने छथि। (आगाँ बढ़ि चारू दिस देखि) ई कोना जे पर्वक दिनो राजदरबार उत्सव लेल सजल नहि अछि? सत्य तँ ई जे ध्यान-शक्तिसँ हम सभ किछु जानि सकैत छी, मुदा सखीक इच्छाक सम्मान करबाक अछि। नीक, अदृश्य होएबाक मायासँ नुकाइ एहि दूनू मालीक लग ठाढ़ि भऽ समाचार बुझैत छी। (ओहिना करैत छथि।) (एक दासी आमक नव अङ्कुर जाँचैत प्रवेश करैत अछि; ओकर पाछाँ दोसर दासी।) पहिल मालिनी: हे आमक मञ्जरी! वसन्त-मासक निःश्वास समान तोरा देखि, हरियर डाँठपर पिङ्गल वर्ण धारण कएने, हमरा ऋतुक मङ्गल-दर्शन भऽ रहल अछि। दोसर मालिनी: (लग आबि) सखी परभृतिका, अपने-आप की बाजि रहल छह? पहिल मालिनी: सखी, आमक कोमल अङ्कुर देखि कोइली मातल भऽ जाइत अछि। दोसर मालिनी: (प्रसन्न भऽ) की वसन्त आबि गेल? पहिल मालिनी: मधुकरिका, आब तोहर प्रेम-रससँ भरल गीतक समय अछि। दोसर मालिनी: सखी, हम पएरक अँगुरीपर ठाढ़ि भऽ कामदेवक पूजा करी, तोँ हमरा थाम्हि राख। पहिल मालिनी: जँ पूजाक आधा फल हमरा भेटए। दोसर मालिनी: सखी, ई तँ कहबाक आवश्यकता नहि; हम दूनू शरीरमे एक आत्मा छी। (सखीक सहारा लऽ आमक मञ्जरी तोड़बाक अभिनय करैत) अहा! आमक मञ्जरी अखनो नहि फूटल अछि, तैयो डाँठ तोड़ितहि सुगन्धि आबि रहल अछि। (कपोत-मुद्रा बनबैत) मकरध्वज कामदेवक जय हो! हे आमक अङ्कुर! धनुष उठौने कामदेवकेँ हम तोरा अर्पित करैत छी; युवती सभकेँ लक्ष्य बनएबला अमोघ बाण बनिह। (अङ्कुर फेँकैत अछि।) (क्रोधित कञ्चुकी प्रवेश करैत छथि।) कञ्चुकी: रोक, मूर्ख कन्या! महाराज वसन्तोत्सव स्पष्ट रूपेँ निषिद्ध कएने छथि, आ तोँ फूल तोड़ए लागल छह। दूनू: (भयभीत) क्षमा करू, स्वामी! हमरा सभकेँ एहि विषयमे किछु सुनबामे नहि आएल। कञ्चुकी: हुँह! महाराजक आज्ञा अहाँ सभ कोना नहि सुनलहुँ, जकर पालन वसन्तक गाछ आ ओकर भीतर रहएबला जीवो कऽ रहल अछि? कारण— आमक मञ्जरी परिपक्व भऽ गेल, तैयो पराग नहि छोड़ैत अछि; राजमाला कोँढ़ी देबाक स्थितिमे अछि, तैयो नहि फूटैत; जाड़ बीति गेलोपर नर कोइलीक कूजन कण्ठमे अटकि जाइत अछि। भय अछि जे चकित कामदेवो तरकससँ आधा निकालल बाण फेर राखि देने छथि। अक्षामाला: एहि विषयमे कोनो सन्देह नहि! राजर्षिक प्रभाव महान अछि। पहिल मालिनी: स्वामी, राजाक साला मित्रवसु हमरा सभकेँ किछु दिन लेल महाराजक सेवासँ हटा कऽ ओहि सोझाँक अटारी सजएबाक काजपर पठौने छलाह। एही कारण हमरा सभकेँ एहि बातक कनो समाचार नहि छल। कञ्चुकी: ठीक अछि, मुदा फेर एहन नहि करब। दूनू: स्वामी, हमरा सभकेँ जिज्ञासा अछि। जँ जानब उचित हो, तँ कृपा कऽ कहू जे महाराज वसन्त पूर्णिमाक उत्सव किएक रोकि देलनि? अक्षामाला: राजा सभ उत्सवप्रिय होइत छथि। एकर पाछाँ अवश्य कोनो गम्भीर कारण अछि। कञ्चुकी: ई बात सभकेँ ज्ञात अछि, तखन अहाँ सभसँ किएक नहि कही? शकुन्तलाक अस्वीकारक कलङ्कक समाचार अहाँ सभक कान धरि पहुँचल? दूनू: स्वामी! राजाक सालासँ औँठी भेटबाक घटना धरि सुनने छी। कञ्चुकी: तखन कहबाक बहुत कम शेष अछि। औँठी देखते महाराजक स्मृति घुरि आएल—“सत्यहि हम शकुन्तला देवीसँ गुप्त विवाह कएने रही आ मोहवश हुनका अस्वीकार कऽ देलहुँ!” तखनसँ ओ पश्चात्तापसँ भरल छथि। कोना? भोग-विलाससँ घृणा करैत छथि; प्रजा आब प्रतिदिन इच्छानुसार हुनका लग नहि पहुँचैत अछि। राति भरि खाटपर छटपटाइत, एक कातसँ दोसर कात बदलैत रहैत छथि। अन्तःपुरक स्त्री सभसँ शिष्टाचारवश विनम्र बात करैतहुँ हुनकर नाम बजबामे भुला जाइत छथि, आ बहुत काल धरि लज्जित रहैत छथि। अक्षामाला: ई सुनि हमरा प्रसन्नता भेल! कञ्चुकी: महाराजक उदासी कारण उत्सव रोकल गेल अछि। दूनू: ई उचित बुझाइत अछि। नेपथ्यसँ: आउ, आउ महोदय। कञ्चुकी: (सुनि) महाराज एहि दिस आबि रहल छथि। अहाँ सभ अपन काजमे लागू! (दासी सभ बाहर जाइत छथि।) (पश्चात्ताप अनुरूप वस्त्र पहिरने राजा, विदूषक आ प्रतिहारी प्रवेश करैत छथि।) कञ्चुकी: (राजाकेँ देखि) अहा! असाधारण सुन्दर मनुष्य प्रत्येक अवस्थामे उदात्त लगैत अछि। शकुन्तलाक विरहमे क्षीण होइतहुँ महाराज दर्शनीय छथि। ओ— दिखावा भरल अलङ्कार त्यागि देने छथि, बाम अग्रबाहुपर एकमात्र ढील सोनक कङ्कण पहिरने छथि; निःश्वाससँ अधर लाल भऽ गेल अछि, जागरणक चिन्तासँ आँखि शिथिल अछि। तैयो जन्मजात तेजक कारण क्षीण नहि देखाइत छथि, घर्षणसँ माँजल महान रत्न जकाँ। अक्षामाला: अस्वीकार कऽ अपमानित कएलाक बादो शकुन्तला हुनका लेल व्याकुल छथि—ई उचितहि अछि। राजा: (विचारमे डूबल, धीरे-धीरे चलैत) ई अभागल हृदय पहिने सुतल छल, यद्यपि मृगनयनी प्रिया एकरा जगएबाक चेष्टा कएने छल। आब ई जागल अछि, मुदा पश्चात्तापक दुःख लेल। अक्षामाला: बेचारी कन्याक भाग्यो लगभग एहने अछि। विदूषक: (अपनेसँ) फेर “शकुन्तला-रोग”क दौरा पड़लनि। नहि जानि एकर उपचार कोना होएत। कञ्चुकी: महाराजक जय हो! महाबली राजन्! राजकीय उपवनक निरीक्षण भऽ गेल अछि, जाहिसँ अवसर भेटला पर अहाँ भ्रमण कऽ सकी। राजा: (प्रतिहारीसँ) वसुमती, हमर नामसँ मन्त्री पिशुनकेँ कह जे दीर्घकालीन अनिद्राक कारण आइ न्यायासनपर बैसब सम्भव नहि। आइ ओ जे नागरिक मुकदमा जाँचथि, तकर लिखित प्रतिवेदन हमरा पठा देथि। प्रतिहारी: महाराजक जे आज्ञा। (बाहर जाइत छथि।) राजा: पर्वतायन! अहूँ अपन कर्तव्य करए जाउ। कञ्चुकी: बहुत नीक। (बाहर जाइत छथि।) विदूषक: मक्खी सभकेँ हटा देलहुँ। आब जाड़ बीति गेल, तखन एहि रमणीय उपवनमे निश्चिन्त भऽ विश्राम कऽ सकैत छी। राजा: मित्र, “दुर्घटना दुर्बल स्थानपरहि प्रहार करैत अछि”—ई कहावत कहियो मिथ्या नहि होइत। देख— राजमुद्रिका कारण स्मृति घुरि आएल अछि, आ अकारण त्यागल प्रियाक लेल पश्चात्तापसँ व्याकुल भऽ विलाप कऽ रहल छी; एहि समय सुगन्धित वसन्त-मासक आनन्द सोझाँ आबि ठाढ़ि भेल अछि। विदूषक: एक क्षण रुकू। हम एहि आम-रूपी कामदेवपर अपन लाठीक प्रहार करैत छी। राजा: छोड़। तोहर ब्राह्मण-तेज देखि चुकल छी। मित्र, एतय बैसि एहि लता सभकेँ देखि आँखि बहलाएब, जे किछु-किछु हमर प्रियाक अनुकृति करैत अछि। विदूषक: मुदा अहाँ चित्रकार मेधाविनीकेँ अखने तँ कहलहुँ—“हम माधवी-लता मण्डपमे किछु समय रहब। शकुन्तला देवीक जे चित्र अपन हाथसँ चित्रपटपर बनौने छी, से लऽ आउ।” राजा: हमर हृदयक दशा एहनहि अछि। माधवी-मण्डपक बाट देखाउ। विदूषक: आउ, महाराज। (दूनू चलैत छथि। अक्षामाला पाछाँ-पाछाँ जाइत छथि।) विदूषक: (देखि) रत्न-जड़ित शिला-आसनसँ सजल ई माधवी-मण्डप हमर प्रिय मित्रक मौन स्वागत कऽ रहल अछि। भीतर चली। महाराज, बैसू। (दूनू प्रवेश कऽ बैसैत छथि।) अक्षामाला: (एक लताक लग ठाढ़ि रहैत छथि।) राजा: (स्मरणक अभिनय करैत) मित्र माधव्य, आब हमरा सभ मोन पड़ि गेल। पहिल बेर शकुन्तलाकेँ देखलापर जे बात तोरा कहलहुँ छल। जखन हम हुनका अस्वीकार कएलहुँ, तखन तोँ हमर लग नहि छलह। ओकरो पहिने तोँ बातचीतमे कहियो हुनकर नाम नहि अनलह। निश्चय तोहूँ, हमर जकाँ, हमरा सभक बात बिसरि गेल छलह। विदूषक: हम बिसरल नहि रही। उलटे, अहाँ हमरा सभ घटना कहने छलहुँ। मुदा अन्तमे कहलहुँ जे ई सत्य नहि, मात्र परिहास छल। माटिक ढेला जकाँ मन्दबुद्धि हम, रहस्य प्रकट होएबाक भयक कारण, अहाँक बातकेँ सच मानि लेलहुँ। आ भाग्य तँ प्रबल होइतहि अछि। अक्षामाला: ई सत्य अछि। राजा: (कल्पनामे डूबल) मित्र, हमर सहायता कर, सहायता कर। विदूषक: बात एतेक दूर कोना पहुँचि गेल? सज्जनक धैर्य दुःखसँ कोना डगमगा सकैत अछि? आँधीक वायुसँ सेहो पहाड़ अचल रहैत अछि। राजा: मित्र! अपन प्रियाक असहाय भयक दशा मोन पड़ितहि हम अत्यन्त व्याकुल भऽ उठैत छी। ओ— हमरासँ निकालल गेली, अपन लोक सभक पाछाँ जाए चाहैत छली, तखन पिताक समान पिताक शिष्य जोरसँ आज्ञा देलक—“रुक!” आ ओ बहैत नोरसँ धुँधल आँखिसँ निर्दयी हमर दिस एक बेर फेर देखि लेली— ई सभ विष-बुझल बाण जकाँ हमरा भेदैत अछि। अक्षामाला: अहा, कतेक पीड़ा! हुनकर दुःख देखि हमरा सन्तोष भऽ रहल अछि। विदूषक: महाराज, एकटा अनुमान अछि। देवीकेँ अवश्य कोनो आकाशचारी उठा लऽ गेल होएत। राजा: देवताक अतिरिक्त ई के कऽ सकैत छल? हमरा कहल गेल छल जे मेनका तोहर सखीक माय छथि। हमर हृदय मानैत अछि जे हुनकर सखी सभ हुनका लऽ गेली। अक्षामाला: अहा! हुनकर मोह आश्चर्यजनक छल, मुदा बुद्धिक जागरण नहि। विदूषक: जँ एहन अछि तँ अन्ततः देवीसँ पुनः मिलन होएत। राजा: कोना? विदूषक: माय-बाप अपन पुत्रीकेँ पतिक वियोगमे बहुत काल धरि नहि देख सकताह। राजा: मित्र, की ओ सपना छल? माया? भ्रम? कि कठिन पुण्यक फल? मोन पाड़बाक पहुँचसँ बाहर चलि गेल, आ हमर अभिलाषा लेल ई अथाह खड्ड बनि गेल। विदूषक: एहन नहि कहू। औँठी स्वयं प्रमाण अछि। भाग्यसँ निश्चित अद्भुत पुनर्मिलन एही प्रकार होइत अछि। राजा: (औँठी दिस देखि) अहा! अगम स्थानसँ खसल ई अभागल वस्तु। हे औँठी, तोहर पुण्यक फल वास्तवमे हमर जकाँ अत्यन्त तुच्छ भेटल। लाल नहसँ मनोहर ओकर आङुरमे तोरा स्थान भेटल छल, तैयो ओतयसँ खसि पड़लह। अक्षामाला: (अपनेसँ) सखी, तोँ बहुत दूर छह। तेँ ई कर्णप्रिय सुख हम असगरे लऽ रहल छी। विदूषक: मित्र! ई औँठी देवीक हाथमे पहिरएबाक प्रयास कोना कएलहुँ? राजा: सुन। तपोवनसँ अपन नगर दिस प्रस्थान करैत रही, तखन आँखिमे नोर भरने प्रिया हमरा कहली—“आर्यपुत्र हमरा कतेक दिन धरि मोन रखताह?” विदूषक: तखन? तखन? राजा: तखन ई राजमुद्रिका हुनकर आङुरमे पहिरा कऽ कहलहुँ— दिन-दिन एक-एक कऽ हमर नामक अक्षर गनिह। प्रिय, जखन अन्तिम अक्षर धरि पहुँचबह, तखन केओ आबि तोरा बाट देखबैत अन्तःपुर लऽ जाएत। ...आ मोहमे पड़ि ओहन घोर अपराध कऽ देलहुँ। अक्षामाला: भाग्य अहाँकेँ मनोहर उपाय सुझौलक। विदूषक: तखन ई औँठी काँटी जकाँ ओहि अभागल रोहू माछक मुँहमे कोना पहुँचि गेल? राजा: तोहर सखी शचीतीर्थक जलकेँ प्रणाम करैत गङ्गाक धारामे एकरा खसा देली। आब एकरा उलाहना दी— कोमल वक्र आङुरबला ओ हाथ छोड़ि जलमे कोना डूबि गेलह? मुदा नहि— जड़ वस्तु गुण-दोष नहि बुझैत अछि; तखन हम अपन प्रियाकेँ कोना ठुकरा देलहुँ? अक्षामाला: एहि कथाक आरम्भ आ अन्त एक-दोसरक विपरीत अछि। राजा: अकारण तिरस्कृत प्रियाकेँ फेर कहिया देखब? (हाथमे चित्रपट लेने चित्रकार प्रवेश करैत छथि।) चित्रकार: (चारू दिस देखि) महाराज एतय छथि। हुनका लग जाइत छी। (लग आबि) महाराजक जय हो! देवीक चित्र अनने छी। (चित्रपट देखबैत छथि।) विदूषक: (देखि) अहा, अहा, अहा! बिलकुल सजीव सौन्दर्य! साधु मित्र, साधु! आ की कही? आत्मा एहि चित्रमे प्रवेश कऽ गेल हो—एहन बुझि एकरासँ बात करबाक इच्छा भऽ रहल अछि। अक्षामाला: अहा! हुनकर साथी चित्रकारक कूचीमे कतेक निपुणता अछि! हमरा सखी सोझाँ ठाढ़ि देखाइत छथि। राजा: (आह भरैत) पहिने सोझाँ ठाढ़ि प्रियाकेँ अस्वीकार कएलहुँ; आब चित्रमे बनल हुनका आदर दऽ रहल छी। बाटमे उमड़ल जलसँ भरल नदीकेँ उपेक्षित कऽ हाय, आब मृगमरीचिकाक लेल तरसि रहल छी। अक्षामाला: जे सभ हम कहए चाहैत रही, से ओ स्वयं स्वीकार कऽ लेलनि। विदूषक: (चित्र जाँचैत) तीन गोट स्त्री देखाइत छथि। सभ सुन्दर छथि। एहि मे शकुन्तला के छथि? अक्षामाला: बेचाराकेँ अपना के धोखा देब नीक जकाँ अबैत अछि; हमर सखी वास्तवमे एतय नहि छथि। राजा: तोरा कोन गोटे बुझाइत छह? विदूषक: (बहुत काल धरि देखि) हमरा बुझाइत अछि—अशोकक लताक सहारे थाकल ठाढ़ि ई स्त्री, जकर मुखपर पसिनाक बूँद अछि; ढील केश-बन्धनसँ फूल खसि रहल; बाँहि-लता अपन शाखा नीचाँ झुका देने; वस्त्रक करधनी खुलल—इएह शकुन्तला देवी होएतीह। दोसर दूनू हुनकर सखी छथि। राजा: तोँ चतुर छह। एहि मे हमर प्रेमक स्पष्ट चिह्न अछि। रेखाक कातमे नम आङुरक धब्बा देखाइत अछि, आ हमर गालसँ खसल नोरक कारण कूचीक रङ्ग पसारल देखल जा सकैत अछि। मेधाविनी! विहार-वनक चित्र आधा बनल अछि। जा, कूची लऽ आ। चित्रकार: आर्य माधव्य! हम घुरि अबैत छी, ताबत चित्रपट पकड़ने रहू। (विदूषककेँ दऽ बाहर जाइत छथि।) विदूषक: एतय आओर की चित्रित करब बाँकी अछि? अक्षामाला: निश्चय ई हमर प्रिय सखीक मनपसन्द सभ स्थान बनाबए चाहैत छथि। राजा: माधव्य, सुन। हम मालिनी नदी बनएब, जकर बालूबला तटपर वनहंसक जोड़ा पाँतिमे अछि; गौरीक पिता पवित्र हिमालयक तलहटीक घाटी, जतय चमरिगाय विश्राम करैत अछि; आ जाहि गाछसँ वल्कल लटकि रहल अछि, ओकर नीचाँ हरिणक सीङमे बाम आँखि रगड़ैत हरिणी बनाबए चाहैत छी। विदूषक: (अपनेसँ) हमरा बुझाइत अछि जे एकर अतिरिक्त तपस्वी सभक झबरा दाढ़िसँ चित्र भरि देताह। राजा: माधव्य, आओर एक बात। शकुन्तलाक प्रिय एकटा अलङ्कार बनाबए बिसरि गेलहुँ। विदूषक: ओ केहन छल? अक्षामाला: वनवासिनी आ हुनकर कोमलताक अनुकूल किछु। राजा: मित्र, कानमे डाँठ अटकायल आ गाल धरि रेशा लटकल शिरीष-फूल नहि बनौने छी; नहि शरदक चन्द्र-किरण जकाँ कोमल स्तनक बीच पड़ल कमल-तन्तुक हार। विदूषक: आब देवी अपन लाल कमल जकाँ सुन्दर आङुरसँ मुँह ढाँपि एतेक डरायल किएक देखाइत छथि? (देखि) अरे, अरे, अरे! ई दासक बेटा, फूलक लुटेरा मधुमाछी देवीक कमल-मुख लेल भूखल अछि। राजा: जा, एहि धृष्ट उपद्रवीकेँ भगा दे! विदूषक: दुष्टक दमन करएबला अहाँहि एकरा हटा सकैत छी। राजा: ठीक अछि। “अरे! प्रत्येक फूलल लताक स्वागत-योग्य अतिथि छह। एतय उड़ि-उड़ि अपना के किएक थका रहल छह?” फूलमे बसल तोहर प्रेममयी मधुमाछी तोहर प्रतीक्षामे अछि। पिआसल रहितहुँ तोहर बिना मधु नहि पीत। अक्षामाला: कतेक सुन्दर ढङ्गेँ विदा कएलनि। विदूषक: एहि जातिक जीव भगेलापर आओर हठी भऽ जाइत अछि। राजा: तोँ ठीक कहैत छह! “जखन हमर आज्ञा नहि मानबह, तखन आब सुन।” हे मधुकर, जँ तोँ हमर प्रियाक बिम्बाफल-जकाँ लाल अधरकेँ डँसबह— जे नव गाछक कुँआरी कोँढ़ी जकाँ मनोहर अछि, आ प्रेमोत्सवमे जकर रस हम कोमलतासँ पीने रही— तखन तोरा कमलमे बन्दी बना देब! विदूषक: एहन कठोर दण्डसँ ओ अहाँसँ कोना नहि डेराएत? (हँसैत, अपनेसँ) ई सचमुच पूरा पागल भऽ गेलाह! हुनकर सङ्गतिसँ हमहूँ दूषित भऽ गेलहुँ। अक्षामाला: आब जागल हमरो एहि मे गनू। राजा: प्रिय! की ओ अखनो ओतहि अछि? अक्षामाला: अहा! प्रेम दृढ़ पुरुषोकेँ वशमे कऽ लैत अछि। विदूषक: ई चित्र अछि। राजा: (दुःखी) मित्र, हमरा पर एहन निर्दयता किएक करैत छह? हृदय तन्मय कऽ सोझाँ उपस्थित जकाँ हुनकर दर्शन-सुख लऽ रहल रही; तोँ स्मृति जगा कऽ फेर हुनका चित्र बना देलह। (कनैत छथि।) अक्षामाला: सखी, अपन आँखिसँ देखि लेलहुँ जे शकुन्तलाकेँ अस्वीकार कऽ जे अनादर कएने छलहुँ, से अहाँकेँ मोन अछि। चित्रकार: (प्रवेश करैत) महाराज, अहाँक रङ्गक पेटी रानी कुलप्रभाक परिजनक हाथमे पड़ि गेल अछि। राजा: ठीक अछि; एखन चित्र बनाएबाक मनो नहि अछि। अक्षामाला: कुलप्रभाकेँ बहुत आदर दैत छथि। मुदा एकर कोनो महत्त्व नहि। विपञ्ची वीणा नहि भेटए तखन एकतारी वीणो प्रिय लगैत अछि। राजा: मित्र, देख। हमरा निरन्तर ई पीड़ा किएक सहए पड़ि रहल अछि? जागल रहब सपनामे हुनकासँ मिलनो रोकैत अछि; आ नोर चित्रमे सेहो हुनका देखए नहि दैत अछि। चित्रकार: महाराज, पिङ्गलिका अपन सखी सभक सङ्ग चित्रकेँ छीनि-फाड़ए लेल आबि रहल छथि। विदूषक: आब हुनकर आशा टूटि गेल! राजा: हाय! (छातीपर हाथ रखैत छथि।) नेपथ्यसँ: देवीक जय हो! जय हो! विदूषक: (सुनि) हाय रे! अन्तःपुरक बघिनी पिङ्गलिका, हरिणी जकाँ मेधाविनीक पदचिह्न पकड़ने, हमरा सभपर टूटि पड़ि रहल छथि। राजा: मित्र, हमर प्रियाक एहि चित्रक रक्षा कर। विदूषक: अर्थात् अहाँ अपनहि रक्षा करबाक कहि रहल छी। अक्षामाला: सखी, शत्रु समान एहि व्यक्तिसँ तोहर चित्रो दूर कऽ देल गेल। विदूषक: (चित्रपट लैत) एकरा एहन ठाम नुकाएब जतय कपोतक अतिरिक्त केओ नहि देखत। (शीघ्र डेगसँ बाहर जाइत अछि।) प्रतिहारी: (पत्र लेने प्रवेश करैत) महाराजक जय हो! राजा: वसुमती! रानी नहि अयलीह? प्रतिहारी: महाराज, हमरा पत्र अनैत देखि ओ घुरि गेली। राजा: ओ समयक मर्यादा बुझैत छथि आ राजकाजमे बाधा नहि दैत छथि। प्रतिहारी: महाराज, मन्त्री कहैत छथि जे काज बहुत रहबाक कारण ओ केवल एक नागरिकक मुकदमा जाँचि सकलाह। महाराज एकरा देखथि। राजा: मेधाविनी, पढ़ू! लेखिका: महाराजक जे आज्ञा। (पत्र खोलि पढ़ैत) “महाराजकेँ ज्ञात हो जे अपन नामकेँ सार्थक करएबला समुद्री व्यापारी धनवृद्धि जहाज डूबला कारण मरि गेल। ओकर कोनो सन्तान नहि अछि। ओकर सम्पत्ति हजारो करोड़ अछि। आब ई राजकोषमे जाएत। ई सुनि महाराज निर्णय दिअथि।” राजा: (व्याकुल) सन्तान नहि होएब बहुत दुःखक बात अछि। वसुमती! ओ धनवान छल, तेँ ओकर अनेक पत्नी अवश्य होएतीह। पता करू जे हुनकामे सँ केओ गर्भवती तँ नहि छथि। प्रतिहारी: महाराज, अखने ज्ञात भेल जे श्रेणिपति केशवक पुत्री, जे हुनकर पत्नी छथि, पुत्र-प्राप्तिक गर्भाधान संस्कार कऽ चुकल छथि। राजा: तखन अजन्मा बालक पिताक सम्पत्तिक अधिकारी अछि। जा, माननीय पिशुनकेँ ई कहि दिअ। प्रतिहारी: महाराजक जे आज्ञा! (जाइत छथि।) राजा: एक क्षण घुरू। प्रतिहारी: (घुरि) उपस्थित छी। राजा: हुनका ईहो कहू। ओकर सन्तान हो वा नहि, एहि सँ की? घोषणा करू जे हमर प्रजाक जे कोनो प्रिय सम्बन्धी मरि जाए, जँ ओ पापमुक्त हो, तँ दुष्यन्त ओकर स्थान लेत। प्रतिहारी: निश्चय एही प्रकार घोषणा होएत। (बाहर जा फेर प्रवेश करैत) महाराज, समयपर मेघ गरजलासँ जेना लोक आनन्दित होइत अछि, तहिना अहाँक घोषणासँ प्रजा हर्षित भऽ गेल। राजा: (गम्भीर निःश्वास लैत) वंश-परम्परा टूटला कारण आधारविहीन कुलक अन्तिम पुरुष जखन मरैत अछि, तखन ओकर धन एही प्रकार दोसराक भऽ जाइत अछि। हमर मृत्युक बाद पुरुवंशक गौरवक संग सेहो एही होएत। प्रतिहारी: ई आशङ्का कहियो सत्य नहि होअ! राजा: धिक्कार अछि हमरा, जे विधाताक देल कल्याणकेँ निन्दित कऽ ठुकरा देलहुँ! अक्षामाला: निश्चय ओ हमर सखीक कारण अपना के दोष दऽ रहल छथि। राजा: हम अपन धर्मपत्नीकेँ त्यागि देलहुँ, जे हमर कुलक आधार छलीह, जाहिमे हमर आत्मा समाहित छल; जे समयपर बीआ रोपल पृथ्वी जकाँ महान फलकेँ जन्म देबएबाली छथि। लेखिका: (अपनेसँ) मन्त्री कोन विचारसँ ई पत्र पठौलनि, जकरा देखते महाराजक मन उदास भऽ गेल? (विचार करैत) मुदा नहि, ओ बिना सोचने काज नहि करैत छथि। राजा: हाय! दुष्यन्त अपन पूर्वज सभकेँ सङ्कटमे डालि देलक। हमर बाद, हाय, हमर कुलमे के शास्त्र-विहित पिण्ड-जल देत? निश्चय हमर पूर्वज जलक बदला हमर निर्मल नोर पीबि रहल छथि— सन्तान-विहीन हम अधूरा छी। अक्षामाला: ई तँ स्वाभाविक भूल अछि! युवावस्थाक पराकाष्ठापर स्थित महाराज आन रानीसँ योग्य पुत्र जन्मा कऽ पितृ-ऋण चुका देताह। (अपनेसँ) ओ हमर वचन सुनि नहि सकैत छथि! अथवा रोगकेँ केवल उचित औषधि ठीक करैत अछि। राजा: (शोकक अभिनय करैत) आरम्भसँ निर्मल ई पौरव वंश अयोग्य आ सन्तान-विहीन हमरा कारण समाप्त भऽ रहल अछि, जेना पवित्र सरस्वती नदी अनुपजाऊ मरुभूमिमे लुप्त भऽ जाइत अछि। (मूर्छित होइत छथि।) परिजन: (भयभीत भऽ देखि) जागू महाराज, जागू! अक्षामाला: एखनहि हुनकर पीड़ा समाप्त कऽ दैत छी। मुदा नहि, महान देवता सभ एहनहि विधान कएने छथि। अनुमति बिना हस्तक्षेप नहि कऽ सकैत छी। ठीक अछि। यज्ञ-भाग लेल उत्सुक देवता सभ राजर्षिक पत्नी-सङ्ग पुनर्मिलनक व्यवस्था करताह। (आकाश दिस देखि, प्रसन्न) ओ सभ कोना करैत छथि, से देखब। एखन ई समाचार दऽ अपन प्रिय सखीकेँ सान्त्वना दैत छी। (ऊपर उड़ि जाइत छथि।) नेपथ्यसँ: अनर्थ! अनर्थ! बचाउ! अनर्थ! राजा: (होशमे आबि सुनैत) अहा! ई माधव्यक सङ्कट-स्वर लगैत अछि। चित्रकार: बेचारा अवश्य पिङ्गलिका देवीक जबड़ामे पड़ि गेल होएत। राजा: वसुमती, जा कऽ हमर नामसँ रानीकेँ डाँटू जे ओ अपन परिजनकेँ नियन्त्रणमे किएक नहि रखैत छथि। प्रतिहारी: जेना आज्ञा। (बाहर जाइत छथि।) राजा: ब्राह्मणक स्वर एना काँपि रहल अछि जेना सचमुच डेरायल हो। के उपस्थित अछि? (प्रवेश करैत) कञ्चुकी: आज्ञा दिअ, महाराज! राजा: ओ बालक माधव्य किएक चिचिया रहल अछि? कञ्चुकी: महाराज, हम जा कऽ देखैत छी। (बाहर जा भयभीत भऽ घुरैत छथि।) राजा: पर्वतायन! ई प्राण-सङ्कटक बात तँ नहि? कञ्चुकी: नहि, महाराज। राजा: तखन ओ डेरायल किएक अछि? मुदा— जे कम्पन पहिने वृद्धावस्थाक कारण होइत छल, आब तोहर सम्पूर्ण शरीरमे अत्यधिक देखाइत अछि, जेना वायुमे पीपरक गाछ काँपैत अछि। कञ्चुकी: तखन महाबली राजन्, अपन मित्रक रक्षा करू। राजा: ककरासँ रक्षा करी? कञ्चुकी: घोर सङ्कटसँ! राजा: हाय! कोनो बुझए योग्य बात कहू! कञ्चुकी: महाराज, “मेघचुम्बी” नामक ओ राजप्रासाद... राजा: ओतय की भऽ रहल अछि? कञ्चुकी: जे सर्वोच्च शिखरपर पालित मोर अनेक बेर विश्राम कऽ पहुँचैत अछि, ओतयसँ कोनो अदृश्य दानव अहाँक मित्रकेँ उठा लेने अछि। राजा: (झट उठैत) ई असम्भव! दानव सभ हमर घर धरि घुसि आएल। राजसत्ता अनेक उलटफेरसँ घेरल अछि। दिन-प्रतिदिन अपन अनदेखल त्रुटियो जानब सम्भव नहि होइत अछि। प्रजामे के कोन बाट चलि रहल अछि, ई पूर्णतः जानबाक शक्ति ककरा अछि? नेपथ्यसँ: दौड़ू, दौड़ू! राजा: (डेग तेज करैत) मित्र, भय नहि कर, भय नहि कर। (नेपथ्यसँ) विदूषक: भय कोना नहि करी? केओ पाछाँसँ हमर गरदनि दबा कऽ ऊख जकाँ चिपटए चाहैत अछि! राजा: (चारू दिस देखि) हमर धनुष! धनुष! (यवन स्त्री धनुष हाथमे लेने प्रवेश करैत अछि।) महाराजक जय हो! ई अहाँक धनुष आ बाँहि-रक्षक। राजा: (धनुष-बाण ग्रहण करैत छथि।) नेपथ्यसँ: तोहर गरदनिक ताजा रक्त पीबाक उत्कण्ठामे बाघ अपन शिकारकेँ जेना पकड़ैत अछि, तेना तोरा जकड़ि मारि देब। पीड़ितक भय दूर करबाक लेल धनुष उठौने दुष्यन्त आब तोहर रक्षा करथि। राजा: (क्रोधित) की ओ हमर उपहास कऽ रहल अछि? ठाढ़ रह, ठाढ़ रह, हे कुलकलङ्क! आब तोँ नहि बचबह। (धनुष उठबैत) पर्वतायन! सोपानक बाट देखाउ। कञ्चुकी: एहि दिस, एहि दिस, महाराज। (सभ दौड़ैत अबैत छथि।) राजा: (चारू दिस देखि) मुदा एतय तँ केओ नहि अछि। (परदा पाछाँसँ) विदूषक: शीघ्र करू! हम अहाँकेँ देखि रहल छी; अहाँ हमरा नहि देखि रहल छी। बिलाड़िक पकड़ल मूसा जकाँ हमर जीवनक आशा समाप्त भऽ गेल। राजा: अदृश्य रहबाक अभिमान करएबला दुष्ट, हमर बाण तोरा देखि लेत। स्थिर ठाढ़ रह! हमर मित्रकेँ पकड़ने रहने कारण निश्चिन्त नहि हो। तोरा लेल ई बाण चढ़ा रहल छी— जे वध योग्य तोरा मारत आ रक्षा योग्य ब्राह्मणकेँ बचाओत; जेना हंस दूध ग्रहण करैत अछि, मुदा ओहिमे मिलल जल छोड़ि दैत अछि। (बाणक लक्ष्य साधैत छथि।) (व्याकुल मातलि विदूषककेँ छोड़ैत प्रवेश करैत छथि; विदूषको सङ्ग छथि।) मातलि: महाराज! इन्द्र दानव सभकेँ अहाँक लक्ष्य बनौने छथि; अपन धनुष हुनका सभपर तानू। सज्जनक कृपामय कोमल दृष्टि मित्रपर पड़ैत अछि, निर्दय बाण नहि। राजा: (बाण उतारैत) अहा, मातलि! देवराजक सारथिक स्वागत अछि। विदूषक: (प्रवेश कऽ लग आबि) अरे! ई राक्षस हमरा लगभग मारिए देने छल! मातलि: (मुस्कराइत) महाराज, इन्द्र हमरा अहाँ लग किएक पठौलनि से सुनू। राजा: ध्यानसँ सुनैत छी। मातलि: कालनेमिक वंशज दुर्जय नामक एक दानव-राज अछि। राजा: नारदसँ एकर विषयमे पहिनहि सुनने छी। मातलि: कहल जाइत अछि जे अहाँक मित्र इन्द्र ओकर वध नहि कऽ सकैत छथि; कहल जाइत अछि जे युद्धक अग्रभागमे अहाँ ओकर संहारक भऽ सकैत छी। जाहि रातिक अन्हारकेँ सूर्य दूर नहि कऽ पबैत छथि, ओकरा चन्द्रमा हटा दैत छथि। तेँ आब धनुष उठाउ, इन्द्रक रथपर चढ़ू आ विजय लेल प्रस्थान करू। राजा: इन्द्रक सम्मानसँ हम धन्य भेलहुँ। मुदा माधव्यकेँ एहन दुर्व्यवहार किएक कएलहुँ? मातलि: (विदूषक दिस मुस्कराइत) कहैत छी। हमरा बुझायल जे महाराज कोनो कारणसँ पश्चात्तापमे उदास छथि। तखन महाराजक क्रोध जगएबाक लेल एहन कएलहुँ। किएक कि— ईंधनकेँ हिलौलापर आगि भभकि उठैत अछि, धमकी भेटलापर साँप फण पसारैत अछि, आ प्रायः मनुष्यकेँ उकसौलापर ओ अपन साहस फेर पाबि लैत अछि। राजा: (एक कात) मित्र माधव्य! देवराजक आदेश टारल नहि जा सकैत अछि। अतः एतय जे भेल से मन्त्री पिशुनकेँ कह आ हमर नामसँ ई सन्देश दऽ— एखन केवल अहाँक तीक्ष्ण बुद्धि प्रजाक रक्षा करए। ई चढ़ल धनुष आब दोसर काजमे नियुक्त अछि। विदूषक: महाराजक जे आज्ञा। (बाहर जाइत अछि।) मातलि: एहि दिस, महाराज। सभ चलैत बाहर जाइत छथि। एहि प्रकार षष्ठ अङ्क समाप्त। सप्तम अङ्क: शाप-मुक्ति (एक दिव्य नर्तकी प्रवेश करैत छथि।) दिव्य नर्तकी: हमर गुरु नारद कहलनि जे एहि समय राजर्षि दुष्यन्त मनुष्यलोकसँ ऊपर जा भगवान इन्द्रक आज्ञासँ एक दानवक वध करए गेल छथि। हुनका प्रणाम कऽ स्तुति गेला पर गुरु हमरा विद्वान दर्शक सभक समक्ष मङ्गल-आशीर्वाद रूपमे नृत्य प्रस्तुत करबाक आज्ञा देलनि—“जा, एक नर्तकी खोजि नृत्य-मण्डपमे आउ!” अतः आब हम एक नर्तकी खोजि रहल छी। (घुमैत चारू दिस देखैत) ई के हमर दिस आबि रहल छथि—मानो अखने कोनो अलङ्कार पाबि एकहि संग उत्कण्ठितो आ सन्तुष्टो छथि? (ध्यानसँ देखि) अरे, ई तँ हमर प्रिय सखी चूतमञ्जरी छथि! नीक, हुनका गुरु लग लऽ चलैत छी। (प्रतीक्षा करैत छथि।) (तखन कहल रूपमे दोसर नर्तकी प्रवेश करैत छथि।) चूतमञ्जरी: (आश्चर्य आ आनन्दसँ) अहा! राजर्षि दुष्यन्तक कतेक महान शक्ति अछि। (तिरस्कारसँ) ओह, महाबली दानव दुर्जय मारल गेल! (विचार करैत) ठीक-ठीक कही तँ केवल अपन सारथिक सङ्ग दुष्यन्त अनगिनत सहस्र अस्त्र बरसा कऽ एक क्षणमे शक्तिशाली दुर्जयक संहार कऽ देलनि। (नृत्य करैत छथि।) पहिल: सखी चूतमञ्जरी, तोँ प्रेमातुर बुझाइत छह? दोसर: (देखि) की तोँ पारिजातमञ्जरी छह? सखी, सभ बात कहब। मुदा पहिने कह—कतय जा रहल छह? पहिल: सखी, संक्षेपमे कहैत छी। राजर्षि दुष्यन्तक दानवपर विजयक अवसरमे आइ उत्सवमय प्रस्तुति करबाक गुरु आज्ञा देलनि। अतः हम दूनू हुनका देखए जाएब। दोसर: (उत्कण्ठासँ) एकर कोनो कारण होएत। मुदा जखन राजा मनुष्यलोक घुरि रहल छथि, तखन प्रस्तुति ककरा लेल करब? पहिल: (चिन्तित) सखी, की ओ महेन्द्रक इच्छा पूर्ण कऽ विदा भेलाह, कि आन प्रकारेँ? दोसर: सखी, सुन! आइए प्रातःकाल ओ पृथ्वी दिस विदा होइत छथि; वरदानक रूपमे दुर्जयक शेष जीवन—आ स्वर्गाङ्गना सभक अनुरक्त हृदय—अपना सङ्ग लऽ जा रहल छथि। एही कारण हम एकहि संग प्रसन्नो छी आ उत्कण्ठितो। पहिल: सखी, तोँ शुभ समाचार देलह। गुरु हमरा सभकेँ पुरुवंशी राजर्षिक समक्ष प्रस्तुति देबाक आज्ञा देलनि। चल, एतहि एकटा गीत रचि गाबी। दोसर: जेना तोहर इच्छा। हमर गीत वा तोहर पाठपर हम दूनू सङ्गहि नाचि सकैत छी। पहिल: सखी, एही प्रकार करब। (दूनू गबैत छथि।) वसन्तकाल एक मधुकरकेँ विषय-भोगसँ विमुख कऽ अनुचित आचरण दिस लऽ जाइत अछि; दोसराकेँ प्रेमसँ भरैत अछि, आ धरतीक लालिमासँ आनकेँ उदास करैत अछि। (अन्तमे नृत्य कऽ बाहर जाइत छथि।) प्रस्तावना समाप्त। (राजा आ मातलि आकाशयानपर प्रवेश करैत छथि।) राजा: मातलि! इन्द्रक आदेश पालन कएनेहुँ, हमरा जे उच्च सम्मान देलनि ओकर सोझाँ हम अपना के अयोग्य मानैत छी। मातलि: महाराज, अहाँ दूनू एक-दोसरक ऋण नहि मानि रहल छी। कोना? इन्द्रक एतेक सहायता कऽ हुनकर उच्च सम्मान देखि अहाँ अपन काज तुच्छ मानैत छी; आ ओ अपन सम्मानकेँ अहाँक महान कार्यक बराबर नहि मानैत छथि। राजा: एहन नहि। विदा होएबाक समय हमरा जे सम्मान देल गेल, से हमर इच्छासँ बहुत बेसी छल। देवता सभक सोझाँ हुनकर आधा सिंहासनपर बैसल रही— तखन इन्द्र अपन लग ठाढ़ि जयन्त दिस मुस्कराइत देखलनि— जे मनहि-मन एहि सम्मानक आकाङ्क्षी छल— आ पीयर चन्दनसँ लिपल अपन छातीसँ रगड़ल स्वर्गीय मन्दार-फूलक माला हमरा पहिरौलनि। मातलि: देवराजसँ ई सम्मान अहाँक योग्य किएक नहि होएत? देखू— सुख चाहएबला इन्द्र लेल स्वर्गक काँट—दानव सभ—दू वस्तु निकालि देलक: अहाँक चिक्कन बाण, आ बहुत पहिने नरसिंहक नह। राजा: एहि मे इन्द्रक महानता अछि। देख— सेवक महान कार्यमे सफल होइत अछि तँ से महान स्वामीक देल सम्मानक कारण—ई जानू। जँ सहस्रकिरण सूर्य अरुणकेँ अपन रथक अग्रभागमे नहि रखितथि, तँ अरुणमे अन्हार नाश करबाक शक्ति कहाँसँ अबैत? मातलि: ई वचन अहाँक अनुरूप अछि। (किछु आगाँ बढ़ैत) महाराज! एतय देखू, अहाँक यशक प्रकाश स्वर्गक छत धरि पहुँचि गेल अछि। देवता सभ अहाँक कर्मक महत्त्व विचारि अप्सरा सभक बाँचल प्रसाधन-रङ्गसँ कल्पलताक बाहरी पातपर ओकर चित्र बनबैत छथि। राजा: मातलि, काल्हि दानवसँ युद्धक उत्कण्ठामे ऊपर चढ़ैत स्वर्गक भूगोलपर ध्यान नहि देलहुँ। आब कोन दिव्य प्रदेशमे यात्रा कऽ रहल छी? मातलि: ई वाष्परहित प्रवाह-वायुक प्रदेश अछि, जे विष्णुक दोसर चरणसँ पवित्र भेल अछि; तीन धाराबाली गङ्गाक स्वर्गीय जलधारा धारण करैत, आ वृत्तमे विकीर्ण किरणसँ नक्षत्र सभकेँ घुमबैत अछि। राजा: एही कारण हमर अन्तरात्मा आ भीतर-बाहरक इन्द्रिय सभ शान्त अछि। (चक्का दिस देखि) हमरा बुझाइत अछि जे हम सभ मेघक प्रदेशमे उतरि आएल छी। मातलि: (मुस्कराइत) कोना बुझलहुँ? राजा: अहाँक रथक चक्काक आरक बीचसँ चातक पक्षी उड़ि रहल अछि; घोड़ा सभ बिजलीक चमकसँ रङ्गल अछि, चक्काक घेर नम अछि— ई बतबैत अछि जे रथ वर्षा-गर्भित मेघक ऊपरसँ गुजरल अछि। मातलि: एक क्षणमे अहाँ अपन शासनक लोकमे पहुँचब। राजा: (नीचाँ देखि) तीव्र गतिसँ उतरबाक कारण मनुष्यलोक विचित्र देखाइत अछि। किएक कि— उभरैत पहाड़क कारण पृथ्वी मानो पाछाँ हटि रहल अछि; गाछक तना ऊपर उठैत पातक आड़ि हटि रहल अछि; पतली रेखा जकाँ जलविहीन देखाइत नदी सभ पूर्ण रूप पाबि स्पष्ट भऽ रहल अछि। देखू! मानो ककरो पृथ्वी ऊपर फेँक कऽ हमर लग आनि देलक हो। मातलि: (आदरपूर्वक देखि) अहा, पृथ्वीक सौन्दर्य अतुलनीय अछि। राजा: मातलि, ई कोन पर्वत अछि जे पूर्व आ पश्चिम समुद्रमे डूबल अछि, आ सन्ध्याकालीन मेघक देवाल जकाँ सोन टपकबैत चमकि रहल अछि? मातलि: महाराज, ई सुवर्णशिखर—किन्नर सभक पर्वत—तपस्वी सभक सिद्धि-प्राप्तिक सर्वोत्तम स्थान अछि। स्वयम्भू मरीचिसँ जन्मल देव आ दानवक पिता प्रजापति अपन पत्नीक सङ्ग एतय तपस्या करैत छथि। राजा: (आदरपूर्वक) शुभ अवसर उपेक्षित नहि करबाक चाही। हुनकर प्रदक्षिणा कऽ भगवानक दर्शन करी। मातलि: इएह हमर प्रधान कर्तव्य! (उतरबाक अभिनय करैत) हम सभ उतरि गेलहुँ। राजा: (आश्चर्यसँ) मातलि! चक्काक घेरसँ कोनो ध्वनि नहि, धूर उठैत नहि देखाइत अछि। अहाँक रथ उतरि गेल, तैयो पता नहि चलल; पृथ्वीकेँ नहि छुअला कारण कोनो झटका नहि लागल। मातलि: अहाँ आ इन्द्रक बीच एतेकहि अन्तर अछि। राजा: मरीचक आश्रम कोन दिस अछि? मातलि: (हाथसँ देखबैत) जतय ओ ऋषि सूर्य दिस मुँह कऽ खम्भा जकाँ अचल ठाढ़ि छथि; देहक आधा भाग दीमकक ढूहमे गड़ल, साँपक केंचुलसँ बनल दोसर जनऊ पहिरने; सुखायल लताक पाशसँ कण्ठ कसायल, आ कान्ह ढाँपएबला विशाल जटामे पक्षीक घोंसला भरल अछि। राजा: महान तपस्वीकेँ प्रणाम! मातलि: (लगाम स्थिर करैत) आब हम सभ प्रजापतिक तपोवनमे प्रवेश कऽ गेलहुँ, जतय अदिति मन्दार-वृक्षक सेवा करैत छथि। राजा: कतेक आश्चर्य! स्वर्गसँ बेसी विश्राम देबएबला अमृतक सरोवरमे डूबल जकाँ अनुभव भऽ रहल अछि। मातलि: (रथ रोकैत) उतरू। राजा: (उतरबाक अभिनय करैत) आब की? मातलि: (दूनू चलैत) बान्हल रथ एतहि रहत। हमहूँ उतरैत छी। (ओहिना करैत) एहि दिस, एहि दिस, महाराज। (दूनू चलैत) महाराज, सिद्ध ऋषि सभक तपोवन देखू। राजा: दूनू बात देखि आश्चर्य भऽ रहल अछि— कल्पवृक्षक वनमे रहितहुँ ओ सभ केवल वायुसँ प्राण धारण करैत छथि; हजारो सोनक कमल-पातसँ पवित्र जलमे सन्ध्याकालीन स्नान करैत छथि; रत्नक गुफामे ध्यान करैत छथि; अप्सरा सभक बीच संयम साधैत छथि। जकर प्राप्ति लेल आन ऋषि तपस्या करैत छथि, ओहि सभक बीच रहियो ई ऋषि सभ तप करैत छथि। मातलि: महान व्यक्तिक अभिलाषा उच्च होइत अछि। (दूनू चलैत; मातलि आकाश दिस पुकारैत) वृद्ध शाकल्य! गुरुदेव कोन कार्यमे व्यस्त छथि? (सुनैत) की कहैत छी? अदिति हुनकासँ सती स्त्रीक गुण पूछने छथि आ ओ तकर व्याख्या कऽ रहल छथि; अतः हमर निवेदनकेँ उचित अवसर धरि प्रतीक्षा करए पड़त। (राजा दिस देखि) हम प्रजापतिकेँ अहाँक आगमनक सूचना दैत छी, ताबत एहि अशोकक नीचाँ बैसू। राजा: जेना अहाँक इच्छा। (प्रतीक्षा करैत छथि।) मातलि: (बाहर जाइत छथि।) राजा: (शुभ फड़कनक अभिनय करैत) हमर इच्छा पूर्ण होएबाक आशा नहि, हे बाँहि, व्यर्थ किएक फड़कि रहल छह? पहिने तिरस्कृत सौभाग्य बादमे दुःख बनि जाइत अछि। नेपथ्यसँ: नहि! दुष्टता नहि कर! हे सिंह, अपन स्वभाव कतेक देखबैत छह! राजा: (सुनि) ई दुष्टताक स्थान नहि। न्याय करएबला के होएत? (दृष्टिसँ ध्वनिक दिशा खोजि, आश्चर्यक अभिनय करैत) अहा! ई तँ वयससँ बालक मुदा पराक्रमसँ प्रौढ़ अछि, जकरा दू तपस्विनी रोकि रहल छथि। हाथसँ सिंहक बच्चाकेँ मारैत, ओकरा घसीटि रहल अछि; कठोर पकड़सँ अयाल छिड़िआयल, मायक स्तनसँ आधा दूध पीने अवस्था मे ओ प्रतिरोध कऽ रहल अछि। (कहल कार्य करैत बालक प्रवेश करैत अछि, जकरा दू तपस्विनी रोकि रहल छथि।) बालक: मुँह खोल! अरे सिंह, मुँह खोल! हम तोहर दाँत गनए चाहैत छी। पहिल तपस्विनी: दुष्ट बालक! हमरा सभक पुत्र समान पशुकेँ किएक कष्ट दऽ रहल छह? तोहर उग्रता बढ़िते जा रहल अछि। ऋषि सभ उचितहि तोहर नाम सर्वदमन रखलनि। राजा: (विचार करैत) ई बालक अपनहि पुत्र जकाँ हमर हृदयकेँ किएक आकर्षित कऽ रहल अछि? (विचार करैत) निश्चय सन्तान-विहीनता कारण हमरा बालक सभसँ स्नेह भऽ रहल अछि। दोसर तपस्विनी: जँ ओकर बच्चाकेँ नहि छोड़बह तँ सिंहनी तोरा पर टूटि पड़त। बालक: (मुस्कराइत) अहा, हम तँ बहुत डेरा गेलहुँ! (अधर काटैत अछि।) राजा: (आश्चर्यसँ) ई बालक महान तेजक बीआ जकाँ लगैत अछि, जे चिनगारीक रूपमे आगि भऽ ईंधनक प्रतीक्षामे अछि। पहिल तपस्विनी: बालक! एहि सिंह-शावककेँ छोड़ि दिअ। हम तोरा दोसर खेलौना देब। बालक: कतय अछि? हमरा दिअ! (दहिना हाथ पसारैत अछि।) राजा: की? एकर हाथमे सम्राटक चिह्न अछि। किएक कि— लोभाओल वस्तु मँगबाक लेल पसारल झिल्लीयुक्त आङुरबला ओकर हाथ एकल कमल जकाँ चमकि रहल अछि, जकर पाँखुरिक बीचक अन्तर अखनो स्पष्ट नहि, आ जे प्रातःकालक लालिमामे फुलए आरम्भ कऽ रहल अछि। पहिल तपस्विनी: सखी, वचन दऽ एकरा रोकब सम्भव नहि। अतः जा; हमर कुटीमे बालऋषि मङ्कणकक रङ्ग-बिरङ्ग माटिक मोर अछि। एकरा लेल ओ खेलौना आन। दोसर तपस्विनी: जेना अहाँ कहैत छी। (बाहर जाइत छथि।) बालक: एखन तँ हम एहि संगहि खेलब। तपस्विनी: (देखि हँसैत छथि।) राजा: ई हठी बालक हमरा आकृष्ट कऽ रहल अछि। (निःश्वास लैत छथि।) ओ सभ धन्य छथि जे पुत्रकेँ कोरामे लऽ ओकर देहक धूरिसँ मैल भऽ जाइत छथि; जकर दाँत बिना कारण हँसैत फुलैत अछि, जकर अस्पष्ट बोली अत्यन्त मधुर, आ जे पिताक कोरामे विश्राम करए प्रिय मानैत अछि। तपस्विनी: (आङुर देखा कऽ धमकबैत) नीक! तोँ हमर बात नहि मानबह! (एक कात देखि) एतय कोनो आश्रम-बालक अछि? (राजाकेँ देखि) सज्जन! कृपा कऽ एतय आउ आ एहि उद्दण्ड बालकक खोलब कठिन पकड़सँ पीड़ित सिंह-शावककेँ छुड़ा दिअ। राजा: अवश्य! (लग आबि) हे महान ऋषिक पुत्र! एहन काज जे आश्रमक अनुकूल नहि—जखन तोहर संयमी पिता प्रसन्न होइत छथि जे जीव सभ हुनकर शरण लैत अछि—तखन नव साँप चन्दन-वृक्षकेँ जेना दूषित करैत अछि, तेना अपन पिताक गौरवकेँ किएक कलङ्कित करैत छह? तपस्विनी: वास्तवमे ई बालऋषि नहि अछि। राजा: ओकर रूपक अनुरूप आचरणेँ ओकर परिचय दऽ रहल अछि। वातावरणपर भरोसा कऽ हम भ्रमित भऽ गेलहुँ। (आज्ञा अनुसार सिंह-शावककेँ छुड़बैत छथि। बालककेँ छुएलाक बाद अपनेसँ) दोसर कुलक एहि बालकक अङ्ग छुअलापर हमरा एतेक आनन्द भऽ रहल अछि! जकर देहसँ ई जन्मल, तकरा ई कतेक सुख दैत होएत! तपस्विनी: (दूनूकेँ देखि) आश्चर्य! आश्चर्य! राजा: की भेल? तपस्विनी: अहाँ दूनूमे कोनो सम्बन्ध नहि रहितहुँ एतेक समानता देखि आश्चर्य भऽ रहल अछि। फेर, ओ अहाँसँ एना सहज अछि जेना अहाँ बहुत परिचित व्यक्ति होइ। राजा: (बालककेँ स्नेह करैत) जँ ई बालऋषि नहि, तँ एकर नाम की अछि? तपस्विनी: ई पुरुवंशक सन्तान अछि। राजा: (अपनेसँ) की? ई हमरहि वंशक अछि? एही कारण ओ हमरा समान बुझैत छथि। (जोरसँ) पौरव सभ कुलक अन्तिम परम्पराक पालन करैत छथि— पहिने पृथ्वीक रक्षा लेल चूना-लेपल राजमहलमे रहैत छथि; बादमे गाछक जड़िमे निवास करैत, केवल तपोव्रतक पालन करैत छथि। मुदा मनुष्य अपन इच्छासँ एतय नहि आबि सकैत अछि। तपस्विनी: अहाँ ठीक कहैत छी, महोदय। मुदा एहि बालकक माय अप्सराक सम्बन्धिनी छथि, तेँ देवता सभक पिताक तपोवनमे एकरा जन्म देली। राजा: (अपनेसँ) सन्देहक दोसर कारणो भेटल। (जोरसँ) ई देवी कोन राजर्षिक पत्नी छथि? तपस्विनी: अपन धर्मपत्नीकेँ त्यागएबला पुरुषक नाम के बजत? राजा: (अपनेसँ) की ई कथा विशेषतः हमरहि विषयमे अछि? की बालकक मायक नाम पूछी? मुदा नहि, परस्त्रीक विषयमे जिज्ञासा करब अनुचित अछि। (माटिक मोर हाथमे लेने दोसर तपस्विनी प्रवेश करैत छथि।) दोसर तपस्विनी: सर्वदमन! ई सुन्दर पक्षी देख। बालक: (एक नजर देखि) माय कतय छथि? (दूनू हँसैत छथि।) पहिल: मायक प्रति स्नेहक कारण समान शब्द सुनि ओ भ्रमित भऽ गेल। दोसर: बालक, शकुन्त अर्थात् पक्षी देख—ई खेलौनाक मोर कतेक सुन्दर अछि। राजा: (अपनेसँ) एकर मायक नाम शकुन्तला अछि? मुदा नाममे समानता भऽ सकैत अछि। ई मृगमरीचिका जकाँ अन्तमे घोर निराशा दऽ सकैत अछि। बालक: मौसी, हमरा ई सुन्दर मोर नीक लगैत अछि। (खेलौना लैत अछि।) दोसर: (देखि व्याकुल) हाय! एकर कलाईक रक्षाबन्ध नहि देखाइत अछि। राजा: चिन्ता नहि करू। सिंह-शावकसँ कुश्ती करैत खसि गेल होएत। (उठए चाहैत छथि।) दूनू: एकरा नहि छुइब! की, ओ छू लैलनि? (आश्चर्यसँ एक-दोसर दिस देखैत, छातीपर हाथ रखैत छथि।) राजा: अहाँ सभ हमरा रोकि किएक रहल छी? पहिल: सुनू, महोदय! ई “अपराजिता” नामक प्रभावशाली जड़ी अछि, जे मरीच एहि बालकक जातकर्मक समय देने छलाह। भूमिपर खसला पर एकर माय, पिता आ बालक स्वयं छोड़ि आन केओ एकरा उठा नहि सकैत अछि। राजा: जँ केओ उठा ले तँ की होइत अछि? पहिल: तखन ई साँप बनि अपरिचित व्यक्तिकेँ डँसि लैत अछि। राजा: अहाँ सभ स्वयं ई परिवर्तन देखलहुँ अछि? दूनू: अनेक बेर। राजा: (आनन्दसँ) तखन अपन आशा पूर्ण भेलापर हम आनन्दित किएक नहि होइ— त? (बालककेँ आलिङ्गन करैत छथि।) दोसर: संयाता, आउ! धार्मिक कर्तव्य पूरा कऽ चुकल शकुन्तलाकेँ ई समाचार दी। पहिल: चली। (दूनू बाहर जाइत छथि।) बालक: हमरा छोड़ू! हम माय लग जाएब। राजा: पुत्र, हम दूनू सङ्गहि जा कऽ तोहर मायकेँ आनन्द देब। बालक: हमर पिता दुष्यन्त छथि, अहाँ नहि। राजा: (मुस्कराइत) ई अस्वीकारेँ हमर प्रमाण अछि। (एक बेनीमे केश बान्हने शकुन्तला प्रवेश करैत छथि।) शकुन्तला: सुनलहुँ जे सर्वदमनक रक्षाबन्ध बदलि जाएबाक स्थिति रहितहुँ अपन स्वाभाविक रूपमे रहल; तैयो अपन भाग्यक विषयमे विश्वास नहि भऽ रहल अछि। मुदा अक्षामाला जे कहलनि, ताहिसँ सम्भव बुझाइत अछि। राजा: (शकुन्तलाकेँ देखि) अहा! ई तँ शकुन्तला देवी छथि! धूसर वस्त्र पहिरने, व्रतक कारण कृश मुख, एक बेनीमे केश बान्हने, निर्मल चरित्रबाली ई स्त्री निर्दयी हमरासँ वियोगक दीर्घ तपस्या सहि रहल छथि। शकुन्तला: (राजाकेँ देखि) ई हमर पति जकाँ नहि देखाइत छथि। तखन ई के छथि जे मन्त्र-सुरक्षित हमर पुत्रकेँ हाथसँ छुइ अपवित्र कऽ रहल छथि? बालक: (माय लग जा) माय! ई कोनो अपरिचित मनुष्य अछि जे हमरा “पुत्र” कहैत अछि। राजा: प्रिय, अहाँक प्रति हमर जे निर्दयता छल, से आब सुखद अन्तमे परिणत भेल। आब चाहैत छी जे अहाँ हमरा चिन्हू। शकुन्तला: (अपनेसँ) हे हृदय, साहस कर, साहस कर! भाग्य हमरा धराशायी कऽ अपन क्रोध शान्त कएलाक बाद दया कएने अछि। ई हमर पति छथि! राजा: सौभाग्यसँ, हे सुन्दरमुखी, स्मृतिसँ मोहक अन्हार हटला पर अहाँ हमर सोझाँ ठाढ़ि छी। ग्रहण समाप्त भेलापर चन्द्रमा आ लाल रोहिणी नक्षत्र फेर मिलैत छथि। शकुन्तला: पति-देवक जय हो...! (नोरसँ कण्ठ रुकल कारण वाक्य बीचमे छोड़ैत छथि।) राजा: प्रिय— “जय” शब्द नोरमे अटकि गेलोपर हम विजयी छी, कारण अहाँक पीयर, बिना शृङ्गारक अधरबला मुख देखए पाबि रहल छी। बालक: माय, ई के छथि? शकुन्तला: पुत्र, हमर भाग्यसँ पूछ। (कनैत छथि।) राजा: (भूमिपर खसि पड़ैत छथि।) हे कृशाङ्गी, अस्वीकारक पीड़ा अहाँक हृदयसँ दूर होअ; ओहि समय हम कोना घोर मोहमे पड़ि गेल रही। अन्हर मनुष्य माथपर पड़ल मालाकेँ सेहो साँप बुझि झाड़ि दैत अछि; गाढ़ अन्हारमे लोक मङ्गल वस्तुसँ सेहो एही प्रकार व्यवहार करैत अछि। शकुन्तला: उठू, पति-देव। ओहि समय निश्चय हमर पूर्वकर्मक कोनो फल, जे हमर सुखक बाधक छल, पकएबला छल; एही कारण दयालु रहितहुँ अहाँ एतेक बदलि गेलहुँ। (राजा उठैत छथि।) तखन पति-देवकेँ हमर स्मृति कोना घुरल? राजा: दुःखक काँट निकालि सभ कहैत छी। हे कृशाङ्गी, ओहि दिन तोहर अधरकेँ व्याकुल करएबला नोर मोहग्रस्त हम अनदेखा कऽ देलहुँ; आब कम्पित बरौनीपर अटकल एहि नोरकेँ पोछि कऽ अपन पश्चात्तापसँ मुक्त होएब। (कहल अनुसार करैत छथि।) शकुन्तला: (नोर पोछैत औँठी देखि) पति-देव! अहा, ई तँ ओहि औँठी अछि! राजा: हँ! चमत्कारिक रूपसँ फेर भेटलापर एकरे कारण हमर स्मृति घुरि आएल। शकुन्तला: ई एक क्षणमे हमर इच्छा पूरा कऽ सकैत छल, मुदा जखन पति-देवकेँ विश्वास दिअए एकर आवश्यकता छल, तखन ई भेटल नहि। राजा: तखन वसन्तक आगमन घोषित करबाक लेल लता अपन फूल ग्रहण करए। शकुन्तला: हमरा एकरापर विश्वास नहि। पति-देव स्वयं एकरा पहिरने रहू। मातलि: (प्रवेश करैत) बधाई! धर्मपत्नी-सङ्ग पुनर्मिलन आ पुत्रक मुख देखलाक बाद महाराज फेर समृद्ध भेलाह। राजा: मित्रक माध्यमसँ पूरा भेल कारण हमर अभिलाषा उत्कृष्ट फल देलक। मातलि, की इन्द्र एहि घटनाकेँ नहि जानैत छलाह? मातलि: आउ, पूज्य मरीच अहाँकेँ दर्शन देबाक लेल प्रतीक्षा कऽ रहल छथि। राजा: शकुन्तला, पुत्रकेँ लिअ। अहाँ हमरा आगाँ चलू; हम अहाँक सङ्ग पूज्यवरक दर्शन करए चाहैत छी। शकुन्तला: की हम पति-देवक सङ्ग जाए योग्य छी? राजा: उत्सवक अवसरमे ई परम्परा अछि। आउ, आउ! (सभ चलैत छथि।) (अदितिक सङ्ग एक आसनपर बैसल मरीच प्रवेश करैत छथि।) मरीच: (राजाकेँ देखि) हे दक्ष-पुत्री— ई पृथ्वीक स्वामी दुष्यन्त छथि, तोहर पुत्र इन्द्रक युद्धमे अग्रणी। हुनकर धनुषक कारण इन्द्रक तीक्ष्ण वज्र निष्क्रिय अलङ्कार बनि गेल अछि। अदिति: हुनकर रूप निश्चय सम्मान योग्य अछि। मातलि: हे पृथ्वीपति! देवता सभक माता-पिता अहाँकेँ वात्सल्यसँ भरल दृष्टिसँ देखि रहल छथि। लग आउ। राजा: मातलि— ई ओ दम्पती छथि, जिनका ऋषि सभ बारह प्रकारक तेजक मूल कहैत छथि; जिनका सँ यज्ञ-भाग पाबएबला देवता सभक स्वामी इन्द्र जन्मलाह; आ जाहिमे स्वयम्भू ब्रह्मासँ सेहो परे परमात्मा जन्मस्थान प्राप्त कएलनि। मातलि: निश्चय। राजा: (प्रणाम करैत) इन्द्रक सेवक दुष्यन्त अहाँ दूनूकेँ प्रणाम करैत अछि। मरीच: पुत्र, दीर्घकाल धरि पृथ्वीक रक्षा कर! अदिति: पुत्र, युद्धमे तोहर कोनो समान नहि होअ! शकुन्तला: पुत्रक सङ्ग अहाँ सभक चरण पूजैत छी। मरीच: पुत्री, दीर्घ सौभाग्यवती रहू! इन्द्र समान पति, जयन्त समान पुत्र रहला पर एहिसँ अलग आशीर्वाद की देल जाए— “पौलोमी समान बनू!” अदिति: पुत्री, पति अहाँक सम्मान करथि। पुत्र दूनू कुलक आभूषण बनए। कृपा कऽ बैसू। (प्रजापतिक अनुमतिसँ सभ बैसैत छथि।) मरीच: (एक-एक दिस सङ्केत करैत) सौभाग्यसँ, पतिव्रता शकुन्तला, ई पूर्ण पुत्र, आ महाराज— श्रद्धा, धन आ धर्म, ई त्रयी एकठाम भऽ गेल अछि। राजा: भगवन्, अहाँक कृपा अभूतपूर्व अछि—पहिने इच्छा पूर्ण भेल, तकर बाद अहाँक दर्शन। देखू— पहिने फूल, तकर बाद फल होइत अछि; पहिने मेघ अबैत अछि, तकर बाद वर्षा। ई कारण आ परिणामक क्रम अछि, मुदा अहाँक कृपासँ पहिने सौभाग्य आबि गेल। मातलि: जगत्-माता-पिताक कृपा एहनहि होइत अछि। राजा: भगवन्, आपसी सहमतिबला विधिसँ हम अहाँक एहि सेविकासँ विवाह कएलहुँ। किछु समयक बाद हुनकर सम्बन्धी हुनका हमरा लग अनलनि। स्मृति नष्ट भेला कारण हम हुनका अस्वीकार कऽ पूज्य कण्वक अपराधी भेलहुँ। बादमे औँठी देखलापर विवाहक स्मृति घुरि आएल। ई घटना हमरा विचित्र लगैत अछि। जेना सोझाँ स्पष्ट ठाढ़ि हाथीकेँ केओ अस्वीकार करए, ओ चलि गेलापर सन्देह करए, आ पदचिह्न देखलापर ओकर अस्तित्व बुझए— हमर मनक विकार ठीक एहने छल। मरीच: पुत्र, अपराध कएलहुँ से सोचि चिन्ता छोड़। तोरा छलल गेल छल। सुन। राजा: ध्यानसँ सुनैत छी। मरीच: मेनका अप्सरा-तीर्थसँ उतरि स्पष्ट रूपेँ दुर्बल शकुन्तलाकेँ लऽ अदिति लग अयलीह, तखन ध्यानसँ हमरा ज्ञात भेल जे बेचारी कन्याकेँ दुर्वासाक शापक कारण पति अस्वीकार कएलनि, आ औँठीक दर्शन एहि शापक अन्तक अवसर छल। राजा: (गम्भीर साँस लैत) हम दोषसँ मुक्त भेलहुँ! शकुन्तला: (अपनेसँ) कतेक सौभाग्य! पति-देव अपन इच्छासँ हमरा अस्वीकार नहि कएने छलाह। मुदा हमरा शाप देल गेल छल—ई मोन नहि पड़ैत। निश्चय हृदय दोसर ठाम रहबाक कारण हम शाप नहि सुनि सकलहुँ; सखी सभ बारम्बार जोर दैत छलीह जे पति-देवकेँ औँठी अवश्य देखाबी। मरीच: पुत्री, तोँ सत्य बुझि लेलह। अतः— आब अपन पतिपर क्रोध नहि कर। देख— तोहर पति तोरा अस्वीकार कएने छलाह, कारण स्मृति नष्ट भेला सँ ओ कठोर भऽ गेल छलाह। आब हुनकर मोहक अन्हार हटि गेल अछि, तेँ राज्यलक्ष्मी तोहर अधीन अछि। धूरिसँ मलिन दर्पणमे प्रतिबिम्ब आकार नहि लैत, मुदा स्वच्छ भेलापर सहजहि स्पष्ट होइत अछि। राजा: जेना भगवन् कहैत छथि। मरीच: पुत्र, आशा अछि जे शकुन्तलाक एहि पुत्रकेँ स्वीकार कएलह, जकर जातकर्म हम स्वयं कएने छी? राजा: भगवन्, एकरहि सहारे हमर वंश टिकल अछि। मरीच: ई सत्य अछि। एकरा भावी चक्रवर्ती जान। देख— बिना झटकाक स्थिर गतिसँ रथपर समुद्र पार कऽ ई अद्वितीय योद्धा शीघ्र सात द्वीपबाली पृथ्वी जीतत। पशु सभकेँ बलसँ वशमे करबाक कारण एतय एकर नाम सर्वदमन अछि; पृथ्वीकेँ धारण करबाक कारण आगाँ ई भरत नामसँ प्रसिद्ध होएत। राजा: भगवन् स्वयं एकर संस्कार कएलनि, तेँ एकर विषयमे एहि सभक आशा कऽ सकैत छी। अदिति: शकुन्तलाक इच्छा कोना पूर्ण भेल, ई सभ विस्तारसँ कण्वकेँ सेहो कहल जाए। मेनका लगहि छथि। शकुन्तला: अहाँ हमर हृदयक बात कहि देलहुँ। मरीच: तपोबलसँ पूज्य कण्वकेँ ई सभ स्पष्ट ज्ञात अछि। राजा: अहा! गुरु हमरा पर क्रोधित नहि छथि। मरीच: तैयो ई शुभ समाचार हुनका हमरासँ सुनबाक चाही। के उपस्थित अछि? (प्रवेश करैत) शिष्य: गुरुदेव, हम उपस्थित छी। मरीच: पुत्र गालव, हमर शब्दमे यशस्वी कण्वकेँ ई शुभ समाचार कह—दुर्वासाक शाप समाप्त भेला पर स्मृति घुरि अयलासँ दुष्यन्त शकुन्तलाकेँ स्वीकार कऽ लेलनि। शिष्य: गुरुदेवक जे आज्ञा। (प्रणाम कऽ बाहर जाइत अछि।) मरीच: (राजासँ) पुत्र, अपन पुत्र आ पत्नीक सङ्ग एतहि उपस्थित मित्र इन्द्रक रथपर चढ़ि अपन राजधानी लेल प्रस्थान कर। राजा: जेना गुरुदेवक आज्ञा। मरीच: पुत्र— यज्ञ-भागक अधिकारी देवता सभकेँ प्रचुर हविसँ तृप्त करैत रह; बदलामे देवराज तोहर प्रजा लेल वर्षा करथि। एहि प्रकार परस्पर उपकारसँ प्रकट अहाँ दूनूक उदारताक महिमा सहित बहुत काल धरि मित्रता बनल रहए। राजा: भगवन्, सम्पूर्ण शक्तिसँ कल्याणक प्रयास करब। मरीच: पुत्र, आब कह, आओर कोन वरदान दी? राजा: जँ एहि सभक बादो गुरुदेव हमरा पर कृपा करए चाहैत छथि, तखन— राजा अपन प्रजाक कल्याणमे समर्पित रहथि! विद्वान सभ सरस्वतीक सम्मान करथि! सर्वव्यापी शक्तिबला स्वयम्भू शिव हमर पुनर्जन्मक अन्त करथि! (सभ बाहर जाइत छथि।) सप्तम अङ्क समाप्त। महाकवि कालिदासक रचना, भाग्यक कृपासँ सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त कविक “अभिज्ञानशाकुन्तलम्” नामक नाटक समाप्त। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१६.गजेन्द्र ठाकुर-विशाखदत्त रचित संस्कृत नाटक मुद्राराक्षसम् केर मैथिली अनुवाद - गजेन्द्र ठाकुर मंत्री राक्षसक राजसी मोहर (विशाखदत्त रचित संस्कृत नाटक मुद्राराक्षसम् केर मैथिली अनुवाद - गजेन्द्र ठाकुर) पात्र-परिचय पुरुष पात्र: १.सूत्रधार: रंगमंच निर्देशक, नाटकक प्रारम्भ केनिहार। २.चाणक्य: नायक विष्णुगुप्त, चन्द्रगुप्तक गुरु आ मन्त्री। ३.चन्द्रगुप्त: मगधक राजा। ५.भागुरायण — चाणक्यक दूत, मलयकेतुक पिताक परम मित्र बनल ८.निपुणक — चाणक्यक गुप्तचर, यमक चित्रपट लऽ कय नीतिज्ञक रूपमे ४.जीवसिद्धि: वेशमे इन्दुशर्मन, चाणक्यक मित्र आ दूत, राक्षससँ मित्रताक नाटक करैत। ६.सिद्धार्थक — चाणक्यक दूत, शकटदासक परम मित्र बनल, चन्दनदासक वधस्थलक कारिन्दा वज्रलोमक रूपमे ७.सुसिद्धार्थक — सिद्धार्थकक मित्र, चण्डालक वेशमे वेणुवेत्रक रूप धारण करैत ९.शार्ङ्गरव — चाणक्यक शिष्य। १०.वैहीनरि — चन्द्रगुप्तक व्यक्तिगत/शयनकक्ष परिचारक ११.मलयकेतु: पर्वतदेशक राजा, अपन पिताक हत्याक बदला लेबाक हेतु पाटलिपुत्रपर चढ़ाई करैत १२.राक्षस: प्रतिनायक, दिवंगत सम्राट नन्द आ हुनकर पुत्रक मन्त्री, सर्वार्थसिद्धिक पक्षमे, मलयकेतुसँ मिलि, अन्तमे चन्दनदासक प्राण बचेबाक हेतु चन्द्रगुप्तक मन्त्री पद स्वीकार करैत छथि। १३.चन्दनदास: रत्नकारक श्रेणीक प्रधान, राक्षसक अभिन्न मित्र १४.शकटदास — राक्षसक मित्र आ सचिव १६.करभक: राक्षसक दूत १७.प्रियम्वदक — राक्षसक परिचारक १८.जाजलि — मलयकेतुक कंचुकी; व्यक्तिगत/शयनकक्ष परिचारक १९.भासुरक: मलयकेतुक अनुचर। २०.चर: चाणक्यक गुप्तचर २१.विराधगुप्त: सपेरा बनल राक्षसक गुप्तचर। प्रियंवदक २२.जीर्णविष भेषमे विराधगुप्त, राक्षसक मित्र आ गुप्त दूत, साँपक खेलाड़ीक रूप धारण करैत २२.प्रथम वैतालिक: चन्द्रगुप्तक चारण। २३.द्वितीय वैतालिक: राक्षसक चारण व्यञ्जन गुप्तचर, स्तनकलश। २४.दौवारिक: राक्षसक द्वारपाल २५.वेत्रहस्तपुरुष: मलयकेतुक आगमनक सूचना देबयबला पुरुष। २६.पुरुष: गुप्तचर (चाणक्यक, आत्महत्याक स्वांग करयबला) २७.वज्रलोमक: प्रथम चण्डालक वेशमे सिद्धार्थक २८.वेणुवेत्रक: द्वितीय चण्डालक वेशमे सुसिद्धार्थक २९:पुत्र: चन्दनदास पुत्र। ३०. पुरुष: संदेशवाहक। ३१.बन्दीजन: (कैकटा) स्त्री पात्र: १.नटी: सूत्रधारक स्त्री २.शोणोत्तरा: चन्द्रगुप्तक प्रतिहारी (स्त्री-द्वारपाल) ३.विजया- मलयकेतुक प्रतिहारी (स्त्री-द्वारपाल) ४.कुटुम्बिनी- चन्दनदासक पत्नी दृश्य — अंक १, ३, ६, ७ मे पाटलिपुत्र; अंक २, ४ मे पर्वतक देशक राजधानी; अंक ५ मे मलयकेतुक शिविर पहिल अंक (नाटकक प्रारम्भमे सूत्रधार प्रवेश करैत छथि, नाट्यपूर्व प्रबन्धन सम्पन्न भेलापर) सूत्रधार: हे श्रोतागण, भगवान शिवक माया अहाँक रक्षा करथु, ओइ शिवक, जे गौरीक प्रश्नक उत्तरमे स्वर्गीय गंगानदीक नाम लुकेबाक हेतु एहि प्रकार बाजल छला- गौरी पूछलखिन: "ई के छथि, जे अहाँक शीशपर एतेक सुन्दर रूपसँ विराजमान छथि?" शिव कहलखिन: "शशिकला अर्धचन्द्र छथि।" गौरी कहलखिन: "की ई हुनकर नाम थिकनि?" शिव कहलखिन: "हँ, ई हुनकर नाम थिकनि- अहाँ जनैत छी, फेर बिसरि केना गेलहुँ?" गौरी कहलखिन: "हम स्त्री जातिक संदर्भमे बाजि रहल छी, चन्द्रमाक नहि।" शिव कहलखिन: "तखन विजयाकेँ बजाउ, जँ चन्द्रमाक वचन प्रमाण नहि!" तदुपरि — भगवान शिव, जे त्रिपुर-दैत्यक संहारक थिका, हुनकर नृत्य — जे स्थानीय परिस्थितिक कारणे अड़बड़ाहटिसँ कयल गेल — अहाँक रक्षा करथु — ओहि शिवक जे भूमिक धसानकेँ अपन पएरक मृदु स्पर्शसँ थामि लेलथि, जे समस्त संसारकेँ छूबैत अपन भुजाक बारम्बार संकुचन-प्रसारसँ मात्र भंगिमाक अभिनय करैत रहला, आ जे अपन भीषण नेत्रसँ अग्निस्फुलिंग निकलेबासँ प्रलयक भयसँ विरत रहला। हमरा विस्तार त्यागि देबाक चाही — दर्शकवर्ग हमरा आदेश दय रहल अछि जे 'मुद्रिका' नामक नव नाटक, जे कवि विशाखदत्तक, महाराज भास्करदत्तक पुत्र आ सामन्त वटेश्वरदत्तक पौत्रक कृति थिक, हमरासँ अभिनीत करायल जाओ। आ हमरा वास्तवमे बहुत प्रसन्नता अछि जे हमरा ई करबाक अवसर भेटल अछि — एहन दर्शकवर्गक समक्ष, जे काव्यक उत्कृष्टताकेँ सराहि सकैत अछि। कारण — एकटा मन्दबुद्धिक बीजारोपण सेहो उर्वर भूमिमे पड़लापर पल्लवित होइत अछि। धानक प्रचुर उत्पत्तिक हेतु कृषकक योग्यता आवश्यक नहि। तँ हम अपन परिवारसँ संगे अभिनय आरम्भ करैत छी। (चारूदिस देखैत) आब की बात अछि? घरक दास-दासी सभ असाधारण उत्साहसँ अपन-अपन काजमे लागल छथि, जेना कोनो महा-उत्सव होय। ई एकटा जल आनि रहल छथि, दोसर सुगन्धित रंग बना रहल छथि (अर्थात् सुगन्धित द्रव्य पीसि रहल छथि), तेसर सुन्दर माला गूँथि रहल छथि, आ ओ चारिम जन मूसल लेने हाथे काज करैत मधुर गुनगुनाहटि कऽ रहल छथि जखन मूसल नीचाँ खसैत अछि। हम अपन स्त्रीकेँ बजाबैत छी (शृंगार-कक्षक दिस देखैत) — हे महानुभावे, शीघ्र आउ! अहाँ, जे नीतिशास्त्रमे प्रवीण छी, जे संसाधनसँ सम्पन्न छी, जे स्थिरता प्राप्त करैत त्रिवर्गक सिद्धि करैत छी, हमर घरक प्रबन्धनमे नीतिशास्त्रक साक्षात् स्वरूप छी — अभिनेत्री (प्रवेश करैत): जी, हे स्वामी! अपन आज्ञाक श्रुतलेख करेबाक कृपा करू। सूत्रधार: हे महानुभावे! आज्ञाक श्रुतलेखक प्रसंग छोड़ू। बस हमरा बताउ — घरमे पूजनीय ब्राह्मणकेँ भोजन-निमन्त्रण देल गेल अछि, अथवा कोनो सुयोग्य अतिथि आयल छथि, जाहि कारणसँ ई विशेष खान-पानक तैयारी भऽ रहल अछि? अभिनेत्री: हे स्वामी, पूजनीय ब्राह्मण लोकनिकेँ भोजनक निमन्त्रण हमरा दिसँ देल गेल अछि! सूत्रधार: अवसर की थिकनि? अभिनेत्री: लोक कहैत अछि जे चन्द्र पर ग्रहण लागत। सूत्रधार: के कहैत अछि? अभिनेत्री: नगरवासी लोक तँ यैह कहैत अछि। सूत्रधार: हे महानुभावे! हम खगोलशास्त्रक चौसठि शाखा सहित अध्ययन कयने छी। तँ पूजनीय ब्राह्मण लोकनिक भोजनक तैयारी अवश्य कयल जाओ। चन्द्र-ग्रहणक विषयमे अहाँकेँ भ्रमित कयल गेल अछि। एहि ठाम देखू — (दुष्टग्रह) राहु, केतुसँ मिलि, समस्त तेजसँ युक्त चन्द्रमापर अखन आक्रमण करबाक प्रयास करैत अछि। (पर्दाक पाछाँसँ आवाज) — अहँ! ओ के थिकाह, जे हमरा बावजूद चन्द्र पर आक्रमण करबाक साहस करैत अछि? सूत्रधार: मुदा बुधग्रहक संयोग हुनका बचा लेत। अभिनेत्री: हे स्वामी! ई के थिकाह जे भूतलवासी होइतो दैत्यक आक्रमणसँ चन्द्रमाकेँ बचेबाक इच्छा रखैत छथि? सूत्रधार: हे महानुभावे, सत्य कहैत छी, हमरा हुनकर ध्यान नहि गेल। हँ, हम हुनकर आवाजसँ हुनका पहचानि लेब। (फेरसँ दोहराबैत) 'दुष्टग्रह राहु...' आदि। (पर्दाक पाछाँसँ आवाज) — अहँ! ओ के थिकाह, जे हमरा बावजूद चन्द्रगुप्त पर आक्रमण करबाक साहस करैत अछि? सूत्रधार: ओह, बुझलहुँ — ई कौटिल्य थिका — (अभिनेत्री भयसँ काँपय लगैत छथि) सूत्रधार: ओ कुटिल नीतिबला, जे नन्द-वंशकेँ अपन क्रोधाग्निमे नलक जेकाँ भस्म कय देलथि। चन्द्रक ग्रहण सुनि हुनका नाम-धारक चन्द्रक ग्रहणक आशंका करैत ओ आयल छथि। तँ हमरा सभ विदा लेबाक चाही। (दुनू प्रस्थान करैत छथि) प्रस्तावनाक अन्त (चाणक्यक प्रवेश होइत अछि — क्रोधमे शीशक जटाकेँ स्पर्श करैत) चाणक्य: अहँ! ओ के थिकाह जे हमरा बावजूद चन्द्रगुप्त पर आक्रमण करबाक साहस करैत अछि? ओ कोन मृत्युकेँ वरण कयने मनुष्य हमर शीशक जटाकेँ अखनहुँ बाँधल नहि देखबाक इच्छा रखैत अछि — ई जटा, जे हमर क्रोधाग्निक कारे काली नागिनक रूपमे नन्द-वंशक काल भेल अछि? ओ कोन मनुष्य, जे अपन विपक्षीक आ अपन शक्तिक आकलनमे भ्रमित अछि, हमर उग्र क्रोधाग्निक सम्मुख पतंगक भाँति तत्काल मृत्यु प्राप्त करैत मरबाक इच्छा रखैत अछि — ओ आग्नि जे नन्द-वंशकेँ एहि भाँति भस्म कय देलक जेना दवानल वनकेँ जरेबैत अछि? (चाणक्य स्वयं बैसैत छथि, जखन शिष्य बाहर चलि जाइत छथि) (मन-ही-मन) आब? की नागरिकोंमे ई बात पसरि गेल अछि जे राक्षस, जे वंश-विनाशसँ रुष्ट अछि, मलयकेतुसँ मिलि लेल अछि — पर्वतकक पुत्र, जे अपन पिताक हत्याक बदलामे जरि रहल अछि, जकरा समस्त नन्द-राज्यक प्रस्ताव दय उकसायल गेल अछि, आ जे म्लेच्छ-सरदारसँ बल पाबि मलयकेतुक सेना लेने वृषालपर आक्रमण करबाक तैयारी कऽ रहल अछि? (क्षण-भरि सोचि) छोड़ू, की होय! हम एकरो बावजूद रोकि लेब। कारण, नन्द-वंशकेँ उखाड़ फेंकबाक प्रतिज्ञा सार्वजनिक रूपसँ करैत हम एहि असाध्य प्रतिज्ञाक नदीकेँ पार कय चुकल छी। हमर क्रोधक अग्नि वन-दहन जेकाँ थिकैक। एकर ज्वालामे नन्द-वंशक सदस्य लोकनि एहि प्रकार भस्म भेला जेना भयत्रस्त नागरिक-समाजसँ परित्यक्त बाँसक डण्डा। हमर नीतिक विस्फोटसँ उड़ल राखसँ हुनकर मन्त्रीगणक पतन-धूम्र आकाशमे शत्रुपत्नीकेँ वैधव्यक शोकसँ आच्छन्न कय गेल। आब जखन एकरा ईंधन नहि रहल तँ ई बुझाबि गेल — एकर शक्ति क्षीण भेलाक कारणे नहि। तदुपरि — ओहि लोक, जे राजा नन्दक भयसँ असन्तोष मनहि-मन दाबि रखने छला, से आब देखि रहल छथि जे नन्द अपन परिवारसँ सहित हमरा दिसँ ओहिना सिंहासनसँ खसाओल गेला जेना हाथीक प्रमुख अपन यूथकेँ पर्वत-शिखरसँ —। यद्यपि महाप्रतिज्ञा पूर्ण भेल, मुदा हम वृषालक कारणे तरुआरि धारण करैत रही। (अन्यथा) — जगतविश्रुत नव नन्द लोकनिकेँ, जे हृदयमे शल्यक भाँति गड़ल छला, हम मूलसँ उखाड़ि देलहुँ, आ सरोवरमे कमल जेकाँ मौर्यक राज्य सुदृढ़ कयलहुँ। एहि प्रकार हम परिश्रमसँ शत्रु आ मित्र दुनूक हेतु उचित फल बाँटि देलहुँ। तखन, नन्द-वंशकेँ पूर्णतः उखाड़ि देल गेल आ चन्द्रगुप्तक राज्यकेँ सुदृढ़ कहल जाए कोना — जखन तक राक्षसकेँ वश नहि कयल गेल? (चिन्तन-विरति) राक्षसक नन्द-वंशक प्रति भक्तिक अप्रतिम उदाहरण देखि हम चकित छी! यावत नन्द-वंशक एकोटा सदस्य जीवित रहला, ओहि तावत हुनकर नन्द-वंशक कारणे कोनो गतिविधि रोकब संभव नहि छल — जेहि हेतु ओ चन्द्रगुप्तक मन्त्री-पदकेँ स्वीकार करथि, ताहि हेतु नन्द-वंशक सर्वार्थसिद्धिकेँ — दयनीय प्राणी — हत्या करेबाक आदेश देलहुँ, यद्यपि ओ तपोवनमे सेहो आश्रय लेने छला। आब मलयकेतुक सहयोग पाबि ओ सत्यमे हमरा नष्ट करबाक हेतु और बलशाली तैयारी कऽ रहल अछि। (हवामे दृष्टि लगाबैत) मन्त्री राक्षस! अहाँ सकल प्रशंसाक योग्य छी। लोक राजाक सेवा स्वार्थवश करैत अछि जावत राजा शक्तिमान रहैत अछि। जे विपत्तिमे हुनकर पाछाँ लागल रहैत छथि, ओ हुनकर पुनर्वापसीक आशामे रहैत छथि। मुदा जे अहाँ जेकाँ मृत्यु उपरान्तो निस्स्वार्थ भक्तिसँ स्वामीक कारण पकड़ने रहैत छथि, पुरानक उपकारक कृतज्ञ स्मृति लेने — एहन योग्य पुरुष मिलनो कठिन अछि। एही कारणे हम अहाँकेँ अपन पक्षमे करबाक प्रयास करैत छी, ई सोचैत जे चन्द्रगुप्तक मन्त्री-पदकेँ स्वीकार करबाक हेतु अहाँकेँ कोना प्रेरित कयल जाय। कारण — बुद्धिहीन मुदा भक्तिसम्पन्न सेवक राखबाक की लाभ? तेहिना बुद्धिमान आ पराक्रमी मुदा भक्तिहीन सेवकक की उपयोग? जे केवल बुद्धि, पराक्रम आ भक्ति — तीनूकेँ एकत्र लऽ महत्त्वमे सहायक होइत छथि, ओ राजाक भृत्य थिकाह; बाकी सभ ओकरा समक्ष भार्याक भाँति सुख-दुखमे परजीवी मात्र छथि। एही हेतु हम बिना सुताएल एहि विषयमे यत्न करैत रही। एही क्रममे नागरिकोंमे एकटा अपवाह पसरेलहुँ जे हमर सहयोगी राजा पर्वत, जे हम सभपर गहन उपकार कयने छला, हमर विषकन्याक माध्यमसँ राक्षसे हत्या कयलखिन — कारण हम एहि विश्वाससँ चललहुँ जे वृषाल वा पर्वतकमेसँ जे मारल जैत, ताहिसँ हमरा — चाणक्यकेँ — क्षति पहुँचत। एहि अपवाहकेँ विश्वसनीय बनेबाक हेतु हम जानि-बूझिकेँ भागुरायणसँ मलयकेतुक कान फुसफुसेलहुँ जे हुनकर पिताक हत्या हमहीं कयलियैक — ई एहि विश्वासपर कयलहुँ जे जँ ओ युद्ध सेहो करय, तँ युक्तिपूर्वक ओकरा रोकल जा सकैत अछि, मुदा मलयकेतुकेँ बन्दी बनाबाक कलंक — जे पर्वतकक हत्यासँ जुड़ल अछि — मेटायल नहि जा सकैत। हित-अहितक तराजूमे शत्रु आ मित्र पक्षमे के-के आ कतऽ-कतऽ अछि — एहि जाँचक हेतु हम बहुरूपियासँ भिन्न-भिन्न स्थानक वेश-भाषा-रीति-परिधानमे प्रवीण गुप्तचर नियुक्त कयलहुँ। एहि दिससँ हम कुसुमपुरामे निवास करैत नन्द-मन्त्रीक अनुयायी लोकनिक गतिविधिपर दृष्टि रखैत छी। एकरा अतिरिक्त भद्रभट आ अन्य उच्च-अधिकारी — जे युद्धमे चन्द्रगुप्तक पक्षधर छला — हुनका सभकेँ विभिन्न असन्तोषक कारण दर्शाबैत प्रत्यक्षतः असन्तुष्ट प्रतीत होयबाला कयलहुँ। राजाक निजी परिचारकक पदपर एहन विश्वासपात्र लोकक नियुक्ति कयलहुँ जे परीक्षामे खरे उतरल छथि आ जे हत्यारा, विषप्रयोगकर्ता आदिक दुराचारकेँ निरन्तर नियन्त्रणमे रखैत छथि। एहिसँ आगाँँ हमर एकटा ब्राह्मण सहपाठी आ मित्र छथि, जनकर नाम इन्दुशर्मन अछि, जे शुक्रनीतिशास्त्रमे महान् दक्षता प्राप्त कयने छथि आ जे खगोलशास्त्रक चौसठि शाखामे प्रवीण छथि। नन्द-वंशकेँ नष्ट करबाक प्रतिज्ञा लेलाक बाद हम हुनका कुसुमपुरामे एकटा बौद्ध-भिक्षुक वेशमे आमन्त्रित कयलहुँ जे ओ नन्दक सभ मन्त्रीसँ मित्रता करथि। हुनका विशेष रूपसँ राक्षससँ घनिष्ठता भेल। आब ओ हमरा बड़ महत्त्वपूर्ण सेवा करत। एहि प्रकार एकटाहु काज शेष नहि रहल। केवल वृषाल — राजनीतिक मण्डलक प्रधान — ई अछि जे सक्रिय रुचि नहि लैत अछि। ओ राज-कार्यक भार हम सभपर छोड़ि दैत अछि। आ निश्चिततः, राज्य तखने सुखदायक होइत अछि जखन ओ राज्यकेँ व्यक्तिगत रूपसँ संभालबाक अतिकठिन झमेलासँ मुक्त रहैत अछि। कारण — मनुष्यक स्वामी आ हस्ती-स्वामी, यद्यपि सर्वशक्तिमान, अधिकांशतः दुखी होइत छथि — स्वाभाविकतः, जखन हुनका स्वयं सभ किछु करबाक आ उपभोग करबाक पड़ैत अछि। (तखन चाणक्यक एकटा गुप्तचर यमक चित्रपट लेने प्रवेश करैत छथि) गुप्तचर: यमक चरणमे प्रणाम करू! अन्य क्षुद्र देवतासँ की लाभ? कारण ई यमे थिकाह जे दोसरक भक्त लोकनिक प्राण हरि लैत छथि — ओहि लोकनिक जे कम्पित अवस्थामे छथि। आ एकटा मनुष्य निश्चयसँ ओही देवताक कृपासँ जीवित रहैत अछि जकर ओ भक्त होइत अछि — ओ देवता चाहे कतेको कठोर होथि। एहि प्रकार हम ओहि यमक कृपासँ जीवित छी जे मनुष्यक संहारक थिकाह। आब हम एहि घरमे प्रवेश करैत छी, चित्रपट देखाओत आ भक्ति-गीत गाओत। शिष्य (गुप्तचरकेँ देखि): हे भले मानुस, एहि घरमे प्रवेश नहि करू। गुप्तचर: हे ब्राह्मण! ई किनकर घर थिकनि? शिष्य: ई हमर परम-गुरु सुनामक पूजनीय चाणक्यक घर थिकनि। गुप्तचर (मुस्कियाइत): हे ब्राह्मण! तखन ई हमर धर्म-भाइक घर थिकनि, आन केकरो नहि। तँ हमरा आबय दिअ। हम अहाँक गुरुकेँ धर्म-सत्यक उपदेश देब। शिष्य (क्रोधमे): अहाँ की कहलहुँ? की अहाँ हमर गुरुसँ अधिक धर्म-सत्य जनैत छी? गुप्तचर: हे ब्राह्मण! क्षुब्ध नहि होउ। एहन नहि जे सभ किछु सभ केओ जनैत हो। किछु बात अहाँक गुरु जनैत छथि, किछु बात हम जेकाँ लोक जनैत छथि। शिष्य: अहाँ हमर गुरुक सर्वज्ञता-विशेषणकेँ छीनबाक प्रयास करैत छी। गुप्तचर: हे भले ब्राह्मण! जँ अहाँक गुरु सर्वज्ञ थिका तँ ओ बताउथि जे ई कोन लोक छथि जे चन्द्रकेँ पसन्द नहि करैत छथि। चाणक्य (गुप्तचरकेँ सुनि, मनहि-मन): अहँ! ई लोक ई कहबाक प्रयास कऽ रहल अछि जे ओ लोकक नाम जनैत अछि जे चन्द्रगुप्तकेँ पसन्द नहि करैत छथि। शिष्य: एहन बात कोना कहैत छी? अहाँ बकबास करैत छी। गुप्तचर: जँ हमर बुद्धिमान कान मिलैत, तखन ई बकबास नहि, बुद्धिक बात होइत। चाणक्य: अरे, आउ भले मनुष्य! हम सुनबाक हेतु प्रस्तुत छी। गुप्तचर: हम आयल। (प्रवेश करैत आ चाणक्यक समक्ष जाइत) — अहाँक कल्याण हो, हे पूजनीय महोदय! चाणक्य (हुनकर मुखाकृति देखि, मनहि-मन): ओह! ई थिकाह निपुणक, जे मनुष्यक मनकेँ जाँचबाक हेतु नियुक्त छथि। (प्रकटतः) भले आउ, भले मनुष्य! बैसू। गुप्तचर: जेहन पूजनीय महोदय आज्ञा दैत छथि। (भूमिपर बैसैत छथि) चाणक्य: आब अपन कार्य-विवरण दिअ। की प्रजा वृषालकेँ चाहैत अछि? गुप्तचर: निश्चय ओकरा चाहैत अछि। कारण अहाँक योग्यतासँ असन्तोषक समस्त कारण दूर भेलापर प्रजा सुयशस्वी चन्द्रगुप्त महाराजकेँ अत्यन्त प्रेमसँ चाहैत अछि। मुदा नगरमे तीन व्यक्ति एहन छथि जे मन्त्री राक्षससँ पूर्व-मित्रता आ आदरसँ बँधल छथि आ सम्माननीय चन्द्रगुप्तक राज्यसत्तासँ असहिष्णु छथि। चाणक्य (बढ़ैत क्रोधसँ, मनहि-मन): हुनका सभकेँ तँ कहना चाहि जे ओ अपन सुखचैनसँ असहिष्णु छथि। (प्रकटतः) की अहाँ हुनकर नाम जनैत छी? गुप्तचर: हे पूजनीय महोदय, हम हुनकर नाम नहि जनैत तँ के बतैतिअनि? चाणक्य: एहि स्थितिमे हम हुनकर नाम जानब चाहैत छी। गुप्तचर: हे पूजनीय महोदय! ध्यान दिअ — पहिल व्यक्ति, शत्रुक सँग मिलल, एकटा क्षपणक (बौद्ध भिक्षु) थिकाह — चाणक्य (मनहि-मन): शत्रुपक्षसँ मिलल एकटा क्षपणक? (आश्चर्यसँ) ओ के भऽ सकैत अछि? गुप्तचर: नाम जीवसिद्धि, जे राजा पर्वतक विरुद्ध मन्त्री राक्षसे नियुक्त विषकन्याद्वारा कयल गेल हत्यामे संलग्न रहला। चाणक्य (मनहि-मन): ओह! ई जीवसिद्धि थिकाह। ई तँ हमर गुप्तचर छथि! (प्रकटतः) आब दोसर के छथि? गुप्तचर: दोसर एकटा लेखक छथि, नाम शकटदास, जे मन्त्री राक्षसक प्रिय मित्र थिकाह। चाणक्य (मनहि-मन): एकटा लेखक कोनो महत्त्वपूर्ण अधिकारी नहि थिकाह। हम हुनकर पाछाँ सिद्धार्थककेँ मित्रताक वेशमे लगेलहुँ, कारण शत्रुकेँ कतेहो नगण्य होथि, तैयो उपेक्षा उचित नहि। (प्रकटतः) आब तेसर के छथि? गुप्तचर: तेसर फुलवारी-चौकपर रहनिहार एकटा धनी रत्नकार थिकाह, नाम चन्दनदास, जे मन्त्री राक्षसक दोसर स्वरूप थिका आ जनकर देखरेखमे मन्त्री अपन परिवारकेँ छोड़ि नगरसँ भागल छला। चाणक्य (मनहि-मन): निश्चय ई हुनकर सभसँ अभिन्न मित्र होयताह। कारण राक्षस एहन व्यक्ति नहि थिका जे अपन परिवारकेँ एहन व्यक्तिक जिम्मेमे छोड़ि जाथि जे हुनकर दोसर स्वरूप नहि होथि। (प्रकटतः) हे भले मनुष्य! एहि बात कोना जनलहुँ जे राक्षस अपन परिवारकेँ चन्दनदासाक देखरेखमे छोड़लनि? गुप्तचर: हे महोदय! एहि मुद्रिकासँ। (गुप्तचर मुद्रिका चाणक्यकेँ प्रदान करैत छथि) चाणक्य (मुद्रिका परीक्षण करैत, हर्षमे मनहि-मन): हँ! हमरा राक्षस अपन अँगुरीमे प्राप्त भऽ गेल! (प्रकटतः) हे भले मनुष्य! हम विस्तारसँ सुनब चाहैत छी जे अहाँ एहि मुद्रिका कोना प्राप्त कयलहुँ। गुप्तचर: सुनू, हे पूजनीय महोदय! अहाँक महान् स्वसँ गुप्त रूपे नागरिकोंक गतिविधिक अन्वेषण करबाक हेतु नियुक्त, यमक चित्रपट आ हुनकर राज्यक संग अपन भ्रमणमे, जे निजी घरोंमे प्रवेश करने कारोकेँ कोनो सन्देह उत्पन्न नहि करैत — धनी रत्नकार चन्दनदासाक घर आयल, ओहिठाम चित्रपट पसरेलहुँ आ भक्ति-गीत गेबा लागलहुँ। चाणक्य: तखन? आगाँँ बताउ। गुप्तचर: लगभग पाँच वर्षक एकटा बालक, अत्यन्त सुन्दर रूपयुक्त, बच्चाक स्वाभाविक जिज्ञासावश आँखि फाड़ि अन्दरसँ बाहर आबऽ चाहलक। एहिपर ओहि अन्दरसँ स्त्रीगणक एकटा हड़बड़ाहटि भेल — "ओ बालक! बाहर जाइत अछि!" — जे हुनका सभक व्याकुलताक प्रकाशन छल। तखन एकटा महिला द्वार-भारसँ झाँकलखिन, बालककेँ डाँटलखिन आ जखन ओ बाहर आबऽ लागल तखन अपन कोमल लता-जेकाँ भुजासँ ओकर हाथ पकड़लखिन। जखन ओ बालककेँ पकड़बाक हड़बड़ाहटिमे अपन अँगुरी पसारि हाथ बढ़ेलखिन, तखन ई मुद्रिका — जे पुरुषक अँगुरीमे पहिरबाक हेतु थिकनि — हुनकर हाथसँ खसि द्वारक देहरीपर पड़ि गेल आ हमर पएरक समीप बिना ध्यानमे पड़ला खसल। ओहिपर मन्त्री राक्षसक नाम खुदल देखि हम ई पूजनीय महोदयक समक्ष लेने आयलहुँ। एहि प्रकार हम एहि मुद्रिका प्राप्त कयलहुँ। चाणक्य: बुझलहुँ। भले मनुष्य, अहाँ जाउ। एहि उपकारक पुरस्कार शीघ्र भेटत। गुप्तचर: हे पूजनीय महोदय! जेहन आज्ञा। (प्रस्थान) चाणक्य: हँ शार्ङ्गरव! शिष्य (प्रवेश करैत): हे पूजनीय महोदय! की आज्ञा? चाणक्य: हमर लेखन-सामग्री आनू, बच्चा! शिष्य: जेहन आज्ञा। (जाइत आ घुरैत) हे पूजनीय महोदय! लेखन-सामग्री उपस्थित। चाणक्य (सामग्री लैत, मनहि-मन): एहिठाम की लिखी? ई तँ राक्षसपर विजयक दस्तावेज होयत — हमर ई लेखन। स्त्री-द्वारपाल (प्रवेश करैत): अहाँक जय हो, हे महान् महोदय! चाणक्य (मनहि-मन, हर्षसँ): विजय-उद्घोषणाकेँ हम स्वागत करैत छी! (प्रकटतः) की बात थिकनि, शोणोत्तरे? स्त्री-द्वारपाल: हे पूजनीय महोदय! महाराज सुयशस्वी चन्द्रगुप्त, मस्तकपर कमल-कलीक भाँति मुड़ल हाथ जोड़ि विनम्रतापूर्वक निवेदन करैत छथि जे, "हम चाहैत छी जे पूजनीय गुरुक अनुमतिसँ पूर्व-राजा पर्वत द्वारा पहिरल गहनासभ पूजनीय ब्राह्मण लोकनिकेँ दान कय परलोकमे शान्ति प्राप्त करी।" चाणक्य (सन्तोषसँ, मनहि-मन): शाबाश वृषाल! तोहर प्रार्थना हमर मनोकामनाकेँ उत्तर देलक। (प्रकटतः) शोणोत्तरे, वृषालकेँ हमर ओरसँ एहि उत्तरमे कहियनु — "हे सुप्रिय राजकुमार! अहाँ विधि-व्यवस्था जनैत छी। हँ, एहि प्रकार करू। मुदा पर्वत द्वारा पूर्व-पहिरल गहना उत्कृष्ट कारीगरीक थिकनि। ओ साधारण ब्राह्मणकेँ नहि, उत्कृष्ट ब्राह्मणकेँ देयोग्य थिकनि। एहि हेतु हम स्वयं विश्वावसु आ हुनकर दुनू भाइकेँ पठेबनि।" स्त्री-द्वारपाल: हे पूजनीय महोदय, जेहन आज्ञा। (प्रस्थान) चाणक्य: हँ शार्ङ्गरव! विश्वावसु आ हुनकर दुनू भाइकेँ हमर नामसँ कहिअनु जे ओ वृषालसँ गहनाक उपहार लेबाक हेतु जाथि आ (घुरैत) हमरासँ भेंट करथि। (शिष्यक प्रस्थान आ पुनरागमन) शिष्य: हे पूजनीय महोदय, जेहन आज्ञा देलहुँ कय देलियनि। (प्रस्थान) चाणक्य: आब एहि पत्रमे की लिखी? (विचार करैत) — हँ! पायल। म्लेच्छ-सरदार लोकनिक मध्य जे पाँचटा सर्वप्रमुख राक्षसक अनुगामी छथि, गुप्तचरसँ जानल जे ओ सभ थिकाह — कुलूतक चित्रवर्मन, मलयदेशक सिंहनाद — सिंह-राजा, कश्मीरक पुष्करराक्ष, शत्रुकेँ नत कय देनिहार सिन्धु-देशक सिन्धुशेन, आ परासीकाक अश्वदल-सम्पन्न मेघकोश — ई पाँचम। निश्चय हम एहि ठाम हुनकर नाम लिखब। चित्रगुप्त भविष्यमे हुनका सभकेँ कलम करथि! (क्षण-भरि सोचैत) नहि-नहि। सभटा अनिर्दिष्ट रहऽ दिअ। हँ शार्ङ्गरव! शिष्य (प्रवेश करैत): हे पूजनीय महोदय! की आज्ञा? चाणक्य: हे बच्चा! वेदाध्ययनकारी विद्वानक लेखनमे सहजता आ सौन्दर्यक कमी होइत अछि। एहि हेतु सिद्धार्थककेँ हमर नामसँ कहियनु जे ओ शकटदाससँ एहि शर्तमे एकटा पत्र लिखवाउ — (ओकर कानमे फुसफुसाबैत) — आ हमरासँ भेंट करथि। एहि पत्रपर बाहरसँ कोनो पताक उल्लेख नहि हेतैक, कारण ओ स्वयं कोनो निश्चित व्यक्तिक पाससँ एकटा मौखिक सन्देश लेबाक हेतु नियुक्त होयताह। शकटदासकेँ ई नहि बतायल जाय जे ई पत्र लिखबेनिहार चाणक्य छथि। शिष्य: हे पूजनीय महोदय, जेहन आज्ञा। (प्रस्थान) चाणक्य: हम कतेक प्रसन्न छी! मलयकेतुपर विजय प्राप्त भेल। (सिद्धार्थक प्रवेश करैत, हाथमे पत्र लेने) सिद्धार्थक: हे महोदय! जय हो। हे पूजनीय महोदय! शकटदासक हस्तलेखमे पत्र उपस्थित। चाणक्य: कतेक सुन्दर हस्तलेख! (मनहि-मन मनन करैत) — एकर मर्म अन्तर्मनसँ स्मरण करैत पत्रपर मुद्रा लगाउ, हे भले मनुष्य! सिद्धार्थक: हे पूजनीय महोदय! जेहन आज्ञा। (मुद्रा लगाबैत) चाणक्य: हँ शार्ङ्गरव! शिष्य (प्रवेश करैत): हे पूजनीय महोदय! की आज्ञा? चाणक्य: काल-पासिककेँ हमर नामसँ कहियनु जे वृषालक ई आज्ञा थिकनि जे ओ बौद्ध-भिक्षु जीवसिद्धि, जे राक्षसक नियुक्त विषकन्याद्वारा राजा पर्वतक हत्यामे संलग्न रहल, ओकरा एहि अपराधक सार्वजनिक घोषणाक बाद राजधानीसँ अपमान सहित निर्वासित कयल जाय। शिष्य: हे पूजनीय महोदय, जेहन आज्ञा! (प्रस्थान) चाणक्य: ठहरू, हे बच्चा! ओकरा आगाँँ कहियनु जे दोसर अपराधी, लेखक शकटदास — जे सदा महाराजक विरुद्ध राजद्रोहक षड्यन्त्र रचैत रहल — ओकरासेहो सार्वजनिक घोषणाक बाद शूलपर चढ़ायल जाय आ हुनकर परिवारकेँ बन्दीगृहमे डालल जाय। शिष्य: हे पूजनीय महोदय, जेहन आज्ञा! (प्रस्थान) सिद्धार्थक: हे महोदय! मुद्रा लगाओल गेल। आगाँँ की करब? चाणक्य: वधस्थलपर सीधा जाउ आ तेवरी चढ़ा, क्रोधसँ वधिकोंकेँ एहि मूल्य भयभीत करू जे ओ सभ दिगम्बर भागि जाथि, आ तखन सिद्धार्थककेँ वधस्थलसँ उठाकय राक्षसक पाससँ लेजाउ। ओ अपन मित्रक उद्धारसँ प्रसन्न होयताह (आ अहाँकेँ पुरस्कृत करताह)। अहाँ पुरस्कार लेबी आ भविष्यमे किछु समय राक्षसक निजी सेवकक रूपमे कार्य करब। तखन शत्रु समीप आयलापर एहि उद्देश्यकेँ पूर्ण करबाक अछि। (हुनकर कानमे फुसफुसाबैत) बस, एतबे। सिद्धार्थक: हे पूजनीय महोदय! जेहन आज्ञा देलहुँ। चाणक्य (व्यग्रतापूर्वक, मनहि-मन): काश, ओ दुष्ट राक्षस पकड़ल जाइत (एतेक उपायक बाद)! सिद्धार्थक: हे महोदय! पकड़ल तँ गेला! चाणक्य (मनहि-मन, हर्षमे): अहँ! राक्षस पकड़ल गेला। सिद्धार्थक: हे महोदय! की पूजनीय महोदयक काज सफल भेल? तँ हम अपन अभियानक सफलताक हेतु जाउ? चाणक्य: जाउ, हे भले मनुष्य! आ सफलता प्राप्त करू। (शिष्यक प्रवेश, पत्र लेने आ घुरैत) शिष्य: हे पूजनीय महोदय! काल-पासिक, नगर-रक्षाक प्रमुख, पूजनीय गुरुसँ प्रार्थना करैत छथि जे ओ तुरन्त महाराज चन्द्रगुप्तक आज्ञाकेँ कार्यान्वित करथि। चाणक्य: ठीक अछि। हे बच्चा! हम चाहैत छी जे धनी रत्नकार चन्दनदास आउ। शिष्य: हे पूजनीय महोदय! जेहन आज्ञा। (जाइत आ चन्दनदासाक संग घुरैत) — हे पूजनीय महोदय! एहि ओरसँ आउ, हे धनिक पुरुष! चन्दनदास (मनहि-मन): जखन क्रूर चाणक्य बजाबैत अछि तखन एकटा निर्दोष व्यक्ति सेहो आशंकाग्रस्त भऽ जाइत अछि। तखन जे दोषी होय, ओकर कतेक अवस्था होयतनि? ताहि कारणे हम धानासेना प्रमुख तेसर बौद्ध-उपासककेँ कहलहुँ जे — "संयोगतः ओ दुष्ट चाणक्य हमर घरकेँ तलाशी करबा सकैत अछि। एहि हेतु हमर महान् मन्त्री राक्षसक परिवारकेँ हटा दिअ। हमर कारण जे भऽ सो हो।" शिष्य: आउ, हे धनिक! चन्दनदास: ठीक अछि, हे महोदय! (चाणक्यक समक्ष उपस्थित होइत) शिष्य: हे पूजनीय महोदय! एहि ठाम छथि ओ धनिक चन्दनदास। चन्दनदास: हे महोदय! अहाँक विजय हो! चाणक्य (हुनकर दिस देखैत): स्वागत, हे धनिक! एहि आसन पर बैसू। चन्दनदास (झुकि प्रणाम करैत): ई सम्मान हमरा जेकाँ लोकक हेतु अत्यधिक अछि — अपमानसँ अधिक। निश्चय अहाँ एहि बात जनैत छी, हे महोदय! एहि हेतु हम एहि भूमिपर बैसैत छी, जेना हमरा उचित अछि। चाणक्य: हे धनिक! एहन नहि कहू! हमरा जेकाँ व्यक्तिक समक्ष ई अहाँक उचित स्थान थिकनि। एहि हेतु ओहि निर्दिष्ट आसनपर बैसू। चन्दनदास (मनहि-मन): ई दुष्ट किछु कटाक्ष कऽ रहल अछि। (प्रकटतः) अहाँक आज्ञाक पालन करैत छी, हे महोदय! (इंगित आसनपर बैसैत छथि) चाणक्य: हे धनिक! आशा अछि वाणिज्यिक लेन-देनक लाभ वृद्धि भऽ रहल अछि? चन्दनदास: अहाँक कृपासँ, हे महोदय! व्यापार समृद्ध अछि। चाणक्य: की चन्द्रगुप्तक त्रुटि-विशेषण प्रजाकेँ पूर्व-राजाक उत्कृष्टताक स्मरण दिलेबैत अछि? चन्दनदास (कान ढाकि): एहन पापी विचारकेँ हम नकारैत छी! प्रजा महाराजसँ पूर्णिमाक शरत्कालीन चन्द्रमा जेकाँ अत्यन्त प्रसन्न छथि। चाणक्य: जँ एहिना अछि, तखन राजा अपन प्रसन्न प्रजासँ बदले उपकार चाहैत अछि। चन्दनदास: हे महोदय! आज्ञा करू, एहि व्यक्तिसँ की अपेक्षित अछि? चाणक्य: हे धनिक! ई चन्द्रगुप्तक शासन थिकनि, नन्दक नहि। नन्दक लोभी राजाकेँ धन-दान प्रसन्न करैत छल, मुदा चन्द्रगुप्तकेँ केवल कठोरतासँ विरति प्रसन्न करैत अछि। चन्दनदास: हे महोदय, एहि हेतु हम अहाँक आभारी छी। चाणक्य: आ अहाँ हमरासँ पूछब जे कठोरतासँ विरतिक माध्यम कोन थिकनि? चन्दनदास: हे महोदय! हम निर्देश पाबऽ चाहैत छी। चाणक्य: संक्षेपमे कहल जाय — स्वामिभक्तिसँ। चन्दनदास: हे महोदय! राजाक प्रति कोन दुर्भाग्यपूर्ण व्यक्ति स्वयंकेँ स्वामिद्रोही मानत? चाणक्य: अहाँ स्वयं, पहिलसँ शुरू करू। चन्दनदास (कान ढाकि): एहन पापी विचारकेँ नकारैत छी! आ भूसा आगि-सँ कि लड़ि सकैत अछि? चाणक्य: देखू ई थिकनि। अहाँ राजाक शत्रु राक्षसक परिवारकेँ आश्रय दैत छी। चन्दनदास: ई असत्य थिकनि, हे महोदय! कोनो दुष्ट व्यक्ति अहाँसँ एहि बात कहलनि। चाणक्य: हे धनिक! चिन्ता नहि करू। पूर्व-राजाक अधिकारी लोकनि आतंकमे दोसर देशमे भागि जाइत छथि, अपन परिवारकेँ नागरिकक घरमे पहिलहिँ पूछने छोड़ैत छथि। ई केवल तथ्य छुपेबाक बात थिकनि — ओहि छुपाबहिसँ ई अपराध बनैत अछि। चन्दनदास: हे महोदय, जे कहलहुँ सैह सत्य अछि। आतंकमे मन्त्री राक्षसक परिवार हमर घरमे रहल। चाणक्य: आ अखन ओ कतऽ अछि? चन्दनदास: हम नहि जनैत छी। चाणक्य (मुस्कियाइत): हँ, हँ! अहाँ नहि जनैत छी — एहना नाटक करैत छी। हे धनिक! खतरा सोझाँ अछि आ उपाय दूर। आ की अहाँ नहि सोचैत छी जे मन्त्री राक्षस ओहिना चन्द्रगुप्तकेँ उखाड़ि देत जेना विष्णुगुप्त नन्दकेँ उखाड़लखिन? (क्षण-भरि संकोचसँ झुकि, फेर शुरू करैत) — देखू। जखन नन्द आ हुनकर परिवार जीवित रहला, राज्य-सत्ता सदा अस्थिर छल, आ वाक्रनास आ अन्य सम्मानित मन्त्री — वीरता आ कूटनीतिज्ञतासँ सम्पन्न — एकरा स्थिर नहि कय सकला। आब ई चन्द्रगुप्तमे स्थिर अछि, जेना चन्द्रमामे आलोकित चाँदनी सभकेँ आनन्द दैत अछि। एकरा हुनकासँ अथवा चाँदनीकेँ चन्द्रमासँ अलग करबाक साहस के करत? तदुपरि — ओ सिंहसँ लड़बाक आ हँफोड़ीक क्रियामे पूर्ण खुलल मुँहसँ रक्तिम हाथी-रक्तसँ रञ्जित एवं सन्ध्याक लालिमामे चमकैत अर्धचन्द्र जेकाँ चमकैत दाँतकेँ निकालबाक साहस के करत? चन्दनदास (मनहि-मन): यथोक्ति प्रमाणित — ई डींग उचित लगैत अछि। (पर्दाक पाछाँसँ "बाट छोड़ू"क आवाज) चाणक्य: हँ शार्ङ्गरव! देखू की बात अछि। शिष्य: हे पूजनीय महोदय, जेहन आज्ञा। (जाइत आ घुरैत) — हे पूजनीय महोदय! ओ राजद्रोही बौद्ध-भिक्षु जीवदसिद्धि — जे महाराज चन्द्रगुप्तक आज्ञासँ अपमान सहित निर्वासित कयल जा रहल अछि। चाणक्य: एकटा बौद्ध-भिक्षु? बड्ड दया लगैत अछि! तैयो ओकरा राजद्रोहक परिणाम भोगबाक पड़त। हे धनिक! राजा, जे एहि प्रकार कठोरतासँ राजद्रोहियोकेँ दण्ड दैत अछि, ओ एहन व्यक्तिपर जे राक्षसक परिवारकेँ आश्रय दैत अछि, कोनो दया नहि देखायत। एहि हेतु अपन पत्नी बचाउ आ दोसराक पत्नी छोड़बाकय अपन जीवन बचाउ। चन्दनदास: हे महोदय! हम अहाँकेँ विनम्रतापूर्वक कहैत छी जे आतंकमे मन्त्री राक्षसक परिवार हमर घरमे रहल। चाणक्य: आ ओ अखन कतऽ अछि? चन्दनदास: हम नहि जनैत छी। चाणक्य (मुस्कियाइत): हँ, हँ! तखन ओकरा राक्षसक परिवार मानिकेँ हमर हाथमे सौंपू आ अपनाकेँ दोषमुक्त करू। चन्दनदास: हे महोदय! अहाँक समक्ष विनम्रतापूर्वक कहैत छी — मन्त्री राक्षसक परिवार हमर घरमे नहि अछि। (पर्दाक पाछाँसँ "बाट छोड़ू"क आवाज फेर) चाणक्य: हँ शार्ङ्गरव! आब की अछि? शिष्य: हे पूजनीय महोदय, जाइत आ घुरैत — दोसर राजद्रोही, लेखक शकटदास, जे शूलदण्ड हेतु वधस्थलपर लयल जाइत अछि। चाणक्य: ओकरा अपन कर्मक फल भोगबाक पड़त। हे धनिक! जे राजा एहि प्रकार कठोरतासँ राजद्रोहियोकेँ दण्ड दैत अछि, ओ राक्षसक परिवारकेँ आश्रय देनिहारपर कोनो दया नहि देखायत। एहि हेतु दोसराक पत्नी छोड़िकेँ अपन पत्नी आ जीवन बचाउ। चन्दनदास: हे महोदय! अहाँ व्यर्थहिँ हमरा भयभीत करबाक प्रयास करैत छी। हम मन्त्री राक्षसक परिवारकेँ तखनहुँ नहि छोड़ब जखन ओ हमरा पाससँ छथि। ओ छथि वा नहि — एकरासँ की अन्तर पड़ैत अछि? चाणक्य: तखन अहाँ मनस्थिर कय लेलहुँ? चन्दनदास: हँ, लय लेलहुँ। चाणक्य (मनहि-मन): शाबाश चन्दनदास! अहाँ सभ प्रशंसाक योग्य छी। वर्तमान युगमे एहि कार्यकेँ करब, जे केवल शिबिक मामलामे संभव छल — दोसर लोकक विश्वासघातसँ सरलतासँ लाभ उठाबाक बावजूद। (क्रोधसँ, प्रकटतः) — हे धनिक! अहाँ मनस्थिर कय लेलहुँ? तखन हे दुष्ट व्यापारी! राज-कोपक भार वहन करबाक तैयार रहू। चन्दनदास: हम तैयार छी। हे महोदय, अपन उच्च पदक अधिकारसँ जे करबाक हो, करू। चाणक्य: हँ शार्ङ्गरव! विजयपालाकेँ (दुर्ग-पालकेँ) कहियनु जे एहि दुष्ट व्यापारीकेँ तुरन्त — नहि, एहिना नहि — एहि ओरसँ हौजकेँ ओकर सम्पत्ति जब्त करबाक, ओकरा जंजीरमे बान्हबाक आ हुनकर पत्नी आ पुत्रक संग बन्दीगृहमे रखबाक आज्ञा दिअ — यावत हम वृषालकेँ प्रतिवेदन नहि करैत छी, जे स्वयं ओकरा मृत्युदण्ड देताह। शिष्य: हे पूजनीय महोदय, जेहन आज्ञा! आउ, हे धनिक! चन्दनदास (आसनसँ उठैत): आयल, हे भले महोदय! (मनहि-मन) — हम प्रसन्न छी जे मित्रक कारणे मरैत छी आ मानवीय दोषक कारणे नहि। (शार्ङ्गरव आ चन्दनदास प्रस्थान करैत छथि) चाणक्य (आनन्दसँ): हँ! राक्षस अखन सुरक्षित अछि। ई रत्नकार जेहन बेपरवाहीसँ अपन जीवनकेँ संकटमे डालि रहल अछि, ओ निश्चय ओही प्रकार रत्नकारक कठिनाईक दिनमे अपन जीवनकेँ बेपरवाह नहि छोड़त। (पर्दाक पाछाँसँ कोलाहल) शिष्य (उतावलीसँ प्रवेश करैत): हे पूजनीय महोदय! ओहि सिद्धार्थक भागि गेल — शकटदासाकेँ वधस्थलसँ लेजाइत, जखन ओ शूल-दण्ड देबाय लेल तैयार छल। चाणक्य (मनहि-मन): शाबाश, सिद्धार्थक! शुभारम्भ भेल। (प्रकटतः) की? भागल? हे बच्चा! भागुरायणकेँ कहियनु जे ओकरा तत्काल पकड़थि। शिष्य (जाइत आ घुरैत): हे पूजनीय महोदय! भागुरायण सेहो प्रस्थान कय चुकला। चाणक्य (मनहि-मन): भले जाय, सफल होउ। (प्रकटतः) हे बच्चा! भद्रभट, पुरुदत्त, दिंगरात, बालगुप्त, राजसेन, रोहिताक्ष आ विजयवर्मनकेँ कहियनु जे दुनूकेँ खोजि पकड़ि लेथि। शिष्य: ठीक अछि। (जाइत आ व्याकुलतापूर्वक घुरैत) — हे पूजनीय महोदय! विपत्तिमे पड़ि गेल! सम्पूर्ण प्रशासनिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न भऽ गेल। की दुर्दशा! भद्रभट आ हुनकर अनुयायी गेल! ओ सभ दिन उगेसँ पहिने निकलि चुकला। चाणक्य (मनहि-मन): भले जाथि! (प्रकटतः) हे बच्चा! मनस्तापक आवश्यकता नहि (एहिसँ किछु अन्तर नहि पड़ैत अछि)। जे लोक श्रेष्ठ कारणसँ अपना जाना-बूझाकेँ प्रस्थान कय गेला, ओ गेल। जे बचल छथि, ओहो हमर इच्छानुसार मन्त्रणासँ प्रस्थान करथि। केवल हमर प्रतिभा हमरा नहि छोड़थि। राजनीतिक उद्देश्यक सिद्धिमे ई एकल क्षमता सैकड़ो सेनाक बराबर थिकनि। एकर शक्तिक महत्त्व नन्दक विनाशसँ पर्याप्त रूपमे प्रमाणित भेल अछि। (आसनसँ उठैत) — आब हम व्यवस्था करैत भद्रभट आ हुनकर अनुयायी सभकेँ घुरेबाक हेतु जाइत छी। (हवामे दृष्टि लगाबैत, मनहि-मन) — ओ दुष्टसंकल्प राक्षस! आब अहाँ कतऽ जायब? हम अहाँकेँ अपन प्रतिभासँ वशीभूत करैत चन्द्रगुप्तक सेवामे नियुक्त करब — अहाँ जे स्वयंमेव व्यक्तिगत पराक्रमक अभिमानसँ फूलल, स्वेच्छाचारी आ उद्दण्ड, विपुल उपहारसँ मनुष्यकेँ आकर्षित करबाक साधन-सम्पन्न थिकहुँ — ठीक ओहिना जेना एकटा व्यक्ति अपन प्रतिभासँ एकटा जंगली हाथीकेँ — जे स्वयं एकाकी विचरैत, व्यक्तिगत शक्तिक अभिमानसँ फूलल, स्वेच्छाचारी आ उद्दण्ड, विपुल मद-स्रावसँ मधुमक्खीकेँ आकर्षित करबामे समर्थ हो — वश कय सेवामे लगा लैत अछि। (सभ प्रस्थान) द्वितीय अंक [दृश्य: एकटा साँप खेलावेबला (ऐंद्रजालिक) हाथमे पिटारी लेने रंगमंच पर प्रवेश करैत अछि] साँप खेलावेबला: जे लोक अपन मन्त्रक गोपनीयताक रक्षाक प्रति सदा सजग रहैत छथि, जे विष-नाशक जड़ी-बूटीक प्रयोग जनैत छथि, आ जे जादूई घेरा (मण्डल) केँ ठीकसँ देखैत छथि, वैह लोक साँपक संग व्यवहार कऽ सकैत छथि। ठीक तहिना, जे लोक राजनीतिक योजनाक गोपनीयताक रक्षाक प्रति सदा सजग रहैत छथि, आंतरिक नीतिक विज्ञान जनैत छथि, आ मित्र, शत्रु तथा उदासीन राजा सभक क्षेत्र (मण्डल) केँ ठीकसँ बुझैत छथि, वैह लोक राजा सभक संग व्यवहार करैत छथि। (ऊपर देखिकऽ) अहाँ की कहि रहल छी, महाशय? अहाँ हमर परिचय पूछि रहल छी? महाशय, हम एकटा साँप खेलावेबला छी, हमर नाम जीर्णविष अछि। अहाँ आगाँँ की कहैत छी? अहाँ साँपक खेल देखबाक इच्छा रखैत छी? ठीक महाशय, अहाँक पेशा की अछि? अहाँ राजाक घरक अधिकारी छी? तखन तँ महाशय, अहाँ वास्तवमे साँपक संगहि व्यवहार कऽ रहल छी। कारण, सफलताक मदमे चूर राजाक घरक अधिकारी, मदिरासँ उन्मत्त महावत, आ मन्त्र तथा जड़ी-बूटीसँ अनभिज्ञ साँप खेलावेबला— ई तीनू एकहि जेकाँ नष्ट भऽ जाइत छथि। की! बजलो नहि कि ओ चलि गेलाह। (पुनः ऊपर देखिकऽ) अहाँ की कहि रहल छी, महाशय? अहाँ पूछि रहल छी कि एहि बाँसक पिटारी सभमे की अछि? एहिमे साँप सभ छथि, जे हमर जीविकाक साधन छथि। अहाँ आगाँँ की कहैत छी? अहाँ साँपक खेल देखबाक इच्छा रखैत छी। महाशय, ई ओकर उचित स्थान नहि अछि, हमरा क्षमा करू। जँ अहाँक कौतूहल अछि, तँ आउ, हम ओहि आगाँँवला घरमे खेल देखायब। अहाँ की कहि रहल छी? ओ महाप्रतापी मन्त्री राक्षसक निवास स्थान अछि? हमरा सभ जेकाँ लोकक ओतय कोनो पहुँच नहि अछि? तखन अहाँ अपन बाट पकड़ू, महाशय! हमर ई पेशा हमरा ओतय पहुँचक सौभाग्य दैत अछि। ओह! ओ चलि गेलाह। (अपन मनमे) ई कतेक आश्चर्यजनक अछि! जखन हम चाणक्यक बुद्धिसँ निर्देशित चन्द्रगुप्तकेँ देखैत छी, तँ हमरा राक्षसक प्रयास सभ निष्फल बुझाइत अछि; आ जखन हम राक्षसक बुद्धिसँ निर्देशित मलयकेतुकेँ देखैत छी, तँ हमरा चन्द्रगुप्त राजसिंहासनसँ वंचित बुझाइत अछि। कारण:— कौटिल्यक बुद्धिरूपी रस्सीसँ बान्हल मौर्य राजाक साम्राज्य हमरा अटल बुझाइत अछि; मुदा वैह समय हम देखि रहल छी कि राक्षस अपन कूटनीतिक कौशलक बलसँ एकरा छीन कऽ रहल छथि। एहि प्रकार, एहि दुनू प्रतिभाशाली आ श्रेष्ठ मन्त्री सभक संघर्षमे राजलक्ष्मी दुविधाक स्थितिमे बुझाइत छथि। एहि भूमि पर ई भयभीत लक्ष्मी कखनो एक मन्त्रीक दिस जाइत छथि तँ कखनो अनिश्चिततामे दोसरकेँ छोड़ि दैत छथि। ओ ओनाहि व्याकुल छथि, जेना कोनो बड़का जंगलमे दुनू लड़ैत जंगली हाथीक बीच एकटा डरायल हथनी व्याकुल रहैत अछि। आब हम जाकऽ महाराज राक्षससँ भेट करब। [ओ आगाँँ बढ़ि कऽ दुआरि पर प्रतीक्षा करैत अछि। तखन राक्षसक प्रवेश होइत अछि, जे चिन्तित मुद्रामे बैसल छथि आ एकटा सेवक ओकर सेवामे ठाढ़ अछि] राक्षस (एकटा दीर्घ श्वास छोड़िकऽ)— अहा! कतेक कष्टक बात अछि! दिन-राति जागल रहि कऽ, पूर्णतः आ व्याकुलतासँ राज्यक विषयमे चिन्तन करैत हम ई योजना सोचलहुँ अछि; मुदा एकरा चित्रित करबाक लेल कोनो कैनवास (भित्ति) नहि बचल अछि, कारण क्रूर भाग्य नन्दक विशाल वंशकेँ यादव वंश जेकाँ नष्ट कऽ देलक अछि। ओ नन्द, जे यादव सभक जेकाँ अपन पराक्रम आ कूटनीतिक बलसँ शत्रु सभक शमन केने छलाह। नहि, नहि, हमरा एहन नहि कहबाक चाही — हम अपन मन राजनीतिमे पूर्ण रूपसँ आ एकाग्रतासँ लगा कऽ रखने छी; एकटा अपरिचितक दासता स्वीकार कयने छी मुदा अपन स्वामिभक्ति कखनो नहि बिसरलहुँ अछि; हम सांसारिक सुखक भोगमे अपनाकेँ नष्ट नहि कऽ रहल छी; नहि हमरा अपन प्राणक मोह अछि आ नहि कोनो व्यक्तिगत महानताक इच्छा। ई सभ केवल एहि लेल अछि कि हमर स्वामी परलोक गेलाक बादो अपन शत्रुकेँ मृत देखिकऽ सन्तुष्ट भऽ सकथि। (शून्यमे देखिकऽ) हे राजलक्ष्मी! अहाँक भीतर कोनो गुणक मूल्य नहि अछि, कतबो नहि। अन्यथा, अहाँ ओहि नीच कुलमे जनमल मौर्यपुत्र चन्द्रगुप्तसँ किएक जुड़ि गेलहुँ, राजा नन्दकेँ छोड़िकऽ, जे सभक प्रिय छलाह? अहाँ ओकरा संगहि किएक नहि नष्ट भऽ गेलहुँ, जेना मदक धारा सुगन्धित हाथीक संगहि समाप्त भऽ जाइत अछि? हमरा कहू। आ, हे कुलटा! की पृथ्वी पर उच्च कुलमे जनमल राजा सभ समाप्त भऽ गेलाह, जे अहाँ एहि आधारहीन आ दुष्ट मौर्यकेँ अपन पति चुनब उचित बुझलहुँ? सम्भवतः स्त्रीक बुद्धि, जे स्वभावसँ कासक फूलक अग्रभाग जेकाँ चंचल होइत अछि, पुरुषक गुण सभकेँ पहिचानब नहि जनैत अछि। तेँ, हम ओहि व्यक्तिकेँ मारि देब जकरासँ अहाँ जुड़ल छी, आ अहाँक एहि कामुकताकेँ समाप्त कऽ देब। (सोचैत) एहि अनुसार, हम पहिल सही कदम ई उठेलहुँ कि जखन हम पाटलिपुत्र छोड़लहुँ तँ अपन परिवारकेँ अपन परम मित्र चन्दनदासक घरमे राखि देलहुँ। कारण, पाटलिपुत्रमे नन्द राजाक जे समर्थक हमरा संग एहि कार्यमे सहयोग कऽ रहल छथि, ओ एहि आश्वासनक कारण अपन प्रयासमे शिथिल नहि होयताह कि हम पाटलिपुत्र पर आक्रमणक विषयमे उदासीन नहि छी। हम शकटदासकेँ पर्याप्त धन दे कऽ ओतय रखने छी जाहिसँ चन्द्रगुप्तक हत्याक लेल लगायल शिकारी, विषकन्या आ दोसर गुप्तचर सभक निष्ठा बनल रहय आ शत्रु पक्षक असन्तुष्ट लोक सभकेँ अपन दिस कऽ सकब। एकर अतिरिक्त, हम जीवसिद्धि आ दोसर मित्र सभकेँ शत्रुक प्रतिपलक सूचना एकत्र करबाक लेल आ ओकर गठबन्धनकेँ तोड़बाक लेल नियुक्त केने छी। संक्षेपमे— हम बहुत जल्द अपन बुद्धिरूपी बाणसँ ओकर मर्मस्थलकेँ बेधि देब, जकरा द्वारा (जेना कोनो बाघक बच्चाकेँ दुलारसँ पोसबाक बाद ओ अपन रक्षककेँ मारि दैत अछि) अपन सन्तान जेकाँ स्नेह करबला राजा नन्द आ ओकर सम्पूर्ण वंश नष्ट भऽ गेल; जँ असहनशील भाग्य कवच बनि कऽ ओकर रक्षा नहि करय। [तखन मलयकेतुक कंचुकी (जजालि) प्रवेश करैत अछि] कंचुकी: वृद्धावस्था हमर वासनाकेँ शान्त कऽ देलक अछि आ धीरे-धीरे हमरा भीतर भक्ति जगा देलक अछि; ठीक ओनाहि, जेना चाणक्यक नीति राजा नन्दकेँ कुचलि कऽ चन्द्रगुप्तकेँ पाटलिपुत्रमे स्थापित कऽ देलक अछि। ओ मौर्य राजाक जेकाँ शक्तिमे बढ़ि रहल अछि। मुदा, लोभ निरन्तर भक्तिकेँ उखाड़बाक प्रयास करैत अछि, जेना राक्षस चन्द्रगुप्तकेँ उखाड़बाक प्रयास कऽ रहल छथि; कारण सेवा अवसर तँ दैत अछि, मुदा सदा सफलता नहि दैत अछि। (आगाँँ बढ़ैत) ई रहलाह मन्त्री राक्षस। (ओकरा लग जाकऽ) अहाँक कल्याण हो। राक्षस: आदरणीय जजालि! हम अहाँकेँ प्रणाम करैत छी। प्रियंवदक, आदरणीय अधिकारीक लेल एकटा आसन राखू। प्रियंवदक: ई रहल आसन। कृपया विराजमान होऊ, आदरणीय महाशय! कंचुकी (आसन ग्रहण करैत): महाराज कुमार मलयकेतु मन्त्रीसँ बड़ विनम्रतापूर्वक कहैत छथि: 'हमर हृदय बड़ दुखी अछि कि अहाँ बहुत समयसँ अपन पदक अनुकूल आभूषण धारण करब छोड़ि देने छी। पूज्य नन्दक श्रेष्ठ गुण सभक स्मृतिकेँ बिसरब कतबो सहज नहि अछि। तैयो, अहाँक लेल हमर ई आग्रह स्वीकार करब उचित होयत।' (एकटा आभूषण देखबैत) 'आ ई आभूषण धारण करू, जकरा हम अपन शरीरसँ उतारि कऽ अहाँक लेल पठायल अछि।' राक्षस: आदरणीय जजालि! कुमारकेँ हमर दिससँ आदरपूर्वक कहियनु कि हमर दिवंगत स्वामीक श्रेष्ठ गुणक स्मृति तँ कुमारक अनुपम गुणक प्रभावसँ पहिनहि हमर मनसँ (ओकर आदरक कारण) एकाकार भऽ गेल अछि। मुदा:— जँ धरि शत्रु सभक पूर्ण विनाश नहि भऽ जाइत अछि आ पृथ्वीक श्रेष्ठ पुरुष कुमारक स्वर्ण सिंहासन सुगाङ्ग महलमे स्थापित नहि भऽ जाइत अछि, हम एहि शरीर पर कोनो आभूषण धारण नहि करब, जकरा शत्रु सभक हाथसँ अपमान सहय पड़ल अछि। कंचुकी: मन्त्रीक कुशल नेतृत्वमे कुमारकेँ सभ किछु सहजतासँ प्राप्त भऽ जाइत बुझाइत अछि। तेँ, कुमारक एहि प्रथम आग्रहकेँ स्वीकार करू। राक्षस: आदरणीय महाशय! अहाँक शब्द कुमारक आज्ञा जँकाँहि अनुलङ्घनीय अछि। तेँ हमरा कुमारक आज्ञाक पालन करबहि पड़त। कंचुकी (राक्षसकेँ आभूषणसँ सुसज्जित करैत)— ईश्वर अहाँक कल्याण करथि। आब हम प्रस्थान करैत छी। राक्षस: हम अहाँकेँ प्रणाम करैत छी, आदरणीय जजालि! [कंचुकीक प्रस्थान] राक्षस: प्रियंवदक, देखू तँ दुआरि पर कोनो व्यक्ति हमरासँ भेट करबाक लेल ठाढ़ अछि की? प्रियंवदक: हम देखैत छी। (दुआरि लग जाकऽ आ साँप खेलावेबलाकेँ देखिकऽ) ठीक भाइ, अहाँ के छी? साँप खेलावेबला: भद्र पुरुष! हम एकटा साँप खेलावेबला छी। हम मन्त्रीक सोझाँ साँपक खेल प्रदर्शित करबाक इच्छा रखैत छी। प्रियंवदक: प्रतीक्षा करू, जँ धरि हम मन्त्रीकेँ सूचित नहि कऽ दी। (राक्षस लग घुरि जाकऽ) आदरणीय महाराज, एकटा साँप खेलावेबला अहाँक सोझाँ साँपक खेल देखबाक इच्छा लऽ कऽ आयल अछि। राक्षस (अपन बामा आँखिकेँ फड़कैत देखिकऽ, अपन मनमे)— ओह! साँपक ई अशुभ दर्शन। (बजबाक स्वरमे) प्रियंवदक, हमरा साँपक खेल देखबाक कोनो इच्छा नहि अछि। तेँ ओकरा किछु दऽ कऽ सन्तुष्ट करू आ विदा करू। प्रियंवदक: हम अहाँक आज्ञाक पालन करैत छी। (साँप खेलावेबला लग जाकऽ) भाइ! मन्त्री अहाँकेँ साक्षात्कारक तँ नहि, मुदा साक्षात्कारक फलक गौरव प्रदान कऽ रहल छथि। साँप खेलावेबला: भद्र पुरुष! मन्त्रीकेँ हमर दिससँ आदरपूर्वक कहियनु कि हम केवल एकटा साँप खेलावेबला नहि छी, एकटा प्राकृत कवि सेहो छी। तेँ जँ मन्त्री साक्षात्कारक अवसर नहि दऽ सकैत छथि, तँ ओ एहि पत्र (लीफलेट) केँ पढ़बक कृपा करथि। प्रियंवदक (पत्र लऽ कऽ राक्षस लग घुरि जाइत अछि)— आदरणीय महाराज! ओ साँप खेलावेबला आदरपूर्वक कहि रहल अछि कि ओ केवल साँप खेलावेबला नहि, प्राकृत कवि सेहो अछि। तेँ जँ अहाँ ओकरासँ भेट नहि कऽ सकैत छी, तँ कृपया एहि पत्रकेँ पढ़ू। राक्षस (पत्र लैत छथि आ पढ़ैत छथि)— 'मधुमक्खी जे मधु फूलक रस पूर्ण रूपसँ चूसि कऽ अपन कुशलतासँ जमा करैत अछि, ओ दोसरेक काज आबैत अछि।' (किछु क्षणक सोचक बाद, अपन मनमे) आहा! एहि श्लोकक अर्थ ई अछि कि कुसुमपुर (फूलक नगर पाटलिपुत्र) सँ समाचार लऽ कऽ हमर गुप्तचर आयल अछि। हमर मन राजनीतिक योजना सभमे एतेक उलझल अछि आ गुप्तचर सभक संख्या एतेक बेसी अछि कि हम विसरि गेल छलहुँ, मुदा आब ओकरा पहिचानि गेलहुँ। ओ निश्चयहि साँप खेलावेबलाक भेषमे विराधगुप्त अछि। (बजबाक स्वरमे) प्रियंवदक, ओकरा भीतर आब दियौक। ओ एकटा महान कवि अछि। हमरा ओकर सुन्दर श्लोक सभ सुनबाक चाही। प्रियंवदक: हम आज्ञाक पालन करैत छी। (साँप खेलावेबला लग जाकऽ) भीतर आउ, महाशय! साँप खेलावेबला (आगाँँ बढ़ैत आ ध्यानसँ देखैत, अपन मनमे)— ई रहलाह महाराज राक्षस— राक्षसक गतिविधिसँ आशंकित भऽ कऽ, राजलक्ष्मी चन्द्रगुप्तक छाती पर अपन दक्षिण वक्षकेँ एहन जेकाँ स्थापित नहि कऽ पाबि रहल छथि जे गाढ़ आलिङ्गनक सुख दऽ सकय, जेना ओ अपन बामा बाहु चन्द्रगुप्तक गर्दनमे तँ लपेटने छथि मुदा दक्षिण बाहु डरे बार-बार कान्हसँ खसि कऽ जांघ पर आबि जाइत अछि। (लग जाकऽ) महाराजक विजय हो! राक्षस (ओकरा देखिकऽ): ओ विराध— (अपनाकेँ बीचहिमे रोकैत, किछु स्मरण करैत) प्रियंवदक, हम आब साँपक खेल देखब। तेँ सेवक लोकनि आब जा सकैत छथि। अहाँ सभ अपन-अपन काज देखू। प्रियंवदक: हम अहाँक आज्ञाक पालन करैत छी। [सेवक सभक संग प्रियंवदकक प्रस्थान] राक्षस: प्रिय विराधगुप्त! एहि आसन पर बैसू। विराधगुप्त: हम अहाँक आज्ञाक पालन करैत छी। (ओ बैस जाइत अछि) राक्षस (ओकरा ध्यानसँ देखैत, एकटा दीर्घ श्वास छोड़िकऽ)— अहा! हमर दिवंगत स्वामीक सेवक सभक ई स्थिति भऽ गेल अछि। विराधगुप्त: एहि विलापकेँ छोड़ू महाराज। अहाँ बहुत जल्द हमरा सभकेँ हमर प्राचीन गौरव आ वैभव पर घुरि पहुँचाएब। राक्षस: आब मित्र, हमरा कुसुमपुरक सम्पूर्ण वृत्तान्त विस्तारसँ सुनाउ। विराधगुप्त: महाराज, कुसुमपुरक कथा बड़ लम्बा अछि। हम कतयसँ आरम्भ करू? राक्षस: मित्र, हम अपन ओहि शिकारी, विषकन्या आ दोसर गुप्तचर सभक कारनामा सुनबाक इच्छा रखैत छी, जकर आरम्भ चन्द्रगुप्तक नन्दक महलमे प्रवेशक समयसँ भेल छल। विराधगुप्त: तँ हम ओकर वर्णन करैत छी। चन्द्रगुप्त आ पर्वतेश्वरक सेना, जे शक, यवन, किरात, कम्बोज, पारसीक, बाह्लीक आ दोसर जाति सभसँ मिलि कऽ बनल छल आ चाणक्यक कूटनीतिसँ संचालित छल— प्रलयकालक उफनत समुद्र जेकाँ देखायबला ओहि सेना कुसुमपुरकेँ चारिहू दिससँ घेरि लेलक। राक्षस (एकाएक अपन तरुआरि खिंचि कऽ)— आहा! ककर ई दुस्साहस कि हमर जीवैत रहैत कुसुमपुरकेँ घेरि लेलक? विराधगुप्त! धनुर्धारी लोकनि देबालक चारिहू दिस माटिक किलाक दिशामे मुस्तैद रहथि, शत्रुक हाथी सभक व्यूहकेँ तोड़बामे सक्षम बलवान हाथी सभकेँ दुआरि पर तैनात कयल जाय, आ जे लोक शत्रुक कमजोर सेना पर प्रहार करबाक इच्छा रखैत छथि आ कीर्तिक आकांक्षा रखैत छथि, ओ मृत्युसँ निडर भऽ कऽ हमरा संग आगाँँ बढ़थि। विराधगुप्त: महाराज अपन क्रोधक एहि वेगकेँ शान्त करू। हम भूतकालक वर्णन कऽ रहल छी। राक्षस (एकटा दीर्घ श्वास छोड़िकऽ)— ओह! ई भूतकालक बात अछि! हमरा बुझल कि ई वर्तमानमे भऽ रहल अछि। [आँखिमे लोर लऽ कऽ तरुआरिकेँ नीचाँ रखैत छथि] महाराज सर्वार्थसिद्धि राक्षस अहाँक एहि महान कृपाकेँ मोन रखैत छथि आ ई ओकरा उदास करैत अछि। अहाँक ओहि प्रगाढ़ आदरक कारण अहाँ राक्षसकेँ अपन कल्पनामे हजार गुणा बढ़ा देने छलहुँ आ ओहि आदरक वशीभूत भऽ कऽ अहाँ युद्धभूमिमे हमरा, जे ओहि समय नगरमे छलहुँ, बार-बार आज्ञा दऽ रहल छलहुँ:— "राक्षस ओहि स्थान दिस तीव्र गतिसँ बढ़थि जतय वर्षाक बादल जेकाँ कारू हाथी सभक ई झुण्ड प्रहार कऽ रहल अछि! राक्षस घोड़ा सभक एहि लहर जेकाँ उमड़ैत झुण्डक आक्रमणकेँ रोकि कऽ नष्ट करथि! राक्षस पैदल सैनिक सभक ओहि टुकड़ीकेँ तुरन्त समाप्त करथि!" विराधगुप्त: महाराज सर्वार्थसिद्धि एकरा देखि रहल छलाह। ओ नागरिक सभकेँ प्रतिदन घेराबन्दीक भयानक कष्ट सहैत नहि देखि सकलाह। एहि परिस्थितिमे, ओ भूगर्भ मार्गसँ निकसि कऽ नागरिक सभक कल्याणक लेल तपस्याक वनमे चलि गेलाह। महाराजक अनुपस्थितिमे, अहाँक सेनाक उत्साह ढीला भऽ गेल, तखन अहाँ नन्दक सत्ताक पुनर्स्थापनाक उद्देश्यसँ ओहि सुरङ्ग मार्गसँ नगर छोड़ि देलहुँ, मुदा ओकरासँ पहिनहि चन्द्रगुप्तक विजयक उद्घोषणाकेँ रोकि कऽ नागरिक सभक निष्ठाक परीक्षा कऽ लेलहुँ। तकर बाद बेचारा पर्वतक ओहि विषकन्याक हाथसँ मृत भऽ गेलाह, जकरा अहाँ चन्द्रगुप्तकेँ मारबाक लेल रखने छलहुँ। राक्षस: मित्र, भाग्यक खेल देखू! ओ भयानक विषकन्या, जे केवल एकटा शिकार लऽ सकैत छल आ जकरा हम चन्द्रगुप्तकेँ मारबाक लेल रखने छलहुँ, ओ पर्वतेश्वर लग पहुँचि कऽ ओकरा मारि देलक, जकरा दुष्ट विष्णुगुप्त मारबाक इच्छा रखैत छलाह। ई ठीक ओनाहि भेल, जेना ओ भयानक आ अमोघ शक्ति अस्त्र, जे कर्ण केवल अर्जुनकेँ मारबाक लेल रखने छलाह, ओ घटोत्कच लग पहुँचि कऽ ओकरा मारि देलक, जकरा कृष्ण मारबाक इच्छा रखैत छलाह आ ओकरासँ ओ बड़ प्रसन्न भेल छलाह। विराधगुप्त: ई भाग्यक एकटा क्रूर उपहास छल। एहिमे मन्त्री की कऽ सकैत छलाह? राक्षस: आगाँँ कहू। विराधगुप्त: अपन पिताक हत्यासँ भयभीत भऽ कऽ, कुमार मलयकेतु ओतयसँ भागि गेलाह। तखन पर्वतेश्वरक भाइ वैरोधाककेँ चाणक्य द्वारा विश्वासमे लऽ कऽ आश्वस्त कयल गेल। आ नन्दक महलमे चन्द्रगुप्तक प्रवेशक सार्वजनिक घोषणा कयल गेल। चाणक्य ओहि दिन कुसुमपुरक सभ बढ़ई सभकेँ बोला कऽ ई आज्ञा देलखिन:— 'आज ज्योतिषी लोकनि द्वारा निर्धारित शुभ मुहूर्तमे नन्दक महलमे चन्द्रगुप्तक प्रवेश होयत। तेँ, अहाँ सभ मुख्य प्रवेश दुआरिसँ आरम्भ कऽ कऽ सम्पूर्ण राजभवनकेँ सुसज्जित करू।' तखन बढ़ई सभ आदरपूर्वक कहलखिन कि महाराज चन्द्रगुप्तक महल प्रवेशक कल्पना कऽ कऽ बढ़ई दारुवर्मा पहिनहिसँ मुख्य दुआरि पर स्वर्ण तोरण आ दोसर भव्य सजावट कऽ देने छथि, केवल भीतरक भाग सँजाएब बाकी अछि। तखन ओहि दुष्ट चाणक्य दारुवर्माक बुद्धिक बड़ प्रशंसा केलक आ बिना कहले राजभवन सँजएबाक लेल प्रसन्नता व्यक्त करैत कहलक कि ओकरा एकर पुरस्कार बहुत जल्द भेटत। राक्षस (चिन्ताक संग): ओह, ओहि दुष्ट चाणक्यक प्रसन्नताक बात नहि करू। अत्यधिक स्वामिभक्ति आ कोनो मूर्खतापूर्ण भूलक कारण दारुवर्मा ओकर मनमे कड़ा सन्देह पैदा कऽ देलक होयत, जेकरासँ चन्द्रगुप्तक प्राण लेबाक ओकर प्रयास असफल भऽ गेल होयत। विराधगुप्त: तकर बाद आधी रातक ओहि शुभ मुहूर्तमे ओहि पापी चाणक्य पर्वतेश्वरक भाइ वैरोधाककेँ चन्द्रगुप्तक संगहि एकहि सिंहासन पर बैठा देलक आ साम्राज्यकेँ दुनूमे आधा-आधा बाँटि देलक। राक्षस: अहाँ की कहि रहल छी? की ओ वास्तवमे पर्वतेश्वरक भाइ वैरोधाककेँ आधा साम्राज्य दऽ देलक, जेकर प्रतिज्ञा ओ पहिनहि केने छल? विराधगुप्त: हँ, ओ देलक। राक्षस (अपन मनमे): निश्चयहि, ओ बड़ धूर्त चाणक्य पर्वतेश्वरक हत्याक कलङ्ककेँ धोबाक लेल ई सार्वजनिक नाटक केने होयत, आ ओकर मनमे ओहि बेचाराकेँ मारबाक कोनो गुप्त योजना होयत। (बजबाक स्वरमे) ठीक, तकर बाद की भेल? विराधगुप्त: राज्याभिषेकक उत्सवक बाद, वैरोधाक अपन शरीर पर मोतीक लड़ियोंसँ कढ़ल रेशमी राजवस्त्र धारण केलक, रत्नजड़ित मुकुटसँ अपन केशकेँ सुसज्जित केलक, आ अपन विशाल वक्ष पर सुगन्धित माला सभ धारण केलक। एहि कारण, ओकरा एहन रूप भेट गेल कि ओकर निकटतम मित्र लोकनि सेहो ओकरा चिनि नहि सकैत छलाह। ओ दुष्ट चाणक्यक आज्ञाक अनुसार ओहि चन्द्रलेखा नामक हथनी पर सवार भेल, जकरा पर चन्द्रगुप्त सवारी करैत छलाह, आ चन्द्रगुप्तक अनुगामी राजकुमार सभक संग ओ नन्दक महलक दुआरि पर पहुँच गेल। तखन अहाँक गुप्त एजेन्ट बढ़ई दारुवर्मा वैरोधाककेँ चन्द्रगुप्त बुझि कऽ ओहि यान्त्रिक तोरणकेँ ओकर ऊपर खसा देलक। ओहि समय मौर्य राजकुमार लोकनि महलक बाहर अपन घोड़ा सभकेँ रोकि कऽ ठाढ़ छलाह। तखन चन्द्रलेखाक महावत बर्बरक, जे अहाँक दोसर गुप्त एजेन्ट छल, ओहि स्वर्ण लाठीकेँ पकड़लक जकर भीतर एकटा गुप्त तरुआरि लुकैल छल। राक्षस (अपन मनमे): दुनूक प्रयास एकहि जेकाँ गलत दिशामे चलि गेल। विराधगुप्त: तँ ओहि हथनी अपन दाहिना पएर पर चोट लगबाक आशंकासँ एकाएक अपन चालि बदलि लेलक। एहि कारण दारुवर्मा द्वारा खसाएल ओहि यान्त्रिक तोरण अपन निश्चित स्थानसँ दूर खसल आ वैरोधाक (जकरा चन्द्रगुप्त बुझल गेल छल) धरि पहुँचेसँ पहिनहि बर्बरककेँ कुचलि कऽ मारि देलक। ओहि क्षण दारुवर्मा, जे ऊपर मंच पर बैसल छल आ जानैत छल कि तोरण खसाएबाक बाद ओकर मृत्यु निश्चित अछि, ओ ओतहि हथनी पर सवार वैरोधाककेँ ओहि लोहक बोल्ट (कील) सँ मारि देलक जे ओहि यन्त्रक चाबी छल। राक्षस: बड़ दयनीय भेल, दुटा अनर्थ भऽ गेल— वैरोधाक आ बर्बरक मारल गेलाह, आ भाग्यक खेल देखू कि चन्द्रगुप्त सुरक्षित रहि गेल। ठीक, बढ़ई दारुवर्माक की भेल? विराधगुप्त: वैरोधाकक पैदल रक्षक लोकनि ओकरा पाथरसँ मारि देलखिन। राक्षस (आँखिमे लोर लऽ कऽ): अहा! हम अपन परम प्रिय मित्र दारुवर्माकेँ खोइ देलहूँ! ठीक, हमर ओहि वैद्य अभयदत्त की केलक? विराधगुप्त: ओ अपन काज पूर्ण पूर्णतासँ केने छल। राक्षस (प्रसन्नताक संग): तँ की चन्द्रगुप्त मारल गेल? विराधगुप्त: नहि मन्त्री! भाग्यक दोषसँ ओ नहि मारल गेल। राक्षस (उदासीक संग): तखन अहाँ किएक कहलहूँ कि ओ अपन काज पूर्णतासँ केने छल? विराधगुप्त: ओ चन्द्रगुप्तक लेल एकटा औषधिक काढ़ा तैयार केने छल जेकरामे एकटा गुप्त विषक चूर्ण मिलल छल। चाणक्य ओकर परीक्षण केलक आ देखलक कि सुवर्ण पात्रमे जाइतहि ओकर रङ्ग बदलि गेल। तेँ ओ चन्द्रगुप्तसँ कहलक: "वृषाल! एहि पेयमे विष अछि, एकरा जनि पीऊ।" राक्षस: निश्चयहि, ओ बड़ चतुर अछि; ठीक, वैद्यक की भेल? विराधगुप्त: ओकरा वैह काढ़ा पीबय पड़ल आ ओ मृत भऽ गेल। राक्षस (उदासीक संग): अहा! चिकित्सा विज्ञानक एकटा प्रकाण्ड विद्वान नष्ट भऽ गेल। ठीक, तखन प्रमोदक— जे शयनकक्षक अधिकारी छल— ओकर की समाचार अछि? विराधगुप्त: ओकरो हश्र दोसर सभ जँकाँहि भेल। राक्षस: ओ कएनाहि? विराधगुप्त: ओ मूर्ख अहाँक देल विशाल धनसँ बड़ विलासितापूर्ण आ खर्चीला जीवन जियय लागल, आ जखन ओकरासँ पूछल गेल कि ओतय एतेक धन कतयसँ आयल, तँ ओ विरोधाभासी बयान देलक, जेकरा पर चाणक्य ओकरा यातना दऽ कऽ मारि देलक। राक्षस (उदासीक संग): कतेक कष्टक बात अछि, एतय सेहो भाग्य हमरा सभकेँ विफल कऽ देलक। ठीक, बीभत्सक आ ओकर साथी सभक की समाचार अछि, जकरा हम शयनकक्षक भित्तर सुरङ्ग मार्गसँ घुसि कऽ चन्द्रगुप्तकेँ मारबाक लेल नियुक्त केने छलहुँ? विराधगुप्त: ओ बड़ भयानक भेल। राक्षस (व्याकुलताक संग): की ओतय ओकर उपस्थिति उजागर भऽ गेल छल? विराधगुप्त: हँ, चन्द्रगुप्तक प्रवेशसँ पहिनहि दुष्ट चाणक्य ओहि शयनकक्षक निरीक्षण करबाक लेल गेल। जखन ओ ध्यानसँ देखलक, तँ देबालक एकटा छिद्रसँ कीमियोंक एकटा कतार पाकल भातक कण लऽ कऽ निकसैत देखलक। एहिसँ ओ निष्कर्ष निकाललक कि शयनकक्षक भीतर लोक लुकैल छथि, आ ओ ओतय आगि लगबाक आज्ञा देलक। जखन आगि लागल, तँ बीभत्सक आ ओकर साथी लोकनि धुआँसँ अन्ध भऽ गेलाह आ सुरङ्गक दुआरि (जकरा ओ सभ भित्तरसँ बन्द केने छलाह) खोजि नहि सकलाह, आ ओ सभ ओहि आगिमे जरि कऽ भस्म भऽ गेलाह। राक्षस (आँखिमे लोर लऽ कऽ): हे मित्र! ओहि दुष्ट चन्द्रगुप्तक भाग्य देखू — जे विषकन्या हम ओकरा मारबाक लेल गुप्त रूपसँ रखने छलहुँ, ओ भाग्यक क्रूरतासँ पर्वतकक मृत्युक कारण बनि गेल जे आधा राज्यक दावेदार छल। आ जकरा हम शस्त्र आ विषसँ मारबाक लेल नियुक्त केने छलहुँ, ओ सभ स्वयं ओहिसँ मारल गेलाह। हमर सभ योजना ओहि मौर्यक लेल केवल मङ्गलकारी सिद्ध भऽ रहल अछि। विराधगुप्त: तैयो महाराज देखू, जे कार्य आरम्भ कयल जाइत अछि, ओकरा कखनो छोड़ल नहि जा सकैत अछि:— नीच प्रकृतिक लोक विघ्नक डरे कोनो काज आरम्भहि नहि करैत छथि; मध्यम प्रकृतिक लोक काज तँ आरम्भ करैत छथि मुदा बाधा ऐला पर बीचहिमे छोड़ि दैत छथि; मुदा श्रेष्ठ आ कुलीन लोक कतबो बाधा आ कष्ट ऐला पर अपन आरम्भ कयल काज कखनो नहि छोड़ैत छथि। राक्षस: निश्चयहि, जे आरम्भ भऽ गेल ओकरा छोड़ल नहि जा सकैत अछि। अहाँ एकरा स्वयं अपन आँखिसँ देखि रहल छी। आब आगाँँक वृत्तान्त सुनाउ। विराधगुप्त: तकर बादसँ चाणक्य चन्द्रगुप्तक सुरक्षाक लेल हजार गुणा बेसी सतर्क भऽ गेल अछि आ ई खोजि कऽ कि एहन काज ककर अछि, ओ कुसुमपुरमे रहबला अहाँक विश्वासपात्र मित्र सभकेँ एक-एक कऽ कऽ दण्ड देबय लागल अछि। राक्षस (आशंकित व्याकुलताक संग): आ ककरा-ककरा दण्ड देल गेल अछि? विराधगुप्त: सभसँ पहिनहि, बौद्ध भिक्षु जीवसिद्धिकेँ अपमानित कऽ कऽ राजधानीसँ विदा (देशनिकाला) कयल गेल। राक्षस (अपन मनमे): ओकरा लेल तँ ई सहय योग्य अछि। जेकर कोनो परिवार वा सम्पत्ति नहि अछि, ओकरा लेल देशनिकाला कष्टकारी नहि होइत अछि। (बजबाक स्वरमे) मित्र, ओकरा पर की आरोप लगा कऽ विदा कयल गेल? विराधगुप्त: एहि आरोप पर कि ओ अहाँक कहबा पर विषकन्याक प्रयोग कऽ कऽ पर्वतेश्वरक हत्या केने छल। राक्षस (अपन मनमे): कौटिल्य! अहाँ अपन एहि नीतिक लेल बड़ प्रशंसाक पात्र छी — अहाँ केवल एकटा बीया बोबैत छी आ अनेक फल प्राप्त करैत छी। एहि प्रकार अहाँ अपन चरित्रक कलङ्ककेँ धो कऽ हमरा पर लगा देलहूँ आ आधा राज्यक दावेदारसँ सेहो मुक्ति पाबि गेलहूँ। (बजबाक स्वरमे) आगाँँ कहू। विराधगुप्त: तकर बाद शकटदासकेँ एहि आरोप पर सूली पर चढ़ाबाक आज्ञा देल गेल कि ओ दारुवर्मा आ दोसर लोक सभकेँ चन्द्रगुप्तक हत्याक लेल नियुक्त केने छल। सम्पूर्ण नगरमे एकर उद्घोषणा कयल गेल। राक्षस (आँखिमे लोर लऽ कऽ): अहा मित्र शकटदास! अहाँ एहन कष्टकारी मृत्युक पात्र नहि छलहूँ। मुदा नहि, अहाँ अपन स्वामीक कार्यक लेल अपन प्राण देलहूँ, तेँ अहाँक लेल शोक नहि कयल जा सकैत अछि। शोक तँ हमरा सभक स्थिति पर कयल चाही जे नन्दक विनाशक बादो अपन प्राणसँ चिपकल छी। विराधगुप्त: एहन नहि कहू। ई स्वामीक काज अछि आ केवल वैह काज अछि जेकरा लेल अहाँ एतय निरन्तर संघर्ष कऽ रहल छी। राक्षस: मित्र — जीवनक प्रति मोहक कारण आ एहि कर्तव्यकेँ छोड़िकऽ, हम कृतघ्न भऽ कऽ अपन परलोक गेल स्वामीक अनुगमन नहि केलहूँ। विराधगुप्त: हमरा क्षमा करू महाराज, मुदा ई ओना नहि अछि जेना अहाँ कहि रहल छी:— एहि महान कर्तव्यसँ जुड़ल रहबाक कारण, आ जीवनक मोहक कारण नहि, अहाँ कृतज्ञ भऽ कऽ अपन परलोक गेल स्वामीक अनुगमन नहि केलहूँ जाहिसँ ओकर काज सम्पूर्ण कऽ सकी। राक्षस: कहू मित्र, हम अपन कोनो दोसर मित्रक एहन संकट सुनबाक लेल तैयार छी। विराधगुप्त: एकरा देखिकऽ, चन्दनदास अहाँक परिवारकेँ सुरक्षित स्थान पर हटा देलखिन। राक्षस: ई अनुचित भेल। कारण ओ ओहि दुष्ट चाणक्यक शत्रुताकेँ आमन्त्रण देलखिन। विराधगुप्त: की मित्रक संग छल करब एकरासँ बेसी अनुचित नहि अछि? राक्षस: ठीक, आगाँँक वृत्तान्त कहू। विराधगुप्त: ओकरासँ अहाँक परिवारकेँ सौंपबाक लेल दबाव देल गेल मुदा ओ मना कऽ देलखिन। तखन ओहि चाणक्य क्रोधसँ आगि भऽ गेल आ— राक्षस (आशंकाक संग): ओकरा मारि देलक? की ई सच अछि? विराधगुप्त: नहि, नहि। ओ ओकर सम्पत्ति जप्त करबाक, ओकरा बेड़ीमे बान्धबाक आ ओकर पत्नी तथा पुत्रक संग जेलमे डालबाक आज्ञा देलक। राक्षस: तखन अहाँ किएक सन्तोषक संग कहि रहल छलहूँ कि ओ हमर परिवारकेँ सुरक्षित हटा देलक? अहाँ ई किएक नहि कहलहूँ कि हम स्वयं अपन पत्नी आ पुत्रक संग बेड़ीमे जकड़ल छी! प्रियंवदक (एकाएक पर्दा हटा कऽ प्रवेश करैत)— महाराजक विजय हो! दुआरि पर शकटदास ठाढ़ छथि। राक्षस: की ई सच अछि? प्रियंवदक: महाराजक सेवक लोकनि झूठ बजब नहि जनैत छथि। राक्षस: मित्र विराधगुप्त, ई कएनाहि भेल? विराधगुप्त: ई भाग्य अछि जे मनुष्यक रक्षा करैत अछि। राक्षस: प्रियंवदक, जँ एहन अछि तँ ओकरा एहि क्षण भीतर आब दियौक आ हमरा शान्ति दियौक। अहाँ विलम्ब किएक कऽ रहल छी? प्रियंवदक: हम आज्ञाक पालन करैत छी। [प्रियंवदकक प्रस्थान] [तखन सिद्धार्थकक संग शकटदासक प्रवेश होइत अछि] शकटदास (अपन मनमे): हम सूलीक ओहि खम्भाकेँ जमीनमे कड़ाईसँ गड़ल देखलहूँ, जेना ओहि मौर्यकेँ; अपन झुकायल माथसँ अपराधीक ओहि मालाकेँ धारण केलहूँ जे हमर चेतनाकेँ झकझोरि देलक, जेना ओकर शासनकेँ; आ फाँसीक ओहि नगाड़ोंक आवाज सुनलहूँ जे कानकेँ चीरि रहल छल, जेना स्वामीक पतनकेँ। तैयो हमर ई हृदय नहि टुटल, हमरा बुझाइत अछि कि विपदाक ओहि तीन पूर्व प्रहारोंसँ ई पाथर बनि गेल अछि। (राक्षसकेँ देखिकऽ प्रसन्नताक संग) ई रहलाह मन्त्री राक्षस— राजा नन्दक काजकेँ अटूट स्वामिभक्तिसँ ओकर मृत्युक बादो सम्हारि कऽ रखने छथि, ओ पृथ्वी पर सभसँ स्वामिभक्त लोक सभमे श्रेष्ठ स्थान पर छथि। (ओकरा लग जाकऽ) मन्त्रीक विजय हो। राक्षस (शकटदासकेँ देखिकऽ प्रसन्नताक संग)— मित्र शकटदास, सौभाग्यसँ हम अहाँकेँ देखि रहल छी जे चाणक्यक चंगुलमे छलहूँ। आउ, हमरा गले लगाऊ। [शकटदास ओकरा गले लगबैत छथि] राक्षस (एकटा दीर्घ आलिङ्गनक बाद)— एतय बैसू। शकटदास: हम बैसैत छी। (ओ बैस जाइत अछि) राक्षस: मित्र शकटदास! हमर हृदयकेँ ई आनन्द देबला महापुरुष के छथि? शकटदास (सिद्धार्थक दिस इशारा करैत)— ई प्रिय मित्र सिद्धार्थक छथि, एहे हमरा फाँसीक स्थानसँ जल्लाद सभकेँ भगा कऽ सुरक्षित निकालि कऽ आनलखिन्ह। राक्षस (प्रसन्नताक संग): भद्र सिद्धार्थक! अहाँ जे उपकार केने छी, ओकरा सोझाँ हमर ई भेंट बड़ कम अछि, तैयो एकरा स्वीकार करू। (ओ अपन शरीरसँ एकटा आभूषण उतारि कऽ सिद्धार्थककेँ भेंट करैत छथि) सिद्धार्थक (आभूषण लऽ कऽ ओकर पएर पर गिरैत)— महाराज, हम एतय नव छी, हमर एतय कोनो एहन जान-पहिचान नहि अछि जकरा लग हम मन्त्रीक एहि बहुमूल्य उपहारकेँ सुरक्षित रखि सकी। तेँ हमर इच्छा अछि कि एकरा अहाँक नाम अंकित एहि राजमुद्रासँ बन्द कऽ कऽ अहाँक खजानामे राखि देल जाय, जखन हमरा आवश्यकता होयत हम लऽ लेब। राक्षस: ठीक अछि, एहिमे कोनो आपत्ति नहि अछि। शकटदास, ओ जे कहि रहल अछि ओनाहि करू। शकटदास: जेहन मन्त्रीक आज्ञा। (राजमुद्राकेँ देखिकऽ राक्षससँ चुपचाप) एहि अँगुठी पर मन्त्रीक नाम खुद्ल अछि। राक्षस (ओकरा ध्यानसँ देखैत, अपन मनमे)— ई तँ बिल्कुल सच अछि। ई वैह अँगुठी अछि जकरा हमर ब्राह्मणी पत्नी हमर व्याकुलताकेँ शान्त करबाक लेल हमर हाथसँ उतारि लेने छलीह। ई एहि व्यक्तिक हाथ धरि कएनाहि पहुँचल? (बजबाक स्वरमे) भद्र सिद्धार्थक, अहाँकेँ ई अँगुठी कतयसँ भेटल? सिद्धार्थक: महाराज! कुसुमपुरमे एकटा चन्दनदास नामक धनी जौहरी छथि। ई ओकर घरक दुआरि पर खसल छल। हमरा ओतहि भेटल। राक्षस: ई सम्भव अछि। सिद्धार्थक: एहिमे की सम्भव अछि, महाराज? राक्षस: हमर अर्थ छल कि एहन बड़का अमीर लोकक हवेलीक दुआरि पर एहन वस्तु भेटब स्वाभाविक अछि। शकटदास: प्रिय सिद्धार्थक! ई मन्त्रीक अपन राजमुद्रा अछि। महाराज अहाँकेँ एकर वास्तविक मूल्यसँ बहुत बेसी धन पुरस्कारमे देताह; एकरा सौंपि दियौक। सिद्धार्थक: आदरणीय मित्र, हम अपन सौभाग्य बुझब जँ महाराज एहि अँगुठीकेँ स्वीकार करथि। (ओ अँगुठी राक्षसकेँ सौंपि दैत अछि) राक्षस: प्रिय शकटदास, अहाँ राजकीय कार्य सभमे एहि अँगुठीक प्रयोग कऽ सकैत छी। शकटदास: जेहन मन्त्रीक आज्ञा। सिद्धार्थक: महाराज, हमर एकटा विन्ती अछि। राक्षस: कहू भाइ, बिना कोनो संकोचक कहू। सिद्धार्थक: अहाँ बुझि सकैत छी कि ओहि चाणक्यसँ शत्रुता लेबाक बाद हम पाटलिपुत्र घुरि नहि जा सकैत छी। तेँ हमर आग्रह अछि कि हमरा अपन सेवामे राखि लेल जाय। राक्षस: भाइ! ई हमर लेल बड़ प्रसन्नताक बात अछि; हम केवल अहाँक मनक इच्छा नहि जनबाक कारण अहाँकेँ आमन्त्रित करबामे हिचकिचा कऽ रहल छलहूँ। अहाँ हमर सेवामे आबि सकैत छी। सिद्धार्थक: हम एहि कृपाक लेल आभारी छी। राक्षस: प्रिय शकटदास, सिद्धार्थकक आराम आ खान-पानक प्रबन्ध करू। शकटदास: हम तुरन्त अहाँक आज्ञाक पालन करैत छी। [सिद्धार्थकक संग शकटदासक प्रस्थान] राक्षस: प्रिय विराधगुप्त, अपन वृत्तान्त सम्पूर्ण करू। की राज्यक मुख्य अङ्ग हमरा सभक एहि फूट डालबाक कूटनीतिकेँ स्वीकार कऽ रहल छथि? विराधगुप्त: हँ महाराज, ओ सभ कऽ रहल छथि। ई बात सभकेँ ज्ञात अछि। राक्षस: की बात ज्ञात अछि, मित्र? विराधगुप्त: ई कि मलयकेतुक भागि जाइसँ चन्द्रगुप्त चाणक्य पर बड़ क्रुद्ध अछि। आ चाणक्य सफलताक मदमे चूर भऽ कऽ चन्द्रगुप्तक आज्ञाक बार-बार उल्लङ्घन कऽ कऽ ओकर अप्रसन्नताकेँ आ बढ़ा रहल अछि। ई हम अपन व्यक्तिगत जानकारीसँ कहि रहल छी। राक्षस (ई सुनि कऽ बड़ प्रसन्न होइत छथि)— प्रिय विराधगुप्त! अहाँ पुनः वैह साँप खेलावेबलाक भेषमे घुरि कुसुमपुर जाउ। ओतय हमर एकटा मित्र स्तानकलश रहैत छथि जे भाटक भेषमे छथि। अहाँ ओकरा हमर नामसँ कहियनु कि जखन-जखन चाणक्य चन्द्रगुप्तक आज्ञाक विरुद्ध काज करय, तखन-तखन ओ चन्द्रगुप्तकेँ उत्तेजक श्लोक सभ सुना कऽ प्रेरित करथि, आ ओकर जे परिणाम निकसय, ओकरा करभकक माध्यमसँ बड़ गुप्त रूपसँ हमरा धरि पहुँचाएब। विराधगुप्त: हम मन्त्रीक आज्ञाक पालन करब। [विराधगुप्तक प्रस्थान] प्रियंवदक (प्रवेश करैत): महाराजक विजय हो! शकटदास आदरपूर्वक कहि रहल छथि कि ई तीनटा बड़ बहुमूल्य आभूषण बिकबाक लेल आयल अछि। महाराज एकर परीक्षण करथि। राक्षस (अपन मनमे, आभूषणक परीक्षण करैत)— ई सभ तँ बड़ कीमती आभूषण अछि। (बजबाक स्वरमे) भद्र पुरुष, शकटदाससँ कहू कि विक्रेताकेँ सन्तुष्ट कऽ कऽ एकरा मङबा लेल। प्रियंवदक: हम आज्ञाक पालन करैत छी। [प्रस्थान] राक्षस: हमरा करभककेँ सेहो कुसुमपुर विदा करबाक चाही। (आसनसँ उठैत) हमर इच्छा अछि कि चन्द्रगुप्त ओहि दुष्ट चाणक्यसँ अपन मित्रता तोड़ि लय। आब हमरा कोनो सन्देह नहि अछि:— सभ सामन्त सभ पर अपन आज्ञा थोपि कऽ मौर्य राजा आब उग्र आ अभिमानी भऽ गेल अछि, आ चाणक्य ई सोचि कऽ कि ओकरे समर्थनसँ मौर्य राजा बनल अछि, अहंकारसँ भरि गेल अछि। एक गोट साम्राज्य प्राप्त कऽ कऽ अपन उद्देश्य सम्पूर्ण कऽ लेलक अछि, तँ दोसर अपन प्रतिज्ञाक समुद्र पार कऽ चुका अछि। उद्देश्य सम्पूर्ण भऽ जाबाक ई चेतना, आ ओकर व्यक्तिगत कमियाँ, निश्चित रूपसँ दुनूक मित्रताकेँ तोड़ि कऽ रखि देत। तेसर अंक [प्रवेश: चन्द्रगुप्तक चेम्बरलेनक प्रवेश] चेम्बरलेन: हे कामदेव! तँ आँखि आदि इन्द्रियसभ द्वारा रूप आदि विषयसभक अनुभव करैत छलाह आर ओकरासँ लाभ उठैत छलाह। ई सभ अपन-अपन कार्यमे तत्पर छल। मुदा आब तोर आज्ञासँ चलनिहार करमेन्द्रियसभ सभ शक्ति हारि गेल अछि। अतएव तोर ऊपर बुढ़ापा आबि गेल अछि। तोर व्यर्थ कऽ लालसा छोड़ि देबाक चाही। आगाँ बढ़ि आकाशक दिशामे देखैत अरे सुगंगा महलक सेवकसभ! हमरा प्रभु चन्द्रगुप्तक आदेश अछि जे महलक प्राङ्गणसभक सजावट करू। किएक तँ प्रभु चन्द्रगुप्त कौमुदी महोत्सव मनाबैत पाटलिपुत्रक शोभा देखबाक इच्छा रखैत छथि। पुनः आकाशमे देखैत अहाँ हमरासँ की कहैत छी? कौमुदी महोत्सव रद्द भऽ गेल? प्रभु की ई बात नहि जानैत छथि? रे दुर्भाग्यशाली! अहाँ ई बात कहि अपन प्राण की बचाबैत छी? शीघ्र आदेश पालन करू। चन्द्रमाक किरणसभक समूह जेकाँ चमकनिहार चामरसभक शोभा, सुगन्धित धूपसँ महकत, मालासभसँ सज्जित स्तम्भसभमे झूलैत रहत अछि। आर पृथ्वी, जे सतत सहन करबाक पड़बाक कारण राजसिंहासनक भारसँ दबल जेकाँ पड़ल अछि, तुरन्त चन्दन जल छिड़काव आर पुष्प बिछावनसँ ताजा करल जाउ। पुनः आकाशमे देखैत अहाँ हमरासँ की कहैत छी? ई घड़ी प्रभुक आदेश पालन करू। शीघ्र करू, भलामानुस! चन्द्रगुप्त स्वयं एतय आबि रहल छथि। ई उच्छृङ्खल राजकुमार, जे छोट उमेरमे भारी राज्यक बोझ ढोइरहल अछि, जकरा पूर्वमे राजा नन्द बहुत दिन धरि सहन केनए छलाह, ओ ठोकर नहि खाइत, नहि पीड़ा अनुभव करैत छथि, यद्यपि ओ अखन नवका साँड़क अवस्थामे अछि जकरा नियन्त्रण करबाक प्रयास कयल जाइत अछि। पर्दाक पाछाँसँ आवाज: ए दिस, प्रभु! [राजा आर एक द्वारपालक प्रवेश] राजा (मनहि-मन)कहैत): राज्य करबा वास्तवमे बड़ पीड़ादायक अछि। एहि कारण जनता रक्षक अपन सुख त्यागि दोसरक सुखक व्यवस्था करैत अछि। 'पृथ्वी रक्षक' शब्द अपन अर्थ खोजि देइत अछि। आर जँ अपन सुखसँ अधिक दोसरक सुख देखबाक प्रयत्न करब, तँ सेवक बनि जाइत अछि। अछि तँ, ठीक शासकसभक लेल सेहो राजलक्ष्मीक सन्तुष्ट करब कठिन अछि। ई राजलक्ष्मी कठोरसँ घृणा करैत अछि, कोमलसँ भयक कारण छोड़ि देइत अछि, अशिक्षितसँ घृणा करैत अछि, अति विद्वानसँ प्रेम नहि करैत अछि, वीरसँ लज्जित होइत अछि आर कायरसँ घृणा करैत अछि। जेना अत्यधिक प्रेम पाबनिहार वेश्या सेवा करब कठिन होइत अछि, तेना राजलक्ष्मीक सेवा करब कठिन अछि। आर आचार्यक आदेश अछि जे हम ओहिसँ कपट वैमनस्य करू आर किछु समय स्वतन्त्र रहि शासन करू। हम अत्यन्त अनिच्छासँ एहि पाप जेकाँ कार्य करबाक सहमति देलहुँ। तैयो, हम सदिखन आचार्यक शिक्षासँ मार्गदर्शन पाबैत रहैत छी। जखन धरि शिष्य उचित कर्म करैत अछि, तखन धरि ओ कखनो असफल नहि होइत। जखन ओ मोहमे पड़ि गलत मार्ग पर चलि जाइत अछि, तखन गुरु रोकेबाक कार्य करैत अछि। हम एहिसँ भिन्न स्वतन्त्रता नहि चाहब। (प्रकट) - आदरणीय वैहिनारि! हमरा सुगंगा महलक बाट देखाउ। चेम्बरलेन: ए दिस, प्रभु। (महलक पास पहुँचबाक पर) - ई सुगंगा महल अछि। धीरे-धीरे चढ़ू, प्रभु। राजा (चढ़बाक अभिनय करैत आर दिशासभ देखैत): शरद ऋतुक शोभासँ सज्जित दिशासभ केना सुन्दर दिसैत अछि! श्वेत बादलसभसँ श्वेत, मधुर गानेबला हंससभक समूहसँ व्याप्त आर सुन्दर नक्षत्रसभसँ भरल, दसों दिशासभ रात्रिमे धीरे-धीरे गगनमे बहैत अछि, जेना नदीसभ बालुकाक तटसँ श्वेत, हंससभक समूहसँ व्याप्त आर रात्रि कमलसभसँ भरल बहैत अछि। तहिना - शरद ऋतु सभक समृद्धि लेबनाए अछि, जे नदीसभक अतिक्रमणक रोकबाक कारण, धानक बालसँ झुकल पौधासभक नम्रता देनाइ अछि, आर मोरसभक अत्यधिक घमंडक रोग ठीक करबाक कारण प्रशंसा पाबैत अछि। पुनः - जेना कुशल दूत प्रेमक, ओ गंगा नदी केओ प्रकार सरि सही बाट पर ला कि समुद्रसँ मिलाबैत अछि, जे पहिने काली छली आर बहु पत्नीसभसँ प्रेम करबाक कारण दुखी छली, अखन सन्तुष्ट दिसैत अछि। (नगरक सर्वेक्षण करैत) - ई की? नगरमे कौमुदी महोत्सवक आयोजन नहि अछि? आदरणीय वैहिनारि! कौमुदी महोत्सव मनाबाक आदेश हमरा नामसँ प्रचारित कयल गेल छल वा नहि? चेम्बरलेन: कयल गेल छल, प्रभु। राजा: तँ जनता हमरा आदेशक पालना नहि केलक? चेम्बरलेन (कान बन्द करैत): ई पापक बात नहि करू। पृथ्वी पर कोनो स्थान पर अहाँक आदेशक उल्लङ्घन भेल अछि? तँ नगरमे कोना भऽ सकैत अछि? राजा: तँ कौमुदी महोत्सव अखनो केनाय मनाए नहि गेल? सुन्दर वार्तामे निपुण, प्रिय सखीसभसँ घिरल, भारी नितम्बक बोझसँ धीरे-धीरे चलैत वेश्यासभ सड़कसभक शोभा नहि बढ़ाबैत अछि, आर धनी नागरिक अपन पत्नीसभक संग वैभवक बिना सङ्कोच एक दोसरसँ प्रतिस्पर्धा करैत एहि महोत्सवक नहि मनाबैत अछि। चेम्बरलेन: प्रभु, ई बात अछि कि... राजा: की अछि? चेम्बरलेन: ई बात अछि कि... राजा: साफ-साफ कहू। चेम्बरलेन: कौमुदी महोत्सव रद्द करि देल गेल अछि। राजा (क्रोधित): की! ई केलक? चेम्बरलेन: आदरणीय चाणक्य, प्रभु। राजा: आदरणीय चाणक्य एतय सुन्दर दृश्यसँ दर्शकसभक वञ्चित केलक? चेम्बरलेन: प्रभु, कोनो जीवित व्यक्ति अहाँक आदेशक उल्लङ्घन करि सकैत अछि? राजा: सोनोत्तरा, हमरा बैसबाक इच्छा अछि। द्वारपाल: ई राजसिंहासन अछि, प्रभु। एतय बैसू। राजा (आसन ग्रहण करैत): आदरणीय वैहिनारि, हम आदरणीय चाणक्यक देखबाक इच्छा रखैत छी। चेम्बरलेन: प्रभुक आदेश जेना। (प्रस्थान) [चाणक्यक प्रवेश - अपन घरमे क्रोध आर चिन्ताक संग आसिन्न] चाणक्य: की! दुष्ट राक्षस हमरासँ प्रतिस्पर्धा करबाक प्रयास करैत अछि? ओ चन्द्रगुप्त मौर्यसँ राज्य छीनि लेनाइ चाहैत अछि, जेना हम कौटिल्य, अपमानित भऽ कालकूट जेकाँ नगर छोड़ि नन्दक मारि वृषाल मौर्यक सिंहासन पर बैसौलहुँ। ओ हमर श्रेष्ठ बुद्धिको पराजित करबाक प्रयास करैत अछि। (आकाशमे देखैत) - हे राक्षस, ई व्यर्थ प्रयाससँ निवृत्त होउ। ई हमर राजा घमण्डी नन्द नहि अछि, जे मन्त्रीसभ पर निर्भर छल। ई चन्द्रगुप्त अछि। आर तँ चाणक्य नहि छी। एकर समानता केवल एतय अछि जे दुनू शत्रुसभ राज्यक प्रधान अङ्ग राजाक विरोधी छी। मुदा हमरा एहि विषय अधिक नहि सोचबाक चाही। पार्वतक पुत्र मलयकेतुक चारिहू दिस परिचितसँ घिरल अछि, जकरा हमर हृदयमे पहुँच गेल अछि। आर सिद्धार्थक आदि गुप्तचरसभ सभ अपन कार्यमे तत्पर छथि। आब चन्द्रगुप्त मौर्यसँ कपट वैमनस्य करि हम शत्रु मलयकेतु आर विरोधी राक्षसक बीच दरार पैदा करब, जे अपनाए कूटनीतिको दरार पैदा करबाक निपुण समझैत अछि। चेम्बरलेन (प्रवेश करैत): हाय सेवाक दुर्दशा! राजा, मन्त्री, दरबारी आर सभक सोझाँ डेराबैत पड़ैत अछि। मिठ बात आर ऊपरि दृष्टिसँ भोजनक लेल दासता करबाक पड़ैत अछि, जे बुद्धिमान लोकनिक मते कुत्ता जेकाँ जीवन अछि। (आगाँ बढ़ि चाणक्यक घर पहुँचि) - ई आदरणीय चाणक्यक निवास अछि। हम प्रवेश करब। (भीतर प्रवेश करि चारिहू दिस देखैत) - राजाधिराजक मन्त्रीक सम्पत्ति देखू। ई गोबरक कण्डा गोल करबाक पाथर अछि, एतय शिष्यसभ द्वारा लानल कुसाक घासक ढेर अछि, आर ओ कच्चा घर देबालक संग झुकल दिसैत अछि। हमरा प्रभु चन्द्रगुप्त एहि लेल केवल वृषाल अछि, आर ई उचित अछि। जे व्यक्ति कामनासँ मुक्त अछि, ओ राजाक तिनका जेकाँ उपेक्षा करैत अछि। (आदरसँ चाणक्यक देखैत) - ई आदरणीय चाणक्य अछि - जे सम्पूर्ण संसार पर नियन्त्रण करि तत्काल नन्दक राज्य समाप्त करि चन्द्रगुप्तक राज्य स्थापित केलक, जेना सूर्य एक समय आधा संसार पर नियन्त्रण करैत अछि, तहिना एकर श्रेष्ठतासँ सूर्यक प्रतिस्पर्धा करैत अछि। (घुटना टेकि नमस्कार करैत) - आदरणीय गुरुजीक विजय होउ। चाणक्य: हे वैहिनारि, अहाँ केनाय हमरा समक्ष आयल छी? चेम्बरलेन: आदरणीय प्रभु! हमरा प्रभु चन्द्रगुप्त, जकर चरण युद्धमे शत्रु राजासभक मुकुट रत्नसँ राताएल अछि, अहाँक चरणमे माथि निहुराबैत अछि आर निवेदन करैत अछि कि जँ अहाँक कार्यमे बाधा नहि अछि तँ अहाँ दर्शन देब। चाणक्य: वृषाल हमरा दर्शन करबाक इच्छा रखैत अछि? ई केना होइत? की हमर द्वारा कौमुदी महोत्सव रद्द करबाक बात ओकर कान पर पहुँच गेल? चेम्बरलेन: हँ, आदरणीय प्रभु। चाणक्य (क्रोधित): की! ओकरा ई बात के कहलक? चेम्बरलेन (भयसँ काँपैत): क्षमा करू, आदरणीय प्रभु। हमरा प्रभु चन्द्रगुप्त सुगंगा महलमे चढ़ि स्वयं देखलनि जे नगरमे कौमुदी महोत्सव नहि मनाएल गेल अछि। चाणक्य: हम समझलहुँ। अहाँ हुनकर मनमे उत्तेजना भरि हमरा विरुद्ध भड़का देलहुँ। कोना होइत? (चेम्बरलेन डरसँ नीचा देखैत अछि) चाणक्य: अरे, राजाक सेवकसभ चाणक्य पर कोना द्वेष रखैत अछि? बिना कहू, वृषाल कतय अछि? चेम्बरलेन: प्रभु सुगंगा महलमे छलाह जखन हमरा आदरणीय प्रभुक समक्ष भेजलनि। चाणक्य (उठैत): तँ हमरा सुगंगा महलक बाट देखाउ। चेम्बरलेन: ए दिस, आदरणीय प्रभु। (दुनू सुगंगा महल जाइत अछि) चेम्बरलेन: ई सुगंगा महल अछि। धीरे-धीरे चढ़ू, आदरणीय प्रभु। चाणक्य (चढ़बाक अभिनय करैत चन्द्रगुप्तक देखैत): ओह, वृषाल राजसिंहासन पर विराजमान अछि। बहुत नीक! राजसिंहासन उजाड़ देबिहार नन्दसभक अछि, मुदा ओ वृषाल श्रेष्ठ राजाकसँ अध्यासित अछि। जेना सिंहासन, तेना राजा। ई तीनू गुणसभसँ हमर तीन गुना सन्तोष भेल अछि। (चन्द्रगुप्तक पास पहुँचि) - वृषलक विजय होउ। राजा (सिंहासनसँ उठि): चन्द्रगुप्त आदरणीय गुरुजीक चरणमे प्रणाम करैत अछि। चाणक्य (हाथ पकड़ि उठाबैत): उठू, पुत्र। शत शत राजासभक मस्तक मुकुट प्रभासँ हिमालयसँ ल कि दक्षिण सागर पर्यन्त तोर चरणक अङ्गुलीक बीच प्रकाशित होउ। राजा: हम आचार्यक कृपासँ पहिनहि एहि सभ पा चुकल छी। कृपा करि आसन ग्रहण करू, आदरणीय प्रभु। (दुनू उपयुक्त आसन पर बैसैत अछि) चाणक्य: वृषाल! हमरा केनाय बुलौलहुँ? राजा: अपन दर्शनसँ हमरा आशीर्वाद देबाक लेल, आदरणीय प्रभु। चाणक्य (मुस्कुराइत): ई विनय बहुत भेल। बिना कारण राजा मन्त्रीसभक नहि बुलाबैत अछि। राजा: कौमुदी महोत्सव रद्द करबामे आदरणीय गुरुजी केना हित देखैत छथि? चाणक्य (मुस्कुराइत): हमरा डाँटबाक लेल बुलौलहुँ? राजा: नहि, नहि, एहि आग्रह करबाक लेल बुलौलहुँ। चाणक्य: जँ एहन अछि तँ शिष्यक गुरुक इच्छाक पालन करबाक चाही, जे आग्रह करबाक योग्य अछि। राजा: एहि बातमे कोनो सन्देह नहि अछि। मुदा आदरणीय गुरुजी बिना कारण कोनो कार्य नहि करैत छथि। चाणक्य: वृषाल! अहाँ ठीक कहलहुँ। चाणक्य बिना कारण एक आँखिसँ सुतैत हुअो कोनो कार्य नहि करैत। राजा: अतएव कारण जानबाक इच्छासँ हम एहि प्रश्न करैत छी। चाणक्य: वृषाल! राजनीतिक कोविदसभ संसारमे तीन प्रकारक शासन बतौलनि - राजाक अधीन, मन्त्रीक अधीन, आर दुनूक अधीन। एहि मध्य अहाँक शासन मन्त्रीक अधीन अछि। अहाँ कारण पूछि कऽ करब? हमर काज अछि। (राजा मुख मोड़ि लैत अछि) [पर्दाक पाछाँसँ दोटा बार्डक पद्यपाठ] प्रथम बार्ड - शिवक शरीर अहाँक कष्टसभक नाश करउ - जे शरीर अपन भस्मसँ आकाशकेँ श्वेत बनाबैत अछि, मस्तक चन्द्रक किरणसँ गजासुरक चर्मकेँ रौपी करैत अछि, मुण्डमाला धारण करैत अछि, आर जोर हँसीसँ उज्ज्वल होइत अछि - जेना शरद ऋतु काशक पुष्पसँ आकाश श्वेत करैत, चन्द्रकिरणसँ बादल रौपी करैत, कुमुदक पुष्पमाला धारण करैत, आर राजहंससँ उज्ज्वल होइत अछि। तहिना - विष्णुक किञ्चित् तिरछा नयन, जे शेषनागक फनाक गद्दी पर विस्तृत शय्या छोड़बाक विचार करि जृम्भित होइत छथि, हमरा रक्षा करउ - जे नयन हाल्हिक उद्घाटनसँ धूमिल छी, जे क्षण भर लेल रत्न दीपक प्रकाशसँ मुड़ि जाइत छी, जकर कार्य मन्द छी, जे जलकणसँ सिक्त छी, आर निद्राक अभावसँ अत्यन्त राताएल छी। द्वितीय बार्ड - जेना राजा सिंह, जे सृष्टिकर्ता द्वारा स्वाभिमानक भण्डार जेकाँ बनौल गेल अछि, अपन जबड़ा तोड़बा सहन नहि करैत, अपन गरिमाक अनुभवसँ युक्त, अपन शक्तिसँ हाथी दलक नायक हाथीसभक पराजित करि, ओ पूर्ण स्वतन्त्रतासँ रहैत अछि - तेना मनुष्य राजा, जे सृष्टिकर्ता द्वारा स्वाभिमानक भण्डार जेकाँ बनौल गेल अछि, अपन आदेशक उल्लङ्घन सहन नहि करैत, अपन शक्तिसँ युद्ध हाथी दलक स्वामी घमण्डी राजासभक पराजित करैत अछि। तहिना - आभूषण आदि धारण करबा मात्रसँ राजा नहि बनल जाइत। ओहि राजा कहल जाइत अछि, जकरा जेना अहाँ, कोनो आदेशक उल्लङ्घन नहि करैत। चाणक्य (मनहि-मन)कहैत): पहिल पद्य शिव आर विष्णुक प्रशंसा करैत शरद ऋतुक संकेत करैत अछि। मुदा दोसर बार्डक पद्य हम नहि समझि पाएलहुँ। (किछु विचार करि) - हम समझलहुँ। ई राक्षसक चाल अछि। रे दुष्ट राक्षस! तँ पकड़ा गेल छी। कौटिल्य जागरुक अछि। राजा: आदरणीय वैहिनारि! एहि दुनू बार्डसभमे प्रत्येककेँ हजार स्वर्ण मुद्रा देल जाउ। चेम्बरलेन: प्रभुक आदेश जेना (प्रस्थानक लेल प्रयत्न) चाणक्य: रुकू, वैहिनारि! अहाँ नहि जाएत छी। (चेम्बरलेन डरसँ राजाक दिस देखैत अछि) चाणक्य: वृषाल! एतेक बड़ रकम व्यर्थ खर्च करबाक की मतलब? राजा: जखन आदरणीय गुरुजी प्रत्येक बातमे हमरा रोकैत छथि, तखन स्वतन्त्रता बन्धन अछि, स्वतन्त्रता नहि। चाणक्य: जे राजा अपन कर्तव्यसँ विमुख होइत अछि, ओही पर ई संकट आबैत अछि। जँ अहाँ सहन नहि करि सकैत छी, तँ अपन कर्तव्यक पालना करू। राजा: हम अपन कर्तव्यक पालना करैत छी। चाणक्य: हमरा अत्यन्त प्रसन्नता अछि। राजा: तँ हम जानबाक चाहैत छी जे कौमुदी महोत्सव रद्द करबाक कारण की अछि? चाणक्य: हम सेहो जानबाक चाहैत छी जे कौमुदी महोत्सव मनाबाक कारण की अछि? राजा: मुख्य कारण हमर आदेशक पालना कराबनाइ अछि। चाणक्य: आर हमर कौमुदी महोत्सव रद्द करबाक मुख्य कारण अछि अहाँक आदेशक पालनासँ इन्कार करब। किएक तँ अहाँक ई आदेश, जे करोड़ों राजा माथ निहुराक मूर पर धारण करैत अछि, जँ हमरा नहि मानैत, तँ अपने ऐलान करैत अछि जे अहाँक राज्यमे विनम्रता सुशोभित अछि। जँ अहाँ चाहू तँ दोसर कारण सेहो बताब। राजा: बताऊ। चाणक्य: सोनोत्तरा! आचार्यक नामसँ लेखक अचालक कहू जे भद्रभट आर हुनकर साथीसभक सूची दिउ, जे असंतुष्ट होइ एतयसँ भागि मलयकेतुक सेवामे प्रविष्ट भऽ गेल अछि। द्वारपाल: जेना आज्ञा। (जाइ सूची लाबैत अछि) - ई सूची अछि, आदरणीय प्रभु। चाणक्य (सूची लैत): वृषाल! सुनू। राजा: हम सुनैत छी। चाणक्य (सूची पढ़ैत): "हमरा प्रभु चन्द्रगुप्तक युद्धमे वीरसभक सूची जे असंतुष्ट होइ एतयसँ भागि मलयकेतुक सेवामे प्रविष्ट भऽ गेल अछि - युद्ध हाथीक अधिकारी भद्रभट, घोड़ाक अधिकारी पुरुदत्त, प्रधान चेम्बरलेनक भतीजा दिङ्गरात, राजाक सम्बन्धी बलगुप्त, राजकुमार अवस्थामे राजाक अङ्गरक्षक राजसेन, सेनापति शूरबलक छोट भाइ भागुरायण, मालव वंशीय रोहिताक्ष, आर क्षत्रिय दलक नायक विजयवर्मा।" राजा: हम हुनकर असंतोषक कारण जानबाक चाहैत छी। चाणक्य: सुनू, वृषाल। एहि मध्य भद्रभट आर पुरुदत्त - हाथी आर घोड़ाक अधिकारी - मद्य, स्त्री आर वन विहारक आसक्त छल। अपन कर्तव्यमे लापरवाही करबाक कारण हुनका पदसँ हटाएल गेल, मुदा वार्षिक वृत्ति देल गेल। अतएव हुनका छोड़ि गेल। दिङ्गरात आर बलगुप्त अति लोभी छल। अहाँ द्वारा देल वृत्ति अपर्याप्त समझि हुनका छोड़ि मलयकेतुक सेवामे चलि गेल। राजसेन डराएल छल कि जे धन हाथी, घोड़ा, आर अपार कोष ओ आकस्मिक रूपसँ अहाँक कृपासँ पाएल अछि, ओ अकस्मात् छीनि लेल जायत। अतएव ओ एतयसँ भागि गेल। भागुरायण पार्वतक मित्र छल। प्रेमवश हुनका माता-पिता जेकाँ मानैत छल। ओ मलयकेतुक कानमे फुँकि देलक जे 'ई चाणक्य तोर पिताक हत्या करौलक' एहिसँ हुनका डेराबा देलक। चाणक्य षड्यन्त्रकारीसभक दण्ड देबाक पर, भागुरायण अपन अपराधसँ डरि भागि गेल। मलयकेतु हुनका प्राण बचाबाक कृतज्ञतासँ मुद्राङ्क अधिकारी पद देलक। रोहिताक्ष आर विजयवर्मा अति घमण्डी छल। अहाँ अपन सम्बन्धीसभक सम्मान देखि सहन नहि करि सकल। अतएव हुनका एतयसँ चलि गेल। राजा: जँ असंतोषक कारण ज्ञात छल, तँ आदरणीय गुरुजी तुरन्त उपाय केना नहि केलहुँ? चाणक्य: हम नहि कयल सकलहुँ, वृषाल। राजा: असमर्थतासँ वा राजनीतिक कारणसँ? चाणक्य: राजनीतिक कारणसँ। असमर्थतासँ कोना होइत? राजा: तँ ओ राजनीतिक कारण जानबाक चाहैत छी। चाणक्य: सुनू। असंतुष्ट प्रजाक उपाय दोटा अछि - अनुग्रह आर दण्ड। भद्रभट आर पुरुदत्त पदसँ हटाएल गेल। हुनका पुनः पद देल जाएत तँ ओ अनुग्रह होइत। हुनकर दोषक बावजूद जँ पुनः पद देल जायत तँ राज्यक मुख्य अधार हाथी आर घोड़ाक दल नष्ट भऽ जायत। दिङ्गरात आर बलगुप्त अति लोभी छल। सम्पूर्ण राज्य देल जाएत तँ सेहो सन्तुष्ट नहि होइत। राजसेन आर भागुरायण हमरा विषय मारि आर सम्पत्ति छीनि लेनिहार सन्देह करैत छल। हुनका अनुग्रह देल कोना स्वीकार होइत? रोहिताक्ष आर विजयवर्मा अत्यन्त घमण्डी छल। अहाँक सम्बन्धीसभक सम्मान सहन नहि करैत। हुनका कोना प्रसन्न कयल जाएत? अतएव अनुग्रहक मार्ग बन्द छल। दण्डक मार्ग सेहो सम्भव नहि छल। जँ हम नन्दक बाद हालमे सत्तामे आबि अपन युद्धक नायक उच्च अधिकारीसभक कठोर दण्ड देब, तँ नन्द पक्षक हमर प्रजा हमरा विश्वास नहि करत। ई हमर सभ असंतुष्ट अधिकारी मलयकेतु द्वारा ग्रहण कयल गेल अछि, जे पिताक हत्याक क्रोधसँ भरल राक्षसक नेतृत्वमे विशाल म्लेच्छ सेनासँ हमरा आक्रमण करबाक तैयारीमे अछि। ई समय युद्धक तैयारीक अछि, उत्सवक नहि। जखन हमरा दुर्ग निर्माणमे ध्यान देनाइ अछि, तखन कौमुदी महोत्सवक केकरो अर्थ? राजा: एहि विषयमे बहुत किछु कहनाइ अछि। चाणक्य: स्वतन्त्र रूपसँ कहू। हमरा सेहो एहि विषयमे बहुत कहनाइ अछि। राजा: अहाँ मलयकेतुक एहि सभ अशान्तिक मूल पलायनमे केनाय सहयोग केलहुँ? चाणक्य: हुनकर पलायनमे सहयोग न करबाक मतलब दोटा उपाय छल - पकड़ि दण्ड देनाइ वा वचन अनुसार आधा राज्य देनाइ। जँ हम पकड़ि दण्ड देब, तँ अपन हाथसँ पार्वतक हत्या करबाक कृतघ्नता पर मुहर लगा देब। जँ आधा राज्य देब, तँ सेहो पार्वतक हत्याक कलंक मिटाबाक मात्र उपाय होइत। एहि कारण हम हुनकर पलायनमे सहयोग केलहुँ। राजा: ई तोर एहि प्रकरणमे बचाओ अछि। मुदा राक्षसक - जे एहि नगरमे छल - हुनकर पलायनमे सहयोग करबाक की कहल जाएत? चाणक्य: राक्षस नन्द पक्षधरसभक अत्यन्त विश्वासपात्र छल, किएक तँ ओ सभ बहुत दिन धरि सँग छल। ओ चतुर, साहसी छल। हुनकर साथी आर कोष विशाल छल। एहि कारण हम हुनकर पलायनमे सहयोग केलहुँ। जँ ओ एतय रहित, तँ नगरमे गम्भीर विद्रोह करत; मुदा जँ बाहर जाएत, तँ जँ देशमे विद्रोह करत सेहो हुनका नियन्त्रण करब कठिन नहि होइत। राजा: जखन ओ एतय छल, तँ हुनका विरुद्ध उपाय केना नहि केलहुँ? चाणक्य: कोना कहल जाएत जे उपाय नहि केलहुँ? ओ हृदयमे काँटा जेकाँ छल। हम ओकरा कौशलसँ निकालि फेकलहुँ। राजा: हुनका बलसँ केना नहि पकड़लहुँ? चाणक्य: हुनका राक्षस बुझू। जँ बलसँ पकड़बाक प्रयास करब, तँ ओ मरि जायत वा हमर सेनाक विनाश करैत। एहन भेल तँ सोतय हानि। जँ दबाव डालल जाए, तँ ओ मरि जायत - तँ ओ हाथसँ निकलि जायत। जँ ओ हमर श्रेष्ठ योद्धासभक मारि डालत - तँ सेहो बड़ हानि। एहि कारण हमरा ओकरा जंगली हाथी जेकाँ साधनसँ वश करबाक चाही। राजा: हम अहाँसँ बहस करबामे असमर्थ छी, आदरणीय प्रभु। मुदा मन्त्री राक्षस प्रत्येक प्रकारसँ प्रशंसा करबाक योग्य अछि। चाणक्य: आर अहाँ नहि - ई प्रशंसा अछि। बिना कहू, ओ केकरो केलक? राजा: सुनू। ओ महापुरुष नगर जीत लेबाक बाद जखन तक चाहलक तखन तक नगरमे रहल, हमर बहुत कष्ट करौलक। हमर सैनिकसँ विजय घोषणा आदि रोकलक। आर अपन श्रेष्ठ कूटनीतिसँ हमरा एहन उल्झौलक जे हम अपन विश्वासपात्र पर सेहो सन्देह करबाक लगल। चाणक्य (हँसैत): ई सभ मात्र राक्षसक कार्य अछि? हम एक क्षण लेल सोचलहुँ कि ओ अहाँक सिंहासनसँ हटा मलयकेतुकेँ सम्राट बना देलक, जेना हम नन्दकेँ हटाइ अहाँकेँ सम्राट बनौलहुँ। राजा: ई दोसर कोनोक कार्य छल। आदरणीय गुरुजी केनाय ओकर लेखा लगाबैत छी? चाणक्य: रे द्वेषी! कोनो दोसर जन सभक अगाड़ि शत्रुक सम्पूर्ण जाति नाश करबाक भीषण प्रतिज्ञा केनए छल? कोनो दोसर क्रोधसँ मुड़ल अङ्गुलीसँ माथक केश बाँधि करि नौ नन्दक जे करोड़ों स्वर्ण मुद्रा धनी छल, एक-एक करि बलि पशु जेकाँ मारलक? राजा: ई भाग्यक कार्य छल जे नन्दसभ पर भयानक छल। चाणक्य: केवल अज्ञानी भाग्य पर विश्वास करैत अछि। राजा: ज्ञानी व्यक्ति पुनः घमण्डी होइत अछि। चाणक्य (अति क्रोधित): वृषाल! अहाँ हमरा नोकर जेकाँ डाँटबाक चाहैत छी? आब हमर हाथ फेरसँ बाँधल गेल केशक गाँठ खोलबाक लेल उद्यत अछि, हमर पएर पुनः कोनो दोसर व्रतमे प्रवेश करबाक लेल चलैत अछि, आर अहाँ जे अपन मृत्युक सोझाँ छी, नन्दसभक नाशसँ शान्त हमर क्रोधक आगि पुनः प्रज्वलित करैत छी। राजा (मनहि-मन)कहैत): साचमे आदरणीय गुरुजी क्रोधसँ भरल छथि। की करब? हुनकर आँखिक तेज, यद्यपि नोर बहबाक कारण शान्त भेल अछि आर पलकसभ क्षुब्ध होइत अछि, तैयो पुनः प्रज्वलित जेकाँ भेल अछि, जखन भृकुटीक घोर अगाड़ि बढ़ैत अछि, आर हुनकर पएरक धक्कासँ पृथ्वी काँपैत अछि, जेना रुद्रक उग्र नृत्य देखि डरि गेल होइत। चाणक्य (शान्त होइत): वृषाल! वाक्य बनैमे किछु नहि रहल। जँ अहाँ राक्षसकेँ हमरसँ श्रेष्ठ समझैत छी, तँ ई तरुआरि हुनका देल जाउ। (तरुआरि फेंकि देइत अछि, आसन छोड़ि आकाशमे देखैत) (मनहि-मन) - राक्षस! ई तोर बुद्धिक चरम अवस्था अछि जे हमर बुद्धिक पराजित करबाक प्रयास करैत अछि। अरे! अहाँ द्वारा प्रयुक्त ई सभ वैमनस्यक नीति जे हमसँ अलग भेल चन्द्रगुप्त मौर्यकेँ आसानीसँ पराजित करबाक विश्वाससँ करू छी, ई कपट वैमनस्यद्वारा अहाँक अपन मलयकेतुसँ वैमनस्य कराएत छी। (चाणक्यक प्रस्थान) राजा: आदरणीय वैहिनारि! जनताक बताबिये कि आइसँ चन्द्रगुप्त स्वयं चाणक्यक स्वतन्त्र राज्य सञ्चालन करत। चेम्बरलेन (मनहि-मन): हाय! राजा हुनका चाणक्य कहि सम्बोधित केलक। ओ पदसँ हटाएल गेल। मुदा ई हुनकर कोनो दोष नहि अछि। जखन राजा अयोग्य कार्य करैत अछि, तखन ओ मन्त्रीक दोष अछि। हाथी सारथिक अविवेकसँ दुष्ट होइत अछि। राजा: आदरणीय ब्राह्मण! अहाँ केनाय अघूरैत छी? चेम्बरलेन: आदरणीय प्रभु! प्रसन्नता अछि कि अहाँ अहाँक शासन अहाँ करबाक छी। राजा (मनहि-मन): आशा अछि जे आदरणीय गुरुजी अपन उद्देश्य सिद्धि हेतु एहि रूपमे देखल जाएबाक लेल प्रयास करैत छथि। (प्रकट) - आदरणीय ब्राह्मण! शीघ्र करू। चेम्बरलेन: प्रभुक आज्ञा जेना। (प्रस्थान) राजा: सोनोत्तरा! एहि कठोर कलहसँ हमर माथि पीड़ा करैत अछि। शयनगृहक बाट देखाउ। द्वारपाल: ए दिस, प्रभु। राजा (आसनसँ उठि): यद्यपि हम हुनकर आदेशसँ आदरणीय गुरुजीक अवज्ञा केलहुँ, हमरा पृथ्वीमे समा जाएबाक इच्छा होइत अछि। तखन जे लोक वास्तवमे अपन गुरुक अपमान करैत अछि, ओ लाजसँ केना नहि मरैत अछि? (सभक प्रस्थान) चारिम अंक [प्रवेश: करभक यात्रीक वेशमे] करभक: कोनो व्यक्ति, हे मैथिलीजन! जे स्वामीक आपात आदेशसँ बिना रुकि सौ योजनसँ अधिक दूरी पार करैत अछि, ओ केना आश्चर्यजनक नहि अछि? आब हम मन्त्री राक्षसक भेंट करबाक जाइत छी। (आगाँ बढ़ि) - ई आदरणीय मन्त्री राक्षसक निवास अछि। द्वारपालसभमेसँ कोनो अछि? हमरा कहू कि करभक पाटलिपुत्रसँ शीघ्र आयल अछि। द्वारपाल (प्रवेश करैत): भलामानुस! धीरे बोलू। राजकाजक चिन्तासँ निद्रा नहि भेलाक कारण मन्त्रीक शिरःपीड़ा अछि। ओ अखनो शयनकक्षमे अछि। किछु समय प्रतीक्षा करू। उचित समय देखि हम अहाँक आगमनक सूचना देब। करभक: भलामानुस! अहाँ एहन सेहो करि सकैत छी। [राक्षसक प्रवेश - शयनकक्षमे चिन्तित मुद्रामे] राक्षस - हम चाणक्यक सभ असंतुष्ट लोकनिकेँ जीति चुकल छी; आर तैयो भाग्यक अनिश्चितता पर विचार करैत, चाणक्यक कुटिल नीति पर मनन करैत, ई बात केना भऽ सकैत अछि, एकर चिन्तासँ रात-रात निद्रा हमरा नहि आबैत अछि। आर हमर जेना कवि वा राजनीतिज्ञकेँ एहि प्रकारक श्रमक अनुभव होइत अछि। पहिने ओ अपन बुद्धिसँ अपन कार्यक बहुत सूक्ष्म बीज रोपैत अछि। तखन ओ ओकरो विकास करैत अछि। तत्पश्चात जखन ओ बीज अर्धविकसित अवस्थामे पहुँचैत अछि, तखन ओ अति दूर फल देनिहार अदृश्य नीतिक प्रयोग करैत अछि। ओकरा बाद ओ संदिग्ध अवस्थाक निर्माण करैत अछि। तखन ओ एहि प्रकारसँ विस्तारित कार्यक समापन करैत अछि। द्वारपाल (राक्षसक पास पहुँचि): विजय होउ। राक्षस: पराजय होउ। द्वारपाल: मन्त्रीक। राक्षस (बायाँ आँखिक स्पन्दन अनुभव करैत(मनहि-मन): रे दुष्ट चाणक्यक विजय होउ! मन्त्रीक पराजय होउ! (प्रकट) - भलामानुस! अहाँ की कहबाक चाहैत छी? द्वारपाल: पाटलिपुत्रसँ करभक आयल अछि। ओ मन्त्रीक दर्शन करबाक इच्छा रखैत अछि। राक्षस: शीघ्र हुनका प्रवेश कराऊ। द्वारपाल: प्रभुक आज्ञा जेना। (करभक पास गेल) - भलामानुस! अहाँ मन्त्रीक दर्शन करि सकैत छी। (प्रस्थान) करभक (राक्षसक पास बढ़ि): प्रभुक विजय होउ। राक्षस: बैसू, भलामानुस! करभक: जेना आज्ञा। (भूमि पर बैसैत अछि) राक्षस (मनहि-मन): एतेक सभ कार्य अछि जे हमरा मोन नहि आबैत अछि कि ई व्यक्ति हमर द्वारा कोन कार्यमे नियुक्त कयल गेल छल। (स्मरण करैत अछि) [एक सेवकक प्रवेश - दण्ड हाथमे] सेवक: हटू, भलामानुसभ! बाट साफ करू। अहाँ नहि जानैत छी जे सौभाग्यवान लोकनिक सेहो हुनकर दर्शन दुर्लभ अछि, तखन निकटता कऽ केकरो बात? (ऊपर देखैत) - अहाँ की कहैत छी, भलामानुस? हम केनाय अहाँकेँ बाट हटाएबाक कहैत छी? तँ सुनू। युवराज मलयकेतु, जे शिरःपीड़ासँ पीड़ित मन्त्री राक्षसक भेंट करबाक लेल एतय आबि रहल छथि। एहि कारण हम अहाँकेँ बाट हटाएबाक कहैत छी। (प्रस्थान) [मलयकेतुक प्रवेश - भागुरायण आर चेम्बरलेनक संग] मलयकेतु (मनहि-मन)उच्छ्वास लैत): आज हमर पिताक मृत्यु भेल दस महिना भऽ गेल; आर तैयो हम अपन प्रतापक घमण्डक वावजूद हुनका जलाञ्जलि सेहो नहि दे सकलहुँ। हम लेल छलहुँ कि शत्रुक पत्नीसभक आँखिसँ हरषक अश्रु पोछि हुनकर पिताक मृत्युक शोकसँ हमर मातासभक जे अवस्था भेल छल - जखन ओ छाती पीटैत अपन मणिमय कङ्कण तोड़ि फेकलनि, वस्त्र खसि गेल, केश धूलिसँ भरि गेल, आर आकाश "हाय! हाय!" कऽ करूण क्रन्दनसँ गुञ्जायमान भेल छल - ओहि प्रकार शोकाकुल बनाएब तखन जलाञ्जलि देनाइ। एहि लेल संक्षेपमे कहू तँ - हम वीरतापूर्वक सहन करब, आर पूर्वजसभक पथ पर चलि युद्धभूमिमे मृत्यु वरण करब, वा अपन मातासभक नयनसँ अश्रु पोछि शत्रुक पत्नीसभक नयनमे अश्रु स्थानान्तरित करब। (प्रकट) - आदरणीय जाजलू! हम मन्त्री राक्षसक निज भेंट करि हुनका आश्चर्यचकित करबाक चाहैत छी। एहि लेल आदिसँ चलैत राजसी जनसभा हमरा पाछाँ नहि करू। हमरा मलयकेतुक आदेशसँ कहू जे कोनो हमर पाछाँ नहि आए। चेम्बरलेन: हम प्रभुक आदेशक पालना करैत छी। (पाछाँ मुड़ि आकाशक दिस देखैत) - सुनू, हे राजसभ! युवराज मलयकेतुक आदेश अछि जे कोनो हुनकर पाछाँ नहि करू। (हुनकर चेष्टासभ देखैत प्रसन्न होइत) - देखू, प्रभु! युवराजक आदेश पाबति की सेनापति तत्काल रुकि जाइत छथि! किछु अपन घोड़ासभ रोकि रहल छथि - जकर ऊँच गर्दन तिख्ण अङ्कुशसँ कसि बाँधलाक कारण बहुत झुकल अछि, जेना खुरसँ आकाश छूबाक प्रयास करैत होइत; तँ किछु अपन महावीर हाथीसभ रोकि रहल छथि, जकर घण्टीसभ नीरव अछि। ई राजसभ समुद्र जेना ज्वार सीमासँ अधिक नहि बढ़ैत, आदरक सीमा नहि लाँघैत। मलयकेतु: आदरणीय जाजलू! अहाँ सेहो पालकी वाहकसभ सँग पाछाँ घुरि जाउ। केवल भागुरायण हमरा संग आएत। चेम्बरलेन: प्रभुक आज्ञा जेना। (पालकी वाहकसभ सँग प्रस्थान) मलयकेतु: मित्र भागुरायण! भद्रभट आर अन्य जे हमरा संग आयल छथि, ओ सेनापति शिखरसेनक माध्यमसँ सेवामे प्रविष्ट भऽ गेल। ओ हमरा एहन निवेदन केलक कि ओ सेवामे मन्त्री राक्षसक माध्यमसँ प्रविष्ट नहि भेल। किएक तँ हम स्वयं सेवा करबाक योग्य राजा छी, जकर गुणसँ मनुष्य आकर्षित होइत अछि, जखन कि चन्द्रगुप्त दुष्ट मन्त्रीक अनुयायी छल। हम बहुत विचार केलहुँ मुदा ओकर आशय नहि समझि पाएलहुँ। भागुरायण: प्रभु, ई सरल अछि। कोनो राजगुणसम्पन्न, उद्यमशील राजाक सेवा करबाक लेल हुनकर हितैषी मित्रक माध्यमसँ सेवा प्रवेश करबाक चाही। ई उचित मार्ग अछि। मलयकेतु: मुदा, मित्र, राक्षस तँ हमर सर्वश्रेष्ठ हितैषी अछि। भागुरायण: आह, सेहो अछि। राक्षसक शत्रुता चाणक्यसँ अछि, चन्द्रगुप्तसँ नहि। एहि लेल होइत कि चन्द्रगुप्त, सफलतासँ गर्वित चाणक्यसँ असहनशील होइक हुनका मन्त्री पदसँ हटा देइत, आर राक्षस तखन अपन नन्द वंशीय सन्तान होइक नन्द परिवारक प्रेमवश, आर मित्रसभक मान करैत, हुनकासँ मैत्री करि सकैत अछि। एहि दशामे ओ प्रभुक विश्वासघात करि सकैत अछि। ई हुनकर कथनक आशय अछि। मलयकेतु: ठीक कहलहुँ। आब हमरा मन्त्री राक्षसक निवासक बाट देखाउ। भागुरायण: ए दिस, प्रभु। (मन्त्रीक निवासक पास पहुँचिक) - हम मन्त्रीक निवास पर पहुँचि गेल छी। प्रवेश करू, प्रभु। मलयकेतु: हम करैत छी। राक्षस (मनहि-मन): अरे! हमरा मोन आयल। (प्रकट) - भलामानुस! अहाँ पाटलिपुत्रमे बार्ड स्तनकलशक भेंट केनहुँ? करभक: हँ, प्रभु, भेटलहुँ। मलयकेतु (ई बात सुनि): मित्र भागुरायण! ओ लोक पाटलिपुत्रक कार्य पर चर्चा करैत छथि। हम मन्त्रीक पास नहि जाएब। हम रुकि सुनब। किएक तँ मन्त्री सभासदसभक भयसँ राजाक सोझाँ एक प्रकारे कहैत छथि, आर अपन लोकसँ निर्बाध वार्तामे दोसर प्रकारे। भागुरायण: प्रभुक आज्ञा जेना। राक्षस: ओ कार्य सफल भेल? करभक: प्रभुक कृपासँ, सफल भेल। मलयकेतु: ओ कार्य की छल, मित्र? भागुरायण: मन्त्रीक कार्य अति गहन अछि। एकर निर्णय एहि अवस्थामे कहनाइ कठिन अछि। प्रभु चुपचाप सुनू। राक्षस: हम सभ विवरण सुनबाक चाहैत छी। करभक: सुनू, प्रभु। प्रभुक आदेश छल जे हम पाटलिपुत्र गेल जाए, आर बार्ड स्तनकलशकेँ कहू कि जखन चाणक्य चन्द्रगुप्तक आदेशक विरुद्ध जाएत, तखन ओ चन्द्रगुप्तकेँ भड़काबैत पद्य सुनाए। राक्षस: आगाँ कहू। करभक: हम ताहि अनुसार पाटलिपुत्र गेलहुँ आर बार्ड स्तनकलशकेँ प्रभुक आदेश सुनौलहुँ। ओ समय नन्द परिवारक विनाशसँ दुखी जनताक प्रसन्न करबाक हेतु चन्द्रगुप्त कौमुदी महोत्सव मनाबाक आदेश देलनि। बहुत दिन बाद प्रिय सम्बन्धीसँ भेंट जेकाँ प्रिय ई महोत्सव जनतासँ स्वागत भेल। राक्षस (उच्छ्वास लैत): हाय! राजा नन्द! अहाँ बिना कौमुदी महोत्सव केनाक? जे संसारमे राजसभक चन्द्र जेकाँ प्रिय छलाह, यद्यपि रात्री कमल विकसित करबाक लेल भौतिक चन्द्र अछि, आर जनताक प्रसन्न करबाक लेल मौर्य चन्द्र अछि। करभक: ओ महोत्सव - जे जनताक दृष्टिसँ अति प्रिय छल - दुष्ट चाणक्य द्वारा राजाक इच्छाक विपरीत रद्द करि देल गेल। ओ समय स्तनकलश चन्द्रगुप्तकेँ भड़काबैत पद्य गाबलक। राक्षस: ओ की छल? करभक: "जेना राजा सिंह, जे सृष्टिकर्ता द्वारा स्वाभिमानक भण्डार जेकाँ बनौल गेल अछि, अपन जबड़ा तोड़बा सहन नहि करैत... तेना मनुष्य राजा सेहो..." आर "आभूषण आदि धारण करबा मात्रसँ राजा नहि बनल जाइत। ओहि राजा कहल जाइत अछि, जकर कोनो आदेशक उल्लङ्घन नहि करैत।" राक्षस (प्रसन्न होइत): शाबाश, मित्र स्तनकलश! उचित समय पर बोएल गेल वियोगक बीज अवश्य फलबैत। सामान्य मनुष्य सेहो अपन उत्सवसँ वञ्चित करबा सहन नहि करि सकैत। तखन राजाक केनाय सहन करि सकैत अछि? मलयकेतु: बिल्कुल ठीक। राक्षस: आगाँ कहू। करभक: चन्द्रगुप्त अपन आदेशक उल्लङ्घनसँ क्रोधित भेल, आर तीखी बहसमे प्रभुक प्रशंसा करैत दुष्ट चाणक्यकेँ पदसँ हटाए देलक। मलयकेतु: मित्र भागुरायण! राक्षसक प्रशंसासँ चन्द्रगुप्तक ओर झुकाव प्रकट होइत अछि। भागुरायण: प्रभु! राक्षसक प्रशंसा नहि, चाणक्यक पदसँ हटाबनाइ मुख्य बात अछि। राक्षस: केवल कौमुदी महोत्सव निषेध चन्द्रगुप्तक चाणक्यसँ अप्रसन्नताक कारण अछि, वा कोनो दोसरो कारण? मलयकेतु: मित्र! ओ चन्द्रगुप्तक अप्रसन्नताक कोनो दोसर कारण खोजैत अछि? भागुरायण: चाणक्य विवेकी अछि। ओ थोर्रा बात लेल चन्द्रगुप्तक क्रोध नहि भड़काएत। चन्द्रगुप्त सेहो कृतज्ञ अछि। ओ एहि मात्र कारणसँ चाणक्यक सम्मानक सीमा नहि लाँघत। चन्द्रगुप्त आर चाणक्यक वियोग स्थायी होइबाक लेल बहुत कारण चाही। एहि लेल एहन भऽ रहल अछि। करभक: हँ, एहिसँ अलगो एक कारण अछि - चाणक्य युवराज मलयकेतु आर प्रभुक पलायनमे सहयोग केलक। राक्षस (प्रसन्नतासँ): मित्र शकटदास! आब चन्द्रगुप्त हमर पूर्ण वशमे अछि। शकटदास: आब चन्दनदास मुक्त होयत, प्रभु अपन पुत्र आर पत्नीक भेंट करत, आर जीवसिद्धि अपन कष्टसँ मुक्त होयत? भागुरायण (मनहि-मन): साचमे जीवसिद्धिक कष्ट आब समाप्त होयत! मलयकेतु: ओ की कहैत अछि, मित्र, जखन कहैत अछि कि 'चन्द्रगुप्त हमर वशमे अछि'? भागुरायण: आब चन्द्रगुप्त चाणक्यसँ अलग होइ गेल अछि। ओ हुनका अलग रखबाक कोनो कारण नहि देखैत। आर कोनो अर्थ होइत? राक्षस: भलामानुस! ओ व्यक्ति अखन कतय अछि, जे पदसँ हटाएल गेल अछि? करभक: प्रभु, ओ सेहो एतय अछि। राक्षस (बेचैनीसँ): ओ अखनो ठीक अछि? ओ प्रायश्चित्त वनमे नहि गेल, वा नया व्रत नहि केलक? करभक: प्रभु! ई चर्चा अछि जे ओ वनमे जाएत। राक्षस: मित्र शकटदास! ई असम्भव अछि। जे व्यक्ति राजा नन्दसँ अपमान सहन नहि करि सकल, ओ चन्द्रगुप्तसँ अपमान सहन करत जे हुनकर बनाएल राजा छी? मलयकेतु: मित्र! चाणक्यक वन गमन वा नया व्रत लेबाकसँ हुनकर कोन उद्देश्य सिद्ध होइत? भागुरायण: स्पष्ट अछि। हुनकर उद्देश्य तखन सिद्ध होइत जखर ओ दूर अछि। शकटदास: अपराध नहि मानू, प्रभु। ई सम्भव अछि। जे राजा शत्रुसभक माथि पएर रखि देवताक समान पूज्य भेल अछि, ओ अपन लोकक आदेश उल्लङ्घन कऽ सहन करत? चाणक्य, यद्यपि प्रकृतिसँ क्रोधी अछि, अपन सौभाग्यसँ एक व्रत समाप्त करि पुनः कठोर व्रत नहि लैत, किएक तँ ओ हिंसात्मक कर्मक कठिनाइ स्वयं अनुभव केनए अछि, आर भविष्यमे विफलताक भय राखैत अछि। राक्षस: सम्भव होइत। आब करभक आराम आर भोजन करू। जाउ। शकटदास: प्रभुक आज्ञा जेना। (शकटदास आर करभकक प्रस्थान) राक्षस: हम युवराजक शुभ समाचार सुनाब। मलयकेतु (राक्षसक पास बढ़ि): हम स्वयं मन्त्रीक दर्शन करबाक आयल छी। राक्षस (देखि): अरे! युवराज! (आसनसँ उठि) - प्रभु! ई आसन ग्रहण करू। मलयकेतु: हम करैत छी। मन्त्री सेहो आसन ग्रहण करू। (दुनू उपयुक्त आसन पर बैसैत अछि) मलयकेतु: मन्त्रीक शिरःपीड़ा ठीक अछि? राक्षस: जखन तक प्रभुक 'युवराज' शब्द 'सम्राट' सँ नहि बदलैत, तखन धरि कोना ठीक भऽ सकैत अछि? मलयकेतु: चूँकि मन्त्री ई कार्य स्वयं करबाक वचन देल छी, एहि लेल ई प्राप्त करब सरल अछि। आब हम कियाँ निष्क्रिय रहू? की हमर राजसभ शत्रुक कोनो दुर्बलताक प्रतीक्षा करैत अभियानक लेल तैयार छथि? राक्षस: आब देरी काकर लेल? प्रभु विजय अभियान पर निकलि सकैत छी। मलयकेतु: मन्त्री हमर शत्रुक कोनो दुर्बलता देखल अछि? राक्षस: हँ। मलयकेतु: की अछि ओ? राक्षस: आर कोनो नहि, मन्त्रीगत दुर्बलता। चन्द्रगुप्त चाणक्यसँ अलग भऽ गेल अछि। मलयकेतु: आदरणीय प्रभु! मन्त्रीगत दुर्बलता साचमे दुर्बलता छी। राक्षस: दोसर राजासभक क्षेत्रमे ई सत्य होइत, मुदा चन्द्रगुप्तक सम्बन्धमे नहि। मलयकेतु: मन्त्री! एहन नहि अछि। चाणक्यक दोष चन्द्रगुप्तक प्रजाक मात्र अप्रसन्नता पैदा करौलक। आब जखन ओ हटाएल गेल अछि, जे पहिने चन्द्रगुप्तसँ प्रेम करैत छल, ओ आब अधिक प्रेम करत। राक्षस: नहि, एहन नहि अछि। प्रजाक दो वर्ग अछि - चन्द्रगुप्तक समर्थक, आर नन्द परिवारक अनन्य भक्त। आब चाणक्यक दोष चन्द्रगुप्तक समर्थकक अप्रसन्नता पैदा करैत अछि, नन्द भक्तक नहि। ओ तँ चन्द्रगुप्तक नन्द परिवार नाश करबाक कृतघ्नतासँ क्रोधित अछि। ओ कोनो योग्य स्वामी नहि पाबि चन्द्रगुप्तक अनुसरण करैत अछि। आब ओ हमरा ओहि प्रभुक रूपमे पाबैत अछि, जकर शत्रु नाश करबाक शक्ति सभ स्वीकार करैत अछि। एहि लेल ओ शीघ्रे हुनका छोड़ि प्रभुक शरणमे आएत। प्रभु हमरो दृष्टान्त देखू। मलयकेतु: आदरणीय प्रभु! की केवल एहि एक कारणसँ चन्द्रगुप्त पर आक्रमण करबाक अछि, वा कोनो दोसरो अछि? राक्षस: दोसरको बहुत किछु अछि। मुदा ई सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अछि। मलयकेतु: ई सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कोना भेल, मन्त्री? आब चन्द्रगुप्त अहाँ कोनो दोसरो मन्त्री नियुक्त करि उचित उपाय नहि करि सकत? राक्षस: नहि, नहि, ओ नहि करि सकत। ई राजाक लेल सम्भव अछि जे स्वतन्त्र शासनक पक्षधर छथि। मुदा दुष्ट चन्द्रगुप्त मन्त्री-शासनक पक्षधर रहल अछि। एहि लेल ओ अहाँ उचित उपाय कोना करि सकत? जेना नवजात शिशु माताक स्तन पर निर्भर रहि किछु क्षण सेहो जीवित नहि रहि सकैत, तेना अनुभवहीन अज्ञानी राजा मन्त्री पर निर्भर रहि एक क्षण सेहो स्वतन्त्र नहि रहि सकैत। मलयकेतु (मनहि-मन): सौभाग्यवश हम मन्त्री-शासनक पक्षधर नहि छी। (प्रकट) - जँ एहनो अछि, तँ जे शत्रु पर मन्त्रीगत दुर्बलता आर आक्रमणक अन्य अनेक कारण होइत, ओ निश्चित सफल होइत। राक्षस: प्रभु निश्चिन्त रहू। प्रभु सभ दिशामे श्रेष्ठ अछि। पाटलिपुत्रक नगर नन्दक अनुरक्त अछि। चाणक्य चन्द्रगुप्तसँ विमुख अछि। मौर्य नवीन राजा अछि। आर हम छी - मात्र मार्ग बतौबिहारक कार्य हेतु। एहि परिस्थितिमे केवल प्रभुक आदेशक अभाव हमर सफलतामे बाधा अछि। मलयकेतु: जँ मन्त्री एहि समय अभियान लेल उचित मानैत छथि, तँ हम किहाँ निष्क्रिय रहू? हमर हाथीसभ, जे सिन्दूरसँ साचमे राताएल अछि, जे अत्यन्त उच्च कदक अछि, जे मद धारण करैत अछि, जे कृष्ण वर्णक अछि, जे बहुत जोरसँ गर्जन करैत अछि, आर दाँतसँ किनारा तोड़ैत अछि - ई नाम मात्रक सोना नदीकेँ - जे उच्च कूलक अछि, जल बहाबैत अछि, जकर दुबेर पातसँ काला अछि, जकर तरङ्ग मधुर अछि, आर जकर बहावसँ किनारा टूटैत अछि - सौ दिस बिखेरि देयत। आर - हमर हाथी दलक पंक्ति, गम्भीर गर्जना करैत, मदक धारा छोड़ैत, पाटलिपुत्रक नगर घेरि लेत, जेना मेघक पंक्ति विन्ध्य पर्वत पर जल बरसाबैत अछि। (मलयकेतु आर भागुरायणक प्रस्थान) राक्षस: कोनो सेवक अछि? प्रियम्वदक (प्रवेश करैत): आज्ञा करू, प्रभु। राक्षस: प्रियम्वदक! कोनो ज्योतिषी द्वार पर अछि? प्रियम्वदक: क्षपणक। राक्षस (अशुभ देखि): की? क्षपणक (घृणित देखाबला)? प्रियम्वदक: जीवसिद्धि। राक्षस: ओ तँ सुन्दर अछि। हुनका भेजू। प्रियम्वदक: प्रभुक आज्ञा जेना। (प्रस्थान) [क्षपणकक प्रवेश] क्षपणक - अर्हतसभक उपदेशक पालना करू, जे मोह रूपी रोगसँ पीड़ित व्यक्तिसभक ठीक करैत अछि, पहिने केवल ठीक उपदेश दैत अछि, मुदा अन्तमे हितकारी। (राक्षसक पास बढ़ि) - आदरणीय प्रभुक मोक्ष प्राप्त होउ। राक्षस: भन्ते! हमरा अभियान प्रस्थानक तिथि बताऊ। क्षपणक (थोर्रा विचार करि): आदरणीय प्रभु, हम तय करि देलहुँ। पूर्णिमाक दिन मध्याह्नसँ पश्चात् सभ प्रकारसँ शुभ अछि। नक्षत्र सेहो प्रभुक उत्तरसँ दक्षिण प्रस्थान लेल अनुकूल अछि। तहिना - बुध ग्रहक राशि प्रस्थानक समय लग्नमे अछि, सूर्य अस्तोन्मुख अछि, चन्द्रमा पूर्ण प्रकाशमे उदित होइत अछि, आर केतु ग्रहक अचानक उदय अस्त होइत अछि। राक्षस: भन्ते! तिथि सेहो आपत्तिजनक अछि। क्षपणक: आदरणीय प्रभु! तिथिक एक, नक्षत्रक चारि, आर चन्द्रक सौ गुना महत्त्व अछि। ई ज्योतिष शास्त्रक वचन अछि। अतएव बुध ग्रहक राशिक स्पर्शकाल शुभ मुहूर्त अछि। केवल भद्रा करणक अशुभ समयसँ बचू। चन्द्रक अनुकूलतासँ प्रभुक बहुत लाभ होयत। राक्षस: भन्ते! हम दोसर ज्योतिषीसभसँ सेहो पूछि लेब। क्षपणक: आदरणीय मन्त्री जे करैत अछि करू। हम जाइत छी। राक्षस: कोना भऽ गेल? भन्ते हमरासँ क्रोधित छी? क्षपणक: भन्ते अहाँसँ नहि क्रोधित छी। राक्षस: तँ कोन अछि? क्षपणक: मनुष्यक भाग्यक अधिदेवता क्रोधित छी। किएक तँ अहाँ विदेशी पर विश्वास करैत छी, आर अपन लोककेँ तिरस्कार करैत छी। (प्रस्थान) राक्षस: प्रियम्वदक! केकरो समय भेल? प्रियम्वदक (प्रवेश करैत): सूर्य अस्त होइबाक लगल अछि। राक्षस (आसनसँ उठि): साचमे सूर्य अस्त होइबाक लगल अछि। जेना उदयकालमे सूर्यक पूजा करनिहार वृक्षक छायाँ, जे सूर्यक उदय पर पश्चिम दिस हटि जाइत अछि, ओ सूर्य अस्त होइत अपन प्रभु परित्याग करैत अछि - तेना जखन स्वामी अपन महत्त्व खोइ देइत अछि, तखन सेवक सेहो हुनका त्यागि देइत अछि। (सभक प्रस्थान) पाँचम अंक [प्रवेश: सिद्धार्थक - एक मुद्रांकित पत्र आर आभूषणक कोष लऽ कऽ] सिद्धार्थक - हे भगवान! चाणक्यक नीति रूपी लता, जे समय आर स्थान रूपी घड़ासँ बुद्धि रूपी जलसँ सींचल जाइत अछि, उद्देश्य सिद्धि रूपी मूल्यवान फल धारण करबाक लगल अछि। एहि हेतु हम ई पत्र लऽ कऽ जाइत छी, जे आदरणीय चाणक्य पहिने शकटदाससँ लिखाएल छल, आर मन्त्री राक्षसक मुद्रिकासँ मुद्रांकित कयल गेल छल, आर ई आभूषण कोष सेहो ओहि मुद्रिकासँ चिह्नित अछि। हम पाटलिपुत्र जाबाक ढोंग करैत छी। (किछु कदम चलि एक क्षपणक देखि) - अरे! एक क्षपणक आबि रहल अछि। हम ओकर प्रतीक्षा करब। [क्षपणकक प्रवेश] क्षपणक - हम अर्हतसभक प्रणाम करैत छी, जे गहन ज्ञानसँ श्रेष्ठ मार्ग द्वारा एहि संसारमे निर्वाण प्राप्त करैत छथि। सिद्धार्थक - भन्ते! हम अहाँक प्रणाम करैत छी। क्षपणक - भन्ते! अहाँक मोक्ष प्राप्त होउ। (बारीक देखि) - भन्ते! अहाँ यात्रा पर निकलि रहल छी। सिद्धार्थक - भन्ते एहि कोना जानलहुँ? क्षपणक - जानबाक की अछि? ई पत्र जे अहाँकेँ जाएबाक लेल प्रेरित करैत अछि, एकर घोषणा करैत अछि। सिद्धार्थक - भन्ते ठीक जानलहुँ। हम दोसर स्थान पर जाइत छी। एहि लेल भन्ते, ई दिन केनाय छी? क्षपणक (हँसि) - अरे भन्ते! अहाँ मुण्डन कराबैत छी, आर नक्षत्र पूछैत छी! सिद्धार्थक - भन्ते! एहि म कोनो हानि अछि, देरी भेल तँ सेहो? जँ शुभ अछि तँ जाएब, नहि तँ घुरि जाएब। क्षपणक - भन्ते! आजकाल शुभ दिन होयत सेहो अहाँ मलयकेतुक शिविरसँ नहि निकलि सकैत छी। सिद्धार्थक - ई कोना भऽ गेल, भन्ते? कहू। क्षपणक - सुनू, भन्ते। पहिने एतय आवागमन निर्बाध छल। मुदा आब जखन पाटलिपुत्र निकट अछि, पारण पत्रक बिना कोनो शिविरमे प्रवेश वा निर्गमन नहि करि सकैत। एहि लेल जँ अहाँक भागुरायणसँ पारण पत्र अछि तँ सुरक्षित जाइ सकैत छी, अन्यथा रुकू, जाहिसँ रक्षक द्वारा हाथ-पएर बेड़ीमे हुनका न्यायालय न लेल जाउ। सिद्धार्थक - भन्ते नहि जानैत छी जे हम सिद्धार्थक छी? हम आदरणीय राक्षसक परिचारक छी। पारण पत्र बिना सेहो हमरा रोकैत केकरो शक्ति अछि? क्षपणक - भन्ते! अहाँ राक्षस वा पिशाच सेवक होयत, पारण पत्र बिना बाहर निकलैक कोनो उपाय नहि अछि। सिद्धार्थक - भन्ते हमरा क्षमा करू, आर हमर कार्य पर आशीर्वाद दिअ। क्षपणक - जाउ, भन्ते, हम अहाँक कार्य पर आशीर्वाद देइत छी। आब हम भागुरायणसँ पारण पत्र माँगब। (सभक प्रस्थान) इति विष्कम्भक (अन्तराल) [भागुरायणक प्रवेश - एक परिचारकक संग] भागुरायण (मनहि-मन) - आदरणीय चाण्यकक नीति केना आश्चर्यजनक रूपसँ परिवर्तनशील अछि! हम राजनीतिज्ञक तरीका पर आश्चर्य करैत छी, जे भाग्यक तरीका जेकाँ अनेक रूपक अछि। उद्देश्यक अनुसार कही ई तरीका एहन होइत अछि जे सरलसँ समझल जाइ सकैत अछि; कही ई एहन होइत अछि जे अति जटिल होइत; कही ई पूर्ण रूपसँ प्रकट होइत अछि; कही ई अदृश्य होइत अछि; कही एकर सुरागो मिलैत अछि; आर कही एकर लक्ष्य विशाल रूप धारण करैत अछि। (प्रकट) - भासुरक! युवराज इच्छा करैत छथि जे हम हुनकर निकट रहू। एहि लेल हमरा ई सार्वजनिक सभा मण्डपमे आसन ला दिअ। परिचारक - ई आसन अछि, प्रभु। अहाँ बैसि सकैत छी। भागुरायण (आसन ग्रहण करि) - जे कोनो पारण पत्र लेल मिलबाक चाहैत अछि, हुनका हमरा पास लाऊ। परिचारक - प्रभुक आज्ञा जेना। (प्रस्थान) भागुरायण - युवराज मलयकेतुकेँ धोखा देनाइ केना कठोर अछि, जे हमरा एतेक प्रेम करैत छथि! मुदा - जे व्यक्ति दोसरक सेवक अछि, अपन जन्मक कुलीनता, लज्जा, सन्मान आर अपन नामक मूल्य छोड़ि क्षणिक लाभक लोभसँ अपन देह हुनका बेचि चुकल अछि, ओ सोचबिचार करैत रहि उचित-अनुचितक विचार केकरा करैत अछि? [मलयकेतुक प्रवेश - एक द्वारपालिकाक संग] मलयकेतु (मनहि-मन) - अनेक संदेहसँ व्याकुल हमर मन राक्षसक विषयमे किछु निर्णय पर नहि पहुँचि रहल अछि। की ओ, नन्द परिवारसँ गहन अनुराग राखि, ओ परिवारक वंशज चतुर मौर्यसँ - जखन ओ चाणक्यक निकाल चुकल अछि - सन्धि करत? वा हमरा निरन्तर सेवा करबाक विचार करि अपन वचन पर अड़ल रहत? एहि प्रकार हमर मन सदिखन सन्देहमे रहैत अछि - जेना कुम्हारक चाक पर चढ़ल होइत। (प्रकट) - विजया! भागुरायण कतय अछि? द्वारपालिका - प्रभु! ओ एतय अछि। ओ शिविरसँ बाहर जाएबाक लेल पारण पत्र दैत अछि। मलयकेतु - विजया! तँ एतय स्थिर रहू, जखन तक हम ओ दुसर दिस देखैत ओकर आँखि न छोपि देब। द्वारपालिका - प्रभुक आज्ञा जेना। परिचारक (प्रवेश करैत) - प्रभु! एक क्षपणक पारण पत्र लेल अहाँसँ भेंट करबाक चाहैत अछि। भागुरायण - प्रवेश करू। परिचारक - प्रभुक आज्ञा जेना। (प्रस्थान) क्षपणक (प्रवेश करैत) - आदरणीय प्रभु! अहाँक मोक्ष प्राप्त होउ। भागुरायण (मनहि-मन) - अरे! ई राक्षसक मित्र जीवसिद्धि अछि। (प्रकट) - भन्ते! अहाँ राक्षसक कोनो कार्य पर जाइत छी, हमरा विश्वास। क्षपणक (कान बन्द करि) - हम ई पापक विचारक निवारण करैत छी। हम तँ ओतय जाएत छी जतय राक्षसक नाम नहि सुनल जाए। भागुरायण - भन्ते! अहाँ अपन मित्रसँ बहुत रुष्ट दिसैत छी। राक्षस की अहाँक अपराध कयल अछि? क्षपणक - आदरणीय प्रभु! राक्षस कोनो अपराध नहि कयल अछि। दुर्भाग्यवश हम स्वयं अपन दुर्भाग्य बनि गेल छी। भागुरायण - भन्ते! अहाँ हमरा उत्सुक करि रहल छी। मलयकेतु (मनहि-मन) - आर हमरा सेहो। भागुरायण - हम सुनबाक चाहैत छी। मलयकेतु (मनहि-मन) - हम सेहो। क्षपणक - अहाँ एहि सुनि कऽ करब? भागुरायण - जँ गुप्त अछि तँ छोड़ू। क्षपणक - गुप्त नहि अछि। भागुरायण - जँ गुप्त नहि अछि तँ बताऊ। क्षपणक - आदरणीय प्रभु! गुप्त नहि अछि। मुदा हम अहाँकेँ नहि बताएत। भागुरायण - तँ हम अहाँकेँ पारण पत्र नहि देब। क्षपणक (मनहि-मन) - ई जानबाक चाहैत अछि। एहि लेल उचित अछि जे हम ई बताएँ। (प्रकट) - जखन हम निवारण नहि करि सकैत, तँ बताबैत छी। सुनू, आदरणीय प्रभु! जखन हम पहिने पाटलिपुत्रमे रहैत छलहुँ, हम राक्षससँ मित्रता केलहुँ। ओहि बीच राक्षस गुप्त रूपसँ विषकन्याक प्रयोग करि सम्राट पार्वतेश्वरक हत्या करौलक। मलयकेतु (मनहि-मन)उच्छ्वास लैत) - हाय! हम की सुनैत छी? पिताक हत्या राक्षस कयलक, चाणक्य नहि? क्षपणक - तखन हमरा राक्षसक मित्र भेलाक कारण हत्यारा समझि दुष्ट चाणक्य हमरा अपमानित करि नगरसँ निर्वासित करि देलक। आब सेहो राक्षस, जे सभ प्रकारक राजनीतिक खेलमे निपुण अछि, एहन किछु करबाक प्रस्ताव रखैत अछि जे हमरा जीवनसँ सेहो निर्वासित करि देयत। भागुरायण - ई पापक कार्य राक्षस नहि, दुष्ट चाणक्य कयलक, जे हुनका वचन अनुसार आधा राज्य देनाइ नहि चाहैत छल। हम एहि बात सुनल छी। क्षपणक (कान बन्द करि) - भगवान बुद्ध हमरा पापसँ मुक्त करू। विषकन्याक नाम सेहो चाणक्यक कान पर नहि लागल छल। भागुरायण - भन्ते! ई अहाँक पारण पत्र लिहू। चलू, ई कथन युवराजक सोझाँ सेहो कहू। मलयकेतु (नोर सहित आगाँ बढ़ि) - मित्र! हम शत्रुक मित्र द्वारा कयल गेल कथन सुनलहुँ। ई पिताक हत्याक कष्टक दुगुना करि देइत अछि - जेना कान फाड़ि देइत अछि। क्षपणक (मनहि-मन) - अरे! दुष्ट मलयकेतु सभ सुनि गेल। हमर कार्य सिद्ध भेल। (प्रस्थान) मलयकेतु (आकाशमे देखि) - राक्षस! ई बहुत अनुचित अछि। अहाँ हमर पिताक हत्या केलहुँ, जे अहाँ पर विश्वास करि, अहाँकेँ अपन मित्र समझि, सभ किछु सौंपि निश्चिन्त छलाह, आर हुनकर पतनक संग हुनकर सम्बन्धीसभक नोर खसि गेल। राक्षस नामक छी, आर राक्षस कर्मक सेहो! भागुरायण (मनहि-मन) - आदरणीय चाणक्यक आदेश अछि जे राक्षसक प्राण बचाएल जाए। हम एहि प्रकार काज करब। (प्रकट) - हम प्रभुसँ अनुरोध करैत छी जे क्रोध नहि करू। आसन ग्रहण करू। हम प्रभुसँ किछु कहबाक चाहैत छी। मलयकेतु (आसन ग्रहण करि) - मित्र! अहाँ हमरा की कहबाक चाहैत छी? भागुरायण - प्रभु! राजनीतिक व्यवहार करनिहार व्यक्तिसभक क्षेत्रमे मित्र, शत्रु आर तटस्थक भेद राजनीतिक उद्देश्य पर निर्भर करैत अछि, आम लोक जेकाँ व्यक्तिगत रुचि पर नहि। ओ समय राजा पार्वतेश्वर राक्षसक दृष्टिसँ राजनीतिक रूपसँ एक मात्र बाधा छलाह, जे सर्वार्थसिद्धिक पुनर्स्थापनाक इच्छा रखैत छल, किएक तँ ओ चन्द्रगुप्तसँ अधिक शक्तिशाली छलाह। अतएव राक्षसक वास्तविक शत्रु राजा पार्वतेश्वर छलाह। एहि कारण ओ हुनका प्रति एहन कार्य केलक। एहि परिस्थितिमे हम एहि कार्यमे कोनो अति अपराध नहि देखैत छी। देखू, प्रभु! राजनीतिक उद्देश्यक अनुसार मित्रक शत्रु आर शत्रुक मित्र स्थापित करैत हुअो, राजनीति जेना व्यक्तिक पुनर्जन्म कराबैत अछि - जाहिमे पूर्व जन्मक सम्बन्ध भुलाएल जाइत अछि। एहि लेल प्रभु राक्षसक एहि कार्यक लेल निन्दा नहि करू, जखन तक नन्द साम्राज्य हस्तगत नहि होइत, तखन तक हुनका सन्तुष्ट रखू। ओकर बाद प्रभु स्वतन्त्र अछि - हुनका राखू वा हटाउ। मलयकेतु - मित्र! हम अहाँसँ सहमत छी। अहाँ ठीक कहलहुँ। किएक तँ मन्त्रीक वधसँ राज्यक अन्य अङ्ग अशान्त होयत, आर अन्ततः हमर सफलता खतरेमे पड़ि सकैत अछि। परिचारक (प्रवेश करैत) - प्रभुक विजय होउ। (भागुरायणक दिस मुड़ि) - प्रभु! प्रहरी नायक निवेदन करैत अछि कि पारण पत्र बिना शिविरसँ निकलैत एक व्यक्ति पकड़ल गेल अछि। ओ अपन पास एक पत्र रखैत अछि। अतएव प्रभु हुनकर परीक्षण करू। भागुरायण - हुनका भीतर लाऊ, भलामानुस! परिचारक - प्रभुक आज्ञा जेना। (प्रस्थान) [सिद्धार्थकक प्रवेश - बेड़ीमे, परिचारक पाछाँ-पाछाँ] सिद्धार्थक (मनहि-मन) - हम कर्तव्यनिष्ठाक भावना प्रणाम करैत छी, जे हमर जेकाँ लोगक पालक अछि - जे मिशनक गुण-दोषसँ मुख मोड़ि लैत अछि। परिचारक (भागुरायणक पास पहुँचि) - प्रभु! ई व्यक्ति अछि। भागुरायण (देखि) - भलामानुस! ई नव आयल अछि वा कोनोक सेवक? सिद्धार्थक - प्रभु! हम आदरणीय राक्षसक परिचारक छी। भागुरायण - तखन पारण पत्र बिना शिविरसँ केनाय निकलैत छी? सिद्धार्थक - हमर कार्यक तात्कालिकता अछि। भागुरायण - कोनो कार्यक तात्कालिकता एहन होइत जे राजादेशक अवज्ञा करा देइत? मलयकेतु - मित्र भागुरायण! पत्र लाऊ। भागुरायण (हाथसँ पत्र लैत) - ई पत्र अछि। (मुद्रा देखि) - एकर मुद्रामे 'राक्षस' अङ्कित अछि। मलयकेतु - खोलू, पन्ना पसराऊ, हमरा देखाउ। (भागुरायण पत्र खोलि युवराजकेँ देखाबैत अछि) मलयकेतु (पढ़ैत अछि) - "हस्ति" एक निश्चित व्यक्ति एक निश्चित स्थानसँ एक निश्चित स्थानमे एक निश्चित उच्चाधिकारीसँ निवेदन करैत अछि - "पत्रकर्ताक शत्रुसँ निपटि सत्यवादी अपन सत्य चरित्र सिद्ध केलक। वचनक पालना करैत हुअो ओ आब पत्रकर्ताक मित्रसभकेँ - जे सँधि करि चुकल अछि - हुनका वचन अनुसार पुरस्कार देनाइ अछि। ई मात्रा तक सन्तुष्ट भेला पर ओ, जकर सेवा करैत अछि, हुनकर शत्रुक नाश करि पत्रकर्ताक वास्तविक सेवा करत। हुनका मध्य ककरो शत्रुक हाथी, ककरो कोष चाही। कोनो दोसरक भूमि चाही। सत्यवादी व्यक्ति एहि बात भुलनिहार नहि अछि। आब पत्रकर्ता हुनका मोन दिलाबैत अछि। ओ आगाँँसँ स्वीकार करैत अछि जे पत्रकर्ता द्वारा भेजल तीन आभूषण हुनका प्राप्त भऽ गेल अछि। पत्र प्राप्तकर्ता पत्र सङ्ग पठित तुच्छ उपहार स्वीकार करू। विश्वासपात्र वाहक सिद्धार्थक मौखिक सङ्केत देयत।" मलयकेतु - ई पत्र केकर अछि, भागुरायण? भागुरायण - भलामानुस सिद्धार्थक! ई पत्र केकर अछि? सिद्धार्थक - प्रभु! हम नहि जानैत छी। भागुरायण - केना? रे धूर्त! अहाँ पत्र लऽ कऽ चलैत छी, आर नहि जानैत छी जे एकर कोन अछि? सभ छोड़ू, अहाँसँ मौखिक सङ्केत कोन लेत? सिद्धार्थक (भयसँ काँपैत) - प्रभु, अहाँ। भागुरायण - हम लेत छी? अहाँ की कहैत छी? सिद्धार्थक - प्रभु, अहाँ हमरा पकड़लहुँ - हम नहि जानैत की कहू। भागुरायण (क्रोधित) - अहाँ तुरन्त जानि जाएत। (परिचारकसँ) - भासुरक! हुनका लऽ कऽ जाउ, आर नीक जेकाँ कोड़ा लगाऊ, जखन तक ओ सभ न कहि देइत। परिचारक - प्रभुक आज्ञा जेना। (हुनका संग बाहर जाइत अछि आर पुनः प्रवेश करैत अछि) प्रभु! जखन हम एहि व्यक्तिको कोड़ा लगाबैत छलहुँ, तखन ओकर काँखसँ मुद्रा सहित ई बक्सा खसि गेल। भागुरायण (देखि) - एकर मुद्रा सेहो 'राक्षस' अछि। मलयकेतु - ई निश्चित रूपसँ पत्रक साथक उपहार होयत। एहि मुद्रा सेहो राखू, बक्सा खोलू, हमरा देखाउ। भागुरायण बक्सा खोलि युवराजकेँ देखाबैत अछि। मलयकेतु (देखि) - अरे! ई ओहि आभूषण अछि जे हम अपन शरीरसँ निकालि राक्षसक पठौने छलहुँ। ई स्पष्ट अछि। पत्र प्राप्तकर्ता चन्द्रगुप्त होयत। भागुरायण - सभ संशय तुरन्त समाप्त होयत। (परिचारकसँ) - भलामानुस! हुनका फिनाकोड़ा लगाऊ। परिचारक - प्रभुक आज्ञा जेना। (बाहर जाइत अछि आर सिद्धार्थक संग घुरि अछि) कोड़ा लगाएला पर ई व्यक्ति कहैत अछि जे ई बात युवराजकेँ स्वयं कहत। मलयकेतु - तँ कहू। सिद्धार्थक (युवराजक चरणमे खसि) - हम युवराजसँ अनुरोध करैत छी जे हमरा सुरक्षाक आश्वासन दिअ। मलयकेतु - जे स्वतन्त्र नहि अछि, ओ सुरक्षित अछि। आगाँ कहू, भलामानुस! सिद्धार्थक - युवराज कृपा करि सुनू। आदरणीय राक्षस हमरा ई पत्र देलथिन आर चन्द्रगुप्तक पास भेजलथिन। मलयकेतु - आब हम मौखिक सङ्केत जानबाक चाहैत छी। सिद्धार्थक - प्रभु! मन्त्री हमरा कहलथिन कि मौखिक सन्देश ई अछि - "कुलूतक राजा चित्रवर्मा, मलय देशक राजा सिंहनाद, काश्मीरक राजा पुष्कराक्ष, सिन्धुदेशक राजा सिन्धुशेण, आर पारसिकक राजा मेघाक्ष - ई पाँच म्लेच्छ प्रमुख हमर प्रिय मित्र अछि। हुनका मध्य पहिल तीन मलयकेतुक भूमि चाहैत अछि; दोसर दू हुनकर हाथी आर कोष चाहैत अछि। एहि लेल युवराज हुनका वचन अनुसार देल जाए। चाणक्यक बर्खास्तगी जेकाँ हमरा अति सन्तुष्टि देलक अछि।" मलयकेतु (मनहि-मन) - ई की अछि? चित्रवर्मा आर ई चारि हमरा विरुद्ध षड्यन्त्र करि रहल अछि? एहन अवश्य होयत। ओ सभ राक्षसक अति निकट अछि, एहि कारण एहन भऽ सकैत अछि। (प्रकट) - विजया! हम मन्त्री राक्षसक चाही। द्वारपालिका - प्रभुक आज्ञा जेना। (प्रस्थान) [राक्षसक प्रवेश - स्वयं तम्बूमे चिन्तित मुद्रामे, परिचारक संग] राक्षस (मनहि-मन) - सत्य कहू तँ हमर मन संशयसँ मुक्त नहि अछि, किएक तँ हमर सेनामे चन्द्रगुप्तक बहुत त्यागी सामिल अछि। किएक तँ - जे सेना लक्ष्यक प्राप्ति हेतु प्रमाणित दक्षता बला अछि, जे सुदृढीकरणसँ शक्तिशाली अछि, जे शत्रु तत्त्वसँ मुक्त अछि, आर एकर संग जे उद्देश्यक अनुकूल अछि - ओ विजय दिलाबैत अछि। मुदा जे सेनापति अप्रमाणित सेना पर निर्भर अछि, जे मित्र आर शत्रु दुनूसँ मिल करैत अछि, आर उद्देश्यक प्रतिकूल अछि - ओ पराजय भोगैत अछि। मुदा हमरा संशय करबाक आवश्यकता नहि अछि। हमर सेनामे जे त्यागी अछि, ओ पहिनेसँ विश्वास दिलाएल अछि। (प्रकट) - प्रियम्वदक! युवराजक अनुगामी म्लेच्छ प्रमुखसभकेँ हमर नामसँ कहू जे ओ अपन-अपन क्रमसँ मार्ग ग्रहण करू, किएक तँ हम प्रतिदिन पाटलिपुत्रक निकट आबि रहल छी। खस आर शबर प्रमुख सेना लऽ कऽ हमर पाछाँ आगाँ बढ़ू। यवन प्रमुख गान्धार प्रमुखक संग केन्द्रक रक्षा करू। शूरवीर शक प्रमुख हूण प्रमुखक संग पाछाँ रहू। आर शेष म्लेच्छ प्रमुखसभ - कुलूतक राजा आदि - युद्ध यात्राक क्रममे युवराज मलयकेतुक आसपास स्थित रहू। प्रियम्वदक - प्रभुक आज्ञा जेना। (प्रस्थान) द्वारपालिका (प्रवेश करैत) - प्रभुक विजय होउ। युवराज प्रभुका बुलाबैत छथि। राक्षस - भद्र महिला! किछु क्षण प्रतीक्षा करू। (पुकारैत) - अरे कोनो अछि? परिचारक (प्रवेश करैत) - आज्ञा करू, प्रभु। राक्षस - भलामानुस! शकटदासकेँ कहू कि युवराजक सोझाँ बिना सज्जा जेना उचित नहि अछि, किएक तँ युवराज हमरा आभूषण दे चुकल अछि। अतएव ओ क्रय कयल गेल तीन आभूषण मध्यसँ कोनो एक दिअ। परिचारक - प्रभुक आज्ञा जेना। (जाइत अछि आर एक आभूषण लऽ कऽ घुरैत अछि) प्रभु! ई आभूषण अछि। राक्षस (आभूषण धारण करि उठि) - भद्र महिला! राजमहलक बाट देखाउ। द्वारपालिका - प्रभु हमर पाछाँ आउ। राक्षस (मनहि-मन) - सत्ता पद निर्दोष सेवकक लेल सेहो भयक स्रोत अछि। पहिने स्वामीक भय रहैत अछि। तखन सेवकसभक भय मन पर प्रभाव डालैत अछि। तखनसँ उच्च व्यक्तिसभक स्थिति दुष्ट लोगक द्वेष उत्पन्न करैत अछि। उच्च व्यक्तिक मन उचित पतनक आशंकासँ भरल रहैत अछि। द्वारपालिका (किछु दूर चलि) - प्रभु, ई युवराज अछि। प्रभु आगाँ बढ़ू। राक्षस (युवराजक देखि) - आह, ओ एतय अछि। एकटक दृष्टिसँ सोझाँ देखैत, आर फिनो अपन चिन्तासँ दबल जेना चन्द्रक जेकाँ मुखकेँ हाथ पर टेकि रहल अछि। (पास पहुँचि) - युवराजक विजय होउ। मलयकेतु - आदरणीय मन्त्री! हम अहाँक प्रणाम करैत छी। ई आसन ग्रहण करू। (राक्षस आसन ग्रहण करैत अछि) मलयकेतु - हमरा दुःख अछि, आदरणीय प्रभु, जे हम अहाँकेँ एतेक देरी बाद देखैत छी। राक्षस - युद्ध यात्राक क्रम निर्धारण करबाक कारण हम युवराजक तिरस्कारक पात्र भेल छी। मलयकेतु - आदरणीय मन्त्री! हम जानबाक चाहैत छी जे अहाँ युद्ध यात्राक क्रम केना निर्धारित केलहुँ? राक्षस - प्रभु! ई युवराजक अनुगामी प्रमुखसभक हेतु निर्देश अछि। (पहिने कहल 'खस आर शबर प्रमुख' आदि पुनः दोहराबैत अछि) मलयकेतु (मनहि-मन) - अरे! ओहि प्रमुखसभ, जे हमरा मारि चन्द्रगुप्तक सेवा करबाक तैयार छी, हमरा आसपास रहबाक लेल कहल गेल अछि! (प्रकट) - आदरणीय प्रभु! कोनो पाटलिपुत्रसँ आयल अछि वा गेल अछि? राक्षस - प्रभु! दूतक आवागमनक आवश्यकता आब समाप्त भऽ गेल अछि। हम स्वयं किछु दिनमे ओतय जाएत छी। मलयकेतु (मनहि-मन) - हम जानैत छी। (प्रकट) - जँ एहन अछि तँ आदरणीय मन्त्री ई व्यक्तिको पत्र सहित केनाय भेजलहुँ? राक्षस (देखि) - अरे! ई तँ सिद्धार्थक अछि। सिद्धार्थक - हम निवेदन करैत छी, कोड़ा लगाएला पर... (अधूरा छोड़ि नीचा देखैत अछि) मलयकेतु - भागुरायण! ओ अपन स्वामीक सोझाँ भय वा लाजसँ नहि कहत। अहाँ स्वयं आदरणीय मन्त्रीकेँ कहू। भागुरायण - प्रभुक आज्ञा जेना। (राक्षसक दिस) - मन्त्री! ई व्यक्ति कहैत अछि जे अहाँ हुनका चन्द्रगुप्तक पास पत्र आर मौखिक सङ्केत सहित भेजलहुँ। राक्षस - भलामानुस सिद्धार्थक! ई सत्य अछि? सिद्धार्थक (लज्जासँ) - हँ, कोड़ा लगाएला पर हम एहन कहलहुँ। राक्षस - ई असत्य अछि। कोड़ा लगाएला पर मनुष्य की की नहि कहि देइत? मलयकेतु - मित्र भागुरायण! हुनका पत्र देखाउ। ओ अपन सेवकसँ मौखिक सङ्केत सुनत। भागुरायण - मन्त्री! ई पत्र अछि। राक्षस (मानसिक रूपसँ पढ़ैत) - युवराज! ई शत्रुक रचना अछि। मलयकेतु - ई आभूषण सेहो आदरणीय मन्त्री द्वारा पत्रक संग उपहार स्वरूप भेजल गेल अछि। तखन ई शत्रुक रचना केना भऽ सकैत अछि? राक्षस (बारीक देखि) - प्रभु! ई उपहार नहि अछि, ई ओहि आभूषण अछि जे प्रभु हमरा भेजल छलहुँ। हम ई आभूषण सिद्धार्थककेँ हुनकर अति सन्तोषजनक कार्यक पुरस्कार स्वरूप दे देलहुँ। भागुरायण - एतेक मूल्यवान आभूषण, आर सेहो प्रभुक अनुग्रह उपहार, एहन व्यक्तिकेँ देल गेल? मलयकेतु - आदरणीय मन्त्री पत्रमे लिखैत छी कि सिद्धार्थक मौखिक सङ्केत सेहो देयत। राक्षस - कोन मौखिक सङ्केत? हम पत्रक सेहो अस्वीकार करैत छी। मलयकेतु - तखन एकर मुद्रा केकर अछि? राक्षस - चतुर जालसाज मुद्रा सेहो बना सकैत अछि। भागुरायण - प्रभु! मन्त्री ठीक कहैत छी। (सिद्धार्थकसँ) - भलामानुस! ई पत्र के लिखलक? (सिद्धार्थक राक्षसक दिस असहाय देखि चुप रहैत अछि) भागुरायण - भलामानुस! फिना कोड़ा खाबाकसँ बचबाक चाही तँ उत्तर देयू। सिद्धार्थक - शकटदास लिखलथिन, प्रभु। राक्षस - जँ शकटदास लिखलथिन, तँ हमर लिखल जेकाँ। मलयकेतु - विजया! हम शकटदासकेँ चाही। भागुरायण (मनहि-मन) - आदरणीय चाणक्यक गुप्तचरसभ कोनो संदिग्ध परिणामक प्रस्ताव नहि करैत। हम ई काज करब। (प्रकट) - प्रभु! शकटदास मन्त्री राक्षसक सोझाँ कदापि नहि मानत कि ई हुनकर लिखल अछि। एहि लेल हुनकर दोसर कोनो लिखल मंगाएल जाए। हस्ताक्षरक समानता स्वयं निर्णय करि देयत। मलयकेतु (विजयासँ) - ओना करू। भागुरायण - प्रभु! मुद्रिका सेहो मंगाएल जाए। मलयकेतु (विजयासँ) - दुनू लाऊ। द्वारपालिका - प्रभुक आज्ञा जेना। (जाइत अछि आर घुरि अछि) प्रभु! ई शकटदासक लिखल अछि, आर ई मुद्रिका अछि। मलयकेतु (दुनूक तुलना करैत) - अक्षर सर्वथा समान अछि। राक्षस (मनहि-मन) - हँ, अक्षर सर्वथा समान अछि। की शकटदास, जे नश्वर सम्बन्धसँ प्रेम करैत अछि, अमर कीर्तिसँ नहि, अपन पत्नी-पुत्रक मिलनक लालसा रखैत अहो, स्वामि भक्ति भुलि गेल? कोनो सन्देह नहि अछि। ई मुद्रिका ओ अपन अङ्गुलीमे धारण करैत अछि। ई सिद्धार्थक हुनकर मित्र अछि। अतएव ई षड्यन्त्र सूचक पत्र निश्चित रूपसँ हुनकर अछि - जे हुनकर दोसर लिखलसँ प्रमाणित अछि। स्पष्ट अछि जे शकटदास अपन प्रिय सम्बन्धीसभक मिलनक लालसासँ स्वामीक प्रेम त्यागि, विरोध पैदा करबामे निपुण शत्रुसभसँ मिलि ई नीच कार्य केलक। मलयकेतु (राक्षसक दिस देखि) - आदरणीय मन्त्री! अहाँ अपन पत्रमे लिखैत छी जे अहाँ आदरणीय द्वारा भेजल तीन आभूषण प्राप्त केलहुँ। की ई हुनका मध्यसँ एक अछि? (बारीक देखि,(मनहि-मन) - ई ओहि आभूषण अछि जे हमर पिता पहिनन्थिन। (प्रकट) - आदरणीय मन्त्री! ई आभूषण अहाँ कियाँ प्राप्त केलहुँ? राक्षस - हम ई क्रय केलहुँ। मलयकेतु - विजया! अहाँ ई आभूषण पहिचानैत छी? द्वारपालिका (बारीक देखि उच्छ्वास लैत) - कोना नहि पहिचानत, प्रभु? ई आभूषण सम्राट पार्वतेश्वर पहिनन्थिन। मलयकेतु (उच्छ्वास लैत) - हाय! पिता! अहाँ जे हमर वंशक आभूषण छलाह, ई आभूषण - जे अहाँक योग्य छल - अहाँ धारण करैत छलाह। ई आभूषणसँ सज्जित भऽ अहाँ शरद सन्ध्या जेकाँ देखावैत छलाह - जे तारासँ जडित, अहाँक मुख चन्द्र जेकाँ दमकैत छल। राक्षस (मनहि-मन) - ओ कहलक पार्वतेश्वर पहिनन्थिन? तँ ई आभूषण हमरा ओहि व्यापारी बेचने छलाह, जे निश्चित रूपसँ चाणक्य द्वारा भेजल गेल छल। मलयकेतु - आदरणीय मन्त्री! जे आभूषण हमर पिता पहिनन्थिन, आर बादमे चन्द्रगुप्तक हाथ लागल छल, ओ क्रयसँ केना प्राप्त भऽ सकैत अछि? सम्भव अछि - अधिक लाभक लोभसँ चन्द्रगुप्त अहाँकेँ ओ आभूषण बेचने छल, आर अहाँ क्रूरतापूर्वक हमरे मूल्य चुकौलहुँ। राक्षस (मनहि-मन) - केना सप्रमाण लगाएल गेल अछि आरोप! पत्रक अस्वीकार करब उचित नहि होइत, किएक तँ एकर मुद्रा हमर अछि। आर कोनो केना विश्वास करत कि शकटदास हमर विश्वासघात केलक? तखन फिनो कोनो केना सम्भव समझत कि मौर्य राजा आभूषण पैसा लेल बेचलक? अतएव एहि परिस्थितिमे एक मात्र उचित उत्तर होइत - अपराध स्वीकार करब। मलयकेतु - हम आदरणीय मन्त्रीसँ पूछैत छी - राक्षस - आदरणीयसँ पूछू, युवराज! हम आब आदरणीय नहि छी। मलयकेतु - मौर्य अहाँक पूर्व स्वामीक पुत्र अछि, जकर अहाँ परम अधीनता करबाक चाही, आर हम अहाँक मित्रक पुत्र छी, जे अहाँक परम अधीनता करैत छी। अहाँ हुनकर आज्ञाक पालन करबाक चाही, आर हम अहाँक आज्ञाक पालन करैत छी। ओ अहाँकेँ जे दैत अछि देयत, हम अहाँसँ जे पाबैत छी पाबैत छी। हुनकर मन्त्री पद सेवा होयत, हमर सेवा सम्मानित स्वतन्त्रता। तखन अहाँक कोनो बड़ हित अछि जे एहन नीच कार्य करि रहल छी? राक्षस - युवराज! ई उल्टि बात अछि। आरोपक शब्दे निर्णय देयत अछि। (पुनः 'मौर्य अहाँक पूर्व स्वामीक पुत्र...' आदि कहैत अछि, सर्वनाम परिवर्तित करि) मलयकेतु (पत्र आर आभूषण कोषक दिस इशारा करि) - तखन ई सभ केकर कार्य अछि? राक्षस (उच्छ्वास लैत) - ई भाग्यक कार्य अछि। एहि भाग्य हमर बुद्धिमान, कुलीन, गुणग्राही स्वामी राजा नन्दक हत्या केलक - जकर दृष्टिमे हम - एक तुच्छ सेवक होएतो - राजपुत्रसभसँ वञ्चित नहि छलहुँ। ई सभ ओहि दुष्ट भाग्यक अगम्य कार्य अछि, जे मनुष्यक प्रयासक विफल करैत अछि। मलयकेतु (क्रोधित) - की? अखनो छुपाबैत छी? ई भाग्यक कार्य अछि, लोभक नहि? रे नीच कृतघ्न! अहाँ पहिने हमर पिताक - जे अहाँ पर विश्वास केनए छलाह - विषकन्याक द्वारा हत्या केलहुँ, आर आब धिक्कार अछि! अहाँ हमरा - जे अहाँकेँ राजमन्त्रीक सम्मान देलहुँ - हमरा मांस लेल शत्रुकेँ बेचैत छी! राक्षस (मनहि-मन) - ई कहैत छी - "फोड़ा पर व्रण"। (प्रकट) - हम पार्वतेश्वरक हत्याक निर्दोष छी। मलयकेतु - तखन हमर पिताक हत्या के केलक? राक्षस - भाग्यसँ पूछू। मलयकेतु - हम भाग्यसँ नहि, क्षपणक जीवसिद्धिसँ पूछब! राक्षस (मनहि-मन) - धिक्कार! जीवसिद्धि सेहो चाणक्यद्वारा वशमे करल गेल! हाय! शत्रु गुप्तक गुप्त रहस्य जानि गेल! मलयकेतु - भासुरक! सेनापति शिखरसेनक ई आदेश पहुँचा देय - "कुलूतक राजा चित्रवर्मा, मलय देशक राजा सिंहनाद, काश्मीरक राजा पुष्कराक्ष, सिन्धुदेशक राजा सिन्धुशेण, आर पारसिकक राजा मेघाक्ष - ई पाँच प्रमुख, जे राक्षसक मित्रता कयलक, हमरा मारि चन्द्रगुप्तक सेवा करबाक प्रस्ताव रखैत अछि। हुनका मध्य पहिल तीन हमर राज्य चाहैत अछि। हुनका गहर गड्ढामे जीवित गाड़ि देल जाए। दोसर दू हमर हाथी दल चाहैत अछि। हुनका हाथीसँ मारि देल जाए।" परिचारक - प्रभुक आज्ञा जेना। (प्रस्थान) मलयकेतु - राक्षस! हम अन्यायी राक्षस नहि छी; हम मलयकेतु छी। जाउ, आर पूर्ण रूपसँ चन्द्रगुप्तक सेवा करू। देखू - हम विष्णुगुप्त आर चन्द्रगुप्तकेँ अहाँ सहित - जे हमरा आक्रमण करबाक आयल छी - तुरन्त नष्ट करि सकैत छी, जेना दुष्ट नीति धर्म, अर्थ आर कामक नाश करैत अछि। भागुरायण! आब देरीक आवश्यकता नहि अछि। हमर सेना एहि घड़ी पाटलिपुत्र पर चढ़ि करि ओकर घेराबन्दी करू। हमर सेनाक घोड़ाक खुरक धूल, हाथीक मद धारासँ पृथ्वीसँ उड़ि, शत्रुक माथि पर गिरत, गौड़ स्त्रीसभक गालकेँ - जे लोध्र पुष्प परागसँ श्वेत छी - काला करैत, आर हुनकर काला घुंघराला केशक कान्ति धूमिल करैत। (मलयकेतु आर भागुरायण सहित सेवकसभक प्रस्थान) राक्षस (व्याकुल होइत) - हाय मोही! ओ सभ - चित्रवर्मा आर चारि - सेहो मारल गेल! ई की अछि? राक्षस जे किछु करैत अछि, ओ मित्रक नाश करैत अछि, शत्रुक नहि! तखन हम दुर्भाग्यशाली मनुष्य की करू? की प्रायश्चित्त वनमे जाएब? नहि, हमर प्रतिशोधी मन प्रायश्चित्तसँ शान्त नहि होयत। की हमर स्वामी नन्दक पाछाँ परलोक जाएब? नहि, शत्रु जीवित रहैत एहन करब स्त्री जेकाँ होयत। की तखन तरुआरि एक मात्र साथी बनाए शत्रु सेना पर टूटि पड़ू? नहि, ई सेहो उचित नहि होयत, किएक तँ हमरा चन्दनदासक मुक्ति कराबाक उत्सुक हृदय एहिसँ रोकत। जँ नहि करत तँ कृतघ्नता होयत। (राक्षसक प्रस्थान) छअम अंक [प्रवेश: सिद्धार्थक - मूल्यवान उपहारसभसँ सज्जित, प्रसन्न मुद्रामे] सिद्धार्थक - कृष्णक गौरव होउ, जे काला बादल जेकाँ केशी नामक राक्षसक नाश केलक। चन्द्रगुप्त चन्द्रक सेहो गौरव होउ, जे मनुष्यक नेत्रक आनन्दित करैत छथि। आर सभसँ अधिक आदरणीय चाणक्यक नीतिक गौरव होउ, जे विजय कार्यक पूर्ण केलक, जकर द्वारा शत्रुक सर्वनाश भऽ गेल। आब हम बहुत दिन बाद अपन प्रिय मित्र समृद्धार्थकक भेंट करब। (किछु कदम चलि आगाँ देखैत अछि) [समृद्धार्थकक प्रवेश] समृद्धार्थक - भाग्य मनुष्यकेँ तखन पीड़ा देइत अछि जखर ओ अपन प्रिय मित्रसँ बिछुड़ल रहैत अछि - मद्यपान आर उत्सव परिवारिक समागममे पीड़ादायक स्मृति सदा सतावैत अछि। हम सुनैत छी जे हमर प्रिय मित्र सिद्धार्थक मलयकेतुक शिविरसँ आबि पहुँचल अछि। हम हुनका खोजब। (किछु कदम चलि आगाँ देखैत अछि) अरे! ई सिद्धार्थक अछि। सिद्धार्थक (समृद्धार्थकक पास बढ़ि) - मित्र! आशा अछि अहाँ कुशल छी? (दुनू गले मिलैत अछि) समृद्धार्थक - जखन अहाँ आबि हमरा घर नहि आवैत छी, यद्यपि अहाँक आज प्रातः आगमन भऽ गेल, तखन कुशल केना भऽ सकैत अछि? सिद्धार्थक - मित्र! हमरा क्षमा करू। ज्योंहि आदरणीय चाणक्य हमरा देखलथिन, तत्काल हमरा आदेश देलथिन - "अरे सिद्धार्थक! जाउ आर हर्षक समाचार महाराज आदरणीय चन्द्रकेँ सुनाउ।" एहि लेल हम हुनका समाचार सुनौलहुँ, आर एहि कारण ई राजसी उपहार प्राप्त केलहुँ। तत्पश्चात सीधा हमर प्रिय मित्रक भेंट करबाक लेल अहाँक घर आबि पहुँचलहुँ। समृद्धार्थक - मित्र! जँ हम सुनि सकैत छी, तँ ओ हर्षक समाचार की छल जे अहाँ आदरणीय चन्द्रकेँ सुनौलहुँ? सिद्धार्थक - मित्र! एहन की अछि जे अहाँ नहि सुनि सकैत छी? बस सुनू। दुष्ट मलयकेतु, आदरणीय चाणक्यक राजनीतिक चालसँ भ्रमित भऽ, राक्षसकेँ निकालि देलक, आर तुरन्त चित्रवर्मा आदि पाँच प्रमुख म्लेच्छ प्रमुखसभक हत्या करि देलक। तखन शेष प्रमुख, हुनका विचारहीन आर क्रूर देखि, शिविर छोड़ि अपन-अपन क्षेत्रमे चलि गेल, आर हुनकर सेना सेहो - जे अचानक भयभीत आर शीघ्र प्रस्थान करबाक इच्छुक छल - ओहि प्रकार चलि गेल। तत्पश्चात भद्रभट, पुरुदत्त, दिङ्गरात, बलगुप्त, राजसेन, भागुरायण, रोहिताक्ष आर विजयवर्मा मलयकेतुकेँ पकड़ि लेलक। समृद्धार्थक - मित्र! लोकमे चर्चा अछि जे भद्रभट आर हुनकर साथी, हमर प्रभु आदरणीय चन्द्रसँ असंतुष्ट होइ, मलयकेतुक सेवामे प्रविष्ट भऽ गेल छल। तखन ई की भऽ गेल? एक प्रकारसँ शुरू, दोसर प्रकारसँ समाप्त - जेना अनाड़ी नाटककारक नाटक! सिद्धार्थक - मित्र! आदरणीय चाणक्यक तरीका अगम्य अछि, भाग्यक तरीका जेकाँ। हम केवल नतमस्तक छी। समृद्धार्थक - बिना कहू, तखन आगाँ की भेल? सिद्धार्थक - तत्काल आदरणीय चाणक्य चुनल सैनिकक बड़ दल लऽ कऽ बाहर निकललथिन, आर बिना प्रमुख रहल सम्पूर्ण म्लेच्छ सेनाक कब्जा करि लेलथिन। समृद्धार्थक - ओ सेना कतय अछि, मित्र? सिद्धार्थक - ओ आबि रहल अछि। सुनू - हाथी - जे जलधारा बला बादल जेकाँ देखावैत अछि - हाथी मदसँ प्रसन्न होइ गर्जन करैत अछि। देखू! घोड़ा - सज्जित साज-सामानसँ युक्त - कोड़ा लगबाक भयसँ अपन पाछिला भाग काँपैत उछलैत अछि। समृद्धार्थक - ई सभ ठीक अछि, मित्र! मुदा आदरणीय चाणक्य, जे सार्वजनिक रूपसँ एहन निर्विवाद रूपसँ मन्त्री पद त्यागि चुकल छल, पुनः ओहि पद पर केना पहुँचल? सिद्धार्थक - आब अहाँ आदरणीय चाणक्यक नीतिक भूलभुलैया सुलझाबाक चाहैत छी, जे मन्त्री राक्षस सेहो नहि सुलझा सकल - आर अहाँ साधारण बुद्धि बला अहाँ! समृद्धार्थक - मित्र! मन्त्री राक्षस अखन कतय अछि? सिद्धार्थक - हुनकर कथा एहन अछि - ओ तत्काल मलयकेतुक शिविर छोड़ि, उदुम्बर नामक गुप्तचरक पाछाँ करैत, एहि नगरक दिस घुरल। ई बात आदरणीय चाणक्य कहलथिन। समृद्धार्थक - मित्र! जे प्रबल संकल्पसँ नन्द साम्राज्य पुनः प्राप्त करबाक निकलल छल, ओ मन्त्री राक्षस अपन उद्देश्य बिना पाटलिपुत्र घुरि किहाँ आबि रहल अछि? सिद्धार्थक - मित्र! मोन अछि चन्दनदासक प्रति हुनकर प्रेम। समृद्धार्थक - तँ अहाँ आशा करैत छी जे चन्दनदास मुक्त होयत? सिद्धार्थक - ओ दुर्भाग्यशाली व्यक्तिक मुक्ति केना भऽ सकैत अछि? आदरणीय चाणक्यक आदेश अछि जे हम दुनू तत्काल हुनका बधिक स्थानमे लऽ जाएब आर ओकर सूली चढ़ा देब। समृद्धार्थक (क्रोधित) - आदरणीय चाणक्य चाण्डाल (सूली चढ़ाबिहारी) पर सवार भऽ गेल छथि जे हमरा ई पापक काज करबाक आदेश देइत छथि? सिद्धार्थक - मित्र! ई संसारमे जे प्राण प्यार अछि, आदरणीय चाणक्यक आदेशक कोनो विरोध करि सकैत अछि? आओ एहि लेल हम चाण्डालक वेश धारण करि चन्दनदासकेँ बधिक स्थान पर लऽ चलू। (दुनूक प्रस्थान) इति विष्कम्भक (अन्तराल) [रस्सी हाथमे लऽ एक व्यक्तिक प्रवेश] व्यक्ति - चाणक्यक नीति रूपी रस्सीक गौरव होउ, जे षड्गुणक डोरसभसँ गुँथलाक कारण बहुत मजबूत अछि, आर राजनीतिक चालसभक शृङ्खलासँ बनल फन्दासँ युक्त अछि, जे शत्रुकेँ पकड़बाक लेल तैयार अछि। (किछु दूर चलि चारिहू दिस देखैत अछि) ई ओहि स्थान अछि, जे गुप्तचर उदुम्बर द्वारा आदरणीय चाणक्यकेँ बतौल गेल छल, जतय आदरणीय चाणक्यक आदेशानुसार हम मन्त्री राक्षसकेँ देखब। (आगाँ देखैत अछि) अरे! ई मन्त्री राक्षस अछि। ओ एहि दिस अपन मुख ढकि आबि रहल अछि। हम ई वीरान उद्यानक वृक्षसभक पाछाँ छिपि जाएब आर देखब कि ओ कतय बसैत अछि। (ओ जाइत अछि आर वृक्षसभक पाछाँ छिपि जाइत अछि) [राक्षसक प्रवेश - तरुआरि सहित, वैसहि जेना वर्णन कयल गेल अछि] राक्षस (नोर सहित) - हाय! केना दुःखद अछि! राजलक्ष्मी, अपन स्वामीसँ वञ्चित भऽ सशंक होइ, दोसर स्वामी खोजि लेलक, आर जनता, अपन प्रेम भुलि, हुनकर संग चलि गेल, जेना बालक पुनर्विवाहित माताक अन्धानुकरण करैत अछि। विश्वासपात्र अनुयायी सेहो, अपन वीर प्रयासक फल नहि पाबि, उद्योगक जुआ छोड़ि देलक - आर कोनो गति नहि? शरीरक अङ्ग बिना मस्तक लम्बा समय धरि नहि टिकैत। तहिना - जेना बेशर्म वृषाल स्त्री, राजा नन्दकेँ - जे कुलीन वंशक छलाह - अचानक छोड़ि, वृषाल चन्द्रगुप्तकेँ वरण करि ओहिसँ चिपटि गेल अछि। हम एतय की करि सकैत छी? केओ प्रयास करू, भाग्य शत्रु जेकाँ हमर प्रयासक विफल करैत अछि। किएक तँ - जखन सम्राट नन्द अकस्मात् परलोक सिधारलाह, तखन हम पर्वत पर्वतराज शक्तिशाली प्रमुखक सहायतासँ प्रयास केलहुँ; जखन ओ मारल गेलाह, तखन हुनकर पुत्रक सहायतासँ प्रयास केलहुँ; मुदा विफलता हमर भाग्यमे छल। निश्चय नन्द परिवारक शत्रु भाग्य अछि, ब्राह्मण चाणक्य नहि। मलयकेतुक केना दुःख करू जे ओ विवेकशून्य भेल! हम राक्षस - स्वस्थ सशरीर, अपन मृत स्वामीक सेवा करैत - शत्रुसँ सन्धि केना करितहुँ? एहि प्रकार विवेकशून्य म्लेच्छ सभ किछु नहि देखलक। आश्चर्य नहि अछि - भाग्य द्वारा विनाशक मुखमे जकर मृत्यु निश्चित अछि, ओकर बुद्धि सभ किछु विपरीत देखैत अछि। एहि लेल अखन सेहो ओ शत्रुक हाथ पड़ि मरत, मुदा राक्षस चन्द्रगुप्तसँ सन्धि नहि करत। किएक तँ अपन स्वार्थ हेतु वचन तोड़ब अति बड़ कलंक अछि, मुदा शत्रु द्वारा पराजित भेलमे कोनो कलंक नहि अछि। (नोर सहित चारिहू दिस देखैत अछि) ई पाटलिपुत्रक ओहि भाग अछि, जे सम्राट नन्दक विचरणसँ पवित्र भेल अछि। एहि स्थान पर सम्राट पहिने घोड़ा पर सवार, लगाम ढीला छोड़ि, धनुष तानि चलैत लक्ष्य पर बाण मारैत छलाह। उद्यानक ओ क्षेत्रमे ओ रुकैत छलाह, आर ओतय वार्ता करैत छलाह। पाटलिपुत्रक ई भाग, आब हुनका बिना एहन चोरी चुपचाप देखैत, हमरा अति दुःखी करैत अछि। आब हम दुर्भाग्यशाली कतय जाएब? (चारिहू दिस देखैत अछि) बिना कहू, हमरा मोन आयल। ई वीरान उद्यान अछि। हम ओतय जाएब आर कोनोसँ चन्दनदासक समाचार सुनब। कोनो अपन भलाई-बुराई देखि सकैत अछि। हम जे पहिने राजा जेकाँ शानसँ, हजार प्रमुखसभसँ घिरल, नगरक जनता द्वारा नवीन चन्द्र जेकाँ अङ्गुलीसँ देखाएल, नगरसँ निकलल छलहुँ, आज उल्टा ओहि नगरक ई उजाड़ उद्यानमे चोर जेकाँ डरसँ अकेला हड़बड़ीमे प्रवेश करैत छी, सभ प्रयासमे विफल! मुदा जे महान राजाक कृपासँ हम ओ सम्मान पाएत छलहुँ, ओ नहि रहल। (उद्यानमे प्रवेश करि चारिहू दिस देखैत अछि) हाय! करुण दृश्य! ई वीरान उद्यान शोचनीय दिसैत अछि। जेना परिवार - जकर कार्य विशाल छल - नष्ट भेल। जेना महल - जकर भवनसभ विशाल छल - ध्वस्त भेल। जेना सज्जनक हृदय - जे मित्र विनाशक शोकसँ जरि गेल - ओ तालाब सूखि गेल। जेना राजनीतिज्ञक योजना - जे प्रतिकूल भाग्यसँ निष्फल भेल - ई वृक्ष फलहीन अछि। आर जेना मूर्खक मन दुष्ट नीतिसँ ग्रस्त अछि - भूमि घाँससँ भरल अछि। तहिना - सर्पसभ, उच्छ्वासक रूपमे निःश्वास छोड़ैत, एतय वृक्षसभक डारक कटल भाग पर नागकञ्चुकक टुकड़ासँ पट्टी बाँधैत अछि, जे बड़े बड़े तिख्ण कुल्हाड़ीसँ काटल गेल अछि, आर परेवाक कूजन रूपी पीड़ाक क्रन्दन निकालैत अछि। ओ हुनकर दुःखमे सहानुभूति वश - किएक तँ ओ एकरासँ घनिष्ठतापूर्वक रहैत छल - ई करैत अछि। ईसँ अलग ई वृक्ष - बुरा दिन देखि दुर्दशाग्रस्त भेल अछि, आर छायाक हानिसँ उदास दिसैत अछि, जेना ओ श्मशान जाएबाक तैयारी करैत छथि - अपन प्रबल शोकसँ अन्तर जरि, सुखाबाक क्रिया तीव्र करि देबाक कारण। आब हम अपन पतन-अनुकूल ई टूटल पाथरक आसन पर किछु विश्राम करब। (बैसैत अछि आर सुनैत अछि) हम की सुनैत छी? ई अचानक कोन शोर अछि? ई नगाड़ा, भेरी आर शङ्खक ध्वनि, जे सुनबिहारीक कान ध्वस्त करि देइत अछि, ओ एतेक तीव्र अछि जे महलसभ द्वारा तुरन्त परावर्तित होइत अछि, जेना आकाशक विस्तार मापबाक उत्सुकतासँ दूर तक पसरैत अछि। (किछु विचार करि) हम समझलहुँ। ई बताबैत अछि कि राज्य - कि कीर्ति - मलयकेतुक कैद करबाक - (पीड़ासँ तोड़ि) हर्षित अछि। (उच्छ्वास लैत) हाय मोही! हमरा शत्रुक राज्याभिषेकक सूचना सुनबाक आर दृश्य देखबाक पड़ल। आब मोन अछि भाग्यक प्रयास हमरा ओकर पूर्ण अनुभव कराएत। [व्यक्ति] (मनहि-मन) - ओ बैसि गेल। आब हम ओहि प्रकार करब जेना आदरणीय चाणक्य हमरा निर्देश देलथिन। (ओ राक्षसक देखैत फन्दा अपन गर्दनमे डालैत अछि, जेना हुनका नहि देख रहल होइत) राक्षस (देखि) - ई की? ओ व्यक्ति आत्महत्या करैत अछि। निश्चय ओ सेहो हमर जेकाँ दुःखी होयत। बिना कहू, हम हुनका कहब। (पास पहुँचि) - भलामानुस! अहाँ की करैत छी? व्यक्ति (उच्छ्वास लैत) - हम जेना दुर्भाग्यशाली, प्रिय व्यक्तिक मृत्युसँ दुःखी होइ, ओहि काज करि रहल छी। राक्षस (मनहि-मन) - हम पहिनहि समझलहुँ जे ओ हमर जेकाँ दुःखी अछि। (प्रकट) - अहाँ दुःखमे हमर समान छी। एहि लेल जँ ई कोनो व्यक्तिगत रहस्य वा निजी आपदा नहि अछि, तँ हम सुनबाक चाहैत छी। व्यक्ति - ई कोनो व्यक्तिगत रहस्य वा निजी आपदा नहि अछि, प्रभु। मुदा हम आत्महत्यामे देर सहन नहि करि सकैत छी। प्रिय मित्रक मृत्यु हमरा शोकाकुल करैत अछि। राक्षस (उच्छ्वास लैत(मनहि-मन) - हाय मोही! ई व्यक्ति हमरासँ श्रेष्ठ अछि, किएक तँ हम अपन मित्रक पीड़ाक प्रति एतेक उदासीन छी! (प्रकट) - हम सुनबाक चाहैत छी, किएक तँ ई व्यक्तिगत रहस्य वा निजी आपदा नहि अछि। व्यक्ति - अहाँ हमरा अति दबाव देइत छी, प्रभु। एहि लेल हम अहाँकेँ बताबैत छी। एहि नगरमे जिष्णुदास नामक धनी मणिकार रहैत अछि। राक्षस (मनहि-मन) - जिष्णुदास चन्दनदासक अन्तरङ्ग मित्र अछि, हम जानैत छी। व्यक्ति - हमर ओ प्रिय मित्र - राक्षस (मनहि-मन)प्रसन्न होइत) - अरे! ओ हुनका 'प्रिय मित्र' कहलक। ओ घनिष्ठ रूपसँ सम्बन्धित अछि। एहि लेल ओ चन्दनदासक बारेमे जानैत होयत। व्यक्ति - जे किछु पास छल, सभ गरीब लोगकेँ देि नगर तुरन्त छोड़ि देलक, आगिमे झुलि मरबाक इच्छासँ। एहि लेल हम हुनकर दुःखद मृत्यु सुनबाक पहिने आत्महत्या करबाक लेल ई वीरान उद्यानमे आयल छी। राक्षस - अहाँक मित्र आगिमे कोना झुलैत अछि? की ओ असाध्य रोगसँ पीड़ित अछि, जे दवाक शक्तिसँ बाहर अछि? व्यक्ति - नहि। राक्षस - की ओ राजाक क्रोधसँ नष्ट भेल अछि, जे अग्नि आर विष जेकाँ घातक अछि? व्यक्ति - ओ सेहो नहि अछि। चन्द्रगुप्त जनता पर क्रूरता नहि करैत। राक्षस - की ओ दोसरक स्त्री पर आसक्तिसँ पीड़ित अछि, जे अगम्य अछि? व्यक्ति - भगवान पापसँ बचाऊ! ओ एहन अनुचित आचरणक सामर्थ्य नहि रखैत। राक्षस - तखन अहाँ जेकाँ, हुनकर कोनो मित्र असहाय अवस्थामे मरि रहल अछि? व्यक्ति - ठीक तँ एहन अछि, प्रभु। राक्षस (बेचैनी सँ(मनहि-मन) - चन्दनदास जिष्णुदासक प्रिय मित्र अछि। एहि लेल पूर्वक मृत्यु पश्चात्क आत्महत्याक कारण होयत। एहिसँ हमर हृदयमे किछु बेचैनी होइत अछि, जे हुनकर प्रति स्नेहसँ परिपूर्ण अछि। (प्रकट) - भलामानुस! हम सेहो अहाँक प्रिय मित्रक उत्तम कार्यक विस्तृत विवरण सुनबाक चाहैत छी। व्यक्ति - हम दुर्भाग्यशाली आत्महत्यामे अबाध रहि सकैत छी। राक्षस - भलामानुस! अहाँ सुनबाक योग्य कथा सुनाउ। व्यक्ति - जखन हम बिना उपाय छी, तँ कहैत छी। सुनू, प्रभु। राक्षस - भलामानुस! हम ध्यानसँ सुनैत छी। व्यक्ति - एहि नगरक पुष्प वर्गमे चन्दनदास नामक धनी मणिकार रहैत अछि। राक्षस (व्यथित होइ(मनहि-मन) - हाय! भाग्य हमर दुःखक जलबन्ध खोलि देलक। हे हृदय! आब अपन धैर्य बटोर। किएक तँ अहाँक समक्ष सुनबाक लेल अति पीड़ादायक बात अछि। (प्रकट) - हँ, भलामानुस! ओ स्थिर मित्र, महान आत्मा कहल जाइत अछि। हुनकर की बात? व्यक्ति - ओ एहि जिष्णुदासक प्रिय मित्र अछि। राक्षस - बिना कहू, आगाँ कहू। व्यक्ति - एहि लेल जिष्णुदास आज चन्द्रगुप्तसँ एहि निवेदन केलक, जेना प्रेमी मित्रक उचित अछि - राक्षस - की निवेदन? व्यक्ति - 'जँ महाराज आज्ञा देयत, हमरा उचित धन राशि अछि। कृपा करि हमर प्रिय मित्र चन्दनदासकेँ एकर बदलामे मुक्त करू।' राक्षस (मनहि-मन) - शाबाश जिष्णुदास! ई मित्रताक प्रमाण अछि। जे धनक लेल पुत्र माता-पिताक, आर माता-पिता पुत्रक विदेशी जेकाँ हत्या करैत अछि, जे धनक लेल मित्र मित्रसँ अपन स्नेह त्यागि देइत अछि, ओहि धनकेँ अहाँ संकटग्रस्त मित्रक लेल समर्पण करबाक प्रस्ताव केलहुँ। अहाँ व्यापारी वर्णमे उत्तम व्यापारी छी। अहाँक ई धन सार्थक भेल। (प्रकट) - एहन सुनि मौर्य की कहलक? व्यक्ति - एहन निवेदन पर चन्द्रगुप्त जिष्णुदाससँ कहलक - "हम चन्दनदासकेँ धनक लेल कैद नहि केल्ही, मुदा एहि लेल केल्ही जे ओ मन्त्री राक्षसक परिवार नहि सौंपैत, जे हम बार-बार माँगैत छी। जँ ओ सौंपि देइत, तँ मुक्ति। अन्यथा मृत्यु।" एहन कहि ओ चन्दनदासकेँ बधिक स्थान लऽ जाएबाक आदेश देलक। तखन जिष्णुदास नगर छोड़ि देलक,(मनहि-मन)कहैत - "अपन मित्र चन्दनदासक दुःखद अन्त सुनबाक पहिने हम आगिमे प्रवेश करब।" तत्पश्चात हम सेहो अपन मित्र जिष्णुदासक दुःखद अन्त सुनबाक पहिने आत्महत्या करबाक एहि वीरान उद्यानमे आयल छी। राक्षस - तखन चन्दनदासक सूली चढ़ा देल गेल? व्यक्ति - नहि, अखनो सूली नहि चढ़ल। ओकर अन्तिम क्षणमे सेहो बार-बार मन्त्री राक्षसक परिवार सौंपबाक कहल जाइत अछि; बार-बार ओ इन्कार करैत अछि, अपन मित्रक प्रति स्नेहमे अटल; एहि कारण हुनकर मृत्युमे देर होइत अछि। राक्षस (मनहि-मन)प्रशंसासँ) - शाबाश चन्दनदास! अहाँ सेहो हमर महान मित्र, जे शरणागतक शरण स्थल साबित भेल छी। अहाँने शिबिक नाम सेहो जीत लेलहुँ, जे शरणक रक्षासँ आबैत अछि। (प्रकट) - शीघ्र जाउ, भलामानुस, आर जिष्णुदासकेँ आगिमे प्रवेश करबसँ रोकू। हम चन्दनदासकेँ मृत्युसँ बचाएत। व्यक्ति - प्रभु, केना बचाएत? राक्षस (तरुआरि निकालि) - एहि साधनसँ - उद्योगक मित्र। ई तरुआरि, जे बादल रहित गगन जेकाँ वर्णक अछि, जे लड़ाईक प्रेमसँ शरीर पुलकित होइबाक रेखा जेकाँ - उज्जवल चमकक धारिया - धारण करैत अछि, जे युद्ध परीक्षामे अपन श्रेष्ठतासँ शत्रुक सामर्थ्य प्रमाणित करि चुकल अछि, ई हमर दाहिना भुजाक प्रिय साथी, मित्रक प्रेमसँ विक्षिप्त हमरा एहि साहसिक कार्यक लेल प्रेरित करैत अछि। व्यक्ति - प्रभु, हम निश्चयक भाषामे नहि कहि सकैत छी कि अहाँ आदरणीय मन्त्री राक्षस छी - जकर नाम मङ्गलकारी अछि - यद्यपि चन्दनदास नामक धनी मणिकारक प्राणरक्षा अहाँकेँ तेना प्रकट करैत अछि, किएक तँ अहाँ दुर्दशाग्रस्त भेल छी। एहि लेल हमरा अनुग्रह करि संशय दूर करू। (ओ राक्षसक चरणमे गिरैत अछि) राक्षस - भलामानुस! हम ओहि राक्षस छी साचमे, जे अपन प्रभुक विनाश अपन नेत्रसँ देखलक, अपन मित्रकेँ संकटमे लानलक, 'नीच' विशेषण पाएलक, आर अपन नाम दुर्भाग्यशाली बना लेलक। व्यक्ति (प्रसन्न होइ पुनः चरणमे खसि) - हे भगवान! हम जकर लालसा करैत छलहुँ, ओ हमरा प्राप्त भऽ गेल। राक्षस - उठू। देर नहि करू। जिष्णुदासकेँ कहू जे राक्षस एहि घड़ी चन्दनदासकेँ मृत्युसँ बचाबैत अछि। (ओ खिंचल तरुआरि सहित प्रस्थान करैत अछि - 'ई तरुआरि जे...' दोहराबैत) व्यक्ति - हम अनुग्रह चाहब, आदरणीय मन्त्री! हमरा किछु कहनाइ अछि। पहिने दुष्ट चन्द्रगुप्त आदेश देलथिन कि शकटदासकेँ सूली चढ़ाएल जाए। ओ कोनो द्वारा बधिक स्थानसँ बचा लेल गेल आर बाहर लेल जाएल गेल। तत्पश्चात दुष्ट चन्द्रगुप्त शकटदासक विरुद्ध अपन क्रोधक ज्वाला - जे धधकि रहल छल - सूली चढ़ाबिहारीक रक्तसँ बुझौलनि, जे पूछल गेल कि केनाय ओ लापरवाही केलक। तखनसँ जँ ओ सोझाँ वा पाछाँ कोनो अजनबी तरुआरि लऽ कऽ देखैत छथि, तँ तत्काल अपन सुरक्षाक चिन्तासँ अपराधीकेँ मारि डालैत छथि। एहि लेल जँ आदरणीय मन्त्री हाथमे तरुआरि लऽ कऽ जाएत, तँ ओ धनी मणिकार चन्दनदासक अन्त शीघ्र करि देयत। (प्रस्थान) राक्षस - एहि चाणक्यक नीतिक मार्ग केना दुर्बोध्य अछि! जँ शकटदास - जे हमरा उपस्थितिमे सञ्चालित छल - हमरा तक शत्रुक विश्वासपात्र द्वारा पहुँचाएल गेल, तँ ओ क्रोधसँ सूली चढ़ाबिहारीक हत्या केनाय केलक? जँ एहन नहि छल, तँ ओ पत्र केना बनौलक? एहि प्रकार विचार पर विचार करैत हमर मन किछु निर्णय पर नहि पहुँचि रहल अछि। (किछु विचार करि) ई तरुआरि चलाबैक समय नहि अछि, किएक तँ एहि स्थितिमे सूली चढ़ाबिहारी शीघ्र दण्ड देइत। राजनीतिक योजना समय बितला पर फलित होइत अछि। एतय हुनकर की उपयोगिता? तटस्थ रहबाक मनोवृत्ति सेहो उचित नहि अछि, किएक तँ हमर प्रिय मित्र हमर कारण ई भयानक मृत्यु भोगैत अछि। अरे, हम देखलहुँ। हम अपन प्राण अर्पित करि हुनका छुड़ाएब। (ओ तरुआरि दूर फेंकि देइत अछि) (प्रस्थान) सातम अंक [प्रवेश: सूली चढ़ाबिहारी वज्रलोमन] वज्रलोमन - हटू, सज्जन! हटू। दूर रहू। हाय रे! जँ अहाँ अपन प्राण, धन, पत्नी आर परिवार बचाबाक चाहैत छी, तँ राजनीतिक रूपसँ अहितकर - जे विष जेकाँ घातक अछि - सँ दूर रहू। तहिना - जँ कोनो शारीरिक रूपसँ अहितकर चीजक सेवन करैत अछि, तँ ओ अहाँ बीमार पड़ैत अछि वा मरि जाइत अछि। मुदा जँ कोनो राजनीतिक रूपसँ अहितकर चीजक सेवन करैत अछि, तँ सम्पूर्ण परिवार नष्ट होइत अछि। जँ अहाँ एकर सत्यता पर सन्देह करैत छी, तँ देखू! चन्दनदास आबि रहल अछि। ओ राजनीतिक रूपसँ अहितकर काज करबाक कारण बधिक स्थान पर लेल जाइत अछि। (ऊपर देखैत अछि) अहाँ की कहैत छी, सज्जनसभ? अहाँ पूछैत छी जे हुनकर मुक्तिक कोनो उपाय अछि? हँ, जँ ओ मन्त्री राक्षसक परिवार सौंपि देइत तँ मुक्ति अछि। (पुनः ऊपर देखैत अछि) अहाँ की कहैत छी? शरणागतक प्रति मान राखैत ओ अपन बचाओ लेल ई पापक काज नहि करत। तखन निश्चित जानू, सज्जनसभ, ओ मृत्यु भोगत। हुनकर उपचारक उत्सुक पूछताछसँ की लाभ? [चन्दनदासक प्रवेश - सूली चढ़ाबैक वेशमे, काँध पर शूल लऽ कऽ, हुनकर पत्नी आर पुत्रक संग, सूली चढ़ाबिहारी बिल्ववक्त्रक अनुगमनमे] पत्नी (नोर सहित) - धिक्कार! धिक्कार ओहि यमकेँ जे हमरा चोर जेकाँ मराबैत अछि, यद्यपि हमर परिवारमे तनिक सेहो अनौचित्यक सदा भय रहैत अछि। हँ, दुष्ट लोक पापसँ दूर रहनिहार आर पाप करनिहारक मध्य कोनो भेद नहि करैत। अन्यथा - धिक्कार अछि शिकारीसभकेँ, जे मृत्युक भयसँ मांस त्यागि घाँस पर जीवित रहनिहार निर्दोष हरिणक हत्या करबाक हठ राखैत अछि। (चारिहू दिस देखैत) - प्रिय जिष्णुदास! अहाँ हमरासँ केनाय नहि बोलैत छी? हाय, एहन समयमे (एहन अवस्थामे) निकट रहनिहार लोक दुर्लभ होइत अछि। चन्दनदास (उच्छ्वास लैत) - ओ हमर प्रिय एवं वन्दनीय मित्र अछि। ओ अपन दुःखी मुख नोरसँ भरल नेत्रसँ हमरा देखैत, अपन शरीर घसीटैत घरक दिस जाइत अछि। बिल्ववक्त्र - श्रीमान् चन्दनदास! अहाँ बधिक स्थान पर पहुँच गेल छी। एहि लेल अपन परिजनसभकेँ पाछाँ हटि जाएबाक कहू। चन्दनदास - आर्ये! पुत्रकेँ संग लऽ कऽ घुरि जाउ। आगाँ आबैक उचित नहि अछि। पत्नी (उच्छ्वास लैत) - प्रभु! अहाँ दोसर देश नहि, दोसर लोक जाइत छी। एहि समय सुशील पत्नीक घुरि जेनाइ उचित नहि अछि। चन्दनदास - आर अहाँक की निश्चय अछि, आर्ये? पत्नी - स्वामीक पदचिह्नक अनुसरण करि अपन कल्याण करबाक। चन्दनदास - आर्ये! ई विवेकपूर्ण निर्णय नहि अछि। अहाँकेँ ई बालकक देखभाल करबाक चाही। ओ अनुभवहीन अछि। पत्नी - भगवान हुनकर रक्षा करू। हे पुत्र! अपन पिताक अन्तिम बेर प्रणाम करू। पुत्र (चन्दनदासक चरणमे खसि) - पिता! आब हम की करब, जे पितृहीन भेल! चन्दनदास - पुत्र! चाणक्य रहित देशमे रहब। बिल्ववक्त्र - श्रीमान् चन्दनदास! शूल गाड़ि देल गेल अछि। आब तैयार होउ। पत्नी - हाय! कोनो वीर पुरुष हमरा बचाबय बला! चन्दनदास - आब की कानैत छी, आर्ये? संकटग्रस्तक दया करनिहार राजा नन्द स्वर्ग सिधारि गेलाह। वज्रलोमन - हे बिल्ववक्त्र! चन्दनदासकेँ पकड़। हुनकर लोक आपहि हटि जाएत। बिल्ववक्त्र - करैत छी, वज्रलोमन! चन्दनदास - भलामानुस! किछु क्षण रुकू। हम अपन पुत्रकेँ आलिङ्गन करू। (पुत्रकेँ आलिङ्गन करैत अछि आर मस्तक सुँघैत अछि) जखन मृत्यु निश्चित अछि, तँ पुत्र! मित्रक कार्यक निष्ठासँ विचलित नहि होएब, एहि मृत्युक स्वागत करब। पुत्र - पिता! हमरा ई कहबाक आवश्यकता अछि? ई हमर कुल परम्परा अछि। वज्रलोमन - आब पकड़, हम कहैत छी। (सूली चढ़ाबिहारी चन्दनदासकेँ पकड़ैत छि) पत्नी (छाती पीटैत) - हाय! कोनो वीर हमरा बचाबय बला! [राक्षसक प्रवेश - परदा हटाइ भीतर आबि] राक्षस - माडोइडोस, भद्र महिला! डरू नहि। अरे सूली चढ़ाबिहारीसभ! अहाँ चन्दनदासकेँ नहि मारू। यमराजक राज्यक बाट रूपी वधूक माल्य हमर गर्दनमे डालू - हमरा, जे पहिने अपन स्वामीक परिवारक विनाश देखलहुँ जेना शत्रुक परिवार होइत; जे अपन प्रिय मित्रक संकटक समयमे आरामसँ रहलहुँ जेना बड़ उत्सवक दिन होइत; आर जे अपन प्राण प्रिय राखलहुँ यद्यपि धोखा देल गेलाक लज्जा सहैत छलहुँ। चन्दनदास (राक्षसकेँ देखि उच्छ्वास लैत) - मन्त्री! ई की अछि! राक्षस - अहाँक उत्तम कार्यक अनुकरण अछि। चन्दनदास - अहाँ की केलहुँ? अहाँ हमर सभ प्रयास विफल करि देलहुँ। राक्षस - हम अपन उद्देश्य प्राप्त करैत छी। मित्र, हमरा दोष नहि देब। (सूली चढ़ाबिहारीसँ) भलामानुस! दुष्ट चाणक्यकेँ जा कहू। वज्रलोमन - की कहू? राक्षस - "ई हम छी, जकर कारण ओहि मनुष्यकेँ - जे पूजनीय अछि - वधक योग्य समझल गेल। हम शिबिक कीर्ति के बहुत क्षीण करि देलहुँ, किएक तँ हम एहि कलियुगमे - जखर मानव प्रवृत्ति विकृत भऽ गेल अछि - अपन जीवन देबाक कीमत पर दोसरक बचाएबाक बहुत बड़ कीर्ति अर्जित केलहुँ, आर अपन श्रेष्ठतासँ बुद्धक उत्तम कार्यकेँ सेहो अधिक नीक कार्यसँ पीछा छोड़ि देलहुँ।" वज्रलोमन - हे बिल्ववक्त्र! श्रीमान् चन्दनदासकेँ लऽ कऽ तँ किछु समय श्मशान भूमिक ओ वृक्षक छायामे प्रतीक्षा कर, जखन तक हम आदरणीय चाणक्यकेँ निवेदन नहि करैत छी जे मन्त्री राक्षस हमर हाथमे अछि। बिल्ववक्त्र - ठीक अछि, वज्रलोमन। जेना अहाँ कहैत छी। (ओ चन्दनदास, पत्नी आर पुत्रकेँ लऽ कऽ जाइत अछि) वज्रलोमन - आउ, मन्त्री! (राक्षसकेँ संग किछु दूर चलैत अछि) अरे कोनो द्वारपाल अछि? आदरणीय चाणक्यकेँ - जे नन्द परिवारक नष्ट करि मौर्य परिवारक स्थापना केलक - कहू। राक्षस (मनहि-मन) - हाय! एहन स्थितिमे सेहो हमरा ई सुनबाक पड़ि रहल अछि। वज्रलोमन - हमर हाथमे मन्त्री राक्षस अछि, जकर सभ बौद्धिक संसाधन आदरणीयक चालसभक सोझाँ विफल भऽ गेल। [चाणक्यक प्रवेश - केवल मुख दृश्यमान, शरीर बारीक कवचसँ ढकल] चाणक्य - भलामानुस! के हुनका जे - अपन बड़ ज्वाला वृत्तसँ लाल धधकैत अग्नि - तुरन्त वस्त्रमे बाँधलक? के हुनका जे - सदा चलैत वायुक जालसँ रोकलक? के हुनका जे - हाथीक मदसँ महकनिहार केसर बला सिंहकेँ पिञ्जरामे बन्द केलक? के हुनका जे - मगर आदिसँ भरल डरावनहार समुद्रकेँ भुजाक जोरसँ रोकलक? वज्रलोमन - आदरणीय प्रभु, अहाँ कयलहुँ, जे राजनीतिमे निपुण छी। चाणक्य - एहन नहि कहू, कहू नन्द परिवारक शत्रु भाग्य कयलक। राक्षस (मनहि-मन) - अरे! हमर सोझाँ ओ अछि - दुष्ट, नहि नहि, (हमरा कहबाक चाही) आदरणीय कौटिल्य। ओ समुद्र जेना सम्पूर्ण ज्ञानक खानि अछि। हमर द्वेष मात्र हुनकर गुणकेँ तुच्छ करैत अछि। चाणक्य (राक्षसकेँ देखि प्रसन्न होइत) - ई मन्त्री राक्षस अछि, ओ महान पुरुष - जे एतेक दिन धरि मौर्य सेनाक सैन्य उपकरणक भारी बोझसँ, आर हमर मस्तिष्कक योजना बनाबाक बोझसँ परेशान करि, निरन्तर जागरण करौलक (सेना आर हमर दुनू के)। (कवच उतारि राक्षसक पास बढ़ि) मन्त्री राक्षस! विष्णुगुप्त अहाँकेँ नमस्कार करैत अछि। राक्षस (मनहि-मन) - 'मन्त्री' शब्द आब हँसीक पात्र अछि। (प्रकट) - कृपा करि हमरा नहि छुएब, विष्णुगुप्त। हम चाण्डालक स्पर्शसँ अपवित्र छी। चाणक्य - मन्त्री राक्षस! ई व्यक्ति चाण्डाल नहि अछि। ई राजाक सेवक अछि। एकर नाम सिद्धार्थक अछि। अहाँ हुनका जानैत छी। ई मित्रताक वेशमे ओ पत्र लिखौलक, जे शकटदासकेँ द्वारा लिखल गेल छल - शकटदास दुर्भाग्यशाली ओकर बारेमे किछु नहि जानैत छल। ओ दोसर व्यक्ति सेहो राजाक सेवक अछि। एकर नाम समृद्धार्थक अछि। राक्षस (मनहि-मन) - सौभाग्यवश हमर मन शकटदासक बारेमे संदेहसँ मुक्त भेल। चाणक्य - संक्षेपमे कहू तँ - ओ भद्रभट प्रमुख असंतुष्ट लोक, ओ नकली पत्र, ओ उद्धारक सिद्धार्थक, ओ बिक्रीक लेल तीन आभूषण, ओ अहाँक मित्र क्षपणक, ओ वीरान उद्यानक दुःखी व्यक्ति, आर ओ मणिकार सरदारक भयानक यातना - ई सभ वृषलक इच्छासँ कयल गेल छल, अहाँ वीर पुरुषक भेंट करबाक हेतु। आर वृषाल अहाँकेँ देखबाक लेल आबि रहल अछि। देखू! ओ ओतय अछि। राक्षस (मनहि-मन) - हम किछु नहि करि सकैत छी। देखैत पड़त। [राजाक प्रवेश - परिजनसभ सहित] राजा (मनहि-मन) - जखनसँ आदरणीय गुरुजी बिना कोनो प्रहारक, इतनी भयंकर शत्रु सेनाकेँ पराजित करि देलक, हम किछु लज्जित अनुभव करैत छी। हमर बाण, जेना शोकसँ मुड़ि गेल मुख बला, किएक तँ हुनकर सहायता बिना इच्छित परिणाम प्राप्तिसँ लज्जित होइ, सदाक लेल तूणीरमे पड़ि रहबाक व्रत पालन करब। मुदा हमरा एहन नहि कहबाक चाही। व्यक्ति निश्चयहि अपन धनुष बिना सेहो शत्रुकेँ पराजित करि सकैत अछि, जँ हुनकर आदरणीय गुरु, जे सभ विषयमे सतर्क अछि, राज्यक सभ कार्यमे जागरुक रहैत अछि। (चाणक्यक पास पहुँचि) आदरणीय प्रभु! चन्द्रगुप्त अहाँकेँ नमस्कार करैत अछि। चाणक्य - वृषाल! हमर आशीर्वाद अहाँकेँ भऽ गेल। आब पूजनीय मन्त्री राक्षसकेँ प्रणाम करू। राजा (राक्षसक पास बढ़ि) - आदरणीय प्रभु! चन्द्रगुप्त अहाँकेँ नमस्कार करैत अछि। राक्षस (देखि(मनहि-मन) - ओ ई चन्द्रगुप्त अछि - जे यथासमय राज्य प्राप्त केलक जेना हाथी हाथी दलक नायकत्व प्राप्त करैत अछि - हुनकर श्रेष्ठता बाल्यकालहिसँ प्रकट छल। (प्रकट) - महाराजक विजय होउ। राजा - आदरणीय प्रभु! जखन अहाँ - जे राजनीतिको बृहस्पति समान छी - सावधानीपूर्वक राज्यक व्यवस्था देखत, तखन अहाँ कहू (विचार करू) संसारक कोन अंश हमरा विजेता नहि भऽ सकैत अछि? राक्षस (मनहि-मन) - मन्त्री पदक सन्दर्भ - कौटिल्यक शिष्य - चन्द्रगुप्त हमरा लगाबैत अछि। नहि, नहि, हमरा एहन नहि कहबाक चाही। ई चन्द्रगुप्तक सरल प्रशंसा अछि। हमर द्वेष हमरा अन्यथा समझाबैत अछि। चाणक्य जे कीर्ति प्राप्त केलक, ओ पूर्णतया उचित अछि। किएक तँ - एक निर्बुद्धि मन्त्री सेहो, जँ वीर गुण सम्पन्न राजासँ मिलि जाइत अछि, तँ निश्चय कीर्ति प्राप्त करैत अछि। मुदा दुष्ट राजासँ मिलि एक अचूक मन्त्री सेहो, जकरा आश्रय देल गेल अछि, हुनकर पतनक संग नदी किनारक वृक्ष जेकाँ खसि जाइत अछि। चाणक्य - मन्त्री राक्षस! अहाँ चाहैत छी जे चन्दनदास जीवित रहे? राक्षस - निस्सन्देह, विष्णुगुप्त। चाणक्य - तखन ई तरुआरि ग्रहण करू। राक्षस - नहि, विष्णुगुप्त, ई नहि भऽ सकैत। हम तरुआरि चलाबैक योग्य नहि छी, आर सेहो ओ तरुआरि जे अहाँ चलाबैत छी। चाणक्य - मन्त्री राक्षस! हम योग्य छी आर अहाँ नहि - ई केना भऽ सकैत अछि? हे प्रतिभाशाली पुरुष, देखू - हाथी - जेना स्नान, भोजन, क्रीड़ा, पान आर इच्छानुसार निद्राक सुखसँ वञ्चित, सेना सज्जाक सतत बोझसँ पीठ सूजल, घोड़ा - सतत लगाम आर जीनसँ बाँधल होइबाक कारण क्षीण - सभ अहाँक महान पराक्रमक (जे घमण्डी शत्रुक गर्व चूर केनए अछि) कारण (भयसँ) आहत छथि। मुदा एतेक बात बहुत अछि? जखन तक अहाँ ई तरुआरि नहि लैत छी, चन्दनदास मरि जाएत। राक्षस - बिना कहू, विष्णुगुप्त, हम वश्यता स्वीकार करैत छी। मित्रक प्रेम हमरा सभ किछु करबाक लेल बाध्य करैत अछि। चाणक्य (प्रसन्न होइ तरुआरि दैत) - वृषाल! हम अहाँकेँ बधाई देइत छी, किएक तँ मन्त्री राक्षस अहाँक प्रति मान राखि तरुआरि ग्रहण केलक। राजा - चन्द्रगुप्त आदरणीय मन्त्रीक कृपाक पूर्ण ज्ञान रखैत अछि। परिचारक (प्रवेश करैत) - महाराजक विजय होउ। आदरणीय प्रभु! मलयकेतु बेड़ीमे द्वार पर अछि, भद्रभट, भागुरायण आर अन्यक संग। चाणक्य - भलामानुस! मन्त्री राक्षससँ कहू। ओ आब एहि सभ विषयक ध्यान राखैत छथि। राक्षस (मनहि-मन) - आब की करब? ओ कैद भेल, आर हम सलाह देबाक लेल बाध्य। कोनो उपाय नहि। (प्रकट) - महाराज! ई सर्वविदित अछि जे हम किछु महिना धरि मलयकेतुक दरबारमे रहल छी। एहि लेल हुनकर प्राण दान करल जाए। (राजा चाणक्यक दिस देखैत अछि - स्वीकृतिक सङ्केत) चाणक्य - हँ, वृषाल! मन्त्री राक्षसक ई प्रथम प्रार्थना स्वीकार करबाक योग्य अछि। (परिचारकसँ) भलामानुस! भद्रभट आर अन्यकेँ हमर नामसँ कहू - मन्त्री राक्षसक सलाहसँ, महाराज चन्द्रगुप्त मलयकेतुकेँ हुनकर पैतृक राज्य घुरि करैत छथि। एहि लेल ओ हुनकर संग जाउ, आर हुनकर पुनः स्थापना पर घुरू। सेहो विजयपाल, दुर्गाधिपतिकेँ कहू जे महाराज चन्द्रगुप्त - मन्त्री राक्षसक तरुआरि स्वीकार करबाकसँ अति प्रसन्न होइ - चन्दनदास, मणिकार सरदारकेँ समस्त नगरक श्रेणीक परम अध्यक्ष बनाबैत छथि। आर युद्ध-घोड़ा आर युद्ध-हाथीकेँ छोड़ि सभ बन्धन मुक्त करल जाए। मुदा आब जखन मन्त्री राक्षस सूचक अछि, तखन युद्ध-घोड़ा आर युद्ध-हाथीक केकरो आवश्यकता अछि? एहि लेल युद्ध-घोड़ा आर युद्ध-हाथी सहित सभ बन्धन मुक्त करल जाए। परिचारक - आदरणीय प्रभुक आज्ञा जेना। (प्रस्थान) चाणक्य - आब राजा चन्द्रगुप्त आर मन्त्री राक्षस! मम एहिसँ अधिक अहाँकेँ की भलाई करि सकैत छी, तँ कहू। राजा - एहिसँ अधिक की भलाई अछि? राक्षस - जँ एखनो अहाँ सन्तुष्ट नहि छी, तँ एहि इच्छाक आशीर्वाद दिअ - हमर स्वामी अवन्तिवर्मान, जे स्वयम्भू भगवान विष्णु छथि - जे पहिने सृष्टिक रक्षाक हेतु जेना सूकर रूप धारण करि, जलमग्न पृथ्वीकेँ अपन दाँतक अग्रभाग पर धारण केनए छलाह, आर जे आब हमर प्रभुक रूपमे म्लेच्छसभ द्वारा पीड़ित पृथ्वीकेँ अपन भुजा बलसँ रक्षा करैत छथि - ओहि राजा - जकर सभ सम्बन्धी आर आश्रित धन-धान्यसँ सम्पन्न छथि - बहुत दिन धरि पृथ्वीकेँ आनन्दित करू! अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१७.गजेन्द्र ठाकुर-उत्तररामचरितम्- महाकवि भवभूति- संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर उत्तररामचरितम् महाकवि भवभूति पात्र-परिचय रंगमञ्च पर आगमनक क्रमसँ — मूल संस्कृत नाम मैथिली परिचय सूत्रधारः सूत्रधार (रंगमञ्चक निर्देशक) नटः नट (अभिनेता) रामः राम, अयोध्याक राजा सीता सीता, रामक पत्नी कञ्चुकी कञ्चुकी अष्टावक्रः अष्टावक्र, एक ऋषि लक्ष्मणः लक्ष्मण, रामक छोट भाइ प्रतीहारी प्रतीहारी (द्वाररक्षिका) दुर्मुखः दुर्मुख, अन्तःपुरक सेवक आत्रेयी आत्रेयी, एक तपस्विनी वासन्ती वासन्ती, वन-देवी शम्बूकः शम्बूक, शूद्र तपस्वी मुरला मुरला, नदी-देवी तमसा तमसा, नदी-देवी सौधातकिः सौधातकि, एक छात्र भाण्डायनः भाण्डायन, एक छात्र जनकः जनक, सीताक पिता अरुन्धती अरुन्धती, वसिष्ठ ऋषिक पत्नी गृष्टिः वाल्मीकिक कञ्चुकी कौसल्या कौसल्या, रामक माता लवः लव, रामक पुत्र बटवः बटुगण (छात्र सभ) पुरुषः एक अधिकारी चन्द्रकेतुः चन्द्रकेतु, रामक भातिज (लक्ष्मणक पुत्र) सुमन्त्रः सुमन्त्र, चन्द्रकेतुक सारथि विद्याधरः विद्याधर (पुरुष) विद्याधरी विद्याधरी (स्त्री) कुशः कुश, रामक पुत्र वाल्मीकिः वाल्मीकि, रामायणक रचयिता गर्भ-नाटकमे (नाटकक भीतरक नाटकमे) — मूल संस्कृत नाम मैथिली परिचय सूत्रधारः सूत्रधार पृथिवी पृथिवी (धरती) भागीरथी भागीरथी (गंगा नदी) प्रस्तावना ई रचना हम प्राचीन कविसभक प्रति श्रद्धाञ्जलि रूपमे अर्पित करैत छी। आउ, वाणीक सेहो वन्दना करी, जे अमर अछि, आत्माक एक अंश अछि। मङ्गलाचरण समाप्त भेलापर सूत्रधार: आब बिना कोनो विलम्बक हमरा भगवान् कालप्रियक उत्सवमे उपस्थित एहि रसज्ञ समाजक समक्ष एकटा निवेदन करबाक अछि। सज्जनसभ निश्चय भट्ट भवभूति नामक ओहि व्यक्तिक विषयमे सुनने होयब, जे काश्यप गोत्रक छथि आ श्रीकण्ठ उपाधि धारण करैत छथि। वाणीदेवी एहि ब्राह्मणक आज्ञा ओहिना मानैत छथि, जेना ब्रह्माक आज्ञा मानैत छथि, आ इएह ‘रामक अन्तिम चरित’ रचलनि, जकर अभिनय आइ हम अहाँसभक समक्ष करब। कविक आज्ञा मानि आब हम स्वयं ओहि युगक अयोध्यामे रहनिहार व्यक्तिक रूप धारण करैत छी। (चारू कात देखैत) केओ अछि? आश्चर्य, आँगनसभमे वाद्यकारक बाजनाइ किएक बन्द भऽ गेल? महान् राजा, माननीय राम—पौलस्त्यक कुल लेल दावानल—हुनक राज्याभिषेकक अवसरपर तँ कतेको दिन-राति आनन्दमय सङ्गीत क्षणोभरि नहि रुकल छल! प्रस्तावना एक नटक प्रवेश नट: मित्र, लङ्काक युद्धमे जे महान् सहयोगी छलाह—वानर आ राक्षससभ—राजा हुनकासभकेँ अपन-अपन घर पठा देने छथि। ओ ब्राह्मण आ देवतासभ सेहो विदा कऽ देल गेलाह, जे राजाक सम्मान करबाक लेल अयलाह आ जाहि-जाहि प्रदेशसँ गेलाह ओकरा पवित्र कऽ देलनि। एहि अतिथिसभक सत्कारक लेल एतेक दिन धरि उत्सव चलैत रहल। एखन तँ रामक राजमातासभ चलि गेलीह— वसिष्ठक संरक्षणमे, अरुन्धतीक पाछाँ-पाछाँ—अपन जामाताक आश्रममे एकटा अनुष्ठानक लेल। सूत्रधार: कहू—हम एहि प्रदेशक मूल निवासी नहि छी, ताहि हेतु पुछैत छी—ई जामाता के छथि? नट: राजा दशरथ शान्ता नामक कन्याक पिता छलाह आ हुनका राजा लोमपादकेँ दत्तक पुत्री रूपमे देलनि। हुनक विवाह विभाण्डक-पुत्र ऋष्यशृङ्गसँ भेल; आ ओएह एखन बारह वर्ष धरि चलनिहार यज्ञ आरम्भ कयने छथि। हुनक आदरमे वृद्धजनसभ भेट करबाक लेल गेल छथि, मुदा अपन पुत्रवधू जानकीकेँ एतहि छोड़ि गेल छथि, यद्यपि हुनक गर्भ बहुत बढ़ि चुकल अछि। सूत्रधार: कोनो बात नहि, चलू; अपन वर्णधर्मक अनुसार राजमहलक द्वारपर उपस्थित होयबाक चाही। प्रस्तावना नट: तखन तँ, मित्र, अहाँकेँ एहन राजकीय प्रशस्ति बनयबाक चाही, जकर शैली सर्वथा निर्दोष हो। सूत्रधार: प्रिय मित्र, परिस्थिति जेहन हो, अभिनय करब हमर कर्तव्य अछि। निन्दासँ बचबाक कोनो उपाय नहि। वचन हो अथवा स्त्री—जतेक पवित्र हो— दुर्जन ओकरो दोष लगबयबे करत। नट: ‘दुर्जन’सँ सेहो अधलाह कहल जाय, तखन उचित होयत। कारण, लोकसभ स्वयं महारानी वैदेहीक निन्दा कऽ रहल अछि। किएक? राक्षसक घरमे हुनक रहनाइ आ अग्निपरीक्षाक विषयमे हुनक सन्देह। सूत्रधार: ई जनश्रुति जँ राजाक कान धरि पहुँचि गेल तँ बड़ अनर्थ होयत। नट: जे हो, ऋषि आ देवतासभ हुनक कल्याण करताह। (घुमैत) केओ अछि? राजा एखन कतय छथि? (कान दैत) लोकसभ कहैत अछि— प्रस्तावना जनक गाढ़ स्नेहवश सम्मान प्रकट करबाक लेल अयलाह, किछु दिन उत्सवमे बितौलनि, आ आब विदेह घुरि गेलाह। एहि कारण महारानी व्याकुल छथि; हुनका सान्त्वना देबाक लेल राजा धर्मासन छोड़ि अपन निवासमे चलि गेल छथि। दुनू प्रस्थान करैत छथि। प्रस्तावना समाप्त प्रथम अङ्क चित्रशाला-दर्शन आरम्भमे राम आसनपर छथि आ सीता हुनक संग छथि। राम: महारानी वैदेही, कृपया उदास नहि होउ। वृद्धजनसभक लेल हमरा सभकेँ छोड़ि जाएब सहज नहि छल। मुदा नित्य अनुष्ठानक निरन्तर भार मनुष्यक स्वतन्त्रता सीमित कऽ दैत अछि। धार्मिक लोकक लेल गृहस्थ जीवनमे अनेक बाधा रहैत अछि। सीता: हम बुझैत छी, आर्यपुत्र, बुझैत छी। मुदा प्रियजनसँ वियोग एतेक दुःख दैत अछि। राम: सत्य। जीवनक ई अवस्थासभ हृदयक कोमलतम भागकेँ विदीर्ण करैत अछि आ संवेदनशील मनुष्यक मोनमे एहन विरक्ति उत्पन्न करैत अछि जे ओ समस्त भोग्य वस्तु त्यागि वनमे शान्ति खोजबाक लेल तत्पर भऽ जाइत अछि। कञ्चुकीक प्रवेश कञ्चुकी: प्रिय राम... (बात रोकि, फेर चिन्तित भावसँ) महाराज... राम: भद्र, एना नहि। पिताक सेवक-मण्डलीक सदस्यक मुखसँ ‘प्रिय राम’ सम्बोधन हमरा लेल पूर्ण उचित अछि। अतएव पहिने जेना कहैत छलहुँ, तहिना बाजू। कञ्चुकी: ऋष्यशृङ्गक आश्रमसँ अष्टावक्र अयलाह अछि। सीता: भद्र, तखन विलम्ब किएक? राम: हुनका तुरन्त भीतर अनाउ। कञ्चुकी प्रस्थान करैत अछि। प्रथम अङ्क : चित्रशाला-दर्शन अष्टावक्रक प्रवेश अष्टावक्र: अहाँ दुनूक कल्याण हो। राम: प्रणाम, भगवन्। कृपया आसन ग्रहण करू। सीता: प्रणाम। हमर गुरुजन आ ननदि शान्ता कुशलपूर्वक छथि ने? राम: सोमपान कयने हमर बहनोइ ऋष्यशृङ्ग आ हमर बहिन शान्ता दुनू कुशल छथि ने? सीता: ओ हमरासभकेँ स्मरण कयलनि? अष्टावक्र: (बैसैत) निश्चय। महारानी, वसिष्ठ अहाँकेँ ई सन्देश देने छथि— “सर्वधारिणी पुण्यमयी पृथ्वी स्वयं अहाँकेँ जन्म देलनि; सृष्टिकर्ताक समकक्ष राजा जनक अहाँक पिता छथि; आ हे पुत्री, अहाँ एहन राजवंशक पुत्रवधू छी, जकर घरमे दू गुरु छथि—हमसभ आ स्वयं सूर्यदेव। तखन वीर पुत्रक जन्मक अतिरिक्त हम अहाँ लेल आओर की कामना कऽ सकैत छी?” राम: हम अत्यन्त कृतार्थ भेलहुँ। सामान्य जीवनमे सज्जनक वचन तथ्यक अनुरूप होइत अछि; मुदा आद्य ऋषिक विषयमे तथ्य स्वयं हुनक वचनक अनुरूप भऽ जाइत अछि। प्रथम अङ्क : चित्रशाला-दर्शन अष्टावक्र: अरुन्धती, राजमातासभ आ शान्ता विशेष आग्रहपूर्वक ई आज्ञा देने छथि—“गर्भावस्थामे सीताक जे इच्छा हो, बिना विलम्ब पूरा कयल जाय।” राम: ओ जे कहतीह, हम पूर्ण करब। अष्टावक्र: महारानीक ननदोइ ऋष्यशृङ्ग ई कहलनि—“पुत्री, गर्भ बहुत बढ़ि गेलाक कारणेँ अहाँकेँ एतय नहि बजाओल गेल अछि। प्रिय पुत्र रामकेँ केवल अहाँक मनोरञ्जन करबाक भार देल गेल अछि। हम शीघ्र अहाँकेँ कुशल-मङ्गल देखबाक आशा करैत छी, जखन पुत्र अहाँक कोरामे होयत।” राम: (आनन्द आ सङ्कोचसँ मुस्कुराइत) एहिना हो। वसिष्ठ हमरा लेल कोनो सन्देश नहि पठौलनि? अष्टावक्र: सुनू— “अहाँक बहनोइक यज्ञमे हमसभ रुकि गेल छी। अहाँ एखन बालके छी आ अहाँक राज्य नव आरम्भ भेल अछि। प्रजाकेँ प्रसन्न रखबामे अपनाकेँ समर्पित करू, कारण सुयश प्राणोसँ बेसी बहुमूल्य निधि अछि।” प्रथम अङ्क : चित्रशाला-दर्शन राम: मैत्रावरुणि जे कहलनि, सेहने होयत। स्नेह, करुणा, सुख... एतबे नहि, स्वयं जानकीकेँ सेहो प्रजाकेँ प्रसन्न करबाक लेल त्यागबामे हम कनेको सङ्कोच नहि करब। सीता: इएह कारण हमर स्वामी राघववंशक आधार छथि। राम: केओ अछि? अष्टावक्रक विश्रामक व्यवस्था करू। अष्टावक्र: (ठाढ़ भऽ कऽ घुमैत) अहा, राजकुमार लक्ष्मण आबि गेलाह। (प्रस्थान) लक्ष्मणक प्रवेश लक्ष्मण: भायजीक जय हो। चित्रकार चित्रशालामे अहाँक जीवनक कथा ओहिना पूर्ण कऽ देने अछि, जेना हमसभ ओकरा सुनौने छलहुँ। भौजीकेँ ओकर दर्शनक निमन्त्रण अछि। राम: प्रिय अनुज, उदास महारानीक मन बहलयबाक उपाय खोजबामे अहाँ निपुण छी। कथा कतय धरि पहुँचल अछि? लक्ष्मण: भौजीक अग्निद्वारा शुद्धि धरि। राम: चुप! जे जन्मसँ पूर्ण पवित्र छथि, हुनका शुद्धिक आवश्यकता की? पवित्र जल आ अग्निक शुद्धि कोनो दोसर साधनसँ नहि होइत अछि। प्रथम अङ्क : चित्रशाला-दर्शन प्रिय महारानी, यज्ञभूमिसँ जन्म लेने अहाँ हमरा क्षमा करू। अहाँक प्रति ई विनम्रता हम जीवनभरि रखब। जिनका लेल कुलक मर्यादा सच्चा धन अछि, हुनका आलोचककेँ प्रसन्न रखए पड़ैत छनि। लोकमतक कारण हम जे अधार्मिक माँग कयने रही, से अहाँसँ कखनो नहि कयल जेबाक चाहैत छल। सभ जनैत अछि जे दुर्लभ सुगन्धित फूलक स्वाभाविक स्थान शिरोमणि बनि माथपर अछि, पएर तर कुचलल पड़ल रहब नहि। सीता: रहए दिअ, आर्यपुत्र, रहए दिअ। आउ, अहाँक जीवनकथा देखी। ओ ठाढ़ भऽ कऽ आगाँ बढ़ैत छथि। लक्ष्मण: भित्तिचित्र एम्हर अछि। सीता: (देखैत) एहि दृश्यमे ऊपर एकठाम जुटल ई प्राणीसभ के छथि, जे हमर स्वामीक गुणगान करैत बुझाइत छथि? लक्ष्मण: ई गुप्त मन्त्रसहित जृम्भक नामक दिव्य अस्त्रसभ छथि। कृशाश्व एहि अस्त्रसभकेँ कौशिक विश्वामित्र—‘विश्वक मित्र’—केँ देने छलाह; आ ताटकाक वध कयलापर विश्वामित्र भायजीकेँ ई सभ देलनि। राम: महारानी, दिव्य अस्त्रसभकेँ प्रणाम करू। प्रथम अङ्क : चित्रशाला-दर्शन वैदिक धर्मक कल्याणक लेल ब्रह्मा आ आन देवतासभ एक सहस्र वर्षसँ बेसी काल धरि तपस्या कयलनि; प्राचीन गुरुसभ जे दर्शन कऽ सकलाह, ई अस्त्रसभ ओही तपशक्तिक मूर्त रूप छथि। सीता: हुनकासभकेँ प्रणाम। राम: आब ई सभ निश्चय अहाँक सन्तानक सेवा करत। सीता: हम कृतार्थ भेलहुँ। लक्ष्मण: ई मिथिलाक प्रसङ्ग अछि। सीता: अहा, ओतय हमर स्वामी चित्रित छथि। ओ अत्यन्त सहजतासँ शङ्करक धनुष तोड़ि देने छथि, आ हमर पिता हुनक सौम्य तेजकेँ निहारि रहल छथि—हुनक देहक सुन्दरता देखि विस्मयसँ प्रायः अवाक्: विकसित नीलकमल जकाँ श्याम, कोमल आ स्निग्ध, मुदा सुदृढ़; माथपर एकटा शिखाक सरल शोभा मात्र। लक्ष्मण: ई देखू— एतय अहाँक पिता अपन नव सम्बन्धी वसिष्ठ आदि केँ प्रणाम करैत छथि, आ समस्त जनकवंशी राजाक कुलपुरोहित शतानन्द गौतम सेहो प्रणाम करैत छथि। प्रथम अङ्क : चित्रशाला-दर्शन राम: ई दृश्य वास्तवमे देखबा योग्य अछि। रघु आ जनक कुलक ओहि सम्बन्धक स्वागत के नहि करत, जाहिमे कुशिक-पुत्र दाता सेहो छलाह आ ग्रहणकर्ता सेहो? सीता: ई चारू भाइ छथि, अवसरानुकूल गोदान करबाक बाद। एतय अहाँसभ विवाहक दीक्षा ग्रहण कयने छी। हमरा तँ एहन लगैत अछि जे मानू हम एखने ओतय छी आ ओ समय एखने उपस्थित अछि। राम: प्रिय पत्नी, हमरा सेहो एहन लगैत अछि मानू ओ क्षण एखने अछि, जखन गौतम प्रसन्नतापूर्वक यज्ञविधिक साक्षात् मूर्तिरूप जकाँ विवाह-कङ्कणसँ चमकैत अहाँक ई हाथ हमरा सौंपने छलाह। लक्ष्मण: ई अहाँ छी; आ ई दोसर भौजी माण्डवी, तथा ई हमर पुतोहु श्रुतकीर्ति। सीता: आ प्रिय बालक, ई दोसर कन्या के छथि? लक्ष्मण: (सङ्कोचसँ मुस्कुराइत; स्वगत) अहा, भौजी निश्चय उर्मिलाक विषयमे पुछैत छथि। ठीक अछि, हुनक ध्यान दोसर दिस करैत छी। (प्रकट) अहा, ई देखू, बड़ दर्शनीय अछि—ई भार्गव छथि। सीता: देखिते हमरा भय लगैत अछि। प्रथम अङ्क : चित्रशाला-दर्शन राम: हे ऋषि, अहाँकेँ प्रणाम। लक्ष्मण: देखू, एतय भायजी आब... राम: (किछु रुष्ट भऽ) अरे, आरो बहुत किछु देखबा योग्य अछि। हमरा दोसर दृश्य देखाउ। सीता: (स्नेह आ प्रशंसासँ देखैत) आर्यपुत्र, ई उदात्त विनय अहाँपर कतेक शोभैत अछि! लक्ष्मण: ई अयोध्या घुरबाक दृश्य अछि। राम: (नोर भरि) मोन पड़ैत अछि—हाय, सभ किछु स्पष्ट मोन पड़ैत अछि। ओ दिन जखन पिता जीवित छलाह, दाम्पत्य जीवन नव छल, आ मातासभ हमर चिन्ता करैत छलीह... ओ दिन आब सदा लेल बीति गेल। आ ओ समयक जानकी ई छथि— निष्कपटतासँ चमकैत मुखबाली बालिका, दू-चारि फूल जकाँ दाँत— दूधक दाँत खसि गेलाक बाद आगाँ नव कोँपल जकाँ निकलैत— कोमल छोट-छोट अङ्ग एतेक मनोहर, मानू निर्मल चाननी; प्रकृति स्वयं हुनका मोहिनी विद्या सिखौने हो, जे हमर एहि अङ्गसभमे कौतूहल जगबैत छल। लक्ष्मण: ई मन्थरा अछि... राम: (उत्तर नहि दैत दोसर दिस बढ़ैत) महारानी वैदेही, प्रथम अङ्क : चित्रशाला-दर्शन ई शृङ्गवेरपुरक इङ्गुदी वृक्ष अछि, जतय बहुत पहिने हमसभ अपन प्रिय मित्र, निषादराजसँ भेट कयने रही। लक्ष्मण: (हँसैत; स्वगत) अहा, भायजी तँ मध्यमा माताक प्रसङ्ग छोड़ि देबय चाहैत छथि! सीता: ई तँ तपस्वीक जटाबन्धनक प्रसङ्ग अछि, जे अहाँकेँ धारण करए पड़ल छल। लक्ष्मण: प्राचीन इक्ष्वाकुसभ पुत्रकेँ राज्य सौंपलापर जे व्रत धारण करैत छलाह, भायजी बाल्यावस्थेमे ओ व्रत धारण कयलनि— वनवासक पवित्र व्रत। सीता: निर्मल पवित्र जलसहित ई भागीरथी छथि। राम: हे देवी, रघुकुलक आराध्या, अहाँकेँ प्रणाम। सगरक यज्ञमे घोड़ा खोजैत हमर पूर्वजसभ एकचित्त भऽ पृथ्वी खोदैत गेलाह, जाधरि क्रुद्ध महाबली कपिल हुनकासभकेँ भस्म नहि कऽ देलनि। भागीरथक ओ प्रपितामहसभकेँ अन्ततः भागीरथक कठोर तपस्ये उद्धार कयलक— ओ अपन शरीरक कनेको चिन्ता नहि कयलनि— आ हे पुण्यमयी, अहाँक जलक स्पर्शसँ ओ सभ मुक्त भेलाह। हे माता, हमर प्रार्थना अछि—अपन पुत्रवधू सीतापर ओहिना स्नेह राखू, जेना अरुन्धती रखैत छथि। प्रथम अङ्क : चित्रशाला-दर्शन लक्ष्मण: ई श्यामा—‘कारी’ बरगद—अछि, कालिन्दीक तटपर चित्रकूट जाएबला बाटमे, जतय भरद्वाज हमरा सभकेँ पठौने छलाह। सीता: आर्यपुत्रकेँ ई स्थान मोन अछि ने? राम: कोना बिसरि सकैत छी? बाटक कठिन यात्रासँ अहाँक कोमल अङ्ग थाकि पीड़ित भऽ गेल छल, आ तखन कुचलल कमल जकाँ शिथिल ओ अङ्ग अहाँ हमर कोरामे राखि देलहुँ; हम दृढ़ हाथसँ दबबैत रहलहुँ, जाधरि अहाँ गाढ़ निद्रेमे नहि सूति गेलहुँ। लक्ष्मण: ई विन्ध्यवनक प्रवेशद्वारपर बाट रोकने विराध अछि। सीता: बस, आब ई नहि! एतय हम अपनाकेँ दक्षिण वनमे प्रवेश करैत देखैत छी—मानू आँखिक सोझाँ सभ घटि रहल हो—आर्यपुत्र हमर माथपर तालपत्रक छत्ता धेने छथि। राम: ई पर्वतीय झरनाक तटबला उपवनसभ अछि, जतय तपस्वी वृक्षतर तपस्या करैत छलाह, आ शान्तिक खोजमे गृहस्थ अपन घर बनबैत छलाह— दिनमे एक मुट्ठी अन्न खाइतो अतिथिक प्रति उदार। प्रथम अङ्क : चित्रशाला-दर्शन लक्ष्मण: ई जनस्थानक बीचमे प्रस्रवण पर्वत अछि। चारूकातक सघन वनक आलिङ्गनमे स्थित एकर गुफासभ गोदावरीक ध्वनिसँ गूँजैत छल। वृक्ष-झाड़ीसँ भरल हरियर-श्याम वन अत्यन्त सघन छल, आ निरन्तर उमड़ैत मेघ पर्वतक स्वाभाविक अन्हारकेँ आरो गाढ़ कऽ दैत छल। राम: प्रिय पत्नी, पर्वतपर बिताओल ओ दिन अहाँकेँ मोन अछि ने, जखन लक्ष्मण हमर सभ आवश्यकता पूरा करैत छल आ हमरा सभकेँ ओतय अपन घर जकाँ लगैत छल? समीप बहैत निर्मल जलबाली गोदावरी मोन अछि, आ ओकर तटपर हमर सभक अनेक विहार? आ ई सेहो— प्रगाढ़ प्रेममे गालसँ गाल लगा कऽ पड़ल, बिना क्रमक ई-ओ बात अति मृदु स्वरमे करैत, एक-दोसरकेँ कसि आलिङ्गनमे बान्हने, घण्टासभ एना बीति जाइत छल जे ज्ञात नहि होइत; जखन भोर होइत, तखन बुझाइत जे केवल राति समाप्त भेल अछि। लक्ष्मण: ई पञ्चवटीमे शूर्पणखा अछि। सीता: हे आर्यपुत्र, ई अहाँक हमर अन्तिम दर्शन अछि! प्रथम अङ्क : चित्रशाला-दर्शन राम: धत्त, वियोगसँ एतेक भय? ई केवल चित्र अछि। सीता: चित्र हो, मुदा दुष्ट लोक उपद्रव कऽ सकैत अछि। राम: अहा, एहन लगैत अछि मानू जनस्थानक प्रसङ्ग सचमुच घटि रहल हो। लक्ष्मण: एतय ओ दुष्ट राक्षससभ सुवर्णमृगक छलसँ एहन कुकर्म कयलक जे पूर्ण प्रतिशोध भेलोपर आइ धरि हृदय दुखबैत अछि। जनस्थान सूना भेलापर भायजीक अर्ध-विक्षिप्त आचरण एखनो पाथरकेँ नोर बहबय आ लोहक हृदयकेँ फोड़ि सकैत अछि। सीता: (नोर भरि; स्वगत) हाय नाथ, रघुकुलक आनन्द, हमर कारणेँ अहाँ कतेक कष्ट भोगलहुँ! लक्ष्मण: (रामकेँ कौतूहलसँ निहारैत) भायजी, ई आब की? नोरक धार उमड़ि रहल अछि, भूमिपर खसैत बून्दसभ टूटल महीन मोतीक हार जकाँ छिड़िआ रहल अछि; अहाँ दुःख दबयबाक प्रयास करैत छी, तैयो काँपैत ओठ-नासापुट आ भारसँ धौंकैत छाती सभकेँ अहाँक व्यथा स्पष्ट देखबैत अछि। प्रथम अङ्क : चित्रशाला-दर्शन राम: प्रिय अनुज, ओ समय प्रियाक वियोगसँ प्रज्वलित शोकाग्नि तीक्ष्ण अवश्य छल, मुदा प्रतिशोधक पियास ओकरा सहनीय बना देने छल। मुदा मोनमे निरन्तर पकैत आब ओ हृदयक कोमलतम मर्म धरि पहुँचल घावक पीड़ा बनि गेल अछि। सीता: हे देव, असीम भयमे हम अपनाकेँ आर्यपुत्रविहीन, एकाकी देखि रहल छी! लक्ष्मण: (स्वगत) हुनका सभक ध्यान हटयबाक चाही। (चित्र दिस देखैत; प्रकट) ई युग-युगसँ प्राचीन गृध्रराज पिता जटायुक वीरताक चित्र अछि। सीता: हाय पिता, अहाँ पुत्रीक प्रति स्नेहक धर्म पूर्ण कयलहुँ। राम: हाय पिता, पक्षिराज, काश्यप-पुत्र! एहन महान् उपकारी फेर कतय भेटताह? लक्ष्मण: जनस्थानक पश्चिममे दण्डकवनक ई भाग चित्रकुञ्जवत कहल जाइत अछि। एतय सिरविहीन दानव कबन्ध रहैत छल। ई ऋष्यमूक पर्वतपर महर्षि मतङ्गक आश्रम अछि; आ ई चमत्कारिणी शबर तपस्विनी श्रमणी। ओतय पम्पा नामक कमल-सरोवर अछि। प्रथम अङ्क : चित्रशाला-दर्शन सीता: सुनने छी, एतहि आर्यपुत्र अपन क्रोध रोकि नहि सकलाह आ उच्च स्वरमे विलाप कयलनि। राम: महारानी, ओ अत्यन्त सुन्दर सरोवर छल। श्वेत कमलक समूह छल; हर्षसँ कलरव करैत हंसक पाँखिसँ हिलि ओकर मोट डाँठ डोलैत छल; मुदा एक नोर खसबाक आ दोसर उमड़बाक बीचमे हमरा ओ सभ नीलकमल जकाँ देखाइत छल। लक्ष्मण: ई महात्मा हनुमान छथि। सीता: हँ, ई पवनदेवक महान् पुत्र छथि, जिनक अनुपम सेवासँ दीर्घकालसँ दुःख भोगैत संसारक उद्धार भेल। राम: अञ्जना-पुत्र महाबलीक जय हो, जिनक सामर्थ्य हमरा सभक आ समस्त लोकक कल्याण सुनिश्चित कयलक। सीता: प्रिय बालक, ई पर्वतक नाम की, जतय विकसित कदम्ब वृक्षपर मयूर उन्मत्त ताण्डव करबाक लेल जागि उठल छल? एतय हमर स्वामी वृक्षतर चित्रित छथि—अहाँ नोर बहबैत हुनका थाम्हने छी, ओ मूर्च्छित होमय पर छथि; स्वाभाविक कान्ति मलिन, पूर्वक मोहक महिमाक केवल अवशेष रहि गेल अछि। प्रथम अङ्क : चित्रशाला-दर्शन लक्ष्मण: ई ककुभ फूलक सुगन्धसँ भरल माल्यवान पर्वत अछि, जकर शिखर नित्य नव मेघसँ श्याम आ आर्द्र रहैत अछि... राम: प्रिय अनुज, बस करू, कृपया बस करू; आब आरो सहन नहि होइत अछि। मानू जानकीक वियोग फेर एक बेर हमरा लग आबि रहल अछि। लक्ष्मण: एहिसँ आगाँ भायजी, वानर आ राक्षससभक असङ्ख्य अद्भुत पराक्रम चित्रित अछि—एकसँ एक बढ़ि कऽ। मुदा भौजी थाकि गेल होयतीह; हुनका आब विश्राम करबाक चाही। सीता: आर्यपुत्र, चित्रसभ देखैत हमर मोनमे एकटा दोहद जागल अछि; अहाँसँ एक कृपा माँगए चाहैत छी। राम: आज्ञा मात्र करू। सीता: हमर इच्छा अछि जे निर्मल सघन वनमे जाइ आ भागीरथीक पवित्र, शान्त, शीतल जलमे स्नान करी। राम: प्रिय लक्ष्मण? लक्ष्मण: आज्ञा दिअ। राम: वृद्धजनसभ एखने आज्ञा देने छथि जे हुनक प्रत्येक दोहद तुरन्त पूरा कयल जाय। अतएव कोमल गतिबला सुखद रथ अनाउ। प्रथम अङ्क : चित्रशाला-दर्शन सीता: आर्यपुत्र, अहाँ सेहो संग नहि चलब? राम: हे कठोरहृदया, ई पुछबाक सेहो आवश्यकता अछि? सीता: ई सुनि हम बड़ प्रसन्न भेलहुँ। लक्ष्मण: भायजीक जे आज्ञा। (प्रस्थान) राम: आउ, क्षणभरि एहि झरोखाक कोनमे बैसी। सीता: हँ, ठीक अछि। एतेक घूमलासँ सचमुच थाकि गेल छी। राम: तखन आउ, अपन पूरा भार हमरापर राखू; हम अहाँकेँ लऽ चली। अपन बाँहि हमर गरदनिमे राखू—एहिसँ हमरा नव जीवन भेटैत अछि। परिश्रम आ भयक कारण पसेनाक बून्दसँ भरल अहाँक बाँहि चन्द्रक किरणक स्पर्शसँ जल टपकबैत चन्द्रकान्त-मणिक हार जकाँ अछि। (ओहिना करैत; परमानन्दसँ) प्रिये, ई की अछि? अहाँक प्रत्येक स्पर्शमे एकटा एहन विकार होइत अछि— ओकरा सुख अथवा दुःख, मूर्च्छा अथवा निद्रा, मद अथवा सर्वाङ्गव्यापी विष किछुओ नहि कहल जा सकैत अछि— ओ हमर इन्द्रियकेँ भ्रमित करैत, एके संग चेतनाकेँ जगबैत आ मन्द करैत अछि। प्रथम अङ्क : चित्रशाला-दर्शन सीता: (हँसैत) हमरा प्रति अहाँक स्नेह सदिखन अटल रहल अछि। ई ओकर अतिरिक्त आ की भऽ सकैत अछि? राम: हमर कम्हलायल जीवन-पुष्पकेँ फेर खिला दैत अछि, हमरा नव स्फूर्ति दैत अछि आ प्रत्येक इन्द्रियकेँ मोहित करैत अछि— कमलनयनी पत्नीकेँ ई मधुर वचन, कान लेल अमृत, मोन लेल संजीवनी। सीता: हे मधुरभाषी, आउ, विश्राम करी। (सुतबाक स्थान ताकैत) राम: ताकबाक आवश्यकता नहि— विवाहक क्षणसँ, घर हो अथवा वन, बाल्य हो अथवा यौवन, विश्रामक ई एकमात्र आधार, जाहिपर कोनो दोसर स्त्री कखनो माथ नहि रखने अछि— रामक इएह बाँहि अहाँक तकिया बनत। सीता: (निद्राक अभिनय करैत) सत्य अछि, आर्यपुत्र, सत्य... (सूति जाइत छथि) राम: ई की, मधुरभाषिणी हमर छातीपर गाढ़ निद्रेमे सूति गेलीह? (स्नेहसँ निहारैत) प्रथम अङ्क : चित्रशाला-दर्शन ई हमर घरमे निवास करैत स्वयं लक्ष्मी छथि, हमर आँखि लेल अमृतमय अञ्जन, शरीरपर गाढ़ चन्दन-लेपक स्पर्श; गरदनिमे पड़ल हुनक ई बाँहि शीतल, चिक्कन मोतीक हार अछि। हुनक कोन वस्तु प्रिय नहि— केवल वियोगक यातना छोड़ि? एक प्रतीहारीक प्रवेश प्रतीहारी: देव, उपस्थित अछि। राम: उपस्थित? के उपस्थित अछि? प्रतीहारी: देवक निज परिचारक दुर्मुख। राम: (स्वगत) अन्तःपुरक परिचारक दुर्मुख? नगर आ जनपदक लोकक विचार जानबाक लेल हम ओकरा नियुक्त कयने रही। (प्रकट) ओकरा भीतर अनाउ। प्रतीहारी प्रस्थान करैत अछि। दुर्मुखक प्रवेश दुर्मुख: (स्वगत) महारानी सीताक विषयमे ई अकथनीय जनश्रुति राजाकेँ कोना सुनायब? मुदा अभागल हमरे ई भार देल गेल अछि। सीता: (निद्रामे चिचियाइत) हे कोमलहृदय आर्यपुत्र, अहाँ कतय छी? राम: चित्र देखलासँ जागल वियोगक भयङ्कर चिन्ता महारानीक स्वप्नकेँ व्याकुल कऽ रहल अछि। (स्नेहसँ हुनका सहलाबैत) प्रथम अङ्क : चित्रशाला-दर्शन सुख-दुःखमे एकरूपता, प्रत्येक अवस्थामे सामञ्जस्य, जतय हृदय विश्राम पाबि सकए, जकर रस वृद्धावस्था सेहो नष्ट नहि कऽ सकए, समय सभ आवरण हटबैत जाए आ निर्मल प्रेम पकैत जाए तखन जे एकमात्र शेष रहए— ई अद्वितीय वरदान केवल सज्जनकेँ भेटैत अछि, सेहो भाग्यसँ। दुर्मुख: (समीप आबि) महाराजक जय हो! राम: जे ज्ञात भेल, कहू। दुर्मुख: नगर आ जनपदक लोक देवक प्रशंसा करैत कहैत अछि—“भगवान् राम हमरा सभकेँ महाराज दशरथोकेँ बिसरा देलनि।” राम: ई केवल चाटुकारिता अछि। कोनो दोष ज्ञात भेल हो तँ कहू, जाहिसँ ओकर निवारण कयल जा सकए। दुर्मुख: (नोर भरि) सुनू, देव। (कानमे सभ बात कहैत) राम: हे देव! अहाँक वचन वज्र बनि हमर मर्म भेदि देलक! (मूर्च्छित भऽ जाइत छथि) दुर्मुख: देव, अपनाकेँ सम्हारू! राम: (चेतना पाबि) प्रथम अङ्क : चित्रशाला-दर्शन नहि—हाय नहि! दोसर पुरुषक घरमे रहबाक कलङ्क वैदेही अद्भुत उपायसँ मिटा देने छलीह; मुदा भाग्यक कुटिल फेरसँ ओ फेर प्रकट भऽ गेल, आ पागल कुकुरक विष जकाँ दूर-दूर धरि पसैर रहल अछि। अभागल हम एकर की करी? (विचारि; करुणासँ) मुदा आओर कऽ की सकैत छी? सज्जनक व्रत अछि—जे कोनो उपायसँ प्रजाकेँ प्रसन्न राखब। हमर पिता हमरा आ अन्ततः अपन प्राण गमा कऽ एहि व्रतक पालन कयलनि। आ वसिष्ठ एखने हमरा इएह आज्ञा देलनि। तखन— प्राचीन प्रतापी सूर्यवंशी राजासभक आचरणसँ उज्ज्वल भेल निर्मल कुलमर्यादा जँ हमर सम्बन्धक निन्दासँ मलिन भऽ जाय, तखन हम निश्चय विनष्ट आ धिक्कृत छी। हे यज्ञभूमिजा महारानी, अहाँ अपन जन्मसँ स्वयं पृथ्वीकेँ गौरवान्वित कऽ पवित्र कयलहुँ; जनक आ निमिक वंशमे आनन्द भरलहुँ। अग्नि, वसिष्ठ आ अरुन्धती अहाँक चरित्रक प्रशंसा कयने छथि। रामे अहाँक सम्पूर्ण जीवन छथि; सघन वनक प्रवासमे अहाँ हमर प्रिय सहचरी छलहुँ, मधुर संयत वचनबाली, हमर पिताक दुलारी... एहन स्त्रीपर ई विपत्ति कोना आबि सकैत अछि? प्रथम अङ्क : चित्रशाला-दर्शन अहाँक कारण संसारक समस्त प्राणी धन्य अछि, तैयो ई अभिशप्त जनश्रुति अहाँपर खसल; अहाँमे प्रजाकेँ सच्चा रक्षक भेटल, मुदा स्वयं अहाँ अरक्षित विनाशक सम्मुख छी। दुर्मुख, लक्ष्मणकेँ कहिहनि जे अनुभवहीन राजा रामक हुनका लेल एकटा आज्ञा अछि। (कानमे बुझबैत) दुर्मुख: अग्निसँ पहिने शुद्ध भेल महारानी अपन गर्भमे रघुवंशक निरन्तरता धारण कऽ आरो पवित्र छथि। हुनक विषयमे दुष्ट लोकक जनश्रुति सुनि देव एहन निर्णय कोना कऽ लेलनि? राम: चुप! नगर आ जनपदक प्रजाकेँ दुष्ट कहबाक साहस कोना भेल? इक्ष्वाकुवंश प्रजाक श्रद्धा अर्जित कयने अछि; ई निन्दाक बीज भाग्यक परिणाम छल; आ शुद्धिक समय जे अद्भुत घटना भेल, ओ दूर देशमे भेल—ताहिपर के विश्वास करत? जाउ! दुर्मुख: हाय महारानी! (प्रस्थान) राम: हाय, कतेक घृणित कर्म करए जा रहल छी! हम कतेक क्रूर भऽ गेलहुँ! प्रथम अङ्क : चित्रशाला-दर्शन बाल्यकालसँ हमर कोमल प्रिया उत्तम भोजनसँ पोषित भेलीह आ गाढ़ प्रेमक कारण कखनो हमरासँ अलग नहि भेलीह। आ आइ हम छलसँ हुनका मृत्युक हाथमे सौंपए जा रहल छी, जेना केओ अपन पाले-पोसल छोट पक्षीकेँ काटि दैत अछि। तखन अछूत आ बहिष्कृत हम अपन स्पर्शसँ महारानीकेँ अपवित्र करबाक साहस कोना करी? (सावधानीसँ सीताक माथ उठा कऽ अपन बाँहि निकालैत) हे निष्पापे, हमरा छोड़ि दिअ— हम एहन चाण्डाल छी जे किछुओ कऽ सकैत अछि। अहाँ चन्दन-वृक्षपर विश्राम करैत छी से बुझलहुँ, ई नहि जे विषैल वृक्षपर पड़ल छी। (ठाढ़ होइत) हे देव! संसार उलटि गेल। रामक जीवित रहबाक आब कोनो प्रयोजन नहि। सहसा पृथ्वी रिक्त, निर्जन वन भऽ गेल; जीवन प्राणहीन, शरीर मात्र जड़ पदार्थ। कोनो आश्रय नहि—की करी, कतय जाई? बुझाइत अछि— केवल पीड़ा अनुभव करयबाक लेल रामकेँ चेतना देल गेल छल। स्वयं जीवन हमर मर्म विदीर्ण कऽ रहल अछि, आ मानू लोहक कीलसँ देहमे जड़ि देल गेल हो। प्रथम अङ्क : चित्रशाला-दर्शन हे माता अरुन्धती, भगवान् वसिष्ठ आ विश्वामित्र, अग्निदेव, समस्त प्राणीकेँ धारण करनिहार पृथ्वीदेवी! हे पिता जनक, मातासभ, प्रिय मित्र राजा सुग्रीव, कोमल हनुमान, महानतम उपकारी लङ्केश विभीषण, प्रिय सखी त्रिजटा—एहि नीच राम अहाँ सभकेँ ठकि अपमानित कयलक। मुदा आब हम अहाँ सभक नाम लेनिहार के छी? अधम कृतघ्न हमर मुखसँ हुनक नाम लेब सेहो मानू अपन पापसँ ओ महान् व्यक्तिसभकेँ दूषित करब होयत। हम— अपन छातीपर निश्चिन्त सूतल घरक आभूषण, प्रिय पत्नीकेँ हटा दैत छी, जे गर्भक भारसँ भारी छथि—शिशु कतेक व्याकुलतासँ हिलल!— आ मांसक बलि जकाँ निर्दयतासँ कुकुरक आगाँ फेकि दैत छी। (सीताक चरणमे माथ रखैत) महारानी, महारानी, ई अन्तिम बेर अछि जखन राम अपन माथ अहाँक चरणकमलमे रखैत अछि। (कानैत) नेपथ्यसँ: अनर्थ! घोर अनर्थ! राम: केओ पता लगाउ, की भेल। प्रथम अङ्क : चित्रशाला-दर्शन नेपथ्यसँ फेर स्वर: यमुनाक तटपर रहनिहार महातपस्वी ऋषिसभक समुदाय लवणसँ भयभीत भऽ अहाँक शरणमे आयल अछि। राम: की, राक्षस एखनो उपद्रव करैत अछि? कुम्भीनसीक पुत्रकेँ जड़िसँ नष्ट करबाक लेल शत्रुघ्नकेँ पठयबाक चाही। (किछु डेग आगाँ बढ़ि फेर घुरैत) हाय महारानी, एहि विषम सङ्कटमे अहाँक की होयत? हे पुण्यमयी पृथ्वी, अपन असहाय पुत्री जानकीक रक्षा करू— रघु आ जनक दुनू कुलक सम्पूर्ण सौभाग्य, देवताक पुण्य यज्ञमे अहाँक जन्माओल पवित्र सन्तान। (प्रस्थान) सीता: (स्वप्नमे) प्रिय स्वामी... (सहसा उठैत) हे देव! हम भयङ्कर स्वप्न देखलहुँ—आर्यपुत्रसँ अलग भऽ हुनका पुकारि कानि रहल रही। (चारू कात देखैत) मुदा हमरा सूतल एकाकी छोड़ि ओ कतय चलि गेलाह? देखिते कनेक रोष देखायब—जँ हुनका देखलापर अपन हृदयपर अधिकार राखि सकी। के उपस्थित अछि? दुर्मुखक प्रवेश दुर्मुख: महारानी, राजकुमार लक्ष्मण निवेदन करैत छथि जे रथ पूर्ण तैयार अछि; अहाँ ओकरा चढ़ि सकैत छी। प्रथम अङ्क : चित्रशाला-दर्शन सीता: हम तैयार छी। (ठाढ़ होइत) गर्भक शिशु बारम्बार हिलैत अछि, धीरे चलए पड़त। दुर्मुख: एम्हर, महारानी। सीता: रघुकुलक देवतासभकेँ प्रणाम! दुनू प्रस्थान करैत छथि। प्रथम अङ्क समाप्त द्वितीय अङ्कक प्रवेशक नेपथ्यसँ: भगवतीक स्वागत! यात्री-वेषमे एक तपस्विनीक प्रवेश। तपस्विनी: अहा, स्वयं वनदेवी फल, फूल आ पातक अर्घ्य लऽ हमर सेवा लेल उपस्थित छथि। वनदेवीक प्रवेश: (अर्घ्य पसारैत) एहि वनक भरपूर आनन्द लिअ। आइ हमर लेल शुभ दिन अछि— सज्जनक मिलन दुर्लभ होइत अछि आ केवल पुण्यक फलसँ सम्भव होइत अछि। वृक्षक छाया, जल, तपस्याक योग्य आहार— फल, मूल आदि—सभ अहाँक सेवामे अछि। तपस्विनी: हम की कही? स्नेहमय व्यवहार, मर्यादित वाणी जे शिष्टतासँ मधुर बनल हो, स्वभावसँ सद्भावपूर्ण हृदय, आ बिना सङ्कोचक सेवा— पहिने हो वा पाछाँ, जकर रस कखनो नहि बिगड़ए— छल आ कलङ्कसँ रहित साधुजनक एहि रहस्यक जय हो। दुनू बैसैत छथि। वनदेवी: हमर पूज्य अतिथि के छथि, ई जानि सकी? द्वितीय अङ्कक प्रवेशक तपस्विनी: हम आत्रेयी छी। वनदेवी: आत्रेयी, अहाँ कतयसँ आबि रहल छी, आ कोन प्रयोजनसँ दण्डकवनमे घूमि रहल छी? आत्रेयी: एहि प्रदेशमे वेदक तत्त्वक अनेक ज्ञाता—अगस्त्य आदि—रहैत छथि। हुनकासभसँ वेदान्त-विद्या सीखबाक लेल हम वाल्मीकिसँ दूर एतय भ्रमण कऽ रहल छी। वनदेवी: मुदा आन ऋषिसभ आध्यात्मिक सिद्धिक लेल प्रचेताक पुत्र ओहि प्राचीन आचार्यक उपासना करैत छथि; तखन आर्या हुनकासँ दूर किएक छथि? आत्रेयी: हुनक समीप अध्ययनमे एखन एकटा बहुत पैघ बाधा उत्पन्न भऽ गेल अछि, ताहि हेतु ई लम्बा वियोग स्वीकार कयने छी। वनदेवी: कोन प्रकारक बाधा? आत्रेयी: कोनो देवता—बड़ अद्भुत घटना छल—एक बेर दूध छोड़ने दू जुम्मा बालक भगवान् वाल्मीकिक समीप आनलनि। स्वाभाविके, ओ बालकसभ हुनक हृदय जीत लेलक; केवल हुनके नहि, समस्त चर-अचर प्राणीक हृदय। वनदेवी: हुनक नामक विषयमे किछु ज्ञात अछि? आत्रेयी: कहल जाइत अछि, स्वयं देवता हुनक नाम—कुश आ लव—आ हुनक सामर्थ्य प्रकट कयलनि। द्वितीय अङ्कक प्रवेशक वनदेवी: कोन सामर्थ्य? आत्रेयी: कहल जाइत अछि जे जन्मक क्षणसँ गुप्त मन्त्रसहित दिव्य अस्त्रसभ हुनक अधिकारमे छल। वनदेवी: निश्चय अद्भुत। आत्रेयी: वाल्मीकि धायीक कार्य स्वीकार कऽ दुनू बालककेँ पोसलनि आ देखभाल कयलनि। चूड़ाकर्म भेलापर त्रयी वेदकेँ छोड़ि तीनू विद्याक विधिवत् शिक्षा देलनि; अन्ततः एगारहम वर्षमे क्षत्रिय विधिसँ उपनयन कऽ त्रयी पवित्र विद्याक ज्ञान देलनि। एहन उज्ज्वल बुद्धि आ अन्तर्दृष्टिबला बालकक संग हमसभ जकाँ लोकक अध्ययन उचित नहि बुझाइत अछि। कारण— गुरु जड़बुद्धि आ तीक्ष्णबुद्धि दुनूकेँ समान ज्ञान दैत छथि, मुदा हुनक ग्रहणशक्ति बना अथवा बिगाड़ि नहि सकैत छथि; ताहि कारण फलमे बहुत अन्तर होइत अछि। माँजल मणि प्रतिबिम्ब धारण करैत अछि; माटिक ढेला नहि। वनदेवी: तखन अध्ययनक बाधा इएह अछि? आत्रेयी: एकटा आओर सेहो अछि। द्वितीय अङ्कक प्रवेशक वनदेवी: ओ की? आत्रेयी: एक बेर ब्रह्मर्षि मध्यान्ह-स्नान लेल तमसा नदीपर गेलाह। ओतय देखलनि—एक बहेलिया मैथुनरत क्रौञ्च-युगलक एक पक्षीकेँ मारि देलक। सहसा वाणीदेवी हुनक मानस-नेत्रमे प्रकट भेलीह; प्रत्येक ध्वनि स्पष्ट, आठ अक्षरक छन्दमे नापल। ओ एहि रूपमे मुखर भेलीह— “हे निषाद, अनन्त काल धरि अहाँ प्रतिष्ठा नहि पाबी, कारण प्रेमरत एहि क्रौञ्च-युगलक एक पक्षीकेँ अहाँ मारि देलहुँ।” वनदेवी: कतेक अद्भुत—वेदसँ असम्बद्ध छन्दक एकटा नव अवतार! आत्रेयी: ओहि समय जखन वाणीक पवित्र रहस्यक प्रकाश ऋषिक भीतर प्रकट भेल, कमलज देव—प्राणिमात्रक जीवनदाता—हुनक समीप आबि कहलनि: “हे ऋषि, अहाँ वाणी नामक रहस्यक ज्ञान प्राप्त कऽ लेलहुँ। आब रामक कथा कहू। अहाँकेँ प्रेरणाक नेत्र, एहन ऋषिदृष्टि प्राप्त होयत जकर प्रकाश कखनो मन्द नहि होइत। अहाँ आदिकवि छी।” एतबा कहि ओ अन्तर्धान भऽ गेलाह। तखन प्रचेता-पुत्र ऋषि ‘रामायण’क रचना कयलनि—मानव समाजमे वाणीक रहस्यक प्रथम प्राकट्य रूप इतिहास। द्वितीय अङ्कक प्रवेशक वनदेवी: अहा, स्वयं जीवन समृद्ध भऽ गेल! आत्रेयी: ताहि कारण हम अध्ययनक महान् बाधाक बात कहलहुँ। वनदेवी: ई स्वाभाविक अछि। आत्रेयी: भद्रे, हम विश्राम कऽ लेलहुँ। आब अगस्त्यक आश्रमक बाट कहू। वनदेवी: एतयसँ पञ्चवटीमे प्रवेश कऽ गोदावरीक तटसँ आगाँ जाउ। आत्रेयी: (नोर भरि) की ई विख्यात तपोवन पञ्चवटी अछि? ई नदी गोदावरी, ओ पर्वत प्रस्रवण—आ अहाँ जनस्थानक देवी वासन्ती छी? वासन्ती: अहाँक प्रत्येक बात सत्य अछि। आत्रेयी: हे पुत्री जानकी, ई सभ वस्तु अहाँकेँ प्रिय छल, क्षण-क्षणक अनेक वार्ताक विषय छल; आ आइ हुनका निहारैत मानू अहाँ साक्षात् देखाइत छी— यद्यपि आब अहाँक नामक अतिरिक्त किछुओ शेष नहि! वासन्ती: (भयसँ; स्वगत) “नामक अतिरिक्त किछुओ नहि”—एकर की अर्थ? (प्रकट) आर्ये, महारानी सीतापर कोनो विपत्ति आयल अछि? आत्रेयी: केवल विपत्ति नहि—अपवाद सेहो। (कानमे कहैत) द्वितीय अङ्कक प्रवेशक वासन्ती: हाय! भाग्यक कतेक क्रूर प्रहार! (मूर्च्छित होइत) आत्रेयी: प्रिय भद्रे, अपनाकेँ सम्हारू! वासन्ती: हाय हमर प्रिय सखी, परम माननीया, जीवनमे अहाँक ई दशा! प्रिय राम, प्रिय राम... नहि, अहाँक नाम बहुत भेल! आत्रेयी, लक्ष्मण सीताकेँ वनमे छोड़ि घुरलाक बाद हुनक की भेल, किछु समाचार अछि? आत्रेयी: हाय, किछुओ नहि। वासन्ती: कतेक भयङ्कर! अरुन्धती आ वसिष्ठक संरक्षणमे रघुकुल, आ वृद्ध राजमातासभ जीवित—तैयो ई कोना भऽ सकल? आत्रेयी: ओ समय वृद्धजन ऋष्यशृङ्गक आश्रममे छलाह। आब बारह वर्षक यज्ञ समाप्त भेल। ऋष्यशृङ्ग सम्मानपूर्वक हुनका सभकेँ विदा करए जा रहल छलाह, तखने अरुन्धती कहलनि—“पुत्रवधूविहीन अयोध्या हम नहि घुरब।” रामक मातासभ सेहो सहमत भेलीह। अरुन्धतीक इच्छानुसार वसिष्ठो विवेकपूर्ण मत देलनि जे सभ वाल्मीकिक तपोवनमे जा कऽ रहथि। वासन्ती: राजा की कऽ रहल छथि? आत्रेयी: राजा अश्वमेध यज्ञ आरम्भ कयने छथि। वासन्ती: हे देव, तखन की दोसर विवाह कऽ लेलनि? आत्रेयी: भगवान् एहन नहि करथि—कदापि नहि। द्वितीय अङ्कक प्रवेशक वासन्ती: तखन यज्ञमे धर्मपत्नी के छथि? आत्रेयी: सीताक सोनाक प्रतिमा। वासन्ती: अहा— एहन अलौकिक पुरुषक हृदय के बुझि सकैत अछि? एके समय इस्पातसँ कठोर आ फूलसँ बहुत बेसी कोमल! आत्रेयी: वामदेवक विधिवत् आशीर्वादक बाद यज्ञक अश्व छोड़ल गेल अछि; शास्त्रानुसार रक्षक नियुक्त भेलाह। दिव्य अस्त्र-परम्परा प्राप्त लक्ष्मण-पुत्र चन्द्रकेतु हुनक नेतृत्व करैत छथि। चारि अङ्गबला सेनासहित हुनका आगाँ पठाओल गेल अछि। वासन्ती: (नोर भरि; स्नेह आ आश्चर्यसँ) राजकुमार लक्ष्मणक पुत्रो छथि? हे माता, ई सुनि हमरा बल भेटल। आत्रेयी: एहि सभ घटनाक बीच एक ब्राह्मण अपन मृत पुत्रकेँ राजमहलक द्वारपर राखि छाती पीटैत “अनर्थ!” चिचियायल। प्रिय राम—मानू करुणाक साक्षात् रूप—विचार कऽ रहल छलाह जे राजाक कोनो दोष बिना हुनक प्रजामे अकाल मृत्यु भऽ नहि सकैत अछि। तखने आकाशवाणी भेल— शम्बूक नामक नीच जातिक व्यक्ति पृथ्वीपर कतहु तपस्या कऽ रहल अछि। हे राम, ओकर माथ काटू; ओकर वध कयले ब्राह्मण-पुत्र फेर जीवित होयत। द्वितीय अङ्कक प्रवेशक ई सुनिते जगत्पति हाथमे खड्ग लऽ पुष्पक विमानपर चढ़लाह आ तपस्वी शूद्रकेँ चारू दिश खोजबाक लेल निकलि पड़लाह। वासन्ती: जनस्थानहिमे शम्बूक नामक शूद्र धूआँ पीबि तपस्या कऽ रहल अछि। काश, प्रिय राम एक बेर फेर एहि वनकेँ सुशोभित करितथि! आत्रेयी: प्रिय भद्रे, आब हमरा जाएब आवश्यक अछि। वासन्ती: ठीक अछि, आत्रेयी; यद्यपि दिन असह्य गरम भऽ गेल अछि— नदीक तटपर बसेरा देनिहार वृक्षसभ अपन फूलक अर्घ्यसँ गोदावरीक पूजा करैत अछि; खुजल गाल घसबाक लेल आयल हाथीक धक्कासँ गरमीमे कोमल पड़ल डाँठसँ फूलक ढेरी खसैत अछि; छाहरिमे पक्षीसभ छाल नोचि चोँचसँ कीड़ा निकालैत अछि, आ गरमीसँ व्याकुल पण्डुक आ कुक्कुट कराहि रहल अछि। दुनू घुमैत प्रस्थान करैत छथि। प्रवेशक समाप्त द्वितीय अङ्क पञ्चवटीमे प्रवेश आरम्भमे राम पुष्पक विमानपर छथि; करुणासँ भरल, खड्ग ऊपर उठौने। राम: हे हमर दहिना हाथ, ई खड्ग शूद्र तपस्वीपर चला, आ ब्राह्मणक मृत पुत्रकेँ फेर जीवित कर। तूँ ओही रामक अङ्ग छह—जे थाकल, गर्भक भारसँ भारी अपन सीताकेँ वनवास देबाक साहस कयलक। आब दया किएक जागैत छह? (कोनो तरह प्रहार करैत) लऽ, रामक योग्य कर्म कऽ देलह। ब्राह्मण-पुत्र जीवित हो! एक दिव्य पुरुषक प्रवेश दिव्य पुरुष: महाराजक जय हो। अहाँ न्यायपूर्ण दण्ड दऽ स्वयं यमसँ अभय प्रदान करैत छी; अहाँक कारण ओ बालक पुनर्जीवित भेल—आ हमहूँ उच्च पद पेलहुँ। ई शम्बूक अहाँक चरणमे माथ नमबैत अछि। सज्जनक संसर्गसँ जे किछु भेटए—मृत्युओ—मोक्ष दैत अछि। राम: दुनू फल हमरा प्रिय अछि। आब अपन उग्र तपस्याक फल भोगू। द्वितीय अङ्क : पञ्चवटीमे प्रवेश पुण्यसँ सञ्चित आनन्द आ सुखमय, प्रकाशमान विराट स्वर्गलोक सदा अहाँक हो। शम्बूक: ई उच्च पद अहाँक चरण-वन्दनासँ भेटल; तपस्याक कोनो भूमिका नहि। मुदा सम्भव अछि तपस्ये हमर बहुत उपकार कयलक— हे प्राणिमात्रक स्वामी आ हमर शरण, हमरा पृथ्वीभरि अहाँकेँ ताकए पड़ितए, मुदा अहाँ स्वयं सय-सय योजन पार कऽ नीचजाति हमरा खोजैत अयलहुँ। ई निश्चय हमर तपस्याक देल वरदान अछि— नहि तँ अयोध्या छोड़ि फेर दण्डकवन किएक अबितहुँ? राम: की, ई दण्डकवन अछि? (चारू कात देखैत) हँ— एतय कोमल गाढ़ हरियर चरागाह, ओतय कठोर भयावह भूभाग; चारू दिश क्षितिज धरि वेगवती नदीक गर्जना गूँजैत; बीच-बीचमे घाट, आश्रम, पर्वत, धार, गुफा आ वन... हँ, ई भूमि परिचित अछि—विन्ध्यक दण्डकबला भाग। द्वितीय अङ्क : पञ्चवटीमे प्रवेश शम्बूक: ई निश्चय दण्डकवन अछि। कहल जाइत अछि, जखन देव एतय रहैत छलाह— युद्धमे चौदह हजार भयङ्कर राक्षसकेँ मारलनि, आ तीनटा आरो—दूषण, खर आ त्रिशिरा। एहिसँ जनस्थान पवित्र भूमि भऽ गेल, जतय हम जकाँ डरपोक लोक सेहो सुरक्षित विचरि सकैत छल। राम: की, केवल दण्डक नहि—जनस्थान सेहो? शम्बूक: हँ, निश्चय। जनस्थानसँ सटल आ दक्षिण दिस जाएबला वनक विशाल विस्तार—जकर घृणित पर्वतीय गुफासभ हिंस्र वनकुकुरक झुण्डसँ भरल—केओ हो, ओकर रोम ठाढ़ कऽ दैत अछि। कतहु भूभाग मृत्युसमान निःशब्द, कतहु वन्य पशुक हाहाकार; शान्त सूतल विशाल भयङ्कर साँपक फुफकारसँ आगि लागि जाइत अछि, जल दुर्लभ—केवल गहिर दरारमे भेटैत; पियासल गिरगिट साँपक पीठक पसेना पीबैत अछि। द्वितीय अङ्क : पञ्चवटीमे प्रवेश राम: खरक निवास-स्थान जनस्थानकेँ निहारैत, पुरान घटना मानू आँखिक सोझाँ फेर घटि रहल अछि। (चारू कात देखैत) वैदेहीक रामपर कतेक गाढ़ प्रेम छल! हे देव, इएह वन—एहिसँ भयङ्कर आ की भऽ सकैत अछि? (नोर भरि) तैयो ओ कहलीह—“मधुगन्धित वनमे हम अहाँक संग रहब,” आ सचमुच एतय आनन्दित रहलीह— एतेक गाढ़ छल हुनक स्नेह। मनुष्यकेँ किछु करबाक आवश्यकता नहि; केवल संग रहबाक आनन्द दुःख मिटा दैत अछि। अपनासँ प्रेम करनिहार केओ हो—कतेक पैघ वरदान! शम्बूक: केवल पीड़ा देनिहार स्मृति छोड़ू। देव बीच दूरीक वन दिस देखथि—शान्त, गम्भीर अरण्य; मदमत्त मयूरक कोमल गरदनिक रङ्गबला पर्वतसँ घेरल; सघन गाढ़ छाह देनिहार वृक्षक झुण्डसँ शोभित; सभ प्रकारक पशु-समूह निश्चिन्त विश्राम करैत। द्वितीय अङ्क : पञ्चवटीमे प्रवेश एतय पर्वतीय धारसभ शीतल, निर्मल जलसँ बहैत; उन्मत्त पक्षीसँ हिलल लता आ सरकण्डाक फूलक सुगन्धसँ भरल; तीव्र धारा पाकल फलसँ श्याम जामुनक कुञ्ज बीच गर्जना करैत खसैत अछि। आओर— पर्वतपर गुफासभ अछि जतय भालुकक बच्चा रहैत; प्रतिध्वनिसँ हुनक गुर्राहट कई गुना बढ़ि जाइत; हाथीसँ डाँठसँ तोड़ि बिखेरल रसदार शल्लकी-पातक शीतल, तीक्ष्ण, कसैला गन्ध सेहो गुफामे घनि जाइत अछि। राम: (सिसकीमे स्वर रुकैत) भद्र, अहाँक मार्ग मङ्गलमय हो; स्वर्गीय पन्थासँ पुण्यलोककेँ प्राप्त करू। शम्बूक: प्राचीन ब्रह्मर्षि अगस्त्यकेँ प्रणाम कयलापर हम शाश्वत धाममे प्रवेश करब। प्रस्थान। द्वितीय अङ्क : पञ्चवटीमे प्रवेश राम: आइ फेर ओही वनकेँ देखि रहल छी जतय बहुत वर्ष पहिने दीर्घकाल धरि रहलहुँ— अपन धर्ममे स्थित तपस्वी सेहो, गृहस्थ सेहो, आ सांसारिक सुखक मधुर स्वाद सेहो जानलहुँ। ओएह पर्वतसभ, जतय मयूर पुकारैत छल; ओएह वन-प्रदेश, जतय मृग मदमत्त छल; ओएह नदी-तट, मनोहर नरकट, लता आ नील-श्याम घन झुण्डमे उगल सरकण्डासँ भरल। दूर मेघमाला जकाँ जे उठल देखाइत अछि, ओ प्रस्रवण पर्वत अछि, जतय गोदावरी बहैत अछि। ओही पर्वतक उच्च शिखरपर पक्षिराज रहैत छलाह, आ नीचाँ गोदावरीक तटपर पातक कुटीमे हमसभ सुखसँ रहैत रही— चारू कात कूजन करैत पक्षीसँ जीवन्त, श्याम वृक्षसँ शोभित वन। द्वितीय अङ्क : पञ्चवटीमे प्रवेश एतहि पञ्चवटी अछि, जकर अनेक स्थल हमर दीर्घ निवासक असङ्ख्य अन्तरङ्ग वार्ताक साक्षी छल; एतहि हमर प्रियाक सखी वासन्ती रहैत छथि। मुदा रामकेँ ई की भऽ रहल अछि? एखन— धीरे-धीरे पसरैत विष जे सहसा तीक्ष्ण शक्ति देखबए, अथवा भीतर गड़ल बाणक नोक जे बाहरी आघातसँ हिलए, अथवा हृदयक कोमल मर्मक पुरान घाव जे भरि गेलोपर फेर फाटि जाए— ओहिना हमर पुरातन शोक सहसा फेर जागि हमरा विदीर्ण करए लागल। तैयो हम ओहि भूभागसभकेँ देखए चाहैत छी जे कखनो हमर मित्र छल। (देखैत) अहा, भूमिक रूप कतेक बदलि गेल! जतय पहिने बहैत धार छल, एखन सुखायल नदीक पाट अछि; जतय वृक्ष घन छल, विरल भऽ गेल; आ जतय विरल छल, घन भऽ गेल। एतेक दिन बाद देखैत वन पूर्ण बदलल लगैत अछि— केवल पहाड़क स्थिति विश्वास करबैत अछि जे इएह ओ स्थान अछि। अहा, हमर अनिच्छाक बादो पञ्चवटीक प्रति स्नेह हमरा बलपूर्वक अपना दिस खिंचि रहल अछि। (करुणासँ) द्वितीय अङ्क : पञ्चवटीमे प्रवेश जतय हुनक संग ओ सभ दिन बितल, आ घर घुरलापर जे निरन्तर स्मरण आ अन्तहीन वार्ताक विषय रहल— अपन परम प्रियाकेँ मारि आब एकाकी भेल पापी राम पञ्चवटीकेँ कोना देखत अथवा प्रणाम कयने बिना एकरा पार करत? शम्बूकक प्रवेश शम्बूक: महाराजक जय हो। अगस्त्य हमरा सँ अहाँक आगमनक समाचार पाबि ई सन्देश पठौने छथि: “लोपामुद्रा स्वागतक सभ व्यवस्था कऽ महर्षिसभक संग स्नेहपूर्वक अहाँक प्रतीक्षा करैत छथि। कृपया आबि दर्शन दऽ हमरा सभकेँ कृतार्थ करू। तदनन्तर तीव्रगामी पुष्पकसँ अपन देश घुरि अश्वमेध यज्ञक तैयारी कऽ सकैत छी।” राम: भगवान् जे आज्ञा देलनि। शम्बूक: तखन देव पुष्पककेँ एहि दिश घुमाबथि। राम: हे पञ्चवटी, वृद्धजनक आज्ञा मानबाक लेल रामकेँ क्षणभरि जे अनादर करए पड़ि रहल अछि, ओकरा क्षमा करिह। शम्बूक: देखू देव, देखू— द्वितीय अङ्क : पञ्चवटीमे प्रवेश ओ क्रौञ्चावत पर्वत अछि, जतय बाँसक वनमे पवनक कर्कश गर्जना पात हिलैत कुञ्जमे उल्लूकक हाहाकारसँ दुगुना भऽ कौआक झुण्डकेँ चुप करा दैत अछि; प्राचीन चन्दन-वृक्षक डारिसँ लटकल साँप नीचाँ ठसकसँ चलैत मयूरक पुकारसँ भयभीत भऽ छटपटाइत अछि। आओर— ओतय दक्षिणक पर्वतसभ अछि; हुनक गुफामे गोदावरीक जल गुड़गुड़ाइत अछि, शिखरपर मँडराइत मेघसँ चोटी श्याम अछि; आ ओ नदी-सङ्गमक तीर्थसभ, जतय सोझा-सोझी टकराइत धारक अनियमित तरङ्गक प्रहारसँ गहिर जल गर्जैत अछि। दुनू प्रस्थान करैत छथि। द्वितीय अङ्क समाप्त तृतीय अङ्कक प्रवेशक दू नदीक प्रवेश। प्रथमा: सखी मुरला, अहाँ किछु व्याकुल बुझाइत छी। मुरला: तमसा, अगस्त्य-पत्नी लोपामुद्रा हमरा श्रेष्ठ नदी गोदावरी लेल सन्देश दऽ पठौने छथि— “अहाँ भलीभाँति जनैत छी, पुत्रवधूकेँ त्यागल क्षणसँ रामक भीतर करुण रस भरल अछि; हुनक गम्भीर मुद्रा ओकरा नुका कऽ रखैत अछि, आ तीक्ष्ण पीड़ा भीतर एना सुलगैत अछि जेना अंगारमे पकैत माटिक पात्र। ताहि कारण प्रिय स्त्रीपर आयल विपत्तिसँ जन्मल आ निरन्तर प्रबल होइत शोकक धारा आब प्रिय रामकेँ पूर्ण रूपेँ तोड़ि देने अछि। हुनका देखैत हमर हृदयक तार टूटए लगैत अछि। आइ ओ पुत्रवधूक संग वनवासक अन्तरङ्ग क्षणक साक्षी स्थानसभकेँ अन्तिम बेर देखबाक लेल पञ्चवटी घुरि रहल छथि। स्वभावसँ आत्मसंयमी छथि, तैयो भय अछि जे एहन स्थानमे असह्य शोकक आघात डेग-डेगपर हुनका विक्षुब्ध करत। हे गोदावरी, एहि बातक ध्यान राखिह। अपन तरङ्गक जलकणसँ शीतल, कमलक केसरक सुगन्ध लऽ चलैत पवनकेँ अति मृदुतासँ प्रिय राम दिस पठबिह, आ जखन ओ मूर्च्छित होमय लगथि, हुनक प्राण शान्त करिह।” तृतीय अङ्कक प्रवेशक तमसा: एहन दूरदर्शिता लोपामुद्राक स्नेहक सर्वथा अनुरूप अछि। मुदा प्रिय रामकेँ पुनर्जीवित करबाक एक अधिक मूल उपाय एखने उपलब्ध अछि। मुरला: कोना? तमसा: सुनू। कहल जाइत अछि, बहुत वर्ष पहिने लक्ष्मण हुनका त्यागि वाल्मीकिक तपोवनसँ घुरलाह, तकर तुरन्त बाद महारानी सीताकेँ प्रसव-वेदना आरम्भ भेल। पीड़ा एतेक तीव्र छल जे ओ गङ्गामे कूदि पड़लीह। ओतहि दू छोट पुत्रकेँ जन्म देलनि। पृथ्वी आ गङ्गा हुनक सहायता कऽ हुनका पाताल लऽ गेलीह। बालकसभक दूध छुटलापर स्वयं गङ्गादेवी हुनका प्रचेता-वंशज महर्षिक देखरेखमे सौंपि देलनि। मुरला: (आश्चर्यसँ) एहन व्यक्तिक विपत्तियो निर्मल आश्चर्यक कारण बनैत अछि, कारण एहन दिव्य सत्ता हुनक सहायता लेल आबि जाइत छथि। तमसा: आब भागीरथी सरयू सँ जानलनि जे शम्बूकक प्रसङ्गक कारण प्रिय राम सम्भवतः जनस्थान अयलाह अछि; तखन हुनको लोपामुद्रा जकाँ कोमल चिन्ता घेरि लेलक। अतः ओ सीताक संग, नजरि उतारबाक बहाना कऽ, गोदावरीक दर्शन लेल अयलीह। तृतीय अङ्कक प्रवेशक मुरला: गङ्गाक दूरदर्शिता उचित छल। जाधरि राजा राम राजधानीमे रहि प्रजाक अनेक तात्कालिक कार्यमे व्यस्त छलाह, हुनक ध्यान निश्चय बँटल रहैत। मुदा आब कोनो मनोरञ्जन नहि, शोकक अतिरिक्त कोनो साथी नहि—एहन अवस्थामे पञ्चवटीमे घुरब सङ्कटपूर्ण अछि। की महारानी सीता कोनो तरह प्रिय रामकेँ सान्त्वना दऽ सकैत छथि? तमसा: देवी भागीरथी एहि विषयमे पहिने सोचि लेने छथि। ओ सीतासँ कहलीह—“यज्ञभूमिसँ जन्मल पुत्री सीता, आइ कुश आ लव—चिरञ्जीवी होथि—हुनक जन्मवर्ष गनबाक गण्डा बारह धरि पहुँचि गेल अछि। अतएव अपन हाथसँ फूल चुनि निष्कलङ्क सूर्यक पूजा करू—ओ मानववंशक आदिपुरुष, अहाँक पुत्रसभक राजवंशक जनक आ अहाँक आद्य श्वसुर छथि। हमर शक्तिसँ मनुष्य तँ दूर, कोनो देवता सेहो पृथ्वीपर अहाँक उपस्थिति नहि देखि सकत।” फेर हमरा आज्ञा देलनि—“तमसा, पुत्री जानकी—हमर पुत्रवधू—अहाँसँ विशेष स्नेह करैत छथि; ताहि हेतु हुनक सेवा अहाँ करिह।” आब हम ओही आज्ञाक पालन कऽ रहल छी। मुरला: हम ई योजना लोपामुद्राकेँ कहब। बुझाइत अछि प्रिय राम स्वयं आबि चुकल छथि। तमसा: आ ओतय, गोदावरीक एक सरोवरसँ निकलि— तृतीय अङ्कक प्रवेशक छिड़िआयल केशसँ मुख झाँपल, पीयर आ धँसल गालसँ आरो सुन्दर, करुणाक प्रतिमा, प्रेम-वियोगक पीड़ाक मूर्त रूप— जानकी वनमे प्रवेश कऽ रहल छथि। मुरला: हँ, ओएह होयतीह— डाँठसँ काटल कोमल कोँपल जकाँ, दीर्घ कठोर शोकक ताप हुनक हृदय-पुष्पकेँ शरदक गरमीसँ केतकीक कोँपलक पात जकाँ सुखा देलक; हुनक पीयर कृश देह मुरझायल अछि। दुनू घुमैत प्रस्थान करैत छथि। प्रवेशक समाप्त तृतीय अङ्क छाया नेपथ्यसँ: सङ्कट! सङ्कट! फूल चुनबामे तल्लीन सीताक प्रवेश; स्वर सुनि क्रमशः करुणा आ चिन्तासँ भरैत। सीता: की ई हमर प्रिय सखी वासन्तीक स्वर सुनाइत अछि? नेपथ्यसँ फेर स्वर: बहुत पहिने महारानी सीता जे हाथसँ चुनल शल्लकी-पातक कोमल छोर खुआ कऽ एक छोट बच्चा रूपमे पोसने छलीह— जे अधीर भऽ हुनक सोझाँ ठाढ़ रहैत छल—ओ हाथी... सीता: ओकर की भेल? नेपथ्यसँ फेर स्वर: नदीमे अपन हथिनीक संग खेलि रहल छल, तखने एक वन्य मदमत्त हाथी निर्लज्जतासँ ओकरापर टूटि पड़ल। सीता: (घबरा कऽ किछु डेग आगाँ बढ़ैत) आर्यपुत्र, हमर छोट पुत्रकेँ बचाउ, बचाउ! (स्मृति घुरबाक अभिनय; उदास) हे देव, पञ्चवटीक दर्शनसँ अभागल हमर मुखमे बहुत पहिने परिचित ई शब्द फेर आबि गेल! हाय आर्यपुत्र! (मूर्च्छित होइत) तमसाक प्रवेश तमसा: पुत्री, कृपया अपनाकेँ सम्हारू। तृतीय अङ्क : छाया नेपथ्यसँ: हे श्रेष्ठ रथ, एतहि ठहर। सीता: (चेतना पाबि; सहसा घबरा कऽ) जलभरल मेघक मन्द गर्जना जकाँ गम्भीर आ मधुर ई मानव-वाणी हमर कानमे भरि सहसा अभागल हमराकेँ एतेक व्याकुल किएक करैत अछि? तमसा: (एके संग मुस्कुराइत आ कानैत) हे पुत्री, दूरक मेघगर्जन सुनि मयूरी जकाँ, एतेक अस्पष्ट आ अनिश्चित ध्वनिसँ अहाँ जकाँ स्त्री एतेक व्याकुल आ उत्कण्ठित कोना भऽ सकैत छथि? सीता: भगवती, “अस्पष्ट” किएक कहैत छी? ई केवल हमर आर्यपुत्रक वाणी भऽ सकैत अछि; हम हुनक स्वर चिन्हैत छी। तमसा: सुनने छी, इक्ष्वाकुवंशी राजा तपस्या करनिहार एक शूद्रकेँ दण्ड देबाक लेल जनस्थान अयलाह अछि। सीता: सौभाग्य जे राजा राजधर्मक आचरण नहि त्यागलनि। नेपथ्यसँ: जतय वृक्ष आ पशु सेहो बन्धु छल, जतय प्रियाक संग दीर्घकाल धरि रहलहुँ... ई गोदावरीक पर्वतीय ढलान, गुफासँ भरल, वेगवती धारसँ काटल। तृतीय अङ्क : छाया सीता: (देखैत) हे देव, ई की... भोरक चन्द्रमण्डल जकाँ पीयर, कृश आ निर्बल देह; मुदा अपन विशिष्ट सौम्य आ गम्भीर मुद्रा—केवल इएह हमरा चिन्हबा दैत अछि... हँ, ई आर्यपुत्रे होयताह। हमरा थाम्हू। (तमसाक कोरामे मूर्च्छित होइत) तमसा: (थाम्हैत) पुत्री, कृपया अपनाकेँ सम्हारू। नेपथ्यसँ: पञ्चवटीक दर्शन हृदयमे बहुत दिनसँ सुतल शोकाग्निकेँ फेर प्रज्वलित करैत अछि; मुदा पहिने घन धूआँक आवरण जकाँ मूर्च्छा हमरा घेरि लैत अछि। हाय प्रिय जानकी! तमसा: (स्वगत) हमर गुरु केँ इएह भय छलनि। सीता: (चेतना पाबि) ई कोना सम्भव? नेपथ्यसँ: हाय महारानी, दण्डकवनक प्रवासमे हमर प्रिय सहचरी! हाय विदेहक राजकुमारी! सीता: हे देव, अभागल हमर नाम मुखपर लैत—हुनक नीलकमल जकाँ आँखि उलटि गेल, ओ मूर्च्छित भऽ भूमि पर खसि पड़लाह। निर्जन धरतीपर मित्रहीन, असहाय एना पसारल हुनका कोना छोड़ि दी? तमसा, हुनका बचाउ, बचाउ; हमर आर्यपुत्रकेँ जीवन दियौ। (चरणमे खसैत) तृतीय अङ्क : छाया तमसा: मनोहर पुत्री, जगत्पतिकेँ जीवन देबाक सामर्थ्य केवल अहाँमे अछि। अहाँक हाथक स्पर्श हुनका प्रिय अछि; सम्पूर्ण भार केवल ओहीपर अछि। सीता: जे होयबाक हो, हो। भगवतीक जे आज्ञा। (घबरा कऽ प्रस्थान) दृश्य खुलैत अछि: राम भूमिपर मूर्च्छित पड़ल छथि; नोर बहबैत सीता हुनका सहला रहल छथि; ओ परमानन्दक भावसँ चेतना पाबि रहल छथि। सीता: (दबल आनन्दसँ) मानू सम्पूर्ण विश्वक प्राण घुरि आयल। राम: मुदा ई की भऽ रहल अछि? ई स्वर्गीय चन्दन-पातक निचोड़ अछि? अथवा यन्त्रमे पेरल चन्द्रकिरणक डाँठसँ खसल बून्द? कि केओ मृत-सञ्जीवनी दिव्य औषधिक रस हमर हृदयपर टपका कऽ पहिने जरल जीवनकेँ फेर शान्त करैत अछि? तृतीय अङ्क : छाया ई स्पर्श बहुत पहिनेक परिचित अछि— जे चेतना घुरबैत अछि आ गाढ़ मदहोशी सेहो दैत अछि; व्यथासँ जन्मल मूर्च्छा हटिते पूर्ण परमानन्दक स्तब्धता उत्पन्न कऽ दैत अछि। सीता: (भय आ करुणासँ हाथ हटबैत) एखन एतबे उचित अछि। राम: (बैसैत) की सम्भव अछि जे महारानी स्नेहवश हमर सहायता लेल अयलीह? सीता: हाय, आर्यपुत्र एखन हमर चर्चा किएक करैत छथि? राम: चारू कात देखी। सीता: तमसा, चलू! राजा हमरा बिना आज्ञा एतय देखि क्रुद्ध होयताह। तमसा: मुदा पुत्री, भागीरथीक कृपासँ अहाँ देवताकेँ सेहो अदृश्य छी। सीता: अहा हँ, अहाँ सत्य कहैत छी। राम: प्रिय जानकी! निश्चय प्रिय जानकी... सीता: (क्रोधसँ स्वर टूटैत) आर्यपुत्र, ई सभ घटलाक बाद ई सम्बोधन कतेको अनुचित अछि। (नोर भरि) मुदा फेर, जखन ओ स्नेहसँ अभागल हमराकेँ सम्बोधित करैत छथि, आ जखन हम क्षणमात्र लेल सेहो ई नहि सोचने रही— तृतीय अङ्क : छाया —जे पुनर्जन्मोमे हुनका फेर देखब, तखन हुनक प्रति एतेक कठोर आ निर्दय किएक होई? हम हुनक हृदय जनैत छी—जेना ओ हमर जनैत छथि। राम: (चारू कात देखि; उदास) नहि, एतय केओ नहि। सीता: हे तमसा, ओ बिना कारण हमरा त्यागि देलनि, तैयो हुनका एहि अवस्थामे देखि हमर हृदय एहन-एहन भाव अनुभव करैत अछि जे हम स्वयं नहि बुझैत छी। तमसा: बुझैत छी, पुत्री, बुझैत छी। निराशासँ शीतल, हुनक कठोरतासँ कटु, दीर्घ वियोगक बाद भेटसँ प्रायः जड़; अपन सज्जनतासँ क्षमाशील, स्वामीक समस्त करुण दशापर गाढ़ सहानुभूतिशील, प्रेमसँ पघिलल— अहाँक हृदय एके क्षणमे ई सभ अछि। राम: हे महारानी, अहाँक स्पर्श मानू क्षमाक साक्षात् रूप, शीतल आ प्रेमक आर्द्रतासँ भरल; सभक बादो हमरा आनन्द देबाक लेल उपस्थित— मुदा हे हृदयेश्वरी, अहाँ कतय छी? तृतीय अङ्क : छाया सीता: सीताक विषयमे आर्यपुत्रक ई करुण वचन गाढ़ स्नेहसँ भरल, प्रेमानन्दसँ छलकैत अछि। विश्वास करैत छी तँ लगैत अछि जन्म सार्थक भेल—यद्यपि निराधार त्यागक बाण अत्यन्त तीक्ष्ण अछि। राम: मुदा प्रिय जानकी एतय की करितथि? ई रामक निर्मल भ्रम मात्र अछि—दीर्घ अभ्याससँ विकसित मनोकामना-कल्पनाक फल। नेपथ्यसँ: सङ्कट! सङ्कट! बहुत पहिने महारानी सीता जे हाथसँ चुनल शल्लकी-पातक कोमल छोर खुआ कऽ बच्चा रूपमे पोसने छलीह—जे अधीर भऽ हुनक सोझाँ ठाढ़ रहैत छल—ओ हाथी... राम: (करुणा आ चिन्ता बढ़ैत) ओकर की भेल? नेपथ्यसँ फेर स्वर: नदीमे अपन हथिनीक संग खेलि रहल छल, तखने एक वन्य मदमत्त हाथी निर्लज्जतासँ ओकरापर टूटि पड़ल। सीता: आब ओकर रक्षा के करत? राम: ओ दुष्ट कतय अछि जे हमर प्रियाक छोट पुत्र आ ओकर संगिनीपर आक्रमण करबाक साहस कयलक? (ठाढ़ होइत) घबरायल वासन्तीक प्रवेश वासन्ती: की ई राजा रघुनन्दन छथि? तृतीय अङ्क : छाया सीता: अहा, ई हमर प्रिय सखी वासन्ती छथि। वासन्ती: महाराजक जय हो। राम: (देखैत) अरे, ई तँ महारानीक प्रिय सखी वासन्ती छथि। वासन्ती: शीघ्र चलू देव, शीघ्र। एतयसँ निकलि जटायु-शिखरक दक्षिणमे सीता-घाटसँ गोदावरी दिस उतरब तँ महारानीक छोट पुत्र देखाइत। सीता: हाय पिता जटायु! अहाँ बिना जनस्थान रिक्त अछि। राम: अहा, ई सङ्केतसभ हृदयक कोमल मर्म फाड़ि दैत अछि। वासन्ती: एम्हर देव, एम्हर। सीता: भगवती, सचमुच वनदेवतासभ सेहो हमरा नहि देखैत छथि। तमसा: प्रिय पुत्री, मन्दाकिनीक शक्ति सभ आन देवतासँ बहुत अधिक अछि। चिन्ता नहि करू। सीता: तखन हमसभ पाछाँ-पाछाँ चली। दुनू घुमैत छथि। राम: पुण्यमयी गोदावरी, अहाँकेँ प्रणाम। तृतीय अङ्क : छाया वासन्ती: (देखैत) देव, प्रसन्न होउ—महारानीक छोट पुत्र अपन संगिनीक संग विजयी भेल। राम: ओकर जय हो, दीर्घायु हो। सीता: अहा, कतेक पैघ भऽ गेल! राम: महारानी, अहाँ कतेक भाग्यवती छी। प्रिय पत्नी, अहाँक जे पुत्र कखनो कमल-पंखुड़ी जकाँ चिक्कन, नव कोँपल सन दाँतक छोरसँ अहाँक कानक पाछाँक लवली-पात तोड़ि लैत छल, ओ आइ मदमत्त हाथीसँ विजय पेलक— स्पष्ट अछि, बाल्यकालक सौभाग्य एखनो ओकर संग अछि। सीता: ओ दीर्घायु हो, आ आइ सँ अपन कोमलहृदया संगिनीसँ कखनो अलग नहि हो। राम: देखू सखी वासन्ती, देखू—बालक प्रायः प्रियाक सम्मान करबाक कला सीखि गेल अछि। खेलमे उखाड़ल कमलनालक कौर ओ जखन चबैत अछि, तकर बीच-बीचमे नव खसल कमलक सुगन्धिबला जल बून्दभरल सूँढ़सँ छिड़कि ओकर मुखमे दैत अछि; मुदा विश्रामक समय सोझ डाँठबला कमल-पातसँ छाया दऽ जे उचित चिन्ता देखयबाक चाही, से एखन नहि सीखलक। तृतीय अङ्क : छाया सीता: तमसा, ओकरा एतेक पैघ देखैत कुश आ लव मोन पड़ैत छथि—एतेक दिन बाद ओ सभ केहन देखाइत होयत। तमसा: ठीक एही जकाँ छथि। सीता: हम कतेक अभागल छी—केवल स्वामीसँ नहि, पुत्रसभसँ सेहो एतेक क्रूरतासँ अलग कऽ देल गेलहुँ। तमसा: भाग्यमे एना लिखल छल। सीता: पुत्र जन्म देबाक की लाभ, जँ आर्यपुत्र अपन पुत्रसभक मुख कखनो नहि चुमि सकताह—दू नव कमल जकाँ मुख, जाहिपर निकलैत किछु कोमल उज्ज्वल श्वेत दाँतक चमक, बाल्यक निष्कपट हँसी, तोतली बोली आ शिखाबला केश? तमसा: देवतासभ कृपा करथि। सीता: तमसा, पुत्रसभक स्मरण मात्रसँ हमर स्तन दूधसँ भरि उठैत अछि, आ हुनक पिताक उपस्थितिसँ क्षणभरि लगैत अछि मानू हम फेर जीवित लोकमे घुरि अयलहुँ। तमसा: की कहल जाय? सन्तान प्रेमक चरम सीमा आ माता-पिताक परम बन्धनक मूल अछि। दुनू दम्पतीक प्रेमक साझा विषय होयबाक कारण सन्तान हुनक हृदयकेँ बान्हनिहार आनन्दक गाँठि अछि। तृतीय अङ्क : छाया वासन्ती: देव, ओतहु देखू— ओएह मयूर कदम्ब-वृक्षक ऊँच डारिपर रत्नमुकुट जकाँ बैसि अपन संगिनीकेँ पुकारि रहल अछि; अद्वितीय उत्सवमय ताण्डव नृत्य समाप्त कऽ एखने कोमल पुछरक पाँखि पसारलक। सीता: (नोर भरि; आश्चर्यसँ) ई ओएह अछि! राम: प्रिय पुत्र, अहाँक सर्वमङ्गल हो। सीता: हँ, एहिना हो। राम: हमरा पितृस्नेहसँ अहाँ मोन पड़ैत छी— हमर सरलहृदया पत्नी अपन सन्तान जकाँ अहाँकेँ नचबैत छलीह, हाथसँ ताल दैत आ आँखि घुमा कऽ अहाँकेँ चक्कर कटबैत; हुनक नेत्रगोलक मण्डल जकाँ घूमैत, आ भौंहक कुशल कम्पनमे ताण्डवक सभ गति देखाइत। अहा, पशु सेहो पुरान परिचितकेँ चिन्हैत अछि— ई एखने फूलल कदम्ब-वृक्ष हमर प्रिय महारानी बीआँसँ रोपने छलीह— सीता: (देखैत; नोर भरि) आर्यपुत्रक स्मरणशक्ति कतेक तीक्ष्ण अछि! तृतीय अङ्क : छाया राम: आ मयूर निश्चय हुनका मोन करैत अछि, ताहि हेतु वृक्षकेँ अपन भाइ जकाँ मानैत अछि। वासन्ती: देव क्षणभरि एतय बैसथि। ई कदली-वनक पाथरक आसन अछि, जतय अहाँ आ प्रिय पत्नी विश्राम करैत छलहुँ; सीता हरिणक बच्चासभकेँ एतेक घास खुआबैत छलीह जे ओ सभ हुनका जाए नहि दैत छल। राम: ई देखल नहि जाइत अछि। (दोसर स्थानपर बैसि कानैत) सीता: सखी वासन्ती, ई सभ देखा कऽ हमर आर्यपुत्रक—आ हमर—की दशा कऽ रहल छी? हे देव, एतय हमर आर्यपुत्र—ओएह स्वामी; ओएह पञ्चवटी वन; ओएह सखी वासन्ती; गोदावरीक तटक ओएह वन-प्रदेश जे हमर असङ्ख्य अन्तरङ्ग क्षणक साक्षी छल; ओएह वृक्ष, पक्षी आ पशु जे हमर सन्तान जकाँ छल—सभ आँखिक सोझाँ अछि, तैयो अभागल हमर लेल सभक अस्तित्व समाप्त भऽ गेल। हमर संसार कतेक पूर्ण रूपेँ उलटि गेल! वासन्ती: हे सखी सीता, रामक दशा नहि देखैत छी? तृतीय अङ्क : छाया जखन हुनक देह नीलकमल-पंखुड़ी जकाँ ताजा छल, आँखि लेल उत्सव छल; मोन भरि निहारलोपर ओ प्रत्येक क्षण नव लगैत छलाह। आ आब प्रायः चेतनाहीन, एके संग पीयर आ श्याम, शोकसँ एतेक निर्बल जे हुनका चिन्हब कठिन, तैयो आँखिकेँ आनन्द दैत छथि। सीता: देखैत छी सखी, देखैत छी। तमसा: पुत्री, दीर्घकाल धरि अपन प्रियकेँ एना देखैत रहू। सीता: हे नाथ, के विश्वास करितए जे ओ हमरा बिना आ हम हुनका बिना रहि सकैत छी? खसैत नोरक बीच-बीचमे प्रिय आर्यपुत्रकेँ क्षणभरि आरो निहारि ली—हुनका देखब मानू नव जन्म पायब अछि। (निहारैत रहैत) तमसा: (स्नेहसँ कानैत हुनका आलिङ्गन करैत) आनन्द आ शोकसँ उठल उफनैत नोरक बाढ़ि लालसासँ फैलल अहाँक आँखिसँ मुक्त भऽ रहल अछि; प्रेमसँ बहैत उज्ज्वल, मधुर, निष्कपट दृष्टि दूधक धार जकाँ अहाँक हृदयेश्वरकेँ भिजा रहल अछि। तृतीय अङ्क : छाया वासन्ती: वृक्षसभ मधु टपकबैत फूल-फलक स्वागत-अर्घ्य देथि; वनक पवन नव विकसित कमलक सम्पूर्ण सुगन्ध लऽ बहए; आ पक्षीसभ पूर्ण कण्ठसँ मधुर, अखण्ड गीत आरम्भ करए— कारण राजा राम स्वयं फेर एहि वनक दर्शन लेल अयलाह अछि। राम: आउ सखी वासन्ती, एतय बैसी? वासन्ती: (बैसैत; नोर भरि) महाराज, आशा अछि राजकुमार लक्ष्मण कुशल छथि? राम: (नहि सुनबाक अभिनय) मैथिली अपन कमल-हाथसँ एहि वृक्ष, पक्षी आ मृगसभकेँ जल, बीआ आ घास दैत छलीह; हुनका फेर देखैत हम एना परिवर्तित होइत छी मानू हृदय द्रव भऽ फूटि बहए लेल तैयार हो। वासन्ती: मुदा महाराज, हम राजकुमार लक्ष्मणक कुशल पुछने रही। राम: (स्वगत) अहा, “महाराज”—कतेक शीत सम्बोधन! ओ केवल सौमित्रिक कुशल पुछैत छथि, आ वाणी सिसकीसँ रुकैत छनि। निश्चय सीताक घटना जानैत छथि। (प्रकट) हँ, राजकुमार कुशल छथि। (कानए लगैत) तृतीय अङ्क : छाया वासन्ती: हाय देव, अन्ततः अहाँ एतेक क्रूर किएक भेलहुँ? सीता: सखी वासन्ती, हुनकासँ एना कोना बाजि सकैत छी? हमर आर्यपुत्र सभक दयाक अधिकारी छथि—विशेषतः हमर प्रिय सखीक। वासन्ती: “अहाँ हमर जीवन छी, दोसर हृदय छी, आँखि लेल चाननी, अङ्ग लेल अमृत”— एहन असङ्ख्य मधुमय वचनसँ ओ सरल कन्याकेँ मोहित कयलहुँ... मुदा बस, आरो कहबाक की प्रयोजन? (मूर्च्छित होइत) तमसा: स्वाभाविक अछि जे ओ अवाक् भऽ जाथि, एतय धरि जे विक्षिप्त भऽ जाथि। राम: सखी, कृपया अपनाकेँ सम्हारू। वासन्ती: (चेतना पाबि) मुदा देव ई अकथनीय कर्म किएक कयलनि? सीता: बस करू सखी वासन्ती, बस करू। राम: प्रजाक निन्दाक कारण। वासन्ती: निन्दाक कारण की छल? राम: केवल प्रजा किछु जानैत अछि। तृतीय अङ्क : छाया तमसा: उलाहना देब आब बहुत देरि भऽ गेल। वासन्ती: हाय निर्दय, कहल जाइत अछि अहाँ प्रतिष्ठाकेँ मूल्यवान मानैत छी; मुदा एहिसँ पैघ अपयश की? मृगनयनी स्त्रीक वनमे की दशा भेल होयत—की बुझैत छी? कहू, हमर स्वामी। सीता: सखी वासन्ती, पहिनेसँ आगिमे जरैत पुरुषक आगि आरो भड़कबैत निर्दय आ निष्ठुर अहाँ छी। तमसा: ई प्रेम आ शोक बाजि रहल अछि। राम: सखी, एहन अवस्थामे की अनुमान कयल जा सकैत अछि? गर्भमे हिलैत शिशुक भारसँ थाकि पड़ल हुनक आँखि डरल एकवर्षीय मृगक आँखि जकाँ घूमल होयत; कमल-पंखुड़ी अथवा चन्द्रकिरणक पुंज जकाँ कोमल देह वन्य पशुसँ फाड़ल गेल होयत। सीता: आर्यपुत्र, हम जीवित छी—एतहि, जीवित। राम: हाय प्रिय जानकी, अहाँ कतय छी? सीता: हे देव, हमर आर्यपुत्र सेहो पूर्ण कण्ठसँ पुकारि रहल छथि। तृतीय अङ्क : छाया तमसा: पुत्री, ई हितकर अछि। शोकाकुल मनुष्यकेँ शोक बाहर निकालबाक प्रयास करए चाही। कारण— जखन बाढ़ि बाँधपर दबाव दैत अछि, जल छोड़ि ओकर प्रतिकार कयल जाइत अछि; आ शोकसँ दबायल हृदयकेँ सहनशील बनेबामे रोनाइ सहायता करैत अछि। विशेषतः प्रिय राम लेल, जिनका संसार एखन अनेक प्रकारसँ भयावह भऽ गेल अछि। तीक्ष्णतम बुद्धिसँ नियमपूर्वक सम्पूर्ण पृथ्वीक रक्षा करबाक अछि, जखन प्रियाक शोक ग्रीष्मतापसँ फूल जकाँ हुनक आत्माकेँ सुखबैत अछि। त्यागक दोष स्वयं हुनक अछि, ताहि हेतु विलापमे शान्ति नहि; तैयो प्राण हठपूर्वक टिकले अछि। अतः रोनाइ निश्चय वरदान अछि। राम: कतेक भयङ्कर! घोर वेदनामे हृदय टूटैत अछि मुदा फाटैत नहि; जर्जर देह विक्षिप्त अछि मुदा चेतना नहि गमबैत; भीतरक आगि अङ्ग जरा रहल अछि मुदा भस्म नहि करैत; भाग्य मर्मपर प्रहार करैत अछि मुदा जीवन समाप्त नहि करैत। तृतीय अङ्क : छाया सीता: हँ, इएह सत्य अछि। राम: हे नगर आ जनपदक लोकसभ! अहाँसभ महारानीकेँ हमर घरमे रहए नहि देलहुँ, ताहि हेतु हम हुनका निर्जन वनमे तृणसमान मूल्यहीन बुझि, बिना शोक कयने छोड़ि देलहुँ। मुदा ई चिरपरिचित दृश्यसभ हमरा पूर्ण नष्ट कऽ रहल अछि; अतः एखन धरि ई असहाय रोनाइ—कृपया क्षमा करब। तमसा: हुनक शोक-सागरक गर्जना कतेक गम्भीर अछि। वासन्ती: देव, जे बीति गेल ओकर सम्मुख धैर्य राखू। राम: सखी, “धैर्य”सँ अहाँक की आशय? महारानीविहीन—जिनक नाम सेहो प्रायः मिटल— एहि रिक्त संसारक बारहम वर्ष अछि, तैयो राम जीवित अछि। सीता: आर्यपुत्रक वचन हमरा यातना दऽ रहल अछि। तमसा: हँ पुत्री। ई प्रियक वचन नहि—कखनो प्रेमसँ कोमल, कखनो शोकसँ कठोर; ई विषमिश्रित मधुक धार अछि जे अहाँक कानमे टपकि रहल अछि। तृतीय अङ्क : छाया राम: हे वासन्ती, की अन्ततः हम— हृदयमे शोकक तप्त अङ्कुश नहि सहने छी, जे गरम बाणक नोक भीतर आड़मे गड़ल अथवा विषैल डङ्क जकाँ मर्मकेँ बेधैत अछि? सीता: हम एतेक अभागल छी जे एखनो आर्यपुत्रकेँ कष्ट दऽ रहल छी। राम: हृदय टूटि संवेदनहीन भेलोपर आइ हुनक प्रिय चिरपरिचित वस्तुसभ देखैत फेर स्तब्ध भऽ गेलहुँ। उन्मत्त वेग धरि जगल करुणाकेँ रोकबाक लेल महान् प्रयत्नसँ कयल प्रत्येक उपाय भीतर विफल भेल; चेतनाक अकथनीय परिवर्तन पूर्ण वेगसँ बाहर उमड़ल— जेना बालुकाक बाँध तोड़ि बाढ़िक जल निर्बाध बहैत अछि। सीता: आर्यपुत्रक क्रूर, अविराम उमड़ैत शोकक आघात मानू हमर हृदयक शोककेँ हटा देलक, मुदा ओकरा अनियन्त्रित धड़कैत छोड़ि देलक। वासन्ती: (स्वगत) देवक दशा भयङ्कर अछि। ध्यान हटयबाक प्रयास करी। (प्रकट) देव आब जनस्थानक ओ पुरान परिचित प्रदेशसभ देखए चाहताह? तृतीय अङ्क : छाया राम: हँ, ठीक अछि। ठाढ़ भऽ घुमैत छथि। सीता: सखी जे मनोरञ्जनक उपाय बुझैत छथि, से उलटे हुनक शोक भड़काओत। वासन्ती: (करुणासँ) देव, देव— एहि लताक कुञ्जमे अहाँ घर जाएबला बाट दिस देखैत ठाढ़ छलहुँ; गोदावरी-तटक हंससँ मोहित भऽ ओ देरि कऽ देलीह; घुरलापर अहाँकेँ रुष्ट देखि चिन्तित भऽ अविकसित कमल जकाँ सरल अञ्जलि जोड़ि प्रणाम कयलनि। सीता: वासन्ती, अहाँ बड़ क्रूर छी—अभागल हमर स्मरण बारम्बार करा कऽ आर्यपुत्रक हृदयक कोमल मर्ममे छुरी आरो गहिर घोंपि रहल छी। राम: कठोरहृदया जानकी, अहाँ ठाम-ठाम प्रकट होइत छी, मुदा हमरापर दया नहि करैत छी। हे महारानी, हृदय फाटि रहल अछि, देहक बन्धन खुलि रहल अछि, संसार रिक्त अछि, भीतर निरन्तर आगिमे जरैत छी; अन्धकारमे डूबल आत्मा असहाय डूबि रहल अछि, पूर्ण मूर्च्छा हमरा घेरि रहल अछि। अभागल हम की करी? तृतीय अङ्क : छाया (मूर्च्छित होइत) सीता: हे देव, आर्यपुत्र फेर मूर्च्छित भऽ गेलाह! वासन्ती: देव, कृपया चेतना पाउ। सीता: हे आर्यपुत्र, अहाँ सम्पूर्ण मर्त्यलोकक मङ्गलक स्रोत छी, मुदा निरन्तर आत्म-विनाशक सङ्कटसँ पीड़ित अहाँक लेल जन्मक वरदान उलटा भऽ गेल—सभ अभागल हमर कारण। हाय, हम नष्ट भेलहुँ। (मूर्च्छित) तमसा: पुत्री, चेतना पाउ। अहाँक हाथक स्पर्श मात्र प्रिय रामकेँ जीवित करत। वासन्ती: हाय, एखनो चेतना नहि आयल। हे सीता, प्रिय सखी, कतय छी? अपन प्राणनाथकेँ सान्त्वना दिअ। सीता घबरा कऽ समीप आबि हुनक हृदय आ माथ छुबैत छथि। वासन्ती: सौभाग्य जे प्रिय राम चेतना पेलनि। राम: लगभग अमृतमय लेप हमर देहक भीतर-बाहर प्रत्येक अङ्गपर मलैत, एक स्पर्श सहसा हमरा जीवित कयलक आ एक नव—आनन्दमय—मूर्च्छा पसारि देलक। (आनन्दमे आँखि बन्द) सखी वासन्ती, अहाँ कतेक भाग्यवती छी। तृतीय अङ्क : छाया वासन्ती: कोना? राम: सखी, एकर अर्थ जानकी घुरि अयलीह—आ की? वासन्ती: मुदा देव, प्रिय राम, ओ कतय छथि? राम: (स्पर्शक सुखक अभिनय) देखू, एतहि हमर सोझाँ छथि। वासन्ती: प्रिय सखीक शोकमे पहिनेसँ जरल अभागल हमर मर्मकेँ फेर काटनिहार ई क्रूर निरर्थक प्रलापसँ हमरा किएक जरबैत छी? सीता: हमरा हटए पड़त, मुदा आर्यपुत्रक स्पर्श—दीर्घ सच्चा स्नेहसँ कतेक कोमल आ शीतल, दीर्घ क्रूर पीड़ाकेँ कतेक शान्त करैत—मानू हमर हाथकेँ ओतहि जोड़ि देलक। हाथ एके संग पसेनायल, थाकल, व्याकुल, काँपैत आ असहाय अछि। राम: सखी, “प्रलाप” किएक कहैत छी? बहुत वर्ष पहिने विवाहमे कङ्कण धारण कयने जे हाथ हम पकड़ने रही, चिरपरिचित, इच्छानुसार छुबि सकनिहार, अमृत जकाँ शीतल... सीता: आर्यपुत्र, इएह ओ हाथ अछि। आब बुझलहुँ। राम: इएह हाथ—हुनक हाथ— लवलीक डाँठ जकाँ कोमल, एतेक सुन्दर जे आन सभ हाथक तुलना एकरे सँ हो। तृतीय अङ्क : छाया (हाथ पकड़ैत) सीता: हे देव, आर्यपुत्रक स्पर्शक आनन्दसँ घोर भूल भऽ गेल। राम: सखी वासन्ती, आनन्दसँ इन्द्रिय जड़ अछि, मन एतेक व्याकुल जे अपनापर विश्वास नहि। कृपया अहाँ स्वयं हुनका छुबि देखू। वासन्ती: हाय, ई पूर्ण उन्माद अछि। सीता घबरा कऽ हाथ छुड़ा पाछाँ हटैत छथि। राम: हे देव, कतेक भूल! हम एतेक स्तब्ध रही जे पंखुड़ी-कोमल हाथ सहसा छोड़ि देलहुँ— हमर हाथ हुनक हाथ जकाँ काँपैत आ पसेनाइत छल। सीता: हे देव, एखनो अपनापर नियन्त्रण नहि; एके संग चञ्चल, जड़ आ भ्रमित; पीड़ा असह्य। तमसा: (स्नेहसँ निहारैत) प्रियक स्पर्शसँ, बेचारी, अहाँक अङ्गपर पसेना आ रोमाञ्च अछि, पवनमे डोलैत, नव वर्षासँ भिजल आ सहसा कोँपल फोड़ैत कदम्बक तना जकाँ काँपैत छी। सीता: (स्वगत) हाय, एहि उच्छृङ्खल देहसँ तमसाक सोझाँ लज्जित भेलहुँ। ओ निश्चय सोचैत होयतीह—एहन त्यागक बादो एहन मोह! तृतीय अङ्क : छाया राम: (चारू कात देखैत) की, कतहु नहि? हे निर्दय वैदेही, कृपा करू! सीता: निश्चय निर्दय छी—अहाँकेँ एहि दशामे देखितो जीवित छी। राम: महारानी, कतय छी? एहि अवस्थामे हमरा नहि छोड़ू। सीता: हाय आर्यपुत्र, की उलटा नहि कहैत छी? वासन्ती: देव, कृपया अलौकिक बलसँ एहि पूर्ण भ्रमकेँ रोकू। हमर प्रिय सखी एतय कोना भऽ सकैत छथि? राम: स्पष्ट अछि, ओ नहि छथि; नहि तँ स्वयं वासन्ती किएक नहि देखितथि? हँ, ई स्वप्न होयत... मुदा नहि, हम सुतल नहि रही—रामकेँ फेर निद्रा कतय? निश्चय कल्पनासँ बारम्बार उत्पन्न ओ पुण्यमय मानस-भ्रम फेर हमरा घेरलक। सीता: नहि, क्रूर हम आर्यपुत्रकेँ भ्रमित कयलहुँ। वासन्ती: देव, देखू— पौलस्त्यक कारी लोहक रथ, जकरा जटायु नष्ट कयलनि; आगाँ वानर-मुख खच्चर—आब केवल हड्डीक ढाँचा। एतयसँ, शत्रु खड्गसँ जटायुक पाँखि काटि तेजस्विनी सीताकेँ लऽ बिजलीसँ घेरल मेघ जकाँ आकाशमे उठल। तृतीय अङ्क : छाया सीता: (भयसँ) आर्यपुत्र, पिता मारल गेलाह, आ हमरा हरण कयल जा रहल अछि। बचाउ! राम: (सहसा उठैत) हे दुष्ट, एके संग पिता आ सीताकेँ छीननिहार, कतय भागैत छह? वासन्ती: देव राक्षसक कुल लेल प्रलयाग्नि छलहुँ; की अहाँक क्रोधक कोनो पात्र एखनो जीवित रहि सकैत अछि? सीता: हाय, क्षणभरि पूर्ण पागल भऽ गेल रही। राम: हाय, मुदा आइ हमर विपत्ति सर्वथा भिन्न अछि— ओ समय उपाय उपलब्ध छल; वीर युद्ध निरन्तर ध्यान हटबैत, अद्भुत रससँ संसार भरैत; जानैत रही जे पत्नी-वियोग शत्रुक मृत्युसँ समाप्त होयत। मुदा अनन्त वियोग चुपचाप सहब कतेक कटु अछि! सीता: “अनन्त!” हाय, हम सचमुच नष्ट भेलहुँ। तृतीय अङ्क : छाया राम: हाय— जतय वानरराजक मित्रता निष्फल, वानरसभक बल व्यर्थ; जतय जाम्बवानक बुद्धि बाट नहि देखबैत, नहि पवनपुत्रक बुद्धि; जतय विश्वकर्मा-पुत्र नलो पुल नहि बना सकैत— प्रिय, अहाँ कतय छी, सौमित्रिक बाणक पहुँचसँ सेहो दूर? सीता: आब पहिल वियोग कतेक प्रिय लगैत अछि। राम: सखी वासन्ती, रामक दर्शन आब मित्रकेँ केवल दुःख देत। कतबा धरि अहाँकेँ कनायब? आब प्रस्थानक अनुमति दिअ। सीता: (चौंकि, विक्षिप्त भऽ तमसासँ लिपटैत) हे तमसा, आर्यपुत्र जा रहल छथि! तमसा: पुत्री, अपनाकेँ सम्हारू। जे हो, आब कुश आ लव—चिरञ्जीवी होथि—हुनक जन्मोत्सवक विधि करबाक लेल भागीरथी लग जाएब आवश्यक अछि। सीता: भगवती, कृपया क्षणभरि अन्तिम बेर हुनका देखि ली—जिनका फेर कखनो नहि देखब। राम: अश्वमेधमे सहायता लेल आब हमर एक आओर धर्मपत्नी अछि... तृतीय अङ्क : छाया सीता: (काँपैत) आर्यपुत्र, के? राम: सीताक सोनाक प्रतिमा। सीता: (राहतिक साँस लैत) आर्यपुत्र... हँ, आब अहाँ सचमुच हमर स्वामी छी। आब अन्ततः त्यागक लज्जाक तीक्ष्ण बाणक नोक हमरासँ निकालि देलहुँ। राम: कमसँ कम ओतय नोरमे सदिखन डूबल आँखिकेँ किछु विश्राम भेटैत अछि। सीता: धन्य ओ स्त्री, जिनका आर्यपुत्र अपन मनोरञ्जनक लेल एतेक मान दैत छथि—एहि कारण ओ संसारक आशाक स्रोत छथि। तमसा: (स्नेह, मुस्कान आ नोरसँ हुनका आलिङ्गन करैत) पुत्री, ई प्रशंसा स्वयं अहाँक अछि। सीता: (लाजसँ माथ नमबैत; स्वगत) भगवती हमर उपहास करैत छथि। वासन्ती: जे अहाँक लेल महान् व्याकुलताक कारण रहल, से हमर सभक प्रति कृपा भेल। जाएब हो तँ अपन कर्तव्यक अनुसार जाउ। सीता: वासन्ती हमर अटल शत्रु भऽ गेलीह। तमसा: पुत्री, आउ, चली। सीता: (उदास) हँ, चलए पड़त। तमसा: मुदा अहाँ जा कोना सकैत छी, जखन— तृतीय अङ्क : छाया जतेक प्रयत्न करू, लालसासँ फैलल आँखि प्रियपर अटल अछि, ओकरा हटा नहि सकैत छी? सीता: आर्यपुत्रक चरणकमलकेँ प्रणाम—निश्चय अतुलनीय पुण्यक फल जे आइ दर्शन भेटल। (मूर्च्छित) तमसा: पुत्री, कृपया अपनाकेँ सम्हारू। सीता: (चेतना पाबि) कारी मेघक बीच पूर्ण चन्द्र कतेक देरि देखाइत अछि? तमसा: ई कथानक कतेक जटिल अछि! रस एके—करुण—अछि; मुदा बदलैत परिस्थितिक अनुसार बदलि अनेक रूप लैत अछि, जेना जल भँवर, बुलबुला अथवा तरङ्ग बनैत अछि, मुदा अन्ततः सभ एके—केवल जल। राम: हे रथराज, तुरन्त एम्हर आउ। सभ ठाढ़ होइत छथि। तमसा आ वासन्ती: (क्रमशः सीता आ रामसँ) तृतीय अङ्क : छाया पृथ्वी, देवनदी, हमर सभ जकाँ आन देवी, छन्दक प्रथम प्रयोगकर्ता आचार्य, ऋषि वसिष्ठ आ हुनक संगिनी अरुन्धती— ई सभ अहाँकेँ आशीर्वाद आ चिरस्थायी सौभाग्य देथि। सभ प्रस्थान करैत छथि। तृतीय अङ्क समाप्त चतुर्थ अङ्कक प्रवेशक दू तपस्वीक प्रवेश। प्रथम: सौधातकि, अनेक सजावट आ आयल अतिथिसभक भीड़सँ वाल्मीकिक आश्रम कतेक सुन्दर लगैत अछि। देखू— आश्रमक मृग अपन एखने बच्चा देने संगिनी लेल बनल मधुर गरम दूध-भातक बचल मलाई मोन भरि पीबैत अछि। बेरक फलसँ मिसल पकैत सागक गन्ध पसैर रहल अछि, आ घी-भातक बहुत हलुक सुगन्ध सेहो। सौधातकि: जे अतिथि—विशेषतः ई बुजुर्गसभ—आबि हमरा अध्ययनसँ छुट्टी दैत छथि, हुनक हार्दिक स्वागत! प्रथम: (हँसैत) सौधातकि, वृद्धजनक प्रति अहाँक ई सम्मान सर्वथा अभूतपूर्व अछि। सौधातकि: भाण्डायन, ई बूढ़ि स्त्रीसभक दलक आगाँ आयल अतिथिक नाम की? भाण्डायन: आब मजाक नहि। अहाँ निश्चय जनैत छी—ई वसिष्ठ छथि, ऋष्यशृङ्गक आश्रमसँ महाराज दशरथक पत्नीसभक रक्षा करैत, अरुन्धतीकेँ अग्रस्थान दैत अयलाह। तखन ई मूर्ख प्रश्न किएक? चतुर्थ अङ्कक प्रवेशक सौधातकि: हँऽ, वसिष्ठ? भाण्डायन: हँ, निश्चय। सौधातकि: हम तँ निश्चय बुझने रही जे बाघ अथवा भेड़िया अछि। भाण्डायन: एकर अर्थ की? सौधातकि: हुनक अयलाक क्षणसँ हमर बेचारा छोट बाछा पूर्ण भयभीत भऽ गेल। भाण्डायन: शास्त्रज्ञ अतिथिक आगमनपर वैदिक विधानानुसार मांसक स्वागत-अर्घ्य देनिहार गृहस्थ एकवर्षीय बाछा, बैल अथवा बकरा काटैत छथि। ‘धर्मसूत्र’क रचयितासभक अनुसार इएह धर्म अछि। सौधातकि: अहा! अहाँ विरोधाभासमे फँसि गेलहुँ। भाण्डायन: कोना? सौधातकि: माननीय वसिष्ठक आगमनपर एकवर्षीय बाछा काटल गेल, मुदा आइ पाछाँ राजर्षि जनक अयलाह तँ वाल्मीकि केवल दूध-दहीसँ अतिथि-अर्घ्य देलनि। बाछीकेँ छोड़ि देल गेल। भाण्डायन: ऋषिसभक विधान मांस नहि छोड़निहार लेल छल। जनक मांस त्यागि देने छथि। सौधातकि: किएक? भाण्डायन: महारानी सीताक भाग्य-विपर्ययक समाचार भेटिते तपस्वी भऽ गेलाह। किछु वर्षसँ चन्द्रद्वीप तपोवनमे तपस्या कऽ रहल छथि। चतुर्थ अङ्कक प्रवेशक सौधातकि: तखन एतय किएक अयलाह? भाण्डायन: अपन चिरप्रिय मित्र प्रचेता-पुत्रक दर्शन लेल। सौधातकि: अपन सम्बन्धिनीसभसँ भेट भऽ गेलनि? भाण्डायन: एखने वसिष्ठ अरुन्धतीकेँ महारानी कौसल्याक समीप पठौलनि, जे ओ विदेहराजसँ भेट करथि। सौधातकि: जेना वृद्धसभ जुटल छथि, हमसभ सेहो सहपाठीक संग जुटि खेल-कूदसँ छुट्टी मनाबी। दुनू घुमैत छथि। भाण्डायन: ओ प्राचीन राजर्षि, आचार्य जनक छथि। प्रचेता-पुत्र आ वसिष्ठकेँ प्रणाम कऽ आश्रम बाहर वृक्षतर बैसल छथि— जिनक हृदयमे सीताक शोक सदिखन एना जरैत अछि, जेना पुरान वृक्षकेँ भीतरसँ खाइत आगि। दुनू प्रस्थान करैत छथि। प्रवेशक समाप्त चतुर्थ अङ्क कौसल्या आ जनकक भेट जनकक प्रवेश। जनक: हमर पुत्रीपर कयल अपराध—विराट, घोर अपराध— जे हमरा तोड़ि हृदय भेदलक, ओ एहन प्रचण्ड झरैत क्रोध जगौलक जे पुरान होइतो सदिखन नव, आराक धार जकाँ मर्म काटैत, कखनो नहि रुकैत। कतेक भयङ्कर! ई अभागल देह—जकर सभ आधार वृद्धावस्था आ अकल्पनीय शोक छीन लेलक, जकर सार आ रस अनेक तपस्या, मासभरि उपवास आ शरीर-दमन सोखि लेलक—आइ धरि मरबाक लेल तैयार नहि, विश्वास नहि होइत। मुदा ऋषिसभ कहलनि—“आत्महत्या करनिहार अन्हार, सूर्यहीन लोकमे जाइत छथि।” एतेक वर्षक बादो निरन्तर चिन्तासँ पूर्ण प्रकट हमर तीक्ष्ण शोकक आघात एखनो नव अछि, घटैत नहि। हे माता! हे यज्ञवेदीसँ जन्मल सीता, जीवनमे अहाँक एहन दशा—एहन उलटफेर जे मन भरि कानबोमे लाज! हाय पुत्री! अहाँक बाल्य-मुख मोन पड़ैत अछि— बिना कारण हँसैत आ कानैत, दू-चारि दूधक दाँत चमेलीक कोँपल जकाँ चमकैत, पहिल वचन लड़खड़ाइत, अस्पष्ट। चतुर्थ अङ्क : कौसल्या आ जनकक भेट हे पृथ्वी, सत्ये अहाँ पाथर जकाँ कठोर छी। जिनक महानता स्वयं अहाँकेँ स्वीकार करबाक चाही छल, ओहिना अग्नि, ऋषिसभ, वसिष्ठ-पत्नी, गङ्गा, एतय धरि जे रघुकुलक गुरु सूर्यदेवकेँ सेहो; जिनका अहाँ स्वयं जन्म देलहुँ—जेना वाणी सच्चा ज्ञानकेँ जन्म दैत अछि— हे क्रूर पृथ्वी, अपन एकमात्र पुत्रीक हत्या कोना सहलहुँ? नेपथ्यसँ: एम्हर, भगवती, आ महारानी। जनक: (देखैत) अहा, गृष्टि अरुन्धतीकेँ बाट देखा रहल अछि। (ठाढ़ होइत) “महारानी” ककरा कहलक? (देखैत) हाय, ई हमर प्रिय सखी, राजा दशरथक धर्मपत्नी कौसल्या तँ नहि? के विश्वास करितए? दशरथक महलमे जे राजलक्ष्मी जकाँ छलीह— अथवा उपमा किएक, स्वयं राजलक्ष्मी छलीह— भाग्यक बलसँ सर्वथा दोसर रूपमे बदलि गेलीह, निर्मल शोकक दुर्लभ जीव। हाय, कतेक विपर्यय! हमर दशाक एक आओर भयङ्कर उलटफेर अछि— चतुर्थ अङ्क : कौसल्या आ जनकक भेट जे लोक पहिने हमर लेल साक्षात् उत्सव छलाह, आइ हुनका देखबो असह्य भए गेल अछि— मानू घावपर नून छिड़कल गेल हो। अरुन्धती, कौसल्या आ कञ्चुकीक प्रवेश। अरुन्धती: मुदा हम अहाँकेँ कहि रहल छी जे कुलगुरुक आज्ञा छल जे अहाँ स्वयं विदेह-नरेशसँ भेट करबाक लेल जाउ, एही हेतु हमरा अहाँ लग पठाओल गेल अछि। प्रत्येक डेगपर ई जड़ कऽ देनिहार हिचकिचाहट किएक? कञ्चुकी: महारानी, अपनाकेँ सम्हारू आ वसिष्ठक आज्ञाक पालन करू—एतबे हमर विनती अछि। कौसल्या: एहन अवसरपर मिथिलानरेशसँ भेंट होयबाक विचार मात्र सँ हमर समस्त दुःख एक्कहि बेर फेर उमड़ि पड़ैत अछि। हृदयक तार सभ टूटि रहल अछि, हम एकरा स्थिर नहि राखि पाबि रहल छी। अरुन्धती: निःसन्देह। प्रिय स्वजनक वियोगसँ उपजल दुःखक धारा भले प्रचण्ड वेगसँ बहैत रहय, मुदा प्रिय मित्रक दर्शन मात्र ओकरा सहस्र धारासँ बढ़ल जकाँ असह्य बना दैत अछि। कौसल्या: हमर प्रिय पुतोहुक संग एहन घटना घटलापर हम राजर्षिक सोझाँ कोना पड़ब? चतुर्थ अङ्क : कौसल्या आ जनकक भेट अरुन्धती: ई अहाँक आदरणीय सम्बन्धी, जनकवंशक आधार छथि, जिनका मनीषी याज्ञवल्क्य कखनो सम्पूर्ण ब्रह्मविद्या प्रदान कएने छलाह। कौसल्या: ओतय राजर्षि ठाढ़ छथि—महान् महाराजक हृदयक आनन्द, हमर प्रिय पुतोहुक पिता। हे दैव, सभटा फेर मोन पड़ि रहल अछि—जखन हम सभ महान् विवाहोत्सव सम्पन्न कएने रही; आ आइ, हे प्रभु, सभ किछु समाप्त भए गेल। जनक: (लग अबैत) अरुन्धती, विदेहक राजा सीरध्वज अहाँकेँ प्रणाम करैत अछि। जिनके कारण मात्र हुनकर पति, स्वयं पवित्रताक अक्षय भण्डार होइतो, अपनाकेँ पवित्र मानैत छथि; आ जे पूर्ववर्ती समस्त गुरुमे परम गुरु छथि... हम ओहि भगवतीकेँ प्रणाम करैत छी, जे उषा जकाँ छथि, जिनका समस्त संसार भूमि धरि माथ नमा प्रणाम करैत अछि, आ जे समूचा विश्वक कल्याण करैत छथि। अरुन्धती: अहाँक परम ज्योति प्रखर रहय, आ धूलिसँ परे प्रज्वलित रहनिहार देव अहाँकेँ पवित्र करथि। जनक: गृष्टि, प्रजापालकक माता कुशलपूर्वक छथि ने? चतुर्थ अङ्क : कौसल्या आ जनकक भेट कञ्चुकी: (अपना मोने) ई हमरा सभपर व्यङ्ग्य अछि—निर्मम आ तीक्ष्ण व्यङ्ग्य। (प्रकट) राजर्षि, प्रिय रामक चन्द्रमा-सदृश मुख दीर्घकालसँ नहि देखि पयबाक कारण महारानी पहिनेसँ गहन दुःखमे छथि; कृपा कऽ अपन क्रोधसँ हुनकर दुःख आरो नहि बढ़ाउ। रामपर सेहो घोर विपत्ति पड़ल छल—नगरवासीक बीच दुष्ट अपवाद फैलि रहल अछि, से कहल गेल; आ क्षुद्रबुद्धि लोक अग्निपरीक्षाक शुद्धिपर विश्वास नहि कएने, तेँ हुनका कठोरतम उपाय करए पड़लनि। जनक: हे देवगण, ई अग्निदेव आखिर छथि के, जे हमर पुत्रीकेँ पवित्र करबाक दम्भ करथि? राम पहिनेसँ हमरा सभक पर्याप्त अपमान कऽ चुकल छथि; आब एहन बात कहि आरो अपमान करबाक साहस केना होइत अछि! अरुन्धती: (निःश्वास छोड़ैत) ई सर्वथा सत्य अछि। हमर बच्चीक सोझाँ ‘अग्नि’ शब्द केवल निरर्थक ध्वनिक माला अछि; सीता होयब मात्र पर्याप्त अछि। हे हमर बच्ची, अहाँ हमर सन्तान छलहुँ अथवा शिष्या, एहि बातक कोनो महत्त्व नहि; अहाँक परम पवित्रतए हमर हृदयमे एहन स्नेह उत्पन्न करैत अछि। बालिका वा स्त्री होयब कोनो बात नहि— अहाँ समस्त संसारक प्रशंसा अर्जित कएने छी। सज्जनमे आदरयोग्य गुण होइत अछि, नहि कि लिङ्ग अथवा आयु। कौसल्या: हाय, हमर घाव फेर फाटि रहल अछि। (मूर्च्छित भए पड़ैत छथि) चतुर्थ अङ्क : कौसल्या आ जनकक भेट जनक: हाय दैव, आब की भेल? अरुन्धती: राजर्षि, आरो की भए सकैत अछि? ओ राजा, ओ सुख, सन्तानक ओ गौरव, ओ बीतल दिन सभ— अहाँ, अपन मित्रकेँ देखते समस्त स्मृति फेर उमड़ि पड़लनि। अहाँ देखिए रहल छी जे एहि घोर घटनासँ ओ कतेक व्याकुल छथि: वृद्ध माताक हृदय सेहो फूल सन कोमल भए सकैत अछि। जनक: हम कतेक नीच बनि गेल छी! दीर्घकालक बाद देखल अपन प्रिय मित्रक प्रिय पत्नीपर सेहो स्नेह-दृष्टि नहि दऽ सकलहुँ। आदरणीय सम्बन्धी, प्रिय मित्र, हमर हृदय, हमर साक्षात् आनन्द, जीवनक सम्पूर्ण सार, हमर देह-प्राण आ ताहूसँ प्रिय जे किछु— यशस्वी महाराज दशरथ हमर लेल की नहि छलाह? हाय, की ई सचमुच कौसल्या छथि? चतुर्थ अङ्क : कौसल्या आ जनकक भेट जँ पति-पत्नीक बीच कखनो एकान्तमे विवाद भए जाइत छल, तऽ ओ दुनूकेँ छोड़ि केवल हम हुनकर शिकायत सुनैत रही, आ आगाँ क्रोध राखब कि क्षमा करब— एकर निर्णय हमरेपर निर्भर रहैत छल... मुदा एहन स्मृति आब बस। ई सभ हमर हृदयपर आक्रमण कऽ ओकरा जरा रहल अछि। अरुन्धती: हाय, दीर्घकाल धरि भीतर दबल निःश्वाससभ हुनकर हृदयकेँ कठोर बना देलकनि। जनक: हाय हमर प्रिय मित्रपत्नी। (अपन कमण्डलुक जल छिड़कैत छथि) कञ्चुकी: आरम्भमे भाग्य अनुकूल मित्र जकाँ छल, जे हुनकर प्रत्येक इच्छाक संग चलैत रहल; तखन अकस्मात् ओकर निर्मम रूपान्तरण आयल, आ हुनका केवल हृदय-व्यथा दऽ गेल। कौसल्या: (चेतना घुरैत) हे हमर पुत्री जानकी, अहाँ कतय छी? विवाहक आभासँ मात्र विभूषित, पवित्र मुस्की खिलल अहाँक ओ निष्कपट कमल-सदृश मुख हमरा कतेक स्पष्ट मोन पड़ैत अछि। हे बच्ची, प्रथम चन्द्रिकासँ सुन्दर अपन ओहि अङ्गसभसँ हमर कोरा फेर उज्ज्वल करू। महाराज सदिखन कहैत छलाह— “ई रघुवंशक अधिपतिक पुतोहु अवश्य छथि, मुदा जनकसँ हमर सम्बन्ध हुनका हमर अपन छोट बेटी बना दैत अछि।” चतुर्थ अङ्क : कौसल्या आ जनकक भेट कञ्चुकी: महारानी जे कहैत छथि, ठीक सैह बात छल: राजाक पाँच सन्तान रहितो सुबाहुक शत्रु सभसँ प्रिय छलाह, आ चारि पुतोहु रहितो सीता, शान्ता सँ कम बेटी नहि छलीह। जनक: हाय हमर प्रिय मित्र महाराज दशरथ! एही कारण अहाँ प्रत्येक प्रकारेँ हमर अनुरूप छलहुँ। हम अहाँकेँ कोना बिसरि सकैत छी? कहल जाइत अछि जे कन्याक पिता जमायक कुटुम्बक सत्कार करय, मुदा हमर सम्बन्धमे एकर ठीक उलट छल; अहाँ स्वयं हमरा प्रसन्न करैत रहलहुँ। अहाँ सन पुरुष आ हमर सम्बन्धक मूलाधार, दुनूकेँ भाग्य छीनि लेलक... धिक्कार अछि हमरा, हम अवश्य पापी छी, जे एहि भयावह नरक-सदृश संसारमे जीवित छी। कौसल्या: जानकी, हे हमर बच्ची, हम की करी? हमर ई अभागल प्राण मानू कोनो अभेद्य गारासँ स्थायी रूपेँ जकड़ल अछि; हम अभागिनीक देह छोड़ि नहि रहल अछि। अरुन्धती: अपनाकेँ सम्हारू, अहाँ राजपुत्री छी। एखन यथाशक्ति अपन सिसकी रोकबाक प्रयास करू। आ एकटा बात आरो। ऋष्यशृङ्गक आश्रममे अहाँक कुलगुरु जे कहने छलाह, से मोन नहि अछि? ओ दृढ़तापूर्वक कहने छलाह जे जे भेल, से होयब अनिवार्य छल, मुदा अन्ततः सभ किछु शुभ होयत। चतुर्थ अङ्क : कौसल्या आ जनकक भेट कौसल्या: जखन हमर सभ सपना चूर-चूर भए गेल, तखन ई कोना सम्भव अछि? अरुन्धती: तँ की अहाँ मानैत छी जे ओ मिथ्या कहने छलाह? अहाँ राजपुत्री आ पराक्रमी क्षत्रियसभक माता छी; दोसर प्रकारेँ नहि सोचू—ई होयब अनिवार्य छल। जिनका प्रकाशक साक्षात्कार भेल अछि, ओहि ब्राह्मणसभक वचनपर कखनो सन्देह नहि करू। कल्याणमयी लक्ष्मी हुनकर वाणीमे निवास करैत छथि; हुनकर कोनो वचन असत्य नहि होइत अछि। नेपथ्यमे कोलाहल। सभ सुनैत छथि। जनक: आइ अध्ययनसँ अवकाश अछि—ई कोलाहल खेलैत बालकसभक होयत। कौसल्या: बाल्यकालमे सुख पाबि लेब कतेक सहज होइत अछि! (देखैत) अहा, ओहि सभक बीच ई के अछि, जकर अत्यन्त मनोहर कोमल आ सुकुमार अङ्ग, प्रिय रामक सौन्दर्यसँ विभूषित, हमर आँखिक पीड़ा धरि शान्त कऽ रहल अछि? अरुन्धती: (अपना मोने; आनन्दाश्रुसहित) ई निश्चय ओहि रहस्य— नहि, ओहि अमृत—क फल अछि जे भागीरथी प्रकट कएने छलीह। हमरा केवल एतबे ज्ञात नहि जे ई दुनूमे सँ कुश छथि कि लव—दुनू चिरञ्जीवी होथि। चतुर्थ अङ्क : कौसल्या आ जनकक भेट जनक: नीलकमलक पाँखुरि सन साँवर कान्ति, सुन्दर केशपाशसँ मण्डित मस्तक, सद्गुणसँ विभूषित; ओकर सौन्दर्य मानू बालकसभक समूहकेँ सेहो कुलीन बना रहल अछि। ओ रघुनन्दन जकाँ देखाइत अछि— मानू हमर प्रिय बालक फेर शिशु बनि गेल हो। ई के अछि, जकर दर्शन मात्र हमर आँखिक लेल अमृतमय अञ्जन अछि? कञ्चुकी: हमरा बुझाइत अछि जे ई बालक क्षत्रिय ब्रह्मचारी अछि। जनक: निश्चय सैह होयत, कारण ओ पीठपर दूटा तूणीर धारण कएने अछि, जकर बाण ओकर शिखाकेँ स्पर्श करैत अछि; वक्षपर कुलचिह्न—पवित्र भस्मक रेखा— आ कृष्णमृगचर्म शोभित अछि; निचला वस्त्र मजीठसँ रङल अछि आ मूर्वा-तृणक डोरीसँ बान्हल; एक हाथमे धनुष आ जपमाला, दोसरमे पीपरक दण्ड अछि। अरुन्धती, अहाँक अनुमानमे ई बालक कतयसँ आयल अछि? अरुन्धती: मुदा हम स्वयं एतय नवागत छी। जनक: गृष्टि, हमर जिज्ञासाक सीमा नहि अछि। तुरन्त वाल्मीकिक लग जाउ आ हुनकासँ पूछू। बालककेँ सेहो कहू जे किछु वृद्धजन ओकर दर्शन चाहैत छथि। चतुर्थ अङ्क : कौसल्या आ जनकक भेट कञ्चुकी: जेना आज्ञा। (प्रस्थान) कौसल्या: अहाँकेँ किएक लगैत अछि जे बजाओलापर ओ आयत? अरुन्धती: ओकर रूप-जकाँ शिष्ट आचरण नहि होयत की? कौसल्या: (देखैत) ई की? गृष्टिक बात विनयपूर्वक सुनि बालक ऋषिक दोसर शिष्यसभकेँ विदा कऽ एतय आबि रहल अछि। जनक: (बहुत काल धरि देखैत) हमरा ई की भऽ रहल अछि? विनयसँ शीतल आ निष्कपटतासँ कोमल भेल ओकर वास्तविक शक्तिक परिमाण केवल सत्यदर्शी लोक बुझि सकैत छथि, आ दोसर केओ नहि। निराशासँ अचल बनल हमर हृदयकेँ ई बालक तहिना हिला देबाक सामर्थ्य रखैत अछि, जेना चुम्बकक एकटा छोट सन खण्ड लोहाक भारी पिण्डकेँ हिला दैत अछि। लवक प्रवेश। लव: नाम आ पद नहि जनिते हम एहि श्रेष्ठजनसभकेँ कोन ढङ्गसँ प्रणाम करी? (विचार करैत) वृद्धजनसँ सीखल एकटा एहन विधि अछि जाहिमे कोनो दोष नहि। (विनयसँ लग अबैत) ई लव क्रमशः अहाँ सभक चरणमे माथ नमबैत अछि। अरुन्धती आ जनक: साधु बालक, चिरञ्जीवी होउ। कौसल्या: बच्चा, दीर्घायु होउ। चतुर्थ अङ्क : कौसल्या आ जनकक भेट अरुन्धती: आउ बच्चा। (लवकेँ कोरामे लैत; अपना मोने) हमर भाग्य कतेक सुन्दर! कोरा मात्र भरल नहि, अन्ततः हमर सपना सेहो पूर्ण भेल। कौसल्या: बच्चा, एक क्षण हमर कोरामे सेहो आउ। (ओकरा कोरामे लैत) अहा! नव खिलल नीलकमल सन साँवर कान्तियुक्त देहक बनावटमे मात्र नहि, स्वरमे सेहो ई प्रिय रामक सदृश अछि—कमल-केसर खाइ कण्ठ रङ्गायल हंसक दीर्घ मन्द गुञ्जन जकाँ। स्पर्शमे देह सेहो निश्चय सैह अछि—पूर्ण विकसित कमलक भीतरक भाग सन कोमल। बच्चा, जरा अहाँक मुख देखी। (ठुड्डी उठा देखैत; अश्रु आ कौतूहलसहित) राजर्षि, अहाँकेँ नहि देखाइत अछि? नीक जकाँ देखू—की ई ठीक अहाँक पुत्री, हमर पुतोहुक चन्द्रमुखसँ नहि मिलैत अछि? जनक: हँ मित्र, देखैत छी, अवश्य देखैत छी। कौसल्या: हाय, हमर हृदय एतेक भ्रमित अछि जे छितरायल विचारक बीच हम अनाप-शनाप बाजि रहल छी। जनक: एहि बालकमे हमर पुत्री आ राम, रघुक उत्तराधिकारीक ठीक ओहि रूपक साक्षात् प्रतिरूप प्रकट अछि— ओही कान्ति, ओही स्वर, ओही सहज आचरण, ओही निर्मल तेज धरि... हे विधाता, हमर व्याकुल मन एहि मरीचिकाक पाछाँ किएक दौड़ि रहल अछि? चतुर्थ अङ्क : कौसल्या आ जनकक भेट कौसल्या: बच्चा, अहाँक माता जीवित छथि? पिताक कोनो स्मृति अहाँकेँ अछि? लव: नहि, हमरा नहि अछि। कौसल्या: अहाँक देखभाल के करैत छथि? लव: भगवान् वाल्मीकि। कौसल्या: आउ ने बच्चा, अहाँक कथा एतय कहब आवश्यक अछि। लव: हमरा बस एतबे ज्ञात अछि। नेपथ्यमे: हे सैनिकसभ! कुमार चन्द्रकेतुक ई आज्ञा अछि जे केओ आश्रमभूमिमे अनधिकृत प्रवेश नहि करय। अरुन्धती आ जनक: अहा, यज्ञाश्वक रक्षाक क्रममे कुमार चन्द्रकेतु आयल छथि; शीघ्र हुनकर दर्शन होयत। आइ कतेक शुभ दिन अछि! कौसल्या: प्रिय लक्ष्मणक छोट पुत्र “आज्ञा” दऽ रहल छथि— ई अक्षर हमर कानमे अमृतबिन्दु सन मधुर लगैत अछि। लव: महोदय, चन्द्रकेतु नामक ई व्यक्ति के छथि? जनक: अहाँ दशरथ-पुत्र राम आ लक्ष्मणक नाम सुनने छी? लव: ओ दुनू ‘रामायण’क नायक छथि। चतुर्थ अङ्क : कौसल्या आ जनकक भेट जनक: निश्चय। लव: तखन हम हुनकर नाम कोना नहि सुनने होयब? जनक: ई चन्द्रकेतु लक्ष्मणक पुत्र छथि। लव: तँ ओ उर्मिलाक पुत्र आ मिथिलानरेशक नाती होयताह। अरुन्धती: (हँसैत) स्पष्ट अछि, बालक कथासँ भलीभाँति परिचित अछि। जनक: जँ अहाँ कथाक एतेक ज्ञान राखैत छी, तँ हमर किछु प्रश्नक उत्तर दिअ—दशरथक अन्य पुत्रसभक सन्तानक नाम की अछि, आ ओ सभ कोन-कोन पत्नीसँ जन्मल? लव: कथाक ई भाग ने हम सुनने छी, ने दोसर केओ। जनक: कवि एकर रचना नहि कएने छथि? लव: कएने छथि, मुदा एखन धरि प्रकाशित नहि भेल अछि। ओकर एक अंश, नव रूपसँ रसवर्धित, अभिनय लेल बनाओल गेल अछि। महर्षि अपन हाथेँ पाण्डुलिपि लिखि ‘सङ्गीतत्रयी-सूत्र’क रचयिता भरतक लग पठा देने छथि। जनक: कोन प्रयोजनसँ? लव: कहल जाइत अछि जे भरत अप्सरासभ सँ ओकर अभिनय कराबथि। जनक: एहि सभ बातसँ हमर जिज्ञासा आरो बढ़ि रहल अछि। चतुर्थ अङ्क : कौसल्या आ जनकक भेट लव: वाल्मीकि एकर विषयमे अत्यन्त सावधान छथि। पाण्डुलिपि स्वयं भरतक आश्रम पहुँचाबऽ जा रहल शिष्यसभक संग कोनो चूक नहि हो, ताहि लेल ओ हमर भाइकेँ धनुष-बाणसहित हुनका सभक सङ्ग पठौने छथि। कौसल्या: अहाँक भाइ सेहो छथि? लव: हमर एक श्रेष्ठ भाइ छथि, जिनकर नाम कुश अछि। कौसल्या: अर्थात् ओ अहाँसँ पैघ छथि। लव: हँ, जन्मक्रमसँ ओ हमर जेठ छथि। जनक: की अहाँ दुनू जुड़वाँ छी? लव: अवश्य। जनक: कहू, मुख्य कथा कोन प्रकार समाप्त होइत अछि? लव: नगरवासीक दुष्ट अपवादसँ व्यथित राजाने यज्ञभूमिमे जन्मल महारानी सीताकेँ वनवास दऽ देलनि। प्रसव-पीड़ा आरम्भ होइत काल लक्ष्मण हुनका निर्जन वनमे एकसरि छोड़ि घुरि अयलाह। कौसल्या: हे हमर निष्पाप चन्द्रमुखी बेटी, अचानक एकसरि अहाँक फूल सन देहपर ई कोन विकट भाग्य-विपर्यय आबि पड़ल? जनक: हे बच्ची, जखन एक्कहि बेर अपमान, भयङ्कर वन आ प्रसव-वेदना सँ अहाँकेँ जूझए पड़ल होयत, आ माँसाहारी पशुसभक झुण्ड अहाँकेँ चारू दिस घेरने होयत, तखन भयमे अहाँक ध्यान अवश्य हमरा, अपन अन्तिम आश्रयपर, केन्द्रित रहल होयत। चतुर्थ अङ्क : कौसल्या आ जनकक भेट लव: (अरुन्धतीसँ) ई दुनू श्रेष्ठ व्यक्ति के छथि? अरुन्धती: ई कौसल्या छथि, आ ई जनक। लव आदर, चिन्ता आ कौतूहलसँ देखैत अछि। जनक: हाय, नगरवासी कतेक विकृत छलाह, आ राजा राम कतेक अविवेकी! एहि वज्रपात-सदृश विपत्तिक भयङ्कर आघातपर विचार करैत, आब हमर धनुष अथवा शापसँ क्रोध प्रज्वलित करबाक समय आबि गेल अछि। कौसल्या: (भयभीत) अरुन्धती, रक्षा करू! कृपा कऽ क्रुद्ध राजाकेँ शान्त करबाक प्रयास करू। लव: अपमानित स्वाभिमानी पुरुषक लेल प्रतिशोधक एकमात्र रूप एतबे अछि। अरुन्धती: मुदा महाराज, राम अहाँक पुत्र छथि, आ अभागल नगरवासी रक्षा पयबाक अधिकारी। जनक: तखन दुनूमे सँ केओ रघुनन्दनकेँ भय नहि देखाबय— अन्ततः ओ हमर अमूल्य पुत्र छथि, आ नगरवासीक बहुतो लोक वृद्ध आ अशक्त, ब्राह्मण, बालक आ स्त्री छथि। चतुर्थ अङ्क : कौसल्या आ जनकक भेट कोलाहल करैत पाठशालाक बालकसभक प्रवेश। बालकसभ: कुमार महोदय! हम सभ गाम-गाममे ‘घोड़ा’ नामक एक अद्भुत जीवक प्रकट होयबाक चर्चा सुनने रही, आ आब अपन आँखिसँ देखलहुँ! लव: ‘घोड़ा’क उल्लेख यज्ञ-पशुसम्बन्धी शास्त्रमे सेहो अछि, आ युद्धशास्त्रमे सेहो। कहू, ई कोन प्रकारक अछि? बालकसभ: सुनू तऽ— ओकर पाछाँ एकटा पैघ नाङरि अछि, जकरा ओ निरन्तर फटकारैत रहैत अछि; गरदनि लम्बा अछि, आ ओकर चारिटा खुर अछि— न बेसी, न कम; ओ घास खाइत अछि आ आमक आकारक लीद करैत अछि... मुदा वर्णन आब बस। ओ भागि रहल अछि—जल्दी करू, चलू! ओ सभ लवक लग आबि ओकर हाथ आ मृगचर्म पकड़ि घीचैत अछि। लव: (कौतूहल, अनिच्छा आ शिष्टतासँ) हमर वृद्धजन देखि सकैत छथि जे हमरा घीचि कऽ लऽ जाओल जा रहल अछि। ओ हड़बड़ीमे चलैत अछि। अरुन्धती आ जनक: जाउ बच्चा, अपन जिज्ञासा शान्त करू। कौसल्या: भगवती, जँ हम हुनका—ओ चिरञ्जीवी होथि—देखैत नहि रही, तँ हमरा ठकल जकाँ लगत। आउ, दोसर ठामसँ हुनकर जाइत रूप देखी। चतुर्थ अङ्क : कौसल्या आ जनकक भेट अरुन्धती: छोट दुष्ट एतेक तेजीसँ एतेक दूर चलि गेल जे आब प्रायः देखाइयो नहि रहल अछि। कञ्चुकीक प्रवेश। कञ्चुकी: वाल्मीकि उत्तर देने छथि जे अहाँ अपन प्रश्नक उत्तर उचित समयपर स्वयं जानि जाएब। जनक: अवश्य कोनो अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात अछि। अरुन्धती, मित्र कौसल्या, गृष्टि—आउ, हम सभ स्वयं प्रचेतस-पुत्रक दर्शन करए चली। वृद्धजनक समूहक प्रस्थान। पाठशालाक बालकसभक प्रवेश। बालकसभ: कुमार महोदय, ई अद्भुत वस्तु देखू। लव: प्रथम दृष्टिमे बुझि गेलहुँ—ई अश्वमेध यज्ञक घोड़ा अछि। बालकसभ: अहाँ कोना बुझलहुँ? लव: हे मूर्खसभ! अहाँ सभ वेदक ओ अंश पढ़ि चुकल छी, तइयो नहि बुझैत छी? एकर रक्षक अवश्य होएबाक चाही—कवच, गदा वा बाण धारण कएने, प्रत्येक दलमे सय-सय सैनिक। एतय जे सेना देखाइत अछि, से प्रायः ठीक एहने अछि। विश्वास नहि हो तऽ हुनकहि सभसँ पूछू। बालकसभ: हे सैनिक, ई घोड़ा रक्षाक बीच किएक घूमि रहल अछि? लव: (ईर्ष्यासँ, अपना मोने) अश्वमेध विश्वविजयी क्षत्रियक सर्वोच्च प्रभुताक अन्तिम परीक्षा अछि; एकर उद्देश्य अन्य समस्त क्षत्रियकेँ अपमानित करब होइत अछि। चतुर्थ अङ्क : कौसल्या आ जनकक भेट नेपथ्यमे: ई घोड़ा कम, सातो लोकक एकमात्र सच्चा वीर, दशग्रीवक कुलक शत्रु केर घोषणा करैत विजयध्वज अथवा युद्धघोष बेसी अछि। लव: (उत्तेजित जकाँ) अहा, ई तँ युद्धक ललकार अछि! बालकसभ: हम सभ की कही? कुमार महोदय सचमुच बहुत ज्ञानी छथि। लव: हे सैनिकसभ, अहाँ सभ एना डीङ मारैत छी मानू पृथ्वीपर कोनो क्षत्रिय बचले नहि हो! नेपथ्यमे: चक्रवर्तीक सोझाँ अन्य क्षत्रियक मूल्ये की? लव: धिक् रे दुष्टसभ! जँ क्षत्रिय छथि, तँ निश्चय क्षत्रिये छथि। अहाँ सभ केकरा डराबऽ चाहैत छी? मुदा बातक समय बीति गेल; आब हम आक्रमण कऽ ओहि ध्वजकेँ छीनि आनब। हे बालकसभ! हुनका सभकेँ घेरू, माटिक ढेपा बरसाउ आ घोड़ाकेँ एतय घीचि आनू। बेचारा आश्रमक हरिणसभक संग स्वतन्त्र घूमय। क्रोधी आ अभिमानी सेनाधिकारीक प्रवेश। सेनाधिकारी: धिक् रे दुष्ट, की कहलह? राजाक सैन्यदल निर्मम आ कठोर अछि; ओ सभ बालकक सेहो उद्दण्ड वचन सहन नहि करत। शत्रुदलन कुमार चन्द्रकेतु एहि विख्यात वनक भ्रमण करबाक प्रबल इच्छासँ एतय पहुँचथि, ताहिसँ पहिने अहाँ सभ जल्दी एहि वृक्षझुरमुटक बाटेँ भागि जाउ। चतुर्थ अङ्क : कौसल्या आ जनकक भेट बालकसभ: कुमार महोदय, घोड़ाक बात छोड़ू। सैन्यदल शस्त्र लहरबैत आ अहाँकेँ धमकबैत आबि रहल अछि, आश्रम बहुत दूर अछि। आउ, जल्दी एतयसँ भागि चली! लव: (हँसैत) हुनकर शस्त्र लहराबऽ सँ हमरा की? (धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़बैत) हमर भयङ्कर धनुष जम्हाइ लेबाक लेल तैयार अछि— ई शस्त्र नहि, लोभसँ ग्रास निगलैत मृत्यु केर हँसैत मुख अछि; उन्मत्त, मन्द, मेघगर्जन सन ध्वनि करैत, जकर तीक्ष्ण अग्र-दाँतकेँ प्रत्यञ्चा-जिह्वा चाटि रहल अछि। सभ अपन अनुकूल गतिसँ चलैत प्रस्थान करैत छथि। चतुर्थ अङ्क समाप्त पञ्चम अङ्क कुमारक पराक्रम नेपथ्यमे: हे सैनिकसभ! अन्ततः हमरा सभक सहायता लेल अतिरिक्त सेना आबि गेल। तीव्रगामी घोड़ासँ जुड़ल रथपर, वेगवान सुमन्त्रक हाँकल, ऊपर फहराइत कोविदार ध्वजसहित— युद्धक समाचार सुनि चन्द्रकेतु आबि रहल छथि। सुमन्त्रक हाँकल रथपर, हाथमे धनुष आ विस्मय, आनन्द तथा आशङ्कासँ भरल चन्द्रकेतुक प्रवेश। चन्द्रकेतु: देखू सुमन्त्र, देखू। युद्धक अग्रभागमे कोनो बालवीर अछि, जे सेनापर बाणक हिमझंझा बरसा रहल अछि; ओकर पाँच शिखा लहरा रहल अछि, धनुष निरन्तर टंकार करैत अछि, आ सुन्दर मुख क्रोधसँ लाल अछि। ई अद्भुत अछि। ऋषिसभक पोसल एकटा मात्र बालक, एतेक सेनासँ घेरायल, रघुवंशक कोनो नव, अपरिचित अंकुर जकाँ, भयङ्कर टंकार करैत धनुषसँ सहस्र अग्निमय बाण छोड़ैत, युद्ध-हाथीक कनपटी विदीर्ण करैत अछि— ई दृश्य हमर जिज्ञासा प्रज्वलित कऽ रहल अछि। सुमन्त्र: कुमार महोदय—अहाँ चिरञ्जीवी होउ— पञ्चम अङ्क : कुमारक पराक्रम एहि बालककेँ देखैत—जकर शक्ति एक्कहि संग देव आ दानव दुनूसँ अधिक, आ रूप सेहो ओहने अछि— हमरा विश्वामित्रक यज्ञक शत्रु दमन करबाक लेल धनुष धारण कएने रामक स्मरण भऽ रहल अछि। चन्द्रकेतु: एतेक लोककेँ एकसरि व्यक्तिपर आक्रमण करैत देखि हमर हृदय घृणासँ सिहरि उठैत अछि। ओ बालक अछि आ पूर्णतः एकसरि, जखन कि विशाल सेना—ताड़क वृक्ष सन विशाल हाथमे गुँथल शस्त्रजाल, युद्ध-सज्जासँ रोमाञ्चित, खनखनाइत सोनक घण्टीयुक्त रथपर, आ मेघ सन युद्ध-हाथीपर, जकर मदधार झंझावात उठबैत अछि—ओकरा चारू दिस घेरि रहल अछि। सुमन्त्र: बच्चा, सभ मिलियो कऽ ओकर सामना नहि कऽ सकैत अछि, एक-एकक तँ प्रश्नहि नहि। चन्द्रकेतु: शीघ्र करू महोदय, शीघ्र! ओ हमर सेवकसभक सामूहिक संहार आरम्भ कऽ देलक। कारण— युद्ध-नगाड़ाक गम्भीर गर्जनसँ बढ़ल धनुष-टंकार, पर्वत-गुफामे चिंघाड़ैत हाथी-झुण्डसँ अधिक विशाल कोलाहल उत्पन्न करैत, वीर धरतीकेँ फड़कैत वीभत्स धड़सभक ढेरीसँ सजबैत अछि, मानू तृप्त मृत्युक भयङ्कर मुखसँ खसि पड़ल अन्नक टुकड़ा हो। पञ्चम अङ्क : कुमारक पराक्रम सुमन्त्र: (अपना मोने) कुमार चन्द्रकेतु आ एहन अलौकिक प्राणीक बीच द्वन्द्व होय, ई हम कोना अनुमति दऽ सकैत छी? (विचार करैत) मुदा अन्ततः हम सभ इक्ष्वाकुवंशक वृद्ध छी। आ वर्तमान परिस्थितिमे दोसर उपायो की अछि? चन्द्रकेतु: (विस्मय, लज्जा आ आशङ्कासँ) अहा, हमर सेना चारू दिस पाछाँ हटि रहल अछि! सुमन्त्र: (तीव्र रथगतिक अभिनय करैत) बच्चा—अहाँ चिरञ्जीवी होउ—वीर आब पुकार सुनबाक दूरीपर अछि। चन्द्रकेतु: (बिसरबाक अभिनय करैत) महोदय, दूतसभ कोन नाम कहने छल? सुमन्त्र: लव। चन्द्रकेतु: हे लव, अहाँ सन बलशालीक लेल एहन सैनिकक की मूल्य? हम एतय छी—एकल युद्धमे हमरा सामना करू: अग्निक सामना अग्निएसँ होएबाक चाही। सुमन्त्र: देखू कुमार, देखू— अहाँक चुनौती सुनि बालवीर सेनाक संहार रोकि दैत अछि, जेना मेघक गर्जन सुनि साहसी सिंहशावक हाथी-झुण्डक वध रोकि दैत अछि। तीव्र आ निर्भीक गतिसँ चलैत लवक प्रवेश। पञ्चम अङ्क : कुमारक पराक्रम लव: साधु राजकुमार, साधु! अहाँ निश्चय सच्चा ऐक्ष्वाक छी। देखू, हम अहाँक लग घुरि अयलहुँ। नेपथ्यमे प्रचण्ड कोलाहल। लव: (अकस्मात् घुमैत) ई की? पहिने पराजित भेल सेनानायकसभ फेर घेराबन्दी करैत पाछाँसँ आक्रमण करए आबि रहल अछि? दुष्टसभ! प्रलय-वायुसँ प्रहारित समुद्रक बाढ़ जकाँ, कान फोड़निहार भयावह गर्जन करैत, चरम ज्वार धरि उमड़ैत हुनकर ई प्रवाह हमर क्रोधक प्रज्वलित होमाग्निक आहार बनय; ओ क्रोध बड़वानलक मुखक अग्नि सन प्रचण्ड अछि, जे पर्वतक प्रहारसँ आरो धधकि उठैत अछि। ओ उत्तेजित भए चलैत अछि। चन्द्रकेतु: हे कुमार महोदय! अहाँक वास्तवमे अद्भुत गुण हमरा अत्यन्त प्रिय बनौलक। आब अहाँ हमर मित्र छी, हमर जे किछु अछि से अहाँक। तखन अपनहि लोकक संहार किएक? अहाँक गौरवक परीक्षा-पत्थर ई चन्द्रकेतुए अछि। लव: (उत्तेजना आ आशङ्कासँ घुमैत) अहा, सूर्यवंशक तेजस्वी वंशजक वचन कतेक कुशल प्रदर्शन अछि—वीर, मधुर, आ एक्कहि संग कोमल-कठोर। तखन हम एहि लोकसभक चिन्ता किएक करी? पहिने हुनकर आदर करी। पञ्चम अङ्क : कुमारक पराक्रम नेपथ्यमे एखनो प्रचण्ड कोलाहल। लव: (क्रोध आ घृणासँ) धिक्, ई कुकुरसभ हमर कतेक अनादर कऽ रहल अछि—वीरसभक वार्तालाप बीचमे रोकि देलक। ओ चन्द्रकेतुक दिस चलैत अछि। चन्द्रकेतु: देखू महोदय, देखू—ई दृश्य देखबाक योग्य अछि: आत्मविश्वास आ कौतूहलसहित धनुष लहरबैत, ओ हमर लक्ष्य साधि रहल अछि, जखन कि पाछाँसँ सेना ओकरा खदेड़ि रहल अछि; मानू इन्द्रधनुष धारण कएने मेघ, जे प्रचण्ड पवनसँ विपरीत दिशामे धकेलल जा रहल हो। सुमन्त्र: ओकरा देखबो—खैर, केवल कुमार महोदय एकर समर्थ छथि। हम सभ तँ विस्मयसँ अभिभूत छी। चन्द्रकेतु: हे श्रेष्ठ सैनिकसभ, अहाँ सभक सेना गिनतीसँ बाहर, आ ओ एकसरि। अहाँ सभ रथ, हाथी आ घोड़ापर—ओ पैदल। अहाँ सभ कवचसँ सुरक्षित, ओ तपस्वीक मृगचर्ममे। अहाँ सभ वयस्क, जखन कि ओकर देहपर यौवनक प्रथम प्रभा चमकि रहल अछि। एहन युद्ध लेल शस्त्र उठेनाइ अहाँ सभ आ हमरा केवल लज्जित करत। पञ्चम अङ्क : कुमारक पराक्रम लव: (चकित) ई की, ओ दयासँ द्रवित भऽ गेल? (विचार करैत) आब समय नहि नष्ट करब; जृम्भक दिव्यास्त्रसँ सेनाकेँ स्तम्भित कऽ दैत छी। (एकाग्रताक अभिनय करैत) सुमन्त्र: हमर सेनाक कोलाहल अकस्मात् शान्त किएक भऽ गेल? लव: अन्ततः ओ धृष्ट व्यक्ति हमरा देखाइ पड़ल। सुमन्त्र: (आशङ्कासँ) बच्चा, हमरा लगैत अछि कुमार जृम्भकास्त्र प्रयोग कएने छथि। चन्द्रकेतु: एहिमे कोनो सन्देह नहि— अन्धकार आ बिजुरीक भयावह मेल जकाँ, पहिने अन्ध करैत, फेर चकाचौंध करैत, ई स्थिर आँखिपर सेहो प्रहार करैत अछि। हमर सैनिक चित्रमे अङ्कित जकाँ निश्चल छथि; निश्चय अजेय जृम्भकास्त्रक प्रयोग भेल अछि। ई चमत्कार अछि—निखालिस चमत्कार! नरकक गर्भमे संचित अन्धकार सन कृष्ण, तपल चमकैत पीतल केर लाल प्रभासँ दीप्त, जृम्भकास्त्र आकाशकेँ तहिना आच्छादित कऽ रहल अछि जेना कल्पान्तक घोषणा करैत भयङ्कर हुंकारयुक्त पवनसँ उखड़ल विन्ध्यक शिखर सभ, जकर गुफा मेघसमूहसँ निकलैत बिजुरीक कारण भीतरसँ पिङ्गल चमकि रहल हो। पञ्चम अङ्क : कुमारक पराक्रम सुमन्त्र: मुदा ओकरा जृम्भकास्त्र कोना प्राप्त भेल? चन्द्रकेतु: अनुमानतः प्रचेतस-पुत्रसँ। सुमन्त्र: बच्चा, एहन अस्त्र—विशेषतः जृम्भकास्त्र—एहि प्रकार नहि प्राप्त होइत अछि। कारण— ई कृष्णाश्वक सन्तान-सदृश अस्त्रसभ छथि; हुनकासँ कौशिक के प्राप्त भेल, जिनका सँ प्रिय रामकेँ प्राप्त भेल, आ तखनसँ ओ सभ हुनकहि लग निवास करैत अछि। चन्द्रकेतु: मुदा अन्य लोक सेहो एकर दर्शन कएने छथि—जे अपन पवित्रतासँ प्रबुद्ध भेल आ स्वतः मन्त्रदृष्टा बनल। सुमन्त्र: बच्चा, सावधान रहू—अहाँक प्रतिद्वन्द्वी घुरि आयल। दुनू कुमार: (एक-दोसरक विषयमे) ई युवक कतेक सौम्य देखाइत अछि। (स्नेह आ प्रेमसँ देखैत) की ई मनक आकस्मिक मिलन अछि? ओकर असंख्य गुणक प्रभाव? पूर्वजन्ममे शीघ्र बनल कोनो पुरान मित्रता? वा भाग्यसँ नुकायल हमर कोनो सम्बन्धी, जे ओकर दर्शन मात्रसँ हमर हृदय एकाग्र मोहमे बान्हल जा रहल अछि? पञ्चम अङ्क : कुमारक पराक्रमसुमन्त्र: आत्माक ई सामान्य स्वभाव अछि जे कोनो एक व्यक्तिदोसर विशेष व्यक्तिप्रति सहज स्नेह अनुभव करय। सांसारिकलोक एकरा रूपकमे “नयन मोहित भऽ जाएब” अथवा “प्रथमदर्शनक प्रेम” कहैत अछि। तें शास्त्रमे लिखल अछि जे ई वस्तुवास्तविक अछि, चाहे आधारहीन आ अबूझ किएक नहि प्रतीत हो।कारणरहित अनुरागक प्रतिकारककोनो उपाय नहि अछि।जीवसभकेँ भीतर गहींरमे जोड़निहारस्नेहक कोनो सूक्ष्म सूत्र अवश्य अछि।दुनू कुमार: (एक-दोसरक विषयमे)राजकीय कोमल पट्टिकासँ सुशोभित एहि देहमेहम बाण कोना छोड़ि सकैत छी,जखन भेटिते हमर अङ्ग ओकरा आलिङ्गन करबाकआकाङ्क्षासँ काँपऽ लागल?मुदा एतेक प्रबल शक्तिक सोझाँ शस्त्र छोड़ि दोसर उपायो की अछि?आ फेर, जखन ओ शस्त्रक सामर्थ्यक सीमासँ बहुत परे अछि,तखन शस्त्रक उपयोगे की?खड्ग निकललाक बाद जँ हम युद्धसँ विमुख भऽ जाई,तँ ओ हमरा विषयमे की कहत?वीरमार्गक रस कठोर अछि,आ सहज स्नेहक प्रवाह रोकि दैत अछि।सुमन्त्र: (लवकेँ देखैत; अश्रुपूर्ण, अपना मोने) हे हमर हृदय,अहाँ एना उन्मत्त किएक भऽ रहल छी?

पञ्चम अङ्क : कुमारक पराक्रम हमर आशाक एकमात्र बीज भाग्य छीनि लेलक। लता कटि गेलापर कोनो नव अंकुर कोना फूटत? चन्द्रकेतु: सुमन्त्र, हम रथसँ उतरए चाहैत छी। सुमन्त्र: किएक? चन्द्रकेतु: पहिल बात, वीरक सम्मान करबाक ई उचित रीति अछि। दोसर, जेना अहाँ जनैत छी, ई क्षत्रिय-परम्पराक पालन अछि। शास्त्रज्ञक व्याख्यानुसार रथारूढ़ व्यक्तिकेँ पैदल व्यक्तिसँ कखनो युद्ध नहि करबाक चाही। सुमन्त्र: (अपना मोने) हम भयंकर दुविधामे पड़ल छी। हम सन व्यक्ति उचित कार्यसँ हुनका कोना रोकू, वा एहन कर्मक अनुमति कोना दी, जकर रस निखालिस दुस्साहस अछि? चन्द्रकेतु: हमर पूज्य पिता धर्म वा राज्यनीतिक प्रत्येक प्रश्न अहाँसँ पूछैत छथि—अपन पिताक प्रिय मित्रसँ। तखन अहाँक ई हिचकिचाहट किएक? सुमन्त्र: बच्चा—अहाँ चिरञ्जीवी होउ—अहाँक विचार धर्मानुकूल अछि। युद्धमे ई उचित आचरण, धर्मक सनातन मार्ग, आ रघुवंशक सिंहसभ द्वारा अपनाओल वीरक पथ अछि। चन्द्रकेतु: अहाँक वचन अनुपम अछि। पञ्चम अङ्क : कुमारक पराक्रम इतिहास आ पुराण, धर्मोपदेश, रघुवंशक कुलाचार—ई सभ केवल अहाँकेँ ज्ञात अछि। सुमन्त्र: (स्नेहाश्रुसहित आलिङ्गन करैत) हे प्रिय बच्चा, अहाँक प्रिय पिता, इन्द्रजितक विजेता जन्मलाह, तकर एखन कतेक दिन बीतल होयत? आ एतय हुनकर अपन पुत्र वीरमार्गपर चलि रहल छथि। दशरथक वंशक सौभाग्य कतेक पूर्णता पओलक! चन्द्रकेतु: (विषादसँ) जखन धरि रघुवंशक ज्येष्ठ अपूर्ण छथि, हमर वंश पूर्णता कोना पाबि सकैत अछि? एही एक विचारसँ हमर पिता आ हमर अन्य तीन पिता शोकमे जरैत छथि। सुमन्त्र: अहा, चन्द्रकेतुक वचन हमर हृदयक कोमल मर्मकेँ विदीर्ण कऽ रहल अछि। लव: सच कहू तँ एतय रसक विकास पूर्णतः उलझि गेल अछि। चन्द्रमा उदित होइतहि रातिमे खिलनिहार कमल प्रसन्न होइत अछि, आ हुनका देखिते हमर आँखि सेहो आनन्दित होइत अछि; मुदा हमर बाँहि—भयावह घाव खुलल, भारी धनुष आ ओकर निर्दय, प्रचण्ड टंकार करैत प्रत्यञ्चाप्रति प्रेमसँ धड़कैत—युद्धक लेल आतुर अछि। पञ्चम अङ्क : कुमारक पराक्रम चन्द्रकेतु: (रथसँ उतरबाक अभिनय करैत) महोदय, सूर्यवंशी चन्द्रकेतु अहाँकेँ प्रणाम करैत अछि। सुमन्त्र: ककुत्स्थ सन अदम्य, निर्मल आ प्रभावशाली ऐश्वर्य अहाँकेँ प्राप्त हो; सनातन देव वराह अहाँक चिरकल्याण करथि। आ आरो— अहाँक वंशपिता सूर्य युद्धमे अहाँकेँ प्रेरित करथि। अहाँक गुरुसभक गुरु आ अहाँक सेहो गुरु मैत्रावरुण अहाँसँ प्रसन्न होथि। अहाँकेँ इन्द्र, विष्णु, अग्नि, मरुद्गण आ सुपर्ण केर बल भेटय। राम आ लक्ष्मणक धनुष-प्रत्यञ्चाक प्रचण्ड मन्त्रध्वनि अहाँकेँ सफलता प्रदान करय। लव: कुमार महोदय, रथपर अहाँ अत्यन्त शोभायमान छी। एतेक विनय प्रदर्शनक कोनो आवश्यकता नहि। चन्द्रकेतु: तखन सौभाग्यशाली कुमार सेहो अपन रथकेँ सुशोभित करथि। लव: महोदय, राजकुमारकेँ फेर रथपर चढ़ाउ। पञ्चम अङ्क : कुमारक पराक्रमसुमन्त्र: तखन अहाँ सेहो कुमार चन्द्रकेतुक अनुरोध स्वीकार करू।लव: अपन उपकरण हो तँ ओकर प्रयोगमे के हिचकिचायत? मुदाहम वनवासीसभ रथ चलाबऽमे अभ्यस्त नहि छी।सुमन्त्र: बच्चा, अहाँ स्वाभिमान आ उदारता—दुनूक दाबीमोन राखैत छी। जँ ऐक्ष्वाक राजा राम अहाँक ई आचरण देखितथि,तँ हुनकर हृदय स्नेहसँ उमड़ि पड़ितनि।लव: हमरा बुझाइत अछि ओ राजर्षि स्वयं वास्तवमे अत्यन्त उदार छथि—कम-सँ-कम एना सुनल अछि। (किछु लज्जित)हम सामान्यतः एहन अनुष्ठानक विरोध नहि करैत छी,आ राजाक असंख्य गुणक आदर संसारमे के नहि करत?तइयो, घोड़ाक रक्षकसभक चुनौती—समस्त क्षत्रियकेँ देल उकसाहट—क कारणहमरामे ई परिवर्तन आयल।चन्द्रकेतु: (मुस्करैत) की अहाँ हमर पिता केर अपारशक्तिक वैभवसँ सेहो क्षुब्ध छी?लव: हम छी वा नहि, एकर महत्त्व नहि; बस ई पूछैत छी—हमसुनने छी जे राघव संयमी पुरुष छथि; कहल जाइत अछि जे नेओ स्वयं अभिमानी छथि, ने हुनकर प्रजामे अहङ्कार अछि। तखनहुनकर लोक राक्षसक योग्य वचन किएक बजैत अछि?

पञ्चम अङ्क : कुमारक पराक्रम ऋषिसभ कहैत छथि, “राक्षसी वचन” से अछि जे केवल उन्मत्त वा अभिमानीक योग्य हो। “ई समस्त वैरक मूल, संसारक साक्षात् अभिशाप अछि,” एना लोक ओकर निन्दा कएने छथि। एकर विपरीत वचनक ओ सभ प्रशंसा करैत छथि— मनीषी कहैत छथि, शुभ वचन साक्षात् कामधेनु अछि; ओ इच्छित सभ किछु दुहि दैत अछि, अभाव दूर करैत अछि, यश जन्मबैत अछि आ समस्त दुष्कर्म मेटा दैत अछि। ओ परम समृद्धिक साक्षात् जननी अछि। सुमन्त्र: वाल्मीकिक ई तरुण शिष्य कतेक सरल-स्वभावक अछि; ओकर प्रत्येक वचन ऋषिस्वभावसँ ओतप्रोत अछि। लव: चन्द्रकेतु, अहाँ एखन जे कहलहुँ—“की अहाँ हमर पिताक शक्तिक वैभवसँ सेहो क्षुब्ध छी?”—ताहि विषयमे हम एतबे पूछैत छी: की क्षत्रियधर्मक प्रयोग सीमित अछि? सुमन्त्र: अहाँ ऐक्ष्वाक प्रभुकेँ कनेको नहि चिन्हैत छी। कृपा कऽ ई हठ आब छोड़ू। सैनिकसभक संहार कऽ अहाँ निश्चय अपन शक्ति देखौने छी, मुदा जामदग्न्य केर विजेतासँ प्रतिस्पर्धा नहि करब नीक। पञ्चम अङ्क : कुमारक पराक्रम लव: (हँसैत) महोदय, राजा जामदग्न्यकेँ पराजित कएलनि—ई बात ढिंढोरा पीटि कऽ किएक कहैत छी? ई स्थापित सत्य अछि जे ब्राह्मणक शक्ति वाणीमे होइत अछि, जखन कि क्षत्रियक शक्ति ओकर भुजामे। जामदग्न्य ब्राह्मण छलाह जे तलवार उठा लेलनि— एहन व्यक्तिकेँ हरौलासँ राजाकेँ कोन गौरव भेटैत अछि? चन्द्रकेतु: (किछु व्याकुल) महोदय, ई वाक्-विवाद आब बस। ई व्यक्ति आदिपुरुषक कोनो नव अवतार अवश्य अछि, जँ भृगुपुत्र सेहो ओकर दृष्टिमे प्रतिद्वन्द्वी नहि, आ जँ ओ ई स्वीकार नहि करैत अछि जे पिता रामक पुण्यकर्म सातो लोकक सुरक्षा सुनिश्चित कऽ सकैत छल। लव: रामक कर्म आ महानताकेँ के नहि स्वीकारैत अछि? मुदा आलोचनाक अवकाश सेहो अछि... खैर, आब बस। पञ्चम अङ्क : कुमारक पराक्रम ओ वृद्ध छथि; हुनकर कर्मपर फेर विचार करबाक आवश्यकता नहि— छोड़ू, आब फेर किएक ओकर चर्चा करी? सुन्दक पत्नीकेँ मारलासँ सेहो हुनकर यश कलङ्कित नहि भेल— संसारक दृष्टिमे ओ एखनो महान छथि। आ खरक संग युद्धमे ओ जे तीन डेग पाछाँ हटने छलाह, वा इन्द्रपुत्रक वधमे जे कौशल देखौने छलाह... लोक एहि सभ बातसँ पूर्ण परिचित अछि। चन्द्रकेतु: नहि, आब पिता रामक निन्दा कऽ अहाँ सीमा लाँघि गेलहुँ; अहाँक दुस्साहस अत्यधिक बढ़ि गेल। लव: की, अहाँ हमरा मुँह बिचका रहल छी? सुमन्त्र: हम देखि रहल छी जे हुनकर क्रोध भड़कि रहल अछि; एक-दोसरक अभिप्राय बुझिते ओ सभ एतेक काँपऽ लगैत छथि जे हुनकर शिखा खुलि जाइत अछि; स्वभावतः गुलाबी कमलक पाँखुरि सन हुनकर आँखि स्वतः रक्तवर्ण भऽ जाइत अछि; आ अचानक उन्मत्त नृत्य आरम्भ करैत भौंहक वक्रता हुनकर मुखकेँ पूर्णिमाक चन्द्रमाक काल दाग, वा खिलल श्वेत कमलपर मँडराइत कारी भौंरा सन बना दैत अछि। दुनू कुमार: चलू, युद्ध लेल कोनो अधिक उपयुक्त स्थान खोजी! सभक प्रस्थान। पञ्चम अङ्क समाप्त षष्ठ अङ्कक प्रवेशक आकाशचारी रथपर एक विद्याधर दम्पतिक दृश्य। विद्याधर: अहा, सूर्यवंशक एहि दुनू कुमारक पराक्रम देखू, जे अकस्मात् आरम्भ भेल युद्धमे प्रचण्डतासँ भिड़ल छथि! क्षत्रिय-शक्तिक सौन्दर्य नव दीप्ति पओलक अछि, आ देव-दानव स्वयं विस्मयसँ निःशब्द छथि। देखू ने प्रिये— ओ सभ सोनक घण्टीक झनकारयुक्त धनुष मोड़ैत छथि, भारी प्रत्यञ्चाक छोरपर प्रचण्ड टंकारसँ भयावह कोलाहल उठबैत छथि; शिखा निरन्तर झूलैत अछि, बाणक वर्षा होइत अछि, आ नाटकीय तीव्रतासँ बढ़ैत युद्ध समस्त संसारकेँ भयभीत कऽ रहल अछि। दुनूक कल्याण लेल स्वर्गक दुन्दुभि मेघ सन गम्भीर गर्जना करैत अछि। तखन एहि दुनू सिद्धवीरपर निरन्तर पुष्पवृष्टि हो—खिलल स्वर्णकमलसँ लदल, सघन समूहमे, अमर देवक वृक्षक कोमल रत्न-सदृश कलिकासँ रस टपकबैत। विद्याधरी: मुदा अकस्मात् आकाश एतेक पिङ्गल किएक भऽ गेल, आ भयङ्कर बिजुरीक चमक अचानक ताण्डव किएक आरम्भ कऽ देलक? षष्ठ अङ्कक प्रवेशक विद्याधर: सचमुच आब की भऽ रहल अछि? की कृष्ण-लोहित देवक तेसर आँखि पूर्णतः खुलि गेल, आ त्वष्टाक खरादपर घुमैत सूर्यक प्रकाश सन धधकि उठल? (विचार करैत) अहा, बुझलहुँ। कुमार चन्द्रकेतु आग्नेयास्त्र छोड़ने छथि; ओकर ज्बला चारू दिस पसरि रहल अछि। एखन— अन्य समस्त दिव्य रथ भागि गेल अछि, हुनकर याक-पुच्छ ध्वज झुलसि इन्द्रधनुषी भऽ गेल; हमर ध्वजक पताकापर ज्बला ओकरा क्षणभर लेल केसरियासँ रङल जकाँ बना रहल अछि। चमत्कार! अग्निदेव प्रकट भेल छथि; हुनकासँ निकलैत चिनगी बिजुरीक कड़क सन फटि रहल अछि—ज्बला कतेक भयङ्कर रूपेँ उछलि-उछलि चाटि रहल अछि! चारू दिस फैलैत ताप असह्य अछि। अपन देहसँ प्रियाकेँ ढाँकि सुरक्षित दूरीपर जाएब उचित होयत। (एना करैत अछि) विद्याधरी: अहा, पतिक देहक स्पर्शसँ ताप रुकि गेल—शुद्धतम मोती सन शीतल आ चिक्कन, एतेक कोमल आ परिपूर्ण जे आनन्दमे हमर आँखि उलटि मुनि जा रहल अछि। विद्याधर: अरे, हम ई की कऽ देलहुँ? मुदा फेर— व्यक्तिकेँ किछु करबो नहि पड़ैत; संग रहबाक मात्र आनन्द दुःख दूर कऽ दैत अछि। प्रेम करनिहार व्यक्ति पाबि लेब कतेक महान् वरदान अछि! षष्ठ अङ्कक प्रवेशक विद्याधरी: आकाश अकस्मात् मेघसँ किएक अन्हार भऽ गेल— तरल, घुमड़ैत समूह, चमकैत बिजुरीसँ अलङ्कृत, उन्मत्त मयूरक कण्ठ सन कृष्ण? विद्याधर: ई कुमार लव द्वारा छोड़ल वारुणास्त्र केर प्रभाव अवश्य अछि। ई की? सहस्र-सहस्र उमड़ैत मेघ आग्नेयास्त्रकेँ बुझा देलक। विद्याधरी: अहा, हमरा कतेक प्रिय लगैत अछि! विद्याधर: मुदा हाय, प्रत्येक अति संकट जन्मबैत अछि। आब संसार ठण्ढसँ काँपि रहल अछि; प्रलय-वायुसदृश गर्जन करैत मेघसँ गाढ़ भेल घोर अन्धकारमे घेरायल—मानू समस्त ब्रह्माण्डकेँ एक्कहि बेर निगलबाक लेल भयावह रूपेँ मुँह फाड़ने कालक गुफासदृश मुखमे छटपटा रहल हो; वा कल्पान्तक योगनिद्रामे समस्त इन्द्रिय-द्वार बन्द कएने नारायण केर उदरमे प्रवेश कऽ गेल हो। साधु कुमार चन्द्रकेतु, साधु! आब वायव्यास्त्र छोड़बाक ठीक समय अछि—ओ निश्चय छोड़ने छथि, कारण— पवन उमड़ैत मेघकेँ तहिना छिन्न कऽ देलक, जेना ज्ञान भ्रान्तिकेँ ब्रह्ममे विलीन कऽ दैत अछि। विद्याधरी: हे स्वामी, ई के छथि जे भयभीत भए दुनू कुमारक बीच अपन दिव्य रथ उतारि रहल छथि, उठाओल हाथसँ वस्त्रक छोर लहरा रहल छथि, आ दूरसँ कोमल वचन कहि युद्ध रोकबाक अत्यन्त प्रयास कऽ रहल छथि? षष्ठ अङ्कक प्रवेशक विद्याधर: (देखैत) ई शम्बूक-वध कऽ घुरैत रघुवंशक प्रभु छथि। महापुरुषक वचन सुनि दुनू हुनकर आदरसँ युद्ध रोकि दैत छथि। लव मौन भए जाइत अछि, आ चन्द्रकेतु गहींर प्रणाम करैत छथि। राजाक अपन पुत्रसभसँ एहि भेटक फल शुभ हो। एखन चलू। दुनूक प्रस्थान। प्रवेशक समाप्त षष्ठ अङ्क कुमारसभक अभिज्ञान दृश्य आरम्भमे राम, लव आ प्रणत चन्द्रकेतु। राम: (पुष्पकसँ उतरैत) सूर्यवंशक चन्द्रमा चन्द्रकेतु, तुरन्त हमरा लग आउ आ कसि कऽ आलिङ्गन करू। अहाँक अङ्ग हिमखण्ड सन शीतल अछि, हम सन हृदयक दाहो शान्त करबाक समर्थ। (हुनका उठबैत आ स्नेहाश्रुसहित आलिङ्गन करैत) अहाँ कुशल छी ने? आ अहाँक देहमे स्थित दिव्यास्त्रसभ सेहो कुशल अछि? चन्द्रकेतु: लव—एहि सुन्दर, अद्भुतकर्मा कुमार—सँ भेटक सौभाग्यक कारण सभ कुशल अछि। हमर विनती अछि जे पिता एहि परम श्रेष्ठ महावीरपर ओहने स्नेह-दृष्टि राखथि जेना हमरापर—बल्कि ताहूसँ बेसी। राम: (लवकेँ देखैत) हमर बच्चाकेँ नव मित्र भेटल—ई कतेक सौभाग्यक बात! ओकर व्यक्तित्व एक्कहि संग अगम्य आ कल्याणमय अछि। मानू लोक-रक्षा लेल अस्त्रविद्या देह धारण कऽ लेने हो; मानू ब्रह्मकोषक रक्षा लेल क्षत्रियधर्म मूर्तिमान भेल हो; मानू समस्त सामर्थ्य पूर्ण पुष्पित, समस्त गुण एकत्रित, आ समस्त संसारक पुण्य संचित भए पूर्णतः प्रकट रूपमे उपस्थित हो। षष्ठ अङ्क : कुमारसभक अभिज्ञान लव: (अपना मोने) अहा, कतेक महान् पुरुष—रूपमे साक्षात् निर्मल तेज! विश्वास, स्नेह आ भक्तिक एकमात्र महान् आश्रय, परम धर्मक सौम्यता देह धारण कएने। ई चमत्कार अछि— वैर समाप्त भऽ गेल, आनन्दपूर्ण रस उमड़ि रहल अछि; हमर उद्दण्डता कतय विलीन भऽ गेल, आ विनय हमरा अभिभूत कऽ रहल अछि; हुनका देखिते हम हुनकर वशमे भऽ गेलहुँ—किएक? मुदा तीर्थ जकाँ महापुरुषसभमे कोनो अत्यन्त मूल्यवान् प्रभाव होइत अछि। राम: ई अचानक हमर दुःखकेँ विश्राम कोना दऽ रहल अछि, आ कोन कारणसँ हमर अन्तःकरणमे स्नेह जगा रहल अछि? मुदा स्नेहक लेल कारण आवश्यक अछि—एना कहब स्वयं विरोधाभास अछि। पारस्परिक आकर्षणक कोनो आन्तरिक कारण होइत अछि; प्रेमभाव कनेको बाह्य कारणपर निर्भर नहि करैत अछि। सूर्योदयमे श्वेत कमल किएक खिलैत अछि, वा चन्द्रोदयमे चन्द्रकान्त मणि किएक रस छोड़ैत अछि? षष्ठ अङ्क : कुमारसभक अभिज्ञान लव: चन्द्रकेतु, ई के छथि? चन्द्रकेतु: प्रिय मित्र, ई हमर पूज्य पिता छथि। लव: तखन न्यायतः ई हमर सेहो पिता भेलाह, कारण अहाँ हमरा प्रिय मित्र कहलहुँ। मुदा ‘रामायण’मे चारि पुरुषकेँ अहाँ एहि सम्बोधनसँ पुकारैत छी। कहू, ई हुनका सभमे सँ के छथि? चन्द्रकेतु: ई हमर ज्येष्ठ पिता छथि। लव: (आनन्दसँ) अर्थात् ई रघुवंशक प्रभु छथि! आइक दिन प्रभुक दर्शन कराबऽ लेल उदित भेल—कतेक सौभाग्य! (विनय आ जिज्ञासासँ देखैत) पिता, प्रचेतस-पुत्रक शिष्य लव अहाँकेँ प्रणाम करैत अछि। राम: बच्चा—चिरञ्जीवी होउ—हमरा लग आउ। (स्नेहसँ आलिङ्गन करैत) बस, बस, ई औपचारिकता छोड़ू। फेर-फेर हमरा कसि कऽ आलिङ्गन करू। अहाँक स्पर्श कठोर परिपक्व कमलक भीतरी पात सन कोमल, चिक्कन, मुदा दृढ़ अछि; आ चन्दनसार वा चन्द्रकिरण सन शीतल, जे प्राणकेँ ताजगी दैत अछि। लव: (अपना मोने) हुनकर हमरा प्रति एहन स्वतःस्फूर्त स्नेह, आ हम अज्ञानमे हुनकहि संग एतेक अपराध कऽ बैसलहुँ—शस्त्र उठा आक्रमण धरि कऽ देलहुँ। (प्रकट) पूज्य पिता आइ लवक बालसुलभ अपराध क्षमा करथि। षष्ठ अङ्क : कुमारसभक अभिज्ञान राम: हमर बच्चा कोन अपराध कएने अछि? चन्द्रकेतु: अश्वरक्षकसभक मुँहसँ पिताक शक्ति-प्रदर्शनक चर्चा सुनि ई वीरता देखाबऽ लेल आतुर भऽ गेल। राम: मुदा ई तँ क्षत्रियक भूषण अछि। महाबली पुरुष दोसरक शक्ति-प्रदर्शन सहन नहि कऽ सकैत; ई ओकर स्वाभाविक प्रकृति अछि, बनावटी नहि। जँ दिन बनौनिहार सूर्य अपन किरणसँ सूर्यकान्त मणिकेँ निरन्तर तपबैत अछि, तँ की ओ अपमानित जकाँ अग्नि नहि उगलत? चन्द्रकेतु: हुनकर रोषो अद्भुत अछि। पिता देखथि—हमर प्रिय मित्र ई वीर जृम्भकास्त्र छोड़ि सैनिकसभकेँ पूर्णतः स्तम्भित कऽ देलक। राम: (देखैत) बच्चा लव, अस्त्रकेँ घुरा लिअ। आ चन्द्रकेतु, अहाँ सेहो जाउ, अशक्त आ विनीत भेल सैनिकसभकेँ शान्त करू। लव ध्यानक अभिनय करैत अछि। चन्द्रकेतु: जेना आज्ञा। (प्रस्थान) लव: अस्त्र शान्त कऽ देल गेल। राम: बच्चा, एहि अस्त्रसभक प्रयोग आ संहार, हुनकर गुप्त मन्त्रसहित, परम्परासँ देल जाइत अछि— षष्ठ अङ्क : कुमारसभक अभिज्ञान ब्रह्मा आ अन्य देवगण वैदिक जीवन-पद्धतिक कल्याण लेल सहस्र वर्ष आ ताहूसँ अधिक तपस्या कएलनि; तखन ओ प्राचीन गुरु सभ जे देखबा योग्य भेलाह, सैह ई अस्त्रसभ छल—हुनकर अपन तपःशक्तिक मूर्तरूप। तदनन्तर कृष्णाश्व अपन लग सहस्र वर्ष आ ताहूसँ अधिक काल रहल शिष्य, कुशवंशी विश्वामित्रकेँ एहि अस्त्रसभक मन्त्रक सम्पूर्ण गूढ़ विद्या प्रदान कएलनि। ओ भगवाने हमरा प्रदान कएलनि। ई पूर्व परम्परा छल। पूछि सकैत छी—कुमार महोदय धरि ई परम्परा कोना पहुँचल? लव: अस्त्रसभ स्वतः हमरा दुनूक सोझाँ प्रकट भेल। राम: (विचार करैत) ई सम्भव किएक नहि हो? पूर्वजन्मक असाधारण पुण्यक परिपाकसँ एहन कोनो सामर्थ्य उत्पन्न भए सकैत अछि... मुदा अहाँ द्विवचनक प्रयोग किएक कएलहुँ? लव: हम दुनू भाइ छी—जुड़वाँ। राम: तखन दोसर कतय छथि? नेपथ्यमे: भाण्डायन! भाण्डायन! षष्ठ अङ्क : कुमारसभक अभिज्ञान प्रिय मित्र, की अहाँ कहैत छी जे राजाक सैनिकसभ लव—ओ चिरञ्जीवी होथि—पर एतेक निर्मम आक्रमण कएने अछि? तखन ‘राजा’ नामक सूर्यसदृश पदवी संसारसँ अस्त भऽ जाएत, आ क्षत्रियास्त्रक अग्नि शीघ्र बुझि जाएत। राम: आब ई के अछि, जकर वर्ण नीलमणि सन साँवर, आ जकर स्वर सुनि हमर देहमे तहिना रोमाञ्च उठैत अछि जेना नव कारी मेघक मन्द गर्जन आरम्भ होइतहि कदम्बमे कली फूटि उठैत अछि? लव: ई हमर जेठ भाइ कुश छथि, भरतक आश्रमसँ घुरि रहल छथि। राम: (कौतूहलसँ) बच्चा, अपन भाइकेँ—ओ चिरञ्जीवी होथि— बजाउ। लव: अवश्य। ओ चलैत अछि। कुशक प्रवेश। कुश: (क्रोध, जिज्ञासा, उत्सुकता आ दृढ़तासँ धनुष टंकारैत) षष्ठ अङ्क : कुमारसभक अभिज्ञानविवस्वान्-पुत्र मनुक कालसँ ई सूर्यवंशीस्वयं इन्द्रकेँ अभयदान दैत अयलाह,आ अभिमानीकेँ जराबऽ लेल अपन क्षत्रियशक्तिकप्रचण्ड अग्नि प्रज्वलित करैत रहलाह।जँ आइ हमरा एहि सूर्यवंशक राजासँ युद्धक अवसर भेटय,तँ हमर धनुष कतेक धन्य होयत—जकर प्रत्यञ्चा हमर चमकैत दिव्यास्त्रकभयङ्कर ज्बलामे अभिषिक्त होयत। ओ लम्बा डेग भरैत चलैत अछि। राम: एहि क्षत्रिय बालकमे कतेक विलक्षण पुरुषार्थ अछि! ओकर दृष्टि कहैत अछि जे ब्रह्माण्डक कोनो प्राणीक ओ तिनका भरियो परवाह नहि करैत; प्रचण्ड वेगसँ चलैत आ धरतीकेँ स्वयं नमा दैत अछि। एखनो तरुण होइतो ओकर भीतर पर्वत सन गम्भीर भार अछि। ई वीररस लग आबि रहल अछि, वा साक्षात् दर्प देह धारण कएने? लव: (लग अबैत) हमर जेठ भाइक जय हो। कुश: बच्चा—चिरञ्जीवी होउ—ई युद्धक समाचार की अछि? लव: किछु नहि। भाइ, एहि पुरुषक सोझाँ अपन अभिमान निगलि विनयपूर्ण आचरण करू। कुश: किएक? षष्ठ अङ्क : कुमारसभक अभिज्ञान लव: ओतय ठाढ़ पुरुष स्वयं रघुपति छथि। ओ हमरा दुनूपर स्नेह रखैत छथि आ अहाँकेँ अपन सोझाँ देखबाक लेल उत्सुक छथि। कुश: (विचारपूर्वक) की ई ‘रामायण’ कथाक नायक आ ब्रह्मकोषक रक्षक नहि छथि? लव: निश्चय सैह। कुश: ओ महापुरुष छथि; हुनकर दर्शन पवित्र आ श्रद्धापूर्वक वाञ्छनीय अछि। मुदा हम बुझि नहि पाबि रहल छी जे हुनकर लग कोना जाई। लव: जेना माता-पिताक लग जाओल जाइत अछि। कुश: संसारमे एना किएक होयबाक चाही? लव: उर्मिला-पुत्र चन्द्रकेतु अत्यन्त उदार व्यक्ति छथि; ओ हमरा मित्र मानि ‘प्रिय सखा’ कहैत छथि। हुनकासँ एहि सम्बन्धक कारण एतय उपस्थित राजर्षि हमरा सभक धर्मतः पिता भऽ गेल छथि। कुश: तखन राजपुरुष होइतो हुनका प्रणाम कएलापर हमरा सभपर कोनो दोष नहि लागत। दुनू चलैत छथि। लव: भाइ, महापुरुषक दर्शन करू। हुनकर समस्त अलौकिक कर्मक वैभव हुनकर गम्भीर आ तेजस्वी आचरणमे पढ़ल जा सकैत अछि। कुश: (देखैत) षष्ठ अङ्क : कुमारसभक अभिज्ञान अहा, हुनकर देह शान्ति निःश्वसित करैत अछि, हुनकर तेज पवित्र करनिहार अछि। ‘रामायण’क कवि देवी वाणीकेँ रूपान्तरित कएलनि—ई कतेक उचित अछि! (लग अबैत) पिता, प्रचेतस-पुत्रक शिष्य कुश अहाँकेँ प्रणाम करैत अछि। राम: हमरा लग आउ, अवश्य आउ—चिरञ्जीवी होउ। अहाँक देह अमृतजलसँ भरल मेघ सन कोमल अछि, आ ई व्यक्ति पितृस्नेहसँ अहाँकेँ आलिङ्गन करबाक आकाङ्क्षा रखैत अछि। (आलिङ्गन करैत; अपना मोने) मुदा ई बालक— मानू स्नेहक कारण हमर देहक सार अङ्ग-अङ्गसँ बहि कऽ बाहर ठाढ़ हो; मानू हमर चेतना, मूल तत्त्व, हमरासँ बाहर मूर्त रूपमे प्रकट हो— आनन्दक एहि गहन भावसँ काँपल हमर हृदयक प्रवाहमे ओ किएक भीजि रहल अछि, आ जखन हम ओकर अङ्गकेँ आलिङ्गन करैत छी, तखन अमृतमय रसक सच्चा बाढ़सँ हमरा फेर किएक भिजा दैत अछि? लव: पिता, धूप हमर कपार जरा रहल अछि। की पिता एतय शालवृक्षक छाहरिमे क्षणभर बैसि सकैत छथि? राम: हमर बच्चाक जे इच्छा। चलैत सभ उचित क्रममे बैसैत छथि। षष्ठ अङ्क : कुमारसभक अभिज्ञान राम: (अपना मोने) अहा, विनयशील होइतो हुनकर चलब, ठाढ़ होयब आ बैसबक ढङ्ग संकेत करैत अछि जे कुश आ लव दुनू भविष्यक सम्राट छथि। देहमे निहित राजकीय गरिमा प्रत्येक अङ्गक मनोहर सौन्दर्य बढ़बैत अछि, जेना किरण निष्कलङ्क चन्द्रमाकेँ, वा रसबिन्दु पूर्ण विकसित कमलकेँ। आ आरो संकेत देखैत छी जे ई दुनू रघुवंशक कुमार छथि— पूर्णवयस्क कपोतक कण्ठ सन श्यामल देह, वृषभक काँध सन ढलुआ काँध, विश्रामरत सिंह सन स्थिर दृष्टि, उत्सवक नगाड़ा सन गम्भीर आ समृद्ध स्वर। (ध्यानसँ देखैत) केवल हमर कुलक रूप नहि, दुनू कुमारक प्रत्येक अङ्ग स्पष्टतः जनकक पुत्रीसँ सेहो मिलैत अछि—सूक्ष्म निरीक्षणसँ एकर अनुमान सहज अछि। मानू हमर प्रियाक मुख फेर दृष्टिगोचर भऽ गेल, नवीनतम कमल सन सुन्दर। निर्दोष श्वेत दाँतक चमकसँ सुन्दर ओही मुख, ओही मनोहर कान; आ आँखि लाल-कृष्ण होइतो ओही सुन्दर स्वभावक छाप। षष्ठ अङ्क : कुमारसभक अभिज्ञान (विचार करैत) ई सैह वन अछि, जतय प्रचेतस-पुत्र निवास करैत छथि, आ जतय महारानीकेँ छोड़ल गेल छल—एना सुनने छी। फेर हुनकर रूप, आयु आ तेज। हमरा ई बात सेहो चकित करैत अछि जे दिव्यास्त्र स्वयं प्रकट भेल—की चित्रदर्शनक अवसरपर अस्त्रसभकेँ देल हमर आदेश फलित भेल? कारण सुनने छी जे प्राचीन महापुरुष धरि परम्परागत दीक्षाक बिना अस्त्र प्राप्त नहि कऽ सकैत छलाह। फेर हमर हृदयमे एक्कहि संग उमड़ैत ई असीम आनन्द आ दुःख हमर डगमग आत्माकेँ विश्वास दैत अछि। आ सभसँ बढ़ि कऽ, हमरा ज्ञात छल जे महारानीक गर्भमे जुड़वाँ छल। (अश्रुपूर्ण) बहुत पहिने जखन परिचय खिलल आ हमर स्नेह बढ़ि दृढ़ होमऽ लागल, आ ओ एकान्तमे अधिक निश्चिन्त भेलीह, यद्यपि सहज लज्जासँ दृष्टि संयत रहैत छलनि, तखन हथेलीसँ स्पर्श करबाक विधिसँ गर्भक गाँठि दू अछि—ई सभसँ पहिने हमे बुझलहुँ; ओ स्वयं किछु दिनक बाद जानलनि। (कनैत) की कोनो प्रकारेँ हुनका सभसँ पूछी? लव: पिता, की भेल? ई अश्रुवृष्टि अहाँक मुखकेँ— जे संसारक कल्याणक स्रोत अछि— प्रातःकालीन ओससँ भीजल कुमुदिनी सन बना देलक। षष्ठ अङ्क : कुमारसभक अभिज्ञान कुश: अरे बच्चा, महारानी सीताक बिना रघुपतिक लेल कोन वस्तु दुःखक स्रोत नहि? कहल जाइत अछि जे प्रियाक वियोगमे समस्त संसार वन भऽ जाइत अछि। हुनकर स्नेह एहन छल, आ ई वियोग अनन्त... ‘रामायण’सँ अनभिज्ञ जकाँ अहाँ एहन प्रश्न कोना पूछैत छी? राम: (अपना मोने) हाय, ई बोलबाक ढङ्ग देखबैत अछि जे ई सभ केवल बाहरी दर्शक छथि। तखन नहि पूछब। हे मूर्ख हृदय, अचानक अहाँमे ई उन्मत्त परिवर्तन किएक? हम अपन हृदयक आघात एतेक प्रकट कऽ दैत छी जे बालक धरि हमरा पर दया करय। खैर, विषय बदलनाइ उचित होयत। (प्रकट) बच्चा सभ, भगवान् वाल्मीकिक माध्यमसँ देवी वाणी सरस्वतीक पवित्र प्रवाह रूपमे एक ‘रामायण’क चर्चा सुनल अछि—सूर्यवंशक स्तुति। ओकर किछु अंश सुनबाक हमरा बहुत जिज्ञासा अछि। कुश: हम सभ सम्पूर्ण रचनाक अभ्यास कएने छी। एखनहि ‘बालकाण्ड’क अन्तिम अध्याय सँ दू श्लोक मोन पड़ि रहल अछि। राम: सुनाउ बच्चा। कुश: महान् रामकेँ सीता स्वभावतः प्रिय छलीह, मुदा अपन समस्त गुणसँ ओ स्नेह आरो बढ़ा देलनि। षष्ठ अङ्क : कुमारसभक अभिज्ञान ओहिना राम सीताकेँ प्राणसँ अधिक प्रिय छलाह। दुनूक हृदय अपन पारस्परिक स्नेहक सीमा भलीभाँति जनैत छल। राम: कतेक भयावह! हमर हृदयक कोमल मर्मपर एकटा आरो निर्मम प्रहार। हे महारानी, वास्तवमे ठीक एहने छल। हाय जीवनक व्यवहार—असङ्गत, उलट-पुलट घटना, रसहीन, विफल प्रेममे समाप्त होइत, केवल दग्ध पीड़ा देनिहार! ओहन आनन्द फेर कतय भेटत, आ ओकरा बढ़ौनिहार ओ पूर्ण विश्वास; एक-दोसरक लेल ओ चिन्ता, आश्चर्यक ओ गहींर बहैत रस; दुःख आ आनन्द दुनूमे दू हृदयक ओ एकरूपता? तइयो हमर ई पापी प्राणवायु अटकल अछि, जाइ नहि रहल। अहा, कतेक भयावह! ओ सभ हमरा ओहि एकमात्र अत्यन्त पीड़ादायक समयक स्मरण करा देलक, जखन एक्कहि संग हमर प्रियाक असंख्य गुण प्रकट छल: षष्ठ अङ्क : कुमारसभक अभिज्ञान जखन बालिकाक कली-सदृश स्तन नव अंकुरित भेल छल, आ किछुए दिनमे कनेक आरो विकसित भऽ गेल छल; जखन यौवन, प्रेम आ कौतूहलक संयुक्त प्रभावसँ गहन भेल कामभाव ओकर हृदयमे साहसी, मुदा देहपर लज्जाशील छल। लव: तखन ई श्लोक सुनू, जे रघुपति चित्रकूट पर्वतक लग मन्दाकिनी वनमे विश्राम करैत समय सीतासँ कहने छलाह— मानू सोझाँक शिलापट्ट केवल अहाँक लेल राखल गेल हो, आ केसरवृक्ष ओकर चारू दिस पुष्पवृष्टि कऽ रहल हो। राम: (लज्जित मुस्की, स्नेह आ करुणासँ) बालक कतेक अद्भुत निष्कपट होइत अछि—विशेषतः वनमे पलल-बढ़ल। हे महारानी, ओहि अवसरक हमर अन्तरङ्ग वार्तालाप अहाँकेँ मोन अछि? ई कतेक भयावह अछि! मनक आँखिसँ हम अहाँक मुख देखैत छी— कपार चन्द्रमा सन उज्ज्वल, मन्दाकिनीक मन्द पवनमे केश उड़ैत, पसीनाक बिन्दुसँ शीतल; केसर-तिलक रहित, खिलल कपोल, आ अत्यन्त मनोहर कान कुण्डल नहि रहिते आरो सुन्दर। षष्ठ अङ्क : कुमारसभक अभिज्ञान (स्तब्ध जकाँ ठाढ़; करुणासँ) हे दैव! प्रियजन वियोगमे रहितो किछु सान्त्वना अवश्य दैत छथि, कारण निरन्तर गहन चिन्तनसँ हम हुनका अपन आँखिक सोझाँ रचि लैत छी। मुदा जखन ई उपायो छीनि लेल जाइत अछि, तखन संसार निर्जन वन भऽ जाइत अछि, आ हृदय भूसीक मन्द अग्निपर पकैत जकाँ अनुभव करैत अछि। नेपथ्यमे: वसिष्ठ, वाल्मीकि, दशरथक महारानीसभ, जनक आ अरुन्धती—बालकसभक युद्धक समाचार सुनि भयभीत— अन्ततः आबि रहल छथि। वृद्धावस्था हुनकर पएर जकड़ने अछि, आ आश्रम दूर अछि; मुदा थाकनिसँ देह मन्द होइतो हुनकर मन आगाँ दौड़ि रहल अछि। राम: की अरुन्धती, वसिष्ठ, हमर मातासभ आ जनक एतय छथि? हुनकर दर्शनक विचारो असह्य अछि। (करुणासँ देखैत) हाय, पिता जनक स्वयं एही दिस आबि रहल छथि—मानू हमरा अभागलपर खसबाक लेल वज्र। षष्ठ अङ्क : कुमारसभक अभिज्ञान जखन एक बेर अपन सन्तानक विवाहोत्सवमे हमर दुनू पिता वसिष्ठादिक उपस्थितिमे भेटल छलाह, आ सम्बन्धक योग्यता देखि आनन्दित भेल छलाह; आइ एतेक विनाश भेलापर हम पिताक एहन मित्रकेँ कोना देखी आ सहस्र टुकड़ामे नहि टूटि जाई? मुदा फेर, रामक लेल कोन काज अत्यधिक कठिन अछि? नेपथ्यमे: हाय, रघुपतिक दर्शन करिते—जिनकर सौन्दर्य आब केवल तेजमे सुरक्षित अछि—हुनकर मातासभ, मूर्च्छित जनककेँ होशमे आनबाक प्रयाससँ पहिनेसँ व्याकुल, स्वयं मूर्च्छित भए गेल छथि। राम: हे पिता, हे मातासभ, हम सन पापीपर दया व्यर्थ नहि करू—हम ओहि स्त्रीपर दया नहि कएलहुँ जे जनक आ रघुवंशक समस्त सौभाग्य छलीह। हमरा जा कऽ प्रणाम करबाक चाही। (उठैत) कुश आ लव: एही दिस, पिता। करुणासँ अभिभूत सभ चलैत प्रस्थान करैत छथि। षष्ठ अङ्क समाप्त सप्तम अङ्क पुनर्मिलन लक्ष्मणक प्रवेश। लक्ष्मण: अहा! की वाल्मीकि अपन तपःशक्तिसँ समस्त जीव-जगतकेँ एकत्र कऽ देलनि—समस्त मर्त्य-अमर्त्य, देव-दानव, पुरुष, स्त्री, पशु, आ अन्तरिक्षक चल-अचल प्राणी—आ हमरा सभक संग समस्त ब्राह्मण, क्षत्रिय, नगरवासी आ ग्रामीण जनकेँ सेहो बजा लेलनि? हमर जेठ भाइ हमरा सेहो आज्ञा देने छथि—“प्रिय लक्ष्मण, वाल्मीकि हमरा सभकेँ अप्सरासभ द्वारा हुनकर नाट्यरचनाक अभिनय देखबाक निमन्त्रण देने छथि। तें गङ्गातटपर रंगशालामे जाउ आ दर्शकसभ उचित स्थानपर बैसल छथि कि नहि, से देखू।” हम मर्त्य-अमर्त्य सभक लेल उपयुक्त आसन-व्यवस्था कऽ चुकल छी। आ देखू— वाल्मीकिक आदरसँ हमर जेठ भाइ एही दिस आबि रहल छथि; ओ एखनो राजा छथि, तइयो कठोर तपस्वी-व्रत धारण कएने छथि। रामक प्रवेश। राम: प्रिय भाइ लक्ष्मण, नाट्य-मर्मज्ञ सभ अपन स्थानपर छथि? लक्ष्मण: अवश्य। राम: एहि दुनू बालक कुश आ लवकेँ कुमार चन्द्रकेतु जकाँ सम्मानित आसन देल जाय। सप्तम अङ्क : पुनर्मिलन लक्ष्मण: प्रभुक हुनका सभप्रतिक स्नेह जानि हम एना कऽ चुकल छी। एतय राजकीय मण्डप तैयार अछि। ओ बैसैत छथि। राम: प्रदर्शन आरम्भ हो। सूत्रधार: सत्यकेँ जेनाक तेना कहनिहार प्रचेतस-पुत्र एतय उपस्थितचल-अचल समस्त प्राणीसँ ई निवेदन करैत छथि—“ऋषिदृष्टिसँसम्भव गहन अन्तर्दृष्टिक माध्यमसँ हम एक संक्षिप्त रचनाप्रस्तुत कएने छी, जे एक्कहि संग पवित्र करनिहार आ रसपूर्णअछि—करुण आ अद्भुत रससँ भरल। विषयक गम्भीरता देखैत कृपा कऽ एकाग्र ध्यान दी।” राम: हुनकर अभिप्राय ई अछि जे ऋषि धर्मक प्रत्यक्ष दर्शन करैत छथि। भगवान् ऋषिसभक अन्तर्दृष्टि “सत्यवह”, असत्यक धूलिसँ परे, कखनो खण्डित नहि होइत—तें ओकरा कखनो सन्देहक दृष्टिसँ नहि देखबाक चाही। नेपथ्यमे: हे हमर पति, हे कुमार लक्ष्मण! हम वनमे एकसरि आ निराश्रय छी; प्रसव-पीड़ा आरम्भ भऽ गेल अछि, आ भयावह वन्य पशु हमरा भक्षण करबाक लेल आतुर अछि। अभागल हमरे लग मन्दाकिनीमे कूदि पड़बाक अतिरिक्त कोनो उपाय नहि। लक्ष्मण: (अपना मोने) ई कतेक भयावह स्थिति अछि—हम जे सोचने रही ताहूसँ बहुत बेसी। सप्तम अङ्क : पुनर्मिलन सूत्रधार: सर्वधारिणी पृथ्वीक पुत्री, राजाद्वारा महावनमे परित्यक्त महारानी, प्रसव-पीड़ा आरम्भ होइतहि देवी गङ्गामे कूदि पड़ैत छथि। प्रस्थान। राम: (स्तब्ध) हे महारानी, हे महारानी, देखू—लक्ष्मण एतय अछि! लक्ष्मण: मुदा भाइ, ई केवल नाटक अछि। राम: हे महारानी, दण्डकारण्यक हमर प्रिय सहचरी! रामक कारण अहाँपर ई विपत्ति आयल। लक्ष्मण: भाइ, कथा देखैत रही। राम: हम अपन हृदय कठोर कऽ लेने छी; तैयार छी। अचेत-जकाँ सीताक प्रवेश; पृथ्वी आ गङ्गा हुनका सहारा देने छथि, आ दुनू सीताक एक-एक पुत्र कोरामे लेने छथि। राम: प्रिय भाइ, हम एहन अन्धकारलोकमे प्रवेश कऽ रहल छी जतय ने कारण देखाइत अछि ने उपचार। हमरा थामू! दुनू देवी: सुन्दरी वैदेही, अपनाकेँ सम्हारू; सौभाग्यसँ अहाँ सफल भेलीह: नदीमे अहाँ दू पुत्रकेँ जन्म देलहुँ, जे रघुवंशकेँ धारण करत। सप्तम अङ्क : पुनर्मिलन सीता: (अपनाकेँ सम्हारि) सौभाग्य जे हम पुत्रसभकेँ जन्म देलहुँ... हे हमर पति! (मूर्च्छित भए पड़ैत छथि) लक्ष्मण: (रामक चरणमे खसैत) भाइ, प्रिय भाइ, कतेक सौभाग्य जे हमरा सभक प्रयोजन सिद्ध भेल! रघुवंशक वृक्षमे एकटा भव्य नव शाखा फूटल अछि। (देखैत) अहा, भाइ स्तब्ध छथि, अश्रुक उमड़ैत बाढ़सँ अभिभूत। (पंखा झलैत) दुनू देवी: बच्ची, अपनाकेँ सम्हारू—हमर विनती अछि। सीता: (होशमे अबैत) भगवती, अहाँ के छी? आ अहाँ? पृथ्वी: ई भागीरथी छथि, अहाँक ससुरक कुलदेवी। सीता: भगवती, अहाँकेँ प्रणाम। भागीरथी: अहाँक पतिव्रतधर्मक अनुरूप पूर्ण सौभाग्य प्राप्त हो। लक्ष्मण: हमरा सभपर महान् कृपा भेल। भागीरथी: आ ई अहाँक माता, भगवती पृथ्वी छथि। सीता: हाय माँ, अहाँ हमरा एहि दशामे देखि रहल छी! पृथ्वी: आउ बच्ची, आउ हमर छोट बेटी। (सीताकेँ आलिङ्गनमे लेने मूर्च्छित भए पड़ैत छथि) लक्ष्मण: (उत्तेजित) अहा, पृथ्वी आ गङ्गा दुनू भौजीक सहायता लेल आबि गेल छथि। सप्तम अङ्क : पुनर्मिलन राम: (देखैत) ई निश्चय सौभाग्यक बात अछि—मुदा गहन करुणाक स्रोत सेहो। भागीरथी: सर्वधारिणी पृथ्वी सेहो काँपि सकैत छथि—सन्तानक प्रेम कतेक शक्तिशाली होइत अछि! मुदा ई सभमे समान अछि: मोहक गाँठि, प्रत्येक चेतन प्राणीक भीतर अशान्तिक स्रोत, सांसारिक जीवनक साक्षात् सूत्र। बच्ची वैदेही, देवी पृथ्वी, कृपा कऽ अपनाकेँ सम्हारू। पृथ्वी: (होशमे अबैत) देवी, सीताकेँ जन्म देनिहार हम कोना सम्हारी? राक्षससभक बीच हुनकर दीर्घ निवास एक बात छल, आ परित्याग—ओ घोर अपमान—दोसर। भागीरथी: जखन भाग्य फल देबाक समीप हो, तखन ओकर द्वार बन्द करबाक सामर्थ्य कोन प्राणीमे अछि? पृथ्वी: ठीक कहलहुँ। मुदा प्रिय रामक लेल ई उचित छल? बाल्यकालमे स्वयं बालक रहैत जे हाथ पकड़ने छलाह, तकर कोनो मान नहि; न हमर, न जनकक, न अग्निक, न हुनकर विनयक, न अपन सन्तानक। सीता: हे हमर पति, ई सभ हमरा फेर अहाँक स्मरण करा देलक। पृथ्वी: अरे! अहाँक पति सेहो छथि? सीता: (लज्जाश्रुसहित) माँ जे कहैत छथि, सैह सत्य अछि। सप्तम अङ्क : पुनर्मिलन राम: माता पृथ्वी, अहाँ जाहि पुरुषक वर्णन करैत छी, सैह हम छी। भागीरथी: हे पृथ्वी, अहाँ समस्त मर्त्य जीवनक देह छी। तखन सर्वथा अनभिज्ञ जकाँ अपन जमायपर कोना क्रुद्ध भऽ सकैत छी? भयावह अपयश दूर-दूर धरि पसरल छल, आ पवित्र करनिहार अग्निपरीक्षा लङ्कामे भेल— एतयक लोक ओकर विश्वास कोना करितथि? इक्ष्वाकुवंशक पैतृक सम्पदा समस्त संसारकेँ प्रसन्न राखब अछि। तखन एहि संकटमे—सचमुच भयावह संकटमे— हमर बच्चा की करिताह? लक्ष्मण: देवीक अन्तर्ज्योति समस्त प्राणीमे निर्बाध चमकैत अछि। भागीरथी: तइयो हम हाथ जोड़ि अहाँकेँ प्रणाम करैत छी। राम: माता, अहाँ भागीरथ केर वंशपर सेहो कृपा कएने छी। पृथ्वी: हम सदिखन अहाँ सभपर कृपालु रहल छी। आरम्भमे असह्य भेल प्रेमजनित व्यथा मात्र छल; एना नहि जे हम प्रिय रामक सीताप्रतिक प्रेम नहि बुझैत रही। ज्वलन्त हृदयसहित भाग्यवश हुनका सीताकेँ छोड़ए पड़ल, आ आइ ओ केवल कोनो अलौकिक साहस आ अपन प्रजाक पुण्यक कारण जीवित छथि। सप्तम अङ्क : पुनर्मिलन राम: वृद्धजन जाहि सभकेँ अपन सन्तान मानैत छथि, हुनका सभपर कतेक गहन करुणा रखैत छथि! सीता: (कनैत; हाथ जोड़ि) माँ, हमरा अपन लग लिअ आ अपन देहमे विलीन कऽ लिअ। राम: ओ एहिसँ अधिक आरो की माँगि सकैत छथि? भागीरथी: ईश्वर नहि करथि! एहन विलय होयबासँ पहिने अहाँ सहस्र वर्ष जीवित रहू। पृथ्वी: बच्ची, अहाँक दुनू छोट पुत्रक देखभाल करबाक अछि। सीता: हमर कोनो रक्षक नहि; हम हुनका सभक की करी? भागीरथी: जखन वास्तवमे अहाँ निराश्रय नहि छी, तखन एना कोना कहि सकैत छी? सीता: अभागल हमरा कोन प्रकारक रक्षक अछि? राम: हे हृदय, अहाँ शीतल इस्पात छी। दुनू देवी: संसारक सौभाग्यक स्रोत होइतो अहाँ अपनहि तिरस्कार कोना कऽ सकैत छी? अहाँसँ सम्बन्धक कारणेँ हमर अपन पवित्रता बढ़ैत अछि। सप्तम अङ्क : पुनर्मिलन लक्ष्मण: भाइ, सुनलहुँ? राम: समस्त संसार सुनय। नेपथ्यमे कोलाहल। राम: एखन आरो अद्भुत घटना होमऽ जा रहल अछि। सीता: समस्त आकाश ज्बलासँ कोना घेरि गेल? दुनू देवी: हम सभ बुझैत छी— जिनकर गुरु-परम्परा कृष्णाश्व, कौशिक आ राम रहल, ओ दिव्यास्त्र आ जृम्भकास्त्र आब स्वयं प्रकट भऽ रहल छथि। नेपथ्यमे: महारानी सीता, अहाँकेँ प्रणाम। चित्रदर्शनक समय रघुवंशक आनन्द जेना घोषणा कएने छल, आब हमर नियति अहाँक पुत्रसभक संग अछि। सीता: कतेक सौभाग्य—अस्त्रदेवता! हे हमर पति, अहाँक कृपाकर्म आइयो प्रकट भऽ रहल अछि। लक्ष्मण: भाइ हुनका कहने छलाह—“आबसँ ई अस्त्रसभ बिना चूक अहाँक सन्तानक सेवा करत।” सप्तम अङ्क : पुनर्मिलन दुनू देवी: हे परम अस्त्रसभ, अहाँकेँ प्रणाम। अहाँ हमरा सभपर कृपा कएलहुँ—हम धन्य छी। जखन ई बालकसभ मनसँ अहाँक स्मरण करथि, तखन कृपा कऽ हुनकर सेवामे उपस्थित होउ। राम: करुणाक तरङ्ग उमड़ि उठल अछि, आश्चर्य आ आनन्दक सरोवरमे टूटि रहल अछि, आ हमरा एहन अवस्थामे पहुँचा देलक जकर वर्णन असम्भव अछि। दुनू देवी: आनन्द करू बच्ची, अहाँक दुनू छोट पुत्र आब प्रिय रामक समकक्ष भऽ गेल। सीता: भगवती, हुनका सभक क्षत्रियोचित संस्कार के सम्पन्न करत? राम: हाय, सीता स्वयं—वसिष्ठ पुरोहितसभ द्वारा सदा सुरक्षित रघुवंशक शक्ति—अपन पुत्रसभक संस्कार करनिहार केओ नहि पाबि रहल छथि। भागीरथी: पुत्री, एहि विषयमे चिन्ता नहि करू। दुनू बालकक दूध छुटलाक बाद हम हुनका सभकेँ वाल्मीकिक संरक्षणमे दऽ देब, आ ओ हुनकर क्षत्रिय-संस्कार सम्पन्न करताह। प्रचेतस-पुत्र रघु आ जनक दुनू वंशक लेल वसिष्ठ आ अङ्गिरस ऋषिसँ कम गुरु नहि छथि। सप्तम अङ्क : पुनर्मिलन राम: भागीरथी प्रत्येक बात अत्यन्त सावधानीसँ विचारि लेने छथि। लक्ष्मण: भाइ, हम सत्य कहैत छी—अनेक कारणसँ हमरा पूर्ण विश्वास अछि जे ओ दुनू बालक कुश आ लव छथि: ओहो सभ जन्मसँ अस्त्रपर अधिकार रखैत छथि, दुनू कुमार प्रचेतस-पुत्र महर्षिसँ संस्कार पओने छथि, आ दुनूक आयु बारह वर्ष अछि। राम: प्रिय भाइ, ई विचार मात्र हमर हृदयमे उथल-पुथल मचा रहल अछि आ हमरा विक्षिप्त कऽ रहल अछि। पृथ्वी: बच्ची, आब हमर संग आउ आ पाताललोककेँ पवित्र करू। सीता: माँ, हमरा अपन लग लिअ आ अपन देहमे विलीन कऽ लिअ। हम संसारक ई उतार-चढ़ाव आब सहन नहि कऽ सकैत छी। राम: ओ की उत्तर देतीह? पृथ्वी: बच्ची, हमर आज्ञा मानू आ अपन दुनू पुत्रक दूध छुटबा धरि प्रतीक्षा करू। तकर बाद जे अहाँक इच्छा। भागीरथी: एहिना हो। गङ्गा, पृथ्वी आ सीताक प्रस्थान। राम: की वैदेहीक विलय भऽ गेल? हे महारानी, दण्डकारण्यमे हमर प्रिय सहचरी, हे सद्गुणक देवी, की अहाँ परलोक जाइबाक निश्चय कऽ लेलहुँ? (मूर्च्छित भए पड़ैत छथि) सप्तम अङ्क : पुनर्मिलन लक्ष्मण: वाल्मीकि, रक्षा करू! की अहाँक काव्यक निष्कर्ष एतबे अछि? नेपथ्यमे: वाद्यवृन्द रोकू। हे समस्त मर्त्य जीव, चल-अचल प्राणीसभ! वाल्मीकि द्वारा प्रदान पवित्र चमत्कारक दर्शन करू। लक्ष्मण: (देखैत) गङ्गाक जल मानू मथल जा रहल अछि, आकाश दिव्य ऋषिसभसँ भरल अछि। चमत्कार! सीता आ देवीसभ—गङ्गा आ पृथ्वी— गहिराइ सँ बाहर आबि रहल छथि। नेपथ्यमे: जगत्पूजिता अरुन्धती, हम गङ्गा आ पृथ्वीपर कृपादृष्टि करू। हम सीताकेँ अहाँक संरक्षणमे सौंपैत छी— पवित्र व्रत पालन करनिहार आदर्श पत्नी। लक्ष्मण: कतेक सौभाग्य, कतेक चमत्कार! भाइ, देखू, देखू। (देखैत)... हाय, भाइ एखन धरि होशमे नहि अयलाह। अरुन्धती आ सीताक प्रवेश। अरुन्धती: बच्ची, अहाँक ई लज्जा अनावश्यक अछि; एकरा छोड़ू। शीघ्र आउ आ अपन प्रिय हाथक स्पर्शसँ हमर बच्चा रामकेँ होशमे आनू। सप्तम अङ्क : पुनर्मिलन सीता: (भयभीत भए स्पर्श करैत) हे हमर पति, कृपा कऽ अपनाकेँ सम्हारू। राम: (होशमे अबैत; आनन्दसँ) अहा, ई की? (देखैत; आनन्द आ विस्मयसँ) महारानी! (लज्जित) आ माता अरुन्धती, हमर समस्त वृद्धजन, आनन्दित ऋष्यशृङ्ग आ शान्तासहित। अरुन्धती: बच्चा, ओतय भागीरथवंशक देवी, कृपामयी गङ्गा छथि। नेपथ्यमे: हे जगत्पति, प्रिय राम, चित्रदर्शनक समय हमरा जे निवेदन कएने छलहुँ, से स्मरण करू—“अपन पुतोहु सीतापर अरुन्धती जकाँ कृपालु रहू।” आब हम ओ ऋणसँ मुक्त छी। अरुन्धती: आ ओतय अहाँक सासु, पृथ्वी छथि। नेपथ्यमे: वर्षसभ पहिने सीताकेँ परित्याग करैत समय अहाँ निवेदन कएने छलहुँ—अहाँ चिरञ्जीवी होउ—“हे पृथ्वी, अपन आदरणीय पुत्री जानकीक रक्षा करू।” महाराज, आइ हम अपन बच्चीक विषयमे ओ अनुरोध पूर्ण कऽ देलहुँ। राम: ई कोना सम्भव? राम घोर अपराधक दोषी होइतो ई दुनू भगवती हुनका पर दया कएने छथि। (प्रणाम करैत) अरुन्धती: हे नगर आ ग्रामक लोकसभ! एहि स्त्रीकेँ अरुन्धतीक संरक्षणमे सौंपल गेल अछि, आ जाह्नवी तथा पृथ्वी हुनकर प्रशंसाक वर्षा कएने छथि। पूर्वमे अग्निदेव वैश्वानर हुनकर सदाचारक प्रमाण देने छलाह। देव आ ब्राह्मण हुनका सावित्रीक कुलक स्त्री रूपमे स्तुति कएने छथि। यज्ञभूमिमे जन्मल महारानी सीताकेँ फेर स्वीकार करू। कहू सज्जनसभ, अहाँ सभक की मत? सप्तम अङ्क : पुनर्मिलन लक्ष्मण: अरुन्धती प्रजाकेँ कतेक कठोर फटकार लगौलनि! समस्त जीव-जगत भौजीकेँ प्रणाम कऽ रहल अछि, आ लोकपाल तथा सप्तर्षि पुष्पवृष्टिसँ हुनकर सेवा कऽ रहल छथि। अरुन्धती: हे जगत्पति, प्रिय राम— धर्मानुसार अपन प्रिय धर्मसहचरीकेँ— स्वर्ण-प्रतिमाक पवित्र मूलरूपकेँ— यज्ञसम्बन्धी कर्तव्य सौंपू। सीता: (अपना मोने) की हमर पति सीताक दुःख शान्त करब जनैत छथि? राम: भगवतीक जेना आज्ञा। लक्ष्मण: हमर उद्देश्य सिद्ध भेल। सीता: हमरा नव जीवन भेटल। लक्ष्मण: भौजी, ई निर्लज्ज लक्ष्मण अहाँक सोझाँ साष्टाङ्ग प्रणाम करैत अछि। सीता: बच्चा, अहाँ जेना छी, तहिना चिरञ्जीवी रहू। अरुन्धती: वाल्मीकि, कृपा कऽ सीताक गर्भसँ रामक जन्मल दुनू पुत्र कुश आ लवकेँ आगाँ आनू। (प्रस्थान) राम आ लक्ष्मण: कतेक सौभाग्य—सभ सत्य अछि! सीता: (अश्रुसँ अभिभूत) हमर दुनू छोट पुत्र कतय छथि? सप्तम अङ्क : पुनर्मिलन कुश आ लवक संग वाल्मीकिक प्रवेश। वाल्मीकि: प्रिय बच्चा कुश आ लव, ई रघुवंशक प्रभु अहाँक पिता छथि; ई लक्ष्मण अहाँक काका; आ महारानी सीता अहाँक माता। ई राजर्षि जनक अहाँक नाना छथि। सीता: (आनन्द, करुणा आ विस्मयसँ देखैत) की हमर पिता सेहो उपस्थित छथि? कुश आ लव: हे पिता! हे माता! हे नाना! राम: (आनन्दसँ आलिङ्गन करैत) निश्चय केवल पुण्यक कारण हम अहाँ दुनू बच्चाकेँ फेर पाबि सकलहुँ। सीता: आउ कुश, बच्चा; आ अहाँ सेहो लव। अपन माताकेँ दीर्घ आलिङ्गन दिअ—मानू ओ फेर जन्म लेने छथि। कुश आ लव: (एना करैत) हम सभ कतेक भाग्यवान् छी! सीता: भगवन्, हम अहाँकेँ प्रणाम करैत छी। वाल्मीकि: बच्ची, अहाँ जेना छी, तहिना चिरञ्जीवी रहू। नेपथ्यमे कोलाहल। वाल्मीकि: (उठि चारू दिस देखैत) लवणक उन्मूलन कऽ मथुरा क प्रभु आबि रहल छथि। लक्ष्मण: जखन शुभ घटना अबैत अछि, तँ बाढ़ जकाँ अबैत अछि। सप्तम अङ्क : पुनर्मिलन राम: ई सभ वास्तवमे हमरा संग भऽ रहल अछि, तइयो विश्वास नहि भऽ रहल अछि। मुदा सौभाग्यक स्वभावे एहने होइत अछि। वाल्मीकि: प्रिय राम, की हम अहाँक लेल आरो कोनो शुभ कार्य कऽ सकैत छी? राम: एहि सभसँ उत्तम आरो की भऽ सकैत अछि? तइयो सम्भवतः ई वरदान— ई कथा पापसँ पवित्र करनिहार, आ समस्त कल्याण उदारतासँ प्रदान करनिहार अछि; जगन्माता आ गङ्गा जकाँ एक्कहि संग मङ्गलमय आ मनोहर। विद्वान् लोक नाट्यरूपमे मूर्त एकर रसास्वादन करथि— भाषाक पवित्र रहस्यक मर्मज्ञ, अनुभवी कविक वाङ्मय-कला। सभक प्रस्थान। सप्तम अङ्क समाप्त। भवभूतिक नाटक “रामक अन्तिम अङ्क” समाप्त। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१८.गजेन्द्र ठाकुर-कादम्बरी पूर्व भाग [वाणभट्ट रचित] उत्तर भाग [वाणभट्टक पुत्र भूषण भट्ट रचित]- संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर कादम्बरी पूर्व भाग [वाणभट्ट रचित] सृष्टि, स्थिति आ संहारक कारण, रूप आ गुण—दुनू दृष्टिसँ त्रिविध, वस्तुसभक उत्पत्तिमे रजोगुण, स्थितिमे सत्त्वगुण आ विनाशमे तमोगुण प्रकट करनिहार अजन्मा परमात्माक जय हो। त्र्यम्बकक चरण-धूरिक जय हो, जकरा दानव बाण-क मुकुट स्नेहपूर्वक स्पर्श करैत अछि; ओहि धूरिक जय हो जे रावणक दसू मुकुट-मणिक मण्डलकेँ चुमैत अछि, देव आ दानवक अधिपतिसभक मस्तकपर विराजैत अछि आ हमर क्षणभङ्गुर जीवनक नाश करैत अछि। विष्णुक जय हो, जे दूरहि सँ प्रहार करबाक निश्चय कऽ, क्रोधसँ प्रज्वलित अपन नेत्रक एक क्षणक दृष्टिमात्रसँ शत्रुक वक्षस्थलकेँ एना रक्तरञ्जित कऽ देलनि मानू भयहि सँ अपने फाटि गेल हो। मुकुटधारी मौखरि नरेशसभ द्वारा पूजित भत्सु-क कमल-सदृश चरणमे हम प्रणाम करैत छी—ओ चरण, जकर ताम्रवर्ण अँगुरी पड़ोसी राजासभक जुटल मुकुटसँ बनल चरणपीठपर घसाइत रहैत अछि। अकारण शत्रुता रखनिहार, निर्दय दुष्टसँ के नहि डरैत अछि, जकर मुँहमे सहन करब कठिन निन्दा सर्पक विष जकाँ सदिखन तैयार रहैत अछि? दुष्ट लोक बेड़ी जकाँ कठोर झनकार करैत, गहींर घाव दैत आ दाग छोड़ि जाइत अछि; मुदा सज्जन रत्नजटित नूपुर जकाँ मधुर ध्वनिसँ सदिखन मनकेँ मोहित करैत अछि। दुष्ट मनुष्यमे कोमल वचन कण्ठसँ नीचाँ नहि उतरैत अछि, जहिना राहु द्वारा पील अमृत। सज्जन ओकरा निरन्तर हृदयमे धारण करैत अछि, जहिना हरि अपन निर्मल मणिकेँ। मनभावन वाणीक माधुर्यसँ कोमल कथा हृदयमे नूतन कौतूहलसँ भरल आनन्द उपजाबैत अछि; आ स्वाभाविक भावसँ ओ अपन स्वामीक अधिकारमे अपने आबि जाइत अछि, जहिना नववधू। नवीन भाषामे रचल, उपमासँ आलोकित आ दीप्तिमान शब्दरूपी दीपसभ सँ जगमग करैत, शब्दक अनेक विरोधाभास सँ गुँथल सुखद कथा—जहिना चम्पकक कोढ़ीसँ गुँथल चमेलीक माला—ककरा मोहित कऽ अपना वशमे नहि कऽ लैत अछि? एक समय वत्स्यायन वंशमे उत्पन्न कुबेर नामक एक ब्राह्मण छलाह। हुनकर सद्गुणक कीर्ति समस्त संसारमे गाओल जाइत छल; ओ सज्जनसभक अग्रणी छलाह। अनेक गुप्त नरेश हुनकर कमल-चरणक पूजा करैत छलाह, आ ओ साक्षात् ब्रह्माक अंश जकाँ लगैत छलाह। हुनकर मुखमे सरस्वती सदिखन निवास करैत छलीह; कारण, वेदक प्रभावसँ ओतय समस्त अशुभ शान्त भऽ गेल छल, यज्ञक पुरोडाशसँ हुनकर ओठ पवित्र छल, सोमरससँ तालु तिक्त छल, आ स्मृति तथा शास्त्रक ज्ञानसँ मुख मधुर छल। हुनकर घरमे यजुर्वेद आ सामवेदक मन्त्र दोहरबैत भयभीत बालकसभकेँ पिंजड़ामे पड़ल सुग्गा आ मैना प्रत्येक शब्दपर डाँटैत छल; कारण, ओ पक्षीसभ शब्दसम्बन्धी प्रत्येक विद्याक पूर्ण ज्ञाता छल। हुनकासँ द्विजसभक अधिपति अर्थपति जन्म लेलनि—जहिना ब्रह्माण्ड-अण्डसँ हिरण्यगर्भ, क्षीरसागरसँ चन्द्रमा अथवा विनतासँ गरुड़ उत्पन्न भेल छलाह। भोरमे दिन-प्रतिदिन जखन ओ अपन विस्तृत व्याख्यान खोलैत जाइत छलाह, तखन सुनबामे एकाग्र नव-नव शिष्यसमूह हुनका नव शोभा प्रदान करैत छल, मानू कानपर ताजा चन्दनक पल्लव सजल हो। विधिपूर्वक अर्पित दक्षिणासँ शोभित असंख्य यज्ञसभ, जकर मध्यभागमे प्रज्वलित महावीर-अग्नि छल आ जे यज्ञ-स्तम्भसभकेँ अपन हाथ जकाँ ऊपर उठा रखने छल—ओही हाथीसैनिक दल जकाँ सहायतासँ ओ सहजहि देवधाम जीत लेलनि। समय बीतलापर हुनका चित्रभानु नामक पुत्र प्राप्त भेलनि, जे श्रुति आ शास्त्रमे पारंगत अपन आन कुलीन आ यशस्वी पुत्रसभक बीच पर्वतसभमे कैलास जकाँ स्फटिकवत् उज्ज्वल छलाह। ओहि महात्माक गुण दूर-दूर धरि पसरल आ चन्द्रकलाक समान चमकैत छल, मुदा चन्द्रकलाक कलङ्कसँ रहित छल; ओ गुण नृसिंह-विष्णुक उगैत नख जकाँ हुनकर शत्रुसभक हृदयमे सेहो गहींर पैस गेल। अनेक यज्ञक श्याम धुआँ आकाश-देवीसभक ललाटपर केशक घुँघराली लट जकाँ उठैत छल, अथवा त्रयी-वेदरूपी वधूक कानपर तमालक कोमल पल्लव जकाँ शोभैत छल; आ एहि सँ हुनकर अपन कीर्ति आरो उज्ज्वल भऽ उठैत छल। हुनकासँ बाण नामक पुत्र जन्म लेलनि। सोमयज्ञक श्रमसँ हुनकर ललाटपर उठल स्वेद-बिन्दुकेँ सरस्वती अपन अञ्जलिबद्ध कमल-सदृश हाथसँ पोंछि देने छलीह, आ हुनकर यशक किरणसँ सातो लोक आलोकित भऽ उठल छल। ओही ब्राह्मण द्वारा—जिनकर मन, अनकहल वचनमे सेहो, अपन सहज जड़ताकेँ पूर्ण मूर्खताक अन्हारसँ आच्छादित रखने छल, आ जे तत्क्षण स्फुरित बुद्धिक माधुर्य कहियो नहि पाबि सकल छलाह—पूर्वक दुनू कथासँ श्रेष्ठ ई ‘कादम्बरी’ रचल गेल। बहुत पहिने शूद्रक नामक एक राजा छलाह। द्वितीय इन्द्र जकाँ सभ राजाक नमल मस्तक हुनकर आज्ञाकेँ सम्मान दैत छल; चारू समुद्रसँ घेरल पृथ्वीक ओ स्वामी छलाह; पड़ोसी नरेशसभक सेना हुनकर प्रतापक सम्मुख भक्तिपूर्वक नतमस्तक छल; हुनकामे चक्रवर्ती सम्राटक सभ लक्षण विद्यमान छल। विष्णु जकाँ हुनकर कमल-सदृश हाथपर शंख आ चक्रक चिह्न छल; शिव जकाँ ओ कामदेवकेँ जीतने छलाह; कार्तिकेय जकाँ पराक्रममे अजेय छलाह; ब्रह्मा जकाँ महान् राजासभक मण्डलकेँ विनीत कऽ देने छलाह; समुद्र जकाँ लक्ष्मीक उद्गम छलाह; गङ्गा-धार जकाँ धर्मात्मा राजा भगीरथक पथक अनुसरण करैत छलाह; सूर्य जकाँ प्रतिदिन नव तेजसँ उदित होइत छलाह; मेरु जकाँ हुनकर चरणक प्रभा समस्त संसार द्वारा पूजित छल; आ दिग्गज जकाँ ओ निरन्तर दानक धार बहबैत छलाह। ओ अद्भुत कार्यक कर्ता, यज्ञक अनुष्ठाता, धर्मक दर्पण, कलाक उद्गम आ सद्गुणक स्वाभाविक निवास छलाह; काव्यक अमृतमय माधुर्यक झरना, मित्रसभ लेल उदयाचल, आ शत्रुसभ लेल भयङ्कर धूमकेतु छलाह। ओ साहित्यिक सभाक संस्थापक, रसिकजनक आश्रय, अहङ्कारी धनुर्धरक तिरस्कर्ता, वीरसभक अग्रणी आ ज्ञानीसभक शिरोमणि छलाह। जहिना वैनतेय विनताकेँ आनन्द देने छलाह, तहिना ओ दीनजनकेँ हर्ष प्रदान करैत छलाह। जहिना पृथुराज श्रेष्ठ पर्वतसभकेँ उखाड़ने छलाह, तहिना ओ अपन धनुषक नोकसँ शत्रुक सीमा-पर्वत उखाड़ि दैत छलाह। ओ कृष्णक सेहो उपहास करैत छलाह; कारण कृष्ण अपन नृसिंह-रूपपर गर्व करैत छलाह, मुदा शूद्रक मात्र अपन नामहि सँ शत्रुसभक हृदय विदीर्ण कऽ दैत छलाह; कृष्ण तीन पगमे विश्वकेँ थका देलनि, मुदा शूद्रक एके वीरतापूर्ण प्रयत्नमे समस्त पृथ्वीकेँ वशमे कऽ लेलनि। हुनकर तलवारक भीजल धारपर यश दीर्घकाल धरि निवास करैत रहल, मानू सहस्र नीच सामन्तक सम्पर्कसँ चिपकल पुरान कलङ्क धोबामे लागल हो। हुनकर मनमे धर्म, क्रोधमे यम, दयामे कुबेर, तेजमे अग्नि, भुजामे पृथ्वी, दृष्टिमे लक्ष्मी, वाणीमे सरस्वती, मुखमे चन्द्रमा, बलमे पवन, ज्ञानमे बृहस्पति, सौन्दर्यमे कामदेव आ प्रतापमे सूर्य निवास करैत छल; एहि कारण ओ सभ रूपमे प्रकट होनिहार आ देवत्वक सारस्वरूप पवित्र नारायण जकाँ लगैत छलाह। रणरात्रिमे, जखन हाथीक कपोलसँ बहैत मदजल वर्षा जकाँ बरसैत छल, राजलक्ष्मी एक बेर प्रेमीसँ भेट करए आबि रहल स्त्री जकाँ हुनका लग आबि गेलीह आ योद्धासभक वक्ष-द्वारसँ ढील भेल सहस्र कवचक अन्हारक बीच हुनकर पास ठाढ़ भऽ गेलीह। हुनकर तलवार मानू ओकरा अनिवार्य रूपसँ अपना दिस खिंचैत छल; प्रबल हाथक दबावसँ निकलल पानिक बूँदक कारण ओकर धार असमान छल, आ जङ्गली हाथीक ललाटास्थि फाड़लापर ओतय चिपकल पैघ मोतीसभसँ ओ सुसज्जित छल। हुनकर प्रतापक ज्बला दिन-राति जरैत रहल—मानू पति-विहीन शत्रुपत्नीसभक भीतर प्रज्वलित अग्नि हो, जे हुनकर हृदयमे मात्र प्रतिष्ठित मृत पतिसभकेँ सेहो भस्म कऽ देबाक अभिलाषा रखैत हो। जखन पृथ्वीकेँ वशमे कऽ ओ संसारक रक्षक बनल छलाह, तखन रंगक मिश्रण केवल चित्रकलामे होइत छल; केश खिंचब केवल प्रेमालापमे; कठोर बन्धन केवल काव्यक नियममे; चिन्ता केवल धर्मक; छल केवल सपनामे; आ सोनाक दण्ड केवल छत्रमे छल। केवल ध्वज काँपैत छल; केवल गीतमे स्वरभेद होइत छल; केवल हाथी मदोन्मत्त होइत छल; केवल धनुषक प्रत्यञ्चा टूटैत छल; केवल झरोखामे जाल फँसाबैत छल; केवल प्रेमीक कलहमे दूत पठाओल जाइत छल; केवल चौपड़ आ शतरञ्जक गोटी अपन घर खाली छोड़ैत छल; प्रजाक घर कहियो सूना नहि होइत छल। हुनकर शासनमे भय केवल परलोकक छल; ऐंठन केवल अन्तःपुरक स्त्रीसभक अलकामे छल; वाचालता केवल नूपुरमे; हाथ धरण केवल विवाहमे; आँसू केवल निरन्तर यज्ञाग्निक धुआँसँ बहैत छल; कोड़ाक आवाज केवल घोड़ाक लेल सुनाइत छल, आ धनुषक टंकार केवल कामदेवक धनुषसँ निकलैत छल। सहस्रकिरण सूर्य नव कमल-कलिकाकेँ खोलैत बहुत देर पहिने उदित भेल छल, यद्यपि भोरक गुलाबी आभामे किछु कमी आबि गेल छल। एही समय एक द्वारपालिका राजसभामे आबि विनयपूर्वक राजाकेँ सम्बोधित केलक। ओकर रूप सुन्दर, मुदा विस्मयमिश्रित भय उत्पन्न करनिहार छल; बाम कात लटकल कृपाण—जे स्त्रीसभ प्रायः नहि धारण करैत अछि—सहित ओ सर्पसँ लपेटल चन्दन-वृक्ष जकाँ लगैत छलि। बहुमूल्य चन्दन-लेपसँ ओकर वक्षस्थल एना चमकि रहल छल, जहिना स्वर्गीय गङ्गाक जलसँ ऐरावतक ललाटास्थि ऊपर उठि रहल हो। ओकरा आगाँ नतमस्तक सामन्तसभक मुकुटपर पड़ल ओकर प्रतिबिम्ब एना बुझाइत छल मानू ओसभ मानव-रूप धारण कएने राजाज्ञाकेँ अपन ललाटपर राखने हो। शरद् जकाँ ओ हंसक श्वेतिमासँ आच्छादित छलि; परशुरामक धार जकाँ राजमण्डलकेँ अधीन रखने छलि; विन्ध्यक वनभूमि जकाँ हाथमे दण्ड धारण कएने छलि; आ राज्यक साक्षात् रक्षिका देवी जकाँ लगैत छलि। भूमिपर कमल-सदृश हाथ आ ठेहुन राखि ओ बजली—‘महाराज, द्वारपर दक्षिण दिशाक एक चाण्डाल-कन्या ठाढ़ अछि। ओ ओहि त्रिशंकुक वंशक राजलक्ष्मी जकाँ अछि, जे आकाशपर चढ़लाह, मुदा क्रुद्ध इन्द्रक हुंकार सुनिते ओतयसँ खसि पड़लाह। ओकर हाथमे पिंजड़ामे एक सुग्गा अछि। ओ अहाँक जय-जयकार कहैत हमरा ई सन्देश देलक अछि—“महाराज, समुद्र जकाँ केवल अहाँ समस्त पृथ्वीक रत्न ग्रहण करबाक योग्य छी। ई पक्षी एक अद्भुत वस्तु आ समस्त पृथ्वीक रत्न अछि—एहि विचारसँ हम एकरा अहाँक चरणमे अर्पित करए आनल छी आ अहाँक दर्शन करबाक इच्छा रखैत छी।” हे राजन्, अहाँ ओकर सन्देश सुनि लेलहुँ; आब जे उचित बुझू, से निर्णय करू।’ एतेक कहि ओ चुप भऽ गेलीह। कौतूहलसँ भरल राजा चारू कात बैसल सामन्तसभ दिस तकलनि आ कहलनि—‘किएक नहि? ओकरा भीतर आनू।’ एहि प्रकार ओ प्रवेशक अनुमति देलनि। राजाज्ञा पाबिते द्वारपालिका चाण्डाल-कन्याकेँ भीतर लऽ अनलक। प्रवेश करिते कन्या सहस्र सामन्तक बीच राजाकेँ देखलक—मानू इन्द्रक वज्रक भयसँ एकठाम सिमटल श्रेष्ठ पर्वतसभक मध्य स्वर्णशिखर मेरु विराजमान हो; अथवा वस्त्रपर छिड़िआयल मणिक प्रभा हुनकर देहकेँ लगभग ढाँकि देने छल, तेँ ओ एहन झंझावाती दिन जकाँ देखाइत छलाह जखन इन्द्रक सहस्र इन्द्रधनुषसँ विश्वक आठो दिशा ढँकि जाइत अछि। स्वर्गीय नदीक फेन जकाँ उज्ज्वल छोट रेशमी चँदोवाक नीचाँ ओ चन्द्रकान्त-मणिसँ जड़ल शय्यापर बैसल छलाह। चँदोवाक चारू रत्नजटित स्तम्भ सोनाक सिकड़ीसँ जुड़ल छल आ पैघ-पैघ मोतीक डोरीसँ वेष्टित छल। सोनाक मूठबला अनेक चँवर हुनकर चारू कात डोलि रहल छल। हुनकर बाम चरण स्फटिकक चरणपीठपर टिकल छल—ओ चरणपीठ मुखक चकाचौंध करनिहार सौन्दर्यक सम्मुख लज्जासँ नमल चन्द्रमा जकाँ लगैत छल। चरणक प्रभासँ ओ अलंकृत छल, मुदा नीलम-जटित धरातलक किरणसँ चरणमे नीलिमा सेहो झलकैत छल, मानू पराजित शत्रुसभक निःश्वास ओकरा श्याम कऽ देने हो। सिंहासनक माणिक्यक लाल प्रभासँ रञ्जित हुनकर वक्षस्थल ताजे मधु-कैटभ-वधक रक्तसँ लाल कृष्णक स्मरण करबैत छल। अमृतक फेन जकाँ उज्ज्वल हुनकर दुनू रेशमी वस्त्रक किनारपर पीयर रङ्गमे हंसक जोड़ी चित्रित छल; चँवरसँ उठल हवामे ओ वस्त्र लहराइत छल। केसर-लेपक छींटसँ युक्त सुगन्धित चन्दनलेप हुनकर छातीकेँ उज्ज्वल कऽ देने छल; ओ भोरक धूप पड़ल हिमाच्छादित कैलास जकाँ लगैत छल। हुनकर मुखक चारू कात मोती एना छल, मानू तारासभ ओकरा चन्द्रमा बुझि घेरि लेने हो। भुजामे बन्हल नीलमक कङ्कण चञ्चल लक्ष्मीकेँ बाँधबाक लेल धमकी देनिहार सिकड़ी जकाँ, अथवा चन्दनक गन्धसँ आकृष्ट सर्प जकाँ लगैत छल। कानक कमल कनी नीचाँ झुकल छल; नाक गरुड़-चञ्चु जकाँ उन्नत; नेत्र पूर्ण विकसित कमल जकाँ; भौंहक बीच गोल घुमावमे रोम उगल छल, जे चक्रवर्ती राज्याभिषेकक जलसँ पवित्र भेल छल। हुनकर ललाट शुद्ध सोनामे ढारल अष्टमीक चन्द्रखण्ड जकाँ छल; सुगन्धित चमेलीक मालासँ घेरल ओ भोरमे ललाटपर फिक्का पड़ैत तारासभबला पश्चिम पर्वत जकाँ लगैत छल। आभूषणक सुनहरा आभाससँ हुनकर देह ताम्रवर्ण भेल छल, तेँ ओ शिवाग्निसँ दग्ध कामदेव जकाँ देखाइत छलाह। दासीसभ हुनका चारू कात घेरने छलि, मानू विश्वक दिक्पालिकासभ पूजा करए आबि गेल हो। स्वच्छ पच्चीकारीबला धरातलमे पड़ल हुनकर प्रतिबिम्बकेँ पृथ्वी भक्तिपूर्वक अपन हृदयपर धारण कएने छलि। लक्ष्मी मानू मात्र हुनकर छलीह, यद्यपि ओ हुनका सभकेँ भोग करबाक लेल बाँटि दैत छलाह। अनुचर असंख्य होइतो ओ अद्वितीय छलाह; सेना मे अनगिनत हाथी-घोड़ा होइतो केवल अपन तलवारपर भरोसा करैत छलाह; छोट स्थानमे ठाढ़ होइतो समस्त पृथ्वीकेँ व्याप्त कएने छलाह; सिंहासनपर बैसल होइतो केवल धनुषपर आश्रित छलाह; शत्रुरूपी समस्त इन्धन उखड़ि गेल होइतो राजतेजक ज्बलासँ चमकैत छलाह; नेत्र विशाल होइतो सूक्ष्मतम वस्तु देखैत छलाह; सभ सद्गुणक निवास होइतो सीमा लाँघि जाइत छलाह; रानीसभक प्रिय होइतो एकछत्र स्वामी छलाह; दानक अक्षय धारा होइतो मदरहित छलाह; स्वभावसँ गौर होइतो आचरणमे कृष्ण छलाह; प्रजापर भारी हाथ नहि रखैत छलाह, तथापि समस्त संसार हुनकर मुट्ठीमे छल। एहन छलाह ओ राजा। दूरहि सँ हुनका देखैत चाण्डाल-कन्याने लाल कमलक पाँखुरि जकाँ कोमल, झनझन करैत कङ्कणसँ घेरल अपन हाथमे खुरदुरा छोरबला बाँसक दण्ड पकड़ि राजाकेँ सचेत करबाक लेल पच्चीकारीबला फर्शपर एक बेर चोट देलक। आवाज होइतहि सामन्तक समस्त सभा राजासँ दृष्टि हटाकऽ ओकरा दिस तकलक—जहिना नारिकेल खसबाक ध्वनि सुनि जङ्गली हाथीक झुण्ड एकाएक मुड़ि जाइत अछि। राजा अपन परिचारकसभसँ ‘ओतय देखू’ कहैत, द्वारपालिका द्वारा देखाओल चाण्डाल-कन्यापर स्थिर दृष्टि देलनि। ओकर आगाँ एक वृद्ध पुरुष चलि रहल छल—केश बुढ़ाड़ीसँ उज्जर, नेत्र लाल कमल जकाँ, यौवन बीति गेलोपर निरन्तर श्रमसँ जोड़ दृढ़, मातङ्गक देह होइतो अवहेलना योग्य नहि, आ राजसभा योग्य श्वेत वस्त्र धारण कएने। ओकर पाछाँ दुनू काँधपर लटकल केशबला एक चाण्डाल बालक पिंजड़ा लेने चलि रहल छल। पिंजड़ाक सलाख सोनाक छल, मुदा सुग्गाक हरियर पाँखक प्रतिबिम्बसँ मरकत जकाँ चमकि रहल छल। कन्याक श्याम वर्ण एना छल मानू कृष्ण दानवसभ द्वारा छीनल अमृत घुरा लेबाक लेल छलपूर्वक स्त्री-वेश धारण कएने होथि। ओ असगरे चलैत नीलमक पुतरी जकाँ छलि। ठेहुन धरि पहुँचैत नील वस्त्रपर लाल रेशमक ओढ़नी एना खसल छल, जहिना नील कमलपर साँझक लाल धूप पड़ल हो। एक कानसँ लटकल कुण्डलक उजास ओकर कपोल-मण्डलकेँ उज्जर कऽ देने छल—मानू उदित चन्द्रक किरणसँ रात्रिक मुख जड़ाओल हो। ओकर ललाटपर गोरोचनक पीयर तिलक तेसर नेत्र जकाँ छल; पर्वतीय वेशमे ओ शिवक वस्त्र-पद्धति अपनौने पार्वती जकाँ लगैत छलि। वक्षस्थलक वस्त्रपर प्रतिबिम्बित नारायणक नीलमणि-सदृश प्रभासँ श्याम भेल श्री जकाँ; क्रुद्ध शिवक अग्निमे मदन जरैत काल उठल धुआँसँ मलिन रति जकाँ; उन्मत्त बलरामक हलसँ खिंचल जेबाक भयमे भागैत यमुना जकाँ; अथवा गाढ़ महावरसँ नव पल्लव जकाँ लाल भेल कमल-चरणबाली ओ दुर्गा जकाँ छलि, जिनकर पएर एखनहि रौंदल महिषासुरक रक्तसँ रञ्जित हो। अँगुरीक गुलाबी आभाससँ ओकर नख अरुण छल। पच्चीकारीबला कठोर धरातल मानू ओकर स्पर्शक योग्य नहि छल; तेँ ओ कोमल डाढ़ि जकाँ पएर धीरे-धीरे भूमिपर रखैत आगाँ बढ़लि। अग्निवर्णमे उठैत नूपुरक किरण ओकरा चारू कात अग्निदेवक भुजा जकाँ घेरने छल—मानू ओकर सौन्दर्यक प्रेममे पड़ि अग्नि ओकर जन्मक कलङ्क पवित्र कऽ स्रष्टाक विधानकेँ मिथ्या सिद्ध करए चाहैत होथि। ओकर करधनी कामदेवक हाथीक ललाटपर गुँथल तारामाला जकाँ छल, आ पैघ उज्ज्वल मोतीक डोरीबला हार यमुनाक कनी श्यामिमा लागल गङ्गा-धार जकाँ। शरद् जकाँ ओ कमल-नेत्र खोलैत छलि; वर्षा ऋतु जकाँ मेघ-सदृश केश धारण कएने छलि; मलय-पर्वतमाला जकाँ चन्दनसँ वेष्टित छलि; राशिचक्र जकाँ तारामय रत्नसँ अलंकृत; श्री जकाँ हाथमे कमलक शोभा धारण कएने; मूर्च्छा जकाँ हृदय हरनिहार; वन जकाँ सजीव सौन्दर्यसँ सम्पन्न; देवीक सन्तान जकाँ कोनो जातिक अधिकारसँ परे; निद्रा जकाँ नेत्रकेँ मोहित करनिहार। वनक कमल-सरोवर हाथीसँ मलिन होइत अछि, तहिना मातङ्ग-कुलमे जन्म ओकर शोभापर धब्बा जकाँ छल। प्रेत जकाँ ओकरा स्पर्श नहि कएल जा सकैत छल; पत्र जकाँ ओ केवल आँखिकेँ आनन्द दैत छल; वसन्तक पुष्प जकाँ ओ जाति-पुष्पसँ रहित छल। ओकर पतली कमर कामदेवक धनुषक रेखा जकाँ हाथसँ नापल जा सकैत छल; घुँघरार केशसहित ओ अलकापुरीक यक्षराजक लक्ष्मी जकाँ छलि। ओ एखन यौवनक प्रथम पुष्प धरि पहुँचल छलीह, मुदा अनुपम सुन्दरी छलि। राजा विस्मित भऽ मनमे सोचलनि—‘एहन सौन्दर्य रचबामे विधाताक परिश्रम अनुचित ठाम लगल! जँ ओकरा चाण्डाल-रूपक उपहास करबाक लेल एना रचल गेल अछि जे ओकर सौन्दर्य समस्त संसारक रूप-सम्पदाकेँ तुच्छ कऽ दैत अछि, तँ ओ एहन कुलमे किएक जन्मलीह जकर संग केओ विवाह नहि कऽ सकैत अछि? निश्चय मातङ्ग-कुलक स्पर्श-दोषसँ डरि प्रजापति केवल मनहि मे ओकर रचना कएने होयत; नहि तँ स्पर्शसँ मलिन अंगमे ई निष्कलङ्क प्रभा आ एहन अनुपम लावण्य कतयसँ अबैत? रूपवती होइतो नीच जन्मक कारण ओ पातालक लक्ष्मी जकाँ देवतासभक निरन्तर निन्दा बनल अछि; एहन विचित्र संयोगक स्रष्टा ब्रह्माकेँ सेहो ई सुन्दरी भयभीत करैत होयत।’ राजा एना सोचि रहल छलाह कि कानपर खसल पुष्पमालासँ सुसज्जित कन्या अपन आयुसँ बेसी आत्मविश्वासक संग हुनका प्रणाम केलक। प्रणाम कऽ जखन ओ पच्चीकारीबला धरातलपर चढ़लि, तखन ओकर सेवक पिंजड़ामे एखनहि प्रवेश कएने सुग्गाकेँ लऽ किछु डेग आगाँ बढ़ल आ राजाकेँ देखबैत कहलक—‘महाराज, वैशम्पायन नामक ई सुग्गा सभ शास्त्रक अर्थ जानैत अछि, राजधर्म आ नीतिक व्यवहारमे प्रवीण अछि, कथा, इतिहास आ पुराणमे कुशल अछि, गीत आ स्वरान्तरक ज्ञाता अछि। ई सुन्दर आ अनुपम नवीन आख्यान, प्रेमकथा, नाटक, काव्य आदि पढ़ैत मात्र नहि, अपने सेहो रचैत अछि; विनोद-वचनमे पारंगत अछि; वीणा, बाँसुरी आ मृदङ्गक अनुपम शिष्य अछि। नृत्यक भिन्न-भिन्न भङ्गिमा देखेबामे निपुण, चित्रकलामे चतुर, क्रीड़ामे अत्यन्त साहसी, प्रणय-कलहमे रूठल कन्याकेँ मनएबाक उपाय तुरन्त खोजि लेनिहार, आ हाथी, घोड़ा, पुरुष तथा स्त्रीक लक्षणक ज्ञाता अछि। ई समस्त पृथ्वीक रत्न अछि। जहिना मोती समुद्रक होइत अछि, तहिना रत्न अहाँक अधिकारक अछि—एहि विचारसँ हमर स्वामीक पुत्री एकरा अहाँक चरणमे आनल छथि। हे राजन्, एकरा अपन मानि स्वीकार करू।’ एतेक कहि ओ पिंजड़ा राजाक सम्मुख राखि पाछाँ हटि गेल। ओकर जाइतहि पक्षीराज राजाक आगाँ ठाढ़ भऽ दहिना पएर ऊपर उठौलक, ‘जय हो’ कहलक, आ प्रत्येक अक्षर तथा स्वराघातक पूर्ण शुद्ध उच्चारणसँ गीतक रूपमे ई पद्य सुनौलक— ‘अहाँक शत्रुसभक रानीक वक्ष एखन शोकसँ भरल अछि, विधवा-एकान्तक व्रत धारण कएने अछि, नोनगर आँसूमे नहायल, मोतीक हारसँ विहीन अछि, आ अपन दुःखी हृदयक अत्यन्त समीप रहबाक कारण दग्ध भऽ रहल अछि।’ ई सुनि राजा विस्मित भेलाह। प्रसन्नतासँ ओ लगहि बहुमूल्य सोनाक सिंहासनपर बैसल अपन मन्त्री कुमारपालितकेँ सम्बोधित कएलनि। वयोवृद्ध, उच्चकुलोत्पन्न आ बुद्धिमान मन्त्रिसभमे अग्रणी कुमारपालित राजनीतिक दर्शनक ज्ञानमे बृहस्पति जकाँ छलाह। राजा कहलनि—‘अहाँ पक्षीक व्यञ्जन-वर्णक स्पष्ट उच्चारण आ स्वरक माधुर्य सुनलहुँ। पहिल आश्चर्य तँ ई अछि जे ओ एहन गीत गाओलक जकर प्रत्येक अक्षर पृथक्-पृथक् स्पष्ट अछि; स्वर आ अनुस्वारक उच्चारणमे शुद्धता आ स्पष्टता दुनू एक संग अछि। दोसर आश्चर्य एहि सँ सेहो पैघ अछि—नीच योनिमे उत्पन्न होइतो ओकर भीतर मनोरम कलाक मानवीय सिद्धि अछि, आ ओकर गीतक गति ज्ञानसँ प्रेरित अछि। “जय हो” कहैत ओ अपने दहिना पएर सोझ कएलक आ हमर विषयमे ई गीत गओलक, जखन कि सामान्यतः पशु-पक्षी केवल डर, भोजन, मैथुन आ निद्राक विद्या जानैत अछि। ई अत्यन्त अद्भुत अछि।’ राजा एना कहलापर कुमारपालित कनी मुस्कराइत उत्तर देलनि—‘एहिमे आश्चर्य कोन बात? महाराज अपने जानैत छी जे सुग्गा आ मैना सँ आरम्भ कऽ सभ प्रकारक पक्षी एक बेर सुनल ध्वनि दोहरा लैत अछि। अतः मनुष्यक प्रयत्नसँ अथवा पूर्वजन्ममे प्राप्त सिद्धिक फलस्वरूप एहन असाधारण कौशल उत्पन्न हो, तँ कोनो आश्चर्य नहि। प्राचीन कालमे पक्षीसभ मनुष्य जकाँ स्पष्ट वाणी सेहो रखैत छल। सुग्गाक अस्पष्ट बोली आ हाथीक जिह्वामे परिवर्तन अग्निदेवक शापसँ भेल।’ कुमारपालितक वचन पूरा होइते घड़ीक अवधि समाप्त होबाक स्पष्ट सङ्केत देनिहार नगाड़ाक गर्जनाक पाछाँ मध्याह्नक शंख बजि उठल, जे सूर्यक आकाश-मध्य पहुँचबाक घोषणा करैत छल। स्नानक समय निकट बुझि राजा सामन्तसमूहकेँ विदा कएलनि आ राजसभासँ उठि पड़लाह। राजा प्रस्थान करए लगलाह तँ महान् सामन्तसभ सेहो एक संग उठि भीड़ लगा देलक। हड़बड़ीमे स्थानसँ खसल कङ्कणक पात-जकाँ नक्काशी हुनकर रेशमी वस्त्र फाड़ि देलक; धक्कासँ हारसभ झूलए लागल; व्याकुल देहसँ झड़ैत सुगन्धित चन्दन-चूर्ण आ केसरक वर्षासँ दिशासभ पीयर भऽ गेल; काँपैत मालती-मालासँ भौंराक झुण्ड उड़ि पड़ल; कानसँ आधा लटकल कमल कपोलकेँ छुबैत रहल; वक्षपर मोतीक लड़ काँपैत रहल। अपन-अपन गौरवक चेतनामे प्रत्येक सामन्त प्रस्थान करैत राजाकेँ प्रणाम करबाक लेल उतावला छल। राजसभाक चारू कात अपार चहल-पहल मचि गेल। काँधपर चँवर रखने सभ दिशामे जाइत चँवरधारिणीसभक नूपुर बजैत छल, प्रत्येक डेगपर हुनकर रत्न झनकैत छल, आ बीच-बीचमे कमल-मधु पीबाक लेल आतुर कलहंसक कलरव मिसाइत छल। प्रणाम करए अबैत नर्तकीसभ वक्ष आ पार्श्वपर हाथ मारैत छलि, जकरा सँ रत्नजटित करधनी आ मालाक मधुर सङ्गीत उठैत छल। राजमहलक सरोवरक कलहंस नूपुर-ध्वनिसँ मोहित भऽ राजसभाक चौड़ा सीढ़ी उज्जर कऽ देने छल। करधनीक ध्वनि सुनबाक लोभमे पालतू सारस काँसाक पात्र खरोंचबाक आवाज जकाँ लम्बा, तीक्ष्ण स्वरमे क्रमशः आरो जोर-जोरसँ चिचिया रहल छल। अचानक विदा होइत सय-सय पड़ोसी नरेशक पएरक भारी धमक सभाभवनक धरातलपर पड़ैत छल, मानू आँधी पृथ्वीकेँ कम्पित कऽ रहल हो। दण्डधारी प्रतिहारी भीड़केँ आगाँसँ हटबैत ‘देखू, हटू!’ कहि रहल छल; ओकर ऊँच, मुदा सदाशय, लम्बा आ तीक्ष्ण पुकार राजमहलक लतागृहसभमे प्रतिध्वनित भऽ दूर धरि गूँजैत छल। शीघ्र प्रणाम करबाक लेल झुकैत राजासभक काँपैत मुकुट-मणि जखन धरातलकेँ छुबैत छल, तखन बाहर निकलल कलगीबला मुकुटक नोकसँ पच्चीकारी खरोंचाइत आ झनझना उठैत छल; प्रणाममे झुकल लोकक कुण्डल कठोर फर्शपर टकरा कऽ बजैत छल। शुभ पद्य पढ़ैत भाटसभ ‘हमर राजाक दीर्घायु हो, विजय हो!’ केर मधुर अनवरत घोष करैत आगाँ बढ़ैत छल, आ ओकर कोलाहल समस्त आकाश भरि दैत छल। सय-सय पएरक हलचलसँ फूल छोड़ि उड़ल भौंरा गुनगुना रहल छल। अफरातफरीमे शीघ्र दण्डवत् होइत सामन्तसभक कङ्कणक नोक रत्नजटित स्तम्भसँ टकराइत, तखन ओहिमे जड़ल मणिसभ खनखनाइत छल। अन्ततः राजा ‘किछु विश्राम करू’ कहि एकत्र सामन्तसभकेँ विदा कएलनि। चाण्डाल-कन्यासँ कहलनि—‘वैशम्पायनकेँ अन्तःपुर लऽ जाउ’—आ ताम्बूलवाहककेँ एहि विषयमे आज्ञा दऽ किछु प्रिय राजकुमारक संग निज महल दिस चलि गेलाह। ओतय सूर्य किरण त्यागि देने हो अथवा आकाश चन्द्र-तारासँ रिक्त भऽ गेल हो, एना अपन आभूषण उतारि सभ व्यवस्था-सज्जित व्यायामशालामे प्रवेश कएलनि। समान आयुबला राजकुमारसभक संग सुखद व्यायाम कऽ ओ स्नानगृह गेलाह। ओकर ऊपर श्वेत चँदोवा तनल छल आ चारू कात अनेक भाटक स्तुतिपाठ गूँजैत छल। मध्यभागमे सुगन्धित जलसँ भरल सोनाक स्नानकुण्ड छल, ओकर बगलमे स्फटिकक स्नानासन राखल छल। एक कात अत्यन्त सुगन्धित जलसँ भरल कलशसभ सजल छल; गन्धसँ आकृष्ट भौंरासभ ओकर मुखपर एना मँडरा रहल छल मानू गरमीक भय सँ कलशपर नील वस्त्र ढाँपल हो। तखन दासीसभ विधिपूर्वक राजाकेँ जलसँ स्नान करओलक। ककरो मरकत-कलशक प्रतिबिम्बसँ देह हरियर छल आ ओ पातयुक्त पात्रबला साकार कमल जकाँ लगैत छलि; ककरो हाथमे चाँदीक घड़ा छल आ ओ पूर्णिमाक चन्द्रसँ बहैत प्रकाश-धाराबाली राति जकाँ देखाइत छलि। तत्क्षण स्नानक अवसरपर बजाओल तुरहीक ध्वनि ब्रह्माण्डक प्रत्येक गुहाकेँ भेदैत उठल। गीत, वीणा, बाँसुरी, मृदङ्ग, झाँझ आ डफलीक भिन्न-भिन्न तीक्ष्ण स्वर, असंख्य भाटक कोलाहलसँ मिलि, श्रवण-पथकेँ चीरैत गूँजि उठल। तदनन्तर राजा साँपक त्यागल केंचुल जकाँ हलुक दुनू श्वेत वस्त्र विधिपूर्वक धारण कएलनि। महीन रेशमक किनारबला, श्वेत मेघखण्ड जकाँ निर्मल पाग पहिरने ओ स्वर्गीय गङ्गा-धारा धारण कएने हिमालय जकाँ लगैत छलाह। मन्त्रसँ पवित्र एक अञ्जलि जलसँ पितरसबकेँ तर्पण देलनि, सूर्यकेँ दण्डवत् कऽ मन्दिर दिस गेलाह। शिवक पूजा आ अग्निमे आहुति देलाक बाद सुगन्धकक्षमे हुनकर अंगपर केसर, कपूर आ कस्तूरीक महकसँ मधुर भेल चन्दन लगाओल गेल; ओकर सुवासक पाछाँ गुनगुनाइत भौंरा चलैत छल। सुगन्धित मालती-पुष्पक माला पहिरि ओ वस्त्र बदललनि; रत्नजटित कुण्डलक अतिरिक्त कोनो आभूषण नहि रखने, ओ उचित भोजनक व्यवस्था पाबि चुकल राजासभक संग मधुर व्यञ्जनक आस्वादसँ उपजल आनन्दपूर्वक उपवास तोड़लनि। तकर बाद सुगन्धित पेय पीलनि, मुख धोएलनि, ताम्बूल ग्रहण कएलनि आ चमचम करैत पच्चीकारीबला आसनसँ उठलाह। लगहि ठाढ़ द्वारपालिका तुरन्त आगाँ बढ़लीह। ओकर बाँहि पर टेक दऽ राजा राजसभा दिस चललाह; पाछाँ अन्तःपुरमे प्रवेश योग्य सेवकसभ छल, जिनकर हथेली दण्डकेँ दृढ़तासँ पकड़ैत-पकड़ैत डाढ़ि जकाँ कठोर भऽ गेल छल। सभाभवनक छोरसभपर लटकल श्वेत रेशमक कारण एना लगैत छल मानू ओकर भित्ति स्फटिकक हो। रत्नजटित धरातलकेँ अत्यन्त सुगन्धित कस्तूरी-मिश्रित चन्दन-जलसँ सींचि शीतल कएल गेल छल। निर्मल पच्चीकारीपर निरन्तर पुष्पक ढेरी बिखेरल जाइत छल, जहिना आकाश तारासमूहसँ भरल रहैत अछि। सुगन्धित जलसँ धोएल अनेक सोनाक स्तम्भ चमकि रहल छल; ओहिमे अनगिनत प्रतिमा सजल छल, मानू प्रत्येक कोटरमे गृहदेवता विराजमान होथि। अगरुक गाढ़ सुगन्ध पसरल छल। सभाक मुख्य आकर्षण एक अलिन्द छल, जाहिमे आँधीक बादक श्वेत मेघ जकाँ उज्जर शय्या राखल छल; ओकर बिछावन फूलक गन्धसँ सुवासित, सिरानक तकिया महीन सनक कपड़ाक, पायासभ रत्नजटित, आ बगलमे मणिमय चरणपीठ—समस्त दृश्य हिमालयक शिखर जकाँ शोभायमान छल। राजा ओहि शय्यापर अधलेटे भेलाह। भूमिपर बैसल एक कन्या अपन सदिखन धारण करनिहार कटार वक्षमे दबौने, नव कमलक पात जकाँ कोमल हथेलीसँ धीरे-धीरे हुनकर चरण मलि रहल छलि। राजा किछु काल विश्राम कएलनि आ ओहि समय उपस्थित रहबाक योग्य राजा, मन्त्री आ मित्रसभक संग अनेक विषयपर वार्ता करैत रहलाह। वैशम्पायनक वृत्तान्त जनबाक कौतूहल बढ़लापर राजा लगहि उपस्थित द्वारपालिकाकेँ अन्तःपुरसँ ओकरा अनबाक आदेश देलनि। ओ हाथ आ ठेहुन भूमिपर टेकि ‘जे आज्ञा’ कहैत आदेशकेँ माथपर धारण केलक आ तुरन्त पालन केलक। शीघ्रहि वैशम्पायन राजाक समीप आयल; ओकर पिंजड़ा द्वारपालिका उठा कऽ आनलि। संगमे एक वृद्ध घोषक छल—सोनाक दण्डपर टेकने, कनी झुकल, श्वेत वस्त्रधारी, बुढ़ाड़ीसँ रुपह केशक चूड़ा, धीमा चालि आ काँपैत वाणी; पक्षिकुलक प्रति प्रेमक कारण ओ बूढ़ कलहंस जकाँ लगैत छल। हथेली भूमिपर राखि ओ सन्देश देलक—‘महाराज, महारानीसभ निवेदन करैत छथि जे अहाँक आज्ञासँ एहि वैशम्पायनकेँ स्नान कराओल आ भोजन कराओल गेल अछि, आ आब द्वारपालिका एकरा अहाँक चरणमे उपस्थित कएने छथि।’ एतेक कहि ओ हटि गेल। राजा वैशम्पायनसँ पुछलनि—‘एहि बीच मनोनुकूल पर्याप्त भोजन कएलह?’ ओ उत्तर देलक—‘महाराज, हम की नहि खएलहुँ! वसन्तक आनन्दमे कोइलीक आँखि जकाँ गुलाबी-नील, सुगन्धित आ मधुर जामुनक रस भरिपेट पीलहुँ। सिंहक नखसँ हाथीक ललाटास्थिसँ निकालल, रक्तसँ भीजल मोती जकाँ चमकैत अनारक दाना फोड़लहुँ। कमलपात जकाँ हरियर आ अङ्गूर जकाँ मधुर पुरान हरड़ मनमाना चोंच मारि खएलहुँ। मुदा आरो की कही? महारानीसभ अपन हाथसँ जे किछु अनैत छथि, से अमृत भऽ जाइत अछि।’ राजा ओकर बात रोकैत कहलनि—‘एखन ई सभ रहए दे। हमर कौतूहल शान्त कर। अपन जन्मक सम्पूर्ण कथा आरम्भसँ कह—कोन देशमे, कोना जन्म भेलह, नाम के देलक? पिता-माता के छलाह? वेदक ज्ञान, शास्त्रक परिचय आ ललित कलाक निपुणता कोना प्राप्त भेल? पूर्वजन्मक स्मृति कोन कारणसँ जागल? ई कोनो विशेष वरदान छल, अथवा केवल पक्षिरूप धारण कऽ छद्मवेशमे रहैत छह? पहिने कतय रहैत छलह? तोहर आयु कतेक अछि? पिंजड़ाक बन्धन, चाण्डाल-कन्याक हाथ पड़ब आ एतय आबब—ई सभ कोना भेल?’ राजाक प्रज्वलित कौतूहलसँ भरल एहन आदरपूर्ण प्रश्न सुनि वैशम्पायन क्षणभर सोचलक आ विनयपूर्वक कहलक—‘महाराज, कथा बहुत लम्बी अछि; तथापि जँ अहाँक इच्छा हो तँ सुनल जाए।’ ‘विन्ध्य नामक एक वन अछि, जे पूर्व आ पश्चिम समुद्रक तटकेँ आलिङ्गन करैत आ पृथ्वीक करधनी जकाँ मध्यदेशकेँ सुशोभित करैत अछि। जङ्गली हाथीक मदजलसँ सिंचित वृक्षसभ ओकर शोभा बढ़बैत अछि; हुनकर शिखरपर श्वेत पुष्पक ढेरी आकाश धरि उठि तारासभसँ स्पर्धा करैत अछि। वसन्तक उल्लासमे मछलीमार पक्षिसभ द्वारा चोंच मारल मरिचक वृक्ष डाढ़ि पसारैत अछि; नव हाथीसँ रौंदल तमालक डाढ़ि सुगन्ध भरि दैत अछि; मदिरासँ लाल मलयदेशीय स्त्रीक कपोल जकाँ वर्णबला पल्लव—मानू भ्रमणशील वनदेवीक पएरक महावरसँ गुलाबी भेल हो—छाया पसारैत अछि। सुग्गाक चोंचसँ छेदल अनारक टपकैत रससँ भीजल लतागृह अछि। कतहु चञ्चल बानर कक्कोल-वृक्षसँ फल-पात नोचि धरातल भरि देने अछि; कतहु निरन्तर झड़ैत फूलक पराग छिड़िआयल अछि; कतहु यात्री लवङ्गक डाढ़िसँ शय्या बना रखने अछि; कतहु सुन्दर नारिकेल, केतकी, करीर आ बकुलक घेरा अछि। पानक लतासँ लिपटल सुपारीक वृक्षबला ओ लतागृह एतेक मनोहर अछि जे वनलक्ष्मीक उचित निवास लगैत अछि। घन एलाक वृक्ष वनकेँ अन्हार आ जङ्गली हाथीक मदजल जकाँ सुगन्धित बनबैत अछि। ओतय सय-सय सिंह विचरैत अछि; हाथीक ललाट-मोती जे एखन धरि हुनकर मुँह आ नखमे चिपकल रहैत अछि, ओकर लोभमे आतुर वनवासी मुखियासभक हाथेँ अन्ततः ओसभ मारल जाइत अछि। वन मृत्युक निवास जकाँ भयङ्कर, यमक दुर्ग जकाँ, आ हुनका प्रिय महिषसभसँ भरल अछि। युद्ध-सज्जित सेना जकाँ ओकर बाण-वृक्षपर भौंरा बाणक नोक जकाँ बैसल अछि, आ सिंहक गर्जना आक्रमणक सिंहनाद जकाँ स्पष्ट सुनाइत अछि। गैंडाक सींग दुर्गाक कटार जकाँ भयावह अछि, आ दुर्गा जकाँ वन लाल चन्दनसँ अलंकृत अछि। कर्णीसुतक आख्यान जकाँ ओकर समीपक विशाल, खरहा-विचरित पर्वतमे विपुल, अचल आ शश उपस्थित अछि। कल्पान्तक अन्तिम सन्ध्या जकाँ ओतय नीलकण्ठ शिवक उन्मत्त नृत्यक समान नीलकण्ठ मयूर नाचैत अछि आ आकाश लालिमा सँ फाटि पड़ैत अछि। समुद्रमन्थनक समय जहिना श्री, कल्पवृक्ष आ वारुणी-मदिराक मधुर पान छल, तहिना वन श्री-वृक्ष आ वरुण-वृक्षसँ शोभित अछि। वर्षाक मेघ जकाँ अत्यन्त सघन आ अन्हार, असंख्य सरोवरसँ अलंकृत; चन्द्रमा जकाँ भालुकक निरन्तर आश्रय आ मृगक घर अछि। राजमहल जकाँ चँवर-मृगक पुच्छसँ सजल आ उग्र हाथीक दलसँ सुरक्षित अछि। दुर्गा जकाँ स्वभावसँ दुर्गम आ सिंहविहारिणी अछि। सीता जकाँ कुश धारण करैत आ रात्रिचरक वशमे अछि। प्रेमातुर कन्या जकाँ चन्दन-कस्तूरीक गन्ध धारण कएने आ उज्ज्वल अगरुक तिलकसँ सजल अछि। विरहिणी नायिका जकाँ अनेक डाढ़िक पवनसँ पङ्खा झेलाइत आ मदनसँ व्याप्त अछि। बालकक गला जकाँ बाघनखक पङ्क्तिसँ चमकैत आ गैंडासँ शोभित अछि। मधुमय पानबला क्रीड़ागृह जकाँ सय-सय मधुमक्खीक छत्ता देखाइत अछि आ फूलसँ पटायल अछि। कतहु पैघ वराहक दाँतसँ पृथ्वीक घेरा उखड़ल अछि—मानू प्रलयक समय महावराहक दाँतपर पृथ्वी-मण्डल उठल हो। कतहु रावणक नगरी जकाँ ऊँच साल-वृक्ष चञ्चल बानरसँ भरल अछि। कतहु नव-विवाहक वेदी जकाँ ताजा कुश, समिधा, फूल, खैर आ पलाशसँ उज्ज्वल अछि। कतहु सिंहक गर्जन सुनि रोमाञ्चित जकाँ काँटा ठाढ़ करैत अछि; कतहु आनन्दोन्मत्त कोइलीक स्वर भरल अछि; कतहु तेज हवामे ताल-पातक ध्वनिसँ उत्तेजित जकाँ गूँजैत अछि; कतहु विधवा कुण्डल त्यागैत हो, एना तालपात झड़ैत अछि; कतहु रणभूमि जकाँ बाण-सदृश सरकण्डासँ भरल अछि; कतहु इन्द्रक देह जकाँ सहस्र नेत्र धारण कएने अछि; कतहु विष्णुक रूप जकाँ तमालक श्यामता अछि; कतहु अर्जुनक रथध्वज जकाँ बानरसँ चिह्नित अछि; कतहु पार्थिव राजाक दरबार जकाँ बाँसक कारण प्रवेश कठिन अछि; कतहु विराटनगर जकाँ कीचक द्वारा रक्षित अछि; कतहु आकाश-लक्ष्मी जकाँ शिकारीसँ खदेड़ल मृगक काँपैत आँखि धारण कएने अछि; कतहु तपस्वी जकाँ वल्कल, झाड़ी, चिथड़ा आ घाससँ युक्त अछि। सप्तपर्णसँ सजल होइतो ओकर पात अनगिनत अछि; तपस्वीसभ द्वारा पूजित होइतो अत्यन्त जङ्गली अछि; पुष्पकालमे होइतो सर्वथा निर्मल अछि।’ ‘ओहि वनमे विश्वविख्यात एक आश्रम अछि—मानू धर्मक जन्मभूमि। ओहिमे एहन वृक्षसभ शोभैत अछि जिनका लोपामुद्रा अपन सन्तान जकाँ पालने छलीह, अपन हाथसँ जल छिड़कि सींचने आ चारू कात खाधि खोदने छलीह। लोपामुद्रा महातपस्वी अगस्त्यक पत्नी छलीह। इन्द्रक प्रार्थनापर अगस्त्य समुद्रक जल पी लेने छलाह। जखन विन्ध्य पर्वत मेरुसँ स्पर्धा करैत आकाश छुबैत सहस्र विशाल शिखरसँ सूर्यक रथक मार्ग रोकए चाहैत छल आ सभ देवताक विनयक अवहेलना करैत छल, तखन सेहो ओ अगस्त्यक आज्ञा मानलक। ओ अपन जठराग्निसँ वातापि दानवकेँ पचा लेलनि; देव-दानवक मुकुटपर सोनाक आभूषणक नोक हुनकर चरण-धूरिकेँ चुमैत छल; ओ दक्षिण दिशाक ललाट-अलंकार छलाह; आ मात्र अपन हुंकारक बलसँ नहुषकेँ स्वर्गसँ खसा अपन प्रताप प्रकट कएलनि।’ ‘लोपामुद्राक पुत्र दृढ़दस्यु सेहो एहि आश्रमकेँ पवित्र कएने छथि। ओ पलाशक दण्ड धारण करनिहार तपस्वी छलाह; पवित्र भस्मक तिलक लगबैत, कुशक पट्टीक वस्त्र पहिरैत, मुञ्जक मेखला बाँधैत आ कुटी-कुटी भिक्षा माँगैत काल हरियर पातक पात्र हाथमे रखैत छलाह। ओ बहुत समिधा आनैत छलाह, तेँ पिता हुनकर उपनाम ‘समिधावाहक’ रखलनि।’ ‘कतहु हरियर सुग्गाक झुण्ड आ कतहु कदलीवन एहि स्थानकेँ श्याम बना दैत अछि। चारू कात गोदावरी नदी घेरने अछि; अगस्त्य समुद्र पी लेने छलाह, तखन पतिव्रता पत्नी जकाँ ओ नदी समुद्रक पथक अनुसरण केलक।’ ‘ओतहि राम, पिताक वचन निभएबाक लेल राज्य त्यागलापर, महातपस्वी अगस्त्यक अनुसरण करैत सीताक संग पञ्चवटीमे किछु काल सुखपूर्वक रहलाह। लक्ष्मण द्वारा बनाओल रमणीय कुटीमे निवास करनिहार ओ राम रावणक यशोविजयकेँ सदा व्यथित करैत छलाह।’ ‘आश्रम बहुत दिनसँ सूना अछि, तथापि एखनो डाढ़िमे कोमलतासँ बैसल श्वेत परेवाक पङ्क्ति एना देखाइत अछि मानू मुनिसभक निर्मल यज्ञधूमक रेखा वृक्षपर चिपकल हो। लताक नव पल्लवमे लालिमा फूटैत अछि, मानू होमक फूल अर्पित करैत सीताक हाथसँ ओ तेज ओकर भीतर सञ्चरित भऽ गेल हो। मुनि द्वारा पीएल आ फेर बाहर निकालल समुद्रक जल मानू आश्रमक चारू कातक विशाल सरोवरसभमे पूरा बाँटि देल गेल अछि। नव पातबला वन चमकैत अछि, मानू रामक अनेक तीक्ष्ण बाणसँ मारल असंख्य राक्षसक रक्तसँ ओकर जड़ सींचल गेल हो आ पलाश एखनो ओहि लाल रङ्गसँ रञ्जित हो। सीताक पालल बूढ़ मृग एखनो वर्षामे नव मेघक गम्भीर गर्जना सुनि ब्रह्माण्डक सभ गुहा भेदैत रामक धनुष-टंकार स्मरण करैत अछि। सूना संसार देखैत आ बुढ़ाड़ीसँ अपन सींग झरैत पबैत ओकर आँखि निरन्तर आँसूसँ धुँधला जाइत अछि, आ ओ मुँहमे लेल ताजा घास छोड़ि दैत अछि। ओतहि निरन्तर आखेटमे मारल आन वनमृगसभसँ उकसाओल जकाँ स्वर्णमृग सीताकेँ छललक आ रघुनन्दनकेँ बहुत दूर लऽ गेल। ओतहि सीताक करुण वियोगमे राम आ लक्ष्मण कबन्ध द्वारा पकड़ल गेलाह; सूर्य-चन्द्रक ग्रहण जकाँ ओ दृश्य रावणक मृत्युक सूचना दैत समस्त विश्वमे महान् भय भरि देलक। ओतहि रामक बाणसँ काटल योजनबाहुक भुजा धरातलपर पड़ल देख मुनिसभ डराइत छलाह जे कतहु अगस्त्यक शापसँ नहुषक सर्परूप फेर घुरा तँ नहि आबि गेल। एखनो वनवासी कुटीक भीतर राम द्वारा वियोग-शान्तिक लेल चित्रित सीताकेँ देखैत अछि—मानू पतिक घर देखबाक आकाङ्क्षासँ ओ फेर धरतीसँ प्रकट भऽ रहल होथि।’ ‘अगस्त्यक ओहि आश्रमसँ—जकर पुरातन इतिहासक चिह्न एखनो स्पष्ट देखाइत अछि—बेसी दूर नहि पम्पा नामक कमल-सरोवर अछि। समुद्र पी लेबाक कारण क्रुद्ध वरुणक प्रेरणासँ विधाता अगस्त्यसँ स्पर्धा करैत मानू दोसर समुद्र बना कऽ आश्रमक लग राखि देने होथि। प्रलय-दिनमे आठो दिशाक टुकड़ा अलग भऽ गेलापर हुनका जोड़बाक लेल आकाश पृथ्वीपर खसि पड़ल हो, एना ओ सरोवर लगैत अछि। वास्तवमे ई अनुपम जलाशय अछि, जकर गहिराइ आ विस्तार केओ नहि नापि सकैत। एखनो यात्री ओतय चक्रवाकक जोड़ी देखैत अछि; फुलायल कमलक नील आभाससँ हुनकर पाँख नील भऽ गेल अछि, मानू रामक साकार शाप हुनका निगलि लेने हो।’ ‘ओहि सरोवरक बाम तटपर, रामक बाणसँ टूटल ताल-वृक्षक झुण्डक लग, एक विशाल प्राचीन शाल्मली-वृक्ष छल। ओकर जड़केँ दिग्गजक सूँढ़ जकाँ एक बूढ़ सर्प सदिखन घेरने रहैत छल, तेँ एना बुझाइत छल मानू पैघ खाधिसँ वेष्टित हो। ऊँच तना सँ लटकल आ हवामे डोलैत सर्पक केंचुल ओकर ओढ़ना जकाँ छल। आकाशमे दूर-दूर पसरल अनेक डाढ़िसँ ओ दिशामण्डलक माप लेबाक प्रयत्न करैत छल—मानू प्रलय-दिनक उन्मत्त नृत्यमे सहस्र भुजा पसारने, मस्तकपर चन्द्रमा धारण कएने शिवक अनुकरण करैत हो। अत्यन्त बुढ़ाड़ीक भारसँ ओ सहाराक लेल पवनक काँध धरैत जकाँ छल। समस्त तना ढाँकने लतासभ बुढ़ापक मोट नस जकाँ बाहर उभरल छल; सतहपर काँटा बुढ़ापक मस्सा जकाँ जुटल छल। समुद्रक जल पी चारू दिससँ आकाश दिस घुरैत घन मेघ ओकर पातकेँ ओससँ भीजाबैत छल, मुदा जलभारसँ थाकि डाढ़िमे पक्षी जकाँ क्षणभर ठहरलोपर ओकर शिखर नहि देखि पबैत छल। असाधारण ऊँचाइक कारण ओ नन्दनवनक शोभा देखबाक लेल पएरक अँगुरीपर ठाढ़ जकाँ लगैत छल। ऊपरक डाढ़ि सेमरक रूइसँ उज्जर छल; लोक ओकरा सूर्यक घोड़ासभक मुँहक कोनासँ खसल फेन बुझि सकैत छल—आकाश-पथक श्रमसँ थाकल ओ घोड़ा ऊपरसँ जाइत काल वृक्षक समीप आबैत हो। ओकर जड़ कल्पपर्यन्त टिकनिहार छल। वनहाथी कपोल रगड़ैत, तखन ओतय लागल मदजलपर मत्त भौंराक माला चिपकि जाइत; एहि सँ वृक्ष एना लगैत छल मानू लोहेक सिकड़ीसँ अचल बाँधल हो। खोखला तनामे भीतर-बाहर चमकैत भौंराक झुण्ड ओकरा सजीव बनबैत छल। पक्षिसभक पाँखक अवतरण ओ एना ग्रहण करैत छल, जहिना दुर्योधन शकुनिक पक्षधरता प्रमाणित करनिहार सङ्केत ग्रहण करैत छल। कृष्ण जकाँ वनमालासँ घेरल आ नव मेघक ढेरी जकाँ आकाशमे उठल देखाइत छल। ई एहन मन्दिर छल जतयसँ वनदेवीसभ समस्त संसारकेँ देखि सकैत छलीह। दण्डकारण्यक राजा, विशाल वृक्षसभक नेता, विन्ध्य पर्वतक मित्र—ओ अपन डाढ़िरूपी भुजासँ समस्त विन्ध्यवनकेँ आलिङ्गन करैत जकाँ छल। डाढ़िक छोर, दरारक मध्य, टहनीक बीच, तनाक गाँठ आ सड़ल छालक छेदमे सुग्गाक झुण्ड घर बना लेने छल। विशाल होबाक कारण ओसभ निडर भऽ सहस्र घोंसला बनौने छल; दुर्गम ऊँचाइक कारण चारू दिशासँ निर्भय आबि बसल छल। बुढ़ाड़ीसँ पात विरल होइतो दिन-राति सुग्गासभक बैठल रहबाक कारण वनराज घन हरियरीसँ भरल देखाइत छल। राति ओसभ अपन-अपन घोंसलामे बितबैत, आ प्रतिदिन उड़िते आकाशमे पङ्क्ति बना दैत छल। आकाशमे ओ पङ्क्तिसभ बलरामक उन्मादमे हल हिलाएलापर छिन्न-भिन्न विस्तृत धाराबाली यमुना जकाँ; स्वर्गीय हाथीसँ उखाड़ि बहा देल गङ्गाक कमलवन जकाँ; सूर्यरथक घोड़ाक प्रभासँ धारदार रेखा पड़ल आकाश जकाँ; चलैत मरकत-फर्श जकाँ; आकाश-सरोवरमे पसरल दीर्घ शैवाल-लता जकाँ देखाइत छल। कदली-पात जकाँ पाँख आकाशक सम्मुख पसारि तीक्ष्ण सूर्यकिरणक भारसँ थाकल दिशासभक मुखपर पङ्खा झेलैत छल। स्वर्गमे दूर धरि घासक बाट बना दैत आ विचरण करैत काल इन्द्रधनुषसँ नभकेँ सुशोभित करैत छल। भोजनक बाद घोंसलामे रहल बच्चासभ लग घुरैत। मारल मृगक रक्तसँ लाल बाघनख जकाँ गुलाबी चोंचसँ फलरस आ धानक बालक अनेक स्वादिष्ट कौर खुआबैत; सन्तानक गाढ़ प्रेम हुनकर आन सभ रुचिकेँ दबा दैत छल। फेर बच्चाकेँ पाँखक नीचाँ राखि ओही वृक्षपर राति बितबैत छल।’ ‘हमर पिता अत्यन्त वृद्ध छलाह आ कठिनतासँ जीवन घिसटैत छलाह। एक पुरान खोखरमे ओ हमर माताक संग रहैत छलाह; भाग्यक विधानसँ हम हुनकर एकमात्र पुत्र भऽ जन्मलहुँ। हमर जन्मक समय प्रसव-वेदनासँ पराजित माता परलोक चलि गेलीह। प्रिय पत्नीकेँ गमएबाक गहन दुःख होइतो सन्तानक प्रेमसँ पिता शोकक तीक्ष्ण वेग रोकलनि आ एकाकी भऽ पूर्णतः हमर पालनमे लगि गेलाह। बुढ़ापक कारण उठाओल पैघ पाँख उड़बाक शक्ति गमा चुकल छल आ काँधसँ ढील लटकल रहैत छल; जखन ओ ओकरा हिलबैत, तँ एना लगैत मानू देहसँ चिपकल पीड़ादायक बुढ़ाड़ीकेँ झाड़ि देबाक प्रयास करैत होथि। पुच्छक बाँचल किछु पाँख चिथड़ा भेल कुश जकाँ टूटल छल। दूर घुमि नहि सकैत छलाह, तथापि आन सुग्गासँ नोचल आ वृक्षक नीचाँ खसल फलक टुकड़ा चुनैत, आन घोंसलासँ खसल धानक बालसँ दाना उठबैत। धानक बाल फोड़ैत-फोड़ैत हुनकर चोंचक नोक टूटल, धार घिसल, आ कठोर शेफालिका-डाँठ जकाँ गुलाबी छल। प्रतिदिन हम जे छोड़ि दैत छलहुँ, ओहि सँ अपन भोजन करैत छलाह।’ ‘एक दिन हम आखेटक कोलाहल सुनलहुँ। प्रभातक लालिमासँ रञ्जित चन्द्रमा स्वर्गीय गङ्गाक द्वीपसँ पश्चिम समुद्रक तट दिस उतरि रहल छल—मानू स्वर्गीय कमलवनक मधुसँ पाँख लाल भेल बूढ़ हंस हो। दिशामण्डल फैलि रहल छल आ रङ्कु-मृगक रोम जकाँ श्वेत छल। आकाशक फर्शपर छिड़िआयल फूल जकाँ तारासमूहकेँ सूर्यक दीर्घ किरण झाड़ू जकाँ बुहारि रहल छल; ओ किरण हाथीक रक्तसँ रङ्गल सिंहक अयाल जकाँ लाल अथवा जरैत लाखक डण्डी जकाँ गुलाबी छल। सप्तर्षिमण्डल मानू मानसरोवरक तटसँ उतरि उत्तर दिशामे टिकि प्रभातक पूजा करैत छल। पश्चिम समुद्र अपन तटपर खुलल सीपसँ छिड़िआयल मोतीक ढेरी ऊपर उठा रहल छल—मानू सूर्यक किरणसँ गलल तारा ओतय खसि, जलोढ़ द्वीपक सतह उज्जर कऽ देने हो। वन ओस टपका रहल छल; मयूर जागि गेल छल; सिंह जम्हाइ लैत छल। हथिनीक झुण्ड जङ्गली हाथीकेँ जगा देलक। वन अपन डाढ़िरूपी अञ्जलि ऊपर उठा, पूर्वाचलक शिखरपर टिकैत सूर्य दिस रात्रिक ओससँ भारी परागबला फूलक ढेरी अर्पित करैत छल। आश्रमक यज्ञधूमक रेखा गदहाक रोम जकाँ धूसर, धर्मक पताका जकाँ चमकैत, वनदेवीक निवासबला वृक्षशिखरपर परेवा जकाँ टिकैत छल। प्रभाती हवा बहि रहल छल; रात्रिक अन्तमे थाकल होइते धीरे-धीरे विचरैत छल। फूलक सुगन्धसँ भौंराक झुण्डकेँ आनन्दित करैत; खिलल कमलसँ मधु-ओसक वर्षा झरबैत; डाढ़ि हिलबैत नाचैत लताकेँ नृत्य सिखएबाक लेल उत्सुक छल। वनमहिषक जुगालीसँ बनल फेनक बूँद लऽ चलैत; थाकल पर्वतवासीक पसेना सुखबैत; कमल हिला ओसकण संग उड़ा लैत। दिनमे खिलनिहार कमलवनकेँ जगएबाक शुभगीत लेल हाथीक ललाटपर नगाड़ा बनबाक योग्य भौंरा एखन बन्द होइत रातिकमलक पाँखुरीमे पाँख अटकल रहने भीतरसँ गुनगुना रहल छल। नोनगर धरातलपर सूतल वनमृगक वक्षमे धूसर चिह्न पड़ल छल। ओ धीरे-धीरे आँखि खोलैत छल; निद्राक अवशेषसँ पुतली एखनो तिरछी, आ शीतल प्रभाती पवनसँ पलक एना अटकल जकाँ मानू गरम लाखसँ जोड़ल हो। वनवासी एम्हर-ओम्हर दौड़ि रहल छल। पम्पा सरोवरक कलहंसक कानप्रिय कोलाहल आरम्भ भऽ गेल। जङ्गली हाथीक कानक सुखद फड़फड़ाहट सुनि मयूर नाचए लागल। क्रमशः सूर्य धीरे-धीरे उदित भेल; मजीठ-वर्ण किरणसँ पम्पाक चारू कात वृक्षशिखरमे घूमैत आ पर्वतशिखरपर ठहरैत छल—मानू आकाशमे प्रवेश करैत सूर्यरूपी हाथीसँ चँवरक ढेरी नीचाँ झुकि रहल हो। सूर्यसँ उत्पन्न नव प्रकाश ताराकेँ भगा कऽ वनपर एना खसल मानू बानरराज फेर ताराकेँ गमा देने हो। प्रभाती सन्ध्या शीघ्र प्रकट भऽ दिनक आठम अंश धरि फैलल, आ सूर्यक उजास निर्मल भऽ गेल।’ ‘सुग्गाक सभ दल अपन-अपन इच्छित स्थान दिस उड़ि चुकल छल। घोंसलामे सभ बच्चा चुपचाप बैसल होइतो गहन निस्तब्धताक कारण वृक्ष सूना लगैत छल। पिता अपन घोंसलामे छलाह। हमर पाँख एखन पूरा निकललो नहि छल, बल सेहो नहि छल; हम हुनकर लग खोखरमे बैसल छलहुँ। अचानक वनमे आखेटक कोलाहल सुनलहुँ। ओ प्रत्येक वनजीवकेँ भयभीत करैत छल; हड़बड़ीमे उड़ैत पक्षिक पाँखक ध्वनिसँ लम्बा होइत; डरायल हाथीक बच्चाक चीत्कारसँ मिश्रित; हिलल लतासँ विचलित मत्त भौंराक गुञ्जारसँ बढ़ैत; थुथुन उठौने घुमैत वराहक आवाजसँ भरल; पर्वत-गुफामे निद्रासँ जागल सिंहक गर्जनसँ फूला उठल। मानू वृक्षकेँ हिला रहल हो; भगीरथ द्वारा उतारल गङ्गाक प्रचण्ड धाराक कोलाहल जकाँ विशाल छल। वनदेवीसभ भयभीत भऽ ओकरा सुनैत छलीह।’ ‘एहन अनजान ध्वनि सुनि बाल्यावस्थाक कारण हम काँपए लगलहुँ। कानक गुहा मानू फाटि जेबाक छल। भयभीत भऽ सोचलहुँ जे लगमे पिता छथि, ओ हमरा बचा सकैत छथि; तेँ बुढ़ाड़ीसँ ढील हुनकर पाँखक भीतर घुसि गेलहुँ।’ ‘तत्क्षण चारू कात पुकार सुनाइत पड़ल—“एम्हरसँ झुण्डक अगुआ हाथीसँ रौंदल कमलवनक गन्ध अबैत अछि! एम्हरसँ वराहसँ चिबाओल नरकटको गन्ध! एम्हरसँ हाथीक बच्चासँ तोड़ल सुगन्धित रालक तीक्ष्ण सुवास! एम्हरसँ झाड़ि खसाओल सूखल पातक सरसराहट! एम्हरसँ जङ्गली महिषक वज्र-सदृश सींगसँ फोड़ल दीमक-ढेरीक धूर! एम्हर मृगक झुण्ड गेल! एम्हर जङ्गली हाथीक दल! एम्हर वराहक टोली! एम्हर वनमहिषक भीड़! एम्हरसँ मयूर-मण्डलक केकारव! एम्हरसँ तीतरक गुञ्जन! एम्हरसँ मछलीमार पक्षीक पुकार! एम्हरसँ सिंहक नखसँ ललाटास्थि फाटल हाथीक करुण गर्जना! ई ताजा कादोसँ लथपथ वराहक बाट अछि! ई एखनहि खएल घासक रससँ श्याम भेल मृगक जुगालीक फेनक ढेरी अछि! ई बहैत मदजलसँ हाथीक ललाट रगड़लापर छूटल सुगन्धपर चिपकल वाचाल भौंराक गुञ्जार अछि! ओ मुरझायल पातपर टपकल रक्तसँ गुलाबी रुरु-मृगक पथ अछि! ओ हाथीक पएरमे कुचल वृक्षक पल्लवक ढेरी अछि! ओतय गैंडा क्रीड़ा कएने अछि! ओ सिंहक पदचिह्न अछि—हाथीक रक्तरञ्जित मोतीक टुकड़ासँ खुरदुरा, नखक विकराल आकृतिसँ अङ्कित! ओ नवजात हरिणशावकक रक्तसँ लाल धरती अछि! ओ स्वच्छन्द विचरैत झुण्डपति हाथीक मदजलसँ श्याम, विधवाक वेणी जकाँ पथ अछि! सोझाँ जाइत याकक एहि पङ्क्तिक सोझे अनुसरण करू! जतय मृगक गोबर सूखल अछि, वनक ओ भाग तुरन्त घेरू! वृक्षक शिखरपर चढ़ू! एहि दिशामे ताकू! ई आवाज सुनू! धनुष उठाउ! अपन स्थानपर ठाढ़ रहू! कुकुर छोड़ू!” आखेटमे तल्लीन, एक-दोसराकेँ चिचिया कऽ निर्देश दैत आ वृक्षक खोखरमे नुकायल मनुष्यक दलक कोलाहलसँ वन काँपि उठल।’ ‘तखन किछुए कालमे ओ वन चारू कात सँ काँपि उठल। शबरसभक बाण सँ बिद्ध सिंहसभक गर्जना पर्वतक खोहमे टकरा कऽ घुरैत प्रतिध्वनि सँ आरो गम्भीर भऽ गेल छल आ नव तेल लगाओल नगाड़ाक ध्वनि जकाँ प्रचण्ड छल; भयभीत झुंड सँ अलग भऽ एकसरि आगाँ बढ़ैत गजराजसभक कण्ठ सँ मेघ-गर्जनासदृश हुंकार उठैत छल, जाहिमे हुनकर सूँड़िक निरन्तर फटकार घुलल छल; कुकुरसभ जखन एकाएक हरिणसभक अंग नोचि देलक, तखन भय सँ थरथर करैत नेत्रबाली हरिणीसभक करुण चीत्कार उठल; अपन स्वामी आ झुंडक नायकक मृत्यु सँ शोकाकुल हथिनीसभ, बच्चासभ केँ पाछाँ लऽ, कान ठाढ़ कऽ चारू दिस भटकैत आ बेर-बेर कोलाहल सुनबाक लेल ठमकि कऽ, लम्बा विलाप करैत छल; किछुए दिन पहिने जन्मल, भगदड़िमे बिछुड़ल बच्चासभ केँ गर्दनि पसारि ताकैत गैंडा-मादासभक डकार गूँजैत छल; गाछक फुनगी सँ उड़ि भ्रमित भऽ इमहर-ओमहर भटकैत पक्षीसभक कलरव पसरल छल; वेग लेल बनल अंगसभक सम्पूर्ण चपलता सँ दौड़ैत मृग-झुंडक असंख्य पएर एक्के बेर धरती पर पड़ैत मानू ओकरा कम्पायमान कऽ रहल हो; कान धरि तानल धनुषसभक टंकार, बरसैत बाणसभक बीच अपन प्रियक लेल चीत्कार करैत मादा कुरर पक्षीसभक स्वरमे मिलि रहल छल; वेग सँ चलैत तलवारक धार वायु केँ चीरैत महिषसभक कठोर काँध पर पड़ि टकराइत छल; आ कुकुरसभक अचानक उठल भौंक वनक प्रत्येक गुप्त कोन धरि पैसि गेल छल।’ ‘किछु कालक बाद आखेटक कोलाहल शान्त भऽ गेल आ वन सेहो एना निश्चल भऽ गेल, जेना मन्थन रुकलापर समुद्रक जल स्थिर भऽ जाइत अछि, अथवा वर्षा ऋतु बीतलापर मेघसमूह मौन भऽ जाइत अछि। हमर भय कने घटल आ मनमे कौतूहल जागल। तेँ हम पिताक आलिङ्गन सँ कनेक बाहर सरकि, कोटरमे ठाढ़ भऽ गर्दनि पसारलहुँ। बाल्यावस्थाक कारणेँ एखनहुँ भय सँ काँपैत आँखि सँ, ई कोन वस्तु अछि से देखबाक उत्कण्ठामे, हम ओहि दिशा दिस नजरि फेरलहुँ।’ ‘हम अपन सोझाँ शबरसभक विशाल सेना केँ वन सँ बाहर अबैत देखलहुँ। ओ अर्जुनक सहस्र भुजा सँ मथल नर्मदाक प्रवाह जकाँ छल; पवन सँ हिलैत तमालवन जकाँ; कृष्णपक्षक सभ राति केँ एक ठाम समेटि देल गेल हो तकरा जकाँ; भूकम्प सँ काँपैत अञ्जनक ठोस स्तम्भ जकाँ; सूर्यक किरण सँ विचलित अन्हारक उपवन जकाँ; विचरैत मृत्युदूतसभ जकाँ; नरक फोड़ि ऊपर उठि आयल राक्षस-लोक जकाँ; एकत्रित दुष्कर्मसभक भीड़ जकाँ; दण्डकारण्यवासी असंख्य मुनिसभक शापसभक यात्रा-दल जकाँ; रामक अविरत बाणवर्षा सँ बिद्ध दूषण आ खरक सम्पूर्ण सेना, जे हुनका प्रति द्वेषक कारण राक्षस बनि गेल हो, तकरा जकाँ; कलियुगक समस्त बन्धुत्व एकत्र भऽ गेल हो तकरा जकाँ; पानिमे पैसबाक लेल उद्यत महिष-झुंड जकाँ; पर्वत-शिखर पर ठाढ़ सिंहक पंजाक प्रहार सँ फाटल घनघोर मेघसमूह जकाँ; समस्त रूप-विनाशक लेल उठल उल्का-पुञ्ज जकाँ। ओ सेना वन केँ अन्हार कऽ रहल छल, हजारो-हजारक संख्यामे छल, महाभय उत्पन्न करैत छल आ अनिष्टक सूचना देनिहार राक्षस-समूह जकाँ बुझाइत छल।’ ‘ओहि विराट शबर-समूहक बीच हम मातङ्ग नामक शबर-नायक केँ देखलहुँ। ओ एखन नवयुवक छल, मुदा एतेक कठोर जे लोहाक बनल बुझाइत छल; मानू एकलव्य दोसर जन्म लेने हो। उगैत दाढ़ी सँ ओ पहिल मदरेखा सँ कनपटी घेराओल तरुण राजहाथी जकाँ लगैत छल। ओकरा सँ झहरैत श्याम कमल-सदृश कान्ति यमुनाक जल जकाँ सम्पूर्ण वन भरि रहल छल। काँध पर लटकल, अग्रभागमे घुँघरायल घनगर केश एना छल, जेना हाथीक मद सँ रँगायल अयालबला सिंह। ओकर ललाट चौड़ा आ नाक कठोर, ऊँच आ वक्र छल। एक कानमे पहिरल मणिमय सर्पफणक हलुक गुलाबी किरण सँ ओकर बाम पार्श्व लालिमा लऽ चमकि रहल छल, मानू पातक बिछाओन पर सुतबाक कारण कोमल कोपलक रङ्ग ओकर देहमे लागि गेल हो। नव मारल हाथीक गण्डस्थल सँ लागल सप्तच्छद-पुष्पक सुगन्धयुक्त मद सँ ओकर देह सुवासित छल, मानू कृष्णागरुक लेप हो। ओहि गन्ध सँ मतायल आ आँखि भरमायल भ्रमरसभ ओकर चारू दिस तमाल-डाढ़ि अथवा मयूरपिच्छक छत्र जकाँ उड़ि ओकरा घाम सँ बचा रहल छल। हाथ सँ गाल पोंछलाक कारण पसेनाक रेखा पड़ल छल; से एना बुझाइत छल, जेना ओकर प्रबल भुजा सँ जीतल विन्ध्यवन अपन हिलैत कोमल टहनिसभक रूपमे संकोचपूर्वक ओकरा प्रणाम चढ़ा रहल हो। ओकर कने रक्ताभ आँखि दिशा-दिशा केँ लाल करैत, मानू मृगसभक लेल प्रलय-रात्रिक सन्ध्या पसारि रहल हो। ओकर विशाल भुजा ठेहुन धरि पहुँचैत छल, मानू ओकर रचना करैत काल हाथीक सूँड़िक माप लेल गेल हो। काली केँ रक्तबलि देबाक हेतु बेर-बेर प्रयुक्त तीक्ष्ण अस्त्रक घाव सँ ओकर काँध खुरदुर छल। आँखिक चारूकातक विस्तृत भाग विन्ध्याचल जकाँ प्रभामय छल; ताहि पर सूखल मृगरक्तक बूँद आ पसेनाक चिह्न एना शोभित छल, जेना गुञ्जाफलमे हाथीक मस्तकक मोती मिला देल गेल हो। निरन्तर कठोर परिश्रम सँ ओकर वक्ष घावक चिह्न सँ भरल छल। ओ किरमिजी रङ्ग सँ लाल रेशमी वस्त्र पहिरने छल, आ ओकर दृढ़ टाङ्गसभ हाथीक मद सँ रँगायल दूटा गज-स्तम्भक उपहास करैत छल। ओकर निष्कारण उग्रताक कारण भयानक ललाट पर तीन रेखाबला भ्रूकुटि मानू तीन ध्वजा बनि गेल छल; एना बुझाइत छल जे महाभक्ति सँ प्रसन्न दुर्गा ओकर सेवक होयबाक चिह्नस्वरूप त्रिशूल अंकित कऽ देने होथि। ओकर संग सभ रङ्गक कुकुर छल, जे ओकर आत्मीय मित्र जकाँ छल। थाकनि सँ हुनकर सुखायल जीह बहुत दूर धरि बाहर लटकि रहल छल, मुदा स्वाभाविक लालिमा सँ एना बुझाइत छल मानू मृगरक्त टपका रहल हो। खुलल मुँहक उठल ओंठक कोन सँ चमकैत दाँत स्पष्ट देखाइत छल, मानू सिंहक अयाल दाँतक बीच फँसल हो। गरा कौड़ीक माला सँ आच्छादित छल आ पैघ वराहसभक दन्त-प्रहार सँ देह कटायल छल। आकारमे छोट होइतहुँ अपार बलक कारण ओसभ बिना अयालक सिंहशावक जकाँ छल। ओसभ हरिणीसभ केँ विधवा बनयबामे निपुण छल; हुनकर संग हुनकर विशाल मादासभ सेहो आबि रहल छल, मानू सिंहनीसभ सिंहसभक लेल अभयदान माँगय आबि रहल हो। चारू दिस नाना प्रकारक शबर-दल छल। केओ हाथीक दाँत आ याकक लम्बा रोम लेने छल; केओ कसि कऽ बान्हल पातक मधु-पात्र; केओ सिंह जकाँ हाथीक मस्तक सँ भेटल अनेक मोती मुट्ठीमे भरने छल; केओ राक्षस जकाँ काँच मांसक टुकड़ी; केओ पिशाच जकाँ सिंहक खाल; केओ जैन मुनि जकाँ मयूरपिच्छ; केओ बालक जकाँ कौआक पाँख पहिरने छल। केओ उखाड़ल गजदन्त ढोइत कृष्णक पराक्रमक अभिनय करैत छल; केओ वर्षा-दिन जकाँ मेघवर्ण वस्त्र पहिरने छल। ओकर तलवारक म्यान वनक गैंडा जकाँ, आ नवमेघ जकाँ ओकर हाथमे मयूरपिच्छ-सदृश चमकीला धनुष छल। बकासुर जकाँ ओकर अद्वितीय सेना छल; गरुड़ जकाँ ओ अनेक विशाल नागक दाँत उखाड़ने छल; भीष्मक शिखण्डी प्रति वैर जकाँ ओकर मयूर सँ बैर छल; ग्रीष्म-दिन जकाँ ओकरा सदा मृगक पियास लागल रहैत छल; दिव्य प्राणी जकाँ गर्वमे उद्दाम छल; व्यास जहिना योजनगन्धाक पाछाँ गेलाह, तहिना ओ कस्तूरी-मृगक पाछाँ पड़ैत छल; घटोत्कच जकाँ ओकर रूप भयावह छल। उमाक जटा जहिना शिवक चन्द्र सँ शोभित छल, तहिना ओ मयूरपिच्छक नेत्रसदृश चिह्न सँ सजल छल। महावराहक दन्त सँ हिरण्यकशिपुक वक्ष जहिना विदीर्ण भेल, तहिना ओकर छाती पैघ वराहक दन्त सँ फाटल छल। महत्त्वाकांक्षी पुरुष जकाँ ओकर चारू दिस बन्दीसभक पाँति छल; राक्षस जकाँ ओकरा व्याध प्रिय छल; स्वरग्राम जकाँ निषादसभ सँ घेरायल छल; दुर्गाक त्रिशूल जकाँ महिषरक्त सँ भिजल छल। अवस्था सँ बहुत नव होइतहुँ ओ अनेक प्राणक अन्त देख चुकल छल। असंख्य कुकुर रहितहुँ स्वयं कन्द-मूल-फल पर जीवैत छल। कृष्णवर्ण होइतहुँ दर्शनमे सुन्दर नहि छल। मनमाना विचरितहुँ पर्वतीय दुर्गे ओकर एकमात्र शरण छल। पृथ्वीपति पर्वतक चरणमे निरन्तर रहितहुँ राजा-सेवामे अनभिज्ञ छल।’ ‘ओ विन्ध्याचलक पुत्र, मृत्युक अंशावतार, दुष्टताक सहोदर आ कलियुगक साकार सार जकाँ छल। रूप भयङ्कर होइतहुँ स्वाभाविक महत्ता सँ आदरजनक भय जगबैत छल; ओकर देह-संरचना अतुलनीय छल। बादमे हम ओकर नाम जानलहुँ। तखन हमर मनमे ई विचार उठल—“अहो, एहि लोकसभक जीवन कोना मूर्खता सँ भरल अछि आ सज्जनसभ हुनकर आचरणक निन्दा करैत छथि! दुर्गा केँ मनुष्यक मांस चढ़ेनाइ हुनकर एकमात्र धर्म; मांस, मदिरा आदिक ओ भोजन सज्जनसभ लेल घृणित; आखेट हुनकर व्यायाम; सियारक चीत्कार हुनकर शास्त्र; उल्लू हुनकर शुभ-अशुभक गुरु; पक्षीक विषयमे दक्षता हुनकर ज्ञान; कुकुर हुनकर अन्तरङ्ग मित्र; निर्जन वन हुनकर राज्य; मदिरापानक गोष्ठी हुनकर उत्सव; क्रूर कर्म करनिहार धनुष हुनकर सखा, आ सर्प जकाँ विष-लिप्त नोकबला बाण हुनकर सहायक। भ्रमित मृग केँ आकर्षित करनिहार ध्वनि हुनकर गीत; बन्दी बनाओल पर-स्त्री हुनकर पत्नी; हिंस्र बाघक संग हुनकर निवास; पशुरक्त सँ देवपूजा, मांस सँ यज्ञ, चोरी सँ जीविका; सर्पफण हुनकर आभूषण; हाथीक मद हुनकर अङ्गराग; आ जाहि वनमे ओसभ बसैत अछि तकरा जड़ि-डाढ़ि सहित उजाड़ि देनाइ हुनकर स्वभाव।”’ ‘हम एहि प्रकारेँ सोचिये रहल छलहुँ कि वनमे भटकैत थाकल शबर-नायक विश्राम करबाक इच्छासँ ओतए आयल। ओ ओही शाल्मली-वृक्षक छाहरिमे धनुष राखि, अनुचरसभ द्वारा शीघ्रतासँ बटोरल टहनीक आसन पर बैसि गेल। दोसर एक तरुण शबर दौड़ैत झील धरि गेल, हाथ सँ जल हिला कऽ कमल-पराग सँ सुवासित पानि आ नव तोड़ल, माटि धोएल उज्ज्वल कमलनाल आनलक। ओ पानि द्रव नीलमणि जकाँ छल; मानू प्रलय-दिनक सूर्यताप सँ आकाशक एक टुकड़ी पघिलि कऽ ओहिमे पड़ल हो; अथवा चन्द्रमण्डल सँ टपकल हो; अथवा पघिलल मोतीक राशि हो; अथवा अत्यन्त निर्मलताक कारण बरफ बनि जमि गेल हो आ स्पर्शे सँ बरफ सँ भिन्न बुझाइत हो। पानि पीबि शबर-नायक क्रमशः कमलनालसभ केँ एना खा गेल जेना राहु चन्द्रक कलासभ केँ ग्रसैत अछि। थाकनि मिटलापर ओ उठल आ पियास बुझा लेने सम्पूर्ण दलक संग धीरे-धीरे अपन अभीष्ट दिशा दिस चलि गेल। मुदा ओहि बर्बर दलक एक बूढ़ शबर केँ मृग-मांस नहि भेटल छल। मांसक लालसा सँ ओकर मुख पर राक्षसी भाव उभरि आयल, तेँ ओ ओहि गाछ लग किछु काल रुकि गेल। शबर-नायकक ओझराइते, रक्तबिन्दु जकाँ गुलाबी आँखि आ ऊपर झुकल पीयर भौंहक कारण भयङ्कर देखाइत ओ वृद्ध मानू हमरा सभक प्राण पीबि रहल छल। पक्षी-मांस चखबाक उतावला बाज जकाँ ओ सुग्गासभक खोंताक गिनती करैत बुझाइत छल; गाछक तना सँ ऊपर धरि नजरि दौड़ा कऽ चढ़बाक इच्छा कयलक। ओकरा देखिते सुग्गासभ मानू अन्तिम साँस लऽ लेलक। निर्दयी लेल कठिन की? अनेक ताड़क बराबर ऊँच आ मेघ छुबैत डाढ़िबला ओ गाछ ओ सहजहि चढ़ि गेल, मानू सीढ़ी लागल हो। डाढ़ि-डाढ़ि सँ ओ एक-एक कऽ सुग्गाक बच्चा फल जकाँ तोड़य लागल। केओ उड़बाक योग्य नहि भेल छल; केओ किछुए दिनक, जन्मक गुलाबी रोआँ सँ एना रंगल जे कपासक फूल बुझाइत; ककरो नव फुटैत पाँख नव कमलपात जकाँ; केओ आकक फल जकाँ; लाल होइत चोंचबला केओ धीरे-धीरे खुलैत पातक बीच सँ गुलाबी माथ उठबैत कमलकलीक शोभा धारण कयने छल। किछु बच्चा निरन्तर माथ हिला कऽ मानू ओकरा रोकबाक निष्फल निषेध करैत छल; मुदा ओ हत्यारा सभ केँ मारि-मारि धरती पर फेकि देलक।’ ‘अचानक अपना पर आयल एहि विशाल, विनाशकारी, निरुपाय आ सभ किछु दबा देनिहार विपत्ति केँ देखि हमर पिता दुगुना काँपि उठलाह। मृत्यु-भय सँ हुनकर पुतली थरथरा कऽ इमहर-ओमहर घूमय लागल; शोक सँ शून्य आ नोर सँ धुँधलायल दृष्टि ओ चारू दिस फेरलनि। तालु सुखा गेल छल, अपन रक्षाक कोनो उपाय नहि छल; तथापि भय सँ जोड़ शिथिल भऽ गेल पाँख सँ हमरा झाँपि लेलनि आ सोचय लगलाह जे एहन क्षणमे कोन उपाय काज आबि सकैत अछि। पुत्र-स्नेह सँ पूर्णतः विवश, हमरा कोना बचाओल जाए से बुझि नहि पबैत, की करथि से असमञ्जसमे, ओ हमरा छाती सँ सटा कऽ ठाढ़ रहलाह। ओ पापी डाढ़ि-डाढ़ि घूमैत कोटरक मुँह धरि आबि गेल। ओ अपन बाम भुजा भीतर पसारलक—पुरान करिया सर्पक देह जकाँ भयङ्कर; हाथ सँ अनेक वराहक काँच चरबीक दुर्गन्ध अबैत; निरन्तर धनुषक डोरी तानबाक कारण बाँहि पर पड़ल धारीसभ सँ मृत्युदण्ड जकाँ। पिता चोंच सँ बेर-बेर प्रहार करैत आ करुण स्वरमे कानैत रहलाह, मुदा ओ हत्यारा हुनका घीचि बाहर निकाललक आ मारि देलक। हम पाँखक भीतर छोट भऽ भय सँ गोल-मटोल सिकुड़ल छलहुँ, आ भाग्यवश हमर नियत आयु एखन शेष छल; तेँ ओकर नजरि हमरा पर नहि पड़ल। ओ पिताक गर्दनि मरोड़ि मृत देह नीचाँ फेकि देलक। हम पिताक पएरक बीच गर्दनि घुसौने, हुनकर छाती सँ चुपचाप सटल, हुनके संग नीचाँ खसलहुँ। भाग्यवश जीवबाक किछु आयु शेष छल, तेँ पवन सँ बटोरल सुखायल पातक मोट ढेरी पर पड़लहुँ आ अंग नहि टूटल। शबर एखन गाछक फुनगी सँ उतरिये रहल छल। हमरा पिताक संग मरि जेबाक चाही छल, तथापि निर्दयी जकाँ हुनका छोड़ि देलहुँ। अत्यन्त बालक होयबाक कारण परिपक्व अवस्थाक स्नेह-बोध हमरा नहि छल; जन्मजात प्राण-भय पूर्ण रूपेँ हमरा वशमे कऽ लेने छल। खसल पातसँ रङ्ग मिललाक कारण हम प्रायः देखाइ नहि रहल छलहुँ। नव उगैत पाँखक सहारा सँ लड़खड़ाइत, मृत्युक मुँह सँ बचि निकललहुँ एना सोचैत, लगहिक एक विशाल तमाल-वृक्षक जड़ि धरि पहुँचलहुँ। ओकर कोपल शबर-स्त्रीसभक कानक आभूषण बनबाक योग्य छल; ओकर नीलिमा मानू बलरामक गाढ़ नील वस्त्रक रङ्ग सँ विष्णुक शरीरक शोभाक उपहास करैत हो, अथवा यमुनाक निर्मल जलक पट्टीसभ पहिरने हो। जङ्गली हाथीक मद सँ ओकर टहनीसभ सिञ्चित छल; ओ विन्ध्यवनक केशराशिक शोभा धारण कयने छल; डाढ़िक बीच दिनहिमे अन्हार रहैत; जड़िक चारूकातक भूमि खोह-सदृश आ सूर्यक किरण सँ अस्पर्शित छल। हम ओहिमे एना पैसलहुँ जेना अपन पुण्यात्मा पिताक वक्षमे शरण लऽ रहल होइ। शबर नीचाँ उतरि धरती पर छितरायल नन्हका सुग्गासभ केँ बटोरलक, लता सँ बान्हल पातक टोकरीमे जल्दी-जल्दी भरलक, आ अपन नायकक पदचिह्नबला बाट पकड़ि तेज डेग सँ ओहि दिशा दिस चलि गेल। हम एखन जीवनक आशा करय लगलहुँ, मुदा पिताक ताजा मृत्युशोक सँ हृदय सुखा रहल छल; ऊँचाई सँ खसबाक पीड़ा देहमे छल; भय सँ उपजल असह्य पियास समस्त अंग केँ यातना दऽ रहल छल। “दुष्ट एखन किछु दूर चलि गेल होयत,” ई सोचि हम कनेक माथ उठेलहुँ। भय सँ काँपैत आँखि सँ चारू दिस तकैत, घासक पातो हिलिते बुझैत छलहुँ जे ओ पापी घुरि रहल अछि। ओकरा डेग-डेग दूर जाइत देखलाक बाद तमालक जड़ि छोड़ि हम पानि दिस घिसकबाक भारी प्रयत्न कयलहुँ। पाँख एखन पूर्ण नहि उगल छल, तेँ डेग दुर्बल छल; बेर-बेर मुँहक बल खसि पड़ैत छलहुँ; एक पाँखक सहारा लैत छलहुँ। भूमि पर घिसकबाक अभ्यास नहि रहने आ परिश्रमक कारण शक्तिहीन भऽ गेलहुँ। प्रत्येक डेगक बाद माथ उठबैत, जोर-जोर सँ हाँफैत, आ आगाँ सरकैत-सरकैत धूरि सँ धूसर भऽ गेलहुँ। मनमे सोचलहुँ—“सचमुच कठिनतम विपत्तिमे सेहो जीव अपन प्राण सँ उदासीन नहि होइत अछि। सृष्टिक सभ प्राणी लेल जीवन सँ प्रिय एहि संसारमे दोसर किछु नहि। हमर पूज्य पिता, जिनकर नाम हुनकर गुणक अनुरूप छल, मरि गेलाह, तैयो हमर इन्द्रिय अक्षत अछि आ हम जीवित छी! धिक्कार अछि हमरा—हम एतेक कठोर, निर्दयी आ कृतघ्न छी! पिताक मृत्युशोक एतेक सहजता सँ सहि कऽ हमर जीवन लज्जाजनक रूपेँ चलिये रहल अछि। हम उपकारक कोनो मान नहि रखैत छी; निश्चय हमर हृदय नीच अछि। माता मरलाक बाद पिता कोना अपन तीव्र शोक रोकने रहथि, आ हमर जन्मदिन सँ वृद्ध होइतहुँ गहन स्नेहवश पालन-पोषणक भारी श्रम केँ तुच्छ मानि सभ प्रकारेँ हमर देखभाल कयलनि—ई सभ सेहो हम बिसरि गेलहुँ। एक क्षणमे हुनकर सम्पूर्ण रक्षा-स्नेह बिसरा देलहुँ! “हमर ई प्राण अत्यन्त अधम अछि, जे हमर एतेक उपकारी पिताक पाछाँ तुरन्त नहि निकलि जाइत अछि। निश्चय जीवनक पियास सभकेँ कठोर बना दैत अछि; नहि तँ एहि दशामे पानि लेल श्रम करबाक इच्छा हमरा कोना होइत? हमरा बुझाइत अछि जे पानि पीबाक ई विचार हृदयक कठोरते अछि, कारण पिताक मृत्युशोक केँ हम हलुक मानि रहल छी। झील एखनहुँ दूर अछि। जलदेवीक नूपुर जकाँ कलहंसक स्वर दूरहि सँ अबैत अछि; सारसक ध्वनि धुँधला अछि; दूरी अधिक रहने कमलवनक सुगन्ध कदाचित् हावाक बाट सँ घिसकैत एतए धरि पहुँचैत अछि। मध्याह्न असह्य भऽ गेल; सूर्य आकाशक बीचमे ठाढ़ भऽ निरन्तर अग्निमय धूरि जकाँ प्रचण्ड ताप बरसा रहल अछि आ हमर पियास आरो बढ़ा रहल अछि। गरम, घन धूरिबाली धरती पर चलब कठिन अछि; अत्यधिक पियास सँ थाकल अंग कनेकहु आगाँ नहि बढ़ि सकैत अछि; हमरा अपनापर अधिकार नहि; हृदय डूबि रहल अछि; आँखिक सोझाँ अन्हार भऽ रहल अछि। काश, ओ निर्दयी भाग्य आब ओ मृत्यु दऽ दिअए, जकर इच्छा करबाक साहस एखनहुँ हमरा नहि होइत अछि!” हम एना सोचिये रहल छलहुँ। झील सँ बेसी दूर नहि जाबालि नामक एक महान तपस्वीक आश्रम छल। हुनकर पुत्र, तरुण मुनि हारीत, स्नान करबाक लेल कमल-सरोवर दिस आबि रहल छलाह। ब्रह्माक पुत्र जकाँ समस्त ज्ञान सँ हुनकर मन निर्मल छल। अपन उमेरक अनेक पवित्र तरुणक संग ओ ओही बाटे आबि रहल छलाह, जतए हम पड़ल छलहुँ। द्वितीय सूर्य जकाँ प्रचण्ड तेजक कारण हुनकर रूप दिस तकब कठिन छल। एना बुझाइत छल जे उदित सूर्य सँ झरि पड़ल होथि; अंग बिजुली सँ गढ़ल आ आकृति पघिलल सोन सँ चित्रित हो। देह सँ फूटैत स्वच्छ पीयर-लाल कान्ति वनाग्नि अथवा नव प्रभातक सूर्यप्रकाशक शोभा प्रकट करैत छल। तपल लोहा जकाँ लाल, अनेक तीर्थक जल-छिड़काव सँ पवित्र, घन जटा काँध पर लटकि रहल छल। खाण्डववन जरयबाक इच्छासँ तरुण ब्राह्मणक छलरूप लेने अग्निदेव जकाँ हुनकर जटाजूट बान्हल छल। दहिना कान सँ उज्ज्वल स्फटिकक जपमाला लटकि रहल छल, मानू आश्रम-देवीक नूपुर हो, अथवा सभ सांसारिक सुख केँ हटयबाक लेल घुमाओल धर्माज्ञाक चक्र। ललाट पर भस्मक त्रिपुण्ड्र मानू त्रिविध सत्यक चिह्न छल। बाम हाथ स्फटिकक कमण्डलु पर राखल छल, जकर गर्दनि सदा ऊपर उठल, मानू स्वर्गक बाट देखबाक लेल आकाश दिस तकैत सारस। काँध सँ लटकल कृष्णमृगचर्म सँ ओ आच्छादित छल; ओकर धूमिल नीलाभ चमक एना बुझाइत छल, जेना तपस्याक पियासमे निगलल घन धुआँ फेर बाहर निकलि आयल हो। बाम काँध पर यज्ञोपवीत एतेक हलुक छल जे नव कमलनालक तन्तु सँ बनल बुझाइत; पवनमे डोलैत ओ मानू मांसहीन पसलीक रेखा गिनि रहल हो। दहिना हाथमे आषाढ़-दण्ड छल, जकर शीर्ष पर शिवपूजाक लेल तोड़ल लता-पुष्प सँ भरल पातक टोकरी राखल छल। आश्रमक एक हरिण हुनका पाछाँ-पाछाँ आबि रहल छल; सींग सँ खोदल स्नान-भूमिक माटि एखनहुँ ओकरा पर लागल छल; मुनिसभक संग पूर्णतः घरेलू बनि गेल छल; चाउरक कौर खाइत छल आ ओकर आँखि चारू दिस कुशक फूल आ लतासभ पर घूमैत छल। वृक्ष जकाँ ओ कोमल वल्कल सँ ढकल छलाह; पर्वत जकाँ मेखला सँ घेरायल; राहु जकाँ बेर-बेर सोमक रस चखने; दिनमे खिलल कमलवन जकाँ सूर्यक किरण पीबैत। नदीक कातक वृक्ष जकाँ हुनकर जटा निरन्तर स्नान सँ पवित्र; तरुण हाथी जकाँ दाँत चन्द्रकमलक पाँखुरीक टुकड़ी जकाँ उज्ज्वल। द्रोणपुत्र जकाँ कृप सदा हुनकर संग; राशिचक्र जकाँ चितकबर मृगक चर्म सँ विभूषित। ग्रीष्म-दिन जकाँ अन्धकाररहित; वर्षा-ऋतु जकाँ कामनाजनित आँखि-अन्हरायल धूरि शान्त कऽ देने; वरुण जकाँ जलमे निवासशील; कृष्ण जकाँ नरकक भय दूर कऽ देने। आरम्भिक सन्ध्या जकाँ भोरक अरुणिमा-सदृश पीयर-लाल आँखि; प्रभात जकाँ नव सूर्यक सोनाली आभा सँ रञ्जित। सूर्यक रथ जकाँ अपन गति पर नियन्त्रण रखने; सुयोग्य राजा जकाँ शत्रुक गुप्त छल निष्फल कऽ देने। समुद्र जकाँ ध्यानक गह्वर सँ कनपटी गंभीर; भगीरथ जकाँ अनेक बेर गङ्गावतरण देख चुकल; भ्रमर जकाँ जल-सिञ्चित वनमे जीवनरसक स्वाद लैत। वनवासी होइतहुँ महान् गृहमे प्रवेश कयने; बन्धनरहित होइतहुँ मोक्षक आकांक्षी; शान्तिकर्ममे तत्पर होइतहुँ दण्ड धारण कयने; सुतल होइतहुँ जाग्रत; दूटा सुस्थिर आँखि रहितहुँ बाम दृष्टिक दोष नष्ट कऽ देने। एहन हारीत स्नान करबाक लेल कमल-सरोवरक कात आबि रहल छलाह।’ ‘सज्जनक मन स्वभावहि सँ करुणामय आ दयालु होइत अछि। अतएव हमर अवस्था देखि हारीतक हृदय दया सँ भरि गेल। लग ठाढ़ दोसर तरुण तपस्वी सँ कहलनि—“ई अधउगल पाँखबला नन्हका सुग्गा कोनो प्रकारेँ ओहि गाछक फुनगी सँ खसल अछि, अथवा सम्भवतः बाजक मुँह सँ छुटल अछि। बहुत ऊँच सँ खसलाक कारण एखरामे प्राण नाममात्र शेष अछि। आँखि मुनल अछि, बेर-बेर मुँहक बल खसि पड़ैत अछि, जोर-जोर सँ हाँफैत आ चोंच खोलैत अछि, गर्दनि ठाढ़ नहि राखि सकैत अछि। प्राण निकलय सँ पहिने एकरा उठा लिअ; पानि लग लऽ चलू।” एना कहि ओ हमरा झीलक कात लऽ गेलाह। ओतए पहुँचि अपन दण्ड आ कमण्डलु जलक कात राखलनि। जखन हम सभ प्रयत्न छोड़ि देने छलहुँ, तखन स्वयं हमरा हाथमे लऽ माथ उठेलनि आ अँगुरी सँ किछु बूँद पानि पिऔलनि। जल छिड़कलाक बाद नव साँस भेटल तखन हमरा कमलपातक छाहरिमे राखि स्वयं स्नान कयलनि। स्नानक बाद रक्तकमल लऽ सूर्यमण्डल केँ अर्घ्य देलनि, आ हमरा संग लऽ आश्रम दिस चलि पड़लाह।’ ‘किछुए दूर गेलापर हम फूल-फल सँ भरल घन वनक बीच नुकायल तपोवन देखलहुँ।’ ‘ओकर परिसर चारू दिस सँ प्रवेश करैत मुनिसभ सँ भरल छल। हुनका पाछाँ-पाछाँ वेद-पाठक मन्द गुंजन करैत, समिधा, कुश, फूल आ पवित्र माटि लेने शिष्यसभ आबि रहल छल। ओतए घैला भरबाक ध्वनि सुनबाक लेल मयूर उत्सुक रहैत छल। निरन्तर घृताहुति सँ तृप्त अग्निक लहराइत धुआँ मानू सशरीर मुनिवंश केँ देवतासभ धरि पहुँचयबाक लेल स्वर्गक पुल बनि उठल हो। चारू दिस सरोवर छल, जकर तरङ्ग पर तपस्वीसभक स्पर्श सँ मानू निष्कलङ्क भेल सूर्यकिरणक रेखा पसरल छल; हुनकर तपस्या देखय आयल सप्तर्षि मानू ओहिमे डुबकी लगा रहल होथि; रातिमे खिलल कुमुदिनीवन केँ ओ जल ऊपर उठबैत, मानू ऋषिसभक सम्मानक लेल नक्षत्रसमूह आकाश सँ उतरि आयल हो। पवन सँ झुकल लताक फुनगी आ निरन्तर झरैत फूलबला वृक्ष तपोवन केँ प्रणाम करैत छल। सुखायल धान आ फल-मूलक ढेरी लगायल छल। नव ब्राह्मणकण्ठ सँ वेदमन्त्र गूँजैत छल; सुग्गासभ यज्ञाहुतिक मन्त्र दुहरबैत आ मैना “सुब्रह्मण्य”क आह्वान करैत छल। कुक्कुट पिण्डदानक चाउर चुनैत, कलहंस जङ्गली धान खाइत। भोजनस्थल पवित्र भस्म सँ रक्षित छल। मयूरपिच्छक पङ्खा सँ होमाग्नि प्रज्वलित कयल जाइत, आ आहुतिक सुगन्ध चारू दिस पसरैत छल। अतिथि आदरपूर्वक भोजन पबैत, पितृगण तर्पित होइत, विष्णु, शिव आ ब्रह्माक पूजा होइत। श्राद्धक विधान, यज्ञविद्या, आचारशास्त्र, पोथी आ तकर अर्थक चर्चा निरन्तर चलैत छल। पर्णकुटी बनाओल जाइत, आँगन गोबर सँ नीपल जाइत, कुटीसभ धो-पोंछि स्वच्छ राखल जाइत। कतहु ध्यान, कतहु मन्त्र-जप, कतहु योगाभ्यास, कतहु वनदेवताक लेल बलि चलैत। मुञ्जक मेखला, वल्कल-वस्त्र, समिधा, मृगचर्म, कुश, कमलगट्टा, जपमाला आ बाँसक दण्ड सभ ठाम देखाइत छल। भ्रमणशील संन्यासीसभक स्वागत होइत, घैला जल सँ भरल जाइत, आ सम्पूर्ण आश्रम तप, अध्ययन, सेवा आ पवित्र अनुशासनक जीवन सँ स्पन्दित छल।’ ‘ओतए मलिनता केवल आहुतिक धुआँमे छल, आचरणमे नहि; मुखक लालिमा सुग्गामे छल, क्रोधी मनुष्यमे नहि; तीखापन घासक पातमे छल, स्वभावमे नहि; चञ्चलता केराक पातमे छल, मनमे नहि; लाल आँखि केवल कोइलीक छल; गर्दनि सँ लिपटनाइ केवल घैलासभक; मेखला बान्हनाइ व्रतमे छल, झगड़ामे नहि; पक्षपात केवल कुक्कुटक पाँख झुकबामे छल, शास्त्रार्थमे नहि; सोमाग्निक चारू दिस दक्षिणावर्त घूमबामे भ्रमण छल, शास्त्रमे भ्रान्ति नहि; आख्यानमे वसुसभक उल्लेख छल, धनक लालसा नहि; रुद्रक लेल जपमाला गिनल जाइत छल, देहक कोनो लेखा नहि; यज्ञक नियममे मुनिसभक केश काटल जाइत छल, मृत्युसँ सन्तानक क्षय नहि; रामायण-पाठ सँ राम केँ प्रसन्न कयल जाइत छल, यौवन सँ स्त्री केँ नहि; झुर्री बुढ़ाड़ी सँ पड़ैत छल, धनक घमण्ड सँ नहि; शकुनिक मृत्यु केवल महाभारतमे; व्यर्थ वायवी गप्प केवल पुराणमे; दाँत केवल बुढ़ाड़ीमे झड़ैत छल; शीतलता केवल उपवनक चन्दन-वृक्षमे; राख भेनाइ केवल अग्निक; गीत सुनबाक प्रेम केवल मृग केँ; नृत्यक चाह केवल मयूर केँ; फण केवल सर्प धारण करैत; फल केवल बानर चाहैत; आ नीचाँ दिस बढ़बाक वृत्ति केवल जड़िमे छल।’ ‘ओतए लाल अशोक-वृक्षक छाहरिमे—जे नव चढ़ाओल फूल सँ सुन्दर, ताजा गोबरक लेप सँ पवित्र, आ आश्रमक कन्यासभ द्वारा बान्हल कुश आ वल्कलक पट्टीक माला सँ सजल छल—हम पवित्र जाबालि केँ परम तपस्वी मुनिसभ सँ घेरायल देखलहुँ। ओ दृश्य एना छल, जेना काल युगसभ सँ, प्रलय-दिन सूर्यसभ सँ, यज्ञ तीन अग्नि धारण करनिहार ऋत्विकसभ सँ, सुवर्णपर्वत श्रेष्ठ पर्वतसभ सँ, अथवा पृथ्वी समुद्रसभ सँ घेरायल हो।’ ‘हुनका देखैत हम मनमे सोचलहुँ—“अहो, तपस्याक शक्ति कतेक महान् अछि! हुनकर रूप परम शान्त अछि, मुदा पघिलल सोन जकाँ निर्मल आ बिजुली जकाँ प्रखर तेज सँ आँखिक चमक केँ सेहो परास्त कऽ दैत अछि। सदा प्रशान्त रहितहुँ स्वाभाविक महिमाक कारण पहिल दर्शनहि मे भय-मिश्रित श्रद्धा उत्पन्न करैत अछि। अल्प तपस्या कयने तपस्वीक तेजो सूखल नरकट, कास अथवा फूल पर पड़ल अग्नि जकाँ सहजहि भड़कि उठैत अछि; तखन एहन महात्मासभक तेजक की कहब, जिनकर चरणक सम्मान सम्पूर्ण संसार करैत अछि, जिनकर कलुष तप सँ घिसि गेल अछि, जे दिव्य दृष्टि सँ सम्पूर्ण पृथ्वी केँ हथेलीक आँवला जकाँ देखैत छथि आ सभ पाप धो दैत छथि! महान् ऋषिक नाममात्र सुनलहुँ फलदायक होइत अछि, तखन हुनकर दर्शनक फल कतेक अधिक होयत! धन्य ई आश्रम, जतए ब्राह्मणसभक ई राजा निवास करैत छथि। नहि, धन्य तँ सम्पूर्ण जगत अछि, जकर भूमिपर पृथ्वीक साक्षात् ब्रह्मा जकाँ ई महापुरुष चलैत छथि। “निश्चय एहि मुनिसभक पुण्यक फल सिद्ध भेल अछि, जे दिन-राति दोसर कोनो कर्तव्य नहि राखि हुनकर सेवा करैत, पवित्र आख्यान सुनैत आ दोसर ब्रह्मा बुझि हुनके पर स्थिर दृष्टि रखने रहैत छथि। धन्य सरस्वती, जे हुनकर उज्ज्वल दाँतक घेरा भीतर कमल-सदृश मुखक सान्निध्य निरन्तर पबैत, अथाह गम्भीरता आ करुणाक भरल प्रवाहबला निर्मल मनमे मानसरोवरक हंसिनी जकाँ निवास करैत छथि। ब्रह्माक चारि कमल-मुखमे दीर्घकाल सँ रहैत चारू वेद केँ एतए अपन सर्वश्रेष्ठ आ सर्वाधिक उपयुक्त निवास भेटल अछि। कलियुगक वर्षाकालमे मलिन भऽ गेल समस्त विद्याशास्त्र हुनका लग पहुँचि शरदमे पैसल नदी जकाँ निर्मल भऽ जाइत अछि। निश्चय पवित्र धर्म कलियुगक उपद्रव दबा कऽ एतए घर बना लेने छथि आ आब सत्ययुग केँ स्मरण करबाक चिन्ता नहि करैत छथि। ई महात्मा पृथ्वी पर चलैत छथि, से देखि स्वर्ग सेहो सप्तर्षिक निवासक गर्व नहि करैत अछि। “बुढ़ाड़ी कतेक दुस्साहसी अछि, जे हुनकर घन जटा पर उतरबासँ नहि डरैत—ओ जटा चन्द्रकिरण जकाँ धवल आ प्रलयसूर्यक किरण जकाँ देखबामे कठिन अछि। बुढ़ाड़ी हुनका पर एना पड़ल अछि, जेना फेनकण सँ उज्ज्वल गङ्गा शिवपर, अथवा दूधक आहुति अग्निपर। अनेक हवनक घन धुआँ सँ अन्हार भेल तपोवनक स्वामी एहि मुनिक महिमा सँ भयभीत भऽ सूर्यक किरणो दूरहि रहैत अछि। अग्निसभ सेहो हुनकर प्रेममे मन्त्र सँ पवित्र आहुति स्वीकार करैत अछि; पवन सँ एकठाम जुटल ज्बलासभ मानू प्रणाममे जोड़ल हाथ हो। पवन स्वयं संकोच सँ हुनका लग अबैत अछि—आश्रमक मधुर लताफूल सँ सुवासित पट आ वल्कल-वस्त्र केँ मात्र कनेक हिलबैत, अत्यन्त मन्द गति सँ। तत्त्वसभक दिव्य शक्ति सामान्यतः मनुष्यक प्रतिरोध सँ बाहर होइत अछि, मुदा ई पुरुष तँ सर्वाधिक शक्तिशाली तत्त्वसभ सँ सेहो ऊपर उठल छथि। हुनकर चरण-स्पर्श सँ पृथ्वी दूटा सूर्यक प्रकाशमे चमकैत बुझाइत अछि। संसार हुनकर आधार पर दृढ़ ठाढ़ अछि। “ओ करुणाक प्रवाह छथि; क्षणभङ्गुर संसार-सागरक सेतु; धैर्यक जलक निवास। कामनाक लता सँ भरल उपवन काटनिहार कुठार; सन्तोषामृतक समुद्र; सिद्धिक बाटक पथप्रदर्शक; ओ पर्वत जकर पाछाँ दुर्भाग्यक ग्रह अस्त भऽ जाइत अछि; सहनशीलताक वृक्षक जड़ि; ज्ञानचक्रक नाभि; धर्मध्वजक दण्ड; समस्त ज्ञान उतरबाक पवित्र तीर्थ; तृष्णासागरक बड़वानल; शास्त्र-रत्न परखबाक कसौटी; कामाङ्कुर भस्म करनिहार ज्बला; क्रोधरूपी सर्पक विष उतारनिहार मन्त्र; मोहान्धकार हटाबयबला सूर्य; नरकक फाटकमे सिटकिनी लगाबयबला; सत्कर्मक जन्मभूमि; मङ्गलकर्मक देवालय; वासनाक पतन लेल निषिद्ध भूमि; शुभमार्गक दिशासूचक; पवित्रताक जन्मस्थान; पुरुषार्थचक्रक नेमि; बलक आवास; कलियुगक शत्रु; तपस्याक कोष; सत्यक मित्र; सरलताक मातृभूमि; पुण्यक राशि उपजयबाक स्रोत; ईर्ष्याक लेल बन्द द्वार; विपत्तिक विरोधी। “निश्चय अनादर हुनकामे ठाम नहि पाबि सकैत अछि; ओ अहङ्कार सँ विमुख, नीचता सँ अछूत, क्रोधक दास नहि, सुखक आकर्षण सँ परे छथि। केवल एहि महात्माक कृपहि सँ आश्रम ईर्ष्यारहित आ वैर-विरोध सँ शान्त अछि। उदार आत्माक शक्ति महान् होइत अछि। एतए चिरकालीन शत्रुता छोड़ि पशुओ शान्त छथि आ आश्रम-जीवनक आनन्द सीखि रहल छथि। धूप सँ थाकल सर्प निर्भय भऽ मयूरक पाँखमे एना पैसि जाइत अछि, जेना ताजा घासमे; शतशः सुन्दर नेत्रचिह्न सँ सजल, मृगक आँखि जकाँ रङ्ग बदलैत ओ पाँख खिलल कमलवन जकाँ अछि। एतए नन्हका हरिण अपन माय केँ छोड़ि अयाल नहि उगल सिंहशावकसभ सँ मित्रता करैत आ सिंहनीक उदार स्तन सँ दूध पीबैत अछि। एतए सिंह आँखि मुनि प्रसन्नतासँ अपन चन्द्रधवल अयाल हाथीक बच्चासभ सँ खिंचबैत अछि, जे ओकरा कमलनाल बुझि लैत अछि। बानरक जाति अपन चञ्चलता छोड़ि स्नान कऽ चुकल बाल मुनिसभक लेल फल आनैत अछि। मदमत्त हाथी सेहो कोमलहृदय भऽ गण्डस्थलक चारू दिस बसल भ्रमरसभ केँ कान फटकारि भगबैत नहि, बल्कि स्थिर ठाढ़ रहैत अछि जाहिसँ ओसभ मद पीबि सकए। “आरो की कहल जाए? ओतए जड़ बुद्धिहीन वृक्षो—जड़ि आ फल सहित, वल्कल पहिरने, आ ऊपर चढ़ैत यज्ञधूमक रेखा सँ निरन्तर बनैत कृष्णमृगचर्मक उत्तरीय धारण कयने—एहि महात्माक सहतपस्वी जकाँ बुझाइत अछि। तखन चेतनाशील प्राणीसभक विषयमे कहबे की!”’ ‘हम एना सोचिये रहल छलहुँ कि हारीत हमरा अशोक-वृक्षक छाहरिमे एक ठाम राखलनि। तखन पिताक चरण आलिङ्गन कऽ प्रणाम कयलनि आ हुनकासँ बेसी दूर नहि कुशासन पर बैसि गेलाह।’ ‘विश्राम करैत हारीत केँ हमरा दिस तकैत तपस्वीसभ पुछलनि—“ई नन्हका सुग्गा कतए सँ अनलहुँ?” ओ उत्तर देलनि—“हम एतए सँ स्नान करय गेलहुँ तखन कमल-सरोवरक तट पर एक गाछक खोंता सँ खसल ई नन्हका सुग्गा भेटल। गरमी सँ मूर्छित, तपल धूरिमे पड़ल, खसबाक आघात सँ काँपैत, एकरामे कनेक मात्र प्राण शेष छल। ओ गाछ तपस्वी लेल चढ़ब अत्यन्त कठिन छल, तेँ एकरा फेर खोंतामे नहि राखि सकलहुँ; दयावश एतए लऽ आयल छी। जाबत एकर पाँख नहि उगैत आ आकाशमे उड़य योग्य नहि होइत, ताबत आश्रमक कोनो गाछक कोटरमे रहए। हमसभ आ बाल तपस्वीसभ एकरा फलरस आ चाउरक कौर आनि खुआयब। निर्बलक रक्षा करब हमरा सभक आश्रम-धर्म अछि। पाँख बढ़ि गेलापर जखन आकाशमे उड़ि सकत, तखन जतए इच्छा हो सेतए चलि जाएत। अथवा सम्भव अछि हमरा सभसँ परिचित भऽ एतहि रहि जाए।” हमर विषयमे ई आ आन बात सुनि पवित्र जाबालि कनेक कौतूहल सँ माथ झुका लेलनि। पवित्र तीर्थजल सँ हमरा शुद्ध करैत होथि एहन अत्यन्त प्रशान्त दृष्टि सँ बहुत काल धरि हमरा तकलनि। फेर मानू पहचानक स्मृति जागि रहल हो, बेर-बेर देखि कहलनि—“ई अपन दुष्कर्मक फल भोगि रहल अछि।” तपस्याक सामर्थ्य सँ दिव्यदर्शी मुनि भूत, वर्तमान आ भविष्य देखैत छथि; सम्पूर्ण जगत हुनकर हथेली पर राखल वस्तु जकाँ स्पष्ट अछि। ओ पूर्वजन्म जानैत, भविष्यक घटना कहैत आ अपन दृष्टिक भीतर आबयबला प्राणीक आयु बतबैत छथि।’ ‘ई वचन सुनिते, हुनकर शक्तिसँ परिचित समस्त तपस्वी-सभा केँ ई जानबाक प्रबल कौतूहल भेल जे हमर अपराध की छल, किएक आ कतए कयल गेल, आ पूर्वजन्ममे हम के छलहुँ। सभ मुनि प्रार्थना कयलनि—“भगवन्, कृपा कऽ कहू, ई कोन प्रकारक दुराचरणक फल भोगि रहल अछि? पूर्वजन्ममे ई के छल, पक्षीक रूपमे कोना जन्मल, आ एकर नाम की अछि? अहाँ समस्त आश्चर्यक उद्गम छी; हमर सभक जिज्ञासा शान्त करू।”’ ‘सभाक एहन आग्रहपर महामुनि उत्तर देलनि—“एहि आश्चर्यक कथा बहुत लम्बा अछि। दिन प्रायः बीति गेल, स्नानक समय लग अछि आ देवपूजाक घड़ी निकलि रहल अछि। अतएव उठू; प्रत्येक व्यक्ति उचित रीति सँ अपन कर्तव्य पूरा करू। अपराह्नमे कन्द-मूल-फल भोजन कऽ जखन शान्तिपूर्वक विश्राम करब, तखन हम आरम्भ सँ अन्त धरि सम्पूर्ण कथा कहब—ई के अछि, पूर्वजन्ममे की कयलक आ एहि लोकमे कोना जन्मल। एखन एकरा भोजन दऽ तृप्त करू। जखन हम एकर पूर्वजन्मक समस्त वृत्तान्त कहब तखन निश्चय एकरा सपना देखल दृश्य जकाँ सभ स्मरण भऽ जाएत।” एना कहि ओ उठि गेलाह; मुनिसभक संग स्नान कयलनि आ दैनिक कर्तव्य पूरा कयलनि।’ ‘दिन आब समाप्ति दिस बढ़ि रहल छल। मुनिसभ स्नान सँ उठि यज्ञाहुति दऽ रहल छलाह। आकाशक सूर्य एना बुझाइत छल मानू लाल चन्दन सँ लेपल धरती पर राखल आहुति केँ हमर सभक आँखिक सोझाँ ऊपर उठा रहल हो। फेर ओकर अरुण प्रभा म्लान भऽ विलीन भऽ गेल। ऊपर उठल मुख आ सूर्यमण्डल पर स्थिर आँखिबला ऊष्मपा पितृगण, मानू तपस्वी होथि, ओकर तेजोमय रस पीबि लेलनि। सूर्य कबूतरक पएर जकाँ गुलाबी भऽ आकाश सँ धीरे-धीरे उतरि गेल, आ उदित होइत सप्तर्षि केँ किरणक स्पर्श नहि हो, से मानू अपन रश्मि समेटि लेलक। पश्चिमी समुद्रमे प्रतिबिम्बित रक्तिम किरणक जाल सँ ओकर मण्डल जलशायी विष्णुक नाभिकमल जकाँ छल, जे अमृत झहरा रहल हो। आकाश आ कमलवन छोड़ल किरणसभ सन्ध्याकालमे पक्षी जकाँ पर्वत आ वृक्षक फुनगीपर ठहरि गेल। लाल प्रकाशक छींट किछु क्षण लेल वृक्षसभ केँ तपस्वीसभ द्वारा टाँगल रक्तवर्ण वल्कल-वस्त्र पहिरा देने जकाँ लगल। सहस्रकिरण सूर्य अस्त भेलापर पश्चिमी समुद्र सँ गुलाबी मूँगा जकाँ सन्ध्या उभरि आयल। तखन आश्रम शान्त चिन्तनक निवास बनि गेल। एक दिशासँ पवित्र गाइक दूध दुहबाक मधुर ध्वनि उठल; अग्निवेदी पर नव कुश बिछाओल गेल; आश्रम-कन्यासभ दिशादेवताक लेल चाउर आ बलि इमहर-ओमहर छिटका रहल छल। लाल तारासँ सजल सन्ध्या मुनिसभ केँ दिन ढलबाक पीयर-लाल आभामे भटकैत आश्रमक लाल-आँखिबाली गाय जकाँ देखाइत छल। सूर्य लुप्त भेलापर कमलवन वियोग-शोकमे दिवसपतिक पुनर्मिलनक आशासँ मानू व्रत धारण कयलक—कलीरूपी पात्र ऊपर उठा लेलक, हंसक सूक्ष्म श्वेत वस्त्र पहिरलक, उज्ज्वल केसरक यज्ञोपवीत बान्हलक आ भ्रमर-मण्डली केँ जपमाला बनौलक। सूर्य पश्चिमी समुद्रमे खसते जलक छींट जकाँ तारकसमूह उछलि आकाश भरि देलक। किछु क्षण लेल तारासँ सजल नभ एना चमकल, मानू सिद्धक कन्यासभ सन्ध्याक सम्मानमे फूल जड़ि देने होथि। मुदा तुरन्तहि सन्ध्याक सम्पूर्ण शोभा, ऊपर उठल मुखसँ मुनिसभ द्वारा आकाश दिस देल अर्घ्यजल सँ धुलि गेल हो, एना विलीन भऽ गेल। ओकर प्रस्थानक शोकमे रात्रि कृष्णमृगचर्म जकाँ आरो गाढ़ अन्हार पहिरलक—एहन अन्हार जे मुनिसभक हृदय छोड़ि सभ किछु अन्हार कऽ देलक।’ ‘सूर्य अस्त भऽ गेल से जानि अमृतमय किरणक स्वामी चन्द्रमा, स्वच्छ प्रकाशक कठोर निर्मलतामे, उज्ज्वल महीन जाल जकाँ श्वेत वस्त्र पहिरने, तारा सहित अपन पत्नीसभक महल सँ निकलि आकाशपर चढ़ल। तमाल-वृक्षक अन्हार सँ रेखाङ्कित, सप्तर्षिमण्डल सँ अधिष्ठित, अरुन्धतीक विचरण सँ पवित्र, आषाढ़ नक्षत्र सँ घेरायल, कोमल आँखिबला श्वेत मृग सहित मूल नक्षत्र देखबैत ओ आकाश साक्षात् दिव्य आश्रम जकाँ छल। हंस जकाँ उज्ज्वल चाँदनी समुद्रसभ केँ भरैत पृथ्वी पर खसल; चन्द्रमा सँ सजल आ ताराक फूटल ठीकरासभ सँ जड़ल आकाश सँ ओ एना उतरि रहल छल, जेना शिवक मस्तक सँ गङ्गा। खिलैत कमल जकाँ उज्ज्वल चन्द्र-सरोवरमे स्थिर मृग देखाइत छल, जे चाँदनीक पानि पीबाक उतावलीमे नीचाँ उतरल आ मानू अमृतक पाँकमे फँसि गेल हो। वर्षाक बाद नव निर्मल सिन्धुवार-पुष्प जकाँ श्वेत समुद्र पर उतरैत हंससभ जकाँ चन्द्रकिरण प्रेमपूर्वक रात्रिकुमुदिनी-सरोवरसभक भ्रमण करैत छल। ओहि समय चन्द्रमण्डल उदयकालक समस्त लालिमा त्यागि चुकल छल—जेना स्वर्गीय गङ्गामे डुबकी लगेलापर ऐरावतक मस्तक सँ सिन्दूर धुलि गेल हो। शीतकिरणक स्वामी धीरे-धीरे आकाशमे बहुत ऊपर चढ़ि गेल आ अपन प्रकाश सँ पृथ्वी केँ चूनक धूरि छिड़कल जकाँ धवल कऽ देलक। रात्रिक आरम्भक हवा बहय लागल; शीत ओस सँ ओकर गति मन्द छल, खिलैत कुमुदिनीक सुगन्ध सँ सुवासित छल, आ निद्रा लग आबय सँ भारी भेल आँखि तथा परस्पर सटल पलकबला, जुगाली आरम्भ कऽ शान्त विश्राममे पड़ैत मृगसभ ओकर स्वागत प्रसन्नतासँ करैत छल।’ ‘रात्रिक आध पहर मात्र बीतल छल। भोजनक बाद हारीत हमरा लऽ आन पवित्र मुनिसभक संग अपन पिताक कात गेलाह। जाबालि आश्रमक चाँदनी सँ उज्ज्वल स्थानमे बाँसक चौकीपर बैसल छलाह। जालपाद नामक शिष्य कुश जकाँ उज्ज्वल मृगचर्मक पङ्खा सँ हुनका धीरे-धीरे हवा दऽ रहल छल। हारीत कहलनि—“पिताजी, एहि आश्चर्यक कथा सुनबाक उत्कण्ठासँ समस्त मुनि-मण्डली अहाँक चारू दिस बैसल अछि; ई नन्हका पक्षी सेहो विश्राम कऽ चुकल। अतएव कहू—एकर कर्म की छल, ई के छल, आ दोसर जन्ममे के होयत?” एना कहलापर महामुनि हमरा दिस तकलनि; सोझाँ एकाग्रचित्त सुनबाक लेल बैसल मुनिसभ केँ देखि धीरे सँ कहलनि—“जँ अहाँसभ सुनय चाहैत छी तँ कथा कहल जाए।”’ ‘“उज्जयिनी नामक एक नगरी अछि—पृथ्वीक सर्वाधिक गौरवमय रत्न, सत्ययुगक साक्षात् निवास। तीनू लोकक सृष्टि, पालन आ संहार करनिहार, प्रमथगणक स्वामी महाकाल मानू अपन योग्य निवासक लेल दोसर पृथ्वी जकाँ एकरा रचने छथि। ओतए प्रतिदिन सूर्य केँ महाकालक प्रणाम करैत देखल जाइत अछि; ऊँच उज्ज्वल राजमहलमे समूहमे गीत गबैत स्त्रीसभक मधुर स्वर सुनि ओकर घोड़ा माथ झुका लैत अछि आ पताका महाकालक सोझाँ नतमस्तक भऽ जाइत अछि।’ ‘“ओतए कहियो अन्हार नहि उतरैत अछि, आ राति चक्रवाक-युगल केँ अलग नहि करैत। दीपकक आवश्यकता सेहो नहि पड़ैत, कारण स्त्रीसभक उज्ज्वल मणि-आभूषण सँ राति भोरक सूर्यकिरण जकाँ सोनाली रहैत अछि, मानू प्रेमक ज्बला सँ समस्त संसार प्रज्वलित हो। ओतए अनन्त जीवन केवल रत्नदीपकमे; डोलाइ केवल मोतीक हारमे; स्वरक फेर केवल नगाड़ा आ गीतमे; युगलक वियोग केवल चक्रवाकमे; रङ्गक परीक्षा केवल सोनक टकसालमे; अस्थिरता केवल ध्वजामे; सूर्य-विरोध केवल कुमुदिनीमे; आ धातु नुकौनाइ केवल तलवारक म्यानमे अछि। “आरो की कहब? जिनकर उज्ज्वल चरण केँ देव आ दानवक मणिमय मुकुटक किरण चुमैत अछि; जिनकर विश्व-दाहक अग्निमालासँ ताम्र जटामे स्वर्गीय गङ्गा बाट बिसरि भटकैत छथि; जे अन्धकासुरक शत्रु, परम पवित्र, कैलासक घरक मोह छोड़निहार छथि—ओही महाकाल नामक भगवान एतए अपन निवास बनौने छथि। “एहि नगरमे तारापीड नामक राजा छलाह। नल, नहुष, ययाति, दुन्धुमार, भरत, भगीरथ आ दशरथ जकाँ महान् राजासभक समान छलाह। भुजाबल सँ सम्पूर्ण पृथ्वी जीतलनि, राज्यक तीनू शक्तिक फल पाओलनि। बुद्धिमान्, दृढ़निश्चयी, राजनीतिमे अथक मेधा आ धर्मशास्त्रक गहन अध्ययनसँ ओ प्रकाश आ तेजमे सूर्य-चन्द्रक संग तेसर स्थान धारण करैत छलाह। अनेक यज्ञ सँ हुनकर देह पवित्र भेल छल; ओ समस्त जगतक विपत्ति शान्त कयलनि। वीरसभक सङ्ग्राममे आनन्द पाबयबाली, कमलहस्ता लक्ष्मी कमलवन छोड़ि आ नारायणक वक्षस्थलक गृहसुख केँ तुच्छ मानि खुल्लमखुल्ला हुनकासँ लिपटल रहैत छलीह। जेना विष्णुक चरण स्वर्गगङ्गाक स्रोत भेल, तहिना ओ सत्यक स्रोत छलाह, जिनकर सन्तसमुदाय निरन्तर सम्मान करैत छल।’ ‘“समुद्र सँ चन्द्रमा निकलैत अछि, तहिना हुनकासँ यश प्रकट भेल। ओकर तापरहित ज्योति शत्रुसभ केँ दग्ध करैत; स्थिर होइतहुँ सर्वत्र विचरैत; निष्कलङ्क होइतहुँ कमलमुखी शत्रु-विधवासभक कान्ति मलिन करैत; श्वेत होइतहुँ जगत केँ हर्षित बनबैत छल। ओ न्यायके अवतार, विष्णुक साक्षात् प्रतिनिधि आ प्रजाक समस्त दुःखक विनाशक छलाह।’ ‘“जखन ओ अनेक रत्नक किरण सँ फुलायल आ मोतीक गुच्छ सँ लटकल सिंहासनक समीप अबैत छलाह, तखन दृश्य एना होइत छल जेना दिग्गज कल्पवृक्षक कात आबि रहल हो। भ्रमरक भार सँ झुकल लता जकाँ विस्तृत दिशा-दिशा हुनकर महिमाक सोझाँ झुकि जाइत छल; हमरा बुझाइत अछि, इन्द्र सेहो हुनकासँ ईर्ष्या करैत होयत। क्रौञ्च पर्वत सँ हंसक झुंड निकलैत अछि, तहिना हुनकासँ गुणसभक समूह निकलि पृथ्वीतल केँ उज्ज्वल आ सभ मनुष्यक हृदय केँ आनन्दित करैत छल। हुनकर कीर्ति दसू दिशामे घूमैत, जगत केँ अपन प्रतिध्वनि सँ भरैत, देव-दानवक लोक केँ सुन्दर बनबैत छल—मानू मन्दराचल सँ मथल दूधक धाराक अमृतमय मधुर फेनरेखा हो। असह्य तेजक गरमी सँ जरैत होथि एना राजलक्ष्मी एक क्षणो अपन छत्रक छाहरि नहि छोड़ैत छलीह। “हुनकर पराक्रमक चर्चा लोक शुभ समाचार जकाँ सुनैत, गुरुक उपदेश जकाँ ग्रहण करैत, मङ्गलसूचक चिह्न जकाँ मूल्यवान् मानैत, मन्त्र जकाँ गुंजैत आ पवित्र पाठ जकाँ स्मरण रखैत छल। हुनकर शासनमे पर्वतसभक उड़ान रोकल गेल छल, मुदा विचारक उड़ान स्वतन्त्र छल। पराधीन केवल व्याकरणक प्रत्यय छल, प्रजा कोनो शत्रुसँ भयभीत नहि। हुनकर सोझाँ ठाढ़ होबाक साहस केवल दर्पण करैत छल। दुर्गाक दबाव केवल शिवमूर्ति पर छल। धनुष केवल मेघ धारण करैत छल। उठान केवल पताकाक; झुकाव केवल धनुषक; लक्ष्यभेदन केवल बाँसपर बसल भ्रमरक डंकक। बलपूर्वक भ्रमण केवल उत्सवमे देवमूर्तिक; कारागार केवल कलीमे बन्द फूलक; नियन्त्रण केवल इन्द्रियक। जङ्गली हाथी सीमाक भीतर अबैत छल, मुदा जल-परीक्षासँ केओ फिक्का नहि पड़ैत छल। तीक्ष्णता केवल तलवारक धारमे; अग्नि-सहन केवल तपस्वीमे; तुला पार करब केवल नक्षत्रक; दूषित जल शुद्ध करब केवल अगस्त्यक उदयमे; छोट करब केवल केश आ नखक। मलिन वस्त्र केवल आँधी-वर्षाक दिन आकाश पहिरैत छल। उघाड़ल केवल रत्न होइत, गुप्त मन्त्रणा नहि। रहस्य केवल धर्मक छल। कुमारक स्तुतिमे वध कयल तारकासुर छोड़ि केओ प्रकाश देखब बन्द नहि करैत। ग्रहणक भय केवल सूर्य केँ। प्रथमजन्मा केँ पार करब केवल चन्द्रमा केँ। ‘अवज्ञाकारी’क चर्चा केवल महाभारतमे सुनल जाइत। दण्ड पकडनाइ केवल वृद्धावस्थामे। बाम वस्तुसँ चिपकल केवल तलवारक म्यान। दानक प्रवाह कतहु नहि रुकैत, केवल हाथीक मदधारा क्षणभर रुकैत। खाली घर केवल पासाक चौखटमे रहैत छल।’ ‘“ओहि राजाक शुकनास नामक एक ब्राह्मण मन्त्री छलाह। हुनकर बुद्धि राज्यक प्रत्येक कार्यपर स्थिर, मन कला आ शास्त्रक गहिराइमे डुबल, आ राजाप्रति दृढ़ स्नेह बाल्यकालहि सँ विकसित छल। राजनीतिशास्त्रक सिद्धान्तमे निपुण, विश्व-शासनक कर्णधार, विशालतम कठिनाइमे सेहो अचल निश्चयबला—ओ धैर्यक दुर्ग, दृढ़ताक आधार, उज्ज्वल सत्यक सेतु, समस्त कल्याणक मार्गदर्शक, सदाचारक संचालक आ सुव्यवस्थित जीवनक नियन्ता छलाह। शेषनाग जकाँ जगतक भार सहैत; समुद्र जकाँ जीवन सँ भरल; जरासन्ध जकाँ युद्ध आ सन्धि रचबामे कुशल; शिव जकाँ दुर्गाक संग स्वाभाविक; युधिष्ठिर जकाँ धर्मक प्रभात। ओ समस्त वेद-वेदाङ्ग जानैत आ राज्यसमृद्धिक सार छलाह। “इन्द्र लेल बृहस्पति, वृषपर्वा लेल शुक्राचार्य, दशरथ लेल वसिष्ठ, राम लेल विश्वामित्र, अजातशत्रु लेल धौम्य, नल लेल दमनक—तहिना तारापीड लेल शुकनास छलाह। ज्ञानक बलपर ओ मानैत छलाह जे लक्ष्मी केँ प्राप्त करब कठिन नहि, चाहे ओ नारायणक वक्षपर विश्राम करैत होथि—ओ वक्ष जे पातालक दानवसभक अस्त्र-घाव सँ भयङ्कर आ निर्दयतासँ आगाँ-पाछाँ घुमाओल मन्दराचलक दबाव सँ कठोर भेल विशाल काँधक समीप अछि। वृक्षक समीप लता अनेक शाखासँ पसरि विजय कयल देशरूपी फल देखबैत अछि, तहिना हुनकर कात ज्ञान विस्तृत भऽ अनेक उपलतासँ राज्य-विजयक फल देखबैत छल। चारू समुद्रक परिधिसँ नापल सम्पूर्ण पृथ्वीपर हजारो गुप्तचरक आबाजाही छल, तैओ प्रत्येक राजाक फुसफुसाहट हुनका अपन महलमे कहल बात जकाँ ज्ञात छल।’ ‘“तारापीड बाल्यावस्थामे ही इन्द्रक हाथीक सूँड़ जकाँ मोट भुजाक बल सँ सातू द्वीप सँ घेरायल सम्पूर्ण पृथ्वी जीत लेने छलाह। साम्राज्यक भार शुकनास नामक ओहि मन्त्रीपर सौंपि, प्रजा केँ पूर्ण सन्तुष्ट कऽ, आब कोनो आन कर्तव्य शेष अछि कि नहि से खोजय लगलाह।’ ‘“शत्रुसभ केँ चूर कऽ देने छलाह, भयक सभ कारण समाप्त छल, आ जगतक कार्यक तनाव कनेक ढील पड़ि गेल छल; तेँ ओ अधिकांश समय युवावस्थाक स्वाभाविक आनन्द उपभोग करय लगलाह।’ ‘“राजा युवावस्थाक सुखमे लीन रहलाह आ राज्यकार्य मन्त्रीपर छोड़ने रहलाह; एहि प्रकार किछु समय बीतल। धीरे-धीरे जीवनक प्रायः सभ आनन्द भोगि चुकलाह, केवल अपन पुत्रक मुख देखबाक सुख नहि भेटल। हुनकर अन्तःपुर एहन नरकटवन जकाँ छल जाहिमे फूल मात्र हो, फल नहि। यौवन बीतैत गेल तखन सन्तानहीनतासँ उपजल पछतावा मनमे बढ़ल। इन्द्रियसुखक चाहसँ मन विमुख भऽ गेल। हजारो राजकुमारसँ घेरायल रहितहुँ स्वयं केँ एकाकी, आँखि रहितहुँ अन्हर, आ संसारक आधार होइतहुँ निराधार अनुभव करय लगलाह।’ ‘“ओहि राजाक सर्वसुन्दर आभूषण हुनकर रानी विलासवती छलीह। शिवक जटामे चन्द्रकला, कैटभ-वधकर्ता विष्णुक वक्षपर कौस्तुभक प्रभा, बलरामक देहपर वनमाला, समुद्रक लेल तट, वृक्षक लेल लता, वसन्तक लेल पुष्प-विस्फोट, चन्द्रक लेल चाँदनी, सरोवरक लेल कमलवन, आकाशक लेल तारामाला, मानसरोवरक लेल हंसपङ्क्ति, मलयपर्वतक लेल चन्दनवनक रेखा, शेषनागक लेल मणिमय मुकुट जेहन—तेहने विलासवती अपन स्वामी लेल छलीह। अन्तःपुरमे हुनकर कोनो समकक्ष नहि छल; मानू सम्पूर्ण नारी-सौन्दर्यक मूल स्रोत होथि, तीनू लोकमे आश्चर्य उत्पन्न करैत छलीह।’ ‘“एक दिन संयोगवश राजा हुनकर निवासपर गेलाह। ओतए विलासवती केँ एक भव्य शय्यापर बैसल, अत्यन्त विलाप करैत देखलनि। परिवारक स्त्रीसभ शोकसँ मौन हुनका घेरने छल, चिन्तामे स्थिर दृष्टि रखने छल; कक्षपालसभ दूर ठाढ़, व्याकुल विचारमे आँखि स्थिर कयने प्रतीक्षा करैत; अन्तःपुरक वृद्ध स्त्रीसभ हुनका सान्त्वना देबाक प्रयत्न करैत छल। निरन्तर नोर सँ रेशमी वस्त्र भिजल; आभूषण उतारि राखल; कमल-मुख बाम हथेलीपर टिकल; केश खोलल आ अस्तव्यस्त छल। राजा केँ स्वागत करबाक लेल जखन ओ उठलीह, तखन राजा फेर शय्यापर बैसा देलनि आ स्वयं लग बैसि गेलाह। रोदनक कारण नहि जनैत अत्यन्त भयभीत भऽ, हाथसँ हुनकर गालक नोर पोंछैत कहलनि— “‘रानी, हृदयमे नुकायल भारी दुःखक भारसँ निःशब्द आ मन्द ई रोदन किएक? अहाँक पलकसँ झरैत नोर मानू मोतीक जाल गूँथि रहल अछि। हे कृशाङ्गी, अहाँ आभूषणविहीन किएक छी? अहाँक पएरपर लाहक धार गुलाबी कमलकलीपर भोरक प्रकाश जकाँ किएक नहि पसरल अछि? प्रेम-सरोवरक जलपक्षीक कलरव जकाँ मधुर झंकारबला मणिमय नूपुर अहाँक कमल-पएरक स्पर्शसँ किएक शोभित नहि? उतारि राखल करधनीक सङ्गीत सँ ई कटि वञ्चित किएक? चन्द्रमापर मृगक चिह्न जकाँ अहाँक वक्षपर चित्रित अलङ्कार किएक नहि? हे सुन्दराङ्गी, शिवक ललाटपर चन्द्रकला केँ स्वर्गीय गङ्गा सजबैत छथि, तहिना ई कोमल गर्दनि मोतीक लड़ सँ किएक नहि सजल? पूर्वमे एतेक प्रसन्न रहनिहार अहाँ नोरक धारसँ धोएल अलङ्कारविहीन मुख व्यर्थ किएक धारण कयने छी? कोमल पाँखुरी जकाँ अँगुरीक गुच्छबला ई हाथ कानक आभूषण बना कऽ किएक उठौने छी, मानू गुलाबी कमल हो? “‘हे हठिनी, पीयर तिलकविहीन सोझ भौंह केँ खोलल केशराशिसँ घेरि किएक उठौने छी? फूलविहीन लहराइत ई केश कृष्णपक्षक गाढ़ अन्हारमे चन्द्रमा हरायल जकाँ हमर आँखि केँ दुःखी करैत अछि। कृपा कऽ अपन दुःखक कारण कहू। ई दीर्घ निःश्वासक आँधी, जाहिसँ वक्षक वस्त्र काँपि रहल अछि, हमर प्रेममय हृदय केँ लाल कोमल लता जकाँ झुका रहल अछि। हमर अथवा अहाँक सेवक-सेविकामे सँ ककरो द्वारा कोनो अपराध भेल अछि? हम अपना केँ सूक्ष्मतासँ जाँचैत छी, मुदा सत्य कहैत छी—अहाँप्रति अपन कोनो त्रुटि नहि देखैत छी। हमर प्राण आ राज्य पूर्णतः अहाँक अछि। हे सुन्दरी, अपन दुःखक कारण कहू।’ “एना कहलापर विलासवती कोनो उत्तर नहि देलीह। तखन राजा परिचारिकासभ दिस घुमि हुनकर अपार शोकक कारण पुछलनि। सदिखन समीप रहनिहारी ताम्बूलवाहिनी मकरिका राजा सँ कहलक—‘स्वामी, अहाँसँ छोटो दोष कोना भऽ सकैत अछि? आ अहाँक उपस्थितिमे अहाँक सेवक वा कोनो आन व्यक्ति अपराध कोना कऽ सकत? महारानीक दुःख ई अछि जे राजासँ हुनकर मिलन सन्तानरहित भऽ निष्फल अछि, मानू राहु ग्रसि लेने हो; एहि पीड़ासँ ओ बहुत कालसँ दुःखी छथि। आरम्भमे महारानी घोर शोकाकुल जकाँ रहैत छलीह। सुतब, स्नान, भोजन, आभूषण पहिरब आदि उचित दैनिक कार्यो परिचारिकासभक बहुत आग्रहपर कठिनतासँ करैत छलीह। पातालक लक्ष्मी जकाँ निरन्तर दैव आ प्रेमदेव केँ धिक्कारैत छलीह। मुदा स्वामीक हृदयक दुःख दूर रखबाक इच्छासँ अपन उदासीक परिवर्तन प्रकट नहि करैत छलीह। “‘आइ मासक चतुर्दशी छल। ओ पवित्र महाकालक पूजा करय गेलीह। ओतए महाभारत-पाठमे सुनलीह—“सन्तानहीन लेल उज्ज्वल लोक नहि; पुत्र ओ अछि जे सूर्यरहित अन्धकारसँ उद्धार करैत अछि।” ई सुनि महल घुरलीह। आब सेविकासभक विनयपूर्वक आग्रहक बादो भोजनमे रुचि नहि लैत छथि, आभूषण पहिरबामे व्यस्त नहि होइत छथि, हमरा सभ केँ उत्तर देबाक कृपाओ नहि करैत छथि। केवल कानैत छथि, आ निरन्तर बहैत नोरक आँधी सँ मुख मेघाच्छन्न अछि। स्वामी सभ सुनलहुँ; आब उचित निर्णय करू।’ एना कहि मकरिका चुप भऽ गेल। राजा एक लम्बा, तीव्र निःश्वास छोड़ि एहि प्रकार बजलाह—’ ‘“‘रानी, भाग्य द्वारा निश्चित विषयमे की कयल जा सकैत अछि? आब ई असीम रोदन छोड़ू। देवतासभक कृपा प्रायः हमरा सभपर नहि बरसैत अछि। निश्चय अपन सन्तानक आलिङ्गनरूपी अमृतक आनन्द धारण करब हमर हृदयक भाग्यमे नहि लिखल। पूर्वजन्ममे कोनो महान् पुण्यकर्म नहि कयल गेल होयत, कारण पूर्वजन्मक कर्मे मनुष्यक एहि जन्ममे फल दैत अछि; अत्यन्त बुद्धिमानो नियति नहि बदलि सकैत अछि। तथापि एहि मर्त्यजीवनमे जे किछु कयल जा सकैत अछि, से सभ करू। गुरुजनक आरो अधिक सम्मान करू; देवपूजा दुगुनी करू; ऋषिसभक सेवामे अपन सत्कर्म प्रकट करू। ऋषि महान् शक्तिबला देवतास्वरूप छथि; जँ हमसभ सम्पूर्ण सामर्थ्यसँ हुनकर सेवा करब तँ कठिन होइतहुँ हृदयक अभिलाषा पूर्ण करनिहार वरदान देताह। “‘पुरान कथा अछि जे मगधक राजा बृहद्रथ चण्डकौशिकक तपोबल सँ जरासन्ध नामक पुत्र पओलनि—जे विष्णु केँ सेहो युद्धमे जीतनिहार, पराक्रममे अतुलनीय आ शत्रुसभक मृत्यु छल। दशरथो अत्यन्त वृद्धावस्थामे महान् मुनि विभाण्डकक पुत्र ऋष्यशृङ्गक कृपासँ चारि पुत्र पओलनि, जे नारायणक चारि भुजा जकाँ अजेय आ समुद्रक गहिराइ जकाँ अचल छलाह। एहने अनेक राजर्षि तपस्वीसभ केँ प्रसन्न कऽ पुत्रमुख-दर्शनरूपी अमृत चखबाक सुख पओने छथि। सन्तसभक सम्मान कहियो निष्फल नहि जाइत अछि।’’ ‘“‘आ हम कहिया अपन रानी केँ गर्भ धारण लेल प्रस्तुत देखब—पूर्णिमाक चन्द्र उदय होयबाक अगिला चतुर्दशीक राति जकाँ पीयर आ उज्ज्वल? कहिया हमर पुत्रजन्मक महान् उत्सवक आनन्द सँ लगभग असह्य भार अनुभव करैत परिचारिकासभ उपहारक भरल टोकरी लऽ चलतीह? कहिया पीयर वस्त्र पहिरने, बाहुमे पुत्र धारण कयने रानी हमरा एना आनन्दित करतीह जेना नव उदित सूर्य आ भोरक किरण धारण कयने आकाश? “‘कहिया हमर पुत्र घुँघरायल केशमे अनेक औषधीय वनस्पति लगौने, तालुपर घीक एक बूँदसँ सिद्ध रक्षाचिह्नस्वरूप राइमे मिलाओल कनेक भस्म, गर्दनिमे हरिद्रासँ पीयर उज्ज्वल डोरा पहिरने, पीठक बल पड़ल दाँतविहीन नन्हका मुँहसँ मुस्कराइत हमर हृदय केँ आनन्द देत? कहिया पीयर रङ्गमे सुनहला चमकैत ओ शिशु, अन्तःपुरक स्त्रीसभक हाथसँ एक सँ दोसरक कात जाएत, सभ लोक द्वारा स्वागत कयल मङ्गलदीप जकाँ हमर आँखिक समस्त शोकान्धकार दूर करत? कहिया दरबारक धूरिसँ धूसर भऽ, हमर हृदय आ आँखिक पाछाँ-पाछाँ चलैत, आँगनमे डगमग डेग दऽ ओकर शोभा बढ़ायत? कहिया ठेहुनमे चलबाक शक्ति विकसित भऽ एक ठामसँ दोसर ठाम जाएत, आ नव सिंहशावक जकाँ स्फटिकक देबालक पाछाँ नुकायल पालतू मृगशावक केँ पकड़बाक प्रयास करत? “‘कहिया आँगनमे मनमाना दौड़ैत पालतू हंससभक पाछाँ भागत, अन्तःपुरक नूपुरक झंकार ओकर संग चलत, आ सोनक करधनीक घण्टीक स्वरक पाछाँ दौड़ैत धाय केँ थका देत? कहिया जङ्गली हाथीक क्रीड़ाक अनुकरण करत—गालपर कृष्णागरुसँ चित्रित मदरेखा, मुँहमे पकड़ल घण्टीक ध्वनिसँ उल्लासित, उठल हाथसँ छिटकायल चन्दनधूरिसँ धूसर, आ मोड़ल अँगुरीक इशारापर माथ हिलबैत? कहिया मायकेँ पएर रँगबाक बाद बचल लाहक रस मुट्ठीमे भरि वृद्ध कक्षपालसभक मुखक भेष बदलि देत? कहिया कौतूहलसँ चञ्चल आँखि जड़ाउ फर्शपर झुकौने, लड़खड़ाइत डेगसँ अपन छाहरिक पाछाँ भागत? कहिया हम सभामण्डपमे ठाढ़ रहब, आ ओ दरबारक बीच घिसकैत आबत; मणिसभक किरणसँ चकित आँखि इमहर-ओमहर घूमत, आ हजार राजा पसारल भुजासँ ओकर आगमनक स्वागत करताह? “‘एहन सैकड़ो अभिलाषाक विचारमे हम राति-राति पीड़ा सहैत छी। सन्तानहीनताक शोक हमरा सेहो दिन-राति अग्नि जकाँ जरबैत अछि। संसार शून्य लगैत अछि, राज्य निष्फल बुझाइत अछि। मुदा ब्रह्माक निर्णयक विरुद्ध हम की कऽ सकैत छी, जकर अपील कतहु नहि? तेँ रानी, निरन्तर शोक छोड़ू। हृदय केँ धैर्य आ धर्ममे लगाउ। जे धर्ममे मन स्थिर करैत अछि, ओकरा लग कल्याणक वृद्धि सदा निकट रहैत अछि।’ “एना कहि नव कोपल जकाँ कोमल हाथसँ जल लेलनि आ नोरसँ भीजल, खुलैत कमल जकाँ हुनकर मुख पोंछि देलनि। अनेक स्नेहमय सम्बोधनसँ मधुर, शोक दूर करबाक कौशल आ धर्मोपदेशसँ भरल वचनसँ बेर-बेर सान्त्वना दऽ अन्ततः राजा ओतए सँ चलि गेलाह। हुनकर गेलाक बाद विलासवतीक शोक कनेक शान्त भेल आ आभूषण पहिरब सहित सामान्य दैनिक कार्यमे लगलीह। “ओहि दिनसँ देवता केँ प्रसन्न करब, ब्राह्मणक सम्मान आ सभ पवित्र व्यक्तिक प्रति श्रद्धामे हुनकर भक्ति निरन्तर बढ़ैत गेल। सन्तानक अभिलाषामे जतए सँ जे उपाय सुनैत छलीह से करैत छलीह; श्रम कतेक पैघ हो, कोनो परवाह नहि। निरन्तर गुग्गुलक धुआँसँ अन्हार दुर्गा-मन्दिरमे उपवास रखि, श्वेत वस्त्रमे निर्मल देह, हरियर घास बिछाओल गदाक शय्यापर सुतैत छलीह। गोशालामे वृद्ध गोपालक पत्नीसभ द्वारा मङ्गलचिह्नयुक्त गाइक अलङ्कार कयल जाइत; सभ प्रकारक रत्नसँ भरल, पीपलक डाढ़ि, विविध फल-फूलसँ सजल आ पवित्र जलसँ पूर्ण सोनक कलशक जल ओहि गाइक देहपर सँ बहा कऽ रानी स्नान करैत छलीह। “प्रतिदिन उठि ब्राह्मणसभ केँ सभ रत्नसँ सजल सोनक राइ-पात दैत छलीह। कृष्णपक्षक चतुर्दशी राति, चारि बाटक सङ्गमपर, राजा स्वयं जे वृत्त बनौने रहथि तकर बीच ठाढ़ भऽ मङ्गल-स्नानक विधान करैत छलीह; विविध बलिसँ दिशादेवता प्रसन्न कयल जाइत छल। सिद्धसभक पूजास्थलक सम्मान करैत आ लोकविश्वासबला पड़ोसी मातृकादेवीसभक गृहमे जाइत छलीह। प्रसिद्ध सभ नागकुण्डमे स्नान करैत। पीपल आ आन पूज्य वृक्षक दक्षिणावर्त परिक्रमा कऽ पूजा करैत। स्नानक बाद डोलैत कङ्कणबला हाथसँ चानीक कटोरामे दही-भातक बलि रखि स्वयं पक्षीसभ केँ दैत। प्रतिदिन दुर्गा केँ प्रचुर मात्रामे भुजल धानक आहुति, पकाओल भात, तिलक मिठाइ, पुआ-पकवान, लेप, धूप आ फूलक बलि चढ़बैत। “सिद्ध नाम धारण करनिहार नग्न भ्रमणशील संन्यासीसभक भिक्षापात्र भरि, मनसँ भूमि पर नतमस्तक भऽ विनय करैत। ज्योतिषीसभक निर्देश केँ बहुत मान दैत; चिह्न-विज्ञानमे निपुण सभ भविष्यवक्ताक कात जाइत; पक्षी-शकुन बुझनिहारसभक पूर्ण सम्मान करैत; पूज्य ऋषिसभक परम्परा सँ चलि आयल सभ गुप्त उपाय स्वीकार करैत। पुत्र-दर्शनक लालसामे उपस्थित ब्राह्मणसभसँ वेदपाठ करबैत; निरन्तर पवित्र कथा सुनैत; भोजपत्रपर पीयर अक्षरमे लिखल मन्त्रसँ भरल नन्हका पेटी संग रखने फिरैत; औषधीय वनस्पतिक माला ताबीज जकाँ बान्हैत। परिचारिकासभो बाहर निकलि बाटक आकस्मिक ध्वनि सुनैत आ ताहिसँ शकुन निकालैत। प्रतिदिन साँझ सियारसभ लेल मांसक लोन्दा फेकबैत। अपन स्वप्नक आश्चर्य पण्डितसभ केँ कहैत आ चौराहापर शिवक लेल बलि चढ़बैत छलीह।’ ‘“एहि प्रकार समय बीतैत रहल। एक बेर रातिक अन्तिम भागमे, जखन आकाश पुरान कबूतरक पाँख जकाँ धूसर छल आ किछुए तारा शेष छल, राजा स्वप्न देखलनि जे श्वेत राजमहलक छतपर विश्राम करैत विलासवतीक मुखमे पूर्ण चन्द्र एना प्रवेश कऽ रहल अछि जेना हाथीक मुँहमे कमलनालक गोला। ओ तुरन्त जागि गेलाह। आनन्दसँ फैलल आँखिक ज्योति सम्पूर्ण निवास भरि रहल छल। उठिते शुकनास केँ बजौलनि आ स्वप्न सुनौलनि। अचानक हर्षसँ भरल शुकनास उत्तर देलनि—‘महाराज, हमर सभक आ प्रजाक अभिलाषा अन्ततः पूर्ण भेल। किछु दिनक बाद स्वामी निश्चय पुत्रक कमल-मुख देखबाक सुख पाओत। कारण आइ राति हमहुँ स्वप्नमे देवतासदृश गरिमा आ शान्त मुखबला श्वेतवस्त्रधारी ब्राह्मण केँ मनोरमाक कोरामे मधुबिन्दु बरसाबयबला कमल रखैत देखलहुँ। ओकर सौ उज्ज्वल पसारल पाँखुरी चन्द्रकलासदृश आ हजार कम्पित केसर जटाजूट जकाँ छल। “‘एखन हमरा सभ केँ भेटैत प्रत्येक शुभ शकुन निकट आबि रहल आनन्दक सूचना दैत अछि। एहि आनन्दक दोसर कारण की भऽ सकैत अछि? रातिक अन्तमे देखल स्वप्न सत्य फल दैत अछि। निश्चय शीघ्र रानी एहन पुत्र जन्म देतीह, जे मान्धाता जकाँ समस्त राजर्षिमे अग्रणी आ सम्पूर्ण जगतक आनन्दक कारण होयत। हे राजन्, शरदमे नव खिलल कमलसँ भरल कमल-सरोवर राजहाथी केँ जहिना आनन्दित करैत अछि, तहिना ओ अहाँक हृदय केँ प्रसन्न करत। ओकर कारण अहाँक राजवंश जगतक भार वहबाक लेल समर्थ होयत आ जङ्गली हाथीक निरन्तर मदधारा जकाँ उत्तराधिकारमे अखण्ड रहत।’ “एना बजैत शुकनासक हाथ पकड़ि राजा अन्तःपुरमे प्रवेश कयलनि आ दुनू स्वप्न सुनाकऽ रानी केँ आनन्दित कयलनि। किछु दिनक बाद देवताक कृपासँ विलासवतीक गर्भमे सन्तानक आशा एना प्रकट भेल जेना सरोवरमे चन्द्रमाक प्रतिबिम्ब। ओ एहि कारणेँ आरो तेजस्विनी भऽ गेलीह—नन्दनवनक पङ्क्तिमे कल्पवृक्ष जकाँ, अथवा विष्णुक वक्षपर कौस्तुभमणि जकाँ।’ ‘“एक स्मरणीय दिन साँझ राजा अन्तःपुरक एक मण्डपमे गेलाह। सुगन्धित तेलक प्रचुरतासँ तेज जरैत हजार दीपसँ घेरायल ओ तारामण्डलक बीच पूर्ण चन्द्र जकाँ, अथवा नागराजक हजार मणिमय फणक बीच बैसल नारायण जकाँ लगैत छलाह। राज्याभिषेक पओने किछुए महान् राजा हुनका घेरने छलाह; निज सेवक कनेक दूरीपर ठाढ़ छल। समीप ऊँच आसनपर श्वेत रेशमी वस्त्र पहिरने, अल्प आभूषणबला, समुद्रक गहिराइ जकाँ गम्भीर राजनीतिज्ञ शुकनास बैसल छलाह। बाल्यकालसँ बढ़ल परस्पर विश्वासक पूर्ण सहजतासँ राजा हुनकासँ अनेक विषयपर वार्ता कऽ रहल छलाह। “एही समय रानीक प्रधान परिचारिका कुलवर्धना समीप आयलीह। दरबारक रीति-नीतिमे सदा दक्ष, राजपरिवारक निकटतासँ पूर्ण प्रशिक्षित आ सभ मङ्गलविधानमे निपुण छलीह। ओ राजाक कानमे विलासवतीक समाचार फुसफुसा कऽ कहलीह। कान लेल सर्वथा नवीन ओ वचन सुनिते राजाक अंग मानू अमृतसँ भीजि गेल। सम्पूर्ण देह रोमाञ्चित भऽ उठल, आनन्दक मदिरा सँ ओ चकित भऽ गेलाह; गालपर मुस्कान फूटल; उज्ज्वल दाँतक चमकक रूपमे हृदयसँ छलकैत सुख चारू दिस छिटका देलनि। काँपैत पुतली आ हर्षक नोरसँ भीजल पलकबाली दृष्टि शुकनासक मुखपर जा ठहरल। “शुकनास राजा केँ एहन अपार हर्षमे देखलनि जे पहिने कहियो नहि देखल छलाह; कुलवर्धनाक मुखपर सेहो दीप्त मुस्कान छल। समाचार स्वयं नहि सुनलहुँ, मुदा एहि विषयपर निरन्तर विचार करैत रहबाक कारण ओहि समय एतेक आनन्दक दोसर उपयुक्त कारण हुनका नहि सुझल। सभ बुझि गेलाह। आसन राजा लग खिसका कऽ धीमा स्वरमे कहलनि—‘महाराज, ओ स्वप्नमे निश्चय किछु सत्य छल। कुलवर्धनाक आँखि चमकि रहल अछि, आ अहाँक दुनू आँखि महान् आनन्दक कारणक घोषणा कऽ रहल अछि—ओ फैलल अछि, पुतली काँपैत अछि, हर्षाश्रुसँ स्नात अछि; शुभ समाचार सुनबाक उतावलीमे कानक पाल धरि घिसकैत बुझाइत अछि, मानू नीलकमलक कुण्डल बनि गेल हो। हमर उत्कण्ठित हृदय अपन लेल जन्मल एहि उत्सवक समाचार सुनय चाहैत अछि। अतएव स्वामी कहथि—ई कोन समाचार अछि?’ “शुकनासक एना कहलापर राजा मुस्कराइत उत्तर देलनि—‘जँ कुलवर्धनाक बात सत्य अछि तँ हमर सभक स्वप्न पूर्ण सत्य अछि; मुदा हमरा विश्वास नहि होइत अछि। एतेक महान् सुख हमर भागमे कोना पड़ि सकैत अछि? एहन शुभ समाचार धारण करबाक योग्य पात्र हम नहि छी। कुलवर्धना सदिखन सत्य बजैत अछि, तथापि जखन एहि आनन्द लेल अपन अयोग्यता सोचैत छी तँ बुझाइत अछि जे ओ अपन स्वभाव बदलि लेने अछि। उठू; हम स्वयं रानीक कात जा कऽ पुछब जे ई सत्य अछि कि नहि; तखने निश्चित होयब।’ “एना कहि सभ राजा केँ विदा कयलनि, आभूषण उतारि कुलवर्धना केँ देलनि। उपहार सहित कृपापूर्वक विदा पाबि ओ सोझे ललाट धरतीपर लगा गम्भीर प्रणाम कयलक। राजा उठलाह आ शुकनासक संग अन्तःपुर दिस चलि पड़लाह। अपार आनन्दसँ भरल मन हुनका शीघ्रता सँ आगाँ बढ़ा रहल छल; दहिना आँखिक फड़कन हुनका प्रसन्न करैत, मानू पवनसँ हिलैत नीलकमलक पाँखुरीक क्रीड़ा हो। देर रातिक भेटक अनुरूप किछुए सेवक पाछाँ छल। आगाँ चलैत स्त्रीसभक दीपकक ज्योति आँगनक घन अन्हार दूर करैत छल, यद्यपि स्थिर ज्बला पवनमे कनेक काँपैत छल।’ ‘बाणभट्ट तखन तारापीडक पुत्रक जन्मक वर्णन करैत छथि। राजाक चन्द्रमासम्बन्धी स्वप्नक कारण बालकक नाम चन्द्रापीड राखल गेल। ओही समय शुकनासक पुत्र वैशम्पायनक जन्म सेहो भेल।’ ‘“चन्द्रापीडक चूड़ाकरणसँ आरम्भ समस्त संस्कार क्रमशः सम्पन्न भेल आ हुनकर बाल्यावस्था बीति गेल। ध्यान भङ्ग नहि हो, एहि हेतु तारापीड नगरक बाहर शिप्रा नदीक कात आध कोस धरि पसरल एक विद्याभवन बनबौलनि। हिमपर्वतक शिखरमाला जकाँ उज्ज्वल ईंटक देबालसँ घेरल, देबालक संग-संग चलैत विशाल खाहिसँ सुरक्षित, अत्यन्त दृढ़ द्वारबला छल। प्रवेशक लेल केवल एकटा फाटक खुलल रहैत; समीप घोड़ा आ पालकीक स्थान, नीचाँ व्यायामशाला बनल छल—देवतासभक योग्य प्रासाद। “राजा सभ विद्याक आचार्य एकत्र करबामे असाधारण प्रयत्न कयलनि। बालक केँ सिंहशावक जकाँ ओहि परिसरमे रखि बाहर निकलनाइ निषिद्ध कयलनि; अधिकांश आचार्यपुत्रक सेवक-दल सँ घेरलनि; बालक्रीड़ाक सभ आकर्षण हटौलनि आ मन केँ विक्षेपरहित रखलनि। शुभ दिन चन्द्रापीड आ वैशम्पायन दुनू केँ गुरुजनक हाथ सौंपलनि, जाहिसँ समस्त ज्ञान अर्जित करथि। प्रतिदिन प्रातः उठि राजा विलासवती आ किछु सेवकक संग हुनका देखय जाइत छलाह। राजाक अनुशासनसँ मन अविचल आ अध्ययनमे स्थिर चन्द्रापीड गुरुजन द्वारा पढ़ाओल सभ विद्या शीघ्र आत्मसात् कऽ लेलनि। हुनकर असाधारण प्रतिभासँ उत्साहित गुरु हुनकर जन्मजात क्षमता प्रकट करैत गेलाह; कला-विद्याक सम्पूर्ण जगत हुनकर मनमे निर्मल रत्न-दर्पण जकाँ एकत्र भऽ गेल। “शब्द, वाक्य, प्रमाण, न्याय आ राजधर्ममे सर्वोच्च दक्षता पओलनि; व्यायाम; धनुष, चक्र, ढाल, तलवार, भाला, गदा, परशु आ मुद्गर सहित सभ प्रकारक अस्त्र-शस्त्र; रथ-सञ्चालन आ गजारोहण; वीणा, वंशी, मृदङ्ग, झाँझ आ शृङ्गी सहित वाद्य; भरत आदि द्वारा प्रतिपादित नृत्यविधान आ नारद-प्रणीत सङ्गीतशास्त्र; हस्तिपालन, घोड़ाक आयु-पहिचान आ मनुष्यक लक्षण; चित्रकला, पात काटि अलङ्कार बनब, पोथीक उपयोग आ लेखन; जुआक सभ कला, पक्षीक बोलीक ज्ञान आ ज्योतिष; रत्नपरीक्षा; बढ़ईक काज आ हाथीदाँतक शिल्प; वास्तु, चिकित्सा, यन्त्रविद्या, विषनिवारण, खानकर्म, नदी पार करब, ऊँच-कूद, छल-कौशल; कथा, नाटक, आख्यान, काव्य; महाभारत, पुराण, इतिहास आ रामायण; सभ लिपि, विदेशी भाषा, पारिभाषिक विद्या, यान्त्रिक कला; छन्दशास्त्र आ प्रत्येक आन कला—सभमे पूर्ण निपुणता पओलनि। “निरन्तर अध्ययनक बीच बाल्यावस्थे सँ भीमसदृश जन्मजात बल हुनकामे प्रकट भऽ जगत केँ आश्चर्यचकित करय लागल। खेलहिमे सिंहशावक बुझि आक्रमण करनिहार तरुण हाथीक कान पकड़ि ओ अंग झुका दैत छलाह, आ ओसभ हिलि नहि सकैत छल। एक तलवार-प्रहारमे ताड़गाछ केँ कमलडाँठ जकाँ काटि दैत। पृथ्वीक राजवंशरूपी वन दाह करैत परशुरामक बाण जकाँ हुनकर बाण केवल सर्वोच्च शिखर विदीर्ण करैत। जे लोहाक गदा दस व्यक्ति मिलि उठा सकैत छल, ताहिसँ ओ अभ्यास करैत छलाह। “शारीरिक बल छोड़ि सभ गुणमे वैशम्पायन हुनकर लगभग समकक्ष छलाह। गहन विद्वत्ताक कारण चन्द्रापीड हुनकर सम्मान करैत, शुकनासक प्रति आदरक कारण अपनत्व रखैत, आ दुनू धूरिमे खेलि एकसंग पैघ भेल छलाह; तेँ वैशम्पायन युवराजक प्रधान मित्र, मानू दोसर हृदय आ समस्त गुप्त बातक निवास छलाह। चन्द्रापीड एक क्षणो हुनकाविना नहि रहैत, आ दिन सूर्यक पाछाँ चलनाइ नहि छोड़ैत अछि, तहिना वैशम्पायन एक पलो चन्द्रापीडक पाछाँ चलनाइ नहि छोड़ैत छलाह।’ ‘“चन्द्रापीड एहि प्रकार समस्त ज्ञान अर्जित कऽ रहल छलाह। एहि बीच तीनू लोक केँ समुद्रमन्थनक अमृतपान जकाँ प्रिय, चन्द्रोदय सँ सन्ध्याक हृदय आनन्दित करनिहार, वर्षा-ऋतुमे इन्द्रधनुषक पूर्ण चाप जकाँ बहुरङ्गी आ क्षणभङ्गुर परिवर्तनशील, कल्पवृक्षपर पुष्प-विस्फोट जकाँ कामदेवक अस्त्र, कमलवनक लेल सूर्योदय जकाँ नित्य नवीन कान्ति प्रकट करनिहार, मयूरपिच्छ जकाँ प्रत्येक ललित गति-क्रीड़ाक लेल तत्पर यौवन-वसन्त हुनकामे प्रकट भेल। स्वभावहि सँ सुन्दर चन्द्रापीडक सौन्दर्य केँ ओ दुगुना फुला देलक। समयक स्वामी कामदेव मानू हुनकर आज्ञा पूरा करबाक लेल सदिखन समीप ठाढ़ रहैत छल। हुनकर वक्ष सौन्दर्य जकाँ विस्तृत भेल; अंग मित्रसभक अभिलाषा जकाँ पूर्णता पओलक; कटि शत्रुसमूह जकाँ क्षीण भेल; देह दानशीलता जकाँ व्यापक; तेज केश जकाँ बढ़ल; भुजा शत्रु-पत्नीसभक वेणी जकाँ आरो-आरो नीचाँ लटकल; आँखि आचरण जकाँ उज्ज्वल; काँध ज्ञान जकाँ विशाल; आ हृदय स्वर जकाँ गम्भीर भेल।’ ‘“यथासमय राजा केँ ज्ञात भेल जे चन्द्रापीड युवावस्थामे प्रवेश कऽ चुकल छथि, समस्त कला पूर्ण कऽ लेने छथि, सभ शास्त्र पढ़ि चुकल छथि आ गुरुजनसँ महान् प्रशंसा पओने छथि। तखन महावीर बलाहक केँ बजा, पैघ घुड़सवार आ पैदल दलक संग अत्यन्त शुभ दिन राजकुमार केँ आनबाक लेल पठौलनि। बलाहक विद्याभवन पहुँचलाह, द्वारपालक सूचना पर भीतर पैसलाह, मुकुटक मणि धरती छुबैत माथ झुका प्रणाम कयलनि, आ राजकुमारक अनुमति सँ पदानुकूल आसनपर एहन आदरसँ बैसलाह मानू राजाक सोझाँ होथि। किछु विरामक बाद चन्द्रापीड लग जा राजाक सन्देश सम्मानपूर्वक देलनि— “‘राजकुमार, महाराज कहलनि अछि—“हमर अभिलाषा पूर्ण भेल। शास्त्र पढ़ल गेल, समस्त कला सीखल गेल, युद्धविद्याक प्रत्येक शाखामे सर्वोच्च कौशल प्राप्त भेल। सभ गुरु अहाँ केँ विद्याभवन छोड़बाक अनुमति दैत छथि। जेना बाड़ासँ बाहर निकलल तरुण राजहाथी, अथवा कला-सम्पूर्ण मण्डल मनमे धारण कयने नव उदित पूर्णचन्द्र, तहिना शिक्षापूर्ण रूप जनता केँ देखाउ। दीर्घकाल सँ दर्शन लेल उत्कण्ठित संसारक आँखि अपन वास्तविक प्रयोजन पूरा करए; समस्त अन्तःपुर अहाँक दर्शनक लालसा करैत अछि। विद्यालयमे निवासक ई दसवाँ वर्ष अछि; छठम वर्षक अनुभव पओने अहाँ प्रवेश कयने छलहुँ। एहि गणनासँ जीवनक ई सोलहम वर्ष अछि। “‘“अतएव बाहर आबि, दर्शनक अभिलाषी सभ माता केँ दर्शन दऽ, सम्मानयोग्यजन केँ प्रणाम कऽ, आरम्भिक अनुशासन कनेक छोड़ू आ राजदरबारक सुख तथा नवयौवनक आनन्द इच्छानुसार अनुभव करू। सामन्तसभक सम्मान करू; ब्राह्मणसभ केँ आदर दिअ; प्रजाक रक्षा करू; बन्धुजन केँ आनन्दित करू। “‘“द्वारपर राजा द्वारा पठाओल इन्द्रायुध नामक घोड़ा ठाढ़ अछि—गरुड़ वा पवन जकाँ वेगवान्, तीनू लोकक प्रधान रत्न। पारस देशक राजा, जे एकरा विश्वक आश्चर्य मानैत छल, एहि सन्देशसँ पठौलक—‘समुद्रक जलसँ सोझे उत्पन्न ई श्रेष्ठ अश्व हमरा भेटल; हे राजन्, अहाँक सवारीक योग्य अछि।’ घोड़ाक लक्षण जाननिहारसभ केँ देखाओल गेल तखन ओसभ कहल—‘उच्चैःश्रवामे बताओल सभ चिह्न एहिमे अछि; एकरा समान घोड़ा न पहिने भेल, न भविष्य मे होयत।’ अतएव अहाँक आरोहणसँ एकर सम्मान हो। ई हजार राजकुमार, सभ राज्याभिषिक्त राजाक पुत्र, उच्च प्रशिक्षित, वीर, बुद्धिमान्, गुणसम्पन्न आ प्राचीन वंशक, अहाँक अनुरक्षण लेल पठाओल गेल छथि; सभ घोड़ापर बैसल प्रणामक उत्कण्ठासँ प्रतीक्षा करैत छथि।”’ “एना कहि बलाहक चुप भऽ गेलाह। चन्द्रापीड पिताक आज्ञा माथपर धारण कऽ नवमेघ जकाँ गम्भीर स्वरमे कहलनि—‘इन्द्रायुध केँ अनल जाए।’ ओ ओकरा चढ़य चाहैत छलाह।’ ‘“आज्ञा मिलिते इन्द्रायुध अनल गेल। राजकुमार ओ अद्भुत अश्व केँ देखलनि। चारू दिस दू-दू व्यक्ति लगामक गोल भाग पकडने अपन सम्पूर्ण बलसँ ओकरा रोकबाक प्रयास करैत छल। ओ एतेक विशाल छल जे उठाओल हाथ मात्र ओकर पीठ धरि पहुँचैत; मुँहक समान ऊँच आकाश केँ पीबैत बुझाइत। पेटक खोह केँ कम्पायमान कऽ तीनू लोकक गुफा भरि देनिहार हिनहिनाहटसँ मानू गरुड़ केँ कथित वेगपर व्यर्थ भरोसाक लेल धिक्कारैत छल। गति रोकनिहार प्रत्येक बाधापर क्रोधसँ फुँकारैत नासिका सँ, गर्वमे तीनू लोकक माप लैत छल जे एक छलाँगमे पार कऽ सकए। देहपर करिया, पीयर, हरियर आ गुलाबी रेखासँ इन्द्रधनुष जकाँ अनेक रङ्ग छल। बहुरङ्गी झूल ओढ़ल तरुण हाथी जकाँ; कैलासक शिखरमे सींग ठोकबाक धातुधूरिसँ गुलाबी भेल शिवक वृषभ जकाँ; दानवक जमल रक्तक लाल धारीसँ अयाल रँगायल पार्वतीक सिंह जकाँ। “समस्त ऊर्जाक साकार रूप जकाँ, सदा काँपैत नासिकासँ निकलैत ध्वनिमे ओ मानू तीव्र दौड़मे भीतर लेल पवन फेर बाहर उगलि रहल छल। मुँहमे घुमबैत लगामक नोक चबबैत खनखनाहट करैत, ओंठसँ उठल फेनकण चारू दिस फेकैत, मानू समुद्ररूपी घरमे पीओल अमृतक घूँट हो। “पहिने कहियो नहि देखल, देवताक योग्य रूप, सम्पूर्ण विश्व-साम्राज्यक उपयुक्त, सभ शुभलक्षणयुक्त आ अश्वाकृतिक पूर्णता धारण कयने इन्द्रायुध केँ देखि, सहज नहि चञ्चल होयबला चन्द्रापीडक हृदयो आश्चर्यसँ स्पर्शित भेल। मनमे विचार उठल—‘सुर-असुर जखन वासुकीक निरन्तर घूमैत देहसँ मन्दराचल घुमा समुद्र मथने छल, तखन एहि अद्भुत अश्व केँ नहि तँ आरो कोन रत्न ऊपर आनने होयत? जँ इन्द्र मेरु जकाँ विशाल एहि पीठपर सवारी नहि कयलक तँ तीनू लोकक स्वामित्वसँ की पओलक? उच्चैःश्रवा पाबि हृदय हर्षित करनिहार इन्द्र केँ समुद्र निश्चय ठकि लेलक! हमरा बुझाइत अछि, ई एखन धरि पवित्र नारायणक दृष्टिमे नहि पड़ल अछि; नहि तँ ओ एखनहुँ गरुड़पर सवारीक मोह नहि छोड़ितथि। “‘हमर पिताक राजलक्ष्मी स्वर्गराज्यक सम्पदासँ ऊपर अछि, कारण सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमे कठिनतासँ भेटनिहार एहन रत्न एतए सेवामे आबि जाइत अछि। भव्यता आ तेजसँ एकर रूप देवालय जकाँ लगैत अछि; से सत्य बुझि एकर पीठपर चढ़बासँ भय होइत अछि। देवताक योग्य आ विश्वक आश्चर्य एहन रूप साधारण घोड़ाक नहि भऽ सकैत अछि। मुनिक शापवश देवतासभ अपन देह छोड़ि शापक शर्तसँ प्राप्त दोसर देहमे प्रवेश कयने छथि। पुरान कथा अछि जे महान् तपस्वी मुनि स्थूलशिरा तीनू लोकक भूषण रम्भा नामक अप्सरा केँ शाप देलनि; ओ स्वर्ग छोड़ि घोड़ाक हृदयमे प्रवेश कयलक आ दीर्घकाल धरि मृतिकावतीमे राजा शतधन्वाक सेवामे घोड़ी बनि पृथ्वीपर रहल। एहन अनेक महात्मा मुनिशापसँ महिमा नष्ट भऽ विविध रूपमे जगतमे विचरने छथि। निश्चय ई कोनो श्रेष्ठ सत्ता अछि जे शापक अधीन भेल अछि; हमर हृदय एकर दिव्यता कहैत अछि।’ “एना सोचि ओ चढ़बाक लेल उठलाह। मनहि-मन अश्वक समीप जा प्रार्थना कयलनि—‘हे श्रेष्ठ अश्व, अहाँ जे छी से स्वयं अपार छी! अहाँक जय हो! तथापि अहाँपर चढ़बाक हमर दुस्साहस क्षमा करू। अज्ञात रूपमे उपस्थित देवतासभ केँ सेहो अयोग्य अपमान सहय पड़ैत अछि।’’ ‘“मानू राजकुमारक विचार बुझि इन्द्रायुध कने तिरछा आँखि सँ हुनका तकलक। उछलैत अयालक प्रहारसँ पुतली घुमि आध मुनल छल। दहिना खुरसँ बेर-बेर धरती ठोकलक, जाहिसँ उड़ल धूरि छातीपरक रोम धूसर कऽ देलक। काँपैत नासिकाक फुँकारमे मिलल लम्बा, मधुर, कोमल हिनहिनाहटसँ मानू राजकुमार केँ चढ़बाक निमन्त्रण देलक। सुहावन हिनहिनाहटसँ आमन्त्रित बुझि चन्द्रापीड इन्द्रायुधपर चढ़लाह। चढ़िते सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड केँ एक बित्ता मात्र मानैत बाहर निकललाह आ एहन विशाल अश्वसेना देखलनि जकर अन्तिम सीमा देखाइ नहि पड़ैत छल। “धरती तोड़ैत खुरक टाप, मेघसँ खसल पत्थरक वर्षा जकाँ प्रचण्ड, तीनू लोकक गह्वर बहिरा करैत छल; धूरिसँ बन्द नासिकाक हिनहिनाहट आरो तीव्र सुनाइत। ठाढ़ भेल असंख्य भालाक वन आकाश सजा रहल छल; सूर्यक स्पर्शसँ चमकैत डाँटसहित ओ दृश्य डाँठपर उठल नीलकमलक कलीक वनमे आध नुकायल सरोवर जकाँ छल। उठल हजारो छत्र आठू दिशा अन्हार करैत, सम्पूर्ण चापमे चमकैत इन्द्रधनुषबला बहुरङ्गी मेघसमूह जकाँ लगैत छल। घोड़ाक मुँह उछटल फेनकणसँ उज्ज्वल, आ निरन्तर उछल-कूदक लहरियायल पङ्क्तिसँ ओ सेना प्रलयकालीन समुद्रक तरङ्गराशि जकाँ उठि रहल छल। चन्द्रमा उदित होयते समुद्रक लहरि जहिना चञ्चल होइत अछि, तहिना चन्द्रापीडक आगमनपर सभ घोड़ा गतिमान भऽ उठल। “प्रणाममे पहिल होयबाक उत्कण्ठासँ प्रत्येक राजकुमार जल्दीमे छत्र हटौने नङ्गा माथ, एक-दोसर केँ रौंदैत उद्दाम घोड़ा रोकबाक प्रयाससँ थाकल, युवराजक चारू दिस जुटि गेल। बलाहक जखन एक-एकक नाम कहि परिचय करौलनि, तखन सभ गहिरा माथ झुका प्रणाम कयलनि। डोलैत मुकुटक माणिकसँ ऊपर उठैत किरणक रूपमे मानू भक्ति-लालिमा चमकि रहल छल। प्रणामक लेल उठाओल कलियुक्त माथ राज्याभिषेकक कलशजलपर टिकायल कमल जकाँ लगैत छल। “सभक प्रणाम स्वीकारि चन्द्रापीड, घोड़ापर चढ़ल वैशम्पायनक संग, तुरन्त नगर दिस प्रस्थान कयलनि। हुनका ऊपर सोनक दण्डबला अत्यन्त विशाल छत्र छल—राजलक्ष्मीक निवासयोग्य कमल जकाँ, राजवंशरूपी कुमुदवनक लेल चन्द्रमण्डल जकाँ, अश्वसेनाक प्रवाहमे बनैत द्वीप जकाँ, क्षीरसागर सँ उज्ज्वल भेल वासुकिक फणमण्डलसदृश रङ्गबला, अनेक मोतीक लड़सँ मालाबद्ध, ऊपर सिंहक चिह्न अंकित। दुनू कात डोलाओल चामरक पवनसँ कानक फूल नाचि रहल छल। आगाँ दौड़ैत हजारो सेवक—अधिकांश तरुण आ वीर—हुनकर यश गबैत, आ भाट निरन्तर ऊँच स्वरमे मङ्गलश्लोक पढ़ैत कोमल घोष करैत छल—‘दीर्घायु हो, विजय हो!’” ‘“देहरहित नहि रहल कामदेवक साक्षात् रूप जकाँ ओ नगर दिस बढ़ैत गेलाह। चन्द्रोदय सँ जागल कमलवन जकाँ सम्पूर्ण जनता अपन काज छोड़ि हुनका देखबाक लेल एकत्र भऽ गेल।’ ‘“नगरवासी कहय लगल—‘एहि राजकुमारक सोझाँ कमलमुखी स्त्रीसभ अपन रूपक उपेक्षा करैत अछि, तेँ कार्तिकेय केँ “कुमार” नामपर लज्जा होयबाक चाही। निश्चय हमसभ महान् पुण्यक फल पाबि रहल छी, जे हृदयमे उमड़ल प्रेमसँ फैलल आ उत्कण्ठासँ ऊपर उठल आँखि द्वारा एहि देवोपम रूपक दर्शन करैत छी। आइ हमर सभक एहि संसारमे जन्म सफल भेल। तथापि धन्य कृष्णक जय हो, जे चन्द्रापीडक रूपमे नवीन अवतार लेने छथि!’ एहन वचन कहैत नगरवासी हाथ जोड़ि प्रणाम करय लगल। “चन्द्रापीडक दर्शनक कौतूहलसँ खुलल हजारो झरोखाक कारण नगर स्वयं असंख्य खुलल आँखिक राशि बनि गेल। विद्याभवनसँ समस्त ज्ञानसँ पूर्ण भऽ हुनकर निकलबाक समाचार सुनिते स्त्रीसभ अधूरा काज छोड़ि शीघ्रतासँ घरक छतपर चढ़ि गेलीह। ककरो बाम हाथमे दर्पण छल, तेँ पूर्ण चन्द्रमण्डल सँ प्रकाशित पूर्णिमाक राति जकाँ लगैत छलीह। ककरो पएर नव लाहसँ गुलाबी, भोरक सूर्यप्रकाश पी लेने कमलकली जकाँ छल। ककरो उतावलीमे करधनी खसि जमीनपर पड़ल आ कोमल पएर ओकर घण्टीमे फँसि गेल छल; ओ जंजीरसँ रोकल धीरे चलैत हथिनी जकाँ लगैत छलीह। केओ इन्द्रधनुषी वस्त्र पहिरने वर्षा-दिनक शोभा जकाँ छलीह। केओ नखक उज्ज्वल किरणमे खिलैत पएर उठौने, नूपुरक स्वर सँ आकर्षित पालतू कलहंस जकाँ लगैत छलीह। “केओ हाथमे पैघ मोतीक माला लेने, कामदेवक मृत्युक शोकमे स्फटिकमाला पकड़ने रति जकाँ छलीह। ककरो दुनू स्तनक बीच मोतीक लड़ी खसल छल, तेँ पवित्र महीन नदीसँ चक्रवाक-युगल अलग कयल सन्ध्याक शोभा जकाँ लगैत छलीह। ककरो नूपुरक रत्नसँ इन्द्रधनुषी चमक उठैत, मानू प्रेमसँ पालतू मयूर साथ चलि रहल हो। ककरो रत्नमय प्याला आध पीओल छल; गुलाबी फूलसदृश ओंठ सँ मानू मधुर अमृत टपका रहल हो। पन्नाक जालीक बीच-बीच सँ देखाइत गोल मुखबाली आन स्त्रीसभ राजकुमार केँ तकैत आकाशमे पसरल खिलैत कमलकलीबला कमलवनक दृश्य उपस्थित करैत छलीह। “अचानक उतावला गतिसँ आभूषणक झंकार उठल। वीणाक तारपर मधुर प्रहारक ध्वनि ओकरामे मिलल; करधनीक खनखनाहटसँ बजाओल सारसक कलरव; लड़खड़ायल पएरसँ सीढ़ी ठोकलाक मेघगर्जनासदृश ध्वनि सुनि अन्तःपुरमे बन्द मयूरसभक हर्षध्वनि; नवमेघक टक्कर सँ डरि फड़फड़ाइत कलहंसक कोमल गुंजन—सभ मिलि कामदेवक विजयघोषक अनुकरण करैत छल। परस्पर टकरा कऽ तीव्र बजैत मणिमालाक डोरी सुन्दरीसभक कान केँ मानू बान्हि लैत, आ सम्पूर्ण घरक कोन-कोनमे प्रतिध्वनित होइत छल। “क्षणभरमे कन्यासभक घन भीड़सँ प्रासादसभ मानू स्त्रीक देबालसँ घेरि गेल। लाह-रञ्जित कमलपएर धरतीपर पड़िते भूमि फूलि उठल बुझाइत। सुन्दर देहक प्रवाहसँ नगर चारू दिस लावण्यसँ घेरायल। गोल मुखक समूहसँ आकाश सर्वत्र चन्द्रमय। धूप रोकबाक लेल उठल हाथसभक कारण दिशामण्डल कमलवन। रत्नक असंख्य किरणसँ सूर्यप्रकाश इन्द्रधनुषी वस्त्र पहिरने। उज्ज्वल दृष्टिक लम्बा पङ्क्तिसँ दिन मानू नीलकमलक पाँखुरीसँ बनल। “स्त्रीसभ स्थिर, कौतूहलसँ फैलल आँखिसँ हुनका तकैत छलीह; चन्द्रापीडक रूप दर्पण, जल अथवा स्फटिक जकाँ हुनकर हृदयमे प्रवेश कऽ गेल। प्रेमक लालिमा भीतर प्रकट होइतहि हुनकर ललित वचन तुरन्त हँसी-मजाक, गोपनीय अपनत्व, भ्रम, ईर्ष्या, उपेक्षा, व्यङ्ग्य, छेड़छाड़, स्नेह वा उत्कण्ठासँ भरि गेल। ओसभ एक-दोसरासँ कहैत छलीह— “‘हे उतावली, हमरा लेल ठहरू! देखिते मातल, अपन आँचर सम्हारू! भोली, मुखपर लटकल लम्बा केश उठा लिअ! चन्द्रकलाबला आभूषण हटाउ! प्रेममे अन्हरायल, अहाँक पएर पूजाक फूलमे फँसल अछि—खसि पड़ब! प्रेमविह्वला, केश बान्हू! चन्द्रापीडक दर्शनमे तल्लीन, करधनी उठा लिअ! दुष्ट, गालपर डोलैत कानक फूल ऊपर करू! निर्दयी, अपन कुण्डल उठा लिअ! यौवनक उतावलीमे अहाँ केँ सभ देखि रहल अछि—वक्ष ढाकू! निर्लज्जे, ढील वस्त्र समेटू! बनावटी भोली, जल्दी आगाँ बढ़ू! जिज्ञासु, राजा केँ फेर एक बेर देखू! अतृप्ते, कतेक काल धरि तकैत रहब? चञ्चलहृदया, अपन घरक लोकक विचार करू! नटखट, आँचर खसि गेल आ सभ उपहास कऽ रहल अछि! प्रेमसँ भरल आँखिबाली, अपन सखीसभ नहि देखैत छी? छलमयी कन्या, कारणहीन हृदययातना लऽ दुःखमे जीयब! बनावटी लज्जाबाली, ई चतुर तिरछी नजरि किएक? निर्भीक भऽ देखू! “‘यौवनदीप्ते, अपन भार हमरा सभपर किएक राखैत छी? क्रुद्धे, आगाँ जाउ! ईर्ष्यालु, झरोखा किएक रोकैत छी? प्रेमक दासी, हमर उत्तरीय पूर्णतः बिगाड़ि देलहुँ! प्रेमक निःश्वाससँ मातल, अपने केँ रोकू! संयमहीने, बड़-बुजुर्गक आगाँ किएक दौड़ैत छी? शक्तिदीप्ते, एतेक भ्रमित किएक? मूर्खे, प्रेमज्वरक रोमाञ्च नुका लिअ! दुर्व्यवहारिणी, अपने केँ एना किएक थकबैत छी? चञ्चले, करधनी दबा रहल अछि आ व्यर्थ पीड़ा सहैत छी! अनमनी, घरसँ बाहर छी तैयो अपन ध्यान नहि! कौतूहलमे हरायल, साँस लेब बिसरि गेलहुँ! प्रियसङ्गमक सुखद कल्पनामे आँखि मुनने, खोलू—ओ आगाँ जा रहल छथि! प्रेमबाणक चोटसँ बुद्धिहीन, सूर्यकिरण रोकबाक लेल रेशमी आँचर माथपर राखू! सतीव्रत धारण कयने, देखय योग्य वस्तु नहि देखैत आँखि इमहर-ओमहर घुमबैत छी! अभागी, परपुरुष नहि देखबाक व्रतसँ खसल पड़ल छी! प्रिय सखी, उठू आ ध्वजविहीन, रतिविहीन, साक्षात् उपस्थित मत्स्यध्वज धन्य कामदेव केँ देखू। “‘छत्रक नीचाँ मालती-फूलक मुकुट भ्रमरसमूहसँ श्याम हुनकर माथपर एना अछि, जेना राति आबि गेल बुझि चन्द्रकिरणक राशि खसि पड़ल हो। पन्नाक कुण्डलक हरित आभाससँ स्पर्शित गाल खिलल शिरीषमालासदृश सुन्दर अछि। मोतीक हारक बीच घन माणिक-किरणक रूपमे हमर नवयौवनक प्रेमदीप्ति हुनकर हृदयमे पैसबाक उत्कण्ठासँ चमकि रहल अछि; चामरक बीच ओ स्वयं एकरा देखैत होयत। वैशम्पायनसँ गप्प करैत ओ की देखि हँसि रहल छथि, जे उज्ज्वल दाँतसँ दिशामण्डल धवल भऽ रहल अछि? सुग्गापाँख जकाँ हरियर रेशमी आँचरक किनारसँ बलाहक घोड़ाक खुरसँ उठल धूरि हुनकर केशक अग्रभागसँ हटा रहल छथि। लक्ष्मीक कमलहाथ जकाँ कोमल डाढ़िसदृश पएर उठा कऽ खेलहिमे घोड़ाक काँधपर आड़ा राखने छथि। गुलाबी कमलकली जकाँ चमकैत, क्रमशः पतला अँगुरीबला हाथ ताम्बूल माँगबाक लेल पूर्ण पसारल अछि—जेना सिंघाड़ाक कौर लेल उतावला हाथीक सूँड़। “‘धन्य ओ स्त्री, जे पृथ्वीक सहवधू बनि लक्ष्मी जकाँ कमल केँ परास्त करनिहार ओ हाथ प्राप्त करतीह! धन्य रानी विलासवती सेहो, जिनका द्वारा सम्पूर्ण पृथ्वी वहन करबाक समर्थ पुत्र जन्ममे एना पोषित भेल जेना दिशा द्वारा दिग्गज!’” ‘“एहि आ एहने आन वचन कहैत स्त्रीसभक आँखि मानू चन्द्रापीड केँ पीबि रहल छल; आभूषणक झंकार हुनका बजा रहल छल; हृदयसभ पाछाँ-पाछाँ चलि रहल छल; रत्नक किरणरूपी डोरी हुनका बान्हि रहल छल; नवयौवनक अर्घ्य हुनका समर्पित कयल जा रहल छल; विवाह-अग्नि जकाँ हुनका पर मङ्गलार्थ फूल आ चाउर छिटकाओल जा रहल छल। शिथिल भुजासँ खसैत श्वेत कङ्कणक ढेरीपर डेग-दर-डेग बढ़ैत ओ राजमहल पहुँचि गेलाह।’ ‘घोड़ासँ उतरि वैशम्पायनक सहारा लऽ, बलाहक केँ आगाँ कऽ, सेवामे उपस्थित राजासभक भीड़ पार करैत ओ दरबारमे पैसलाह आ श्वेत शय्यापर रक्षकसभसँ घेरायल अपन पिता केँ देखलनि।’ ‘“कक्षपाल ‘देखू, राजकुमार आबि गेलाह!’ कहिते राजकुमार दूरहि सँ माथ बहुत नीचाँ झुका, काँपैत मुकुटसहित प्रणाम कयलनि। पिता दूरसँ पुकारलनि—‘आउ, आउ, एतए आउ!’ दुनू भुजा पसारि शय्यासँ कनेक उठलाह। आँखि हर्षाश्रुसँ भरि गेल, देह रोमाञ्चित भऽ उठल। श्रद्धासँ झुकल पुत्र केँ एहन आलिङ्गनमे लेलनि मानू कसि कऽ बान्हि अपनेमे समा लेब, पीबि लेब चाहैत होथि। “आलिङ्गनक बाद चन्द्रापीड पिताक पादपीठ लग खाली धरतीपर बैसि गेलाह। हुनकर ताम्बूलवाहिनी जल्दीमे उत्तरीय मोड़ि आसन बनौने छल, मुदा ओ पएरसँ कने दूर सरका कोमल स्वरमे हटाबय कहलनि। तखन राजा वैशम्पायन केँ अपन पुत्र जकाँ आलिङ्गन कयलनि, आ ओ हुनका लेल राखल आसनपर बैसलाह। किछु काल ओतए रहलापर अन्तःपुरक स्त्रीसभ चामर डोलौनाइ बिसरि स्थिर ठाढ़ छलीह। हुनकर सुन्दर, काँपैत, तिरछा आँखिसँ पवनमे हिलैत कमलनाल जकाँ लम्बा प्रेममय दृष्टि राजकुमारपर आक्रमण करैत बुझाइत छल। राजा कहलनि—‘पुत्र, जाउ; दर्शन लेल उत्कण्ठित स्नेहमयी माताक प्रणाम करू, आ तखन क्रमशः पालन-पोषण करनिहार सभकेँ दर्शन दऽ आनन्दित करू।’ “चन्द्रापीड आदरसँ उठलाह, अनुचरसभ केँ पाछाँ आबयसँ रोकलनि, आ अन्तःपुरमे प्रवेशयोग्य राजसेवकक मार्गदर्शनमे वैशम्पायनक संग भीतर गेलाह। परिचारिका आ आख्यान पढ़ि-सुना रहल वृद्ध तपस्विनीसभसँ घेरायल माताक समीप जा प्रणाम कयलनि।’ ‘“माता हुनका उठा लेलनि। आज्ञापालनमे दक्ष परिचारिकासभ चारू दिस ठाढ़ छलीह। मनहि-मन सैकड़ो मङ्गलवचन सोचैत, प्रेमसँ सहलाबैत बहुत काल धरि आलिङ्गनमे रखने रहलीह। स्नेहक तृप्ति भेलापर वैशम्पायन केँ सेहो आलिङ्गन कयलनि। फेर बैसि, भूमि पर आदरसँ बैसल चन्द्रापीड केँ हुनकर अनिच्छाक बादो बलपूर्वक खिंचि कोरामे बैसा लेलनि। परिचारिकासभ शीघ्रतासँ आसन अनलक आ वैशम्पायन ओहिपर बैसलाह। माता चन्द्रापीडक ललाट, वक्ष आ काँध बेर-बेर आलिङ्गन आ स्नेहस्पर्श करैत कहलीह— “‘पुत्र, अहाँक पिता कतेक कठोरहृदय छथि, जे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड द्वारा सहेजब योग्य एतेक सुन्दर देह केँ एतेक दीर्घकाल धरि महान् श्रम करौलनि! गुरुजनक कठिन अनुशासन कोना सहलहुँ? एतेक कम उमेरमे सेहो दृढ़ पुरुषक धैर्य अछि! बाल्यावस्थे मे हृदय बालक्रीड़ा आ व्यर्थ खेलक आकर्षण छोड़ि देलक। अहो, जन्मदाता आ आध्यात्मिक गुरुजनप्रति पूर्ण भक्ति सचमुच विलक्षण वस्तु अछि। आइ पिताक कृपासँ अहाँ केँ सभ ज्ञानसँ सम्पन्न देखैत छी; शीघ्रहि योग्य पत्नीसभसँ सम्पन्न सेहो देखब।’ “एना कहलापर चन्द्रापीड लज्जासँ आध मुस्कराइत माथ झुका लेलनि। माता अपन मुखक पूर्ण प्रतिबिम्ब जकाँ, खिलल कमलसँ मालाबद्ध हुनकर गाल चुमि लेलनि। किछु काल ओतए रहि राजकुमार सम्पूर्ण अन्तःपुर केँ क्रमशः दर्शनसँ आनन्दित कयलनि। तखन राजद्वारसँ बाहर निकलि ओतए ठाढ़ इन्द्रायुधपर चढ़लाह, राजकुमारसभक संग शुकनास केँ देखय गेलाह। “अनेक सम्प्रदायक पुरोहितसभसँ भरल बाहरी आँगनक फाटकपर घोड़ासँ उतरि शुकनासक महलमे प्रवेश कयलनि, जे दोसर राजदरबार जकाँ छल। भीतर पैसिते हजारो राजाक बीच ठाढ़ शुकनास केँ दोसर पिता जकाँ प्रणाम कयलनि; दूरहि सँ मुकुट बहुत नीचाँ झुका पूर्ण सम्मान प्रकट कयलनि। शुकनास शीघ्र उठलाह; राजासभो एकक बाद एक उठि गेलाह। ओ सोझे राजकुमार दिस आदरसँ बढ़लाह; आनन्दसँ फैलल आँखिसँ हर्षाश्रु झरि रहल छल। वैशम्पायन सहित चन्द्रापीड केँ हृदयसँ, अपार स्नेहपूर्वक आलिङ्गन कयलनि। “राजकुमार सम्मानसँ अनल रत्नमय आसन अस्वीकार कऽ खाली धरतीपर बैसलाह; लगमे वैशम्पायन बैसलाह। हुनका धरतीपर बैसल देखि शुकनास छोड़ि समस्त राजा अपन आसन छोड़ि धरतीपर बैसि गेलाह। शुकनास किछु क्षण मौन रहलाह; देहक रोमाञ्च अपार हर्ष प्रकट करैत छल। तखन राजकुमार सँ कहलनि— “‘पुत्र, राजा तारापीड अहाँ केँ यौवनप्राप्त आ ज्ञानसम्पन्न देखि अन्ततः विश्व-राज्यक फल पओलनि। आइ माता-पिताक समस्त आशीर्वाद पूर्ण भेल; अनेक पूर्वजन्ममे अर्जित पुण्य फलित भेल; कुलदेवता तृप्त भेलाह। अहाँ जकाँ तीनू लोक केँ विस्मित करनिहार व्यक्ति अयोग्य माता-पिताक पुत्र नहि होइत छथि। कतए अहाँक अल्प आयु, आ कतए ई अलौकिक शक्ति तथा अनन्त ज्ञान धरि पहुँचबाक क्षमता! भरत आ भगीरथसदृश रक्षक पाओल ओ प्रजा धन्य अछि। पृथ्वी कोन उज्ज्वल पुण्य कयने छल जे अहाँ केँ स्वामीक रूपमे पओलक? विष्णुक वक्षमे रहबाक हठपूर्ण चञ्चलतामे अड़ल लक्ष्मी निश्चय अपन हित नष्ट कऽ रहल छथि, जे मानवी रूपमे अहाँ लग नहि अबैत छथि। तथापि महावराह जहिना दन्तमण्डलसँ पृथ्वी उठौलनि, तहिना अहाँ अपन भुजासँ पिताक सहायता करैत असंख्य युग धरि पृथ्वीक भार धारण करू।’ “एना कहि आभूषण, वस्त्र, फूल आ सुगन्धित लेपसँ सम्मान कऽ शुकनास हुनका विदा कयलनि। राजकुमार उठि अन्तःपुरमे गेलाह, वैशम्पायनक माता मनोरमाक दर्शन कयलनि। फेर बाहर आबि इन्द्रायुधपर चढ़ि अपन महल गेलाह। पिता पहिनहि ओकर व्यवस्था कयने छलाह। फाटकपर भरल श्वेत कलश राखल छल; महल राजप्रासादक प्रतिरूप जकाँ। हरियर चन्दन-डाढ़िक माला, उड़ैत हजारो श्वेत पताका, मङ्गलवाद्यक ध्वनिसँ भरल आकाश, चारू दिस छिटकायल खिलल कमल। अग्निहोत्र एखनहि सम्पन्न भेल छल; प्रत्येक सेवक उज्ज्वल वस्त्रमे; गृहप्रवेशक सभ मङ्गलविधान तैयार। “आगमनपर सभामे राखल शय्यापर किछु काल बैसलाह। तखन राजकुमारक दलक संग स्नानसँ आरम्भ भोज धरि दिनक समस्त कर्तव्य पूरा कयलनि। एहि बीच इन्द्रायुध केँ अपन निजी कक्षमे रखबाक व्यवस्था कयलनि।’ ‘“एहि सभ कार्यमे दिन समाप्त भऽ गेल। आकाशसँ शीघ्र उतरैत दिवसलक्ष्मीक माणिक-नूपुर जकाँ सूर्यबिम्ब उठल किरणसहित खसि गेल; ओकर बीचक रिक्ति अपनहि प्रकाशसँ ढकल छल। साँझ आरम्भ भेलापर चन्द्रापीड जरैत दीपकक प्रकाश-वाड़िसँ घेरायल पएदल राजमहल गेलाह। पिताक संग किछु काल रहि, विलासवतीक दर्शन कऽ, अपन घर घुरलाह आ विविध रत्नक प्रभासँ बहुरङ्गी शय्यापर एना सुतलाह जेना शेषनागक फणमण्डलपर कृष्ण।’ ‘“राति भोरमे बदलल तखन पिताक अनुमति लऽ सूर्योदय सँ पहिने उठलाह। आखेटक नवीन आनन्दक उत्कण्ठामे इन्द्रायुधपर चढ़ि दौड़निहार सेवक, घोड़ा आ हाथीक विशाल दलक संग वन दिस चलि गेलाह। व्याधसभ सोनक जंजीरमे गदहा जकाँ विशाल कुकुर लेने छल, जे हुनकर उत्साह दुगुना करैत। खिलल कमलपात जकाँ उज्ज्वल दण्डबला, तरुण जङ्गली हाथीक मस्तक विदीर्ण करबाक योग्य बाणसँ हजारो वराह, सिंह, शरभ, याक आ अनेक प्रकारक मृग मारलनि। धनुषक टंकारक भय सँ काँपैत वनदेवीसभ आध मुनल आँखिसँ हुनका तकैत छलीह। आन पशुसभ केँ महान् शक्ति सँ जीवित पकड़लनि। सूर्य आकाशक मध्य पहुँचलापर उत्तम घोड़ापर बैसल किछुए राजकुमारक संग वनसँ घुरलाह। बाटमे आखेटक घटना दुहरबैत कहैत गेलाह—‘एना सिंह मारलहुँ, एना भालू, एना महिष, एना शरभ, एना हरिण।’” ‘“घोड़ासँ उतरि ओ सेवकसभ द्वारा शीघ्रता सँ अनल आसनपर बैसलाह, कवच उतारलनि आ सवारीक शेष वस्त्र सेहो खोललनि। डोलैत पङ्खाक हवासँ थाकनि दूर होइ धरि किछु काल विश्राम कयलनि। तखन स्नानगृह गेलाह, जतए सोन, चानी आ रत्नक सौ कलश राखल छल आ बीचमे सोनक आसन। स्नान समाप्त भेलापर अलग कक्षमे वस्त्रसँ देह पोंछाओलनि; माथपर निर्मल कपड़ाक पट्टी बान्हल गेल; वस्त्र पहिरलनि आ देवतासभ केँ प्रणाम कयलनि। “सुगन्ध-कक्षमे प्रवेश कयलापर महाप्रतिहार द्वारा नियुक्त आ राजा द्वारा पठाओल दरबारक स्त्रीसेविका, विलासवतीक दासीसभ कुलवर्धनाक संग, आ सम्पूर्ण अन्तःपुरसँ पठाओल स्त्रीसभ टोकरीमे विविध आभूषण, माला, सुगन्धित लेप आ वस्त्र लऽ उपस्थित भेलीह आ हुनका अर्पित कयलनि। राजकुमार स्त्रीसभसँ विधिपूर्वक वस्तु ग्रहण कऽ पहिने अपन हाथसँ वैशम्पायन केँ सुगन्धित लेप लगौलनि। अपन अलङ्कार-लेपन पूर्ण भेलापर चारू दिसक लोक केँ योग्यतानुसार फूल, सुगन्ध, वस्त्र आ रत्न देलनि। “तखन भोजशाला गेलाह, जे हजार रत्नमय पात्रसँ एना चमकि रहल छल जेना तारासँ जगमग शरदाकाश। दूहरा बिछाओनपर बैसलाह, वैशम्पायन लगमे। राजकुमारक गुणक प्रशंसा करबामे उत्सुक राजकुमारसभ उमेरक क्रमसँ धरतीपर बैसल छलाह। युवराज अत्यन्त शिष्टतासँ बेर-बेर कहैत छलाह—‘ई हुनका दिअ, ओ हुनका दिअ।’ ई देखि राजकुमारसभक सेवासुख आरो बढ़ि गेल। एहि प्रकार ओ विधिपूर्वक प्रातःभोजन कयलनि।’ ‘“मुख धोइ ताम्बूल ग्रहण कऽ किछु काल ओतए रहलाह, तखन इन्द्रायुधक कात गेलाह। ओतए बैसल नहि; सेवकसभ पाछाँ मुख ऊपर कयने आज्ञाक प्रतीक्षामे ठाढ़ छल। बातचीत मुख्यतः इन्द्रायुधक गुण-लक्षणपर छल। इन्द्रायुधक श्रेष्ठतासँ हृदय प्रफुल्लित राजकुमार स्वयं ओकरा सोझाँ चारा छिटकौलनि। तखन दरबारक दर्शन करैत क्रमशः राजा केँ देखलनि; घर घुरि ओतहि राति बितौलनि। “अगिला दिन भोरमे अन्तःपुरक प्रधान प्रतिहार कैलास केँ अबैत देखलनि। ओ राजाक परम विश्वस्त छल। संगमे श्रेष्ठ रूपबाली, प्रथम यौवनमे प्रवेश करैत एक कन्या छल। दरबारी जीवनसँ आत्मसंयमी, मुदा लज्जाहीन नहि; कुमारिका अवस्थामे विकसित होइत; किरमिजी लाल रेशमी घूँघटमे ओ भोरक सूर्यकिरण पहिरने पूर्व दिशा जकाँ लगैत छलीह। कैलास प्रणाम कऽ समीप आयल, दहिना हाथ धरतीपर राखि एहि प्रकार बजल—’ ‘“‘राजकुमार, रानी विलासवतीक सन्देश अछि—“ई पत्रलेखा नामक कन्या कुलूत देशक राजाक पुत्री अछि। महाराज जखन कुलूतक राजधानी जीतलनि तखन युद्धबन्दीसभक संग एकरा अनल गेल; ओहि समय ई नन्हकी बालिका छल आ अन्तःपुरक स्त्रीसभक बीच राखल गेल। राजकुमारी आ निराश्रित बुझि हमर हृदयमे ओकराप्रति स्नेह जागल; दीर्घकाल धरि अपन पुत्री जकाँ देखभाल कऽ पालन कयलहुँ। आब अहाँक ताम्बूलवाहिनी होयबाक योग्य बुझि पठा रहल छी। मुदा, हे दीर्घायु राजकुमार, एकरा आन सेविकाजकाँ नहि देखब। नवयौवना कन्या जकाँ सहेजब; अपन स्वभाव जकाँ अविवेकी लोकसँ रक्षा करब; शिष्या जकाँ देखब। सखी जकाँ सभ गुप्त बातमे सम्मिलित करब। “‘“दीर्घकालसँ बढ़ल स्नेहक कारण हमर हृदय ओकरापर अपन पुत्रीजकाँ टिकल अछि। उच्च कुलमे जन्मलाक कारण एहन सेवाक योग्य सेहो अछि। किछुए दिनमे अपन पूर्ण सौम्यता सँ स्वयं राजकुमारक मन मोह लेत। ओकराप्रति हमर प्रेम पुरान आ तेँ दृढ़ अछि; राजकुमार एखन ओकर स्वभाव नहि जनैत छथि, एहि कारण ई सभ कहल जा रहल अछि। हे भाग्यवान् राजकुमार, सभ प्रकार प्रयत्न करब जे ई दीर्घकाल धरि अहाँक योग्य संगिनी रहए।”’ “कैलास एना कहि चुप भऽ गेल। पत्रलेखा विनम्र प्रणाम कयलक; चन्द्रापीड दीर्घकाल धरि स्थिर दृष्टिसँ ओकरा देखलनि आ ‘माताक जे इच्छा’ कहि प्रतिहार केँ विदा कयलनि। पहिल दर्शनहि सँ पत्रलेखाक हृदय हुनकाप्रति भक्तिसँ भरि गेल। राजकुमार सुतल, बैसल, ठाढ़, चलैत वा दरबार जाइत—राति-दिन ओ छाहरि जकाँ हुनकर पार्श्व नहि छोड़ैत। चन्द्रापीडक हृदयमे सेहो पहिल नजरिसँ ओकराप्रति गहन स्नेह जागल आ निरन्तर बढ़ैत गेल। प्रतिदिन आरो कृपा करैत आ सभ गुप्त विषयमे ओकरा अपन हृदयक अंश मानैत छलाह।’ ‘“एहि प्रकार दिन बीतैत रहल। राजा चन्द्रापीडक युवराजाभिषेक लेल उत्सुक छलाह, तेँ प्रतिहारसभ केँ आवश्यक सामग्री एकत्र करबाक आदेश देलनि। अभिषेक निकट आबि गेल तखन शुकनास, राजकुमारक पहिनहिसँ महान् विनय केँ आरो बढ़ेबाक इच्छासँ, एक भेटमे हुनका दीर्घ उपदेश देलनि— “‘प्रिय चन्द्रापीड, अहाँ जानय योग्य बात सीखि लेलहुँ आ समस्त शास्त्र पढ़ि लेलहुँ, तथापि सीखबाक बहुत किछु एखनहुँ शेष अछि। यौवनसँ उत्पन्न अन्धकार स्वभावतः अत्यन्त घन होइत अछि; न सूर्य ओकरा भेदि सकैत, न रत्नक आभा चीरि सकैत, न दीपकक प्रकाश हटा सकैत। लक्ष्मीक मद भयानक अछि आ वृद्धावस्थामे सेहो नहि उतरैत। प्रभुत्वक दोसर दुष्ट अन्धापन अछि, जे कोनो अञ्जनसँ ठीक नहि होइत। अहङ्कारक ज्वर बहुत तेज चढ़ैत, कोनो शीतल उपचार ओकरा शान्त नहि कऽ सकैत। इन्द्रिय-विष चखलासँ उपजल उन्माद प्रबल अछि; जड़ि-बूटी वा मन्त्र ओकर प्रतिकार नहि। वासनाक दागसँ लागल मल स्नान-शुद्धिसँ कहियो नहि हटैत। राजसी सुखक समूह सँ आयल निद्रा सदा भयङ्कर अछि; राति बीतलो भोरमे जागरण नहि होइत। अतएव अहाँ केँ एहन बात बेर-बेर विस्तारसँ कहल जाए। जन्महि सँ पाओल प्रभुत्व, नवयौवन, अतुल रूप आ अलौकिक प्रतिभा—ई सभ विपत्तिक लम्बा शृङ्खला अछि। एक-एक वस्तु अलगो उद्दण्डताक घर अछि; सभ एकत्र हो तखन की कहब! “‘यौवनक आरम्भमे मन शास्त्रक निर्मल जलसँ धोएल होइतहुँ प्रायः शुद्धता गमा दैत अछि। युवाक आँखि पूर्ण दृष्टिहीन नहि होइतहुँ मदसँ लाल भऽ जाइत अछि। वासनाक बवण्डर उठिते प्रकृति यौवनमे मनुष्य केँ अपन इच्छासँ बहुत दूर उड़ा लैत अछि, जेना पवन सुखायल पात केँ। इन्द्रियरूपी मृग केँ मोहित करनिहार सुखक मृगतृष्णा सदैव दुःखमे समाप्त होइत अछि। प्रारम्भिक यौवनसँ मनक चेतना मन्द भेलापर बाह्य जगतक गुण नव-नव चखल जल जकाँ आरो मधुर लगैत अछि। विषय-वस्तुमे अत्यधिक आसक्ति दिशा-बोधक अभाव जकाँ भ्रमित कऽ मनुष्यक विनाश करैत अछि। मुदा अहाँ जकाँ पुरुष उपदेशक उचित पात्र होइत छथि। निष्कलङ्क मनमे सदुपदेशक गुण चन्द्रकान्तमणिपर चन्द्रकिरण जकाँ सहजहि प्रवेश करैत अछि। “‘गुरुक वचन निर्मल होइतहुँ दुष्टक कानमे पैसिते पानि जकाँ घोर पीड़ा दैत अछि; सज्जनमे हाथीक कानक आभूषण जकाँ आरो उदात्त शोभा उत्पन्न करैत अछि। सन्ध्याक चन्द्रमा जकाँ अनेक पापक घन अन्हार दूर करैत अछि। गुरुक शिक्षा शान्तिदायक अछि; यौवनक दोष केँ गुणमे बदलि समाप्त करैत अछि, जेना वृद्धावस्था केशक कालिमा केँ धूसर बनाकऽ हटबैत अछि। एखन अहाँ इन्द्रियसुख नहि चखने छी, तेँ उपदेशक उचित समय अछि। कामबाणक प्रहारसँ विदीर्ण हृदयमे शिक्षा जल जकाँ बहि जाइत अछि। उद्दण्ड आ अनुशासनहीन लेल कुल आ पवित्र परम्परा निष्फल होइत अछि। चन्दनक लकड़ी देलापर अग्नि नहि जरैत अछि की? आगि बुझाबयबला जलक भीतर रहनिहार बड़वानल आरो प्रचण्ड नहि होइत अछि की? “‘गुरुवचन बिना जलक स्नान अछि, जे मनुष्यक सभ मल धो सकैत; एहन परिपक्वता जे केश केँ धूसर नहि करैत; शरीरक आकार बढ़ौने बिना भार-गाम्भीर्य दैत; सोनसँ नहि बनलहुँ असाधारण कर्णाभूषण अछि; प्रकाशविहीन होइतहुँ चमकैत; चौंकौने बिना जगबैत। राजासभ लेल एकर विशेष आवश्यकता अछि, कारण राजा केँ सचेत करनिहार बहुत कम होइत छथि। भयक कारण लोक राजाक वचनक प्रतिध्वनि जकाँ पुनरावृत्ति करैत अछि। फलतः गर्वमे निरंकुश राजा कानक खोह पूर्ण बन्द कऽ लेताह आ देल गेल सदुपदेशो नहि सुनताह। सुनियो लेताह तँ हाथी जकाँ आँखि मुनि तिरस्कार देखबैत आ हितवचन देनिहार गुरु केँ पीड़ा दैत छथि। अहङ्कारज्वरक उन्मादसँ अन्हार राजस्वभाव विचलित रहैत; धन घमण्ड आ मिथ्या आत्म-महत्त्व उत्पन्न करैत; राजलक्ष्मी राजसत्ताक विषसँ उत्पन्न जड़ता दैत। “‘सुख चाहनिहार मनुष्य पहिने लक्ष्मीक स्वभाव देखए। ई लक्ष्मी एखन नङ्गा तलवारक मण्डलरूपी कमलवनपर भ्रमर जकाँ बसैत छथि। क्षीरसागरसँ निकलल समय पारिजातक कलीसँ लालिमा, चन्द्रकलासँ वक्रता, उच्चैःश्रवासँ चञ्चलता, कालकूट विषसँ मायावीपन, अमृतसँ मद आ कौस्तुभमणिसँ कठोरता लेने छथि। संगहीसभक स्नेह स्मरण कऽ वियोग घटेबाक लेल ई सभ चिन्ह स्मृतिचिह्न जकाँ अपने संग रखलनि। एहि संसारमे नीच लक्ष्मी जतेक अबूझ वस्तु दोसर नहि। प्राप्त भेलापर संभालब कठिन; वीरताक दृढ़ डोरीसँ कसि बान्हलहुँ गायब; हजार उग्र वीरक घुमाओल तलवारक पिँजड़ामे रोकलहुँ निकलि जाए; मदक आँधीसँ श्याम घन हाथी-दलसँ रक्षित रहलहुँ भागि जाए। “‘ओ मित्रता नहि निभबैत; कुल नहि देखैत; रूपक चिन्ता नहि; वंशक भाग्यक अनुसरण नहि; चरित्रपर दृष्टि नहि; चतुराईक मूल्य नहि; पवित्र विद्या नहि सुनैत; धर्मक अभिलाषा नहि; उदारताक सम्मान नहि; विवेकक मान नहि; आचरणक रक्षा नहि; सत्य नहि बुझैत; शुभचिह्न केँ मार्गदर्शक नहि मानैत। आकाशनगरक रेखा जकाँ देखिते-देखिते विलीन भऽ जाइत। मन्दराचलक मन्थनसँ बनल भँवरमे घूमबाक अनुभूति सँ एखनहुँ चक्करायल अछि। कमलवनक बदलैत गतिसँ बान्हल कमलडाँठक नोक जकाँ कतहु स्थिर आधार नहि दैत। महलमे महान् प्रयाससँ पकड़लहुँ असंख्य जङ्गली हाथीक मद पीबि मातल जकाँ डगमगाइत। “‘क्रूरता सीखबाक लेल तलवारक धारपर बसैत। निरन्तर रूप बदलनाइ सीखबाक लेल नारायणक रूपसँ चिपटल। अत्यन्त चञ्चल; मित्र, न्यायिक शक्ति, कोष आ प्रदेशसँ सम्पन्न राजा केँ सेहो दिनक अन्तमे जड़ि, डाँठ, कली आ विस्तृत पाँखुरीबला कमल छोड़ि देबाक समान छोड़ि दैत। लता जकाँ सदा परजीवी। गङ्गा जकाँ धन उत्पन्न करैतहुँ बुलबुलासँ चञ्चल। सूर्यक किरण जकाँ एक वस्तुसँ दोसरपर उतरैत। नरकक गर्त जकाँ घन अन्हारसँ भरल। हिडिम्बा जकाँ केवल भीमक साहस ओकर हृदय जीत सकैत। वर्षाकाल जकाँ क्षणिक बिजुली चमकबैत। दुष्ट राक्षसी जकाँ अनेक पुरुषक ऊँचाई पाबि दुर्बल मन केँ पागल करैत। “‘ईर्ष्यालु जकाँ विद्या द्वारा अनुगृहीत पुरुष केँ आलिङ्गन नहि करैत; सदाचारी केँ अपवित्र बुझि नहि छुबैत; उदात्त स्वभाव केँ अमङ्गलकारी बुझि तिरस्कार करैत; सुसंस्कृत कुलीन केँ अनुपयोगी मानैत। विनयी पुरुष केँ सर्प बुझि लाँघि जाइत; वीर सँ काँटा जकाँ बचैत; दानी केँ दुःस्वप्न जकाँ बिसरैत; संयमी सँ दुष्ट जकाँ दूर रहैत; ज्ञानीक उपहास मूर्ख जकाँ करैत। विरोधी गुण जोड़निहार जादूगरक खेल जकाँ अपन चाल जगतमे देखबैत। निरन्तर ज्वर उत्पन्न करितहुँ ठिठुरन दैत; मनुष्य केँ ऊँच उठबैतहुँ आत्माक नीचता प्रकट करैत; जलसँ उत्पन्न होइतहुँ पियास बढ़बैत; स्वामित्व दैतहुँ अस्वामी स्वभाव देखबैत; शक्ति लादितहुँ गम्भीरतासँ वञ्चित करैत; अमृतक बहिन होइतहुँ मुँहमे कड़ुआहट छोड़ैत; पार्थिव रूप होइतहुँ अदृश्य; सर्वोच्चसँ जुड़ल होइतहुँ नीचक प्रेमी; धूरिक प्राणी जकाँ निर्मलो केँ मलिन करैत। “‘ई चञ्चला जतेक चमकए, दीपकक लौ जकाँ अन्ततः काजर मात्र निकालैत। कामनाक विषवृक्षक पोषक वर्षा; इन्द्रियरूपी मृग केँ फँसबयबला व्याधक गीत; सद्गुणक चित्र मलिन करनिहार धुआँ; मोहक दीर्घ निद्राक विलासी शय्या; गर्व आ धनक राक्षससभक पुरान प्रहरी-मचान। शास्त्रसँ प्रकाशित आँखिपर जमैत मोतियाबिन्द; उद्दण्डक ध्वजा; क्रोधरूपी ग्राहसभक जन्मनदी; इन्द्रियमदिराक मदिरालय; मोहक नृत्यक सङ्गीतशाला; पापसर्पक माँद; सदाचार केँ खदेड़निहार दण्ड। गुणरूपी कलहंसक लेल असमय वर्षा; कलङ्कक फोड़ा उगाबयबला भूमि; कपट-नाटकक प्रस्तावना; कामरूपी हाथीक गर्जना; सत्कर्मक बूचड़खाना; पवित्रतारूपी चन्द्रमा लेल राहुक जीह। हमरा कोनो एहन व्यक्ति नहि देखाइत अछि, जकरा अपरिचिते अवस्था मे ई हिंस्र आलिङ्गन नहि कयने आ धोखा नहि देने हो। चित्रमे सेहो हिलैत; पुस्तकमे सेहो जादू करैत; रत्नमे काटि अंकित कयलहुँ छल करैत; नाम सुनलहुँ भ्रमित करैत; विचार मात्र कयलहुँ विश्वासघात करैत अछि।’ ‘“‘भाग्यक इच्छासँ ई दीन दुष्टा बहुत श्रमक बाद जखन राजा केँ प्राप्त करैत अछि, तखन ओ असहाय भऽ प्रत्येक लज्जाजनक कर्मक निवास बनि जाइत छथि। राज्याभिषेकक क्षणहि मङ्गलकलशक जलसँ मानू हुनकर सौम्यता धोएल जाइत; यज्ञाग्निक धुआँसँ हृदय अन्हार; पुरोहितक कुशझाड़ूसँ धैर्य बुहारल; पगड़ी पहिरबासँ बढ़ैत आयुक स्मृति ढकल; छत्रमण्डलसँ परलोकक दृष्टि दूर; चामरक पवनसँ सत्य हटाओल; राजदण्डसँ सद्गुण खदेड़ल; ‘जय हो’क घोषसँ सज्जनक स्वर दबाओल; आ ध्वजाक फहरैत पटसँ यशक उपहास कयल जाइत अछि।’ ‘“‘किछु राजा एहन सफलतासँ धोखा खाइत छथि जे थाकनिसँ ढील पड़ल पक्षीक काँपैत चोंच जकाँ अनिश्चित, आ जुगनूक चमक जकाँ क्षणभर सुखद होइतहुँ ज्ञानीक दृष्टिमे तुच्छ अछि। कनेक धन जोड़बाक गर्वमे अपन मूल बिसरि जाइत छथि; संचित रोगसँ उपजल रक्तविष जकाँ वासनाक प्रहारसँ व्याकुल। पाँच मात्र इन्द्रिय प्रत्येक सुख चखबाक लालसामे हजार बनि यातना दैत। एकटा मन स्वभावतः चञ्चल, अपन आवेगक पाछाँ चलैत, निरन्तर परिवर्तनमे लाखक बल पाबि भ्रमित करैत। एहि प्रकार ओ पूर्णतः असहाय भऽ जाइत छथि। मानू भूत पकड़ि लेलक, पिशाच जीतलक, जादू वशमे कयलक, दैत्य जकड़लक, पवन उपहास कयलक, राक्षस निगलि गेल। “‘कामबाणसँ विद्ध भऽ हजार भाँति अंग मोड़ैत; लोभक आगिमे जरि छटपटाइत; प्रचण्ड प्रहारसँ खसि पड़ैत। केकड़ा जकाँ टेढ़ चलैत। पापसँ टूटल डेगबला लँगड़ा जकाँ दोसरक सहारे विवश चलाओल जाइत। पूर्वक असत्य-पापक कारण हकलाहटबला जकाँ मुश्किलसँ बड़बड़ाइत। सप्तच्छद-वृक्ष जकाँ निकटवर्ती लोकक माथ दुखबैत। मरनिहार जकाँ अपन जनो नहि चिन्हैत। धुँधला दृष्टिबला जकाँ उज्ज्वलतम गुणो नहि देखैत। अमङ्गल घड़ीमे विषदंशित मनुष्य जकाँ शक्तिशाली मन्त्रसँ सेहो नहि जागैत। लाहक आभूषण जकाँ तीव्र ताप सहि नहि सकैत। उद्दण्ड हाथी जकाँ आत्माभिमानक खूँटामे कसि बान्हल रहि शिक्षा अस्वीकार करैत। लोभविषसँ भ्रमित भऽ सभ वस्तु सोन बुझैत। घिसि तीक्ष्ण कयल बाण जकाँ दोसरक हाथमे पड़ि विनाश करैत। “‘राजदण्डसँ ऊँच फल जकाँ महान् कुलसभ केँ गिरा दैत। असमय फूल जकाँ बाहरसँ सुन्दर होइतहुँ विनाशक कारण। चिताक राख जकाँ स्वभावसँ भयङ्कर। मोतियाबिन्दबला जकाँ दूर नहि देखैत। भूतग्रस्त जकाँ घरक शासन विदूषकक हाथ देत। नाम सुनिते अन्त्येष्टि-नगाड़ा जकाँ भय जगबैत; विचार मात्र सँ महापाप करबाक सङ्कल्प जकाँ महान् विपत्ति आनैत। प्रतिदिन पापसँ भरैत पूर्णतः फूला जाइत। एहि दशामे सैकड़ो पापसँ मित्रता कऽ दीमकक टीला पर घासक नोकमे लटकल जलबिन्दु जकाँ रहैत—आ खसलाक बादो अपन पतन नहि बुझैत।’ ‘“‘आन राजा अपन स्वार्थमे मग्न दुष्टसभसँ धोखा खाइत छथि—धनरूपी मांसक लोभी, महलक कमलवनक बक! ओसभ कहैत अछि—“जुआ मन बहलाव; परस्त्रीगमन चतुराई; आखेट व्यायाम; मदिरापान आनन्द; उतावलापन वीरता; पत्नीक उपेक्षा आसक्तिरहितता; गुरुवचनक तिरस्कार दोसरासँ समर्पण माँगबाक अधिकार; सेवकक उद्दण्डता सुखद सेवा सुनिश्चित करबाक उपाय; नृत्य, गीत, वाद्य आ दुष्टसङ्गक आसक्ति लोकज्ञान; लज्जाजनक अपराध सुनब उदारचित्तता; अपमान चुपचाप सहब धैर्य; स्वेच्छाचार प्रभुत्व; देवताक अनादर उच्च साहस; भाटक प्रशंसा यश; चञ्चलता उद्योग; विवेकक अभाव निष्पक्षता।” “‘दोष केँ गुणक पदवी देबामे तत्पर, छलमे प्रशिक्षित, भीतरहि-भीतर हँसनिहार, परम नीच लोक एहन अलौकिक प्रशंसासँ राजा केँ ठकैत अछि। बुद्धिहीन राजाक मन धनगर्वसँ मातल होइत आ स्थायी मिथ्या विश्वास जमि जाइत जे ई सभ सचमुच गुण अछि। मर्त्य दशाक अधीन होइतहुँ अपने केँ अलौकिक नियतिबला देवता बुझैत, जे पृथ्वीपर उतरि आयल हो। प्रत्येक उद्यममे केवल देवताक योग्य ठाठ करैत आ सम्पूर्ण मानवजातिक तिरस्कार अर्जित करैत। अनुचर द्वारा अपन एहि ठकाइ केँ प्रसन्नतासँ स्वीकार करैत। मनमे जमल अपन दिव्यताक भ्रमसँ मिथ्या विचारक गर्तमे गिरैत। बुझैत जे दू भुजाक संग दोसर जोड़ी भुजा सेहो उगि गेल; कल्पना करैत जे ललाटक चमड़ी भीतर तेसर आँखि गाड़ल अछि। “‘अपन दर्शन केँ अनुग्रह, नजरि केँ उपकार, वचन केँ उपहार, आज्ञा केँ महान् वरदान, स्पर्श केँ शुद्धि मानैत। मिथ्या महिमाक गर्वसँ दबायल ओ न देवताक प्रणाम करैत, न ब्राह्मणक आदर, न सम्माननीयक सम्मान, न प्रणम्य केँ प्रणाम, न सम्बोधनयोग्य केँ सम्बोधन, न गुरु केँ देख उठैत। विद्वानक उपहास करैत जे व्यर्थ परिश्रममे सभ सुख गमा रहल अछि। वृद्धक शिक्षा केँ बुढ़ापक असम्बद्ध प्रलाप मानैत। मन्त्रीक परामर्श केँ अपन बुद्धिक अपमान कहि गारि दैत। हितोपदेश देनिहारपर क्रुद्ध होइत।’ ‘“‘अन्ततः ओ जे व्यक्ति केँ अपन लग स्वीकार करैत, गप्प करैत, पार्श्वमे बैसबैत, पदोन्नत करैत, सुखक साथी आ दानक पात्र बनबैत, मित्र चुनैत, जकर स्वर सुनैत, जकरापर कृपा बरसाबैत, जकरा उच्च मानैत आ जकरापर विश्वास करैत—ओ एहन व्यक्ति होइत जे दिन-राति निरन्तर प्रणाम करब, देवता जकाँ प्रशंसा करब आ राजाक महानता बढ़ा-चढ़ा कऽ कहब छोड़ि आन किछु नहि करैत।’ ‘“‘ओहि राजा सँ की आशा कयल जा सकैत अछि, जकर मानदण्ड कठोर सिद्धान्तबला निर्दयी कपटनीति; जकर गुरु जादू-टोना आ अभिचारसँ निर्दय स्वभाव बनौने कुलपुरोहित; जकर शिक्षक दोसर केँ ठकबामे निपुण मन्त्री; जकर हृदय ओहि सत्तापर टिकल जे हुनकासँ पहिने सैकड़ो राजा पओलनि आ गमा देलनि; जकर अस्त्र-कौशल केवल मृत्यु देबाक लेल; आ जकर सहोदर, स्वाभाविक स्नेहसँ हृदय कोमल होइतहुँ, केवल वध करबाक वस्तु बनि जाइत?’ ‘“‘अतएव हे राजकुमार, सैकड़ो दुष्ट आ विपरीत प्रवृत्तिसँ भयङ्कर एहि साम्राज्यपदमे, आ पूर्ण मोहक कात लऽ जाएबला एहि यौवनकालमे, अहाँ गम्भीर प्रयत्न करू जे प्रजा तिरस्कार नहि करए, सज्जन दोष नहि लगाबए, गुरु शाप नहि देथि, मित्र उलाहना नहि देथि, ज्ञानी शोक नहि करथि। सेहो सावधान रहू जे नीच लोक अहाँक पोल नहि खोलए; ठक धोखा नहि दे; दुष्ट शिकार नहि बनाबए; भेड़िया-सदृश दरबारी टुकड़ी-टुकड़ी नहि करए; बदमाश गलत बाट नहि देखाबए; स्त्री भ्रमित नहि करए; भाग्य छल नहि करए; गर्व नचा नहि दे; कामना पागल नहि करए; विषय-वस्तु आक्रमण नहि करए; वासना सिरक बल घीचि नहि लए; सुख बहा नहि लए।’ ‘“‘ई सत्य अछि जे अहाँ स्वभावसँ दृढ़ छी, पिताक देखरेखमे सद्गुणक प्रशिक्षण पओने छी, आ धन केवल हलुक स्वभावबला तथा अविवेकी केँ मातल बनबैत अछि। तथापि अहाँक गुणमे हमर अपार आनन्दे हमरा एतेक विस्तारसँ बजय लेल प्रेरित करैत अछि।’ ‘“‘ई वचन सदिखन अहाँक कानमे गूँजैत रहए—एहन कोनो व्यक्ति नहि जे कतेकहु ज्ञानी, विवेकी, उदार, सौम्य, दृढ़ आ प्रयत्नशील हो, आ निर्लज्ज दुष्टा भाग्य ओकरा पीसि धूरि नहि बना सकए। आब शुभ मुहूर्तमे पिताक हाथसँ युवावस्था केँ राजत्वमे समर्पित करनिहार अभिषेकक आनन्द लिअ। पूर्वजसभ जे जुआ वहने छथि, उत्तराधिकारमे भेटल ओ भार उठाउ। शत्रुसभक माथ झुकाउ; मित्रदल केँ ऊँच उठाउ; राज्याभिषेकक बाद दिग्विजय लेल जगतमे भ्रमण करू; पिताद्वारा पहिनहि जीतल सातू द्वीपबाली पृथ्वी केँ अपन अधीन राखू।’ ‘“‘एखन यशक मुकुट धारण करबाक समय अछि। यशस्वी राजाक आज्ञा महान् तपस्वीक सङ्कल्प जकाँ तुरन्त सिद्ध होइत अछि।’ ‘“एतेक कहि शुकनास मौन भऽ गेलाह। हुनकर वचनसँ चन्द्रापीड मानू धोएल, जगाओल, पवित्र कयल, उज्ज्वल बनाओल, अमृत-बिन्दुसँ सिञ्चित, अभिषिक्त, अलङ्कृत, निर्मल आ दीप्त कयल गेलाह। प्रसन्न हृदयसँ किछु कालक बाद अपन महल घुरि गेलाह।’ ‘“किछु दिनक बाद शुभ मुहूर्तमे राजा हजारो सामन्तसँ घेरायल छलाह। शुकनासक सहायता सँ अभिषेककलश ऊपर उठौलनि आ स्वयं पुत्रक अभिषेक कयलनि; शेष विधान कुलपुरोहित पूरा कयलनि। अभिषेकजल सभ तीर्थ, नदी आ समुद्रसँ अनल गेल छल; प्रत्येक औषधि, फल, माटि आ रत्नसँ घेरल; हर्षाश्रुसँ मिलल; मन्त्रसँ पवित्र। ओही क्षण, राजकुमार एखन अभिषेकजलसँ भीजल छलाह, राजलक्ष्मी तारापीड केँ छोड़ने बिना चन्द्रापीडमे प्रवेश कयलीह—जेना एक वृक्षसँ लिपटल लता दोसर वृक्ष धरि सेहो पसरि जाए। “तुरन्त समस्त अन्तःपुरसँ घेरायल, कोमल स्नेहसँ भरल विलासवती हुनकर माथसँ पएर धरि चन्द्रकिरण जकाँ उज्ज्वल सुगन्धित चन्दन लगौलनि। नव श्वेत फूलक माला पहिरौलनि; गोरोचनक रेखासँ सजौलनि; दूबक कर्णाभूषण लगौलनि; चन्द्रमा जकाँ श्वेत, लम्बा झालरबला दूटा नव रेशमी वस्त्र पहिरौलनि। कुलपुरोहित हाथमे रक्षासूत्र बान्हलनि। वक्षपर मोतीक हार घेरल गेल—मानू नव युवराजक राजलक्ष्मीरूपी कमल-सरोवरक तन्तुसँ गूँथल सप्तर्षिमण्डल अभिषेक देखय उतरि आयल हो।’ ‘“चन्द्रकिरण जकाँ कोमल, परस्पर गूँथल आ ठेहुन धरि लटकल श्वेत पुष्पमालासँ देह पूर्णतः ढकल, आ हिमसदृश वस्त्र पहिरने ओ घन अयाल हिलबैत नरसिंह जकाँ; झहरैत धाराबला कैलास जकाँ; स्वर्गगङ्गाक उलझल कमलनालसँ खुरदुर भेल ऐरावत जकाँ; अथवा उज्ज्वल फेनकणसँ पूर्ण ढकल क्षीरसागर जकाँ लगैत छलाह।’ ‘“ओहि अवसरपर पिता स्वयं प्रतिहारक दण्ड हाथमे लऽ पुत्रक लेल बाट साफ कयलनि। चन्द्रापीड सभामण्डप गेलाह आ मेरुशिखरपर चन्द्रमा जकाँ राजसिंहासनपर चढ़लाह। राजासभसँ विधिपूर्वक सम्मान पओलाक किछु क्षण बाद दिग्विजय-प्रस्थानक सूचना देनिहार महान् नगाड़ा सोनक डण्डाक प्रहारसँ गम्भीर गूँजि उठल। ओकर ध्वनि प्रलय-दिनमे जुटैत मेघक गर्जना; मन्दराचलसँ प्रहार पओल समुद्र; कल्पान्तक भूकम्पसँ हिलल पृथ्वीक नींव; बिजुली चमकबैत उत्पात-मेघ; अथवा महावराहक थूथनक प्रहारसँ नरकक खोहक ध्वनि जकाँ छल। “ओ ध्वनि सँ जगतक दिशासभ मानू फूलि, खुलि, अलग भऽ, विस्तृत, पूर्ण, दक्षिणावर्त घूमि आ गम्भीर भऽ गेल; आकाश केँ बाँधनिहार बन्धन खुलि गेल। प्रतिध्वनि तीनू लोकमे विचरल। पातालमे सहस्र फण भय सँ ठाढ़ कयने शेषनाग ओकरा आलिङ्गन कयलनि। अन्तरिक्षमे दिशाक हाथी दाँत उछालि चुनौती देलक। आकाशमे भयक फुँकारसँ माथ हिलबैत सूर्यक घोड़ा दक्षिणावर्त घूमि सम्मान कयलक। कैलासशिखरपर शिवक वृषभ, ई स्वामीक प्रचण्ड अट्टहास बुझि आनन्दसँ गरजि अद्भुत उत्तर देलक। मेरुपर ऐरावत गम्भीर चिंघाड़सँ स्वागत कयलक। देवसभामे यमक महिष अनोखा ध्वनिपर क्रोधसँ वक्र सींग तिरछा कऽ आदर प्रकट कयलक। लोकपाल देवता भयमिश्रित विस्मयसँ सुनलनि।’ ‘“नगाड़ाक गर्जनाक संग चारू दिससँ ‘जय हो’क घोष उठल। चन्द्रापीड सिंहासनसँ उतरि गेलाह, आ हुनकर संग शत्रुसभक यश सेहो उतरि गेल। हजारो सामन्त चारू दिस शीघ्र उठि पाछाँ चललाह। परस्पर टकराइत हारसँ पैघ मोती टूटि चारू दिस छिटकि रहल छल—मानू विश्वविजय-प्रस्थानक मङ्गलक लेल खेलहिमे अक्षत फेकल जा रहल हो। श्वेत कल्पवृक्षक कलिक बीच पारिजात जकाँ; सूँड़िक जलसँ सिञ्चित करैत दिग्गजसभक बीच ऐरावत जकाँ; तारा बरसाबैत आकाशसहित स्वर्ग जकाँ; अथवा निरन्तर मोट बूँद बरसाबैत मेघसहित वर्षा-ऋतु जकाँ ओ शोभित छलाह।’ ‘“तखन महावत यात्रा-सम्बन्धी सभ मङ्गलचिह्नसँ सजल हाथी शीघ्र अनलक; भीतरी आसनपर पत्रलेखा बैसाओल गेलीह। राजकुमार चढ़लाह आ मोतीसँ जड़ल सौ तारबला छत्रक छाहरिमे यात्रा आरम्भ कयलनि। ओ छत्र रावणक भुजापर ठाढ़ कैलास जकाँ सुन्दर, आ पर्वत-मन्थनसँ घुमरैत क्षीरसागरक भँवर जकाँ उज्ज्वल छल। “प्रस्थान सँ पहिने किछु क्षण रुकि ओ दसू दिशा देखलनि। प्राचीरक पाछाँ मुख नुकौने हुनका तकैत राजासभक चमकैत मुकुटमणिसँ पघिलल लाहक लालिमा केँ सेहो हरबैत घन सूर्यप्रकाश पसरल छल। मानू अभिषेकक बाद हुनकर अपन राजतेजक अग्नि फूटि निकलल हो। युवराजाभिषेकसँ पृथ्वी मानू हुनकर अपन निष्ठाक आभासँ उज्ज्वल; शत्रुसभक शीघ्र विनाशक सूचना देनिहार ज्बलासँ आकाश लाल; आ स्वागत लेल अबैत पृथ्वीलक्ष्मीक पएरक लाहरससँ दिन गुलाबी देखाइत छल।’ ‘“बाटमे राजासभक विशाल दल प्रणाम करैत गेल। हजारो हाथी भ्रममे डोलैत; भीड़क दबावसँ छत्र टूटैत; मुकुट झुकिते शिरोमणि नीचाँ लटकैत; कुण्डल झूलैत आ रत्न गालपर खसैत। विश्वस्त सेनापति एक-एकक नाम सुनबैत छल। “राजकुमारक पाछाँ गन्धमादन हाथी चलैत छल। प्रचुर सिन्दूरसँ गुलाबी, मोतीक कान-आभूषण धरती धरि लटकल, माथ श्वेत पुष्पमालासँ घेरल—ओ एहन मेरु जकाँ छल जकरापर सन्ध्याक लालिमा ठहरल, आर-पार श्वेत गङ्गाधारा खसल, आ शिखरपर तारकसमूहक चमकीला खुरदुरापन पसरल हो। चन्द्रापीडक आगाँ साईस द्वारा डोर पकड़ि चलाओल इन्द्रायुध छल; केसरसँ सुवासित, बहुरङ्गी, अंगपर सोनक साजक चमक। एहि प्रकार अभियान धीरे-धीरे पूर्व दिशा दिस चलि पड़ल।’ ‘“तखन सम्पूर्ण सेना अद्भुत कोलाहलसँ चलि पड़ल। हाथीक गतिसँ हिलैत छत्रवन एना छल, जेना प्रलयक समुद्र आगाँ बढ़ैत तरङ्गपर हजार चन्द्रमाक प्रतिबिम्ब लेने पृथ्वी केँ प्लावित कऽ रहल हो।’ ‘“राजकुमार महलसँ निकललापर वैशम्पायन सभ मङ्गलकर्म पूरा कयलनि। तखन श्वेत वस्त्र पहिरि, श्वेत पुष्पक सुगन्धित लेप लगौने, शक्तिशाली राजासभक विशाल दलसँ घेरायल, श्वेत छत्रक छाहरिमे, वेगवान् हाथीपर चढ़ि दोसर युवराज जकाँ राजकुमारक तुरन्त पाछाँ चललाह आ सूर्यक कात चन्द्रमा जकाँ हुनकर समीप पहुँचि गेलाह। चारू दिस पृथ्वी सुनलक—‘युवराज प्रस्थान कयलनि!’ आ आगाँ बढ़ैत सेनाक भारसँ काँपि उठल।’ ‘“क्षणभरमे पृथ्वी मानू घोड़ासँ बनल, क्षितिज हाथीसँ, अन्तरिक्ष छत्रसँ, आकाश पताकावनसँ, पवन मदगन्धसँ, मानवजाति राजासँ, दृष्टि रत्नक किरणसँ, दिन मुकुटसँ आ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ‘जय हो’क घोषसँ बनल बुझाइत छल।’ ‘“सेनाक आगाँ बढ़िते धूरि एना उठल, जेना सूर्यकिरणरूपी कमल उखाड़बाक लेल हाथीक झुंड, अथवा तीनू लोकक लक्ष्मी केँ ढाकयबला घूँघट। दिन माटिमय भऽ गेल; दिशासभ माटिसँ गढ़ल बुझाइत; आकाश धूरिमे विलीन; सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मानू एक्के तत्त्वसँ बनल देखाइत छल।’ ‘“क्षितिज फेर निर्मल भेल तखन समुद्रसँ उठैत बुझाइत विशाल सेना देखिकऽ वैशम्पायन विस्मयसँ भरि गेलाह। चारू दिस नजरि घुमा चन्द्रापीड सँ कहलनि—‘राजकुमार, महाबली राजा तारापीड अहाँक विजय लेल की अजेय छोड़ने छथि? कोन प्रदेश एखन अधीन करबाक शेष? कोन दुर्ग जीतबाक बाकी? कोन द्वीप अधिकारमे लेबाक शेष? कोन निधि अप्राप्त? कोन राजा माथ नहि झुकौने अछि? ककर नवकमल जकाँ कोमल प्रणामक हाथ माथपर नहि पहुँचल? सोनक पट्टीसँ घेरल ककर ललाट हुनकर सभामण्डपक फर्श नहि चमकौने? ककर मुकुटमणि हुनकर पादपीठ नहि घिसने? के हुनकर राजदण्ड स्वीकार नहि कयलक? के चामर नहि डोलौलक? के ‘जय’क घोष नहि कयलक? ककर मुकुटरूपी मकर निर्मल नदी जकाँ हुनकर चरणप्रभा नहि पीओलक? “‘ई सभ राजकुमारक सेना कठोर क्रीड़ामे चारू समुद्रमे कूद पड़बाक गर्वसँ भरल अछि; ओ दशरथ, भगीरथ, भरत, दिलीप, अलर्क आ मान्धातासदृश महान् राजासभक समकक्ष छथि; राज्याभिषिक्त, सोमपायी आ कुलगर्वसँ उद्दण्ड छथि। तैयो अभिषेकजलसँ पवित्र मुकुटक कोपलपर अहाँक मङ्गलमय चरणधूरि भस्मक ताबीज जकाँ धारण कयने छथि। नवीन श्रेष्ठ पर्वतसभ जकाँ ओ पृथ्वी धारण कयने छथि। दसू दिशाक हृदयमे पैसल हुनकर सेनासभ केवल अहाँक पाछाँ चलि रहल अछि। देखू—जतए अहाँक दृष्टि पड़ैत अछि, नरक सेना उगलैत, पृथ्वी जन्म दैत, दिशा बाहर निकालैत, आकाश बरसाबैत आ दिन रचैत बुझाइत अछि। असीम सेनाक भारसँ रौंदल पृथ्वी आइ महाभारतक युद्धक अस्तव्यस्तता स्मरण कऽ रहल अछि।’ ‘“‘एतए सूर्य पताकाक उपवनमे घूमैत अछि; ओकर मण्डल पताकाक फुनगीमे अटकैत, मानू कौतूहलसँ ध्वजासभ गिनबाक प्रयत्न करैत हो। हाथी चारू दिस इलायची जकाँ मधुर सुगन्धबला, केशवेणी जकाँ बहैत मद निरन्तर छिटका रहल अछि। ओहिपर बसल भ्रमरक घन गुंजनसँ धरती यमुनाक तरङ्गसँ भरल जकाँ चमकैत अछि। चन्द्रधवल ध्वजाक पङ्क्ति क्षितिज ढाकि देने अछि—मानू विशाल सेनासँ मलिन होयबाक भयमे नदीसभ आकाशमे भागि गेल हो। आश्चर्य जे आइ सेनाक भारसँ धरती हजार टुकड़ीमे नहि फाटल; ओकर जोड़ बान्हनिहार श्रेष्ठ पर्वतसभ नहि टूटल; आ सेनाभारसँ दबायल पृथ्वीक बोझ सहैत नागराज शेषक फण पीड़ामे झुकि नहि गेल।’ ‘“वैशम्पायन एना बजिये रहल छलाह कि राजकुमार अपन शिविर-प्रासाद पहुँचलाह। अनेक ऊँच विजयतोरणसँ सजल, घासक परकोटासँ घेरल हजार मण्डपसँ बिन्दुबिन्दु, चमकैत श्वेत कपड़ाक अनेक तम्बूसँ उज्ज्वल छल। ओतए उतरि राजोचित रीति सँ सभ आवश्यक कर्म पूरा कयलनि। जुटल राजा आ मन्त्री विविध कथासँ मन बहलाबय चाहलनि, मुदा पितासँ नव वियोगक तीव्र शोक हृदय केँ यातना दऽ रहल छल; शेष दिन दुःखमे बीतल। “दिन समाप्त भेलापर रातियो अधिकांश जागिते बितौलनि। वैशम्पायन हुनकर शय्यासँ किछु दूर शय्यापर विश्राम करैत छलाह; पत्रलेखा लगहिमे धरतीपर बिछाओल कम्बलपर सुतल छलीह। गप्प कखनो पिता, कखनो माता, कखनो शुकनासक विषयमे; विश्राम बहुत कम। भोरमे उठलाह। प्रत्येक पड़ावपर बढ़ैत, एकहि क्रममे आगाँ बढ़ैत सेनासँ पृथ्वी खोखर, पर्वत कम्पित, नदी सुखायल, सरोवर खाली, वन धूरि, टेढ़ स्थान समतल, दुर्ग ध्वस्त, खोह भरल आ ठोस भूमि फेर खोदल जाइत छल।’ ‘“क्रमशः मनमाना विचरैत ओ घमण्डी केँ झुकौलनि, विनम्र केँ ऊँच उठौलनि, भयभीत केँ साहस देलनि, शरणागतक रक्षा कयलनि, दुष्ट केँ जड़िसँ उखाड़लनि आ शत्रु केँ खदेड़लनि। विभिन्न स्थानमे राजकुमारसभक अभिषेक कयलनि, कोष एकत्र कयलनि, उपहार स्वीकारलनि, कर लेलनि, स्थानीय नियम सिखौलनि, अपन यात्राक स्मारक स्थापित कयलनि, स्तुतिगीत रचौलनि आ राजाज्ञा खुदबौलनि। ब्राह्मणक सम्मान, सन्तक प्रणाम, आश्रमक रक्षा कयलनि आ एहन पराक्रम देखौलनि जाहिसँ प्रजाक प्रेम पओलनि। राजतेज बढ़ौलनि, यशक राशि जोड़लनि, गुण दूर-दूर धरि प्रकट कयलनि आ सत्कर्मक कीर्ति अर्जित कयलनि। एहि प्रकार समुद्रतटीय वन रौंदैत आ सेनाक धूरिसँ समुद्रक सम्पूर्ण विस्तार धूसर करैत पृथ्वीपर विचरलाह।’ ‘“पहिल विजय पूर्व दिशाक भेल; तखन त्रिशङ्कुसँ चिह्नित दक्षिण दिशा; फेर वरुणचिह्नबाली पश्चिम दिशा; आ तुरन्त सप्तर्षिसँ सजल उत्तर दिशा। तीन वर्ष धरि संसारमे भ्रमण करैत ओ चारू समुद्रक खाहिसँ सीमाबद्ध द्वीपसहित सम्पूर्ण पृथ्वी अधीन कऽ लेलनि।’ ‘“तखन दक्षिणावर्त घूमैत पूर्वी समुद्रसँ बेसी दूर नहि सुवर्णपुर जीतलनि आ अधिकार कयलनि। ओ कैलासक कात रहनिहार हेमजकूट नामक किरातसभक निवास छल। विश्वव्यापी भ्रमणसँ सेना थाकल छल, तेँ किछु दिन विश्रामक लेल ओतहि पड़ाव देलनि।’ ‘“ओतए ठहरल एक दिन इन्द्रायुधपर चढ़ि आखेट लेल निकललाह। वनमे घूमैत पर्वतसँ मनमाना नीचाँ उतरल किन्नरक एक युगल देखलनि। विचित्र दृश्यपर विस्मित आ हुनका पकड़बाक इच्छासँ सम्मानपूर्वक घोड़ा हुनकर समीप बढ़ौलनि। अपरिचित मनुष्य केँ देखि किन्नरसभ डरायल आ तेजीसँ भागय लागल। चन्द्रापीड पाछाँ दौड़लाह; बेर-बेर इन्द्रायुधक गर्दनि थपथपा ओकर वेग दुगुना कयलनि। सेना बहुत पाछाँ छूटि गेल आ ओ एकसरि आगाँ बढ़ैत रहलाह। ‘आब पकड़लहुँ’ एहि भ्रममे इन्द्रायुध एक छलाँग जकाँ वेगसँ क्षणभरमे अपन शिविरसँ पन्द्रह कोस दूर लऽ गेल; ओ पूर्णतः साथीविहीन भऽ गेलाह। “किन्नर-युगल सोझाँक कठिन पहाड़ीपर चढ़ि रहल छल। हुनकर गति ताकैत नजरि अन्ततः हटौलनि। तीख चढ़ाइ रोकलक, तेँ इन्द्रायुधक लगाम खिंचलनि। घोड़ा आ स्वयं दुनू परिश्रमसँ थाकल आ तपल देखलनि। किछु क्षण सोचि अपनेपर हँसलाह—‘बालक जकाँ व्यर्थ अपने केँ किएक थकौलहुँ? किन्नर-युगल पकड़ल जाए वा नहि, ताहिसँ की? पकड़लहुँ तँ लाभ की, छुटल तँ हानि की? हमर ई कोन मूर्खता! तुच्छ बातमे काजक नाटक करबाक कोन रुचि! उद्देश्यहीन श्रमक कोन उन्माद! बालक्रीड़ासँ कोन आसक्ति! “‘जे शुभ कार्य करैत छलहुँ से व्यर्थ आरम्भ भेल; आवश्यक विधि निष्फल; मित्रताक कर्तव्य अपूर्ण; राजकीय दायित्व अधूरा; पैघ कार्य समाप्त नहि; योग्य अभिलाषामे गम्भीर परिश्रम नष्ट। अनुचरसभ केँ छोड़ि एतेक दूर आबि हम एतेक पागल किएक भेलहुँ? घोड़ामाथबला एहि विचित्र जीवसभक पाछाँ उद्देश्यहीन दौड़ि जे उपहास दोसरक करितहुँ से अपने अर्जित कयलहुँ। पाछाँ आबि रहल सेना कतेक दूर अछि, नहि जानैत छी। इन्द्रायुधक वेग एक क्षणमे विशाल दूरी पार करैत; आँखि किन्नरपर स्थिर छल, तेँ अबैत काल घुरबाक बाट ध्यानमे नहि रहल। आब घन वनमे छी—धरतीपर सुखायल पात, घनी लता-झाड़ी आ शाखादार वृक्ष। एतए जतेक घूमी, कोनो मनुष्य नहि भेटत जे सुवर्णपुरक बाट देखाबए। “‘बेर-बेर सुनने छी जे सुवर्णपुर उत्तरमे पृथ्वीक अन्तिम सीमा; ओकरापार अलौकिक वन; तकरापार कैलास। तखन ई कैलास अछि। आब घुरबाक चाही आ दृढ़तासँ बिना सहायता दक्षिणक बाट खोजबाक चाही। मनुष्य केँ अपन दोषक फल स्वयं सहय पड़ैत अछि।’” ‘“एहि निश्चयसँ बाम हाथक लगाम हिलौने घोड़ाक मुँह घुमौलनि। फेर सोचलनि—‘तेजस्वी सूर्य एखन दहकैत ज्योतिसँ दक्षिण दिशा केँ एना सजा रहल छथि जेना दिवसलक्ष्मीक करधनीक मणि। इन्द्रायुध थाकल अछि। पहिने किछु कौर घास खाय; तखन कोनो पहाड़ी झरना वा नदीमे स्नान कऽ पानि पीअए। ताजा भेलापर हमहुँ पानि पीबि गाछक छाहरिमे किछु विश्राम करब, तखन फेर प्रस्थान करब।’” ‘“एना सोचैत जलक लेल चारू दिस निरन्तर तकैत घूमलाह। अन्ततः एकटा बाट देखलनि, जे नव स्नान कऽ कमल-सरोवरसँ ऊपर आयल पर्वतीय हाथीक विशाल दलक पएरसँ उठल पाँकक ढेरीसँ भीजल छल। समीपे जल अछि से अनुमान कऽ कैलासक ढलानपर सोझे आगाँ बढ़लाह। ओतए वृक्ष एतेक घन छल, मुदा अधिकांश देवदारु, साल आ सरलवृक्ष ऊँच आ शाखाविहीन छल, तेँ दूर-दूर ठाढ़ बुझाइत; छत्रक मण्डल जकाँ, माथ उठा कऽ देखय योग्य। पीयर बालू घन छल; पथरीली भूमि होयबाक कारण घास आ झाड़ी बहुत कम।’ ‘“अन्ततः कैलासक उत्तर-पूर्वमे अत्यन्त ऊँच वृक्षसमूह देखलनि। वर्षाभारसँ झुकल मेघराशि जकाँ उठल, कृष्णपक्षक रातिक अन्हार एकठाम जमल हो एना घन छल।’ ‘“जलतरङ्गसँ उठल पवन चन्दन जकाँ कोमल, ओसयुक्त, जलक ऊपरसँ आबि शीतल, फूलसँ सुवासित छल; मानू प्रेमसँ हुनकर स्वागत करैत। कमलमधुसँ मातल कलहंसक कान-मोहक स्वर भीतर आबय बजा रहल छल। ओ वृक्षसमूहमे पैसलाह आ बीचमे अच्छोद सरोवर देखलनि—मानू तीनू लोकक लक्ष्मीक दर्पण, पृथ्वीदेवीक स्फटिक-कक्ष, समुद्रजल बाहर निकलबाक बाट, दिशासभक रिसैत जल, आकाशक एक अंशक अवतार, बहबाक शिक्षा पओल कैलास, द्रवित हिमालय, पघिलल चाँदनी, जल बनल शिवक मुस्कान, सरोवररूपमे ठहरल तीनू लोकक पुण्य, जलमे बदलल नीलमणि-पर्वतश्रेणी, अथवा एकठाम उझलल शरदमेघक राशि। निर्मलतासँ वरुणक दर्पण बुझाइत; मानू तपस्वीक हृदय, सज्जनक गुण, मृगक उज्ज्वल आँखि वा मोतीक किरणसँ बनाओल हो।’ ‘“महापुरुषक शरीर जकाँ ओ मीन, मकर, कच्छप आ चक्रक शुभचिह्न स्पष्ट देखबैत छल। कार्तिकेयक कथाजकाँ क्रौञ्चक पत्नीसभक विलाप ओहिमे गूँजैत। श्वेत धृतराष्ट्र हंसक पाँखसँ जल हिलैत—जेना पाण्डव आ धृतराष्ट्रवंशीक प्रतिस्पर्धासँ महाभारत। मयूरसभ ओकर जल पीबैत, मानू समुद्रमन्थनक समय शिवक विषपानक अभिनय हो। देवताजकाँ सुन्दर, स्थिर दृष्टिबला। निष्फल तर्क जकाँ अन्तहीन बुझाइत, तथापि अत्यन्त सुन्दर आ आँखि केँ आनन्दित करनिहार सरोवर।’ ‘“ओकर दर्शनमात्र चन्द्रापीडक थाकनि हटबैत बुझायल। एकटक तकैत मनमे सोचलनि—’ ‘“‘घोड़ामुखी युगलक पीछा निष्फल भेल, मुदा एहि सरोवरक दर्शनसँ फल प्राप्त भऽ गेल। देखय योग्य समस्त वस्तु देखबाक आँखिक फल आब मिलल। सौन्दर्यक अन्तिम सीमा, दृष्टिक आनन्दक चरम बिन्दु, मोहक वस्तुक सीमारेखा, सुखदायक वस्तुक पूर्णता, दर्शनयोग्यक परम समाप्ति—सभ एतहि प्रकट। अमृतजकाँ मधुर ई जल रचि सृष्टिकर्ता अपन शेष सृष्टि-श्रम अनावश्यक बना देलनि। अमृत जहिना सभ इन्द्रिय केँ आनन्द दैत, तहिना ई निर्मलतासँ आँखि, शीतलतासँ स्पर्श, कमलसुगन्धसँ घ्राण, हंसक निरन्तर गुंजनसँ कान आ मधुरतासँ रसना केँ प्रसन्न करैत अछि। “‘निश्चय एकर दर्शनक उत्कण्ठे शिव केँ कैलास-निवासक मोह छोड़य नहि दैत। कृष्ण अपन जलशय्याक स्वाभाविक रुचिक अनुसरण नहि करैत छथि—नोन सँ कड़ुआ समुद्रमे सुतैत छथि आ ई अमृतमधुर जल छोड़ैत छथि! ई आदिम सरोवर नहि होयत। प्रलयवराहक दन्तप्रहारसँ डरि पृथ्वी समुद्रमे पैसल छलीह, जकर सम्पूर्ण जल अगस्त्यक एक घूँटक लेल बनल छल। जँ अनेक गहिर नरकसँ गहिर एहि विशाल सरोवरमे डुबि जाइतथि, तँ एक नहि हजार वराहो हुनका धरि नहि पहुँचि सकितथि। “‘निश्चय कल्पान्तक विनाशमे जगतक रिक्ति डुबाबय आ सभ दिशा संहारक आँधीसँ अन्हार करयबला प्रलयमेघ एही सरोवरसँ कनेक-कनेक जल भरैत होयत। हमरा बुझाइत अछि सृष्टिक आरम्भमे जलमय ब्रह्माण्ड-अण्ड केँ समेटि सरोवरक रूपमे एतहि राखल गेल।’ “एना सोचैत दक्षिणी तट पहुँचलाह। घोड़ासँ उतरि इन्द्रायुधक साज खोललनि। ओ धरतीपर लोटल, फेर उठि किछु कौर घास खयलक। राजकुमार ओकरा सरोवरमे लऽ गेलाह; मनमाना जल पीबय आ स्नान करय देलनि। फेर लगाम खोलि सोनक जंजीरसँ दू पएर लगहिक गाछक नीच डाढ़िमे बान्हलनि। खञ्जरसँ तटक दूब काटि ओकरा सोझाँ फेकलनि आ स्वयं जलक कात घुरलाह। “हाथ धोइ चातक जकाँ जलक भोज कयलनि; चक्रवाक जकाँ कमलनालक टुकड़ी चखलनि; चन्द्रमा किरणसँ कुमुद छुबैत अछि, तहिना अँगुरीक नोकसँ कुमुदिनी छुबौलनि; सर्प जकाँ तरङ्गक हवा स्वागत कयलनि; कामबाणसँ घायल जकाँ वक्षपर कमलपातक आवरण राखलनि; फुहारसँ सूँड़िक नोक भीजल पर्वतीय हाथी जकाँ जलधोएल कमलसँ हाथ सजौलनि। ओसयुक्त कमलपात आ नव तोड़ल नालसँ लताक कुञ्जमे एक शिलापर शय्या बनौलनि; उत्तरीय मोड़ि तकिया बना सुतलाह। “किछु विश्रामक बाद सरोवरक उत्तरी तटसँ वीणाक तारमे मिलल अलौकिक मधुर सङ्गीत कानमे आयल। इन्द्रायुध पहिने सुनलक; खाइत घास छोड़ि, कान ठाढ़ आ गर्दनि मोड़ि स्वर दिस तकलक। मनुष्यविहीन स्थानमे ई गीत कतएसँ उठल से देखबाक कौतूहलसँ राजकुमार कमलशय्यासँ उठलाह, ओहि दिशा दिस नजरि दौड़ौलनि। दूरी बहुत छल, आँखि पूरा तानलहुँ किछु नहि देख सकलाह; ध्वनि निरन्तर सुनाइत रहल। स्रोत जानबाक उत्कण्ठासँ प्रस्थानक निश्चय कयलनि। इन्द्रायुध केँ सज्जित कऽ चढ़लाह आ पश्चिमी वनपथसँ गीत केँ लक्ष्य बना चललाह। सङ्गीतसँ आनन्दित मृगसभ बिना कहलहि आगाँ दौड़ि मार्गदर्शक बनि गेल।’ ‘“कैलासक पवनसँ स्वागत पबैत ओ स्थान दिस बढ़लाह, जे चारू दिस वृक्षसँ घेरल छल। कैलासक ढलानक पएरमे, अच्छोद सरोवरक बाम तटपर चन्द्रप्रभा नामक स्थान छल, जकर चाँदनी-सदृश प्रकाश सम्पूर्ण प्रदेश धवल करैत। ओतए एक निर्जन शिवमन्दिर देखलनि।’ ‘“मन्दिरमे पैसिते पवनसँ उड़ल केतकी-पराग हुनकापर खसल आ देह उज्ज्वल कऽ देलक। मानू शिवदर्शन लेल बलपूर्वक भस्मधारण-व्रत कराओल गेल हो, अथवा मन्दिर-प्रवेशक पवित्र पुण्यक वस्त्र पहिराओल गेल हो। चारि खम्भापर टिकायल स्फटिक-मण्डपमे चारिमुखबला, जगतगुरु, विश्वपूजित चरणबला शिव केँ देखलनि; हुनकर लिङ्ग निर्मल मोतीक बनल छल। “देवता केँ स्वर्गगङ्गाक चमकैत कमल चढ़ाओल छल—नव तोड़ल, भीजल, पातक नोकसँ बूँद खसैत, मोतीक मुकुट बुझाइत। ओसभ फोड़ि सोझ ठाढ़ कयल चन्द्रमण्डलक टुकड़ी, शिवक मुस्कानक अंश, शेषक फणक खण्ड, कृष्णक शङ्खक सहोदर, अथवा क्षीरसागरक हृदय जकाँ लगैत छल।’ ‘“मुदा देवताक दहिना दिस, हुनकर सम्मुख ध्यानमुद्रामे बैसल, शिवसेवाक व्रत लेने एक कन्या चन्द्रापीड केँ देखाइ पड़लीह। अपन सौन्दर्यक उज्ज्वलतासँ ओ पहाड़ आ वन सहित समस्त प्रदेश केँ हाथीदाँत जकाँ धवल बना देने छलीह। हुनकर कान्ति दूर-दूर धरि अन्तरिक्षमे पसरैत छल—प्रलयकालमे सभ वस्तु केँ डुबा दयबला क्षीरसागरक उज्ज्वल ज्वार जकाँ; अथवा दीर्घ वर्षक सञ्चित तपस्या बाहर बहि रहल हो, वृक्षसभक बीच गङ्गाक धारा जकाँ एकत्रित भऽ उमड़ैत हो, कैलास केँ नव धवलता दैत हो, आ आँखिक बाट प्रवेश करितो दर्शकक आत्मा केँ पवित्र करैत हो। हुनकर शरीरक अत्यधिक गौरवर्ण अंगसभ केँ एना नुकौने छल, मानू ओ स्फटिक-मन्दिरमे प्रवेश कऽ गेलीह; दूधक समुद्रमे डुबकी लगा लेने होथि; निष्कलङ्क श्वेत रेशममे लपेटल होथि; दर्पणक चमकैत सतहमे अटकि गेलीह; अथवा शरदकालीन मेघक आवरणमे नुकायल होथि। बुझाइत छल, पाँच स्थूल तत्त्वसँ बनल देह रचबाक सामान्य सामग्रीक सहायता बिना, केवल धवलताक परम सारसँ हुनकर निर्माण भेल हो।’ ‘“ओ मानू साक्षात् यज्ञ छलीह, जे अपात्रक हाथ पड़बाक भय सँ शिवक पूजा करय आयल हो; अथवा रति, कामदेवक शरीर फेर प्राप्त कराबय लेल शिव केँ प्रसन्न करबाक अनुष्ठान करैत हो; अथवा क्षीरसागरक देवी लक्ष्मी, जे समुद्रक गहिराइमे संग रहबाक पुरान परिचयक कारण शिवक चन्द्रमाक एक कला पाबय लेल आकुल हो; अथवा देहधारी चन्द्रमा, राहुसँ रक्षा लेल शिवक शरण आयल हो; अथवा ऐरावतक शोभा, शिवक हाथीक चाम पहिरबाक इच्छा पूर्ण करय आयल हो; अथवा शिवक दक्षिण मुखक मुस्की अलग रूप धारण कऽ स्वतंत्र निवास बना लेने हो; अथवा शिव जे श्वेत भस्म अपन देहपर छिड़कैत छथि, से शरीर धारण कऽ लेने हो; अथवा शिवक कण्ठक अन्हार दूर करबाक लेल चाँदनी साकार भऽ गेल हो; अथवा गौरीक मनक निर्मलता देह धारण कयने हो; अथवा कार्तिकेयक ब्रह्मचर्य साक्षात् रूपमे उपस्थित हो; अथवा शिवक वृषभक उज्ज्वलता ओकर शरीरसँ अलग भऽ एतए रहय लागल हो। अथवा मन्दिरक वृक्षसभपर खिलल फूलक सम्पदा स्वयं शिवपूजा लेल आबि गेल हो; अथवा ब्रह्माक तपस्याक पूर्णता पृथ्वीपर उतरि आयल हो; अथवा सत्ययुगक प्रजापतिसभक तेज सातो लोकमे भ्रमणक थाकनिक बाद एतए विश्राम करैत हो; अथवा कलियुगमे धर्मक पराभव देखि शोकाकुल तीनू वेद वनमे आबि निवास कऽ रहल हो; अथवा भावी सत्ययुगक बीज कन्याक रूप धारण कयने हो; अथवा मुनिक पूर्ण समाधि मनुष्य-रूपमे प्रकट भेल हो; अथवा स्वर्गगङ्गापर पहुँचि दिग्भ्रमित भेल देवहाथीसभक समूह हो; अथवा रावण द्वारा उखाड़ल जयबाक भय सँ कैलासक शोभा खसि एतए आबि गेल हो; अथवा श्वेतद्वीपक लक्ष्मी दोसर द्वीप देखय लेल आयल हो; अथवा नव फूटैत काँसक फूलक शोभा शरद ऋतुक खोजमे भटकैत हो; अथवा शेषनागक शरीरक उजास पाताल छोड़ि पृथ्वीपर आबि गेल हो; अथवा बलरामक तेज, हुनकर मदोन्मत्ततासँ थाकि शरीर छोड़ि देने हो; अथवा अनेक शुक्लपक्ष एकठाम सघन भऽ गेल हो।’ ‘“हुनकर धवलता देखि बुझाइत छल जे ओ सभ हंससँ गौरवर्णक एक-एक अंश लऽ लेने छथि; अथवा धर्मक हृदयसँ बाहर आयल छथि; शङ्खसँ गढ़ल गेल छथि; मोतीसँ निकालल गेल छथि; कमलनालक रेशासँ बनल छथि; हाथीदाँतक पतली परतसँ रचल छथि; चन्द्रकिरणक कूचीसँ शुद्ध कयल गेल छथि; चूनक जड़ाइक काजसँ सजायल छथि; अमृतक फेनगोलासँ उज्ज्वल कयल गेल छथि; पाराक धारामे नहायल छथि; पघिलल चानीसँ घसल गेल छथि; चन्द्रमण्डलसँ खोदि निकालल गेल छथि; अथवा कुटज, चमेली आ सिन्धुवारक फूलक वर्णसँ अलङ्कृत कयल गेल छथि। वस्तुतः ओ धवलताक अन्तिम सीमा बुझाइत छलीह। हुनकर माथ जटासँ उज्ज्वल छल, जे काँधपर लटकैत छल। ओ जटा मानू पूर्वाचलपर उदित सूर्यसँ प्रभातक किरणक कान्ति लऽ बनाओल गेल हो; चमकैत बिजुरीक काँपैत आभा जकाँ पिङ्गल छल; नव स्नानसँ भीजल छल; आ भक्तिसँ शिवक चरण पकड़लापर लागल चरणधूलिसँ चिह्नित छल। केशबन्धनसँ कसि ओ माथपर शिवक चरण धारण कयने छलीह, जाहिपर रत्नसँ हुनकर नाम अंकित छल। हुनकर कपारपर भस्मक सम्प्रदायिक तिलक छल, जे सूर्यक घोड़ाक एड़ीसँ पिसायल तारकाधूलि जकाँ निर्मल छल। ओ देवी छलीह; पृथ्वीक कालगणनासँ हुनकर आयु जानल नहि जा सकैत छल, तथापि रूपमे ओ अठारह बसन्तक कन्या जकाँ लगैत छलीह।’ ‘“हुनका देखि चन्द्रापीड घोड़ासँ उतरलाह, इन्द्रायुध केँ एक डाढ़िमे बान्हलनि, आदरसँ भगवान शिव केँ प्रणाम कयलनि, आ फेर ओहि दिव्य कन्या केँ स्थिर, अपलक दृष्टिसँ देखय लगलाह। हुनकर सौन्दर्य, माधुर्य आ शान्त भाव राजकुमार केँ विस्मित कऽ देलक; मनमे विचार उठल—‘एहि संसारमे एक वस्तु भेटिते दोसर वस्तु क्रमशः मूल्यहीन किएक भऽ जाइत अछि! किन्नर-युगलक व्यर्थ आ उच्छृङ्खल पीछा करैत हमरा मनुष्यक पहुँचसँ बाहर, देवतासभक विहारभूमि ई अत्यन्त सुन्दर स्थान भेटल। फेर जल खोजैत सिद्धसभक प्रिय ई मनोहर सरोवर देखलहुँ। तकर तटपर विश्राम करैत दिव्य गीत सुनलहुँ; स्वरक पाछाँ अबैत ई अलौकिक कन्या आँखिक सोझाँ आबि गेलीह, जिनकर सौन्दर्य मनुष्यक दृष्टिसँ परे अछि। हुनकर देवी होयबामे हमरा कोनो सन्देह नहि। हुनकर सौन्दर्य स्वयं दिव्यता घोषित करैत अछि। मनुष्यलोकमे एहन स्वर्गीय सङ्गीतक सामञ्जस्य कतएसँ उत्पन्न भऽ सकैत अछि? तेँ जँ ओ हमर आँखिक सोझाँसँ अदृश्य नहि होथि, कैलासक शिखरपर नहि चढ़ि जाइथि, वा आकाशमे उड़ि नहि जाइथि, तँ हम समीप जा कऽ पुछबनि—‘अहाँ के छी? अहाँक नाम की अछि? जीवनक प्रभातहि मे ई व्रत किएक ग्रहण कयलहुँ?’ ई सभ अद्भुत रहस्यसँ भरल अछि।’ एना निश्चय कऽ ओ स्फटिक-मण्डपक दोसर खम्भाक समीप गेलाह आ गीत समाप्त होयबाक प्रतीक्षामे ओतहि बैसि रहलाह।’ ‘“जखन ओ वीणा शान्त कयलनि—जेना मधुमाछीक मधुर गुंजन थमिते रात्रिक कमलवन मौन भऽ जाइत अछि—तखन उठलीह, शिवक प्रदक्षिणा आ प्रणाम कयलनि, आ फेर घुरलीह। स्वभावतः निर्मल आ तपस्याक सामर्थ्यसँ निर्भय दृष्टिसँ चन्द्रापीड दिस तकलनि। मानू ओहि दृष्टिसँ हुनका साहस दैत होथि, पुण्य छिड़कैत होथि, पवित्र जलसँ नहबैत होथि, तपस्यासँ शुद्ध करैत होथि, कलङ्कसँ मुक्त करैत होथि, मनोवाञ्छित फल दैत होथि आ पवित्रताक बाटपर लऽ जाइत होथि।’ ‘“‘अतिथिक कल्याण हो!’ ओ बजलीह। ‘स्वामी एहि स्थान धरि कोना पहुँचलाह? उठू, समीप आउ आ अतिथिक योग्य सत्कार स्वीकार करू।’ एना कहलापर चन्द्रापीड केवल हुनकर सम्बोधनहि केँ महान सम्मान मानि आदरसँ उठलाह आ प्रणाम कयलनि। ‘देवी, जेना अहाँक आज्ञा,’ उत्तर देलनि, आ शिष्य जकाँ हुनकर पाछाँ चलैत अपन विनय देखौलनि। बाटमे सोचय लगलाह—‘अरे, हमरा देखितो ओ अदृश्य नहि भेलीह! आब हुनकासँ प्रश्न पुछबाक आशा सचमुच हृदयमे जमि गेल अछि। तपस्विनीसभमे दुर्लभ एहन सौन्दर्यवती कन्याक करुणासँ भरल विनीत स्वागत देखि विश्वास होइत अछि जे हमर प्रार्थनापर ओ अपन सम्पूर्ण कथा अवश्य सुनौतीह।’” ‘“लगभग सय डेग चललापर चन्द्रापीड एक गुफा देखलनि। प्रवेशद्वार घन तमालवृक्षसँ एना आच्छादित छल जे दिनहूमे अपन अलग राति रचैत। चारू कात फूटैत फूलबला लताक कुञ्जमे प्रसन्न मधुमाछीक गम्भीर गुंजन गूँजैत छल। सोझे नीचाँ खसैत जलधारा फेन बनि श्वेत चट्टानपर टकराइत, खुरदरा पहाड़क कुल्हाड़ीजकाँ तीख नोकसँ चिराइत, शीतल फुहार ऊपर उछलैत आ टूटैत, तीव्र झनकार उत्पन्न करैत छल। दुनू कातसँ बहैत झरना—शिवक मुस्की वा मोतीसदृश पाला जकाँ श्वेत—गुफा केँ द्वारपर लटकल हिलैत चँवरक समूह जकाँ बना दैत छल। भीतर रत्नजड़ित घड़ासभक मण्डल छल। एक दिस पवित्र ध्यानक समय पहिरल जायबला आवरण टँगल छल। नारिकेरक रेशाक चटाइसँ बनल स्वच्छ पादुका खूंटीपर लटकल छल। एक कोनमे वृक्षछालक शय्या छल, जे कन्याक देहपर लगाओल भस्मसँ झरल धूलिसँ धूसर भऽ गेल छल। मुख्य स्थानपर छेनीसँ तराशल शङ्खक पात्र राखल छल, जे चन्द्रमण्डल जकाँ लगैत; लगहिमे भस्म भरल एक लौकी ठाढ़ छल।’ ‘“गुफाक प्रवेशद्वारक चट्टानपर चन्द्रापीड बैसि गेलाह। कन्या अपन वीणा वृक्षछालक शय्याक तकियापर राखि अतिथि लेल पातक पात्रमे झरनाक जल भरि आनय लगलीह। हुनका समीप अबैत देखि राजकुमार कहलनि—‘अहाँक एहन पैघ परिश्रम पर्याप्त भेल। एहि अत्यधिक कृपाक अन्त करू। देवी, हमर आग्रह मानू। एतेक महान सम्मान छोड़ि दिअ। अघमर्षण मन्त्र जकाँ अहाँक दर्शनहि सभ पाप शान्त करैत अछि आ शुद्धिकरण लेल पर्याप्त अछि। कृपा कऽ बैसि जाउ।’ मुदा हुनकर आग्रहपर राजकुमार माथ झुका आदरसँ अतिथिक रूपमे देल गेल समस्त सत्कार स्वीकार कयलनि। अतिथि-सेवा पूर्ण कऽ कन्या दोसर चट्टानपर बैसि गेलीह। किछु काल मौन रहलापर हुनकर अनुरोधसँ चन्द्रापीड दिग्विजय-यात्रासँ आरम्भ कऽ किन्नर-युगलक पीछा करैत एतए पहुँचबाक सम्पूर्ण कथा सुनौलनि। तखन कन्या उठलीह, भिक्षापात्र लऽ मन्दिरक चारू दिसक वृक्षसभक बीच घूमय लगलीह। किछुए समयमे स्वतः खसल फलसँ पात्र भरि गेल। जखन ओ चन्द्रापीड केँ फल ग्रहण करबाक निमन्त्रण देलनि, तखन हुनकर हृदयमे विचार उठल—‘सचमुच तपस्याक सामर्थ्यसँ बाहर किछु नहि। ई महान आश्चर्य अछि जे चेतनाविहीन वनस्पतिराज सेहो चेतन प्राणी जकाँ एहि कन्या लेल अपन फल खसा कऽ सम्मान अर्जित करैत अछि। ई अद्भुत दृश्य अछि, जे पहिने कहियो नहि देखलहुँ।’” ‘“आरो विस्मित भऽ ओ इन्द्रायुध केँ ओहि स्थानपर अनलनि, साज खोलि लगहिमे बान्हलनि। फेर झरनामे स्नान कऽ अमृत जकाँ मधुर फल खयलनि, शीतल जल पीबि मुँह धोइलनि, आ कन्या जखन जल, कन्द-मूल आ फल ग्रहण करैत छलीह तखन ओ कनेक दूर ठाढ़ भऽ प्रतीक्षा करैत रहलाह।’ ‘“भोजन समाप्त कऽ सन्ध्या-वन्दना केलापर कन्या निर्भय भावसँ चट्टानपर बैसि गेलीह। राजकुमार धीरेसँ समीप गेलाह, लग बैसि किछु काल मौन रहलाह, तखन आदरसँ बजलाह—’ ‘“‘देवी, मनुष्यकेँ घेरि लेनिहार मूर्खता हमरा इच्छाक विरुद्धो अहाँसँ प्रश्न पुछबाक लेल प्रेरित कऽ रहल अछि; अहाँक कृपासँ साहस पाबि उठल जिज्ञासा हमरा व्याकुल कऽ देने अछि। स्वामीक कनेको अनुग्रह दुर्बल स्वभावक मनुष्यमे साहस भरि दैत अछि; किछुए कालक सङ्ग सेहो घनिष्ठता उत्पन्न कऽ दैत अछि; आदरक अल्प स्वीकारो स्नेह जगा दैत अछि। तेँ जँ अहाँ थाकब नहि, तँ अपन कथा सुनाकऽ हमरा अनुगृहीत करू। पहिल दर्शनहिसँ एहि विषयमे प्रबल उत्कण्ठा हमरा घेरने अछि। देवी, अहाँक जन्मसँ सम्मानित वंश मरुतसभक अछि, ऋषिसभक, गन्धर्वसभक, गुह्यकसभक अथवा अप्सरासभक? फूल जकाँ कोमल एहि नवीन यौवनमे अहाँ ई व्रत किएक ग्रहण कयलहुँ? अहाँक यौवन, सौन्दर्य आ अनुपम माधुर्यक ई सांसारिक चिन्तासभसँ सर्वथा विरक्त शान्तिसँ केहन दूर-दूरक सम्बन्ध बुझाइत अछि! हमरा ई बड़ अद्भुत लगैत अछि। देवतासभक पुण्यसँ प्राप्त होमयबला, परम मुनिसभक सभ आवश्यक साधनसँ सम्पन्न स्वर्गीय आश्रम छोड़ि अहाँ एहि निर्जन वनमे एकसरि किएक रहैत छी? पाँच स्थूल तत्त्वसँ बनल होइतो अहाँक शरीरमे ई निर्मल धवलता कोना आबि गेल? एहन वस्तु हम ने कहियो सुनने छी, ने देखने। कृपा कऽ हमर जिज्ञासा शान्त करू आ पुछल सभ बात कहू।’” ‘“किछु काल धरि ओ हुनकर निवेदनपर मौन भऽ विचार करैत रहलीह। तखन बिना आवाज कयने कानय लगलीह। पैघ-पैघ बून बनि खसैत नोरसँ हुनकर आँखि धुँधरा गेल। मानू ओ नोर हृदयक निर्मलता अपना संग बहा अनैत हो; इन्द्रियसभक निष्कपटता बरसा रहल हो; तपस्याक सार निचोड़ि रहल हो; आँखिक ज्योति द्रवरूपमे टपका रहल हो। परम निर्मल ओ बून धवल गालपर टूटल मोतीक माला जकाँ निरन्तर खसैत, वृक्षछालक वस्त्रसँ आच्छादित वक्षस्थलपर छिटकि रहल छल।’ ‘“हुनका कनैत देखि चन्द्रापीड सोचलनि—‘विपत्ति केँ रोकब कतेक कठिन अछि! जे सौन्दर्य ओकर सामर्थ्यसँ परे बुझाइत छल, ओकरो ओ अपन शिकार बना लेलक। सचमुच देहधारी जीवनक दुःखसँ अछूता केओ नहि। सुख आ दुःख—ई परस्पर विरोधी शक्तिसभक प्रभाव अत्यन्त प्रबल अछि। हुनकर नोर हमर पूर्वक जिज्ञासासँ सेहो पैघ नव जिज्ञासा उत्पन्न कऽ देलक। एहन रूपमे निवास करयबला दुःख साधारण नहि भऽ सकैत अछि; धरती केँ हिला देनिहार आघात क्षीण नहि होइत अछि।’” ‘“एना हुनकर जिज्ञासा बढ़ि रहल छल, मुदा कन्याक दुःख फेर जगा देबाक अपराधबोधो भेलनि। ओ उठलाह आ झरनासँ अञ्जलिमे जल भरि हुनकर मुख धोयबाक लेल अनलनि। राजकुमारक कोमल व्यवहारो हुनकर नोरक धार नहि रोकि सकल; तथापि ओ लाल भेल आँखि धोइलनि, वृक्षछालक वस्त्रक कोरसँ मुख पोंछलनि, आ दीर्घ करुण निःश्वास छोड़ैत धीरेसँ बजलीह—’ ‘“‘राजकुमार, हमर तपस्वी जीवनक कथा अहाँ किएक सुनय चाहैत छी? ओ अहाँक कानक योग्य नहि अछि। जन्महिसँ हमर हृदय क्रूर, भाग्य कठोर आ दशा अमङ्गल रहल अछि। तथापि जँ जानबाक इच्छा बहुत प्रबल अछि तँ सुनू। शुभ ज्ञानहि दिस लागल रहयबला हमर कान धरि ई बात पहुँचल अछि जे देवलोकमे अप्सरा नामक कन्यासभ होइत छथि। हुनकर चौदह वंश अछि—एक ब्रह्माक मनसँ उत्पन्न, दोसर वेदसँ, तेसर अग्निसँ, चारिम वायुसँ, पाँचम समुद्रमन्थनमे निकलल अमृतसँ, छठम जलसँ, सातम सूर्यक किरणसँ, आठम चन्द्रक किरणसँ, नवम पृथ्वीसँ आ दसम बिजुरीसँ; एक वंश मृत्युदेवक रचना अछि आ दोसर कामदेवक। एहि अतिरिक्त समस्त प्रजाक पिता दक्षक अनेक पुत्रीमे मुनि आ अरिष्टा नामक दू पुत्री छलीह; गन्धर्वसभसँ हुनकर संयोगसँ शेष दू वंश उत्पन्न भेल। एहि प्रकारेँ कुल चौदह वंश भेल। दक्षक एहि दुनू पुत्री आ गन्धर्वसभसँ उत्पन्न वंशमे मुनिक सोलहम पुत्र चित्ररथ नामक भेलाह, जे अपन पन्द्रह भाइ—सेन आदि—सभसँ गुणमे श्रेष्ठ छलाह। हुनकर वीरता तीनू लोकमे प्रसिद्ध छल। देवतासभक झुकल मुकुट जिनकर कमलचरण सहलाबैत अछि, से इन्द्र हुनका ‘मित्र’ नाम देलनि, जाहिसँ हुनकर गौरव आरो बढ़ल। बाल्यकालहिमे तलवारक चमकसँ रँगायल दहिना बाँहक पराक्रमसँ ओ समस्त गन्धर्वक अधिपति भऽ गेलाह। एतयसँ बहुत दूर नहि, भारतवर्षक उत्तरमे किम्पुरुष देशक सीमापर्वत हेमकूट हुनकर निवास अछि। हुनकर बाहुबलक संरक्षणमे ओतए असंख्य गन्धर्व रहैत छथि। ई रमणीय चैत्ररथ वन हुनकेँ बनाओल, ई विशाल अच्छोद सरोवर हुनकेँ खुदाओल आ भगवान शिवक ई प्रतिमा हुनकेँ निर्मित कराओल अछि। दोसर गन्धर्ववंशमे अरिष्टाक पुत्र केँ गन्धर्वराज चित्ररथ बाल्यकालहिमे राजपदपर अभिषिक्त कयने छलाह। एखन ओ राजकीय पद धारण कऽ असंख्य गन्धर्वक संग एहि पर्वतपर रहैत छथि। चन्द्रामृतसँ उत्पन्न अप्सरावंशमे एक कन्या जन्मलीह—मानू चन्द्रमाक समस्त कलाक कृपा एक धारामे ढारि हुनकर निर्माण भेल हो। ओ समस्त जगतक आँखि केँ आनन्दित करनिहार, चाँदनी जकाँ गौर आ नाम तथा स्वभाव दुनूमे दोसर गौरी छलीह। दोसर गन्धर्ववंशक स्वामी हंस हुनकर वरण ओहिना कयलनि जेना क्षीरसागर गङ्गाक; हुनकर संयोग रति-काम अथवा शरद्-कमलवनक संयोग जकाँ भेल। एहन मिलनक महान सुख भोगैत ओ हुनकर अन्तःपुरक रानी भेलीह। एहि श्रेष्ठ दम्पतिसँ हम एकमात्र पुत्रीक रूपमे जन्मलहुँ—अमङ्गलकारिणी, दुःखक शिकार आ असंख्य विपत्तिक पात्र। मुदा हमर पिता केँ दोसर सन्तान नहि छलनि, तेँ हमर जन्मपर पुत्रजन्मसँ सेहो पैघ उत्सव मनौलनि। दसम दिन विधिपूर्वक संस्कार कऽ हमर योग्य नाम ‘महाश्वेता’ रखलनि। गन्धर्वाङ्गनासभक गोदिसँ गोदिमे वीणा जकाँ घूमैत, शैशवक अस्पष्ट मधुर बोली बजैत, प्रेमक दुःखसँ सर्वथा अनजान, हम पिताक राजमहलमे बाल्यकाल बितौलहुँ। समय बीतल आ वसन्तमे मधुमास जकाँ, मधुमासमे नव पल्लव जकाँ, नव पल्लवमे फूल जकाँ, फूलमे भ्रमर जकाँ आ भ्रमरमे मधु जकाँ हमर भीतर नवीन यौवन आबि गेल।’” ‘“‘एक दिन मधुमासमे हम अपन माय संग अच्छोद सरोवरमे स्नान करय गेलहुँ। वसन्तसँ ओकर सौन्दर्य चारू दिस पसरल छल आ सभ कमल खिलल छल।’ ‘“‘तटवर्ती चट्टानसभपर पार्वतीक हाथसँ उकेरल भगवान शिवक प्रतिमासभक हम पूजा कयलहुँ। पार्वती स्नान लेल उतरैत समय भृङ्गिरिटिसहित शिवक ई चित्र बनौने छलीह; धूरिमे पड़ल तपस्वीसभक क्षीण पदचिह्न मानू हुनकर विनीत उपासना दर्शा रहल छल। हम कहैत गेलहुँ—“ई लताक कुञ्ज कतेक सुन्दर अछि! मधुमाछीक भारसँ फूलगुच्छक मध्य भाग टूटि गेल अछि आ केसर झुकि गेल अछि। ई आमक गाछ पूर्ण रूपेँ फुलायल अछि; कोइलीक तीख नखसँ छेदल कोढ़ीक डाँटसँ मधु बहि रहल अछि। ई चन्दनक पाँति कतेक शीतल अछि, जतयसँ जङ्गली मोरक समूहक केकारवसँ भयभीत साँपसभ भागि गेल अछि। ई डोलैत लतासभ कतेक मनोहर अछि; खसल फूल बतबैत अछि जे वनदेवीसभ एहि पर झूलि गेलीह। तटक गाछसभक जड़ि कतेक सुखद अछि, जतए कलहंससभ अनेक फूलक परागमे अपन पदचिह्नक पाँति छोड़ि गेल अछि!” वनक निरन्तर बढ़ैत सौन्दर्यसँ खिंचाइत हम सखीसहित घूमैत रहलहुँ। एक स्थानपर पवनमे बहैत फूलक अत्यन्त तीव्र सुगन्ध भेटल, जे पूर्ण फुलायल वनक अन्य सभ गन्ध केँ दबा दैत छल। ओ गन्ध लग अबैत गेल आ अपन अत्यधिक माधुर्यसँ मानू घ्राणेन्द्रिय केँ सुगन्धित, आनन्दित आ परिपूर्ण करैत गेल। मधुमाछीसभ ओकर पाछाँ पड़ल छल, मानू ओकरा अपन बना लेबाक इच्छा हो। ओ सचमुच पहिने कहियो नहि भेटल, देवताक योग्य सुगन्ध छल। हमहूँ ओकर स्रोत जानबाक लेल उत्सुक भऽ गेलहुँ। आँखि कली जकाँ आध मुनल, ओहि सुगन्धसँ मधुमाछी जकाँ खिंचाइत, जिज्ञासाक काँपैत वेगमे टकराइत पायल जोर-जोरसँ बाजैत, सरोवरक कलहंससभ केँ अपना दिस आकृष्ट करैत किछु डेग आगाँ बढ़लहुँ। तखन स्नान लेल उतरैत एक सुन्दर युवा तपस्वी केँ देखलहुँ। ओ एना लगैत छलाह—शिवक अग्निमे ईंधन बनि गेल कामदेवक शोकमे वसन्त तपस्या कऽ रहल हो; अथवा शिवक कपारपरक अर्धचन्द्र पूर्ण मण्डल पाबय लेल व्रत कयने हो; अथवा शिव केँ जीतबाक उत्साह रोकि कामदेव संयम धारण कयने हो। हुनकर महान तेजसँ बुझाइत छल जे काँपैत बिजुरीक पिञ्जरमे घेरल, ग्रीष्मक सूर्यगोलक भीतर बसल अथवा भट्ठीक ज्बलासँ परिवेष्टित छथि। दीपशिखा जकाँ पीयर हुनकर रूपक दीप्ति निरन्तर बढ़ैत सम्पूर्ण वनकुञ्ज केँ सुनहरा भूरा बना रहल छल। हुनकर केश गोरचनामे रँगल ताबीज जकाँ कोमल आ पीयर छल। कपारपर भस्मक रेखा हुनका नव बालुकातटबाली गङ्गा जकाँ बनबैत छल; मानू सरस्वती केँ पाबय लेल चन्दनक तिलक हो, आ पवित्रताक ध्वजक काज करैत हो। भौंह लोकक शापसभक निवासक ऊपर उठल धनुषाकार तोरण जकाँ छल। आँखि एतेक लम्बा जे मानू ओकर माला पहिरने छथि; मृगनयनक सौन्दर्यमे मृगसभक सहोदर लगैत छलाह। नाक लम्बा आ गरुड़चञ्चु जकाँ तीख छल। हृदयमे प्रवेश नहि पाबि सकल यौवनक अरुण आभा हुनकर नीचाँक ओठरूपी बिजौरा नीबू केँ गुलाबी बना देने छल। दाढ़ी-रहित गालसँ ओ नव कमल जकाँ लगैत छलाह, जकर केसर केँ मधुमाछीसभ खेलमे एखन धरि नहि झकझोरने हो। यज्ञोपवीत हुनकर शोभा बढ़बैत छल—कामदेवक धनुषक झुकल डोरी अथवा तपस्यारूपी सरोवरक कमलवनसँ निकलल रेशा जकाँ। एक हाथमे डाँटसहित केसरा फल जकाँ कमण्डलु छल; दोसर हाथमे स्फटिकक जपमाला, मानू कामदेवक मृत्यु पर विलाप करैत रतिक नोरक बून गूँथल हो। कमर मूँजक मेखलासँ बान्हल छल; स्वाभाविक तेजमे सूर्य केँ पराजित कऽ प्रभामण्डल धारण कयने होथि। वस्त्रक काज स्वर्गीय पारिजातक छाल करैत छल, जे बूढ़ तीतरक गुलाबी पलक जकाँ चमकैत आ स्वर्गगङ्गाक लहरिमे धुआयल छल। ओ तपस्वी जीवनक आभूषण, पवित्रताक युवा शोभा, सरस्वतीक आनन्द, समस्त विद्याक चुनल स्वामी आ सम्पूर्ण दिव्य परम्पराक सङ्गम छलीह। ग्रीष्म ऋतु जकाँ हुनकर हाथमे आषाढ-दण्ड छल; शिशिरकालीन वन जकाँ खिलैत प्रियङ्गुक उजास छल; मधुमास जकाँ श्वेत तिलकसँ अलङ्कृत मुख छल। हुनका संग फूल चुनि देवपूजा करैत हुनकहि वयसक, हुनकर योग्य मित्र एक दोसर युवा तपस्वी छलाह।’” ‘“‘तखन हम हुनकर कान सजौने एक अद्भुत फूलगुच्छ देखलहुँ। ओ वसन्तक दर्शनसँ प्रसन्न वनलक्ष्मीक उज्ज्वल मुस्की जकाँ छल; मलयपवनक स्वागतमे मधुमासक अर्घ्य जकाँ; पुष्पलक्ष्मीक यौवन जकाँ; अथवा कामदेवक हाथी केँ सजौनिहार कौड़ी जकाँ। मधुमाछी ओकर प्रणय करैत छल; कृत्तिका नक्षत्र अपन शोभा ओकरा देने छल आ ओकर मधु अमृत छल। हम निश्चय कयलहुँ—“निश्चय यैह ओ सुगन्ध अछि जे अन्य सभ फूल केँ गन्धहीन बना दैत अछि।” युवा तपस्वी दिस तकैत मनमे विचार उठल—“अहा, सृष्टिकर्ता कतेक उदार छथि! परम सुन्दर रूप रचबाक कौशल हुनका अछि। ओ समस्त अद्भुत सौन्दर्य मिला कऽ विश्वसँ श्रेष्ठ कामदेव रचलनि, तकरो बाद हुनकासँ अधिक सुन्दर ई तपस्वी बना देलनि—मानू मायासँ जन्मल दोसर कामदेव। हमरा बुझाइत अछि, ब्रह्मा जखन जगत केँ आनन्द देबाक लेल चन्द्रमण्डल आ लक्ष्मीक क्रीड़ाभवन बनेबाक लेल कमल रचने छलाह, तखन वस्तुतः एहि तपस्वीक मुख रचबाक अभ्यास कऽ रहल छलाह; नहि तँ एहन वस्तु किएक बनबैत? ई बात निश्चय मिथ्या अछि जे कृष्णपक्षमे सूर्य अपन सुषुम्णा किरणसँ चन्द्रमाक सभ कला पीबि लैत अछि; वस्तुतः ओहि कलाक किरणसभ खसि एहि सुन्दर रूपमे प्रवेश कऽ गेल अछि। नहि तँ सौन्दर्यक नाश करयबला कठिन तपस्यामे जीवन बितौनिहारमे एहन रूप-माधुर्य कोना होइत?” हम एना सोचिए रहल छलहुँ कि सौन्दर्यक अटल पक्षधर, भला-बुराक भेद नहि जानयबला आ युवासभक सदिखन समीप रहयबला कामदेव हमर निःश्वाससहित हमरा ओहिना वशमे कऽ लेलक, जेना वसन्तक उन्माद मधुमाछी केँ। तखन दहिना आँखिसँ स्थिर दृष्टि कयलहुँ; पलक आध मुनल छल, काँपैत तिरछी दृष्टिसँ पुतलीक चारूकातक भाग गाढ़ भऽ गेल छल; हम बहुत काल धरि हुनका देखैत रहलहुँ। ओहि दृष्टिसँ मानू हुनका पीबि रहल होइ, प्रार्थना कऽ रहल होइ, कहि रहल होइ जे हम पूर्णतः अहाँक छी, अपन हृदय अर्पित कऽ रहल होइ, सम्पूर्ण आत्मासँ हुनकर भीतर प्रवेश करय चाहैत होइ, हुनकामे लीन होयबाक इच्छा करैत होइ, कामपीड़िता केँ बचयबाक लेल हुनकर शरण माँगैत होइ, आ हुनकर हृदयमे स्थान पाबय लेल अपन दीन प्रार्थिनी दशा देखबैत होइ। हम अपनेसँ पुछलहुँ—“ई केहन लज्जाजनक भावना हमरा भीतर उत्पन्न भेल? कुलीन कन्याक लेल सर्वथा अनुचित आ अयोग्य!” ई बुझितो अपना ऊपर अधिकार नहि रहल; बड़ कठिनतासँ स्थिर ठाढ़ रहि हुनका देखैत रहलहुँ। मानू देह जड़ भऽ गेल, चित्रमे बदलि गेल, चारू दिस छिड़िआ गेल, बान्हल गेल अथवा समाधिमे चलि गेल; तथापि अद्भुत रूपेँ किछु हमरा सँभालने रहल—मानू अंगसभ शिथिल होइतहि ओहि क्षण सहारा भेटि गेल हो। जे बात ने कहल जा सकैत अछि, ने सिखाओल, ने कहबाक योग्य अछि आ केवल भीतरसँ अनुभव कयल जाइत अछि, ओकर विषयमे निश्चित कोना भेल जा सकैत अछि? ई भावना हुनकर सौन्दर्य प्रस्तुत कयलक, हमर अपन मन, कामदेव, यौवन, अनुराग अथवा कोनो आन कारण—हम नहि कहि सकैत छी। इन्द्रियसभ हमरा ऊपर उठा हुनका दिस खिंचैत छल; हृदय आगाँ लऽ जाइत छल; कामदेव पाछाँसँ धकेलैत छल; तथापि प्रबल प्रयत्नसँ अपन वेग रोकलहुँ। तत्क्षण निरन्तर निःश्वासक आँधी चलय लागल—मानू कामदेव हमर भीतर स्थान खोजैत ओकरा बाहर पठा रहल हो। वक्षस्थल उठय-बैसय लागल, मानू हृदयसँ गम्भीरतापूर्वक बात करबाक लेल उद्यत हो। हम मनमे सोचलहुँ—“ई नीच कामदेवक केहन अयोग्य कृत्य अछि! ओ हमरा प्रेमक विचारसँ सर्वथा मुक्त एहि शीतल तपस्वीक हाथ सौंपि रहल अछि। स्त्रीक हृदय सचमुच अत्यन्त मूर्ख होइत अछि, कारण जेकरा प्रेम करैत अछि ओकर उपयुक्तता-अनुपयुक्तता तौलि नहि सकैत। तेज आ तपस्याक एहि उज्ज्वल धामक सम्बन्ध ओहि प्रेमोन्मादसँ की, जकर साधारण मनुष्य स्वागत करैत अछि? निश्चय ओ मनहिमे कामदेव द्वारा एना ठकल हमरा तिरस्कार करैत होयताह। अद्भुत अछि जे ई सभ बुझितो हम अपन भावना रोकि नहि पबैत छी। आन कन्यासभ लाज छोड़ि स्वयं अपन प्रियक समीप गेलीह; आनकेँ उच्छृङ्खल कामदेव उन्मत्त बनौलक; मुदा एतए हमर जकाँ एकसरि केओ नहि! केवल एक क्षणक दर्शनसँ हमर हृदय कोना एना विचलित भऽ अधिकारसँ बाहर भऽ गेल? ज्ञान आ सद्गुणक परिपक्वता जतेक हो, कामदेव ओतेकहि दुर्जेय भऽ जाइत अछि। एखन धरि चेतना शेष अछि आ ओ हमर ई घृणित प्रेममूर्खता स्पष्ट नहि देखने छथि; तेँ एहि स्थानसँ चलि जायब उचित। जँ ओ अपन लेल अस्वीकार्य प्रेमक चिह्न हमरा भीतर देखि लेताह, तँ क्रुद्ध भऽ शापक अनुभव करा सकैत छथि; तपस्वी स्वभावतः क्रोधी होइत छथि।” एना निश्चय कऽ हम चलबाक लेल उत्सुक भेलहुँ। मुदा पवित्र पुरुष सभक आदर करबाक कर्तव्य स्मरण कऽ हुनका प्रणाम कयलहुँ। आँखि हुनकर मुखपर टिकल छल; पलक निश्चल, दृष्टि नीचाँ नहि झुकल; कानमे नाचैत फूल गाल केँ नहि छुबैत छल; लहराइत केशपर माला डोलैत आ रत्नजड़ित कुण्डल काँधपर झूलैत छल।’” ‘“‘हम एना झुकलहुँ, आ प्रेमक अजेय आज्ञा, वसन्तक प्रेरणा, स्थानक मनोहरता, यौवनक उद्दण्डता, इन्द्रियक चञ्चलता, सांसारिक सुखक अधीर लालसा, मनक अस्थिरता, घटनाक नियन्ता भाग्य—संक्षेपमे हमर अपन क्रूर नियति—आ ई तथ्य जे हुनकरे कारण हमर सभ क्लेश उत्पन्न भेल छल, एहि सभ माध्यमसँ कामदेव हमर भावना हुनका देखा हुनकर दृढ़ता भङ्ग कऽ देलक। ओ हमर दिस ओहिना डोललाह जेना पवनमे ज्बला। नव प्रवेश करैत कामदेवक स्वागतमे मानू हुनकर रोमाञ्च स्पष्ट छल। हुनकर मन हमरा दिस दौड़ि रहल छल आ निःश्वास आगाँ-आगाँ ओकर बाट देखबैत छल। हाथक जपमाला व्रतभङ्गक भय सँ काँपि रहल छल। गालपर स्वेदबिन्दु उभरल—कानसँ लटकल दोसर माला जकाँ। हमरा देखबाक आनन्दमे पुतली फैलल आ दृष्टि विस्तृत भेल; हुनकर आँखि ओहि स्थान केँ कमलवन बना देलक। ओकर लम्बा किरणसभ मानू अच्छोद सरोवर छोड़ि स्वयं आकाश दिस उठैत खिलल कमलक समूह हो, जाहिसँ दसो दिशा भरि गेल।’ ‘“‘हुनकामे प्रकट परिवर्तन देखि हमर प्रेम दूना भऽ गेल आ ओहि क्षण हम एहन दशामे पड़लहुँ, जकर वर्णन नहि कऽ सकैत छी आ जे हमर कुलक सर्वथा अयोग्य छल। हम सोचलहुँ—“निश्चय कामदेव स्वयं आँखिक ई क्रीड़ा सिखबैत अछि, जे सामान्यतः दीर्घ सुखमय प्रेमक बाद अबैत अछि; नहि तँ एहि तपस्वीक दृष्टि एहन कोना भेल? हुनकर मन सांसारिक आनन्दक मिश्रित भावसँ अनभिज्ञ अछि; तथापि हुनकर आँखि, कला कहियो नहि सीखने होइतो, प्रेमक माधुर्यधारा बहा रहल अछि, अमृत बरसा रहल अछि, आनन्दसँ आध मुनल अछि, व्याकुलतासँ मन्द अछि, निद्रासँ भारी अछि; पुतली काँपैत भटकैत अछि आ उल्लासक भारसँ शिथिल अछि, तैयो भौंहक क्रीड़ासँ दीप्त अछि। केवल दृष्टिसँ, बिना शब्दक, हृदयक अभिलाषा कहि देनिहार ई असाधारण कौशल कतयसँ आयल?”’” ‘“‘एहि विचारसभसँ प्रेरित भऽ हम आगाँ बढ़लहुँ, आ हुनकर सङ्गी दोसर युवा तपस्वी केँ प्रणाम कऽ पुछलहुँ—“एहि पूज्यक नाम की अछि? ई कोन तपस्वीक पुत्र छथि? ई माला कोन गाछक फूलसँ गुँथल अछि? एकर पहिने कहियो नहि अनुभव भेल दुर्लभ मधुर सुगन्ध हमरा भीतर प्रबल जिज्ञासा जगा रहल अछि।”’ ‘“‘ओ कने मुस्करा कऽ उत्तर देलनि—“कन्या, एहि प्रश्नक की आवश्यकता? तथापि अहाँक जिज्ञासा शान्त करैत छी। सुनू।”’ ‘“‘“देवलोकमे श्वेतकेतु नामक एक महान ऋषि रहैत छथि। हुनकर उदात्त चरित्रक यश सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमे पसरल अछि। सिद्ध, देवता आ दानवक समूह हुनकर चरणक सम्मान करैत अछि। नलकूबरसँ सेहो श्रेष्ठ हुनकर रूप तीनू लोक केँ प्रिय अछि आ देवाङ्गनासभक हृदय आनन्दित करैत अछि। एक बेर देवपूजाक लेल कमल आनय ओ स्वर्गगङ्गामे उतरलाह। गङ्गा शिवक मुस्की जकाँ धवल छल, आ ऐरावतक मदजलसँ ओकर जल मोरक पाँखपरक आँखि जकाँ चित्तीदार भऽ उठल छल। लगहिमे सहस्रदल श्वेत कमलपर विराजमान लक्ष्मी हुनका फूलसभक बीच उतरैत देखलनि। हुनका देखिते प्रेमसँ आध मुनल, आनन्दाश्रुक भारसँ काँपैत आँखिसँ हुनकर सौन्दर्य पीबय लगलीह; कोमलसँ खुलैत ओठपर पतली आङुरि रखलनि; कामदेव हुनकर हृदय विचलित कऽ देलक। केवल दृष्टिसँ ओ ऋषिक स्नेह जीत लेलीह। एक पुत्र जन्मल। लक्ष्मी ओकरा गोदिमे लऽ ‘ई अहाँक पुत्र अछि, स्वीकार करू’ कहैत श्वेतकेतु केँ सौंप देलनि। श्वेतकेतु पुत्रजन्मक सभ संस्कार कयलनि आ पुण्डरीक कमलमे जन्मल कारण ओकर नाम पुण्डरीक रखलनि। उपनयनक बाद ओ समस्त कला आ विद्याक पूर्ण चक्र हुनका सिखौलनि। अहाँ जे देखैत छी, ई सेइ पुण्डरीक छथि। आ ई फूलगुच्छ पारिजात वृक्षक अछि, जे देवता आ दानव द्वारा क्षीरसागर मथलापर उत्पन्न भेल छल। व्रतक विरुद्ध ई हुनकर कान धरि कोना पहुँचल, से आब कहैत छी। आइ मासक चौदहम तिथि होयबाक कारण कैलास गेल भगवान शिवक पूजा करबाक लेल ई हमरा संग स्वर्गसँ चललाह। बाटमे नन्दनवनक समीप फूलक रससँ मातल एक वनदेवी भेटलीह। कानमे आमक नव पल्लव छल; ठेहुन धरि झूलैत मालासभसँ शरीर पूर्णतः ढँकल; केसरा फूलक मेखला बान्हल; आ वसन्तलक्ष्मीक बढ़ाओल सुन्दर हाथपर टेक देने। ओ ई पारिजातगुच्छ तोड़ि गहिर झुकलीह आ पुण्डरीकसँ बजलीह—‘आर्य, जगतक आँखि केँ आनन्द देनिहार अहाँक एहि रूपक योग्य आभूषण ई गुच्छ बनय। कृपा कऽ एकरा कानक अग्रभागमे धारण करू; आखिर मालाक चपलता मात्र एकरामे अछि। पारिजातक जन्म आइ पूर्ण सफल हो।’ हुनकर वचन सुनि अपन सत्य प्रशंसापर लज्जित पुण्डरीकक आँखि नीचाँ झुकि गेल। ओ हुनका दिस ध्यान नहि दैत घुरि चलबाक प्रयास कयलनि। मुदा ओ वनदेवी हमरा पाछाँ-पाछाँ अबैत देखाइ पड़लीह, तेँ हम कहलहुँ—‘मित्र, एहि मे की हानि? हुनकर विनम्र उपहार स्वीकार कऽ लिअ।’ एहि प्रकारेँ बलजोरी, हुनकर इच्छाक विरुद्ध, ई गुच्छ कान सजा रहल अछि। आब सभ कहि देलहुँ—ई के छथि, ककर पुत्र छथि, फूल कोन अछि आ कान धरि कोना पहुँचल।” ओ एना कहि चुकलापर पुण्डरीक कने मुस्करा कऽ हमरा बजलाह—“अहा, जिज्ञासु कन्या, एतेक कष्ट कऽ पुछबाक की आवश्यकता छल? जँ एहि फूलक मधुर सुगन्ध अहाँ केँ नीक लगैत अछि, तँ एकरा स्वीकार करू।” ओ आगाँ बढ़लाह, अपन कानसँ गुच्छ उतारि हमर कानमे लगा देलनि। ओकर मधुमाछीक कोमल गुंजन मानू प्रेमक प्रार्थना छल। हुनकर हाथ छुबयबाक आकुलतामे, जतए माला रखल गेल, ओतए रोमाञ्च दोसर पारिजातफूल जकाँ खिलि उठल। हमर गाल छुबयबाक आनन्दमे ओ ई नहि देखलनि जे काँपैत आङुरिसँ जपमाला सेहो लाजसंग खसि रहल छल। धरतीपर खसयसँ पहिने हम ओकरा पकड़ि लेलहुँ आ हँसी-खेलमे अपन गला पर पहिरि लेलहुँ। ओ अन्य सभ हारसँ भिन्न शोभा धारण कयलक; मानू हुनकर बाँह हमर गला घेरने हो, आ हम ओहि आलिङ्गनक आनन्द अनुभव कयलहुँ।’” ‘“‘एना जखन हमर दुनूक हृदय एक-दोसरमे लागल छल, तखन छत्र धारण करयबाली परिचारिका हमरा बजलीह—“राजकुमारी, महारानी स्नान कऽ चुकलीह। घर घुरबाक समय निकट अछि। तेँ अहूँ स्नान कऽ लिअ।” ओकर वचन सुनि हम नब पकड़ल हाथी जकाँ, जे पहिल बेर नब अङ्कुशक स्पर्शपर विद्रोह करैत अछि, अनिच्छासँ खिंचि लऽ जायल गेलहुँ। स्नान लेल उतरैत आँखि हुनकासँ हटाबय कठिन भेल। बुझाइत छल, आँखि हुनकर मुखक अमृतमय सौन्दर्यमे डूबि गेल अछि; अथवा हमर रोमाञ्चित गालक झाड़ीमे फँसि गेल अछि; कामदेवक बाणसँ खूँटिल अछि; अथवा हुनकर रूपमाधुर्यक डोरीसँ सिलि देल गेल अछि।’ ‘“‘एहि बीच दोसर युवा तपस्वी पुण्डरीकक आत्मसंयम ढील पड़ैत देखि कोमल स्वरमे डाँटलनि—“प्रिय पुण्डरीक, ई अहाँक योग्य नहि। ई साधारण लोकक चलल बाट अछि। सज्जन आत्मसंयमरूपी धनसँ सम्पन्न होइत छथि। नीच कुलक मनुष्य जकाँ अहाँ अपन अन्तःकरणक उथल-पुथल किएक नहि रोकि पबैत छी? एखन धरि अपरिचित इन्द्रियक ई आक्रमण कतयसँ आयल, जे अहाँ केँ एना बदलि रहल अछि? अहाँक पुरान दृढ़ता कतए गेल? इन्द्रियजय, आत्मनिग्रह, मानसिक शान्ति, वंशपरम्पराक पवित्रता आ सांसारिक वस्तुप्रति उदासीनता कतए गेल? गुरुक शिक्षा, वेदाध्ययन, तपस्याक सङ्कल्प, विषयसुखप्रति घृणा, व्यर्थ आनन्दसँ विरक्ति, तपमे अनुराग, भोगसँ वितृष्णा आ यौवनक आवेगपर शासन कतए गेल? सचमुच, जँ अहाँ जकाँ पुरुषो रागक स्पर्शसँ कलुषित आ मोहसँ पराजित भऽ जाइत छथि, तँ सभ ज्ञान निष्फल, धर्मग्रन्थक अध्ययन व्यर्थ, दीक्षा निरर्थक, गुरु-उपदेशक मनन बेकार, निपुणता मूल्यहीन आ विद्या फलरहित अछि। अहाँ ईहो नहि देखैत छी जे जपमाला हाथसँ खसि दोसर द्वारा उठा लेल गेल। हाय, एना आहत मनुष्यक विवेक कोना समाप्त भऽ जाइत अछि! अपन हृदय रोकू; ई निरर्थक कन्या एकरा लऽ जाय चाहैत अछि।”’ ‘“‘ई सुनि किछु लज्जित भऽ ओ उत्तर देलनि—“प्रिय कपिञ्जल, अहाँ हमरा एना गलत किएक बुझैत छी? अपन जपमाला छीनि लेबाक एहि उच्छृङ्खल कन्याक अपराध हम सहयबला नहि छी।” बनावटी क्रोधसँ सुन्दर चन्द्रमासदृश मुख, भयावह भृकुटी चढ़यबाक प्रयाससँ आरो मनोहर, आ हमरा चुम्बन करबाक लालसासँ काँपैत ओठसहित ओ हमरा बजलाह—“चञ्चल कन्या, हमर जपमाला घुरौने बिना एहि स्थानसँ एक डेगो नहि बढ़ब।” तखन कामदेवक सम्मानमे होमयबला नृत्यक आरम्भिक पुष्पाञ्जलि जकाँ हम गला सँ एक लड़ी मोती खोललहुँ आ हुनकर बढ़ाओल हाथमे राखि देलहुँ। हुनकर आँखि हमर मुखपर स्थिर छल आ मन कतौ दूर। हम स्नान लेल चललहुँ, मुदा कोना चललहुँ से नहि जानि। माय आ सखीसब हमरा बड़ कठिनतासँ बलपूर्वक लऽ गेलीह—मानू नदी केँ उलटा बहाओल जा रहल हो। हम केवल हुनकरे चिन्ता करैत घर घुरलहुँ।’ ‘“‘कन्यागृहमे प्रवेश करिते हुनकर वियोगदुःखमे अपनेसँ पुछय लगलहुँ—“हम सचमुच घुरि आयल छी कि एखनहुँ ओतहि छी? एकसरि छी कि सखीसंग? मौन छी कि किछु बाजय लागल छी? जागल छी कि सुतल? कनैत छी कि नोर रोकने? ई आनन्द अछि कि दुःख, मिलनक लालसा कि निराशा, विपत्ति कि हर्ष, दिन कि राति? ई सभ सुख अछि कि पीड़ा?” किछुओ बुझि नहि पबैत छलहुँ। प्रेमक बाटसँ अनजान, नहि जानैत छलहुँ कतए जाउ, की करू, की सुनू, की देखू, की बाजू, केकरा कहू अथवा कोन उपचार खोजू। कन्याप्रासादमे प्रवेश कऽ द्वारपर सखीसब केँ विदा कयलहुँ, सेविकासभ केँ बाहर रोकलहुँ, सभ काज छोड़ि एकसरि रत्नजड़ित झरोखाक लग मुँह लगा ठाढ़ भऽ गेलहुँ। ओहि दिशा दिस तकैत रहलहुँ, जे हुनकर उपस्थितिसँ अत्यन्त अलङ्कृत, महान निधिसँ सम्पन्न, अमृतसागरमे डुबायल, पूर्णचन्द्रक उदयसँ सुसज्जित आ दर्शनमे परम सुन्दर बनि गेल छल। ओतयसँ अबैत हवा, वनफूलक सुगन्ध अथवा पक्षीक गीतसँ सेहो हुनकर समाचार पुछबाक इच्छा होइत छल। हुनकर अनुराग तपस्यापर छल, तेँ हम तपस्याक कष्टसँ सेहो ईर्ष्या कयलहुँ। प्रेमक अन्ध अनुसरणमे हुनकर लेल मौनव्रत ग्रहण कयलहुँ। तपस्वी-वेष केँ शोभा देलहुँ, कारण ओ अपनौने छलाह; यौवन केँ सौन्दर्य देलहुँ, कारण हुनकर छल; पारिजातफूल केँ मोहकता देलहुँ, कारण ओ हुनकर कान छूने छल; स्वर्ग केँ आनन्दमय मानलहुँ, कारण ओतए रहैत छलाह; आ कामदेव केँ अजेय कहलहुँ, कारण ओ एतेक सुन्दर छलाह। बहुत दूर रहितो हम हुनका दिस ओहिना मुड़ल छलहुँ, जेना कमलवन सूर्य दिस, समुद्रक ज्वार चन्द्रमा दिस, आ मोर मेघ दिस। हुनकर वियोगसँ आहत जीवन नष्ट नहि हो, एहि लेल हुनकर जपमाला ताबीज जकाँ गला पर धारण कयने रहलहुँ। देह निश्चल छल, मुदा गालपर रोमाञ्च कदम्बफूलक कुण्डल जकाँ उभरल छल—हुनकर हाथक स्पर्शक आनन्दसँ आ कानमे लगायल पारिजातगुच्छसँ, जे मधुर स्वरमे हुनकर कथा कहैत छल।’ ‘“‘हमर ताम्बूलवाहिनी तरलिका सेहो हमरा संग स्नान लेल गेल छल। ओ हमरा पाछाँ किछु देरीसँ घुरलीह आ हमर दुःखी दशा देखि धीरेसँ बजलीह—“राजकुमारी, अच्छोद सरोवरक तटपर देखल ओहि देवतुल्य तपस्वीसभमे सँ एक—जिनका द्वारा ई स्वर्गवृक्षक फूलगुच्छ अहाँक कानमे लगाओल गेल—हम जखन अहाँक पाछाँ आबि रहल छलहुँ, तखन अपन दोसर स्वरूपसदृश सङ्गीक दृष्टिसँ बचि फूलल लताक डाढ़िसभक बीच कोमल डेगसँ हमरा लग अयलाह। ओ अहाँक विषयमे पुछलनि—‘सखि, ई कन्या के छथि? ककर पुत्री छथि? नाम की छनि? आ कतए जा रहल छथि?’ हम उत्तर देलियनि—‘ई चन्द्रवंशी अप्सरा गौरीक गर्भसँ उत्पन्न छथि। हुनकर पिता हंस समस्त गन्धर्वक राजा छथि। सभ गन्धर्वक पागपर लागल रत्नजड़ित कलगीक अग्रभागसँ हुनकर चरणनख चमकायल जाइत अछि। वृक्षसदृश बाँहपर गन्धर्वरानीसभक गालक प्रसाधनक चिह्न पड़ल रहैत अछि, आ लक्ष्मीक कमलहस्त हुनकर पादपीठ बनैत अछि। राजकुमारीक नाम महाश्वेता अछि। एखन ओ गन्धर्वक निवास हेमकूट पर्वत दिस चलि गेलीह।’”’ ‘“‘“हम एतेक कहि चुकलापर ओ किछु क्षण चुपचाप सोचलनि। तखन हमरा दिस दीर्घ समय स्थिर दृष्टिसँ तकैत, मानू कोमल अनुरोध करैत होथि, बजलाह—‘सखि, अहाँ एखन युवा छी, मुदा रूपसँ सत्यनिष्ठा आ स्थिरताक उत्तम आशा जागैत अछि। तेँ हमर एक निवेदन स्वीकार करू।’ हम आदरसँ हाथ जोड़ि उत्तर देलियनि—‘एना किएक कहैत छी? हम के छी? अहाँ जकाँ महात्मा, जे समस्त जगतक सम्मानक योग्य छथि, हमरा जकाँ व्यक्तिपर पाप नाश करयबाली दृष्टि मात्र डालैत छथि, ताहूमे पुण्य अर्जित करैत छथि; फेर आज्ञा देब तँ आरो पैघ अनुग्रह। निःसङ्कोच कहू, की करबाक अछि। अहाँक आदेशसँ हमरा सम्मानित करू।’”’ ‘“‘“एना कहला पर ओ मित्र, सहायक आ जीवनदाता जकाँ स्नेहपूर्ण दृष्टिसँ हमरा अभिनन्दन कयलनि। लगहिक तमालवृक्षसँ एक पल्लव तोड़ि तटक पत्थरपर पीसलनि; अपन ऊपरक वृक्षछाल-वस्त्रसँ एक टुकड़ा फाड़ि लेखपट बनौलनि; सुगन्धित हाथीक मदजलक समान मधुर तमालरससँ अपन कमलहस्तक कनिष्ठिका-नख द्वारा किछु लिखलनि। ओकरा हमर हाथमे राखैत कहलनि—‘ई पत्र ओहि कन्या केँ एकान्तमे गुप्त रूपसँ देब।’” एतेक कहि तरलिका ताम्बूल-पेटीसँ ओ पत्र निकालि हमरा देखौलक।’ ‘“‘तरलिकाक हाथसँ वृक्षछालपर लिखल पत्र लैत हम हुनकर चर्चा सँ भरि गेलहुँ। ओ केवल ध्वनि छल, तैयो स्पर्शक आनन्द दैत छल; केवल कानक विषय छल, तैयो रोमाञ्चक रूपमे समस्त अंगमे अपन व्यापक उपस्थितिक अनुभव करा रहल छल—मानू कामदेव केँ आह्वान करयबला मन्त्र हो। पत्रमे ई पङ्क्तिसभ देखलहुँ—’ मानस सरोवरक हंस, लताक छलपूर्ण उजाससँ मोहित भऽ गेल; अहाँक मोतीमालासँ लुभायल हमर हृदय थाकल आखेटक पाछाँ दौड़ि रहल अछि।’ ‘“‘ई पढ़िते प्रेमरोगी मनक दशा आरो बिगड़ि गेल—जेना बाट बिसरल मनुष्य दिशा-बोधो गमा दे; अन्हरा केँ कृष्णपक्षक राति भेटि जाय; मूकक जिह्वा काटि देल जाय; अज्ञानीक सोझाँ मायावी अपन पाँखुड़ी घुमा दे; अस्पष्ट बजयबला केँ ज्वरक प्रलाप घेरि ले; विषाक्त मनुष्य घातक निद्रामे पड़ि जाय; दुष्ट केँ नास्तिक दर्शन भेटि जाय; विक्षिप्त केँ तीव्र मदिरा पिया देल जाय; अथवा प्रेतबाधित मनुष्यपर ओकर प्रेत आरो प्रबल भऽ उठय। भीतर एहन हलचल उठल जे बाढ़िक नदी जकाँ डोलय लगलहुँ। तरलिका हुनका फेर देखने छलीह, तेँ ओकर आदर एना कयलहुँ मानू ओ महान पुण्य अर्जित कयने हो, स्वर्गसुख भोगने हो, देवताक दर्शन पयने हो, सर्वोच्च वरदान प्राप्त कयने हो, अमृत पीने हो अथवा तीनू लोकक रानीक रूपमे अभिषिक्त भेल हो। सदिखन संग रहयबाली परिचिता होइतो ओकरासँ एना आदरसँ बजलहुँ मानू दुर्लभ अतिथि आ एखन धरि अपरिचित हो। ओ पाछाँ ठाढ़ छलीह, तैयो हमरा जगतसँ ऊपर बुझाइत छलीह। ओकर गालपर लटकल घुँघरार केश केँ स्नेहसँ सहलौलहुँ आ स्वामिनी-दासीक भेद पूर्णतः बिसरा बेर-बेर पुछलहुँ—“अहाँ हुनका कोना देखलहुँ? ओ अहाँसँ की कहलनि? कतेक काल ओतए रहलहुँ? ओ हमरा पाछाँ कतेक दूर धरि अयलाह?” सभ सेविका केँ बाहर रोकि ओकर कथा सुनैत सम्पूर्ण दिन महलमे ओकरहि संग बितौलहुँ। आकाशमे लटकल सूर्यगोल हमर हृदयक ताप बाँटि लाल भऽ गेल। अरुण सूर्यक दर्शन लेल व्याकुल सूर्यप्रभाक लक्ष्मी कमल-शय्या सजबैत प्रेममूर्छासँ पीयर पड़ि गेलीह। लाल गेरूसँ रँगायल जलपर पड़ैत गुलाबी सूर्यकिरण कमलवनसँ उठैत छल, जे वनहाथीक झुण्ड जकाँ जुटल छल। आकाशक उतारसँ थाकि विश्राम लेल उत्सुक सूर्यरथक घोड़ासभक आनन्दपूर्ण हिनहिनाहटक प्रतिध्वनिसहित दिन मेरुपर्वतक गुफामे प्रवेश कयलक। मधुमाछी लाल कमलक मुनैत पातक भीतर घुसल, तखन कमलवन आँखि मुनैत लगल—मानू सूर्यक विदाइपर मूर्छासँ हृदय अन्हार भऽ गेल हो। चक्रवाकक जोड़ी, जे एक-दोसरक हृदय संगहि खायल कमलनालक खोखलमे सुरक्षित नुका रखने छल, अलग भऽ गेल। एतबे मे छत्रवाहिनी हमरा लग आबि बजलीह—“राजकुमारी, ओहि युवा तपस्वीसभमे सँ एक द्वारपर छथि। कहैत छथि जे जपमाला माँगय आयल छथि।” तपस्वीक नाम सुनिते देह निश्चल रहितो हम मानू द्वार धरि पहुँचि गेलहुँ। हुनकर आगमनक कारण अनुमान कऽ दोसर द्वारपाल केँ बजा कहलहुँ—“जाउ, हुनका भीतर आनू।” किछुए क्षणमे युवा तपस्वी कपिञ्जल केँ देखलहुँ। पुण्डरीकक लेल ओ ओहिना छलाह जेना सौन्दर्यक लेल यौवन, यौवनक लेल प्रेम, प्रेमक लेल वसन्त, आ वसन्तक लेल दक्षिण पवन—सचमुच हुनकर योग्य मित्र। धूसरकेश वृद्ध द्वारपालक पाछाँ ओ चाँदनीक पाछाँ सूर्यप्रकाश जकाँ आबि रहल छलाह। समीप अबिते हुनकर आकृतिसँ दुःख, उदासी, व्याकुलता, प्रार्थना आ अपूर्ण लालसा प्रकट भेल। हम आदरसँ उठि हुनका आसन देलहुँ। बड़ आग्रहक बाद अनिच्छासँ आसन स्वीकार कयलनि; हम हुनकर चरण धोइ अपन उत्तरीयक रेशमी कोरसँ सुखौलहुँ आ स्वयं लगहिमे नाङट धरतीपर बैसि गेलहुँ। ओ किछु क्षण बाजय लेल उद्यत रहि लगमे ठाढ़ तरलिका दिस देखलनि। दृष्टिमात्रसँ हुनकर अभिप्राय बुझि हम कहलहुँ—“आर्य, ई हमरा सँ अलग नहि अछि। निर्भय भऽ बाजू।” तखन कपिञ्जल बजलाह—“राजकुमारी, हम की कही? लाजसँ हमर स्वर वाणी धरि पहुँचि नहि रहल अछि। वनमे कन्द-मूल खा निर्विकार तपस्या करयबला सन्यासीक सम्बन्ध ओहि प्रेममोहसँ कतेक दूर, जे चञ्चल हृदयमे घर करैत, सांसारिक भोगक लालसासँ कलुषित आ कामदेवक अनेक क्रीड़ासँ भरल अछि! देखू, ई सभ कतेक अनुचित अछि। भाग्य की आरम्भ कऽ देलक? ईश्वर मनुष्य केँ कतेक सहज उपहासक पात्र बना दैत छथि! नहि जानि ई वृक्षछालक वस्त्रसँ मेल खाइत अछि कि नहि, जटाक योग्य अछि कि नहि, तपस्याक अनुरूप अछि कि नहि, पवित्र शिक्षासँ सङ्गत अछि कि नहि। एहन उपहास कहियो नहि सुनल गेल। मुदा कथा कहनाइ आवश्यक अछि। आन कोनो बाट देखाइ नहि पड़ैत; कोनो उपचार बुझाइ नहि दैत; कोनो शरण उपलब्ध नहि; कोनो उपाय सोझाँ नहि। जँ बात अनकहल रहि गेल तँ आरो पैघ संकट उठत। मित्रक जीवन अपन जीवनक मूल्यपर सेहो बचाओल जाय; तेँ कथा कहैत छी।”’ ‘“‘“अहाँक सोझाँ हम पुण्डरीक केँ कठोरतासँ डाँटने छलहुँ। ओ बात कहि क्रोधमे हुनका छोड़ि फूल चुनबाक काज त्यागि दोसर स्थानपर चलि गेलहुँ। अहाँ चलि गेलापर किछु काल अलग रहलहुँ। फेर ओ की कऽ रहल छथि, एहि चिन्तासँ घुरि एक गाछक ओटसँ ओहि स्थान केँ देखलहुँ। ओ ओतए नहि छलाह। मनमे विचार उठल—‘हुनकर मन प्रेमक दास भऽ गेल छल, सम्भवतः ओ कन्याक पाछाँ गेलाह; आब ओ चलि गेलीह तखन चेतना घुरल होयतनि आ हमरा सोझाँ अबयमे लाज होइत होयतनि। अथवा हमरा पर क्रुद्ध भऽ चलि गेलाह, वा हमरा खोजैत आन स्थानपर गेलाह।’ एना सोचि किछु समय प्रतीक्षा कयलहुँ। जन्मसँ एखन धरि एक क्षणक लेलो हुनकासँ अलग नहि भेल छलहुँ; एहि अपरिचित वियोगसँ व्याकुल भऽ फेर सोचलहुँ—‘दृढ़ता गमा देबाक लाजमे ओ अपन कोनो हानि नहि कऽ बैसथि। लाज मनुष्यसँ किछुओ करा सकैत अछि। हुनका एकसरि छोड़ब उचित नहि।’ ई निश्चय कऽ तत्परतासँ खोजय लगलहुँ। चारू दिस खोजितो दर्शन नहि भेल। मित्रस्नेहसँ चिन्तित, तरह-तरहक अनिष्ट कल्पना करैत दीर्घ काल धरि भटकलहुँ। गाछक खुला स्थान, चन्दनक पाँतिक बीच लताक कुञ्ज, सरोवरक तट—सभ ठाम सावधानीसँ चारू दिस देखैत खोजलहुँ। अन्तमे एक सरोवर लग लताक घन कुञ्जमे हुनका देखलहुँ। ओ स्थान वसन्तक जन्मभूमि जकाँ परम सुन्दर छल; घनताक कारण मानू केवल फूल, मधुमाछी, कोइली आ मोरसँ बनल हो। पुण्डरीक पूर्णतः निष्क्रिय छलाह—चित्रित, उकेरल, जड़, मृत, सुतल अथवा समाधिस्थ व्यक्ति जकाँ। निश्चल होइतो उचित बाटसँ भटकल; एकसरि होइतो कामदेवसँ आविष्ट; भीतर प्रज्वलित होइतो पीयर मुख उठौने; ध्यानहीन होइतो प्रेम केँ हृदयमे स्थान देने; मौन रहितो प्रेमक महान दुःखक कथा कहैत; पत्थरपर बैसल होइतो मृत्यु केँ सोझाँ ठाढ़। कामदेव हुनका पीड़ा दऽ रहल छल, मुदा अनेक शापक भय सँ स्वयं अदृश्य रहल। हुनकर महान निश्चलतासँ बुझाइत छल जे इन्द्रियसभ हृदयमे बसल प्रेम देखय भीतर प्रवेश कऽ असह्य तापसँ भयभीत भऽ मूर्छित भऽ गेल हो; अथवा मनक उथल-पुथलपर क्रुद्ध भऽ हुनका छोड़ि चलि गेल हो। आँखि दृढ़तासँ मुनल छल, भीतर प्रेमाग्निक तीक्ष्ण धुआँसँ मलिन; पलकक बीचसँ निरन्तर नोरक आँधी बहि रहल छल। बाहर निकलैत निःश्वास लताक समीपवर्ती केसर केँ कँपा दैत छल; ओ निःश्वास हुनकर ओठक लालिमा लऽ एना निकलैत मानू हृदय जरा रहल कामदेवक अरुण ज्बला अचानक उठि रहल हो। बामा गालपर हाथ टिकल छल। ऊपर उठैत निर्मल नखकिरणसँ कपारपर मानू शुद्ध चन्दनक नब तिलक बनि गेल छल। पारिजातक कानफूल एखनहि उतारल गेल छल; तकर शेष सुगन्धक लालसामे ऊपर चढ़ैत मधुमाछी अपन कोमल गुंजनक बहाने प्रेमवशीकरण मन्त्र पढ़ैत कानपर तमालपल्लव अथवा नीलकमलक शोभा दऽ रहल छल। प्रेमक रोमाञ्चसँ उठल रोम मानू कामदेवक फूलबाण शरीरक रोमछिद्रमे घुसि टूटल नोकक समूह भऽ अंगपर रहि गेल हो। दहिना हाथसँ वक्षस्थलपर मोतीक माला धारण कयने छलाह। नखक चमकैत किरणसँ गुँथल ओ माला हथेलीक स्पर्शसुखमे रोमाञ्चित लगैत, आ उच्छृङ्खलताक ध्वज जकाँ छल। गाछसभ हुनका प्रेमशमनक चूर्ण जकाँ परागसँ ढकैत छल। पवनमे डोलैत अशोकपल्लव सहला अपन अरुणिमा हुनका दैत छल। वनलक्ष्मी नव फूलगुच्छसँ मधुबिन्दु छिड़कि कामदेवक अभिषेक करैत छलीह। कामदेव चम्पकक कलीसँ प्रहार करैत छल; मधुमाछी सुगन्ध पीबैत, तेँ कली धुआँ छोड़ैत अग्निबाण जकाँ लगैत। वनक अनेक गन्धसँ उन्मत्त मधुमाछीक गुंजनक बहाने दक्षिण पवन हुनका डाँटैत छल। मधुर उन्मादमे ‘वसन्तक जय’ पुकारैत कोइलीक स्वरक बहाने मधुमास हुनका भ्रमित करैत छल। उदित चन्द्रमा जकाँ पीयरता ओढ़ने; ग्रीष्मक गङ्गाधारा जकाँ क्षीण; भीतर आगि लागल चन्दनवृक्ष जकाँ मुरझाइत। मानू दोसर जन्ममे प्रवेश कऽ भिन्न मनुष्य बनि गेलाह—अपरिचित, अनजान, रूपान्तरित। दुष्ट आत्मासँ ग्रस्त, प्रबल दानवक अधीन, महाप्रेतसँ आविष्ट, मदोन्मत्त, मोहित, अन्हरा, बहिरा, मूक, आनन्द आ प्रेममे पूर्णतः विलीन—कामदेवक अधीन मनक दासताक चरम सीमा धरि पहुँचि गेल छलाह; पुरान पुण्डरीक केँ चिन्हब असम्भव छल।’ ‘“‘“दीर्घ समय धरि स्थिर दृष्टिसँ हुनकर दुःखमय दशा देखैत हम निराश भऽ गेलहुँ। काँपैत हृदयमे विचार उठल—‘ई सचमुच ओहि कामदेवक प्रभाव अछि, जकर शक्ति केँ केओ रोकि नहि सकैत। ओ एक क्षणमे पुण्डरीक केँ एहन असाध्य दशामे पहुँचा देलक। नहि तँ ज्ञानक एहन भण्डार अचानक निष्फल कोना भऽ जाइत? बाल्यकालहिसँ दृढ़ स्वभाव, अडिग आचरण, आ जकर जीवन हमरा तथा अन्य युवा तपस्वीसभक ईर्ष्याक विषय छल—हाय, हुनकामे ई अद्भुत परिवर्तन! एतए ओ सामान्य मनुष्य जकाँ ज्ञानक तिरस्कार, तपस्याक शक्तिक अवहेलना आ गहिर स्थिरताक जड़ि उखाड़ि कामदेवसँ जड़ भऽ गेल छथि। जीवन भरि अविचलित रहयबला यौवन सचमुच दुर्लभ अछि।’ हम आगाँ बढ़ि ओहि पत्थरपर हुनकर लग बैसलहुँ। काँधपर हाथ राखि, आँखि एखनहुँ मुनल होइतो पुछलहुँ—‘प्रिय पुण्डरीक, ई सभक अर्थ हमरा कहू।’ बहुत कठिन परिश्रमसँ ओ आँखि खोललनि। दीर्घ काल मुनल रहबाक कारण मानू दुनू पलक परस्पर चिपकि गेल छल। निरन्तर कनने आँखि लाल, नोरसँ भरल, पीड़ासँ काँपैत—श्वेत रेशमसँ ढँकल लाल कमलवन जकाँ लगैत छल। अत्यन्त शिथिल दृष्टिसँ हमरा बहुत काल तकलनि; तखन गहिर निःश्वास छोड़ि, लाजसँ टूटैत स्वरमे धीरे-धीरे पीड़ापूर्वक बजलाह—‘प्रिय कपिञ्जल, जे बात अहाँ जानिते छी, से किएक पुछैत छी?’ ई सुनि हम सोचलहुँ जे पुण्डरीक असाध्य रोगसँ पीड़ित छथि, तथापि गलत बाटपर बढ़ैत मित्र केँ प्रेमीजन जतेक सम्भव हो रोकबाक पूर्ण प्रयास करबाक चाही। तेँ उत्तर देलियनि—‘प्रिय पुण्डरीक, हम सभ बुझैत छी। केवल एतबे पुछैत छी—अहाँ जे ई आचरण आरम्भ कयलहुँ, से गुरुसभ सिखौने छथि, धर्मग्रन्थमे पढ़ल अछि, पवित्रता अर्जित करबाक उपाय अछि, तपस्याक कोनो नब रूप, स्वर्गक बाट, गूढ़ व्रत, मोक्षसाधन अथवा आन कोनो अनुशासन? एहन विचार मनमे अनबो अहाँक योग्य नहि, फेर देखब आ कहब तँ दूरक बात। मूर्ख जकाँ अहाँ नहि देखैत छी जे ओ दुष्ट कामदेव अहाँ केँ उपहासक पात्र बना रहल अछि। कामदेवक पीड़ा मूर्खहि भोगैत अछि। जे विषय नीच लोकक सम्मानित मुदा सज्जनक निन्दित, ओहिमे सुखक आशा कोना? जे मनुष्य इन्द्रियसुखमे सुख मानैत अछि, जकर अन्त दुःखमे होइत अछि, ओ कर्तव्य बुझि विषवृक्ष सींचैत अछि; कमलमाला बुझि तलवारक पातबाली लता आलिङ्गन करैत अछि; कृष्णागुरुक धुआँ बुझि करैत साँप पकड़ैत अछि; मणि बुझि दहकैत अङार छुबैत अछि; कमलनाल बुझि जङ्गली हाथीक गदासदृश दाँत उखाड़य चाहैत अछि। अहाँ इन्द्रियक वास्तविक स्वरूप जानैत छी, तथापि जुगनूक उजास जकाँ अपन ज्ञान केवल नुकाबय लेल धारण कयने छी; कारण उन्मत्त वेगमे गदगद नदी जकाँ बाट छोड़ैत इन्द्रियसभ केँ रोकैत नहि छी, आ उथल-पुथल करैत मन केँ वशमे नहि करैत छी। आखिर ई कामदेव अछि के? अपन दृढ़तापर भरोसा कऽ एहि दुष्ट केँ धिक्कारू।’”’ ‘“‘“हम एना बजलहुँ तखन ओ पलकक बीचसँ बहैत नोर हाथसँ पोंछलनि। एखनहुँ हमरा पर टेक देने, हमर बातक प्रतिवाद करैत बजलाह—‘मित्र, एतेक बातक की आवश्यकता? कम सँ कम अहाँ तँ अछूता छी! साँपक विषसँ क्रूर कामदेवक बाणक सीमा भीतर अहाँ नहि पड़लहुँ। दोसर केँ शिक्षा देब सहज अछि; आ जखन ओ दोसर व्यक्ति अपन इन्द्रिय आ मन पर अधिकार रखैत हो, देखैत-सुनैत हो, सुनल बात बुझैत हो, भला-बुराक भेद कऽ सकैत हो, तखने सलाहक पात्र होइत अछि। मुदा ई सभ हमरा सँ बहुत दूर चलि गेल। स्थिरता, विवेक, दृढ़ता आ विचारक चर्चा समाप्त भऽ गेल। प्रबल प्रयास बिना हम साँसो कोना लैत छी? उपदेशक समय बहुत पहिने बीति गेल; दृढ़ताक अवसर हाथसँ निकलि गेल; विचारक घड़ी समाप्त; स्थिरता आ निर्णयक ऋतु बीतल। एहि समय अहाँक अतिरिक्त के उपदेश दऽ सकैत अछि अथवा हमर भटकैत मन रोकबाक प्रयास कऽ सकैत अछि? अहाँक अतिरिक्त हम केकर बात सुनब? संसारमे अहाँ जकाँ मित्र आओर के अछि? हमरा की भऽ गेल जे अपना केँ रोकि नहि पबैत छी? एक क्षणमे अहाँ हमर दयनीय दशा देखि लेलहुँ। तेँ उपदेशक समय आब बीति चुकल। जाधरि साँस अछि, प्रलयकालक बारह सूर्यक किरण जकाँ प्रचण्ड प्रेमज्वरक कोनो उपचार चाहैत छी। अंग पाकि रहल अछि, हृदय उबलि रहल अछि, आँखि जरि रहल अछि, सम्पूर्ण देह आगि बनल अछि। तेँ समय जे माँगैत अछि से करू।’ एतेक कहि ओ मौन भऽ गेलाह। हम बेर-बेर हुनका चेताबय चाहलहुँ; हुनकहि जकाँ उदाहरणसभ आ पुराणक कथासँ भरल धर्मग्रन्थक शुद्ध शिक्षाक आधारपर कोमल स्नेहपूर्ण उपदेश देलहुँ, मुदा ओ सुनलनि नहि। तखन सोचलहुँ—‘ओ बहुत आगाँ निकलि गेल छथि; घुराओल नहि जा सकैत। उपदेश आब निष्फल अछि। केवल जीवन बचयबाक प्रयत्न करब।’ ई निश्चय कऽ उठलहुँ। सरोवरसँ रसदार कमलनाल उखाड़लहुँ; जलक चिह्न लागल कमलपात लेलहुँ; भीतरक सुगन्धित परागसँ मधुर अनेक प्रकारक कमल तोड़लहुँ; आ ओहि कुञ्जक चट्टानपर कमलक शय्या बनौलहुँ। ओ सुखसँ ओहिपर सुतलाह। लगहिक चन्दनवृक्षक कोमल डाढ़ि पीसि स्वभावतः मधुर, बर्फ जकाँ शीतल रससँ कपारपर तिलक देलहुँ आ माथसँ पएर धरि शरीर लेपलहुँ। समीपक गाछक फाटल छालक दरारिसँ कपूरक टुकड़ा निकालि हाथमे चूर्ण कऽ स्वेद शान्त कयलहुँ। निर्मल जल टपकैत केलाक पातसँ हवा कयलहुँ। वक्षस्थलपर लगाओल चन्दनसँ वृक्षछालक वस्त्र भीजि गेल छल। बेर-बेर नव कमलशय्या बिछबैत, चन्दन लेपैत, स्वेद पोंछैत आ लगातार हवा करैत मनमे विचार उठल—‘कामदेवक लेल सचमुच किछुओ कठिन नहि। वनगृहमे मृगशावक जकाँ सरल आ सन्तुष्ट पुण्डरीक आ गन्धर्वराजकुमारी महाश्वेता—सौन्दर्यक समस्त तारामण्डल—दुनू कतेक भिन्न! तथापि कामदेवक लेल संसारमे ने किछु कठिन, ने दुष्कर, ने अजेय, ने असम्भव। ओ अत्यन्त कठिन काजो तिरस्कारपूर्वक आरम्भ करैत अछि, आ केओ ओकर प्रतिरोध नहि कऽ सकैत। चेतन प्राणीक की बात, जँ ओकर इच्छा हो तँ जड़ वस्तुसभ केँ सेहो मिला दैत अछि। रातिक कमलवन सूर्यक किरणसँ प्रेम करय लगैत अछि; दिनक कमल चन्द्रमाप्रतिक घृणा छोड़ि दैत अछि; राति दिनसँ मिलि जाइत अछि; चाँदनी अन्हारक सेवा करैत अछि; छाया प्रकाशक सोझाँ ठाढ़ होइत अछि; बिजुरी मेघमे स्थिर रहैत अछि; बुढ़ाड़ी यौवनक संग चलैत अछि। अथाह गहिराइ बला समुद्रसदृश पुण्डरीक केँ घासक तिनका जकाँ हलुक बना देबासँ अधिक कठिन की हो सकैत अछि? हुनकर पूर्वक तपस्या कतए आ वर्तमान दशा कतए! सचमुच असाध्य रोग हुनका पकड़ि लेलक। आब हम की करू, कोन प्रयत्न, कतए जाउ, कोन शरण, साधन, सहायता, उपचार, योजना वा उपायसँ जीवन टिकत? कोन कौशल, युक्ति, माध्यम, सहारा, विचार वा सान्त्वनासँ ओ जीवित रहताह?’ एहन अनेक विचार उदास हृदयमे उठल। फेर सोचलहुँ—‘एहि निष्फल चिन्तामे पड़ल रहला सँ की लाभ? नीक वा अधलाह कोनो उपायसँ हुनकर जीवन बचयब अनिवार्य अछि। हुनका बचयबाक एकमात्र बाट महाश्वेतासँ मिलन अछि। यौवनक कारण ओ लजालु छथि; प्रेमक व्यवहार केँ व्रतक विरुद्ध, अनुचित आ अपना लेल उपहास मानैत छथि; तेँ अन्तिम साँस धरियो स्वयं हुनका लग जा अपन इच्छा पूर्ण नहि करताह। ई प्रेमरोग विलम्ब सहन नहि करैत। सज्जन मानैत छथि जे निन्दनीय कृत्यसँ सेहो मित्रक जीवन बचाओल जाय। तेँ ई लज्जाजनक आ अनुचित काज होइतो हमरा लेल आवश्यक भऽ गेल। आन की कयल जाय? दोसर बाट की अछि? हम अवश्य महाश्वेताक लग जायब आ हुनकर दशा कहब।’ एना सोचि कोनो बहाना बना ओ स्थान छोड़लहुँ। हुनका नहि कहलियनि, कारण कहीं हमरा अनुचित काजमे लागल बुझि लाजसँ रोकि नहि दैथि। परिस्थिति एहन अछि; आब देवी, समयक अनुकूल, एतेक महान प्रेमक योग्य, हमर आगमनक अनुरूप आ अहाँक लेल उचित काजक निर्णय स्वयं करू।” एतेक कहि ओ मौन भऽ गेलाह आ हम की उत्तर देब, से देखबाक लेल दृष्टि हमर मुखपर स्थिर कयलनि। हुनकर बात सुनि हम मानू अमृतमय आनन्दक सरोवरमे डुबि गेलहुँ, प्रेममाधुर्यक समुद्रमे निमग्न, सभ सुखक ऊपर तैरैत, समस्त इच्छाक शिखरपर चढ़ैत, उल्लासक अन्तिम सीमापर विश्राम करैत। आनन्दक नोरसँ सुख प्रकट भेल। पलक मुनल नहि छल तेँ निर्मल, पैघ, भारी बून निकलल; निरन्तर पाँतिक कारण माला जकाँ गुँथल; अचानक लाजसँ मुख कने झुकल छल तेँ गाल नहि छुबि सकल। तुरन्त सोचलहुँ—‘अहा, कामदेव हुनका सेहो हमरा जकाँ फँसा लेलक! हमरा पीड़ा दैत-दैत कम सँ कम एतेक कृपा तँ कयलक। जँ पुण्डरीक सचमुच एहन दशामे छथि, तँ कामदेव हमर कोन सहायता नहि कयलक, हमर लेल की नहि कयलक, ओकर जकाँ मित्र के? शान्तचित्त कपिञ्जलक ओठसँ सपनामे सेहो झूठ कथा कोना निकलि सकैत अछि? जँ बात सत्य अछि, तँ हुनकर सोझाँ हमरा की करब आ की कहब?’ हम एना विचारिए रहल छलहुँ कि एक द्वारपालिका जल्दीसँ भीतर आबि बजलीह—“राजकुमारी, सेविकासँ महारानी केँ ज्ञात भेलनि जे अहाँ अस्वस्थ छी; ओ एखन आबि रहल छथि।” ई सुनि पैघ भीड़क सम्पर्कसँ बचबाक लेल कपिञ्जल तुरन्त उठि बजलाह—“राजकुमारी, आब पैघ विलम्बक कारण उपस्थित भऽ गेल। तीनू लोकक शिरोमणि सूर्य डूबि रहल छथि; हम चलैत छी। मुदा प्रिय मित्रक जीवन बचयबाक लेल अपन हाथ जोड़ि ई लघु निवेदन अर्पित करैत छी; से हमर सर्वाधिक मूल्यवान निधि अछि।” हमर उत्तरक प्रतीक्षा बिना ओ कठिनतासँ निकललाह, कारण महारानीक आगमन सूचित करैत सेवकसमूह प्रवेश करैत द्वार रोकने छल। सोने छड़ी धारण कयने द्वारपालिकासभ; सुगन्धित लेप, प्रसाधन, फूल, ताम्बूल लैत आ चँवर डोलबैत अन्तःपुराधिकारी; हुनकर पाछाँ कुबड़, बर्बर, बहिरा, नपुंसक, बौना आ बहिर-मूक लोक छल।’ ‘“‘तखन महारानी हमरा लग अयलीह। बहुत काल रहि ओ घर घुरलीह; मुदा हमरा हृदय दूर छल, तेँ ओ की कयलनि, की बजलीह अथवा की प्रयत्न कयलनि, किछुओ ध्यान नहि रहल। हुनकर विदाइ धरि हरितालवर्ण कपोत जकाँ उज्ज्वल घोड़ाबला, कमलक जीवनस्वामी आ चक्रवाकक मित्र सूर्य अस्त भऽ चुकल छल। पश्चिम दिशाक मुख लाल भऽ रहल छल; कमलवन हरियर अन्हारमे बदलैत; पूर्व दिशा नील भऽ रहल छल। मनुष्यलोक प्रलयसमुद्रक ओहि कृष्ण लहरि जकाँ अन्हारसँ आच्छादित भऽ गेल, जे नरकक कादोसँ गदगद हो। की करब से नहि बुझि तरलिकासँ पुछलहुँ—“तरलिका, अहाँ नहि देखैत छी हमर मन कतेक भ्रमित अछि? अनिश्चिततासँ इन्द्रियसभ व्याकुल, हम स्वयं कनेको नहि बुझि पबैत छी की करब। कपिञ्जल आब चलि गेलाह, आ हुनकर कथा अहाँक सोझाँ कहल गेल; तेँ उचित उपाय अहाँ कहू। जँ हम नीच कुलक कन्या जकाँ लाज फेकि दिअ, आत्मसंयम छोड़ि दिअ, विनय त्यागि लोकनिन्दाक उपेक्षा करू, सदाचार उल्लङ्घन करू, मर्यादा कुचलू, कुलीन जन्मक तिरस्कार करू, प्रेमान्ध बाटक अपयश स्वीकार करू, आ पिताक अनुमति वा मायक स्वीकृति बिना स्वयं हुनका लग जा अपन हाथ अर्पित करि दिअ, तँ माता-पिताप्रति ई उल्लङ्घन महान अपराध होयत। मुदा जँ दोसर विकल्प चुनि धर्मक अनुसरण करी, तँ पहिने मृत्यु स्वीकार करब; आ संगहि परम श्रद्धेय कपिञ्जलक हृदय तोड़ब, जे हुनका पहिनेसँ प्रेम करैत छथि आ स्वयं एतए अयलाह। फेर जँ हमर कृत्यसँ हुनकर आशा नष्ट भऽ ओ पुरुष मरि जाइत छथि, तँ तपस्वीक मृत्यु कारण बनबाक महान पाप लगत।” हम एना विचार करैत छलहुँ कि चन्द्रोदयक हलुक उजाससँ पूर्व दिशा धूसर भऽ गेल—वसन्तमे फूलक परागसँ ढँकल वनपाँति जकाँ। चाँदनीमे पूर्व दिशा एना धवल देखाइत छल मानू चन्द्ररूपी सिंह अन्धकाररूपी हाथीक कपार फाड़ि मोती चूर्ण कऽ देने हो; अथवा पूर्वाचलक अप्सरासभक वक्षसँ झरल चन्दनधूलिसँ पीयर पड़ल हो; वा निरन्तर चलैत समुद्रक लहरिपर पवनसँ उड़ल, ज्वार उतरला पर उघरल द्वीपक बालुकासँ उज्ज्वल हो। चाँदनी धीरे-धीरे नीचाँ उतरि रातिक मुख चमका देलक—मानू चन्द्रमा देखिते राति कोमल मुस्की हँसलीह आ दाँतक चमक फैलि गेल। फेर चन्द्रमण्डलसँ सन्ध्या एना शोभित भेल, मानू पातालसँ उठैत शेषनागक फणमण्डल धरती चीरि बाहर आबि गेल हो। तकर बाद मनुष्यलोक केँ आनन्द देनिहार आ प्रेमीसभक प्रिय चन्द्रमासँ राति सुन्दर भऽ उठल। ओ बाल्यावस्था छोड़ि कामदेवक सहायक बनि रहल छल; भीतर युवा कान्ति उभरल; प्रेमक क्रीड़ा भोगबाक लेल एकमात्र उपयुक्त अमृतमय प्रकाश; साकार यौवन जकाँ आकाश चढ़ैत। उदित चन्द्रमा हमरा एना देखाइत छल मानू एखनहि छोड़ल समुद्रक मूँगा सँ लाल हो; पूर्वाचलरूपी सिंहक पंजासँ आहत अपन मृगक रक्तसँ रँगायल हो; प्रणयकलहमे स्वामी केँ ठोकर मारैत रोहिणीक पएरक अलक्तकसँ चिह्नित हो; वा नब प्रज्वलित तेजसँ अरुण भऽ उठल हो। भीतर प्रेमाग्नि जरैत छल, तैयो हृदय अन्हार; देह तरलिकाक गोदिमे, मुदा हम कामदेवक बन्दिनी; आँखि चन्द्रमापर, मुदा दर्शन मृत्युक। हम सोचलहुँ—‘मधुमास, मलयपवन आ एहन सभ वस्तु एकठाम जुटल अछि; तकरा संग एहि दुष्ट पापी चन्द्रमाक उपस्थितियो सहन नहि होइत। हृदय एकरा नहि झेलि सकैत। एकर उदय ज्वरसँ जरैत मनुष्यपर अङारक वर्षा जकाँ, शीतरोगीपर हिमपात जकाँ, वा विषसँ मूर्छित मनुष्यपर करैत साँपक दंश जकाँ अछि।’ एना सोचिते मूर्छा आँखि मूनि देलक—दिनकमल केँ मुरझौनिहार चाँदनीसँ आयल निद्रा जकाँ। किछुए कालमे व्याकुल तरलिकाक पंखा आ चन्दनलेपसँ चेतना घुरल। ओकरा कनैत देखलहुँ; निरन्तर नोरसँ मुख मलिन; भीजल चन्द्रकान्त मणिक नोक कपारपर दबौने; मानू साकार निराशा ओकरा आविष्ट कयने हो। हम आँखि खोललहुँ तखन ओ पएरपर खसि पड़ल आ गाढ़ चन्दनलेपसँ एखनहुँ भीजल हाथ जोड़ि बजलीह—“राजकुमारी, लाज वा माता-पिताक अनादरक चिन्ता किएक? कृपा करू; हमरा पठाउ, हम अहाँक हृदयप्रिय केँ लऽ आनब। उठू, वा स्वयं ओतए चलू। आब प्रबल चन्द्र उदित भेला पर अनेक उन्मत्त लहरि फुला रहल समुद्रसदृश एहि प्रेम केँ अहाँ सहि नहि सकब।” ओकर बातक उत्तर देलहुँ—“पागलि, हमरा प्रेमसँ की? ई रातिक कमलक स्वामी चन्द्रमा अछि, जे सभ सङ्कोच दूर करैत, बचबाक उपाय खोजब बन्द करैत, सभ बाधा नुका दैत, सभ सन्देह हरैत, सभ भयक तिरस्कार करैत, लाजक जड़ि उखाड़ैत, प्रियक लग स्वयं जयबाक पापपूर्ण चपलतापर परदा दैत, सभ विलम्ब टारैत, आ केवल हमरा पुण्डरीक अथवा मृत्यु लग लऽ जयबाक लेल आयल अछि। तेँ उठू; जाधरि जीवन अछि, हम हुनकर पाछाँ जायब आ प्रिय होइतो हमर हृदय केँ पीड़ा देनिहार हुनकर सम्मान करब।” एतेक कहि ओकर सहारा लऽ उठलहुँ; प्रेमजनित मूर्छाक दुर्बलतासँ अंग एखनहुँ अस्थिर छल। उठिते दहिना आँखि फड़कय लागल—अमङ्गलक सङ्केत। अचानक भयभीत भऽ सोचलहुँ—‘भाग्य आब कोन नब विपत्ति देखाबय चाहैत अछि?’” ‘“‘आकाश चाँदनीसँ भरि गेल छल। एखन बहुत ऊपर नहि चढ़ल चन्द्रमण्डल मानू ब्रह्माण्ड-मन्दिरक जलनिकासी-नलिका बनि स्वर्गगङ्गाक हजार धार छोड़ि रहल हो, अमृतसमुद्रक लहरि उँडेलि रहल हो, चन्दनरसक अनेक झरना बहा रहल हो, सुधाक बाढ़ि अनैत हो। जगत मानू श्वेतद्वीपक जीवन आ सोमलोक देखबाक आनन्द सीखि रहल छल। गोल पृथ्वी क्षीरसागरक गहिराइ सँ चन्द्रमा द्वारा बाहर उँडेलल जा रहल छल; चन्द्रमा महावराहक गोल दाँत जकाँ लगैत छल। प्रत्येक घरमे स्त्रीसभ खिलल कमलसुगन्धित चन्दनजलसँ चन्द्रोदयक अर्घ्य दऽ रहल छलीह। सुन्दर स्त्रीसभ द्वारा पठाओल हजारो दूतिसँ राजमार्ग भरल छल। प्रियसँ मिलय चलल कन्यासभ नील रेशममे मुँह ढँकि चारू दिस दौड़ि रहल छलीह; उज्ज्वल चाँदनीक भय सँ काँपैत ओ नीलकमलक कान्तिमे नुकायल श्वेत दिनकमलवनक अप्सरा जकाँ लगैत छलीह। रातिरूपी नदीमे आकाश बालुकाद्वीप बनि गेल छल; खिलल रातिक कमलवनक घन परागसँ मध्य भाग धवल। गृहसरोवरक कुमुदवन जागि रहल छल; प्रत्येक फूलसँ चिपकल मधुमाछी ओकर चारू कात घेरा देने छल। मनुष्यलोक समुद्र जकाँ चन्द्रोदयक आनन्द समेटि नहि पबैत, आ मानू प्रेम, उत्सव, हँसी आ कोमलतासँ बनल हो। चन्द्रकान्त मणिक नलिकासँ झरैत जलधाराक उल्लासमे बकबक करैत मोरक मधुर स्वर सँ सन्ध्या मनोहर छल।’ ‘“‘तरलिका सुगन्धित चूर्ण, इत्र, लेप, ताम्बूल आ अनेक प्रकारक फूल लऽ हमर संग चललीह। मूर्छाक समय लगाओल चन्दनलेपसँ भीजल ओ रूमाल सेहो हमरा लग छल; ओकर रोआँ कने अस्त-व्यस्त आ आध सुखायल चन्दनक चिह्नसँ धूसर छल। गला पर जपमाला, कानक अग्रभाग केँ चुमैत पारिजातगुच्छ, आ माणिक्यक किरणसँ बनल जकाँ लाल रेशमी घोघट ओढ़ि, समर्पित सेविकासभक नजरिसँ बचि महलक ऊपरी तलसँ उतरि गेलहुँ। बाटमे कमलवन आ उद्यान छोड़ि पारिजातक सुगन्धसँ खिंचायल मधुमाछीक झुण्ड हमरा पाछाँ आबि गेल; खेल-खेलमे हमर चारू कात नील घोघट बना रहल छल। क्रीड़ोद्यानक द्वारसँ बाहर निकलि पुण्डरीकसँ मिलय चललहुँ। केवल तरलिका संग छल, से देखि बाटमे सोचलहुँ—‘प्रियतमक खोजमे सेवकसमूहक आडम्बरक की आवश्यकता? एहन समय सेवक केवल सेवाक उपहास करैत अछि। कामदेव धनुषपर बाण चढ़ा हमर पाछाँ चलि रहल अछि; चन्द्रमा लम्बा किरण हाथ जकाँ पसारि हमरा खिंचैत अछि; खसबाक भय सँ प्रत्येक डेगपर अनुराग सहारा दैत अछि; हृदय इन्द्रियसभसंग लाज केँ पाछाँ छोड़ि दौड़ि रहल अछि; लालसा निश्चय पाबि हमर मार्गदर्शन करैत अछि।’ जोर सँ बजलहुँ—“अरे तरलिका, काश ई दुष्ट चन्द्रमा अपन किरणसँ पुण्डरीकक केश पकड़ि हुनको हमरा जकाँ आगाँ खिंचि अनैत!” ओ मुस्करा कऽ उत्तर देलक—“राजकुमारी, अहाँ पागल छी! चन्द्रमा केँ पुण्डरीकसँ की? उलटे, प्रेमक बाणसँ आहत चन्द्रमा स्वयं अहाँक लेल ई सभ कऽ रहल अछि। अपन प्रतिबिम्बक बहाने स्वेदबिन्दुसँ चिह्नित अहाँक गाल चुमैत अछि; काँपैत किरणसँ गौर वक्षस्थलपर खसैत अछि; करधनीक रत्न छुबैत अछि; उज्ज्वल नखमे फँसि पएरपर खसैत अछि। प्रेमरोगी चन्द्रमाक रूप ज्वरमे सुखायल चन्दनलेप जकाँ पीयर अछि। कमलनाल जकाँ श्वेत किरण पसारैत; प्रतिबिम्बक बहाने स्फटिकक आँगनपर खसैत; केतकीक भीतरक केसरधूलि जकाँ धूसर किरणसँ कमलसरोवरमे डुबैत; फुहारसँ भीजल चन्द्रकान्त मणि केँ किरणसँ छुबैत; आ पहिले अलग भेल चक्रवाक-युगलबला दिनकमलवनसँ घृणा करैत अछि।” समयानुकूल एहन बातचीत करैत हम ओकर संग ओहि स्थान लग पहुँचलहुँ। बाटक लताफूलक परागसँ धूसर पएर कपिञ्जलक निवास लग ओहि धारामे धोइलहुँ, जे चन्द्रोदयसँ पघिलल चन्द्रकान्त मणिसँ कैलासक ढलानपर बहैत छल। ओतए सरोवरक बामा तटपर दूरीसँ कोमल पड़ल पुरुषक रोदन सुनलहुँ। दहिना आँखि फड़कला सँ पहिनहि भीतर भय उठल छल; आब ओहि क्रन्दनसँ हृदय आरो फाटय लागल, मानू उदास मन भीतरहि भयङ्कर समाचार कहि रहल हो। आतंकमे चिचिया उठलहुँ—“तरलिका, ई की?” अंग काँपैत, साँस फूलैत तीव्र गतिसँ आगाँ दौड़लहुँ।’ ‘“‘तखन शान्त रातिमे दूरसँ स्पष्ट करुण विलाप सुनलहुँ—“हाय, हम नष्ट भऽ गेलहुँ! जरि गेलहुँ! ठकि गेलहुँ! ई हमरा संग की भेल? ई की भऽ गेल? हमर जड़ि उखड़ि गेल! हे क्रूर, दुष्ट, निर्दयी कामदेव, अहाँ ई केहन लज्जाजनक काज कऽ देलहुँ? हे दुष्टा, पापिनी, उच्छृङ्खल महाश्वेता, ओ अहाँक की बिगाड़ने छलाह? हे दुष्ट, उन्मत्त, विकराल चन्द्रमा, अहाँक इच्छा पूर्ण भेल। हे क्रूर कोमल दक्षिण पवन, अहाँक कोमलता समाप्त, इच्छा सफल। जे करबाक छल से भऽ गेल; आब इच्छा हो तँ चलि जाउ! हे पूज्य श्वेतकेतु, पुत्रवत्सल पिता, अहाँ नहि जानैत छी जे अहाँक जीवन चोरी भऽ गेल! धर्म, अहाँ बेदखल भऽ गेलहुँ! तपस्या, अहाँक रक्षक नहि रहल! वाणी, अहाँ विधवा भऽ गेलहुँ! सत्य, अहाँ स्वामीहीन! स्वर्ग, अहाँ रिक्त! मित्र, हमरा बचाउ! तथापि हम अहाँक पाछाँ जायब। अहाँ बिना एक क्षणो एकसरि नहि रहि सकैत छी। जकरा हमर आँखि कहियो नहि देखने हो, एहन अपरिचित जकाँ अचानक हमरा छोड़ि अपन बाट कोना चलि गेलहुँ? ई एतेक कठोरता कतयसँ आयल? कहू, अहाँ बिना हम कतए जाउ? केकरा प्रार्थना करू? कोन शरण खोजू? हम अन्हरा भऽ गेलहुँ! हमरा लेल दिशा रिक्त, जीवन निरुद्देश्य, तपस्या व्यर्थ, संसार आनन्दहीन! केकर संग घूमब, केकरासँ बाजब, केकर संग वार्ता करब? उठू! हमरा उत्तर दिअ। मित्र, हमरा प्रति अहाँक पुरान प्रेम कतए? ओ सदिखनक मुस्कराइत स्वागत कतए?”’ ‘“‘कपिञ्जलक ई वचन सुनलहुँ। एखन दूरहि छलहुँ, मुदा मानू जीवन खसि गेल हो—एहन जोर सँ चीत्कार निकलल। सरोवरक तटक लतामे अँटकि रेशमी ओढ़नी फाटि गेल; धरती समतल अछि कि खुरदरी, ओकर चिन्ता बिना पएर राखैत, जतबे तेज जा सकैत छलहुँ ओतेक तेज दौड़लहुँ। प्रत्येक डेगपर ठोकर खाइत, तैयो मानू केओ उठाकऽ आगाँ लऽ जा रहल हो।’ ‘“‘सरोवर लग शीतल फुहारसँ भीजल चन्द्रकान्त मणिक शिलापर बनल शय्यामे पुण्डरीक केँ पड़ल देखलहुँ। शय्या कोमल कमलनालसँ बनल, सभ प्रकारक कमलक मृदु पुष्पमाला जकाँ; मुदा बुझाइत छल मानू पूर्णतः कामदेवक बाणक नोकसँ रचल हो। अत्यधिक निश्चलतामे पुण्डरीक मानू हमर पदध्वनि सुनबाक प्रतीक्षा करैत छलाह। मानू निद्रामे क्षणिक सुख पयने होथि, भीतरक क्रोधसँ प्रेमपीड़ा बुझा गेल हो; अथवा तपस्वी कर्तव्यभङ्गक प्रायश्चित्तमे श्वास रोकबाक योगाभ्यास करैत होथि। उज्ज्वल मुदा काँपैत ओठसँ मानू धीरे कहैत छलाह—“अहाँक कृत्यसँ हम एहि दशामे पहुँचलहुँ।” प्रेमाग्निसँ धड़कैत हृदयपर राखल उज्ज्वल नखक बहाने चन्द्रकिरण हुनकर पीठपर पड़ि हुनका बेधि रहल छल; ओ चन्द्रमासँ घृणा कऽ ओकरा पाछाँ दऽ सूतल छलाह। कपारपर चन्दनरेखाक तिलक छल, जे सुखायल पीयरताक कारण कामदेवक क्षीण होइत चन्द्रकलाजकाँ हुनकर विनाशक पूर्वसूचना दैत छल। जीवन क्रोधमे कहैत मानू बाहर जा रहल हो—“मूर्ख, अहाँ केँ हमरा सँ अधिक प्रिय दोसर केओ अछि!” आँखि पूर्णतः मुनल नहि; पुतली कने घुरि देखबाक चेष्टा करैत; निरन्तर कनने लाल; श्वास रुकलासँ नोर समाप्त भऽ गेल, तेँ मानू रक्त टपका रहल हो; कामदेवक बाणक पीड़ासँ कने वक्र। आब ओ अचेतनाक कष्ट भोगैत छलाह—मानू प्रेमयन्त्रणासंग जीवनो सौंपि रहल होथि। कामरहस्यक नब रूपपर ध्यान करैत, अपरिचित कुम्भक साधैत लगैत छलाह। हुनकर जीवन मानू कामदेव पुरस्कारक रूपमे लऽ जा रहल छल, जे कृपा कऽ हमर आगमनक व्यवस्था कयने छल। कपारपर चन्दनक त्रिपुण्ड्र; रसदार कमलनालक यज्ञोपवीत; काँधपर चिपकल वस्त्र केलाक पात ढँकयबला आवरण जकाँ सुन्दर; जपमाला एक पाँतिक मोटाइ मात्र; कपारक भस्म प्रचुर श्वेत कपूरचूर्ण; बाँहपर ताबीज जकाँ बान्हल कमलनालक डोरी। बुझाइत छल, हमर आगमनक मन्त्र पूर्ण करैत प्रेमव्रतक वेष पहिरने छथि। आँखिसँ कोमल उलाहना दैत छलाह—“कठोरहृदया! केवल एक दृष्टिसँ हमर पाछाँ अयलहुँ, फेर कहियो कृपा नहि देलहुँ।” ओठ कने खुलल, दाँतक किरणसँ रूप धवल चमकि रहल छल—मानू जीवन लऽ जयबाक लेल शरीरमे प्रवेश कयने चाँदनी बाहर निकलि रहल हो। प्रेमपीड़ासँ टूटैत हृदयपर बामा हाथ रखि मानू कहैत छलाह—“जीवनसँ प्रिय, कृपा करू; हमर जीवनसंग चलि नहि जाउ!” आ एहि प्रकारेँ हमरा हृदयमे दृढ़तासँ रोकय चाहैत होथि। दहिना हाथ ऊपर उठल—असमान नखकिरणसँ मानू चन्दन टपकैत—चाँदनी रोकबाक चेष्टा। लगमे तपस्याक मित्र कमण्डलु गर्दन उठौने ठाढ़, मानू जीवन जे बाट ऊपर जा रहल छल से देखैत हो। गला सजौने कमलनालक माला चन्द्रकिरणक रस्सीसँ बान्हि हुनका परलोक लऽ जा रहल हो। हमरा देखिते कपिञ्जल “बचाउ! बचाउ!” कहि हाथ उठौलनि, दूना नोरसँ जोर-जोर कनैत हुनकर गला सँ लिपटि गेलाह। ठीक ओहि क्षण हम दुष्टा आ अभागिन ओहि श्रेष्ठ युवक केँ प्राण त्यागैत देखलहुँ। मूर्छाक अन्हार छा गेल; मानू नरकमे उतरि गेलहुँ। तखन कतए गेलहुँ, की कयलहुँ, की बजलहुँ—किछुओ नहि जानि। ईहो नहि बुझि सकलहुँ जे ओहि क्षण हमर जीवन किएक नहि निकलल—स्तब्ध हृदयक परम कठोरतासँ, हजार दुःख सहबाक अभ्यस्त अभागल शरीरक संवेदनहीनतासँ, दीर्घ शोक भोगबाक नियतिसँ, पूर्वजन्मक पापपात्र होयबासँ, दुःख देबामे क्रूर भाग्यक कुशलतासँ, अथवा शापित दुष्ट प्रेमक अद्वितीय विकृतिसँ। एतबे स्मरण अछि जे बहुत काल बाद चेतना घुरल तखन धरतीपर तड़पैत छलहुँ; असह्य शोक एना जरा रहल छल मानू आगिपर खसल होइ। ई असम्भव बात विश्वास नहि होइत छल जे ओ मरि गेलाह आ हम जीवित छी। “हाय, ई की—माय, पिता, मित्र?” कहि करुण चीत्कारसँ उठलहुँ आ पुकारलहुँ—“हे स्वामी, हमर जीवनक आधार, हमरा सँ बाजू! हमरा एकसरि आ रक्षकहीन छोड़ि निर्दयतासँ कतए जा रहल छी? तरलिकासँ पुछू, अहाँक लेल हम की सहलहुँ। हजार युग जकाँ लम्बा दिन बड़ कठिनतासँ काटलहुँ। कृपा करू! केवल एक शब्द बाजू! प्रेम करयबाली पर स्नेह देखाउ! एक बेर हमरा दिस देखू! हमर लालसा पूर्ण करू! हम अभागिन छी! निष्ठावान छी! हृदयसँ अहाँक छी! स्वामीहीन छी! युवा छी! असहाय छी! दुःखी छी! दोसर शरणसँ वञ्चित छी! कामदेवसँ पराजित छी! अहाँ दया किएक नहि करैत छी? कहू, हम की कयलहुँ वा की नहि कयलहुँ, कोन आज्ञा नहि मानलहुँ, अहाँ केँ प्रिय कोन बातमे स्नेह नहि देखौलहुँ, जाहिसँ क्रुद्ध छी? बिना कारण अपन दासी केँ छोड़ि जा रहल छी—लोकनिन्दाक भय नहि? तथापि हमरा जकाँ विकृत, दुष्ट, झूठ प्रेमक दिखावा कऽ ठकयमे निपुण स्त्रीक चिन्ता किएक करब? हाय, हम एखनहुँ जीवित छी! हाय, हम शापित आ नष्ट भऽ गेलहुँ! कारण आब ने अहाँ छी, ने सम्मान, ने कुटुम्ब, ने स्वर्ग। हमर धिक्कार—हम पापकर्मिणी, जकर कारण अहाँपर ई विपत्ति आयल। हमर जकाँ हत्यारिन हृदय केकरो नहि, जे अहाँ जकाँ अनुपम पुरुष केँ छोड़ि घर घुरि गेलीह। हमरा लेल घर, माय, पिता, कुटुम्ब, सेवकक की मूल्य छल? हाय, आब कोन शरण जाउ? हे भाग्य, हमरा पर दया करू! प्रार्थना करैत छी। हे नियतिदेवी, दयाक वरदान दिअ! करुणा देखाउ! स्वामीहीन स्त्रीक रक्षा करू! हे वनदेवीसभ, कृपा करू! हुनकर जीवन घुरा दिअ! हे पृथ्वी, सभकेँ उपकार देनिहारि, सहायता करू! हे राति, अहाँक भीतर दया नहि? हे पिता कैलास, अहाँक शरण माँगैत छी; अपन स्वाभाविक करुणा देखाउ!” जतेक स्मरण अछि, एहन विलाप कयलहुँ। प्रेतग्रस्त, आविष्ट, पागल अथवा दुष्ट आत्मासँ आहत व्यक्ति जकाँ असम्बद्ध बड़बड़ाइत रहलहुँ। धारासँ खसैत नोरमे मानू जल बनि गेलहुँ, पघिलि गेलहुँ, जलक रूप धारण कयलहुँ। दाँतक तीक्ष्ण किरणसँ पाछाँ-पाछाँ अबैत विलाप मानू नोरक बौछारसंग खसैत छल। निरन्तर झरैत फूलबला केश सेहो नोरक बून बहबैत बुझाइत; आभूषण अपन निर्मल रत्नज्योतिक नोरसँ विलाप करैत लगैत। हुनकर जीवन जकाँ अपन मृत्यु चाहलहुँ। ओ मृत होइतो सम्पूर्ण आत्मासँ हुनकर हृदयमे प्रवेश करय लेल व्याकुल छलहुँ। हाथसँ गाल, सुखायल चन्दनसँ धवल केशमूलबला कपार, कमलनाल पड़ल काँध, आ कमलपात तथा चन्दनरसक बिन्दुसँ ढँकल हृदय छुलहुँ। कोमल उलाहना देलहुँ—“पुण्डरीक, अहाँ क्रूर छी! हम एना दुःखी छी, तकर कनेको चिन्ता नहि!” फेर हुनका घुराबय चाहलहुँ। फेर आलिङ्गन, फेर गला पकड़ा जोर-जोर कानय लगलहुँ। तखन मोतीमाला केँ डाँटलहुँ—“हे दुष्टे, कम सँ कम हमर आगमन धरि हुनकर जीवन नहि बचा सकलहुँ?” फेर कपिञ्जलक पएरपर खसि प्रार्थना कयलहुँ—“स्वामी, कृपा करू; हुनका जीवित करू!” फेर तरलिकाक गला सँ लिपटि कानय लगलहुँ। आइयो सोचैत छी तँ बुझि नहि पबैत छी—हमर अभागल हृदयसँ ओ करुण कोमल शब्द कोना निकलल, जे ने पहिने सोचल, ने सीखल, ने सिखाओल, ने देखल; ओ वचन कतयसँ आयल, निराशाक हृदयविदारक चीत्कार कतयसँ? सम्पूर्ण अस्तित्व बदलि गेल छल। भीतरक नोरक प्रलयलहर उठल; रोदनक स्रोत खुलि गेल; विलापक कली फूटल; शोकक पर्वतशिखर ऊँच भेल; उन्मादक लम्बा पाँति आरम्भ भेल।’ अपन कथा कहैत ओ पुनः पूर्वक क्रूर, असह्य दशाक कड़वाहट चखय लगलीह; मूर्छा चेतना हरि लेलक। प्रबल मूर्छासँ चट्टानपर खसि पड़लीह। चन्द्रापीड सेवक जकाँ तत्क्षण हाथ बढ़ा दुःखसँ भरल हुनका थामि लेलनि। नोरसँ भीजल हुनकर अपन वृक्षछालक वस्त्रक कोरसँ हवा कऽ अन्ततः चेतना घुरौलनि। करुणासँ भरल, नोरमे नहायल गालसहित जीवित होइत हुनका कहलनि—‘देवी, हमर दोषसँ अहाँक दुःख फेर पहिल जकाँ ताजा भऽ गेल आ अहाँ एहि दशामे पहुँचलहुँ। आब ई कथा नहि। एतहि समाप्त करू। हमहूँ सुनि नहि सकैत छी। मित्रक बीतल दुःखक कथो हमरा एना पीड़ा दैत अछि मानू स्वयं भोगि रहल होइ। तेँ एतेक अमूल्य आ कठिनतासँ बचल जीवन शोकक आगिमे नहि राखब।’ ई सुनि दीर्घ गरम निःश्वास आ नोरमे गलल आँखिसहित निराशासँ उत्तर देलनि—‘राजकुमार, ओहि भयङ्कर रातिमे सेहो ई घृणित जीवन हमरा नहि छोड़लक; आब छोड़त, ई सम्भव नहि। धन्य मृत्यु सेहो एहन अभागिन आ दुष्टासँ मुँह फेरि लैत अछि। एतेक कठोरहृदया केँ शोक कोना होयत? एहन नीच स्वभावमे ई सभ केवल ढोंग हो सकैत अछि। तथापि जे हो, ओ निर्लज्ज हृदय हमरा निर्लज्जसभक मुखिया बना देलक। जे प्रेमक सम्पूर्ण शक्ति देखि चुकल आ तकर बादो जीवित रहल—एहन वज्रकठोर मनुष्य लेल केवल कथा कहब की अर्थ रखैत अछि?’ ‘“‘अथवा एहि घटना सँ अधिक कठिन कहबाक आन की हो सकैत अछि, जकरा सुनब-बाजब असम्भव कहल जाइत अछि? ओहि वज्राघातक बाद जे चमत्कार भेल से संक्षेपमे कहब। ओ क्षीण, धुँधला कारणो कहब, जे जीवन बढ़बयबला बनल; ओकर मृगतृष्णा एना ठकैत अछि जे लगभग मृत, हमरा सँ पराया, बोझिल, आवश्यकता लेल अनुपयुक्त आ हमर देखभालक कृतघ्न ई घृणित शरीर ढोइत छी। एतबे पर्याप्त होयत। तकर बाद भाव अचानक बदलल; मृत्यु लेल दृढ़ सङ्कल्प कऽ करुण विलाप करैत तरलिकासँ कहलहुँ—“उठ, कठोरहृदया! कतेक काल रोएब? लकड़ी जमा कऽ चिता बनाउ। हम अपन जीवनस्वामीक पाछाँ जायब।”’ ‘“‘तत्क्षण चन्द्रमण्डलसँ एक दिव्य पुरुष तीव्रतासँ निकलि आकाशसँ उतरि अयलाह। मुकुटसँ लटकल अमृतफेन जकाँ श्वेत रेशमी वस्त्र पाछाँ घिसटैत पवनमे लहरा रहल छल। कानमे डोलैत उज्ज्वल रत्नक लाल चमकसँ गाल अरुण; वक्षस्थलपर विशाल मोतीक तारकागुच्छ जकाँ दीप्त हार; श्वेत रेशमक पट्टीसँ बान्हल पाग; घुँघरार केशसँ घन, मधुमाछी जकाँ श्याम माथ; कानमे खिलल कुमुदक कुण्डल; काँधपर पत्नीसबक केसरतिलकक छाप। कुमुद जकाँ श्वेत, ऊँच देह, महानताक समस्त लक्षणसँ सम्पन्न, देवतुल्य रूप। हुनकर शरीरसँ निकलैत निर्मल जल जकाँ स्वच्छ उजास मानू अन्तरिक्ष पवित्र करैत; शीतल सुगन्धित अमृतबिन्दुक वर्षा घन पाला जकाँ लेपि ठण्डक भरैत; आ गोशीर्ष चन्दनरसक प्रचुर धार छिड़कैत छल।’ ‘“‘ऐरावतक सूँड़ जकाँ बलिष्ठ बाँह आ कमलनाल जकाँ श्वेत, स्पर्शमे शीतल आङुरिसँ ओ हमर मृत स्वामी केँ उठा लेलनि। नगाड़ा जकाँ गम्भीर स्वरमे हमरा कहलनि—“पुत्री महाश्वेता, अहाँ केँ मरब नहि चाही; अहाँक हुनकासँ पुनः मिलन होयत!” पिता जकाँ कोमल ई वचन कहि पुण्डरीक केँ लऽ आकाशमे उड़ि गेलाह।’ ‘“‘अचानक घटल एहि घटनासँ भय, विस्मय आ व्याकुल उत्कण्ठा भरि गेल। मुख ऊपर उठा कपिञ्जलसँ अर्थ पुछलहुँ। मुदा ओ उत्तर बिना जल्दीसँ उठलाह। आँखि ऊपर, अचानक क्रोध, कमर कसैत चिचियौलनि—“अरे दुष्ट, हमर मित्र केँ लऽ कतए जा रहल छी?” उड़ैत पुरुषक पाछाँ तीव्र वेगसँ आकाशमे उठि गेलाह। हम देखिते रहलहुँ; सभ तारासभक बीच प्रवेश कऽ गेल। कपिञ्जलक प्रस्थान प्रियक दोसर मृत्यु जकाँ भेल; दुःख दूना, हृदय फाटि गेल। की करब नहि बुझि तरलिकासँ चिचिया पुछलहुँ—“अहाँ किछु जानैत नहि छी? कहू, एकर अर्थ की?” मुदा स्त्रीस्वभावक भय सँ ओहि दृश्यपर ओकर समस्त अंग काँपैत छल। शोकसँ अधिक प्रबल भय ओकरा वशमे कयने; हमर मृत्यु आशङ्कासँ सेहो आतंकित। उदास हृदयसँ करुण उत्तर देलक—“राजकुमारी, अभागिन हम किछु नहि जानैत छी। तथापि ई महान चमत्कार अछि। ओ पुरुष मनुष्यक देहक नहि छलाह; उड़ैत समय पिता जकाँ दयासँ अहाँ केँ सान्त्वना देलनि। एहन देवतुल्य प्राणी सपनामे सेहो ठकि नहि सकैत, सोझाँ तँ कदापि नहि। विचार करैत हुनकर झूठ बाजबाक कनेको कारण नहि देखाइत अछि। तेँ उचित अछि जे हुनकर वचन तौलि मृत्यु-इच्छा रोकू। वर्तमान दशामे ई सचमुच महान सान्त्वनाक आधार अछि। कपिञ्जलो पुण्डरीकक पाछाँ गेलाह। हुनकासँ जानि सकब जे ओ दिव्य पुरुष कतयसँ, के छथि; पुण्डरीकक मृत्यु भेला पर हुनका किएक उठाकऽ लऽ गेलाह, कतए लऽ गेलाह, आ अकल्पनीय पुनर्मिलनक आशा देलनि किएक। तकर बाद जीवन वा मृत्यु कोन चुनब, निर्णय कऽ सकब। मृत्यु ठानि लेलापर ओकरा प्राप्त करब सहज अछि; ओ काज प्रतीक्षा कऽ सकैत अछि। कपिञ्जल जीवित रहताह तँ अहाँसँ बिना भेटने निश्चय नहि रुकताह। तेँ हुनकर घुरब धरि जीवन बचाउ।” एतेक कहि पएरपर खसि पड़लीह। प्राणीमे कठिनतासँ जीत्य जा सकयबला जीवनतृष्णा, स्त्रीस्वभावक दुर्बलता, दिव्य पुरुषक वचनसँ उत्पन्न मोह आ कपिञ्जलक घुरबाक चिन्तासँ हम ओहि समय एहि योजनाकेँ सर्वोत्तम मानलहुँ आ मरल नहि। आशा की नहि करा दैत अछि?’ ‘“‘ओ राति तरलिकाक संग सरोवरतटपर बितौलहुँ। अभागिन हमरा लेल ओ प्रलयरात्रि जकाँ, हजार वर्ष धरि लम्बायल, पूर्णतः यन्त्रणा, शोक, नरक आ आगि छल। निद्राक जड़ि उखड़ि गेल; धरतीपर तड़पैत रहलहुँ। खुलल, अस्त-व्यस्त केश गालपर चिपकल—नोरसँ भीजल, धूरिसँ धूसर—मुख ढँकि देने छल। करुण रोदनसँ टूटल स्वर समाप्त, तेँ कण्ठ दुर्बल।’ ‘“‘भोरमे उठि सरोवरमे स्नान कयलहुँ। दृढ़ सङ्कल्प कऽ पुण्डरीकक प्रेममे हुनकर कमण्डलु, वृक्षछालक वस्त्र आ जपमाला धारण कयलहुँ। संसारक निरर्थकता स्पष्ट बुझि गेल छल; अपन पुण्यक अभाव देखलहुँ; भाग्यक प्रहारक उपचारहीन क्रूरता मनमे चित्रित कयलहुँ; दुःखक अनिवार्यता पर विचार; नियतिक कठोरता देखल; शोकसम्पन्न प्रेमक मार्गपर मनन; सांसारिक वस्तुक अस्थिरता सीखल; समस्त आनन्दक नश्वरता बुझल। पिता-मायक चिन्ता छोड़ल; कुटुम्ब आ सेवक त्यागल; सांसारिक सुख मनसँ निकालल; इन्द्रियसभ दृढ़तासँ वशमे कयल।’ ‘“‘हम तपस्वी-व्रत ग्रहण कऽ तीनू लोकक स्वामी आ असहायक सहायक भगवान शिवक शरण लेलहुँ। दोसर दिन कोनो प्रकारेँ हमर कथा जानि पिता माय आ कुटुम्बीसभ केँ संग लऽ अयलाह। दीर्घ काल कनैत रहलाह; प्रार्थना, उपदेश, अनेक प्रकारक कोमल वचन—सभ उपाय आ सम्पूर्ण शक्ति लगा हमरा घर लऽ जयबाक प्रयत्न कयलनि। जखन हमर सङ्कल्पक दृढ़ता बुझि गेलाह आ देखलनि जे एहि मोहसँ हमरा हटाओल नहि जा सकैत अछि, तखन आशा नहि रहितो पुत्रीस्नेह छोड़ि नहि सकलाह। हम बेर-बेर हुनका घुरबाक लेल कहलहुँ, तैयो किछु दिन रहि गेलाह। अन्ततः शोकसँ भरल, भीतरसँ हृदय दहकैत घर घुरलाह।’ ‘“‘हुनकर गेलापर केवल व्यर्थ नोर बहा अपन स्वामीप्रति कृतज्ञता देखबैत रहलहुँ। प्रेमसँ क्षीण, पापसँ भरल, लज्जाहीन, अमङ्गल, हजार शोकयन्त्रणाक घर एहि घृणित शरीर केँ अनेक तपस्यासँ सुखबैत रहलहुँ। जल, वनक कन्द-मूल आ फल मात्रपर जीवन बितौलहुँ। जपमाला फेरबाक बहाने हुनकर गुण गिनैत; दिनमे तीन बेर सरोवरमे स्नान; प्रतिदिन भगवान शिवक पूजा; आ एहि गुफामे तरलिकासंग दीर्घ शोकक कड़वाहट चखैत रहैत। हम एहन दुष्टा, अमङ्गला, निर्लज्ज, क्रूर, शीतहृदया, हत्यारिन, तुच्छ, अनुपयोगी, निष्फल, असहाय आ आनन्दहीन छी। अहाँ जकाँ उदात्त पुरुष हमरा दिस देखबाक वा हमरा सँ बाजबाक कृपा किएक करब—हम, जे ब्राह्मणहत्या जकाँ विकराल अपराध कयलहुँ?’ एतेक कहि वृक्षछालक वस्त्रक श्वेत कोरसँ मुख ढाँपि लेलनि—मानू शरद्-मेघक टुकड़ासँ चन्द्रमा ढँकल हो। नोरक अजेय धार रोकि नहि सकलीह; हिचकी छोड़ि दीर्घ काल जोर-जोर कानय लगलीह।’ ‘“आरम्भहिसँ चन्द्रापीड हुनकर रूप, लज्जा आ शिष्टता; वाणीमाधुर्य, निःस्वार्थता आ कठोर साधना; शान्ति, विनय, गरिमा आ निर्मलतासँ श्रद्धापूर्ण छलाह। मुदा आब हुनकर जीवनक कथा, जाहिमे महान चरित्र प्रकट छल, आ समर्पित आत्मासँ ओ पूर्णतः अभिभूत भऽ गेलाह; हृदयमे नव कोमलता जागल। कोमल हृदयसँ धीरे बजलाह—‘देवी, जे दुःखसँ डरैत, कृतज्ञताहीन आ सुखप्रिय होइत अछि, सैह कानय; कारण ओ प्रेमक योग्य कोनो काज नहि कऽ सकैत आ व्यर्थ नोरसँ मात्र स्नेह देखबैत अछि। मुदा अहाँ सभ किछु उचित रूपेँ कयलहुँ; प्रेमक कोन कर्तव्य अधूरा छोड़लहुँ जे कनैत छी? पुण्डरीकक लेल जन्मसँ चारू कात रहयबला प्रिय कुटुम्बीसभ केँ अपरिचित जकाँ छोड़ि देलहुँ। पएरक लग रहितो सांसारिक सुख केँ तिरस्कार कऽ घास जकाँ हलुक मानलहुँ। इन्द्रक साम्राज्यसँ अधिक समृद्ध राजवैभवक आनन्द छोड़लहुँ। स्वभावतः कमलनाल जकाँ क्षीण देह केँ भयङ्कर तपस्यासँ आरो सुखा देलहुँ। तपस्वी-व्रत ग्रहण कयलहुँ; आत्मा महान तपमे समर्पित कयलहुँ; स्त्री लेल कठिन होइतो वनमे निवास कयलहुँ। शोकसँ पराजित मनुष्य लेल जीवन त्यागब सहज अछि; मुदा भारी दुःखमे जीवन नहि फेकब अधिक महान प्रयत्न माँगैत अछि। दोसरक पाछाँ मृत्यु चुनब परम व्यर्थ; अज्ञानीक बाट; पागलपनक चपलता; अविवेकक मार्ग; उच्छृङ्खल साहस; नीच दृष्टि; पूर्ण विचारहीनताक चिह्न; मूर्खताक भूल—जे पिता, भाइ, मित्र वा पतिक मृत्युपर अपन जीवन त्यागि देल जाय। जँ जीवन स्वयं नहि छोड़ैत अछि तँ हमरा ओकरा त्यागबाक अधिकार नहि। विचार करब तँ ई जीवनत्याग केवल अपन स्वार्थ लेल होइत अछि—हम अपन असाध्य दुःख सहि नहि सकैत छी। मृतक केँ एकर कनेको लाभ नहि। एहि सँ ने ओ जीवित घुरैत, ने ओकर पुण्य बढ़ैत, ने ओकरा स्वर्ग भेटैत, ने नरकसँ उद्धार, ने फेर दर्शन, ने पुनर्मिलन। ओ अपन कर्मफलानुकूल दोसर अवस्थामे असहाय, अजेय रूपेँ लऽ जायल जाइत अछि; उलटे आत्महत्या करयबला मित्रक पापमे भागी बनैत अछि। जीवित मनुष्य जलाञ्जलि आदि द्वारा मृतक आ अपन दुनूक बहुत सहायता कऽ सकैत अछि; मरि कऽ केकरो नहि। स्मरण करू—समस्त स्त्रीक हृदय जीतनिहार उदात्त पति कामदेव शिवक अग्निमे भस्म भऽ गेलाह, तैयो हुनकर एकमात्र प्रिय पत्नी रति जीवन नहि त्यागलीह। वृष्णिवंशी शूरसेनक पुत्री कुन्ती केँ स्मरण करू; हुनकर स्वामी विद्वान पाण्डु छलाह, जिनकर आसन सहज पराजित समस्त राजाक मुकुटफूलसँ सुगन्धित, आ समस्त पृथ्वी कर दैत छल। किन्दमक शापसँ पाण्डु मरलाह, तैयो कुन्ती जीवित रहलीह। विराटनगरक युवा पुत्री उत्तरा सेहो कोमल, वीर, नव चन्द्रमा जकाँ नेत्रानन्द अभिमन्युक मृत्युपर जीवित रहलीह। धृतराष्ट्रक पुत्री दुःशला, जकर सय भाइ स्नेहसँ पालन कयने छलाह, सेहो जीवन नहि त्यागलीह, जखन सिन्धुराज जयद्रथ—सुन्दर आ शिवक वरदानसँ महान—अर्जुन द्वारा मारल गेलाह। राक्षस, देवता, दानव, तपस्वी, मनुष्य, सिद्ध आ गन्धर्वक हजारो पुत्रीक कथा अछि, जे पतिक वियोगमे जीवन बचौने रहलीह। हँ, जतए पुनर्मिलन सन्दिग्ध हो, ओतए जीवन त्यागक विचार उठि सकैत अछि; मुदा अहाँ तँ ओहि महान दिव्य पुरुषसँ पुनर्मिलनक प्रतिज्ञा सुनने छी। स्वयं अनुभव कयल बातमे सन्देह की? एहन सत्यवादी उदात्त साधुक वचनमे, जँ पैघ कारणो रहित, मिथ्या कतयसँ आबित? मृत आ जीवितक मिलन कोना सम्भव? तेँ निश्चय ओ अद्भुत पुरुष करुणासँ भरि पुण्डरीक केँ पुनर्जीवन देबाक लेल स्वर्ग लऽ गेलाह। महात्मासभक शक्ति कल्पनासँ परे होइत अछि। जीवनक अनेक रूप; नियतिक अनेक बाट; तपोनिपुण चमत्कारक योग्य; पूर्वकर्मसँ प्राप्त सामर्थ्यक अनेक स्वरूप। सूक्ष्मतासँ जतेक विचार करू, पुण्डरीक केँ लऽ जयबाक नब जीवन देबासँ भिन्न कोन कारण कल्पित भऽ सकैत अछि? ई असम्भव नहि; बहुत चलल बाट अछि। गन्धर्वराज विश्वावसु आ मेनकाक पुत्री प्रमद्वरा स्थूलकेशक आश्रममे विषधरक दंशसँ मरलीह; प्रमतिक पुत्र आ भृगुवंशी च्यवनक पौत्र युवा तपस्वी रुरु अपन आध जीवन दऽ हुनका जीवित कयलनि। अश्वमेधक घोड़ाक पाछाँ चलैत अर्जुन युद्धक अग्रभागमे अपन पुत्र बभ्रुवाहनक बाणसँ बेधल गेलाह; नागकन्या उलूपी हुनका पुनर्जीवित कयलनि। अभिमन्युक पुत्र परीक्षित अश्वत्थामाक अग्निबाणसँ भस्म भऽ जन्मकालहिमे मरि गेल छल; उत्तराक विलापसँ करुण कृष्ण अमूल्य जीवन घुरा देलनि। उज्जयिनीमे तीनू लोक द्वारा पूजित चरणबला कृष्ण ब्राह्मण सान्दीपनिक पुत्र केँ मृत्युनगरसँ आनिकऽ घुरा देलनि। अहाँक विषयमे सेहो कोनो प्रकारेँ यैह होयत। वर्तमान शोकसँ की काज सिद्ध, की लाभ? भाग्य सर्वशक्तिमान, नियति प्रबल; अपन इच्छासँ साँसो नहि लऽ सकैत छी। ओ शापित परम कठोर नियतिक चपलता अत्यन्त क्रूर। निष्कपट सुन्दर प्रेम केँ दीर्घ काल टिकय नहि देल जाइत; आनन्द स्वभावतः भङ्गुर आ अल्पजीवी, दुःख दीर्घजीवी। मनुष्य एक जन्ममे कठिनतासँ मिलैत, हजार जन्ममे अलग रहैत। अहाँ दोषरहित होइतो स्वयं केँ दोष नहि दऽ सकैत छी। जन्म-मरणक उलझल बाटमे प्रवेश करयबलाक संग एहन घटना प्रायः होइत अछि; वीर व्यक्ति विपत्ति केँ जीतैत अछि।’ एहन कोमल सान्त्वनापूर्ण वचनसँ ओ हुनका धीरज देलनि। अनिच्छा रहितो झरनासँ अञ्जलिमे आनल जलसँ मुख धोयबाक लेल तैयार कयलनि।’ ‘“तुरन्त सूर्य डूबय लगल—मानू महाश्वेताक कथा सुनि शोकसँ दिनक कर्तव्य छोड़ि रहल हो। दिन क्षीण भेल; पूर्ण फुलायल प्रियङ्गुगुच्छक पराग जकाँ लाल सूर्य चमकैत लटकल। अनेक कमलरससँ रँगल रेशम जकाँ कोमल सन्ध्याकान्ति दिशासभसँ हटि रहल छल। आकाशक नीलिमा नुकायल, तीतरक पुतली जकाँ अरुण चमकसँ रँगायल। कपोतक आँखि जकाँ भूरा सन्ध्या पृथ्वी केँ लाल आलोक दैत। तारागुच्छ परस्पर होड़ करैत चमकल। रातिक अन्हार वनमहिसि जकाँ श्याम रूपसँ तारासभक विस्तृत बाट चोरबैत गाढ़ कृष्ण होइत गेल। हरियरी गहिर अन्हारमे नुकायल तेँ वनपाँति एकठाम सघन देखाइत। रातिक ओससँ शीतल पवन गाछ-लताक जाल हिलबैत घूमैत; वनफूलक सुगन्ध ओकर बाट चिह्नित करैत। रातिक सभ पक्षी निद्रामे मौन भेला पर महाश्वेता धीरे उठलीह, सन्ध्या-वन्दना कयलनि, कमण्डलुक जलसँ पएर धोइलनि आ गरम दुःखपूर्ण निःश्वास छोड़ि वृक्षछालक शय्यापर बैसलीह। चन्द्रापीडो उठि फूल मिलल जलक अर्घ्य देलनि, सन्ध्या-वन्दना कयलनि, दोसर चट्टानपर कोमल लताडाढ़िक शय्या बनौलनि। ओहिपर विश्राम करैत महाश्वेताक कथा फेर मनमे दोहरौलनि। सोचलनि—‘ई दुष्ट कामदेवक शक्ति ने उपचार करब सहज, ने सहब। महान पुरुषो ओकर वशमे भऽ कालक क्रम नहि देखैत, अकस्मात् सभ साहस गमा जीवन सौंपि दैत छथि। तथापि कामदेवक जय हो, जकर शासन तीनू लोकमे सम्मानित!’ फेर पुछलनि—‘अहाँक दासी, वननिवासक सङ्कल्पमे सखी, शोकमे ग्रहण कयल तपस्वी-व्रतक सहभागी तरलिका कतए अछि?’ महाश्वेता उत्तर देलीह—‘आर्य, अमृतसँ उत्पन्न अप्सरावंशक जे कथा कहने छलहुँ, ओहि मे मदिरा नामक सुन्दरनयना पुत्री जन्मलीह। ओ राजा चित्ररथसँ विवाह कयलनि—ओहि राजासँ, जिनकर पादपीठ समस्त गन्धर्वक मुकुटकलिकासँ बनैत। असंख्य गुणसँ मोहित राजा हुनका प्रधान महारानीक उपाधि देलनि—चँवर, राजदण्ड, छत्र आ स्वर्णसिंहासनक चिह्नसहित; समस्त अन्तःपुर हुनकर अधीन—स्त्रीक दुर्लभतम गौरव। दुनू परस्पर पूर्ण अनुरागमे यौवनसुख भोगैत छलाह। समयपर अमूल्य पुत्री कादम्बरी जन्मलीह—अद्भुत, माता-पिताक जीवन, सम्पूर्ण गन्धर्ववंशक, बल्कि सभ जीवक प्राण। जन्महिसँ हमर बालसखी; आसन, शय्या, भोजन-पान सभ हमरा संग बाँटैत। हमर गहिरतम प्रेम हुनकामे; पूर्ण विश्वासक घर; दोसर हृदय जकाँ। संगहि नृत्य-सङ्गीत सीखलहुँ; बाल्यकालक खेलमे रोक-टोक बिना समय बीतल। हमर दुःखद कथा सँ शोकित ओ सङ्कल्प कयलनि जे जाधरि हम दुःखमे छी, कदापि पति स्वीकार नहि करतीह। सखीसबक सोझाँ शपथ लेलनि—“जँ पिता कोनो प्रकारेँ, कोनो समय, हमर इच्छाक विरुद्ध बलपूर्वक विवाह करय चाहताह, तँ उपवास, आगि, फाँसी वा विषसँ जीवन समाप्त कऽ देब।” परिचारिकासभक बेर-बेर चर्चासँ चित्ररथ स्वयं पुत्रीक दृढ़ सङ्कल्प सुनलनि। समय बीतैत पूर्ण यौवन दिस बढ़ैत देखि महान चिन्ताक शिकार भेलाह, किछुओमे आनन्द नहि रहल। एकमात्र प्रिय पुत्री होयबाक कारण किछु कहि नहि सकलाह, यद्यपि दोसर उपायो नहि देखलनि। उपयुक्त समय बुझि महारानी मदिरासँ विचार कयलनि आ प्रातःकाल क्षीरोद नामक दूत केँ हमरा लग सन्देशसहित पठौलनि—“प्रिय महाश्वेता, अहाँक दुःखद भाग्यसँ हमर हृदय पहिनहि जरल छल; आब ई नव संकट आयल। कादम्बरी केँ घुराबय लेल हम अहाँ दिस देखैत छी।” एहन सम्मानित व्यक्तिक वचनक आदर आ सखीप्रेमसँ हम तरलिका केँ क्षीरोदसंग पठौलहुँ। कादम्बरी केँ कहलियनि जे पहिनहिसँ अत्यन्त दुःखी हमरा आरो दुःख नहि दिअ; जँ हमरा जीवित देखय चाहैत छथि तँ पिताक वचन मानथि। तरलिका गेलाक बहुत समयो नहि भेल छल जे आर्य अहाँ एहि स्थानपर अयलहुँ।’ एतेक कहि मौन भेलीह।’ ‘“तखन चन्द्रमा उदित भेल। ओकर चिह्न महाश्वेताक हृदयक अनुकरण करैत छल—शोकाग्निसँ जरल, युवा तपस्वीक मृत्युक महान अपराध वहैत, दक्षक शापक दाहक पुरान गहिर दाग देखबैत; घन भस्मसँ श्वेत आ कृष्णमृगचर्मसँ आध ढँकल, शिवक घन जटाक शिरोमणि दुर्गाक बामा वक्षस्थल जकाँ। अन्ततः चन्द्रापीड महाश्वेता केँ सुतल देखलनि। चुपचाप अपन पातक शय्यापर पड़लाह। सोचैत-सोचैत निद्रा आबि गेल—वैशम्पायन, दुःखी पत्रलेखा आ राजकुमार मित्रसभ एहि समय हुनकर विषयमे की सोचि रहल होयत?’ ‘“भोरमे महाश्वेता उषाकालक उपासना कऽ अघमर्षण मन्त्र जपैत छलीह, आ चन्द्रापीड प्रातः-वन्दना पूर्ण कयने छलाह। तखन तरलिका केँ केयूरक नामक गन्धर्वयुवकसंग अबैत देखल गेल। समीप आबि ओ चन्द्रापीड केँ बहुत काल तकलीह—ई के छथि, एहि आश्चर्यमे। महाश्वेताक लग पहुँचि गहिर झुकि प्रणाम कयलक आ आदरसँ लग बैसि गेल। केयूरक दूरहिसँ माथ झुका, महाश्वेताक दृष्टिसँ बताओल कनेक दूरक चट्टानपर स्थान लेलनि। चन्द्रापीडक दुर्लभ अद्भुत सौन्दर्य देखिकऽ विस्मयसँ भरि गेलाह—जे देवता, दानव, गन्धर्व, विद्याधरक रूपक उपहास करैत आ कामदेवसँ सेहो श्रेष्ठ छल।’ ‘“पूजा समाप्त कऽ महाश्वेता तरलिकासँ पुछलनि—‘प्रिय कादम्बरी केँ नीकसँ देखलहुँ? हमर बात मानतीह?’ तरलिका आदरसँ माथ झुका अत्यन्त मधुर स्वरमे बजलीह—‘राजकुमारी, कादम्बरी केँ सभ प्रकारेँ स्वस्थ देखलहुँ आ अहाँक पूरा उपदेश कहलियनि। सुनि गाढ़ नोरक निरन्तर धार बहौलनि। हुनकर उत्तर ई वीणावादक केयूरक, जिनका ओ पठौने छथि, कहताह।’ तरलिका मौन भेला पर केयूरक बजलाह—‘राजकुमारी महाश्वेता, हमर स्वामिनी कादम्बरी गाढ़ आलिङ्गन पठबैत ई सन्देश देलीह—“तरलिका द्वारा कहल ई बात माता-पिता केँ प्रसन्न करबाक लेल अछि, हमर भावना जाँचबाक लेल, घरमे रहबाक अपराधपर सूक्ष्म उलाहना, हमर मित्रता तोड़बाक इच्छा, प्रेम करयबाली केँ छोड़बाक युक्ति, अथवा केवल क्रोध? अहाँ जानैत छी हमर हृदय जन्मजात प्रेमसँ उमड़ैत अछि। एतेक क्रूर सन्देश पठबैत लाज कोना नहि भेल? पहिने एतेक कोमल वचन बजयबाली अहाँ कठोर बात आ उलाहना केकरासँ सीखलहुँ? सुखी मनुष्य सेहो जे काज अन्तमे दुःख देत, ओहि लघु काजक सङ्कल्प विवेकमे किएक करत? फेर गहिर शोकसँ आहत हमरा जकाँ व्यक्तिक की कहब? सखीक दुःखसँ क्षीण हृदयमे आनन्दक आशा, सन्तोष, सुख वा हँसी कतए? ओ विषाक्त, निर्दयी, कठोर कामदेव हमर प्रिय सखी केँ एहन दुःखद दशामे पहुँचा देलक; ओकर इच्छा हम कोना पूर्ण करी? सूर्यास्तसँ कमलवन विधवा होइत अछि, तखन ओकर बीच रहबाक मित्रतासँ चक्रवाकी सेहो अपन स्वामीसंग मिलनसुख त्यागि दैत अछि; मनुष्य स्त्री तँ आरो अधिक। हमर सखी स्वामीक वियोगमे दिन-राति शोक करैत, मनुष्यक दर्शनसँ बचैत छथि—तखन दोसर केओ हमर हृदयमे कोना प्रवेश करत? सखी दुःखमे तपस्यासँ अपना केँ यातना दैत महान पीड़ा सहैत छथि; तकरा एतेक हलुक मानि हम अपन सुख खोजू, पति स्वीकार करू—हमरा सुख कोना भेटत? अहाँक प्रेमक कारण एहि विषयमे कन्याधर्मक विरुद्ध स्वतन्त्र जीवन अपनाकऽ अपयश स्वीकार कयलहुँ। कुलीन संस्कारक तिरस्कार, माता-पिताक आज्ञा उल्लङ्घन, लोकक चर्चाक अवहेलना, स्त्रीक जन्मजात शोभा लाज फेकि देलहुँ—कहू, एहन हम पाछाँ कोना घुरी? तेँ प्रणाम करैत छी, झुकैत छी, अहाँक चरण आलिङ्गन करैत छी; कृपा करू। अहाँ वनमे जाइत हमर जीवन संग लऽ गेलहुँ; ई निवेदन मनमे सपनामे सेहो नहि आनू।”’ एतेक कहि केयूरक मौन भेलाह। महाश्वेता दीर्घ विचार कऽ कहलनि—‘अहाँ जाउ; हम स्वयं हुनका लग जा उचित काज करब।’ केयूरक गेलापर चन्द्रापीडसँ बजलीह—‘राजकुमार, हेमकूट रमणीय, चित्ररथक राजधानी अद्भुत, किन्नरदेश विचित्र, गन्धर्वलोक सुन्दर, आ कादम्बरी उदात्त तथा उदार हृदयबाली छथि। जँ यात्रा अहाँ केँ अत्यधिक कष्टकर नहि लगय, कोनो जरूरी काज बाधित नहि हो, दुर्लभ दृश्य देखबाक जिज्ञासा हो, हमर वचनसँ उत्साह भेटय, अद्भुत दर्शन आनन्द दे, हमर निवेदन स्वीकार करबाक कृपा हो, हमरा अस्वीकार नहि करबाक योग्य मानैत हो, हमर बीच किछु मित्रता उत्पन्न भेल हो अथवा हम अहाँक अनुग्रहक पात्र छी—तँ ई प्रार्थना तिरस्कार नहि कऽ सकब। हमरा संग चलू। केवल सौन्दर्यक निधि हेमकूट नहि, हमर दोसर स्वरूप कादम्बरी केँ देखू। हुनकर ई मूर्ख सङ्कल्प दूर कऽ एक दिन विश्राम करू; दोसर भोर एतए घुरि आयब। अहाँक सहज उदार कृपादृष्टिसँ हमर शोक सहनीय भऽ गेल; दीर्घ कालसँ शोकान्ध हृदयमे दबायल कथा अहाँसँ कहि साँसक संग बाहर निकालि देलहुँ। सज्जनक उपस्थिति दुःखी हृदयकेँ सेहो आनन्द दैत अछि; अहाँ जकाँ व्यक्तिमे एहन गुण जन्मैत अछि जकर सम्पूर्ण प्रवृत्ति दोसर केँ सुखी करबाक होइत अछि।’ ‘“चन्द्रापीड उत्तर देलनि—‘देवी, पहिल दर्शनक क्षणहिसँ हम अहाँक सेवामे समर्पित छी। निःसङ्कोच अपन इच्छा आदेशक रूपमे दिअ।’ एतेक कहि हुनकर संग चलि पड़लाह।’ ‘“समयपर गन्धर्वराजधानी हेमकूट पहुँचलाह। सोनेक तोरणबला सात अन्तःप्राकार पार कऽ राजकुमार कन्यागृहक द्वार लग अयलाह। महाश्वेता केँ देखिते दूरहिसँ झुकैत, सोने छड़ी लऽ आगाँ दौड़ल द्वारपालसभक मार्गदर्शनमे भीतर प्रवेश कऽ कन्याप्रासाद देखलनि। ओ असंख्य स्त्रीसँ पूर्ण नब स्त्रीलोक जकाँ छल—मानू तीनू लोकक समस्त नारी एकठाम जुटा ई समष्टि बनौने हो। अथवा पुरुषरहित नब सृष्टि, एखन जन्म नहि लेने कन्याद्वीप, स्त्रीसभक पाँचम युग, पुरुषप्रतिक घृणासँ प्रजापति द्वारा रचल नब जाति, अनेक युग बनयबाक लेल तैयार स्त्रीनिधि। चारू दिस घेरने कन्यासौन्दर्यक लहरि अन्तरिक्ष भरैत, दिनपर अमृत छिड़कैत, जगतक दरारिसभमे कान्ति बरसैत, पन्ना जकाँ चमकैत स्थान केँ हजार चन्द्रमासँ आलोकित बना रहल छल। मानू चाँदनीमे ढालल; रत्नसभ दोसर आकाश बनौने; उज्ज्वल दृष्टिसँ सेवा; प्रत्येक भाग यौवनक क्रीड़ाक लेल; रतिक खेलक सभा; कामदेवक अभ्यासक सामग्री; प्रेम सभक प्रवेश सहज करैत; सभ किछु अनुराग, सौन्दर्य, रागक परम देवता, कामबाण; सभ किछु आश्चर्य, चमत्कार आ यौवनक कोमलता। किछु भीतर गेलापर कादम्बरीक चारू कात घूमैत कन्यासभक मधुर बातचीत सुनलनि—‘लवलिका, लवलीक खाइसभ केँ केतकीपरागसँ सजाउ। सागरिका, सुगन्धित जलक कुण्डमे रत्नचूर्ण छिड़कू। मृणालिका, कृत्रिम कमलवनक खेलौना चक्रवाक-युगल केँ केसरचूर्णसँ जड़ू। मकरिका, सुगन्धित मिश्रणमे कपूररस मिलाउ। रजनिका, अन्हार तमालपाँतिमे रत्नदीप राखू। कुमुदिका, पक्षीसँ बचाबय अनारपर मोतीक जाली चढ़ाउ। निपुणिका, रत्नक पुतलीसभक वक्षपर केसररेखा बनाउ। उत्पलिका, केलागृहक पन्नाक मण्डप सोनेक झाड़ूसँ साफ करू। केसरिका, बकुलफूलक गृहपर मदिरा छिड़कू। मालतिका, काममन्दिरक हाथीदाँतक छत केँ सिन्दूरसँ लाल करू। नलिनिका, पालतू कलहंस केँ कमलमधु पिआउ। कदलिका, पालतू मोर केँ झरना-स्नान लेल लऽ जाउ। कमलिनिका, चक्रवाकक बच्चासभ केँ कमलनालक रस दिअ। चूतलतिका, पिञ्जरामे कपोतसभ केँ आमक कोढ़ी खुआउ। पल्लविका, पालतू हरितालवर्ण कपोतसभ केँ मरिचगाछक ऊपरक पात बाँटू। लवङ्गिका, तीतरक पिञ्जरामे पीपलीक पातक टुकड़ा फेकू। मधुकरिका, फूलक आभूषण बनाउ। मयूरिका, सङ्गीतकक्षसँ किन्नरयुगल केँ विदा करू। कन्दलिका, तीतरक जोड़ी केँ क्रीड़ापर्वतक शिखरपर चढ़ाउ। हरिणिका, पिञ्जराक सुग्गा-मैना केँ पाठ पढ़ाउ।’ ‘“तखन मण्डपक मध्य कादम्बरी स्वयं देखाइ पड़लीह। चारू कात बैसल कन्यासमूहक चमकैत रत्न हुनका कल्पवृक्षक झुण्ड जकाँ बनबैत छल। नील रेशमसँ ढँकल छोट शय्यापर राखल श्वेत तकियापर दुनू बाँह मोड़ि टेक देने विश्राम करैत छलीह। चँवरवाहिनीसभ हवा करैत; डोलैत बाँहक गतिसँ मानू हुनकर विस्तृत सौन्दर्यधारामे तैराक हो—ओ धारा सम्पूर्ण पृथ्वी ढँकि देने छल, जकरा महावराहक दाँत मात्र थामने हो।’ ‘“हुनकर प्रतिबिम्ब नीचाँक रत्नजड़ित फर्शपर पड़ल तखन बुझाइत छल मानू नागसभ हुनका लऽ जा रहल हो; लगहिक देबालपर दिक्पालसभ मार्ग देखबैत हो; ऊपरक छतपर देवतासभ हुनका आकाश दिस उछालि रहल हो; खम्भासभ अपन अन्तरतम हृदयमे समेटि रहल हो; महलक दर्पण हुनका पीबि रहल हो; मण्डपमे छितरायल, छतसँ नीचाँ तकैत विद्याधर हुनका आकाश उठाबि रहल हो। चित्रक बहाना बना नुकायल सम्पूर्ण जगत हुनका देखबाक लेल जुटि चारू कात घेरने लगैत छल। हुनकर रत्नक झनकारपर नाचैत मोरसबक पाँखक सहस्र आँखि खुलल छल, तेँ मानू महल स्वयं हजार आँखि पाबि हुनका देखैत हो। सेविकासभ एकटक तकैत; दर्शनक उत्कण्ठामे मानू दिव्यदृष्टि पाबि लेने होथि।’ ‘“हुनकर सौन्दर्यपर जागैत प्रेमक छाप पड़ल छल, यद्यपि एखन केवल सम्भावनारूपमे; ओ बाल्यकाल केँ निरर्थक वस्तु जकाँ फेकि रहल छलीह।’ ‘“राजकुमार कादम्बरी केँ एहन रूपमे देखलनि। हुनकर सोझाँ केयूरक बैसल छलाह। कादम्बरी चन्द्रापीडक विषयमे पुछैत छलीह आ केयूरक हुनकर सौन्दर्यक जोरदार प्रशंसा करैत छलाह—‘ओ के छथि? ककर वंशक? नाम की? रूप आ वयस केहन? ओ की कहलनि, अहाँ की उत्तर देलहुँ? कतेक काल धरि देखलहुँ? महाश्वेताक एतेक घनिष्ठ मित्र कोना भऽ गेलाह? एतए किएक आबि रहल छथि?’” ‘“कादम्बरीक चन्द्रमासदृश मुख-सौन्दर्य देखिते राजकुमारक हृदय समुद्रक ज्वार जकाँ उठल। सोचलनि—‘सृष्टिकर्ता हमर सभ इन्द्रिय केँ आँखि किएक नहि बना देलनि? अथवा हमर आँखि कोन महान पुण्य कयने अछि, जे बिना रोक-टोक हुनका देखय पबैत अछि? ई सचमुच आश्चर्य! सृष्टिकर्ता सभ आकर्षणक घर एतहि बना देलनि। एहि अनुपम सौन्दर्यक अंगसभ कतयसँ बटोरल गेल? निश्चय ब्रह्मा जखन अपन हाथसँ कोमलतासँ हुनका गढ़ैत गम्भीर विचारक श्रममे नोर बहौलनि, ओहि नोरसँ जगतक समस्त कमल जन्मल।’” ‘“ओ एना सोचिए रहल छलाह कि हुनकर आँखि कादम्बरीक आँखिसँ भेटि गेल। ‘यैह ओ छथि जिनकर चर्चा केयूरक कयने छलाह’—ई बुझि हुनकर असाधारण सौन्दर्यक विस्मयसँ फैलल दृष्टि दीर्घ काल शान्त भावसँ हुनका पर टिकल रहल। कादम्बरीक दर्शनसँ चन्द्रापीड भ्रमित, मुदा हुनकर दृष्टिक प्रकाशसँ आलोकित, क्षणभर शिला जकाँ ठाढ़ रहलाह। राजकुमार केँ देखिते कादम्बरी रोमाञ्चित भेलीह; रत्नक झनकार भेल; ओ आध उठि गेलीह। प्रेमक कारण देह लाल भेल, मुदा बहाना जल्दी उठबाक प्रयासक बनल। कम्पन डेग रोकलक—पायलध्वनिसँ खिंचायल चारू कातक हंसपर दोष देल गेल। निःश्वाससँ वस्त्र हिलल—चँवरक हवा कारण मानल गेल। हाथ हृदयपर पड़ल, मानू भीतर प्रवेश कयने चन्द्रापीडक प्रतिमा छुबय चाहैत हो—बहाना वक्ष ढकबाक। आनन्दाश्रु खसल—कानक फूलसँ झरल पराग कारण कहल गेल। लाज स्वर रोकलक—मुखकमलक मधु लेल दौड़ैत मधुमाछीक झुण्ड दोषी ठहरल। कामबाणक पहिल स्पर्शक पीड़ासँ निःश्वास निकलल—फूलक बीच केतकीक काँटा अपराध बाँटलक। हाथ काँपल—सन्देश लऽ आयल द्वारपालिका केँ रोकबाक अभिनय। एना जखन प्रेम कादम्बरीमे प्रवेश करैत छल, मानू दोसर प्रेम हुनकासंग चन्द्रापीडक हृदयमे प्रवेश कयलक। ओ हुनकर रत्नक चमक केँ घोघट, हृदयमे प्रवेश केँ कृपा, रत्नझनकार केँ बातचीत, समस्त इन्द्रिय पर अधिकार केँ अनुग्रह, आ उज्ज्वल सौन्दर्यक स्पर्श केँ सभ अभिलाषाक पूर्णता मानलनि। एहि बीच कादम्बरी कठिनतासँ किछु डेग आगाँ बढ़लीह। दीर्घ विलम्बक बाद दर्शन लेल व्याकुल सखी महाश्वेता केँ स्नेह आ उत्कण्ठासँ आलिङ्गन कयलनि। महाश्वेता आरो दृढ़तासँ आलिङ्गन घुरा बजलीह—‘प्रिय कादम्बरी, भारतवर्षमे तारापीड नामक राजा छथि, जे प्रजाक सभ दुःख टारैत आ श्रेष्ठ घोड़ाक खुरक धारसँ चारू समुद्रपर अपन मोहर लगा चुकल छथि। ई हुनकर पुत्र चन्द्रापीड छथि। अपन शिलासदृश बाँहक आधारपर टिकल पृथ्वीमण्डलसँ अलङ्कृत, जगत-विजयक अभियानमे एहि देश धरि अयलाह। पहिल दर्शनक क्षणहिसँ बिना कोनो कारण स्वाभाविक रूपेँ हमर मित्र बनि गेलाह। सभ सम्बन्ध त्यागिसँ शीतल हमर हृदय केँ सेहो अपन दुर्लभ जन्मजात चरित्र-महिमासँ आकृष्ट कऽ लेलनि। तीक्ष्ण बुद्धिबला एहन मनुष्य दुर्लभ होइत अछि, जे एकहि संग सत्यहृदय, मित्रतामे निःस्वार्थ आ शिष्टताक पूर्ण अधीन हो। तेँ हुनका देखलापर बलजोरी एतए लऽ आयलहुँ। हम चाहलहुँ जे अहूँ ब्रह्माक शिल्पक ओ आश्चर्य देखू, जकरा हम देखलहुँ—सौन्दर्यक अनुपम स्वामी, लक्ष्मीक प्रतिस्थापक, उदात्त स्वामी पाबि पृथ्वीक आनन्द, मनुष्य द्वारा देवताक अतिक्रमण, स्त्रीक आँखिक पूर्ण फल, समस्त माधुर्यक एकमात्र सङ्गम, कुलीनताक साम्राज्य आ पुरुषसभक लेल शिष्टताक दर्पण। हुनकासँ हमर प्रिय सखीक चर्चा सेहो अनेक बेर कयने छी। तेँ पहिने नहि देखने छी ई सोचि लाज छोड़ू; अपरिचित छथि ई मानि सङ्कोच त्यागू; चरित्र अज्ञात अछि ई सन्देह फेकि दिअ; आ हुनकर संग ओहिना व्यवहार करू जेना हमर संग। ओ अहाँक मित्र, कुटुम्बी आ सेवक छथि।’ महाश्वेताक ई वचन सुनि चन्द्रापीड कादम्बरीक सोझाँ गहिर झुकलाह। ओ स्नेहसँ तिरछी दृष्टि देलीह। लम्बा आँखिक कोन दिस घुरल सुन्दर पुतलीसँ मानू थाकनिक कारण आनन्दाश्रुक धार खसल। अमृत जकाँ श्वेत मुस्कीक चाँदनी फूटल—मानू हृदय जल्दीसँ हुनका लग चलि पड़ल आ उठल धूरि हो। एक भौंह उठल—मानू हृदयप्रिय अतिथि केँ प्रत्युत्तर-प्रणाम करबाक आदेश माथ केँ दैत हो। हाथ कोमल खुलैत ओठ लग गेल; आङुरिक बीच पन्नाक अँगूठीक चमकसँ बुझाइत छल मानू ताम्बूल लेने हो। सङ्कोचसँ झुकलीह, फेर महाश्वेतासंग शय्यापर बैसलीह। सेविकासभ तुरन्त सोने पएरबला, श्वेत रेशमी आवरण चढ़ल आसन शय्याक लग राखलक; चन्द्रापीड ओहिपर बैसलाह। महाश्वेता केँ प्रसन्न करबाक लेल कादम्बरीक इच्छा बुझनिहार द्वारपालिकासभ मुनल ओठपर हाथ रखि सभ ध्वनि रोकबाक आदेश ग्रहण कयलक; चारू दिस बाँसुरी, वीणा, गीत आ मागध स्त्रीसभक ‘जय हो’क स्वर रोकि देलक। सेवक तुरन्त जल अनलक। कादम्बरी स्वयं महाश्वेताक पएर धोइलनि, अपन वस्त्रसँ सुखा फेर शय्यापर बैसलीह। कादम्बरीक योग्य सखी, जीवनसँ प्रिय आ सम्पूर्ण विश्वासक घर मदलेखा चन्द्रापीडक अनिच्छाक बावजूद हुनकर पएर धोयबाक आग्रह कयलनि। एहि बीच महाश्वेता कादम्बरीक कुशल पुछलनि; कुण्डलक प्रतिबिम्बित प्रकाशसँ चमकैत सखीक आँखिक कोन स्नेहसँ हाथसँ छुलनि; मधुमाछीसँ भरल कानक फूल ऊपर उठा देलनि; चँवरक हवासँ खुरदरा भेल केशक कुण्डल धीरे सहलौलनि। सखीप्रेमसँ कादम्बरी अपन कुशलतापर लज्जित छलीह—मानू एखनहुँ घरमे रहब अपराध हो—तथापि प्रयत्नसँ कहलीह जे सभ कुशल अछि। महाश्वेताक मुख देखबाक इच्छासँ शोकपूर्ण रहितो हुनकर आँखिक श्याम, काँपैत पुतली तिरछी दृष्टिसँ बाहर निकलल। प्रेमक पूर्ण तनल धनुषसँ चन्द्रापीडक मुख दिस एहन अजेय खिंचाव भेल जे दृष्टि हटि नहि सकल। ओहि क्षण लग ठाढ़ सखीक गालपर हुनकर प्रतिबिम्ब देखि सौतियाडाह; रोमाञ्चसँ बेधल अपन वक्षपर प्रतिबिम्ब मेटिते वियोगपीड़ा; प्रतिमासभक छाया हुनका पर पड़िते प्रतिद्वन्द्वी पत्नी जकाँ क्रोध; ओ आँखि मुनिते निराशाक शोक; आनन्दाश्रुसँ प्रतिमा ढँकिते अन्धता अनुभव कयलनि।’ ‘“क्षणभर बाद कादम्बरी ताम्बूल देबामे लागल छलीह तखन महाश्वेता कहलनि—‘प्रिय कादम्बरी, नव आगन्तुक अतिथि चन्द्रापीडक सत्कारक समय अछि; हुनका किछु ताम्बूल दिअ।’ कादम्बरी झुकल मुख फेरि धीरे, अस्पष्ट स्वरमे उत्तर देलीह—‘प्रिय सखि, हम हुनका चिन्हैत नहि छी, तेँ देबामे लाज होइत अछि। अहाँ लऽ हुनका दिअ; अहाँक कृत्य हमरा जकाँ धृष्ट नहि बुझायत।’ बहुत मनौलापर कठिनतासँ, ग्रामक कन्या जकाँ, स्वयं देबाक निर्णय कयलनि। आँखि महाश्वेताक मुखसँ हटैत नहि; अंग काँपैत; दृष्टि डोलैत; गहिर निःश्वास; कामदेवक बाणसँ स्तब्ध। ताम्बूल लऽ हाथ बढ़बैत मानू भयाकुल भऽ खसय काल किछु पकड़बाक प्रयास कऽ रहल होथि। चन्द्रापीडक बढ़ाओल हाथ स्वभावतः गुलाबी छल—मानू विजय-हाथीक फड़फड़ाइत कानसँ सिन्दूर खसि पड़ल हो। धनुषडोरीक दागसँ श्याम, आ शत्रुक लक्ष्मी केँ केश पकड़ि खिंचैत समय कनैत आँखि छुलासँ काजरक बून चिपकल जकाँ। नखक फूटैत किरणसँ आङुरिसभ मानू जल्दी ऊपर दौड़ैत, लम्बा होइत आ हँसैत; स्पर्शक इच्छामे प्रेमसँ भरि प्रवेश कयने पाँच इन्द्रियक रूपमे हाथ पाँच अतिरिक्त आङुरि उठा रहल हो। ओहि क्षण सुलभ सौन्दर्य देखबाक जिज्ञासामे मानू विरोधी भावसभ एकठाम जुटि कादम्बरी केँ घेरि लेलक। कतए हाथ जा रहल अछि, नहि देखला सँ व्यर्थ आगाँ बढ़ल; नखक किरण चन्द्रापीडक हाथ खोजबाक लेल आगाँ दौड़ैत लगल। कम्पनसँ हिलल कङ्कणक पाँतिक गुंजन आ हथेलीपर उभरैत स्वेदबिन्दु मानू कहैत छल—‘कामदेव द्वारा अर्पित एहि दासी केँ स्वीकार करू।’ मानू स्वयं केँ अर्पित करैत—‘आब ई अहाँक हाथमे अछि।’ मानू हाथ केँ सजीव बनाकऽ ताम्बूल देलनि। हाथ घुरबैत बाँहसँ खसैत कङ्कणपर ध्यान नहि गेल; स्पर्शक उत्कण्ठामे ओ कामबाणसँ बेधल हृदय जकाँ खसि पड़ल। दोसर ताम्बूल लऽ महाश्वेता केँ देलनि।’ ‘“तखन एक मैना तीव्र डेगसँ लग अयलीह—साक्षात् फूल जकाँ; पएर कमलकेसर जकाँ पीयर, चोंच चम्पकक कली जकाँ, पाँख नीलकमल-पात जकाँ। पाछाँ-पाछाँ धीमा चालबला सुग्गा आयल—पन्ना जकाँ हरियर पाँख, मूँगा जकाँ चोंच, गला पर तीन किरणबला वक्र इन्द्रधनुष। मैना क्रोधसँ बजलीह—‘राजकुमारी कादम्बरी, ई अभागल, अशिष्ट, अहङ्कारी पक्षी हमरा पाछाँ अबैत अछि; अहाँ रोकैत किएक नहि छी? जँ एकर अत्याचारक उपेक्षा करब तँ निश्चय प्राण त्यागि देब। अहाँक कमलचरणक सत्य शपथ।’ ई सुनि कादम्बरी मुस्करौलीह। कथा नहि जानि महाश्वेता मदलेखासँ पुछलनि। ओ कहलीह—‘ई मैना कालिन्दी राजकुमारी कादम्बरीक सखी अछि। राजकुमारी विधिपूर्वक एकर विवाह परिहास नामक सुग्गासँ कयने छलीह। आइ भोर एकरा कादम्बरीक ताम्बूलवाहिनी तामालिकाक संग एकान्तमे किछु पाठ करैत देखि लेलनि। तखनहिसँ ईर्ष्यासँ भरल, क्रोधक हठमे ने लग जाइत, ने बाजैत, ने छुबैत, ने देखैत। हम सभ शान्त करबाक बहुत प्रयास कयलहुँ, मुदा नहि मानैत अछि।’ चन्द्रापीडक मुखपर मुस्की पसरल। कोमल हँसीसँ बजलाह—‘गप्पक बाट यैह होइत अछि। राजसभामे सुनल जाइत; कानसँ कान सेवक आगाँ बढ़बैत; बाहरी जगत दोहरबैत; कथा पृथ्वीक अन्त धरि घूमैत; आब हमहूँ सुनि रहल छी जे ई सुग्गा परिहास राजकुमारी कादम्बरीक ताम्बूलवाहिनी पर मोहित भऽ प्रेमक दास बनि अतीत बिसरि गेल अछि। ई अशिष्ट, निर्लज्ज, पत्नी त्यागनिहार दूर जाउ—आ ओ स्त्री सेहो! मुदा राजकुमारी अपन चञ्चल सेवक केँ नहि रोकथि, ई उचित अछि? सम्भवतः हुनकर क्रूरता आरम्भहिमे प्रकट भेल, जखन बेचारी कालिन्दी केँ एहि दुष्चरित्र पक्षीक हाथ सौंपलनि। आब ओ की कऽ सकैत छथि? स्त्रीक लेल पति केँ बाँटब क्रोधक सर्वाधिक कटु कारण, दूरीक मुख्य आधार, आ परम अपमान होइत अछि। कालिन्दी बहुत धैर्यवती अछि जे एतेक शोकसँ उत्पन्न घृणामे विष, आगि अथवा उपवाससँ मरल नहि। स्त्री केँ एहि सँ अधिक तिरस्कृत किछु नहि करैत। एहन अपराधक बादो जँ मेल करय आ फेर ओकर संग रहय लेल तैयार हो, तँ ओकर धिक्कार! बहुत भेल; ओकरा निर्वासित कऽ तिरस्कारसँ बाहर फेकि दिअ! फेर के ओकरासँ बाजत, के देखत, के नाम लेत?’ हुनकर विनोदपूर्ण वचन सुनि कादम्बरीक स्त्रीसमूह हँसि उठल। परिहास ई ठट्ठा सुनि बजल—‘चतुर राजकुमार, ओ बहुत होशियार अछि। चञ्चल होइतो अहाँ वा दोसर केओ ओकरा ठकि नहि सकैत। एहन टेढ़ बातसभ बूझैत अछि; विनोदक अर्थ जानैत; राजदरबारक सम्पर्कसँ बुद्धि तीक्ष्ण भेल। ठट्ठा बन्द करू। साहसी पुरुषक चर्चाक विषय ओ नहि। कोमलभाषिणी होइतो क्रोध आ मेलक समय, कारण, सीमा, उद्देश्य आ विषय नीकसँ जानैत अछि।’ एहि बीच एक दूत आबि महाश्वेतासँ बजल—‘राजकुमारी, राजा चित्ररथ आ महारानी मदिरा अहाँक दर्शन चाहैत छथि।’ चलबाक उत्सुक महाश्वेता कादम्बरीसँ पुछलनि—‘सखि, चन्द्रापीड कतए रहथि?’ कादम्बरी भीतरहि मुस्करौलीह—ओ हजार स्त्रीक हृदयमे पहिनहि स्थान पाबि चुकल छथि—आ जोर सँ बजलीह—‘प्रिय महाश्वेता, एना किएक कहैत छी? हुनका देखलापर हम अपने ऊपर अधिकार नहि रखैत छी; महल आ सेवकपर अधिकार तँ आरो कम। जतए हुनकर आ हमर प्रिय सखीक मन प्रसन्न हो, ओतए रहथि।’ महाश्वेता उत्तर देलीह—‘तँ अहाँक महल लग राजोद्यानक क्रीड़ापर्वतपर रत्नभवनमे रहथि।’ एतेक कहि राजाक दर्शन लेल चललीह।’ ‘“महाश्वेताक प्रस्थानक बाद चन्द्रापीडो निकललाह। कादम्बरीक आदेशपर द्वारपालिकाद्वारा मनोरञ्जन लेल पठाओल कन्यासभ पाछाँ चललीह—वीणा-बाँसुरीवादिनी, गायिका, पासा आ चौपड़मे निपुण, कुशल चित्रकार आ मनोहर श्लोक पाठ करयबाली। पुरान परिचित केयूरक हुनका क्रीड़ापर्वतक रत्नमण्डप धरि लऽ गेलाह।’ ‘“हुनकर गेलापर गन्धर्वराजकुमारी सखीसब आ सेविकासभ केँ विदा कऽ केवल किछुकेँ संग लऽ महलमे गेलीह। ओतए शय्यापर खसि पड़लीह। सेविकासभ आदरसँ कनेक दूर ठाढ़ सान्त्वना देबाक प्रयत्न करैत रहलीह। अन्ततः चेतना स्थिर भेल; एकसरि रहिते लाजसँ भरि गेलीह। लज्जा डाँटलक—‘चपले, ई की आरम्भ कयलहुँ?’ आत्मसम्मान उलाहना देलक—‘गन्धर्वराजकुमारी, ई अहाँक योग्य कोना?’ सरलता उपहास कयलक—‘समय पूरा होयसँ पहिने बाल्यकाल कतए चलि गेल?’ यौवन सावधान कयलक—‘हठी कन्या, अपन कोनो उन्मत्त योजना एकसरि पूर्ण नहि करू!’ गरिमा धिक्कारलक—‘भीरु बालिका, उच्चकुलीन कन्याक बाट ई नहि।’ सदाचार दोष देलक—‘उच्छृङ्खल कन्या, ई अनुचित व्यवहार छोड़ू!’ कुलीनता चेतौलक—‘मूर्खे, प्रेम अहाँ केँ चपल बना देलक।’ स्थिरता लाज दिलौलक—‘स्वभावमे ई अस्थिरता कतयसँ?’ उदात्तता डाँटलक—‘स्वेच्छाचारिणी, अहाँ हमर अधिकारक अवहेलना कयलहुँ।’” ‘“ओ मनमे सोचलीह—‘हमर ई केहन लज्जाजनक आचरण! सभ भय फेकि अस्थिरता प्रकट कयलहुँ; मूर्खतासँ अन्हरायल। धृष्टतामे ई नहि सोचलहुँ जे ओ अपरिचित छथि; निर्लज्जतामे नहि विचारलहुँ जे ओ हमरा चञ्चल स्वभावक बुझताह। हुनकर चरित्र जाँचल नहि; मूर्खतामे नहि सोचलहुँ जे हम हुनकर दृष्टिक योग्य छी कि नहि; अनपेक्षित अस्वीकारक भय नहि; माता-पिताक डर नहि; लोकचर्चाक चिन्ता नहि। एतबे नहि—निर्दयतामे बिसरलहुँ जे महाश्वेता दुःखमे छथि; मूर्खतामे नहि देखलहुँ जे सखीसब सोझाँ ठाढ़ देखैत अछि; पूर्ण जड़तामे नहि बुझलहुँ जे पाछाँ सेवकसभ ध्यान दऽ रहल अछि। एहन मर्यादाविस्मरण गम्भीर मनुष्य सेहो देखत; फेर प्रेमक बाट जानयबाली महाश्वेता, ओकर सभ चालमे निपुण सखीसभ, आ लक्षण चिन्हयबाली दरबार-अनुभवी सेविका तँ अवश्य। अन्तःपुरक दासीसभक नजरि एहि विषयमे तीक्ष्ण होइत अछि। दुष्ट भाग्य हमरा नष्ट कऽ देलक! एहन लज्जित जीवनसँ मरब नीक। कथा सुनि पिता, माय आ गन्धर्वसभ की कहत? की करू? कोन उपाय? ई भूल कोना ढाँपू? अनियन्त्रित इन्द्रियक ई मूर्खता केकरा कहू? पाँच बाणबला कामदेवसँ जरैत कतए जाउ? महाश्वेताक दुःखमे प्रतिज्ञा कयने छलहुँ; सखीसबक सोझाँ घोषित; केयूरकक हाथ सन्देश पठौने। आब ओ छलिया चन्द्रापीड एतए कोना आनल गेल—अभागिन हम नहि जानि—क्रूर भाग्य, गर्वित प्रेम, पूर्वकर्मक दण्ड, शापित मृत्यु वा दोसर किछु। कोनो एहन शक्ति, जे पहिने ने देखल, ने जानल, ने सुनल, ने सोचल, ने कल्पित, हमरा ठकय आयल। केवल दर्शनसँ बन्धनमे बन्दिनी; इन्द्रियसभ पिञ्जरामे राखि सौंपि देलक; प्रेम दासी बना हुनका लग लऽ गेल; अनुराग विदा कऽ देलक; भावना मूल्य लऽ बेचि देलक; हृदय घरक वस्तु बना देलक। एहि निकम्मासँ हमरा कोनो सम्बन्ध नहि!’ क्षणभर एहन निश्चय कयलनि। मुदा निश्चय करते हृदयक कम्पनसँ हिलैत चन्द्रापीडक प्रतिमा उपहास कयलक—‘झूठ मर्यादामे हमरा नहि चाहैत छी तँ हम चलैत छी।’ चन्द्रापीड त्यागबाक निर्णयक क्षण विदाइ-आलिङ्गनमे चिपकल जीवन पुछलक—‘सच?’ ओहि क्षण उठल नोर बजलक—‘एक बेर साफ आँखिसँ फेर देखू, अस्वीकारक योग्य छथि कि नहि।’ कामदेव डाँटलक—‘अहाँक गर्व जीवनसंग लऽ जायब।’ फेर हृदय चन्द्रापीड दिस घुरि गेल। ध्यानक बल टूटल, प्रेमक प्रबल आक्रमणसँ अभिभूत; ओकर वशमे उठि खिड़कीसँ क्रीड़ापर्वत दिस तकय लगलीह। आनन्दाश्रुक घोघटसँ भ्रमित जकाँ आँखिसँ नहि, स्मृतिसँ हुनका देखलीह; गरम हाथसँ चित्र मलिन भऽ जायत एहि भय सँ कूचीसँ नहि, कल्पनासँ चित्र बनौलीह; रोमाञ्च बाधा देत एहि डर सँ वक्षसँ नहि, हृदयसँ आलिङ्गन देलनि; हुनकर आगमनक विलम्ब सहि नहि सकि सेवक नहि, मन केँ स्वागत लेल पठौलनि।’ ‘“एहि बीच चन्द्रापीड प्रसन्नतासँ रत्नभवनमे प्रवेश कयलनि—मानू कादम्बरीक दोसर हृदय हो। चट्टानपर कम्बल बिछल छल, दुनू छोरपर तकियाक ढेर। ओहिपर पड़लाह, पएर केयूरकक गोदिमे, आ कन्यासभ अपन निर्धारित स्थानपर चारू कात बैसलीह। व्याकुल हृदयसँ विचारमे डुबि गेलाह—‘राजकुमारी कादम्बरीक सभ पुरुषक हृदय चोरयबला ई माधुर्य जन्मजात अछि, अथवा हमरा कोनो सेवा बिना प्रसन्न कामदेव विशेष रूपेँ हमर लेल नियुक्त कयने छथि? ओ प्रेमसँ लाल, कने वक्र आँखिसँ तिरछी दृष्टि देलीह; मानू हृदयपर खसल कामदेवक फूलबाणक परागसँ आँखि ढँकल हो। हम देखलहुँ तखन रेशम जकाँ उज्ज्वल सुन्दर मुस्कीसँ लाजपूर्वक अपना केँ ढाँपलीह। हमर दृष्टिसँ लजाइ मुख फेरिते अपन गालक दर्पण हमर प्रतिमा लेल अर्पित कयलनि। शय्यापर नखसँ ओहि हठी हृदयक पहिल रेखा खिंचलीह, जे हमरा प्रवेश दऽ रहल छल। ताम्बूल अनबाक श्रमसँ भीजल काँपैत हाथ मानू गरम मुख केँ हवा करैत तमालपल्लव हो; ओकरा गुलाबी कमल बुझि मधुमाछीक झुण्ड चारू कात मँडरा रहल छल। सम्भवतः मनुष्यक स्वाभाविक शीघ्र आशा आब व्यर्थ इच्छाक समूहसँ हमरा ठकि रहल अछि; विवेकहीन यौवनक उष्णता अथवा स्वयं कामदेव मस्तिष्क घुमा रहल अछि। तेँ युवाक आँखि मोतियाबिन्दुसँ आहत जकाँ छोट चिह्नो पैघ देखैत; यौवनक आवेग जल जकाँ कनेक प्रेमक बिन्दु केँ दूर धरि पसारि दैत। उत्साहित हृदय कविक कल्पना जकाँ अपने उत्पन्न विचारक भीड़सँ भ्रमित, सभ वस्तुमे समानता खोजैत। चतुर प्रेमक हाथमे युवा भावना कूची जकाँ, किछुओ चित्रित करयसँ नहि डरैत; अचानक पाओल सौन्दर्यपर गर्वित कल्पना सभ दिशामे घुमैत। लालसा सपनामे अनुभव देखबैत। आशा मायावी छड़ी जकाँ असम्भव वस्तु सोझाँ आनैत। तँ व्यर्थ मन किएक थकाउ? जँ ई उज्ज्वलनयना सचमुच हमरा प्रति एहन भाव रखैत छथि, तँ बिना माँगने कृपालु कामदेव शीघ्र स्पष्ट कऽ देत; यैह सन्देहक निर्णायक होयत।’ अन्ततः ई निश्चय कऽ उठलाह, फेर बैसलाह, आ प्रसन्नतासँ कन्यासभक कोमल बातचीत तथा सुन्दर खेलमे सहभागी भेलाह—पासा, गीत, वीणा, मृदङ्ग, मिश्रित सङ्गीतसभा आ कोमल पद्यक मधुर पाठ। किछु विश्रामक बाद उद्यान देखय निकललाह आ क्रीड़ापर्वतक शिखरपर चढ़लाह।’ ‘“कादम्बरी हुनका देखलनि। महाश्वेताक घुरब देखबाक बहाना बना खिड़की खोलबाक आदेश देलीह—‘ओ बहुत देरी कऽ रहल छथि।’ प्रेमसँ उथल-पुथल हृदय लऽ महलक छतपर चढ़लीह। किछु सेविकासंग ओतए ठाढ़; पूर्णचन्द्र जकाँ श्वेत, सोने मूठबला छत्र धूपसँ बचबैत; फेन जकाँ निर्मल चारि चँवर हवा करैत। माथक फूलसुगन्धक लालसामे मधुमाछीसभ मँडरा दिनहूमे अन्हारक घोघट बना रहल छल—मानू चन्द्रापीडसँ मिलय जयबाक योग्य सजावट अभ्यास करैत होथि। कखनो चँवरक नोकपर टेक, कखनो छत्रक डण्डापर; कखनो तामालिकाक काँधपर हाथ; कखनो मदलेखासँ चिपकल; कखनो कन्यासभक बीच नुका तिरछी दृष्टि; कखनो घुरि पड़ल; कखनो द्वारपालिकाक छड़ीक नोकपर गाल; कखनो स्थिर हाथसँ ताजा ओठपर ताम्बूल; कखनो कन्यासभपर कमल फेकैत ओकर प्रहारसँ भागल सेविकासभक पाछाँ हँसैत किछु डेग दौड़। राजकुमार केँ देखैत आ हुनकर दृष्टि अपना पर अनुभव करैत कतेक समय बीतल, नहि बुझलनि। अन्ततः द्वारपालिका महाश्वेताक घुरब सूचित कयलक। नीचाँ उतरलि; अनिच्छा रहितो महाश्वेता केँ प्रसन्न करबाक लेल स्नान आ दैनिक कर्तव्य कयलनि।’ ‘“चन्द्रापीड नीचाँ उतरलाह, कादम्बरीक परिचारिकासभ केँ विदा कयलनि, स्नानक संस्कार कयलनि, सम्पूर्ण पर्वतपर पूजित देवताक उपासना, भोजनसहित दिनक सभ कर्तव्य क्रीड़ापर्वतपर पूर्ण कयलनि। पर्वतक सोझाँ दिस देखाइत पन्नाक आसनपर बैसलाह। ओ सुखद, कपोत जकाँ हरियर; मृगशावकक जुगालीक फेनसँ ओसाइत; बलरामक हलक भय सँ स्थिर जमुना-जल जकाँ चमकैत; कन्यासभक पएरक अलक्तकरससँ लाल; फूलधूलिसँ बालुकित; कुञ्जमे नुकायल; मोरसबक सङ्गीतगृह। अचानक देखलनि—श्वेत दीप्तिधारासँ दिन ढँकि गेल, महिमामय प्रकाश मानू कमलनालक मालासँ पी लेल गेल, पृथ्वी क्षीरसागरमे डुबि गेल, अन्तरिक्ष चन्दनरसक आँधीसँ ओसाइत, आ आकाश श्वेत चूनसँ रँगायल।’ ‘“सोचलनि—‘ई की! वनस्पतिक राजा स्वामी चन्द्रमा अचानक उदित भऽ गेलाह? अथवा सहस्र स्नान-फुहारक झरना खुलि श्वेत धार छोड़ि रहल अछि? कि पवनसँ उछलैत फेनसँ पृथ्वी धवल करयबाली स्वर्गगङ्गा जिज्ञासासँ पृथ्वीपर उतरि आयलीह?’” ‘“प्रकाशक दिशा दिस आँखि घुमौलनि। कादम्बरी केँ देखलनि; संगमे मदलेखा, आ श्वेत रेशमसँ ढँकल थारीपर मोतीक हार लऽ तरलिका। चन्द्रापीड निश्चय कयलनि जे यैह हार चाँदनी केँ मात दऽ उजासक कारण बनल अछि। मदलेखा एखन दूर छलीह, तखनहि उठि सामान्य सभ शिष्टाचारसँ स्वागत कयलनि। क्षणभर पन्नाक आसनपर विश्राम कऽ मदलेखा उठलीह, चन्दनसुगन्धसँ हुनका लेपलनि, दू श्वेत वस्त्र पहिरौलनि, मालतीफूलक मुकुट सजौलनि, फेर हार दैत बजलीह—‘राजकुमार, अहाँक अहङ्कारहीन कोमलता सभ हृदय केँ वशमे करब आवश्यक अछि। अहाँक कृपा हमरा जकाँकेँ सेहो निकट अबबाक अवसर दैत; रूपसँ सभक जीवनस्वामी; बिना अधिकारो जे कोमलता देखबैत, ओ सभकेँ प्रेमबन्धनमे बान्हैत; व्यवहारक जन्मजात मधुरता प्रत्येक मनुष्य केँ मित्र बनबैत; स्वाभाविक नम्रतासँ प्रकट गुणसभ सभकेँ साहस दैत। दोष अहाँक रूपक अछि, जे पहिल दर्शनहिमे विश्वास जगा दैत; नहि तँ एतेक गरिमावान व्यक्तिसँ बात करब अनुचित लगैत। अहाँसँ बाजब अपमान बुझाइत; आदर धृष्टताक दोष अनैत; प्रशंसा साहस देखबैत; सेवाभाव चपलता; प्रेम आत्मछल; सम्बोधन उद्दण्डता; सेवा ढिठाइ; उपहार अपमान। आरो—अहाँ हमर हृदय जीत चुकलहुँ, देबाक शेष की? अहाँ जीवनस्वामी, की अर्पित करी? उपस्थितिक महान कृपा पहिनहि देलहुँ, प्रतिदान की? दर्शनसँ जीवन सार्थक कयलहुँ, आगमनक मूल्य कोना चुकाबी? तेँ कादम्बरी एहि बहाने अपन प्रेम देखबैत छथि, गरिमा नहि। उदात्त हृदयमे ‘हमर-अहाँक’ प्रश्न नहि। प्रतिष्ठाक विचार दूर रहय। अहाँ जकाँ व्यक्तिक दासता स्वीकारो हुनकर अयोग्य नहि; स्वयं केँ अर्पित करितो ठकाइ नहि; जीवन देतियो पछताइ नहि। उदात्त हृदयक उदारता सदिखन कृपा दिस झुकल, प्रेम अस्वीकार करय नहि चाहैत; माँगनिहार देनिहारसँ कम लजैत। तथापि कादम्बरी जानैत छथि एहि विषयमे अहाँक अपराध कयने छथि। ई हार ‘शेष’ कहल जाइत अछि, कारण अमृतमन्थनमे उत्पन्न समस्त रत्नमे अन्तिम शेष ई रहि गेल छल। एहि कारण समुद्रदेव अत्यन्त मूल्यवान मानि वरुण केँ घर घुरैत समय देलनि। वरुण गन्धर्वराज केँ, आ ओ कादम्बरी केँ देलनि। कादम्बरी अहाँक रूप केँ एहि आभूषणक योग्य मानलीह—कारण चन्द्रमाक घर पृथ्वी नहि, आकाश अछि—तेँ पठौने छथि। अहाँ जकाँ व्यक्ति, जिनकर एकमात्र आभूषण उदात्त आत्मा, साधारण लोकक सम्मानित रत्न पहिरब कष्टकर बुझैत होयत; मुदा एतए कादम्बरीक स्नेह कारण अछि। लक्ष्मीसंग उत्पन्न कौस्तुभमणि विष्णु वक्षपर धारण कऽ सम्मान देखौलनि; तथापि ओ अहाँसँ महान नहि, कौस्तुभ मूल्य मे शेषसँ श्रेष्ठ नहि; आ लक्ष्मी कादम्बरीक सौन्दर्यक कनेको अनुकरण नहि कऽ सकैत छथि। सच, जँ अहाँ हुनकर प्रेम कुचलि देब तँ ओ हजार उलाहनासँ महाश्वेता केँ दुःखी करतीह आ स्वयं मरि जेतीह। तेँ महाश्वेता हारसहित तरलिका केँ पठौने छथि, आ हमरा कहलनि—“परम उदात्त राजकुमार, कादम्बरीक प्रेमक प्रथम आवेग केँ विचारोमे नहि कुचलू।”’ एतेक कहि सोने पर्वतक ढलानपर तारामण्डल जकाँ टिकैत हार हुनकर वक्षपर बान्हि देलीह। विस्मित चन्द्रापीड उत्तर देलनि—‘मदलेखा, ई की? अहाँ चतुर छी; उपहार स्वीकार करबय जानैत छी। उत्तरक अवसर नहि छोड़ि वक्तृत्वक कौशल देखौलहुँ। मुदा मूर्ख कन्या, अहाँक सोझाँ हम की, स्वीकार-अस्वीकार की? ई चर्चा वस्तुतः निरर्थक। एतेक शिष्ट देवीसभक कृपा पाबि हमरा प्रिय वा अप्रिय कोनो काजमे लगाउ। सच, एहन मनुष्य नहि जे परम शिष्ट कादम्बरीक गुणसँ अशिष्टतासँ दास नहि बनि जाय।’ कादम्बरीक विषयमे किछु बातचीतक बाद मदलेखा केँ विदा कयलनि। ओ गेलाक किछुए समय बाद चित्ररथक पुत्री सेविकासभ केँ विदा, छड़ी-छत्र-चँवरक राजचिह्न छोड़ि केवल तामालिकासंग फेर महलक छतपर चढ़लीह। मोती, रेशमी वस्त्र आ चन्दनसँ चमकैत चन्द्रापीड केँ क्रीड़ापर्वत दिस ओहिना जाइत देखलनि जेना चन्द्रमा उदयाचलपर। सभ माधुर्यसँ भरल प्रेमपूर्ण दृष्टिसँ ओ हुनकर हृदय चुरा लेलनि। अन्हारमे देखब असम्भव भेला पर छतसँ उतरीह; चन्द्रापीड पर्वतक ढलानसँ।’ ‘“तखन अमृतक स्रोत, सभ आँखिक आनन्द चन्द्रमा समेटल किरणसहित उदित भेलाह। रातिक कुमुदसभ पूजा करैत लगल; क्रोधसँ अन्हार मुखबाली दिशासभ केँ शान्त करैत; दिनकमल केँ जगा देबाक भय सँ बचैत। कलङ्कक बहाने राति केँ हृदयपर धारण कयने; उदयक लालिमामे रोहिणीक ठोकर खायल पएरसँ लागल अलक्तक वहन करैत; गाढ़ नील घोघटबला आकाशरूपी प्रेयसीक पाछाँ; महान सद्भावसँ सर्वत्र सौन्दर्य पसारैत।’ ‘“कामदेवक परम साम्राज्यक छत्र, कमलक स्वामी, रातिक हाथीदाँतक कुण्डल चन्द्रमा उदित भेल; जगत हाथीदाँतसँ मढ़ल जकाँ श्वेत। कादम्बरीक सेविकासभ द्वारा बताओल शीतल चाँदनी शिलापर चन्द्रापीड पड़लाह। मोती जकाँ धवल, ताजा चन्दनजलसँ धुआयल, निर्मल सिन्धुवारफूलसँ माला सजल, चारू कात कमलपातक बेलबूटेदार नक्काशी। महलक कमलसरोवरक तटपर; पूर्ण चाँदनीसँ मानू कुमुदसँ बनल; लहरिसँ धुआयल इँटाक सीढ़ी श्वेत; तरङ्गसँ पंखा कयल हवा। हंसयुगल सुतल, चक्रवाकयुगल वियोगक विलाप करैत। राजकुमार विश्राम करिते केयूरक आबि कहलनि राजकुमारी कादम्बरी दर्शन लेल आयल छथि। चन्द्रापीड जल्दी उठलाह, कादम्बरी केँ समीप अबैत देखलनि। किछुए सखी; सभ राजचिह्न हटायल; एकमात्र हारमे मानू नब स्वरूप; पतला शरीर शुद्धतम चन्दनरससँ श्वेत; एक कानमे कुण्डल, दोसरमे नव चन्द्रकलासदृश कोमल कमलपात; चाँदनी जकाँ निर्मल कल्पवृक्षक वस्त्र; समयानुकूल वेशमे चन्द्रोदयक साक्षात् देवी जकाँ, मदलेखाक बढ़ाओल हाथपर टेक। समीप आबि प्रेमप्रेरित माधुर्य देखौलनि, दासीसभक स्थान धरतीपर निम्नकुलीन कन्या जकाँ बैसलीह। मदलेखा बेर-बेर शिलासनपर बैसबाक अनुरोध कयलनि, मुदा चन्द्रापीडो धरतीपर मदलेखाक लग बैसलाह। सभ स्त्री बैसलापर बाजय प्रयास कयलनि—‘राजकुमारी, अहाँक दास, जे केवल दृष्टिसँ आनन्दित, ओकरा अहाँक वचनक कृपा आवश्यक नहि; एतेक पैघ अनुग्रह तँ दूर। गहिर विचार करितो अपना भीतर एहन कोनो योग्यता नहि देखैत छी जे एहि उच्च कृपाक अनुरूप हो। अहङ्कार त्यागल अहाँक ई शिष्टता परम उदात्त आ मधुर—नव दासपर एतेक अनुग्रह। सम्भवतः हमरा उपहारसँ जीतयबला रूख मनुष्य बुझैत छी। सच, धन्य ओ सेवक जकरा पर अहाँक शासन! अहाँक आदेश पाबय योग्य मानल सेवक केँ केहन महान सम्मान! मुदा शरीर कोनो मनुष्यक सेवा लेल सहज उपहार; जीवन घास जकाँ हलुक। अहाँक आगमनक स्वागत एहन उपहारसँ करबामे भक्तिभावो लाज दैत। हम एतए छी; हमर शरीर, जीवन, इन्द्रिय एतए। इनमें सँ कोनो एक स्वीकार कऽ ओकर सम्मान बढ़ाउ।’” ‘“मदलेखा मुस्करा उत्तर देलीह—‘बस करू, राजकुमार। अत्यधिक औपचारिकतासँ सखी कादम्बरी पीड़ित छथि। एना किएक बाजैत छी? बिना आरो चर्चा ओ अहाँक वचन स्वीकार करैत छथि। एतेक चाटु वचनसँ हुनका अनिश्चिततामे किएक राखैत छी?’ क्षणभर रुकि फेर पुछय लगलीह—‘राजा तारापीड केहन छथि? महारानी विलासवती? उदात्त शुकनास? उज्जयिनी केहन आ कतेक दूर? भारतवर्ष केहन? मनुष्यलोक सुखद अछि?’ एहन बातचीतमे किछु समय बितल। कादम्बरी उठलीह; चन्द्रापीड लग पड़ल केयूरक आ अपन सेविकासभ केँ बजा शयनकक्षमे गेलीह। श्वेत रेशमी चादरबला शय्या सजौलीह। चन्द्रापीड शिलापर, केयूरक पएर दबबैत, सम्पूर्ण राति क्षण जकाँ बितौलनि—कादम्बरीक विनय, सौन्दर्य, चरित्रक गहराइ; महाश्वेताक अकारण कृपा; मदलेखाक शिष्टता; सेविकासभक गरिमा; गन्धर्वलोकक महान वैभव; किम्पुरुषदेशक आकर्षण सोचैत।’ ‘“तारासभक स्वामी चन्द्रमा कादम्बरी केँ देखैत जागलासँ थाकि मानू सुतबाक लेल तटवर्ती वनमे उतरि गेलाह—ताल, तमाल, ताली, बरगद आ कन्दलाबला, मन्द हिलैत तरङ्गक शीतल हवासँ ठण्डा। प्रियक आसन्न वियोगपर शोकित स्त्रीक ज्वरयुक्त निःश्वास जकाँ चाँदनी फीकि पड़ल। कुमुदपर राति बितौने लक्ष्मी दिनकमलपर पड़लीह—मानू चन्द्रापीडक दर्शनसँ प्रेम जन्मल हो। रातिक अन्तमे महलक दीप पीयर पड़ल, मानू कन्याक कानक कमलप्रहार स्मरण कऽ वियोगमे क्षीण। लताफूलसुगन्धित प्रभाती पवन बहल; निरन्तर बाण छोड़ि थाकल कामदेवक निःश्वाससंग खेलैत। उषाक उदयसँ तारा ढँकल, भय सँ मन्दरपर्वतक घन लताकुञ्जमे शरण लेल। सूर्य उदित भेल—गोलक लाल, मानू चक्रवाकक हृदयमे राति रहबाक लालिमा शेष। चन्द्रापीड शिलासँ उठि कमलमुख धोइलनि, प्रातः-वन्दना, ताम्बूल; केयूरक केँ पठौलनि राजकुमारी जागलीह कि नहि, कतए छथि। ओ घुरि कहलनि—मन्दरप्रासादक नीचाँ आँगनक कुञ्जमे महाश्वेतासंग। गन्धर्वराजक पुत्रीक दर्शन लेल चललाह। ओतए महाश्वेता भ्रमणशील तपस्विनीसभसँ घेरल—साक्षात् प्रार्थनादेवी जकाँ; कपारपर श्वेत भस्म; जपमाला फेरैत तीव्र गतिसँ हाथ; शिवानुयायीक व्रत; खनिजरङ्गसँ भूरा वस्त्र, लाल कपड़ा, पकल नारिकेरक अरुण छाल, वा मोट श्वेत पट्टीक मेखला; श्वेत वस्त्रक पंखा; दण्ड, जटा, मृगचर्म, वृक्षछाल; पुरुष तपस्वीक चिह्न। शिव, दुर्गा, कार्तिकेय, विश्रवस, कृष्ण, अवलोकितेश्वर, अर्हत आ विरिञ्चिक पवित्र स्तुति पाठ। महाश्वेता राजाक वृद्ध कुटुम्बिनी आ अन्तःपुरक प्रमुख स्त्रीसभ केँ प्रणाम, विनम्र वचन, उठि स्वागत आ सरकण्डाक आसन दऽ सम्मान करैत छलीह।’ ‘“कादम्बरी नारदक मधुरकण्ठ पुत्रीद्वारा पाठित, सभ शुभचिह्नसँ ऊपर महाभारतश्रवणमे ध्यान देत देखाइ पड़लीह। पाछाँ बैसल किन्नरयुगल मधुमाछीक गुंजन जकाँ कोमल बाँसुरीसँ सङ्गत दैत। सोझाँ रखल दर्पणमे अपन ओठ देखैत—मधु निकलल मधुमोम जकाँ पीयर; दाँतक चाँदनीमे नहायल, भीतर ताम्बूलसँ श्याम। पालतू हंस हुनकर प्रदक्षिणा करैत—स्थिर वृत्तमे घूमैत चन्द्रमा जकाँ; वलिस्नेरियाक लालसामे सिरिसफूलक कुण्डल दिस पैघ आँखि उठा। राजकुमार लग आबि प्रणाम कऽ मञ्चपर रखल आसनपर बैसलाह। किछु काल बाद गालमे गढ्ढा बनबैत कोमल मुस्कीसँ महाश्वेताक मुख दिस देखलनि। हुनकर इच्छा तुरन्त बुझि महाश्वेता कादम्बरीसँ बजलीह—‘प्रिय सखि, चन्द्रापीड अहाँक गुणसँ ओहिना पघिलल छथि जेना चन्द्रकान्त चन्द्रमासँ; स्वयं बाजि नहि सकैत। ओ विदा चाहैत छथि, कारण पाछाँ छोड़ल दरबार, की भेल नहि जानि, दुःखमे अछि। अहाँ दुनू कतेको दूर रहब, तथापि प्रेम सूर्य-दिनकमल वा चन्द्र-कुमुदक प्रेम जकाँ प्रलय धरि टिकत। तेँ हुनका जयबाक अनुमति दिअ।’” ‘प्रिय महाश्वेता,’ कादम्बरी उत्तर देलनि, ‘हम आ हमर समस्त परिचर-वर्ग कुमारक अपन प्राण जकाँ पूर्णतः हुनकहि छी। तखन ई औपचारिकताक कोन प्रयोजन?’ ई कहि ओ गन्धर्व-कुमार सभकेँ बजौलनि आ कुमारकेँ हुनक निवास धरि पहुँचा देबाक आज्ञा देलनि। चन्द्रापीड उठि पहिने महाश्वेताकेँ, फेर कादम्बरीकेँ प्रणाम कयलनि। कादम्बरीक आँखि आ हृदय स्नेहसँ कोमल भऽ गेल छल। चन्द्रापीड कहलनि, ‘देवि, हम की कहू? अधिक वचन पर लोक विश्वास नहि करैत अछि। अपनेक सखीसभक वार्तामे हमरा स्मरण राखल जाय।’ ई कहि ओ अन्तःपुरसँ बाहर निकललनि। कादम्बरीकेँ छोड़ि सभ कन्या चन्द्रापीडक गुणक प्रति श्रद्धासँ आकृष्ट भऽ प्रजाजन जकाँ हुनका बाहरी द्वार धरि विदा करबाक लेल पाछाँ-पाछाँ गेलीह। सभक घुरला पर चन्द्रापीड कीयूरक द्वारा आनल घोड़ा पर चढ़लनि आ गन्धर्व-कुमार सभक संग हेमकूटसँ विदा भेलनि। बाट भरि भीतर-बाहर प्रत्येक वस्तुमे हुनक समस्त विचार कादम्बरी पर केन्द्रित रहल। कादम्बरीक भावमे पूर्णतः डूबल मनसँ ओ हुनका कतहु पाछाँ देखैत छलाह—निर्दय वियोगक तीव्र दुःखमे मानो ओ हुनक अन्तःकरणमे विराजमान होथि; कतहु आगाँ, मानो हुनक बाट रोकि रहल होथि; कतहु आकाशमे अंकित, मानो वियोग-विकल हृदयक उत्कट अभिलाषा हुनक मुखमण्डलकेँ स्पष्ट रूपेँ आकाश पर उकेरि देने हो; आ कतहु अपन हृदय पर साक्षात् विश्राम करैत, मानो चन्द्रापीडक अभावसँ हुनक मन आहत भऽ गेल हो। महाश्वेताक आश्रम पर पहुँचि ओ अपन शिविर देखलनि, जे इन्द्रायुधक पदचिह्नक अनुसरण करैत ओतय आबि गेल छल। गन्धर्व-कुमार सभकेँ विदा कऽ ओ अपन सैनिकसभक हर्ष, कौतूहल आ विस्मयसँ भरल प्रणामक बीच अपन निवासमे प्रवेश कयलनि। दरबारक शेष लोकसभसँ भेंट कयलाक बाद दिनक अधिकांश समय वैशम्पायन आ पत्रलेखाक संग एहि प्रकारक चर्चामे बितौलनि—‘महाश्वेता ई कहलनि, कादम्बरी ई कहलनि, मदलेखा ई कहलनि, तमालिका ई कहलनि, कीयूरक ई कहलनि।’ कादम्बरीक सौन्दर्य देखि ईर्ष्यालु भेल राजलक्ष्मी आब हुनकामे अपन आनन्द नहि पबैत छल। उज्ज्वल नेत्रबाली ओहि कन्याक निरन्तर अभिलाषामे डूबल मनसँ विचार करैत हुनक राति जागरणमे बीतल। दोसर दिन सूर्योदय पर, मन एखनो कादम्बरीमे लागल रहिते, ओ अपन मण्डपमे गेलनि आ सहसा द्वारपालक संग प्रवेश करैत कीयूरककेँ देखलनि। दूरसँ कीयूरक एना भूमि पर दण्डवत् भेल जे हुनक शिखा फर्श छूबि गेल। चन्द्रापीड ‘आबह, आबह’ कहैत पहिने तिरछी दृष्टिसँ, फेर हृदयसँ, आ अन्तमे रोमाञ्चसँ हुनक स्वागत कयलनि। तत्पश्चात् ओ स्वयं शीघ्र आगाँ बढ़ि सरल आ हार्दिक आलिङ्गन देलनि आ अपन लग बैसौलनि। मुस्कानक अमृतसँ उज्ज्वल आ उमड़ैत प्रेमसँ भरल वचनमे आदरपूर्वक पुछलनि, ‘कहह कीयूरक, देवी कादम्बरी कुशलसँ छथि? हुनक सखीसभ, परिचर-वर्ग आ देवी महाश्वेता सभ कुशल छथि?’ कुमारक गहन स्नेहसँ उपजल मुस्कान मानो ओकर स्नान, अनुलेपन आ श्रम-हरण कऽ देने हो, एहन अनुभव करैत कीयूरक विनीत भावसँ प्रणाम कऽ उत्तर देलक— ‘आब ओ कुशल छथि, कारण हमर स्वामी हुनक समाचार पुछलनि।’ तखन ओ भीजल वस्त्रमे लपेटल एकटा मोड़ल कमल-पात देखौलक। ओकर मुख कमल-तन्तुसँ बान्हल छल आ भीजल चन्दनक लेप पर कोमल कमल-तन्तुक मुहर लागल छल। ओकरा खोलि ओ कादम्बरी द्वारा पठाओल चिन्ह देखौलक—छिलका उतारल, नव पल्लवसँ घेरल, मरकत जकाँ हरियर दूधिया सुपारी; सुग्गीक गाल जकाँ पीयर पान; शिवक मस्तकक चन्द्रमाक ठोस खण्ड जकाँ कपूर; आ गाढ़ कस्तूरीक सुगन्धसँ मनोहर चन्दन-लेप। ओ कहलक, ‘देवी कादम्बरी अपन कोमल अँगुरीक किरणसँ अरुण, मस्तक छुबैत जोड़ल करसँ अपनेकेँ प्रणाम पठबैत छथि; महाश्वेता अभिवादन आ आलिङ्गन; मदलेखा प्रणाम करैत एहन नत ललाट, जाहि पर झुकल शिरोमणिक चन्द्रिका बरसि रहल अछि; कन्यासभ अपन मत्स्याकार आभूषण आ केशक माँग भूमि पर टेकैत प्रणाम; आ तरलिका अपनेक चरण-धूलि छुबैत साष्टाङ्ग दण्डवत्। महाश्वेता ई सन्देश पठौने छथि—“वास्तवमे ओ लोकनि धन्य छथि जिनकर आँखिसँ अहाँ कखनो ओझराइत नहि छी। अहाँ निकट रहैत छी तऽ अहाँक गुण हिम आ चन्द्रमा जकाँ शीतल लगैत अछि, मुदा अनुपस्थितिमे से सूर्यक किरण जकाँ दहैत अछि। सभकेँ बीतल दिनक एना चाह अछि मानो से ओहि दिन जकाँ छल जहिया भाग्य बहुत परिश्रमसँ अमृत उत्पन्न कयने छल। अहाँ बिना गन्धर्वराजक नगरी उत्सव समाप्त भेला पछाति जकाँ शिथिल पड़ल अछि। अहाँ जनैत छी जे हम सभकिछु समर्पित कऽ देने छी, तथापि हमर इच्छाक विरुद्धो हमर हृदय अहाँ सन अकारण कृपालुकेँ देखबाक आकांक्षा करैत अछि। कादम्बरी सेहो किञ्चितो स्वस्थ नहि छथि। ओ अहाँक मुस्कराइत मुखकेँ, साक्षात् कामदेव जकाँ, निरन्तर स्मरण करैत छथि। अहाँ पुनः आबि हुनका अपन किछु गुण पर गर्व करबाक अवसर दऽ सकैत छी, कारण श्रेष्ठ पुरुषक आदर अवश्य सम्मान प्रदान करैत अछि। हमरा सभ सन लोकक समाचार जनबाक कष्टकेँ क्षमा करब। अहाँक अपन उदारता हमरा सभकेँ एतेक निर्भीक भऽ निवेदन करबाक साहस दैत अछि। आ ई शेष-हार अहाँक शय्या पर छुटि गेल छल।”’ ई कहि कीयूरक अपन पट्टमे राखल हार निकाललक। महीन सूत्रक बीचसँ निकलैत लम्बा किरणक कारण से स्पष्ट चमकि रहल छल। ओ ओकरा चँवरधारिणीक हाथमे राखि देलक। ‘ई तऽ महाश्वेताक चरणमे कयल प्रणामक फल अछि जे देवी कादम्बरी अपन सेवक पर स्मरणक एतेक भारी सम्मान रखलनि,’ ई कहैत चन्द्रापीड सभ वस्तु मस्तकसँ लगा स्वीकार कयलनि। ओ हार गला मे पहिरलनि; पहिने ओकरा एहन शीतल, सुखद आ सुगन्धित लेपसँ अनुलिप्त कयल गेल, मानो कादम्बरीक गालक सौन्दर्य निचोड़ि कऽ बनाओल हो, हुनक मुस्कानक ज्योति पघिलि गेल हो, हुनक हृदय द्रवित भऽ गेल हो अथवा हुनक गुण स्पन्दित भऽ बाहर आबि रहल हो। किछु पान लऽ ओ उठलनि आ बामा बाँह कीयूरकक काँध पर राखि ठाढ़ भेलनि। नियमित आदर अर्पित करैत आनन्दित सभासदसभकेँ विदा कऽ अन्ततः अपन हाथी गन्धमादनकेँ देखबाक लेल गेलनि। ओतय किछु काल रुकि स्वयं हाथीकेँ घासक एक मुट्ठी देलनि, जे हुनक नखक किरणसँ कटल-फटल कमल-तन्तु जकाँ देखाइत छल। फेर अपन प्रिय अश्वक अस्तबल दिस बढ़लनि। बाटमे ओ कखनो एहि दिस, कखनो ओहि दिस मुख घुमा अपन अनुचर-वर्ग पर दृष्टि देलनि। द्वारपालसभ हुनक इच्छा बुझि सभकेँ पाछाँ आबयसँ रोकि देलक आ परिचर-वर्गकेँ विदा कऽ देलक, फलतः ओ केवल कीयूरकक संग अस्तबलमे प्रवेश कयलनि। अश्वपालसभ प्रणाम कऽ विदा भेल, मुदा अप्रत्याशित रूपेँ हटाओल गेलासँ भयचकित आँखिसँ देखैत रहल। कुमार इन्द्रायुधक एक दिस खसकल वस्त्र ठीक कयलनि, आँखि पर झूलि आधा बन्द करैत सिंहक केशर जकाँ कपिश अयालकेँ पाछाँ कयलनि, फेर सहज भावसँ एक पएर बान्हनक खूंटा पर रखि अस्तबलक देबालसँ टेक लगा उत्सुकतासँ पुछलनि— ‘कहह कीयूरक, हमर विदा भेलाक बाद गन्धर्व-दरबारमे की-की भेल? गन्धर्व-कन्या समय कोन काजमे बितौलनि? महाश्वेता आ मदलेखा की करैत छलथि? कोन-कोन वार्ता भेल? अहाँ सभ आ परिचर-वर्ग कोन काजमे रहलहुँ? आ हमर विषयमे किछु चर्चा भेल की?’ तखन कीयूरक सभ बात कहलक—‘सुनू कुमार। अहाँक प्रस्थानक बाद देवी कादम्बरी अपन परिचर-वर्गक संग महलक छत पर चढ़लीह। हुनक नूपुरक ध्वनि कन्या-महलमे सहस्र हृदयसँ उठैत विदाईक नगाड़ाक ताल जकाँ गूँजि रहल छल। ओ घुड़सवार दलक धूरसँ धूसर अहाँक बाट दिस एकटक देखैत रहलीह। अहाँ दृष्टिसँ ओझराइतहि ओ अपन मुख महाश्वेताक काँध पर राखि देलनि आ प्रेमवश क्षीरसागर जकाँ उज्ज्वल दृष्टिसँ अहाँक यात्राक दिशा सींचैत रहलीह। मानो ईर्ष्यालु चन्द्रमा श्वेत छत्रक रूप धरि सूर्यक स्पर्शसँ हुनक रक्षा कऽ रहल हो, ओ बहुत काल धरि ओतहि रहलीह। अन्ततः बड़ कठिनाइसँ अपना केँ ओतयसँ अलग कऽ नीचाँ अयलीह। मण्डपमे किछु क्षण विश्राम कयलाक बाद उठि ओहि प्रमोदवन दिस गेलीह जतय अहाँ रहि चुकल छलहुँ। पूजा-फूलमे गुञ्जैत भँवरासभ मानो हुनका बाट देखा रहल छल। गृह-मयूरक पुकारसँ चौंकि ओ ऊपर देखैत मयूरसभक स्वरकेँ अपन नखक वर्षा-जकाँ किरणसँ रोकि देलनि; हुनक गला मे ढील पड़ल कण्ठाभूषण डोलि रहल छल। प्रत्येक डेग पर ओ फूलसँ उज्ज्वल लता-डारि पर हाथ आ अहाँक गुण पर मन टिकबैत गेलीह। प्रमोदवन पहुँचला पर परिचर-वर्ग अनावश्यक रूपेँ हुनका बतबैत गेल—“एतय कुमार ओहि जलधारासँ धोल पाथर पर ठहरल छलाह, जकर पाइप मरकतक माछ-मुख पर समाप्त होइत अछि आ जकर लता-मण्डप फुहारसँ भीजल अछि; एतय सुगन्धित जलक सुवासमे मग्न भँवरासँ घेरल स्थानमे स्नान कयलनि; एतय पुष्प-परागसँ बालुमय पर्वतीय धाराक तट पर शिवक पूजा कयलनि; एतय चन्द्रिकाकेँ मात करैत स्फटिक-शिला पर भोजन कयलनि; आ एतय चन्दन-रसक चिह्न अंकित मोती-जकाँ शिला पर शयन कयलनि।” एहि प्रकार ओ अहाँक उपस्थितिक चिह्नसभ देखैत दिन बितौलनि। साँझ पड़ला पर महाश्वेता हुनक अनिच्छाक बावजूद ओहि स्फटिक-भवनमे भोजन तैयार करौलनि। सूर्य अस्त भेल आ चन्द्रमा उदित भेल तऽ कादम्बरी मानो चन्द्रकान्त मणि होथि, जे चाँदनीसँ पघिलि जायत, एही भयें चन्द्र-प्रतिबिम्बक प्रवेशसँ डरैत दुनू हाथ गाल पर राखि विचारमग्न भऽ किछु क्षण आँखि मूनि बैसल रहलीह। तत्पश्चात् उठि शयन-कक्ष दिस गेलीह। हुनक सुन्दर, शिथिल चालमे उठैत पएर एना भारी लगैत छल मानो उज्ज्वल नख पर पड़ल चन्द्र-प्रतिबिम्बक भार वहन कऽ रहल हो। शय्या पर पड़ितहि हुनका भीषण माथक पीड़ा आ दाहक ज्वर घेरि लेलक। राजमहलक दीप, रात्रि-विकासी कमल आ चक्रवाकक संग ओ तीव्र दुःखमे आँखि खोलने पूरी राति काटलनि। प्रभात होइतहि हमरा बजा उलाहना दैत अहाँक समाचार अनबाक आज्ञा देलनि।’ ई सुनितहि चन्द्रापीड प्रस्थान लेल अधीर भऽ पुकारलनि, ‘घोड़ा! घोड़ा!’ आ महलसँ बाहर निकलि गेलनि। अश्वपालसभ शीघ्र इन्द्रायुधकेँ सज्जित कऽ अनलक। चन्द्रापीड पत्रलेखाकेँ पाछाँ बैसा स्वयं चढ़लनि, शिविरक भार वैशम्पायन पर छोड़लनि, समस्त अनुचर-वर्गकेँ विदा कयलनि, आ दोसर अश्व पर सवार कीयूरकक संग हेमकूट दिस चलि देलनि। पहुँचि कादम्बरीक महलक द्वार पर उतरलनि, घोड़ा द्वारपालकेँ सौंपलनि, आ पत्रलेखाक संग कादम्बरीक प्रथम दर्शन लेल उत्कण्ठित भऽ भीतर प्रवेश कयलनि। आगाँ आएल एक कञ्चुकीसँ पुछलनि जे देवी कादम्बरी कतय छथि। ओ गहिर प्रणाम कऽ बतौलक जे मत्तमयूर प्रमोदवनक नीचाँ कमल-सरोवरक तट पर हिमगृहमे छथि। तखन कीयूरकक मार्गदर्शनमे कुमार स्त्री-उद्यानक भीतर किछु दूर गेलनि। कदलीवनक मरकत-जकाँ हरियर प्रतिबिम्बसँ दिन हरियर आ सूर्यक किरण घास जकाँ देखाइत छल। ओतहि ओ कादम्बरीकेँ देखलनि। एक-एक कऽ आबैत सखीसभ जखन चन्द्रापीडक आगमनक सूचना देलक, तखन कादम्बरी काँपैत दृष्टिसँ परिचर-वर्ग दिस देखि प्रत्येकसँ नाम लऽ पुछैत रहलीह, ‘सचमुच ओ आबि गेलाह? अहाँ हुनका देखने छी? एखन कतेक दूर छथि?’ दूरसँ चन्द्रापीडकेँ देखितहि हुनक आँखि क्रमशः चमकि उठल, आ ओ फूलक शय्यासँ उठि ठाढ़ भेलीह—नव पकड़ल हथिनी जकाँ जे खूँटासँ बान्हल हो, आ प्रत्येक अंग काँपि रहल हो। पुष्पशय्याक सुवाससँ सामन्त जकाँ आकृष्ट गुञ्जैत भँवरा हुनका घूँघट जकाँ घेरने छल। उत्तरीय अस्त-व्यस्त छल आ ओ चमकैत हारकेँ वक्ष पर ठीक करबाक चेष्टा करैत छलीह। बामा हाथ रत्नजटित फर्श पर राखैत ओ मानो अपन छायासँ सहारा माँगैत होथि। खसैत केशकेँ बान्हबाक परिश्रमसँ भीजल दहिना हाथसँ जल छिड़कैत ओ मानो स्वयंकेँ उपहारस्वरूप ग्रहण करैत होथि। सम्प्रदाय-तिलकक चन्दन-रस मानो भीतर प्रवेश कऽ मिलि गेल हो, एहन शीतल आनन्दाश्रु ओ बहबैत रहलीह। माला-परागसँ धूसर चिक्कन गालकेँ हर्षाश्रुक धारासँ धोइत ओ मानो व्यग्र छलीह जे प्रियतमक प्रतिबिम्ब ओतय पड़ि सकय। चन्द्रापीडक मुख पर स्थिर, तिरछी पुतलीबाली लम्बा आँखि मानो हुनका आगाँ खिंचि रहल छल; ललाटक चन्दन-चिह्नक भारसँ हुनक माथ किञ्चित् झुकल छल। चन्द्रापीड निकट आबि पहिने महाश्वेताकेँ प्रणाम कयलनि, फेर विनयपूर्वक कादम्बरीकेँ अभिवादन कयलनि। कादम्बरी हुनक प्रणामक उत्तर दऽ पुनः शय्या पर बैसलीह। द्वारपालिका रत्न-ज्योतिसँ चमकैत पएरबला स्वर्णासन अनलक, मुदा चन्द्रापीड ओकरा पएरसँ सरका भूमि पर बैसि गेलनि। तखन कीयूरक पत्रलेखाक परिचय दैत कहलक, ‘ई कुमार चन्द्रापीडक पान-पेटी राखनिहारि आ सभसँ प्रिय सखी छथि।’ कादम्बरी ओकरा देखि मनमे विचारलनि, ‘प्रजापति मनुष्य-स्त्रीसभ पर कतेक विशेष कृपा करैत छथि!’ पत्रलेखा आदरपूर्वक प्रणाम कयलक तऽ ओ ओकरा निकट आबय कहि अपन पाछाँ सटि कऽ बैसौलनि। समस्त परिचर-वर्ग कौतूहलसँ ओकरा देखैत रहल। प्रथम दर्शनहि मे पत्रलेखाक प्रति गहन स्नेहसँ भरि कादम्बरी बेर-बेर अपन कोमल हाथसँ ओकरा दुलारि छुबैत रहलीह। आगमनक समस्त शिष्टाचार शीघ्र पूरा कऽ चन्द्रापीड चित्ररथक पुत्रीक दशा ध्यानसँ देखलनि आ मनमे कहलनि, ‘निश्चय हमर हृदय जड़ अछि जे एखनो विश्वास नहि कऽ रहल अछि। रहय दिअ। तथापि हम चतुराइपूर्वक रचल वचनसँ हुनक मन पुछब।’ तखन ओ स्पष्ट कहलनि, ‘राजकुमारी, हम जनैत छी जे ई निरन्तर पीड़ा देनिहार कष्ट प्रेमक कारण अहाँ पर आएल अछि। तथापि हे कृशाङ्गि, ई अहाँकेँ ओतेक नहि सतबैत अछि जतेक हमरा सभकेँ। अपन सर्वस्व अर्पित कऽ हम अहाँकेँ पुनः स्वस्थ करऽ चाहैत छी। अहाँकेँ काँपैत देखि हमरा दया होइत अछि, आ प्रेमक पीड़ासँ धराशायी देखि हमर हृदय सेहो भूमि पर पड़ि जाइत अछि। अहाँक बाँह पातर आ आभूषण-विहीन अछि, आ ज्वरक गहन क्षीणतासँ अहाँक आँखिमे जपाकुसुम जकाँ लाल कमल बसल अछि। अहाँक पीड़ासँ समस्त परिचर-वर्ग निरन्तर कानि रहल अछि। अपन आभूषण स्वीकार करू। अपन इच्छासँ सर्वोत्तम अलंकार धारण करू; जेना भँवरा आ फूलमे नुकायल लता शोभैत अछि, तहिना अहाँकेँ शोभय चाही।’ कादम्बरी स्वभावतः नवयौवनक सरलता सँ भरल छलीह, तथापि प्रेमसँ प्राप्त ज्ञानक कारण एहि गूढ़ वचनक सम्पूर्ण आशय बुझि गेलीह। मुदा अपन अभिलाषा एहन अवस्थाधरि पहुँचि गेल अछि—ई स्वीकार करबाक साहस नहि भेल; लज्जाक आश्रय लऽ ओ मौन रहलीह। तथापि कोनो बहाना बना ओहि क्षण मुस्कानक ज्योति बिखेरलनि, मानो ओकर मधुरताक चारू कात जुटल भँवरासँ चन्द्रापीडक मुख अन्हार भऽ गेल अछि की नहि, से देखऽ चाहैत होथि। तखन मदलेखा उत्तर देलनि, ‘कुमार, हम की कहू? ई पीड़ा वर्णनसँ परे निर्दय अछि। फेर एतेक कोमल प्रकृतिक देहमे कोन वस्तु पीड़ा नहि दैत अछि? शीतल कमल-तन्तु सेहो आगि बनि जाइत अछि, चाँदनी दहैत अछि। पङ्खाक हवा सँ हुनक मनमे जे कष्ट उठैत अछि, से अहाँ देखि नहि रहल छी? केवल मनोबल हुनका जीवित रखने अछि।’ कादम्बरी मनहि-मन मदलेखाक वचनकेँ कुमारक प्रश्नक उत्तर रूपेँ स्वीकार कयलनि। मुदा चन्द्रापीड हुनक आशयक अनिश्चिततासँ संशयमे रहलनि। महाश्वेताक संग किछु काल स्नेहपूर्ण वार्ता कयलाक बाद बड़ी कठिनाइसँ स्वयंकेँ ओतयसँ अलग कऽ कादम्बरीक महल छोड़ि शिविर दिस चलि गेलनि। चन्द्रापीड घोड़ा पर चढ़ए जा रहल छलाह कि पाछाँसँ कीयूरक आबि कहलक, ‘कुमार, मदलेखा कहलनि अछि जे देवी कादम्बरी पत्रलेखाकेँ देखलाक क्षणसँ ओकरा पर मोहित छथि आ ओकरा अपना लग रखऽ चाहैत छथि। बादमे ओ घुरि आयत। हुनक सन्देश सुनि आब अहाँ निर्णय करू।’ कुमार उत्तर देलनि, ‘पत्रलेखा धन्य आ ईर्ष्याक पात्र अछि जे राजकुमारीक एहन दुर्लभ कृपा ओकरा प्राप्त भेल। ओकरा भीतर लऽ जाउ।’ ई कहि ओ शिविर दिस चलि गेलनि। शिविर पहुँचैतहि ओ अपन पिताक दरबारसँ आएल, परिचित पत्रवाहककेँ देखलनि। घोड़ा रोकि स्नेहसँ विस्तृत आँखि कऽ दूरहि सँ पुछलनि, ‘हमर पिता आ हुनक समस्त परिचर-वर्ग कुशल छथि? माता आ सम्पूर्ण अन्तःपुर कुशल अछि?’ पुरुष निकट आबि प्रणाम कऽ कहलक, ‘कुमार, अपनेक कथनक अनुरूप सभ कुशल अछि,’ आ दूटा पत्र देलक। कुमार दुनू पत्र मस्तकसँ लगा क्रमशः स्वयं खोलि पढ़लनि। पहिल पत्रमे लिखल छल—‘उज्जयिनीसँ शुभाशिष। सभ राजाक मस्तक पर मुकुट-जकाँ विराजमान चरणकमलबला महाराजाधिराज तारापीड समस्त सौभाग्यक निवास चन्द्रापीडकेँ, जकर मस्तकक शिरोमणि-ज्योति चारू दिस चमकैत अछि, माथ चूमि अभिवादन पठबैत छथि। हमर प्रजा कुशल अछि। तोरा देखने एतेक दिन किएक बीति गेल? हमर हृदय तोहर दर्शन लेल अत्यन्त उत्कण्ठित अछि। रानी आ अन्तःपुर तोहर वियोगमे क्षीण भऽ रहल अछि। अतः एहि संक्षिप्त पत्रकेँ तोहर तुरन्त प्रस्थानक कारण बुझ।’ दोसर पत्र शुकनासक छल, जाहिमे एही आशयक वचन लिखल छल। ओही क्षण वैशम्पायन सेहो निकट आबि अपन नाम आएल एही अर्थक दूटा पत्र देखौलक। चन्द्रापीड ‘पिताक आज्ञा शिरोधार्य’ कहि तुरन्त घोड़ा पर चढ़लनि आ प्रस्थानक नगाड़ा बजबौलनि। समीप विशाल दलसँ घेरल ठाढ़ सेनापति बलाहकक पुत्र मेघनादकेँ निर्देश देलनि—‘अहाँ पत्रलेखाक संग बादमे आउ। कीयूरक अवश्य ओकरा एतय धरि पहुँचा देत। ओकरहि मुखसँ देवी कादम्बरीकेँ प्रणाम सहित हमर सन्देश कहल जाय। वास्तवमे मनुष्यक स्वभाव तीनू लोकक निन्दाक योग्य अछि—अशिष्ट, स्नेहहीन आ बुझबामे कठिन। जखन मनुष्यक प्रेम सहसा परस्पर टकराइत अछि, तखन ओ सहज कोमलताक पूरा मूल्य नहि बुझैत अछि। हमर एहि प्रस्थानसँ हमर प्रेम छलपूर्ण नकली सिक्का बनि गेल, हमर निष्ठा झूठ स्वर निकालबामे कुशल भऽ गेल, आत्मसमर्पण केवल बनावटी मधुरताबला नीच कपटमे डूबि गेल, आ वचन तथा मनक भेद खुलि पड़ल। मुदा हमर चर्चा एतहि छोड़ू। देवताक सहचारिणी बनबाक योग्य राजकुमारी अयोग्य पात्र पर कृपा देखा स्वयं निन्दाक भागी भेलीह। महापुरुषक अमृतमय करुण दृष्टि जखन अनुपयुक्त स्थान पर व्यर्थ पड़ैत अछि, तखन पाछाँ लज्जाक कारण बनैत अछि। तथापि राजकुमारीक अपेक्षा महाश्वेताक कारण हमर हृदय अधिक लज्जासँ दबैत अछि। निश्चय राजकुमारी बेर-बेर हुनका दोष देतीह जे अनुचित पक्षपातसँ हमरा मे नहि रहल गुणक मिथ्या चित्र बनौलनि। हम की करू? माता-पिताक आज्ञा अधिक भारी अछि, यद्यपि से केवल हमर देहकेँ वशमे रखैत अछि। हमर हृदय तऽ हेमकूटमे निवास करबाक लालसासँ देवी कादम्बरीक नाम एक हजार जन्मक दासत्व-पत्र लिखि चुकल अछि, आ हुनक कृपा ओकरा ओहिना जकड़ने अछि जेना घना वन शिकारीकेँ। तथापि हम पिताक आज्ञासँ जा रहल छी। निश्चय एहि कारण कुख्यात चन्द्रापीड लोकक कहबी बनत। मुदा ई नहि सोचब जे चन्द्रापीड जीवित रहि राजकुमारीक चरणकमल पूजाक आनन्द फेर नहि पाबि स्थिर रहि सकत। महाश्वेताक चरणमे नत मस्तकसँ प्रदक्षिणापूर्वक प्रणाम निवेदित करब। मदलेखाकेँ कहब जे प्रणामक बाद हृदयसँ आलिङ्गन पठाओल अछि। तमालिकाकेँ प्रणाम आ कादम्बरीक समस्त परिचर-वर्गक कुशल-समाचार हमर दिससँ पुछब। धन्य हेमकूटकेँ उठाओल हाथसँ हमर नमस्कार।’ ई सन्देश दऽ ओ शिविरक भार वैशम्पायन पर छोड़लनि आ मित्रकेँ सेनाकेँ अधिक श्रम नहि दैत धीरे-धीरे चलबाक निर्देश देलनि। तत्पश्चात् अश्वदलसँ घेरल ओ प्रस्थान कयलनि। अधिकांश सैनिक युवा घोड़ा पर सवार छल, भालाक वन जकाँ शोभा धारण कयने, खुरसँ पृथ्वी फोड़ैत आ हर्षित हिनहिनाहटसँ कैलास कम्पित करैत। कादम्बरीक नव वियोगसँ हृदय रिक्त होइतहुँ चन्द्रापीड अपन काठीसँ सटल पत्रवाहकसँ उज्जयिनीक बाट पुछैत रहलनि। बाटमे वनक भीतर ओ एकटा लाल ध्वजा देखलनि। ओकर समीप दुर्गाक मन्दिर छल, जकर रक्षा एक वृद्ध द्रविड़ तपस्वी करैत छल आ ओतहि निवास करैत छल। घोड़ा सँ उतरि चन्द्रापीड मन्दिरमे प्रवेश कयलनि, आदरपूर्वक देवीकेँ प्रणाम कयलनि आ प्रदक्षिणा कऽ पुनः नमन कयलनि। स्थानक शान्तिसँ आकृष्ट भऽ ओ चारू दिस घूमैत रहलनि। एक दिस ओ क्रोधी तपस्वीकेँ देखलनि जे हुनका देखि चिचिया आ हुंकार करऽ लागल। कादम्बरीक वियोगजनित उत्कट अभिलाषासँ व्याकुल होइतहुँ ओकर दशा देखि चन्द्रापीड किछु क्षण मुस्कान रोकि नहि सकलनि। सैनिकसभ हँसैत तपस्वीसँ झगड़ा आरम्भ करऽ चाहलक, मुदा ओ हुनका सभकेँ रोकलनि। बहुत कठिनाइसँ अनेक शान्त, विनम्र वचन कहि तपस्वीकेँ शान्त कयलनि आ ओकर जन्मस्थान, जाति, विद्या, पत्नी-पुत्र, धन, आयु तथा संन्यास-व्रतक कारण पुछलनि। पुछला पर तपस्वी अपन परिचय देलक। ओ अपन अतीतक वीरता, सौन्दर्य आ सम्पत्तिक बड़बोला वर्णन करैत रहल, जाहिसँ वियोगक पीड़ामे डूबल कुमारक मन किछु देर लेल बहलि गेल। ओकर संग मैत्री स्थापित कऽ चन्द्रापीड ओकरा पान देबौलनि। सूर्यास्त भेल तऽ राजकुमारसभ समीप उपलब्ध वृक्षसभक नीचाँ पड़ाव देलक। घोड़ासभक स्वर्ण-काठी डारि पर टाँगल गेल। धरती पर लोटलासँ धूरसँ भरल अयालकेँ झटकैत घोड़ा दिन भरिक परिश्रम प्रकट करैत छल। किछु मुट्ठी घास खुआ जल पियाओल गेल, आ ताजगी अयला पर ओकरा आगाँ भूमि मे भाला गाड़ि बान्हि देल गेल। दिन भरिक यात्रासँ थाकल सैनिक पहराक व्यवस्था कऽ घोड़ासभक समीप पातक ढेरी पर प्रसन्नतासँ सुति गेल। अनेक शिविर-अग्निक प्रकाश अन्हार पी लेने छल, अतः पड़ाव दिन जकाँ उज्ज्वल देखाइत छल। अनुचरसभ इन्द्रायुध बान्हल स्थानक सोझाँ कुमारक लेल शय्या तैयार कऽ द्वारपालसभसँ देखौलक। मुदा शय्या पर पड़ितहि हुनक हृदय अशान्त भऽ उठल। पीड़ासँ अभिभूत ओ राजकुमारसभकेँ विदा कयलनि आ पाछाँ ठाढ़ विशेष प्रिय सेवकसभसँ सेहो किछु नहि कहलनि। आँखि मूनि ओ बेर-बेर मनहि-मन किम्पुरुष-देश पहुँचि जाइत छलाह। एकाग्र चित्तसँ हेमकूट स्मरण करैत छलाह। महाश्वेताक सहज कृपाक उपकार पर विचार करैत छलाह। कादम्बरीक दर्शनकेँ जीवनक परम फल मानि निरन्तर तरसैत छलाह। अहंकारविहीन, मनोहर मदलेखाक वार्ता सुनबाक इच्छा करैत छलाह। तमालिकाकेँ देखऽ चाहैत छलाह। कीयूरकक आगमनक बाट जोहैत छलाह। कल्पनामे हिमगृह देखैत छलाह। बेर-बेर दीर्घ, तापपूर्ण निःश्वास छोड़ैत छलाह। शेष-हार पर अपन कुटुम्बसँ अधिक स्नेह उँड़ेलैत छलाह। हुनका कल्पना होइत छल जे भाग्यवती पत्रलेखा हुनक पाछाँ ठाढ़ अछि। एहि प्रकार पूरी राति बिना निन्नक बीतल। प्रभातमे उठि तपस्वीक इच्छा अनुसार पर्याप्त धन दऽ ओकर कामना पूर्ण कयलनि। बाटक रमणीय स्थानसभ पर ठहरैत किछु दिनमे उज्जयिनी पहुँचलनि। हुनक आकस्मिक प्रवेशसँ नगरवासी भ्रम आ हर्षमे सहसा अतिथिक पूजा लेल उठाओल कमल-जकाँ सहस्र हाथ जोड़ि ठाढ़ भऽ गेल। पहिने समाचार देबाक लेल दौड़ैत अनुचरसभ राजाकेँ कहल जे चन्द्रापीड द्वार पर छथि। अचानक आनन्दसँ विह्वल राजा हर्षक भारसँ मन्द डेग उठबैत पुत्रक स्वागत लेल निकललाह। खसैत निष्कलंक रेशमी उत्तरीयकेँ अपना दिस खिंचैत ओ मन्दराचल जकाँ छलाह जे क्षीरसागरकेँ मथबाक लेल खिंचैत हो। आँखिसँ श्रेष्ठ मोती-जकाँ आनन्दाश्रु बरसबैत ओ कल्पवृक्ष जकाँ लगैत छलाह। हुनक चारू दिस वृद्धावस्थासँ श्वेत शिखाबला, चन्दन-लेपित, अखण्ड मलमल वस्त्र, बाजूबन्द, पगड़ी, मुकुट आ माला धारण कयने, तलवार, दण्ड, छत्र आ चँवर लऽ हजारो सामन्त चलि रहल छल; हुनक कारण पृथ्वी मानो असंख्य कैलास आ क्षीरसागर सँ समृद्ध भऽ गेल हो। दूरसँ पिताकेँ देखितहि कुमार घोड़ा सँ उतरि शिरोमणिक किरणसँ मालित मस्तक भूमि पर टेकौलनि। पिता बाँह पसारि निकट आबय कहलनि आ गाढ़ आलिङ्गनमे भरि लेलनि। उपस्थित सभ सम्माननीय व्यक्तिकेँ प्रणाम कयलाक बाद राजा हुनका विलासवतीक महल लऽ गेलाह। माता आ परिचर-वर्ग शुभ आगमनक सभ विधिसँ हुनक स्वागत कयलक। दिग्विजयक कथा पर किछु काल वार्ता कऽ ओ शुकनासकेँ देखऽ गेलनि। ओतय उचित समय धरि रहि वैशम्पायन शिविरमे कुशल अछि से बतौलनि आ मनोरमासँ भेंट कयलनि। फेर घुरि विलासवतीक महलमे मानो यन्त्रवत् स्नान आदि विधि पूर्ण कयलनि। दोसर दिन अपन महल गेलनि। चिन्तासँ उद्वेलित मनमे हुनका केवल स्वयं नहि, बल्कि अपन महल, नगरी आ सम्पूर्ण संसार कादम्बरी बिना शून्य लगल। हुनक समाचार सुनबाक उत्कण्ठामे ओ पत्रलेखाक घुरबाक एना प्रतीक्षा करऽ लगलाह मानो उत्सव, वरदान-प्राप्ति अथवा अमृतोदयक क्षण आबयबला हो। किछु दिन बाद मेघनाद पत्रलेखाक संग आयल आ ओकरा भीतर लऽ गेल। दूरसँ पत्रलेखा प्रणाम कयलक तऽ चन्द्रापीड स्नेहसँ मुस्करौलनि, आदरपूर्वक उठि ओकरा आलिङ्गन कयलनि। स्वभावतः प्रिय होइतहुँ कादम्बरीक निकटता सँ प्राप्त नव तेजक कारण आब ओ हुनका आरो प्रिय भऽ गेल छल। मेघनाद नमन कयलक तऽ कुमार अपन कोमल हाथ ओकर पीठ पर रखलनि, फेर बैसि कहलनि, ‘पत्रलेखा, कहह—महाश्वेता, मदलेखा आ देवी कादम्बरी कुशल छथि? तमालिका आ कीयूरक सहित हुनक समस्त परिचर-वर्ग कुशल अछि?’ ओ उत्तर देलक, ‘कुमार, अपनेक कथनक अनुरूप सभ कुशल छथि। देवी कादम्बरी अपन सखी आ परिचर-वर्गक संग उठाओल हाथकेँ ललाटक माला बना अपनेकेँ प्रणाम करैत छथि।’ ई सुनि कुमार राजकीय अनुचर-वर्गकेँ विदा कऽ पत्रलेखाक संग महलक भीतर गेलनि। तीव्र प्रेमसँ समाचार सुनबाक उत्कण्ठा रोकबामे असमर्थ, पीड़ित हृदयसँ ओ सभ परिचरकेँ दूर पठा भवनमे प्रवेश कयलनि। पातक मण्डपक पन्ना-जकाँ ध्वजाक नीचाँ ढलान पर सुखसँ सुतल हंसक जोड़ीकेँ चरणकमलसँ धीरे सरका देलनि। चौड़ा, लम्बा डाँठबला पातसँ छत्र बनबैत नव जपाकुसुमक शय्याक बीच बैसि पुछलनि, ‘पत्रलेखा, अपन सभ समाचार कहह। कत दिन ओतय रहलहुँ? राजकुमारी अहाँ पर कतेक कृपा देखौलनि? कोन-कोन वार्ता आ संवाद भेल? हमरा सभकेँ सभसँ अधिक के स्मरण करैत अछि आ केकर स्नेह सर्वाधिक अछि?’ एहि प्रकार पुछला पर पत्रलेखा कहलक, ‘मन लगा सभ सुनू। अहाँक प्रस्थानक बाद हम कीयूरकक संग घुरि फूलक शय्याक निकट बैसलहुँ। राजकुमारीक नित्य नव कृपा पबैत प्रसन्नतासँ ओतहि रहलहुँ। अधिक की कहू? ओहि पूरा दिन हुनक दृष्टि, देह आ हाथ हमरा पर लागल रहल; हुनक वाणी हमर नाम पर आ हृदय हमर स्नेह पर टिकल रहल। दोसर दिन हमर सहारा लऽ ओ हिमगृहसँ बाहर निकललीह। स्वेच्छासँ घुमैत परिचर-वर्गकेँ पाछाँ रहबाक आज्ञा दऽ कन्या-उद्यानमे प्रवेश कयलनि। यमुनाक तरंगसँ बनल जकाँ मरकत सीढ़ी चढ़ि एक श्वेत ग्रीष्म-भवनमे पहुँचलनि। ओतय रत्नमय खम्भासँ टेक लगा किछु काल ठाढ़ रहलीह। हृदयसँ विचार-विमर्श करैत, किछु कहबाक इच्छा रखैत, स्थिर पुतली आ निश्चल पलकसँ हमर मुख देखैत रहलीह। देखैत-देखैत मनमे निर्णय बनौलनि। मानो प्रेमक अग्निमे प्रवेश करबाक इच्छा हो, हुनक देह पसेनासँ भीजि गेल। तत्पश्चात् कम्पन एना घेरलक जे प्रत्येक अंग काँपए लागल, मानो खसि पड़बाक भय हो, आ ओ निराशासँ भरि गेलीह। ‘हम हुनक मनक भाव बुझैत छलहुँ। हुनका पर ध्यान स्थिर कऽ मुख पर आँखि टिकौने कहलहुँ जे अपन बात कहथि। मुदा अपन काँपैत अंगहि सँ मानो ओ रोकल जा रहल छलीह। एकटा पएरक अँगुरीसँ फर्श पर पाछाँ हटबाक रेखा खिंचैत ओ मानो लज्जासँ अपनहि प्रतिबिम्ब मेटा रहल होथि जे कतहु से हुनक रहस्य सुनि नहि ले। फर्श कुरेदैत कमल-जकाँ पएरसँ, जकर नूपुर झनझना उठल, ओ पालतू हंससभकेँ हटा देलनि। तपैत मुखक लेल रेशमक पट्टीसँ पङ्खा बना कानक कमल पर जुटल भँवराकेँ उड़ौलनि। दाँतसँ कटल पानक टुकड़ा मयूरकेँ घूस जकाँ देलनि। कतहु कोनो वनदेवी सुनि नहि ले—एहि भयें बेर-बेर चारू दिस देखैत, बोलबाक प्रबल इच्छा होइतहुँ लज्जा हुनक वाणी रोकि रहल छल, आ एको शब्द बाहर नहि निकलल। अत्यन्त प्रयत्नक बावजूद हुनक आवाज प्रेमाग्निमे पूर्णतः दग्ध भऽ गेल छल, निरन्तर बहैत आँसूमे बहि गेल छल, उमड़ैत दुःखसँ दबि गेल छल, कामदेवक झरैत बाणसँ टूटि गेल छल, आक्रमणकारी निःश्वाससँ निर्वासित भऽ गेल छल, हृदयमे रहैत सैकड़ो चिन्तासँ बान्हल छल, आ श्वासक सुवास चाखैत भँवरासभ ओकरा पी लेने छल; अतः वाणी बाहर आबि नहि सकल। संक्षेपमे, नत मस्तकसँ गाल छुए बिना खसैत उज्ज्वल आँसूसँ ओ अपन असंख्य दुःख गिनबाक मोती-माला बना रहल छलीह, आ स्वयं वर्षाक मूर्ति जकाँ लगैत छलीह। हुनक ओहि दशासँ लज्जा अपन पूर्ण शोभा, मर्यादा अनुपम मर्यादा, सरलता अपन वास्तविक सरलता, शिष्टता अपन श्रेष्ठ शिष्टता, भय अपन संकोच, नखरा अपन सार, निराशा अपन असली स्वरूप आ सौन्दर्य नव सौन्दर्य सीखि रहल छल। हम जखन पुछलहुँ, “राजकुमारी, ई सभक अर्थ की?” तऽ ओ लाल आँखि पोछलनि। कमल-तन्तु जकाँ कोमल बाँहसँ मण्डपक फूलक गुँथल माला पकड़लनि, मानो दुःखक अधिकतामे से बाँह हुनका मजबूतीसँ थामबाक लेल बनल हो। एकटा भौंह उठौलनि, मानो मृत्युक बाट देखैत होथि, आ लम्बा, ज्वरित निःश्वास छोड़लनि। हुनक दुःखक कारण जनबाक इच्छा सँ हम बहुत आग्रह कयलहुँ। ओ लज्जामे नखसँ खरोंचल केतकीक पंखुड़ी पर मानो अपन सन्देश लिखि रहल छलीह। बोलबाक उत्कण्ठामे नीचला ओठ हिलौलनि आ श्वास पीबैत भँवरासभकेँ मानो फुसफुसा रहल होथि। एहि प्रकार किछु समय धरि भूमि पर दृष्टि गड़ौने रहलथि। ‘अन्ततः बेर-बेर हमर मुख दिस दृष्टि उठबैत ओ भरल आँखिसँ खसैत आँसूसँ मानो प्रेमाग्निक धुआँसँ म्लान अपन वाणीकेँ पवित्र करऽ लगलीह। कम्पनमे जे विचित्र शब्द कहबाक चाह रहितहुँ बिसरि गेल छलीह, ओकरा आँसूक रूपमे बलपूर्वक मुस्कानसँ चमकैत दाँतक किरणसँ मानो फेर जोड़लनि, आ बड़ कठिनाइसँ बोलऽ लगलीह। ओ हमरा कहलनि—“पत्रलेखा, तोरा पर हमर अपार कृपाक कारण, पहिल दर्शनसँ न पिता, न माता, न महाश्वेता, न मदलेखा, एतय धरि जे प्राणो हमरा लेल तोहर समान प्रिय रहल अछि। हम नहि जानैत छी हमर हृदय सभ मित्रकेँ त्यागि केवल तोरे पर विश्वास किएक कयलक। आन केकरा लग शिकायत करब, अपन अपमान कहब अथवा दुःखक भाग देब? अपना असह्य दुःखक भार तोरा देखा हम मरि जायब। अपन प्राणक शपथ दऽ कहैत छी—अपन कथा अपन हृदय जनैत अछि, एतबे सँ हम लज्जित छी; दोसर कियो जानि जायत तऽ की दशा होयत? हम सन कन्या चाँदनी जकाँ निर्मल वंश पर कुख्यातिक दाग कोना लगाबी? पूर्वजसँ प्राप्त मान कोना नष्ट करी? पिताक आज्ञा, माताक दान आ ज्येष्ठसभक मंगलाशंसाक बिना; कोनो घोषणा, उपहार-प्रेषण अथवा चित्र-दर्शनक बिना; कन्याक योग्य मर्यादा छोड़ि चञ्चलतामे मन कोना लगाबी? असहाय भयभीत कन्या जकाँ ओ अहंकारी चन्द्रापीड हमरा माता-पिताक दोषारोपणक योग्य बना देलनि। की ई कुलीन पुरुषक आचरण अछि? की हमर भेटक फल ई अछि जे कमल-तन्तु जकाँ कोमल हमर हृदय आब कुचलि गेल? युवकसभकेँ कन्यासभक संग हलुक व्यवहार नहि करबाक चाही। प्रेमाग्नि पहिने हुनक लाज-संकोच, फेर हृदय भस्म करैत अछि; कामदेवक बाण पहिने मर्यादा, फेर प्राण भेदैत अछि। अतः दोसर जन्ममे भेट धरि तोरा विदा कहैत छी, कारण तोरा सँ प्रिय हमरा लेल कियो नहि अछि। मृत्युक संकल्प पूरा कऽ हम अपन कलंक धोयब।” ई कहि ओ मौन भऽ गेलीह। ‘हुनक कथाक वास्तविकता नहि बुझि हम दुःखी, लज्जित, भयभीत, भ्रमित आ चेतनाहीन जकाँ भऽ शपथ दैत कहलहुँ—“राजकुमारी, हम सुनऽ चाहैत छी। कुमार चन्द्रापीड की कयलनि? कोन अपराध भेल? कोन अशिष्टतासँ ओ अहाँक कमल-जकाँ कोमल, कोनो व्यक्तिसँ पीड़ित नहि करबाक योग्य हृदयकेँ दुखौलनि? ई सुनलाक बाद अहाँ हमर निर्जीव देह पर मरब।” हमर आग्रह पर ओ फेर कहऽ लगलीह—“हम कहैत छी, ध्यानसँ सुन। प्रतिदिन सपनामे ओ धूर्त दुष्ट अबैत अछि आ पिंजड़ाक सुग्गा आ सारिकाकेँ गुप्त सन्देश पहुँचाबयमे लगबैत अछि। सपनामे व्यर्थ अभिलाषासँ भ्रमित मनबला ओ हमर कर्णाभूषण पर मिलनक समय लिखि दैत अछि। उन्मत्त आशासँ भरल, अत्यन्त मधुर प्रेमपत्र पठबैत अछि, जकर अक्षर धोइ गेल रहैत अछि आ जकरा पर रंगसँ रंगल आँसूक रेखा ओकर अपन दशा प्रकट करैत अछि। अपन भावनक लालिमासँ हमर इच्छाक विरुद्ध पएर रङ्गि दैत अछि। उद्दण्ड धृष्टतामे अपन नख पर पड़ल प्रतिबिम्ब पर गर्व करैत अछि। अनधिकार निर्लज्जतासँ, उद्यानमे जखन हम असगर रहैत छी, पकड़ल जेबाक भयेसँ लगभग मृतप्राय अवस्था मे हमरा इच्छाक विरुद्ध आलिङ्गन करैत अछि। रेशमी वस्त्र डारिमे फँसि डेग रोकैत अछि, आ हमर सखी लतासभ हमरा पकड़ि ओकर हाथमे सौंपि दैत अछि। स्वभावसँ टेढ़ ओ हमर वक्ष पर चित्रित अलंकरणक माध्यमसँ स्वभावतः सरल हृदयकेँ टेढ़पनक सार सिखबैत अछि। कपटपूर्ण चाटुकारितासँ भरल ओ हमर अभिलाषाक हृदय-तरंगसँ उठल हवा जकाँ ठण्डा श्वाससँ भीजल, चमकैत गालकेँ पङ्खा करैत अछि। अपन हाथ खाली होइतहुँ नखक किरणकेँ नव जौक बालि जकाँ हमर कान पर साहसपूर्वक रखैत अछि, कारण थाकनिसँ शिथिल पकड़सँ ओकर हाथक कमल खसि गेल रहैत अछि। अपन प्रिय बकुल-फूल सींचैत जे मधुर सुवास ओ श्वासमे भरने छल, ओकर मदिरा पिबाबय लेल निर्लज्जतासँ केश पकड़ि हमरा अपना दिस खिंचैत अछि। अपन मूर्खतासँ उपहासक पात्र बनल ओ अशोक-वृक्षकेँ देबाक योग्य हमर पएरक स्पर्श अपन माथ पर माँगैत अछि। प्रेमोन्मादक चरम अवस्थामे ओ कहैत अछि—‘पत्रलेखा, कहह तऽ, एक पागलकेँ कोना अस्वीकार कयल जा सकैत अछि?’ कारण ओ इन्कारकेँ ईर्ष्याक चिह्न बुझैत अछि, गारीकेँ कोमल ठट्ठा मानैत अछि, मौनकेँ रूठब बुझैत अछि, अपन दोषक उल्लेखकेँ अपना विषयमे सोचबाक उपाय मानैत अछि, तिरस्कारकेँ प्रेमक घनिष्ठता बुझैत अछि, आ लोकनिन्दाकेँ कीर्ति मानैत अछि।” ‘हुनका ई कहैत सुनि हमर भीतर मधुर आनन्द भरि गेल। हम सोचलहुँ—“निश्चय कामदेव चन्द्रापीडक प्रति हुनक भावकेँ बहुत दूर धरि लऽ गेल छथि। जँ ई सत्य अछि तऽ कादम्बरीक रूप धारण कऽ कामदेव कुमारक प्रति अपन कोमल भाव प्रत्यक्ष रूपमे देखबैत छथि, आ हुनक सामना कुमारक जन्मजात तथा साधनासँ परिष्कृत गुणसँ भऽ रहल अछि। दिशासभ हुनक यशसँ चमकि रहल अछि; युवावस्था स्नेहक सागरक तरंग पर मोतीक वर्षा कऽ रहल अछि; तरुण उल्लास चन्द्रमा पर हुनक नाम लिखि रहल अछि; सुखद भाग्य स्वयं हुनक सौभाग्यक घोषणा कऽ रहल अछि; आ चन्द्रकलासभ जकाँ हुनक कृपा अमृत बरसा रहल अछि।” ‘आब अन्ततः मलय-पवनकेँ अपन उचित ऋतु भेटल, चन्द्रोदयकेँ पूर्ण अवसर प्राप्त भेल, वसन्तक प्रचुर पुष्पसम्पदाकेँ उपयुक्त फल भेटल, मदिराक तीक्ष्णता परिपक्व मधुर गुणमे बदलल, आ पृथ्वी पर प्रेम-युगक अवतरण स्पष्ट देखाइत अछि।’ ‘तखन हम मुस्करा स्पष्ट कहलहुँ—“जँ एहन बात अछि, राजकुमारी, तऽ क्रोध छोड़ू, शान्त होउ। कामदेवक अपराधक दण्ड कुमारकेँ नहि दऽ सकैत छी। ई नटखट चन्द्रापीडक नहि, पुष्पधन्वा कामदेवक क्रीड़ा अछि।” ‘हमरा ई कहितहि ओ उत्सुकतासँ पुछलनि—“ई कामदेव जे कियो हो, हमरा कहह जे ओ कोन-कोन रूप धारण करैत अछि?” ‘हम उत्तर देलहुँ—“ओकर रूप कोना भऽ सकैत अछि? ओ रूपहीन अग्नि अछि। बिना लपटिक ताप उत्पन्न करैत अछि, बिना धुआँक आँसू बहबैत अछि, आ बिना राखक धूरक मुख पीयर कऽ दैत अछि। एहि विशाल ब्रह्माण्डमे एहन कोनो प्राणी नहि जे ओकर बाणक शिकार नहि अछि, नहि छल अथवा नहि होयत। ओकरा सँ के नहि डरैत अछि? फूलक धनुष हाथमे लैतहि ओ सबल पुरुषकेँ सेहो बेधि दैत अछि। ‘“जखन ओ कोमल स्त्रीसभ पर अधिकार कऽ लैत अछि, तखन ओ सभ जिधर देखैत अछि, आकाश प्रियतमक सहस्र प्रतिमासँ भरि जाइत अछि। प्रियक रूप अंकित करैत अछि तऽ सम्पूर्ण पृथ्वी सेहो चित्रपट लेल छोट पड़ि जाइत अछि। अपन नायकक गुण गिनैत अछि तऽ संख्या स्वयं समाप्त भऽ जाइत अछि। प्रियतमक चर्चा सुनैत अछि तऽ वाग्देवी स्वयं अत्यन्त मौन बुझाइत छथि। अपन प्राणप्रियक संग मिलनक आनन्द पर विचार करैत अछि तऽ हृदय लेल काल स्वयं बहुत छोट भऽ जाइत अछि।” ‘ओ एहि पर किछु क्षण विचार कऽ उत्तर देलनि—“पत्रलेखा, तोहर कथन सत्य अछि; प्रेम हमरा कुमारक प्रति कोमल अनुरागमे लऽ गेल अछि। ई सभ चिह्न आ एहि सँ अधिको हमरा भीतर उपस्थित अछि। तू हमर अपन हृदय समान छह; आब कहह हम की करी? एहि विषयक हमरा कनेको अनुभव नहि अछि। फेर माता-पिताकेँ कहबाक विवशता भेल तऽ एतेक लज्जा लागत जे हमर हृदय जीवनक अपेक्षा मृत्यु चुनत।” ‘हम फेर कहलहुँ—“बस करू राजकुमारी! मृत्युकेँ अनिवार्य शर्त बना ई निरर्थक चर्चा किएक? हे सुन्दरी, अहाँ हुनका प्रसन्न करबाक प्रयास नहि कयलहुँ, तथापि कामदेव कृपासँ अहाँकेँ ई वरदान देलनि। माता-पिताकेँ कहबाक की आवश्यकता? कामदेव स्वयं माता-पिता जकाँ अहाँक व्यवस्था करैत छथि; माता जकाँ अनुमोदन करैत छथि; पिता जकाँ अहाँक दान करैत छथि; सखी जकाँ अनुराग जगबैत छथि; धात्री जकाँ कोमल वयकेँ प्रेमक रहस्य सिखबैत छथि। जे स्त्री स्वयं अपन पति चुनलक, ओकर उदाहरण हम किएक दी? जँ एहन नहि होइत तऽ धर्मशास्त्रमे स्वयंवरक विधान निरर्थक होइत। अतः राजकुमारी, निश्चिन्त होउ। मृत्युक चर्चा बस करू। अहाँक चरणकमल छुबि शपथ दैत छी—हमरा विदा दिअ। हम जेबाक लेल तैयार छी। अहाँक हृदय-प्रियकेँ अहाँ लग घुरा आनब।” ‘हमरा ई कहला पर ओ स्नेहपूर्ण दृष्टिसँ मानो हमरा पीबि लेबाक इच्छा कयलनि। रोकल रहितहुँ अनुरागक वेग बाट पाबि कामदेवक बाणसँ छिद्रित लज्जा-आवरणकेँ फोड़ि बाहर आबि गेल, जाहिसँ ओ विह्वल भऽ गेलीह। हमर वचनसँ प्रसन्न भऽ थाकनिक कारण देहसँ सटल रेशमी उत्तरीय उतारलनि, मुदा से रोमाञ्चित अंग पर अटकि झूलैत रहल। गला मे फाँसीक फन्दा जकाँ राखल चन्द्रकिरण-सदृश हार ढील कयलनि; से झूलैत कर्णाभूषणक मत्स्याकार सजावटमे उलझि गेल छल। तथापि पूरा आत्मा आनन्द-ज्वरमे तपैत रहितहुँ कन्याक स्वाभाविक सम्पदा लज्जासँ स्वयंकेँ सम्हारि ओ कहलनि—“हम तोहर अपार प्रेम जनैत छी। मुदा नव शिरीष-फूल जकाँ कोमल स्वभावबाली स्त्री, विशेषतः हमर सन कम आयुबाली, एहन साहस कोना देखाबय? वास्तवमे ओ स्त्रीसभ बहुत साहसी छथि जे स्वयं सन्देश पठबैत अथवा स्वयं सन्देश कहैत छथि। हम कम आयुबाली कन्या छी; निर्लज्ज सन्देश पठबैत लाज होइत अछि। हम की कहि सकैत छी? ‘अहाँ हमरा बहुत प्रिय छी’—ई अनावश्यक अछि। ‘हम अहाँकेँ प्रिय छी की?’—ई मूर्खतापूर्ण प्रश्न अछि। ‘अहाँक प्रति हमर प्रेम अपार अछि’—ई निर्लज्जक वचन अछि। ‘अहाँ बिना हम जीवित नहि रहि सकैत छी’—ई अनुभवक विरुद्ध अछि। ‘प्रेम हमरा जीतने अछि’—ई अपन दोषक शिकायत अछि। ‘कामदेव हमरा अहाँकेँ सौंपि देलनि’—ई निर्लज्ज आत्मसमर्पण अछि। ‘अहाँ हमर बन्दी छी’—ई लाजहीन धृष्टता अछि। ‘अहाँकेँ अवश्य आबय पड़त’—ई सौभाग्यक अहंकार अछि। ‘हम स्वयं आयब’—ई स्त्रीक दुर्बलता अछि। ‘हम पूर्णतः अहाँक समर्पित छी’—ई थोपल स्नेहक चञ्चलता अछि। ‘अस्वीकारक भयें सन्देश नहि पठबैत छी’—ई सुतल व्यक्तिकेँ जगाएब अछि। ‘तिरस्कृत सेवाक दुःखक उदाहरण हमरा बनय दिअ’—ई स्नेहक अतिरेक अछि। ‘हमर मृत्युसँ अहाँ हमर प्रेम बुझब’—एहन विचार मनमे प्रवेशो नहि करबाक चाही।”’ एहि स्थान पर बाणभट्टक निधन भऽ गेल, अतः पूर्व भाग अचानक समाप्त भऽ गेल। हुनक निर्धारित योजनाक अनुसार बादमे हुनक पुत्र भूषणभट्ट उत्तर भागमे कथा पूर्ण कयलनि। उत्तर भाग [वाणभट्टक पुत्रभूषणभट्ट रचित] एहि अपूर्ण कथाक कठिन परिश्रमकेँ पूर्ण करबाक लेल हम पृथ्वीक माता-पिता उमा आ शिवक वन्दना करैत छी। दुनू अर्धभागक मिलनसँ बनल हुनक एक देहमे ने संयोगक बिन्दु देखाइत अछि, ने विभाजनक रेखा। हम विश्वक स्रष्टा नारायणकेँ प्रणाम करैत छी, जिनका द्वारा नृसिंह-रूप सुखपूर्वक प्रकट भेल—हिलैत केशरसँ भयानक मुख आ हाथमे चक्र, खड्ग, गदा तथा शंख धारण कयने। हम अपन पिता, वाणी-पति, के प्रणाम करैत छी—ओ स्रष्टा जिनका द्वारा एहन कथा रचल गेल जकर निर्माण आन कियो नहि कऽ सकैत छल; ओ श्रेष्ठ पुरुष जिनका प्रत्येक घरमे सभ सम्मान दैत अछि; आ जिनकासँ पूर्वजन्मक पुण्यफलस्वरूप हमरा जन्म प्राप्त भेल। जखन हमर पिता आकाशलोक चलि गेलाह, तखन पृथ्वी पर हुनक वाणी-संग कथाक धारा सेहो रुकि गेल। ओकर अपूर्ण अवस्था सज्जनसभक दुःखक कारण बनल देखि हम ओकरा आगाँ बढ़बऽ आरम्भ कयलहुँ—काव्य-अहंकारसँ नहि। वचनमे एहन सौन्दर्यक प्रवाह हमर पिताक विशिष्ट वरदान अछि। अमृतक एकमात्र स्रोत चन्द्रमाक किरणक केवल एक स्पर्श चन्द्रकान्त मणिकेँ द्रवित करबाक लेल पर्याप्त होइत अछि। जेना पूर्ण वेगबाली आन नदीसभ गङ्गामे प्रवेश कऽ ओकरामे लीन भऽ समुद्र धरि पहुँचैत अछि, तहिना एहि कथा पूर्ण करबाक लेल हम अपन वाणीकेँ पिताक समुद्रगामिनी वाग्धारामे समर्पित करैत छी। कादम्बरीक प्रबल मधुरतासँ मदहोश व्यक्ति जकाँ डगमगाइत हम विवेकशून्य भऽ गेल छी; ताहि कारण मधुरता आ वर्ण-विभासँ रहित अपन वाणीमे एहि कथाक अन्त रचबाक साहस करैत हमरा भय नहि होइत अछि। जे बीआ फल देबाक आशा जगबैत आ फूल बनबाक नियति रखैत अछि, ओकरा बोएनिहार उचित परिश्रमसँ भूमि मे रोपैत अछि। उत्तम माटिमे छिटकल बीआ बढ़ि परिपक्व होइत अछि, मुदा ओकर फल बोएनिहारक पुत्र बटोरैत अछि। ‘एहि अतिरिक्त,’ कादम्बरी आगाँ कहलनि, ‘जँ कुमारकेँ एतय आनल जायत, तऽ हमर दुर्बलतासँ लज्जित लज्जा स्वयं हमरा हुनक दर्शन नहि करऽ देत। बलपूर्वक हुनका अनबाक अपराधसँ भयभीत भय स्वयं हुनक समक्ष प्रवेश नहि करत। आ जँ हमर प्रति प्रेमक कारण सखी पत्रलेखा पूरा प्रयास कयलाक बादो हुनक चरण पर पड़ि हुनका अनबाक लेल राजी नहि कऽ सकली—चाहे माता-पिताक आदर, राजधर्मक निष्ठा, जन्मभूमिक प्रेम अथवा हमर प्रति अनिच्छाक कारण—तऽ सभकिछु समाप्त भऽ जायत। एतबे नहि। हम ओही कादम्बरी छी जिनका ओ हिमगृहमे फूलक शय्या पर विश्राम करैत देखने छलाह, आ ओ ओही चन्द्रापीड छथि जे दोसरक पीड़ा सँ पूर्णतः अनजान रहि केवल दू दिन ठहरि चलि गेलाह। महाश्वेता संकटमे रहलीह ताधरि विवाह नहि करबाक वचन हम देने छलहुँ, यद्यपि ओ हमरा रोकैत कहने छलीह जे कामदेव कखनो अनदेखल व्यक्तिक प्रेमो सँ प्राण लऽ लैत छथि। मुदा हमर दशा एहन नहि अछि। कल्पनामे अंकित कुमार निरन्तर हमर दृष्टिक सोझाँ उपस्थित रहैत छथि; सुतल वा जागल, प्रत्येक स्थानमे हम हुनकहि देखैत छी। अतः हुनका अनबाक चर्चा नहि करू।’ तखन हम विचारलहुँ, ‘वास्तवमे कल्पनामे रचल प्रियतम वियोगिनी स्त्रीसभक लेल, विशेषतः कुलीन कन्यासभक लेल, बहुत पैघ सहारा होइत अछि।’ आ हे कुमार, हम कादम्बरीकेँ अहाँकेँ आनबाक प्रतिज्ञा कयलहुँ। अहाँक नामसँ भरल हमर वाणी सुनि ओ विष उतारबाक मन्त्रसँ जागल जकाँ सहसा आँखि खोलि कहलनि, ‘पत्रलेखा, हम ई नहि कहैत छी जे तोहर जेब हमरा प्रसन्न करैत अछि। केवल तोरा देखैत हम जीवन सहि पबैत छी। तथापि जँ एहि अभिलाषासँ तू वशीभूत छह तऽ जे इच्छा हो, से करह।’ ई कहि अनेक उपहार दऽ ओ हमरा विदा कयलनि। तत्पश्चात् किञ्चित् नत मुखसँ पत्रलेखा आगाँ कहलक, ‘कुमार, राजकुमारीक हालक कृपालेँ हमरा साहस देलनि अछि। हुनक दुःखसँ हम व्यथित छी, ताहि लेल अपनेकेँ पुछैत छी—हुनका एहन अवस्थामे छोड़ि आबि की अहाँ अपन कोमल स्वभावक अनुरूप आचरण कयलहुँ?’ पत्रलेखाक एहि उलाहना आ परस्पर विरोधी भावसँ भरल कादम्बरीक वचन सुनि कुमार विह्वल भऽ गेलाह। कादम्बरीक वेदनामे सहभागी भऽ आँखिमे आँसू भरि पत्रलेखासँ पुछलनि, ‘हम की करू? प्रेम हमरा कादम्बरीक दुःख आ तोहर उलाहनाक कारण बना देलक। हमरा लगैत अछि कोनो शाप हमर बुद्धि अन्हार कऽ देने छल; नहि तऽ एतेक स्पष्ट संकेत, जाहिसँ जड़ मनमे सेहो सन्देह नहि रहित, देखितहुँ हमर मन कोना भ्रमित भेल? ई सभ दोष भ्रमसँ उत्पन्न भेल अछि। अतः आब हम प्राणो सहित स्वयंकेँ हुनका समर्पित कऽ एहन आचरण करब जे राजकुमारी हमरा एतेक कठोर हृदयबला नहि बुझथि।’ ओ ई कहिये रहल छलाह कि एक द्वारपालिका शीघ्र आबि कहलक, ‘कुमार, महारानी विलासवती ई सन्देश पठौने छथि—“परिचारिकासभक चर्चासँ सुनलहुँ जे पाछाँ रहि गेल पत्रलेखा आब घुरि आयल अछि। हम ओकरा तोहरहि समान प्रेम करैत छी। अतः तू ओकरा संग लेने आब। सहस्र अभिलाषासँ प्राप्त तोहर कमल-मुखक दर्शन दुर्लभे भेटैत अछि।”’ कुमार मनमे सोचलनि, ‘हमर जीवन आब सन्देहसभक बीच कतेक डोलि रहल अछि! माता एक क्षणो हमरा नहि देखि दुःखी भऽ जाइत छथि। प्रजा हमरा प्रेम करैत अछि, मुदा गन्धर्व-राजकुमारीक प्रेम अधिक गहन अछि। देवी कादम्बरी प्राप्त करबाक योग्य छथि आ हमर मन विलम्ब सहि नहि सकैत अछि।’ एहि प्रकार विचारैत ओ महारानी लग गेलनि। असह्य हृदय-लालसामे दिन बितौलनि आ राति प्रेमक मन्दिर जकाँ कादम्बरीक सौन्दर्यक चिन्तनमे। ओहि दिनसँ मनोहर वार्ता हुनक हृदयमे प्रवेश नहि पबैत छल। मित्रसभक वचन कठोर बुझाइत छल, कुटुम्बक बातचीतमे आनन्द नहि भेटैत छल। प्रेमाग्निसँ देह सुखैत गेल, मुदा हृदयक कोमलता नहि छोड़लनि। सुखक तिरस्कार कयलनि, आत्मसंयमक नहि। एहि प्रकार कादम्बरीक सद्गुण आ सौन्दर्य पर टिक्कल प्रबल प्रेम हुनका आगाँ खिंचैत छल, आ माता-पिताक प्रति अत्यन्त गहन स्नेह पाछाँ रोकैत छल। एक दिन शिप्रा नदीक तट पर घुमैत ओ घुड़सवारक एक दल निकट अबैत देखलनि। ओकर परिचय पुछबाक लेल एक व्यक्ति पठौलनि। स्वयं जाँघ धरि जलबला स्थानसँ शिप्रा पार कऽ कार्तिकेयक मन्दिरमे सन्देशवाहकक प्रतीक्षा करऽ लगलाह। पत्रलेखाकेँ निकट खिंचि कहलनि, ‘देखह! ओ घुड़सवार, जकर मुख एखन कठिनाइ सँ चिन्हाइत अछि, कीयूरके अछि!’ तखन चन्द्रापीड दूरहि सँ कीयूरककेँ घोड़ा सँ कूदैत देखलनि। तीव्र गतिसँ आबि धूरसँ धूसर भेल कीयूरकक बदलल रूप, अलंकारहीन देह, निराश मुख आ अन्तःपीड़ाक सूचना दैत आँखि बिना एको शब्द कहने कादम्बरीक दुर्दशा घोषित कऽ रहल छल। ओ शीघ्र प्रणाम कऽ निकट आयल तऽ चन्द्रापीड स्नेहसँ बजा ओकरा आलिङ्गन कयलनि। कीयूरक अलग भऽ विधिवत् प्रणाम कयलक। कुमार शिष्टतापूर्वक समाचार पुछि ओकर अनुचरसभकेँ प्रसन्न कयलाक बाद उत्सुक दृष्टिसँ ओकरा देखि कहलनि, ‘कीयूरक, तोहर दर्शनहि सँ देवी कादम्बरी आ हुनक परिचर-वर्गक कुशलता सूचित होइत अछि। विश्राम कऽ स्वस्थ भेलाक बाद अपन आगमनक कारण कहिह।’ ई कहि ओ कीयूरक आ पत्रलेखाकेँ अपन हाथी पर बैसा घर लऽ गेलनि। ओतय अनुचरसभकेँ विदा कऽ केवल पत्रलेखाक संग कीयूरककेँ निकट बजा कहलनि, ‘कादम्बरी, मदलेखा आ महाश्वेताक सन्देश कहह।’ कीयूरक उत्तर देलक, ‘हम की कहू? एहि तीनूमेसँ केकरो सन्देश नहि अछि। पत्रलेखाकेँ मेघनादक हाथ सौंपि हम जखन घुरलहुँ आ अहाँक उज्जयिनी प्रस्थानक समाचार देलहुँ, तखन महाश्वेता ऊपर दिस देखलनि, लम्बा गरम निःश्वास छोड़ि दुःखसँ कहलनि, “तऽ एहन भेल,” आ तपस्या करबाक लेल अपन आश्रम घुरि गेलीह। कादम्बरी चेतनाशून्य जकाँ महाश्वेताक प्रस्थानो नहि बुझि सकलीह। बहुत काल बाद आँखि खोलि हमरा तिरस्कारपूर्वक महाश्वेताकेँ समाचार देबाक आज्ञा देलनि। मदलेखासँ पुछलनि जे चन्द्रापीड सन काज कियो कखनो कयने अछि अथवा आगाँ करत? तत्पश्चात् परिचर-वर्गकेँ विदा कऽ शय्या पर पड़ि माथ ढाँपि लेलनि। हुनक दुःखमे पूर्ण सहभागी मदलेखासँ सेहो एको शब्द बिना कहने पूरा दिन बितौलनि। दोसर दिन बहुत भोरमे हम हुनका लग गेलहुँ तऽ ओ आँसू भरल आँखिसँ बहुत काल धरि हमरा एना देखैत रहलीह मानो दोष दऽ रहल होथि। दुःखी स्वामिनीक एहन दृष्टि देखि हम एकरा प्रस्थानक आज्ञा बुझलहुँ, आ राजकुमारीकेँ बिना कहने अपन स्वामीक चरणमे आबि गेलहुँ। अतः एकमात्र अहाँक आश्रय पर निर्भर जीवनकेँ बचाबय लेल व्याकुल हृदयबला कीयूरकक निवेदन ध्यानसँ सुनबाक कृपा करू। जेना अहाँक पहिल आगमनसँ ओ कुमारिका-जकाँ वन मलय-पवनक सुगन्धसँ उद्वेलित भेल छल, तहिना सम्पूर्ण संसारक आनन्द, वसन्त जकाँ अहाँकेँ देखितहि प्रेम लाल अशोक-लता जकाँ हुनक भीतर प्रवेश कऽ गेल। मुदा आब ओ अहाँक कारण महान यातना सहि रहल छथि।’ तखन कीयूरक हुनक सभ पीड़ाक विस्तृत वर्णन करैत रहल, जाधरि दुःखसँ अभिभूत कुमार आरो नहि सहि सकलनि आ मूर्छित भऽ गेलाह। मूर्छासँ चेतना अयला पर चन्द्रापीड विलाप करऽ लगलाह जे कादम्बरी वा हुनक सखीसभ हुनका एतेक कठोर हृदयबला बुझलनि जे कोनो सन्देश पठबय योग्य नहि मानलनि। जखन ओ हेमकूटमे छलाह तखने हुनक प्रेमक विषय नहि कहबाक लेल सभकेँ दोष देलनि। ओ कहलनि, ‘जे सदैव हुनक चरणमे रहनिहार सेवक अछि, ओकर विषयमे लज्जाक कोन कारण छल? एतेक कोमल व्यक्तिमे दुःख घर कऽ लेलक आ हमर अभिलाषा अपूर्ण रहि गेल। आब अनेक दिनक दूरी पर रहि हम की कऽ सकैत छी? हुनक देह फूलक खसबो सहि नहि सकैत अछि, जखन कि हमर सन वज्र-जकाँ हृदय पर सेहो प्रेमक बाण सहन कठिन अछि। निर्दय भाग्य द्वारा आरम्भ कयल अस्थिर काजसभ देखि हम नहि जानैत छी से कतय रुकत। नहि तऽ किन्नरक निष्फल खोजमे अमरभूमि धरि हमर पहुँचब कतय, महाश्वेताक संग हेमकूट यात्रा कतय, ओतय राजकुमारीक दर्शन कतय, हमरा प्रति हुनक प्रेमक जन्म कतय, आ अभिलाषा अपूर्ण रहितहुँ उल्लङ्घन नहि कऽ सकबाक पिताक आज्ञासँ हमर घुरब कतय? दुष्ट भाग्य हमरा सभकेँ ऊँच उठा फेर भूमि पर पटकि देलक। अतः राजकुमारीकेँ सान्त्वना देबाक लेल अपन पूरा शक्ति लगाबी।’ साँझमे ओ कीयूरकसँ पुछलनि, ‘तोहर की विचार अछि? हमरा सभक पहुँचबा धरि कादम्बरी जीवन धारण कऽ सकथिन? अथवा हम फेर हुनक भीरु हरिणीक आँखि-जकाँ मुख देखब?’ कीयूरक उत्तर देलक, ‘कुमार, धैर्य राखू। जेबाक लेल अपन पूरा प्रयास करू।’ कुमार स्वयं प्रस्थानक योजना आरम्भ कऽ देने छलाह। मुदा पिताक अनुमति बिना कोन सुख, कोन मानसिक शान्ति भेटत? एतेक लम्बा अनुपस्थितिक बाद अनुमति कोना प्राप्त होयत? एहि काजमे मित्रक सहायता आवश्यक छल, मुदा वैशम्पायन दूर छल। दोसर दिन भोरमे चन्द्रापीड सुनलनि जे हुनक सेना दशपुर पहुँचि गेल अछि। वैशम्पायन आब निकट अछि—एहि रूपमे भाग्यक कृपा प्राप्त होयबाक विचारसँ आनन्दित भऽ ओ समाचार कीयूरककेँ देलनि। कीयूरक उत्तर देलक, ‘ई घटना निश्चय अपनेक प्रस्थानक सूचना दैत अछि। अहाँ अवश्य राजकुमारीकेँ प्राप्त करब। चाँदनी बिना चन्द्रमा, कमल बिना सरोवर अथवा लता बिना उद्यान के कखनो देखने अछि? तथापि वैशम्पायनक आगमन आ हुनक संग योजना निश्चित करबामे विलम्ब होयत। मुदा राजकुमारीक जे दशा हम बतौलहुँ, ओ विलम्ब सहि नहि सकैत अछि। अतः अपनेक स्नेहसँ प्राप्त कृपाक कारण निर्भीक भेल हमर हृदय ई अनुग्रह माँगैत अछि जे हमरा तत्काल जेबाक आज्ञा दिअ, जाहिसँ स्वामीक शीघ्र आगमनक आनन्दक समाचार हुनका दऽ सकी।’ कुमारक दृष्टिमे आन्तरिक सन्तोष चमकि उठल। ओ उत्तर देलनि, ‘समय आ स्थानक एतेक उचित ज्ञान आन केकरा अछि? एतेक निष्कपट निष्ठा आन केकरा मे अछि? अतः ई उत्तम विचार अछि। राजकुमारीक जीवन सम्हारबाक आ हमर घुरबाक तैयारी लेल जाउ। मुदा पत्रलेखा सेहो तोहर संग पहिने राजकुमारीक चरणमे जाय, कारण राजकुमारी ओकरा पर विशेष कृपा करैत छथि।’ तखन ओ मेघनादकेँ बजा पत्रलेखाक रक्षा करैत लऽ जेबाक आज्ञा देलनि; स्वयं वैशम्पायनसँ भेंट कयलाक बाद हुनका सभकेँ बाटमे पकड़बाक बात कहलनि। पत्रलेखाकेँ कहलनि जे कादम्बरीकेँ निवेदन करय—हुनक कुलीन सत्यता आ स्वाभाविक कोमलता दूर रहि प्रेमाग्निमे दग्ध चन्द्रापीडकेँ जीवित रखने अछि; आ हुनक आगमनक आज्ञा माँगय। हुनका सभक प्रस्थानक बाद चन्द्रापीड वैशम्पायनसँ भेटबाक लेल जेबाक पिताक अनुमति माँगऽ गेलनि। राजा स्नेहसँ स्वागत कऽ शुकनाससँ कहलनि, ‘आब ई विवाहक योग्य आयु मे पहुँचि गेल अछि। अतः रानी विलासवतीक संग विचार कऽ कोनो सुन्दर कन्याक चयन करू। हमर पुत्र जकाँ मुख बारम्बार नहि देखल जाइत अछि। आब वधूक कमल-मुखक दर्शनसँ अपना सभकेँ आनन्दित करी।’ शुकनास सहमति देलनि—कुमार समस्त विद्या प्राप्त कऽ चुकल छथि, राजलक्ष्मीकेँ दृढ़तासँ अपन बना लेने छथि आ पृथ्वीकेँ वरण कऽ चुकल छथि; आब पत्नी-वरण छोड़ि आन कोनो काज शेष नहि अछि। चन्द्रापीड सोचलनि, ‘कादम्बरीक संग मिलनक हमर विचार लेल पिताक योजना कतेक उचित समय पर आयल! “अन्हारमे प्रकाश” आ “मरत व्यक्तिपर अमृत-वर्षा”—ई कहबी हमरा मे सत्य भऽ रहल अछि। वैशम्पायनकेँ देखितहि हम कादम्बरीकेँ प्राप्त करब।’ राजा विलासवती लग गेलाह आ पुत्रक वधू विषयमे कोनो परामर्श नहि देबाक लेल विनोदपूर्वक उलाहना देलनि। एहि बीच कुमार पूरा दिन वैशम्पायनक प्रतीक्षामे बितौलनि। रातिक दू पहर सँ अधिक समय ओकर प्रतीक्षाक उत्कण्ठामे जागलाक बाद हुनक प्रेमक उत्साह दुगुना भऽ गेल, आ प्रस्थानक शंख बजबौलनि। ओ दशपुरक बाट पकड़लनि। किछु दूर गेलाक बाद शिविर देखाइतहि वैशम्पायनक दर्शनक विचारसँ आनन्दित भेलनि। असगर आगाँ बढ़ि मित्रक विषय पुछलनि। मुदा कानैत स्त्रीसभ उत्तर देलक, ‘किएक पुछैत छी? ओ एतय कोना रहिताह?’ पूर्णतः भ्रमित भऽ ओ शिविरक बीच दिस दौड़लनि। लोकसभ हुनका चिन्हि लेलक। प्रश्न कयला पर सामन्तसभ एक वृक्षक नीचाँ विश्राम करबाक निवेदन कऽ वैशम्पायनक भाग्यक कथा कहबाक अनुमति माँगलक। ओ सभ कहलक जे वैशम्पायन एखनो जीवित छथि, आ जे भेल से सुनौलक—‘अपने हमरा सभकेँ छोड़लाक बाद ओ एक दिन रुकलाह, फेर प्रस्थानक आज्ञा देलनि। मुदा कहलनि—“पुराणमे अच्छोद सरोवरकेँ अत्यन्त पवित्र कहल गेल अछि। चलू, स्नान करी आ तटक मन्दिरमे शिवक पूजा करी। देवतासभसँ सेवित एहि स्थानकेँ सपनामे सेहो फेर के देखत?” तट पर एक लता-मण्डप देखितहि ओ ओकरा बहुत कालसँ बिछुड़ल भाइ जकाँ देखऽ लगलाह, मानो पुरान स्मृति जागि उठल हो। हमरा सभ प्रस्थानक आग्रह कयलहुँ तऽ ओ सुनबो नहि कयलनि। अन्ततः कहलनि जे हमरा सभ चलि जाउ, ओ एहि स्थानकेँ नहि छोड़ताह। ओ कहलनि—“अहाँ सभ प्रस्थानक लेल जे तर्क दैत छी, की हम सभ नहि बुझैत छी? मुदा हमरा अपनहि पर अधिकार नहि अछि। मानो एहि स्थान पर कील ठोकि बान्हि देल गेल अछि; हम अहाँ सभक संग नहि जा सकैत छी।” अन्ततः हमरा सभ हुनका ओतहि छोड़ि एतय आबि गेलहुँ।’ सपनोमे कल्पना नहि कऽ सकबाक एहन वृत्तान्त सुनि चन्द्रापीड चकित भऽ सोचलनि, ‘सभकिछु त्यागि वनमे रहबाक ओकर निश्चयक कारण की भऽ सकैत अछि? हमरा अपन कोनो दोष देखाइत नहि अछि। ओ हमर प्रत्येक वस्तु आ भावक सहभागी अछि। पिता अथवा शुकनास हुनका एहन किछु कहलनि की जे हृदयकेँ चोट पहुँचौने हो?’ अन्ततः ई सोचैत जे जतय वैशम्पायन छथि ओतहि कादम्बरी सेहो छथि, आ मित्रकेँ घुरा अनबाक निश्चय कऽ ओ उज्जयिनी घुरलनि। सुनलनि जे राजा-रानी शुकनासक घर गेल छथि, अतः हुनको पाछाँ ओतय पहुँचलनि। ओतय मनोरमाकेँ पुत्रक अभावमे विलाप करैत सुनलनि—ओहि पुत्रक दर्शन बिना ओ जीवित नहि रहि सकैत छलीह आ जे बाल्यावस्थासँ एखन धरि कखनो हुनक उपेक्षा नहि कयने छल। चन्द्रापीड प्रवेश कयलनि तऽ राजा कहलनि, ‘हम तोहर ओकरा प्रति गहन प्रेम जनैत छी। तथापि ई वृत्तान्त सुनि हमर हृदय तोहरहि कोनो दोषक शंका करैत अछि।’ मुदा दुःख आ अधैर्यसँ मुख अन्हार भेल शुकनास उलाहना दैत कहलनि, ‘हे राजन्, जँ चन्द्रमामे ताप आ अग्निमे शीतलता भऽ सकैत अछि, तखने कुमारमे दोष भऽ सकैत अछि। वैशम्पायन सन व्यक्ति विनाशक अपशकुन होइत अछि—बिना ईंधनक अग्नि, एहन चमकाओल दर्पण जे प्रत्येक वस्तु उल्टा देखा दैत अछि। ओकरा लेल नीच उच्च, अन्याय न्याय आ अज्ञान विद्या होइत अछि। ओकर प्रत्येक प्रवृत्ति कल्याण नहि, अनिष्ट दिस जाइत अछि। एही कारण वैशम्पायन ने अहाँक क्रोधसँ डरलक, ने ई सोचलक जे ओकर माताक जीवन ओकरा पर निर्भर अछि, ने ई जे वंश चलबैत पितृ-तर्पण देबाक लेल ओकर जन्म भेल अछि। निश्चय एहन दुष्ट आसुरी व्यक्तिक जन्म केवल हमरा सभकेँ दुःख देबाक लेल भेल।’ राजा उत्तर देलनि, ‘हम सन व्यक्ति अहाँकेँ उपदेश दी, से एना होयत मानो दीपक अग्निकेँ प्रकाश दय अथवा दिन सूर्यकेँ समान तेज दय। तथापि दुःख बुद्धिमानसँ बुद्धिमान व्यक्तिक मनकेँ वर्षासँ मानस-सरोवर जकाँ मलिन कऽ दैत अछि, आ तखन दृष्टि नष्ट भऽ जाइत अछि। एहि संसारमे युवा अवस्थासँ के नहि बदलैत अछि? यौवन प्रकट होइतहि बाल्यकालक संग ज्येष्ठक प्रति प्रेम बहि जाइत अछि। वैशम्पायनक विषयमे अहाँक कठोर वचन सुनि हमर हृदय दुःखी होइत अछि। ओकरा एतय अनल जाय; तखन जे उचित होयत से करब।’ शुकनास पुत्रकेँ दोष दैत रहलाह, मुदा चन्द्रापीड ओकरा अनबाक अनुमति लेल निवेदन करैत रहलनि; अन्ततः शुकनास मानि गेलाह। तखन कुमार ज्योतिषीसभकेँ बजा गुप्त रूपसँ निर्देश देलनि जे राजा वा शुकनास पूछथि तऽ एहन प्रस्थान-दिन बताबथि जाहिसँ विलम्ब नहि हो। ज्योतिषी उत्तर देलक, ‘ग्रहयोग अपनेक यात्राक अनुकूल नहि अछि। मुदा राजा स्वयं समयक निर्णायक होइत छथि। अपनेक इच्छा जाहि समय पर स्थिर हो, प्रत्येक काज लेल ओही समय उचित अछि।’ तखन ओ सभ दोसर दिनकेँ प्रस्थानक शुभकाल घोषित कयलक। कुमार ओ दिन आ राति यात्राक तैयारीमे बितौलनि, मानो कादम्बरी आ वैशम्पायनकेँ सोझाँ देखिये रहल होथि। समय अयला पर विलासवती गहन दुःखसँ विदा दैत कहलनि, ‘तोहर पहिल प्रस्थान पर हमरा एतेक दुःख नहि भेल छल, जतेक आब होइत अछि। हमर हृदय फाटि रहल अछि, शरीर यातनामे अछि, मन दबि गेल अछि। नहि जानि किएक हृदय एतेक पीड़ित अछि। बहुत दिन बाहर नहि रहिह।’ कुमार हुनका सान्त्वना देबाक प्रयास कऽ पिताक समीप गेलनि। राजा स्नेहसँ ग्रहण कऽ अन्ततः कहलनि, ‘हमर इच्छा अछि तू विवाह कऽ राज्यक भार ग्रहण कर, जाहिसँ हम राजर्षिसभक बाट पर चलि सकी। मुदा वैशम्पायनक ई प्रसंग बाधा बनल अछि, आ शंका होइत अछि जे हमर अभिलाषा पूर्ण नहि होयत। नहि तऽ ओ एहन विचित्र आचरण कोना करित? अतः पुत्र, जेब आवश्यक अछि, मुदा शीघ्र घुरिह, जाहिसँ हमर हृदयक इच्छा विफल नहि हो।’ अन्ततः चन्द्रापीड प्रस्थान कयलनि। दिन-रात यात्रामे मित्र आ गन्धर्वलोकक चिन्तन करैत रहलनि। बहुत दूर पहुँचला पर वर्षा ऋतु आरम्भ भऽ गेल। आँधी-वर्षाक प्रत्येक हलचल हुनक अपन हृदयमे प्रतिध्वनित होइत छल। तथापि ओ बाटमे नहि रुकलनि, ने सामन्तसभक अपन देहक किछु ध्यान रखबाक विनती मानलनि; पूरा दिन घोड़ा दौड़बैत रहलनि। यात्राक एक-तिहाइ भाग शेष रहितहि मेघनाद देखाइत पड़ल। वैशम्पायनक विषयमे उत्सुकतासँ पुछला पर ज्ञात भेल जे वर्षा हुनक आगमन रोकत—ई निश्चित बुझि पत्रलेखा मेघनादकेँ हुनक स्वागत लेल पठौने छल, आ मेघनाद अच्छोद सरोवर धरि नहि गेल छल। दुगुना दुःखसँ कुमार सरोवर पहुँचि अनुचरसभकेँ चारू दिस पहरा देबाक आज्ञा देलनि, जाहिसँ वैशम्पायन लज्जासँ कतहु भागि नहि जाय। मुदा बहुत खोजलाक बादो मित्रक कोनो चिह्न नहि भेटल। ओ सोचलनि, ‘हुनका बिना हमर पएर एहि स्थानसँ हटि नहि सकैत अछि, आ कादम्बरीक दर्शन सेहो नहि भेल। सम्भव अछि महाश्वेता एहि विषयमे किछु जनैत होथि; कमसँ कम हुनक दर्शन तऽ करी।’ इन्द्रायुध पर चढ़ि हुनक आश्रम दिस गेलनि। उतरि भीतर प्रवेश कयलनि, मुदा गुफाक द्वार पर तरलिकाक सहारासँ कठिनतासँ ठाढ़, तीव्र विलाप करैत महाश्वेताकेँ देखलनि। ओ सोचलनि, ‘कतहु कादम्बरी पर कोनो अनिष्ट तऽ नहि आयल? हमर आगमन आनन्दक कारण होयबाक चाही, तखन महाश्वेताक ई दशा किएक?’ दुःख आ उत्कण्ठासँ तरलिकासँ पुछलनि, मुदा ओ केवल महाश्वेताक मुख दिस देखलक। अन्ततः महाश्वेता टूटैत वाणीमे कहलनि, ‘हम सन दुर्भागिनी अहाँकेँ की कहि सकैत छी? तथापि घटना सुनब। कीयूरकसँ अहाँक प्रस्थान सुनि हमर हृदय एहि विचारसँ फाटि गेल जे कादम्बरीक माता-पिताक इच्छा, हमर अपन अभिलाषा, आ अहाँक संग मिलनमे कादम्बरीक सुख-दर्शन—किछुओ पूर्ण नहि भेल। हुनक प्रति प्रेमक बन्धनो काटि हम पहिनेसँ अधिक कठोर तपस्या करबाक लेल अपन आश्रम घुरि अयलहुँ। एतय अहाँक सदृश एक युवा ब्राह्मणकेँ शून्य दृष्टिसँ एतय-ओतय देखैत पयलहुँ। हमरा देखितहि ओकर आँखि केवल हमरे पर स्थिर भऽ गेल, मानो पहिने कखनो नहि देखितहुँ चिन्हैत हो, अपरिचित होइतहुँ दीर्घकालसँ जनैत हो। पागल वा आविष्ट व्यक्ति जकाँ हमरा देखैत अन्ततः कहलक—“सुन्दरी, एहि संसारमे केवल ओ लोक निन्दासँ बचैत अछि जे अपन जन्म, वय आ रूपक अनुरूप आचरण करैत अछि। विपरीत भाग्य जकाँ एहन अनुपयुक्त काजमे किएक परिश्रम करैत छी—फूलमाला जकाँ कोमल देहकेँ कठोर तपस्यामे किएक क्षीण करैत छी? तपस्याक कष्ट ओहि लोकक लेल अछि जे जीवनक सुख भोगि ओकर शोभा गमा चुकल अछि, सौन्दर्यसँ सम्पन्न अहाँक लेल नहि। जँ अहाँ संसारक आनन्दसँ विमुख होयब तऽ कामदेव व्यर्थ धनुष तानैत छथि, चन्द्रमा व्यर्थ उदित होइत अछि, चाँदनी आ मलय-पवन निष्फल सेवा करैत अछि।”’ महाश्वेता आगाँ कहलनि, ‘पुण्डरीककेँ गमौलाक बाद हमरा कोनो बातक चिन्ता नहि रहि गेल छल, अतः हम ओकर परिचय नहि पुछलहुँ। तरलिकाकेँ कहलहुँ जे ओकरा दूर राखय; ओ फेर घुरत तऽ अवश्य कोनो अनिष्ट होयत। मुदा दूर रखलाक बावजूद—प्रेमक दोषसँ अथवा हमरा सभ पर आएल दुःखमय नियतिक कारण—ओ अपन अनुराग नहि छोड़लक। एक राति तरलिका सुति गेल छल आ हम पुण्डरीकक विचारमे डूबल छलहुँ। दिन जकाँ उज्ज्वल चाँदनीमे ओ युवक आविष्ट जकाँ निकट अबैत देखाइत पड़ल। ओकरा देखितहि परम भय हमरा घेरि लेलक। हम सोचलहुँ, “हमरा पर अनिष्ट आबि पड़ल। जँ ई निकट आबि केवल हाथे छुबि देत तऽ एहि अभिशप्त जीवनकेँ नष्ट करब आवश्यक होयत। तखन पुण्डरीकक पुनर्दर्शनक आशामे जीवन धारण करबाक हमर संकल्प व्यर्थ भऽ जायत।” हम एना सोचिये रहल छलहुँ कि ओ निकट आबि कहलक—“चन्द्रमुखि, प्रेमक सहायक चन्द्रमा हमरा मारबाक प्रयास कऽ रहल अछि। ताहि लेल शरण माँगय अयलहुँ। हम निराश्रय आ असहाय छी; हमर जीवन अहाँकेँ समर्पित अछि। हमर रक्षा करू। शरणागतक रक्षा तपस्वीक धर्म होइत अछि। जँ अपना केँ हमरा देबाक कृपा नहि करब तऽ चन्द्रमा आ कामदेव हमरा मारि देत।” ओकर वचन सुनि क्रोधसँ अवरुद्ध स्वरमे हम कहलहुँ—“दुष्ट, ई वचन कहैत तोहर माथ पर वज्र किएक नहि खसल? मनुष्यक न्याय-अन्यायक साक्षी पाँचो तत्त्व निश्चय तोहर देहमे नहि अछि, नहि तऽ पृथ्वी, वायु, अग्नि आदि तोरा पूर्णतः नष्ट किएक नहि कयलक? उचित-अनुचित वचनक विचार बिना तू सुग्गा जकाँ बोलब सीखल छह। तखन सुग्गा रूपेँ जन्म किएक नहि लेलह? हम तोरा एही नियति दैत छी—अपन वाणीक अनुरूप जन्म ग्रहण कर, आ हमर सन स्त्रीसँ प्रेम-निवेदन करब छोड़।” ई कहि हम चन्द्रमा दिस मुड़ि हाथ उठा प्रार्थना कयलहुँ—“हे भगवन्, सर्वेश्वर, जगत्-रक्षक! पुण्डरीकक दर्शनक बाद हमर हृदयमे आन कोनो पुरुषक विचार नहि आयल हो तऽ हमर एहि सत्य-वचनक प्रभावसँ ई मिथ्या प्रेमी हम कहने योनिमे खसि पड़य।” तखन तत्काल—हम नहि जानि प्रेमक बलसँ, ओकर अपन पापसँ अथवा हमर वचनक शक्तिसँ—ओ जरिसँ उखड़ल वृक्ष जकाँ निर्जीव खसि पड़ल। ओकर मृत्युक बाद कानैत अनुचरसभसँ ज्ञात भेल जे ओ अहाँक मित्र छल, हे श्रेष्ठ कुमार।’ ई कहि ओ लज्जासँ मुख झुका मौन कानऽ लगलीह। मुदा स्थिर दृष्टि आ टूटैत आवाजमे चन्द्रापीड उत्तर देलनि, ‘देवि, अहाँ अपन दिससँ सभ किछु कयलहुँ; तथापि हम एतेक दुर्भाग्यवान छी जे एहि जन्ममे देवी कादम्बरीक चरण-सेवाक आनन्द नहि पाबि सकलहुँ। दोसर जन्ममे हमरा लेल ई सुख उत्पन्न करब।’ ई कहितहि हुनक कोमल हृदय कादम्बरीकेँ प्राप्त नहि कऽ सकबाक दुःखसँ एना टूटि गेल जेना खिलबाक लेल तैयार कली भँवराक डङ्कसँ फाटि जाय। तखन तरलिका हुनक निर्जीव देह पर विलाप करऽ लागल आ महाश्वेताकेँ उलाहना देबऽ लगल। सामन्तसभ सेहो दुःख आ विस्मयक चीत्कार करऽ लागल। ओही समय किछु मात्र अनुचरक संग स्वयं कादम्बरी प्रवेश कयलनि। महाश्वेतासँ भेंटक बहाना छल, मुदा वेश प्रियतमसँ मिलबाक लेल सजल छल। पत्रलेखाक हाथक सहारा लऽ अबैत ओ कुमारक वचनबद्ध घुरब पर सन्देह व्यक्त करैत, आ कहैत छलीह जे जँ फेर हुनका देखतीह तऽ ने बात करतीह, ने हुनक विनय वा सखीक प्रयाससँ मानतीह। वचन एहन छल, मुदा पुनः दर्शनक अभिलाषामे यात्राक समस्त कष्ट हुनका तुच्छ बुझाइत छल। चन्द्रापीडकेँ मृत देखितहि एक तीव्र चीत्कारसँ भूमि पर खसि पड़लीह। मूर्छा हटला पर स्थिर आँखि आ काँपैत मुखसँ हुनका देखलनि—तेज कुठारक आघातसँ काँपैत लता जकाँ—फेर स्त्री-स्वभावक विपरीत दृढ़तासँ निश्चल ठाढ़ भऽ गेलीह। मदलेखा हुनकासँ विनती कयलनि जे आँसू बहा दुःखकेँ मार्ग दिअ, नहि तऽ हृदय फाटि जायत; स्मरण करू जे दू वंशक आशा अहाँ पर टिकल अछि। कादम्बरी मुस्करा उत्तर देलनि, ‘मूर्खि, ई दृश्य देखितहुँ जँ हमर वज्रक हृदय नहि टूटल तऽ आब कोना टूटत? कुल आ मित्रक चिन्ता जीवित रहबाक इच्छा राखनिहार व्यक्तिक लेल होइत अछि, मृत्यु चुनने हमर लेल नहि। हमरा प्रियतमक देह प्राप्त भेल अछि, जे हमर जीवन अछि। से जीवित हो वा मृत, पृथ्वी पर मिलनसँ वा मृत्युमे ओकर अनुसरणसँ—हरेक दुःख शान्त करबाक लेल पर्याप्त अछि। हमरहि कारण स्वामी एतय आबि प्राण गमौलनि; तखन आँसू बहा हुनक देल महान सम्मानकेँ हम कोना तुच्छ करी? स्वर्ग-प्रस्थानक समय अमङ्गल विलाप कोना करी? जखन चरण-धूलि जकाँ हुनक पाछाँ चलबाक आनन्दमय क्षण आएल अछि तऽ किएक कानू? आब सभ दुःख दूर भऽ गेल। हुनक लेल हम आन सभ सम्बन्ध उपेक्षित कयलहुँ; आब जखन ओ नहि छथि तखन तू हमरा जीवित रहबाक लेल कोना कहि सकैत छह? आब मरबहि हमर जीवन अछि, जीवित रहब हमरा लेल मृत्यु होयत। माता-पिता आ मित्रसभक समीप तू हमर स्थान ग्रहण करह; हम दोसर लोकमे रहब तखन जलाञ्जलि देबाक लेल तोरा पुत्र हो। आँगनक युवा आम, जे हमरा अपन सन्तान जकाँ प्रिय अछि, ओकर विवाह माधवी-लतासँ कराबह। हमर पएरक स्पर्श पाओल अशोक-वृक्षक एको टहनी कानक आभूषण लेल सेहो नहि तोड़ल जाय। हमरा द्वारा पोसल मालती-लताक फूल केवल देवताकेँ चढ़ाबय लेल तोड़ल जाय। हमर कक्षमे तकियाक समीप कामदेवक चित्र फाड़ि देब। हम जे आमक वृक्ष रोपने छी ओकर पालन करब, जाहिसँ फल धरय। पिंजड़ाक दुःखसँ सारिका कालिन्दी आ सुग्गा परिहासकेँ मुक्त करब। हमर गोदीमे विश्राम करनिहार छोट नेवल आब तोहर गोदीमे रहय। हमर सन्तान-समान हरिणशावक तरलककेँ कोनो आश्रममे दऽ देब। प्रमोद-पर्वत पर हमर हाथसँ पोसल तीतिरसभ जीवित राखल जाय। हमर डेगक पाछाँ चलनिहार हंस मारल नहि जाय—ई ध्यान रखब। हमर बेचारी बनरिया घरमे दुःखी अछि, ओकरा मुक्त कऽ देब। प्रमोद-पर्वत कोनो शान्तचित्त तपस्वीकेँ दऽ देब आ हमर व्यक्तिगत वस्तु ब्राह्मणसभकेँ। हमर वीणा प्रेमसँ अपन गोदीमे राखब; आन जे वस्तु तोरा पसिन्न हो से तोहर हो। हम अपन स्वामीक गला सँ लिपटि चितापर ओहि ज्वरकेँ शान्त करब, जकरा चन्द्रमा, चन्दन, कमल-तन्तु आ सभ शीतल वस्तु उलटे बढ़ौने अछि।’ फेर महाश्वेताकेँ आलिङ्गन कऽ कहलनि, ‘तोहर लग कोनो आशा अछि जाहिसँ मृत्युसँ अधिक कठोर जीवन-पीड़ा सहि सकैत छह; मुदा हमर लग कोनो आशा नहि। प्रिय सखी, दोसर जन्ममे भेट धरि विदा।’ पुनर्मिलनक आनन्द अनुभव करैत जकाँ कादम्बरी नत मस्तकसँ चन्द्रापीडक चरणक पूजा कयलनि आ ओकरा अपन गोदीमे राखि लेलनि। हुनक स्पर्शसँ चन्द्रापीडक देहसँ एक विचित्र उज्ज्वल प्रकाश उठल, आ तत्काल आकाशवाणी भेल—‘प्रिय महाश्वेता, हम फेर तोरा सान्त्वना देब। तोहर पुण्डरीकक देह हमर लोक आ हमर प्रकाशसँ पोषित, मृत्युसँ मुक्त, तोहर संग पुनर्मिलनक प्रतीक्षा करैत अछि। चन्द्रापीडक ई दोसर देह सेहो हमर प्रकाशसँ भरल अछि; अतः अपन स्वभावसँ आ कादम्बरीक स्पर्शसँ पोषित होयबाक कारण मृत्युक अधीन नहि अछि। शापक कारण आत्मा ओकरा त्यागने अछि, जेना योगीक देह जकर आत्मा आन रूपमे प्रवेश कऽ गेल हो। शाप समाप्त होयबा धरि ई देह तोरा आ कादम्बरीकेँ सान्त्वना देबाक लेल एतहि रहय। ओकर दाह नहि करब, जलमे नहि बहाएब, नहि त्यागब। पुनर्मिलन धरि पूर्ण सावधानीसँ सुरक्षित राखब।’ आकाशवाणी सुनि पत्रलेखाकेँ छोड़ि सभ विस्मित भऽ आकाश दिस स्थिर दृष्टिसँ देखऽ लागल। पत्रलेखा चन्द्रापीडक मृत्यु देखि आएल मूर्छासँ ओहि प्रकाशक शीतल स्पर्श पाबि चेतनामे आयल। ओ तुरन्त उठि अश्वपालक हाथसँ इन्द्रायुधक लगाम छीनैत कहलक, ‘हमरा सभक जे हो, मुदा तू अपन स्वामीकेँ दीर्घ यात्रामे बिना घोड़ाक असगर एक क्षणो नहि छोड़िह,’ आ इन्द्रायुध सहित अच्छोद सरोवरमे कूदि पड़ल। तत्काल सरोवरसँ एक युवा तपस्वी निकलल। महाश्वेताक समीप आबि दुःखपूर्ण स्वरमे कहलक, ‘गन्धर्व-राजकुमारी, दोसर जन्म पार कऽ आब हमरा चिन्हैत छह?’ आनन्द आ दुःखक बीच विभक्त महाश्वेता हुनक चरणमे प्रणाम कऽ उत्तर देलनि, ‘भगवन् कपिञ्जल, की हम एतेक गुणहीन छी जे अहाँकेँ बिसरि जाइ? तथापि अहाँक ई शंका स्वाभाविक अछि, कारण हम स्वयं अपना केँ नहि चिन्हि पबैत छी। उन्मादसँ एतेक भ्रमित छी जे स्वामी पुण्डरीक स्वर्ग चलि गेलाह, तकर बादो जीवित छी। हमरा पुण्डरीकक समाचार कहू।’ तखन कपिञ्जल स्मरण करौलनि जे पुण्डरीकक देह लऽ जेबाक व्यक्तिक पाछाँ ओ आकाशमे उड़ल छलाह, दिव्य विमानमे विस्मित देवतासभकेँ पार करैत चन्द्रलोक पहुँचल छलाह। ओ आगाँ कहलनि—‘ओ व्यक्ति पुण्डरीकक देह महोदय नामक सभागृहमे शय्या पर राखि कहलक—“हमरा चन्द्रमा बुझ। जखन हम संसारक कल्याण लेल उदित भेलहुँ, तखन तोहर मित्र हमरा शाप देलक, कारण प्रियासँ मिलनक पूर्वहि हमर किरण ओकरा मारि रहल छल। ओ प्रार्थना कयलक जे सभ पवित्र कर्मक भूमि भारतवर्षमे जन्म लऽ हमो प्रेमक पीड़ा भोगि मरी। अपनहि दोषक कारण शाप भेटला पर क्रोधमे हम प्रत्युत्तर देलहुँ जे ओकरा सेहो हमरहि समान सुख-दुःखक भाग भोगय पड़त। क्रोध शान्त भेल तऽ महाश्वेताक प्रसंग बुझलहुँ। ओ हमर किरणसँ उत्पन्न वंशक कन्या अछि आ पुण्डरीककेँ स्वामी रूपेँ चुनने अछि। तथापि जन्मक्रमक विधान पूरा करबाक लेल हमरा दुनूकेँ मनुष्यलोकमे दू बेर जन्म लेब आवश्यक अछि। ताहि लेल हम ई देह एतय आनलहुँ आ शाप समाप्त होयबा पूर्व नष्ट नहि हो, एहि हेतु अपन प्रकाशसँ पोषण करैत छी। महाश्वेताकेँ सेहो सान्त्वना देने छी। सम्पूर्ण वृत्तान्त पुण्डरीकक पिताकेँ कहिह। हुनक आध्यात्मिक शक्ति महान अछि; सम्भव अछि ओ कोनो उपाय निकालथि।” हम दुःखमे व्यग्र भऽ फेर दौड़लहुँ आ आकाशमार्गमे एक दिव्य विमानक सवारक ऊपरसँ कूदि पार भेलहुँ। क्रोधित भऽ ओ हमरा कहलक—“विशाल आकाश-पथमे उन्मत्त घोड़ा जकाँ हमरा लाँघि गेलह, अतः घोड़ा बनि मनुष्यलोकमे उतर।” हम आँसू भरि कहलहुँ जे दुःखक अन्धतामे ओकरा लाँघल, तिरस्कारसँ नहि। ओ उत्तर देलक—“एक बेर कहल शाप घुरा नहि होइत अछि। मुदा जखन तोहर सवारक मृत्यु होयत, स्नान करितहि शापसँ मुक्त भऽ जेबह।” तखन हम विनती कयलहुँ जे हमर मित्र चन्द्रदेवक संग मनुष्यलोकमे जन्म लेबएबला अछि, अतः घोड़ा रूपमे निरन्तर ओकरहि संग रहबाक अनुमति भेटय। हमर स्नेहसँ कोमल भऽ ओ बतौलक जे चन्द्रमा उज्जयिनीक राजा तारापीडक पुत्र रूपेँ जन्म लेताह, पुण्डरीक हुनक मन्त्री शुकनासक पुत्र होयताह, आ हम कुमारक अश्व बनब। तत्काल हम समुद्रमे कूदि पड़लहुँ आ घोड़ा रूपमे प्रकट भेलहुँ, मुदा पूर्वजन्मक स्मृति नहि गमौलहुँ। किन्नरसभक पाछाँ लगबैत चन्द्रापीडकेँ एतय जानि-बुझि हमरे अनने छलहुँ। पूर्वजन्मक संस्कारसँ उपजल प्रेमक कारण तोरा खोजैत, आ तोहर अनजान अवस्थामे शापसँ दग्ध भेल युवक हमर मित्र पुण्डरीके छल, जे पृथ्वी पर जन्म लेने छल।” ई सुनि महाश्वेता करुण चीत्कारसँ छाती पीटैत कहलनि, ‘पुण्डरीक, दोसर जन्मोमे अहाँ हमर प्रेम अक्षुण्ण रखलहुँ; हम अहाँक लेल सम्पूर्ण संसार छलहुँ। मुदा नव जन्मोमे अहाँक विनाश लेल उत्पन्न राक्षसी जकाँ हम दीर्घ आयु केवल एही लेल पयलहुँ जे बेर-बेर अहाँकेँ मारी। हमरा लगैत अछि एहन दुर्भागिनी प्रति अहूँक मनमे आब शीतलता आबि गेल अछि, ताहि कारण हमर विलापक उत्तर नहि दैत छी।’ ई कहि ओ भूमि पर खसि पड़लीह। मुदा कपिञ्जल दयासँ कहलनि, ‘राजकुमारी, अहाँ निर्दोष छी आ आनन्द निकट अछि। अतः शोक नहि करू; जे तपस्या आरम्भ कयने छी, ओकरा निरन्तर पूरा करू। पूर्ण तपस्याक लेल किछुओ असम्भव नहि। अपन तपोबलसँ शीघ्र हमर मित्रक बाँहमे रहब।’ तखन कादम्बरी कपिञ्जलसँ पुछलनि जे पत्रलेखा हुनक संग सरोवरमे कुदला पर कोन दशामे गेलीह। मुदा ओकर बाद पत्रलेखा, मित्र पुण्डरीक वा चन्द्रापीडक संग की भेल—कपिञ्जल किछुओ नहि जनैत छलाह। अतः तीनू लोकक प्रत्येक घटना देख सकनिहार पुण्डरीकक पिता ऋषि श्वेतकेतुसँ पुछबाक लेल आकाशमे उड़ि गेलाह। तखन महाश्वेता, जकर संग दुःखक समानतासँ कादम्बरीक प्रेम आरो दृढ़ भऽ गेल छल, हुनका परामर्श देलनि जे जीवन चन्द्रापीडक देहक सेवा मे बिताबथि आ कनेको सन्देह नहि राखथि। आन लोक अदृश्य देवताक मात्र प्रतिमा रूप काठ आ पाथरक आकृतिक पूजा कऽ कल्याण पबैत अछि; तखन हुनका चन्द्रापीड नामक आवरणमे उपस्थित साक्षात् देवताक पूजा करबाक चाही। चन्द्रापीडक देह कोमलतासँ एक शिला पर राखि कादम्बरी प्रियतमसँ भेट लेल पहिरल अलंकार उतारि देलनि; केवल मंगल-चिह्न रूपेँ एक कङ्कण रखलनि। स्नान कऽ दू श्वेत वस्त्र धारण कयलनि, ओठसँ पानक गाढ़ लालिमा मेटौलनि, आ सुखद प्रेमक शोभा लेल आनल फूल, धूप आ अनुलेपन सभ आब देवताक योग्य पूजामे चन्द्रापीडकेँ अर्पित कयलनि। दिन-राति निश्चल बैसि कुमारक चरण थामने रहलीह। दोसर दिन प्रसन्नतासँ देखलनि जे हुनक कान्ति अपरिवर्तित अछि। ई समाचार देलासँ सखीसभ आ कुमारक अनुचरसभ आनन्दित भेल। अगिला दिन मदलेखाकेँ माता-पिताकेँ सान्त्वना देबाक लेल पठौलनि। ओ सभ प्रत्युत्तर देलक जे कादम्बरीक विवाह देखबाक आशा कखनो नहि कयने छल, मुदा आब आनन्द अछि जे ओ साक्षात् चन्द्रदेवक अवतारकेँ पति चुनलनि। शाप समाप्त होयला पर जमायक संग पुनः पुत्रीक कमल-मुख देखबाक आशा रखैत छथि। एहि सान्त्वनासँ कादम्बरी कुमारक देहक सेवा आ पूजा करैत रहलीह। वर्षा समाप्त भेला पर मेघनाद आबि बतौलक जे तारापीड कुमारक विलम्बक कारण पुछबाक लेल दूत पठौने छथि। कादम्बरीकेँ दुःखसँ बचाबय लेल ओ दूतसभकेँ पूरा घटना कहि शीघ्र राजाकेँ समाचार देबाक आज्ञा देने छल। मुदा दूतसभ उत्तर देलक—‘ई सभ सत्य हो, तथापि कुमारक प्रति वंशानुगत प्रेम छोड़ियो एहन महान आश्चर्य देखबाक इच्छा हमरा सभकेँ हुनक दर्शन माँगय बाध्य करैत अछि। दीर्घ सेवाक कारण ई कृपा पाबय योग्य छी। जँ चन्द्रापीडक देह नहि देखलहुँ तऽ राजा की कहताह?’ तारापीडक सम्भावित दुःखक कल्पनासँ कादम्बरी व्यथित भेलीह, तथापि दूतसभकेँ भीतर आबय देलनि। आँसू भरि दण्डवत् होइत हुनका सभकेँ सान्त्वना दैत कहलनि जे ई दुःखक नहि, आनन्दक कारण अछि। ‘अहाँ सभ कुमारक मुख आ परिवर्तनसँ मुक्त देह देखि लेलहुँ; आब शीघ्र राजाक चरणमे जाउ। मुदा एहि कथाकेँ सभ दिस नहि पसारब। केवल कहब जे कुमारकेँ देखने छी आ ओ अच्छोद सरोवरक तट पर ठहरल छथि। मृत्यु प्रत्येक व्यक्तिक होइत अछि, अतः सहज विश्वास होइत अछि; मुदा ई घटना देखलाक बादो विश्वास करब कठिन अछि। एखन माता-पिताकेँ ई कहि हुनक मृत्युशंका उत्पन्न करब उपयोगी नहि। जखन ओ पुनः जीवित होयताह तखन ई अद्भुत कथा स्वयं स्पष्ट भऽ जायत।’ दूतसभ उत्तर देलक, ‘तखन हमरा सभकेँ वा तऽ घुरब नहि, वा मौन रहब पड़त। दुनूमेसँ कोनो उपाय सम्भव नहि; शोकाकुल राजाक स्वागत एना नहि कऽ सकैत छी।’ ताहि लेल कादम्बरी हुनका सभक संग चन्द्रापीडक सेवक त्वरितककेँ पठौलनि, जाहिसँ वृत्तान्त विश्वसनीय हो। कुमारक सम्पूर्ण राजकीय अनुचर-वर्ग ओतहि फल-मूल खा जीवन बिताबय आ कुमार स्वयं घुरब ताधरि घुरा नहि जेबाक व्रत लेने छल। अनेक दिन बाद पुत्रक समाचारक तीव्र लालसामे महारानी विलासवती उज्जयिनीक रक्षक देवी, अवन्तीक दिव्य मातृकासभक मन्दिरमे हुनक घुरबाक प्रार्थना करऽ गेलीह। सहसा परिचर-वर्गमे पुकार उठल—‘महारानी, अहाँ धन्य छी! मातृकासभ कृपा कयलनि! कुमारक दूत निकट आबि गेल अछि।’ ओ देखलनि जे नगरवासी दूतसभकेँ घेरि कुमार, अथवा हुनक अनुचरसभमे शामिल अपन पुत्र, भाइ आ सम्बन्धीक समाचार पुछि रहल छल, मुदा कोनो उत्तर नहि भेटैत छल। महारानी हुनका सभकेँ मन्दिरक प्राङ्गणमे बजा पुकारलनि, ‘हमर पुत्रक समाचार शीघ्र कहू। अहाँ सभ हुनका देखने छी?’ दूतसभ दुःख नुकेबाक प्रयास करैत उत्तर देलक, ‘महारानी, हमरा सभ हुनका अच्छोद सरोवरक तट पर देखने छी। शेष वृत्तान्त त्वरितक कहत।’ ओ कहलनि, ‘ई अभागल व्यक्ति आब आरो की कहत? अहाँ सभक दुःखी दशा कथा स्वयं कहि देलक। हाय हमर बच्चा! तू किएक नहि घुरि अयलह? विदा होइत समय हमर अशुभ पूर्वाभास कहने छल जे तोहर मुख फेर नहि देखब। ई सभ पूर्वजन्मक दुष्कर्मक फल अछि। मुदा पुत्र, ई नहि सोचिह जे तोरा बिना हम जीवित रहब; तखन तोहर पिताक सामना कोना करब? तथापि नहि जानि प्रेमक कारण, एतेक सुन्दर व्यक्ति अवश्य जीवित रहत—एहि विचारसँ, अथवा स्त्री-मनक स्वाभाविक सरलतासँ, हमर हृदय विश्वास नहि करैत अछि जे तोरा पर अनिष्ट आयल।’ एहि बीच राजाकेँ समाचार भेटल। ओ शुकनासक संग मन्दिर दिस दौड़लाह आ शोकक जड़तामे डूबल रानीकेँ जगाबय कहलनि, ‘रानी, एहि प्रकार दुःख देखाबय अपना सभ अपनहि सम्मान घटा रहल छी। पूर्वजन्मक पुण्य हमरा सभकेँ एखन धरि आनलक। आगाँक सुख धारण करबाक पात्र नहि छी। जे अर्जित नहि कयल, से छाती पीटलासँ इच्छानुसार नहि भेटैत अछि। स्रष्टा अपन इच्छानुसार करैत छथि, ककरो पर निर्भर नहि। पुत्रक शैशव, बाल्य आ यौवनक आनन्द पयलहुँ; ओकर राज्याभिषेक कयलहुँ; दिग्विजयसँ घुरला पर स्वागत कयलहुँ। केवल एतबे अभिलाषा अपूर्ण रहल जे ओकर विवाह नहि देखलहुँ, ओकरा अपना स्थान पर छोड़ि आश्रम नहि गेलहुँ। मुदा प्रत्येक इच्छा पूर्ण होयब अत्यन्त दुर्लभ पुण्यक फल अछि। तथापि त्वरितकसँ पुछी, कारण एखन पूरा बात नहि जनैत छी।’ त्वरितकसँ जखन सुनलनि जे कुमारक हृदय टूटि गेल, तखन बीचहि मे रोकि महाकालक मन्दिरक निकट अपन लेल चिता तैयार करबाक आज्ञा देलनि। सम्पूर्ण धन ब्राह्मणसभकेँ दऽ देबाक आ अनुयायी राजासभकेँ अपन-अपन देश घुरबाक आदेश देलनि। मुदा त्वरितक वैशम्पायनक शेष कथा सुनबाक विनती कयलक। राजाक दुःख विस्मयमे बदलल। सच्चा मित्रक भाँति अपन दुःख बिसरि सान्त्वना देबाक इच्छा देखबैत शुकनास कहलनि, ‘महाराज, देव, दानव, पशु आ मनुष्यसँ भरल, सुख-दुःखमे घूमैत एहि अद्भुत क्षणभङ्गुर संसारमे कोन घटना असम्भव अछि? तखन एहि वृत्तान्त पर सन्देह किएक? जँ कारण खोजैत छी तऽ अनेक बात केवल परम्परा पर आधारित होइतहुँ सत्य देखाइत अछि—विषाक्त व्यक्तिक उपचारमे ध्यान वा विशेष आसनक उपयोग, चुम्बक द्वारा लोहा खिंचब, विविध कर्ममे वैदिक अथवा अन्य मन्त्रक प्रभाव—जाहि सभमे पवित्र परम्परा प्रमाण अछि। पुराण, रामायण, महाभारत आदि मे शापक अनेक कथा अछि। शापेँ नहुष सर्प, सौदास नरभक्षी, ययाति वृद्ध, त्रिशङ्कु चाण्डाल भेलाह; स्वर्गवासी महाभिष शान्तनु रूपेँ जन्म लेलनि, गङ्गा हुनक पत्नी आ वसु हुनक पुत्र भेलाह। एतबे नहि, परमेश्वर विष्णु जमदग्निक पुत्र रूपेँ जन्म लेलनि, अपन चारि भाग कऽ दशरथक पुत्र भेलाह, आ मथुरामे वसुदेवक पुत्र रूपेँ सेहो जन्म लेलनि। अतः देवताक मनुष्यलोकमे जन्म अविश्वसनीय नहि। महाराज, गुणमे अहाँ प्राचीन महापुरुषसभसँ कम नहि छी; आ चन्द्रमा कमल-उत्पादक देवतासँ महान नहि अछि। पुत्रसभक जन्मक समय देखल सपना एहि कथाकेँ पुष्ट करैत अछि। चन्द्रमामे स्थित अमृत कुमारक देह सुरक्षित रखैत अछि, आ संसारकेँ आनन्द देनिहार हुनक सौन्दर्य निश्चय पृथ्वी पर रहबाक नियति रखैत अछि। अतः शीघ्र कादम्बरीक संग हुनक विवाह देखब आ एहि आनन्दमे जीवनक पूर्व दुःखसँ अनेक गुना प्रतिफल पाबि लेब। देवताक पूजा, ब्राह्मणकेँ दान आ तपस्या द्वारा एहि वरदानकेँ सुनिश्चित करबाक पूरा प्रयास करू।’ राजा सहमत भेलाह, मुदा स्वयं पुत्रक दर्शन लेल जेबाक निश्चय व्यक्त कयलनि। ओ रानी, शुकनास आ हुनक पत्नीक संग सरोवर दिस चललाह। स्वागत लेल आएल मेघनादक एहि आश्वासनसँ सान्त्वना पयलनि जे कुमारक देह प्रतिदिन अधिक उज्ज्वल भऽ रहल अछि। आश्रममे प्रवेश कयलनि। हुनक आगमनक समाचार सुनि महाश्वेता लज्जासँ गुफाक भीतर नुकि गेलीह आ कादम्बरी मूर्छित भऽ गेलीह। पुत्रकेँ केवल सुतल जकाँ देखि रानी दौड़ि निकट गेलीह आ स्नेहपूर्ण उलाहना दैत चन्द्रापीडसँ हुनका सभसँ बात करबाक विनती कयलनि। मुदा राजा स्मरण करौलनि जे शुकनास आ हुनक पत्नीकेँ सान्त्वना देब हुनक कर्तव्य अछि। ‘जिनका कारण पुत्रकेँ पुनः जीवित देखबाक आनन्द भेटत—ओ गन्धर्व-राजकुमारी एखन मूर्छामे छथि। हुनका बाँहमे लऽ चेतनामे आनू।’ तखन रानी कादम्बरीकेँ स्नेहसँ छुबि कहलनि, ‘माँ, धैर्य राखू। अहाँ नहि रहितहुँ तऽ हमर पुत्र चन्द्रापीडक देह के सुरक्षित रखित? निश्चय अहाँ पूर्णतः अमृतसँ बनल छी, ताहि कारण फेर ओकर मुख देख पबैत छी।’ चन्द्रापीडक नाम आ हुनकहि समान रानीक स्पर्शसँ कादम्बरीक चेतना घुरल। मदलेखाक सहायतासँ लज्जामे नत मुखेँ ओ कुमारक माता-पिताक उचित सम्मान कयलनि। हुनका ‘दीर्घायु होउ आ दीर्घकाल अखण्ड सौभाग्य भोगू’ आशीर्वाद भेटल, आ विलासवतीक ठीक पाछाँ बैसाओल गेल। राजा हुनका कुमारक सेवा पुनः करबाक निर्देश देलनि। स्वयं आश्रमक निकट शीतल शिलापट्टयुक्त, तपस्वीक योग्य एक पातक मण्डपमे निवास कयलनि। राजकीय अनुचर-वर्गसँ कहलनि जे आब दीर्घकालसँ पोसल संन्यासी जीवनक अभिलाषा पूरा करताह आ ओ सभ प्रजाक रक्षा करय। ‘योग्य व्यक्तिकेँ अपन स्थान सौंपि एहि दुर्बल, अनुपयोगी देहसँ परलोकक सुख अर्जित करी—ई निश्चय लाभे अछि।’ ई कहि राजा अपन अभ्यस्त समस्त सुख त्यागि अपरिचित वन-जीवन स्वीकार कयलनि। वृक्षक नीचाँ हुनका महल भेटल; लतासभमे अन्तःपुरक आनन्द; हरिणशावकसभमे मित्रक स्नेह; चीर आ वल्कलमे वस्त्राभूषणक सुख। जपमाला हुनक शस्त्र बनल, परलोक हुनक महत्त्वाकांक्षा, आ तपस्या धनक इच्छा। कादम्बरी आ महाश्वेता द्वारा आनल समस्त स्वादिष्ट भोजन अस्वीकार कऽ रानी आ शुकनासक संग ओतहि निवास करऽ लगलाह। प्रत्येक भोर-साँझ चन्द्रापीडक दर्शनक आनन्द पाबय लेल प्रत्येक कष्टकेँ तुच्छ मानलनि। ई कथा कहि ऋषि जाबालि अपन पुत्र हारीत आ आन तपस्वीसभसँ तिरस्कार-मिश्रित मुस्कानसँ कहलनि, ‘अहाँ सभ देखलहुँ जे एहि कथामे हमरा सभकेँ एतेक काल धरि बान्हि रखबाक आ हृदय मोहित करबाक शक्ति अछि। ई ओही प्रेमपीड़ित जीव अछि जे अपन दोषसँ स्वर्गसँ खसल, पृथ्वी पर शुकनासक पुत्र वैशम्पायन भेल, आ अपन क्रोधित पिताक शाप तथा महाश्वेताक हृदय-सत्यक आह्वानसँ आब सुग्गा रूपमे जन्म लेने अछि।’ ओ ई कहिये रहल छलाह कि हम मानो निन्नसँ जागि गेलहुँ। कम आयु होइतहुँ पूर्वजन्ममे प्राप्त समस्त ज्ञान जिह्वाक अग्रभाग पर आबि गेल; सभ कलामे निपुण भऽ गेलहुँ; स्पष्ट मानवीय वाणी, स्मृति आ मनुष्यक आकृति छोड़ि लगभग सभ गुण प्राप्त भऽ गेल। कुमारक प्रति स्नेह, अनियन्त्रित प्रेमोन्माद, महाश्वेताक प्रति समर्पण—सभ पुनः घुरि आयल। हुनक आ आन मित्रसभक समाचार जनबाक उत्कण्ठा उठल। अत्यन्त लज्जित होइतहुँ मन्द स्वरमे जाबालिसँ पुछलहुँ, ‘भगवन्, अहाँ हमर ज्ञान घुरा देलहुँ, मुदा हमर मृत्यु-दुःखसँ प्राण त्यागनिहार कुमारक कारण हृदय फाटि रहल अछि। कृपा कऽ हुनक समाचार कहू, जाहिसँ हम हुनक निकट जा सकी। पशु-जन्मो हमरा दुःख नहि देत।’ तिरस्कार आ दयाक मिश्रित भावसँ ओ उत्तर देलनि, ‘एखनो अपन पुरान अधीरता नहि रोकबह? पाँख बढ़लाक बाद पुछिह।’ तखन पुत्र पुछलनि जे ऋषिवंशमे जन्मल व्यक्ति प्रेमक एतेक दास कोना भेल। जाबालि उत्तर देलनि जे केवल मातासँ जन्मल हमर सन व्यक्तिमे ई दुर्बल आ असंयत स्वभाव होइत अछि। वेद कहैत अछि—‘माता-पिता जकाँ होइत छथि, सन्तान सेहो तहिना होइत अछि’; चिकित्साशास्त्र सेहो एहन सन्तानक दुर्बलता कहैत अछि। ओ कहलनि जे एहि जन्ममे हमर आयु छोट होयत, मुदा शाप समाप्त भेलाक बाद दीर्घायु प्राप्त होयत। हम विनयपूर्वक पुछलहुँ जे कोन यज्ञसँ आयु बढ़ा सकैत छी, मुदा ओ प्रतीक्षा करबाक आज्ञा देलनि। हुनक कथा सुनैत पूरा राति अनजाने बीति गेल छल, अतः भोरक आहुति देबाक लेल तपस्वीसभकेँ पठौलनि। हारीत हमरा लऽ अपन कुटीमे शय्याक निकट राखि प्रातःकर्म लेल चलि गेलाह। हुनक अनुपस्थितिमे दुःखसँ सोचलहुँ—पक्षी-योनिसँ फेर ब्राह्मण बनब, एतबे नहि, स्वर्गसुख पाओल ऋषि बनब कतेक कठिन होयत! तथापि जँ पूर्वजन्मक प्रियजनसँ मिलन नहि होयत तऽ जीवित किएक रही? ओही समय हारीत घुरि कपिञ्जलक आगमनक समाचार देलनि। थाकल होइतहुँ पहिने जकाँ स्नेहपूर्ण कपिञ्जलकेँ देखितहि हम उड़ि हुनका लग जेबाक प्रयास कयलहुँ। ओ हमरा उठा पहिने वक्ष, फेर माथ पर राखलनि। तखन कहलनि, ‘तोहर पिता श्वेतकेतु दिव्य दृष्टिसँ तोहर दुर्दशा जानि तोहर सहायताक लेल अनुष्ठान आरम्भ कयने छथि। अनुष्ठान आरम्भ होइतहि हम अश्व-रूपसँ मुक्त भऽ गेलहुँ। मुदा जाबालि तोरा पूर्वस्मृति करा देथि ताधरि ओ हमरा रोकने रहलाह। आब आशीर्वाद देबाक लेल पठौने छथि, आ ई कहबाक लेल जे तोहर माता लक्ष्मी सेहो अनुष्ठानमे सहायता करैत छथि।’ हमरा आश्रममे रहबाक आज्ञा दऽ ओ अनुष्ठानमे भाग लेबाक लेल आकाश दिस उठि गेलाह। किछु दिन बाद हमर पाँख पूर्ण बढ़ि गेल। महाश्वेताक समीप उड़ि जेबाक निश्चय कऽ उत्तर दिशा दिस चललहुँ। मुदा शीघ्र थाकनि घेरि लेलक। एक वृक्ष पर सुति गेलहुँ, आ जागलहुँ तऽ देखलहुँ जे भयानक चाण्डालक फन्दामे पड़ल छी। मुक्त करबाक विनती कयलहुँ—प्रियाक समीप जा रहल छी—मुदा ओ कहलक जे हमर गुणक चर्चा सुनने युवा चाण्डाल-राजकुमारीक लेल हमरा पकड़ने अछि। लक्ष्मी आ महान ऋषिक पुत्र होइतहुँ बर्बर लोकसँ सेहो त्याज्य जातिक बीच रहय पड़त—ई सुनि भयभीत भऽ गेलहुँ। हम तर्क देलहुँ जे कियो नहि देखत, अतः बिना भय हमरा छोड़ि सकैत अछि। ओ हँसि उत्तर देलक, ‘जकर देहहि मे शुभ-अशुभक साक्षी पाँच लोकपाल ओकर कर्म देखबाक लेल निवास करैत छथि, जँ ओ हुनका सभक अस्तित्व नहि मानैत अछि, तखन आन व्यक्तिक भयें धर्मक पालन कोना करत?’ ओ हमरा पकड़ि लऽ गेल। ओकरासँ मुक्त होयबाक अवसर खोजैत चारू दिस देखलहुँ तऽ बर्बर बस्ती देखाइत पड़ल—दुष्कर्मक साक्षात् हाट। चारू दिस शिकारमे लागल बालक छल—कुकुर छोड़ैत, बाजकेँ प्रशिक्षण दैत, फन्दा ठीक करैत, शस्त्र ढोइत, माछ पकड़ैत—भयानक वेशमे राक्षस जकाँ। घना बाँसवनक पाछाँ नुकायल घरसभक प्रवेशद्वार केवल हरितालक धुआँ उठैत देखि अनुमानित होइत छल। चारू दिस घेराबन्दी खोपड़ीसँ बनल; बाटक कूड़ाक ढेरी हड्डीसँ भरल; झोपड़ीक आँगन रक्त, चरबी आ काटल मांससँ दलदली छल। ओतय जीवन शिकार, भोजन मांस, अनुलेपन चरबी, वस्त्र मोट रेशम, शय्या सुखाओल चमड़ा, गृहसेवक कुकुर, सवारी गाय-बैल, पुरुषक व्यसन मदिरा आ स्त्री, देवताक आहुति रक्त, आ यज्ञ पशुहत्या छल। ओ स्थान समस्त नरकक प्रतिमा छल। तखन ओ पुरुष हमरा चाण्डाल-कन्याक समीप लऽ गेल। ओ प्रसन्नतासँ ग्रहण कऽ पिंजड़ामे राखैत कहलक, ‘तोहर सभ उद्दण्डता निकालि देब।’ हम की करितहुँ? मुक्त करबाक प्रार्थना करितहुँ तऽ हमर वाणीहि ओकरा हमरा चाहबाक कारण बनल छल; मौन रहितहुँ तऽ क्रोधमे निर्दय भऽ सकैत छल। तथापि असंयमहि हमर समस्त दुःखक मूल छल, अतः सभ इन्द्रिय नियन्त्रणमे रखबाक निश्चय कऽ पूर्ण मौन धारण कयलहुँ आ भोजन अस्वीकार कयलहुँ। दोसर दिन कन्या फल आ जल अनलक। हम नहि छुलहुँ तऽ कोमलतासँ कहलक, ‘भूख लगला पर पशु-पक्षीक भोजन छोड़ब प्रकृतिविरुद्ध अछि। पूर्वजन्म स्मरण रहबाक कारण जँ खाद्य-अखाद्यक भेद करैत छह, तथापि आब पशु-योनिमे जन्म लेने छह आ एहन भेदक पालन नहि कऽ सकैत छह। पूर्वकर्मसँ प्राप्त अवस्थाक अनुरूप आचरणमे कोनो पाप नहि। भोजनक नियम माननिहार मनुष्यक लेल सेहो विपत्तिक समय जीवन बचाबय लेल निषिद्ध भोजन ग्रहण करब उचित मानल गेल अछि; तखन तोहर लेल तऽ आरो उचित अछि। हमर जातिक हाथक भोजन होयबाक भय सेहो नहि कर। फल हमरा सभसँ सेहो लेल जा सकैत अछि, आ लोक कहैत अछि जे हमर पात्रसँ खसल जल भूमि पर पड़ितहि पवित्र भऽ जाइत अछि।’ ओकर बुद्धिमत्ता देखि विस्मित भऽ हम भोजन ग्रहण कयलहुँ, मुदा मौन बनल रहलहुँ। किछु काल बाद पूर्ण बढ़ि गेलहुँ। एक दिन जागलहुँ तऽ अपना केँ एहि स्वर्ण-पिंजड़ामे पयलहुँ आ ओही रूपमे चाण्डाल-कन्याकेँ देखलहुँ जाहि रूपमे, हे राजन्, अहाँ देखलहुँ। सम्पूर्ण बर्बर बस्ती देव-नगर जकाँ देखाइत छल। एहि परिवर्तनक अर्थ पुछबो नहि कऽ पयलहुँ कि कन्या हमरा अहाँक चरणमे लऽ आयल। मुदा ओ के छथि, चाण्डाल रूप किएक धारण कयलनि, हम किएक बान्हल गेलहुँ आ एतय किएक आनल गेलहुँ—ई जनबाक लेल हे राजन्, हमो अहाँकहि समान उत्सुक छी।’ ई सुनि राजा महान विस्मयमे कन्याकेँ बजबौलनि। ओ प्रवेश कऽ अपन तेजसँ राजाकेँ अभिभूत करैत गरिमापूर्ण स्वरमे कहलनि, ‘हे पृथ्वीक रत्न, रोहिणीक स्वामी, कादम्बरीक नेत्रक आनन्द—हे चन्द्रमा, अहाँ अपन पूर्वजन्म आ एहि मूर्ख जीवक कथा सुनि लेलहुँ। ओकरहि मुखसँ जानि लेलहुँ जे एहि जन्मोमे ओ पिताक आज्ञा उपेक्षित कऽ वधूकेँ खोजय निकलि पड़ल। हम ओकर माता लक्ष्मी छी। दिव्य दृष्टिसँ ओकर प्रस्थान देखि पिता हमरा आज्ञा देलनि जे ओकर लेल धार्मिक अनुष्ठान पूर्ण होयबा धरि सुरक्षित राखी आ पश्चात्ताप कराबी। आब अनुष्ठान पूर्ण भऽ गेल। शापक अन्त निकट अछि। अहाँ दुनू एहि पर आनन्दित होउ, ताहि लेल ओकरा अहाँक समीप अनलहुँ। मनुष्यक स्पर्शसँ बचबाक लेल चाण्डाल रूप धारण कयलहुँ। आब अहाँ दुनू जन्म, वृद्धावस्था, पीड़ा आ मृत्युक रोगसँ घेरल एहि देहकेँ तत्काल त्यागू आ अपन-अपन प्रियाक संग मिलनक आनन्द प्राप्त करू।’ ई कहि ओ सहसा आकाशमे उठि गेलीह। सभ लोकक दृष्टि हुनक पाछाँ लागल रहल आ नूपुरक झनकारसँ आकाश गूँजि उठल। हुनक वचनसँ राजाकेँ पूर्वजन्म स्मरण भऽ आयल। ओ कहलनि, ‘प्रिय पुण्डरीक, जे आब वैशम्पायन कहल जाइत छह, ई बड़ सुखक बात अछि जे हमरा दुनूक शाप एकहि क्षण समाप्त भऽ रहल अछि।’ मुदा ओ बोलिये रहल छलाह कि कामदेव कादम्बरीकेँ अपन सर्वोत्तम शस्त्र बना धनुष तानलनि आ राजाक प्राण नष्ट करबाक लेल हृदयमे प्रवेश कयलनि। प्रेमक ज्बला हुनका पूर्णतः दग्ध कऽ देलक। महाश्वेताक अभिलाषामे वास्तविक पुण्डरीक वैशम्पायन सेहो राजाकहि समान पीड़ा सहऽ लगल। ओही समय मानो चन्द्रापीडकेँ पूर्णतः दग्ध करबाक लेल सुगन्धित वसन्त ऋतु आबि गेल। समस्त प्राणीकेँ मातल बनबैत वसन्तकेँ कामदेव कादम्बरीक हृदय भ्रमित करबाक लेल अपन सभसँ शक्तिशाली बाण बना लेलनि। कामोत्सवक दिन ओ बड़ कठिनाइसँ बितौलनि। सन्ध्या समय दिशासभ अन्हार होमय लगल तऽ स्नान कयलनि, कामदेवक पूजा कयलनि, आ धोओल, कस्तूरी-सुगन्धित चन्दनसँ अनुलिप्त तथा फूलसँ सजाओल चन्द्रापीडक देह हुनक सोझाँ राखलनि। गहन अभिलाषासँ भरल ओ मानो अनजाने सहसा निकट गेलीह। प्रेम हुनक स्त्री-सुलभ संकोच हरि लेने छल; आब स्वयंकेँ रोकि नहि सकलीह आ चन्द्रापीडकेँ जीवित बुझि हुनक गला सँ लिपटि गेलीह। हुनक अमृतमय आलिङ्गनसँ कुमारक प्राण घुरि आयल। निन्नसँ जागल व्यक्ति जकाँ ओ हुनका गाढ़ आलिङ्गनमे भरि प्रसन्न करैत कहलनि, ‘भीरु, भय छोड़ू! अहाँक आलिङ्गन हमरा जीवित कऽ देलक। अहाँ अमृतसँ उत्पन्न अप्सरा-वंशमे जन्मल छी; केवल शाप अहाँक स्पर्शकेँ हमरा पहिने जीवित करबासँ रोकने छल। आब शूद्रकक ओ मनुष्य-रूप त्यागि देने छी जे अहाँक वियोगक दुःखक कारण छल; मुदा एहि देहकेँ रखने रहलहुँ, कारण एहि देह अहाँक प्रेम प्राप्त कयलक। आब ई संसार आ चन्द्रलोक दुनू अहाँक चरणमे बान्हल अछि। अहाँक सखी महाश्वेताक प्रिय वैशम्पायन सेहो हमरहि संग शापसँ मुक्त भऽ गेल।’ चन्द्रापीडक रूपमे निहित चन्द्रमा ई कहिये रहल छलाह कि श्वेतवर्ण पुण्डरीक आकाशसँ उतरलाह। एखनो महाश्वेता द्वारा देल मोतीक माला पहिरने आ कपिञ्जलक हाथ पकड़ने छलाह। कादम्बरी आनन्दसँ महाश्वेताकेँ प्रियतमक घुरबाक समाचार देबाक लेल दौड़लीह। चन्द्रापीड कहलनि, ‘प्रिय पुण्डरीक, पूर्वजन्ममे अहाँ हमर जमाय छलहुँ, मुदा पछिला जन्म जकाँ आब हमर मित्र बनू।’ एहि बीच कीयूरक हंस आ चित्ररथकेँ समाचार देबाक लेल हेमकूट दिस चलि गेल। मृत्युञ्जय शिवक प्रार्थनामे लीन तारापीड आ विलासवतीक चरणमे मदलेखा खसि आनन्दक समाचार सुनौलनि। तखन वृद्ध राजा शुकनासक सहारासँ रानी आ मनोरमाक संग अयलाह, आ सभक आनन्दक सीमा नहि रहल। कपिञ्जल श्वेतकेतुक सन्देश सेहो शुकनासकेँ देलनि—‘पुण्डरीककेँ केवल हम पोसलहुँ; वास्तवमे ओ अहाँक पुत्र अछि आ अहाँकेँ प्रेम करैत अछि। अतः ओकरा अनिष्टसँ बचाउ आ अपन पुत्र जकाँ पालन करू। हम अपन प्राण ओकर भीतर राखि देने छी; ओ चन्द्रमा धरि दीर्घायु होयत। एहि प्रकार हमर अभिलाषा पूर्ण भेल। आब हमरा भीतरक दिव्य जीवनशक्ति देवलोकसँ ऊपरक प्रदेशमे पहुँचबाक लेल व्याकुल अछि।’ ओ राति पूर्वजन्मक वार्तामे बीतल। दोसर दिन दुनू गन्धर्वराज अपन-अपन रानीक संग अयलाह आ उत्सव हजार गुना बढ़ि गेल। मुदा चित्ररथ कहलनि, ‘अपन महल रहितहुँ वनमे उत्सव किएक मनाबी? यद्यपि हमरा सभक बीच केवल पारस्परिक प्रेम पर आधारित विवाह धर्मसम्मत अछि, तथापि लोकाचारक पालन करू।’ तारापीड उत्तर देलनि, ‘नहि। मनुष्य जाहि स्थान पर जीवनक परम आनन्द पबैत अछि, वन होइतहुँ ओतहि ओकर घर होइत अछि। एहि स्थानसँ अधिक आनन्द हम कतय पयलहुँ? हमर सभ महल सेहो अहाँक जमायकेँ समर्पित अछि। अतः अपन पुत्रकेँ वधूक संग लऽ जाउ आ गृहस्थ-सुख भोगू।’ तखन चित्ररथ चन्द्रापीडक संग हेमकूट गेलाह आ कादम्बरीक हाथक संग सम्पूर्ण राज्य हुनका अर्पित कयलनि। हंस सेहो पुण्डरीकक संग एही कयलनि। मुदा दुनू किछुओ स्वीकार नहि कयलनि, कारण हृदयप्रिय वधू प्राप्त भेलासँ हुनक समस्त अभिलाषा पूर्ण भऽ गेल छल। एक दिन पूर्ण आनन्दमे रहितहुँ कादम्बरी आँखिमे आँसू भरि पतिसँ पुछलनि, ‘हम सभ मरि पुनः जीवित भऽ परस्पर मिलि गेलहुँ, मुदा केवल पत्रलेखा एतय नहि अछि, ने ई ज्ञात अछि जे ओकर की भेल—एहन किएक?’ कुमार कोमलतासँ उत्तर देलनि, ‘प्रिय, ओ एतय कोना रहि सकैत अछि? ओ हमर पत्नी रोहिणी अछि। हमरा शाप भेटल सुनि हमर दुःखसँ दुःखी भऽ ओ मनुष्यलोकमे हमरा असगर छोड़ब स्वीकार नहि कयलक। हम रोकबाक प्रयास कयलहुँ, तथापि हमर सेवा करबाक लेल हमरा सँ पहिनहि ओहि लोकमे जन्म ग्रहण कयलक। जखन हम दोसर जन्ममे प्रवेश कयलहुँ, तखन ओ फेर पृथ्वी पर उतरऽ चाहलक, मुदा हम ओकरा चन्द्रलोक घुरा पठा देलहुँ। ओतय अहाँ ओकर पुनः दर्शन करब।’ रोहिणीक कुलीनता, कोमलता, उच्च आत्मा, निष्ठा आ आकर्षण देखि कादम्बरी विस्मित आ संकुचित भऽ गेलीह; एको शब्द नहि कहि सकलीह। हेमकूटमे चन्द्रापीडक बिताओल दस राति एक दिन जकाँ शीघ्र बीति गेल। हुनकासँ पूर्ण सन्तुष्ट चित्ररथ आ मदिरा विदा देलनि, तखन ओ पिताक चरणमे पहुँचलनि। अपन दुःखमे सहभागी सामन्तसभकेँ अपन समान अवस्था प्रदान कयलनि। शासनक भार पुण्डरीक पर राखि सांसारिक दायित्व त्यागने माता-पिताक मार्गक अनुसरण कयलनि। कखनो जन्मभूमिक प्रेमसँ उज्जयिनीमे रहैत छलाह, जतय नागरिक विस्मयसँ विस्तृत आँखि कऽ हुनका देखैत छल; कखनो गन्धर्वराजक सम्मानसँ अनुपम सुन्दर हेमकूटमे; कखनो रोहिणीक आदरसँ चन्द्रलोकमे, जतय अमृतक शीतलता आ सुगन्धसँ प्रत्येक स्थान मनोहर छल; कखनो पुण्डरीकक प्रेमसँ लक्ष्मीक निवासबला ओहि सरोवरक तट पर, जतय राति-दिन कमल खिलल रहैत; आ कादम्बरीकेँ प्रसन्न करबाक लेल अनेक आन रमणीय स्थानमे। कादम्बरीक संग ओ अनेक सुख भोगलनि, जाहिमे दू जन्मक अभिलाषा नित्य नव आ अक्षय आनन्द भरैत रहल। केवल चन्द्रमा कादम्बरीक संग अथवा कादम्बरी महाश्वेताक संग आनन्दित नहि भेलीह; महाश्वेता पुण्डरीकक संग आ पुण्डरीक चन्द्रमाक संग—सभ परस्परक संग अनन्त आनन्द बितौलनि आ सुखक परम शिखर प्राप्त कयलनि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१९.गजेन्द्र ठाकुर- आगमडम्बरम् जयन्त भट्ट (नैयायिक)- मूल संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर आगमडम्बरम् जयन्त भट्ट (नैयायिक) मूल संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर पात्र-परिचय रंगमञ्च पर आगमनक क्रमसँ — मूल संस्कृत नाम मैथिली परिचय सूत्रधारः सूत्रधार (रंगमञ्चक निर्देशक) पारिपार्श्वकः पारिपार्श्वक, सूत्रधारक सहायक भिक्षुः बौद्ध भिक्षु, नाम धर्मोत्तर उपासकः उपासक, हुनक शिष्य सङ्कर्षणः, स्नातकः सङ्कर्षण, मीमांसक स्नातक; बादमे राजा शङ्करवर्मनक अधिकारी बटुः बटु (बालक), स्नातकक शिष्य प्राश्निकाः प्राश्निक (शास्त्रार्थक निर्णायक सभ) चेटः चेट (सेवक) क्षपणकः जैन भिक्षाचर क्षपणिका जैन साध्वी भिक्षुः जैन मुनि, नाम जिनरक्षित शिष्याः हुनक शिष्य सभ तापसाः जैन तपस्वी नीलाम्बराः नीलाम्बर सभ (आचार-विरोधी तपस्वीक एक समूह) प्रथमः साधकः पहिल शैव साधक, नाम कङ्कालकेतु द्वितीयः साधकः दोसर शैव साधक, नाम श्मशानभूति पुरुषः सेवक पुरुष भट्टारकः सैद्धान्तिक शैव मठाधीश, नाम धर्मशिव तापसाः शैव तपस्वी सभ वृद्धाम्भिः वृद्धाम्भि, भौतिकवादी (चार्वाक) दार्शनिक शिष्याः हुनक शिष्य सभ ऋत्विक् ऋत्विक् (वैदिक याजक) उपाध्यायः उपाध्याय (वैदिक शिक्षक) मञ्जीरः मञ्जीर, राजाक अधिकारी धैर्यराशिः धैर्यराशि (उपनाम भट्ट सहट), न्यायदर्शनक प्रख्यात दार्शनिक वादिनः वादी सभ (शास्त्रार्थकर्ता) प्रस्तावना: वैराग्य अनादि अविद्याक क्रमशः विनाश करनिहार ब्रह्म जाहिमे तीव्र नव आनन्द झिलमिलाइत अछि, आ जकर चेतनाक स्तर धरि “अवतरण” आरम्भ होइतहि आन मनोहर विषयक भोगक इच्छा शान्त भऽ जाइत अछि, से अहाँ सभक समक्ष प्रकाशित होथि। मङ्गलाचरण समाप्त भेलापर सूत्रधार कहैत अछि: धिक्कार, धिक्कार! नट केर जीविका सचमुच अत्यन्त नीच अछि—निरन्तर घोर छल-कपट केर कोलाहल। शिव, विष्णु, ब्रह्मा, ऋषि, राजा, पशुसमान मूर्ख, लम्पट, कायर, वीर, सुखी, दुःखी—नट लोकक सोझाँ कनेको लज्जा नहि करैत सभटा रूप धारण करैत अछि; वास्तवमे पेट भरबाक लेल ओ केवल अभिनय-कौशलक आश्रय लैत अछि। एहन दशामे ई नीच कला बन्द कऽ देब नीक—जाहिमे फल अल्प, कष्ट बहुत आ लज्जा ताहूसँ बेसी अछि। कोनो आश्रममे गुरुक गृहसँ जुड़ि मनुष्यक परम पुरुषार्थ—समस्त दुःखक निवृत्ति—प्राप्त करबाक प्रयत्न करब। (विचार करैत) मुदा प्रस्थानसँ पूर्व अपन दयनीय परिवारक ई अभागल भार केकरा सुपुर्द करूँ? (आगाँ देखैत) पहिने ई बुझि ली जे ओकर विचार की अछि। सहायक प्रवेश करैत अछि, सूत्रधार दिस देखैत कहैत अछि: आइ वैराग्यसँ हुनक मुख एतेक मलिन किएक देखाइत अछि? पूछैत छी। (निकट आबि) आर्य, मुखपर एतेक शोक किएक? कतहु टीकाकारक शिष्यसभ अहाँकेँ कोनो काज तँ नहि सौंपि देने अछि? सूत्रधार ऊपर कहल बात “दुःखक निवृत्ति” धरि फेर कहैत अछि। सहायक: वैराग्य नहि करू, एकर कोनो आवश्यकता नहि। देवता, मनुष्य वा पशुमे के एहन अछि जे छल-मायासँ मुक्त भऽ परम पद प्राप्त कऽ लेने हो? ब्रह्मासँ लऽ कऽ पशु धरि ई समस्त प्राणिसमूह केवल मायाक कारण संसारमे घूमि रहल अछि। अहाँक दशा हुनकासँ कोना बेसी खराब? मायासँ ठकल, अन्ततः असत्य, समस्त जगत्‌क आचरणसँ हमर आचरण अलग कोना भऽ सकैत अछि? सूत्रधार: मित्र, अहाँ ठीक कहैत छी। मुदा हमर आचरण हुनकासँ खराब नहि होइतो, एकरा जारी रखब हमरा असम्भव बुझाइत अछि। सहायक: से किएक, आर्य? सूत्रधार: मित्र, महर्षि भरत द्वारा उपदिष्ट दस प्रकारक नाट्य-विधिक मंचनमे की हम परिश्रम नहि कएलहुँ? मुदा आब माननीय भट्ट जयन्त आबि रहल छथि। बाल्यकालमे व्याकरणपर व्याख्याग्रन्थ लिखबाक कारण ओ ‘टीकाकार’ नामसँ सेहो प्रसिद्ध छथि। हुनक शिष्य-मण्डली हमरा अपन गुरुक नवीन कृति—‘धर्मक भारी आडम्बर’ नामक एक अद्भुत नाटक—मंचित करबाक आज्ञा देने अछि। मुदा एकर मंचन हम कोना करी? ई न सांसारिक कथावस्तुपर आधारित अछि, न नाट्यशास्त्रक नियम मानैत अछि, आ एकर पहिले कहियो अभिनय सेहो नहि भेल अछि। तेँ ई अभागल जीविका छोड़ि देबहि हमरा नीक बुझाइत अछि। सहायक: आर्य, एना नहि कहू। टीकाकारक एहि माननीय शिष्यसभक आज्ञाक विरोध करब व्यर्थ अछि। अहाँक चिन्ता जे नाटक नियमक पालन नहि करैत अछि—से की सूत्रधारक दोष थिक? कवि भरतक उपदेशक कनेको परवाह नहि कऽ रचना करैत छथि; तैयो हुनक शिष्य एकर प्रचार करैत छथि, आ ओहीसभ अहाँक दर्शक सेहो छथि। तेँ मंचित कऽ दिअ। कोनो आन तटस्थ व्यक्ति एकर दोष खोजबाक कष्ट किएक करत? सूत्रधार: लोकक निन्दाक हमरा चिन्ता नहि। सहायक: तँ की राजाक कोनो धमकीसँ भयभीत छी? सूत्रधार: (मुस्कुराइत) से बात सेहो नहि। सहायक: तखन विलम्ब किएक? नटसभकेँ बौद्ध, जैन आदि अलग-अलग भूमिका बाँटि दिअ। सूत्रधार: मित्र, छल आ मायासँ भरल ई असह्य अभिनय-जीविका आब हम चला नहि सकैत छी। काव्य नियम तोड़य वा मानय, लोक क्रुद्ध होअय वा प्रसन्न—हमरा सभसँ विरक्ति भऽ गेल अछि। आइए ई पेशा छोड़ि तीर्थयात्रापर निकलि जायब। अहाँ वा तँ हमर निर्धन परिवारक पालन करू, अथवा हमरासँ चलू। हम स्वयं सत्य जानबाक लेल उत्कण्ठित छी। समीपक एहि विशाल विहारमे प्रवेश करब, जतय सैकड़ो राग-विरहित भिक्षु रहैत छथि आ जे परम मोक्षक मार्ग देखबैत अछि। दुनू प्रस्थान करैत छथि। प्रस्तावना समाप्त। प्रथम अङ्कक प्रस्तावना: बुद्धक उपदेश (तखन एकटा चौकीपर बैसल, लाल चीवर पहिरने बौद्ध भिक्षु आ ओकर सोझाँ ओकर गृहस्थ शिष्य प्रवेश करैत अछि।) भिक्षु: (वैराग्यपूर्वक) हाय! एहि अनादि संसारक रीति एहने अछि—मोहग्रस्त जीव जन्म लैत अछि, फेर मरैत अछि; मरि कऽ फेर जन्म लैत अछि। एहि दुःखमय मार्गकेँ देखनिहार बुद्धिमान मनुष्यकेँ अपन चित्त ओहि अवस्थादिस लगयबाक चाही, जतय जन्म आ मृत्यु दुनूक अन्त भऽ जाइत अछि। शिष्य: हे पूज्यवर, जन्म-मृत्युक व्यवहारसँ परे ई स्थान कोन अछि? आ कोन उपायसँ ओ प्राप्त होइत अछि? भिक्षु: बुद्धिमान मित्र, जँ जानबाक उत्कण्ठा अछि तँ आब चारि आर्यसत्य बुझबाक प्रयत्न करू। शिष्य: हे पूज्यवर, ओ चारि आर्यसत्य कोन-कोन अछि? भिक्षु: बुद्धिमान मित्र—दुःख, दुःखक कारण, दुःखक निरोध आ मार्ग—ई चारि आर्यसत्य अछि। शिष्य: हे पूज्यवर, एतबासँ हमर ज्ञान नहि खुजल। कृपा कऽ विस्तारसँ बुझाउ। भिक्षु: आर्य, हम अहाँकेँ बुझबैत छी। प्रथमतः, जे किछु अछि से सभ दुःख अछि—व्यक्तिगत अनुभूतिमे सुखक विपरीत। जाहिसँ ई उत्पन्न होइत अछि, से कारण अर्थात् मोहक शक्ति अछि। समस्त क्लेशक अन्त निर्वाणे निरोध अछि। सम्यक् विचारक लोक निर्वाण प्राप्त करबाक साधनकेँ मार्ग कहैत छथि। शिष्य: हे पूज्यवर, दीर्घकालसँ निरन्तर बहैत, पार करब कठिन एहि दुःखक गहिर जलकेँ आत्मा कोन उपायसँ पछाड़ि निर्वाणमे जा टिकैत अछि? भिक्षु: भद्र, अहाँ बात बुझले नहि। वास्तवमे दुःखक सङ्कटसँ निकलि निर्वाण धरि पहुँचयबला कोनो आत्मा नामक वस्तु अछि नहि। संसाररूपी कारागार—जतय कठोर यातना भोगल जाइत अछि—केँ टिकौने रखनिहार दृढ़ खम्भा केवल स्थायी आत्माक आग्रह थिक। बुझबाक लेल: “ई हम छी” एना माननिहार जीव अनिवार्य रूपसँ “ई हमर अछि” सेहो मानत; ‘हम’ आ ‘हमर’क भावमे पड़ल मन्दबुद्धि अपन हानिकारक कामना नहि छोड़त। जकर तृष्णा शान्त नहि भेल, ओकरा लेल वैराग्यक अभ्यास बहुत दूर अछि; आ वैराग्यक अभ्यास बिना संसार-सागर कोना पार कएल जा सकैत अछि? शिष्य: हे पूज्यवर, जँ सचमुच कोनो स्थायी आत्मा नहि अछि, तँ संसारक दुःख के भोगैत अछि? अथवा ओकरासँ ऊपर उठि निर्वाण-धाममे के पहुँचैत अछि? भिक्षु: (मुस्कुराइत) वत्स, जँ स्थायी आत्मा होइत तँ निरोध, निर्वाण, परम कल्याण वा पूर्णता आरो असम्भव होइत; कारण जे स्थायी अछि ओकर निरोध भऽ नहि सकैत अछि। तेँ ई जगत् केवल चैतन्य थिक, जे सुख-दुःख आदि अनेक रूपसँ मलिन अछि आ अनादि प्रवाहमे सक्रिय विविध संस्कारक अनुसार असंख्य रूप धारण करैत अछि। अनात्मता आदिक भावनाक ई मार्ग जखन आकस्मिक गुणक समूहसँ उपजल अनेक मलिनता हटा कऽ एकरा केवल शुद्ध चैतन्यमे प्रतिष्ठित कऽ दैत अछि, तखन ई प्रवाह बनल रहय वा स्वयं प्रवाह कटि जाय—निर्वाणक शीघ्र मार्ग एहीमे अछि। शिष्य: हे पूज्यवर, जँ स्थायी आत्मा नहि अछि तँ परलोकमे अपन कर्मक फल के भोगैत अछि? आ एहि लोकमे सेहो स्मृतिपर आधारित ई क्रियासभ केकर अछि? भिक्षु: हम कुशलतासँ बुझबैत छी। स्थायी पदार्थ क्रमशः वा एक्के बेर कारणगत कार्यक्षमता नहि राखि सकैत अछि; कार्यक्षमता नहि रहबाक कारण ओ परमार्थतः सत्य नहि अछि। ज्ञानीसभ कहैत छथि—“जे कारणगत कार्य करबाक सामर्थ्य रखैत अछि, केवल सेही परमार्थतः सत्य अछि।” आरो सुनू: ई घड़ा, स्वभावतः नश्वर होअय वा नहि, हथौड़ा वा आन कारणसँ नष्ट नहि कएल जा सकैत अछि। एहन कारण वा तँ निरर्थक होयत अथवा असमर्थ; आ जँ युगभरि ई कारण उपस्थित नहि होअय तँ घड़ा नष्ट नहि होयत। तेँ पदार्थ उत्पन्न होइतहि नष्ट भऽ जाइत अछि, मुदा एके प्रवाहमे रहबाक कारण सत्य बुझाइत अछि। प्रवाहमे रहबाक कारण एहन स्थायी कर्ताक कल्पना सहज होइत अछि, जे स्वयं ओहि कर्ताक कर्मफलक भोक्ता अछि, आ स्मृति आदि क्रियाक सेहो आधार अछि। शिष्य: जँ सभ पदार्थ क्षणिक अछि, अर्थात् दोसर क्षण धरि टिकैत नहि, तँ चैतन्य ओकरा अपन विषय कोना बनबैत अछि? स्पष्ट अछि जे विषय वा तँ ज्ञानक संगहि, अथवा ओकर बाद ज्ञान द्वारा प्रकाशित होयत। अथवा, जँ ओ ज्ञान उत्पन्नो करैत हो, तखन धरि ओकरा विषय नहि बनाओल जा सकैत अछि जखन धरि ओ ज्ञान सीमाबद्ध भऽ कोनो रूप ग्रहण नहि करय। नहि तँ क्षणिक वस्तुक प्रत्यक्षज्ञानक व्याख्या नहि भऽ सकत। भिक्षु: आर्य, स्पष्ट देखब तँ वास्तवमे ज्ञानक विषय बनयबला कोनो पदार्थ अछि नहि। स्वयं चैतन्ये नील, पीत आदि रूपसँ जड़ित भऽ प्रकट होइत अछि। किएक—ई पूछैत छी? मनुष्यकेँ ज्ञान आ ओकर विषयक एकसंग दू-रूपी अनुभूति नहि होइत अछि। आ जँ चेतनाहीन विषय स्वयंप्रकाश ज्ञान द्वारा ग्रहण होइत, तँ ग्रहण पहिने ग्रहण कएल जाइत—जेनाकि दीपकक प्रकाश पहिने देखाइत अछि। मुदा रूपहीन ज्ञान ग्रहण नहि भऽ सकैत अछि। तेँ स्वयं ई ज्ञान विभिन्न रूपमे प्रकाशित होइत अछि। दोसर कोनो बाह्य विषय-वस्तु कोना भऽ सकैत अछि? एहि कारण सभ किछु शून्य अछि, सभ किछु क्षणिक अछि, सभ किछु स्थायी सारविहीन अछि, सभ किछु दुःख अछि। एहि प्रकार ध्यान करैत मनुष्य निर्वाण प्राप्त करैत अछि। नेपथ्यमे काठक घण्टी बजैत अछि। शिष्य: (सुनैत) हे पूज्यवर, ई निश्चय भिक्षुसमुदायक एकत्र होयबाक समय सूचित करयबला काठक घण्टी थिक। आब की करब, से पूज्यवर स्वयं निश्चित करू! भिक्षु: तखन एहि बातक ध्यान राखी जे अबेर नहि हो। (दुनू उठि कऽ चलैत आ चारूकात देखैत अछि।) ई एकटा युवा ब्राह्मण आबि रहल अछि—श्याम वक्षस्थलपर कमल-तन्तु जेकाँ उज्जर यज्ञोपवीत, हाथमे बाँसक दण्ड। उचित उपाय करी, नहि तँ एकर कारण निर्धारित समय चूकि जायब। शिष्य: हे पूज्यवर, ई युवा ब्राह्मण बहुत कालसँ एतय ठाढ़ अछि। जखन पूज्यवर एहि गाछक नीचाँ बैसलहुँ, ठीक ओही क्षण ई आयल छल, मुदा अहाँक दृष्टि नहि पड़ल। लताक जालमे नुकायल ई पूज्यवरक समस्त उपदेश सुनि लेने अछि। भिक्षु: से जे हो, एहन व्यक्तिक कारण आब हम किएक अबेर करी? भिक्षु शिष्यक संग प्रस्थान करैत अछि। प्रथम अङ्क: बौद्धसभ पराजित तखन पूर्वोक्त रूपमे स्नातक आ बालक प्रवेश करैत अछि। स्नातक: हम विधिपूर्वक वेद पढ़लहुँ, छह वेदाङ्गमे पारङ्गत भेलहुँ, आ मीमांसाक सेहो परीक्षण कएलहुँ। एहि प्रकार द्विजक योग्य कर्तव्य पूरा कएलहुँ। मुदा जखन धरि निरन्तर कुतर्कक घातक शस्त्र लहरा कऽ अपन वाणी दूषित करनिहार वेद-विरोधीसभकेँ नीचा नहि देखायब, तखन धरि अध्ययनमे कएल हमर परिश्रम निष्फल बुझायत। आ शुद्धोदन-पुत्रक ई मूर्ख शिष्यसभ वेदकेँ विदीर्ण करनिहारसभमे सभसँ आगाँ अछि। तेँ चोर जेकाँ दण्ड देबाक क्रममे ई सभ पहिने आयत। (ओ चलैत अछि।) बालक: आर्य, स्नानक सामग्री लऽ आयल छी। अहाँ स्नान करबाक लेल जाइत छलहुँ। स्नातक: तँ की भेल? बालक: परिस्थिति अनुकूल नहि बुझाइत अछि। बाटपर ई सभ लोक निश्चय विहारहि दिस जा रहल होयत। स्नातक: तखन पहिने एहि विहारक भिक्षुसभकेँ देखि ली, स्नान बादमे करब। बालक: जेना आर्यक आज्ञा। दुनू चलैत अछि। स्नातक: (आगाँ देखैत) अहा, कतेक मनोहर विहार! कारण एतय— चन्द्रकिरणसँ चमकैत हिमालयक शिखरकेँ टक्कर दैत मन्दिरक उच्च शिखर; सघन आमक बारी; घाससँ भरल रमणीय लता-मण्डप; आ कमल-परागसँ देह लाल भेल भ्रमरीसभ कमल-सरोवरक ऊपर मँडरा रहल अछि, जकर जल निकलैत कमल-अङ्कुरसँ रोमाञ्चित भऽ शरदाकाशक अनुकरण करैत अछि। ओ कमल-सरोवर दिस देखैत अछि। तटस्थ गाछक समूहक प्रतिबिम्ब—डाढ़ि नीचाँ आ पसरल जरि ऊपर—सरोवरक जलकेँ शोभायमान कऽ रहल अछि। एतय जलमे हम गाछक डाढ़िपर बैसल, चोँच खोलि फलक टुकड़ा खाइत चिड़ैसभकेँ देखि रहल छी। बालक: आर्य, पूजाक सामग्रीक प्रचुरता देखू—फूल, धूप आ चन्दन, कपूर, केसर तथा कस्तूरीक लेप; ई सभ सुवर्ण बुद्ध-प्रतिमापर अर्पित अछि, जाहिसँ घन, विराट् तेज निकलि रहल अछि, आ जे सुन्दर रङ्ग तथा अलङ्कारसँ सजल अछि। ई प्रतिमासभ मेरु-पर्वत समान उच्च मन्दिरमे स्थापित अछि, जकरा मन्द पवनमे काँपैत बहुरङ्गी ध्वजासभ शोभित कऽ रहल अछि। अहा, अद्भुत! स्नातक: (देखैत) ई स्पष्टतः तपस्वीक शिक्षाश्रम नहि, राजोद्यान थिक! अहो काल! अहो आचार! लम्पट मार्गदर्शकसभक लूटक शिकार धनी लोक पूर्णतः व्यर्थ बाटपर भटकि गेल अछि आ अपन बहुविध धन अनुचित वस्तुपर फेकि रहल अछि। ई धर्म जँ छलो हो, तैयो अशान्त लोकक योग्य एतेक मनोरञ्जन-सामग्री ओहि लोकक लेल निरर्थक अछि जे कथित रूपसँ इन्द्रियसुखसँ चित्त फेरि लेने छथि, बारम्बार ध्यानक अभ्यासमे तत्पर छथि आ जेना-तेना जीवन धारण करैत छथि। बालक: आर्य, देखू, देखू! चूनासँ उज्जर एहि भवनक अटारीमे बौद्ध भक्तसभ भोजनक लेल तैयार बुझाइत छथि। इत्र, फूल आ धूपक गन्धक राशि दसों दिशाकेँ भरि रहल अछि। स्नातक: नीक देखलहुँ। हमरा सभकेँ देखितहि सम्भवतः ई भिक्षुसभ अपन व्यवहारमे सङ्कोच करत। तेँ एहि लता-मण्डपमे नुकायल रहि किछु काल हुनक आचरण देखि ली। दुनू सेहिए करैत अछि। स्नातक: (उत्सुकतासँ देखैत) आश्चर्य! विहारक भोजन करबाक हड़बड़ीमे एको गोटे स्नानादि शुद्धि तक नहि कएलक। बालक: स्नान छोड़ू, कपड़ो नहि बदललक! स्नातक: (ध्यानसँ देखैत) आचमनसँ शुद्धि करबाक हुनक विधि सेहो शूद्रसभ जेकाँ अछि! अहो! चारू वर्णक लोक आ सङ्कर वर्णक लोक सभ एक्के पाँतिमे भोजन कऽ रहल अछि! एहि आश्रमक नियम कतेक रमणीय अछि! बालक: आर्य, आरो देखू! ई भरल-पुरल देहबाली दासीसभ भोजन परोसबाक लेल तैयार छथि आ चञ्चल कटाक्षसँ भिक्षुसभक दृष्टि बाँधि रहल छथि! आ एतय निर्मल पात्रमे कोनो पेय परसल जा रहल अछि। स्नातक: एतय “फलक रस” नाम धऽ मदिरा अछि, आ शाकाहारीक योग्य कहल जाएबला मांस सेहो। अहा, कतेक कठोर तपस्या! बालक: आर्य, देखू, देखू, ई भिक्षु! पियासल होइतो, जाहि पेयमे नीलकमल घूमि रहल अछि, ओकरा जीहसँ कम, दासीसभक सरल मुखकेँ आँखिसँ बेसी पीबि रहल अछि। स्नातक: बस, राग-विरहित लोकक विहार-अनुशासन देखि लेलहुँ। बालक: विलासोद्यानमे निवास, पेय आ भोजन सहज उपलब्ध, नियमक कोनो झञ्झट नहि—धन्य छथि जे बौद्ध बनैत छथि! स्नातक: आब उपहास बहुत भेल। प्रसिद्ध महामनीषी बौद्ध भिक्षु धर्मोत्तर आबि रहल छथि। भोजन समाप्त कऽ ओ प्रासादसँ उतरि गाछक छाहाँमे घासबला स्थानपर बैसय जा रहल छथि। चलू, हुनका लग चली। तखन पूर्वोक्त रूपमे बौद्ध भिक्षु आ हुनक शिष्य प्रवेश करैत अछि। भिक्षु: आर्य, परम करुणामय भगवान् बोधिसत्त्वक उपदेश हृदयमे सँजोने छी? शिष्य: पूज्यवर, कृपा कऽ हमरा फेर अनुगृहीत करू। भिक्षु: जे युवा ब्राह्मण पहिने देखलहुँ, ओ एखनो एतहि अछि। ओकर मुखसँ बोलबाक उत्कण्ठा झलकैत अछि। स्नातक: (निकट आबि) भिक्षु, कुशल छी? आशा अछि अहाँक धार्मिक साधनामे कोनो विघ्न नहि पड़ि रहल अछि। भिक्षु: स्वागत। ई घासबला स्थान अपवित्र नहि अछि। कृपा कऽ बैसू। स्नातक: (बैसैत) मुदा गुरु रूपमे अहाँ एकरा एखन की पढ़ेलहुँ, जे पूछैत छलहुँ—बुझलह की नहि? भिक्षु: (शिष्यसँ) हुनक प्रश्नक उत्तर दहक। स्नातक: कतेक अपमान—“शिष्य, उत्तर दहक”! बालक, सुन, ई की कहैत अछि। भिक्षु: ब्राह्मण, शुद्ध प्रयोग तँ “हुनकासँ सीखू” होयबाक चाही। स्नातक: हे प्रिय रक्तचीवरधारी! एहन प्रलापपर ई व्याकरण-नियम लागू नहि होइत—“विधिपूर्वक उपदेश होय तँ शिक्षकवाचक संज्ञा अपादान कारकमे होइत अछि।” देखू, एतय उपयुक्त प्रयोग केवल एतबे अछि—“ओ अभिनेताक षष्ठी-विभक्तिसँ सुनैत अछि।” भिक्षु: अहा, कतेक कटुवचन बोलनिहार ई द्विज! तीनू लोकक एकमात्र स्वामी, परम करुणामय भगवान् बुद्धक <उपदेश> एकरा प्रलाप बुझाइत अछि! स्नातक: (शिष्यसँ) आब तूँ कह, ई तोरा की पढ़ेलक? शिष्य: गुरु हमरा चारि आर्यसत्य पढ़ेलनि—दुःख, दुःखक कारण, दुःखक निरोध आ मार्ग। स्नातक: (मुस्कुराइत) ई परम करुणामयक उपदेश थिक? आ जाहिमे अनात्म-बोधकेँ मोक्षदायी मार्ग कहि महिमा गाओल जाइत अछि, से प्रलाप नहि थिक? भिक्षु: ब्राह्मण! अहाँ सन लोककेँ परमार्थ-सत्यक उपदेश प्रलापे बुझायत; अहाँक बुद्धि एहि मतक अभ्याससँ मलिन अछि जे अग्नि-सोमक लेल बलि देल पशु आदि जीवक हत्या मोक्ष प्राप्त करबाक साधन अछि! स्नातक: की? ई पतित बौद्ध वैदिक विधानमे सेहो दोष निकालैत अछि! हम की करी? केकर उपस्थितिमे बात कही? एहि विहारमे केवल धर्मद्रोही समुदाय भरल अछि। (चारूकात देखि आनन्दसँ) उत्तम! हमर पुण्यक फलसँ विश्वरूप आ ई अनेक माननीय आचार्य विहारक उद्यान देखबाक उत्कण्ठासँ आबि गेल छथि; ई सभ हमरा लेल सहज न्यायनिर्णायक बनताह। ठीक अछि, एहि अपराधीसभकेँ दण्ड देबाक अवसर भेटि गेल। तखन सामर्थ्य-अनुसार जतेक न्यायनिर्णायक होथि, प्रवेश करैत छथि। न्यायनिर्णायकसभ: केवल हुनक मुखक कान्ति देखि बुझाइत अछि जे ई स्नातक सङ्कर्षण आ ई बौद्ध भिक्षु धर्मोत्तर परस्पर विवाद कऽ रहल छथि। चलू, देखि आबी। (सभ गोटे सभा लग किछु डेग चलैत छथि।) भिक्षु: स्वागत, सज्जनसभ! कृपा कऽ एतय बैसू। (ई कहि ओ घासबला स्थान देखबैत अछि।) न्यायनिर्णायकसभ: (बैसि भिक्षुसँ) अहाँसभ कोन विषयपर चर्चा कऽ रहल छी? भिक्षु: यज्ञोपवीतधारी ई व्यक्ति बोधिसत्त्वक उपदेशकेँ प्रलाप कहैत अछि। स्नातक: हम एतय छी, भिक्षु सेहो एतय अछि, आ अहाँसभ विवेकी न्यायनिर्णायक—तर्कक सबल आ दुर्बल पक्ष विचारबाक एहन अनुपम अवसर दोसर कोन! न्यायनिर्णायकसभ: जँ अहाँक वार्ता यथार्थ, संयत आ स्थापित सत्यसँ उत्पन्न हो; जँ छलयुक्त वाद, निष्फल प्रतिवाद, निग्रहस्थान आ कुतर्कक कोलाहलमय भीड़सँ भरल वचनसँ बची; जँ हृदयमे कनेको ईर्ष्या नहि हो, वाणीमे कठोरता नहि हो, मुखपर भ्रूभङ्ग नहि हो; जँ ई सज्जनसभक बीचक शास्त्रार्थ हो—तखन हम सदैव परीक्षक बनबाक लेल प्रस्तुत छी। भिक्षु आ स्नातक: सज्जनसभ जेना आज्ञा करथि। न्यायनिर्णायकसभ: तँ अहाँ दुनूमे पहिने अपन प्रतिज्ञा के प्रस्तुत कएलनि? स्नातक: शिष्यकेँ पढ़बैत भिक्षुए पूर्वपक्ष प्रस्तुत कऽ चुकल छथि। भिक्षु: (स्नातकसँ) सुनलहुँ? स्नातक: हँ, सुनलहुँ। भिक्षु: तखन फेर कहू। स्नातक: अवश्य। सङ्क्षेपमे कहैत छी: दुःख, ओकर कारण आ ओकर निरोध; ओकरा प्राप्त करबाक मार्ग, जे ‘अनात्म-बोध’ कहल जाइत अछि—ई सभ क्षणिकता सिद्ध कएलासँ स्थापित होइत अछि। पदार्थ अस्तित्ववान होयबाक कारण क्षणिक अछि, आ ओकर विनाशक लेल कोनो कारण अपेक्षित नहि। स्मृति आदि क्रिया प्रवाहमे कारण-कार्य सम्बन्धक कारण सम्भव अछि। मुदा बाह्य वस्तु क्षणिक होइतो ज्ञानक विषय नहि बनि सकैत अछि। केवल ई चैतन्ये असंख्य रूपसँ जड़ित भऽ प्रकाशित होइत अछि। तेँ सभ किछु शून्य अछि, सभ किछु क्षणिक अछि, सभ किछु स्थायी सारविहीन अछि, सभ किछु दुःख अछि। एहि प्रकार ध्यान कएलासँ निर्वाण प्राप्त होइत अछि। (भिक्षुसँ) एहि प्रकार ठीक अछि? भिक्षु: (तिरस्कारपूर्वक) हँ, सङ्क्षेप रूपमे। स्नातक: आब हमर बारी। न्यायनिर्णायकसभ: हम सभ ध्यानसँ सुनि रहल छी। स्नातक: क्षणिकता सिद्ध होइतहि उपर्युक्त परम कल्याणक मार्ग जँ अस्तित्वमानो हो, तैयो पदार्थसभक गहन परीक्षण कएलापर ओ सभ क्षणिकतासँ कनेको मेल नहि खाइत अछि। भिक्षु: किएक नहि? स्नातक: केवल एहि कारण जे एकर समर्थनमे कोनो युक्तिसङ्गत हेतु नहि अछि। भिक्षु: मुदा हेतु तँ प्रस्तुत कएल गेल अछि—‘अस्तित्ववान होयबाक कारण’। स्नातक: अहाँ बौद्धसभ जे ‘अस्तित्व’ हेतु कहैत छी, ओकर साध्य—अर्थात् ‘क्षणिकता’—सँ व्याप्ति धुँआ आ आगि जेकाँ प्रत्यक्ष रूपसँ निश्चित नहि कएल जा सकैत अछि; कारण एकरा समर्थित करयबला कोनो दृष्टान्त भेटैत नहि। तेँ ई हेतु निष्फल अछि। भिक्षु: ताहिसँ की? व्यतिरेक द्वारा व्याप्ति निश्चित कएल जाए, तैयो व्याप्तिक निश्चय तँ भेल। क्रमिक आ युगपद् दुनू प्रकारक कार्यक्षमता नहि रहबाक कारण ‘अस्तित्व’ स्थायी पदार्थसँ बहिष्कृत भऽ जाइत अछि; तखन ओकरा कतहु आन ठाम नहि भेटबाक कारण क्षणिक पदार्थमे स्थान लेबहि पड़त। स्नातक: स्थायी पदार्थ जेकाँ अहाँक क्षणिक पदार्थसँ सेहो अस्तित्व आरो अधिक बहिष्कृत अछि, कारण ओहो अनिवार्य सहचर गुण रखि नहि सकैत अछि। देखू: जँ ई पदार्थ उत्पन्न भेलाक बाद काज करैत, तँ क्षणिक नहि रहैत। आ जँ उत्पन्न होइतहि मृत्यु ओकरा ग्रसि लैत अछि, तँ फेर काज करबाक दोसर अवसर ओकरा कोना भेटत? भिक्षु: मुदा क्षणिक पदार्थक बीच कारण-कार्य सम्बन्ध एतबे थिक—‘क-क ज्ञान भेलाक बाद ख-क ज्ञान होइत अछि’; अर्थात् ‘पूर्व ज्ञानक पश्चात् दोसर ज्ञान उत्पन्न होइत अछि’। स्नातक: एहि विषयमे आरो बहुत किछु कहबाक अछि, मुदा एखन छोड़ू। हम ई प्रतिपादित करैत छी—एहि मतक अनुसार कारण होयबाक अवस्था स्वयं वास्तविक नहि रहैत, कारण पदार्थ कोनो विशिष्ट वस्तुक प्रति उपादान-कारण होइत अछि। एहन दशामे कारणतासँ सम्पन्न सभ व्यवहार विफल भऽ जाएत—जेनाकि कोनो प्रवाहक प्रत्येक ज्ञानक अपन पूर्वकर्मक फल भोगबाक क्षमता। अथवा मानि ली जे एतय कोनो प्रकारक कारण-सम्बन्ध अछि; तँ आन प्रवाहमे उत्पन्न अन्य ज्ञान-क्षणक सम्बन्धमे सेहो ठीक एहने होयत। भिक्षु आँखि नीचाँ कऽ धरतीपर रेखा खिंचैत अछि। स्नातक: अथवा कारण-सम्बन्ध यथार्थ रूपसँ सिद्धो मानि ली, तैयो ज्ञानसभक परस्पर भिन्नता बनल रहबाक कारण के अपन कर्मक फल कोना भोगत? आ ‘पदार्थ अस्तित्ववान होयबाक कारण क्षणिक अछि’ एहि अनुमानमे हेतु विरुद्ध अछि, कारण ओ सिद्ध करबाक गुणक विपरीत गुण सिद्ध करैत अछि। भिक्षु: से कोना? स्नातक: कहल गेल अछि जे क्षणिक पदार्थ कार्यक्षम नहि भऽ सकैत अछि। मुदा स्थायी पदार्थ सहायक कारणसभक संग क्रमशः वा युगपद् काज कऽ सकैत अछि; एहीकेँ कारणगत कार्यक्षमता कहल जाइत अछि, आ एहि प्रकार ओकर स्थायित्व सिद्ध होइत अछि। भिक्षु मौन रहैत अछि। स्नातक: पदार्थक उत्पत्ति जेकाँ ओकर विनाश सेहो कोनो कारणपर निर्भर अछि, कारण कारण-कार्यक उपस्थितिमे अन्वय आ अनुपस्थितिमे व्यतिरेक दुनू स्थितिमे समान अछि। भिक्षु: मुदा विनाशक कारणक विषयमे अन्वय-व्यतिरेक दोसर प्रकारसँ सिद्ध होइत अछि, कारण ओ भिन्न प्रवाहक कारण अछि। उत्पत्तिक कारणक विषयमे अन्वय-व्यतिरेक एहि प्रकार नहि भऽ सकैत अछि, कारण कोनो दोसर प्रकारक कार्य अछि नहि। स्नातक: (मुस्कुराइत) ई रागवश कहैत छी वा द्वेषवश? किछु लोक मानैत छथि जे ‘दोसर प्रकारक कार्य नहि अछि’ एना कहब कठिन अछि, कारण प्राकट्य आदि सम्भव होइत अछि। भिक्षु: उत्पत्तिक कारण बिना कोनो कार्य उत्पन्न होइत कहियो नहि देखल गेल अछि। स्नातक: की विनाशक कारण बिना कोनो कार्य नष्ट होइत अहाँ कहियो देखलहुँ? भिक्षु: तखन तँ विनाशक कारण उपस्थित नहि रहला पर युग बीति गेलो घड़ा नष्ट नहि होयत। स्नातक: (व्यङ्ग्यसँ) दया करू! जँ घड़ा नित्य भऽ गेल तँ लोक-व्यवहार समाप्त, लोकक सर्वनाश, आ घड़ामात्र रूप संसारक शाश्वत मृत्यु हमर सभक माथपर मँडरा रहल अछि! जाहि वस्तुक विनाशक कारण नहि अछि, जेनाकि आकाश, ओकरा नित्य रहय दिअ—एहिमे हानि की? मुदा संयुक्त पदार्थक विनाशक कारण होइतहि अछि, कारण ओकर अवयवसभक वियोग आदि अनिवार्य अछि। आ हे मूर्ख, अहाँक मत मानियो ली तँ की घड़ा-क्षणक प्रवाह सेहो नष्ट नहि रहि जाइत अछि? जँ ओकरामे भिन्न प्रवाहक कोनो कारण उत्पन्न भऽ गेल, तँ हमर मतक अनुसार विनाशक कारण सेहो ठीक ओही प्रकार उत्पन्न होयत—तर्कक क्रम एक्के अछि। तेँ क्षणिकताक मतक वास्तविक दशा ई अछि। भिक्षु लज्जित भऽ बैसैत अछि। शिष्य: हे धिक्कारे योग्य ब्राह्मण! पूज्यवरक अपमान करबाक साहस तोरा कोना भेल? बालक: हे सङ्करजात! आचार्यसँ एना बात करैत छह? शिष्य: ई केकर आचार्य अछि? केवल एहि ऊँट-मुखबला छौड़ाक। बालक क्रोधसँ उछलि शिष्यक मुँहपर थप्पड़ मारबाक लेल बढ़ैत अछि। स्नातक, भिक्षु आ न्यायनिर्णायकसभ: शान्त हो! (ओ सभ दुनूकेँ अलग करैत छथि।) स्नातक: आ स्थायी वस्तुकेँ ग्रहण करयबला प्रत्यभिज्ञा—‘ई ओही वस्तु अछि’—सेहो एहि हेतुक खण्डन करैत अछि। अथवा प्रत्यभिज्ञा छोड़ू। पलक नहि झपकयबला व्यक्तिक प्रत्यक्षज्ञान, जे वस्तुकेँ अखण्ड अस्तित्वबला रूपमे ग्रहण करैत अछि, सेहो निःसन्देह एहि हेतुक विरोध करैत अछि। एहन प्रत्यक्ष होइतो किछु मूर्ख कहैत अछि—‘प्रत्यक्ष वस्तुक अलग-अलग क्षणकेँ ग्रहण करैत अछि।’ ई कथन स्पष्टतः खण्डित अछि, कारण एक क्षण दीर्घकाल धरि टिकि नहि सकैत, आ एहन दशामे ग्रहण एहि प्रकार होइते नहि। न्यायनिर्णायकसभ: आब बेसी विस्तारमे नहि जाउ। हे स्नातक, अहाँ जे तर्क-क्रम प्रस्तुत कएलहुँ, ओकरा सुनि हमर कान आनन्दित भेल। एहिसँ क्षणिकतावाद खण्डित भऽ गेल। आब विज्ञानवादक विषयमे किछु कहू। स्नातक: सुनू, भिक्षु। मानि ली जे विषय आ ओकरा ग्रहण करयबला ज्ञान दुनूक एकसंग प्रत्यक्ष नहि होइत अछि। जँ अहाँ कहैत छी—‘ज्ञानक स्वरूप प्रकाशित हो’—तँ की ओ अपनहि रूप प्रकट करैत अछि, वा कोनो आन वस्तुक रूप? ‘हम नील छी’ एहि रूपक कोनो ज्ञान नहि होइत; वस्तुकेँ अपनासँ भिन्न ‘ओ’ रूपमे जानयबला ज्ञानहि तथ्यक अनुकूल अछि। तेँ ई बाह्य ज्ञेय-वस्तु अवश्य अस्तित्वमान अछि। भिक्षु: जँ अस्तित्वमान अछि तँ अनुभूत किएक नहि होइत? स्नातक: के कहल जे अनुभूत नहि होइत? ‘ई नील अछि’ एहि रूपमे निश्चय अनुभूत होइत अछि। भिक्षु: भद्र, ई ज्ञानक आभास थिक, कारण ज्ञान प्रकाशस्वरूप अछि; ई वस्तुक आभास नहि, कारण वस्तु जड़ अछि। आ अहूँ कहलहुँ जे दुनूक एकसंग आभास नहि भऽ सकैत अछि। स्नातक: ज्ञानो जखन प्रकाशित होइत अछि, तँ अपनहि प्रकाश रूपमे नहि, आन वस्तुक प्रकाश रूपमे प्रकाशित होइत अछि; कारण ई प्रकाश प्रकाशित होयबला वस्तुक प्रकाश थिक, केवल प्रकाशक प्रकाश नहि। दीपादि प्रकाशक रीति एहने अछि। कहल गेल अछि—‘तीनू प्रकाश अपनाकेँ आ आन वस्तुकेँ प्रकाशित करैत अछि।’ मुदा ओहि समय वास्तवमे ज्ञान नहि प्रकाशित होइत, नील आदि रूपे प्रकाशित होइत अछि। आ नील आदि रूप ‘ज्ञान’ नहि अछि, कारण गौत्व जेकाँ अन्वय-व्यतिरेकसँ ओकर ज्ञानस्वरूपता सिद्ध नहि भेल अछि। भिक्षु मौन रहि आँखि नीचाँ कऽ धरतीपर रेखा खिंचैत अछि। स्नातक: माननीय न्यायनिर्णायकसभ, कहू—दुनू पक्षमे श्रेष्ठ कोन अछि? न्यायनिर्णायकसभ: हमरा सभसँ किएक पूछैत छी? भिक्षु स्वयं मौन रहि अहाँक पक्षक समर्थन कऽ रहल छथि। स्नातक: तखन आब हम स्नान करबाक लेल जाइत छी। हमरा क्षमा करू। अहाँसभ तमाशा देखि लेलहुँ, आब जे उचित बुझय से करू। (भिक्षुसँ) हे भिक्षुसभ, जँ अहाँक ई प्रयत्न उत्तम परलोकक लेल अछि तँ बस करू, छोड़ि दिअ—कारण एकर फल उलट होइत अछि। आ जँ पाखण्ड आ ढोंगक ढेरक आश्रय लऽ कएल ई परिश्रम जीविका चलयबाक लेल अछि, तँ अपन इच्छानुसार जारी राखू। सभ गोटे प्रस्थान करैत छथि। प्रथम अङ्क समाप्त। द्वितीय अङ्कक प्रस्तावना: कामासक्त तपस्वी तखन टहलुआ प्रवेश करैत अछि। टहलुआ: एहि सुख-सुविधाविहीन ब्राह्मण-गृहमे ने ठंढा मदिरा पीबि सकैत छी, ने दासीसभसँ प्रेम-क्रीड़ा कऽ सकैत छी, आ ने मांसक व्यञ्जन सहज भेटैत अछि। तँ की करी? जन्मजात दास जँ अपन स्वामीसँ मुँह मोड़य तँ ओकरा लेल कोनो बाट नहि—ई निश्चित। हमर स्वामी जे काज सोचि पठबैत छथि, से एहन होइत अछि जे दौड़ैत-दौड़ैत खाइ-पीबि तक नहि सकी। एखनहि स्वामी आज्ञा देलनि—“हे कालू, जा कऽ देख जे मुनि जिनरक्षित जैन साधुसभक उपाश्रयमे छथि कि नहि।” हमरा तँ ईहो नहि बूझल जे जैन साधुसभक उपाश्रय कतय अछि। (ओ चलैत अछि, बाट दिस देखि सोचैत अछि:) एतय धूराक कण उखाड़ल, अन्नक शूक जेकाँ केशक छितरायल गुच्छासँ चितकबर बुझाइत अछि। तेँ एहि वनमे जैन साधुसभक उपाश्रय एतहि होयत। (किछु डेग चलि आगाँ देखि प्रसन्नतासँ:) ई निश्चय जैन साधुसभक उपाश्रय थिक; कारण एतय गाछक नीचाँ सघन लताजालक अन्हारमे एक साधु क्रुद्ध साध्वीकेँ मनबैत बुझाइत अछि। (किछु काल देखैत अछि।) ई राक्षसी साध्वी निश्चय बहुत क्रुद्ध अछि—युवा साधु ओकर पएरपर खसि पड़ल, तैयो ओ ओकरा झटकि कऽ चलि गेली। बेचारा साधुक मुख सेहो उदास बुझाइत अछि। तखन मयूर-पुच्छक पिच्छी हाथमे लेने एक जैन साधु प्रवेश करैत अछि। साधु: (कानैत) हाय अभागल हम! उत्तम परलोकक व्यर्थ आशामे पहिने जैन साधु बनलहुँ। फेर ओहि मार्गसँ भ्रष्ट भऽ गेलहुँ; आब हमर वर्तमान आ भविष्य दुनू नष्ट भऽ गेल। कारण पएरपर खसि पड़लहुँ, तैयो ई राक्षसी साध्वी नहि मानलि। (आँखि पोछैत) हे राक्षसी कुकुरनी, दूर जा! की तोहरासँ भिन्न कोनो आन साध्वी हमरा नहि भेटत? टहलुआ: (विचार करैत) ई साधु हमरा देखयसँ पहिने जैन साध्वीक वेश धऽ एकर उपहास करब। (अपन देह दिस देखैत) निश्चय हमर कान नमहर अछि, मुखपर दाढ़ीक आरम्भो नहि, आ जैन साध्वीक माथपर चोटी रहत—एहन आशा के करत? तेँ सहजहि जैन साध्वीक रूप धऽ सकैत छी। (ओ वेश बदलि चारूकात देखैत अछि।) आब जैन साध्वी बुझायबाक लेल केवल मयूर-पुच्छक पिच्छी चाही। (आगाँ देखि प्रसन्नतासँ) खूब! साध्वी जे पिच्छी हाथमे लेने छलि आ एतय छोड़ि गेलि, से लऽ कऽ समीप जाइत छी। (ओ सेहिए करैत अछि।) आर्य, प्रणाम। बहुत थाकल छी; कृपा कऽ कहू, पूज्य मुनि जिनरक्षित एखन कतय छथि? साधु: (प्रसन्न भऽ मनमे) आब बुझाइत अछि भाग्य हमरा पीठ नहि देखाओत। एकटा आन युवा साध्वी आबि गेली। (प्रकट रूपसँ) हे साध्वी-कन्या, मुनि जिनरक्षितसँ तोहर की काज? तूँ बहुत थाकल बुझाइत छह। एहि एकान्त, शीतल लताकुञ्जमे बैसि किछु काल विश्राम कर। टहलुआ: हम सदिखन दुःखी आ अभागल रहलहुँ। हमरा विश्राम कोना भेटत? साधु: (स्नेहसँ) तूँ एखनो नेनी छह, तैयो दुःखी होयबाक कारण भऽ गेल? टहलुआ: (निःश्वास छोड़ैत) आर्य, हमर घृणित कथापर वाणी व्यर्थ नहि करी। कृपा कऽ मुनि जिनरक्षित कतय छथि, से कहू। साधु: हे कन्या, मुनि जिनरक्षित भीतर न्यग्रोध-वृक्षक नीचाँ अपन शिष्यसभकेँ प्रवचन दऽ रहल छथि। मुदा एक क्षण बैस, आ अपन वैराग्यक कारण कह। टहलुआ: (बैसि निःश्वास छोड़ैत) आर्य, जीवनसँ कुचलल कन्याक एकत्रित लज्जाक कथा आब कहबासँ की लाभ? (ओ कानैत अछि।) साधु: (टहलुआक आँखि पोछैत) कह ने, हमर नेनी। प्रिय, हम तोहर हृदयसँ अलग नहि छी। टहलुआ: अभागल हम, बहुत छोट कन्या रहितहि संन्यासिनी बनि गेलहुँ। साधु: तकर बाद? टहलुआ: तकर बाद, जखन यौवनक कोमल चिह्न अल्प-अल्प प्रकट होमय लागल छल मुदा प्रेम-रससँ एखनो परिचित नहि छलहुँ, तखन एक युवा साधु हमर इच्छाक विरुद्ध हमर शील भङ्ग कऽ देलक। साधु: (मनमे आनन्दसँ) अमृतक नदी भेटि गेल! (प्रकट रूपसँ) प्रिय, जीवनक रीति एहने अछि। तकर बाद? टहलुआ: आर्य, तकर बाद जखन धीरे-धीरे प्रेम-रससँ परिचित भऽ गेलहुँ, ओ साधु हमरा छोड़ि एक दोसर कंजूस बूढ़ि साध्वीमे आसक्त भऽ गेल। साधु: †... † चल, कहबीक लङ्गड़ा आ आन्हर जेकाँ परस्पर सहारा ली। ओ टहलुआक गरदनमे बाँहि दऽ बलपूर्वक चुम्मा लैत अछि। टहलुआ लज्जाक अभिनय कऽ आँखि नीचाँ कऽ बैसैत अछि। साधु: प्रिय, हमरादिस किएक नहि देखैत छह? टहलुआ: कोना देखी? अहूँ हमरा छोड़ि आनक लग चलि जायब। साधु: प्रिय, एना नहि कह। हम तोहर दास बनि रहब! (ओ टहलुआक छातीपर हाथ रखैत अछि।) तोहर स्तन एखनो निकलले नहि? टहलुआ: (लजाइत) हाय अभागल हम, की करी? साधु अपन हाथ टहलुआक नाभिक नीचाँ सरकबैत अछि, ओकर पुरुषाङ्ग पाबि लज्जा आ क्रोधसँ कहैत अछि—धिक् दुष्ट! तूँ हमरा बड़का धोखा देलह! (ओ टहलुआकेँ थप्पड़ मारबाक लेल उद्यत होइत अछि।) टहलुआ: हे कामी तपस्वी, किछु कहब तँ मुनि जिनरक्षित लग तोहर सभ पोल खोलि देब! साधु: (क्षणभरि विचार कऽ टहलुआक पएरपर खसि पड़ैत) हमर सभक एहि ठट्टाक बात किनको नहि कहिह! टहलुआ: मुँह बन्द रखबाक मूल्य की भेटत? साधु अपन मयूर-पुच्छक पिच्छीक मूठिसँ किछु निकालि टहलुआकेँ दैत अछि। टहलुआ: ठट्टा कऽ लेलहुँ, सिक्का भेटि गेल, आ मुनिक ठिकाना सेहो बुझि लेलहुँ। आब स्वामीकेँ समाचार देबाक लेल जाइत छी। (चलैत-चलैत आगाँ देखैत) आइ तँ तोहर भाग्य खुलि गेल! तोहर प्रिया आबि गेली। तखन असली साध्वी प्रवेश करैत छथि। जैन साध्वीक वेशमे टहलुआकेँ देखि ईर्ष्या आ क्रोधसँ कहैत छथि: साध्वी: हे तपस्विनी दुष्टा, दोसरक पिच्छी हाथमे लऽ कतय जा रहल छह? टहलुआ: लिअ, आर्या। हमरा तँ एहि लताकुञ्जमे ई साधु हमर इच्छाक विरुद्ध ठकि लेलक। हमर कोनो दोष नहि। (ओ निकलि जाइत अछि।) साध्वी: (साधुक निकट जा कऽ) हे दुष्ट कामी, तपस्विनीसभपर कुदृष्टि रखनिहार! पिच्छी छुटि गेल छल, तेँ हम फेर आबि रहल छलहुँ; एतबामे, किछुए क्षणमे, तूँ <आन साध्वीकेँ> आलिङ्गन करय लगलह। आब अपन साधनाक फल भोग! (ओ पिच्छीक डण्ठासँ ओकरा मारैत छथि।) साधु: आर्या, एना नहि बुझू। की नहि देखैत छी—ई एकटा सेवक छल, जे स्त्री-वेश धऽ हमर उपहास करबाक लेल आयल छल? ओ दुष्ट अहाँकेँ क्रुद्ध कऽ देलक। शपथपूर्वक कहैत छी, ई पूर्ण सत्य अछि। (ओ साध्वीक पएरपर खसि पड़ैत अछि।) साध्वी: जकर आत्मसंयम एहन हो, ओकर मुँहसँ सत्य कोना निकलत? साधु: ई दुष्ट सेवक फेर कोनो ठट्टा करत। तेँ आर्या, चलू, कतहु आन ठाम चली। (घबराइत) एक ब्राह्मण एही दिस आबि रहल अछि; जल्दी चलू, आर्या। दुनू प्रस्थान करैत छथि। द्वितीय अङ्क: वैराग्यक भोज तखन स्नातक आ बालक प्रवेश करैत अछि। स्नातक: पहिने, अपनेकेँ बुद्धिमान माननिहार ओहि रक्तचीवरधारीसभक अहङ्कारपूर्ण उत्साह शान्त करबाक लेल शीघ्र शास्त्रार्थ कएलहुँ। एहि बेर दयाक पात्र, दुर्बुद्धि नग्न साधुसभसँ सेहो किछु क्रीड़ा करबाक इच्छा अछि। बालक: आर्यक लेल तँ ई मनोरञ्जन अछि, मुदा ओहि बेचारा सभक लेल ओकर सभ किछुक विनाश। स्नातक: (मुस्कुराइत) ठीक कहैत छह। गोरू, परिवार, घर, सम्पत्ति, खेती आ व्यापार—ई सभ लोक सभ किछु गमबैत अछि। मुदा भिक्षा खा कऽ गाछक जरिमे रहनिहार दिगम्बर जैन मुनिक ‘सभ किछु’ की अछि? बालक: सुनू, कहैत छी। उत्तम परलोकक लेल बेचारा सभ बहुत कठोर तपस्या करैत अछि। तकर बाद आर्यक वाक्प्रवाहमे पड़ि जाइत अछि। तेँ एहि धर्म-मर्दनसँ हुनक समस्त साधना निष्फल भऽ जाएत। स्नातक: वाह, वाह! तोहर करुणा तँ देखू! ठीक अछि, तोहर प्रसन्नताक लेल हुनकापर अपन शक्ति हल्के आजमायब। चल। हुनक आश्रम आबि गेल। आब भीतर चली। दुनू चलैत अछि। स्नातक: (आगाँ देखैत) जैन मुनि जिनरक्षित एतय न्यग्रोध-वृक्षक छाहाँमे बैसल छथि। सम्भवतः कोनो विषयपर प्रवचन दऽ रहल छथि, आ अनेक शिष्य हुनक चरण लग बैसल अछि। तखन पूर्वोक्त रूपमे जैन मुनि प्रवेश करैत छथि। मुनि: (मनमे) हाय! संसार-चक्रक घुमावसँ निकलनाइ अत्यन्त कठिन अछि। बलपूर्वक रोकलहुँ तैयो ई कर्मफलमे होयबला अनेक दोषक विचार नहि कऽ ओही इन्द्रिय-विषयक अभिलाषा करैत अछि। की करी, बुझि नहि पबैत छी—मन शुभ मार्गपर नहि जाइत। ई अनन्त अविद्या-देवी छोड़यबे नहि करैत छथि। (विचार करैत) जे हो, सामर्थ्य भरि एहि अभागल मुनिसभकेँ दिन-रात अनुशासित करैत रहबहि पड़त। (प्रकट रूपसँ) हे मुनिसभ! भाग्यरूपी व्याध निरन्तर बाण चला रहल अछि; संसाररूपी फन्दाक पाश भयङ्कर अछि। आत्मारूपी हरिण एहि प्रज्वलित दुःख-वनसँ कोना पार होयत? अथवा: जिनकामे भगवान् जिनक उपदेशक ध्यानसँ स्वभावतः शुद्ध ‘सिद्ध’ आत्माक शक्ति जागि गेल अछि, हुनक क्रुद्धो भेल अभागल भाग्य की बिगाड़ि सकैत अछि? ओ केवल निरुपाय लोककेँ सतबैत अछि। तेँ आब: जिनक वचनक चिन्तन आ तप-व्रतसँ शरीरकेँ कृश करब—उपदेशक समस्त रहस्य एतबे अछि; एकरा अपन मनमे गहिर रोपि लिअ। शिष्यसभ: जेना पूज्यवरक आज्ञा। स्नातक: (निकट आबि विनयपूर्वक) पूज्यवर आ अहाँक शिष्य-मण्डली कुशल अछि? मुनि: (मनमे विचार करैत) बौद्धसभकेँ पराजित कऽ आब ई स्नातक सङ्कर्षण हमरा सभकेँ अपमानित करबाक उत्कण्ठासँ आयल अछि। एहि अवसरपर पाछाँ हटब नीक। एकर पराक्रम दुर्निवार, वक्तृत्व-शक्ति आ बुद्धि अद्वितीय अछि। (प्रकट रूपसँ) स्वागत, आर्य। कृपा कऽ एतय बैसू। कुशल छी? स्नातक: आइ कोन विषय चुनल गेल अछि? मुनि: एहि संसाररूपी वनमे चुनबाक योग्य की अछि? केवल एकरासँ निकलबाक कोनो उपाय भेटि जाय। स्नातक: उपाय तँ निश्चय भेटि गेल अछि। बुझू: न हिंसा, न असत्य, न घर-सम्पत्ति वा वस्त्रमे आसक्ति, न संसारमे तत्काल फल देनिहार कोनो कर्ममे प्रवृत्ति; आ व्रत-नियमसँ भरल, निर्दोष ई कठोर तपस्या—संसारसँ मुक्त होयबाक दोसर कोन मार्ग भेटत? मुनि: प्रजापति अहाँ सन लोककेँ एहन जीह गढ़ि देने छथि, आर्य, जे मधुर वचन बोलबामे अत्यन्त कुशल अछि। स्नातक: तथापि कहू, मुनि, कोन विषयपर प्रवचन आरम्भ कएलहुँ? मुनि: जिज्ञासासँ प्राण निकलि रहल अछि की? अनेकान्तवाद हमर जैन परम्पराक विशिष्ट सिद्धान्त अछि, आ एखन ठीक ओहीपर चर्चा भऽ रहल अछि। स्नातक: मुनि, एक प्रसिद्ध उक्ति अछि— “एक वस्तुक स्वभाव सभ वस्तुक स्वभाव अछि। सभ वस्तुक स्वभाव एक वस्तुक स्वभाव अछि। जे व्यक्ति एक वस्तुकेँ यथार्थ रूपमे देखैत अछि, ओ सभ वस्तुकेँ यथार्थ रूपमे देखि लेलक।” तँ हमरा ई कहू: जँ एक वस्तुक स्वभाव सभ वस्तुक स्वभाव अछि, तँ प्रयोजनबला लोक की साधनक उपयोग करत, आ कोन वस्तुक प्रति? जँ वस्तुसभ अपन-अपन कार्यक अनुसार व्यवस्थित अछि, तँ एक वस्तु सभ वस्तुक स्वभावबाली नहि भऽ सकैत अछि। वस्तुसभमे किछु समान रूप साझा देखाइतो, प्रत्येक वस्तुक अपन विशिष्ट स्वरूप रहितहि अछि। मुदा वस्तु-व्यवस्था जँ अहाँक कथनानुसार होइत—जकरा हम स्वीकार नहि करैत छी—तँ परलोक वा एहि लोकक फल लेल लोक कहियो कोनो काज आरम्भ नहि करैत। मुनि एक शिष्यकेँ सङ्केत करैत छथि। शिष्य: (जानि-बुझि) पूज्यवर, मुनिसभ निवेदन करैत छथि—“पूज्यवरकेँ अबेर भऽ रहल अछि, तेँ हमर सभक वर्तमान कर्तव्यक समय आब बीति रहल अछि।” मुनि: (स्नातकसँ) आर्य, मुनिसभक कर्तव्यमे बाधा पड़ि रहल अछि। तेँ जे उचित बुझू, निर्णय करू। स्नातक: मुनि, अपन इच्छानुसार करू। मुनि: (शिष्यसँ) हे, दौड़ि जा आ मुनिसभकेँ कह जे एक क्षण अपन-अपन स्थानपर सावधान रहथि; हम आबि रहल छी! मुनि शिष्यसभक संग प्रस्थान करैत छथि। स्नातक: बालक, दिगम्बर जैन मुनिक चतुराई देखलह? बालक: आर्य, शास्त्रार्थक युद्धमे अहाँक सोझाँ के टिकि सकैत अछि? तेँ एहि बहानासँ भागि ओ अपन प्राण बचा लेलक। स्नातक: की ओकरा दण्ड देबाक चाही छल? तथ्य जानब आवश्यक छल, आ हम जानि लेलहुँ। मुदा केवल तोहर मान रखबाक लेल एहि विषयमे कठोर रुख नहि अपनएलहुँ। बालक: आर्य, अहाँक वचन कोमल होइतो वादिसभक हृदय विदीर्ण करैत अछि; तटपर फेँकल माछसभ †... † स्नातक: तखन आब कतय चली, बालक? बालक: स्नान करबाक लेल किएक नहि चली? स्नातक: (मुस्कुराइत) किएक, भूख लागल छह? (ऊपर देखैत) एखन स्नानक समय कोना भऽ सकैत अछि? जैन मुनिसभक एहि उपाश्रयक झाड़ीमे किछु काल एतहि रहब नीक। बालक: ठीक अछि। दुनू उठि कऽ चलैत अछि। स्नातक: (आगाँ देखि आश्चर्यसँ) अहा, ई स्थान कतेक रमणीय आ विश्रामक योग्य अछि! कारण— ई वन घन, शीतल छाहाँ दैत अछि; एतय घासबला स्थल आ जल सेहो अछि; पुष्पगुच्छक गन्धसँ पवन सुगन्धित अछि; हरिण सभ दिशामे खेलैत उछलि रहल अछि; आ चिड़ैसभक कलरव अनेक रागक लहरिसँ मिलि गेल अछि। (विचार करैत) जँ कोनो वेदान्तनिष्ठ व्यक्ति एहि पवित्र वनमे निवास करय, आत्माक समस्त कामना शान्त कऽ आ मानसिक वृत्तिक समूह रोकि लय, तँ किछुए दिनमे निश्चय एक अद्भुत, परम, उज्ज्वल अवस्थाकेँ प्राप्त करत—जे नित्य आनन्दमय अछि आ सांसारिक मार्गक हड़बड़ी तथा परिश्रमसँ रहित। नेपथ्यसँ: वेदान्तक उपदेशक मर्म पाबि लेब कठिन अछि। तीनू वेदमे कहल कथा नमहर विस्तारक कारण भ्रम उत्पन्न करैत अछि। उच्चकुलीन लोक एहि गम्भीर प्रश्नपर विचार करैत अछि—“आत्मा अछि कि नहि?” हुनका सभकेँ हमरा सँ दूर राखू! संसारक असह्य पीड़ा छोड़बाक लेल महर्षि जिन द्वारा उपदिष्ट सङ्क्षिप्त, स्पष्ट शास्त्रकेँ अपनाबी। बालक: आर्य, लाल वस्त्र पहिरने एक तपस्वी हड़बड़ीमे एही दिस आबि रहल अछि आ एहने किछु बड़बड़ा रहल अछि... तखन एक तपस्वी प्रवेश करैत अछि। तपस्वी “वेदान्तक उपदेशक मर्म...” पढ़ैत चलैत अछि। बालक: आश्चर्य, ई लोक एखनो जिनक उपदेशे मानैत अछि? स्नातक: छोड़, बालक। ताहिसँ की? हम एकरासँ आन बात पूछब। (तपस्वीसँ) तपस्वी, कुशल? एतेक हड़बड़ीमे कतय जा रहल छी? तपस्वी: अहाँ स्पष्टतः ब्राह्मण छी; तखन भूखक अनुभव कोना नहि बुझैत छी? स्नातक: आर्य, भोजन करबाक लेल निकलल छी? तपस्वी: आ नहि तँ की? स्नातक: कतय जायब? तपस्वी: एतहि, मुनि जिनरक्षितक तपोवनमे आइ महाभोज अछि। स्नातक: महाभोजक कारण की अछि? तपस्वी: जिन-गुरुक उपदेश ग्रहण कएने कोनो कुलीन पुरुष आइ एतय भोजन करा रहल छथि। हजारो तपस्वी एकत्र भेल छथि। हुनका सभकेँ दलियाक ढेर, तिलतेलक घैल, खट्टा माँड़क पात्र, गुड़क छोट-छोट घैल आ तिलतेलमे पाकल खाद्य-पदार्थक पहाड़ परसल जा रहल अछि। स्नातक: तपस्वी, कहू—एतेक व्यञ्जनमे दही, दूध, घी आदि किछुओ नहि भेटत? तपस्वी: अहा, नहि! ई आचार अहाँ ब्राह्मणसभक योग्य अछि। हम तपस्वीसभ पशुसँ प्राप्त कोनो वस्तुक उपयोग ने भोजनमे, ने पेयमे, ने वस्त्रमे, ने ओछाओन-बैसबाक आसनमे, आ ने शरीरक आन कोनो सज्जामे करैत छी। गाछक छालसँ बनल हमर ई पादुका नहि देखैत छी? आब एहि गप्पकेँ छोड़ू! भोजमे हमरा अबेर भऽ रहल अछि। स्नातक: बाट हमरा सेहो देखाउ। हम तपस्वीसभक ऐश्वर्य सेहो देखि लेब। तपस्वी: चलू, चलू। कृपा कऽ संग आउ। सभ गोटे चलैत अछि। स्नातक: तपस्वी, अहाँ जिनक उपदेश मानैत छी, तखन लाल वस्त्र किएक पहिरैत छी? की अहाँक जिन ‘सुगत’ छथि? तपस्वी: (मुस्कुराइत) हमर सभक लेल सेहो भगवान् जिन सुगत छथि। आ सुगतकेँ सेहो जिन-गुरु कहल जाइत अछि। हम अर्हतसभ कतेक भाग्यवान छी—किछु केवल आकाशकेँ वस्त्र बनौने, किछु केवल छालक वस्त्र पहिरने, किछु लाल कपड़ा, आ किछु श्वेत वस्त्र पहिरने। देखू! दिगम्बर सभ आबि रहल छथि—निर्दयतासँ केश लोच करबाक निष्ठाक कारण हुनक केश-मूल देखाइत अछि आ ओतयसँ अल्प-अल्प रक्त-बिन्दु टपकि रहल अछि। ई छालक चिथड़ा पहिरनिहार आबि रहल छथि, जिनक कोमल छाल-वस्त्रक किनारी †... † सँ लिपटल अछि। ई ब्रह्मचारी तपस्वी आबि रहल छथि, जिनक वस्त्र एखनहि भट्ठासँ निकलल पाकल माटिक बरतनक रङ्ग जेकाँ अछि। ई श्वेताम्बर आबि रहल छथि, जिनक वस्त्रक छोर हंसक पाँखि जेकाँ उज्जर आ मन्द पवनमे फरफरा रहल अछि। आइ जिनका ओ सभ अनुगृहीत करत, ओ कुलीन पुरुष कतेक पुण्यवान छथि! स्नातक: (मुस्कुरा कऽ मनमे) एकरा ‘पुण्यवान’ कहल जाइत अछि, ‘अनर्थकारी’ नहि। ओ हाथी, घोड़ा, तलवार, बाट, कर-वसूली, सेना-विभाजन वा ऊँट आदिक कोनो चिन्ता नहि करैत अछि। एहन काजमे धनक सार भाग उड़ा दैत अछि आ राज-सेवासँ बचैत अछि; तेँ निश्चय राजा ओकर सम्पत्ति जब्त कऽ लेताह। (प्रकट रूपसँ) ई तपोवन कतेक शान्त आ मनोहर अछि! जगत् शान्तिसँ भरल बुझाइत अछि, पृथ्वी स्वयं व्रत करैत देखाइत अछि। एतय सचमुच एना लगैत अछि जे देहधारी आत्माकेँ बाँधनिहार संसारक फन्दासभक शृङ्खला टुकड़ा-टुकड़ा भऽ गेल। बालक: हवा, छाल, लाल वस्त्र आ श्वेत वस्त्र पहिरने तपस्वीसभ देखि लेलहुँ। आब एही दिस अबैत ई कारी-कम्बलबला सभकेँ देखू। स्नातक: (आगाँ देखि आश्चर्यसँ) हे भगवान्, ई तपस्याक नव रूप अछि! एक स्त्री आ एक पुरुष एक्के कारी वस्त्रमे लपेटल असाधारण मधुर गीत गाबि मनोरञ्जन कऽ रहल अछि। (ध्यानसँ देखैत) की? एहन तँ दलक दल देखाइत अछि! निश्चय पृथ्वी डूबि गेल, तीनू वेद उखड़ि गेल। (तपस्वीसँ) तपस्वी, तपस्याक एहि नवीन, अद्भुत विधिसँ परिचित छी? तपस्वी: ई मनोहर धार्मिक आचार कोन अछि, हम नहि जनैत छी। हमर अनुमान अछि—किछु लोक भोजक चर्चा सुनि केवल भोजनक लोभमे एतय मँडरा रहल अछि। बस, हुनक कथा एतहि छोड़ू। हम अपन सहधर्मीसभसँ जा मिलैत छी। (ओ प्रस्थान करैत अछि।) तखन एक स्त्री आ पुरुष एक्के कारी वस्त्रमे लपेटल, गीत गबैत प्रवेश करैत अछि; वा सामर्थ्य हो तँ एहन अनेक जोड़ा निम्न गीत गबैत प्रवेश करैत अछि: सीमाबद्ध जीवनक मोह दूर करनिहार कारी-कम्बलधारी मुनि-प्रभुक जय हो। हे भगवान्, जे अहाँक नवीन उपदेश मानैत अछि, ओ अमृतक अनुपम आनन्द पीबैत अछि। एहि लोकमे स्त्रीसभसँ प्रेम-क्रीड़ामे रमैत अछि, आ परलोकमे मुक्ति प्राप्त करैत अछि। शरीर सफल होइत अछि, संसारसँ छुटकारा भेटैत अछि। आन सम्प्रदायपर विश्वास नहि करू, जतय शरीर पूर्णतः सुखा देल जाइत अछि आ मुक्ति एखनो अनिश्चित रहैत अछि। अनुशासनक साधनामे की भेटैत अछि? मनुष्य अन्ततः दास भऽ जाइत अछि! बहुत पुण्य जमा भेलो, ओ मनुष्यकेँ सुखसँ वञ्चिते करत। जे एहि मिलनकेँ लपेटैत अछि †... †... जँ प्रत्येक जोड़ा एहि प्रकार बुझय <... > ... फेर सुख (?) अपन जन्म सफल नहि कऽ मनुष्य शरीरमे कतय भटकि सकैत अछि, आ कतय पहुँचत? जँ ई जगत् परमात्माक विकार अछि, वा शब्द-ब्रह्मक विकार, तैयो अविद्याक निवृत्ति बिना ई सभ कोना...? †... † एहि प्रकार आन सभ धर्म निष्फल अछि, ई बुझि। कारी-कम्बलधारी मुनिक अनुसरण कऽ एहि लोक आ परलोक दुनूमे सुख पाउ... स्नातक: (किछु काल गीत सुनि) बालक, ई निम्न कोटिक वाद-विवाद अछि, जे केओ गीतक बहानामे सभ दर्शनक निन्दा करबाक लेल रचल अछि। मुदा एहि दुष्टसभसँ गप्प आरम्भ करबाक साहस सेहो नहि करैत छी; कारण तकर बाद जे प्रायश्चित्त-शुद्धि करय पड़त, से हम नहि चाहैत छी। स्त्री आ पुरुष ओही गीत फेर गबैत अछि। स्नातक: बालक, देख— हुनक वचनमे शुद्धता नहि, घृणित शरीर सेहो अशुचि; मन सदिखन अविवेकी, अत्यन्त निन्दनीय आचरणमे आनन्द लैत अछि। परलोकसँ एतेक निर्भय हृदय केकर अछि, जे एहि पुण्यकारी, अद्भुत तपस्यामे प्रवृत्त हो? अथवा मनुष्यक कोनो आचरण <अपयशकारी नहि> अछि? आरो देखू: इच्छानुसार बारम्बार गाओल लयबद्ध गीत दिनभरि गूँजैत रहैत अछि। सभ सङ्कोच छोड़ि ओ सभ मधुर मदिरा पीबैत अछि, जकर रस प्रेमीक लारिसँ मिसल अछि। शरीर उच्छृङ्खल गति करैत अछि, निरन्तर परस्पर उद्दीपन करघाक वस्त्रसँ नुकायल अछि। एहन अत्यन्त कामुक व्रत के नहि मानत? बालक: आर्य, ठीक एहेन अछि। स्नातक: हमरा लगैत अछि ई नूतन, आधुनिक महाव्रत थिक। जँ हुनक गीतक बात बहुत पसरि गेल तँ वर्णाश्रमक स्थापित आचार असीम रूपसँ नष्ट भऽ जाएत। निश्चय तीनू वेदक मार्ग टुकड़ा-टुकड़ा भेल बुझाइत अछि। कारण जखन नवसिखुआसभ द्वारा प्रशंसित, सभ संयम समाप्त करयबला एहि ‘तपस्या’केँ देखत, तखन पतिव्रता गृहिणीसभ सेहो पतिक घरमे बहुत दिन नहि टिकती। बालक: (मुस्कुराइत) आर्य, अहाँकेँ किएक चिन्ता? अहाँक विवाह एखनो नहि भेल। हमर बात तँ एखन बहुत दूर अछि। स्नातक: मुदा तोहर पूजनीय माता एखनो जीवित छथि ने? बालक: ओ बेचारा बूढ़ि स्त्री लगभग मरले जेकाँ छथि; तेँ एखन एहि विपत्तिसँ निश्चय सुरक्षित छथि। स्नातक: ठट्टा बन्द कर। एतय बड़का अनर्थ उठि ठाढ़ भेल अछि। बालक, विचार कर—एकर उपाय की? बालक: आर्य, हमरा नहि बूझल। अहाँ अवश्य जनैत होयब। मुदा आइ-कालि कलियुगक प्रभाव बढ़ि रहल अछि; एहन विपत्तिक प्रतिकार कोना हो? स्नातक: तैयो बिना प्रयत्न कएने जड़ भऽ बैसल रहब उचित नहि। (विचार करैत) हँ, उपाय अछि। बालक: से की? स्नातक: स्वयं महाराज शङ्करवर्मा। ओ वर्णाश्रमक विधिसम्मत मर्यादाक उपदेशक, तीनू लोकक रक्षाक लेल अभिषिक्त सम्राट छथि; तेँ एहि समस्याक उपाय अवश्य जनताह। विशेषतः हुनक संग माननीय भट्ट जयन्त छथि, जे शिवक समस्त शास्त्रमे पारङ्गत छथि। हँ, हुनकेँ सूचना देब। विपत्तिमे विलम्बक स्थान नहि। बालक, तूँ एहि गबैत स्त्री-पुरुषकेँ भोज-स्थल दिस बढ़ा दे। बालक: हे तपस्वीसभ, सुनू! एहि तपोवनमे अहाँक भोजक समय भऽ गेल; तखन अबेर किएक? सभ गोटे प्रस्थान करैत छथि। द्वितीय अङ्क समाप्त। तृतीय अङ्कक प्रस्तावना: निर्भयसभमे भय तखन एक सिद्ध प्रवेश करैत अछि। सिद्ध: (भयभीत भऽ चारूकात देखैत) सींगबला चन्द्रमा—महादेवक चिह्न—एखन अस्त भऽ चुकल अछि। आकाश हमर हृदय जेकाँ खाली आ अन्हार अछि। चुपचाप भागि निकलबाक एहीसँ नीक समय नहि भेटत। हमर परम मित्र श्मशानभस्म कतय अछि, जकरा संग भागब? (ओ चलैत आ आगाँ देखैत अछि।) ई रहल श्मशानभस्म; एही दिस आबि रहल बुझाइत अछि। तखन दोसर सिद्ध प्रवेश करैत अछि। दोसर सिद्ध: ई मित्र कङ्कालध्वजक आश्रय अछि। एहि अन्हारोमे धुँधला देखाइत अछि। पएर सम्हारि आगाँ बढ़ैत छी। (ओ चलैत आ सुनैत अछि।) पएरक आवाज सुनलहुँ जेकाँ लगल। हे भगवान्, नगर-रक्षक एही दिस आबि रहल छथि बुझाइत अछि! जँ हमरा पकड़ि लेत तँ चोर बुझि कारागारमे फेकि देत, शूलपर चढ़ा देत वा गाछपर लटका देत। चिन्ता नहि! भगवान् भैरव हमर शरण छथि। (ध्यानसँ देखैत) मित्र कङ्कालध्वजक आवाज छल जेकाँ लगल। (साहस कऽ निकट जाइत) मित्र कङ्कालध्वज, अहाँ भेटि गेलहुँ! हमरा नगर-रक्षक बुझि भय लागि रहल छल। पहिल सिद्ध: हे श्मशानभस्म, तूँ छह? नीक भेल जे एतय आबि गेलह। चल, जल्दी आगाँ बढ़ी। अन्हार रहितहि दुनू चुपचाप भागि चली। दोसर सिद्ध: नगर-रक्षक तोरा चोर बुझि मारि देत—एहि भयमे छह? पहिल सिद्ध: एहन भय नहि। होइतो आब दूर भऽ गेल। मुदा दोसर अनर्थ उठि ठाढ़ भेल अछि। दोसर सिद्ध: (व्याकुलतासँ) से कोना? पहिल सिद्ध: ई चर्चा चारूकात अछि—की तूँ नहि सुनलह? आइ-काल्हि ई अभागल राज्य पूर्णतः बदलि गेल अछि। दोसर सिद्ध: हमर हृदय धक्-धक् कऽ रहल अछि! मित्र, जल्दी सभ बात कह! पहिल सिद्ध: राजा शङ्करवर्माक कठोरता सर्वविदित अछि। हुनक ब्राह्मण मन्त्री, दुष्ट जयन्त, हुनकासँ सेहो कठोर। वैदिक धर्मसँ बाहर रहबाक आरोपमे ओ सभ कारी-कम्बलधारी तपस्वीकेँ पकड़ि, अधमरा धरि पीटि, राज्यसँ बाहर निकालि देलक। आब वैदिक धर्मसँ बाहरक कोनो आन तपस्वी पकड़ायल तँ ओकरा पीटल, मारल, कारागारमे फेँकल वा वध कएल जाएत। की हम सभ ओही वर्गक नहि छी? मदिरा पीबैत छी, मांस खाइत छी, स्त्री राखैत छी। कारी-कम्बलधारीसभ जेकाँ एक्के धार्मिक आचार नहि करैत छी? तेँ आब सिद्ध-वेश नुका ली, आ एहि अन्हारमे केकरो दृष्टिमे नहि पड़ि तेजी सँ चलि चली। दोसर सिद्ध: (भयभीत) सेहिए करी! दुनू चलैत अछि। दोसर सिद्ध: मित्र कङ्कालध्वज, ई विपत्ति कोना उठल? पहिल सिद्ध: सुन। पहिने सङ्कर्षण नामक ओ स्नातक ब्राह्मण जिनरक्षित मुनिक वनमे असंख्य कारी-कम्बलधारी जोड़ाकेँ गीत गबैत, आनन्द करैत देखलक। दोसर सिद्ध: तकर बाद? पहिल सिद्ध: ओ जयन्तकेँ सूचना देलक। जयन्त राजाकेँ सभ बात कहलक। दोसर सिद्ध: तकर बाद? पहिल सिद्ध: तखन राजा ओहि स्नातक ब्राह्मण सङ्कर्षणकेँ बजौलनि, विवाह करा देलनि, विशेषाधिकार, पाग पहिरबाक अधिकार आ ‘महामान्य’ उपाधि देलनि; फेर सम्पूर्ण राज्यक धार्मिक विषयक अधीक्षक बना देलनि। आगि ओही लगौलक। दोसर सिद्ध: कह जे आगि दुष्ट जयन्त लगौलक। पहिल सिद्ध: जे हो, दशा एहेन अछि। आब कतय चली? दोसर सिद्ध: मन्त्रसाधिका प्रलयाग्निशिखाक समक्ष उपस्थित होयब आवश्यक अछि। आशा अछि, एहि खराब समयमे ओतय हमरा सभपर विपत्ति नहि आएत। पहिल सिद्ध: आइ-काल्हि हुनका संरक्षण भेटल अछि? दोसर सिद्ध: सम्भवतः राजाक मुख्य रानी, समस्त अन्तःपुरक स्वामिनी सुगन्धादेवी, स्त्री होयबाक कारण हुनका अपन आश्रयमे राखती। पहिल सिद्ध: ओ स्वयं सुरक्षित होथि, तैयो हमरा सभकेँ सुरक्षित राखि सकती? उपाय बुझलहुँ! वनसँ घेरल कोनो दूर देश चली। दोसर सिद्ध: ठीक कहैत छह, मित्र। दिन उगयसँ पहिने जल्दी आगाँ बढ़ी। दुनू सेहिए करैत अछि। पहिल सिद्ध: हे श्मशानभस्म, तूँ ठीक कहैत छह। मुदा दिन उगला बाद एहि अभागल राज्यमे एक डेग चलबो कठिन अछि। दोसर सिद्ध: किएक? पहिल सिद्ध: प्रत्येक प्रदेश, प्रत्येक नगर, प्रत्येक गाम—सभ ठाम वेदपाठक ध्वनि कान चीरैत अछि, घीक गन्ध नाकमे गड़ैत अछि, यज्ञक धुँआ आँखिमे नोर भरि दैत अछि। तेँ एहि अभागल राज्यकेँ केवल रातिमे पार करय पड़त। दिन वनक गहिराइमे काटय पड़त। दोसर सिद्ध: बिल्कुल ठीक। सङ्कर्षणक भय सेहो अछि, तेँ केवल रातिमे चलब। दिन जंगलमे केकरो नजरिमे नहि पड़ि बितायब। दुनू चलैत अछि। पहिल सिद्ध: हे श्मशानभस्म, दिशासभ स्पष्ट होमय लागल, तारासभ धीरे-धीरे मलिन भऽ रहल अछि। प्रभात भऽ गेल। आब की करी? नेपथ्यसँ, नगाड़ाक ध्वनिक बाद: हे नगरवासी आ ग्रामवासीसभ, सुनू! महाराज शङ्करवर्माक राजाज्ञासँ महामान्य भट्ट सङ्कर्षण अहाँसभकेँ सूचित करैत छथि—अनादि संसार-प्रवाहमे पड़ल, विभिन्न धर्म माननिहार जे सदाचारी लोक छथि, ओ अपन-अपन धार्मिक अनुशासनमे निर्धारित आचार करैत जेना छथि, तेना रहथि। मुदा स्थापित सामाजिक आ धार्मिक व्यवस्थाकेँ नष्ट करनिहार अपराधी छद्मतपस्वी जँ तत्काल राज्य नहि छोड़त, तँ राजा हुनका चोर जेकाँ दण्ड देताह। दुनू: (सुनि भयभीत) सङ्कर्षण नामक हमर सभक जीबैत मृत्यु सचमुच आबि गेल। चल, जल्दी कोनो आन ठाम चली। दुनू प्रस्थान करैत अछि। तृतीय अङ्क: धर्मक निषेध आ समर्थन तखन स्नातक-वस्त्र त्यागि विवाहित राजकर्मचारीक योग्य वस्त्र पहिरने महामान्य सङ्कर्षण, बालक आ सामर्थ्य-अनुसार अनेक परिचारक प्रवेश करैत छथि। सङ्कर्षण: बालक, कारी-कम्बलधारीसभकेँ भगा देबाक कारण लोक हमरा सभक निन्दा करैत अछि? बालक: एहन भय नहि करू, आर्य! भ्रष्ट छद्मतपस्वीसभसँ पराजित भऽ सचमुच नष्ट भेल त्रयी-धर्मक व्यवस्था अहाँ फेर स्थापित कऽ देलहुँ। सङ्कर्षण: कह जे राजा शङ्करवर्मा ओकरा स्थापित करौलनि। मुदा राज्यमे कारी-कम्बलधारीक ढंगक नकल करैत आन छद्मतपस्वी खुल्लमखुल्ला नहि घूमि रहल अछि, जे भगा देबाक योग्य हो? बालक: आर्य, शिवक अनुयायी कहबैत क्रीड़ा करनिहार किछु भ्रष्ट तपस्वी एखन धरि देखाइत छल। मुदा अहाँक उत्साहक कारण बदनाम भऽ आब बहुत कम रहि गेल अछि। सङ्कर्षण: नीक कहलह! हमहूँ हुनका सभकेँ देखल अछि। ओ सभ निर्वासनक योग्य अछि। कारण— पीबाक योग्य की नहि मानैत अछि? केवल जे द्रव नहि हो। खाइ नहि सकैत अछि केवल ओ जे कटु हो वा दाँतसँ तोड़ल नहि जा सकय। स्तनबला कोनो जीव जँ मैथुनक योग्य नहि अछि, तँ ओ या तँ अजन्मा होयत वा मृत। संसारमे तपस्याक उचित स्थान की हो? सम्भवतः मदिरालय। बालक: आर्य, ठीक कहैत छी। सङ्कर्षण: बालक, ई वर्णाश्रम-व्यवस्थापर सेहो गम्भीर प्रहार अछि। बालक: शिवक नामक दुरुपयोग कऽ अपन व्यवसाय चलाबयबला हुनक तथाकथित अनुयायीसभक लेल सेहो ई लज्जाक बात अछि। सङ्कर्षण: बालक, बिल्कुल ठीक। हुनका सभक निष्कासनपर ध्यान दऽ राजा उचिते करैत छथि। आरो—“हम शिवक उपदेश मानैत छी” कहि भगवान्‌क नामक उद्घोष करैत ई दुष्ट लोक हुनक शुद्ध धर्मसभकेँ हानि पहुँचा रहल अछि। जँ राजा उचित रीति सँ हुनका वशमे कऽ निर्मल मार्गपर स्थापित करथि, तँ पृथ्वीक प्रशंसनीय रक्षण वा हुनक यशमे कोन हानि होयत? बालक: ठीक एहेन। सङ्कर्षण: निश्चिन्त रह, एहि विषयमे राजाज्ञा हमरा भेटल अछि। गश्ती-दलकेँ हुनका सभक खोज करबाक आज्ञा दे। बालक: जेना आर्यक आज्ञा। (ओ प्रस्थान कऽ फेर प्रवेश करैत अछि।) आर्य, ओ सभ राज्यसँ भागि गेल। मुदा एक उत्सुक दूत अहाँकेँ खोजैत आयल अछि। की आज्ञा? सङ्कर्षण: ओकरा भीतर अनाउ। बालक सङ्केतसँ ओकरा बजबैत अछि। सेवक: (प्रवेश कऽ व्याकुलतासँ) स्वामीक जय हो! मांस-भक्षण, मदिरापान आ दासीसभसँ मैथुनमे आसक्त शिवानुयायी कारी-कम्बलधारीसभक समाचार सुनितहि एको गोटे छोड़ि बिना सभ राज्यसँ गायब भऽ गेल। मुदा आन शुद्ध आचरणबला तपस्वीसभ सेहो भयभीत भऽ प्रस्थान करय लागल अछि। स्वामीक की आज्ञा? सङ्कर्षण: बालक, सदाचारी लोककेँ रोकबाक लेल शीघ्र आ आदरपूर्वक समुदाय-प्रमुख नियुक्त करय पड़त। (सेवकसँ) तूँ हुनक संग जा आ बाट देखाबह। सेवक: जेना स्वामीक आज्ञा। (प्रस्थान करैत अछि।) बालक: अहा आर्य, अहाँक सङ्कल्प डगमगा गेल! सङ्कर्षण: बालक, अनादि संसार-प्रवाहमे रहि शुद्ध धर्म माननिहार लोकक चिन्तासँ घेरल रहब उचित नहि। राजा शङ्करवर्मा परम शिवभक्त छथि आ सभ धर्म-सम्प्रदायक प्रति दयालु। चल, निरर्थक भय शान्त करबाक लेल सीधे पूज्य धर्मशिवक आश्रम चली। बालक: जेना आर्यक आज्ञा। दुनू चलैत अछि। नेपथ्यसँ: हे तपस्वीसभ, चिन्तित आ भयभीत किएक छी? सभ धर्म-सम्प्रदायक स्वामी राजा अहाँसभक शत्रु नहि छथि। कपटपूर्ण व्रतक आवरणमे अहाँसभक लगभग विनाश करनिहार लोककेँ परमेश्वर राज्यसँ बाहर कऽ देलनि। बालक: आर्य, ई अहाँ द्वारा नियुक्त समुदाय-प्रमुख होयताह, जे बाटे-बाट जनताकेँ सूचना दऽ रहल छथि। सङ्कर्षण: नीक चिन्हलह, बालक। जल्दी चली। (दुनू चलैत अछि।) बालक, पूज्य धर्मशिवक आश्रम आबि गेल बुझाइत अछि, कारण— भस्म-लेपसँ धूसर वर्ण, धूपक अग्नि प्रज्वलित करबाक क्षमता, त्रिपुर-विजयी शिवक पूजामे प्रयुक्त फूलक निर्मल मकरन्द एखनहि पीने—शैव आश्रमक ई धन्य पवन केकरा मोहित नहि करैत अछि? ई तपस्वीसभक जटाक गाँठि खोलैत आ भिक्षुवस्त्रक मन्द, ललित नृत्य प्रस्तुत करबामे आनन्द लैत अछि। बालक: आर्य, ठीक कहैत छी। ई तपोवन हमरा शान्त आ मनोहर लगैत अछि। सङ्कर्षण: आउ, भीतर चली। (प्रवेशक अभिनय करैत अछि।) अहा! पूज्य मठाधीश धर्मशिव स्वयं प्राङ्गणमे आगाँ आबि रहल छथि! हुनक तपस्याक तेज सभकेँ मात दऽ रहल अछि। कारण—हुनक सुन्दर मुख भस्मसँ मुस्कुरा रहल अछि; ललाट गङ्गाजलक पवित्रतासँ स्वच्छ अछि; शिवक गण जेकाँ तपस्वीसभ दौड़ि-दौड़ि सेवा करैत हुनक पूजा करैत अछि; कपूर जेकाँ उज्ज्वल यशसँ हुनक निर्मल आत्मा निरन्तर आनन्दित अछि, जेना चन्द्रक संग सुविख्यात गौरीसँ शिव आनन्दित छथि। केवल दर्शनसँ शिव श्रीकण्ठ सदृश ओ सचमुच प्राणिसभक कल्याण करैत छथि। आ आरो: कलियुगक अनेक कलङ्क दूर करनिहार एहि आश्रम-परिसरमे प्रवेश कऽ, सत्य कहैत छी, हमरा एना लगैत अछि जे कामदेवक मुस्कुराइत शत्रु शिवक तीन आँखिसँ पुनर्जीवित शिवलोकमे आबि गेल छी। बालक: हमहूँ। अपनाकेँ ब्रह्ममे लीन होयबाक लेल उड़ैत देखैत छी। तखन पूर्वोक्त रूपबला पूज्य धर्मशिव चौकीपर बैसल, आ सामर्थ्य-अनुसार अनेक अनुयायीक संग प्रवेश करैत छथि। मठाधीश: (विचारमग्न) एहि राजाक गुणक यश समस्त जगत्‌मे पसरल अछि, आ हुनक ध्यान केवल सामाजिक-धार्मिक व्यवस्थामे लागल रहैत अछि। ई मन्त्री जयन्त सेहो दर्शन आ शास्त्रक विशाल वनमे विचरण करैत कहियो थाकैत नहि छथि। हमरा नहि लगैत अछि जे ओ सभ अपन यशक विपरीत कोनो उपाय करताह। तपस्वीसभ पूर्ववत् रहथि। चिन्ता किएक? अथवा, हमरा सन लोककेँ कोन भय भऽ सकैत अछि? (आगाँ देखैत) ई की! स्नातक एतहि आबि गेल? आब सभ बात स्पष्ट भेल। सङ्कर्षण: आउ बालक, मठाधीशकेँ प्रणाम करी। (दुनू निकट जाइत अछि।) हमर सोझाँ साक्षात् प्रकट भगवान् महेश्वरस्वरूप पूज्य मठाधीशकेँ प्रणाम! मठाधीश: स्वागत, आर्य। कुशल छी? कृपा कऽ एहि आसनपर बैसू। सङ्कर्षण: आसनक आवश्यकता नहि; हम एहि घासपर बैसैत छी। पूज्यवर, स्थापित विधिक अनुसार धार्मिक तपस्या बिना विघ्न चलि रहल अछि ने? अथवा एतय कोन विघ्न भऽ सकैत अछि? स्वयं भगवान् महेश्वर अपनहि द्वारा अपन पूजा करैत छथि। तेँ कृपा कऽ तपस्वीसभकेँ बुझा दिअ जे जनतामे पसरल एहि चर्चाक कारण कनेको चिन्ता नहि करथि। राजा केवल तपस्याक बाधक तत्त्व हटौलनि अछि। आ राजा स्वयं सेहो पूज्यवरक दर्शनक लेल हमर सभक पाछाँ-पाछाँ आबि रहल छथि। मठाधीश: (मुस्कुराइत) हम वा तपस्वीसभ किएक चिन्ता करी? जखन धरि महाराज शङ्करवर्मा अपन प्राप्त राज्यपर धर्मपूर्वक शासन करैत छथि, राज्य वस्तुतः सज्जनसभक अछि, ओ केवल ओकर पालन करैत छथि। ई बात केवल आइक नहि; बहुत कालसँ हमर अनुभव एहेन अछि। एक तपस्वी: (परदा झटका कऽ व्याकुलतासँ प्रवेश करैत) मठाधीशक जय हो! कोनो वृद्ध विद्वान् अनेक शिष्यसँ घेरल, अहङ्कार देखबैत, आश्रमक उपहास करैत आ †... † करैत आबि गेल अछि। पूज्यवर कहथि, हम की करी? मठाधीश: (मुस्कुराइत) बेचारा भीतर आबय; हमरा कोनो आपत्ति नहि। तखन पूर्वोक्त रूपमे वृद्धाम्भि प्रवेश करैत अछि। वृद्धाम्भि: आश्चर्य! राजा शङ्करवर्मा कतेक पैघ विपत्तिक जन्मदाता अछि! वैदिक पुरोहित, वानप्रस्थ, संन्यासी, ब्रह्मचारी, आ एहि शैव, पाशुपत, पाञ्चरात्रिक, जैन, सांख्य, बौद्ध आदि सभकेँ राज्यक अपार धन निर्बाध खाय दैत अछि। एहन दशामे ओ दीर्घायु कोना होयत? एखन ओ चारूकात रिक्ततासँ घेरल कल्पवृक्ष जेकाँ देखाइत अछि। एहि अवसरक लाभ उठा कऽ हम ईश्वरकेँ समाप्त करब, परलोककेँ किनार करब, वेदक प्रामाण्य ध्वस्त करब, आ एहि प्रकार राजाकेँ गलत बाटसँ घुमा कऽ उचित मार्गपर स्थापित करब, जाहिसँ सांसारिक समृद्धिपर ध्यान दऽ दीर्घकाल धरि राज्यसुख भोगथि। सुनलहुँ अछि जे एहि शैव आश्रममे अनेक स्वयंभू विद्वान् एकत्र छथि। हुनकहि सोझाँ एहि शैव आचार्यकेँ उपहासक पात्र बनायब। (किछु डेग चलि आन दिस देखैत) ई कणभक्ष, अक्षपाद आदि दर्शनमे पारङ्गत शैव आचार्य छथि; ई महान् मीमांसक सङ्कर्षण छथि; आ एतय विभिन्न विद्याशाखाक अनेक विद्वान् छथि। ठीक अछि, निकट जाइत छी। (निकट जा कऽ) तपस्वी, कुशल? ब्राह्मण, नमस्कार। (एना कहैत ओ अपन शिष्यसभक संग घासपरहि बैसि जाइत अछि।) मठाधीश: (मुस्कुराइत) की? आरम्भे सँ अनादर? (ओ सङ्कर्षणक मुख दिस देखैत छथि।) सङ्कर्षण: पूज्यवर, अहाँ ठीक बुझलहुँ। चलू, देखि ली। वृद्धाम्भि: सैकड़ो निरर्थक कष्ट सहि एतेक दुःखी जीवन किएक बितबैत छी? तपस्या यातनाक एक प्रकार मात्र अछि; आत्मसंयम सुखसँ अपनाकेँ ठकबाक उपाय मात्र; आ अग्निहोत्र आदि यज्ञकर्म हमरा बालकक खेल जेकाँ बुझाइत अछि। मठाधीश: की करी? प्रभु ईश्वर हमरा सभकेँ एहन कर्म करबाक प्रेरणा दैत छथि। वृद्धाम्भि: मुदा ई ‘प्रभु ईश्वर’ के छथि? बाँझ स्त्रीक पुत्र जा रहल अछि—मृगतृष्णाक जलमे एखनहि स्नान कएने, माथपर आकाश-पुष्पक माला, हाथमे खरहा-क सींगसँ बनल धनुष। मठाधीश: ई निन्दा बन्द करू! ओ समस्त जगत्‌क भगवान् स्रष्टा आ संहारकर्ता छथि; अनन्त जीवसमूहमे सक्रिय, विविध फलदायी कर्मराशिक उपयुक्त क्षेत्रानुसार निरीक्षण करैत छथि; ओ नित्यानन्द, सर्वज्ञ, करुणामय परमेश्वर छथि। वृद्धाम्भि: (हलुक हँसैत) भक्तिक अन्धतासँ दृष्टि रुकल, किछुओ नहि देखनिहार मूर्खसभक ई मूर्खतापूर्ण दृष्टि देखू। ई कोना सम्भव? लोक ईश्वरकेँ परम कर्ता कोना मानि सकैत अछि? बुझू: ई करुणा अछि, लीला अछि, प्रभुताक मनमानी अछि, आवेग अछि, हुनक स्वभाव अछि, पुण्य कमायबाक उपाय अछि, वा हुनक सत्यनिष्ठा—के जानय जे कामनारहित, सभ किछु प्राप्त प्राचीन मुनिक मनमे जगत् रचबाक आ नष्ट करबाक की सूझल? जिनका निमित्त आदि कारणसमूहक कोनो इच्छा नहि, आ जे सहायक कारणसँ सेहो रहित छथि, ओ लोकसभक पालन, संहार आ सृष्टिक कारण कोना बनि सकैत छथि—जाहिसँ न हुनका, न आन केकरो <विशिष्ट> लाभ अछि? आरो: मानि ली ओ स्रष्टा छथि, मुदा कोन नियम सुनिश्चित करैत अछि जे ओ ठीक अहाँक कथनानुसार केवल तीन लोकहि रचताह, आन वा अधिक लोक नहि? मठाधीश: दोष खोजयबला तर्क प्रस्तुत करबामे परिश्रम बन्द करू। एक दिस, प्रमाणक आधारविहीन वस्तुक विषयमे दोषारोपक तर्क निरर्थक अछि; दोसर दिस, प्रमाणसँ सिद्ध वस्तुक विषयमे ओ पूर्णतः त्याज्य अछि। तेँ वादिसभ एहि इन्द्रियातीत विषयमे दोषारोपक तर्कक कोलाहल बन्द कऽ साधक तर्क खोजथि। वृद्धाम्भि: (मुस्कुराइत) जँ अहाँक विचार एहेन अछि, तँ ईश्वर सिद्ध करबाक प्रमाण प्रस्तुत करू। मठाधीश: हम कहैत छी—अनुमान हुनक अस्तित्व सिद्ध करैत अछि। वृद्धाम्भि: (मुस्कुराइत) कोनो वस्तुकेँ एकसंग अनुमान आ प्रमाण कहब केवल मनोकामना अछि। अवस्था, देश आ कालक भेदसँ वस्तुक शक्ति बदलैत रहैत अछि; तेँ अनुमान द्वारा वस्तुक सत्यापन अत्यन्त कठिन अछि। आरो: अनुमानक सहारा लेनिहार सहजहि खसि पड़ैत अछि, जेना ऊबड़-खाबड़ बाटपर हाथसँ टटोलैत दौड़निहार आन्हर। आ फेर: चतुर तार्किक बहुत परिश्रमसँ कोनो बातक अनुमान करैत अछि, मुदा दोसर अत्यन्त समर्थ तार्किक ओही बातक दोसर प्रकारसँ व्याख्या कऽ दैत अछि। मठाधीश: ई विस्तार बन्द करू! भौतिकवादीसभक एहि ‘घरक विशेषता’सँ हम नीक जेकाँ परिचित छी। मुदा ई कहू—की ओ सभ केवल इन्द्रिय-प्रत्यक्षकेँ एकमात्र प्रमाण मानैत अछि? वृद्धाम्भि: हँ, एहेन मानैत अछि। मठाधीश: तखन हुनक लेल दैनिक व्यवहार असम्भव अछि। वृद्धाम्भि: से कोना? मठाधीश: बेचारा, भूखक कष्ट होइत तँ चाउर खोजैत छी, बालु नहि; पियास लगैत तँ जल खोजैत छी, आगि नहि। वृद्धाम्भि: हँ, मुदा एहि बातसँ की सिद्ध करय चाहैत छी? मठाधीश: मित्र, कोनो विशिष्ट प्रयोजनक लेल ‘सर्वोत्तम वस्तु’ होयब इन्द्रियक विषय नहि। ई पदार्थक अन्वय आ व्यतिरेक द्वारा निश्चित होइत अछि। आ अन्वय-व्यतिरेक अनुमान-चिह्नक मुख्य लक्षण अछि। पक्षधर्मता तँ कोनो विशिष्ट पक्षमे देखल प्रत्येक हेतुकेँ प्राप्त होइत अछि। अन्वय, व्यतिरेक आ पक्षधर्मता—एहि सभमे अनुमानक प्राण बसैत अछि। वृद्धाम्भि: मनुष्यक दैनिक व्यवहार, पशुसभ जेकाँ, सुखदायी आ दुःखदायी वस्तुक निश्चय करैत केवल स्वाभाविक प्रवृत्तिसँ चलैत अछि। मठाधीश: एना नहि कहू। जाहि ज्ञानक प्रामाण्यक विशिष्ट कारण ज्ञात नहि हो, से प्रवृत्ति कहल जाइत अछि। एतय कारण—अन्वय, व्यतिरेक आदि—ज्ञात अछि। आ स्वयं स्पष्ट वस्तुक निषेध नहि कएल जा सकैत अछि। वृद्धाम्भि: कारण बुझियो वास्तवमे नहि बुझैत छी, कारण अविनाभाव-सम्बन्धक ग्रहण नहि कऽ सकैत छी। तेँ दैनिक व्यवहारक जाँच नहि कएल जाए तँ से सुखद लगैत अछि; केवल एतबे वास्तविक अछि—तत्त्वज्ञ लोक एहेन कहैत छथि। मठाधीश: ई आलस्य अछि, वा अहाँ एक डेग पाछाँ हटय नहि चाहैत छी। एतय उपस्थित विद्वान् एहि अवसरपर वस्तुक परीक्षण कऽ रहल छथि। वृद्धाम्भि: ई परीक्षण असम्भव अछि। धुँआ-आगि, अधुँआ-अनागिक अनन्त व्यक्तिगत उदाहरण अछि; तीनू लोकक समस्त वस्तु प्रत्यक्ष नहि देखने लोक अन्वय-व्यतिरेक निश्चित नहि कऽ सकैत अछि। आ सर्वज्ञकेँ अनुमानक आवश्यकता की? मठाधीश: पहिने तँ सामान्यक सहारा लऽ अन्वय ग्रहण कएल जा सकैत अछि। व्यक्तिगत उदाहरणक अनन्तता अनुमानकेँ अमान्य नहि करैत, कारण धूमत्व एक अछि आ अग्नित्व सेहो एक। सकारात्मक सामान्यक अनुकूलताक अनुसार ओकर अभावक अनुकूलता सेहो ग्रहण कएल जा सकैत अछि; ओहीकेँ व्यतिरेक कहल जाइत अछि। दू वस्तुक सहस्थिति अन्वय कहल जाइत अछि; दुनूक अभावक सहस्थिति व्यतिरेक मानल जाइत अछि। हेतुक पक्षधर्मता बेचारा सहजहि बुझल जा सकैत अछि, कारण बिना आश्रयक हेतुकेँ धर्म रूपमे निश्चित नहि कऽ सकैत छी। तेँ एहि प्रकार प्रामाण्यक कारण सहज निर्धारित भऽ गेलापर पशुओ ज्ञानी जेकाँ प्रमाणक सहायतासँ व्यवहार करैत अछि। भाष्यकार कहैत छथि—“तेँ देवता, मनुष्य आ पशुक क्रिया एहि प्रमाणसभक सहायतासँ एही प्रकार सम्भव अछि, आन प्रकार नहि।” वृद्धाम्भि: लोकमे पहिनहि सिद्ध वस्तु, जकर ज्ञान उत्पन्न भऽ चुकल अछि, ओकर विषयमे ई ठीक भऽ सकैत अछि; मुदा <जकर ज्ञान एखन प्राप्त करबाक अछि, ओकर विषयमे> असम्भव। साधारण लोक, जँ तार्किकसभ द्वारा ठकल नहि हो, तँ पृथ्वी आदि कार्यसँ ईश्वरक ज्ञान ओना नहि करैत अछि जेना धुँआसँ आगिक। मठाधीश: स्त्री, बालक, ग्वाला, एतय धरि जे अहूँ—कोनो विशिष्ट वस्तुसँ दोसर वस्तुकेँ निःसन्देह बुझैत छी। अविनाभावक शक्तिसँ कार्यसँ चेतन कर्ताक सफल अनुमान कएल जा सकैत अछि, जेना धुँआसँ आगिक। वृद्धाम्भि: घड़ा सन कार्य, जकर निर्माण कल्पना कएल जा सकैत अछि, एक प्रकारक अछि; मुदा पर्वत आदि सर्वथा भिन्न, कारण दुनूमे बहुत अन्तर अछि। मठाधीश: रसोइघरमे छोट रूपसँ उठनिहार ई धुँआ एक प्रकारक अछि, आ आकाशक मुख्य तथा उपदिशासभमे पसरल पर्वतक धुँआ बहुत भिन्न। आ अहाँ ई सभ लाल चीवरबला बौद्धसभक जूठन खा रहल छी: “जखन ओ विशिष्ट प्रकारक संघटन आदि नियन्ताक अस्तित्वसँ अन्वय-व्यतिरेकयुक्त सिद्ध हो, तखन ओहि प्रकारक संघटनसँ नियन्ताक अस्तित्वक अनुमान उचित अछि।” वास्तवमे अनुमानक प्रक्रिया विशिष्ट धर्मपर निर्भर होइत अछि। साध्यधर्मी वस्तु आ दृष्टान्तक वस्तुमे पूर्ण समानता कतय होइत अछि? वृद्धाम्भि: आन स्थितिमे वास्तविक सामान्य अछि, मुदा एतय समानता केवल नाममात्रक, वास्तविक नहि। नाममात्रक समानतापर अनुमान लागू करब अतिव्याप्ति-दोष होयत। मठाधीश: (मुस्कुराइत) बौद्धक घरमे वास्तविक सामान्य कोना होयत? लोकक दैनिक व्यवहार कोनो सामान्यपर निर्भर देखैत छी—ओ बुद्धिसँ उत्पन्न हो, बाह्य हो, वास्तविक हो वा परम्परागत। अनेक वस्तु कार्य होइतो परस्पर समान नहि अछि। तेँ ‘ओ विशिष्ट प्रकार’ कहबाक प्रयोजन हमरा नहि बुझाइत अछि। वृद्धाम्भि: मुदा पृथ्वी आदि ई उत्पाद अत्यन्त विशिष्ट अछि। मठाधीश: तखन अत्यन्त विशिष्ट कारीगर मानू। वृद्धाम्भि: अज्ञात वस्तु मानि नहि सकैत छी। मठाधीश: आ हम कर्ताविहीन कार्यक चर्चा नहि कऽ सकैत छी। वृद्धाम्भि: एहन दशामे की कएल जाए? मठाधीश: कोन विकल्प त्यागी? कर्ताक असाधारण स्वरूप कठिन अछि, वा कर्ताविहीन कार्य? एहि दुनू विकल्पमे सामान्य नियम अछि—“देखल वस्तुक व्याख्याक लेल अदृश्य मानल जाइत अछि, मुदा देखल वस्तुक निषेध नहि कएल जा सकैत अछि।” तेँ कार्यक कार्यत्वकेँ नकारबाक बदला, कार्य स्वयं असाधारण होयबाक कारण कर्ताक असाधारणता सहन करब उचित अछि। वृद्धाम्भि धरतीपर रेखा खिंचैत अछि। मठाधीश: आरो, रङ्गक प्रत्यक्षसँ दृष्टि-इन्द्रियकेँ साधन रूपमे अनुमान करैत छी—जेना काटयबला क्रियासँ हँसुआ आ छेदन-क्रियासँ कुल्हाड़ी। एतय दृष्टि-इन्द्रियक कोन गुण हँसुआ आ कुल्हाड़ीसँ समान अछि? वृद्धाम्भि: ओकर अनुमानो नहि हो—हमरा की चिन्ता? मठाधीश: मुदा दृष्टि-इन्द्रिय बिना रङ्ग कोना देखब? वृद्धाम्भि: ठीक अछि, कोनो प्रकारक साधन मानि ली। मठाधीश: तखन ठीक ओही प्रकार कोनो कर्ता सेहो मानू। वृद्धाम्भि: कर्ता स्वीकार नहि कऽ सकैत छी। मुदा साधन बिना क्रिया कोना होयत? मठाधीश: कर्ता बिना कार्य कोना होयत? ‘कार्य’ शब्द दिट्ठ नाम जेकाँ केवल नाम नहि; जे बनाओल गेल, से कार्य अछि। जँ किछु बनल सेहो आ कर्ताविहीन सेहो, तँ के बनौलक? नहि जनैत छी। तेँ ईश्वरक अनुमानक एहि असाध्य माथदुखाइकेँ सहन करय पड़त। आन उपाय की? वृद्धाम्भि धरतीपर रेखा खिंचैत अछि। मठाधीश: आ संसारक कठोर पीड़ा सेहो सहय पड़त। वृद्धाम्भि: जीबैत रहला धरि नहि सहब। मठाधीश: तखन तँ बहुत जल्दी मरि जायब। वृद्धाम्भि: से कोना? मठाधीश: चैतन्य भौतिक तत्त्वक गुण नहि भऽ सकैत अछि, कारण ओ द्रव्यक अस्तित्वकाल भरि नहि रहैत, आ अपनाकेँ स्वयं जानैत अछि। आ जँ ‘चैतन्य-प्रवाह’क सिद्धान्त मानैत छी, तँ एक समन्वयकारी सत्ता बिना स्मरण, इच्छा आदि क्रिया सम्भव नहि। वृद्धाम्भि: तखन एहन कोनो सत्ताकेँ ज्ञाता रूपमे स्वीकार करब। मुदा शरीरक दाह-संस्कारक बादो ओकर अस्तित्व अछि—ई की सिद्ध करैत अछि? मठाधीश: भद्र, एकर लेल कोनो अतिरिक्त प्रमाण आवश्यक नहि। वृद्धाम्भि: किएक नहि? मठाधीश: कारण हम मानैत छी जे कोनो वस्तुक विनाश ओकर स्वभावक अङ्ग नहि। एहि अतिरिक्त, ज्ञाताक उत्पत्ति वा विनाश, अथवा एहन उत्पत्ति-विनाशक कोनो कारणक अनुभव हमरा कहियो नहि होइत अछि। आ ईहो नहि जे अवयवयुक्त होयबाक कारण ओकर विनाश सम्भव मानब—जेना तन्तुसभक परस्पर संयोग टूटलापर वस्त्र नष्ट होइत अछि। तेँ ‘ज्ञाता’ नामक एहि वास्तविक सत्ताक केवल स्वरूपक प्रत्यक्ष होइत अछि, उत्पत्ति वा विनाशक नहि। एहि कारण, जँ ज्ञाता अस्तित्वमान अछि तँ ओ नित्य होयत। जँ नित्य अछि तँ ओही संसारमे गमन करैत अछि। तखन भौतिकवादी किएक कहैत अछि—“संसार करयबला कोनो सत्ता नहि, तेँ संसार नहि”? आरो विचारणीय बात अछि—नवजात शिशुक आनन्द, भय, शोक आदि, दूधक इच्छा इत्यादिक विषयमे ई नहि कहल जा सकैत अछि जे ई सभ जन्मजात, आकस्मिक वा केवल सहज प्रवृत्तिसँ उत्पन्न अछि। तेँ एहि आधारपर सेहो आत्माकेँ नित्य मानय पड़ैत अछि। वृद्धाम्भि: मुदा ईश्वर सिद्ध करबाक प्रसङ्गमे संसारक जाँचसँ की लाभ? मठाधीश: लाभ ई जे जँ संसार अछि, तँ भौतिक जगत्‌क सृष्टि व्यक्तिगत कर्मसभक कारणे होयत। वृद्धाम्भि: ताहिसँ की? मठाधीश: कर्म शरीर आदि सृष्टिक सेहो कारण अछि। वृद्धाम्भि: तकर बाद? मठाधीश: कर्म अचेतन अछि। वृद्धाम्भि: तखन सेहो की? मठाधीश: अचेतन वस्तु चेतन अधिष्ठाताक नियन्त्रणमे रहिते कारण बनि सकैत अछि। वृद्धाम्भि: ओही कर्मक चेतन कर्तासभ ओकर अधिष्ठान करत। मठाधीश: नहि कऽ सकैत अछि, कारण अलग-अलग अभिप्रायबला लोकमे समन्वय सम्भव नहि। वृद्धाम्भि: तखन बढ़इसभक की? मठाधीश: बढ़इसभ किएक? वृद्धाम्भि: अनेक होइतो ओ सभ एक घर बनबैत अछि ने? मठाधीश: एना नहि। ओ सभ एक वास्तुकारक इच्छाक अनुसरण करैत अछि। वृद्धाम्भि: तखन सभामे ब्राह्मणसभक सहमतिक की? मठाधीश: ओतय सेहो सभा विषयविशेषज्ञ एक सभापतिक इच्छाक अनुसरण करैत अछि। मुदा एतय राजा वा मन्त्रीक एकटा शरीर सहायता वा हानिक माध्यमसँ हजारो जीवक सुख-दुःखक कारण बनैत अछि; तेँ निश्चय ओ सभक संयुक्त कर्मसँ उत्पन्न होइत अछि। आ जिनका लेल राजाक शरीर दुःखक कारण अछि, ओ ओकर उत्पत्तिपर प्रसन्न नहि होइत। तेँ एहन विशाल कर्मराशिक अधिष्ठाता केवल प्रभु ईश्वरकेँ मानय पड़त। ई पूर्ण रूपसँ स्थापित भऽ गेलापर ईश्वरक अस्तित्वक प्रमाण अखण्डनीय होइत अछि। पृथ्वी, समुद्र, पर्वत आदि विशाल, अपरिमेय उत्पाद छोड़ू; हमर सन क्षुद्र, कृश शरीरहि सँ ओही क्रममे ईश्वरक अनुमान कऽ सकैत छी। नदीक तटपर अचेतन, अकुशल शरीरसभ द्वारा बनल बालुकाक ढेर, वा पर्वत, गुफा, वन आ झाड़ीमे उगल घास, लता, झाड़ी सन जङ्गली वनस्पति सेहो लोकक सुख-दुःखक कारण होयबाक कारण हुनक कर्मपर निर्भर अछि। तेँ कर्मक अधिष्ठान आवश्यक होयबाक कारण एहि वस्तुसभक निर्माता अचेतन नहि भऽ सकैत अछि। वृद्धाम्भि धरतीपर रेखा खिंचैत अछि। मठाधीश: आन स्थूल वा सूक्ष्म कार्य छोड़ू। हमरा सन लोकक दैनिक क्रिया—खेती, सेवा, व्यापार, एतय धरि जे सुतब, बैसब, चलब, खायब आदि—अनेक जीवक लाभ वा हानिक कारण भऽ सुख-दुःख उत्पन्न करैत अछि। तेँ उपर्युक्त तर्कसँ ई क्रियासभ ओहि जीवक कर्मपर निर्भर अछि; कर्म अचेतन अछि; ओकर कर्ता अनेक आ परस्पर विरोधी होयबाक कारण सहमत नहि भऽ सकैत अछि—अतः ई क्रियासभ सेहो भगवान्‌क अधिष्ठानमे ओही कर्मसभ द्वारा उत्पन्न होइत अछि। एही कारण महर्षि व्यास कहैत छथि: “ई जीव अज्ञानी अछि, अपन सुख-दुःखक स्वामी नहि; ईश्वरक प्रेरणासँ ओ स्वर्ग जा सकैत अछि, वा सीधे नरकमे।” वृद्धाम्भि: एहि विषयपर विचार करब। एखन जाइत छी। मठाधीशक तपस्वी अनुयायी वृद्धाम्भिक उपहास करैत आ अनेक प्रकारसँ ओकरा अपमानित करैत छथि। मठाधीश: (हुनका सभकेँ रोकि वृद्धाम्भिसँ) कतय जा रहल छी? अपन कर्मजनित दुःख एक क्षण एखने सहू। शास्त्रक प्रामाण्यसँ सेहो हम ईश्वरक अस्तित्व जनैत छी। वृद्धाम्भि: शास्त्र प्रमाण! ई तँ पैघ साहसक बात अछि। मठाधीश: (सङ्कर्षणसँ) हम थाकि गेलहुँ; कृपा कऽ एकरा बुझायब? सङ्कर्षण: जेना पूज्य मठाधीशक इच्छा। शास्त्रक प्रामाण्यक पुष्टि करबाक लेल हमरा कनेको परिश्रम नहि करय पड़त, कारण ओकर प्रामाण्य स्वभावसिद्ध अछि। वृद्धाम्भि: शास्त्रक प्रामाण्य स्वभावसिद्ध? ई कोना कहैत छी? वेद केवल नित्य होयबाक कारण प्रमाण नहि अछि। आकाश सन आन नित्य वस्तु की प्रमाण रूपमे देखल जाइत अछि? अथवा प्रत्यक्ष आदि, जे नित्य नहि, ओकर प्रामाण्यक विषयमे के विवाद करत? सङ्कर्षण: भद्र, हम ई नहि कहैत छी जे वेद नित्य होयबाक कारण प्रमाण अछि; हमर कथन अछि जे ज्ञान उत्पन्न करबाक कारण प्रमाण अछि। वृद्धाम्भि: कखनो वाक्य वस्तु-विरोधी होइतो ज्ञान उत्पन्न करैत अछि—जेनाकि केओ कहय, “हमर औँठापर हाथी अछि।” सङ्कर्षण: एतयो वाक्यमे जुड़ल शब्दक अभिधेय अर्थ वाक्यज्ञानकेँ असम्भव नहि बनबैत; वास्तवमे कथित अर्थक विषयमे दोसर कोनो प्रमाणक उपलब्धि असम्भव होइत अछि। वृद्धाम्भि: शब्दवाक्य आन प्रमाणसँ ज्ञात वस्तुक विषयमे कार्य करैत अछि। तेँ वस्तुसँ विरोध होइतहि अहाँक मतमे शब्द स्वयं अप्रमाण होयबाक चाही। सङ्कर्षण: मानलहुँ, जखन शब्दक विषय दोसर प्रमाणक अधिकारमे आबि जाइत अछि, तखन ओ खण्डित होइत अछि; मुदा विधि अर्थात् आज्ञाक विषय आन प्रमाणक पहुँचमे कोना आएत? आ स्वभावतः आन प्रमाण ओकर क्षेत्रमे प्रवेश नहि कऽ सकैत अछि, तेँ ओकर सहायता वा हानिसँ ई अप्रभावित अछि। जँ आन प्रमाण शब्द-प्रमाणक सहायता करय तँ केवल पुनरुक्ति; जँ विरोध करय तँ मिथ्या। मुदा जखन दुनू असम्भव अछि, तखन शब्द प्रमाण किएक नहि होयत? वृद्धाम्भि: शब्दकेँ अर्थबोधक होयबाक लेल शब्द आ अर्थक सम्बन्ध अनिवार्य चाही, आ ओ सम्बन्ध मनुष्यक बनाओल होइत अछि। मुदा जे वस्तु किनको पहुँचमे नहि, ओकर विषयमे ई सम्बन्ध कोना सम्भव? सङ्कर्षण: सम्बन्ध शब्दक शक्ति मात्र अछि, आ ई शक्ति ओकरामे स्वभावसिद्ध अछि। पहिनहि अर्थबोधक शब्द बिना मनुष्य कोनो सङ्केत-सम्बन्ध बना नहि सकैत अछि। एहि सम्बन्धकेँ सीखब—जाहि विधिवाक्यक अर्थ केवल शब्दसँ उपलब्ध अछि—प्रयोग द्वारा सम्भव अछि, जखन दोसरक प्रवृत्तिक कारण अपनामे सेहो ओही प्रकार प्रकट होइत अछि। “ओ एकरा करय” एहि वाक्यक कालातीत अर्थमे कालबद्ध विषयबला आन प्रमाण प्रवेश नहि कऽ सकैत अछि। वृद्धाम्भि: तखन ओ विधि सीखल कोना जाइत अछि? सङ्कर्षण: पहिनहि कहलहुँ, मुदा अहाँ नहि बुझलहुँ। अपन भीतर देखैत छी जे प्रवृत्तिसँ पहिने प्रेरकक ज्ञान होइत अछि। दोसर व्यक्तिकेँ विधिलिङ्-प्रत्यय सुनि काज करैत देखि मानैत छी जे ओहो प्रेरककेँ जानलक। अपनामे जेना आत्माक अनुभव होइत अछि, ओही प्रकार प्रेरकक स्वरूप अनुभव करैत छी। मुदा रूपबला वस्तु जेकाँ दोसरकेँ “एहेन अछि” कहि देखाओल नहि जा सकैत अछि। आन लोक सेहो एकर अनुभव करैत अछि, मुदा किनको देखाबि नहि सकैत अछि। तेँ आन प्रमाणसँ अज्ञेय विधिवाक्यमे सेहो शब्द-अर्थ सम्बन्ध सीखब सिद्ध अछि। वृद्ध लोक बाल्यकालमे एही प्रकार सीखल; तेँ संसार अनादि अछि। वृद्धाम्भि: वैदिक विधिक प्रामाण्य सिद्ध करबाक लेल एतबे पर्याप्त अछि? सङ्कर्षण: आरो की चाहैत छी? वृद्धाम्भि: आन प्रमाणक आधारसँ रहित शास्त्रवचन प्रमाण नहि भऽ सकैत; ओ केवल अर्थबोध करबैत अछि, ई आश्वासन नहि दैत जे वस्तु वास्तवमे एहेन अछि। सङ्कर्षण: अर्थबोधक वस्तु वास्तवमे ज्ञान उत्पन्न कऽ सकैत अछि। प्रत्येक प्रमाण केवल ज्ञान उत्पन्न करैत अछि; ज्ञेय-वस्तुक गरदनमे रस्सी बाँधि घड़ा जेकाँ सोझाँ नहि पहुँचा दैत अछि। जे लोक प्रामाण्यकेँ आन प्रमाणक सहमतिपर निर्भर मानैत अछि, ओ सैकड़ो कल्पमे सेहो प्रमाणसभक शृङ्खलाक अन्त नहि पाबि सकत। मिथ्यात्वक दू कारण अछि—बाध वा ज्ञानक कारणमे दोष। वेदमे एहि दुनूमे एको नहि, तेँ ओकर प्रामाण्य सिद्ध अछि। वृद्धाम्भि धरतीपर रेखा खिंचैत अछि। सङ्कर्षणक अनुयायी ओकरा देखि हँसैत छथि। सङ्कर्षण हुनका रोकैत छथि। मठाधीश: वेदक प्रामाण्य सिद्ध करबाक अहाँक एहि विधिपर आश्रित होयब, वा “पवित्र परम्परा हुनक वचन होयबाक कारण प्रमाण अछि” आ “विश्वसनीय पुरुष प्रमाण होयबाक कारण, मन्त्र वा चिकित्साशास्त्र जेकाँ, ई प्रमाण अछि”—एहि विचारक्रमपर चलब नीक—ई हमर सभक आन्तरिक विवाद अछि। एकरा छोड़ू। पहिने अहाँ सेहो एहि प्रकारक वेदद्वेषी नास्तिकसभक पूर्ण खण्डन करू। सङ्कर्षण: जेना पूज्यवरक आज्ञा। नेपथ्यमे कोलाहल। मठाधीश: ई की? सङ्कर्षण: ई कोलाहल निश्चय राजाक आगमनक सूचना दैत अछि। हम हुनक स्वागतक लेल जाइत छी। अहाँ अपन शास्त्रक विधानानुसार राजाक लेल सम्मान-सामग्री तैयार करू। मठाधीश: ठीक अछि, आर्य। सङ्कर्षण: आ पूज्यवरकेँ फेर स्मरण कराबी: हम निश्चय शिवदेवसँ द्वेष नहि करैत छी, जिनक महिमाक शक्ति अनुपम अछि। लोकसभक धारण, संहार आ सृष्टिक एकमात्र कारण ओही छथि। ओ रुद्र छथि, ब्रह्मा छथि, हरि छथि, वा हुनकासँ परे कोनो आन पुरुष। ई सम्पूर्ण जगत् हुनकापर निर्भर अछि। तेँ शैव, पाशुपत, कालामुख आ महाव्रतीसभ निश्चिन्त रहथि। अहाँक गुरुसभसँ प्राप्त ज्ञान सेहो मोह दूर करैत बुझाइत अछि, मुदा जकर विषयमे ओ युक्तिसङ्गत रूपसँ सिद्ध अछि, ओकर क्षेत्र ओतबे धरि सीमित रहय। मठाधीश: ठीक एहेन, आर्य। सभ गोटे प्रस्थान करैत छथि। तृतीय अङ्क समाप्त। चतुर्थ अङ्कक प्रस्तावना: रूढ़िवादी पाखण्ड तखन वैदिक याजक आ वैदिक उपाध्याय प्रवेश करैत छथि। याजक: (व्याकुलतासँ) हाय, कतेक पैघ आघात! सोचल किछु छल, भेल बिल्कुल आन। हमरा आशा छल जे सभ अवैदिक धर्मक निन्दा भेलापर पूरा देशपर हमर सभक सुखपूर्वक अधिकार होयत। मुदा परिणाम ई भेल जे पाखण्डी धर्म पहिने जेकाँ एखनो व्यापक अछि। शैव, पाशुपत, पाञ्चरात्रिक, सांख्य, बौद्ध, दिगम्बर जैन आदि सभ पूर्ववत् टिकले अछि। स्नातकक निष्फल विद्वत्ताकेँ धिक्कार! उपाध्याय: मुदा मित्र, आब ओ राजकर्मी छथि। राजा परम शिवभक्त छथि, तेँ सङ्कर्षणकेँ पूर्णतः हुनक आराधनामे तत्पर रहय पड़ैत अछि। कारण—राजाक निकट रहनिहार सेवक प्रतिध्वनि जेकाँ सदिखन हुनकहि वचन दोहरबैत अछि; अपन लाभक उत्कण्ठामे शुभ-अशुभक भेद नहि करैत। याजक: ठीक कहैत छी, मित्र। अपन स्वार्थ छोड़ि निष्पक्ष भावसँ केवल धर्मपर ध्यान के देत? मुदा हमर सभक समय कोना कटत? यज्ञ करौनाइ, पढ़ौनाइ आदि हमर व्यवसाय केवल वेदसँ सम्बन्धित अछि। उपाध्याय: मित्र, भविष्य सेहो अतीत जेकाँ काटब—खाय आ पहिरबाक भरि भेटि जाय, एतबामे सन्तुष्ट रहब। कारण— पुण्य बिना दुष्टक गप्पसँ रहित सभा, मान-रोषसँ मुक्त प्रेमिका, आ दोसरक दाबीसँ मुक्त धन नहि भेटैत अछि। याजक: ठीक कहलहुँ। की करी? मुदा एकटा आन बात हमरा आरो बेसी खिझबैत अछि। उपाध्याय: से की? याजक: ई पाञ्चरात्रिक भागवतसभ ब्राह्मणक आचार अपनबैत अछि। ब्राह्मणसभक संग घुलमिल जाइत अछि, आ केवल समान ब्राह्मणकेँ कहय योग्य अभिवादन-रूप प्रयोग करबामे कनेको सङ्कोच नहि करैत। वेदपाठक अनुकरण करैत विशेष उदात्त-अनुदात्त स्वर-विन्याससँ पाञ्चरात्र शास्त्र पढ़ैत अछि। “हम ब्राह्मण छी”—अपन विषयमे कहैत अछि आ आन लोकसँ सेहो एही रूपमे कहल करबैत अछि। शैव आदि लोककेँ देखू—ओ सभ चारि वर्णक व्यवस्थामे नहि अछि, वेद आ स्मृति द्वारा निर्धारित आश्रमसभकेँ अस्वीकार करैत अछि, आ भिन्न सिद्धान्त अपना कऽ अलग रहैत अछि। मुदा ई लोक कहैत अछि—“हम जन्मसँ, पूर्वजक दीर्घ परम्परासँ, वास्तविक ब्राह्मण छी”; आ ओही प्रकार चारि आश्रमक व्यवस्थाक नकल करैत अछि। ई महान् पीड़ा अछि। उपाध्याय: मित्र, ई पीड़ा एतेक पैघ कोना? यज्ञ करौनाइ, पढ़ौनाइ, विवाह-सम्बन्ध वा आन कोनो प्रसङ्गमे वेदज्ञ ब्राह्मण पाञ्चरात्रिकसभसँ पर्याप्त दूरी राखैत छथि। ओ सभ अपनाकेँ ‘ब्राह्मण’ कहैत अछि—ई केवल हुनक सम्प्रदायक आन्तरिक व्यवहार अछि। याजक: ई छोट उपद्रव अछि? उपाध्याय: पैघ कोना? वेद, स्मृति वा मीमांसा पढ़बाक, अथवा श्रौत-स्मार्त कर्म करबाक अधिकार हुनका कहियो नहि भेटत। आ जँ मर्यादासँ भटकल कोनो ब्राह्मण स्त्रीसँ विवाह करत, तँ ‘प्रतिलोम विवाह’क बदनामी भेटत। वेदाङ्गसभमे किछु अल्प ज्ञान पाबियो जँ किछु स्थानसँ बहिष्कृत नहि कएल जाए, तँ ताहिपर क्रोध करबाक आवश्यकता नहि। विषय छोड़ू। मुदा ई बात सुनल अछि। याजक: की? उपाध्याय: आइ माननीय सङ्कर्षण वैष्णवक मन्दिर गेल छथि, जतय सैकड़ो-हजारो भागवत भरल छथि—ठीक हुनक धर्मक परीक्षा करबाक लेल। ब्रह्मद्वीपमे हजारो ब्राह्मण विद्वान् सेहो एकत्र भेल छथि। ओतय विशाल सम्मेलन होयत। चलू, ओतहि चली। याजक: सङ्कर्षणक उत्साह देखि चुकल छी; ओ सभ धर्मकेँ प्रमाण मानयबला सिद्धान्तक समर्थक छथि। दोसर दिस, महारानी सुगन्धादेवी विशेष रूपसँ एहि लोकक प्रति सहानुभूति रखैत छथि—एहन सुनल जाइत अछि। चर्चा अछि जे एक राजकर्मी सेहो सात्वतसभक समर्थक छथि। उपाध्याय: सदिखन अनिष्टक आशङ्का नहि करू। स्थापित आचारक विपरीत हो तँ ओ सभ घासक एक पातो नहि मोड़ि सकत। चलू, ओतय जा कऽ देखि जे मीमांसकक प्रवहमान वाक्पटुताक समुद्रमे बारम्बार डुबकी खाइत पाखण्डी धर्मसभ कोना अनेक प्रकारसँ छटपटा रहल अछि। दुनू प्रस्थान करैत छथि। चतुर्थ अङ्क: मर्यादित सहिष्णुता तखन माननीय सङ्कर्षण, बालक आ सामर्थ्य-अनुसार अनेक परिचारक प्रवेश करैत छथि। सङ्कर्षण: बालक, हम कठिन सङ्कटमे पड़ल छी। कारण— जिनक मन जगत्‌क अवस्थासभ—पालन, सृष्टि आ संहार—केँ बदलयबला लीला सम्पन्न करबामे लीन भगवान् विष्णु नारायणक उपदेश माननिहारसभक दर्शन मिथ्या अछि—ई अपन जीहसँ कोना कही? आ जँ नहि कही, तँ तीनू वेदमे पूर्णतः लीन बुद्धिबला विद्वान्‌क सोझाँ कोना ठाढ़ होयब? बालक: हाय आर्य, अहाँ सचमुच द्विधामे छी। तैयो बहुत काल पहिने स्थापित आचार जेना छल तेना चलि रहल अछि। एहि विषयमे व्याकुल किएक होइत छी? आब सैकड़ो-हजारो पाञ्चरात्रिक आ आन महामनीषीसँ भरल एहि स्थानकेँ देखू। सङ्कर्षण: (चलैत-चलैत आगाँ देखि चकित) हे भगवान्! विद्वान्‌क कतेक विशाल सम्मेलन! परस्पर स्पर्धासँ पसरल वाद-विवादक महान् कोलाहल दिशासभ भरि रहल अछि। एहि सभामे—वाक्यक विविध अर्थ-प्रक्रियापर विचार कएने मीमांसक; संज्ञा आ धातुक मूल जाँचि चुकल वैयाकरण; हेतुक व्याप्ति निश्चित करबामे तीक्ष्ण बुद्धिबला तार्किक; आ एतय स्मृति, नीतिशास्त्र, पुराण आदिक वरिष्ठ आचार्य उपस्थित छथि। अहा, अद्भुत! आब पवित्र कीर्तिबला महाराज यशोवर्मदेवक राज्य ठीक ब्रह्मलोक जेकाँ लगैत अछि। हुनक हृदय त्रिपुरविनाशी शिवमे अनुरक्त, ओ ईर्ष्या जगाबयबला गुणक समुद्र, विद्वान्‌क मूल्यवान् उपदेश सुनि अपन कान अलङ्कृत करनिहार, आ प्रत्येक सज्जनक इच्छा पूर्ण करनिहार छथि। (क्षणभरि विचार कऽ एकान्तमे) परस्पर-विरोधी विविध विद्वत्-ग्रन्थक मार्गदर्शन आ उपदेश माननिहार एहि लोकक बीच हम कोन आचरण करी? वेदविरोधक कारण दुर्गम एहि बाटपर, जतय विशेषज्ञ सेहो निर्णयपर नहि पहुँचि सकय, हम की करी? बुझलहुँ! धनुष, चक्र आ शङ्ख धारण करनिहार भगवान् विष्णु हमर शरण छथि। ठीक अछि! पहिने तत्काल स्वयं भगवान्‌क शरण ली। (उच्च स्वरमे) बालक, भगवान्‌क मन्दिर समीप अछि। सभक शरण भगवान् विष्णु रणस्वामीकेँ प्रणाम करब, तकर बाद सभामे अपन आसन ग्रहण करब। बालक: जेना आज्ञा। दुनू चलैत अछि। सङ्कर्षण: (प्रवेशक अभिनय कऽ धरतीपर ठेहुन टेकैत) जिनका पएरक डेगसँ नापल विविध त्रिभुवन आश्रित अछि, आ जकर उदरक कोनक एक अंशक अणुमात्रमे जगत् लीन भऽ स्थित अछि—ओहि विष्णुकेँ प्रणाम। जिनक हथेलीमे शङ्ख आ चक्र सुशोभित, जे मुक्तिक सच्चा मार्ग देखबैत आ निर्मल परम कल्याण प्रकाशित करैत छथि—ओ चक्रीकेँ प्रणाम। परम निर्वाणक कारण रथाङ्गीकेँ प्रणाम... (<सुनैत> आ आनन्दसँ कहैत:) एहि मङ्गलमय शङ्खध्वनिसँ हम अनुमान करैत छी... <मञ्जीर>: ...ई वर्णाश्रमक लेल बहुत पैघ जोखिम अछि। तेँ प्रधान मन्त्री ब्रह्म...क्ष द्वारा निवेदन कएलापर रानी एहि आदरणीय ब्राह्मणसभकेँ बजयबाक लेल तैयार भेली। ओतयसँ घुरि प्रधान मन्त्रीकेँ कहलनि जे हुनका एहि प्रकार अनुरोध कएल गेल—“तीनू वेदक विद्वान् आ आन धर्मक आचार्यसभक एहि वादमे महान् नैयायिक, धैर्यराशि नामसँ प्रसिद्ध भट्ट साहतकेँ सभ गोटे निर्णायक मानैत छथि; कृपा कऽ एहि वाद-विषयक प्रकरणमे हुनका मध्यस्थ बनाउ।” ...तेँ आर्य, कृपा कऽ प्रस्थान नहि करू। हम चाहैत छी जे अपन मत प्रस्तुत कए बिना अहाँ एहि वादक सभामे उपस्थित रहू... सङ्कर्षण: मित्र मञ्जीर, आउ, हम सभ संगहि सभामे प्रवेश करी। दुनू चलैत अछि। नेपथ्यसँ: सुप्रसिद्ध गरिमाबला विशिष्ट कुलमे ... असाधारण भाग्यवान्, विरोधी मतबला लोकक प्रत्येक शङ्का दूर करैत छथि, आ एहि प्रकार विद्वान्‌सभकेँ परम तत्त्वक एक समान दृष्टि प्राप्त होइत अछि। माननीय साहत जगत्‌क सच्चा आभूषण बनि जन्मल छथि, परमेश्वरक लगभग समान। साधारण गुण नहि, महान् गुण हुनका एतेक ऊँच उठौलक जे केओ हुनक सामना नहि करैत अछि। सङ्कर्षण: आबि रहल धैर्यराशिक प्रशंसा भऽ रहल अछि। स्पष्ट अछि, लोक धैर्यराशिक पक्षमे अछि! हुनक सहानुभूति उचितो अछि, कारण ओ ठीक वर्णनानुसार छथि। मित्र मञ्जीर, अहाँक कृपासँ हम कठिन सङ्कटसँ निकलि गेलहुँ, आ एहन विषयसँ अलग रहि सकैत छी। मञ्जीर: अजर-अमर परमेश्वर जखन अहाँक संग छथि, तँ जीवनभरि लोकक सहायता करबाक अपन अभियानमे अहाँकेँ कोन कठिनाई होयत, आर्य? बालक: आर्य, वर्तमान सभामे अहाँक लेल ई आसन अछि। कृपा कऽ प्रवेश करू। सङ्कर्षण: सहकर्मी मञ्जीर, पहिने अहाँ प्रवेश कऽ सभासद्‌सभकेँ राजाज्ञा सुनाउ। मञ्जीर: ठीक अछि। (ओ चलैत अछि।) हे विद्वान्‌सभ, अहाँ सभ अपन-अपन स्थान ग्रहण कऽ चुकल छी; कृपा कऽ ध्यान दी। एक तीक्ष्णबुद्धि वक्ता छथि, सज्जनसभक अत्यन्त आदरणीय, विद्याक नदीसभक समुद्र, जे विद्वत्समाजमे सर्वश्रेष्ठ पण्डितक रूपमे महान् यश प्राप्त कएने छथि। आइ राजाज्ञा आ धर्माचार्यसभक अनुरोधपर एहि प्रकरणक मध्यस्थ नियुक्त कएल गेल छथि। सभ लोक निश्चिन्त रहथि, मतभेद छोड़थि आ आनन्द करथि! तखन पूर्वोक्त रूपमे धैर्यराशि आ सामर्थ्य-अनुसार वादिसभक विशाल समूह प्रवेश करैत अछि। धैर्यराशि: (चकित) विद्याक कतेक अद्भुत सङ्गम! आश्चर्य! जम्बूद्वीपक भारतवर्षमे एतहि परमपुरुषक नगरी देखैत छी। कारण—एतय चौदह विद्यास्थान दृढ़तासँ प्रतिष्ठित अछि; विविध आचार उपस्थित; अनेक व्रत-नियम अछि; आ स्वभावतः शुद्ध तपस्या निर्विघ्न शान्त भावसँ चलि रहल अछि। राजा स्पष्टतः देहधारी ब्रह्मा छथि—एहिसँ श्रेष्ठ की होयत? (आगाँ देखैत) पौराणिक ऋषिसभक समान माननीय सङ्कर्षण उपस्थित छथि। ठीक अछि, हुनका प्रणाम करी। (<ओ> प्रणाम करैत छथि।) सङ्कर्षण: (गाढ़ आलिङ्गन करैत) अहाँक आलिङ्गन सभ तीर्थक जलमे विधिपूर्वक स्नान जेकाँ अछि! सभ गोटे बैसैत छथि। सङ्कर्षण: आदरणीय धर्मशास्त्रीसभ, अहाँक सभ जटिल शङ्का आब कटले जेकाँ अछि। राजाज्ञासँ जीवित अक्षपाद, दर्शनक प्रजापति कहय योग्य धैर्यराशि हमर सभक बीच उपस्थित छथि! वादिसभ: राजाज्ञासँ नहि, धर्माचार्यसभक अनुरोधसँ। सङ्कर्षण: (धैर्यराशिसँ) तार्किकसभक आभूषण, एखन विचाराधीन विषयक तथ्यसँ अहाँ अवश्य परिचित होयब। तेँ अपन प्रेरणानुसार जे उचित बुझू, निर्णय सुनाउ। धैर्यराशि: आर्य, हम एतबे जनैत छी—एतय वादिसभ पाञ्चरात्र आदि शास्त्र प्रमाण अछि कि नहि, एहि विषयमे असहमत छथि। मुदा अहाँ उपस्थित छी, तखन हमरा सन लोककेँ बोलबाक कोन अधिकार? अहाँ अनुमति दी तखनहि अहाँक बालक जेकाँ किछु कहि सकैत छी। सङ्कर्षण: एना किएक कहैत छी? आदेश देनिहार अहाँ छी। प्रत्येक वादी केवल अहाँपर विश्वास रखने अछि। कृपा कऽ कहू। धैर्यराशि: (वादिसभसँ) आदरणीय सज्जनसभ, दुनू पक्षक विषयमे अहाँसभ द्वारा प्रस्तुत तर्क सुनि बुझि लेलहुँ; ओ पूर्ण अछि। तेँ जखन हम निर्बाध अपन वक्तव्य दैत रहब, बीचमे किछु नहि कही। वादिसभ: ठीक अछि, आर्य। बिना पूछने अहाँक वचन बाधित करबाक लेल बीचमे किछु नहि कहब। धैर्यराशि: तखन आब ध्यानसँ सुनू। वादिसभ: हम सभ अहाँक प्रत्येक शब्दक प्रतीक्षा कऽ रहल छी। धैर्यराशि: सर्वप्रथम मीमांसक कहैत छथि—वेद स्वयं प्रमाण अछि, कारण ओ ज्ञान उत्पन्न करैत अछि। अनादित्वरूपी दर्भ-घास ओकर लेखक आ प्रामाण्यपर उठयबला दुनू आपत्तिक धूरा बुहारि देलक। एहि अनुसार ओ सभ कहैत छथि: हमर सभक प्रत्येक ज्ञान अपन उचित विषयक सूचना देबाक कारण स्वतः प्रमाण अछि। मुदा जँ बाध उत्पन्न हो वा ज्ञान-साधन दोषपूर्ण अछि—ई बुझाइत, तँ ओ प्रमाण नहि रहैत। नित्य वेदक विषयमे दुनू आपत्ति असङ्गत अछि, आ ज्ञान उत्पन्न करब सिद्ध अछि। अथवा, जँ इन्द्रियातीत विषय सिद्ध करबाक हो तँ आपत्तिक स्थान आरो कम अछि। इन्द्रियगम्य वस्तु एहेन अछि वा नहि—ई लोक निश्चित कऽ सकैत अछि। मुदा इन्द्रियातीत वस्तुक विषयमे ओकरा लग कोन उपाय अछि? तेँ वेद केवल ज्ञान उत्पन्न करबाक कारण आ प्रामाण्यक दुनू बाधा नहि रहबाक कारण स्वयं प्रमाण अछि। एहिपर हमर कथन अछि—वेदक प्रामाण्यक ई मार्ग निश्चय सोझ आ सरल अछि। तैयो ई हमर हृदय नहि जीतैत अछि। शब्द आ अर्थक व्यवस्था मनुष्य-विहीन कतय देखल जाइत अछि? वेदपाठ सेहो पहिल बेर कतहु सँ आरम्भ भेल होयत। वेदक ई ‘पहिल अवसर’ कहिया छल—एकर कल्पना अहाँ करू। कारण घटक नित्य होइतो वेदक ई विन्यास स्वयं नित्य नहि भऽ सकैत। ध्वनि नित्य मानू, मुदा रचनामे ई स्वभाव नहि देखैत छी; हमर लोकमे रचना निश्चय कर्तापर निर्भर अछि। अहाँ आपत्ति कऽ सकैत छी—“वेदक लेखकक स्मरण नहि, जेना व्यास आदिक स्मरण अछि।” आउ! ई आरोप खतरनाक नहि। कर्ताक असाधारण स्वरूप ओकरा अप्रत्यक्ष बनबैत अछि। हमरा सन साधारण लोकक प्रत्यक्षमे आबयबला वस्तु वा व्यक्तिकहि स्मृति भऽ सकैत अछि। आरो, प्राचीन कालसँ लोक कहैत आयल अछि जे समृद्ध वैदिक वाङ्मयक लेखक हिरण्यगर्भ छथि। जँ कहब—“ई परम्परा अर्थवादसँ उपजल अछि”—तँ एहि भेदकेँ निश्चित करबाक लेल रत्ती भरि प्रमाण प्रस्तुत नहि कऽ सकब। आरो: जेना अहाँ कहैत छी जे अष्टका-कर्म आदि स्मृतिक आधारमे सदिखन वैदिक वाक्यक अनुमान करब चाही, ओही प्रकार वेदक लेखकक सेहो सदिखन अनुमान करय पड़त; नहि तँ भेद कहू। अहाँ पूछि सकैत छी—“जकर अनुमान करबाक अछि, ओकर बिना की असम्भव होइत अछि?” तखन वैदिक वाक्यक अनुमान बिना की असम्भव? जँ कहब निर्धारित कर्मक स्मृति असम्भव होयत, हमर उत्तर—रचना असम्भव होयत। जँ स्मृति कार्यस्वरूप अछि, तँ रचना सेहो ओही प्रकारक अछि। अहाँ आपत्ति करब—“वैदिक वाक्यक आधार बिना मनुक वचन मिथ्या होयत।” अपन प्रयोजनक अनुसार प्रमाणक स्रोत किएक कल्पैत छी? अथवा: मनुक प्रतिपादन मिथ्या रहय दिअ; मुदा सैकड़ो वेदशाखा पढ़निहार एको व्यक्तिक मुखमे नहि भेटयबला, कतहु नहि रहनिहार वैदिक वाक्यक अनुमान नहि कऽ सकैत छी। जँ वेदज्ञसभक सम्मानवश ओकर आधारमे वैदिक वाक्य मानब, तँ वैदिक <शब्द>क क्रम सन रचनाक कारण लेखक सेहो मानय पड़त। “वेदक नियमित अध्ययन अपन गुरुसँ नियमित अध्ययनक पूर्वधारणा करैत अछि, कारण ‘वेदाध्ययन’ शब्द एही बातक द्योतक अछि”—ई हेतु अनैकान्तिक अछि। अहाँ स्वयं कहैत छी जे एहन हेतु प्रभावी नहि, आ ओही समय स्वयं ओकर प्रयोग करैत छी—ई हास्यास्पद अछि। जाहि प्राचीन रचनाक ख्याति एहन परम्परासँ भेल जकर मूल भ्रम नहि, ओकर लेखकक स्मृति नहि रहितो आरम्भमे लेखक स्पष्टतः होइत अछि। जँ वेद रचित अछि, तँ लेखकक स्मरण नहि रहितो सज्जन लोक बहुत धनसँ सम्पन्न होयबला ओकर कर्म किएक करैत अछि? एहन दशामे लेखकक अनुमान कएलोपर ज्ञानीक प्रयास पूर्णतः उचित अछि, जेना स्मृतिमे निर्दिष्ट अष्टका आदि कर्म करबाक लेल वैदिक वाक्यक अनुमानपर आधारित अहाँक प्रयास उचित अछि। निम्न कारणसँ सेहो वेदक लेखक अछि, जकर सदिखन अनुमान करय पड़ैत अछि: सर्वजित् यज्ञमे, वैदिक वचनमे स्पष्ट उल्लेख नहि होइतो, कर्म-विधिसँ उत्पन्न अपेक्षाक कारण विशेष फल उचित रूपसँ मानल जाइत अछि। ओतय फल अपेक्षा करनिहार के? वाच्य अर्थ आ वाचक शब्द निश्चय चेतन नहि। जँ कहब ई बोधक विशेषता अछि, तँ केकर बोध? ओ स्वतन्त्र नहि। जँ कहब हमर बोध, तँ वेदक लेखक मनुष्य सिद्ध होयत। जखन-जखन हम अर्थ बुझैत छी, तखन ज्ञाता लेखकक अभिप्रायक ज्ञान होइत अछि। एतय अभिप्राय केकर? शब्दक नहि, अर्थक नहि। जकर अपेक्षाकेँ कोनो कर्मक अङ्ग वा फल मानबाक कारण मानल जाइत अछि, ओही ओहि कर्मक लेखक अछि। हुनका छोड़ि ई अपेक्षा केकर होयत? तेँ वेदक लेखक अवश्य अछि, भले सदिखन ओकर अनुमान करय पड़य; कारण ओकर बिना कोनो वैदिक क्रिया सम्भव नहि। ‘लेखकक स्मरण नहि’ एहि कथनक विश्लेषण एना करैत छी: व्यास आ वाल्मीकि सन लेखक, जिनक स्मरण एहि लोकमे सम्भव अछि, सभ सीमित शरीरबला छथि आ हमरा सन लोकक दृष्टिपथमे चलैत-फिरैत छथि। सम्भव अछि आकाशे हुनक शरीर हो, वा ओ अनेक रूप धारण करथि, वा पूर्णतः अशरीरी होथि—एहन स्थितिमे वेदक लेखक ईश्वर स्मृतिक विषय कोना बनताह? एही कारण ज्ञानीसभ एहि लेखकक विषयमे विविध कल्पना करैत छथि। वास्तवमे ओ एक छथि, तीनू लोकक कल्याण करबाक समर्थ। समान अभिप्रायबला अनेक देवता नहि मानल जा सकैत। विरोधी अभिप्राय एकसंग पूरा नहि भऽ सकैत, तेँ किछु स्पष्टतः देवता नहि रहत। अतः एकमात्र सर्वज्ञ पुरुष छथि। जँ जगत्‌क अनेक व्यवस्थापक होइत, तँ या जगत् रचलहि नहि जाइत, वा कोनो प्रकार रचलो तँ कुशासनबला राज्य जेकाँ बहुत दिन नहि टिकैत। भवनक निर्माण अनेक लोक केवल एक वास्तुकारक निर्देशन मानि सम्पन्न करैत अछि; तेँ जगत् एक कर्ता द्वारा रचल गेल होयत। दौड़धूप करैत अनेक लोक सैकड़ो कल्पमे सेहो एहि जगत्‌क निर्माण नहि कऽ सकैत। मुदा जकर सङ्कल्प सदिखन सिद्ध होइत अछि, एहन एक शुद्धचित्त पुरुष एक क्षणमे एकरा सम्पन्न करैत छथि—ई उचित मत अछि। आ कहल गेल अछि: “सृष्टि, पालन आ संहाररूपी अपन कार्यक अवयवसँ सम्बन्धक कारण सम्पूर्ण जगत्‌क उत्सर्जनक कारण, अद्वितीय, अद्भुत, अजन्मा, परम शक्तिशाली पुरुष ब्रह्मा, विष्णु आ रुद्र नामसँ जानल जाइत छथि।” जेना ई विश्वात्मा सभ लोकक स्रष्टा छथि, ओही प्रकार शुद्धचित्त ओ वेदक लेखक सेहो छथि। जेना तीनू लोकक व्यवस्था परस्पर निर्भर अछि, ओही प्रकार वेद सेहो परस्पर सम्बद्ध विधि घोषित करैत अछि। परस्पर जुड़ल विषय वा शब्दमे देखल व्यवस्था आन प्रकार सम्भव नहि; तेँ हम निम्न बात मानैत छी: अतुलनीय सुखक मार्ग देखबयबला, अनेक शाखामे पसरल वेदसभक एकमात्र रचयिता एक शुद्धचित्त ऋषि—अद्भुत, प्राचीन देव—छथि। ओही प्रकार भगवान्‌केँ सभ शास्त्रक एकमात्र लेखक मानू; कारण, पहिनहि कहल गेल, अनेक लेखकक कल्पना सहज नहि। अहाँ कहि सकैत छी—“अहो! सभ शास्त्र बिना अपवाद परस्पर-विरोधी अछि, कारण ओहिमे कोनो साझा विषय देखाइत नहि। एक व्यक्ति द्वारा रचित कोना मानब? वा एक-दोसरक खण्डन करैत ओ सभ प्रमाण कोना होयत?” पहिने अहाँक एहि कथनक परीक्षा होयत—“परस्पर विरोध रहला पर प्रामाण्य कोना?” वेदमे परस्पर विरोधकेँ कोना रोकैत छी? जँ कहब वेद नित्य अछि—अहा! अपनहि घरक कथामे फँसि गेलहुँ। जँ वैदिक वाक्यक विषय-भेद कऽ विरोध टारैत छी, तँ आन शास्त्रक वाक्यमे सेहो ओही प्रक्रिया अपनाउ। वेदमे दीर्घायु चाहनिहार लेल जामुनक आहुति निर्धारित अछि, आ मरबाक इच्छा रखनिहार लेल सर्वस्वार कर्मक पाठ कहल गेल अछि। जँ विधेय-विषयक भेदसँ एहि वैदिक वाक्यक विरोध दूर करैत छी, तँ आन धर्मक कथनक विषयमे सेहो ओही उपाय अपनय पड़त। एहि प्रकार, परस्पर-विरोधी होइतो आन पवित्र ग्रन्थक उपदेशमे वैदिक विधिसँ बेसी दोष नहि। अथवा— परम पुरुषार्थक विषयमे शास्त्रसभमे कोनो विरोध नहि, कारण सभ एक्के फल—मुक्ति—क उपदेश दैत अछि। तैयो अनुग्रह-योग्य जीवक बुद्धिक अनुसार मुक्तिक अलग-अलग मार्ग सिखाओल गेल अछि। सर्वज्ञ भगवान् देखलनि—“ई लोक अपन रुचिक एहि मार्गसँ परम कल्याण प्राप्त कऽ सकैत अछि”—तेँ विविध उपाय सिखौलनि। जेना एक दुर्ग वा विशाल भवनमे प्रवेश करयबला भीड़ अलग-अलग द्वारसँ भीतर जाइत अछि, ओही प्रकार मोक्षक इच्छुक लोक परम धाममे प्रवेश करैत अछि। समस्त विद्याक सारमे पारङ्गत, तत्त्वज्ञ, भ्रमरहित प्रतिभाशाली जयन्तक ई बुद्धिमत्तापूर्ण उक्ति एही बातक विषयमे अछि— “विभिन्न शास्त्रीय मार्गसँ उपदिष्ट अनेक साधन एक परम पुरुषार्थमे मिलैत अछि, जेना गङ्गाक धारासभ समुद्रमे।” “विरोधी शास्त्रक एक लेखक कोना भऽ सकैत अछि?”—एहि आपत्तिक उत्तर सेहो दऽ देल गेल: वेद स्वतः प्रमाण नहि, ईश्वर द्वारा उच्चरित होयबाक कारण प्रमाण अछि। आ दोसर दिस, अनेक ईश्वर मानबाक कोनो तर्क नहि। अलग-अलग लेखकक उल्लेखक व्याख्या दोसर प्रकारसँ होइत अछि। ओ एक होइतो अपन इच्छासँ रचल विभिन्न शरीर धारण कऽ सभ जीवक कल्याणक लेल सभ प्रकारक शास्त्र उपदिष्ट करैत छथि; तेँ समस्त लोकमे प्रसिद्ध ओ सभ अलग-अलग नाम धारण करैत छथि। शिव, पशुपति, कपिल, विष्णु, दिव्य सङ्कर्षण, जिनमुनि, बुद्ध आ मनु—सभ एक छथि। केवल नाम, सम्भवतः शरीर सेहो, अलग अछि; अविभक्त परमात्मामे अनेकता नहि। जँ कोनो असाधारण महान् पुरुष ईश्वरसँ भिन्नो हो, तैयो ओ प्रभुक तेज धारण करैत अछि। कृष्ण कहने छथि— “जे कोनो जीव शक्तिशाली, समृद्ध वा प्रभावशाली अछि, ओकरा हमर तेजक अंशसँ उत्पन्न बुझू।” अथवा जिन आदि अनेक यशस्वी ऋषि अलग-अलग धर्मक प्रचारमे तत्पर होथि; ओहो परमपवित्रक भक्तिपूर्ण ध्यानसँ प्राप्त शुद्ध, अविनाशी दृष्टिक कारण परम कल्याणदायी उपायकेँ चिन्हताह। योगी आ परमेश्वरमे एतबे भेद अछि—परमेश्वरक ज्ञान स्वभावसिद्ध, जखन कि योगीक ज्ञान ध्यान-अभ्याससँ प्राप्त होइत अछि। कुल मिला कऽ, जे लोक वेदकेँ विश्वसनीय पुरुषक रचना मानैत अछि, ओ एही प्रकार ओकर प्रामाण्य प्रतिपादित करैत अछि। पाञ्चरात्र आदि प्रत्येक शास्त्रक प्रामाण्यक विषयमे तर्कक क्रम एक्के अछि। ओकर लेखक एक—भगवान्—होथि, वा अलग-अलग मार्गक ज्ञाता अनेक विश्वसनीय पुरुष। दुनू स्थितिमे हुनका वा हुनकासभ द्वारा रचित ई ग्रन्थ अपन प्रामाण्य वेद जेकाँ नहि गमबैत अछि। अथवा मानि ली वेद अनादि अछि आ स्वयं प्रमाण बनैत अछि; बहुत नीक—पाञ्चरात्र आदि ई विधिवाक्य सेहो ओही प्रकार प्रमाण भऽ सकैत अछि। एतयो लेखकक स्पष्ट स्मृति हमरा नहि अछि। दिव्य सङ्कर्षण आदि एहि प्रतिपादनसभक प्रवर्तक छथि, जेना कठ आदि। “मुदा,” केओ आपत्ति कऽ सकैत अछि, “लोक नीक जेकाँ जनैत अछि जे वेद केवल चारिटा अछि। इतिहास आ पुराणक विषयमे ‘वेद’ शब्द गौण अर्थमे प्रयुक्त होइत अछि। ‘ई वेद अछि, ई ब्राह्मण अछि, ई जल अछि, ई अग्नि अछि, ई पृथ्वी अछि’—शब्दार्थक एहि स्पष्ट ज्ञानमे एकाग्रचित्त वृद्ध लोक प्रमाण छथि। तखन कोन बालको उतावलीमे पाञ्चरात्रकेँ ‘वेद’ कहत? वा एहि मतक अनुयायी ऋषि जेकाँ देखाइतो ओकरा ब्राह्मण के कहत? हम एतय पाँच वा छह वेद अछि—ई नहि कहैत छी; संख्या सर्वविदित रूपसँ सीमित अछि—केवल चारि। मुदा ओ अनेक शाखामे विभक्त अछि; तेँ पाञ्चरात्र ओकर एक विशिष्ट शाखा रहय। केओ आपत्ति कऽ सकैत अछि: “वैदिक विधिक ज्ञाता सभ शाखासँ एके कर्तव्य—सोमयाग वा पशुबलि सन यज्ञ—जानल जाइत अछि, एना कहैत छथि। कहू, पाञ्चरात्रसँ सम्बद्ध कोनो वैदिक कर्म कतहु देखलहुँ?” हम उत्तर दैत छी: अनेक होइतो जे वाक्य अनेक अङ्गसँ युक्त एक कर्मक उपदेश दैत अछि, ओकर साझा प्रयोग होइत अछि। एहि विस्तृत कर्मक किछु नियम किछु विशिष्ट शाखामे निर्धारित कहल जाइत अछि; ठीक एहीकेँ ओकर परस्पर सम्बन्ध मानू। निश्चित विषयबला एक शास्त्रसँ दोसर शास्त्रक प्रश्न नहि कएल जा सकैत। भिन्न विधिबला वेदमे सेहो एहेन व्यवस्था अछि। एतय सुरा-पात्रक प्रयोगक विधान केवल सौत्रामणी यज्ञक लेल विशिष्ट अछि; निश्चय आन कर्मसँ ओकर सम्बन्ध नहि। वेद आ स्मृतिमे अलग-अलग आश्रमक लेल उपदिष्ट आन पुण्यकर्म की परस्पर गड्डमड्ड होइत अछि? ओही समय, अहिंसा, सत्य, सन्तोष, शुचिता, इन्द्रियसंयम, दानशीलता, करुणा आदि सभ पवित्र परम्परामे समान धर्म लोक सदिखन प्रशंसा करैत आयल अछि। एही बिन्दुपर ई परम्परासभ वेद आ स्मृतिसँ मेल खाइत अछि। पाञ्चरात्रक ग्रन्थकेँ लोक जे ‘वेद’ कहैत अछि, ओ कोनो आन अर्थक द्योतक अछि। सामान्य व्यवहारक आधारपर विषयक अन्तिम निर्णय नहि भऽ सकैत। अथवा नाम सत्य अछि कि मिथ्या, एहि चिन्तामे किएक पड़ब? आयुर्वेद आ धनुर्वेद आदि नाममे ई प्रयोग नहि भेटैत अछि? भगवान् विष्णुक उपासना-विधिसँ प्राप्त अलग विशेष नाम होइतो, एहि उपदेशक अनुयायीकेँ लोक सामान्य रूपसँ ब्राह्मण कहैत अछि— जेना परिव्राजक भिक्षुकसभकेँ सामान्य रूपसँ ब्राह्मण कहल जाइत अछि। सभ जनैत अछि जे ‘ब्राह्मण’ शब्दसँ हुनक नामकरण होइत अछि। लोक अपन इच्छानुसार सामान्य आ विशेष नामक प्रयोग करैत अछि। ‘ब्राह्मणत्व’ आदि जाति-सामान्यक विषयमे विद्वान् असहमत छथि। किछु कहैत छथि—चारि वर्णक व्यवस्था केवल शब्दपर आधारित अछि। “‘ब्राह्मणत्व’ आदि जाति-सामान्य ‘गोत्व’ जेकाँ प्रत्यक्ष होइत अछि वा अलग प्रकारसँ?”—वास्तविक स्थितिपर एहन विचार अप्रासङ्गिक अछि; एहिसँ कोनो अन्तर नहि पड़ैत। सभ सिद्धान्त आ सभ लोकमे स्थापित वर्तमान व्यवस्था पर कोनो प्रकारक अटकलबाजी नहि होयबाक चाही। तेँ जाति अछि वा नहि, एहि चिन्ताकेँ छोड़ू। वर्तमान विषय जारी रखैत छी। ई सभ पवित्र शास्त्र वेद जेकाँ अनादि हो, वा अन्ततः रचना मात्र—सज्जन लोक ओकर निन्दा नहि करथि। कनेको निन्दा वेदक निन्दा समान होयत। ओकर दोष खोजयबला मूर्ख पापक भागी अछि। अथवा एना कहू—पाञ्चरात्र आदि पवित्र ग्रन्थक वाक्य मनु आदि स्मृतिवचन जेकाँ वेदपर आधारित होयबाक कारण प्रमाण अछि। प्रत्येक कार्य धुँआसँ आगि जेकाँ अपन सिद्धिक कारण निश्चित करैत अछि। ई कारण मानय पड़त; कारण वस्तुक प्रत्यक्ष बिना कोनो विषयक स्मृति कहियो देखल वा सुनल नहि जाइत। लोभ, मोह, लोककेँ ठकब, वा सारहीन मानवीय वचनक शृङ्खला—कोनो निर्विवाद तथ्यक आधार नहि बनैत। एतय खण्डनकारी कारण नहि, कारण सक्षम लोक एकरा स्वीकार करैत छथि। वेद अनादि अछि एना माननिहार लोक शास्त्रक प्रामाण्यकेँ योगिक प्रत्यक्षपर आधारित नहि मानि सकैत। तखन पाञ्चरात्रक वचनक आधार रूपमे वेदे शेष रहैत अछि। केओ आपत्ति करत—“एतय कर्तासभक समानता देखाइत नहि, आ ओकर बिना वैदिक वाक्यक अनुमान उचित नहि।” हम उत्तर दैत छी: ठीक, कर्ता अलग होयबाक कारण हुनक आचार समान नहि हो; मुदा कार्य निःसन्देह पर्याप्त कारणक अनुमान करबाक योग्य अछि। केओ आपत्ति कऽ सकैत अछि: “पहिल तीन वर्णक सदस्यक लेल सैद्धान्तिक सम्भावना रहबाक कारण वेदसँ सम्बन्ध मानल जा सकैत अछि। मुदा कार्यक स्रोत केवल ओकर कारण अछि, आ एतय ई कोनो कारणसँ उत्पन्न भऽ सकैत छल।” हम उत्तर देब: धर्मक विषयमे केवल वेद प्रमाण अछि, आन किछु नहि। एही कारण एतय वेदकेँ स्रोत कहल गेल, कर्तासभक समानताक बलपर नहि। एही कारण योगिक प्रत्यक्षक सिद्धान्तक सेहो आवश्यकता नहि। एतय कर्ता समान होथि वा नहि। प्रत्येक दशामे धर्म नामक एहि कर्तव्यक स्रोत केवल वेद अछि। जँ जिन, कपिल वा बुद्धक उपदेश आदि सभ शिक्षाक आधार एतय न योगिक प्रत्यक्ष हो, न वेद, तँ अनेक आर्य द्वारा स्वीकारल ओकर असीम विस्तारक कारण मोह कोना भऽ सकैत अछि? किछु स्थानपर तँ पूर्ण सहमति सेहो भेटैत अछि। मोह किछु दिन धरि ओकरा टिकौने राखि सकैत अछि; मुदा युग-युग धरि एहन मोह टिकैत अछि—ई कहब विलक्षण कल्पना होयत। अहाँ पूछब—“के जानय जे प्राचीन कालमे बौद्ध छलो कि नहि?” तखन के जानय जे प्राचीन कालमे वेदज्ञ ब्राह्मण छलो कि नहि? अथवा जँ कहब लोभ आदि एतय प्रत्यक्ष स्रोत अछि, तँ पाखण्डी लोक पलटि कहत जे वेदो जीविकाक साधन अछि। दोसर दिस, बृहस्पतिक मतक अनुयायी द्वारा बकबकाओल निन्दाक शृङ्खला वेदक विषयमे आदर्श पुरुषक स्वीकृतिक कारण दूर कएल जाइत अछि, तँ आन शास्त्रक उपदेशक विषयमे सेहो ओही प्रकार दूर कएल जा सकैत अछि; कारण कहल जाइत अछि जे बुद्धिमान् लोक ओकरो स्वीकार करैत छथि। वेदक प्रामाण्य सिद्ध करबाक लेल जतेक प्रकारक जतेक तर्क प्रस्तुत करब, आन धार्मिक सिद्धान्तक विषयमे सेहो ओ समान मूल्य रखैत अछि। ‘जगत् सदिखन एखन जेकाँ रहल अछि’ अहाँक ई कथन आन लोक सेहो ओही प्रकार कहैत अछि—ओ धर्मसभ सेहो सदिखन रहल अछि। मुदा चर्चा सङ्क्षिप्त करी। बहुत बोलनिहार लोक अप्रिय होइत अछि; तेँ आब अपन जीहक अत्यधिक बकबक रोकैत छी। धार्मिक शास्त्र सत्यवादी, विश्वसनीय पुरुष द्वारा कहल होयबाक कारण प्रमाण अछि; वा वेद जेकाँ अनादि होयबाक कारण स्वयं प्रमाण; वा मनुक उपदेश जेकाँ वैदिक परम्पराक अनुकूल होयबाक कारण। सभ शास्त्र प्रमाण अछि—एना नीतिशास्त्रीसभ कहैत छथि। अहाँ आपत्ति कऽ सकैत छी: “एहि प्रकार अनुचित विस्तारक तर्कदोषसँ पृथ्वीक सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था पूर्णतः नष्ट भऽ जाएत। कोनो प्रतिपादन जतेक निरर्थक हो, ओकर विषयमे सेहो एहि प्रकार कहब असम्भव हो—एहन एक उदाहरण कहू।” एहि आपत्तिक उत्तर एना अछि: जकर व्यापक रूपसँ मान्य, अखण्ड परम्परा हो; जकर संग सम्बन्ध वा चर्चा करबामे आर्यसभ घृणा नहि करथि; जकर स्वीकृत आचार समाजविरोधी वा खतरनाक नहि हो; जे एखनहि अचानक उत्पन्न नहि भेल हो; जे पागलक बकवास, विचित्र कल्पना वा केवल लोभ आदिपर आधारित नहि हो—एहन शास्त्रपर एहि प्रामाण्य-विधिक प्रयोग भऽ सकैत अछि, प्रत्येक ग्रन्थपर नहि। केवल एहन शास्त्रक विषयमे कहि सकैत छी—ई विश्वसनीय पुरुष द्वारा कहल, अनादि, वा वैदिक परम्परापर आधारित अछि; प्रत्येक स्थितिमे नहि। आ ई श्रेष्ठ वादी ओहि कोनो शास्त्रकेँ प्रमाण नहि मानताह जाहिमे घृणित कर्तव्यक उपदेश हो—जेनाकि निषिद्ध स्त्रीसँ मैथुन वा अपवित्र वस्तुक भोजन। (अपन वक्तव्य समाप्त कऽ धैर्यराशि एक क्षण मौन रहैत छथि, फेर सङ्कर्षण दिस घुमैत छथि:) आर्य, अपन बुद्धिक सर्वोत्तम सामर्थ्यअनुसार कहलहुँ। आब आसनक्रमे एहि आदरणीय वादिसभसँ पूछी जे हमर वचन हुनक हृदय जीतलक कि नहि। सङ्कर्षण: (आनन्दसँ) माननीय धैर्यराशि, निश्चिन्त रहू—अहाँ द्वारा प्रवाहित विद्याक एहि नवीन नदीसँ हम सभ मानू पुनर्जीवित, परमकल्याणप्राप्त, शुद्ध, पुष्ट, आ एहि सांसारिक जीवनक लक्ष्यक अनुभव कएने भेलहुँ। अहा, अद्भुत! कतेक सूक्ष्म बुद्धि! कतेक प्रवाहमय वाणी! दर्शन आ शास्त्रमे कतेक निपुणता! ईर्ष्या आदि दोषसँ मुक्त कतेक निर्मल मन! अथवा एहि व्यक्तिमे कोन गुण अपन चरम सीमा धरि नहि पहुँचल? लोक सदिखन कहैत आयल अछि—साहतक समान दोसर जन्मलहि नहि। ई आचार्यसभ सेहो गुण ग्रहण करबामे समर्थ छथि; तखन अहाँ हुनक हृदय कोना नहि जीतब? पूछी? (वादिसभ दिस घुमैत) आदरणीय आचार्यसभ, धैर्यराशिक वचन अहाँक हृदय जीतलक? वादिसभ: आर्य, कमसँ कम हुनक विद्वत्ता मनुष्यसँ परे अछि। <सङ्कर्षण:> माननीय धैर्यराशिक एहि वचनक कारण अहाँक बुद्धि ब्रह्मर्षिसभ जेकाँ सदिखन शुद्ध रहत। ई वचन नीतिज्ञानक अक्षय धारा बरसबैत, अनुपम प्रवाहमय आ द्वेषरहित अछि। तैयो अहाँसभकेँ बारम्बार स्मरण कराओल जाइत अछि—सज्जनसभ, दू बातक पालन अहाँसभकेँ अवश्य करय पड़त। वादिसभ: कोन दू बात? सङ्कर्षण: जेना कहल गेल, ई धार्मिक परम्परासभ परस्पर मिश्रित नहि; प्रत्येक अपन स्थापित रूपमे अपन-अपन क्षेत्रमे रहैत अछि। सज्जनसभ, ओकर मिश्रण नहि हो—एहि बातपर सदिखन ध्यान दी। वादिसभ: आर्य, मनु द्वारा उपदिष्ट अहिंसा आदि सार्वभौम धर्म, जे प्रत्येकक अपन सिद्धान्तमे परम्परासँ प्राप्त अछि, ओकर विषयमे की कही? मुदा तकर अतिरिक्त, अपन शास्त्रक वचनक विरुद्ध आचरणक भय सँ हम विशिष्ट रूपसँ उपदिष्ट अलग-अलग कर्मकाण्डक मिश्रणसँ बचैत छी। एना पहिल बात निश्चित भेल। दोसर बात की? सङ्कर्षण: जे लोक मुँहसँ अहाँक नाम लैत अछि आ अपन दुष्ट आचरणसँ शास्त्र आ धर्म दुनूकेँ उलटि दैत अछि, ओकरा अपन धर्ममे प्रवेश नहि दी। वादिसभ: ईहो निश्चय कएल जाएत। मुदा ई केवल हमर सभक वशमे नहि। आर्य आ राजक अधिकारीसभ एकरा सम्पन्न करा सकैत छथि। सङ्कर्षण: ठीक कहैत छी। वर्णाश्रमक स्थापित नियमक उपदेशक महाराज निश्चय एहि अवसरकेँ ग्रहण करताह। अहाँसभ एहन लोकसँ अलग रहू; हुनक प्रति सहानुभूति नहि रखू। वादिसभ: जेना आर्यक आज्ञा। सङ्कर्षण: आब उठी आ अपन-अपन काज करी। प्रत्येक व्यक्ति स्थापित आचारक अनुसार अपन धर्मक पालन करय। माननीय धैर्यराशि, आउ; जेना घटना भेल, से अपन स्वामीकेँ निवेदन करब। सभ गोटे प्रस्थान करैत छथि। चतुर्थ अङ्क समाप्त। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.२०.गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-६) सन्दर्भ- कुणाल-कृत प्रेम-प्रतिज्ञा उर्फ श्रुवावतीक जय! गजेन्द्र ठाकुर मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-६) सन्दर्भ- कुणाल-कृत प्रेम-प्रतिज्ञा उर्फ श्रुवावतीक जय! कुणाल-कृत नाट्य-समीक्षा शृंखला · चतुर्थ नाटक प्रेम-प्रतिज्ञा उर्फ श्रुवावतीक जय! एक चतुर्भुज नाट्य-समीक्षा : भारतीय · पाश्चात्य · चीनी · इजरायली परिप्रेक्ष्यमे प्रकाशन : अंतिका, अप्रैल-जून २०१३  ·  मंच : त्रिस्तरीय  ·  पात्र : दू अभिनेता + दू अभिनेत्री १. परिचय, नाट्य-स्थापत्य आ मूल-प्रश्न प्रेम-चतुष्टयक प्रथम नाटिका ‘प्रेम-प्रतिज्ञा उर्फ श्रुवावतीक जय!’ कुणालक नाट्य-लेखनमे एक नवीन मोड़ थिक। लोकनाट्य-त्रयीक बहु-पात्रीय, गीत-नृत्य-बहुल विस्तारसँ एकदम भिन्न—ई नाटिका मितव्ययी, तीक्ष्ण आ विचार-केन्द्रित अछि। मंच निर्देश स्वयं बताबैत अछि—“त्रिस्तरीय मंच, स्तरक उपयोग कखनो प्लेटफार्म, कखनो सीढ़ी जकाँ”—आ पात्र मात्र चारि—दू अभिनेता, दू अभिनेत्री, जे अनेक भूमिका निभाबैत छथि (भारद्वाज/वृद्ध/वशिष्ठ/इन्द्र = एक-दू अभिनेता; श्रुवावती/सखी/स्त्री = एक-दू अभिनेत्री)। स्रोत पुराण-आख्यान थिक—महर्षि भारद्वाजक पुत्री श्रुवावती, जनिकर उल्लेख विभिन्न पौराणिक सन्दर्भमे अछि। मुदा कुणालक श्रुवावती परम्परागत आख्यानसँ बहुत आगाँ जाइत छथि। ओ ‘विवाह-योग्य कन्या’क पारम्परिक भूमिकाकेँ अस्वीकार नहि करैत, मुदा विवाहक शर्त स्वयं निर्धारित करैत छथि—“जखने किओ हमरा लेल अर्थवान भ’ जैत, हम विवाह क’ लेब!” ई ‘अर्थवान होएबा’क माँग नाटकक केन्द्रीय दार्शनिक-नाट्य प्रश्न थिक। नाटकक पाँच क्रम—(१) भारद्वाजसँ श्रुवावतीक ‘स्वतंत्र-स्वावलम्बी’ घोषणा; (२) सरिता-तट पर इन्द्रक छायासँ प्रेम-अनुभव; (३) इन्द्रक प्रत्यक्ष प्रकटन आ प्रस्ताव—“मरणोपरांत स्वर्ग आउ”—श्रुवावतीक अस्वीकार; (४) वृद्ध-वेशमे/वशिष्ठ-वेशमे इन्द्रक परीक्षा—अद्भुत फल—फल पाथर बनब; (५) श्रुवावतीक चिता-संकल्प—इन्द्रक स्वीकृति—दुष्यन्त कुमारक शेरसँ समापन। २. भारतीय नाट्य-सिद्धांत २.१ एकांकी-नाटिकाक शास्त्रीय स्वरूप आ ‘अंक’-विधान भरतमुनिक नाट्यशास्त्र नाटकक विस्तार आ संरचनाक अनुसार विभिन्न रूप-भेद करैत अछि। दशरूपकमे ‘नाटिका’ एक अपेक्षाकृत लघु रूप थिक—सामान्यतः चारि अंकसँ कम, एक केन्द्रीय प्रेम-वृत्तांत, नायिका-प्रधान आ करुण-सम्पृक्त। एहि नाटिकाक शीर्षकमे ‘उर्फ’ शब्दक प्रयोग अभिजन-परम्परा आ लोक-परम्पराक संयोग थिक—‘प्रेम-प्रतिज्ञा’ (शास्त्रीय भाव) आ ‘श्रुवावतीक जय!’ (लोक-उद्घोष)। त्रिस्तरीय मंचक उपयोग नाट्यशास्त्रक ‘रंगमण्डप’ सिद्धांतक आधुनिक रूपान्तरण थिक। भरत मंचकेँ तीन भागमे विभाजित करैत छथि—रंगशीर्ष (उपर), रंगपीठ (मध्य) आ नेपथ्य। कुणालक त्रिस्तरीय मंच एकर नव व्याख्या थिक—‘शीर्ष सतह पर पुरुष’ (उद्घोषक-सूत्रधार), ‘मध्य सतह’ (कथाक प्रमुख दृश्य) आ ‘निचला स्तर’ (वनस्पति-सरिता-तटक प्राकृत संसार)। २.२ रस-विचार : शृंगारक तीन रूप एकहि संग एहि नाटिकामे शृंगार-रसक तीन उपभेद एकहि संग उपस्थित अछि—(क) ‘संयोग-शृंगार’ (आकर्षण-भाव, सरिता-तट पर छाया-दर्शन); (ख) ‘वियोग-शृंगार’ (इन्द्रक बारम्बार अस्वीकार, श्रुवावतीक प्रतीक्षा-यातना); (ग) भक्ति-शृंगार (माला गँथनाइ—“मोनक देवताकेँ पहिराब’क लेल”)। भरत शृंगारक ‘स्थायी भाव’ ‘रति’ मानैत छथि, आ एकर उच्चतम अवस्था ओ ‘परम-रति’ मानैत छथि—जे इन्द्रियसँ परे शुद्ध प्रेम-तत्त्व थिक। श्रुवावती एहि परम-रतिक अवतरण छथि। करुण-रसक एक विशिष्ट उपस्थिति सेहो अछि—“जाहि मोन मे प्रियक स्मरण नहि, से मोन ल’ क’ की?” ई विचार शुद्ध करुणाक नहि, एक दार्शनिक करुणाक अभिव्यक्ति थिक जाहिमे जीवनक मूल्य प्रश्नगत होइत अछि। अभिनवगुप्तक ‘शान्त-रस’—जीवनक समस्त सम्बन्धसँ परे शान्त स्वीकृति—समापन-दृश्यमे उपस्थित अछि। २.३ धर्मशास्त्र आ स्त्री-स्वाधीनता : नाट्यक राजनीतिक पाठ मनुस्मृतिक एक प्रसिद्ध उद्धरण—“पिता रक्षति कौमारे, भर्ता रक्षति यौवने”—स्त्रीक ‘रक्षा’क उत्तरदायित्व पिता-पति-पुत्रमे विभाजित करैत अछि। भारद्वाज अही परम्पराक पालक छथि—“स्त्रीकेँ भाइ, पिता वा पतिएक संग रहबाक चाही।” श्रुवावती एहि धर्मशास्त्रीय मानदण्डकेँ एक प्रश्नसँ खण्डित करैत छथि—“किए? हम अपन रक्षा आ देखभाल स्वयं नहि क’ सकैत छी बाबूजी!” एहि प्रश्नक सांस्कृतिक महत्त्व असाधारण अछि। ई केवल व्यक्तिगत स्वाधीनताक प्रश्न नहि—ई मैथिली पौराणिक-नाट्य-परम्पराक भीतरसँ एक धर्मशास्त्रीय मानदण्डकेँ चुनौती देबाक नाट्य-प्रयास थिक। भारद्वाजक अन्तिम उत्तर—“सुखी रही—गृहिणी जकाँ की तपस्विनी जकाँ”—ओ अपनहुँ श्रुवावतीक आत्मनिर्णयकेँ स्वीकार क’ लैत छथि। पितृसत्तात्मक संरचना एतय आत्म-समर्पण करैत अछि—एक नाट्य-क्षण जे भारतीय स्त्री-केन्द्रित नाट्य-परम्पराक (मैत्रेयी, गार्गी, शकुन्तला)क क्रमागत अगिला पड़ाव थिक। २.४ वक्रोक्ति-दृष्टि : ‘अर्थवान’ शब्दक बहु-आयामी ध्वनि कुन्तकक वक्रोक्ति-सिद्धांत आ आनन्दवर्धनक ध्वनि-सिद्धांत दुनूक परिप्रेक्ष्यमे ‘अर्थवान’ शब्द एहि नाटकक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पद थिक। अभिधातः—‘महत्त्वपूर्ण/उपयोगी’; लक्षणातः—‘सार्थक जीवन जीबएवाला’; व्यंजनातः—‘जे हमर अस्तित्वकेँ अर्थ दैत हो’। ई तृतीय अर्थ नाटकक दार्शनिक आत्मा थिक—श्रुवावती कोनो बाह्य मानदण्ड (सुन्दरता, सम्पत्ति, शौर्य) नहि, एक अन्तरंग ‘अर्थ’क सम्बन्ध खोजैत छथि। एहि शब्दक वक्रोक्ति एतय अछि—देवराज इन्द्र, जे सर्वशक्तिमान छथि, बहु-विवाहित छथि, स्वर्गक स्वामी छथि—ओ एक ऋषि-कन्याक ‘अर्थवान’ बनबाक परीक्षामे असफल होइत छथि, आ अंततः चिता-दृश्यमे जा क’ स्वयंकेँ ‘अर्थवान’ सिद्ध करैत छथि। एहि उनटा परीक्षामे वक्रोक्ति आ व्यंग्य एकहि संग अछि। ३. पाश्चात्य नाट्य-सिद्धांत ३.१ सिमोन द बोउवार : ‘दोसर लिंग’ आ स्त्री-कर्तृत्व फ्रांसीसी दार्शनिक-नारीवादी सिमोन द बोउवार (Simone de Beauvoir, १९०८–१९८६) अपन ‘द सेकेण्ड सेक्स’ (Le Deuxième Sexe, १९४९)मे घोषणा कएलनि—“one is not born, but rather becomes, a woman” (स्त्री जन्म नहि लैत, बनाओल जाइत अछि)। ओ तर्क देलनि जे स्त्रीक ‘अन्यता’ (otherness) सामाजिक-सांस्कृतिक निर्माण थिक। श्रुवावतीक चरित्र बोउवारक एहि सिद्धांतक एक पौराणिक-नाट्य उदाहरण थिक। पिताक संरक्षण, राजकुलक विवाह-प्रस्ताव, इन्द्रक ‘मरणोपरांत’ प्रस्ताव—ई सभ श्रुवावतीकेँ एक वस्तु बनेबाक प्रयास थिक। श्रुवावती प्रत्येक बेर एहि प्रयासकेँ अस्वीकार क’ अपनाकेँ कर्ता बनेबाक दावा करैत छथि। हुनकर अन्तिम वाक्य—“हमरा तैँ हरदम स्वीकार छल प्रिय! अहाँ अपने कहूँ!”—एहि कर्तृत्वक पराकाष्ठा थिक—विजय हुनकर अछि। ३.२ सार्त्र : अस्तित्ववाद आ ‘अर्थ-निर्माण’ फ्रांसीसी दार्शनिक ज्याँ-पॉल सार्त्र (Jean-Paul Sartre, १९०५–१९८०) अपन अस्तित्ववादक केन्द्रीय घोषणा कएलनि—“existence precedes essence” (अस्तित्व सारसँ पहिने आबैत अछि)। मानव जन्मसँ कोनो पूर्व-निर्धारित ‘सार’ (essence) नहि लैत—ओ अपन स्वतंत्र निर्णयसँ अपनाकेँ परिभाषित करैत अछि। श्रुवावतीक दर्शन सार्त्रीय अस्तित्ववादक एक पौराणिक-नाट्य प्रतिरूप थिक। ऋषि-कन्या होएब एक जन्म-दत्त ‘essence’ थिक; ‘स्वतंत्र-स्वावलम्बी व्यक्ति’ होएब हुनकर स्व-निर्मित ‘existence’ थिक। “अहीं कहने छी, अपवादों सँ नियमक पुष्टि होइत छै। हमरा आहाँ अपवाद बन’ दिअ’ बाबूजी!”—ई वाक्य सार्त्रक ‘radical freedom’ (मूलभूत स्वतंत्रता)क एक मैथिली अभिव्यक्ति थिक। सार्त्र ‘mauvaise foi’ (bad faith / अ-प्रामाणिक जीवन) कहैत छलाह ओहि स्थितिकेँ जाहिमे व्यक्ति अपन स्वतंत्रतासँ मुँह मोड़ि परम्परा-आज्ञाक शरण लैत अछि। इन्द्रक बहु-वेश-प्रयास (वृद्ध, वशिष्ठ) एहि ‘mauvaise foi’क देवत्व-संस्करण थिक—देवराज अपन यथार्थ पहचानसँ मुँह नुका क’ परीक्षा दैत छथि। श्रुवावती प्रत्येक वेश भेदि दैत छथि—“हम तखने विवाहित भ’ गेलहूँ जखन हृदयमे स्थान देलहूँ”। ३.३ बाख्तिन : बहु-स्वरीय नाटक आ ‘डायलॉजिज्म’ मिखाइल बाख्तिन (Mikhail Bakhtin) अपन ‘डायलॉजिज्म’ (Dialogism) सिद्धांतमे तर्क दैत छलाह जे भाषा स्वभावतः बहु-स्वरीय (polyphonic) होइत अछि—प्रत्येक शब्दमे अनेक आवाज गूँजैत अछि। एहि नाटकमे सर्वाधिक उल्लेखनीय ‘डायलॉजिज्म’ थिक—समापनक उर्दू शेर। दुष्यन्त कुमार (१९३१–1९७५)क प्रसिद्ध उर्दू शेर—“कौन कहता है कि आसमाँ में सुराख हो नहीं सकता / एक पत्थर तो तबीअत से उछालो यारो”—मैथिली पौराणिक नाटिकाक समापनमे एकाएक उभरैत अछि। एहि ‘बहु-स्वरीय’ समापनमे एकहि क्षणमे तीन भाषा-संस्कृति उपस्थित अछि—मैथिली पौराणिक आख्यान, हिन्दी उर्दू काव्य-परम्परा, आ आधुनिक राजनीतिक चेतना (आकाशमे सुराख = असम्भवकेँ सम्भव करब)। ई बाख्तिनक ‘heteroglossia’ (बहु-भाषी संवाद)क एक विशिष्ट नाट्य-उदाहरण थिक। ३.४ पीटर ब्रूक : ‘खाली मंच’ आ रंगमंचीय मितव्ययिता ब्रिटिश निर्देशक पीटर ब्रूक (Peter Brook, १९२५–२०२२) अपन ‘द एम्प्टी स्पेस’ (The Empty Space, १९६८)मे घोषणा कएलनि—“एक व्यक्ति खाली मंच पर चलैत अछि, दोसर व्यक्ति ओकरा देखैत अछि—बस, एतबे रंगमंचक लेल पर्याप्त अछि।” ब्रूकक ‘Holy Theatre’ (पवित्र रंगमंच) सिद्धांतमे ओ माँगैत छलाह जे दृश्य-सामग्री न्यूनतम होए जाहिसँ दर्शकक कल्पना सक्रिय हो। एहि नाटिकाक त्रिस्तरीय खाली मंच ब्रूकक ‘खाली मंच’क एक सटीक मैथिली-पौराणिक संस्करण थिक। “स्तरक उपयोग कखनो प्लेटफार्म, कखनो सीढ़ी जकाँ”—दृश्य-सामग्री नहि, स्थान-सम्भावना। इन्द्रक अन्तर्धान आ पुनः प्रकटन, फलक पाथर बनब, चिताक निर्माण—ई सभ ‘प्रकाश-परिवर्तन’ आ अभिनय-क्रियाद्वारा निर्मित होइत अछि, नहि कि भारी दृश्यावली सज्जासँ। ब्रूकक ‘holy theatre’ यैह थिक—जाहिमे दर्शकक आत्म-चेतना जागृत होइत अछि। ४. चीनी नाट्य-सिद्धांत ४.१ युआनफेन : भाग्य-निर्धारित प्रेम आ श्रुवावतीक चुनौती चीनी सांस्कृतिक-दार्शनिक परम्परामे ‘युआनफेन’ (fate-bound love / भाग्य-सम्बन्ध) एक महत्त्वपूर्ण अवधारणा थिक—दू आत्माकेँ मिलाबएवला एक पूर्व-निर्धारित दैवी डोरि। चीनी काव्य-नाट्यमे प्रायः ‘युआनफेन’क साकार होएब नाटकक लक्ष्य होइत अछि। श्रुवावती-इन्द्रक सम्बन्धमे ‘युआनफेन’ जटिलतापूर्वक उपस्थित अछि—श्रुवावती इन्द्रकेँ ‘मोनक देवता’ कहैत छथि, माला गँथैत छथि—ई ‘युआनफेन’क स्वीकृति थिक। मुदा ओ इन्द्रक शर्त (‘मरणोपरांत’) नहि मानैत छथि—ई ‘युआनफेन’क पुनः-परिभाषा थिक। श्रुवावती कहैत छथि जे ‘युआनफेन’ दैवी-निर्धारित भऽ सकैत अछि, मुदा ओकर समय आ शर्त स्वयं तय करब—ई स्त्री-कर्तृत्वक एक सूक्ष्म अभिव्यक्ति थिक। ४.२ काओयान : परीक्षा-नाट्य-परम्परा चीनी शास्त्रीय रंगमंचमे ‘काओयान’ (test/trial) एक प्रमुख नाट्य-उपकरण थिक। चीनी लोककथा-नाटकमे अनेक उदाहरण अछि जाहिमे प्रेमीक निष्ठाकेँ एक असाधारण परीक्षासँ सिद्ध करबाक चाही। प्रसिद्ध ‘लियाङझू’ (Butterfly Lovers) कथाक नाट्यीकरणमे सेहो निष्ठाक परीक्षा केन्द्रमे अछि। एहि नाटकमे ‘काओयान’ एक उनटल संरचनामे अछि—सामान्यतः नायकक निष्ठाकेँ परखल जाइत अछि; एतय नायिका स्वयं परीक्षार्थी छथि (इन्द्र द्वारा दत्त ‘फल-परीक्षा’), आ परीक्षक इन्द्र स्वयं परीक्षित होइत छथि (श्रुवावतीक चिता-संकल्प इन्द्रकेँ विचलित करैत अछि)। ई उनटल ‘काओयान’ नाटकक मौलिकताक प्रमाण थिक—परीक्षक स्वयं परीक्षित भ’ जाइत अछि। ४.३ यीझी : इच्छाशक्ति आ नियोकन्फ्यूशियाई नैतिकता नियोकन्फ्यूशियाई दार्शनिक (विशेषतः वांग यांगमिंग, १४७२–१५२९) ‘यीझी’ (moral will / नैतिक इच्छाशक्ति) आ ‘झी लियाँगझी’ (extending innate moral knowledge / सहज नैतिक ज्ञानक विस्तार) पर बल दैत छलाह। ओ मानैत छलाह जे मनुष्यक भीतर सहजाततः एक ‘नैतिक ज्ञान’ विद्यमान अछि—बाहरसँ थोपल नहि। श्रुवावती ‘यांगमिंग’क अर्थमे एक ‘यीझी-सम्पन्न’ पात्र छथि। हुनकर ‘अर्थवान’क माँग, वशिष्ठ-वेशमे इन्द्रकेँ ‘अनकर स्त्री’ घोषित कएनाइ, आ चिता-संकल्प—ई सभ बाहरसँ शिखाओल नहि, भीतरसँ उपजल नैतिक निर्णय थिक। नाटककारक अपन सन्देश—“आत्मबल, मनुष्यक सब सँ पैघ संपत्ति अछि”—वांग यांगमिंगक दर्शनसँ अद्भुत साम्य रखैत अछि। ४.४ बेइजू: चीनी त्रासदी-सिद्धांत आ एहि नाटकक ‘जय’ चीनी नाट्य-चिन्तकक परम्परामे यह प्रश्न उठाओल गेल अछि जे चीनी नाटकमे पाश्चात्य अर्थमे ‘बेइजू’ (tragedy) अछि वा नहि। वांग गुओवेई तर्क देलनि जे चीनी शास्त्रीय नाटकमे ‘दुखद परिस्थिति’ होइत अछि, मुदा अंत सामान्यतः समझौता वा समन्वयमे होइत अछि। एहि ‘अर्ध-त्रासदी’केँ ओ ‘दुखी खोज’ कहलनि। एहि नाटकक शीर्षकक ‘जय!’ शब्द यैह बताबैत अछि जे ई ‘बेइजू’ नहि, ‘बेइ झोंग योऊ शी’ (joy within sorrow)क एक रूप थिक। फलक पाथर बनब, चिता-संकल्प—ई दुखद; मुदा इन्द्रक स्वीकार आ ‘जय’ क उद्घोष—ई समन्वय थिक। मुदा विशेष ई जे एहि ‘जय’क नायिका श्रुवावती छथि, देवराज इन्द्र नहि—ई एक महत्त्वपूर्ण उलटफेर थिक। ५. इजरायली नाट्य-सिद्धांत ५.१ हनोख लेविन : मानव-प्रतिष्ठाक नाट्य-रक्षा इजरायलक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण नाटककार हनोख लेविन (Hanoch Levin, १९४३–१९९९) अपन नाटकमे बेर-बेर ओइ प्रश्नसँ जुझलाह—मानव-प्रतिष्ठाक (human dignity) कोन-कोन व्यवस्थाक विरुद्ध रक्षा करबाक चाही? हुनकर ‘द लेबर ऑफ लाइफ’ (The Labour of Life) जेकाँ नाटकमे स्त्री-पात्र प्रायः सामाजिक-पारिवारिक दबावक विरुद्ध अपन अस्मिताक लड़ाइ लड़ैत अछि। श्रुवावतीक स्थिति लेविनक स्त्री-पात्रसँ एक महत्त्वपूर्ण भेदक संग समान अछि। लेविनक स्त्री प्रायः असफल होइत अछि—व्यवस्था ओकरा निगलि जाइत अछि। श्रुवावती विजयी होइत छथि। ई भेद कुणालक आशावादी मानवतावादक प्रमाण थिक—ओ लेविनक क्रूर यथार्थवादसँ भिन्न एक भारतीय-पौराणिक आशावाद लैत छथि जाहिमे ‘आत्मबल’क अन्ततः विजय होइत अछि। ५.२ एली रोजिक : बहु-भूमिका आ ‘परिवर्तनशील पहचान’क प्रतिमात्मकता एली रोजिकक प्रतिमात्मकता (theatrical iconicity)क सिद्धांत एहि नाटकमे एक विशेष परीक्षामे पड़ैत अछि—बहु-भूमिका अभिनय (multi-role performance)। एक्के अभिनेता भारद्वाज, वृद्ध, वशिष्ठ आ इन्द्र बनैत अछि। रोजिकक प्रश्न—जखन एक अभिनेता अनेक पात्र खेलाइत अछि, तखन दर्शक कोन ‘प्रतिमा’ देखैत अछि? रोजिक तर्क दैत छलाह जे दर्शक एकहि संग दू ‘प्रतिमा’ देखैत अछि—अभिनेताक आ पात्रक—एहि द्वैत-दर्शनमे रंगमंचक विशिष्ट सौन्दर्य निहित अछि। एहि नाटकमे एहि ‘डबल आइकॉनिसिटी’क एक विशेष राजनीतिक अर्थ अछि—इन्द्र वृद्धक वेशमे आ वशिष्ठक वेशमे परीक्षा लैत छथि; दर्शक जनैत छथि जे ई इन्द्र छथि—ई ‘dramatic irony’ (नाट्य-विडम्बना) थिक जाहिमे श्रुवावतीक सत्य-दृष्टि आर अधिक उज्ज्वल भ’ जाइत अछि। ५.३ उत्तर-हॉलोकास्ट नाट्य-चिन्तन : ‘अग्नि’ आ ‘अस्तित्व’ इजरायली रंगमंच-विद्वान ड्वोरा बेन शाउल (Dvora Ben-Shaul) आ अन्यक उत्तर-हॉलोकास्ट नाट्य-चिन्तनमे अग्नि एक अत्यन्त भार-वाहक प्रतीक (loaded symbol) बनि गेल अछि—विनाश आ उत्तरजीविता (survival) दुनू एकहि संग संग्रहित अछि। श्रुवावतीक चिता-दृश्य एहि परिप्रेक्ष्यसँ एक जटिल प्रतिमा बनैत अछि। अग्नि-प्रवेश पारम्परिक भारतीय परम्परामे ‘सती’क प्रतीक थिक—एक पितृसत्तात्मक संस्था। कुणाल एहि प्रतीककेँ उनटैत छथि—श्रुवावतीक चिता ‘मरबाक’ नहि, ‘जीबाक माँग’क अभिव्यक्ति थिक। ओ स्वयं आगि लगाबैत छथि, आ घोषणा करैत छथि—“प्रियक स्मरण करैत हम अग्नि-प्रवेश करब।” ई ‘नहि जीबाक’ नहि, ‘प्रेमसहित जीबाक वा नहि जीबाक’क द्विभाजन थिक। इजरायली दृष्टिसँ एहि ‘उत्तरजीविताक राजनीति’मे श्रुवावती एक ‘witness’ (साक्षी) छथि—ओ अपन अस्तित्वकेँ ‘प्रमाण’ बनाबैत छथि। ५.४ याकोव शाबताई : समापनक उर्दू शेर आ ‘अन्तर-सांस्कृतिक संवाद’ इजरायली नाटककार याकोव शाबताई (Yaakov Shabtai, १९३४–१९८१) अपन ‘पास्ट कन्टीन्यूअस’ (Past Continuous) जेकाँ कृतिमे भाषाक प्रयोग एक प्रमुख सौन्दर्यशास्त्रीय उपकरण बनाबैत छलाह—हिब्रू, यिद्दिश आ अरबीक मिश्रण एहि सांस्कृतिक संकरताक अभिव्यक्ति थिक। कुणालक मैथिली नाटिकाक समापनमे उर्दू शेरक प्रयोग शाबताईक अन्तर-सांस्कृतिक संवादक समानांतर थिक। मैथिली + पौराणिक सन्दर्भ + उर्दू काव्य-परम्परा—ई संयोग मात्र सजावट नहि, एक सांस्कृतिक-राजनीतिक वक्तव्य थिक—जे ‘आत्मबल’क भाषा सीमा नहि मानैत अछि, जे एहि सन्देशक उर्दू अभिव्यक्ति ओतबे प्रामाणिक अछि जतेक मैथिली। दुष्यन्त कुमारक ‘एक पत्थर तो तबीअत से उछालो’ श्रुवावतीक चिता-संकल्पक उर्दू अनुवाद थिक। ६. चतुर्भुज-संश्लेषण : ‘जय’क बहुआयामी अर्थ चारू नाट्य-परम्पराकेँ एकठाम राखि देखल जाए तँ ‘प्रेम-प्रतिज्ञा उर्फ श्रुवावतीक जय!’क केन्द्रीय प्रश्न स्पष्ट होइत अछि—‘जय’ केकर थिक, आ ओ ‘जय’ केहन? भारतीय दृष्टि—शृंगारक तीनू उपभेद; धर्मशास्त्रक स्त्री-मानदण्डकेँ नाट्य-खण्डन; ‘अर्थवान’क त्रि-स्तरीय ध्वनि; चिता = भक्ति-परम्पराक पुनःव्याख्या। पाश्चात्य दृष्टि—बोउवारक ‘subject’-बनब; सार्त्रक radical freedom; बाख्तिनक heteroglossia (उर्दू शेर); ब्रूकक ‘holy theatre’ (खाली मंच)। चीनी दृष्टि—युआनफेनक पुनःपरिभाषा; उनटल काओयान; वांग यांगमिंगक यीझी = आत्मबल; ‘बेइ झोंग योऊ शी’ जयन्ती। इजरायली दृष्टि—लेविनक स्त्री बनाम कुणालक आशावादी आत्मबल; रोज़िकक double iconicity; अग्नि = उत्तरजीविताक राजनीति; शाबताईक अन्तर-सांस्कृतिक संवाद। चारू परम्पराक साझा निष्कर्ष—श्रुवावतीक ‘जय’ एक ब्यक्तिगत प्रेम-विजय नहि। ई एक दार्शनिक ‘जय’ थिक—‘आत्मबल’ (जे भारतीयमे साहस, पाश्चात्यमे freedom, चीनीमे यीझी, आ इजरायलीमे dignity थिक) क ‘जय’। शीर्षकक विस्मयादिबोधक चिह्न (‘!’) यैह कहैत अछि—ई घोषणा थिक, विवरण नहि। अगिला अंकमे : विश्वासक शक्ति उर्फ सुकन्याक विवाह [सैद्धांतिक विवेचन लेल देखू- मैथिली समीक्षाशास्त्र- गजेन्द्र ठाकुर] अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। पद्य Poetry ३.१. तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम'] मूल तेलुगु: नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव) मैथिली अनुवाद: मानेश्वर मनुज [खण्ड ८] ३.२. अशोक कुमार ठाकुर-उपवास केवल शरीरक नहि/ मिथिलाक पुकार/ धरती माँ के पुकार ३.३. जगदानन्द झा "मनु"- २ टा गजल ३.४. पूजा कर्ण- बचाउ प्रभु! ३.५. रामचन्द्र राय- दू गोट कविता [भूख/ तरहथिए पर दुनिया] ३.६. डा. किशन कारीगर- बेलज्ज पिछलगुआ भरिया सब (कविता) ३.७. संतोष कुमार राय 'बटोही'- फ्री भेल बिजली ३.८.गजेन्द्र ठाकुर-तीन टा व्यंग्य: १.कवि भल्लट- भल्लट-शतक (भल्लटक शत अन्योक्ति) २.महाकवि क्षेमेन्द्र- छल-कौशलक विलास (कलाविलास) ३.कवि नीलकण्ठ- कलियुग-विडम्बना- संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर ३.१. तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम'] मूल तेलुगु: नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव) मैथिली अनुवाद: मानेश्वर मनुज [खण्ड ८] तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम' केर लेखक छथि नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव)] मूल तेलुगु लेखक नग्नमुनि एक परिचय नाम: मानेपल्लि हृषीकेशवराव जन्म: 15 मई 1940 जन्म स्थान: शहर- तेनाली, जिला- गुंटूर (आंध्र प्रदेश) वृत्ति: चीफ ऑडिटर, आंध्र प्रदेश विधान सभा, तकर बाद डिप्टी सेक्रेटरी, ओतहि लिंक: पहिने साम्यवादी (कम्युनिस्ट), बादमे राष्ट्रवादी (नेशनलिस्ट) संस्था: अविभाज्यक जनतंत्र, 1990 आंदोलन: दिगम्बर कविता आन्दोलन 1965 लक्ष्य: नंगट, भूखल, दीन, दरिद्रक हित कृति: उदयिंचनि उदयलु (ओ उदय जे उदित नहि भेल) पूर्वा हवा जम्मि चेट्ट विशेष: 1977 ई. मे बहुचर्चित काव्य- 'कोय्या गुर्रम' (KOYA-GURRAM), जकर अर्थ अछि- 'काठक घोड़ा', भाव- 'नकली सरकार'। 19 नवम्बर 1977, शनि दिन बंगालक खाड़ीमे पचास-साठि फुट ऊँच लहड़ि उमड़ि कऽ कृष्णा जिलाक दिविसीमा क्षेत्रकेँ डुबा कऽ नष्ट कऽ देलक। हजारो लोक मारल गेलाह। ई घटना काव्यक वस्तु बनल। विषय आ परिस्थितिसँ उपजल ई काव्य हिन्दी कवि मुक्तिबोधक 'अंधेरे में' क बराबरीक अछि। मैथिली अनुवादक नाम: मानेश्वर मनुज जन्म: गाम- गम्हरिया (बेनीपट्टी) मधुबनी। जनवरी 1958 (प्रमाण पत्रक अनुसार)। वृत्ति: भारतीय नौसेनामे तकनीकी सहायक, तकर बाद भारतीय रेलक वाणिज्य विभाग सँ (रिटायर्ड)। कृति: 'सम्बन्ध', कथा संग्रह (मैथिली) 2007 'कि', कविता संग्रह (मैथिली) 2011 'परिवर्तन', कहानी संग्रह (हिन्दी) 2019 'बेघर', कविता संग्रह (हिन्दी) 2022 'तालाब', कहानी संग्रह (हिन्दी) 2024 अनुभव: विभिन्न भाषा सँ हिन्दी आ मैथिलीमे अनुवाद। हिन्दी आ मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिकामे लेख, कविता, कथा, कहानी इत्यादि प्रकाशित। अनुवादकक टिप्पणी: अनेक तेलुगुमित्र, स्वयं नग्नमुनि जी, हिन्दी तथा अंग्रेजी मे अनुदित पुस्तकक मदति सँ दीर्घ काल तक मंथन कयलाक बाद अनुवाद कयल गेल अछि। ई नग्नमुनिक प्रसिद्ध कविता अछि। नग्नमुनि सँ लगातार हमर पत्राचार होइत छल। ओ अंग्रेजी आ तेलुगुक विद्वान छलथि। हुनक किछु पत्र देसिल-बयना, हैदराबाद मे छपल अछि। -मानेश्वर मनुज सम्पादकीय टिप्पणी (खण्ड-८) जँ ईसा मसीहो सन महापुरुष अपन अंतिम भोज मे धोखा देवऽ बला केँ नहि चिन्हि सकलाह, तँ साधारण मनुष्यक की गति? कवि एहि प्रश्न सँ शुरू कऽ कऽ मनुखक जिनगीक किछु अकत-तीत यथार्थकेँ हमरा सभक सोझाँ राखि दैत छथि। कवि कहैत छथि जे सड़क कातक झोपड़ी, झोपड़ी आगूक साँपक बिल, बिल मे विषधर, आ साँपक दाँत मे जहर—एहि सभसँ सब लोक परिचित छथि। मुदा विडंबना देखू जे जे हाथ दूध पियबैत छै, ओहि हाथ मे लागल विषाक्त दाँतक लहरि निर्दयता सँ डसि लैत छै। विश्वासघातक ई पीड़ा ओना व्यक्त नहि कऽ सकैत छी—ई स्वीकारोक्ति अपनामे बड्ड मार्मिक छै। से "हमरा बुझल अछि जे असली हत्यारा के?/ थोड़ेक काल हेतु -/ समुद्र पर दोष मढ़ि दैत छी।" सत्य जानितो- ई सामाजिक विवशता व्यंग्य अछि। सूतब तँ सपना आँखिकेँ डसि लैत छै, छुअब तँ मधुमाछी पाछू सँ दौड़ि कऽ डंक मारि दैत छै। आ सबसँ पैघ बात जे जँ बिल्कुल चुप्पी साधि लेल जाए, तँ सेहो बेकार-"क्षुद्र राजनीतिक भ्रष्ट दलाल" तखनो भरल-पुरल जिनगी चूसि कऽ सुड्डाह कऽ दैत छथि। आ तखन कवि कालचक्र आ कार्ल मार्क्स दुनू गोटेक माध्यम सँ ओही प्रश्नकेँ दोहराबैत छथि—"आदमी, आदमी केँ धोखा कियाक दैत छै?" ई कोनो साधारण प्रश्न नहि, मानव सभ्यताक ओहि शाश्वत कुंठाकेँ उद्घाटित करैत छै जेकर कोनो एकमत उत्तर नहि। अंतिम भाग मे प्रसिद्ध शिल्पी रोडिनक "द थिंकर" जकाँ मुद्राक उल्लेख, आ फेर विचार-मनुज, भाषा-भाव, देह-वेदना, जमीन-जलक आपसी सरोकारक प्रश्न—सभ मिलि कऽ ऐ कविताकेँ सामाजिक यथार्थ सँ उठा कऽ एक दार्शनिक अनुसन्धानक धरातल दैत अछि। - गजेन्द्र ठाकुर नग्नमुनिक तेलुगु काव्य 'काठक घोड़ा' (कोया गुर्रम) खण्ड-८ इसा मसीह केँ बुझल छलनि कि अंतिम भोज मे आखिर हुनका धोखा देवऽवला के छलनि? सब केँ नीक जकाँ बुझल छनि कि सड़कक काते झोपड़ी छै ओहि झोपड़ीक आगाँ साँपक बिल छै ओहि बिल मे विषधर छै ओहि साँपक दाँत मे जहर छै सबकेँ बुझल छै कि क्षीर पियाबऽवला हाथ केँ विषाह दाँतक लहरि निर्दयता सँ डसैत छै हमरा बुझल अछि जे असली हत्यारा के? थोड़ेक काल हेतु - समुद्र पर दोष मढ़ि दैत छी। सूति रही तऽ सपना आँखि केँ डसैत छै छू दियै तऽ मधुमाछी पाछा सँ दौड़ डंक मारत छूने बिना, कि बिनु बजने चुप्पी साधि ली तैओ क्षुद्र राजनीतिक भ्रष्ट दलाल काटि खाइत अछि भरल-पुरल जिनगी केँ सुड्डाह कऽ दैत अछि कालचक्र जनै छै जे - आदमी, आदमी केँ धोखा कियाक दैत छै कार्ल मार्क्स जनैत छथि जे - आदमी, आदमी केँ धोखा कियाक दैत छै। प्रसिद्ध शिल्पी रोडिन स्वयं म्यूजियमक शिल्प बनि कऽ ठोढ़ी केँ हथेली पर राखि कऽ सदिखन सोचैत रहि गेलथि कि विचार सँ मनुजक नाता की छनि? भाषा केँ भाव सँ नाता कोन? देह केँ वेदना सँ नाता कोन? जमीन केँ जल सँ रिश्ता कोन? -मानेश्वर मनुज आदर्श नगर कॉलोनी गोशाला रोड मधुबनी पिन - 847211 मो. - 9920674861 / 7464077106 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.२. अशोक कुमार ठाकुर-उपवास केवल शरीरक नहि/ मिथिलाक पुकार/ धरती माँ के पुकार अशोक कुमार ठाकुर उपवास केवल शरीरक नहि/ मिथिलाक पुकार/ धरती माँ के पुकार १ उपवास केवल शरीरक नहि उपवास भूखक पीड़ा सहि जे सकय, ओ पीड़क मर्म बुझैत अछि। अपन सुखकेँ त्यागि कऽ जे चलय, ओ मानव धर्म निभैत अछि।

जाति नहि, धर्म नहि पूछू, पूछू कतेक विचार। जे जनहितमे दीप जरबय, ओहि पर हो सत्कार।

राजनीतिक रंग बदलैत रहय, सत्ता अबय-जाय। मुदा जनकल्याणक संकल्प, कखनो नहि मुरझाय।

जे अपन हित छोड़ि समाजक, पीड़ा अपन बनाबय। मानवताक ओ पावन पथ पर, इतिहास अमर कहाबय।

संघर्षक मोल बुझू मित्र, घृणाक बीज नहि बोउ। प्रेम, करुणा, सत्य आ सेवा, एही सँ जीवन जोउ।

भूख जँ केवल पेटक रहितय, क्षणभरमे मिटि जाइत। मुदा जे भूख न्यायक होइत अछि, युग-युग लोक जगाइत।

आब समय अछि हाथ मिलाबी, मनमे प्रेम जगाबी। जाति, धर्म, राजनीति छोड़ि, पहिने मनुष्य बनि जाबी। २ मिथिलाक पुकार उठू मिथिलाक सपूत सभ, जागू नव अभियान। माटि, भाषा, संस्कृति बचाबू, ई हमर पहचान॥

कोयलि गाबय आमक डारि पर, भोरक मधुर विहान। माँ मैथिलीक चरणमे अर्पित, तन-मन आ सम्मान॥

विद्यापतिक वाणी बाजय, जनकक पावन धाम। सीताक पग-पग पवित्र कयने, धन्य भेल ई ग्राम॥

पढ़ू मैथिली, लिखू मैथिली, ई जीवनक शृंगार। भाषा बिनु संस्कृति अधूरी, बुझू एहि विचार॥

जाति-पाँतिक भेद बिसरू, जोड़ू प्रेमक डोर। एकतामे मिथिल बसैत अछि, ई सत्य अति घोर॥

सत्य, श्रम आ ज्ञानक बलसँ, गढ़ब नव इतिहास। मिथिल धरणी फेर गबैत रहत, गौरवक मधुमास॥

जय-जय मिथिला, जय-जय भाषा, जय जननीक मान। युग-युग धरि अमर रहय, हमर मिथिल स्थान॥ ३ धरती माँ के पुकार धरती रोइ-रोइ कहै छैक, "बौआ,हम धरती माई छी। तोहर माइक माइक माई छी, सभ जीवक जननी ठाढ़ि छी।

तोरा लेल अन्न उपजौलौं, तोरा लेल जल बहौलौं। तोहर सभ दुख अपन बुझि, छाती चीरि फल-फूल देलौं।

मुदा अहाँ हमर कोन बेटा, जे हमरा टुकड़ा-टुकड़ा करै। एक धूर, एक कट्ठा खातिर, भाइक संग लड़ै-मरै।

मरैत दम धरि 'हमर-हमर', कहैत रहै संसारमे। खाली हाथ आयल छल, खाली हाथ जाएत पारमे।

जन्म देनिहार माइक तक, अहाँ सम्मान बिसरि गेलौं वृद्धाश्रमक सून्न कोठरीमे, जीवित भगवान छोड़ि देलौं।

जे माई राति-राति जागल, तोहर ज्वरमे कानल छल। अपन सुख सब तोरा देलक, तोहर दुःखमे पागल छल।

आइ ओही माई बाट जोहै, कखनो बेटा आबि भेटत। एक बेर 'माँ' कहि बजा देत, मोनक घाव सभ मिटत।

धरती फेर हौले सँ बजली— "बौआ, एते अभिमान नहि कर। जमीनक झगड़ा छोड़ि क माइक चरणक सम्मान कर।

धरती, धन आ घर-दुआर, एहि संसारमे रहि जाएत। माइक आशीष जकरा भेटत, से जीवन भर सुख पाएत।" *कविताक मुख्य संदेश: जमीन बाँटए सँ पहिने ओहि माइकें मोन पाड़ू, जे अहाँकेँ जन्म देने छथि; आ ओहि धरती माइकें सेहो, जे अहाँकेँ जीवन देने छथि। अथवा धरती बाँटए सँ पहिने जननीक सम्मान करू, किएक तँ जननी आ धरती दुनू जीवनक आधार छथि। अथवा अधिक मार्मिक रूपमे- धूर-कट्ठाक हिसाब करए सँ पहिने माइक ममता मोन पाड़ू, किएक तँ जमीन जीवन धारण करबैत अछि, मुदा माई जीवन दैत छथि। एक पंक्ति मे सार: "धरती आ जननीक मोल नहि होइत छै; एक जीवन दैत छथि, दोसर जीवन चलबैत छथि।

-अशोक कुमार ठाकुर; ग्राम–करमौली, पोस्ट–करमौली, थाना–खजौली, जिला–मधुबनी (बिहार); मोबाइल नंबर:8709568993, जनसेवा:एस.डी.आर.एफ. मे कार्यरत सिपाही। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.३. जगदानन्द झा "मनु"- २ टा गजल जगदानन्द झा "मनु" २टा गजल १ प्रेम जिनकासँ छल ओ मुँह मोरि लेलनि नेग दर्दक  द झट नाता  तोरि लेलनि ओ हमर दर्दकेँ हँसि खिल्ली उड़ाकय छोरि आनसँ किए नाता जोरि लेलनि प्रेम केनाइ की बुझता निर्दयी ओ जे हृदय केकरो छनमे कोरि लेलनि सीखता की चलब नेहक फूलपर ओ संग चलनाइ शूलक जे छोड़ि लेलनि ‘मनु’ अनाड़ी कपट छलकेँ चिन्हलक नहि मोन नहि ओ करेजोकेँ झोरि  लेलनि (बहरे असम, मात्राक्रम : 2122-1222-2122) २ की बनब चाहै छलौं हम कि बनि गेलौं प्रेममे प्रियतम  अहीं केर    सनि गेलौं आस जे परिवारकेँ  आब नहि रहलै जेब खाली देख सभ हीन जनि गेलै सुधि रहल नहि बोझ लदने अपन हमरा पाबि चुटकी भरि  सिनेहेसँ कनि गेलौं खूनमे सदिखन बसल नेह गामक अछि छल लिखल परदेशकेँ  गाम मनि गेलौं आब प्रेमक ई अगण लय रहल जीवन मोनमे बसि ‘मनु’ हमर साँस गनि गेलौं (बहरे कलीब, मात्राक्रम : 2122-2122-1222) -जगदानन्द झा ‘मनु’, मो० न० +९१ ९२१२-४६-१००६ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.४. पूजा कर्ण- बचाउ प्रभु! पूजा कर्ण

बचाउ प्रभु!

प्रश्न तऽ अनेक छै... मुदा उत्तर क की?

देवाल तऽ अनेक छै... मुदा ओ मुक्त हवा क की?

कतहु पतझड़ छै, तँ कतहु हरियर संसार। कतहु धरती सुखायल छै, तँ कतहु सुर्ख लालीक बहार।

कतहु भीड़क बीच बेबस लोक छथि, तँ कतहु अनेक एकड़ जमीन पर एकटा मात्र मालिक छथि।

कतहु लोक कानैत-बिलखैत छथि, तँ कतहु हँसी-ठिठोली चलि रहल अछि। अपन अस्तित्व बचाबयक आड़ि मे घृणा भरल होली खेलल जा रहल अछि।

मन बहुत कचोट रहल अछि । अपने के असहाय बुझए लागल छी। एहन जीवनक कल्पना हम कखनो नहि केने रही, जकरा आइ जीबय लेल विवश भेल छी।

केकरा कहू? कतऽ जाऊ? केकरा बुझाबी जे आब हमर दम घुट रहल अछि?

डर लाईग रहल अछि, कहीं लोक ई नहि कहए लागय— "ओहि पार चलि जाउ, अहाँक एतय की काज?"

कोना बुझाबी जे हमहूँ एहि माटिक सन्तान छी। एतय जन्म लेने छी, आ एहि माटिमे मिलि जायब—एहने अभिलाषा रखैत छी।

कोना बुझाबी जे अहूँ हमर छी, आ ओहो हमर छथि। जेना अहाँक सुखमे हम प्रसन्न होइत छी, तहिना हुनक दुःखमे हमर हृदय सेहो व्यथित भऽ जाइत अछि।

की एहन नहि भऽ सकैत अछि, जे अहूँ किछु आगाँ बढ़ि हाथ बढ़ाबी, आ ओहो आगाँ आबि अहाँक हाथ थामि लेथि?

अहाँक मनक बात तऽ सभ सुनैत छथि, एक बेर हुनको मनक बात सुनि लिअ।

केओ कतेको दिनसँ भूखल-पियासल सड़क कात बैसल छै। थोड़ेक करुणा देखाउ ओहि बेबस मनुख पर।

गंभीर पीड़ामे, सुध-बुध बिसरल, आँखिमे आस लऽ बैसल छथि— जे कोनो तऽ आएत, हुनकर बात सुनत, हुनकर मनक पीड़ा बुझत, अन्यायक विरोधमे ठाढ़ हएत, आ किछु नीक करत।

कोनो तऽ राम बनि आएत, एहि गहिर अन्हारमे आशाक एकटा दीप जराएत।

हे प्रभु श्रीराम! अहाँ सँ हमर विनती अछि— किछु तऽ चमत्कार देखाउ।

मानैत छी जे कलियुग अपन चरम पर अछि, मुदा त्रेताक शीतलता फेर सँ एहि धरती पर बरसाउ, प्रभु।

केओ रामराज्य लेल अपन प्राण अर्पित करय लेल तैयार अछि।

कोनो तरह ओहि पागल "सोनम" के बचा लिअ, प्रभु।

बचा लिअ.. आब तऽ बचा ही लिअ, प्रभु। -मैथिल डॉक्टर -पूजा कर्ण, दरभंगा, शिक्षा- एम.कॉम., गृहणी। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.५. रामचन्द्र राय- दू गोट कविता [भूख/ तरहथिए पर दुनिया] रामचन्द्र राय दू गोट कविता [भूख/ तरहथिए पर दुनिया] १ भूख

थाकल ठेहियायल तन बोझिल मन फाटल मैल वसन नोरायल नयन केस दाढ़ी बढ़ल कलुषित आत्मा जड़ल एक हाथ में बाटी दोसर हाथ में लाठी लड़खड़ाइत डेग स' बढ़ि रहल छै आगाॅं गली के कचड़ाक ढेर दिश चुनतै ओ सड़ल - गलल पचपचाइत अन्न जै सऽ मिझौतै ओ अपन उदरक भूख! शासन,समाज छै मूक कियो नहि बांटि रहलै ओकर ई दुख कहु भला ई केकर चूक? कहु भला ई केकर चूक? २ तरहथिए पर दुनिया

देखु - देखु जुग कोना बदैल गेलैए, तरहथिए पर दुनिया समैट गेलैए।

कम जाइछ लोक आब बैंक आ बजार, मोबाइले में बन्न छै हजारक हजार .. खगताक पूर्ति ऑनलाइने स' भऽ रहलैए.. देखु-देखु जुग..

कम जाइछ छात्र आब स्कूल आ कॉलेज, गुगले पर भेट जाइछ दुनियां क नॉलेज .. घरहि बैसल आब ऑनलाइन पढ़ाई भ' रहलैए.. देखु-देखु..

नहि लगाबैछ डुबकी छात्र किताबक सागर मे, रील्स देखि - देखि ओ नहाइछ गागर मे .. सिरिफ ओंगरीएटा स' सभ कमाल भ' रहलैए.. देखु-देखु..

सोशल मीडिया आब बनि गेलै सभक जीवनक अंग, नवतुरिया सभ रहैछ सदिखन अही मे मगन.. अगड़म - बगड़म देखि,लिखि,पढि ओ बहैक रहलैए.. देखु-देखु..

जे छैथ सचेष्ट से करैछ नीक काज, सोशल मीडियाक उपयोग कऽ उठबैछ बेस लाभ.. एहि सॅं बहुतो के जिनगी सवैर गेलैए.. देखु- देखु..

-रामचन्द्र राय फोन: 9931092370 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.६. डा. किशन कारीगर- बेलज्ज पिछलगुआ भरिया सब (कविता) डा. किशन कारीगर बेलज्ज पिछलगुआ भरिया सब (कविता) बाप/दादा/ पित्ती सब दिन लोक बोली बजलै बुझलकै आ तेकर बेटा (कनकिरबा) उ सब? मानकी मैथिली लिखै बजै जाइए?

की तोरा अप्पन लोक बोली शैली लिखैत बजैत कोन बातक डर होइ छौ? आ की निरलज्ज भेल मंच लोभे खूब मानकी मैथिली किए लिखै बजै छही?

जेकरा सबहक मानक छियै त उ अप्पन बोली शैली प्रचार दुआरे मानकी दललपनी तक करै जेतै लेकिन तूं सब किए मानकी देखौंस क रहलीही?

एहेन लेखक साहित्यकार हेबाक कहेबाक होहकारी चलेन आबो छोड़ै जाइ जो. अप्पना माइक बोली के बिसैर मैथिली मानक लाजे डूब मइर जो रे पिछलगुआ सब

मैथिली साहित्यकार कहबै मंच लोभ दुआरे? तूं सब त माइक बोली के तिरस्कार सहलिही ? कहअ त सप्पत खा जे कोनो दिन? बारहो बरण समावेशी मैथिली लै किछ बजलिही?

आबो कनी लाज क ले रै पिछलगुआ सब अप्पन माइक बोली शैली के जिआ के राख पब्लिको तोहर किरदानी जनै छौ जो रे बेलज्ज मानकी पिछलगुआ भरिया सब - डा. किशन कारीगर, मूल नाम- डा. कृष्ण कुमार राय) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.७. संतोष कुमार राय 'बटोही'- फ्री भेल बिजली संतोष कुमार राय 'बटोही' फ्री भेल बिजली

तेहन गरमी अछि देह पसीज रहल अछि जनता सँ बिन पुछने फ्री भेल बिजली भरि दिन कटले रहैत अछि तैं तऽ फ्री भेल बिजली के कहलकै नेता के ? हमरा नहि फ्री चाही पाय लऽ जाउ बिजली देल जाउ एसी मे बैठनिहार सभ कहियो गरीबक नहि होयत अछि । जनता भऽ जाउ सावधान नहि तऽ आब देह होयत निलाम नहि अछि सबको एसी/कुलर नहि अछि सबको केसरिया चुनर देश मे क्रांति हेबाक चाही रेबरी बटनिहार के बहिष्कार हेबाक चाही । - संतोष कुमार राय ' बटोही '; ग्राम - मंगरौना अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.८.गजेन्द्र ठाकुर-तीन टा व्यंग्य: १.कवि भल्लट- भल्लट-शतक (भल्लटक शत अन्योक्ति) २.महाकवि क्षेमेन्द्र- छल-कौशलक विलास (कलाविलास) ३.कवि नीलकण्ठ- कलियुग-विडम्बना- संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुर-१.कवि भल्लट- भल्लट-शतक (भल्लटक शत अन्योक्ति) २.महाकवि क्षेमेन्द्र- छल-कौशलक विलास (कलाविलास) ३.कवि नीलकण्ठ- कलियुग-विडम्बना [व्यंग्य] संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर अनुक्रम भल्लट · क्षेमेन्द्र · नीलकण्ठ १. भल्लट-शतक (भल्लटक शत अन्योक्ति) कवि भल्लट मंगलाचरण (भवानी-स्तुति) सहित शत अन्योक्ति — क्रमबद्ध पद्यावली २. छल-कौशलक विलास (कलाविलास) महाकवि क्षेमेन्द्र सर्ग १ — दम्भक वर्णन (दम्भ) सर्ग २ — लोभक वर्णन (लोभ) सर्ग ३ — कामक चित्रण सर्ग ४ — वेश्यासभक व्यवहार (विश्वासघात) सर्ग ५ — लेखनिकक पराक्रम सर्ग ६ — मदक वर्णन सर्ग ७ — गायक-वर्णन (दुर्वृत्ति) सर्ग ८ — सोनारक उत्पत्ति (छल-कपट) सर्ग ९ — विविध दुष्टक वर्णन (ढोंग आ ठगी) सर्ग १० — समस्त कलाक वर्णन (सद्गुण) ३. कलियुग-विडम्बना कवि नीलकण्ठ खण्ड १ — पण्डित खण्ड २ — मन्त्र-तान्त्रिक खण्ड ३ — ज्योतिषी खण्ड ४ — वैद्य खण्ड ५ — कवि खण्ड ६ — सम्बन्धी खण्ड ७ — महाजन खण्ड ८ — दरिद्रता खण्ड ९ — धनी खण्ड १० — चुगलखोर खण्ड ११ — कृपण खण्ड १२ — धर्मध्वजी खण्ड १३ — दुष्ट उपसंहार — कलियुग-प्रणाम (पद्य १०० धरि, समापन-वचन सहित) कवि भल्लट- भल्लट-शतक (भल्लटक शत अन्योक्ति) आउ, शिवक अर्धाङ्गिनी भवानीक स्तुति करी, जे निपुण छथि दूर करबामे सांसारिक जीवनक पीड़ा, आ जे वाणी-स्वरूपा, सिंहासन पर विराजमान छथि, जकर उज्जरता शरदक मेघ सन अछि! आकाश-मणि सूर्यक प्रथम किरणसभ, लालिमा लऽ उगैत, अहाँसभ पर अपन आशीष बरसाबथि। दिनक जन्मोत्सव मनबैत, ओ सभ लाल सिन्दूरसँ रँगैत जकाँ बुझाइत अछि दिशा-देवीसभक मुख। महाकविसभक शब्द, सोचि-बुझि चुनल : बन्दी बनाओल, भाव पहुँचाबए लेल : माल छोड़ए लेल, ओ तत्क्षण किएक नहि समर्पित करैत अछि अभिप्रेत अर्थ : चोरायल वस्तु? ओ सभ सौँपैत : कबूल करैत अछि गूढ़तर अर्थ : आन चोरीसभ, मात्र संघर्ष : यातनाक बाद, मानू ओ सभ सज्जन : दबे-पाँए चोर होथि। मूर्ख पशुक दृष्टिमे मणि काँच अछि आ काँच मणि। ज्ञानीक दृष्टिमे काँच काँच अछि आ मणि मणि। कहह, हे विष! के अहाँकेँ उकसौलक एतेक ऊँचासँ आरो ऊँच प्रतिष्ठा पाबए लेल? पहिने समुद्रक हृदयमे, तकर बाद वृषध्वज शिवक कण्ठमे, आ आब दुष्टक वचनमे अहाँ निवास करैत छी। भल्लटक शत अन्योक्ति आपत्कालमे सहारा, उत्सवमे आभूषण, संकटमे शरण, अन्हारमे प्रकाश, अनेक रूपेँ उपयोगी : सुन्दर, अहाँ सन सच्चा मणि दोसर के भऽ सकैत अछि? भाग्यक देवी लक्ष्मी —जे निर्लज्ज भऽ अपन अयोग्य प्रेमीक संग भागि रहलि छथि अभेद्य अन्हारसँ करिया बाट पर— अपन सूत्रबद्ध करधनीक कनेको झनकार होमए नहि देथि। : सज्जनक कहल एकोटा वचनपर कान धरए नहि चाहथि। हे लोभ! अहाँक संग भाग्य जोड़लहुँ, जखन मान-सम्मान एकरा स्वीकार नहि करैत छल, जखन संयम रोकैत छल, जखन लज्जा भूमिपर रेखा खिंचैत छल, जखन स्वतन्त्र इच्छा पाछाँ हटि गेल, धैर्य हमरा छोड़ि देलक, आ हमर हाथ काँपि रहल छल— एकर प्रतिफल ई भेटल: जकरा हम पएरसँ छुबितहुँ नहि, ओ हमरा अपन पएर छुबए नहि दैत अछि। भल्लटक शत अन्योक्ति सूर्य समुद्रमे डूबि सकैत अछि : पोखरिमे खसि सकैत अछि, क्षितिज पार कऽ सकैत अछि : नाङट भऽ दौड़ि सकैत अछि, अग्निमे पुनः लीन भऽ सकैत अछि : आगिमे पड़ि सकैत अछि, पातालमे उतरि सकैत अछि : कादोमे लोटि सकैत अछि। एहिसँ ओकर गुण : विचित्रता जाहिसँ समस्त संसार आनन्दित : मनोरञ्जित होइत अछि, की कनेको घटैत अछि? सत्य-असत्य चिन्हनिहार सम्मानित लोकसभ केकरो विषयमे की कहैत छथि, से विचारू। चोर, वेश्या आ एहने लोकक वचनपर विश्वास करब, तँ दिनकर सूर्यक खैर नहि। सूर्यक अस्त होएब कोनो पैघ दुःख नहि, कारण एहि संसारमे समय आबि गेलापर के नहि गेल अछि, के नहि जाइत अछि, अथवा के नहि जाएत? दुःखक बात केवल एतबे अछि— अन्हार : अन्त्यज, प्रकाशसँ अपरिचित : करिया देहबला, ओहि स्वभावतः विशाल आकाशमे अपन : ओकर अवसर पकड़ि लैत अछि। शीतल किरणबला चन्द्रमा आ ओकर साथीसभ श्रेष्ठ संगतिमे रहथि : एक पाँतिमे घुसथि, पाछाँसँ आगाँ गनलापर ओ सभ नेता मानल जाइत छथि। एतेक भेलाक बादो—की हुनका सभकेँ लाज नहि? ओ सभ रहितहुँ नहि रहल जकाँ बुझाइत छथि जखन आकाश सूर्यक प्रकाशसँ भरि जाइत अछि। भल्लटक शत अन्योक्ति एहिसँ बेसी अयोग्य आ असङ्गत विचार दोसर नहि भऽ सकैत: “सूर्य अस्त भेलापर चन्द्रमा सभ भय दूर कऽ देत जखन तीनू लोक दृष्टिसँ ओझराएत।” हृदयकेँ आरो बेसी ई बात बींधैत अछि, जे ई दीपसभ एतए अचानक उगि पड़ल अछि, अन्हार मेटाबए लेल अपन फड़फड़ाइत बाती उठौने। “आकाश-प्रकाशक” ई उपाधि, जे सूर्य छोड़ि ककरो लेल मिथ्या अछि, एतय धरि जे चन्द्रमाक लेल सेहो— कोनो भ्रमित लोक एकरा जुगनू लेल प्रयोग कऽ देलक। हे जुगनू! आब दिन अछि, कोमल, फिक्का किरणबला चन्द्रमाक रश्मि सूर्यक किरणमे डूबि गेल अछि। एहि बातक कोनो महत्त्व नहि, जे अहाँ रातिमे चमकैत छी जखन दसो दिशा घोर करिया भऽ जाइत अछि अभेद्य अन्हारसँ। “जुगनू” नामक कीड़ाक लालिमायुक्त मन्द ज्योति देखि हम सभ धोखा खा गेलहुँ, आ ओकरा जीवित मणि मानि लेलहुँ। धिक्कार अछि ओहि मद्धिम प्रकाशपर, जे जीवमे : कल्पनामे टिमटिमाइत अछि, जे तुच्छ अछि, कारण ओकर गुण आनक अछि, आ जे डरपोककेँ चकाचौंध कऽ दैत अछि। भल्लटक शत अन्योक्ति केवल हाथी, जे अपन भाला-सन नुकील दाँतक निरन्तर प्रहारसँ ऊँच शिलाखण्डकेँ तोड़ैत अछि, ओही बुझि सकैत अछि ओहि आघातक पीड़ा, जे सिंहक पंजाक प्रहाररूपी वज्रजालसँ पड़ैत अछि— सियार नहि, जकर साहस कुकुरक बच्चाक भुकनहिसँ मरि जाइत अछि। आब ई युवा चातक अपन माथकेँ बुझबैत, जे ऊँच उड़बाक धुनिमे पागल अछि। जँ ओकर इच्छा होइत, तँ एतेक दिशामे एहन कोन दिशा छल जतए ओकरा निर्मल, शीतल, मधुर जल नहि भेटित? जिह्वाकेँ एहि अपरिचित ढङ्गसँ मोड़ब, कानक ई चञ्चलता, ‘हमर’ आ ‘दोसरक’ सीमाकेँ बिसरि गेल ई मदहोश दृष्टि: आरो की कही—हे भँवरा! अहाँ सभ बात जनैत छी! हे भाइ! ई कोन पागलपन अछि? जे एखनहुँ अहाँ चाकरीमे नाचि रहल छी एहि हाथीक : एहि मूर्खक, जकर सूँड़ खोखल अछि : हाथ खाली अछि। भल्लटक शत अन्योक्ति दूध आ पानि अलग करबाक कौशल, ओ मधुर स्वर : बातचीत, ओ कोमल पएरक चाल : नम्र वचनक शोभा! हे बक! ई सभ छोड़ू। मित्र, जँ अहाँ कने अपन काँध ढील करब आ चुपचाप बैसि रहब सीखि जाइतहुँ, तँ हमर लेल हंस किएक नहि होइतहुँ? निर्जन बाटक कात ढक्कन-विहीन ताजा दहीक घैल देखि— जँ एक-आँखिबला कौआ, अभिमानसँ फूलि, गरदनि पसारि, सैकड़ो लालसामे डगमगाइत, अपन स्वभावक अनुसरण नहि करत, तँ फेर कहिया करत? आब ओ सुन्दर ढङ्गसँ नाचैत मोरसभ नहि देखाइत अछि, ने ओ मिठासँ रटैत सुग्गासभ; उलटे क्रोधसँ हुनका सभकेँ खदेड़ल जाइत अछि। आब ई मायावी कौआ, शुभ शकुनक कारण घरमे स्थान बना कऽ, परदेश गेल पथिकक स्त्रीक घरमे मनमाने सुख भोगैत अछि। भल्लटक शत अन्योक्ति हे ऊँट! अहाँ जोर-जोरसँ रेंकए जा रहल छी: हाय, कानमे ज्वर लगा देबएबला ई आवाज! सौभाग्यसँ अहाँक गरदनि नमहर आ टेढ़ अछि, तेँ अहाँक चीत्कार, नमहर कण्ठमे घुमैत-फिरैत शक्ति खर्च कऽ, बहुत देरसँ बाहर गरजत। ओहि बीच केकरा संग की भऽ जाएत, के जानैत अछि? भीतर बहुत छिद्र : अन्तःकरणमे दोष, बाहर बहुत काँट : बाहरी शत्रु— कमल-डाँठक तन्तु : गुण कोमल : दिखावटी किएक नहि होइत? हे कमल! अहाँ किएक नुकबैत छी अपन नमहर उज्जर तन्तु : निर्मल गुण? बात एतबे अछि—जँ नीच लक्ष्मी ओकरा देखि लेथि, तँ एतए पएर रखबाक साहस नहि करथि। हे जपा-पुष्प, अहाँक देह एहन कान्तिसँ रँगल अछि जे मणिक प्रकाशोकेँ मात दैत अछि। अहाँ कादोसँ उत्पन्न नहि भेल छी, अहाँ पानिमे नहि बढ़ैत छी : मूर्खक संगति नहि करैत छी। जँ अभागल सृष्टिकर्ता अहाँकेँ दुर्बल गाभा : नीच हृदय नहि देने रहितथि, तँ एहि संसारमे केवल अहाँ लक्ष्मीक निवास-स्थान होइतहुँ। भल्लटक शत अन्योक्ति झींगुर बाटक कातक गाछपर बैसि जोर-जोरसँ बजैत रहए; मुदा ई शङ्खक ध्वनि अछि जकर आधारपर लोक मानैत अछि जे शब्द समस्त आकाशमे व्यापल अछि। शङ्ख हड्डीक अवशेष अछि—फुटल वा मृत। वास्तवमे ओ आनक साँससँ बजैत अछि। तैयो ओकर मुँहसँ एहन कोनो ध्वनि नहि निकलैत जे मनोहर नहि हो, अथवा जे कोनो योग्य वस्तुक प्रशंसा नहि करैत हो। हाय माय! ओ गाछसभ कतए चल गेल— जकर फूल ओकर कोपलक अनुरूप छल, जकर फल-समृद्धि ओकर फूलक अनुरूप छल, आ जकर ऊँचाइ ओकर फल-धनक अनुरूप छल? सृष्टिकर्ता नीक केलनि जे व्यर्थ परिश्रम नहि केलनि चन्दनक गाछ बनबैत काल। अयोग्य फलसँ लाभे की होइत? कारण ई चन्दनक गाछ अत्यन्त शीतल : अज्ञानी अछि, एक-दोसरासँ लपटायल विषधर साँपसँ जकड़ल अछि, फूल : विद्वान ओकरा लग नहि अबैत अछि, तेँ ओ फल नहि दैत अछि। भल्लटक शत अन्योक्ति चन्दनक गाछपर विषधर सहि लैत छी; सुन्दर वस्तु असुरक्षित कोना रहत? हे खदिरक गाछ, कहू—की अपन सुन्दरता बचाबए लेल अहाँ एतेक काँटसँ भरल छी? अनुचित बातो कहियो शुभ फल दऽ सकैत अछि: चन्दनक गाछकेँ एकोटा फूल वा फल किएक नहि देल गेल? चौड़ा कुल्हाड़ी लेने ओकर लग जाएबोमे हमरा सभकेँ घोर लाज होइत अछि। ई रूखर, दुष्ट ताड़क गाछ, जे पथिकक शापसँ जरैत रहैत अछि, सए वर्षमे एक बेर जे फल दैत अछि— बहुत देरीक बाद भेटल ओ फल, की अमृत जकाँ अमरत्व दैत अछि? अथवा रसायन जकाँ फेरसँ जवान बनबैत अछि? हे साँपसभ, सुनू! गरमीसँ दग्ध लोकक मित्र, जाहि चन्दनक गाछक शरणमे अहाँ गेल रही, ओ काटि देल गेल। की अहाँ बिसरि गेल छी ओ सुख, जखन ओतए कुण्डली मारि : वैभव भोगि प्रतिदिन रहैत रही? जँ ओकर विनाशककेँ अहाँ अपन दाँतक ज्वलन्त विषसँ प्रतिदान नहि देब, तँ ओकर संग स्वयं नष्ट किएक नहि भऽ गेलहुँ? भल्लटक शत अन्योक्ति ई सन्तोष छल? असमर्थता छल? अथवा उपेक्षा? अथवा लोभ? अथवा चञ्चलता? कि वैर सेहो? हे अभागल सृष्टिकर्ता! उचित फल-भार आ फूलक शोभाक बात छोड़ू! चन्दनक गाछकेँ अनुचित फूल-फलो किएक नहि देलहुँ? हाय सज्जन गाछ! चौराहापर अहाँक जन्म किएक भेल? अहाँ एतेक घनगर छायाबला किएक भेलहुँ? छायावान भऽ कऽ फल किएक देलहुँ? फल-भारसँ लदला पर, तँ अहाँकेँ झुकए किएक पड़ल? आब अपन कर्मक फल भोगू, मित्र, जखन लोक अहाँक डाढ़िसभकेँ घींचैत, हिलबैत, झुकबैत आ टहनीक आगाँ भाग तोड़ैत अछि। ई सोचि जे—एकर जड़ : ओकर कुल उत्तम अछि, एकर ऊँचाइ : ओकर कुलीनता प्रसिद्ध अछि, एकर छाया घनगर : ओकर सौन्दर्य प्रखर अछि, ई उत्तम बाटपर ठाढ़ अछि : ओ सदाचारपर चलैत अछि, एतए सज्जन अबैत छथि : ओ सज्जनक संगति करैत अछि— पथिक ताड़क गाछक शरण लेलक। मनुष्यक वशमे एतबे अछि— मुदा ई आइ फल देत, काल्हि, कखनहुँ आगाँ, वा कहियो नहि—ई ईश्वरक वशमे अछि। भल्लटक शत अन्योक्ति अहाँक पएरतरे अपन देह सुखबैत हम सम्पूर्ण आयु बिता देलहुँ। एहि स्थानक बाद एक क्षणो हम कोना जीवित रहि सकैत छी? अस्तु, अहाँसँ विदा! अहाँ खूब फलू-फूलू! आइ हमरा कोन हड़बड़ी अछि? हे हमर उपकारी! अहाँ फल दी हमर पुत्रसभकेँ अथवा पौत्रसभकेँ। “देखी, ई लग अबए केना साहस करैत अछि,” ई सोचि, घमण्डी मन्त्र-जादूगर : मन्त्रीसभ, जे मेघ-मन्त्रक कनेकहि विद्या जनैत छल, प्रबल अनुष्ठानमे व्यस्त : राज्यक गम्भीर काजमे डूबल, पूर्णतः उपेक्षा कऽ देलक अजेय शत्रु-मेघक : एकत्र शत्रु-सेनाक, जे अवसर पकड़लक, अपन वज्र : अस्त्र छोड़लक, आ हाय! समृद्ध पहाड़ी गामकेँ जरा देलक। वाह, विनाशक मेघ, वाह! बुद्धिमान आश्चर्य करथि: “पृथ्वीपर ई काज आरो के कऽ सकैत अछि?” केवल अहाँ ई कठिन काज सिद्ध कऽ सकैत छी। जे खेत सभक हित करैत अछि ओहि सभपर अहाँ वज्र फेकैत छी, आ ओहि जरल मरुभूमिमे वर्षा करैत छी जे ककरो उपयोगक नहि। भल्लटक शत अन्योक्ति जखन गवय, पक्षी वा आन कोनो प्राणी पियासल छल, अहाँक वर्षा ओकरा सहारा देलक। आब ओहि बातकेँ पूर्णतः बिसरि जाउ! हे मेघ! एहि सर्वथा निकम्मा नोनगर बञ्जर भूमिक लेल अहाँक वर्षाक लाभ की? देखू! एकर जरल सतह फेर पहिने जकाँ कठोर आ प्रतिकूल भऽ गेल। हे समुद्र! अहाँकेँ अपन ओहि पानिपर लाज नहि होइत अछि जे अपवित्र काजमे उपयोग होइत अछि, ओकर सोझाँ जे अहाँक शरण अबैत अछि आन जल पीबए वा आचमन करए योग्य अछि कि नहि, एहि संशयक बाद? स्त्री आ बच्चो धरि जनैत अछि जे पियासल लोक समुद्रकेँ अपेय मानि छोड़ि दैत अछि। तखन ई आन लोककेँ किएक डरबैत अछि धक्का मारैत लहरिसँ, खुलल दाँतबला मकरसभक पाँतिसँ भयङ्कर बनि? हे समुद्र! सभ दिशामे बहिर करएबला गम्भीर गर्जनसँ अपनहि महानताक गुणगान करैत अहाँ हमर सभक कानपर किएक आघात करैत छी? कारण एहि संसारमे एक ऋषिक जन्म घड़ासँ भेल छल। जखन ओ पियासल भेलाह, अहाँ अपन समस्त जलो सँ हुनक अञ्जुरी नहि भरि सकलहुँ। भल्लटक शत अन्योक्ति कारण ई अछि जे तीनू लोकक समस्त जलक आधार अहाँ छी। ज्वारसँ फूलैत छी : जलभण्डारसँ प्रसन्न करैत छी, हे समुद्र! अनेक जीवकेँ आश्रय दैत छी : उदार हृदय छी। अहाँक लग पहुँचि, अनेक लहरि : धमकीक भङ्गिमासँ भयावह अहाँक देह देखि, हम दहकैत पेयक पीड़ा सहैत छी, ई आशामे जे पृथ्वीक छोरक पहाड़मे कखनहुँ कोनो छोट धारासँ शान्ति भेटत। जँ अहाँ फूलि नहि उठब : क्रोध नहि करब, आ एक क्षण ध्यानसँ हमर बात सुनब, तँ हे समुद्र, एक प्रश्न पूछी। विचारि कऽ उत्तर दी: पाताल-अग्निसँ सेहो बेसी कष्टकर ई नहि अछि की, जे पियासल पथिक पूर्ण निराशासँ स्तब्ध भऽ अहाँकेँ ताकैत रहैत अछि? मन्द कान्तिबला स्फटिकमे कोन प्रकारक शुद्धता अछि? ओ अपन सोझाँ देखाइत वस्तुक रङ्गक अनुसार स्वयं बदलि जाइत अछि। भल्लटक शत अन्योक्ति हे कामधेनु-मणि! “पृथ्वीक कोनो राजा हमरा अपन माथपर नहि धारण करैत अछि।” मित्र, एहि विचारसँ निराश नहि होउ। कारण एहि संसारमे ककरो माथ एहन आशीषक योग्य नहि, जे पूर्वक पुण्यक बीजसँ अर्जित हो आ अहाँक राज्याभिषेकक औचित्य सिद्ध करए। गुणक मोल बुझबाक पहिने गुणक पहिचान आवश्यक अछि। तँ कहू, एहि संसारमे ककरो कोनो वस्तुक प्रशंसा कखन होइत अछि? कृपा कऽ कहू! हे श्रेष्ठ मणि! जखन स्थिति एहेन अछि, तँ जीवित रहबा धरि चमकैत : सहैत रहू। संसार सहल जा सकैत अछि— एहि जनश्रुतिक एकमात्र साकार प्रमाण हमरा लेल अहाँ छी। कामना-पूर्ति मणि आ विद्युत्-आकर्षी मणिकेँ एकहि ‘मणि’ जातिमे कोन सृष्टिकर्ता रखलक? एकटा याचकक इच्छा पूरा करैत कखनो थाकैत नहि; दोसर पुरान पुआलक कणो स्वीकार करबामे लजाइत नहि। भल्लटक शत अन्योक्ति एकटा बहुत दूर अछि, दोसर ओकर सार बुझि नहि सकैत अछि, अभिमानी ओकरासँ याचना नहि करैत, आ अल्पबुद्धि तुच्छ वस्तु माँगैत अछि। फलतः, जे कामना-पूर्ति मणि माँगल वस्तु देबामे अनुरक्त अछि, ओकर उदारताक चमक कौशल बिना पहुँच सँ बाहर परीक्षाक स्थलसभमे प्रकट नहि भऽ सकल। ओ आनक हितमे दबाव : यातना सहैत अछि, आ टूटलाक बादो मधुर : दयालु रहैत अछि, ओकर परिष्कृत रस : श्रेष्ठ कर्म एहि संसारमे सभक स्वागत पबैत अछि। जँ ओ उन्नति नहि कऽ पबैत, बञ्जर भूमिमे पड़ि दुर्भाग्यसँ नष्ट भऽ जाइत अछि, तँ दोष ऊखक अछि कि निकम्मा बञ्जर भूमिक? की एतए फल-भारसँ माथ झुकौने आमक गाछ अछि? गरमी दूर करएबला सुगन्धित, छायादार कदलीक गाछ अछि? फूलल चम्पकक गाछ अछि? एतए तँ कठोर शमीक गाछसभ अछि, जे उग्र जङ्गली ऊँटक चरलासँ विरल भऽ गेल अछि। हे मूर्ख! ई निष्पवन मरुभूमिमे व्यर्थ अपन मृत्युदिस किएक भटकि रहल छी? भल्लटक शत अन्योक्ति धिक्कार अहाँपर, नीच कुलक धूर! जन्मसँ आइधरि कखनहुँ कोनो नीक काज केलहुँ? कहू! जाहि काज लेल ई दुष्ट पवन, अग्निक सारथि, अहाँकेँ ऊपर उठौलक अछि, से पूरा करू: संसारकेँ मैला करू। पूर्णतः खोखल, स्वभावसँ दुर्बल, कोनो काजक नहि— हाय! देखू, आइ मनमौजी चञ्चल पवन पर्वत : गुणी पुरुषसभसँ मुँह मोड़ि, हाथ लगल सुखायल, झुरायल पुआलक टुकड़ासभकेँ महान लोकक निवास आकाशमे उठा देलक। स्वभावसँ नीच, कखनो कोनो गिनतीमे नहि आबएबला, प्रतिदिन पएरतर रौंदायल, बहुत काल धरि जमीनसँ चिपकल— देखू! आब अस्थिर पवनसँ फुलायल ई धूरक कण आकाशमे उड़ि रहल अछि, धरती धारण करएबला ऊँच पर्वतसभक ऊपर। भल्लटक शत अन्योक्ति धिक्कार अहाँपर, हे साँप! ई सत्य अछि जे अहाँ अयोग्य छी, तैयो शिव : राजा, अहाँकेँ, निश्चय, स्नेहपूर्वक अपन पएरक आभूषण बनबैत छथि : अपन चरण लग स्थान देने छथि। की अहाँमे एहन फुसफुसाबक कला अछि, जे मातल भँवरासभक झुण्डक गुँजारोकेँ मात दे? मित्र साँप! ई सभ आडम्बर किएक? अहाँ माथपर उत्तम मणि धारण करैत छी, पर्वतक गुफामे रहैत छी, आ अपनहि केंचुल छोड़ैत छी। बिना परिश्रम उपलब्ध वायुसँ जीवन चलबैत छी। एक दिस अहाँक आचरण एहेन अछि। दोसर दिस, अहाँक चाल टेढ़ अछि, जिह्वा दूफाँक अछि, दृष्टि विष अछि, जाहि दिशामे घूरैत छी, ओतय ज्बला चमकि उठैत अछि। हे समुद्र! लहरिमे लुढ़कैत शिलाखण्डक तीक्ष्ण आघातसँ एहि मणिसभकेँ कष्ट नहि दी। की कौस्तुभ मणि स्वयं विष्णुकेँ सेहो अहाँक लग हाथ पसारि याचना करए नहि अनलक? भल्लटक शत अन्योक्ति विश्व-धारक शेषनागक माथ अनेक अछि, हुनक महान शक्ति प्रसिद्ध अछि, ओ कद्रूक कुलीन सन्तान छथि। ओ क्रोधित होइत छथि तँ संसार संकटमे पड़ैत अछि। हुनक पराक्रम तीनू लोकक आश्चर्य एहन अछि जे नाग-जातिमे जन्म लेबाक दोष मानू पूर्णतः मेटा गेल हो। धन्य अछि ओ अद्भुत दिन, भलेँ पूरा वर्षमे एके दिन हो, जे महानतामे बितल, आ जकर आनन्द पूर्वज नहि पाबि सकल, ने भविष्यक लोक पाबि सकत। जँ कुकुरक काँधपर नकली अयाल सजा कऽ पशुराज सिंहक स्थानपर बैसा देल जाए, तँ ओ पशुराज सन कोना गर्जत, जे मदोन्मत्त हाथीक गण्डस्थल चीरए लेल व्याकुल रहैत अछि? भल्लटक शत अन्योक्ति की ई अहाँक लक्ष्यवेधक शुद्धताक अनुकूल अछि? की ई अहाँक बाण-पाँखक स्थितिसँ सम्बन्धित अछि : पदोन्नति अहाँक अपन लोकक? की ई अहाँक तैयारी : पूर्वकर्मक अनुरूप अछि, अथवा धनुषक डोरी : सद्गुणसँ लगावक शोभा? हे बाण : मुँड़ायल साधु! ई की, जे क्षणभर मुखियाक कान लग पहुँचैत छी, आ उड़ि कऽ दूरसँ निर्दयतापूर्वक सोझाँ ठाढ़ लोककेँ मारि गिरबैत छी, हे निष्ठुर! देखल जाइत ई मनोहर रूपसभ निश्चय फलवान होइत अछि जखन क्षणमात्र लेल आँखिक विषय बनैत अछि। आब जखन संसार प्रकाशहीन अछि, हाय! ई आँखि आन सभ इन्द्रियक समान कोना भऽ गेल? अथवा वस्तुतः ओ सभ समान नहि अछि। जखन पक्षीसभकेँ बजाओल जाइत अछि, तखन आबि गेल मच्छरकेँ भगाओल नहि जाइत। समुद्रक गहिराइमे राखल विद्युत्-मणि मणिसभक कान्ति ग्रहण कऽ लैत अछि। जुगनू ज्योतिर्मय लोकक बीच चलबासँ नहि डरैत अछि। धिक्कार एहन समानतापर, जे वास्तविक भेदक कनेको विचार नहि करैत। भल्लटक शत अन्योक्ति हे सोनार! हे बुद्धिमान, अहाँक जय हो! अनिर्णीत वस्तुक पुनः-पुनः जाँच करबाक लेल अहाँ अपन तराजूपर सोनाक आभूषण आ बाटकेँ समान रूपेँ रखैत छी। हे अन्हर इनार! घैल अहाँक कृपा नहि पाबि फेरि गेल। मुदा अहाँ अपन नीच कृत्यपर मोहर लगा देलहुँ ओकर मुँहसँ पानिक बूँदसभ लऽ कऽ। वास्तवमे उदारताक विषयमे की कहल जाए विद्युत्-मणि आ मनुष्य—दुनूक? हुनकर देन-लेन केवल पुआलक महीन टुप्पीक टूटल कण धरि सीमित अछि। सए पएरबला कनखजूरा जँ एकटा छोट डबरा पार नहि कऽ सकैत अछि, तँ की एहि कारण दू पएरबला हनुमानक समुद्र-लाँघनपर सन्देह करी? युवा शिकारी : लोभी मूर्खक घरमे नहि अछि नमहर बाँस चुनबाक लगन : पहिचानबाक विवेक कुलीन वंशक, नहि डोरी बटबाक उत्साह : उच्च गुण एकत्र करबाक तत्परता, नहि बाणमे नोक लगाबक संकेत : पुरस्कार देबाक आभास जरूरतमन्दकेँ; तखन एतए किएक रुकल जाए? भल्लटक शत अन्योक्ति की एहन केओ अछि जे बहुत काल धरि धोखा नहि खाइत एहि वस्तुसँ, जे पातर घासक पातक टुप्पीपर टिकल अछि, ई सोचि जे सम्भवतः मोती हो? हाय! ई तँ पानिक बूँद अछि। संसार एकरा भ्रमसँ देखैत अछि। हम एकर सत्य जनैत छी। बहुत विचारलाक बादो हमरा नहि बुझाइत अछि, ओहि विशालहृदय लोकसभकेँ कोन-कोन नामसँ बजाबी, जे एकटा पाथरकेँ अन्तिम प्रमाण मानैत छथि सोनाक सच्चा मोल जाँचबाक लेल, जे सम्पूर्ण संसारक आभूषण अछि। खेतक रक्षा लेल हलवाहा बनौने एहि पुआलक बिजूकेँ देखू, अपनहि रूपमे। आब निर्भय भऽ, एहि टेकल वस्तुक निश्चलता : निष्क्रियतासँ एहि घमण्डी पुरुषक, हरिणक झुण्ड ओकर सोझाँ गहूम चरैत अछि। निमेषहीन आँखि ककर अछि स्वर्गवासी देवतासभ छोड़ि? हे मूर्ख माछ! पृथ्वीपर एहन आँखि पाबियो कऽ, भीतर घुसैत बंसीक काँटाकेँ किएक नहि देखलहुँ जखन कौर लेल मुँह खोललहुँ? भल्लटक शत अन्योक्ति भलेँ पुरुषत्वक बाटसँ हटि जाए : स्त्री बनि जाए, भलेँ पद गँवा दे : पातालमे उतरि जाए, भलेँ याचनाक समय स्वयंकेँ छोट करए : बनि जाए माँगए लेल बौना, तैयो ओ संसारक उद्धार कऽ सकैत अछि— ई बाट एक राजा : विष्णु देखौने छथि। ई क्षुद्रबुद्धि काँच-बेचनिहार दानव, जे अभ्यास करितहुँ भूल करैत अछि अपन कुलक अत्यन्त विशिष्ट कलाक, ओहि जौहरीसँ ईर्ष्यामे जरि रहल अछि जे सहजहि सूत्रमे पिरो सकैत अछि मणिराज कौस्तुभ सन मणिसभकेँ। ओ चूहासभक शत्रु छल, तेँ घरमे आनल गेल, मुदा ओकरा पूर्ण स्वतन्त्रता नहि देल गेल। “जँ पेट भरि गेल तँ ई ओकरा सभक शिकार नहि करत,” ई सोचि ओकरा भरिपेट भोजन नहि देल गेल। दुबरायल, गुमसुम भऽ गेल ओ बिलाइ एतए की करत? आरो की कही? आब मालिकक घरमे चूहासभ निर्भय दौड़ि रहल अछि। भल्लटक शत अन्योक्ति जँ एतेक महानता अछि अहाँक स्वाभाविक मिठास : योग्यतामे, तँ ई शीतलता : मूर्खता किएक? जँ अहाँक सहज सोझाइ : स्पष्टवादिता एतेक अछि, तँ ई गाँठ : विकृति किएक? जँ अहाँक जड़ : उत्पत्ति शुद्ध : कुलीन अछि, तँ “कादोमे जन्मल” ई नाम किएक? जँ ई तन्तु : गुण अछि, तँ ई छेद : दोष किएक? हे कमल-डाँठ! मित्र, हम अहाँकेँ बुझि नहि पबैत छी! जे सभ मानू बनाओल गेल विषमे लेपल, जकर टेढ़ चाल : कुकर्म गननासँ बाहर अछि, जकर दूफाँक जिह्वा निर्दोषकेँ मारए लेल अछि, जे बिलमे नुकायल रहैत : दोष खोजैत अछि, —ओ साँपसभ भला-बुरा नहि बुझितहुँ, फनपर मणि धारण करैत : योग्य पुरुषकेँ मुखिया बनबैत अछि। सज्जन कत्तहुँ मर्यादासँ नहि खसैत छथि। चिन्ता छोड़ू! भल्लटक शत अन्योक्ति देखू, स्त्रीसभक निर्दयता! हे अभागल राति! धिक्कार अहाँपर! अहाँ पूर्ण दुष्टा छी! व्यर्थ अहाँ ई चाल चलैत छी अपन केश-बन्धन खोलबाक। जड़ समुद्रादि सेहो उचित काज केलक अपन प्रेमक अन्तपर चन्द्रमाक अवर्णनीय अस्तकालमे, जे लोकक नेत्रक स्वामी छथि। अहो! घरक वीर, उद्दण्ड दीप, दिनकेँ जीतबाक ज्वरमे दहकैत, व्यर्थ अपन अङ्ग : परिवारजनकेँ मलिन करैत अछि। की ओ देखब सहि सकैत छल अन्हारक मुख : आरम्भो, जे संसारसँ छीन लैत अछि ओकर सम्पूर्ण क्रिया-स्वतन्त्रता? जखन एकरा उन्नत कएल गेल, तखन आन गाछक नामो ओझरायल। बाटपर ठोकर खाइत ईश्वरक हाथ रोकल गेल, अपरिचित दृश्यसँ उत्पन्न आँखिक कष्टसँ संसार बचि गेल, —हे लकड़हारा, अहाँ उचित केलहुँ काटि कऽ असमय फूलल आमक बगान। भल्लटक शत अन्योक्ति वायु खा कऽ जीवित रहबाक कारण साँपसभ संसारक विश्वास जीतलक, आ उपद्रव मचौलक। बदला मे ओ सभ मोरसँ खायल गेल, जे पालन करैत अछि वर्षाक बूँद पीबएबला कठोर व्रत। फेर ओ मोरसभ सेहो मारल जाइत अछि शिकारीसभक हाथेँ, जे चमरु हरिणक खुरदुरा छाल पहिरने रहैत अछि। ई प्रत्यक्ष पाखण्ड देखितहुँ, अभागल मनुष्य एहन गुणक लालसा करैत अछि। जे एकसरि पैघ भार उठौने छल ऊबड़-खाबड़ बाटपर, जे अपन गोहालमे दोसरक घमण्डी हुँकार कखनो नहि सहलक, जे बैल-जातिक आभूषण छल, आब जखन ओ उज्जर बैल बूढ़ भऽ गेल, हाय लाज! ओकर दाम जोर-जोरसँ पुकारल जा रहल अछि। अपन अनुचित प्रयास छोड़ू! लँगड़ाक विचरण लेल आकाश स्थान नहि। हे हमर सज्जन फतिंगा! एतय-ओतय उड़ैत फिरबाक अहाँक हानिकारक प्रवृत्ति अहाँकेँ मात्र थका देत। देव विष्णुओ कल्पना नहि कऽ सकैत छथि ओहि पवन-झोंकाक, जे गरुड़क पाँखक टुप्पीसँ निकलैत अछि, जे सहजहि संसारक सीमाकेँ हिला दैत अछि, आ अपन बाटमे जड़िसँ उखाड़ल पर्वतसभक भारी भार लेने चलैत अछि। भल्लटक शत अन्योक्ति जँ केवल चन्द्रमा, चञ्चल लहरिक किलोलसँ मुखर, समुद्रक जल फुला कऽ, ओकरामे जीवन भरैत अछि, तँ पर्वतीय धारासभ ई काज कोना कऽ सकैत? जँ ई सत्य नहि रहित, तँ समुद्र घटैत नहि जखन ओ सभ ओकरादिस दौड़ैत अछि माथ झुकौने, ठसकसँ, केवल तमाशबीन बनि देखए लेल, सहायता करबामे पूर्ण असमर्थ। ओ ऋषि, जे बहुत पहिने अथाह समुद्रकेँ पीबि गेलाह एके अञ्जुरीमे, एतेक भुखायल, जे बिना हानि एहन हजार समुद्र पीबि सकथि। मुदा निश्चय, ई सम्भव नहि रहित कोनो दीप्त तेज बिना? ओ रहितहुँ नहि रहल जकाँ बुझाइत अछि, शक्तिमानक भीतर दहकैत। ओहिमे पाथर : मणि अछि, ओ तीनू लोकक आभूषण अछि, ओ अपन मर्यादामे रहैत अछि। निश्चय चन्द्रमा केवल ओहिमे निवास करैत छथि, ओ देवतासभक इच्छा पूर्ण केलक, स्वयं विष्णु ओकर ऊपर शयन करैत छथि, आ हुनक नाभिसँ निकलल कमलपर ब्रह्मा प्रकट छथि। भाग्यक विधान अछि जे जल : अज्ञानी समुद्रो, ओकर पेट : पाताल-गुफासभ भरए लेल नीचाँ धँसैत अछि। भल्लटक शत अन्योक्ति हे श्रोतासभ! जँ सहन करब तँ हम कही। शक्तिशाली शत्रुसँ नहि, अपन पक्षसँ डरू! अन्हार जखन क्षितिजपर आक्रमण करैत अछि, तखन तारासभ केना चमकैत अछि! सूर्य जखन प्रकाशित होइत छथि, तखन ओ सभ अपन बलसँ चमकि नहि सकैत। एहि मे कोनो पैघ बात नहि जे मूर्ख कमल-पातपरक पानिक बूँदकेँ मोती बुझि लेलक। ओकर आरो कथा सुनू: जखन ओ धीरेसँ ओकरा उठौलक, आँगुरक टुप्पीक हलुक गतिसँ ओ विलीन भऽ गेल। “ओ उड़ि कऽ कतए गेल?” आब आन्तरिक दुःखसँ ओ प्रतिदिन सुति नहि पबैत अछि। ओ एहि सरोवरमे रहैत अछि। अहो! कतेक सन्तोषक बात! हंसक मन कनेको लालायित नहि होइत लक्ष्मीक निवास कमलक प्रति। “ई सुतल अछि, एखनहुँ नहि जागल! आउ, पहिने ककरो दोसरक सेवा करी!” ई कहि, पेटू भँवरासभ सहि नहि सकैत एक क्षणक विलम्बो। भल्लटक शत अन्योक्ति क्रोधसँ टर्राइत मेढ़क, निर्भय भऽ हाथ उठा दे थप्पड़ मारबाक लेल करिया नागक मुँहपर, आ ओ नाग ओतए रहि जाए मुँह नीचाँ कऽ, आँखि मूनि, ई सभ कोनो प्रबल नाग-मन्त्रज्ञक लीला अछि। डोरी चढ़ल ई धनुष यमक खुलल मुँह सन अछि, आ बाणसभ विषधर साँप सन, ओकर निशाना अर्जुनादिसँ सेहो श्रेष्ठ अछि, आ ओकर चाल सदिखन दबे-पाँए अछि। देखू, धूर्त शिकारीक भीतरक क्रूरता, आ हाय! ओकर मुँहमे मधुर, मनमोहक गीत : प्रशंसा। एहिसँ हमरा भय अछि जे वन पशु-विहीन भऽ जाएत। हे पवन, अहाँ कतेक पैघ भूल कऽ रहल छी, जखन भरपूर धूरकेँ उठा दैत छी, जे सम्पूर्ण संसारक पएरतर रौंदायल अछि, आकाशमे प्रतिष्ठित कऽ, ज्योतिर्मय समूहक संगतिक योग्य बना दैत छी! उठलापर लोकक दृष्टि धुँधला भऽ जाइत अछि—एहि बातक उल्लेखो छोड़ू। अहाँक देहसँ एहि मैलाक दागकेँ मेटाबए लेल कोन उपाय अछि? भल्लटक शत अन्योक्ति ई महत्त्वाकांक्षी पुरुषसभ, राजद्वारपर आँखि गड़ौने, धन माँगबाक धुनिमे, क्रोधसँ उफनैत द्वारपालसभ द्वारा तितर-बितर कएल जाइत अछि। विद्वान लोक, धनसँ विरक्त भऽ, सांसारिक भोगक त्यागक कारण, स्वर्गीय नदीक रमणीय कातपर विश्राम करैत छथि। कदम्ब-परागसँ चितकबर हवा बहैत अछि, साँपक शत्रु मोरसभ नाचैत अछि, ताजा जलसँ भरल भयङ्कर मेघ गरजैत अछि। हमरा उदास देखि, प्रिय-वियोगक अग्निमे डूबैत, हे बिजुरी! हे निर्दयी, अहाँ किएक चमकि रहल छी—की हम दुनू स्त्री नहि छी? जे अहाँकेँ जीवन : आशा देलक, जे अहाँकेँ ठाढ़ केलक : प्रबल पदोन्नति देलक जे काँधपर उठा कऽ : सेनामे रखलक बहुत काल धरि, जे अहाँक पूजा केलक : सम्मान देलक, क्षणमात्रमे, केवल एकटा गुप्त मुस्की सँ अहाँ ओकर प्राण लऽ लैत छी। हे भाइ! अहाँ कृतज्ञताक साक्षात् मूर्ति छी, पूर्णतः पिशाच सन आचरण करैत! भल्लटक शत अन्योक्ति सभ दिशा रस्सीसँ घेरल अछि, विषक कारण जल पार नहि कएल जा सकैत अछि, धरती खूनल अछि, झाड़ीमे आगि लगा देल गेल अछि, धनुष लेने शिकारी ओकर पाछाँ सटले अछि; झुण्डक मुखिया कतए भागत? “ई जलक एकमात्र भण्डार अछि, मणिक खानि अछि!” ई सोचि, पियाससँ हृदय काँपैत हम समुद्र लग पहुँचलहुँ। के जनैत छल जे ऋषि अगस्त्य क्षणमात्रमे एकरा पीबि जेताह अपन खोह-जकाँ अञ्जुरीसँ, एहिमे भरल माछक झुण्डसहित। सेमलक विशाल, आँखि मोहनिहार फूल देखि सुग्गा सोचलक: “एकर फलो एहने अद्भुत होएत!” ओ बहुत काल धरि ओतए बैसल रहल, आ संयोगसँ एकटा फल लगल। जखन ओ पाकल, तँ भीतर रूई छल, आ ओकरो पवन उड़ा लेलक। विष्णुक निवास, जे सभक उपकारी छथि, जे समस्त देवताक असङ्ख्य इच्छा पूर्ण करैत अछि, जे चन्द्रकिरणक समूहसँ चमचमाइत उज्जर अछि— हाय, कालकूट विष! ओहि समुद्रसँ अहाँक जन्म कोना भेल? भल्लटक शत अन्योक्ति इच्छापूरक कल्पवृक्षक सोझाँ, जे अपन फलल डाढ़िक घनगर छत्रसँ सूर्यक ताप दूर करबामे निपुण अछि, की छाया खोजएबला कोनो मूर्ख पशुओ आकर्षित होएत एकटा सुखायल झाड़ीदिस? क्षेमेन्द्र: छल-कौशलक विलास १. दम्भ एकटा विशाल, भव्य नगर अछि जकर महलसभ धनक परिष्कारक स्पर्शसँ धन्य अछि, आ सम्पत्तिसँ चमचमा रहल अछि। ओ श्रीक पति विष्णुक विशाल वक्षस्थल सन अछि— लक्ष्मीक सुन्दर आलिङ्गनक सुखद आधार, कौस्तुभ मणिसँ दीप्तिमान। एहन नगर जतए विश्वधारक शेषनाग अथक भावसँ महलसभकेँ थामने बुझाइत छथि, —एक रहितहुँ अनेक रूपमे प्रतिबिम्बित भऽ— लटकैत मोतीक मालाक वैभवसँ, जे मणिजड़ित फर्शपर प्रतिबिम्बित अछि। जतए पाँतिमे ठाढ़ महलसभ चमकैत अछि, स्फटिक-जकाँ तीक्ष्ण कान्तिसँ दमकैत: देवी रातिक करिया घूँघटक निर्लज्ज चोर, —प्रेमीक लग चोरी-चोरी जाएबाली स्त्रीसभक लेल सङ्कट। जतए कामदेव, जे पतङ्ग सन आचरण करबामे प्रवृत्त छथि, शिवक तेसर आँखिसँ निकलैत ज्बलाक लपकादिस आकर्षित भऽ, चन्द्रमुखी स्त्रीसभक मुखक सौन्दर्य-अमृतसँ पोषित होइत छथि। जतए निरन्तर हवा बहैत अछि, पसेनाक बूँदसँ भरल, रमणीय, निर्बन्ध स्त्रीसभक थाकनिसँ, जे प्रेमक्रीड़ासँ क्लान्त छथि, आ हुनकर खुलल केशक फूलक सुगन्धसँ सुवासित। छल-कौशलक विलास : दम्भ जतए वनहंसक मधुर पुकार, जकर स्वर गरम अछि कारण ओकर चोंच भरल अछि कोपल आ नव पल्लवसँ, कमल-सरोवरसभमे फैलैत अछि, मानू लक्ष्मीक पायल झनकि रहल हो। जतए वर्षा ऋतु ठहरल जकाँ बुझाइत अछि इन्द्रधनुष आ मेघक समूहसहित, मरकत फुहाराक पाँतिमे साकार, आ नाचैत पालतू मोरसहित। जतए हरिणीक बच्चा सन आँखिबाली स्त्रीसभ स्फटिक-मण्डपपर चमकैत छथि, चाँदनीक आवरणमे, मानू अमृत-सागरक मथल लहरिसँ जन्मल अप्सरासभ होथि। ओतए समस्त छलक श्रेष्ठ भण्डार रहैत छल—एकटा धूर्त पुरुष, नाम मूलदेव, जे सए प्रकारक अनुपम छलमे सिद्ध छल। दुष्टसभ, जकर जीविका ओकर बुद्धिक पराक्रमपर निर्भर छल, दूर-दूर देशसँ ओकर लग आबि जुटैत छल। ओकरा अथाह धन भेटैत छल, जेना चक्रवर्ती सम्राट अपन स्वाभाविक गुणसँ प्राप्त यशमे उल्लसित होइत अछि। एक दिन भोजन कऽ, रसज्ञ पुरुषसभक संग सभाभवनमे बैसल छल, तखन एकटा सार्थवाह ओकर लग आबि अनमोल उपहार रूपेँ मणिजड़ित पात्र देलक। माथ झुकौने हिरण्यगुप्त, अपन पुत्र चन्द्रगुप्तक संग, आसन आ उचित सत्कार पाओल; कनेक विश्रामक बाद मौन तोड़लक: छल-कौशलक विलास : दम्भ “हाय! अहाँक सोझाँ हमर ई वाणी, जे परिचयक निर्लज्जता धारण कऽ रहल अछि, बहुत बेसी साहसी होएबाक हिम्मत नहि करैत, मानू नगरमे आएल कोनो गामक कन्या हो। बृहस्पतिक बुद्धि समेटने अहाँक ज्ञानक प्रकाशमान किरणक विशालता अन्धता दूर करएबाली आशा दैत अछि; मानू सूर्यक कोनो तेजस्वी भाइ हो, जे बृहस्पति ग्रहकेँ मलिन कऽ दिशासभकेँ अन्हारसँ मुक्त करैत हो। जन्मसँ हम एकटा कोष जमा केने छी, जे अनेक प्रकारक मणि, मोती आ सोनासँ भरल अछि। आब जीवनक साँझमे हमरा एकमात्र पुत्र जन्मल अछि। बाल्यकाल मूर्खताक अवस्था अछि, यौवन प्रेमसँ उत्पन्न मानसिक विक्षिप्तता, आ जमा कएल धनक टिकब ओतबे अनिश्चित अछि जतेक पानिक बूँद कुमुदिनी-पातपर, जे हवामे काँपैत रहैत अछि। मोहक, हरिणी-नयन कन्यासभ सदैव दुष्ट होइत अछि मादा भँवरासभ जकाँ, जे भोगरूपी कमलमे नुकायल रहैत अछि। दुर्घटनाक ई शृङ्खला हमर एहि पुत्रपर टूटि पड़ल अछि। सत्य, ठकक हाथक गेंदक कोनो मुक्ति नहि, ने वेश्याक पायलमे जड़ल मणिक, ने धनी घरक भोला वंशजक। छल-कौशलक विलास : दम्भ अशिक्षित लोक चिरैक बच्चा सन होइत अछि, समय-स्थानक विचार बिना चहचहाइत, चलनाइ नहि आबितहुँ फुदकैत, आ ठक-बिलाइसभक शिकार बनैत। हे बुद्धिमान गुरु! अहाँक याचकक ई पुत्र, जे वस्तुतः अहाँक दोसर पुत्रसँ कम नहि: एकरा अपन सर्वोच्च बुद्धि प्रदान करू, जाहिसँ ई नष्ट नहि हो!” ओ संकोचसँ अपन निवेदन रखलक अछि—ई बुझि, विनयपूर्वक माथ झुकौने ओकरा मूलदेव सम्बोधित केलक, ओकर ओठक सीमा सद्भावनाक बाढ़िक लेल खुलि गेल: “अहाँक ई पुत्र हमर घरमे एहि तरह रहए जेना हमर अपन पुत्र हो। परिश्रमसँ ई धीरे-धीरे छलक सम्पूर्ण हृदय-तत्त्व बुझत, जकर शिक्षा हम एकरा देब।” बुद्धिमान सार्थवाह आदेशानुसार अपन पुत्रकेँ मूलदेवक घरमे सौँपि, ओकरा प्रणाम कऽ, प्रसन्न भऽ चलि गेल अपन महल। सूर्य धीरे-धीरे दृष्टिसँ ओझराए लगल, ओकर किरणक कान्ति घटैत गेल, अस्पष्ट आकारसहित धुँधलका मे चमकैत, ठीक ओहि जुआरी सन जकर मुख राख सन पड़ि गेल हो, जकर हाथपर नियन्त्रण ढील भऽ गेल हो, जे अपन वस्त्रो गँवा देने हो, आ अन्ततः ठकसभसँ लुटा कऽ धन गँवा दैत हो। छल-कौशलक विलास : दम्भ दिनकर अस्त भेलापर, पश्चिमी क्षितिज-पर्वतक शिखरपर आधा प्रकाश चमकल, मानू लाल सिन्दूरक आवरणक अरुण आभा अन्हाररूपी हाथीपर चिपकल हो। प्रतिदिन छोड़ि देल जाइतो, दिनक शोभा दिनकर सूर्यक पाछाँ चलैत अछि। सन्ध्या नहि, भलेँ ओ हुनक प्रिया छथि। स्त्रीक हृदय के बुझि सकैत अछि? सन्ध्याक अनुरागमय लाली जखन धीरे-धीरे विलीन भऽ गेल आकाशक आँगनक कमल-सरोवरमे, तखन ओकर उपपति अन्हार, भ्रमसँ ई डरि जे ई सूचना अछि ओकर पति सूर्यक आगमनक, ठोस आधार नहि पाबि व्याकुल घूमए लगल। धरती अन्हारसँ ढँकल बुझाइत छल, मानू बेहोश हो तीक्ष्ण किरणबला सूर्यक वियोगसँ। कारण स्थिर आ तेजस्वी प्रेमी प्रिय होइत अछि। राति भव्य छल वनवासी शबर कन्या सन, उज्जरतम तारासँ पिरोएल मोतीक हारसँ सुशोभित, घोर अन्हारसँ बनल मोर-पाँखक चादर ओढ़ने। छल-कौशलक विलास : दम्भ तकर बाद धीरे-धीरे राति-निर्माता चन्द्रक प्रकाश उगि आएल, दूर यात्रा पर गेल पुरुषक स्त्रीसभकेँ दहकबैत, रातिमे फूलएबला कुमुदक जागरणक अग्रदूत, चक्रवाकी पक्षीसभकेँ वियोगक शिक्षा देनिहार। रातिक स्वामी चमकल, कामदेवक उज्जर छत्र, दिशा-देवीसभक स्फटिक दर्पण, उज्जर ललाट-चिह्न सुन्दरी अन्हारक माथपर। राति-निर्माता फिक्का सौन्दर्यसँ दमकल मानू स्वर्गीय मन्दाकिनी नदीक कातक किनारपर ठाढ़ राजहंस, अपनहि किरणक चारूकात पसरल तन्तुक प्रभामण्डलमे झिलमिलाइत। करिया राति चन्द्रमासँ सुन्दर भेल, प्रेम रातिसँ, वसन्तोत्सव प्रेमसँ, आ हरिण-नयन कन्यासभक आकर्षण, जकर मन मदिरासँ प्रसन्न : कामनासँ रोमाञ्चित छल, वसन्तोत्सवसँ सुन्दर भेल। स्वच्छन्द, केवल सुखक समयक मित्र भँवरासभ कान्तिहीन कमलकेँ छोड़ि देलक, आ उन्मादमे, फूलल कुमुदक गुच्छपर टूटि पड़ल। छल-कौशलक विलास : दम्भ राति दमकैत छल खप्पर धारण कएनिहार स्त्री-साध्वी सन, चाँदनीसँ बनल भस्ममे चमकैत, सुन्दर खप्पर-पात्रसहित जे मनोहर चन्द्रकलासँ बनल छल, तारासँ बनल हड्डीक टुकड़ाक हार पहिरने। जखन पूर्णिमाक चन्द्रक असङ्ख्य किरण पूर्ण रूपेँ प्रकट भऽ गेल ओकर मणिमय महलक भीतरी बगानमे, मूलदेव, ध्यानसँ उठि शान्त भावसँ स्थिर, स्फटिक आसनपर बैसल अपन अभिन्न मित्र शशिनक संग। कन्दली आदि ओकर शिष्यसभ ओकर पएरक चौकीक कातमे उपस्थित छल। बहुत कालसँ सोझाँ प्रतीक्षा करैत सार्थवाहक पुत्रकेँ ताकि, मूलदेव बाजल; ओकर दाँतसँ निकलैत प्रकाशकिरण मानू चाँदनीकेँ लाजसँ गायब कऽ देलक। “हे पुत्र, ठकसभक समस्त छलक अत्यन्त टेढ़ हृदय-सार सुनू। एकरा बुझि लेलापर धन, जे सामान्यतः क्षणिक बिजुरी सन चञ्चल अछि, स्थिर भऽ जाइत अछि। एहि संसाररूपी झाड़ीमे एकटा गड्ढा अछि, जे घास, कोपल आ लतिक जालसँ नुकायल अछि, जकर अथाह खोहमे भोला हरिणसभ खसि पड़ैत अछि। छल-कौशलक विलास : दम्भ ई ओहि निधि-घैल : शवकलशक नाम अछि “दम्भ,” जे स्वभावतः अथाह अछि। एहि संसारमे एकर मुँह ढँकल अछि लपटायल दुष्ट-साँपसभसँ। दुष्टक लेल दम्भ एकटा गुप्त मन्त्र अछि, सभ लालसा पूर्ण करएबला चिन्तामणि, एकटा सिद्धि, लक्ष्मी देवीकेँ वशमे करबाक उपाय। दम्भक चाल के बुझि सकैत अछि, जे माछक चाल सन अछि, सदैव पानिक भीतर डूबल? वास्तवमे ओकर गति बूझब कठिन अछि जकर हाथ नहि, पएर नहि, माथ नहि। साँप मन्त्रक शक्तिसँ पकड़ल जाइत अछि, विश्वासी हरिण नुकायल फन्दासँ, पक्षी भूमिपर बिछायल जालसँ, आ मनुष्य दम्भसँ। दम्भ विजयी अछि, लोकक हृदयकेँ भयभीत करैत, मोहसँ उत्पन्न जड़ता, जे संसारकेँ दबा लेने अछि, : छलक स्तम्भ, विश्व-विजयक स्मारक रूपेँ ठाढ़ कएल, सदैवक अचेतना, दम्भोद्भवक अवतार। छल-कौशलक विलास : दम्भ दम्भ आधार अछि, कुतर्कक विशाल चक्रक नाभि, जकर हजार टेढ़ आरा अछि असह्य बेतुका बातक, आ जे निरन्तर घूमैत कुमार्गपर लुढ़कैत अछि। मूनल आँखि जड़ि बनि, दीर्घ अनुष्ठानिक स्नानसँ भीजल केशसँ टपकैत जलसँ सींचल, दम्भक गाछ कर्मकाण्डी शुद्धताकेँ फूल बनबैत अछि आ फल दैत अछि †ऊपर उठल हाथ† रूपी सैकड़ो डाढ़िसँ। व्रत-पालनक तपस्यासँ बकक आत्मतुष्टि उत्पन्न होइत अछि, अङ्ग समेटबाक तपस्यासँ काछुक विशिष्ट आत्मतुष्टि, निर्लिप्त भावसँ आँखि गड़ौने रहबाक तपस्यासँ बाटपर, बिलाइक भयावह आत्मतुष्टि। बक-दर्प मिथ्या धर्माचारक मुखिया अछि, काछु-दर्प राजा अछि, मुदा बिलाइ-दर्प सम्राट्क प्रभुता अपना लेने अछि। काटल नह, दाढ़ी आ केशबला पुरुष, शिखाधारी, जटाधारी, नमहर दाढ़ीबला पुरुष, बहुत माटि देहपर पोतबाक धुनिबला पुरुष, ओठ भींचने पुरुष, जूता पहिरने पुरुष; छल-कौशलक विलास : दम्भ एहन पुरुष जे हेमवल्ली अपन पैघ गाँठबला जनेऊक ऊपर बाँधने अछि, एहन पुरुष जे एना बुझाइत अछि मानू हाथमे पेटी लेने हो, कारण ओकर बाँहि स्थिर भऽ गेल अछि काँखमे खोंसल वस्त्रक किनारासँ; एहन पुरुष जे अनेक झगड़ासँ अपन पाण्डित्य देखबैत अछि, हिचकिचाहट आ हाथक इशारासँ नकार करैत, एहन पुरुष जकर ओठ बुदबुदायल मन्त्रसँ चलैत रहैत अछि भीड़क बीच, एहन पुरुष जे ध्यानमे डूबल रहैत अछि नगरक मुख्य बाटपर; एहन पुरुष जे तीर्थपर पूसक कठोर स्नानक कष्टक प्रदर्शन करैत अछि दाँत किटकिटा आ फुफकारि, अनन्त काल धरि डुबकी लगबैत, विधिपूर्वक मुँह धोइत अञ्जुरी सन मोड़ल हाथसँ नाटकीय भङ्गिमामे; एहन पुरुष जकर निरन्तर धूर-स्नान सम्पूर्ण देहक घिसल खुरदुरापनसँ प्रकट होइत अछि, एहन पुरुष जकर देव-पूजा पूर्ण कर्मकाण्डसहित माथपर पोतल विशाल तिलकसँ पहिचानल जा सकैत अछि; एहन पुरुष जे माथपर फूल पहिरैत अछि जे दाएँ-बाएँ डोलैत कौआक आँखि सन बुझाइत अछि, —एहि प्रकारक कोनो पुरुषकेँ पाखण्डी बुझबाक चाही। छल-कौशलक विलास : दम्भ पाखण्डी एहन दुष्ट अछि जे अयोग्यकेँ प्रणाम करैत, योग्यक सोझाँ घमण्ड करैत, अपन सम्बन्धीसँ वैर करैत, आ अपरिचितक संग दयालु सम्बन्धी सन व्यवहार करैत, ओ यशक भूखल मनुष्य अछि। जखन ओकरा कोनो काजमे सहायता चाही, निष्ठुर पाखण्डी माथ झुकबैत अछि आ सए प्रकारक चापलूसीसँ अपन बनबैत अछि। मुदा तुरन्त उद्देश्य पूरा भेलापर ओ भौं सिकोड़ि चुप भऽ जाइत अछि। बहुत पहिने दितिक पुत्र जम्भ नामक दानव छल, जे देवतासभक समृद्धि रोकि देने छल। आब पृथ्वीक सतहपर ओ प्राणीसभक हृदयमे दम्भ रूपेँ निवास करैत अछि। शुद्धताक दम्भ, मौन-वैराग्यक दम्भ, स्नातकक दम्भ, आ उच्च ध्यानक दम्भ: ई सभ विरक्तताक दम्भक सएम भागो बराबर नहि। छल-कौशलक विलास : दम्भ शुद्धताक दम्भसँ ग्रस्त मनुष्य शुद्ध-अशुद्धपर कुतर्क करैत अछि, शुद्धिकरणक माटि व्यर्थ गँबैत अछि, अपन सम्बन्धीकेँ नहि छुबैत अछि, सभक शत्रु बनि जाइत अछि, : ओ भेदपर विवाद करैत अछि शुद्ध आ अशुद्धक बीच, माटिक तपस्या-कुटी बनबैत अछि, अपनहि कुलक लोकसँ अलग भऽ जाइत अछि, आ एहि प्रकार साक्षात् विश्वामित्र बनि जाइत अछि। अहिंसाक दम्भ निरन्तर दहकैत, सभकेँ भस्म करएबला पाताल-अग्नि अछि, जे सभ प्रकारक प्राणी : धन-सम्पत्तिक नाश कऽ देने अछि, आ जमा धनरूपी जलक पियासल रहैत अछि। स्नातक टकला पुरुष भऽ सकैत अछि, मोट पुरुष, सुखायल देहबला पुरुष, अथवा ऋषि सन देखाएबला पुरुष, माथपर कपड़ा लपेटने पुरुष, अथवा पीड़ित पुरुष, कारण ओकर ऊँच शिखा श्मशानक टीला सन बाहर निकलल रहैत अछि। छल-कौशलक विलास : दम्भ उच्च ध्यानक दम्भ मुँह फाड़ने साँप अछि, जे सभ देशमे फैलैत अछि। ओ भोथर-नाक : मुँड़ायल साधु भऽ सकैत अछि, अपनहि चारूकात लपेटायल : जटाधारी साधु, चिह्नहीन : नाङट साधु, फनबला : छत्रधारी, कठोर : दण्डधारी, लाल पट्टीबला : लाल वस्त्रधारी, अथवा राख सन उज्जर देहबला : उज्जर भस्मसँ ढँकल। लोभ दम्भक प्राचीन पिता अछि, माया ओकर माय, मिथ्या ओकर सहोदर भाइ, विकृति ओकर पत्नी, आ ‘हुँ!’ करैत उपहास ओकर पुत्र। बहुत पहिने स्वयंभू ब्रह्मा लोकसभ आ जीव-जातिक सृष्टि केलनि। तकर बाद ओ सभ क्रियासँ विरत भऽ बहुत काल धरि ध्यानमे रहलाह। दिव्य दृष्टिसँ ओ देखलनि जे आत्मनिर्भर मनुष्यलोकक लोक धनादिक सुख अपना नहि सकल छल, कारण हुनकर विशेष लगाव स्पष्ट आ सोझ व्यवहारसँ छल। आँखि मूनि ओ तत्काल सृष्टि-मायाक शक्तिसँ युक्त गम्भीर ध्यानमे डूबि गेलाह। मनुष्यक समृद्धि सुनिश्चित करए लेल ओ दम्भकेँ प्रतिष्ठाक पात्र रूपेँ उत्पन्न केलनि। छल-कौशलक विलास : दम्भ शुद्ध करएबला कुशक गट्ठर लेने, शास्त्रक बोझ, खाली कमण्डल, अपन हृदय सन टेढ़ हरिणक सींग, करिया हरिणक छाल आ कुदाल; ओ पवित्र घासक मोट-मोट गट्ठर कानक पाछाँ खोंसने छल, हाथमे यजमानक अनुष्ठानिक अँगूठी पहिरने, आ पूर्णतः साफ मुँड़ायल माथपर शिखाक जड़ि उज्जर फूलसँ घेरल छल; ओकर गरदनि तख्ता सन कठोर छल, ओठ बुदबुदायल मन्त्रसँ चञ्चल, आँखि योग-समाधिसँ निस्तेज, हाथमे रुद्राक्षक माला लपेटल, आ शुद्धिकरणक माटिक पैघ पात्र लेने; मौन रहितहुँ, हृदयमे नुकायल सभ लालसा प्रकट करैत क्रोधपूर्ण तिरछी दृष्टिसँ, मुँह बिगाड़ि, घुरघुराइत आ भौं सिकोड़ि, आ सभ प्रकारक चिड़चिड़ाहटसँ; दोसरकेँ छुबासँ सावधान; शुद्धिकरणक आवश्यकता मानैत ब्रह्मलोकक स्वर्गोमे, दम्भ आसनक अपेक्षामे सृष्टिकर्ताक सोझाँ ठाढ़ छल। ओकरा देखि सृष्टिकर्ता, जे सहजहि समस्त सृष्टि-क्रम उत्पन्न कऽ देने छलाह, काँपि उठलाह, अत्यन्त अविश्वासक रोमाञ्चसँ। छल-कौशलक विलास : दम्भ सप्तऋषियो, दम्भक विशाल आडम्बरक प्रबल प्रभावमे, हाथ जोड़ि झुकल ठाढ़ रहलाह। जखन अगस्त्य दम्भक अत्यन्त कठोर त्याग देखि आश्चर्यसँ निगलल जकाँ बुझाइत छलाह, वसिष्ठ अपन अल्प तपस्या-भण्डारपर लजाइ पीठ झुका लेलनि; कौत्स सिकुड़ि गेलाह मानू दोष लगाओल गेल हो हुनक अत्यन्त सरल मौन-व्रतपर, नारदकेँ अपन प्रदर्शनहीन तपस्या तुच्छ बुझाए लगल; जमदग्नि अपन मुख नुकौलनि अपनहि ठेहुनक शिखरमे, विश्वामित्र भयमे काँपलाह, गालवक गरदनि डोलए लगल, आ भृगु दबि गेलाह; चारिमुँह सृष्टिकर्ता देव बुझलनि जे दम्भ एतेक कालसँ ठाढ़ छल, आ क्रोधसँ अपन दृष्टि गड़ा देने छल ब्रह्माक कमलासनपर। ओ शूलपर चढ़ाओल जकाँ निश्चल ठाढ़ छल, अत्यधिक घमण्डसँ अङ्गसभ जड़ पड़ल। छल-कौशलक विलास : दम्भ ओ बैसए चाहैत अछि—ई बुझि, ब्रह्मा मुस्कराइत ओकरासँ कहलनि, मानू अपन वाहन उज्जर वनहंसकेँ बना रहल होथि अपन दाँतक चमकसँ: “हे पुत्र, हमर गोदमे बैसू। अहाँ योग्य छी, कारण अहाँक अद्भुत आ दृढ़ आत्मसंयम अनेक गुणसँ जन्मल गम्भीरताक अनुरूप अछि।” सर्वसृष्टिकर्तासँ ई सुनि, दम्भ बिना हिचक, घृणाभावसँ, हुनक गोदपर एक अञ्जुरी पानि छिड़कलक आ असुविधाक प्रदर्शन करैत बैसि गेल। दम्भ कहलनि: “अहाँ एतेक जोर सँ नहि बाजू! जँ बाजए अनिवार्य हो, तँ अपन कमल-हाथसँ मुँह ढाँपि लिअ, जाहिसँ हमरा नहि छुए अहाँक मुँहसँ निकलैत साँसक कणसभ।” तखन ओकर अनुपम शुद्धता देखि, सृष्टिकर्ता प्रजापति, आनन्दमय मुस्कानक कान्तिसँ दमकैत, आँगुर चटकलनि आ कहलनि: “अहाँ निश्चय दम्भ : ढोंगी छी! छल-कौशलक विलास : दम्भ उठू आ पृथ्वीपर उतरू, जे समुद्ररूपी मणिमय करधनीसँ घेरल अछि, आ सुख भोगू, एहन रूपेँ जे बुद्धिमानो अहाँक असली स्वभाव नहि चिन्हथि।” विधिपूर्वक आ सम्मानसँ विदा पाबि, ओ पृथ्वीपर उतरल, समुद्रमे डूबए लेल अभिशप्त मनुष्यसभक गरदनिमे पाथर बाँधैत। मनुष्यलोकमे पहुँचि, दम्भ वन आ नगरसभमे घूमए लगल। ओ बङ्गालमे अपन विजय-पताका गाड़लक आ सभ दिशामे बढ़ि चलल। दम्भ बल्खक लोकक वाणीमे रहैत अछि, आग्नेय प्रदेशक लोकक तपस्या-व्रत पालनमे, कश्मीरक अधिकारीसभमे, आ सम्पूर्ण बङ्गालमे। जे सभ कोनो स्रोतसँ भेटल भस्मसँ अपन माथपर तिलक बनबैत अछि, दानयुक्त श्राद्ध-कर्ममे जादुई चूर्ण जकाँ, ओ सभ दम्भक सहायक अछि। दम्भ शीघ्रहि अलग-अलग वर्गमे बाँटलक : उजाड़लक पृथ्वीक सतहपर रहनिहार प्राणीसभकेँ हजारो प्रकारक श्रेणीमे : हजार कर लगा कऽ, आ स्वयं देह धारण केलक अधिकारीसभक मुखमे। छल-कौशलक विलास : दम्भ सभसँ पहिने स्वयं दम्भ प्रवेश केलक धर्मगुरुसभक हृदयमे, तकर बाद प्रान्तीय शासकसभक टेढ़ हृदयमे, तपस्वीसभक हृदयमे, आयुक्तसभक हृदयमे, आ दीक्षितसभक हृदयमे। तकर बाद ओ ज्योतिषीसभक हृदयमे गेल, वैद्य, सेवक, व्यापारी, सोनार, अभिनेता, भाड़ाक सैनिक, गायक, कथावाचक आ बाजीगरसभक हृदयमे। अनेक रूप धारण कऽ अपनाकेँ बाँटैत, दम्भ सभ चलनिहार जीवक हृदयमे प्रवेश केलक, फेर ओ पक्षी आ गाछोमे घुसि गेल। बक-साधु तीर्थसभमे अकड़ि कऽ चलैत अछि, माछक भूखल, एक पएरपर निश्चल ठाढ़; ओकर माध्यमसँ दम्भ पक्षीसभ धरि पहुँचल। गाछसभक अनेक जटिल जड़ि हो, ओ सभ छाल पहिरने रहए, फल धारण करबाक आशामे सदैव शीत, ताप आ वर्षासँ पीटल जाए— ई सेहो दम्भक प्रभाव अछि। तेँ सदैव दम्भसँ सावधान रहबाक चाही, जे सभमे पैसल अछि आ सभक नाश करैत अछि। जखन ओकर विविध रूप चिन्हल जाइत अछि, तखन जादूगरक मन्त्र टूटि जाइत अछि। छल-कौशलक विलास : दम्भ दम्भक ई विविधता ठकक संसारक सोझाँ एकटा कल्पवृक्ष अछि। बहुत पहिने हरि तीनू लोककेँ जीतने छलाह वामन-अवतारक दम्भसँ। प्रथम सर्ग, ‘दम्भक वर्णन’ नामक, “छल-कौशलक विलास”मे, जकर रचना केलनि महाकवि क्षेमेन्द्र। छल-कौशलक विलास २. लोभ लोभसँ सावधान रहू— लोभीक भय सर्वत्र स्पष्ट अछि। लोभमे अन्हर मनुष्य उचित-अनुचितक चिन्ता नहि करैत अछि। लोभ, सञ्चयक दुष्ट उन्माद : किलाबन्द कोषमे नुकायल दानव, सभ किछु करए मे सक्षम अछि, आ मूल कारण अछि ठगी आ छलक : छद्म कोषागारक, सभ प्रकारक टालमटोल : अवरोधक, मिलावट : अन्हर मोड़क, आ झूठ सम्झौता : जादुई सीमाक। शास्त्रज्ञानी, पुरुषार्थी, सद्गुणी, शान्त आ तपस्वी लोकसँ पराजित भऽ, लोभ अपन बिलमे घुसि गेल: व्यापारीसभक टेढ़ हृदयमे। व्यापारी वस्तुतः दिनदहाड़ि लुटनिहार अछि, ओ लोककेँ लूटबामे आनन्द पबैत अछि जमा धन रोकि राखब, कम वजनक बाट प्रयोग करब, आ किनबेचमे हाथक सफाइ जकाँ चालिसँ। दिन भरि व्यापारी सभ प्रकारक ठगी आ युक्तिसँ ग्राहकक धन हलुक करैत अछि। मुदा अपन घर चलाबए लेल तीन कौड़ी देबामे ओ व्याकुल होइत अछि। छल-कौशलक विलास २ : लोभ कथाक प्रेमी, ओ सदैव दौड़ि कऽ पहुँचैत अछि सुनए धार्मिक ग्रन्थक पाठ। मुदा दान देबाक कर्तव्यसँ एना भागैत अछि, मानू करिया नाग काटि लेने हो। द्वादशी तिथिमे, पितृक पवित्र दिनमे, सूर्यक सङ्क्रमणकालमे, सूर्य वा चन्द्र ग्रहणमे, ओ दीर्घ स्नान करैत अछि, मुदा एक कौड़ियो दान नहि करैत। ठीक चोर जकाँ ओ दिशासभ ताकैत अछि : पहरा दैत, भिखारीसँ घबड़ाइत : प्रश्न करनिहारसँ चौंकैत, परदाक पाछाँ नुकाइत : भेष बदलैत, घुमावदार बाट लैत : सन्देहास्पद व्यवहार करैत, आ चौड़ा सड़कपर दौड़ैत : गुप्त बाटसँ भागैत अछि। कृपण व्यापारी चुप रहैत अछि, उत्तर नहि दैत बेचबाक समय मोलभाव करनिहारकेँ। केवल जखन ओ देखैत अछि हाथमे जमा करबाक धन लेने कोनो मनुष्यकेँ, तखन बातचीत आरम्भ करैत अछि। जमा धन हाथमे लेने कोनो सम्मानित व्यक्ति देखि तुरन्त उठि प्रणाम करैत, कुशलक्षेम पूछैत, आसन दैत आ धार्मिक कथा सुनाबए लगैत अछि। कोनो व्यक्ति ओकर लग आबि कहैत अछि: “हे भाइ! हम विदेश जएब अहाँ लग अपन धन जमा कऽ। मुदा आइ भोर ज्योतिषानुसार अशुभ विष्टि-करण अछि। की आइए ई काज करी?” छल-कौशलक विलास २ : लोभ ई सुनि ओ आँखि पसारि चिन्तित होएबाक अभिनय करैत अछि। ओकर दृष्टि कारोबारदिस भागैत, बेर-बेर तिरछी नजरि दैत, आ कहैत अछि: “हे सज्जन, ई प्रतिष्ठान अहाँक सेवामे अछि, मुदा अहाँक जमा धन बहुत काल धरि राखब झंझट होएत; समय आ स्थान प्रतिकूल अछि। हाय! हम तँ अहाँक सेवक छी। भद्राक ई आधा दिन अशुभ नहि; कहल गेल अछि जे ई जमा धनक सुरक्षा सुनिश्चित करैत अछि। मुदा अहाँ जनैत छी, एहि बातक व्यवसाय-ज्ञानीसभ सैकड़ो बेर पुष्टि केने छथि। किछु काल पहिने हमर एक मित्र विष्टिक दिन धन जमा केने छल। ओ शीघ्र घुरि क्रमशः सुरक्षित रूपेँ सभटा निकालि लेलक।” एहि प्रकार भोला मनुष्यसँ गोपनीय स्वरमे निरर्थक बात कऽ, ओ ओकर सभ इच्छाक साधन सोनाक भण्डार लऽ नाचए लगैत अछि। ओहि घिसल सोनाक किनबेचसँ अगणित लाभ आ अदला-बदलीक वस्तुक ढेर पाबि, ओ धनदेव कुबेरपर उपहाससँ हँसैत अछि। कृपण व्यापारीक धन-घैलसभ, जमा सम्पत्तिसँ भरल, व्यर्थ नष्ट होइत : धँसैत जाइत अछि, कोनो उत्तम काजमे उपयोग बिना, दुःख उत्पन्न करैत, ठीक ओहि तरह जेना युवा विधवाक स्तन। छल-कौशलक विलास २ : लोभ व्यापारी घृणित मोट मुसरीसभ अछि, जे संसाररूपी जीर्ण महलमे उपद्रव मचौने अछि। सदैव अवसर ताकैत, ओ सभ सोनाकेँ नुका राखैत अछि भोग आ दान—दुनूक पहुँचसँ बाहर। ‘नगरक स्वामी’ उपाधि धारण कएनिहार, निधिक रक्षा करएबला साँप जकाँ, ओ झुकल देहसँ चलैत : टेढ़-मेढ़ रेंगैत, चोगामे लपेटल : शल्कमय चमड़ासँ ढँकल, स्पष्ट देखाइत फनसँ फूलल, जे चटकीला कपड़ा ऊँच शिखा जकाँ लपेटि बनल अछि। भाग्यसँ अभिशप्त ओ मनुष्य, जे धन जमा केने छल, पृथ्वीक छोर धरि भटकि गेल। धन आ अपन लोक गँवा कऽ बहुत नमहर अनुपस्थितिक बाद अपन देश घुरि सकल। आशङ्कासँ भरल ओ ककरोसँ पूछलक: “ओ बुद्धिमान व्यापारी कतए गेल?” केओ ओकर लग आबि कहलक: “मित्र, आइकाल्हि ओकर दशा एकदम बदलि गेल अछि! हाथमे खड़िया लेने ओ निरन्तर नव-नव कपड़ा, कस्तूरी-सुगन्ध, चन्दन, कपूर, मरिच आ सुपारीक व्यापारसँ प्रति घण्टा करोड़क हिसाब करैत अछि। ओ नगरमे ठाटसँ रहैत अछि, ओहि अद्भुत महलमे, जे मेरु पर्वत सन ऊँच अछि आ जकर उज्जर देवाल भित्तिचित्रसँ सजल अछि। नगरक शासको ओकर सम्मान करैत अछि।” ई सुनि ओ व्यापारीक घर गेल, पूर्ण आश्चर्यसँ माथ घूमैत। स्तब्ध, ओ बहुत काल धरि द्वारपर की करी से नहि बुझि, पहिरने फाटल-पुरान चिथड़ा, ठाढ़ रहल। छल-कौशलक विलास २ : लोभ व्यापारी अपन ऊँच महलक शिखरक जालीदार खिड़कीसँ ओकरा चिन्हि लेलक; ओकर मन सुन्न भऽ गेल, साँस रुकि गेल, मानू माथपर वज्र पड़ि गेल हो। भीड़हीन अवसर भेटलापर ओ मनुष्य संकोचसँ ओकर लग पहुँचल। स्मृति ताजा करौलक आ अपन धन माँगलक। व्यापारी आँखि फेरलक, भौं सिकोड़लक, आँगुर हिलौलक आ ओकरासँ कहलक: “जीविकाहीन ई दुष्ट अभागल कतयसँ झूठ बाजैत आबि गेल? अहाँ के छी? केकर पुत्र? हमरा अहाँकेँ कखनहुँ देखनेक स्मरण नहि: हम अहाँसँ बात कोना कऽ सकैत छलहुँ? हुँ? कहिया? कतए? कोना? खुलि कऽ बाजू! के केकरा की देलक? हाय! देखू, एहि शापित कलियुगमे की दशा आबि गेल। ई पागल धन माँगैत अछि, नहि तँ लोक सभ सुनत ई बात। हमर हरगुप्त कुलमे जमा धन स्वीकारबो अश्रुत अछि; कलङ्कसँ उत्पन्न विश्वासघाती, प्राणदण्ड-योग्य आरोपक सङ्केतक बात तँ छोड़िए। मुदा दोसर दिस, महान लोक एहन आरोपसँ अपमान करनिहार मनुष्यकेँ सहजहि कोना उपेक्षित करथि? कहू, कोन दिन छल! ओहि दिनक सभ किछु लिखल अछि। स्वयं देखू! हम बूढ़ भऽ गेल छी। प्रबन्धक भार पुत्रकेँ सौँपि देने छी। हम जे लिखने छी, ओ निश्चय जनैत अछि।” एतेक कहि छल-कौशलक विलास २ : लोभ व्यापारी ओकरा बाहरक बाट देखा देलक। दृढ़ता डगमगाइत, ओ पुत्रक लग गेल। “पिता जनैत छथि!” “हम जे लिखने छी, हमर पुत्र सभ जनैत अछि!” एहि प्रकार ओ अनन्त काल धरि गेंद सन एतय-ओतय दौड़ैत रहल। जखन ओ राजदरबारक द्वारपर पहुँचि गम्भीर आमरण अनशन आरम्भ केलक, व्यापारी राजाक क्रोध सहलक, तैयो धनक एक अंशो नहि देलक। राजा ओकरा सभ प्रकारक यातना-यन्त्रसँ पीड़ा देलनि, तैयो ओ एतबे कहैत रहल: “हमरा किछु सौँपल नहि गेल छल!” अत्यन्त लोभी लोक धनरूपी नोनगर जलक पियासल पाताल-अग्नि सन होइत अछि। ओ अपन देहकेँ पुआलक टुकड़ा जकाँ छोड़ि देत, मुदा कनेको धन नहि। बहुत पहिने, धनक आवश्यकता पड़लापर शुक्राचार्य अपन बाल्यकालक मित्र धनदेव वैश्रवणक लग पहुँचलाह, जे कोषक समस्त समृद्धिक स्वामी छथि, आ कहलनि: “मित्र! देवता आ दानवक महिमाकेँ पार करैत अहाँक विपुल यश अहाँक मित्रसभकेँ पूर्ण आनन्द आ शत्रुसभकेँ दुःख दैत अछि। छल-कौशलक विलास २ : लोभ मित्र, अहाँ धनक देवता छी, मुदा हम निर्धन, विशाल परिवारक भारसँ दबायल छी। सुख-दुःख दुनूमे स्थिर आ आर्थिक रूपेँ स्वतन्त्र भऽ गेल मित्र प्रशंसित होइत अछि। अपन यशक प्रति सजग महान लोकक धनक उपयोग मित्रसभ करथि—ई पूर्णतः उचित अछि, जकर उदारतापर जरूरतमन्द निर्भर रहैत, जे जन्मल प्रतिष्ठित कुलमे होथि। प्रचुर निधि आ सच्चा मित्र—दुनू भेटैत अछि असाधारण पुण्यक भण्डार जुटौलासँ। समृद्धिमे ओकरा सावधानीसँ सुरक्षित राखल जाइत अछि, आ विपत्तिमे ओ रक्षा करैत अछि।” एहि प्रकार दैत्यगुरु पूर्ण निष्कपटतासँ एकान्तमे अपन बात कहलनि। धनदेव स्नेह आ लोभक बीच फँसि बहुत काल विचार कएलनि, आ अन्ततः कहलनि: “हम अहाँकेँ अपन बाल्यकालक मित्र रूपेँ असीम स्नेहसँ स्मरण करैत छी। मुदा जीवनक सार धनक अत्यल्प राशियो छोड़बाक सामर्थ्य हमरा नहि। सम्बन्धी ओ अछि जे स्नेह माँगैत अछि, सभ प्रकारक उपकारसँ मित्र बनाओल जा सकैत अछि, पत्नी आ पुत्र सहजहि भेटि जाइत अछि— केवल धन अछि जे एहि संसारमे कठिनाइ सँ भेटैत अछि। धन दऽ देब अत्यन्त उतावलीक काज अछि, जे कठिनाइसभसँ घेरल अछि, आ अत्यन्त चकित करएबला साहस। जे अपन देह छोड़ए लेल तैयार हो ओहो कनेक धन नहि छोड़ि सकैत।” छल-कौशलक विलास २ : लोभ धनदेवसँ अस्वीकृत भऽ शुक्र क्षीण मुखसँ चलि गेलाह, आशा टूटल। हुनक मन घूमि रहल छल आ लज्जासँ देह झुकल छल। घर घुरि ओ मन्त्रीसभक संग बहुत काल धरि योजना बनबैत रहल। तकर बाद महान योगी जादूसँ धनदेवक हृदयमे प्रवेश केलनि तकर बाद महान योगी जादूसँ धनदेवक हृदयमे प्रवेश केलनि जाहिसँ ओकर समस्त धन छीनि सकथि। शुक्रसँ आविष्ट देहबला वैश्रवण अद्भुत रूपेँ उदार भऽ गेल आ अपन समस्त धन शुक्रक संग मिलल ब्राह्मणसभकेँ दऽ देलक। कुबेरकेँ समस्त धनसँ खाली कएलाक बाद, दैत्यगुरु बाहर निकलि गेलाह। तखन धनदेव षड्यन्त्र बुझलनि आ बहुत काल धरि शोक केलनि। माथ हाथमे धऽ ओ शङ्ख, मुकुन्द, कुन्द, पद्म आदिक संग शुक्रक जादूपर विचार कएलनि। गरम निःश्वास छोड़ैत विलाप केलनि: “मित्रक भेष धारण कएल एक अत्यन्त लोभी जादूगर हमरा ठकि लेलक। दुष्ट शुक्र हमर कमजोरी जनैत अछि, आ ओकर कमजोरी जनैत अछि; दैत्यसभक समर्थनक कारण ओ अजेय अछि। आब धनहीन भऽ हम अचानक पुआलक टुकड़ा सन तुच्छ भऽ गेलहुँ। अपन दुःख ककरा कही? की करी? कतए जाउ? छल-कौशलक विलास २ : लोभ धनसँ विहीन मनुष्यकेँ सेवकसभ छोड़ि दैत अछि। सेवकहीन मनुष्य अपमानित होइत अछि। अपमानित मनुष्यक देह भारी बोझ बनि जाइत अछि, हानिकारक अभिशाप। हाय! जखन धन अथवा जीवन, जे देहधारीसभक प्रिय अछि, धर्मरूपी लतिक सिंचाइ-कुण्ड अछि, नष्ट होइत अछि, तखन सभ किछु नष्ट भऽ जाइत अछि। धनवान मनुष्य सभ किछु बनि जाइत अछि: बुद्धिमान, सुन्दर, सम्मानित, प्रसिद्ध, कुलीन, वीर; मुदा धन बिना, सद्गुणी मनुष्यो बदनाम भऽ जाइत अछि।” धनदेवक आशा सुखा देने छल ओहि अग्निसँ जे धन-हानिक असह्य दुःख छल; ओ मन्त्रीसभक संग बहुत काल विचार कएलनि, तकर बाद शरण लेलनि भगवान शिवक। बहुत पहिने शिव हुनक मित्र बनल छलाह, जे सभक लेल सुलभ शरण छथि। घटना जानि शिव शुक्रक लग अपन दूत पठौलनि। दूतसँ बजाओल शुक्र तुरन्त उपस्थित भेलाह, धनक शोभासँ चमकैत, श्रद्धासँ जोड़ल हाथक मुकुट धारण कएने। पुर-विनाशक शिव सोझाँ ठाढ़ हुनकासँ कहलनि: “अहो! अपन कर्तव्य पूर्णतः जनितहुँ, अहाँ अपन एहि मित्र धनदेवकेँ ठकि लेलहुँ। स्वार्थी कृतघ्नो मित्रकेँ हानि पहुँचाबए धरि नहि जाइत। हे सज्जन! स्नेही, निर्दोष, विश्वासी मित्रकेँ अहाँ सन के कखनहुँ धोखा देने अछि—अपन यशक चिन्ता बिना, अपन पदसँ भटकि? छल-कौशलक विलास २ : लोभ की ई अहाँक विद्वत्ताक अनुकूल अछि? अहाँक व्रतक संग मेल खाइत अछि? अहाँक कुलक अनुरूप अछि, हे बुद्धिमान, जे अहाँ सद्गुणक उपेक्षासँ जन्मल काज कएलहुँ? की विवेकपूर्ण आचरणक पालन, शान्तिक अभ्यास, गुरुक शिक्षा, अथवा जन्मजात उदारता अहाँकेँ ठग बनौलक? धन केकर प्रिय नहि? धनसँ के मोहित नहि? मुदा उत्तम यशरूपी धनक लालसा करनिहार अनुचित उपायसँ सम्पत्ति पाबए नहि चाहैत। नहि! नहि! भृगुक सम्पूर्ण निष्कलङ्क वंशकेँ लोभक दागसँ मलिन नहि करू! लोभरूपी मेघ निर्मल कीर्तिरूपी हंसक शत्रु अछि। दुष्टसभमे ओ कतेक दुष्ट अछि जे अमर यश फेकि धनकेँ चुनैत अछि, जे पवनसँ उड़ैत पानिक बूँद सन अछि? जे सदाचारसँ भटकि जाइत अछि आ धूर्त चातुरीसँ दोसराकेँ ठकैत अछि, ओ मूर्ख केवल अपनाकेँ ठकैत अछि, पूर्वमे कएल पुण्यकेँ मेटबैत। छल-कौशलक विलास २ : लोभ जे पतित भऽ गेल छथि आ जकर यश मलिन भऽ गेल, सौभाग्य, जे स्वभावतः कोमल अछि नव अँकुरायल लतिक जकाँ, ओ कुम्हिला जाइत अछि धुँआसँ जे बदनामीक विषवृक्षसँ निकलैत अछि। वास्तवमे सज्जनक निर्मल यश साक्षात् निष्कलङ्क स्फटिक-दर्पण अछि, जे मलिन नहि होइत अपमानसँ व्यथित लोकक निःश्वाससँ। मूर्खतासँ कएल एहि अनुचित, घृणित काजक प्रायश्चित्त करू, केवल घुरा कऽ ओ धन, जे दोसराक अछि। निन्दाक धूरसँ मैल अपन निर्मल यशकेँ अपनहि हाथसँ पोछि साफ करू! हमर बात मानू! छोड़ू दोसराक धन!” तीनू लोकक गुरु देवाधिदेव शिव एहि प्रकार शान्त स्वरमे बुझबितो, दोसराक धनक लालसामे अटल शुक्र हाथ जोड़ि कहलनि: “हे भगवन्! श्रेष्ठ देवतासभक असङ्ख्य मुकुटपर प्रतिष्ठित अहाँक आज्ञाक उल्लङ्घन करबाक मूर्ख साहस के करित, जँ निर्धनता ओकर सद्बुद्धि नहि छीनि लेने रहित? जकर घरमे सेवक, पत्नी आ पुत्र निराशामे तड़पैत अछि, ओ अभागल धन जुटाबए मे उचित-अनुचितक कोन विचार करत? छल-कौशलक विलास २ : लोभ हम सदिखन धनदेवकेँ अपन मित्र मानने छलहुँ, आ विपत्तिमे शरण। हमर हृदयमे पैघ आशा दृढ़ भऽ गेल छल। अभिमान निगलि हम हुनक लग गेलहुँ आ माँगलहुँ, तैयो ओ निर्लज्जतासँ अस्वीकृतिक धारसँ हमर आशा काटि देलक। ओ दुष्ट अज्ञानतासँ हमर आशा चकनाचूर केलक, बिना अस्त्र घायल केलक, बिना आगि जरौलक, बिना विष मृत्यु देलक। तेँ ओ हमर शत्रु अछि। शत्रुकेँ ठकब पुण्यक समान अछि, पाप नहि। निर्धन मनुष्यक धन, भलेँ छलसँ पाओल हो, निन्दासँ परे अछि। हमरा धनक एक कणो छोड़बाक आवश्यकता नहि, कारण अहाँ स्वयं उचित कहलहुँ जे यश : धन जीवनक चिनगारी अछि। धन छोड़ब प्राण छोड़ब अछि।” बहुत बेर विनती कएलाक बादो दैत्यगुरु एहि प्रकार टालमटोल करैत रहलाह। हुनक हठपर क्रोधित भऽ त्रिनेत्र शिव अचानक हुनका निगलि लेलनि। शिवक पेटक भीतर प्रलय-अग्निसँ भरल भयावह गुफामे देह पाकैत शुक्र चीखलाह आ शाप देलनि। छल-कौशलक विलास २ : लोभ “धन छोड़ू!” शिव बेर-बेर कहलनि। शुक्र कहलनि: “हे भगवन्, हमरा मरए दी! हम धनदेवक धन नहि घुराएब।” तखन शुक्र शिवक आँतक भयावह गहिराइमे नीचाँ खसैत गेलाह, जतए योग-समाधिसँ तीव्र भेल हजारो उफनैत ज्बला भयङ्कर छल, आ ओ जोर-जोरसँ विलाप कएलनि। देवाधिदेव हुनकासँ कहलनि: “हे हठी अभागल! छोड़ू दोसराक धन! हमर पेटरूपी समुद्रक पाताल-अग्निमे नष्ट नहि होउ!” शुक्र उत्तर देलनि: “एहि दावानलमे मृत्यु हमरा प्रिय अछि, जे अत्यधिक तापसँ फटैत हमर हड्डीक मज्जा-चरबीसँ भड़कैत अछि। साँस रहबा धरि हम एक कौड़ियो नहि छोड़ब।” शिवक योगाग्नि आ उग्र प्रलय-अग्नि आरो भड़कल, तखन जीवनक अन्तिम क्षणमे शुक्र देवीक स्तुति रचलनि। हुनक स्तुति-वचनसँ प्रसन्न गौरी स्नेहपूर्वक शिवकेँ शान्त केलनि; शिवक आज्ञासँ शुक्र स्थिरता पुनः पाओलनि आ शिवक वीर्य रूपेँ बाहर निकललाह। एहि प्रकार स्वभावसँ लोभी लोक धन नहि छोड़ैत भलेँ भीषण यातना सहए; जेना नीच अभागल जन्मजात बेईमानी नहि छोड़ि सकैत। छल-कौशलक विलास २ : लोभ तेँ लोभसँ जन्मल ठगीक कला, एकटा भ्रम जे टेढ़ चाल चलैत अछि, लोभीक हृदयमे निवास करैत अछि। जे लोभी नहि, ओ ठगी नहि करैत। दोसरा सर्ग, ‘लोभक वर्णन’ नामक, “छल-कौशलक विलास”मे, जकर रचना महाकवि क्षेमेन्द्र केलनि। छल-कौशलक विलास ३. काम इन्द्रिय-सुख अपन आकर्षणसँ कोनो ने कोनो तरह आसक्तिकेँ मनभावन बना दैत अछि। ओ मिठाससँ जीवन नष्ट करैत अछि, मधुसँ खायल विष जकाँ। हाथी : पुरुष, मदसँ उन्मत्त : कामसँ उद्दीप्त, जकर मदजल प्रकट होइत अछि चारूकात गुँजार करैत सुगन्धसँ आकर्षित भँवराक झुण्डसँ, : सुगन्धित चूड़ीक पाँतिक झनकारसँ, आ जे उपयुक्त, विपुल उपहार अनैत अछि, शीघ्र पाछूक पएरमे बाँधल जाइत : आलिङ्गित होइत स्त्रीसभसँ। की बलवान हाथी : प्रेमी, खुला विचरणसँ वञ्चित : इन्द्रिय-सुखसँ अन्हर, स्नेहसँ ठकल : कामदेवसँ छकल, लात सहैत नहि अछि? अपन दाँत कटबाबैत : दाँतक काट सहैत, अंकुशसँ हाँकल जाइत : नहक खरोंच सहैत, आ लोहाक जंजीरसँ बाँधल : कामक्रीड़ाक पेचमे लपेटायल? स्त्रीसभ पुरुषकेँ, घोर दुर्गुणसँ नपुंसक बनल, भौं उठा देल आदेश मानए लेल पालतू बनल, इन्द्रिय-सुखसँ पराजित, पालतू मोर सन नचबैत अछि। छल-कौशलक विलास ३ : काम मोहक अन्हार रातिमे कामातुर पुरुषकेँ आकर्षित करबाक धुनिमे स्त्रीसभ चातुरीसँ भोला लोकक हृदय चोरा लैत अछि, ठीक राक्षसीसभ जकाँ, : रक्त पीबाक धुनिमे, जादू-टोना सँ घोर रातिमे अपन निर्दोष शिकारक हृदय अपना लैत अछि। स्त्रीक वशमे पड़ल लोकक कोनो छुटकारा नहि, कारण ओ सभ फन्दा अछि कामातुर पुरुषरूपी हरिणक लेल, हृदयरूपी हाथीक लेल जंजीर-बेड़ीक समूह, आ आसक्तिरूपी फलैत-फूलैत उलझन-घास। आत्मतत्त्व जानि लेने मनुष्यो, जे जन्म-मरणक विचित्र मोह, शम्बरक मायाजाल, आ विष्णुक माया बुझैत अछि, स्त्रीक छल बुझि नहि सकैत। देह फूल सन कोमल, हृदय हीरक-पट्ट सन कठोर, विचित्र आचरणबाली स्त्रीसभ केकर अन्तःकरणकेँ पीड़ा नहि दैत अछि? छल-कौशलक विलास ३ : काम स्त्री स्नेह देखौनिहारक शत्रु होइत अछि, आज्ञाकारीक तिरस्कार करैत, उदासीनपर मोहित होइत, ठकक वचनक आदर करैत, आ झूठ बाजए मे प्रवृत्त रहैत अछि। केवल ओहि पुरुषक घरपर अधिकार रहैत अछि, जकर पत्नी अनेक लोकक आवागमनक स्थान नहि, जकर अङ्ग चितवन-भङ्गिमामे कुशल नहि, आ जे धैर्यक विनाशक पताका नहि। स्त्री घरक कूड़ा-कर्कटक पूरा टोकरी ओहि पतिक मुँहपर उलटि दैत अछि, जे मोहसँ मूर्छित, गुमसुम आ बुद्धिहीन रहैत अछि। कृत्रिम रूपेँ अस्पष्ट अक्षरबला स्नेहमय मधुर स्वरमे, घरक हुकुम चलौनिहार स्त्री, मानू स्वभावतः भोली कन्या हो, अपन मन्दबुद्धि पतिसँ ललाट-आभूषण लेल चन्द्रमण्डल माँगैत अछि। चञ्चल स्त्री स्वयंकेँ थका दैत अछि आबि-जाइत, अपन इच्छानुसार मनोरञ्जन करए प्रेमीसभक संग, तीर्थ-दर्शनक बहाना बना कऽ। ओकर बनावटी लाजसँ ठकल पति फेर ओकर पएर मलैत अछि। छल-कौशलक विलास ३ : काम ओ एक पुरुषकेँ आँखिक चितवनसँ प्रेम करैत, दोसराकेँ वचनसँ, तेसराकेँ भङ्गिमासँ, आ आनकेँ देहसँ—स्त्री स्वभावतः अनेक रूपबाली अछि। अपन नरसँ चञ्चल हरिणी, दोसराक गाछपर बैसल मादा भँवरा, स्वभावसँ अन्त्यजा, झूठ नखराक लहरि, टेढ़ साँप— ओ आखिर केकर अछि? एकान्तमे स्त्री सदैव निःश्वास छोड़ि कहैत अछि: “धन्य अछि गणिका, जे अनेक युवकसँ स्वतन्त्र मिलनक सुख भोगैत अछि!” ओकर चाल अनुमानसँ बाहर अछि: कखनो महलमे रहैत, गीत गबैत आ इच्छानुसार नीचाँ सड़क दिस ताकैत, अथवा बिना कारण दौड़ैत वा हँसैत, मानू स्फटिक-मणिक माला पहिरने हो। “पशु सन, ई हमर पति नहि जनैत अछि की कहए वा की करए किछुओ,” घरक सेविकासभसँ ई कहि, स्त्री पुरुषक कारोबार अपना हाथमे लऽ लैत अछि। ओ पत्नी, जकर पति जीबिते मृतक समान अछि, आगन्तुकक स्वागत करैत, सामान्य काज लेल स्वयं बाहर जाइत, आ घरमे ऊँच स्वरमे हुकुम चलबैत अछि। छल-कौशलक विलास ३ : काम ईर्ष्यालु बूढ़क पत्नी, सेवकक पत्नी, अथवा आयुक्तक पत्नी, कारीगर वा कलाकारक स्त्री, लम्पटक पत्नी, सार्थवाहक पत्नी; सभा-समागममे बराबर जाएबाली स्त्री, स्वभावसँ युवकक प्रेमी स्त्री, आन पुरुषक गुण बेर-बेर गनएबाली स्त्री, अपन पतिक दोष निरन्तर गिनबएबाली स्त्री; निर्धन होइतहुँ बहुत खर्च करएबाली स्त्री, सुन्दरी अथवा कुरूप पुरुषक पत्नी, भोला पुरुषक पत्नी, सभ कलामे अपन निपुणतापर अभिमान करएबाली, नीच लोकक संगतिसँ उत्तेजित होएबाली स्त्री; सदैव जुआ आ मदिरामे लीन स्त्री, राग-रागिनी गाबए मे निपुण स्त्री, गीत आ नमहर कथा कहए मे कुशल, जकर सखीसभक अनेक प्रेम-सम्बन्ध अछि, जे स्वभावतः साहसी पुरुषक पक्ष लैत अछि; घरक कर्तव्य उपेक्षित करएबाली, बहुत वस्त्रक भण्डारबाली, घर छोड़ि बाहर जाएबाक स्वतन्त्रता पाओल, निर्लज्ज उत्तर देनिहार, सत्यनिष्ठाहीन, स्वभावसँ निर्लज्ज स्त्री; कुशलक्षेमक प्रश्न, स्वास्थ्य आ गप्प-सरक्कामे रुचि रखएबाली, जकर वाणी स्नेहसँ कोमल, जे सार्वजनिक रूपेँ पतिव्रता सावित्री मुदा गुप्त रूपेँ छल-कौशलक विलास ३ : काम सभ प्रकारक प्रेम-क्रीड़ाक जालमे लीन रहैत; यज्ञसभमे जाए लेल उत्सुक स्त्री, तीर्थ, मन्दिर, ज्योतिषी, वैद्य आ सम्बन्धीक लग जाएबाली, जे मानू स्वतन्त्र हो, बहुत खर्चसँ पेय आ भोजनक पूजा-उत्सव आयोजित करैत; भिक्षु आ तपस्वीमे भक्त स्त्री, सम्बन्धीसँ छोड़ल गेल स्त्री, सुखद वस्तुमे आसक्त स्त्री, मूर्ति-दर्शन आ दीक्षा पाबए चाहएबाली, प्रेमीसँ दूर रहितहुँ ध्यानमे ओकर संग रहएबाली; एहन स्त्री जकर सखीसभ मनोरञ्जन करैत अछि सामाजिक समारोहमे, अपन वचनसँ मनोरञ्जन करएबाली, खड़खड़ाइत जूताबाली, अथवा गरदनिमे यज्ञक घास पहिरने स्त्री— एहन स्त्रीकेँ उच्छृङ्खल आचरणबाली बुझबाक चाही। स्त्रीसभ सन्ध्याक आकाश अछि, सदैव दुर्गुणप्रिय : रातिकेँ निरन्तर लाल करएबाली, लोककेँ भ्रमित : प्रसन्न करएबाली, अनेक पुरुष लेने : अनेक ग्रहसँ भरल, अस्थिर : कनेक काल मात्र टिकएबाली; ओ सभ निष्ठुर राक्षसी अछि, लाल गालसँ सुन्दर : रक्तक प्राण-ज्योतिसँ चित्रित। छल-कौशलक विलास ३ : काम ओ भोला पुरुष ककर लेल, जे स्त्रीक कनेको इच्छाक आज्ञाकारी, अपन गरिमा गँवा देने अछि पुरुषत्वहीन भऽ गेलाक कारण, आ स्त्रीक बीच दबायल रहैत— भार ढोएनिहार पशु नहि बनत? प्रेममे साहसक डींग, आ अयोग्य लोककेँ देल उपहारक अनेक बड़बोली, स्त्रीकेँ मोहित करबाक लेल पर्याप्त अछि मन्त्र वा यन्त्र बिना। स्त्रीक निर्दय कृत्यसँ के नहि काँपैत, जे रातिमे घूमएबाली अछि कलह-युग सन करिया रातिमे, आ हजारो जादू जनैत अछि? एक बेर धनदत्त नामक विश्वप्रसिद्ध श्रेष्ठी छल, जे अपन वैभवसँ धनदेवकेँ मात दैत छल। समुद्र जकाँ ओ रत्नक भण्डार छल। ओकर वसुमती नामक रूपवती पुत्री छल, मानू कामदेवक महिमा साकार भऽ गेल हो। अपन आँखिक चञ्चल गतिसँ ओ दिशासभकेँ जीत लेने छल। पुत्रहीन होएबाक कारण ओ अपन प्रिय पुत्रीकेँ पुत्रक स्थानपर उत्तराधिकारी बनौलक, आ ओकर विवाह व्यापारी समुद्रदत्तसँ केलक, जे धन आ कुलीनतामे ओकर समान छल। समुद्रदत्त बहुत काल धरि ससुरक महलमे रहल, हरिणी-नयन कन्याक संग प्रेम-सुख भोगैत। तखन समय आएल जखन ओ विदेशी द्वीपसँ आएल व्यापारिक सार्थक अगुआ बनि यात्रा पर निकलल। छल-कौशलक विलास ३ : काम पति विदेशमे रहला काल युवती पिताक महलक शिखरपर चढ़ि सखीसभक संग क्रीड़ा-छतपर खेलि मनोरञ्जन करैत छल। शिखरसभक बीच रहैत, विशाल-नयन युवती बाटपर कामदेव सन सुन्दर पुरुषकेँ देखलक। ओकरा देखिते ओकर आत्मसंयम अनुचित विचारसँ क्रोधित भऽ मानू दूर चलि गेल। काँपैत आँखिबाली स्त्री विवेकसँ विहीन, मानू ओ पुरुष बलपूर्वक ओकरा लूटि लेने हो, आ प्रेमसँ भेल परिवर्तन नुकेबाक लेल मनक दृढ़ता जुटा नहि सकल। कम्पनसँ हिलैत ओकर करधनीक झनकार तीक्ष्ण स्वरमे मानू बेर-बेर ओकरा पुकारैत छल: “अपन मर्यादा थामि राखू! अपन कुलक सीमा नीचाँ नहि घींचू!” गुप्त रूपेँ ओ अपन सखीसँ प्रसङ्ग कहलक आ आदेश देलक: “ओहि युवककेँ हमर लग आनू!” कामातुर स्त्रीक चञ्चल मन के बुझि सकैत अछि? निर्बन्ध स्त्री बढ़ैत कामनासँ ओकर संग मन भरि प्रेमक्रीड़ा केलक, सम्भोगक चञ्चल भङ्गिमासँ, हास-परिहाससँ, आ अपन इच्छानुसार चुनल प्रेम-शय्यासभमे। समुद्रदत्त पैघ हड़बड़ीमे आर्थिक काज निपटौलक, आ प्रिय पत्नीकेँ देखबाक लालसासँ दौड़ि कऽ ससुरक घर घुरि आएल। छल-कौशलक विलास ३ : काम दिन विशाल उत्सवक आनन्दमे मग्न लोकसभ आ अनुपम मनोरञ्जनक उमङ्गमे बितल। तकर बाद ओ प्रिय पत्नीक संग शयनकक्षमे गेल। ओतए निर्दोष पलङ छल, छत्रसँ ढँकल, सुन्दर ढङ्गसँ सजायल, सुगन्धित धूपसँ भरल, देव-महल सन सुन्दर, आ चमकैत मणिजड़ित दीपसँ प्रकाशित। ओतए ओ अपन प्रियाकेँ पकड़लक, जकर नेत्र-कमल भँवरासदृश पुतरीक चञ्चलतासँ काँपि रहल छल; प्रेमक्रीड़ाक उत्सुक ओ शय्यापर गेल, जेना मदोन्मत्त हाथी नव कमलसँ भरल सरोवरमे प्रवेश करैत अछि। मुदा ओकर विचार ओहि दोसर पुरुषपर केन्द्रित छल, जे ओकर हृदयमे रहैत छल। आँखि मूनि ओ बहुत काल उदासीन रहल, गम्भीर ध्यानमे डूबल योगिनी जकाँ, जे अपन ध्यानक लक्ष्य बनौने हो परमात्माकेँ, जे अन्तःहृदयमे निवास करैत अछि। पति आलिङ्गन, चुम्बन आ वस्त्र खोलैत रहल, मुदा ओ बेर-बेर निःश्वास छोड़ैत। पतिसँ हटि ओ केवल ओहि पुरुषकेँ स्मरण करैत रहल जे ओकर सतीत्व लूटने छल। भोला पति समुद्रदत्त ओकरा नखरासँ बनावटी क्रोध करैत बुझलक। ओ ओकर पएरपर खसल आ मधुर वचनसँ मनाबए बहुत प्रयास केलक। कारण मन्दबुद्धि नर-पशु आरो बेसी मोहित होइत अछि आन पुरुषपर आसक्त, दूरी बनौने आ बनावटी क्रोधमे हठी स्त्रीसँ। छल-कौशलक विलास ३ : काम प्रेम एकहि समय दोसरापर निर्भर होएबाक लक्ष्य आ स्वतन्त्र होएबाक लक्ष्य कोना रखि सकैत अछि? हाय! सूर्य देवी सन्ध्यासँ प्रेम करैत छथि, आ सन्ध्या शशाङ्क चन्द्रसँ। बहुत काल धरि ओ अपन प्रेमीक कल्पना करैत रहल, जे निश्चित योजनानुसार उपवनक नुकायल कुञ्जमे प्रतीक्षा करैत छल, आ मूर्छित भावसँ पतिकेँ विष बुझलक। अन्ततः, मनाबए के प्रयाससँ थाकल समुद्रदत्तक आँखि जखन निन्नसँ मूनि गेल, ओ उठल, चुपचाप वस्त्र पहिरलक आ बाहर जाए लेल ठहरल। ठीक ओहि क्षण, मदिरासँ मातल लोकक बीच एकटा चोर भवनमे घुसल। बिना देखल गेल ओ ओकरा विदा होए लेल व्याकुल, आभूषणसँ झनकैत ठाढ़ देखैत रहल। ठीक तखन शशाङ्क चन्द्र, जे धीरे-धीरे पूर्व दिशामे उगल छल, तारासँ टिमटिमाइत, अचानक मानू बिजुरीक चमकसँ झिलमिला उठल। : चन्द्रमा, पूर्व दिशाक देवीकेँ धीरे-धीरे आलिङ्गन करैत, जे देवराजक प्रिया छथि, आँखि मूनने, अचानक काँपि उठल, मानू आनन्दसँ भरि गेल हो। छल-कौशलक विलास ३ : काम शीतल किरणबला चन्द्रमा प्रकट भेल मानू ओ अभिनय कऽ रहल हो रातिक हँसीक, जे अपन फिक्का लाल कमल-सन ओठ पाछाँ घींचने छलि, आ चमकैत छलि पूर्ण खिलल कुमुद-सन दाँतसँ। आकाशकेँ देखि, जे सूर्यक दहकैत तापसँ थाकल छल, चन्द्र उगलापर आनन्दित, : दिवा-देवीकेँ देखि, जे रविक कामोन्मत्त तापसँ थाकलि छलि, ओकर चरमावस्थामे आनन्दित, सरोवर मानू हँसि उठल कुमुदक गुच्छसँ, भँवराक झुण्डक गुँजारसँ मुखर। सुन्दरी राति, जकर अन्हारक आवरणरूपी चोली चन्द्रक किरणसँ खिंचि लेल गेल, मानू लजाइ, कुमुदक सुगन्धसँ उत्तेजित भँवराक झुण्डक ओढ़नीसँ स्वयंकेँ ढाँपि लेलक। तकर बाद आधा रातिमे जखन सभ सुतल छल, निर्भीक स्त्री चुपचाप उपवनमे गेल, मानू अनैतिकताक अन्हारमे, यद्यपि चन्द्रमा उज्जर छल। छल-कौशलक विलास ३ : काम आवेगशील स्त्री, विषम सङ्ख्यक बाण धारण कएनिहार कामदेवसँ दग्ध, परिचित उपवनमे प्रवेश केलक, आभूषणक लोभमे विस्मित चोर गुप्त रूपेँ ओकर पाछाँ चलल : भयङ्कर बाणसँ घायल शिकार-पशु जकाँ, ओ मरबाक इच्छासँ अपन उपवनमे प्रवेश केलक, आ पुरस्कारक लोभी प्रसन्न शिकारी गुप्त रूपेँ पाछाँ चलल। ओतए ओ अपन प्रेमीकेँ देखलक। ओ आभूषण पहिरने, झिलमिलाइत बहुमूल्य वस्त्रमे सजल, फूलसँ चमकैत, झाड़ीमे अशुभ, पक्षीसभक आवाजसँ प्रकट छल। हृदय-प्रियाक वियोगक दहकैत ज्बलाक किनारसँ ओ झुलसि गेल छल, आ दिशासभकेँ आलोकित करएबला चन्द्रक किरणरूपी आगिसँ फोका पड़ि गेल छल। मिलन-स्थानपर बहुत काल प्रतीक्षा कएलाक बाद, ओ प्रियासँ फेर भेंटक आशा छोड़ि देने छल। ओकर प्राण निकलि गेल छल, गाछसँ लटकल लतिक फन्दामे स्वयंकेँ फाँसी लगा कऽ। ओकरा देखि पातर-कमर स्त्री लड़खड़ा गेल, आ दुर्घटनाक दुःखसँ काँपैत कनैत भूमिपर खसि पड़ल, गुँजार करैत भँवराक झुण्डसँ ढँकल लति जकाँ। विस्मृतिमे आँखि मूनि ओ बहुत काल धरि भूमिकेँ आलिङ्गन कऽ पड़ल रहल। फेर धीरे-धीरे चेतना घुरला पर, कमजोर स्वरमे बिना रोक-टोक सिसकि उठल। छल-कौशलक विलास ३ : काम “हाय! हाय! हमर आँखिक आनन्द! पूर्णिमा चन्द्र सन सुन्दर अहाँक मुख आब कतए? हम अभागल स्त्री फेर ओकरा देखब? हमर आ प्रेमीक बीच कतेक अथाह दूरी!” दुर्बल स्त्री कोमल आ करुण स्वरमे विलाप केलक। फन्दा खोलबाक प्रयास कऽ ओकर मुख गोदमे रखलक आ चुम्बन केलक, मानू फेर ओकरामे प्राण सञ्चारित करैत हो। मूर्छित भावसँ अपन मुँह ओकर कमल-मुखपर रखि सुपारी ओकर मुँहमे देलक, †मानू अपन प्रेमक गहिराइ देखबैत हो†। फूलक ढेर, कस्तूरी-धूप आदिक सुगन्धसँ एकटा वेताल आकृष्ट भेल। ओ मृत देहमे प्रवेश केलक आ ओकर नाक काटि लेलक। अपन निर्लज्जताक अनुरूप दुराचारक फल पाबि, ओ कटायल नाकसहित भागि गेल। पतिक घरमे प्रवेश कऽ जोर-जोरसँ चीत्कार केलक: “हाय! हाय!” जखन सभ जागि गेल आ समुद्रदत्त शोरसँ डरि गेल, ओ विलाप केलक: “हमर नाक नष्ट भऽ गेल, हमर पति काटि देलक!” क्रोधित सम्बन्धीसभ, ससुरक अगुआईमे, समुद्रदत्तसँ प्रश्न केलक, मुदा ओ किछु नहि बाजल, मानू विदेशमे बेचल जा रहल गुमसुम मनुष्य हो। छल-कौशलक विलास ३ : काम तेँ भोरमे ओकर सम्बन्धी अपराधक सूचना राजदरबारमे देलक। राजाक क्रोध समुद्रदत्तपर टूटल आ ओकरा भारी अर्थदण्ड देल गेल। सम्पूर्ण घटना देखनिहार चोर आश्चर्यसँ भरि गेल। ओ राजाक सोझाँ सभ कहलक, आ कङ्कण आदि पुरस्कार पाबि, उपवनमे मृत देहक मुँहमे ओकर नाक देखौलक। एहि प्रकार ओ समुद्रदत्तकेँ निर्दोष सिद्ध केलक, जेना बिना स्वार्थक मित्रक कर्तव्य हो। बुद्धिमान पुरुष, जे एहन सुन्दर स्त्रीसभकेँ वास्तवमे अत्यन्त टेढ़, आचरणमे निष्ठुर, निर्लज्ज आ चञ्चल बुझैत अछि, ओ स्त्रीसँ धोखा नहि खाइत। तेसर सर्ग, ‘कामक चित्रण’ नामक, “छल-कौशलक विलास”मे, जकर रचना महाकवि क्षेमेन्द्र केलनि। छल-कौशलक विलास ४. विश्वासघात हुनकामे गणिका सभसँ बेसी विश्वासघाती होइत अछि। ओ बनावटी प्रेमसँ संसारकेँ मोहित करैत अछि, आ जकर कपटपूर्ण युक्तिक कारण धनदेवो उदार दाता बनि जाइत छथि। गणिकाक हृदयमे चौंसठि कला : गति अछि; ओ मनमोहक : विनाशक, चञ्चल : उफनैत, मनमौजी : लहरिसँ भरल, आ नीच चरित्रक संगिनी : नीचाँ बहएबाली; ठीक जेना धारासभ समुद्रमे होइत अछि। वस्त्र-सज्जाक कला, नृत्यक कला, गायनक कला, तिरछी चितवनक कला, कामातुर पुरुष चिन्हबाक कला, फँसाबक कला, मित्रकेँ ठकबाक कला; मिश्रित मदिरा बनाबक कला, प्रेमक्रीड़ाक कला, सम्भोगक कला, अनेक प्रकारक आलिङ्गनक कला, खेल-खेलमे ईर्ष्या आ झगड़ाक कला, रोएबाक कला, क्रोध शान्त करबाक कला; चुम्बन, खरोंच आ दाँत काटबाक कला, निर्लज्ज, उत्तेजित आ उत्कट होएबाक कला, वियोग सहि नहि सकएबला कामोन्मादक कला, कामनाकेँ विफल करबाक सङ्कल्पक कला; पसेना, थाकनि आ कम्पनक कला, एकान्तमे बेर-बेर स्वयंकेँ ताजा करबाक कला, आँखि मूनबाक कला, अशक्त आ निश्चल देखाएबाक कला, मृत देखाएबाक कला; छल-कौशलक विलास ४ : विश्वासघात अपन मायसँ झगड़बाक कला, घर जाएत समय प्रसन्न आँखिक कला, सभ किछु चोराबक कला, चोरसभमे राजा होएबाक कला, आ माँगि-माँगि खएनिहारसभमे वीर होएबाक कला; उदासीनता आ बोझिलपनक कला, बिना कारण निन्दा करबाक कला, तीक्ष्ण पीड़ाक कला, लेप लगाबक कला, निन्नायल आँखिक कला आ मासिक धर्मक अत्यन्त क्षीण अवस्थाक कला; निर्दय होएबाक कला, उग्रताक कला, ताला लगाबक कला, घरक द्वारक साँकल चढ़ाबक कला, गला दबाबक कला, त्यागल प्रेमीकेँ फेर बजाबक कला आ देवता, तीर्थ तथा स्तुति-दर्शनक लेल जाएबाक कला; तीर्थ, विहार-उपवन आ मन्दिरसभमे घूमैत चञ्चल होएबाक कला, भूत-प्रेत लगबाक कला, वशीकरणक औषधि आ मन्त्रक कला, कामोत्तेजनाक कला, उम्र नुकाबए लेल केश रँगबाक कला; बौद्ध भिक्षु आ तपस्वीसभक अनेक गुण जनबाक कला, शरण-स्थल जाएबाक कला, आ तिरसठिम कला रूपेँ जरावस्था पाबि, गणिका अन्ततः कुटनी बनि जाइत अछि। छल-कौशलक विलास ४ : विश्वासघात जे कनेक धनक लेल अज्ञात नाम आ जातिबला पुरुषकेँ स्वयं सौँपि दैत अछि, —मेघ सन ओकर वास्तविकता एखनहुँ शोधक विषय अछि। कामनासँ हृदय जरल पुरुषसभक समस्त धन, जे ओ सभकेँ ठकि अर्जित केलक, कोनो भ्रष्ट चरित्रबला खा जाइत अछि, नाङट भिक्षुक, जे गुणक पूरा समूह नष्ट कऽ देने अछि, अथवा आरो नीच कुलक कोनो व्यक्ति। नीच पुरुष, घुड़सवार, महावत अथवा दुष्ट कारीगर एहि गणिकासभक प्रिय बनैत अछि, जे सभ लोककेँ ठकि लेने अछि। बहुत पहिने राजा विक्रमसिंह शक्तिशाली शत्रु राजासभसँ पराजित भेलाह। क्रोधसँ ओ विदर्भ गेलाह अपन मन्त्री गुणयशसक संग। ओतए ओ वेश्यालयमे प्रवेश कएलनि आ, निर्धन अवस्था होइतहुँ, प्रसिद्ध गणिका विलासवतीक संग रहए लगलाह, जकर भोग अत्यन्त धनी पुरुष करैत छल। राजसी देहक प्रमाण रूपेँ ठेहुन धरि पहुँचैत बाँहि आ महान पुरुषार्थ देखि, ओ सोनाक कोष आ सभ प्रकारक मणि हुनक उपयोग लेल रखि देलक। ओकर जन्मजात स्नेह आ अद्भुत मर्यादा देखि, राजा आश्चर्यसँ विचलित भऽ, स्नेहपूर्वक एकान्तमे मुख्य मन्त्रीसँ कहलनि: छल-कौशलक विलास ४ : विश्वासघात “ई अद्भुत अछि! गणिका होइतहुँ ओ हमर लेल धनकेँ पुआल सन बुझि किछुओ खर्च करबासँ नहि बचैत। गणिकाक कामना धनपर निर्भर रहैत अछि, प्रेमक बाट छोड़ि देने अछि। वेश्या कनेक धनक लोभमे झूठ स्नेह देखबैत अछि। मुदा ई तँ ओही धन छोड़ि दैत अछि; तखन ओकर प्रेमपर कोन सन्देह भऽ सकैत अछि?” राजाक ई वचन सुनि मन्त्री हँसल आ उपहासपूर्वक कहलनि: “हे राजन्! गणिकाक व्यवहारपर के विश्वास कऽ सकैत अछि? गणिका बेईमान होइत अछि, धनक टुकड़ासँ चिपकल, क्षणिक सुखपर निर्भर, आ मधुर पुकार करैत अविवेकी पुरुषक हृदयमे पैसि जाइत अछि। पुरुषक आकांक्षा आ गणिका समान अछि: प्रथम भेंटमे सुख दैत अछि, बीचक कालमे विपत्ति आ निर्वासन, अन्तमे दुःखक फल। आइ धरि हरि आ हरक अगुआईबला देवतासभो न जन्म-मरणक माया, ने भ्रम, छद्म रूप आ कुतर्कसँ भरल गणिकाकेँ ठीकसँ बुझि सकल— : जे मोह, नखरा आ चक्करायलपनसँ भरल अछि।” राजा मन्त्रीक बात सुनलनि आ सहमत भेलाह गणिकाक परीक्षा लेल मृत होएबाक ढोंगक युक्तिपर। छल-कौशलक विलास ४ : विश्वासघात मन्त्री जखन हुनक मृत देह चितापर रखलक, विलासवती तुरन्त आभूषण पहिरने श्मशानदिस दौड़लि। ओ प्रचण्ड ज्बलासँ भड़कैत दावानलमे माथक बल कूदए जा रहलि छलि, तखन राजा ओकरा बाँहिमे जकड़ि आनन्दसँ कहलनि: “हम जीवित छी!” तखन ओकर प्रेम दृढ़ आ सत्य मानि, पूर्णतः मोहित राजा मन्त्रीकेँ बेर-बेर डाँटलनि, गणिकाक गुणपर दृढ़ विश्वास कऽ। आब राजा गणिकाक जमा धन जे हुनक उपयोग लेल देल गेल छल, ओहिसँ हाथी, घोड़ा आ योद्धाक शक्तिशाली सेना बनौलनि। राजा सुसज्जित विशाल सेनाक बाढ़िसँ पृथ्वीक राजासभकेँ जीतलनि आ फेर पाओलनि अपन राज्यमे, आनन्द पसारैत चन्द्रमाक समान, जे विशाल आ प्रबल ज्वारक बाढ़ि उठा कऽ पर्वतसभकेँ पराजित कऽ दैत अछि। राजा विलासवतीकेँ समस्त अन्तःपुरक प्रधान बना देलनि; याक-पुच्छक चँवर सँ उठैत मन्द पवनमे ओकर पातर देह आ उड़ैत केश लक्ष्मीक समान शोभित भेल। तकर बाद एक दिन, जखन दुनू एकान्तमे छलाह, ओ हाथ जोड़ि राजाकेँ प्रणाम कऽ कहलनि—“हे स्वामी, अहाँकेँ अपन कल्पवृक्ष मानि दासीक समान विनीत भऽ हम सेवा केलहुँ। छल-कौशलक विलास ४ : विश्वासघात हे महापुरुष, जँ कोनो प्रकारेँ हम अहाँक सौभाग्यमे योगदान देने होइ, तँ हमर आशा पूर्ण कऽ हमरा अनुगृहीत करू। महान् लोकक संगम—जे पुण्यक फलस्वरूप प्राप्त होइत छथि, जे दोसरक मलिनता सँ दूषित नहि होइत छथि, जे स्वभावतः निर्मल छथि—तीर्थ-संगमक समान अछि : जे महान् पुण्य प्राप्त करबाक योग्य होइत अछि, जे महापाप नष्ट कऽ देने अछि आ स्वभावतः स्वच्छ अछि— एहन संगम निष्फल नहि भऽ सकैत अछि। हमर एकटा युवक प्रेमी छल, जे धन आ प्राणो सँ बेसी प्रिय छल। दैवयोग सँ ओ विदर्भ नगरमे चोर बुझि कारागारमे बन्द अछि। हे महाराज! ओकरा मुक्त कराबय लेल हम अपन सामर्थ्य अनुसार अहाँक सेवा केलहुँ। आब अपन स्वभाव, कुल आ वीरताक अनुरूप काज करू!” राजा जखन बुझलनि जे हुनका ठकायल गेल अछि, तँ मानो अवाक् भऽ गेलाह। बहुत काल धरि धरती दिस तकैत रहलाह आ अपन मन्त्रीक वचन स्मरण केलनि। तथापि राजा ओकरा सान्त्वना देलनि। विदर्भक राजाकेँ पराजित कऽ कारागार सँ मुक्त कराओल चोरक संग ओकर पुनर्मिलन करा देलनि। अतः वेश्यासभकेँ यथार्थमे के बुझि सकैत अछि—जकर अनेक हृदय, अनेक जिह्वा, अनेक हाथ, अनेक वेश आ वस्तुतः कोनो सार नहि होइत अछि? छल-कौशलक विलास ४ : विश्वासघात वेश्या एक पुरुष सँ ओकर प्रशंसाक कारण प्रेम करैत अछि, दोसर सँ धनक कारण, तेसर सँ ओकर दासवत् विनयक कारण, चारिम सँ संरक्षणक कारण, आ आन ककरो सँ मनोरञ्जनक कारण। चारिम सर्ग, ‘वेश्यासभक व्यवहार’ नामक, महाकवि क्षेमेन्द्र-विरचित ‘छल-कौशलक विलास’मे समाप्त। छल-कौशलक विलास ५. छल मोह निश्चय मनुष्यक सभकिछु लूटि लैत अछि। आरम्भे ओ विवेक छीनि लैत अछि। भलीभाँति नुकायल ओ लेखनिक मुँह आ लेखनीमे आश्रय लैत अछि। अन्न सँ भरल कोठार चन्द्रमाक कलाक समान अछि: देखिते : निरीक्षण होइतहि पूर्णतः खा लेल जाइत अछि : पूर्ण ग्रहण लागि जाइत अछि क्षण भरिमे : एक क्षण लेल लेखनिक धूर्तता सँ : आकाशचारी राहुक वस्तु अदृश्य करबाक : ग्रहण लगाबयबला शक्तिसँ। योगीसभ, मोह आ तृष्णा सँ मुक्त भऽ, संसार-चक्रक मायावी दृश्यकेँ आर-पार देखि सकैत छथि। मुदा कियो, कतबो प्रयास किएक नहि करय, लेखनिक छल-कपट नहि बुझि सकैत अछि। सैकड़ो प्रकारक कपट-कौशलक सेनासँ युक्त, जनताक धन लेल सदिखन खुजल जेबी रखने, अमावस्याक रातिक समान अगम्य— समस्त मानवताकेँ काल नहि, लेखनिकेँसभ भक्षण करैत अछि। छल-कौशलक विलास ५ : छल कारण, ई करिखाहा सियाहीबला लोक : यमदूतसभ जनतामे विनाश मचबैत अछि : लोककेँ मारैत अछि अपन पैघ कलम सँ बहैत सियाही सँ : अपन विशाल दण्डक प्रहार सँ। ई गणना आ गलत हिसाबक राक्षस छथि, जे भोजपत्रक ध्वजा लऽ धरतीभरि विचरण करैत छथि। एहन लोकसभ पर के विश्वास करत, जे यमक साँढ़क सिङक अग्रभागक समान टेढ़ अछि, जँ अन्त आनयबला मृत्यु स्वयं ओकर गरदनिमे फाँसीक फन्दा नहि कसि दैत? राज्यक अधिष्ठात्री देवी, लुटायल : बलात् अपमानित, लेखनिक कलमक नोक सँ छिटकैत सियाहीरूपी वीर्य सँ, दुःखमे कानैत सन देखाइत छथि, काजल-मिश्रित नोर : अञ्जनक नोर बहबैत, जे सरकण्डाक कलम सँ छिटकैत सियाहीक बूँदक वेश धारण केने अछि। संसारमे एहन कियो अछि जे ई लेखनिकसभक गढ़ल झूठ सँ ठकायल नहि गेल हो, जे विकृत अङ्क लिखैत अछि, मायादेवीक घुँघरायल केशक समान टेढ़? छल-कौशलक विलास ५ : छल जनसामान्य लेखकीय अधिकारीसभ द्वारा निरन्तर उजाड़ल जाइत अछि, जे झूठ हिसाब सँ सभकेँ ठकैत अछि आ दफ्तरी कागजातक धौंस देखबैत अछि, आ अपन प्रभावाधीन गामसभ पर परजीवी बनल अछि; जेना ज्ञानेन्द्रियसभ, : जे शरीरमे निवास करैत अछि, जे इन्द्रिय-विषयक क्षेत्रकेँ ग्रहण करैत अछि आ मायावी प्राकट्य द्वारा सभकेँ भ्रमित करैत अछि तथा लय द्वारा, निरन्तर ज्ञान-प्रकाशकेँ रोकैत अछि। टेढ़-मेढ़ लिखावटसभ, यमक फन्दाक समान, लेखनिक भोजपत्ररूपी पर्वत पर सर्प जकाँ कुण्डली मारैत देखाइत अछि। कुटिल बुद्धिबला लेखनिकसभ, जे गुप्त रूपेँ चोरी करैत : चुपचाप प्राण हरैत अछि, नरकक पुण्य-पापक लेखा लिखनिहार छथि। मात्र एक पाँति मेटा कऽ ओ ‘सहित’ अर्थात् ‘अधिकारयुक्त’केँ ‘रहित’ अर्थात् ‘अधिकारविहीन’ बना सकैत छथि। लेखनिक कलाक संख्या अल्प अछि जे सामान्य ज्ञानक रूपमे प्रचलित अछि। सम्भवतः हुनकर गुप्त कलासभक ज्ञान कलियुग अथवा अन्त आनयबला यमकेँ हो? छल-कौशलक विलास ५ : छल अनेकार्थक लेखनक कला, पूरा अङ्ककेँ अस्पष्ट करबाक कला, सङ्गृहीत राजस्वकेँ निरन्तर लूटबाक कला, खर्च बढ़ेबाक कला; लाभक एक अंश अलग कऽ लेबाक कला, देय राशि हड़पबाक लेल कानूनी कागज बनयबाक कला, घूस द्वारा चोरी करबाक कला, पड़ोसी प्रदेश दिस भागि जयबाक कला; बचल धन हटेबाक कला, चल सम्पत्तिकेँ पूर्णतः गड़पि जयबाक कला, कोनो लाभ रोकि रखबाक कला, नष्ट वा उड़ा देल वस्तुकेँ फेर प्रकट देखयबाक कला; किनबाक बहाने मजदूरी प्राप्त करबाक कला, यात्रा-व्ययमे हेरफेर कऽ हानि करबाक कला; लङ्गड़ापनक उपचारक बहाने एके ठाम पन्द्रह दिन धरि बैसल रहबाक कला, आ अन्ततः प्रमाण नष्ट करबाक लेल भोजपत्रक कागजकेँ पूर्णतः जरा देबाक कला, जकर बिना वादी अपन सोन फेर पयबाक विषयमे अन्हारमे रहैत अछि। ई लेखनिकक सोलह टेढ़ कला अछि, जे दोषक खान आ सियाहीक धब्बा सँ लिप्त अछि, जे धन घटबैत आ अनेक वेश धारण करैत अछि, जे लोकक आमदनीक एक अंश हड़पि लैत अछि। ई चिह्नधारी, क्षीण होइत आ फेर नव रूप धारण करैत, बढ़ैत आ आकाशमे चलैत रात्रि-निर्माता चन्द्रमाक सोलह वक्र कला सेहो अछि। छल-कौशलक विलास ५ : छल लेखनिकसभ असत्यमे विश्वास करैत अछि, ओसभ मोहक कला सिद्ध केने अछि आ एक क्षणमे पूर्णतः ‘नहि’ सँ बनल अपन मायावी मन्त्र द्वारा जीविका नष्ट कऽ सकैत अछि; जेना गुरुजन, जे अपरिवर्तनशील परमात्माकेँ प्राप्त कऽ लेने छथि, आ मोहकेँ आर-पार देखि लेने छथि, अपन सिद्ध मन्त्र द्वारा पुनर्जन्मक क्रम समाप्त कऽ सकैत छथि, जे सभ वस्तुक अस्तित्वक निषेध करैत अछि। बहुत पहिने जुआक अत्यन्त व्यसनी एक व्यक्ति अपन दाँवक धन आ घर दुनू गमा देलक। ओकर सम्बन्धीसभ, ओ हुनका सभकेँ लूटि लेत एहि भय सँ, ओकरा निकालि देलक; ओ समस्त पृथ्वी पर भटकय लागल। एक दिन, अपन सञ्चित पुण्यक प्रभाव सँ, ओ पवित्र उज्जयिनी नगर पहुँचल। स्नान कऽ एकान्तमे घूमैत स्नान कऽ एकान्तमे घूमैत ओ दुर्ग-भञ्जक शिवकेँ समर्पित एक मन्दिर देखलक। निर्जन गर्भगृहमे प्रवेश कऽ ओ वरदानी महाकाल देवक प्रतिमा देखलक। आन सभ काज छोड़ि, लेप, फूल आ फलक अर्पण सँ पूजा केलक। ओ बहुत काल धरि ओतहि रहल, रातिमे जागरण करैत, स्तुति, मन्द जप, मन्त्रपाठ आ दीप प्रज्वलन करैत, आ गम्भीर ध्यानमे लीन रहैत, अपन असह्य दुर्भाग्य सँ मुक्ति चाहैत। एक समय एहन आयल जखन ओकर भक्ति आ सौगुना सुन्दर आवाहन सँ प्रसन्न भऽ पूज्य शिव, भूतनाथ, संसारक भय दूर कयनिहार, अकस्मात् ओकरा कहलनि: छल-कौशलक विलास ५ : छल “पुत्र, स्वीकार कर...” देवता एतबे कहलनि छलाह कि मानव-कपालक मुकुटक शिखर पर स्थित एक कपाल दुर्ग-शत्रु शिवकेँ बेर-बेर सङ्केत कऽ ठेलक। कपालक ठकठक सङ्केत सँ वाक्यक बीचमे वरदान देनाइ रुकि गेलनि, तखन रुद्र मौन भऽ गेलाह, कारण जुआरीक अर्जित अल्प पुण्य आब समाप्त भऽ गेल छल। ओ व्यक्ति स्नान करबाक लेल चल गेलापर देवता ओहि कपाल सँ एकान्तमे कहलनि; दाँतक बीच सँ निकलैत तेजक धारदार उजास मानो गङ्गाक रूपमे हुनक सोझाँ प्रकट भऽ रहल छल: “ई योग्य जुआरी, जे बहुत दिन सँ भक्त अछि, ओकर इच्छा पूर्ण करबाक समय अहाँ हमरा सङ्केत सँ किएक ठेललहुँ?” भगवान् द्वारा एहि प्रकार पूछल गेलापर कपाल मुस्करायल आ धीरे उत्तर देलक; एकहि समय तेसर आँखिक तेज सँ मुरझाइत आ शिरोभूषण चन्द्रमाक अमृत-रस सँ फेर जीबि उठैत: “हे सरल स्वभावबला प्रभु, सुनू जे हम अहाँकेँ किएक सचेत केलहुँ। कारण बिना कियो अपन स्वामीकेँ किएक टोकत, भलेँ स्वामी सहज सुलभे किएक नहि होथि? ई दीन ठक, दरिद्रतामे अपन सभ कर्तव्य त्यागि, स्नान, नैवेद्य, फूल आ धूप सँ अहाँक श्रद्धापूर्वक पूजा करैत अछि। छल-कौशलक विलास ५ : छल दुर्दशाग्रस्त मनुष्य पश्चात्तापी बनैत अछि, निर्धन व्यक्ति धर्मक प्रति गम्भीर होइत अछि, पद आ प्रतिष्ठा गमौने व्यक्ति सभक सोझाँ माथ झुकबैत अछि। दरिद्र भऽ ओ देवता आ ब्राह्मणक सम्मान करैत अछि, गुरुकेँ प्रणाम करैत आ मित्रसभकेँ स्मरण करैत अछि। कठोर होइतो, लोहाक ढेला, तपलापर, नम्य भऽ जाइत अछि। विपत्तिक आगिमे जरल हृदयबला प्रत्येक व्यक्ति धर्माचरण अपनबैत अछि, मुदा पद-मोह सँ जड़ भऽ गेल लोकमे कर्तव्य स्मरणक सम्भावना कतय? हे पूज्यवर, ई जुआरी शक्ति पयबाक प्रयत्नमे, आशाक फन्दामे झूलैत, उत्कट स्तुति करैत अछि। फल भेटि गेलापर ओ फेर देखाइत नहि पड़त। अपन लेल धन चाहयबला सेवक परिश्रमी होइत अछि, मुदा सम्पत्ति प्राप्त कऽ लेलापर व्यर्थ निष्क्रिय भऽ जाइत अछि; कारण एहि पृथ्वी पर आत्मनिर्भर व्यक्ति ककरो सेवक नहि होइत अछि। हे देव, ई पुरस्कृत जुआरी चल गेलापर एहि उजाड़ मन्दिरमे फल, जल, फूल आ आन सुविधा देनिहार कियो नहि रहत। अतः सौभाग्य सँ हाथ लागल एहि जुआरीकेँ स्थायी सेवक बनौने राखू; हे पूज्यवर, ओकर इच्छा पूर्ण करब अर्थात् अपन पूजा केँ निर्वासित करब अछि।” छल-कौशलक विलास ५ : छल ई धूर्ततापूर्ण वचन सुनि धनुषधारी शिव आश्चर्य सँ खूब मुस्करायल आ पूछलनि—“अहाँ वास्तवमे के छी? अहाँक व्यवसाय की छल?” एहि प्रकार पूछल गेलापर कपाल अपन उत्पत्ति स्मरण कऽ तुरन्त उत्तर देलक—“हम मगधक लेखनिक-कुलमे जन्म लेने छलहुँ, मुदा अपन जन्मजात परम्परा सँ विमुख छलहुँ। हम स्नान, प्रार्थना आ व्रतमे आनन्द लैत, तीर्थस्थल दिस आकृष्ट रहैत आ समस्त धर्मग्रन्थक तात्पर्य बुझैत छलहुँ। गङ्गामे अपन दीन शरीर त्यागि हम अहाँक धाम पहुँचलहुँ। : वस्तुतः हम अपन कुल-परम्पराकेँ अपनौने छलहुँ। हम स्नान, प्रार्थना आ व्रत सँ विरत, धनक तहसभक लोभी आ कोनो धर्मग्रन्थक अर्थ सँ अनभिज्ञ छलहुँ। अपन प्राण त्यागलापर दोसरक भाग भोगबाक मार्ग सँ अहाँक धाम पहुँचलहुँ।” ई सुनि आराध्य देव कहलनि—“तँ अहाँ लेखनिक छी! ई सत्य अछि! आश्चर्य जे केवल कपाल बचलोपर अहाँ अपन कपट-कला नहि छोड़ि सकलहुँ।” एना कहि ओ अपन उज्ज्वल मुस्कानक प्रभा सँ दिशारूपी लताकेँ प्रकाशित कऽ देलनि, जाहि सँ ओ उज्जर फूल सँ भरल देखायल। तखन वरदानी देव स्नान सँ घुरल जुआरीक इच्छा पूर्ण कऽ देलनि। लेखनिकक आँखिक सोझाँ जुआरीक कल्याण सुनिश्चित कऽ, चन्द्रशेखर शिव तुरन्त ओहि कपालकेँ अपन श्रेष्ठ कपाल-मुकुट सँ निकालि देलनि। छल-कौशलक विलास ५ : छल एहि प्रकार लेखनिक केवल हड्डीमात्र रहि गेलोपर अपन जन्मजात अपवित्र कुटिल कला नहि छोड़ि सकैत अछि, जे, मृत्युक दाँतक समान, लोकक विनाश करबाक लेल झुकल रहैत अछि। सात शरीर-धातुमे अवरोध भेलापर कियो स्वस्थ कोना रहि सकैत अछि, जे निरन्तर अशुद्ध पदार्थ सँ दूषित रहैत अछि आ मल-जकाँ हानिकारक वस्तु उत्पन्न करैत अछि? : लेखनिकसभक हस्तक्षेपमे कियो समृद्ध कोना रहि सकैत अछि, जकर कला सदिखन अनैतिक उद्देश्य सँ दूषित रहैत अछि, आ जे मलक समान अपवित्र करैत अछि? बुद्धिमान व्यक्ति, लेखनिकक कपटकेँ राक्षसक लेख जकाँ उचित सावधानी सँ जाँचि, रत्न-समृद्ध पृथ्वीक रक्षा करैत अछि। पाँचम सर्ग, ‘लेखनिकक पराक्रम’ नामक, महाकवि क्षेमेन्द्र-विरचित ‘छल-कौशलक विलास’मे समाप्त। छल-कौशलक विलास ६. मद समस्त लोकक हृदयमे एक शत्रु बसल अछि: मद। ओकर वशमे पड़ल व्यक्ति न किछु देखैत अछि, न किछु सुनैत अछि, स्तब्ध भऽ जाइत अछि। सत्ययुगक ज्ञानी लोकमे प्रचलित ‘दम’ अर्थात् आत्मसंयमक साधना, एहि पतित युगमे उलटि कऽ ‘मद’ अर्थात् आत्मभोग बनि गेल अछि। मदक पहिल लक्षणसभ अछि— मौन रहब : मौन-व्रत धारण करब, व्यङ्ग्यपूर्ण ओंठ सिकोड़ब : प्राणायाम लेल ओंठ समेटब, महत्त्वाकाङ्क्षा : भौंहक बीच ऊपर दिस दृष्टि लगायब, आन वस्तु दिस तकब : आँखिकेँ परलोक पर केन्द्रित करब, आ अङ्गमे लेप लगायब : अङ्गमे धूरि लगायब आ ओकरा जोड़ि लेब। वीरताक उन्माद, अहङ्कारक चक्कर, मोहक घुमरी आ कुलीनताक प्रलाप— ई सभ मनुष्यक मदरूपी वृक्ष अछि, जे एके जड़ि—आडम्बर—सँ उगैत अछि। आडम्बरी व्यक्ति समृद्धिक बीच : अतिभोग करैत, मानो विकट ज्वरक आरम्भ सँ पीड़ित देखाइत अछि। ओ शूल पर चढ़ाओल : पेटक शूल सँ पीड़ित सन देखाइत अछि, रुकल वायु सँ फुलायल बुझाइत अछि, प्रेतक समान प्रतीत होइत अछि। छल-कौशलक विलास ६ : मद वीरताक उन्मादी अपन बाँहक प्रशंसा करैत अछि, अहङ्कारी दर्पण आदि दिस तकैत अछि, मोहग्रस्त स्त्रीसभ पर ललचायल दृष्टि दैत अछि, मुदा आडम्बरी जन्महि सँ आन्हर होइत अछि। ‘धनक मद’ मनुष्यमे कोनो प्रकार आत्मसाक्षात्कारक आनन्द जकाँ प्रकट होइत अछि: सञ्चित धन पर चिन्तन करैत : ध्यानमे लीन, आँखि बन्द रहैत अछि मूर्छामे : विश्राममे, गुप्त उल्लासक मधुर स्वाद सँ : अन्तःस्थित परमानन्दक सुख सँ। एकटा आन अछि—नहि रुकयबला ‘मूर्खताक सनक’। ओ बिना उकसाओने विक्षिप्त करैत : आनन्दोन्माद उत्पन्न करैत, इन्द्रिय-विषय त्यागलापर : बिना कारण, अनेक रूपेँ पतनकारी अछि : अनेक अवस्थाबला, सर्वथा गुणहीन अछि : सभ गुण सँ मुक्त। ओ विचित्र आ आधारहीन अछि : अद्भुत आ निराधार। अपन जड़ करयबला स्वभावक कारण, ‘तपस्वीक स्तब्धता’ धरती नहि देखैत, अपितु सदिखन आकाशचारी देवतासभ दिस तकैत अछि। ‘भक्तिक भ्रम’, जे स्वभावतः अस्थिर अछि, चमत्कार करैत अछि, मुदा अपन शरीरक उपेक्षा करैत अछि। छल-कौशलक विलास ६ : मद पीड़ादायक ‘विद्वत्ताक प्रलाप’ शरीर-तत्त्वसभक साकार उथल-पुथल अछि: उठैत क्रोध सँ आँखि लाल भऽ जाइत अछि, दोसरक आवाज मात्र सहन नहि होइत अछि, मुदा स्वयं निरर्थक बकबक करैत अछि। ‘अधिकारक उन्माद’ सर्वभक्षी, निर्दय राक्षस अछि जे मानवजातिकेँ पीड़ित करैत अछि। निरन्तर सिकुड़ल भौंहक कारण ओ घृणित देखाइत अछि, लोककेँ कठोर गारि दैत अछि, आ हिंसक आक्रमण लेल तत्पर रहैत अछि। ‘कुलीन वंशक प्रलाप’ पूर्वजक गौरवक नीरस कथा कहबामे व्यस्त रहैत अछि, मुदा दोसरक प्रति अपन कर्तव्य बिसरि जाइत अछि। मनुष्यसभमे अद्वितीय, ओ दूरदर्शी महा-मूर्खता अछि : तीक्ष्ण दृष्टिबला गिद्ध। ‘शुद्धताक उन्माद’ निरन्तर डरि कऽ सिमटल रहैत : अखण्ड योग-प्रत्याहारमे रहैत अछि। अल्पो स्पर्श सँ पछुआ जाइत : कोनो इन्द्रिय-स्पर्श सँ दूर रहैत, मित्रहीन अछि : निराधार समाधि अछि, कारण ओ सभकेँ अपवित्र बुझैत : सभ इन्द्रिय-विषयकेँ असत्य जानैत अछि, आ आकाशो सँ दूषित होयबाक डर रखैत : शून्यताकेँ सेहो बाधा बुझैत अछि। ई सभ मदरूप सीमित अछि, अपन-अपन जड़ि काटल गेलापर समाप्त भऽ जाइत अछि। केवल ‘आत्ममहत्त्वक अभिमान’ अलग ठाढ़ अछि: खुजल जबड़ाबला अनन्त कुण्डली मारल सर्प। छल-कौशलक विलास ६ : मद मुदा मदिराजनित नशा सभसँ नीच अछि, पूर्णतः घृणास्पद अवस्था, निरा मूर्खता। क्षणमात्र रहितो, ओ सहसा हजारों वर्षमे सञ्चित पुण्य छीनि लैत अछि। नशा विद्वान् आ साधु ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुकुर आ कुकुर-मांस पकयनिहारकेँ समान बुझैत अछि, आ ‘अपन’ आ ‘दोसरक’ बीचक भेद नहि बुझैत अछि। सत्य आ असत्यक भेद सँ मुक्त, सोन, माटि आ पाथरकेँ समान बुझैत, मातल, एहि प्रकार योगीक अवस्था प्राप्त कयलोपर, अपनाकेँ नरकमे धकेलि दैत अछि। मातल संसार-चक्रक दर्पण-प्रतिबिम्ब अछि: ओ कनैत, गबैत, हँसैत अछि, दौड़ैत आ चिचियाइत, भ्रमक शिकार भऽ जाइत, एक मनोदशा सँ दोसरमे झूलैत अछि। ओ अपन पत्नीकेँ दोसर स्त्रीक पतिकेँ चुम्बन करबामे लीन देखियो कोनो क्रोध नहि अनुभव करैत अछि। की मातल, अत्यन्त लाल : कामोत्तेजित होइतो, मदिरा गटकि कऽ कामना सँ मुक्त भऽ गेल अछि? छल-कौशलक विलास ६ : मद मातल अपन वस्त्र ‘वसन’ दूर फेकि दैत अछि आ असह्य दुर्व्यसन ‘व्यसन’ धारण करैत अछि। अपन अँजुरी सँ ओ अपन मूत्रमे बढ़ैत चन्द्रमाकेँ पीबैत अछि। बहुत पहिने महर्षि च्यवन अश्विनीकुमार दुनूक सेवा सँ फेर युवावस्था प्राप्त केने छलाह। कृतज्ञ भऽ ओ अपन यज्ञमे हुनका सोमपानक अधिकार दऽ सम्मानित केलनि। क्रुद्ध इन्द्र हुनका सोझाँ आबि डाँटलनि: “हे ऋषि! अहाँ किछु नहि जनैत छी? वैद्यसभ संग भोज करबाक योग्य नहि होइत अछि! हुनका सोमाहुति सँ के सम्मानित करत?” देवराज एहि प्रकार बेर-बेर मना केलनि, तैयो अपन सामर्थ्य पर निश्चिन्त दृढ़ च्यवन अश्विनीकुमारक प्रेमवश अपन निर्णय सँ नहि डिगलाह। श्रेष्ठ ऋषि इन्द्रक विशाल स्तम्भ-जकाँ बाँहकेँ निष्क्रिय कऽ देलनि, जे अपन शक्तिक कारण भयङ्कर छल आ हुनका मारबाक लेल क्रोधमे वज्र उठा लेने छल। तखन इन्द्रकेँ मारबाक लेल ओ एक विकराल, विशाल असुर रचलनि, जकर देह प्रनमहरसुरक समान छल, चारिटा दाँत छल, शरीरक विस्तार हजार योजन छल, आ जे अभिचारक साकार रूप छल। वज्रधारी इन्द्र ओकर प्रबल वशमे पड़ि गेलाह। भयभीत भऽ ओ शरण लेल च्यवन दिस दौड़लाह, आ साहस छोड़ि मानि लेलनि—“दुनू देववैद्य सोमक अपन अंश पाबथि!” छल-कौशलक विलास ६ : मद करुणाक नदी सन ऋषि भयभीत आ विनीत महान् इन्द्रकेँ सान्त्वना देलनि, आ भयानक ‘मद’ नामक दानवकेँ जुआ, स्त्री, मदिरा आ आखेटमे पठा देलनि। क्रुद्ध ऋषि द्वारा रचल ओ विदारक दानव आब जड़ताक वेशमे प्राणीसभक हृदयमे रहैत अछि, गुणसभ द्वारा नियन्त्रित। धनक मदमे मातल लोकक मौनतामे, पद-वृद्ध लोकक स्थिर दृष्टिमे, धनिकक भौंह सिकोड़ने विकृत मुखमे, कामुक आदिक तानल भौंहमे; दूत आ विद्वानक जिह्वामे, सुन्दर लोकक दाँत, केश आ वस्त्रमे, वैद्यक सिकुड़ल ओंठमे, गुरु, छोट अधिकारी आ ज्योतिषीक गरदनिमे; पहलवानक फुलायल कान्हमे, व्यापारीक हृदयमे, शिल्पीक हाथमे, विद्यार्थीक तानल गरदनि, फाटल भोजपत्र-पाण्डुलिपि आ मोड़ल औँरीमे, पातर देहबाली स्त्रीक उन्नत स्तनमे; श्राद्ध-भोजक अधिकारी लोकक पेटमे, आ दूतक पिण्डलीमे, हाथीक गालमे, मोरक पूँछक पाँखिमे, आ हंसक चालिमे। छल-कौशलक विलास ६ : मद एहि प्रकार ‘मद’ नामक प्रबल दानव, काठक कुन्दा जकाँ चेतनाहीन भऽ, अनेक रूप धारण कयनिहार गहन मोह बनि, सदैव समस्त प्राणीक शरीरमे निवास करैत अछि। छठम सर्ग, ‘मदक वर्णन’ नामक, महाकवि क्षेमेन्द्र-विरचित ‘छल-कौशलक विलास’मे समाप्त। छल-कौशलक विलास ७. दुर्वृत्ति मानवीय प्रयत्नक विशाल विस्तारक प्रेरणा समृद्धि अछि। एहि समृद्धिकेँ सर्वथा निर्लज्ज, बकराक कण्ठबला गायकसभ एहि संसारमे लूटि लैत अछि। लाल दिन-कमलक पोखरिक कलिसभ पूर्णतः समाप्त कऽ देलोपर आ उज्जर कुमुदिनीसभकेँ चट कऽ देलोपर, गायक-भ्रमरसभ एखनहुँ कृश रहैत, हाथीक सुगन्धित मदजल लेल तरसैत अछि। : अपन आश्रयदाताक कोष पूर्णतः रिक्त कऽ देलापर जे धन-सम्पत्ति सँ भरल छल, आ फेर ओकर क्रोधक स्वाद चाखलापर, निर्धन गायक-कामुकसभ नीचतम चाण्डालो सँ याचना करैत अछि। घैला आ कम्बल सँ ठसाठस भरल गाड़ीक दल पाछाँ-पाछाँ चलैत, बाल-बच्चाक झुण्ड संग, जकर छिड़िआयल केश असँवारल अछि, ई मांस सँ पोसल, राजाक परजीवी गायकसभ भयङ्कर अछि। : कीलाकार व्यूहमे चलैत सेनादलसभ सँ घेरायल, घोर युद्धमे रणभेरी बजबैत, प्रबल अस्त्रसभक तरकस आ बाण सँ सज्जित, ई प्रेतोत्पन्न, राजघाती युद्धदेवक योद्धासभ भयङ्कर अछि। छल-कौशलक विलास ७ : दुर्वृत्ति दीन चोर ‘आह! आह!’ कहि कराहैत अछि आ अन्हारमे दबि-पाँए चलैत काँपैत अछि। गायक-चोर सेहो ‘आह! आह!’क तान लगबैत दिन-दहाड़े सम्पत्ति लऽ भागि जाइत अछि। “पा पा धा धा नि नि ग म सा धा धा मा मा स मा स गा धा म” एहि प्रकार सङ्गीतक स्वरसभक टुकड़ा रटैत, ई गायकसभ शिकार खोजैत घूमैत अछि। गायक-दल हाथमे ढोल लऽ अपन गीत प्रस्तुत करैत अछि; ओकर गायन टेढ़-मेढ़ ‘घुमावदार अलङ्कार’ सँ दोषपूर्ण, विकृत ‘वंशी-अलङ्कार’ सँ छिन्न-भिन्न, आ आरम्भिक विषय विकृत अछि, : ओसभ टेढ़ घुमरीमे डगमगाइत, मेरुदण्ड मोड़ने, मुख विकृत केने, हाथ खँजरी जकाँ काँपबैत, आ तकर बाद बहुत काल धरि मौन रहैत अछि। चारण गीतकेँ बोझिल करैत अछि “जय! जय!”क प्रणाम आ घोष सँ, गरगराहट, झाँझक टक्कर सँ, प्रत्येक स्वर-खण्डक बाद भनभनाहट-जकाँ टनकार सँ, आ “वाह!” कहि स्वयं अपन प्रशंसा करैत अछि। छल-कौशलक विलास ७ : दुर्वृत्ति जँ माड़क एक कौर पानिमे छोड़ल जाय आ माछ ओकरा खा लय, तँ किछु पुण्य प्राप्त भऽ सकैत अछि। मुदा गायकसभकेँ दान देलापर, चाहे करोड़ों किएक नहि हो, जनताक दुःख बढ़ैत अछि। विधाता मूर्खसभक रुकल धन लेल ठसाठस भरल, पैघ मुँहबला ‘गायक’ नामक निकास ठाढ़ कोषरूपी इनारसभ पर बना देने छथि। ईहो नहि जे आगू निकलल दाँतबला गवैयासभक ई भीड़ सदैव गानहि मे व्यस्त रहैत अछि; ओ धन हड़पलापर भीड़क पाछाँ चलयबला सरल लोक पर हँसबामे सेहो व्यस्त रहैत अछि। भोरहि, गायक-कामुकसभ निर्भीक रहैत, मोतीक हार आ सोनक बाजूबन्द सँ सजल रहैत अछि। दुपहरमे, जुआमे हारि ओसभ नाङट ठाढ़ रहैत, अपमानित आ आश्रयहीन। : साँझमे, गायक-कामुकसभ रोमाञ्चकारी प्रेम-क्रीड़ामे सामर्थ्यवान् रहैत, दुपहरमे, प्रेम-क्रीड़ा सँ थाकल, एखनहुँ निर्वस्त्र, पीड़ित आ सारहीन भऽ जाइत अछि। छल-कौशलक विलास ७ : दुर्वृत्ति गवैया-शिकारीसभ अपन मूर्ख शिकारक धन : प्राण हरैत अछि : निर्दोष हरिणक, प्रशंसारूपी फन्दा सँ रचल गीत द्वारा, गीत-पङ्क्तिरूपी बाण आ नुकायल जाल-जकाँ विन्यास द्वारा। जे गीतक स्वर-खण्ड पहिनहि विलीन भऽ चुकल, तकर लेल तुरन्त बहुत धन भेटलापर सङ्गीतकार बड़बड़ाइत अछि: “ओ दासीक बेटा आखिर देलक की?” आ असन्तुष्ट भऽ निकलि जाइत अछि। धनदेवी लक्ष्मीक एहन अभिशाप अछि जे सभक दुःख सँ घेरायल रहितो, ओ साधु ब्राह्मणसभ आ प्रतिष्ठित, विशिष्ट वृद्धसभ सँ दूर रहथि, आ सदैव गायकसभ द्वारा भोगल जयथि। बहुत पहिने देवताक अधिपति इन्द्र बहुत दिन बाद आयल नारद मुनि सँ संसारक समाचार आ पृथ्वीक रक्षा करयबला राजासभक कुशल पूछलनि। ओ उत्तर देलनि—“मानव-लोकमे घूमैत हम विजयी पृथ्वीपति राजासभमे, जे दान, धर्म आ यज्ञ सँ भरल छथि, देवराजक योग्य वैभव देखलहुँ। छल-कौशलक विलास ७ : दुर्वृत्ति धन-सम्पत्तिमे ओसभ अहाँ, वरुण आ कुबेर तीनूकेँ एकसंग टक्कर दैत छथि। ओ अहाँक ‘शतक्रतु’ अर्थात् ‘सए यज्ञ कयनिहार’ उपाधिक उपहास करैत, एक बेर नहि, अनेक बेर एहन यज्ञ करैत छथि।” ऋषिक वचन सुनिते, शतशक्तिमान् इन्द्रक शत्रुता भभकि उठल; ओ मानव-राजासभक धन लूटबाक लेल दानवसभकेँ धरती पर पठा देलनि। देवराज इन्द्र द्वारा संचालित, ‘गीत’ नामक मन्त्र-अधिपति दानवसभक ई दल समस्त राजाक पूरा धन छीनबाक लेल पृथ्वी पर चढ़ि आयल। हुनकामे सभसँ आगू छल ‘मायाक सेवक’, तकर बाद ‘वाचालताक सेवक’, ‘कुख्यातिक सेवक’, ‘विनाशक सेवक’, ‘लूटक सेवक’, ‘कठोरताक सेवक’, ‘वज्रक सेवक’, आ ‘बड़वानलक सेवक’। ई आठ अत्यन्त भयङ्कर प्राणी अपन खुजल जबड़ामे विकट कण्ठ-गर्जना करैत मानव-लोकमे आयल आ सर्वथा भयानक सङ्गीतकार-जातिक सृष्टि केलक। चारू दिस ओसभ समस्त जनताक धन छीनयबला ई राजासभकेँ निर्धन बना देलक। पृथ्वीक राजासभक यज्ञ आदि करबाक समस्त उत्साह घटि गेल। एहि कारण, गीतक रूप धारण कएने ई भयावह कर्ण-पिशाच पृथ्वीपर शासन करनिहार राजाक कानक बाटे भीतर घुसि जाइत अछि आ जबरदस्ती हृदयपर अधिकार कऽ लैत अछि। तेँ जे राजा एहि भ्रष्टकारी सभकेँ अपन राज्य में प्रवेश करए नहि दैत छथि, हुनका लेल समस्त सौभाग्य, सफलता आ यज्ञ-संपदासँ परिपूर्ण पृथ्वीदेवी आज्ञाकारिणी बनल रहैत छथि। नट, नर्तक, बाजीगर, मूक-अभिनेता, गवैया आ कुटनी सभ राज्यरूपी धानपर टिड्डीक झुंड जकाँ उमड़ि पड़ैत अछि; राजलक्ष्मीकेँ हुनका सभसँ बचाएब आवश्यक अछि। गवैया सभक मिलल-जुलल भीड़सँ गीतक प्रचण्ड कोलाहल उठैत अछि—मानो अनुपयुक्त वरक संग ब्याहल गेल लक्ष्मीक व्यथित क्रन्दन हो; अथवा गलत स्वर-पट्टीमे पढ़ल लक्ष्मी-स्तोत्रक उलझल बेसुरापन। महाकवि क्षेमेन्द्रक रचित “कलाविलास”क सातम सर्ग—“गायक-वर्णन”—समाप्त। कलाविलास ८. छल-कपट एही स्वभावक सोनार सभ सेहो होइत अछि—सोनाक कलामे एहन निपुण जे वस्तुकेँ गायब कऽ देत। दूरक कौड़ी आननिहार कल्पनाक बलपर ओ सभ अपन अपार समृद्धिसँ भरल घरक बीचोबीच दिवालिया होयबाक प्रदर्शन कऽ सकैत अछि। एहन योगी सेहो भेटैत छथि जे हिमक कष्ट सहबाक सामर्थ्यक दावा करैत छथि। गहन ध्यानमे लीन भऽ ओ सभ परमानन्दसँ भरल अवस्थामे ‘शून्यता-सिद्धि’ देखबैत छथि। ई दुष्ट सोनार सभ निरन्तर सभ सम्पत्तिक सार—समृद्धिमे आभूषण आ विपत्तिमे सुरक्षा बननिहार सोनाक परम तेज—लूटि लैत अछि। जेनाक अल्प स्पर्श मात्रसँ सदा अपवित्र दुष्ट अन्त्यज उच्च वर्णक लोककेँ छुबि हुनकर शुद्धता नष्ट कऽ दैत अछि, तहिना अरुचिकर दुष्ट सोनार अपन उतावला हाथसँ सोनाकेँ मलिन कऽ ओकर चमक मन्द कऽ दैत अछि। किनबाक समय हुनकर चालि ई होइत अछि जे मुलायम कसौटीपर फिक्का चमकबाली रेखा देखबैत छथि। बेचबाक समय लाभ कमायबाक चालि ई जे जाँच लेल खुरदुर कसौटीपर रेखा खिंचैत छथि। बाटक बटखरामे पाँच प्रकारक छल होइत अछि। मधुमोमक सरकारी मुहर जकाँ छापल रहितो ओ प्रायः बालूसँ बनल होइत अछि, आ आवश्यकतानुसार ओकरा पानिमे भिजाओल, सुखाओल वा गरम कएल जाइत अछि। धातु गलएबाक मूसाक छह दोष अछि—ओ दोहरा पात्र होइत अछि, दोहरा पेंदी रहैत अछि, सहजहि फाटि सकैत अछि, पघिलल सोना सोखि लैत अछि, ओकरामे तामाक जड़ान रहैत अछि, आ सीसा तथा क्षार-चूर्ण रोकि रखबाक व्यवस्था रहैत अछि। सोना तौलनिहार तराजूमे सोलह दोष होइत अछि—टेढ़ सूचक, असमान पलड़ा, छिद्रयुक्त तह, पारासँ भरल भाग, मोड़ल जा सकनिहार डाँड़ी, अटकनिहार काँटा, गाँठदार डोरी, गलत ढंगसँ बान्हल वा बहुत तन्तुबाली डोरी, उपयोगसँ पहिनेहि असन्तुलन, हावासँ डोलि उठनाइ, अत्यन्त हलुक वा अत्यन्त भारी होनाइ, खुरदुर पलड़ामे सोनाक धूरि अटकि रहनाइ, चुम्बकीय स्थिरता वा अस्थिरता। ई तँ शीत ऋतुक सोलह लक्षण जकाँ अछि—दिशा सभ प्रतिकूल भऽ जाइत अछि, गह्वर अगम्य होइत अछि, धरती फाटि जाइत अछि, मानो चारू कात पारा छिड़कल हो, तें भूमि कोमल भऽ जाइत अछि। बहुत भारी ओढ़ना सभ गाँठि कऽ, शरीरपर बेर-बेर असुन्दर ढंगसँ लपेटि, क्षीण हो वा स्थूल, आँधीजकाँ बहैत हावासँ काँपैत लोक आगाँ झुकि जाइत अछि; खुरदुर वस्त्रपर हिमक चूर्ण चिपकि जाइत अछि, आ निर्जीव वस्तु सेहो जीवित-जकाँ उड़ैत फिरैत अछि। हुनकर फूँक मारबाक छह ढंग अछि—कमजोर फूँक, बेचैन फूँक, बीचेमे रुकि जाएब, घरघराहटसँ फूँकब, थूक उछालैत फुफकारब आ सीटी-जकाँ आवाज करब। हुनकर आगिक सेहो छह रूप अछि—चारू कात ज्बला घेरल, धुआँयुक्त, गरजनिहार, भीतरहि-भीतर सुलगनिहार, चिनगारी छोड़निहार, आ आगूक कात तामाक धूरि राखल रहैत अछि। हुनकर व्यवहारक बारह लक्षण अछि—प्रश्न पूछब, विचित्र कथा सुनाएब, देह खुजाएब, अपन कपड़ाक भीतर देखब, समय बुझबाक लेल सूर्य दिस ताकब, बहुत हँसब, माछी उड़ाएब, अधीरता देखाएब, अपन लोकसँ बेर-बेर झगड़ब, पानिक घैल फोड़ब आ बारम्बार बाहर जाएब। गोबरक मन्द आगिमे नमकीन अम्ल लगाओलासँ बनल वस्तुक सतह कृत्रिम रंगक चकाचौंध चमकसँ दिपदिप करए लगैत अछि। धरतीक भीतर गुप्त रूपसँ चुम्बकीय तह राखल रहबाक कारण साधारण लोहक पलड़ाबला तराजूक सूचक खाली रहितो अचानक एना उछलैत अछि मानो पलड़ा भरल हो। आभूषण बनि चुकलाक बाद, जखन ओकर तौल होइत अछि, तखन सोनार ओहि नुकाओल सोनाक टुकड़ी निकालि लैत अछि जे लाखसँ जड़ाइ करैत काल भीतर राखि, छेदक बाटे गुप्त कएने छल। †जखन आगि जोर पकड़ैत अछि अथवा कसौटीपर काज चलि रहल होइत अछि, तखन हुनका लेल सोनाक एक टुकड़ी काटि लेब अत्यन्त सहज होइत अछि; अथवा ओहि सन चमकैत दोसर आभूषणसँ बदलि देबाक अवसर सेहो भेटि सकैत अछि।† †ओ सभ काज लेल पूरा वजनक सोना लैत छथि, मुदा देबामे घटा दैत छथि; ऊपरसँ चिक्कन चमक चढ़बैत छथि, समयपर वस्तु लेब असम्भव बनबैत छथि, आर सामग्री माँगैत छथि आ बहुत दुटप्पी बात करैत छथि। संक्षेपमे, ई हुनकर एगारह व्यावहारिक कला अछि।† हुनकर अन्तिम कला रातिमे चुपचाप सभ किछु लऽ कऽ भागि जाएब अछि। ई सोनार सभक चौंसठ कला अछि, जकर अनुमान बुद्धिसँ कएल जा सकैत अछि; मुदा हजार आँखिबला इन्द्र सेहो हुनकर दोसर गुप्त कला सभ नहि जनैत छथि। मनुष्यलोकक भय छोड़ि मेरु पर्वत बहुत दूर ऊँच उठल अछि। निश्चयहि ओकरा सोनार नामक चोर सभक लूटक भय छल। बहुत पहिने, असंख्य विशाल सुरंग बनबैत मुस सभ सोनाक सैकड़ो खानक शिरा खोदि-खोदि क्षरणसँ मेरु पर्वतक शिखरकेँ ढहबाक कगारपर पहुँचा देने छल। मुसक एहि समस्त सेनाक नखसँ खनल सुरंग सभ मेरुक नींवकेँ प्रचण्ड रूपसँ हिला देने छल। मुसक नखसँ उजाड़ल मेरु अत्यन्त सुन्दर देखाइत छल; उछिटल सोनाक धूरिक आवरणसँ ढाकल ओकर शिखर लालिमा लऽ कऽ चमकि रहल छल। ओकर चोटी टूटि गेल, पर्वत-पाँति, शिखर आ ढलान दरारि आ खोहसँ फाटि गेल; ई देखि सभ देवता भयभीत भऽ उठलाह जे कल्पक अन्त आबि गेल। ऋषिराज अगस्त्य दिव्य दृष्टिसँ एहि विपत्तिक परीक्षण कऽ सभकेँ कहलनि—“निश्चय, ई ओहि रात्रिचर ब्राह्मण-घाती सभ अछि जे देवताक संग युद्धमे नष्ट कएल गेल छल! “मुसक रूपमे फेर जन्म लऽ ई सभ मेरु पर्वतकेँ ढहाबए चाहैत अछि। अहाँ सभकेँ फेर ओकर विनाश करबाक चाही, कारण ओ सभ ऋषिक आश्रम सेहो नष्ट कऽ देने अछि।” ऋषिक ई वचन सुनि देवता सभ बिलक पाँतिकेँ धुआँसँ भरि देलनि आ ओहि विशाल मुस सभकेँ जरा देलनि, जे पूर्वजन्ममे सेहो शापसँ जरल छल। तकर बाद ई सोना-लुटेरा पृथ्वीपर सोनार बनि पुनर्जन्म लेलनि। प्रत्येक जन्ममे ओ सभ निरन्तर सोनाक धूरि खुरचि-खुरचि जमा करैत रहैत अछि। तेँ विष देनिहार, चोर वा डाकू नहि भेटलाक दशामे राजा सभकेँ सोनार सभपर बिना दया, बिना विराम कठोर दमन करबाक चाही। महाकवि क्षेमेन्द्रक रचित “कलाविलास”क आठम सर्ग—“सोनारक उत्पत्ति”—समाप्त। कलाविलास ९. ढोंग आ ठगी समुद्रसँ घेरल समस्त पृथ्वीक सतहपर छलक एक विशाल आवरण पसारल अछि—जेनाक मछुआ सभ जालक पाँति लगबैत अछि, तहिना धूर्त लोक बुद्धिहीन माछ-जकाँ मनुष्य लेल जाल बिछौने अछि। प्राण सभसँ अन्तिम आ परम सम्पत्ति अछि; मनुष्यक सभ प्रयास ओकरहि रक्षा लेल होइत अछि। जिनकर हाथमे ई प्राण सदा रहैत अछि, हुनका वेदक देवता—वैद्य—बुझू। ई भयानक वैद्य सभ विरह जकाँ शरीरकेँ जरबैत अछि; प्रचण्ड ग्रीष्म-दिन जकाँ बहुत पिआस लगबैत आ शरीर सुखा दैत अछि। हजार रोगीकेँ अपन औषध-मिश्रणसँ मारि, विभिन्न दवा सभक मात्रा बदलि-बदलि अपनहि शास्त्र बुझबाक प्रयास कएलाक बाद वैद्य प्रसिद्ध सफल चिकित्सक बनैत अछि। राशिचक्र बना कऽ, ओठ सिकोड़ि ग्रह सभक चिन्ता करबाक अभिनय कऽ, बहुत देर चुप रहि ज्योतिषी अन्ततः प्रश्नकर्ताक पुछल बातकेँ दोसर शब्दमे दोहरा दैत अछि। ज्योतिषी आकाशमे चन्द्रमाक संग विशाखा नक्षत्रक मिलनक गणना करैत अछि, मुदा घरमे ओकर पत्नी अनेक प्रेमीसँ रतिक्रीड़ामे आसक्त अछि—एहि बातसँ अनजान रहैत अछि। सोना बनौनिहार पहिने अपनहि सम्पत्ति असफल प्रयोगमे जरा कऽ राख कऽ दैत अछि। तकर बाद सोनाक पानी चढ़ेबामे निपुण भऽ धनिक रससिद्ध सभकेँ बरबाद करैत अछि। रससिद्ध डींग हाँकैत अछि—“हम शतवेधी पाराकेँ सिद्ध कऽ लेने छी, एतबे नहि, सहस्रवेधी पारा सेहो पूर्ण सिद्ध कऽ लेने छी।” मुदा ओ नाङट, झुरायल, क्षीण आ मैल-कुचैल रहैत अछि। कायाकल्पक ढोंगीक माथ तामाक बर्तन जकाँ टकला होइत अछि, वृद्धावस्थासँ ओकर देह सुखायल रहैत अछि, तथापि ओ टकला लोककेँ नव केश उगबाक कथा सुना कऽ ठकैत अछि। चमकैत चञ्चल आँखिबाली सुन्दर प्रेमिकाक लालसामे कामुक लोक बेल आदि सामग्रीक होम करैत अछि आ धुआँसँ अपनहि आँखि अन्हार कऽ लैत अछि। “आकाश-फूल प्राप्त करबाक चेष्टा करब तँ आकाशगामी होयबाक सिद्धि सहजहि भेटि जाएत; तान्त्रिक सभ कहने छथि जे मच्छरक हड्डीमे अनेक शक्ति रहैत अछि। “कृष्ण घोड़ाक लीदसँ बनल अंजन लगौने आकाशमे इन्द्रक काज देखाइत अछि; बेंगक चरबी शरीरपर मललासँ मनुष्य अप्सराक प्रिय बनि सकैत अछि।” एहन दाबी कऽ ठगक झुंड समस्त संसारमे निरन्तर आशाक हवा दैत अछि आ सभ प्रकारक सिद्धिक लोभमे पड़ल सैकड़ो मनुष्यकेँ नरकक खोहमे ढकेलि दैत अछि। प्रत्येक गलीमे वशीकरणक कोनो तथाकथित सिद्ध स्त्री सभकेँ ताबीज दैत फिरैत अछि, जखन कि ओकरा न तँ ओहि विद्याक जादुई जड़िक ज्ञान रहैत अछि, न मूल मन्त्रक। थोड़ेक दीक्षा पाओल आ अल्प योग सीखल अनेक गली-गुरु रोग जकाँ फैलैत, सरल लोकक धन आ स्त्री लूटैत अछि। “एकर हाथमे धन-रेखा तँ बहुत नमहर अछि, मुदा एकर पति आधा-बुद्धि अछि”—एना कहि हस्तरेखा देखनिहार कुलीन स्त्रीक कोमल हाथ दबबैत अछि। कुमारी तलवारक धारमे, अपन नहमे वा पानिमे अनेक प्रकारक लोक देखैत अछि, मुदा चोर पकड़ल नहि जाइत अछि—दैवज्ञ-जादूक निष्फलता एहेन अछि। ठग खूब खाइत-पिबैत अछि आ लोकक प्रशंसाक बीच बकबक करैत रहैत अछि; थोड़े धूप, बिना मन्त्रक, अपन नीच कुलक साथीपर ‘देवता चढ़ा’ दैत अछि। “नागार्जुनक ‘कक्षपुट’मे वर्णित अंजन धूपक धुआँमे बनाओल जाएबाक चाही। संयोगसँ ई जरि गेल!”—एहि बहानासँ दुष्ट दोसरक धन आगिमे झोंकि दैत अछि। यक्षिणीक पुत्र ओहि चोर सभकेँ बुझू जे मादक धूप बनबैत अछि; हुनकर प्रत्यक्ष फल दरिद्रता आ राजदण्ड अछि। “एक अत्यन्त धनी व्यापारी अपन पुत्रक बदला हमर आश्रित कन्याकेँ उत्तराधिकारी नियुक्त कएने अछि”—एहन कथा कहि दुष्ट एक कन्याक खर्चपर पेट भरैत अछि। अङ्ग-लक्षणक विशेषज्ञ सेहो सन्देहास्पद अछि। दोसरक कमजोर ठाम बुझनिहार ओ हृदयक चोर अछि। विरोधीक योजनानुसार बहीर वा मूक बनबाक अभिनय करैत ओ सोझाँ अबैत अछि। भस्मसँ पीयर पड़ल वेश्या, बूढ़ि सन्यासिनी वा मूर्ति लऽ कऽ चलनिहार गणिका—ई सभ कुलीन स्त्रीक धन आ सदाचार नष्ट करबाक लेल घूमैत रहैत अछि। “एक जवान धनिक विधवा अहाँ जकाँ दिव्य प्रेमीक आकांक्षा करैत अछि”—एना कोनो मूर्खसँ कहि दुष्ट ओकर धन खाइत रहैत अछि। भ्रष्ट कारीगर, शिल्पी आ दिन-मजूरी करनिहार जे काजमे बाधा उत्पन्न कऽ मनोरञ्जन करैत अछि, ओकरा समयक चोर बुझबाक चाही। कपटपूर्ण पासा, गलत गणना, हाथक सफाइ आदि मे निपुण पेशेवर जुआरी परदेशमे बिना चिन्हल घूमैत रहैत अछि। जे सम्बन्धी केवल भोजनक समय देखाइत अछि आ जुआ, मदिरा आ चरित्रहीन स्त्रीपर बहुत धन उड़बैत अछि, ओकरा घरक चोर वा गृह-पिशाच बुझबाक चाही। “धर्मशास्त्र बनाओल आ झूठ अछि; परलोक वास्तवमे के देखने अछि?”—जे एना कहैत अछि, ओकरासँ मदमत्त हाथी जकाँ डरबाक चाही। असह्य लोभसँ भरल जे लोक अधिक लाभक आशा करनिहारक ऋण झपटि लैत अछि, ओकरा लाभक चोर बुझबाक चाही। परदेशक उत्तम भोग-विलासक मोहक प्रशंसा कऽ लोककेँ पशु जकाँ बाहर लऽ जाएनिहार सभ देशक चोर अछि। जे ‘माननीय’क उपाधि धारण कएने अछि, न्यायालयरूपी समुद्रक बीच सभ किछु निगलनिहार बड़वानल अछि, आ हारल पक्षसँ मिलि निर्णयक परिणाम तय करैत अछि—ओ ज्ञानक चोर अछि। समृद्धिरूपी कमलक मधु पिबनिहार मित्र, जे दुःखक अप्रिय झोंकासँ उड़ि जाइत अछि आ भाग्यलताक आकर्षणमे घूमैत रहैत अछि, सुखक चोर अछि। जे मनोरञ्जक अनसुनी, असम्बद्ध सभ प्रकारक बात कहैत अछि, कारण दोसरक कएल काजकेँ ठीकसँ रूप नहि दऽ सकैत, ओ बकबकिया कर्ण-चोर अछि। जे मधुर आवाज आ चतुर वचनसँ दोषमे गुणक प्रशंसा कऽ विश्वास उत्पन्न करैत अछि आ मानो प्रतिस्पर्धी जगत्-व्यवस्था बना दैत अछि, ओ मर्यादाक सीमा लाँघनिहार अधर्मी चोर अछि। जे घोर दुष्ट अपन गुणक घोषणा करबामे तत्पर रहैत आ दोसरक गुण ढकबाक लेल पूरा बल लगबैत अछि, ओ गुणक चोर अछि; सरल-बुद्धि लोकपर ओकर प्रभाव चलैत अछि। राजकृपा प्राप्त जे दुष्ट ईर्ष्यासँ नाना प्रकारक चुगली कऽ दोसरकेँ राजकृपासँ वञ्चित करैत अछि, ओ जीविकाक चोर अछि। जकरामे शान्ति, संयम आ भक्ति नहि अछि, मुदा कठोर धर्मव्रत करबाक सनक पकड़ने अछि, ओ अपन दृढ़तासँ सज्जन सभकेँ दबा दैत अछि; ओ यशक चोर अछि। आदतन पेशाक चोर अनेक चतुर विनोद, परिहास आ प्रहसनसँ भरल भिन्न-भिन्न हँसीमे दिनभरि समय नष्ट करैत अछि। जे अपन सभ धन गँवा चुकल अछि आ आब दोसरक सम्पत्ति उड़ेबामे लागल अछि, जे निरन्तर वेश्यालयक प्रशंसा करैत बकबक करैत अछि—ओ दलाल होयबाक सन्देह उत्पन्न करैत अछि। अत्यन्त ‘निष्काम’ आयुक्त, जे सर्वोच्च पदक काज करैतो असाधारण पवित्रताक नामपर वेतन नहि लैत अछि, संयमरूपी पानिमे हिंस्र समुद्री माछ बुझि ओकरासँ दूर रहबाक चाही। दुष्ट घुमन्तू बिक्रेता बिना बोलौने घर-घर पहुँचैत अछि। ओ जे वस्तु देखबैत अछि, क्षणभरिमे विशिष्ट रत्न बनि जाइत अछि, चाहे ओ केवल काँचक टुकड़ी किएक नहि हो। चाटुकार, जे कियो खोहमे खसैत रहितो “वाह! वाह!” कहबाक लेल तैयार रहैत अछि, मधुर आवाजसँ सभ किछु लूटि लैत अछि आ विष जकाँ भीतर फैलि जाइत अछि। “राजा अहाँपर प्रसन्न छथि; ओ अहाँक अनेक गुणक यथार्थ मूल्य बुझैत छथि”—एहन गुप्त आश्वासन दऽ राजसेवक सभ सदा दोसर सेवकक धन झपटैत अछि। “स्वप्नमे हम लक्ष्मीदेवीकेँ देखलहुँ; हाथमे कमल लऽ ओ अहाँक घरमे प्रवेश कएलनि। हमर मासभरि उपवाससँ प्रसन्न भऽ, सामान्यतः संकोची लक्ष्मी हमरा कहलनि—‘हमर भक्त अहाँकेँ सभ किछु देत।’ तेँ हम अहाँ लग आएल छी।” एहन बहानासँ दुष्ट घर-घर सरल श्रद्धालु लोकक लाभ उठबैत अछि। नगरमे दंगा, यज्ञ, विवाहोत्सव वा एहन कोनो कारणसँ भीड़ जुटल हो तँ परिजनक वेशमे अपरिचित लोक भीतर घुसि मूल्यवान वस्तु उठा लैत अछि। सभ लोक मदिरा पिबैत अछि, मुदा ओ मदिराकेँ छुबितो नहि। राति जागि चिन्तामे डूबल रहैत अछि। अपन मनक करबाक प्रवृत्ति रहैत अछि आ कोनो साहसिक योजनाक जाल बुनने रहैत अछि। ओ उत्तर नहि दैत अछि; अथवा हकलाइत दबा आवाजमे उत्तर दैत अछि। चेहरा नुकबैत, नमहर साँस छोड़ैत, एकाएक काँपि उठैत अछि—ई चोरक चिन्ह अछि। जे असाधारण शुद्धताक माँग करैत आ घमण्डसँ हल्ला मचबैत अछि, ओ दुष्ट सन्देहक कारण आ भयावह कपटक स्रोत अछि। देखल गेल हो वा नहि, जे घटित बातकेँ अघटित आ कहल बातकेँ अनकहल बना दैत अछि, ओहो बिना पलक झपकौने—ओ मनुष्य लेल परम संकट अछि। जे दुष्ट बनावटी सरलता देखबैत, नपुंसक जकाँ स्त्रीक ढंगसँ बाजैत आ स्त्री सभक आसपास मँडराइत अछि, ओ घरक भीतर कामदेव अछि। जे कोषाध्यक्ष धन रहितो सदा आँखि नीचाँ कएने, शरीर आ वस्त्र मैल कएने रहैत आ कोषागारमे खेलैत-कूदैत अछि, ओकरासँ चोर-मुस बुझि डरबाक चाही। घरक संग लागल जे सेवक कृपापात्र बनि दिनभरि अन्तःपुरमे रहैत आ घरक नमहर-चौड़ा कथा सुनबैत अछि, ओकरा गुप्तचर बुझि सावधानीसँ दूर रखबाक चाही। जे दोसरकेँ निरन्तर एहन पापक काज करबाक लेल उकसबैत अछि जकरा लेल कठोर दण्ड भेटि सकैत अछि, ओ अपन शेष जीवन भयपूर्वक भोगबाक लेल समुद्र-जकाँ विपत्ति बाँधि लेने अछि। सरल लोकक सभ गुप्त व्यवहार देखि आ बिना कठिनाई रहस्य बुझि लेलाक बाद दुष्ट ओकरा मानो पाथरक पट्टपर लिखि दैत अछि। ओकर विनाश लेल दुष्ट निषिद्ध माल, राजाद्वारा रोकल धन, जाली कागज वा एहन किछु गुप्त रूपसँ राखि चुपचाप भागि जाइत अछि। जे व्यक्ति अपन खर्चपर अपन घरमे कोनो दुब्बर-दीन मनुष्यकेँ आश्रय दैत अछि, बादमे ओहि विषलिप्त छुरा आ फाँस लऽ कऽ चलनिहार साक्षात् यमक हाथसँ फिरौती देबाक लेल बाध्य होइत अछि। गर्भवती स्त्रीक सहायतासँ दुष्ट सभ लाजुक, कुलीन, शुद्ध आचरणक मर्यादा माननिहार पुरुषकेँ स्त्री-जकाँ विवश बना दैत अछि। पति परदेश गेल रहला पर दुष्ट ओकर सरल पत्नीकेँ क्रूर बनावटी सन्देश, नकली मुहर आ पहिने देखल पहचान-चिह्नक सहायतासँ ठकैत अछि। लोकक बीचोबीच सभ्य वस्त्र पहिरने, आभूषणसँ सजल निर्भीक ‘भद्र’ चोर बिना प्रयास निरन्तर चोरी करैत रहैत अछि। पकड़ल गेल तँ ‘मजाक’, नहि पकड़ल गेल तँ लाभ। लाखों मूल्यक अमानत चोराबनिहार ठग, समृद्ध परदेशमे अपन घर धनक घड़ा सभसँ भरि लेने बाद एक वर्षक भीतर गायब भऽ जाइत अछि। फोंफर सोनाक आभूषण आ उत्तम वस्त्र पहिरने छलिया सभ साझा शत्रुद्वारा राज्यच्युत राजकुमारक रूप धारण कऽ घर-घर सम्मान पबैत अछि। कोनो मूर्ख ठगसँ ‘शुभ’ बकरा आ देहाती साँढ़ किनैत अछि; मूल्यवान सौदा भेटबाक ओकर हर्ष अन्ततः दुःखमे पकैत अछि। उपेक्षा कएलापर गारि देनिहार आ प्रतिष्ठित लोकक समृद्धिसँ ईर्ष्या करनिहार जबरन धन वसूलनिहारक भय सँ निर्धन लोक सेहो पैसा देबाक लेल विवश होइत अछि। वास्तवमे निरर्थक भोजपत्रक गठरीकेँ माल बता कऽ दुष्ट गाड़ी सभसँ सजल विशाल व्यापारिक कारवाँ बनबैत, संसारभरि घूमैत आ हजारों धनी लोककेँ ठकैत अछि। सादा-संयत वस्त्र पहिरल ठग गङ्गा-तीर्थ जाएबाक घोषणा करैत अछि आ सरल लोकसँ हुनकर परिजनक अस्थि-विसर्जन करबाक नामपर धन लैत अछि। कारवाँक वेश्या निदाएल सरल लोकक चोगा चोरा लैत अछि; ओहि राति कोनो दुष्टसँ नकली सिक्का पाबि स्वयं ठकि जाइत अछि। दुष्ट कोनो बहीर वा मूक व्यापारीकेँ ओकर गोदाममे बन्द कऽ तुरन्त माल आ सोनाक ढेरी लऽ कऽ भागि जाइत अछि। ठग अपनाकेँ सर्वज्ञ देखबैत निकलैत अछि—किछु परिचयक बलपर, किछु दुस्साहससँ, किछु डींग हाँकिसँ, किछु झगड़ा आ मतभेदसँ। केवल पुस्तकक शीर्षक पढ़ि सीखल झूठकेँ जोर-जोरसँ सत्य बतबैत, वाद-विवादमे निपुण आ अलङ्कारमे वीर दुष्ट दोसर चारिमुख ब्रह्मा जकाँ प्रतिष्ठित होइत अछि—मानो झूठक शक्तिशाली खण्डनकर्ता, निर्मल कमलदलपर बैसल विद्वान, शास्त्रज्ञ आ विश्व-सृष्टिमे वीर हो। घर सभमे अपन दलाल बैसा कऽ, जे पूरा देहमे हिंसक कम्पनक अभिनय करबाक लेल तैयार रहैत अछि, महाठग ‘वेध-दीक्षा’क गुरु बनि आनन्द करैत एतय-ओतय घूमैत अछि। गुरु सभक सोझाँ दुष्ट घोषणा करैत अछि—“हम श्रीपर्वतसँ आएल छी, जतय सय वर्ष पुरान हरड़ खएने छी। हमरा शकुनिक स्मृति अछि।” संक्षेपमे कहल ई छलक चौंसठ कला अछि। ठग सभक लाखों उपाय के जानि सकैत अछि? महाकवि क्षेमेन्द्रक रचित “कलाविलास”क नवम सर्ग—“विविध दुष्टक वर्णन”—समाप्त। कलाविलास १०. सद्गुण ढोंगी सभक ई चालि अवश्य बुझबाक चाही, मुदा स्वयं ओकर अनुसरण नहि करबाक चाही। बुद्धिमान लोक अनेक सद्गुणमय कलाक माध्यमसँ अपन कल्याण खोजैत अछि। धर्मक श्रेष्ठ कला ई अछि—जीवमात्रपर दया, परोपकार, दान, क्षमा, सद्भाव, सत्य, सन्तोष आ शान्ति। अर्थक कला अछि—अविराम उद्योग, नियमितता, सञ्चय, व्यापारक ज्ञान, उचित समयपर बिक्री, दक्षता, धैर्य आ स्त्रीपर अविश्वास। कामक कला अछि—सुन्दर वस्त्र, कोमलता, शिष्ट सौन्दर्य, उत्तम गुण, स्नेह, विश्वास, क्रीड़ाभाव आ प्रियजनक मन बुझबाक क्षमता। मोक्षक कला अछि—विवेकमे प्रेम, शान्ति, तृष्णाक उन्मूलन, आत्म-सन्तोष, आसक्ति-त्याग, आत्मामे लीनता, समभाव आ परम प्रकाश। संसारक छल बुझनिहार बुद्धिमान लेल धर्म, अर्थ, काम आ मोक्ष—एहि चारि पुरुषार्थक ई बत्तीस कला अछि, जकर अभ्यास क्रमसँ वा एके बेर कएल जा सकैत अछि। ईर्ष्या छोड़ब, मधुर वचन, धैर्य, क्रोधसँ मुक्ति आ दोसरक धनसँ विरक्ति—ई सुखक पाँच जादुई कला अछि। सच्चरित्रताक सात मूल कला अछि—सज्जनक सङ्गति, इन्द्रिय-विषयक इच्छापर विजय, पवित्रता, गुरुक सेवा, सदाचार, निर्मल विद्या आ सुयश प्राप्त करबाक प्रयास। गरिमा, चरित्र, बुद्धि, निश्चय, राज्यनीति, गुप्त अभिप्राय प्रकट करनिहार सङ्केतक ज्ञान, साहस, विश्वासपात्र मित्र, कृतज्ञता, गोपनीयता, उदारता, भक्ति, विधिसम्मत अधिकार, मित्र-प्राप्ति, दया, लज्जा आ आश्रितजनपर कृपा—ई शक्तिक सत्रह कला अछि। संकोच, दृढ़ता आ याचना नहि करब—ई तीन कला सम्मानक जीवन अछि। बुद्धिमानकेँ एहि चौंसठ कलाकेँ अपन बनएबाक चाही। अपनासँ अधिक शक्तिशाली विरोधी भेटए तँ हटि जाएब वा नत होएब; बलपूर्वक आक्रमण हो तँ प्रतिरोध देखाएब; पीड़ितक प्रति धर्मपूर्ण व्यवहार, दुःखमे धैर्य, सुखमे विनम्रता; धनक साझेदारी, सज्जनक प्रति अनुराग, सलाह सन्दिग्ध हो तँ स्पष्ट विवेक, आ निन्दनीय लोकसँ विरक्ति—ई दस उपचारात्मक कला अछि। एहि संसारमे सत्य सभमे गुरुक वचन यशस्वी अछि; कर्म सभमे गौ, ब्राह्मण आ देवताक पूजा; महापाप सभमे लोभ; दुःखक कारण सभमे क्रोध। समस्त गुणमे बुद्धि, विशाल सम्पत्तिक गरिमा सभमे प्रतिष्ठा, दुःख सभमे दासत्व, घन फाँस आ कालसर्प सभमे आशा। रत्न-भण्डार सभमे दान, सुखलोक सभमे शत्रुतासँ मुक्ति, सम्मान मिटौनिहार सभमे भीख, शापजनित तपस्या सभमे दरिद्रता। यात्रा-पाथेय सभमे धर्म, मुखरूपी कमल शुद्ध करनिहार सभमे सत्य, रोग-महामारी सभमे दुर्व्यसन, घरक समृद्धि नष्ट करनिहार सभमे आलस्य। प्रशंसनीय वस्तु सभमे निष्कामता, मधुर वस्तु सभमे प्रिय वचन, अभेद्य अन्धकार सभमे अहङ्कार, हास्यास्पद वस्तु सभमे कपटपूर्ण धर्माचार। पवित्रता सभमे द्वेषक अभाव, कठिन व्रतसँ लादल नियम सभमे दृढ़ता, अप्रिय कर्म सभमे चुगली, नीच कर्म सभमे दोसरक जीविका काटब। पुण्यक काज सभमे करुणा, श्रेष्ठ पुरुषक लक्षण सभमे कृतज्ञता, मूर्ख विचार सभमे छल, नरक-पतनक कारण सभमे अकृतज्ञता। नुकायल चोर सभमे कामदेव, सम्बन्धीमे फूट करनिहार सभमे स्त्रीक वचन, चाण्डाल सभमे क्रूर मनुष्य, कलियुगमे जन्म लेल लोक सभमे शव-साधक। रत्नदीप सभमे शास्त्र, दीक्षा सभमे शिक्षा, कठोर विष सभमे प्रेम, फैलैत दाद-कुष्ठ सभमे वेश्याप्रेम। गृह-सम्पत्ति सभमे पत्नी, परलोकमे सहायता करनिहार सम्बन्धी सभमे पुत्र, सैकड़ो काँटा सभमे शत्रु, कुल-नाशक सभमे कुपुत्र। सुन्दर वस्तु सभमे यौवन, भव्य ठाठ-वस्त्र सभमे रूप, कष्ट सभमे वृद्धावस्था, मृत्युतुल्य यातना सभमे रोग। सौभाग्य सभमे राज्यसत्ता, आनन्द सभमे पुत्र-जन्म, उत्साहवर्धक वस्तु सभमे आत्मसम्मान, कर्मकाण्ड आ धर्ममे अनुरक्त लोक लेल परम्परागत आचार। राज्य सभमे सन्तोष, सम्राटक वैभव सभमे सत्सङ्ग, सुखौनिहार वस्तु सभमे चिन्ता, खोखर गाछमे सुलगैत आगि सभमे घृणा। अन्तरङ्ग विश्वास सभमे सौम्यता, अमूल्य भोग सभमे स्वाधीनता, रोग सभमे आत्महीनता, पानिविहीन गुप्त इनार सभमे कपट। निर्मल वस्तु सभमे निष्कपटता, चुन्नल रत्नक मुकुट सभमे लज्जा, दुराचार सभमे जुआ, आकर्षक पिशाच सभमे स्त्रीसँ पराजय। रत्नजड़ित कङ्कण सभमे त्याग, चमकैत रत्नयुक्त कुण्डल सभमे विद्या, अनिश्चितता सभमे दुष्टसँ मित्रता, निष्फल प्रयत्न सभमे दुष्टक सेवा। उद्यान सभमे परमानन्द, अमृत-वृष्टि सभमे मित्रक दृष्टि, सहज उपलब्ध वस्तु सभमे सत्यक आनन्द, गुण-विवेक नष्ट करनिहार सभमे मूर्खक सभा। फलदार गाछ सभमे कुटज, पूर्वकर्मक फल सभमे सौभाग्य, साधन सभमे राजकुल, स्वभावतः कपटी वस्तु सभमे स्त्रीक हृदय। प्रशंसनीय वस्तु सभमे सामञ्जस्य, चन्दनादि लेप सभमे सद्गुणक अनुराग, दुःखक कारण सभमे पुत्री, दयाक पात्र सभमे मूर्ख। शुभ गति सभमे धन, यशक मूल सभमे लोकप्रियता, प्रेत सभमे मदिरा, हाथीक वनमे यक्ष सभमे शिकार। आरोग्यवर्धक औषध सभमे शान्ति, तीर्थयात्रा सभमे आत्मानन्द, पुण्यहीन सभमे शिकारी, श्मशान सभमे व्यभिचारी। स्त्रीक रक्षा-उपाय सभमे विवेक, महान पराक्रम सभमे इन्द्रिय-विजय, क्षय-रोगक सैकड़ो रूप सभमे ईर्ष्या, अपयशपूर्ण मृत्यु सभमे बदनामी। आशीर्वाद सभमे माता, शुभकर्मक उत्सवक शिक्षा सभमे पिता, तीक्ष्ण बाण सभमे हत्या, चमकैत उस्तरा-जकाँ शस्त्र सभमे प्राण-नाड़ी काटब। क्रोध शान्त करनिहार सभमे विनय, दुर्लभ माँग सभमे मित्रता, मार्गदर्शक सिद्धान्त सभमे ईश्वर-भक्ति, सुखक पथ सभमे युद्धभूमिमे मृत्यु। प्राप्तव्य वस्तु सभमे पुण्य, उज्ज्वलतम प्रकाश सभमे ज्ञान—जे सभ मनुष्य लेल सर्वाधिक बहुमूल्य अछि। एहि समस्त कला-सङ्ग्रहमे निपुण, सभ वस्तुक सत्य बुझनिहार व्यक्तिकेँ संसारमे अनुपम मानबाक चाही, जेनाक समस्त वर्णमे ब्राह्मण। भाग्यदेवी केवल ओहि लोकक प्रयासपर स्पष्ट प्रसन्नता देखबैत छथि जे एखन कहल गेल सौ कलाकेँ जनैत छथि—जकर फल सौभाग्य वा दुर्भाग्य दुनू भऽ सकैत अछि। एना कहि मूलदेव उचित विधिसँ अपन शिष्य सभकेँ विदा कएलनि आ किरणक गुच्छासँ खिलल रातिक शेष भाग अपन महलमे बितौलनि। ई “कलाविलास” सज्जन सभकेँ प्रिय हो—ई विनोदसँ भरल, विस्तृत मुस्कानक कलासँ प्रसन्न, सभ स्वभावक भीतरी क्रियाक उज्ज्वल दीप, शिक्षाप्रद कथासँ लोककेँ आनन्द दैत उपदेशात्मक रचना अछि। क्षेमेन्द्रक प्रतिभारूपी समुद्रसँ प्रकट ई “कलाविलास” चन्द्रमा जकाँ सदैव सज्जनक मनकेँ आनन्दित करैत रहए। महाकवि क्षेमेन्द्रक रचित “कलाविलास”क दशम सर्ग—“समस्त कलाक वर्णन”—समाप्त। नीलकण्ठ कलियुग-विडम्बना पण्डित सभामे विजय चाहैत छी तँ नहि डरू, ध्यान नहि दिअ, प्रतिपक्षक तर्क सुनू तक नहि—तुरन्त ओकर खण्डन कऽ दिअ! विचलित नहि होएब, निर्लज्जता, विरोधीक अवहेलना, उपहास आ राजाक प्रशंसा—ई पाँच विजयक आधार अछि। निर्णायक विद्वान नहि हो तँ जोर-जोरसँ चिचिया कऽ जीतल जा सकैत अछि। विद्वान हो तँ केवल पक्षपातक सङ्केत कऽ दिअ—“लोभ” प्रतिज्ञा अछि, “धन” साध्य अछि, “पुरोहित” उदाहरण अछि, “निजी लाभ” निष्कर्ष अछि; ई भेल शुद्ध न्याय-पद्धति। विनम्र ज्ञानार्थीकेँ सत्यपर बहुत काल विचार करए पड़ैत अछि; पद-प्रतिष्ठाक इच्छुककेँ लज्जा छोड़ि भारी हल्ला मचएबाक चाही। मुख्यतः ग्रन्थ रचि आ अध्यापन कऽ प्रसिद्धि भेटैत अछि; सम्भव अछि जीवनक अन्त धरि एहि उपायसँ सच्चा विद्वत्ता सेहो प्राप्त भऽ जाए—अथवा नहि। एहि पृथ्वीपर मूर्खक प्रशंसा के करत? ओ अपन रचनाक प्रशंसा स्वयं नहि करत तँ सुखी कोना होयत? “आगाँ पढ़ू! समय कम अछि। अगिला भागमे बात स्पष्ट भऽ जाएत”—एहन शिक्षण-पद्धतिमे कोनो ग्रन्थ कठिन कोना रहि सकैत अछि? साधनहीनता, अत्यधिक श्रद्धा आ ज्ञानक केवल बाहरी रूपसँ सन्तोष—शिष्यमे ई तीन गुण मूर्ख शिक्षक लेल वरदान अछि। मन्त्र-तान्त्रिक जँ हमर बुद्धि कोनो शास्त्रमे कनेको प्रवेश नहि कऽ सकए, तँ हम सदा मन्त्र-तान्त्रिक, योगी वा तपस्वी बनि सकैत छी। सिद्धि तुरन्त भऽ जाए तँ मन्त्र-तान्त्रिक प्रसिद्ध होइत अछि; देरि हो तँ महँग अनुष्ठानक भविष्यवाणी कऽ धन कमबैत अछि। मन्त्र-तान्त्रिक निश्चय धन्य अछि, कारण समृद्धक सुख आ दीनक दुःख—दुनूसँ ओकर जीविका चलैत अछि। तान्त्रिक अपन अज्ञानमे चुप रहए अथवा विचित्र व्यवहार अपनाए, तँ ओकर महिमा निश्चित अछि। ज्योतिषी ग्रहक ‘चर’ अर्थात् गतिसँ प्राप्त सूचना हुनका लेल अनिवार्य अछि, तेँ ज्योतिषी ‘चर’ अर्थात् गुप्तचर सभसँ पूछिकऽ राजाकेँ भविष्यवाणी सुनबैत अछि। गर्भक विषयमे पूछल जाए तँ ज्योतिषी पितासँ “पुत्र” आ मातासँ “पुत्री” कहि विजय प्राप्त करैत अछि। आयु पुछलापर दीर्घायु कहैत अछि। जीवित बचल लोक ओकरासँ चमत्कृत रहत; मरल लोक ओकरासँ हिसाब के माँगत? ज्योतिषीकेँ कहबाक चाही जे प्रत्येक वस्तुक दू पक्ष अछि, प्रत्येक घटना दू समय-सीमाक भीतर होइत अछि, आ सभ किछु बदलैत बुझाइत अछि। निर्धनकेँ धन-लाभ आ धनीकेँ आरो अधिक धनक भविष्यवाणी करनिहार ज्योतिषीक लोक सदैव स्वागत करत। सयक अनुमानित लाभपर ज्योतिषीकेँ सुपारी भेटैत अछि, हजारक अनुमानित लाभपर भोजन, आ असफल भविष्यवाणीपर अनन्त निन्दा। समुद्रक किनार धरि समस्त पृथ्वी छानि लिअ, कतहु एक हाथ भूमि सेहो ज्योतिषीसँ रिक्त नहि भेटत। कियो तिथि जनैत अछि, कियोग्रह, कियो नक्षत्र; जे तीनू जनैत अछि, ओ साक्षात् वाचस्पति अछि। शकुन बतौनिहार, स्वप्नक अर्थ कहनिहार आ पुरोहित—ई तीन ज्योतिषीक जन्मजात शत्रु बनाएल गेल अछि। वैद्य पूर्ण स्वस्थ आ मरणासन्न रोगीसँ वैद्यकेँ कोनो लाभ नहि; वैद्य रोगक भ्रममे पड़ल आ पुरान रोगसँ पीड़ित लोकपर फलैत-फूलैत अछि। रोगीकेँ ने बहुत आशा देबाक चाही, ने बहुत भय। पहिल दशामे चिन्ता नहि रहत, तेँ पैसा नहि देत; दोसर दशामे आशा नहि रहत, तेँ पैसा नहि देत। वैद्य मनमाना औषध लिखैत अछि, मुदा कठिन आ अल्प आहारपर जोर दैत अछि। स्वास्थ्य घुरि आए तँ वैद्यक महिमा; नहि घुरए तँ रोगी आहार-विधान नहि मानलक। रोग-विज्ञान, निदान, पथ्य-अपथ्य आ चिकित्सा—रोगीक घरक स्त्री सभ वैद्यकेँ सभ किछु सिखा देतीह। महामारी फैलैत अछि, लोक मरैत अछि, तखन अन्ततः वैद्य रोगक प्रकृति सीखैत अछि। पहिने घर देखए जाएब पर, बीचमे दवा लेल, आ अन्तमे कृतज्ञताक नामपर—वैद्य प्रत्येक अवस्थामे शुल्क माँगैत अछि। धनलोभी वैद्य जखन अन्ततः कोनो रोगी पकड़ि लैत अछि, तखन ओकर दू सह-उत्तराधिकारी प्रकट होइत अछि—ज्योतिषी आ मन्त्र-तान्त्रिक। रोगक आरम्भमे रोगी वैद्यपर कृपा देखबैत अछि; बीचक अवस्थामे किछु धन दैत अछि; स्वास्थ्य घुरैत ओकर रुचि घटि जाइत अछि; रोगमुक्तिक स्नानक बाद वैद्य अप्रिय व्यक्ति बनि जाइत अछि। कवि ज्योतिष, मन्त्र-तन्त्र, चिकित्सा आ चाटुकारिताक कला—प्रत्येक अलग-अलग लाभदायक अछि, मुदा एक व्यक्ति मे दू वा तीन गुणक मिलन दुर्लभ अछि। बेइमानी आ चाटुकारिताक महान योग धनक सूचक अछि; ईमानदारी आ विद्वत्ताक योग दरिद्रताक ओर लऽ जाइत अछि। कायरता, असभ्यता, लोभ आ विवेकहीनता—एक मुट्ठी चाउरक मजदूरीपर कवि सभ किछु मेटा सकैत अछि। प्रशंसा लेल तैयार कविकेँ कारणक आवश्यकता नहि; जखन ओ ककरो प्रशंसा नहि करैत अछि, तखनो ओकर जीह फड़फड़ाइत रहैत अछि। कवि पहिनेसँ प्रशंसित वस्तुक प्रशंसा करैत अछि; वास्तवमे गुणक आदर नहि करैत। एक माछरिक नाम “भँवरा” राखि देल जाए, तकर वर्णनमे कविक कतेक परिश्रम व्यर्थ जाएत? “अनुपम” कविता ओ अछि जे गाँव, घोड़ा वा हाथीक बदलामे रचल जाए; अवसर आए तँ भोजन, वस्त्र वा किछु पान-सुपारीक बदलामे सेहो। सुन्दर काव्यरचनामे सजाओल “वाणी” नामक दोसर ब्रह्मकेँ कियो बेचैत अछि, कियो व्यर्थ गँबैत अछि। ई अभागल सभ वाणीदेवीकेँ प्राप्त कऽ हुनकर दुरुपयोग तथाकथित वीरक स्तुति लेल करैत अछि; ई तँ कामधेनुकेँ सेहो हर जोतबाक लेल लगा देत! दुष्टक प्रशंसा, बकबकसँ प्रत्येक बातकेँ मरोड़ब, आ कामनाकेँ परम सिद्धान्त कहब—एहन कवि मुक्ति कोना पाओत? मुदा जँ विषय शिव छथि, तँ कोनो रचना, वर्णन वा ध्वनिपर एकाग्र ध्यान समाधिसँ श्रेष्ठ अछि। सम्बन्धी पत्नी, ओकर बहिन, ओकर माता-पिता आ पत्नी-क भाइ—कलियुग पुरुष लेल ई पाँच अतिरिक्त प्राण बनौने अछि। जमाय, भाञ्जा, मामा आ ससुरारिक लोक गृहस्थक घरमे ओकरा बिना बुझने मुस जकाँ भोजन करैत अछि। माता मामाक शक्ति अछि, पुत्री जमायक शक्ति, पत्नी ससुरक शक्ति, आ अतिथि अपनहि बलपर बलवान अछि। जमाय जाबत जवान अछि, पत्नी-क भाइ कपटी रहैत अछि; जमाय बुझए लगैत अछि तँ ओ सोझ बनैत अछि; जमाय पूर्ण बुझि जाइत अछि तँ ओ भागि जाइत अछि। पत्नी जेठ पुत्री हो, पत्नी-क भाइ बालक हो, सास मनमानी करनिहारि हो आ ससुर परदेशमे हो—तँ जमाय लेल बाट सहज अछि। एकहि बेरक यात्रामे पुत्री गहना, वस्त्र, बर्तन आ बच्चाक खेलौना लऽ कऽ घर लूटि विदा होइत अछि। पत्नी कहैत अछि जे ओकर माता-पिता सूखल टुकड़ा सेहो कने-कने खाइत छथि, मुदा पतिक माता-पिता पेटू छथि, दूध पिबैत छथि, सम्भवतः चोर सेहो छथि। बहुत बच्चाबाली दू पत्नी आ पति-विहीन बहिन—गृहस्थ लेल ई “निरन्तर कलह” नामक योग अछि। दू पत्नी, अनेक बच्चा, दरिद्रता, रोग, बूढ़ माता आ पिता—प्रत्येक नरकसँ खराब अछि। महाजन ओकर स्मरण होइतहि हाथ-पएर ढील पड़ि जाइत अछि; दर्शन होइतहि प्राण सूखि जाइत अछि। अहा! “महाजन” नामक प्रेत कतेक शक्तिशाली अछि! मृत्यु सेहो प्राणीक अन्तिम दिनक प्रतीक्षा करैत अछि, मुदा महाजन समयक बन्धन नहि मानैत अछि। ओकर मुँहमे दाँत नहि देखाइत अछि, मुट्ठीमे फाँस नहि, तथापि महाजन देखाइतहि हृदय ऐंठि उठैत अछि। दरिद्रता शत्रुक विरोधमे सन्धि उपाय अछि; प्रत्येक रोगक दवा अछि; मृत्यु टारबाक लेल मृत्युञ्जय मन्त्र अछि; मुदा दरिद्रताक विरुद्ध किछु नहि। दरिद्रता लोककेँ घर-घर घूमबाक बल दैत अछि, गरमी-ठण्ड सहन योग्य बनबैत अछि आ जठराग्नि प्रज्वलित करैत अछि—दरिद्रता परम औषध अछि। हकलाइत वचन, झुकल आँखि, डगमगाइत पएर—राजदण्ड जकाँ दरिद्रता मनुष्यकेँ भीख माँगबाक लेल प्रेरित करैत अछि। पूर्ण अभावसँ भरल लोक राजाक अपमान पचा सकैत अछि, मर्यादासँ बाहर बात पचा सकैत अछि, आ अन्तमे पाथर सेहो पचा सकैत अछि। ओकरा लेल ने चोर अछि, ने चुगलखोर, ने उत्तराधिकारी, ने राजा। यथार्थ दृष्टिसँ देखल जाए तँ दरिद्रता राजत्वसँ श्रेष्ठ अछि। धनी सम्पत्तिमे थोड़ा वृद्धि अहङ्कार बढ़बैत, चोरक उत्साह बढ़बैत आ उत्तराधिकारीकेँ निर्भीक बनबैत अछि। जे धनी सदा विद्वानकेँ तुच्छ बुझैत अछि, भाग्य रूठलापर स्वयं उपहासक पात्र बनैत अछि। चाटुकारिताकेँ सत्य बुझब, अपनाकेँ देवता मानब, साधारण लोककेँ कीड़ा बुझब—नवधनिक होयबाक ई परिणाम अछि। सुनि सकितो ओ पूछैत अछि, देखि सकितो नहि बुझैत अछि; धनी उपहासकेँ सेहो प्रशंसा मानि लैत अछि। परस्पर गुप्त साँठगाँठ कएने आश्रित सभ धनक मदमे अन्हार लोकपर बच्चा, पागल वा भूत चढ़ल मनुष्य जकाँ खुलिकऽ हँसैत अछि। जकर प्रशंसा ओकरा करबाक चाही, ओही ओकर प्रशंसा करैत अछि; जकर सेवा ओकरा करबाक चाही, ओही ओकर सेवा करैत अछि; तथापि धनीकेँ ने भय अछि, ने लज्जा। ग्रह-पिशाचक आवेश क्षणभरि रहैत अछि, मदिराक नशा एक पहर, मुदा मूर्ख धनक नशामे शरीर रहबाक समय धरि डूबल रहैत अछि। धनदेवी एक मास, सम्भवतः आधा मास सहायक बनि फेर हाथ खिंचि लैत छथि; मुदा हुनकर अनल परिवर्तन लहसुनक दुर्गन्ध जकाँ सदा बनल रहैत अछि। कुन्दा नामक तृणक सूजन गला सुन्न करैत अछि, सुपारी हृदयकेँ जड़ करैत अछि; मुदा धनक मूर्च्छा पूरा शरीरकेँ, एतबे नहि पत्नी-बच्चाक चेहराकेँ सेहो प्रभावित करैत अछि। जे व्यक्ति कहियो धनी छल वा एखन धनी अछि, ओकरा उन्माद होएब बुझाइत अछि; मुदा ई कुष्ठ वा मिरगी जकाँ पूरा परिवारमे कोना फैलैत अछि? हाथमे पाँच-छह छोट सिक्का आबितहि शास्त्रपर व्याख्यान देबाक अधिकार, विद्वानकेँ भूसा बुझबाक साहस आ अपन जाति बिसरबाक छूट भेटि जाइत अछि। धनी आश्रितक पालन करए, भिखारीकेँ दान दे; मुदा जखन ओ स्वयं कोनो उपकार माँगबाक मुद्रा बनबैत अछि, तखन कियो ओकर उपस्थिति सहन नहि करैत अछि। चुगलखोर निश्चय संसारक धनक भार केवल चुगलखोर सभ उठौने अछि; नहि तँ ओकरा हलुक करबाक लेल ओ सभ असगरे एतेक परिश्रम किएक करैत? राजा चुगलखोरकेँ ओकर परिश्रमक अनुरूप पुरस्कार देत? मृत्यु ओकर दू, बल्कि तीन गुना अधिक सत्कार करत। “गो-कर्ण” आ “शुभ-कर्ण” नामक तीर्थमे मन्त्र फुसफुसाएलासँ पूर्व पाप नष्ट होइत अछि; राजाक कानमे फुसफुसाएलासँ एक्कहि बेर सभ कर्म नष्ट भऽ जाइत अछि। हुनका अपन काजमे रुचि नहि, कियो मार्गदर्शन नहि कऽ सकैत अछि; ओ दोसरक काजमे हस्तक्षेप करैत अछि—दुष्ट आ सज्जन दुनू। स्वयं किछु नहि चाहैत, ककरो प्रेरणासँ नहि चलैत, आ ‘उच्चतम उद्देश्य’सँ काज करैत अछि। घरपर बैसल गिद्ध भविष्यक विपत्तिक शकुन बुझाइत अछि; मुदा घर लग मँडराइत दुष्ट तुरन्त विनाशक सूचना दैत अछि। कृपण धार्मिक आचारमे कृपण अल्पाहार-व्रत पसन्द करैत अछि; चिकित्सामे शरीरकेँ भूखल रखनाइ; यज्ञमे धीमा आवाजमे मन्त्र पढ़नाइ। जेनाक निर्धन धनीसँ डरैत अछि—“ओ की कहत?”—तहिना कृपण निर्धनसँ डरैत अछि—“ओ की माँगत?” कृपण अतिथि-सत्कार सम्बन्धी शास्त्रीय उपदेशकेँ प्रत्यक्ष रूपसँ अनुभव करैत अछि, कारण ओकरा दानक प्रत्येक ग्रास मेरु पर्वत जकाँ विशाल देखाइत अछि। “कोषाध्यक्ष” नामक राक्षस स्वामी एलापर दैत अछि; “कृपण” नामक राक्षस ककरो किछु देबाक नहि चाहैत अछि। दानीसँ पहिने याचक विनती करैत अछि, फेर याचकसँ दानी विनती करैत अछि। कर्ता-कर्मक एहि उलटफेरमे कतेक उतार-चढ़ाव! “हम जीवित नहि रहब तँ हमर धनक रक्षक कियो नहि रहत”—एना सोचि कृपण कोनो तरहेँ अपनेकेँ भोजन करबैत अछि। दिन-दिन प्रस्थानक कगारपर पहुँचि ओ नाना बाधा गनबैत फेर भीतर आबि टिकि जाइत अछि—मानो प्रवास नमहर करबाक इच्छुक अतिथि। धर्मध्वजी विद्वानकेँ एक, कविकेँ दस, नटकेँ सय, पाखण्डी धर्मध्वजीक झुंडकेँ हजार देल जाइत अछि, मुदा शास्त्रनिष्ठ ब्राह्मणकेँ किछु नहि। दलालसँ याचना कएलाक बाद अत्यन्त तपस्याक प्रदर्शन करबाक चाही। जाबत कपट नुकायल रहैत अछि, सम्पत्ति प्राप्त होइत रहैत अछि। “एक कात सभ शास्त्र, दोसर कात तुलसीक काठ”—ई केवल अलङ्कार अछि; वास्तवमे तुलसी सर्वोपरि अछि। तुलसीक गुण गनबैत वाग्भट दू गुण बिसरि गेलाह—समस्त जगतकेँ भ्रमित करबाक शक्ति आ धन देबाक क्षमता। लँगोटी, भस्मक लेप, पवित्र दर्भ, रुद्राक्षक माला, मौन-व्रत आ एकान्तमे बैसब—ई मूर्खक जीविकाक छह साधन अछि। तीर्थमे निवास, प्रसिद्ध किन्तु मृत गुरु, आ एके शिक्षाक बारम्बार आवृत्ति—लाभ कमाबए चाहनिहार लोकमे ई सभ मूल्यवान मानल जाइत अछि। मन्त्र गलत हो तँ “परम्परा” कहल जाइत अछि; विधिमे त्रुटि हो तँ “प्रयोग-पद्धति”; आ आचरण अनुचित हो तँ “स्थानीय प्रथा”—विरोध करनिहारकेँ ई प्रभावी उत्तर अछि। सभ धर्मक आचरण एना करबाक चाही जे बहुत लोक देखए, दाताकेँ सूचना दे; निरर्थक किछु नहि करू। हाथमे सदा माला-झाँप, बीच-बीचमे आँखि मूनब, “सभ किछु ब्रह्म अछि” कहि बकबक करब—तुरन्त विश्वास उत्पन्न करबाक ई कारण अछि। दुपहरि धरि नदीक कात मँडराएब, सार्वजनिक भीड़मे देवपूजा करब आ सदा धार्मिक वेश पहिरब—ई पाखण्डक जीवन अछि। दर्शकक भीड़ हो तँ दैनिक अनुष्ठान बहुत नमहर; कियो नहि देखए तँ सभ किछु छोट। जे इच्छानुसार आनन्दक नोर बहा सकैत अछि आ रोमाञ्च उत्पन्न कऽ सकैत अछि, ओकरा दोसर साधनाक की आवश्यकता? सभ राजा ओकर सेवक अछि। दुष्ट दण्ड देलासँ ओ आरो खराब होइत अछि, दया कएलासँ सेहो। तेँ दुष्ट लेल एकमात्र नियम अछि—दूर निर्वासन। किछु नहि देब आ अल्प देब दुष्टक क्रोधकेँ कने उकसबैत अछि; पेटभरि देब ओ अपन अधिकार मानैत अछि, आ देनाइ बन्द होइतहि पागल कुकुर जकाँ भऽ जाइत अछि। दुष्टसँ व्यवहार नहि करब श्रेष्ठ; परिचय ओकर ईर्ष्या जन्मबैत अछि। ओकर सन्तानसँ विवाह-सम्बन्ध केवल विनाश दैत अछि। कुलीनता, अज्ञान, चुगली आ दरिद्रता—ई चारि एकहि व्यक्तिमे मिलि जाए तँ “क्षितिजकेँ प्रणाम”, अर्थात् जतए धरि भागि सकी, भागू। सृष्टिकर्ता दुष्टक हृदयकेँ ओकर शारीरिक छिद्र लेल बनाएलनि—दोसरक दोष ओकर आँखि लेल, दोसरक अफवाह ओकर कान लेल, आ दोसरक कमजोर स्थान ओकर वाणी लेल। जेनाक पूँछमे राखल विषसँ पूरा बिच्छू जीवकेँ भयभीत करैत अछि, तहिना काल अपन दशम अंश—कलियुग—सँ समस्त जीवकेँ भयभीत करैत अछि। महिमामय कलियुगकेँ प्रणाम, जतए पत्नीक वचन वेद अछि, धर्म धन कमाबयक साधन अछि, आ अपन कल्पना कानून अछि! जगत् एहि युगक अधीन हो, तँ हो; कालक संहारकर्ता शिवक शरणमे रहल हमरा सभक काल की बिगाड़ि सकैत अछि? विद्वानक आनन्द आ राजसभाक मनोरञ्जन लेल कवि नीलकण्ठ एहि “कलियुग-विडम्बना”क रचना कएलनि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। 1 विदेह ४४६|| 1 गजेन्द्र ठाकुर

गए हाल TOME I-IV / VOLUMES -00 | A Parallel History of | Mithila & Maithili Literature with Critical Appreciations of Representative Maithili Writers 2 Reg = by | | GAJENDRA THAKUR | editor, Videha eJournal VIDEHA + PARALLEL LITERARY MOVEMENT se + ISSN 2229-547X - est. 2000 - Delhi - MMXXVI

FROM THE SERIES The Videha Parallel Library a centuries of Maithili letters — from the Buddhist Charyapadas | of the eighth century to the digital insurgency of the twenty-first — | gathered under a single critical lens. Across one hundred volumes the | Videha Parallel Library has assembled the suppressed, the neglected, | the folk, the Dalit, the women’s, and the diasporic traditions of Maithili literature into a counter-archive to the official canon curated by the Sahitya Akademi. This volume brings that project to its threshold. Applying Bharata’s rasa-theory, Anandavardhana’s dhvani, Kuntaka's vakrokti, Gahgesa Upadhyaya’s Navya-Nyaya pramana system, Bakhtinian dialogism, Spivak’s subaltern historiography, and the Videha Parallel History Framework, it offers sustained critical appreciations of one hundred contemporary and historical Maithili writers — poets, novelists, dramatists, essayists, theorists, and translators — whose work constitutes the living parallel tradition. “The parallel is not the marginal but the truthful, in long delay.” WHAT THIS VOLUME CONTAINS, >> One hundred chapter-length critical appreciations, each paired with a portrait image »® A historical synthesis from 8th-century Charydpadas to contemporary digital publishing >> Indigenous theory (Navya-Nyaya, rasa, dhvani) alongside Western and postcolonial lenses >> Archival recovery of the Dooshan Panji records on Gafigesa Upadhyaya of Mithila pes ABOUT THE AUTHOR | GAJENDRA THAKUR — Maithili author, editor, and literary scholar — founder | of the Videha Parallel Literary Movement and founded the Videha eJournal in | | 2000 and has edited it without interruption since. He writes in Maithili, Hindi, ‘i and English, and has authored scholarly monographs on Gangesa Upadhyaya’s Navya-Nyaya and the parallel history of Mithila’s literary cultures. SON 978-93-5832-486-6 VIDEHA | | till | | | | | Fe AEE nee > हि, ISSN 2229-547X - videha.co.in

Mets eee ecoding the nit at है दर a Panji of Mithila oa Surprising Insights from India and Pp a | lal l Nepal's Oldest Social Network The Panji system of Mithila is a remarkable example of how communities preserved, recorded and td e transmitted social memory across generations. Spanning centuries, it functions as one of the world’s oldest social networks—long before the हू digital age. This book decodes the structure, gt. purpose and significance of Panji, bringing to light Surprising Insights from its value for understanding kinship, migration, India and Nepal's Oldest marriage alliances and societal organization in Ps Social Network India and Nepal. थी, au Bridging tradition with modern research, this work TDi ig कि हि. ae offers surprising insights for scholars of sociology, ea ii; Ni A ote ee - WON GA. anthropology and genomic genealogy. It opens new i= a rate ys a oe किए pathways for interdisciplinary studies, showing how Sy CxS wee ancient records can inform contemporary social Mh ¢ ere nl ae ~ science and genealogical mapping. ' tee. cet s\ \ Seca ES ५१६ सी Gajendra Thakur ye —— 5 ap we, ae: £ Hh | | धर है... ap 6) ee pig ऊ | डक gee. \ For the Research Students of ew if NX. रे Sociology, Anthropology and a, Dy Jy AX Genome/ Geneological Mappin Sn? oh an & ie BPS 9 ०9९9: = ee = oD ) A EN. LP EB ८ Vary फनी दी के 2 4 We aa q ISBN 978-93-595-894-5 www.videha.co.in Aas we 25 Zee FESS igi agi he AS rad ae ne eae Gajendra Thakur निधि lee Editor ISBN videha.co.in Videha Maithili eJournal

VIDEHA DECODING THE PANJI OF MITHILA VOLUME II Genealogical Mapping, Mula, Dusan, and the Videha Panji Search System Panji is Mithila’s grammar of memory. पज्जी मिथिलाक स्मृतिक व्याकरण अछि। Gajendra Thakur Editor Videha — First Maithili Fortnightly eJournal www.videha.co.in

== the Panji of Mithila Volume II Decoding the Panji of Mithila Volume II introduces Mithila’s Panji Prabandha as a layered archive of genealogy, marriage rules, mila, milagrama, gotra-pravara, maternal lines, scholarly titles, Diisan records, village memory, and historical persons. The book explains Panji as genealogical mapping, not modern DNA, and proposes the Videha Panji Search System as a responsible digital search aid. Important Ethical Note Panji records are historical and genealogical sources. They are not modern genetic proof, legal proof, or automatic marriage clearance. Diisan records must not be used to stigmatize living persons, families, villages, or communities. Scan to read पुढ़ खोलनाक लेल स्कैन करू काका see नाक A ey pest a a हि re a Videha — First Maithili Fortnightly eJournal www.videha.co.in

v CCD 0 TOTTNNS CTO sues eau ans ey DECODING THE Orla on ss seve abl a pata it PANJI OF MITI I LA A describes, (ontinuing the work hegun in Volumes Land Il, this Khand > Kaw (Gey ‘I Genome Mapping Volume I carries Mithia’s tradition 0 len Senne “A Panji is not read so much as back into the house that bore it." 2 दर शा डडड्ड of Genome Mapping gS On| |) a if a HE APONTE ना iol A q GAJENDRA THAKUR

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=. z mira sri ons The fifth volume turns to the Panji of Volume IL mapping Mithila’ DECODING T HE in, Te res ses ration th a रकम का — eth (oy. =) “A genealogy is a kind of clock — wind it back far enough and the ११९७ १,०१७ names start keeping their oan time.” a! Nay ° Y by ell oo ir a ave 7 il 4 i GAJENDRA THAKUR

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E a eel ae et a a eo a EN OF la! yy ie DECODING THE RS SY | cE gay PANII १४ iy” Hi Sich न | STS <i H | 0? se — BASED ON DUSHAN PANJI — neaal Ke H Decoding the Panji of Mithila, Volume VI, based on Dushan Panji, ‘el Had is a detailed scholarly exploration of one of Mithila’s most ll bead H Heed difficult genealogical archives. This volume explains the logic of et fl easf Panji entries, mool and migration, maternal and daughter lines, Hei कि H caste and marriage records, named women, social vocabulary, : $33 Fi x, H and the ethical challenges of reading Dushan Panji today. i: x H Hal It combines close entry-by-entry decoding with historical taal । $3 interpretation, making a difficult source accessible without | ee H ey i losing its complexity. The book is intended for researchers, tel H 3) students, family historians, and all readers interested in Mithila, tl all LPS genealogy, caste, social history, and textual preservation. coal | €33 4) Gajendra Thakur is a researcher and writer associated with पा eH Videha and the study of Mithila’s literary, historical, and Hei 3} of E: a मिल <> | genealogical traditions. i 3 H मन I Maal eit, fa “lft i i (Deel fs | 2 © t H पक m hee i Re re || Hal H 3 i a Scan to visit www.videha.co.in oA | es TING हे न हि 4 Head aN VIDEHA eJOURNAL fade elo RS, eg LATS) | i के Ea a EERE ET a Oy H 89: के“ BiG Bo Ooo Sob GG SB ey SM]

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yy मैथिली साहित्यक सभसेँ पैय उपन्यास Gohi Sabhak Beech Jalsamadhi | गजेन्द्र ठाकुर " गोहि देह खाइत अछि, नाम नहि -- नाम ओकर दाँतमे अटकि जाइत अछि।" PT ie se ee के की पक ( at ga-gien | | [) डिजिटल अरेस्ट | ( <= धनक कारी धार | लेखक — गजेन्द्र ठाकुर मैथिली कावर्धरी « न्याय-दर्शन आ समकालीन अपराध-गाथा « विदेह प्रकाशन UU on ई-पत्रिका ae ® rw ae ae fade प्रकाशन * दिल्‍ली

नि ~_ . . . के . . . +> fade मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम्‌ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। — . . . के . . . अनुक्रम २.१२. कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा- ओझड़ी (पृष्ठ ३३५-३३६) २.१३. Tabs OER गोहि सभक बीच जल समाधि (मैथिलीक आइ धरिक ae पैघ उपन्यास)- ‘fate अंक ४४६ [१५ जुलाई २०२६] मैथिली कादम्बरीक अंश (पृष्ठ ३७-५०४) २.१४. गजेन्द्र ठाकुर-चारिटा मूल संस्कृत एकनट नाटक (भाण) १.श्री शूद्रक केर मूल संस्कृत- वर्ष १९ मास २२३ ISSN 2229-547X पद्मप्राभुतकम्‌ [कमलक भेंट]; २.ईश्वरदत्तक मूल संस्कृत- धूर्तविटसंवाद: [धूर्त आ दलालक विचार- विमर्श]; ३.वररुचिक मूल - उभयाभिसारिका [परस्पर प्रेम-पलायन] आ ४.महाकवि श्यामिलक केर ऐ अंकमे अछि:- मूल संस्कृत- पादताडितकम्‌ [लात] (संस्कृतसं मैथिली अनुवाद- गजेन्द्र ठाकुर द्वारा) (पृष्ठ ५०५-६०१) २.१५.गजेन्द्र ठाकुर- कालिदासक मूल संस्कृत नाटक अभिज्ञानशाकुन्तलम्‌ संस्कृतसें मैथिली अनुवाद RATER OTL नूतन अंक सम्पादकीय (पृष्ठ २-१०) WHR OR (पृष्ठ इन्-७०८) ashe wea पर टिप्पणी (पृष्ठ सदर) २.१६.गजेन्द्र ठाकुर विशाखदत्त रचित संस्कृत नाटक ART केर मैथिली अनुवाद - गजेन्द्र ाकुर (पृष्ठ 9०९-७९५) गद्य Prose २.१७.गजेन्द्र ठाकुर-उत्तररामचरितम्‌- महाकवि भवभूति- संस्कृतसेँ मैथिली अनुवाद गजेन्दर ठाकुर (पृष्ठ २.१. हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२५ (पृष्ठ ९४-१८) स्वत २.२. कल्पना झा- मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-ध (पृष्ठ ee Tay ठाकुर-कादम्बरी पूर्व भाग [वाणभट्ट रचित] उत्तर भाग [वाणभट्टक पुत्र भूषण भट्ट रचित]- २९-१०४) संस्कृत मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर (पृष्ठ ९६२-१११५) २.३.अरविन्द ठाकुर- मैथिली साहित्यमे बलेन्द्र नारायण ठाकुर “विप्लव' एवं हुनक परिवारक योगदान-१ २.१९.गजेन्द्र ठाकुर: आगमडम्बरम्‌ जयन्त भट्ट (नैयायिक)- मूल संस्कृतसेँ मैथिली अनुवाद (पृष्ठ १०५-२९८) गजेन्द्र ठाकुर (पृष्ठ १११६-११७७) २.४. डा. किशन कारीगर- हमरा त जोगार अछि (हास्य कथा) (PB 248-302) २.२०.गजैन्द्र ठाकुर- मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-६) सन्दर्भ कुणाल- २.५. लाल देव कामत- बहुजन कवि आ नाटककार राम श्रेष्ठ दीवाना : एक संक्षिप्त बायोग्राफी (पृष्ठ कृत प्रेम-प्रतिज्ञा उर्फ श्रुवावतीक जय! (पृष्ठ ११७८-१९८६) 303-382) २.६. लाल देव कामत- पतीत : पोधी चर्चा (पृष्ठ ३९३-३१६) I Poetry २.७. सुरेन्द्र लाभ- दुगोट कनिका नाटक [नवकी Gag) रटन्त विद्या] (पृष्ठ ३१७-३१९) ३.१. तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु' कोय्या Tr] मूल तेलुगु: नग्नमुनि (मानेपल्लि २.८. आचार्य रामानंद मंडल- महाकवि विद्यापति बनाम संत तुलसीदास (पृष्ठ 320-322), हषीकेशवराव) मैथिली अनुवाद: मानेश्वर मनुज [खण्ड ८] (पृष्ठ १९८८-११९२) ee. igen eg after: er a (82-28) ३.२. अशोक कुमार ठाकुर-उपवास केवल शरीरक नहि/ मिथिलाक re) धरती माँ के पुकार (पृष्ठ २.१८. संतोष कुमार राय 'बटोही'- भिक्षुक खबासक वंशावली (धारावाहिक संस्मरण)- (पहिल खेप) cost) (पृष्ठ 324-324) ३.३. जगदानन्द झा "HG"= 2 टा गजल (पृष्ठ ११९९-१२००) २.११. प्रणव कुमार झा- लोकतंत्रक माने आ मतलब (पृष्ठ ३२६-३३४) ३.४. पूजा कर्ण- बचाउ प्रभु! (पृष्ठ १९०१-१२०४)

THE VIDEHA PARALLEL LIBRARY TOME I-IV / VOLUMES -00 A Parallel History of Mithila & Maithili Literature with Critical Appreciations of Representative Maithili Writers by GAJENDRA THAKUR editor, Videha eJournal VIDEHA - PARALLEL LITERARY MOVEMENT videha.co.in - ISSN 2229-547X - est. 2000 - Delhi - MMXXVI

Decoding the D di h As ea, ecoding the Panji of Mithila ee Surprising Insights from India and a i nN | l Nepal's Oldest Social Network The Pani system of Mithila is a remarkable example : of of how communities preserved, recorded and e e transmitted social memory across generations. Spanning centuries, it functions as one of the world's oldest social networks—tong before the digital age. This book decodes the structure, purpose and significance of Panji, bringing to light Surprising Insights from its value for understanding kinship, migration, India and Nepal's Oldest marriage alliances and societal organization in ig Social Network India and Nepal. iis ee. Bridging tradition with modern research, this work i rag ig 2 Sie Se sr offers surprising insights for scholars of sociology, 4) spp & ee, ee anthropology and genomic genealogy. It opens new कु =a eT ap सदन 4 oe aoe pathways for interdisciplinary studies, showing how —— Sr, Cet we na i ही FD erect A, ancient records can inform contemporary social WA Vege este ve \ = Waal A ss science and genealogical mapping. ay gee पक तर ENS के "सका -»9)ge-—_—_____—_——. गरजे Se \ Yee S\N Gajendra Thakur aa less Aa Es AN 4 ~~ , For the Research Students of el KN Sociology, Anthropology and seg ei) Ly) Vz Wy CN Genome/ Geneological Mapping ISBN 978-93-595-894-5 www-videha.co.in BE sa eek SAE RAO (OF ee O| (OF {| sane yeas Gajendra Thakur elo ore 0 (Ob ss Ele Raitor ISBN videha.co.in Videha Maithili eJournal

Decoding the Panji of Mithila Volume II Decoding the Panji of Mithila Volume II introduces Mithila’s Panji Prabandha as a layered archive of genealogy, marriage rules, mila, milagrama, gotra-pravara, maternal lines, scholarly titles, Diisan records, village memory, and historical persons. The book explains Panji as genealogical mapping, not modern DNA, and proposes the Videha Panji Search System as a responsible digital search aid. we Ethical Note Panji records are historical and genealogical sources. They are not modern genetic proof, legal proof, or automatic marriage clearance. Diisan records must not be used to stigmatize living persons, families, villages, or communities. Scan to read one fa Ogee Videha — First Maithili Fortnightly eJournal www.videha.co.in

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vy मैथिली साहित्यक सभसँ te उपन्यास गौहिं सभक बीच जलसमार्धिं W ८ " गोहि देह खाइत अछि, नाम नहि — नाम ओकर दाँतमे अटकि जाइत ares |" लेखक -- गजेन्द्र ठाकुर || 2 ISSN 2229-547X gs videha.co.in मैथिली wee ई-पत्रिका अन्तर्राष्ट्रीय मानक Ww! पूर्ण पाठ ऑनलाइन

oo > . थक + a ° + ° +> ३.५. रामचन्द्र राय- दू गोट कविता [भूख/ तरहथिए पर दुनिया] (पृष्ठ १२०५-१२०७) ३.६. डा. किशन कारीगर- बेलज्ज पिछलगुआ भरिया सब (कविता) (पृष्ठ १२०८-१२०९) ३.७. संतोष कुमार राय 'बटोही'- फ्री Het बिजली (पृष्ठ १२१०-१२१० ३.८.गजेन्द्र ठाकुर-तीन टा व्यंग्य: १.कवि भल्लट- भल्लट-शतक (भल्लटक शत अन्योक्ति) २.महाकवि क्षेमेन्द्र- छल-कौशलक विलास (कलाविलास) ३.कवि नीलकण्ठ- कलियुग-विडम्बना- संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद WH OTH (पृष्ठ १२११-१४४७) न ° के कै थक थक +> VIDEHA « Issue 446 First Maithili Fortnightly eJournal (since 2000) 5 July 2026 + Year 9, Month 223 ISSN 2229-547X www.videha.co.in Editor: Gajendra Thakur ~~ ° + a ° के ला