VIDEHA — Issue 447 / अंक ४४७

Publication: VIDEHA · Issue: 447
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विदेह ४४७ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। [विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X Videha e-Journal (since 2000) at www.videha.co.in ] ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। कॉपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- २०२६. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. It is a platform for scholars, researchers and writers to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, prose and verse in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili and from Maithili into English. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication. (c)२०००- २०२६. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA. सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@zohomail.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/ These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@zohomail.in. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents. © Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover design: AUM GAJENDRA THAKUR VIDEHA:447 समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा। for the writers, readers, and listeners of Mithilā, who have kept the lamp of Maithilī burning through a thousand years of storms ………………………….. "The Parallel is not the marginal but the truthful, in long delay." Mānuṣīm iha saṃskṛtām मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। मिथिलाक ओइ लेखक, पाठक आ श्रोता लोकनि लेल, जे सहस्र वर्षक झंझावात मे सेहो मैथिलीक दीप प्रज्वलित रखने छथि। समानांतर कात-करोट मे हएब नै अछि, वरन् ई अछि असल सत्य, जे अपन समय लेलक अछि। अनुक्रम विदेह अंक ४४७ [०१ अगस्त २०२६] वर्ष १९ मास २२४ ISSN 2229-547X ऐ अंकमे अछि:- १.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (पृष्ठ १-२४) गद्य Prose २.१. हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२६ (पृष्ठ २७-३२) २.२. कल्पना झा- मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-७ (पृष्ठ ३३-३८) २.३. अभिनंदिनी कुमारी- एकैसम शताब्दीक पहिल औपन्यासिक कृति - ‘पथिक पिआसल’क तात्विक विश्लेषण (पृष्ठ ३९-५१) २.४. परमेश्वर कापड़ि- खिस्सा- पाइनेमे माछ आ’ नौ–नौ कुटियाक’ बखरा (पृष्ठ ५२-५४) २.५. लाल देव कामत- जगैत जीवन : पोथी समीक्षा /शहिदे आजम भगत सिंहक तीनटा पत्र : अंतिम पत्र कोन मानल जाए?/ अतिशय आह्लादित थिकहुँ/ पाठकीय प्रतिक्रिया : भागिन - मैथिली उपन्यास (कोसी कातक संघर्षमय गाथा)/ पाठकीय प्रतिक्रिया : भागिन - मैथिली उपन्यास (कोसी कातक संघर्षमय गाथा) (पृष्ठ ५५-६८) २.६. आचार्य रामानंद मंडल- प्राथमिक शिक्षा मे अंगिका बज्जिका/ नीट छात्र आंदोलन -२०२६/ मिथिला राज्य निर्माण के इतिहास (पृष्ठ ६९-७१) २.७. कैलाश कुमार ठाकुर- विद्यापतिक धरा पर मैथिलीमे रैप-संगीत (पृष्ठ ७२-९४) २.८. संतोष कुमार राय 'बटोही'- 'मातृभूमि स्वर्गादपि गरीयसी' (पृष्ठ ९५-९६) २.९. प्रणव कुमार झा- लोकतन्त्र के पिच पर (पृष्ठ ९७-१०६) २.१०. जगदानन्द झा "मनु"- ४ टा बीहनि कथा- मुख्य वक्ता/ पैखाना खाए गेल/ कोन काज करै छी?/ हमरा तँ चिन्हते होएब? (पृष्ठ १०७-१०८) २.११. हास्यक सागर [हास्यार्णवप्रहसनम्‌क मैथिली अनुवाद (मूल संस्कृत श्री जगदीश्वर भट्टाचार्य्य; संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा)] (पृष्ठ १०९-१४६) २.१२. दामक प्रहसनम् [सम्भवतः भास रचित/ संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर] (पृष्ठ १४७-१५२) २.१३. हरिजीवन मिश्रक कृति- पालाण्डुमण्डन प्रहसनम् [संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद- गजेन्द्र ठाकुर] (पृष्ठ १५३-१६८) २.१४. गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-७) सन्दर्भ- कुणाल-कृत कुणाल-कृत विश्वासक शक्ति उर्फ सुकन्याक विवाह (पृष्ठ १६९-१८०) २.१५. गजेन्द्र ठाकुर- समग्र सिंहावलोकन-चतुर्भाणी, दामक प्रहसनम्, हास्यार्णव, आगमडम्बरम्, कादम्बरी, भल्लट-क्षेमेन्द्र-नीलकण्ठक व्यंग्य-त्रयी, पलाण्डुमण्डन, उत्तररामचरितम्, अभिज्ञानशाकुन्तलम्, मुद्राराक्षसम्, मृच्छकटिकम्, भगवदज्जुकम् आ मत्तविलास तेरहटा अनूदित पोथीक तुलनात्मक अध्ययन [संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर] (पृष्ठ १८१-२२१) २.१६. भामती (वाचस्पति)/ आत्मतत्त्वविवेक (उदयन)/ न्यायकुसुमाञ्जलि (उदयन)/तत्त्वचिन्तामणि (गंगेश)/ (मैथिली अनुवाद): ग्रन्थ-सार आ समालोचनात्मक मूल्याङ्कन [मूल संस्कृत सँ मैथिली अनुवाद: गजेन्द्र ठाकुर] (पृष्ठ २२२-३३९) २.१७.गजेन्द्र ठाकुर- गोहि सभक बीच जलसमाधि [गजेन्द्र ठाकुरक मैथिली कादम्बरी, खण्ड ०-१–२, खण्ड ० अध्याय (-१००) सँ अध्याय (-१); खण्ड १ अध्याय ० सँ अध्याय १००; आ खण्ड २ अध्याय १०१ सँ अध्याय २००] कथासार आ समीक्षात्मक मूल्याङ्कन: भारतीय आ पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्तक आलोकमे (पृष्ठ ३४०-३८२) २.१८. गजेन्द्र ठाकुर- मैथिलीक एकटा समानान्तर व्याकरण, रचना आ भाषा-विज्ञान (ठेठी-अंगिका आ बज्जिकाकेँ संग लऽ कऽ)- गजेन्द्र ठाकुर] एकीकृत विस्तृत समालोचनात्मक शोध-समीक्षा (पृष्ठ ३८३-४४२) २.१९. गजेन्द्र ठाकुर- डॉ. अमरेन्द्रक ‘अंगिका बाल-साहित्य’- लोकस्मृतिसँ आधुनिक बाल-सृजन धरि : चतुर्आयामी समग्र समीक्षा (मैथिली–ठेठी-अंगिका समानान्तर अनुशीलन) (पृष्ठ ४४३-५२५) २.२०. गजेन्द्र ठाकुर- ‘बज्जिका गीत-संगीत’ : समेकित द्विभाषिक बहुआयामी साहित्यिक समीक्षा- डॉ. रामेश्वर प्रसादक कृतिक मैथिली–बज्जिका समानान्तर अनुशीलन (पृष्ठ ५२६-५८३) २.२१. गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली बाल-उपन्यासक समीक्षाशास्त्र (पृष्ठ ५८४-६५६) २.२२. गजेन्द्र ठाकुर- नाट्य-नवग्रह (पृष्ठ ६५७-६९९) २.२३. भारतीय दलित साहित्य: मैथिली अनुवाद, समीक्षा आ सौन्दर्यशास्त्र (पृष्ठ ७००-८३८) २.२४. गङ्गेश उपाध्याय जीवन, तर्कशास्त्र, तत्त्वचिन्तामणि आ नव्य-न्याय परम्परामे विरासत (पृष्ठ ८३९-९३४) २.२५. मिथिलाक पञ्जी–प्रबन्ध वंश, विवाह, दूषण, सामाजिक स्मृति आ आधुनिक पुनर्पाठ (पृष्ठ ९३५-९८६) पद्य Poetry ३.१. तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम'] मूल तेलुगु: नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव) मैथिली अनुवाद: मानेश्वर मनुज [खण्ड ९] (पृष्ठ ९८८-९९७) ३.२. अशोक कुमार ठाकुर-कारगिलक अमर वीर/संघर्षक अमर ज्योति/माछी खोजय घाव,दुश्मन खोजय दाँव।/ लोकनायक राजा सल्हेश स्तवन (पृष्ठ ९९८-१००५) ३.३. राजदेव मंडल- संबोधन (पृष्ठ १००६-१००७) ३.४. बद्रीनाथ राय ’अमात्य’- किएक सूतल छी यौ! (पृष्ठ १००८-१०११) ३.५. परमेश्वर कापड़ि- हमर रचनागत अदका-फदका (पृष्ठ १०१२-१०१३) ३.६. आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल (पृष्ठ १०१४-१०१५) ३.७. राम शंकर झा"मैथिल"- झिझिया (पृष्ठ १०१६-१०१८) APPENDIX: METHODOLOGICAL NOTE The Nepal Bikram Samvat years cited have been converted to approximate CE years using the standard offset of BS minus 56–57 years. Web sources consulted include the Videha digital archive (videha.co.in). All URLs were last accessed April 2026. This research was prepared using primary texts, and standard academic resources. All quoted material is from the cited sources. For the most current scholarship, consult the Videha Parallel History series at www.videha.co.in/gajenthakur.htm. ………………………………………………. A PARALLEL HISTORY OF MAITHILI LITERATURE: INTRODUCTION DALIT LITERARY CRITICISM: TELUGU, GUJARATI, AND ODIA DALIT LITERATURE IN MAITHILI TRANSLATION GANGESA UPADHYAYA: LIFE, LOGIC, AND LEGACY IN THE NAVYA-NYAYA TRADITION [NAVYA-NYAYA’S HIERARCHICAL USE OF LIMITORS IS COMPATIBLE WITH MODERN ARTIFICIAL INTELLIGENCE AND NATURAL LANGUAGE PROCESSING (NLP)] MITHILA & MAITHILI: CRITICAL ANALYSIS OF INSTITUTIONS THE MAITHILI GHAZAL VIDEHA (ISSUE 1-350) SADEHA SERIES (1-37) VIDEHA ISSUES 351-438 VIDEHA MAITHILI PARALLEL DRAMA THEATRE VIDEHA PARALLEL AUDIO VIDEO ARCHIVE VIDEHA PARALLEL CHILDREN'S LITERATURE Abdur Razzak, Abha Jha, Abhilash Thakur, Achhe Lal Shastri, Ajit Kumar Jha, Amit Mishra, Amod Kumar Jha, Amrendra Yadav, Anamika Raj, Anand Kumar Jha, Anil Mallik, Anjani Kumar Verma, Anmol Jha, Arvind Thakur, Ashish Anchinhar, Ashok (kathakar Ashok), Ashraf Rain, Dr. Bacheshwar Jha, Badri Nath Roy 'Amatya', Pt. Bal Govind 'Arya', Bechan Thakur, Pandit Bhavnath Jha, Bibhuti Anand, Bijayendra Jha, Binay Bhushan, Bindeshwar Thakur, Chandan Kumar Jha, Dinesh Kumar Mishra, Durganand Mandal, Gajendra Thakur, Ghanashyam Ghanero, Gopalji Jha 'Gopesh', Gyanvardhan Kanth, Harimohan Jha, Hitendra Gupta, Hitnath Jha, Hriday Narayan Jha, Ilarani Singh, Jagdanand Jha 'Manu', Jagdish Chandra Thakur 'Anil', Jagdish Prasad Mandal, Jhauli Paswan, Jitendra Kumar Jha 'Jeetu', Dr. Kailash Kumar Mishra, Kalikant Jha 'Buch', Kalpana Jha, Kalpana Jha, Bokaro, Kalpana Jha, Delhi, Kalpana Jha, Patna, Kameshwar Choudhary, Kameshwar Jha 'Kamal', Dr. Kamini Kamayini, Kamla Chaudhary, Kapileshwar Raut, Kedar Nath Chaudhary, Dr. Kirtinath Jha, Dr. Kishan Karigar, Krishna Kumar Kashyap, Kumar Manoj Kashyap, Kumar Pawan, Kundan Kumar Karn, Kusum Thakur, Lal Dev Kamat, Lalita Jha, Lallan Prasad Thakur, Laxman Jha 'Sagar', Mala Jha, Manmohan Jha, Meena Jha, Mithilesh Kumar Jha, Munnaji, Munnaji, Munni Kamat, Nabo Narayan Mishra, Nagendra Kumar, Nand Kumar Mishra 'Nand', Nand Vilas Roy, Nanda Vilas Ray, Narayan Yadav, Narayanji Chaudhary, Narendra Jha, Navendu Kumar Jha, Neerja Renu, OM Prakash Jha, Panna Jha, Phanishwar Nath Renu, Prabhat Rai Bhatt, Pradeep Bihari, Pradeep Pushpa, Pranav Jha, Prayas Premi Maithil, Preeti Thakur, Premlata Mishra 'Prem', Premshankar Singh, Rabindra Narayan Mishra, Rajdeo Mandal, Rajeev Ranjan Mishra, Rajnandan Lal Das, Ram Bharos Kapari 'Bhramar', Ram Chandra Roy, Ram Sogarth Yadav, Ram Vilas Sahu, Acharya Ramanand Mandal, Prof. Dr. Ramawatar Yadav, Ramdeo Prasad Mandal 'Jharudar', Ramesh, Ramesh Narayan, Rameshwar Prasad Mandal, Pandit Ramji Chaudhary, Ramji Prasad Mandal, Acharya Ramlochan Sharan, Ramlochan Thakur, Ravi Mishra Bhardwaj, Ravibhushan Pathak, Ravindra Nath Thakur, S.C. Suman, Sandeep Kumar Safi, Sanju Das, Santosh Kumar Mishra, Santosh Kumar Roy 'Batohi', Satyanand Pathak, Shail Jha 'Sagar', Dr. Shambhu Kumar Singh, Shanti Lakshmi Chaudhary, Shardindu Chaudhary, Shashi Bala, Shashidhar Kumar 'Videh', Shiv Kumar Jha 'Tillu', Dr. Shiv Kumar Prasad, Shivshankar Singh Thakur, Shivshankar Sriniwas, Dr. Shubh Kumar Barnwal, Shyam Darihare, Siyaram Jha 'Saras', Srijan Shekhar 'Ajneya', Subhash Chandra Yadav, Subhash Kumar Kamat, Subodh Jha, Subodh Kumar Thakur, Sujit Kumar Jha, Sushil, Sweta Jha Chaudhary, Taranand Viyogi, Prof. Udaya Narayana Singh Nachiketa, Umesh Mandal, Umesh Paswan, Veena Thakur, Vibha Rani, Vibhuti Anand, Vijaynath Jha, Vineet Utpal, Yoganand Jha, Prof. Dr. Yogendra P. Yadava, Yogendra Pathak Viyogi A Parallel History of Mithila & Maithili Literature, Original Poem in Maithili, Translated into English, Children's Literature Theory, Children's Picture-Story Literature, Contemporary Mithila Artists, Contemporary Mithila Artists, Dalit and Subaltern Literature, Dalit Literary Criticism, Dalit Literary Criticism — Gujarati Dalit Literature in Maithili Translation, Dalit Literary Criticism — Odia Dalit Literature in Maithili Translation, Dalit Literary Criticism — Telugu Dalit Literature in Maithili Translation, Digital Maithili Children's Literature, Digital Maithili Literature, The Epistemology of Parallelism — Videha Sadeha Series and the Maithili Digital Renaissance, Gangeśa Upādhyāya / Navya-Nyāya, Gangesa Upadhyaya — Life, Logic, and Legacy in the Navya-Nyaya Tradition, Institution Critical Analysis, Language Transmission, Laprek vs Bīhani Kathā, Maithili Bīhani Kathā — The Seed Story Tradition in Maithili Literature, The Maithili Ghazal — History, Theory, Revival, and the Anchinhar Era, Maithili Micronarrative, Mithila & Maithili — Critical Analysis of Institutions, Awards and Recognition Frameworks, Mithila & Maithili Institution Critical Analysis, Parallel Literature Movement, Seed Story Tradition, Tirhuta / Mithilakshar, Videha 351–438 Critic, Videha Children Literature Expanded, Videha Children Literature Expanded — Parallel Children Literature in Maithili, Videha eJournal, Videha Issues 1–350, Videha Issues 351–438, Videha Issues 351–438 — Epistemological and Canonical Transformations, The Videha Maithili Parallel Drama Theatre, Videha Maithili Parallel Drama Theatre, The Videha Maithili Parallel Drama Theatre — Critical Historiography and Epistemological Analysis, The Videha Parallel Audio Video Archive, Videha Parallel Audio Video Archive, The Videha Parallel Audio Video Archive — Digital Remediation and Subaltern Historiography, Videha Parallel Audio Video Critic, Videha Parallel Children Literature, Videha Parallel Drama Critic, Videha Parallel History Framework, Videha Sadeha 1–37 / Issues 1–350 Critic, Videha Sadeha, Videha Sadeha Series 1–37, Vidyapati, the Primal Poet of Maithili (Pre-Jyotirishvara), Women’s Writing, Young Readers in Maithili … AND MORE TO COME IN TOME 5. I. A PARALLEL HISTORY OF MITHILA & MAITHILI LITERATURE [TOME 1-4; VOLUMES 1-100] BY GAJENDRA THAKUR [Parallel History Series ISBN Number: 978-93-5812-486-6] GOOGLE PLAY BOOK [TOME 1-4; VOLUMES 1-100] https://play.google.com/store/books/details?id=uvjREQAAQBAJ AMAZON KINDLE [TOME 1-4; VOLUMES 1-100] https://www.amazon.in/dp/B0GX2XRKM7 POTHI HARDBACK POTHI TOME 1 [VOLUMES 01-25] https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-parallel-history-mithila-maithili-literature/ POTHI TOME 2 [VOLUMES 26-50] https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-parallel-history-mithila-maithili-tome-2/ POTHI TOME 3 [VOLUMES 51-75] https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-parallel-history-mithila-maithili-literature-volume-1-100-tome-3-volume-51-75-b/ POTHI TOME 4 [VOLUMES 76-100] https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-parallel-history-mithila-maithili-literature-volume-1-100-tome-4-volume-76-100-/ II. DECODING THE PANJI OF MITHILA: Surprising Insights from India and Nepal’s Oldest Social Network [ISBN: 978-93-5915-894-5] Decoding the Panji of Mithila Volume I-VI POTHI HARDBACKS Decoding the Panji of Mithila : Surprising Insights from India and Nepal's Oldest Social Network [Volume I] https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-decoding-panji-mithila/ Decoding the Panji of Mithila Volume II: Genealogical Mapping, Mūla, Dūṣaṇ, and the Videha Panji Search System [Based on Prachin Panji] https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-decoding-panji-mithila-volume-ii/ Decoding the Panji of Mithila Volume III: A Complete Index-wise Decoding of Genome Mapping Volume I - Khand 2 Based on Uptip Panji https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-decoding-panji-mithila-volume-iii/ Decoding the Panji of Mithila Volume IV: Based on the Nagram Panji https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-decoding-panji-mithila-volume-iv/ Decoding the Panji of Mithila Volume V: Based on Volume II Panji: Genealogical Mapping of Mithila, 450 AD-2009 AD https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-decoding-panji-mithila-volume-v/ Decoding the Panji of Mithila Volume VI: Based on Dushan Panji https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-decoding-panji-mithila-0/ Decoding the Panji of Mithila Volume I-VI KINDKE EDITIONS Decoding the Panji of Mithila : Surprising Insights from India and Nepal's Oldest Social Network https://www.amazon.in/dp/B0H463RVT8 Decoding the Panji of Mithila Volume II: Genealogical Mapping, Mūla, Dūṣaṇ, and the Videha Panji Search System https://www.amazon.in/dp/B0H6NPRTYB Decoding the Panji of Mithila Volume III: A Complete Index-wise Decoding of Genome Mapping Volume I - Khand 2 Based on Uptip Panji https://www.amazon.in/dp/B0H6R4BBFB Decoding the Panji of Mithila Volume IV: Based on the Nagram Panji https://www.amazon.in/dp/B0H6R6VSBF Decoding the Panji of Mithila Volume V: Based on Volume II Panji: Genealogical Mapping of Mithila, 450 AD-2009 AD https://www.amazon.in/dp/B0H6R4BBFD Decoding the Panji of Mithila Volume VI: Based on Dushan Panji https://www.amazon.in/dp/B0H6R2YCFP III. गद्य पद्य भारती खण्ड १ आ २ (विदेह सदेह २८ & विदेह सदेह ३७) [विभिन्न भाषासँ अनूदित गद्य आ पद्य रचना (खण्ड-१) & (खण्ड-२) (विदेह www.videha.co.in/ पेटार अंक १-३५० सँ)] [खण्ड १ ISBN No: 978-93-341-0402-8; खण्ड २ ISBN No: 978-93-5890-150-4] १ विदेह सदेह २८ GADYA PADYA BHARTI 1 विभिन्न भाषासँ अनूदित गद्य आ पद्य रचना (खण्ड-१) (विदेह www.videha.co.in/ पेटार अंक १-३५० सँ) https://store.pothi.com/book/editor-gajendra-thakur-gadya-padya-bharti-1/ २ विदेह सदेह ३७ GADYA PADYA BHARTI 2 विभिन्न भाषासँ अनूदित गद्य आ पद्य रचना (खण्ड-२) (विदेह www.videha.co.in/ पेटार अंक १-३५० सँ) https://store.pothi.com/book/translator-gajendra-thakur-gadya-padya-bharti-2/ IV. मैथिलीक एकटा समानान्तर व्याकरण, रचना आ भाषा विज्ञान (ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाकेँ संग लऽ कऽ)- गजेन्द्र ठाकुर साहित्य अकादेमीक संकीर्ण मैथिली भाषा विभागसँ विदेह (मैथिली साहित्यक समानान्तर मंच) ऐ अर्थमे सेहो फराक अछि जे विदेहमे ठेठी, अंगिका आ बज्जिका सन सहभाषाकेँ संग लऽ कऽ मिथिलाक बोली-वैविध्यक समग्र चित्र देल जाइत अछि। विदेहमे ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाक भाषा विज्ञान, रचना आ व्याकरण मैथिलीक संग देल गेल अछि मैथिलीक एकटा समानान्तर व्याकरण, रचना आ भाषा विज्ञान (ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाकेँ संग लऽ कऽ)- गजेन्द्र ठाकुर, संगे विदेहमे ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाक साहित्य ई-प्रकाशित आ समीक्षित सेहो होइत अछि।– गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक, विदेह ISSN 2229-547X POTHI HARBDACK https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-maithili_thethi_angika_bajjika/ V. भामती (वाचस्पति)/ आत्मतत्त्वविवेक (उदयन)/ न्यायकुसुमाञ्जलि (उदयन)/तत्त्वचिन्तामणि (गंगेश) [मूल संस्कृत सँ मैथिली अनुवाद: गजेन्द्र ठाकुर] भामती (वाचस्पति) [मूल संस्कृत सँ मैथिली अनुवाद: गजेन्द्र ठाकुर] POTHI HARDBACK https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-bhamti/ आत्मतत्त्वविवेक (उदयन) [मूल संस्कृत सँ मैथिली अनुवाद: गजेन्द्र ठाकुर] POTHI HARDBACK https://store.pothi.com/book/%E0%A4%AE%E0%A5%82%E0%A4%B2-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%A4-%E0%A4%89%E0%A4%A6%E0%A4%AF%E0%A4%A8-atmatattvaviveka/ न्यायकुसुमाञ्जलि (उदयन) [मूल संस्कृत सँ मैथिली अनुवाद: गजेन्द्र ठाकुर] POTHI HARDBACK https://store.pothi.com/book/%E0%A4%AE%E0%A5%82%E0%A4%B2-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%A4-%E0%A4%89%E0%A4%A6%E0%A4%AF%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF-%E2%80%A2-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%B8%E0%A4%81-%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%A5%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%80-%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6-%E0%A4%97%E0%A4%9C%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%A0%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%B0-nyayakusumanjali/ तत्त्वचिन्तामणि (गंगेश) [मूल संस्कृत सँ मैथिली अनुवाद: गजेन्द्र ठाकुर] https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-tattvachintamani/ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका WWW.VIDEHA.CO.IN VIDEHA 23 LANGUAGE TRANSLITERATOR https://www.videha.co.in/new_page_101.htm विदेह लिपि परिवर्तक IPA · IAST · Tirhuta · Braille https://www.videha.co.in/script-converter.html विदेह आ सदेह सम्पूर्ण इंडेक्स https://www.videha.co.in/script-converter.html विदेह पेटार VIDEHA ARCHIVE https://www.videha.co.in/archive.htm विदेह मैथिली थेसॉरस — मैथिली-अंग्रेजी / अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोश https://www.videha.co.in/maithili-thesaurus.html विदेह मैथिली ↔ अंग्रेजी अनुवादक · Videha Maithili ↔ English Translator https://www.videha.co.in/maithili-translator.html विदेह पञ्जी प्रबन्ध — मैथिल ब्राह्मण वंशावली इंडेक्स https://www.videha.co.in/panji-mool-index.html विदेह गद्य https://www.videha.co.in/prose.htm विदेह पद्य https://www.videha.co.in/verse.htm विदेह स्त्री कोना https://www.videha.co.in/femcorner.htm A PARALLEL HISTORY OF MITHILA & MAITHILI LITERATURE https://www.videha.co.in/gajenthakur.htm विदेह मिथिला रत्न https://www.videha.co.in/ratna.htm विदेह मिथिलाक खोज https://www.videha.co.in/discovery.htm विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण https://www.videha.co.in/investigation.htm विदेह पुरान अंक https://www.videha.co.in/videha.htm विदेह पोथी https://www.videha.co.in/pothi.htm विदेह दृश्य-श्रव्य नाट्य उत्सव https://www.videha.co.in/Audio_Video.htm विदेह शिशु, बाल आ किशोर उत्सव https://www.videha.co.in/kids.htm विदेह ई-लर्निङ्ग/ विदेह ई-लर्निङ्ग क्विज https://www.videha.co.in/videha-elearning.htm [विदेह ई-लर्निङ्ग क्विज UPSC / BPSC / UGC-NET / NTA हेतु मैथिली भाषा, साहित्य आ मिथिला इतिहास पर निःशुल्क प्रश्नोत्तरी — क्विज खोलबा लेल कार्ड पर क्लिक करू। शब्दकोश मिथिलाक इतिहास साहित्यक इतिहास UPSC / UGC-NET समानान्तर इतिहास मिथिला पञ्जी मैथिली गजल वेब पत्रकारिता विदेह चित्रकला · कला · संगीत विदेह दृश्य-श्रव्य विदेह विशेषांक/ सम्मान विदेह प्रश्नोत्तरी विदेह नाट्य उत्सव विदेह शिशु उत्सव विदेह स्त्री कोना] Videha Converters- Thesaurus, Panji, Script Converters, Transliterators, Translators, eLearning Quizzes, Maithili Language Search and other Technical Tools https://www.videha.co.in/videha-converters.htm विदेह आ सदेह दुनू https://archive.org/details/VidehaAndSadeha Videha Github: https://github.com/videha-ejournal/ TWITTER/ X https://x.com/videha FACEBOOK https://www.facebook.com/groups/videha/ Videha Googlegroups https://groups.google.com/g/videha 1 गजेन्द्र ठाकुर

१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय विदेह सदेह ९ विदेह मैथिली शिशु उत्सव सम्पूर्ण रचनाकार-समीक्षा विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क · गंगेशक नव्य न्याय · भारतीय · पाश्चात्य · चीनी · यहूदी (इसरायली) साहित्यिक समीक्षा सिद्धान्त १. भूमिका — छह समीक्षा-दृष्टिक परिचय विदेह सदेह ९, मैथिली शिशु-बाल-किशोर साहित्यक एकटा ऐतिहासिक संकलन थिक। श्रुति प्रकाशन, नई दिल्लीसँ २०१२ मे प्रकाशित ई पोथी विदेह पाक्षिक ई-पत्रिकाक अंक ५१–१०० मे प्रकाशित सामग्री सँ संचित अछि। ई पोथीक अध्ययन मात्र एकटा साहित्यिक समीक्षाशास्त्रसँ नै, अपितु छह सम्पूरक समीक्षा-दृष्टिसँ कएल जाएत — (अ) विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क, (आ) गंगेशोपाध्यायक नव्य न्याय, (इ) भारतीय काव्यशास्त्र, (ई) पाश्चात्य साहित्यिक समीक्षा, (उ) चीनी साहित्यिक समीक्षा, (ऊ) यहूदी-इसरायली साहित्यिक व्याख्याशास्त्र। अ. विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क गजेन्द्र ठाकुरक विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्कक केन्द्रीय प्रस्थापना अछि जे मिथिलाक साहित्यिक इतिहासक एकमात्र मुख्यधाराक दृष्टिसँ नहि, अपितु समानान्तर एवं प्रतिस्पर्धी दृष्टि बिन्दुसँ देखल जाएत। एहि अनुसार शिशु-बाल साहित्यक मूल्यांकन तखनि सम्भव होएत जखन हम राजकीय, उच्चजातीय, एवं केन्द्रीय आख्यानक पाश्र्वमे स्थापित लोक-कथा, लोक-गीत, एवं सीमान्त समुदायक आवाजक समानान्तर स्थान दी। आ. गंगेशोपाध्यायक नव्य न्याय मिथिलाक महाकवि-तार्किक गंगेशोपाध्याय (तेरहम शताब्दी) 'तत्त्वचिन्तामणि' मे प्रमाण-शास्त्रक नवीन व्याख्या देलथि। नव्य न्यायक अनुसार कोनो प्रतिज्ञाक प्रामाणिकताक परीक्षण 'व्याप्ति' (कारण-कार्य सम्बन्ध), 'पक्षता' (विषय-प्रासंगिकता), एवं 'हेतु' (आधार) सँ होइत अछि। बाल साहित्यमे एहि पद्धतिसँ कोनो रचनाक 'सत्यता-दावा', ओकर आन्तरिक तर्क-संगति, एवं पाठक-प्रभावक मूल्यांकन सम्भव अछि। इ. भारतीय काव्यशास्त्र भरतमुनिक नाट्यशास्त्रमे वर्णित नवरस-सिद्धान्त, आनन्दवर्धनक ध्वनि-सिद्धान्त, कुन्तकक वक्रोक्ति-जीवित, एवं मम्मटक काव्यप्रकाशक परम्परामे बाल साहित्यक मूल्यांकन सम्भव अछि। विशेषतः शृंगार, वात्सल्य, अद्भुत, एवं शान्त रसक दृष्टिसँ एहि संकलनक रचनाक मूल्यांकन करब अत्यन्त समीचीन अछि। ई. पाश्चात्य साहित्यिक समीक्षा टी.एस. इलियटक 'Tradition and the Individual Talent', रोलाँ बार्थक 'Death of the Author', आ मिखाइल बाख्तिनक बहुस्वरता (Polyphony) एवं संवादिता (Dialogism) — एहि त्रय-दृष्टिसँ पाश्चात्य समीक्षाक प्रयोग कएल जाएत। फेमिनिस्ट क्रिटिसिज्म, पोस्टकोलोनियल थ्योरी, एवं न्यू हिस्टोरिसिज्मक दृष्टिकोण सेहो प्रासंगिक अछि। उ. चीनी साहित्यिक समीक्षा कन्फ्यूशियसक 'जेंग मिंग' (Zhengming — नामक शुद्धता), दाओवादी चिन्तनक 'वू वेई' (Wu Wei — अकर्म-कर्म), एवं 'यि' (Yi — अर्थ-व्यंजना) — एहि त्रिक दृष्टिसँ चीनी परम्पराक प्रयोग होएत। जुआङझीक भाषा-सिद्धान्त अनुसार कोनो रचनाक परम सत्य भाषाक सीमाक परे अछि। ऊ. यहूदी-इसरायली साहित्यिक व्याख्याशास्त्र मिद्राश-परम्पराक पुनर्कथन (Midrash — पाठक पुनर्सृजन), वाल्टर बेंजामिनक 'एलेगरी' एवं 'मेसियैनिक टाइम', ज़ाक देरिदाक 'डिकन्स्ट्रक्शन' (जे यहूदी परम्परासँ गहरोमे जुड़ल अछि), एवं एमानुएल लेवीनासक 'अदरनेस' (Otherness) — एहि परम्पराक दृष्टिसँ बाल साहित्यक नैतिक एवं आध्यात्मिक आयामक मूल्यांकन कएल जाएत। २. गजेन्द्र ठाकुर — 'शिशु, बाल आ किशोर साहित्य आ ओकर समीक्षाशास्त्र' सम्पादक गजेन्द्र ठाकुरक ई परिचयात्मक निबन्ध समूचा संकलनक बौद्धिक नींव थिक। लेखक ऋग्वेदक आख्यानसँ लेसकर जातक-कथा, ऐसप, पंचतन्त्र, हितोपदेश, एवं आधुनिक बाल साहित्यक एक वैश्विक इतिहास प्रस्तुत कएलनि अछि। विदेह समानान्तर इतिहास दृष्टि लेखक सलहेस-कथाक क्षेत्रीय परिवर्तनक उल्लेख करैत देखबैत छथि जे लोक-नायक सलहेस 'राजा' सँ 'चोर' बनैत अछि, एवं एकर विपरीत। ई समानान्तर इतिहासक सर्वश्रेष्ठ उदाहरण अछि — एके व्यक्ति विभिन्न सामाजिक दृष्टिसँ भिन्न-भिन्न रूपमे देखाइत अछि। ई बाल साहित्यमे सेहो प्रासंगिक अछि। नव्य न्यायक दृष्टि ठाकुर जी बाल साहित्यक मूल्यांकन लेल जे प्रश्न उठबैत छथि — 'की बाल साहित्य अन्धविश्वासक बढ़ावा देइत अछि?', 'की ई जातिवादक विरुद्ध शिक्षित करैत अछि?' — ई प्रश्न नव्य न्यायक 'हेतु' (प्रमाण) परम्पराक अनुरूप अछि। प्रत्येक रचनाक मूल्यांकन एहि प्रश्नक कसौटी पर होएबाक चाही। भारतीय काव्यशास्त्र दृष्टि ठाकुरजी ब्रह्माण्डीय परिप्रेक्ष्य देइत लिखैत छथि जे 'यी सूर्य अरब-खरब आन सूर्यमेसँ एकटा मध्यम कोटिक तरेगण-मेडिओकर स्टार अछि।' ई अद्भुत रसक उद्रेक अछि — भरतमुनिक नाट्यशास्त्रमे जाहि 'विस्मय' सँ अद्भुत रस उत्पन्न होइत अछि, ओकर यथार्थ प्रयोग एतय देखाइत अछि। पाश्चात्य दृष्टि टी.एस. इलियटक 'Tradition and the Individual Talent' क सन्दर्भ स्वयं ठाकुरजी उद्धृत कएलनि अछि। ओ इलियटक मतक सँदर्भमे श्रीमती श्रीति ठाकुरक रचनाक मूल्यांकन करैत छथि। ई पाश्चात्य एवं मैथिली परम्पराक सम्मिलन थिक। चीनी दृष्टि लेखकक 'सरल शब्द, सरल भाषा, सरल विचार' — एहि त्रिसूत्रक सिद्धान्त कन्फ्यूशियसक 'जेंग मिंग' — नाम-शुद्धि एवं 'यि' — यथार्थ अर्थक आग्रहसँ मेल खाइत अछि। दाओवादी 'वू वेई' अनुसार उत्कृष्ट बाल-साहित्य ओ होइत अछि जे कृत्रिमता सँ मुक्त हो। यहूदी-इसरायली दृष्टि शंकराचार्यक कमंडलु-कथाक माध्यमसँ ठाकुरजी मिद्राश-परम्पराक उदाहरण प्रस्तुत करैत छथि — एक प्राचीन घटनाक पुनर्व्याख्या नवीन अर्थक सृजन करैत अछि। वाल्टर बेंजामिनक 'मेसियैनिक टाइम' अनुसार बाल-साहित्य भविष्यक पीढ़ीक लेल वर्तमानमे 'मोक्ष-बीज' बुआइत अछि। ३. ज्योति सुनीत चौधरी — ध्वनि-प्रतिध्वनि · अदृश्य बन्धन · नानीक खिस्सा (पाँच कथा) ज्योतिजी संकलनक सर्वाधिक प्रतिभाशाली रचनाकार छथि। हिनकर रचनाक तीन भाग अछि — (क) ध्वनि-प्रतिध्वनि — एकटा पहाड़ी आख्यानकथा, (ख) अदृश्य बन्धन — एकटा मनोवैज्ञानिक गल्प, (ग) नानीक खिस्सा — भलुनिया मौसी, सिंदूरक पुल, एक राजाक सात मेहरी, पदसाया कुमारि, सुहान बोन — पाँच लोककथा। विदेह समानान्तर इतिहास दृष्टि 'ध्वनि-प्रतिध्वनि' मे प्रतिध्वनि-चरित्र राजकुमारसँ प्रेम करैत अछि मुदा राजकुमार हुनकर बहिन ध्वनिसँ विवाह करैत अछि। प्रतिध्वनि पहाड़ीसँ कूदि प्राण दैत छथि, एवं हिनकर आत्मा पहाड़ी खाँचिमे भटकैत रहैत अछि। ई 'Echo' पुराण-कथाक मैथिलीकरण थिक — समानान्तर इतिहास अनुसार पाश्चात्य यूनानी मिथक एवं मैथिली लोककथाक बीच मौलिक साम्य अछि। नव्य न्यायक दृष्टि 'अदृश्य बन्धन' मे माया — एक बाल-मनोवैज्ञानिक — अपन क्षेत्रीय ज्ञान (लोक-ज्ञान) एवं व्यावसायिक ज्ञानक बीच द्वंद्वक सामना करैत छथि। नव्य न्यायक 'व्याप्ति' अनुसार — 'व्यावसायिक सफलता' एवं 'व्यक्तिगत सुख' — एहि दुनूक बीच कारण-कार्य सम्बन्ध सीधा नहि अछि। माया अन्ततः मातृत्वक 'अदृश्य बन्धन' मे बँधि जाइत छथि — ई नव्य न्यायक 'पक्षता' (सर्वाधिक प्रासंगिक प्रमाण) थिक। भारतीय काव्यशास्त्र नानीक पाँचों खिस्सामे वात्सल्य रस प्रबल अछि — 'सुहान बोन' मे साधुबाबाक वरदान एवं अन्धी रानीक आँखिक पुनःप्राप्ति — ई करुण रसक चरमोत्कर्ष एवं ततपश्चात् शान्त रसक उत्थान थिक। ध्वनि-सिद्धान्त अनुसार 'सिंदूरक पुल' मे नाग-मणिक ध्वनि अनेक स्तरक अभिव्यंजना करैत अछि। पाश्चात्य दृष्टि 'एक राजाक सात मेहरी' — एहि कथामे बाख्तिनक बहुस्वरता स्पष्टतः देखाइत अछि। सात रानीक आवाज, बड़कीरानीक षड्यन्त्र, सियारनीक मातृत्व, चिड़ोड़ीक पालन-पोषण — एहि बहुविध आवाजक सम्मिलनसँ एकटा जटिल कथा-संरचना निर्मित होइत अछि। फेमिनिस्ट क्रिटिसिज्म अनुसार छोटकी रानीक उपेक्षा एवं अन्तिम न्याय पितृसत्तात्मक व्यवस्थाक आलोचना थिक। चीनी दृष्टि 'भलुनिया मौसी' मे दुखनी एवं सुखनीक विपरीत नियति दाओवादी 'वू वेई' — सहज कर्म — एवं लोभ-विनाशक सिद्धान्तक अनुरूप अछि। दाओ दे जिंग (Tao Te Ching) अनुसार जे व्यक्ति स्वाभाविक रूपसँ दूसराक सेवा करैत अछि, ओकरा स्वतः पुरस्कार मिलैत अछि। यहूदी-इसरायली दृष्टि 'पदसाया कुमारि' मे पानक पाताल-राजकुमारीक रूपान्तरण — ई यहूदी कब्बाला परम्पराक 'एन सोफ' (सीमाहीन ईश्वरीय सत्ता) एवं सृष्टि-खेलक अनुरूप अछि। लेवीनासक 'अदरनेस' अनुसार 'पहुनाइ' राजकुमारी — जे 'पहुना' अर्थात् 'अन्य' अछि — ओ ओकर 'अदरनेस' (परकीयता) क सर्वोच्च प्रतीक अछि। ४. यूटी कुमारी — 'राहुलजी एक नजरिमे' आ 'कैदी' यूटी कुमारी सहायक शिक्षिका, संस्कृत मधुराम इंटर विद्यालय, वालपाड़ा, मधेपुरा — हिनकर दू रचना संकलनमे संगृहीत अछि। 'राहुलजी एक नजरिमे' — समीक्षा ई राहुल सांकृत्यायनक जीवनी-लेख अछि। लेखिका राहुलजीक बहुआयामी प्रतिभाक वर्णन करैत छथि — इतिहास, दर्शन, राजनीति, साहित्य सभमे हिनकर योगदान अतुलनीय रहल। पाश्चात्य फेमिनिस्ट दृष्टिसँ — राहुलजीक पत्नी ए.एम. लोलाक साथ साइबेरियामे विवाह — पितृसत्तात्मक बन्धन तोड़बाक एकटा स्त्रीवादी आख्यान सेहो अछि। 'कैदी' — समीक्षा 'कैदी' मे एकटा चित्रकार ईसा मसीहक चित्र लेल बच्चाक खोजमे निकलैत अछि, शैतानक चित्र लेल वर्षों बाद उपयुक्त चेहरा भेटैत अछि — एवं ओ व्यक्ति ओहि अनाथ बच्चे निकलैत अछि। एहि कथाक मूल अर्थ — मानवीय सौन्दर्य एवं अधमता एके आत्मामे सह-अस्तित्व रखैत अछि। यहूदी 'टिक्कुन ओलम' (Tikkun Olam — जगतक मरम्मत) की परम्पराक अनुसार पापी एवं पुण्यात्मा एकटा बच्चाक दुई रूप छथि। ५. भावना नवीन — 'हमर प्रिये नेना भुटका' एहि भाषण-रूपी लेखमे भावना नवीन बाल-दिवसक अवसर पर बच्चा सभक अपन मातृभाषा मैथिलीसँ दूर होएबाक पीड़ाक सशक्त चित्रण कएलनि अछि। विदेह समानान्तर इतिहास लेखिका उर्दूक उदाहरण दैत देखबैत छथि जे उर्दू पढ़ल बच्चा तेजमे पानि माँगैत मरि गेल — मातृभाषाक परित्यागक परिणाम भयावह होइत अछि। ई भाषाई उपनिवेशवादक विरुद्ध प्रतिरोधक आख्यान थिक। पाश्चात्य एवं पोस्टकोलोनियल दृष्टि फ्रेन्ट्ज़ फेनोन (Fanon) एवं होमी भाभाक पोस्टकोलोनियल सिद्धान्त अनुसार औपनिवेशिक मानसिकता बच्चामे मातृभाषाक प्रति हीन भावना उत्पन्न करैत अछि। भावना नवीन एहि मनोवैज्ञानिक उपनिवेशवादक विरुद्ध चेतावनी दैत छथि। ६. डॉ. रमण झा — गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा / तरेगन आ मिथिलाक लोकदेवता (समीक्षा) डॉ. रमण झाक तीन समीक्षा एहि संकलनमे संगृहीत अछि — श्रीति ठाकुरक 'मैथिली चित्रकथा', 'गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा', एवं 'मिथिलाक लोकदेवता' पोथीक विस्तृत समीक्षा; संगहि जगदीश प्रसाद मण्डलक 'तरेगन' संकलनक समीक्षा। 'गोनू झा' चित्रकथाक समीक्षा गोनू झाक कथाक चित्रात्मक प्रस्तुति बच्चा सभक लेल अत्यन्त उपयुक्त अछि। झाजीक समीक्षा मे टी.एस. इलियटक परम्परा-दृष्टिक उल्लेख उल्लेखनीय अछि। श्रीति ठाकुरक रचनात्मकता एहि अर्थमे अतुलनीय अछि जे एहि शैलीमे पूर्ववर्ती कोनो रचना उपलब्ध नहि छल। 'तरेगन' संग्रहक समीक्षा जगदीश प्रसाद मण्डलक 'तरेगन' — मैथिलीमे प्रथम सम्पूर्ण विहनि-कथा संग्रह — एहि संकलनमे विस्तृत समीक्षा पाबैत अछि। झाजी ओकरा 'नैतिक शिक्षा-दायक मैथिली पथ-दर्शक पोथी' मानैत छथि। ७. गंगेश गुंजन — 'लाट साहेबक किरानी' गंगेश गुंजन मैथिली साहित्यक वरिष्ठतम रचनाकारमे सँ एक छथि। 'लाट साहेबक किरानी' एकटा सामाजिक यथार्थवादी कथा थिक जाहिमे एकटा नगरक पुलपर भिखमंगा लोकनिक स्थिति एवं हुनकर मानवीय गरिमाक प्रश्न उठाओल गेल अछि। विदेह समानान्तर इतिहास पुलपर बैसल भिखमंगा सभ — टंगटुट्टी बुढ़िया, कोढ़ियाभिखारी, अन्धी स्त्री — एहि सभक आवाज इतिहासक 'समानान्तर धारा' थिक जे मुख्य इतिहासमे लुप्त रहैत अछि। गुंजनजी एहि समानान्तर आवाजक साहित्यिक रूप दैत छथि। नव्य न्यायक दृष्टि 'लाट साहेबक किरानी' कथाक अन्तिम दृश्यमे — कोढ़ी भिखारी सभ लाट साहेबक किरानीक सुझाव पर 'पिजुआह हाथ' (रोगग्रस्त हाथ) सँ धनी लोकक हाथ छूबैत दौड़ैत छथि। नव्य न्यायक 'व्याप्ति' अनुसार — 'पापक भय' एवं 'दूसराक कष्ट' — एहि दुनूक बीचक सम्बन्ध एहि कथामे प्रमुख तर्क-बिन्दु अछि। बाख्तिन-दृष्टि कथाक अन्त — किरानीक ओहि राजधानीसँ विदा होएब — बाख्तिनक 'नॉन-फिनलाइज्ड' (अपूर्ण) चरित्र-शास्त्रक उदाहरण अछि। किरानी एहि अनुभवसँ परिवर्तित होएत अछि, मुदा परिवर्तनक दिशा अनिश्चित रहैत अछि। लेवीनास-दृष्टि लेवीनासक अनुसार 'अदर' (परकीय) — जे कोढ़ी, अन्धा, विकलांग अछि — ओकर मुखमण्डल (Face) हमरा नैतिक दायित्वमे आबद्ध करैत अछि। गुंजनजीक कथा एहि नैतिक आह्वानक साहित्यिक प्रतिरूप थिक। ८. शिव कुमार झा 'टिल्लू' — तरेगन देखाइए · दहीक ठोप · खोइंछक लेल साड़ी · नारियर गाछ · मिथिलाक लोकदेवता · तरेगन 'टिल्लू' जीक रचना-संग्रह एहि संकलनमे सर्वाधिक विविध थिक। हिनकर छह रचना बाल मनोविज्ञानक विभिन्न पक्षक मर्मस्पर्शी चित्रण प्रस्तुत करैत अछि। 'तरेगन देखाइए' — मिथिला-परम्परा एवं बाल-नटखटी १९८७क बाढ़ि-त्रस्त मिथिलामे बच्चा-दल होलिका-दहन लेल खोपड़ी चोरेबाक प्रसंग — ई कथा मैथिली बाल-साहित्यक क्लासिक बनि गेल अछि। गुंजनजी द्वारा उद्धृत 'तरेगन देखाइए' — अर्थात् चकाचौंध देखाओल — एहि पदबन्ध मे संस्कृति, नटखटपन एवं लोक-स्मृतिक अद्भुत सम्मिलन अछि। 'दहीक ठोप' — समूहक दबाव आ बाल-मनोविज्ञान एहि कथामे बालक-दल एकटा भरिया (दही वाहक) क दही छीनैत अछि। नव्य न्यायक 'पक्षता' — अर्थात् प्रासंगिक तथ्य — एहि अर्थमे उल्लेखनीय अछि जे 'पितृ-मृत्यु भय' (जे बच्चाक दल उत्पन्न करैत अछि) ओ तर्क नहि, भावना-संचालित झूठ अछि। ई बाल-मनोविज्ञानक गहन अन्वेषण थिक। 'खोइंछक लेल साड़ी' — मातृ-प्रेम एवं बालक-साहस एहि कथाक टिप्पणी दुर्गानन्द मण्डलजी दैत छथि जे कथाक साथकता एवं यथार्थता कथाकारक स्वयंक जीवनानुभवसँ प्राप्त होइत अछि। दाओवादी 'चेंग' — सत्यता — एहि कथाक सबल पक्ष अछि। 'नारियर गाछ' — पर्यावरण चेतना त्याग बाबूक नारियल-वृक्ष उखाड़बाक प्रसंग — ई पर्यावरणीय चेतनाक मैथिली साहित्यमे एक दुर्लभ उदाहरण थिक। ९. डॉ. शेफालिका वर्मा — विविध गद्य-पद्य डॉ. शेफालिका वर्माक बहुसंख्यक रचना संकलनमे संगृहीत अछि — 'आनक बड़ाइ', 'साबरमती आश्रम' (यात्रा-वृत्तान्त), 'मूर्ख राजा आ ओकर बेटा', 'देश-प्रेम', 'गोनू झा चित्रकथा समीक्षा', 'बाल दिवस'। 'आनक बड़ाइ' — गुरु-शिष्य संवाद एहि लघुकथामे गुरु शिष्यक कंजूसी (स्तुति नहि करब) क उपाय बतबैत छथि — दूसराक तारीफ करब स्वयंक उदारता बढ़ाइत अछि। ई कन्फ्यूशियसक 'रेन' (Ren — मानवता-सौन्दर्य) एवं 'यि' (Yi — उचित व्यवहार) क अनुरूप अछि। 'साबरमती आश्रम' — गाँधी-आख्यान ई यात्रा-वृत्तान्त इतिहास-लेखन एवं व्यक्तिगत स्मृतिक सुन्दर सम्मिश्रण अछि। लेखिका एहि तीर्थ-समान स्थानक अनुभव मैथिली पाठकक समक्ष सजीव कएलनि अछि। 'मूर्ख राजा आ ओकर बेटा' — बाल-साहस एवं परिणाम राजाक चारि पुत्रक साहसिक यात्रामे तीनक मृत्यु — ई कथा बाल-जिज्ञासाक परिणामक यथार्थ चित्रण थिक। बेंजामिनक 'एलेगरी' अनुसार एहि कथाक प्रत्येक प्रसंग एकटा नैतिक अर्थक प्रतीक थिक। 'देश-प्रेम' — जापानी सैनिकक बलिदान एहि कथामे जापानी सैनिक खाई भरबाक हेतु एक-एक कूदि जाइत छथि। ई एकटा विवादास्पद कथा थिक — एकटा पाश्चात्य दृष्टिसँ ई देश-भक्तिक चरम अभिव्यक्ति थिक, मुदा मानवाधिकारक दृष्टिसँ सैनिकक बलिदान का महिमामण्डन प्रश्नवाचक अछि। १०. काश्यप कमल (पवनकान्त झा) — 'बाबूक सुनाएल खिस्सा' काश्यप कमल अपन पिताक सुनाएल छह कथा मैथिली पाठकक समक्ष प्रस्तुत कएलनि अछि — सहस्रमुखक दीप, गप्पक अर्थ, जहियासँ काल धेलक, नीक करी तँ पैघ के?, पढ़बे टा नै करी ओकरा गुनबो करी, अकिलक मोल। 'सहस्रमुखक दीप' — श्रम-सम्मान मजदूरक 'सहस्रमुखक दीप' — पुआरक जलोत एकटा श्रमिक-गरिमाक अत्यन्त सुन्दर रूपक थिक। मार्क्सवादी दृष्टिसँ — श्रमक सम्मान एवं राजदरबारक औपनिवेशिक दृष्टि — एहि दुनूक बीच एकटा वर्ग-संघर्ष अन्तर्निहित अछि। 'गप्पक अर्थ' — संगीत एवं नीति नटुआक गीत राजकुमार एवं राजकुमारीक हत्या एवं पलायनक संकल्पक उचित दिशा देइत अछि। ई भारतीय ध्वनि-सिद्धान्तक उत्कृष्ट उदाहरण थिक — गीतक शब्दार्थसँ परे ध्वन्यर्थ अत्यन्त गहन अछि। 'अकिलक मोल' — बुद्धिमत्ता बनाम अनुभव बृद्ध मन्त्री एवं युवा मन्त्रीक बीच नागिनक बच्चाक परीक्षण — ई नव्य न्यायक 'पूर्ण ज्ञान' (Paksha + Hetu + Vyapti) क सिद्धान्तक व्यावहारिक उदाहरण थिक। बृद्ध मन्त्री एकहि बेरमे सम्पूर्ण सूचना लाबैत छथि — ई 'आवश्यक तथ्य' एकत्रण थिक। ११. दुर्गानन्द मण्डल — पारस · राखी · स्वतन्त्रता दिवस दुर्गानन्द मण्डलजीक तीन रचना — 'पारस' (सामाजिक यथार्थवाद), 'राखी' (भाई-बहन सम्बन्ध), 'स्वतन्त्रता दिवस' (राजनीतिक व्यंग्य) — एहि संकलनमे संगृहीत अछि। 'पारस' — चाहवाला शिक्षक पारस — चाह बेचैत-बेचैत बी.ए., एम.ए. करैत, अन्ततः शिक्षक बनैत अछि — ई 'पारस-मणि' (छूलापर सोना बना देबाक गुण) रूपकक मैथिली साहित्यमे अत्यन्त सुन्दर अनुप्रयोग थिक। कन्फ्यूशियसक 'जुन्जी' (Junzi — आदर्श व्यक्ति) एहि चरित्रमे सजीव होइत अछि। 'राखी' — राखीक वास्तविक अर्थ लेखक राखीक वास्तविक अर्थ — आत्मिक रक्षासूत्र — पर बल दैत छथि। मिद्राश-परम्पराक पुनर्व्याख्याक अनुसार राखी-परम्पराक मूल आध्यात्मिक अर्थकें नवीन सन्दर्भमे प्रासंगिक बनाओल जाइत अछि। 'स्वतन्त्रता दिवस' — राजनीतिक व्यंग्य ई रचना सर्वाधिक तीक्ष्ण व्यंग्य थिक — 'झूठा लोकक झूठा भाषण' एवं 'स्वतन्त्रताक वास्तविक अर्थ' — एहि दुनूक बीच विरोधाभास। बेंजामिनक 'मेसियैनिक टाइम' अनुसार — वास्तविक स्वतन्त्रता अखनो भविष्यमे प्रतीक्षारत अछि। १२. वृषेश चन्द्र लाल — 'गोलबा' आ 'एकदन्त हाथी आ नौलखा हार' वृषेश चन्द्र लालजीक दू रचना संकलनमे सर्वोत्कृष्ट श्रेणीमे आबैत अछि। 'गोलबा' — मानव-पशु सम्बन्धक गहन आख्यान एहि कथामे गोलबा — एकटा नवजात बछड़ा — 'बड़कीमाई' (घरक मालकिन) के अपन माँ मानैत अछि। पूरा कथा बछड़ाक दृष्टिकोणसँ कहल गेल अछि, ओकर पाल-पोसाइ, हर्ष, एवं अन्तमे बलिदान — ई मैथिली बाल-साहित्यक एक महाकाव्यिक रचना थिक। कन्फ्यूशियसक 'रेन' — प्राणीमात्रक प्रति करुणा — एहि रचनामे परम रूपमे व्यक्त अछि। 'एकदन्त हाथी आ नौलखा हार' — राजकुमारी इन्द्रकुमारीक साहस गोरखा राजकुमार पृथ्वीनारायण शाहक विवाह-प्रस्ताव एवं राजकुमारी इन्द्रकुमारीक साहसिक प्रतिरोध — ई ऐतिहासिक कथा मैथिली स्त्री-शक्तिक अत्यन्त प्रेरणादायक चित्रण थिक। 'नारी वस्तु नहि — सृष्टिक बीज अछि' — ई पंक्ति फेमिनिस्ट क्रिटिसिज्मक स्वर थिक। १३. जगदानन्द झा 'मनु' — 'चोन्हा' (बाल उपन्यास) 'चोन्हा' मैथिलीक उत्कृष्ट बाल-उपन्यासमे से एक अछि। संजय नामक नेत्र-दुर्बल बालकक जीवन-संघर्ष एहि उपन्यासक केन्द्रमे अछि। विदेह समानान्तर इतिहास दिल्लीक झुग्गी-बस्तीमे रहनिहार मैथिल प्रवासी परिवारक जीवन — ई विदेह समानान्तर इतिहासमे 'विस्थापित मैथिली समाजक आख्यान' थिक जे मुख्यधारा इतिहासमे स्थान नहि पाबैत अछि। नव्य न्यायक दृष्टि संजयक माता-पिता हुनकर नेत्र-दुर्बलताक कारण खोजबाक बदले 'बहाना करैत अछि' — ई 'अज्ञान' (Non-cognition) क नव्य न्यायीय श्रेणी थिक। ज्ञानक अनुपस्थिति एहि परिवारमे उपचारक अनुपस्थितिक कारण बनैत अछि। भारतीय मनोविज्ञान करुण रस एहि उपन्यासक प्रबल आधार थिक। संजयक पीड़ा 'चोन्हा' (टेढ़-आँखि) उपनाम — ई करुणाक उत्तम काव्यात्मक प्रयोग थिक। यहूदी दृष्टि 'टिक्कुन ओलम' — जगत-सुधारक कार्य — संजयक स्वयं रोटरी क्लब आँखि-अस्पताल खोजब, तिफिनक पैसा बचेनाइ — ई 'मेसियैनिक' स्वयं-उद्धारक कथा थिक। १४. जगदीश प्रसाद मण्डल — 'बुढ़िया दादी' आ 'मान' (कथा) आ 'तरेगन' (संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्डल मैथिली बाल-साहित्यक ओ स्तम्भ छथि जिनकर 'तरेगन' संग्रह डॉ. रमण झाजी 'मैथिली बाल-साहित्यक पथ-दर्शक' मानैत छथि। 'बुढ़िया दादी' एवं 'मान' — ग्राम-जीवनक यथार्थ ग्रामीण दादी-नाती सम्बन्धमे लोक-संस्कृतिक सुन्दर अभिव्यंजना। चीनी कन्फ्यूशियन 'ज़ियाओ' (Xiao — पितृभक्ति/माता-पिता-वरिष्ठ-सम्मान) एहि कथाक मूल मूल्य थिक। 'तरेगन' संग्रहक विस्तृत समीक्षा 'तरेगन' — सम्पूर्ण पोथीक अवलोकन कएलापर एकरा मात्र बाल-कथा-संग्रह नहि मानल जा सकैछ। दर्शनक सभ विधाक सरल भाषामे चित्रण कएल गेल अछि। 'उद्धारा' कथामे महाभारतसँ कालजयी प्रतीकक निकालब 'हंस' आचार्यक कार्य थिक। १५. अनिल मल्लिक — 'दादीक गीत' अनिल मल्लिक एकटा अत्यन्त भावुक एवं सांस्कृतिक रूपसँ महत्त्वपूर्ण रचना प्रस्तुत कएलनि अछि — हिनकर दादी प्रत्येक भोर एकटा विशेष लोकगीत गाबैत छलीह जे पूरे गाँवक जागबेलाक घड़ी बनि गेल रहए। दादीक देहान्त पश्चात् ओ गीत हुनकर हस्तलिखित रूपमे मात्र शब्द बनि रहि गेल। यहूदी मिद्राश दृष्टि दादीक गीत — 'उठू हे फूलकुमैर रानी, झाड़ि दिअ अँगना' — ई एकटा 'सैक्रेड टेक्स्ट' (पवित्र पाठ) थिक जेकर मिद्राश-व्याख्या हर पीढ़ी नए अर्थ निकालैत अछि। 'रिह गेल एकटा अन्तहीन प्रतीक्षा — की दादी फेर औतीह?' — ई बेंजामिनक 'मेसियैनिक प्रतीक्षा' थिक। १६. डॉ. शशिधर कुमार 'विदेह' — दक्षिणी ध्रुव पर मनुष्यक पएरक सए वर्ष · उड़िने सकी पर चिड़ै छी हम · अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस · चन्दा मामा डॉ. शशिधर कुमार 'विदेह' एहि संकलनमे सर्वाधिक वैज्ञानिक एवं भाषाई चेतनायुक्त रचना प्रस्तुत कएलनि अछि। 'दक्षिणी ध्रुव पर मनुष्यक पएरक सए वर्ष' — विज्ञान-कथा अन्टार्कटिका अभियानक विज्ञान-आख्यान मैथिली बाल-साहित्यमे अत्यन्त दुर्लभ थिक। ई विज्ञान-बोध एवं साहित्यिक प्रस्तुतिक सफल सम्मिश्रण थिक। भाषाई चेतना 'अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस' — ई कविता-लेख मातृभाषा-संरक्षणक आग्रह थिक। पोस्टकोलोनियल दृष्टिसँ — मातृभाषाक सम्मान एवं भाषाई आत्म-सम्मान — एकटा वैश्विक चुनौती थिक। १७. बिपिन कुमार झा — 'ऐ चराचर जगतमे मनुष्य के?' आ 'सुखक मृगमरीचिका' 'ऐ चराचर जगतमे मनुष्य के?' एहि दार्शनिक बाल-कथामे ब्रह्माजी पशु-सभाक समक्ष मनुष्यक श्रेष्ठताक कारण — 'परिवर्तनशीलता' — बतबैत छथि। गजेन्द्र ठाकुरक परम्परामे ई कथा नव्य न्यायक 'व्याप्ति' — कारण-कार्य — क उत्कृष्ट बाल-उपयोग थिक। 'सुखक मृगमरीचिका' — देवदत्त बसुक संस्कृत कथाक मैथिली अनुवाद संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद बिपिन कुमार झाजी कएलनि अछि। नीमक कड़वाहटक प्रतीक — 'संसारो अही नीमक गाछ जकाँ अछि' — एहि उपदेशमे भारतीय काव्यशास्त्रक 'उपदेश-काव्य' परम्पराक सुन्दर अनुसरण अछि। १८. नवीन ठाकुर — 'चन्दा मामा आ चन्द्रमा' एहि संकलनक सर्वाधिक दार्शनिक लेख। 'चन्दा मामा' — बाल-काव्यक भावनात्मक उपनाम — एवं 'चन्द्रमा' — वैज्ञानिक यथार्थ — एहि दुनूक बीच तनावमे लेखक 'सामंजस्य' खोजैत छथि। दाओवादी दृष्टि लेखकक निष्कर्ष — 'चन्दा मामा रहिथ आकि चन्द्रमा, की फरक पड़ैत छै, छिऐ तँ एकैगो' — ई दाओवादी 'एकत्व' (One-ness) क स्वीकृति थिक। जुआङझी कहैत छलाह — सत्य एवं भ्रम दुनू 'एके ताओ' केर अंश छथि। १९. गजेन्द्र ठाकुर — 'तरहरिमे परीलोक' सम्पादक-रचनाकारक रूपमे ठाकुरजीक एहि कथाक शीर्षक 'तरहरिमे परीलोक' — लोक-कथाक 'परीलोक' (Fairy World) एवं तरहरि (सब्जी-जड़ी) — दुनूक सम्मिश्रण अत्यन्त रोचक रूपक थिक। विदेह समानान्तर इतिहास 'तरहरि' — एकटा साधारण शब्द — एवं 'परीलोक' — एकटा अलौकिक अवधारणा — एहि दुनूक संयोजन विदेह फ्रेमवर्कक 'साधारण एवं असाधारणक समानान्तरता' क प्रतीक थिक। २०. डॉ. अभयधारी सिंह — 'अभिनव वर्ष' ई लेख ग्रेगोरियन कैलेण्डरक इतिहास एवं भारतीय विक्रमी संवतक श्रेष्ठताक तर्कसंगत प्रस्तुति थिक। नव्य न्यायक दृष्टि लेखक ग्रेगोरियन, यहूदी, चीनी, मिस्री, पारसी एवं भारतीय कालगणनाक तुलनात्मक विश्लेषण करैत नव्य न्यायक 'तुलनात्मक प्रमाण' प्रस्तुत करैत छथि। भारतीय कालगणना सर्वाचीनतम होएबाक ऐतिहासिक तर्क अत्यन्त सुदृढ़ अछि। २१. बाल-काव्य: पंकज कुमार झा, रमाकान्त राय रमा, महाकान्त ठाकुर, डॉ. जया वर्मा एवं अन्य एहि संकलनमे ३०+ कविता एवं गीत संगृहीत अछि। सभक संक्षिप्त समीक्षा: पंकज कुमार झा — 'माए गइ माए' माँक विरह-गीत — करुण रसक उत्कृष्ट अभिव्यंजना। 'माए गइ माए' — तीन शब्दमे समस्त वात्सल्यक व्यंजना थिक। रमाकान्त राय रमा — 'उल्लूक शिकारी' उल्लूकें शिकारी बनाएब — एहि विलोमार्थक रूपकमे बाल-हास्य एवं व्यंग्यक सुन्दर सम्मिश्रण। महाकान्त ठाकुर — 'स्नेहक सरगम', 'खगता भगतसिंहक', 'अपन भूमि' देश-भक्ति एवं प्रकृति-प्रेमक भाव प्रभावशाली शैलीमे। 'ज्ञान-दीप' — ज्ञानक महिमागान। डॉ. जया वर्मा — 'बेटी' 'बेटी' कविता — स्त्री-शक्तिक ओजपूर्ण उद्घोष। फेमिनिस्ट क्रिटिसिज्म अनुसार ई मैथिलीमे स्त्री-चेतनाक महत्त्वपूर्ण रचना थिक। चन्द्रशेखर कामित — 'भात छै नाम-नाम' गजेन्द्र ठाकुरक अनुसार काव्यात्मक प्रवाहमे कामितजी सभसँ आगाँ छथि। ई निर्णय सुपुष्ट प्रतीत होइत अछि। शान्तिलक्ष्मी चौधरी — बाल गज़ल, कुहर, बरखा रानी गज़ल-विधाक मैथिलीमे सफल प्रयोग। 'कुहर' एवं 'बरखा रानी' प्रकृति-काव्यमे उत्कृष्ट रचना। मुक्ती कामत — 'जड़ैत ज्योत' 'नै खेबै तरकारी, रोटी / हमरा नूने रोटी खाए दे... माए गे, हमरा तूँ पढ़ैं लेल जाए दे' — ई बाल-जिज्ञासाक उत्कृष्ट काव्य-अभिव्यंजना थिक। शंभूनाथ झा — 'न्यूटनक सिद्धान्त' विज्ञान-काव्यक मैथिलीमे अत्यन्त दुर्लभ प्रयोग। न्यूटनक गुरुत्वाकर्षण मैथिली बाल-काव्यमे — ई अद्भुत रचनात्मकता थिक। स्वे आलम गौहर — 'नेना भुटकाक लेल एकटा सुन्दर कविता' एहि मुस्लिम लेखकक कविता संकलनमे मैथिलीक धर्म-निरपेक्ष स्वरूपक प्रमाण थिक। २२. चित्रकला — तुनीशा प्रियम · गुंजन कर्ण · ज्योति सुनीत चौधरी · गणेश ठाकुर · अनुपमा प्रियदर्शिनी · श्वेता झा चौधरी · श्वेता झा (सिंगापुर) · प्रवीण कुमार ठाकुर · कैलाश कुमार कामत · मोना पाण्डेय · इरा मल्लिक संकलनमे ११ चित्रकारक रचना संगृहीत अछि। श्वेता झा चौधरीक मिथिला चित्रकला सर्वश्रेष्ठ श्रेणीमे आबैत अछि। ज्योति सुनीत चौधरीक छह चित्र — जे हुनका स्वयं बनाओल — एहि संकलनक आत्मा थिक। चीनी सौन्दर्यशास्त्रक दृष्टि मिथिला-चित्रकलामे चीनी 'यि' (Yi — अर्थ-व्यंजना) एवं 'जिंग' (Jing — शान्त-सौन्दर्य) — दुनूक अनुरूप परम्पराक मौलिक चित्रण अछि। रेखाक सरलता एवं रंगक जीवन्तता मिथिला-कलाक मूल गुण थिक। २३. मुक्ताजी, अचना कुमर, शबनम श्री — संक्षिप्त समीक्षा मुक्ताजी — 'पथ दर्शन' एकटा विद्यालय-सांस्कृतिक कार्यक्रममे बच्चाद्वारा हिन्दी फिल्मी गीत 'आवारा हूँ' गेनाइ देखि लेखकक विचलन — ई मैथिली सांस्कृतिक पहचानक संकटक यथार्थ आख्यान थिक। अचना कुमर — 'विज्ञान' (दादीसँ सुनल कथाक पुनर्लेखन) एकटा विद्वान ब्राह्मणक 'आसनम् भु: चालयन्' (बैसबासँ पूर्व बिछौन झाड़ू) श्लोक जीवन-रक्षा करैत अछि — ई लोक-ज्ञान एवं संस्कृत-शास्त्रक सम्मिलन थिक। शबनम श्री — 'कम्प्यूटरक खेल' कम्प्यूटर शिक्षाक बाल-सुलभ परिचय — अत्यन्त सरल एवं प्रभावशाली लेखन। कन्फ्यूशियसक 'शिक्षाक लोकतन्त्रीकरण' — ई रचना ओहि आदर्शक प्रतिनिधि थिक। २४. अनमोल झा, विनीत उत्पल, डॉ. अभयधारी — बाल-लेख अनमोल झा — 'भांडाफोर' एहि लघुकथामे बूढ़ दादा जे आगन्तुकक परिचय माँगैत छथि — एहि प्रसंगमे एकटा टुकड़ा-टुकड़ा दोकानदार पर्दाफाश भेल। नव्य न्यायक 'परिज्ञान' (ज्ञान-प्राप्ति) एकटा विनोदी प्रसंगमे सम्पन्न होइत अछि। अनमोल झा — 'अपन गाम', 'मामा गाम' ग्राम-जीवनक पुनर्स्मरण — विस्थापित मैथिल युवाक अनुभव। दाओवादी 'घर' (Homeland) एहि कविताक केन्द्र-बिन्दु थिक। विनीत उत्पल — 'कतए गेल फिल्मक बाल-कलाकार' हिन्दी सिनेमाक इतिहास — 'जागृति', 'बूट पालिश', 'तारे जमीन पर' आदि — मैथिली पाठकक समक्ष। ई मनोरंजन-शिक्षाक माध्यमसँ बाल-विश्वक रोचक खोज थिक। २५. अन्य कवि-लेखक लोकनि नवीन कुमार 'आशा', राजदेव मण्डल, चन्दन कुमार झा, मनोज कुमार मण्डल, प्रभात राय भद्र, मिथिलेश कुमार झा, अमित मिश्र, आशुतोष मिश्र, देव शुभवंश — एहि सभक रचना संकलनमे एकटा सुगठित बाल-काव्यक परम्परा निर्मित करैत अछि। राजदेव मण्डल — 'मुनियाँक चिन्ता' आ 'कथीक गाछ' ग्रामीण बाल-जीवनक यथार्थ एवं पर्यावरण-चेतना — दुनू एहि रचनामे समाहित। मनोज कुमार मण्डल — 'खेल' बाल-खेल एवं उत्साहक सुन्दर काव्यात्मक चित्रण। देव शुभवंश — 'गतिक रहस्य' विज्ञान-काव्यक एकटा आओर उत्कृष्ट उदाहरण। २६. समग्र समीक्षा — छह दृष्टिसँ संकलनक मूल्यांकन अ. विदेह समानान्तर इतिहास — समग्र दृष्टि एहि संकलन मैथिली बाल-साहित्यक इतिहासमे कएक समानान्तर आख्यान एकत्रित करैत अछि — लोककथा (ज्योतिजी), भिखारी-आख्यान (गंगेश गुंजन), विस्थापित मैथिल (मनुजी), नारी-प्रतिरोध (वृषेशजी), एवं दलित-वंचित समुदायक अप्रत्यक्ष स्वर। सम्पादकीय दृष्टिकोण समावेशी एवं प्रगतिशील थिक। आ. गंगेशक नव्य न्याय — समग्र दृष्टि संकलनक रचना सभमे 'ज्ञान', 'अज्ञान', एवं 'तर्क' — एहि तीनू प्रकारक उपयोग भिन्न-भिन्न रूपमे देखाइत अछि। 'अकिलक मोल', 'ऐ चराचर जगतमे', 'सुखक मृगमरीचिका' — एहि तीनू रचनामे नव्य न्यायक प्रत्यक्ष प्रयोग अछि। एहि संकलनक 'अभिनव वर्ष' — कालगणनाक तार्किक तुलना — नव्य न्यायक तुलनात्मक प्रमाण-पद्धतिक उत्कृष्ट अनुप्रयोग थिक। इ. भारतीय काव्यशास्त्र — समग्र दृष्टि नौ रसमे सर्वाधिक प्रयुक्त — वात्सल्य (नानीक खिस्सा, गोलबा, चोन्हा), करुण (दादीक गीत, पारस, माए गइ माए), अद्भुत (विज्ञान-काव्य, तरहरिमे परीलोक), एवं वीर (एकदन्त हाथी, स्वतन्त्रता दिवस) रस। ध्वनि-सिद्धान्त अनुसार अनेक रचनाक अर्थ-व्यंजना बहुस्तरीय अछि। ई. पाश्चात्य साहित्यिक समीक्षा — समग्र दृष्टि टी.एस. इलियटक 'परम्परा-व्यक्तित्व' द्वंद्व — लोककथा-परम्परा एवं व्यक्तिगत रचनात्मकताक सम्मिश्रण — संकलनमे सर्वत्र दृश्यमान अछि। बाख्तिनक बहुस्वरता 'लाट साहेबक किरानी' एवं 'एक राजाक सात मेहरी' मे स्पष्ट अछि। फेमिनिस्ट क्रिटिसिज्म 'बेटी', 'एकदन्त हाथी', एवं 'अदृश्य बन्धन' मे प्रासंगिक अछि। उ. चीनी साहित्यिक समीक्षा — समग्र दृष्टि कन्फ्यूशियनवादी 'जुन्जी' (आदर्श व्यक्ति) — पारस, टिल्लूजी, मण्डलजी — एहि सभक नायक। दाओवादी 'वू वेई' — सहज कर्म एवं लोभ-त्याग — सम्पूर्ण लोककथा-परम्परामे। जुआङझीक भाषाई सीमाक दर्शन — 'चोनहा' उपन्यासमे एवं 'अदृश्य बन्धन' मे स्पष्ट। ऊ. यहूदी-इसरायली साहित्यिक दृष्टि — समग्र दृष्टि मिद्राश-पुनर्कथन — नानीक खिस्सा, दादीक गीत, 'विज्ञान' कथा — लोककथाक पुनर्सृजन। बेंजामिनक 'मेसियैनिक टाइम' — 'स्वतन्त्रता दिवस', 'राखी', 'अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस' — एहि सभमे भविष्यक मुक्तिक प्रतीक्षा। लेवीनासक 'अदरनेस' — 'लाट साहेबक किरानी', 'चोन्हा', 'गोलबा' — हाशिये पर रहनिहारक प्रति नैतिक दायित्व। २७. निष्कर्ष विदेह सदेह ९ — विदेह मैथिली शिशु उत्सव — मैथिली बाल-साहित्यक इतिहासमे एकटा दुर्लभ संकलन थिक। एकर वैशिष्ट्य बहुआयामी अछि: (क) वैविध्य — कथा, कविता, निबन्ध, जीवनी, चित्रकथा, यात्रा-वृत्तान्त, उपन्यास, विहनि-कथा — सभ विधा एकत्रित। (ख) भाषाई उत्कृष्टता — सरल, खाँटी मैथिलीक प्रयोग जाहिमे संयुक्ताक्षर एवं ङ-ञक उचित व्यवहार। (ग) सांस्कृतिक संरक्षण — मिथिलाक लोककथा, लोकगीत, लोकदेवता एवं पर्व-त्योहारक जीवन्त दस्तावेजीकरण। (घ) सामाजिक चेतना — जातिवाद-विरोध, नारी-सशक्तीकरण, भाषाई आत्मसम्मान, पर्यावरण-बोध। (ङ) अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टि — विज्ञान, इतिहास, राजनीति, दर्शन — सभमे वैश्विक दृष्टिकोणक समावेश। छह समीक्षा-दृष्टिसँ एहि संकलनक अध्ययन सिद्ध करैत अछि जे मैथिली बाल-साहित्य केवल 'क्षेत्रीय' नहि — ओ सार्वभौमिक मानवीय मूल्यक वाहक थिक। विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क एहि रचनाक 'अनकहल' आवाजक प्रति सचेत अछि। गंगेशक नव्य न्याय एहि रचनाक तर्क-संगति परखैत अछि। भारतीय रस-सिद्धान्त एहि रचनाक सौन्दर्यात्मक उत्कर्ष मापैत अछि। पाश्चात्य समीक्षा एकर संरचनात्मक एवं विचारधारात्मक जटिलता उद्घाटित करैत अछि। चीनी परम्परा एकर सहज-ज्ञान एवं नैतिक दर्शनक मूल्यांकन करैत अछि। एवं यहूदी-इसरायली परम्परा एकर पुनर्व्याख्याक असीमित सम्भावना देखबैत अछि। अन्तमे — 'गोलबा' क अन्तिम यात्रा, 'चोन्हा' क आँखिक उजास, 'दादीक गीत' क स्मृति, 'लाट साहेबक किरानीक' नैतिक क्रान्ति, 'एकदन्त हाथी' क राजकुमारीक साहस — ई सभ मिलि कए एकटा 'विदेह मैथिली शिशु उत्सव' रचैत अछि जे भविष्यमे मैथिली बाल-साहित्यक आधारशिला रहत। — समाप्त — सन्दर्भ-सूची १. गजेन्द्र ठाकुर (सम्पा.) — विदेह मैथिली शिशु उत्सव (विदेह सदेह ९), श्रुति प्रकाशन, नई दिल्ली, २०१२। २. गंगेशोपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि (तेरहम शताब्दी), सम्पा. कामेश्वर नाथ मिश्र। ३. भरतमुनि — नाट्यशास्त्र, चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान। ४. आनन्दवर्धन — ध्वन्यालोक, सम्पा. के. कृष्णमूर्ति। ५. T.S. Eliot — 'Tradition and the Individual Talent', 1919. ६. Mikhail Bakhtin — The Dialogic Imagination, University of Texas Press. ७. Walter Benjamin — Illuminations, Schocken Books. ८. Emmanuel Levinas — Totality and Infinity, Duquesne University Press. ९. Lao Tzu — Tao Te Ching, D.C. Lau (trans.), Penguin Classics. १०. Zhuangzi — The Complete Works, Burton Watson (trans.), Columbia University Press. -Gajendra Thakur, editor, Videha [be part of Videha www.videha.co.in JOIN VIDEHA WHATSAPP CHANNEL JOIN VIDEHA ARATTAI CHANNEL ] -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp/ Arattai no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। गद्य Prose २.१. हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२६ २.२. कल्पना झा- मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-७ २.३. अभिनंदिनी कुमारी- एकैसम शताब्दीक पहिल औपन्यासिक कृति - ‘पथिक पिआसल’क तात्विक विश्लेषण २.४. परमेश्वर कापड़ि- खिस्सा- पाइनेमे माछ आ’ नौ–नौ कुटियाक’ बखरा २.५. लाल देव कामत- जगैत जीवन : पोथी समीक्षा /शहिदे आजम भगत सिंहक तीनटा पत्र : अंतिम पत्र कोन मानल जाए?/ अतिशय आह्लादित थिकहुँ/ पाठकीय प्रतिक्रिया : भागिन - मैथिली उपन्यास (कोसी कातक संघर्षमय गाथा)/ पाठकीय प्रतिक्रिया : भागिन - मैथिली उपन्यास (कोसी कातक संघर्षमय गाथा) २.६. आचार्य रामानंद मंडल- प्राथमिक शिक्षा मे अंगिका बज्जिका/ नीट छात्र आंदोलन -२०२६/ मिथिला राज्य निर्माण के इतिहास २.७. कैलाश कुमार ठाकुर- विद्यापतिक धरा पर मैथिलीमे रैप-संगीत २.८. संतोष कुमार राय 'बटोही'- 'मातृभूमि स्वर्गादपि गरीयसी' २.९. प्रणव कुमार झा- लोकतन्त्र के पिच पर २.१०. जगदानन्द झा "मनु"- ४ टा बीहनि कथा- मुख्य वक्ता/ पैखाना खाए गेल/ कोन काज करै छी?/ हमरा तँ चिन्हते होएब? २.११. हास्यक सागर [हास्यार्णवप्रहसनम्‌क मैथिली अनुवाद (मूल संस्कृत श्री जगदीश्वर भट्टाचार्य्य; संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा)] २.१२. दामक प्रहसनम् [सम्भवतः भास रचित/ संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर] २.१३. हरिजीवन मिश्रक कृति- पालाण्डुमण्डन प्रहसनम् [संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद- गजेन्द्र ठाकुर] २.१४. गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-७) सन्दर्भ- कुणाल-कृत कुणाल-कृत विश्वासक शक्ति उर्फ सुकन्याक विवाह २.१५. गजेन्द्र ठाकुर- समग्र सिंहावलोकन-चतुर्भाणी, दामक प्रहसनम्, हास्यार्णव, आगमडम्बरम्, कादम्बरी, भल्लट-क्षेमेन्द्र-नीलकण्ठक व्यंग्य-त्रयी, पलाण्डुमण्डन, उत्तररामचरितम्, अभिज्ञानशाकुन्तलम्, मुद्राराक्षसम्, मृच्छकटिकम्, भगवदज्जुकम् आ मत्तविलास तेरहटा अनूदित पोथीक तुलनात्मक अध्ययन [संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर] २.१६. भामती (वाचस्पति)/ आत्मतत्त्वविवेक (उदयन)/ न्यायकुसुमाञ्जलि (उदयन)/तत्त्वचिन्तामणि (गंगेश)/ (मैथिली अनुवाद): ग्रन्थ-सार आ समालोचनात्मक मूल्याङ्कन [मूल संस्कृत सँ मैथिली अनुवाद: गजेन्द्र ठाकुर] २.१७.गजेन्द्र ठाकुर- गोहि सभक बीच जलसमाधि [गजेन्द्र ठाकुरक मैथिली कादम्बरी, खण्ड ०-१–२, खण्ड ० अध्याय (-१००) सँ अध्याय (-१); खण्ड १ अध्याय ० सँ अध्याय १००; आ खण्ड २ अध्याय १०१ सँ अध्याय २००] कथासार आ समीक्षात्मक मूल्याङ्कन: भारतीय आ पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्तक आलोकमे २.१८. गजेन्द्र ठाकुर- मैथिलीक एकटा समानान्तर व्याकरण, रचना आ भाषा-विज्ञान (ठेठी-अंगिका आ बज्जिकाकेँ संग लऽ कऽ)- गजेन्द्र ठाकुर] एकीकृत विस्तृत समालोचनात्मक शोध-समीक्षा २.१९. गजेन्द्र ठाकुर- डॉ. अमरेन्द्रक ‘अंगिका बाल-साहित्य’- लोकस्मृतिसँ आधुनिक बाल-सृजन धरि : चतुर्आयामी समग्र समीक्षा (मैथिली–ठेठी-अंगिका समानान्तर अनुशीलन) २.२०. गजेन्द्र ठाकुर- ‘बज्जिका गीत-संगीत’ : समेकित द्विभाषिक बहुआयामी साहित्यिक समीक्षा- डॉ. रामेश्वर प्रसादक कृतिक मैथिली–बज्जिका समानान्तर अनुशीलन २.२१. गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली बाल-उपन्यासक समीक्षाशास्त्र २.२२. गजेन्द्र ठाकुर- नाट्य-नवग्रह २.२३. भारतीय दलित साहित्य: मैथिली अनुवाद, समीक्षा आ सौन्दर्यशास्त्र २.२४. गङ्गेश उपाध्याय जीवन, तर्कशास्त्र, तत्त्वचिन्तामणि आ नव्य-न्याय परम्परामे विरासत २.२५. मिथिलाक पञ्जी–प्रबन्ध वंश, विवाह, दूषण, सामाजिक स्मृति आ आधुनिक पुनर्पाठ २.१. हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२६ हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२६ हितनाथ झा (मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070) विरोध परिहार श्री जनकदेव झा पूर्वोक्त कथनसँ इएह सिद्ध होइत अछि जे विरोध कयने कल्याण नहि! कारण जे, विरोधक आदि कारण थिक क्रोध। श्री गोस्वामीजी लिखैत छथि जे क्रोध पापक मूल, परन्तु आइ-काल्हि विरोध उपकारक बुझना जाइछ। तकर हेतु एक मात्र लाभ-लोभक हेतु ओ पड़ैत छैक, पूर्वक झगड़ा गाम-गाम पंचैती द्वारा फरिछाइत छल। आधुनिक विरोध तँ बिना भागीरथीक जल पीने फरिछैबाक कथा कोन। तेँ होइत अछि की तँ झगड़ा उठितहिं मधुबनीक रास्ता पकड़ैत छी। जहाँ गामसँ विदा होमय लगलहुँ की साक्षी ओरिआउ, तुरन्त साक्षी लोकनि मोछ,-पर हाथ फेरैत संग भेलाह।मधुबनी पहुँचतहि फरमाइश। औ की कहू ! हमरा तँ वायु बिगड़ि गेल अछि, अहाँ नहि मानल तेँ अयलहुँ, देखब ! आलू कोबीमे मारिचाइ नहि पड़तैक, शरीरक समाचार सुनाइये देल अछि। तखन हम थाकल सेहो अत्यन्त छी, कनेक सुतै छी, भानस भय जाय तँ उठा देब। आलू कोबी बिना घिउ देने घरहुमे मुँह मे देबाक योग्य नहि होइत अछि। यदि घिउ मे अनठा देबैक तँ तेहेन थाकनि अछि जे एकोग्रास कंठक पार नहि होयत। हँ, एकटा बात बिसरि गेलहुँ भाड• पीबक विशेष अभ्यास पड़ि गेल अछि । दाम दिअ, हम चीनी लबैत छी, ताबत भाड• पीसि राखू, नहि तँ काल्हि इजलाश पर ठाढ़ो नहि भय सकब, ठेही सँ देह सोझे ने हैत, इत्यादि धमकी दय दिमाग ठंढा करैत छथि। जाबत न्यायकर्ताक सोझाँ साक्षी लोकनिक मिथ्या आडम्बर नहि झारल गेल अछि तावत देवतहुँ सँ बेसी प्रसाद चढ़बैत रहू नहि तँ देवता गोटेक अपराध क्षमो करताह, ई साक्षीरूप देवता बड़ अनटाह, चट घर मुँहा डेग उठौताह, पयर पकड़ैत-पकड़ैत विपत्ति। तेँ हेतु विरोध केनिहार लोकनि व्यक्तिसँ सविनय प्रार्थना जे विरोध जनु करी। यदि दिनक दोषे पड़ि जाय तँ गामहिमे पञ्चैती द्वारा फड़िछाउ, नहि तँ साक्षी लोकनिक बिना कर्म दक्षिणा लेने जान नहि छोड़ताह।। (अंक~4, अप्रैल 1933) नवकी कनियाँ केदारमणि झा, मंगरौनी आजुक दिन बड़ सुन्दर! कनियाँ एकादशी व्रत कैने छथि। बौआ लै रोटिये वाटीक इंतजाम कए देलथिन्ह।तुरन्ते सभकेँ खुआ- पिआ कै पछवारिया घर गेले टा छलीहि। चूल्हा सै दू टुकड़ी कोइला लए आचमन कुरूड़ कए विदा भेलीहि।तावत बढ़नियाँ चंगेराक भार सँ अकसक भेल अवैत देखल गेलि।चट कनियाँ दू टा कुरूड़ फेकि नैहरक कुशल क्षेम मे व्यस्त भए गेलीहि।। " गे, भाइ कहिया तक औताह ? " " लै हे, कहै छीय से बुझै नै छहक ? " 'की ?' "की? हमरा आगू विदा कैलन्हि, अपने पौं गाड़ी पर पाछू सँ अबै छथुन। ई कथा भामो सुनैत छलीहि।ओ आव भुइयाँ मे पैरे ने रोपै छथि। कोठलीमे दुहू दियौर-भाउज गप्प करैत छलाह। बौआ- एं यै भौजी ! एखन यदि अहाँक घर कोनो मनसा पैसे तँ अहाँ की करब ? कनियाँ - करब की ? अहाँ केँ सोर करब। वो. - आ जँ हमहीं रही । कनियाँ - अहाँ तँ छी हे । ई गप्प होइते छल कि भागलपुर सँ भीम बाबूक तार पहुँचल। बौआ पढ़ि तुरत एक आदमी केँ घोघड़ड़िया. स्टेशन पर पठौलथीन कारण गाड़ी ऐवा मे विलम्ब नहि छलैक। भुसकौल कोनो तेहन खराब गाम नहि थीक। नीको-नीको लोक बहुत छथि। भीमबाबू गंगानाथक बहिनोइ और गंगानाथ भीमबाबूक। हिनका लोकनिक पिता मे अगाध मैत्री छलैन्हि। दुनू गोटे लंगौटिया यार छलाह तैं हेतु आपसमे ई गोलटक लेल। कनियाँ तँ दिनाहिसँ नंदोसिक छ' तीमनमे बेहाल छलीह। फलाहार करती सेहो छुट्टी नहि । भाँटाक साना, भटबर, कुटबी, भाँटा अदौरी और दालि लगा क' पाँच टा तँ तीमन ओरिएलैन्हि, छठम किछु भेटिते नहि छलैन्हि। तावत ननदि कहलथिन्ह- आहि बा-बा ओही भाँटा के सौसें-सौँसे भुजबी क' ने दियौ! कनियाँ ननदिक सहायतासँ गदगद भए गेलीह। एक छैनी काट थारीमे सवा सेर तुलसी फूल चाउरक भात एहि रूपकेँ साँठल अछि जेना कि सागरमे स्वेत कमल फुलाएल हो बड़का बट्टामे थाल सन राहड़ीक दालि, ताहिपर कमलक पातक पानि जकाँ घी दहाइत छ' बाटी मे छ' तरकारी, दही अचार प्रभृति साँठि कनियाँ स्त्रीगण सभमे मिलि कए कोबरा घरक ओसारा पर गाव' लगलीहि कारण वरक ई तेसरे यात्रा थिकैन्हि। सभकेँ जूड़ सुस्त कए कयनहुँ फलहार कैलैन्हि। एक खिली पान खा चन्द्रकान्ता पढ़' लगलीह। तावत भीमबाबू ऐलाह। भीमबाबू - पढ़िते रहब की सुतबो करब । कनियाँ- पढ़ै कहाँ छी, ध्यान करै छी। भीमबाबू - ककर ? कनियाँ - अहाँक। कारण आइए एकादशी थिकैक। (अंक-4, वर्ष 1933) आश्चर्य-विचार देव नारायण चौधरी, कोइलख डॉक्टर दयाक तलाशमे वृद्ध, लांगड़, रोगी हाथमे फराठी लेने विकल मोनसँ द्वारवाजा पर पहुँचलाह। हमरा कहलैन्हि जे हम निम्नलिखित स्थानमे दया केर तलाश कैल अछि। प्रथम स्थान देवनगर ग्राममे एक आस्तिक धनी ब्राह्मण छथि। जनिक नाम श्री ब्रजमोहन थिकैन्ह। पता लागल जे ओत डा. दया छथि। हम ओत पहुँचलहुँ। देखी त ब्रजमोहन पूजापर सँ उठि आध सेरक करीब खोआ, पा भरिक करीब मिसरी लय जलपान करै छलाह। ओसारा पर एक सुन्दर कुकुरो बैसल छलैन्ह। कनियें-कनियें क' दैत छलथिन्ह। ओसारासँ नीचा दरिद्रता देवीक सतावल पाँच मनुष्य ठाढ़ छलैन्ह। जाहिमे एक गोटासँ एहि तरहेँ बातचीत होइत छलैन्ह- ब्रजमोहनकेँ कहलैन्ह-मालिक ! एकादशीक दिन अहाँकेँ चारि आनाक सारुक द' गेलहुँ, से दाम हमरा नहि भेटल अछि,से भेटैत। अन्न बिना हमरा परिवारकेँ तीन संध्या भय गेल अछि।एक दुखिताह घरमे काहि कटैत अछि।पाइ दिअ, उत्तर- आज हमारे पास में पैसा नहीं है। जाओ, पन्द्रह रोज के बाद आना। ओ बेचारा ओत सँ कनैत-खिझैत आँगनकेँ विदा भेल। दोसर गोटासँ- ब्रजमोहन केँ कहैत छलैन्ह जे सरकार ! हमरा घीवक दाम भेटैत तँ हम मड़ुआ लितहुँ। एक टा बेटा से चारि माससँ दुःखित अछि।वैद्य कहने छलाह जे एक सेर घी ला।मोदक बना देबौक। से नहि कैल।पेट जरैत छल। अपनेक हाथे बेचल।दू मास भ' गेल, नहि भेटल अछि। भेटैत। उत्तर ब्रजमोहनक- (ललकारि क') एखन जो। तीन मास औरो नहि भेटतौक। ओ बेचारा हताश भय घर गेल। तेसर-( प. ब्रजमोहन सँ) मालिक ! अपनेक ओत' श्री सत्यनारायणक पूजा छल। जाहिमे अपनेकेँ हम नेना सभक मुँहसँ एक घरि केरा पाकल छीनि क' देलहुँ- तेकर बारह आना दाम नहि भेटल, से दिअ। हमरा मायकेँ कानमे घाव भ' गेल छैक। डॉक्टर केँ देबैक। विकल मोनसँ धोखामे पड़ि पण्डितजीक ओसाराक खाम्ही छुलकै। ओ जातिक मुसहर छल। पण्डित ब्रजमोहन मुसहरसँ (क्रोधमे,) रौ, तों घर कियैक छुइलें। मुसहर - (पण्डितजीसँ डेराइत- डेराइत) सरकार, अपनेक आसनपर कुकुर बैसल आ से त' कोनो दोष नहि। हम धोखा सँ कनिएक खाम्ही मे भीरि गेलहुँ त' घर छुइत गेल। प. ब्रजमोहन मुसहर सँ- जो तोहर दाम एहिमे मोजर भ' गेलौक। चारिम - एक डोम ब्रजमोहन सँ। मालिक । बैसाखमे श्री बच्चा बाबूक उपनयन छलैन्ह। ओहिमे हमरासँ तीन रुपैयाक बासन अयलैक। ताहिमे एक रुपैया भेटल और वांकिये रहल। भेटैत। प. ब्रजमोहनक उत्तर - ओकर सफाइ तँ ओही दिन भय गेलैक। तों कोन तरहक अपराध केने छलहीक से मोन नहि छौक। डोम- सरकार ! हम तँ जानि क' अपराध नहि कैल। कुकुर मालक हाड़ सोनितैल नेने घर चल गेलैक।ओकरा हम ओसारा पर धोखामे जा क' बैला देलियैक। कुकुर सोनितैल गायक हाड़ सँ घर नै छूतै , हमरासँ घर छूतैक ! प. ब्रजमोहनक उत्तर- बदमाश ! मारि जूतासँ कपार फोड़ि देब। एत' सँ भाग। ओ बेचारा ईश्वर केँ गबाही रखैत अपना खोपड़ी दिशक मुँह कैलक। पाँचम- मेहिया चमाइन गुदरी-गुदरी नूआ पहिरने ओसाराक नीचाँ सँ एक नेनाकेँ ( ब्रजमोहन केँ सुनबैत) बच्चा, मालिक केँ कहियौन जे यशोदा दाइक जन्मकेर हमर कमाइ(बियौट केर) हमर पौने दू रुपैया हैत। से बरोबरि कहैत छलाह जर रुपैया आओत तखन देबौक। से सुनैत छी जे काल्हि तीन बीस(६0) रु. मनीऑर्डर आयल छैन्ह। आब देथु ने। उत्तर-पण्डितजी गै, पछबरिया घरक ओसारापर प्रसूति केर नेना जन्मकालक नूआ धोबीक ओहिठाम जैबाक हेतु राखल छलैक। से सुनैत छी जे तोहीं ऊपरसँ खींचि धोबीके देलहीक। ओहिसँ घर छूति गेलैक। ओहिमे डेढ़ रुपैयाक बासन छुतलैक से काटि क' बाँकी चारि आना रहलौक। जो परसू देबौक। ओ बेचारी बाजल जे ओतेक नूआमे तीन दिनका (वियौर केर) लहू लागलसँ घर नहि छूतै। हमरासँ घर छुतलैन्ह। एकरा उत्तरमे ओहि बेचारीकेँ तीन लात भेटलैक। ओ अबला उचित अवस्था लय अपना आँगन गेल। प्रथम स्थानक ई दृश्य देखि रोग वृद्धिये भेल। दया कहाँ ! आब दोसर स्थान---- (अंक-11, नवम्बर-1933) क्रमश: संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-7 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-8 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-9 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-10 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-11 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-12 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-13 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-14 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-15 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-16 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-17 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-18 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-19 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-20 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-21 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-22 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-23 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-24 मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-25 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.२. कल्पना झा- मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-७ कल्पना झा मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-७ 'मिथिला मिहिर'क संवर्द्धक-संरक्षक विद्यालंकार श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'क पत्रकारिताक दीर्घ अनुभव सँ मिथिला मिहिर मैथिली साप्ताहिक प्रचूर मात्रा मे लाभान्वित भेल छलए, एहन कहब छनि सुरेश्वर झाक। सुनियोजित तरीका सँ 1960 सँ 1984 धरि नियमित मिथिला मिहिरक प्रकाशन होइत रहल, तकर पूरा-पूरा श्रेय 'विद्यालंकार' केँ देल जाइत छनि। आ से ओहिना नहि देल जाइत अछि। मैथिली भाषा ओ साहित्यक लेल हुनकर श्रम आ समर्पण 'नोटिस' कएल गेल विद्वत समाज द्वारा, तखन ई श्रेय देल गेलनि हुनका। मैथिली भाषा ओ साहित्यक लेल हुनक एहि अवदान केँ मैथिली साहित्यक इतिहास मे स्वर्णाक्षर मे लिखल गेल अछि। कथा-साहित्य, उपन्यास, नाटक, एकांकी, निबन्ध, बाल-साहित्य, कविता, संस्मरण , आत्मकथा, साक्षात्कार ओ यात्रा साहित्यक संग क्रीड़ा जगतक गतिविधि आ मैथिल ललना द्वारा लिखल मिथिलाक व्यंजन-विधि, सिलाइ-कढ़ाइक नमूना पर्यन्त, सभ किछुक समावेश सँ मिथिला मिहिरक लोकप्रियता अप्रत्याशित रूप सँ बढ़ैत गेल। मैथिली भाषा, साहित्य सँ लऽ कऽ संस्कृति ओ कला पक्ष पर ध्यान दैत मिथिला मिहिर मे चित्रकला, हस्तकला एवं संगीत पर सेहो आलेख सभ निरन्तर प्रकाशित होइत रहल। मैथिली भाषाक वर्तनी सम्बन्धी जटिल समस्याक समाधान करबा मे सेहो सफल रहल मिथिला मिहिर। मिथिला मिहिर जे लेखन शैली एवं वर्तनी स्थिर कएलक से आइ धरि सर्वाधिक मान्य ओ प्रचलित अछि। आ मिथिला मिहिरक एहि सर्वाधिक मान्य ओ प्रचलित वर्तनीक निर्धारण 'विद्यालंकार' जीक प्रयासे सँ सम्भव भऽ सकल छलए। कारण "मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना" बला स्थिति तँ छलएहे। मिथिला मे तँ कने बेसीए चरितार्थ होइत अछि ने "मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना।" एहन स्थिति मे कोनो निर्णय लेब, कोनो प्वाइंट पर सभक सहमति प्राप्त करब कतेक कठिन छल होएत, तकर अनुमान लगाओल जा सकैत अछि। आर्यावर्त आ मिथिला मिहिर, दुनूक प्रति 'विद्यालंकार'क ममत्व एवं मात्सर्य जग-जाहिर छलनि। एहि दुनूक उन्नयन, संवर्द्धन ओ लोकप्रियता मे हुनकर योगदान बिसरल नहि जा सकैत अछि। साहित्य अकादमी द्वारा 'विद्यालंकार'क जीवन-यात्रा पर आधारित 72 पृष्ठक मोनोग्राफ प्रकाशित कएल गेल अछि। लेखक छथि सुरेश्वर झा। सन् 2013 मे प्रकाशित ई मोनोग्राफ 'विद्यालंकार'क व्यक्तित्वक सामाजिक पक्ष सँ पाठक केँ परिचित करएबा मे पूर्णतया सक्षम अछि। राजनीति शास्त्रक विद्वान, मैथिलीक ख्यातिलब्ध लेखक, कथाकार, निबंधकार एवं अनुवादक सुरेश्वर झा "भारतीय साहित्यक निर्माता श्रीकान्त ठाकुर विद्यालंकार" शीर्षक सँ अपन लिखल एहि मोनोग्राफ मे पत्रकार 'विद्यालंकार'क साहित्यिक अवदान पर विशेष रूप सँ प्रकाश देलनि अछि। आ से पोथीक नामहि सँ स्पष्ट अछि। भारतीय साहित्यक निर्माता कहलनि अछि ओ श्रीकान्त ठाकुर केँ। एकटा पत्रकार साहित्यक उत्थान मे कोन तरहेँ सहयोग कऽ सकैत अछि, से सिखबा लेल सुरेश्वर झाक उक्त मोनोग्राफ पढ़बाक चाही आजुक युवावर्ग केँ, जे पत्रकारिता मे रुचि राखैत छथि। ओहुना एखन सोशल मीडियाक चलती भेने आ असंख्य 'न्यूज चैनल'क प्रकोप सँ पत्रकारिताक 'क्रेज' कनि बेसीए देखाइत अछि‌। गरिमामय भाषा-शैली-युक्त 'पत्रकारिता'क बल पर 'विद्यालंकार'क एतेक ख्याति पाएब हुनका सभ लेल प्रेरक भऽ सकैत छनि। अरे, गप्प करबाक छलए मिथिला मिहिरक आ हम राग अलापए लगलहुँ पत्रकारिताक। ओना दुनू एक-दोसर सँ 'कनेक्टेडे' विषय अछि, तथापि....! मैथिली मे सभ सँ अधिक दिन धरि प्रकाशित होबए बला 'मिथिला मिहिर'क अवदान केँ रेखांकित करैत सुरेश्वर झा कहैत छथि, "मिथिला मिहिरक पटना सँ प्रकाशनक कथा एना अछि। एक दिन 'आर्यावर्त इंडियन नेशन'क प्रेसक बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्सक बैसार मे दरभंगा महाराज डॉ. कामेश्वर सिंह ''विद्यालंकार' केँ कहलथिन जे मिहिरक प्रकाशनक लेल एकटा ठोस योजना बना कऽ प्रस्तुत करथि। ठाकुर जी अत्यन्त उत्साह सँ ओकर प्रकाशनक हेतु नवढंग सँ योजना बनौलनि। ओकर पृष्ठ संख्या, विभिन्न विधाक आलेख, मैथिली मिथिलाक सम्बन्ध मे सूचना एवं विचार तथा लेखक केँ उचित पारिश्रमिक, आदि विषयक योजना बना कऽ महाराज केँ देलथिन, जकरा महाराज सहर्ष स्वीकार कऽ लेलथिन।" मिथिला मिहिरक 1960 सँ 1984 धरि पटना सँ जे नियमित प्रकाशन होइत रहल, तकर पूरा-पूरा श्रेय 'विद्यालंकार' केँ प्राप्त छनि। मैथिली भाषा ओ साहित्यक विकास मे हुनक ई अवदान स्वर्णाक्षर मे लिखल जाए बला एक टा अध्याय अछि। एहि मैथिली साप्ताहिकक प्रकाशनक पाछाँ श्रीकान्त ठाकुरक चिंतन, दर्शन, योजना आ संचालनक दायित्व छलनि आ तकर निर्वाह ओ कुशलता पूर्वक करैत रहलाह। 1960 सँ 1984क अभ्यन्तर पटना सँ मिथिला मिहिरक प्रकाशनक जे चर्चा कएलहुँ अछि, से दोसर खेपक खिस्सा अछि। मिथिला मिहिरक इतिहासक प्रारम्भ 1909 ई. मे दरभंगा भेल छल। 1909 ई.क मकर संक्रान्तिक दिन तत्कालीन महाराजाधिराजक संरक्षकत्व मे दरभंगा सँ मिथिला मिहिरक प्रकाशन प्रारम्भ भेल छलए। 1909 सँ 1911 धरि मासिक आ तकर बाद साप्ताहिक रूप मे एकर प्रकाशन 1954 ई. धरि निर्बाध रूप मे दरभंगा सँ होइत रहल। 13 नवम्बर 1954क अंकक बाद एकर प्रकाशन हठात् बन्द भऽ गेल छलैक। दरभंगा सँ प्रकाशित मिथिला मिहिरक पाँच गोट सम्पादक रहलाह - विष्णु कान्त झा शास्त्री (1909-1912), योगानन्द कुमार (1912-1919), जनार्दन झा 'जनसीदन' (1919-1921), कपिलेश्वर झा शास्त्री (1922-1935) तथा आचार्य सुरेन्द्र झा 'सुमन' (1935-1954)। 1954 ई. मे मिथिला मिहिरक प्रकाशन जे ठप्प पड़ल से छओ वर्ष धरि ठप्पे रहल। पुनः पटना सँ मिथिला मिहिरक साप्ताहिक 11 सितम्बर 1960 ई. कऽ बहराएल। एकर पाछाँ श्रीकान्त ठाकुरक भूमिका अविस्मरणीय अछि। मिथिला मिहिरक पुनर्प्रकाशन सँ एक टा नब आशाक उदय मैथिली साहित्य आ ओकर भाषा शैली मे भेल छलैक। भाषाक प्रसंग मे एक टा जटिल प्रश्न रहैत छै वर्तनीक। एहि सन्दर्भ मे कतेको बेर विद्वान लोकनि द्वारा प्रयास कएल गेल। मुदा कोनो सर्वमान्य वर्तनी मिथिला मिहिरक पटना सँ प्रकाशनक पूर्व स्थिर नहि भऽ सकल छलए। एहि लेल श्रीकान्त ठाकुरक प्रयास प्रशंसनीय रहलनि। हुनकर मार्गदर्शन मे मिथिला मिहिर एहि बिन्दु पर विस्तार सँ विचार-विमर्श कएलक आ तखन जा कऽ वर्तनीक एक गोट निश्चित स्वरूप केँ मान्यता भेटल। कालान्तर मे एकरा 'मिथिला मिहिरक वर्तनी'क नाम देल गेल। ओना एहू वर्तनीक पक्ष-विपक्ष मे बहुत किछु तर्क देल गेलैक मुदा एतेक निश्चित रूप सँ कहल जा सकैछ जे मिथिला मिहिर मे मैथिली लिखबाक लेल जे लेखन शैली आ वर्तनी अपनाओल गेल, सएह आइ धरि सभ सँ अधिक मान्य अछि, प्रचलित अछि। सुरेश्वर झाक कहब छनि जे वर्तनीक एहि स्थिरताक लेल श्रीकान्त ठाकुरक बहुत पैघ अवदान छनि। वर्तनीक स्तर पर मिथिला मिहिर ठाकुर जीक नेतृत्व मे एक गोट मापदण्ड स्थापित कऽ मैथिली भाषाक स्वरूप केँ दृढ़ता प्रदान कएलक। 'विद्यालंकार'क कथन छलनि, "पटना सँ साप्ताहिक मिथिला मिहिरक संस्करण प्रकाशित होएबा सँ पूर्व धरि वर्थनीक कोनो एक शैली स्थिर नहि भऽ सकल छल‌‌‌। जखन कि शैली स्थिर करबाक प्रयास ओहि सँ चारि दशक पहिनहि सँ होइत आएल छलए। यद्यपि पहिने जकाँ शैली-सम्बन्धी अराजकता नहि रहि गेल छलए तथापि प्रायः दू शैली व्यापक रूप सँ प्रचलित छलए। मिथिला मिहिरक पूर्व सम्पादक पं. सुरेन्द्र झा 'सुमन' तथा 'अमर' जी, 'मधुप' जी आदि साहित्यकार लोकनिक एक शैली छलनि आ दोसर शैली छलनि प्रो. रमानाथ झा, प्रो. तन्त्रनाथ झा, आदि लोकनिक। पटना सँ जखन साप्ताहिक मिथिला मिहिरक प्रकाशन प्रारम्भ भेल तखन ओहि मे 'सुमन' जी, 'अमर' जी जाहि शैली मे लिखैत छलाह, ओकरे आधार बनाओल गेल। एहि सँ नब लेखक लोकनि केँ मार्गदर्शन भेटैत रहलनि। वर्तनीक सन्दर्भ मे गौर करए बला बात ई अछि जे मिथिला मिहिर एतबा उदारता देखओलक जे प्रो. रमानाथ झा, डॉ. सुभद्र झा सन विद्वानक लेख केँ हुनकहि शैली मे यथावत प्रकाशित करैत रहल। हुनका लोकनिक सम्मानक रक्षार्थ ई उदारता देखाओल जाइत छलए। मैथिली अकादमी द्वारा प्रकाशित पोथी सभ मे सेहो मिथिला मिहिर द्वारा स्वीकृत शैली केँ अपनाओल गेल अछि। एहि सँ स्पष्ट अछि जे मिथिला मिहिर मे मैथिली लिखबाक लेल जे लेखन शैली आ वर्तनी अपनाओल गेल, निस्सन्देह सएह सर्वमान्य सिद्ध भेल। मिथिला मिहिरक 'अन्त'क चर्चा करैत एहि आलेखक समापन करब हम। सन् 1984 मे गजेन्द्र नारायण चौधरीक सम्पादकत्व मे दैनिक रूप मे मिथिला मिहिरक प्रकाशन प्रारम्भ भेल जे दीर्घजीवी नहि भऽ सकल। मैथिली पत्रकारिताक ई दुर्भाग्य रहल जे मिथिला मिहिरक प्रकाशनक 'दैनिक रूप'क जे सपना देखने छलाह बुद्धिजीवी वर्ग, से ओकर साप्ताहिको रूप सदाक लेल बन्द भऽ गेल। संयोग एहन जे मिथिला मिहिरक प्रकाशनक बन्द होएबाक पाँच बर्खक अभ्यन्तरहि 20 मइ, 1989 ई. मे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार' इहलोक त्यागि देलनि। अठासी बर्खक हुनकर जीवनकाल (17जुलाइ, 1901 ई. सँ 20मइ, 1989 ई.) रहलनि, जाहि मे 'विद्यालंकार' जी मिथिला मैथिली लेल बहुत किछु कऽ गेलाह, ई तऽ स्वीकारहि पड़तनि हुनको सभ केँ जे 'विद्यालंकार' केँ मात्र हिन्दीक अनन्य पुजारी मानैत आबि रहल छथि। संपादकीय सूचना- एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी- मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-6 विद्यालंकारजीसँ पहिने विदेहपर व्यासजीक कृतित्वपर कल्पनाजी लीखि रहल छथि। पाठक व्यासजीपर प्रकाशित एखन धरिक सभ खंड निच्चा केर लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकै छथि- मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-2 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-3 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-4 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-5 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-6 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-7 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-8 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-9 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-10 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-11 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-12 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-13 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-14 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-15 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-16 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-17 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-18 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-19 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-20 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-21 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-22 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-23 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-24 मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-25 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.३. अभिनंदिनी कुमारी- एकैसम शताब्दीक पहिल औपन्यासिक कृति - ‘पथिक पिआसल’क तात्विक विश्लेषण अभिनंदिनी कुमारी एकैसम शताब्दीक पहिल औपन्यासिक कृति - ‘पथिक पिआसल’क तात्विक विश्लेषण शोध-निर्देशक डा. अमिताभ चक्रवर्ती विभागाध्यक्ष, मैथिली विभाग तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर शोधार्थी अभिनंदिनी  कुमारी मैथिली विभाग तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर सारांश विजेन्द्र कुमार मिश्र द्वारा रचित मैथिली उपन्यास 'पथिक पिआसल' एक टा सामाजिक उपन्यास अछि। एहि उपन्यासमे विवाहसँ संबंधित समस्याक संग ओकर परिणाम केँ देखाओल गेल अछि। किछु चित्रण एहि प्रकारक अछि जकरा आजुक बैज्ञानिक लोकनि नहि मानैत छथि मुदा मारतीय समाजमे एहि प्रकारक चित्रणकेँ सभ दिनसँ मान्यता प्राप्त छै। एहि उपन्यासमे पात्रक मृत्युक बाद ओकर प्रेतक रूपमे चित्रण विलक्षण अछि। कुंजी-शब्द एकैसम शताब्दी, मैथिली उपन्यास, तात्विक विश्लेषण, पथिक पिआसल, विजेन्द्र कुमार मिश्र। कथासार एहि उपन्यासक आरम्भ “रेलवे कातक छोटछिन जंगलाहा गाम - ललित लक्ष्मीपुरा। क्षण भरि लेल गाड़ी ठहरैत अछि... सेहो पसिंजरे टा। जौं हाल्ट नहिं बनल रहतै त' ई गाम एनाइयो समस्यामे भ' जाईत।"1सँ भेल अछि अर्थात एहि उपन्यासक पहिल तत्वक रुपमे परिवेश/वातावरणकेँ राखल गेल अछि। महाकान्त बाबूकेँ भगवान एकटा बेटी आ एकटा बेटा देने छथिन। नियारने रहथिन्ह जे पहिने बेटीक विवाह करायब जँ कोनो नीक घर-वर भेटि जाइत। वर खोजबाक भार अपन जेठका सार साहेबकें देने छलथिन्ह। महाकान्त बाबूक बेटी 17 वर्षक रहैत छनि आ मैट्रिक पास भेल रछै। राजनगरमे आगूक पढ़ाइक लेल नाम लिखा देल गेल छलै मुदा कहियो कॉलेज नहि जाइत छलै। परीक्षे काल जेतै। अपनो एकटा बेटी छन्हि, माधवीसँ वयसमे एक सालक छोट। एहि साल भगिनीमे बियाह करबा क' अगिला साल फेर अपन जमाय लेल घुमता। साल भरिमे व्यवस्थाक लेल टाका केनाइ जुटा लेता… दरमाहासँ… पैंच-उधारसँ… नहि त' खेत छन्हि… भरना कि केवाला… देखल जेतै।"2 माधवी अपना वरकें भवेशसँ तुलना करैत छै तऽ पाबैत छै जे ई झूस छै। भवेशकें देखने रहैत छै। गीत गबैत सुनने रहैत छै। सभ बात मोनमे चलैत रहैत छै। देखल जाय उपन्यासकारक शब्दें- “माधवी के केहनो सन नहि लागि रहल छलैन। रहि-रहि क’ एतबे सोच, जे आई जदी बाबू जीबैत रहितथि…! मामा केनाहूँ हमरा स' पिण्ड छोड़ा लेला। माधवी अमर के भवेशक मापदण्ड स' नपैत छथि। अमर ओछ भ जाइत छथि भवेशक आगू। भवेश के बटखारा बना अमर के तौलल जेतनि त डण्डी सोझ कोना रहत? अमर साधारण व्यक्ति छथि। हुनकर पयर जमीन पर छैन। कनहा पर घर-गृहस्थी के बोझ छनि, सोझ लोक छथि, नीक लोक छथि। चहल-पहल स' फराक अपन काजमे व्यस्त रहैत छथि। अपना पर ठाढ़ छथि, किनको खुशामत नहि छैन। गीत-नादमे विशेष रुचि नहि छनि। मंच पर कहियो चढ़लो नहि छथि। अमरक लाचारी माधवीक नजरिमे दुर्गुण बनि गेल। अमरले ओहने होयबाक चाह़ैत छलैन, जेहने भवेश छथि जेहने माधवी के चाहियनि। ओना माधवी किछु बाजैत नहि छथि मुदा मने-मन धुलैत रहैत छथि।"3 भवेशक विवाहमे माधवी सेहो आयल रहैत छै आ विवाहमे गीत-नाद सेहो गाबैत छै जाहिसँ चर्चाक केन्द्रमे माधवी आबि जाइत छै। "भवेश मंजु स’ चतुर्थी रातिक पहिल प्रश्न कयलनि- "ओ के छथि, जे खूब गीत-नाद आ खूब गोर सेहो छथि।" मंजु- अमर के बेटी! अपने पिसियोत बहीन अछि माधवी। भवेश- अहाँ के कयक टा दीदी छथि?… एकटा त' लक्ष्मीपुर… से त' हमरा बुझल अछि…। मंजु - एक्कहि टा! अहाँ के कोना बूझल अछि जे...। भवेश- कयक टा पिसियौत बहीन छथि अहाँ के? मंजु – एक्कहि टा। माधवी… से किऐक?"4 एहि वार्तालापक क्रममे ई बात भऽ जाइत छैक जे भवेशक ससुर भवेश आ ओकर बापसँ झूठ बजने रहैत छथिन। मंजु सब बात सच-सच बता दैत छै। आब “भवेशक आँखिमे निम्न कतय? ओ बिसरि गेला जे आई चतुर्थीक राति छै, कनियाँ लगेमे छथि! रहि-रहि क दाँत पिसैत भवेश सोचैत छथि हमरा संगे ऐना कियैक भेल? हमरा कियैक धोखा देल गेल? की दण्ड देबाक चाही एहेन फरेबी सब के? हमहूँ दोषी छी। हमरा निर्णय करबाक क्षमता नहि अछि। की हम खुलि क' बाबूक विरोध नहि क' सकैत छलहुँ? की क’ लितैथ हमर! बच्चे बनल रहि गेलहुँ हमहूँ! आत्मग्लानिक नोरसँ आँखि भीज गेलैन। भेर भिन्नमे सुतलि मंजु के मुँह निहारैत छथि भवेश। बेचारी के कोन दोष? सबटा बात सत्त-सत्त कहि देलनि। बाप वला दुर्गण नहि छन्हि हिनकामे। कतेक झुट्टा छधि हमर ससुर! कहलनि जे अई साल कुटमैती नहि हेतै आओर अपने विवाह-दान करबा क' आयल रहथि। चालबाजीसँ भगिन जमाय के अपन जमाय बना लेलनि जे बेटी सुख करत। आबि क' देखथु ने केहन सुख क' रहल छनि बेटी। राति केनाहुँ बीतय, भोरे हम नहि छोड़बैन, देखार क' क' राखि देबैन। समाजो त’ बुझतै हिनकर किरदानी! बड़ बहादुर बनल फिरैत छथि… नीच… पापी… भवेश भरि राति जगले रहलाह। कोहबर घरक लालटेम भरि राति ओहिना जरैत रहल।"5 माधवी ओहि सत्यकें सुनि कनियो मुह मलान नहि करैत छै। उनटे भवेश केँ समझाबैत कहैत छै- “देखू ओझा जी, मंजू हमर छोट बहिन अछि। अहाँ हमर बहिनोई नहि जमाय भेलहुँ। आब अहाँसँ एक सीढ़ी हमही ऊपर भ' गेलहुँ माने अहीं त'र हमही उप्पर"- मुस्किया दैत छथि माधवी, तें हमर आदेश अछि जे अहाँ सब किछु बिसरि केँ मंजूमे रमि जाउ। हमहूँ हुनका संग' नीक जकाँ रमि गेल छी।”6 भवेश आ माधवीक संग भेल वार्तासँ माधवीक नानी बुझि जाइत छथिन जे झूठ बाजि कऽ बेटा पोतीक विवाह कराओल अछि। “हमही कहियो ओरिया क' कहबै। साहेब त’ काल्हि चलि जेता मुदा अखन रहबौ। हमरा जीबैत तू सब निश्चिंत रह। मामा-मामीक बात जाय दही…। हमर मुँह चुप नहि रहि सकैत अछि…”7 एहि घटनाक समाचार चारु कात पसरि जाइत छै जाहिसँ देखयबालाक तांता लागि जाइत छै। एकटामेला जकाँ दृश्य बनि जाइत छै। एम्हर मंजू सेहो एक बेरमे बेसी दवाइ खा कऽ आत्महत्या कऽ लैत छै आ साहेब अपन समधि आ जमायपर केस कऽ दैत छै। बादमे भवेश फरार चलैत रहैत छैआ ओकिल सभसँ सलाह लैत छै। अन्तमे दोष अपना उपर लऽ लैत छै आ मृत्युदण्डक सजा सुनाओल जाइत छै। उपन्यासक अंतमे उपन्यासकार एहि सभ पात्रकेँ भूतक रुपमे समारोहक मंचक पाछू अन्हारमे ठाढ़ करबैत छथि। सभ एक-दोसरासँ संवाद करैत अछि आ उपन्यास समाप्त भऽ जाइत छै। परिवेश एहि उपन्यासक परिवेश मिश्रित अछि। पहिने ग्रामक चित्रण देखबामे आबैत अछि आ बादमे भवेश आ अमर पात्रकें उपस्थित कऽ नगरक चित्रण कयलाह अछि। एहि उपन्यासमे एक संग ग्रामीण आ नगरीय चित्रण कयलासँ एकर परिवेश मिश्रित भेल अछि। शैली एहि उपन्यासक शैली सेहो मिश्रित अछि। पहिने सरपट शैलीक संग वार्तालाप शैली, पूर्वदीप्ति शैली, एकालाप शैली, मनोविश्लेषणात्मक शैली, एक कथामे एकसँ बेसी कथाक नियोजन शैलीक समावेश देखबामे आबैत अछि। पात्र एहि उपन्यासमे सबसँ पहिल पात्र - महाकान्त बाबू छथि आ सबसँ अन्तिम पात्र मुन्नू जी जे अमरकेँ गाम लऽ जाय आबैत अछि। एहि दूनू पात्रक बीचमे कुल 24 गोट पात्र आओर अछि जे मुख्य पात्र आ गौण पात्रक भूमिकामे देखबामे आबैत अछि। उपन्यासकार आवश्यकतानुसार चरित्रक निर्माण आ चित्रण करबामे पूर्णतः सफल भेल छथि। एहि उपन्यासक जे पात्र सभ अछि तकर सूची अग्र रूपे प्रस्तुत अछि - 1.    महाकान्त बाबू - गामक प्रतिष्ठित धनिक लोक। 2.    महाकान्त बाबूक बेटी – माधवी, 17 वर्षक। 3.    महाकान्त बाबूक बेटा – मनोज, 10 वर्षक। 4.    महाकान्त बाबूक जेठ सार - साहेब उर्फ सोमनाथ चौधरी। 5.    साहेबक बेटी – मंजु, 16 वर्षक। 6.    जवाहर झा - आकाशवाणी कलाकार- (गौण पात्र) 7.    रवीन्द्र जी -     ”                              "                  " 8.    महेन्द्र -        ”                     "                  " 9.    हेमकान्त -     ”                               "                  " 10.  अवनीन्द्र -     ”                     "                  " 11.    वीरेन्द्र -     ”                      "                  " 12.    भवेश - कथानायक 13.    दयानन्द बाबू - महाकान्त बाबूक ग्रामीण, पाँच गोट बेटाक बाप, 14.    राजी बाबू - निःसंतान दाम्पत्य 15.    चन्द्रकान्त बाबू - भवेशक पिता 16.    मुखिया जी - गौण पात्र 17.    जिबछा मुसहर - महाकान्त बाबूक जन 18.    झमेलिया चमार – महाकान्त बाबूक दोसर जन 19.    बलहावाली - गौरी बाबूक पत्नी 20.    अमर बाबू - माधवीक वर 21.    साहेबक कनिया - नागदह बाली 22.    देबन भाइ- चन्द्रकान्त बाबूक ग्रामीण – गौण पात्र 23.    राजू -                     "                  "                  " 24.    मुन्ना जी – अमरक भाय, 25.    साहेबक माय, 26.    अमरक माय। भाषा एहि उपन्यासक भाषा सरल, सुबोध ओ बोधगम्य अछि संगहि विभिन्न प्रकारक सौन्दर्यसँ आओर सुस्पष्ट देखबामे आबैत अछि। ‘पथिक पियासल’मे युग्म शब्दक प्रयोग बेर-बेर देखबामे आबैत अछि। जेना- बाप-दादा, जन-बोनिहार, लागल-भीरल, बेरा-बेरी, धोती-कुर्ता, धीरे-धीरे, नीक-बेजाय, बात-व्यवस्था, आगू-पाछू, दर्शक-श्रोता, धीरे-धीरे, ठीक-ठाक आदि। ‘पथिक पियासल’मे अरबी-फारसी-उर्दू शब्दक प्रयोग सेहो ठाम-ठाम देखबामे अबैत अछि। जेना- अंदाज, शान, मजलिस, तरह, चीज, इलाज, तमाशा, साहेब, जरूर, शमियाना, जर्दा, शोर, शरबत, आस्ते, जनानी, तकिया, जमीन, हर्ज, इशारा, जल्दी, आदमी, लाश, माफ, खून, शोर, जरूर, खराब आदि। ‘पथिक पियासल’ उपन्यासमे काव्यात्मक भाषाक प्रयोग सेहो देखबामे आबैत अछि। जेना- 1.    “समय-समय पर चैताबर, कजरी आ फागुसँ गुंजैत रहैत अछि दलान।”8 2.    “दाँत, जीह, लोल-ठोर के पेरने रहैत छथि साहेब।”9 3.    “गामे लग कोनो सरकारी स्कूलमे मास्टर छथि चटपटिया।”10 4.    “गरदा उड़बैत जीप बिदा भेल दरभंगा दीस…।”11 5.    “एनाही कुर्सी रहतै बरियातीक लेल।”12 6.    “चाह-पानक दोकान सेहो लागि गेलै बाटक कातमे।”13 7.    “खूब ठाठ-बाट छनि गाम पर।”14 8.    “यौ फटलका जुत्ता पहिर क’ आबि गेलौं धोखा सँ, निकहा राखले अछि गाम पर।”15 9.    “उठि क’ पड़ा गेली माधवी कल वाला बाड़ी दीस।”16 10.  “कसि क’ मुँह बन्न क’ लेली माधवी।”17 11.  “अखन त’ कोनो चर्च वर्ष नहि छै विवाहक”18 12.  “माथ पर चमकैत पसीनाक बुन्न मोती जकाँ चमकैत छलनि।”19 13.  “औ जी, चन्द्रकांत बाबू खानदानी कुटुम कयलहुँ अछि अहाँ।”20 14.  “माधवीक प्रसन्नता भेलैन मंजु कें देखि क'।”21 15.  “वयसमे माधवी सँ एक साल छोट छथि मंजु।”22 16.  “विध-व्यवहार बुझय वाली शांत स्वभावक छथि मंजु।”23 17.  “खिलखिला क हँसि पड़ैत छथि दुनू बहीन”24 18.  “बड़का मामा सेहो बड़ हरान भेला घटकैतीमे।”25 19.  “की भ' गेलैन हुनका?26 20.  “की निर्दय छधि विधाता? देखल कोना जाईत छनि ई सब! के नहि कानि रहल अछि आई!”27 ‘पथिक पियासल’ उपन्यासमे अलंकृत भाषाक प्रयोग सेहो देखबामे आबैत अछि। जेना- 1.    “किछु गोटे जिनकर धोती-कुर्ता बर्फ सन झलकैत छैन ओ कुर्सीपर बैसल छथि, पीयर सन मटियायल गंजी-धोतीबला व्यक्ति सभ चौकी पर पलथा मारने बैसल।”28 2.    “अपने गीत गाबैत नहि छथि; मुदा राग-भास नीक जकाँ बुझैत छथि।”29 3.    “टाका लेल त' कोनो गप्प नहि मुदा जमाय अपने सन चास-वास बला तकैत छथि से नहि भेटैत छनि।”30 4.    “बातमे विभेद भेला पर ज्वालामुखी जकाँ फूटि पड़ैत छथि।”31 5.    “जरैल सन गामक रहितहुँ साहेब के लाठी-भाला चलेबाक लूरि नहि छैन।”32 6.    “पुलकित होईत माधवी सोचय लगली- बाबू के कते नीक जकाँ व्यवस्था करय आबैत छनि।”33 7.    “कम त’ कम्मे जकाँ होइत छै।”34 8.    “च्यवन ऋषि जकाँ बुढ़ारीक बाद फेर सँ जुआनी आबि गेल।”35 9.    “देखैत-सुनैत माधवी सन सुन्नरि त’ नहि मुदा बड़ बढ़ियाँ मनुक्ख सन।”36 10.  “हम कि जाने ने गेलियै, हमहूँ त' तोरे जकाँ छी।”37 ‘पथिक पियासल’ उपन्यासमे मुहाबराक प्रयोग सेहो देखबामे आबैत अछि। जेना- 1.    “दीप ल’ क’ ताकए पड़तै।”38 2.    “कन्ना-रोहट आ हाहाकारक स्वर सँ सबहक करेज पानि भ’ गेल।”39 3.    “एक-डेढ़ लाख टाका स' पचहत्तरि हजार पर एलहुँ, आब ओहो भेटाई पहाड़ भ’ गेल।”40 4.    “चन्द्रकांत बाबू संभरि क' तीर छोड़ला।”41 ‘पथिक पियासल’मे लेखकक अनुभवी वचन सेहो देखबामे आबैत अछि। जेना- 1.    “मनुक्ख सोचैत अछि किछु, होईत छैक किछु।”42 2.    “मरण-हरण त’ कोनो अपना हाथमे नहि छै।”43 3.    “मनुक्खक सोचने की होईत छैक?”44 4.    “भगवान जे करैत छथि नीके करैत छथि।”45 5.    “समाज आब कमजोरहे लेल छैक।”46 6.    “मिथिलामे कन्याक भाग्य विधाता नहि, समाजक पाँच गोटे मिल क’ लिखैत छथि।”47 7.    “यज्ञक मालिक जगदीश होईत छथि।”48 8.    “जे कपारमे रहतै, सैह ने हेतै?”49 9.    “बात-बाप एककहि टा होईत छैक।”50 10.  “पहिल बेर त’ केहनो भव्य मुँह-कान वला वर विपटे जकाँ लगैत छै।”51 ‘पथिल पियासल’मे कहबीक प्रयोग सेहो देखबामे आबैत अछि। जेना- 1.    “घरमे धाधर पापे वृद्धि”52 2.    “ने ओ देवी आ ने ओ कड़ाह।”53 3.    “अहाँ अनेरे बिना फीसक ओकील जकाँ चरचरा रहल छी।”54 4.    “लक्ष्मीपुरक रामा-खटोलामे कतेक दिन ओझरायल रहता।”55 5.    “अपनहि जालमे अपने ओझरा गेला।”56 6.    “सुमरने मरी बिसरने जीबी।”57 7.    “साँप-छुछुनरिक पईर भ' गेलैन।”58 8.    “जखन उक्खैरमे मुड़ी द' देने छथि तखन समाठक कोन डर।”59 9.    “बहुक मारल छथि, अप्पन हारल छथि।”60 10.  “भैया सँ नहि जीति त' भौजी के…!”61 11.  “खेत खाय गदाहा मारि खाय जोलहा”62 12.  “मंजुए पर छजैत छनि, आन छौड़ी रहितनि त' एतेक काल नचनी नाच देने रहितनि।”63 13.  “आँखिक ओट पहाड़”64 14.  “चन्द्रकान्त बाबू गड़ल मुर्दा उखाड़’ पर लागल छथि”65 15.  “हम सब दिन अन्हारेमे रहलहुँ।”66 16.  “… बुड़य वंश कबीर के।”67 17.  “सपना त’ सपने भ' गेलनि।”68 18.  “जखन विधाता बाम होइत छथिन्ह त' एहिना होइत छैक।”69 19.  “झगड़ामे कतहुँ अमृत बरसैत छैक।”70 20.  “जायब नेपाल कपार जायत संगे।”71 ‘पथिक पियासल’मे गारिक प्रयोग सेहो देखबामे आबैत अछि। जेना- 1.    “देखियो केहन बात बाजि क' चलि गेल खचराहा।”72 2.    “तोरा जकां चोरि-छिनरपन त' नहि करैत छी। पपियाहा नहितन।”73 3.    “सबटा हरमाद गौरी क' रहल छै। सरधुआ कतेक नोन खयने अछि एहि घरक, कोना पचतै? दिनकर-दिनानाथ कुष्ट फुटा देथिन।”74 4.    “बज्र खसौ शितलहरी के।”75 5.    “पूरा रामायण बादमे कहबौ, अखन एतबे बुझही जे तोहर बेटी छिनारि छौ।”76 6.    “बज्र खसौ मस्टरबा के जे अपन बहकल भगिनी के हमर नेन्नाक गरामे बान्हि देलक।”77 ‘पथिक पियासल’ उपन्यासमे विशेषण शब्दक प्रयोग देखबामे आबैत अछि। जेना- जंगलाहा गाम, बड़ नीक, पुरना, नवका, बड़का, बड़ गुण, भोथहा, नीक, बीच दुपहरिया, लिखलाहा, प्रतिष्ठित, नीक लोक, बड़ लोभी, सरकारी नोकरी, समाज, कमजोरहे, फिफरी पड़ल ठोर, सहज मुद्रा, उज्जर धोती-कुर्ता, पढ़ल-लिखल आदि। ‘पथिक पियासल’ उपन्यासमे अंग्रेजी शब्दक प्रयोग सेहो देखबामे आबैत अछि। जेना- रेलवे, पसिंजर, हाल्ट,मेस, स्कूल, मास्टर, जेनरेटर, माइक, भैकम, फास्ट, ट्यूबलाइट, हार्न, सुट, बूट, बी. ए., आई. ए० एस०, फर्स्ट डिवीजन, टेबुल, विडियो, ट्रे, नम्बर, फाईनल, फ्री, कैंसर, आपरेशन, इंग्लैण्ड, फीस, पेट्रोमेक्स, रजिस्टर, मजिस्ट्रेट, सेपरेट क्वाटर, ट्रांजिस्टर, शॉल, क्लास, प्राइवेट, स्टोव, पैडिल, ब्रेक, टी. बी., केस आदि। संदर्भ सूची 1.    मिश्र, बिजेन्द्र कुमार, वर्ष: 2001, पथिक पियासल, प्रगति इंटरप्राइजेज, लालबाग, दरभंगा, पृष्ठ सं०—5 (अघोषित). 2.    उपरोक्त, पृष्ठ सं०-7. 3.    उपरोक्त, पृष्ठ सं०-46-47. 4.    उपरोक्त, पृष्ठ सं०-61. 5.    उपरोक्त, पृष्ठ सं०-63. 6.    उपरोक्त, पृष्ठ सं०-65. 7.    उपरोक्त, पृष्ठ सं०-67. 8.    उपरोक्त, पृष्ठ सं०-6. 9.    उपरोक्त, पृष्ठ सं०-7. 10.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-7. 11.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-9. 12.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-10. 13.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-10. 14.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-13. 15.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-14. 16.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-15. 17.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-15. 18.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-16. 19.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-20. 20.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-21. 21.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-23. 22.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-23. 23.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-23. 24.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-23. 25.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-25. 26.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-26. 27.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-5 28.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-6 29.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-6. 30.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-7. 31.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-7. 32.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-10. 33.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-20. 34.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-23. 35.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-23. 36.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-23. 37.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-7. 38.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०—25. 39.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-28. 40.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-29. 41.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-26. 42.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-27. 43.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-27. 44.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-29. 45.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-29. 46.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-45. 47.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-46. 48.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-51. 49.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-54. 50.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-60. 51.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-122. 52.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-26. 53.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-33. 54.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-41. 55.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-45. 56.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-69. 57.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-82. 58.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-100. 59.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-103. 60.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-104. 61.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-104. 62.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-104. 63.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-104. 64.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-107. 65.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-116. 66.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-117. 67.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-118. 68.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-124. 69.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-126. 70.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-126. 71.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-127. 72.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-129. 73.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-136. 74.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-38. 75.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-42. 76.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-43. 77.  उपरोक्त, पृष्ठ सं०-80. अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.४. परमेश्वर कापड़ि- खिस्सा- पाइनेमे माछ आ’ नौ–नौ कुटियाक’ बखरा परमेश्वर कापड़ि खिस्सा- पाइनेमे माछ आ’ नौ–नौ कुटियाक’ बखरा

ई जे हम कह’ लागलछी, से आइ–काल्हिके नै, पुरने जुग–जमानाके खिस्सा कहैछी । एहिना कोनो गां–नगरमे दू–परानी रहैत रहए । उ दुनू बूढ़–पुरान नै रहए, त’ उमका–उमकी तन–वयसके सेहो नै रहए । उसुन गरीब गुरबा रहए, गरीबीके मारल, जिनगी–जानस’ थाकल–हारल रहए । दुख–दरद सह’क,े भुखल–दुखल बेथुथ रह’के, ओकरासबके ठेल्ला–घट्टा पडि़ गेल रहै । असबी दिदगर केहन त’, उसुन दुखके दुखे नै बूझ’ लागल रहए । ओकरासबके अपन ननटुनमा घर–परिवारके सब काज–बातमे चूड़मे चूड़ मिलने, अपसी मेधा–मिलान बड़ धनगर रहैक । गरीबी जीवन रहै । फाटले पुरान पेन्हए केहुना गुजर करए । जहिया बोइन–बुतात नै लगैै तहिया अधपेटो, उपास रहि जाय । भगमानके माया, दैवक चलित्तर । एकदिनके ओकरासबके चलित्तर–चलेबाके बकझोंझों, दुरमतियाके खिस्सा कहैछी । से, ओइदिन गरमी–गुमारके उखम समैया रहैक । भल मुनहर सांझ पड़ल रहै आ उ दुनू परानी अङनेमे खंड़तैर चटकुन्नी ओछाक’, बैसल मनसुवा बंटैत रहए । मनसुवा ममोलबा त’ से कथीके ? पुरहिया लगहैर भैंंस पोस’के । से, सोन्हाएले मने, हलसिक’ मरदबा बाजल— मौगी गै, हमर मन गभिनाइअ’, भैंसी पोइसती ! झबहीमे, गरर्र–गों दूध दुहिती ! आ भैंसीके दूध–दही बेचि–बिखिनक’, गुजर–गुजरान करिती । छलकैत नितराइत ओकर मौगिया बाजल— हँ ऐ, कतेक निमन होत्तै जे हम बढ़का कराहमे दूध औंटती ! बड़ बढि़ञा, बड़ निमन । दुनूके मनमे ऐ बातपर आनन्दक लवा फूट’ लागल । आगबैत उमेद बढ़ने, दुनू बेगतीके मन, त’र धरती उपर असमान ठेक’ लागल । —हे गै हे, हम भैं चरएबोै, तों चौरी–चांचरस’ घास–भुंसा अनिहे ! —हे ऐ हे, ई बहरिया काज–धन्धा करतै, हम घर–अङना सम्हारि डेबबै ! —हँ, से सब बात बान्हि सम्हारिक’ जुगुतस’ करिहे धरिहे । तेकर कनिके कालमे ओकर मने उनटि गेलै । हलसल लहालोट मौगियाके मन हिलोर मार’ लगलै आ लपकले लाढ़ करैत, अपन जरल खरकटल मनसूबा बंटलक— हे ऐ हे, ई एगो बात बूझिलौक ! हम पहिनुका दुहानक दूधके खीरक’, एकरे हाथे अपन भौजाइके सधोरि पठएबै ! ऐपर मरदबा तरङल खड़ङल—न’, नै गे ! हम, नै जएबौ ! हमरा होत्तै त’ कहियो काल घोर, डाढ़ही अरोसियो–परोसियाके पपनीयोमे सट’ देबै । —नै, एकरा सधारि ल’क’ जाही पड़तै । —टिप ध’क’ तोरे कहने ? हम कहलियौ न,ै त’ नै जएबौ ! ऐला’ सुरुज पुरुबके बदला पछिममे कथिला नै उगौ ! —ई त’, कहलक जे ! एकरे कहने, ओतेक सखस’ बनाएल खीर–सधोरि, हम जिआन, बेबाइिल होअ’ देबै ? —नै त’, हम उ खीर लेने–लेने अपन बहिनके द’ अएबौ ! दोसर दिन अपन भाइ–भौजाइके , तेसर दिन अपन दोस–महिमके द’ देबै । —त’, कहलक जे, मुह बड़ चिक्कन ! हम अपन भौजाइके नै देब ? मताइरके नै खिआएब ? बहिन पिउसी घरे नै देब, जे एकरा लर–जरके देबग’ ! चौतरी चौचंख होइत बाजल— तब की ! हम अमबोहि अलेल दही नैहरा पठएबै ! ऐ बातपर चौतरा कौजला मरदबा, तरङि–खरङिक’ लागल अपन बेकैतपर गरज’ बरस’— हे, हमर हंटन–बरजन मान । अनेरे नाहकमे दूध–दही बेबाइल नै क’र । तबधल तरेगनी भ’, उ धीपल आगि–बालुसन दाग, पाक’बला बोल–भाख बाजल– कहलक जे, टिप ध’क’ एकरे कहने, हमर नैहराके लोक दूध–दही अछैतेमे ललाएत सिहाएतग! ! नैहरा नामे हमरा केउ कतौ नै रोकौ टोकौक । नै त’ हम घरमे अट्ठा–बज्जर खसाक’, लोहा–लड़ाइ उखाडि़, भाम्ही–भङठा नै लगा दलिऐै, त’ हम अपना बापक बिया–बुन्नके नै ! —त’ एगो बात लोको सुइने लौक ! जखैनते जे ई दूध–दही ल’क’ अङनास’ एकौगो डेग हनलकै, कि हम सोहाइ लाठी मारि, डेङा ठठा नै देलिऐ, त’ ई हमर मोछ नै, झांइट ! ई एहन करुआएल, लहैर लिअ’बला झरकबाइसनके बात सुनिते, पहिनेत’ दुनूके मुंहाठुठी, कटौवलि आ पछाति धरा–धरौवलि, पछरा–पछरी हुअ’ लगलै । एतबेमे, कोमहर नै कोमहरस’ उगो घटेनगर गोहियार बुढ़बा लोहछले चोटाएल आएल आ पच्छेस’ मरदबाके मारलक सोहाय लाठी । मरदबा त’ एके लाठीके मारिमे, ऐंच–गैंचक’ धरती गर ध’ लेलक । आ से गारि–बात दैत ओइ भैंसीबालीके मारलक एहन ने हुराठ, जे ओकर पराने जाए लगलै । आब चोटस’ बेसी उ दुनू मरदबा–मौगी छगुनाए, अकचकाए— भल भाइ रे, ई मारलक त’ मारलक केहनमे ? कथी ला, कोन बाते घाते ? ऐ बातके भरना उतारा बुढ़बा फनकैत, गारि–बात दैत, बाजल— हम अपना खेतमे बाली–बुटा जे लगाहिबला छली, से तोहर भैंसी जा’क’, सबटा चरि–बझिक’ लाहेब नाश क’, सौंसे चासेके धङरा–चास क’ देलक ! अकथ अजोध बात सूनिक’ मौगिया लोहछले लोलिअबैत बाजल— मर गे, हमरा त’ पहिने भैंसीए नै ! ताबे एकर चास केना चरि गेलै ? —नै बुझले ! ओएह भैंसी, जेकर दूध दही ला’, तोंसब कटरा कटांउझ करैत छले ! ई फुसि–पदना बात सुनिते, दुनू परानी लगले लजा गेल । माइरक चोट दुनूके ठामे बिसरा गेलै अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.५. लाल देव कामत- जगैत जीवन : पोथी समीक्षा /शहिदे आजम भगत सिंहक तीनटा पत्र : अंतिम पत्र कोन मानल जाए?/ अतिशय आह्लादित थिकहुँ/ पाठकीय प्रतिक्रिया : भागिन - मैथिली उपन्यास (कोसी कातक संघर्षमय गाथा)/ पाठकीय प्रतिक्रिया : भागिन - मैथिली उपन्यास (कोसी कातक संघर्षमय गाथा) लाल देव कामत जगैत जीवन : पोथी समीक्षा /शहिदे आजम भगत सिंहक तीनटा पत्र : अंतिम पत्र कोन मानल जाए?/ अतिशय आह्लादित थिकहुँ/ पाठकीय प्रतिक्रिया : भागिन - मैथिली उपन्यास (कोसी कातक संघर्षमय गाथा)/ पाठकीय प्रतिक्रिया : भागिन - मैथिली उपन्यास (कोसी कातक संघर्षमय गाथा) १

जगैत जीवन : पोथी समीक्षा

गाम- समाजमे व्याप्त रूढ़ि, शोषण आ सामन्ती व्यवहार केर विरूद्ध एकतारे ३५ सालपूर्व धरि संघर्ष करैत आबि रहलाह ,वर्ष २००० ई० सँ साहित्य सृजनमे सतत् लागल रहला श्री जगदीश प्रसाद मंडल जीके सामाजिक खिस्सा संग्रह 'जगैत जीवन' पाठकके धियान अपन कथाक सौन्दर्य दिश घीचैत य। पल्लवी प्रकाशन निर्मली सँ सद्यप्रकाशित मैथिलीमे ११४ पृष्ठक पोथी ,जाहिक दाम २९९ टाका छै ; मेँ १० गोट पाठ मिज्झर कयल गेल छैक। ऐ पोथीक' पहिल पाठमे शव्द सँख्याँ १८९० य आ ई श्री मंडल जीके १०७३म् कथा "त्रिवेणी स्नान" छी। जीतन आ सोहन कक्काक बीच विमर्श ललीतपुर गामक लोकक बीच भ' रहलैक हेन। गामक लोक बीच सूर्यग्रहणके पाप केँ धोय लेल उध चढ़ल छैक। पैंचो - उधार आ कर्जा लैत लोक त्रिवेणी स्नान करय ट्रैन सँ ५ दिनमे गाम सँ बहरेतैक। एक - एक व्यक्ति पर ३-४ सय टाका खर्चा बैठतैक। तीन हजार टाकामे सुदामा दादीके खस्सी बिकाएल छै ,से गौर किनय चाहैत छै। आ कहियो पुण्य करय तीर्थंवर्थ लेल कतौह नहिं गेल य ,से रतुपार बाली भौजी हलहौर चढ़बैत छै। बहुतों लोक गहना - जेबर बन्हक राखि आ गीरधारी लाल सँ सुदि पर महाजनी उठबैत य। चन्द गहण आ सूर्य ग्रहण प्राकृतिक नियम छी, जकरा लोक डोम सँ छूयेबाक विषय बूझैत रहैछ। जीतनके मोन डोलल छै,ओ अनुभवी सोहन कका सँ बुझि धार्मिक यात्रा करत। एहि तरहेँ कथा आगू बढ़बैत श्री मंडल जी कथाक माध्यम खुलस्ता रूपेँ लिखैत छथि-"भगवानक चर्चा भेल भजन आओर नाम गायन भेल कीर्तन। मनुखक शरीर मन आ चेतनाक समन्वय भेला सँ योगस्थली कहाबैछ - त्रिवेणी संगम। वास्तविकता टटोला पर अन्त:करणमे तत्वज्ञान जगैत छै आ बाह्यदर्शन भ्रमण - परिश्रम आ टका खर्च कयलासन्ता आनन्द होइ छै। सेहो बात तँ लोकक बीच छैहे।" मरैत जीवन कथामे साँझु पहरकेँ गुरु कक्का ओहिठाम फोँच कका पहुँच कय वार्तालाप मंगलाक दशा मादे करैत रहैत छैक, ताहि घरि नियारल अनुसारे रमानन्द जाए ,अपन मोनक जिज्ञासा व्यक्त करय छैक। गामक मानल हरबाह मंगल जे कोनू कोढ़ि बरद होई वा फरकाह तकरा बशमे करैत गिरहथ केर खेतमे जोतय आ मजुरी लैत , सालाना सेहो किछ कैँचा पाबैक। आब दूनू बेटा- पूतौह भिन्न छै। पत्नी दू साल सँ बेराम रहैछ। कोटा केर गहुँम चाउर सँ पखबरो नहिं बुतात चलै छै। तेँ भीखमँगनी करय पर समाजमे उतरि गेल य। तत्काले दू टाका गुरुकका सेहोओकरा भीखमे दैत छै । भीखके आखरि निदान कहल गेल हेन। जगैत जीवन एहि पोथीक' केन्द्रीय कथा थीक। महेश'क तीन पिढ़ि आम गाछीक ओगरबाही सातकठा कलमके करैत आबि रहल छै। दादा स्व० राम अधिन , बाप किशुन लाल आ ओ अपने आई आमक मचान पर बैस मनन करैत छैक। ओगरबाहीक हिस्सा अदौ सँ कलमी आममे चारिमे एक फल, शरही (बीजू) तीनमे एक दरे होय छै। छोटफल बथुआ प्रभेद चारिमे एकटा आ बड़का फल फैजली,सजमनिया,सापसीन इत्यादि तीन गोटमे एकटा देल वा लेल जाइछ। अमैया छुट्टीमे विद्यार्थी जीवनक' किछु भाग आमक बगानमे बितैत छै। से महेश अपन कांपी- कलम आ किताब मचान पर आनि गाछीकेँ हिआसय छै। आठटा कलमीमे दूटा कलकतिया, दूटा बम्बई, एक- एकटा कृष्ण भोग,सफेता - मालदह ,फैजली छै। सातगो शरही आमक गाछमे फरी लुधकल छै। जम,कटहर , मौह ,शिशो, आ गम्हायर चारू आरि पर इमारती लकड़ी मोटाएल छै। काठ काटैक पुश्तैनी काज बरहीक जातीय गुण हेबाक कारणेँ सेहो अखियास ओकरा रहैछ। परम्परागत औजारमे आरी,रूखान, बैसला, छैनी,हथौरी (मरिया) सेहो ओकरा घरमे छै। जातीये वृत्ति अनुसारे घरपर हंसुआ - कुट्टीकटामे धार ले कमरसाढ़ि चलै छै। भाथी सँ लोहाक हाँसु - खुरपी, टेंगारी,कुल्हरि ,छैनी, खंती, भाला-बरछी, चकू-सरौता, दबिया -तलबार आदि बनेबाक पुश्तैनी लुरि अबडेरने य। आब हर बरद सँ खेती नहियें जेकाँ होईछ,मुदा कोदारि सँ कचिकेँ खेती-बाड़ी चलिये रहलैक हेन। कृषि काजक वाद आब मोन दोसर दिस सोच बौआइत गेलैक। जोलहा धुनियां'क बिनल वस्त्र सेहो बिचारमे सन्हियाइत छै। ग्रामीण शिल्पकार -दस्तकारके बनाओल समानक जगह अब गामो देहातमे फैशनेबल शहरी कल- कारखानाक निर्मित वस्तुजात लेने छै , से घर-घर पसरल छै। एतय लोकल फोर वोकलके पुनः सृजयके संदेश देल गेल छैक।तेँ बांसके छिट्टा पथिया, चंगेरा डलिया आ कुम्हारगिरी सँ मांटिक बासन यथा, फुच्ची,घैला तौला डाबा कोही आ काठक बनल बेलना चक्की, पिढ़िया,सरबा ढकना ,करीण, ढ़ेकी ,हथरा , मलसी घरेलू सामान कमैत गेलैक अछि। परिवेश बदलने नव पिढ़िक लोक किलोग्राम बैटखारा सँ पूर्वक चलैन कच्चीसेर, पक्कीसेर, पांच शेरक पसेरी,बारह शेरक धारा आदि -आदि पौराणिक उपकरण उजागर एहि कथामे भेने रहस्य सँ विज्ञ होइत अछि। साबिक जमानामे सिंचाई करीण सँ होय से आब पम्पिनसेट आ विद्युत मोटर सँ पटबन होईछ। गामक प्रवन्धन सँ उबि अर्थशास्त्रक विद्यार्थी महेश अपन बाबूजी सँ कहि दिल्ली शहर ममियौत भाय लग जाइए। ओतय सहयोग भेटैत छैक आ रघुनंदन कारोबारी लग नोकड़ी सेहो धरा दैत छै। दू साल ओहि उद्योगमे रहि स्वचालित मशीनके मर्म बुझि- गमि आपस गाम अबैत य। बृध्द बाबू सँ विमर्श करैत य जे जोतसीम कुल १२ कठा खेत बेचि गामेमे उद्योग लगा आनो बेरोजगार केँ काज देत। जीवनमे समृद्धि लेल आश्वासन भेटलैन। भारतके आत्मा गाममे बसैत छै आ भारत गामक देश छी। कोलकातामे नोकरी करैत बीए.पास हरे कृष्णक मोनमे सुखक' प्रति द्वन्द्व मचल छै। ३३ करोड़ वा ५६ करोड़ जीव-जंतुमे मनुखेयोनि चेतनशील प्राणी कहबैछ। गारी सँ दुःख आ प्रशंसा सँ सुखक अनुभुति करैत नशाक प्रयोगके दुखक कारण सेहो बुझैत दयाराम बाबा मोन पड़ैत छै। फगुआक आठदिन पूर्व गाम पहुँच कय एक बेगमे बजार सँ देहक सब वस्त्र आ किछु भोजन- विन्यास बेसाहि तेसरका दिनभने दयाराम बाबाकेँ अर्पित करैत कुशलक्षेम जानैत छै। बाबा सँ सार्थक जीवन'क भाँज बुझि गेल जे श्रमसँ सुफल होई छै। तपस्या कथामे गुलाबपुरके समृद्ध किसान परिबारक राधाकृष्ण बीए.आनर्सक विद्यार्थी छथि। सही अर्थमे तपस्या की थीक ,से बुझय पढ़ुआ काका लग जाईत छै। ओतय आरो पाँच व्यक्ति वार्तालाप करैत रहैत छै। भीतरी अनुशासनक माने भेल अपने आपकेँ जानव आ बाहरी अनुशासन - तपस्या भेल। व्यवहार कुशल रही। पतंजलि सेहो कहने अछि " योगाश्चित्रवृत्तिनिरोध:।" पाठ छठम धर्मक बदलैत स्वरूप मेँ समय काल परिस्थिति परिवर्तनशील थीक। से पोखैर,इनार मिथिलाक गामेगाम अधिक स़ंख्याँमे देकर गेलैक हेन। रौदी'क समय दू दर्जन पोखैर सिपौल- सहरसा , मधुबनी -दरिभंगा जिलामे तँ संत लक्ष्मीनाथ गोसाईं जी खुनौने रहथि। श्याम आ सोहन दूनू मीत अपना रामपुर गाममे सेहो भजनलालकेँ पोखैर खुनबैत आ ताहिमे जाइठिक स्थापना विधिवत करैत देखने छैक। मुदा आब ओ मानल धर्मकाज नहिं रहल वरण् माछ मखान उपजाबैक किसानक साधन भऽ गेल छै। आबक लोक चापाकल ,टँकी सँ पेयजल प्रवन्धन कयने अछि। से वस्तुत: धर्मक बदलैत स्वरूप'क दृष्टांत कथामे छै। एकमात्र स्त्री पात्र शान्तिक भुमिका चाह पियैतकाल आयल छैक। चेकप कथा ग्रामीण परिवेशक सोझमतिया लोकक विचार केँ प्रकाशमे आनैछ। खरबोनी गाममे स्वास्थ्य शिविर महामारी विषय पर ५ सरकारी डाक्टर आ १० नर्श आ कम्पाउन्डर केर टीम जनजागृति लेल अपन सरकारी रूटिन अनुसारे बताबैत छै। सहदेव बुढ़ माय दमयंती - बाबू हरे कृष्ण ककाकेँ चेकप करबय दरिभंगा ल' जेबामे सक्षम होइछ। डाक्टर के कथन सँ धरि कारणी प्रशन्न रहैछ। तम्बाकूल वर्जित आ व्रत ले उपास करनाई सँ मनाही भेल छै। रोगक आगमन भ' गेल रहैछ। पाठ ८ इज़्ज़त बचाकऽ केना जीब ? कथामे ब्रह्मपुरके रघुबीर कका , रामपुर बाली भौजी ,श्याम बौआ ,अररियाबाली भौजी, दुलारपुर बाली काकी पोती सुशीलके समक्ष वार्ता चलि रहल छै। नशाके एसमोग्लर करैत पोताक कारणेँ अपन आचरणके बैल नहिं देता। ओगरबाहि 'कथा'मे मनमोहन गामक अनुप लालक बाबा जूगुतलाल पोस्टमास्टर बनल छैक। अनुपलालक' पूर्वज मध्यप्रदेश सँ आबि मिथिलामे बसलाह । पूर्वजके १० बिगहा सँ आब ३० बिगहा खेत बना लेलनि हेन। जूगूत लालक बेटा मलेटरीमे मेजर बनलैक । जूगूत लालकेँ तीन बेटी आ एकेटा बेटा य - पूहूपलाल। बीएसएफ. अनुपलालक पूर्वज हिम्मतलाल रहथि। श्याम लाल केँ अपना घरक ओगरबाही देलनि, अदालत सँ तकर कागत बनेबाक पकिया गप्प ठेस बान्हल जाईछ। आखरि कथा 'पंचदेब' म चर्चित गाम किसानपुरमे पंचकोसी क्षेत्र स्तर पर पचासो बरख सँ दुर्गापूजा आयोजित होय छै। ओतयके गरीब घरक रहैत ध्यानचंद बीए पास करैते हाईस्कूलक शिक्षक बनि जाईछ। जेठ मासक गोटपंगरा पकैत आमफलक आनन्द लैत य। अपना घरमे पंचदेवोपासनाक' अदौ सँ व्यबहार पर मोन ठमकैत आगूक जिज्ञासा खूबे जगै छैक। मिथिलामे विद्यापति सेहो ऐ के चर्च कयने रहथि ,से किनको सँ विशेष रूपेँ जानबाक गुनधुनमे रहैत छथि। ता कियो अनठिया लोक डेढ़िया पर घरबारीकेँ पुकार लगबैत छै। दोसरे हाक पर बहराईत अनभुआर अपरिचित केँ भुजल चुरा आ जल सँ सुआगत करैत अपन जिज्ञासा विषयकें सेहो शांत करैत छैक। कुर्सी पर बैसि जीवानंद आगन्तुक अतिथि पंचदेव क' भूमिका बतबैत फरिछाएल गपृप कलकैन। आंखि कान नाक जीह्वा आ त्वचा अपने शरीरमे पंचदेवों दर्शन'क परिचिति बूझू। एहि प्रकारे कथाकार जगदीश जीक कथा समाजमे नव संदेश संचार करैत छैक। ग्रामीण क्षेत्रक बीच हिनक कथा बढ़ चाउ सँ सुनील आ पढ़ल जाईछ।

२ शहिदे आजम भगत सिंहक तीनटा पत्र : अंतिम पत्र कोन मानल जाए?

मित्रसभ, समय आबि गेल अछि जे समयक 'किताब' आ समयक 'हिसाब' दुनूक आधार पर ई तय कयल जाए ,जे शहीद भगत सिंहक अंतिम पत्र कोन रहय। पछिला १२ वर्षसँ वरिष्ठ पत्रकारसभक बीच ई ज्वलंत प्रश्न बनल रहल अछि ,जे हुनकर अंतिम पत्र कोनकेँ मानल जाए। तारीख आ इतिहासक आधार पर भगत सिंह जीक तीनटा पत्र उपलब्ध अछि। तेसर पत्र उर्दूमे अछि, जे लगधक अप्रचारित रहल, आ फाँसीसँ एक दिन पहिने लिखल गेल छल। दोसर पत्र अंग्रेजीमे अछि, जे फाँसीसँ तीन दिन पहिने लिखल गेल आ सभसँ बेसी प्रसिद्ध भेल अछि। पहिल पत्र हिंदी लिपिमे अछि, जे फाँसीसँ बीस दिन पहिने लिखल गेल रहय, मुदा ओहो बहुत कम प्रकाशित भेल। संभवतः एहि कारणसँ ई यक्ष प्रश्न एखन धरि बनल रहल अछि। ई तीनू पत्र आब मात्र इतिहासक दस्तावेज नहि रहल, बरण् एहन जीवंत विचार बनि गेल य जे आइयो समाजमे प्रेरणा दैत छै। (१) छोट भाइ कुलतार सिंहक नाम पत्र-: ३ मार्च १९३१, सेंट्रल जेल, लाहौर प्रिय कुलतार! आइ तोरा आँखिमे नोर देखि हमरा बहुत दुःख भेल। तोहर बातमे बहुत पीड़ा छल। तोहर नोर हमरा सँ सहल नहि जाइत अछि। बरखुरदार, हिम्मतसँ पढ़ाइ करैत रहियह। अपन स्वास्थ्यक ध्यान राखिहय। साहस बनौने रहिहय। आरो की कही— हुनका हरदम ई चिंता रहैत छनि जे अत्याचारक नव तरीका की होयत,आ हमरा ई उत्सुकता अछि जे देखी, अत्याचारक सीमा कतय धरि अछि।संसारसँ किएक नाराज रही? भाग्य पर किएक दोष दी? जँ समूचा संसार विरोधी होअ, तँ आउ, ओकर सामना करी। हम एहि सभा मे किछुए क्षणक मेहमान छी,प्रभातक दीप जेकाँ आब बुझाएबला छी। हमर विचारक बिजली सदिखन हवामे रहत,ई माटिक शरीर नश्वर अछि, रहए वा नहि रहए। आब विदा। खुश रहू, हे देशवासी! हम तँ अपन यात्रा पर निकलि रहल छी। हिम्मतसँ रहिहय। नमस्ते। अहाँक भाय, _भगत सिंह (२) भगत सिंह, सुखदेव आ राजगुरुक संयुक्त पत्र २0 मार्च १९३१ पंजाबक गवर्नरक नाम सेवार्थ, महामहिम गवर्नर, पंजाब, लाहौर। महोदय! सादर निवेदन अछि जे अहाँक ध्यान निम्न विषय दिस आकृष्ट करय चाहैत छी। विशेष लाहौर षड्यंत्र केस अध्यादेशक अधीन गठित ब्रिटिश न्यायाधिकरण द्वारा ७ अक्टूबर १९३0 केँ हमरा सभ केँ मृत्युदंड देल गेल। हमरा सभ पर मुख्य आरोप ई छल जे हम ब्रिटेनक सम्राट किंग जॉर्ज पंचमक विरुद्ध युद्ध शुरह कयने छी। हम स्पष्ट रूपसँ कहय चाहैत छी जे ई संघर्ष ता धरि जारी रहत, जा धरि मुट्ठीभर शोषक भारतीय मेहनतकश जनता आ देशक प्राकृतिक सम्पदाक शोषण करैत रहताह। चाहे ओ विशुद्ध ब्रिटिश पूँजीपति होथि, ब्रिटिश आ भारतीय पूँजीपति सभक संयुक्त समूह होथि अथवा केवल भारतीय पूँजीपति—शोषणक स्वरूप बदलि सकैत अछि, मुदा संघर्ष समाप्त नहि होयत। ई लड़ाय विभिन्न समयमे अनेको रूप धारण कऽ सकैत अछि। कखनो खुला आन्दोलनक रूपमे, कखनो गुप्त संघर्षक रूपमे, आ आवश्यकता पड़ला पर जीवन-मरणक निर्णायक संग्रामक रूप सेहो लऽ सकैत अछि। हमर ई बलिदान संघर्षक ओहि श्रृंखलाक एक छोट कड़ी मात्र अछि, जाहिमे श्री यतिन दासक अनुपम बलिदान, कामरेड भगवती चरण वोहराक महान आ दुःखद बलिदान तथा अमर क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आजादक गौरवपूर्ण शहादत अमर भऽ चुकल अहि। जहाँ धरि हमर भाग्यक प्रश्न अछि, जँ अहाँ हमरा सभ केँ मृत्युदंड देबाक निर्णय कऽ लेने छी, तँ निश्चित रूपसँ ओहि निर्णय पर अमल सेहो करब। शक्ति अहाँक हाथमे अछि, आ संसारमे प्रायः शक्तिकेँ न्याय मानल जाइत अछि। हमर पूरा मुकदमा सेहो एहि बातक प्रमाण रहल अछि। हम केवल ई स्मरण कराबय चाहैत छी जे अहाँक न्यायालय स्वयं कहने अछि जे हम युद्ध केने छी। ताहि कारणसँ हम युद्ध-बंदी छी। अतः हमरासभक संग युद्ध-बंदीक समान व्यवहार होयबाक चाही। हमर विनम्र निवेदन अछि जे हमरा सभ केँ फाँसी देबाक स्थान पर सैनिकक' गोलीसँ मृत्युदंड देल जाए। यदि न्यायालयक निर्णय वास्तवमे सत्य अछि, तँ ओकर पालन सेहो ओहिना होयबाक चाही। अतः अहाँसँ आग्रह अछि जे सैन्य विभाग केँ आदेश देल जाए जे ओ सैनिक टुकड़ी पठाकऽ हमर मृत्युदंड गोली चलाकऽ पूरा करए।

अहाँक प्रार्थी,

भगत सिंह सुखदेव राजगुरु (३) जेलक साथीसभक नाम २२मार्च १९३१ प्रिय साथीसभ! जीवित रहबाक इच्छा स्वाभाविक रूपसँ हमरा भीतर सेहो अछि। हम एहि बातकेँ नुकाबय नहि चाहैत छी। मुदा हम एकटा शर्त पर जीवित रहि सकैत छी—हम कैदी बनिकऽ अथवा बन्धनमे पड़िकऽ जीवित नहि रहब। आइ हमर नाम हिन्दुस्तानी क्रांतिक प्रतीक बनि चुकल अछि। क्रांतिकारी दलक आदर्श आ बलिदानसभ हमरा एतेक ऊँच स्थान पर पहुँचा देने अछि जे जीवित रहला पर सेहो हम एहि सँ बेसी सम्मान प्राप्त नहि कऽ सकैत रही। आइ जनता हमर कमजोरी सभ सँ अनजान अछि। यदि हम फाँसी सँ बचि जाएब, तँ ओ कमजोरी सभ लोकक सामने आबि जाएत, आ क्रांतिक प्रतीकक रूपमे हमर छवि मद्धिम पड़ि जाएत, सम्भव अछि जे पूर्ण रूपेँ मेटा जाए। मुदा यदि हम हँसैत-हँसैत निर्भीकतासँ फाँसी पर चढ़ब, तँ हिन्दुस्तानक मातासभ अपन पुत्रकेँ भगत सिंह जकाँ बनबाक कामना करतीह। तखन देशक स्वतंत्रताक लेल बलिदान देबय बला लोकक संख्या एतेक बढ़ि जाएत जे साम्राज्यवादक समस्त दुष्ट शक्तिसभ सेहो एहि क्रांतिकेँ रोकि नहि सकत।

हँ, एकटा विचार आइयो हमर मनमे अबैत अछि। देश आ मानवताक लेल ,जे किछु करबाक अभिलाषा हमर हृदयमे छल, तकर हजारहम् भाग सेहो हम पूरा नहि कऽ सकलहुँ हेन। यदि हम स्वतंत्र आ जीवित रहि सकैतहुँ, तँ सम्भवतः ओहि अधूरा सपना सभकेँ पूरा करबाक अवसर भेटैत। एहि एकटा बातकेँ छोड़ि हमरा मनमे फाँसी सँ बचबाक कोनो लालच नहि रहि गेल अछि। हम सोचैत छी—हमरा सँ बेसी सौभाग्यशाली आर केओ होएत? आइ-कालि हमरा अपना ऊपर बहुत गर्व होइत अछि। आब तँ हम अत्यन्त आतुरतासँ अपन अंतिम परीक्षा अर्थात् शहादतक क्षणक प्रतीक्षा कऽ रहल छी। हमर एकमात्र लालषा अछि, जे ओ शुभ घड़ी यथा शीघ्र आबए।

अहाँक साथी,

भगत सिंह (नोट-: हेमंत जी'क हिन्दी सँ मैथिली भावानुवाद कयलहुँ अछि)

३ अतिशय आह्लादित थिकहुँ 

वेदव्यास शिखर सम्मान भेटला संँ आयोजन समिति'क प्रति अभिभूत छी हम। गत बुधवार दि० २९-७ २०२६ ई० केँ गुरू पूर्णिमा'क शुभ अवसर पर आयोजित कार्यक्रम 'महर्षि वेदव्यास ' आ लोकदेव भीमा कैवर्त जीक नामे आन  सालक तरहेँ एहूबेर जिला मुख्यालय - सुपौलमे भव्य समारोह भेल रहय। पूर्व घोषित सूचना पत्रक अनुसारे चोटिक विद्वान लोकनिक समक्ष हमरा "व्यास शिखर सम्मान" मिथिला संस्कृति अनुसारे देल गेल हेन। विगत साल ई सम्मान अतिपिछड़ा वर्ग राज्य आयोग'क पूर्व सदस्य श्री सूर्य नारायण कामतजी - अधिवक्ता केँ देल गेल रहनि। विधिवत् कार्यक्रमके संयोजक ओ अध्यक्ष प्रो०(डॉ०) रामचन्द्र प्र० मंडल जी (पूर्व पीजी हेड, मधेपुरा विश्वविद्यालय)अंग वस्त्र 'व्यास मुरेठा' आ पुष्प माला'क संगहि भगवान् वेदव्यास मेमोन्टो दऽ कऽ पुरस्कृत कयलाह हय। एहि विशेष कार्यक्रमके उदघाटनकर्ता डॉ० (प्रो०) राजाराम प्रसाद जी- पूर्व प्रति कुलपति पटना विश्वविद्यालय सँ हुनक दू गोट मैथिली भाषा मेँ साहित्य पोथी अपने कर कमल सँ हमरा प्रदान कयलन्हि, ताहि लेल  विशेष साधुवाद छन्हि हुनका। मैथिली 'लोक साहित्यक विस्तृत इतिहास ' प्रथम खंड सन् २०१९ मे, दोसर खंड वर्ष २०२३ मे ३५२ पृष्ठक आ २०२४ ई०मे तेसर खंड २२४ पृष्ठ क ' पोथी अभिषेक प्रकाशन लहेरियासराय जि०- दरिभंगा सँ ,आ मुद्रण सरस्वती प्रेस - सिसोधिया प्लेस , गोरखनाथ कम्पाउन्ड बोरिंग केनाल रोड- पटना द्वारा भेल अछि। ई कालजयी ग्रन्थ अस्तित्वमे अयला सँ अनेक शोधकर्ता आ गवेषणात्मक अध्ययन करैत विद्यार्थी'क अतिरिक्त सुविज्ञ पाठककेँ ज्ञानमे अभिवृद्धि अवश्ये होयत। हमरा आरो  किछु लोक साहित्य पढबाक काज अधूरा रहि गेल छल,ई पोथी प्राप्ति सँ तृप्त छी। सम्पूर्ण अद्यावधि मनन कयला उपरान्त पाठकीय प्रतिक्रिया सेहो देब। पूर्व प्राचार्य प्रो० साहेब जीके १० गोट मैथिली भाषा मेँ प्रकाशित पोथी तथा हुनक धर्मपत्नी पूर्व प्राचार्य श्रीमती लालपरी देवी जीकेँ सेहो अदहा दर्जन मैथिली भाषा मेँ प्रकाशित पोथी छन्हि। दम्पत्ति द्वय के आरो पोथी प्रकाश्य कृति छन्हि। लेखन काजके तपस्या बुझयमे लागल रहैत छथि,से हम प्रशंसा करैत छियैन। सधन्यवाद!(२) पुस्तक चर्चा 

शहनाई रिसोर्ट - पिपरा मार्ग ,सुपौल (बिहार) म वेदव्यास गुरु पूर्णिमा 'क सुअवसर पर शिक्षक श्री सचिदानंद कुमार कृत हिन्दी 'कविता' संग्रह पोथीके लोकार्पण समारोह पूर्वक सुसंपन्न भेल रहय। सन् २०२४ ई० मे आनन्द प्रकाशन - कोलकाता सँ बहराएल एहि पोथी केँ आई एस बी एन ९७८-९३-८८८५८-५२-६ नं० भेटल छैक, जाहिक दाम २२५ टाका य। गांउ - विशनपुर पो०- लाउढ़ थाना + जिला सुपौलमे दि० ७-६- १९६९ केँ माय स्व० गंगादेवी आ बाबू श्री कृष्ण देव मंडल जीके घर कवि, कथाकार आ उपन्यासकार श्री सच्चिदानन्द जीक जन्म भेल रहनि। से ई पुस्तिका अपन श्रद्धेय माता - पिता कें समर्पित कयने छथि। ओ नालन्दा खुला  विश्वविद्यालय सँ स्नातकोत्तर कयने छथि। वर्तमानमे सुपौल नगर परिषद केर वार्ड नं० २६ जयप्रकाश नगरमे रहैत छथि। हिनक लेखन कार्य अष्टम्  वर्गक छात्र अवस्थहि सँ आरंभ भेल छैन। हिनक साहित्यिक रचना पढ़बाक कदाचित  जौं अवसर भेटत तँ पाठककेँ हम अपन प्रतिक्रिया सेहो देबैन। सधन्यवाद!

४ पाठकीय प्रतिक्रिया : भागिन - मैथिली उपन्यास (कोसी कातक संघर्षमय गाथा)

नवोदित उपन्यासकार श्री कुंवर जी कृत पल्लवी प्रकाशन निर्मली सँ २०२६ ई०मे सद्यप्रकाशित "भगीन" मैथिलीमे साहित्यक १०९ पृष्ठक पोथी 'क दाम २०० टाका छैक। एहिकेँ आई एस बी एन ९७८-९३-४८८६५-५१-९ भेटल छैक। मधुबनी जिलान्तर्गत राजनगर प्रखंडक मझौरा गाममे दि० १५-१० १९८५ मे लेखक कुवर जीके जन्म भेल रहनि । ओ एम.काॅम.मारबाड़ी काॅलेज दरिभंगा सँ कयने छथि। सम्प्रति बिहार सरकार, पंचायती राज विभागमे सेवारत छथि। पूर्वमे हुनक हिन्दी उपन्यास 'जिन्दगी के मोड़ पर ' सराहल गेल य। दि० २७-६-२०२६ केँ आयोजित 'सगर राति दीप जरय ' त्रिमासिक मैथिली कथा विमर्श कार्यक्रमके सुअवसर पर अपन पैतृक गामक दियादेक पव्लिक कन्वेन्ट स्कूलमे प्रस्तुत पोथीक लोकार्पण श्री जगदीश प्रसाद मंडल जीके कर कमल सँ भेल हेन। पोथीक' आवरण पृष्ठ सज्जा ए .आई .सँ आकर्षक बनल छैक,आ पछिला कभर पर संक्षिप्त परिचय लेखकके उपर छपल छन्हि। ओ पाठक सँ मो० पर प्रतिक्रिया चाहैत छथि। भागीन नातेदारकेँ अपना लग बसौनाई मिथिलामे अदौ सँ बढ़ दियेमान बूझल जाइत रहल अछि। ५० वर्ख पूर्व श्री गंगेश गुंजन जीक उपन्यास जे छपल रहनि- तँ ओहिमे सब परावके पाठ शिर्षक पृथक रूपेँ लेल गेल रहय। तहिना उपन्यासकार श्री उदय शंकर झा'क पतीत 'मैथिली पोथीमे ' सब पराउके अलगे-अलग पाठ शिर्षक लेल गेल छन्हि। अहिना नवोदित लेखक कुंवर जीके प्रस्तुत सामाजिक उपन्यासमे पृथक-पृथक पाठ पाठककेँ द्रष्टव्य हेतनि। यथा-: भगिनमानपुर, नवटोलक प्रलय, नवटोल सँ भागिनमानपुर , बाधक शीतल छांह आ भगिनक दोस्ती , होलीमे माछक पुछरी, अधजरल सपना आ रीनाक साहस, लौफा हाटमे मीत नानाक उद्धार, भागिनक लंका दहन , बैजूक यात्रा आ मौसम बाबाक ज्ञान, जागेश्वर बाबाक कुट्टी आ नंदनीक पुनर्मिलन , भागीनक दर्द, स्नेहक डोरस जीवनक आश ,जीवन दवाखाना , प्रेमक अंतिम विदाय,प्रेमक कर्ज। मुदा आब हरसठे एहन तरहक चलैन नहिं छैक, लेखन काज प्रायः उपन्यासकार हिन्दी'क तर्ज पर पाठ क्र० १-२-३........... दर्शाबैत छथि। ग्रामीण परिवेश'क कथा कहैत ई उपन्यास सामाजिक जीवनके चित्रण करैत नव संदेश दैत छैक, नव सृजन करैत छैक। नायक लालू केँ जीवनक तीत - मीठ अनुभव एहि उपन्यासक मुख्य कथानक थीक। उपन्यासकार कुवर जीक बोधगम्य शैलीमे गद्य लेखन काज ऐ तरहक होय छैन,जे पाठककेँ भूमिका पढ़ैत काल अभरत। यथा-: भागीनक बीज हमरा मनमे बहुत पहिने सँ छल। गाम - समाजमे हम अनेक बेर देखने छी जे बहिनक बच्चाकेँ मम्हरमे राखल जाइत अछि। कहबा लेल ओकरा पढ़ेबाक ,पालबाक, सहारा देबाक आ भविष्य बनेबाक बात होइत अछि। कतेक घरमे ई बात सचमुच नेह आ करुणाक संग निभाओल सेहो जाइत अछि। एहन उदाहरण सभ हमरा समाजक मानवीय पक्षकेँ उज्जवल करैत अछि। मुदा ऐ सम्बन्धक दोसर चेहरा सेहो अछि। किछु ठाम बच्चाकेँ मम्हर म राखि कऽ ओकर श्रम सँ घर चलाओल जाइत अछि । ओकर पढ़ाई पाछु छुटि जाइत अछि, बालपन घास, महिष, खेत ,दलान ,वर्तन ,घरक छोट - बड़ काज आ अपमानक बीच खपि जाइत अछि। समाज ओहि बच्चाकेँ 'भागिन' कहि सम्मानक भाषा दैत अछि,मुदा ओकर वास्तविक जीवनमे सम्मानक स्थान परिश्रम आ उपेक्षा सँ भरल रहैत अछि। ऐ तरहक विरोधाभास हमरा भीतर बहुत दिन सँ टीस दैत रहल। 'भागिन' ओहि टीसक कथा अछि। ...…! कथा प्रसंगमे अनेको शव्द मैथिलीक अछैत हिन्दी - उर्दू क' प्रयोग भेला सँ मातृभाषा मलीन भेल छैक। प्रायः सब पन्नामे प्रकाशक मुद्रण त्रुटि रखने छैक ,जे सुधी पाठककेँ अबुझ आ बोझिल बुझाइत छै। आश करब संशोधित संस्करण बहराय जाहि सँ समीक्षक आ ग्राहककेँ कठिनता नहिं होय। उपन्यासक पुरुष पात्रमे भोला ,बैजू, रामलखन, फुसीया आ रामसुख ,मौसम बाबा आ हुनक बाबाजी मित्रक तथा स्त्री पात्रमे नंदनी ,रमौलवाली, रीना , कल्पना ओ पुष्पाक नाम मुख्य रूपेँ उजागर भेल य। लालूक बालपन किशोरावास्था आ नवयुवक वयस अनुन - विशनुन सुवादक चलैत रहलैक। जीवन उतार - चढ़ाबक सांगोपांग वर्णन एहि पोथीमे पढि पाठक रसास्वादन करताह/ करतीह। कुवर जीक आगू कथा पोथी , कविता आ दोसरो विधामे नव पोथी आओर से विश्वास जगैत अछि। ५ पाठकीय प्रतिक्रिया : भागिन - मैथिली उपन्यास (कोसी कातक संघर्षमय गाथा)

नवोदित उपन्यासकार श्री कुवर जी कृत पल्लवी प्रकाशन निर्मली सँ २०२६ ई०मे सद्यप्रकाशित "भागीन" मैथिलीमे साहित्यक १०९ पृष्ठक पोथी 'क दाम २०० टाका छैक। एहिकेँ आई एस बी एन ९७८-९३-४८८६५-५१-९ भेटल छैक। मधुबनी जिलान्तर्गत राजनगर प्रखंडक मझौरा गाममे दि० १५-१० १९८५ मे लेखक कुवर जीके जन्म भेल रहनि । ओ एम.काॅम.मारबाड़ी काॅलेज दरिभंगा सँ कयने छथि। सम्प्रति बिहार सरकार, पंचायती राज विभागमे सेवारत छथि। पूर्वमे हुनक हिन्दी उपन्यास 'जिन्दगी के मोड़ पर ' सराहल गेल य। दि० २७-६-२०२६ केँ आयोजित 'सगर राति दीप जरय ' त्रिमासिक मैथिली कथा विमर्श कार्यक्रमके सुअवसर पर अपन पैतृक गामक दियादेक पव्लिक कन्वेन्ट स्कूलमे प्रस्तुत पोथीक लोकार्पण श्री जगदीश प्रसाद मंडल जीके कर कमल सँ भेल हेन। पोथीक' आवरण पृष्ठ सज्जा ए .आई .सँ आकर्षक बनल छैक,आ पछिला कभर पर संक्षिप्त परिचय लेखकके उपर छपल छन्हि। ओ पाठक सँ मो० पर प्रतिक्रिया चाहैत छथि। भागीन नातेदारकेँ अपना लग बसौनाई मिथिलामे अदौ सँ बढ़ दियेमान बूझल जाइत रहल अछि। ५० वर्ख पूर्व श्री गंगेश गुंजन जीक उपन्यास जे छपल रहनि- तँ ओहिमे सब परावके पाठ शिर्षक पृथक रूपेँ देल गेल रहय। तहिना उपन्यासकार श्री उदय शंकर झा'क पतीत 'मैथिली पोथीमे ' सब पराउके अलगे-अलग पाठ शिर्षक देल गेल छन्हि। अहिना नवोदित लेखक कुवर जीक प्रस्तुत सामाजिक उपन्यासमे पृथक-पृथक पाठ पाठककेँ द्रष्टव्य हेतनि। यथा-: भगिनमानपुर, नवटोलक प्रलय, नवटोल सँ भागिनमानपुर , बाधक शीतल छांह आ भगिनक दोस्ती , होलीमे माछक पुछरी, अधजरल सपना आ रीनाक साहस, लौफा हाटमे मीत नानाक उद्धार, भागिनक लंका दहन , बैजूक यात्रा आ मौसम बाबाक ज्ञान, जागेश्वर बाबाक कुट्टी आ नंदनीक पुनर्मिलन , भागीनक दर्द, स्नेहक डोरस जीवनक आश ,जीवन दवाखाना , प्रेमक अंतिम विदाय,प्रेमक कर्ज। मुदा आब हरसठे एहन तरहक चलैन नहिं छैक, लेखन काज प्रायः उपन्यासकार हिन्दी'क तर्ज पर पाठ क्र० १-२-३........... दर्शाबैत छथि। ग्रामीण परिवेश'क कथा कहैत ई उपन्यास सामाजिक जीवनके चित्रण करैत नव संदेश दैत छैक, नव सृजन करैत छैक। नायक लालू केँ जीवनक तीत - मीठ अनुभव एहि उपन्यासक मुख्य कथानक थीक। उपन्यासकार कुवर जीक बोधगम्य शैलीमे गद्य लेखन काज ऐ तरहक होय छैन,जे पाठककेँ भूमिका पढ़ैत काल अभरत। यथा-: भागीनक बीज हमरा मनमे बहुत पहिने सँ छल। गाम - समाजमे हम अनेक बेर देखने छी जे बहिनक बच्चाकेँ मम्हरमे राखल जाइत अछि। कहबा लेल ओकरा पढ़ेबाक ,पालबाक, सहारा देबाक आ भविष्य बनेबाक बात होइत अछि। कतेक घरमे ई बात सचमुच नेह आ करुणाक संग निभाओल सेहो जाइत अछि। एहन उदाहरण सभ हमरा समाजक मानवीय पक्षकेँ उज्जवल करैत अछि। मुदा ऐ सम्बन्धक दोसर चेहरा सेहो अछि। किछु ठाम बच्चाकेँ मम्हर म राखि कऽ ओकर श्रम सँ घर चलाओल जाइत अछि । ओकर पढ़ाई पाछु छुटि जाइत अछि, बालपन घास, महिष, खेत , दलान , वर्तन ,घरक छोट - बड़ काज आ अपमानक बीच खपि जाइत अछि। समाज ओहि बच्चाकेँ 'भागिन' कहि सम्मानक भाषा दैत अछि,मुदा ओकर वास्तविक जीवनमे सम्मानक स्थान परिश्रम आ उपेक्षा सँ भरल रहैत अछि। ऐ तरहक विरोधाभास हमरा भीतर बहुत दिन सँ टीस दैत रहल। 'भागिन' ओहि टीसक कथा अछि। ...…! कथा प्रसंगमे अनेको शव्द मैथिलीक अछैत हिन्दी - उर्दू क' प्रयोग भेला सँ मातृभाषा मलीन भेल छैक। प्रायः सब पन्नामे प्रकाशक मुद्रण त्रुटि रखने छैक ,जे सुधी पाठककेँ अबुझ आ बोझिल बुझाइत छै। आश करब संशोधित संस्करण बहराय जाहि सँ समीक्षक आ ग्राहककेँ कठिनता नहिं होय। उपन्यासक पुरुष पात्रमे भोला ,बैजू, रामलखन, फुसीया आ रामसुख ,मौसम बाबा आ हुनक बाबाजी मित्रक तथा स्त्री पात्रमे नंदनी , रमौलवाली, रीना , कल्पना ओ पुष्पाक नाम मुख्य रूपेँ उजागर भेल य। लालूक बालपन किशोरावास्था आ नवयुवक वयस अनुन - विशनुन सुवादक चलैत रहलैक। जीवन उतार - चढ़ाबक सांगोपांग वर्णन एहि पोथीमे पढि पाठक रसास्वादन करताह/ करतीह। कुवर जीक आगू कथा पोथी , कविता आ दोसरो विधामे नव पोथी आओत से विश्वास जगैत अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.६. आचार्य रामानंद मंडल- प्राथमिक शिक्षा मे अंगिका बज्जिका/ नीट छात्र आंदोलन -२०२६/ मिथिला राज्य निर्माण के इतिहास आचार्य रामानंद मंडल प्राथमिक शिक्षा मे अंगिका बज्जिका/ नीट छात्र आंदोलन -२०२६/ मिथिला राज्य निर्माण के इतिहास १ प्राथमिक शिक्षा मे अंगिका बज्जिका मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी स्वयं अंगिका क्षेत्र के छतन।हुनकर मातृभाषा अंगिका हय।संवदिया के पत्रकार अक्षय आंनद सन्नी हुनका अंगिका के बारे मे समझा रहल छतन कि प्राथमिक शिक्षा मे क्षेत्रीय भाषा के रूप मे अंगिका मे न पढा के मैथिली अर्थात सोतिपुरा मैथिली भाषा में पढायल जाय।त अंगिका क्षेत्र के कैगो बच्चा सोतिपुरा मैथिली समझतै।नयी शिक्षा नीति में संविधान के अष्टम सूची में शामिल भाषा के आधार पर  अनिवार्य शिक्षा देबे के बात न कैल गेल हय।नीति में क्षेत्रीय भाषा वा स्थानीय भाषा में शिक्षा देबे के बात कैल गेल हय। तैं मैथिली अनिवार्य न हय।तत्काल बिहार सरकार के अंग क्षेत्र में अंगिका आ बज्जि क्षेत्र मे बज्जिका मे पढाई की व्यवस्था करे के चाही। जैसे अंग आ बज्जि क्षेत्र के बच्चा के प्राथमिक शिक्षा मजबूत हो आ बच्चा के सार्वंगिक विकास हो सके। ज्ञात हो कि दक्षिणी मैथिली अंगिका, पश्चिमी मैथिली बज्जिका आ केन्द्रीय मैथिली सोतिपुरा मूल मैथिली के अलग-अलग शैली हय।जे एक दोसर से भाषायी दृष्टि से अलग अलग शैली हय। नेपाल के मधेश प्रदेश में बज्जिका आ मैथिली अलग-अलग भाषा के रुप मे दर्ज हय। नेपाली मिथिला में मैथिली आ बज्जिका के मतभेद के कारण मिथिला प्रदेश न बनके मधेश प्रदेश के निर्माण भेल।मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के किन्हको झांसा मे आबे के आवश्यकता न हय। बिहार में अंगिका आ बज्जिका भाषा अकादमी बनाबे के आवश्यकता हय। २ नीट छात्र आंदोलन -२०२६ काक्रोच जनता पार्टी अराजनीतिक के संयोजक अभिजीत दीपके के नेतृत्व में नीट छात्र आंदोलन -2026 के सफल कहल जा सकय हय।इ आंदोलन दिल्ली स्थित जंतर-मंतर पर कैल गेल। आंदोलन के शुरुआत सोनम वांगचुक के आमरण अनशन से शुरू भेल।अनशन काल मे स्वास्थ्य कारण से पुलिस अस्पताल मे भर्ती कैलक आ सरकार से वार्ता के बाद वांगचुक अपन अनशन समाप्त क देलन। अनशन मे जेएनयू के छात्र नेहा बोरा सेहो आमरण अनशन पर रहय। सरकार के कोनो अनुकूल कदम न उठाबे के कारण सामाजिक कार्यकर्ता मशहूर अभिनेत्री शबाना आजमी के सलाह पर बोरा अपन अनशन समाप्त क देलक।अइ बीच आंदोलन अपन उग्र रूप धैले रहय। आंदोलन राजधानी दिल्ली से राज्य आ जिला मुख्यालय तक फैल गेल। सामाजिक कार्यकर्ता से लेके राजनेता तक आंदोलन मे साथ देबे लागल। सामाजिक कार्यकर्ता प्रो योगेन्द्र यादव,  मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे आ राजनेता विरोधी दल राहुल गांधी ,सासंद डिंपल यादव आदि तक आंदोलन मे संग देबे लागल। आंदोलन के संवेदनशीलता के देखैत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत के व्यक्तव्य युवा के डिक्टेशन के न बल्कि डायलॉग के आवश्यकता हय। सरकार पर अइ वक्तव्य के असर पड़लैय। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आधि रात में अपन भावना से युवा आ छात्र के अवगत करैलन।असर केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान पर सेहो पड़लैय आ प्रधान पद से त्यागपत्र दे देलन। आंदोलनकारी के प्रमुख मांग पूरा भेल आ आंदोलनकारी आंदोलन समाप्ति के घोषणा कैलन। केन्द्रीय शिक्षा मंत्री के पदभार प्रह्लाद जोशी के सौपल गेल।आब छात्र आ युवा के सरकार के अगला कदम पर नजर राखे के आवश्यकता हय त सरकार के छात्र आंदोलन के मर्म के समझे के आवश्यकता हय जे युवा आ छात्र सरकार के कोनो अगला कदम से मर्माहत न होय। तत्काल नीट  छात्र आंदोलन साबित क देलक कि भारत मे लोकतंत्र जीवित हय।इ भारतीय लोकतंत्र के जीत हय। *ऐ आन्दोलनमे ६२ टा हत्याक प्रयासक आरोपी, २२९ टा आर्म्स एक्ट, १९६१ मे आरोपी, ६१टा बलात्कारक आरोपी आ ६ टा बाल यौन शोषण (POCSO) मे आरोपी रहथि [स्रोत दिल्ली पुलिस]; तेँ अखन कोनो निर्णयपर पहुँचब सम्भव नै अछि।– सम्पादक ३ मिथिला राज्य निर्माण के इतिहास मिथिला नरेश रामेश्वर सिंह  १९१०ई मे अलग मिथिला राज्य के परिकल्पना कैले रहतन।अइ के साकार करे के लेल मैथिल महासभा के गठन कैलन। मैथिल महासभा के सदस्य केवल आ केवल मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ ही हो सकैत रहतन एकर विरोध भेल रहय कि कोनो मिथिलावासी हो सकय हय।परंच राजा रामेश्वर सिंह के स्पष्ट विचार रहय कि मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ ही शुच्चा मैथिल हय। हालांकि सामाजिक , सांस्कृतिक आ भाषायी संस्था के रूप में गठन कैल गेल रहय। परंच संगठन के उद्देश्य मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ के विकास आ संरक्षण रहय आ अही उद्देश्य के प्रतिपूर्ति के लेल अलग मिथिला राज्य के लेल काज कैल गेल रहय।आब राजा रामेश्वर सिंह के सपना साकार करे के लेल अलग मिथिला राज्य के लेल अभियान चलायल जा रहल हय। परंच आब राजा के विचार से अलग राज्य के निर्माण न हो सकय छै।आब आम लोग के विचार आ समर्थन से अलग राज्य के निर्माण हो सकय छै। पड़ोसी देश नेपाल मे मिथिला राज्य न बनके मधेश प्रदेश के निर्माण भेलय।तहिना भारत मे सेहो अलग राज्य के निर्माण हो सकय छै। चाहे वो मिथिला राज्य बनय ।वर्तमान मे भारत मे कोनो राज्य पौराणिक राज्य के नाम पर न हय। जौं भगवान राम के राज्य के नाम पर वर्तमान प्रदेश के नाम न हय। जौं कि भारत जे मगध साम्राज्य के नाम पर जानल जाइ छै।आइ मगध नाम पर मगध जिला तक न हय। प्रजातांत्रिक देश में कोनो राजतंत्रीय राज के नाम पर कोनो राज्य के नाम रखनाइ प्रजातांत्रिक विचार के अवमूल्यन हय।आइ विचार करे के आवश्यकता हय कि आइ मैथिल महासभा  आ राजावादी विचार समयोचित हय! -आचार्य रामानंद मंडल पश्चिमी मैथिली बज्जिका साहित्यकार सीतामढ़ी। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.७. कैलाश कुमार ठाकुर- विद्यापतिक धरा पर मैथिलीमे रैप-संगीत कैलाश कुमार ठाकुर विद्यापतिक धरा पर मैथिलीमे रैप-संगीत विद्यापतिक धरा पर मैथिलीमे रैप-संगीत परापूर्वे कालसँ मिथिलाक चेतनस्थ तपस्वी-ध्यानी-ज्ञानी, विज्ञानी, ऋषि-मुनि, आचार्य-प्राचार्य, अनुसन्धानी साहित्याचार्यागणसभ मानवीय ऊर्जाकेँ एहिठामक माटि-पानि सऽ सिञ्चित व्यवहारिक सृजनमे लगा सकै, एहि लेल सर्जनक अनेकन कला, विधा ओ आयामक बाटसब खोजलथि। आ, समय-कालक विभिन्न प्रवाह ओ परिस्थितिमे ओहि कला एवं विधासभ केऽ परिष्कृत करैत १४ विद्या एवं ६४ कलाक रूपमे विस्तारित रूप-स्वरूप देलथि। देवाधिदेव महादेव ओ भगवान श्रीकृष्ण ६४ कलामे स्वयं केऽ निपुण कएने छलथि, से मानल जाइछ। २१म शताब्दीक एहि 'क्वांटम युग'क आरम्भिक चरणमे इन्टरनेट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आ विभिन्न तरहक सफ्टवेयरक विकासक कारणेँ ओहि कला सभमे सऽ मिथिला मैथिलीमे सेहो कथा, कविता, नाटक लगायत सिनेमा (सर्ट फिल्म) तथा रैप गीत-संगीत सृजन कलामे तिव्रता आयल अछि। अनेकन कला ओ विधा मध्य रैप गीत-संगीतक चलन मैथिलीयोमे युवासब मध्य आइकाल्हि बेसी लोकप्रिय भेल देखल जा रहल अछि। जे मैथिली भाषा साहित्य सिनेमा लेल बड़ बेसी महत्वपूर्ण आ सुखद हय। रैप गीत-संगीतक आरम्भ दू-तीन सय वर्ष पहिने पश्चिम अफ्रीकामे भेल मानल जाइछ। जखन कारी अफ्रीकी-अमेरिकनसब उपर गोर एवं सम्भ्रान्त समुदायक लोकसब द्वारा असह्य शोषण, उत्पिडन, अन्याय, अत्याचार, बलात्कार, हत्या एवं जघन्य अपराधीक घटनासभ होएब नियति जका बना देल गेल रहे। तेहन समयमे ओ कारी समुदायक अगुवा लोकसब क्रुरता आ घृणा सऽ भरल ओहि अपराधीक घटनासभ केऽ छन्दोवद्ध कऽ ढोलकक साधारण ताल पर विभिन्न गाम-शहर-बजारमे जाकऽ लयवद्ध स्वरमे सुनबैत शान्तिपूर्ण प्रतिकार करबाक परम्परा चलौलथि। पश्चिममे एहि तरहेँ रैप-संगीत चलनमे आयल मानल जा सकैछ। किछु लोक रैप-संगीत अर्थात् ‘रिदम एन्ड पोएट्री’ (RAP– Rhythm and Poetry Music) क उदय १९७० (ई.)क दशकमे संयुक्त राज्य अमेरिकाक न्यूयोर्क शहरमे अफ्रीकी लैटिन युवा समुदायक आवाजक रूपमे सांस्कृतिक आन्दोलन रूपेँ प्रस्फुटित भेल मानैछ। जेकरा हिप-हप संगीत (Hip-Hop music) सेहो कहल जाइछ। छोटमे कहल जाय तऽ, "हिप-हप" एकटा पूरा 'गाछ' अछि, आ रैप-संगीत ओकर सब सऽ पैघ आ लोकप्रिय 'ठाढ़ि'। मुदा, किछु लोक रैप म्यूजिक आ हिप-हप केऽ एक दोसरक पूरक मानि एक्कहि बुझति छथि। एम्हर, रैप गीत-संगीतक उद्भव सम्बन्धमे पूर्वीय वा भारतीय कथा-इतिहास भिन्न अछि। रैप गीत केऽ किछु गण्य-मान्य लोक द्वारा कवित्त सेहो कहल जाइछ। कवित्त, अर्थात् जखन केओ कोनो घटना, कथा वा कोनो ऐतिहासिक प्रसंग केऽ कवितात्मक ताल, भाव, ओ लयक मादे प्रस्तुत करैछ, तऽ ओकरा कवित्त कहल जाइछ। मिथिलामे सेहो ताल-भाव सहित लयबद्ध रूपेँ कथा कविता कहबी लोकोक्ति कहबाक चलन‌ हजारो वर्ष पुरान अछि, यद्यपि एहि विषय पर आर खोज-अनुसन्धान करबाक आवश्यकता अछि। ओना, डा. जयप्रकाश चौधरी "जनक" जीक मैथिली काव्य वाचनमे विशेष शैली ओ लयात्मकता देखल जाइछ, जे स्वयंमे बड्ड विशिष्ट अछि। हिनकर किछु काव्यवाचनक अडियो रैप संगीतमे प्रयोग (हिनका सऽ अनुमति लकऽ) कएल जा सकैछ, जे सम्भवतः आर बड्ड महत्वपूर्ण आ लोकप्रिय होयत। मिथिलामे एखनो एतुक्का हरेक घर-परिवारक महिला लोकनि किछु विशेष प्रंसगसभमे विशेष रूपेँ भावविह्वल भेला पर तथा अनियन्त्रित रूपेँ मन-मस्तिष्क ओ हृदयमे पीड़ा प्रस्फुटित भेला पर हृदय छटपटाइत काल, कनैत काल ओइ असह्य पिडा़ केऽ लयात्मक रूपेँ अभिव्यक्त करैत छथि। विशेष अवस्था ओ परिस्थितिक असह्य दुःख ओ वेदना केऽ कनैत काल लयात्मक रूपेँ अभिव्यक्त करब मात्र किछु साल ओ शताब्दीमे विकसित भेल हो, से सम्भव नइ भऽ सकैछ। पीड़ाक एहि तरहक अभिव्यक्तिक शैलीक विकासमे हजारो साल लागल होयत प्रतित कएल जा सकैछ। लयात्मक शैलीमे कथा कहबाक परम्परा वा शैली गबैयाक रूपमे सेहो एखनो मिथिलामे कतौ-कतौ देखल जाइछ। जाहिमे कथावाचक वा गबैया मात्र एकटा ढोलकक साधारण ताल पर कथा केऽ भावयुक्त लयमे प्रस्तुत कऽ दर्शक ओ श्रोतासभ केऽ सन्न कऽ दैत छथि। मिथिलाक ई विशिष्ट गायन परम्परा एखन पूर्ण रूपेँ विलुप्त होयबाक अवस्थामे पहुंचल अछि। तथापि, मिथिलाक उपरोक्त कला, परम्परा, संस्कृतिसभ आ मैथिली रैप-संगीत वा मैथिली हिपहप बिच कोनो सोझ सम्बन्ध सम्भवतः नइ स्थापित कएल जा सकैछ। मैथिली रैप-संगीत पश्चिमी हिपहप संगीत सऽ प्रत्यक्ष–अप्रत्यक्ष रूपेँ प्रभावित भऽ किछु मैथिली भाषी प्रतिभावान युवासभ द्वारा आविर्भाव कएल गेल अछि। मैथिलीमे रैप-गीत लेल प्रोफेशनल रूपेँ सम्भवतः सब सऽ पहिले मानिया आ ए.के. रैन २०२० (ई.) मे आगा अएलथि। जाहि समयमे पुरा विश्व कोरोना महामारी सऽ संघर्षरत छल। हिनकर सभक एन्टी लभ, निकम्मा, होपलेस, घमण्ड, शिवजी, घुर्मी नचा दे, भगतइ गीतसब बेसी लोकप्रिय अछि। ओहि समयमे, अपूर्व चौधरी सेहो मैथिली रैप-संगीतमे किछु करबाक तैयारी करैत "दु दूनी चारि" बोलक गीत २०२१ मे पोस्ट कएलथि। हिनकर – 'मिथिलाके लाल', 'बूझलीयइ', 'दू-दूनी चार', 'तोरा प्यारमे', 'वारेंट', 'जूग-जूग जीय' गीतसभक भ्यूज हजारोक संख्यामे देखल-सूनल गेल अछि। २०२४ मे संतोष झा अक्का ओडी (OD)क 'एलौ जनकपुर बोल्टस' तथा ए.के. रैन ओ मानियाक "ओधबाध" गीत बहुत लोकप्रिय भेल। ई दूनू गीत नेपालमे क्रिकेट खेलक प्रमोशन लेल सृजन कएल कएल गेल - कराओल गेल छल। मानियाक आदित्य बलराम (Aaditya Balram) संग रीलीज भेल 'कलाकार' गीतक भ्यू सेहो लाख सऽ बेसी पहूंचल अछि। बलराम जीक 'वार्ड नम्बर ८-९', 'देहाती रैप', 'फूटानीबाली छौरी', 'महुवा छाप', 'झालमूड़ी' लगायतक गीतसभ सेहो लाखोक संख्यामे देखल-सुनल गेल अछि। कोनो पेशा वा कलाक क्षेत्रमे स्वयं केऽ स्थापित करब संगहि आर्थिक रूपेँ सेहो समुन्नत होयब बड्ड बेसी दुरूह होइछ। मिथिला-मधेशमे हिंदी आ निम्नस्तरीय भोजपुरी गीत-संगीतक प्रभाव प्रबल रहितहुं मैथिली रैप-संगीतमे जे युवा-युवतीसब लागल छथि, ओ सब अपने मातृभूमि मिथिलामे मैथिलीमे स्वयं केऽ स्थापित कऽ लेने छथि वा कऽ सकताह – कऽ सकतीह की नइ, आर्थिक रूपेँ सेहो सफल भऽ सकताह / सकतीह की नइ, से बादका बात होइतहुंमे वर्तमानमे बड़ बड़का चुनौती रूपेँ हिनका सभक आगा ठाढ़ हय। मुदा, किछु सन्तोष करबाक बात अवश्य देखल जा रहल अछि, ओ ई जे हिनकरसभक मेहनति आ गीत-संगीत हिंदी आ भोजपुरी गीत-संगीतक प्रभाव केऽ बाहर दिशि धकियबैत अपन मिथिलाक चौहद्दी धरि पहुंचबाक क्रममे अवश्य अछि। रैप-गीत-संगीत मादे मैथिली रैपर ओ म्यूजिक इन्जिनियरसब मैथिली भाषा साहित्य संस्कृति सभ्यता ओ समाज-राज्यक संरक्षण सम्वर्द्धन ओ विकासमे कतेक योगदान दऽ सकताह / सकतीह, ई त भविष्यक बात अछि। मुदा, कविता, पद्य ओ गीत-संगीत मादे अपन भुगोल भाषा साहित्य संस्कृति सभ्यता लोक-समाज-राज्यक संरक्षण सम्वर्द्धन ओ विकास लेल पूर्ण रूपेँ पृथक युगान्तरकारी एवं स्वयंमे क्रान्तिकारी काज मैथिली संस्कृत प्राकृत भाषाक विद्वान ओ महापंडित महाकवि विद्यापति (१३५२-१४४८) करबाक लेल बाध्य भेल रहथि कहब अतिशयोक्ति नइ होएबाक चाही। इतिहासकार सभक अनुसार, १३हम शताब्दी सऽ १५हम शताब्दीक बीच दिल्ली सल्तनत, जौनपुर आ बंगालक आक्रमणकारी यवन‌ शासकसब द्वारा मिथिला (तिरहुत) पर लगभग ११ बेर छोटका-बड़का आक्रमण कएल गेल, संगहि दर्जनो बेर झड़प सेहो भेल हय। इतिहासकार मुल्ला तकियाक अनुसार, मिथिलाक कर्नाट सेना सऽ खिलजीक तुगलक सेना दू बेर पराजित भेल (लगभग १३२३–२४ ई.)। अपन जीवन कालमे मानव लेल उपयोगी कोनो तरहक शोध-खोज-अनुसन्धान आधारित ज्ञान-विज्ञान, कला-कौशल मिथिला राज्य केऽ नइ दऽ सकल क्रुर यवनी शासक सब तेसर बेर सेहो आक्रमण कऽ मिथिला केऽ युद्धमे धकेल देलक। जाहि तेसर युद्धमे मिथिलाक कर्णाटवंशी राजा शक्तिसिंहदेव, अलाउद्दीन खिलजीक सेनापति शेख इस्माइलक हाथे पराजित भऽ गेलथि (लगभग १३२५ ई.)। युद्धक उपरान्त हुनका बन्दी बना दिल्ली लऽ गेलन्हि, जतऽ दिल्ली सल्तनतक सुल्तान समक्ष प्रस्तुत कएल गेलाह। भयावह राजनीतिक परिस्थिति केऽ देखैत सुल्तान अन्ततः हुनका पुनः मिथिला (तिरहुत) पर शासन करबाक अनुमति तऽ देलन्हि, मुदा पूर्ण रूपेँ स्वतन्त्र शासकक रूपेँ नइ, अपितु दिल्ली सल्तनतक अधीनस्थ सामन्त-शासकक रूपमे। एहि स्वीकृतिक संग दू गोट अनिवार्य शर्त सेहो मिथिला समाज-राज्य ओ राजा पर थोपल गेल। पहिल, मिथिला (तिरहुत) राज्य नियमित रूपेँ दिल्ली सल्तनत केऽ सलाना भारी कर अर्पित करैत रहत; दोसर, जखन-जखन आवश्यकता पड़त, तखन-तखन मिथिलाक शासक दिल्ली सल्तनत केऽ सैन्य सहायता उपलब्ध करबति रहत। तेसर युद्धमे हारलाक बाद आ एकतर्फी रूपेँ थोपल गेल सन्धि उपरान्त मिथिला गम्भीर राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक आ सांस्कृतिक संकटमे फंसैत आएल। राज्यव्यवस्था संगहि आर्थिक व्यवस्था दिनानुदिन कमजोर होइत गेल, जनजीवन असुरक्षित बनैत रहल तथा समग्र समाज-राज्यमे भय, अस्थिरता आ निराशाक वातावरण व्याप्त होइत गेल। दिल्ली सल्तनतक चरम आर्थिक शोषण, धार्मिक उत्पीड़न, जबरन धर्मान्तरणक प्रयास, अन्याय, अत्याचार, हिंसा, बलात्कार, हत्या तथा अन्य जघन्य अपराधसभक सामना करब एहिठामक आमलोक लेल नियति जका भेल क्रम राजा शिवसिंहक शासनकाल धरि आएल। यवन आक्रमणकारी शासकसभ केऽ भारी कर तिरैत आएल मिथिला समाज-राज्यमे भुखमरी जेहन भयावह परिस्थिति बेर-बेर अबैत देखि, राजा शिवसिंह स्वतन्त्र शासकक रूपमे शासन करबाक प्रयास आरम्भ कएलन्हि आ संगहि अपन नाम सऽ मुद्रा सेहो चलनमे लओलथि। एहि तरहेँ राजा शिवसिंह मुद्रा जारी कएनिहार पहिल मैथिल राजा भेलाह। एकर प्रतिक्रिया स्वरूप, लगभग १४०६–१४०९ (ई.) अवधीमे राजा शिवसिंह आ दिल्ली सल्तनतक जौनपुर सुल्तान 'इब्राहिम शाह शर्की' बीच बेर-बेर संघर्ष आ युद्ध होइत रहल। विभिन्न ऐतिहासिक विवरण अनुसार एहि युद्धसभमे राजा शिवसिंह या तऽ वीरगति प्राप्त कएलथि वा अपन प्राण बचा कतौ भागि गेलथि वा अपन राज्य एवं प्रजाक सुरक्षा लेल आजीवन बन्दी भऽ गेलाह। (एहि घटनाक निश्चित विवरण नइ भेटैछ। विभिन्न स्रोतमे अलग-अलग विवरण भेटैछ।) मुसलमानी आक्रमणक कारण राजर्षि जनक, रानी सुनैना, याज्ञवल्क्य, गार्गी, भारती, मैत्रेयी, राजा ओ लोकनायक सलहेस, दिना-भद्री जेहन अनेकन राज्यक पोषक ओ संरक्षक राजा-रानी, ऋषि-मुनि, विद्वान-विदुषी ओ आमजनकक शरीर रूपी मिथिला उपर मात्र भौतिक, शारीरिक ओ मानसिक आघात नइ भेल, अपितु एकर राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक ओ आध्यात्मिक सभ्यताक चेतना पर सेहो बड़ पैघ प्रहार भेल। अचानक सऽ अभिभावक रूपी राजा, राजदरबार ओ राज्यव्यवस्थाक अभावमे हरेक जाति-समाजक नर-नारी, बेटी-पुतौहु ओ संतान-संततिसब हरेक दृष्टिएँ छिन्न-भिन्न भऽ रहल देखि, लोकपरम्परामे ओ लोकभाषामे निहित-जीवित हजारो-लाखो सालमे पूर्वजसभ द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी अर्जित, अन्वेषित, परिष्कृत आ परिमार्जित भाषा-चिन्तन, ज्ञान-विज्ञान, आचार-विचार, कला-कौशल, साहित्य, संस्कृति, सभ्यतादि ढहि रहल वर्तमान‌मे भविष्यक दुर्गति देखि संकटक ओहि भयावह ओ विकराल कालमे राजा शिव सिंहक परम मित्र ओ राजसंस्थाक अभिलेखपाल, महाकवि विद्यापति अत्यन्त चिन्तित आ बड्ड बेशी असहज भेल हेतन्हि। जेकर परिणामस्वरूप, मिथिलाक तत्कालीन ओ भावी संतान-सन्ततिसभक कर्म ओ जीवन एकटा निकृष्ट ओ विक्षिप्त प्राणी सदृश भऽ जायत। भविष्यक ई भयावह मुदा कटुतापूर्ण परिदृश्य महाकविक चेतनामे सघन रूपेँ चित्रित भेल हेतन्हि से सहजे अनुमान लगाओल जा सकैछ। संगहि, चेतनस्थ महाकवि इहो अकानि लेने रहथि, ई देखि लेने रहथि, ई बुझि लेने रहथि जे भविष्यमे, अपन पूर्खासभक हजारो-लाखो वर्षक परिष्कृत-परिमार्जित ज्ञान-विज्ञान, भाषा, साहित्य, कला, संस्कृति, सभ्यतादि सऽ विमुख भेल एहि मिथिला भुगोलक संतान ओ सन्ततिसभ अपन कर्म, दायित्व ओ पहिचानक-संकट (Identity Crisis) सऽ सेहो जूझबाक लेल बाध्य होयत। पहिचानक संकट सऽ संघर्ष कऽ रहल मानव समाज-राज्य विक्षिप्तताक ओहि अवस्थामे पहुंच जाइछ, जाहि दरिद्र मानसिकताक अवस्थामे ओ आन समुदाय, समाज-राज्य, एवं ओहि समाज-राज्यक भाषा साहित्य संस्कृति सभ्यता कला-कौशल ज्ञान-विज्ञानादि केऽ अपन समुदाय ओ सन्ततिसभक लेल घातक मानऽ लगैछ। एहन अवस्थामे मात्र ओ आन समुदाय एवं समाज-राज्य लेल मात्रे नइ भऽ स्वयं अपन समुदाय लेल सेहो ओतबे घातक स्वयं अपन व्यवहार सऽ सिद्ध करैत देखल जा रहल वर्तमान अछि। एहिठाम बहुत आश्चर्य आ बहुत दुखद बात ई जे, उक्त लोक-समुदाय लेल बहुत मजगूत रूपेँ आश्चर्य सन किंकर्तव्यविमूढ़ताक स्थिति उत्पन्न भऽ जाइछ। कारण, अपन पूर्वजक जड़ि दिश पुनः घुरि आएब "पराजित मानसिकताक उपज भेल" कहि दुत्कारल जएबाक डर आ लोकलाज व्याप्त भऽ जाइछ। तऽ दोसर दिशि, अनकर दूरस्थ भुगोलक भाषा साहित्य संस्कृति केऽ जबरजस्ती पकड़ि कऽ अपन जीवनक सीमित दायरामे कैद कऽ घिसियाइत रहब सेहो नियति जका बना लेने देखल जा रहल अछि पुरा विश्वमे। आइ ई भयावह दृष्टान्त मिथिला-मधेश-नेपाल लगायत विश्वक हरेक कोनामे देखल जा रहल अछि। जे की सहज मानवीय व्यवहार ओ प्रकृतिक बड्ड विरूद्धमे अछि। ई भयावह ओ विक्षिप्तपूर्ण दुर्गति ओहि लोकजनमे भेल पुरा विश्वमे देखल जा रहल अछि, जेकरा सभ केऽ अपन पूर्वजक भाषा, साहित्य, संस्कृति, संस्कार, सभ्यातादि सभ सऽ तोड़ि देल गेलै, आ ओहि भाषा साहित्य संस्कार सऽ जोड़बाक बलपूर्वक हरेक नैतिक-अनैतिक प्रयत्न कएल जा रहल हइ, जे अपन छइहे नइ, एहि भुगोलक छइहे नइ, अपन माटि-पानिक हइबे नइ करै। आ बहुत बड़का दुर्भाग्य ई जे, ई क्रम कहिया धरि चलैत रहत, तेकर कोनो ठेकान नइ। मानव समुदायक सामुहिक पक्ष द्वारा मात्र मानव लेल नइ अपितु आन्य जीव-जन्तु ओ प्राणीसब लेल सेहो खोजल गेल, संकलित कएल गेल ज्ञान-विज्ञानक हरेक आयाम ओ कला-कौशलसभ केऽ नकारैत अपन लोक-समुदाय केऽ पृथक रखबाक चेष्टा करैत रहब कतेक उचित ? मिथिलाक सन्दर्भेँ, एहिठाम प्रश्न उठैछ जे, संस्कृत भाषामे एगारह टा ग्रन्थ रचनीहार महाकवि विद्यापतिक समक्ष कोन एहन बाध्यता ठाढ़ भेलन्हि, जे संस्कृतमे समाजोपयोगी ग्रंथसभक सृजन केऽ निरन्तरता दति, मैथिलीमे सेहो हजारोक संख्यामे गीत ओ पद्यसब लिखि घर-घरमे स्थापित कऽ देलथि ? वस्तुत: मिथिला हजारो वर्ष सऽ बाढ़ि आ रौदी सऽ ग्रस्त रहैत आएल अछि। एहि यथार्थक जानकारी होइतहुं, दिल्ली पर कब्जा कएने क्रुर यवन शासकसब भारतक विभिन्न राज्यसंग मिथिला पर सेहो बेर-बेर आक्रमण आ लुटपाट करैत भारी 'कर तिरबाक लेल' बाध्यात्मक परिस्थिति बनबैत आबि रहल छल। जाहि कारण, मिथिलामे आर्थिक समस्या आर विकराल होइत भुखमरी जेहन परिस्थिति बेर-बेर अबैत रहल। जाहि भयावह समस्याक समाधानक लेल महाकवि विद्यापति यवन शासकसभक संग बेर-बेर कूटनीतिक मादे सेहो तत्कालीन परिस्थिति केऽ साम्य करबाक चेष्टा करैत रहलथि। एहि कूटनीतिक पहल ओ संवाद लेल हुनका मिथिलाक विभिन्न ठामक वास्तविक वस्तुस्थिति जनबाक-बुझबाक लेल विभिन्न ठामक यात्रा करबाक बाध्यता होइत रहलन्हि। मुख्य रूपेँ, राज्यक विभिन्न कामकाजक दस्तावेजीकरण तथा संस्कृत साहित्य सृजनमे व्यस्त महाकवि विद्यापति जखन बाध्यात्मक यात्राक दौरान अपन चौहद्दी मिथिलाक आमलोकजन मध्य पहुंच हुनकर सभक दिनचर्या, भावना, व्यस्तता, बाध्यतादि ठेठ मैथिलीमे सुनलथि-बुझलथि, तखन मिथिलाक आमलोकजनक भाषा ओ भावक गहिराई सऽ सम्भवतः पहिल बेर पूर्ण रूपेँ परिचित भेलथि, आ तेँ, कहबाक लेल बाध्य भेलथि – “देसिल बयना सब जन मिट्ठा, तेँ तैसन जम्पओ अवहट्ठा (आरम्भिक मैथिली)"। तेँ, तऽ सम्भवतः राष्ट्रकवि रामधारी सिंह (१९०८– १९७४ ई.) 'दिनकर' ६००-६५० वर्ष पूर्व महाकवि विद्यापतिक ओहि दुरगामी चेतनस्थ दृष्टि द्वारा कएल गेल साहित्य सृजनक कारण ओ प्रयोजनसभके देखि अपन शब्दमे व्यक्त करबाक लेल बाध्य भेलथि आ कहलथि, जे, – 'जखन-जखन राज्यक राजनीति लड़खड़ाछि, तखन-तखन ओकरा साहित्ये साहार दति अछि।' वस्तुत: चेतनस्थ विद्वत्त ओ विदुषीजन अपन आगा आएल चुनौती ओ दायित्व सभ सऽ उर्ध्वगामी पुरूषत्व ओ स्त्रैणत्वक कारणेँ स्वयं केऽ विमुख करब असम्भव होइछ। एहन युगद्रष्टा-क्रान्तद्रष्टाजनसब अपन समाज-राज्य, देश-दुनिया एवं मानवता लेल ओ काजसब कऽ जाइत छथि, जेकर खगता वर्तमानमे मात्रे नइ अपितु भविष्यमे सेहो ओतबे सान्दर्भिक, अति आवश्यक आ व्यवहारिक रूपेँ बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध होयत, से पहिनहिए देखि – अकानि लेने रहति छन्हि। वैदिक-संस्कृत परम्पराक प्रकाण्ड विद्वान ओ साहित्याचार्य महाकवि विद्यापति, हजारो-लाखो वर्षक चेतनस्थ सदृश्य मिथिलाक संरक्षण ओ संवर्धन लेल संस्कृतक सीमित विद्वत्-परम्परा सऽ एकाएक बाहर आबि ठेठ 'मैथिली'मे साहित्य, गीत ओ पद्य सृजन दिशि तीब्र गतिएँ अग्रसर भेलथि। समाज-राज्यक भयावह परिस्थिति केऽ ध्यानमे रखैत वैष्णव, शैव आ शाक्त— एहि तीनू भक्ति-धाराक सेतुक रूपेँ स्वयं केऽ ठाढ़ करैत 'श्रृङ्गार' 'भक्ति' ओ दर्शन पर आधारित अनगिनत मैथिली गीति ओ पद्य रचना कयलथि, जे मिथिलाक भाषिक ओ सांस्कृतिक चेतनाक अक्षय स्रोत बनल अछि, सदैव लेल।महाकवि द्वारा मैथिलीक अक्षय श्रोत निर्माण सऽ पहिले सेहो बहुत महत्वपूर्ण काज सब भेल अछि। जाहि मध्य कविशेखराचार्य ज्योतिरीश्वर (१२९० – १३५० ई.) मैथिली पद्य-गद्य सहित नाटकक मजगूत आधारस्तम्भ रखने छलाह। एखन धरि हिनकर तीन टा ग्रंथ प्राप्त भेल अछि – (१) पंचशायक (२) धूर्तसमागम, तथा (३) वर्णरत्नाकर। संस्कृत भाषामे लिखल 'पंचशायक' मुख्य रूपेँ 'काम ओ प्रणय' पर आधारित ग्रंथ अछि। मैथिली लेल हिनकर दोसर महत्वपूर्ण ग्रंथ अछि 'धूर्त समागम'। ई एकटा प्रहसन वा हास्य नाटक थिक। जाहिमे नाटकक प्रमुख पात्रसब संस्कृत आ प्राकृतमे बजैत छथि, मुदा गीतसभ मैथिलीमे अछि। एहि नाटकक मादे कविशेखराचार्य समाज-राज्यक अगुवा, प्रतिष्ठित वर्ग, धनी, तथाकथित साधू-संत आ शासनतंत्रक अनैतिकता ओ पाखण्ड पर धरगर प्रहार कएने छथि। कविशेखराचार्य ज्योतिरीश्वर प्रारम्भिक मैथिली आ संस्कृतक महान कवि आ नाटककार छलन्हि, जिनकर तेसर महत्वपूर्ण रचना 'वर्ण रत्नाकर' (१३२४) थिक। ई मैथिलीक सभ सऽ प्राचीन उपलब्ध गद्य-ग्रन्थ अछि। एकरा किछु विद्वान लोकनि ज्ञानकोशीय कृति सेहो कहैत छथि, कारण गद्य ओ विश्वकोश शैलीमे मिथिलाक संस्कृति, समाज ओ कलाक संगहि मध्यकालीन भारतीय जीवन आ संस्कृतिक सेहो उल्लेख भेटैछ। सात कल्लोलमे विभाजित एहि ग्रन्थक सबटा तऽ नइ मुदा जे पाण्डुलिपिसब बचाओल जा सकल अछि ओकरा सबकेऽ एसियाटिक सोसाइटी, कोलकातामे सुरक्षित राखल गेल अछि। कविशेखराचार्यक उपरोक्त तिनू ग्रंथ मानव, मानवीय समाज-राज्य ओ मानवता लेल अत्यन्त उपयोगी ओ महत्वपूर्ण हय। कारण, हरेक जाति समाज राज्य ओ देशमे मानवता लेल सत्य कर्म ओ धर्मक बाट पर चलऽ बला लोक अवश्य रहैछ तथा एकर विपरीत अपन स्वार्थ सुख सुविधा ओ वर्चस्व लेल निच सऽ निच करम करऽ बला लोकसब सेहो अवश्य रहैछ, आ एहि दुनू शक्तिक बिच कमोबेश संघर्ष सदैव चलैत रहैछ। मुदा, वर्तमान ओ भविष्यक संतान - सन्ततिसभ कोन व्यक्ति वा कोन पक्ष केऽ सही आ कोन व्यक्ति वा कोन पक्ष केऽ गलत मानि अपन जन्म-जीवन केऽ सद्गतिक मार्ग पर लऽ जाय, आ की निकृष्टताक मार्ग पर..., एकर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष निर्देशन तऽ बिना भेदभाव एवं बिना पूर्वाग्रह वा दुराग्रह सऽ सृजन भेल साहित्येमे भेट सकैछ। एहि तरहक साहित्य कृति सब मैथिली साहित्य भण्डारमे यथेष्ट मात्रामे अछि। जाहि साहित्याचार्या ओ साहित्य कृतिसभक विषयमे रैपरसब स्वयं केऽ सेहो 'अपडेटेड' राखथि, सेहो आवश्यक बुझाइछ। मैथिली भाषाक साहित्य सृजन ओ सम्वर्द्धन दृष्टिएँ किछु सन्दर्भेँ ओहने सन काज अंग्रेजीक प्राध्यापक प्रो. डा. रामावतार यादव सेहो करैत आबि रहल वर्तमान अछि। प्रो. डा. यादव सेहो एकाएक अंग्रेजी विषय सऽ मैथिली भाषा पर शोध-अनुसन्धान दिशि प्रवृत्त भेल वर्तमानमे दृष्टांत अछि। 'अ रेफरेन्स ग्रामर अफ मैथिली (१९९६)', 'मैथिली फोनेटिक्स एंड फोनोलोजी (१९८४)' सहित एखन धरि नौ टा सोधपरक पुस्तकसब संग ९५ टा सोधपत्रसब मैथिली आ भाषाविज्ञान सऽ सम्बन्धित नेपाल, भारत, अमेरिका, ब्रिटेन आ जर्मनी देशसभमे प्रकाशित भेल अछि। जे मैथिली भाषा साहित्य लेल बहुत बेसी महत्वपूर्ण एवं आवश्यक अछि।++ प्रो. डा. यादव अंग्रेजी विषयक प्राध्यापक रहितो लगभग ४०–५० वर्ष सऽ अपन मातृभाषा मैथिली पर निरन्तर शोध-अनुसन्धान करैत आबि रहल छथि। मैथिली भाषाक वर्तमान अवस्था ओ कविशेखराचार्य ज्योतिरिश्वर तथा महाकवि विद्यापतिकालीन भाषिक स्थिति सऽ बहुत मेल खाइत अछि। आइ नेपालक ८–१० टा आ बिहारक लगभग २२–२५ जिलाक घर-घरमे मैथिली बाजल जाइत अछि, मुदा तइयो विद्यालय, सरकारी कार्यालय आ सार्वजनिक जीवनमे अंग्रेजी, हिन्दी आ नेपालीक प्रभुत्व बनल अछि। एतबे नइ, मैथिली भाषी शिक्षक, प्राध्यापक, डाक्टर, अभियन्ता आ राजनीतिकर्मीसब सेहो स्वयं केऽ विद्वान ओ सम्भ्रान्त देखएबाक लेल मैथिलीए भाषी लोकनि बिच प्रायः हिंदी नेपाली आ अंग्रेजी भाषाक प्रयोग करैत छथि। ई प्रवृत्ति मध्यकालमे संस्कृत भाषाक प्रति देखाओल जाइत छल। किछु समीक्षक ओ साहित्यकार कखनो-काल इ विचार-भाव व्यक्त करबाक चेष्टा करैत छथि जे महाकवि विद्यापति द्वारा मैथिलीमे रचल गीतसभक; खास कऽ देवी-देवताक विषयमे सृजन कएल गेल गीतसभक वर्तमानमे कोनो उपयोगिता नइ रहि गेल अछि। मुदा जँ एहि दृष्टिकोणेँ देखल जाय, तऽ की आजुक युवा रैपर सभ द्वारा मैथिलीमे सृजन कएल जा रहल रैप-संगीतक सेहो कोनो उपयोगिता नइ हई (?), जे गीत सब रिलीज भेलाक २४ घण्टा भितर हजारोक संख्यामे देखल-सुनल जाइछ। मुदा, मैथिलीमे प्रकाशित भेल आ भऽ रहल साहित्यिक कृति सभक विषयमे हजारो टा लोकजन केऽ खबर धरि नइ भऽ पबैछ, आ ओ पुस्तकसब किन कऽ पढ़ब तऽ बहुत दूर केऽ बात अछि। वास्तविकता तऽ इ अछि जे विद्यापतिक गीतमे देवी-देवताक माध्यमसँ प्रेम, भक्ति, कर्म ओ शौर्य जेहन शाश्वत विषय समाहित अछि, जे मिथिलाक संतान ओ संततिसभमे मानवीय ओ उत्तम संस्कार निर्माण हेतु अति आवश्यक अछि। आजुक समाज-राज्य ओ देश-दुनियाँमे पसरि रहल भयावह सामाजिक संक्रमित समय केऽ देखि सघन रूपेँ विचार कएला उत्तर प्रतित होइछ, जे महाकवि विद्यापति मैथिलीमे हजारो गीत ओ काव्य सृजन कए मिथिलाक भाषा साहित्य संस्कार संस्कृति ओ सभ्यतादिक मौलिक आधारके जन-जन मादे संरक्षित रखबाक आधारभूमी सृजन कऽ सुदृढ कएलथि। जेकर प्रासंगिकता आइयो अछि आ सदैव लेल सेहो। आजुक युवा रैपर सभक गीतमे समाज आ राज्यमे भोगल-देखल जा रहल दुःख, अन्याय, अत्याचार, लाञ्छना, प्रेम, पढ़ाई-लिखाई, अध्ययन, संघर्ष, सफलता-विफलता आ सामाजिक विभेदसभ सऽ उत्पन्न विद्रोहक यथार्थ चित्रणसब बेसी भेटैछ। संगहि किछु गीतसबमे रैपर वा आर्टिस्ट स्वयंकेऽ महान, विद्रोही आ श्रेष्ठ (GOAT' - Greatest of All Time) कहबा सऽ पाछा नइ हटैत छथि। वस्तुत: रैप संगीतमे इ एकटा अवधारणा अछि जे –"जखन धरि अहाँ अपन लक्ष्य धरि नइ पहुँच जाइत छी, तखन धरि ओहि रूपेँ व्यवहार करू जेना अहाँ पहिनही सऽ ओतऽ विराजमान हो"। ई अवधारणा आपसी संघर्ष (Battle Rap) सऽ जन्मल अछि, जतय जीतबाक लेल अपन प्रतिद्वन्द्वी वा प्रतिपक्षी समक्ष स्वयं केऽ श्रेष्ठ साबित करब लयात्मक रूपेँ छन्दोवद्ध शैलीमे शाब्दिक संघर्ष होइछ। जाहि लेल रैपरमे छन्दयुक्त वाकपटुता ओ उच्च आत्मविश्वास होयब अति आवश्यक होइछ। रैप संगीतमे आत्मकेन्द्रित प्रशंसाबला रवैया ओ दृष्टिकोण सम्भ्रान्त श्वेतलोक सब द्वारा अश्वेत सब उपर कएल गेल घृणा अन्याय अत्याचार भेदभावादिक विरूद्धमे प्रतिकारक रूपमे आएल अछि। जाहि दृष्टिकोणक प्रयोग मैथिली रैपर सब द्वारा सेहो गीतसबमे कएल जा रहल देखल जाइछ। मुदा, किछु गीतसबमे मात्र एकटा-दूटा अपशब्दसब प्रयोग कएल गेल कारणेँ जातिय सामाजिक आर्थिक राजनीतिक भेदभावक विरूद्धक गीत हौइतोमे सार्वजनिक स्थानसब पर ओ गीतसब नइ बजाओल-सुनल जा सकैछ। मात्र एतबे नइ, रैपरसब स्वयं अपन सर्वस्वीकार्यता केऽ बाधित कऽ दैत छथि। श्रोता एवं विशेष कऽ युवा लोकनि आत्मविश्वास आ ऊर्जा सऽ भरल गीतसब बेसी पसन्द करै छथि। आ अपन मातृभाषा मैथिलीमे गीत होयबाक कारणेँ स्वयं केऽ गौरवान्वित सेहो अनुभव करै छथि। तेँ तऽ रैप गीतसभक 'व्यूज' (Views) किछुए दिन आ महिनामे लाखो-करोड़ोमे पहुँच रहल अछि। मैथिली रैप-गीत निरन्तर आबि रहल अछि, उहो फरक - फरक धारमे, फरक - फरक कलाकार, रैपर ओ म्यूजीसियन सभक संग। मात्र एक महिनामे रैपर मानिया ओ अक्षय बंकर'क "सैंया", एलिना चौहानसंगक 'चकमा' मैथिली-नेपाली गीत लाखो भ्यूजसंग लोकप्रिय भऽ रहल अछि। भर्खरे, 'मिस्टर मण्डल' ओ 'समिर'क 'बेटी' बोलक रैप गीत सेहो निक बनल अछि, तथा सैंतालीस हजार सऽ बेसी भ्यूज पहूंचल अछि। मैथिली रैप संगीतक क्षेत्रमे एखन धरि महिला रैपर सम्भवतः मात्र एकटा आएल छथि: अनिभा सिंह। जिनकर आवाज मात्र किछु दिन पहिले निर्माता आनन्द द्वारा निर्मित 'नरभक्षी शैतान' बोलक रैपगीतमे सुलन जा सकैछ। एखन धरि पुरुष प्रधान बला मैथिली हिप-हप आ रैप संगीत विधामे महिला रैपरक रूपमे अनिभाक प्रवेश सऽ मैथिली भाषाक संगीत-साहित्य क्षेत्र आर विकसित होयत से आसा-अपेक्षा आर बढ़ि जाइछ। एकटा महिला रैपर केऽ मैथिली रैप संगीतक क्षेत्रमे स्वयं केऽ स्थापित करबाक लेल बहुत मेहनति आ निरन्तर मेहनति करबाक अलावा किछु गीत स्वयं सेहो लिखबाक क्षमताक संगहि बाबु-माय, घर-परिवारक संग-संग सही साथीसभक साथ सेहो ओतबे आवश्यक अछि। ई यथार्थ बात सम्भवतः अनिभा केऽ अवश्य बुझल हेतन्हि। ओना, मिथिलाक भाषा साहित्य संस्कृति सभ्यता ओ आध्यात्मिक क्षेत्रमे समेत वैदिक कालहि सऽ पुरुष सभक ज्ञान बराबर महिलासब सेहो महान विदुषी ओ तत्वज्ञानीसब भेल अनेकन उदाहरण व्याप्त अछि। राज आयुष सेहो 'पेपर' आ 'धियापुता' बोलक रैप गीतक मादे मैथिली ओ नेपाली रैप-संगीत क्षेत्रमे बहुत निक सम्भावना लकऽ आएल छथि । कानून विषयक अध्ययन पुरा कऽ अदालतमे अधिवक्ताक रूपमे अभ्यास कऽ रहल आयुष रैप-गीत-संगीत सम्बन्धमे कहैत छथि जे, "रैपबैटल ककरो पर व्यक्तिगत रूपेँ लक्षित हमला नइ होइछ। एकटा रैपरक काज होइछ जे ओ अपन प्रतिद्वन्द्वीसब केऽ नीक तुकबन्दी, रूपक, श्लेष, उपमा ओ शब्दजाल सभक प्रयोग कऽ ओकर मनोबल आ अहंकार केऽ तोरि दू आ ओकरा स्वयं रैप बैटल समाप्त करबाक लेल बाध्य कऽ दू।" रैपर सब Itish, MEC, आ शब्दजाल संग हूंकार द्वारा निर्मित हिनकर 'धियापुता' गीतक भ्यूज युट्युब पर १ लाख ४२ हजार सऽ बेसी भ्यू पहूचल अछि। युवा रैपरसभ मैथिली भाषा केऽ स्मार्टफोनक स्क्रीनपर, यूट्यूबक चैनलपर, इन्स्टाग्राम ओ फेसबुकक रील्ससभक मादे आर बेसी जीवन्तता प्रदान कएने छथि। संगहि मैथिली भाषा केऽ विभिन्न अनावश्यक नाम दऽ सुनियोजित रूपेँ पसारल जा रहल घृणा ओ भ्रमसभ केऽ सेहो तोड़ि रहल छथि। मैथिलीक अपन समुचित व्यापकता लेल ई कम पैघ बात नइ हय। तेँ एकर उपयोगिता केऽ सेहो व्यापक रूपेँ देखबाक आवश्यकता अछि। कलाकार, गायक ओ रैपर संजय कुशवाहा जीक सेहो रैप गीत-संगीत पर मजबूत पकड़ छन्हि। हिनकर गीत 'नून रोटी' आ रैप गीत 'किसान' मे हिनकर गायन अभिनय गीत-संगीत आ भिडियो सऽ सम्बन्धित टेक्निशियन बला काजसबमे सेहो उच्चस्तरीय कार्यकुशलता देखल जा सकैछ। तहिना, "डीके सागर (DK Sagar) ओ कालकवि (Kaal Kavi)"क 'छुकटारा', 'कागजके नोट' 'फुटल नसीब' गीतसब सेहो युवासभक बीच बेस लोकप्रिय भेल अछि। नेपाल सशस्त्र प्रहरी बलमे जवानक रूपमे कार्यरत डीके सागरक 'जनचेतना' रैप गीत मैथिली गीत-संगीतक आकाशमे नव इतिहास लिखि देने अछि। मैथिली, नेपाली आ हिन्दीमे लिखल एहि गीतक मैथिली छंद नेपाली आ हिन्दी छंद पर समेत बड्ड बेसी हावी भेल हय। एहि गीतक लोकप्रियता एतेक बढ़ल जे भारतक लोकप्रिय संगीतकर्मी हनी सिंह स्वयं डीके सागरकेँ इन्टाग्राम पर फोलो कएलथि। "जनचेतना" गीतसंग एकटा आर बहुत महत्वपूर्ण घटना घटल अछि। मैथिली संगीत क्षेत्रमे पारम्परिक लोकगीत आ आधुनिक रैप गीतक बीचक दूरी केऽ समाप्त कऽ मैथिली रैपके एकटा व्यवस्थित आ व्यावसायिक स्वरूप देबामे मूख्य भूमिका निभाबि रहल बिरेन्द्र केसरीक अरेन्जमेन्ट तथा कम्पोजिशन आ सागरक अपने शब्द, गायन ओ परफोर्मेंसमे २० अगस्त २०२५क दिन यूट्यूब चैनल "Madhesi Beats" पर रिलीज भेल। "जन चेतना" गीतक भ्यूज आजुक दिनमे दू करोड़ ५६ लाख ५० हजार सऽ बेसी पहूंचल अछि। आ ठीक ओहि दिन, मलयालम फिल्म – लोकाह; चैप्टर एक (Lokah - Chapter 1: Chandra)क प्रमोशनल गीत – 'थनी लोका मुराक्कारी' (Thani Lokah Murakkaari) केरलाक संगीतकार जैक्स बेजोयक अरेन्जमेन्ट, मेघालयक रैपर रेबल (Reble) आ पंजाबी गायिका ज्योति नूरनक आवाजमे रिलीज भेल छल। जेकर भ्यूज एखन धरि दू करोड़ ७१ लाख ८८ हजार सऽ बेसी पहूंचल अछि। कहबाक तात्पर्य प्रष्ट अछि जे, दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योगक लाखो-करोड़ो रुपैयाक खर्चमे निर्मित गीतक तुलनामे बहुत कम खर्चमे निर्मित मैथिली रैप गीत सेहो ओकरासँ बहुत पाछा नइ रहल अछि। जेकर कारण थिक दमगर शब्द, संगीत तथा सागरक आवाज ओ साथीसभक संग कएल गेल भिडियोमे परफोर्मेंस। बहुत कम बजेटमे निर्मित मैथिली रैपगीत "जन चेतना", लाखोक खर्चमे निर्मित मलयालम गीत "थनी लोका मुराक्कारी" (Thani Lokah Murakkaari) क भ्यूज सऽ तुलना करबाक आधार देने अछि। "थनी लोका मुराक्कारी" एकटा बड़का बजेटक मलयालम फिल्मक प्रमोशनल गीत अछि। अमेरिकाक स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी सऽ 'म्यूजिक साइंस एंड टेक्नोलोजी'मे मास्टर डिग्री प्राप्त कएने जेक्स बेजोय भारतीय फिल्म संगीतक सर्वाधिक प्रतिभाशाली संगीतकारमे सऽ एक छथि। बेजोयक अरेन्जमेन्ट आ कम्पोजिशन, रेबल (Daiaphi Lamare) आ नूरन जेहन स्थापित महिला रैपर ओ गायिकाक आवाज, आ फिल्मक विशाल प्रचार-तंत्र – ई सभ मिलि कऽ दू करोड़ ७१ लाख सऽ बेसी भ्यूज देने अछि। दोसर दिशि, "जन चेतना", एकटा मैथिली रैप गीत अछि। जे गीत एकटा साधारण घर-परिवारसँ आयल युवा डीके सागर द्वारा लिखल गायल आ किछु साथीसभक संग परफोर्मेंस कएल गेल अछि तथा संगीत देने छथि नेपालक कम्प्यूटर इंजीनियर बीरेन्द्र केशरी, जिनकर "Madhesi Beats" एकटा युट्युब चैनल पर बिना कोनो फिल्मक प्रमोशनल तन्त्र जकाँ गीत रिलीज कएल गेल। मुदा, तइयो ई मैथिली रैप गीत दू करोड़ ५६ लाख सऽ बेसी भ्यूज पार कऽ लेलक। ई भ्यूज मैथिली भाषा लेल साधारण संख्या आ मात्र व्यावसायिक आँकड़ा नइ हय, अपितु मैथिली भाषाक जीवन्तता ओ व्यापकताक प्रमाण थिक। ई दर्शबैत अछि जे युवा मैथिली भाषी सब सेहो अपन मातृभाषाक आधुनिक स्वरूप केऽ जनैत छथि, चिन्हैत छथि आ बुझैत छथि। हिनका सब केऽ उचित प्लेटफोर्म, प्रोडक्शन, गीतकार, संगीतकार ओ दक्ष टेक्निशियन सभक आर बेसी व्यवसायिक रूपेँ सहयोगक आवश्यकता अछि। जाहि सऽ मैथिली रैप-संगीत मात्र मिथिलामे नइ अपितु मिथिला सऽ बाहर उत्तर भारतमे सेहो अपन व्यापकता क्रान्तिकारी रूपेँ स्थापित कऽ सकैछ, आ करबाक चाही। मुदा, एहि क्रान्तिक सर्वाधिक दुखद पक्ष ई अछि जे मैथिली साहित्यिक जगतक साहित्यकार कवि, लेखक ओ पत्रकारादि — एखनो हिनकरसभक गीत मेहनति आ प्रत्यक्ष ओ परोक्ष रूपेँ मैथिली भाषाक व्यापकतामे दऽ रहल योगदान प्रति अनभिज्ञता देखा रहल छथि, तेकर कारण की ?मैथिली भाषामे रैपर सभक उदय बड्ड बेसी महत्त्वपूर्ण अछि। मुदा, साहित्यकार लेखक पत्रकार एवं संघ-संस्थासभक उदासीनता-अनभिज्ञता चिन्ताजनक अछि। जखन सागरक "जन चेतना" मात्र एगार महिनामे करोड़ो बेर सुनल-देखल जाइछ, जखन अक्षय बंकर, मानिया, आदित्य बलराम, संजय कुशवाहा, ए.के. रैन, अपूर्व, ओडी (OD), आसिफ, कालकवि, मधेशी बोय, मिस्टर कलाकार, अनुदेश चौधरी, अनुज मिथिलावासी जेहन अनेकन रैपर सभक रैप गीत-संगीत हजारो-लाखो-करोड़ोमे देखल-सुनल जाइछ, तखन मैथिलीक पत्रिका सभमे, मैथिली भाषाक समाचारपत्र सभमे, खास कऽ सोसल मिडियापर सक्रिय मैथिली भाषाक आदरणीय साहित्यकार, लेखक, पत्रकारसभक पोस्टमे ई कलाकारसभक गीत एवं काजसभ पर चर्चा कैला नइ होइछ ? "मैथिली भाषा साहित्य ओ संस्कृति" लगायत विभिन्न विषयसभ पर सलाना लाखोक खर्चमे विभिन्न संघ-संस्थासभ द्वारा कएल जा रहल कार्यक्रमसभमे मैथिली रैप-गीत-संगीत पर चर्चा कएला नइ होइछ ? चर्चा तऽ दूरके बात हय, किनको द्वारा हिनकर सभक गीत केऽ सेयर कमेंट आ लाइक धरि नइ कएल देखल जाइछ। हिनकर सभक चैनलसभ केऽ सेहो फ्री मेऽ सब्सक्राइब कऽ प्रोत्साहित करब आदरणीय साहित्यकार, लेखक ओ पत्रकारसब उचित नइ बुझै छथि। कारण की ? मिथिलाक सन्ततिसभ विश्वक प्रतिकूल समयमे सेहो अपन माटि-पानिमे अपन मातृभाषा ओ साहित्य संस्कार संस्कृतिमे स्वयं केऽ भीजा कऽ रखबाक यथेष्ट चेष्टा कऽ रहल छथि। जाहि चेष्टा ओ यथेष्ट प्रयत्न सभप्रति दूनू दिसक मिथिलाक मुख्य धाराक साहित्यकार पत्रकार ओ संघ-संस्था सभ जे हरेक वर्ष मैथिली भाषा साहित्य संस्कृतिक संरक्षण सम्वर्द्धन ओ विकास लेल लाख सऽ लकऽ करोड़ो धरिक टका खर्च करैत अछि, एहि मैथिली रैपर ओ संगीतकर्मी सभ प्रति अनभिज्ञता - उदासीनता प्रकट कऽ रहल छथि। कारण की ? मैथिलीक स्थापित साहित्यकार लेखक ओ पत्रकारसब मैथिली भाषाक संरक्षण सम्वर्द्धन ओ विकास लेल सम्भवतः मात्र "साहित्य" केऽ, अर्थात् कविता-कथा-संग्रह, उपन्यास, नाटक, लेख/आलेखक परम्परागत विधासभ केऽ मात्र आधार मानैत छथि। जखन की विभिन्न प्रायोजित सुनियोजित षड्यंत्रक मादे मैथिली केऽ विभिन्न खण्ड-खण्डमे तोड़बाक जे षड्यंत्र चलैत आबि रहल हइ, ओइ षड्यंत्रसभ केऽ ध्वस्त करैत मिथिला मैथिलीक पौराणिक सत्य-तथ्य आधारित नैरेटिव गढ़बामे रैप गीत-संगीत ब्रह्मास्त्र सदृश्य साबित भऽ सकैछ। एहि दृष्टान्तेँ ध्यातव्य हो जे २०२० (ई.) मे नेपालक वर्तमान प्रधानमन्त्री बालेन शाह अपन इमानदारी, नैतिकता, शिक्षा ओ सत्यक शाहसक कारणेँ अपन आधार भुमि केऽ मजगूत रखैत, मात्र एकटा नेपाली रैप गीत 'बलिदान'क मादे नेपालक शीर्ष नेतासब – केपी ओली, प्रचण्ड, शेर बहादुर, उपेन्द्र यादव, सिके राउत लगायत नेतासभक राजनीतिक कुर्सीसंग राजनीतिक जीवन केऽ समेत बहुत जोड़दार धक्का देबामे सफल भेल भर्खरेक इतिहास अछि। जाहि धक्कामे हिनका सभक संग हिनकर सभक पार्टीसब सेहो धाराशायी भेल तथा मेयर पद सऽ राजीनामा देने बालेन महोदय राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टीक मादे सोझे प्रधानमन्त्री भेल वर्तमान अछि। 'बलिदान' रैप गीत एक तरहेँ न्युटनक तेसर नियम आधारेँ प्रधानमन्त्री बालेन लेल काज कएलक कहब अतिशयोक्ति नइ होयबाक चाही। नेपालक राजनीतिक बेथिति विरूद्धमे मात्र ३-४ मिनट केऽ एकटा रैप गीत, जेकर एकटा भिडियो पर छौ सालमे एखन धरि मात्र १४ मिलियन (१ करोड़ ४० लाख) भ्यूज तथा दोसर भिडियो पर चारि सालमे १७ मिलियन भ्यूज पहूंचल अछि, जे की मैथिली रैप गीत "जन चेतना"क भ्यूज सऽ बहुत कम अछि, ओहि रैप गीतक मादे जतेक सकारात्मक नैरेटिव बालेन अपना लेल गढ़ि लेलथि, ओतबे विपरीत नैरेटिव उक्त नेता ओ पार्टी सभक विरूद्धमे स्वयं प्रवाह भऽ गेल साक्ष्य वर्तमान अछि। जाहि प्रवाहमे वर्षो-दशको सऽ विभिन्न आन्दोलन आ संघर्ष मादे अपन राजनीतिक कैरियर आ पार्टीक वर्चस्व बजार नेतासब गढ़ने छलथि ओ सब ढहि गेल अवस्था छइ। ब्रह्माण्डमे कतौ कोनो कोनामे यदि आइंस्टीन महोदय कोनो स्वरूपेँ विद्यमान हो आ हुनका धरि ई समाद कहुना पहुँच जाई जे नेपालक राजनीतिक रणभूमिमे मिथिलाक लाल एकटा रैप गीतक मादे न्यूटनक तेसर नियमक सफल प्रयोग कऽ प्रधानमन्त्री भेल छथि, तऽ सम्भवतः आइंस्टीन महोदय दोसर बेर जीभि बाबि देताह। अपन भाषा साहित्य संस्कृति सभ्यता व्यापार लेल सेहो रैप-संगीतक प्रचलन तिब्र रूपेँ बढ़ि रहल अछि। मात्र किछु मास पूर्व, विश्व भरि लोकप्रिय भेल धुरन्धर' फिल्मक ट्रेलर, निर्देशक – आदित्य धर रैप-गीतक शैलीमे प्रस्तुत कएलथि। एहि फिल्म सऽ पहिले, मैथिली मगही भोजपुरी भाषाक फिल्म निर्माता ओ निर्देशक नितिन चन्द्रा सेहो मैथिली फिल्म "जैक्सन हाल्ट"कऽ प्रमोशन लेल रैप-गीतक प्रयोग कएने साक्ष्य वर्तमान अथि। १९७० (ई.)क दशक ओ समय छलै, जहिया भारतीय सिनेमा तेजी सऽ 'ब्लैक एण्ड ह्वाइट' सऽ रंगीन सिनेमा दिशि शिफ्ट भऽ रहल छल। ओहि समयमे अर्थात्, सन् १९७१ मे निर्माण भेल 'कन्यादान' मैथिली भाषाक पहिल फीचर फिल्म छल। जे फिल्म, मैथिली भाषा ओ साहित्य मादे अन्धविश्वास पर प्रखर चोट कएनिहार साहित्याचार्य प्रोफेसर हरिमोहन झाक उपन्यास 'कन्यादान ओ द्विरागमन ' पर आधारित अछि। मुदा, मिथिलाक दुर्भाग्य ई हय जे चारियो-पांचटा ओहन लोक वा व्यक्तित्वसब नइ भेल छथि एखनो धरि जे निरन्तर विश्वस्तरीय सिनेमाक मादे मैथिली भाषाक व्यवसायीकरण करओ; संगहि राजर्षि जनक रानी सुनैना, जानकी, राजा ओ लोकनायक सलहेस, महर्षि याज्ञवल्क्य, महर्षि गौतम, दिना-भद्री, अष्टावक्र, गार्गी, भारती, मैत्रेयी, ज्योतिरिश्वर, विद्यापति, चन्दा झा, मनवोध, लाल फजलुर रहमान हाशमी लगायत अनेकन विद्वान ओ विदुषी सभक एहि धर्तीक हजारो-लाखो वर्षक साहित्य संस्कृति सभ्यता ओ ज्ञान-विज्ञानक पक्षमे सत्य-तथ्य आधारित नैरेटिव गढ़ि सकओ, जे जन-जनक चेतनामे पसैरसकओ। सत्य-तथ्य आधारित ओहि नैरेटिव अन्तर्गत एहि ठामक हरेक जाति वर्ग समुदाय एक-दोसर केऽ साकारात्मक रूपेँ हरेक बात-विचार ओ व्यवहारमे देख सकए–देखा सकए। मुदा, "सत्य–तथ्य आधारित नैरेटिव, कथा, विमर्श-आख्यान" मिथिलाक संतान ओ सन्ततिसभक लेल निरन्तर सिनेमाक मादे जे गढ़ल जएबाक आवश्यक अछि, ओहि लेल मिथिलाक कोनो धनवीर संतान-संतति निर्माता रूपेँ नइ ठाढ़ भेलथि, आ मात्र साहित्य सृजन होइत रहल। परिणामत: मिथिलाक भाषा वैज्ञानिक, भाषा संरक्षक ओ साहित्याचार्यसभ एहि भुगोलक संतान ओ संततिसभ केऽ हिन्दी सिनेमाक एकभङाह ओ छद्म नैरेटिव गढ़ि उत्पन्न कएल गेल भस्मासुरीयन प्रवृत्ति सऽ नइ बचाबि सकि रहल छथि, आ स्वयं सेहो अभिमन्यु सदृश्य ओहि संकुचित कएल जा रहल चक्रव्यूह सदृश्य परिधिमे धकेलल जा रहल छथि, भाषाक किछु ओहि तथाकथित विद्वानसब द्वारा जे भाषाक आधारभूत सिद्धान्त केऽ मानबे नइ करै छथि आ मैथिलीक हाथ-पैर-आँखि-मूंहकेँ नोंचि-नोंचि कऽ छद्म नामसब दऽ खा रहल छथि।। आ नइ तऽ आयरलैंडक भाषाशास्त्री जर्ज अब्राहम ग्रियर्सन (Sir George Abraham Grierson) द्वारा रेखांकित मैथिलीक भुगोल केऽ मानैत छथि, जे मैथिलीक व्याकरण, शब्दकोष, तथा क्रिस्टोमैथी (१८८१/८२)क संग मैथिलीक आन्तरिक संरचनासभक दस्तावेजक आधार पर मैथिलीक भुगोल रेखांकित कएने छथि। मिथिलाक चौहद्दी भितर घर-घरमे बाजल जाय बला भाषा केऽ समग्रतामे पहिल बेर भाषाक वैज्ञानिक सिद्धान्तक आधार पर "मैथिली" नाम राखल गेलन्हि अंग्रेजी प्राच्यविद 'हेनरी थोमस कोलब्रुक' (Henry Thomas Colebrooke) द्वारा। भारतमे अंग्रेजक शासनकालमे भाषा, साहित्य ओ संस्कृति पर विशेष खोज-अनुसन्धान ओ अध्ययनक आधार पर दस्तावेजीकरण करबाक लेल नियुक्त कएल गेल कोलब्रुक महोदय अपन पुस्तक 'एशियाटिक रिसर्चेज (१८०१)' मे चौहद्दी मिथिलाक भाषा लेल पहिल बेर 'मैथिली' (Mythilee) शब्दक प्रयोग कएने छथि। ग्रियर्सन ओ कोलब्रुक महोदय द्वारा मिथिला ओ मैथिली भाषा साहित्य लेल अति महत्वपूर्ण ओ आवश्यक उपरोक्त काजसब कएल गेलाक बादोमे नियोजित रूपेँ भाषाक राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय सिद्धान्त आ मान्यता केऽ लतमर्दन करैत भारत आ नेपाल मेऽ सेहो भाषाई अराजकता पसारल जा रहल छइ, मिथिला ओ मैथिलीक सर्वनाश लेल।‌ माओवादीक सशस्त्र संघर्ष, ०६२/६३ क आन्दोलनक संगहि मुख्य रूपेँ मधेश आन्दोलन सऽ स्थापित भेल संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र नेपालमे इयह बितल साउन ११ गते सोमदिन (27 July 2026), सुनसरीक कप्तानगन्जमे किछु हिन्दू युवासब द्वारा भगवान शिव केऽ मन्दिरमे जल चढएबाक लेल जाइतकालमे किछु मुसलमान युवा सभक बीचमे भेल झड़पमे गोली चलाएला पर मात्र हिन्दूक ११-१२ संतानसबके गोली लागब दुर्भाग्यपूर्ण संगोय नइ अपितु सुनियोजित रूपेँ घटाओल गेल प्रतित होइछ। कारण ओहि झड़पमे गोली के चलौलक तेकर कोनो प्रमाण नइ सामने लाओल गेल अछि। सुनियोजित रूपेँ घटाओल गेल प्रतित भऽ रहल ओहि घटनामे मिथिला-मधेशक ओमप्रकाश मेहता, जयप्रकाश मेहता आ गणेश यादवक देहावसान भेल अछि। बहुत सूक्ष्म रूपेँ जेकर तार जुटल प्रतित भऽ रहल अछि नेपालमे साम्प्रदायिक हिंसा मादे संघियता केऽ नष्ट करब आ ओकर दोष सत्य-तथ्य ओ न्याय पर आधारित स्वतन्त्र रूपेँ सत्ता-सरकार चलएबाक प्रयास कएनिहार मिथिला सभ्यता-संस्कृतिक सपूत बालेन्द्र शाह केऽ, जे मात्र एखन ३६ वर्षक छथि। किछु एहने सन प्रयास मिथिलाक इतिहासमे राजा शिवसिंह द्वारा १५म शताब्दीक आरम्भिक कालमे कएल गेल छलन्हि। यदि प्रधानमन्त्री बालेन शाहक सरकार अपन पाँच वर्षिय कार्यकाल पुरा करैत अछि तऽ नेपालमे वर्षोसँ पसरल भ्रष्टाचार, अनियमितता, विभिन्न तरहक शोषण ओ राजनैतिक अस्थिरता बहुत हद धरि काबुमे आबि सकैछ। जेकर पश्चात्, बहुत आयाममे नेपाल संग मिथिला-मैथिलीक विकास होयबाक सम्भावना बहुत बढ़ि जाएत। जेकर प्रत्यक्ष प्रभाव भारतक मिथिला ओ मैथिली पर पड़बे करत। एहनमे मिथिला मैथिलीक विरोधीसब चुप केना रहि सकत ? वस्तुत: मिथिला मैथिली भाषा साहित्य संस्कृति सभ्यता सऽ सत्रुता राखऽ बला किछु लोक मात्र चौहद्दी भितरके नइ छथि, चौहद्दी बाहरक सेहो अछि। आ ओहि समय-काल सऽ अछि, जाहि समय-कालमे सम्राट जनक तत्वदर्शी ओ स्थितिप्रज्ञ अष्टावक्र केऽ गुरु स्विकार कऽ चेतनाक धरातल पर समाधिस्थ भऽ स्थितिप्रज्ञ भेलथि, आत्मज्ञानी भेलथि (किछु आंकलन अनुसार लगभग १६,७८० वर्ष पूर्व, मुदा किछु विद्वान सभक आंकलन अनुसार राजर्षि जनकक शासन काल लाखो वर्ष पुरान अछि)। जाहि दुर्लभ आध्यात्मिक घटनाक बाद हुनका "सम्राट राजर्षि"क पदवी देल गेलनन्हि। जाहि पदवी सऽ चारू युगमे कोनो दोसर राजा विभूषित भऽ सकबाक संयोग नइ भऽ सकल। वास्तवमे वैदिक कालक मिथिलाक राजाक जीवनमे घटल ओ सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना सम्पूर्ण मानव समुदाय लेल अद्भुत अद्वितीय एवं महत्वपूर्ण अछि। कारण, भौतिक ओ आध्यात्मिक रूपेँ सिखर पर पहूचल मिथिलाक मानवीय चेतना कोनो स्वर्ग लोकमे बैसल सर्वशक्तिमान परमात्मा जे हरेक प्राणीक जन्म जीवन ओ मृत्युक समय तय करैत लेखा-जोखा रखैछ, ओहि सिद्धान्त लगायत परमात्मा सम्बन्धमे पसरल हरेक तरहक अन्धविश्वासक जड़ि केऽ काटि अध्यात्मक ओहि आयाम केऽ पृथक रूपेँ प्रस्तुत करबामे सक्षम भऽ गेल रहैछ, जाहि पर ओहि सऽ पहिले मात्र शिव स्वयं अपन सामर्थ सऽ बिना कोनो गूरूक सहायता एवं शिक्षा सऽ पहूंचल रहति छथि। राजर्षि जनकक जीवनमे अद्वितीय घटना घटबा सऽ मात्र किछु दिन पूर्व सेहो एकटा आर बहुत महत्वपूर्ण आ अद्वितीय घटना घटल रहैछ मिथिलामे। ओ ई जे मिथिलाक तत्कालीन समाज-राज्य ओ प्रजासब द्वारा ब्रह्मज्ञानी पदवी सऽ सम्मानित आ स्वीकृत महर्षि याज्ञवल्क्य तथा विदुषी ओ दार्शनिक – गार्गी (गार्गी वाचक्नवी) बीच भेलशास्त्रार्थमे महर्षि याज्ञवल्क्य हारि गेल रहथि वा शब्द वा अनुभवक अभावमे उचित जवाब नइ दऽ सकलथि। ओहि समय-काल सऽ मिथिलाक विरूद्धमे सुनियोजित रूपेँ नैरेटिवसब गढ़ब आरम्भ भेल। संगहि, ईहो देखल जा सकैछ, जे सम्राट जनक जाहि समय-काल सऽ महर्षि याज्ञवल्क्य लगायत अन्य विद्वान सब – जे सब 'ब्रह्मज्ञानी पदवी' सऽ विभूषित छलथि, हुनका सब केऽ छोड़ि अष्टावक्र केऽ गुरू मानि राजा जनक स्थितिप्रज्ञ भेलथि।‌ तथा दोसर दिसि महिला दार्शनिक गार्गीक प्रश्नसभक उचित जवाब नइ दऽ सकल विद्वान ओ आचार्यसभ मध्य घोर नैराश्यता व्याप्त भेल। आ एतबे नइ, विद्वान ओ ब्रह्मज्ञानी मानल गेल महर्षि सब भितर राजर्षि जनकक संगहि विदुषी महिला सब प्रति घोर तिरस्कार भाव सेहो उत्पन्न भेल प्रतित होइछ। जाहि निराशा, तिरस्कार आ उदासीनताक कारण भौतिक जीवन ओ आध्यात्मिक आयाममे जे ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, संस्कार ओ संस्कृतिसभ मानव जगत लेल गढ़बाक आवश्यकता अएलै, ओ नइ गढ़ल गेलै। राजर्षि जनकक विराट व्यक्तित्व सऽ स्वयं राजकुमार ओ राजा राम सेहो बड्ड बेसी प्रभावित भेल प्रतित होइछ।++ दू टा एहि दुर्लभ आध्यात्मिक घटनाक बहुत बादमे रामायण महाकव्य लिखल गेल, विद्वानसभक अनुसार सम्भवतः २००० वर्ष पूर्व। जेकर प्रभाव मिथिलाक समुदायमे सेहो एतेक धरि पड़ल अछि, जे कोनो विद्यार्थी यदि परिक्षामे असफल भऽ जाइछ, तऽ ओकर दोष मिथिलाक माता-पिता सेहो अपन आ अपन संतानक भाग्य पर थोपैत छथि, संगहि कोनो भगवान वा देवी-देवता केऽ गोहरबति छथि। जे मानू कतौ कोनो मानवरूपी दिव्यपूरूष सिंहासन पर बसि सभक हिसाब-किताब करैत हो, आ वयह परिक्षामे फेल कऽ देने हो। कहबाक तात्पर्य ई अछि जे मात्र एखुनका समयमे नइ अपितु हजारो वर्ष पूर्व सऽ मानव समुदाय ओ राज्यसब अपन वर्चस्व लेल विभिन्न तरहक नैरेटिव कथ्य विमर्शसब गढ़ैत आबि रहल दृष्टांत व्याप्त अछि। जाहिमे मनुष्यक आध्यात्मिक विकास लेल रत्ति भरिक मात्र उपयोगिता देखल जाइछ। कतेको राज्य आ तथाकथित महापुरुष सब लेल छद्म नैरेटिव सेहो गढ़ल अछि। मुदा, मिथिलाक समाज-राज्य सत्य-तथ्य आधारित ऐतिहासिक घटनासब सऽ भरल पड़ल अछि। तथापि, एहि ठामक साहित्यकार लेखक पत्रकार नेतासभ लगायत विभिन्न क्षेत्रक अगुवासब अपन समाज-राज्यक भाषा साहित्य संस्कृति सभ्यताक संरक्षण सम्वर्द्धन ओ विकास लेल जाहि तरहक नैरेटिव कथ्य विमर्शक आवश्यकता अछि, ओ नइ गढ़ि पाबि रहल छथि। विभिन्न सोसल मीडियाक कारण साहित्यिक पुस्तक ओ समाचार पत्रक दायरा बहुत कम भऽ गेल अछि। मैथिलीमे फिल्म निर्माणक गति सेहो विभिन्न कारण सब सऽ बहुत कमजोर अछि। एहन अवस्थामे मैथिली भाषाक संरक्षण सम्वर्द्धन ओ विकास लेल मैथिली रैपर सभक भुमिका आर बेसी बढ़ि जाइत छन्हि। जाहि भुमिकाक निरन्तर निर्वहन लेल मिथिला ओ मैथिलीक हरेक जाति वर्ग ओ समुदायक साथ-सहयोगक आवश्यकता अछि। ओ साथ-सहयोगक लेल एखन बहुत बेसी किछु करबाक आवश्यकता नइ अछि। मात्र फुर्सदक समयमे एवं घरक समान्य काज करबाक समयमे हिनकर सभक गीत-संगीत सोसल मीडिया पर देखि-सुनि कऽ आवश्यक सुझाव सहित उचित कमेंट कऽ, सेयर आ सब्सक्राइब कऽ पुरा कएल जा सकैछ। रैपर मानिया ओ डीके सागरक अन्तरवार्ता नव रैपर सभक लेल प्रेरणाक श्रोत अछि। तथापि नव रैपर सभक लेल हिनका सभक दिसि सऽ उचित सुझाव बेर-बेर अएबाक आवश्यकता बुझि पड़छि। कारण किछु युवासब ई बुझैत छथि जे कहुना आ केहनो २-४ टा गीत सोसल मीडिया पर पोस्ट कएला पर बहुत लोकप्रियताक संग मोट पाई कमाई सेहो भऽ जाइ हइ, बुझि भ्रममे अपन जीवनक महत्वपूर्ण समय बर्बाद कऽ रहल देखल जाइछ। प्रतिभावान मैथिली रैपर सभ अपन मेहनति ओ लगनशीलताक आधारेँ अपन भाषा ओ पहिचान केऽ अन्तर्राष्ट्रीय मन्च धरि लऽ जएबाक सामर्थ्य राखैत छथि। रैप संगीतक माध्यम सऽ मिथिलाक सांस्कृतिक गाथासभ केऽ नव अवतारमे विश्व समक्ष प्रस्तुत करबाक आवश्यकता अछि। एहि लेल जनकपुरधाम स्थित 'मैथिली विकास कोष' आ एकर दूरदर्शी अध्यक्ष तथा सम्मानित सदस्यगणसभ अपन दूरगामी सोच, उचित मार्गदर्शन आ ठोस कार्य-योजना निर्माण कऽ समय-समय पर एहि कलाकार सभ केऽ उचित दिशानिर्देश सहित सहयोग कऽ सकै, त अति उत्तम होयत की ?! दोसर दिसि, ए.के. रैन, मानिया, अपूर्व, ओडी, राज आयुष, मी. मंडल, समीर, कालकवि, बंकर, सागर (डीके), संजय, मी. कलाकार, अनिभा सिंह लगायत रैपर सभ स्वयं केऽ मैथिली भाषा साहित्य संस्कृति सभ्यतादिक संग अपन रैप संगीतक यात्रा केऽ प्रासंगिक बना कऽ राखि सकथि, ओहि सिद्धान्त पर निरन्तर काज करबाक आवश्यकता केऽ देख सकै छथि। एहि दिसि रैपर मानिया प्रवृत्त भऽ सबटा वृत्त सब केऽ तोड़ैत आगा जा रहल छथि। मुदा, मानिया लगायत सबटा रैपर सभ लग जे चुनौती छइ, ओहि चुनौती केऽ स्विकार कऽ ओहि पर काज करबाक लेल तयार छथि आ की नइ ? अर्थात्, की पचास वर्ष-सौ वर्ष पश्चात सेहो स्वयं केऽ संग अपन रैप-संगीत केऽ मिथिलामे प्रासंगिक बना कऽ राखि सकतथि की नइ ? महाकवि विद्यापतिक गीत ओ पद्यसभक प्रासंगिकता सर्वकालिक अछि, से सर्वविदित अछि, मुदा, मैथिलीमे टोमस एंडर्स (Thomas Anders) आ डिएटर बोहलेन (Dieter Bohlen) क "चेरी चेरी लेडी" (Cheri, Cheri Lady) सदृश्य गीतसभक सेहो आवश्यकता हय, जे ४० वर्ष बादो ओतबे लोकप्रिय अछि। किछु एहने सन काज ३५ वर्ष पहिले अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अमेरिकी पप गायक माइकल जैक्सन अपन प्रसिद्ध गीत "ब्लैक और व्हाइट" (१९९१) मे कएने रहथि। छौ मिनट २३ सेकेण्डक गीतमे शास्त्रीय ओडिसी नर्तकी डा. यमुना संगरशिवमक संग अन्य चारि देशक नर्तक-नर्तकी सभक संग नृत्य कऽ अपन दर्शकक दायरा ओ लोकप्रियता केऽ भारत लगायत विश्वक बहुत देश धरि पहुचएलथि। निश्चिते, मैथिली रैपर सभ लग निर्माता नइ केऽ बराबर छन्हि। मुदा, चुनौती छई एहिठाम मिथिलाक चौहद्दी पर अपन मातृभाषा मैथिली केऽ संरक्षण सम्वर्द्धन ओ विकास करब संगहि अपन सांगीतिक कैरियर केऽ राष्ट्रीय ओ अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करब। जाहि लेल आवश्यक कदम उठएबाक विकल्प नइ। जेकरा लेल मैथिली शास्त्रीय संगीत, पारम्परिक संगीत, लोकगीत, भक्तिगीत आधुनिक संगीतमे लागल गायक-गायिका सभ सऽ लकऽ नाटक, फिल्म, सर्ट फिल्म, ओ कमेडी भिडियो सबमे काज कऽ रहल, निर्माण क‌‌‌ऽ रहल सभक संग काज करबाक आवश्यकता थिक। किछु लोक सब युट्युब पर मैथिली कमेडी भिडियोसबमे काज कऽ रहल कलाकार सभ केऽ स्तरीय वा निक कलाकार नइ बुझै छथि। एहि मान्यता आ विडम्बना सब केऽ तोड़बाक आवश्यकता सेहो छइ। एहि सबटा विडम्बना ओ बाधा सबके अवसरमे बदलबाक लेल सहयोगीक भुमिका 'मैथिली विकास कोष' तथा एहि कोषक अध्यक्ष, सदस्यगणसब तथा अन्य संघ-संस्थासभ सेहो प्रत्यक्ष ओ परोक्ष रूपेँ निभाबि सकै छथि। कोषसंग किछु आदरणीय विद्वत् व्यक्तित्व सब जुटल छथि, जे वास्तवमे मैथिली रैपर ओ रैप-संगीतक महत्व बुझि रहल छथि। जिनका सभक मादे आधुनिक, पारम्परिक, लोक, शास्त्रीय संगीत आ रैप-संगीतक बिच जे नम्हर आ गहींरगर खाही देखल जा रहल छइ, ओकरा नव सिद्धान्त प्रतिपादन कऽ भरल जा सकैछ, (जे सम्भवतः चुनौती रूपेँ ठाढ़ भेल अछि मैथिली संगीत सर्जक ओ संगीताचार्या सभक आगा) जाहि सऽ मैथिली संगीत जगत एकटा नव‌ आयाममे प्रवेश कऽ सकत। जाहि आयामक प्रासंगिकता केऽ औपचारिक रूपेँ मैथिली संगीत विश्वविद्यालय ओ नाट्यविश्वविद्यालयक स्थापनाक माध्यम सऽ पूर्णता आ स्थायित्व प्रदान कयल जएबाक आवश्यकता बुझि पड़ैछ। मैथिली भाषामे साहित्य सृजन ओ मैथिली भाषा साहित्य संस्कृति सभ्यता पर सोध-खोज-अनुसन्धान कएनिहार अध्येता, साहित्याचार्या तथा साहित्य सर्जकसभक काज अति महत्वपूर्ण अछिए। संगहि हिनका सभक संग चर्चा-परिचर्चा करैत रहब सेहो ओतबे सान्दर्भिक महत्वपूर्ण ओ आवश्यक। मुदा, मैथिली भाषा साहित्य केऽ विभिन्न छद्म नाम दऽ तोड़ल जा रहल समयमे अपन हियाऊ, मेहनति ओ पाई-पाई जोड़ि कऽ स्टुडियो धरि खड़ा कएने मैथिली रैपरसभ केऽ अपनहि हियाऊ पर छोड़ि देब कतेक उचित ? ई तऽ ठिक ओहने बात हेतै, जेना वर्षो-दशको सऽ नेपालमे पसरल भ्रष्टाचार, संस्थागत अनियमितता, कुशासन ओ राजनैतिक अस्थिरता केऽ समाप्त कऽ देश केऽ विकास ओ सुशासनक बाट पर लऽ जएबाक लेल अपन दूरदर्शी दृष्टिकोण ओ दृढ निष्ठाक बल पर देशक प्रधानमन्त्री पद धरि पहुँचल इन्जिनियर ओ रैपर बालेन शाह केऽ मिथिला–मधेशक चारि टा हिन्दू युवासभक हत्या सऽ उत्पन्न भेल कठिन समयमे विरोधी शक्तिसभक बीच अपनहि हियाऊ पर छोड़ि देल जाय लडै़त रहबाक लेल असगरे। वर्तमान समय-कालमे मैथिली भाषाक संरक्षण सम्वर्द्धन ओ विकासमे नव दृष्टि आ चेतनासभ केऽ संस्थागत संरक्षण ओ निर्देशन दैत रहब बहुत आवश्यक अछि। विशेष कऽ मैथिली रैप-संगीतक माध्यम सऽ युवा-युवतीसभक मनक आवाज केऽ सोझे संसारक सोझा राखि रहल नवतुरिया रैपरसभक लेल बहुत बेसी सान्दर्भिक भऽ जाइछ। मैथिली रैप-संगीत केऽ मात्र मनोरञ्जनक साधन रूपेँ नइ, अपितु मैथिली भाषामे आधुनिक चेतना आ क्रान्तिकारी विचार संचारित करबाक एकटा सशक्त माध्यम रूपेँ देखबाक आवश्यकता थिक। सन्दर्भ श्रोत १. videha.co.in २. ilovemithila.com ३. विकीपीडिया ४. नेपाल न्युज प्रा. लि ५. युट्युब ६. सोसल मीडिया ७. वेबसाइट / वेबसाइट अभिलेख अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.८. संतोष कुमार राय 'बटोही'- 'मातृभूमि स्वर्गादपि गरीयसी' संतोष कुमार राय 'बटोही' 'मातृभूमि स्वर्गादपि गरीयसी'

आइ मोन बड़ दुखी भऽ गेल अछि। गरीबी मे जनम हेनाई सभ सँ पैघ पाप होएत छै, ई गप सरिपहुँ सच छै । दोसर सच छै सहोदर अई कलियुग मे अपन नहि होयत छै। एक-दु धूर जमीन लेल मर्डर भऽ जायत छै ई देखवा मे आबि रहल अछि । काल्हिए रवि केँ दियाद मे जमीन लेल झगड़ा फँसि गेल छेलै। 112 नम्बर पकड़ि के लऽ गेल छेलै दुनु केँ । दस हजार टाका खरच केलकै, तखन शाम मे थाना हुनका दुनू केँ छोड़ि देखथिन्ह। गप किछु नहि छेलै। कनेक बतकही भऽ गेल रहै निर्मल आओर विलेक्षण केँ । विलेक्षण केँ बड़का लड़िका आओर पुतौहु कुनाल केँ मारै लेल गेल छेलै। कुनाल झंझारपुर मे ब्लॉक में कम्प्युटर आपरेटर केँ रूप मे कार्यरत छथि । ओ 112 नंबर केँ फोन केलथिन्ह ।

दियादी मे ओना जमीन बटवारा किनको नहि देखलियैन्ह आई धरि । घरक आगा मेहेक जमीन केँ ओना बटवारा केलाथि विलेछन जे चौड़ाई तीन कोड़ी छै आओर लंबाई पचास कड़ी। कुनाल केतबो कहैत रहि गेलै जे एना बटवारा केला सँ जमीन बरबादे टा भ रहल अछि। कनिको पॉजिटीव सोचियौ, परञ्च विलेक्षण आओर हुनकर तीनूटा लङिका नहि मानलकै । जमीन केँ छिन्न-भिन्न क देलकै । कतेक दिन तक लड़ाई होएत रहलै । जमीन माय जकाँ होएत छै- अन्नपूर्णा । मायक दूध आओर अपन खेतक अन्न एक होयत छै ।

घर बनेवाक लेल बड़ दिन सँ होयत अछि, परञ्च घर बनेवाक लेल जमीन जे हेवाक चाही से नहि अछि । बेसी नहि तँ गुजारा करवाक लेल जमीन अछि अपना। घरक लेल चौरस जमीन चाही। रस्ता से चाही। मेन रस्ता सँ जुड़ल हेबाक चाही । उ जमीन नहि भेट रहल अछि । तीनकोनमा, लमछुड़का, टेढ़-बाँकुर लोक बेचैत अछि आओर सोझुका अपन खानदान लेल रखैत अछि । हँ, किछु बिका जायत छै, तखन मालूम होयत अछि । जमीन चोरनुकबा बड़ बिकैत छै, पते नहि चलत। जमीन बिकेलाक छह मास पछैत मालूम होयत छै जे फलाँ केर फलाँ जमखन, घरारी, खेत बिका गेलै ।

एक बेर तँ मोन भेल सासुरे मे बसि जाउ जमीन खरीद कऽ जखन ओनहै छपराढ़ी मे पोस्टेड छलहुँ अछि। कोशिश केलियै आओर कऽ रहल छियैय जत जमीन घरक लेल निक भेट जेतै ओतै किन लेबै । ओ सासुर हेतै आ कोनो दोसर गाम। सुविधा हेबाक चाही सभ । अबै वाला जेनरेशन केँ दिक्कत नहि हेतै से काज करबाक अछि आब । राम तँ कहने रहतिन्ह जे मातृभूमि स्वर्ग सँ बढ़ि केँ होयत छै, परञ्च की करू जखन कियो अपन गाम मे घर बनेबाक लेल डमीन देबाक लेल नहि चाहैत छथि उचित दाम पर । मोन पीता गेल अछि । बड़ नीक हेतैन्ह रामक लेल अपन मातृभूमि। हमरा लैल अपन गाम निक जरूर अछि, परञ्च की केल जाय ।

गाम छोड़ि कऽ भाग' पड़त मने । बाप-पीत्ती, बाबा-परबाबा केर इ गाम छियैय। हुनका कहियो रस्ता-पेड़ा लेल दिक्कत नहि भेलैन्ह , परञ्च आब त लोक रस्ता रोकि रहल छै ...रोकि देलकै । अपन धौंस जमा रहल छै लोक- तों हमरा दक चलैत छैं, तोरा घरेटा छौ...घर सँ निकलबीही से रस्ता नहि छौ । किछु नव लोक जे आपर पर रस्ता वाला भेलाह अछि से बेसी उलाहना द रहल छथि । दम घुटि रहल अछि अइ जली मे , छटपटैत छी..मुर्छित भ गेल छी...अकुवा-बकुला गेल छी। की कहु ? किछु नहि फुरा रहल अछि। सरिपहुँ ' मातृभूमि स्वर्गादपि गरीयसी होयत हेतै किनको लेल। हमरा लेल त हमर गाम हमरा भगेनिहार भऽ रहल अछि ।

- संतोष कुमार राय ' बटोही '; ग्राम - मंगरौना अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.९. प्रणव कुमार झा- लोकतन्त्र के पिच पर प्रणव कुमार झा लोकतन्त्र के पिच पर जखन हम क्रिकेट देखैत छलहुँ, तँ हमर सदिखन इच्छा होइत छल जे भारतीय टीमक विजय होअए। एहि लेल भगवान से कतेक प्रार्थना करैत छलहुँ। मन होइत छल जे प्रिय खेलाड़ी सचिन, द्रविड़, कुंबले, श्रीनाथ, लक्ष्मण आ युवराज नीक प्रदर्शन करथि, आउट नहि होथि आ विकेट लेथि। मुदा, कखनो मनमे इ विचार नहि आयल जे अपन टीम बेईमानी सँ जीतए या एहि खेलाड़ी सभक नीक प्रदर्शनक कारण कोनो छल-प्रपंच होअए। क्रिकेट सँ मन उचटबाक एकटा मुख्य कारण आईपीएल आ ओहिमे खुल्लम-खुल्ला भेल अनियमिता आ बेईमानीए त छल। आजुक समयमे जे लोक क्रिकेट देखैत छथि, हमरा नहि लगैत अछि जे ओहिमे सँ एकोगोटाकेँ इ पसंद आबैत होएत जे हुनक टीम छल सँ जीतए। ओ इहे चाहैत हेताह जे टीम परिश्रम करए, भाग्य साथ दय आ टीम विजयी होअए; नहि कि बेईमानीक बल पर जीत हासिल करए। आइ जखन लोकतन्त्रक स्थिति पर विचार करैत छी तँ बार-बार ओहि क्रिकेटक मैदानक स्मृति मोनमे आबि जाइत अछि। लोकतन्त्र मे चुनाव सेहो एक प्रकारक सार्वजनिक प्रतियोगिता अछि। अन्तर मात्र एतेक अछि जे क्रिकेटक परिणामसँ लोकक मनोरंजन प्रभावित होइत अछि, जबकि लोकतन्त्रक परिणामसँ लोकक वर्तमान, भविष्य, समाज, अर्थव्यवस्था, स्वतन्त्रता आ सन्तानसभक जीवन प्रभावित होइत अछि। तेँ लोकतन्त्रक पिच, क्रिकेटक पिचसँ कतौ अधिक पवित्र होयबाक चाही। प्रत्येक नागरिककेँ अपन राजनीतिक विचार राखबाक अधिकार अछि। केओ दक्षिणपंथक समर्थक होथि, केओ वामपंथक, केओ समाजवादी, केओ उदारवादी, केओ कोनो क्षेत्रीय दलक समर्थक। ई लोकतन्त्रक स्वाभाविक सौन्दर्य अछि। लोकतन्त्रक अर्थ ई नहि जे सभ एक्के सोच रखथि। लोकतन्त्र तँ असहमतिक सम्मान करबाक कला अछि। मुदा एतय एकटा मौलिक प्रश्न जन्म लैत अछि। की अपन दलक जीतक इच्छामे हम एतेक दूर चलि जाइ छी जे लोकतन्त्रक निष्पक्षताक चिन्ता छोड़ि दैत छी? यदि हमर दल बेइमानीसँ जीतए, तखन की हम ओहि जीत पर गर्व करब? यदि चुनावक मैदान क्रमशः असंतुलित होमए लागए, मुदा जीत हमर पसन्दक दलकेँ भेटैत रहए, तखन की हम चुप रहब? यदि संविधानक संस्था कमजोर होइत रहए, मुदा तत्काल राजनीतिक लाभ हमर विचारधाराकेँ भेटैत रहए, तखन की हम एहि प्रक्रियाकेँ लोकतन्त्र कहि सकैत छी? ई लेख कोनो दलक पक्ष वा विपक्षमे नहि लिखल जा रहल अछि। ई लेख तऽ एकटा सामान्य नागरिकक बेचैनी अछि। हमर शिकायत ई नहि अछि जे लोक अपन-अपन राजनीतिक दलक समर्थन करैत छथि। लोकतन्त्रमे ई अधिकार पवित्र अछि। हमर चिन्ता मात्र एतेक अछि जे लोकसभ अपन-अपन टीमक समर्थन करैत-करैत लोकतन्त्रक पिचकेँ बैलेंस के बिसरि नहि जाथि। लेवेल प्लेईंग फील्ड सभक प्राथमिकता हेबाक चाहिए । क्रिकेटमे समर्थकक पहिल कर्तव्य अपन टीमकेँ चाहब होइत अछि। मुदा लोकतन्त्रमे नागरिकक पहिल कर्तव्य लोकतन्त्रकेँ बचाएब होइत अछि। दल हारि सकैत अछि। नेता बदलि सकैत छथि। सरकार आबि-जाइत रहैत अछि। मुदा यदि लोकतन्त्रक पिचे असंतुलित भऽ गेल, तँ अन्ततः जीत कोनो दलक नहि, हार सम्पूर्ण समाजक होइत अछि। आधुनिक राजनीतिक विज्ञान एहि स्थितिक लेल एकटा शब्द प्रयोग करैत अछि - छद्म लोकतन्त्र। एहन व्यवस्था जतए चुनाव तँ होइत अछि, मुदा चुनावक आत्मा धीरे-धीरे कमजोर होइत जाइत अछि; जतए लोकतन्त्रक भवन ठाढ़ रहैत अछि, मुदा ओकर नींव चुपचाप खुरचाइत रहैत अछि; जतए नागरिककेँ लोकतन्त्र देखाइ पड़ैत अछि, मुदा शासनक चरित्र क्रमशः अधिनायकवादी बनैत जाइत अछि। एहि लेखमे हमर प्रयास ई बुझबाक अछि जे लोकतन्त्र आखिर खाली मतदानक नाम अछि, कि ओहिसँ किछु बेसी? निष्पक्ष चुनाव किएक लोकतन्त्रक प्राण कहल जाइत अछि? आ किएक इतिहास सिखबैत अछि जे लोकतन्त्रक सबसँ पैघ शत्रु सदिखन खुल्लमखुल्ला तानाशाह नहि होइत अछि , कतेको बेर लोकतन्त्रक बाहरी रूप बचौने राखि ओकर आत्माकेँ धीरे-धीरे कमजोर कएल जाइत अछि। लोकतन्त्रक चर्चा जखन होइत अछि तँ हमसभ प्रायः सरकार, प्रधानमन्त्री, मुख्यमन्त्री, चुनाव अथवा राजनीतिक दलसभक चर्चा करए लगैत छी। मुदा हम एकटा मौलिक प्रश्न बहुत कम पूछैत छी जे लोकतन्त्र आखिर चुनावी जीतक व्यवस्था अछि कि न्यायपूर्ण प्रतिस्पर्धाक व्यवस्था? पहिल नजरिमे ई प्रश्न सामान्य लगि सकैत अछि। मुदा जँ एहि प्रश्नक उत्तर बदलि जाए, तँ पूरा लोकतन्त्रक अर्थ बदलि जाइत अछि। जँ लोकतन्त्रक उद्देश्य खाली सत्ता प्राप्त करब अछि, तँ फेर कोन दल जीतए ई पर्याप्त अछि। मुदा जँ लोकतन्त्रक उद्देश्य जनविश्वास, जनसहमति आ संविधानक मर्यादाक भीतर सत्ता परिवर्तन सुनिश्चित करब अछि, तँ फेर खाली जीत पर्याप्त नहि रहि जाइत। ओ जीत कोना भेटल, ई बेसी महत्वपूर्ण भऽ जाइत अछि। एहि अन्तरकेँ बुझब अत्यन्त आवश्यक अछि। नेतासभ प्रायः भाषण मे कहैत छथि जे जनता सबसँ पैघ अछि। जनता जे निर्णय देत, से स्वीकार। ई वाक्य सुनएमे बहुत सुन्दर लगैत अछि। मुदा जनता निर्णय कोना दैत अछि? जनता अपन निर्णय देबासँ पहिने कोन-कोन प्रक्रियासँ गुजरैत अछि? ओ प्रक्रिया कतेक निष्पक्ष अछि? जनता धरि पहुँचल सूचना निष्पक्ष अछि कि नहि? मतदाता सूची सही अछि कि नहि? चुनावी प्रतिस्पर्धामे सभ दलक अवसर समान अछि कि नहि? यदि एहि प्रश्नसभ पर विचार नहि करब तँ जनताक निर्णय सेहो धीरे-धीरे अर्थहीन भऽ सकैत अछि। एही कारणसँ संविधान निर्मातासभ चुनावकेँ खाली प्रशासनिक कार्यक्रम नहि मानलनि। हुनक दृष्टिमे ई सम्पूर्ण गणराज्यक नैतिक परीक्षा अछि। लोकतन्त्रमे पक्षधरता दोष नहि अछि। वास्तवमे, विचारधारा बिना लोकतन्त्र अधूरा अछि। विचारक विविधता लोकतन्त्रक शक्ति अछि। मुदा पक्षधरता आ अन्धसमर्थनमे जमीन-आसमानक अन्तर अछि। समर्थक कहैत छथि - हम एहि दलक वा नेताक ई नीति पसन्द करैत छी। अन्धसमर्थक कहैत छथि - हमर दल या नेता जे करत, सही करत। पहिल कथन लोकतान्त्रिक अछि। दोसर कथन अधिनायकवादक बीया अछि। लोकतन्त्रमे दल संविधानसँ पैघ नहि होइत अछि। नेता राष्ट्रसँ पैघ नहि होइत छथि। जखन ई प्राथमिकता उलटि जाइत अछि, तखन लोकतन्त्र धीरे-धीरे खाली चुनावी गणित बनि रहि जाइत अछि। समाजमे एकटा शब्द बारम्बार प्रयोग होइत अछि - प्रबुद्ध वर्ग। शिक्षक, लेखक, पत्रकार, न्यायविद्, वैज्ञानिक, कलाकार, प्रोफेसर, चिकित्सक, सामाजिक चिन्तक ई सभ खाली अपन-अपन पेशाक प्रतिनिधि नहि छथि। समाज हुनकासँ नैतिक नेतृत्वक सेहो अपेक्षा करैत अछि। इतिहास साक्षी अछि जे जखन समाज दिशाहीन भेल, तखन मार्गदर्शन राजनीतिक दलसभसँ कम, विचारकसभसँ बेसी भेटल। महात्मा गांधी कोनो सरकारी पद पर नहि छलाह। रवीन्द्रनाथ ठाकुर सत्ता चलबैत नहि छलाह। डॉ. भीमराव आंबेडकर खाली कानूनविद् नहि छलाह; ओ लोकतान्त्रिक चेतनाक निर्माता छलाह। राममनोहर लोहिया बार-बार कहैत छलाह जे लोकतन्त्रक रक्षा खाली चुनाव नहि करैत अछि; सतत् सार्वजनिक आलोचना सेहो करैत अछि। प्रश्न उठैत अछि जे यदि समाजक प्रबुद्ध वर्ग सेहो खाली अपन-अपन राजनीतिक शिविरक प्रवक्ता बनि जाए, तँ लोकतन्त्रक रक्षा के करत? एकटा लेखकक लेख खाली अपन पसन्दक सरकारक प्रशस्ति बनि जाए। एकटा पत्रकार खाली अपन विचारधाराक सुविधा अनुसार प्रश्न पूछए। एकटा बुद्धिजीवी खाली विरोधी पक्षक दोष देखए आ अपन पक्षक दोषपर मौन रहए। तखन समाजक नैतिक कम्पास धीरे-धीरे निष्क्रिय होमए लगैत अछि। लोकतन्त्रकेँ सबसे बेसी क्षति विपक्ष नहि पहुँचबैत अछि। सबसे बेसी क्षति ओ मौन पहुँचबैत अछि, जे सुविधा अनुसार बदलैत रहैत अछि। एतय फेर स्पष्ट करब आवश्यक अछि जे ई लेख कोनो नागरिकसँ ई अपेक्षा नहि करैत अछि जे ओ अपन राजनीतिक विचार छोड़ि देथिन। ई सम्भवो नहि अछि, आवश्यक सेहो नहि। सभक अनुभव अलग अछि। सभक आर्थिक सोच अलग अछि। सभक सांस्कृतिक प्राथमिकता अलग अछि। एहि कारणेँ राजनीतिक पसन्द सेहो अलग होयत। समस्या विचारधारामे नहि अछि। समस्या ओहि क्षण प्रारम्भ होइत अछि जखन हम कहए लगैत छी जे जँ बेइमानीसँ सेहो हमर दल जीतैत अछि तँ निक बात नहि। एहि वाक्यमे लोकतन्त्र हारि जाइत अछि। कारण आई जकरा लेल नियम तोड़ल जाएत, काल्हि ओहि नियमक शिकार ओ स्वयं सेहो भऽ सकैत अछि। संविधान कोनो एक दलक रक्षा लेल नहि बनल छल। ओ भविष्यक अनिश्चिततासँ प्रत्येक नागरिकक रक्षा लेल बनल छल। एही कारणेँ लोकतन्त्रमे निष्पक्ष प्रक्रिया परिणामसँ बेसी महत्वपूर्ण मानल गेल अछि। किएकि परिणाम प्रत्येक पाँच वर्षमे बदलि सकैत अछि। मुदा यदि प्रक्रिया टूटि गेल, तँ परिणाम बदलबाक अधिकार सेहो धीरे-धीरे समाप्त भऽ सकैत अछि। चंडीगढ़ नगर निगम चुनावमे चुनाव अधिकारी अनिल मसीह कैमराक समक्ष प्रत्यक्ष रूपेँ भोट चोरी आ बेईमानी करैत पकडेल गेलाह। सर्वोच्च न्यायालय एकरा लोकतन्त्रक हत्या करार देलक, मतपत्रक पुनर्गणना करवाएल आ परिणाम पलटि गेल। मुदा, लोकतन्त्रक प्रति एतेक जघन्य अपराधक बावजूद ओहि अधिकारी कें कोनो दण्ड नहि भेटल! पारदर्शिताक नाम पर 2019 मे चन्दा उगाही लेल इलेक्टोराल बॉन्ड सन अत्यंत अपारदर्शी व्यवस्था लाओल गेल, जाहि सँ अरबौँ रूपैयाँक गुपचुप उगाही कएल गेल। साधुवाद अछि एडीआर (ADR) क स्वर्गीय प्रोफेसर जगदीप छोकर, वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण आ पत्रकार पूनम अग्रवाल सन समाजक सजग नागरिक सभ कें, जिनका लोकनिक संघर्षक बल पर एहि व्यवस्था कें चुनौती देल गेल। मुदा, देशक सर्वोच्च न्यायालय, जाहि पर संविधान आ लोकतन्त्रक रक्षाक प्राथमिक दायित्व अछि ओहो एहि अत्यंत गंभीर विषय कें पाँच वर्ष धरि अटका कऽ राखलक। अंततः एक दीर्घ कानुनी लड़ाईक बाद सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एकरा असंवैधानिक घोषित कऽ कऽ रद्द कएल गेल। बॉन्ड कें असंवैधानिक करार देलाक बादो भारतीय स्टेट बैंक (SBI) दानदाता सभक नाम उजागर करबामे आनाकानी करैत रहल। अंततः कोर्टक कड़ा आदेशक बाद जखन बिखरल (scattered) डाटा जारी भेल आ ओकरा खोजी पत्रकार सभ डिकोड केलनि, तँ धांधलीक एक सँ एक नजारा सामने आयल। एहन कतेको कंपनी भेटल जे घाटामे चलबाक बावजूद सैकड़ों करोड़ रूपैयाँक चंदा दऽ रहल छल! इ एकटा बुनियादी सवाल अछि जे घाटामे चलै बला कंपनी कोनो दल कें सैकड़ों करोड़ रूपैयाँक चंदा केना दऽ सकैत अछि? मुदा, एहि निष्पक्ष जाँच लेल नै तँ कोर्ट द्वारा कोनो विशेष जाँच टीम (SIT) क गठन कएल गेल आ नै ईडी, सीबीआई या आयकर विभाग एहि पर कोनो संज्ञान लेलक। हरियाणा पंचायत चुनावक एकटा उदाहरण अछि, जाहि मे पराजित घोषित कएल गेल एक प्रत्याशी 2 वर्षक लंबा संघर्षक बाद कोर्टक आदेश सँ भेल पुनर्गणनाममे विजयी भेल। परिणाम तँ पलटि गेल कारण ओ लड़ाई लड़लक, मुदा ई प्रश्नचिन्ह ठाढ़ भ जाय अछि जे एहन अनेकौँ मामला दबा देल गेल हेत। आ एहि मामलामे सेहो ओ प्रत्याशीक जे दु वर्ष बर्बाद भेल, ओकर भरपाई के करत? दिल्ली चुनावक दौरान अरविंद केजरीवाल द्वारा मतदाता सूची सँ पैघ स्तर पर नाम कटेबाक आ फर्जी नाम जोड़ेबाक मामला कें उजागर कएल गेल छल, जे चुनाव परिणाम कें सीधा प्रभावित करै बला छल। हालहि मे, मध्य प्रदेशमे राज्यसभा चुनावक दौरान कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन क नामांकन पत्र कें जै प्रकार सँ एकतरफा आ तकनीकी बहाना बना कऽ निरस्त कएल गेल, ओ सीट अपहरणक एकटा टिपिकल उदाहरण अछि। तेलंगानाक एकटा सामान्य प्रक्रियात्मक समन कें लंबित आपराधिक मामला घोषित कऽ कऽ ओकर पर्चा रद्द कऽ देल गेल। नै तँ निर्वाचन आयोग एहि पर त्वरित संज्ञान लेलक आ नहि चुनाव प्रक्रिया शुरू भऽ जेबाक हवाला दऽ कऽ अदालत हस्तक्षेप केलक, जाहि सँ सीधा-सीधा एकटा जनप्रतिनिधिक लोकतांत्रिक अधिकार छीनि लेल गेल। इहे खेल गुजरात लोक सभा चुनाव (2024) मे सेहो देखबाक लेल भेटल, जहाँ ऐन अंतिम समयमे विपक्षी उम्मीदवार सभ पर साम-दाम-दंड-भेद सँ दबाव बना कऽ ओकरा सभ कें चुनावी मैदान सँ हटबा लेल विवश कऽ देल गेल, जाहि सँ बिना चुनाव ही सत्तापक्ष कें उम्मीदवार के जीत भेटि गेल। पश्चिम बंगालमे विशेष गहन संशोधन (SIR) क दौरान 27 लाख मतदाता सभक नाम काटि देबाक निर्णयक वैधानिकता कें सर्वोच्च न्यायालयमे चुनौती देल गेल छल, मुदा मामला अदालतमे लंबित रहि गेल। ओही सर्वोच्च अदालत जाहि पर देशक संविधान आ नागरिकक लोकतांत्रिक अधिकार सभक रक्षाक प्राथमिक दायित्व अछि 27 लाख नागरिकक मताधिकार सँ जुड़ल एतेक संवेदनशील विषय कें पर्याप्त गंभीरता सँ नहि लेलक आ चुनाव भऽ जाय देलक। कल्हि यदि कानुनी जाँचमे ओ मतदाता सभ वैध पाओल जाइत छथि, तँ की इ संविधान, लोकतन्त्र आ ओहि 27 लाख नागरिकक संग कएल गेल घोर बेईमानी आ अन्याय नहि कहायत? इ कोनो दूरक बात नहि अछि, स्वयं हमरा लग किछु दिन पहिने निर्वाचन आयोग (ECI) सँ एकटा एसएमएस (SMS) प्राप्त भेल जे—अहाँक द्वारा कोनो व्यक्तिक नाम मतदाता सूची सँ हटेबाक लेल देल गेल आवेदन पर  कार्रवाई कऽ देल गेल अछि। जबकि तथ्य इ अछि जे हम एहन कोनो आवेदन कहियो देनहे नहि छलहुँ! तँ फिर इ केना भेल? हमरा नाम आ पहचानक दुरुपयोग कऽ कऽ ककरो नाम मतदाता सूची सँ उड़ा देल गेल! जब हमरा संग इ भऽ सकैत अछि, तँ देशभरमे एहि व्यवस्थाक दुरुपयोग कऽ कऽ कतेक लाख वैध नागरिकक नाम काटल आ फर्जी नाम जोड़ाएल जा रहल हेतै, ई त एकटा स्वाभाविक प्रश्न छैक? राहुल गांधी आ अरविंद केजरीवाल सन विपक्षी नेता सभ इहे गड़बड़ी आ संस्थागत सेंधमारीक शिकायत तँ कऽ रहल छथि। ECI क निष्पक्षता आ स्वायत्तता पर हालक वर्ष सभमे गंभीर प्रश्नचिन्ह ठाढ़ भेल अछि। एकटा निष्पक्ष चुनावक मुख्य शर्त समान अवसर (Level Playing Field) होइत अछि, मुदा आयोगक कार्यशैलीमे सत्ताधारी दल प्रति स्पष्ट झुकाव आ पक्षपात देखबाक लेल भेटैत अछि। विरोधी दलक नेता सभ पर आचार संहिता उल्लंघनक आरोपमे त्वरित आ कठोर कार्रवाई कएल जाइत अछि, जबकि सत्तापक्षीय प्रतिनिधि सभक आपत्तिजनक भाषण आ अनियमिता पर आयोग प्रायः मौन धारण कऽ लेइत अछि। मतदाता सूचीमे हेरफेर, चुनावक तिथिक घोषणामे पक्षपात आ संस्थागत शिथिलता आयोगक गिरैत साखक प्रत्यक्ष प्रमाण अछि। इ संस्थागत पक्षपात लोकतन्त्रक आत्मा कें गम्भीर क्षति पहुँचा रहल अछि। लोकतन्त्र पर काज करनिहार विश्वक प्रतिष्ठित विद्वानसभ एकटा रोचक निष्कर्ष पर पहुँचल छथि। हुनक अनुसार एक्कैसवीं शताब्दीमे लोकतन्त्रक मृत्यु प्रायः सैनिक विद्रोहसँ नहि होइत अछि। आब सेनापति टैंक लऽ कऽ राष्ट्रपति भवन पर कब्जा नहि करैत अछि। संविधान एकहि रातिमे समाप्त नहि कएल जाइत अछि। संसद पर ताला नहि लगाओल जाइत अछि। एहि सभक आवश्यकता सेहो नहि पड़ैत अछि। आधुनिक समयमे लोकतन्त्रकेँ समाप्त करबाक सबसँ प्रभावी उपाय अछि लोकतन्त्रक रूपकेँ बचा कऽ ओकर आत्माकेँ धीरे-धीरे कमजोर करैत चलू। बाहरसँ सभ किछु सामान्य देखाउ। चुनाव होअय। मतदान होअय। संसद चलअय। संविधानक शपथ लेल जाए। मीडिया सेहो रहए। न्यायालय सेहो रहए। मुदा धीरे-धीरे एहन वातावरण बनैत जाए जतए वास्तविक प्रतिस्पर्धा कमजोर होमए लगए। अहि अवस्थाकेँ राजनीतिक वैज्ञानिक स्टीवन लेवित्स्की आ लूकन वे अपन प्रसिद्ध शोधमे Competitive Authoritarianism नाम देने छथि। ई शब्द पहिल बेर सुनएमे विरोधाभासी लगैत अछि। प्रतिस्पर्धा सेहो अछि, आ अधिनायकवाद सेहो? मुदा वस्तुतः आधुनिक राजनीति एहि विरोधाभाससँ भरल अछि। एक समय छल जखन अधिनायकवादक चेहरा स्पष्ट रहैत छल। हिटलर छलाह। मुसोलिनी छलाह। फ्रांको छलाह। लैटिन अमेरिकामे सैनिक शासन छल। एशियामे सेहो कतेको देशमे सेना प्रत्यक्ष सत्ता चलबैत छल। मुदा आब परिस्थितिमे परिवर्तन भेल अछि। आधुनिक अधिनायकवाद प्रायः लोकतन्त्रक भाषा बाजैत अछि। ओ संविधानक सम्मानक बात करैत अछि। ओ चुनाव करबैत अछि। ओ अपनाकेँ जनतासँ चुनल सरकार कहैत अछि। ओ लोकतन्त्र शब्दक प्रयोग सेहो खूब करैत अछि। मुदा प्रश्न ई नहि अछि जे लोकतन्त्र शब्द कतेक बेर कहल गेल। प्रश्न ई अछि जे लोकतन्त्रक मूल मूल्य कतबा जीवित अछि। राजनीतिक वैज्ञानिक रॉबर्ट डाहल लोकतन्त्रकेँ खाली मतदानक अधिकार धरि सीमित नहि रखैत छथि। हुनकर अनुसार लोकतन्त्रक किछु अपरिहार्य आधार अछि - नागरिक स्वतन्त्रतासँ अपन विचार व्यक्त कऽ सकथि। वैकल्पिक सूचना उपलब्ध हो। विपक्षक अस्तित्व सुरक्षित रहए। सरकारक आलोचना करब अपराध नहि बनए। आ चुनावी प्रतिस्पर्धा वास्तविक हो। डाहल चुनाव शब्दसँ बेसी प्रतिस्पर्धा शब्दपर बल दैत छथि। कारण, जँ प्रतियोगिते निष्पक्ष नहि रहल तँ मतदानक दिन खाली औपचारिकता बनि सकैत अछि। बहुत लोक सोचैत छथि जे लोकतन्त्र या तँ पूर्ण रहैत अछि, या समाप्त भऽ जाइत अछि। वास्तविकता एहि सँ अलग अछि। लोकतन्त्र एकटा स्विच नहि अछि जे या तँ ऑन अछि या ऑफ। लोकतन्त्र बेसी सही अर्थमे स्वास्थ्य जकाँ अछि। एकदम स्वस्थ शरीर सेहो धीरे-धीरे रोगग्रस्त भऽ सकैत अछि। शुरुआतमे किछु लक्षण देखाइ नहि पड़ैत अछि। रोग भीतर बढ़ैत रहैत अछि। एक दिन जखन लक्षण स्पष्ट होइत अछि, तावत् बहुत क्षति भऽ चुकल रहैत अछि। लोकतन्त्र सेहो तहिना अछि। पहिने लोक संस्थासभ पर कम विश्वास करए लगैत अछि। तकर बाद आलोचनाकेँ शत्रुता मानल जाए लगैत अछि। तकर बाद राजनीतिक निष्ठा संवैधानिक निष्ठासँ पैघ बनि जाइत अछि। तकर बाद नागरिकक स्थान समर्थक लऽ लैत अछि। आ अन्तमे लोकतन्त्र खाली चुनावक मशीन बनिकऽ रहि जाइत अछि। अपना समाजमे बहुमतकेँ प्रायः लोकतन्त्रक पर्याय मानि लेल जाइत अछि। बहुमत मिलि गेल, तें सब उचित। ई सोच सुनएमे सरल अछि, मुदा लोकतान्त्रिक दृष्टिसँ अधूरा अछि। यदि खाली बहुमतहि लोकतन्त्र होइत, तँ इतिहासमे अनेक अन्यायकेँ न्याय कहल जाइत। लोकतन्त्रक वास्तविक सौन्दर्य ई अछि जे ओ बहुमतक शासन आ अल्पमतक अधिकार दूनूक रक्षा एक संग करैत अछि। बहुमतकेँ शासनक अधिकार दैत अछि, मुदा प्रक्रिया पर नियन्त्रण नहि। एही कारणेँ लोकतन्त्रमे निर्वाचन आयोग, न्यायपालिका, स्वतन्त्र मीडिया, नागरिक समाज, विश्वविद्यालय आ संवैधानिक संस्थासभकेँ खाली प्रशासनिक संस्था नहि मानल गेल अछि। ई सभ लोकतन्त्रक रेफरी छथि खेलाड़ी नहि। यदि रेफरी परसँ विश्वास समाप्त भऽ जाए, तँ दुनू टीम अपन-अपन जीतक दावा करए लगैत अछि। आ जखन खेलमे रेफरी पर विश्वास समाप्त भऽ जाए, तँ विवादक अन्त नहि रहैत। लोकतन्त्रमे संस्थासभ पर जनविश्वास लोकतन्त्रक अदृश्य पूँजी होइत अछि। एक बेर ई पूँजी समाप्त भऽ गेल, तँ संविधानक पुस्तक सुरक्षित रहितो लोकतन्त्र कमजोर भऽ जाइत अछि। इतिहास पढ़ैत समय हम प्रायः राजा, युद्ध, क्रान्ति आ सरकारक चर्चा करैत छी। मुदा इतिहासक एकटा दोसर अध्याय सेहो अछि, जे बहुत कम पढ़ाओल जाइत अछि। ओ अध्याय अछि ओ अछि समाजक मौनक इतिहास। बहुत बेर लोकतन्त्रक हार खाली तानाशाहक कारण नहि होइत अछि। ओकर कारण ओ लोक सेहो बनैत छथि, जे बाजि सकैत छलाह, मुदा चुप रहि गेलाह; जे प्रश्न उठा सकैत छलाह, मुदा सुविधाक कारण मौन धारण कऽ लेलनि। जखन समाजक प्रबुद्ध वर्ग - लेखक, पत्रकार, प्राध्यापक आ न्यायविद् खाली अपन-अपन दलक अन्धसमर्थक बनि जायत, तखन लोकतन्त्रक रक्षा के करत? विचारधारा महत्वपूर्ण भऽ सकैत अछि, मुदा ओ लोकतन्त्र सँ पैघ नहि भऽ सकैत। समाजमे उच्च शिक्षा वा डिग्री कें प्रबुद्धता मानि लेबक भूल कएल जाइत अछि। डिग्री ज्ञानक प्रमाणपत्र दऽ सकैत अछि, मुदा प्रबुद्धता विवेकक परिचय अछि। एकटा उच्च शिक्षित व्यक्ति अन्धसमर्थक भऽ सकैत छथि, जबकि एकटा साधारण किसान लोकतन्त्रक मूल भावनाकेँ बेसी गहराई सँ बुझि सकैत छथि। प्रबुद्धताक अर्थ सभ प्रश्नक उत्तर जनाएब नहि, बल्कि अपन प्रिय नेता आ पसंदीदा दल सँ सेहो कठिन प्रश्न पूछबाक साहसिक चेतना राखब अछि। लोकतन्त्रमे जे लोक सर्वाधिक उपयोगी सिद्ध भेलाह, ओ सत्ता-विरोधी नहि, बल्कि अन्याय-विरोधी छलाह। आजुक सार्वजनिक जीवनमे एकटा खतरनाक प्रवृत्ति पनपि रहल अछि जे सरकारी नीतिक आलोचना करैत देरी विरोधी दलक ठप्पा लगा देब, आ विपक्षक आलोचना करैतहि सत्ताक समर्थक कहि देब। लोकतन्त्रमे आलोचना विरोध वा शत्रुता नहि, बल्कि लोकतन्त्रक प्रतिरक्षा-तन्त्र  अछि। जाहि शरीरमे प्रतिरक्षा-तन्त्र नष्ट भऽ जाइत छैक, ओ छोट-सँ-छोट बीमारी सँ मरि जाइत अछि। तहिना, जाहि लोकतन्त्रमे प्रश्न पूछबाक आ आलोचना करबाक परिपाटी समाप्त भऽ जाइत अछि, ओ भीतर सँ खोखला भऽ जाइत अछि। दल आ सरकार कोनो हो, लोकतन्त्रमे प्रश्न पूछब नागरिकक प्राथमिक कर्तव्य अछि। निर्वाचन आयोगक शक्ति ओकर भवनमे नहि, न्यायपालिकाक शक्ति ओकर विशाल परिसरमे नहि, आ मीडियाक शक्ति ओकर स्टुडियो मे  नहि अछि, एहि सभक वास्तविक शक्ति विश्वसनीयता आ जनविश्वास मे निहित अछि। जखन एहि संस्था सभक निष्पक्षता पर सँ लोकक विश्वास उठि जाइत अछि, तखन भवन तँ ठाढ़ रहैत अछि, मुदा लोकतन्त्र मरि जाइत अछि। लोकतन्त्रक वास्तविक चिन्ता इ नहि जे फलाँ दल जीतल वा हारल; मुख्य चिन्ता इ हेबाक चाहिए जे लोकतन्त्रक पिच निष्पक्ष रहए। जेना कोनो परीक्षा कें खाली परिणाम सँ उचित नहि ठहराओल जा सकैत यदि ओकर उत्तरपुस्तिका आ मूल्यांकन प्रक्रिया अपारदर्शी होअए, ओहीना चुनाव खाली मतगणनाक अंक नहि, बल्कि जनविश्वासक प्रक्रिया अछि। अलेक्सिस द टोकविल चेतावनी देने छलाह जे बहुमतक अत्याचार (Tyranny of the Majority) सेहो ओतबे खतरनाक अछि जतेक कोनो तानाशाहक शासन। लोकतन्त्रक महानता एहि बातमे अछि जे पराजित उम्मीदवार सेहो इ मानि कऽ घर लौटए जे ओकर पराजय एक निष्पक्ष प्रतिस्पर्धामे भेल अछि। लोकतन्त्रक अन्तिम रक्षा-पङ्क्ति नै तँ खाली निर्वाचन आयोग अछि, नै न्यायपालिका, आ नहि संसद, एकर अन्तिम रक्षक स्वयं नागरिक छथि। राष्ट्रभक्ति खाली झण्डा फहराएब वा नारा लगाएब धरि सीमित नहि अछि। सच्चा देशभक्त ओ अछि जे देश कें दल सँ ऊपर, संविधान कें सरकार सँ ऊपर, आ लोकतन्त्र कें चुनावी जीत सँ ऊपर राखए। अतः समाजक समस्त बुद्धिजीवी, प्राध्यापक, वकील, पत्रकार, लेखक आ सजग युवा सभ सँ आशा हेबाक चाहिए जे अहाँ अपन-अपन विचारधारा आ दलक समर्थन करू, मुदा मुक्त आ निष्पक्ष चुनाव पर कखनो समझौता जुनि करू। यदि अहाँक पसंदीदा दल सेहो चुनावी निष्पक्षता कें क्षति पहुँचाबए, तँ पहिल प्रतिवाद अहाँक होबाक चाही। कारण, प्रबुद्धताक असली परीक्षा विरोधीक आलोचनामे नहि, अपन पक्षक अनियमिता पर सवाल उठाबैमे सेहो होइत अछि। लोकतन्त्र चापलूस नहि, सजग नागरिक सँ जीवित रहैत अछि। जय भारत। -[प्रणव कुमार झा, ग्राम-गोरापुर, जिला - बेगूसराय] अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१०. जगदानन्द झा "मनु"- ४ टा बीहनि कथा- मुख्य वक्ता/ पैखाना खाए गेल/ कोन काज करै छी?/ हमरा तँ चिन्हते होएब? जगदानन्द झा ‘मनु’ ४ टा बीहनि कथा- मुख्य वक्ता/ पैखाना खाए गेल/ कोन काज करै छी?/ हमरा तँ चिन्हते होएब? १. मुख्य वक्ता “काका यौ कोनो विधा लेल प्रोफेसर पैघ कि विधाकार? विधाकार माने जे ओही विधापर काज कएने हुअथि, जिनकर ओही विधाक विकासमे कोनो योगदान होइन। जे बेस मात्रामे नीक-नीक रचना ओही विधामे लिखने हुअथि वा जिनकर ओही विधामे योग्य पोथी प्रकाशित भेल होइन।” “हमरा हिसाबे तँ विधाकार पैघ होबाक चाही।” “तहन मंचपर ओही विधाक नाम गूगल करैबला प्रोफेसर मुख्य वक्ता कोना?” ▪️ २. पैखाना खाए गेल “मुझौँसा, टाटीबला, सरधुआ, कीड़ा फरतौ कीड़ा” “की भेल? यै गायटोलबाली, भोरे-भोर एतेक आमिल किएक पीने छी? आ ई कीड़ा ककरा फरा रहल छी?” “की कहूँ यौ बौआ, घर-घर शौचालय-योजनाक लेल आइ चारि महीनासँ ई सरधुआ मुखियाक अँगनाक फेरा लगा-लगा कय टाँग टूटि गेल, मुदा आइ बुझयमे आबि गेल जे सरधुआ अंततः हमर पैखाना खाए गेल।” ▪️ ३. कोन काज करै छी? “अहाँ कोन काज करै छी?” “हम लिखैत छी।” “की लिखैत छी?” “मैथिली साहित्य, जेना कविता, गजल, कथा आदि।” “लिखैत छी से बुझलहुँ, मुदा काज की करै छी? “लिखबे हमर काज अछि।” “तँ ई लिखलासँ घर चलि जाइए? नहि ने तँ घर चलबै लेल कोन काज करै छी?” ▪️ ४. हमरा तँ चिन्हते होएब? भोरे भोर एकटा अजोध वयोवृद्ध मैथिली साहित्यकार, गीतकार स्वघोषित गजलकार केर फ़ोन आएल- “ट्रीन ट्रीन ट्रीन….” हम- “हेलो” उम्हरसँ- “के ? मनु।” हम- “जी” उम्हरसँ खूब खिसियाइत- “ई की अहाँ सभ फेसबुकपर उल्टा-पुल्ता लिखैत रहै छी ? एक दू, एक दू। हम सभ तँ भरि जिंदगी घास छिललहुँ।” हम- “अपने के?” उम्हरसँ- “हम सारेगामा, हमरा तँ चिन्हते होएब ?” हम- “हाँ” उम्हरसँ- “कतेक?” हम- “जतेक अहाँ हमरा चिन्है छी।” की ओ झट फोन राखि देला। -जगदानन्द झा ‘मनु’, मोबाइल न० ९२१२-४६-१००६ अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.११. हास्यक सागर [हास्यार्णवप्रहसनम्‌क मैथिली अनुवाद (मूल संस्कृत श्री जगदीश्वर भट्टाचार्य्य; संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा)] हास्यक सागर हास्यार्णवप्रहसनम्‌क मैथिली अनुवाद (मूल संस्कृत श्री जगदीश्वर भट्टाचार्य्य; संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा) हास्यार्णवमे पात्रक नाम, प्रवेशक्रमक अनुसार सूत्रधार — प्रधान पुरुष अभिनेता नटी — प्रधान स्त्री अभिनेत्री राजा अनयसिन्धु — अव्यवस्थाक सागर सेवक — गुप्तचर कुमतिवर्मा — मूर्खताक रक्षक बन्धुरा — झुकल भगवाली मृगाङ्कलेखा — नव चन्द्ररेखा विश्वभण्ड — विश्व-विदूषक कलहाङ्कुर — कलहक अंकुर व्याधिसिन्धु — रोगक सागर आतुरान्तक — रोगीक मृत्युरूप रक्तकल्लोल — रक्तक तरंग मिथ्यार्णव — मिथ्याक सागर साधुहिंसक — साधुक पीड़क रणजम्बुक — युद्धक सियार महायात्रिक — परलोकक भविष्यवक्ता मदनान्धमिश्र — कामसँ अन्हरायल कुलाल — जंगली मुरगा महानिन्दक — महान निन्दक प्रथम अंक बेल-लता जकाँ बाँहिसँ बान्हल, मैथुनरत दुनू गोटाक परिश्रमसँ देहपर लागल सुगन्धित चन्दन पसीनाक धारसँ बहि रहल अछि। समागमक स्मृति विस्मयसँ जागि उठैत अछि, ओठ कसल अछि, स्वास ऊपर-नीचा अस्थिर भ’ रहल अछि। अकस्मात् आनन्दक सूचक स्वास लैत, आँखि आनन्दसँ चमकैत, देहक रोम पुलकसँ ठाढ़, भउँह डोलैत आ हाथ घुमि-घुमि नाचि रहल अछि। शिव आ पार्वतीक उन्मत्त प्रेम-मिलनक ई आनन्द आ भाव चारू कात पसरि रहल अछि। "आकाशक दानव राहु सूर्यसँ चन्द्रमा दिस बढ़ल जा रहल अछि, चन्द्रमाकेँ भोजनक निमित्त निगलबाक इच्छासँ, गिरहन लगबैत। हे चन्द्रमुखी पार्वती! की ओ तोहर मुख, जे चन्द्रमाक चमकसँ मिलैत अछि, देखि भ्रमवश ओकरा निगलबाक इच्छा नहि करत?" अपन स्वामीक ई बात सुनि पार्वती राहुक मार्ग देखबाक लेल आकाश दिस तकय लगैत छथि, आर शिव आदरणीया पार्वतीक मुखकेँ जोरसँ चूमि लैत छथि। त्रिनयन भगवानक ई स्तुति सज्जन आ सद्गुणी पुरुषक कामना पूर्ण करय। मंगलाचरणक श्लोक पढ़ला उत्तर सूत्रधार, प्रधान पुरुष अभिनेता, बजलाह: अधिक विस्तार कहब निरर्थक अछि, तेँ अहिना कहैत छी: कवि जगदेश्वर भट्टाचार्यक काव्य एक गोर-वर्ण, अद्भुत नारी जकाँ अछि, जे स्वतन्त्र, स्वच्छन्द, स्वाधीन आ बिबिध भाव उत्पन्न करबामे सक्षम अछि; ई काव्य उपमा आदि अलंकारशास्त्रक नियमसँ सुसज्जित अछि, जकर सहायतासँ सम्यक ज्ञान होइत अछि; व्याकरण आ अन्य कठोर मानदंडक दृष्टिसँ ई शुद्ध अछि; ई हास्यादि रसेँ भरल अछि आ हास्य उत्पन्न करबामे समर्थ अछि — कवि जगदेश्वरक काव्य सुनि विद्वान लोकनिक दाँत हँसैत-हँसैत खसैत लगैत छनि। ई काव्य विद्वान लोकनिक आत्माकेँ आनन्दित करैत अछि आ अपार सुख दैत अछि। शिवजीक आराधनासँ जकर कुल निष्कलंक भेल आ काव्य-शक्ति प्रकाशित भेल, ओ कवि श्री जगदेश्वर हमरा आदेश देलनि: "बसन्त ऋतुक अनुकूल, तूँ हास्यार्णव नामक हमर प्रहसनकेँ प्रस्तुत क’ काव्य-रसिक लोकनिक हृदयमे आनन्द उत्पन्न कर।" निश्चित रूपेँ ई आदेशक पालन करब आवश्यक अछि। एहि विद्वत-सभामे हमर मनो अधीर आ उत्सुक अछि बसन्तमे अपन मोहक स्वरसँ चोंचला करबाक लेल, आर नाचबाक लेल सेहो। तेँ आउ, हम नाचब, बाजा बजाएब आ गाएब शुरू करी। (घूमि क’ चारू कात तकैत छथि) अहो! बसन्तक सुन्दरताएँ हमर हृदयकेँ आन्दोलित क’ रहल अछि, कारण— कोन संवेदनशील मनुष्यक हृदय बसन्तमे आनन्दसँ नहि उमड़ैत छैक, जखन मलय-वनसँ स्पर्शित पवन चन्दनक सुगन्ध ल’ अबैत अछि, आर मधुमक्खीक मीठ गुंजार आ कोयलिक मधुर गान सुनाइत अछि? आर तेँ, एहि बसन्त-काल मे मधु-मत्त भ्रमर की-की नहि करैत अछि! ओ भ्रमर बगीचामे गुंजैत घुमैत अछि, आकाश दिस उड़ैत अछि, आर फेर आकाशसँ खसि पड़ैत अछि। परागसँ लिपाएल देहसँ इत-उत भरमैत, चंचल दृष्टिसँ ताकैत, ओ फूलकेँ चुमैत अछि आर अपन प्रियाकेँ आलिंगन करैत अछि। हे नारी! तोहर आँखिक पुतरी सुनहर पात्रसँ लटकैत कमलक झुण्डक समान चंचल कटाक्ष फेकैत अछि। बिना नारीक भोग कोना सम्भव अछि? (घूमि क’ पर्दाक पाछाँ तिरिंग-कोठरी दिस देखैत, पढ़ैत छथि)— हे नारी, तोहर आँखिक पुतरी सुनहर पात्रसँ लटकैत कमलक झुण्डक समान चंचल कटाक्ष फेकैत अछि! तोहर देह चन्द्रमाक किरणक समान अछि! तूँ कामदेवक बाणक समान छह! तोहर देह सर्पक समान कामदेवसँ डसल जकाँ अछि! तोहर देह अमृतक समान अछि! हे प्रिये! तूँ चतुर, चालाक, तीक्ष्ण छह! तूँ सुहावन आ देदीप्यमान छह! जल्दी आउ! (नटी, प्रधान स्त्री अभिनेत्री, प्रवेश करैत छथि) नटी : हे स्वामी! हम अहाँक इच्छाक अनुसार उपस्थित भेलहुँ। कृपया हमरा अपन मधुर वचनसँ अनुगृहीत करू। सूत्रधार : हे आदरणीया! देखू— जखन कोयलिक मीठ गीत चारू दिस पसरि रहल अछि, जखन कुंजमे भ्रमर फूलकेँ मगन भ’ चुमि रहल अछि, मलय-वनक पवनसँ स्पर्शित, चमेलीक सुगन्ध चारू कात पसरि रहल अछि — बसन्तक आगमनपर कोन विवेकी पुरुष कामदेवक बाणसँ पीड़ित नहि होइत अछि? आर सेहो: एहि बसन्त-कालमे माधविका लताक बेल, नव-नव फूलसँ लदल, आनन्दसँ आम्रवृक्षकेँ आलिंगन क’ रहल अछि। एहि आनन्दमय आलिंगनक अव्यक्त ध्वनिसँ, आर कोयलिक मधुर गानसँ, माधविका लता जेना एकटा नव-विवाहिता वधूकेँ प्रेम-कलाक शिक्षा दैत होइक। नटी : (मन बहटकाएल जकाँ देखबैत छथि) सूत्रधार : हे आदरणीया! अहाँ किएक अन्यमनस्क बुझा रहल छी? नटी : हे स्वामी! अहाँ नहि सुनल की? सूत्रधार : की? नटी : हम एहि लेल चिन्तित आ अन्यमनस्क छी जे हमरा अनयसिन्धु नामक एकटा राजाक शासन-व्यवस्थापर बातचीत करबाक अछि, जे सदिखन अपन महलक अन्तःपुरमे बन्द रहैत छथि। सूत्रधार : हे प्रिये! की ई सत्य अछि? नटी : हँ, ई सत्य अछि। (पर्दाक पाछाँसँ आवाज सुनाइत अछि) राजा अनयसिन्धु, अव्यवस्थाक सागर, एहि नगरक कल्याण आ दुर्दशा दुनू जानबाक इच्छासँ शीघ्र आबि रहला अछि। हे प्रजा! बड़-बड़ जलहीन माटिक बर्तन एकठाम जुटा राखू आर मुख्य मार्गपर अन्न-भूसक सुइयासँ रेखा खींचबाक व्यवस्था करू। सूत्रधार : (आकाश दिस तकैत, सुनैत छथि। सुनला उत्तर)— डर आ आशंकाएँ न्याय [नीति] आ सम्पूर्ण सज्जन लोककेँ दूर भगा देल अछि। के छैक जे धूर्त आ ठकबाजक चतुर बातचीत सुनि दोसराक धन हड़पबाक फिराकमे नहि लागल छैक? आजुक राज्यमे के छैक जे बलपूर्वक दोसराक पत्नीकेँ अपन कामवासना शान्त करबाक लेल नहि प्रयोग करैत छैक? ई राजा अखन एहि नगर दिस बढ़ि रहला अछि, तेँ हे प्रिये! हमरा सभकेँ एतय रहब उचित नहि बुझना जाइत अछि। तेँ आउ, हम दुनू गोटे ई मार्गसँ आन कतहु चली जाइ। (सूत्रधार आ नटी दुनू गोटे प्रस्थान करैत छथि।) (प्रस्तावनाक समाप्ति) (एहि उत्तर राजा अनयसिन्धु, अव्यवस्थाक सागर, एकटा सेवकक संग प्रवेश करैत छथि) राजा : (अपन मनमे) आह! कतेक दुःखक बात जे हमर देह कामदेवक फूलक बाणसँ आहत भ’ शिथिल भ’ गेल अछि, आर हमर देह प्रेमक अगिनिसँ दग्ध भ’ गेल अछि; दिन-राति हम दोसराक पत्नीक संग सम्भोग करबाक उपाय सोचैत रहैत छी। एहि लेल बहुत दिनसँ हम नगरक प्रजाक कल्याणपर ध्यान नहि दऽ सकल छी। (प्रकाशमे आबि सेवक-गुप्तचरसँ बजलाह) हे परम गुप्तचर! हे मिथ्या-धारणाक व्याख्याकार! हमर राज्यक अवस्थाक पूर्ण अनुसंधान करू। सेवक-गुप्तचर : जे स्वामी आज्ञा करैत छथि। (एना कहि गुप्तचर बाहर निकलैत छथि, आगू देखैत छथि आर फेर वापस आबि ऊँच स्वरमे राजाक कानमे बजैत छथि) हे स्वामी! हम राज्यक रहस्यक भेद खोलि लेलहुँ। राजा : कहू, कहू। सेवक-गुप्तचर : राज्यक न्याय-व्यवस्था आ नागरिक कानून [व्यवहार] बहुत दिनसँ परामर्शक अभावमे पूर्णतः पतित आ उपेक्षित भ’ गेल अछि। राजा : (क्रोधसँ) केना? सेवक-गुप्तचर : (संस्कृतमे बजैत) हे स्वामी! एहि कारणसँ— सब पुरुष दोसराक पत्नीकेँ त्यागि केवल अपन पत्नीकेँ आलिंगन करैत छथि; सुयोग्य आ विद्वान ब्राह्मणक उपस्थिति रहितहुँ जूता सिबय बला मोची जूता सीबि रहल अछि। निर्लज्ज लोक निम्नतम जातिक सुरक्षित उपस्थितिमे सेहो ब्राह्मणक पूजा करैत अछि। हे राजन! अहाँक राज्यमे एहि प्रकारक नियमक अति उल्लंघन भ’ गेल अछि। आर सेहो, स्त्री लोकनि अपन आँखिमे नहि, बल्कि जांघमे काजर लगबैत छथि; ओठमे सेनुर नहि सजाबैत छथि, बल्कि माथाक बीच सिनुर लगबैत छथि जे लाल आभासँ चमकैत अछि। ओ पएरमे लाह लगबैत छथि, गोड़मे पाजेब पहिरैत छथि, आँखिमे रत्नजड़ित हार पहिरैत छथि आर दुनू छातीपर पाजेब सजाबैत छथि। कमरक चारू कात हार पहिरैत छथि, पएरमे नहि, आर सोनाक करधनी कमरमे पहिरैत छथि, ओठपर नहि। बड़ पीड़ासँ हम राज्यक हर घरमे एहन उलट-पुलट, निरर्थक आभूषण-पहिरनाइ देखने छी। (गुप्तचरक बात सुनैत, फेर अपन मनमे बजैत छथि) राजा : बहुत दिनसँ हम राज्यक विषयमे विचार आ चिन्तन नहि केने छी। एहि कारणसँ न्याय-व्यवस्थाक पतन तीव्र भ’ गेल अछि। ठीक अछि, हम दण्ड-व्यवस्था बनाएब। (प्रकाशमे आबि) राजा : सुनू, कुमतिवर्मा, मूर्खताक रक्षक नामक मंत्रीकेँ बजाउ। सेवक-गुप्तचर : जे स्वामी आज्ञा करैत छथि। (गुप्तचर बाहर जाइत छथि आर मंत्रीक संग फेर प्रवेश करैत छथि) (मूर्खताक रक्षक प्रवेश करैत छथि आ बामा हाथसँ राजाकेँ प्रणाम करैत छथि) मूर्खताक रक्षक : हे स्वामी! बिना पुछने अहाँक जे इच्छा हो, स्पष्ट आदेश करू, हम पालन करब। राजा : हे मंत्री! दरबार लगेबाक उपयुक्त स्थान नहि होएबाक कारण बहुत दिनसँ हम राज्यक विषयमे बातचीत नहि क’ सकल छी। मूर्खताक रक्षक : (आश्चर्यसँ) हे स्वामी! एतहि तँ एकटा अत्यन्त सुन्दर स्थान अछि दरबार लगेबाक। कहू, कहू! राजा : एकटा दलालिनि, बन्धुरा, झुकल-भगवाली, क घर। राजा : (जोर सँ हँसैत) हे मूर्खताक रक्षक! एहन बुझना जाइत अछि जेना अहाँ दरबार लगेबासँ पहिने हमर हृदयक भितरी इच्छा सँ सलाह क’ लेलहुँ। रानीक झुलैत छातीकेँ स्पर्श करबामे हमरा अरुचि अछि, हमरो इच्छा अछि जे हम एकटा वेश्याकेँ आलिंगन करी। की कामदेव झुलैत छातीबाली स्त्रीमे कहियो निवास क’ सकैत छथि? आर सेहो, रुचिकर स्त्रीक ऊँच स्तन देखि, जे दुर्गम पहाड़ जकाँ उठल रहैत अछि, कामदेव अपन तीक्ष्ण बाणसँ युवककेँ हृदयकेँ बलपूर्वक फाड़ि दैत छथि। एहि प्रेम-युद्धमे कामदेवक आक्रमण स्तनकेँ चोट पहुँचाबैत अछि आर ओकर पतन क’ दैत अछि — कमजोर आ डरपोक कामदेव किला ढहितहि पाछाँ भागि जाइत छथि, इएह हमर विश्वास अछि। मूर्खताक रक्षक : चलू की? राजा : (खुशी सँ मंत्रीक संग चलैत छथि) सेवक-गुप्तचर : हे स्वामी! कर्पूर, चन्दन, कस्तूरी आर बिबिध फूलक सुगन्ध एहि दिससँ अबैत अछि। तेँ हमर अनुमान अछि जे ईहे झुकल-भगवालीक घर होएत। हे स्वामी! कृपया एहि दिस चलू। राजा : (प्रवेश करैत, आनन्दसँ बजैत छथि) ई तँ झुकल-भगवालीक घर अछि। एतय आबि, हम सए तीर्थयात्राक पुण्य प्राप्त क’ लेलहुँ। मूर्खताक रक्षक : दलालिनि झुकल-भगवाली कतय छथि? (एहि उत्तर झुकल-भगवाली सए-सए यार लगेबालाक संग खुशी-खुशी प्रवेश करैत छथि) झुकल-भगवाली : ओहो! आश्चर्य! आश्चर्य! सुनू हे यार लोकनि! धूर्तमे सर्वश्रेष्ठ, राजा अव्यवस्थाक सागर, आबि गेला अछि; तेँ अहाँ लोकनि बसन्त-सम्बन्धी गीत गाबय, ताल आ ढोलक संग, बिलम्ब जुनि करू। (सब यार लगेबाला नजदीक आबि आनन्दसँ गाबय लगैत छथि) मधु-मत्त भ्रमरक मीठ गुंजारसँ भरल, अत्यन्त सुन्दर स्वरबाली स्त्रीक गानसँ युक्त, कामदेवसँ हृदय-विदीर्ण युवकसँ भरल — ई सभ बसन्त-ऋतुकेँ अहाँ लोकनि लेल आनन्दमय बनाबय। (ओ लोकनि बेर-बेर एहि तरहेँ गाबैत आ बजबैत रहैत छथि) राजा : (सुनैत छथि, फेर मंत्रीक कानमे फुसफुसाइत छथि) ओहो! मूर्खताक रक्षक, झुकल-भगवालीकेँ किछु चाही। मूर्खताक रक्षक : अहाँ पूरा दुनियाँमे सबसँ बेसी पापी छी। तेँ, आन सबकेँ बचा, वज्रपात केवल अहींक माथपर पड़त। राजा : हमरा नहि बुझल छैक की होएत। मुदा एखन हमरा की करबाक चाही? मूर्खताक रक्षक : अपन कंजूसी देखा चुकला अछि, तेँ एहि तीर्थस्थलमे तीनि उपवास करू, जाहिमे सम्पूर्ण भोग-विलाससँ परहेज हो। राजा : (अपन मनमे) डरेबाक जरूरत नहि अछि। हम झुकल-भगवालीकेँ धोखा देबाक लेल प्रणाम करैत छी। (प्रकाशमे) हे माता झुकल-भगवाली! हम अहाँकेँ प्रणाम करैत छी। झुकल-भगवाली : मृगाङ्कलेखा, नव-चन्द्ररेखा, अहाँपर प्रसन्न होथि। राजा : (खुशी सँ अपन मनमे बजैत छथि) एहि दलालिनि झुकल-भगवाली हमरासँ कोनो अनुग्रहक याचना नहि केलनि, तेँ हम एकटा महापापसँ मुक्त भ’ गेलहुँ। (प्रकाशमे) नव-चन्द्ररेखा कतय छथि? (एहि उत्तर नव-चन्द्ररेखा, अपन बेल-लता जकाँ देहकेँ विशेष आभूषणसँ सजाओने, प्रवेश करैत छथि) नव-चन्द्ररेखा : हे माता! ई के छथि? झुकल-भगवाली : हे बेटी! तूँ ओकरा नहि चिन्हैत छह? राजा अव्यवस्थाक सागर अहाँसँ भेंट करय आयल छथि। नव-चन्द्ररेखा : (मुस्कुराइत) एहिसँ बेसी पुण्यक कार्य आर की भ’ सकैत अछि? राजा : (नव-चन्द्ररेखाकेँ देखैत) एकर देह अद्भुत अछि— एकर मुख चन्द्रमाक कान्तिकेँ मात करैत अछि, एकर चंचल आँखि काजरसँ काजरित अछि, ओ लताक समान अपन भउँह घुमा-घुमा अपन भाव प्रकट करैत छथि, माथपर कस्तूरी-मिश्रित चन्दनक टीका शोभा दैत अछि। एकर सुन्दर ओठ बन्धूक फूलक रंग जकाँ लाल अछि: एहि लताक समान सुन्दर देह सुनि देवता आ ऋषि सेहो मोहित भ’ सकैत छथि। एकर अमृत-सिक्त वाणी सुनि के मोहित नहि होएत? एहन सुन्दर देह त्रिलोकमे दुर्लभ अछि। आर सेहो, एकर देह एकटा सुन्दर सरोवर जकाँ अछि, एकर देदीप्यमान यौवन जलक समान अछि, एकर मुख कमलक समान अछि जे कस्तूरीक कीचमे अछि, एकर चंचल आँखि कमल-नालक समान अछि, एकर हाथ भ्रमरक भ्रमणक समान लगैत अछि। एकर स्तन दू प्रतिद्वन्द्वी हाथीक समान अछि; हमर मन एहि सरोवरसँ बाहर नहि निकलय चाहैत अछि, मुदा ई मन एकर छाती-हाथीकेँ क्रोधसँ कुचलि केना छोड़ि सकत? नव-चन्द्ररेखाक ई देह! (एना कहला उत्तर, झुकल-भगवालीकेँ अन्यमनस्क देखि, कहैत छथि) हे झुकल-भगवाली! अहाँ किएक अन्यमनस्क बुझा रहल छी? झुकल-भगवाली : हे स्वामी! हम विश्वभण्ड, विश्व-विदूषक नामक एकटा वेतनभोगी उपाध्यायक प्रतीक्षा क’ रहल छी, जे प्रेम-कलाक शिक्षा देबाक लेल आबि रहला अछि। ओ नव-चन्द्ररेखाकेँ प्रेम-कलामे प्रशिक्षित करता। राजा : (प्रसन्नतासँ) विश्व-विदूषक हमरो कुल-पुरोहित छथि। (पर्दाक पाछाँसँ आवाज) ओ दिनमे उपवास राखैत छथि, मुदा राति मे माछ-मांस खाइत छथि; ओ तापस जकाँ जटा राखैत छथि मुदा वेश्यागमनक तीव्र इच्छा राखैत छथि। ओ छली लोकमे शिरोमणि, गेरुआ वस्त्र पहिरने, सुन्दर छड़ी हाथमे लेने, आदरणीय विश्व-विदूषक एहि दिस चलि आबि रहला अछि। (एहि उत्तर विश्व-विदूषक अपन शिष्य कलहाङ्कुर, कलहक अंकुर, संग प्रवेश करैत छथि) विश्व-विदूषक : (स्थानक चारू कात घूमैत, आगू देखैत बजैत छथि) अहो! ई बसन्तक सुन्दर समय अछि। आर सेहो— बसन्तक मीठ-सुगन्धित मादक सुगन्ध प्रेमीक हृदयकेँ नशामे डुबा दैत अछि। ई कामदेवक साथी अछि, तृप्तिक चाहबालाक भाई अछि, एकटा एहन गन्तव्य जतय आनन्द, चुहल आ शर्मीलापनक बिबिध भाव एकठाम आबि जुटैत अछि। (शिष्यक दिस देखैत, पढ़ैत छथि) कांस्यक झाँझक स्वर पूरा आकाशमे गूँजि रहल अछि। मृदंगक कोमल मुदा निरन्तर ध्वनि सेहो चारू दिस पसरि रहल अछि। कर्पूर, अगरु आ चन्दनक सुगन्ध आकाशक चारू दिशाकेँ भरि देने अछि। हे बेटा! जाउ आर शीघ्र पता लगाउ जे केकर घरमे एहन उत्सव मनाओल जा रहल अछि। कलहक अंकुर : (चारू कात घूमैत बजैत छथि) हे स्वामी! ई उत्सव झुकल-भगवाली नामक दलालिनिक घरमे भ’ रहल अछि। विश्व-विदूषक : (प्रसन्नतासँ) हे बेटा! पछिला वर्ष झुकल-भगवाली दलालिनि हमरा सभकेँ भोजनक निमंत्रण देने रहथि। तेँ ई अवसर उपयुक्त बुझना जाइत अछि। (फेर घूमि, ओ लोकनि झुकल-भगवालीक द्वारपर पहुँचैत छथि) झुकल-भगवाली : हे उपाध्याय! ई तँ टूटल आसन अछि। हे आदरणीय, कृपया एहिपर बैसू। विश्व-विदूषक : (बैसबाक अभिनय करैत आदरसँ बजैत छथि) हे माता झुकल-भगवाली! हम अहाँकेँ प्रणाम करैत छी। झुकल-भगवाली : हे पुत्र! तूँ कामवासनाक सागरकेँ पार करय पाबहु। विश्व-विदूषक : (नव-चन्द्ररेखाकेँ देखैत) जँ हम एहि हिरणक समान आँखिबाली कन्याक बड़-बड़ घैलक समान स्तनकेँ पकड़य पाबी, तखन हम कामवासनाक सागरकेँ पार क’ सकब। नव-चन्द्ररेखा : (मुस्कुराइत विश्व-विदूषकक दिस देखैत छथि) राजा : (अपन मनमे) ई तँ विश्व-विदूषक छथि, महान उपाध्याय। ओ पहिनहिये वेश्याक सम्पूर्ण समुदायसँ पूजित झुकल-भगवालीक आशीर्वाद प्राप्त क’ चुकल छथि; आर आर अधिक आशीर्वाद पेबाक लेल ओ ओकरा संग बैसल छथि। (प्रकाशमे) हे स्वामी! हम अहाँकेँ प्रणाम करैत छी। विश्व-विदूषक : सुनू, कलहाङ्कुर! तूँ शीघ्र राजाक लेल आशीर्वचन कहू। कलहाङ्कुर : (जोर सँ हँसैत, भांग आर पवित्र दूर्वा घास मिला, चाउर लऽ, ऊँच स्वरमे संस्कृतमे बजैत छथि) अहाँक आँखिसँ मासिक धर्मक रक्त झरय। आर सेहो, अहाँक शत्रु बढ़य, अहाँक डर बढ़य, अहाँक बीमारी बढ़य, अहाँक कर्ज आ पाप बढ़य। अहाँकेँ दुर्भाग्य आ मूर्खताक समृद्धि मिलय — ई सात प्रकारक समृद्धि अहाँकेँ प्राप्त होअय। (आशीर्वाद पढ़ि राजाक माथपर दूर्वा घास आर चाउर छिड़कैत छथि) राजा : हे स्वामी! ई कोन दुष्ट बालक छथि? विश्व-विदूषक : अहाँ हुनका नहि चिन्हैत छी? ओ अगिन छथि जे अपन पूरा वंशकेँ भस्म क’ देलनि, ओ सम्पूर्ण भयंकर पापक चरम रूप छथि, ओ सम्पूर्ण लापरवाहीक संचय छथि। धन लुटबामे ओ वीर छथि, मूर्खताक मूर्तिमन्त रूप छथि, आ क्रूर सेहो — इएह कलहाङ्कुर, कलहक अंकुर, छथि। (झुकल-भगवाली दिस देखैत बजैत छथि) विश्व-विदूषक : हे बेटा! कलहाङ्कुर! एकर लटकैत स्तन जल-भरल बादरक समान अछि, बुढ़ारीएँ एकरा तमाम रोगक बासस्थान बना देने अछि; उजरल खेतक समान, ओ अब सब वस्तुकेँ त्यागि चुकल अछि — बगुला जकाँ, एकर पएरक आभूषण अब नहि रहल, ओ नक्षत्रविहीन तारा जकाँ अन्हार भ’ गेल अछि। एकर बढ़ल उम्र लोककेँ एकरा वासना-योग्य नहि बुझबय दैत अछि, जेना चन्द्रमाक मुख अदृश्य भ’ जाइत अछि। ईहे झुकल-भगवाली अछि। एकरा देखलासँ अखन एकटा अप्रिय तैरैत बादरक याद अबैत अछि। हे बेटा! जाउ आ आदरणीया झुकल-भगवालीकेँ प्रणाम करू। कलहाङ्कुर : (खुशीसँ नाचैत झुकल-भगवालीक गोड़मे लोटैत छथि। फेर ओकर जांघक बीचक खाली जगह देखि, ताली बजा जोरसँ हँसैत संस्कृतमे बजैत छथि) अहो! महान उपाध्याय! ई आश्चर्यक बात अछि जे एहि झुकल-भगवालीक मुखक नीचाँ दाढ़ी अछि। आर सेहो, बुढ़ारीक तबाही देखि डरसँ एकर योनि सिकुड़ि गेल अछि। झुकल-भगवाली : (मुस्कुराइत) ई ब्रह्मचारी बड़ भ्रष्ट अछि। तेँ ई कलहाङ्कुर, कलहक अंकुर, नाम सार्थक करैत अछि। विश्व-विदूषक : (नव-चन्द्ररेखा दिस देखैत) अद्भुत! एहि युवतीक कामुक भाव-भंगिमा कतेक तीव्र अछि। स्वेच्छासँ आ बिना संयमक, ओ देखैत अछि आर मुस्काइत अछि; कतेक फुरसदक बाद ओ रुकैत अछि, आर बगासैत अछि, आ एहि सँ ओकर पूरा देह कँपि उठैत अछि। ओ आनन्दक क्षणकेँ लम्बा करैत अछि, आर ओकर स्तनकेँ ढकनिहार कपड़ा चारू कात सरकि खसि पड़ैत अछि। अपन केश खोलि आर ढील क’, अपन सखीकेँ आलिंगन करैत, बिना कोनो प्रश्न पुछनहि ओ अपन सखीसँ उत्तरक आग्रह करैत अछि; के छथि ई अद्भुत नारी, चंचल आँखिबाली, जे प्रेम-क्रीड़ामे सर्वश्रेष्ठ शोभा पाबैत छथि। आर सेहो, ओकर आँखि खंजनक समान चंचल अछि, मुख सुनहर कमल जकाँ सुन्दर अछि, स्तन पूर्ण आ ऊँच अछि, सदिखन कँपैत। ओकर कमर पातर आर नितम्ब भरल आ बड़ अछि; जँ भगवान शिव, महान तपस्वी, एक बेर सेहो नव-चन्द्ररेखाकेँ देखि लेथि तँ की ओ सेहो कामदेवक बाणसँ आहत नहि होएता? झुकल-भगवाली : हे उपाध्याय! हमर बेटी नव-चन्द्ररेखा अब प्रेम-कलाक शिक्षा लेबाक लेल पूर्णतः तैयार अछि। विश्व-विदूषक : (हँसैत) एहि समयपर हमरो पाठशाला विद्यार्थीविहीन अछि। नव-चन्द्ररेखा : हे माता! एकर नख आर दाँत बूढ़ बाघ जकाँ जीर्ण-शीर्ण अछि; बुढ़ारीएँ एकरा केवल हाड़-चाम बना देने अछि; मुदा दिन-राति ई निर्लज्ज विश्व-विदूषक हमरापर हँसैत आ हमर मजाक उड़बैत रहैत अछि। कलहाङ्कुर : (क्रोधसँ) हे नीच वेश्या! दोसराक बेटा आर धन हड़पयवाली! हमर गुरु दिस देखि ई मत सोचू जे ओ बुरा संगतिमे पड़ि गेल छथि; एकर पत्नी, हुनकासँ निरन्तर सम्भोग करितहुँ, प्रेम-कलाक महान ज्ञाता खोजबाक लेल भटकैत रहैत छथि, जाहिसँ एहि विद्याक ज्ञान बढ़ि जाइक। हुनक पतिव्रत-धर्म एहन अछि जे विधवाक वेश धारण क’ विश्व-विदूषकक पीछू चिता तक जाय आ अपन आपकेँ भस्म करबाक ढोंग करैत छथि। अहाँ हमर गुरुकेँ अखनो बूढ़ कहय साहस करैत छी? एतबहि नहि, हमर गुरु अखनो अपन लाज ढकयवाला कपड़ा उतारि माताक गोदमे सुतैत छथि — आर अहाँ एहन गुरुकेँ निर्लज्ज कहैत छी? (क्रोधक ढोंग करैत छथि) नव-चन्द्ररेखा : (हँसैत) ओ ब्राह्मणी धन्य छथि, ओ ब्राह्मण शिष्य धन्य छथि, आर ई उपाध्यायो धन्य छथि। झुकल-भगवाली : हे बेटी! एहन दुष्ट बात मत कहू। अहाँ अखन धरि उपाध्यायकेँ नीक जकाँ नहि जनने छी। विश्व-विदूषक भले सब दुष्टक गुरु आर बूढ़ छथि, मुदा ओ सूर्य जकाँ प्रेमक ज्योति फैला कमलकेँ खिलेबाक क्षमता रखैत छथि। विश्व-विदूषक : (सुनि अपन मनमे बजैत छथि) अहो! केहन आश्चर्य— झुकल-भगवालीक माथक श्वेत केश आर सफेद भउँह काश-फूल जकाँ पूर्ण खिलल अछि; बुढ़ारीएँ एकर देह, जे कहियो प्रेमक निवासस्थान छल, दुर्बल क’ देने अछि; स्तन झुरझुरा क’ झुलि गेल अछि। ई सब परिवर्तनक बादो, एकर वाणी सुनि अखनो कामक इच्छा जागि जाइत अछि। जँ अहिना अछि, ई कहाँ गायब भ’ जाएत? (सबहक सोझाँ, प्रकाशमे आबि) हे झुकल-भगवाली! अहाँ बुढ़ारीएँ किछु कँपैत बुझना जाइत छी की? झुकल-भगवाली : ई सत्य अछि। पहिनहिसँ हमरा समर्पित यार लोकनिक याद आर हुनक गुणक स्मरण क’, हम अखन प्रेमक ज्वरसँ पीड़ित छी। विश्व-विदूषक : (हँसैत) हे राजन! झुकल-भगवालीकेँ प्रेमक ज्वर भेल अछि। राजा : तखन अहाँ महान वैद्य व्याधिसिन्धु, रोगक सागर, जे आतुरान्तक, रोगीक मृत्युरूप, क बेटा छथि, हुनका किएक नहि बजबैत छी? विश्व-विदूषक : अहाँ रोगीक मृत्युरूपक बेटाकेँ नहि चिन्हैत छी? हुनक गुणक बारेमे किछु नहि जनैत छी? राजा : की अहाँ रोगक सागर अपन रोगीक संग जे शिष्टाचार बरतैत छथि, ओहिसँ अनभिज्ञ छी? पेटमे तेज दर्द होयतछ तँ आँखिमे तप्त छड़ी लगाउ; पएरमे सूजन आबय तँ तरहत्थीमे छेद करू; मूत्राशयमे पथरी हो तँ नाकक भीतर तेज छूरीसँ ऑपरेशन करू; गाउट आ बात-रोगमे रोगीकेँ गरम तेल पियाउ। हृदय-रोगमे रोगीक अण्डकोषकेँ दू छड़ीक बीच रखि जोरसँ दबाउ। एहन सुखद उपचार पेलाक बाद, कोन रोगी श्मशान दिस अग्रसर नहि होएत? आर सेहो, खाँसीसँ पीड़ित रोगीकेँ जरैत भूसाक धुआँ सूंघाउ; जँ रोगीक पेटमे बेसी गैस अछि तँ ओकरासँ मेहनत करबाउ, विरेचक दियौक आर उपवास कराउ; जँ पाचन कमजोर अछि तँ रोगीकेँ भोजनक संग कीमा-मांस खुआउ; जँ रोगी दमाक शिकार अछि तँ ओकरा निरन्तर पानि पियाउ। जँ रोगीकेँ पित्तक शिकायत हो तँ सुखल अदरख, पाकड़क पात आर मिर्चक शोरबा खुआउ; जँ शरीरक दोषक कारण ज्वर हो तँ रोगीकेँ टबमे नहलाउ; रोगक सागर, महान वैद्यक गुणक कतेक प्रशंसा करी! एकहि मुँहसँ हुनक गुणक पूरा सूची कहब असंभव अछि। (पर्दाक पाछाँसँ) जे हर रोगीकेँ मारि दैत छथि — ओ राज-वैद्य, रोगक सागर, मंचपर आबि रहला अछि; हुनक पएरक मांस अत्यन्त सड़ल अछि, गोल-गोल फोड़ा बनल अछि; अपन वस्त्रक अग्रभागसँ ओ अपन खसैत घावपर बैसैत मक्खीकेँ बेर-बेर उड़बैत छथि; हुनक खाँसीक तीव्रता चारू दिस, आकाशमे सेहो, गूँजैत अछि। (रोगक सागर प्रवेश करैत छथि, धीरे घूमैत, महान गर्वसँ बजैत छथि) रोगक सागर : वैद्यक रूपमे, सब रोग हमरामे भलीभाँति स्थापित अछि; हमर अपकीर्ति आर बदनामी हमर गौरव अछि। हमरासँ इलाज भेलाक बाद, अमर मार्कण्डेय सेहो शीघ्र जीवित नहि भ’ सकैत छथि। आर सेहो, रोगीकेँ न औषधिक जरूरत छैक, ने कोनो उपचारक। हमर एकटा झलक देखलासँ ओकर मृत्यु लेल पर्याप्त अछि। रोगक सागर : (नजदीक आबि) हे महान उपाध्याय! हम अहाँकेँ प्रणाम करैत छी। विश्व-विदूषक : हे कलहाङ्कुर! राज-वैद्यकेँ आशीर्वाद दियौ। कलहाङ्कुर : (हाथ उठा आशीर्वादक भंगिमा बना ऊँच स्वरमे बजैत छथि) अहाँ अपन शत्रुक संग सदिखन जीबू, अहाँक जीवन छोट होअय, अहाँ आर दू शुभ मुहूर्तो जीबय नहि पाबी, अहाँक हृदयमे तेज कँटा गड़ि जाय, अहाँक गरदनकेँ सर्प डसि लेय, आन्हक अपराधक दण्ड अहाँकेँ राजा द्वारा शिरच्छेद द्वारा मिलय, अहाँ सदिखन भोजनक चिन्तामे रहू, आर अहाँक घर सदिखन आगिमे जरैत रहय। रोगक सागर : अरे दुष्ट बालक! तूँ हमर मजाक उड़बैत छह? विश्व-विदूषक : (हँसैत) हे रोगक सागर! तोहर मृत बाप, रोगीक मृत्युरूप, कुशल छथि की? रोगक सागर : अहाँकेँ देखने बिना ओ कोना कुशल रहि सकैत छथि? (नव-चन्द्ररेखा दिस देखैत) एहि पूरा संसारमे के छैक जकर हृदय एकर सोनाक घैला जकाँ स्तन देखि लोभसँ भरि नहि जाएत? विश्व-विदूषक : हे महान वैद्य! हमरा अहाँसँ किछु औषधि-सम्बन्धी विषयमे बातचीत करबाक अछि। रोगक सागर : (गर्वसँ) पितृ-श्राद्धक निमित्त चाउर आर तिल इकठ्ठा केला उत्तर, चिताक निमित्त एकटा सुन्दर कुल्हाड़ी चुनला उत्तर, की रोगीक परिवार आर सम्बन्धीजन जखन रोगीक प्रति सम्पूर्ण मोह त्यागि चुकल हुअव, तखने वैद्यसँ सलाह लेल जाइत छैक? विश्व-विदूषक : (हँसैत) अहाँ महान वैद्य छी। (फेर हँसैत) हे महान वैद्य! झुकल-भगवाली अत्यधिक प्रेम-भोगक कारण कफसँ पीड़ित छथि। तेँ अहाँकेँ एकर उपचार बतेबाक अछि। रोगक सागर : किएक नहि पहिनहि तप्त तेलक एकटा घोल हुनक गुदामे नहि डालल गेल? अब एहि प्रक्रियामे बिलम्ब मत करू। झुकल-भगवाली : (हँसैत, अपन मनमे) ई वैद्य त बुद्धिविहीन अछि। (प्रकाशमे) हे स्वामी! सौभाग्यसँ हमरा सर्वश्रेष्ठ वैद्य भेट गेल। विश्व-विदूषक : (आकाश दिस देखैत बजैत छथि) आह! हजार बातपर ध्यान देबय पड़ैत अछि, हम प्रश्न भुला गेलहुँ। (हँसैत) हे बेटा कलहाङ्कुर! वैद्यसँ पूछल प्रश्नक याद दियाउ। कलहाङ्कुर : (बजि उठैत) हे महान वैद्य! अत्यधिक सेनुर आर कस्तूरी लगेबाक कारण नव-चन्द्ररेखाकेँ खुजली भ’ गेल अछि। कृपया बताउ की करब चाही एहि व्याधिक इलाजक लेल। झुकल-भगवाली : (मुस्कुराइत, अपन मनमे) शिष्य अपन गुरु जकाँ छथि। कुकुरकेँ राखक ढेरमे रहबाक चाही। रोगक सागर : जल-कुंभीक मलहम बिच्छू आर काँटाक जकाँ बारीक धूराक संग मिला नव-चन्द्ररेखाक पूरा देहपर लगाउ; एहिसँ खुजली शीघ्र दूर भ’ जाएत। झुकल-भगवाली : ई औषधि नीक अछि। कलहाङ्कुर : (सोचबाक ढोंग करैत) हँ, अब याद अयलौं। हे महान वैद्य! प्रेम-युद्धक आनन्दक कारण झुकल-भगवालीकेँ माथ-दर्द भ’ गेल अछि। एकर लेल की करब चाही? झुकल-भगवाली : (मुस्कुराइत, नजदीक आबि) हे महान वैद्य! अहाँक विद्वताक बारेमे तँ हमरा पहिनहि सँ बुझल अछि, कृपया हमर कफक इलाजक लेल एकटा औषधि बताउ। रोगक सागर : (एक क्षण सोचैत) ही! ही! अहाँ किएक नहि कहैत छी जे अहाँकेँ कफ भ’ गेल अछि? एक बेर, बहुत पहिने, एकटा शासक राजाकेँ अत्यधिक वायु-रोगक कारण कफ भ’ गेल छलनि। ओहि समय हमर पिता आतुरान्तक, रोगीक मृत्युरूप, जे चरक, सुश्रुत, वाग्भट आर नागार्जुनक आयुर्वेदिक ग्रन्थमे प्रामाणिक छलाह — हुनक आँखिकेँ काला नमकसँ साफ क’ आ सए जोंकसँ आँखिपर लगा राजाक कफकेँ ठीक केने छलाह। झुकल-भगवाली : हमर व्याधिक इलाज की होएत? रोगक सागर : जँ छोट इलाजेसँ काज चलि जाय तँ बड़ इलाज बतेबाक की उपयोग? अहाँक कफ नष्ट भ’ जाएत जँ अहाँ ततैया, जोंक आर बिच्छू नाक आर आँखिमे राखू। झुकल-भगवाली : (हँसैत) अहाँ सचमुच रोगीक मृत्युरूपक पुत्र छी। (पर्दाक पाछाँसँ हलचल सुनाइत अछि) राजा : (कान आकाश दिस लगा सुनैत छथि, आर सुनला उत्तर प्रकाशमे आबि) सुनू! द्वारपाल! फौरन पता लगाउ के हमरासँ भेंट करय आयल छथि। शीघ्र एतय ल’ आउ। द्वारपाल : जे स्वामी आज्ञा। (बाहर जाइत छथि, नीक जकाँ देखि, फेर वापस आबि) हे महान राजा! रक्तकल्लोल, रक्तक तरंग, एकटा नाइ, नगरक एकटा खून बहरैत नागरिकक कपड़ासँ खींचल आबि रहल छथि। राजा : ओकरा प्रवेश आर उपस्थित होबाक लेल कहू। द्वारपाल : (बाहर जाइत, फेर वापस आबि) हे महान राजा! हम अहाँक सोझाँ ई नाइ प्रस्तुत करैत छी, जकर नाम रक्तकल्लोल अछि। (रक्तक तरंग नगरक एकटा खून बहरैत नागरिककेँ अपन कपड़ा पकड़ने प्रवेश करैत छथि। ओ घूमि संस्कृतमे बजैत छथि) रक्तक तरंग : जखने हम छूरा हाथमे लऽ छिलबय लेल तैयार होइत छी, मनुष्य जीवनक सम्पूर्ण आशा त्यागि दैत अछि। जखने हम नाइक रूपमे अपन कार्य करय जाइत छी, हमर हृदय मनुष्यक देहसँ खूनक धार बहैत देखबाक लेल उत्सुक भ’ उठैत अछि। आर सेहो, जखन एहन मनुष्यक हाथ, पएर आर गरदन बान्हल रहैत छैक, आर ओ भयंकर पीड़ासँ चिचिआइत रहैत अछि, हम जखन एहन मनुष्यक नखकेँ काटैत छी, ओ निश्चित रूपसँ पुनर्जन्मक सम्पूर्ण आशा त्यागि दैत अछि। (सभाकेँ देखैत, एकटा दर्पण हाथमे दैत छथि) राजा : हे झुकल-भगवाली! अहाँकेँ पहिने ई दर्पण लेबाक चाही। झुकल-भगवाली : (लऽ क’ देखैत छथि) हे महान राजा! हमरा मोतियाबिन्द नामक आँखिक रोग भ’ गेल अछि। तेँ हम अपन मुखक प्रतिबिम्ब दर्पणमे कोनो प्रकारेँ नहि देखि सकैत छी। तेँ महाराज पहिने दर्पण लेथि। राजा : हे रोगक सागर! अहाँक उपस्थितिमे सेहो एहि दलालिनि झुकल-भगवालीकेँ मोतियाबिन्द नामक आँखिक रोग भ’ गेल अछि। रोगक सागर : किएक नहि अहाँ आगिमे तपाओल एकटा लोहाक छड़ी दृढ़ता आर स्थिरतासँ हाथमे धरि आँखिक पुतरीपर लगाउ। जखन आँखिये नहि रहत, तखन मोतियाबिन्द नामक रोग कोना बचि सकत? नव-चन्द्ररेखा : (हँसैत) पहिने वैद्यकेँ अपने आँखिमे तप्त छड़ी लगा एहि उपायकेँ स्वयं परखबाक चाही? रोगक सागर : ई वेश्या हमर मजाक उड़बैत अछि, तेँ एतय ठाढ़ रहब व्यर्थ अछि। (एना कहि ओ चलि जाइत छथि) विश्व-विदूषक : (दर्पण लऽ क’ देखैत, आश्चर्यसँ बजैत छथि) ओहो! हमरापर बुढ़ारी आबि गेल अछि! हमर केश सफेद भ’ गेल अछि, हमर दाँत सड़ि खसय लगल अछि; हमर देह सेहो बूढ़ आर कमजोर भ’ गेल अछि, हमर आँखिमे मोतियाबिन्द अछि, कान अब कोनो शब्द नहि सुनैत अछि, देहक मांस सेहो ढीला भ’ गेल अछि। ई सभ बुढ़ारीक कारण अछि; तैयो एहि अवस्थामे हमर चंचल हृदय सदिखन गोर वेश्याकेँ आलिंगन करय उत्सुक रहैत अछि: भगवानक ई लीला हमरा बड़ अजीब बुझना जाइत अछि। राजा : सुनू नाइ! जँ एहि विषयमे किछु कहबाक अछि तँ अखने कहू। रक्तक तरंग : हे महान राजा! एहि पीड़ासँ छटपटाइत व्यक्तिसँ हमर झगड़ा अछि। राजा : हे मंत्री! एहि दुनू व्यक्तिकेँ न्याय देबाक विषयमे विचार करू। मूर्खताक रक्षक : हे नाइ! हमरा बताउ, ई खून सबसँ पहिने केकरा देखल? रक्तक तरंग : हम सबसँ पहिने देखल। नगरक नागरिक : अहाँक की मतलब जे अहाँ सबसँ पहिने हमर देहसँ खून बहैत देखल? मूर्खताक रक्षक : हे नाइ! ई अहाँ सबसँ पहिने कोना देखल? रक्तक तरंग : (अपन मनमे) ई प्रशंसनीय मंत्री राजाक समान प्रतिष्ठित छथि। (प्रकाशमे) हे महान राजा! हम एहि व्यक्तिक नखकेँ काटबाक लेल हुनक अंगुरी पकड़ने रहियै। ठीक तखनहि एहि व्यक्ति अपन आँखिकेँ अपन अंगुरीसँ ढकि लेलनि। तेँ हमर औजार हुनक आँखिमे घुसि गेल आर टूटि गेल। एहि कारणसँ ओ खून बहय लगलाह। मूर्खताक रक्षक : ओ ठीक बात कहलनि। हे नागरिक! अहाँकेँ नाइकेँ अपन नख काटबाक औजारक कीमत देबाक चाही। झुकल-भगवाली : मंत्री राजा जतबे प्रतिष्ठित छथि। द्वारपाल : (प्रवेश करैत) हे महान राजा! एकटा ब्राह्मण, मिथ्यार्णव, मिथ्याक सागर, अहाँसँ भेंट करय चाहैत छथि। विश्व-विदूषक : ओकरा भीतर आबय दिअ। द्वारपाल : आउ। (मिथ्याक सागरक उपस्थितिक सूचना दऽ, चलि जाइत छथि) (मिथ्याक सागर प्रवेश करैत छथि) मिथ्याक सागर : हे महान उपाध्याय! हमर समधी हमर लग रहैत छथि। हुनक घरमे एकटा ब्राह्मणक मृत्यु भ’ गेल छनि। ई ब्राह्मण चारू वेदक अध्ययन केने छलाह, ब्रह्मचर्यक नियमक विशेष पालन केने छलाह, साल भरिमे एक बेर स्नान करैत छलाह, आर मक्खीक पएरक चोटसँ हुनका बहुत घाव भ’ गेल छलनि। ब्राह्मणक मृत्युसँ दुःखी भ’ हम शास्त्रज्ञ पण्डितक खोज करय लगलहुँ। हम अहाँकेँ दलालिनिक घरमे पओलहुँ। अब कृपया हमरा बताउ जे एहि पापक प्रायश्चित्त लेल हमरा सभकेँ कोन तपस्या करबाक चाही। विश्व-विदूषक : (नाकपर अंगुरी टकटका सोचबाक अभिनय करैत, बड़ विचार केला उत्तर बजलाह) जँ ब्राह्मण सचमुच मरि गेला अछि, तँ हुनक पत्नी वा पुत्रकेँ अत्यन्त गरम पानि गोबरक संग मिला पियबाक चाही। एहि प्रकारेँ ओ लोकनि सेहो स्वर्गक मार्ग प्राप्त करता। मिथ्याक सागर : (कानमे धीरे बजैत छथि) ओ मक्खीक पएरक चोटसँ नहि मरलाह। ओ नगरक लोक द्वारा एकटा धोबिनिक संग व्यभिचार करबाक अपराधमे पीट-पीट क’ मारल गेलाह। विश्व-विदूषक : तखन सब लोक पापक कलंकसँ मुक्त भ’ गेल। ब्राह्मण-हत्याक पापसँ लिप्त धोबिनकेँ अनुष्ठान द्वारा शुद्ध क’ घर वापस लऽ आउ। नव-चन्द्ररेखा : अहाँक विद्वता प्रशंसनीय अछि। मिथ्याक सागर : (नव-चन्द्ररेखा दिस देखैत बजैत छथि) के छथि ओ व्यक्ति जे गंगाक तटपर गेला आर कमलक फूल अर्पित क’ भगवान शिवक पूजा केलनि? के छथि ओ व्यक्ति जे शम्बरासुरक शत्रु कामदेवक पूर्ण मनोयोगसँ पूजा केलनि? आर सेहो, के छथि ओ व्यक्ति, जे जानबूझि आर निःस्वार्थ भावसँ अपन प्राण त्यागि दैत अछि जखन गंगा सागरसँ मिलैत अछि? इएह प्रश्न, के छथि ओ भाग्यशाली व्यक्ति जकर गोदमे विश्व-मोहिनी नव-चन्द्ररेखा किछु क्षणक लेल सेहो बैसि शोभा बढ़ाओती? मिथ्याक सागर : (सबकेँ देखि अपन मनमे बजैत छथि) हम एतय एकटा वेश्याकेँ आलिंगन करय आयल छलहुँ, मुदा एतय पहिनहिये अनेक दुष्ट पुरुष जमा छथि। जखन जोंक अपनहि जोंकक देहपर रहैत अछि, तखन एतय ठहरब व्यर्थ अछि। राजा : साधुहिंसक, साधुक पीड़क, नामक मजिस्ट्रेट अखन धरि किएक नहि पहुँचला? (एहि उत्तर साधुक पीड़क, प्रसन्न मुद्रामे, प्रवेश करैत छथि) साधुक पीड़क : तलवारधारी चोर पूरा नगरमे उपद्रव मचा देने अछि। एहि लेल, हम अत्यन्त प्रसन्न भ’ एकटा वेश्यासँ भेंट करय आयल छी। राजा : (डरक ढोंग करैत) हे मंत्री! एहि चोरक कारण भारी भय पसरि गेल अछि। एहि विषयमे की करबाक चाही? मूर्खताक रक्षक : हे महान राजा! सबसँ पहिने सेनाकेँ नीक जकाँ सुसज्जित करबाक चाही। तेकर बाद हमर सुरक्षा, फेर रानीक सुरक्षा, आ अन्तमे राजमहलक सुरक्षा करबाक चाही। राजा : (पीड़ासँ बजैत छथि) महलमे बैसि चन्द्रमाक झलक भेटैत अछि; रानीक संग, हम जीर्ण-शीर्ण भीत गिरबाक डरसँ पूरा राति जागल रहैत छी। सर्प विष लऽ हरदम तैयार रहबाक चाही, कारण मेढ़क रातिभरि टर्रबैत रहैत अछि आर सर्पक ओकरा पकड़बाक डर बनल रहैत अछि। एहि लेल पहिने महलकेँ चोरसँ सुरक्षित करबाक चाही। राजा : अहो! रानीक अवस्था अखन कोना अछि, हमरा जानबाक इच्छा अछि। झुकल-भगवाली : हे परम मंत्री! रानीक बारेमे हमरा किछु आर कहू, जकर लेल राजा एतेक दुखी आ चिन्तित बुझना जाइत छथि। मूर्खताक रक्षक : की एकटा मनुष्यकेँ रानीक गुणक वर्णन करबाक लेल आदिशेषक समान हजार मुँह नहि चाही? झुकल-भगवाली : तैयो, हमरा किछु कहू। हम हुनक गुण सुनबाक इच्छुक छी। मूर्खताक रक्षक : जँ अहाँ एहन आग्रह करैत छी तँ अहाँकेँ संक्षेपमे हुनक गुण बताबैत छी— रानीक मुख अमावस्याक राति जकाँ अन्हार अछि, ओ काजर जकाँ गोर छथि, हुनक सुन्दर आँखि बिलारक आँखि जकाँ अछि; बड़ घैला जकाँ कमर, आर नाभिक नीचाँ लटकैत उच्च स्तन — ई सभ गुण रानीकेँ पूरा दुनियाँक मोहिनी बना दैत अछि। झुकल-भगवाली : हे मित्र! राजा विद्वानमे सर्वश्रेष्ठ छथि, मुदा अहाँ तँ सब कविमे शिरोमणि छी। मूर्खताक रक्षक : हे महान राजा! जँ चोरक भय एतेक बढ़ि गेल अछि आर पसरि गेल अछि, तखन सेनापति रणजम्बुक, युद्धक सियार, केँ किएक नहि बजाउ? (युद्धक सियार प्रवेश करैत, घूमि गर्वसँ बजैत छथि) रणजम्बुक : हे महान राजा! हमर वीरतापूर्ण कार्यक विवरण सुनू। राजा : कहू। रणजम्बुक : हे महान राजा! आइ हम एकटा भ्रमरकेँ लाल फूलसँ मधु पियैत देखलहुँ। राजा : आर तखन? रणजम्बुक : तखने हम कवच पहिरि, अपन हथियार उठा, आर चारि सैनिकक संग, भ्रमरकेँ मोट चमड़ाक रस्सीसँ बान्हि अपन दिस खींचि लेलहुँ। राजा : (प्रसन्नतासँ) फेर की? रणजम्बुक : तेकर बाद हम भ्रमरकेँ अपन तेज तलवारसँ चमड़ाक थैला जकाँ खोखला क’ देलहुँ। राजा : अहाँक वीरताक बारेमे कोनो शंका नहि रहि जाइत अछि। अहाँमे दस हजार हाथीक बल अछि। मूर्खताक रक्षक : हे सेनापति! पापी लोकनिक संग युद्धक बेला आबि गेल अछि। एहिपर अहाँ केहन उत्साहित छी? रणजम्बुक : (संस्कृतमे बजैत छथि) सहवासक बेला जँ अपन पत्नीक पएरमे लगाओल लाल रंगकेँ भ्रमवश खून बुझि हम बेहोश भ’ खसि पड़ैत छी; आर जखन पृथ्वीक सम्पूर्ण भाग अमावस्याक अन्हारसँ ढकल रहैत अछि, तखनो हम बेहोश भ’ जाइत छी। अब कहू, जँ हमरा युद्धक्षेत्रमे खूनसँ नहाएल सैनिक देखय पड़य तँ हमर की हाल होएत। नव-चन्द्ररेखा : (जोरसँ हँसैत छथि) रणजम्बुक : (क्रोधसँ) ओहो! अहाँ दुष्ट वेश्या! हमर मजाक उड़बैत छी! अखने हमरासँ युद्ध किएक नहि करैत छी? (क्रोधक ढोंग करैत छथि) द्वारपाल : हे महान राजा! महायात्रिक, परलोकक भविष्यवक्ता, नामक ज्योतिषी द्वारपर छथि। राजा : हुनका आबय दिअ। (द्वारपाल बजि बाहर जाइत छथि) परलोकक भविष्यवक्ता : (प्रवेश करैत, अपन पोथी खोलि, दक्षिण दिस घूमि पढ़ैत छथि)— सूर्य अहाँक जन्मराशिमे स्थित होअय आर अहाँक स्थितिकेँ नष्ट करय, बृहस्पति अहाँक जन्मकुण्डलीमे रहय आर अहाँक भयकेँ बढ़ाबय, शनि अहाँक अष्टम भावमे रहि अहाँक पीड़ा आर व्याधिकेँ बढ़ाबय, मंगलो अष्टम भावमे रहि अहाँक पूरा परिवारकेँ मारि देतय आर अहाँपर हथियारक प्रहार करतय; आर फेर बलशाली राहु सूर्यक संग अहाँक द्वादश भावमे रहि अहाँक धनकेँ नष्ट करतय। एहि शक्तिशाली ग्रहक स्थितिकेँ देखैत, चन्द्रमा, शुक्र आर बुधक अन्यथा शुभ प्रभाव सेहो मुश्किलेसँ फलदायी भ’ सकत। मूर्खताक रक्षक : अहाँ आशीर्वचन सुनि चुकल छी। एहि क्षण महान राजा युद्धमे जाय चाहैत छथि। तेँ हुनक "महायात्रा"क लेल एकटा शुभ मुहूर्त निकालू। परलोकक भविष्यवक्ता : महान राजाक "महायात्रा" शनि दिन प्रातःकाल, पूर्णिमाक दिन, श्रावण मासमे, वृश्चिक राशिमे होएत। कलहाङ्कुर : तखन ओ निश्चित रूपसँ मरि जाएता। परलोकक भविष्यवक्ता : ओ अपन प्रजाक दुर्भाग्यक दानवकेँ अपन संगे लऽ जाएता। विश्व-विदूषक : (पूब आर पश्चिम दिस देखैत बजैत छथि)— सूर्यक बिम्ब अस्त होबय जा रहल अछि आर चन्द्रमाक बिम्ब बढ़ि उदय होबय जा रहल अछि। कामदेवक क्रोधित आँखि सूर्य आर चन्द्रमाक बिम्बक लालीक नकल करैत अछि, कारण निवासी अपन पत्नीसँ दूर रखल गेल छथि। विश्व-विदूषक : (नव-चन्द्ररेखा दिस देखैत, प्रेमसँ बजैत छथि) कलहाङ्कुर, हे बेटा! साँझ भ’ गेल अछि। तेँ जाउ आर नव-चन्द्ररेखा लग जा हुनक कानमे कहू जे हम एकान्त स्थानमे हुनक संग साँझ ध्यानमे बिताबय चाहैत छी। कलहाङ्कुर : (सुनि अपन मनमे संस्कृतमे बजैत छथि) हमर ई गुरु बड़ दुष्ट छथि; ओ एहि युवतीक संग रति-क्रीड़ा करय चाहैत छथि। आर सेहो, हम हर दिन अपन आदरणीय गुरुक सेवा तत्परतासँ केलहुँ, मुदा एहिसँ हमरा की भेटल? हम हर दिन सूर्यक पूजा केलहुँ, मुदा एहिसँ हमरा की लाभ भेल? हम कठोरतासँ वेदक अध्ययन केलहुँ, मुदा एहिसँ हमरा की फायदा भेल? जँ हमरा स्वर्ग सेहो प्राप्त भ’ जाय, तखन हमरा एहिसँ की लाभ होएत? ई सब निष्फल अछि जँ हम नव-चन्द्ररेखाक कलश जकाँ उच्च स्तनकेँ जोशसँ आलिंगन क’ पसीनासँ प्रेमक आगिकेँ शान्त नहि क’ सकी। कलहाङ्कुर : आर बिलम्ब करब व्यर्थ अछि। किएक नहि हम दृढ़तासँ हुनका आलिंगन क’ हुनक मुख चूमी। (प्रकाशमे आबि नजदीक जाइत छथि) हे नव-चन्द्ररेखा! हमरा अहाँसँ किछु कहबाक अछि। नव-चन्द्ररेखा : जँ उचित हो तँ कहू। कलहाङ्कुर : (संस्कृतमे बजैत छथि)— हमर सभक युवावस्था क्षणभंगुर अछि आर केवल दस-पन्द्रह दिन धरि रहैत अछि; उच्च आर दृढ़ स्तन उमेरक संग झुकि आर लटकि जाइत अछि आर फेर उठि नहि सकैत अछि। हे चन्द्रमुखी नव-चन्द्ररेखा! जीवनक कोनो निश्चितता नहि अछि, ई कतेक दिन रहत, केकरो नहि बुझल अछि। ई सब जानितहु, जखन युवती प्रेम-इच्छुक युवककेँ नकारि दैत छथि, तखन एहि युवतीक दृढ़ स्तन एहि युवकक हृदयमे कँटा जकाँ चुभि जाइत अछि। नव-चन्द्ररेखा : (हल्कासँ मुस्काइत छथि) कलहाङ्कुर : हे नव-चन्द्ररेखा! हमरा अहाँकेँ एकटा रहस्य कहबाक अछि, तेँ कृपया सुनू। (ओ अपन मुख हुनक कानक नजदीक ल’ जा, हुनका दृढ़तासँ आलिंगन क’, हुनक मुख तीव्रतासँ चूमैत छथि। आर फेर संस्कृतमे बजैत छथि) देवता सेहो नव-चन्द्ररेखाक ओठक अमृत नहि पिबि सकल होएता। एहि लेल आश्चर्य नहि जे देवता राहुक मुखसँ खसल चन्द्रमा-रूपी अमृतसँ हर्षपूर्वक सन्तुष्ट भ’ गेल छथि। विश्व-विदूषक : (क्रोधसँ) हे दुष्ट बालक! तूँ ई प्रायश्चित्त करब जे तूँ नव-चन्द्ररेखाकेँ आलिंगन आर चूमल, जकरा हम शुरूएसँ चाहैत छलहुँ। कलहाङ्कुर : अहीं प्रायश्चित्त करू, कारण अहाँ ओहि नारीक इच्छा राखैत छी जकरा अहाँक शिष्य द्वारा पहिनहि आलिंगन कएल जा चुकल अछि। विश्व-विदूषक : हाथीक सूँढ़केँ जकर नामसँ नाम भेटैत अछि, अहाँक देहक ओ अंग, यानि हाथ, काटि देबाक चाही, कारण अहाँ अपन गुरुक इच्छित युवतीकेँ स्पर्श केलहुँ। कलहाङ्कुर : जखन अहाँ अपन शिष्य द्वारा चुम्बित नव-चन्द्ररेखाकेँ अपन इच्छित नारी कहि रहल छी, तखन सुन्दर स्त्रीक कमरकेँ शोभा दयवाला अंग काटि देबाक योग्य अछि। विश्व-विदूषक : अहाँक ओ दाँत, जे अहाँक ओठसँ ढकल अछि, ओकरा उखाड़ि देबाक चाही, कारण अहाँ नव-चन्द्ररेखाक ओठकेँ दाँतसँ चोट पहुँचेलहुँ। कलहाङ्कुर : अहाँक लिंग, जकर शब्द "लिगि" धातुक आगाँ स्वर जोड़ि बनैत अछि, ओ लिंग उखाड़बाक योग्य अछि। कारण एहि लिंगसँ अहाँ ओहि युवतीकेँ सतायब जकरा अहाँक शिष्य चूमि चुकल अछि। (एहि तरहेँ ओ दुनू गोटे नाचि-नाचि झगड़ा करैत छथि आर सब उपस्थित लोक हँसैत छथि) (एकटा भाट पर्दाक पाछाँसँ बजैत छथि) कसकसा आलिंगित, साहसी आर परिपक्व नारीक आँखि प्रेम-क्रीड़ाक महान आनन्दक कल्पनासँ चंचल भ’ जाइत अछि। भोली आर अनभिज्ञ नारीक विचलित आँखि प्रेम-युद्धमे पराजित होबाक भयकेँ प्रतिबिम्बित करैत अछि। जिनक पति यात्रापर गेल छथि, ओहन नारी अश्रुपूर्ण आँखिसँ, हृदयमे एकाकीपनक संग — ई सब नारी, भले एक-दोसरसँ रक्त-सम्बन्ध नहि रखनिहार, पहाड़ पाछाँ अस्त होइत उग्र सूर्यकेँ पीड़ासँ देखि रहल छथि। आर सेहो, पश्चिममे सूर्यदेवक अस्त होयबाक संग चन्द्रमाक किरण अखन झुलसैत आ कमलकेँ मुरझा रहल अछि। राति आबि जायसँ बड़-बड़ काला भ्रमर कमलकेँ त्यागि रहल छथि, आर अस्त होइत सूर्य हुनका प्रकाशसँ वंचित क’ रहल अछि — ओ ओहि नारी जकाँ छथि जे अपन पतिक यात्रापर जायबाक चिन्तासँ व्याकुल छथि। (एकटा दोसर भाट गबैत छथि) किछु क्षण पहिने धरि देखाइत, सूर्यक बिम्ब कतय चलि गेल? किछु क्षण पहिने धरि सुनाइत चक्रवाक पक्षीक बोली कतय चलि गेल? किछु क्षण पहिने धरि अपन शर्म त्यागि प्रेम-क्रीड़ामे लागल हंस-हंसिनी कतय चलि गेल? चन्द्रमा उदय भ’ गेल अछि, अस्त सूर्यक किरणसँ लाल-लाल, ओहि क्रोधित नारीक चेहरा जकाँ जकरा पता चलैत अछि जे हुनक पति दोसरा नारीसँ जुड़ल छथि; भ्रमरक गान सुनि कमलक झुण्ड जागि उठैत अछि आर अपन प्रसन्नता प्रकट करय हँसैत जकाँ बुझना जाइत अछि। आर सेहो, उगैत चन्द्रमाक मण्डल देखि हृदयमे शंका उठैत अछि जे की ई सचमुच स्वर्गवासीक अमृत पीबाक सुन्दर कटोरा अछि? या ई कामदेवक पत्नी रतिक खेलैवाला गेंद अछि? नहि तँ, की ई गंगाक फेनक ढेर अछि? या फेर, की ई राजा कामदेवक छाता अछि? या ई कीर्तिक विशाल खजाना अछि? मूर्खताक रक्षक : साँझ भ’ गेल अछि, तेँ अहाँ अपन दैनिक नियम पूर्ण करय किएक नहि जाइत छी? राजा : दैनिक नियम पूर्ण करलासँ की भलाइ होएत? हम चोरसँ उत्पन्न उपद्रवसँ चिन्तित छी। तैयो हम जाएब। मुदा थोड़ेक ठहरू: उपाध्याय आर हुनक शिष्यक बीचक शत्रुता देखू। विश्व-विदूषक : (हाथमे छड़ी लऽ क्रोधसँ दौड़ैत छथि) कलहाङ्कुर : (चिचिआइत, पूरा देह हिलबैत छथि) (एहि उत्तर दुनू गोटे नव-चन्द्ररेखाक कपड़ा पकड़ि नाचैत झगड़ा करैत छथि आर कहैत छथि, "ई हमर अछि!" "ई हमर अछि!") झुकल-भगवाली : हे स्वामी! हे उपाध्याय! कृपया आइ ई झगड़ा समाप्त करू। राति भ’ गेल अछि। काल्हि सबेर मदनान्धमिश्र, कामसँ अन्हरायल, नामक एकटा उपाध्याय नव-चन्द्ररेखाकेँ शिक्षा देबाक लेल एतय आयत। अहाँ दुनू गोटेकेँ जे ओ आदेश देत, ओ मानय पड़त। विश्व-विदूषक व कलहाङ्कुर : अहिना होअय। (सब चलि जाइत छथि) सभा-निर्णय, परिषदक निर्णय, हास्यार्णव-प्रहसानक प्रथम अंक समाप्त भेल। द्वितीय अंक (दोसर दिन सबेर। विश्व-विदूषक आर कलहाङ्कुर प्रवेश करैत छथि) विश्व-विदूषक : (पूब दिस देखैत) अहो! पूब दिशामे सूर्यक किरण नारीक माथाक सिनुर जकाँ लाल बुझा रहल अछि। (घूमि, सोझामे तालाब दिस देखैत) पति राति भरि रत्रि-क्रीड़ामे अपन प्रेयसीक संग बितेला उत्तर सबेर सूर्योदयक संग नायिकाक सोझाँ ठाढ़ भेल पाबि, ओ अपन प्रेयसीक रक्तवर्ण आर क्रोधित आँखिसँ ओकरा देखैत अछि; ठीक ओहिना तालाबक लाल कमल अखन प्रातःकालक लाल किरणमे आर बेसी लाल देखाइत अछि, कारण सूर्य पूरा राति धरतीक कोनो आन भागमे बितेने अछि। आर सेहो, सबेरक पवनक प्रवाह हृदयकेँ बड़ आनन्द दैत अछि, कारण एहिमे दिन-कमलक सुखद सुगन्ध घुलल अछि। एहिमे कस्तूरी आर सिनुरक मीठ सुगन्ध सेहो अछि, जे प्रेम-क्रीड़ामे थकित नारीक पसीनासँ धुजल-मुजल भ’ लाल-कारी रंगक संग बहि रहल अछि। विश्व-विदूषक व कलहाङ्कुर : (दुनू गोटे घूमि झुकल-भगवालीक घर दिस आबि, प्रवेश करैत, एकहि संग कहैत छथि) झुकल-भगवाली आर नव-चन्द्ररेखा कतय छथि? (झुकल-भगवाली आर नव-चन्द्ररेखा प्रवेश करैत छथि) विश्व-विदूषक : (नव-चन्द्ररेखा दिस देखैत, बजैत छथि) जँ नव-चन्द्ररेखा, जकर मुख शरदऋतुक चन्द्रमा जकाँ अछि, हमरा दिस चंचल दृष्टिसँ देखय, तखन नील कमल दिस, जे हुनक कानमे शोभा दैत अछि, के देखत? आर सेहो, भगवान शिवक लेल सेहो नव-चन्द्ररेखाक निन्न-भरल, चंचल कटाक्षभरल आँखिकेँ नकारब कठिन अछि। कलहाङ्कुर : हे झुकल-भगवाली! की मदनान्धमिश्र, कामसँ अन्हरायल, अखन तक नहि पहुँचला? (पर्दाक पाछाँसँ) जकर पवित्र यज्ञोपवीत वेश्याक सुगन्धित लेपसँ लाल भ’ गेल अछि, जकर आँखि गाँजाक शराब पिबिकऽ लाल भ’ गेल अछि, जकर पूरा माथा चन्दनसँ लिपल अछि, आर जे पूरा तरहेँ धार्मिक पूजा-पाठ त्यागि चुकल छथि — एहन गुणक मूर्तिमन्त रूप स्वयं आबि रहला अछि। (कामसँ अन्हरायल अपन शिष्य कुलाल, जंगली मुरगा, संग प्रवेश करैत देखल जाइत छथि) कामसँ अन्हरायल : (आगू देखैत) देखू! आम्रवृक्षक चारू कात भ्रमरक गुंजार सुनि आर सारस आ कोयलिक मीठ गान सुनि, ई बसन्त प्रेमीसँ बिछुरल सुन्दर स्त्री-सभक गरम साँससँ गूंजि रहल अछि। आर सेहो, कावेरी नदीक जलमे खेलैत नारीक हाथसँ छिटकल शीतल जलक बूँदसँ स्पर्शित, उजरा चन्दनक सुगन्धसँ भरल, प्रेमक उत्साह जगाबैत, दक्षिणी पवन आम्रवृक्षपर लागल कोंपलक झुण्डकेँ धीरे-धीरे हिला रहल अछि, आर लताक फूलक पूर्ण खिलावटक स्पर्शसँ किछु डरल जकाँ बुझना जाइत अछि, जेना ओ रजस्वला नारीसँ मिल गेल हो। कामसँ अन्हरायल : (अपन मनमे) हम एहि बसन्त ऋतुकेँ वेश्याक बिना कोना बितायब? (प्रकाशमे) जंगली मुरगा, हे बेटा! देखू, अखन दुपहर भ’ गेल अछि— भगवान सूर्य अपन किरणसँ धरतीकेँ गरम क’ रहला अछि। सब पक्षी लताक कुंजक सुरक्षामे चलि गेल अछि। हंस देदीप्यमान खिलल कमलक नीचाँ जा स्थिर भ’ गेल अछि। थकल आ दुखी यात्री, जिनक हृदय पत्नीसँ लम्बा जुदाइक तीव्र पीड़ासँ जरि रहल अछि, टहनीविहीन वृक्षक छाहरिमे बैसि निरन्तर लम्बा साँस लैत किछु लिखि रहल छथि। जंगली मुरगा : हे सज्जन! एहि नगरमे झुकल-भगवाली नामक एकटा दलालिनि रहैत छथि। ई सुनल जाइत अछि जे ओ मेहमानकेँ बड़ नीक जकाँ सत्कार करैत छथि। तेँ हमरा सभकेँ ओतय भोजन करबाक चाही। कामसँ अन्हरायल : की ओ उच्च कुलक छथि? जंगली मुरगा : एहिमे कोन शंका? हुनक घरमे तँ निम्नतम जातिक व्यक्ति सेहो पानि पिबि लैत छथि। कामसँ अन्हरायल : (उत्साहसँ) हे बेटा! तखन चलू। (एहि उत्तर दुनू गोटे झुकल-भगवालीक घर दिस मुड़ि, प्रवेश करबासँ पहिनहि) झुकल-भगवाली : हे कामसँ अन्हरायल! कृपया एहि सुन्दर आसनपर बैसू। कामसँ अन्हरायल : (बैसबाक अभिनय करैत, सबकेँ देखि, फेर अपन मनमे बजैत छथि) की ई आश्चर्यक बात नहि जे नारी-रत्न नव-चन्द्ररेखा हमर सोझाँ अछि? लाल पोशाकक बीचमे झलकैत नव-चन्द्ररेखाक स्तन उगैत अर्ध-चन्द्रक आकारमे अछि; ओ पूर्वी पहाड़सँ उगैत चन्द्रमाक चमकैत टुकड़ी जकाँ अछि। ओ अपन भउँह सिकोड़ैत छथि, कामुक आर चंचल दृष्टि फेकैत छथि, जाहिसँ भ्रम होइत अछि जेना एकटा भ्रमर बड़ केतकी फूलक पंखुड़ी खींचि रहल हो। कोन पुरुष एहि दृश्यकेँ देखि व्याकुल नहि होएत आर हुनका दिस देखबाक लेल विवश नहि भ’ जाएत। आर सेहो, नव-चन्द्ररेखाक देह एकटा शानदार वनक समान अछि। हुनक उच्च स्तन अगम पहाड़ जकाँ लगैत अछि, हुनक नाभिक क्षेत्र नीचाँ अछि, हुनक कँपैत, फड़कैत बाँहि एकटा सुन्दर भ्रमरक झुण्डक शोभा दैत अछि। एहि सब भावकेँ देखि, हृदयमे थोड़ेक डर होइत अछि जे कामदेव स्वयं शिकारीक रूप धारण क’ अपन चंचल दृष्टिक तीक्ष्ण बाणसँ प्रहार क’ रहल छथि। हे हमर हिरणसदृश हृदय! कहू, कतय शरण लेब अहाँ अपना बचेबाक लेल? कामसँ अन्हरायल : (एना कहि, अपन मनमे बजैत छथि) कलहाङ्कुर आर विश्व-विदूषककेँ कोना धोखा दी? ठीक अछि, हम वैष्णव सम्प्रदायक अनुयायी होबाक ढोंग क’ हुनका ठकब। (प्रकाशमे) हे जिह्वा! तूँ सदिखन विष्णुक नाम दोहराबय पड़त। हे नेत्र! भगवान पूरा संसारमे व्याप्त छथि — तूँ एहि दृष्टिएँ देखय पड़त। हे कान! तूँ सदिखन भगवानक महिमा सुनय पड़त। हे हृदय! तूँ पूरा दृढ़तासँ बुझय पड़त जे भगवान नारायणे सबहक शरणस्थल छथि। (फेर अपन मनमे) आह! हम भगवानक नाम लेल एकटा महापाप क’ देलहुँ। अब एहि पापक प्रायश्चित्त लेल हमरा की करबाक चाही? विश्व-विदूषक : (सुनि अपन मनमे बजैत छथि) कामसँ अन्हरायल एकटा धूर्त छथि, आर वैष्णव सम्प्रदायक नामसँ धोखा देबाक प्रयास करैत छथि। ठीक अछि, हमहूँ हुनका किछु देखेबैक। (प्रकाशमे) जे तीनू लोकक शिरोमणि छथि आर जकर रूप नीलमणि समान अछि, जे भ्रमरक समान लक्ष्मी देवीक कमल-समान मुखक पाछाँ लागल रहैत छथि, जकर वर्ण असुरक पत्नीक आँखिमे आँसू लाबय बला धुआँ जकाँ अछि — हम सदिखन अपन हृदयमे भगवान कृष्णक ध्यान करैत छी। कामसँ अन्हरायल : (क्रोधसँ) हे जंगली मुरगा, बेटा! अब तूँ वैष्णव सम्प्रदायक सिद्धान्तक विस्तार करू। जंगली मुरगा : हे स्वामी! जे अहाँ आज्ञा करैत छी। (संस्कृतमे बजैत छथि) कलियुगमे मनुष्यक आयु स्वाभाविक रूपेँ छोट अछि। एकर उपर, दुष्ट लोग दोसरा लोककेँ उपवास आर बिबिध शारीरिक कठोरता करय बाध्य क’, देहकेँ नष्ट क’ दैत छथि। जे बुद्धिमान छथि, ओ शारीरिक कठोरताक निरर्थकतासँ अवगत छथि आर एहन धर्म आर पूजाक विधिकेँ पसन्द करैत छथि जाहिमे भोग-विलासक जीवन आर वेश्याक दुआरे भेटैत आनन्द शामिल अछि। विश्व-विदूषक : (क्रोधसँ) कलहाङ्कुर, हे बेटा! तूँ वैष्णव सिद्धान्तक विस्तार करू। कलहाङ्कुर : (संस्कृतमे बजैत छथि) मूर्ख लोकनिक तिरस्कारक डरसँ यदि कोनो व्यक्ति भारी कष्ट सहितहुँ उपवास करैत अछि, आर रातिमे आबय बला मृत्युक भयसँ भीतरी पीड़ा सहैत अछि, तैयो जीबय लेल मनुष्यकेँ सबसँ पहिने सबेर उठिकऽ खएबाक जरूरत होइते अछि। एहि तरहेँ, ई सच्चा भय अछि जे भूखल रहि उपवास करलासँ जीवन सचमुच समाप्त भ’ सकैत अछि। जँ मृत्युक ई तरीका अछि तँ पूर्ण मुक्ति कोना सम्भव भ’ सकत? आर सेहो, पीड़ादायक उपवास पालन करलासँ पुण्य भेटैत अछि — एना कहनिहार पुरोहितक मुखपर राखक लेप लगाओल जेबाक चाही। परम मुक्ति तखने सम्भव अछि जखन सर्वोच्च आर अतुलनीय भगवान शिवकेँ मांस, माछ आर स्त्रीक अर्पण द’ प्रसन्न कएल जाय। कामसँ अन्हरायल : (सुनि, अपन मनमे बजैत छथि) ई उपाध्याय बड़ चतुर अछि, एकरा ठकब सम्भव नहि। बूढ़ बिलारकेँ खट्टा भात खुआ फँसाएब बेकार अछि। ठीक अछि, हम विनम्रता देखा हुनका ठकबैक। (प्रकाशमे) कामसँ अन्हरायल : हे स्वामी! हम अहाँकेँ प्रणाम करैत छी। विश्व-विदूषक : (ऊँच स्वरमे) हे मित्र! अहाँ दीर्घायु होउ! मुदा अहाँ जकाँ लोककेँ पहिने झुकल-भगवाली, बहुजन-सेविता स्त्री, उपस्थित रहितहुँ हमरा पहिने प्रणाम करब उचित नहि लगैत अछि। कामसँ अन्हरायल : ओहो! हम अहाँकेँ झुकल-भगवाली बुझि प्रणाम क’ देलहुँ। विश्व-विदूषक : (हँसैत) ई सचमुच कामसँ अन्हरायल छथि। एहि लेल ओ एकटा पुरुषकेँ झुकल-भगवाली, दलालिनि, बुझि लेलनि। कामसँ अन्हरायल : (नजदीक जा) हे झुकल-भगवाली! हम अहाँकेँ आदरपूर्ण प्रणाम करैत छी। झुकल-भगवाली : हे बेटा! हुनका उठाउ आर हुनकापर आशीर्वाद कहू। नव-चन्द्ररेखा : (ठाढ़ भ’) गौरी, भगवान शिवक अर्धांगिनी, अहाँपर प्रसन्न होथि। (नव-चन्द्ररेखा एना कहि लजाइत छथि) कामसँ अन्हरायल : ओहो! नव-चन्द्ररेखाकेँ देखि हम आश्चर्यचकित छी— हिरणक समान आँखिबाली नव-चन्द्ररेखाक दुनू पएर बड़ कठिनाईसँ हुनक अत्यन्त बड़ नितम्बक भारकेँ सम्हारि रहल अछि। हुनक अनुपम कमर कोना हुनक दुनू उच्च स्तनक भार सम्हारि सकैत अछि, जे हाथीक गालक समान अछि। झुकल-भगवाली : हे उत्तम ब्राह्मण! हम अहाँकेँ सूचित करैत छी जे आइ हमरा घरमे कामदेवक निमित्त हवन आयोजित अछि। तेँ कृपया एहिमे पौरोहित्य करू आर एकरा सम्पन्न करू। कामसँ अन्हरायल : (अपन मनमे) हिरणक आँखिबाली नव-चन्द्ररेखाक जांघक गड्ढा यज्ञक वेदीक काज करत; हुनक जांघक पास हुनक योनि, जे भोगी पुरुषक चाहबाक स्थान अछि, ओ यज्ञक कुंड बनत; हुनक स्तन यज्ञक फलक रूपमे कार्य करत। अत्यधिक जरैत कामाग्नि यज्ञक अग्नि बनत; हम पुरोहित बनब आर हमर वीर्य यज्ञमे अर्पित सामग्री बनत, जखन कि हमर लिंग यज्ञक चम्मच, स्फ्य, बनत। एहि सब तात्कालिक तृप्ति दयवाला सामग्री लऽ, के पुरुष एहन कामुक अग्निहोत्र करबासँ इन्कार करत? (प्रकाशमे) हे झुकल-भगवाली! बुढ़ारीएँ अहाँक देह कमजोर भ’ गेल अछि। एहिसँ अहाँ अपन कर्तव्य निभाय असमर्थ छी। तेँ अहाँकेँ अपन बेटीकेँ यज्ञ-सामग्री जुटेबाक लेल नियुक्त करबाक चाही। झुकल-भगवाली : हे बेटी! आदरणीय ब्राह्मणक इच्छाक अनुसरण करू। (नव-चन्द्ररेखा घरक भीतर जाइत छथि) कलहाङ्कुर : (नजदीक आबि) पहिने हम दुनू, गुरु आ शिष्यक बीचक झगड़ा समाप्त करू। कामसँ अन्हरायल : हे बेटा! थोड़ेक ठहरू। ताबत धरि यज्ञ पूर्ण भ’ जाएत। (कामसँ अन्हरायल घरक भीतर जा, नव-चन्द्ररेखाक संग तीव्र सम्भोग क’, प्रसन्नतासँ बजैत छथि) हुनक स्तन आलिंगनसँ दबि गेल अछि, अत्यधिक परिश्रमक कारण हुनक मुख पसीनासँ भरल अछि; ओ आँखि मूनि चूमला उत्तर आनन्दक सूचक ध्वनि निकालैत छथि, हुनक भउँह सुन्दर अछि आर हुनक कटाक्ष दृष्टि सेहो चंचल अछि — ठकबाजक चिकनी बातसँ प्रशंसा प्राप्त एहन वेश्याक आनन्द केवल ओहि मनुष्य पाबि सकैत छथि जे सए वर्ष धरि बिबिध पुण्य जुटा चुकल होथि। विश्व-विदूषक : (नव-चन्द्ररेखा दिस देखैत, अपन मनमे बजैत छथि) नव-चन्द्ररेखाक दुनू सुन्दर आँखिसँ काजर धोआएल गेल अछि, हुनक ओठक लाली सेहो धोआएल गेल अछि, माथाक जूड़ा ढील पड़ि गेल अछि, प्रेम-क्रीड़ाक पसीनासँ हुनक देहसँ चन्दनक लेप पोछा गेल अछि। हुनक जांघ अब नहि कँपि रहल अछि, हुनक हाथ शिथिल भ’ गेल अछि आर छाती बेर-बेर काँपि रहल अछि। एहि सब संकेतकेँ देखि, ई निश्चित बुझना जाइत अछि जे ओ सम्भोगक बाद एहि दिस आबि रहल छथि। जंगली मुरगा : (आगू आबि जोरसँ हँसैत) हे सज्जन! एक व्यक्ति यज्ञ पूर्ण क’ चुकल छथि। कामसँ अन्हरायल : (अपन बामा आँखि बन्द क’ इशारा करैत, ओकरा रोकैत छथि) जंगली मुरगा : हमरा रोकिकऽ अहाँकेँ की भेटत? एक व्यक्तिक अर्जित पुण्यसँ दोसराक शुद्धि तँ नहि भ’ सकैत अछि, है नहि? कामसँ अन्हरायल : हे बेटा! एक मिनट ठहरू। विश्व-विदूषक : (मुस्कुराइत) हे महान कामसँ अन्हरायल! हम अहाँक यज्ञक समापनक विषयमे अब जानि चुकल छी। तैयो, अहाँकेँ हमरा दुनू गोटेक बीच न्याय करबाक चाही। (कामसँ अन्हरायलक कानमे) अहाँ एहन ढंगसँ काज करू जाहिसँ हमर विवाह नव-चन्द्ररेखाक संग भ’ सकय। कामसँ अन्हरायल : हम दुनू गोटे हुनकासँ विवाह करब। विश्व-विदूषक : एहिमे की हानि अछि? देखू— एहि संसारमे राजा भोजक बेटी, कुन्ती आर माद्री, छओ राजा — धर्म, पवन, इन्द्र, दुनू अश्विनी कुमार, आर पाण्डु — केँ विवाहित छलीह, आर तैयो पतिव्रता कहेलीह। द्रौपदी सेहो युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल आ सहदेव, पाँचो पाण्डवक पत्नी छलीह। एहिसँ बुझना जाइत अछि जे एकटा नारीक अनेक पुरुषसँ विवाह होएब कोनो पाप नहि अछि। जंगली मुरगा : (अपन मनमे) ई दुनू दुष्ट व्यक्ति एक-दोसरसँ मिल गेल छथि। हमरो अब कलहाङ्कुरसँ मित्रता करबाक चाही। (मुड़ि कलहाङ्कुरकेँ आलिंगन क’ कानमे फुसफुसाइत छथि)— हे मित्र! देखू, ई दुनू व्यक्ति मित्रता क’ लेलनि आर दुनू गोटे नव-चन्द्ररेखासँ विवाह करता। तखन किएक नहि हम दुनू गोटे झुकल-भगवालीसँ विवाह करी? कलहाङ्कुर : हे मित्र! हमरा नहि लगैत अछि जे अहाँ ठीक बात कहलहुँ। हमरा सभकेँ एकटा बुढ़िया नारीक संग सम्भोगक कोनो अनुभव नहि अछि। फेर, ई बड़ दुःखक बात अछि जे ई दुनू बूढ़ पुरुष नव-चन्द्ररेखा, तीनू लोककेँ मोहित करय बाली नारीसँ विवाह करता। जासमीनक माला बानरक कलाइमे शोभा नहि दैत, मूर्ख देहातीकेँ कस्तूरीक ज्ञान नहि होइत, आर मोतीक हार बूढ़ नारीक स्तनकेँ शोभा नहि दैत। जंगली मुरगा : हे मित्र! अहाँकेँ की लगैत अछि ई दुनू बूढ़ पुरुष कतेक दिन जीबता? हुनका दुनूक मृत्युक बाद हम दुनू गोटे नव-चन्द्ररेखासँ विवाह करब। कलहाङ्कुर : ई ठीक बात अछि, मुदा हमरा अखनो दुःख भ’ रहल अछि। जंगली मुरगा : जखन ई दुनू बूढ़ पुरुष रोज भीख मांगय जाएता, तखन ओ दुनूक अनुपस्थितिमे नव-चन्द्ररेखा घरमे रहती। झुकल-भगवालीक आँखिमे मोतियाबिन्द अछि। तेँ एहि समयमे हम सभ अपन इच्छित कार्य पूर्ण क’ सकब। कलहाङ्कुर : हे मित्र! अहाँ जे कहलहुँ ओहिना होअव। झुकल-भगवाली : (अपन मनमे हँसैत) ई दुनू ठग एक-दोसरसँ मिलि गेल छथि, आ अब एक-दोसराकेँ नीक जकाँ जानि रहल छथि। कामसँ अन्हरायल : हे विद्वान गुरु! अहाँ दुनूक बीच कोन विवाद अछि? की समस्या अछि? विश्व-विदूषक : ई नव-चन्द्ररेखासँ विवाह करय चाहैत अछि, मुदा हमहूँ हुनकासँ इच्छा राखैत छी। कामसँ अन्हरायल : हे कलहाङ्कुर! एहि विषयमे अहाँक की कहब अछि? कलहाङ्कुर : भलेहि हम नव-चन्द्ररेखाकेँ आलिंगन आ चुम्बन केलहुँ, फेरो ओ हुनकासँ विवाह करय चाहैत छथि? कामसँ अन्हरायल : हम न्यायक मूल तत्त्व जनैत छी; झुरझुराएल आर क्षीण चीज भोगबामे कोनो आनन्द नहि अछि। अहाँक गुरुए पहिने नव-चन्द्ररेखाकेँ चाहलनि, तेँ किछु अंशमे ओ हुनके छथि। मुदा हमरा सभक समझौता उत्तर ओ पूर्णतः हमर छथि। (एना कहि, घूमि) हे बेटा! तूँ बारह वर्षक वर छह। झुकल-भगवाली, जे सए वर्षसँ बेसी बूढ़ छथि आर अपन प्रेमीक संख्या अपन झुर्रीसँ गिनैत छथि, ओ तोहर योग्य कन्या छथि। जंगली मुरगा : (नजदीक आबि संस्कृतमे बजैत छथि) अहाँ ई समझौता क’ लेलहुँ, आर हम अहाँक शिष्य छी, तेँ नव-चन्द्ररेखा हमरो अछि। कामसँ अन्हरायल : हे कलहाङ्कुर! बेटा! स्वीकार करू, आर हमर शिष्य जंगली मुरगाक संग झुकल-भगवालीसँ विवाहक लेल राजी होउ। कलहाङ्कुर : जे विद्वान ब्राह्मण आज्ञा करैत छथि। झुकल-भगवाली : (अपन मनमे संस्कृतमे बजैत छथि) अहो! विधाताजी हमरापर प्रसन्न बुझना जाइत छथि। हम अपन बुढ़ारीमे दू युवा पति पाबि रहल छी। विश्व-विदूषक : (कलहाङ्कुरकेँ देखि, मुस्काइत, अपन मनमे बजैत छथि) ई बालक अपन छोट लिंगसँ एहि छिद्रमे की करत जाहिसँ एकटा शिशुक जन्म भेल छैक? (प्रकाशमे) विवाहक समय नजदीक अबैत जा रहल अछि। तेँ महानिन्दक, महान निन्दक, जे विवादित दक्षिणी भूमिमे रहैत छथि, हुनका किएक नहि बजाउ? (महान निन्दक प्रवेश करैत, सबकेँ देखि, अत्यन्त गर्वसँ बजैत छथि)— महान निन्दक : की एहि पूरा ब्रह्मांडमे कोनो ब्राह्मण अछि जे हमरासँ धार्मिक विवादमे आर वंशावलीमे हमर तुलना क’ सकय? (फेर, गर्वसँ) हम चारू वेदक रचना केने छी। कलहाङ्कुर : हे स्वामी! वेद तँ भगवान ब्रह्माक मुखसँ प्रकट भेल छल। अहाँ ओकर रचना कोना क’ सकैत छी? महान निन्दक : (क्रोधसँ) आह! अहाँ ओहि मूर्ख ब्रह्माकेँ वेदक रचयिता मानैत छी! हम स्वर्ग गेल छलहुँ ब्रह्माक वंशावली जाँचबाक लेल। सुनू— जखन भगवान शंकर अपन जटामे बन्द गंगाक जलसँ ब्रह्माक पएर धोलनि, तखन क्रोधित ब्रह्मा अपन हाथसँ भगवान शंकरकेँ पीटलनि। भयभीत भ’ भगवान शंकर ब्रह्माकेँ प्रणाम केलनि, मुदा ब्रह्मा हुनका दीर्घायुक आशीर्वाद नहि देलनि। जखन देवताक गुरु बृहस्पति हुनक सोझाँ आयल, ब्रह्मा हुनका देखबहुँ नहि केलनि, ओ बृहस्पतिकेँ तेतीस देवतासँ उपहार लेबाक कारण पापी मानैत छलाह। कामसँ अन्हरायल : शब्दक ई बाढ़ि रोकू। अब अहाँ ई दुनू विवाह सम्पन्न करू। महान निन्दक : हम दान वा उपहारक रूपमे किछु नहि लैत छी। जंगली मुरगा : एकटा वेश्यासँ उपहार लेबामे की हानि अछि? महान निन्दक : अहाँ ठीक कहलहुँ। एकरासँ पहिने हमरा नहि बुझल छल जे ई दलालिनि उच्च कुलक छथि। (आदरसँ) हे स्वामी! कोन नारीक विवाह कोन पुरुषसँ होएत? विश्व-विदूषक : हिरणक आँखिबाली नव-चन्द्ररेखा हमरा दुनू योग्य उपाध्यायसँ विवाह करती, जखन कि झुकल-भगवाली, जकर आँखिमे मोतियाबिन्द अछि, ई दुनू शिष्यसँ विवाह करती। महान निन्दक : (हँसैत, अपन मनमे) अहो! ई आश्चर्यक बात अछि। (नव-चन्द्ररेखा दिस देखैत) आश्चर्यक बात अछि जे हुनक आँखिक तीक्ष्ण बाणसँ आहत भेलाक बादो, की कोनो पुरुष अछि जे हिरणक आँखिबाली नव-चन्द्ररेखाक संग रहबाक इच्छा त्यागत? आर सेहो, नव-चन्द्ररेखाक अत्यन्त उजरा आँखि, जकर मध्यमे चंचल पुतरी अछि, दृढ़ हृदयकेँ सेहो चीर सकैत अछि, ई समुद्र-मन्थनसँ निकलल दूध जकाँ विष अछि। भगवान शिव सेहो एकरा सहन करबाक शक्ति नहि रखैत छथि। मुदा एहि क्षण जँ हम नव-चन्द्ररेखाकेँ दृढ़तासँ आलिंगन नहि करब, तँ शायद हम जीवित नहि रहब। (प्रकाशमे) हुनक चन्द्रमा जकाँ मुखक श्वेत आभासत्तावो, हिरणक आँखिबाली नव-चन्द्ररेखाक ढकल स्तन खिलल नहि अछि। मुदा हुनक चन्द्रमुखी मुखक उपस्थिति सत्तावो, हुनक भउँहबाले, कमल जकाँ आँखि खुलि रहल अछि। हुनक आँखिक ई खिलावट बेर-बेर हमर हृदयमे शंका उठा रहल अछि। आर सेहो, अहो! ई लोक मूर्ख छथि — हिरणक आँखिबाली नव-चन्द्ररेखाक ओठ पिबय जोग अमृत अछि, हुनक जांघक ऊपरक भाग रहय जोग स्थान अछि, हुनक हिरणसदृश आँखि हमर एकमात्र मित्र अछि, हुनक सुन्दर वाक्य उत्तम मंत्रोच्चारणक समान अछि, हुनक कमलसदृश देह ध्यानक योग्य अछि — जँ हुनक देहक समान तपोवन अछि, तँ किएक विद्वान ऋषि जंगलमे तपस्या करय जाइत छथि? सुनू! सुनू! उपाध्याय! महायात्रिक, परलोकक भविष्यवक्ता, ज्योतिषीकेँ किएक नहि बजाउ विवाहक शुभ मुहूर्त निकालबाक लेल? (परलोकक भविष्यवक्ता प्रवेश करैत, पंचांग खोलि बजैत छथि)— परलोकक भविष्यवक्ता : हे पुरोहित! की गणना करबाक अछि? कामसँ अन्हरायल : विवाहक शुभ मुहूर्त निकालू। परलोकक भविष्यवक्ता : (अपन कनिष्ठा अंगुरी भूमिपर रखि) जे शुभ मुहूर्त हो, जे भी दिन हो, जे भी नक्षत्र हो, जकाज करबाक अछि, ओ हुनका जल्दी करबाक चाही। महान निन्दक : (अपन मनमे) ई ज्योतिषी सक्षम छथि। (प्रकाशमे) सुनू ज्योतिषी! एहि शुभ मुहूर्तमे विधवापनक कोनो संयोग तँ नहि अछि की? परलोकक भविष्यवक्ता : की धरती एहि नारीक लेल पुरुषविहीन भ’ गेल अछि जे ओ सदा विधवा रहती? महान निन्दक : हे विदूषक आर सब उपस्थित लोक! बिल्व, कठबेलक पात, आर माला हाथमे लऽ अपन-अपन भावी पत्नीक नजदीक जाउ। परलोकक भविष्यवक्ता : ई सजावट तँ मरनासन्न पुरुषक लेल उपयुक्त अछि। (सब पुरुष अपन-अपन भावी पत्नीक हाथ पकड़ि बैसि जाइत छथि: झुकल-भगवाली दुनू शिष्यक बीच, आर नव-चन्द्ररेखा दुनू उपाध्यायक बीच। अत्यन्त दुःखसँ नव-चन्द्ररेखा अपने मनमे बजैत छथि)— नव-चन्द्ररेखा : हम अत्यन्त एकान्त स्थानपर बैसि देवी पार्वतीक पूजा करैत रहलहुँ; हर दिन हृदयक पूर्ण भक्तिसँ हम कामदेवसँ प्रार्थना करैत रहलहुँ। पार्वती आर कामदेव आदि सब देवताक प्रति हमर प्रार्थना आर भक्ति आइ फल दऽ रहल अछि — एहि दुनू बूढ़ ब्राह्मणसँ हमर विवाह मृत्युदण्ड जकाँ भयावह अछि, जे हमरा मृत्युक आर नजदीक धकेलत। महान निन्दक : हे उपहार दयवाली! मधुपर्क आनू, जे मधु, दूध, दही, चीनी आ घीक मिश्रण होइत अछि। उपहार दयवाली : (नजदीक आबि बजैत छथि) हे स्वामी! मधु नहि अछि, केवल दूध आर पानि अछि। महान निन्दक : आनू। उपहार दयवाली : (दूध आर पानि आनि दैत छथि) महान निन्दक : (हरेक वरकेँ देखि) अहाँ लोकनि ओ मनुष्य छी जे श्मशानक अग्निसँ जरल छी आर अपन मित्र आर सम्बन्धीजन द्वारा त्यागल गेल छी। अहाँकेँ स्नान क’ ई दूध पीबाक चाही आर पीबिकऽ खुशी अनुभव करबाक चाही। (दूर्वा घास आर चाउर हाथमे लऽ) एहि संसारमे प्राणीक मृत्यु अनिवार्य अछि आर ई जीवन स्वप्न समान अछि — अहाँ जीवन आर मृत्युक बारेमे एहिना सोचू आर एहि सब घटनाकेँ लऽ शोक जुनि करू। (उठि जोरसँ बजैत छथि) अहाँ जे महान निद्रापर भरोसा रखैत छी, अहाँ जे चिताक महान शय्यापर सुतैत छी — अहाँ सब श्मशानमे निवास करू। (सबहक माथपर दूर्वा घास आर चाउर छिड़कैत छथि) परलोकक भविष्यवक्ता : विवाह करयवाला लोकक लेल श्मशानमे चितापर सुतब हिने उचित अछि। महान निन्दक : (नजदीक आबि) हे कलहाङ्कुर! अहाँ पहिने हमरा सए वर्षक कन्याकेँ स्वीकार करबाक फीस दिअ। कलहाङ्कुर : (भांगसँ बनल मिठाइ अर्पित करैत छथि) महान निन्दक : अहाँ समृद्ध होउ! (मिठाइ लऽ आनन्दसँ अपन माथासँ स्पर्श करैत छथि) — ओम! हम देवी गायत्रीकेँ प्रणाम करैत छी (मिठाइक एकटा भाग भूमिपर फेकि, बाकी खा उत्साहसँ बजैत छथि)— ई मिठाइ प्रेम-विषयमे महान आनन्द उत्पन्न करैत अछि, वाणीकेँ अमृतक वर्षा जकाँ बना दैत अछि आर आँखिमे इच्छा भरि दैत अछि — भांगसँ बनल मिठाइक जय होअय। झुकल-भगवाली : महान निन्दक एकटा प्रतिष्ठित परिवारसँ छथि। महान निन्दक : (नजदीक आबि) हे उत्तम ब्राह्मण लोकनि! कृपया कन्या-दान करबाक फीस दिअ। कामसँ अन्हरायल व विश्व-विदूषक : चारि वर्ष धरि प्रतीक्षा करू। महान निन्दक : तखन चारि वर्ष धरि ई एकटा वेश्या [बन्धकी] बनल रहती। (ओ नव-चन्द्ररेखाक हाथ पकड़ि आनन्दसँ हुनका संग नाचैत छथि) परलोकक भविष्यवक्ता : हे महान निन्दक! ई अहाँक स्वभावक अनुकूल बुझना नहि जाइत अछि। महान निन्दक : (आनन्दसँ) हम नव-चन्द्ररेखाकेँ, जे सम्पूर्ण मानवजातिक लेल आनन्ददायक छथि, दुष्ट पुरुषक झुण्डक चंगुलसँ अब मुक्त क’ लेने छी; हम हुनका अपनहि लेल पाबि गेलहुँ। एहि लेल हमर हृदय आनन्दसँ भरल अछि। हमर बड़ इच्छा अछि जे हम भोग-कक्षमे वापस जाइ आर बिबिध प्रकारक भोगक हथियारसँ, हुनका चिह्नित करैत, हुनकासँ एकटा महान प्रेम-युद्ध छेड़ी। (हास्यार्णव नामक प्रहसन समाप्त होइत अछि) अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१२. दामक प्रहसनम् [सम्भवतः भास रचित/ संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर] दामक प्रहसनम् [सम्भवतः भास रचित/ संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर] दामक प्रहसनम् पात्र-परिचय रंगमञ्च पर प्रवेशक क्रमसँ — पात्र परिचय सूत्रधारः सूत्रधार (रंगमञ्चक निर्देशक); नान्दीक अन्त भेला पर प्रवेश नटी नटी (अभिनेत्री), सूत्रधारकेँ "आर्यपुत्र" कहि सम्बोधित करैत छथि दामकः दामक ("नेक दामक"), अंगदेशक राजा महाराज कर्णक घनिष्ठ मित्र आ अनुचर; प्रहसनक मुख्य विदूषक-सन पात्र परशुरामः परशुराम (भार्गव), धनुर्विद्याक गुरु; क्षत्रियकेँ शिक्षा नहि दैत छथि कर्णः कर्ण, अंगदेशक राजा; धनुर्विद्याक उच्चतर रहस्यमे दीक्षित होयबाक इच्छासँ परशुरामक आश्रम आयल छथि दुर्बुद्धिः दुर्बुद्धि, एक सैनिक; कर्णक शाप-प्रसंग सुनओनिहार दुर्मुखः दुर्मुख, दोसर सैनिक, दुर्बुद्धिक मित्र उल्लेख-मात्र पात्र (मंच पर नहि अबैत छथि) — पात्र परिचय ब्रह्मदत्तः ब्रह्मदत्त, काम्पिल्य नगरीक राजा (प्रस्तावनामे उल्लेख) भर्तृदारिका राजमहिषी, जे दामक लेल सुस्वादु भोजन तैयार कऽ राखैत छथि (दामकक कथनमे) वज्रमुखः वज्रमुख नामक भृंग, जे परशुरामक जाँघ डसलक (दुर्बुद्धिक कथनमे) गालव आदि शिष्याः गालव आदि ब्रह्मचारी शिष्यगण (आश्रम-वर्णनमे) ──────────── (नान्दीक अंत भेला पर सूत्रधारक प्रवेश।) स्वर्ण-कमलवासिनी ब्रह्माणी केँ प्रणाम करैत छी, कुश-ध्वजधारी ब्रह्मा केँ, सभ देवता आ सभ ऋषि केँ प्रणाम करैत छी। (पट दिस ताकैत) सूत्रधार— आर्ये, एतय आउ। नटी— (प्रवेश करैत) एतय छी, आर्यपुत्र! अहाँक संग उद्यानमे घुमबाक हेतु उत्सुक भऽ, बहुत काल सँ अहाँकेँ खोजि रहल छलहुँ। आब अहाँक संग समय बितेबाक चाहैत छी, आर्यपुत्र! सूत्रधार— आब उद्यान-भ्रमणक विचार छोड़ू। एहि ब्रह्मदत्तक नगरीमे महाराज काम्पिल्यक समक्ष एकत्रित भेल जन-समुदाय एकटा नव नाटकसँ मनोरञ्जित हेबाक अछि। ताहि लेल हम सुसज्जित आ अपन-अपन भूमिकामे निपुण अभिनेतागणकेँ तैयार कऽ रखने छी। नटी— हमरा बुझल अछि जे काम्पिल्य नामक एकटा नगरी अछि आ ब्रह्मदत्त नामक एकटा राजा छथि। सूत्रधार— अहीं कऽ तँ हमहूँ कहलहुँ! अहाँसँ भेंट भेलाक आनन्दमे हम भ्रमित भऽ गेलहुँ। नटी— आर्यपुत्र! हमरा डर लागि रहल अछि। ई दुष्ट के अछि, जे भोजनमे बिलम्ब भेल ब्राह्मणक समान आ नुका समावर्तन भेल युवा ब्रह्मचारीक समान एना हड़बड़ीमे एतय आबि रहल अछि! सूत्रधार— आर्ये, प्रदर्शन प्रारम्भ भऽ गेल। हमहूँ सभ अपन आगाँक कार्यक तैयारीमे लागी। (दुनू गोटे प्रस्थान करैत छथि।) ──── (तखन दामकक प्रवेश।) दामक— (अपना मनमे) आह! बड़का लोक भाग्यक उलट-फेरकेँ नहि बुझि सकैत छथि। “एक विपत्ति कहियो असगर नहि अबैत अछि” ई कहबी सत्य सिद्ध होइत अछि। हम छी नेक दामक, अंगदेशक राजा महाराज कर्णक घनिष्ठ मित्र। बुद्धिमान्, शक्तिशाली, उन्नतिशील, सभ राजाकेँ वशमे कएने महाराज कर्ण एखनो सन्तुष्ट नहि छथि। त्रिभुवन-विजयी रावणक समान अद्वितीय शक्तिशाली बनबाक इच्छासँ, ओ धनुर्विद्याक उच्चतर रहस्यमे दीक्षित होयबाक उद्देश्यसँ आब परशुरामक आश्रम पर पहुँचल छथि। यद्यपि हमरा महाराजक अनुचर होयबाक सौभाग्य प्राप्त अछि, तथापि आब हम एकटा भारी संकट-भँवरमे पड़ल छी। हम तँ महाराजक ऊँच अट्टालिका, राजमहलक तड़ागमे स्नान, सुसज्जित शय्या पर सुतब, सन्ध्याकाल मीठ पेय, पाँच सुगन्धसँ युक्त पान, आ कोमल मलमली वस्त्रक अभ्यस्त छी। भर्तृदारिका (राजमहिषी) हमरा लेल सुस्वादु भोजन तैयार कऽ राखैत छथि आ बेर-बेर पूछैत छथि जे 'नेक दामक कतय छथि।' मुदा एहि सभक बादो एकटा कठिनाइ अछि — हमरा भूख नहि लागैत अछि। आरामदायक बिछौनासँ ढाँकल ओहि शय्या पर सेहो हमरा निन्न नहि अबैत अछि। पगड़ी बन्हने माथसँ हम महाराजकेँ प्रणाम कऽ सूचित कएने छलहुँ जे हम अहाँक संग एतय नहि आबि रहल छी। पशु-पक्षीक एहि वनमे भटकैत हम एहि प्राणीगणकेँ अपन आहार बुझि रहल छी। हमरा शरीर सेहो नीक नहि लागि रहल अछि। पेटू हम, भोजनक विचारसँ हमर आँखि बेचैन भऽ जाइत अछि। कपार-दर्द सेहो हमरा सतबैत अछि। बयारिसँ उड़ल काशक फूलक पराग हमर आँखिमे पड़ि गेल अछि जे हमरा आँखिकेँ नोरायल बना देलक। ई दुष्ट मधुमाछी सभ बाटमे हमरा काटलक। हमर इन्द्रियगण दर्पणक प्रतिबिम्बक समान हमरासँ छल कऽ रहल अछि—दहिनाक बदला बामाँ आ बामाँक बदला दहिना। हम कानसँ सुँघैत छी; हम अपन कारी नथुनासँ देखैत छी। (विचार करैत) जे स्वामी सलाह नहि सुनैत छथि, ओकर आश्रित रहनिहारक भाग्यमे दुःखे दुःख अछि। (आगाँ दृष्टि देल) आह! ई दुष्ट कुकुर ओहि आश्रमसँ एकटा वल्कल-वस्त्र लऽ कऽ भागि रहल अछि। रे दुष्ट, कतय जा रहल छह? हम तोहर दाँत तोड़ि देब। (घुमि-घुमि कऽ देखैत) आह! ई आश्रम तँ सभक लेल विश्रामक साझा स्थान थिक। एतय हरेक तपस्वी संतुष्ट जीवन बिता रहल छथि। वल्कल-वस्त्र पहिरने, माथसँ लटकैत विविधरंगी जटा, आ कारी मृगचर्मक करधनी बन्हने, आश्रमक तपस्वीगण वनसँ स्वच्छन्द समित्, कुश आ फूल आनि रहल छथि। एतय किछु गोटे जलमे स्नान कऽ रहल छथि। ओतय जगायल अग्नि जरि रहल अछि। अग्निक धुँआ तपोवन पर पसरि रहल अछि। अन्य महात्मा तपस्वी, जे अग्निमे आहुति देने छथि आ वेद-वेदाङ्गमे पारंगत छथि, अपन जीर्ण वल्कल-वस्त्र आ कान्हपर ढुलकैत जटामे शोभित भऽ रहल छथि। अपन मोतीसन यज्ञोपवीत, स्वर्ण-वल्कल आ मणि-सन माला सहित ओ अपन तपस्यामे कल्पवृक्ष सन देखबामे आबि रहल छथि। गालव आदि ब्रह्मचारी शिष्यगण, अपन पाठमे तत्पर, समित्-ईंधनसँ अग्निकेँ प्रज्वलित कऽ रहल छथि। सभ प्रकारक तेलहन, अन्न, घास, ईंधन, चर्म, समित्, सिंग, बाँस, वल्कल आ पाथर वर्ष भरिक उपयोगक लेल एतय संग्रहित अछि। वनक अन्नक मुट्ठी खा कऽ पोसायल हरिण आश्रमक द्वार पर एम्हर-ओम्हर घुमि रहल अछि। तपस्विनी कन्यागण अपन घैलासँ नव पौधाकेँ एना सिंचि रहल छथि जेना माता अपन शिशुकेँ स्तनपान करबैत होथि। आह! ई आश्रम सचमुच अद्भुत अछि। (सुनैत) आह! एरण्ड वृक्ष 'समय भऽ गेल, समय भऽ गेल' कहि रहल अछि। तँ हम महाराजक ओहिठाम जाइत छी। देवगण अपन आशीर्वाद दिअथि। (प्रस्थान।) (तखन परशुराम आ कर्णक प्रवेश।) कर्ण— भगवन्! हम अहाँकेँ प्रणाम करैत छी। परशुराम— तूँ के छह? की लऽ कऽ एतय आयल छह? कर्ण— हम धनुर्विद्याक उच्चतर रहस्यमे दीक्षित होयबाक इच्छुक छी। परशुराम— हम ब्राह्मणकेँ शिक्षा देब, क्षत्रियकेँ नहि। कर्ण— हम क्षत्रिय नहि छी। परशुराम— तखन हम तोरा शिक्षा देब; आउ। (दुनू गोटे प्रस्थान करैत छथि।) ──── (तखन दू टा सैनिकक प्रवेश।) दुर्बुद्धि— दुर्मुख, हे मित्र! की तोहरा बुझल अछि? दुर्मुख— दुर्बुद्धि, की बात अछि? दुर्बुद्धि— हमर महाराज अपन गुरु परशुरामक संग फल, मूल, समित्, कुश आ फूल संग्रह करबाक लेल वनमे गेल छलाह। वन-यात्रासँ थाकल परशुराम महाराजक जाँघ पर माथ राखि सुति गेलाह। दुर्मुख— तखन की भेल? तखन की भेल? दुर्बुद्धि— आ तखन, वज्रमुख नामक एकटा भृंगसँ गुरुजीक जाँघ अनायास डसा गेल। गुरुक निन्न भंग नहि हुअय, ताहि डरसँ महाराज चुपचाप ई पीड़ा साहससँ सहि लेलनि। रक्तसँ लथपथ आ अत्यन्त क्रुद्ध भऽ गुरु उठि ठाढ़ भेलाह, महाराजक क्षत्रियत्व चिन्हि गेलाह, आ ई शाप देलनि—'जखन जरूरत पड़तह, तोहर अस्त्र काज नहि करतौह।' दुर्मुख— आह! ई दुःखक बात अछि जे गुरुदेव एना कहलनि। चलू। (दुनू गोटे प्रस्थान करैत छथि।) (भरतवाक्य।) सर्वत्र समृद्धि होउ आ कतहु आपदा नहि होउ। सभकेँ संतोष प्राप्त होउ आ केओ असंतुष्ट नहि रहथि। समाप्त अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१३. हरिजीवन मिश्रक कृति- पालाण्डुमण्डन प्रहसनम् [संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद- गजेन्द्र ठाकुर] हरिजीवन मिश्रक कृति- पालाण्डुमण्डन प्रहसनम् [संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद- गजेन्द्र ठाकुर] पात्र-परिचय (उपस्थितिक क्रममे पात्र) प्रजापति देव, पण्डित, समारोहक सूत्रधार (व्यवस्थापक)। लिङ्गोजी भट्ट, एक पण्डित। चिञ्चा, लिङ्गोजीक दोसर पत्नी। (इमली) त्र्यम्बक भट्ट, लिङ्गोजी भट्टक साढू। (नारिकेल) क्वथिका, त्र्यम्बकक पत्नी। (उसिनल तरल व्यञ्जन) पूर्णपोलिका, लिङ्गोजीक पहिल पत्नी। (एक प्रकारक मीठ पूआ, पोली) लशुन पन्त, त्र्यम्बक आ क्वथिकाक जेठ बेटा। (लहसुन) गृञ्जनाद्रि, लशुनक छोट भाइ। (प्याज—छोट किसिम) पालाण्डुमण्डन, एक अतिथि। (प्याज—पैघ किसिम) चित्तपावन, दोसर अतिथि। महाराष्ट्री ब्राह्मण। रक्तमूलिका, पूर्णपोलिका आ लिङ्गोजीक बेटी। (एक लाल खाद्य कन्द) आरणाल भट्ट, एक अतिथि। (माँड़/कांजी) मिथ्याकूट भट्ट, एक अतिथि। [एक महाराष्ट्रीय व्यञ्जन—दहीमे पिसल चाउर, दाल, राइ आ मेथी मिला कऽ] दाक्षिणात्य-१, दक्खिनी पण्डित-१ पेरम् भट्ट, एक पुरोहित, आन्ध्रवासी कलङ्काङ्कुर, दोसर पुरोहित। (कुकुरमुत्ता) झल्लरि—झङ्कार आ भेरि-भङ्कार भट्टाचार्य, अतिथि। बंगाली पण्डित। शिष्य, उपर्युक्तक शिष्य दाक्षिणात्य-२, दक्खिनी पण्डित-२ पुरुष, राजकर्मचारी। सिपाही। (पादातयः) अन्य ब्राह्मण पण्डित आ अन्य लोक। ──────────── 'शिव, जे विश्वक स्वामी छथि, सभ लोकमे गौरवशाली छथि! ओ बहुत रसक आनन्द लैत छथि आ सभ प्रकारक खाद्य-पेय भोग करैत छथि। ओ लोकक सांसारिक जीवनक बुराइकेँ दूर करैत छथि आ धर्म-पालन, इच्छापूर्ति आ धनोपार्जनक विषयमे कहैत छथि। ओ प्रचुर धन कमौने छथि आ पार्वतीक प्रिय स्वामी छथि।' (१) (मंगलाचरणक अन्तमे) सूत्रधार— बेसी नहि बजू। आह! ई तँ लिङ्गोजी भट्टक पत्नीक गर्भाधान-संस्कारक अवसर थिक। एहि उत्सवमे पालाण्डुमण्डन आ अन्य अतिथि भूखल छथि, कारण एकटा वैवाहिक सम्बन्धक चर्चा चलि रहल अछि। जखन एहि अतिथिक इच्छा पूर्ण नहि होयत तखन ओ आशीर्वाद कोना देताह? आर, बिनु भीतरी संतोषक ओ वैदिक शब्दक सही उच्चारण कोना करताह, जखन कि उत्तर भारतीय बहुत चालाक आ बहुविध कुशल छथि? एहि लेल दर्शकक तीव्र भावने सफल होउ! (हवामे प्रसन्नतासँ सुँघैत) आह, हमर इच्छा पूर्ण होयबाक अछि, ओहि प्याजक तेज गन्धसँ जे सभटा गन्धकेँ दबा देने अछि। (अपना मने) एहिना होउ। हम अपन पत्नीकेँ बजा कऽ लोक जुटायब। (चारू दिस ताकैत) आर्ये, एतय, एतय आउ! (प्रवेश करैत) नटी— स्वामी, जल्दी कहू। हम आन काजमे लागल छी आ व्यस्त छी। सूत्रधार— आर्ये, कोन काज अछि जे अहाँकेँ एना हड़बड़ीमे राखने अछि? नटी— स्वामी, आइ पालाण्डुमण्डन आ हुनकर दलकेँ आमंत्रित कएल गेल अछि। हुनका आदरसँ स्वागत करबाक लेल हम घरकेँ धूपसँ सुगन्धित कऽ देने छी आ एहि बीच एतय आबि गेलहुँ। अहूँ ओतय जा कऽ अपन उत्तरीयक आँचरसँ हुनका स्वागत करू। सूत्रधार— आर्ये, की अहाँ घरकेँ कारी अगरुक धूपसँ बिगाड़ि देलहुँ? नटी (मुस्कुराइत)— स्वामी, की अहाँकेँ नहि बुझल अछि जे ई तँ पैघ प्याजक गन्ध थिक? सूत्रधार (चारू दिस सुँघैत)— बड़ नीक, बड़ नीक, पालाण्डुमण्डन आ अन्य लोक आब संतुष्ट भऽ गेल होयताह। तँ आउ, हम हुनका आदरसँ सम्मानित करी। एतेक अबेर किए? (मंचक बाहर सँ) पालाण्डुमण्डन आ अन्य लोक, गलीमे छिटल पैघ प्याजक छिलकाक ढेर देखि कऽ, प्याज-सम्पन्न घरमे जेबाक इच्छासँ एम्हर-ओम्हर घुमि रहल छथि। प्रजापति देव एहि बातकेँ लिङ्गोजी भट्टकेँ सूचित करबाक लेल एतय आबि रहल छथि। सूत्रधार (सुनैत)— की भेल जे पालाण्डुमण्डन आ हुनकर दल भ्रमित छथि? ओ कतय जा रहल छथि? आउ, हम सभ हुनका लग जाइ छी। (दुनू गोटे प्रस्थान करैत छथि।) प्रस्तावना (तखन प्रजापति देवक प्रवेश।) प्रजापति देव— वेश्या आ यारक पुत्र, दुष्टक राजा लिङ्गोजी भट्ट कतय गेलाह? कारण पालाण्डुमण्डन आ हुनकर दल, क्रुद्ध भऽ, कतहु आन ठाम जा रहल छथि। आह! हमरा नीक जकाँ मोन अछि! कदाचित पालाण्डुमण्डन आ अन्य अतिथि-पण्डित साढू त्र्यम्बक भट्ट आ लिङ्गोजी भट्टक बेटा-बेटीक विवाहक चर्चाक हेतु जुटल कैक प्रमुख कुटुम्बीक उपस्थितिसँ नाराज भऽ कऽ चलि गेल छथि। जे होउ। हम स्वयं जा कऽ हुनका आनब। (परदाक पाछाँ, हल्ला-गुल्ला) सभ गणक स्वामी आ सूर्य, चन्द्रमा, प्रसन्न देवताक समूह; (पञ्च-तत्त्वक) समूह—जल, वायु, अग्नि, आकाश आ पृथ्वी; बहुतरास कीमती रत्न आ मंत्र, तथा सिद्ध ज्ञानमे निपुण ब्राह्मण—ई सभ अहाँ सभकेँ आशीर्वाद दिअथि! (२) प्रजापति (ध्यान सँ सुनैत)— आह, शुभ मुहूर्त आबि गेल! ब्राह्मण-भोजन आ अन्य कार्य तुरंत होउ! (परदाक पाछाँ, वैदिक स्वरमे) “एकटा प्रजापति छलाह, चूहा। हुनका दूटा दाँत छलनि। हर दाँतसँ ओ गड्ढा खुनैत छथि, बर्तनकेँ फोड़ैत छथि आ हवि निगलि जाइत छथि। यजमान जखन ओ 'कुम्-कुम्' सुनबैत छथि तँ ओकरा मारैत छथि। तखन यजमान स्वर्ग पहुँचबामे समर्थ होइत छथि। जे ई जनैत छथि—!” प्रजापति (आदरसँ सुनैत)— आह! वैदिक उच्चारण! सभ अतिथि आबि गेला की? हम पेरम् भट्ट आ कलङ्काङ्कुराचार्यकेँ संग लऽ, यज्ञीय ताम्रपात्र लऽ कऽ फेर एतय आयब। (एना कहि ओ प्रस्थान करैत छथि।) (तखन वाद्य-संगीतक संग चिञ्चा, लिङ्गोजी भट्टक हाथ पकड़ने प्रवेश करैत छथि। हुनकर अंग हरदीसँ रंगल अछि, ओ माला आ आभूषणसँ सजल छथि, आ अपन उत्तरीयक चुनरीकेँ कसि कऽ आ विशेष ढंगसँ पहिरने छथि। ओ स्वादसँ पान-सुपारी चबा रहल छथि। हुनकर शुभ आ आकर्षक रूप अछि, ओ सुसज्जित (वा सुगन्धित) छथि आ प्रेमसँ दीप्त छथि। हुनका संग क्वथिका सेहो त्र्यम्बकक हाथ पकड़ने प्रवेश करैत छथि।) लिङ्गोजी आ त्र्यम्बक भट्ट (हाथ जोड़ैत)— हमर प्रणाम! ब्राह्मण सभ आबऽमे किएक अबेर कऽ रहल छथि? (दुनू सारी एक-दोसराकेँ चोरि-चोरि देखैत छथि।) क्वथिका (अपन ननदि चिञ्चासँ)— अहाँक सौतिन पूर्णपोलिकाक बेटी रक्तमूलिका नीक छथि की? चिञ्चा— अहाँक आशीर्वादसँ ओ नीक छथि। आब अहाँक बेटा गृञ्जनाद्रि नीक छथि की? क्वथिका— हँ, दिन-रात, ई साहसी छौड़ा अहाँक बेटीक सुन्दरताक विचारमे लागल रहैत अछि। चिञ्चा (मुस्कुराइत)— एहि तरहेँ रक्तमूलिका सेहो सुगठित गृञ्जनाद्रिक सुन्दरताकेँ बेर-बेर मोन पाड़ि कऽ अपनाकेँ बहलबैत छथि। (दुनू गोटे एक-दोसराक हाथ पकड़ैत छथि।) लिङ्गोजी भट्ट— अरे, अरे, त्र्यम्बक भट्ट! हमरा स्मृतिक ओहि कथनसँ डर लागैत अछि जे जुआन बेटीकेँ बियाहमे देनिहार पुरुष स्वर्ग नहि पहुँचैत छथि। एहि लेल हम अपन बेटी रक्तमूलिका, जे नव अमक बौर सन सुन्दर छथि, हुनकर विवाहक व्यवस्था बहुत जल्दी करय चाहैत छी। त्र्यम्बक— अहाँक भेंट तँ अपन भागिन गृञ्जनाद्रिसँ भऽ गेल हैत। लिङ्गोजी— अरे त्र्यम्बक, जे होउ। हम अपन पत्नीसँ पूछब। (हुनका दिस ताकैत) पूर्णपोलिका, एतय, एतय आउ! पूर्णपोलिका— की बात अछि, आदरणीय लिङ्ग? लिङ्गोजी— प्रिये, अहाँक बेटी रक्तमूलिकाक विवाह धनी त्र्यम्बक भट्टक बेटा, अहाँक भागिन गृञ्जनाद्रिक संग विचार भऽ रहल अछि। पूर्णपोलिका— माननीय, ई तँ बड़ नीक विचार अछि, मुदा कठिन एहि लेल अछि जे लशुन पन्तक मृत्यु जल्दी भऽ सकैत अछि। लिङ्गोजी— प्रिये, ई सही अछि। मुदा फेरो गृञ्जनाद्रि जुआन छथि। ओहि बूढ़ (अर्थात् लशुन पन्त) क की उपयोग? पहिने एहि विवाहक सम्बन्धमे तुरत मौखिक सहमति भऽ जाय। पूर्णपोलिका— एहिमे की सन्देह अछि? (चारू दिस ताकैत) अरे, अरे, क्वथिका, ई रक्तमूलिका अहाँक जिम्मामे अछि। क्वथिका— हम तँ धन्य भऽ गेलहुँ। की गृञ्जनाद्रि अहाँक बेटा नहि छथि? त्र्यम्बक (सुनैत, हृदयसँ प्रसन्न भऽ)— छौड़ा आ छौड़ीक बीच मौखिक सहमति भऽ जाय। (जखन कलङ्काङ्कुर एखनो नहि पहुँचल छथि, तखन लशुन पन्तक प्रवेश।) लशुन पन्त— अरे, अरे, लिङ्गोजी भट्ट, दोसराक आशाकेँ तोड़निहार, हमरासँ स्वर्ग छिनि कऽ अहाँकेँ की मिलत? रक्तमूलिकाक जन्मसँ लऽ कऽ हमर जीवनक एकमात्र सहारा हुनकर हाथ प्राप्त करबाक इच्छा रहल अछि। गृञ्जनाद्रि निःसन्देह हमरासँ छोट छथि आ हमर सख्खा भाइ छथि। ओ अपन जीवनक बारेमे आशा राखि सकैत छथि। अहाँ किएक एतेक हड़बड़ीमे छी? की आइक गर्भाधानक बाद चिञ्चासँ अहाँकेँ एकटा बेटी नहि हैत? पूर्णपोलिका (अपना मने)— ई बूढ़ हमर बेटीक प्रति दुष्टतापूर्ण छथि। जे होउ। हम एहिपर विचार करब। क्वथिका (अपना मने)— लशुन पन्त बूढ़ छथि। एहि लेल विवाह तँ केवल धन-बलसँ सम्भव अछि। (स्वर्ण-मुद्रा निकालि ओ देखबैत छथि।) लिङ्गोजी— आब जे एतेक धन देखा रहल अछि, तँ वैवाहिक सम्बन्ध केवल लशुन पन्तेसँ होउ। गृञ्जनाद्रि जुआन तँ छथि, मुदा बस भेल। चिञ्चा— अरे, अरे, अहाँ ठीक-ठीक राशिक शर्त राखू! क्वथिका— हँ, अहाँकेँ दस कर्ष बराबर सोना भेटत। लिङ्गोजी— प्राणीक आयुक कोनो निश्चय नहि होइत अछि। तँ एतेक मात्र सोनाक की उपयोग? लशुन पन्त (सुनि, अपना मने प्रसन्न भऽ)— १२० वर्षसँ बेसीक पालाण्डुमण्डनक भाइक विवाह पिण्डमूलिकासँ केवल धन-बलसँ सम्पन्न भेल छल। (जोरसँ) आह, लिङ्गोजी, की लहसुनसँ पोषित केओ कहियो मृत्युकेँ प्राप्त होइत अछि? (एना कहि ओ जतेक चाही ओतेक सोना देखबैत छथि।) लिङ्गोजी भट्ट— एहि सोनाक की उपयोग हैत? जे होउ। पूर्णपोलिका (सोना दिस ताकैत)— आह, आह, बेटा लशुन पन्त, ई तँ बड़ नीक अछि। मुदा तखन अहाँ अपन अन्त्येष्टि-संस्कारक हेतु आब किछु धन किएक नहि देल जाइत? लशुन पन्त (सोचैत)— जँ एना अछि, तँ हमर ई खेत, जाहिमे लहसुन आ प्याज उपजैत अछि, केना उपयोगमे आओत? (अपन खेत दिस देखबैत) हे नारी, जँ एहन किछु भऽ जाय, तँ एही खेत (क्षेत्र) मे एकटा स्मारक-चिह्न (लिङ्ग) स्थापित कऽ देल जाय। खेत बड़ उपजाउ अछि। आर की चाही? पूर्णपोलिका (लिङ्गोजी दिस ताकैत)— हमर उद्देश्य पूर्ण भऽ गेल। वैवाहिक सम्बन्ध केवल लशुन पन्तेसँ होउ। लिङ्गोजी भट्ट— हमहूँ एही तरहेँ सोचि रहल छी। (तखन परदाकेँ हटा कऽ प्रवेश करैत) गृञ्जनाद्रि— आह, सहायक स्वभावक लोकक आलोचक! की राजा विधवाकेँ मुफ्त भोजन नहि दैत छथि? ओहो, स्वामी, कतेक अद्भुत! केना, चुस्त तहबन्द आ कान्हपर चुनरी पहिरने, एम्हर-ओम्हर घुमैत मनुक्खसँ डरायल, अपन कपड़ामे बचल भोजन भरि कऽ आ मुफ्त पियाउमे मुट्ठी भरि पानि लोभसँ पीबैत लोक, धनक मात्र देखलासँ अपन क्षेत्रीय आचार-व्यवहार बिसरि जाइत छथि? लिङ्गोजी (अपना मने)— एतय हमर करेजामे कांट गड़ि गेल! जे होउ। हम एकरा ठकब। (जोरसँ) अरे, अरे, गर्भाधानक समय आबि गेल। एहि लेल आमंत्रित ब्राह्मण सभकेँ तुरत भोजन परसल जाय! (मंचक बाहरसँ) अरे, अरे, शाप देबामे अगुआ, निन्दाक अंकुर, पागल कुकुर, कुकुरक पूँछ, वेश्याक पालतू, गुरुक पत्नी आ अपने पुतोहुक प्रेमी, नौकरानीक कुशल प्रेमी, मृत्युक स्वामी, मित्रक विनाशक, टूटल विश्वासक स्वामी, सम्पूर्ण संसारक ठग, नारायणकेँ सेहो कांट, तेज-मुँह, बदमाशक प्रधान, अखाद्य वस्तुक भक्षक, अहाँ सभ ओतहि रहू! भीतर जगहक कमीक कारणेँ, भोजनक हेतु आरामदायक बैसबाक व्यवस्था केवल गलीमे कएल जायत। प्रसिद्ध पालाण्डुमण्डन आ किछु अन्य लोक भीतर जा सकैत छथि। (तखन पालाण्डुमण्डन, मिथ्याकूट आ किछु अन्य लोकक प्रवेश) पालाण्डुमण्डन (चारू दिस देखैत)— हम कहियो चित्तपावनक संग एक्के भोजनमे नहि बैसल छलहुँ। चित्तपावन— हा, हा, महाशय, की अहाँ काल्हिक बात भुला गेलहुँ? खण्डेरायक पूजाक अवसर पर, की अहाँ नाना प्रकारक प्याजसँ मसालेदार विशेष व्यञ्जन नहि निगलने रही? पालाण्डुमण्डन (मुस्कुराइत चित्तपावनकेँ गरे लगबैत)— हा, हा, भाइ, की एतहू पैघ प्याजक उपयोग होइत अछि? चित्तपावन— नहि तँ आर की उपयोग होइत अछि? (पालाण्डुमण्डन घमण्डसँ ठाढ़ होइत छथि।) गृञ्जनाद्रि— अरे, मात्र पैघ प्याजक की उपयोग? छोट प्याज बिना व्यञ्जन खुरधार पशुक घासक भोजन जकाँ बेस्वाद हैत। लशुन पन्त— अरे, अरे, एहि बेस्वाद चर्चाक की उपयोग? जखन औषधीय जड़ीबूटीक स्वामी (चन्द्रमा) जकाँ लहसुनक कन्द उगैत अछि, तँ जुगुनू सन प्याजक किसिमक की जरूरत? पालाण्डुमण्डन— हा, हा, भाइ, की पैघ प्याज लहसुनसँ बेसी श्रेष्ठ नहि थिक? प्याजक प्रजातिक नीक संग्रह तारागणक समूह जकाँ चमकैत अछि। मोती, हीरा आ पुखराज एकर सयवाँ भागक बराबरो नहि भऽ सकैत अछि। एकरा देखितहि परम संतोष होइत अछि। खेतमे कन्दयुक्त प्याज दिनमे आकाशक चन्द्रमा जकाँ उज्जवल चमकैत अछि। (३) लशुन पन्त (क्रोधित भऽ)— सत्यमे! लहसुनक एकटा गुच्छा वायु-विकारसँ उत्पन्न असंख्य रोगकेँ नाश करैत अछि। लहसुनक तुलना कोनसँ भऽ सकैत अछि? एकर मात्र गन्धे देवता आ राक्षसक हेतु भोजनकेँ विशेष रूपसँ स्वादिष्ट बना दैत अछि। (४) गृञ्जनाद्रि (दुनूकेँ अलग करैत)— हमर बात सुनू। छोट प्याज मसालाक सभसँ श्रेष्ठ थिक। मूँगाक चमक तँ एकर मात्र दासी थिक। मूर्ख लोक एकर वास्तविक स्वभाव नहि जनैत छथि। ओ एकर सूक्ष्मताकेँ कोना बुझि सकताह? (५) (प्रजापति देवक फेर प्रवेश।) प्रजापति देव— अरे, अरे, ब्राह्मण-भोजनमे किएक अबेर भऽ रहल अछि? चिञ्चा— आह, प्रजापति देव, अबेर एहि लेल अछि जे उसिनल तरकारी आ साग प्याज आ लहसुनसँ छौंकल जा रहल अछि। प्रजापति— एहिना होउ। हम पत्तरि लऽ आबैत छी। (पत्तरि आनबाक अभिनय करैत छथि।) (मंचक बाहरसँ) आह, प्याज आ लहसुनक गन्धसँ तँ पूरा जगह स्वर्ग बनि गेल अछि! रे, रे, देखू, देखू, ई दुष्ट उत्तर भारतीय नाक ढाँकि कऽ किएक भागि रहल छथि? भाग्यशाली छथि दक्षिणी लोक जे नाना व्यञ्जनसँ उत्साहित छथि। एहि तरहेँ ओ स्पष्ट वैदिक उच्चारणसँ पद, क्रम आ जटा-पाठक प्रदर्शन कऽ रहल छथि। लिङ्गोजी भट्ट— ई सभ कुटुम्बीक श्रेष्ठ, सभा-गृहकेँ सुशोभित करैत, किएक नहि बैसल छथि? (तखन प्रवेश) (पेरम् भट्ट आ अन्य लोक, अपन देहमे भस्म लगौने। ओ प्रसन्नतासँ पत्तरि, कमण्डलु आ अन्य वस्तु धारण करैत छथि। हुनकर पेट खाली अछि। सयटा टुकड़ीसँ जोड़ल हुनकर लाल-भूरा कपड़ासँ, ओ सहस्र-नेत्रधारी इन्द्रक शानदार भ्रम चारू दिस बना रहल छथि। (६)) (लशुन पन्त अपन प्रेम प्रदर्शित करैत उत्साहसँ खूब खाँसैत छथि आ सांस फूलबाक कारणेँ मूर्छित भऽ खसि पड़ैत छथि।) पालाण्डुमण्डन— अरे, अरे, तुरत पैघ प्याजक रस आनू; नहि तँ लशुन पन्त बेसी दिन हमरा सभक संग नहि रहताह। (गृञ्जनाद्रि छोट प्याजक रससँ दौगल आबैत छथि। आरणाल भट्ट माँड़क घैला आनैत छथि।) त्र्यम्बक— भाइ लिङ्गोजी, हुनका शक्ति-वर्धक कोनो चीज दिअ। (लिङ्गोजी भट्ट मुड़ी हिलबैत चारू दिस ताकैत छथि।) चिञ्चा— प्रिय रक्तमूलिका, लाल मूलाक रसकेँ इमलीक रससँ मिला दिअ। (रक्तमूलिका तुरत एना करैत छथि।) मिथ्याकूट भट्ट (मिथ्याकूट तरल आनैत)— अरे, अहाँ मूर्ख सभ, देखू हम एहि चमत्कारकेँ कोना तुरत कऽ देखबैत छी! (एना कहि ओ तुरत लशुन पन्तक मुँहमे देल जाइत छथि।) (परदाक पाछाँसँ) अरे, अरे, अहाँ जे नियमितरूपेँ अन्त्येष्टि-संस्कारक व्यवस्था करैत छी आ लशुन पन्तकेँ आन लोककेँ परलोक पठएबामे लागल छी! सूखल प्याज आ लहसुनक छिलकासँ बनल चिताकेँ फेकि दिअ! कारण, मृत्युक दूतगण लशुन पन्तक मुँहपर मूतरि कऽ भागि गेल छथि। एहि लेल ओ अवश्य आब जीवित छथि! लिङ्गोजी— सचमुच ई दवाई बड़ प्रभावशाली अछि! (तखन धरि लशुन पन्त जागि जाइत छथि।) लशुन पन्त— अरे, अरे, कृपया लहसुनक गुच्छा आनू! कारण अधिक पित्तक कारणेँ हम मूर्छित भऽ गेल छलहुँ। पालाण्डुमण्डन— बड़ नीक, बड़ नीक, महाशय, हमरो एहन बेर-बेर होइत अछि। गृञ्जनाद्रि— हम मूर्खक समूहमे फँसि गेलहुँ। अरे, अरे, दुष्ट मूर्खो, मीठ रस बिना पित्तक रोग कोना ठीक भऽ सकैत अछि? एहि लेल छोट प्याजसँ बनल ई रस लिअ। लशुन पन्त (मुस्कुराइत)— जँ लहसुन (रोग) दूर करय मे असमर्थ अछि, तँ छोट प्याजक की कहब? जँ सूर्य अन्धकारक मुख्य नाशक नहि भऽ सकय, तँ चन्द्रमाक की कहब? (८) हे लहसुनक गुच्छा, सभ कष्टक नाशक, उच्च मार्ग (वा परलोकक मार्ग) पर दौड़निहार घोड़ा, महापापक चूरनिहार, सुगन्धक अभागल नाशक, तुरतमे सच्चा चमत्कार (वा पूर्ण ज्ञान) देनिहार, भूखलकेँ प्रसन्न करैबला रोटी, परम देवी, कृपा करू! (९) (पूर्णपोलिका, अपन चुनरी ढील करैत, बामाँ हाथसँ लहसुनक गुच्छा उतारि लशुन पन्तक मुँहमे राखि दैत छथि।) गृञ्जनाद्रि (मुस्कुराइत)— एहि मूर्ख लोक केतेक जिद्दी छथि? छोट प्याज मूँगा जकाँ लाल, अमृत जकाँ रसदार, प्रेमकेँ उगबैबला, आनन्द देबामे समर्थ अछि, आ एकरा देखितहि पवित्रता जागि उठैत अछि। मूर्ख लोक एकर शक्ति पर विश्वास नहि करैत छथि। (१०) लशुन पन्त (आँखि खोलैत, लहसुनक स्वाद लैत, ओकरा 'हे लशुनपोतिके' आदि कहैत, श्लोक ९)— हा, हा, ई सत्य थिक जे एही तरहेँ देवगण (लहसुनसँ) रूपक समानताक कारणेँ चन्द्रमा (अमृत-किरण)केँ पिबैत छथि। आ चन्द्रमा स्वयं संसारमे लहसुनक फांकसँ समानताक कारणेँ पूजाक योग्य छथि। (११) लिङ्गोजी भट्ट— अरे पूर्णपोलिका, ई व्यक्ति (लशुन पन्त) अहाँक पुण्यक बलसँ जीवित छथि। अहाँक बेटी सेहो भाग्यशाली छथि; कारण, अखने, हुनका एतेक धन भेटि गेल अछि जे ओ जीवन भरि, आ अपन पतिक जीवन मे सेहो, निश्चिन्त रहि सकैत छथि। (तखन परदा हटा कऽ पुरोहित पेरम् भट्टक प्रवेश, ईंधन, कुश-घास, यज्ञीय चम्मच, घी आ यज्ञीय पात्रक संग।) पेरम् भट्ट— हा, हा, पुतोहु सभक बीच बड़ भ्रम बुझना जाइत अछि। एहि लेल लहसुन आ प्याजक गन्धकेँ ढाँकि देल जाय। तेज हवाक कारणेँ गन्ध एतेक बढ़ि किएक गेल अछि? लहसुन-प्याजक छिलकासँ ढाँकल आकाश जेना अनामंत्रित वैदिक पुरोहितकेँ बजा रहल अछि! गर्भाधान समारोह प्रारंभ होउ। (एना कहि ओ यज्ञ-वेदीकेँ कुश-घासक बदला लहसुन आ प्याजक छिलकासँ ढाँकैत छथि, तखन—) (लिङ्गोजी भट्ट, चिञ्चा दिस ताकैत, इशारासँ अपन कामेच्छा सूचित करैत छथि।) चिञ्चा (अपना मने)— की गर्भाधान संस्कार एतहि होयत? (अपन पतिकेँ देखैत ओ लक्ष्मणा (एकटा जड़ी) निकालि खेबाक अभिनय करैत छथि।) लिङ्गोजी भट्ट (अपना मने)— हम शक्ति प्राप्त करी। कारण, जे व्यक्तिक पौरुष हनुमानक चीत्कारसँ नष्ट भऽ गेल छल, ओ सेहो प्याज खएलासँ फेर पुरुष बनि जाइत अछि। (एना कहि ओ हविक बाँचल अंश जकाँ लहसुन निगलबाक अभिनय करैत छथि। भस्म आदरसँ ग्रहण करबाक बहानाँ ओ भाँग (गाँजासँ बनल नशीली वस्तु) सेवन करबाक अभिनय करैत छथि। धुँआसँ बचबाक बहानाँ, गुप्त रूपसँ यज्ञीय अग्निमे तमाकुक पात चढ़बैत, ओ फूँकनीसँ तमाकु, भाँग आदिक धुँआ खिंचैत छथि।) पूर्णपोलिका (क्रोधित भऽ)— एहन पारिवारिक रीति कतहु नहि देखल गेल अछि। हमरो गर्भाधान संस्कार भेल छल। अजगुत, अजगुत! (एना कहि ओ चिञ्चाक हाथसँ लक्ष्मणा छिनि लैत छथि।) गृञ्जनाद्रि (देखैत)— आब हमरा पहाड़सँ खसय पड़त वा पानिमे डूबय पड़त (आत्महत्याक हेतु)। (एना कहि ओ हड़बड़ीमे पूर्णपोलिकाक समर्थनमे उठि ठाढ़ होइत छथि। गृञ्जनाद्रिक सहायतासँ, ओ जोरसँ रोबय लगैत छथि।) कलङ्काङ्कुर (उठैत)— अरे, अरे, गृञ्जनाद्रि, अहाँ ई गर्भाधान समारोहकेँ किएक बिगाड़ि रहल छी? क्वथिका (उठैत)— अरे, ई अहाँक लेल उचित नहि थिक, पूर्णपोलिका, जे पहिनहि लशुन पन्तसँ वचनबद्ध छी। दोसर दिस, की गृञ्जनाद्रि सदिखन अविवाहित रहताह? (आपसी उलझनमे, पूर्णपोलिका आ क्वथिकाक चुनरी ढील भेलासँ, छोट-पैघ प्याज आ लहसुन चारू दिस बिखरि जाइत अछि।) पालाण्डुमण्डन आ अन्य लोक (क्रोधसँ देखैत)— अरे, अरे, सचमुच कुलक्षिणी छथि ई (स्त्री सभ) जे अमृत जकाँ लहसुन आ आन कन्दकेँ बर्बाद करैत छथि! मिथ्याकूट भट्ट (एहि विचित्र हड़बड़ीसँ भयभीत रक्तमूलिकाक बिगड़ल चुनरी देखैत)— अरे, अरे, रक्तमूलिका, अहाँकेँ (बहुतो लोक) देखि रहल छथि! अहाँ अपन पिताक बहुत लाड़ली छी। मुदा एतय द्वेषी उत्तर भारतीय आबि रहल छथि जे सभ दक्षिणीक मूल पोषक स्वादबला मिथ्याकूट व्यञ्जनक अपमान करैत छथि। हुनकर धारणा एकदम विपरीत हैत। (मंचक बाहरसँ) अरे, अरे, आब चाचाक बेटीसँ आपसी विवाह आदि विषयक उपहासकेँ टारल जा सकैत अछि। उत्तर भारतीय, जे दोसराक दोषकेँ व्यंग्यसँ उघारि सकैत छथि, आब आबि गेल छथि। (तखन बंगाली पण्डित झल्लरि-झङ्कार आ भेरि-भङ्कार भट्टाचार्यक अपन शिष्यक संग, जे हाथमे माछ धेने छथि, प्रवेश।) भट्टाचार्य (चारू दिस देखैत आ सुँघैत)— शिव, शिव, हाय! ई सभ निःसंतान लोकक काज थिक। हा, हाय! पालाण्डुमण्डन (सभ नाक ढाँकि कऽ रहि जाइत छथि।) शिष्य— भट्टाचार्य, हमरा सभकेँ तुरत रसोइघर दिस देखाउ, कारण ई तीन दिनक पुरान माछ कखनहु सड़ि सकैत अछि। भट्टाचार्य— अरे, अरे, हम सभ एकटा अशास्त्रीय घरमे फँसि गेलहुँ! एतय एहि बाँझ लोकक बीच भोजनक व्यवस्था कोना करब? दाक्षिणात्य— रे, रे, हम सभ सड़ल माछक गन्धसँ मरि रहल छी; कतय जाइ? भट्टाचार्य— अरे, अहाँ सभ धर्मक सीमासँ बाहर छी, अहाँकेँ धर्मक बारेमे प्रायः किछु नहि बुझल अछि। स्मृति कहैत अछि: “जे व्यक्ति देवता आ पितरक पूजाक बाद माँस खाइत अछि, ओ दूषित नहि होइत अछि।” दाक्षिणात्य (हृदयसँ)— अरे, अरे, ई कोना भऽ सकैत अछि, कारण कलियुगमे सम्बन्धित स्मृति-भागमे माँस-भक्षण निषिद्ध अछि? भट्टाचार्य (हँसैत)— ई “दुष्टकेँ संतुष्ट करबाक सिद्धान्त” सँ भऽ सकैत अछि। पहिने, अहाँक कथनक कोनो आधार नहि अछि। आर, माछ खएनाइ कतय निषिद्ध अछि? दाक्षिणात्य— जँ एना अछि, तँ कतय एकर विधान अछि? भट्टाचार्य— की कात्यायनाचार्य “परञ्च माछ दू मासमे” कहैत गलती केने छथि? आर, की मनु बकवास कऽ रहल छथि जखन ओ कहैत छथि जे पाठीन आ रोहित प्रजातिक माछ क्रमशः देवगणकेँ (हव्य) आ पितरगणकेँ (कव्य) अर्पण करबाक हेतु सभसँ उपयुक्त अछि? (ई विचार कऽ कऽ जे झूठा आरोप बिना प्रतिद्वंद्वीकेँ हरायल नहि जा सकत, दाक्षिणात्य लोक अपना बीचसँ एक व्यक्तिकेँ बाहर पठबैत छथि। जाबे धरि ओ राजकर्मचारीकेँ पकड़ि कऽ ओतय नहि आनि लैत छथि, ताबे धरि ओ किछु गढ़ल कथनसँ अपन प्रस्तावकेँ स्थापित करैत छथि।) पालाण्डुमण्डन (तखन प्रधान राजकर्मचारीक प्रवेश, जे भट्टाचार्यकेँ बान्हि कऽ मारैत छथि।) भट्टाचार्य— हमरा नहि बुझना जाइत अछि जे अहाँ हमरा किएक मारि रहल छी। हम निर्दोष छी। राजकर्मचारी— अरे, अरे, अहाँ एहन व्यक्ति छी जे मृत्यु घटाबय लेल कोनो तान्त्रिक क्रिया कऽ रहल छी। (सिपाही दिस देखैत) जे होउ; एकरा फेर बेर-बेर मारू! (सिपाही ओकरा मारैत छथि।) भट्टाचार्य (दुःखसँ)— ओह, ओह, दक्षिणी भाइ सभ, की ई सत्य थिक? की अहाँ सभ एहि मामलामे प्रत्यक्षदर्शी नहि छी? दाक्षिणात्य— हम सभे एकमात्र गवाह छी। एहिमे की सन्देह अछि? भट्टाचार्य— तँ अहाँ सभ ई साफ किएक नहि कहैत छी? दाक्षिणात्य— की हमर गवाह होयबाक कोनो प्रमाण अछि? भट्टाचार्य— अहाँ सभ, वैदिक ज्ञानमे निपुण भऽ कऽ, अहाँक गवाह होयबामे की सन्देह अछि? दाक्षिणात्य (राजकर्मचारी दिस मुड़ैत)— जँ एना अछि, तँ एहि भट्टाचार्यकेँ मारि देल जाय, कारण ई एकटा तान्त्रिक थिक! (एना कहि ओ प्याज, लहसुन आ अन्यक छिलकाक ढेर देखबैत छथि। एकरा सत्य पाबि, राजकर्मचारी भट्टाचार्य आ हुनकर शिष्यकेँ बान्हि कऽ कूड़ाक ढेरक संग लऽ जाइत छथि।) दाक्षिणात्य (एक-दोसराक हाथ पकड़ैत)— जगदीश हमर प्रतिद्वंद्वी पर कोना विजय पाओल? हमर मित्रगण एहन गौरव भोगथि! पालाण्डुमण्डन शत्रु पराजित भेल, बाधाक अन्धकार पूर्णतः दूर भेल; ज्ञानक जय-जयकार भऽ रहल अछि; मुदा एखनो कलियुगमे निषिद्ध खाद्य-सम्बन्धी अन्धविश्वास किएक दूर नहि भेल? (१२) जे होउ। गर्भाधान संस्कार फेर कोनो आन शुभ मुहूर्त पर मनायल जाय। हम सभ चलैत छी। लिङ्गोजी भट्ट— तखन हम सभ आन शुभ मुहूर्तक व्यवस्था करी! (एना कहि सभ उठैत छथि।) तथापि, ई अन्तिम आशीर्वचन होउ। राज्य-प्राप्ति, सभ दिशामे विजय, आ कठिनाइक पार पयबाक कार्य निःसन्देह केवल शुभ मुहूर्तेमे होइत अछि। (१३) (सभ प्रस्थान करैत छथि।) पालाण्डुमण्डन नामक प्रहसन समाप्त भेल। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१४. गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-७) सन्दर्भ- कुणाल-कृत विश्वासक शक्ति उर्फ सुकन्याक विवाह कुणाल-कृत नाट्य-समीक्षा शृंखला · पञ्चम नाटक विश्वासक शक्ति उर्फ सुकन्याक विवाह एक चतुर्भुज नाट्य-समीक्षा : भारतीय · पाश्चात्य · चीनी · इजरायली परिप्रेक्ष्यमे प्रकाशन : अंतिका, अप्रैल-जून २०१३ · स्रोत : महाभारत (शान्तिपर्व) · पात्र : सूत्रधार + बहु-भूमिका १. परिचय, कथा-स्थापत्य आ विशिष्टता प्रेम-चतुष्टयक द्वितीय नाटिका ‘विश्वासक शक्ति उर्फ सुकन्याक विवाह’ महाभारतक शान्तिपर्वक सुकन्या-च्यवन-आख्यान पर आधारित अछि, मुदा कुणाल एहि परम्परागत कथाकेँ एक नवीन नारीवादी-दार्शनिक दृष्टिसँ पुनः-लिखैत छथि। नाटिकाक नामकरण सूचक अछि—‘विश्वासक शक्ति’ शीर्षक-भाव थिक, ‘सुकन्याक विवाह’ कथा-घटना। नाटकक स्थापत्य अत्यन्त सुगठित अछि। पाँच नाट्य-क्रम—(१) वसन्तोत्सव : सूत्रधार+विद्यापतिक ‘आयल रितुपति राज बसंत’+राजा-रानीक विरोधाभासी दर्शन; (२) च्यवनक वल्मीक-आच्छादित समाधि आ सुकन्याक क्रीड़ा-दुर्घटना; (३) च्यवनक क्षमा, विवाह-प्रस्ताव, राजाक असमञ्जस आ सुकन्याक स्वेच्छा-स्वीकार; (४) आश्रम-जीवन + अश्विनी कुमारक छल-परीक्षा (तीन एकसदृश रूप); (५) सुकन्याक नेत्र-परीक्षा, च्यवनकेँ यौवन, सोमरस-प्रदान आ समापन। नाटककक केन्द्रीय नाट्य-प्रश्न—‘विश्वास’ केहन होइत अछि? ओ आँखिसँ उत्पन्न होइत अछि, वा हृदयसँ? जखन तीन एकसदृश रूप सोझाँ हो, तखन स्त्री अपन ‘पति’केँ की द्वारा चिन्हैत अछि—देह द्वारा वा आत्मा द्वारा? एहि प्रश्नक नाट्य-उत्तर—“स्नेह, मात्सर्य, करुणा। एहि आँखि मे हिलकोरैए”—नाटकक वैचारिक पराकाष्ठा थिक। २. भारतीय नाट्य-सिद्धांत २.१ महाभारत-स्रोत आ पुनर्पाठ : नाट्यीकरणक राजनीति महाभारतक शान्तिपर्वक सुकन्या-च्यवन-आख्यानमे सुकन्या एक आज्ञाकारी पुत्री थिकाह जे पिताक आज्ञासँ वृद्ध च्यवनसँ विवाह करैत छथि। कुणाल एहि ‘आज्ञाकारी पुत्री’क स्थानमे एक ‘स्वेच्छाकारी स्त्री’ रखैत छथि। महाभारतमे सुकन्याक विवाहक निर्णय पिताक निर्णय थिक; एहि नाटकमे सुकन्या स्वयं घोषणा करैत छथि—“हमर अछि अपराध, हम करब परिमार्जन”—आ स्वेच्छासँ च्यवनक अर्धागिनी बनैत छथि। ई ‘महाकाव्य-पुनर्पाठ’ (epic rewriting) भारतीय स्त्री-लेखनक एक स्थापित परम्परा थिक—उर्मिला (रामायण), द्रौपदी (महाभारत), आ अन्यक दृष्टिकोणसँ मूल महाकाव्यक पुनर्कथन। कुणाल पुरुष-लेखकक रूपमे एहि परम्परासँ सचेत जुड़ाव देखाबैत छथि। २.२ रस-विचार : शृंगारक तीन अवस्था + अद्भुतक विजय शृंगार-रसक प्रवाह एहि नाटकमे एक विशिष्ट नाट्य-रूपरेखा लेलक अछि—(क) वसन्तपदसँ आरम्भ : विद्यापतिक ‘आयल रितुपति राज बसंत’ शृंगारक उदात्त काव्यात्मक प्रवेश थिक; (ख) वल्मीक-भेदनसँ करुण-भय : सुकन्याक क्रीड़ामे अनजान घाव, च्यवनक क्रोध, सुकन्याक अपराध-बोध; (ग) आश्रम-जीवनमे विश्वास-शृंगार : वल्कल-वेशमे ‘तपस्विनी जकाँ जीबैत छी, प्रसन्न तखनहूँ छलहूँ, प्रसन्न एखनहूँ छी’। अद्भुत-रसक चरम क्षण थिक अश्विनी-परीक्षा—तीन एकसदृश रूप! ई नाट्यशास्त्रक ‘अद्भुत’ (विस्मय)क एक विशेष उपभेद थिक—‘सुखद-अद्भुत’ (pleasant wonder)। भरत कहलाह जे अद्भुत-रसक व्यभिचारी भाव थिक श्रम, हर्ष, असूया (ईर्ष्या), विषाद आ चपलता—एहि दृश्यमे सभ उपस्थित अछि। २.३ नयन-परीक्षा : भारतीय दर्शनशास्त्रक आँखि-तत्त्व भारतीय दार्शनिक परम्परामे आँखि (नेत्र/नयन) कएक अर्थमे महत्त्वपूर्ण अछि—प्रत्यक्ष-प्रमाणक इन्द्रिय, आत्माक ‘दर्पण’, आ मिलनक माध्यम। ‘नयनसँ हृदय पढ़ब’ एक सुदीर्घ काव्य-परम्परा थिक (विद्यापतिक पदमे सेहो नयन-संवाद प्रमुख अछि)। एहि नाटकमे ‘तीन एकसदृश रूप’क परीक्षामे सुकन्याक विश्वास आँखिसँ उत्पन्न होइत अछि—मुदा बाह्य आँखिसँ नहि, ‘अन्तरदृष्टि’सँ। स्नेह, मात्सर्य, करुणा। एहि आँखि मे हिलकोरैए। आवेग, ममता, आनन्द। एहि आँखि मे बसैए। न्याय-दर्शनक परिप्रेक्ष्यमे ई ‘लाक्षणिक प्रत्यक्ष’ (लक्षण-द्वारा प्रत्यक्ष) थिक—बाह्य रूपक अभावमे आन्तरिक गुण-धर्मसँ पहचान। नव्य-न्यायक शब्दमे—‘लिंग’ (hetu/mark) द्वारा ‘साध्य’ (conclusion)क सिद्धि। सुकन्या आँखिमे स्नेह-करुणाक ‘लिंग’ देखि ‘च्यवन’क ‘साध्य’ सिद्ध करैत छथि। २.४ ‘च्यवनप्राश’ प्रसंग : लोक-स्मृति आ नाट्य-विनोद सूत्रधार नाटकक आरम्भमे एक मनोरंजक टिप्पणी करैत अछि—“च्यवनप्राश बला च्यवन कि...हँ...नईँ...मानि लिअ’...सैह।” एहि एक पंक्तिमे कुणाल दू हजार वर्षक अन्तरालकेँ एक हास्यात्मक नाटकीय क्षणमे समेटि दैत छथि—महर्षि च्यवन जे औषधि-ज्ञानक लेल विख्यात छलाह, ओहि परम्पराक आधुनिक उत्तराधिकार ‘च्यवनप्राश’ नामक उत्पाद थिक। भारतीय नाट्य-परम्पराक ‘विदूषकोक्ति’ (vidūṣaka utterance) जाहिमे पौराणिक गाम्भीर्यमे हास्य-व्यंग्य घुसड़ैत अछि, एकर उत्कृष्ट आधुनिक उदाहरण थिक। ३. पाश्चात्य नाट्य-सिद्धांत ३.१ मार्टिन बुबर : ‘आई-थाऊ’ आ ‘आई-इट’ सम्बन्ध जर्मन-यहूदी दार्शनिक मार्टिन बुबर (Martin Buber, १८७८–1९६५) अपन ‘आई एंड थाऊ’ (Ich und Du / I and Thou, १९२३)मे दू प्रकारक मानव-सम्बन्ध प्रस्तुत कएलनि—‘आई-थाऊ’ (I-Thou) जाहिमे दोसर व्यक्तिकेँ एक सम्पूर्ण ‘तुम’ (subject)क रूपमे देखल जाइत अछि; आ ‘आई-इट’ (I-It) जाहिमे दोसरकेँ एक वस्तु (object) मानल जाइत अछि। एहि नाटकमे अश्विनी कुमार ‘आई-इट’क प्रतिनिधि छथि—ओ सुकन्याकेँ एक सुन्दर वस्तु बनेबाक चाहैत छथि (“देह टा देखैत छी, देह टा बुझाबैत छी”)। च्यवन-सुकन्याक सम्बन्ध ‘आई-थाऊ’क अवतरण थिक—च्यवन कहैत छथि—“अहाँ नेत्रक द्वार मे पैसि क’ हृदय देखैत छी।” ई बुबरक ‘मिटिंग’ (Begegnung / genuine meeting)क नाट्य-रूपान्तरण थिक। अश्विनी-परीक्षाक उलटल-दिशा—सुकन्या आँखिसँ आत्मा पढ़ैत छथि—यैह ‘आई-थाऊ’क पहचान-विधि थिक। ३.२ अरस्तू : ‘एनागनोरिसिस’क एक नूतन रूप अरस्तूक ‘काव्यशास्त्र’मे ‘अभिज्ञान’ (ἀναγνώρισις / anagnorisis) एक महत्त्वपूर्ण नाट्य-क्षण थिक—जाहिमे पात्र एक महत्त्वपूर्ण ‘पहचान’ करैत अछि। सर्वोत्कृष्ट अभिज्ञान ओ थिक जे कथाक परिवर्तन-बिन्दुसँ (peripeteia) एकहि संग घटित हो। एहि नाटकक तीन-मुखौटा दृश्यमे ‘अभिज्ञान’ एक अत्यन्त नवीन रूप लैत अछि—सुकन्या तीन एकसदृश रूपमेसँ पतिकेँ पहचानैत छथि। अरस्तूक अभिज्ञान प्रायः ‘बाह्य चिह्न’ (घाव, अँगूठी, नाम)सँ होइत अछि; एहि नाटकमे सुकन्याक अभिज्ञान ‘आन्तरिक गुण-पठन’सँ होइत अछि—‘स्नेह, करुणा, ममता’क पहचान। ई ‘आन्तरिक अभिज्ञान’ (internal anagnorisis) अरस्तूक श्रेणीकेँ विस्तारित करैत अछि। ३.३ एरिक एरिकसन : पहचान-संकट आ ‘विश्वास’क विकास अमेरिकी मनोवैज्ञानिक एरिक एरिकसन (Erik Erikson, १९०२–1९९४) मानव-विकासक आठ चरण प्रस्तुत कएलनि। प्रथम चरणमे ओ ‘बेसिक ट्रस्ट बनाम मिस्ट्रस्ट’ (Basic Trust vs. Mistrust) रखलनि—एहि मौलिक ‘विश्वास’क निर्माण व्यक्तित्वक सम्पूर्ण विकासक आधार थिक। सुकन्याक विश्वास एरिकसनक अर्थमे ‘बेसिक ट्रस्ट’क पौराणिक-नाट्य रूपान्तरण थिक। ओ एहन पितासँ आयल छथि जे ‘प्रसन्न रहू, सब ठीक हेतै’ (राजाक उदार आशावाद) आ ‘यथार्थसँ आँखि जुनि फेरियाउ’ (रानीक सतर्क यथार्थवाद) दुनूक दर्शन सुनने छथि। ई दुनू दृष्टिकोणसँ परे सुकन्या अपन मौलिक विश्वास स्वयं निर्मित करैत छथि—वल्मीक-भेदनक अपराध-बोध, स्वेच्छा-विवाह, अश्विनी-परीक्षामे अडिगता—यैह ‘ट्रस्ट फॉर्मेशन’ (विश्वास-निर्माण)क नाट्य-यात्रा थिक। ३.४ ब्रेख्त : हास्य-राजनीति आ ‘अर्ध-देव’क विडम्बना ब्रेख्तीय नाट्यशास्त्रमे हास्य-दृश्य प्रायः राजनीतिक व्यंग्यक वाहक होइत अछि। अश्विनी कुमारक दृश्य एहि दृष्टिसँ असाधारण अछि। ‘अर्द्धदेव’—जे स्वर्गमे बसैत, अप्सराक संग रहैत, देवता कहबैत—ओ एक राजकुमारी जे अरण्यमे वल्कल पहिरि क’ रहैत छथि, तनिकर समक्ष विफल होइत छथि। ब्रेख्तक ‘Gestus’ (सामाजिक भाव-मुद्रा)क परिप्रेक्ष्यमे अश्विनी कुमारक दृश्य एक ‘class critique’ (वर्ग-आलोचना) थिक—विशेषाधिकार-प्राप्त देवता (privileged class) ओहन ‘मानव-मूल्य’केँ नहि बुझि सकैत जे एक साधारण ‘नश्वर’ स्त्री जीवैत अछि। सुकन्याक उत्तर—“आहाँ लोकनि तँ हृदय रखैत नहि छी”—यैह ब्रेख्तीय नैतिक-राजनीतिक निर्णय थिक। ४. चीनी नाट्य-सिद्धांत ४.१ 心眼 (शीन-यान) : हृदय-दृष्टि चीनी काव्यशास्त्री आ बौद्ध दार्शनिक परम्परामे ‘शीन-यान’ (心眼, heart-eye / हृदय-आँखि) एक महत्त्वपूर्ण अवधारणा थिक—ओ अन्तरदृष्टि जे बाह्य रूपक परे आन्तरिक सत्यकेँ देखैत अछि। चान-बौद्ध (禅) परम्परामे ‘शीन-यान’केँ ‘धर्मेन्द्रिय’ (dharma-eye)क एक रूप मानल जाइत अछि। एहि नाटकक केन्द्रीय परीक्षा—तीन एकसदृश रूपमेसँ पतिकेँ पहचानब—ठीक ‘शीन-यान’क अभ्यास थिक। सुकन्या बाह्य आँखि मूनि क’ (“सुकन्या आँखि मुनैत अछि”), भीतरी हृदय-दृष्टिसँ प्रत्येक आँखिमे गुण-धर्म पढ़ैत छथि—गौरव-घमंड (अश्विनी-१), लिप्सा-कुत्सा-लोभ (अश्विनी-२), स्नेह-करुणा-आनन्द (च्यवन)। ई ‘शीन-यान’क एक आश्चर्यजनक नाट्य-उदाहरण थिक। ४.२ 缘 (युआन) : कर्म-सम्बन्ध आ प्रायश्चित्त-योग चीनी बौद्ध-दार्शनिक परम्परामे ‘युआन’ (缘, karmic connection / कर्म-सम्बन्ध) एक केन्द्रीय अवधारणा थिक—दू प्राणीक मिलन एक पूर्व-कर्मक परिणाम थिक। एहि सिद्धांतमे कर्म-सम्बन्ध केवल पूर्व-जन्मक ऋण नहि, वर्तमान क्षणक निर्णयसँ सेहो निर्मित होइत अछि। सुकन्याक वल्मीक-भेदन एक अनजान कर्म थिक—“कर' नहि चाहलहूँ, भ’ गेल”। मुदा हुनकर प्रतिक्रिया—“हम अपराधी छी, दंडक भागी छी”—एक सचेत ‘प्रायश्चित्त-युआन’ (karmic rectification) थिक। एहि ‘युआन’क परिणाम थिक च्यवनक विवाह-प्रस्ताव। चीनी काव्य-नाट्यमे ई ‘कर्म-विनाश’ (karma-resolution) एक प्रमुख नाट्य-चाप थिक। ४.३ 形神 (शिंग-शेन) : रूप आ आत्माक द्वन्द्व चीनी सौन्दर्यशास्त्रमे ‘शिंग-शेन’ (形神, form and spirit)क द्वन्द्व एक प्रमुख चर्चा-विषय थिक। ‘शिंग’ (形) बाह्य रूप थिक, ‘शेन’ (神) आन्तरिक सत्ता। चीनी चित्रकला-सिद्धांतमे कहल जाइत अछि—‘तुआन-की-शिंग-शी-शेन’ (得其形似神, to capture the spirit through form)। एहि नाटकक तीन-मुखौटा दृश्यमे ‘शिंग’ (बाह्य रूप) एकसदृश अछि; ‘शेन’ (आन्तरिक आत्मा) भिन्न-भिन्न। सुकन्याक विश्वास ‘शेन’केँ ‘शिंग’क परे देखबाक शक्ति थिक। अश्विनी कुमारक असफलता—ओ ‘शिंग’ नकल क’ सकलाह, ‘शेन’ नहि—यैह चीनी ‘शिंग-शेन’ सिद्धांतक अनुरूप थिक। ४.४ 义务 (यीवू) : कर्तव्य-बोध आ सुकन्याक नैतिक विकास कन्फ्यूशियाई दार्शनिक परम्परामे ‘यीवू’ (义务, moral obligation / नैतिक कर्तव्य) एक केन्द्रीय मूल्य थिक। ई केवल बाह्य नियम-पालन नहि—‘मेंग्ज़ी’ (孟子, Mencius)क अनुसार नैतिक कर्तव्य मनुष्यक अन्तर्निहित ‘रेन’ (仁, benevolence / मानवता)सँ उत्पन्न होइत अछि। सुकन्याक नाट्य-यात्रा ‘यीवू’क एक विशेष क्रम दर्शाबैत अछि—(क) अनजान कर्म (वल्मीक-भेदन) → (ख) कर्तव्य-बोध (अपराध-स्वीकार) → (ग) नैतिक निर्णय (स्वेच्छा-विवाह) → (घ) ‘रेन’क प्रकटीकरण (अश्विनी-क्षमा, च्यवन-प्रेम)। ई एक मेंग्ज़ियन नैतिक-विकास-चाप (Mencian moral arc) थिक। ५. इजरायली नाट्य-सिद्धांत ५.१ मार्टिन बुबर आ इजरायली आत्मीयता : ‘हसिदिक’ विश्वास-दर्शन मार्टिन बुबर (जकर ‘आई-थाऊ’ सिद्धांत पाश्चात्य खण्डमे विवेचित भेल) इजरायली संस्कृतिक परम्पराक एक महत्त्वपूर्ण स्तम्भ थिकाह। बुबर हसिदिक (Hasidic Jewish) परम्पराक दार्शनिक थिकाह—जाहिमे ‘विश्वास’ (Emunah / אמונה) एक केन्द्रीय आध्यात्मिक-नैतिक मूल्य थिक। बुबरक हसिदिक दर्शनमे ‘विश्वास’ मात्र बौद्धिक सहमति नहि, अपितु एक ‘समर्पण’ (Hingabe) थिक—समग्र आत्मासँ दोसरक ओर मुड़नाइ। सुकन्याक विश्वास एहि ‘हसिदिक Emunah’क एक हिन्दू-पौराणिक समकक्ष थिक—ओ च्यवनकेँ बुद्धिसँ नहि, समग्र हृदयसँ पहचानैत छथि। एहि नाटिकाक शीर्षक ‘विश्वासक शक्ति’ आ बुबरक ‘Emunah’ एक्के आत्मिक यात्रा थिक। ५.२ एली रोज़िक : ‘मास्क’क प्रतिमात्मकता आ पहचानक संकट एली रोज़िकक प्रतिमा-सिद्धांत (theatrical iconicity) एहि नाटकमे एक असाधारण परीक्षामे पड़ैत अछि। तीन एकसदृश अभिनेता—एक्कहिं वेश, एक्कहिं रूप, एक्कहिं भाषा। रोज़िकक प्रश्न—‘जखन प्रतिमा अपना ‘referent’सँ अलग नहि क’ सकल जाइत, तखन दर्शक की देखैत अछि?’ एहि नाटकमे दर्शक एकहि संग तीन स्तर पर देखैत अछि—(क) तीन अभिनेताक शारीरिक उपस्थिति; (ख) तीन काल्पनिक पात्र (च्यवन, अश्विनी-अग्रज, अश्विनी-अनुज); (ग) सुकन्याक ‘हृदय-पाठ’ जाहिमे प्रतिमाक ‘referent’ भिन्न हो जाइत अछि। रोज़िकक शब्दमे—ई ‘iconic ambiguity’ (प्रतिमात्मक-अस्पष्टता)क एक जटिल उदाहरण थिक जाहिमे पहचानक संकट स्वयं नाट्य-विषय बनि जाइत अछि। ५.३ यहूदी परम्पराक ‘टिक्कुन ओलाम’ आ प्रायश्चित्त-नाट्य यहूदी धर्म-दर्शनमे ‘टिक्कुन ओलाम’ (Tikkun Olam / संसार-सुधार) एक महत्त्वपूर्ण अवधारणा थिक—एहि दर्शनमे मानवक नैतिक दायित्व थिक जे ओ अपन कर्मद्वारा संसारकेँ ठीक करए। ई ‘टिक्कुन’ (सुधार/मरम्मत) व्यक्तिगत स्तर पर ‘तेशुवा’ (teshuva / पश्चाताप-परिवर्तन)सँ आरम्भ होइत अछि। सुकन्याक आचरण एहि ‘टिक्कुन’-दर्शनक एक हिन्दू-पौराणिक प्रतिरूप थिक। ओ वल्मीक-भेदनक ‘शेबेर’ (שבר, brokenness / टूटन) स्वीकार करैत छथि, ‘तेशुवा’ (पश्चाताप-स्वीकार) करैत छथि, आ अपन जीवनक ‘टिक्कुन’ करैत छथि—च्यवनक अर्धागिनी बनि क’। नाटकक समापन (“स्नेह सँ सुरभित बरसात बहैत रहल”) एहि ‘टिक्कुन’क पूर्णता थिक। ५.४ इजरायली लोक-रंगमंचक ‘पुरीम-शपील’ : कौतुक-विडम्बना इजरायली लोक-नाट्य-परम्परामे ‘पुरीम-शपील’ (Purim Spiel / पुरीम-खेल) एक विशेष विधा थिक जाहिमे पारम्परिक आख्यानकेँ हास्य-व्यंग्यात्मक रूपमे प्रस्तुत कएल जाइत अछि। एहिमे ्रान्तिकारी पात्र-उलटफेर (inversion), वेश-परिवर्तन (costume change), आ गम्भीर विषयक हास्यात्मक उपस्थापन होइत अछि। अश्विनी-कुमार-प्रसंग एहि ‘पुरीम-शपील’ शैलीक एक हिन्दू-पौराणिक संस्करण थिक। ‘अर्द्धदेव’ (देवता) एक ‘सिद्धान्ततः उच्च’ सत्ता छथि, मुदा एहि दृश्यमे ओ हास्यास्पद, असफल आ विडम्बित छथि। सुकन्याक धमकी—“आगाँ सँ मनुख, पाछाँ सँ बकरी”—एक पुरीम-शपील-सदृश कार्निवालेस्क उलटफेर थिक। गम्भीर देवता-पात्रमे हास्य-व्यंग्य एकहि संग नाटककेँ जीवन्त बनाबैत अछि। ६. चतुर्भुज-संश्लेषण : ‘विश्वासक शक्ति’ के थिक? चारू नाट्य-परम्पराकेँ एकठाम राखि देखल जाए तँ एहि नाटिकाक केन्द्रीय प्रश्नक उत्तर बहुआयामी भ’ जाइत अछि। भारतीय दृष्टि—महाकाव्य-पुनर्पाठ (स्वेच्छा-विवाह); शृंगार+अद्भुत+करुण; नव्य-न्यायक लिंग-साध्य (आँखिमे गुण-पठन); ‘च्यवनप्राश’ विदूषकोक्ति। पाश्चात्य दृष्टि—बुबरक आई-थाऊ (हृदय-सम्बन्ध बनाम वस्तुकरण); अरस्तूक आन्तरिक-अभिज्ञान; एरिकसनक ट्रस्ट-फॉर्मेशन; ब्रेख्तीय वर्ग-आलोचना (अर्धदेव बनाम मानव-हृदय)। चीनी दृष्टि—(शीन-यान / हृदय-दृष्टि); (युआन / कर्म-सम्बन्ध + प्रायश्चित्त); (शिंग-शेन / रूप बनाम आत्मा); (यीवू / मेंग्ज़ियन नैतिक-चाप)। इजरायली दृष्टि—बुबरक हसिदिक Emunah (समग्र-हृदय-विश्वास); रोज़िकक iconic ambiguity; टिक्कुन ओलाम (संसार-सुधार = वल्मीक-भेदन → विवाह); पुरीम-शपील (अश्विनी-दृश्यक कार्निवालेस्क)। चारू परम्पराक साझा निष्कर्ष—‘विश्वासक शक्ति’ देह आ रूपक शक्ति नहि, हृदयक शक्ति थिक। एहि नाटकक सभ सँ उत्कृष्ट नाट्य-क्षण—जखन सुकन्या आँखि मुनि क’ तीन एकसदृश रूपमेसँ स्नेह-करुणाक आँखि देखि पतिकेँ पहचानैत छथि—ई क्षण भारतीय, पाश्चात्य, चीनी आ इजरायली, चारू नाट्य-परम्पराक दृष्टिमे एकसमान ‘आलोकित’ क्षण थिक। च्यवनक अन्तिम वाक्य—“नहि भ’ सकैत छल...हम अहाँसँ परिचित छी प्रिय। अहाँ नेत्रक द्वार मे पैसिक’ हृदय देखैत छी”—एहि चतुर्भुज-समीक्षाक समापन-वाक्य सेहो थिक। ॥ पञ्चम नाटकक समीक्षा समाप्त ॥ · अगिला अंक रमानन्द झा ’रमण’ विशेषांक अछि; तेँ “ प्रेमक विस्तार उर्फ श्वेताक आविष्कार” विदेहक अंक ४४७ दिनांक ०१ सितम्बर २०२६ मे ई-प्रकाशित हएत। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१५. गजेन्द्र ठाकुर- समग्र सिंहावलोकन-चतुर्भाणी, दामक प्रहसनम्, हास्यार्णव, आगमडम्बरम्, कादम्बरी, भल्लट-क्षेमेन्द्र-नीलकण्ठक व्यंग्य-त्रयी, पलाण्डुमण्डन, उत्तररामचरितम्, अभिज्ञानशाकुन्तलम्, मुद्राराक्षसम्, मृच्छकटिकम्, भगवदज्जुकम् आ मत्तविलास तेरहटा अनूदित पोथीक तुलनात्मक अध्ययन [संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर] समग्र सिंहावलोकन-चतुर्भाणी, दामक प्रहसनम्, हास्यार्णव, आगमडम्बरम्, कादम्बरी, भल्लट-क्षेमेन्द्र-नीलकण्ठक व्यंग्य-त्रयी, पलाण्डुमण्डन, उत्तररामचरितम्, अभिज्ञानशाकुन्तलम्, मुद्राराक्षसम्, मृच्छकटिकम्, भगवदज्जुकम् आ मत्तविलास तेरहटा अनूदित पोथीक तुलनात्मक अध्ययन [संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर] — भारतीय आ पाश्चात्य सिद्धान्तक आलोकमे विस्तृत समीक्षा — भारतीय आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक दृष्टिसँ संकलनक स्वरूप प्रस्तुत तेरह पोथी — चतुर्भाणी, दामक प्रहसनम्, हास्यार्णव, आगमडम्बरम्, कादम्बरी, भल्लट-क्षेमेन्द्र-नीलकण्ठक व्यंग्य-त्रयी, पलाण्डुमण्डन, उत्तररामचरितम्, अभिज्ञानशाकुन्तलम्, मुद्राराक्षसम्, मृच्छकटिकम्, भगवदज्जुकम् आ मत्तविलास — मिलि कऽ संस्कृत साहित्यक लगभग सहस्र वर्षक (गुप्त-पूर्वसँ सत्रहम शताब्दी धरि) आ सम्पूर्ण विधा-वितानक (भाण, प्रहसन, नाटक, प्रकरण, गद्यकाव्य, शतक-काव्य, व्यंग्य-काव्य) प्रतिनिधि चयन थिक। एहि चयनक अपन आन्तरिक तर्क अछि: एक छोर पर कालिदास-भवभूति-बाणक "महापरम्परा" अछि, दोसर छोर पर भाण-प्रहसन-व्यंग्यक ओ "समानान्तर परम्परा" जे गणिका-वीथी, जुआघर, मदिरालय, भ्रष्ट सभा — समाजक अस्वीकृत कोण सभकेँ साहित्यक केन्द्रमे अनैत अछि। एहि दुनू परम्पराकेँ एक्कहि पाँतिमे राखब स्वयं एकटा आलोचनात्मक वक्तव्य थिक — जे साहित्यक इतिहास केवल शिखर-सभक नहि, घाटी-सभक सेहो इतिहास थिक। भारतीय सिद्धान्तक आलोकमे: रससँ औचित्य धरि रस-सिद्धान्तक कसौटी पर ई तेरह पोथी रस-वितानक दुनू ध्रुव छूबि लैत अछि। शाकुन्तल आ कादम्बरी शृंगारक, उत्तररामचरित करुणक, मुद्राराक्षस बुद्धिवीरक, आ शेष रचना-मण्डल हास्यक — मुदा वास्तविक शिक्षा ई जे कोनो कृति एक-रस-बद्ध नहि अछि: शाकुन्तलमे करुण, उत्तररामचरितमे अद्भुत, मृच्छकटिकमे नओ रसक मेला, आ प्रहसनक हास्यक तरमे प्रायः निर्वेद। ध्वनि-सिद्धान्त एहि संकलनमे अपन दुनू सीमा देखैत अछि — भल्लटक अन्योक्ति "असंलक्ष्यक्रम ध्वनि"क शिखर थिक, तँ हास्यार्णवक वाच्य व्यंग्य "चित्रकाव्य"क; आ बीचमे आगमडम्बर-भगवदज्जुक सन रचना जे देखबैत अछि जे दर्शनो ध्वनित भऽ सकैत अछि। वक्रोक्ति-दृष्टिएँ सम्पूर्ण संकलन कुन्तकक कोटि-क्रमक उदाहरणमाला थिक — पद-वक्रतासँ (श्लेष: बाण) प्रबन्ध-वक्रता धरि (कथा-भीतर-कथा: कादम्बरी; नाटक-भीतर-नाटक: उत्तररामचरित)। औचित्य-सिद्धान्त एतऽ सभसँ रोचक रूपमे प्रकट अछि: क्षेमेन्द्र स्वयं एहि संकलनक रचनाकार छथि, आ प्रहसन-वर्ग देखबैत अछि जे सायास "अनौचित्य" (वेश-वाणी-आचारक व्यत्यय) स्वयं एकटा काव्य-युक्ति थिक — औचित्यक व्याकरणसँ अनौचित्यक कविता। पाश्चात्य सिद्धान्तक आलोकमे: अरस्तूसँ बाख्तिन धरि पाश्चात्य कोटि-सभसँ मिलान एहि संकलनक विश्व-साहित्यिक कद नापि दैत अछि: उत्तररामचरित शेक्सपियरी रोमांसक, मुद्राराक्षस मैकियावेली-पूर्व राजनीतिक यथार्थवादक, कादम्बरी आधुनिक कथाशास्त्र (narratology)क, भगवदज्जुक लॉक-पूर्व personal identity विमर्शक, चतुर्भाणी ब्राउनिंग-पूर्व नाटकीय एकालापक, आ पलाण्डुमण्डन इरैस्मस-पूर्व व्याज-प्रशस्तिक समानान्तर वा पूर्वरूप थिक। मुदा एहि संकलन पर सभसँ फलदायी एक्कटा पाश्चात्य दृष्टि जँ चुनल जाए तँ ओ बाख्तिन छथि — कार्निवल, बहुस्वरता आ "हँसीक संस्कृति"क सिद्धान्तकार। प्रहसन-भाण-व्यंग्यक ई समूचा वर्ग बाख्तिनक ओहि प्रमेयक भारतीय प्रमाण थिक जे प्रत्येक "गम्भीर" संस्कृतिक समानान्तर एकटा "हँसैत" संस्कृति जीबैत रहैत अछि — आ जे संस्कृति अपन हँसीकेँ साहित्य बनौलक (काञ्चीक सम्राट् धरि प्रहसन लिखलनि!) से भीतरसँ आत्मविश्वासी छल। संगहि सबाल्टर्न-नारीवादी दृष्टि एहि संकलनक तेसर सूत्र खोलैत अछि: शम्बूक (उत्तररामचरित), आर्यक-स्थावरक (मृच्छकटिक), वसन्तसेना-अज्जुका (दू-दू गणिका-नायिका), शकुन्तला-सीताक साक्ष्य-संकट — शास्त्रीय साहित्यक भीतरहि हाशियाक स्वर सभ अभिलिखित अछि, आलोचकक काज ओकरा सुनब थिक। मैथिली अनुवाद-परियोजनाक महत्त्व ई तेरह अनुवाद एकटा सुचिन्तित परियोजनाक अंग थिक — संस्कृत क्लासिकक पूर्ण वितान (उच्च नाट्यसँ प्रहसन धरि, गद्यकाव्यसँ व्यंग्य-शतक धरि) केँ शुद्ध मैथिलीमे उतारब। एकर साहित्यिक-ऐतिहासिक अर्थ तीन स्तर पर अछि। पहिल, भाषिक: ई अनुवाद-समूह मैथिली गद्यक क्षमता-परीक्षा थिक — बाणक समास, भवभूतिक करुणा, शकारक वाक्-विकृति, जयन्तक प्रमाण-भाषा — आ मैथिली प्रत्येक परीक्षामे अपन देशज सम्पदासँ उत्तीर्ण होइत अछि। दोसर, सांस्कृतिक: मिथिला — गंगेश-अयाचीक न्यायभूमि, विद्यापतिक काव्यभूमि — लेल ई अनुवाद कोनो "आयात" नहि, अपन पैतृक सम्पत्तिक गृह-प्रवेश थिक। तेसर, परम्परा-निर्माणक: विधा-वैविध्यक ई सायास चयन मैथिली साहित्यकेँ ओ आदर्श उपलब्ध करबैत अछि जे कोनो जीवित साहित्यकेँ चाही — गम्भीर आ विनोदी, शास्त्रीय आ लौकिक, केन्द्र आ हाशिया — सभ स्वर एक्कहि आलमारीमे। एही अर्थेँ ई तेरह पोथी तेरह अनुवाद मात्र नहि, मैथिलीमे एकटा सम्पूर्ण "समानान्तर क्लासिक-मण्डल"क स्थापना थिक। चतुर्भाणी चारि संस्कृत भाण — पद्मप्राभृतकम् (शूद्रक), धूर्तविटसंवाद (ईश्वरदत्त), उभयाभिसारिका (वररुचि), पादताडितकम् (श्यामिलक) विस्तृत समीक्षा — भारतीय आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक दृष्टिसँ कृति-परिचय भाण संस्कृत रूपकक दस भेदमे सभसँ अनूठा विधा थिक — एकपात्रीय, एकांकी, जाहिमे एकटा वाक्पटु विट रंगमञ्च पर असगरे ठाढ़ भऽ "आकाशभाषित"क कौशलसँ समस्त नगरक चरित्र-वैचित्र्यकेँ जीवन्त कऽ दैत अछि। ओ अदृश्य पात्र सभसँ गप करैत अछि, हुनकर उत्तर स्वयं दोहरबैत अछि, आ एहि क्रममे गणिका-वीथी, जुआघर, विटमण्डली, पण्डित-सभा — सम्पूर्ण नागरक संसार श्रोताक आगाँ पसरि जाइत अछि। चतुर्भाणीक चारू रचना — शूद्रकक पद्मप्राभृतकम्, ईश्वरदत्तक धूर्तविटसंवाद, वररुचिक उभयाभिसारिका आ श्यामिलकक पादताडितकम् — गुप्तयुगक आसपासक नागर-संस्कृतिक अद्वितीय दस्तावेज थिक। एहिमे काव्यशास्त्र-प्रसिद्ध "शृंगार सहायक" विटक ओ रूप भेटैत अछि जे कामसूत्रक नागरक व्यावहारिक संस्करण बुझाइत अछि। भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टि भरतक नाट्यशास्त्र भाणकेँ भारती वृत्ति-प्रधान कहैत अछि — अर्थात् वाणीक अभिनय एतऽ सर्वोपरि। रस-दृष्टिएँ भाणमे शृंगार आ हास्यक अद्भुत रसायन अछि: विट स्वयं शृंगारक दूत थिक, मुदा ओकर दौत्य-वर्णनमे व्यंग्यक एहन धार अछि जे हास्य स्थायी भावक रूप धरि पहुँचि जाइत अछि। ध्वनि-सिद्धान्तक कसौटी पर भाणक "आकाशभाषित" स्वयं व्यञ्जनाक रंगमञ्चीय रूप थिक — जे पात्र मंच पर नहि अछि, तकर उपस्थिति ध्वनित होइत अछि, कहल नहि जाइत। कुन्तकक वक्रोक्ति-सिद्धान्तसँ देखी तँ चारू भाणक प्राण "वाक्य-वक्रता"मे अछि: पादताडितकम्‌मे गणिकाक लातसँ माथ पर प्रहार पओलाक बादो ओकरा "अनुग्रह" कहब वक्रोक्तिक चरम अछि। क्षेमेन्द्रक औचित्य-दृष्टिसँ ई प्रश्न रोचक अछि जे गणिका-जगतक अश्लीलप्राय विषय काव्योचित कोना बनैत अछि — उत्तर अछि: विटक परिष्कृत, अलंकृत भाषा विषयक ग्राम्यताकेँ उदात्त कऽ दैत अछि; उक्तिक औचित्य वस्तुक अनौचित्यकेँ साधि लैत अछि। पाश्चात्य सिद्धान्त-दृष्टि पाश्चात्य दृष्टिसँ भाण dramatic monologue क प्राचीनतम परिपक्व रूपमे गनल जयबा योग्य अछि — ब्राउनिंगक एकालाप-कलासँ सहस्राब्दी पूर्व। बाख्तिनक "कार्निवलेस्क" अवधारणा चतुर्भाणी पर सटीक बैसैत अछि: गणिका-वीथी ओ "उत्सवी वर्ग-विपर्यय"क स्थल थिक जतऽ पण्डित, राजपुरुष, तपस्वी — सभ अपन-अपन सामाजिक मुखौटा उतारि समान भऽ जाइत छथि; भाण ओहि उल्टल संसारक विवरणी थिक। बर्गसाँक हास्य-सिद्धान्त ("यान्त्रिकताक आरोपण") विटक चरित्र-चित्रणमे प्रत्यक्ष अछि — प्रत्येक पात्र अपन एकहि टेकक यन्त्र बनल अछि: कृपण अपन कृपणताक, कामुक अपन कामुकताक। Reader-response दृष्टिसँ भाण श्रोताक कल्पना पर निर्भर सभसँ माँगबला विधा थिक — इज़रक "रिक्त स्थान" (Leerstellen) एतऽ शाब्दिक अर्थमे मंच पर पसरल अछि; अदृश्य पात्रकेँ दर्शके गढ़ैत छथि। एहि अर्थमे भाण minimalist theatre आ one-man show क पूर्वज थिक। अनुवाद-मूल्यांकन आ निष्कर्ष मैथिली अनुवादमे विटक नागर वाग्विलास लेल मैथिलीक ओ परिहास-परम्परा सहज उपलब्ध अछि जे विद्यापतिक नखरा-वर्णनसँ लऽ धाङनि-गीत धरि पसरल अछि। अनुवादमे "आकाशभाषित"क लय — प्रश्न दोहराएब, फेर उत्तर देब — मैथिलीक स्वाभाविक संवाद-शैलीमे ढलल अछि, आ गणिका-जगतक पारिभाषिक शब्दावली लेल देशज शब्दक चयन अनुवादकेँ पण्डिताऊ बनयबासँ बचबैत अछि। समग्रतः चतुर्भाणी प्राचीन भारतीय नगर-जीवनक व्यंग्य-चित्रशाला थिक, जकर मैथिली प्रवेश एहि भाषाक रंगमञ्च-साहित्यमे एकटा रिक्त कोठरी भरैत अछि। दामक प्रहसनम् लघु संस्कृत प्रहसन — कर्ण-परशुराम आख्यानक हास्य-रूपान्तर विस्तृत समीक्षा — भारतीय आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक दृष्टिसँ कृति-परिचय दामक प्रहसनम् लघुकाय मुदा सुगठित प्रहसन थिक जे महाभारतक एकटा मर्मान्तक प्रसंग — कर्णक परशुरामसँ छद्म-वेशमे धनुर्विद्या सीखब आ शापित होयब — केँ हास्यक चौखटामे राखि दैत अछि। नाटकक केन्द्रमे वीर-कथा नहि, "नेक दामक" अछि — कर्णक पेटू अनुचर, जे राजमहलक तड़ाग-स्नान, पाँच सुगन्धक पान आ मलमली वस्त्र छोड़ि वन-वासक कष्टमे पड़ल अछि आ जकर इन्द्रिय सभ "दर्पणक प्रतिबिम्ब जकाँ" उनटा गेल अछि — कानसँ सुँघैत अछि, नथुनासँ देखैत अछि। प्रस्तावना, दामकक दीर्घ एकालाप, परशुराम-कर्णक अति-संक्षिप्त दीक्षा-दृश्य, आ दू सैनिकक मुखेँ शाप-वृत्तान्त — एतबेमे प्रहसन सम्पूर्ण भऽ जाइत अछि। भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टि रस-दृष्टिएँ ई रचना हास्य आ करुणक विलक्षण सन्धि पर ठाढ़ अछि। दामकक क्षुधा-विलाप "आत्मस्थ" हास्य थिक (भरतक भेदमे, जतऽ पात्र स्वयं हँसीक विषय बनैत अछि), मुदा पृष्ठभूमिमे कर्णक नियति करुणक अन्तर्धारा बहबैत अछि — भृंगक दंश सहैत कर्णक मौन वीर आ करुणक व्यभिचारी भावसँ पुष्ट अछि। ध्वनि-दृष्टिसँ सभसँ सूक्ष्म क्षण ओ अछि जखन कर्ण कहैत छथि "हम क्षत्रिय नहि छी" — ई एक पाँतिमे वस्तुध्वनि अछि: झूठ बजबाक क्षणहिमे शापक बीज रोपा गेल, से कहल नहि गेल, ध्वनित भेल। दामकक आश्रम-वर्णन — तपस्विनी कन्या घैलसँ पौधा सिंचैत "जेना माता शिशुकेँ स्तनपान करबैत होथि" — कालिदासीय उपमा-परम्पराक औचित्यपूर्ण अनुकरण थिक, आ प्रहसनक भीतर शान्त रसक ई द्वीप वैषम्य-सौन्दर्य (contrast) उत्पन्न करैत अछि। एरण्ड वृक्षक "समय भऽ गेल" कहब अचेतनमे चेतनारोपसँ हास्यक उद्दीपन थिक। पाश्चात्य सिद्धान्त-दृष्टि पाश्चात्य कोटिमे दामक स्पष्टतः parasite (उपजीवी) पात्र-परम्पराक अछि — ग्रीक-रोमन कॉमेडीक ओ भोजन-लोलुप अनुचर जे प्लॉटस आ टेरेंसक नाटकमे स्वामीक छाया बनल घूमैत अछि। दामकक एकालाप बर्गसाँक हास्य-सिद्धान्तक पाठ्य-उदाहरण थिक: शरीरक यान्त्रिक विद्रोह (इन्द्रिय-विपर्यय) आ अभ्यासक जड़ता (राजभोगक टेव) — दुनू "जीवन पर यन्त्रक आरोपण" थिक जे बर्गसाँक अनुसार हास्यक मूल स्रोत अछि। संरचनावादी दृष्टिसँ प्रहसन mock-heroic (व्याज-वीर) विधाक लघु प्रयोग अछि: महाकाव्यीय कथावस्तु (गुरु-शिष्य, शाप, नियति) आ क्षुद्र नायक (पेटू सेवक)क विसंगति स्वयं व्यंग्यक संरचना बनि जाइत अछि। एहि विसंगतिकेँ incongruity theory (कान्ट-शोपेनहावर) सोझे व्याख्यायित करैत अछि। आधुनिक दृष्टिसँ दामकक देह-केन्द्रित विलाप — भूख, निन्न, कपार-दर्द — कथाक "महान" स्तरक प्रति देहक प्रतिरोध थिक; बाख्तिनक भाषामे grotesque body उदात्त आख्यानकेँ धरती पर उतारि अनैत अछि। अनुवाद-मूल्यांकन आ निष्कर्ष मैथिली अनुवादमे दामकक भोजन-स्मृति ("सन्ध्याकाल मीठ पेय, पाँच सुगन्धसँ युक्त पान") मैथिल भोज-संस्कृतिक शब्दावलीमे एहन सहज उतरल अछि जे पात्र देशज बुझाइत अछि; "हमरा भूख नहि लागैत अछि"क विडम्बना मैथिलीमे आओर चोखगर भेल अछि। संक्षिप्त दीक्षा-दृश्यक ऋजु संवाद ("हम क्षत्रिय नहि छी।" "तखन हम तोरा शिक्षा देब; आउ।") अनुवादमे अपन नाटकीय शुष्कता बचौने अछि — एतऽ अलंकरणक लोभ संवरण कएल गेल अछि, से औचित्यक निर्वाह थिक। समग्रतः दामक प्रहसनम् सिद्ध करैत अछि जे भारतीय परम्परा अपन सर्वाधिक करुण नायको (कर्ण) पर स्नेहपूर्ण हँसी हँसि सकैत छल — आ ई हँसी श्रद्धाक विलोम नहि, ओकर पूरक थिक। हास्यार्णव-प्रहसनम् (हास्यक सागर) जगदीश्वर भट्टाचार्यक द्व्यंकी प्रहसन विस्तृत समीक्षा — भारतीय आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक दृष्टिसँ कृति-परिचय जगदीश्वर भट्टाचार्यक हास्यार्णव मध्यकालीन संस्कृत प्रहसन-परम्पराक सभसँ निर्मम व्यंग्य-रचनामे गनल जाइत अछि। "हास्यक सागर" नाम स्वयं घोषणा थिक — एतऽ हास्य कोनो सहायक रस नहि, समुद्र जकाँ सर्वग्रासी अछि। राजा अनयसिन्धु ("अन्यायक सागर")क राज्यमे भ्रष्टाचारक जे शोभायात्रा निकलैत अछि ताहिमे राजवैद्य, ज्योतिषी, पुरोहित, कोतवाल, गुरु — समाजक प्रत्येक "पूज्य" संस्थाक प्रतिनिधि गणिका-गृहमे जुटल अछि आ प्रत्येक अपन शास्त्रक दोहाइ दैत ओकरे मर्यादा भंग करैत अछि। नामकरणहिमे व्यंग्य अछि: पात्रक नाम सभ उनटा अर्थक (विश्वभण्ड, कलहांकुर आदि) — नामे चरित्रक घोषणापत्र थिक। भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टि नाट्यशास्त्रीय दृष्टिसँ हास्यार्णव शुद्ध प्रहसनक लक्षण-ग्रन्थ सन अछि: निन्द्य जनक अनुकृति, वेश-भाषाक विडम्बना, आ हास्यक छहू भेद (स्मित सँ अतिहसित धरि)क प्रयोगशाला। मुदा एकर हास्य भरतक "परस्थ" कोटिक अछि — कवि पात्र पर हँसबैत अछि, पात्रक संग नहि। ध्वनि-सिद्धान्तक कसौटी पर एतऽ विशेष बात ई जे व्यंग्य प्रायः वाच्ये भऽ गेल अछि — आनन्दवर्धन जकरा "चित्र-काव्य" कहितथि; मुदा गहिंर देखला पर सम्पूर्ण प्रहसन एक विराट "प्रबन्ध-ध्वनि" थिक: कोनो पात्र नहि कहैत अछि जे राज्य-व्यवस्था सड़ि गेल अछि, समूचा रचना ई ध्वनित करैत अछि। क्षेमेन्द्रक औचित्य-सिद्धान्त एतऽ उनटा कसौटी बनैत अछि — प्रत्येक पात्र अपन वर्ण-धर्मक ठीक विपरीत आचरण करैत अछि, आ इएह सुनियोजित "अनौचित्य" प्रहसनक अलंकार थिक; अनौचित्ये एतऽ औचित्य अछि। वक्रोक्ति-दृष्टिसँ श्लेष आ विपरीत-लक्षणाक भरमार — आशीर्वादक भाषामे गारि आ स्तुतिक छन्दमे निन्दा — कुन्तकक "विपर्यय-वक्रता"क उदाहरणमाला थिक। पाश्चात्य सिद्धान्त-दृष्टि पाश्चात्य कोटिमे हास्यार्णव Juvenalian satire क निकटतम भारतीय बन्धु थिक — जुवेनलक रोम जकाँ एतहु क्रोध ("saeva indignatio") हास्यक ईंधन अछि। बाख्तिनक कार्निवल-सिद्धान्त एहि रचना पर सर्वाधिक फलदायी अछि: गणिका-गृह ओ कार्निवल-स्थल थिक जतऽ मुकुट उतरैत अछि, पवित्र-अपवित्रक सीमा मेटाइत अछि, आ "उच्च"क विसर्जन देहक निम्न स्तर पर होइत अछि। मुदा बाख्तिनक कार्निवलमे जे पुनर्जीवनी उल्लास अछि, हास्यार्णवमे ओकर ठाम अन्धकारपूर्ण निराशा अछि — एहि अर्थेँ ई dark comedy अथवा स्विफ्टक सदृश misanthropic satire लग पहुँचैत अछि। नॉर्थ्रॉप फ्राइक विधा-सिद्धान्तमे ई "विडम्बना आ व्यंग्यक मिथॉस" (शीतकालीन कथारूप)क शुद्ध उदाहरण थिक — एतऽ कोनो हरियर संसार नहि, कोनो पुनर्स्थापित व्यवस्था नहि; समापनो व्यंग्ये अछि। न्यू हिस्टॉरिसिज्मक दृष्टिसँ प्रहसन अपन युगक संस्था-क्षयक दस्तावेज थिक — व्यंग्यक अतिरेक स्वयं इतिहासक साक्ष्य अछि। अनुवाद-मूल्यांकन आ निष्कर्ष मैथिली अनुवाद एहि रचनाक सभसँ कठिन चुनौती — श्लेष आ नामगत व्यंग्य — केँ देशज समानान्तरसँ साधैत अछि; मैथिलीक अपन गारि-परिहासक लोक-परम्परा (विवाहक डहकन धरि) एहि अनुवादकेँ सांस्कृतिक घर दैत अछि। ध्यातव्य जे अनुवादमे अश्लीलताक ग्राम्य स्तर नियन्त्रित राखल गेल अछि — व्यंग्यक धार बचल अछि, फूहड़ि छँटल अछि। समग्रतः हास्यार्णव व्यंग्यक ओ आरसी थिक जाहिमे कोनो युग अपन भ्रष्ट मुँह देखि सकैत अछि; ओकर मैथिली आगमन एहि आरसीकेँ मिथिलाक दलान पर टाँगि दैत अछि। आगमडम्बरम् नैयायिक जयन्त भट्टक दार्शनिक नाटक विस्तृत समीक्षा — भारतीय आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक दृष्टिसँ कृति-परिचय नवम शताब्दीक काश्मीरमे न्यायमञ्जरीक रचयिता जयन्त भट्ट जखन नाटक लिखलनि तँ एकटा अभूतपूर्व विधा जन्म लेलक — दार्शनिक शास्त्रार्थक रंगमञ्चीय रूपान्तर। आगमडम्बरक नायक कोनो राजा वा प्रेमी नहि, सङ्कर्षण नामक तेजस्वी मीमांसक स्नातक अछि जे "आगम-आडम्बर" — धर्मक नाम पर पाखण्ड — क विरुद्ध अभियान पर निकलल अछि। चारि अंकमे ओ क्रमशः बौद्ध, जैन, नीलाम्बर, शैव साधक, चार्वाक — सभसँ भेंट करैत अछि, आ अन्ततः न्यायदर्शनक प्रौढ़ प्रतिनिधि धैर्यराशिक मुखेँ "सर्वागमप्रामाण्य"क समन्वयकारी सिद्धान्त पर नाटक विश्राम पबैत अछि: सभ आगम प्रमाण अछि, जँ ओ लोक-विरुद्ध आ हिंसा-प्रवर्तक नहि हो। राजा शंकरवर्मनक समकालीन राजनीति — नीलाम्बर सम्प्रदायक निषेध — नाटकमे प्रत्यक्ष उपस्थित अछि। भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टि रस-निष्पत्तिक दृष्टिसँ आगमडम्बर विलक्षण प्रयोग थिक: एकर अंगी रस निर्धारित करब कठिन — हास्य (पाखण्डी सभक विडम्बना), शान्त (अन्तिम समन्वय), आ एकटा एहन बौद्धिक आनन्द जकरा अभिनवगुप्तक शब्दावलीमे "चर्वणा"क विशुद्ध रूप कहल जा सकैत अछि — तर्कक रसास्वाद। एतऽ प्रश्न उठैत अछि जे की शास्त्रार्थ रसक विषय भऽ सकैत अछि; जयन्तक उत्तर व्यावहारिक अछि — हुनक शास्त्रार्थ-दृश्य सभमे जय-पराजयक नाटकीय तनाव ओहिना अछि जेना युद्ध-दृश्यमे। ध्वनि-दृष्टिसँ नाटकक शीर्षके श्लेषगर्भ अछि: "डम्बर" माने आडम्बरो आ कोलाहलो — धर्मक हल्ला आ धर्मक पाखण्ड, दुनू ध्वनित। औचित्य-सिद्धान्तक कसौटी पर जयन्तक सन्तुलन प्रशंसनीय अछि: व्यंग्य पाखण्डी पर अछि, दर्शन पर नहि — बौद्ध धर्मोत्तर विद्वान् रूपमे आदरणीय देखाओल गेल छथि, हुनक पतित अनुयायी उपहास्य। इएह विवेक एहि नाटककेँ साम्प्रदायिक फूहड़िसँ बचबैत अछि। पाश्चात्य सिद्धान्त-दृष्टि पाश्चात्य परम्परामे एकर निकटतम बन्धु अरिस्तोफेनीसक "मेघ" (Clouds) थिक — दार्शनिक सभक रंगमञ्चीय विडम्बना; मुदा जयन्त अरिस्तोफेनीससँ आगू जाइत छथि: हुनका लऽग विडम्बनाक बाद एकटा सकारात्मक दार्शनिक निष्कर्ष अछि। एहि अर्थेँ आगमडम्बर novel of ideas क पूर्वज-रूप "drama of ideas" थिक — शॉ आ ब्रेख्तसँ सहस्र वर्ष पूर्व मंच पर विचारक द्वन्द्व। बाख्तिनक "बहुस्वरता" (polyphony) एतऽ आश्चर्यजनक रूपेँ चरितार्थ अछि: प्रत्येक दर्शन अपन प्रामाणिक स्वरमे बजैत अछि — चार्वाक धरि अपन पक्ष पूरा बलसँ रखैत अछि — आ लेखकीय स्वर अन्त धरि प्रतीक्षा करैत अछि। तुलनात्मक धर्म-दर्शनक आधुनिक दृष्टिसँ नाटकक समापन religious pluralism क मध्यकालीन घोषणापत्र सन पढ़ल जा सकैत अछि — यद्यपि न्यू हिस्टॉरिसिस्ट सतर्कता कहत जे ई बहुलतावाद राज्य-शक्तिक छत्रछायामे संचालित अछि (नीलाम्बरक निषेध ओकर सीमा देखबैत अछि)। एहि तनाव — समन्वय आ बहिष्करणक सहअस्तित्व — मे नाटकक आधुनिक प्रासंगिकता अछि। अनुवाद-मूल्यांकन आ निष्कर्ष मैथिली अनुवादक समक्ष द्वैध चुनौती छल — दार्शनिक पारिभाषिकता आ नाटकीय प्रवाह। अनुवाद प्रमाण, प्रामाण्य, अनुमान सन पारिभाषिक शब्द यथावत् राखि, व्याख्यात्मक सहज मैथिली वाक्य-गठनसँ ओकरा वहनीय बनबैत अछि — मिथिलाक अपन नव्यन्याय-परम्परा (गंगेश उपाध्यायक भूमि!)क कारणेँ ई शब्दावली मैथिली पाठक लेल आगन्तुक नहि, घुरल पाहुन थिक। समग्रतः आगमडम्बर सिद्ध करैत अछि जे भारतीय रंगमञ्च बौद्धिक बहसकेँ मनोरञ्जन बना सकैत छल — आ इएह सिद्धि एकरा विश्व-नाट्यमे अद्वितीय बनबैत अछि। कादम्बरी बाणभट्टक गद्य-महाकाव्य विस्तृत समीक्षा — भारतीय आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक दृष्टिसँ कृति-परिचय "बाणोच्छिष्टं जगत्सर्वम्" — ई प्रसिद्धोक्ति कादम्बरीक कीर्तिक साक्ष्य थिक। सप्तम शताब्दीमे हर्षवर्धनक सभाकवि बाणभट्ट गद्यकेँ ओहि शिखर पर पहुँचौलनि जतऽ पद्य ईर्ष्या करए। कादम्बरीक कथा-यन्त्र स्वयं चमत्कार अछि: शूकक मुखेँ कहल कथाक भीतर कथा, जन्म-जन्मान्तरक तीन स्तर (शूद्रक/चन्द्रापीड/पुण्डरीक...), आ स्मृति-विस्मृतिक ओ खेल जाहिमे पाठको पात्रक संग अपन पूर्वजन्म बिसरल रहैत अछि आ अन्तमे सभटा गिरह एक्केबेर खुजैत अछि। महाश्वेता आ कादम्बरी — प्रतीक्षाक दू मूर्ति — भारतीय साहित्यक अमर नायिका छथि। बाणक मृत्युक बाद हुनक पुत्र भूषणभट्ट उत्तरभाग पूर्ण कएलनि — पिताक वाक्य-वृक्षक छाहरिमे। भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टि रस-दृष्टिएँ कादम्बरी विप्रलम्भ शृंगारक महासमुद्र थिक — संयोगक क्षण एतऽ दुर्लभ अछि, प्रतीक्षा अनन्त; महाश्वेताक तपस्विनी-रूप विप्रलम्भकेँ शान्तक सीमा धरि लऽ जाइत अछि, आ इएह "शृंगार-शान्त-सन्धि" कादम्बरीक विशिष्ट रस-रसायन थिक। ध्वनि-सम्प्रदाय लेल बाण चुनौती छथि: आनन्दवर्धन जकरा "गुणीभूतव्यंग्य" कहितथि, से बाणक अलंकृत शैलीमे सर्वत्र अछि — व्यंग्यार्थ वाच्यक सेवक बनल; तथापि सम्पूर्ण कृतिक स्तर पर कर्म आ जन्मान्तरक जे दार्शनिक ध्वनि अछि से प्रबन्ध-ध्वनिक उदाहरण थिक। रीति-सम्प्रदायक कसौटी पर कादम्बरी पाञ्चाली-गौड़ी रीतिक समास-भूयिष्ठ ओज आ वैदर्भीक माधुर्यक सङ्गम अछि; दण्डी जकर "पदलालित्य" कहने छथि, से एतऽ चरम पर अछि। श्लेष बाणक स्वभाव थिक — शुकनासोपदेशमे लक्ष्मीक निन्दा श्लेषक एहन जाल अछि जे अनुवाद-मात्रक परीक्षा थिक। वक्रोक्ति-दृष्टिसँ बाण "प्रबन्ध-वक्रता"क आचार्य छथि — कथा कहबाक टेढ़ बाटे कथाक अर्थ थिक। पाश्चात्य सिद्धान्त-दृष्टि पाश्चात्य विधा-सिद्धान्तमे कादम्बरीकेँ प्रायः "विश्वक प्रथम उपन्यास"क दावेदारीमे राखल जाइत अछि; ई दावा जतबा विवादित हो, एकर कथा-संरचना निर्विवाद रूपेँ आधुनिक अछि — frame narrative (शहरजादी-शैली), embedded narrator, आ analepsis क एहन प्रयोग जे जेरार जेनेटक कथाशास्त्र (narratology) लेल पाठ्य-सामग्री थिक: कथावाचक शुक स्वयं कथाक पात्र थिक, आ "के ककरा कथा कहि रहल अछि" — ई प्रश्न अन्त धरि घूमैत रहैत अछि। स्मृति-विस्मृतिक केन्द्रीयता कादम्बरीकेँ प्रूस्तक निकट अनैत अछि — चन्द्रापीडक हृदयमे अकारण उठल पूर्वजन्मक टीस प्रूस्तक mémoire involontaire क संस्कृत पूर्वाभास सन अछि। मनोविश्लेषणक दृष्टिसँ जन्मान्तर-यन्त्र दमित कामनाक (पुण्डरीकक तपोभंग) पीढ़ी-दर-पीढ़ी पुनरागमनक रूपक थिक — फ्रायडक "दमितक प्रत्यावर्तन"। नारीवादी पाठ महाश्वेता-कादम्बरीक प्रतीक्षाकेँ दू तरहेँ पढ़त — निष्क्रियताक आदर्शीकरण, अथवा (गहिंर पाठमे) स्त्री-स्मृतिक ओ दृढ़ता जे पुरुष-पात्रक विस्मृति-मृत्युक बीच कथाक निरन्तरता बचौने रहैत अछि: एतऽ स्त्रिये कथाक धुरी छथि। अनुवाद-मूल्यांकन आ निष्कर्ष बाणक समास-सघन गद्यक मैथिली अनुवाद साहसक काज थिक। प्रस्तुत अनुवाद दीर्घ समासकेँ मैथिलीक लयबद्ध वाक्य-शृंखलामे तोड़ि कऽ राखैत अछि — अर्थ-घनत्व बचल अछि, श्वास-अवकाश भेटल अछि; श्लेषक ठाम जतऽ द्विअर्थ असम्भव छल ओतऽ एक अर्थ चुनि टीका-भावेँ दोसर सुरक्षित कएल गेल अछि। महाश्वेता-वृत्तान्तक करुण गद्यमे मैथिलीक "नोर", "हिय", "बाट जोहब" सन शब्द बाणक भावकेँ माटिक गन्ध दैत अछि। समग्रतः कादम्बरीक ई मैथिली रूप गद्यकाव्यक ओहि परम्पराकेँ मिथिलामे पुनःप्रतिष्ठित करैत अछि जकर बीज विद्यापतिक भूपरिक्रमा सनक रचनामे छल। भल्लट-शतक, कलाविलास आ कलियुग-विडम्बना तीन व्यंग्य-कृति — भल्लट, क्षेमेन्द्र, नीलकण्ठ विस्तृत समीक्षा — भारतीय आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक दृष्टिसँ कृति-परिचय ई संकलन संस्कृत व्यंग्य-परम्पराक तीन युग आ तीन शैलीक त्रिवेणी थिक। नवम शताब्दीक काश्मीरी कवि भल्लटक शतक अन्योक्तिक शिखर अछि — राजा शंकरवर्मनक उपेक्षासँ आहत कविक ओ पद्यावली जाहिमे समुद्र, कल्पवृक्ष, सुग्गा, विष — सभ किछु मनुष्यक बात कहैत अछि, मनुष्यक नाम लेने बिना। एगारहम शताब्दीक क्षेमेन्द्र कलाविलास ("छल-कौशलक विलास")मे दस सर्ग धरि दम्भ, लोभ, काम, वेश्या-वृत्ति, कायस्थ-लेखनिक, मद, गायक, सोनार, विविध ठग आ अन्तमे सद्गुणक "कला" गनबैत छथि — मूलदेव-चरितक बहन्ने समाजक ठगिनी विद्या सभक विश्वकोश। सत्रहम शताब्दीक दाक्षिणात्य नीलकण्ठ दीक्षित कलियुग-विडम्बनामे सए श्लोकक भीतर पण्डित, ज्योतिषी, वैद्य, कवि, महाजन, कृपण, धर्मध्वजी — तेरह कोटिक विडम्बना कसैत छथि, आ अन्तमे कलियुगहिकेँ प्रणाम कऽ दैत छथि — "जतऽ अपन कल्पना कानून अछि"। भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टि तीनू कृति अलंकारशास्त्रक तीन भिन्न औजारक सिद्धि थिक। भल्लटक प्राण अन्योक्ति (अप्रस्तुतप्रशंसा) अछि — अप्रस्तुतक वर्णनसँ प्रस्तुतक बोध; ई ध्वनि-सिद्धान्तक आदर्श अलंकार थिक, कारण व्यंग्यार्थ सम्पूर्णतः अनुक्त रहैत अछि। आनन्दवर्धन (भल्लटक समकालीन काश्मीरी!) जाहि "अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य"क बात करैत छथि, भल्लट ओकर जीवित उदाहरण छथि — "हाय कालकूट! ओहि समुद्रसँ अहाँक जन्म कोना भेल?" मे समुद्र समुद्र नहि रहि जाइत अछि। क्षेमेन्द्र स्वयं औचित्यविचारचर्चाक आचार्य छथि, आ हुनक व्यंग्य-विधि अपनहि सिद्धान्तक प्रयोग थिक: प्रत्येक वर्गक "अनौचित्य"क सूचीकरण — सोनारक चौंसठ कला, तराजूक सोलह दोष — शास्त्रीय गणना-शैली (कोश-पद्धति)क व्याज-प्रयोगसँ हास्य उपजबैत अछि; शास्त्रक रूपमे ठगीक शास्त्र। नीलकण्ठक शैलीमे वक्रोक्तिक चरम संक्षेप अछि — प्रत्येक श्लोक सूक्ति-सन, जाहिमे विपरीत-लक्षणा ("मन्त्र-तान्त्रिक निश्चय धन्य अछि") डंकक काज करैत अछि। रस-दृष्टिएँ तीनूमे हास्यक पाछाँ जे स्थायी अछि से वस्तुतः शान्त-मिश्रित निर्वेद थिक — व्यंग्य एतऽ वैराग्यक पूर्वपीठिका अछि, विशेषतः नीलकण्ठमे जे अन्ततः शिव-शरणमे विश्राम पबैत छथि। पाश्चात्य सिद्धान्त-दृष्टि पाश्चात्य कोटिमे भल्लटक अन्योक्ति ईसपक फेबल आ रूपक-काव्य (allegory)सँ भिन्न अछि — फेबलमे नीति वाच्य अछि, अन्योक्तिमे व्यंग्य; ई emblematic poetry क निकट, मुदा ओहूसँ सूक्ष्म। भल्लटक राजा-विरोधी स्वर लऽ कऽ ई निर्वासित-साहित्य (literature of exile/disgrace)क कोटिमे ओविडक Tristia क दूरस्थ बन्धु थिक। क्षेमेन्द्रक कलाविलास मेनिप्पियन व्यंग्य (Menippean satire)क लक्षण-पूर्ति करैत अछि — विधा-मिश्रण, विश्वकोशीय सूची-प्रेम, ठग-नायक (मूलदेव picaresque परम्पराक पूर्वज अछि — स्पेनी पिकारोसँ पाँच सए वर्ष पहिने)। नीलकण्ठक शैली रोमन epigram (मार्शल) आ लॉ रोशफूकोक maxim-कलाक समकक्ष अछि — संक्षेपे शस्त्र थिक। तीनू पर बाख्तिनक ई सूत्र लागू अछि जे व्यंग्य "समापनहीन वर्तमान"क विधा थिक — महाकाव्यक बन्द अतीतक विपरीत; इएह कारण अछि जे ई तीनू कृति आइयो समकालीन बुझाइत अछि: सोनार, ज्योतिषी आ "माननीय"क चरित्र-चित्रण एकैसम शताब्दीक अखबार सन पढ़ाइत अछि। अनुवाद-मूल्यांकन आ निष्कर्ष अनुवादमे तीन भिन्न शैली लेल तीन भिन्न रजिस्टर साधल गेल अछि — भल्लट लेल पद्यानुकारी भावगर्भित मुक्त लय, क्षेमेन्द्र लेल सूची-सुलभ कथात्मक गद्य, नीलकण्ठ लेल सूक्ति-चोख वाक्य। "छल-कौशलक विलास" सन शीर्षक-अनुवाद स्वयं व्याख्या थिक। मैथिली पाठक लेल विशेष लाभ ई जे मिथिलाक अपन व्यंग्य-परम्परा (हरिमोहन झा धरि) एहि त्रिवेणीमे अपन पुरखा चिन्हत। समग्रतः ई संकलन देखबैत अछि जे संस्कृत केवल देवभाषा नहि, धारदार लोकालोचनक भाषा सेहो छल। पलाण्डुमण्डन प्रहसनम् निषिद्ध प्याजक स्तुति-सभा — पण्डित-समाजक विडम्बना विस्तृत समीक्षा — भारतीय आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक दृष्टिसँ कृति-परिचय पलाण्डुमण्डन ("प्याजक मण्डन/स्तुति") उत्तर-मध्यकालीन संस्कृत प्रहसन-परम्पराक ओ चुटगर रचना थिक जाहिमे व्यंग्यक निशाना कोनो राजा वा गणिका नहि — स्वयं पण्डित-समाज अछि। कथा-बीज सरल आ विस्फोटक अछि: स्मृति-शास्त्रमे ब्राह्मण लेल निषिद्ध पलाण्डु (प्याज)क सेवन-समर्थनमे पण्डित सभक सभा जुटैत अछि, आ ओ सभ ओहि शास्त्रार्थ-कौशल, ओहि प्रमाण-परम्परा, ओहि व्याख्या-चातुरीसँ — जाहिसँ वेदान्तक गुत्थी सोझरौल जाइत छल — प्याज-भक्षणक शास्त्रीय औचित्य सिद्ध करैत छथि। लिङ्गोजी भट्ट सन पात्र-नाम दाक्षिणात्य पण्डित-परिवेशक सूचक थिक। प्रहसनक हास्य एहि विरोधाभास पर टिकल अछि जे विद्वत्ताक समस्त यन्त्र जीभक सेवामे लागल अछि। भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टि नाट्यशास्त्रीय वर्गीकरणमे ई शुद्ध प्रहसन थिक — निन्द्यक अनुकृति; मुदा एकर "निन्द्य" कोनो नीच पात्र नहि, स्वयं शास्त्रार्थ-पद्धतिक दुरुपयोग अछि — ई सूक्ष्मता एकरा साधारण प्रहसनसँ ऊपर उठबैत अछि। वक्रोक्ति-दृष्टिसँ सम्पूर्ण रचना एक विराट "व्याज-स्तुति" थिक — स्तुतिक व्याजसँ निन्दा: प्याजक जतबा गुणगान, पण्डितक ततबा पोल। ध्वनि-सिद्धान्तसँ देखी तँ हास्यक व्यंग्यार्थ श्रोताक शास्त्र-परिचय पर निर्भर अछि — जे मीमांसाक प्रमाण-प्रक्रिया जनैत अछि, तकरे लेल "अर्थवाद", "गौण-मुख्य" सन पदक व्याज-प्रयोग खुलैत अछि; ई "सहृदय-सापेक्ष ध्वनि"क रोचक स्थिति थिक। औचित्य-दृष्टिएँ कविक साहस देखू — शास्त्रक भाषामे शास्त्रक विडम्बना, मुदा शास्त्रक प्रति अनादर बिना; व्यंग्य पद्धतिक दुरुपयोग पर अछि, पद्धति पर नहि। हास्यक भेदमे ई "उपहसित"सँ "अपहसित" धरिक यात्रा करबैत अछि — आ अन्ततः पाठक अपनहि पर हँसैत अछि, कारण तर्कसँ अपन रुचिकेँ शास्त्र बनयबाक कला केवल पण्डिते टा क नहि, सार्वजनीन दुर्बलता थिक। पाश्चात्य सिद्धान्त-दृष्टि पाश्चात्य विधामे एकर सोझ समानान्तर mock-encomium (व्याज-प्रशस्ति) थिक — इरैस्मसक "मूर्खताक प्रशंसा" (Moriae Encomium) आ ओकर पूर्ववर्ती ग्रीक adoxography (तुच्छ विषयक गम्भीर स्तुति — माछी, टकलापन, ज्वरक प्रशस्ति!)। पलाण्डुमण्डन ठीक एही कोटिक अछि — तुच्छ विषय (प्याज) पर महाशास्त्रीय गम्भीरता; हास्य ओही असंगतिसँ (incongruity) फूटैत अछि। बाख्तिनक दृष्टिसँ ई रचना "भोजनक कार्निवल" थिक — निषिद्ध स्वादक विद्रोह, जतऽ देहक भूख शास्त्रक अनुशासन पर विजयी होइत अछि; ई विजय बाख्तिनक ओहि "material bodily principle"क उत्सव थिक जे समस्त कार्निवल-साहित्यक प्राण अछि। सोफिस्ट-आलोचनाक प्राचीन ग्रीक बहस (प्लेटोक "कमजोर पक्षकेँ प्रबल बनयबाक कला"क आक्षेप)सँ तुलना करी तँ पलाण्डुमण्डन संस्कृत जगतक सोफिस्ट्री-विमर्श थिक — तर्कक शक्ति आ तर्कक नैतिकताक बीचक खाधि पर हँसैत। आधुनिक भाषामे ई motivated reasoning (अभीष्ट-प्रेरित तर्क) पर लिखल प्राचीनतम व्यंग्यमे एक थिक। अनुवाद-मूल्यांकन आ निष्कर्ष मैथिली अनुवादमे एहि प्रहसनकेँ विशेष घरेलू स्वाद भेटल अछि — मिथिलाक पण्डित-सभा, शास्त्रार्थ-परम्परा आ भोजन-प्रेम तीनू एतऽ आत्मीय प्रसंग थिक; "पलाण्डु"क ठाम मैथिलक रसोई-विमर्श सहजहि जुड़ि जाइत अछि। शास्त्रार्थक पारिभाषिक व्यंग्य अनुवादमे बचल अछि, कारण मैथिली स्वयं शास्त्रार्थक भाषा रहल अछि। समग्रतः पलाण्डुमण्डन लघु आकारक पैघ रचना थिक — ई देखबैत अछि जे कोनो परम्परा तखनहि जीवित रहैत अछि जखन ओ अपनहि पर हँसबाक साहस रखैत अछि। उत्तररामचरितम् भवभूतिक करुण-नाट्य विस्तृत समीक्षा — भारतीय आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक दृष्टिसँ कृति-परिचय अष्टम शताब्दीक भवभूति उत्तररामचरितमे रामकथाक ओहि अध्यायकेँ उठौलनि जकरासँ कवि सभ कतराइत रहलाह — सीता-परित्याग। सात अंकक ई नाटक परित्यागक बाद बारह वर्षक विरहकथा थिक: चित्रदर्शनसँ आरम्भ (प्रथम अंकमे राम-सीता अपन अतीतक चित्र देखैत छथि — स्मृतिक रंगमञ्च), पञ्चवटीमे छाया-सीताक अदृश्य स्पर्श, लव-कुशसँ अनजान पिताक भेंट, आ अन्तमे गर्भ-नाटक (नाटकक भीतर नाटक) द्वारा पुनर्मिलन — वाल्मीकि स्वयं मंच पर रामायणक "सुखान्त पाठान्तर" खेलबा कऽ लोकापवादक उत्तर लोकहिसँ दिअबैत छथि। "एको रसः करुण एव" — भवभूतिक अपन घोषणा एहि नाटकक बीज-वाक्य थिक। भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टि रस-सिद्धान्तक इतिहासमे उत्तररामचरित एकटा सैद्धान्तिक हस्तक्षेप थिक। भवभूति करुणकेँ अंगी रस बना कऽ भरतक ओहि मान्यताकेँ चुनौती देलनि जे नाटक-सन दृश्यकाव्यमे शृंगार वा वीरे प्रधान हो; आ आगाँ बढ़ि घोषणा कएलनि जे करुणे एकमात्र रस थिक, शेष रस ओकरे आवर्त-विवर्त। अभिनवगुप्तक साधारणीकरण-सिद्धान्त एहि नाटकक तेसर अंकसँ नीक कतहु सिद्ध नहि होइत — छाया-सीता प्रसंगमे सीता मंच पर छथि मुदा राम नहि देखैत छथिन; दर्शक दुनूक वेदना एक्केबेर देखैत अछि — ई "द्वैध-दृष्टि" साधारणीकरणक रंगमञ्चीय यन्त्र थिक, दर्शक व्यक्तिगत शोकसँ ऊपर उठि शोक-सामान्यक आस्वादक करैत अछि। ध्वनि-दृष्टिसँ "अपूर्वकर्मचण्डालमयि मुग्धे विमुच्यताम्" सन पाँति — जतऽ राम अपनहिकेँ चण्डाल कहैत छथि — आत्मधिक्कारक व्यंग्यार्थसँ भरल अछि। औचित्य-प्रश्न एतऽ केन्द्रीय अछि: की मर्यादापुरुषोत्तमक अश्रुपात उचित? भवभूतिक उत्तर — "वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि" — लोकोत्तर चरित्रक हृदयकेँ लोक-हृदय बना कऽ औचित्यक नव व्याख्या करैत अछि। पाश्चात्य सिद्धान्त-दृष्टि अरस्तूक कोटिमे उत्तररामचरित निकटतम भारतीय "ट्रेजेडी" कहल गेल अछि — hamartia (राज्यधर्मक नाम पर निरपराध पत्नीक त्याग), पीड़ाक दीर्घ अनुभव, आ अनुकम्पा-भय (eleos-phobos)क विरेचन; मुदा समापनक पुनर्मिलन एकरा शुद्ध ट्रेजेडी नहि रहऽ दैत अछि — पाश्चात्य शब्दावलीमे ई tragicomedy अथवा शेक्सपियरक अन्तिम "रोमांस" (विशेषतः The Winter's Tale — ओहूमे निर्दोष पत्नीक परित्याग, वर्षोक पश्चात्ताप, आ कला-माध्यमे — मूर्ति/नाटक — पुनर्जीवन!)क अद्भुत पूर्वरूप थिक। गर्भ-नाटक metatheatre क प्राचीनतम सचेत प्रयोगमे अछि — हैमलेटक "मूसक जाल"सँ आठ सए वर्ष पूर्व, आ ओहूसँ आगू: एतऽ नाटक-भीतर-नाटक सत्यक परीक्षा नहि, सत्यक पुनर्लेखन करैत अछि — कला यथार्थकेँ सुधारैत अछि। सबाल्टर्न-दृष्टिसँ शम्बूक-प्रसंग अनिवार्य पाठ थिक: शूद्र तपस्वीक वध रामक हाथेँ — भवभूति एहि प्रसंगकेँ काटि नहि, मंच पर आनि, शम्बूककेँ दिव्य रूपमे रामक स्तुति करबैत छथि; आधुनिक आलोचना एहिमे वर्ण-व्यवस्थाक हिंसाक स्वीकार आ ओकर असहज परिशोधन — दुनू पढ़त। नारीवादी पाठ लेल छाया-सीता "उपस्थित-अनुपस्थित स्त्री"क (present absence) चिरन्तन रूपक थिक — जे बजैत छथि मुदा सुनल नहि जाइत छथि। अनुवाद-मूल्यांकन आ निष्कर्ष मैथिली अनुवाद भवभूतिक दुरूह पदावली लेल प्रसिद्ध चुनौतीकेँ करुणक देशज शब्द-सम्पदासँ साधैत अछि — मैथिलीक "नोर", "हिय हहरब", "छाती फाटब" भवभूतिक करुणकेँ सोहर-समदाउनिक भूमिमे रोपि दैत अछि; प्राकृतभाषी पात्रक पहिचान अनुवादमे सुरक्षित अछि। समग्रतः उत्तररामचरित विश्व-साहित्यक ओ नाटक थिक जे देखबैत अछि जे महाकाव्यक बाद की होइत अछि — विजयक बाद वेदना; आ मैथिली, जे विरह-गीतक भाषा थिक, एकर स्वाभाविक दोसर घर सिद्ध होइत अछि। अभिज्ञानशाकुन्तलम् कालिदासक नाट्य-शिरोमणि विस्तृत समीक्षा — भारतीय आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक दृष्टिसँ कृति-परिचय "काव्येषु नाटकं रम्यं तत्र रम्या शकुन्तला" — संस्कृत आलोचनाक ई सर्वसम्मति दुर्लभ घटना थिक। कालिदास महाभारतक शकुन्तलोपाख्यानक कठोर कथाकेँ (जतऽ दुष्यन्त जानि-बूझि मुकरि जाइत छथि) दुर्वासाक शाप आ अँगूठीक "अभिज्ञान"-यन्त्रसँ रूपान्तरित कऽ सात अंकक ओ नाटक रचलनि जाहिमे प्रेम तीन अवस्थासँ गुजरैत अछि — तपोवनक सहज अंकुरण, नगर-राजसभामे विस्मृति-प्रत्याख्यानक दारुण मध्य, आ हेमकूटक तपःपूत पुनर्मिलन। प्रकृति एतऽ पृष्ठभूमि नहि, पात्र थिक — शकुन्तलाक विदाईमे वृक्ष वस्त्र दैत अछि, मृग आँचर पकड़ैत अछि। भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टि रस-दृष्टिएँ शाकुन्तल संयोग-विप्रलम्भ-पुनर्संयोगक पूर्ण शृंगार-चक्र थिक, आ एकर विशेषता ई जे विप्रलम्भक कारण बाह्य खलनायक नहि — शाप-रूपेँ नियति आ स्वयं नायकक विस्मृति अछि; एहिसँ करुणक जे छाया शृंगार पर पड़ैत अछि से रस-मिश्रणक आदर्श उदाहरण थिक। ध्वनि-सम्प्रदाय लेल शाकुन्तल घर-आँगन थिक: आनन्दवर्धन-अभिनवगुप्त बेर-बेर एहीसँ उदाहरण अनैत छथि। चतुर्थ अंकक कण्व-विदाई — "पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलम्" — वात्सल्यक एहन ध्वनि-सघन क्षण थिक जे परवर्ती आलोचना "काव्येषु नाटकं... तत्रापि च चतुर्थोऽङ्कः" कहि एकरे मुकुट-मणि मानलक। वक्रोक्ति-दृष्टिसँ "अभिज्ञान" (चिन्ह/अँगूठी) स्वयं महावक्रता थिक — प्रेमक प्रमाण वस्तुमे राखब आ वस्तुक हेरायब — कुन्तक जकरा "प्रकरण-वक्रता" कहितथि। औचित्यक कसौटी पर कालिदासक संयम अद्वितीय अछि: प्रत्याख्यान-दृश्यमे दुष्यन्त क्रूर नहि, शापित छथि — खलनायकहीन दुःखान्तक ई कला औचित्यक चरम थिक। भरतक "काव्यं ग्राह्यमलंकारात्" एतऽ उपमामे सिद्ध अछि — "अलं कालिदासस्य उपमा"। पाश्चात्य सिद्धान्त-दृष्टि शाकुन्तल पाश्चात्य साहित्य-चेतनामे प्रवेश करनिहार प्रथम भारतीय कृति थिक — सर विलियम जोन्सक अनुवाद (१७८९) पढ़ि गेटे लिखलनि जे स्वर्ग आ पृथ्वी एक्कहि नाममे चाही तँ "शकुन्तला" कहू; फाउस्टक रंगमञ्चीय प्रस्तावना (Vorspiel auf dem Theater) शाकुन्तलक सूत्रधार-प्रस्तावनाक प्रत्यक्ष ऋणी थिक — विश्व-साहित्य (Weltliteratur)क गेटे-कल्पनाक एकटा बीज एतहि अछि। रोमैंटिक आलोचना एहिमे प्रकृति-मनुष्यक अद्वैत देखलक; इको-क्रिटिसिज्मक आजुक दृष्टिसँ तपोवन "पारिस्थितिक समुदाय"क साहित्यिक आदर्श-चित्र थिक जतऽ मनुष्य प्रकृतिक स्वामी नहि, सदस्य अछि। संरचनावादी पाठ लेल अँगूठी बार्थक "hermeneutic code"क शुद्ध यन्त्र थिक — हेराएब-भेटब पर कथाक ताला-कुंजी। नारीवादी आलोचना दू स्वरमे बजैत अछि: एक दिस शकुन्तलाक वाणी-हरण (सभा-दृश्यमे ओकर सत्य अप्रमाण भऽ जाइत अछि — स्त्री-साक्ष्यक अवमूल्यनक चिरपरिचित संरचना), दोसर दिस महाभारतक तेजस्विनी शकुन्तला (जे राजाकेँ भरल सभामे धिक्कारैत छथि)क तुलनामे कालिदासीय नायिकाक "कोमलीकरण"; मुदा सूक्ष्म पाठ ई देखत जे कालिदासो शकुन्तलाकेँ सभा-दृश्यमे तीखा प्रतिवाद ("अनार्य!") देने छथि। मनोविश्लेषण लेल दुष्यन्तक विस्मृति दमनक (repression) रूपक थिक — गान्धर्व-विवाहक सामाजिक अपराध-बोध स्मृतिकेँ निगलि जाइत अछि, आ अँगूठी — भौतिक साक्ष्य — दमितकेँ घुरा अनैत अछि। अनुवाद-मूल्यांकन आ निष्कर्ष मैथिली अनुवादमे शाकुन्तलक तपोवन मिथिलाक फुलवारी बनि गेल अछि — लता, भ्रमर, मृग-छौना लेल मैथिलीक कोमल शब्दावली कालिदासक कोमलताक समवर्ती थिक; प्राकृत-भाषिणी शकुन्तला-सखी लेल मैथिलीक घरेलू बोली-स्तर आ पद्य-भाग लेल तत्सम-गन्धी उच्च स्तर — ई द्विस्तरीय रजिस्टर मूलक संस्कृत-प्राकृत विभाजनक सर्जनात्मक समाधान थिक। समग्रतः शाकुन्तलक मैथिली अवतरण विद्यापतिक भाषाकेँ कालिदाससँ जोड़बाक सांस्कृतिक सेतु-कर्म थिक — दुनू कविक साझा सम्पत्ति थिक शृंगार आ प्रकृतिक अभेद। मुद्राराक्षसम् (मंत्री राक्षसक राजसी मोहर) विशाखदत्तक राजनीतिक नाटक विस्तृत समीक्षा — भारतीय आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक दृष्टिसँ कृति-परिचय संस्कृत नाट्य-परम्परामे मुद्राराक्षस अकेला-दुकेला रचना थिक — ने नायिका, ने शृंगार, ने विदूषक; सम्पूर्ण नाटक दू मस्तिष्कक शतरञ्ज थिक। नन्द-वंशक पतनक बाद चाणक्य चन्द्रगुप्तकेँ सिंहासन पर बैसा चुकल छथि, मुदा हुनक असली लक्ष्य आब शत्रुक विनाश नहि — शत्रुक हृदय-परिवर्तन अछि: नन्दक स्वामिभक्त अमात्य राक्षसकेँ चन्द्रगुप्तक मन्त्री बनाएब। एक टा मोहर (मुद्रा), एक टा जाली चिट्ठी, आ छद्मवेशी गुप्तचरक जालसँ चाणक्य राक्षसक प्रत्येक चालिकेँ पहिनहिसँ खेलल घर बना दैत छथि — अन्तिम चालिमे राक्षसक सद्गुणे (मित्र चन्दनदासकेँ बचएबाक करुणा) ओकर "पराजय"क द्वार बनैत अछि। विशाखदत्त क्षत्रिय-राजपुत्र छलाह — राजनीतिक हुनक ज्ञान पोथीक नहि, प्रासादक अछि। भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टि रस-दृष्टिएँ मुद्राराक्षस शास्त्रीय वर्गीकरण लेल समस्या थिक — परम्परा एकर अंगी रस वीर मानैत अछि, मुदा ई युद्धवीर नहि, "नीतिवीर"/"बुद्धिवीर" थिक: उत्साह स्थायी भाव अछि, मुदा ओकर विषय रणभूमि नहि, कूटयोजना अछि। ई रस-सिद्धान्तक सीमाक रचनात्मक विस्तार थिक। संधि-योजनाक दृष्टिसँ (नाट्यशास्त्रक कथा-संरचना-सिद्धान्त) मुद्राराक्षस पाठ्यपुस्तक-योग्य अछि — मुख-प्रतिमुखसँ निर्वहण धरि प्रत्येक संधि कसल; एकहु दृश्य निष्प्रयोजन नहि। ध्वनि-दृष्टिसँ नाटकक व्यंग्य-सम्पदा "नाटकीय विडम्बना" (dramatic irony)मे अछि — दर्शक चाणक्यक जाल जनैत अछि, राक्षस नहि; प्रत्येक राक्षस-संवादक दोसर अर्थ दर्शकहि लेल ध्वनित होइत रहैत अछि। औचित्य-दृष्टिएँ विशाखदत्तक साहस ई जे ओ "खलनायक"केँ नाटकक नैतिक केन्द्र बना देलनि — राक्षसक स्वामिभक्ति एहन उदात्त अछि जे शीर्षकहि हुनका नामे अछि; चाणक्य जितैत छथि, मुदा महिमा राक्षसक भागमे जाइत अछि — विजय आ महत्त्वक ई विभाजन औचित्यक सूक्ष्मतम प्रयोग थिक। पाश्चात्य सिद्धान्त-दृष्टि पाश्चात्य कोटिमे मुद्राराक्षस राजनीतिक यथार्थवादक नाट्य-रूप थिक — मैकियावेलीक Il Principe सँ सहस्र वर्ष पूर्व "साध्य-साधन"क ओ विमर्श जे कौटिल्यीय अर्थशास्त्रक रंगमञ्चीय भाष्य सन अछि; चाणक्य मैकियावेलीक आदर्श "नव-राजा"क निर्माता-रूप छथि, मुदा एक भेदसँ — हुनक लक्ष्यमे व्यक्तिगत स्वार्थ शून्य अछि, कार्य सिद्ध भेला पर ओ शिखा बान्हि वनप्रस्थ दिस ताकैत छथि: सत्ता-संन्यासक ई युग्म पाश्चात्य यथार्थवादकेँ अनुपलब्ध अछि। विधा-दृष्टिसँ ई espionage thriller आ heist-संरचनाक प्राचीनतम परिपक्व रूप थिक — ल कारेक शीत-युद्ध कथा-जालसँ तुलनीय: छद्म-पहिचान, double agent (भागुरायण), जाली दस्तावेज, आ "मास्टरमाइंड"क बिन्दु-दर-बिन्दु खुलैत योजना। संरचनावादी दृष्टिसँ नाटक द्वयात्मक विरोध (binary opposition) पर गठित अछि — बुद्धि/हृदय, राजनीति/निष्ठा, मुद्रा (राज्यक अमूर्त शक्ति)/चन्दनदास (नागरिक स्नेह) — आ समाधान विरोधक विलय (राक्षसक मन्त्रित्व-ग्रहण)मे अछि। न्यू हिस्टॉरिसिज्म एहि नाटककेँ गुप्तयुगीन राज्य-विमर्शक दस्तावेज रूपेँ पढ़त — साम्राज्य-निर्माणक वैधता-कथा, जाहिमे हिंसा न्यूनतम आ सहमति-निर्माण (राक्षसक सहमति!) परम लक्ष्य अछि। अनुवाद-मूल्यांकन आ निष्कर्ष मैथिली अनुवाद "मंत्री राक्षसक राजसी मोहर" शीर्षकहिसँ अनुवाद-दृष्टि घोषित करैत अछि — मुद्राक अर्थ-गाम्भीर्य देशज पदावलीमे। कूटनीतिक संवादक द्विअर्थकता — जे एहि नाटकक प्राण थिक — अनुवादमे सतर्कतासँ बचाओल गेल अछि; गुप्तचर-प्रसंगक सांकेतिक भाषा मैथिलीमे सहज चलैत अछि। समग्रतः मुद्राराक्षस देखबैत अछि जे संस्कृत नाटक कोमलताक अतिरिक्त कठोरताक, हृदयक अतिरिक्त मस्तिष्कक नाट्य सेहो रचि सकैत छल — आ ओहूमे अन्ततः जीत हृदयेक होइत अछि। मृच्छकटिकम् (माटिक खेलौना-गाड़ी) शूद्रकक दस-अंकी प्रकरण विस्तृत समीक्षा — भारतीय आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक दृष्टिसँ कृति-परिचय मृच्छकटिक संस्कृत नाट्य-साहित्यक सभसँ "लौकिक" महारचना थिक। राजा शूद्रक (परम्परा-प्रसिद्ध रचयिता) राजप्रासाद छोड़ि उज्जयिनीक गली-कूचीमे उतरि गेलाह — एतऽ दरिद्र भेल उदार व्यापारी चारुदत्त अछि, बुद्धिमती गणिका वसन्तसेना अछि, जुआरी-सँ-भिक्षु बनल संवाहक अछि, सेन्ह काटबकेँ कला माननिहार चोर शर्विलक अछि, राजाक साला शकार अछि — मूर्खता आ क्रूरताक अमर मूर्ति — आ पृष्ठभूमिमे आर्यकक राज्य-क्रान्ति पकैत अछि। शीर्षकक "माटिक गाड़ी" — रोहसेनक खेलौना, जाहिमे वसन्तसेना अपन गहना भरि दैत छथि — सम्पूर्ण नाटकक बीज-प्रतीक थिक: माटि आ सोनक, दरिद्रता आ प्रेमक सङ्गम। भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टि रूपक-भेदमे ई "प्रकरण" थिक — कल्पित कथा, लौकिक पात्र, आ नायिका गणिका; भरतक व्यवस्थामे प्रकरणकेँ नाटकसँ न्यून मानल गेल, मुदा शूद्रक एहि "न्यून" विधाकेँ दस अंकक व्याससँ महाकाव्यीय गरिमा देलनि। रस-दृष्टिएँ मृच्छकटिक रस-मिश्रणक प्रयोगशाला थिक — शृंगार (चारुदत्त-वसन्तसेना), हास्य (मैत्रेय, शकार), करुण (वध-स्थल-यात्रा), अद्भुत, वीर, बीभत्स धरि — आ आश्चर्य ई जे एतेक रसक भीड़मे रस-भंग नहि होइत अछि; कारण औचित्य: प्रत्येक रस अपन पात्र-स्तर आ भाषा-स्तरसँ बान्हल अछि। नाट्यशास्त्रक भाषा-व्यवस्थाक सभसँ समृद्ध प्रयोग एतहि अछि — सात-आठ प्राकृति-भेद, पात्रक सामाजिक स्तरक ध्वनि-चित्र। वक्रोक्ति-दृष्टिसँ शकारक "विपरीत-पाण्डित्य" (रामायण-महाभारतक उनटल हवाला) अज्ञानक वक्रोक्ति थिक — भाषिक हास्यक अक्षय कोष। ध्वनि-दृष्टिएँ माटिक गाड़ी वस्तु-ध्वनिक आदर्श अछि: ओहिमे राखल गहना कथाक समस्त उलझनक बीज बनैत अछि, आ "माटिमे सोन" — चारुदत्तक दरिद्र-उदारताक — प्रतीक बनि व्यंग्यार्थ पसारैत अछि। पाश्चात्य सिद्धान्त-दृष्टि पाश्चात्य विधा-कोटिमे मृच्छकटिक tragicomedy आ melodrama क पूर्ण लक्षणसँ युक्त अछि — निर्दोषक फाँसी-यात्रा अन्तिम क्षणमे रुकैत अछि; मुदा एकर गहिंर पहिचान "नगर-नाट्य" (city comedy) रूपेँ अछि — बेन जॉनसनक लंदनसँ बारह सए वर्ष पूर्व उज्जयिनीक अर्थतन्त्र, न्यायतन्त्र, अपराधतन्त्रक पूर्ण नागरिक चित्र। मार्क्सवादी पाठ लेल ई संस्कृतक सर्वाधिक उर्वर पाठ थिक: सम्पत्तिक गति (गहनाक हाथ-दर-हाथ भ्रमण) कथाक वास्तविक चालक अछि; न्यायालय-दृश्य वर्ग-न्यायक नग्न चित्र थिक — "दरिद्र साक्ष्य अप्रमाण"; आ आर्यकक क्रान्ति एकमात्र संस्कृत नाटक थिक जतऽ राज-परिवर्तन ग्वाला-पुत्रक नेतृत्वमे होइत अछि — सबाल्टर्न इतिहास-दृष्टिक रंगमञ्चीय पूर्वाभास। नारीवादी दृष्टिसँ वसन्तसेना गणिका-पात्रक मुक्ति-कथा थिक — ओ अपन देह-वृत्तिक अर्थतन्त्रसँ निकसि "वधू" पद पबैत छथि; आधुनिक पाठ एहि समापनकेँ दू तरहेँ देखत — स्त्रीक विजय, अथवा विवाह-संस्थामे ओकर पुनर्वशीकरण। ब्रेख्तीय दृष्टिसँ नाटकक न्याय-प्रहसन आ शकारक अति-नाटकीयता स्वयं "अलगाव-प्रभाव" उत्पन्न करैत अछि — दर्शक व्यवस्था पर सोचबा लेल बाध्य होइत अछि। (स्मरणीय: जर्मन रंगमञ्च एहि नाटककेँ उन्नैसम शताब्दीहिसँ अपनौने अछि।) अनुवाद-मूल्यांकन आ निष्कर्ष मैथिली अनुवाद "माटिक खेलौना-गाड़ी" एहि नाटकक बहुभाषिकताक समक्ष मैथिलीक अपन स्तर-भेद (ठेठ, सामान्य, तत्समगर्भी) उतारैत अछि — शकारक भ्रष्ट उक्ति लेल मैथिलीक हास्यमूलक वाक्-विकृति, चारुदत्तक पद्य लेल प्रौढ़ स्तर। चोरिक "शास्त्रीय" वर्णन आ जुआघरक दृश्य मैथिली मुहावरामे विशेष खिलल अछि। समग्रतः मृच्छकटिक प्रमाण थिक जे भारतीय क्लासिक "क्लासिक" एहि द्वारे नहि जे ओ राजा-देवताक कथा कहैत अछि, वरन् एहि द्वारे जे ओ माटिक गाड़ीमे मनुष्यताक सोन भरि सकैत अछि। भगवदज्जुकम् (साधु आ वेश्या) बोधायन-कृत प्रहसन — आत्मा-विनिमयक हास्य विस्तृत समीक्षा — भारतीय आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक दृष्टिसँ कृति-परिचय भगवदज्जुकम् संस्कृत प्रहसन-परम्पराक सभसँ बुद्धिदीप्त रचना मानल जाइत अछि। कथा-यन्त्र अद्भुत अछि: परिव्राजक (भगवान्) अपन चञ्चल शिष्य शाण्डिल्यकेँ योगक "परकाय-प्रवेश" सिद्धि देखयबा लेल — यमदूतक भूलसँ मृत भेल गणिका वसन्तसेना (अज्जुका)क देहमे प्रवेश करैत छथि; बादमे यमदूत भूल सुधारऽ मे गणिकाक आत्माकेँ परिव्राजकक देहमे धऽ दैत अछि। फल: गणिकाक देहसँ वेदान्त-वाणी आ संन्यासीक देहसँ शृंगार-चेष्टा! वैद्य, माता, प्रेमी — सभ चकराइत अछि, आ शाण्डिल्य — भूख-प्रेरित भऽ बौद्ध-मठसँ भागल ई "अन्न-दास" शिष्य — एहि अराजकताक सूत्रधार-साक्षी बनल हँसबैत रहैत अछि। पल्लव-युगमे (सम्भवतः महेन्द्रविक्रमक समकालीन/पूर्ववर्ती) रचित ई प्रहसन मत्तविलासक संग दक्षिणक मन्दिर-रंगमञ्च (कूडियाट्टम् धरि) मे जीवित रहल। भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टि रस-दृष्टिएँ एतऽ हास्यक उद्भव-स्थल "वेश-वाणीक व्यत्यय" थिक — भरत हास्यक विभावमे "विकृत-वेष-अलंकार" गनने छथि; भगवदज्जुक ओकरा दार्शनिक स्तर पर लऽ जाइत अछि: विकृति वस्त्रक नहि, आत्महिक अछि। ध्वनि-सिद्धान्तसँ ई प्रहसन असाधारण अछि, कारण एकर हास्यक प्रत्येक क्षण वेदान्तक गम्भीर प्रमेय ध्वनित करैत अछि — देह-आत्माक भेद, "को ऽहम्"क प्रश्न — जे उपनिषद् गम्भीर स्वरे कहैत अछि, से ई प्रहसन उनटा कऽ देखा दैत अछि: देह बदलि गेला पर "हम" के? हास्यक व्याजसँ शास्त्रार्थ — ई "व्यङ्ग्य-वेदान्त" थिक। वक्रोक्ति-दृष्टिएँ सम्पूर्ण नाटक एक विराट "विपर्यय-वक्रता" पर ठाढ़ अछि। औचित्य-प्रश्न रोचक अछि: की संन्यासीक एहन विडम्बना उचित? रचनाक भीतरहि उत्तर अछि — व्यंग्य सच्चा योगी पर नहि (परिव्राजकक सिद्धि वास्तविक अछि!), पाखण्ड आ देहात्म-भ्रम पर अछि; प्रहसनक अन्तमे सभ आत्मा अपन-अपन देह घुरि पबैत अछि — व्यवस्था-पुनर्स्थापन औचित्यक रक्षा करैत अछि। पाश्चात्य सिद्धान्त-दृष्टि पाश्चात्य कोटिमे एकर कथा-यन्त्र body-swap comedy क विश्व-साहित्यमे प्राचीनतम पूर्ण प्रयोग थिक — आधुनिक सिनेमा धरि (Freaky Friday सन) पसरल एहि रूढ़िक जड़ि एतऽ अछि; मुदा पाश्चात्य रूपान्तरसभ जतऽ मनोवैज्ञानिक "समानुभूति"क पाठ पढ़बैत अछि, बोधायन दार्शनिक प्रश्न उठबैत छथि — पहिचान देहमे अछि की चेतनामे? ई प्रश्न आधुनिक philosophy of mind (लॉकक स्मृति-सिद्धान्त, personal identity विमर्श) सँ सोझे संवाद करैत अछि — लॉकक "राजकुमार आ मोचीक" प्रसिद्ध विचार-प्रयोगसँ सहस्र वर्ष पूर्व मंच पर ओकर प्रदर्शन। बाख्तिनक कार्निवल-सिद्धान्त एतऽ शाब्दिक रूपेँ फलित अछि — उच्च-नीचक विनिमय (संन्यासी-गणिका!) कार्निवलक मूल-मन्त्र थिक, आ "देह"क केन्द्रीयता बाख्तिनक भौतिक-दैहिक सिद्धान्तक अनुरूप। बर्गसाँक हास्य-सूत्र — "देह पर यन्त्रवत् आरोपण" — एतऽ चरम रूपमे अछि: आत्मा बदलल, देहक टेव नहि बदलल। Absurdist दृष्टिसँ यमदूतक "लिपिकीय भूल" (गलत जीव उठा लेब) ब्रह्माण्डीय प्रशासनक ओ विडम्बना थिक जे काफ्का-योनेस्कोक जगत्सँ परिचित पाठककेँ चौंका दैत अछि — नियति एतऽ त्रासद नहि, दफ्तरी अछि। अनुवाद-मूल्यांकन आ निष्कर्ष मैथिली अनुवाद "साधु आ वेश्या" शीर्षक-द्वन्द्वहिसँ नाटकक विपर्यय-संरचना पकड़ि लैत अछि। अनुवादक कठिनतम स्थल — गणिका-देहस्थ संन्यासीक संस्कृतनिष्ठ वाणी आ संन्यासी-देहस्थ गणिकाक विलास-वाणीक व्यत्यय — मैथिलीक स्तर-भेदसँ (तत्समगर्भी बनाम लोकरंजक बोली) सधल अछि; एहि भाषिक व्यत्ययहिमे अनुवादक सफलता अछि। समग्रतः भगवदज्जुकम् देखबैत अछि जे भारतीय परम्परामे गम्भीरतम दर्शन आ उन्मुक्ततम हास्य परस्पर विरोधी नहि — एक्कहि सिक्काक दू पीठ थिक; "को ऽहम्"क प्रश्न ठहाकाक बीचोबीच पूछल जा सकैत अछि। मत्तविलास प्रहसनम् (आनन्दमे मत्त करैबला प्रहसन) पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रम वर्माक प्रहसन विस्तृत समीक्षा — भारतीय आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक दृष्टिसँ कृति-परिचय सप्तम शताब्दीक आरम्भमे काञ्चीक पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रम वर्मा — "विचित्रचित्त" — स्वयं जे प्रहसन रचलनि से राजकीय आत्मविश्वासक अद्भुत दस्तावेज थिक: अपनहि राजधानी काञ्चीक धर्म-जगतक विडम्बना। कपाली सत्यसोम — मदिरा-मत्त शैव कापालिक — अपन कपाल (भिक्षा-पात्र, नर-कपाल) हेरा दैत अछि आ बौद्ध भिक्षु नागसेन पर चोरिक आरोप लगबैत अछि; बीचमे पाशुपत मध्यस्थ बनैत अछि, उन्मत्तक हाथसँ कपाल घुरैत अछि, आ झगड़ा जेना उठल तेना बैसि जाइत अछि। एक अंकक एहि लघु रचनामे तत्कालीन काञ्चीक धार्मिक बहुलता — कापालिक, बौद्ध, पाशुपत, जैनक उल्लेख — सड़क-स्तरीय यथार्थमे अंकित अछि। भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टि नाट्यशास्त्रीय दृष्टिसँ मत्तविलास "शुद्ध प्रहसन"क लक्षण-सिद्ध उदाहरण थिक — पाखण्डी-तापस-चेटादिक निन्द्य अनुकृति; मुदा राजा-रचयिताक स्पर्शसँ एकर हास्यमे जे परिष्कार अछि से उल्लेखनीय: गारि-स्तरक स्थूलता न्यून, स्थिति-जन्य आ चरित्र-जन्य हास्य प्रधान। रस-व्यवस्थामे हास्यक "मद"-आधारित विभाव एतऽ केन्द्रमे अछि — भरत मदक तीन अवस्था गनने छथि, आ सत्यसोमक सम्पूर्ण आचरण ओकर क्रमिक प्रदर्शनी थिक; नाटकक नामहिमे "मत्त" अछि। वक्रोक्ति-दृष्टिएँ नाटकक तीक्ष्णतम शस्त्र "व्याज-तर्क" थिक — सत्यसोम मदिरालयकेँ यज्ञशाला कहैत अछि (ध्वजा=यूप, मदिरा=सोम, चषक=चमस...): ई उपमा-शृंखला वक्रोक्तिक चमत्कार आ धर्म-भाषाक खोखलापनक ध्वनि — दुनू एक्केसंग थिक। ध्वनि-दृष्टिसँ बौद्ध भिक्षुक मनोगत ("पिटक-ग्रन्थमे मदिरा-स्त्रीक निषेध कोन ईर्ष्यालु बूढ़ जोड़ि देलक!") प्रच्छन्न-लालसाक व्यंग्य-गर्भ उक्ति थिक। औचित्य-दृष्टिएँ राजाक सन्तुलन देखू — कोनो सम्प्रदाय-विशेषक पक्षधरता नहि; व्यंग्य सभ पर बराबर, आ तेँ कोनो पर नहि — शासकीय निष्पक्षताक सौन्दर्यशास्त्र। पाश्चात्य सिद्धान्त-दृष्टि पाश्चात्य कोटिमे मत्तविलास farce क लक्षण — हेरायल वस्तु, झूठ आरोप, सार्वजनिक झगड़ा, संयोगसँ समाधान — पूर्णतः धारण करैत अछि; मोलियरक Tartuffe सँ हजार वर्ष पूर्व धार्मिक पाखण्डक रंगमञ्चीय विडम्बना, मुदा एक निर्णायक भेदसँ: मोलियरक व्यंग्य-पात्र कपटी अछि, सत्यसोम कपटी नहि — निष्ठावान् मूर्ख अछि; ओ जे बजैत अछि से मानैत अछि। ई भेद व्यंग्यकेँ क्रूरतासँ बचबैत अछि आ बर्गसाँक "टेवक यान्त्रिकता"क शुद्ध क्षेत्रमे रखैत अछि। बाख्तिनक दृष्टिसँ मत्तविलास कार्निवलक शाब्दिक मंचन थिक — मदिरा, सड़क, पवित्रक अपवित्रीकरण (कपाल-पात्र!), आ "सम्राट्क अपन कार्निवल" — राजसत्ता स्वयं अपन नगरक धर्मसत्ताक विडम्बना रचि रहल अछि: न्यू हिस्टॉरिसिस्ट एतऽ पूछत जे ई विडम्बना विध्वंसक (subversive) थिक की सत्ता-पोषित सुरक्षा-कपाट (safety valve / licensed misrule)? सम्भवतः दोसर — राजा हँसबाक अनुमति दऽ कऽ धर्म-संस्था सभ पर अपन प्रभुत्वहि देखा रहल छथि। धर्म-समाजशास्त्रक दृष्टिसँ ई नाटक सम्प्रदाय-प्रतिस्पर्धाक "बाजार"क चित्र थिक — भिक्षा, पात्र, प्रतिष्ठाक अर्थतन्त्र; आ कपाल-हरण-कथा वस्तुतः प्रतीक-पूँजी (symbolic capital, बूर्द्यो)क हरण-कथा थिक: कपाल गेल तँ कापालिकक पहिचाने गेल। अनुवाद-मूल्यांकन आ निष्कर्ष मैथिली अनुवाद "आनन्दमे मत्त करैबला प्रहसन" शीर्षकसँ मूलक श्लेष (मत्त=मातल/आनन्दमग्न) खोलैत अछि। मातलक लटपटायल वाणी लेल मैथिलीक अपन "मातल-बोली"क लोक-परिचित लय अनुवादमे सटीक बैसल अछि; मदिरालय-यज्ञशाला उपमा-शृंखला पारिभाषिक शब्दसहित बचाओल गेल अछि, जे एकर व्यंग्य-धार लेल अनिवार्य छल। समग्रतः मत्तविलास ओ दुर्लभ रचना थिक जाहिमे सिंहासन स्वयं सड़क पर उतरि हँसैत अछि — आ डेढ़ हजार वर्ष बाद ओ हँसी एखनहुँ ताजा अछि, कारण पाखण्ड कहियो पुरान नहि होइत अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१६. भामती (वाचस्पति)/ आत्मतत्त्वविवेक (उदयन)/ न्यायकुसुमाञ्जलि (उदयन)/तत्त्वचिन्तामणि (गंगेश)/ (मैथिली अनुवाद): ग्रन्थ-सार आ समालोचनात्मक मूल्याङ्कन [मूल संस्कृत सँ मैथिली अनुवाद: गजेन्द्र ठाकुर] भामती (चतुःसूत्री) गजेन्द्र ठाकुर कृत शुद्ध मैथिली अनुवादक एकीकृत विस्तृत ग्रन्थ-सार आ समालोचनात्मक मूल्याङ्कन भारतीय आ पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्तक आलोकमे मूल संस्कृत: वाचस्पति मिश्र • संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद: गजेन्द्र ठाकुर प्रथम संस्करण 2004 · परिवर्धित संस्करण 2026 · ISBN 978-93-5943-682-1 · विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका · ISSN 2229-547X अध्यासभाष्यसँ चतुःसूत्री-समाप्ति धरि १. प्रस्तावना, उद्देश्य आ समीक्ष्य ग्रन्थक संरचना नवम शताब्दीक मिथिलाक 'सर्वतन्त्रस्वतन्त्र' दार्शनिक वाचस्पति मिश्र द्वारा रचित "भामती"—शंकराचार्यक शारीरक भाष्यपर लिखल टीका—अद्वैत वेदान्तक इतिहासमे एकटा स्वतन्त्र प्रस्थान (भामती-प्रस्थान)क आधारग्रन्थ अछि। सहस्राधिक वर्ष धरि ई कृति संस्कृत वाङ्मयक परिधिमे सीमित रहल, यद्यपि एकर रचयिता स्वयं मिथिलाक सन्तान छलाह। गजेन्द्र ठाकुर—विदेह ई-पत्रिकाक सम्पादक, नव्य-न्याय आ गङ्गेश उपाध्यायक परम्पराक अध्येता, आ मैथिली-हिन्दी-संस्कृत-अंग्रेजी चारू भाषामे सक्रिय साहित्यकार—एहि ऐतिहासिक अभावक पूर्ति अपन मूल संस्कृतसँ शुद्ध मैथिली अनुवाद द्वारा कएलनि अछि। प्रथम संस्करण 2004 आ परिवर्धित/ऑडिट-संशोधित संस्करण 2026 (विदेह ग्रन्थ-शृङ्खला, ISSN 2229-547X) एहि अनुवादक दू दशकक परिपक्व साधनाक साक्षी अछि। प्रस्तुत अनुशीलनक उद्देश्य दुइ अछि: पहिल, समीक्ष्य 491 पृष्ठक सम्पूर्ण पाठक—मंगलाचरणसँ लऽ कऽ समन्वयाधिकरणक अन्तिम पुष्पिका "एतय चतुःसूत्री-भामती समाप्त होइत अछि" धरि—कोनो अंश नहि छोड़ैत, ओकर विस्तृत, क्रमबद्ध ग्रन्थ-सार प्रस्तुत करब; दोसर, ई ग्रन्थ (मूल दार्शनिक कृति आ ओकर अनुवाद-कर्म दुनू) केँ भारतीय काव्यशास्त्र (रस, ध्वनि, वक्रोक्ति, गुण-रीति, औचित्य, आ मिथिलाक अपन नव्य-न्याय-दृष्टि) तथा पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त (अनुवाद-सिद्धान्त: श्लायरमाखर-वेनुटीक deशीकरण/विदेशीकरण, नाइडाक गतिशील-औपचारिक तुल्यता, वाल्टर बेन्यामिनक "अनुवादकक कार्य", गाडामरक हर्मेन्यूटिक्स, आ नव समीक्षाक निकट-पाठ पद्धति) क आलोकमे समालोचनात्मक दृष्टिसँ परखब। ई अनुसन्धान प्रतिवेदन वाचस्पति मिश्रक दार्शनिक अवदान, भामती-प्रस्थानक तात्त्विक सिद्धान्त, गजेन्द्र ठाकुरक मैथिली अनुवादक भाषिक आ दार्शनिक समीक्षा, तथा मैथिली वाङ्मयमे एहि ग्रन्थक समावेशसँ उत्पन्न नव बौद्धिक विमर्शक विस्तृत मीमांसा प्रस्तुत करैत अछि। एतदतिरिक्त ई प्रतिवेदन मैथिली साहित्यक नवजागरणमे सास्थानिक योगदानक सेहो विस्तृत विवेचन करैत अछि। समीक्ष्य अनुवाद संचयी संस्करणक पृष्ठ १ सँ ४९१ धरि विस्तृत अछि आ निम्नलिखित क्रममे संरचित अछि: (क) आवरण आ प्रकाशकीय पृष्ठ; (ख) शंकरक अध्यासभाष्यक मूल पाठक मैथिली रूपान्तर; (ग) वाचस्पति मिश्रक सात मंगलश्लोकक गद्यानुवाद; (घ) "अध्यास" शीर्षकसँ अध्यासभाष्यपर भामती-टीकाक सम्पूर्ण अनुवाद; (ङ) प्रथम सूत्र 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा'क टीका; (च) द्वितीय सूत्र 'जन्माद्यस्य यतः'क टीका; (छ) तृतीय सूत्र 'शास्त्रयोनित्वात्'क टीका; आ (ज) चतुर्थ सूत्र 'तत्तु समन्वयात्' (समन्वयाधिकरण)क विशालकाय टीका, जे अकेल सम्पूर्ण ग्रन्थक लगभग एक-तिहाइ भाग घेरैत अछि—मूल भामतीक अनुपातक प्रति अनुवादकक निष्ठाक प्रमाण। संस्करणक अन्तमे (अध्याय ४ रूपमे) एकटा विस्तृत, बारह खण्डमे विभाजित बिबलियोग्राफी अछि, जाहिमे समीक्ष्य संस्करण, ब्रह्मसूत्र-शाङ्करभाष्यक आधार-पाठ, भामतीक संस्कृत संस्करण, भामतीपर टीका-उपटीका (वेदान्तकल्पतरु, कल्पतरुपरिमल, आभोग, भामतीतिलक आदि), विवरण-प्रस्थानक तुलनात्मक ग्रन्थ, वाचस्पतिक अन्य कृति, आधुनिक शोध, आ डिजिटल संग्रह—सभक सूचीकरण, प्रत्येकक "उपयोगिता"-टिप्पणीसहित, कएल गेल अछि। ई सम्पादकीय अंश शोधार्थीक हेतु विशेष उपयोगी अछि, यद्यपि ई स्वयं अनुवाद-कर्मक भाग नहि, अपितु सहायक उपकरण अछि, तेँ प्रस्तुत ग्रन्थ-सारमे एकर अलग सङ्क्षिप्त उल्लेखे पर्याप्त बुझल गेल। पुस्तक चारि मुख्य अध्यायमे व्यवस्थित अछि। पहिल अध्याय प्रस्तावना आ दार्शनिक अनुशीलन, दोसर विस्तृत दार्शनिक–अनुवाद-समीक्षात्मक–साहित्यिक समीक्षा, तेसर मूल शुद्ध मैथिली अनुवादक परिशिष्ट, आ चारिम विस्तृत सन्दर्भग्रन्थ-सूची अछि। तेसर अध्यायमे अध्याससँ आरम्भ कऽ ब्रह्मसूत्रक पहिल चारि सूत्र धरि पूरा चतुःसूत्री-भामती राखल अछि। दोसर अध्याय पहिल अध्यायक विषयसभकेँ फेर लैत अछि, मुदा अधिक सूक्ष्म उपशीर्षकमे बाँटैत अछि—अध्यासक सात उपभाग, पहिल सूत्रक चारि उपभाग, चतुर्थ सूत्रक पाँच उपभाग, अनुवाद-कला, भारतीय-पाश्चात्य समीक्षा, मैथिली वाङ्मयमे स्थान, निरीक्षण, उपसंहार आ समग्र निर्णय। २. वाचस्पति मिश्र: 'सर्वतन्त्रस्वतन्त्र' दार्शनिक व्यक्तित्व आ ऐतिहासिक धरोहर वाचस्पति मिश्र (लगभग ९०० - ९८० ई.) भारतीय दर्शनक इतिहासमे एकटा अलोकसामान्य प्रतिभाक धनी छलाह। हुनक आविर्भाव मिथिलाक मधुबनी जिलान्तर्गत अन्धराठाढ़ी (जे ओहि समय राजा नृगक राजधानी छल) अथवा समौल गाममे भेल छल। वैशेषिक दर्शन केँ छोड़ि, भारतीय दर्शनक प्रायः सभ आस्तिक प्रस्थानपर हुनक अधिकारपूर्ण टीकासभ उपलब्ध अछि, जकर कारणेँ हुनका पण्डितसभ द्वारा 'सर्वतन्त्रस्वतन्त्र' क उपाधिसँ विभूषित कएल गेल अछि। भारतीय दार्शनिक परम्परामे एहन कोनो दोसर विद्वान नहि भेलाह जकर लेखनीसँ षड्दर्शनक प्रायः सभ प्रमुख शाखामे एतेक प्रामाणिक आ युगांतरकारी भाष्य रचित भेल होय। वाचस्पति मिश्रक विपुल वाङ्मयक परिदृश्य अत्यन्त व्यापक अछि। न्याय दर्शनमे हुनक 'न्यायवार्तिकतात्पर्यटीका' उपलब्ध अछि, जकरा कारण न्याय सम्प्रदायमे हुनका 'तात्पर्याचार्य' क रूपमे ख्याति भेटल आ एहि टीका द्वारा ओ उद्योतकरक न्यायवार्तिकक रक्षा कएलनि। एतदतिरिक्त न्यायसूत्रक कालक्रम आ विषयवस्तुक व्यवस्थापन हेतु 'न्यायसूचीनिबन्ध' सेहो हुनक महत्वपूर्ण कृति अछि। सांख्य दर्शनमे ईश्वरकृष्णक सांख्यकारिकापर हुनक 'सांख्यतत्त्वकौमुदी' अद्यावधि सांख्यक सर्वमान्य व्याख्या मानल जाइत अछि। योग दर्शनमे पतञ्जलिक योगसूत्रपर आधारित व्यासभाष्यपर 'तत्त्ववैशारदी' नामक हुनक टीका योगक मनोवैज्ञानिक आ दार्शनिक गुत्थीसभकेँ सुलझबैत अछि। पूर्वमीमांसा दर्शनमे मण्डन मिश्रक विधिविवेकपर 'न्यायकणिका' आ शब्दबोधपर आधारित स्वतन्त्र ग्रन्थ 'तत्त्वबिन्दु' हुनक मीमांसक दृष्टिक परिचायक अछि। वेदान्त दर्शनमे मण्डन मिश्रक 'ब्रह्मसिद्धि' पर 'ब्रह्मतत्त्वसमीक्षा' (जे आब अनुपलब्ध अछि) आ शारीरक भाष्यपर 'भामती' हुनक कीर्तिकेँ अमर बना देलक। एहि ऐतिहासिक भूमिकाक महत्त्व ई अछि जे पाठक भामतीकेँ केवल शंकराचार्यक वाक्यक पद-पदार्थ व्याख्या मानि नहि बैसथि। वाचस्पति मिश्र भाष्यकारक अनुचर अवश्य छथि, मुदा हुनक टीकाक भीतर स्वतंत्र तर्क-विस्तार, प्रतिपक्ष-निर्माण, प्रमाण-विवेचन आ अवधारणात्मक वर्गीकरण अछि। एही स्वतंत्र बौद्धिक आकारक कारण “भामती-प्रस्थान” नाम सार्थक होइत अछि। २.१ भामती नामकरणक नेपथ्यक जनश्रुति वाचस्पति मिश्रक जीवनक अन्तिम आ सर्वश्रेष्ठ कृति 'भामती' क नामकरणक पाछाँ एकटा अत्यन्त मार्मिक आ प्रेरणादायी किंवदन्ती अछि, जे भारतीय नारीक मौन तपस्याक शाश्वत प्रतीक अछि। जनश्रुति आ ऐतिहासिक सन्दर्भक अनुसार, वाचस्पति मिश्रक विवाह अल्पायुमे भामती नामक कन्या सँ भेल छल। विवाहक पश्चात् ओ आचार्य शंकरक शारीरक भाष्यपर टीका लिखबाक महान् संकल्प लेलनि आ अपन पत्नी भामती सँ आग्रह कएलनि जे यावत् ई ग्रन्थ पूर्ण नहि होइत, तावत् हुनका एहि साधनामे कोनो प्रकारक विघ्न नहि देल जाय। भामती अपन पतिक एहि महान् उद्देश्यक सम्मान करैत सम्पूर्ण गृहस्थीक भार अपन कान्हपर लऽ लेलनि। वर्षों धरि (किछु सन्दर्भक अनुसार लगभग ३० वर्ष) वाचस्पति मिश्र साहित्य आ दर्शनक साधनामे एतेक लीन रहलाह जे हुनका ईहो भान नहि रहल जे हुनक सेवा के कऽ रहल अछि, हुनका लेल भोजन, जल, आ दीपमे तेलक प्रबन्ध के करैत अछि। एक दिन सन्ध्या काल जखन दीपमे तेल समाप्त भऽ रहल छल आ दीप बुझबाक कगारपर छल, तखने वाचस्पति मिश्रक ग्रन्थ सेहो पूर्ण भेल। दीप बुझैत देखि भामती शीघ्रतासँ तेल भरबाक लेल अएलीह। जखन वाचस्पति मिश्र अपन पोथीसँ दृष्टि उठौलनि, तँ सम्मुख एकटा प्रौढ़ा स्त्रीकेँ ठाढ़ देखलनि। ओ विस्मयपूर्वक पुछलनि, "हे देवि, अहाँ के छी?" भामती नम्रतापूर्वक उत्तर देलनि, "हे देव, हम अहाँक पत्नी भामती छी"। अपन पत्नीक एहि अपूर्व त्याग, असीम समर्पण आ निस्वार्थ सेवाकेँ देखि वाचस्पति मिश्र अभिभूत भऽ गेलाह। ओ अनुभव कएलनि जे हुनक जीवन-संगिनी हुनका लेल अपन सम्पूर्ण जीवनक आहुति दऽ देलनि। एहि असीम त्यागक प्रति कृतज्ञता प्रकट करैत ओ अपन एहि महान् वेदान्त-टीकाक नाम 'भामती' रखलनि, जाहिसँ सम्पूर्ण विश्व दार्शनिक ज्ञानक संगे-संग एकटा भारतीय नारीक महान् त्यागकेँ सेहो अनन्त काल धरि स्मरण रखैत। ई ग्रन्थ आइयो अद्वैत वेदान्तक सर्वोच्च ग्रन्थसभमे गिनल जाइत अछि आ भामतीक नाम दर्शनक इतिहासमे स्वर्णाक्षरमे अङ्कित अछि। आधुनिक कालमे साहित्यकार उषाकिरण खान एहि ऐतिहासिक आ दार्शनिक प्रेमकथाकेँ आधार बना कऽ मैथिली आ हिन्दीमे 'भामती-एक अविस्मरणीय प्रेमकथा' नामक उपन्यासक रचना कएलनि, जकरा साहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ सेहो सम्मानित कएल गेल। ३. भामती-प्रस्थान, विवरण-प्रस्थान आ टीका-परम्परा चतुःसूत्री-अंशमे भामती-प्रस्थानक अनेक बीज-सिद्धान्त उपस्थित अछि, जकरा अनुवाद कोनो बाह्य टिप्पणी बिना, पाठ-निष्ठ रहितहुँ, स्वतः उजागर करैत अछि। भामती-प्रस्थान आ पद्मपादाचार्यक पंचपादिकापर प्रकाशात्मयति-रचित 'पंचपादिका-विवरण'सँ उद्भूत विवरण-प्रस्थानक तात्त्विक भेद तर नीचाँ देल तालिकामे संक्षेपतः देखल जा सकैत अछि: अविद्याक जीवाश्रयत्वक ई भामती-सिद्धान्त, ब्रह्मसाक्षात्कारकेँ मननजन्य अन्तःकरण-वृत्तिरूप मानब, आ अध्यासकेँ भेदाग्रह-मूलक बुझबामे प्राभाकर-सामग्रीक अद्वैत-सात्करण—ई सभ बिन्दु अनुवादमे पाठकेँ स्वतः भेटि जाइत अछि, जे अनुवादकक शास्त्रीय गहराइक प्रमाण अछि। अद्वैत वेदान्तक विकास-क्रममे आचार्य शंकरक परवर्ती कालमे दुइटा प्रमुख प्रस्थान (सम्प्रदाय) स्थापित भेल—वाचस्पति मिश्रक 'भामती-प्रस्थान' आ पद्मपादाचार्यक 'पञ्चपादिका' पर प्रकाशात्मयति द्वारा रचित 'पञ्चपादिका-विवरण' सँ उद्भूत 'विवरण-प्रस्थान'। एहि दुनू प्रस्थानक तात्त्विक भेद अद्वैत दर्शनक सूक्ष्मताकेँ बुझबाक लेल नितान्त आवश्यक अछि, जकर निर्वाह गजेन्द्र ठाकुरक मैथिली अनुवादमे पूर्ण निष्ठासँ भेल अछि। भामती-प्रस्थानमे जीवकेँ कर्ता, भोक्ता आ अविद्याक आश्रय मानल गेल अछि। अविद्याक जीवाश्रयत्वक ई सिद्धान्त भामतीक आधारभूत विशेषता अछि। वाचस्पति मिश्रक अनुसार, अविद्या वास्तवमे अनिर्वचनीय अछि आ ओकरा दुइ भागमे विभक्त कएल जा सकैत अछि—आवरण (मूलाविद्या) आ विक्षेप (तूलाविद्या/संस्कार)। ई सम्पूर्ण पृष्ठभूमि गजेन्द्र ठाकुरक अनुवादमे स्वतः प्रतिध्वनित होइत अछि, जतय अनुवादक बिना कोनो बाह्य टिप्पणीक पाठ-निष्ठ रहि भामतीक आशयकेँ स्पष्ट करैत छथि। ई तुलना उपयोगी अछि, मुदा एहि जगह एकटा शास्त्रीय सावधानी आवश्यक अछि। भामती-विवरण भेदक अनेक सूत्र उत्तरवर्ती परम्पराक व्यवस्थित वर्गीकरणक फल सेहो अछि; अतः पाठककेँ ई न बुझबाक चाही जे सभ भेद एहि रूपमे स्वयं वाचस्पतिक मूल पाठमे सूचीबद्ध भेटैत अछि। पुस्तक मूल अनुवाद आ परम्परागत सिद्धान्त-इतिहासक बीच भेद आर स्पष्ट करितय तँ शोधोपयोगिता बढ़ितय। वाचस्पति मिश्रक भामती एतेक प्रौढ आ गम्भीर अछि जे ओकरा बुझबाक लेल स्वयं भामतीपर अनेक टीकासभ रचित भेल। तेरहम् शताब्दीमे अमलानन्द सरस्वती (जिनकर गुरु अनुभवानन्द छलाह) भामतीपर 'वेदान्तकल्पतरु' नामक प्रसिद्ध टीका लिखलनि, जाहिसँ भामती-प्रस्थानकेँ अद्वैत वेदान्तक क्षेत्रमे अपूर्व प्रतिष्ठा भेटल। अमलानन्दक कल्पतरुपर सोलहम शताब्दीमे अप्पय दीक्षित 'कल्पतरुपरिमल' आ लक्ष्मीनृसिंह 'आभोग' नामक टीका लिखलनि। एहि अतिरिक्त भामतीपर वल्लालसूरी कृत 'भामतीतिलक', अखण्डानुभूति यति कृत 'ऋजुप्रकाशिका', अच्युतकृष्णतीर्थ कृत 'भामती-भावदीपिका' आ सुब्रह्मण्यशास्त्री कृत 'भामती-विवरण' सन अनेक टीकासभ उपलब्ध अछि। एहि टीकासभमे कतहु-कतहु भामती आ कल्पतरुक सिद्धान्तसभक सूक्ष्म मतभेद परिलक्षित होइत अछि। अप्पय दीक्षित अपन 'परिमल' मे जतय वाचस्पति आ अमलानन्दक शारीरक भाष्यसँ असमानता देखलनि, ओतय हुनका लोकनिक खण्डन कऽ शारीरक भाष्यक समर्थन कएलनि। मुदा 'आभोग' कार लक्ष्मीनृसिंह परिमलक एहि व्यवस्थाक तीव्र आलोचना कऽ भामतीकार आ कल्पतरुकारक समर्थन कएलनि। एहि प्रकार भामती-प्रस्थानक भीतर सेहो दुइ उप-प्रस्थान विकसित भेल। ई सम्पूर्ण टीका-सम्पत्ति वाचस्पति मिश्रक मूल ग्रन्थक बौद्धिक वर्चस्व प्रमाणित करैत अछि। तात्त्विक आ ज्ञानमीमांसक बिन्दु भामती-प्रस्थान (वाचस्पति मिश्र) विवरण-प्रस्थान (पद्मपाद / प्रकाशात्मयति) अविद्याक आश्रय (Locus of Avidya) अविद्याक आश्रय 'जीव' अछि (जीवाश्रित अविद्या)। ब्रह्म अविद्याक विषय अछि, आश्रय नहि। अविद्याक आश्रय 'ब्रह्म' अछि (ब्रह्माश्रित अविद्या)। अज्ञान ब्रह्ममे स्थित अछि। जीव आ ईश्वरक स्वरूप अवच्छेदवाद: जीव अविद्यासँ सीमित (अवच्छिन्न) ब्रह्म अछि, जहिना घटाकाश आ महाकाश। प्रतिबिम्बवाद: जीव अविद्यामे ब्रह्मक प्रतिबिम्ब अछि, जहिना जलमे सूर्यक प्रतिबिम्ब। अविद्याक एकत्व-नानात्व अविद्या अनेक अछि (नाना जीव, नाना अविद्या)। प्रत्येक जीवक अपन अविद्या अछि। मूलाविद्या एक अछि। सम्पूर्ण प्रपञ्च एकहि अविद्याक कार्य अछि। ब्रह्मसाक्षात्कारक साधन मननजन्य अन्तःकरणक ब्रह्माकार वृत्ति (मन) अपरोक्ष ज्ञानक मुख्य साधन अछि (निदिध्यासन)। महावाक्य (शब्द) साक्षात् अपरोक्ष ज्ञानक साधन अछि (शब्दापरोक्षवाद / श्रवण)। मोक्षक साधन जीव अविद्याक आश्रय अछि आ निदिध्यासनक माध्यमसँ जीवन्मुक्ति प्राप्त करैत अछि। श्रवण मात्र पर्याप्त अछि, अविद्या ब्रह्माश्रित अछि आ ब्रह्मज्ञानसँ स्वतः नष्ट होइत अछि। सृष्टिक्रम आ भूत-मिश्रण त्रिवृत्करण (तीन भूतसभक मिश्रण—तेज, जल, अन्न/पृथ्वी) मान्य अछि। पञ्चीकरण (पाँच भूतसभक मिश्रण—आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी) मान्य अछि। ४. विस्तृत ग्रन्थ-सार आ दार्शनिक मीमांसा ४.१ मङ्गलाचरण: दर्शन आ काव्यक संगम भामतीक सात मंगलश्लोक अनुवादमे गद्यानुवाद रूपमे प्रस्तुत अछि, छन्द-सुरक्षापर अर्थ-सुरक्षा केँ प्राथमिकता देल गेल अछि। प्रथम श्लोकमे ब्रह्म केँ 'अपरिमेय आनन्द आ ज्ञानस्वरूप' कहि, 'दुइ प्रकारक अनिर्वचनीय अविद्या केँ मन्त्री बना कऽ' पंचभूतक मिथ्या अभिव्यक्तिकर्ता रूपमे प्रणाम कएल गेल अछि—एतहि भामती-प्रस्थानक बीज-सिद्धान्त (द्विविध अविद्या: आवरण आ विक्षेप/संस्कार) क सङ्केत भेटि जाइत अछि। द्वितीय श्लोक—'वेद हुनक श्वास छथि, पाँचो महाभूत हुनक दृष्टि छथि, चल-अचल जगत हुनक मुस्की अछि आ हुनक निद्रा महाप्रलय अछि'—मे 'मुस्की' शब्दक प्रयोगसँ ब्रह्माण्डीय लीला घरेलू आत्मीयता पाबि लैत अछि। आगाँ वेद-भव, मार्तण्ड-तिलकस्वामिन्-महागणपति, व्यास आ शंकरक वन्दना क्रमशः अछि। सातम श्लोकक विनयोक्ति—'जहिना राजपथक पानि गङ्गाक धारमे पड़ि शुद्ध भऽ जाइत अछि, तहिना हमरा सन लोकक तुच्छ वचन आचार्यक रचनासँ जुड़ि पवित्र भऽ जाइत अछि'—टीकाकारक शास्त्रीय आत्म-नम्रताक प्रतिरूप अछि। एहि मङ्गलाचरणमे अनुवादक पद्धति स्पष्ट भऽ जाइत अछि—छन्द छोड़ल जा सकैत अछि, अर्थ नहि; संस्कृत पदावली राखल जा सकैत अछि, मुदा वाक्य मैथिलीमे साँस लेबाक चाही। समग्र अनुवादमे यही नीति बारम्बार सफल देखाइत अछि। ४.२ अध्यास-भाष्य: पूर्वपक्ष, गौण-मिथ्या भेद, ख्यातिवाद आ आत्माक स्वयंप्रकाशता टीका एकटा दीर्घ पूर्वपक्षसँ आरम्भ होइत अछि: जाहि वस्तुमे सन्देह नहि आ जकर ज्ञानसँ प्रयोजन सिद्ध नहि हो, ओ जिज्ञासाक विषय नहि भऽ सकैत ('तेज इजोतमे उपस्थित घट' आ 'कौआक दाँत'क दृष्टान्त)। पूर्वपक्षी 'हम' (अस्मत्)क अपरोक्ष अनुभव कृमि-पतङ्गसँ लऽ कऽ देवता-ऋषि धरि सभमे निर्विवाद देखबैत अछि; बाल्यकालसँ वृद्धावस्था धरिक प्रत्यभिज्ञा, फूल आ गूँथनिहार सूतक दृष्टान्त, स्वप्न-दिव्यदेह-बाध, योगबलजनित बाघ-देहमे आत्माभिन्नता, आ इन्द्रिय-व्यभिचारक तर्कसभद्वारा देहेन्द्रियादिसँ आत्माक भेद स्थापित करैत अछि। पूर्वपक्षक चरम उद्घोष—'हजार शास्त्र मिलियो घट केँ पट नहि बना सकैत अछि'—अनुभवविरोधी श्रुतिकेँ गौणार्थक मानबाक आग्रह अछि। सिद्धान्त-पक्ष उपक्रम-उपसंहार-अभ्यासादि तात्पर्यलिङ्गक आधारपर श्रुतिक निरुपाधिक आत्म-प्रतिपादन स्थापित करैत अछि। श्रुतिजन्य ज्ञान प्रत्यक्षक व्यावहारिक प्रामाण्य केँ नष्ट नहि करैत, केवल पारमार्थिक प्रामाण्यक निषेध करैत अछि—ई व्यावहारिक-पारमार्थिक भेद अद्वैत-प्रमाणमीमांसाक मेरुदण्ड अछि। 'दीर्घा चिचिया रहल अछि' सन गौणी वृत्तिक उदाहरण, कुण्डपायिनाम् अयनक 'अग्निहोत्र', सिंह-शिष्य, आ तैल-सरिसोक दृष्टान्तसभद्वारा सिद्ध कएल गेल जे गौण प्रयोग भेदज्ञानपूर्वक होइत अछि, मुदा 'हम'क प्रयोगमे देहसँ भेदज्ञानक अभावक कारण ओ गौण नहि, अपितु मिथ्या (अध्यास) अछि। अध्यासक भाष्यीय लक्षण—'पहिने देखल वस्तुक स्मृतिसदृश स्वरूपमे आन ठाम प्रकट होएब'—क पदशः विश्लेषण, अतिव्याप्ति-अव्याप्तिक परीक्षा (कालाक्षी गाएमे गोत्व-प्रत्यभिज्ञा, स्वप्नज्ञान), आ भ्रमक लौकिक कोश—शुक्ति-रजत, दर्पण-प्रतिबिम्बभ्रम, द्विचन्द्र, अलातचक्र, मृगतृष्णा, बाँसमे साँप—सम्पूर्णतः अनूदित अछि। एहि आधारपर ख्यातिवादक शास्त्रार्थ अछि: आत्मख्याति (सौत्रान्तिक-विज्ञानवादी बौद्ध), अख्याति (प्राभाकर मीमांसक), आ अन्यथाख्याति (नैयायिक)। वाचस्पति एहि सभक तीक्ष्ण खण्डन करैत छथि—'अहा! बेचारा ज्ञानक ई केहन महान सौभाग्य अछि जे असत्यक द्वारा सेहो निश्चितता प्राप्त कऽ लैत अछि!' सन व्यंग्य-वैभवसहित। सिद्धान्ततः अनिर्वचनीयख्याति स्थापित होइत अछि: किरणपर आरोपित मृगतृष्णाजल 'ने सत्य अछि, ने असत्य, आ ने सत्य-असत्य दुनू'—सदसद्विलक्षणताक ई त्रैविध्य-निषेध अद्वैत प्रमाणमीमांसाक हृदय अछि। चैतन्यक स्वप्रकाशताक शास्त्रार्थमे 'अन्हर अन्हरक हाथ पकड़ि प्रत्येक डेगपर खसैत अछि' (अन्धपरम्परा-दूषण), ज्ञानान्तर-कल्पनामे अनवस्था-दोष, आ विज्ञानवादीक विषय-प्रकाशवादक निरास—एहि सभद्वारा आत्माक स्वयंप्रकाश, नित्य, निरवयव स्वरूप स्थापित कएल गेल अछि। अप्रत्यक्ष आकाशपर अविवेकी बालकद्वारा मलिनता-आरोप (इन्द्रनील मणिसँ बनल विशाल उलटल कटोराक उपमा) क दृष्टान्तद्वारा अविद्याकल्पित बुद्धि-मन-देहोपाधिसँ जीवभावक निष्पत्ति देखाओल गेल अछि। 'अध्यास केँ ज्ञानी लोक अविद्या कहैत छथि' ई युग्म-लक्षण, प्रमातृत्वक अध्यासाधीनता, आ पशु-साम्यक प्रसिद्ध भाष्यांश—लाठी उठौने मनुष्य देखि भागब, हरियर घास देखि लग जाएब—मैथिलीमे ग्राम्य-जीवनक जीवन्त चित्र बनि जाइत अछि। धर्माध्यास (हम गूँग/एकनयन/बहिर छी) आ धर्म्यध्यास (इच्छा-सङ्कल्प-संशय-निश्चय) क विवेकसहित उपोद्घात 'यथार्थज्ञानक अभ्याससँ भ्रम-संस्कारक उच्छेद' रूपी प्रतिज्ञापर पूर्ण होइत अछि। आत्मख्याति (बौद्ध-सौत्रान्तिक/विज्ञानवादी): बाह्य वस्तुक असत्ता मानि, भीतरक ज्ञानाकारक बाह्य आरोप। अख्याति (मीमांसक-प्राभाकर): स्मृति आ ग्रहणक भेदाग्रह; स्मृतिक स्मृतित्व लुप्त भऽ जाएब। अन्यथाख्याति (नैयायिक): एक विद्यमान वस्तुक दोसर रूपमे ज्ञान (यथा सीपमे बाजारक रजतक भान)। ई अंश आधुनिक दर्शनक भाषा मे सेहो महत्त्वपूर्ण अछि, कारण प्रश्न मात्र “भ्रम किएक होइत अछि?” नहि, बल्कि “अनुभवमे उपस्थित वस्तुक सत्ता-स्थिति की अछि?” एहि रूपमे उठैत अछि। अनुवाद एहि प्रश्नक दार्शनिक गरिमा सुरक्षित रखैत अछि। ४.३ प्रथम सूत्र: 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' — अधिकार, साधन, कर्म-ज्ञान सम्बन्ध आ मोक्ष 'अथ' शब्दक चारि अर्थ-विकल्प (आनन्तर्य, आरम्भ, मंगल, अधिकार) क परीक्षा, आ 'धर्मजिज्ञासाक अनन्तर ब्रह्मजिज्ञासा' पक्षक खण्डन—ब्रह्मसाक्षात्कारक उत्पाद्य-विकार्य-संस्कार्य-आप्य चतुर्विध कार्यतासँ बहिर्भाव (आटाक गोला, दही, ओखलीक प्रोक्षण, दूध दुहबक दृष्टान्तचतुष्टय)—एहि सूत्रक केन्द्रीय विषय अछि। कर्म केँ केवल 'दूरस्थ सहायक' ठहराओल गेल अछि। साधन-चतुष्टय (नित्यानित्यवस्तुविवेक, इहामुत्रार्थभोगविराग, शमदमादिसाधनसम्पत्ति, मुमुक्षुत्व) क व्याख्यामे वैराग्य-विरोधी दृष्टान्तसभ—काँटासहित माछ, भूँसीसहित धान, वन्य पशुक डरे बीज नहि छोड़निहार किसान—मैथिली गद्यक विशेष सरसताक स्थल अछि। सूत्रक अन्तमे 'ब्रह्मणे जिज्ञासा' (चतुर्थी समास)क खण्डन कऽ 'ब्रह्मणः जिज्ञासा' (षष्ठी तत्पुरुष) स्थापित कएल गेल अछि—ई ऐतिहासिक दृष्टिएँ महत्त्वपूर्ण अछि, कारण एतय वाचस्पति शाङ्कर-पूर्व वृत्तिकार-परम्पराक खण्डन करैत छथि। प्रकरण आत्मस्वरूपक ऐतिहासिक मत-सर्वेक्षण (लोकायत, इन्द्रियात्मवाद, मन-आत्मवाद, क्षणिकविज्ञानवाद, शून्यवाद, सांख्य, न्याय-वैशेषिकक जीवभिन्न ईश्वर, आ अद्वैत)सँ समाप्त होइत अछि—भारतीय दर्शनक एकटा लघु-विश्वकोश। 'अथ' शब्दक मङ्गल, आरम्भ आ अधिकार अर्थक निरास कऽ 'आनन्तर्य' अर्थ स्थापित कएल गेल अछि। मङ्गल ध्वनिक दृष्टान्त "मृदङ्ग वा शङ्खक ध्वनि" आ "दोसर प्रयोजन लेल आनल जलपूर्ण कलशक दर्शन" सँ देल गेल अछि। धर्मजिज्ञासाक अनन्तर ब्रह्मजिज्ञासा हो—एहि मीमांसक पूर्वपक्षक तीव्र खण्डन कएल गेल अछि। मोक्ष उत्पाद्य (आटाक गोला), विकार्य (दही), संस्कार्य (ओखलीक प्रोक्षण), वा आप्य (दूध दुहब) नहि अछि। कर्म केवल वैराग्य आ बुद्धिशुद्धिक "दूरस्थ सहायक" अछि। एहि सूत्रक वास्तविक शक्ति कर्म–ज्ञान सम्बन्धक विमर्शमे अछि। पूर्वमीमांसक आग्रह—धर्मजिज्ञासाक बादे ब्रह्मजिज्ञासा—केँ कठोर अनिवार्यता रूपमे अस्वीकार कएल जाइत अछि। मुदा कर्मकेँ सर्वथा निरर्थक नहि कहल गेल अछि। पुस्तक मूल पाठमे विभिन्न मत सुरक्षित रखैत अछि: कर्म अन्तःकरणक मल हटबैत अछि; साधककेँ शुद्ध करैत अछि; तीन ऋण चुकाबैत अछि; वा ब्रह्मभावनाक सहायक होइत अछि। श्रवण, मनन आ निदिध्यासनक क्रम एहि चर्चा बीच विकसित होइत अछि। एतय अनुवादक विशेष सफलता ई अछि जे अत्यन्त तकनीकी मीमांसक तर्कक बीच लौकिक उदाहरण पाठककेँ थाकय नहि दैत। काँटासहित माछ, भूँसीसहित धान, वन्य पशुक भय, भिखारीक भय, मधुमे मिश्रित विष—ई सभ वैराग्यक तर्कमे केवल सजावट नहि, बल्कि दार्शनिक प्रमाणक उदाहरण बनैत अछि। एतय भामतीक ज्ञानसाधना बहुत सूक्ष्म अछि। श्रवणजन्य वाक्यार्थ मननसँ दृढ़ होइत अछि; निदिध्यासन विपरीत संस्कार हटबैत अछि; अन्तःकरणक ब्रह्माकार वृत्ति उपाधिबद्ध “त्वम्”क वास्तविक “तत्” स्वरूपकेँ प्रकट करैत अछि। मोक्ष उत्पन्न नहि होइत—अज्ञान हटैत अछि। ४.४ द्वितीय सूत्र: 'जन्माद्यस्य यतः' — ब्रह्मक जगत्कारणता तटस्थलक्षणक स्थापना—'ब्रह्मसँ उत्पन्न होएबाक कारण जगत ब्रह्मक लक्षण भऽ सकैत अछि, जहिना विभिन्न देशमे पहुँचब सूर्यक गतिक लक्षण होइत अछि'—एहि सूत्रक केन्द्रीय तर्क अछि। यास्कक छह भावविकार (जायते, अस्ति, वर्धते, विपरिणमते, अपक्षीयते, विनश्यति) क उत्पत्ति-स्थिति-विनाशमे अन्तर्भावसहित निरुक्त-विमर्श, आ जगद्वैचित्र्यसँ सर्वज्ञ-सर्वशक्तिमान् कारणक स्थापना—नियत-व्यवस्थाक अपूर्व दृष्टान्तचतुष्टय (निश्चित देशमे कृष्णमृगक उत्पत्ति, निश्चित कालमे कोइलीक कूजब, वर्षाक आरम्भमे मेघगर्जनसँ बगुलाक गर्भाधान) सहित—अछि। प्रकरणक निर्णायक मोड़ ई अछि जे सूत्र स्वतन्त्र अनुमानक सङ्केत नहि, अपितु भृगु-वरुण-संवादक तैत्तिरीय-श्रुतिक उपन्यास मात्र अछि; अविद्यासहित रस्सीक सर्प-उपादानता दृष्टान्तसँ ब्रह्मक (अविद्यासहितक) उपादान-कारणता सिद्ध कएल गेल अछि, आ वस्तुतन्त्र-पुरुषतन्त्र-भेदक प्रथम उपस्थापन सेहो एतय भेटैत अछि, जे आगाँ चतुर्थ सूत्रक भूमिका बनैत अछि। ब्रह्म निमित्त-कारण मात्र नहि; अविद्यासहित ब्रह्म उपादान-कारणो। रस्सी–सर्पक उदाहरण एहि कठिन अद्वैत कारणवादकेँ संक्षिप्त दृश्य रूप दैत अछि। ४.५ तृतीय सूत्र: 'शास्त्रयोनित्वात्' — ब्रह्म आ शास्त्रक द्विमुख सम्बन्ध दुइ शास्त्रसम्मत व्याख्या क्रमशः देल गेल अछि: (क) 'शास्त्रक कारण ब्रह्म'—असङ्ख्य विद्यास्थानसँ परिपूरित शास्त्र-समूहक योनि ब्रह्म छथि, पाणिनि-व्याकरणक दृष्टान्तसँ 'रचयिता ओहि शास्त्रक विषयसँ बेसी व्यापक ज्ञान रखैत छथि' ई व्याप्ति स्थापित कएल गेल; (ख) 'ब्रह्मक प्रमाण शास्त्र'—ब्रह्म केवल शास्त्रसँ ज्ञात होइत छथि, स्वतन्त्र अनुमानसँ नहि। एहि प्रसंगमे वेद-नित्यता-विमर्श विशेष मूल्यवान अछि—वर्ण-नित्यतावादी मीमांसकक क्रमविशिष्ट शब्द-वाक्यक अनित्यता स्वीकार करैक बाध्यता, नृत्य-शिक्षक-शिष्यक दृष्टान्तसँ वेद-पाठ-क्रमक अनुवर्तनक व्याख्या, आ जैमिनीय-व्यासमतक समन्वय। 'कोनो सृष्टिमे ब्रह्महत्या पुण्यक कारण नहि बनैत, नहि अश्वमेध पापक; जहिना अग्नि कखनो भिजबैत नहि, जल कखनो जरबैत नहि'—नियत-स्वभाववादक ई सूक्ष्म प्रतिपादन सम्पूर्ण वेद-प्रामाण्य-मीमांसा केँ मैथिलीमे पहिल बेर एहि गहराइसँ उपलब्ध करबैत अछि। ४.६ चतुर्थ सूत्र: 'तत्तु समन्वयात्' — वेदान्त-वाक्यक फलवत्ता, वस्तुतन्त्र ज्ञान, मोक्षक नित्यता आ जीवन्मुक्ति समन्वयाधिकरण ग्रन्थक सभसँ विशाल आ शास्त्रार्थ-सघन अंश अछि, जे सम्पूर्ण अनुवादक लगभग एक-तिहाइ भाग घेरैत अछि। पूर्वपक्ष मीमांसक-सिद्धान्तपर ठाढ़ अछि: 'शास्त्रक प्रयोजन कर्मक शिक्षा अछि'; वेदान्तवाक्य या तँ विधि-शेष, या ध्यानादि-कर्मक विधायक, या 'अमरत्व चाहनिहार लेल ब्रह्मोपासनाक विधान' (प्रतिपत्तिविधि-वाद) मानल जाय। 'तत्त्वमसि सुनलाक बादो संसारधर्म—सुख, दुःख, भय आदि—पहिनेक जकाँ बनल रहैत अछि' ई अनुभव-मूलक आक्षेप सेहो पूर्वपक्षक भाग अछि। सिद्धान्त-पक्ष 'समस्त वेदान्त-वाक्य एकहि तात्पर्यसँ ब्रह्ममे समन्वित होइत अछि' ई आधार-वाक्यक पुष्टि 'सदेव सोम्य इदमग्र आसीत्', 'एकमेवाद्वितीयम्' आदि श्रुतिसमूह आ उपक्रमोपसंहारक एकवाक्यतासँ करैत अछि। मोक्षक नित्यताक स्थापनामे चतुर्विध कार्यताक (उत्पाद्य, विकार्य, संस्कार्य, आप्य) क्रमिक खण्डन एहि अधिकरणक मेरुदण्ड अछि—नाविक-नौकाक रमणीय दृष्टान्त (परिवर्तनशील तट-फेन-तरंग छोड़ि तरंगरहित शान्त मध्यभागमे पहुँचब), गुणाधान (लाखक रससँ रंगल जवा फूल) आ दोषापनयन (ईंटक चूर्णसँ घसल दर्पण) क ब्रह्ममे असम्भवता—एहि सभसँ 'ज्ञान बाहेक कर्मक छायो मोक्षमे प्रवेश नहि पबैत अछि' ई निष्कर्ष-वाक्य स्थापित होइत अछि। कूटस्थनित्यता-परिणामिनित्यताक विवेक, भेदाभेदवादक विस्तृत खण्डन ('घट केँ एहिमे बदरी अछि नहि कहल जाइत, आ चैत्र-मैत्र एक आसनपर रहितहुँ चैत्र मैत्र अछि नहि कहल जाइत'), आ 'माटि मात्र सत्य अछि' (वाचारम्भण) श्रुतिसँ कूटस्थपक्षक निर्णय—एहि सभक संग मोक्षक साद्यन्तताक श्रुति-राशि आ वामदेवक 'हम मनु भेलहुँ, हम सूर्य भेलहुँ' उदाहरण अछि। 'ज्ञान वस्तुतन्त्र अछि, पुरुषतन्त्र नहि' ई भाष्यीय सिद्धान्तक व्याख्यामे 'मन वास्तवमे अग्नि अछि' सन आरोपमूलक उपासना (पुरुषतन्त्र) आ प्रसिद्ध अग्निक अग्निबुद्धि (वस्तुतन्त्र) क भेद स्पष्ट कएल गेल अछि। सिद्धवस्तु-वाक्यक फलवत्ताक स्थापनामे भामतीक दुइ अविस्मरणीय स्थल—सुमेरु-वर्णनक अलंकृत गद्य, आ आर्यभाषा नहि जाननिहार द्रविड़क प्रसिद्ध आख्यान (दूतद्वारा 'अहाँक पुत्र जन्मल अछि' कहलापर द्रविड़ द्वारा देवदत्तक रोमांच आ खिलल मुख देखि वाक्यार्थ-ज्ञानक अनुमान)—भाषा-दर्शनक ई युगान्तकारी तर्क मैथिलीमे कथा जकाँ प्रवाहमय अछि। निषेध-मीमांसा (ब्राह्मणकेँ नहि मारबाक चाही—नञ्-पदक अभाव-बोधकता, प्रजापतिव्रतक पर्युदास-व्यवस्था), आ अन्तमे गौण-मिथ्या अहंबुद्धिक विवेक तथा जीवन्मुक्तिक स्थापन (साँपक त्यक्त केंचुली बाँबीपर मृत पड़ल रहबाक श्रुति-दृष्टान्त)—एहि सभसँ ग्रन्थ अपन तार्किक वृत्त पूर्ण करैत अछि। 'हम ब्रह्म छी—एहि ज्ञानमे सभ विधि आ अन्य समस्त प्रमाण समाप्त भऽ जाइत अछि' ई चरम-सिद्धान्तवाक्यसँ, आ प्रथम सूत्रसँ अन्विति साधि (रचना-शिल्पक दृष्टिएँ वृत्त-पूर्ति/ring composition) चतुःसूत्री-भामतीक ई अनुवाद समाप्त होइत अछि। सिद्धवस्तु विषयक वाक्य निरर्थक नहि। “ई रस्सी अछि, साँप नहि” कहला मात्रसँ भ्रमजन्य भय हटि सकैत अछि। तहिना आत्माक संसारित्व मिथ्या बुझला पर ब्रह्मज्ञान स्वयं फलदायी अछि। श्रवण, मनन, निदिध्यासन नूतन मोक्ष उत्पन्न नहि करैत, बल्कि संशय आ विपरीत संस्कार हटबैत अछि। घट–बदरी, चैत्र–मैत्र, सुवर्ण–कुण्डल आदि उदाहरणसँ भेद आ अभेदकेँ एकहि सम्बन्धमे समानरूपेँ वास्तविक मानबाक कठिनाइ देखाओल गेल अछि। दूरसँ सुवर्ण बुझलासँ कुण्डलरूप विशिष्ट वस्तुक ज्ञान नहि होइत—एहिसँ सामान्य द्रव्यज्ञान आ विशेषाकारज्ञानक अन्तर निकलैत अछि। भेद आ अभेद एक-दोसरपर निर्भर होइत तँ परस्पराश्रय-दोष उत्पन्न होइत। “नहि”क अर्थ, पर्युदास, निषेध, निवृत्ति आदिक सूक्ष्म मीमांसा पुस्तकक सभसँ कठिन भाषा-दर्शनात्मक अंशमे अछि। कवच हटलाक बादो बाण नहि लगल तँ जीवन तत्काल समाप्त नहि—एहन दृष्टान्त निवृत्ति आ फलसम्बन्ध बुझबैत अछि। अन्ततः अहंकारक गौण-मिथ्या भेद आ जीवन्मुक्तिक प्रसङ्गमे साँपक त्यक्त केंचुली तथा धन त्यागल मनुष्यक उदाहरण देल गेल अछि। “हम ब्रह्म छी” ज्ञानपर विधि आ प्रमाणक व्यवहारिक प्रयोजन समाप्त होयब चतुःसूत्रीक चरम बिन्दु बनैत अछि। ५. अनुवाद-सिद्धान्त, भाषा-रणनीति, मुहावरा आ पारिभाषिकी-निर्माण अनुवादक भाषा-रणनीति तीन स्तरपर काज करैत अछि। पहिल, पारिभाषिक शुद्धता: अध्यास, अनिर्वचनीय, समानाधिकरण, प्रत्यभिज्ञा, अर्थापत्ति, संयोग-पृथक्त्व, कूटस्थ, उपादान सन शब्द यथावत् राखल गेल अछि, मुदा प्रथम प्रयोगपर मैथिली व्याख्यासहित—एहिसँ मैथिलीमे मीमांसा-न्याय-वेदान्तक पारिभाषिकीक सफल आ स्थायी निर्माण भेल अछि। दोसर, वाक्य-रचनाक मैथिलीकरण: संस्कृतक दीर्घ समास-गुम्फित वाक्यकेँ तोड़ि 'बात ई अछि—', 'मानि लिअ', 'कहल ई जा रहल अछि—', 'एकर उत्तर... दैत छथि' सन सूत्रधार-पदक प्रयोग कएल गेल अछि, जाहिसँ शास्त्रार्थक गति-यति स्पष्ट रहैत अछि। तेसर, देशज मुहावराक विवेकपूर्ण प्रयोग—'अन्हर अन्हरक हाथ पकड़ि प्रत्येक डेगपर खसैत अछि', 'जौक खीर नोनगर नहि अछि', 'हजार शास्त्र मिलियो घट केँ पट नहि बना सकैत अछि'—संस्कृत न्यायोक्तिकेँ मैथिली लोकवाणीमे रूपान्तरित करबाक ई पद्धति अनुवादक सर्वोत्कृष्ट पक्ष अछि। लिंग-वचन-सङ्गति, 'छथि' (आदरार्थ: ब्रह्म, आत्मा, आचार्यक हेतु) आ 'अछि' (सामान्य) क अनुशासित प्रयोग, तथा नुक्ताक सङ्गति (ड़/ढ़ मात्र, विदेह-मानकक अनुरूप) पूरा 491 पृष्ठमे सुसंगत अछि, जे समीक्ष्य संस्करणक सम्पादकीय श्रमक प्रमाण अछि। गजेन्द्र ठाकुरक अनुवाद "अर्थानुगामी किन्तु वाक्-स्वतन्त्र" सिद्धान्तपर आधारित अछि। मूलक तर्क-क्रम, दृष्टान्त-क्रम आ प्रमाण-क्रमसँ तनिकहु विचलन नहि अछि, मुदा वाक्य-विन्यास पूर्णतः मैथिलीक अपन देशज प्रकृतिमे अछि। "हजार कारीगरो घटसँ वस्त्र नहि बना सकैत"। "बाणक दाँतक परीक्षा जकाँ निरर्थक वस्तुमे जिज्ञासा"। सम्पूर्ण समीक्षामे ई बात स्पष्ट रहबाक चाही जे पहिल-दोसर अध्याय चाहे जतबा महत्त्वपूर्ण हो, पुस्तकक स्थायी मूल्य तेसर अध्यायक वास्तविक अनुवाद-पाठपर निर्भर अछि। एहि परिशिष्टमे अध्यास आ ब्रह्मसूत्र १.१.१–१.१.४क चतुःसूत्री-भामती क्रमशः देल अछि। एहि अनुवादक मुख्य गुण अछि—तर्कक क्रम नहि टूटैत अछि। पूर्वपक्षी जतेक लम्बा तर्क करैत अछि, ओकरा कृत्रिम रूपेँ छोट नहि कएल गेल। उदाहरण, आपत्ति, प्रतिउत्तर, पुनःआपत्ति, सूत्र, भाष्यवाक्य, व्याकरणिक विवेचन आ मीमांसक न्याय सभ जगह बनल अछि। फलतः पाठक “वाचस्पति की निष्कर्ष देलनि” मात्र नहि, “ओ निष्कर्ष धरि केना पहुँचलाह” सेहो देखैत अछि। दार्शनिक मैथिली लिखबाक दुइ खतरा रहैत अछि—एक दिस संस्कृतक एतेक बोझ जे मैथिली केवल विभक्ति-मात्र रहि जाए; दोसर दिस एतेक सरलीकरण जे शास्त्रीय भेद विलीन भऽ जाए। एहि अनुवादक श्रेष्ठ अंशमे दुनू संकट टारल गेल अछि। विशेष महत्त्व ई जे देशजता हास्य वा ग्राम्यता नहि बनैत; गंभीर दार्शनिक गद्यक मर्यादा बनल रहैत अछि। “अन्हर अन्हरक हाथ पकड़ि...” जकाँ वाक्य अनवस्था-दोषक अर्थ केतेको संस्कृतपरक परिभाषासँ बेसी तुरन्त स्पष्ट कऽ दैत अछि। एहि अनुवादकेँ “शाब्दिक” वा “स्वच्छन्द”—एहि दू साधारण कोटिमे नहि राखल जा सकैत अछि। एकर पद्धति मूलतः तर्क-निष्ठ अर्थानुवाद अछि। मूलक दार्शनिक क्रम, प्रतिपक्ष, उदाहरण आ प्रमाण राखल जाइत अछि; संस्कृतक वाक्यरचना नहि। एहि कारण अनुवाद मूलपाठक दार्शनिक संरचना प्रति निष्ठावान रहितहुँ मैथिलीमे कृत्रिम नहि सुनाइत। शास्त्रीय पदकेँ पूर्णतः देशज पर्यायसँ बदलि देबाक प्रलोभनसँ बचल गेल अछि। “अध्यास”केँ प्रत्येक बेर “आरोप” कहि देल जाए तँ अवधारणाक शास्त्रीय इतिहास मिटि जाइत; “अनिर्वचनीय”, “प्रत्यभिज्ञा”, “कूटस्थ”, “उपादान” आदिक संग सेहो यही बात। मुदा आसपासक वाक्य मैथिलीमे अर्थ खोलैत अछि। ई पारिभाषिक शब्दनिर्माणक अपेक्षा पारिभाषिक शब्द-स्वीकार आ मैथिली वाक्य-व्याख्याक पद्धति अछि, जे दर्शन-अनुवाद लेल व्यवहारतः सफल अछि। ६. भारतीय साहित्य-सिद्धान्तक आलोकमे समालोचनात्मक मूल्याङ्कन ६.१ रस-सिद्धान्त: शास्त्रार्थमे शान्त रसक अन्तःसलिला भरत-आनन्दवर्धन-अभिनवगुप्तक रस-सिद्धान्त मूलतः काव्य-नाट्यक हेतु प्रवर्तित भेल छल, मुदा शास्त्रीय गद्यमे सेहो एकर प्रयोग असंगत नहि, विशेषतः जखन विषय स्वयं मोक्ष आ चित्तवृत्ति-निरोध सम्बन्धी हो। एहि अनुवादमे आलम्बन-विभाव निर्विशेष ब्रह्म अछि, उद्दीपन-विभाव पूर्वपक्ष-सिद्धान्तक द्वन्द्वात्मक आवाजाही, आ व्यभिचारीभाव तर्क-कौतुक, विस्मय आ (वाचस्पतिक कटाक्षमे) क्षणिक हास्यक स्फुरण अछि। समग्र स्थायीभावक रूपमे शम—जे शान्तरसक स्थायीभाव अछि—समन्वयाधिकरणक अन्तिम जीवन्मुक्ति-वर्णनमे स्पष्ट परिपाक पबैत अछि। अनुवादक एहि रसात्मक अन्तःसूत्रकेँ भंग नहि करैत छथि; बरु मैथिली लोकोक्तिक 'रस' (जौक खीर नोनगर नहि अछि, हजार शास्त्र मिलियो घट केँ पट नहि बना सकैत अछि) शास्त्रार्थक शुष्कतामे सरसताक सिञ्चन करैत अछि, जे भारतीय काव्यशास्त्रक दृष्टिएँ 'माधुर्य' गुणक निकट अछि। ६.२ ध्वनि-सिद्धान्त: पाठ-निष्ठताक व्यंजना-शक्ति आनन्दवर्धनक ध्वनि-सिद्धान्तक अनुसार काव्यक आत्मा वाच्यार्थक पाछाँ छिपल व्यंग्यार्थमे अछि। अनुवादमे अनुवादक कतहु स्पष्टीकरणात्मक टिप्पणी नहि जोड़ैत छथि—भामती-प्रस्थानक विशिष्ट सिद्धान्त (अविद्याक जीवाश्रयत्व, मननजन्य साक्षात्कार) पाठकेँ केवल पाठ-निष्ठ अनुवादसँ स्वतः, ध्वनित रूपमे, भेटैत अछि। ई 'अनुवादकक अदृश्यता'क आदर्श—जकरा पाश्चात्य अनुवाद-सिद्धान्तमे सेहो महत्त्वपूर्ण मानल जाइत अछि (देखू ६.१)—भारतीय ध्वनि-सिद्धान्तक 'वस्तु-ध्वनि' आ 'रसध्वनि'क द्वैत सिद्धान्तसँ मेल खाइत अछि: शब्दार्थ (वाचस्पतिक तर्क-वाक्य) यथावत् रहितहुँ ओकर दार्शनिक अभिप्राय (व्यंग्यार्थ) मैथिली पाठकक हृदयमे स्वतः स्फुरित होइत अछि। ६.३ वक्रोक्ति: वाचस्पतिक कटाक्ष आ अनुवादकक निर्वाह कुन्तकक वक्रोक्ति-सिद्धान्त 'शब्दार्थयोः वैदग्ध्यभंगीभणिति'केँ काव्यत्वक हेतु मानैत अछि। वाचस्पतिक शास्त्रार्थमे उपचार-वक्रता (Nyāyika-खण्डनमे 'अहा! बेचारा ज्ञानक ई केहन महान सौभाग्य अछि जे असत्यक द्वारा सेहो निश्चितता प्राप्त कऽ लैत अछि!' जकाँ व्यंग्यात्मक प्रशंसा-वाक्य) आ वाक्य-वक्रता (प्रौढ़वादक रीतिसँ शंका-समाधान)क प्रचुर प्रयोग अछि। गजेन्द्र ठाकुरक अनुवाद एहि कटाक्ष-कौशलकेँ मैथिलीक अपन व्यंग्य-सामर्थ्यसँ (जे मैथिली लोकोक्ति आ ठट्ठाक परम्परामे सेहो प्रचुर अछि) पूर्णतः मेल खुआ दैत अछि, जे अनुवादकक द्विभाषिक वक्रोक्ति-सम्वेदनशीलताक प्रमाण अछि। ६.४ गुण-रीति: प्रसाद, माधुर्य आ समता वामन-आचार्यक रीति-सिद्धान्त आ दण्डी-भामहक गुण-विमर्शक दृष्टिएँ ई अनुवाद 'प्रसाद' गुणक आदर्श अछि—अर्थ-गाम्भीर्य रहितहुँ शब्द-प्रसन्नता, जाहिसँ जटिलतम शास्त्रार्थ सेहो पाठकक बुद्धिमे बिना अवरोधक प्रवेश करैत अछि। शास्त्रीय गद्यक 'समता' (एकरूप रचना-शैली, कतहु आडम्बर वा शैथिल्य नहि) एकर स्थायी धर्म अछि। 'इजोत', 'अन्हार', 'मुस्की', 'बाछा', 'औँठी', 'केंचुली', 'बाँबी', 'धुँधलका', 'गड़ेरिया', 'भूँसी', 'ओखली', 'जुलाहा', 'कुम्हार' सन देशज शब्दावली माधुर्य-गुणक (कर्णप्रियता, चित्त-द्रवीकरण) संचार करैत अछि, तैयो कतहु ग्राम्यताक अतिरेकसँ गाम्भीर्य खण्डित नहि होइत—ई भरतमुनिक 'अर्थव्यक्ति' आ दण्डीक 'श्लेष-रहित प्रसाद'क सूक्ष्म सन्तुलन अछि। ६.५ औचित्य-सिद्धान्त: क्षेमेन्द्रक कसौटीपर क्षेमेन्द्रक औचित्य-विचार-चर्चाक अनुसार रस, अर्थ, अलंकार, आ शब्द-सभक औचित्य ही काव्यक (आ शास्त्रीय गद्यक) सौष्ठवक निर्णायक अछि। एहि अनुवादमे तीन प्रमुख औचित्य-निर्णय विशेष उल्लेखनीय अछि: (क) श्लोकसभक गद्यानुवाद—दार्शनिक ग्रन्थमे छन्दक बन्धनसँ मुक्त भऽ अर्थ-परिशुद्धता केँ प्राथमिकता देब औचित्यपूर्ण अछि; (ख) पारिभाषिक शब्दक यथावत्-रक्षण (अध्यास, अनिर्वचनीय, समानाधिकरण, प्रत्यभिज्ञा, कूटस्थ, उपादान)—शास्त्रीय अर्थ-सूक्ष्मताक हेतु आवश्यक; (ग) देशज लोकोक्तिक विवेकपूर्ण, न्यून-किन्तु-सटीक प्रयोग—अतिरेक होइत तँ शास्त्रीय गाम्भीर्य खण्डित होइत। तीनू निर्णय वाक्य-पद-वर्ण-स्तरपर औचित्यक कसौटीपर खरा उतरैत अछि। ६.६ नव्य-न्याय-दृष्टिसँ पारिभाषिक परिशुद्धता मिथिलाक अपन नव्य-न्याय-परम्परा (गंगेश उपाध्यायक तत्त्वचिन्तामणि-धारा, जकर पूर्वपीठिका भामतीक ख्याति-विमर्श आ प्रामाण्य-विमर्शमे निहित अछि) क दृष्टिसँ परखने ई अनुवाद विशेष रूपेँ प्रशंसनीय अछि, कारण एहिमे लक्षण-परीक्षा (अतिव्याप्ति, अव्याप्ति, असम्भव)क पद्धति, हेतु-साध्य-व्याप्तिक कठोर क्रम, आ प्रत्येक तर्कस्थल (पूर्वपक्ष → शंका → समाधान → पुनःशंका → सिद्धान्त) क अनुशासित निर्वाह मैथिलीमे संरक्षित अछि। नव्य-न्यायक परिभाषा-निर्माण-कौशल—जाहिमे प्रत्येक पद अपन प्रयोजन सिद्ध करैत अछि, कोनो अतिरिक्त वा न्यून पद नहि—एहि अनुवादक वाक्य-रचनामे प्रतिफलित होइत अछि: प्रत्येक 'बात ई अछि—', 'मानि लिअ', 'कहल ई जा रहल अछि—' सन सूत्रधार-पद ठीक ओतबे स्थानपर अछि जतय तार्किक सन्धिक आवश्यकता अछि, ने बेसी ने कम। ७. पाश्चात्य साहित्य आ अनुवाद-सिद्धान्तक आलोकमे मूल्याङ्कन ७.१ विदेशीकरण आ देशीकरण फ्रीड्रिश श्लायरमाखर (1813) क प्रसिद्ध द्वैध—'या तँ अनुवादक पाठककेँ लेखक लग लऽ जाइत छथि (foreignizing), या लेखककेँ पाठक लग लऽ अबैत छथि (domesticating)'—एहि अनुवादपर प्रयुक्त करलापर एकटा सूक्ष्म संकरता (hybridity) उजागर होइत अछि। तर्क-संरचना, दृष्टान्त-क्रम, प्रमाण-क्रम आ पारिभाषिक शब्दावलीक स्तरपर अनुवाद पूर्णतः स्रोत-निष्ठ (foreignizing) अछि—लॉरेन्स वेनुटीक शब्दमे कहल जाय तँ ई 'मूलक विदेशीपनकेँ लक्ष्यभाषामे दृश्यमान राखब' क सिद्धान्तक निर्वाह अछि, जाहिसँ अनुवाद अपनहि एकटा स्वतन्त्र दार्शनिक-पाठ्य रूपमे प्रतिष्ठित होइत अछि, केवल सरलीकृत सारांश नहि। परञ्च अभिव्यक्ति-स्तरपर (वाक्य-विन्यास, मुहावरा, लय) ई पूर्णतः देशीकृत (domesticating) अछि—मैथिली लोकोक्ति आ देशज शब्दावलीक भरपूर प्रयोगसँ। ई दुइ प्रवृत्तिक एकसाथ, बिना परस्पर-विरोधक, उपस्थिति एहि अनुवादक सभसँ पैघ सैद्धान्तिक उपलब्धि मानल जा सकैत अछि—ई सिद्ध करैत अछि जे विदेशीकरण आ देशीकरण अनिवार्यतः परस्पर-विरोधी नहि, अपितु भिन्न-भिन्न स्तरपर (सामग्री बनाम शैली) एकसाथ प्रवर्तित भऽ सकैत छथि। ७.२ नाइडाक औपचारिक आ गतिशील तुल्यता यूजीन नाइडाक 'formal equivalence' (मूलक रूप-संरचना केँ यथासम्भव सुरक्षित राखब) आ 'dynamic equivalence' (लक्ष्यभाषाक पाठकपर मूलक जकाँ प्रभाव उत्पन्न करब) क द्वैध-कसौटीपर ई अनुवाद विशेष अछि, कारण ई दुनूकेँ एकसाथ साधैत अछि—जे नाइडाक मूल सिद्धान्तमे प्रायः या-या (either-or) रूपमे प्रस्तुत होइत अछि। तर्कक्रम आ प्रमाणक्रमक अविचलित निर्वाह औपचारिक तुल्यताक निर्वाह अछि; वाक्य-संरचनाक मैथिलीकरण (दीर्घ समास-गुम्फित संस्कृत-वाक्यक खण्डन कऽ छोट, सम्भाषणात्मक वाक्यसभमे रूपान्तर) गतिशील तुल्यताक निर्वाह अछि, जाहिसँ आधुनिक मैथिली पाठकपर सेहो ओहि प्रकारक बौद्धिक प्रभाव पड़ैत अछि जे संस्कृतज्ञ पाठकपर मूल पाठक पड़ैत छल। ७.३ गाडामरक 'क्षितिज-सम्मेलन' आ बेन्यामिनक 'अनुवादकक कार्य' हान्स-गेओर्ग गाडामरक हर्मेन्यूटिक्स-सिद्धान्तक अनुसार बुझब सदिखन 'क्षितिज-सम्मेलन' (fusion of horizons) अछि—पाठक आ पाठ, दुनूक ऐतिहासिक-सांस्कृतिक क्षितिज एक-दोसरसँ मिलि नव अर्थ उत्पन्न करैत अछि। भामती एतय दोहरा हर्मेन्यूटिक स्तरपर काज करैत अछि: शंकरक अध्यासभाष्य (मूल पाठ), वाचस्पति मिश्रक टीका (नवम शताब्दीक व्याख्या-क्षितिज), आ गजेन्द्र ठाकुरक मैथिली अनुवाद (एकविंश शताब्दीक तेसर क्षितिज)—तीनूक सम्मेलन। अनुवादमे भाष्यांश-उद्धरण आ टीका-गद्यक स्पष्ट विभाजन एहि त्रि-स्तरीय हर्मेन्यूटिक संरचनाकेँ पारदर्शी बनाबैत अछि, जे वाल्टर बेन्यामिनक निबन्ध 'The Task of the Translator' मे प्रस्तावित विचारसँ मेल खाइत अछि—अनुवादकक कार्य मूलकेँ प्रतिस्थापित करब नहि, अपितु मूल आ लक्ष्यभाषा दुनूकेँ एकसाथ, परस्पर-पूरक 'शुद्ध भाषा' (reine Sprache) क अंश रूपमे प्रकट करब अछि। एतय मैथिली संस्कृत-तर्कक 'शुद्ध भाषा'क वाहक बनि रहल अछि, ओकर प्रतिस्पर्धी नहि। ७.४ पाठक-प्रतिक्रिया सिद्धान्त वुल्फगांग ईज़र आ स्टैनली फिशक 'reader-response' सिद्धान्तक दृष्टिएँ, ई अनुवाद पाठककेँ केवल निष्कर्ष नहि, अपितु सम्पूर्ण शास्त्रार्थ-प्रक्रिया (पूर्वपक्ष → शंका → उत्तर → पुनःशंका → समाधान → सिद्धान्त)मे सक्रिय सहभागी बनबैत अछि। 'मानि लिअ' (मानो, संस्कृत 'ननु'क अनुवाद) सन सूत्रधार-पद पाठककेँ पूर्वपक्षक भूमिकामे बेर-बेर आमंत्रित करैत अछि, जाहिसँ ईज़रक 'गैप्स' (पाठ-रिक्ति) भरबाक कार्यमे पाठक स्वयं तार्किक सहभागी बनि जाइत छथि। ई तकनीक शास्त्रार्थ-गद्यकेँ शुष्क सूचना-प्रस्तुतिसँ ऊपर उठा एकटा गतिशील, नाट्य-सदृश बौद्धिक अनुभवमे बदलि दैत अछि। ७.५ नव समीक्षा: निकट-पाठ आ जैविक एकता नव समीक्षाक 'close reading' आ 'organic unity'क कसौटीपर परखने अनुवादक आन्तरिक सामंजस्य विशेष रूपेँ उल्लेखनीय अछि। पारिभाषिक शब्दक (यथा 'अपरोक्ष', 'भेदाग्रह', 'गौण-मिथ्या') एकरूप प्रयोग—जे प्रथम अंश (अध्यास-भाष्य)मे स्थापित होइत अछि, ओ चतुर्थ सूत्र धरि निर्वाहित रहैत अछि—पाठकेँ एकटा जैविक, आत्मनिर्भर इकाई बनबैत अछि, जाहिमे भाग आ समग्रक सम्बन्ध क्लीन्थ ब्रुक्सक 'well-wrought urn'क आदर्शसँ मेल खाइत अछि। रचना-शिल्पक दृष्टिएँ ग्रन्थक अन्तिम पंक्ति (प्रथम सूत्रसँ अन्विति साधि उपसंहार) एकटा स्पष्ट 'ring composition' (वृत्त-पूर्ति) अछि, जे नव-समीक्षकसभद्वारा प्रशंसित संरचनात्मक बन्दिशक (structural closure) उदाहरण अछि। ७.६ तुलनात्मक सैद्धान्तिक सीमाक प्रश्न पुस्तक अपन अनुवादकेँ भारतीय काव्यशास्त्रक प्रसाद-गुण, समता, वक्रोक्ति आ औचित्यसँ परखैत अछि। विशेषतः वाचस्पतिक व्यङ्ग्यात्मक वाक्य, शास्त्रीय पारिभाषिक पदक संरक्षण आ देशज लोकोक्तिक उपयुक्त स्थानक विवेचन सार्थक अछि। पाश्चात्य अनुवादचिन्तनक दृष्टिएँ मूल-निष्ठा आ लक्ष्यभाषा-निष्ठाक सन्तुलन तथा भाष्य आ टीकाक दोहरा स्तरक व्याख्याशास्त्रीय चुनौती चिन्हित कएल गेल अछि। एहि समीक्षात्मक अंशक सीमा ई अछि जे पाश्चात्य सिद्धान्तसभक नाम आ अवधारणा उल्लेखित छथि, मुदा ओकरासँ मूल पाठमे दीर्घ तुलनात्मक संवाद नहि कएल गेल अछि। अतः ई “सैद्धान्तिक संकेत” अधिक अछि, स्वतंत्र तुलनात्मक सिद्धान्त-ग्रन्थ नहि। पुस्तकक लक्ष्य देखैत ई कमी घातक नहि। ८. मैथिली वाङ्मय, विदेह आ संस्थागत परिदृश्य वाचस्पति मिश्र मैथिल छलाह—ई गौरव-वाक्य मैथिलीमे बेर-बेर दोहराओल जाइत अछि, मुदा हुनक ग्रन्थ मैथिलीमे नहि छल। गजेन्द्र ठाकुरक ई अनुवाद ओहि ऐतिहासिक अभावक पूर्ति अछि आ ओहि गौरव केँ पाठ्य-सम्पत्तिमे बदलैत अछि। विदेह ई-पत्रिका (स्थापना २०००, ISSN 2229-547X) आ ओकर ग्रन्थ-शृङ्खलामे शास्त्रीय संस्कृत ग्रन्थक जे मैथिली-सेतु बनि रहल अछि, ताहिमे भामती-सन दर्शन-ग्रन्थक समावेश ई सिद्ध करैत अछि जे मैथिली केवल गीत-कथाक नहि, कठोरतम शास्त्र-विमर्शक सेहो सक्षम वाहिका अछि। गजेन्द्र ठाकुर द्वारा न्याय दर्शनक सर्वोच्च ग्रन्थ गङ्गेश उपाध्यायक 'तत्त्वचिन्तामणि' क मैथिली अनुवाद सेहो प्रकाशित कएल गेल अछि, जे मिथिलाक दार्शनिक धरोहरक पुनरुद्धारक दिशामे एकटा क्रान्तिकारी डेग अछि। साहित्यक क्षेत्रमे सेहो हुनक योगदान अप्रतिम अछि; हुनक वृहत् मैथिली कादम्बरी 'गोहि सभक बीच जलसमाधि' न्याय दर्शन आ समकालीन अपराध-गाथाक एकटा अद्वितीय सम्मिश्रण अछि, जतय 'गोहि देह खाइत अछि, नाम नै' सन रूपकक माध्यमसँ सामाजिक आ दार्शनिक यथार्थकेँ उघाड़ल गेल अछि। मैथिली साहित्यक एहि नवजागरणमे 'साहित्य अकादेमी' जकाँ राष्ट्रिय संस्थासभक सेहो महत्त्वपूर्ण भूमिका अछि। मैथिली भाषाकेँ अष्टम अनुसूचीमे स्थान भेटलाक पश्चात् (९२म संविधान संशोधन, २००३) मैथिली साहित्यकेँ राष्ट्रिय स्तरपर व्यापक मान्यता प्राप्त भेल अछि। साहित्य अकादेमी द्वारा निरन्तर उत्कृष्ट मैथिली रचनासभकेँ पुरस्कृत कएल जा रहल अछि। वर्ष २०२५ क साहित्य अकादेमी पुरस्कार वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. महेन्द्र झा केँ हुनक संस्मरण 'धात्री पात सन गाम' लेल प्रदान कएल गेल, जे ग्रामीण जीवन, सामाजिक संरचना आ मानवीय भावनासभक एकटा जीवन्त दस्तावेज अछि। एहि सँ पूर्व यशोधर झा केँ 'मिथिला वैभव' (दार्शनिक प्रबन्ध) लेल १९६६ मे, आ यात्री (नागार्जुन) केँ 'पत्रहीन नग्न गाछ' लेल १९६८ मे साहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ सम्मानित कएल जा चुकल अछि। मैथिली वाङ्मयक दार्शनिक आ साहित्यिक ग्रन्थसभक संरक्षणमे 'राष्ट्रिय पुस्तकालय (National Library), कोलकाता' आ 'इन्दिरा गान्धी राष्ट्रिय कला केन्द्र (IGNCA)' जकाँ संस्थासभक अवदान सेहो स्मरणीय अछि। राष्ट्रिय पुस्तकालयक स्थापना १९ अम शताब्दीमे 'कलकत्ता पब्लिक लाइब्रेरी' क रूपमे भेल छल आ ई भारतक सभसँ पैघ पुस्तकालय अछि जतय २२ लाखसँ बेसी पोथी आ पाण्डुलिपि संरक्षित अछि। एतय मैथिली भाषा प्रभागमे विद्यापतिक 'कीर्तिलता', 'कीर्तिपताका', 'पुरुष परीक्षा' आ ज्योतिरीश्वर ठाकुरक 'वर्णन रत्नाकर' जकाँ प्राचीन आ दुर्लभ पाण्डुलिपिसभ संरक्षित अछि, जे मैथिली भाषाक मध्यकालीन आ प्राचीन इतिहासक अध्ययनक लेल अपरिहार्य अछि। IGNCA आ एशियाटिक सोसाइटी जकाँ संस्थासभ हजारो पाण्डुलिपिक डिजिटलीकरण कऽ रहल अछि, जाहिमे मैथिली (तिरहुता) लिपिमे रचित दार्शनिक आ तान्त्रिक ग्रन्थसभ सेहो सम्मिलित अछि। ई सम्पूर्ण सास्थानिक आ व्यक्तिगत प्रयास मैथिली भाषाक बौद्धिक क्षितिजकेँ निरन्तर विस्तार दऽ रहल अछि। एहि दावामे वजन अछि, कारण वाचस्पति मिश्र मिथिलाक दार्शनिक इतिहासक केन्द्रीय पुरुष छथि। हुनक मूल ग्रन्थ मैथिली पाठक धरि आनब केवल भाषान्तर नहि, एक प्रकारक बौद्धिक इतिहासक पुनःस्थापन अछि। ९. विस्तृत सन्दर्भग्रन्थ-सूचीक अकादमिक मूल्य चारिम अध्याय मात्र नामक सूची नहि। प्रत्येक खण्डमे ग्रन्थक उपयोगिता सेहो बताओल गेल अछि। पहिने समीक्ष्य मैथिली संस्करण, फेर ब्रह्मसूत्र–शाङ्करभाष्यक आधार-पाठ, भामतीक संस्कृत संस्करण, चतुःसूत्रीकेन्द्रित अनुवाद, टीका–उपटीका, विवरण-प्रस्थान, वाचस्पतिक आन रचना, आधुनिक अध्ययन, अद्वैतक इतिहास–पद्धति–प्रमाणमीमांसा, उपनिषद्–प्रस्थानत्रयी, डिजिटल संग्रह आ दुर्लभ/अनिश्चित ग्रन्थ क्रमशः व्यवस्थित अछि। बालशास्त्रीक बिब्लियोथेका इंडिका संस्करण, जीवनानन्द विद्यासागर संस्करण, ढुण्ढिराज शास्त्रीक काशी संस्करण, संयुक्त भाष्य–भामती–कल्पतरु–परिमल संस्करण आदि देल गेल अछि। आधुनिक अध्ययनो विस्तृत अछि—हसुरकर, सहदेव झा, राजेन्द्र प्रसाद दुबे, रङ्गनाथ, रूदुरमुन, कार्ल पॉटर, हाजिमे नकामुरा, माइकल कोमन्स, इलियट डॉइच, अनन्तानन्द रामबचन, बीना गुप्ता, एण्ड्रू फोर्ट आदि। विशेष प्रशंसनीय पक्ष दुर्लभ ग्रन्थसभक सामने “पूर्ण सत्यापन अपेक्षित” कहबाक सावधानी अछि। आभोग, ऋजुप्रकाशिका, भामती-भावदीपिका, भामती-विवरण, वेदान्तकल्पतरुमञ्जरी, भामती-व्याख्या, भामती-विलास आदिक विषयमे पुस्तक असत्य निश्चितता नहि देखबैत, बल्कि पाण्डुलिपि-सूची आ संस्थागत अभिलेखसँ सत्यापनक सलाह दैत अछि। शोधार्थी लेल सूत्र → शाङ्करभाष्य → भामती → कल्पतरु → परिमल क्रम, संस्करण आ पृष्ठ स्पष्ट करब, पाठभेद मिलान, अनुवाद तुलना करितहुँ मूल संस्कृतकेँ निर्णायक मानब, आ ओसीआर पाठकेँ प्रत्यक्ष उद्धरणक आधार नहि बनायब—ई सभ अत्यन्त उपयोगी शोध-पद्धतिक निर्देश अछि। १०. पुस्तकक अङ्ग्रेजी उत्तरार्ध आ द्विभाषिक संरचना एहि फाइलक एकटा महत्त्वपूर्ण संरचनात्मक विशेषता अवश्य चिन्हित करबाक अछि: मैथिली भाग समाप्त भेलाक बाद पुस्तकमे अङ्ग्रेजी रूपमे फेर प्रकाशकीय पृष्ठ, अनुक्रम, अध्याय १, अध्याय २, पूरा चतुःसूत्री-विषयक पाठ आ सन्दर्भग्रन्थ-सूची आबैत अछि। अङ्ग्रेजी अनुक्रम स्पष्ट रूपेँ ओही चारि अध्यायक समान संरचना देखबैत अछि—दार्शनिक अध्ययन, विस्तृत समीक्षा, “Pure Maithili Translation of Bhamati” नामक परिशिष्टक अङ्ग्रेजी प्रस्तुति, आ विस्तृत bibliography। अङ्ग्रेजी भागमे सेहो भामती–विवरणक तुलनात्मक सारणी, अध्यास, ख्यातिवाद, ब्रह्मजिज्ञासा, समन्वयाधिकरण आदि पुनः पूर्ण रूपेँ प्रस्तुत अछि। अन्तक अङ्ग्रेजी bibliography सेहो आधुनिक भामती-अध्ययन आ अद्वैत-वेदान्तक सन्दर्भसभ दोहरबैत अछि। एहि द्विभाषिक व्यवस्था लाभकारी सेहो अछि—गैर-मैथिली शोधककेँ सामग्री उपलब्ध होइत अछि। मुदा सम्पादकीय दृष्टिसँ एकटा समस्या अछि: पुस्तकक मुख्य परिचय “संस्कृतसँ शुद्ध मैथिली अनुवाद” रूपमे अछि, जखन फाइलक पैघ उत्तरार्ध अङ्ग्रेजी अछि। अतः अगिला संस्करणमे आवरण वा प्रकाशकीय पृष्ठपर “मैथिली मूल अनुवादसहित अङ्ग्रेजी अध्ययन/रूपान्तर” सन स्पष्ट सूचना देल जाए तँ पुस्तकक वास्तविक द्विभाषिक स्वरूप तुरन्त बुझाइत। दोसर बात, मैथिली आ अङ्ग्रेजी भागमे पहिल दू आलोचनात्मक अध्याय तकरीबन समान संरचना दोहरबैत अछि। शोध-सुविधा लेल ई उपयोगी अछि, मुदा मुद्रित ६×९ हार्डबैकमे पुस्तकक आयतन बढ़बैत अछि। यदि द्विभाषिकता प्रकाशकीय लक्ष्य अछि तँ उचित; यदि लक्ष्य मुख्यतः शुद्ध मैथिली संस्करण अछि तँ अङ्ग्रेजी भाग अलग सहायक खण्ड वा अलग संस्करण होयब अधिक स्वाभाविक होइत। ११. सम्पादकीय आ पाठगत परिष्कार 'अपरोक्क्ष' रूप पाठमे सात ठाम, जखन कि शुद्ध 'अपरोक्ष' चारि ठाम आएल अछि—एहि द्वैधक एकरूपीकरण वांछनीय। प्रतिलिप्यधिकार-पंक्तिमे 'प्रीति ठाकर' मुद्रित अछि; अभीष्ट 'प्रीति ठाकुर' बुझना जाइत अछि। रूपान्तरण-त्रयक गणनासूचीमे प्रवाह-सम्बन्धी एकटा लघु योजक-वाक्यक अभाव अछि, जकर पूर्ति सँ पठनीयता आर सहज भऽ सकैत अछि। भावी संस्करणमे पारिभाषिक शब्दक मैथिली-संस्कृत कोश-परिशिष्ट, सूत्र-भाष्य-टीका स्तरक मुद्रण-भेद (भिन्न टंकन-शैली), आ अधिकरण-अनुक्रमणिका जोड़ल जा सकैत अछि, जाहिसँ शोधार्थीक हेतु सन्दर्भ-अन्वेषण आर सुलभ होएत। एहि सभक अतिरिक्त वर्तमान फाइलमे किछु उत्पादनगत चिह्न सेहो देखाइत अछि—कतहु शब्दक बीचक अन्तराल टूटल, कतहु शीर्षकमे अक्षर दोहरायल/विभक्त जकाँ देखाइत अछि, यथा “अनुवा नु द”, “सूत्रसू”, “मूल्या मू ङ्कन”; किछु ठाउँ रोमन पाठ वा URL सेहो विच्छिन्न रूपमे देखाइत अछि। ई सभक किछु अंश दस्तावेज-पाठ निष्कर्षणक दोष हो सकैत अछि, तें मुद्रित पृष्ठपर प्रत्यक्ष सत्यापन बिना सभकेँ मूल DOCXक दोष मानब उचित नहि। मुदा अन्तिम मुद्रणपूर्व दृश्य-पृष्ठ परीक्षणमे एहि प्रकारक स्थान अवश्य जाँचबाक चाही। १२. आलोचनात्मक सीमा आ भावी संस्करणक दिशा कृतिक प्रशंसा करितहुँ किछु सीमा स्पष्ट अछि। पहिल, अध्याय १ आ अध्याय २ मे सामग्रीक पर्याप्त पुनरावृत्ति अछि। दोसर, पुस्तकक भीतर अनुवादक स्वयं समीक्षक सेहो छथि; एहि कारण समीक्षात्मक अध्यायमे प्रशंसात्मक स्वर स्वाभाविक रूपेँ अधिक अछि। बाह्य शास्त्रीय समीक्षकक स्वतंत्र असहमति, विशिष्ट संस्कृत पाठभेद आ अन्य अनुवादसँ पङ्क्ति-दर-पङ्क्ति तुलना जोड़ल जाए तँ भविष्यक संस्करण अकादमिक दृष्टिएँ आर मजबूत होएत। तेसर, भामती–विवरण भेद, आधुनिक अनुवाद-सिद्धान्त आ पाश्चात्य दर्शनक तुलना उपयोगी अछि, मुदा किछु ठाउँ ई व्यापक पृष्ठभूमि मूल चतुःसूत्री पाठसँ आगाँक परम्परागत वर्गीकरणपर निर्भर अछि। तें “मूल पाठमे प्रत्यक्ष”, “उत्तरवर्ती भामती-परम्परामे विकसित”, आ “आधुनिक तुलनात्मक व्याख्या”—एहि तीन स्तरकेँ दृश्य रूपेँ अलग कएल जाए तँ विद्वत् उपयोगिता बढ़त। चारिम, द्विभाषिक फाइलक संरचना आर स्पष्ट चाही। मैथिली भागक बाद अङ्ग्रेजी पुनरावृत्ति हेतुक प्रस्तावना, पृथक् खण्ड-पृष्ठ वा “अङ्ग्रेजी सहायक संस्करण”क उद्घोष रहला पर पाठकीय दिशा अधिक स्पष्ट होयत। १३. उपसंहार आ समग्र साहित्यिक-दर्शनिक निर्णय भामती (चतुःसूत्री)क मूल्य केवल ऐतिहासिक गौरवमे नहि अछि। वास्तविक प्रश्न ई अछि—की मैथिलीमे वाचस्पति मिश्रक जटिल शास्त्रार्थ बिना बौद्धिक क्षति चलि सकैत अछि? एहि पुस्तकक उत्तर अधिकांशतः हाँ अछि। अध्यासमे विषय–विषयी विरोध, भ्रमक सत्ता, आत्माक स्वयंप्रकाशता; पहिल सूत्रमे अधिकार, वैराग्य, कर्म आ ज्ञान; दोसरमे ब्रह्मक कारणता; तेसरमे श्रुति-प्रामाण्य; चारिमे विधिवादक प्रतिरोध, वस्तुतन्त्र ज्ञान, सिद्धवस्तु-वाक्यक फलवत्ता, मोक्षक अनुत्पाद्यता, भेदाभेद-विमर्श आ जीवन्मुक्ति—ई सभ क्रमशः मैथिलीमे दार्शनिक भाषाक परीक्षा लैत अछि। अनुवाद बारम्बार एहि परीक्षामे सफल होइत अछि। एकर साहित्यिक शक्ति एहि बातमे अछि जे तर्कक कठोरता बीच भाषा निर्जीव नहि होइत। “मुस्की”, “इजोत”, “अन्हार”, “भूँसी”, “ओखली”, “केंचुली”, “बाँबी” जकाँ शब्द ब्रह्म, आत्मा, अविद्या, मोक्ष आ प्रमाणक विमर्शक संग सहज रूपेँ रहैत अछि। फलतः दर्शन लोकभाषामे “सरल” नहि बनाओल जाइत, बल्कि लोकभाषा दर्शन धारण करबाक योग्य सिद्ध होइत अछि। सन्दर्भग्रन्थ-सूची एहि अनुवादकेँ एकल साहित्यिक उपलब्धिसँ उठाकऽ शोध-साधन बनबैत अछि; मूल संस्कृत संस्करण, उत्तरवर्ती टीका, आधुनिक अध्ययन, डिजिटल संग्रह आ दुर्लभ ग्रन्थक सत्यापन-पद्धति धरि देब पुस्तकक अकादमिक उपयोगिता बढ़बैत अछि। अतः समग्र रूपेँ ई कृति मैथिली दार्शनिक गद्य, अनुवाद-वाङ्मय आ मिथिलाक बौद्धिक परम्परा—तीनू क्षेत्रमे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ अछि। एकर प्रमुख शक्ति मूल तर्कक अखण्डता, शास्त्रीय पारिभाषिक अनुशासन आ स्वाभाविक मैथिली गद्य अछि; प्रमुख सम्पादकीय आवश्यकता पाठगत सूक्ष्म त्रुटिक एकरूपीकरण, अनावश्यक सम्पादकीय अवशेष हटायब, अध्याय १–२क भूमिका-भेद स्पष्ट करब, सूत्र–भाष्य–टीका दृश्यतः अलग करब, आ मैथिली–अङ्ग्रेजी द्विखण्डक प्रकाशकीय स्वरूप स्पष्ट करब अछि। अन्तिम निर्णयतः, ई केवल भामतीक अनुवाद नहि; ई मैथिलीमे शास्त्रार्थ करबाक एकटा विकसित गद्य-पद्धतिक प्रदर्शन अछि। वाचस्पतिक दर्शन एहिमे केवल मैथिली शब्द पबैत नहि, मैथिली आवाज पबैत अछि। अध्यासभाष्यक सूक्ष्मतम ख्याति-विमर्शसँ लऽ कऽ समन्वयाधिकरणक विराट शास्त्रार्थ धरि—कतहु तर्कक कड़ी टूटल नहि, कतहु भाषाक सांस फूलल नहि। 'जहिना राजपथक पानि गंगाक धारमे पड़ि शुद्ध भऽ जाइत अछि'—वाचस्पतिक ई विनयोक्ति एहि अनुवादपर उनटा कऽ लागू होइत अछि: आचार्यक गंगा-धार आब मिथिलाक राजपथ धरि आबि गेल अछि, आ पथिक-मात्र ओहिमे अवगाहन कऽ सकैत छथि। मैथिली दर्शन-वाङ्मयक हेतु ई ग्रन्थ दीर्घकाल धरि सन्दर्भ-स्तम्भ रहत, आ शेष भामतीक (प्रथमाध्यायक अवशिष्ट अंशसँ चतुर्थाध्याय धरिक) मैथिली-आगमनक प्रतीक्षा एहि संस्करणक पाठक स्वाभाविके करताह। आत्मतत्त्वविवेक : एकीकृत विस्तृत ग्रन्थ-सार आ समालोचनात्मक मूल्याङ्कन दार्शनिक पृष्ठभूमि, भारतीय-पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त, अनुवाद-मीमांसा, भाषिक उपलब्धि आ सम्पादकीय परीक्षण १. भूमिका आ कृतिक समग्र स्वरूप उदयनाचार्यक «आत्मतत्त्वविवेक» — जकरा परम्परामे «बौद्धधिक्कार» वा «बौद्धाधिकार» नामसँ सेहो अभिहित कएल जाइत अछि — न्याय-वैशेषिक दर्शनक ओहि महत्त्वपूर्ण वाद-ग्रन्थसभमेसँ अछि जतय बौद्ध आ नैयायिक शास्त्रार्थ अत्यन्त सघन तार्किक रूप ग्रहण करैत अछि। गजेन्द्र ठाकुरक मैथिली अनुवाद एहि कृतिक दार्शनिक तर्ककेँ मिथिलाक आधुनिक भाषिक क्षेत्रमे उपलब्ध करबैत अछि। विधागत दृष्टिसँ ई पूर्वपक्ष आ उत्तरपक्षक अटूट शृङ्खलापर निर्मित शास्त्रीय गद्य अछि। चारि प्रमुख दार्शनिक मोर्चा क्रमशः क्षणभङ्गवाद, विज्ञानवाद, गुण-गुणी अभेद आ नैरात्म्यवादक परीक्षण करैत आत्मा, ईश्वर, शास्त्रप्रामाण्य आ मोक्ष-विवेचन धरि पहुँचैत अछि; अन्तिम ध्यान-सोपान सर्वदर्शनक क्रमिक साधना-रूप पाठ प्रस्तुत करैत अछि। प्रस्तुत परिवर्धित प्रकाशनक स्वरूप केवल भाषान्तरक नहि, अध्ययन-संस्करणक अछि। एकर भीतर मूल संस्कृत कृतिक मैथिली अनुवाद, दार्शनिक विवेचन, भारतीय आ पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्तक आधारपर आलोचना, अनुवाद-सिद्धान्तपर विमर्श, अनुसन्धानपरक सामग्री, विषयवार टिप्पणीसहित विस्तृत ग्रन्थसूची आ आङ्ग्ल प्रस्तुति समाहित अछि। प्रकाशन-विवरणमे प्रथम संस्करण २००४ आ परिवर्धित संस्करण २०२६ देल अछि। एहि बहुस्तरीय संरचनाक कारण पाठक एक्के जिल्दमे उदयनक दर्शन, ओकर मैथिली भाषिक पुनर्जन्म, आलोचनात्मक व्याख्या आ अनुसन्धान-संसाधन पबैत छथि। ई व्यापकता कृतिक बल अछि; संगहि, मूल परिवर्धित संस्करणमे आलोचनात्मक सामग्रीक किछु आंशिक पुनरावृत्तिक कारण सेहो बनैत अछि। पहिल पृष्ठक आवरण सेहो कृतिक मिथिला-केन्द्रित सांस्कृतिक अभिप्रायकेँ दृश्य रूप दैत अछि—मिथिला-चित्रकला सँ प्रेरित सीमा-विन्यास, सूर्य, पक्षी, पुष्प आ हाथीक लोक-मोटिफ दार्शनिक पोथीकेँ शुष्क अकादमिक ग्रन्थक बदला सांस्कृतिक वस्तु रूपमे प्रस्तुत करैत अछि। संस्कृत जँ एहि ग्रन्थक मूल शास्त्रीय भाषा अछि, तँ मैथिली ओकर भू-सांस्कृतिक परिवेशसँ गहरे जुड़ल भाषा अछि। एहि अर्थमे अनुवाद स्रोत-परम्परा आ आधुनिक मैथिली पाठकक बीच जीवन्त सेतु बनैत अछि। २. ऐतिहासिक आ दार्शनिक पृष्ठभूमि भारतीय दार्शनिक परम्परामे न्याय-वैशेषिक आ बौद्ध दर्शनक मध्य भेल वैचारिक संघर्ष अत्यन्त गहन, सुदीर्घ आ तार्किक उत्कर्षसँ परिपूर्ण रहल अछि। द्वितीय शताब्दी ईसवीमे जखन वात्स्यायन न्यायसूत्रपर अपन भाष्य रचलनि आ ताहिमे नागार्जुन तथा वसुबन्धु जकाँ महान् माध्यमिक आ योगाचार बौद्ध दार्शनिक सभक मतक आलोचना कएलनि, तखने सँ एहि महाविवादक आधारशिला राखल गेल छल। एकर पश्चात् दिङ्नाग, धर्मकीर्ति, शान्तरक्षित आ कमलशील जकाँ बौद्ध तार्किक सभ न्याय-वैशेषिक परम्परापर तीक्ष्ण प्रहार कएलनि, जकर उत्तर उद्योतकर, त्रिलोचन आ वाचस्पति मिश्र जकाँ नैयायिक लोकनि देलनि। मुदा दशम-एकादश शताब्दीक मिथिलामे, करियन गामक माटिपर बैसि, नैयायिक-शिरोमणि उदयनाचार्य द्वारा रचित कालजयी ग्रन्थ 'आत्मतत्त्वविवेक' एहि सहस्राब्दी-व्यापी शास्त्रार्थक अन्तिम आ निर्णायक चरमोत्कर्ष थिक। उदयनाचार्यक एहि ग्रन्थक मुख्य लक्ष्य बौद्ध दर्शनक क्षणिकवाद, विज्ञानवाद, गुण-गुणी अभेद आ नैरात्म्यवादक परीक्षण आ खण्डन करैत न्याय-वैशेषिक सम्मत आत्मा आ ईश्वरक यथार्थताक स्थापना करब अछि। ग्रन्थ न्याय आ वैशेषिक तत्त्वमीमांसाक समन्वित धरातल सेहो तैयार करैत अछि। दशम-एकादश शताब्दीक ई बौद्धिक वातावरण अत्यन्त संघर्षात्मक छल। उदयनाचार्यक एहि तार्किक महासमरमे मुख्य बौद्ध प्रतिपक्षी ज्ञानश्रीमित्र आ हुनकर शिष्य रत्नकीर्ति छलाह। ज्ञानश्रीमित्र विक्रमशिला महाविहारक 'महास्तम्भ' मानल जाइत छलाह आ हुनक 'ज्ञानश्रीमित्रनिबन्धावली' तथा रत्नकीर्तिक 'रत्नकीर्तिनिबन्धावली' मे न्याय-वैशेषिक दर्शनक ज्ञानमीमांसा आ तत्त्वमीमांसाक तीव्र आलोचना कएल गेल छल। 'आत्मतत्त्वविवेक' मे उदयन प्रत्यक्ष रूपेँ ज्ञानश्रीमित्रक नाम लऽ कऽ हुनक मतक खण्डन कएलनि अछि। परवर्ती कालक महान् नैयायिक शङ्कर मिश्र अपन टीका 'कल्पलता' मे एहि बातक पुष्टि करैत छथि जे उदयनक प्रहारक मुख्य लक्ष्य ज्ञानश्रीमित्र छलाह, आ 'कल्पलता' मे ज्ञानश्रीमित्रक उल्लेख अनेक बेर भेल अछि। एहि खण्डन-मण्डनक परम्परामे बौद्ध दार्शनिक सभक तर्क एतेक क्षीण भऽ गेल जे उदयनक परवर्ती कालमे भारतवर्षमे बौद्ध तर्कशास्त्रक पतन सुनिश्चित भऽ गेल। उदयनाचार्यक 'आत्मतत्त्वविवेक' प्राचीन न्याय आ नव्य-न्यायक बीचक एकटा महत्त्वपूर्ण सङ्क्रमण-बिन्दु थिक। हुनक एहि ग्रन्थक तार्किक सूक्ष्मता एतेक गम्भीर छल जे परवर्ती कालमे मिथिला आ बङ्गालक विद्वान् सभ एकरा आधार बनाकऽ नव्य-न्यायक विकास कएलनि। चौदहम शताब्दीमे गङ्गेश उपाध्याय द्वारा 'तत्त्वचिन्तामणि'क रचना भेलाक बाद नव्य-न्यायक जे धारा प्रवाहित भेल, तकर बीजारोपण उदयनक एही ग्रन्थमे भऽ चुकल छल। बादमे पक्षधर मिश्र, शङ्कर मिश्र ('कल्पलता'), रघुनाथ शिरोमणि ('दीधिति'), भगीरथ ठक्कुर आ मथुरानाथ तर्कवागीश जकाँ दिग्गज नैयायिक सभ 'आत्मतत्त्वविवेक' पर गम्भीर टीका सभ लिखि एकर दार्शनिक महत्ताकेँ आओर सुदृढ़ कएलनि। गजेन्द्र ठाकुरक मैथिली अनुवाद एहि समस्त टीका-परम्पराक आलोकमे मूल ग्रन्थक गूढ़ार्थकेँ आधुनिक पाठकक समक्ष प्रस्तुत करैत अछि। अनुसन्धानपरक व्याख्यामे कतिपय स्थलपर ई मजबूत ऐतिहासिक दावा कएल गेल अछि जे उदयनक प्रहारक बाद भारतमे बौद्ध तर्कशास्त्रक आधार निर्णायक रूपेँ क्षीण भऽ गेल। मुदा एकीकृत आलोचनात्मक दृष्टिसँ एहन कथनकेँ सावधानीसँ पढ़ब उचित अछि: बौद्ध धर्म आ बौद्ध दार्शनिक परम्पराक ऐतिहासिक परिवर्तन अनेक सामाजिक, संस्थागत, राजनीतिक आ बौद्धिक कारणक फल छल; एकटा ग्रन्थकेँ एकमात्र कारण मानब जटिल इतिहासकेँ विजय-कथामे संकुचित कऽ सकैत अछि। ३. पोथीक विन्यास, अनुक्रम आ अध्ययन-संस्करणक स्वरूप प्रकाशन-विवरणक बाद देल विस्तृत अनुक्रम पोथीक बौद्धिक मानचित्रक काज करैत अछि। मूल परिवर्धित संस्करणमे साहित्यिक-सांस्कृतिक आलोचना, न्याय-वैशेषिक आ बौद्ध विमर्शपर अनुसन्धानपरक प्रबन्ध, अधिक कठोर पाठालोचनात्मक परीक्षण, तकर बाद मूल ग्रन्थक चारि खण्डक मैथिली अनुवाद व्यवस्थित अछि। अनुक्रम क्षणिकवाद, अपोह, विज्ञानवाद, अवयव-अवयवी, आत्मा, ईश्वर, शास्त्रप्रामाण्य आ मोक्ष धरि सम्पूर्ण तर्कयात्रा पहिनहि सँ देखबैत अछि। एहि विशाल अनुक्रमक उपयोगिता असाधारण अछि। उदयनक वाद-ग्रन्थ स्वभावतः विकल्प, प्रतिविकल्प, आपत्ति, उत्तर, पुनरापत्ति आ निष्कर्षक घन जाल अछि। सम्पादकीय शीर्षकसभ एकरा बोधगम्य बनबैत अछि। मुदा एहिमे एकटा मूलभूत सम्पादकीय प्रश्न रहि जाइत अछि—कोन शीर्षक मूल संस्कृत पाठक अछि आ कोन अनुवादक-संपादक द्वारा जोड़ल गेल? एहि भेदक स्पष्ट चिह्न नहि रहने शोधार्थी अनुवाद आ व्याख्याक सीमा तत्काल नहि पकड़ि सकैत छथि। 'आत्मतत्त्वविवेक' विधाक दृष्टिसँ वाद-ग्रन्थ अछि। मैथिली संस्करणमे मूलक कठिन तर्कक्रमकेँ चारि खण्ड आ ४०५ सँ अधिक विषयसूचक खण्ड-शीर्षकमे बाँटि अध्ययन-सुगम बनाओल गेल अछि। ई शीर्षक पाठककेँ विकल्प, प्रतिविकल्प, आपत्ति, उत्तर आ पुनरापत्तिक घन जालमे दिशा दैत अछि; मुदा शोध-संस्करण लेल मूल शीर्षक आ सम्पादकीय शीर्षकक भेद स्पष्ट चिह्नित होयब आवश्यक अछि। मैथिली मूल-पाठक परिशिष्ट पृष्ठ ७९ सँ स्पष्ट रूपेँ आरम्भ होइत अछि; स्तुतिपद्यक बाद विचारणीय विषय, विरोधी सिद्धान्त आ सार्वत्रिक क्षणिकताक अनुमानक परीक्षण शुरू होइत अछि। ४. विस्तृत ग्रन्थ-सार ४.१ खण्ड १ — क्षणभङ्गवादक खण्डन ४.१.१ मंगलाचरण, विषय-निर्धारण आ अविनाभाव-सिद्धिक प्रश्न ग्रन्थ स्तुतिपरक मंगल-पद्यसँ आरम्भ होइत अछि, जाहिमे उदयन अपन गुरु-परम्परा आ इष्टदेवकेँ नमन करैत आगाँक तर्क-यात्राक भूमिका बान्हैत छथि। विचारणीय विषय स्पष्ट कएल जाइत अछि : न्याय-वैशेषिक मतमे आत्मा नित्य, स्थायी द्रव्य थिक, जखन बौद्ध मत एकर प्रबल विरोध करैत सभ सत्ताकेँ क्षणिक मानैत अछि। सर्वप्रथम बौद्ध पक्ष अपन प्रस्ताव रखैत अछि — सत्ताक क्षणिकत्व एहि अनुमानसँ सिद्ध होइत अछि जे जे किछु सत् अछि, से क्षणिके अछि, कारण सत्ता आ क्षणिकत्वक बीच अविनाभाव (अनिवार्य सहचार) अछि। उदयन एहि अनुमानक मूलमे प्रहार करैत छथि — अविनाभावे असिद्ध अछि, कारण ओकरा सिद्ध करएवला कोनो प्रमाण नहि भेटैत। ४.१.२ अपोहवादक प्रथम खण्डन-शृङ्खला बौद्ध पक्ष अविनाभाव सिद्ध करबाक लेल अपोह-सिद्धान्त (शब्दक अर्थ भिन्न वस्तुक बहिष्करण मात्र थिक) क सहारा लैत अछि। उदयन एकरा कएक कोणसँ खण्डित करैत छथि : एक-दोसराकेँ बहिष्कृत करएवला वस्तु सभक बीच अपोहक भेद कोना सम्भव, अपोह सभमे आंशिक समावेश आ आंशिक बहिष्कार कोना सम्भव, आगन्तुक गुणक भेदसँ अपोहक भेद कोना सिद्ध होयत, आ ज्ञानक भिन्नता मात्रसँ अपोह सभ भिन्न कोना बनि जायत — एहि चारू प्रश्नक उत्तरमे बौद्ध पक्षक हर विकल्प निरस्त होइत अछि। अपोह-विमर्शक व्यवहारिक पक्ष सेहो महत्त्वपूर्ण अछि। जँ ‘गाय’क अर्थ केवल ‘अगाय नहि’ मानल जाए, तँ ‘अगाय’ बुझबाक लेल पहिने ‘गाय’क सकारात्मक परिचय आवश्यक भऽ जाइत अछि, जाहिसँ परस्पराश्रयक दोष उठैत अछि। व्यवहारमे सेहो व्यक्ति जल भरबाक लेल ‘ई अघट नहि अछि’ सोचि प्रवृत्त नहि होइत, बल्कि ‘ई घट अछि’ एहि सकारात्मक ज्ञानपर प्रवृत्त होइत अछि। ४.१.३ सामर्थ्यवाद-विमर्श : कारण-कार्यक अनिवार्य क्रमिकताक तर्क एकर बाद बहस केन्द्रित होइत अछि सामर्थ्य (उत्पादन-योग्यता) क प्रश्नपर। बौद्ध पक्ष तर्क दैत अछि — कारणमे स्थित उत्पादन-सामर्थ्य तीन रूपमे भऽ सकैत अछि, मुदा उदयन एक-एक कऽ तीनू रूपकेँ खण्डित करैत छथि। पहिल रूप स्वतः अस्वीकार्य अछि; दोसर रूपक विस्तृत खण्डन कएल जाइत अछि, जाहिमे नव-नव प्रमाणक प्रस्ताव आ ओकर क्रमशः निराकरण होइत अछि; तेसर रूपक खण्डनक लेल नव हेतुक प्रस्ताव अबैत अछि, से सेहो खण्डित होइत अछि। विलम्ब आ अविलम्ब उत्पादकताक अर्थ स्पष्ट कएल जाइत अछि, आ एहि पूरा विमर्शक निष्कर्षमे उदयन देखबैत छथि जे केवल उत्पादक कारणे सहायक कारणसँ जुड़ैत अछि — एहि मतक तीन सम्भावित रूप आ हुनकासँ निकलएवला व्यङ्ग्यपूर्ण परिणाम (जेना गदहा आ ऊँट सन असम्बद्ध वस्तुओकेँ एकत्र मानय पड़त) देखाओल जाइत अछि। बीजत्व अंकुरत्वकेँ निर्धारित करैत अछि — एहि निष्कर्षक वैकल्पिक प्रमाण आ ओकर अनुमानात्मक रूप प्रस्तुत होइत अछि, आ सहायक कारणसँ युक्त बीज अपन कार्य उत्पन्न करैत अछि — एहि आपत्तिक उत्तर देल जाइत अछि। ४.१.४ विरोध-असंगतिक तर्क : एके वस्तु उत्पादक आ अनुत्पादक दुनू नहि भऽ सकैत आब उदयन एकटा नव आ बलशाली तर्क प्रस्तुत करैत छथि — एके व्यक्तिवस्तु एके समय उत्पादक आ अनुत्पादक दुनू नहि भऽ सकैत, तेँ जँ कोनो कारण-वस्तु सहायक कारणक अनुपस्थितिमे अनुत्पादक अछि आ उपस्थितिमे उत्पादक, तँ ओ वस्तु स्वयं परिवर्तित भऽ गेल, से क्षणिकतावादक विरुद्ध जाइत अछि। विरोधक भिन्न-भिन्न प्रकार आ उदाहरण देल जाइत अछि, आ ओकर पहिल-दोसर रूपक खण्डन होइत अछि। की एके द्रव्यमे अलग-अलग समयमे भिन्न परिमाण रहि सकैत अछि — एहि प्रश्नक विस्तृत विवेचन होइत अछि, आ सामर्थ्य-असामर्थ्यक सहस्थितिपर उठल आपत्ति सभक क्रमशः निराकरण होइत अछि। एहि प्रसङ्गमे अलग-अलग स्थानक प्रत्येक उत्पादन लेल अलग कारण मानबाक विकल्प, आ विरोधी गुणक सहस्थिति सिद्ध करबाक लेल प्रस्तावित अनुमान-युग्म — दुनूक खण्डन विस्तारसँ कएल जाइत अछि। सहायक कारण सभक एकत्रीकरणमे असंगतिक आपत्ति, आ एकत्रीकरणक अव्याप्यवृत्तित्वपर आधारित आपत्ति — ई सभ सेहो एक-एक कऽ निरस्त होइत अछि। ४.१.५ अवास्तविक वस्तु, अभाव आ शब्दार्थ-नियामकताक विमर्श तर्कक धारा आब अवास्तविक (असत्) वस्तुक व्यवहारपर मुड़ैत अछि — खरहाक सींग सन अवास्तविक वस्तुक व्यवहार आत्मविरोधी अछि की नहि, अवास्तविक वस्तुमे गुण आरोपित भऽ सकैत अछि की नहि, आ केवल ज्ञानसँ व्यवहार निर्धारित होइत अछि — एहि मतक समीक्षा आ खण्डन होइत अछि। शब्दार्थक नियामकक निरूपण आ समीक्षा एकटा महत्त्वपूर्ण उप-प्रकरण थिक, जाहिमे संस्कार (वासना) केँ शब्दार्थक नियामक मानयवला मतक खण्डन होइत अछि — ‘खरहाक सींग’ पदक संकेत-सम्बन्ध अवास्तविक वस्तुसँ कोना ज्ञात भऽ सकैत अछि, ई प्रश्न आ ओकर सभटा सम्भावित उत्तर (आन उपाय, व्यक्तिगत संस्कार आदि) क्रमशः खण्डित होइत अछि। एकर बाद निषेध वा अभावक स्वरूपक परीक्षा होइत अछि — वैध ज्ञान बिना अभाव व्यवहारक विषय भऽ सकैत अछि की नहि, सकारात्मक आ नकारात्मक वस्तु परस्पर बहिष्काररूप अछि की नहि — एहि सभ प्रश्नक उत्तरमे वस्तु आ ओकर निषेध दुनूक वैध सिद्धि देखाओल जाइत अछि। ४.१.६ विनाशक अनिवार्यताक तर्क आ ओकर बहुमुखी खण्डन क्षणिकताक समर्थनमे बौद्ध पक्ष एकटा नव तर्क रखैत अछि — विनाश अनिवार्य अछि, तेँ सत्ता क्षणिक अछि। उदयन विनाशक अनिवार्यताक तीन सम्भावित व्याख्या (विनाश आ विनष्ट वस्तुक अभिन्नता, अनस्तित्वक अनिवार्यता, आ अन्तिम व्याख्या) – एक-एककेँ बारी-बारीसँ, प्रत्येकक भीतरक उप-विकल्प सभकेँ सेहो खण्डित करैत छथि। एहि क्रममे विनाश आ प्रतियोगीक सम्बन्धपर कएक आपत्ति-उत्तर होइत अछि, आ अन्तमे बौद्धक अनुमान सभक दोषक व्यवस्थित निरूपण आ तार्किक पुष्टि देल जाइत अछि। एहि खण्डक एकटा निर्णायक मोड़ अबैत अछि जखन उदयन वस्तु सभक स्थायित्वक सकारात्मक प्रमाण प्रस्तुत करैत छथि — ई केवल खण्डन नहि, स्थापनात्मक तर्क थिक, जाहिपर उठल आपत्ति सभक सेहो समाधान देल जाइत अछि। विनाश-विमर्शक सरल दृष्टान्तमे घट दण्डक प्रहारसँ नष्ट होइत अछि। जँ विनाश सर्वथा अहेतुक होइत, तँ ओकर निश्चित समयक अनुभव व्याख्यायित नहि भऽ सकैत। ‘आब घट नष्ट भेल’ सन अनुभव विनाशक समय, कारण आ प्रतियोगी-सापेक्ष स्वरूपक प्रश्नकेँ सामने आनैत अछि। ४.१.७ जाति (सामान्य) क विमर्श आ अपोह-सिद्धान्तक पुनः विस्तृत खण्डन खण्डक अन्तिम आ सभसँ लम्बा भाग जाति (सामान्य-रूप) क वास्तविकतापर केन्द्रित अछि। वस्तु सभक सामान्य रूपक स्वरूपपर विचार होइत अछि, बहिष्कार-ज्ञानक पक्षमे आपत्ति सभक खण्डन होइत अछि, आ बौद्ध आचार्य ज्ञानश्रीक मत — जे बहिष्कार ज्ञानक केवल गौण विषय अछि — ओकर विस्तृत समीक्षा आ खण्डन होइत अछि। सविकल्पक ज्ञानमे वास्तविक सामान्य रूपक प्राकट्यक औचित्य सिद्ध कएल जाइत अछि। अपोह- सिद्धान्तक विभिन्न अनुमान-प्रमाण — हेतुक तेसर आ चारिम परिभाषा, ज्ञानश्रीक अनुमान, आ अपोह-सिद्धान्तक कएकटा प्रतिरक्षा-प्रयास — एक-एककेँ क्रमशः खण्डित कएल जाइत अछि। एहि क्रममे धर्मकीर्तिक मतक विस्तृत समीक्षा आ आलोचना अबैत अछि, जाति-व्यक्ति सम्बन्धक गहन विचार होइत अछि, आ अन्तमे सविकल्पक जातिज्ञानक इन्द्रियजन्यता आ प्रत्यक्षताक समर्थन सहित अपोह-सिद्धान्त स्वीकार करबाक प्रयोजनक खण्डन आ ज्ञानश्रीक मतक अन्तिम आलोचनासँ प्रथम खण्ड समाप्त होइत अछि। ४.२ खण्ड २ — विज्ञानवादक खण्डन (बाह्य वास्तविकताक निषेधक परीक्षा) ४.२.१ वाद-विषयक परिचय आ विज्ञानवादी अनुमानक दोष-निरूपण दोसर खण्ड बौद्ध विज्ञानवाद (चेतनाक बाहर किछु नहि अछि) क परीक्षा करैत अछि। विज्ञानवादी अनुमानक दोष निरूपित कएल जाइत अछि, आ रत्नकीर्ति नामक बौद्ध आचार्यक उत्तरक विस्तृत खण्डन होइत अछि, जाहिमे व्यंग्यात्मक प्रत्युत्तरक शैली सेहो प्रयुक्त अछि। ४.२.२ चित्रज्ञान-विमर्श एहि खण्डक दार्शनिक हृदय-स्थल चित्रज्ञानक (एके ज्ञानमे नील-पीत आदि अनेक रूपक युगपत् प्रतीति) विमर्श थिक। शुद्ध ज्ञान विभेदरहित अछि — एहि आपत्तिक खण्डन होइत अछि; ज्ञानमे असंगत गुणक प्राकट्य भ्रमात्मक अछि — ई आपत्ति सेहो खण्डित होइत अछि; भिन्नता अवास्तविक अछि — एहि मतक प्रतिरक्षा आ खण्डन कएल जाइत अछि। चित्रज्ञान भिन्नो नहि, अभिन्नो नहि — एहि आपत्तिक उत्तर, आ चित्रता समस्त निर्धारणसँ परे अछि — एहि आपत्तिक खण्डन, दुनू विस्तारसँ प्रस्तुत होइत अछि। रत्नकीर्तिक मतक अन्तिम समीक्षा आ खण्डनसँ ई उप-प्रकरण समाप्त होइत अछि। ज्ञान-विषय भेदकेँ ‘हम नील देखैत छी’ सन अनुभवसँ सेहो स्पष्ट कएल जाइत अछि: ‘हम’ ज्ञाता, ज्ञान प्रकाशक, आ नील ज्ञेय विषय अछि। सार्थक प्रवृत्ति बाह्य विषयक दिशामे होइत अछि, जाहिसँ विज्ञानसँ भिन्न ज्ञेयक वास्तविकताक प्रतिरक्षा मजबूत बनैत अछि। ४.२.३ ज्ञान-ज्ञेय सम्बन्धक विमर्श आ विभिन्न दार्शनिक मतक समीक्षा आब प्रश्न होइत अछि — ज्ञानसँ भिन्न वस्तु ओकर विषय होयबामे की दोष अछि? विषयक ज्ञानसँ जातिगत समानताक प्रतिरक्षा होइत अछि, ज्ञेयताक नव-नव परिभाषाक निर्माण आ खण्डन होइत अछि, आ अन्तमे वेदान्तक मतक व्याख्या सेहो प्रस्तुत होइत अछि। एकर बाद न्याय-वैशेषिक मतक ज्ञान-सम्बन्धक प्रतिरक्षा होइत अछि, सांख्य आदि मतक ज्ञान-सम्बन्धक आश्रय-विषयक खण्डन होइत अछि, आ बौद्ध मतक विरोधाभासी स्वभावक व्याख्या दऽ न्यायवाक्यक प्रयोजनपर विमर्श समाप्त होइत अछि। निषेधमुखी अनुमान सभक हेतु सभक आ अनुमानमे देल उदाहरण सभक खण्डनसँ ई उप-खण्ड अपन निष्कर्षपर पहुँचैत अछि। ४.२.४ अवयवी द्रव्यक वास्तविकता : परमाणुवाद-विमर्श खण्डक सभसँ विस्तृत आ तार्किक दृष्टिसँ सघन भाग अवयवी वस्तु (सम्पूर्ण, जेना घट) क वास्तविकताक स्थापना अछि, जकरा बौद्ध पक्ष केवल परमाणु-समूह मानि अवयवीक पृथक् वास्तविकता नकारैत अछि। भेदक वास्तविकतापर आपत्ति, आ भेदक विभिन्न मत (पहिल, दोसर, तेसर) क क्रमशः रक्षा होइत अछि। सातम आ आठम प्रतिज्ञाक रक्षा तथा आंशिक स्वीकृति होइत अछि, आ एकर बाद अवयवी वस्तुक वास्तविकतापर एकटासँ बेसी क्रमिक आपत्ति (पहिल, दोसर, तेसर आ अन्य) आ हुनकर खण्डन होइत अछि — ई खण्डन-क्रम कएकटा उप-चक्रमे बारम्बार आगू बढ़ैत अछि, जाहिमे परमाणुक निषेधपर आधारित नव-नव आपत्ति, माध्यमिक (शून्यवादी) मतक खण्डन, स्थूलताक ज्ञान मिथ्या अछि — एहि आपत्तिक खण्डन, परमाणु सभमे एकत्व-ज्ञानक प्रतिरक्षा आ खण्डन, अदृश्य परमाणु प्रत्यक्ष नहि भऽ सकैत — एहि विषयक खण्डन, आ स्थूलताए इन्द्रियग्राह्यताक निर्धारक अछि — एहि खण्डनक विस्तार सामिल अछि। एहि पूरा उप-खण्डक निष्कर्ष ई अछि जे बाह्य, अवयवी वस्तुक वास्तविकतापर उठल कोनो आपत्ति नहि टिकैत अछि, आ प्रसङ्ग-विपर्ययरूप शर्तयुक्त तर्कक खण्डन आ अवयवी वस्तुक अनुमानात्मक प्रमाणक माँगक खण्डनसँ ई प्रकरण समाप्त होइत अछि। अवयवी-विमर्शमे स्थूल दृश्य वस्तुक प्रश्न निर्णायक बनैत अछि। जँ घट केवल अदृश्य परमाणुसभक समूह होइत, तँ अनेक अदृश्य अंशक मात्र समष्टि दृश्य स्थूलताकेँ कोना जन्म देत? न्याय-पक्ष स्थूलताकेँ अवयव-संयोगसँ उत्पन्न नव अवयवी धर्मक रूपमे व्याख्यायित करैत अछि। ४.२.५ बाह्यार्थ-वादपर सामान्य आपत्ति आ स्वप्रामाण्यक विमर्श आब बाह्य वस्तुक वास्तविकतापर एकटा सामान्य आपत्ति आ ओकर खण्डन अबैत अछि, आ ताहि पछाति सविकल्पक मिथ्याज्ञानक सम्भावनाक समर्थन, भिन्नताक अज्ञानक वैकल्पिक व्याख्या आ ओकर निराकरण होइत अछि। ‘सभ ज्ञान मिथ्या अछि’ — एहि चरम विकल्पक खण्डनक बाद खण्ड ज्ञानक स्वप्रामाण्यक (ज्ञान स्वयं अपन प्रामाण्यक ज्ञापक अछि, कोनो बाहरी प्रमाणक आवश्यकता नहि) दिस मुड़ैत अछि। ई प्रतिरक्षा कएल जाइत अछि, ताहिपर दू क्रमिक आपत्ति आ हुनकर खण्डन होइत अछि। यथार्थता परामर्शज्ञान (द्वितीयक, प्रतिवेदनात्मक ज्ञान) द्वारा ज्ञात होइत अछि — एहि प्रतिस्पर्धी मतक विस्तृत खण्डन होइत अछि, जाहिमे परामर्शज्ञानमे सत्य-असत्यक द्वैत किएक नहि रहैत अछि – एहि प्रश्नक उत्तरो सामिल अछि। अन्तमे जागरण आ स्वप्नक भेदक स्पष्टीकरणसँ खण्ड २ अपन अन्तिम निष्कर्षपर पहुँचि समाप्त होइत अछि। ४.३ खण्ड ३ — गुण आ द्रव्यरूप आश्रयक भेदपर वाद-विवाद ई सभसँ छोट खण्ड अछि, मुदा तर्क-सघनतामे न्यून नहि। बौद्ध पक्षक चुनौती ई अछि – जँ गुण (रंग, स्पर्श आदि) आ हुनकर आश्रय (द्रव्य) परस्पर अभिन्न मानल जाय, तँ आत्मा-सन द्रव्यक स्वतन्त्र अस्तित्वे नहि रहत, केवल क्षणजीवी ज्ञान शेष रहत। उदयन देखब-छूबबसँ एके वस्तुक पुनःपहचानक प्रमाण दैत पाँचटा सम्भावित विकल्प (एकल गुण, गुण-समूह, गुण-भिन्न वस्तु, अवास्तविक रूप, आ सर्वथा अविद्यमान वस्तु) प्रस्तुत करैत क्रमशः खण्डित करैत छथि। गुण-समूहक चारि सम्भावित आधार — समान आश्रय, समकालिकता, एके फल, आ एके कारण — चारू खण्डित होइत अछि, आ तेसर विकल्प (द्रव्ये गुणक आश्रय अछि) स्वीकृत होइत अछि। एकर बाद गुण आ आश्रयक अभेदक पक्षमे प्रस्तुत प्रमाण सभ (उज्जर शङ्ख पित्तदोषसँ पियर देखाइत अछि — एहि दृष्टान्तक सहारेँ) विस्तारसँ खण्डित होइत अछि, आ दूर-निकटसँ देखलापर वस्तुक स्पष्ट-धुँधल प्रतीतिक व्याख्याक माध्यमसँ द्रव्य आ गुणक भेद पुष्ट कएल जाइत अछि। खण्डक अन्त निर्विकल्पक आ सविकल्पक ज्ञानक सम्बन्धक सूक्ष्म प्रश्नमे विलीन होइत अछि, जे अगिला खण्डक भूमिका बान्हैत अछि। ४.४ खण्ड ४ — नैरात्म्यवादक खण्डन, आत्मसिद्धि, ईश्वरसिद्धि आ मोक्ष-विवेचन ४.४.१ ‘आत्मा ज्ञात नहि होइत अछि’ — एहि प्रमाणक खण्डन अन्तिम आ सभसँ विस्तृत खण्ड बौद्धक अन्तिम आ केन्द्रीय दावासँ आरम्भ होइत अछि — आत्मा ज्ञात नहि होइत, तेँ आत्मा नहि अछि। उदयन एहि अनुमानकेँ स्वतन्त्र (बौद्धक अपन मान्यतापर आधारित) कहि, ओकर हेतु (अज्ञातता) क आत्मश्रयी दोष देखबैत छथि — न्याय-वैशेषिक दर्शन तँ आत्माकेँ ज्ञेय आ प्रत्यक्षगम्य मानिते अछि, तेँ ई अनुमान बौद्धक अपन मान्यताक विरुद्ध अपने ढहि जाइत अछि। ४.४.२ आत्मज्ञानक प्रमाण आ ओकर प्रतिरक्षा आत्माक वास्तविकताक प्रमाण प्रस्तुत होइत अछि, आ ओकर प्रतिरक्षा होइत अछि। बाहरी इन्द्रियसँ आत्मा ज्ञात नहि होयबाक कारण ओकरा अवास्तविक मानब — ई आपत्ति खण्डित होइत अछि (जँ एना मानल जाय तँ चेतनाक स्वसंवेदनो निराधार भऽ जायत)। आत्मज्ञानक विषय शरीर भऽ सकैत अछि — ई आपत्ति सेहो खण्डित होइत अछि, आ ‘चेतनाए आत्मा अछि’ — एहि योगाचार-बौद्ध मतक विस्तृत खण्डन होइत अछि, जाहिमे ‘हम काटैत छी’ आ ‘हम जानैत छी’ — एहि दुनू क्रिया-प्रयोगक समान्तर तर्कसँ कर्ता (आत्मा) आ क्रिया (चेतना) क भेद सिद्ध कएल जाइत अछि। चतुर्थ खण्डक आत्मसिद्धि ‘हम छी’क प्रत्यक्ष बोध धरि पहुँचैत अछि। एहि बोधकेँ न केवल शब्दजन्य, न अनुमानजन्य, न स्मृतिमात्र मानल गेल अछि; ई आत्माक प्रत्यक्ष उपलब्धिक पक्षकेँ रेखांकित करैत अछि। ४.४.३ प्रत्यभिज्ञाक अनुमान : आत्माक एकत्वक प्रमाण आत्माक अस्तित्व सिद्ध करएवला मुख्य अनुमान प्रत्यभिज्ञा (देखब आ छूबब जकाँ भिन्न अनुभव सभक माध्यमसँ एके वस्तुक पुनःपहचान) थिक। एकर वैधतापर उठल आपत्ति (जेना जलैत दीपशिखाक भ्रामक एकत्व-प्रत्यभिज्ञाक उदाहरण) क विस्तृत उत्तर देल जाइत अछि। उपादान-कारण-कार्य सम्बन्धक परिभाषापर लम्बा बहस होइत अछि — शिक्षक-शिष्यक ज्ञान, नवजात शिशुक पूर्वजन्मक स्मृति, घट-ठीकराक कारण-कार्य सम्बन्ध, आ काठ-कोइलाक रूपान्तरण — एहि सभ दृष्टान्तक माध्यमसँ क्षणिकतावादी मतमे वास्तविक उपादान-कारणता असम्भव सिद्ध कएल जाइत अछि, जखन नित्य आत्माक सिद्धान्तमे ई सहजहि सिद्ध होइत अछि। कर्ताक एकत्वक प्रमाणक विस्तार, आ प्रसङ्ग-विपर्ययक सहारे एहि निष्कर्षक समर्थनसँ ई खण्ड आगू बढ़ैत अछि। स्मृति आ प्रत्यभिज्ञाक तर्क नैतिक निरन्तरतासँ सेहो जुड़ैत अछि। जँ कर्मक कर्ता आ फलभोगी पूर्णतः भिन्न क्षणिक सत्ता होथि, तँ कृतप्रणाश — अपन कएल कर्मक फल नहि भेटब — आ अकृताभ्यागम — नहि कएल कर्मक फल भेटब — क दोष उठैत अछि। एहि कारण आत्माक प्रश्न केवल तत्त्वमीमांसाक नहि, नैतिक उत्तरदायित्वक प्रश्न सेहो बनैत अछि। ४.४.४ आत्मज्ञानक आवश्यकता आ आत्मा-अनात्माक विवेकपूर्ण ज्ञानक प्रमाण आत्मज्ञानक आवश्यकतापर दूटा क्रमिक आपत्ति आ हुनकर खण्डनक बाद, उदयन आत्मा आ अनात्माक विवेकपूर्ण ज्ञानक प्रमाण देल शास्त्रीय प्रमाणक ओर मुड़ैत छथि। एहि मतक शास्त्रीय समर्थन देल जाइत अछि, आ ई शास्त्रक प्रामाण्यक प्रमाणक भूमिका बनि जाइत अछि — जे आगाँ ईश्वरसिद्धिक तर्कसँ जुड़ैत अछि। ४.४.५ ईश्वरसिद्धि : सृष्टिकर्ताक अनुमानात्मक प्रमाण एहि खण्डक दार्शनिक रूपेँ सभसँ महत्त्वाकांक्षी भाग ईश्वरसिद्धि थिक। ईश्वरसिद्धिक अनुमानपर तीनटा क्रमिक आपत्ति आ हुनकर खण्डन होइत अछि, आ अविनाभावक ज्ञान असम्भव अछि — एहि मौलिक आपत्तिक विस्तृत उत्तर देल जाइत अछि। शरीरधारी कर्तासँ सृष्टिकेँ उपाधि (सीमित शर्त) मानि ईश्वरक अस्तित्व नकारबाक तर्कक खण्डन कएल जाइत अछि, आ अविनाभावपर दोसर आ तेसर आपत्तिक खण्डन सेहो होइत अछि। अनुमान लेल आवश्यक अविनाभावक स्वरूप स्पष्ट कएल जाइत अछि, आ एकर बाद ‘ईश्वर सर्वज्ञ नहि छथि’ — एहि मतक खण्डन, शास्त्रक प्रामाणिकताक सिद्धि, आ ईश्वरक सर्वज्ञताक प्रमाण — ई त्रयी क्रमशः प्रस्तुत होइत अछि। ‘महानता’ शब्दक अर्थपर सूक्ष्म विमर्श, आ शास्त्रीय प्रमाणिकता अनादि परम्परासँ समर्थित — एहि निष्कर्षसँ ईश्वरसिद्धिक प्रकरण समाप्त होइत अछि। ईश्वरसिद्धिक प्रसिद्ध अनुमान ‘क्षित्यादिकं सकर्तृकं कार्यत्वात् घटवत्’क आशय ई जे पृथ्वी आदि कार्य अछि, अतः ओकर कर्ताक प्रश्न उठैत अछि, जेना घटक कर्ता कुम्हार। शरीरधारिता कर्तृत्वक अनिवार्य शर्त अछि की नहि, ज्ञान-इच्छा-प्रयत्नक भूमिका, सर्वज्ञता, अविनाभाव आ उपाधिक प्रश्न—ई सभ एहि प्रकरणकेँ साधारण ‘घट-कुम्हार’ उदाहरणसँ बहुत अधिक जटिल बनबैत अछि। शास्त्रप्रामाण्यक विवेचनमे चिकित्साशास्त्रक दृष्टान्तद्वारा विश्वसनीय वक्ता, सफल व्यवहार आ प्रमाणिक वचनक सम्बन्ध खोलल गेल अछि। न्याय-वैशेषिकक ईश्वर-प्रणीत शास्त्र-दृष्टि एतय मीमांसक अपौरुषेयता सँ भिन्न रूपमे उभरैत अछि। ४.४.६ मोक्षक स्वरूपक विस्तृत विवेचन ग्रन्थक दार्शनिक आ साहित्यिक दुनू दृष्टिसँ सभसँ मार्मिक भाग मोक्षक स्वरूपक विवेचन थिक। मोक्ष — आत्माक स्वरूपसँ दुःखक आत्यन्तिक निवृत्ति — क परिभाषा देल जाइत अछि, आ दुःखनिवृत्ति सुख प्राप्त करबाक लेल चाहल जाइत अछि की नहि, ई सूक्ष्म प्रश्न उठाओल जाइत अछि। उदयन एतय सुख आ दुःखक अनुपातपर एकटा गहन जीवन-दर्शन प्रस्तुत करैत छथि — ‘दुःख सदा सुखक साधनसँ युक्त नहि, मुदा सुख प्रायः दुःखक साधनसँ घेरल रहैत अछि’; धर्मसम्मत ढंगसँ अर्जित वस्तुमे सुखक अल्प चिनगी रहैत अछि, जखन ओकरा अर्जित करय आ सुरक्षित रखयमे दुःखक अनगिन वर्षा-दिन। मधु-विष-मिश्रित भोजनक रूपक, आ भूसीसँ अन्न अलग करबाक कृषक-बिम्बसँ ई तर्क पुष्ट होइत अछि। एकर बाद ‘सुख नित्य अछि’ — एहि मतक विस्तृत खण्डन होइत अछि, आ ज्ञान आ सुखक नित्यता-अनित्यताक सूक्ष्म विश्लेषणसँ मोक्षक स्वरूप अन्ततः आत्माक स्वस्वरूप-स्थितिक रूपमे स्थापित होइत अछि। न्याय-वैशेषिक परम्परामे अपवर्ग दुःखक आत्यन्तिक निवृत्ति थिक; तुलनात्मक सारणीमे एकरा एकाइस प्रकारक दुःखक पूर्ण निवृत्तिक रूपमे सेहो संकेत कएल गेल अछि। सुखक अनुभूति शरीर-मन-इन्द्रिय-संयोगपर निर्भर मानल गेल कारण मोक्षकेँ नित्य सकारात्मक सुखक अनुभूति मानबाक बदला दुःखनिवृत्ति आ आत्माक स्वस्वरूप-स्थिति रूपमे स्थापित कएल जाइत अछि। ४.४.७ ध्यान-सोपान : सर्वदर्शन-समन्वयक विलक्षण उपसंहार ग्रन्थक उपसंहार भारतीय दर्शनक इतिहासमे अपन कोटिक अनूठा अछि। उदयन आत्मध्यानक क्रमिक अवस्था सभक वर्णन करैत सम्पूर्ण भारतीय दर्शन-परम्पराकेँ एकटा एकल साधना-यात्राक सोपानक रूपमे प्रस्तुत करैत छथि : पहिल अवस्थामे बाह्य वस्तुक अध्ययन (मीमांसा, चार्वाक), दोसरमे आत्माकेँ सभ वस्तुसँ अभिन्न मानब (त्रिदण्डी मत, योगाचार बौद्ध), तेसरमे आत्माकेँ समस्त वास्तविकताक बहिष्काररूपेँ ध्यान करब (ब्रह्म-परिणामवाद, बौद्धक शून्यता-नैरात्म्य), चारिममे आत्माकेँ जगत्सँ भिन्न मानब (सांख्य), पाँचममे आत्माकेँ एकमात्र वास्तविकता मानब (अद्वैत), आ अन्तमे सभ संस्कार मिटला पछातिक शुद्ध आत्माक निर्विकल्पक ज्ञान — जकरा न्याय-दर्शन मोक्षनगरक शिखरशिला कहैत अछि। प्रत्येक अवस्थाक समर्थनमे आ खण्डनमे उपनिषद्क वचन उद्धृत होइत अछि, जाहिसँ ई सोपान चार्वाकसँ अद्वैत धरि प्रत्येक दर्शनकेँ सत्यक एक-एक आंशिक झलकक रूपमे सम्मान दैत, अन्ततः न्याय-दर्शनक निर्विकल्पक आत्मज्ञानपर स्थिर होइत अछि। ४.४.८ समापन-पद्य ग्रन्थ एकटा तीक्ष्ण, आत्मविश्वासपूर्ण समापन-पद्यसँ बन्द होइत अछि — उदयन अपनाकेँ अनेक परमतक अन्हारमे भटकल लोकक मार्गदर्शक कहैत छथि, आ अन्हराक झुंड द्वारा चित्रक प्रशंसासँ चित्रकारक गौरव नहि बढ़बाक व्यंग्यपूर्ण उपमाद्वारा अयोग्य प्रशंसाकेँ अस्वीकार करैत, ज्ञानी लोक द्वारा देखाओल भूलपर प्रसन्न होयबाक शास्त्रार्थी विनम्रताक संग ग्रन्थकेँ समर्पित करैत छथि। ५. कृतिक दार्शनिक एकता आ तर्क-कथानक चारू खण्ड अलग विवाद नहि। हुनकर भीतर क्रमिक दार्शनिक योजना अछि। क्षणिकवाद स्थायित्वकेँ चुनौती दैत अछि। अपोह सकारात्मक सामान्य आ भाषिक यथार्थकेँ चुनौती दैत अछि। विज्ञानवाद बाह्य ज्ञेयकेँ चुनौती दैत अछि। गुण-समष्टिवाद द्रव्यकेँ चुनौती दैत अछि। नैरात्म्यवाद स्थायी ज्ञाताकेँ चुनौती दैत अछि। उदयन प्रत्येक स्तरपर पहिने ओ सत्ता बचबैत छथि जकरा बिना अगिला स्तरक प्रश्न उठिए नहि सकैत। वस्तु टिकत तखन कारणता सम्भव। बाह्य ज्ञेय रहत तखन ज्ञान-विषय सम्बन्ध अर्थपूर्ण। द्रव्य रहत तखन गुणक आश्रय सम्भव। कालगत आत्मा रहत तखन स्मृति, कर्म आ मोक्ष सम्भव। ईश्वर आ शास्त्र तकर बाद व्यापक विश्व-व्यवस्था आ मोक्षमार्गक आधार बनैत अछि। एहि कारण “आत्मतत्त्वविवेक”क शीर्षक केवल चतुर्थ खण्डक संकेत नहि; सम्पूर्ण पूर्ववर्ती तर्क आत्म-विवेकक भूमि तैयार करैत अछि। ग्रन्थक संरचनाकेँ “प्रतिज्ञा → आपत्ति → प्रश्न → विकल्प → खण्डन → दृष्टान्त → निष्कर्ष”क आवर्त रूपमे पढ़ल जा सकैत अछि। वास्तविक कथानक घटना-प्रधान नहि, तर्कक क्रमिक शुद्धीकरण अछि। क्षणिक वस्तुसँ स्थायी वस्तु, विज्ञानसँ बाह्य ज्ञेय, गुणसभसँ द्रव्य, क्षणिक चेतना-सन्तानसँ आत्मा, आत्मासँ ईश्वर आ अन्ततः मोक्ष—ई आरोह एक अखण्ड बौद्धिक कथानक बनबैत अछि। ६. भारतीय साहित्य-सिद्धान्तक आलोकमे समालोचना कृति मूलतः काव्य नहि, तथापि संवाद, व्यङ्ग्य, दृष्टान्त, रूपक, प्रश्नोत्तर आ मोक्षाभिमुख अन्तर्ध्वनिक कारण एकर साहित्यिक परीक्षण पूर्णतः सार्थक अछि। उदयनक तर्क-विन्यास “ज्ञान-नाटक” सन अनुभव उत्पन्न करैत अछि: प्रतिज्ञा, आपत्ति, प्रतिप्रश्न, विकल्प, खण्डन आ निष्कर्षक आवृत्त लय नाटकीय तनाव बनबैत अछि। ६.१ रस-विमर्श आचार्य अभिनवगुप्तक अनुसार शान्त रस सभ रसक प्रकृति (मूल आधार) थिक, कारण ओ मोक्षपुरुषार्थसँ जुड़ल अछि। «आत्मतत्त्वविवेक»क स्थायी भाव निर्वेद-मूलक तत्त्वजिज्ञासा अछि — ग्रन्थक आरम्भ दुःखसँ आत्यन्तिक निवृत्तिक आकांक्षासँ होइत अछि, आ समापन मोक्षनगरक शिखरशिला-रूपी निर्विकल्पक आत्मज्ञानपर। एहि दृष्टिसँ सम्पूर्ण चारि खण्डक तर्क-यात्रा शान्त रसक विभाव-सामग्री थिक; प्रत्येक खण्डन-मण्डन ओहि परम प्रशान्तिक व्यभिचारी भाव जकाँ काज करैत अछि। मुदा शान्तक अङ्गी-रसत्वक भीतर वीर रसक एकटा बौद्धिक रूप — जकरा ‘तर्कवीर’ वा ज्ञानवीरक कोटिमे राखल जा सकैत अछि — निरन्तर स्पन्दित अछि। उत्साह एतय स्थायी भाव थिक : प्रत्येक विकल्पक व्यवस्थित संहार, ‘नहि।’ क दृढ़ एकाक्षरी प्रहार, आ प्रसङ्ग-विपर्ययक शस्त्र-सञ्चालन पाठमे ओज भरैत अछि। हास्य आ व्यङ्ग्यक अंश सेहो अल्प नहि — असंगत ज्ञान-स्वीकृतिकेँ ‘एहन दैत्य जन्मबैत अछि जे ओहि ज्ञान सभकेँ स्वयं नष्ट कऽ दैत अछि’ कहब, वा गदहा आ ऊँटक असम्भव समूहक उपमा — ई सभ शास्त्रीय गद्यमे विरल परिहास-चातुर्यक उदाहरण थिक। खण्ड ४ क मोक्ष-विवेचनमे करुण रसक अछूता झलको अछि — संसारक दुःख-बहुलताक चित्रण, आ ‘स्वर्गीय सुखो दुःखक बाणसँ आर-पार बेधल अछि’ सन कथनमे संसारक अनित्यताक प्रति गहन वैराग्यभाव प्रकट होइत अछि। “तर्कवीरता”क अवधारणा आलोचनात्मक रूपसँ उपजाऊ अछि, मुदा एकरा सम्प्रदायगत विजय-घोषणामे बदलल नहि जाए। “समूल पराभव” सन भाषा ऐतिहासिक जटिलताकेँ संकुचित करैत अछि; साहित्यिक वीरभाव आ इतिहासलेखनक दावामे स्पष्ट दूरी आवश्यक अछि। ६.२ ध्वनि-विमर्श आनन्दवर्धनक कसौटीपर शास्त्रग्रन्थ प्रायः ‘चित्र’ कोटिमे (जतय ध्वनि अपेक्षा वाच्यार्थक प्राधान्य रहैत अछि) पड़ैत अछि, मुदा «आत्मतत्त्वविवेक»मे वस्तुध्वनिक कतोक स्तर सक्रिय अछि। पहिल ध्वनि आत्मगौरवक अछि — सम्पूर्ण खण्डन-परम्पराक व्यङ्ग्यार्थ ई जे मनुष्यक प्रत्यभिज्ञा, स्मृति, कर्तृत्व आ नैतिक दायित्व, सभ आत्माक स्थायित्वपर टिकल अछि; क्षणिकवाद मानब अपन जीवनक प्रत्येक अनुभवकेँ नकारब थिक। दोसर ध्वनि भाषा-यथार्थ-सम्बन्धक अछि — अपोहवाद-खण्डनक अन्तर्ध्वनि ई जे शब्द नकारसँ नहि, सत्तासँ जुड़ल अछि। तेसर, आ सभसँ गहन ध्वनि, ध्यान-सोपानक संरचनामे अछि — प्रत्येक पूर्व-दर्शनक खण्डन ओकर सर्वथा अस्वीकार नहि, अपितु ओकर आंशिक सत्यताक स्वीकृति आ ओकर उत्क्रमण थिक; एहि व्यञ्जनासँ ई ध्वनित होइत अछि जे सत्य क्रमिक, संचयी प्रक्रिया थिक, आ भारतीय दर्शन-परम्परा एकटा एकल, समन्वित यात्रा थिक — ई ग्रन्थक सभसँ दूरगामी अर्थ थिक, जे कतहु प्रत्यक्ष रूपेँ नहि कहल गेल अछि, मुदा उपसंहारक रचना-शिल्पेँ प्रकट होइत अछि। ध्वनिक एक आधुनिक स्तर मैथिलीक दार्शनिक सामर्थ्य सेहो अछि। अपोह, अविनाभाव, सह-उपलम्भ, प्रत्यभिज्ञा, अन्योन्याभाव, उपाधि, सविकल्पक आ निर्विकल्पक सन पद मैथिली वाक्य-विन्यासमे सक्रिय भऽ कऽ ई व्यञ्जित करैत अछि जे मैथिली केवल दर्शनक वर्णन करएवाली नहि, दार्शनिक तर्क करएवाली भाषा सेहो बनि सकैत अछि। ६.३ वक्रोक्ति-विमर्श कुन्तकक वक्रोक्ति-सिद्धान्तक भाषामे एहि ग्रन्थक प्रधान वक्रता प्रकरण-वक्रता आ वाक्य-वक्रता थिक। प्रश्नोत्तर-शृङ्खला — ‘की एना मानल जाए जे…? नहि।’ — पाठककेँ निष्क्रिय श्रोता नहि रहय दैत अछि; प्रत्येक ‘की’ क बाद पाठक क्षण भरि स्वयं उत्तर सोचैत अछि, आ तखन उदयनक ‘नहि’ ओकरा अपन अनुमानसँ भिड़ाबैत अछि। पूर्वपक्ष-उत्तरपक्षक ई अनवरत आवृत्ति — कहियो उत्तर देल गेल आपत्तिपर फेर आपत्ति, फेर ओकरो खण्डन, फेर ताहिपर सेहो आपत्ति — एकटा प्रकरण-स्तरीय वक्रताक जाल बुनैत अछि, जाहिमे पाठक कहियो निश्चित नहि भऽ सकैत अछि जे तर्क कतय रुकत। अलंकारमे दृष्टान्तक प्राचुर्य अछि (बीज-अंकुर, रज्जु-सर्प, राजमहलक फाटकपर हाथी देखिकऽ अन्हार-मेघ-छाया बुझयवला मूर्खक दृष्टान्त, सर्प-नेउरक स्वाभाविक वैर, उज्जर शंख पित्तदोषसँ पियर देखाएब), रूपकक सघनता समापनमे (‘मोक्षनगरक शिखरशिला’, ‘लक्ष्यभेदी बाण’), आ समापन-पद्यमे व्याजस्तुतिक छटा — अन्हराक प्रशंसासँ चित्रकारक गौरव नहि बढ़ैत — जे आत्मप्रशंसाक स्थानपर पाठकीय योग्यताक माँग रखैत अछि। ६.४ गुण, रीति आ औचित्य गुण-विमर्शमे उदयनक प्रधान शैली-गुण ओज आ प्रसाद दुनू थिक — ओज खण्डन-अंशमे प्रधान अछि, जतय ‘नहि।’ क आवृत्ति वज्रपात जकाँ पड़ैत अछि, आ प्रसाद-माधुर्य मोक्ष-विवेचन तथा स्तुति-पद्यमे। क्षेमेन्द्रक औचित्य-कसौटीपर देखल जाय तँ प्रत्येक पारिभाषिक पद (अविनाभाव, अपोह, सह-उपलम्भ, प्रसङ्ग-विपर्यय, उपादान-कारण, सविकल्पक-निर्विकल्पक, परस्पराश्रय, अन्यथानुपपत्ति) अपन प्रकरणक अनुरूप ठीक स्थानपर प्रयुक्त होइत अछि, जाहिसँ शास्त्रीय गद्यक कठोरतमपन बचाओल गेल अछि, आ फेर सेहो प्रत्येक तर्क-चरणक भीतर एकटा नाटकीय गति बनल रहैत अछि। रीतिक दृष्टिसँ ग्रन्थ वैदर्भी रीतिक निकट अछि — छोट-छोट, स्पष्ट, अल्पसमास वाक्य, जे तर्कक सूक्ष्मताकेँ भार नहि बनय दैत। प्रश्नोत्तर-वक्रता अनुवादक शैलीगत उपलब्धि सेहो अछि। “की?”, “नहि”, “तखन?”, “मुदा?” सन छोट संकेत संस्कृत शास्त्रार्थकेँ मैथिली मौखिकता दैत अछि। पारिभाषिक पदकेँ जबर्दस्ती घरेलू पर्यायमे बदलल नहि गेल; एहि कारण अवधारणाक ऐतिहासिक विशिष्टता सुरक्षित रहैत अछि। ६.५ अलंकार-योजना आ काव्य-लिंग अन्तमे, «आत्मतत्त्वविवेक» मे अर्थालंकार सभक (दृष्टान्त, रूपक, व्याजस्तुति, अर्थान्तरन्यास) घनिष्ठ सम्बन्ध तर्क-संरचनासँ यैह अछि जे ई सभ केवल सजावट नहि, प्रमाणक अंग बनि जाइत अछि — दृष्टान्त स्वयं एकटा लघु-प्रमाण थिक, रूपक निष्कर्षकेँ सान्द्र करैत अछि। एहि दृष्टिसँ ई ग्रन्थ भारतीय शास्त्र-साहित्यक ओहि दुर्लभ कोटिक उदाहरण थिक जतय तर्क आ काव्य एक्के वाक्यमे अभिन्न भऽ जाइत अछि। ७. पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त आ तुलनात्मक दार्शनिक पुनर्पाठ ७.१ सोक्रेटिक-प्लेटोनिक द्वन्द्वात्मकता आ नाटकीय संवाद प्लेटोक संवाद-ग्रन्थ (Dialogues) जकाँ «आत्मतत्त्वविवेक» मे सत्य प्रत्यक्ष घोषणासँ नहि, अपितु एलेन्खोस (elenchus) — प्रश्न-प्रतिप्रश्न द्वारा प्रतिपक्षक मतक आन्तरिक असंगति उजागर करबाक सोक्रेटिक पद्धति — सँ उभरैत अछि। उदयनक प्रत्येक ‘नहि।’ सोक्रेटिक elenchusक ओही क्षण जकाँ काज करैत अछि जतय वार्ताकार अपन दावाक असंगति स्वयं देखबाक लेल बाध्य होइत अछि। मुदा एतय एकटा महत्त्वपूर्ण अन्तर सेहो अछि — प्लेटोक संवादमे प्रायः खुल्ला प्रश्नक (aporia) संग समाप्ति होइत अछि, जखन उदयनक ग्रन्थ अपोरियासँ शुरू भऽ निश्चित सिद्धान्त (आत्मा, ईश्वर, मोक्ष) क स्थापनापर समाप्त होइत अछि। ई अन्तर एहि ग्रन्थकेँ प्लेटोनिक संवादसँ बेसी अरस्तूक व्यवस्थित निबन्ध-शैलीक निकट लऽ जाइत अछि, यद्यपि नाटकीय रूप (काल्पनिक विरोधीक वाणी, प्रश्नोत्तर) प्लेटोनिके रहैत अछि। ७.२ अरस्तूक रेटरिक आ काव्यशास्त्र अरस्तूक Rhetoric मे वर्णित तीन अनुनय-साधन — एथोस (वक्ताक विश्वसनीयता), पैथोस (श्रोताक भावनात्मक संलग्नता), आ लोगोस (तार्किक प्रमाण) — तीनू «आत्मतत्त्वविवेक» मे स्पष्ट देखल जा सकैत अछि। लोगोस स्वाभाविक रूपेँ प्रधान अछि — अनुमान, हेतु, दृष्टान्तक न्याय-शास्त्रीय संरचना। एथोस उदयनक बारम्बार पूर्वपक्षक तर्कक पूर्ण, निष्पक्ष प्रस्तुतीकरणसँ निर्मित होइत अछि — ओ विरोधीक मतकेँ कमजोर बना कऽ नहि रखैत छथि, अपितु ओकर सभसँ सशक्त रूपमे प्रस्तुत कऽ तखन खण्डित करैत छथि (जे ‘भद्रलोकक तर्क’ यानी steel-manning कहल जा सकैत अछि)। पैथोस — व्यङ्ग्य, दृष्टान्त, आ मोक्ष-विवेचनमे भावनात्मक अपील (दुःखक बहुलताक चित्रण) — शुद्ध तार्किक विधाकेँ पाठकीय संलग्नतासँ जोड़ैत अछि। एकर अतिरिक्त, अरस्तूक Poetics मे वर्णित catharsis (शुद्धीकरण, जे त्रासदीक अन्तमे भय-करुणाक विरेचनसँ होइत अछि) क एकटा दार्शनिक समानान्तर एतय देखल जा सकैत अछि — खण्डन-मण्डनक लम्बा, कष्टप्रद यात्राक अन्तमे मोक्षक निर्विकल्पक शान्तिपर पहुँचब एकटा प्रकारक बौद्धिक catharsis थिक, जतय पाठक तर्क-संघर्षक ‘भय’ सँ गुजरि निर्विकल्पक ज्ञानक शान्तिमे विरेचित होइत अछि। ७.३ बाख्तिनक संवादवाद आ बहुस्वरात्मकता मिखाइल बाख्तिनक संवादवाद (dialogism) आ बहुस्वरात्मकता (polyphony) सिद्धान्तक आलोकमे «आत्मतत्त्वविवेक» एकटा असाधारण पाठ थिक। बाख्तिनक अनुसार सच्चा संवादात्मक पाठमे विभिन्न स्वर (voices) परस्पर बराबरीक हैसियतसँ संवाद करैत छथि, कोनो एक स्वर पूर्णतः दोसराकेँ अधीन नहि बनबैत। उदयनक ग्रन्थमे बौद्ध पूर्वपक्ष — रत्नकीर्ति, ज्ञानश्री, धर्मकीर्तिक मत — केवल कठपुतली बनि खण्डित होयबाक लेल नहि अबैत अछि; हुनकर तर्क पूर्ण दार्शनिक गम्भीरतासँ, अपन आन्तरिक तर्कशक्तिसँ युक्त रूपमे प्रस्तुत होइत अछि, अनेक स्थलपर बहुस्तरीय आपत्ति- प्रत्युत्तरक शृंखला एतेक लम्बी अछि जे पाठकक मनमे क्षणिक भरि बौद्ध पक्षक जीतक सम्भावना सेहो जागि सकैत अछि। ई तनावे ग्रन्थकेँ एकपक्षीय प्रवचनसँ बचबैत, सच्चा शास्त्रार्थ (dialectical agon) बनबैत अछि। तथापि बाख्तिनी अर्थमे पूर्ण बहुस्वरात्मकता (जेना दोस्तोयेव्स्कीक उपन्यासमे) एतय नहि अछि, कारण अन्ततः लेखकीय स्वर (उदयन-सिद्धान्तपक्ष) निर्णायक विजय प्राप्त करैत अछि — ई मोनोलॉजिक निष्कर्षसहित डायलॉजिक प्रक्रियाक संयोग थिक, जे शास्त्रीय वाद-साहित्यक विशिष्ट रूप-लक्षण मानल जा सकैत अछि। ७.४ रूपवाद, नवसमालोचना आ पाठक-प्रतिक्रिया रूसी रूपवाद (Formalism) क ‘साहित्यिकता’ (literariness) क अवधारणासँ देखल जाय तँ «आत्मतत्त्वविवेक» क साहित्यिक प्रभाव ओकर विषयवस्तुसँ बेसी ओकर ‘उपकरण’ (device) — विशेषतः स्वचालन-हटाओनक (defamiliarization / ostranenie) प्रयोगसँ अबैत अछि। प्रश्नोत्तर-रूपक बारम्बार आवृत्ति एकटा लयबद्ध अनुभूति उत्पन्न करैत अछि, जाहिमे पाठक ‘नहि’ क प्रत्येक आघातसँ नव-नव रूपेँ चौंकैत अछि, चाहे तर्क- संरचना पूर्वानुमेय होइतो होइक। न्यू क्रिटिसिज्मक ‘क्लोज रीडिंग’ पद्धतिसँ देखल जाय तँ ग्रन्थक पाठ स्वयं-निर्भर (self-contained) अछि — प्रत्येक अनुच्छेदक आन्तरिक तनाव (आपत्ति बनाम उत्तर) आ ओकर समाधान एकटा सूक्ष्म-इकाईक रूपमे विश्लेषणीय अछि, जे पूरा ग्रन्थक बृहत् संरचनाकेँ प्रतिबिम्बित करैत अछि (part mirrors whole)। आ पाठक-प्रतिक्रिया सिद्धान्त (Reader-Response Theory, वुल्फगांग ईज़र) क दृष्टिसँ ग्रन्थक प्रश्नोत्तर-शैली पाठकक सक्रिय सहभागिताक माँग करैत अछि — ईज़रक ‘रिक्त स्थान’ (Leerstelle / gaps) क सिद्धान्त एतय प्रत्येक ‘की…?’ क पछातिक क्षणिक विराममे साकार होइत अछि, जतय पाठक अपन उत्तर स्वयं निर्मित करैत अछि, इएह पाठकक निर्मित उत्तर आ ग्रन्थक वास्तविक उत्तरक बीचक टकराव पाठ-अनुभवक केन्द्रीय गतिशीलता बनि जाइत अछि। ७.५ उत्तर-संरचनावादी दृष्टि आ विखण्डन देरिदाक विखण्डनवाद (deconstruction) क आलोकमे एकटा रोचक विडम्बना उभरैत अछि — उदयनक पूरा पद्धति स्वयं एकटा ‘खण्डन’-केन्द्रित पाठ थिक, जे प्रतिपक्षक अवधारणा सभक भीतरी विरोधाभास (जेना क्षणिकत्व आ अविनाभाव, अपोह आ भेद) उजागर करैत ओकरा ध्वस्त करैत अछि — ई विधि deconstructive पद्धतिसँ संरचनात्मक समानता रखैत अछि, यद्यपि उद्देश्यमे विपरीत अछि : देरिदा खण्डनक बाद कोनो स्थायी सत्यपर नहि पहुँचैत छथि, जखन उदयन खण्डनकेँ स्थापनाक साधन बनबैत छथि। ई अन्तर स्वयं भारतीय आ पाश्चात्य चिन्तनक एकटा मौलिक भेदकेँ उजागर करैत अछि — भारतीय खण्डन-पद्धति (जेना नागार्जुनक प्रसंग वा उदयनक अनुमान-खण्डन) प्रायः ‘प्रासंगिक’ (dialectical) होइत अछि, अन्तिम रूपेँ अस्थिरतामे नहि, स्थापनामे समाप्त होइत अछि, जखन उत्तर-आधुनिक विखण्डन जान-बूझि खुल्ला अनिश्चितता (aporia) मे विराम करैत अछि। ई तुलना ग्रन्थकेँ विश्व-साहित्यिक सिद्धान्तक संवादमे एकटा विशिष्ट स्थान दैत अछि। बाख्तिनीय कसौटीपर पूर्वपक्षकेँ पर्याप्त स्वर भेटैत अछि, मुदा अन्तिम अधिकार उत्तरपक्षक अछि। तेँ ई पूर्ण बहुस्वरात्मक ग्रन्थ नहि, बल्कि संवादात्मक संरचनावला न्याय-प्रधान ग्रन्थ अछि—मोनोलॉजिक निष्कर्षसहित डायलॉजिक प्रक्रिया। संरचनात्मक स्तरपर स्थायी/क्षणिक, ज्ञान/ज्ञेय, द्रव्य/गुण, अवयव/अवयवी, आत्मा/अनात्मा आ सत्य/भ्रमक द्वन्द्व चारू खण्डकेँ जोड़ैत अछि। उदयन प्रतिपक्षक प्रतिज्ञाक भीतरी असंगति धरि पहुँचि खण्डन करैत छथि; मुदा देरिदीय अनिर्णयपर नहि रुकि सकारात्मक स्थापना करैत छथि। एहि कारण एकरा “विखण्डनात्मक विधि, अविखण्डनवादी निष्कर्ष” कहब सार्थक अछि। ७.६ व्याख्याशास्त्र, घटनाविज्ञान आ पाठकीय सहभागिता स्मृति, प्रत्यभिज्ञा आ “काल्हि अनुभवनिहार हम आइ स्मरण करैत छी” सन संरचना कालगत आत्म-अनुभवक घटनावैज्ञानिक अध्ययन लेल उपयोगी अछि। मुदा उदयनक वस्तुवादी आत्मसिद्धि आ आधुनिक घटनाविज्ञान एकहि वस्तु नहि; तुलना प्रश्नक स्तरपर उपयोगी, सिद्धान्तक समानताक दावा रूपमे नहि। पाठक-प्रतिक्रिया दृष्टिसँ प्रश्नोत्तर पाठककेँ सहभागी बनबैत अछि। तथापि “अस्वीकार्य”, “खण्डन”, “दोष” सन सम्पादकीय शीर्षक पहिने निष्कर्ष कहि देबाक कारण पाठकक स्वतन्त्र खोजक स्थान किछु घटा सकैत अछि। ७.७ तुलनात्मक दर्शन प्रत्यभिज्ञाकेँ पाश्चात्य व्यक्ति-अनन्यता-विमर्श, विज्ञानवादक आलोचनाकेँ प्रत्ययवाद-विवाद, अपोहकेँ नामवाद-यथार्थवाद विवाद, आ ईश्वरसिद्धिकेँ अभिकल्प-तर्कक समानान्तर पढ़ल जा सकैत अछि। अपोह-विमर्श क्वाइन आ गुडमैनक नामवाद-यथार्थवाद प्रश्नकेँ स्मरण करबैत अछि; ज्ञान-ज्ञेय भेद जी.ई. मूरक प्रत्ययवाद-विरोधी तर्कसँ संवाद करैत अछि; स्मृति-प्रत्यभिज्ञा जॉन लॉक आ डेरेक पारफिटक व्यक्ति-अनन्यता प्रश्नक समान क्षेत्र छूबैत अछि; ईश्वरक कार्यत्व-तर्क विलियम पेलीक अभिकल्प-विमर्शक समानान्तर राखल जा सकैत अछि। मुदा एहि समानता सभ मुख्यतः प्रश्नक समानता अछि, उत्तरक नहि। भारतीय न्यायीय आत्मा, बौद्ध विज्ञान-सन्तान, आधुनिक मनोवैज्ञानिक निरन्तरता आ पाश्चात्य व्यक्ति-अनन्यता भिन्न तत्त्वमीमांसीय पृष्ठभूमिसँ आबैत अछि। अतः तुलनात्मक पठन क्षितिज खोलैत अछि, प्रत्यक्ष सिद्धान्त-समानता स्थापित नहि करैत। ८. भारतीय अनुवाद-दृष्टि : तात्पर्य, भाषा-भाष्य आ मैथिलीकरण पोथी अनुवादकेँ शब्दानुवादक बदला तात्पर्यानुवाद आ भाषा-भाष्य रूपमे देखैत अछि। ई दृष्टि एहि काजपर उपयुक्त अछि। अनुवादक मूल तर्कक्रमकेँ राखैत छथि, मुदा दीर्घ संस्कृत संरचनाकेँ मैथिली वाक्यमे खोलैत छथि, बीच-बीचमे विषयसूचक शीर्षक दैत छथि आ प्रश्नोत्तरक रूपमे तर्ककेँ श्रव्य बनबैत छथि। एहि ठाम एकटा महत्त्वपूर्ण उपलब्धि अछि—पारिभाषिक विदेशीपन आ वाक्यगत देशीयता एक्के संग। शब्द “अपोह” रहैत अछि, मुदा ओकर चारूकात मैथिली वाक्य रहैत अछि। “प्रत्यभिज्ञा” रहैत अछि, मुदा स्मृतिक तर्क मैथिली अनुभव-वाक्यमे खुलैत अछि। एहि विधिसँ स्रोत परम्परा मेटैत नहि अछि आ लक्ष्यभाषा सेहो संस्कृतक छाया मात्र नहि बनैत अछि। एहि अनुवादक महत्त्वपूर्ण विशेषता ई जे स्रोत-परम्पराक पारिभाषिक विदेशीपन आ लक्ष्यभाषाक वाक्यगत देशीयता एक्के संग चलैत अछि। “अपोह” आ “प्रत्यभिज्ञा” सन पद सुरक्षित रहैत अछि, मुदा ओकर तर्क मैथिली अनुभव-वाक्य, प्रश्नोत्तर आ स्वाभाविक संयोजकसभमे खुलैत अछि। ई शब्दानुवादक बदला तर्कक मैथिलीकरणक परियोजना बनैत अछि। ९. पाश्चात्य अनुवाद-सिद्धान्तक आलोकमे ९.१ विदेशीकरण आ देशीकरण फ्रीडरिष श्लायरमाखर आ लरेन्स भेनुटीक सिद्धान्तक आलोकमे ई अनुवाद दुनू मार्गपर एक्के संग चलैत अछि। पारिभाषिक स्तरपर विदेशीकरण (Foreignization) अछि, जाहिसँ पाठककेँ उदयनक वैचारिक जगत्‌मे प्रवेश करय पड़ैत अछि। दोसर दिस, वाक्य तथा दृष्टान्तक स्तरपर देशीकरण (Domestication) अछि—खरिहान, गदहा-ऊँट, 'प्रिय भाय' जकाँ प्रयोग उदयनकेँ मैथिल आङनमे बजैत देखाबैत अछि। अनुवादक अदृश्य नहि बनैत छथि, मुदा भाषिक बाधा हटाकऽ वैचारिक चुनौतीकेँ ज्यों-क-त्यों रखैत छथि। ९.२ गतिशील समतुल्यता, अर्थपरक-संप्रेषणपरक सन्तुलन आ प्रयोजन यूजीन नाइडाक गतिशील समतुल्यता (Dynamic Equivalence) क मानदण्डपर ई अनुवाद संकर (hybrid) कोटिक अछि। तर्क-संरचनामे रूपात्मक निष्ठा अछि, मुदा वाक्य-स्तरपर गतिशील समतुल्यता अछि जाहिसँ मैथिल पाठकपर ओएह प्रभाव उत्पन्न होइत अछि जे संस्कृतज्ञ पाठकपर मूल करैत छल। पीटर न्यूमार्कक शब्दावलीमे ई अर्थपरक (semantic) आ संप्रेषणपरक (communicative) अनुवादक सन्तुलन थिक। राइस-फर्मीरक स्कोपोस-सिद्धान्त (Skopos Theory) क अनुसार एहि अनुवादक प्रयोजन द्वैध अछि—मैथिली भाषाकेँ दार्शनिक गद्यक सामर्थ्य देब आ मैथिल शोधार्थीकेँ अपन परम्पराक प्रवेश-द्वार देब। खण्ड-शीर्षक आ सुगठित प्रकरण-विभाजन एकरा स्वयंशिक्षण-योग्य पाठ बनबैत अछि। ९.३ स्टाइनरक चतुश्चरण आ बेन्यामिनक उत्तरजीवन स्टाइनरक अनुवादक चारि चरण—विश्वास, आक्रमण, आत्मसात् आ प्रतिदान—एहि अनुवादमे प्रत्यक्ष लक्षित कएल जा सकैत अछि। अनुवादकक ई विश्वास जे एहि प्राचीन पाठमे मैथिली पाठक लेल अर्थ अछि; मूलक अखण्ड गद्यकेँ ४०५ खण्डमे बाँटब (आक्रमण); पारिभाषिक कोषकेँ मैथिली वाक्यमे घोरब (आत्मसात्); आ अन्ततः 'आत्मतत्त्वविवेक' केँ आओर विस्तृत जीवन देब (प्रतिदान)। वाल्टर बेन्यामिनक सिद्धान्तानुसार अनुवाद मूलक 'उत्तरजीवन' (Fortleben) थिक; बेन्यामिनक मान्यता जे श्रेष्ठ अनुवाद मूल आ लक्ष्य-भाषा दुनूकेँ ओहि 'विशुद्ध भाषा' दिस ठेलैत अछि, से प्रस्तुत कृतिमे घटित देखाइत अछि। स्टाइनर आ बेन्यामिनक अवधारणा सांस्कृतिक रूपसँ आकर्षक तुलनात्मक बाट खोलैत अछि। मुदा एकरा भारतीय अनुवाद-परम्पराक “समान सिद्धान्त” मानबाक बदला तुलनात्मक पठनक उपकरण मानब अधिक सावधान पद्धति होयत। ९.४ बहुतन्त्र, पुनर्लेखन आ पुनर्प्राप्ति आन्द्रे लेफेभेयरक पुनर्लेखन सिद्धान्त (Rewriting) आ इतमार इभेन-जोहारक बहुतन्त्र-सिद्धान्त (Polysystem Theory) क परिप्रेक्ष्यमे विदेह ई-पत्रिकाक ई स्वायत्त, संस्थेतर प्रकाशन एकटा सांस्कृतिक-राजनीतिक वक्तव्य अछि। मैथिली साहित्य-तन्त्रमे दार्शनिक गद्यक स्थान जे प्रायः रिक्त छल, तकरा ई अनुवाद भरैत केन्द्रीय स्थान ग्रहण करैत अछि। ई केवल एकटा पोथी नहि, भविष्यक मैथिली दर्शन-लेखनक एकटा गद्य-प्रतिमान (Register) स्थापित करैत अछि। गणेश देवीक 'अनुवाद पुनर्प्राप्ति थिक' (Translation as Retrieval) सिद्धान्त एतय पूर्णतः चरितार्थ होइत अछि, कारण मिथिलाक बौद्धिक स्मृतिमे उदयन एकटा नाम मात्र रहि गेल छलाह, ई अनुवाद ओहि नामकेँ फेर सँ पाठ बनबैत अछि। ९.५ टूरी, हाउस आ बर्मनक कसौटी अनुवादकेँ अर्थपरक भाषान्तर, संप्रेषणपरक पुनर्वाक्यीकरण आ व्याख्यात्मक प्रस्तुतिक मिश्रण मानल जा सकैत अछि। एहि तीनू तत्वक सह-अस्तित्व कृतिक वास्तविक प्रकृति बुझबाक उपयोगी सूत्र अछि। टूरीक लक्ष्य-पाठ दृष्टिसँ मैथिली स्वीकार्यता सफल अछि; स्रोतपरक पर्याप्तता पारिभाषिक पद द्वारा बचल अछि। मुदा संस्कृत आधारपाठ समानान्तर नहि रहने “किछु छुटल कि नहि”, “किछु बढ़ाओल गेल कि नहि”, “शीर्षक मूल कि सम्पादकीय”—ई प्रश्न पूर्णतः जाँचल कठिन अछि। जुलियाने हाउसक प्रत्यक्ष अनुवादक कसौटी सेहो एहिठाम प्रासंगिक अछि। ऐतिहासिक दूरीकेँ मेटाओल नहि गेल, मुदा आधार-संस्करण, पाठभेद आ सम्पादकीय हस्तक्षेपक विवरण नहि रहने पारदर्शिता अपूर्ण अछि। बर्मनक विकृति-प्रवृत्तिक आलोकमे सामान्य शीर्षकसभ तर्ककेँ अधिक व्यवस्थित अवश्य करैत अछि, मुदा मूलक अनिश्चितता वा क्रमशः खुलैत निष्कर्षकेँ समयसँ पहिने बता दैत अछि। “पहिल विकल्प अस्वीकार्य” सँ नीक “पहिल विकल्पक परीक्षण” सन तटस्थ शीर्षक शोध-संस्करण लेल अधिक उपयुक्त होयत। १०. मैथिली भाषाक उपलब्धि आ अनुवादक शैली कृतिक सर्वाधिक स्थायी उपलब्धि शायद कोनो एक दार्शनिक निष्कर्ष नहि, बल्कि मैथिली दार्शनिक गद्यक व्यवहारिक प्रदर्शन अछि। अनुवाद देखबैत अछि जे मैथिलीमे दीर्घ विकल्प-विभाजन, कारण-कार्य विश्लेषण, हेत्वाभास, परस्पराश्रय, स्मृति, प्रत्यक्ष, अनुमान, अभाव, सामान्य, ईश्वर आ मोक्षपर लगातार शास्त्रीय तर्क सम्भव अछि। “मुदा”, “तेँ”, “तखन”, “जँ—तँ”, “अथवा”, “की”, “नहि” सन स्वाभाविक मैथिली संयोजक जटिल न्यायीय संरचनाकेँ उठबैत अछि। एतय विशेष महत्त्व ई जे संस्कृत पदावली मैथिली व्याकरणकेँ विस्थापित नहि करैत। वाक्यक हड्डी मैथिली अछि; संस्कृत पारिभाषिक पद ओकर अवधारणात्मक केन्द्र अछि। एहि सन्तुलनक कारण पाठ न संस्कृतक कृत्रिम छाया बनैत अछि, न दार्शनिक शुद्धता छोड़ि अत्यधिक सरलीकृत गद्य। अनुवादक विशिष्ट उपलब्धि चारि बिन्दुमे देखल जा सकैत अछि: • मैथिली दार्शनिक शब्द-संसारक सक्रियकरण: ‘अविनाभाव’, ‘प्रत्यभिज्ञा’, ‘सविकल्पक’ आदि संस्कृत पद मैथिली वाक्य-विन्यासक भीतर काज करैत छथि। • संस्कृत-भारक नियन्त्रण: पारिभाषिक केन्द्र संस्कृतनिष्ठ रहितो क्रिया, संयोजक आ सम्बन्ध-सूचक पद मैथिली अछि, जाहिसँ पाठ स्वतन्त्र मैथिली गद्य बनैत अछि। • तर्कक मौखिकीकरण: ‘की?’, ‘नहि’, ‘ठीक अछि’, ‘तखन’, ‘मुदा’ सन संकेत शास्त्रार्थक श्रव्य लय उत्पन्न करैत अछि। • विकल्प-विभाजनक वाक्य-रचना: ‘अथवा’, ‘वा’, ‘की…की’ आदि संयोजक पाठककेँ बिना आरेखक तर्क-संरचना पकड़बाक सुविधा दैत अछि। एहि कारण कृतिक सर्वाधिक स्थायी भाषिक उपलब्धि कोनो एक शब्दक पर्याय खोजब नहि, बल्कि दीर्घ न्यायीय तर्ककेँ मैथिली वाक्यरचनामे टिकाऊ ढंगसँ चलायब अछि। ११. साहित्यिक बिम्ब आ उदयनक लेखक-व्यक्तित्व बीज-अङ्कुर, घट-दण्ड, खरहाक सींग, हाथी, चिकित्सक, अन्हरा, चित्रकार, सुख-दुःख, मोक्षनगर आ बाण—ई उदाहरणसभ हटि जाइत तँ पोथी तार्किक रूपेँ बचि सकैत छल, मुदा साहित्यिक रूपेँ निर्धन भऽ जाइत। अनुवादकक महत्त्वपूर्ण गुण ई जे उदाहरणसभकेँ “केवल तर्कक दृष्टान्त” नहि बुझि हुनकर कथात्मक ऊर्जा बचाओल गेल अछि। विशेषतः हास्य आ व्यङ्ग्य उदयनक वादात्मक व्यक्तित्वकेँ उपस्थित करैत अछि। एकर कारण पाठक एक निर्जीव सूत्र-संग्रह नहि, एक जीवित शास्त्रार्थक अनुभूति करैत अछि। काल-सापेक्ष कठोर, सम्प्रदायगत अथवा स्त्री-विषयक उदाहरण आधुनिक पाठक लेल सम्पादकीय टिप्पणी माँगैत अछि। एहन अंश ऐतिहासिक स्रोतक हिस्सा होयबाक कारण हटाओल नहि जाए; मुदा स्पष्ट कएल जाए जे ई मूलक कालबद्ध विवादात्मक भाषा अछि, आधुनिक सम्पादक वा अनुवादकक मूल्य-स्वीकृति नहि। १२. भाषिक, सम्पादकीय आ अनुसन्धानपरक सीमासभ वर्तमान पोथीक मुख्य कमजोरी अनुवादक मूल सामर्थ्यमे कम, सम्पादकीय संरचना आ शोध-पारदर्शितामे बेसी देखाइत अछि। १२.१ आधार-संस्करण आ स्रोत-पारदर्शिता ग्रन्थसूचीमे अनेक संस्कृत संस्करण उपलब्ध कराओल गेल अछि, मुदा अनुवाद मुख्यतः कोन आधार-संस्करणपर टिकल अछि से स्पष्ट घोषणाक आवश्यकता अछि। संस्कृत मूल समानान्तर नहि रहने “किछु छुटल कि नहि”, “किछु बढ़ाओल गेल कि नहि”, “शीर्षक मूल कि सम्पादकीय”—ई प्रश्न पूर्णतः जाँचब कठिन होइत अछि। १२.२ मूल पाठ आ सम्पादकीय शीर्षकक भेद ४०५ सँ अधिक शीर्षक अध्ययन-सुगमता बढ़बैत अछि, मुदा मूल संस्कृत शीर्षक आ अनुवादक-संपादक द्वारा जोड़ल शीर्षक अलग चिह्नित होयब चाही। “पहिल विकल्प अस्वीकार्य”क बदला “पहिल विकल्पक परीक्षण” सन तटस्थ शीर्षक शोध-संस्करणमे अधिक उपयुक्त होयत, कारण निष्कर्ष समयसँ पहिने नहि बताओत। १२.३ भाषा-नीति आ रूपगत एकरूपता “खंड/खण्ड”, संयुक्त पदमे हाइफनक उपयोग, किछु वर्तनी-रूप, आ “भऽ सकैत अछि/हो सकैत अछि” सन क्रियारूप लेल एकरूप सम्पादकीय नीति अपेक्षित अछि। मैथिली आलोचनात्मक भागमे रोमन अंग्रेजी पदक अधिकता मुख्य देवनागरी-प्रधान गद्यक प्रवाह तोड़ैत अछि; पाश्चात्य सिद्धान्तक नाम आवश्यक रूपेँ राखि तकनीकी अवधारणाक मैथिली वा देवनागरी रूप प्रधान कएल जा सकैत अछि। १२.४ प्रशस्तिपरक इतिहास-वाचन “समूल खण्डन”, “एक ग्रन्थक कारण बौद्ध तार्किक आधारक समाप्ति”, “युगान्तरकारी” आदि भाषा आलोचनात्मक अनुसन्धानसँ हटि प्रशस्ति दिस जा सकैत अछि। उदयनक दार्शनिक महत्त्व कम केने बिना इतिहासक बहुकारणीय जटिलता सुरक्षित राखब आवश्यक अछि। १२.५ अध्ययन-उपकरण पूर्ण अन्तरराष्ट्रीय अध्ययन-संस्करणक लेल आधार संस्कृत पाठक स्पष्ट घोषणा, चयनित संस्कृत मूल, पाठभेद, अनुवादक द्वारा जोड़ल शब्द/शीर्षकक चिह्न, पारिभाषिक कोश, विषयानुक्रमणिका आ सम्भव हो तँ मूल पाठक क्रम-संख्या उपयोगी होयत। ई कमी अनुवादक पठनीयता वा दार्शनिक क्षमता कम नहि करैत; ई शोधीय सत्यापनक प्रश्न अछि। १३. विस्तृत ग्रन्थसूची, आङ्ग्ल अर्धांश आ अनुसन्धान-संसाधन मैथिली भागक अन्तमे विषयवार ९९ प्रविष्टिक टिप्पणीसहित विस्तृत ग्रन्थसूची अछि। एकर आरम्भ मूल संस्कृत पाठ, प्रमुख संस्करण, टीका आ अनुवादसँ होइत अछि आ क्रमशः उदयनक अन्य ग्रन्थ, न्याय-वैशेषिक, बौद्ध तर्क, आत्ममीमांसा, भारतीय काव्यशास्त्र, अनुवाद-सिद्धान्त तथा डिजिटल-पाण्डुलिपि संसाधन धरि फैलैत अछि। ग्रन्थसूची अपन उद्देश्य सेहो स्पष्ट करैत अछि। अन्तिम प्रविष्टि राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन धरि पहुँचैत अछि आ सम्पादकीय टिप्पणी स्पष्ट करैत अछि जे आलोचनात्मक संस्करण तैयार करैत काल संस्कृत उद्धरण मुद्रित मूल अथवा विश्वसनीय पाण्डुलिपिसँ मिलान आवश्यक अछि। सन्दर्भ-सूचीक पूर्ववर्ती आलोचनामे विकिपीडिया, व्यावसायिक पुस्तक-विक्रेता आ सामान्य वेबसाइटक उपस्थिति जकाँ समस्या उठाओल गेल छल; मुदा वर्तमान अंतिम ग्रन्थसूची ९९ व्यवस्थित प्रविष्टि आ उपयोगिता-टिप्पणीसहित अधिक परिष्कृत रूपमे अछि। अतः पुरान सन्दर्भ-आलोचनाक जे अंश वर्तमान सूचीपर लागू नहि होइत, ओकरा अगिला संस्करणमे अद्यतन करब उचित होयत। पृष्ठ २९१क आसपाससँ प्रकाशन-विवरण फेर आङ्ग्लमे शुरू होइत अछि। ओतय मूल संस्कृत ग्रन्थ, मैथिली अनुवादक आ परिवर्धित संस्करणक विवरण पुनः देल अछि। तकर बाद विशाल आङ्ग्ल अनुक्रम, आलोचनात्मक निबन्धसभ, मूल अनुवादक आङ्ग्ल प्रस्तुति आ विस्तृत ग्रन्थसूची अछि। अध्याय-क्रममे समीक्षा, आलोचनात्मक अध्ययन, दार्शनिक पाठक आङ्ग्ल प्रस्तुति आ ग्रन्थसूची क्रमशः व्यवस्थित अछि। एहि द्विभाषिक संरचनाक लाभ बहुत पैघ अछि—मैथिली नहि जननिहार शोधार्थी सेहो कृतिक तर्क-विन्यास आ आलोचनात्मक सामग्री धरि पहुँचि सकैत छथि। एहि कारण पोथीक सम्भावित पाठक-वर्ग क्षेत्रीय सीमासँ बाहर जाइत अछि। मुदा एकर मूल्य आकार आ पुनरावृत्तिक रूपमे देब पड़ैत अछि। मैथिली आ आङ्ग्ल सामग्री एक्के जिल्दमे लगभग पूर्णरूपेँ दोहरल रहने पोथी भारी बनैत अछि। शोध-संस्करण लेल ई उपयोगी; सामान्य पाठक लेल पृथक् मैथिली आ पृथक् आङ्ग्ल संस्करण अधिक सुगम भऽ सकैत छल। एक छोट सम्पादकीय असंगति सेहो अछि—आङ्ग्ल भागक अध्याय ४ “बिबलियोग्राफी विद मैथिली एनोटेशन्स” कहैत अछि, मुदा ओहि भागक उपयोगिता-टिप्पणी स्वयं आङ्ग्लमे अछि। शीर्षककेँ केवल “टिप्पणीसहित विस्तृत ग्रन्थसूची”क समतुल्य आङ्ग्ल रूप देब अधिक यथार्थ होयत। १४. अन्तिम समेकित मूल्याङ्कन ‘आत्मतत्त्वविवेक’क प्रस्तुत परिवर्धित संस्करणक महत्त्व चारि स्तरपर स्थिर अछि। दार्शनिक स्तरपर, ई क्षणिकता, कारणता, भाषा, सामान्य, बाह्य यथार्थ, अवयवी, आत्मा, स्मृति, ईश्वर, शास्त्र आ मोक्षकेँ एक अखण्ड तार्किक यात्रामे जोड़ैत अछि। अनुवादक स्तरपर, ई संस्कृतक कठिन पारिभाषिक परम्पराकेँ नष्ट नहि करैत, मुदा ओकरा मैथिली वाक्यक प्राकृतिक प्रवाहमे जीवित करैत अछि। अनुवादक प्रधान उपलब्धि शब्द बदलब नहि, तर्कक मैथिलीकरण अछि। साहित्यिक स्तरपर, तर्क-नाटक, व्यङ्ग्य, दृष्टान्त, प्रश्नोक्ति, बीज-अङ्कुर, हाथी, खरहाक सींग, चिकित्सक, अन्हरा, चित्रकार, मोक्षनगर आ लक्ष्यभेदी बाण कृतिक सौन्दर्य-ऊर्जा बनैत अछि। शान्त रसक अन्तर्धारा आ तर्कवीरताक ओज एकरा शुष्क न्यायग्रन्थ रहबासँ बचबैत अछि। सांस्कृतिक स्तरपर, ई पोथी मैथिलीमे उच्च दार्शनिक गद्यक सम्भावनाकेँ दाबी मात्र नहि करैत—प्रत्यक्ष पाठ द्वारा ओकर प्रमाण प्रस्तुत करैत अछि। यैह कृतिक सर्वाधिक स्थायी देन अछि। एकर सीमासभ सेहो स्पष्ट अछि—किछु आरम्भिक प्रशस्तिपरक अतिरेक, स्रोत-संस्करणक अस्पष्टता, मूल आ सम्पादकीय हस्तक्षेपक भेदक अभाव, रोमन पदक अधिकता, सामान्य शीर्षकक पुनरावृत्ति, मूल परिवर्धित संस्करणक आलोचनात्मक सामग्रीमे आंशिक पुनरुक्ति, आ आङ्ग्ल अर्धांशक कारण बढ़ल आकार। मुदा वर्तमान ९९-प्रविष्टिक ग्रन्थसूची देखबैत अछि जे सम्पादकीय उपकरणक क्षेत्रमे पहिनुक अनेक कमी सुधारल जा चुकल अछि। अन्ततः, एहि पोथीकेँ केवल “उदयनाचार्यक मैथिली अनुवाद” कहब एकर वास्तविक स्वरूपकेँ छोट करब होयत। ई मूल दर्शनक पुनर्पाठ, मैथिली दार्शनिक गद्यक निर्माण, अनुवाद-सिद्धान्तक प्रयोग, आत्मालोचनात्मक सम्पादकीय विमर्श, अनुसन्धान-संसाधन आ आङ्ग्ल सेतु—एहि सभक संयुक्त ग्रन्थ अछि। एकर सर्वश्रेष्ठ अंश स्वयं मूल मैथिली अनुवाद अछि; ओकर चारूकातक आलोचनात्मक सामग्री ओकर अर्थ-क्षेत्र विस्तृत करैत अछि, यद्यपि किछु ठाम अपनहि उत्साहकेँ संयमित करबाक आवश्यकता अछि। कृतिक समापनमे मोक्षकेँ दुःखक आत्यन्तिक निवृत्ति कहि दीर्घ तर्कयात्राकेँ साधनाक दिशि मोड़ल गेल अछि, आ अन्तिम पद्य आलोचकसँ अन्ध प्रशंसा नहि, तथ्यगत दोषक निर्देश माँगैत अछि। एहि कसौटीपर प्रस्तुत संस्करणक उचित मूल्याङ्कन ई अछि—दार्शनिक अनुवाद रूपमे अत्यन्त समर्थ, मैथिली बौद्धिक इतिहासमे महत्त्वपूर्ण, अध्ययन-संस्करण रूपमे समृद्ध, आ पूर्ण समालोचनात्मक संस्करण बनबाक दिशामे एखन किछु स्पष्ट सम्पादकीय काज शेष। न्यायकुसुमाञ्जलि (उदयनाचार्यक मैथिली अनुवाद): एकीकृत विस्तृत ग्रन्थ-सार आ समालोचनात्मक मूल्याङ्कन भारतीय आ पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त, दर्शन आ अनुवाद-विज्ञानक आलोकमे — मूल संस्कृत: उदयनाचार्य; मैथिली अनुवाद: गजेन्द्र ठाकुर; प्रकाशक: विदेह, ISSN 2229-547X १. समीक्षा-आधार, ऐतिहासिक अवस्थिति आ अनुवादक स्वरूप ई एकीकृत समीक्षा सम्पूर्ण ग्रन्थक आरम्भिक प्रकाशन-सामग्री, अनुक्रम, अध्याय १ सँ अध्याय १२ धरि सभ आलोचनात्मक-अनुसन्धानात्मक खण्ड, पाँचू फूलक गुच्छमे देल पूर्ण मैथिली अनुवाद, परिशिष्ट, सन्दर्भ-ग्रन्थसूची, तथा ग्रन्थक उत्तरार्धमे देल अङ्ग्रेजी समानान्तर खण्ड—सभकेँ एकहि समग्र दृष्टिसँ देखैत अछि। ग्रन्थ अपनाकेँ उदयनाचार्यक मूल संस्कृत ‘न्यायकुसुमाञ्जलि’, गजेन्द्र ठाकुरक संस्कृतसँ मैथिली अनुवादक रूपमे प्रस्तुत करैत अछि। प्रकाशन-सूचनामे प्रथम संस्करण २००४, परिवर्धित संस्करण २०२६, अनुवाद-संपादन-पुस्तक-विन्यासक दायित्व आ विदेहक प्रकाशकीय भूमिका सेहो स्पष्ट अछि। सम्पूर्ण पुस्तकक मूल उपलब्धि केवल ई नहि अछि जे एकटा संस्कृत न्यायग्रन्थ मैथिलीमे पहुँचल; एकर वास्तविक महत्त्व ई अछि जे न्याय-वैशेषिकक अत्यन्त जटिल ज्ञानमीमांसा, कारणमीमांसा, अभाव-विचार, प्रमाणशास्त्र, भाषादर्शन, वाद-विधि आ ईश्वरानुमान लेल मैथिलीमे एकटा व्यवस्थित दार्शनिक गद्य-विन्यास निर्मित भेल अछि। एहि अर्थमे ई पोथी अनुवाद, भाष्य, आलोचना, अनुसन्धान, ग्रन्थेतिहास आ भाषा-निर्माण—पाँचू कार्य एकहि ठाम करैत अछि। भारतीय दर्शनक इतिहासमे दसम-एगारहम शताब्दीक उदयनाचार्य ओहि सन्धि-बिन्दु पर ठाढ़ छथि जतयसँ प्राचीन न्याय नव्य-न्यायक दिशामे मुड़ैत अछि। हुनकर न्यायकुसुमाञ्जलि — शाब्दिक अर्थमे "न्यायरूपी फूलक अञ्जलि" — ईश्वरक अस्तित्वक पक्षमे भारतीय परम्पराक सर्वाधिक व्यवस्थित, सर्वाधिक सूक्ष्म आ सर्वाधिक प्रभावशाली दार्शनिक प्रबन्ध मानल जाइत अछि। पाँच स्तबक (फूलक गुच्छ) मे विभक्त ई ग्रन्थ कारिका आ स्वोपज्ञ गद्य-व्याख्याक मिश्रित शैलीमे रचित अछि, आ एकर प्रत्येक पृष्ठ पर पूर्वपक्ष-उत्तरपक्षक द्वन्द्वात्मक नाट्य चलैत अछि जे पछाति गंगेश उपाध्यायक तत्त्वचिन्तामणिमे अपन चरम परिष्कार पबैत अछि। उदयनाचार्य मिथिलाक विभूति छथि, आ न्यायकुसुमाञ्जलि मिथिलाक माटिमे जनमल चिन्तनक फल अछि, मुदा सहस्राधिक वर्ष धरि ई फल संस्कृतक कोठीमे बन्द रहल — मिथिलाक जनभाषा ओकरा छूबि नहि सकल। गजेन्द्र ठाकुरद्वारा कएल प्रस्तुत मैथिली अनुवाद तेँ केवल एकटा भाषिक स्थानान्तरण नहि; ई अपन बौद्धिक पैतृक सम्पत्तिक घर-वापसी (repatriation) अछि। जे तर्क कहियो मिथिलाक टोलक सभा, पाठशाला आ शास्त्रार्थ-मण्डपमे संस्कृत माध्यमसँ गुंजित होइत छल, ओ आब पहिल बेर व्यवस्थित रूपेँ ओही धरतीक मातृभाषामे बाजि रहल अछि। विदेह-परम्पराक समानान्तर साहित्य आन्दोलनक दृष्टिसँ ई घटना असाधारण अछि, कारण एहिमे अनुवाद उपनिवेश-मुक्तिक, आत्म-पुनराधिकारक कार्य बनि जाइत अछि। अनुवादक इतिहास स्वयं रोचक अछि: प्रथम संस्करण 2004मे आएल, आ 2026क परिवर्धित संस्करण दुइ दशकक परिपक्वताक साक्ष्य दैत अछि — एहन अनुवाद जे बीस वर्ष धरि अनुवादकक संग जीबैत रहल, ओ अनुवाद-कर्म केँ घटना नहि, प्रक्रिया मानबाक जीवन्त उदाहरण अछि। मूल न्यायकुसुमाञ्जलि कारिका (पद्य) आ गद्य-विवरणक द्विस्तरीय बुनावटिमे अछि। प्रस्तुत अनुवाद एहि द्विस्तरीयता केँ एकटा धारावाहिक, अनुच्छेद-बद्ध मैथिली गद्यमे रूपान्तरित करैत अछि, जाहिमे प्रत्येक तर्क-प्रकरण एकटा स्पष्ट मैथिली शीर्षकसँ चिह्नित अछि — "जिज्ञासाक विषयक निरूपण", "सामर्थ्य केँ स्वतन्त्र सत्ता मानबाक तर्क", "क्षणभंगुरता-विषयक संशयक निराकरण" इत्यादि। ई शीर्षक-प्रणाली आधुनिक पाठकक लेल मानचित्रक काज करैत अछि; शास्त्रीय पाठ जे भूलभुलैया-स्वरूप छैक, ताहिमे ई शीर्षकसभ मील-पाथर जकाँ ठाढ़ अछि। रोमन याकोब्सनक त्रिविध वर्गीकरणक भाषामे कही तँ एतय तीनू प्रकारक अनुवाद एक्के संग घटित भऽ रहल अछि: अन्तरभाषिक (संस्कृतसँ मैथिली), अन्तःभाषिक (कारिकाक संकेत-सघन सूत्रात्मकता केँ व्याख्या-गद्यक संग मिलाकऽ एकटा विस्तारित स्वतःपूर्ण कथनमे घोरब — मूलक भीतरे जे टीका-स्तर छल, से अनुवादमे अवशोषित भऽ गेल अछि), आ एक अर्थमे अन्तरसांकेतिक (पद्यक लय-संकेतसँ गद्यक तर्क-संकेतमे माध्यमान्तरण)। २. पुस्तकक सम्पूर्ण वास्तु: अनुवादसँ बहुस्तरीय ज्ञान-ग्रन्थ धरि पुस्तकक रचना साधारण “भूमिका–अनुवाद–ग्रन्थसूची” प्रकारक नहि अछि। पहिल दस अध्याय अनुवादक विभिन्न अवस्थामे भेल आलोचनात्मक, साहित्यशास्त्रीय, दार्शनिक आ अनुवादशास्त्रीय मूल्याङ्कनक क्रमिक अभिलेख जकाँ उपस्थित अछि। अध्याय ११मे पाँचू गुच्छक मैथिली अनुवाद अछि। अध्याय १२मे विस्तृत ग्रन्थसूची अछि। तकर बाद अङ्ग्रेजीमे एहि सम्पूर्ण अनुसन्धान-सामग्री आ अनूदित पाठक समानान्तर प्रस्तुति देल गेल अछि। अङ्ग्रेजी खण्ड अपन पृथक् प्रकाशन-सूचना आ अनुक्रमसँ शुरू होइत अछि। ई संरचना एक दिस असाधारण रूपसँ समृद्ध अछि, कारण पाठक केँ अनूदित ग्रन्थक संग-संग ओकर व्याख्या, सिद्धान्त, आलोचना, पृष्ठभूमि आ तुलनात्मक अध्ययन सभ भेटैत अछि। दोसर दिस, एतेक सामग्री एकहि जिल्दमे रहने एकटा सम्पादकीय समस्या सेहो उत्पन्न करैत अछि: आरम्भिक अध्यायसभ कखनो ओहि अवस्थाक समीक्षा छथि जखन अनुवाद पूर्ण नहि छल, मुदा पछिला अध्यायसभ पाँचू गुच्छ पूर्ण भऽ गेलाक बाद लिखल गेल छथि। उदाहरणार्थ एक ठाम चारिम-पाँचम स्तबक “प्रतीक्षित” कहल गेल अछि, मुदा पछिला समग्र अध्ययन स्पष्ट करैत अछि जे पाँचू गुच्छ पूर्ण उपलब्ध अछि। एहि कारण पुस्तकक अन्तिम अकादमिक स्वरूपमे आरम्भिक अध्यायसभकेँ “अनुवाद-निर्माणक अमुक अवस्था पर लिखल समीक्षा” कहि तिथि अथवा संस्करण-संकेत देब अत्यन्त आवश्यक अछि। एना कएलासँ जे बात एखन विरोधाभास जकाँ बुझाइत अछि, से वास्तवमे अनुवादक बाइस वर्षक विकास-यात्राक मूल्यवान अभिलेख बनि जाएत। ३. अनुसन्धानात्मक अध्यायसभक क्रमिक आलोचनात्मक विकास अध्याय १ : पहिल विस्तृत समीक्षा — अनुवादक साहित्यिक आ भाषिक आत्मबोध अध्याय १ ग्रन्थ, ग्रन्थकार, अनुवादक आ ऐतिहासिक अवस्थिति सँ शुरू होइत अछि। उदयनाचार्य केँ प्राचीन न्यायसँ नव्य-न्यायदिस संक्रमणक महत्त्वपूर्ण बिन्दु मानि, ‘न्यायकुसुमाञ्जलि’क पाँच-स्तबकीय स्वरूप आ कारिका-सहित स्वोपज्ञ गद्य-व्याख्याक संरचना रेखाङ्कित कएल गेल अछि। एहि अध्यायक सर्वाधिक सफल अंश मंगलाचरणक श्लेष-विवेचन अछि। मूलमे फूल आ न्याय-सिद्धान्त एक्के शब्द-समूहक द्वि-अर्थक रूपमे आबैत अछि। अनुवाद एकर समाधान “फूलक अर्थमे” आ “न्याय-सिद्धान्तक अर्थमे” दू स्तर खोलिकऽ करैत अछि। शुद्ध काव्यानुवादक दृष्टिसँ एक्के क्षणमे फूटनिहार श्लेषक चमत्कार एना दू भागमे विभाजित अवश्य भऽ जाइत अछि; मुदा शास्त्रीय अनुवादक दृष्टिसँ कोनो अर्थ हराइत नहि। ई निर्णय एहि सम्पूर्ण अनुवाद-पद्धतिक प्रतिनिधि उदाहरण अछि: चमत्कारक किछु हानि स्वीकार कऽ अर्थक सम्पूर्णता बचाएब। “दबाओल गेलो पर फूल नहि मुरझाइत” सन बिम्बक व्याख्यामे फूलक विरोधाभासी दृश्य आ तर्कक अखण्डनीयताक संकेत एकहि ठाम देखाओल गेल अछि। एहि आधारपर अध्याय श्लेष, वक्रोक्ति आ ध्वनिक सफल अध्ययन करैत अछि। रस-विवेचनमे शान्त रस केँ मूल प्रवाह मानल गेल अछि, मुदा शास्त्रार्थक टकराहटिमे वीरक एक विशेष “तर्कवीर” रूप आ सूक्ष्म तर्कक बौद्धिक आश्चर्यमे अद्भुतक उपस्थिति देखाओल गेल अछि। ई व्याख्या शास्त्रक गद्यपर काव्यशास्त्र लागू करबाक सर्जनात्मक प्रयास अछि। एतय सावधानी एतबे चाही जे रसक ई प्रयोग नाटक वा महाकाव्यक प्रत्यक्ष रसानुभव जकाँ नहि, बल्कि दार्शनिक गद्यक सौन्दर्यात्मक प्रभाव बुझबाक व्याख्यात्मक उपकरणक रूपमे ग्रहण कएल जाए। औचित्य-विचारमे अध्याय अनुवादक द्विस्तरीय शब्दनीति ठीक पकड़ैत अछि। हेतु, साध्य, व्याप्ति, उपाधि, समवाय, प्रतियोगी, अन्वय-व्यतिरेक जकाँ पारिभाषिक पद अक्षुण्ण राखल गेल; दोसर दिस “खरहाक सींग” जकाँ उदाहरण पाठकक निकट मैथिली भाषाभूमिमे उतारल गेल। पछिला समग्र अध्ययन सेहो एहि द्विस्तरीय नीति केँ अनुवादक प्रमुख उपलब्धि मानैत अछि। रीति आ वाक्यलयक विवेचनमे “जँ–तँ”, “तेँ”, “मुदा”, “अतः” आदि मैथिली संयोजकसभ द्वारा संस्कृत तर्क-वाक्यक कारण–परिणाम-सम्बन्ध केँ पुनर्गठित करबाक क्षमता देखाओल गेल अछि। ई उचित निरीक्षण अछि। एहि अनुवादक वास्तविक भाषिक उपलब्धि संस्कृतक वाक्यरचनाक नकल करब नहि, बल्कि मैथिलीक अपन तर्क-वाक्य विकसित करब अछि। भर्तृहरि, शब्द-प्रमाण आ अनुवादक आत्म-सन्दर्भिताक चर्चा विशेष रोचक अछि। जखन ग्रन्थ शब्द केँ स्वतन्त्र ज्ञान-साधन मानैत अछि, तखन अनुवाद स्वयं शब्दार्थ, वाक्यार्थ, वक्ता, तात्पर्य आ बोधशक्ति पर विचार करैत पाठ बनि जाइत अछि। एकरा अनुवाद-सिद्धान्तक भारतीय अन्तःस्रोतसँ जोड़बाक प्रयत्न अध्यायक मौलिकता अछि। पाश्चात्य खण्डमे बाख्तिनक बहुस्वरता, श्लायरमाखर-गादामरक व्याख्याशास्त्र, नाइडा, वेनुती, बेन्यामिन, स्टाइनर, स्कोपस, लफ़ेव्रे, बहु-प्रणाली, इज़र आदि द्वारा पाठ केँ पढ़ल गेल अछि। ई तुलनासभ उपयोगी अछि, मुदा सभठाम ई स्पष्ट रहबाक चाही जे आधुनिक सिद्धान्त उदयनाचार्यक “ऐतिहासिक स्रोत” नहि, आधुनिक पाठकीय व्याख्याक उपकरण छथि। अध्याय १क एकटा महत्त्वपूर्ण सीमा स्वयं ओकर ऐतिहासिक अवस्थिति अछि: ई ओहि समयक समीक्षा अछि जखन चारिम आ पाँचम गुच्छ पूर्ण अनुवादमे सम्मिलित नहि छल। अतः एहि अध्यायकेँ वर्तमान सम्पूर्ण ग्रन्थक अन्तिम निर्णय नहि, बल्कि अनुवाद-निर्माणक पहिल आलोचनात्मक पड़ाव मानल जाए। अध्याय २ : उत्तरार्धक दार्शनिक वास्तु आ तर्कक गहनता अध्याय २क संरचना अधिक सघन अछि। एहिमे समीक्ष्य अंशक ग्रन्थीय स्थान, दार्शनिक वास्तु, भारतीय काव्यशास्त्र, नव्य-न्यायदृष्टि, पाश्चात्य दर्शन, अनुवाद-सिद्धान्त, भाषा-शैली, सीमा आ उपसंहार अछि। अनुक्रममे ई पूरा विन्यास स्पष्ट देल अछि। पहिल अध्याय जतय अनुवादक साहित्यिक-भाषिक प्रकृति पर अधिक केन्द्रित छल, दोसर अध्याय तर्कक गहन संरचना पर अधिक बल दैत अछि। विशेषतः तेसर गुच्छक पछिला भाग, प्रमाणक संख्या, शब्द-प्रमाण, अन्वित अर्थ, अर्थापत्ति, अनुपलब्धि; तकर बाद ज्ञातता-विवाद आ ईश्वर-सिद्धिदिस गमन—एहि सम्पूर्ण क्रम केँ एकटा वास्तुक रूपमे देखबाक क्षमता अध्याय २क विशेषता अछि। नव्य-न्याय दृष्टिसँ उदयनसँ गङ्गेश धरिक सेतुक चर्चा पुस्तकक व्यापक उद्देश्यसँ मेल खाइत अछि। मुदा ई सेतु “सीधा सिद्धान्तगत वंशानुक्रम” कहबाक बदला बौद्धिक पूर्वपीठिका मानल जाए—एहन सावधानी ऐतिहासिक विश्लेषण केँ अधिक कठोर बनाओत। अनुवाद-सिद्धान्तक दृष्टिसँ अध्याय २ ई बुझबाक प्रयास करैत अछि जे मूलक सूत्र-सघनता मैथिलीमे व्याख्यात्मक प्रसार किएक पबैत अछि। एहि प्रसारकेँ केवल “अधिक शब्द” कहि दोष देब उचित नहि; न्यायशास्त्रक आधुनिक मातृभाषिक पाठक लेल प्रसङ्ग, पूर्वपक्ष आ उत्तर स्पष्ट करब अनुवादक प्रयोजनक अंग अछि। मुदा एतहि अनुवाद आ भाष्यक सीमा चिह्नित करब जरूरी भऽ जाइत अछि—ई समस्या पुस्तकक अनेक अध्यायमे फेर उठैत अछि। अध्याय ३ : सभसँ व्यापक आरम्भिक आलोचनात्मक परीक्षण अध्याय ३ पहिल चरणक सभसँ व्यवस्थित समीक्षा थिक। एहिमे समीक्षा-सार, पद्धति, ग्रन्थक दर्शन-शास्त्र-साहित्यात्मक स्वरूप, पाठ-संरचना, भारतीय साहित्यशास्त्र, पाश्चात्य सिद्धान्त, भारतीय आ आधुनिक अनुवाद-परम्परा, चयनित खण्डक निकट-पाठ, भाषा-शैली, सम्पादकीय उपकरण, तुलनात्मक मूल्याङ्कन आ संशोधित आलोचनात्मक संस्करणक अनुशंसा सम्मिलित अछि। भारतीय साहित्यशास्त्रीय खण्डमे रस, ध्वनि, वक्रोक्ति, गुण, रीति, औचित्य, अलङ्कार आ दृष्टान्त सभक पृथक् विवेचन भेल अछि। ई अध्यायक एकटा पैघ गुण अछि जे ई ‘न्यायकुसुमाञ्जलि’ केँ केवल ईश्वर-सिद्धिक तर्कपुस्तक नहि मानैत; ओकर शीर्षक, फूलक बिम्ब, संवाद-विन्यास, पूर्वपक्ष-उत्तरपक्ष, उदाहरण आ समापन-प्रार्थनाक सौन्दर्यगत भूमिका सेहो चिन्हैत अछि। पाश्चात्य खण्ड अरस्तूवादी तर्क-वक्तृत्वसँ रूसी रूपवाद, नव-समीक्षा, संरचनावाद, बाख्तिनीय संवादवाद, व्याख्याशास्त्र, पाठक-प्रतिक्रिया आ विखण्डन धरि जाइत अछि। व्यापकता प्रभावशाली अछि, मुदा एतय अध्यायक कमजोरी सेहो छैक: एकहि पाठपर बहुत सिद्धान्त एकैबेर लगाओल गेलासँ कतहु-कतहु सिद्धान्तक नाम स्वयं विश्लेषणपर भारी पड़ैत अछि। चयनित दू-तीन सिद्धान्तक अधिक गहन प्रयोग कखनो दस सिद्धान्तक संक्षिप्त प्रयोगसँ अधिक फलदायी होइत। अनुवाद-सिद्धान्तमे नाइडा, न्यूमार्क, स्कोपस, देशीकरण–विदेशीकरण, कॅटफोर्ड, टूरी, बहु-प्रणाली, बर्मन आ स्टाइनरक कसौटी सभ लगाओल गेल अछि। एहि बहुविध परीक्षणसँ एकटा बात स्पष्ट उभरैत अछि—अनुवाद न पूर्ण देशीकृत अछि, न पूर्ण संस्कृताभिमुख; तकनीकी कोश संस्कृतपरम्परासँ आबैत अछि, मुदा तर्क-वाक्य आ उदाहरण मैथिली पाठक दिस मुड़ैत अछि। “अकस्मात्”क चार अर्थ, अभावक कारणता, सांख्य-चार्वाक-बौद्ध पक्ष, प्रामाण्य, शब्द-अनित्यता, अग्रहण-अनस्तित्व, अनुमान-उपाधि, उपमान-शब्द आ अन्वितार्थ—एहि प्रतिनिधि स्थलसभक निकट-पाठ अध्यायकेँ वास्तविक आलोचनात्मक धरातल दैत अछि; केवल सिद्धान्तक नामक प्रदर्शनसँ बचबैत अछि। सम्पादकीय खण्ड अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि। पुस्तक स्वयं भविष्यक आलोचनात्मक संस्करण लेल मूल संस्कृत पाठ, प्रवाहपूर्ण मैथिली अनुवाद, दार्शनिक व्याख्या, पादटिप्पणी, पारिभाषिक कोश, अनुक्रमणिका आ डिजिटल समानान्तर दृश्यक पृथक् व्यवस्था सुझबैत अछि। ई अनुशंसा एखनहुँ सम्पूर्ण पुस्तकक सर्वाधिक उपयोगी सम्पादकीय दिशा अछि। मुदा अध्याय ३ सेहो आंशिक पाठक अवस्था सँ सम्बद्ध अछि। अतः जतय ओ “अधूरापन” पर टिप्पणी करैत अछि, ओ वर्तमान पूर्ण अनुवादक दोष नहि, पूर्वावस्थाक दस्तावेज अछि। अध्याय ४ : कठोर आत्मालोचनाक अध्याय अध्याय ४ भारतीय आ पाश्चात्य साहित्यिक तथा अनुवाद-सिद्धान्तक आलोकमे दोसर विस्तृत समीक्षा अछि। ई रस, ध्वनि, वक्रोक्ति, अलङ्कार, रीति, गुण, औचित्य, रूपवाद, नव-समीक्षा, संरचनावाद, पाठक-प्रतिक्रिया, व्याख्याशास्त्र, विखण्डन, वक्तृत्वशास्त्र, औपचारिक-कार्यात्मक समानता, अर्थप्रधान-संप्रेषणप्रधान अनुवाद, देशीकरण-विदेशीकरण, स्कोपस, अनुवादकीय विस्तार, पारिभाषिकता, मैथिली भाषाक गुणवत्ता, पुनरावृत्ति, सम्पादकीय त्रुटि, विचारधारा, उपलब्धि, सीमा, प्रकाशनपूर्व सुधार आ मूल्याङ्कन धरि जाइत अछि। एहि अध्यायक विशेषता ओकर प्रशंसासँ अधिक आत्मालोचनात्मक कठोरता अछि। पुरान अवस्थामे ओ दू शीर्षकक अनुचित विलय, अन्तिम वाक्यक अपूर्णता, उद्धरण-स्रोतक अस्पष्टता आ लेखक-भाष्यकार-अनुवादकक आवाजक सीमा अस्पष्ट रहबाक प्रश्न उठबैत अछि। पुरान मूल्याङ्कन-सारणीमे दार्शनिक सम्प्रेषण आ तर्क-क्रम केँ उच्च, मुदा आलोचनात्मक सम्पादकीय उपकरण आ तत्काल प्रकाशन-तत्परता केँ अपेक्षाकृत कम अंक देल गेल छल। वर्तमान पूर्ण ग्रन्थक सन्दर्भमे एहि निर्णयकेँ हूबहू अन्तिम निर्णय मानब उचित नहि, कारण पछिला अध्याय स्वयं पूर्ण पाँच-गुच्छीय पाठक घोषणा करैत अछि। एहि अध्यायकेँ पाठ-संशोधनक ऐतिहासिक निरीक्षण-पत्रक रूपमे राखल जाए तँ एकर मूल्य बहुत बढ़ि जाइत अछि। ई पाठक केँ देखबैत अछि जे ग्रन्थ अन्तिम रूप धरि कोना पहुँचल। अध्याय ५ : मैथिली भाषा, इतिहास, लिपि, संस्था आ आधुनिकता अध्याय ५ केवल ‘न्यायकुसुमाञ्जलि’क पाठालोचना नहि, मैथिली भाषाक व्यापक सामाजिक-बौद्धिक परिसरसँ एहि अनुवादकेँ जोड़ैत अछि। एहिमे मैथिलीक ऐतिहासिक अवस्थिति, जनसांख्यिक विस्तार, भाषिक संरचना, ध्वनिविज्ञान, “नल-सब्जेक्ट” व्याकरण, उपभाषा आ मानकीकरण, आधुनिक डिजिटल भाषिक तकनीक, मिथिलाक्षर/तिरहुता, युनिकोड, दार्शनिक परम्परा, विदेह, समानान्तर साहित्य आन्दोलन, शैक्षणिक संस्था आ आधुनिक प्रसारक चर्चा अछि। भाषिक इतिहासक प्रसङ्गमे वर्णरत्नाकर, विद्यापति आदि सेहो आबैत छथि। एहि अध्यायक बौद्धिक उद्देश्य स्पष्ट अछि: ‘न्यायकुसुमाञ्जलि’क अनुवादकेँ एकटा पृथक् पुस्तक नहि, मैथिली भाषाक आधुनिक ज्ञानक्षमता बढ़ेबाक व्यापक परियोजनाक अंग मानब। विदेह आ समानान्तर साहित्य आन्दोलनक चर्चा सेहो एही ढाँचामे अछि। ई विस्तार महत्त्वपूर्ण अछि, मुदा एहि अध्यायमे सभसँ अधिक स्रोत-सावधानी आवश्यक अछि। जनसङ्ख्या, विश्वविद्यालयीय पाठ्यक्रम, युनिकोड, संस्था, आधुनिक डिजिटल भाषिक तकनीक, डिजिटल परियोजना आदि परिवर्तनीय तथ्य छथि। ताहि लेल प्रत्येक एहन तथ्यक संग स्पष्ट वर्ष, स्रोत आ पादटिप्पणी रहबाक चाही। अन्यथा ग्रन्थक स्थायी दार्शनिक भागक बीच काल-विशिष्ट सूचना शीघ्र पुरान भऽ सकैत अछि। दार्शनिक भागमे श्लेष-वक्रोक्ति, पाँच नास्तिक आपत्ति, मीमांसक अदृष्ट-सामर्थ्य, सांख्य, चार्वाक, बौद्ध क्षणभंगवाद, शब्द-प्रमाण आ पाश्चात्य सिद्धान्तक सम्बन्ध देल अछि। अध्याय एतय भाषा-इतिहास आ दर्शनकेँ जोड़ैत अछि, मुदा संरचनात्मक दृष्टिसँ एकरा दू पृथक् अध्याय—“मैथिली भाषा-इतिहास” आ “अनुवादक दार्शनिक महत्त्व”—मे बाँटला पर अधिक सघनता आबि सकैत छल। अध्याय ६ : ज्ञानमीमांसा आ ईश्वर-सिद्धिक दार्शनिक गहिराइ अध्याय ६ पुस्तकक विशुद्ध दार्शनिक अध्यायसभमे प्रमुख अछि। एहिमे अन्वितार्थवाद, अर्थापत्ति, अनुपलब्धि, ज्ञानक प्रामाण्य, ज्ञातता, ईश्वरक सर्वज्ञता, ईश्वर-सिद्धिक आठ हेतु, वैदिक विधि आ प्रेरक शक्ति, योगिक प्रत्यक्ष तथा तर्क-आस्थाक सम्बन्धक विश्लेषण अछि। अध्याय स्वयं अन्वितार्थवाद, अर्थापत्ति, अनुपलब्धि आ ज्ञातता-विवादकेँ ईश्वरसिद्धिक पूर्वपीठिका बनबैत अछि। एतय पुस्तकक एकटा महत्त्वपूर्ण दार्शनिक गुण स्पष्ट होइत अछि: ईश्वर-सिद्धि पाँचम गुच्छमे अचानक शुरू नहि होइत। पहिल चारि गुच्छमे कारणता, प्रमाण, भाषिक बोध, अभाव, प्रामाण्य, ज्ञातता, जगत् आ ज्ञानक एहन सिद्धान्त तैयार होइत अछि जाहिपर पाँचम गुच्छक सकारात्मक अनुमान ठाढ़ भऽ सकय। अतः पाँचम गुच्छ केँ अलग “ईश्वरक आठ प्रमाण”क सूची मात्र मानब ग्रन्थक वास्तु बुझब नहि होएत। अन्विताभिधानवादक प्रतिवादमे शब्दक स्वतन्त्र अर्थबोध आ वाक्यगत अन्वयक प्रश्न अनुवादक लेल सेहो आत्मसन्दर्भी भऽ उठैत अछि। अर्थापत्ति आ अनुपलब्धिक स्वतन्त्र प्रमाणत्वक विरोध न्याय-मिमांसक मतभेदक केन्द्रीय प्रश्न बनैत अछि। ज्ञातताक खण्डन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि। जँ यथार्थ ज्ञान लेल प्रत्येक बेर “नवीनता” अथवा बाह्य ज्ञातता-धर्म आवश्यक मानल जाए तँ नित्य सर्वज्ञ ईश्वरक ज्ञान समस्या बनि सकैत अछि। चौथ गुच्छ एहि अड़चन केँ हटबैत पाँचम गुच्छ लेल ज्ञानमीमांसीय भूमि तैयार करैत अछि। ईश्वर-सिद्धिक आठ आधार—कार्य, आयोजन, धृति, पद, प्रत्यय, श्रुति, वाक्य आ संख्या—पुस्तकक दार्शनिक चरम-बिन्दु छथि। अध्याय ६क एकटा सकारात्मक गुण ई अछि जे ई सभ आठ केँ एकहि प्रकारक तर्क नहि मानैत; किछु कारणतत्त्वपर, किछु परमाणु-संयोजनपर, किछु भाषा-संकेतपर, किछु ज्ञानक प्रामाण्यपर, किछु वैदिक वाक्यपर आश्रित अछि। आधुनिक तुलनाक उपयोग करैत काल सावधानी चाही। “विश्वोत्पत्तिक तर्क”, “भाषिक तर्क”, “प्राकृतिक धर्मदर्शन” आदि आधुनिक नाम पाठक लेल उपयोगी पुल छथि, मुदा उदयनक तर्कक ऐतिहासिक अर्थकेँ यूरोपीय धर्मदर्शनक श्रेणीमे पूर्णतः विलीन नहि करबाक चाही। अध्याय ७ : उदयनाचार्य, टीका-परम्परा आ भारतीय ईश्वर-विमर्श अध्याय ७ शोध-प्रस्तावना, उदयनाचार्यक जीवन आ मिथिलाक न्यायपरम्परा, ग्रन्थीय संरचना, स्तबक-कारिकाक संख्या, पाँच विप्रतिपत्ति, पाँचू स्तबक, टीका-भाष्य-परम्परा, ऐतिहासिक अनुवाद, नारायण शास्त्री द्रविड़क अध्ययन, नव्य-न्यायपर प्रभाव आ निष्कर्ष समेटैत अछि। टीका-परम्परा आ द्रविड़क अध्ययनक पृथक् खण्ड अनुक्रममे स्पष्ट अछि। ई अध्याय पुस्तकक ग्रहण-इतिहास तैयार करैत अछि। अनुवाद केँ केवल वर्तमान भाषिक कृत्य नहि, अनेक संस्कृत टीका, आधुनिक सम्पादन आ अनुवादक शृङ्खलामे राखब एकर महत्त्वपूर्ण अकादमिक उपलब्धि अछि। मुदा जीवनी, कालनिर्धारण, कारिका-सङ्ख्या आ संस्करणभेद सन विषय पर स्रोत-पादटिप्पणी अत्यन्त आवश्यक अछि। पुस्तकक एक अंश ७२ वा ७३ कारिकाक विकल्पक उल्लेख करैत अछि। एहन भेदक कारण, कोन संस्करणमे कोन गणना, आ कोन कारिका संयुक्त वा पृथक् गनल गेल अछि—ई आलोचनात्मक संस्करणमे स्पष्ट होयबाक चाही। अध्याय ७क मूल्य एहि बातमे अछि जे ई मैथिली अनुवाद केँ आधुनिक स्वतन्त्र प्रयास मानितो ओकर पाछाँक दीर्घ टीका-परम्परा नहि विसरैत। अध्याय ८ : समेकित दार्शनिक, भाषिक आ सांस्कृतिक अध्ययन अध्याय ८ ‘न्यायकुसुमाञ्जलि’ आ ओकर मैथिली अनुवादक एकटा व्यापक समेकित अध्ययन अछि। एहिमे नव्य-न्याय पृष्ठभूमि, मैथिलीक ऐतिहासिक-सामाजिक अवस्थिति, पाँच विप्रतिपत्ति, पाँचू स्तबक, ईश्वर-सिद्धिक आठ हेतु, न्याय-मिमांसक प्रमाण-विवाद, अन्वितार्थवाद, अर्थापत्ति, अनुपलब्धि, अनुवादक भाषिक-दर्शनात्मक महत्त्व, भारतीय साहित्य-सिद्धान्त, पाश्चात्य अनुवाद-सिद्धान्त, समानान्तर साहित्य आन्दोलन आ डिजिटल रूपान्तरण सभ एकत्र भेल अछि। एहि अध्यायक निष्कर्ष उदयनक कृतिकेँ धार्मिक घोषणाक बदला कठोर तर्क, ज्ञानमीमांसा आ वाद-विवादपर आधारित ईश्वर-विमर्श मानैत अछि; आठ हेतु कार्यात्, आयोजनात्, धृत्यादेः, पदात्, प्रत्ययतः, श्रुतेः, वाक्यात् आ संख्याविशेषाच्च धरि क्रमबद्ध करैत अछि। एहि अध्यायक सीमा पुनरावृत्ति अछि। अध्याय ५–७मे जे सामग्री अलग-अलग विस्तार पबैत अछि, अध्याय ८ ओकर समेकित पुनर्पाठ करैत अछि। जँ पुस्तक शोध-प्रबन्धक रूपमे व्यवस्थित हो, तँ एहि अध्यायकेँ “समग्र संश्लेषण” कहि चिह्नित करब आवश्यक अछि; अन्यथा पाठक केँ एकहि विषय बारम्बार आबि रहल बुझा सकैत अछि। अध्याय ९ : पाँचू गुच्छपर आधारित पहिल वास्तविक समग्र समीक्षा अध्याय ९ पुस्तकक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मोड़ अछि। एतय स्पष्ट रूपसँ पाँचू गुच्छ पूर्ण पाठक आधारपर अध्ययन कएल गेल अछि। अध्याय स्वयं कहैत अछि जे आरम्भिक मंगलाचरणसँ अन्तिम पुष्पाञ्जलि धरि पूर्ण पाठ उपलब्ध भेलापर मात्र तर्कक अखण्ड प्रवाह, रूपक-विधान आ भाषिक नीति केँ आद्योपान्त जाँचब सम्भव भेल। एहि अध्यायक तर्क-मानचित्र विशेष सफल अछि: पहिल गुच्छ कारणता, अदृष्ट आ आत्माक नित्यता; दोसर प्रामाण्य, शब्दक अनित्यता आ सृष्टि-प्रलय; तेसर अनुपलब्धि, प्रमाण-मीमांसा आ शब्द-विमर्श; चारिम प्रमा आ ईश्वरक नित्य ज्ञान; पाँचम ईश्वर-साधक प्रमाण आ पुष्पाञ्जलि। एहि अध्यायमे मंगलाचरणक श्लेष, शान्त रसक अधीन तर्कवीर, अलङ्कार, औचित्य, वक्रोक्ति; पाश्चात्य पक्षमे तर्कप्रधान धर्मदर्शन, बाख्तिनीय बहुस्वरता, गादामरी क्षितिज-संगम, रूपवाद आ नव-समीक्षा; अनुवादशास्त्रमे नाइडा-न्यूमार्क, वेनुती-बर्मन, स्कोपस-टूरी; भाषा-शैलीमे पारिभाषिक शब्दावली आ लोक-कोष—सभक सुव्यवस्थित परीक्षण अछि। एहि अध्यायक सभसँ महत्त्वपूर्ण अकादमिक सद्गुण पद्धतिगत विनय अछि। अङ्ग्रेजी समानान्तर खण्ड स्पष्ट कहैत अछि जे अध्ययन लक्ष्य-पाठ—मैथिली अनुवाद—पर केन्द्रित अछि; संस्कृत मूलक पङ्क्ति-दर-पङ्क्ति मिलान एकर क्षेत्र नहि, अतः शब्दस्तरीय मूलनिष्ठाक अन्तिम प्रमाणपत्र देब सम्भव नहि। लक्ष्य-पाठक आन्तरिक संगति आ स्रोत-निष्ठा दू पृथक् कसौटी मानल गेल अछि। ई स्वीकारोक्ति एहि सम्पूर्ण पुस्तकक विद्वत्तापूर्ण विश्वसनीयता बढ़बैत अछि। अध्याय १० : सम्पूर्ण ग्रन्थक केन्द्रीय अनुसन्धानात्मक शिखर अध्याय १० एहि पुस्तकक सर्वाधिक सुव्यवस्थित, सर्वाधिक परिपक्व आ सर्वाधिक उपयोगी अकादमिक खण्ड अछि। ई वास्तवमे एकटा स्वतन्त्र शोधग्रन्थ जकाँ अछि। एहि अध्यायमे आधार-पाठ, शोध-निवेदन, शोध-सार, बीजशब्द, पद्धति, ऐतिहासिक-पाठपरम्परागत अवस्थिति, “कुसुमाञ्जलि” रूपक, पाँच मूल संशय, पाँचू गुच्छक तर्क, वाद-पद्धति, प्रमाणमीमांसा, अभाव-अर्थापत्ति-अनुपलब्धि, आत्मा-परमाणु-अदृष्ट-सृष्टि-प्रलय, पद-वाक्य-तात्पर्य-विधि, ईश्वरक स्वरूप, प्रतिपक्षसभक न्यायोचित प्रस्तुति, भारतीय काव्यशास्त्र, आधुनिक व्याख्याशास्त्र, तुलनात्मक दर्शन, अनुवाद-पद्धति, भाषा-शैली, सम्पादन-विन्यास, बारह प्रतिनिधि स्थल, मैथिली ज्ञान-परम्परामे कृतिक महत्त्व, निष्कर्ष, भावी शोध आ पाँच परिशिष्ट सम्मिलित अछि। एहि व्यापक विषयविन्यासक मूल रूप पुस्तकमे स्पष्ट अछि। पाँचू गुच्छक दार्शनिक एकता अध्याय १०क मुख्य उपलब्धि ई अछि जे ओ पाँच स्तबक केँ पाँच पृथक् निबन्ध नहि मानैत, एकटा आरोही तर्क-यात्राक रूपमे पढ़ैत अछि। पहिल गुच्छ कारणता, कर्मफल, आत्मा आ क्षणिकवादक समस्या सँ प्रारम्भ करैत अछि। दोसर प्रामाण्य, शब्द-अनित्यता आ सृष्टि-प्रलय द्वारा ज्ञान आ परम्पराक आधार जाँचैत अछि। तेसर ईश्वर-अभावक अनुमान, अनुमान-विरोधक आत्मविरोध, उपमान, शब्द, अन्विताभिधान, अर्थापत्ति आ अनुपलब्धिक समीक्षा करैत अछि। चारिम प्रमा, स्मृति आ ज्ञातता-विवाद द्वारा नित्य सर्वज्ञ ज्ञानक सम्भावना सुरक्षित करैत अछि। पाँचम कार्य, आयोजन, धृति, पद, प्रत्यय, श्रुति, वाक्य आ संख्या द्वारा सकारात्मक ईश्वरानुमान करैत अछि। पुस्तक स्वयं एहि अनुक्रमकेँ एही रूपमे संक्षेपित करैत अछि। अध्याय १० एहि दार्शनिक एकताकेँ सर्वाधिक स्पष्ट करैत अछि। एहि कारण पाठक केँ ई बुझाइत अछि जे ‘न्यायकुसुमाञ्जलि’क चरम “ईश्वर अछि” कहबाक घोषणा नहि, बल्कि ई प्रश्न अछि जे कारण, ज्ञान, भाषा, संख्या, प्रमाण आ नैतिक व्यवस्था कोन प्रकारक तत्त्वमीमांसा माँगैत अछि। तर्क-पद्धति पूर्वपक्ष केँ पूरा बलसँ उपस्थित करब, तकर परिणाम देखाएब, दोष चिह्नित करब, प्रतितथ्यात्मक परिस्थिति मानि ओकर परिणाम जाँचब आ अन्ततः आत्मविरोध धरि पहुँचेब—ई उदयनक पद्धतिक महत्त्वपूर्ण रूप अध्याय १० ठीक पकड़ैत अछि। विशेष रूपसँ चार्वाकक अनुमान-विरोध: जँ सभ अनुमान अस्वीकार्य, तखन अनुमानक अस्वीकार स्वयं कोना सर्वमान्य ठहरत? एहि प्रकारक व्यवहारिक आत्मविरोध आधुनिक पाठक लेल बहुत प्रभावी होइत अछि। अभाव आ अनुपलब्धि अभावक प्रतियोगी, अनुपलब्धिक स्वरूप, अर्थापत्तिक अनुमानमे अन्तर्भाव आ अनुपलब्धिक स्वतन्त्र प्रमाणत्वक अस्वीकार—ई सूक्ष्म प्रश्नसभ अध्याय १०मे व्यवस्थित अछि। एहिमे आधुनिक सरल भाषा उपयोगी अछि, मुदा मूल पारिभाषिक संस्कृत पदक समानान्तर सूची रहितय तँ शोधार्थी लेल आरो उपयोगी होइत। तत्त्वमीमांसा आत्माक स्थायित्व, अदृष्ट आ नैतिक कारणता, परमाणु आ सृष्टि-प्रलयक विवेचनक एकटा विशेष गुण ई अछि जे अध्याय आधुनिक विज्ञानसँ अनुचित एकरूपता करबाक विरुद्ध सावधानी सेहो देत अछि। अदृष्ट केँ “अज्ञात चमत्कार”क बदला कर्म आ फलकेँ जोड़निहार कारणसूत्रक रूपमे व्याख्यायित कएल गेल अछि; परमाणु-विचार केँ आधुनिक परमाणुविज्ञानक बराबर ठहराएब ऐतिहासिक भूल मानल गेल अछि। ई विवेक प्रशंसनीय अछि। भाषादर्शन पद, वाक्य, तात्पर्य, विधि, शब्दार्थ, वाक्यार्थ आ लेखकत्वक प्रश्न पुस्तकक अनुवादकीय परियोजनासँ प्रत्यक्ष जुड़ैत अछि। शब्दक स्वतन्त्र बोधशक्ति, तात्पर्यक भूमिका, वाक्यक अन्वय आ विधि-वाक्यक प्रेरणा—ई सभ केवल प्राचीन मिमांसा-विवाद नहि, अनुवादक दैनिक निर्णयक आधार सेहो बनैत अछि। परिशिष्ट पाँचू गुच्छक विषय-मानचित्र, तर्क-दोषक लघुकोश, चयनित पारिभाषिक शब्दकोश, शोधार्थी प्रश्नावली आ पाठ-स्रोत/उद्धरण-नीति—ई परिशिष्ट अध्याय १० केँ सामान्य आलोचना सँ विश्वविद्यालयीय अध्ययन-सामग्रीक स्तरपर लऽ जाइत अछि। भविष्यक संस्करणमे एहि परिशिष्टसभकेँ अझ विस्तारित कऽ पुस्तकक अन्तमे साझा शोध-उपकरणक रूपमे देल जाए तँ उपयोगिता बहुत बढ़त। अध्याय ११ : सम्पूर्ण मैथिली अनुवाद ई पुस्तकक केन्द्रबिन्दु अछि। पहिल दस अध्याय एहि पाठक चारूकात आलोचनात्मक परिधि निर्मित करैत अछि, मुदा पुस्तकक वास्तविक ऐतिहासिक मूल्य अध्याय ११मे निहित अछि। ४. सम्पूर्ण मैथिली अनुवादक पाँच फूलक गुच्छ: तर्कक अखण्ड यात्रा फूलक पहिल गुच्छ : कारणता, कर्म, सामर्थ्य, आत्मा आ क्षणिकवाद पहिल गुच्छ मंगलाचरणक विनय-पद्यसँ शुरू होइत अछि। तकर बाद जिज्ञासाक विषय, जिज्ञासाक आवश्यकता, विचारार्थ प्रतिज्ञा, “अकस्मात्” उत्पत्तिक सम्भावना, कारण-कार्य सम्बन्ध, सामान्य-विशेष कारण, अद्वैत आ सांख्यक कारणवाद, अदृश्य कारण, सामर्थ्य, अभावक कारणता, मीमांसक सामर्थ्य-सिद्धान्त, उत्पादित अथवा आरोपित सामर्थ्य, यज्ञक प्रभाव, कर्ताक संस्कार, न्यायमतक सामर्थ्य, सांख्य, चार्वाक, सार्वभौम क्षणभंगुरता, स्थायित्व आ कारणता—सभ क्रमशः आबैत अछि; अन्तमे प्रार्थना अछि। एहि गुच्छक मूल प्रश्न अछि: जगत् आ अनुभवमे नियमितता किएक अछि? “अकस्मात्” कहि कारणता सँ बचल जा सकैत अछि की नहि? कर्मक फल दूर भविष्य धरि कोना पहुँचैत अछि? आत्मा क्षणिक हो तँ स्मृति, संस्कार, नैतिक फल आ अनुभवक एकता कोना सम्भव? अनुवाद एहि कठिन तर्कक लेल प्रश्न–उत्तर शैलीक सुन्दर उपयोग करैत अछि। “जँ ई मानि ली तँ…”, “मुदा एतय आपत्ति होइत अछि…”, “एकर उत्तर…” सन मैथिली विन्यास न्यायशास्त्रक तकनीकी अनुक्रम केँ वाचिक शास्त्रार्थक सहजता दैत अछि। मंगलाचरणक द्वि-अर्थ खोलबाक निर्णय एतय पुनः विशेष स्मरणीय अछि। फूलक ताजगी, सुगन्ध, अमरता आ न्याय-सिद्धान्तक प्रमाणिकताक सम्बन्ध स्पष्ट करैत अनुवाद श्लेषक अर्थ-सम्पदा बचबैत अछि। फूलक दोसर गुच्छ : प्रामाण्य, शब्दक अनित्यता, सृष्टि आ प्रलय दोसर गुच्छ ज्ञानक प्रामाण्यक कारण सँ शुरू होइत अछि। यथार्थ ज्ञानक सत्यता बाह्य कारणसँ ज्ञात होइत अछि की स्वतः—ई प्रश्न न्याय-मिमांसक मतभेदक केन्द्र बनैत अछि। तकर बाद शब्दक अनित्यता सिद्ध करबाक प्रयास, शब्द-परम्परा, उच्चारण, रूपसामान्य, शिक्षक-शिष्य परम्परा, सृष्टि-प्रलय, धर्म-आचार-शिक्षाक क्रमिक ह्रास, स्मृति, अप्राप्य वैदिक विधान, प्रलयमे परम्पराक विच्छेद, नवसृष्टि आ कपिलादि ऋषिक सर्वज्ञता द्वारा शास्त्रप्रवर्तनक मतक आलोचना आबैत अछि। शब्दव्यक्ति अनित्य होइतहुँ अर्थसम्बन्ध परम्परासँ टिकि सकैत अछि—एहि भेदक विवेचन उल्लेखनीय अछि। ई गुच्छ पहिल गुच्छक कारणमीमांसासँ ज्ञानमीमांसा आ ब्रह्माण्डमीमांसादिस संक्रमण करैत अछि। बाह्य रूपेँ विषय बदलल बुझाइत अछि, मुदा अन्तर्सम्बन्ध स्पष्ट अछि: जँ परम्परा अनादि अखण्ड नहि, तँ ज्ञान-व्यवस्थाक पुनःस्थापनक प्रश्न उठैत अछि; ई प्रश्न आगाँ सर्वज्ञ नियामकक आवश्यकता दिस बढ़ैत अछि। भाषिक दृष्टिसँ ई गुच्छ पहिलक अपेक्षा अधिक सघन अछि। प्रामाण्य-विवेचनमे दीर्घ वाक्य पाठकक ध्यान माँगैत अछि। स्वयं आरम्भिक समीक्षा एहिठाम चयनात्मक वाक्य-विभाजन उपयोगी मानैत अछि। फूलक तेसर गुच्छ : नास्तिक अनुमान, चार्वाक, उपमान, शब्द, अन्वित अर्थ, अर्थापत्ति आ अनुपलब्धि तेसर गुच्छ ग्रन्थक प्रमाणमीमांसक केन्द्र अछि। ईश्वरक ज्ञान नहि होएबाक आधारपर अनस्तित्व सिद्ध करबाक तर्क, निषेधक प्रतियोगी, अवास्तविक वस्तु, ईश्वर-अभावक अन्य अनुमान, तकर प्रतिरक्षा-खण्डन, चार्वाकक अनुमान-विरोध, न्याय द्वारा अनुमानक औचित्य, उपमान, मीमांसक आ न्यायमतक मतभेद, वैशेषिक प्रत्यापत्ति, शब्द-प्रमाण, प्रभाकरक वैदिक–लौकिक वाक्यभेद, अन्वित अर्थ, सर्वज्ञ स्रष्टापर शब्दाधारित आपत्ति, अर्थापत्ति आ अनुपलब्धि—ई सभ एकहि बौद्धिक कड़ीमे आबैत अछि। एहि क्रमक सूची पुस्तकमे स्पष्ट अछि। ई गुच्छ अनुवादक लेल सभसँ कठिन क्षेत्रसभमे एक अछि, कारण “अनुपलब्धि”, “प्रतियोगी”, “विशेष्य”, “व्याप्ति”, “उपमान”, “बोधशक्ति” आदि पदक सूक्ष्म सीमासभ सामान्य पर्यायसँ बदलल नहि जा सकैत अछि। अनुवाद एतय मूल पद बचबैत मैथिली व्याख्यात्मक वाक्य रचैत अछि—ई सही नीति अछि। चार्वाकक स्वरकेँ हास्यास्पद बना देबाक बदला ओकर तर्क पूरा बलसँ देल गेल अछि। एही कारण उत्तरपक्षक विजय बौद्धिक रूपसँ विश्वसनीय बनैत अछि। बहुस्वरताक दृष्टिसँ पुस्तकक ई सर्वोत्तम स्थलसभमे एक अछि। फूलक चारिम गुच्छ : प्रमा, स्मृति आ ज्ञातता चारिम गुच्छ आकारमे अपेक्षाकृत छोट मुदा दार्शनिक वास्तुमे अत्यन्त निर्णायक अछि। ज्ञानक स्वरूप, मीमांसक मत, “ज्ञातता” नामक वस्तुगत धर्मक पक्षमे पहिल प्रमाण आ ओकर खण्डन, दोसर प्रमाण आ ओकर खण्डन—ई मुख्य प्रवाह अछि। एकर महत्त्व पाँचम गुच्छक पूर्वपीठिकाक रूपमे बुझल जाए। जँ ज्ञानक यथार्थता अनिवार्य रूपसँ नवज्ञान, ज्ञातता अथवा ज्ञानोत्तर बाह्य गुणपर निर्भर मानल जाए तँ ईश्वरक नित्य सर्वज्ञ ज्ञानपर कठिनाई उठैत। चारिम गुच्छ एहि बाधाकेँ हटबैत अछि। पुस्तकक समग्र विश्लेषण सेहो स्पष्ट करैत अछि जे चारिम गुच्छ ज्ञातता-खण्डन द्वारा सर्वज्ञक नित्य ज्ञानक वैधता सुरक्षित करैत अछि। अनुवादक दृष्टिसँ ई अंश बहुत सघन अछि। भविष्यक शोध-संस्करणमे “प्रमा”, “प्रामाण्य”, “ज्ञातता”, “विषयता”, “स्मृति” आदिक परिभाषा प्रथम प्रयोगक समय बगलमे देल जाए तँ पाठकीय भार घटत। फूलक पाँचम गुच्छ : ईश्वर-सिद्धिक आठ हेतु आ तर्कक भक्तिमय परिणति पाँचम गुच्छ सम्पूर्ण ग्रन्थक चरम अछि। ईश्वरक अस्तित्वक प्रमाण प्रस्तुत आ प्रतिरक्षित कएल जाइत अछि; आपत्ति आ प्रत्युत्तर होइत अछि; नास्तिकक शर्ताधारित प्रतितर्कक आत्मविरोध देखाओल जाइत अछि; परमाणुक प्रथम गति लेल चेतन कारण, विश्वधारण, पद, प्रत्यय, श्रुति, वाक्य, संख्या, विधि, आज्ञा, क्रियाप्रत्यय, प्रयत्न, फलसम्बन्ध, शास्त्रीय वचन, वैदिक शाखाक नामकरण, योगिक प्रत्यक्ष आ ईश्वरप्रत्यक्षक शास्त्रीय समर्थन धरि चर्चा पहुँचैत अछि। आठ प्रसिद्ध हेतु—कार्य, आयोजन, धृति, पद, प्रत्यय, श्रुति, वाक्य, संख्या—ग्रन्थक मुकुटमणि छथि। मुदा एहि आठकेँ आधुनिक अर्थमे आठ स्वतंत्र “वैज्ञानिक प्रमाण” कहब उचित नहि। ई न्याय-वैशेषिक तत्त्वमीमांसा, भाषादर्शन, ज्ञानमीमांसा आ वैदिक परम्पराक भीतर गढ़ल परस्पर सम्बद्ध अनुमान-समूह छथि। एहि आठ हेतुक संग्राहक श्लोक अछि: "कार्यायोजनधृत्यादेः पदात् प्रत्ययतः श्रुतेः। वाक्यात् संख्याविशेषाच्च साध्यो विश्वविदव्ययः॥" अर्थात् कार्यत्व, आयोजन, धृति-संहार, पद, प्रत्यय, श्रुति, वाक्य आ संख्याविशेष — एहि आठ मार्गसँ अविनाशी विश्वविद् (सर्वज्ञ) ईश्वरक सिद्धि कएल गेल अछि। (१) कार्यात्: संसार उत्पादित वस्तु (कार्य) अछि, जेना घट कुम्हारसँ बनैत अछि, तहिना संसारक सेहो एकटा सर्वज्ञ कर्ता होएबाक चाही। नास्तिकक आपत्ति जे कर्ता देहधारी होएबाक चाही, ताहिकेँ उदयनाचार्य "उपाधि" (अनावश्यक शर्त) मानि खण्डित करैत छथि — कार्यत्व सामान्य धर्म अछि, देहधारिता विशेष धर्म, आ ईश्वरक नित्य ज्ञान-इच्छा देहरहित कर्तृत्वकेँ सम्भव बनबैत अछि। (२) आयोजनात्: परमाणुसभक आदिम गति (जड़ वस्तुक गति सदिखन चेतनक प्रेरणासँ होइत अछि) क लेल एकटा चेतन, सर्वज्ञ प्रेरक चाही। (३) धृत्यादेः: ब्रह्माण्डक धारण (गुरुत्वाकर्षण-सन प्राकृतिक नियमक पाछाँ ईश्वरीय धारणकारी प्रयत्न) आ महाप्रलयक संहार-प्रक्रिया लेल चेतन कर्ता आवश्यक अछि। (४) पदात्: भाषा-संकेतक आदिम स्थापना, विशेषतः प्रत्येक सृष्टि-चक्रक आरम्भमे नव जीवसभकेँ भाषा सिखयबाक लेल एकटा आदि-गुरु चाही। (५) प्रत्ययतः: वेदक प्रामाण्य ओकर वक्ताक दोषरहितता सिद्ध करैत अछि, अतः एकटा पूर्णज्ञानसम्पन्न वक्ता चाही। (६) श्रुतेः: वेद वाक्य-समूह अछि, आ वाक्य-समूहक कोनो रचयिता अवश्य होइत अछि; अतीन्द्रिय सत्यक यथार्थ वर्णन केवल सर्वज्ञ ईश्वरे कऽ सकैत छथि। (७) वाक्यात्: वैदिक वाक्यक तात्पर्य वक्ताक अभिप्रायपर निर्भर करैत अछि, आ वेदमे प्रयुक्त प्रथम-पुरुष सर्वनामक सार्थकता एकटा स्वतन्त्र वक्ताक अस्तित्व माँगैत अछि। (८) संख्याविशेषाच्च: द्व्यणुक-त्र्यणुकक परिमाणक व्याख्या "अपेक्षा बुद्धि" (गणना-चेतना) क अस्तित्व माँगैत अछि, जे सृष्टिक आरम्भमे — जखन कोनो जीव नहि छल — केवल सर्वज्ञ ईश्वरक ओतहि सम्भव अछि। एहि पाँचम गुच्छक समापन वैदिक आज्ञा-विधिक दार्शनिक स्वरूप, योगिक प्रत्यक्षक सम्भावना आ ईश्वर-प्रार्थनासँ होइत अछि। एहि आठ प्रमाणक अनुक्रम स्वयं एकटा तार्किक स्थापत्य अछि — कार्यकारण-न्याय (cosmological), गतिशास्त्रीय (kinetic), भौतिक-नियमशास्त्रीय (sustenance-dissolution), भाषा-दार्शनिक (linguistic), ज्ञानमीमांसीय (epistemic), शास्त्र-प्रामाण्यमूलक (scriptural), वाक्यार्थमूलक (semantic) आ गणितीय-आणविक (numerical) — आठ भिन्न अनुशासनसँ एके निष्कर्ष दिस अभिसरण करैत अछि, जे उदयनाचार्यक तार्किक प्रतिभाक बहुआयामी विस्तारकेँ प्रमाणित करैत अछि। एकटा विशेष अनुवादकीय उपलब्धि “मूल पाठमे प्रयुक्त हेतु-पदसभक वैकल्पिक अर्थ”क पृथक् खण्ड अछि। जेना मंगलाचरणमे बहुअर्थता अलग-अलग खोलल गेल, तहिना अन्तिम गुच्छमे सेहो मूल पदक द्वितीय अर्थ-परत बचाओल गेल। पुस्तक एकरा “स्तरित निष्ठा”क उदाहरण मानैत अछि। समापनमे तर्क भक्तिमे रूपान्तरित होइत अछि। लेखकक कामना अछि जे एहि तर्क-पुष्पक सुगन्ध आस्तिक आ नास्तिक दुनू धरि पहुँचय; अन्ततः बौद्धिक पुष्पाञ्जलि ईश्वरकेँ समर्पित होइत अछि। अङ्ग्रेजी समानान्तर पाठ सेहो ई समापन, नास्तिकक लेल सद्बुद्धिक प्रार्थना, प्रभुमे मनक निमज्जन आ पाँच गुच्छक पुष्परूपक सँ समाप्त करैत अछि। एहि अन्तिम गतिमे ‘न्यायकुसुमाञ्जलि’क साहित्यिकता सर्वाधिक उजागर होइत अछि: तर्क अपनाकेँ नष्ट नहि करैत, बल्कि पुष्प बनिकऽ समर्पणमे परिणत होइत अछि। ५. विशिष्ट दार्शनिक मीमांसा: ज्ञान, ध्वनि, कारणता, प्रलय, कर्म आ परम्परा भारतीय दार्शनिक परम्परा अत्यन्त समृद्ध आ बहुआयामी अछि, जाहिमे सत्ता, ज्ञान, आ मोक्षक साधनसभपर सहस्राब्दीसँ गहन विमर्श होइत रहल अछि। एहि बौद्धिक मन्थनमे न्याय-वैशेषिक दर्शनक स्थान सर्वोपरि अछि, जे अपन तार्किक यथार्थवाद (Logical Realism) आ परमाण्विक बहुलवाद (Atomic Pluralism) लेल सम्पूर्ण विश्वमे ख्यात अछि। न्याय दर्शन मुख्य रूपेँ प्रमाणशास्त्र (Epistemology) पर केन्द्रित अछि, जखन कि एकर समानतन्त्र (Samanatantra) वैशेषिक दर्शन प्रमेयक (Ontology) सूक्ष्म विश्लेषण करैत अछि। दुनू दर्शनक अन्तिम उद्देश्य सांसारिक दुःखसँ पूर्ण निवृत्ति अर्थात् मोक्ष प्राप्त करब अछि, जे यथार्थ ज्ञानसँ सम्भव अछि। दशम शताब्दीक महान् दार्शनिक उदयनाचार्य द्वारा रचित 'न्यायकुसुमाञ्जलि' एक एहन कालजयी ग्रन्थ अछि, जाहिमे ईश्वरक अस्तित्व, ज्ञानक सत्यता, कार्य-कारण सम्बन्ध, आ सृष्टिक भौतिक नियमसभक विशद तार्किक व्याख्या कएल गेल अछि। उदयनाचार्यक ई ग्रन्थ नहि केवल न्याय दर्शनक आधारशिला अछि, अपितु ई बौद्ध दर्शन जकाँ नास्तिक मतसभक सशक्त खण्डन सेहो करैत अछि। ५.१ ज्ञानमीमांसा आ प्रमाणशास्त्रक सैद्धान्तिक पृष्ठभूमि ज्ञान (Cognition) कोना उत्पन्न होइत अछि, ओकर स्वरूप की अछि, आ ओकर सत्यता (Validity) क निर्धारण कोना होइत अछि, ई भारतीय दर्शनक एकटा अत्यन्त जटिल आ आधारभूत प्रश्न अछि। न्याय दर्शन, जे ज्ञान केँ विषय (Object) आ विषयी (Subject) दुनू सँ पृथक् एकटा प्रकाशक तत्त्व मानैत अछि, यथार्थवादक समर्थन करैत अछि। अद्वैत वेदान्त जतय ज्ञानक पारमार्थिक स्वरूपपर बल दैत अछि, ओतय न्याय दर्शन ज्ञानक व्यावहारिक आ तार्किक स्वरूपक गम्भीर मीमांसा करैत अछि। न्याय दर्शनक अनुसार ज्ञान अथवा प्रमिति यथार्थ अनुभूति अछि, जकरा 'प्रमा' कहल जाइत अछि। जे ज्ञान यथार्थ नहि अछि, ओ 'अप्रमा' (Invalid knowledge) अछि। ज्ञानक उत्पत्तिक लेल न्यायमे एकटा विशिष्ट मनोवैज्ञानिक आ तार्किक प्रक्रिया वर्णित अछि। बाह्य वस्तुक प्रत्यक्ष बोध तखन धरि सम्भव नहि अछि, जखन धरि इन्द्रियसभक सम्पर्क मन (Manas) सँ नहि हो, आ मनक सम्पर्क आत्मा (Self) सँ नहि हो। एहि प्रकार, इन्द्रिय-विषय सम्पर्क वस्तुतः मन-इन्द्रिय आ आत्मा-मन सम्पर्कक पूर्वकल्पना करैत अछि। मन एतय आत्मा आ इन्द्रियसभक बीच मध्यस्थक (Mediator) काज करैत अछि। दर्शनक नाम मुख्य सिद्धान्त स्वीकृत प्रमाणक सङ्ख्या न्याय दर्शन (प्राचीन) तार्किक यथार्थवाद (Logical Realism) प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द नव्य-न्याय (उदयनाचार्य आदि) नव्य-तर्कशास्त्र प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमान (४ प्रमाण) वैशेषिक दर्शन परमाण्विक बहुलवाद (Atomic Pluralism) प्रत्यक्ष, अनुमान (२ प्रमाण) ५.२ प्रामाण्यवाद: ज्ञानक सत्यताक दार्शनिक सङ्घर्ष ज्ञानमीमांसाक क्षेत्रमे प्रामाण्यक (Validity of Knowledge) सिद्धान्त पर भारतीय दर्शनमे एकटा पैघ विमर्श विद्यमान अछि। एहि विमर्शमे मुख्य रूपेँ दुइटा पक्ष अछि: अद्वैत वेदान्त आ मीमांसा द्वारा समर्थित 'स्वतः प्रामाण्यवाद' (Intrinsic Validity) आ न्याय दर्शन द्वारा स्थापित 'परतः प्रामाण्यवाद' (Extrinsic Validity)। स्वतः प्रामाण्य बनाम परतः प्रामाण्य अद्वैत वेदान्त आ मीमांसाक मन्तव्य अछि जे ज्ञान अपन सत्यता स्वयं प्रमाणित करैत अछि; जँ ज्ञान अछि, तँ ओ मूलतः सत्य अछि, जावत कोनो बाह्य बाधक तत्त्व ओकरा असत्य नहि प्रमाणित कऽ दे। ई 'स्वतः प्रामाण्यवाद' अछि। एकर विपरीत, न्यायक 'बाह्य प्रामाण्यवाद' (परतः प्रामाण्यवाद) क अनुसार, कोनो ज्ञानक सत्यता (प्रामाण्य) आ ओकर सत्यताक बोध स्वयं ज्ञानक कारणसभसँ नहि, बल्कि बाह्य परिस्थिति आ कारणसभपर निर्भर करैत अछि। न्याय ई बात केँ खण्डित करैत अछि जे ज्ञान स्वतः सत्य होइत अछि। न्यायक तर्क अछि जे ज्ञानक प्रामाण्य ओकर 'विषयानुरूपता' अछि—अर्थात् जेना वस्तु अछि, ओकरा ओहिने रूपमे जननाइ सत्य अछि। ज्ञान नवीन हो, इन्द्रिय द्वारा उत्पन्न हो, वा पहिने अज्ञात वस्तु केँ जाने, ई सभ शर्तसभ सत्यताक लेल अनिवार्य नहि अछि। सत्यताक अन्तिम कसौटी 'कारण-सम्बन्ध' पर आधारित अछि। ज्ञानक सत्यता सिद्ध करबाक लेल न्याय दर्शन अनुमानक सहारा लैत अछि। एतय अनुमानक मुख्य हेतु (मध्यपद) अछि— "सफल कर्मप्रवृत्ति उत्पन्न करबाक कारण होएब"। अर्थात्, जे ज्ञान व्यक्ति केँ कोनो वस्तु दिस प्रवृत्त करैत अछि आ ओ प्रवृत्ति जँ सफल होइत अछि, तँ ओ ज्ञान सत्य मानल जाइत अछि। अन्योन्याश्रय दोष आ स्मृति-संस्कारक मनोवैज्ञानिक तन्त्र जँ ज्ञानक सत्यता 'सफल प्रवृत्तिक कारणता' सँ अनुमानित होइत अछि, तँ एतय एकटा गम्भीर तार्किक सङ्कट—'अन्योन्याश्रय दोष' (Circularity/Mutual Dependence)—उत्पन्न होइत अछि। प्रतिपक्ष तर्क दैत अछि जे साध्य (ज्ञानक प्रामाण्य) आ हेतु (सफल प्रवृत्तिक कारणता) एकहि भऽ जाइत अछि, कारण प्रवृत्तिक सफलता स्वयं ज्ञानक सत्यतापर निर्भर करैत अछि। ज्ञानक प्रामाण्य ओहि मध्यपद द्वारा सिद्ध कएल जा रहल अछि, जकर मध्यपदत्व स्वयं प्रामाण्यपर निर्भर अछि। एहि दोष सँ बचाव करबाक लेल न्याय एकटा सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक आ तार्किक व्यवस्था प्रस्तुत करैत अछि। न्याय कहैत अछि जे "सफल प्रवृत्तिक कारणता" कोनो सामान्य जातिगत धर्म नहि अछि। प्रत्येक सत्य ज्ञान अपन-अपन सफल प्रवृत्तिक विशिष्ट कारण होइत अछि; एही व्यक्तिगत कारणताक आधारपर ओहि ज्ञानक सत्यता अनुमानल जाइत अछि। मुदा एकटा व्यावहारिक समस्या अछि—जखन धरि प्रवृत्तिक फल (सफलता) प्राप्त होइत अछि, तखन धरि मूल ज्ञान (जे क्षणिक होइत अछि) नष्ट भऽ चुकल रहैत अछि। तखन ई कारण-सम्बन्ध कोना ज्ञात होइत अछि? एकर उत्तर 'स्मृति' (Memory) आ 'संस्कार' (Mental Impression) क मनोवैज्ञानिक तन्त्रमे निहित अछि। जखन मूल ज्ञान नष्ट भऽ जाइत अछि, तखन ओ चेतनामे अपन एकटा 'संस्कार' वा स्मृतिरूप छाप छोड़ि जाइत अछि। जखन कार्य सफल होइत अछि, तखन ओ छाप मूल ज्ञानक स्मृति केँ जाग्रत करैत अछि; एहि स्मृतिक माध्यमसँ व्यक्ति बुझैत अछि जे "ई ज्ञान सफल प्रवृत्तिक कारण छल"। एहि सिद्धान्त केँ 'धरतीपन' (Earthhood) आ गन्ध (Smell) क उदाहरणसँ स्पष्ट कएल गेल अछि। जँ ककरो ई सिद्ध करबाक अछि जे कोनो वस्तु भौतिक धरती-तत्त्व अछि, तँ पहिने ओकर विशेष धर्म 'गन्ध' क अनुभव कएल जाइत अछि। तकर बाद पूर्व अनुभूत वस्तुसभक संस्कारसँ स्मृति जाग्रत होइत अछि, जे ई सिद्ध करैत अछि जे वर्तमान वस्तु सेहो ओही धरतीपन सँ सम्बन्धित अछि जाहिमे गन्ध रहैत अछि। एतय ई ध्यातव्य अछि जे प्रत्यभिज्ञान (पहचान) वा स्मृति कोनो दुइ अलग प्रकृति क ज्ञानक मिश्रण नहि अछि। "ई ओही घट अछि जे हम पहिने देखल छल"—एहि ज्ञानमे वर्तमान प्रत्यक्ष आ पुरान स्मरण दुनू एक मानसिक निष्कर्षमे जुड़ैत अछि, मुदा दुनूक अपन अलग-अलग कारणशर्तसभ होइत अछि। वर्तमान ज्ञान वा केवल संस्कार जकाँ अतिरिक्त शर्तसभ द्वारा ही आत्मज्ञान प्रत्यक्ष अथवा स्मरणात्मक बनैत अछि। न्यायक आन्तरिक प्रामाण्यवाद-विरोधी मुख्य तर्क ई अछि जे ज्ञानक प्रामाण्यपर बारम्बार संशय उठैत अछि। मुदा, न्याय कहैत अछि जे सभ आत्मानुभूत ज्ञानक प्रामाण्यपर संशय करब आत्मघाती अछि। जँ कोनो आत्मज्ञान सत्य नहि अछि, तँ संशयक उपस्थिति सेहो सत्य नहि भऽ सकैत अछि। जँ संशय केँ सत्य मानल जाए, तँ ओकरा जननिहार आत्मज्ञानक प्रामाण्य सेहो मानए पड़त। ई तर्क अद्वैत वेदान्त जकाँ दर्शनसभक लेल एकटा तगड़ा चुनौती प्रस्तुत करैत अछि। तुलनाक बिन्दु स्वतः प्रामाण्यवाद (अद्वैत/मीमांसा) परतः प्रामाण्यवाद (न्याय दर्शन) ज्ञानक सत्यताक आधार ज्ञानक निज स्वरूपमे अन्तर्निहित। बाह्य परिस्थिति आ सफल प्रवृत्ति पर निर्भर। संशयक स्थिति ज्ञान स्वयं संशय-रहित होइत अछि, बाधक तत्त्व बादमे आबैत अछि। संशय सम्भव अछि, जकरा दूर करबाक लेल अनुमानक आवश्यकता होइत अछि। कारणताक सिद्धान्त सत्यताक लेल कोनो बाह्य कारणक आवश्यकता नहि। स्मृति आ संस्कार द्वारा कारणता स्थापित होइत अछि। ५.३ न्यायक अनुमान-प्रक्रिया न्याय दर्शन ज्ञानक सत्यता केँ स्थापित करबाक लेल अनुमान (Inference) क जे पञ्चावयव (Five-part syllogism) प्रस्तुत करैत अछि, ओ भारतीय तर्कशास्त्रक मेरुदण्ड अछि। एकर पाँचटा अङ्ग अछि: १. प्रतिज्ञा (Pratijna) - जेना, "ई पहाड़ अग्निमान अछि" (Parvatovahniman)। २. हेतु (Hetu) - जेना, "कारण ओतय धूआँ अछि" (Dhumat)। ३. उदाहरण (Udaharana) - जेना, "जतय-जतय धूआँ अछि, ओतय-ओतय अग्नि अछि, जेना चुल्हा" (Yatra yatra dhoomah, tatra tatra vahnih)। ४. उपनय (Upanaya) - जेना, "ई पहाड़ सेहो ओहिने अछि" (Tatha chaasau)। ५. निगमन (Nigamana) - जेना, "ताहि कारण ई पहाड़ अग्निमान अछि" (Tasmat tatha)। एही सूक्ष्म तार्किक ढाँचाक आधारपर न्याय दर्शन ईश्वर, ज्ञानक सत्यता, आ जगत्-प्रपञ्चक व्याख्या करैत अछि। नव्य-न्याय (Neo-Logic) क संस्थापक गङ्गेश उपाध्याय अपन ग्रन्थ 'तत्त्वचिन्तामणि' मे एहि तार्किक प्रणालीक चरम विकास केलनि, जे न्यायकुसुमाञ्जलिक सिद्धान्तसभसँ गहिर रूपेँ प्रभावित अछि। ५.४ शब्द आ ध्वनिक भौतिकी न्याय-वैशेषिक परम्परामे भौतिकी (Physics) आ तत्त्वमीमांसा (Ontology) क बीच घनिष्ठ सम्बन्ध अछि। शब्द आ ध्वनिक उत्पत्तिक विश्लेषण केवल भौतिकीक विषय नहि अछि, अपितु ई मीमांसा दर्शनक 'जातिशक्तिवाद' (Jatishaktivada) क खण्डनक लेल सेहो आवश्यक अछि। मीमांसक सभक माननाइ अछि जे शब्द आ जाति (Universals) नित्य अछि आ ओहिमे अर्थ प्रकट करबाक शाश्वत शक्ति होइत अछि। ओ तर्क दैत छथि जे जेना अनित्य वस्तुसभक विनाशक कारण देखल जाइत अछि, तेना शब्दक विनाशक कोनो कारण नहि भेल करैत अछि, ताहि लेल शब्द नित्य अछि। मुदा न्याय दर्शन एहि सिद्धान्त केँ पूर्ण रूपेँ अस्वीकार करैत अछि। आकाश, कम्पन, आ ध्वनिक सम्बन्ध न्याय दार्शनिकसभक अनुसार, ध्वनि (Sound) अनित्य अछि आ ई आकाशक (Space/Ether/Akasha) गुण अछि। वाद्ययन्त्र (Instrument), जेना वीणा, बाँसुरी, वा मृदङ्ग, स्वयं ध्वनिक आश्रय नहि अछि। साधारण जनमानसक भाषामे हम कहैत छी जे "वीणा वा बाँसुरी बज रहल अछि" वा "वाद्ययन्त्र ध्वनियुक्त अछि", मुदा दार्शनिक अर्थमे वाद्ययन्त्र केवल ध्वनि उत्पन्न करबाक गतिविधि (कम्पन वा Vibration) क स्रोत मात्र अछि। वाद्ययन्त्र निमित्त कारण अछि, मुदा ध्वनिक समवायी कारण वा वास्तविक आश्रय आकाश अछि। जखन कोनो व्यक्ति दूरसँ ध्वनि नहि सुनि पाबैत अछि, तखन एकर अर्थ ई नहि जे ध्वनि सर्वव्यापक अछि आ केवल श्रवण नहि भऽ रहल अछि; एकर अर्थ अछि जे श्रवणेन्द्रिय (कान) आ ध्वनिक कारण-समूहक बीच कोनो बाधक तत्त्व उपस्थित अछि वा श्रवणेन्द्रियमे दोष अछि। "सुनाइ नहि पड़ब = ध्वनि विद्यमान नहि" ई नियम सार्वत्रिक नहि अछि, बल्कि ई कारणसमूहक भेद केँ बुझावैत अछि। ध्वनिक 'विनाश' आ 'अत्यन्ताभाव' क तार्किक भेद जखन वाद्ययन्त्र बजाएब बन्द कऽ देल जाइत अछि, तखन ध्वनि रुकि जाइत अछि। एतय मीमांसक प्रश्न उठा सकैत अछि जे वाद्य बन्द भेलापर ध्वनिक की होइत अछि? की ओ सर्वदाक लेल सुप्त भऽ जाइत अछि? न्याय दर्शनक तर्क अछि जे जँ ध्वनि नष्ट नहि होइत, आ केवल अश्राव्य (inaudible) भऽ जाइत, तखन वाद्य बन्द भेलो पर अनन्त पुरान ध्वनिसभ आकाशमे कतहु न कतहु विद्यमान मानए पड़त—जकर कोनो प्रमाण नहि अछि। एतय न्याय दर्शन 'विनाश' (Dhvamsa) आ 'अत्यन्ताभाव' (Absolute Non-existence) क बीच स्पष्ट अन्तर करैत अछि। अत्यन्ताभाव कालसीमाहीन होइत अछि—ई अपन आश्रयमे सदिखन रहैत अछि (जेना- आकाशमे रूप वा रङ्गक अत्यन्ताभाव)। मुदा जखन वाद्य बन्द होइत अछि, तखन जे अभाव उत्पन्न होइत अछि ओ 'विनाश' (प्रध्वंसाभाव) अछि, अर्थात् जे वस्तु पहिने छल आ आब समाप्त भऽ गेल। जँ वाद्यमे ध्वनिक 'अत्यन्ताभाव' सिद्ध कएल जाए, तँ एखने समाप्त भेल ध्वनिक 'विनाश' सिद्ध नहि भऽ सकत, आ ई अनुमान साध्याभाव दोषमे पड़ि जाएत। पुनः, कोनो वस्तुक नाश सर्वदा ओतय होइत अछि जतय ओकर वास्तविक आश्रय होइत अछि। जेहेतु ध्वनिक आश्रय आकाश अछि, यन्त्र नहि, ताहि कारण ध्वनिक विनाश सेहो आकाशेमे होइत अछि। कम्पन रुकि जेनाइ कारण-कार्य सम्बन्धक आधारपर ध्वनिक अभाव सिद्ध करैत अछि। ई दार्शनिक विश्लेषण योग दर्शन आ अन्य तान्त्रिक परम्परासभक ध्वनिक अवधारणासँ सेहो सम्वाद करैत अछि। योग दर्शनमे पतञ्जलि 'ॐकार' (Pranava) केँ एकटा सार्वभौमिक प्रतीक वा समस्त ध्वनिसभक आधार (norm or matrix of all kinds of sounds) मानैत छथि, जकर ध्यानसँ समाधि प्राप्त होइत अछि। वैदिक परम्परासभमे तँ ध्वनिक कम्पन (sound vibrations) आ मानसिक शक्ति (hypnosis) सँ शारीरिक चिकित्सा धरिक प्रभाव मानल गेल अछि। मुदा न्याय दर्शन ध्वनिकेँ केवल एकटा भौतिक गुणक रूपमे विश्लेषित करैत अछि, जे कार्य-कारणक बन्धनमे अछि। ५.५ तत्त्वमीमांसा आ सृष्टिविज्ञान: कार्य-कारण सिद्धान्त आ परमाणुवाद न्याय-वैशेषिक दर्शन पूर्णतः यथार्थवादी अछि आ ई मानैत अछि जे विश्वक प्रत्येक परिवर्तन 'कार्य-कारण सम्बन्ध' (Law of Causality) सँ नियन्त्रित अछि। ई दर्शन परमाणुवाद (Atomism) क पक्का समर्थक अछि, जाहिमे ब्रह्माण्डक मूल उपादान कारण (Material Cause) नित्य परमाणुसभ केँ मानल गेल अछि। परमाणु, अवयवी, आ आकस्मिक कारणता न्याय दर्शनक अनुसार, कोनो सेहो कार्य (Effect) वा सृजन विशिष्ट कारण-समूहक उपस्थितिसँ उत्पन्न होइत अछि आ ओहि कारण-समूहक अभावमे समाप्त भऽ जाइत अछि। कारण उपस्थित हो तँ प्रभाव उत्पन्न, कारण अनुपस्थित हो तँ प्रभाव अनुपस्थित—ई विश्वक सामान्य नियम अछि। प्रतिपक्षक ई तर्क जे कोनो कार्यक उत्पत्ति वा विनाश केवल मानव अनुभवक प्रयोजनपर निर्भर अछि, न्याय द्वारा अमान्य कएल गेल अछि। न्याय निद्रामे चलैत श्वास-प्रश्वासक उदाहरणसँ ई सिद्ध करैत अछि जे निद्रामे सुतनिहार व्यक्ति ओकर उपयोगक चेतना नहि रखैत अछि, मुदा श्वास चलैत रहैत अछि। अर्थात्, उपयोग वा चेतना नहि रहितो भौतिक कार्य-कारण नियम ब्रह्माण्डमे सक्रिय रहैत अछि। जँ उत्पादक कारणसभ नित्य आ सदा समान रूपेँ सक्रिय होइत, तँ प्रभाव सेहो नित्य होइत आ ओकर समय-विशेषमे उत्पत्ति असम्भव भऽ जाएत। मुदा सृष्टि परिवर्तनशील अछि। द्वयणुक (Diatoms) सँ लऽ कऽ सूक्ष्मतम जीव आ विशालतम ब्रह्माण्ड धरि समस्त विश्व कार्य-कारण नियमक अधीन अछि। ताहि कारण, ई मानए पड़त जे कारण-समूहक एकत्रीकरण आ विघटन आकस्मिक (Contingent) अछि, नित्य नहि। परमाणु (Paramanu) नित्य अछि, मुदा परमाणुसभक संयोगसँ बनल 'अवयवी' (Composite whole) पूर्णतः अनित्य आ विनाशी अछि। प्रलय (Cosmic Dissolution) आ अपरिहार्य विनाश जखन ब्रह्माण्ड अपन जीवन-चक्र पूर्ण कऽ लैत अछि, तखन समस्त ब्रह्माण्ड परमाण्विक अवस्थामे विघटित भऽ जाइत अछि। एहि अन्तिम अवस्था केँ दर्शनमे 'प्रलय' (Dissolution) कहल जाइत अछि। प्रलयक समयमे समस्त परमाणु एक-दोसरसँ पृथक् भऽ जाइत अछि आ सृष्टिक पूर्ण अन्त होइत अछि। यद्यपि, प्रलयमे परमाणु नष्ट नहि होइत अछि, केवल हुनकर संयोजन (संयोग) टुटि जाइत अछि। न्यायक प्रबल तर्क अछि जे जखन मूल आधार (परमाणु) विघटित भऽ गेल, तखन कोनो सेहो सजीव वा निर्जीव वस्तु अपन संयुक्त (अवयवी) रूपमे कोना बचि सकत? ओ सभ पूर्णतः विघटित होएबाक लेल बाध्य अछि। एहि अपरिहार्य विनाश (Inescapable destruction) केँ स्पष्ट करबाक लेल 'न्यायकुसुमाञ्जलि' मे तीनटा अत्यन्त सटीक आ व्यावहारिक दृष्टान्त देल गेल अछि: दृष्टान्त (Analogy) विनाशक कारण (Cause of Destruction) परिणाम (Consequence) उदुम्बर फल आ मक्खी क्रुद्ध बानर द्वारा फल (जे आश्रय अछि) केँ खा लेब। फलक भीतरक मक्खीसभक अनिवार्य विनाश होइत अछि। वृक्षक छिद्रमे कीड़ा वृक्षमे प्रचण्ड अग्नि लागब। कीड़ासभ वृक्षक सङ्गे भस्म भऽ जाइत अछि। जहाजमे एकत्र यात्री प्रलयकालीन समुद्री अग्निक भड़कनाइ। सभ यात्रीसभ जहाजक सङ्गे नष्ट भऽ जाइत छथि। ई दृष्टान्तसभ ई निर्विवाद रूपेँ सिद्ध करैत अछि जे उचित विनाशकारी कारण उपस्थित भेला पर, अवयवी जगत् (Composite world) अपन आधारसभक विनाशसँ ककरो स्थितिमे बचि नहि सकैत अछि। ईश्वरक अस्तित्वक तार्किक सिद्धि प्रलय आ अवयवी विनाशक ई सम्पूर्ण तार्किक शृङ्खला न्याय दर्शनक लेल मात्र भौतिक विज्ञान नहि, अपितु ईश्वर-सिद्धि (Teleological Argument) क एकटा प्रमुख आधार अछि। जँ प्रलयक बाद सभ परमाणु पूर्णतः अलग भऽ गेल अछि, तखन पुनः सृष्टिक लेल हुनका सभमे 'आद्य गति' (Initial Motion), द्वित्व (Dyadic combination) आ संयोग कोना उत्पन्न होएत?। अचेतन आ जड़ परमाणु स्वयं सँ गति नहि कऽ सकैत अछि। एतय उदयनाचार्य एकटा चेतन अभिकर्ता (Conscious Agent) क अनिवार्यता सिद्ध करैत छथि, जकरा ईश्वर कहल गेल अछि। गङ्गेश उपाध्याय सेहो अपन 'तत्त्वचिन्तामणि' मे एहि विषयक विस्तार करैत स्पष्ट करैत छथि जे पृथ्वी आ भौतिक वस्तुसभ कार्य अछि, अतः हुनकर एकटा चेतन कारण (ईश्वर) होएबाक चाही। अचेतन परमाणुसभक संयोग आ वियोग बिना कोनो चेतन नियन्त्रकक सम्भव नहि अछि। ई तर्क पाश्चात्य दर्शनक 'Unmoved Mover' वा 'First Cause' सिद्धान्त सँ गहिर दार्शनिक समानता रखैत अछि। ५.६ कर्म-सिद्धान्त, संस्कार आ मानवीय परम्पराक क्रमिक ह्रास न्याय दर्शन भौतिक जगत् (परमाणु) सँ आगाँ बढ़ि मनोवैज्ञानिक आ नैतिक जगत् क सञ्चालनक सूक्ष्म विवेचन सेहो करैत अछि। जँ प्रलयक समय सभ अवयवी वस्तु नष्ट भऽ जाइत अछि, तखन पुनः सृष्टिकेँ आकार आ विविधता के दैत अछि? एकर उत्तर 'अदृष्ट' (Unseen force) वा 'कर्मफल' अछि। कर्म, अनुभव आ सन्तति समस्त सुख-दुःख आदिक अनुभव जीवक पूर्व सञ्चित 'कर्मफल' सँ उत्पन्न होइत अछि। यद्यपि जीवक अनुभव कर्मफलसँ होइत अछि, मुदा एकर कारण वस्तुसभक स्वाभाविक भौतिक कार्य-कारण सम्बन्ध खण्डित नहि होइत। बौद्ध दर्शनक 'कर्म-सन्तति' (karmic continuity) आ वेदान्तक संस्कारक अवधारणासभ सँ सहमति रखैत, न्याय सेहो ई मानैत अछि जे जीवक पूर्व जन्मक संस्कार आ कर्म प्रलयक बाद सेहो आत्मामे अदृष्ट रूपमे विद्यमान रहैत अछि। एही संस्कारक आधारपर अगिला सृष्टिमै जीवक भोगाधिकार (experiences) तय होइत अछि। कर्म एकटा एहन पारलौकिक नियम अछि जे व्यक्ति केँ अपन कार्यक उत्तरदायी बनबैत अछि आ जन्म-मरणक चक्र केँ सञ्चालित करैत अछि। युगानुरूप परम्परा आ आचारक ह्रास 'न्यायकुसुमाञ्जलि' मे केवल ब्रह्माण्डक भौतिक प्रलयक चर्चा नहि अछि, अपितु मानवीय सामाजिक आ सांस्कृतिक परम्परासभक क्रमिक पतनक (Devolution/Degradation) एकटा गहिर समाजशास्त्रीय-दार्शनिक चित्र सेहो प्रस्तुत कएल गेल अछि। कालक प्रवाहक सङ्ग (विभिन्न युगसभमे) जन्म, संस्कार, शिक्षा, अध्ययन-निष्ठा, आ कर्तव्यपालन क्रमशः क्षीण होइत जाइत अछि। एकर सभसँ ज्वलन्त उदाहरण सन्तानोत्पत्ति आ जन्म-परम्पराक पतनक रूपमे देल गेल अछि: अवस्था/युग सन्तानोत्पत्ति प्रक्रिया चारित्रिक विशेषता प्रथम अवस्था (प्राचीन काल) केवल मानसिक सङ्कल्प (Mental Resolve) सँ सन्तानक उत्पत्ति। शुद्ध इच्छाशक्ति आ चेतनाक चरम विकास। द्वितीय अवस्था माता-पिता द्वारा सन्तान पाबयक शुद्ध उद्देश्यसँ सम्भोग (Copulation)। कर्तव्य-प्रेरित आ धर्मसम्मत व्यवहार। तृतीय अवस्था कामवासना (Lust) सँ प्रेरित पति-पत्नीक अनिवार्य सहवास। शारीरिक आकर्षण प्रधान, मुदा वैवाहिक मर्यादामे। चतुर्थ अवस्था (वर्तमान काल) स्त्री-पुरुषक पशुवत् असंयमित आ उच्छृङ्खल सम्पर्क। देश, काल आ मर्यादाक पूर्ण क्षय; पाशविक प्रवृत्ति। एहि पतनक प्रभाव केवल जन्म-प्रक्रिया पर नहि, बल्कि गर्भाधान आ जन्म-संस्कारसभ (Sacraments) पर सेहो पड़ल अछि। पहिने गर्भवती स्त्री जे खाद्य-पदार्थ ग्रहण करैत छल, ओ सभ मन्त्र आ संस्कारपूर्वक पवित्र कएल जाइत छल। कालान्तरमे खाद्यक स्थानपर स्वयं गर्भवती स्त्रीक व्यक्तिगत संस्कार कएल जाए लागल, आ अन्त्यमे केवल गर्भमे पलैत भ्रूणक संस्कारक विधान शेष रहि गेल। ई विवरण स्पष्ट करैत अछि जे जेना भौतिक जगत् मे व्यवस्था सँ अव्यवस्था (Order to Disorder) दिस प्रवृत्तिक नियम अछि, तहिना सामाजिक-नैतिक जगत् मे सेहो चेतनाक स्खलन होइत अछि। विशुद्ध मानसिक धरातल सँ खसि कऽ पूर्णतः भौतिक-पाशविक धरातल पर आबब ई सिद्ध करैत अछि जे कर्म बन्धन जतबे गाढ़ होइत अछि, जीव ततबे जड़ता (Materialism) दिस बढ़ैत अछि। ५.७ अन्य दार्शनिक परम्परासभक सङ्ग अन्तःसम्बन्ध न्याय दर्शनक ई प्रस्थापनासभ शून्यमे विकसित नहि भेल अछि। एकर विकास अद्वैत वेदान्त, विशिष्टाद्वैत, मीमांसा, आ बौद्ध दर्शनक सिद्धान्तसभक एकटा गम्भीर प्रतिक्रिया आ प्रतिवादक रूपमे भेल अछि। अद्वैत वेदान्त आ बौद्ध दर्शन सँ विरोध अद्वैत वेदान्त (शङ्कराचार्यक दर्शन) मानैत अछि जे अन्तिमतः केवल एकटा ब्रह्म सत्य अछि, आ ई सम्पूर्ण जगत्, जीव, आ माया ओकरे विवर्त (Illusory manifestation) अछि। वेदान्तक लेल ज्ञाता, ज्ञान, आ ज्ञेयक त्रिपुटी (Triad of Knower, Knowledge, Object) केवल व्यावहारिक स्तर पर सत्य अछि, पारमार्थिक स्तर पर अद्वैतमे ई सभ विलीन भऽ जाइत अछि। ओतय न्याय पूर्णतः यथार्थवादी अछि। न्याय मानैत अछि जे ज्ञाता (आत्मा), ज्ञान (प्रमिति), आ ज्ञेय (विषय) पूर्णतः भिन्न आ वास्तविक सत्ता अछि। न्याय-वैशेषिकक जगत् मिथ्या वा माया नहि अछि, बल्कि परमाणुक यथार्थ संयोजन अछि। यद्यपि, अज्ञान सँ बन्धन आ यथार्थ ज्ञान सँ मोक्ष (अपवर्ग) प्राप्त होइत अछि, एहि विषयमे न्याय आ वेदान्त दुनू सहमत अछि। दोसर दिस, उदयनाचार्य आ अन्य न्याय दार्शनिकसभ बौद्ध चिन्तकसभक कड़ा आलोचना केलनि अछि। बौद्ध दर्शन वेदासभक प्रमाणिकता केँ अस्वीकार करैत अछि (नास्तिक दर्शन) आ आत्माक नित्यता (No-self) केँ नहि मानैत अछि। उदयनाचार्य अपन 'न्यायकुसुमाञ्जलि' आ 'आत्मतत्त्वविवेक' मे बौद्धसभक क्षणिकवाद आ अनीश्वरवादक तार्किक खण्डन केलनि, आ श्रुति (Vedas) क निन्दक मानि कऽ हुनका सभ केँ 'भ्रमित' धरि कहलनि। विशिष्टाद्वैत वेदान्तक परिप्रेक्ष्य आ समन्वय रामानुजाचार्य आ परवर्ती दार्शनिक वेदान्त देशिक द्वारा प्रवर्धित विशिष्टाद्वैत दर्शन, न्यायक बहुलांश तार्किक सिद्धान्तसभक आलोचनात्मक उपयोग करैत अछि। वेदान्त देशिक अपन प्रसिद्ध ग्रन्थ 'न्याय-सिद्धाञ्जन' (Nyaya-Siddhanjana) मे न्यायक प्रमेयसभ (Objects of valid knowledge) केँ विशिष्टाद्वैतक 'शरीर-शरीरी भाव' (Body-Soul relationship) क प्रकाशमे व्याख्यायित करैत छथि। विशिष्टाद्वैतमे, न्याय जकाँ ईश्वर केँ मात्र एकटा निमित्त कारण वा तार्किक अभिकर्ता (Logical Agent) नहि मानल गेल अछि। रामानुज ईश्वर केँ सर्वान्तर्यामी आ प्रकृतिकेँ ओकर 'शरीर' मानैत छथि। प्रलयक सम्बन्धमे विशिष्टाद्वैत सेहो मानैत अछि जे प्रकृतिक तत्त्व (अचेतन) आ जीव (चेतन) सूक्ष्म अवस्थामे ईश्वरक भीतर लीन भऽ जाइत अछि, जे न्यायक परमाण्विक विघटन सँ किञ्चित् भिन्न मुदा एकटा समानान्तर अवधारणा अछि। न्याय-सिद्धाञ्जनमे देशिक स्पष्ट करैत छथि जे पञ्चभूतमे शब्दक उत्पत्ति आ विनाश केवल इन्द्रिय-व्यापारक विनाश अछि, वर्ण-स्वरूपक नहि, जे रामानुजक सिद्धान्तसभसँ मेल खाइत अछि। ६. भारतीय साहित्यशास्त्रक कसौटी पर श्लेष आ वक्रोक्ति: मंगलाचरणक कौशल मंगलाचरणक विनय-पद्यमे द्विअर्थी (श्लिष्ट) शब्दसभक प्रयोगद्वारा न्याय-दर्शनक सिद्धान्तसभक तुलना फूलसभसँ कएल गेल अछि — "स्तबक" शब्दक अर्थ एके संग "फूलक गुच्छ" आ "ग्रन्थक अध्याय" दुनू होइत अछि। ई श्लेष केवल भाषिक क्रीड़ा नहि, कुन्तकक वक्रोक्तिजीवित-सिद्धान्तक अर्थमे "वैदग्ध्य-भङ्गी-भणिति" क उत्कृष्ट उदाहरण अछि, जतय तर्कशास्त्रीय कठोरता आ काव्यात्मक कोमलताक एक्के संग सह-अस्तित्व अछि। अनुवादकक लेल ई द्वि-क्षेत्रीय अर्थ (शीर्षक स्वयं द्वि-अर्थी) केँ मैथिलीमे सुरक्षित राखब एकटा वास्तविक अनुवाद-चुनौती छल, जकर समाधान अनुवादक व्याख्यात्मक टिप्पणीक सहारे कएने छथि। रस-विमर्श: शान्तक अंगीत्वमे अद्भुत आ वीरक संचरण काव्यप्रकाशक अनुसार दर्शन-प्रधान ग्रन्थमे शान्त रस अंगी (प्रधान) रहैत अछि, आ न्यायकुसुमाञ्जलिमे सेहो एहन्ने अछि। तर्क-विजयक उल्लासमे कतहु-कतहु वीर रसक झलक (जेना नास्तिक-मतक निर्णायक खण्डनक क्षणमे), आ ब्रह्माण्ड-रचनाक विराटताक वर्णनमे अद्भुत रस (जेना परमाणु-सृष्टिक वर्णनमे) अंगी शान्तक अंग बनि उपस्थित होइत अछि। मंगलाचरण, दुःख-मुक्तिक उल्लेख आ मोक्ष-वर्णनमे भक्ति-संवेदना प्रबल अछि, जे शान्त रसक भक्तिपरक उपशाखाकेँ पुष्ट करैत अछि। अनुवाद एहि रसात्मक स्तरकेँ यथासम्भव सुरक्षित रखबाक प्रयास करैत अछि, विशेषतः मंगलाचरण आ स्तबक-समापन-प्रार्थनासभमे। मानव-दुःखक चिन्तामे करुणाक सूक्ष्म स्पर्श सेहो एहि रसात्मक संरचनाकेँ व्यापक बनबैत अछि। ध्वनि-सिद्धान्त: वाच्यार्थसँ परे तर्कक अर्घ्य आनन्दवर्धनक ध्वनि-सिद्धान्तक दृष्टिसँ शीर्षक आ मंगलाचरण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि। "फूलक गुच्छ" (स्तबक) क रूपक केवल संरचनात्मक विभाजन नहि, अपितु व्यंजनाशक्तिद्वारा ई सूचित करैत अछि जे तर्क स्वयं एकटा उपासना अछि — तार्किक विजय ईश्वरक चरणमे अर्पित फूल जकाँ अछि। एहि प्रकार दार्शनिक ध्वनि (philosophical resonance) उत्पन्न होइत अछि, जतय वाच्यार्थ (शाब्दिक तर्क-प्रस्तुति) सँ परे व्यंग्यार्थ (भक्ति-भाव, समर्पण) प्रतिध्वनित होइत अछि। पुष्पगुच्छक रूपक तर्कसँ भक्तिदिस गमनक सूचक अछि — ग्रन्थक अन्तमे तर्क स्वयं प्रार्थनामे विलीन भऽ जाइत अछि। वक्रोक्ति आ अलंकार अनुवादमे उपमा (जेना कुदाल-चालकक दृष्टान्त, कुम्हार-घटक दृष्टान्त), रूपक (फूलक गुच्छक केन्द्रीय रूपक) आ व्यङ्ग्य (नास्तिक-मतक आत्म-विरोधी स्वरूपकेँ उजागर करैत विडम्बनात्मक स्वर) क सम्यक् प्रयोग भेल अछि। दृष्टान्त-प्रयोग (जेना धुआँसँ अग्निक अनुमान) अमूर्त न्याय-तर्ककेँ मूर्त, सुबोध बनबैत अछि, जे अनुमानक सौन्दर्यशास्त्रीय आयाम अछि। औचित्य-सिद्धान्त: क्षेमेन्द्रक कसौटी क्षेमेन्द्रक औचित्य-विचार-चर्चाक कसौटी पर परखला पर ई अनुवाद विषय, भाषा आ पाठकक बीच सामान्यतः उचित संगति राखैत अछि। दार्शनिक गाम्भीर्यक अनुकूल गद्य-लय, पारिभाषिक पदक संस्कृतनिष्ठता आ लोक-बोधगम्य दृष्टान्तक सन्तुलन — ई सभ द्विभाषिक पदावलीक (संस्कृत-तत्सम आ तद्भव मैथिली) एकटा सन्तुलित औचित्य-बोधकेँ प्रकट करैत अछि। तथापि किछु स्थान पर पारिभाषिक कठोरता (जेना "अभावक कारणता" जकाँ खण्डसभमे) सामान्य पाठकक लेल भार बनि जाइत अछि, जे औचित्यक एकटा सीमा अछि। रीति आ गुण अनुवादक प्रधान गुण प्रसाद अछि — स्पष्टता आ सुगमता, विशेषतः दृष्टान्त आ उदाहरणसभमे। खण्डनात्मक भागसभमे ओज गुणक उपस्थिति अछि, जतय समास-रहित, दृढ़ वाक्य-रचनाद्वारा तार्किक प्रहारक तीव्रता व्यक्त होइत अछि। मंगलाचरण, फूल-बिम्ब आ मोक्ष-वर्णनमे माधुर्य गुण प्रधान अछि। एहि तीन गुणक सन्तुलन ग्रन्थक त्रिविध स्वभाव (तर्क, खण्डन, भक्ति) क अनुरूप अछि। भाषा-लयक दृष्टिसँ ई वैदर्भी रीतिक निकट अछि, यद्यपि तर्क-सान्द्र खण्डसभमे कहीं-कहीं गौड़ी-सन सामासिक गहनता सेहो झलकैत अछि। ७. पाश्चात्य साहित्यिक आ व्याख्यात्मक सिद्धान्तक आलोकमे एहि आधुनिक सिद्धान्तसभकेँ उदयनाचार्यक ऐतिहासिक स्रोत नहि, आधुनिक पाठकीय व्याख्याक उपकरणक रूपमे ग्रहण कएल जाए—ई पद्धतिगत सावधानी आवश्यक अछि। अरस्तूवादी वक्तृत्वशास्त्र आ बौद्धिक नाट्य अरस्तूक रेटोरिकक दृष्टिसँ ग्रन्थक पूर्वपक्ष-उत्तरपक्ष-संरचना एकटा शास्त्रीय dialectical demonstration क रूप लैत अछि, जतय logos (तर्क), ethos (शास्त्र-वक्ताक प्रामाण्य) आ pathos (भक्ति-भाव) क त्रिविध अपील एकसाथ काज करैत अछि। रूसी रूपवाद आ अपरिचितीकरण श्क्लोव्स्कीक "ostranenie" (defamiliarization) क अवधारणा एतय लागू होइत अछि जखन उदयनाचार्य परिचित उदाहरणसभ (घट-कुम्हार, कुदाल-चालक) क माध्यमसँ अपरिचित तात्त्विक सत्यकेँ नव दृष्टिसँ देखबैत छथि — सामान्य वस्तुसभकेँ दार्शनिक तर्कक साधन बनाकऽ ओकरा नव अर्थ दैत छथि। नव-समीक्षा (New Criticism) आ आन्तरिक एकता नव-समीक्षात्मक निकट-पाठ (close reading) क दृष्टिसँ शीर्षक, मंगलाचरण आ तर्कक बीच एकटा जैविक (organic) सम्बन्ध देखल जा सकैत अछि — "फूल" केवल अलंकार नहि, अपितु सम्पूर्ण कृतिक संरचनात्मक एकता (organic unity) क केन्द्रीय बिम्ब अछि, जे आरम्भसँ अन्त धरि (मंगलाचरणसँ अन्तिम प्रार्थना धरि) व्याप्त अछि। संरचनावाद आ द्विपदी विरोध संरचनावादी दृष्टिसँ सम्पूर्ण ग्रन्थ आस्तिक/नास्तिक, चेतन/जड़, नित्य/अनित्य, कार्य/कारण जकाँ द्विपदी विरोधसभ (binary oppositions) क संरचनापर आधारित अछि, जे प्रत्येक स्तबकमे नव रूपमे प्रकट होइत छथि आ अन्ततः पञ्चम स्तबकमे एकटा उच्चतर संश्लेषण (सर्वज्ञ ईश्वर) मे विलीन भऽ जाइत छथि। बाख्तिनीय संवादवाद: शास्त्रार्थक बहुस्वरता बाख्तिनक "बहुस्वरता" (polyphony) आ "संवादवाद" (dialogism) क अवधारणा शास्त्रार्थ-परम्पराक स्वाभाविक व्याख्याकार अछि। ग्रन्थमे नैयायिक, मीमांसक, चार्वाक, बौद्ध, सांख्य आ वैशेषिकक स्वर एक्के पाठमे परस्पर संवाद करैत छथि, कोनो एक स्वर पूर्णतः दबल नहि अछि — प्रत्येक प्रतिपक्षकेँ पूर्ण न्यायपूर्ण प्रस्तुति देल जाइत अछि, तखने ओकर खण्डन होइत अछि। ई बहुस्वरता अनुवादमे सेहो सुरक्षित अछि। व्याख्याशास्त्र (Hermeneutics): श्लायरमाखर, गादामर आ क्षितिज-संगम गादामरक "क्षितिज-संगम" (fusion of horizons) क अवधारणाक अनुसार अनुवादक कर्म दू क्षितिज — उदयनाचार्यक एगारहम शताब्दीक संस्कृत-क्षितिज आ आजुक मैथिली पाठकक क्षितिज — क बीच सेतु बनबैत अछि। श्लायरमाखरक "अनुवादक या तँ पाठककेँ लेखक लग लऽ जाए वा लेखककेँ पाठक लग" वाला द्वैतमे प्रस्तुत अनुवाद संतुलित मार्ग अपनबैत अछि, न पूर्णतः विदेशीकरण न पूर्णतः देशीकरण। पाठक-प्रतिक्रिया सिद्धान्त: इज़रक रिक्त-स्थान वोल्फगांग इज़रक "रिक्त-स्थान" (Leerstellen/gaps) सिद्धान्तक अनुसार शीर्षक "फूलक अञ्जलि" स्वयं एकटा रिक्त-स्थान अछि, जकरा पाठक अपन व्याख्याद्वारा भरैत अछि — कि ई फूल तर्कक अछि, भक्तिक अछि, वा दुनूक? अनुवादक ई अनिश्चय (ambiguity) केँ जानि-बुझिकऽ सुरक्षित रखने छथि, जे पाठकीय संलग्नताकेँ बढ़बैत अछि। विखण्डनवाद (Deconstruction) क सम्भावना आ सीमा देरिदाक दृष्टिसँ देखल जाए तँ ग्रन्थक "उपाधि" (unwarranted condition) क अवधारणा स्वयं एकटा विखण्डनकारी औजार अछि — ई देखबैत अछि जे नास्तिक-तर्क अपन आधारभूत श्रेणीसभ (जेना देहधारिता) पर अत्यधिक निर्भर अछि, जकरा हटौला पर तर्क ढहि जाइत अछि। तथापि ग्रन्थक अन्तिम लक्ष्य (ईश्वर-सिद्धि) स्वयं एकटा केन्द्र-स्थापक (foundationalist) परियोजना अछि, अतः विखण्डनवादी पाठ केवल आंशिक रूपेँ लागू होइत अछि — ई सीमा स्वयं ध्यातव्य अछि। ८. आधुनिक अनुवाद-सिद्धान्तक आधार पर मूल्याङ्कन यूजीन नाइडाक औपचारिक बनाम गतिशील समानताक (formal vs. dynamic equivalence) कसौटीपर ई अनुवाद अधिकांशतः गतिशील समानतादिस झुकल अछि — पाठकक बोधगम्यताकेँ प्राथमिकता देल गेल अछि, यद्यपि पारिभाषिक पदसभमे औपचारिक निष्ठा सेहो सुरक्षित अछि। पीटर न्यूमार्कक अर्थप्रधान (semantic) आ संप्रेषणप्रधान (communicative) अनुवादक द्वैतमे ई अनुवाद दुनूक संतुलन खोजैत अछि — दार्शनिक पारिभाषिकतामे अर्थप्रधानता, आ दृष्टान्त-व्याख्यामे संप्रेषणप्रधानता। वर्मीरक स्कोपोस-सिद्धान्तक (उद्देश्य ही अनुवादक निर्णायक तत्त्व) दृष्टिसँ अनुवादक स्पष्ट उद्देश्य — मैथिली पाठककेँ शास्त्रीय दार्शनिक बहसमे सहभागी बनाएब — अनुवादक हरेक निर्णयकेँ न्यायसंगत ठहरबैत अछि। लॉरेंस वेनुतीक देशीकरण-विदेशीकरणक (domestication vs. foreignization) द्वन्द्वमे ई अनुवाद आंशिक विदेशीकरणक मार्ग अपनबैत अछि — संस्कृत पारिभाषिक पद (अदृष्ट, उपाधि, अभाव, प्रामाण्य) सुरक्षित रखल गेल अछि, जे मूल शास्त्रीय-सांस्कृतिक "अन्यता" (otherness) क आदर करैत अछि, जखन कि वाक्य-रचना आ दृष्टान्त-प्रस्तुतिमे देशीकरणक तत्त्व अछि — ई एन्तवान बर्मनक "विकृतिकरण-प्रवृत्ति" (deforming tendencies) क विरुद्ध सचेत सावधानीक परिचायक अछि। कैटफोर्डक अनुवाद-परिवर्तन (translation shifts) क दृष्टिसँ कारिकासँ गद्य-रूपान्तरण एकटा श्रेणी-परिवर्तन (category shift, विशेषतः "structure-shift") अछि, जे मूल कवितात्मक बन्धनकेँ शिथिल करैत अर्थ-स्पष्टताकेँ प्राथमिकता दैत अछि। गिडियोन टूरीक स्वीकार्यता-पर्याप्तता (acceptability vs. adequacy) क मानदण्डपर ई अनुवाद स्वीकार्यतादिस अधिक झुकल अछि, अर्थात् लक्ष्य-भाषा (मैथिली) क स्वाभाविक मानकसभक अनुसरण मूल-भाषाक रूपगत निष्ठासँ बेसी प्राथमिकता पबैत अछि। आन्द्रे लफ़ेव्रेक पुनर्लेखन-सिद्धान्त (rewriting) आ पॉलीसिस्टम-सिद्धान्तक दृष्टिसँ ई अनुवाद मैथिली साहित्यिक बहुतन्त्र (polysystem) मे एकटा नव उपतन्त्र — शास्त्रीय दार्शनिक गद्य — क स्थापना करैत अछि, जे विदेह-परम्पराक समानान्तर साहित्य-संस्था-विमर्शक अनुरूप अछि। जॉर्ज स्टाइनरक "आफ्टर बेबल" मे प्रस्तुत व्याख्यात्मक गति (hermeneutic motion — trust, aggression, incorporation, restitution) क चतुष्टयी प्रक्रिया एहि अनुवादमे स्पष्ट देखल जा सकैत अछि: मूल पाठपर विश्वास, तार्किक-आक्रमणपूर्वक अर्थ-निष्कर्षण, मैथिली गद्यमे समावेशन, आ अन्ततः दार्शनिक सन्तुलन-पुनर्स्थापन (restitution)। ९. अनुवाद-पद्धति, पारिभाषिकता, भाषा-शैली आ मैथिली ज्ञानगद्य ९.१ शाब्दिक अनुवाद नहि, व्याख्यात्मक शास्त्रीय अनुवाद ई पाठकेँ शाब्दिक अनुवाद कहब एकर स्वभाव गलत बुझब होएत। मूल कारिका, स्वोपज्ञ गद्य, दार्शनिक संकेत, तर्कक पूर्वापर सम्बन्ध आ आधुनिक पाठकक आवश्यकता मिलिकऽ मैथिलीमे विस्तारित रूप लैत अछि। पुस्तक स्वयं उचित रूपसँ एकरा “व्याख्यात्मक शास्त्रीय अनुवाद” मानबाक पक्षमे अछि। एहि पद्धतिक लाभ स्पष्ट अछि: पाठ पठनीय होइत अछि, तर्कक चरण देखाइत अछि, शास्त्रीय भूलभुलैयामे शीर्षक मानचित्रक काज करैत अछि। हानि ई जे मूल, स्वोपज्ञ भाष्य, अनुवादक स्पष्टीकरण आ सम्पादकीय टिप्पणीक सीमा कतहु धुँधली भऽ सकैत अछि। ताहि लेल आलोचनात्मक संस्करणमे चार स्तर स्पष्ट होयबाक चाही: मूल संस्कृत; निकट मैथिली अनुवाद; प्रवाहपूर्ण व्याख्यात्मक मैथिली; सम्पादकीय टिप्पणी। पुस्तकक अपन आलोचना सेहो एही पृथक्करणक आवश्यकता स्वीकार करैत अछि। ९.२ नव्य-न्याय पारिभाषिकता आ शब्दनीति न्यायकुसुमाञ्जलि प्राचीन न्यायसँ नव्य-न्यायक संक्रमण-बिन्दु पर अछि, आ अनुवादमे एहि संक्रमणकालीन पारिभाषिकताक — अभाव, प्रतियोगी, उपाधि, व्याप्ति, अपेक्षा-बुद्धि, ज्ञातता, अन्वितार्थ, अभिहितान्वय आदि पद — सम्यक् मैथिलीकरण कएल गेल अछि। "उपाधि" जकाँ पारिभाषिक शब्दक व्याख्या करैत अनुवादक एकर आधुनिक तार्किक तुल्य ("unwarranted condition") सेहो कोष्ठकमे देल छथि, जे शास्त्रीय आ आधुनिक तर्कशास्त्रक बीच सेतु बनबैत अछि। उदयनसँ गंगेश धरिक वैचारिक निरन्तरताक दृष्टिसँ ई अनुवाद उपाधि-निरूपण, अभावक कारणता आ अन्वितार्थवाद-अभिहितान्वयवादक द्वन्द्व — नव्य-न्यायक तीनू केन्द्रीय अवधारणाक बीजकेँ यथोचित उजागर करैत अछि। यद्यपि एकटा समर्पित पारिभाषिक शब्दकोश आ तुलनात्मक-सारणीक अभाव शोधार्थीक लेल एकटा सीमा रहि जाइत अछि। अनुवादक सभसँ उचित निर्णय ई कएने छथि जे न्यायशास्त्रक मूल तकनीकी पदसभकेँ जबरदस्ती सामान्य मैथिली पर्यायसँ बदलल नहि गेल। हेतु, साध्य, व्याप्ति, उपाधि, समवाय, प्रतियोगी, प्रामाण्य, उपमान, शब्द-प्रमाण, अभाव आदि पदक ऐतिहासिक परिभाषा अछि; ओकरा बदलला पर सरलता तँ आबि सकैत अछि, मुदा दार्शनिक सटीकता नष्ट होएत। एकर चारूकात मैथिली वाक्यरचना बनाओल गेल अछि। पुस्तक एहि उपलब्धिकेँ जटिल प्रतिपक्ष, विकल्प, हेतु, साध्य, व्याप्ति, उपाधि, अभाव, प्रमाण आ शब्दार्थ-विचार लेल आधुनिक मैथिली बौद्धिक गद्यक निर्माण मानैत अछि। ९.३ लोक-कोष आ शीर्षक-प्रणाली “खरहाक सींग”, “भँवरा”, “गङ्गामे गोठ” सन रूप अनुवादकेँ जीवित रखैत अछि। ई देशीकरण मात्र नहि; ई दार्शनिक अमूर्तताकेँ स्थानीय अनुभूतिक दृश्य धरातल दैत अछि। प्रत्येक जटिल तर्कक आगाँ स्पष्ट मैथिली शीर्षक एहि अनुवादक महान सम्पादकीय उपलब्धि अछि। मूल शास्त्रीय पाठक निरन्तर गद्य-पद्य जालमे आधुनिक पाठक हेरा सकैत छल; शीर्षक तर्कक दिशा बतबैत अछि। पूर्ण अध्ययन सेहो एहि शीर्षक-चिह्नित धारावाहिक गद्यकेँ प्रमुख उपलब्धि मानैत अछि। ९.४ दीर्घ वाक्य, पठनीयता आ लक्षित पाठक किछु प्रामाण्य, अन्वितार्थ, ज्ञातता आ अनुमान-खण्डमे वाक्य बहुत उपवाक्य वहैत अछि। ई केवल अनुवादक दोष नहि; मूल शास्त्रीय तर्कक प्रकृति सेहो एहन अछि। तथापि सम्पादकीय स्तरपर जँ निष्कर्षक सीमा नहि टूटय तँ दीर्घ वाक्यक चयनात्मक विभाजन पठनीयता बढ़ाओत। मैथिली वाक्य-विन्यासक दृष्टिसँ अनुवाद प्रायः स्वाभाविक अछि, यद्यपि संस्कृतनिष्ठ दीर्घ-समासयुक्त वाक्यसभमे कहीं-कहीं अनुवाद-गन्ध (translationese) रहि जाइत अछि। पारिभाषिक पदक नीतिमे संस्कृत-तत्सम पदक संरक्षण एकटा सुविचारित निर्णय अछि, जे शास्त्रीय गाम्भीर्यकेँ अक्षुण्ण रखैत अछि, मुदा सामान्य पाठकक लेल कठिनाइ बनि सकैत अछि। स्पष्टता आ पुनरावृत्ति (शीर्षक-प्रणाली आ प्रश्नोत्तर-शैली) पाठकक मार्गदर्शनमे सहायक अछि। स्वर-दृष्टिसँ अनुवाद सम्मानजनक बहसक मर्यादा राखैत अछि — प्रतिपक्षी मतसभक प्रस्तुतिमे कोनो व्यंग्यात्मक अपमान नहि अछि, जे शास्त्रार्थ-परम्पराक औचित्यक अनुरूप अछि। पठनीयता आ लक्षित पाठकक दृष्टिसँ ई अनुवाद उच्चशिक्षित, दर्शन-रुचि-सम्पन्न पाठक-वर्गकेँ लक्षित करैत अछि, आम पाठकक लेल अतिरिक्त सहायक-सामग्रीक आवश्यकता रहत। ९.५ प्रतिपक्ष-प्रस्तुतिक नैतिकता दार्शनिक अनुवादक एकटा गम्भीर कसौटी ई होइत अछि जे ओ अपन विरोधीक तर्ककेँ ईमानदारीसँ दैत अछि की ओकर कमजोर रूप बनाकऽ आसानीसँ खण्डन करैत अछि। एहि दृष्टिसँ पुस्तक सफल अछि। चार्वाकक भौतिकवाद, बौद्ध क्षणिकवाद, सांख्य कारणवाद, कुमारिल-प्रभाकर मिमांसा, वैशेषिक आपत्ति—सभकेँ पर्याप्त बौद्धिक सम्मान देल गेल अछि। ई गुण साहित्यिक बहुस्वरता मात्र नहि, दार्शनिक न्यायशीलता अछि। अनुवादक स्वर कतहु विजयी होइत अछि, मुदा प्रतिपक्ष केँ विदूषक बनबैत नहि। ९.६ मैथिली दार्शनिक गद्यक ऐतिहासिक महत्त्व एहि कृतिक ऐतिहासिक मूल्यक सभसँ पैघ आधार भाषा अछि। मैथिलीमे प्रेम, लोकगीत, आख्यान, नाटक वा कविता लिखल जा सकैत अछि—ई सिद्ध करबाक आवश्यकता नहि। कठिन प्रश्न छल: की मैथिली “व्याप्ति”, “उपाधि”, “प्रतियोगी”, “ज्ञातता”, “अन्विताभिधान”, “अर्थापत्ति”, “अनुपलब्धि”, “परतः प्रामाण्य”, “प्रतितथ्यात्मक शर्त”, “निमित्त कारण” जकाँ अवधारणाक क्रमबद्ध विश्लेषण वहन कऽ सकैत अछि? ई पुस्तक व्यवहारतः उत्तर दैत अछि—हँ। ई उपलब्धि केवल शब्दकोषक नहि। दार्शनिक भाषा वाक्य-विन्याससँ बनैत अछि। “जँ… तँ…”, “एहि आपत्तिक उत्तर…”, “मुदा जँ एना मानल जाए…”, “तेँ…”, “अतः…” जकाँ तर्कसूचक संरचनाक दीर्घ अभ्यास एहि पोथीमे मैथिली बौद्धिक गद्यक एकटा व्यवहारिक व्याकरण रचैत अछि। १०. सन्दर्भ-ग्रन्थसूची आ अङ्ग्रेजी समानान्तर खण्ड अध्याय १२ : सम्पूर्ण सन्दर्भ-ग्रन्थसूची अध्याय १२ एहि विशाल परियोजनाकेँ शोधयोग्य बनबैत अछि। ग्रन्थसूची आधार-पाठ आ संस्कृत संस्करण; उदयनाचार्यक आन कृति; न्याय-वैशेषिक आ नव्य-न्यायक मूल ग्रन्थ; मीमांसा, बौद्ध, सांख्य, योग, जैन आ वेदान्तक तुलनात्मक स्रोत; आधुनिक उदयन-अध्ययन; भारतीय काव्यशास्त्र; पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त; अनुवाद-सिद्धान्त; मैथिली भाषा-साहित्य आ दार्शनिक गद्यक स्रोत—एहि सभ क्षेत्रकेँ समेटैत अछि। एहि नौ प्रकारक विन्यास अनुक्रममे स्पष्ट रूपेँ देल अछि। ग्रन्थसूचीक विस्तार पुस्तकक बहुविषयी चरित्रक अनुरूप अछि। न्यायसूत्र, भाष्य-टीका, उदयनक संस्करण, आधुनिक शोध, काव्यशास्त्र, व्याख्याशास्त्र आ अनुवाद-विज्ञानक एकहि परियोजनामे संगठित उपस्थिति शोधार्थीक लेल बहुत उपयोगी अछि। एकरा आरो सशक्त करबाक सर्वाधिक आवश्यक उपाय ई अछि जे पुस्तकक प्रत्येक ऐतिहासिक, भाषिक, संस्थागत अथवा उद्धृत दावाकेँ सम्बन्धित ग्रन्थसूची-प्रविष्टिक पृष्ठ अथवा टिप्पणी सँ जोड़ल जाए। केवल अन्तिम ग्रन्थसूची पर्याप्त नहि; दावा सँ स्रोत धरि प्रत्यक्ष मार्ग आवश्यक अछि। अङ्ग्रेजी समानान्तर खण्ड पुस्तकक उत्तरार्धमे एकटा विशाल अङ्ग्रेजी रूपान्तर अछि। ई केवल छोट सारांश नहि; अपन प्रकाशन-सूचना, अनुक्रम, अध्याय १ सँ १० धरि अनुसन्धानात्मक सामग्री, अध्याय ११ रूपेँ सम्पूर्ण अनूदित पाठक अङ्ग्रेजी प्रस्तुति, आ अन्तमे “Complete Bibliography” रखैत अछि। अङ्ग्रेजी खण्डक ग्रन्थसूची मूल पाठ, संस्कृत संस्करण, टीका, अनुवाद, न्याय-वैशेषिक, प्रतिपक्षी दर्शन, आधुनिक शोध, भारतीय काव्यशास्त्र, पाश्चात्य समीक्षा आ अनुवाद-सिद्धान्त सभ समेटैत अछि। एहि अङ्ग्रेजी खण्डक सांस्कृतिक उपयोगिता स्पष्ट अछि। मैथिलीमे निर्मित दार्शनिक ज्ञान केवल मैथिली पाठक धरि सीमित नहि रहैत; विश्वक शोधार्थी ओकर दार्शनिक संरचना आ अनुवाद-पद्धति तक पहुँचि सकैत छथि। मुदा पुस्तक-विन्यासक दृष्टिसँ एतय दू समस्या अछि। पहिल, पूरा सामग्री पुनः देल गेलासँ पुस्तक अत्यन्त विशाल भऽ गेल अछि। दोसर, मैथिली आ अङ्ग्रेजी खण्डक बीच अध्याय-दर-अध्याय, खण्ड-दर-खण्ड समानान्तर पृष्ठ-सूचक नहि रहने तुलनात्मक उपयोग कठिन भऽ सकैत अछि। भविष्यक संस्करणमे “मैथिली खण्ड” आ “अङ्ग्रेजी समानान्तर खण्ड” स्पष्ट विभाजक पृष्ठसँ शुरू हो, आ एकटा मैथिली पृष्ठ/अध्याय ↔ अङ्ग्रेजी पृष्ठ/अध्याय मिलान-सूची जोड़ल जाए तँ पुस्तकक शोध-मूल्य बहुत बढ़त। अङ्ग्रेजी ग्रन्थसूचीक एकटा नीक नीति ई अछि जे विदेशी भाषाक प्रकाशित शीर्षक शोध आ पुस्तकालयीय पहचान बचेबाक लेल मूल रूपेँ राखल गेल अछि। ११. पुनरावृत्ति, शास्त्रीय विश्वसनीयता आ सम्पादकीय परिष्कार पुस्तकक भीतर पुनरावृत्तिक प्रश्न अध्याय १ सँ १० धरि समान विषय अनेक बेर लौटैत अछि—उदयनाचार्यक ऐतिहासिक स्थान, फूलक रूपक, पाँच गुच्छ, श्लेष, रस, बहुस्वरता, नाइडा-वेनुती, मैथिली ज्ञान-सम्प्रभुता, समानान्तर साहित्य आदि। सामान्य पुस्तक-संपादनक दृष्टिसँ ई पुनरावृत्ति घटाओल जा सकैत अछि। मुदा वर्तमान पुस्तकक निर्माण-इतिहास देखला पर ई पुनरावृत्ति दू प्रकारक अछि। किछु वास्तविक अनावश्यक पुनरावृत्ति अछि; किछु क्रमिक आलोचनात्मक विकास अछि—पहिने तीन गुच्छ आधारित समीक्षा, तकर बाद उत्तरार्धक समीक्षा, अन्ततः पाँचू गुच्छक पूर्ण अध्ययन। अतः सभ पुरान समीक्षा हटाएब उचित नहि। सही उपाय ई होएत जे प्रत्येक अध्यायक आरम्भमे स्पष्ट संकेत हो— “ई समीक्षा अनुवादक अमुक संचयी अवस्था पर लिखल गेल छल”; “ई अध्याय तेसर गुच्छ धरि उपलब्ध पाठक अध्ययन थिक”; “ई अध्याय पाँचू गुच्छ पूर्ण भेला बाद समग्र पुनर्मूल्याङ्कन थिक।” एना भेला पर पुनरावृत्ति “त्रुटि” सँ “अनुवाद-इतिहास” बनि जाएत। शास्त्रीय विश्वसनीयता आ मूल-संस्कृतक प्रश्न पुस्तकक अपन सर्वाधिक विवेकपूर्ण स्वीकारोक्ति ई अछि जे लक्ष्यभाषिक गुणवत्ता आ मूलनिष्ठा एक बात नहि। मैथिली पाठ सुन्दर, संगत आ तार्किक होएतहुँ प्रत्येक संस्कृत पदक अर्थ हूबहू बचल अछि—ई केवल मैथिली पाठ पढ़िकऽ प्रमाणित नहि कएल जा सकैत अछि। पूर्ण स्रोत-निष्ठाक निर्णय लेल संस्कृत मूलक पङ्क्ति-दर-पङ्क्ति मिलान आवश्यक अछि। ताहि लेल भविष्यक “आलोचनात्मक शोध-संस्करण”मे मूल संस्कृत कारिका आ गद्य, पाठभेद, कारिका-सङ्ख्या, तकर सोझाँ निकट मैथिली अनुवाद, तकर बाद व्याख्यात्मक मैथिली—ई व्यवस्था आदर्श होएत। पुस्तक स्वयं मूल संस्कृत, मैथिली, व्याख्या, कोश, अनुक्रमणिका आ डिजिटल समानान्तर दृश्यक अनुशंसा करैत अछि। ई सुधार वर्तमान अनुवादक मूल्य घटबैत नहि; उलटे ओकर विद्वत्तापूर्ण प्रतिष्ठा सुरक्षित करत। सम्पादकीय आ पुस्तक-विन्यास सम्बन्धी समीक्षा वर्तमान संस्करणक मुखपृष्ठ, प्रकाशन-सूचना, विस्तृत अनुक्रम आ अध्याय-विभाजन पुस्तक केँ औपचारिक ग्रन्थरूप दैत अछि। आरम्भिक पृष्ठपर मूल संस्कृत ग्रन्थकार, अनुवादक, सम्पादक, संस्करण-वर्ष आ प्रकाशकक पहचान स्पष्ट अछि। मुदा एकटा हजार पृष्ठसँ पैघ द्विभाषिक शोधग्रन्थमे सामान्य विषय-सूची पर्याप्त नहि। एहि स्तरक संस्करण लेल चार प्रकारक अन्तिम अनुक्रमणिका बहुत उपयोगी होएत: दार्शनिक पद, व्यक्ति/सम्प्रदाय, उदाहरण-दृष्टान्त, आ संस्कृत कारिका। पुस्तकक अपन आलोचनात्मक अनुशंसा सेहो पूर्ण विषय-सूची, पद-सूची, व्यक्ति/सम्प्रदाय-सूची आ अन्तर्निर्देश जोड़बाक बात करैत अछि। मैथिली-अङ्ग्रेजी समानान्तर अध्याय मिलान-सूची सेहो चाही। एहि बिना अङ्ग्रेजी पाठक जँ कोनो मैथिली अनुच्छेदक समतुल्य अङ्ग्रेजी पाठ खोजय चाहत तँ कठिनाई होएत। तथ्यात्मक आ स्रोतगत सावधानी दार्शनिक मूल पाठपर आधारित विवेचन पुस्तकक मजबूत धरातल अछि। मुदा अध्याय ५–८मे भाषा-जनसङ्ख्या, आधुनिक संस्था, विश्वविद्यालय, युनिकोड, आधुनिक डिजिटल भाषिक तकनीक, डिजिटल आन्दोलन, लेखकसभक संस्थागत स्थान आदि पर जे बाह्य तथ्य देल गेल अछि, ओहि सभक लेल पादटिप्पणी अनिवार्य बनाओल जाए। एहने प्रकारेँ प्रत्यक्ष शास्त्रीय उद्धरण, वेद-वाक्य, भगवद्गीता, उपनिषद्, न्यायसूत्र अथवा टीकाकारक कथनक संग संस्करण, पृष्ठ/कारिका अथवा सूत्र-सङ्ख्या रहबाक चाही। ग्रन्थसूची व्यापक अछि; आब ओकरा उद्धरण-तन्त्रसँ जोड़ब शेष काज अछि। एहि कृतिक दस मुख्य बौद्धिक उपलब्धिक समेकित अर्थ सम्पूर्ण पुस्तक पढ़लापर एकर उपलब्धि दसटा पृथक् उपलब्धिक रूपमे नहि, एकहि अन्तरसम्बद्ध परियोजनाक रूपमे बुझाइत अछि। उदयनाचार्यक संस्कृत तर्क मैथिलीमे आबैत अछि; मैथिली तर्क-वाक्य विकसित करैत अछि; शास्त्रीय पारिभाषिकता बचैत अछि; लोक-कोष सँ पाठ जीवन्त बनैत अछि; पाँच गुच्छक दार्शनिक एकता स्पष्ट होइत अछि; प्रतिपक्षसभ न्यायपूर्ण स्वर पबैत छथि; भारतीय काव्यशास्त्र ग्रन्थक साहित्यिकता उद्घाटित करैत अछि; आधुनिक अनुवाद-विज्ञान अनुवादक निर्णय बुझबैत अछि; अनुसन्धानात्मक अध्याय अनुवादक सीमा स्वयं चिन्हैत अछि; आ अङ्ग्रेजी समानान्तर खण्ड एहि मैथिली ज्ञानक वैश्विक पठनीयता बनबैत अछि। ताहि कारण एकरा केवल “उदयनाचार्यक पुस्तकक मैथिली रूप” कहब बहुत छोट परिभाषा होएत। ई वास्तवमे मैथिलीमे न्याय-दर्शनक अध्ययन-परिसर निर्मित करबाक प्रयास अछि। आवश्यक भावी परिष्कार सम्पूर्ण ग्रन्थक आधारपर सभसँ आवश्यक परिष्कार चारि स्तरपर अछि। पहिल, प्रारम्भिक आंशिक समीक्षा आ पछिला पूर्ण समीक्षा बीच संस्करण-काल स्पष्ट कएल जाए। दोसर, मूल–अनुवाद–व्याख्या–सम्पादकीय स्वरक दृश्य भेद बने। तेसर, मूल संस्कृत समानान्तर पाठ, कारिका-सङ्ख्या, पाठभेद आ स्रोत-पादटिप्पणी जोड़ल जाए। चारिम, मैथिली-अङ्ग्रेजी समानान्तर अनुक्रम, पदकोश, व्यक्ति-सूची, उदाहरण-सूची आ तर्क-नकाशा जोड़ल जाए। पुस्तकक भीतर पहिनेसँ एहि दिशाक बहुत स्पष्ट योजना उपस्थित अछि—मूल संस्कृत आ पाठभेद, प्रवाहपूर्ण मैथिली, दार्शनिक व्याख्या-पादटिप्पणी, पारिभाषिक कोश-सूची-ग्रन्थसूची, तथा खोजयोग्य डिजिटल समानान्तर संस्कृत-मैथिली दृश्य। अतः ई बाहरी आलोचकक आरोप नहि; पुस्तक अपन अगिला परिपक्व अवस्थाक बाट स्वयं देखबैत अछि। एहि सभक अतिरिक्त, सामान्य पाठकक सुविधा लेल अध्यायान्त लघु-सार वा तर्क-चित्र उपयोगी होएत; कतहु-कतहु हिन्दी-प्रभावित रूप आ पदक्रमगत अस्वाभाविकताकेँ मानक मैथिली अनुरूप परिष्कृत कएल जाए; आ प्रत्येक प्रत्यक्ष उद्धरणक संग स्तबक, कारिका, संस्करण अथवा पृष्ठ-सूचना देल जाए। १२. अन्तिम समग्र मूल्याङ्कन ‘न्यायकुसुमाञ्जलि’क एहि संस्करणक सर्वाधिक महत्त्व ई अछि जे ई मैथिली केँ दार्शनिक जटिलताक बोझ उठेबाक अवसर नहि मात्र दैत अछि, ओकर व्यवहारिक क्षमता देखबैत अछि। कारणता, अदृष्ट, सामर्थ्य, क्षणभंगवाद, प्रामाण्य, शब्द-अनित्यता, अभाव, अनुमान, उपमान, शब्द-प्रमाण, अन्वितार्थ, अर्थापत्ति, अनुपलब्धि, ज्ञातता, परमाणु, तात्पर्य, विधि आ ईश्वरानुमान—एतेक विविध आ सूक्ष्म विषय एकहि मातृभाषिक गद्य-परम्परामे आबि जाइत अछि। अनुवादक सर्वाधिक सफल जतय छथि, ओतय संस्कृत पद केँ छोड़ैत नहि, मुदा संस्कृत वाक्यक दासता सेहो स्वीकारैत नहि। मूलक पारिभाषिक स्मृति बचैत अछि, लक्ष्यभाषाक व्याकरण सक्रिय रहैत अछि। एही द्वन्द्वात्मक सन्तुलनमे कृतिक वास्तविक अनुवाद-कला अछि। आलोचनात्मक अध्यायसभक बारम्बार आत्मपरीक्षण पुस्तकक दोसरो विशिष्ट गुण अछि। कतहु पाठक अधूरापन, कतहु सम्पादकीय सीमा, कतहु मूल-संस्कृतक अभाव, कतहु दीर्घ वाक्य, कतहु स्रोत-निर्देश—ई सभ प्रश्न पुस्तक अपन भीतर स्वयं उठबैत अछि। पछिला पूर्ण अध्ययन पहिल आंशिक अध्ययनकेँ अप्रासंगिक नहि करैत; ओकरा विकास-इतिहासमे बदलि दैत अछि। मुदा अन्तिम संस्करणमे एहि कालक्रमकेँ स्पष्ट करब जरूरी अछि। दार्शनिक दृष्टिसँ कृतिक सर्वाधिक प्रभावशाली उपलब्धि पाँचम गुच्छक आठ हेतु नहि मात्र, बल्कि पहिल चारि गुच्छ द्वारा ओकर भूमि तैयार करब अछि। कारणता सँ प्रमाण, प्रमाण सँ भाषा, भाषा सँ ज्ञान, ज्ञान सँ सर्वज्ञता, आ तकर बाद ईश्वरानुमान—ई क्रम ‘न्यायकुसुमाञ्जलि’क वास्तुशिल्प अछि। एहि वास्तुकेँ मैथिलीमे स्पष्ट करब अनुवादक मुख्य सफलता अछि। साहित्यिक दृष्टिसँ फूलक रूपक आरम्भसँ अन्त धरि ग्रन्थकेँ बाँधैत अछि। तर्क पुष्प बनैत अछि, विवाद गुच्छ बनैत अछि, आ निष्कर्ष अञ्जलि। शान्ति, बौद्धिक वीरता, आश्चर्य आ अन्तिम भक्ति एहि कठोर न्यायग्रन्थकेँ निर्जीव तर्क-संग्रह होमय सँ रोकैत अछि। अनुवादशास्त्रीय दृष्टिसँ ई निष्ठा बनाम सृजनशीलताक सरल द्वन्द्व केँ अस्वीकार करैत अछि। कतहु मूल पद हूबहू बचैत अछि; कतहु लोक-मैथिली प्रवेश करैत अछि; कतहु श्लेष दू अर्थमे खुलैत अछि; कतहु सूत्र व्याख्यात्मक गद्य बनैत अछि। अतः एकर श्रेष्ठ परिभाषा वही अछि जे पुस्तक स्वयं सुझबैत अछि—व्याख्यात्मक शास्त्रीय अनुवाद। सम्पादकीय दृष्टिसँ ई विशाल कृति एखन सेहो एकटा आरो उच्चतर “आलोचनात्मक समानान्तर संस्करण”क सम्भावना रखैत अछि। मूल संस्कृत, कारिका-सङ्ख्या, पाठभेद, स्पष्ट अनुवाद-व्याख्या विभाजन, स्रोत-पादटिप्पणी, विस्तृत अनुक्रमणिका आ मैथिली-अङ्ग्रेजी मिलान-सूची जोड़ल गेलापर ई केवल महत्त्वपूर्ण अनुवाद नहि, विश्वविद्यालयीय स्तरक मानक अनुसन्धान-संस्करण बनबाक सामर्थ्य रखैत अछि। अन्तिम निर्णय ई अछि: प्रस्तुत ‘न्यायकुसुमाञ्जलि’ मैथिली दार्शनिक गद्यक एकटा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण उपलब्धि अछि। एकर मुख्य शक्ति पूर्ण पाँच-गुच्छीय अनुवाद, कठिन न्याय-पारिभाषिकताक संरक्षण, स्वाभाविक मैथिली तर्क-वाक्य, प्रतिपक्षक न्यायपूर्ण प्रस्तुति, श्लेष आ पुष्परूपकक अर्थ-संरक्षण, विस्तृत आलोचनात्मक आत्मपरीक्षण, शोधोपयोगी अध्याय, परिशिष्ट, ग्रन्थसूची आ अङ्ग्रेजी समानान्तर विस्तारमे अछि। एकर मुख्य सम्पादकीय चुनौती पुरान आंशिक समीक्षा आ वर्तमान पूर्ण पाठक कालक्रम स्पष्ट करब, मूल–अनुवाद–व्याख्याक सीमा पृथक् करब, स्रोत-तन्त्र मजबूत करब आ विशाल सामग्रीक पुनरावृत्तिकेँ ऐतिहासिक क्रममे व्यवस्थित करब अछि। एहि सुधारसभक बाद ई कृति केवल उदयनाचार्यक ‘न्यायकुसुमाञ्जलि’क मैथिली अनुवाद नहि रहत; ई मिथिला-जनित न्यायपरम्पराक मातृभाषिक पुनर्प्रतिष्ठा, मैथिली ज्ञानगद्यक विस्तार, आ शास्त्रीय दर्शनक आधुनिक पाठकीय पुनर्जीवनक एकटा दीर्घजीवी आधार-ग्रन्थ बनि सकैत अछि। तत्त्वचिन्तामणि (मैथिली अनुवाद): ग्रन्थ-सार आ समालोचनात्मक मूल्याङ्कन भारतीय आ पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्तक आलोकमे एक अध्ययन तत्त्वचिन्तामणि [मूल संस्कृत कृति: गङ्गेश उपाध्याय · मैथिली अनुवाद: गजेन्द्र ठाकुर] सारांश प्रस्तुत अध्ययन गङ्गेशोपाध्याय-प्रणीत तत्त्वचिन्तामणिक मैथिली अनुवादित आ विस्तृत संस्करणक कृतिसार तथा आलोचनात्मक मूल्यांकन प्रस्तुत करैत अछि। ई ग्रन्थ परम्परागत अर्थमे उपन्यास वा काव्यकृति नहि, अपितु भारतीय ज्ञानमीमांसा, तर्कशास्त्र, भाषादर्शन आ सत्तामीमांसाक महत्त्वपूर्ण शास्त्रीय ग्रन्थ थिक। तथापि एकर पूर्वपक्ष–उत्तरपक्षात्मक रचना, तर्कक नाटकीय गति, अवधारणाक क्रमिक परिष्कार, भाषिक घनत्व आ बौद्धिक विस्मय एकरा साहित्यिक आलोचनाक अनेक उपकरणसँ पढ़बाक अवसर दैत अछि। अध्ययनमे रस, ध्वनि, वक्रोक्ति, रीति, औचित्य, शब्दशक्ति आ शास्त्र-काव्य सम्बन्ध जकाँ भारतीय अवधारणाक संग अरस्तूवादी तर्क, रूपवाद, संरचनावाद, व्याख्याशास्त्र, पाठक-प्रतिक्रिया, विखण्डन, व्यवहारवाद, विश्वसनीयतावाद आ विश्लेषणात्मक दर्शनक तुलनात्मक उपयोग कएल गेल अछि। मुख्य निष्कर्ष ई अछि जे तत्त्वचिन्तामणिक वास्तविक साहित्यिकता कथानकमे नहि, बल्कि विचारक संरचना, संवादात्मकता, परिभाषात्मक अनुशासन आ सत्यक अनवरत परीक्षणमे निहित अछि। मैथिली अनुवाद एहि शास्त्रीय धरोहरकेँ आधुनिक मातृभाषायी ज्ञान-संसारमे पुनः प्रतिष्ठित करैत अछि आ मैथिली अकादमिक गद्यक सामर्थ्यकेँ विस्तृत करैत अछि। कूटशब्द : तत्त्वचिन्तामणि, गङ्गेश उपाध्याय, नव्य-न्याय, मैथिली अनुवाद, ज्ञानमीमांसा, भारतीय काव्यशास्त्र, पाश्चात्य आलोचना, भाषादर्शन। १. प्रस्तावना : कृति, परम्परा, संस्करण आ आलोचनात्मक समस्या भारतीय बौद्धिक इतिहासमे किछु ग्रन्थ एहन होइत अछि जे केवल अपन विषयक प्रतिपादन नहि करैत, अपितु विचार करबाक भाषा, पद्धति आ अनुशासनकेँ बदलि दैत अछि। गङ्गेशोपाध्यायक तत्त्वचिन्तामणि एहनहि ग्रन्थ थिक। प्राचीन न्याय-वैशेषिक परम्पराक अनेक तत्त्वकेँ स्वीकार करैतहुँ ई कृति प्रमाणमीमांसाकेँ केन्द्रमे आनैत अछि आ अवधारणा, सम्बन्ध, अभाव, ज्ञान, स्मृति, भ्रम, अनुमान तथा शब्दार्थक विश्लेषण लेल एहन पारिभाषिक ढाँचा विकसित करैत अछि जे परवर्ती भारतीय दर्शनक लगभग सभ प्रमुख शास्त्रीय परम्पराकेँ प्रभावित करैत अछि। गङ्गेश उपाध्याय-विरचित 'तत्त्वचिन्तामणि'क ई मैथिली अनुवाद (अनुवादक-सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर; विदेह प्रकाशन; प्रथम संस्करण २००४, परिवर्धित संस्करण २०२६; ISBN 978-93-6123-729-4) मैथिली गद्य-साहित्यक इतिहासमे एकटा असाधारण घटना अछि। चौदहम शताब्दीक मिथिलामे रचित जे ग्रन्थ सम्पूर्ण भारतीय ज्ञानमीमांसाक दिशा बदलि देलक, ओ सात सय बर्खक बाद पहिल बेर अपने माटिक जीवन्त भाषामे, समग्र रूपेँ, घुरि आयल अछि—ई तथ्य अपने-आपमे एहि ग्रन्थक सांस्कृतिक महत्त्वक घोषणा अछि। संस्कृतक जटिलतम शास्त्रीय गद्यकेँ—जकर पारिभाषिक सघनता विश्वक तर्कशास्त्रीय साहित्यमे अद्वितीय मानल जाइत अछि—मैथिलीमे उतारब केवल भाषान्तरण नहि, अपितु मैथिली भाषाक शास्त्रधारण-क्षमताक अग्निपरीक्षा छल, आ ई संस्करण ओहि परीक्षामे भाषाकेँ उत्तीर्ण सिद्ध करैत अछि। ग्रन्थक स्थापत्य द्विस्तरीय अछि। पहिल स्तरपर छह अध्याय अछि जे क्रमशः भूमिका आ प्रारम्भिक दार्शनिक विवेचन, प्रत्यक्षखण्ड, अनुमानखण्ड, ईश्वरानुमान, उपमानखण्ड आ शब्दखण्डक परिचय प्रस्तुत करैत अछि—ई अध्यायसभ पाठककेँ मूल पाठक सोझाँ ठाढ़ हेबासँ पहिने आवश्यक दार्शनिक, ऐतिहासिक आ पारिभाषिक भूमि उपलब्ध करबैत अछि। दोसर स्तरपर पाँच परिशिष्टमे पाँचू खण्डक (प्रत्यक्ष, अनुमान, ईश्वरानुमान, उपमान आ शब्द) पूर्ण मैथिली अनुवाद अछि। छठम परिशिष्ट 'अध्ययन-सहचर'क रूपमे ग्रन्थक प्रमुख परिभाषा, पूर्वपक्ष, सिद्धान्त, आपत्ति आ उत्तरकेँ स्रोत-क्रममे सूत्रबद्ध करैत अछि—अध्यापन आ पुनरावृत्ति लेल ई एकटा स्वतन्त्र लघुग्रन्थक काज करैत अछि। अन्तमे व्यापक सत्यापित ग्रन्थसूची अछि जे बिब्लियोथेका इण्डिका संस्करणसँ आरम्भ कऽ तिरुपति-संस्करण, फ्राउवाल्नर, गूकूप, सिबजीवन भट्टाचार्य, वी. एन. झा आ स्टीफन फिलिप्स धरिक अन्तरराष्ट्रीय अध्ययन-परम्पराकेँ समेटैत अछि। एहि प्रकारेँ ई संस्करण अनुवाद, भाष्य, पाठ्यपुस्तक आ शोध-सन्दर्भ—चारू भूमिका एक्केसंग निमाहैत अछि। अतः ई केवल भाषान्तरण नहि, बल्कि पाठकीय प्रवेश, शास्त्रीय पारिभाषिकता, आधुनिक तुलनात्मक दृष्टि आ क्षेत्रीय बौद्धिक इतिहासकेँ एकत्र करयवला सम्पादित ज्ञान-परियोजना थिक। एहि अध्ययनक आलोचनात्मक समस्या दू स्तरपर अछि। पहिल, दर्शन-ग्रन्थक साहित्यिक मूल्यांकन कोना कएल जाए? दोसर, भारतीय आ पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्तक उपकरण एहन शास्त्रीय तर्कग्रन्थपर कतय धरि सार्थक सिद्ध होइत अछि? एहि प्रश्नक उत्तर लेल साहित्यकेँ केवल कल्पित कथा अथवा रसात्मक पद्यक संकुचित परिभाषामे नहि, बल्कि भाषामे विन्यस्त मानवीय अनुभव, ज्ञान, विवाद आ अर्थ-निर्माणक व्यापक क्रियारूपेँ ग्रहण करब आवश्यक अछि। २. शोधक उद्देश्य, प्रश्न आ पद्धति एहि अध्ययनक मुख्य उद्देश्य तत्त्वचिन्तामणिक समग्र वैचारिक संरचनाकेँ संक्षिप्त किन्तु पर्याप्त रूपेँ प्रस्तुत करब, एकर शास्त्रीय गद्यक साहित्यिक गुणसभक विवेचन करब, भारतीय काव्यशास्त्रीय अवधारणासँ एकर अन्तर्सम्बन्ध निर्धारित करब, पाश्चात्य आलोचनात्मक सिद्धान्तक आलोकमे एकर पुनर्पाठ करब आ मैथिली अनुवादक सांस्कृतिक तथा भाषिक महत्त्वक मूल्यांकन करब थिक। मुख्य शोध-प्रश्न ई सभ अछि : तत्त्वचिन्तामणिक वैचारिक एकता कोन तत्त्वसँ निर्मित होइत अछि? पूर्वपक्ष–सिद्धान्तात्मक संरचना कोना बौद्धिक नाटकीयता उत्पन्न करैत अछि? रस, ध्वनि, वक्रोक्ति, रीति आ औचित्य जकाँ सिद्धान्त दर्शन-ग्रन्थपर कोना लागू होइत अछि? संरचनावाद, व्याख्याशास्त्र आ विखण्डन जकाँ आधुनिक पद्धति नव्य-न्यायक अर्थ-निर्माणकेँ कोना उद्घाटित करैत अछि? मैथिली अनुवाद मूल शास्त्रीय घनत्वकेँ सुरक्षित रखैत मातृभाषायी सुबोधता कोना निर्मित करैत अछि? पद्धतिक स्तरपर ई अध्ययन पाठकेन्द्रीय, तुलनात्मक, व्याख्यात्मक आ मूल्यांकनात्मक अछि। मूल प्रतिपादनक कथ्य, तर्क-विन्यास, उदाहरण, पारिभाषिकता आ भाषिक शैलीक अध्ययन भारतीय तथा पाश्चात्य सिद्धान्तक चयनित अवधारणाक संग कएल गेल अछि। दर्शनक ऐतिहासिक सत्यता आ साहित्यिक प्रभावकेँ अलग-अलग स्तरपर ग्रहण कएल गेल अछि। ३. तत्त्वचिन्तामणिक संरचना आ बौद्धिक परियोजना एहि ग्रन्थक केन्द्रीय जिज्ञासा अछि—मनुष्य यथार्थ ज्ञान कोना प्राप्त करैत अछि, यथार्थ आ अयथार्थ ज्ञानक भेद कोना निश्चित होइत अछि, आ कोन ज्ञान-साधनकेँ प्रमाण मानल जाए। गङ्गेशोपाध्याय प्राचीन न्यायक सोलह पदार्थपर केन्द्रित विन्यासक स्थानपर प्रमाणमीमांसाकेँ केन्द्रमे स्थापित करैत प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान आ शब्द—एहि चारि प्रमाणक सूक्ष्म विश्लेषण करैत छथि। तत्त्वचिन्तामणिक बौद्धिक केन्द्र प्रमाण थिक। प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान आ शब्द—एहि चारि माध्यमसँ यथार्थ ज्ञान कोना उत्पन्न होइत अछि, ओकर सीमा कतेक अछि, दोष कोना प्रवेश करैत अछि आ सत्यताक निर्णय कोना होइत अछि—ग्रन्थक समस्त विमर्श एहि प्रश्नक चारूकात विकसित होइत अछि। ग्रन्थक रचना-प्रक्रियामे पूर्वपक्ष केवल औपचारिक विरोधी नहि। मीमांसक, बौद्ध, वेदान्ती, व्याकरणविद् आ प्राचीन नैयायिक मतसभक सबलतम रूप प्रस्तुत कएल जाइत अछि। ओकर बाद व्यभिचार, अतिव्याप्ति, अव्याप्ति, असम्भव, अनवस्था, अन्योन्याश्रय, गौरव वा बाध जकाँ दोषसभक परीक्षण होइत अछि। परिभाषा आ सिद्धान्त एहि द्वन्द्वात्मक प्रक्रियासँ क्रमशः परिष्कृत होइत अछि। एहि कारण कृतिक समग्रता विषयसभक मात्र संग्रह नहि। एकर एकता विधिमे अछि—कोनो ज्ञान-दाबीकेँ तखने स्वीकार करब जखन ओकर कारण, सीमा, विषय, विरोधी उदाहरण आ प्रामाण्य स्पष्ट हो। सत्य एतय पूर्वनिर्धारित निष्कर्ष नहि, अपितु परीक्षणक प्रक्रिया थिक। ४. विस्तृत कृतिसार ४.१ मङ्गलवाद आ कारणताक परीक्षण ग्रन्थक आरम्भ मङ्गलाचरणक फलपर विवादसँ होइत अछि। सामान्य मान्यता अछि जे मङ्गलाचरण ग्रन्थक सफल समाप्तिक कारण अछि। गङ्गेश एहि दावाकेँ अन्वय-व्यतिरेकक कसौटीपर परखैत छथि। मङ्गलाचरणक बिना सेहो काज पूर्ण होइत अछि आ मङ्गलाचरणक बादो लेखकक मृत्यु वा अन्य कारणसँ ग्रन्थ अधूरा रहि सकैत अछि। अतः मङ्गलाचरण स्वयं समाप्तिक प्रत्यक्ष कारण नहि। सिद्धान्त ई स्थापित होइत अछि जे मङ्गलाचरण सम्भावित विघ्नक नाश करैत अछि। जखन विघ्न दूर होइत अछि, तखन लेखकीय प्रयास, ज्ञान, समय आ सामग्री जकाँ लौकिक कारण काज पूर्ण करैत अछि। ई विमर्श धार्मिक आचारकेँ तार्किक कारणवादक भीतर पुनःपरिभाषित करैत अछि। जतय मङ्गल बिना काज पूर्ण होइत अछि ओतय पहिनेसँ विघ्नाभाव मानल जाइत अछि। एहि प्रकार एकटा प्रतीयमान लघु धार्मिक प्रश्न कार्यकारणभावक गम्भीर तार्किक विमर्शमे बदलि जाइत अछि। ४.२ प्रामाण्यवाद, भ्रम आ ज्ञानक सत्यता मीमांसक स्वतःप्रामाण्यवादक अनुसार ज्ञान अपन सत्यता स्वयं प्रकाशित करैत अछि। नैयायिक परतःप्रामाण्यवादक अनुसार ज्ञानक यथार्थता ओकर उत्पत्तिक क्षण स्वतः निश्चित नहि होइत अछि, अपितु अनुमान, सफल प्रवृत्ति अथवा प्रमाणान्तरसँ—अर्थात् एकटा पृथक्, परवर्ती मानसिक प्रक्रियासँ—ज्ञात होइत अछि। जँ प्रत्येक ज्ञान उत्पन्न होइतहि प्रमाणित हो, तँ संशय आ भ्रमक अनुभव असम्भव होएबाक चाही; संशयक अनुभवे स्वतःप्रामाण्यक विरुद्ध निर्णायक साक्ष्य अछि। शुक्ति-रजत भ्रम एहि विवादक प्रसिद्ध उदाहरण थिक। प्रभाकर मतमे सोझाँ उपस्थित शुक्ति आ स्मृत रजतक भेद ग्रहण नहि होइत अछि; भ्रम भेदाग्रह थिक। न्यायमतमे शुक्तिमे रजतत्वक सकारात्मक आरोप होइत अछि। एहि अन्यथाख्यातिवादमे भ्रम केवल रिक्त अज्ञान नहि, बल्कि विशेष्य-विशेषणक सदोष संयोजन थिक। ४.३ प्रत्यक्ष, सन्निकर्ष, अभाव आ मन प्रत्यक्षकेँ साक्षात्कारी प्रमा मानल गेल अछि। गङ्गेश प्रत्यक्षक लक्षण, छह प्रकारक लौकिक सन्निकर्ष—संयोग, संयुक्त-समवाय, संयुक्त-समवेत-समवाय, समवाय, समवेत-समवाय आ विशेष्य-विशेषण-भाव—तथा तीन प्रकारक अलौकिक प्रत्यक्ष—सामान्यलक्षण, ज्ञानलक्षण आ योगज—क विवेचन करैत छथि। निर्विकल्पक-सविकल्पक भेद सेहो एहि खण्डक महत्त्वपूर्ण पक्ष अछि। निर्विकल्पक प्रत्यक्षक स्थापना ई देखबैत अछि जे प्रथम अनुभवमे वस्तु आ जाति पृथक्-पृथक् गृहीत होइत अछि, संसृष्ट रूपेँ नहि; अवधारणा शून्यसँ नहि गढ़ल जाइत अछि, बाह्य वास्तविकतासँ प्राप्त होइत अछि। ई सन्निकर्ष द्रव्य, गुण, कर्म, जाति, शब्द आ अभावक प्रत्यक्ष स्पष्ट करैत अछि। अनुमान, उपमान आ शब्द पूर्वज्ञानपर आश्रित छथि, जखन कि प्रत्यक्ष इन्द्रिय-विषय सम्बन्धसँ उत्पन्न होइत अछि; इन्द्रियक सम्बन्ध केवल स्थूल द्रव्यसँ नहि। अभावकेँ पृथक् यथार्थ मानब न्याय-दर्शनक महत्त्वपूर्ण विशेषता अछि। घटयुक्त भूमि आ घटरहित भूमि दृश्यतः एकहि अधिकरण होइतहुँ अनुभूतिक स्तरपर भिन्न छथि। “भूमिपर घट नहि अछि” ज्ञान केवल भूमिक ज्ञान नहि, बल्कि भूमिविशिष्ट घटाभावक प्रत्यक्ष थिक। एहि बिन्दुपर न्याय दर्शन अनुपलब्धिकेँ स्वतन्त्र प्रमाण मानबाक आवश्यकता अस्वीकार करैत अछि। मनक अणुत्वक सिद्धान्त ज्ञानक क्रमिकताकेँ स्पष्ट करैत अछि। मन जँ सर्वव्यापक होइत, तँ सभ इन्द्रियक विषय एकहि समय ज्ञात होइत। मुदा ज्ञान क्रमशः उत्पन्न होइत अछि। एहि कारण मन अणुपरिमाणक आ एक समयमे एक इन्द्रियसँ संयुक्त मानल गेल अछि। “हम जनैत छी जे हम घटकेँ देखि रहल छी” एहन आत्मपरक ज्ञानक लेल अनुव्यवसाय नामक द्वितीय मानसिक ज्ञान स्वीकार कएल गेल अछि। अनुव्यवसायक सिद्धान्त—ज्ञानक ज्ञान—एहि खण्डक सर्वाधिक सूक्ष्म उपलब्धिमेसँ अछि: बाह्य प्रत्यक्षमे भ्रम सम्भव अछि, मुदा ‘हमरा देबाल पियर देखाइत अछि’ एहि आन्तरिक अनुभूतिमे भ्रम नहि भऽ सकैत अछि। ४.४ अनुमान, व्याप्ति, परामर्श आ उपाधि अनुमानखण्ड नव्य-न्यायक हृदय आ ग्रन्थक तार्किक चरमोत्कर्ष थिक। एतय अनुमिति, व्याप्ति, पक्षता, परामर्श, उपाधि, तर्क, केवलान्वयी, केवलव्यतिरेकी आ हेत्वाभासक विश्लेषण अछि। व्याप्तिक—साध्य आ हेतुक अविनाभाव-सम्बन्धक—निर्दोष परिभाषाक खोज प्रसिद्ध ‘व्याप्तिपञ्चक’सँ आरम्भ भऽ ‘सिंह-व्याघ्री’ लक्षण धरि पहुँचैत अछि। व्याप्तिग्रहक उपाय, तर्कक भूमिका, सामान्यलक्षणा-प्रत्यासत्तिक अनिवार्यता आ उपाधिक सिद्धान्त मिलिकऽ आगमनात्मक ज्ञानक एकटा पूर्ण दर्शन निर्मित करैत अछि। पक्षताक परिभाषा ‘सिषाधयिषा-विरह-विशिष्ट-सिद्ध्यभाव’क रूपमे कएल गेल अछि, जे अनुमानक मनोवैज्ञानिक पूर्वशर्तकेँ तार्किक परिशुद्धतासँ बान्हैत अछि। अनुमान अज्ञात साध्यक ज्ञान उत्पन्न करैत अछि। पर्वतपर धूम देखि अग्निक अनुमिति तखन सम्भव अछि जखन धूम-अग्निक व्याप्ति स्मृत हो आ वर्तमान पर्वतमे व्याप्तिविशिष्ट धूमक पक्षधर्मता ग्रहण हो। एहि संयुक्त ज्ञानकेँ परामर्श कहल जाइत अछि। व्याप्तिक परिभाषा करैत गङ्गेश सम्भावित अतिव्याप्ति, अव्याप्ति, असम्भव आ उपाधि-दोषसभकेँ क्रमशः हटबैत छथि। एहि पद्धतिमे परिभाषा कोनो स्थिर वाक्य नहि, अपितु प्रतिपक्षीय आक्षेपसभक अग्निमे परिशोधित अवधारणा थिक। मात्र “जतय हेतु, ततय साध्य” कहब पर्याप्त नहि, कारण सोपाधिक सहचार व्यभिचारी भऽ सकैत अछि। उपाधि एहन गुप्त शर्त थिक जे साध्यक संग तँ रहैत अछि, मुदा हेतुक संग सर्वत्र नहि। “अग्नि अछि, अतः धूम अछि” अनुमान आर्द्र इन्धनक उपाधिसँ दूषित अछि, कारण प्रत्येक अग्नि धूम उत्पन्न नहि करैत अछि। एहि प्रकार उपाधि दृश्य सहसम्बन्ध आ वास्तविक अविनाभावक बीचक भेद उद्घाटित करैत अछि। केवलान्वयी, अन्वयव्यतिरेकी आ केवलव्यतिरेकी अनुमानद्वारा सकारात्मक आ नकारात्मक सहचारक भिन्न स्थितिसभ स्पष्ट होइत अछि। अर्थापत्तिकेँ पृथक् प्रमाण मानबाक मीमांसक मतकेँ न्याय केवलव्यतिरेकी अनुमानमे समाहित करैत लाघवक सिद्धान्त अपनबैत अछि। ४.५ पञ्चावयव, वाद आ हेत्वाभास न्याय-वाक्यक पाँच अवयव—प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय आ निगमन—तर्ककेँ सार्वजनिक, क्रमबद्ध आ परीक्षणीय बनबैत अछि। उदाहरण व्याप्तिक सामान्य नियम देखबैत अछि, उपनय ओहि नियमकेँ वर्तमान पक्षपर लागू करैत अछि, आ निगमन निष्कर्ष स्थापित करैत अछि। हेत्वाभास तर्कक आन्तरिक दोषसभक व्यवस्थित वर्गीकरण थिक। सव्यभिचार अनियमित हेतु, विरुद्ध विपरीत निष्कर्षक हेतु, सत्प्रतिपक्ष समानबल विरोधी कारण, असिद्ध अप्रमाणित हेतु आ बाधित प्रबल प्रमाणसँ पूर्वहि खण्डित साध्यक द्योतक अछि। ई वर्गीकरण केवल शास्त्रार्थक उपकरण नहि; आधुनिक बौद्धिक विमर्श, न्यायिक तर्क, वैज्ञानिक प्रतिपादन आ सार्वजनिक संवादमे सेहो एकर उपयोगिता अक्षुण्ण अछि। ४.६ ईश्वरानुमान, शक्ति आ पुरुषार्थ ईश्वरानुमान आस्थाक आवेगपर नहि, कार्य-कारण सम्बन्धपर आधारित अछि। पृथ्वी आदि कार्य छथि; कार्य बुद्धिमान कर्त्ताक अपेक्षा करैत अछि; अतः जगतक निमित्त कारणरूपेँ ईश्वरक स्थापना कएल जाइत अछि। परमाणु उपादान कारण छथि, ईश्वर संयोजक निमित्त कारण। ईश्वरानुमान-खण्डमे ‘क्षित्यङ्कुरादिकं सकर्तृकं कार्यत्वात् घटवत्’ एहि पञ्चावयव अनुमानक रक्षा प्रतिपक्षीक आक्रमण-शृङ्खलाक विरुद्ध कएल गेल अछि। पक्षक अनुगत रूपक अभाव, अन्योन्याश्रय, संदिग्धानैकान्तिकता, सिद्धसाधन आ अर्थान्तरक आपत्तिसभक क्रमबद्ध परिहार एहि खण्डकेँ भारतीय दार्शनिक ईश्वरवाद-विमर्शक सर्वाधिक कठोर तार्किक दस्तावेजमेसँ एक बनबैत अछि। एहि तर्कपर शरीररहित कर्त्ता, अनेक कर्त्ता, अदृष्टक स्वतन्त्रता आ जगतक स्वाभाविक गठन जकाँ आपत्तिसभ उठैत अछि। न्याय परम्परा इच्छा, ज्ञान, प्रयत्न, शक्ति आ कर्मफल-वितरणक अवधारणाद्वारा उत्तर दैत अछि। एहिमे दाहशक्ति-सिद्धान्त, प्रतिबन्धकाभाव, कार्य-कारण सम्बन्ध, पुरुषार्थवाद, कर्मफल आ मोक्षक विवेचन सेहो अछि। एतय ईश्वर आस्थाक नहि, अनुमानक विषय छथि—पक्ष, साध्य, हेतु, व्याप्ति आ उपाधिक कसौटीपर कसल गेल निष्कर्ष। ग्रन्थ ईश्वरक अस्तित्वक प्रश्नकेँ भावावेग वा धार्मिक आदेशक विषय नहि, सार्वजनिक तर्कक विषय बनबैत अछि। ४.७ उपमान : सादृश्यसँ नाम-ज्ञान उपमान सादृश्यद्वारा संज्ञा आ संज्ञीक सम्बन्धक ज्ञान थिक। “गवय गायसदृश वन्य पशु अछि” ई वचन सुनल व्यक्ति वनमे गायसदृश जीव देखि “एहि वस्तुक नाम गवय अछि” बुझैत अछि। एतय केवल सादृश्यक ज्ञान नहि, पूर्वश्रुत शब्द आ वर्तमान वस्तुक सम्बन्धक नवीन बोध उत्पन्न होइत अछि। गङ्गेश उपमानकेँ प्रत्यक्ष, अनुमान वा शब्दमे पूर्णतः विलीन नहि करैत छथि। उपमानक स्वतन्त्रता एहि विशिष्ट फलमे अछि जे ज्ञात सादृश्यक माध्यमसँ शब्दक वाच्य वस्तुक पहचान होइत अछि। एहि विमर्शमे सादृश्यक सत्ता, एकत्व, अनेकत्व, धर्म-साम्य आ शब्दशक्तिक सूक्ष्म प्रश्न उठैत अछि। ४.८ शब्द, वाक्यार्थ आ तात्पर्य शब्दखण्ड भाषादर्शनक दृष्टिसँ अत्यन्त समृद्ध अछि। शब्द प्रमाण तखन बनैत अछि जखन विश्वसनीय वक्ताक अर्थपूर्ण वचन श्रोतामे यथार्थ ज्ञान उत्पन्न करैत अछि। वाक्यार्थ-बोध लेल आकाङ्क्षा, योग्यता, आसत्ति आ तात्पर्य आवश्यक मानल गेल अछि। आकाङ्क्षा पदसभक परस्पर अपेक्षा थिक; योग्यता अर्थसभक सम्भव सम्बन्ध; आसत्ति पदसभक उचित सामीप्य; तात्पर्य वक्ताक अभिप्रेत अर्थ। “अग्निसँ सींचू” वाक्यमे व्याकरणिक आकाङ्क्षा रहितो अर्थगत योग्यता नहि अछि। व्यङ्ग्य, अनेकार्थकता, लक्षणा आ प्रसङ्गजन्य अर्थमे तात्पर्य निर्णायक बनैत अछि। शब्दखण्ड जाति आ व्यक्ति, अभिधा आ लक्षणा, योग आ रूढ़ि, समास, धातु, आख्यात, उपसर्ग तथा विधिवाक्यक अर्थक विवेचन करैत अछि। एहि कारण ई खण्ड केवल प्रमाणशास्त्र नहि, एकटा सुविकसित अर्थविज्ञान आ वाक्यदर्शन सेहो थिक। बौद्ध आ वैशेषिक आक्षेपसभक खण्डन, शब्दानित्यतावादक स्थापना आ वेदक पौरुषेयत्व-विमर्श एहि खण्डक अन्य प्रमुख विषय अछि। एहि प्रकार ग्रन्थ ज्ञानक चारू स्रोत—प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान आ शब्द—क एकटा पूर्ण, अन्तःसंगत ज्ञानमीमांसीय स्थापत्य निर्मित करैत अछि। ४.९ जीवनवृत्त आ इतिहास-विमर्श अध्यायसभक एकटा विशिष्ट योगदान गङ्गेशक जीवनवृत्तक बहुस्तरीय प्रस्तुति अछि। परम्परागत चमत्कार-कथा (मन्दबुद्धि बालक, काली-वरदान, ननिहालक अपमान) केँ आख्यानक रूपमे राखल गेल अछि; ऐतिहासिक कालनिर्धारण (लगभग १३२० ईस्वी, हरिसिंहदेवक शासनकाल, करियन-निवास) केँ प्रामाणिक स्रोतसँ; आ पञ्जी-आधारित सामाजिक विवरणकेँ—पिताक मृत्युक ५ साल बाद जन्म, अन्तर्जातीय विवाह (चर्मकारिणीसँ), दूषण-पञ्जीक साक्ष्य—एकटा तेसर, समानान्तर स्रोत-धाराक रूपमे। ई त्रिस्तरीय स्रोत-विवेक ग्रन्थकेँ पारम्परिक जीवनी-लेखनसँ फराक कऽ आधुनिक इतिहास-पद्धतिक निकट आनैत अछि। ५. कृतिक बौद्धिक नाटकीयता आ शास्त्रीय गद्य यद्यपि ई कृति उपन्यास नहि, तथापि एकर अन्तरंग संरचनामे विशिष्ट नाटकीय गति अछि। प्रत्येक प्रसङ्गमे सामान्यतः पाँच अवस्था देखाइत अछि— पूर्वपक्ष अपन मत प्रस्तुत करैत अछि; सिद्धान्ती ओहिमे दोष देखबैत अछि; पूर्वपक्ष प्रत्युत्तर दैत अछि; सिद्धान्ती परिभाषाकेँ परिष्कृत करैत अछि; अन्ततः दोषरहित अथवा अपेक्षाकृत समर्थ निष्कर्ष स्थापित होइत अछि। ई संरचना शास्त्रीय वादक बौद्धिक नाट्य थिक। एहिमे पात्रक स्थानपर दार्शनिक मतसभ उपस्थित छथि; संघर्षक स्थानपर अवधारणात्मक विरोध; उत्कर्षक स्थानपर सूक्ष्मतम आपत्ति; आ समाधानक स्थानपर सिद्धान्त-लक्षण। पाठक निष्क्रिय श्रोता नहि रहैत, अपितु प्रत्येक तर्कक सम्भावित दोष खोजयवला सह-विचारक बनि जाइत अछि। नाटकीय उत्कण्ठा एहि प्रश्नसँ उत्पन्न होइत अछि जे प्रस्तुत परिभाषा अगिला आपत्तिक सामना कऽ सकत वा नहि। शास्त्रीय गद्यक सौन्दर्यक मूल पारिभाषिक अनुशासन, क्रमिकता आ अवधारणात्मक घनत्वमे अछि। वाक्यक उद्देश्य सजावट नहि, अर्थक सीमांकन अछि। ६. भारतीय साहित्य-सिद्धान्तक आलोकमे आलोचनात्मक अनुशीलन ६.१ रस : बौद्धिक अद्भुत आ शान्ति परम्परागत रसदृष्टिसँ दार्शनिक ग्रन्थमे शृङ्गार, करुण वा वीर रसक प्रत्यक्ष आयोजन नहि भेटैत अछि। तथापि ज्ञानानुभूतिक स्तरपर एहि कृतिक प्रधान भाव “बौद्धिक अद्भुत” थिक। जटिल समस्याक सूक्ष्म समाधान, सामान्य अनुभवक भीतर निहित तार्किक संरचनाक उद्घाटन आ परिभाषाक क्रमिक परिष्कार विस्मय उत्पन्न करैत अछि। रस-सिद्धान्त मूलतः नाट्य आ काव्यक भावानुभूतिक विवेचन करैत अछि; तत्त्वचिन्तामणिमे परम्परागत कलात्मक योजना नहि भेटैत अछि, मुदा ज्ञानानुभूतिक स्तरपर रसात्मक प्रभावक सम्भावना बनैत अछि। शान्त रसक सम्भावना सेहो ग्रन्थक अन्तिम पुरुषार्थमे निहित अछि। यथार्थ ज्ञानद्वारा मिथ्याज्ञान, दोष, प्रवृत्ति, जन्म आ दुःखक शृङ्खला विच्छिन्न करब आ अपवर्ग प्राप्त करब न्याय दर्शनक चरम प्रयोजन अछि। अतः ग्रन्थक बौद्धिक यात्रा अन्ततः शान्तिक आध्यात्मिक लक्ष्यसँ जुड़ैत अछि। ६.२ ध्वनि : सत्यक परीक्षण, बौद्धिक नैतिकता आ सांस्कृतिक वस्तुध्वनि आनन्दवर्धनक ध्वनि-सिद्धान्त मुख्यतः काव्यार्थक व्यञ्जनापर केन्द्रित अछि। तत्त्वचिन्तामणि प्रत्यक्षतः अभिधामूलक आ परिभाषात्मक ग्रन्थ थिक। तथापि एकर व्यापक सांस्कृतिक ध्वनि स्पष्ट अछि—सत्य परम्परासँ मात्र प्राप्त नहि होइत; सत्यकेँ तर्क, प्रतिपक्ष, अपवाद आ अनुभवक परीक्षासँ गुजरय पड़ैत अछि। ग्रन्थक प्रत्येक खण्ड अप्रत्यक्ष रूपसँ बौद्धिक स्वाधीनताक व्यञ्जना करैत अछि। अपन सम्प्रदायक सिद्धान्तो आलोचनासँ मुक्त नहि। एहि अर्थमे कृतिक गहनतम ध्वनि “विचारक उत्तरदायित्व” थिक। प्रतिपक्षकेँ दुर्बल बनाकऽ पराजित करब उचित नहि; ओकर सबलतम रूप प्रस्तुत करि उत्तर देब चाही। आनन्दवर्धनक ध्वनि-सिद्धान्त शास्त्रगद्यपर सोझे लागू नहि होइत अछि—शास्त्रक प्रयोजन व्यङ्ग्य नहि, वाच्य अछि। तथापि एहि संस्करणक समग्र संयोजनमे एकटा वस्तुध्वनि अवश्य स्फुरित होइत अछि: मिथिलाक भूमिपर रचित ग्रन्थ मिथिलाक भाषामे घुरब—ई तथ्य कतहु घोषित नहि कएल गेल अछि, मुदा प्रत्येक पृष्ठसँ ध्वनित होइत अछि जे मैथिली केवल गीत-कथाक नहि, प्रमाणशास्त्रक सेहो भाषा अछि। एही ध्वनिकेँ ग्रन्थक गम्भीरतम व्यङ्ग्यार्थ मानल जा सकैत अछि। ६.३ वक्रोक्ति : दृष्टिक अवधारणात्मक विचलन कुन्तकक वक्रोक्ति काव्यमे अभिव्यक्तिक विशिष्ट विचलन आ सौन्दर्यक सिद्धान्त थिक। नव्य-न्याय गद्य अलङ्कारिक वक्रताक बदला अवधारणात्मक वक्रता उत्पन्न करैत अछि। सामान्य भाषा “अभाव”, “सम्बन्ध”, “ज्ञान” वा “समानता” केँ सरल मानैत अछि; गङ्गेश एहि प्रत्यक्ष सरलताकेँ उलटि ओकर भीतरक जटिलता उद्घाटित करैत छथि। एहि प्रकार वक्रता शब्दालङ्कारमे नहि, दृष्टिकोणमे अछि। “नहि देखाइ पड़ब” आ “अभावक प्रत्यक्ष” एक नहि; “दू वस्तु समान अछि” आ “सादृश्य कोन धर्मसँ अवच्छिन्न अछि” एक नहि। एहि विश्लेषणात्मक विचलनमे कृतिक मौलिक सौन्दर्य निहित अछि। ६.४ रीति, गुण आ शास्त्रगद्यक परम्परा भारतीय साहित्यशास्त्रमे काव्य आ शास्त्रक भेद स्वीकृत अछि, मुदा शास्त्रगद्यक अपन सौन्दर्यशास्त्र सेहो अछि—वात्स्यायन-भाष्यसँ उदयनक ‘न्यायकुसुमाञ्जलि’ धरि शास्त्रीय गद्य अपन प्रौढ़ि, अर्थगौरव आ वाक्य-विन्यासक कौशलसँ काव्यगुणक स्पर्श करैत रहल अछि। मूल नव्य-न्याय-गद्य गौडी रीतिक समासभूयिष्ठ सघनताक चरम अछि; प्रस्तुत अनुवादक गद्य वैदर्भी रीतिक निकट अछि—समास-लाघव, प्रसाद-गुणक प्राधान्य, आ ओज ओतबे जतय तर्कक तीक्ष्णता माङ्गैत अछि। तथापि विषयक सूक्ष्मता कारण प्रसादगुण सर्वत्र समान नहि। ओजगुण विशेषतः खण्डन, दोषोद्घाटन आ सिद्धान्त-स्थापनमे प्रबल अछि; माधुर्यक स्थानपर बौद्धिक दृढ़ता आ परिभाषात्मक कठोरता प्रमुख अछि। अनुवादक अवच्छेदक, प्रतियोगिता, अनुयोगिता, सिषाधयिषा जकाँ पारिभाषिक शब्दक अक्षुण्ण रक्षा करैत छथि, मुदा परिचयात्मक अध्याय, उदाहरण आ सरल विवेचनद्वारा पाठकीय प्रवेश सुगम बनबैत छथि। ई सन्तुलन क्षेमेन्द्रक औचित्य-सिद्धान्तक कसौटीपर विशेष रूपेँ खरा उतरैत अछि: शास्त्रानुवादमे औचित्य ई अछि जे सरलीकरण अर्थ-हानिक मूल्यपर नहि हो आ पारिभाषिकता दुर्बोधताक बहाना नहि बनय। ‘जँ मीमांसकक बात मानि लेल जाए... तँ अनभ्यास-दशामे संशय सर्वथा असम्भव भऽ जाएत’—एहन वाक्य-रचनामे मूलक तर्कक धार आ मैथिलीक स्वाभाविक अन्वय दुनू सुरक्षित अछि। ६.५ औचित्य : कठिनता, विस्तार आ प्रयोजन क्षेमेन्द्रक औचित्यदृष्टिसँ ग्रन्थक भाषा, विषय आ प्रयोजनमे गहन सामञ्जस्य अछि। सूक्ष्म तत्त्वक विवेचन लेल सूक्ष्म पारिभाषिकता आवश्यक अछि। जँ नव्य-न्यायक अवधारणाकेँ अत्यधिक सरल करि देल जाए, तँ ओकर तार्किक सीमा नष्ट भऽ जाएत। अतः कठिनता सर्वत्र दोष नहि; किछु कठिनता विषयगत औचित्यक परिणाम थिक। अवच्छेदक, प्रतियोगिता, निरूपकता आ समानाधिकरण्य जकाँ पदसभ बिना सूक्ष्म सम्बन्ध व्यक्त करब कठिन अछि। तथापि जतय एकहि निष्कर्ष प्रश्नोत्तर, सारांश आ पुनर्व्याख्याक रूपमे अनेक बेर दोहराओल गेल अछि, ओतय औचित्य शिथिल होइत अछि। अध्यापन-सहायक पुनरावृत्ति आरम्भिक पाठक लेल उपयोगी भऽ सकैत अछि, मुदा विशेषज्ञ पाठक लेल ई विस्तारक भार उत्पन्न करैत अछि। आदर्श संस्करणमे मूल अनुवाद, सरल व्याख्या, शोध-टिप्पणी आ अभ्यास-सामग्री अलग स्तरपर व्यवस्थित होएबाक चाही। ६.६ शब्दशक्ति, तात्पर्यवृत्ति आ आत्मप्रतिबिम्बी अनुवाद कृतिक शब्दखण्ड भारतीय अर्थमीमांसाक भीतरसँ अपन आलोचनात्मक उपकरण स्वयं प्रदान करैत अछि। अभिधा, लक्षणा, योग, रूढ़ि, जाति, व्यक्ति, तात्पर्य आ वाक्यार्थक प्रश्न केवल भाषाक बाह्य अध्ययन नहि; ग्रन्थ अपन अभिव्यक्तिक शर्तसभक सेहो परीक्षण करैत अछि। एहि आत्मप्रतिबिम्बी स्वरूपक कारण तत्त्वचिन्तामणि एकटा एहन कृति बनैत अछि जे भाषाक माध्यमसँ दर्शन करैत अछि आ संगहि दार्शनिक रीति सँ भाषाक प्रकृतिक अन्वेषण सेहो करैत अछि। ग्रन्थ भाषाक माध्यमसँ दर्शन करैत अछि आ दर्शनक माध्यमसँ भाषाक सीमा, शक्ति आ प्रमाणत्व निर्धारित करैत अछि। एहि ग्रन्थक सर्वाधिक रोचक साहित्यशास्त्रीय आयाम ई अछि जे ई अपन अनुवाद-पद्धतिक सिद्धान्त स्वयं अपना भीतर धारण करैत अछि। शब्दखण्ड शाब्दबोधक जे चारि तत्त्व स्थापित करैत अछि—आकाङ्क्षा, योग्यता, आसत्ति आ तात्पर्य—से अनुवाद-कर्मक चारू कसौटी सेहो अछि। अनुवादककेँ मूल वाक्यक पदसभक पारस्परिक आकाङ्क्षा पकड़ऽ पड़ैत छनि, लक्ष्यभाषामे ओकर योग्यता (अर्थ-सङ्गति) सुनिश्चित करऽ पड़ैत छनि, वाक्य-विन्यासक आसत्ति निमाहऽ पड़ैत छनि, आ सर्वोपरि ग्रन्थकारक तात्पर्यक निर्णय करऽ पड़ैत छनि। नैयायिक तात्पर्य-सिद्धान्त—जे अर्थ-निर्णयमे वक्ताक विवक्षाकेँ निर्णायक मानैत अछि—अनुवादकक अपन कर्मक शास्त्रीय आधार अछि। एहि दृष्टिसँ ई अनुवाद आत्म-प्रतिफलित (स्वसंवेदी) कृति अछि: जे सिद्धान्त ओ अनुवादित करैत अछि, ओही सिद्धान्तसँ ओ अनुवादित होइत अछि। भर्तृहरिक स्फोटवाद आ नैयायिक खण्डशः शाब्दबोधक ऐतिहासिक द्वन्द्वमे ई अनुवाद व्यवहारतः नैयायिक पक्षक साक्ष्य अछि—वाक्यार्थ पद-पदार्थक अन्वयसँ निर्मित होइत अछि, आ तेँ ओ भाषान्तरणीय अछि। ७. पाश्चात्य आलोचना-सिद्धान्तक आलोकमे पुनर्पाठ ७.१ अरस्तूवादी तर्क आ वाग्मिता अरस्तूक वाग्मितामे वक्ताक विश्वसनीयता, श्रोताक भाव आ तर्कगत प्रमाण—ई तीन प्रमुख पक्ष मानल जाइत अछि। तत्त्वचिन्तामणिमे भावात्मक प्रेरणाक स्थान न्यून आ तर्कप्रधान प्रमाणक स्थान सर्वोच्च अछि। तथापि आप्तवाक्यक सिद्धान्त वक्ताक विश्वसनीयता, ज्ञान आ दोषरहित अभिप्रायक प्रश्न उठबैत अरस्तूवादी वक्ता-विश्वसनीयतासँ संवाद स्थापित करैत अछि। न्यायक पञ्चावयव अनुमान अरस्तूवादी त्रिपदी न्यायवाक्यसँ अधिक संवादात्मक अछि। उदाहरण, उपनय आ निगमनद्वारा ई केवल निष्कर्ष नहि दैत, अपितु श्रोताकेँ सामान्य नियमसँ वर्तमान पक्षधरि क्रमशः लऽ जाइत अछि। ७.२ रूपवाद आ अपरिचयीकरण रूसी रूपवाद साहित्यिक कृतिक निर्माण-विधि आ युक्तिपर बल दैत अछि। एहि दृष्टिसँ तत्त्वचिन्तामणिक वास्तविक “कथ्य” जतेक महत्त्वपूर्ण अछि, ओकर प्रस्तुति-विधि सेहो ओतबे महत्त्वपूर्ण अछि। पूर्वपक्ष, उत्तरपक्ष, दोष, समाधान, अवच्छेदक आ सिद्धान्त-लक्षणक आवर्ती संरचना ग्रन्थक प्रमुख रचनात्मक उपकरण थिक। एहि उपकरणसभ सामान्य विचारकेँ अपरिचित बनबैत अछि। दैनिक जीवनमे सहज बुझाइत “देखब”, “नहि होएब”, “समान होएब” वा “जानब” जकाँ क्रियासभ ग्रन्थमे जटिल दार्शनिक घटना बनि उठैत अछि। ई अपरिचयीकरण कृतिक बौद्धिक प्रभावक मूल स्रोत अछि। ७.३ संरचनावाद : अर्थ-सम्बन्धक जाल संरचनावादी दृष्टि अर्थकेँ पृथक् वस्तुमे नहि, सम्बन्धक जालमे देखैत अछि। नव्य-न्याय सेहो विशेष्य–विशेषण, आश्रय–आश्रित, धर्म–धर्मी, प्रतियोगी–अभाव, साध्य–हेतु, शब्द–अर्थ आ ज्ञाता–ज्ञेयक सम्बन्धात्मक संरचनापर आधारित अछि। अर्थात् कोनो तत्त्व अपनहि पूर्णतः परिभाषित नहि; ओकर सीमा अन्य तत्त्वसँ सम्बन्ध आ भेदद्वारा निश्चित होइत अछि। एहि दृष्टिसँ नव्य-न्यायक “अवच्छेदक” आधुनिक संरचनात्मक चिन्तनक अत्यन्त निकट पड़ैत अछि। मुदा अन्तर ई अछि जे संरचनावाद प्रायः भाषिक संरचनाकेँ प्राथमिक मानैत अछि, जखन कि न्याय भाषा-बाह्य वस्तुजगतक यथार्थ अस्तित्व स्वीकार करैत अछि। ७.४ व्याख्याशास्त्र आ विश्लेषणात्मक दर्शन गाडामरपरक व्याख्याशास्त्र मानैत अछि जे पाठक अपन ऐतिहासिक क्षितिजसहित पाठक समीप अबैत अछि। प्रस्तुत मैथिली अनुवादमे संस्कृत शास्त्रीय क्षितिज आ आधुनिक मैथिली पाठकीय क्षितिजक संगम होइत अछि। अनुवाद केवल शब्द-प्रतिस्थापन नहि; ओ परम्परा आ वर्तमानक बीच संवाद थिक। परिचयात्मक अध्याय, उदाहरण, पारिभाषिक व्याख्या आ अध्ययन-सहचर पाठकक पूर्वबोध तैयार करैत अछि। एहि कारण अनुवाद मूल पाठक पुनरुक्ति मात्र नहि, अपितु एकटा व्याख्यात्मक सेतु बनि जाइत अछि। तथापि व्याख्याशास्त्रीय दृष्टिसँ अनुवादक प्रत्येक सरलीकरण एकटा चयन सेहो अछि। जतय मूलक बहुअर्थकता वा विवादग्रस्तता एक निश्चित व्याख्यामे बदलि जाइत अछि, ओतय पाठक अन्य सम्भावित अर्थसँ वञ्चित भऽ सकैत अछि। अतः मूल संस्कृत पद, मैथिली अनुवाद आ आवश्यक पाठ-टिप्पणीक त्रिस्तरीय व्यवस्था एहि प्रकारक ग्रन्थ लेल विशेष उपयोगी होइत। गादामरक क्षितिज-संलयन (Horizontverschmelzung) क अवधारणा एहि संस्करणक द्विस्तरीय स्थापत्यक सटीक व्याख्या करैत अछि: चौदहम शताब्दीक शास्त्रार्थ-सभाक क्षितिज आ एकैसम शताब्दीक मैथिली पाठकक क्षितिज—परिचयात्मक अध्याय एही दुनू क्षितिजक संलयन-भूमि अछि, जतय गङ्गेशक 'रिलायबिलिज्म', 'एक्सटर्नलिज्म' आ 'फैलिबिलिज्म' सन समकालीन विश्लेषणात्मक ज्ञानमीमांसाक अवधारणासँ संवाद करैत छथि। ई संवाद आरोपित नहि, अर्जित अछि—इङ्गल्स, मतिलाल, सिबजीवन भट्टाचार्य आ स्टीफन फिलिप्सक अध्ययन-परम्परा सिद्ध कऽ चुकल अछि जे गङ्गेशक विशेष्य-विशेषण-विश्लेषण फ्रेगे-रसेलक तर्कशास्त्रीय विश्लेषणक समकक्ष अछि, आ गङ्गेशक परतःप्रामाण्यवाद समकालीन विश्वसनीयतावादी (reliabilist) ज्ञानमीमांसाक पूर्वाभास। एहि ग्रन्थक परिचयात्मक अध्याय एहि तुलनात्मक विमर्शकेँ मैथिलीमे पहिल बेर व्यवस्थित रूपेँ उपलब्ध करबैत अछि। ७.५ पाठक-प्रतिक्रिया : द्विस्तरीय पाठक ग्रन्थ दू प्रकारक पाठक निर्मित करैत अछि। पहिल, आरम्भिक पाठक, जकर लेल प्रश्नोत्तर, उदाहरण, सरल व्याख्या आ अध्यायगत परिचय आवश्यक अछि। दोसर, विशेषज्ञ पाठक, जे मूल तर्क, पाठान्तर, पूर्वपक्षीय स्रोत आ परम्परा, पारिभाषिक अन्तर तथा सूक्ष्मता खोजैत अछि। प्रस्तुत संस्करण दुनू पाठक-वर्गकेँ सम्बोधित करबाक प्रयास करैत अछि। एहि कारण कखनो व्याख्या अत्यन्त सरल, कखनो मूल अनुवाद अत्यन्त सघन देखाइत अछि। ई द्विस्तरीयता कृतिक उपयोगिता बढ़बैत अछि, मुदा शैलीगत एकरूपताकेँ कखनो बाधित सेहो करैत अछि। दुनू अपेक्षाकेँ एकहि सतत शैलीमे पूरा करबाक प्रयास कखनो असमानता उत्पन्न करैत अछि; स्तरित विन्यास अधिक उपयुक्त होएत। ७.६ विखण्डन : परिभाषाक निरन्तर अस्थिरता विखण्डनवादी आलोचना पाठक भीतर उपस्थित द्वन्द्व आ अस्थिर सीमाकेँ उद्घाटित करैत अछि। तत्त्वचिन्तामणि सत्य–असत्य, प्रमाण–अप्रमाण, उपस्थिति–अभाव, प्रत्यक्ष–स्मृति आ शब्द–अर्थक स्पष्ट सीमा स्थापित करबाक प्रयत्न करैत अछि। मुदा ग्रन्थक अपन विमर्श देखबैत अछि जे एहि सीमासभकेँ स्थापित करबा लेल निरन्तर अतिरिक्त विशेषण, अवच्छेदक आ अपवादक आवश्यकता पड़ैत अछि। एहि तथ्यसँ ग्रन्थ विफल नहि होइत; उलटे एकर दार्शनिक ईमानदारी प्रमाणित होइत अछि। प्रत्येक परिभाषा अपन सम्भावित विघटनकेँ आमन्त्रित करैत अछि आ फेर अधिक सूक्ष्म रूपमे पुनर्गठित होइत अछि। एहि अर्थमे तत्त्वचिन्तामणि स्थिर अर्थक ग्रन्थ नहि, अर्थक निरन्तर अनुशासन आ संशोधनक ग्रन्थ थिक। ७.७ व्यवहारवाद, विश्वसनीयतावाद आ बाह्यवाद ज्ञानक सत्यता सफल प्रवृत्तिसँ निश्चित होएबक न्यायसिद्धान्त आधुनिक व्यवहारवादक समीप अछि। जँ जलक ज्ञानसँ प्रेरित प्रवृत्ति प्यास बुझबैत अछि, तँ ओ ज्ञान सफल आ प्रमाणित अछि। संगहि ज्ञानक यथार्थता ओकर उचित कारण-शृङ्खलासँ जुड़ल अछि; ई आधुनिक विश्वसनीयतावादी ज्ञानमीमांसासँ साम्य रखैत अछि। प्रस्तुत ग्रन्थ स्वयं सेहो गङ्गेशक दर्शनकेँ वस्तुनिष्ठ कारण-प्रक्रिया आ बाह्य यथार्थवादसँ सम्बद्ध करैत अछि। एहि कारण न्याय आधुनिक विश्वसनीयतावाद आ बाह्यवादक निकट सेहो देखाइत अछि। तथापि न्याय सत्यकेँ मात्र उपयोगितामे विलीन नहि करैत। ७.८ अनुवाद-सिद्धान्त : श्लायरमाखर, बेन्यामिन आ वेनुती फ्रीडरिख श्लायरमाखरक प्रसिद्ध द्विभाजन—अनुवादक पाठककेँ लेखक दिस लऽ जाय अथवा लेखककेँ पाठक दिस—एहि अनुवादमे एकटा तेसर मार्ग पबैत अछि। परिचयात्मक अध्यायसभ पाठककेँ गङ्गेश दिस लऽ जाइत अछि; परिशिष्टक पूर्ण अनुवाद गङ्गेशकेँ मैथिली पाठकक आङनमे आनैत अछि। लॉरेन्स वेनुतीक शब्दावलीमे ई अनुवाद 'विदेशीकरण' (foreignization) क पक्षधर अछि—अवच्छेदकत्व, प्रतियोगिता, संदिग्धानैकान्तिकता सन पद अननूदित रहैत अछि, कारण एहि पदसभक पारिभाषिक परिशुद्धते नव्य-न्यायक प्राण अछि; 'सहजीकरण' (domestication) केवल वाक्य-विन्यास आ अन्वयक स्तरपर कएल गेल अछि। वाल्टर बेन्यामिनक 'अनुवादकक कार्य'क दृष्टिसँ ई अनुवाद मूलक 'उत्तरजीवन' (Fortleben) अछि—तत्त्वचिन्तामणि एहि अनुवादमे केवल संरक्षित नहि, पुनर्जीवित भेल अछि, आ मैथिली भाषा एहि प्रक्रियामे अपन 'विशुद्ध भाषा'क सम्भावनाक—अपन शास्त्रधारण-क्षमताक—साक्षात्कार कएलक अछि। ७.९ परापाठ, अभिग्रहण आ अधीनस्थ ज्ञानक पुनर्वास जेरार झेनेतक परापाठ (paratext) सिद्धान्तक दृष्टिसँ एहि संस्करणक परिचय-अध्याय, अध्ययन-सहचर आ सत्यापित ग्रन्थसूची केवल सहायक सामग्री नहि, अर्थ-निर्माणक सक्रिय उपकरण अछि—ई परापाठे ग्रन्थकेँ शोध-प्रयोग्य बनबैत अछि आ पाठकक अभिग्रहण-क्षितिज (यौसक Erwartungshorizont) केँ निर्मित करैत अछि। सर्वाधिक मार्मिक पाश्चात्य प्रतिध्वनि मुदा फूकोक 'अधीनस्थ ज्ञान' (subjugated knowledges) आ सबाल्टर्न इतिहास-दृष्टिमे भेटैत अछि: गङ्गेशक जीवनवृत्तक पञ्जी-आधारित समानान्तर विवरण—अन्तर्जातीय विवाह, चर्मकार-टोलसँ सम्बन्ध, मुख्यधारा जीवनी-लेखनमे एहि तथ्यक मौन—मध्यकालीन मिथिलामे ज्ञान, जाति आ प्रतिष्ठाक सम्बन्धपर जे प्रश्न उठबैत अछि, से इतिहास-लेखनक वंशावली-पद्धति (genealogy) क शुद्ध उदाहरण अछि। ग्रन्थ ई देखबैत अछि जे भारतक सर्वश्रेष्ठ तार्किकक अपन जीवने तर्क आ सामाजिक संरचनाक द्वन्द्वक रणभूमि छल—आ ई द्वन्द्व इतिहास-लेखनमे आइयो अनिर्णीत अछि। ८. मैथिली अनुवाद : कला, भाषा, परम्परा आ ज्ञानक लोकतन्त्रीकरण अनुवादक भाषा-नीति तीन स्तम्भपर ठाढ़ अछि। पहिल, पारिभाषिक अविकलता: नव्य-न्यायक तकनीकी पदावली यथावत् राखल गेल अछि आ प्रथम प्रयोगपर कोष्ठकमे आङ्ग्ल समतुल्य (जेना Invariable Concomitance, Apperception, Qualificandum) देल गेल अछि, जाहिसँ ग्रन्थ अन्तरराष्ट्रीय अध्ययन-परम्परासँ जुड़ल रहैत अछि। दोसर, वाक्य-विन्यासक मैथिलीकरण: संस्कृतक दीर्घ समास-शृङ्खलाकेँ मैथिलीक स्वाभाविक अन्वय-क्रममे तोड़ल गेल अछि—'ईहो नहि कहल जाए जे...', 'एतबा सेहो नहि कहल जाए जे...' सन प्रतिषेध-सूत्रसभ शास्त्रार्थक गतिकेँ मैथिली गद्यमे जीवन्त राखैत अछि। तेसर, पूर्वपक्ष-सिद्धान्तक नाट्यशास्त्रीय स्पष्टता: आपत्ति, खण्डन, पुनःस्थापना आ निष्कर्षक अनुक्रम उपशीर्षकसभसँ एना चिह्नित अछि जे शास्त्रार्थक सम्पूर्ण नाट्य-संरचना—जकरा पाश्चात्य विद्वान 'डायलेक्टिकल थिएटर' कहलनि अछि—पाठकक सोझाँ मञ्चित भऽ जाइत अछि। मैथिलीक व्याकरणिक सम्पदा—आदरार्थक क्रिया-रूप, 'छथि/अछि'क भेद, 'सेहो/तँ/मुदा'क तर्क-संयोजक शक्ति—शास्त्रीय विमर्शक सूक्ष्म भेदसभकेँ वहन करबामे पूर्ण समर्थ सिद्ध भेल अछि, आ एतबे एहि अनुवादक स्थायी भाषावैज्ञानिक प्रमाण-मूल्य अछि। नव्य-न्यायक जन्मभूमि मिथिला रहल, मुदा आधुनिक मैथिली पाठक लेल एकर अधिकांश मूल सामग्री संस्कृत अथवा विदेशी भाषामे सीमित रहल। मैथिली अनुवाद एहि ऐतिहासिक विडम्बनाकेँ कम करैत अछि; ई सांस्कृतिक पुनरधिग्रहण आ ज्ञानक भाषिक लोकतन्त्रीकरण थिक। प्रामाण्य, व्याप्ति, अवच्छेदक, प्रतियोगिता, उपाधि, अनुव्यवसाय आ तात्पर्य जकाँ विषयक निरूपण मैथिली अकादमिक गद्यक क्षमता सिद्ध करैत अछि। ई मैथिलीकेँ केवल भावात्मक, लोककाव्यात्मक, घरेलू, लोकजीवन, गीत-कथा वा भावाभिव्यक्तिक भाषा नहि, बल्कि सूक्ष्म तर्क, ज्ञानमीमांसा, भाषादर्शन आ सत्तामीमांसाक समर्थ भाषा सिद्ध करैत अछि; मिथिलाक दार्शनिक विरासतकेँ वर्तमान भाषिक समुदायसँ पुनः जोड़ैत अछि; आ पारिभाषिक शब्दनिर्माण तथा शास्त्रीय गद्य-विन्यासक माध्यमसँ मैथिली अकादमिक गद्यक सम्भावना विस्तृत करैत अछि। मैथिली अनुवादक ऐतिहासिक महत्त्व एहि बातमे सेहो अछि जे ई मिथिलाक शास्त्रीय बुद्धिवादकेँ आधुनिक मैथिली जनसमुदायक भाषिक अधिकारक भीतर पुनः स्थापित करैत अछि। मुख्य चुनौती पारिभाषिक समरूपता थिक। एकहि संस्कृत पदक भिन्न मैथिली रूप, अनावश्यक विदेशी कोष्ठक, अत्यधिक शाब्दिकता अथवा अत्यधिक सरलीकरण अर्थक सीमा बदलि सकैत अछि। ९. प्रमुख कलात्मक, बौद्धिक आ सांस्कृतिक उपलब्धिसभ कृतिक सभसँ पैघ उपलब्धि तार्किक सूक्ष्मता थिक। कोनो परिभाषाकेँ स्वीकार करबासँ पूर्व ओकर प्रत्येक सम्भावित अपवाद खोजल जाइत अछि। एहि बौद्धिक अनुशासनक कारण पाठकक सोचबाक पद्धति परिवर्तित होइत अछि। दोसर उपलब्धि संवादशीलता थिक। प्रतिपक्षकेँ दुर्बल रूपमे प्रस्तुत नहि कएल जाइत; ओकर समर्थतम तर्क रखि तकर उत्तर देल जाइत अछि। एहि कारण ग्रन्थ वास्तविक शास्त्रार्थक आदर्श प्रस्तुत करैत अछि। तेसर उपलब्धि ज्ञान आ भाषाक अभिन्न सम्बन्धक उद्घाटन थिक। सत्य केवल वस्तुजन्य नहि; ओकर बोध शब्द, सम्बन्ध, स्मृति, तात्पर्य, सन्निकर्ष आ मानसिक प्रक्रियापर निर्भर अछि। ज्ञानमीमांसा, सत्तामीमांसा, भाषादर्शन आ मनोविज्ञानक अन्तर्सम्बन्ध एहि कृतिक एकटा अन्य महत्त्वपूर्ण उपलब्धि अछि। चारिम उपलब्धि बौद्धिक नैतिकता थिक। ग्रन्थ पाठककेँ सिखबैत अछि जे निष्कर्षसँ प्रेम करबासँ पूर्व कारणक परीक्षा आवश्यक अछि; परम्पराक सम्मान तकर आलोचनात्मक परीक्षण रोकबाक कारण नहि बनबाक चाही। मैथिली भाषामे शास्त्रीय ज्ञानक विशाल भण्डार उपलब्ध करेनाइ एहि संस्करणक विशिष्ट सांस्कृतिक उपलब्धि थिक। १०. निष्कर्ष तत्त्वचिन्तामणि भारतीय दर्शनक केवल ऐतिहासिक धरोहर नहि, विचारक पद्धति थिक। तत्त्वचिन्तामणि भारतीय बुद्धिवादक महान स्मारक थिक। एकर मूल शक्ति कोनो एक सिद्धान्तक स्थापना मात्र नहि, अपितु विचार करबाक एकटा अनुशासित विधिक निर्माणमे अछि। ई ग्रन्थ सिखबैत अछि जे ज्ञानक दाबी तखने स्वीकार्य अछि जखन ओकर कारण स्पष्ट हो, ओकर व्याप्ति सुरक्षित हो, ओकर विरोधी उदाहरणक उत्तर हो आ ओकर भाषा भ्रमरहित हो। अन्ततः कहल जा सकैत अछि जे तत्त्वचिन्तामणिक वास्तविक नायक कोनो व्यक्ति नहि, “यथार्थ ज्ञान” थिक; एकर संघर्ष अज्ञान, भ्रम, अस्पष्टता आ अव्याप्त परिभाषासँ अछि; एकर कथा विचारक क्रमिक परिष्कारक कथा थिक; आ एकर चरम परिणति मनुष्यक बुद्धिकेँ अधिक सूक्ष्म, उत्तरदायी आ सत्याभिमुख बनेबामे निहित अछि। प्रत्येक दाबीकेँ प्रश्न, प्रत्येक परिभाषाकेँ अपवाद, प्रत्येक निष्कर्षकेँ प्रमाण आ प्रत्येक भाषिक प्रयोगकेँ अर्थक उत्तरदायित्वसँ गुजरय पड़ैत अछि। समग्रतः ई संस्करण तीन स्तरपर ऐतिहासिक अछि। ज्ञानमीमांसाक स्तरपर ई गङ्गेशक सम्पूर्ण प्रमाण-चतुष्टयकेँ पहिल बेर मैथिलीमे समग्र रूपेँ उपलब्ध करबैत अछि। भाषाक स्तरपर ई मैथिलीक शास्त्रधारण-क्षमताक निर्णायक प्रमाण अछि—जे भाषा विद्यापतिक पदावली गाबि सकैत अछि, से सिंह-व्याघ्री-लक्षणक सूक्ष्मता सेहो वहन कऽ सकैत अछि। आ सांस्कृतिक स्तरपर ई एकटा ऐतिहासिक ऋणक परिशोध अछि: मिथिला जे ग्रन्थ विश्वकेँ देलक, से विश्व-परिक्रमा कऽ—कलकत्ता, तिरुपति, विएना आ हार्वर्ड होइत—अपन जन्मभूमिक भाषामे घुरि आयल अछि। भारतीय काव्यशास्त्रक औचित्य-तात्पर्य-दृष्टि हो अथवा पाश्चात्य अनुवाद-व्याख्याशास्त्र—दुनू कसौटीपर ई कृति एकटा परिपक्व, आत्मसजग आ दूरगामी महत्त्वक शास्त्रानुवाद सिद्ध होइत अछि, जे मैथिली गद्यक इतिहासमे शास्त्रगद्यक एकटा नव अध्यायक उद्घाटन करैत अछि। ११. तुलनात्मक सारणी आलोचनात्मक दृष्टि तत्त्वचिन्तामणिमे प्रासंगिक तत्त्व मुख्य निष्कर्ष रस-सिद्धान्त तर्कजन्य विस्मय, दुःखनिवृत्तिक लक्ष्य बौद्धिक अद्भुत आ शान्तिपरक परिणति ध्वनि परम्परागत दावाक निरन्तर परीक्षण बौद्धिक नैतिकता आ सत्याभिमुखता वक्रोक्ति सामान्य अनुभवक अवधारणात्मक पुनर्रचना दृष्टिगत वक्रता कृतिक सौन्दर्य औचित्य सूक्ष्म विषय लेल पारिभाषिक कठिनता आवश्यक कठिनता उचित; पुनरावृत्ति सीमित हो रूपवाद पूर्वपक्ष-दोष-सिद्धान्तक संरचना कथ्यसँ अधिक प्रस्तुति-विधि प्रभावकारी संरचनावाद विशेष्य-विशेषण, हेतु-साध्य, प्रतियोगी-अभाव अर्थ सम्बन्धक जालमे निर्मित व्याख्याशास्त्र संस्कृत मूल आ आधुनिक मैथिली पाठकक संवाद अनुवाद क्षितिज-संगम थिक विखण्डन परिभाषाक निरन्तर संशोधन स्थिर अर्थक बदला अनुशासित परिष्कार विश्वसनीयतावाद उचित कारण-सामग्रीसँ प्रमा ज्ञानक सत्यता प्रक्रियात्मक आ वस्तुनिष्ठ १२. चयनित ग्रन्थसूची आनन्दवर्धन। ध्वन्यालोक। विविध संस्कृत संस्करण। अरस्तू। पोएटिक्स तथा रेटोरिक। विभिन्न अनुवाद आ संस्करण। उदयनाचार्य। न्यायकुसुमाञ्जलि। कुन्तक। वक्रोक्तिजीवित। क्षेमेन्द्र। औचित्यविचारचर्चा। गङ्गेश उपाध्याय। तत्त्वचिन्तामणि। प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान आ शब्दखण्ड। गौतम। न्यायसूत्र। वात्स्यायनभाष्यसहित। भट्ट, वी. पी. तत्त्वचिन्तामणिक विभिन्न खण्डपर सम्पादन आ अध्ययन। भरतमुनि। नाट्यशास्त्र। मम्मट। काव्यप्रकाश। वामन। काव्यालङ्कारसूत्रवृत्ति। फिलिप्स, स्टीफन एच. गङ्गेश आ भारतीय ज्ञानमीमांसापर विभिन्न अध्ययन। गाडामर, हान्स-गेओर्ग। ट्रुथ एण्ड मेथड। ईगलटन, टेरी। लिटरेरी थ्योरी : एन इन्ट्रोडक्शन। सॉस्यूर, फर्डिनान्द द। कोर्स इन जनरल लिङ्ग्विस्टिक्स। देरिदा, जाक। ऑफ ग्रामेटोलॉजी तथा राइटिंग एण्ड डिफरेन्स। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१७.गजेन्द्र ठाकुर- गोहि सभक बीच जलसमाधि [गजेन्द्र ठाकुरक मैथिली कादम्बरी, खण्ड ०-१–२, खण्ड ० अध्याय (-१००) सँ अध्याय (-१); खण्ड १ अध्याय ० सँ अध्याय १००; आ खण्ड २ अध्याय १०१ सँ अध्याय २००] कथासार आ समीक्षात्मक मूल्याङ्कन: भारतीय आ पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्तक आलोकमे विदेह · समानान्तर साहित्य आन्दोलन गोहि सभक बीच जलसमाधि सम्पूर्ण त्रयीक आलोचनात्मक अध्ययन तीन खण्ड · अध्याय −१०० सँ २०० · कुल ३०१ अध्याय भाग-एक — खण्ड-० (पूर्व-कथाकाल) साहित्यिक समीक्षा भाग-दुइ — मुख्य उपन्यास (खण्ड १–२) कृतिसार तथा आलोचना परिशिष्ट — एन्थ्रोपोलोजिकल संकलन (तीनू खण्ड) लेखक : गजेन्द्र ठाकुर भाग-एक खण्ड-० (पूर्व-कथाकाल) — साहित्यिक समीक्षा एक · जड़िक ओर घुरैत कथा गढ़ नारिकेल नामक ओहि गामक कथा, जकर पोखरिमे देह डुबैत अछि आ पातपर नाम बचैत अछि, “गोहि सभक बीच जलसमाधि” उपन्यासक मुख्य खण्ड (खण्ड-१ आ खण्ड-२) मे वर्तमानसँ भविष्य दिस बहैत अछि। मुदा खण्ड-० ओहि बहावक विपरीत दिस—जड़िक ओर—घुरैत अछि। ई पूर्व-कथाकाल थिक : अध्याय [−१००] सँ आरम्भ भऽ [−१] धरि, ऋणात्मक सङ्ख्यामे उतरैत, ओ एक हजार दू सय बरखक ओहि दीर्घ स्मृतिकेँ उघारैत अछि जाहिपर मुख्य उपन्यासक समस्त कथा-भवन ठाढ़ अछि। साहित्यमे ‘प्रीक्वेल’ प्रायः मूल कृतिक व्यावसायिक विस्तार बनि जाइत अछि; मुदा एतय ओ एकटा दार्शनिक अनिवार्यता थिक। जँ मुख्य उपन्यासक केन्द्रीय सूत्र ई अछि जे ‘गोहि देह खाइत अछि, नाम नहि’, तँ ओहि सूत्रक उद्गम, ओकर पहिल उच्चारण, ओकर विकास आ ओकर परीक्षण—ई सभटा खण्ड-० मे घटित होइत अछि। अतः ई खण्ड कोनो परिशिष्ट नहि, वरन् मूल कृतिक ज्ञानमीमांसीय आधारशिला थिक। एहि समीक्षामे हम खण्ड-०केँ चारि दृष्टिसँ पढ़बाक प्रयास करब : भारतीय काव्यशास्त्रीय (रस-ध्वनि-वक्रोक्ति), पाश्चात्य आधुनिक सिद्धान्त (स्मृति-अध्ययन, उत्तर-औपनिवेशिक, अभिलेखागार-सिद्धान्त), नव्य-न्यायक ज्ञानमीमांसा, आ विदेह समानान्तर-इतिहास ढाँचा। ई चारू दृष्टि एक-दोसराकेँ काटैत नहि, वरन् एहि पाठक अनेकस्तरीयताकेँ उघारैत अछि। दुइ · ऋणात्मक कालक वास्तुकला खण्ड-०केर सभसँ साहसिक संरचनात्मक निर्णय ओकर ऋणात्मक अध्याय-सङ्ख्या थिक। [−१००] सँ [−१] धरिक ई गणना पाठककेँ निरन्तर ई स्मरण दैत अछि जे ओ ‘शून्य’ दिस—अर्थात् मुख्य कथाक आरम्भ-बिन्दु दिस—बढ़ि रहल अछि। ई केवल मुद्रण-युक्ति नहि; ई कालक एकटा दार्शनिक व्याख्या थिक। प्रत्येक अध्याय शून्यसँ जतेक दूर, ओतेक ओ इतिहासक गहींरमे। जेना-जेना सङ्ख्या घटैत अछि, पाठक वर्तमानक निकट आबैत अछि—मुदा ओकरा ई कहियो नहि बिसरय दैत जे ई सम्पूर्ण वर्तमान एहि सुदीर्घ अतीतक ऋणी थिक। जे आरम्भ, वैह अन्तमे ठाढ़ भेल। शंख-रजतसँ जे चलल, से बारह सय बरख बाद, अमावसक ओहि रातिमे फेर एक ठाम आयल। — अध्याय [−३], “पूरा भेल गोल” एहि वास्तुकलामे इतिहास रैखिक नहि, वृत्ताकार अछि। अध्याय [−१००] केर शंख-रजत-भ्रम आ अध्याय [−१] केर अन्तिम साक्षीक स्वीकृति एक-दोसराकेँ प्रतिध्वनित करैत अछि। पाठ अपन आदि दिस घुरैत अछि—मुदा ओहि घुरावमे ओ बारह सय बरखक भार लऽ कऽ घुरैत अछि। ई ‘वृत्त’ केवल संरचना नहि, थीम सेहो थिक : नाम मरैत अछि, फेर जन्म लैत अछि; गाम डुबैत अछि, फेर उठैत अछि; साक्षी बदलैत अछि, मुदा साक्ष्य नहि। तीन · देह आ नाम — केन्द्रीय प्रतिपाद्य सम्पूर्ण खण्डक वैचारिक अक्ष एकटा फकरामे नुकाएल अछि, जे गढ़ नारिकेलक लोक-स्मृतिसँ बेर-बेर उभरैत अछि : “गोहि देह खाइत अछि, नाम नहि।” एहि एक वाक्यमे उपन्यासक समस्त तत्त्वमीमांसा समाहित अछि। गोहि—अर्थात् काल, विस्मृति, सत्ता, हिंसा, बजार—देहकेँ ग्रसैत अछि; मुदा जँ ‘नाम’ (अर्थात् स्मृति, अभिलेख, साक्ष्य, पहचान) कण्ठ आ पातपर बचल रहय, तँ व्यक्ति सम्पूर्णतः नहि मरैत। ई ‘नाम’ बहुअर्थी थिक। ओ व्यक्तिक पहचान थिक, मुदा ओ अभिलेखो थिक—ओ ‘पंजी’, ओ ‘हिसाब’, ओ लिखित साक्ष्य, जे सत्ताक विरुद्ध सामान्य जनक एकमात्र प्रतिरोध थिक। अध्याय [−२०] (“नामक पुल”) मे ई सूत्र अपन चरम रूप पबैत अछि : पत्थरक पुल बाढ़िमे बहि जाइत अछि, मुदा नामक पुल—अर्थात् ओहि मृतक-सभक अभिलेख जे पुल-निर्माणमे मारल गेलाह—युग-युग ठाढ़ रहैत अछि। एतय ‘नाम’ स्थापत्य बनि जाइत अछि; स्मृति अभियन्त्रण बनि जाइत अछि। गोहि देह खाइत अछि हे, नाम नहि खाइत रे। पत्थरक पुल छोड़ू, नामक पुल बान्हू। — अध्याय [−२०] केर अध्यायारम्भ लोकगीत चारि · रस, ध्वनि आ वक्रोक्ति रस-योजना खण्ड-०केर रस-संरचना बहुल थिक, मुदा ओकर प्रधान रस ‘करुण’ थिक—ओहि करुणाक जे विस्मृतिक विरुद्ध ठाढ़ अछि। बुधुआक जलसमाधि [−९०], महामारीक राति [−७१], देहक बजार [−३५]—एहि सभमे शोक अपन गरिमामे प्रकट होइत अछि, कहियो चीत्कारमे नहि उतरैत। एहि करुणक संग वीर रस सेहो अछि—मुदा ओ अस्त्रक वीरता नहि, स्मृतिक वीरता थिक : जे नाम राखैत अछि, जे साक्षी बनैत अछि, ओ एहि उपन्यासक नायक थिक। दार्शनिक अध्याय-सभमे (शंख आ रजत, आत्मसिद्धि-वाद) ‘शान्त’ रसक अनुशीलन अछि, जतय तर्कक उत्तेजना अन्ततः प्रशान्तिमे विलीन होइत अछि। ध्वनि एहि कृतिक शक्ति ओकर ‘ध्वनि’ (व्यंग्यार्थ) मे अछि। साक्षी-गाछ, जोड़ी-पोखरि, गोहि, शंख-रजत—ई सभटा वाच्यार्थसँ बहुत आगू इशारा करैत अछि। ‘गोहि’ प्रत्यक्षतः पोखरिक कुम्भीर थिक, मुदा ध्वन्यर्थमे ओ काल, पूँजी, सत्ता आ विस्मृतिक समुच्चय थिक। जखन अध्याय [−३६] मे कहल जाइत अछि जे ‘पुरान गोहि पानिमे रहै, नव गोहि तारमे बसै’, तखन इंटरनेट-कालक अदृश्य ठगीकेँ ओहि प्राचीन कुम्भीरक ध्वनिमे बान्हि देल जाइत अछि। ई ध्वनि-सातत्य समस्त बारह सय बरखकेँ एक सूत्रमे बान्हैत अछि। वक्रोक्ति कुन्तककृत ‘वक्रोक्ति’ अर्थात् कथनक वक्रता—एतय शीर्षक-योजनामे प्रकट होइत अछि। ‘नामक पुल’, ‘कण्ठक कागच’, ‘इनारक तल’, ‘मीनार आ जड़ि’—प्रत्येक शीर्षक एकटा वक्र-रूपक थिक जे विरोधाभासकेँ एक-संग बान्हैत अछि। एहि वक्रतामे कवि-व्यापार अछि : सोझ कथनकेँ ओ रूपकक ओर मोड़ि दैत छथि, आ ओहि मोड़मे अर्थ गहींर भऽ जाइत अछि। पाँच · नव्य-न्यायक ज्ञानमीमांसा खण्ड-०केर आरम्भिक अष्टक (अध्याय [−१००] सँ [−९३]) दार्शनिक नाटकक शृंखला थिक, जे मिथिलाक न्याय-परम्पराकेँ कथाक जड़िमे रोपैत अछि। एतय वाचस्पति मिश्र (भामती), उदयनाचार्य (न्यायकुसुमाञ्जलि) आ गंगेश उपाध्याय (तत्त्वचिन्तामणि)—मिथिलाक ई तीन दार्शनिक-शिखर—पात्र आ प्रतिध्वनि दुनू रूपमे उपस्थित छथि। अध्याय [−१००], “शंख आ रजत”, समस्त उपन्यासक ज्ञानमीमांसीय द्वार थिक। दूरसँ चमकैत शंखकेँ रजत (चानी) बुझबाक भ्रम—ई शास्त्रीय ‘शुक्ति-रजत’ दृष्टान्त—एतय एकटा वादक रूप लैत अछि : जे प्रश्न पुछब जनैत अछि, से भ्रमसँ बचैत अछि। प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान आ शब्द—ई चारि प्रमाण एहि नाटकमे केवल शास्त्रीय कोटि नहि, वरन् जीवनक व्यावहारिक उपकरण बनि जाइत अछि। सम्पूर्ण उपन्यासक ‘सतर्कता’—अफवाहसँ, ठगीसँ, विस्मृतिसँ बचबाक जे आग्रह—ओकर दार्शनिक बीज एतहि रोपल जाइत अछि। भ्रम क्षण भरि हे, सत्य युग-युग रे — जे पुछब जनै, से शंखकेँ रजत नहि बुझै। — अध्याय [−१००] केर सूत्रधार-लोकगीत एहि दार्शनिक अध्याय-सभक अन्तमे जे ‘कथा, आख्यान, दृष्टान्त आ उद्धरण’ केर संग्रह अछि—राजपथक पानि आ गङ्गाक धारा, स्फटिक आ जपाकुसुम, रस्सी आ सर्प, तत्त्वमसि आ अहं ब्रह्मास्मि—से केवल पाण्डित्य-प्रदर्शन नहि। ई सूत्रधारक कण्ठसँ, शिष्य आ गामक लोकक बीच, एकटा जीवित परम्पराक रूपमे प्रस्तुत होइत अछि। एतय शास्त्रक ‘उद्धरण’ लोक-वाचनमे रूपान्तरित भऽ जाइत अछि—अर्थात् नव्य-न्यायक अभिजात्य लोक-कण्ठमे उतरि आबैत अछि। ई एहि उपन्यासक एकटा मौलिक अवदान थिक : ‘दर्शन’केँ ओ ‘लोक’ बना दैत अछि। छह · स्मृति, अभिलेख आ अधीनस्थ स्वर पाश्चात्य आधुनिक सिद्धान्तक दृष्टिसँ खण्ड-० एकटा समृद्ध पाठ थिक। एकर केन्द्रीय चिन्ता—‘के मरैत अछि आ के मोन राखल जाइत अछि’—सोझे स्मृति-अध्ययन (memory studies) आ अभिलेखागार-सिद्धान्त (archive theory) सँ संवाद करैत अछि। जे पुल-निर्माणमे मारल गेल, जकर नाम ठेकेदारक कागचसँ काटल गेल, ओकरा फेर लिखबाक जे आग्रह ([−१०], [−४], [−३०])—ई ‘काउण्टर-आर्काइव’ केर कल्पना थिक : सत्ताक अभिलेखक विरुद्ध लोकक अभिलेख। अधीनस्थ-अध्ययन (subaltern studies) केर स्वर एहि खण्डमे स्पष्ट अछि। चर्मकार टोलाक उजास [−९१], माटिक मालिक [−५४], देहक बजार [−३५]—एहि सभमे ओ स्वर उठैत अछि जकरा इतिहास प्रायः मौन कऽ दैत अछि। मुदा उपन्यास एहि स्वरकेँ ‘उद्धार’ केर मुद्रामे नहि, वरन् ‘साक्षी’ केर मुद्रामे प्रस्तुत करैत अछि—ओ बजैत अछि, अपन नाम कहैत अछि, आ ओहि नामकेँ पातपर चढ़ा दैत अछि। एतय गायत्री स्पिवाकक ओ प्रश्न—‘की अधीनस्थ बाजि सकैत अछि?’—केँ उपन्यास एकटा काव्यात्मक उत्तर दैत अछि : ओ बाजि सकैत अछि, जँ गाम ओकर नाम मोन राखय। देह माटिमे मिलै छै हे, नाम पातपर टिकै — जे गाम मन राखै रे, तकरा केओ मेटा नहि सकै। — अध्याय [−९६] केर लोकगीत आघात-सिद्धान्त (trauma theory) केर दृष्टिसँ, महामारी, बाढ़ि, अकाल आ तस्करीक ओ अध्याय एहि आघातकेँ ‘चीत्कार’ नहि, वरन् ‘अनुष्ठान’ बना दैत अछि। शोककेँ लोकगीतमे बान्हब—ई आघातकेँ सम्हारबाक ओ लोक-विधि थिक जे आधुनिक चिकित्सा-भाषासँ भिन्न, मुदा ओतबी गहींर अछि। सात · समानान्तर-इतिहासक ढाँचा विदेह समानान्तर-इतिहास ढाँचाक अनुसार, ‘इतिहास’ ओ नहि जे विजेता लिखैत छथि, वरन् ओ जे लोक कण्ठमे राखैत अछि। खण्ड-० एहि ढाँचाक कथात्मक साकार-रूप थिक। एतय बारह सय बरखक ‘आधिकारिक’ इतिहास—राजा, सन्धि, युद्ध—पृष्ठभूमिमे रहैत अछि; अग्रभूमिमे ओ ‘समानान्तर’ इतिहास अछि : के बाढ़िमे बचल, के नाम राखल, के साक्षी बनल। एहि ढाँचाक एकटा सुन्दर आत्म-संदर्भ अध्याय [−७३] मे अछि, जतय ‘अध्यायारम्भ लोकगीत’ केर परम्पराक उद्गम-कथा कहल जाइत अछि। मोहन, अपन बेटी राधिकाक मृत्युक शोकमे, बाँसुरीपर जे धुन बजाबैत छथि, सैह धुन आगू चलि कऽ ‘अध्यायारम्भ लोकगीत’ बनि जाइत अछि—ओ युक्ति जे मुख्य उपन्यास (खण्ड-१) केर प्रत्येक अध्यायकेँ खोलैत अछि। एतय उपन्यास अपन साहित्यिक-युक्तिकेँ अपने कथा-जगतमे जन्म दैत अछि। ई ‘मेटा-फिक्शन’ केर एकटा मार्मिक रूप थिक : रूप अपन उद्गम-कथा अपने कहैत अछि। इएह धुन आगू चलल, कथाक आरम्भ बनल, हर अध्यायक भोरमे, लोकगीत बनि उगल। — अध्याय [−७३], “मोहनक पहिल धुन” आठ · लोकगीत, सूत्रधार आ मंच-युक्ति खण्ड-० तीन कथात्मक स्वरक बीच दोलैत अछि : उपन्यासक गद्य, नाटकक संवाद, आ लोकगीतक पद्य। दार्शनिक अध्याय नाटकक रूपमे, ऐतिहासिक वृत्तान्त उपन्यास-अंशक रूपमे, आ प्रत्येक अध्यायक भोर लोकगीतक रूपमे—ई त्रि-स्वरता पाठकेँ एकरस नहि होमय दैत। सूत्रधार एहि तीनू स्वरकेँ जोड़ैत अछि : ओ मंच-संचालक थिक, कथावाचक थिक, आ लोकगीतक गायक सेहो। ‘अध्यायारम्भ लोकगीत’ केर युक्ति—प्रत्येक अध्याय (अध्याय [−७३] सँ [−१] धरि) एकटा नामित लोकधुनक संग खुजैत अछि (बाँसुरी-शोकधुन, विवाह-सोहर, जागरण-धुन, कचहरी-गीत, बिदेसिया, आन्दोलन-गीत…)—मैथिली लोक-संगीतक विपुल भण्डारकेँ आधुनिक उपन्यास-संरचनामे बुनि दैत अछि। ई लोकधुन केवल अलंकार नहि; प्रत्येक धुन ओहि अध्यायक भाव-मुद्राकेँ पूर्व-निर्धारित करैत अछि। बिदेसिया-धुनमे प्रवासक विरह, जागरण-धुनमे महामारीक रातिक सामूहिकता, सोहर-धुनमे जन्म-आशा—लोक-रूप आ कथा-भाव एतय एकाकार अछि। नौ · भाषा आ शैली मैथिली गद्यक जे परिष्कार एहि खण्डमे अछि, से एकर एकटा प्रमुख उपलब्धि थिक। दार्शनिक अध्याय-सभमे भाषा तत्समप्रधान आ सुनियन्त्रित अछि (प्रत्यक्ष, अनुमान, प्रामाण्य, अभाव); लोकगीत-सभमे ओ ठेठ, तद्भवप्रधान आ लयात्मक अछि (‘हे’, ‘रे’ केर सम्बोधन, ‘नाम’, ‘गोहि’, ‘माटि’ केर पुनरावृत्ति)। ई द्वि-भाषिकता—शास्त्रीय आ लोक—एहि उपन्यासक मूल तनाव (दर्शन बनाम लोक, अभिजात बनाम सामान्य) केँ भाषाक स्तरपर सेहो साकार करैत अछि। फकरा (लोकोक्ति) केर प्रयोग विशेष उल्लेखनीय थिक। प्रत्येक अध्याय एकटा गढ़ नारिकेली फकरासँ खुजैत अछि, जे ओहि अध्यायक सारकेँ एक पाँतिमे बान्हि दैत अछि। ई फकरा-सभ काल्पनिक अछि, मुदा लोक-लय एहन प्रामाणिक जे ओ सचमुच केओ प्राचीन कहावत बुझाइत अछि। ई मौलिक लोकोक्ति-निर्माण मैथिली कथा-साहित्यमे एकटा दुर्लभ कौशल थिक। दस · मूल्यांकन खण्ड-० एकटा दुस्साहसिक कृति थिक। ओ प्रीक्वेलक व्यावसायिक सुगमताकेँ नकारि, अपनाकेँ एकटा दार्शनिक-ऐतिहासिक महाकाव्यक रूपमे गढ़ैत अछि। एकर ऋणात्मक काल-संरचना, एकर त्रि-स्वरता, एकर नव्य-न्याय आ लोक-गीतक अद्भुत संयोग, आ एकर केन्द्रीय नैतिक आग्रह—‘नाम राखू’—एकरा समकालीन मैथिली उपन्यासमे विशिष्ट बना दैत अछि। जँ कोनो सीमा अछि, तँ ओ एकर घनत्व थिक : दार्शनिक अष्टकक सघन तर्क-जाल सामान्य पाठककेँ आरम्भमे रोकि सकैत अछि। मुदा जे पाठक ओहि द्वारसँ प्रवेश करैत अछि, ओकरा लेल ई खण्ड एकटा दुर्लभ अनुभव खोलैत अछि—जतय दर्शन कथा बनि जाइत अछि, इतिहास लोकगीत बनि जाइत अछि, आ स्मृति प्रतिरोध बनि जाइत अछि। दीप बुझय, पर्दा खसय हे, मुदा नाम जागल रहै रे — जे गाम अपन नाम राखल, तकर कथा कहियो नहि मरै। — अध्याय [−१], “अन्तिम साक्षी” केर भरतवाक्य ❖ भाग-दुइ मुख्य उपन्यास (खण्ड १–२) — कृतिसार तथा आलोचना गोहि सभक बीच जलसमाधि कृतिसार तथा भारतीय-पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्तक आलोकमे आलोचनात्मक मूल्यांकन लेखक : गजेन्द्र ठाकुर १. प्रस्तावना “गोहि सभक बीच जलसमाधि” आधुनिक मैथिली उपन्यासक क्षेत्रमे एक असाधारण, विराट आ बहुस्तरीय कृति अछि। तीन खण्ड — खण्ड-० (पूर्व-कथाकाल: अध्याय −१०० सँ −१), खण्ड-१ (अध्याय ० सँ १००) आ खण्ड-२ (अध्याय १०१ सँ २००) — मे विभक्त, कुल तीन सय एक अध्यायक ई रचना परम्परागत कथानकक सीमामे आबद्ध नहि रहि लोकमहागाथा, अभिलेखीय आख्यान, सामाजिक यथार्थ, दार्शनिक उपन्यास, रहस्य-अनुसन्धान, लोकनाट्य, स्मृति-वृत्तान्त आ प्रतिरोधक सामुदायिक दस्तावेज—एहि सभ रूपकेँ एक-दोसरामे गुंथि दैत अछि। कृतिक केन्द्रमे गढ़ नारिकेल नामक गाम अछि; मुदा ई गाम केवल भौगोलिक स्थान नहि, अपितु स्मृति, माटि, श्रम, जल, जाति, स्त्री-अनुभव, लोकविश्वास, तकनीकी आधुनिकता आ संस्थागत अन्यायक परस्पर टकराइत संसार अछि। ई आलोचना मूलतः मुख्य उपन्यास — खण्ड-१ आ खण्ड-२ (अध्याय ० सँ २००) — केँ केन्द्रमे राखैत अछि; खण्ड-० (पूर्व-कथाकाल, अध्याय −१०० सँ −१) क विस्तृत साहित्यिक समीक्षा एहि अध्ययनक ‘भाग-एक’ मे पृथक् रूपेँ देल गेल अछि। तीनू खण्ड मिलि एक हजार दू सय बरखक साक्ष्य-यात्राक एकल, अखण्ड कृति बनैत अछि। उपन्यासक मूल नैतिक प्रश्न सरल मुदा अत्यन्त गम्भीर अछि—मनुष्यक देह मरलाक बाद ओकर नाम, श्रम, अधिकार आ स्मृतिक की होइत अछि? राज्य, बाजार, अदालत, विश्वविद्यालय, दान-संस्था, बैंक, पटल, दूरभाष, अभिलेखागार आ जातिगत समाज जखन मनुष्यकेँ संख्या, प्रपत्र, खाता, प्रतिशत, छवि वा “अनुपस्थित” शब्दमे बदलि दैत अछि, तखन साहित्यक कर्तव्य की रहैत अछि? उपन्यास एहि प्रश्नक उत्तर कोनो एक नायकक विजयमे नहि, सामुदायिक स्मृति, नाम-पाठ, सहमति, गवाही, लोकगीत, बच्चाक खेल आ निरन्तर पहरामे खोजैत अछि। कृतिक महत्त्व एहि बातमे अछि जे ई केवल अन्यायक चित्रण नहि करैत; ई न्याय पाबय लेल आवश्यक ज्ञान-पद्धति सेहो रचैत अछि। प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, अनुपलब्धि, स्मृति, अवशेष, आवाज, देह, पगचिन्ह, मुहर, फाटल कागच, रद्दी बोरा, खाली संदूक, सूखल पात, माटिक गन्ध आ पानिक हलचल—सभ प्रमाण बनैत अछि। एहि अर्थमे ई उपन्यास कथा मात्र नहि, ज्ञान आ नैतिक उत्तरदायित्वक वैकल्पिक शास्त्र सेहो अछि। ई कृति ‘मैथिली कादम्बरी’ कहबैत अछि, आ ओकर संग तीन परिशिष्ट अछि — गढ़ नारिकेल लोककोश, अनाम ग्रह प्रसंगक मूल गीत, आ न्याय-दर्शनक मूल अन्तःकथा। ई परिशिष्ट कोनो अलङ्करण नहि; ओ कृतिक लोक-आधार, स्वप्न-आधार आ शास्त्र-आधार तीनूकेँ प्रत्यक्ष रूपेँ सोझाँ राखैत अछि। २. एक वाक्यमे कृतिसार गढ़ नारिकेलक नदी, पुल, अदालत, पटल, बाजार, दान-संस्था आ अभिलेखमे डूबाओल लोकक नाम बच्चा, स्त्री, श्रमिक, मृतक, पश्चात्तापशील साक्षी आ लोक-स्मृतिक संयुक्त प्रयाससँ पुनः ऊपर उठैत अछि, आ गाम अन्ततः स्वयं “नामक पहरुआ” बनि जाइत अछि। ३. विस्तृत कृतिसार ३.१ लोक-संसारक स्थापना शून्य अध्याय गढ़ नारिकेलक लोक-सांस्कृतिक प्रस्तावना अछि। माटि, पानि, खेत, पोखरि, गाछ, बाढ़ि, श्रमगीत, विवाहगीत, स्त्री-कण्ठ, बालखेल, लोकदेवता, निर्गुण, मर्सिया, कारीगरी, पेशागत ज्ञान आ जातिगत विषमता—सभ मिलि उपन्यासक भूगोल बनबैत अछि। ई प्रस्तावना स्पष्ट करैत अछि जे आगाँक कथा कोनो रिक्त आधुनिक संसारमे नहि, एक जीवित सांस्कृतिक स्मृति-प्रदेशमे घटित होएत। गढ़ नारिकेलमे ज्ञान केवल पोथी वा कार्यालयमे नहि; हाथ, कान, पग, गीत, कहबी आ सामूहिक अनुभवमे बसैत अछि। चन्ना गाछी एहि संसारक केन्द्रीय स्मृति-स्थल अछि। रातिमे ओतय भूत, प्रेत, राकश, लोथ, पनिडुब्बी आ अन्य अकालमृत आत्मा कबड्डी खेलैत छथि। ई खेल मनोरंजन नहि, मृतकक लोक-अदालत अछि। खेलक मूल नियम—सीमा पार करू, साँस बचाउ, नाम लऽ कऽ घुरू—सम्पूर्ण उपन्यासक रूपात्मक सिद्धान्त बनि जाइत अछि। जे नाम लऽ कऽ लौटि सकैत अछि, से इतिहासमे उपस्थित रहैत अछि; जे नाम बिसरि जाइत अछि, ओकर पारी टूटि जाइत अछि। शून्य अध्यायमे चौबीस लोक-प्रसंग सङ्कलित अछि — डकही पोखरिक पात-दीप, धान रोपबाक गीत, बेटी-विदाइक समदाउन, मृत्यु-शोकक गीत, अरिपनक मौन गीत, झिझियाक दीप, कबीरक निर्गुण वाणी, कचहरी-तारीख आ लोकन्यायक गीतसँ लऽ कऽ डिजिटल ठगीक चेतावनी धरि। ई प्रस्तावना घोषणा थिक जे एहि कादम्बरीक पहिल आ अन्तिम पात्र लोक स्वयं थिक — ओकर गीत, ओकर स्मृति, ओकर न्याय-बोध। ३.२ पुल-दुर्घटना, डूबल श्रमिक आ नामक प्रथम संघर्ष कथा पुल-निर्माण, नदीक दुर्घटना आ श्रमिकक असंख्य मृत्यु-दृश्यसँ तीव्र रूपेँ खुलैत अछि। आधिकारिक रजिस्टरमे तीस नाम अछि, मुदा वास्तविक मृत्यु तीन सयक आसपास संकेतित अछि। बिसेसर पासवान, सरयू, कन्हैया, शिवनाथ सदा आ अनेक अनाम श्रमिक—जिनकर श्रम पुलक भीतर गाड़ल अछि—कागचपर अनुपस्थित, अधूरा वा विकृत छथि। नदीमे देह डूबैत अछि, किन्तु व्यवस्थामे नाम डूबैत अछि। नन्द आरुणि एहि विसंगतिक प्रथम सजग साक्षी बनैत छथि। ओ फाटल गमछा, जूता, टिफिन, अधूरा पर्चा, डायरी आ छपाकक आवाजकेँ प्रमाण रूपमे पढ़ैत छथि। “छपाक” एतय केवल देहक पानिमे खसब नहि, व्यवस्था द्वारा मनुष्यक गायब करबाक ध्वनि अछि। नन्दक आवेदन, मृतक-सूची आ दैनन्दिनी कथा केँ अदालत, कार्यालय आ दूरस्थ वित्तीय संसार धरि लऽ जाइत अछि। ३.३ गोहिक रूप-विस्तार पहिल खण्डक आरम्भिक अध्याय सभमे “गोहि” क्रमशः अनेक संस्थागत रूप धारण करैत अछि। अदालतमे ई “तारीखक गोहि” अछि, जे वादीक वर्ष खाइत अछि। महामारीक समय “श्वासक भाव” बनि जीवनकेँ बाजारक वस्तु बनबैत अछि। पटल आ दूरभाषमे ई अंककीय जुआ, ऋण, छल, ब्लैकमेल आ निजताक चोरी बनि प्रवेश करैत अछि। “देहक बाजार” स्त्रीक देह, छवि, सहमति आ लाजकेँ वस्तु बनबैत अछि। “धनक कारी नदी” अवैध खाता, म्यूल खाता, विदेशक नली, दान आ वित्तीय अपराधक गुप्त प्रवाह अछि। हार्वर्डक नैतिक भाषण, एडवर्ड ब्रूमक सभ्य वाक्य, चन्द्रपाल बत्राक वित्तीय पटल, राघव “सिग्नल”क मिटैत सन्देश, लाउ किन-हंगक नामहीन खाता आ बटुकनाथ हरिहरनक विधिक चातुरी—ई सभ मिलि देखबैत अछि जे आधुनिक शोषण केवल स्थानीय गुंडागर्दी नहि; ओ ज्ञान, प्रतिष्ठा, तकनीक, कानून, पूँजी आ वैश्विक नैतिक भाषाक गठजोड़ अछि। ३.४ चन्ना गाछीक अदालत आ पराजितक नब राजनीति मनुष्यक अदालत विलम्ब, लाल फीता आ विजय-पत्र दैत अछि; चन्ना गाछीक अदालत स्मृति, नाम आ आत्मस्वीकार माँगैत अछि। एतय मृतक निर्णायक नहि, नैतिक दर्पण बनैत छथि। धूर्त सभ बाहरी अदालतमे जीतल रहितो भीतरक अदालतमे पराजित होइत अछि। हुनकर दण्ड जेल वा फाँसी नहि, अपन कएल कार्यक नाम पढ़ब, उच्चारण करब, घर धरि पहुँचब आ ओकर भार उठाब अछि। उपन्यासक अत्यन्त मौलिक पक्ष ई अछि जे “हारल लोक” प्रतिशोधक नारा नहि लगबैत, अपन काजमे लगि जाइत छथि। देविका अंककीय ठगी-विरोधी शिक्षा चलबैत छथि; मीरा निजता, सहमति आ दृष्टिक अधिकारक मण्डल बनबैत छथि; ईरा विदेशक नैतिक मंचपर नाम पढ़ैत छथि; गोप कुमार अभिलेख सुरक्षित करैत छथि; बच्चा सभ नामक पाठशाला खोलैत छथि। एहि प्रकार विजयक परिभाषा बदलि जाइत अछि। वास्तविक विजय विरोधीकेँ हराबयमे नहि, समाजकेँ एहन बनाबयमे अछि जतय अगिला पीड़ित अकेला नहि रहए। ३.५ नामक पाठशाला आ पीढ़ीगत उत्तराधिकार अनन्या आ आरुणि अगिला पीढ़ीक प्रतिनिधि छथि। ओ सभ मृतकक नाम “उपस्थित” कहि पढ़ैत छथि। नाम-पाठ केवल सूची-पाठ नहि; परिवार, श्रम, अधूरा सपना, देह आ अधिकारक पुनर्स्थापन अछि। “स्क्रीनक विरुद्ध पाठशाला”, “निजताक शपथ”, “तीन कंकड़”, “नामक उच्चारण”, “नामक नाव”, “पोतीक कापी” आ “अगिला आवाज” जेकाँ अध्याय सभ स्मृतिरक्षाकेँ शैक्षिक क्रियामे बदलि दैत अछि। तीन कंकड़—घर, भय, सपना—बाल-नैतिक शिक्षाक सूत्र बनैत अछि। बच्चा सभ प्रत्येक नामसँ पूछैत छथि: ओकर घर कतय, ओकर भय की, ओकर सपना की? एहि प्रश्नसँ मृतक आँकड़ा नहि, पूर्ण मनुष्य बनैत अछि। शिक्षा एतय पुस्तकक स्थिर पाठ नहि, समुदायमे जीवित गवाही सुनबाक अभ्यास अछि। ३.६ कटान, स्मृतिक वस्तुकरण आ नब संघर्ष चन्ना गाछीक कटानक बाद ठूँठ बाँचि रहैत अछि। ठूँठ घायल स्मृति अछि—विनष्ट, किन्तु निष्प्राण नहि। नगरपालिकाक सूचना-पत्र, विरासत-परियोजना, स्मृति पर निविदा, स्मारक-अनुप्रयोग, हार्वर्डक शोध-दल, नकली भूतक जुलूस आ दान-पत्र स्मृतिसभकेँ पुनः बाजारक वस्तु बनाबय चाहैत अछि। मृतकक कथा पर अधिकार, छवि, मंचन, शोध आ पर्यटनक प्रश्न उठैत अछि। मीरा “दृष्टिक अधिकार” आ देविका स्मृतिकोँ अनुमति बिनु उपयोगक विरुद्ध ठाढ़ होइत छथि। उपन्यास एतय अत्यन्त आधुनिक प्रश्न उठबैत अछि—पीड़ितक कथा के कहत? ओकर छवि के रखत? मृतकक सहमति सम्भव नहि तँ परिवार, समुदाय आ मर्यादाक भूमिका की? स्मारक न्याय अछि कि स्मृतिबजार? एहि प्रश्नसभक उत्तर एकरेखीय नहि; कथा निरन्तर सहमति, सहभागी निर्णय आ रिक्त स्थानक सम्मानपर बल दैत अछि। ३.७ स्त्री-सभा, श्रमिकक पएर आ नामक संविधान स्त्री सभक राति-सभा उपन्यासक नैतिक केन्द्रमे सँ एक अछि। पुरुष-प्रभुत्वशाली सार्वजनिक वाक्यक बाद स्त्री-कण्ठ अनुभवक असली देह खोलैत अछि। कमीजक नमी, फाटल एड़ी, लाल डोरी, पुत्रक प्रतीक्षा, निजताक घाव, घरेलू मौन आ जातिगत अपमान—ई सभ आधिकारिक गवाहीसँ बेसी प्रामाणिक बनैत अछि। “मजदूरक पाँव” श्रमक इतिहासकेँ पुलक वास्तुशिल्पसँ नहि, देहक थकान, फाटल एड़ी आ पसीनासँ पढ़ैत अछि। “स्क्रीनक उपवास” दृष्टि आ श्रवणकेँ पुनः मनुष्यक चेहरा दिस घुरबैत अछि। “सत्यव्रतक जन-सुनवाई” आ “नामक संविधान” सामुदायिक नैतिक विधान बनबैत अछि—नाम नहि मेटाएब, निजता नहि बेचाएब, देहक अपमान नहि करब, स्मृति पर ठेका नहि लगायब, अनुपस्थितक नाम पूछब। ३.८ बाढ़ि, गोहिक वापसी आ आंशिक आत्मस्वीकार पुनः बाढ़ि कथा केँ जलक मूल संकट दिस घुरबैत अछि। गोहि सभक वापसी स्पष्ट करैत अछि जे एक जीत स्थायी समाधान नहि। लोभ सदैव नब कागच, नब प्रस्ताव, नब संस्था आ नब तकनीकी रूपमे लौटि सकैत अछि। लाउ किन-हंग अपन नामहीनताक बाल्यकालीन घावकेँ पहचानैत अछि; बटुकनाथ देरसँ आयल क्षमा माँगैत अछि; चन्द्रपाल बुझैत अछि जे ओकर पूरा जीवन म्यूल खाता बनि गेल; राघवक मेटाओल सन्देश अन्ततः अमिट गवाही बनैत अछि; सत्यव्रत अपन मौनक स्वीकार करैत छथि। उपन्यास अपराधक कारण आ अपराधक क्षमा बीच स्पष्ट भेद राखैत अछि। बाल्यकालीन अपमान, भय वा सामाजिक घाव अपराधकेँ बुझबा योग्य बनबैत अछि, निर्दोष नहि। आत्मस्वीकार आवश्यक अछि, किन्तु न्याय, प्रतिपूर्ति आ सार्वजनिक उत्तरदायित्वक स्थान नहि लैत। ३.९ गज-ग्राह दृष्टान्त आ अनाम ग्रह पहिल खण्डक अन्त “गज, ग्राह, आ बच्चाक हाथ”मे होइत अछि। पुराणक गज-ग्राह आख्यानकेँ उपन्यास नब अर्थ दैत अछि। बलवान गज आ पकड़निहार ग्राहक द्वन्द्वक समाधान ऊपरसँ चमत्कारी उद्धारमे नहि, बच्चाक हाथ, नाम सुनब आ सामुदायिक सहयोगमे अछि। दोसरा खण्डक आरम्भमे आरुणि आ बच्चा सभ अनाम ग्रहक स्वप्न देखैत छथि। ओ ग्रह दुःख-विहीन अछि, कारण स्मृति मेटाओल गेल अछि; घरपर नामक बदला संख्या अछि। ई आदर्शलोक वास्तवमे विस्मृतिक निरंकुश व्यवस्था अछि। दुःख मेटाबयक नामपर इतिहास, अपराध आ सम्बन्ध मेटाओल गेल अछि। बच्चा सभ ग्रहक बीच कबड्डी खेलि नाम घुरबैत छथि। अन्ततः गढ़ नारिकेल घावसहित पृथ्वी चुनैत अछि। ई चुनाव निराशा नहि, उत्तरदायित्वक स्वीकृति अछि—अपूर्ण पृथ्वी छोड़ि स्मृतिहीन स्वर्गमे भागब नैतिक पलायन होएत। ३.१० पृथ्वीक पहरा: बीजसँ न्याय धरि अध्याय १०५ सँ १३२ धरि कथा पृथ्वीक तत्व आ सामाजिक देहक पहरा रचैत अछि। बीज भविष्यक गवाही अछि; बीजक चोरी काल्हिक अन्नक चोरी। माटि स्वामित्व, जाति, अधिग्रहण, रसायन आ ऋणक प्रश्न उठबैत अछि। जल स्मृति राखैत अछि; आगि जराओल कागचक राखकेँ गवाही बनबैत अछि; वायु सामूहिक अधिकार अछि; आकाशक रिक्ति पलायनक आह्वान नहि, उत्तरदायित्वक प्रश्न अछि। शब्दक देह, अर्थक आत्मा, कण्ठक पहरा, मौनक उत्तराधिकार, स्मृतिक ऋण, देहक अधिकार, श्रमक देह आ न्यायक देह—ई क्रम सामाजिक न्यायकेँ अमूर्त संकल्पनासँ देहधारी व्यवहारमे उतारैत अछि। “जातिक पिंजरा” परम्परा, भोजन, विवाह, स्पर्श, श्मशान आ रसोइमे जातिक सूक्ष्म उपस्थिति देखबैत अछि। “गंगेशक मुक्ति” मिथिलाक महान दार्शनिककेँ केवल पूजनीय प्रतीक नहि, प्रश्न करबाक अधिकारक प्रतिनिधि बनबैत अछि। “तत्त्वचिन्तामणिक पात” प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द आ अनुपलब्धिक ज्ञानमीमांसाकेँ लोकन्यायक साधन बनबैत अछि। अन्न, भूख, प्यास, नून, स्वाद, साझा थारी आ रसोइक गणराज्यक अध्याय सभ स्पष्ट करैत अछि जे न्याय केवल न्यायालयक निर्णय नहि; ओ खेत, मेड़, पानि, चूल्हि, भोजन, साझा आसन आ जातिमुक्त रसोइमे मूर्त होइत अछि। एकहि थारीमे भोजन समाजक गूढ़ सत्ता-संरचनाकेँ चुनौती दैत अछि। ३.११ नाटकक भीतर उपन्यास, उपन्यासक भीतर जन-सुनवाई विदेह नाट्य उत्सवक प्रसंगमे उपन्यास अपनहि पहिल एक सय बत्तीस अध्यायकेँ नाट्य-पाठमे बदलैत अछि। कथा मंचपर चढ़ैत अछि, किन्तु सारांश बनि अपन देह नहि गमबैत। मंचनक बाद तालीक सन्नाटा, दर्शकक गवाही, मंचसँ बाहरक जुलूस, बाटक रंगमंच आ चल चौपाल—ई क्रम कलाकेँ प्रदर्शनसँ सामाजिक उत्तरदायित्व धरि लऽ जाइत अछि। दर्शक निष्क्रिय उपभोक्ता नहि रहैत; ओ गवाह बनैत अछि। हाथ ताली बजबैत अछि, हस्ताक्षर करैत अछि, अपराधो करैत अछि आ गवाही सेहो दैत अछि। नाटक जखन बाटपर उतरैत अछि, मंचक पदानुक्रम टूटैत अछि। लोकधर्मी प्रदर्शन जन-लेखन आ चलैत अदालत बनि जाइत अछि। ३.१२ अभिलेखीय अनुसन्धान: बरामदासँ शहरक खाता धरि अध्याय १४१ सँ कथा विस्तृत अभिलेखीय अनुसन्धानक रूप ग्रहण करैत अछि। बरामदा प्रतीक्षाक मध्यावस्था अछि; रेकर्ड-घर रोकल समयक अन्हार; रद्दी बोरा फेकल जीवनक गवाही। फाइलक नाम देहरी धरि घुरैत अछि। डरमे दरार पड़ैत अछि। मुहरक दाग कागचसँ बेसी हाथपर गाढ़ देखाइत अछि। घर-घरक दस्तक आदेशसँ नहि, अनुमतिसँ देल जाइत अछि। मिलावट पहचान, जालक नक्शा, मुहरक छाया, आदेशक स्रोत, संकेतक पाछाँ नाम, बाबाक वचन, सेवाक खाता, दानक ऋण, लोहेक संदूक, सहमति-कापीक मिलान, मृतकक सहमति आ गोदामक छाया—ई सभ अध्याय संस्था, दान, श्रद्धा, भूख, दवा आ सहायताकेँ कोना सहमति-अपहरणक औजार बनाओल जाइत अछि, तकर सूक्ष्म विवेचन करैत अछि। बीमारीक राति वा भूखक दिन लेल गेल अँगूठा स्वेच्छा नहि। मृत्युक बाद बनाओल सहमति सभसँ सस्ता कागच आ सभसँ महग अपराध अछि। ३.१३ दूरभाष, आवाज आ भयक उद्योग फोनक कैद, आवाजक मोहर, हटायल कागचक निशान, चन्द्रपालक छायाक पेट, इमली घाटक कोठार, नदी पारक आवाज, शहरक गला, चन्द्र दू आ चन्द्र एकक खोल—ई क्रम अंककीय ठगीक जालकेँ सामाजिक भरोसा, पेंशन, मुकदमा, परदेशी पुत्र, स्त्री-नाम, वृद्धक भय आ संस्थागत आवाजसँ जोड़ैत अछि। अपराधी केवल तकनीकी युक्ति नहि उपयोग करैत; ओ परिवारक बोली, मायक स्वर, सरकारी आदेशक लय, पंखाक ध्वनि, स्टेशनक समय आ स्थानीय विश्वासक नकल करैत अछि। चन्ना गाछीक “अदृश्य अदालत” पीड़ितक भय खोलबाक सुरक्षित स्थल बनैत अछि। गाँठ धीरे-धीरे पढ़ल जाइत अछि; झटका नहि देल जाइत। पंजीक पहरा, चौखट, मुहरबाहक, सेवा-समारोह, घर-घरक कागच, ऊपरक कोठरी, मुहरक पगचिन्ह आ शहरक खाता अपराधक स्थानीय आ शहरी सूत्र जोड़ैत अछि। ३.१४ अपराधक अन्तिम परत आ नामक पुनरुत्थान सिमक छाया, सेवा-केंद्रक दरबाजा, फोनक भीतरक चेहरा, आवाजक नकाब, मास्टरक कमरा, मधवेशक असली नाम, छत्ताक भीतरक रानी, महेश्वरक मुहर, लोहेक पेटी, नील पंजी, ध्रुवेशक कुर्सी, बन्द रेकॉर्डरक स्वर, आवाजक चेहरा, साँसक समन आ रोकल खाता—ई अध्याय अपराधक बहुस्तरीय संगठन खोलैत अछि। मधुकर माधव मिश्र, महेश्वरनाथ सेवक, ध्रुवेश आ सम्बद्ध संस्था सभ नाम, स्त्री-खाता, आवाज, मुहर, सहायता-सूची आ भयक कारोबार चलबैत अछि। खाता रोकब न्याय अछि, मुदा उपन्यास सावधान करैत अछि जे गरीबक पेंशन, छात्रक सहायता वा वैध चूल्हि न बुझए। सत्यक कठोरता आ करुणाक विवेक एकसंग आवश्यक अछि। “जलसमाधिक अर्थ” अध्याय शीर्षकक सार खोलैत अछि—पानि अपराधी नहि; असली डुबेनिहार ओ व्यवस्था अछि जे देहक बाद नामो छीनि लैत अछि। किनारपर ठाढ़ लोकक चुप्पी जलसमाधिक गहिराइ बढ़बैत अछि। “ऊपर उठल नाम” तमाशाक विरोध करैत अछि। पीड़ितक अनुमति, परिवारक मौनक सम्मान आ प्रतीक्षाक अधिकार आवश्यक अछि। “अपराधीक धरती” प्रमाण-संरक्षणक नैतिक अनुशासन सिखबैत अछि। “संदूकक भीतरक बिहान” शिवनाथ सदाक नामकेँ झूठी अनुपस्थितिसँ निकालि घरक देहरी दैत अछि। अन्तिम अध्याय “नामक पहरुआ”मे गाम तीन सय एक अध्यायक शीर्षक पुनः पढ़ैत अछि। मृतक निर्णायकक डण्डा जीवित सभकेँ दैत छथि। बच्चा सभ फेर घेरा बनबैत अछि—जे सीमा पार करत, एक नाम लऽ कऽ घुरत। कथा रुकैत अछि, समाप्त नहि; कारण न्याय एक बेरक निर्णय नहि, निरन्तर पहरा अछि। ४. प्रमुख पात्र आ सामुदायिक नायकत्व ई उपन्यास परम्परागत अर्थमे एक नायकक कथा नहि। एकर असली नायक “गढ़ नारिकेलक जागल समुदाय” अछि। तथापि किछु पात्र विशिष्ट नैतिक आ संरचनात्मक भूमिका निभबैत छथि। नन्द आरुणि प्रथम गवाह, अभिलेखक आ नैतिक आरम्भकर्ता छथि। हुनकर डायरी, आवेदन आ छपाकक हिसाब कथा केँ निजी दुःखसँ सार्वजनिक प्रमाण धरि लऽ जाइत अछि। हुनकर महत्त्व एहि बातमे अछि जे ओ असम्भव सत्यक महिमामण्डन नहि करैत; छोट-छोट वस्तु, अधूरा नाम आ अनुपस्थित पंक्तिकेँ जोड़ैत छथि। आरुणि उत्तराधिकारक सजग युवा चेतना अछि। ओ तकनीक, रजिस्टर, स्वप्न आ लोकस्मृतिक बीच सेतु बनैत अछि। अनन्या बाल-नैतिक बुद्धिक सर्वाधिक प्रभावशाली प्रतिरूप अछि। ओकर प्रश्न जटिल संस्थागत भाषाकेँ सहज मानवीय कसौटीपर जाँचैत अछि। ओ वीरांगना रूपमे निर्भय नहि, डर सहित जिम्मेदार अछि; एहि कारण ओकर चरित्र विश्वसनीय बनैत अछि। मीरा दृष्टि, देह, छवि, निजता आ सहमतिक नैतिकता प्रतिनिधित्व करैत छथि। हुनकर भूमिका आधुनिक दृश्य-संस्कृतिक आलोचनामे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि। ओ पीड़ितक छवि, मृतकक स्मृति वा स्त्रीक देहकेँ जनहितक नामपर मुक्त वस्तु मानबाक विरोध करैत छथि। देविका प्रतिरोधक शैक्षिक रूप अछि। उज्ज्वलक मृत्युकेँ निजी लाज नहि, सामाजिक चेतावनी बनबैत छथि। ईरा वैश्विक नैतिक मंचक खोखलापनक भीतर स्थानीय नामक प्रवेश करबैत छथि। सत्यव्रत मेहता विधि-संस्थाक भीतरक विवेक छथि—देर सँ जागल, मौनक दोषसँ ग्रस्त, मुदा आत्मस्वीकार आ सार्वजनिक गवाही लेल प्रस्तुत। बा, फूलकली, सुरमणी, जगमाया, शान्ति, धीरमती आ स्त्री-सभाक अन्य पात्र लोक-स्मृति, शोक, सहमति, भोजन, देह आ नैतिक धैर्यक धारक छथि। भूत, प्रेत, पनिडुब्बी आ बूढ़बा भूत मृतक मात्र नहि; ओ सामुदायिक स्मृतिक रूपक छथि। चन्द्रपाल, बटुकनाथ, राघव, लाउ, ब्रूम, मधुकर, महेश्वर, ध्रुवेश आदि खल-पात्र एकरूप राक्षस नहि। ओ पूँजी, विधि, तकनीक, दान, प्रतिष्ठा, नामहीनता, भय आ सेवा-भाषाक विभिन्न गठजोड़ प्रतिनिधित्व करैत छथि। किछु पात्रक मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि देल गेल अछि, मुदा उपन्यास हुनकर घावकेँ अपराधक क्षमा नहि बनबैत। ५. पात्र-लेखा-जोखा — समग्र यात्राक बाद तीन खण्ड, तीन सय एक अध्यायक ई लम्बा यात्रा समाप्त भेलाक बाद, चन्ना गाछीक ठूँठ लग बैसि जँ हिसाब लेल जाय — के की पेलक, के की गमेलक, आ के कतय हेरा गेल — तँ ई लेखा-जोखा सामने अबैत अछि। १. जिनकर नाम मृत्युक बादो फेर भेटलनि बिसेसर पासवान — पुलक पायापर मृत्यु, रजिस्टरमे 'अनुपस्थित' लिखल गेल, मुदा समग्र यात्राक अन्तमे ओकर जूता, ओकर नाम, आ ओकर श्रम गामक स्थायी स्मृतिमे, माटिक पट्टिकापर, आ लोहाक पेटीक गवाहीमे अमर भऽ गेल। ओ किछु नहि पेलक जे ओकरा घुरा सकय, मुदा ओकर नाम पेलक — जे एहि उपन्यासक सभसँ पैघ 'जीत' थिक। सरयू — स्त्री-मजदूर, जकर नाम आधिकारिक रूपेँ अस्तित्वहीन छल (पतिक नाम पर काज करैत छलि), अन्तमे अदालतक कक्षमे सत्यव्रत मेहता द्वारा सार्वजनिक रूपसँ पढ़ल गेल। ओकर अँगूठाक निशान, जे कहियो कानूनक लेल अदृश्य छल, अन्ततः न्यायक पहिल पाठ बनल। छोटू (भोलटुन) — मुसहरिनक नाबालिग बेटा, जकर असली नाम गामक सामूहिक स्मृतिसँ फेर सँ खोजल गेल। मुनिया, धनेसरी, नगीना आ आर बहुत गोटे — सभक नाम अन्तिम अध्यायक 'मौनक नामावली' आ माटिक पट्टिकापर अमर भऽ गेल। जिनकर नाम कतहु नहि भेटल, हुनका लेल रिक्त ठाम राखल गेल — बा कहली छली, रिक्त ठामो गवाही थिक। उज्ज्वल झा — डिजिटल-अरेस्ट ठगीक शिकार भऽ आत्महत्या केलक, अपन जीवन गमेलक, मुदा ओकर मृत्युए पूरा जालक (चन्द्रपाल बत्रा, राघव सिग्नल, लाउ किन-हंग) उद्घाटनक बीआ बनल। ओकर बहिन देविका साहक संघर्षसँ ओकर नाम गामक न्याय-आन्दोलनक प्रतीक बनि गेल — व्यक्तिगत क्षति सामूहिक जागृतिमे बदलल। २. जीवित पात्र जिनक यात्रा पूर्ण भेल नन्द आरुणि आ हुनकर वंश नन्द आरुणि — खण्ड-१ क मूल साक्षी, अपन इंजीनियरिंगक करियर गमेलनि (स्थानान्तरण, बहिष्कार), मुदा 'एक प्रति माय लग, एक पानि लग, एक हवा लग' क सिद्धान्त दऽ गेलाह जे पूरा उपन्यासक गवाही-रक्षाक आधार बनल। बा — मातृ-स्वर, अन्त धरि जीवित रहलीह, अपन परिवारक तीन-चारि पीढ़ीकेँ न्यायक मार्गपर चलैत देखलनि — सभसँ पैघ प्राप्ति। आरुणि (नन्दक वंशज) — अदालतमे अन्तिम विजय (नाम-पाठ) देखलनि, गामक नेतृत्व सम्हारलनि। अनन्या — बाल्यकालसँ पाठशालाक केन्द्रीय शिष्या, अन्तमे पंजीक रखबारि (गामक स्थायी अभिलेखपाल) बनि गेली — सभसँ पैघ जिम्मेदारी हुनका भेटलनि। नव पीढ़ीक अगुआ ईरा आरुणि — विदेशमे जन्मल, हार्वर्डमे एडवर्ड ब्रूमकेँ चुनौती देलनि, अपन कुलनामकेँ बोझ नहि प्रमाण बुझय लगलीह — विदेशी संस्थाक पाखण्डपर विश्वास गमेलनि, मुदा अपन जड़ि फेर पेलनि। मीरा (मृणालिनी आर्या) — निजताक चोरी आ ब्लैकमेलक शिकार भेली, मुदा अपन प्रेम (अदिति) आ अपन गरिमा नहि गमेलनि — शिकार नहि, साक्षी बनि बजबाक साहस पेलीह। देविका साह — अपन भाइ उज्ज्वल हमेशाक लेल गमेलीह (ई क्षति अपूरणीय अछि), मुदा एहि क्षतिसँ ओ गामक सभसँ साहसी आवाज बनि उभरलीह। फूलमति — देह-व्यापारक जालसँ मुक्त भेली, अपन असली नाम सार्वजनिक रूपसँ फेर पेलनि — 'हमर नाम फूलमति अछि, एफ०एम० नहि' कहबाक अधिकार। अन्वेषक आ न्यायक पक्षधर गोप कुमार — अपन कॉर्पोरेट करियर गमेलनि (अधिकार घटाओल गेल, फोल्डरसँ बाहर कएल गेल), मुदा पूरा जालक भेद खोलबाक श्रेय आ नैतिक सन्तोष पेलनि — तीन-प्रति-प्रणालीक जनक बनलाह। सौम्या रामनाथन आ रमैय्या सुब्रमण्यम — निरन्तर सहयोगी भूमिकामे रहलाह, अपन विश्वसनीयता आ गामक भरोसा पेलनि। सत्यव्रत मेहता — सरकारी वकीलक आरामदायक करियर आ पुरान मित्रता गमेलनि, मुदा इतिहासमे ओ लोक बनलाह जे राज्यक विरुद्ध सत्यक पक्षमे ठाढ़ भेलाह — अदालतमे मृतकक नाम पढ़ब हुनकर जीवनक सभसँ पैघ गवाही बनल। ३. अपराधी पात्र — पतन आ आंशिक प्रायश्चित्त बटुकनाथ हरिहरन — बार काउन्सिलक चमक, प्रतिष्ठा, आ नैतिक अधिकार गमेलाह; बेटाक एक प्रश्नसँ ('न्याय बचेलहुँ कि पेशा?') भीतरसँ हिलि गेलाह; अन्तमे विलम्बित क्षमा-याचना केलनि, मुदा जे वर्ष बर्बाद भेल, से नहि घुरल। ओकर खाता रोकल गेल, नाम अपराधी-सूचीमे दर्ज भेल। चन्द्रपाल बत्रा — म्यूल-अकाउण्ट जाल पूर्ण रूपेँ उजागर भेल, ओकर बैंक-खाता रोकल गेल; बाल्यकालक अपमानित नामक घाव (शिक्षक द्वारा नाम बिगाड़ि पढ़ब) प्रकट भेल, जे ओकर अपराधक अनजान जड़ि छल — ओ स्वयं आधा नाम लऽ कऽ जीबय बाध्य भेल छल, आ अन्ततः पूरा नामसँ पकड़ेलाह। राघव सोमानी ('सिग्नल') — अपन माएक अन्तिम आवाज अनजानमे मेटा देने रहथिन्ह, ई क्षति ओकरा भीतरसँ तोड़ि देलक; अन्तिम, सभसँ ईमानदार संदेश लिखलाह — मुदा ओकर पूरा नेटवर्क, ओकर 'भरोसा बिनु नेटवर्क'क खेल, समाप्त भऽ गेल। लाउ किन-हंग — हांगकांगक सूत्रधार, अपन बाल्यकालक शरणार्थी-पहचान (गलत क्रमांकसँ पुकारल जायब) क स्मृतिसँ अपन अन्तिम सौदाक निर्णय लेलाह; ओकर खाता सेहो रोकल गेल — मुदा ओ सभसँ दूर, सभसँ अस्पष्ट रहि गेलाह, उपन्यास ओकरा व्यक्तिगत प्रायश्चित्तक कोनो दृश्य नहि दैत, केवल संस्थागत पराजय। एडवर्ड ब्रूम — पुल, दवा, आ खेलक जालक अन्तरराष्ट्रीय चेहरा, कहियो प्रत्यक्ष दण्ड नहि पेलाह; ईराक प्रश्न आ गामक अस्वीकृत दान-पत्रसँ हुनकर नैतिक मुखौटा फाटल, मुदा उपन्यास स्पष्ट संकेत करैत अछि जे एहन शक्तिशाली अन्तरराष्ट्रीय अपराधी सभ प्रायः पूर्ण दण्डसँ बचि जाइत छथि — 'किछु अपराधी भागत, किछु पकड़ाएत' (अध्याय २००)। मालविका ग्रीन, मधवेश, महेश्वर, ध्रुवेश — मध्यम-स्तरीय संचालक, सभ एक-एक कऽ उजागर भेलाह, मुदा हुनकर व्यक्तिगत अन्त उपन्यास स्पष्ट नहि करैत — ई अनिश्चितता स्वयं एकटा टिप्पणी थिक जे व्यवस्थागत अपराधमे सभ दोषीक नाम आ अन्त कहियो पूर्ण रूपसँ ज्ञात नहि होइत। ४. गायब आ रहस्यमय पात्र ईशान दत्त — सभसँ रहस्यमय पात्र, जकर छाह कहियो नहि पड़ल, जे सरकारी रिकॉर्डमे पहिनहिये 'मृत' घोषित छल। ओ पूरा उपन्यासमे सूचना आ साहस दैत रहल, मुदा अन्तमे ओ कोनो व्यक्तिगत परिणतिमे नहि पहुँचैत — ओ बस चलि जाइत अछि, ई कहैत, 'जँ कोनो एक मरत, दोसर बाजत।' ओ एक व्यक्ति नहि, अनाम सूचनादाता सभक सामूहिक प्रतीक बनि रहि जाइत अछि — ओकर 'गायब' होयब स्वयं ओकर सभसँ पैघ सत्य थिक: जे लोक सत्यक रक्षाक लेल अपन पहचान मेटा दैत छथि, ओ व्यक्तिक रूपमे कहियो पूर्ण रूपसँ नहि भेटैत। शशिभूषण देव, महेन्द्र पाठक, विक्टर हाल्डेन, दिवाकर लाल — खण्ड-१ क आरम्भिक भ्रष्ट अधिकारी सभ, जे नन्द आरुणिक स्थानान्तरणक बाद कथासँ लोप भऽ गेलाह — हुनकर कोनो हिसाब कहियो पूर्ण नहि भेल, जे निम्न-स्तरीय भ्रष्टाचारक दण्डहीनताक यथार्थवादी चित्रण थिक। बूढ़बा भूत, हुलासी, पनिडुब्बी, लोथ, राकश, डाइन, पीपरक ब्रह्मा — गढ़ नारिकेलक लोकोत्तर न्यायाधीश सभ, जे बारह सय बरखसँ मृतकक न्याय करैत छला, अन्तिम अध्यायमे स्वेच्छासँ अपन निर्णायकक डण्डा जीवितक हाथमे सौंपि दैत छथि — 'आब निर्णय जीवित करथि।' ओ सभ कहियो नहि हारलाह, मुदा अपन केन्द्रीय भूमिका गमा कऽ पहरादार मात्र बनि गेलाह — ई एकटा स्वैच्छिक, गरिमापूर्ण 'हार' थिक, जे वस्तुतः पूर्ण जीत थिक। उपसंहार समग्र यात्राक अन्तमे बुझना जाइत अछि जे एहि उपन्यासमे कोनो एक नायक नहि जीतल आ कोनो एक खलनायक पूर्ण रूपसँ नहि हारल। जीतल अछि नाम — जे मरलाक बादो, विस्मृतिक बादो, अपराधक बादो, फेर-फेर उठि खाड़ भऽ जाइत अछि। जे किछु स्थायी रूपसँ गमाओल गेल, सएह जीवन थिक — उज्ज्वल, सरयू, बिसेसर, आ अनगिनत अनाम श्रमिकक जीवन कहियो नहि घुरत। मुदा जे बचि गेल, ओ नाम थिक, आ नामक संगे ओ जिम्मेदारी जे अनन्या आ गामक बच्चा सभ अपन कान्हपर उठा लेलनि। कथा एहि अर्थमे कहियो पूर्ण रूपसँ 'समाप्त' नहि होइत — जाधरि एको मुँह 'हम छी' कहत, ताधरि पहरा जारी रहत। ६. शीर्षकक बहुस्तरीय अर्थ ६.१ “गोहि”क अर्थ गोहि उपन्यासमे प्राकृतिक जीवक सीमासँ बाहर जा संरचनात्मक प्रतिनायक बनैत अछि। नदीक गोहि दृश्य भय अछि; किन्तु असली गोहि अदालतक तारीख, पटल, बैंक, बाजार, विश्वविद्यालय, जाति, दान, अभिलेख, प्रतिष्ठा, निजता-चोरी, मौन आ लाभक भूखमे नुकायल अछि। गोहिक मुख्य गुण—दाँत, पकड़, घात, पानिक भीतर अदृश्य रहब आ शिकारकेँ नीचे घीचब—सभ संस्थागत हिंसाक रूपक बनैत अछि। महत्त्वपूर्ण बात ई जे उपन्यास कोनो एक व्यक्ति केँ सम्पूर्ण दुष्टताक केन्द्र नहि बनबैत। प्रत्येक व्यक्ति जालक एक गाँठ अछि; गोहिक पूरा देह संस्था, आदत, सुविधा आ सामूहिक चुप्पीसँ बनैत अछि। एहि अर्थमे “गोहि सभ” बहुवचन अत्यन्त सार्थक अछि। ६.२ “जलसमाधि”क अर्थ जलसमाधि कमसँकम पाँच स्तरपर अर्थवान अछि। प्रथम, ई नदीमे वास्तविक देहक डूबनाइ अछि। द्वितीय, रजिस्टरमे नामक डूबनाइ। तृतीय, ऋण, पटल, देह-बाजार, दूरभाष आ खातामे व्यक्तित्वक अदृश्य होयब। चतुर्थ, समाजक मौनमे पीड़ाक विस्मृति। पंचम, स्मृतिक भीतर पुनर्जन्म—नाम जखन पानिसँ ऊपर उठैत अछि, मृत्यु अन्तिम नहि रहैत। एहि कारण शीर्षक करुणामय होइतहुँ निराशावादी नहि। जलसमाधि विनाशक प्रतीक अछि, मुदा जल स्वयं स्मृति, गवाही आ पुनरुत्थानक माध्यम सेहो अछि। नदी देह बहा सकैत अछि, नाम नहि। ७. प्रमुख प्रतीक आ बिम्ब-व्यवस्था चन्ना गाछी लोक-संसद, स्मृति-अभिलेख, अदालत, पाठशाला आ रंगमंच सभ अछि। ओकर कटान इतिहासपर आक्रमण; ठूँठ घायल निरन्तरता; हरियर बिन्दु पुनर्जन्मक संकेत अछि। नारिकेल पात वैकल्पिक पन्ना अछि। कागच झूठ, निरस्तीकरण आ मुहरक अधीन भऽ सकैत अछि; पात समुदाय, ऋतु आ प्रकृतिक स्मृति सँ जुड़ल अछि। सूखल पातो नस सभमे कथा बचा कऽ रखैत अछि। छपाक ध्वनिक प्रतीक अछि। आरम्भमे मृत्यु, बादमे पटल टूटब, कागच खुलब, स्मृति जागब आ उत्तरक ध्वनि बनैत अछि। नाम अस्तित्वक न्यूनतम किन्तु सर्वोच्च अधिकार अछि। नाम व्यक्ति, परिवार, श्रम, देह, उत्तराधिकार, न्याय आ स्मृतिक संगम अछि। उपन्यासमे नाम केवल भाषिक संकेत नहि, नैतिक सम्बन्ध अछि। कबड्डी साँस, सीमा, जोखिम, वापसी आ सामुदायिक नियमक रूपक अछि। सीमा पार करब साहस अछि; नाम लऽ कऽ घुरब उत्तरदायित्व; साँस बचायब स्मृति; साथी सभक आवाज समुदाय। खाली पट्टिका, रिक्त संदूक, हटायल पन्ना, धूलिक निशान आ अनुपस्थित कुर्सी अभावक सक्रिय प्रतीक छथि। जे नहि अछि, सएह प्रश्न बनि उपस्थित होइत अछि। मुहर, खाता, पंजी, संदूक, रेकॉर्डर आ दूरभाष संस्थागत देहक प्रतीक छथि। ई वस्तु तटस्थ नहि; मानव हाथ, भय, लाभ आ इतिहासक छाप राखैत अछि। ८. भारतीय साहित्य-सिद्धान्तक आलोकमे मूल्यांकन ८.१ रस-सिद्धान्त कृतिक स्थायी भाव करुणा अछि। डूबल श्रमिक, प्रतीक्षारत माए, फाटल एड़ी, खाली थारी, मेटाओल नाम, देहक बाजार, मृतकक सहमति आ बरखों लटकल न्याय करुण रस उत्पन्न करैत अछि। मुदा ई निष्क्रिय करुणा नहि। करुणाक भीतर रौद्र, वीर आ शान्त रसक क्रमिक रूपान्तरण होइत अछि। रौद्र रस अन्यायक विरुद्ध सामुदायिक क्रोधमे प्रकट होइत अछि, किन्तु उपन्यास ओकरा हिंसक प्रतिशोधमे नहि बहबैत। वीर रस नाम लिखब, गवाही देब, अनुमति माँगब, अभिलेख बचाब, जातिक पिंजरा तोड़ब आ भयक गाँठ खोलबमे अछि। अद्भुत रस भूतक कबड्डी, पातपर अक्षर, जलक स्मृति आ अनाम ग्रहक स्वप्नसँ जन्मैत अछि। भयानक रस गोहि, अन्हार रेकर्ड-घर, नकली आवाज आ पनिडुब्बीक संसारमे अछि। वीभत्स रस देह-बाजार, मृतकक सहमति, जाली अँगूठा आ मनुष्यक पीड़ाकेँ लाभमे बदलबाक प्रक्रियामे प्रकट होइत अछि। अन्तिम शान्त रस विरक्त निस्तब्धता नहि, सजग नैतिक समत्व अछि। मृतक निर्णायकक डण्डा रखि दैत छथि आ जीवित लोक पहरा ग्रहण करैत अछि। अभिनवगुप्तक अर्थमे करुणाक साधारणीकरण दर्शककेँ निजी शोकसँ ऊपर उठा सार्वभौम मानवीय अनुभव धरि लऽ जाइत अछि; किन्तु उपन्यास विशिष्ट नाम मेटा कऽ सार्वभौमिकता नहि बनबैत। ओकर साधारणीकरण नामक विशिष्टता बचा कऽ होइत अछि। ८.२ ध्वनि-सिद्धान्त आनन्दवर्धनक ध्वनि-सिद्धान्तक आलोकमे ई कृति अत्यन्त समृद्ध अछि। “गोहि”, “जलसमाधि”, “छपाक”, “नाम”, “ठूँठ”, “पात”, “साँस”, “मुहर” आ “रिक्ति”क वाच्यार्थ सीमित अछि, मुदा व्यंग्यार्थ विशाल। “तारीखक गोहि”मे तारीख केवल दिन नहि, न्याय-भक्षणक संरचना ध्वनित करैत अछि। “स्क्रीनक गोहि” पटलकेँ डिजिटल माध्यमसँ अधिक मनोवैज्ञानिक शिकार-क्षेत्र बनबैत अछि। रसध्वनि विशेषतः ओहि ठाम प्रभावशाली अछि जतय दृश्य अपनहि अर्थ खोलैत अछि—खाली पट्टिका, ठूँठमे हरियर बिन्दु, मृतकक हस्ताक्षर, नाम लऽ कऽ कबड्डी खेलैत बच्चा, ध्रुवेशक जूता, पातपर ओस। एहन दृश्यक बाद अर्थ पाठकक भीतर प्रतिध्वनित होइत अछि। ८.३ वक्रोक्ति-सिद्धान्त कुन्तकक वक्रोक्ति-सिद्धान्त अनुसार काव्यत्व साधारण कथनक विशिष्ट वक्रतामे अछि। उपन्यासक भाषा संस्थागत वस्तुकेँ जीवित रूप दैत अछि—अदालत पोखरि बनैत अछि, लाल फीता पनिडुब्बीक झोँटा, अलमारी अन्हार-घर, धूलि मुंशी, मुहर घाव, खाता नदी, पंजी पहरुआ, पटल गोहि। ई वक्रता केवल सजावट नहि; सत्ता-संरचनाकेँ दृश्य बनाबयक पद्धति अछि। वाक्य-वक्रता आ प्रकरण-वक्रता दुनू स्तरपर रचना सशक्त अछि। “उपन्यास फेर शुरू”, “कथा समाप्त नहि भेल”, नाटकक भीतर उपन्यास, अन्तमे सभ अध्यायक पुनर्पाठ—ई प्रबन्ध-वक्रताक उदाहरण छथि। ८.४ औचित्य-सिद्धान्त क्षेमेन्द्रक औचित्य-दृष्टिसँ लोकगीत, कबड्डी, भूतक कथा, नदी, पात, स्त्री-सभा, साझा थारी आ लोकनाट्यक प्रयोग कथा-जगतसँ स्वाभाविक रूपेँ निकलैत अछि। मिथिलाक लोकजीवन आ आधुनिक संस्थागत संकटक मेल प्रायः उचित आ सार्थक अछि। तथापि औचित्यक कसौटीपर किछु सीमा सेहो देखाइत अछि। प्रत्येक अध्यायमे सूक्ति, गीत, दार्शनिक अन्तर्ध्वनि आ अन्तिम नैतिक वाक्यक पुनरावृत्ति कतेको बेर अर्थकेँ अत्यधिक स्पष्ट कऽ दैत अछि। जतय प्रतीक अपने बोलि रहल अछि, ओतय फेर व्याख्या ध्वनिक अवकाश घटा दैत अछि। अतः कृतिक वैचारिक औचित्य प्रबल, किन्तु कतेको ठाम कलात्मक संयम अपेक्षित बुझाइत अछि। ८.५ रीति, गुण आ भाषा वामनक रीति-सिद्धान्तक दृष्टिसँ उपन्यासक मुख्य गुण प्रसाद आ ओज अछि। भाषा सहज बिम्ब, लोक-कहबी आ लयात्मक सूक्तिसँ अर्थ स्पष्ट करैत अछि; अन्यायक प्रसंगमे ओज प्रबल होइत अछि। स्त्री-सभा, शोकगीत, पात, ओस आ नूनक प्रसंगमे माधुर्य सेहो अछि। कृतिक विशिष्ट रीति “लोक-अभिलेखीय रीति” कहल जा सकैत अछि—लोकभाषा, प्रशासनिक शब्दावली, तकनीकी शब्द, गीत, दार्शनिक पदावली आ न्यायिक वाक्य एकहि शैलीमे परस्पर प्रवेश करैत अछि। ८.६ साधारणीकरण आ लोकमंगल भट्टनायकक साधारणीकरण अनुसार निजी भाव कलामे सार्वजनीन अनुभव बनैत अछि। उपन्यास बिसेसर, सरयू, शिवनाथ, उज्ज्वल, फूलकली आ अन्य विशिष्ट पात्रक दुःखकेँ समस्त विस्मृत लोकक अनुभव बनबैत अछि। किन्तु ई सार्वजनीनता अमूर्त “गरीब” वा “पीड़ित” बनाकऽ नहि, नाम, जाति, पेशा, देह आ स्थानक विशिष्टता बचा कऽ अर्जित होइत अछि। आधुनिक भारतीय आलोचनाक लोकमंगल-दृष्टिसँ कृति साहित्यकेँ समाजक नैतिक पुनर्गठनक साधन मानैत अछि। पाठशाला, साझा थारी, जन-सुनवाई, नाटक, संविधान, स्मृति-पहरा आ अभिलेख-सुरक्षा—सभ लोकमंगलक सक्रिय रूप छथि। ८.७ लोकधर्मी आ नाट्यधर्मी भरतमुनिक परम्परामे लोकधर्मी अभिनय जीवनक स्वाभाविक आचरणक निकट, नाट्यधर्मी शैलीबद्ध प्रस्तुति अछि। उपन्यास दुनूकेँ मिलबैत अछि। चन्ना गाछीक भूतक कबड्डी शैलीबद्ध, रूपकात्मक आ नाट्यधर्मी अछि; मजदूरक पएर, स्त्रीक एड़ी, अदालतक बरामदा, रद्दी बोरा, पेंशनक सूची लोकधर्मी यथार्थ अछि। विदेह नाट्य उत्सव एहि द्वैतकेँ स्वचेतन रूपेँ मंचित करैत अछि। ९. नव्य-न्याय आ उपन्यासक ज्ञानमीमांसा कृतिक सर्वाधिक मौलिक बौद्धिक उपलब्धि नव्य-न्यायक प्रमाण-चिन्ताकेँ सामाजिक न्यायसँ जोड़ब अछि। प्रत्यक्ष केवल आँखिसँ देखल वस्तु नहि; देह, पग, गन्ध, ध्वनि, पसीना, माटि आ कागचक स्पर्श प्रत्यक्षक क्षेत्र बढ़बैत अछि। अनुमान धूरि, हटायल पन्नाक निशान, टायर, आवाजक साँस, मुहरक दबाव आ खाताक प्रवाहसँ अपराधक अदृश्य जाल धरि पहुँचैत अछि। शब्द-प्रमाण पीड़ितक गवाही, लोकगीत, स्त्री-कण्ठ आ बच्चाक प्रश्नमे प्रकट होइत अछि। अनुपलब्धि—जे नहि भेटल—उपन्यासक केन्द्रीय प्रमाण अछि: सूचीमे नाम नहि, संदूकमे अपेक्षित कागच नहि, कुर्सी खाली, पन्ना हटायल, रेकॉर्डर बन्द, सहमति असम्भव। ई ज्ञानमीमांसा अत्यन्त लोकतान्त्रिक अछि। सत्य केवल विशेषज्ञ, न्यायाधीश वा विश्वविद्यालयक अधिकार नहि। धूरि, बूढ़ मुवक्किल, स्त्रीक स्मृति, बच्चाक प्रश्न, कारीगरक आँखि आ गामक बोली सेहो प्रमाणक निर्माण करैत अछि। तथापि उपन्यास अन्ध-लोकविश्वासक समर्थन नहि करैत; मिलावट पहचान, जाँच, क्रम, प्रतिलिपि, अनुमति आ विरोधी प्रमाणक आवश्यकता मानैत अछि। एहि कारण लोकज्ञान आ तर्कक सन्तुलन बनैत अछि। १०. पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्तक आलोकमे मूल्यांकन १०.१ अरस्तूक अनुकरण, कथानक आ करुणोन्मोचन अरस्तूक दृष्टिसँ उपन्यास जीवनक अनुकरण करैत अछि, किन्तु एकरेखीय क्रिया, एक नायक आ एक चरमबिन्दुक परम्परागत संरचना स्वीकार नहि करैत। एकर कथानक वृत्ताकार, प्रकरणात्मक आ तरंगमय अछि। प्रत्येक संकट नब रूपमे लौटैत अछि। कारण-कार्य सम्बन्ध तथापि उपस्थित अछि—पुल-दुर्घटनासँ नामक खोज, नामक खोजसँ अदालत, अदालतसँ पाठशाला, पाठशालासँ संविधान, संविधानसँ अभिलेखीय अनुसन्धान, अनुसन्धानसँ आर्थिक आ तकनीकी जालक उद्घाटन। अरस्तूक करुणोन्मोचन एतय केवल भय आ करुणाक भावनात्मक शुद्धि नहि। पाठक शोक करि मुक्त नहि होइत; ओकरा पहरुआ बनबाक नैतिक दायित्व भेटैत अछि। कृति करुणोन्मोचनकेँ नागरिक उत्तरदायित्वमे बदलि दैत अछि। १०.२ लुकाच आ सामाजिक समग्रता जॉर्ज लुकाचक यथार्थवादी समग्रता-दृष्टिसँ उपन्यासक महत्त्व स्पष्ट होइत अछि। पुलक दुर्घटना अलग घटना नहि; ओकर सम्बन्ध श्रमबाजार, ठेकेदारी, अदालत, बैंक, विश्वविद्यालय, महामारी, पटल, देहबाजार, दान, जाति, भूमि, बीज, भोजन आ वैश्विक पूँजीसँ अछि। स्थानीय गाम विश्व-व्यवस्थासँ जुड़ल सामाजिक समग्रता बनैत अछि। कृतिक पात्रसभ कतेको बेर सामाजिक प्रकारक रूप धारण करैत छथि—वकील, वित्तीय दलाल, तकनीकी संचालक, दानगुरु, मौन अधिकारी, जागल बच्चा, स्मृति-रक्षक स्त्री। एहि प्रकारिकता सँ सामाजिक संरचना स्पष्ट होइत अछि; मुदा मनोवैज्ञानिक सूक्ष्मता कतेको ठाम घटैत अछि। ई लुकाचीय उपलब्धि आ सीमा दुनू अछि। १०.३ मार्क्सवादी आलोचना मार्क्सवादी दृष्टिसँ कृति श्रम आ पूँजीक असमान सम्बन्धक तीक्ष्ण आख्यान अछि। पुल श्रमिकक देहसँ बनैत अछि, मुदा लाभ ठेकेदार, वित्तीय संस्था आ प्रतिष्ठित लोककेँ भेटैत अछि। श्रमिकक नाम मेटाओल जाइत अछि, कारण नाम उत्तरदायित्व माँगैत अछि; संख्या शोषण लेल सुविधाजनक अछि। वस्तु-पूजा आ वस्तुकरण उपन्यासक अनेक स्तरपर अछि—श्वासक मूल्य, देहक बाजार, निजताक सौदा, स्मृतिक निविदा, बीजक पेटेण्ट, पानिक निजीकरण, दानक ऋण, आवाजक नकल, स्त्री-नामक खाता। मनुष्यक श्रम आ सम्बन्ध वस्तु बनैत अछि; वस्तु—मुहर, खाता, पटल—मानवीय सत्ता प्राप्त करैत अछि। दान आ सेवा प्रभुत्वक कोमल रूप बनैत अछि। सहायता लेल गेल अँगूठा भविष्यक मौन बनाओल जाइत अछि। ई ग्राम्शीक प्रभुत्व-सहमति अवधारणासँ मेल खाइत अछि—सत्ता केवल बलसँ नहि, विश्वास, श्रद्धा, उपकार, प्रतिष्ठा आ सामान्य-बुद्धिक माध्यमसँ टिकैत अछि। १०.४ बाख्तिनक बहुस्वरता आ संवादिता मिखाइल बाख्तिनक बहुस्वरता-दृष्टिसँ कृति अत्यन्त उपजाऊ अछि। लोकगीत, भूतक आवाज, बच्चाक प्रश्न, न्यायिक भाषा, तकनीकी सन्देश, स्त्री-कण्ठ, दार्शनिक अन्तर्ध्वनि, प्रशासनिक कागच, सूक्ति, पत्र, नाटक आ मौन—सभ अलग-अलग सामाजिक भाषा रूपमे उपस्थित अछि। चन्ना गाछीक कबड्डी कार्निवलात्मक उलटफेर अछि। मृतक जीवितकेँ जाँचैत छथि, बच्चा अधिकारीकेँ प्रश्न करैत छथि, रद्दी कागच अभिलेखागारक सत्य खोलैत अछि, खाली कुर्सी सत्ता पर शासन करैत अछि। पदानुक्रम उलटैत अछि। तथापि पूर्ण बहुस्वरता कतेको ठाम लेखकक प्रबल नैतिक वाणी सँ सीमित होइत अछि। अध्याय-अन्तक स्पष्ट निष्कर्ष, दार्शनिक अन्तर्ध्वनि आ पुनरावृत्त सूक्ति भिन्न आवाजकेँ स्वतन्त्र अन्त तक जायबासँ रोकैत अछि। पात्रक वाणी अनेक अछि, मुदा नैतिक दिशा प्रायः पूर्वनिर्धारित। १०.५ फूको: सत्ता, अभिलेख आ जैव-राजनीति मिशेल फूकोक दृष्टिसँ उपन्यास आधुनिक सत्ताक सूक्ष्म तन्त्र खोलैत अछि। सत्ता केवल पुलिस वा न्यायालय नहि; रजिस्टर, अस्पताल, पेंशन, विश्वविद्यालय, पहचान-पत्र, मोबाइल, बैंक, कैमरा, सहायता-सूची आ शोध-संस्था शरीर आ जनसंख्याकेँ वर्गीकृत, मापित आ नियंत्रित करैत अछि। “तीस नाम, तीन सय लाश” जैव-राजनीतिक गणनाक क्रूरता अछि। कतेक लोक जीवित मानल जाएत, कतेक मृत, ककर मृत्यु वैध, ककर शोक सार्वजनिक—ई निर्णय सत्ता करैत अछि। निजता, आवाज आ देहक डेटा आधुनिक अनुशासनक साधन बनैत अछि। रेकर्ड-घर, पंजी, मुहर, सहमति-कापी आ नील सूची अभिलेखीय सत्ता दर्शबैत अछि। किन्तु उपन्यास प्रतिअभिलेख रचैत अछि—पात, गीत, बच्चाक कापी, स्त्री-स्मृति, वस्तु, धूरि आ सामुदायिक प्रतिलिपि। १०.६ देरिदा: चिह्न, अनुपस्थिति आ अभिलेख जाक देरिदाक विखण्डन-दृष्टिसँ उपस्थित/अनुपस्थित, जीवित/मृत, कागच/पात, सत्य/प्रतिलिपि, केन्द्र/सीमा जेकाँ द्वन्द्व उपन्यासमे निरन्तर अस्थिर होइत अछि। अनुपस्थित व्यक्ति नाम, जूता, ध्वनि आ रिक्त स्थानक रूपमे अधिक तीव्र उपस्थित होइत अछि। हटायल पन्ना अपन धूरिक चौखट छोड़ैत अछि। खाली संदूक भरेल संदूकसँ बेसी प्रश्न उठबैत अछि। “चिह्न” अपराधक बाद बाँचल अवशेष अछि। अर्थ कोनो एक अन्तिम दस्तावेजमे बन्द नहि; ओ पात, जल, स्मृति, देह, आवाज आ पुनर्पाठमे फैलैत अछि। अन्तमे अध्यायक शीर्षक पुनः पढ़ल जाएब अभिलेखक पुनरावर्तन अछि—पाठ अपनहि इतिहासक प्रतिलिपि बनैत अछि। १०.७ स्मृति आ आघात-सिद्धान्त सामूहिक स्मृतिक सिद्धान्तक आलोकमे गढ़ नारिकेल स्मृतिसमुदाय अछि। मौरिस हॉल्बवैक्स अनुसार स्मृति सामाजिक ढाँचामे बनैत अछि; उपन्यास एहि बातकेँ लोकगीत, देहरी, गाछ, पात, नदी, खेल आ वार्षिक नाम-पाठद्वारा मूर्त करैत अछि। आघात एक बेर घटित घटना नहि; ओ “छपाक”, पटल, तारीख, बाढ़ि, आवाज आ खाली पन्ना रूपमे लौटैत अछि। पुनरावृत्ति प्रारम्भमे विवश स्मरण अछि, बादमे सचेत “कार्य-समाधान” बनैत अछि। गवाही, नाम-पाठ, नाटक, संविधान आ अभिलेख-सुरक्षा आघातकेँ सार्वजनिक अर्थ दैत अछि। कृति शोकक तमाशाक विरोध करैत अछि। पीड़ितक अनुमति, मौनक अधिकार आ प्रतीक्षा आवश्यक मानल जाइत अछि। ई आघात-साहित्यक नैतिक सिद्धान्तक अनुरूप अछि। १०.८ स्त्रीवादी आलोचना स्त्रीवादी दृष्टिसँ उपन्यास देह, दृष्टि, सहमति, निजता, लाज, घरेलू मौन, श्रम आ भोजनक राजनीति पर गम्भीर हस्तक्षेप करैत अछि। मीरा दृश्य-अधिकारक प्रश्न उठबैत छथि—केकर छवि के देखत, के प्रकाशित करत, के लाभ उठाओत? स्त्री-सभाक राति सार्वजनिक इतिहासमे अदृश्य घरेलू श्रम आ पीड़ाकेँ वाणी दैत अछि। “मृतकक सहमति”, “स्त्री-नामक खाता”, “छत्ताक भीतरक रानी”, “साझा थारी” आ “रसोइक गणराज्य” स्त्रीक नाम आ श्रमकेँ परिवार वा संस्था द्वारा हरणक आलोचना करैत अछि। लाज पीड़ितक माथसँ अपराधीक माथपर घुराओल जाइत अछि। तथापि कतेको स्त्री पात्र प्रतीकात्मक नैतिक भूमिका निभबैत छथि; हुनकर निजी इच्छाक बहुविधता, कामना, अन्तर्विरोध आ वैयक्तिक संघर्ष आरो विस्तार चाहैत छल। स्त्री-समुदाय सशक्त अछि, किन्तु विशिष्ट स्त्री-मनोविज्ञान किछु ठाम सामुदायिक रूपकमे विलीन होइत अछि। १०.९ उत्तर-औपनिवेशिक आ अधीनस्थ-वर्गीय दृष्टि औपनिवेशिक-उत्तर सत्ता केवल विदेशी शासन नहि; ज्ञान, विकास, विश्वविद्यालय, विधि, वित्त आ भाषा द्वारा स्थानीय जीवनक अधीनस्थीकरण अछि। हार्वर्डक नैतिक मंच आ गढ़ नारिकेलक पातक गवाहीक विरोध अत्यन्त सार्थक अछि। प्रतिष्ठित वैश्विक संस्था स्थानीय पीड़ाकेँ अध्ययन-वस्तु बनाबय चाहैत अछि; गाम अपन ज्ञान-अधिकार वापस लैत अछि। अधीनस्थ लोक बोलि सकैत अछि कि नहि—कृति एकल वाणी नहि, सामूहिक अभिलेखक उत्तर दैत अछि। श्रमिक, स्त्री, दलित, वृद्ध, बच्चा आ मृतक अलग-अलग माध्यमसँ बोलैत छथि। तथापि आरुणि, सत्यव्रत, मीरा जेकाँ शिक्षित मध्यस्थक भूमिका प्रबल अछि; एहि कारण प्रश्न रहि जाइत अछि जे अधीनस्थ वाणी कतेक प्रत्यक्ष आ कतेक प्रतिनिधिक माध्यमसँ सुनाइत अछि। उपन्यास एहि तनावकेँ पूर्ण समाधान नहि, किन्तु स्वीकृत करैत अछि। १०.१० पारिस्थितिक आलोचना नदी, माटि, बीज, आगि, वायु, आकाश, गाछ, पात आ गोहि कथा-भूमि मात्र नहि, सक्रिय नैतिक उपस्थिति छथि। जल स्मृति राखैत अछि; माटि प्रश्न करैत अछि; राख गवाही दैत अछि; हवा अफवाह आ धुँआ दुनू बहबैत अछि; गाछ समुदायकेँ छाह आ अभिलेख दैत अछि। ई मानव-केंद्रित साहित्यक सीमा विस्तृत करैत अछि। नील-हरित मानवीय अध्ययनक दृष्टिसँ उपन्यास नदीकेँ केवल संसाधन मानबाक विरोध करैत अछि। जल निजीकरण, बीज चोरी, माटिक अधिग्रहण आ बाढ़िक राजनीति पारिस्थितिक न्यायक प्रश्न छथि। एक आलोचनात्मक सावधानी आवश्यक अछि—“गोहि”क रूपक संस्थागत हिंसाकेँ प्रभावशाली बनबैत अछि, मुदा वास्तविक जीवकेँ नैतिक दुष्टताक प्रतीक बनाबयक जोखिम सेहो अछि। कृति कतेको ठाम गोहिक प्राकृतिक अस्तित्व आ मानवीय गोहिक भेद करैत अछि; तथापि पारिस्थितिक दृष्टिसँ एहि भेदकेँ आरो स्पष्ट बनाओल जा सकैत छल। १०.११ पाठक-प्रतिक्रिया सिद्धान्त रिक्त पट्टिका, खाली पन्ना, अनुपस्थित नाम, अधूरा अक्षर, बन्द रेकॉर्डर आ “कथा समाप्त नहि भेल” पाठककेँ सक्रिय सहभागिता लेल आमन्त्रित करैत अछि। वोल्फगाङ आइजरक “रिक्त स्थान” अवधारणासँ ई संरचना मेल खाइत अछि। पाठककेँ प्रश्न पूरा करबाक, नाम स्मरण करबाक आ नैतिक निर्णय लेबाक पड़ैत अछि। किन्तु कतेको ठाम रचना अपने रिक्त स्थानक व्याख्या तुरन्त कऽ दैत अछि। एहि कारण पाठकीय स्वतन्त्रता घटैत अछि। जहाँ दृश्य मौन रहैत अछि, कृति सर्वोत्तम; जहाँ प्रत्येक अर्थक स्पष्ट टिप्पणी देल जाइत अछि, पाठकक सृजनशील सहभागिता सीमित होइत अछि। एतुक्का अलौकिकता आयातित नहि, देशज अछि — भूत-प्रेत-राकश-लोथ-पनिडुब्बी-डाइनक ओ लोक-विश्वास जे अध्याय-० क लोककोशमे पहिनहि प्रामाणिक रूपेँ राखल गेल अछि। तेँ एकरा जादुई यथार्थवादसँ बेसी ‘लोक-यथार्थवाद’ कहब उचित — जतय मृतक जीवितक अन्यायक विरुद्ध वादी बनि सकैत अछि। आ डिजिटल-अरेस्ट, आवाज-नकल आ म्यूल-खाताक प्रकरण एहि कादम्बरीकेँ निगरानी-पूँजीवादक समकालीन आलोचनासँ जोड़ैत अछि : जे व्यवस्था पहिने नाम काटैत छल, से आब ‘नामक गला’ बनबैत अछि। ११. कथन-शिल्प आ रूप-विधान उपन्यासक संरचना वृत्ताकार अछि। अध्याय १क कबड्डी अन्तिम अध्यायमे फेर लौटैत अछि; अन्तर एतबे जे आरम्भमे मृतक खेलैत छथि, अन्तमे जीवित बच्चा। आरम्भमे मृतक न्याय माँगैत छथि; अन्तमे जीवित पहरा ग्रहण करैत छथि। प्रत्येक अध्यायक शीर्षक, सूक्ति, लोकगीत, कथा-देह आ कतेको ठाम दार्शनिक अन्तर्ध्वनि एक निश्चित लय बनबैत अछि। ई महागाथात्मक अनुशासन दैत अछि। पुनरावृत्त वाक्य—कथा समाप्त नहि भेल, नाम उपस्थित, गोहि देह खाइत अछि नाम नहि—मौखिक आख्यानक टेक जकाँ कार्य करैत अछि। उपन्यास अनेक विधा अपनबैत अछि: लोककथा, भूतकथा, रहस्य, सामाजिक दस्तावेज, दार्शनिक संवाद, गीत, पत्र, जन-सुनवाई, नाट्य-पाठ, अभियोग, अभिलेखीय जाँच, स्वप्न-दृष्टान्त आ बालखेल। एहि विधामिश्रणसँ कृति आधुनिक महाकाव्यात्मक विस्तार पबैत अछि। मेटाकथात्मकता सेहो महत्त्वपूर्ण अछि। “उपन्यास फेर शुरू” अपन कथारूप पर टिप्पणी करैत अछि। नाट्य उत्सवमे पहिल अध्याय सभ मंचित होइत अछि। अन्तिम अध्यायमे अध्यायक शीर्षक सभ पुनः पढ़ल जाइत अछि। पाठ अपन निर्माण, पुनर्लेखन आ सार्वजनिक उपयोग पर विचार करैत अछि। लेखक अपन कृतिकेँ ‘मैथिली कादम्बरी’ कहैत छथि, आ ई संज्ञा केवल विधा-नाम नहि। परिशिष्ट-३ मे बाणभट्टक अपूर्ण कादम्बरीक अन्तिम पन्नाकेँ लऽ कऽ मङ्गलवादक शास्त्रीय विमर्श कथा-रूपमे राखल गेल अछि — मङ्गलाचरणक फल ग्रन्थ-समाप्ति नहि, विघ्न-नाश थिक — जाहिसँ ई कृति बाणक गद्य-परम्परा आ मिथिलाक न्याय-परम्परा दुनूसँ अपन नाल जोड़ैत अछि। प्रत्येक अध्यायक स्थापत्य — सूक्ति-वाक्य, लोकधुन-निर्देश सहित अध्यायारम्भ लोकगीत, गद्य-कथा, तिर्यक् दार्शनिक अन्तर्ध्वनि, आ अध्यायान्त गीत — संस्कृत चम्पू आ लोक-नाच दुनूक स्मृति जगबैत अछि। १२. भाषा, लोकधुन आ शैलीगत वैशिष्ट्य कृतिक भाषा लोकमैथिली, अकादमिक पदावली, प्रशासनिक वाक्य, दार्शनिक संज्ञा आ आधुनिक तकनीकी शब्दक मिश्रित संसार बनबैत अछि। छोट सूक्तिपूर्ण वाक्य स्मरणीय छथि—नदी धारसँ मेड़ काटैत अछि, कागच तारीखसँ गाम; नाम लिखलासँ बेसी ओकर घर धरि जाएब आवश्यक; देहरी सत्यक पहिल मर्यादा; सहायता जखन चुप्पी माँगए, दान सौदा बनि जाइत अछि। लोकगीत कथा केँ मौखिकता, सामूहिकता आ लय दैत अछि। गीत केवल अलंकरण नहि; ओ श्रम, शोक, शिक्षा, नाटक आ प्रतिरोधक साधन अछि। स्त्री-गीत आ बालगीत विशेष रूपेँ सामुदायिक ज्ञानक वाहक छथि। उपन्यासक बिम्ब-संसार प्रायः अत्यन्त प्रभावकारी अछि। लाल फीता पनिडुब्बीक झोँटा; अलमारी रोकल समयक अन्हार; धूलि मुंशी; मुहर घाव; पंजी डरक नक्शा; ठूँठमे हरियर बिन्दु—ई बिम्ब सामाजिक अमूर्तनकेँ इन्द्रियग्राह्य बनबैत अछि। १३. सामाजिक-राजनीतिक महत्त्व ई कृति विकासक आधिकारिक आख्यानपर प्रश्न उठबैत अछि। पुल, सेवा, दान, तकनीक, शोध आ वित्तीय समावेशन—सभ लोकहितक शब्द छथि; मुदा जँ नाम, सहमति, सुरक्षा आ उत्तरदायित्व नहि, तँ ई सभ हिंसाक आवरण बनि सकैत अछि। जातिक प्रश्न उपन्यासक मूल संरचनामे अछि। श्रमिकक नाम, साझा थारी, रसोइ, श्मशान, स्पर्श, गंगेशक जीवन आ सभसँ नीच कहल घरक गवाही—सभ देखबैत अछि जे न्याय जाति-विमर्श बिनु अधूरा अछि। कृति अंककीय आधुनिकताक सरल विरोध नहि करैत। मोबाइल, अभिलेख, प्रतिलिपि, सन्देश आ पटल अपराधक औजारो छथि, प्रतिरोधक साधनो। प्रश्न तकनीक नहि, स्वामित्व, सहमति, पारदर्शिता आ सामुदायिक उपयोगक अछि। उपन्यास लोकतन्त्रक वैकल्पिक रूप सुझबैत अछि—नामक संविधान, जन-सुनवाई, साझा रसोइ, अनुमति-आधारित जाँच, सामुदायिक प्रतिलिपि, बच्चाक प्रश्न आ स्मृति-पहरा। ई विधिक संस्थाकेँ नकारैत नहि; ओकरा मानवीय अर्थ देबाक लेल समुदायक कण्ठ आवश्यक मानैत अछि। १४. कृतिक प्रमुख उपलब्धि प्रथम उपलब्धि—स्थानीयता आ वैश्विकताक सशक्त मेल। गढ़ नारिकेलक गाछी हार्वर्ड, हांगकांग, बैंक, अंककीय पटल आ वैश्विक पूँजीसँ जुड़ैत अछि, मुदा अपन लोकदृष्टि गमबैत नहि। द्वितीय—नामक नैतिक दर्शन। आधुनिक साहित्यमे पहचानक चर्चा प्रचुर अछि, मुदा एतय नाम कानूनी, सामाजिक, भावात्मक, दार्शनिक आ आध्यात्मिक सभ स्तरपर केन्द्र बनैत अछि। तृतीय—लोकस्मृति आ प्रमाण-पद्धतिक मेल। भूतकथा अन्धविश्वास नहि, दबाओल इतिहासक रूपक; पात कागचक विकल्प; गीत अभिलेख; बच्चाक खेल न्यायशास्त्र बनैत अछि। चतुर्थ—सहमति आ दृष्टिक अधिकारक गम्भीर प्रस्तुति। पीड़ितक कथा, स्त्रीक देह, मृतकक छवि, शोध आ स्मारकक नैतिक प्रश्न मैथिली उपन्यासमे विरल विस्तार पबैत अछि। पंचम—विधामिश्रित महागाथात्मकता। सामाजिक उपन्यास, दार्शनिक विचार, रहस्य-अनुसन्धान, लोकगीत, नाटक आ स्वप्नदृष्टान्तक संयुक्त रूप कृतिक विशिष्ट चिन्ह अछि। षष्ठ—आशाक गैर-सरलीकृत रूप। अन्तमे सभ अपराधी समाप्त नहि, सभ मामला निपटल नहि। अपराधी भागत, किछु पकड़ाएत, किछु धर्म वा बीमारीक आवरण लैत। आशा “समस्या समाप्त”मे नहि, पहरा जारी रहबमे अछि। १५. रचनात्मक सीमा आ आलोचनात्मक आपत्ति विराटता कृतिक शक्ति अछि, किन्तु विस्तार कतेको ठाम कथात्मक सघनता घटबैत अछि। तीन सय एक अध्यायमे नाम, स्मृति, मौन, गवाही, पहरा, पात, गोहि आ “कथा समाप्त नहि भेल”क पुनरावृत्ति अनुष्ठानात्मक प्रभाव उत्पन्न करैत अछि; मुदा लगातार आवृत्ति पाठकपर अर्थक अतिरिक्त भार सेहो दैत अछि। सम्पादन द्वारा समान विचारक पुनर्कथन घटाओल जाए तँ प्रभाव आरो तीक्ष्ण होएत। प्रत्येक अध्यायक सूक्ति, गीत आ दार्शनिक निष्कर्ष संरचनात्मक एकरूपता दैत अछि, किन्तु कतेको ठाम सूत्रबद्धता उत्पन्न करैत अछि। कथा जखन अपने दृश्यसँ अर्थ स्पष्ट कऽ दैत अछि, तखन अन्तिम व्याख्या अनावश्यक बुझाइत अछि। ध्वनि-सिद्धान्तक दृष्टिसँ अर्थक किछु अवकाश पाठक लेल छोड़ल जा सकैत छल। शून्य अध्यायक लोक-सांस्कृतिक विस्तार विश्वनिर्माण लेल महत्त्वपूर्ण अछि, मुदा कथा आरम्भ होएबासँ पहिने एतेक विस्तृत निबन्धात्मक सामग्री कथागतिकेँ विलम्बित करैत अछि। एकर किछु अंश परिशिष्ट वा कथाभरि वितरित रहित तँ आरम्भ आरो सघन होइत। नव्य-न्यायक दार्शनिक अन्तर्ध्वनि कृतिक मौलिकता अछि, परन्तु जखन शास्त्रीय उदाहरण कथासँ ढीला सम्बन्ध रखैत अछि, तखन ओ स्वतंत्र पाठ्यपुस्तकीय खण्ड जकाँ बुझाइत अछि। कथा आ दर्शनक सम्बन्ध जतय जैविक अछि—अनुपलब्धि, शब्द, अनुमान, सहमति, प्रमाण—ओतय प्रभाव असाधारण; जतय केवल सिद्धान्त-प्रदर्शन अछि, ओतय कथाप्रवाह टूटैत अछि। किछु खल-पात्र सामाजिक संरचनाक प्रतिनिधि बनैत-बनैत योजनाबद्ध प्रकारमे बदलि जाइत छथि। हुनकर निजी जीवन, अन्तर्विरोध, आत्मछल, सम्बन्ध आ परिवर्तनक गति आरो सूक्ष्म होइत तँ नैतिक जटिलता बढ़ैत। आत्मस्वीकारक प्रसंग कतेको बेर समान ढाँचा ग्रहण करैत अछि—बाल्यकालीन अपमानक स्मृति, अपराधक पहचान, अधूरा पश्चात्ताप। उपन्यासक नैतिक पक्ष स्पष्ट आ दृढ़ अछि, मुदा स्पष्टता कतेको ठाम कला पर प्रभुत्व करैत अछि। पाठककेँ ककरा सही मानब, प्रायः आरम्भे बुझाइत अछि। नैतिक अस्पष्टता, विडम्बना आ पात्रक जटिल निर्णयक किछु अधिक क्षेत्र रहित तँ कृति मनोवैज्ञानिक रूपेँ आरो बहुस्तरीय बनैत। अलौकिकता लोकदृष्टिसँ स्वाभाविक अछि, किन्तु प्रत्येक वस्तुक बोलब, पातपर अक्षर उगब आ मृतकक प्रत्यक्ष हस्तक्षेप कतेको पाठक लेल रूपक आ घटना बीचक सीमा धुँधला करि सकैत अछि। कृति सामान्यतः एकरा लोक-स्मृतिक भाषा बनबैत अछि; तथापि किछु ठाम संयम एहि प्रभावकेँ प्रखर बना सकैत छल। १६. समग्र आलोचनात्मक निर्णय “गोहि सभक बीच जलसमाधि”क मूल्य केवल ओकर विशाल आकार वा विषयक बहुलतामे नहि, अपितु एहि मौलिक विचारमे अछि जे मनुष्यक न्याय ओकर नामक सामाजिक जीवन बचाए बिना सम्भव नहि। ई कृति मृत्युकेँ जैविक घटना, अन्यायकेँ कानूनी मामला, तकनीककेँ उपकरण आ स्मृतिकेँ भावुकता मानबाक संकीर्णता तोड़ैत अछि। मृत्यु कागच, देह, परिवार, इतिहास आ भविष्यक सम्बन्धक संकट अछि; अन्याय संरचनात्मक जाल; तकनीक नैतिक स्वामित्वक प्रश्न; स्मृति सार्वजनिक उत्तरदायित्व। भारतीय काव्यशास्त्रक दृष्टिसँ ई करुणासँ वीर आ सजग शान्त रस धरि जायवला, ध्वनि आ वक्रोक्तिसँ सम्पन्न लोकमहागाथा अछि। नव्य-न्यायक दृष्टिसँ ई अनुपस्थितिक प्रमाण, शब्दक प्रामाण्य आ अनुमानक सामाजिक प्रयोगक उपन्यास अछि। पाश्चात्य सिद्धान्तक दृष्टिसँ ई सामाजिक समग्रता, बहुस्वरता, अभिलेखीय सत्ता, जैव-राजनीति, आघात-स्मृति, स्त्रीवादी सहमति, उत्तर-औपनिवेशिक ज्ञान आ पारिस्थितिक न्यायक बहुस्तरीय पाठ प्रस्तुत करैत अछि। रचनाक सीमा ओकर अति-विस्तार, व्याख्यात्मक पुनरावृत्ति, सूत्रात्मक अध्याय-विधान आ कतेको पात्रक प्रकारिकतामे अछि। मुदा ई सीमा कृतिक मूल उपलब्धि केँ नष्ट नहि करैत। उलटे स्पष्ट करैत अछि जे ई रचना सुघर, सीमित, मनोवैज्ञानिक उपन्यास बनबाक अपेक्षा एक विशाल सामुदायिक अभिलेख बनबाक जोखिम लैत अछि। ओकर रूप अनेक बेर असमतल अछि, कारण ओ भिन्न आवाज, गीत, दस्तावेज, सिद्धान्त, स्मृति आ घावकेँ एकहि देहमे समेटबाक प्रयत्न करैत अछि। अन्ततः ई उपन्यासक सर्वोच्च उपलब्धि एक नब नैतिक वाक्य रचब अछि—न्याय केवल अपराधीक दण्ड नहि; विस्मृतक नाम घुराएब, पीड़ितक अनुमति मानब, अभिलेख बचाएब, बच्चाकेँ प्रश्न सिखाएब, साझा थारी बनायब आ अपन भीतरक मौनक नाम लिखब सेहो न्याय अछि। चन्ना गाछीक अन्तिम हरियर बिन्दु एहि विश्वासक प्रतीक अछि जे स्मृति जाधरि सामुदायिक काज बनल रहत, ताधरि कोनो गोहि मनुष्यक नाम पूर्ण रूपेँ नहि खा सकत। १७. उपसंहार “गोहि सभक बीच जलसमाधि” आधुनिक मैथिली साहित्यक एक महत्त्वाकांक्षी लोक-दर्शनात्मक उपन्यास अछि। ई गामक कथा कहैत विश्वक कथा बनैत अछि, मुदा विश्वक विस्तारमे गामक बोली, पात, नून, माटि आ देहरी गमबैत नहि। एकर अन्तिम संदेश आश्वासन नहि, आह्वान अछि—मृतकक नाम पढ़ू, जीवितक भय सुनू, प्रमाणक मर्यादा राखू, आ न्यायकेँ निरन्तर पहरा बनाउ। कृति समाप्त नहि होइत, कारण अन्तिम पन्नाक बाद पाठक स्वयं अगिला पहरुआ बनबाक प्रश्नक सोझाँ ठाढ़ होइत अछि। परिशिष्ट एन्थ्रोपोलोजिकल संकलन — तीनू खण्ड (०·१·२) संकेत — ० = पूर्व-कथाकाल (−१०० सँ −१) · १ = अध्याय ० सँ १०० · २ = अध्याय १०१ सँ २०० अ · श्रेणीवार सूची भौगोलिक स्थान — गाम, टोल, हवेली, स्थल गढ़ नारिकेल · चन्ना गाछी · नारिकेल पात पाठशाला · चर्मकार टोल · मुसहरी · हरिपुर कटान · ठाकुर-हवेली · देहक बाजार · हरिहर सेवा केंद्र · तेतरि घाट · इमली घाट · पुरान पुल / महापुल · हार्वर्ड · हांगकांग · मेरठ जल-स्रोत — नदी, पोखरि, इनार, आहर, चौर कमला-बलान · गंगा · कोसी · जोड़ी-पोखरि · पनिडुब्बी पोखरि · डकही पोखरि · भीतरक पोखरि · धनक कारी नदी · इनार · आहर · चौर · बान्ह · डबरा गाछ-बृच्छ चन्ना गाछी (पीपर / साक्षी-गाछ) · नारिकेल गाछ · आम · इमली · बाँस · बथुआ साग जीव-जन्तु गोहि · माछ · मखान · गज-ग्राह · शंख · सर्प (साँप) · बाघ · कबूतर व्यक्ति — श्रमिक आ मृतक (मुख्य) बिसेसर पासवान · सरयू देवी · छोटू (भोलटुन) · सलामत अंसारी · गोपी महतो · रजनू मंडल · कन्हैया · शिवनाथ सदा · उज्ज्वल झा व्यक्ति — नायक-पक्ष आ साक्षी (मुख्य) नन्द आरुणि · बा · आरुणि · अनन्या · ईरा आरुणि · मीरा (मृणालिनी आर्या) · देविका साह · फूलमति · गोप कुमार · सत्यव्रत मेहता · सौम्या रामनाथन · रमैय्या सुब्रमण्यम · ईशान दत्त · रामलखन · माधव · अदिति व्यक्ति — अपराधी-पक्ष बटुकनाथ हरिहरन · चन्द्रपाल बत्रा · राघव सोमानी (‘सिग्नल’) · लाउ किन-हंग · एडवर्ड ब्रूम · महावीर पाठक · मालविका ग्रीन · मधवेश · महेश्वर · ध्रुवेश · शशिभूषण देव · महेन्द्र पाठक · विक्टर हाल्डेन · दिवाकर लाल व्यक्ति — खण्ड-२ क अन्य पात्र आ पंजी-नाम भिखारी लाल · सुरमणी देवी · रानी देवी · दीनबंधु आ विधवा रागिनी देवी · फूलकली देवी · रमरतिया देवी · जसोदा देवी · सुरजमुखी · फुलकुंवरि · कमलू पासवान · जगदीश मल्लाह · मुन्ना पासवान · सौरभ महतो · इमरान · नागेश्वर झा · मुनिया · धनेसरी · नगीना व्यक्ति — पूर्व-कथाकाल (खण्ड-०) आ दार्शनिक मोहन आ राधिका · सुखदेव महतो · थॉम्पसन साह (साहेब) · प्रतापसेन · कमला देवी · गौरी · कारू · कलित · गंगेश उपाध्याय · वाचस्पति मिश्र · उदयनाचार्य लोकोत्तर आ लोक-पात्र बूढ़बा भूत · हुलासी · पनिडुब्बी · लोथ · राकश · डाइन · पीपरक ब्रह्मा · सलहेस लोक-पाबनि, अनुष्ठान, नाच आ गीत-विधा सोहर · समदाउन · विदापत · बटगबनी · चैती · फाग · निर्गुण · मर्सिया · जट-जटिन · झिझिया · मधुश्रावणी · अरिपन · अध्यायारम्भ लोकगीत · फकरा · ढोल · मृदंग · बाँसुरी · नगाड़ा लोक-न्याय आ सामुदायिक संस्था भूत-कबड्डी · पंजी · नील पंजी · रानी-खाता · सेवा-पंजी · नामक संविधान · नाम-उत्सव · राति-सभा · जन-सुनवाई · स्त्री-सभा · मौनक नामावली · नामक पहरुआ वस्तु आ प्रतीक माटिक पट्टिका · काँसक कटोरा (तीन जल) · फाटल गमछा · लोहाक संदूक · लोहाक पेटी · तीन कंकड़ (घर·भय·सपना) · पात-दीप · दीप · कलश · पान · सुपारी · सिन्दूर · पाग · धोती · गमछा · छपाक (ध्वनि) फसल, भोजन आ जाति-समुदाय धान · मखान · मड़ुआ · कुसियार · चूड़ा · दही · पासवान · मुसहर · चर्मकार · अंसारी · महतो · मंडल · सदा · मल्लाह दर्शन, शास्त्र आ आधुनिक परिघटना नव्य-न्याय · तत्त्वचिन्तामणि · भामती · न्यायकुसुमाञ्जलि · प्रमाण-चतुष्टय + अनुपलब्धि · डिजिटल-अरेस्ट · म्यूल-खाता · आवाज-नकल · निगरानी-पूँजीवाद ब · विस्तृत तालिका भौगोलिक स्थान — गाम, टोल, हवेली, स्थल नाम खण्ड संक्षिप्त विवरण गढ़ नारिकेल ०·१·२ उपन्यासक केन्द्रीय गाम; स्मृति-श्रम-जल-जातिक जीवित संसार। चन्ना गाछी ०·१·२ कटल पीपर-वनक स्थल; मृतकक लोक-अदालत आ भूत-कबड्डीक रंगमञ्च। नारिकेल पात पाठशाला ०·१·२ चन्ना गाछीक ठूँठ लगक बाल-विद्यालय; गवाही-पंजीक केन्द्र। चर्मकार टोल ०·१·२ गामक श्रमशील टोल; जातिगत विषमताक स्थल। मुसहरी २ मुसहर-समुदायक टोल; छोटूक मूल। हरिपुर कटान २ कटानग्रस्त गाम; रानी देवी-प्रसंगक ‘रानी-खाता’क मूल। ठाकुर-हवेली ० प्रतापसेन-कमला देवीक हवेली; खण्ड-० अन्तःकथाक स्थल। देहक बाजार १·२ देह-व्यापार-जालक रूपक-स्थल; फूलमतिक मुक्ति-प्रसंग। हरिहर सेवा केंद्र १·२ अन्वेषणक सूत्र-स्थल; अभिलेखीय अनुसन्धानक द्वार। तेतरि घाट · इमली घाट २ · ०·१·२ कमला-बलानक घाट; लोक-स्मृतिक स्थल। पुरान पुल / महापुल ०·१·२ गंगापर बनैत सड़क-पुल; जोन-मजदूरक जलसमाधि-स्थल। हार्वर्ड · हांगकांग · मेरठ ०·१·२ · ०·१ · ०·१ बाहरी केन्द्र — नैतिक-पाखण्ड, वैश्विक वित्त-जाल आ दूरक अपराध। जल-स्रोत — नदी, पोखरि, इनार, आहर, चौर नाम खण्ड संक्षिप्त विवरण कमला-बलान ०·१·२ गामक नदी; बाढ़ि-कटानक स्रोत, पारिस्थितिक कर्ता। गंगा ०·१·२ महानदी; महापुल आ मजदूर-जलसमाधिक स्थल। कोसी ० मिथिलाक शोकनदी; बाढ़ि-स्मृतिक सन्दर्भ। जोड़ी-पोखरि ० जोड़ल पोखरि; पूर्व-कथाकालक जलसमाधि-स्थल। पनिडुब्बी पोखरि ०·१·२ पनिडुब्बी-आत्मासँ जुड़ल पोखरि। डकही पोखरि ०·१ पात-दीप-प्रसंगक पोखरि (अध्याय-० लोककोश)। भीतरक पोखरि ०·१·२ घरक भीतर दबाओल मृत्युक रूपक; ‘पानि बिनु जलसमाधि’। धनक कारी नदी ०·१·२ अवैध खाता-म्यूल-दानक गुप्त वित्तीय प्रवाहक रूपक। इनार · आहर · चौर · बान्ह · डबरा ०·१·२ कूप, जल-नाला, नीचला जलक्षेत्र, बान्ह आ डबरा — गामक जल-भूगोल। गाछ-बृच्छ नाम खण्ड संक्षिप्त विवरण चन्ना गाछी (पीपर / साक्षी-गाछ) ०·१·२ बारह सय बरखक साक्षी-वृक्ष; कटलाक बादो ठूँठ स्मृति रखैत अछि। नारिकेल गाछ ०·१·२ गामक नाम-मूल वृक्ष। आम · इमली · बाँस ०·१·२ घाट-नामक मूल आ लोक-परिवेशक वृक्ष। बथुआ साग २ देहरी-दरारमे उगल साग; उजाड़-स्मृतिक बिम्ब (सुरमणी देवी-प्रसंग)। जीव-जन्तु नाम खण्ड संक्षिप्त विवरण गोहि ०·१·२ कुम्भीर/मगर; काल, विस्मृति, सत्ता आ पूँजीक केन्द्रीय रूपक — ‘गोहि देह खाइत अछि, नाम नै’। माछ ०·१·२ पोखरिक जीव; रजिस्टरसँ कटल शब्दक बिम्ब (‘छोट-छोट माछ’)। मखान १·२ पोखरिक जलीय फसल; लोक-अर्थतन्त्रक अङ्ग। गज-ग्राह ०·१·२ हाथी-मगरक दृष्टान्त; नाम-पुकारसँ उद्धारक प्रसंग। शंख ० शंख-रजत भ्रमक दार्शनिक बिम्ब (नव्य-न्याय)। सर्प (साँप) · बाघ · कबूतर ०·१·२ दृष्टान्त-जीव (रस्सी-सर्प, योगबल-बाघ, नील-उज्जर कबूतर)। व्यक्ति — श्रमिक आ मृतक (मुख्य) नाम खण्ड संक्षिप्त विवरण बिसेसर पासवान १·२ पुलक पायापर मृत; रजिस्टरमे ‘अनुपस्थित’, अन्तमे नाम अमर। सरयू देवी १·२ स्त्री-मजदूर; अँगूठाक निशान न्यायक पहिल पाठ बनल। छोटू (भोलटुन) १·२ मुसहरिनक नाबालिग बेटा; असली नाम सामूहिक स्मृतिसँ फेर भेटल। सलामत अंसारी · गोपी महतो · रजनू मंडल · कन्हैया · शिवनाथ सदा १·२ अनाम-कागचपर डूबल श्रमिक-नाम। उज्ज्वल झा १·२ डिजिटल-अरेस्ट-ठगीक शिकार; मृत्यु जाल-उद्घाटनक बीआ। व्यक्ति — नायक-पक्ष आ साक्षी (मुख्य) नाम खण्ड संक्षिप्त विवरण नन्द आरुणि ०·१·२ मूल साक्षी; ‘तीन-प्रति गवाही’-सिद्धान्तक स्रोत। बा १·२ मातृ-स्वर; लोक-स्मृतिक रखबारि, ‘रिक्त ठामो गवाही’। आरुणि · अनन्या ०·१·२ अगिला पीढ़ी; नाम-पाठ, गाम-नेतृत्व आ पंजी-रक्षा। ईरा आरुणि १·२ विदेश-जन्मा; हार्वर्डमे एडवर्ड ब्रूमकेँ चुनौती। मीरा (मृणालिनी आर्या) १·२ निजता-चोरीक शिकार; ‘दृष्टिक अधिकार’-मण्डलक सूत्रधार। देविका साह १·२ उज्ज्वलक बहिन; अंककीय-ठगी-विरोधी शिक्षाक साहसी स्वर। फूलमति १·२ देह-व्यापार-जालसँ मुक्त; ‘हमर नाम फूलमति अछि’। गोप कुमार ०·१·२ अभिलेख-रक्षक; तीन-प्रति-प्रणालीक जनक, जाल-भेदक। सत्यव्रत मेहता ०·१·२ वृद्ध अधिवक्ता; अदालतमे मृतकक नाम-पाठ। सौम्या रामनाथन · रमैय्या सुब्रमण्यम १·२ निरन्तर सहयोगी अन्वेषक। ईशान दत्त १·२ रहस्यमय सूचनादाता; ‘मृत’ घोषित, अनाम सूचनादाता-प्रतीक। रामलखन · माधव · अदिति १·२ बही-पंजी उलटनिहार आ सहायक-पात्र; मीराक प्रेम अदिति। व्यक्ति — अपराधी-पक्ष नाम खण्ड संक्षिप्त विवरण बटुकनाथ हरिहरन १·२ बार काउन्सिलक चमक; विधिक चातुरी, विलम्बित क्षमा-याचना। चन्द्रपाल बत्रा १·२ म्यूल-खाता-जालक संचालक; अपमानित बाल्य-नामक घाव। राघव सोमानी (‘सिग्नल’) १·२ आवाज-नकल-नेटवर्क; माएक अन्तिम आवाज मेटेबाक अपराध-बोध। लाउ किन-हंग ०·१ हांगकांगक सूत्रधार; नामहीन खाता, संस्थागत पराजय। एडवर्ड ब्रूम १·२ पुल-दवा-खेल-जालक अन्तरराष्ट्रीय चेहरा; ‘मानव गरिमा सहित विकास’। महावीर पाठक २ बटुकनाथक समयक नुकाएल नाम; अन्वेषणमे उभरल। मालविका ग्रीन · मधवेश · महेश्वर · ध्रुवेश १·२ मध्यम-स्तरीय संचालक; अन्त अनिश्चित। शशिभूषण देव · महेन्द्र पाठक · विक्टर हाल्डेन · दिवाकर लाल १ आरम्भिक भ्रष्ट अधिकारी; बादमे कथासँ लोप। व्यक्ति — खण्ड-२ क अन्य पात्र आ पंजी-नाम नाम खण्ड संक्षिप्त विवरण भिखारी लाल २ गामक पात्र; तालाक भारीपन-प्रसंग — ‘भीतरक साँस भारी छै’। सुरमणी देवी २ पश्चात्ताप-यात्राक पहिल घरक स्वामिनी। रानी देवी २ हरिपुर कटानक वृद्धा; पहिल ‘रानी-खाता’क नाम (उमेर बहत्तर)। दीनबंधु आ विधवा रागिनी देवी २ रागिनी देवी पहिल बेर सार्वजनिक साक्ष्य दैत छथि। फूलकली देवी २ फूलमतीसँ भिन्न; अभिलेख-पंजीमे नाम-भेदक प्रसंग। रमरतिया देवी · जसोदा देवी · सुरजमुखी · फुलकुंवरि २ बही/नाम-पंजीमे अभिलिखित स्त्री-नाम। कमलू पासवान · जगदीश मल्लाह · मुन्ना पासवान · सौरभ महतो · इमरान १·२ पंजी आ म्यूल-खाता-प्रसंगक नाम। नागेश्वर झा २ जीवित मुवक्किल; चन्ना गाछी-प्रसंग (‘ओ तँ जीवित छथि’)। मुनिया · धनेसरी · नगीना २ ‘मौनक नामावली’ आ माटिक पट्टिकापर अमर नाम। व्यक्ति — पूर्व-कथाकाल (खण्ड-०) आ दार्शनिक नाम खण्ड संक्षिप्त विवरण मोहन आ राधिका ० बाँसुरी-वादक मोहन; बेटी राधिकाक शोकसँ ‘अध्यायारम्भ लोकगीत’ परम्पराक जन्म। सुखदेव महतो ०·१·२ गामक दक्षिण छोरक निवासी; बदलाक बदला क्षमा चुननिहार। थॉम्पसन साह (साहेब) ० नोटबुक-धारी विदेशी; गामक बुढ़-पुरानसँ पुछताछ (‘साहेबक नोटबुक’)। प्रतापसेन · कमला देवी · गौरी ० ठाकुर-हवेली अन्तःकथाक पात्र; गौरीक हाथक लोक-विश्वास। कारू · कलित ०·१·२ पूर्व-कथाकाल आ मुख्य-कथाक आवर्ती लोक-पात्र। गंगेश उपाध्याय ०·१·२ तत्त्वचिन्तामणिक प्रणेता; नव्य-न्यायक जन्मदाता, ‘प्रमाणक दुआरक’ प्रश्न। वाचस्पति मिश्र · उदयनाचार्य ० भामती आ न्यायकुसुमाञ्जलिक कर्ता; खण्ड-० दार्शनिक-नाट्यक आधार। लोकोत्तर आ लोक-पात्र नाम खण्ड संक्षिप्त विवरण बूढ़बा भूत ०·१·२ बारह सय बरखक निर्णायक; अन्तमे डण्डा जीवितकेँ सौंपि दैत छथि। हुलासी ०·१·२ बिनु हाथक आत्मा; भूत-कबड्डीक खेलाड़ी। पनिडुब्बी · लोथ · राकश · डाइन ०·१·२ अकालमृत लोक-आत्मा; मृतक-अदालतक सदस्य। पीपरक ब्रह्मा ०·१·२ साक्षी-गाछक अधिष्ठाता लोक-देवता। सलहेस २ मिथिलाक लोक-देव/लोक-गाथा-नायक; लोक-सन्दर्भ। लोक-पाबनि, अनुष्ठान, नाच आ गीत-विधा नाम खण्ड संक्षिप्त विवरण सोहर · समदाउन ०·१·२ जन्म-मंगल आ बेटी-विदाइ/शोकक लोकगीत। विदापत · बटगबनी · चैती · फाग ०·१·२ विद्यापति-पद, यात्रा-धुन, ऋतु-गीत आ फागक लय। निर्गुण · मर्सिया ०·१·२ कबीर-निर्गुण वाणी आ शोक-मर्सिया। जट-जटिन · झिझिया · मधुश्रावणी १·२ मिथिलाक लोक-नृत्य आ पाबनि। अरिपन १·२ आँगनक मौन अल्पना-कला; लोक-स्मृतिक चिह्न। अध्यायारम्भ लोकगीत · फकरा ०·१·२ हर अध्यायक भोर खोलनिहार नामित-लोकधुन गीत; आ सूक्ति-फकरा। ढोल · मृदंग · बाँसुरी · नगाड़ा ०·१·२ लोक-वाद्य। लोक-न्याय आ सामुदायिक संस्था नाम खण्ड संक्षिप्त विवरण भूत-कबड्डी ०·१·२ मृतकक लोक-अदालत; ‘सीमा पार करू, साँस बचाउ, नाम लऽ कऽ घुरू’। पंजी · नील पंजी · रानी-खाता · सेवा-पंजी ०·१·२ गामक स्थायी नाम-अभिलेख; काउण्टर-आर्काइव, अपराध-खातासँ पृथक्। नामक संविधान · नाम-उत्सव १·२ नाम-रक्षाक सामुदायिक विधान आ उत्सव। राति-सभा · जन-सुनवाई · स्त्री-सभा ०·१·२ सामूहिक न्याय-प्रक्रिया। मौनक नामावली · नामक पहरुआ १·२ मौन-नाम-सूची आ निरन्तर स्मृति-पहरा। वस्तु आ प्रतीक नाम खण्ड संक्षिप्त विवरण माटिक पट्टिका २ गाछीक चारू कात एक-एक नामक स्मृति-फलक। काँसक कटोरा (तीन जल) २ इनार + कमला-बलान + गंगाक जल — ‘तीन प्रकारक गवाही’। फाटल गमछा १·२ हारक चिन्ह नहि, श्रम-स्मृति-साहसक ध्वज। लोहाक संदूक · लोहाक पेटी १·२ बन्द अभिलेख-साक्ष्यक पात्र। तीन कंकड़ (घर·भय·सपना) १·२ बाल-नैतिक शिक्षाक सूत्र; हर नाममे तीन प्रश्न। पात-दीप · दीप · कलश ०·१·२ डकही-पोखरिक पात-दीप; अनुष्ठान-दीप आ कलश। पान · सुपारी · सिन्दूर · पाग · धोती · गमछा ०·१·२ मैथिल लोक-जीवनक वस्तु आ वेश। छपाक (ध्वनि) ०·१·२ जलमे देह खसबाक आवाज; अन्यायक ध्वनि-चिह्न। फसल, भोजन आ जाति-समुदाय नाम खण्ड संक्षिप्त विवरण धान · मखान · मड़ुआ · कुसियार · चूड़ा · दही ०·१·२ गामक फसल आ लोक-भोजन। पासवान · मुसहर · चर्मकार · अंसारी · महतो · मंडल · सदा · मल्लाह ०·१·२ गामक श्रमशील जाति-समुदाय; अधीनस्थ-स्वरक वाहक। दर्शन, शास्त्र आ आधुनिक परिघटना नाम खण्ड संक्षिप्त विवरण नव्य-न्याय · तत्त्वचिन्तामणि ०·१·२ मिथिलाक तर्क-परम्परा आ गंगेशक मूल-ग्रन्थ; अन्याय-परीक्षाक औजार। भामती · न्यायकुसुमाञ्जलि ० वाचस्पति आ उदयनक ग्रन्थ; खण्ड-० दार्शनिक-नाट्यक आधार। प्रमाण-चतुष्टय + अनुपलब्धि ०·१·२ प्रत्यक्ष·अनुमान·उपमान·शब्द आ अनुपलब्धि — गवाहीक कोटि। डिजिटल-अरेस्ट · म्यूल-खाता · आवाज-नकल · निगरानी-पूँजीवाद १·२ नकली-गिरफ्तारी-ठगी, किराया-खाता, चोरायल-कण्ठ आ पहिचान-चोरीक आधुनिक गोहि। ❖ गोहि सभक बीच जलसमाधि — सम्पूर्ण त्रयीक आलोचना · विदेह समानान्तर साहित्य आन्दोलन अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१८. गजेन्द्र ठाकुर- मैथिलीक एकटा समानान्तर व्याकरण, रचना आ भाषा-विज्ञान (ठेठी-अंगिका आ बज्जिकाकेँ संग लऽ कऽ)- गजेन्द्र ठाकुर] एकीकृत विस्तृत समालोचनात्मक शोध-समीक्षा मैथिलीक एकटा समानान्तर व्याकरण, रचना आ भाषा-विज्ञान ठेठी-अंगिका आ बज्जिकाकेँ संग लऽ कऽ एकीकृत विस्तृत समालोचनात्मक शोध-समीक्षा व्याकरण · रचना · भाषा-विज्ञान · भारतीय · पाश्चात्य · इस्रायली · चीनी · तिब्बती · जापानी · विदेह समानान्तर दृष्टि मूल ग्रन्थ: गजेन्द्र ठाकुर · सम्पादक: विदेह · ISSN 2229-547X सम्पूर्ण खण्ड १–४, अध्याय १–९२६, परिशिष्ट, प्रमाण-तन्त्र आ सन्दर्भ-सूचीक समेकित समीक्षा समीक्षा-पद्धति आ सीमांकन ई समीक्षा मूल पोथीक सम्पूर्ण संरचनाकेँ आधार बनबैत अछि। पोथी चारि मुख्य खण्डमे विभक्त अछि: ठेठी-अंगिका व्याकरण आ रचना; बज्जिका व्याकरण आ रचना; मैथिली व्याकरण आ रचना; आ ठेठी-अंगिका, बज्जिका तथा मैथिलीक भाषा-विज्ञान। तेसर खण्ड अध्याय २१–६९३ धरि आ चतुर्थ खण्ड अध्याय ६९४–९२६ धरि विस्तारित अछि। अन्तमे समेकित सन्दर्भ-सूची सेहो अछि। समीक्षा एहि सभ स्तरकेँ अलग-अलग जाँचैत, फेर समेकित निष्कर्ष दैत अछि। मूल पोथीक कथन, उदाहरण, अध्याय-विन्यास आ पद्धतिक चर्चा जखन कएल गेल अछि, तखन ओकरा मूल ग्रन्थक अन्तर्गत मानल गेल अछि। भारतीय, पाश्चात्य, इस्रायली, चीनी, तिब्बती आ जापानी सिद्धान्त बाह्य तुलनात्मक कसौटी रूपेँ प्रयुक्त भेल अछि; ई सिद्धान्त मूल पोथीमे अनिवार्य रूपेँ प्रतिपादित अछि, एहन दावा नहि कएल गेल अछि। “विदेह समानान्तर समीक्षा” नाम एहि पोथीक अपन समानान्तर पद्धति—एक्के प्रश्न तीनू भाषा, तुलनीय आँकड़ा, स्रोत-समर्थित कथन, क्षेत्रकार्य, कॉर्पस, पुनरुत्पाद्यता आ सम्पादकीय सत्यनिष्ठा—केँ एक समेकित आलोचनात्मक रूप देबाक लेल प्रयुक्त अछि; एकरा बाह्य स्थापित सम्प्रदायक नाम नहि मानल जाए। व्याकरणक मूल्यांकनमे वर्णनात्मकता, रूप-संरचना, वाक्य-संरचना, अर्थ, प्रयोग, मानकीकरण आ भाषिक विविधता मुख्य कसौटी अछि। रचनाक मूल्यांकनमे विषय-विन्यास, पाठक, शैली, रस, ध्वनि, वक्रोक्ति, औचित्य, तर्क, प्रवचन, विधा आ सम्पादन मुख्य कसौटी अछि। भाषा-विज्ञानक मूल्यांकनमे प्रमाण, पुनरुत्पाद्यता, क्षेत्रकार्य, ध्वनिक मापन, कॉर्पस, समाजभाषिकता, ऐतिहासिक तुलना, प्रकारिकी आ डिजिटल संरक्षण मुख्य कसौटी अछि। समग्र निर्णय ई पोथी केवल “व्याकरण” नहि, बल्कि भाषा-शिक्षण, रचना-कौशल, सम्पादन, भाषिक अनुसंधान, कॉर्पस, क्षेत्रकार्य, डिजिटल प्रकाशन आ तीन निकटवर्ती भाषिक परम्पराक समानान्तर अध्ययनकेँ एक ठाम आनबाक महत्त्वाकांक्षी प्रयास अछि। एहि कारण एकर वास्तविक शक्ति “व्यापकता” मात्र नहि, “स्तर-सम्बन्ध” अछि: शब्दसँ वाक्य, वाक्यसँ प्रवचन, प्रवचनसँ समाज, समाजसँ इतिहास, आ इतिहाससँ डिजिटल दस्तावेजीकरण धरि एक निरन्तर अध्ययन-पथ बनैत अछि। एकर दोसर विशिष्टता ई अछि जे ठेठी-अंगिका आ बज्जिकाकेँ केवल मैथिलीक परिशिष्ट जकाँ नहि, बल्कि अपन व्याकरण, रचना, मानक-क्षेत्रीय रूप, अभ्यास, शब्दावली आ भाषावैज्ञानिक इकाईसहित प्रस्तुत कएल गेल अछि। भाषिक प्रतिष्ठाक दृष्टिसँ ई संरचना महत्त्वपूर्ण अछि। मुदा विद्वत्तापूर्ण संस्करणमे भाषा-स्थिति, वंश-वर्गीकरण, क्षेत्रीय सीमा, मानक रूप, ध्वनि-सूची आ ऐतिहासिक दावासभक संग स्रोत-स्तर, वक्ता-संख्या, स्थान, तिथि आ प्रमाण-प्रकारक स्पष्ट संकेत आर बेसी आवश्यक होयत। तेसर शक्ति रचना-भागक असाधारण विस्तार अछि। निबन्ध, कथा, संवाद, पत्र, समाचार, सार, अनुवाद, तर्क, समीक्षा, भाषण, सम्पादकीय, शैक्षिक लेखन, शैली, अर्थ, उच्चारण, सम्पादन, प्रूफ-पठन, पृष्ठ-सज्जा आ प्रकाशन-जाँच धरि रचनाकेँ व्यवहारिक कौशलक रूपमे देखाओल गेल अछि। एहि ठाम पोथी पारम्परिक स्कूल-व्याकरणसँ बहुत आगाँ जाइत अछि। मुख्य सम्पादकीय चुनौती पुनरावृत्ति आ स्तर-ओवरलैप अछि। ठेठी-अंगिका खण्डमे अध्याय १–२०क बाद फेर विस्तृत व्यवहारिक सन्दर्भ-पोथीक रूप; बज्जिकामे चौदह भाग आ परिशिष्टक बाद फेर पाँच-भागीय विस्तृत व्यवहारिक रूप; मैथिलीमे अध्याय २१–४३क आधारक बाद ४४–६९३क विशाल विस्तार; आ भाषा-विज्ञानमे तीनू भाषाक समान विषयक पृथक श्रृंखला, फेर समेकित श्रृंखला, फेर समानान्तर शोध-कार्यपुस्तिका—ई सभ सामग्री उपयोगी अछि, मुदा अगिला संस्करणमे “कहाँ पहिल परिचय, कहाँ पुनरावृत्ति, कहाँ उन्नत विस्तार” स्पष्ट क्रॉस-सन्दर्भसँ देखाओल जाए तँ पाठकीय भार घटत। विस्तृत प्रवेश आ सात समीक्षा-दृष्टिक पूरक रूपरेखा प्रवेश: ग्रन्थ आ समीक्षाक प्रयोजन समीक्षाधीन ग्रन्थ कोनो साधारण व्याकरण-पोथी नहि थिक। ई एकटा चारि-खण्डीय, प्रायः एक लाख शब्दक विशाल सङ्कलन थिक, जे तीनटा निकट-सम्बद्ध मागधी-वर्गीय भाषा — ठेठी-अंगिका, बज्जिका आ मैथिली — केँ एके छत्रक तर आनि, हुनक व्याकरण, रचना-कला आ भाषा-विज्ञानकेँ समानान्तर (parallel) दृष्टिसँ प्रस्तुत करैत अछि। खण्ड एक ठेठी-अंगिकाक व्याकरण आ रचना (अध्याय १–२०) डॉ. अमरेन्द्र आ डॉ. आभा पूर्वेक मानक व्याकरणक आधारपर देत अछि; खण्ड दुइ बज्जिकाक व्याकरण, शब्दकोश आ मुहावरा-कहावत-कोश समेटैत अछि; खण्ड तीन मैथिलीक विस्तृत व्याकरण आ रचना (अध्याय २१–६९३) प्रस्तुत करैत अछि; आ खण्ड चारि (अध्याय ६९४–९२६) तीनू भाषाक भाषा-विज्ञान — ध्वनितत्त्वसँ लऽ कऽ प्रकारिकी, समाजभाषा-विज्ञान, मनोभाषा-विज्ञान आ संगणकीय भाषा-विज्ञान धरि — केँ एक समानान्तर शोध-ढाँचामे बान्हैत अछि। अन्तमे एकटा समेकित सन्दर्भ-सूची अछि। एहन ग्रन्थक समीक्षा साधारण गुण-दोष-गणनासँ नहि भऽ सकैत। जे पोथी अपन प्रयोजनमे बहु-परम्परीय (multi-traditional) थिक, तकर मूल्यांकनो बहु-परम्परीय कसौटीपर हेबाक चाही। तेँ एहि समीक्षामे हम सात समीक्षा-दृष्टि — भारतीय, पाश्चात्य, इस्रायली, चीनी, तिब्बती, जापानी आ विदेह समानान्तर — केँ आधार बनौने छी। पहिने हम प्रत्येक खण्डक वर्णनात्मक-मूल्यांकनात्मक विवेचन देब (जाहिसँ कोनो अंश छूटय नहि), तकर बाद सातू सैद्धान्तिक दृष्टिसँ ग्रन्थकेँ जाँचब, आ अन्तमे समग्र गुण-दोष आ भविष्यक दिशाक चर्चा करब। समीक्षाक स्वर एतय समादरपूर्ण मुदा निरपेक्ष रहत। जतय ग्रन्थ अपन घोषित लक्ष्य पूर करैत अछि, ओतय स्पष्ट कहब; जतय संरचना, पुनरावृत्ति वा प्रमाण-सन्तुलनमे विचारणीय बिन्दु अछि, ओहो निर्भीकतासँ राखब। नीक समीक्षाक धर्म प्रशंसा नहि, प्रमाण-सम्मत विवेक थिक। समीक्षाक पद्धति: सात दृष्टिक संक्षिप्त परिचय आगाँ जाहि सात दृष्टिसँ ग्रन्थक परीक्षा हएत, तकर संक्षिप्त परिचय एतय राखल जाइत अछि, जाहिसँ पाठककेँ आगाँक विवेचनक ढाँचा पहिनहिसँ स्पष्ट रहय। समीक्षा-दृष्टि मुख्य कसौटी जे एहि दृष्टिसँ लागू होइत अछि भारतीय पाणिनीय सूत्र-मितव्ययिता, प्रातिशाख्य-शिक्षाक ध्वनि-सूक्ष्मता, भर्तृहरिक स्फोट आ वाक्य-अखण्डता, मीमांसाक शब्द-प्रामाण्य, नव्य-न्यायक परिभाषा-कठोरता, आ रस-ध्वनि-वक्रोक्तिक रचना-दृष्टि। पाश्चात्य सस्यूरक ल्याङ्ग/पारोल आ समकालिक/ऐतिहासिक भेद, ब्लूमफील्डीय वर्णनवाद, चोम्स्कीय संरचना, ग्रीनबर्गक प्रकारिकी-सार्वभौम, हैलिडेक प्रकार्यवाद, कॉर्पस आ विरोधात्मक विश्लेषण, शिक्षण-व्याकरणक सिद्धान्त। इस्रायली ज़ुकरमानक पुनरुज्जीवन-भाषाविज्ञान आ संकर-भाषा-सिद्धान्त, हिब्रू-भाषा-अकादमीक मानकीकरण-प्रतिमान, मृत/संकटग्रस्त भाषाक पुनःप्राणन। चीनी श्याओश्वे (小學) आ 'स्वोवन च्येची'क कोश-परम्परा, 'माशी वेन्थोङ्ग'क प्रथम-व्याकरण-प्रतिमान, गणक (classifier/量詞) आ विषय-प्रधानताक विश्लेषण। तिब्बती थोन्मि सम्भोटक 'सुम्चुपा' आ लिपि-संहिताकरण, 'झेसा' (ཞེ་ས) आदर-रजिस्टर, कर्तृ-कारक (ergative) चिह्नन, बौद्ध अनुवाद-मानकीकरण। जापानी कोकुगोगाकु (国語学), तोकिएदाक 'भाषा-प्रक्रिया-सिद्धान्त', केइगो (敬語) आदर-तन्त्र, वागो/कांगो/गाइराइगो शब्द-स्तरीकरण, विषय-टिप्पणी संरचना। विदेह समानान्तर प्रति-कानन (counter-canon), जनतांत्रिक भाषा-अधिकार, अवदमित/लोक/स्त्री/दलित-स्वरक पुनर्प्राप्ति, समानान्तर-इतिहास ढाँचा, संस्थागत आधिकारिकताक विकेन्द्रीकरण। ग्रन्थक संरचना, प्रयोगात्मक दृष्टि आ प्रारम्भिक मूल्यांकन प्रस्तुत शोध-समीक्षा 'मैथिली समानान्तर व्याकरण, रचना आ भाषा-विज्ञान' पोथीक अत्यन्त गहन, सर्वांगीण आ विस्तृत विश्लेषण अछि। ई ग्रन्थ कोनो सामान्य व्याकरणिक नियमावली मात्र नहि अछि, अपितु ई मैथिली, ठेठी-अंगिका आ बज्जिकाक समाजभाषिक, प्रकारिक (Typological) आ ऐतिहासिक विकासक एकटा सम्पूर्ण, प्रामाणिक आ क्रान्तिकारी दस्तावेज थिक। एहि समीक्षा-प्रतिवेदनमे पोथीक संरचनात्मक विश्लेषणक संगे-संग भारतीय, पाश्चात्य, इस्रायली, चीनी, तिब्बती, जापानी आ विदेह समानान्तर समीक्षाक विश्वजनीन सिद्धान्तसभक आलोकमे भाषा-विज्ञानक गुढ़ तत्त्वसभक परीक्षण कएल गेल अछि। ई प्रतिवेदन एकटा विशेषज्ञक दृष्टिसँ लिखल गेल अछि, जाहिमे पोथीक कोनो खण्डकेँ छोड़ल नहि गेल अछि आ प्रत्येक भाषिक सम्भावनापर सूक्ष्म विचार कएल गेल अछि। पोथीक मुख्य विषय, संरचना आ प्रयोगात्मक दृष्टि ई ग्रन्थ परम्परागत व्याकरणक नियम-रटन्त विधिकेँ पूर्णतः खण्डित करैत 'कार्यगत वितरण' (Functional Distribution) आ 'प्रयोगशाला' (Lab) आधारित अध्ययनपर बल दैत अछि। ई पोथी मैथिली, ठेठी-अंगिका आ बज्जिकाक व्याकरण आ रचनाक समानान्तर अध्ययन प्रस्तुत करैत अछि आ मुख्य रूपसँ चारि खण्ड तथा अनेक विस्तृत अध्यायमे विभक्त अछि। खण्ड १ (ठेठी-अंगिका: व्याकरण आ रचना): एहि खण्डमे अध्याय १ सँ २० धरि भाषा, ध्वनि, शब्द-रूप, वाक्य-विचार आ रचना-कलाक सविस्तार विवेचन अछि। एहिमे भाषाक व्यावहारिक प्रयोगपर जोर देल गेल अछि आ क्षेत्रीय रूपसभकेँ मानक रूपक संगे-संग सुरक्षित राखल गेल अछि। खण्ड २ (बज्जिका: व्याकरण आ रचना): परिशिष्ट-आधारित संरचनापर बज्जिका व्याकरणक नियम आ प्रयोगक विश्लेषण कएल गेल अछि। खण्ड ३ (मैथिली: व्याकरण आ रचना): अध्याय २१ सँ ६९३ धरि मैथिलीक मानक व्याकरण, रूपविज्ञान (Morphology), स्वनिम-विज्ञान (Phonology) आ वाक्यविज्ञान (Syntax) क सांगोपांग अध्ययन अछि। खण्ड ४ (भाषा-विज्ञान: ठेठी-अंगिका, बज्जिका, मैथिली): अध्याय ६९४ सँ ९२६ धरि भाषा-विज्ञानक आधुनिक शाखासभ—प्रकारिकी (Typology), मनोभाषाविज्ञान (Psycholinguistics), सहभाषामिति (Dialectometry), ऐतिहासिक भाषा-विज्ञान (Historical Linguistics) आ समाजभाषाविज्ञान (Sociolinguistics) क प्रयोगात्मक रूपरेखा देल गेल अछि। एहि पोथीक सबसँ विशिष्ट पक्ष ई अछि जे प्रत्येक सिद्धान्तक संगे 'स्रोत-पुष्ट उदाहरण-बैंक' (Source-backed Example Bank) आ प्रयोगशाला-अभ्यास देल गेल अछि। अध्याय ८८८ सँ ९०८ धरि भाषा-भावना (Language Attitude), मानकीकरण (Standardization), ध्वनि-परिवर्तन (Sound Change), व्याकरणीकरण (Grammaticalization) आ द्विभाषिक शब्द-पहिचान (Bilingual Word Recognition) जकाँ अत्यन्त उन्नत विषयसभक समावेश ई प्रमाणित करैत अछि जे ई पोथी अन्तरराष्ट्रीय शोध-मापदण्डपर आधारित अछि। भाग १ — सिद्धान्तक सात कसौटी १. भारतीय दृष्टि: पाणिनि सँ काव्यशास्त्र धरि भारतीय व्याकरण-परम्पराक पहिल कसौटी “रूपक सूक्ष्मता” अछि। पाणिनीय परम्परा ध्वनि, धातु, प्रत्यय, रूपान्तरण आ नियमक परस्पर सम्बन्धकेँ अत्यन्त सङ्गठित ढंगसँ देखैत अछि। एहि दृष्टिसँ पोथीक शब्द-निर्माण, उपसर्ग-प्रत्यय, कृदन्त, समास, कारक, क्रिया-रूप आ रूप-ध्वनि-विज्ञानक अध्यायसभ उपयुक्त दिशा लैत अछि। मुदा पाणिनीय कसौटी केवल संस्कृत-श्रेणी आरोपित करब नहि; मूल प्रश्न ई होयत जे मैथिली, ठेठी-अंगिका आ बज्जिकाक वास्तविक रूप-व्यवहारकेँ न्यूनतम, स्पष्ट आ परीक्षणीय नियममे कोना व्यक्त कएल जाए। पोथीक उन्नत भाग जखन डेटा, अपवाद, क्षेत्रीय रूप आ विरोधी उदाहरण खोजबाक आग्रह करैत अछि, तखन ई आधुनिक अर्थमे पाणिनीय सूक्ष्मताक नगीच पहुँचैत अछि। पतञ्जलिक भाष्य-परम्परा नियमक प्रयोग, प्रचलित रूप आ शिष्ट प्रयोगक बीच संवाद करैत अछि। एहि कसौटीसँ पोथीक “मानक बनाम क्षेत्रीय रूप” नीति उपयोगी मुदा सावधानी-आधारित हेबाक चाही। कोनो रूपकेँ केवल “अशुद्ध” कहबाक बदला ओकर सामाजिक क्षेत्र, शैली, वक्ता-समूह आ लिखित/मौखिक संदर्भ देल जाए। ई दिशा पोथीक समाजभाषावैज्ञानिक भागमे उपस्थित अछि; प्रारम्भिक व्याकरण अध्यायमे सेहो ओही संवेदनशीलता निरन्तर रहबाक चाही। भर्तृहरिक वाक्य-दृष्टि अर्थकेँ केवल अलग-अलग शब्दक जोड़ नहि मानैत। पोथीक वाक्य, आकाङ्क्षा, योग्यता, आसक्ति, पदक्रम, उपवाक्य, सूचना-संरचना, संदर्भ आ प्रवचनक विस्तार एहि व्यापक वाक्यार्थ-दृष्टिसँ सशक्त रूपेँ पढ़ल जा सकैत अछि। खास कऽ अध्याय १६१ सँ आगाँ वाक्य-प्रकार, २०४ सँ आगाँ उपवाक्य, ४३६ सँ आगाँ अर्थ, आ ८७८ सँ आगाँ अर्थ-प्रयोग-प्रवचन—ई सभ एक “शब्दसँ वाक्यार्थ” यात्रा बनबैत अछि। रचना-भागपर भारतीय काव्यशास्त्रक चारि कसौटी विशेष उपयोगी अछि: रस—रचनाक अनुभूति-परिणाम; ध्वनि—प्रत्यक्ष अर्थसँ परे निहित अर्थ; वक्रोक्ति—अभिव्यक्तिक विशिष्ट मोड़; औचित्य—विषय, पात्र, प्रसंग, भाषा आ शैलीक अनुरूपता। पोथी छन्द-अलंकारकेँ पृथक पढ़बैत अछि, मुदा उन्नत रचना-अध्यायमे रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्यकेँ कथा, संवाद, निबन्ध, समीक्षा, भाषण आ सम्पादकीयक वास्तविक उदाहरणसँ जोड़ल जाए तँ साहित्यिक सिद्धान्त व्यावहारिक लेखनक अंग बनि सकैत अछि। २. पाश्चात्य दृष्टि: संरचना, प्रकार्य, प्रयोग आ प्रमाण पाश्चात्य आधुनिक भाषा-विज्ञानक पहिल महत्त्वपूर्ण कसौटी वर्णनात्मकता अछि। सॉस्यूरक संरचनात्मक दृष्टि भाषिक इकाईक मूल्य ओकर पारस्परिक सम्बन्धमे देखैत अछि; ब्लूमफील्डीय परम्परा वितरण आ रूपक ठोस वर्णनपर बल दैत अछि; चॉम्स्कीय परम्परा वाक्यक आन्तरिक संरचना, निर्भरता आ उत्पादक नियमकेँ प्रश्न बनबैत अछि; हॉलिडे प्रकार्य, पाठ आ सामाजिक अर्थपर बल दैत छथि। पोथीमे ई चारू प्रकारक प्रश्न अलग-अलग स्तरपर उपस्थित अछि—शब्द-वर्ग आ रूपविज्ञान; पदक्रम आ उपवाक्य; सूचना-संरचना; रजिस्टर, पाठक आ प्रयोजन। लाबोवक समाजभाषावैज्ञानिक दृष्टि एहि ग्रन्थ लेल खास प्रासंगिक अछि, कारण ठेठी-अंगिका आ बज्जिका दुनूमे क्षेत्रीय रूप, मानकीकरण, वक्ता-पहचान आ रूप-भिन्नता महत्त्वपूर्ण अछि। “भिन्नता स्वयं डेटा अछि” जकाँ उन्नत अध्यायक भावना एहि परम्परासँ मेल खाइत अछि। अगिला संस्करणमे रूप-भिन्नताक संग वक्ताक आयु, स्थान, शिक्षा, शैली, माध्यम आ प्रसंगक सूचक देल जाए तँ सामाजिक व्याख्या अधिक मजबूत होयत। ऑस्टिन आ ग्राइसक प्रयोगविज्ञान वाक्यक शाब्दिक अर्थ आ सामाजिक क्रिया बीच भेद देखबैत अछि। आदेश, विनती, आदर, प्रश्न, संकेत, निपात, संबोधन, श्रोता-सम्बन्ध आ अप्रत्यक्ष कथनक चर्चा एहि दृष्टिसँ विशेष समृद्ध बनि सकैत अछि। ठेठी-अंगिकाक श्रोता-सम्बद्ध क्रिया-रूप आ मैथिलीक आदर-स्तर एहन विषय अछि जतय केवल काल-पुरुष तालिका पर्याप्त नहि; सामाजिक क्रिया आ सहभागिता देखब आवश्यक अछि। ग्रीनबर्गीय प्रकारिकी आ आधुनिक क्रॉस-लिंग्विस्टिक तुलना पोथीक समानान्तर भागक स्वाभाविक विस्तार अछि। मुदा प्रकारिकीमे “एक भाषा = एक स्थिर प्रकार” मानब उचित नहि। शब्दक्रम, कारक-चिह्न, सहायक क्रिया, वर्गक, बहुवचन आ आदर जकाँ विशेषतासभक अलग-अलग मान हो सकैत अछि। पोथीक अध्याय ८१४–८२६ एहि सूक्ष्म समानान्तर पद्धतिक दिशामे सबसँ मजबूत खण्ड अछि। ३. इस्रायली दृष्टि: बहुप्रणाली, मानदण्ड आ स्थानान्तरण इस्रायली साहित्य-अध्ययनक सन्दर्भमे एतय मुख्यतः तेल-अवीव-सम्बद्ध इवेन-जोहारक बहुप्रणाली सिद्धान्त आ गिडियन टूरीक वर्णनात्मक अनुवाद-अध्ययन उपयोगी अछि। बहुप्रणाली दृष्टि साहित्य आ भाषा-रूपकेँ एकल, अलग इकाई नहि मानि, परस्पर प्रतिस्पर्धी आ सहयोगी प्रणालीक जालमे देखैत अछि। मैथिली, ठेठी-अंगिका, बज्जिका, हिन्दी, संस्कृत, उर्दू आ अंग्रेजीक पारस्परिक सम्पर्कक चर्चा लेल ई दृष्टि उपयोगी अछि—विशेषतः शब्द-आगत, मानकीकरण, तकनीकी शब्दावली, अनुवाद आ शैली-परिवर्तनमे। टूरीक “मानदण्ड” दृष्टि ई प्रश्न उठबैत अछि जे वास्तविक समुदायमे कोन रूप स्वीकार्य, प्रतिष्ठित, औपचारिक, अनौपचारिक वा क्षेत्रीय मानल जाइत अछि। पोथी जखन एक मुख्य लिखित रूप चुनैत आ अन्य रूपकेँ क्षेत्रीय रूप कहैत अछि, तखन ई केवल व्याकरणिक निर्णय नहि रहैत; ई सामाजिक मानदण्डक निर्णय सेहो बनैत अछि। तेँ प्रत्येक मानकीकरणक संग प्रमाण चाही: प्रकाशित प्रयोग, वक्ता-साक्षात्कार, क्षेत्रीय वितरण, शिक्षण-परम्परा वा संस्थागत व्यवहार। अनुवाद आ संरचनात्मक अन्तरणपर पोथीक बादक अध्यायसभमे इस्रायली वर्णनात्मक दृष्टि खास उपयोगी अछि। लक्ष्य-भाषाक स्वाभाविकता, विधागत परम्परा, पाठकीय अपेक्षा आ स्थानीय शैलीक मानदण्डकेँ स्रोत-भाषाक संरचनासँ अलग राखब आवश्यक अछि। एहि अर्थमे अंग्रेजीसँ तुलना उपयोगी अछि, मुदा अंग्रेजी संरचनाकेँ अन्तिम मापदण्ड बनाओनाइ उचित नहि। ४. चीनी दृष्टि: व्यवस्थित व्याकरण, बोलचाल आ रचनात्मक विन्यास चीनी परम्परासँ तीन भिन्न कसौटी उपयोगी अछि। पहिल, मा जियानझोंगक “माशी वेनतोंग” जकाँ आरम्भिक आधुनिक व्याकरण-प्रयास ई देखबैत अछि जे परम्परागत भाषिक सामग्रीकेँ नव विश्लेषण-पद्धतिसँ व्यवस्थित करब सम्भव अछि, मुदा बाहरी श्रेणीकेँ जस-के-तस आरोपित करब जोखिमपूर्ण अछि। एहि कसौटीसँ पोथीक अंग्रेजी समानान्तर तुलना उपयोगी तखन अछि जखन ओ मैथिली/ठेठी-अंगिका/बज्जिकाक अपन संरचनाकेँ स्पष्ट करए, नहि कि ओकरा अंग्रेजी ढाँचामे फिट करए। दोसर, युएन रेन चाओक बोलल चीनीक विस्तृत वर्णन जकाँ परम्परा जीवित बोलचाल, स्वर, वाक्य-रूप, कण, संदर्भ आ प्रयोगकेँ केन्द्रीय बनबैत अछि। पोथीक क्षेत्रकार्य, प्राकृतिक पाठ, रिकॉर्डिंग, प्रश्नोत्तर, लोककथा, डिजिटल संदेश आ कॉर्पसक आग्रह एहि दृष्टिसँ अत्यन्त अनुकूल अछि। प्रारम्भिक व्याकरण अध्यायमे सेहो लिखित रूपक संग बोलल नमूना, ध्वनि-रिकॉर्डिंग आ वक्ता-सूचना जोड़ल जाए तँ पुस्तकक वैज्ञानिक मूल्य बढ़त। तेसर, लिउ शिएक “वेनशिन दियाओलोंग” परम्परा रचनामे भाव, विन्यास, विधा, शब्द-शक्ति, अलंकरण आ सम्पूर्ण कृतिक अनुरूपताकेँ परस्पर जोड़ि देखैत अछि। एहि दृष्टिसँ पोथीक रचना-भागक सबसँ पैघ गुण ई अछि जे ओ केवल “निबन्ध लिखू” नहि कहैत, बल्कि विषय सीमित करब, मुख्य प्रतिपाद्य, अनुच्छेद-संगति, तर्क, प्रमाण, सम्पादन, शैली आ पाठककेँ जोड़ैत अछि। साहित्यिक रचनामे एहि ढाँचाक संग संवेदना, लय, छवि आ ध्वन्यार्थक अधिक व्यवस्थित अभ्यास जोड़ल जा सकैत अछि। ५. तिब्बती दृष्टि: सम्बन्धसूचक व्याकरण आ ज्ञान-संचरण तिब्बती व्याकरण-परम्परा संस्कृत व्याकरणक ग्रहण आ स्वदेशी विश्लेषण दुनूक संवादसँ विकसित भेल। “सुम-चु-पा” आ “र्तग्स-क्यि-जुग-पा” जकाँ परम्परागत ग्रन्थक चर्चा प्रायः कण, कारक-सदृश सम्बन्ध, वाक्यगत भूमिका आ सही प्रयोगक प्रश्नसँ जुड़ैत अछि। एहि दृष्टिसँ पोथीक परसर्ग, निपात, कारक, संबोधन, आदर, वाक्य-संबन्ध आ अनुबन्धक रूपसभक विश्लेषण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि। तिब्बती उदाहरण एकटा आर महत्त्वपूर्ण आलोचनात्मक शिक्षा दैत अछि: बाहरी उच्च प्रतिष्ठाक व्याकरणिक परम्परा ग्रहण करैत समय स्थानीय भाषाक संरचना बदलि नहि देल जाए। पोथी संस्कृत-उत्पन्न पदावली—संज्ञा, सर्वनाम, कारक, समास, कृदन्त, अलंकार—क उपयोग करैत अछि; ई शिक्षण लेल सहज अछि, मुदा आधुनिक विश्लेषणमे एतबा स्पष्ट करब चाही जे कोन श्रेणी पारम्परिक शिक्षण-श्रेणी अछि आ कोन श्रेणी प्रत्यक्ष भाषिक व्यवहारसँ सिद्ध होइत अछि। ज्ञान-संचरणक दृष्टिसँ तीनू भाषामे समान तकनीकी शब्दावली, अन्तररेखीय व्याख्या, लिप्यन्तरण आ द्विभाषिक शब्दावलीक प्रयास प्रशंसनीय अछि। ई केवल शब्द-सूची नहि, बल्कि एक भाषिक ज्ञान-परम्पराकेँ दोसर पीढ़ी, शोधकर्ता आ डिजिटल माध्यम धरि पहुँचाबयक साधन बनि सकैत अछि। ६. जापानी दृष्टि: कण, सम्बन्ध, प्रक्रिया आ पाठ-व्यवहार जापानी व्याकरण-अध्ययनमे “तेनिओहा” परम्परा कण आ वाक्यगत सम्बन्धकेँ कविता आ गद्य दुनूमे महत्त्व दैत रहल। मोतोओरी नोरिनागाक कण-सम्बन्धक विश्लेषण आ “ककारी-मुसुबी” जकाँ सम्बन्धसूचक विचार ई देखबैत अछि जे छोट कण सेहो वाक्यक सूचना, बल आ सम्बन्ध बदलि सकैत अछि। मैथिली, ठेठी-अंगिका आ बज्जिकाक निपात, परसर्ग, प्रश्नकण, बलसूचक रूप आ संबोधनपर एहि दृष्टिसँ अधिक सूक्ष्म अध्ययन सम्भव अछि। तोकिएदा मोतोकीक भाषा-प्रक्रिया दृष्टि भाषाकेँ केवल तैयार वस्तु नहि, वक्ता-सुननिहार बीच घटित अभिव्यक्ति-प्रक्रिया मानबाक दिशामे पढ़ल जाइत अछि। ठेठी-अंगिकाक श्रोता-सम्बद्ध क्रिया, मैथिलीक आदर-स्तर, बज्जिकाक संबोधन-भेद, संवाद-लेखन आ प्रवचन-अध्याय एहि दृष्टिसँ खास महत्त्वपूर्ण अछि। भाषा “के कहलक?” मात्र नहि; “केकरा, कोन सम्बन्धमे, कोन प्रसंगमे, कोन रूपसँ कहलक?”—ई चारू प्रश्न व्याकरणक हिस्सा बनैत अछि। जापानी परम्परासँ रचना लेल सेहो एक शिक्षा अछि: सूक्ष्म कण, विराम, क्रम आ अप्रत्यक्षता पाठकक अनुभव बदलैत अछि। पोथीक शैली, लय, वाक्य-लम्बाइ, सूचना-संरचना, विराम-चिह्न आ सम्पादन अध्याय एहि संवेदनशीलताकेँ व्यवस्थित अभ्यासमे बदलि सकैत अछि। ७. विदेह समानान्तर दृष्टि: एहि पोथीक अपन आलोचनात्मक पद्धति एहि पोथीक सर्वाधिक मौलिक सम्भावना “समानान्तर” शब्दमे अछि। समानान्तर अध्ययनक अर्थ तीनू भाषाकेँ एक-दोसरक विकृत रूप वा सीढ़ी नहि मानि, समान प्रश्नक उत्तर देनिहार स्वतंत्र भाषिक प्रणाली मानब। अध्याय ८१४क पद्धतिमे तुलनीयता, स्रोत-समर्थित कथन, न्यूनतम समानान्तर नमूना आ शोध-नैतिकता; अध्याय ८२५मे एक्के प्रश्न तीनू भाषा, अर्थ-उद्बोधन, स्वाभाविकता-निर्णय आ अनुवादक प्रभावक नियंत्रण—ई सभ एहि दृष्टिक आधार बनैत अछि। विदेह समानान्तर समीक्षा लेल दस कसौटी प्रस्तावित कएल जा सकैत अछि: (१) तीनू भाषाक समान प्रतिष्ठा; (२) एक्के शोध-प्रश्न; (३) तुलनीय मुदा स्थानीय रूपसँ स्वाभाविक डेटा; (४) प्रत्येक उदाहरणक स्रोत; (५) वक्ता, ठाम, समय आ विधाक मेटाडेटा; (६) मानक आ क्षेत्रीय रूपक पृथक चिह्नीकरण; (७) असहमति वा अनिश्चितताक स्पष्ट स्तर; (८) कॉर्पस/रिकॉर्डिंग/क्षेत्रकार्यसँ पुनः जाँच; (९) अनुवादक वा शोधकर्ता प्रभावक नियंत्रण; (१०) सम्पादनमे तथ्य आ लेखक-अभिप्रायक संरक्षण। एहि कसौटीसँ देखल जाए तँ पोथीक आरम्भिक भाग शिक्षणक रूपमे मजबूत अछि, मुदा उन्नत भागमे जतेक कठोर प्रमाण-पद्धति विकसित भेल अछि, ओही पद्धतिक प्रकाश आरम्भिक व्याकरण-तालिका आ भाषिक दावापर सेहो फेर सँ पड़बाक चाही। अगिला संस्करणक सबसँ महत्त्वपूर्ण सम्पादकीय काज ई “पश्च-प्रमाणीकरण” होयत। सात परम्पराक विस्तृत सैद्धान्तिक पूरक समीक्षा सैद्धान्तिक समीक्षा: सात परम्पराक आलोकमे आब ग्रन्थकेँ ओहि सात दृष्टिसँ जाँचल जाइत अछि जकर प्रस्ताव आरम्भमे कएल गेल छल। प्रत्येक उपभागमे पहिने ओहि परम्पराक मूल सिद्धान्त संक्षेपमे कहल गेल अछि, तकर बाद ग्रन्थक विशिष्ट विशेषतासँ तकर संवाद — जतय ग्रन्थ ओहि परम्पराक कसौटीपर खरा उतरैत अछि, आ जतय ओकर आर सम्भावना छल। भारतीय समीक्षा-परम्परा भारतीय भाषा-चिन्तन विश्वक प्राचीनतम आ सूक्ष्मतम परम्परा थिक। एकर पाँच स्तम्भ एहि ग्रन्थक परीक्षामे प्रासङ्गिक अछि — पाणिनीय व्याकरण, प्रातिशाख्य-शिक्षाक ध्वनि-शास्त्र, भर्तृहरिक वाक्यपदीय (स्फोट आ वाक्य-अखण्डता), मीमांसाक शब्द-प्रामाण्य, आ नव्य-न्यायक परिभाषा-विवेक; एकर संग रस-ध्वनि-वक्रोक्तिक रचना-दृष्टि। पाणिनि-दृष्टि: पाणिनीय अष्टाध्यायीक आत्मा मितव्ययिता (लाघव) आ नियम-निष्ठा थिक — न्यूनतम सूत्रसँ अधिकतम रूप-सिद्धि। समीक्षाधीन ग्रन्थ एकर विपरीत ध्रुवपर ठाढ़ अछि — ई विस्तार (विस्तर) क ग्रन्थ थिक, लाघवक नहि। ई दोष नहि, अपितु प्रयोजन-भेद थिक: अष्टाध्यायी विदग्ध-व्याकरणीक लेल थिक, ई ग्रन्थ जन-शिक्षणक लेल। तथापि पाणिनीय दृष्टिसँ एकटा गुण स्पष्ट अछि — ग्रन्थ रूप-सिद्धिकेँ प्रत्यय-आधारपर देखैत अछि (जेना क्रियाक व्यक्ति-प्रत्यय-सार, संज्ञाक कारक-परसर्ग)। ई प्रकृति-प्रत्यय-विभाजनक पाणिनीय-दृष्टिक आधुनिक शिक्षण-रूपान्तर थिक। जतय अष्टाध्यायी 'अन्तरङ्ग-बहिरङ्ग' आ 'उत्सर्ग-अपवाद' क तर्कसँ रूप सिद्ध करैत अछि, ओतय ई ग्रन्थ सारणी आ उदाहरणसँ; दुनू लक्ष्य एके — नियमक व्यवस्थित प्रस्तुति। प्रातिशाख्य-शिक्षा-दृष्टि: भारतीय ध्वनि-शास्त्र (स्थान-प्रयत्न-करण, उदात्त-अनुदात्त-स्वरित, संहिता-सन्धि) विश्वक प्रथम वैज्ञानिक ध्वनि-विवेचन थिक। ग्रन्थक ध्वनि-अध्याय (उच्चारण-स्थान, महाप्राण–अल्पप्राण, नासिक्यता, अपिनिहिति–अभिश्रुति) एही परम्पराक उत्तराधिकारी थिक; मुदा एकर विशेषता ई जे ओ प्रातिशाख्यीय वर्गीकरणकेँ आधुनिक ध्वनि-विज्ञान (IPA, VOT, स्पेक्ट्रोग्राम, न्यूनतम-जोड़ी) सँ जोड़ि दैत अछि। 'अपिनिहिति' आ 'अभिश्रुति' जेहन मैथिली-विशिष्ट ध्वनि-प्रक्रियाक उल्लेख ई देखबैत अछि जे ग्रन्थ देसी ध्वनि-परम्पराकेँ छोड़ने नहि अछि। भर्तृहरि-दृष्टि: वाक्यपदीयक स्फोट-सिद्धान्त कहैत अछि जे अर्थक वास्तविक वाहक खण्डित वर्ण नहि, अपितु अखण्ड वाक्य-स्फोट थिक — अर्थ समग्रमे प्रकाशित होइत अछि। एहि दृष्टिसँ ग्रन्थक सभसँ सबल अंश ओ थिक जतय ओ खण्ड-विश्लेषणसँ आगाँ बढ़ि वाक्य-समग्रता आ प्रवचन (discourse) दिस जाइत अछि — जेना 'सूचना-संरचना' (information structure), 'बात के केंद्र', आ प्रवचन-सन्दर्भमे सर्वनाम-लोपक विवेचन। मैथिलीक बहु-आयामी क्रिया-सामञ्जस्य तँ स्वयं भर्तृहरिक 'वाक्य एकटा अखण्ड इकाई' सिद्धान्तक जीवन्त उदाहरण थिक — किएक तँ ओतय क्रिया-रूप एके पदक नहि, अपितु समग्र वाक्यक सामाजिक-सम्बन्ध-संरचनाक प्रकाशक थिक। मीमांसा आ नव्य-न्याय-दृष्टि: मीमांसा शब्दकेँ स्वतःप्रमाण मानैत, आप्त-वाक्य आ प्रत्यक्षकेँ प्रमाण-कोटिमे राखैत अछि। ग्रन्थक 'आधार-पाठ समर्थित / वर्णनात्मक प्रवृत्ति / परिकल्पना' — ई त्रिविध कोटि-विभाजन ठीक मीमांसा-न्यायक प्रमाण-विवेकक आधुनिक प्रतिरूप थिक: कोन कथन प्रत्यक्ष-आँकड़ा-सिद्ध, कोन आप्त-वचन (स्रोत-टिप्पणी) पर आधृत, आ कोन केवल अनुमान-कल्प (परिकल्पना)। नव्य-न्यायक परिभाषा-कठोरता (अव्याप्ति–अतिव्याप्ति–असम्भव दोषसँ मुक्त लक्षण) क कसौटीपर ग्रन्थक पारिभाषिक-शब्दकोश आ 'रूप/कार्य/अर्थ/प्रयोग/वितरण' क पञ्चस्तरीय विभाजन खरा उतरैत अछि — ई पञ्चस्तर 'समान शब्द देखिते समान कार्य मानब' क अतिव्याप्ति-दोषसँ पाठककेँ बचबैत अछि। ग्रन्थकारक नव्य-न्याय-प्रवीणता (गङ्गेश-परम्परा) एतय अप्रत्यक्ष रूपेँ फलदायी अछि। रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-दृष्टि: ई काव्य-समीक्षाक उपकरण थिक, तेँ व्याकरण-ग्रन्थपर सीधे लागू नहि; मुदा ग्रन्थक रचना-कला-खण्ड (काव्य-भाषा, छन्द, अलंकार, आ 'असरदार वाक्य') मे एकर बीज अछि। अलंकार-अध्याय शब्दालंकार–अर्थालंकार आ उपमाक चारि-अंग धरि जाइत अछि; मुदा ध्वनि-सिद्धान्त (व्यंग्यार्थ, प्रतीयमान अर्थ) क गहन विवेचन एतय नहि — जे स्वाभाविक, किएक तँ ई शिक्षण-व्याकरण थिक, काव्य-शास्त्र नहि। भविष्यमे विदेह-परम्पराक ध्वनि-वक्रोक्ति-केन्द्रित समीक्षा-पद्धतिकेँ एहि रचना-खण्डसँ जोड़ब एकरा साहित्यिक गहराइ देत। पाश्चात्य समीक्षा-परम्परा आधुनिक भाषा-विज्ञानक ढाँचा — जकरा ग्रन्थ स्वयं अपनबैत अछि — पाश्चात्य थिक। तेँ एतय संवाद सभसँ प्रत्यक्ष अछि। सस्यूर-दृष्टि: फ़र्दिनान्द द सस्यूर (Saussure) क तीन आधार-भेद — ल्याङ्ग/पारोल (langue/parole), संकेतक स्वेच्छाचारिता (arbitrariness), आ समकालिक/ऐतिहासिक (synchronic/diachronic) — ग्रन्थमे स्पष्ट स्वीकृत अछि। भूमिकामे ग्रन्थ लिखैत अछि: 'चिह्न स्वेच्छाचारी थिक... तेँ मैथिली गाछ, बज्जिका गाछ/पेड़ आ अंगिका गाछ सभ समान रूपसँ वैध। ' — ई शुद्ध सस्यूरीय स्थापना थिक, आ एकरे सहारे ग्रन्थ 'कोनो भाषा हीन नहि' क समताकेँ भाषा-वैज्ञानिक आधार दैत अछि। समकालिक/ऐतिहासिक भेदकेँ ओ अलग खण्डमे राखि (अधिकांश समकालिक, ऐतिहासिक-तुलनात्मक अलग) सस्यूरीय अनुशासन निबाहैत अछि। ब्लूमफील्ड-दृष्टि: अमेरिकी वर्णनवाद (Bloomfield) क सूत्र — वर्णन करू, निर्णय नहि; रूपिम-स्वनिमकेँ वितरण (distribution) सँ सिद्ध करू। ग्रन्थक वर्णनात्मक-स्वर आ न्यूनतम-जोड़ी-आधारित ध्वनिम-सिद्धि शुद्ध ब्लूमफील्डीय थिक। 'रूप/कार्य/अर्थ/प्रयोग/वितरण' मे 'वितरण' क पृथक् स्तर ब्लूमफील्डीय distributional method क सीधा अनुवाद थिक। चोम्स्की-दृष्टि: उत्पादक व्याकरण (generative grammar) क कसौटी — नियमक ओहन समुच्चय जे सभ व्याकरणिक वाक्य उत्पन्न करय आ अव्याकरणिककेँ रोकय (generativity), आ अन्तर्जात भाषा-क्षमता। ग्रन्थ मुख्यतः वर्णनात्मक-शैक्षणिक थिक, तेँ ई औपचारिक उत्पादक-नियम नहि लिखैत; मुदा वाक्य-विन्यास-खण्डमे constituency (पदसमूह-संरचना), dependency (निर्भरता), valency (क्रिया-अपेक्षा) आ argument structure क विवेचन उत्पादक-परम्पराक अवधारणाकेँ शिक्षण-रूपमे आनैत अछि। चोम्स्कीय पूर्ण औपचारिकता (rewrite rules, tree) क अभाव एतय अभावो नहि — ई प्रयोजन-सङ्गत निर्णय थिक। ग्रीनबर्ग-प्रकारिकी-दृष्टि: जोसेफ ग्रीनबर्ग (Greenberg) क शब्द-क्रम-सार्वभौम (word-order universals) कहैत अछि जे SOV भाषा प्रायः परसर्गीय (postpositional), प्रधान-अन्त्य (head-final) होइत अछि। ग्रन्थ तीनू भाषाकेँ SOV, परसर्गीय, प्रधान-अन्त्य रूपमे स्थापित करैत, ग्रीनबर्गीय सहसम्बन्ध (correlation) क सीधा परीक्षण करैत अछि — पदक्रम-प्रकारिकी, कारक-संरेखण, सामञ्जस्य-प्रकारिकी, प्रधान/आश्रित-चिह्नन धरिक पृथक् अध्याय एकरे प्रमाण। ई ग्रन्थकेँ विश्व-प्रकारिकीक मानचित्रमे स्थान दैत अछि। हैलिडे-प्रकार्यवाद आ कॉर्पस-दृष्टि: हैलिडे (Halliday) क प्रणालीगत-प्रकार्यात्मक भाषा-विज्ञान (SFL) भाषाकेँ अर्थ-विकल्पक जालक रूपमे, आ रजिस्टर/प्रवचनकेँ केन्द्रमे देखैत अछि। ग्रन्थक रजिस्टर, code-switching, diglossia, cohesion/coherence, आ conversation analysis क अध्याय प्रकार्यवादी थिक। कॉर्पस-भाषा-विज्ञानकेँ ग्रन्थ न केवल स्वीकारैत, अपितु '३ वक्ता × २० शब्द', '२० मिनट बातचीत' सन न्यूनतम-कॉर्पस-मानक धरि निर्धारित करैत अछि — जे बिहारी उपवर्गक भाषाक लेल एकटा दुर्लभ पद्धतिगत योगदान थिक। विरोधात्मक विश्लेषण आ शिक्षण-व्याकरण-दृष्टि: विरोधात्मक भाषा-विज्ञान (contrastive linguistics) मातृभाषा आ लक्ष्य-भाषाक संरचनात्मक अन्तर देखि त्रुटि-पूर्वानुमान करैत अछि। ग्रन्थ बेर-बेर 'अंग्रेजीसँ संरचनात्मक तुलना' आ 'हिन्दी-प्रभावसँ बचू' क अध्याय दैत, विरोधात्मक-पद्धतिकेँ शिक्षण-उपकरण बनबैत अछि — यएह ओकर सभसँ मौलिक पाश्चात्य-अनुप्रयोग थिक। सीमा: विरोधात्मक-परिकल्पना (contrastive hypothesis) आधुनिक द्वितीय-भाषा-अर्जन-सिद्धान्तमे आंशिक रूपेँ संशोधित अछि (सभ त्रुटि अन्तर-भाषिक हस्तक्षेपसँ नहि होइत); ग्रन्थ जँ त्रुटि-विश्लेषण (error analysis) क आधुनिक अन्तर्भाषा (interlanguage) सिद्धान्तकेँ जोड़य, तँ शिक्षण-पक्ष आर सन्तुलित हएत। इस्रायली समीक्षा-परम्परा इस्रायली भाषा-चिन्तन आधुनिक विश्वमे एकटा अद्वितीय प्रयोगक — मृत-प्राय हिब्रूक पुनर्जीवन — क सैद्धान्तिक फल थिक। एहि परम्पराक तीन अवधारणा एहि ग्रन्थपर विशेष रूपेँ प्रासङ्गिक अछि। ज़ुकरमान-दृष्टि (पुनरुज्जीवन-भाषा-विज्ञान): गिलआद ज़ुकरमान (Ghil'ad Zuckermann) क स्थापना थिक जे 'पुनर्जीवित' भाषा कहियो अपन मूल शुद्ध रूपमे नहि घुरैत — ओ सदा एकटा संकर (hybrid) होइत अछि, जाहिमे पुनरुज्जीवनकर्ताक मातृभाषाक छाप अनिवार्य। ई दृष्टि विदेह-परियोजनाक लेल क्रान्तिकारी प्रासङ्गिकता रखैत अछि। मैथिली, अंगिका आ बज्जिका मृत नहि, मुदा संकटग्रस्त आ हिन्दी-आच्छादित अछि। ग्रन्थक बेर-बेरक आग्रह — 'हिन्दी-प्रभावसँ बचू', 'शुद्ध ठेठी = हिन्दी-कलंकसँ मुक्त' — ज़ुकरमानीय-चेतनाक विपरीत ध्रुव थिक: जतय ज़ुकरमान कहैत छथि 'संकरता अनिवार्य, ओकरा स्वीकारू', ओतय ग्रन्थ 'शुद्धीकरण' क अभियान चलबैत अछि। ई तनाव समीक्षाक सभसँ रोचक बिन्दु थिक — आ ई कोनो एकतरफा दोष नहि। भाषा-योजनाक दुइ वैध लक्ष्य अछि: शुद्धीकरण (purism) आ यथार्थ-अभिलेखन (documentation)। ग्रन्थ दुनूकेँ साधैत अछि — व्याकरण-खण्डमे शुद्धीकरण, भाषा-विज्ञान-खण्डमे यथार्थ-वर्णन। मुदा ज़ुकरमानीय दृष्टिसँ एकटा प्रश्न उठैत अछि: जकरा ग्रन्थ 'हिन्दी-कलंक' कहैत अछि, ओ किछु दशकसँ भाषा-समुदायक जीवन्त प्रयोगक अंग बनि गेल अछि — तँ ओ 'अशुद्धि' थिक वा भाषाक स्वाभाविक विकास? भविष्यक संस्करणमे एहि प्रश्नक स्पष्ट सैद्धान्तिक उत्तर (जे शुद्धीकरण किएक, कतबा, कोन सीमा धरि) ग्रन्थकेँ आर सुदृढ़ करत। हिब्रू-अकादमी-दृष्टि (मानकीकरण-प्रतिमान): आधुनिक हिब्रूक मानकीकरण एकटा केन्द्रीय संस्था (Academy of the Hebrew Language) क माध्यमसँ भेल — जे शब्द-निर्माण, वर्तनी आ पारिभाषिकीक निर्णय करैत अछि। ग्रन्थक 'शैली-पत्र', पारिभाषिक-शब्दकोश, आ 'एके संकल्पना लेल एके मुख्य शब्द' क आग्रह — ई सभ अकादमी-प्रतिमानक अनुरूप संस्थागत मानकीकरणक प्रयास थिक। विदेह एतय एकटा अनौपचारिक भाषा-अकादमीक भूमिका निबाहि रहल अछि। हिब्रू-अनुभवसँ शिक्षा ई जे मानकीकरण तखने सफल होइत अछि जखन ओ आदेशक संग स्वीकार्यता (community buy-in) सेहो अर्जित करय — तेँ ग्रन्थक शिक्षण-सुलभता आ अभ्यास-बहुलता एकर स्वीकार्यताक कुञ्जी थिक। पुनःशब्दीकरण-दृष्टि: हिब्रू-पुनर्जीवनमे प्राचीन शब्दकेँ आधुनिक अर्थ देल गेल (नवीकरण)। ग्रन्थक पारिभाषिक-निर्माण — जेना अंग्रेजी भाषा-वैज्ञानिक संज्ञाकेँ संस्कृत-मूलक मैथिली-पारिभाषिकी (स्वन-विज्ञान, स्वनिम-विज्ञान, रूप-विज्ञान, प्रयोग-विज्ञान) देब — ठीक यएह पुनःशब्दीकरण-प्रक्रिया थिक। ई संस्कृत-आधार मैथिलीकेँ आधुनिक विमर्शक भाषा बनबैत अछि, आ इस्रायली-प्रतिमानक सफल अनुकरण थिक। चीनी समीक्षा-परम्परा चीनी भाषा-चिन्तन दुइ धारामे बहैत अछि — प्राचीन स्वदेशी (श्याओश्वे/कोश-परम्परा) आ आधुनिक पाश्चात्य-प्रेरित (माशी वेन्थोङ्ग-प्रतिमान)। दुनू एहि ग्रन्थपर प्रासङ्गिक अछि। श्याओश्वे आ 'स्वोवन'-दृष्टि (कोश-परम्परा): चीनी 小學 (श्याओश्वे, 'लघु-विद्या') परम्परामे — विशेषतः श्वो-वन च्येची (說文解字) — शब्दकेँ रूप, ध्वनि आ अर्थ तीनू आयामसँ व्यवस्थित करब केन्द्रीय छल। ग्रन्थक विशाल कोश-परिशिष्ट (बज्जिका–हिन्दी शब्दकोश, पारिभाषिक-शब्दकोश, glossary) एही कोश-प्रधान परम्पराक सजातीय थिक। चीनी परम्परा शिखबैत अछि जे शब्दकोश केवल परिशिष्ट नहि, अपितु भाषा-संरक्षणक मूल-आधार थिक — आ ग्रन्थ एहि सत्यकेँ आत्मसात् कएने अछि। माशी वेन्थोङ्ग-दृष्टि (प्रथम-व्याकरण-प्रतिमान): १८९८ ई. मे मा च्येन्चोङ्ग (馬建忠) क 'माशी वेन्थोङ्ग' (馬氏文通) चीनीक प्रथम व्यवस्थित व्याकरण छल, जे पाश्चात्य (लैटिन) व्याकरण-कोटिकेँ चीनीपर आरोपित कऽ लिखल गेल। एकर सफलता आ आलोचना दुनू शिक्षाप्रद: सफलता ई जे एहिसँ चीनी आधुनिक व्याकरण-विमर्शमे प्रविष्ट भेल; आलोचना ई जे लैटिन-कोटि सभ चीनीक अपन प्रकृतिपर पूर्णतः फिट नहि बैसल। समीक्षाधीन ग्रन्थ ठीक एही ऐतिहासिक-क्षणपर ठाढ़ अछि — ई अंगिका-बज्जिका-मैथिलीक लेल किछु अर्थमे 'माशी वेन्थोङ्ग-क्षण' थिक। मुदा ग्रन्थ माशीक भूलसँ सचेत अछि: ओ बेर-बेर चेतबैत अछि 'तकनीकी शब्द विश्लेषण के औजार हए, भाषा पर थोपल साँचा नहि' — अर्थात् पाश्चात्य कोटि आरोपित नहि, अपितु परीक्षणीय उपकरण थिक। ई माशी-प्रतिमानक परिपक्व, आत्म-आलोचनात्मक संस्करण थिक। गणक (classifier) आ विषय-प्रधानता-दृष्टि: चीनी भाषा-विज्ञानक दुइ प्रसिद्ध योगदान — गणक (量詞, measure word/classifier) क विस्तृत विश्लेषण आ 'विषय-प्रधान बनाम कर्ता-प्रधान भाषा' (Li–Thompson) क भेद — एहि ग्रन्थपर सीधे लागू होइत अछि। तीनू भाषामे गणक-तन्त्र (मैथिली 'टा/गोटा', बज्जिका 'गो', अंगिका 'गो') जीवन्त अछि, आ ग्रन्थ एकरा पृथक् अध्याय दैत अछि — जे चीनी-दृष्टिसँ अत्यन्त उपयुक्त, किएक तँ गणक-तन्त्र दक्षिण-एसियाई आ पूर्व-एसियाई भाषाक साझा प्रकारिक-लक्षण थिक। एहिसँ ई तीनू भाषा चीनी-सन गणक-भाषाक विश्व-मानचित्रसँ जुड़ि जाइत अछि। विषय-प्रधानताक दृष्टिसँ ग्रन्थक 'बात के केंद्र / सूचना-संरचना' अध्याय संकेत दैत अछि जे ई भाषा सभ पदक्रममे विषय (topic) केँ विशेष स्थान दैत अछि — एहि दिशामे चीनी विषय-टिप्पणी-विश्लेषणक अधिक प्रयोग एकटा फलदायी भविष्य-सम्भावना थिक। तिब्बती समीक्षा-परम्परा तिब्बती भाषा-परम्परा एकटा सचेत, राज्य-प्रायोजित लिपि-आ-व्याकरण-निर्माणक अनुपम उदाहरण थिक — जकर एहि ग्रन्थसँ गूढ़ संवाद अछि। थोन्मि सम्भोट-दृष्टि (लिपि-संहिताकरण): सातम शताब्दीमे थोन्मि सम्भोट (Thonmi Sambhoṭa) तिब्बती लिपि आ प्रथम व्याकरण ('सुम्चुपा' आ 'तग्किजुगपा') क निर्माण कएलनि — एकटा सुविचारित, ऊपरसँ-नीचाँ (top-down) भाषा-अभियन्त्रण। विदेह-परियोजना, आ विशेषतः एहि ग्रन्थक तिरहुता-लिपि-परिशिष्ट आ यूनिकोड-संरक्षण-चर्चा, थोन्मि-परम्पराक आधुनिक प्रतिध्वनि थिक: लिपि केवल लेखन-उपकरण नहि, अपितु सांस्कृतिक-राजनीतिक आत्म-निर्णयक प्रतीक थिक। जेना थोन्मि तिब्बतीकेँ भारतीय ब्राह्मी-आधारपर स्वतन्त्र लिपि देलनि, तहिना ग्रन्थ मैथिलीकेँ ओकर अपन तिरहुता-लिपिसँ पुनर्जोड़ैत, देवनागरी-तिरहुता वर्ण-सारणी आ यूनिकोड-संरक्षणक व्यावहारिक मार्ग दैत अछि। ई एकटा सशक्त सभ्यतागत कदम थिक। झेसा-आदर-दृष्टि (honorific register): तिब्बतीक सभसँ विशिष्ट लक्षण थिक 'झेसा' (ཞེ་ས, zhe sa) — एकटा विस्तृत आदर-रजिस्टर, जाहिमे सामान्य आ आदरणीय सन्दर्भ लेल भिन्न शब्द, भिन्न क्रिया-रूप होइत अछि। ई ठीक ओ क्षेत्र थिक जतय हमर तीनू भाषा विश्व-भाषामे विशिष्ट अछि। मैथिलीक बहु-आयामी सामञ्जस्य ('देखलिऐ' बनाम 'देखलियनि'), बज्जिकाक 'तूँ/रउआ' प्रयोग-मूलक आदर, आ अंगिकाक इनी/हिनी/हुनी-भेद — ई तिब्बती झेसा-तन्त्रक सजातीय, आ किछु अर्थमे ओहूसँ जटिल परिघटना थिक। ग्रन्थ एहि आदर-तन्त्रकेँ जतबा विस्तार दैत अछि, ओ तिब्बती-दृष्टिसँ पूर्णतः न्यायसङ्गत — किएक तँ एहन भाषाक व्याकरण जँ आदर-तन्त्रकेँ गौण करय, तँ ओ भाषाक आत्माकेँ चूकि जाइत अछि। ग्रन्थ ई नहि चूकैत। कर्तृ-कारक (ergative) आ अनुवाद-मानकीकरण-दृष्टि: तिब्बती कर्तृ-कारक (ergative-absolutive) संरेखणक भाषा थिक, आ बौद्ध-अनुवाद-युगमे तिब्बतीक पारिभाषिकी संस्कृतसँ अत्यन्त सुनियोजित रूपेँ मानकीकृत भेल ('महाव्युत्पत्ति' कोश)। समीक्षाधीन ग्रन्थ जखन 'कारक-चिह्नन, संरेखण (alignment) आ भेदात्मक चिह्नन (differential marking)' क अध्याय दैत अछि, तखन ओ ठीक ओहि प्रकारिक-प्रश्नकेँ उठबैत अछि जे तिब्बती-प्रकारकेँ बुझबाक लेल आवश्यक। मैथिली-आदि भाषामे विभेदक कर्म-चिह्नन ('केँ') आ किछु प्रयोगमे कर्ता-चिह्नक अभाव ('ने-रहित कर्ता') — ई सभ संरेखण-प्रकारिकीक जीवन्त प्रश्न थिक, आ ग्रन्थ एकरा प्रकारिकी-कोडिंग-पत्र धरि लऽ जाइत अछि। तिब्बती अनुवाद-मानकीकरणक अनुभवसँ शिक्षा ई जे पारिभाषिकीक स्थिरता (एके अर्थ = एके पद) दीर्घकालिक ग्रन्थ-परम्पराक आधार थिक — जकरा ग्रन्थ 'पारिभाषिक-संगति' क रूपमे सचेत रूपेँ साधैत अछि। जापानी समीक्षा-परम्परा जापानी 'कोकुगोगाकु' (国語学, राष्ट्रभाषा-विज्ञान) एकटा स्वदेशी-आधुनिक भाषा-विज्ञान थिक, जे पाश्चात्य पद्धति आ जापानी-विशिष्ट संरचनाकेँ मिलाबैत अछि। एकर तीन अवधारणा एतय प्रासङ्गिक। तोकिएदा-दृष्टि (भाषा-प्रक्रिया-सिद्धान्त): तोकिएदा मोतोकि (時枝誠記) क 'गेन्गो-कातेइ-सेत्सु' (भाषा-प्रक्रिया-सिद्धान्त) भाषाकेँ स्थिर-वस्तु नहि, अपितु वक्ताक जीवन्त-प्रक्रिया मानैत — विशेषतः 'शि' (概念-प्रधान, वस्तुनिष्ठ पद) आ 'जि' (वक्ता-भाव-प्रधान पद, जेना निपात/आदर-रूप) क भेद करैत अछि। ई दृष्टि ग्रन्थक निपात (particle), आदर-रूप आ 'बात के केंद्र' क विवेचनसँ गहन संवाद करैत अछि। मैथिली-बज्जिका-अंगिकाक आदर-प्रत्यय आ वाक्यान्तिक कण (जेना बज्जिका 'नी', मैथिली भावसूचक कण) — ई ठीक तोकिएदाक 'जि' कोटिक उदाहरण थिक: ई पद वस्तु-अर्थ नहि, अपितु वक्ताक सामाजिक-भावनात्मक स्थितिकेँ अंकित करैत अछि। ग्रन्थ एहि पदकेँ जँ तोकिएदा-दृष्टिसँ 'वक्ता-केन्द्रित' कोटिमे स्पष्ट रूपेँ वर्गीकृत करय, तँ आदर-तन्त्रक विश्लेषण आर सैद्धान्तिक हएत। केइगो-दृष्टि (आदर-तन्त्र): जापानी 'केइगो' (敬語) विश्वक सभसँ व्यवस्थित सम्मान-भाषा-तन्त्रमे एक थिक — जाहिमे सोन्केइगो (आदरार्थ), केन्जोगो (विनम्रार्थ) आ तेइनेइगो (शिष्टार्थ) क त्रिविध-भेद अछि। जापानी केइगो-दृष्टिसँ देखलापर ग्रन्थक सभसँ मूल्यवान् योगदान स्पष्ट होइत अछि: ओ तीनू भाषाक आदर-तन्त्रकेँ केवल 'तूँ/अहाँ' क द्विभाजनमे नहि सीमित करैत, अपितु बहु-स्तरीय (सामान्य–आदर–अति-आदर, आ मैथिलीमे कर्ता-कर्म-सम्बन्धी त्रिकोणीय आदर) रूपमे देखैत अछि — जे केइगो-सन जटिलताक द्योतक। जापानी अनुभव शिखबैत अछि जे आदर-तन्त्र भाषाक सभसँ कठिन शिक्षण-क्षेत्र थिक; तेँ ग्रन्थक आदर-केन्द्रित अभ्यास-बहुलता (१० सामाजिक परिस्थिति × ३ वक्ता सन elicitation) शिक्षण-दृष्टिसँ अत्यन्त समीचीन। वागो/कांगो/गाइराइगो आ विषय-टिप्पणी-दृष्टि: जापानी शब्द-भण्डारक स्तरीकरण — वागो (देशज), कांगो (चीनी-मूलक तत्सम-तुल्य), गाइराइगो (पाश्चात्य आगत) — दक्षिण-एसियाई तद्भव/तत्सम/आगत-भेदक अनुरूप थिक। ग्रन्थक शब्द-विचार (उत्पत्तिक आधारपर वर्गीकरण: तत्सम/तद्भव/देशज/विदेशज) एही स्तरीकरण-दृष्टिक भारतीय-रूप थिक, आ जापानी-अनुभव एकरा वैश्विक सन्दर्भ दैत अछि। जापानीक विषय-कण 'wa' (は) बनाम कर्ता-कण 'ga' (が) क प्रसिद्ध भेद ग्रन्थक सूचना-संरचना-विवेचनकेँ एकटा सशक्त तुलनात्मक-आदर्श दैत अछि, जकर पूर्ण-प्रयोग भविष्यक सम्भावना थिक। विदेह समानान्तर समीक्षा-परम्परा अन्तमे ओ दृष्टि, जे ग्रन्थक अपन जन्मभूमि थिक — विदेह समानान्तर-साहित्य-आन्दोलनक समीक्षा-परम्परा। ई प्रति-कानन (counter-canon) क दृष्टि थिक: जे साहित्यिक-भाषिक आधिकारिकताक केन्द्रीकरणकेँ चुनौती दैत, अवदमित-लोक-स्त्री-दलित-स्वरकेँ इतिहासमे पुनर्स्थापित करैत, आ समानान्तर-इतिहास-ढाँचा (parallel history framework) द्वारा संस्थागत आख्यानक विकल्प रचैत अछि। एहि आन्तरिक-दृष्टिसँ देखलापर ग्रन्थक गहनतम अर्थ प्रकट होइत अछि। पहिल — 'समानान्तर' शब्द एतय द्वि-अर्थी थिक: ई एक दिस भाषा-वैज्ञानिक 'समानान्तर तुलना' (parallel/contrastive linguistics) थिक, आ दोसर दिस विदेह-आन्दोलनक 'समानान्तर-कानन' थिक। ग्रन्थ तीन उपेक्षित जनभाषाकेँ (अंगिका-बज्जिका-मैथिली) एके मंचपर, समान गरिमासँ, समान पद्धतिसँ राखि — भाषिक-समानताक ओ जनतांत्रिक घोषणा करैत अछि जकरा सस्यूरीय 'कोनो भाषा हीन नहि' सैद्धान्तिक आधार दैत अछि, मुदा जकर राजनीतिक-प्रेरणा विदेह थिक। मैथिलीकेँ अंगिका-बज्जिकाक 'ऊपर' नहि, अपितु 'संग' राखब — ई स्वयं एकटा प्रति-कानन-कर्म थिक, जे भाषिक-श्रेणीक्रम (hierarchy) केँ अस्वीकारैत अछि। दोसर — ग्रन्थक 'ठेठ/लोक-रूपकेँ प्राथमिकता, हिन्दी-प्रभावित नगरीय रूपकेँ नहि' क नीति विदेह-आन्दोलनक 'अवदमित-लोक-स्वर-पुनर्प्राप्ति' क सीधा अनुप्रयोग थिक। जतय संस्थागत-मानकीकरण प्रायः नगरीय-अभिजात रूपकेँ 'मानक' बनबैत अछि, ओतय ग्रन्थ ग्रामीण-लोक-रूपकेँ प्रमाणक केन्द्रमे राखि, मानकीकरणक दिशा उलटि दैत अछि — ई विदेह-समानान्तर-इतिहासक पद्धतिगत हस्ताक्षर थिक। तेसर — ग्रन्थक बज्जिका-लोकोक्ति-कोश, अंगिका-लोकवार्ता-सन्दर्भ, आ मुहावरा-अभिलेखन विदेह-आन्दोलनक 'लोक-प्रज्ञा-पुनर्प्राप्ति' क अंग थिक। मुदा एतय विदेह-दृष्टि स्वयं एकटा आन्तरिक-आलोचना माँगैत अछि: जँ आन्दोलन स्त्री-स्वर-पक्षधर थिक, तँ 'नारी-विषयक' पितृसत्तात्मक लोकोक्तिकेँ अभिलेखित करबाक संग ओकर आलोचनात्मक-रूपरेखा देब आन्दोलनक अपन घोषणाक अनुरूप हएत। ई ग्रन्थ-विरुद्ध आक्षेप नहि, अपितु विदेह-दृष्टिक आन्तरिक-संगति-हेतु सुझाव थिक। चारिम — ग्रन्थक 'शून्य-कल्पन नीति' (कोनो कल्पित रूप नहि, प्रत्येक दाबी स्रोत-सिद्ध वा स्पष्ट-परिकल्पना) विदेह-आन्दोलनक 'प्रामाणिकता बनाम आधिकारिकता' क द्वन्द्वक समाधान थिक: आन्दोलन संस्थागत-आधिकारिकता (authority) केँ अस्वीकारैत अछि, मुदा प्रमाण-प्रामाणिकता (evidential validity) केँ नहि — अपितु ओकरे नव आधार बनबैत अछि। यएह एहि ग्रन्थकेँ 'प्रति-कानन' होइतो 'अ-वैज्ञानिक' होयबासँ बचबैत अछि। ई विदेह-समीक्षाक सभसँ परिपक्व उपलब्धि थिक — प्रति-कानन जे प्रमाणकेँ नहि छोड़ैत। प्रकारिकी, नव्य-न्याय आ विश्वजनीन साहित्यिक सिद्धान्तक विस्तृत पूरक विवेचन भाषा-प्रकारिकी (Typology) आ पाश्चात्य-भारतीय व्याकरणिक सिद्धान्त पोथीक अध्याय ७०६ मे भाषा-प्रकारिकी (Linguistic Typology) क अन्तर्गत मैथिली, ठेठी-अंगिका, बज्जिका आ अंग्रेजीक समानान्तर तुलना कएल गेल अछि। ई तुलना विश्व भाषा-विज्ञानक मापदण्डपर ई प्रमाणित करैत अछि जे ई तीनू सहभाषासभ इंडो-आर्य भाषा परिवारक एक विशिष्ट उपशाखा (मागधी वंश) क प्रतिनिधित्व करैत अछि। प्रकारिक विशेषता (Typological Feature) मैथिली, ठेठी-अंगिका, बज्जिका अंग्रेजी (तुलनात्मक पाश्चात्य भाषा) सामान्य पदक्रम (Basic Word Order) कर्ता-कर्म-क्रिया (S-O-V) कर्ता-क्रिया-कर्म (S-V-O) सम्बन्धसूचक (Adposition) उत्तरसर्ग (Postposition) - संज्ञाक बाद प्रयुक्त पूर्वसर्ग (Preposition) - संज्ञाक पहिने प्रयुक्त आदर सूचक (Honorificity) सर्वनाम आ क्रियाक रूपमे अनिवार्य सामञ्जस्य (Grammatical) मुख्य रूपसँ शाब्दिक (Lexical Politeness Strategies) पदक्रमक लचीलापन (Flexibility) प्रसंगानुसार अत्यधिक लचीला (Pragmatically flexible) तुलनात्मक रूपेँ स्थिर आ कठोर (Stable and rigid) योगेन्द्र पी. यादवक 'गवर्नमेंट-एण्ड-बाइंडिंग' (GB Theory) आ पदानुक्रम वाक्यविज्ञानक स्तरपर ई पोथी प्रसिद्ध भाषाविद् योगेन्द्र पी. यादवक शोधकेँ आधार बनबैत अछि। यादव जी नोआम चोमस्कीक 'गवर्नमेंट-एण्ड-बाइंडिंग' (Government-and-Binding) सिद्धान्तक प्रयोग मैथिली वाक्य-विन्यासपर कएलनि। मैथिली आ ओकर सहभाषासभमे क्रिया-सामञ्जस्य (Verb Agreement) विश्वक कोनो भी इंडो-आर्य भाषासँ बेसी जटिल अछि। एतय कर्ताक संगे-संग कर्म, सम्प्रदान, वा वाक्यसँ बाहरक कोनो 'विशिष्ट आन्तरिक अधिकारी' (Prominent Internal Possessors - PIPs) सेहो क्रियाक रूपकेँ नियन्त्रित कऽ सकैत अछि। यादवक विश्लेषण ई स्पष्ट करैत अछि जे ई जटिल सामञ्जस्य कोनो यादृच्छिक (arbitrary) व्याकरणिक नियम नहि अछि, बल्कि ई मैथिल समाजक दू टा प्रमुख समाजभाषिक सिद्धान्तपर आधारित अछि: १. सामाजिक पदानुक्रम (Principle of Social Hierarchy / Face): ई समाजमे व्यक्तिक मान-सम्मान आ आदरकेँ रेखांकित करैत अछि। २. सामाजिक समानुभूति (Principle of Social Solidarity / Empathy): ई वक्ता आ श्रोताक बीचक मनोवैज्ञानिक सम्बन्ध (अपनपन वा दूरी) केँ क्रियाक प्रत्ययमे ढालैत अछि। श्रोता-सामञ्जस्य (Allocutive Agreement) आ पोर्टमेन्टो (Portmanteau) रूप पाश्चात्य 'मिनिमलिस्ट प्रोग्राम' (Minimalist Program) आ 'लेफ्ट पेरिफेरी' (Left Periphery) सिद्धान्तक आलोकमे प्रीति कुमारीक शोध ई प्रमाणित करैत अछि जे मैथिली (विशेष कऽ दरभंगा सहभाषा) मे 'श्रोता-सामञ्जस्य' (Allocutive Agreement) आ 'कर्म-सामञ्जस्य' (Object Agreement) क बीच पूरकता (Complementarity) होइत अछि। जखन वक्ता वाक्यमे श्रोताक सम्मानकेँ क्रियापर दर्शाबैत अछि (Allocutivity), तँ ओकर प्रभाव FinP (Finiteness Phrase) वा c-head पर पड़ैत अछि। Fin head जखन श्रोताक लेल 'उर्ध्वगामी सामञ्जस्य' (Upward Agree) करैत अछि, तखन ओ 'अधोगामी सामञ्जस्य' (Downward Agree) कऽ कऽ कर्मक आदरकेँ नहि देखा सकैत अछि। ई 'पोर्टमेन्टो' (Portmanteau) आदर-सामञ्जस्य ई देखाबैत अछि जे मैथिली-बज्जिका परिवारमे समाजक पदानुक्रम भाषाक 'सिंटेक्स ट्री' (Syntax Tree) क सबसँ उच्च बिन्दु (Treetops) धरि पहुँचि गेल अछि। विदेह समानान्तर समीक्षा आ नव्य-न्याय ज्ञानमीमांसा (Epistemology) पोथीक वैचारिक आन्दोलन गजेन्द्र ठाकुर द्वारा स्थापित 'विदेह समानान्तर इतिहास' (Videha Parallel History Framework) क आधारपर ठाढ़ अछि। ई ढाँचा परम्परागत, साहित्य अकादेमी द्वारा समर्थित, सम्भ्रान्त (मुख्यतः मैथिल ब्राह्मण केन्द्रित) साहित्येतिहासकेँ खण्डित कऽ एकटा लोकतान्त्रिक, बहुस्वरवादी, नारीवादी, दलित आ क्षेत्रीय (नेपालक तराईसहित) इतिहासक वकालत करैत अछि। गंगेश उपाध्याय आ नव्य-न्यायक प्रयोग समानान्तर समीक्षा अपन ज्ञानमीमांसा (Epistemology) चौदहम शताब्दीक महान मैथिल दार्शनिक गंगेश उपाध्याय द्वारा प्रवर्तित 'नव्य-न्याय' (Navya-Nyaya) सँ प्राप्त करैत अछि। गंगेशक 'तत्त्वचिन्तामणि' मे प्रमाण (Means of knowledge), अनुमान (Inference) आ व्याप्ति (Invariable concomitance) क जे कठोर आ सूक्ष्म विश्लेषण अछि, ओकरे आधारपर विदेह समीक्षा साहित्यिक दावासभक मूल्याङ्कन करैत अछि। विदेहक 'व्याप्ति' अछि: जतय-जतय वास्तविक साहित्यिक जीवन्तता अछि, ओतय-ओतय उपेक्षित, लोक, दलित आ नारी-स्वरक उपस्थिति अनिवार्य अछि (Wherever there is genuine Maithili literary vitality, there is inclusivity of subaltern, non-Brahmin, and marginalised voices)। नव्य-न्यायक एहि कठोर 'प्रमाण' सिद्धान्तिक आधारपर सन्दीप कुमार शफीक दलित आत्मकथा, प्रीति ठाकुरक बाल-साहित्य, बेचन ठाकुरक समानान्तर रङ्गमञ्च, आ अञ्चिन्हार आखरक गजल आन्दोलनकेँ (जाहिमे सियाराम झा 'सरस' आ आशीष अञ्चिन्हारक योगदान महत्त्वपूर्ण अछि) मुख्यधारामे स्थापित कएल गेल अछि। गजेन्द्र ठाकुरक ई 'समानान्तर' (Parallel) विमर्श वस्तुतः कोनो सीमान्त (Marginal) विमर्श नहि, अपितु एकटा विलम्बित मुदा सत्य इतिहास थिक ("The Parallel is not the marginal, but the truthful, in long delay")। विश्वजनीन साहित्यिक सिद्धान्तसँ तुलनात्मक परीक्षण एहि व्याकरणिक आ रचना-सम्बन्धी पोथीक मूल्याङ्कन केवल भारतीय (रस, ध्वनि, वक्रोक्ति) वा पाश्चात्य (संरचनावाद, नव्य-आलोचना) सिद्धान्तपर नहि, अपितु सम्पूर्ण पूर्वी आ मध्य-पूर्वी एसियाक साहित्यिक-भाषिक सिद्धान्तक आलोकमे कएल गेल अछि। चीनी सिद्धान्त: लियू शिएक 'वेनशिन द्याओलोङ्ग' (Wenxin Diaolong) पाँचम शताब्दीक चीनी आलोचक लियू शिए अपन ५० अध्याय बला महान ग्रन्थ Wenxin Diaolong (साहित्यिक मन आ ड्रैगनक नक्काशी) मे 'वेन' (Wen - Pattern / साहित्य) क ब्रह्माण्डीय अवधारणा देलनि अछि। लियू शिएक अनुसार, साहित्य (वेन) कोनो बाह्य सजावट वा कृत्रिम निर्माण नहि अछि; ई ब्रह्माण्डीय व्यवस्था (Cosmic patterns) आ मानव मनक आन्तरिक प्रकृतिक स्वाभाविक अभिव्यक्ति (Externalization of the inner mind) थिक। मैथिली, ठेठी-अंगिका आ बज्जिकाक व्याकरणमे ई 'वेन' (पैटर्न) ओकर आदर-सूचक सर्वनाम आ क्रिया-सामञ्जस्यमे स्पष्ट रूपेँ देखल जा सकैत अछि। चीनी साहित्यमे जेना 'जेन' (सम्राट लेल) वा 'जैशा' (सेवक लेल) जकाँ पदानुक्रमित सर्वनामक प्रयोग प्रकृतक पदानुक्रमकेँ दर्शाबैत अछि, तहिना मैथिली-बज्जिका परिवारमे 'हम-तोँह-अहाँ-अपने' (1st, 2NH, 2MH, 2H, 2HH) आ तेसर पुरुषमे 'ऊ-ओ-ई-ए' क जे बहुआयामी पदानुक्रम अछि, ओ वस्तुतः समाजक ब्रह्माण्डीय आ सामाजिक ढाँचाक भाषिक 'वेन' (पैटर्न) थिक। एकर अतिरिक्त, चीनी कवितामे सर्वनामक लोप (Omission of subject) जहिना मानवकेँ प्रकृतिसँ एकाकार करैत अछि, मैथिलीमे सेहो क्रियाक 'सामञ्जस्य-प्रत्यय' (Agreement suffixes) एतेक समृद्ध अछि जे कर्ताक सर्वनामक स्पष्ट उल्लेखक बिना सेहो पूर्ण अर्थ स्पष्ट भऽ जाइत अछि, जे 'वेन' क उच्चत्तम अवस्था थिक। जापानी सिद्धान्त: 'मोनो नो अवेयर' (Mono no aware) आ 'कोतोदामा' (Kotodama) जापानी साहित्य-शास्त्रमे 'मोनो नो अवेयर' क अर्थ अछि वस्तुक करुणा वा सौन्दर्य-बोध (Pathos of things), आ 'कोतोदामा' क अर्थ अछि शब्दक आध्यात्मिक वा संवेगात्मक शक्ति (Spiritual power of words)। विदेह समानान्तर समीक्षा द्वारा सङ्कलित 'समानान्तर श्रव्य-दृश्य अभिलेखागार' (Videha Parallel Audio Video Archive) मे मिथिलाक लोकगीत, गोसाउनिक गीत, अनुष्ठानिक गायन (Ritual performances) आ संस्कार-गीतक जे डिजिटल दस्तावेजीकरण कएल गेल अछि, ओ स्पष्ट रूपेँ 'कोतोदामा' क सिद्धान्तपर आधारित अछि। लोकगीतक जे भावनात्मक आ संवेगात्मक प्रभाव (Affective/suasive power) होइत अछि, ओ मात्र लिखित पाठसँ सम्भव नहि। बज्जिका आ ठेठी-अंगिकाक लोक-कला आ गीतमे निहित ध्वनि-सौन्दर्य आ जनमानसक जे अगाध करुणा अछि, ओ 'मोनो नो अवेयर' क सटीक उदाहरण प्रस्तुत करैत अछि। ई पोथी अपन श्रव्य-दृश्य सन्दर्भक माध्यमसँ भाषाकेँ केवल कागजक वस्तु नहि, बल्कि ध्वनिक शक्ति (कोतोदामा) क रूपमे स्थापित करैत अछि। तिब्बती सिद्धान्त: थोन्मी सम्भोटाक 'सुम्कुपा' (Sumcupa) आ काव्यादर्श तिब्बती भाषा-विज्ञानक जनक थोन्मी सम्भोटा द्वारा रचित 'सुम्कुपा' (Sumcupa) आ संस्कृतक महान आचार्य दण्डीक 'काव्यादर्श' क तिब्बती अनुवाद भाषाक संरचना आ ओकर काव्यिक सम्भावनापर अद्भुत प्रकाश डालैत अछि। तिब्बती सिद्धान्त व्याकरणकेँ दर्शन आ स्थानिक ध्वनिकीसँ जोड़ैत अछि। प्रस्तुत पोथीमे अध्याय ७४१ (स्वन-विज्ञान) मे संस्कृत शिक्षा-परम्परा (कण्ठ्य, तालव्य, मूर्धन्य, दन्त्य, ओष्ठ्य) आ पाश्चात्य स्वन-विज्ञान (Velar, Palatal, Retroflex, Dental, Bilabial) क जे तुलनात्मक समन्वय कएल गेल अछि, ओ तिब्बती 'सुम्कुपा' क ओहि अनुवाद-परम्पराक स्मरण कराबैत अछि जतय भारतीय भाषिक ढाँचाकेँ स्थानीय तिब्बती ध्वनिक अनुरूप ढालल गेल छल। पोथी स्पष्ट करैत अछि जे उच्चारण-स्थानक ई कोटि सम्पूर्ण इंडो-आर्य विरासत थिक, मात्र ओकर 'कार्यगत वितरण' (Functional distribution) क्षेत्रीय स्तरपर बदलैत अछि। इस्रायली सिद्धान्त: घिलाद जुकरमैनक 'भाषा-पुनरुज्जीवन विज्ञान' (Revivalistics) इस्रायली भाषा-वैज्ञानिक घिलाद जुकरमैन (Ghil'ad Zuckermann) 'Revivalistics' (भाषा-पुनरुज्जीवन विज्ञान) क विश्व-प्रसिद्ध जनक थिकाह। हुनकर 'Phono-Semantic Matching' (ध्वनि-अर्थगत सामञ्जस्य - PSM) क सिद्धान्त भाषा-सम्पर्कक स्थितिमे नव शब्द निर्माणक अद्भुत प्रक्रिया अछि, जतय विदेशी वा उधार लेल गेल शब्दकेँ स्थानीय भाषाक ध्वनि आ अर्थक संग मिला कऽ नव रूप (Camouflaged borrowing) देल जाइत अछि। इस्रायली हिब्रू (Israeli Hebrew) क विकासमे यिडिश (Yiddish) आ अन्य भाषासभक जे 'हाइब्रिडिटी' (Hybridity) अछि, ओकरा जुकरमैन स्पष्ट कएलनि अछि। जुकरमैन मृत वा उपेक्षित भाषासभकेँ 'स्लीपिंग ब्यूटी' (Sleeping Beauty) कहैत छथि आ ओकर पुनरुत्थानपर बल दैत छथि, जाहिसँ सांस्कृतिक परतन्त्रता (Loss of soul) सँ बचल जा सकय। ठेठी-अंगिका आ बज्जिका, जकरा मुख्यधारा द्वारा मात्र 'बोली' कहि कऽ सदिखन उपेक्षित कएल गेल, ओकर व्याकरणिक मानकीकरण (Standardization) आ शब्द-संरचना ई पोथी जुकरमैनक 'Revivalistics' क तर्जपर करैत अछि। पोथीक अध्याय ८९३ (Language Ecology / भाषा-पारिस्थितिकी) मे जीवन्तता (Vitality) आ पीढ़ीगत हस्तांतरण (Intergenerational Transmission) क जे चर्चा अछि, ओ सोझे इस्रायली पुनरुज्जीवन सिद्धान्तसँ प्रेरित अछि। नव शब्द बनाबय (Neologization) क प्रक्रियामे पोथीक 'अभ्यास L' (नव शब्द बनाबय सँ पहिने) इस्रायली 'लेक्सिकल इन्जीनियरिंग' (Lexical Engineering) क व्यावहारिक प्रयोग थिक। भारतीय आ पाश्चात्य समीक्षा-सिद्धान्तक अन्य प्रयोग विदेह समीक्षा-पद्धति भारतीय परम्परा (भरतमुनिक नाट्यशास्त्र, रस, ध्वनि, औचित्य आ वक्रोक्ति) क उपयोग नव-उपनिवेशवादी (Post-colonial) आ सबाल्टर्न (Subaltern) दृष्टिक संग करैत अछि। भर्तृहरिक 'वाक्यपदीय' मे वर्णित 'स्फोटवाद' (Sphota Theory) ई मानैत अछि जे अर्थक उत्पत्ति कोनो एक ध्वनि वा वर्णसँ नहि, अपितु सम्पूर्ण वाक्यक अखण्ड बोध (Meaning of Meaning) सँ होइत अछि। पोथीक अध्याय ८९९ मे 'व्याकरणीकरण' (Grammaticalization) आ शब्दार्थीसँ व्याकरणिक कार्य (Lexical to Grammatical Function) दिस जे यात्र अछि, ओ स्फोटवादक आधुनिक रूप थिक। पाश्चात्य सिद्धान्तमे जतय जर्गेन हेबरमासक 'पब्लिक स्फीयर' (Public Sphere) क चर्चा अछि, ई पोथी आ विदेह आर्काइभ मैथिली, बज्जिका आ अंगिकाक एकटा नव भाषिक 'पब्लिक स्फीयर' आ डिजिटल रेनेसां (Digital Renaissance) निर्माण करबाक सफल प्रयास अछि। भाग २ — खण्ड १: ठेठी-अंगिका व्याकरण आ रचना २.१ अध्याय १–२०क आधार-व्याकरण खण्ड १क पहिल क्रम अध्याय १ सँ २० धरि ठेठी-अंगिकाक परिचय, ध्वनि, शब्द-विचार, संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, अव्यय, समास, शब्द-निर्माण, वाक्य-विचार, गद्य, पद्य, मुहावरा-लोकोक्ति, शब्द-अर्थ, अनुच्छेद-निबन्ध, पत्र, संवाद, छन्द आ अलंकारकेँ क्रमबद्ध करैत अछि। शिक्षण-शास्त्रीय दृष्टिसँ ई क्रम स्वाभाविक अछि: ध्वनि → शब्द → रूप → वाक्य → रचना → काव्य। आरम्भिक अध्यायसभमे स्थानीय रूपकेँ स्थानीय भाषामे समझेबाक प्रयास विशेष महत्त्वपूर्ण अछि। व्याकरणक परिभाषा, भाषा-परिवार, बोलबाक इलाका, सहभाषा-भेद, लिपि, पद-भेद, विकारी-अविकारी, स्वर-व्यंजन, उच्चारण-स्थान, शब्दक उत्पत्ति, लघु-गुरु-अतिरिक्त रूप, लिंग-वचन-कारक, सर्वनाम, विशेषण आ क्रिया-रूप—ई सभ प्राथमिक पाठक लेल एक ठोस आधार बनबैत अछि। मुदा पारम्परिक ध्वनि-वर्गीकरणक संग आधुनिक ध्वनिविज्ञानक IPA, ध्वनिक मापन आ क्षेत्रीय उच्चारण-भिन्नता आरम्भसँ जोड़ल जाए तँ बादक भाषा-विज्ञान खण्डसँ एकर सम्बन्ध अधिक स्वच्छ होयत। “उच्चारण-स्थान”क संस्कृत-आधारित वर्ग उपयोगी अछि, मुदा वास्तविक ध्वनि-नमूनाक रिकॉर्डिंग, न्यूनतम भेद आ वक्ता-भेद ओकर वैज्ञानिक पुष्टि करैत। २.२ क्रिया, श्रोता-सम्बन्ध आ अर्थक सूक्ष्मता मूल ठेठी-अंगिका उदाहरण: “ऊ खैलखौं? · ऊ खाय छौ।” बनाम “ऊ खैलकै? · ऊ खाय छै।” ठेठी-अंगिका क्रियामे श्रोता-संबन्धक चर्चा एहि खण्डक सबसँ रोचक अंशमे एक अछि। ई केवल “पुरुष”क पारम्परिक तालिका नहि, बल्कि सहभागिताक सामाजिक-व्याकरणिक प्रभाव देखबैत अछि। पाश्चात्य प्रयोगविज्ञान, जापानी प्रक्रिया-दृष्टि आ विदेह समानान्तर कसौटी—तीनू एहि बिन्दुकेँ उच्च प्राथमिकता देत। अगिला संस्करणमे श्रोता-सम्बद्धताक पूरा रूपावली, व्यक्ति/आदर/काल/पक्षसँ अन्तःक्रिया, क्षेत्रीय वितरण आ स्वाभाविक संवाद-उदाहरण जोड़ल जाए तँ ई स्वतन्त्र शोध-अध्ययनक विषय बनि सकैत अछि। मूल ठेठी-अंगिका उदाहरण: “गिलास में पानी छै।” आ “ई पानी छेकै।” “छै” आ “छेकै”क अस्तित्व/पहचान-भेदक प्रस्तुति सेहो अर्थविज्ञानक दृष्टिसँ महत्त्वपूर्ण अछि। एहि प्रकारक भेदकेँ केवल शब्दार्थक वाक्यसँ नहि, नकार, प्रश्न, जोर, काल, संदर्भ आ क्षेत्रीय प्रयोगसँ जाँचल जाए। यदि सब वक्ता एहि भेदकेँ समान रूपसँ नहि राखैत छथि, तँ “सामान्य नियम”क बदला “प्रवृत्ति” वा “क्षेत्रीय वितरण” लिखब अधिक वैज्ञानिक होयत। २.३ रचना-कला: अध्याय १२–२० गद्य-विधा, पद्य, मुहावरा-लोकोक्ति, शब्द-अर्थ, अनुच्छेद-निबन्ध, पत्र, संवाद, छन्द आ अलंकारक क्रम ठेठी-अंगिकाकेँ केवल बोलचालक भाषा मानबाक संकीर्ण दृष्टिक प्रतिरोध करैत अछि। भाषा जखन कथा, निबन्ध, संवाद, कविता आ आलोचनात्मक लेखन करए, तखन ओकर मानकीकरण केवल वर्तनीक प्रश्न नहि, विधागत सामर्थ्यक प्रश्न सेहो बनैत अछि। भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति दृष्टिसँ पद्य-अध्यायकेँ केवल छन्द-अलंकार सूचीपर सीमित नहि रखि पाठकीय अनुभूति, अप्रत्यक्ष अर्थ आ प्रसंग-संगति जोड़ल जा सकैत अछि। चीनी “रचना-विन्यास” दृष्टिसँ गद्य-अध्यायमे आरम्भ-मध्य-अन्त, अनुच्छेद-संगति, छवि, लय आ शैलीक अभ्यास बढ़ाओल जा सकैत अछि। २.४ अध्याय २०क बादक विस्तृत व्यवहारिक पुनर्संरचना अध्याय १–२०क बाद पोथी ठेठी-अंगिकाकेँ फेर “व्यवहारिक संदर्भ-पोथी” रूपमे पाँच भागमे व्यवस्थित करैत अछि: भाषा-ध्वनि-लिखाय; शब्द-रूप; वाक्य-विचार; रचना-कला; अभ्यास आ सहायक सामग्री। एतय मानक आ क्षेत्रीय रूप, वर्तनी, क्रिया, काल-पक्ष-भाव, सामंजस्य, अंग्रेजीसँ तुलना, सम्पादन, उत्तरमाला, शैली-पत्र आ स्रोत-सूची जोड़ल गेल अछि। शिक्षणक दृष्टिसँ ई दोसर प्रस्तुति पहिल अध्याय-क्रमक विस्तार अछि, मुदा पुस्तक-संरचनामे ई पुनरावृत्ति पाठककेँ भ्रमित कऽ सकैत अछि। अगिला संस्करणमे पहिल २० अध्यायकेँ “संक्षिप्त पाठ्यक्रम” आ बादक पाँच भागकेँ “विस्तृत सन्दर्भ संस्करण” नाम दऽ क्रॉस-सन्दर्भ देल जाए। एहि सँ दोहराव दोष नहि, उद्देश्यपूर्ण स्तर-विन्यास बनि जाएत। २.५ खण्ड १क निर्णय ठेठी-अंगिका खण्डक मूल उपलब्धि अपन भाषिक रूपकेँ अपन व्याकरणिक गरिमा देब अछि। एकर सबसँ मजबूत विषय क्रिया-व्यवस्था, श्रोता-सम्बन्ध, स्थानीय शब्द-रचना, परसर्ग-निपात, क्षेत्रीय रूप आ व्यवहारिक रचना अछि। मुख्य सुधार-क्षेत्र ध्वनिवैज्ञानिक प्रमाण, मानकीकरणक सामाजिक आधार, क्षेत्रीय रूपक मेटाडेटा, प्रारम्भिक नियमसभक स्रोत-टैगिंग आ दोहरावक सम्पादकीय मानचित्र अछि। ठेठी-अंगिका खण्डक पूरक वर्णनात्मक-मूल्यांकन खण्ड एक — ठेठी-अंगिका: व्याकरण आ रचना पहिल खण्ड ठेठी-अंगिकाकेँ इंडो-यूरोपीय → इंडो-ईरानी → इंडो-आर्य → पूर्वी इंडो-आर्य (मागधी वर्ग) → बिहारी उपवर्गक भाषाक रूपमे स्थापित करैत अछि, आ ग्रियर्सन (१९०३) क 'छिका-छिकी' पहिचानसँ लऽ कऽ आजुक झारखण्ड-राजभाषा-स्थिति धरिक इतिहास संक्षेपमे दैत अछि। एकर सभसँ प्रशंसनीय बात ई थिक जे व्याकरण अंगिकाकेँ बाहरसँ नहि, अपितु स्वयं अंगिका-गद्यमे बुझबैत अछि — 'व्याकरण भाषा-प्रयोग के संविधान छेकै', 'ठेठी-अंगिका में "है" के मतलब लेली छिकै/छेकै/छै क्रिया के व्यवहार होय छै' — ई आत्म-वर्णनक शैली भाषाक स्वायत्ततेकेँ रूपमे स्थापित करैत अछि। अंगिका आदर-रूपक नमूना (ग्रन्थसँ): 'हम्में अपने पढ़ै छी। ' · 'अपनें बोलियै नी। ' · आदर: इनी/हिनी (नगीच), हुनी/हुन्ही (दूर)। कर्ता: हम, हमें, हम्में, हमरा। खण्डक भाग-एक (व्याकरण, अध्याय १–१७) विकारी/अविकारी शब्द, स्वर-मात्रा-नासिक्यता, व्यंजन-उच्चारण, संज्ञा-लिंग-वचन, कारक-उत्तरसर्ग, सर्वनाम-आदर, क्रियाक काल-पक्ष-भाव, आ शब्द-रचना धरिकेँ समेटैत अछि; भाग-दुइ (रचना, अध्याय १८ आगाँ) वाक्य-विचार, अनुच्छेद, पत्र, निबन्ध, संवाद, समाचार, सार-लेखन, अनुवाद आ सम्पादनकेँ। अध्याय ४१ मे देल 'लेखनक शैली-पत्र' आ अध्याय ४२ मे 'स्रोत आ सम्पादकीय सीमा' — ई दुनू अध्याय ग्रन्थकारक प्रामाणिकता-चेतनाक प्रमाण थिक: ओ अपन आधार-ग्रन्थ आ ओकर सीमा दुनू स्पष्ट स्वीकारैत छथि। प्रारम्भिक मूल्यांकन: खण्ड एक शिक्षण-दृष्टिसँ सुगठित, आत्म-प्रामाणिक आ आधार-ग्रन्थ-निष्ठ अछि। सीमा ई जे ई मुख्यतः एके आधार-ग्रन्थ (अमरेन्द्र–पूर्वे) पर निर्भर अछि; तेँ जतय ओहि ग्रन्थमे विवाद वा अपूर्णता अछि, ओ एतहु प्रतिबिम्बित होयत। ग्रन्थकार स्वयं ई स्वीकारि 'अकादमिक दावाक स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक' लिखैत छथि — ई ईमानदारी प्रशंसनीय। भाग ३ — खण्ड २: बज्जिका व्याकरण आ रचना ३.१ चौदह भाग आ तीन परिशिष्टक संरचना बज्जिका खण्ड पहिल रूपमे चौदह भाग बनबैत अछि: भूमिका; ध्वनि-विचार; संज्ञा; सर्वनाम; विशेषण; गिनती आ संख्या-शब्द; क्रिया; क्रिया-विशेषण; परसर्ग आ निपात; समुच्चयबोधक; विस्मयादिबोधक; वाक्य-रचना; शब्द-रचना; रचना। एकर बाद मुहावरा-कहावत कोश, बज्जिका-हिन्दी शब्दकोश आ अभ्यास-पुस्तिका तीन परिशिष्ट रूपमे अछि। ई संरचना पारम्परिक व्याकरणक संग शब्दभण्डार आ व्यवहारिक अभ्यास जोड़ैत अछि। बज्जिकाक रचना-भाग भाषा-मानकीकरण लेल खास महत्त्वपूर्ण अछि, कारण लिखित परम्पराक विस्तार बिना मानक केवल नियम-पुस्तकमे रहि जाएत। पत्र, निबन्ध, संवाद, समाचार, सार, अनुवाद जकाँ विधा लिखित प्रयोगक वास्तविक क्षेत्र बनबैत अछि। ३.२ मानक बनाम क्षेत्रीय रूप मूल पोथीमे देखाओल क्षेत्रीय/वैकल्पिक रूपक उदाहरण: “हए/हइ/छै; सभ/सब; रउआ/रउरा; हमर/हमार” ई प्रकारक रूप-भिन्नता बज्जिका खण्डक शक्ति सेहो अछि आ सबसँ कठिन सम्पादकीय प्रश्न सेहो। पाश्चात्य समाजभाषाविज्ञान कहत जे रूपक वितरण “त्रुटि” नहि, सामाजिक-भौगोलिक डेटा अछि। इस्रायली मानदण्ड-दृष्टि कहत जे लिखित मानक चयन समुदायिक स्वीकृति, प्रकाशन, शिक्षा आ प्रतिष्ठासँ जुड़ल अछि। विदेह समानान्तर पद्धति कहत जे प्रत्येक रूपक संग स्रोत, ठाम, वक्ता आ प्रसंग लिखल जाए। एहि आधारपर पोथीक मुख्य लिखित रूप चुनबाक नीति व्यवहारिक अछि, मुदा “मानक” शब्दक संग पद्धति स्पष्ट हेबाक चाही: चयनक आधार पारस्परिक बोधगम्यता, भौगोलिक विस्तार, साहित्यिक प्रयोग, शिक्षण-सुगमता, ऐतिहासिक परम्परा, वा संस्थागत स्वीकृति—कोन-कोन अछि? ई प्रश्नक उत्तर लिखित प्रस्तावनाकेँ वैज्ञानिक आधार देत। ३.३ सर्वनाम, आदर, क्रिया आ संवाद बज्जिका उदाहरण: “रउआ कहाँ जा रहल हई?” बज्जिकामे रउआ/रउरा जकाँ आदरसूचक सर्वनाम, हमर/हमार जकाँ सम्बन्ध-रूप, सहायक क्रियाक क्षेत्रीय रूप आ निषेधक भिन्नता सामाजिक व्याकरणक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र अछि। जापानी कण-आ-अन्तरव्यक्तिक सम्बन्धक अध्ययन आ तोकिएदाक प्रक्रिया-दृष्टि एहि खण्डकेँ केवल रूप-तालिकासँ आगाँ लऽ जाइत अछि: कोन वक्ता कोन सुननिहारसँ कोन रूप चुनैत अछि? संवाद-अध्यायमे एहन सामाजिक परिदृश्यक न्यूनतम जोड़ी देल जाए तँ शिक्षण आ शोध दुनू लाभान्वित होयत। ३.४ पाँच-भागीय विस्तृत व्यवहारिक संस्करण खण्डमे बादमे बज्जिकाक फेर विस्तृत पाँच-भागीय ढाँचा भेटैत अछि—भाषा/ध्वनि/लिखाइ; शब्द/रूप; वाक्य-विचार; रचना; अभ्यास/उत्तर/सारणी। ई पुनर्संरचना पहिल चौदह भागक सामग्रीकेँ आधुनिक व्यावहारिक क्रममे व्यवस्थित करैत अछि। एतय वर्तनी, रूप-विन्यास, वाक्य, प्रश्न, सम्बन्ध, रचना आ सहायक तालिका अधिक व्यवस्थित रूप लैत अछि। सम्पादकीय दृष्टिसँ एहि दुनू संस्करणक सम्बन्ध स्पष्ट कएल जाए। एक सम्भव उपाय: चौदह भागक संक्षिप्त व्याकरणकेँ “आधार-पाठ” आ पाँच-भागीय संस्करणकेँ “विस्तृत संदर्भ आ अभ्यास” कहब। पुनरुक्त नियमपर “देखू: आधार-पाठ, भाग...” जकाँ संकेत देल जाए। ३.५ खण्ड २क निर्णय बज्जिका खण्डक मुख्य उपलब्धि भाषा-रूपक प्रणालीकरण, आदर-सर्वनाम, क्रिया, परसर्ग, वाक्य आ रचनाकेँ एक पाठ्यक्रममे आनब अछि। मुख्य सुधार क्षेत्र: क्षेत्रीय विविधताक प्रमाण-नक्शा, मानक चयनक स्पष्ट नीति, ध्वनि-रिकॉर्डिंग, स्वाभाविक संवाद, शब्दकोशीय प्रविष्टिमे स्रोत-सूचना, आ दोसर व्यवहारिक संस्करणक संरचनात्मक एकीकरण। बज्जिका खण्डक पूरक समीक्षा: व्याकरण, कोश, लोकोक्ति आ समाजभाषिक सन्दर्भ खण्ड दुइ — बज्जिका: व्याकरण, कोश आ लोकोक्ति बज्जिका-खण्ड बारह भाग (परिचय, ध्वनि-विचार, संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, गिनती, क्रिया, क्रिया-विशेषण, परसर्ग-निपात, समुच्चयबोधक, विस्मयादिबोधक, वाक्य-रचना) आ तीन विस्तृत परिशिष्ट (मुहावरा-कहावत-कोश, बज्जिका–हिन्दी शब्दकोश, अभ्यास-पुस्तिका) मे विभक्त अछि। एकर सभसँ मूल्यवान् अंश दुइ थिक — एक, प्रयोग-मूलक आदर-प्रणालीक निरूपण, आ दुइ, विशाल शब्दकोश-परिशिष्ट। बज्जिका आदर-क्रम (ग्रन्थसँ): 'तूँ' (आम) बनाम 'रउआ/अहाँ' (आदर)। क्रिया-रूप ('खा-' धातु, सामान्य वर्तमान): हम — खाइले · तूँ — खालs · अपने — खाइले · ऊ (एक) — खाले · ऊ (बहु) — खालन। ई क्रिया-रूपावली एकटा गूढ़ भाषिक तथ्यकेँ उजागर करैत अछि: बज्जिका क्रियामे आदर आ पुरुष केवल व्याकरणिक नहि, अपितु प्रयोग-मूलक (pragmatic) रूपेँ अंकित होइत अछि — जकर पुष्टि ग्रन्थक सन्दर्भ-सूचीमे उद्धृत काश्यप (Kashyap 2012, Journal of Pragmatics) आ काश्यप–याप (2017, Linguistics) क शोधसँ होइत अछि। ग्रन्थकारक 'शून्य-कल्पन (zero-hallucination) नीति' एतय स्पष्ट दृश्य अछि: ओ बेर-बेर लिखैत छथि — 'ए निष्कर्ष के अउर वक्ता/कॉर्पस से जाँच बाकी हए' — अर्थात् जतय प्रमाण कम, ओतय दाबी कम। परिशिष्ट-दुइक बज्जिका–हिन्दी शब्दकोश (सङ्ख्यामे विशाल) आ परिशिष्ट-एकक कहावत-कोश (नारी-विषयक, धन-घमण्ड-विषयक, व्यवहार-नीति आदि वर्गमे विभक्त) लोक-प्रज्ञाक अभिलेख थिक। एतय एकटा समीक्षात्मक सतर्कता आवश्यक: 'नारी-विषयक' लोकोक्तिमे प्रायः पितृसत्तात्मक मूल्य अन्तर्निहित रहैत अछि; ग्रन्थ हिनका अभिलेखित करैत अछि, जे भाषा-वैज्ञानिक दृष्टिसँ उचित (लोक-भाषाक तथ्य), मुदा भविष्यक संस्करणमे एहन सामग्रीक संग एकटा आलोचनात्मक टिप्पणी जोड़ब समीचीन हएत — विशेषतः विदेह-आन्दोलनक स्त्री-स्वर-पक्षधर घोषणाक संगतिमे। प्रारम्भिक मूल्यांकन: बज्जिका-खण्ड आँकड़ा-निष्ठ आ कोश-समृद्ध अछि। एकर पद्धतिगत विनम्रता (जतय डेटा कम, ओतय स्पष्ट स्वीकृति) अनुकरणीय। ठेठी-अंगिका आ बज्जिकाक समाजभाषाविज्ञान आ व्याकरण भाषा-विज्ञानक इतिहासमे सर जर्ज अब्राहम ग्रियर्सन (George Abraham Grierson) अपन 'लिङ्गुइस्टिक सर्वे अफ इण्डिया' (Linguistic Survey of India - LSI, 1903) मे अंगिका (जकरा ओ छिका-छिकी कहलनि) आ बज्जिका (पश्चिमी मैथिली) केँ मैथिलीक उपभाषा (Dialect) मानलनि छल। मुदा कालान्तरमे भाषा, जाति आ पहिचान (Identity) क प्रश्न उठल, आ ई सीमान्तकृत समूहसभ अपन स्वतन्त्र भाषिक पहिचान लेल संघर्ष करय लागल। ई पोथी (अध्याय ६९४ सँ) स्पष्ट करैत अछि जे भाषा आ सहभाषाक भेद पूर्णतः सामाजिक थिक। बज्जिका आ ठेठी-अंगिकाक व्याकरणिक आ ध्वन्यात्मक उदाहरण (शुद्ध देवनागरी फॉन्टमे) ई पोथी देवनागरीक पूर्णतः शुद्ध आ मानकीकृत रूपमे (जाहिमे फॉन्ट रेन्डरिंगक कोनो त्रुटि नहि अछि) बज्जिका आ ठेठी-अंगिकाक रूपवैज्ञानिक उदाहरण प्रस्तुत करैत अछि। बज्जिकाक विशिष्टता आ उदाहरण: बज्जिका (वैशाली, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, शिवहर, समस्तीपुर आ नेपालक रौतहट, सर्लाही मे बाजल जाय वला भाषा) मे ८ टा स्वर आ ३० टा व्यंजन अछि। एहिमे व्यंजन-द्वित्व (Gemination) क प्रचुरता अछि, जेना: 'मज्जिल' (मृत्यु-यात्रा), 'हम्मर' (हमर), 'निम्मन' (नीक)। वाक्य प्रयोग: "राम घर जा रहल है।" (राम घर जा रहल अछि)। सर्वनाम आ आदर: "हमनी" (हमसब), आदरसूचक "रउआ" (आदरसूचक आप/अपने)। ठेठी-अंगिकाक विशिष्टता आ उदाहरण: अंगिका (भागलपुर, मुंगेर, बाँका, दुमका क्षेत्रमे बाजल जाय वला भाषा) मे विशिष्ट सर्वनाम आ प्रत्ययक व्यवहार होइत अछि। वाक्य प्रयोग: "हम जायछी।" (हम जा रहल छी)। "हम गेलीये।" (हम गेलहुँ)। "ई की छिकै।" (ई की थिक/अछि)। भाषा-सम्पर्क आ संरचनागत परिवर्तन (Language Contact & Structural Change) समाजभाषिक अध्ययनक (विशेष कऽ अध्याय ८९२ आ ८८८ क) परिप्रेक्ष्यमे एकटा क्रान्तिकारी तथ्य सोझाँ अबैत अछि। बज्जिका मूल रूपसँ मैथिलीक अङ्ग (पश्चिमी मैथिली) रहितो, वर्तमानमे सामाजिक-राजनीतिक कारणसँ अपन संरचनामे परिवर्तन कऽ रहल अछि। अध्ययन स्पष्ट करैत अछि जे बज्जिका भाषीसभ (विशेषतः युवा पीढ़ी) अपन भाषाकेँ मैथिल ब्राह्मणक सांस्कृतिक आ भाषिक आधिपत्यसँ दूर करबाक लेल (Distancing strategy) पश्चिमी भाषा भोजपुरीक व्याकरणिक तत्त्वसभकेँ अपना रहल छथि। पहिने बज्जिकाक सहायक क्रिया मैथिली जकाँ 'छ' (chh) छल आ भूतकालक चिह्नन शून्य वा भिन्न छल, मुदा आब युवा बज्जिका भाषीसभ भोजपुरीक सहायक क्रिया 'हवे' (hawe) आ वर्तमान/भूतकालिक प्रत्यय '-ल' (-la) क प्रयोग कऽ रहल छथि (लगभग २०-२२% प्रयोगमे ई नव रूप आबि रहल अछि)। ई 'Language Contact' (भाषा-संपर्क), 'Diffusion' (प्रसार) आ 'Structural Convergence' (संरचनात्मक अभिसरण) क साक्षात् आ ज्वलन्त उदाहरण थिक। ई मात्र भाषिक परिवर्तन नहि, अपितु पहिचान आ भाषा-भावना (Language Attitude) क एकटा गम्भीर सामाजिक संघर्ष अछि जकरा ई पोथी निष्पक्षतासँ दर्ज करैत अछि। भाग ४ — खण्ड ३: मैथिली व्याकरण आ रचना, अध्याय २१–६९३ ४.१ अध्याय २१–४३: पारम्परिक आधार अध्याय २१–४३ भाषा-परिचय, वर्णमाला, उच्चारण, सन्धि, शब्द, संज्ञा, लिंग, वचन, कारक, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, क्रियाविशेषण, अव्यय, वाक्य-संरचना, वाच्य, वाक्य-प्रकार, पत्र, निबन्ध, संवाद-अनुवाद-सार, विराम-चिह्न, छन्द आ अलंकारक आधार बनबैत अछि। ई पारम्परिक शिक्षण-क्रम छात्रकेँ परिचित व्याकरणिक शब्दावली दैत अछि। भारतीय दृष्टिसँ ई भाग शिक्षणोपयोगी अछि, मुदा आधुनिक भाषा-विज्ञानक दृष्टिसँ किछु पारम्परिक श्रेणीकेँ पुनः परिभाषित करब उचित होयत। उदाहरणार्थ “कारक”क अर्थगत भूमिका आ वास्तविक परसर्ग-चिह्न, “लिंग”क व्याकरणिक/सामाजिक अर्थ, “वाच्य”क रूपात्मक बनाम प्रवचनात्मक उपयोग, आ “सन्धि”क शास्त्रीय नियम बनाम आधुनिक उच्चारण—ई भेद स्पष्ट रहए। ४.2 अध्याय 44–61: भाषा, वाक्य आ सामाजिक सम्बन्ध एहि समूहमे भाषा, व्याकरण, वाक्य, पद, पदसमूह, उपवाक्य, अर्थ, रचना आ सामाजिक सम्बन्धक आधार विकसित होइत अछि। विशेष महत्त्व ई जे व्याकरणकेँ सामाजिक सम्बन्धसँ जोड़ा गेल अछि। ई भारतीय वाक्यार्थ-दृष्टि, हॉलिडे प्रकार्यात्मकता आ तोकिएदाक अन्तरव्यक्तिक भाषा-दृष्टि बीच सेतु बनि सकैत अछि। “शुद्ध वाक्य”क कसौटी केवल नियम नहि, प्रसंग, उद्देश्य आ श्रोता अनुरूपता सेहो होयत। सीमा-सत्यापन: अध्याय 44 “भाषा, व्याकरण आ रचना” सँ आरम्भ भऽ अध्याय 61 “शुद्ध वाक्य बनाबयक पाँच आधार” धरि ई समीक्षा-समूह पहुँचैत अछि। ४.3 अध्याय 62–89: संज्ञा, वचन, कारक, सर्वनाम आ आदर संज्ञा-विन्याससँ सर्वनामक अंग्रेजी तुलना धरि ई समूह नाम-पदसमूहक विस्तार करैत अछि। मैथिलीक बहुवचन, वर्गक, परसर्ग, व्यक्ति, आदर, संकेत, निजवाचक आ सम्बन्धवाचक रूपक विश्लेषण भाषा-विशिष्ट डेटा लेल महत्त्वपूर्ण अछि। विदेह समानान्तर दृष्टिसँ एहि रूपसभक ठेठी-अंगिका आ बज्जिकासँ एक्के अर्थ-उद्बोधनपर तुलना विशेष फलदायी होयत। सीमा-सत्यापन: अध्याय 62 “संज्ञाक विस्तृत स्वरूप” सँ आरम्भ भऽ अध्याय 89 “सर्वनामक सामान्य अशुद्धि आ सुधार” धरि ई समीक्षा-समूह पहुँचैत अछि। ४.4 अध्याय 90–124: क्रिया, काल-पक्ष-भाव, सहायक क्रिया आ तुलना क्रियामूल, सकर्मकता, काल-पक्ष-भाव, सहायक क्रिया, सामंजस्य, निषेध, विधि, संयुक्त क्रिया, infinitive-सदृश रूप आ अंग्रेजी तुलना—ई समूह आधुनिक व्याकरणक मुख्य मेरुदण्ड अछि। पाणिनीय रूप-सूक्ष्मता आ पश्चिमी TAM विश्लेषण दुनूक संग ई अंश पढ़ल जा सकैत अछि। मुख्य आवश्यकता प्रत्येक रूपक स्वाभाविक उदाहरण, नकार/प्रश्नक परीक्षण, आदर-स्तर आ क्षेत्रीय वितरण होयत। सीमा-सत्यापन: अध्याय 90 “क्रिया की?” सँ आरम्भ भऽ अध्याय 124 “अंग्रेजी adjective/determiner प्रणालीसँ तुलना” धरि ई समीक्षा-समूह पहुँचैत अछि। ४.5 अध्याय 125–160: क्रियाविशेषण, निपात, परसर्ग, समुच्चय आ बल एहि समूहमे छोट शब्दसभ—क्रियाविशेषण, निपात, परसर्ग, संयोजक, बलसूचक रूप—अर्थ आ वाक्य-सम्बन्धक केन्द्र बनैत अछि। जापानी तेनिओहा परम्परा आ तिब्बती सम्बन्धसूचक व्याकरण एहि खण्डक आलोचनात्मक मूल्य बढ़बैत अछि। कणक स्थान बदललासँ फोकस, अर्थ वा विनम्रता बदलैत अछि कि नहि—एहन न्यूनतम जोड़ी आर बेसी देल जाए। सीमा-सत्यापन: अध्याय 125 “क्रियाविशेषण की?” सँ आरम्भ भऽ अध्याय 160 “सामान्य अशुद्धि आ सुधार” धरि ई समीक्षा-समूह पहुँचैत अछि। ४.6 अध्याय 161–203: वाक्य-प्रकार, प्रश्न, सूचना-संरचना, वाच्य आ कथन विधान, प्रश्न, आदेश, निषेध, सूचना-संरचना, रूपान्तरण, वाच्य, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कथन आ उद्धरणक समूह व्याकरणकेँ प्रवचनक दिशामे लऽ जाइत अछि। ऑस्टिन-ग्राइस दृष्टिसँ वाक्य-प्रकारक वास्तविक भाषिक क्रिया—आज्ञा, विनती, सुझाव, व्यंग्य—भिन्न हो सकैत अछि। एहि कारण रचना-भागक संवादसँ क्रॉस-सन्दर्भ उपयोगी होयत। सीमा-सत्यापन: अध्याय 161 “वाक्य-प्रकारक आधुनिक दृष्टि” सँ आरम्भ भऽ अध्याय 203 “मिश्रित कथन आ उद्धरण” धरि ई समीक्षा-समूह पहुँचैत अछि। ४.7 अध्याय 204–260: उपवाक्य आ शब्द-निर्माण मुख्य-अधीनस्थ, पूरक, सम्बन्धवाचक, क्रियाविशेषणीय, शर्तीय उपवाक्यसँ उपसर्ग-प्रत्यय, समास, पुनरुक्ति, आगत शब्द आ तकनीकी शब्द-निर्माण धरि ई समूह वाक्य आ शब्द दुनू स्तरक उत्पादकता देखबैत अछि। बाहरी श्रेणीसँ तुलना उपयोगी अछि, मुदा मैथिलीक आफ्ना निर्माण-ढाँचा पहिने वर्णित होय। तकनीकी शब्द गढ़ैत समय प्रचलन, पारदर्शिता, संक्षिप्तता आ समुदाय-स्वीकृति चारि कसौटी रहए। सीमा-सत्यापन: अध्याय 204 “मुख्य उपवाक्य आ अधीनस्थ उपवाक्य” सँ आरम्भ भऽ अध्याय 260 “अंग्रेजी word formation सँ व्यावहारिक तुलना” धरि ई समीक्षा-समूह पहुँचैत अछि। ४.8 अध्याय 261–323: वर्तनी, देवनागरी, सम्पादन आ अनुच्छेद शुद्ध लेखन, देवनागरी, विराम, सम्पादन, डिजिटल लेखन, शैली-पत्र, वाक्य-सुधार, अनुच्छेद-विकास आ संगतिक ई विस्तृत समूह व्याकरणकेँ वास्तविक प्रकाशन-कौशलसँ जोड़ैत अछि। ई पोथीक व्यवहारिक विशेषता अछि। अगिला संस्करणमे तिरहुता, देवनागरी आ डिजिटल यूनिकोड रूपक cross-script दिशानिर्देश, खोज/कॉपी-पेस्ट जाँच आ accessibility जाँच जोड़ल जा सकैत अछि। सीमा-सत्यापन: अध्याय 261 “शुद्ध लेखनक मूल सिद्धान्त” सँ आरम्भ भऽ अध्याय 323 “कमजोर अनुच्छेदक सम्पूर्ण सुधार” धरि ई समीक्षा-समूह पहुँचैत अछि। ४.9 अध्याय 324–397: रचना-विधा, तर्क, समीक्षा आ शैक्षिक लेखन कथा-वर्णन, पत्र, ई-पत्र, सूचना, समाचार, सार, निबन्ध, तर्कपूर्ण लेख, दावा-प्रमाण, तर्कदोष, समीक्षा, भाषण, सम्पादकीय, प्रस्ताव, बैठक-वृत्त, जीवनी आ शैक्षिक लेखन—ई समूह पोथीक साहित्यिक-व्यावहारिक हृदय अछि। भारतीय औचित्य, ध्वनि, वक्रोक्ति; चीनी रचनात्मक विन्यास; पाश्चात्य rhetoric आ discourse—सभ एहि ठाम प्रयोज्य अछि। “लेखन = विषय + पाठक + उद्देश्य + शैली + प्रमाण + संशोधन”क सूत्र एहि समूहसँ निकलैत अछि। सीमा-सत्यापन: अध्याय 324 “रचनाक उद्देश्य, पाठक आ स्वर” सँ आरम्भ भऽ अध्याय 397 “उन्नत रचनाक सम्पादकीय जाँच” धरि ई समीक्षा-समूह पहुँचैत अछि। ४.10 अध्याय 398–477: शैली, रजिस्टर, अर्थ, शब्द-संबन्ध आ संदर्भ शैली, रजिस्टर, सामाजिक दूरी, सटीकता, अस्पष्टता, लय, मुहावरा, लोकोक्ति, अलंकार, विधा, शैली-परिवर्तन, बहुअर्थकता, पर्याय, विलोम, शब्द-क्षेत्र, सहप्रयोग, रूपक, संदर्भ आ अर्थ-जाँच—ई समूह साहित्यशास्त्र आ अर्थविज्ञानकेँ जोड़ैत अछि। ध्वनि/वक्रोक्ति आ प्रयोगविज्ञानक दृष्टि एतय खास उपयुक्त अछि। शब्दकोशीय अर्थकेँ कॉर्पस-सहप्रयोगसँ पुष्ट करब भविष्यक महत्त्वपूर्ण दिशा होयत। सीमा-सत्यापन: अध्याय 398 “शैली की अछि?” सँ आरम्भ भऽ अध्याय 477 “व्यावहारिक अर्थ-जाँचसूची” धरि ई समीक्षा-समूह पहुँचैत अछि। ४.11 अध्याय 478–574: ध्वनिविज्ञान, उच्चारण, पठन, सम्पादन आ प्रकाशन-जाँच ध्वनि, उच्चारण-अंग, ध्वनिम, अक्षर, लय, स्वराघात, पठन, रिकॉर्डिंगसँ सम्पादन, प्रूफ-पठन, पृष्ठ-सज्जा, तालिका, उद्धरण, सन्दर्भ, फॉण्ट, PDF/चित्र दृश्य-जाँच, संस्करण-नियन्त्रण आ सम्पादकीय नैतिकता धरि ई समूह भाषिक सामग्रीक “जीवन-चक्र” प्रस्तुत करैत अछि। “तथ्य नहि बदलू, लेखकक आशय नहि बिगाड़ू, आवश्यक सामग्री नहि हटाउ, नब दावा नहि जोड़ू” जकाँ सिद्धान्त सम्पादकीय नैतिकताक मजबूत आधार अछि। सीमा-सत्यापन: अध्याय 478 “ध्वनि, अक्षर आ ध्वनिम” सँ आरम्भ भऽ अध्याय 574 “अन्तिम सम्पादकीय जाँचसूची” धरि ई समीक्षा-समूह पहुँचैत अछि। ४.12 अध्याय 575–620: समेकित निदान, पुनरावृत्ति, अभ्यास आ मूल्यांकन एहि समूहमे भाषा-दोषक स्तर-निर्णय, संज्ञा-सर्वनाम-क्रिया-वाक्यक पुनरावृत्ति, अभ्यास, प्रश्नपत्र, उत्तर-रूपरेखा आ स्व-मूल्यांकन अछि। शिक्षणक दृष्टिसँ ई mastery learning काज करैत अछि। बेहतर संस्करणमे प्रत्येक अभ्यासकेँ सीखबाक लक्ष्य, कठिनाई-स्तर, मॉडल उत्तरक तर्क आ सामान्य भूलक निदानसँ टैग कएल जाए। सीमा-सत्यापन: अध्याय 575 “समेकित निदान: भाषा-दोष कोन स्तरक?” सँ आरम्भ भऽ अध्याय 620 “स्व-मूल्यांकन सूची” धरि ई समीक्षा-समूह पहुँचैत अछि। ४.13 अध्याय 621–676: त्वरित सन्दर्भ, प्रारूप, त्रुटि-सूची, शब्दावली आ स्व-परीक्षण ई खण्ड पाठककेँ विशाल पोथी भीतर शीघ्र लौटबाक सुविधा दैत अछि। त्वरित सारणी, रचना-प्रारूप, सामान्य त्रुटि, शब्दावली आ स्व-परीक्षण व्यवहारिक संदर्भ-पुस्तक लेल आवश्यक अछि। डिजिटल संस्करणमे एहि भागकेँ हाइपरलिंक, खोज-शब्द, downloadable forms आ machine-readable glossary सँ जोड़ल जा सकैत अछि। सीमा-सत्यापन: अध्याय 621 “एहि सन्दर्भ-खण्डक उपयोग” सँ आरम्भ भऽ अध्याय 676 “त्वरित स्व-परीक्षणक उत्तर” धरि ई समीक्षा-समूह पहुँचैत अछि। ४.14 अध्याय 677–693: संरचनात्मक मानचित्र, अनुक्रमण, अन्तिम जाँच आ पुस्तक-समापन अन्तिम समूह पूरा ग्रन्थक संरचनात्मक मानचित्र, पुनरावृत्ति-जाँच, पारिभाषिक एकरूपता, अनुक्रमणिका, अन्तिम सम्पादकीय निरीक्षण आ समापन करैत अछि। विशाल कृतिक लेल ई self-audit आवश्यक अछि। मुदा एहि audit केँ chapter-source matrix, terminology registry आ duplicate-map जकाँ स्पष्ट तालिकासँ आर कठोर बनाओल जा सकैत अछि। सीमा-सत्यापन: अध्याय 677 “पूरा ग्रन्थक संरचनात्मक मानचित्र” सँ आरम्भ भऽ अध्याय 693 “पुस्तक-समापन” धरि ई समीक्षा-समूह पहुँचैत अछि। ४.१५ खण्ड ३क समेकित निर्णय मैथिली खण्डक असाधारण शक्ति एकर विस्तार आ चरणबद्ध व्यावहारिकता अछि। पारम्परिक व्याकरणसँ शुरू भऽ आधुनिक वाक्यविज्ञान, अर्थविज्ञान, प्रयोगविज्ञान, शैली, रचना, सम्पादन, ध्वनिविज्ञान, प्रकाशन-जाँच आ स्वमूल्यांकन धरि पहुँचब मैथिलीमे एक “पूर्ण भाषा-कौशल प्रणाली” बनबाक दिशा देखबैत अछि। मुख्य जोखिम विशालता अछि। अध्याय संख्या ६९३ धरि पहुँचबाक कारण पाठककेँ स्पष्ट मार्ग-रेखा चाही—आरम्भिक, मध्यवर्ती, उन्नत, शोध-स्तर। पुनरावृत्ति जँ जानि-बुझि spiral learning लेल अछि, तँ ओकरा चिन्हित कएल जाए; जँ अनावश्यक पुनरावृत्ति अछि, तँ विलय कएल जाए। प्रत्येक उन्नत दावाक संग स्रोत-टैगिंग आ कॉर्पस/क्षेत्रकार्य प्रमाण जोड़ल जाए तँ खण्ड ३ शिक्षण-पुस्तकसँ शोध-सन्दर्भ-पुस्तक धरि सहज रूपेँ उन्नत होयत। मैथिली खण्डक पूरक वर्णनात्मक-मूल्यांकन खण्ड तीन — मैथिली: व्याकरण आ रचना (अध्याय २१–६९३) ई ग्रन्थक सभसँ पैघ आ केन्द्रीय खण्ड थिक। एकर पहिल एकक (अध्याय २१–४३) परम्परागत व्याकरण-शिक्षणक क्रममे चलैत अछि — भाषा-व्याकरण-परिचय, वर्णमाला, उच्चारण-ध्वनि-नियम, सन्धि, शब्द-विचार, संज्ञा, लिंग, वचन, कारक, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, क्रियाविशेषण, अव्यय, वाक्य-संरचना-पदक्रम, वाच्य, वाक्य-भेद-उपवाक्य, पत्र, निबन्ध, संवाद-अनुवाद-संक्षेपण, विराम-चिह्न, छन्द आ अलंकार — आ परिशिष्टमे पारिभाषिक शब्दकोश, उत्तर-कुञ्जी, क्रियाक पूर्ण रूपावली आ तिरहुता-लिपि देत अछि। मैथिलीक जे विशेषता विश्व-भाषा-विज्ञानमे प्रसिद्ध अछि — बहु-आयामी क्रिया-सामञ्जस्य — तकर निरूपण ग्रन्थ अत्यन्त सटीकतासँ करैत अछि। मैथिली क्रिया केवल कर्ता नहि, अपितु वाक्यमे उपस्थित आन आदरणीय व्यक्ति (कर्म वा सम्बन्धी) क आदर-स्तर अनुसारो बदलैत अछि: बहु-आयामी सामञ्जस्य (ग्रन्थसँ): कर्ता एके 'हम' रहितो — 'ओकरा हम देखलिऐ' (कर्म सामान्य) बनाम 'हुनका हम देखलियनि' (कर्म आदरणीय)। केवल कर्मक आदर बदलबासँ क्रिया-रूप 'देखलिऐ' → 'देखलियनि'। आगाँ आबि खण्ड तीन दुइ आर विशाल पद्धतिक अनुवर्ती एकक समेटैत अछि — एकटा 'इकाई-आधारित' विस्तृत मैथिली भाषा-विज्ञान-सम्मत व्याकरण (अध्याय ४४ सँ आगाँ, संज्ञा-सर्वनाम-क्रिया-विशेषण-क्रियाविशेषण-वाक्यविन्यासकेँ इकाई-दर-इकाई गहनतासँ, प्रत्येक इकाईक संग व्यापक अभ्यास, उत्तरमाला आ रचना-सिद्धान्त), आ एकटा 'समानान्तर रचना/सम्पादन' अनुभाग (अध्याय २८० आगाँ), जाहिमे समानान्तरता (parallelism), काल-आदर-संगति, पारिभाषिक-संगति, सम्पादनक तीन चरण, डिजिटल दृश्य-जाँच, आ शैली-पत्र धरिक चर्चा अछि। एतय ग्रन्थ शिक्षण-व्याकरणसँ आगाँ बढ़ि सम्पादकीय-विज्ञान (editorial science) मे प्रवेश करैत अछि — जे विदेह-सन डिजिटल प्रकाशन-संस्थाक व्यावहारिक आवश्यकतासँ स्वाभाविक रूपेँ उपजल अछि। प्रारम्भिक मूल्यांकन: खण्ड तीन विषय-वस्तुक दृष्टिसँ मैथिली व्याकरणक सम्भवतः सभसँ विस्तृत आधुनिक शिक्षण-सङ्ग्रह अछि। एकर सीमा संरचनात्मक थिक — भिन्न-भिन्न पद्धतिक अनुवर्ती-सङ्कलन (batch) एतय एकठाम मिलल अछि, तेँ किछु विषय (जेना संज्ञा, सर्वनाम, क्रियाक परिचय) एकाधिक बेर, भिन्न गहनतासँ आबैत अछि। ई दोष नहि, मुदा अन्तिम सम्पादनमे एकर सुव्यवस्था (जेना 'प्रारम्भिक' आ 'गहन' स्तरकेँ स्पष्ट लेबल देब) पठनीयता बढ़ाओत। भाग ५ — खण्ड ४: भाषा-विज्ञान, अध्याय ६९४–९२६ ५.1 अध्याय 694–708: ठेठी-अंगिका भाषा-विज्ञानक आधार भाषा-विज्ञानक स्वरूप, ध्वनिविज्ञान, ध्वनितत्त्व, लिपि/IPA, रूपविज्ञान, शब्द-वर्ग, वाक्यविज्ञान, निषेध-प्रश्न-सूचना-संरचना, अर्थ, प्रयोग/प्रवचन, समाजभाषाविज्ञान, इतिहास, प्रकारिकी, मनोभाषाविज्ञान आ क्षेत्रकार्य-कॉर्पस-संगणना—ई पन्द्रह-अध्यायीय ढाँचा भाषा-विज्ञानक लगभग पूर्ण परिचय अछि। ठेठी-अंगिकाक उदाहरणक आधारपर आधुनिक शाखासभ प्रस्तुत करब महत्त्वपूर्ण अछि। सीमा-सत्यापन: अध्याय 694 “भाषा-विज्ञान के स्वरूप आरो वैज्ञानिक तरीका” सँ अध्याय 708 “क्षेत्रकार्य, कॉर्पस, दस्तावेजीकरण आरो संगणकीय भाषा-विज्ञान” धरि। ५.2 अध्याय 709–723: बज्जिका भाषा-विज्ञानक समान आधार ठेठी-अंगिका जकाँ समान विषय बज्जिकापर लागू कएल गेल अछि। समान अध्याय-विन्यास तुलनात्मक अध्ययन लेल लाभदायक अछि, कारण शोधकर्ता एक्के विषय—जकाँ ध्वनिम, वाक्यक्रम वा समाजभाषिक भिन्नता—तीनू भाषामे खोजि सकैत अछि। मुदा समान शीर्षकक अर्थ समान निष्कर्ष नहि; भाषा-विशिष्ट डेटा स्वतंत्र रहबाक चाही। सीमा-सत्यापन: अध्याय 709 “भाषा-विज्ञान के स्वरूप आ वैज्ञानिक तरीका” सँ अध्याय 723 “क्षेत्रकार्य, कॉर्पस, दस्तावेजीकरण आ संगणकीय भाषा-विज्ञान” धरि। ५.3 अध्याय 724–738: मैथिली भाषा-विज्ञानक समान आधार मैथिली श्रृंखलामे वैज्ञानिक पद्धति, IPA, क्षेत्रकार्य प्रपत्र, १००-वाक्यक छोट कॉर्पस आ अनुसन्धानक चरण जकाँ सहायक सामग्री जोड़ल गेल अछि। ई शिक्षण आ शोधक बीच सीधा सेतु बनबैत अछि। कॉर्पसक आकार आरम्भिक हो सकैत अछि, मुदा metadata, genre balance आ speaker diversity स्पष्ट रहबाक चाही। सीमा-सत्यापन: अध्याय 724 “भाषा-विज्ञानक स्वरूप आ वैज्ञानिक पद्धति” सँ अध्याय 738 “क्षेत्रकार्य, कॉर्पस, दस्तावेजीकरण आ संगणकीय भाषा-विज्ञान” धरि। ५.4 अध्याय 739–768: वंश, ध्वनि, रूप, वाक्य, अर्थ, समाज, इतिहास आ लिपि-प्रौद्योगिकी ई समूह तीनू भाषाक आधारक बाद अधिक समेकित विश्लेषण करैत अछि। वंश-वर्गीकरण, स्वर-व्यंजन, अक्षर-बलाघात, रूप-ध्वनि-विज्ञान, संज्ञा-सर्वनाम-क्रिया, शब्दक्रम, alignment, clause, प्रश्न-निषेध-focus, semantics-pragmatics, dialect geography, contact, historical change, graphology, Tirhuta, Kaithi/Devanagari आ transliteration-language technology—ई विस्तार भाषा-विज्ञानकेँ पाठ्यपुस्तकक सामान्य सीमा पार लऽ जाइत अछि। सीमा-सत्यापन: अध्याय 739 “भाषा-विज्ञान की थिक” सँ अध्याय 768 “लिप्यन्तरण आ भाषा-प्रौद्योगिकी” धरि। ५.5 अध्याय 769–783: ठेठी-अंगिका उन्नत शोध-पद्धति प्राथमिक भाषिक डेटा, क्षेत्रकार्य-नैतिकता, ध्वनिक अध्ययन, ध्वनितत्त्व, लिप्यन्तरण, रूप, वाक्य, अर्थ, समाज, इतिहास, प्रकारिकी, मनोभाषाविज्ञान, कॉर्पस आ शब्दकोश-विज्ञानक उन्नत रूप एहि समूहमे अछि। “नियम बनाउ, फेर ओकरा गलत साबित करयवला उदाहरण खोजू” जकाँ वैज्ञानिक भावना अत्यन्त मूल्यवान अछि। सीमा-सत्यापन: अध्याय 769 “भाषा-विज्ञान के स्वरूप, शाखा आरो वैज्ञानिक पद्धति” सँ अध्याय 783 “कॉर्पस, शब्दकोश, दस्तावेजीकरण आरो संगणकीय भाषा-विज्ञान” धरि। ५.6 अध्याय 784–798: बज्जिका उन्नत शोध-पद्धति समान शोध-अभिकल्प बज्जिकामे दोहराओल गेल अछि। ई पुनरावृत्ति विषयगत तुलना सहज बनबैत अछि, मुदा पुस्तक-लम्बाइ बढ़बैत अछि। डिजिटल संस्करणमे साझा पद्धति एक ठाम आ भाषा-विशिष्ट डेटा अलग मॉड्यूलमे रखल जाए तँ अधिक किफायती संरचना बनि सकैत अछि। सीमा-सत्यापन: अध्याय 784 “भाषा-विज्ञान के स्वरूप, शाखा आ वैज्ञानिक तरीका” सँ अध्याय 798 “कॉर्पस, शब्दकोश, दस्तावेजीकरण आ संगणकीय भाषा-विज्ञान” धरि। ५.7 अध्याय 799–813: मैथिली उन्नत शोध-पद्धति मैथिली श्रृंखला प्रमाण, पुनरुत्पाद्यता, ध्वनिविज्ञान, रूप, वाक्य, अर्थ, समाज, इतिहास, प्रकारिकी, मनोभाषा, दस्तावेजीकरण आ संगणकीय भाषा-विज्ञानकेँ विस्तृत करैत अछि। ई खण्ड खास कऽ उच्च शिक्षा आ शोध-प्रशिक्षण लेल उपयोगी अछि। सीमा-सत्यापन: अध्याय 799 “भाषा-विज्ञान: विषय, शाखा, प्रमाण आ पुनरुत्पाद्यता” सँ अध्याय 813 “कॉर्पस, शब्दकोश-विज्ञान, दस्तावेजीकरण आ संगणकीय भाषा-विज्ञान” धरि। ५.8 अध्याय 814–826: समानान्तर पद्धतिक केन्द्रीय खण्ड तुलनीयता, नियंत्रण, स्रोत-समर्थन, न्यूनतम नमूना, शोध-नैतिकता, ध्वनि, नाम-पदसमूह, सर्वनाम-आदर, क्रिया-TAM, वाक्य, अर्थ-प्रयोग, समाजभाषा, इतिहास, प्रकारिकी, कॉर्पस, क्षेत्रकार्य आ तकनीकी शब्दावली—ई तेरह अध्याय पूरा ग्रन्थक वैचारिक केन्द्र मानल जा सकैत अछि। “एक्के प्रश्न, तीनू भाषा”क सिद्धान्त एहि पुस्तककेँ सामान्य तुलनात्मक व्याकरणसँ अलग पहचान दैत अछि। सीमा-सत्यापन: अध्याय 814 “समानान्तर अध्ययनक पद्धति: तुलनीय आँकड़ा, नियंत्रण आ प्रमाण” सँ अध्याय 826 “द्विभाषिक तकनीकी शब्दावली: English term + अनिवार्य भारतीय/मैथिली रूप” धरि। ५.9 अध्याय 827–850: शोध-अभिकल्प, प्रयोग, आँकड़ा आ तुलनात्मक दावा चर, नमूना, नियंत्रण, परिमाण, प्रयोगात्मक ध्वनिविज्ञान, समाजध्वनिविज्ञान, प्रयोगात्मक व्याकरण, मनोभाषाविज्ञान, भाषा-अर्जन, बहुभाषिकता, सम्पर्क, अनुप्रयुक्त भाषा-विज्ञान, अनुवाद, शब्दकोश, डिजिटल साधन, अभिलेखागार आ तुलनात्मक दावाक प्रमाण—ई समूह पद्धति-सघन अछि। Randomization, counterbalancing, reproducibility आ preregistration जकाँ संकल्पना स्थानीय भाषा-अध्ययनमे प्रवेश करब एक मजबूत वैज्ञानिक उन्नयन अछि। सीमा-सत्यापन: अध्याय 827 “शोध-अभिकल्प, चर, नमूना, नियंत्रण आ पुनरुत्पाद्यता” सँ अध्याय 850 “समानता, भिन्नता आ प्रमाण: Comparative Claim (तुलनात्मक दावा) कोना लिखी” धरि। ५.10 अध्याय 851–858: कॉर्पस परियोजना आ गुणवत्ता-जाँच फाइल-संरचना, वक्ता-मेटाडेटा, रिकॉर्डिंग, प्रतिलेखन, सामान्यीकृत पाठ, अन्तररेखीय विश्लेषण, लेक्सिकॉन/UD-सदृश संरचना आ कॉर्पस गुणवत्ता-जाँच—ई खण्ड डिजिटल भाषा-संसाधन निर्माण लेल अत्यन्त उपयोगी अछि। अगिला संस्करणमे नमूना लाइसेन्स, सहमति-पत्र, versioning convention, persistent identifier आ checksum नीति सेहो जोड़ल जा सकैत अछि। सीमा-सत्यापन: अध्याय 851 “कॉर्पस परियोजनाक इकाई आ फाइल-संरचना” सँ अध्याय 858 “Corpus QA (कॉर्पस गुणवत्ता-जाँच) आ पुनरुत्पादन” धरि। ५.11 अध्याय 859–877: ध्वनितत्त्व सँ वाक्य-संरचना धरि निदानात्मक कार्य ध्वनिम-सहध्वनि, न्यूनतम भेद, ध्वनि-प्रक्रिया, रूपिम, allomorph, inflection-derivation, valency, argument structure, phrase, dependency, relative/complement/coordination/subordination आ information structure—ई समूह विश्लेषणात्मक अभ्यासक रूप लैत अछि। एहि अध्यायसभमे वास्तविक तीन-भाषीय उदाहरणक समानान्तर dataset पुस्तकक शोध-मूल्य कई गुना बढ़ा सकैत अछि। सीमा-सत्यापन: अध्याय 859 “Phoneme (ध्वनिम) आ Allophone (सहध्वनि): अर्थभेद बनाम उच्चारण-भेद” सँ अध्याय 877 “Relative, Complement, Coordination, Subordination आ Information Structure” धरि। ५.12 अध्याय 878–883: अर्थ, प्रयोग, प्रवचन आ वार्तालाप शब्दार्थ, अर्थ-सम्बन्ध, वाक्यार्थ, deixis, implicature, speech act, discourse आ conversation analysis—ई समूह व्याकरणकेँ वास्तविक संचारसँ जोड़ैत अछि। भारतीय ध्वनि-सिद्धान्त, ग्राइसक निहितार्थ, तोकिएदाक प्रक्रिया-दृष्टि आ चीनी/जापानी कण-अध्ययन एतय संवाद करि सकैत अछि। सीमा-सत्यापन: अध्याय 878 “Lexical Semantics (शब्दार्थविज्ञान): Lexeme, Sense, Reference” सँ अध्याय 883 “Conversation Analysis (वार्तालाप-विश्लेषण) आ Practical Annotation Lab” धरि। ५.13 अध्याय 884–893: समाजभाषिक भिन्नता, संपर्क, पारिस्थितिकी आ जीवन्तता समाजभाषिक चर, शैली, पहचान, क्षेत्रीय भेद, code-switching, language attitude, standardization, contact, ecology, vitality आ पीढ़ीगत हस्तांतरण—ई समूह तीनू भाषाक वर्तमान भविष्य लेल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि। मानकीकरणक प्रत्येक निर्णय एहि खण्डक प्रमाण-दृष्टिसँ पुनः जाँचल जाए। सीमा-सत्यापन: अध्याय 884 “Sociolinguistic Variable (समाजभाषिक चर) आ Variant (रूपांतर): भिन्नता स्वयं डेटा अछि” सँ अध्याय 893 “Language Ecology (भाषा-पारिस्थितिकी), Vitality (जीवन्तता), Intergenerational Transmission (पीढ़ीगत हस्तांतरण)” धरि। ५.14 अध्याय 894–900: ऐतिहासिक तुलना, पुनर्निर्माण आ परिवर्तन पाठ-साक्ष्य, कालक्रम, तुलनात्मक पद्धति, sound correspondence, cognate बनाम loan, reconstruction, analogy, grammaticalization, inheritance-contact-parallel innovation—ई समूह ऐतिहासिक दावा लिखबाक अनुशासन सिखबैत अछि। ग्रियर्सन-जकाँ पुरान वर्गीकरण उद्धृत करैत समय आधुनिक डेटा आ समुदायिक आत्मपहचान अलग-अलग स्तरपर राखब एहि पद्धतिक स्वाभाविक निष्कर्ष अछि। सीमा-सत्यापन: अध्याय 894 “Historical Linguistics (ऐतिहासिक भाषा-विज्ञान): Attestation (पाठ-साक्ष्य), Change (परिवर्तन) आ Chronology (कालक्रम)” सँ अध्याय 900 “Inheritance (वंशपरम्परा), Contact (संपर्क) आ Parallel Innovation (समानान्तर नवाचार) अलग कोना करी?” धरि। ५.15 अध्याय 901–908: प्रकारिकी आ बहुभाषिक प्रसंस्करण feature-value, dominance, word order, alignment, typological comparison, bilingual control, switching cost आ multilingual processing—ई समूह तीनू भाषाकेँ व्यापक मानव-भाषिक परिप्रेक्ष्यमे रखैत अछि। एतय नमूना-संतुलन आ अंग्रेजी/हिन्दी प्रभावक नियंत्रण अनिवार्य अछि। सीमा-सत्यापन: अध्याय 901 “Linguistic Typology (भाषा-प्रकारिकी): Feature (विशेषता), Value (मान) आ Dominance (प्रधानता)” सँ अध्याय 908 “Language Control (भाषा-नियंत्रण), Switching Cost (बदलाव-मूल्य), Multilingual Processing (बहुभाषिक प्रसंस्करण) आ स्थानीय प्रयोग-डिजाइन” धरि। ५.16 अध्याय 909–919: प्रमाण-स्तर, स्रोत-बैंक आ विश्लेषण-आधार प्रमाण-स्तर, स्रोत-उद्धरण, उदाहरण-स्थिति, तीनू भाषाक उदाहरण-बैंक, paradigms, charts, syntax, semantics, pragmatics आ discourse references—ई समूह पूरा ग्रन्थक विश्वसनीयता लेल निर्णायक अछि। यदि प्रारम्भिक अध्याय १–८१३क प्रत्येक महत्त्वपूर्ण नियमकेँ एहि evidence hierarchy सँ backlink देल जाए, तँ पुस्तकक प्रमाण-संरचना बहुत मजबूत होयत। सीमा-सत्यापन: अध्याय 909 “Evidence Hierarchy (प्रमाण-स्तर), Source Citation (स्रोत-उद्धरण) आ Example Status (उदाहरण-स्थिति)” सँ अध्याय 919 “Pragmatics and Discourse (प्रयोगविज्ञान आ प्रवचन): Deixis सँ Conversation Analysis धरि” धरि। ५.17 अध्याय 920–926: समेकित अभ्यास, उत्तर, शब्दावली, अनुक्रमणिका आ पूर्णता-जाँच १२० समेकित कार्य, उत्तर-रूपरेखा, द्विभाषिक शब्दावली, संक्षेप/चिह्न, विषय-अनुक्रमणिका, भाषा/रूप-अनुक्रमणिका आ १२/१२ पूर्णता-जाँच—ई विशाल कृतिक आवश्यक समापन उपकरण अछि। ई भाग पाठककेँ केवल पढ़बाक नहि, पुस्तककेँ काममे लेबाक सुविधा दैत अछि। सीमा-सत्यापन: अध्याय 920 “Final Integrated Exercises (अन्तिम समेकित अभ्यास): 120 कार्य” सँ अध्याय 926 “12/12 Completeness Audit (बारह मुख्य लक्ष्यक अन्तिम पूर्णता-जाँच)” धरि। ५.१९ खण्ड ४क समेकित निर्णय खण्ड ४ पुस्तकक सबसँ आधुनिक आ शोधोपयोगी भाग अछि। भाषा-विज्ञानक शाखासभकेँ तीनू भाषामे समान विन्यास देब, फेर समेकित तुलनात्मक पद्धति, प्रयोगात्मक अनुसंधान, कॉर्पस, डिजिटल संसाधन, समाजभाषिकता, इतिहास, प्रकारिकी आ प्रमाण-स्तर धरि लऽ जाएब दुर्लभ व्यापकता अछि। एहि खण्डक अगिला चरण “उदाहरण-सत्यापन” होयत। प्रत्येक नियमक संग स्थिर ID, स्रोत, पृष्ठ/रिकॉर्डिंग, वक्ता-मेटाडेटा, विश्लेषक, निश्चितता-स्तर आ लाइसेन्स देल जाए। जहाँ डेटा अनुपलब्ध अछि ओतय “परिकल्पना” लिखल जाए, “स्थापित तथ्य” नहि। एहि एक सुधारसँ पुस्तक शोध-पुस्तक, कॉर्पस मार्गदर्शक आ डिजिटल reference grammar तीनू रूपमे अधिक विश्वसनीय बनत। खण्ड ४क पूरक समेकित मूल्यांकन खण्ड चारि — भाषा-विज्ञान: तीनू भाषाक समानान्तर अध्ययन (अध्याय ६९४–९२६) चारिम खण्ड ग्रन्थक बौद्धिक शिखर थिक। एतय दृष्टि बदलि जाइत अछि — आदेशात्मक (prescriptive) व्याकरणसँ वर्णनात्मक (descriptive) भाषा-विज्ञान दिस। भूमिकामे स्वयं ग्रन्थकार तीन आधार-सिद्धान्त घोषित करैत छथि: (एक) आँकड़ा पहिने — कोनो कल्पित रूप नहि; (दुइ) समानान्तर तुलना — तीनू भाषा संग-संग; (तीन) पाश्चात्य ढाँचा, देसी आँकड़ा। ई तेसर सिद्धान्त ग्रन्थक समग्र पद्धतिक सार थिक, आ आगाँ हम देखब जे ई ठीक ओ बिन्दु थिक जतय भारतीय, चीनी आ जापानी परम्पराक संग एकर संवाद सम्भव अछि। खण्ड चारिक पद्धति-विवेचन (अध्याय ८१४ आगाँ) समकालीन तुलनात्मक भाषा-विज्ञानक स्तरक अछि। ई 'तुलनीयता' (comparability) केँ केन्द्रमे राखि, विधा-माध्यम-उमेर-क्षेत्र-आदर-शिक्षा-लिपि-प्रसङ्ग नियन्त्रित रखबाक आग्रह करैत अछि; कथनकेँ तीन कोटिमे बाँटैत अछि — 'आधार-पाठ समर्थित', 'वर्णनात्मक प्रवृत्ति', आ 'परिकल्पना (hypothesis)' — आ कहैत अछि जे एहि तीनकेँ मिलाउ नहि। ई ठीक ओ epistemic अनुशासन थिक जे नव्य-न्यायक प्रमाण-विवेक आ पाश्चात्य विज्ञान-दर्शन दुनूकेँ प्रिय। समानान्तर परीक्षणक नमूना (ग्रन्थसँ): 'तीनू भाषा देवनागरीक उपयोग करैत अछि, मुदा समान अक्षर देखिते समान ध्वनिम मानब वैज्ञानिक नहि। लिपि (script), ध्वनि (phone) आ ध्वनिम (phoneme) अलग स्तर अछि। ' — न्यूनतम-नमूना तालिका: ध्वनि — ३ वक्ता × २० लक्षित शब्द; सर्वनाम/आदर — १० सामाजिक परिस्थिति × ३ वक्ता; TAM — १० धातु × ८ अर्थ-परिस्थिति। एहि खण्डमे ध्वनि-विज्ञान, ध्वनितत्त्व, रूप-विज्ञान, वाक्य-विन्यास, अर्थ-विज्ञान, प्रयोग-विज्ञान, समाजभाषा-विज्ञान, ऐतिहासिक-तुलनात्मक भाषा-विज्ञान, भाषा-प्रकारिकी, मनोभाषा-विज्ञान (द्विभाषिक शब्द-पहिचान, भाषा-नियन्त्रण, स्विचिंग-कॉस्ट), कॉर्पस, शब्दकोश-विज्ञान, दस्तावेजीकरण आ संगणकीय भाषा-विज्ञान (OCR/ASR/TTS/NLP) — सभ आधुनिक शाखा समाविष्ट अछि। परिशिष्टमे सहभाषा-सर्वेक्षण-प्रपत्र, ४०-लक्षण dialectometry मैट्रिक्स, ऐतिहासिक-तुलना-प्रत्याशी-बैंक, प्रकारिकी-कोडिंग-पत्र आ द्विभाषिक-प्रसंस्करण-प्रयोगशाला धरि अछि। अन्तिम अध्याय (९२६) एकटा '१२/१२ पूर्णता-जाँच' प्रस्तुत करैत, प्रत्येक शाखाक उपस्थितिकेँ अध्याय-सन्दर्भ सहित सूचीबद्ध करैत अछि। प्रारम्भिक मूल्यांकन: खण्ड चारि 'व्यावहारिक भाषा-विज्ञान पाठ्यपुस्तक (practical linguistics textbook)' क अन्तर्राष्ट्रीय स्तरकेँ छुबैत अछि। सीमा दुइ: (क) कतिपय अध्याय (जेना 'भाषा-विज्ञान की थिक', 'ऐतिहासिक-तुलनात्मक', 'कॉर्पस/संगणकीय') भिन्न अनुवर्ती-सङ्कलनक कारण एकाधिक बेर, तीनू भाषाक भिन्न मानकीकरणमे, दोहराइत अछि — जे विषय-सूचीक क्रम-सङ्ख्या (६९४, ७०९, ७२४, ७३९, ७६९, ७८४, ७९९) सँ स्पष्ट; (ख) प्रकारिकी-दाबी (typological claim) कखनहुँ-कखनहुँ उपलब्ध कॉर्पस-आँकड़ासँ आगाँ बढ़ि जाइत अछि, जकरा ग्रन्थ स्वयं 'परिकल्पना' कहि सीमांकित करैत अछि — ई ईमानदारी थिक, मुदा पाठकक लेल कखनहुँ-कखनहुँ दाबी आ परिकल्पनाक रेखा धूमिल भऽ सकैत अछि। समेकित सन्दर्भ-सूची आ परिशिष्ट-तन्त्र अन्तिम सन्दर्भ-सूची ग्रन्थक प्रामाणिकताक मेरुदण्ड थिक। एतय ठेठी-अंगिका (अमरेन्द्र–पूर्वे, ग्रियर्सन LSI, रञ्जन कुमारक IJCRT-अध्ययन), बज्जिका (रामेश्वर प्रसाद, योगेन्द्र प्रसाद सिंह, आर्ती कुमारीक JNU-शोध, काश्यपक Journal of Pragmatics आ Linguistics-लेख, DOI सहित), आ मैथिली (यादवक Mouton reference grammar, ग्रियर्सन, दीनबन्धु झाक 'मिथिला-भाषा-विद्योतन', गोविन्द झाक 'लघु विद्योतन') — सभ प्रमुख स्रोत सम्मिलित अछि। DOI आ ISBN धरिक विवरण एकरा अकादमिक रूपेँ उद्धरणीय (citable) बनबैत अछि। प्रारम्भिक मूल्यांकन: सन्दर्भ-सूची व्यापक आ सत्यापनीय अछि। भविष्यमे एकरा एकटा एकीकृत शैली (जेना पूर्णतः author–date वा पूर्णतः पारम्परिक) मे ढालब आ भीतरी उद्धरण (in-text citation) केँ प्रत्येक दाबीसँ जोड़ब एकरा शोध-मानकक पूर्ण अनुरूप बना देत। खण्ड ४ — विस्तृत शोध-समीक्षा: पद्धति, प्रमाण, दस्तावेजीकरण आ तिरहुता प्रस्तावना आ समीक्षाक परिधि प्रस्तुत ग्रन्थ चारि खण्डमे विभक्त अछि; एहिमे पहिल तीन खण्ड (ठेठी-अंगिका, बज्जिका आ मैथिलीक व्याकरण-रचना) निर्देशात्मक-शिक्षणपरक थिक, मुदा चारिम खण्ड — भाषा-विज्ञान — अपन प्रकृति, पद्धति आ लक्ष्यमे मूलतः भिन्न अछि। ओ प्रयोगकेँ 'शुद्ध-अशुद्ध' कहबाक स्थान पर वास्तविक भाषिक व्यवहारकेँ दर्ज, वर्गीकृत आ विश्लेषित करैत अछि। एहि आत्यन्तिक भेदक कारणेँ चारिम खण्ड एकटा स्वतन्त्र, पूर्ण शोध-समीक्षाक अधिकारी अछि — कारण एकर मूल्यांकन व्याकरण-समीक्षाक मापदण्डसँ नहि, प्रत्युत वर्णनात्मक-दस्तावेजी भाषा-विज्ञानक (descriptive–documentary linguistics) अन्तरराष्ट्रीय मानकसँ हेबाक चाही। एहि समीक्षाक परिधि केवल खण्ड ४ (अध्याय ६९४ सँ ९२६ धरि, लगभग २३३ अध्याय) धरि सीमित अछि। समीक्षा दुइ स्तरपर चलैत अछि — पहिल, वर्णनात्मक: खण्डक आन्तरिक वास्तुकला, विषय-विस्तार आ प्रमाण-तन्त्रक विवरण; दोसर, मूल्यांकनात्मक: सात समीक्षा-परम्पराक आलोकमे एकर पद्धतिशास्त्रीय गुण-दोषक निष्पक्ष निर्णय। समीक्षा प्रशंसा-प्रधान नहि; ई विद्वत्परम्पराक ओहि रीतिकेँ मानैत अछि जाहिमे आदर आ कठोर आलोचना सङ्ग-सङ्ग चलैत अछि। एहि संस्करणमे समीक्ष्य ग्रन्थसँ लेल गेल प्रत्येक मूल उद्धरण मैथिलीक पारम्परिक लिपि — तिरहुता (मिथिलाक्षर) — मे देल गेल अछि, आ ओकर नीचाँ देवनागरी लिप्यन्तरण आ स्रोत-अध्याय देल गेल अछि। ई निर्णय आकस्मिक नहि: स्वयं समीक्ष्य ग्रन्थ (अध्याय ८०५) तिरहुताक सांस्कृतिक-ऐतिहासिक महत्त्वकेँ स्वीकार करैत ओकर संरक्षणक नीति देैत अछि; तेँ ओकर उद्धरणकेँ तिरहुतामे देब समीक्षा आ समीक्ष्यक बीच एकटा आत्म-सन्दर्भी (self-reflexive) संगति स्थापित करैत अछि। खण्ड ४क आन्तरिक वास्तुकला खण्ड ४क सभसँ पैघ संरचनात्मक विशेषता एकर स्तर-विन्यास (stratified architecture) थिक। लगभग २३३ अध्याय एकरेखीय क्रममे नहि बढ़ैत, प्रत्युत छह क्रियात्मक स्तरमे सङ्गठित अछि। एहि स्तर-विन्यासकेँ स्पष्ट देखब समीक्षाक पहिल अनिवार्य कार्य थिक, कारण एहिसँ ग्रन्थक 'पुनरावृत्ति' आ 'क्रमिक गहनता'क बीचक भेद स्पष्ट होइत अछि। स्तर अध्याय-परास क्रियात्मक स्वरूप परिचय-सर्वेक्षण ६९४–७६८ भाषा-विज्ञानक स्वरूप, शाखा आ पद्धतिक प्रारम्भिक सर्वेक्षण — अंगिका आ मैथिली रजिस्टरमे बेर-बेर एकभाषिक पूर्ण-सर्वेक्षण ७६९–८१३ ध्वनिसँ प्रवचन धरि सम्पूर्ण शाखाक एकभाषिक पास; ८०५मे देवनागरी–तिरहुता–IPA–IGT समानान्तर-पद्धति ८१४–८२६ तुलनीयता, नियन्त्रण, न्यूनतम-नमूना आ द्विभाषिक पारिभाषिक शब्दावली प्रायोगिक/अनुप्रयुक्त ८२७–८४० शोध-अभिकल्प, परिमाणात्मक अध्ययन, प्रयोगात्मक ध्वनि, मनोभाषा, अर्जन, अनुवाद, NLP गूढ़-सैद्धान्तिक इकाई ८५९–९०८ ध्वनिम/सहध्वनि, रूपध्वनितत्त्व, निर्भरता, संयोजकता, सामञ्जस्य, प्रकारिकी, ऐतिहासिक प्रमाण-बैंक आ सन्दर्भ-तन्त्र ९०९–९२६ प्रमाण-स्तर, स्रोत-पुष्ट उदाहरण-बैंक, समानान्तर रूप-सारणी, अभ्यास, पूर्णता-जाँच एहि विन्याससँ एकटा महत्त्वपूर्ण मूल्यांकनात्मक निष्कर्ष निकलैत अछि: आरम्भिक स्तर (६९४–७६८) मे स्पष्ट पुनरावृत्ति अछि — एक्के परिचय-सर्वेक्षण तीन बेर, भिन्न भाषिक रजिस्टरमे, दोहराओल गेल अछि। मुदा ८१४सँ आगाँक स्तर संचयी (cumulative) अछि, दोहरावटि नहि; प्रत्येक स्तर पूर्ववर्तीक ऊपर नव विश्लेषणात्मक परत जोड़ैत अछि। तेँ 'पुनरावृत्ति'क आलोचना केवल पहिल स्तरपर लागू होइत अछि, समग्र खण्डपर नहि — ई भेद आगाँ §५मे विस्तारसँ उठाओल गेल अछि। दोसर संरचनात्मक वैशिष्ट्य: खण्ड ४ केवल पाठ्य-सामग्री नहि, प्रत्युत एकटा सम्पूर्ण दस्तावेजीकरण-तन्त्र (documentation apparatus) प्रस्तुत करैत अछि — वक्ता-विवरण प्रपत्र (अ. ८५२), रिकॉर्डिंग-अभिलेख (अ. ८५३), मूलरूप बनाम सामान्यीकृत लिप्यांकन (अ. ८५४), अन्तररेखीय रूपिम-व्याख्या वा IGT (अ. ८५५), शब्दसूची-कार्यपुस्तिका (अ. ८५६), आ UD/CoNLL-U निर्भरता-टिप्पणीकरण (अ. ८५७)। ई तन्त्र आधुनिक भाषा-दस्तावेजीकरणक (Himmelmann-परम्पराक) मानक-उपकरणसँ सीधा संवाद करैत अछि — जे एहि खण्डकेँ मात्र पाठ्यपुस्तकसँ ऊपर उठाकऽ शोध-आधारभूत संरचनाक श्रेणीमे राखैत अछि। पद्धतिशास्त्रीय मूल्यांकन कोनो भाषा-विज्ञान-ग्रन्थक शोध-समीक्षाक केन्द्र ओकर पद्धति थिक — कारण वर्णनात्मक भाषा-विज्ञानमे निष्कर्षक मूल्य ओकर प्रस्तुतिक सौन्दर्यसँ नहि, प्रत्युत ओकर प्रमाण-अनुशासनसँ निर्धारित होइत अछि। एहि दृष्टिएँ खण्ड ४ चारि आधारभूत पद्धति-स्तम्भपर ठाढ़ अछि। वर्णनवाद बनाम निर्देशवादक स्पष्ट विभाजन ग्रन्थ आरम्भेमे वर्णनात्मक आ निर्देशात्मक अध्ययनक बीच स्पष्ट रेखा खींचैत अछि, आ ई घोषणा करैत अछि जे क्षेत्रीय बोलचालक रूप 'अवैज्ञानिक' नहि होइत — शोध-संस्करणमे रूपान्तर दर्ज करब आ सामान्य-संस्करणमे चुनल नीति राखब, दुनू अलग उद्देश्य थिक। ई सैद्धान्तिक-दृष्टिएँ सस्यूरक 'लांग बनाम पारोल' आ आधुनिक समाजभाषाविज्ञानक भिन्नता-केन्द्रित दृष्टिसँ पूर्णतः संगत अछि। 𑒦𑒰𑒭𑒰-𑒫𑒱𑒖𑓂𑒘𑒰𑒢𑒲 “𑒄 𑒬𑒳𑒠𑓂𑒡 𑒁𑒕𑒱 𑒏𑒱 𑒁𑒬𑒳𑒠𑓂𑒡?” 𑒮𑒿 𑒂𑒑𑒰𑒿 𑒥𑒜𑓃𑒱 𑒣𑒴𑒕𑒻𑒞 𑒁𑒕𑒱 — 𑒄 𑒩𑒴𑒣 𑒏𑒹 𑒥𑒖𑒻𑒞 𑒕𑒟𑒱, 𑒏𑒞𑒨, 𑒏𑒐𑒢, 𑒏𑒹𑒏𑒩𑒰 𑒮𑓀𑒑, 𑒏𑒼𑒢 𑒁𑒩𑓂𑒟𑒧𑒹, 𑒏𑒼𑒢 𑒂𑒠𑒩-𑒮𑓂𑒞𑒩𑒣𑒩, 𑒂 𑒏𑒼𑒢 𑒬𑒻𑒪𑒲𑒧𑒹? भाषा-विज्ञानी “ई शुद्ध अछि कि अशुद्ध?” सँ आगाँ बढ़ि पूछैत अछि — ई रूप के बजैत छथि, कतय, कखन, केकरा संग, कोन अर्थमे, कोन आदर-स्तरपर, आ कोन शैलीमे? — अध्याय ७९९, §१.१ प्रमाण-अनुशासन: त्रि-स्तरीय आ A/B/C/D प्रणाली खण्डक एकल सर्वाधिक मौलिक आ सुदृढ़ पद्धति-योगदान एकर प्रमाण-अनुशासन थिक। दुइ स्तरपर ई अनुशासन कार्य करैत अछि। पहिल — त्रि-स्तरीय वर्गीकरण: (क) आधार-पाठ समर्थित (source-backed), (ख) वर्णनात्मक प्रवृत्ति (descriptive tendency), आ (ग) परिकल्पना (hypothesis)। ग्रन्थ स्पष्ट निर्देश दैत अछि जे एहि तीन श्रेणीकेँ कहियो नहि मिलाओल जाए। 𑒮𑓂𑒩𑒼𑒞𑒧𑒹 𑒢𑒯𑒱 𑒩𑒯𑒪𑒰 𑒣𑒩 𑒮𑒰𑒧𑒰𑒢𑓂𑒨 𑒦𑒰𑒭𑒰-𑒫𑒱𑒖𑓂𑒘𑒰𑒢𑒮𑒿 𑒅𑒚𑒪 𑒮𑒧𑓂𑒦𑒰𑒫𑒢𑒰𑒏𑒹𑒿 “𑒣𑒩𑒱𑒏𑒪𑓂𑒣𑒢𑒰 (𑒖𑒰𑒿𑒔 𑒨𑒼𑒑𑓂𑒨 𑒣𑓂𑒩𑒮𑓂𑒞𑒰𑒫)” 𑒏𑒯𑒪 𑒖𑒰𑒋। 𑒋𑒯𑒱 𑒞𑒲𑒢 𑒬𑓂𑒩𑒹𑒝𑒲𑒏𑒹𑒿 𑒋𑒏-𑒠𑒼𑒮𑒩𑒰𑒮𑒿 𑒢𑒯𑒱 𑒧𑒱𑒪𑒰𑒅। स्रोतमे नहि रहला पर सामान्य भाषा-विज्ञानसँ उठल सम्भावनाकेँ “परिकल्पना (जाँच योग्य प्रस्ताव)” कहल जाए। एहि तीन श्रेणीकेँ एक-दोसरासँ नहि मिलाउ। — अध्याय ८१४, §१६.२ दोसर — अन्तिम प्रमाण-बैंकमे (अ. ९०९) चारि-स्तरीय संकेत-प्रणाली: A = प्रत्यक्ष स्रोत-पाठमे भेटल रूप, B = एकाधिक स्वतन्त्र स्रोतमे मिलान भेल रूप, C = स्रोत-पुष्ट तत्त्वसँ बनल विश्लेषणात्मक (नव) वाक्य, आ D = क्षेत्रकार्य/प्रयोग लेल जाँच-अनिवार्य पद। केवल A आ B कें 'प्रमाणित उदाहरण' मानल गेल अछि। एतबे नहि, स्रोत-संकेत (A-GRAM = अमरेन्द्र·आभा पूर्वे, B-GRAM = रामेश्वर प्रसाद, M-GRAM = मैथिली व्याकरण) प्रत्येक उदाहरणकेँ ओकर मूल-ग्रन्थसँ जोड़ैत अछि। 𑒦𑒰𑒭𑒰-𑒫𑒱𑒖𑓂𑒘𑒰𑒢𑒧𑒹 𑒅𑒠𑒰𑒯𑒩𑒝𑒏 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒮𑒢𑒲𑒨𑒞𑒰 𑒍𑒏𑒩 𑒮𑒳𑒢𑓂𑒠𑒩𑒞𑒰 𑒮𑒿 𑒢𑒯𑒱, 𑒮𑓂𑒩𑒼𑒞 𑒂 𑒖𑒰𑒿𑒔-𑒣𑒠𑓂𑒡𑒞𑒱𑒮𑒿 𑒢𑒱𑒩𑓂𑒡𑒰𑒩𑒱𑒞 𑒯𑒼𑒃𑒞 𑒁𑒕𑒱। भाषा-विज्ञानमे उदाहरणक विश्वसनीयता ओकर सुन्दरता सँ नहि, स्रोत आ जाँच-पद्धतिसँ निर्धारित होइत अछि। — अध्याय ९०९ मूल्यांकन: ई अनुशासन विदेह-आन्दोलनक 'शून्य-मनगढ़न्त' (zero-hallucination) नीतिकेँ एकटा ठोस पद्धति-यन्त्रमे परिणत करैत अछि। अन्तरराष्ट्रीय दस्तावेजी भाषा-विज्ञानमे (जेना Himmelmann, आ Chelliah–de Reuse) यएह प्रमाण-स्रोत-पारदर्शिता आदर्श मानल जाइत अछि; ओहि आदर्शकेँ एहि खण्डमे एक क्षेत्रीय-भाषा-परियोजनाक स्तरपर व्यवस्थित रूपेँ लागू करब विरल आ प्रशंसनीय उपलब्धि थिक। तुलनीयता-नियन्त्रण आ न्यूनतम-नमूना समानान्तर तुलनाक सभसँ पैघ पद्धति-जोखिम ई होइत अछि जे शैली-भेदकेँ भाषा-भेद बुझि लेल जाए। ग्रन्थ एहि जोखिमकेँ स्पष्ट पहचानैत अछि — ठेठी-अंगिकाक समाचार-गद्य, बज्जिकाक घरेलू बातचीत आ मैथिलीक संस्कृतनिष्ठ निबन्धक सीधा तुलना भ्रामक होयत; तेँ विधा, माध्यम, उमेर, क्षेत्र, आदर-सम्बन्ध, शिक्षा आ प्रसङ्ग नियन्त्रित राखब अनिवार्य अछि। आओर आगाँ, ग्रन्थ प्रत्येक डेटा-क्षेत्र लेल न्यूनतम-नमूनाक संख्यात्मक मापदण्ड निर्धारित करैत अछि — ध्वनि लेल कम-सँ-कम ३ वक्ता × २० लक्षित शब्द, सर्वनाम/आदर लेल १० सामाजिक परिस्थिति × ३ वक्ता, वाक्य-क्रम लेल १०० विधानवाचक वाक्य, TAM लेल १० धातु × ८ अर्थ-परिस्थिति, आदि। एहन परिमाणात्मक नमूना-अनुशासन क्षेत्रीय व्याकरण-लेखनमे प्रायः अनुपस्थित रहैत अछि; एकर उपस्थिति ग्रन्थकेँ 'शोध-अभिकल्प' (research design)क कोटिमे राखैत अछि। लिपि-नीति आ अन्तररेखीय व्याख्या अध्याय ८०५ लिपि आ भाषाकेँ भिन्न स्तरपर राखैत अछि, आ तीन महत्त्वपूर्ण पद्धति-निर्देश दैत अछि। पहिल, IPA केँ शोधक उपकरण मानल गेल अछि, वर्तनी-सुधारक योजना नहि: IPA 𑒬𑒼𑒡𑒏 𑒪𑒹𑒪 𑒅𑒔𑓂𑒔𑒰𑒩𑒝 𑒢𑒼𑒙 𑒏𑒩𑒥𑒰𑒏 𑒮𑒰𑒡𑒢 𑒁𑒕𑒱, 𑒧𑒻𑒟𑒱𑒪𑒲 𑒫𑒩𑓂𑒞𑒢𑒲 𑒥𑒠𑒪𑒥𑒰𑒏 𑒨𑒼𑒖𑒢𑒰 𑒢𑒯𑒱। 𑒖𑒹 𑒮𑒴𑒏𑓂𑒭𑓂𑒧𑒞𑒰 𑒮𑒳𑒢𑒪 𑒫𑒰 𑒧𑒰𑒣𑒪 𑒢𑒯𑒱 𑒑𑒹𑒪, 𑒁𑒢𑒳𑒧𑒰𑒢𑒮𑒿 𑒔𑒱𑒢𑓂𑒯 𑒢𑒯𑒱 𑒖𑒼𑒛𑓃𑒴। IPA शोधक लेल उच्चारण नोट करबाक साधन अछि, मैथिली वर्तनी बदलबाक योजना नहि। जे सूक्ष्मता सुनल वा मापल नहि गेल, अनुमानसँ चिन्ह नहि जोड़ू। — अध्याय ८०५, §७.२ दोसर, ध्वनिमीय ( / / ) आ ध्वन्यात्मक ( [ ] ) लिप्यंतरणक भेद कठोरतासँ राखल गेल अछि। तेसर — आ सर्वाधिक उल्लेखनीय — तिरहुता-संरक्षणक स्पष्ट नैतिक नीति, जे एहि समीक्षाक लिपि-चयनक आधार सेहो थिक: 𑒣𑒳𑒩𑒰𑒢 𑒞𑒱𑒩𑒯𑒳𑒞𑒰 𑒣𑒰𑒚𑒏𑒹𑒿 𑒠𑒹𑒫𑒢𑒰𑒑𑒩𑒲𑒧𑒹 𑒥𑒠𑒪𑒻𑒞 𑒮𑒧𑒨 𑒧𑒴𑒪 𑒔𑒱𑒞𑓂𑒩/𑒣𑒵𑒭𑓂𑒚-𑒮𑒢𑓂𑒠𑒩𑓂𑒦 𑒮𑒳𑒩𑒏𑓂𑒭𑒱𑒞 𑒩𑒰𑒐𑒴; 𑒣𑒰𑒚-𑒮𑓀𑒣𑒰𑒠𑒢𑒏𑒹𑒿 𑒧𑒴𑒪 𑒪𑒱𑒣𑒱𑒏 𑒮𑓂𑒟𑒰𑒢𑒰𑒣𑒢𑓂𑒢 𑒢𑒯𑒱 𑒥𑒢𑒰𑒅। पुरान तिरहुता पाठकेँ देवनागरीमे बदलैत समय मूल चित्र/पृष्ठ-सन्दर्भ सुरक्षित राखू; पाठ-संपादनकेँ मूल लिपिक स्थानापन्न नहि बनाउ। — अध्याय ८०५, §७.४ अन्तररेखीय रूपिम-व्याख्या (IGT) चारि-पंक्तिक मानक ढाँचामे (मूल वाक्य · रूपिम-विभाजन · व्याकरणिक संक्षेप · स्वाभाविक अनुवाद) देल गेल अछि — जेना «हम पोथी पढ़-ैत छी» → 1SG book read-PROG AUX.1। ई ढाँचा लाइपजिग ग्लॉसिंग नियम (Leipzig Glossing Rules)क अनुरूप अछि; तथापि, ग्रन्थ एहि नियमावलीकेँ नामसँ उद्धृत नहि करैत — एकटा सुझाव जे §५मे उठाओल गेल अछि। सात समीक्षा-परम्पराक आलोकमे एहि भागमे प्रत्येक समीक्षा-परम्पराकेँ खण्ड ४क विशिष्ट पद्धति-विशेषतासँ जोड़ल गेल अछि — सामान्य टिप्पणी नहि, प्रत्युत ठोस पाठ-आधारित सम्बन्ध। भारतीय परम्परा भारतीय भाषा-चिन्तनक मूल सूत्र एहि खण्डमे तीन ठाम प्रतिध्वनित होइत अछि। पहिल, प्रातिशाख्य-परम्पराक ध्वनि-वर्गीकरण (स्थान-प्रयत्न-करण) खण्डक उच्चारण-यन्त्र आधारित ध्वनिविज्ञानमे पुनर्जीवित अछि। दोसर, पाणिनिक अष्टाध्यायी स्वयं विश्वक प्रथम वर्णनात्मक (descriptive) व्याकरण थिक — जे भाषाकेँ 'जेहन अछि तेहन' दर्ज करैत अछि; एहि खण्डक वर्णनवादी आधार ठीक ओहि परम्पराक आधुनिक उत्तराधिकारी थिक। तेसर आ सर्वाधिक गहन — नव्य-न्यायक प्रमाण-विवेक आ 'उपाधि'-विश्लेषण। खण्डक A/B/C/D प्रमाण-स्तर नव्य-न्यायक प्रत्यक्ष-अनुमान-शब्द प्रमाण-मीमांसाक भाषिक अनुप्रयोग जकाँ अछि; आ आदर-सामञ्जस्यमे कर्म-पदक आदर-कोटि (object-honorificity) कें 'उपाधि' मानि क्रिया-रूपमे ओकर प्रभाव देखब — ई नव्य-न्यायक अवच्छेदक-अवच्छिन्न सम्बन्धक भाषावैज्ञानिक प्रतिरूप थिक। पाश्चात्य परम्परा पाश्चात्य आधुनिक भाषा-विज्ञानसँ एहि खण्डक संवाद सभसँ प्रत्यक्ष अछि। सस्यूरक लांग/पारोल भेद वर्णन/निर्देशक विभाजनमे; ब्लूमफील्ड-पाइकक वितरणात्मक पद्धति ध्वनिम/सहध्वनि आ न्यूनतम-युग्म अध्यायमे (अ. ८५९–८६०); ग्रीनबर्गक प्रकारिकी पदक्रम-प्रकारिकी आ सहसम्बन्ध अध्यायमे (अ. ९०१–९०६); तुलनात्मक पद्धति आ नियमित ध्वनि-संगति ऐतिहासिक भागमे (अ. ८९६)। मुदा सभसँ महत्त्वपूर्ण — Himmelmann-प्रवर्तित दस्तावेजी भाषा-विज्ञानक सम्पूर्ण उपकरण-शृंखला (मेटाडेटा, रिकॉर्डिंग-लॉग, IGT, UD/CoNLL-U) एहि खण्डमे व्यवस्थित रूपेँ उपस्थित अछि। एहि दृष्टिएँ खण्ड ४ क्षेत्रीय-भाषा-दस्तावेजीकरणक समकालीन अन्तरराष्ट्रीय ढाँचाक भीतर सचेत रूपेँ ठाढ़ अछि। इस्रायली परम्परा गिलअद जुकरमानक पुनरुज्जीवन-भाषाविज्ञान (revivalistics) आ 'भाषा-पुनःप्राप्ति' (language reclamation)क नैतिकता एहि खण्डक समुदाय-सहकार्य-नीतिसँ मिलैत अछि — ग्रन्थ भाषा-दस्तावेजीकरणकेँ 'केवल डेटा-संग्रह नहि, प्रत्युत समुदायसँ सहकार्यक काम' कहैत अछि, जे जुकरमानक नैतिक-सहभागी दृष्टिक अनुरूप थिक। तथापि, एतय एकटा उत्पादक तनाव सेहो अछि: जुकरमान संकर-रूपता (hybridity)केँ स्वाभाविक मानैत छथि आ शुद्धतावादक आलोचना करैत छथि, जखन कि एकटा मानकीकरण-उन्मुख व्याकरण-परियोजनामे शुद्धतावादी झुकावक स्वाभाविक आकर्षण रहैत अछि। खण्ड ४ एहि तनावकेँ अपन वर्णनवादी घोषणासँ बहुत हद धरि सुलझाबैत अछि — मुदा ई सचेत सन्तुलन ग्रन्थक स्थायी सतर्कता-बिन्दु बनल रहत। चीनी परम्परा चीनी भाषाशास्त्रक दुइ तत्त्व एतय प्रासंगिक अछि। पहिल, 'श्याओश्वे' (小學) — शुओवन-परम्पराक प्रमाण-मूलक भाषाशास्त्र, जतय प्रत्येक व्याख्या मूल-पाठ-साक्ष्यपर आधृत रहैत अछि। खण्डक स्रोत-पुष्ट उदाहरण-बैंक (अ. ९१०–९१२) ठीक एहने प्रमाण-मूलक भाषाशास्त्रीय अनुशासनक आधुनिक रूप थिक। दोसर, चीनी व्याकरणक गणक-प्रधानता (量詞 / classifier) आ विषय-प्रधानता (topic-prominence) — खण्डक संख्या-बहुवचन-गणक अध्याय (अ. ८४५, ९१४) आ सूचना-संरचना-अध्यायमे एहि प्रकारिक-लक्षणक तुलनात्मक विश्लेषण अछि, जे मैथिली-अंगिका-बज्जिकाक गणक-तन्त्रकेँ पूर्व-एसियाई प्रारूपसँ जोड़ैत अछि। तिब्बती परम्परा तिब्बती परम्परासँ तीन समानान्तर उभरैत अछि। पहिल, थोन्मि सम्भोटक लिपि-संहिताकरण — जेना तिब्बतीक लेल एकटा सुव्यवस्थित लिपि-व्याकरण गढ़ल गेल, तहिना खण्डक अध्याय ८०५ तिरहुता-देवनागरी लिपि-सम्बन्धकेँ सचेत नीतिगत आधार दैत अछि। दोसर, तिब्बतीक 'झेसा' (ཞེ་ས / honorific register) — आदर-सूचक शब्द-भण्डार आ क्रिया-रूपक पृथक् तन्त्र — खण्डक सर्वनाम-आदर रूप-सारणी (अ. ९१३) आ बहु-आयामी आदर-सामञ्जस्यसँ प्रत्यक्ष तुलनीय अछि। तेसर, तिब्बतीक कर्तृ-कारक (ergative) संरेखण खण्डक सकर्मकता आ कारक-संरेखण अध्याय (अ. ८७४) मे प्रकारिक-तुलनाक विषय बनैत अछि। जापानी परम्परा जापानी 'कोकुगोगाकु' (国語学) वर्णनात्मक परम्परा आ तोकिएदाक 'भाषा-प्रक्रिया-सिद्धान्त' (言語過程説) — जाहिमे भाषाकेँ स्थिर वस्तु नहि, प्रत्युत वक्ताक क्रिया मानल जाइत अछि — खण्डक 'रूप–कार्य–अर्थ–प्रयोग' (form–function–meaning–use) चतुष्कोणसँ (अ. ७९९ §१.४) संगत अछि। मुदा सभसँ गहन समानान्तर जापानीक 'केइगो' (敬語 / सम्मान-भाषा)क बहु-आयामी तन्त्रसँ अछि। मैथिलीक क्रिया-सामञ्जस्यमे कर्ता आ कर्म दुनूक आदर-कोटिक एकसाथ प्रभाव (जेना «देखलिऐ» बनाम «देखलियनि») विश्वक भाषा-विज्ञानमे बिकेल–बिसंग–यादवक ‹Face vs. Empathy› (१९९९) अध्ययनसँ सुविख्यात अछि; खण्ड ४ एहि जटिल तन्त्रकेँ स्रोत-आधारित रूप-सारणीमे व्यवस्थित करैत अछि, जे केइगो-प्रकारिकीक सङ्ग तुलनाक उत्कृष्ट आधार प्रस्तुत करैत अछि। विदेह समानान्तर समीक्षा-परम्परा अन्ततः, विदेह समानान्तर परम्पराक दृष्टिएँ खण्ड ४ केवल भाषा-वर्णन नहि, प्रत्युत एकटा प्रति-कानूनिक (counter-canonical) दस्तावेजी-कर्म थिक। तीन भाषाकेँ — जाहिमे दुइ (अंगिका, बज्जिका) प्रायः 'उपभाषा'क अधीनस्थ स्थानपर धकेलल गेल — समान पद्धति, समान प्रमाण-मानक आ समान गरिमाक सङ्ग समानान्तर राखब स्वयं एकटा भाषिक-न्यायक (linguistic-justice) कर्म थिक। 'शून्य-मनगढ़न्त' नीति एतय केवल शुद्धताक प्रश्न नहि, प्रत्युत ज्ञान-मीमांसीय-न्यायक (epistemic-justice) अभ्यास बनि जाइत अछि — कारण अधीनस्थ-भाषाक वक्ताक वास्तविक प्रयोगकेँ 'पहिल प्रमाण' मानब ओकर भाषिक-स्वायत्तताक स्वीकृति थिक: 𑒥𑒖𑓂𑒖𑒱𑒏𑒰 𑒏𑒹 𑒫𑒰𑒮𑓂𑒞𑒫𑒱𑒏 𑒣𑓂𑒩𑒨𑒼𑒑 𑒣𑒯𑒱𑒪 𑒣𑓂𑒩𑒧𑒰𑒝 𑒯𑒋। 𑒞𑒏𑒢𑒲𑒏𑒲 𑒬𑒥𑓂𑒠 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒪𑒹𑒭𑒝 𑒏𑒹 𑒎𑒖𑒰𑒩 𑒯𑒋, 𑒦𑒰𑒭𑒰 𑒣𑒩 𑒟𑒼𑒣𑒪 𑒮𑒰𑒿𑒔𑒰 𑒢𑒯𑒱। बज्जिका के वास्तविक प्रयोग पहिल प्रमाण हए। तकनीकी शब्द विश्लेषण के औजार हए, भाषा पर थोपल साँचा नहि। — समेकित सन्दर्भ-सूची, बज्जिका सम्पादकीय सिद्धान्त गुण, सीमा आ संस्तुति प्रमुख गुण पहिल आ सर्वप्रधान — प्रमाण-अनुशासन (§३.२)। A/B/C/D स्तर आ त्रि-स्तरीय वर्गीकरण खण्डकेँ अनुमान आ प्रमाणक बीच स्थायी रेखा राखबाक सामर्थ्य दैत अछि। दोसर — वास्तविक तुलनीयता: समानान्तरता एतय सजावट नहि, प्रत्युत नियन्त्रित पद्धति थिक, संख्यात्मक न्यूनतम-नमूना सहित। तेसर — दस्तावेजीकरण-उपकरणक पूर्णता: मेटाडेटा, लिप्यांकन-भेद, IGT आ निर्भरता-टिप्पणीकरण एक स्थानपर। चारिम — प्रकारिक-कवरेज: १२/१२ पूर्णता-जाँच केवल दाबा नहि, प्रत्येक शाखाक विशिष्ट घटक आ अध्याय-सन्दर्भ सहित सिद्ध कएल गेल अछि। पाँचम — आदर-सामञ्जस्यक उन्नत विवेचन, जे समकालीन विश्व-भाषाविज्ञानक स्तरक अछि। छठम — तिरहुता-संरक्षणक नैतिक-दृष्टि, जे दस्तावेजी-कठोरताकेँ सांस्कृतिक-निरन्तरतासँ जोड़ैत अछि। सातम — पुनरुत्पाद्यता-केन्द्रित रचना: ग्रन्थ बेर-बेर ई कहैत अछि जे निष्कर्ष एहन रूपमे राखू जे दोसर शोधकर्ता फेर जाँचि सकए। आदर-सामञ्जस्यक स्रोत-आधारित रूप-सारणीक एकटा उदाहरण (ठेठी-अंगिका, तृतीय-पुरुष आदर-भेद; अ. ८७५) — तिरहुतामे: 𑒯𑒳𑒢𑒲 — 𑒑𑒹𑒪𑒟𑒱𑒢 (हुनी — गेलथिन) 𑒯𑒧𑓂𑒧𑒹𑓀 — 𑒑𑒹𑒪𑒱𑒨𑒻 (हम्में — गेलियै) 𑒞𑒼𑓀 — 𑒑𑒹𑒪𑒯𑓄 (तों — गेलहऽ) 𑒆 — 𑒑𑒹𑒪𑒻 (ऊ — गेलै) सर्वनाम–क्रिया आदर-सामञ्जस्य: आदर-कोटि बदलैत क्रिया-अन्त्य बदलैत अछि (स्रोत-आधारित; पूर्ण रूपावली लेल समान-काल elicitation अपेक्षित)। विचारणीय सीमा आ सुझाव पहिल — परिचय-सर्वेक्षणक पुनरावृत्ति (अ. ६९४–७६८ मे तीन बेर)। यद्यपि ई भिन्न रजिस्टरमे अछि, तथापि एक शोध-संस्करण लेल ई विस्तार अनावश्यक अछि। सुझाव: एकटा प्रामाणिक सर्वेक्षण राखि, शेषकेँ पार-सन्दर्भ (cross-reference)मे बदलल जाए। दोसर — उपभाषा-मिश्रण आ अधिभाषा (meta-language)। खण्डमे कतहु विश्लेषणक भाषा स्वयं अंगिका वा बज्जिका भऽ जाइत अछि; एहिसँ अधिभाषा (जाहिसँ वर्णन कएल जाइत अछि) आ विषय-भाषा (जकर वर्णन होइत अछि) बीच रेखा धुंधला भऽ सकैत अछि। सुझाव: सम्पूर्ण खण्डक अधिभाषा एकरूप (मैथिली) राखल जाए, आ विषय-भाषाक डेटा सदैव स्पष्ट उद्धरण-चिह्नमे राखल जाए। तेसर — अध्याय-क्रमांकन। ६९४सँ ९२६ धरि निरन्तर क्रम स्तर-विन्यासकेँ झँपैत अछि। सुझाव: स्तर-उपसर्ग सहित क्रमांकन (जेना L1-01, L4-12), जाहिसँ पाठक तुरन्त बुझि सकए जे ओ कोन स्तरमे अछि। चारिम — ध्वन्यात्मक/परिमाणात्मक दाबा प्रायः कार्यक्रमात्मक (programmatic) रहि जाइत अछि। खण्ड ईमानदारीसँ एहन दाबाकेँ D-स्तर (जाँच-अनिवार्य) कहि देैत अछि — ई ईमानदारी प्रशंसनीय — मुदा एक भावी शोध-संस्करण लेल वास्तविक F0/VOT/अवधि-मान अपेक्षित रहत, जाहिसँ ध्वनिविज्ञान 'ढाँचा'सँ 'निष्कर्ष'क कोटिमे बढ़ि सकए। पाँचम — स्रोतक कोटि-मिश्रण। सन्दर्भ-सूचीमे सामुदायिक स्रोत (angika.com, Wikipedia, Omniglot) समकक्ष-समीक्षित (peer-reviewed) स्रोतक (Yadav 1996 Mouton, Kashyap 2012/2017) संग राखल अछि। खण्ड एहन स्रोतकेँ 'स्वतन्त्र पुष्टि आवश्यक' कहि सतर्क करैत अछि — मुदा एक शोध-संस्करणमे 'भूरा-साहित्य' (grey literature) कें पृथक् खण्डमे राखब उचित रहत। छठम — ग्लॉसिंग-संकेतक अन्तरराष्ट्रीय संगति। IGT ढाँचा लाइपजिग नियमक अनुरूप अछि, मुदा एकरा नामसँ बान्हल नहि गेल। सुझाव: संक्षेप-तालिकाकेँ स्पष्टतः लाइपजिग ग्लॉसिंग नियमसँ जोड़ल जाए, जाहिसँ अन्तर-प्रचालनीयता (interoperability) बढ़ए। सातम — समाजभाषाविज्ञान-भाग उपकरण-दृष्टिएँ सुदृढ़, मुदा वर्णनात्मक-कार्यक्रमात्मक रहि जाइत अछि; एकरा वास्तविक चर-अध्ययन (variationist dataset)क प्रतीक्षा अछि। ई सीमा दोष नहि, प्रत्युत भावी शोधक स्पष्ट दिशा थिक। संस्तुति आ तुलनात्मक स्थान व्यावहारिक-शिक्षणपरक वर्णनात्मक भाषा-विज्ञानक त्रिभाषिक समानान्तर सन्दर्भ-ग्रन्थक रूपमे खण्ड ४ एकटा मील-पाथर थिक — मैथिली-बिहारी-पट्टीक भाषा-विज्ञानमे एहन नियन्त्रित, प्रमाण-अनुशासित समानान्तर संरचना पूर्वनिदर्शनहीन अछि। एकटा विशुद्ध आनुभविक शोध-प्रबन्ध (empirical monograph)क रूपमे ई अखनो एकटा कठोरतासँ रचित ढाँचा थिक, जकरा अपन क्षेत्रकार्यक फसल भेटब बाकी अछि — आ खण्ड स्वयं ई स्वीकार करैत अछि: “𑒣𑒴𑒩𑓂𑒝”𑒏 𑒁𑒩𑓂𑒟 𑒄 𑒢𑒯𑒱 𑒖𑒹 𑒦𑒫𑒱𑒭𑓂𑒨𑒏 𑒬𑒼𑒡𑒏 𑒮𑒧𑓂𑒦𑒰𑒫𑒢𑒰 𑒮𑒧𑒰𑒣𑓂𑒞; 𑒁𑒩𑓂𑒟 𑒄 𑒖𑒹 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒫𑒱𑒠𑓂𑒨𑒰𑒪𑒨-𑒮𑓂𑒞𑒩𑒲𑒨 𑒫𑓂𑒨𑒰𑒫𑒯𑒰𑒩𑒱𑒏 𑒦𑒰𑒭𑒰-𑒫𑒱𑒖𑓂𑒘𑒰𑒢 𑒣𑒰𑒚𑓂𑒨𑒣𑒳𑒮𑓂𑒞𑒏 𑒪𑒹𑒪 𑒂𑒫𑒬𑓂𑒨𑒏 𑒒𑒙𑒏 𑒮𑒦 𑒣𑒳𑒮𑓂𑒞𑒏𑒧𑒹 𑒅𑒣𑒮𑓂𑒟𑒱𑒞 𑒁𑒕𑒱। “पूर्ण”क अर्थ ई नहि जे भविष्यक शोधक सम्भावना समाप्त; अर्थ ई जे विश्वविद्यालय-स्तरीय व्यावहारिक भाषा-विज्ञान पाठ्यपुस्तक लेल आवश्यक घटक सभ पुस्तकमे उपस्थित अछि। — अध्याय ९२६, पूर्णता-जाँच उपसंहार खण्ड ४ अपन तीन खण्डक व्याकरण-रचना-प्रयासकेँ एकटा वैज्ञानिक-वर्णनात्मक आधार प्रदान करैत अछि, आ ओहिसँ सम्पूर्ण ग्रन्थ-परियोजनाकेँ निर्देशसँ वर्णन धरिक पूर्ण चाप (arc) दैत अछि। एकर सभसँ स्थायी योगदान कोनो विशिष्ट भाषिक निष्कर्ष नहि, प्रत्युत एकटा पद्धति-आदर्श थिक: प्रमाणकेँ स्रोतसँ बान्हब, अनुमानकेँ अनुमान कहब, तुलनाकेँ नियन्त्रित करब, आ निष्कर्षकेँ पुनर्जाँच-योग्य राखब। विदेह-आन्दोलनक 'शून्य-मनगढ़न्त' नीति एतय एक अमूर्त आदर्शसँ ठोस पद्धति-यन्त्रमे परिणत भऽ जाइत अछि। आ अन्ततः, तिरहुताक प्रति एकर सचेत नीति एकरा एकटा गहन सांस्कृतिक अर्थ दैत अछि — भाषिक-दस्तावेजीकरणक आधुनिक कठोरता आ मिथिलाक लिपि-परम्पराक निरन्तरता, दुनू एक्के आवरणमे। एहि समीक्षाकेँ तिरहुता-लिपिमे उद्धृत करब ओहि निरन्तरताक एकटा विनम्र स्वीकृति थिक। भाग ६ — सात सिद्धान्तपरम्परासँ समेकित समानान्तर समीक्षा ६.१ व्याकरणक स्तरपर भारतीय पाणिनीय दृष्टि पोथीक रूप-सूक्ष्मता आ प्रत्यय-व्यवस्था बढ़ेबाक आग्रह करैत अछि; पाश्चात्य संरचनात्मक/प्रकार्यात्मक दृष्टि वितरण, पदक्रम, निर्भरता, सूचना-संरचना आ सामाजिक प्रकार्यक स्पष्टता माँगैत अछि; तिब्बती आ जापानी परम्परा परसर्ग-कण-संबन्धक सूक्ष्म उपयोगपर ध्यान खींचैत अछि; चीनी आधुनिक व्याकरण बोलचालक वास्तविक डेटा आ बाहरी श्रेणीक सावधान उपयोगक शिक्षा दैत अछि; इस्रायली मानदण्ड-दृष्टि “मानक”केँ सामाजिक चयन मानैत अछि; विदेह पद्धति तीनू भाषामे समान प्रश्न आ प्रमाण-स्तर माँगैत अछि। एहि सभकेँ जोड़ि मुख्य निष्कर्ष ई: पोथीक व्याकरणिक ढाँचा व्यापक अछि, मुदा “नियम”क चार प्रकार अलग चिन्हित होय—वर्णनात्मक सामान्यीकरण, शिक्षण-मानक, क्षेत्रीय प्रवृत्ति, आ ऐतिहासिक/परिकल्पित व्याख्या। चारूक भाषिक अधिकार अलग अछि; एक शब्द “नियम”सँ सभ नहि चलबाक चाही। ६.२ रचना आ साहित्यक स्तरपर भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य रचनाक भाव, निहितार्थ, विशिष्ट अभिव्यक्ति आ प्रसंग-संगति जाँचैत अछि। चीनी वेनशिन परम्परा विन्यास, भाव, विधा, शैली आ शब्द-चयनक जैविक एकता देखैत अछि। जापानी कण-आ-विराम संवेदनशीलता सूक्ष्म पाठ-प्रभावपर बल दैत अछि। पाश्चात्य rhetoric दावा, प्रमाण, पाठक, शैली, प्रवचन आ विधागत संरचना जाँचैत अछि। इस्रायली बहुप्रणाली दृष्टि रचनाकेँ साहित्यिक-सामाजिक प्रणालीमे ओकर स्थानसँ जोड़ैत अछि। पोथीक अध्याय ३२४–४३५ एहन समेकन लेल सबसँ उपयुक्त अछि। अगिला संस्करणमे प्रत्येक रचना-विधा लेल “विषय”, “पाठक”, “उद्देश्य”, “संरचना”, “भाषा-रजिस्टर”, “साहित्यिक प्रभाव”, “प्रमाण/उद्धरण”, “सम्पादन-जाँच” आठ-बिन्दु साँचा देल जाए। कथा/कविता लेल रस-ध्वनि-वक्रोक्ति; निबन्ध/सम्पादकीय लेल तर्क-प्रमाण; संवाद लेल सामाजिक सम्बन्ध; अनुवाद लेल लक्ष्य-मानदण्ड—एहन विधा-विशिष्ट कसौटी उपयोगी होयत। ६.३ भाषा-विज्ञानक स्तरपर भाषा-विज्ञान भाग सिद्धान्तक तुलना सँ कम, प्रमाण-पद्धतिसँ बेसी जाँचल जाए। “कोन डेटा?”, “के कहलक?”, “कतय?”, “कखन?”, “कोन शैलीमे?”, “रिकॉर्डिंग अछि?”, “कतेक वक्ता?”, “विरोधी उदाहरण अछि?”, “विश्लेषण दोसर शोधकर्ता दोहरा सकैत अछि?”—ई प्रश्न सभसँ ऊपर रहए। पोथीक ८१४, ८२५, ८२७, ८५१–८५८, ९०९–९१९ जकाँ समूह एहि दिशा तैयार करैत अछि। एहि आधारपर प्रारम्भिक खण्डसभक भाषिक तथ्यक backward audit कएल जाए। ध्वनि, रूप, मानक, क्षेत्रीय वितरण, ऐतिहासिक व्युत्पत्ति, भाषा-वर्गीकरण, शब्द-स्रोत—सभ पर प्रमाण-टैग लागू हो। एहि सँ विशाल सामग्रीक विश्वसनीयता समान स्तरपर पहुँचत। ६.४ समानान्तरता: समानता नहि, तुलनीयता तीनू भाषा निकट होयबाक कारण समान रूप भेटब स्वाभाविक अछि; मुदा समानान्तर अध्ययनक लक्ष्य समानता सिद्ध करब नहि, तुलनीय प्रश्नक उत्तरमे समानता आ भिन्नता दुनू देखब अछि। उदाहरणार्थ बहुवचन, आदर, क्रिया-सामंजस्य, निपात, परसर्ग, प्रश्न, निषेध, वर्गक आ काल-पक्ष-भाव—ई सभमे एक्के अर्थ-उद्बोधन प्रयोग कएल जाए, मुदा प्रत्येक भाषाक स्वाभाविक वाक्य स्वीकार कएल जाए। अनुवादक प्रभाव विशेष जोखिम अछि। जँ पहिने मैथिली वाक्य बनल, फेर ओहि ढाँचापर ठेठी-अंगिका/बज्जिका अनुवाद भेल, तँ कृत्रिम समानता पैदा भऽ सकैत अछि। पोथीक अध्याय ८२५ एहि जोखिमकेँ पहचानैत अछि; एहि सिद्धान्तकेँ सम्पूर्ण तुलनात्मक उदाहरण-बैंकपर लागू करब चाही। भाग ७ — भाषिक, साहित्यिक आ सम्पादकीय विशेषता ७.१ मुख्य उपलब्धिसभ तीन निकटवर्ती भाषिक परम्पराकेँ अलग गरिमा दैत समान अध्ययन-क्षेत्रमे आनब। व्याकरणसँ रचना आ रचनासँ आधुनिक भाषा-विज्ञान धरि निरन्तर अध्ययन-पथ बनाबयब। अभ्यास, उत्तर, शैली-पत्र, सम्पादन, प्रूफ, प्रकाशन-जाँच आ डिजिटल कार्यप्रवाहकेँ व्याकरण-पुस्तकमे शामिल करब। क्षेत्रकार्य, प्राकृतिक पाठ, कॉर्पस, मेटाडेटा, पुनरुत्पाद्यता, शोध-नैतिकता आ प्रयोगात्मक पद्धतिक परिचय देब। मानक आ क्षेत्रीय रूप दुनूकेँ मान्यता देबाक प्रयास। समान प्रश्न तीनू भाषामे लागू करबाक पद्धति विकसित करब। वाक्य, अर्थ, प्रयोग, समाज, इतिहास, प्रकारिकी, मनोभाषा आ संगणकीय भाषा-विज्ञान धरि व्यापक शाखा-समावेश। सम्पादनक स्पष्ट नैतिकता—तथ्य, आशय आ आवश्यक सामग्रीक संरक्षण। ७.२ मुख्य सुधार-क्षेत्र पुनरावृत्त संरचनाकेँ स्तरवार मानचित्र आ क्रॉस-सन्दर्भसँ स्पष्ट करब। “मानक” शब्दक पद्धतिगत परिभाषा: कोन प्रमाणपर कोन रूप प्राथमिक? प्रत्येक क्षेत्रीय रूपक ठाम, वक्ता-समूह, शैली, तिथि आ स्रोतक मेटाडेटा। ध्वनि-दावाक संग रिकॉर्डिंग, IPA, न्यूनतम भेद आ आवश्यक ठाम ध्वनिक मापन। ऐतिहासिक/वंशीय दावामे पुरान स्रोत, आधुनिक शोध आ समुदायिक आत्मपहचानक स्तर अलग करब। अंग्रेजी तुलना उपयोगी राखि अंग्रेजी श्रेणीक अनावश्यक आरोपणसँ बचब। पारम्परिक संस्कृत व्याकरणिक पदावली आ आधुनिक वर्णनात्मक श्रेणीक भेद स्पष्ट करब। उदाहरणक स्रोत-स्थिति—मूल पाठ, वक्ता-उद्बोधन, लेखक-निर्मित, अनुवादित, संशोधित—स्पष्ट करब। अध्याय ९०९–९१९क प्रमाण-स्तर प्रणालीकेँ पूरा पोथीपर backward लागू करब। बृहद डिजिटल संस्करणमे खोज, अन्तःसन्दर्भ, कॉर्पस लिंक, रिकॉर्डिंग ID आ मशीन-पठनीय शब्दावली जोड़ब। ७.३ फॉण्ट, लिपि आ उदाहरणक सम्पादकीय नीति ठेठी-अंगिका, बज्जिका आ मैथिलीक देवनागरी उदाहरण एक्के Unicode-संगत देवनागरी फॉण्टमे रहबाक चाही, मुदा भाषा-भेद रंग वा अलग font-family सँ नहि, स्पष्ट लेबलसँ देखाओल जाए। संयुक्ताक्षर, अनुस्वार/चन्द्रबिन्दु, ङ/ञ/ण, ड़/ढ़, दीर्घ मात्रा, विराम-चिह्न आ combining marksक PDF/Word rendering जाँच आवश्यक अछि। मूल भाषिक उदाहरणकेँ “सुधार” नामपर मानक मैथिलीमे बदलल नहि जाए। ठेठी-अंगिका उदाहरण ठेठी-अंगिका रूपमे, बज्जिका उदाहरण बज्जिका रूपमे, मैथिली उदाहरण मैथिली रूपमे रहए; केवल typographic defect सुधरए। यदि मानकीकृत रूप अलग देब आवश्यक हो तँ “मूल रूप” आ “मानकीकृत रूप” पृथक राखल जाए। समग्र गुण-दोष आ तुलनात्मक स्थान-निर्धारणक पूरक विवेचन समग्र गुण-दोष विवेचन सातू दृष्टिसँ परीक्षाक बाद आब ग्रन्थक समग्र मूल्यांकन — पहिने गुण, तकर बाद विचारणीय सीमा। नीक समीक्षाक धर्म थिक जे प्रशंसा आ आलोचना दुनू प्रमाण-सम्मत हो। प्रमुख गुण (क) समानान्तर-पद्धतिक मौलिकता। तीन निकट-सम्बद्ध जनभाषाकेँ एके पद्धतिसँ, एके मंचपर, समान गरिमासँ राखब — ई दक्षिण-एसियाई भाषा-लेखनमे दुर्लभ आ मौलिक कर्म थिक। ई न केवल शिक्षण-सुविधा दैत, अपितु स्वयं एकटा प्रकारिक (typological) अन्तर्दृष्टि उत्पन्न करैत अछि, किएक तँ भेद तखने स्पष्ट होइत अछि जखन समान-वस्तु संग-संग राखल जाय। (ख) प्रमाण-अनुशासन आ शून्य-कल्पन नीति। 'आधार-पाठ समर्थित / वर्णनात्मक प्रवृत्ति / परिकल्पना' क त्रिविध-कोटि, आ 'जतय डेटा कम, ओतय दाबी कम' क सतत आग्रह — ई ग्रन्थकेँ लोकप्रिय-व्याकरणसँ ऊपर उठा शोध-प्रामाणिकता दैत अछि। भारतीय प्रमाण-विवेक आ पाश्चात्य विज्ञान-दर्शन दुनू एहि अनुशासनकेँ स्वीकारत। (ग) व्यापकता आ पूर्णता। ध्वनितत्त्वसँ लऽ कऽ संगणकीय भाषा-विज्ञान, दस्तावेजीकरण-नैतिकता, dialectometry-मैट्रिक्स आ द्विभाषिक-प्रसंस्करण-प्रयोगशाला धरि — ई ग्रन्थ आधुनिक भाषा-विज्ञानक प्रायः कोनो प्रमुख शाखाकेँ नहि छोड़ैत। '१२/१२ पूर्णता-जाँच' एकर प्रमाण थिक। (घ) आत्म-प्रामाणिकता आ आत्म-वर्णन। प्रत्येक भाषाक व्याकरण ओहि भाषाक अपन गद्यमे लिखब (अंगिका अंगिकामे, बज्जिका बज्जिकामे, मैथिली मैथिलीमे) — ई भाषाक स्वायत्तताक सशक्त घोषणा थिक, आ ज़ुकरमानीय-इस्रायली-दृष्टिसँ भाषा-पुनरुज्जीवनक व्यावहारिक-मनोवैज्ञानिक कदम थिक। (ङ) आदर-तन्त्रक न्यायसङ्गत विस्तार। मैथिलीक बहु-आयामी सामञ्जस्य, बज्जिकाक प्रयोग-मूलक आदर आ अंगिकाक भेद-प्रणालीकेँ ग्रन्थ जे गहनता दैत अछि, ओ तिब्बती झेसा आ जापानी केइगो-दृष्टिसँ पूर्णतः उचित — किएक तँ एहन भाषाक आत्मा हुनक आदर-तन्त्रमे बसैत अछि। (च) लिपि-चेतना आ डिजिटल-संरक्षण। तिरहुता-लिपि-परिशिष्ट, यूनिकोड-चर्चा आ OCR/TTS/NLP-अध्याय ग्रन्थकेँ थोन्मि-सम्भोट-परम्पराक आधुनिक-डिजिटल उत्तराधिकारी बनबैत अछि — भाषा-संरक्षणकेँ ओ केवल ग्रन्थ नहि, अपितु प्रौद्योगिकीक प्रश्न बुझैत अछि। (छ) शिक्षण-सुगमता। प्रत्येक अध्यायक संग अभ्यास, उत्तरमाला, सारणी आ रचना-सिद्धान्त — ई हिब्रू-अकादमी-प्रतिमानक 'मानकीकरण + स्वीकार्यता' क सन्तुलन साधैत अछि। ग्रन्थ केवल वर्णन नहि, अपितु सिखबैत अछि। विचारणीय सीमा आ सुझाव (क) संरचनात्मक पुनरावृत्ति। भिन्न-भिन्न अनुवर्ती-सङ्कलन (batch) एके ग्रन्थमे मिलबाक कारण किछु विषय (विशेषतः खण्ड चारिक 'भाषा-विज्ञान की थिक', 'ऐतिहासिक-तुलनात्मक', 'कॉर्पस/संगणकीय') भिन्न मानकीकरणमे एकाधिक बेर आबैत अछि — अध्याय-क्रम ६९४, ७०९, ७२४, ७३९, ७६९, ७८४, ७९९ एकर साक्षी। सुझाव: अन्तिम सम्पादनमे एहि समानान्तर-संस्करणकेँ या तँ एकीकृत कएल जाय, या प्रत्येककेँ स्पष्ट लेबल ('अंगिका-केन्द्रित संस्करण', 'मैथिली-केन्द्रित संस्करण') देल जाय, जाहिसँ पाठककेँ दोहराव खटकय नहि। (ख) रजिस्टर-मिश्रण। ग्रन्थ तीन भिन्न भाषाक गद्यमे लिखल अछि (अंगिका: छेकै/होय छै/आरो; बज्जिका: हए/छै; मैथिली: अछि/थिक/छथि)। ई सैद्धान्तिक रूपेँ न्यायसङ्गत आ प्रशंसनीय निर्णय थिक, मुदा निरन्तर-पठनमे ई शैली-अन्तरण (register shift) कखनहुँ-कखनहुँ पाठकक प्रवाहकेँ तोड़ैत अछि। सुझाव: प्रत्येक खण्डक आरम्भमे एकटा स्पष्ट टीप — 'ई खण्ड अमुक भाषाक अपन गद्यमे अछि' — पाठककेँ मानसिक रूपेँ तैयार कऽ देत। (ग) क्रम-सङ्ख्याक असामान्यता। मैथिली-खण्ड अध्याय २१–६९३, भाषा-विज्ञान ६९४–९२६ — ई सङ्ख्या-क्रम सङ्कलनक इतिहाससँ उपजल, मुदा स्वतन्त्र-पाठकक लेल भ्रामक भऽ सकैत अछि (जेना 'अध्याय ६९३' सुनि पाठक असामान्य-विशाल-ग्रन्थक अपेक्षा करत)। सुझाव: प्रत्येक खण्डक भीतर स्वतन्त्र-क्रमांकन (खण्ड ३, अध्याय १–…) मुख्य राखि, समेकित-क्रमांक कोष्ठकमे देब पठनीयता बढ़ाओत। (घ) शुद्धीकरण बनाम यथार्थ-अभिलेखनक सैद्धान्तिक स्पष्टता। ग्रन्थ एक दिस 'हिन्दी-प्रभावसँ बचू' (शुद्धीकरण) कहैत अछि, दोसर दिस 'भाषा-भाषी असलमे केना बजैत छथि, ओ देखू' (वर्णनवाद) — ई दुनू लक्ष्य वैध, मुदा किछु ठाम अनिर्णीत रूपेँ सटल अछि। ज़ुकरमानीय-दृष्टिसँ सुझाव: भूमिकामे एकटा स्पष्ट सैद्धान्तिक-वक्तव्य जोड़ल जाय जे — 'व्याकरण-खण्डमे लक्ष्य शुद्धीकरण थिक, भाषा-विज्ञान-खण्डमे यथार्थ-वर्णन; आ हिन्दी-सम्पर्कजन्य रूपकेँ हम अशुद्धि नहि, अपितु सम्पर्क-परिघटना (contact phenomenon) क रूपमे अभिलेखित करब, मुदा मानक-लेखनमे अनुशंसित नहि करब। ' एहिसँ आन्तरिक-तनाव सिद्धान्त बनि जाएत। (ङ) लोकोक्ति-सामग्रीक आलोचनात्मक-रूपरेखा। नारी-विषयक आ अन्य मूल्य-भारित लोकोक्तिकेँ अभिलेखित करब भाषा-वैज्ञानिक रूपेँ आवश्यक; मुदा विदेह-आन्दोलनक स्त्री-स्वर-पक्षधरताक संगतिमे, एहन सामग्रीक संग एकटा संक्षिप्त-सन्दर्भ-टिप्पणी ('ई लोकोक्ति तत्कालीन सामाजिक-मूल्यक अभिलेख थिक, अनुशंसा नहि') समीचीन हएत। (च) उद्धरण-शैलीक एकरूपता। सन्दर्भ-सूची व्यापक आ सत्यापनीय अछि, मुदा शैली-मिश्रित (कतहु author–date, कतहु पारम्परिक)। एकटा एकीकृत उद्धरण-शैली आ भीतरी-उद्धरण (in-text citation) क सुसंगत-प्रयोग ग्रन्थकेँ पूर्ण-अकादमिक-मानकपर पहुँचा देत। (छ) प्रकारिकी-दाबी आ आँकड़ाक सन्तुलन। किछु प्रकारिक-दाबी उपलब्ध कॉर्पससँ आगाँ बढ़ैत अछि; ग्रन्थ एकरा 'परिकल्पना' कहि सीमांकित करैत अछि, जे उचित। तथापि दाबी आ परिकल्पनाक रेखाकेँ प्रत्येक अध्यायमे दृश्य-रूपेँ (जेना भिन्न-प्रतीक वा बॉक्स) अलग करब पाठक-हितकर हएत। तुलनात्मक स्थान-निर्धारण समग्रमे, ई ग्रन्थ यादव (Yadav 1996, Mouton) क सन्दर्भ-व्याकरणक शोध-गहनता आ ग्रियर्सनक सर्वेक्षण-व्यापकताक बीच एकटा नव स्थान बनबैत अछि — ई शोध-व्याकरण जतबा नहि, मुदा शिक्षण-व्याकरणसँ बहुत बेसी; ई ओ 'व्यावहारिक तुलनात्मक भाषा-विज्ञान पाठ्यपुस्तक' थिक जकर अभाव बिहारी-उपवर्गक भाषा-अध्ययनमे बहुत दिनसँ खटकैत छल। अंगिका-बज्जिका-मैथिलीकेँ एके तुलनात्मक-ढाँचामे आनयवला ई सम्भवतः प्रथम पूर्ण-ग्रन्थ थिक — आ एतबे एकर ऐतिहासिक महत्त्व सिद्ध करबाक लेल पर्याप्त अछि। भाग ८ — अगिला संस्करण लेल प्राथमिक सम्पादकीय रूपरेखा प्रत्येक खण्डक आरम्भमे “ई भाग कोन पाठक लेल?” आ “पहिने की पढ़ू?” मार्गदर्शिका जोड़ू। अध्याय १–२०क बादक ठेठी-अंगिका विस्तृत भागकेँ स्पष्ट “विस्तृत संदर्भ संस्करण” शीर्षक दिअ। बज्जिकाक चौदह-भागीय आ पाँच-भागीय प्रस्तुति बीच स्पष्ट mapping table दिअ। मैथिली अध्याय ४४–६९३केँ आरम्भिक/मध्यवर्ती/उन्नत/शोध चार स्तरमे tag करू। भाषा-विज्ञान ६९४–८१३क तीन भाषीय पुनरावृत्तिमे साझा पद्धति एक ठाम, भाषा-विशिष्ट डेटा अलग ठाम देबाक सम्भावना जाँचू। अध्याय ८१४–८२६केँ “समानान्तर पद्धतिक मूल विधान” रूपमे पुस्तकक आरम्भिक मार्ग-रेखासँ लिंक करू। प्रत्येक भाषिक उदाहरणक unique ID आ example-status जोड़ू: प्राकृतिक/उद्बोधित/प्रकाशित/लेखक-निर्मित/अनुवादित। प्रत्येक ध्वनि उदाहरण लेल recording ID, वक्ता, क्षेत्र, वर्ष आ IPA दऽ सकल जाए। मानकीकरणक प्रत्येक निर्णय लेल policy note राखू—प्रचलन, साहित्यिक परम्परा, बोधगम्यता, शिक्षा, समुदायिक स्वीकृति। स्रोत-सूची समेकित रहए, मुदा अध्याय-अन्त वा margin citation code सँ claim-to-source traceability बनाउ। डिजिटल संस्करणमे search index, cross-links, corpus links, audio links, glossary anchors आ version history राखू। प्रकाशनपूर्व पूर्ण Unicode visual QA: DOCX, PDF, browser, Android/iOS, zoom/reflow आ copy-paste परीक्षण। भावी गहन शोधक पाँच-चरणीय रूपरेखा नव दिल्ली सँ 'गहन शोध' (Deep Research) क प्रस्तावित योजना पोथीक परिशिष्टसभ (O, P, Q, R, S) आ 'विदेह आर्काइभ' क विस्तृत दृष्टिकेँ आधार बना कऽ, भारतक राजधानी नव दिल्लीसँ मैथिली, बज्जिका आ ठेठी-अंगिकाक लेल एकटा बहुआयामी, 'डीप रिसर्च' (गहन शोध) क पञ्च-चरणीय योजना निम्नलिखित रूपमे प्रस्तावित कएल जा रहल अछि: चरण (Phase) शोधक प्रबन्धन आ प्रणाली (Methodology) लक्षित अध्याय आ उद्देश्य (Target & Objectives) चरण १: द्विभाषिक प्रसंस्करण प्रयोगशाला नव दिल्लीमे एकटा 'Multilingual Processing Lab' क स्थापना। सफ्टवेयर-आधारित 'Lexical Access' क परीक्षण। अध्याय ९०७ आ ९०८। दिल्लीमे प्रवासी मैथिल/बज्जिका-भाषीक 'Switching Cost' आ 'Cross-language Activation' नापब। चरण २: सहभाषामिति (Dialectometry) विश्लेषण परिशिष्ट P क '40-feature starter matrix' क प्रयोग। Levenshtein आ Hamming Distance मापन। अध्याय ८९०। ग्रियर्सनक वर्गीकरणक कम्प्यूटेशनल परीक्षण कऽ तीनू भाषाक वास्तविक 'भाषिक दूरी' स्थापित करब। चरण ३: क्षेत्रकार्य आ कोतोदामा-अभिलेखीकरण बिहार (बज्जिकाञ्चल/अंग) आ नेपाल (रौतहट, सर्लाही) मे ऑडियो-विजुअल सर्वेक्षण (Apparent/Real Time)। अध्याय ८९१, ८९३। जापानी 'कोतोदामा' सिद्धान्तक आधारपर लोकगीत, गजल आ लुप्तप्राय शब्दावलीक डिजिटल अर्काइविंग। चरण ४: प्रकारिकी कोडिंग आ ऐतिहासिक पुनर्निर्माण परिशिष्ट R (Typology Coding Sheet) क प्रयोग। 'Comparative Method' द्वारा 'Proto-form' निर्माण। अध्याय ८९४-८९७, ९०१-९०६। मागधी अपभ्रंशसँ एहि भाषासभक ऐतिहासिक विकास-क्रम (Chronology) क पुनर्निर्माण। चरण ५: मानकीकरण आ डिजिटल फन्ट रेन्डरिंग यूनिकोड कन्सोर्टियमक मानक अनुरूप तिरहुता (Mithilakshar) आ कैथी लिपिक डिजिटल विकास आ ओपन-सोर्स OCR। पञ्जी-प्रबन्ध आ पुरान पाण्डुलिपिक डिजिटाइजेशन। 'Revivalistics' (जुकरमैन) क अन्तर्गत लिपिक पुनरुज्जीवन। ई 'डीप रिसर्च' योजना एहि भाषाई क्षेत्रकेँ केवल पारम्परिक व्याकरणक घेरासँ बाहर निकालि आधुनिक 'कम्प्यूटेशनल लिंग्विस्टिक्स' (Computational Linguistics) आ मनोभाषाविज्ञानक उच्चतम अन्तरराष्ट्रीय मानक धरि पहुँचाबय लेल एकटा सुदृढ़ ब्लूप्रिंट थिक। भाग ९ — अन्तिम साहित्यिक-वैज्ञानिक मूल्यांकन “मैथिलीक एकटा समानान्तर व्याकरण, रचना आ भाषा विज्ञान”क मूल्य केवल अध्याय-संख्यामे नहि। एकर महत्त्व एहि प्रयत्नमे अछि जे भाषा सीखब, शुद्ध लिखब, साहित्यिक रचना करब, तर्कपूर्ण लेख लिखब, पाठ सम्पादित करब, ध्वनि रिकॉर्ड करब, क्षेत्रकार्य करब, कॉर्पस बनाबब, ऐतिहासिक तुलना करब आ डिजिटल संसाधन तैयार करब—ई सभकेँ एक सतत ज्ञान-परम्पराक अंग मानल गेल अछि। भारतीय दृष्टि एहि पोथीमे रूप-सूक्ष्मता, वाक्यार्थ आ साहित्यिक प्रभावकेँ आर गहन करबाक सम्भावना देखैत अछि। पाश्चात्य दृष्टि वर्णनात्मकता, संरचना, प्रयोग, समाज, प्रकारिकी आ प्रमाणक कठोरता माँगैत अछि। इस्रायली दृष्टि मानदण्ड, प्रणाली, स्थानान्तरण आ लक्ष्य-समुदायक भूमिका स्पष्ट करैत अछि। चीनी दृष्टि बोलचाल, व्यवस्थित वर्णन आ रचनात्मक विन्यासक महत्त्व बढ़बैत अछि। तिब्बती दृष्टि बाह्य व्याकरणिक परम्परा ग्रहण करैत स्थानीय संरचनाकेँ सुरक्षित रखबाक शिक्षा दैत अछि। जापानी दृष्टि कण, अन्तरव्यक्तिक सम्बन्ध आ भाषा-प्रक्रियाक सूक्ष्मता देखबैत अछि। विदेह समानान्तर दृष्टि एहि सभकेँ तुलनीय डेटा, समान प्रतिष्ठा, स्रोत, क्षेत्रकार्य, कॉर्पस आ पुनरुत्पाद्य जाँचमे परिणत करैत अछि। एहि आधारपर पोथीकेँ “पूर्ण” कहबाक अर्थ ई नहि जे आब संशोधनक आवश्यकता नहि; उलटे, एकर व्यापक संरचना अगिला विद्वत्तापूर्ण संस्करण लेल एक मजबूत आधार तैयार करैत अछि। सबसँ जरूरी अगिला चरण सामग्री बढ़ेनाइ नहि, सामग्रीक प्रमाण-संरचना, क्रॉस-सन्दर्भ, पुनरावृत्ति-नियन्त्रण, मानक-नीति, उदाहरण-मेटाडेटा आ डिजिटल सत्यापनकेँ एकरूप बनौनाइ अछि। एहि सुधारक बाद ई कृति मैथिली, ठेठी-अंगिका आ बज्जिकाक व्याकरण-रचना मात्र नहि, बल्कि पूर्वी इंडो-आर्य भाषिक अध्ययनक एक महत्त्वपूर्ण समानान्तर शोध-संसाधन रूपमे अधिक प्रभावशाली भऽ सकैत अछि। समेकित उपसंहार निष्कर्ष 'मैथिली समानान्तर व्याकरण, रचना आ भाषा-विज्ञान' मात्र एकटा भाषा-शास्त्रीय पोथी नहि, अपितु एकटा वैचारिक आ बौद्धिक क्रान्ति थिक। ई पोथी भारतीय (नव्य-न्याय, रस, स्फोट), पाश्चात्य (संरचनावाद, जनरेटिव ग्रामर), चीनी (वेन), जापानी (कोतोदामा, मोनो नो अवेयर), तिब्बती (सुम्कुपा) आ इस्रायली (रिवाइवलिस्टिक्स/पुनरुज्जीवन) सिद्धान्तसभक एकटा अभूतपूर्व, सर्वांगीण समन्वय प्रस्तुत करैत अछि। भाषा-प्रकारिकी आ समाजभाषाविज्ञानक कड़ाई सँ पालन करैत ई पोथी बज्जिका आ ठेठी-अंगिका जकाँ उपेक्षित भाषासभकेँ ओकर उचित सम्मान, व्याकरणिक मानकीकरण आ स्वतन्त्र भाषिक अस्तित्व प्रदान करैत अछि। विदेह समानान्तर इतिहासक दृष्टि एहि ग्रन्थकेँ केवल व्याकरणक नीरस सीमासँ बाहर निकालि कऽ पहिचान, सामाजिक शक्ति-समीकरण आ लोकतान्त्रिक प्रतिनिधित्वक गम्भीर विमर्श बना दैत अछि। नव दिल्लीसँ प्रस्तावित 'डीप रिसर्च' योजना एहि सैद्धान्तिक पोथीकेँ एकटा व्यावहारिक, तकनीकी आ विश्वस्तरीय अनुसन्धानक मञ्चपर लऽ जायत। समग्रतामे, ई पोथी आ एकर समानान्तर दृष्टि समग्र इंडो-आर्य भाषा-विज्ञान आ दक्षिण-एसियाली साहित्य-शास्त्रक लेल एकटा नव प्रतिमान (Paradigm) स्थापित करैत अछि, जतय भाषा केवल नियमक सङ्ग्रह नहि, बल्कि मानव मन, समाज, पदानुक्रम आ प्रकृतिक साक्षात् 'वेन' (प्रतिरूप) बनि कऽ प्रस्फुटित होइत अछि। उपसंहार मैथिलीक एकटा समानान्तर व्याकरण, रचना आ भाषा-विज्ञान — एहि नामक भीतरे ग्रन्थक आत्मा बसल अछि। ई 'समानान्तर' थिक — भाषा-वैज्ञानिक अर्थमे (तीन भाषाक तुलना), आ विदेह-आन्दोलनक अर्थमे (प्रति-कानन)। ई दुनू अर्थ एतय एक भऽ गेल अछि, आ यएह ग्रन्थक मौलिक उपलब्धि थिक। सातू समीक्षा-दृष्टिक निष्कर्ष एक स्वरमे कहैत अछि: भारतीय प्रमाण-विवेक आ आत्म-वर्णन, पाश्चात्य वर्णनवाद आ प्रकारिकी, इस्रायली पुनरुज्जीवन-चेतना, चीनी कोश-आ-गणक-दृष्टि, तिब्बती लिपि-आ-आदर-तन्त्र, जापानी केइगो-आ-प्रक्रिया-दृष्टि, आ विदेह प्रति-कानन — ई सभ एहि ग्रन्थमे कोनो-न-कोनो रूपेँ सजीव अछि। जे सीमा अछि, ओ मूलतः सम्पादन-स्तरक (पुनरावृत्ति, क्रमांकन, शैली-एकरूपता) थिक, सिद्धान्त-स्तरक नहि — आ एहन सीमा अन्तिम-सम्पादनसँ सुधार्य थिक। एकटा भाषा-समुदायक सभसँ पैघ आत्म-रक्षा ओकर अपन व्याकरणकेँ अपन हाथसँ, अपन प्रमाणसँ, अपन गद्यमे लिखब थिक। ई ग्रन्थ ठीक यएह करैत अछि — तीन-तीन उपेक्षित जनभाषाक लेल, एके संग। तेँ ई केवल व्याकरण-पोथी नहि, अपितु एकटा भाषिक-आत्म-निर्णयक दस्तावेज थिक। भविष्यक संस्करण जँ ऊपर-सुझाओल सम्पादकीय-परिष्कार अपनाबय, तँ ई अंगिका-बज्जिका-मैथिली-अध्ययनक एकटा आधार-ग्रन्थ (standard reference) बनबाक पूर्ण सामर्थ्य रखैत अछि। परिशिष्ट अ — सम्पूर्ण अध्याय-आवरण जाँच अध्याय विषय-समूह आरम्भिक शीर्षक अन्तिम शीर्षक 1–20 ठेठी-अंगिका आधार व्याकरण आ रचना भूमिका: ठेठी-अंगिका भाषा के परिचय अलंकार (विस्तृत) 21–43 मैथिली पारम्परिक आधार भाषा, व्याकरण आ मैथिली — परिचय अलंकार 44–61 भाषा-वाक्य-सामाजिक आधार भाषा, व्याकरण आ रचना शुद्ध वाक्य बनाबयक पाँच आधार 62–89 संज्ञा-सर्वनाम संज्ञाक विस्तृत स्वरूप सर्वनामक सामान्य अशुद्धि आ सुधार 90–124 क्रिया-TAM क्रिया की? अंग्रेजी adjective/determiner प्रणालीसँ तुलना 125–160 अव्यय-परसर्ग-संयोजन क्रियाविशेषण की? सामान्य अशुद्धि आ सुधार 161–203 वाक्य-प्रकार-वाच्य-कथन वाक्य-प्रकारक आधुनिक दृष्टि मिश्रित कथन आ उद्धरण 204–260 उपवाक्य-शब्दनिर्माण मुख्य उपवाक्य आ अधीनस्थ उपवाक्य अंग्रेजी word formation सँ व्यावहारिक तुलना 261–323 वर्तनी-सम्पादन-अनुच्छेद शुद्ध लेखनक मूल सिद्धान्त कमजोर अनुच्छेदक सम्पूर्ण सुधार 324–397 रचना-तर्क-शैक्षिक लेखन रचनाक उद्देश्य, पाठक आ स्वर उन्नत रचनाक सम्पादकीय जाँच 398–477 शैली-अर्थ शैली की अछि? व्यावहारिक अर्थ-जाँचसूची 478–574 ध्वनि-सम्पादन-प्रकाशन ध्वनि, अक्षर आ ध्वनिम अन्तिम सम्पादकीय जाँचसूची 575–620 समेकित अभ्यास समेकित निदान: भाषा-दोष कोन स्तरक? स्व-मूल्यांकन सूची 621–676 त्वरित सन्दर्भ एहि सन्दर्भ-खण्डक उपयोग त्वरित स्व-परीक्षणक उत्तर 677–693 मानचित्र-अन्तिम जाँच पूरा ग्रन्थक संरचनात्मक मानचित्र पुस्तक-समापन 694–708 ठेठी-अंगिका भाषा-विज्ञान भाषा-विज्ञान के स्वरूप आरो वैज्ञानिक तरीका क्षेत्रकार्य, कॉर्पस, दस्तावेजीकरण आरो संगणकीय भाषा-विज्ञान 709–723 बज्जिका भाषा-विज्ञान भाषा-विज्ञान के स्वरूप आ वैज्ञानिक तरीका क्षेत्रकार्य, कॉर्पस, दस्तावेजीकरण आ संगणकीय भाषा-विज्ञान 724–738 मैथिली भाषा-विज्ञान भाषा-विज्ञानक स्वरूप आ वैज्ञानिक पद्धति क्षेत्रकार्य, कॉर्पस, दस्तावेजीकरण आ संगणकीय भाषा-विज्ञान 739–768 समेकित भाषिक विस्तार भाषा-विज्ञान की थिक लिप्यन्तरण आ भाषा-प्रौद्योगिकी 769–783 ठेठी-अंगिका उन्नत शोध भाषा-विज्ञान के स्वरूप, शाखा आरो वैज्ञानिक पद्धति कॉर्पस, शब्दकोश, दस्तावेजीकरण आरो संगणकीय भाषा-विज्ञान 784–798 बज्जिका उन्नत शोध भाषा-विज्ञान के स्वरूप, शाखा आ वैज्ञानिक तरीका कॉर्पस, शब्दकोश, दस्तावेजीकरण आ संगणकीय भाषा-विज्ञान 799–813 मैथिली उन्नत शोध भाषा-विज्ञान: विषय, शाखा, प्रमाण आ पुनरुत्पाद्यता कॉर्पस, शब्दकोश-विज्ञान, दस्तावेजीकरण आ संगणकीय भाषा-विज्ञान 814–826 समानान्तर मूल पद्धति समानान्तर अध्ययनक पद्धति: तुलनीय आँकड़ा, नियंत्रण आ प्रमाण द्विभाषिक तकनीकी शब्दावली: English term + अनिवार्य भारतीय/मैथिली रूप 827–850 शोध-अभिकल्प/प्रयोग शोध-अभिकल्प, चर, नमूना, नियंत्रण आ पुनरुत्पाद्यता समानता, भिन्नता आ प्रमाण: Comparative Claim (तुलनात्मक दावा) कोना लिखी 851–858 कॉर्पस परियोजना कॉर्पस परियोजनाक इकाई आ फाइल-संरचना Corpus QA (कॉर्पस गुणवत्ता-जाँच) आ पुनरुत्पादन 859–877 ध्वनि-रूप-वाक्य निदान Phoneme (ध्वनिम) आ Allophone (सहध्वनि): अर्थभेद बनाम उच्चारण-भेद Relative, Complement, Coordination, Subordination आ Information Structure 878–883 अर्थ-प्रयोग-प्रवचन Lexical Semantics (शब्दार्थविज्ञान): Lexeme, Sense, Reference Conversation Analysis (वार्तालाप-विश्लेषण) आ Practical Annotation Lab 884–893 समाजभाषा-संपर्क-जीवन्तता Sociolinguistic Variable (समाजभाषिक चर) आ Variant (रूपांतर): भिन्नता स्वयं डेटा अछि Language Ecology (भाषा-पारिस्थितिकी), Vitality (जीवन्तता), Intergenerational Transmission (पीढ़ीगत हस्तांतरण) 894–900 ऐतिहासिक तुलना Historical Linguistics (ऐतिहासिक भाषा-विज्ञान): Attestation (पाठ-साक्ष्य), Change (परिवर्तन) आ Chronology (कालक्रम) Inheritance (वंशपरम्परा), Contact (संपर्क) आ Parallel Innovation (समानान्तर नवाचार) अलग कोना करी? 901–908 प्रकारिकी-मनोभाषा Linguistic Typology (भाषा-प्रकारिकी): Feature (विशेषता), Value (मान) आ Dominance (प्रधानता) Language Control (भाषा-नियंत्रण), Switching Cost (बदलाव-मूल्य), Multilingual Processing (बहुभाषिक प्रसंस्करण) आ स्थानीय प्रयोग-डिजाइन 909–919 प्रमाण-स्रोत बैंक Evidence Hierarchy (प्रमाण-स्तर), Source Citation (स्रोत-उद्धरण) आ Example Status (उदाहरण-स्थिति) Pragmatics and Discourse (प्रयोगविज्ञान आ प्रवचन): Deixis सँ Conversation Analysis धरि 920–926 अन्तिम अभ्यास-अनुक्रमण-पूर्णता Final Integrated Exercises (अन्तिम समेकित अभ्यास): 120 कार्य 12/12 Completeness Audit (बारह मुख्य लक्ष्यक अन्तिम पूर्णता-जाँच) परिशिष्ट ब — मूल भाषिक उदाहरण आ समीक्षा-सूचना ठेठी-अंगिका: “ऊ खैलखौं? · ऊ खाय छौ।” / “ऊ खैलकै? · ऊ खाय छै।” समीक्षा-सूचना: श्रोता-सम्बन्ध, क्रिया-सामंजस्य आ प्रयोगविज्ञान लेल प्राथमिक उदाहरण; क्षेत्र, वक्ता आ काल-रूपक विस्तृत corpus validation अपेक्षित। ठेठी-अंगिका: “गिलास में पानी छै।” / “ई पानी छेकै।” समीक्षा-सूचना: अस्तित्व बनाम पहचानक अर्थभेदक परीक्षण; नकार, प्रश्न, focus आ क्षेत्रीय प्रयोगसँ जाँच आवश्यक। बज्जिका: “रउआ कहाँ जा रहल हई?” समीक्षा-सूचना: आदर-सर्वनाम, सहायक क्रिया, प्रश्न आ सामाजिक सम्बन्धक संयुक्त उदाहरण; क्षेत्रीय रूपसँ तुलनीय बनाओल जा सकैत अछि। बज्जिका रूप-भिन्नता: “हए/हइ/छै; सभ/सब; रउआ/रउरा; हमर/हमार” समीक्षा-सूचना: मानक बनाम क्षेत्रीय रूपक निर्णय लेल speaker-region-style metadata आवश्यक। बिबलियोग्राफी (ग्रन्थ-सूची) नीचाँ पहिने समीक्षासभमे स्पष्ट रूपेँ उद्धृत वा नामित कृतिसभ देल गेल अछि। जतय मूल समीक्षास्रोतमे पूर्ण प्रकाशन-विवरण उपलब्ध नहि अछि, ओतय उपलब्ध विवरण धरि प्रविष्टि राखल गेल अछि; अनिश्चित विवरण जोड़ल नहि गेल अछि। पाणिनि — अष्टाध्यायी। पतञ्जलि — महाभाष्य। भर्तृहरि — वाक्यपदीय। भरतमुनि — नाट्यशास्त्र। आनन्दवर्धन — ध्वन्यालोक। कुन्तक — वक्रोक्तिजीवित। मम्मट — काव्यप्रकाश। Ferdinand de Saussure — Cours de linguistique générale. Leonard Bloomfield — Language. Noam Chomsky — Syntactic Structures; Aspects of the Theory of Syntax. M. A. K. Halliday — An Introduction to Functional Grammar. William Labov — Sociolinguistic Patterns. J. L. Austin — How to Do Things with Words. H. P. Grice — Studies in the Way of Words. Joseph H. Greenberg — Universals of Language (ed.). Itamar Even-Zohar — Polysystem Studies; “The Position of Translated Literature within the Literary Polysystem”. Gideon Toury — Descriptive Translation Studies – and beyond, revised edition, 2012. Yuen Ren Chao — A Grammar of Spoken Chinese, 1968. Ma Jianzhong — Mashi Wentong, 1898. Liu Xie — Wenxin diaolong (The Literary Mind and the Carving of Dragons). Pieter C. Verhagen — A History of Sanskrit Grammatical Literature in Tibet, Vol. 1 (1993) and Vol. 2 (2001). Motoori Norinaga — Japanese grammatical studies on teniwoha / kakari-musubi tradition. Tokieda Motoki — Kokugogaku genron, 1941; later work on particles, auxiliaries and interpersonal relations. डॉ. अमरेन्द्र आ डॉ. आभा पूर्वे — ठेठी-अंगिका व्याकरण-रचना सम्बन्धी कृति, २०२३ (पूर्ण शीर्षक/प्रकाशन-विवरण समीक्षास्रोतमे नहि देल अछि)। George Abraham Grierson — Linguistic Survey of India, 1903. Yogendra P. Yadav — Maithili reference grammar, Mouton, 1996 (समीक्षास्रोतमे एतबे प्रकाशन-विवरण उपलब्ध अछि)। दीनबन्धु झा — मिथिला-भाषा-विद्योतन। गोविन्द झा — लघु विद्योतन। रञ्जन कुमार — ठेठी-अंगिका सम्बन्धी IJCRT-अध्ययन (पूर्ण शीर्षक समीक्षास्रोतमे नहि देल अछि)। रामेश्वर प्रसाद — बज्जिका व्याकरण सम्बन्धी स्रोत (पूर्ण प्रकाशन-विवरण समीक्षास्रोतमे नहि देल अछि)। योगेन्द्र प्रसाद सिंह — बज्जिका सम्बन्धी स्रोत (पूर्ण प्रकाशन-विवरण समीक्षास्रोतमे नहि देल अछि)। आर्ती कुमारी — बज्जिका सम्बन्धी JNU शोध (पूर्ण शीर्षक/वर्ष समीक्षास्रोतमे नहि देल अछि)। Kashyap — बज्जिका सम्बन्धी Journal of Pragmatics लेख, 2012; Kashyap–Yap — Linguistics लेख, 2017 (पूर्ण लेख-विवरण समीक्षास्रोतमे नहि देल अछि)। Ghil'ad Zuckermann — Revivalistics आ Phono-Semantic Matching सम्बन्धी कृतिसभ (समीक्षास्रोतमे पूर्ण प्रकाशन-विवरण नहि देल अछि)। Jürgen Habermas — Public Sphere सम्बन्धी विचार/कृति (समीक्षास्रोतमे पूर्ण प्रकाशन-विवरण नहि देल अछि)। Li–Thompson — विषय-प्रधान बनाम कर्ता-प्रधान भाषा सम्बन्धी प्रकारिक विश्लेषण (समीक्षास्रोतमे पूर्ण प्रकाशन-विवरण नहि देल अछि)। Leipzig Glossing Rules — अन्तररेखीय रूपिम-व्याख्या (IGT) लेल मानक संकेत-परम्परा। Himmelmann; Chelliah and de Reuse — वर्णनात्मक/दस्तावेजी भाषा-विज्ञान सम्बन्धी पद्धतिशास्त्रीय सन्दर्भ (पूर्ण प्रकाशन-विवरण समीक्षास्रोतमे नहि देल अछि)। मूल पोथीक संरचनात्मक स्रोत-टिप्पणी मूल पोथी अन्तिम भागमे समेकित सन्दर्भ-सूची रखैत अछि आ बिखरल सन्दर्भकेँ एकठाम आनबाक सम्पादकीय प्रयास करैत अछि। ठेठी-अंगिका भागक मुख्य आधार-ग्रन्थ रूपमे डॉ. अमरेन्द्र आ डॉ. आभा पूर्वेक २०२३क व्याकरण-रचना कृति उल्लेखित अछि। अगिला विद्वत्तापूर्ण संस्करणमे समेकित bibliography यथावत् राखि, प्रत्येक अध्याय वा प्रमुख दावाक संग छोट स्रोत-कोड जोड़ल जाए तँ पाठक मूल प्रमाण धरि तुरन्त पहुँचि सकत। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.१९. गजेन्द्र ठाकुर- डॉ. अमरेन्द्रक ‘अंगिका बाल-साहित्य’- लोकस्मृतिसँ आधुनिक बाल-सृजन धरि : चतुर्आयामी समग्र समीक्षा (मैथिली–ठेठी-अंगिका समानान्तर अनुशीलन) डॉ. अमरेन्द्रक ‘अंगिका बाल-साहित्य’ लोकस्मृतिसँ आधुनिक बाल-सृजन धरि : चतुर्आयामी समग्र समीक्षा (मैथिली–ठेठी-अंगिका समानान्तर अनुशीलन) समीक्ष्य पोथी: अंगिका बाल-साहित्य · लेखक: डॉ. अमरेन्द्र · समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली/मुजफ्फरपुर · प्रथम संस्करण: २०२२ पृष्ठ: ११२ · मूल्य: दू सय टाका 1. प्रस्तावना: बाल-साहित्यक इतिहास नहि, सांस्कृतिक वंशावली ठेठी-अंगिका: 1. प्रस्तावना: बाल-साहित्य के इतिहास नै, सांस्कृतिक वंशावली मैथिली — डॉ. अमरेन्द्रक ‘अंगिका बाल-साहित्य’ सामान्य अर्थमे बाल-पोथीसभक सूची, रचनाकार-परिचय अथवा कालक्रम-मात्र नहि अछि। एकर पैघ प्रयत्न ई बुझब अछि जे अंगिका भाषिक समाजमे बालक साहित्यसँ पहिल परिचय कतऽ आ कोना करैत अछि, आ ओहि आरम्भिक मौखिक-सांस्कृतिक अनुभवसँ आधुनिक मुद्रित बाल-साहित्य धरि कोन निरन्तरता बनैत अछि। एहि कारण ई पोथी इतिहास लिखबाक संगहि एक प्रकारक सांस्कृतिक वंशावली तैयार करैत अछि: मातृक कण्ठक लोरी, शिशु-ध्वनि, पहेली, खेलगीत, लोककथा, परिवार आ आँगनक सामूहिक अनुभवसँ आधुनिक कविता, उपन्यास, कहानी, नाटक, निबन्ध आ जीवनी धरि। ठेठी-अंगिका — डॉ. अमरेन्द्र के ‘अंगिका बाल-साहित्य’ सामान्य अर्थ में बाल-पोथी सिनी के सूची, रचनाकार-परिचय अथवा कालक्रम-मात्र नै छै। एकर बड़का प्रयत्न ई बुझब छै जे अंगिका भाषिक समाज में बालक के साहित्य सें पहिल परिचय कहाँ आरो केना करै छै, आरो ओही आरम्भिक मौखिक-सांस्कृतिक अनुभव सें आधुनिक मुद्रित बाल-साहित्य तक कोन निरन्तरता बनै छै। ई कारण ई पोथी इतिहास लिखै के संगें एक प्रकार के सांस्कृतिक वंशावली तैयार करै छै: माय के कण्ठ के लोरी, शिशु-ध्वनि, पहेली, खेलगीत, लोककथा, परिवार आरो आँगन के सामूहिक अनुभव सें आधुनिक कविता, उपन्यास, कहानी, नाटक, निबन्ध आरो जीवनी तक। मैथिली — ग्रन्थक विषय-क्रम स्वयं एहि दृष्टिक पुष्टि करैत अछि। पहिल भाग ‘अंगिका-बाल-लोकसाहित्य’ पृष्ठ 8–42 धरि पसरल अछि, जखन दोसर, बहुत पैघ भाग ‘आधुनिक अंगिका बाल-साहित्य’ पृष्ठ 43–112 धरि। अन्तिम पृष्ठसभ सन्दर्भ आ पत्रिका-सूची लेल अछि। एहि स्थापत्यक अर्थ ई अछि जे लेखक आधुनिक लिखित बाल-साहित्यकेँ शून्यमे जन्मल उपलब्धि नहि मानैत छथि; ओकर भाषिक लय, कथात्मक ढाँचा, खेलधर्मिता, मनोरञ्जन आ सामुदायिक स्मृतिक मूल लोकपरम्परामे देखैत छथि। ठेठी-अंगिका — ग्रन्थ के विषय-क्रम अपने ई दृष्टि के पुष्टि करै छै। पहिल भाग ‘अंगिका-बाल-लोकसाहित्य’ पृष्ठ 8–42 तक पसरलों छै, जबें दोसर, बहुत बड़का भाग ‘आधुनिक अंगिका बाल-साहित्य’ पृष्ठ 43–112 तक। अन्तिम पृष्ठ सिनी सन्दर्भ आरो पत्रिका-सूची लेली छै। ई स्थापत्य के अर्थ ई छै जे लेखक आधुनिक लिखित बाल-साहित्य कें शून्य में जन्मलों उपलब्धि नै मानै छै; ओकर भाषिक लय, कथात्मक ढाँचा, खेलधर्मिता, मनोरञ्जन आरो सामतरकियिक स्मृति के मूल लोकपरम्परा में देखै छै। मैथिली — आधुनिक बाल-साहित्य-अध्ययनक व्यापक परिप्रेक्ष्यमे सेहो ई स्थापना अर्थवान अछि। Kimberley Reynolds प्रत्येक नब पीढ़ीक साहित्यिक परम्परामे प्रवेशमे मौखिक रूपेँ चलि आबि रहल कथा-संसारक महत्त्व चिन्हित करैत छथि। एहि तुलनात्मक आलोकमे डॉ. अमरेन्द्रक लोकसाहित्यसँ आधुनिक सृजन धरि बनाओल क्रम स्थानीय सामग्रीसँ उपजल स्वतंत्र आलोचनात्मक सूझ प्रतीत होइत अछि। पोथीक स्थायी महत्त्व एहि बातमे अछि जे ई बाल-साहित्यक इतिहास लिखैत काल बालकक वास्तविक सांस्कृतिक जीवनकेँ केन्द्र बनबैत अछि; घर, माँ, दादी, खेलक साथी, पशु-पक्षी, खेत-पथार, वर्षा, नदी, भोजन, नींद, भय, हँसी, तुक आ शरीरक गति साहित्यिक इतिहासक वैध सामग्री बनि जाइत अछि। ठेठी-अंगिका — आधुनिक बाल-साहित्य-अध्ययन के व्यापक परिप्रेक्ष्य में भी ई स्थापना अर्थवान छै। Kimberley Reynolds प्रत्येक नब पीढ़ी के साहित्यिक परम्परा में प्रवेश में मौखिक रूपेँ चलि आबि रहल कथा-संसार के महत्त्व चिन्हित करै छै। ई तुलनात्मक आलोक में डॉ. अमरेन्द्र के लोकसाहित्य सें आधुनिक सृजन तक बनावलों क्रम स्थानीय सामग्री सें उपजलों स्वतंत्र आलोचनात्मक सूझ प्रतीत होय छै। पोथी के स्थायी महत्त्व ई बात में छै जे ई बाल-साहित्य के इतिहास लिखै काल बालक के वास्तविक सांस्कृतिक जीवन कें केन्द्र बनावै छै; घर, माँ, दादी, खेल के साथी, पशु-पक्षी, खेत-पथार, वर्षा, नदी, भोजन, नींद, भय, हँसी, तुक आरो शरीर के गति साहित्यिक इतिहास के वैध सामग्री बनि जाय छै। आमुख: चारि प्रकाश-कोण ठेठी-अंगिका: आमुख : चार रौशनी-कोन मैथिली — विदेह जाहि समान्तर-साहित्य-दृष्टिक वाहक थिक, ताहिमे कोनो भाषाक बाल-साहित्य ‘लघु’ नहि होइत—जे परम्परा संस्थागत इतिहासक हाशिया पर धकेलल गेल, ओकरे प्रति समान समीक्षकीय गम्भीरता एहि आन्दोलनक मूल प्रतिज्ञा थिक। एहि दृष्टिएँ डॉ. अमरेन्द्रक ‘अंगिका बाल-साहित्य’ केँ हम चारि आयाम—रस-ध्वनि-वक्रोक्तिमूलक भारतीय काव्यशास्त्र, पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त, नव्य-न्यायमूलक ज्ञानमीमांसा, आ विदेह समान्तर-इतिहास-प्रारूप—सँ जाँचि रहल छी। ई चारू दृष्टि एक-दोसरक विरोधी नहि, अपितु एके पाठक चारि प्रकाश-कोण थिक, जे मिलिकए ओकर पूर्ण रूप उघारैत अछि। ठेठी-अंगिका — विदेह जे समान्तर-साहित्य के नजर के वाहक छै, ओकरा में कोय भाषा के बाल-साहित्य ‘छोटका’ नै होय छै—जे परम्परा के संस्थागत इतिहास हाशिया पर ढकेली देलकै, वहीं के प्रति ओतने समीक्षकीय गम्भीरता ई आन्दोलन के मूल परन छै। एहि नजर सें डॉ. अमरेन्द्र के ‘अंगिका बाल-साहित्य’ के हम चार आयाम—रस-ध्वनि-वक्रोक्ति वाला भारतीय काव्यशास्त्र, पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त, नव्य-न्याय वाला ज्ञानमीमांसा, आरो विदेह समान्तर-इतिहास-प्रारूप—सें जाँची रहलों छी। ई चारू नजर एक-दोसरा के दुश्मन नै, बल्कि एके पाठ के चार रौशनी-कोन छै, जे मिली कें ओकर पूरा रूप उघारी दै छै। परिचय आ पृष्ठभूमि ठेठी-अंगिका: परिचय आरो पिछुलका बात मैथिली — डॉ. अमरेन्द्रक ई पोथी अंगिका बाल-साहित्यक एकटा समग्र सर्वेक्षण थिक, जकर विशेषता एहिमे अछि जे ई विधाक लोक-मूल आ आधुनिक—दुनू छोर केँ एके सूत्रमे बान्हि कए देखबाक प्रयास करैत अछि। लेखक स्वयं “आत्मकथन”मे नम्रतापूर्वक स्वीकार कएने छथि जे ई कोनो स्वतंत्र रूपसँ लिखल पोथी नहि, अपितु डॉ. सुरेश गौतम आ डॉ. वीणा गौतमक संपादनमे प्रकाशित “भारतीय बाल-लोकसाहित्य कोश” आ “भारतीय लोरी-साहित्य कोश” लेल समय-समय पर लिखल आलेख-सभक संग्रह थिक। एहि आत्म-स्वीकृतिक अन्तमे लेखकक ई मान्यता समीक्षा-दृष्टिसँ महत्त्वपूर्ण अछि जे जे कमी एहिमे रहि गेल अछि, इएह कमी आगाँ अंगिका बाल-साहित्य पर बेसी लिखबाक मार्ग खोलत। एहि विनम्र स्वीकृतिमे पोथीक वास्तविक प्रकृति—एकटा प्रारम्भ-बिन्दु, न कि अन्तिम शब्द—पहिनहिं स्पष्ट भ’ जाइत अछि। ठेठी-अंगिका — डॉ. अमरेन्द्र के ई पोथी अंगिका बाल-साहित्य के एगो पूरा सर्वेक्षण छै, जेकर खासियत ई छै कि ई विधा के लोक-मूल आरो आधुनिक—दुन्नु छोर के एके सूत्र में बान्ही कें देखै के कोसिस करै छै। लेखक अपने “आत्मकथन” में नरमी सें मानी लै छै कि ई कोय अलगे सें लिखलों पोथी नै छै, बल्कि डॉ. सुरेश गौतम आरो डॉ. वीणा गौतम के संपादन में छपलों “भारतीय बाल-लोकसाहित्य कोश” आरो “भारतीय लोरी-साहित्य कोश” लेली समय-समय पर लिखलों आलेख सिनी के संग्रह छै। ई स्वीकृति के आखिर में लेखक के ई मानब समीक्षा के नजर सें जरूरी छै कि जे कमी एकरा में रही गेलै, वहै कमी आगू अंगिका बाल-साहित्य पर बेसी लिखै के रास्ता खोलतै। ई नरम स्वीकृति में पोथी के असली रूप—एगो सुरू के बिन्दु, नै कि आखिरी बात—पहिनहिं साफ होय जाय छै। मैथिली — साहित्य कोनो समाजक, भाषिक समुदायक आ ओकर सांस्कृतिक धरोहरक जीवन्त दर्पण होइत अछि। जखन बात बाल-साहित्यक होइत अछि, तँ ई मात्र किछु कथा आ गप-शपक सङ्ग्रह नहि रहि जाइत अछि, अपितु ई नव पीढ़िक मनोवैज्ञानिक, सामाजिक आ चारित्रिक निर्माणक एकटा सशक्त आधारशिला बनि जाइत अछि। प्रस्तुत समीक्षात्मक आलेखमे अंगिका भाषाक मूर्धन्य साहित्यकार डॉ. अमरेन्द्र द्वारा रचित आ सम्पादित ग्रन्थ 'अंगिका बाल-साहित्य' क विस्तृत साहित्यिक, भाषिक आ मनोवैज्ञानिक विश्लेषण कएल गेल अछि। समीक्षा प्रकाशन, मुजफ्फरपुर/दिल्ली द्वारा प्रकाशित ई पोथी अंगिका बाल-साहित्यक विकास-यात्रा, ओकर लोक-परम्परा आ आधुनिक प्रवृत्तिकेँ बुझबाक लेल एकटा विश्वकोश जकाँ अछि। ठेठी-अंगिका — साहित्य कोनो समाज के, भाषिक समुदाय के आरो ओकर सांस्कृतिक धरोहर के जीवन्त दर्पण होय छै। जबें बात बाल-साहित्य के होय छै, तें ई मात्र कुछु कथा आरो गप-शपक सङ्ग्रह नै रहि जाय छै, बल्कि ई नया पीढ़ी के मनोवैज्ञानिक, सामाजिक आरो चारित्रिक निर्माण के एगो सशक्त आधारशिला बनि जाय छै। प्रस्तुत समीक्षात्मक आलेख में अंगिका भाषा के मूर्धन्य साहित्यकार डॉ. अमरेन्द्र द्वारा रचित आरो सम्पादित ग्रन्थ 'अंगिका बाल-साहित्य' के विस्तृत साहित्यिक, भाषिक आरो मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करलों गेलों छै। समीक्षा प्रकाशन, मुजफ्फरपुर/दिल्ली द्वारा प्रकाशित ई पोथी अंगिका बाल-साहित्य के विकास-यात्रा, ओकर लोक-परम्परा आरो आधुनिक प्रवृत्तिकेँ बुझै लेली एगो विश्वकोश जेना छै। अंगिका आ मैथिलीक भाषिक-सांस्कृतिक सम्बन्ध आ ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ठेठी-अंगिका: अंगिका आरो मैथिली के भाषिक-सांस्कृतिक सम्बन्ध आरो ऐतिहासिक पृष्ठभूमि मैथिली — अंगिका आ मैथिलीक बीचक सम्बन्ध अत्यन्त प्रगाढ़ आ ऐतिहासिक रहल अछि। भाषाविद् जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन अपन 'लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया' (१९०३) मे अंगिका (जकरा ओ 'छिका-छिकी' कहलन्हि) केँ मैथिलीक एकटा उपबोलीक रूपमे वर्गीकृत केने छलाह। मुदा पण्डित राहुल सांकृत्यायन आ बादक भाषा-आन्दोलनकारी लोकनि एकरा एकटा स्वतन्त्र भाषाक दर्जा देलन्हि। डॉ. शोभा कुमारीक 'अंगिका साहित्य का इतिहास' सेहो एकरा एकटा समृद्ध परम्पराक भाषा मानैत अछि। एहि भाषाक प्राचीनतम साहित्यिक प्रमाण ७म शताब्दीक बौद्ध सिद्ध (लुइपा, भुसुकुपा, कान्हपा) द्वारा रचित 'चर्यापद' मे भेटैत अछि। भारतक २६ जिला (बिहार, झारखण्ड, आ पश्चिम बङ्गाल) मे लगभग ६ करोड़ लोक द्वारा बाजल जाए वला एहि भाषाक लोक-साहित्य अत्यन्त समृद्ध अछि। एहि कारणेँ एकटा अंगिका पोथीक मैथिलीमे समीक्षा करब दुनू सहोदर भाषिक परम्पराकेँ आ समीप लाबब अछि। ठेठी-अंगिका — अंगिका आरो मैथिली के बीचक सम्बन्ध बहुत प्रगाढ़ आरो ऐतिहासिक रहल छै। भाषाविद् जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन अपन 'लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया' (१९०३) में अंगिका (जेकरा ऊ 'छिका-छिकी' कहलकै) कें मैथिली के एगो उपबोली के रूप में वर्गीकृत केने छेलै। मतरकि पण्डित राहुल सांकृत्यायन आरो बादक भाषा-आन्दोलनकारी लोग सिनी एकरा एगो स्वतन्त्र भाषा के दर्जा देलकै। डॉ. शोभा कुमारीक 'अंगिका साहित्य का इतिहास' भी एकरा एगो समृद्ध परम्परा के भाषा मानै छै। ई भाषा के सभसें पुरान साहित्यिक प्रमाण ७म शताब्दीक बौद्ध सिद्ध (लुइपा, भुसुकुपा, कान्हपा) द्वारा रचित 'चर्यापद' में मिलै छै। भारतक २६ जिला (बिहार, झारखण्ड, आरो पश्चिम बङ्गाल) में लगभग ६ करोड़ लोक द्वारा बाजल जाए वाला ई भाषा के लोक-साहित्य बहुत समृद्ध छै। ई कारणेँ एगो अंगिका पोथी के मैथिली में समीक्षा करब दूनो सहोदर भाषिक परम्परा कें आरो समीप लाबै के काम करै छै। पृष्ठ १–११४ : अन्तर्वस्तु-समीक्षा सार ठेठी-अंगिका: पृष्ठ १–११४ : अन्तर्वस्तु-समीक्षा सार मैथिली — क्रम · पृष्ठ · खण्ड/विधा · मूल ग्रन्थमे सामग्री · परीक्षण/प्रश्न · निष्कर्ष ठेठी-अंगिका — क्रम · पृष्ठ · खण्ड/विधा · मूल ग्रन्थ में सामग्री · परीक्षण/सवाल · निष्कर्ष मैथिली — १. पृष्ठ १–४ — मुखपृष्ठ/प्रकाशन। मूल सामग्री: शीर्षक, लेखक, प्रथम संस्करण २०२२ आ प्रकाशक। परीक्षण: भारतवाणीक २०२२ प्रविष्टिमे लेखक अमरेन्द्र, भाषा हिन्दी/अंगिका आ प्रकाशक समीक्षा प्रकाशनक स्वतंत्र पुष्टि भेटैत अछि। निष्कर्ष: प्रकाशन-तथ्य पुष्ट अछि। ठेठी-अंगिका — १. पृष्ठ १–४ — मुखपृष्ठ/प्रकाशन। मूल सामग्री: शीर्षक, लेखक, प्रथम संस्करण २०२२ आरो प्रकाशक। परीक्षण: भारतवाणी के २०२२ प्रविष्टि में लेखक अमरेन्द्र, भाषा हिन्दी/अंगिका आरो प्रकाशक समीक्षा प्रकाशन के स्वतंत्र पुष्टि मिलै छै। निष्कर्ष: प्रकाशन-तथ्य पुष्ट छै। मैथिली — २. पृष्ठ ५–६ — समर्पण/आत्मकथन। मूल सामग्री: पूर्व प्रकाशित वा सम्पादित आलेखसभक संशोधित-संयोजित रूप; सम्भावित कमी स्वीकारल गेल अछि। परीक्षण: संकलनात्मक निर्माण सामग्री बढ़बैत अछि, मुदा पुनरावृत्ति सेहो अनैत अछि। निष्कर्ष: निर्माण-पद्धति शक्ति आ सीमा दुनू अछि। ठेठी-अंगिका — २. पृष्ठ ५–६ — समर्पण/आत्मकथन। मूल सामग्री: पहिने प्रकाशित वा सम्पादित आलेख सिनी के संशोधित-संयोजित रूप; सम्भावित कमी स्वीकारल गेल छै। परीक्षण: संकलनात्मक निर्माण सामग्री बढ़ावै छै, मतरकि पुनरावृत्ति भी अनै छै। निष्कर्ष: निर्माण-पद्धति शक्ति आरो सीमा दूनो छै। मैथिली — ३. पृष्ठ ७ — विषय-क्रम। मूल सामग्री: दू भाग—बाल-लोकसाहित्य पृष्ठ ८–४२ आ आधुनिक बाल-साहित्य पृष्ठ ४३–११२। परीक्षण: मौखिक परम्परासँ आधुनिक मुद्रित साहित्य धरि विकास-रेखा बनैत अछि। निष्कर्ष: सांस्कृतिक वंशावली ग्रन्थक मूल संरचना अछि। ठेठी-अंगिका — ३. पृष्ठ ७ — विषय-क्रम। मूल सामग्री: दू भाग—बाल-लोकसाहित्य पृष्ठ ८–४२ आरो आधुनिक बाल-साहित्य पृष्ठ ४३–११२। परीक्षण: मौखिक परम्परा सें आधुनिक मुद्रित साहित्य तक विकास-रेखा बनै छै। निष्कर्ष: सांस्कृतिक वंशावली ग्रन्थ के मूल संरचना छै। मैथिली — ४. पृष्ठ ८–९ — बाल-मन/लोरी। मूल सामग्री: कल्पना, तर्क, जिद, खेल, चित्र-संगीत; प्रत्यक्ष उपदेश गौण। परीक्षण: एवर्स आ रेनॉल्ड्सक बाल-केन्द्रित दृष्टिसँ तुलनात्मक संवाद सम्भव अछि। निष्कर्ष: बाल-मन पोथीक केन्द्रीय कसौटी अछि। ठेठी-अंगिका — ४. पृष्ठ ८–९ — बाल-मन/लोरी। मूल सामग्री: कल्पना, तर्क, जिद, खेल, चित्र-संगीत; प्रत्यक्ष उपदेश गौण। परीक्षण: एवर्स आरो रेनॉल्ड्स के बाल-केन्द्रित दृष्टि सें तुलनात्मक संवाद सम्भव छै। निष्कर्ष: बाल-मन पोथी के केन्द्रीय कसौटी छै। मैथिली — ५. पृष्ठ १०–११ — पहेली। मूल सामग्री: एकपदीसँ चतुष्पदी; बौद्धिक खेल, किशोर धरि ग्रहण। परीक्षण: वर्गीकरण समृद्ध, मुदा सूक्ष्म पाठालोचन सीमित। निष्कर्ष: भाषा-कौशल, स्मृति आ खेलक संगम। ठेठी-अंगिका — ५. पृष्ठ १०–११ — पहेली। मूल सामग्री: एकपदी सें चतुष्पदी; बौद्धिक खेल, किशोर तक ग्रहण। परीक्षण: वर्गीकरण समृद्ध, मतरकि सूक्ष्म पाठालोचन सीमित। निष्कर्ष: भाषा-कौशल, स्मृति आरो खेल के संगम। मैथिली — ६. पृष्ठ १२–१४ — तुक्तक/शिशु-काव्य। मूल सामग्री: अर्थक अपेक्षा ध्वनि, तुक आ उच्चारण-आनन्द प्रमुख। परीक्षण: कविता कोश आ अंगिका.कॉम पर ‘तुक्तक-मुक्तक’क स्वतंत्र उपस्थिति दर्ज अछि। निष्कर्ष: ध्वनि स्वयं बाल-सौन्दर्यक मूल तत्त्व अछि। ठेठी-अंगिका — ६. पृष्ठ १२–१४ — तुक्तक/शिशु-काव्य। मूल सामग्री: अर्थ के अपेक्षा ध्वनि, तुक आरो उच्चारण-आनन्द प्रमुख। परीक्षण: कविता कोश आरो अंगिका.कॉम पर ‘तुक्तक-मुक्तक’ के स्वतंत्र उपस्थिति दर्ज छै। निष्कर्ष: ध्वनि अपने बाल-सौन्दर्य के मूल तत्त्व छै। मैथिली — ७. पृष्ठ १५–२४ — खेलगीत। मूल सामग्री: ऐच्छिक, प्रतिस्पर्धात्मक आ बौद्धिक खेलगीत; सामूहिक प्रस्तुति। परीक्षण: शब्द सुरक्षित अछि, मुदा धुन, देह-चाल, खेल-नियम आदि सहायक विवरण कम अछि। निष्कर्ष: भविष्यक लेल दृश्य-श्रव्य अभिलेख आवश्यक। ठेठी-अंगिका — ७. पृष्ठ १५–२४ — खेलगीत। मूल सामग्री: ऐच्छिक, प्रतिस्पर्धात्मक आरो बौद्धिक खेलगीत; सामूहिक प्रस्तुति। परीक्षण: शब्द सुरक्षित छै, मतरकि धुन, देह-चाल, खेल-नियम आदि सहायक विवरण कम छै। निष्कर्ष: आगू लेल दृश्य-श्रव्य अभिलेख जरूरी छै। मैथिली — ८. पृष्ठ २५–३७ — बाल-लोककथा। मूल सामग्री: मौखिक संचरण, रूप-परिवर्तन, पशु-पक्षी, नीति आ चमत्कार। परीक्षण: एक निश्चित मूल-पाठक बदला पाठान्तर महत्त्वपूर्ण अछि। निष्कर्ष: पोथी एकटा पाठ-संग्रह बनबैत अछि; कथाविज्ञान आगाँक काज अछि। ठेठी-अंगिका — ८. पृष्ठ २५–३७ — बाल-लोककथा। मूल सामग्री: मौखिक संचरण, रूप-परिवर्तन, पशु-पक्षी, नीति आरो चमत्कार। परीक्षण: एक निश्चित मूल-पाठ के बदला पाठान्तर महत्त्वपूर्ण छै। निष्कर्ष: पोथी एगो पाठ-संग्रह बनावै छै; कथाविज्ञान आगू के काज छै। मैथिली — ९. पृष्ठ ३८–४२ — अन्तरभाषिक लोककथा। मूल सामग्री: अन्य भारतीय भाषासँ अनुवाद/रूपान्तरण; पर्यावरणीय प्रसंग। परीक्षण: अनुवाद भाषा-विस्तारक साधन अछि, मुदा स्रोत-पाठ आ लक्ष्य-पाठक तुलना कम अछि। निष्कर्ष: अनुवाद साहित्यिक क्षेत्र-विस्तारक प्रक्रिया अछि। ठेठी-अंगिका — ९. पृष्ठ ३८–४२ — अन्तरभाषिक लोककथा। मूल सामग्री: आन भारतीय भाषा सें अनुवाद/रूपान्तरण; पर्यावरणीय प्रसंग। परीक्षण: अनुवाद भाषा-विस्तारक साधन छै, मतरकि स्रोत-पाठ आरो लक्ष्य-पाठ के तुलना कम छै। निष्कर्ष: अनुवाद साहित्यिक क्षेत्र-विस्तारक प्रक्रिया छै। मैथिली — १०. पृष्ठ ४३ — आधुनिक खण्डक भूमिका। मूल सामग्री: आधुनिक श्रेष्ठ बाल-साहित्यक जड़ लोकक रूप, रस आ गतिमे। परीक्षण: रेनॉल्ड्सक मौखिकसँ लिखित साहित्यक संक्रमण सम्बन्धी दृष्टिसँ तुलनात्मक साम्य। निष्कर्ष: लोक आ आधुनिकता रूपान्तरित निरन्तरता अछि। ठेठी-अंगिका — १०. पृष्ठ ४३ — आधुनिक खण्ड के भूमिका। मूल सामग्री: आधुनिक श्रेष्ठ बाल-साहित्य के जड़ लोक के रूप, रस आरो गति में। परीक्षण: रेनॉल्ड्स के मौखिक सें लिखित साहित्य के संक्रमण वाली दृष्टि सें तुलनात्मक साम्य। निष्कर्ष: लोक आरो आधुनिकता रूपान्तरित निरन्तरता छै। मैथिली — ११. पृष्ठ ४४–५० — अनुवादित बाल-कथा। मूल सामग्री: संस्कृत, जातक, बाइबिल आदि कथा-परम्पराक चर्चा। परीक्षण: ऐतिहासिक सूची समृद्ध; तुलनात्मक अनुवाद-विश्लेषण अपेक्षित। निष्कर्ष: आधुनिक लिखित बाल-गद्यक निर्माणमे अनुवाद महत्त्वपूर्ण। ठेठी-अंगिका — ११. पृष्ठ ४४–५० — अनुवादित बाल-कथा। मूल सामग्री: संस्कृत, जातक, बाइबिल आदि कथा-परम्परा के चर्चा। परीक्षण: ऐतिहासिक सूची समृद्ध; तुलनात्मक अनुवाद-विश्लेषण अपेक्षित। निष्कर्ष: आधुनिक लिखित बाल-गद्य के निर्माण में अनुवाद महत्त्वपूर्ण। मैथिली — १२. पृष्ठ ५१–६० — बाल-उपन्यास। मूल सामग्री: ‘बण्टा’; विद्यालय, परिवार, सामाजिक आ पर्यावरणीय अनुभव। परीक्षण: गद्य कोश पर ‘बण्टा’क अंगिका पाठक डिजिटल उपस्थिति अछि। निष्कर्ष: उपन्यास बालकक विस्तृत सामाजिक संसार खोलैत अछि। ठेठी-अंगिका — १२. पृष्ठ ५१–६० — बाल-उपन्यास। मूल सामग्री: ‘बण्टा’; विद्यालय, परिवार, सामाजिक आरो पर्यावरणीय अनुभव। परीक्षण: गद्य कोश पर ‘बण्टा’ के अंगिका पाठ के डिजिटल उपस्थिति छै। निष्कर्ष: उपन्यास बालक के विस्तृत सामाजिक संसार खोलै छै। मैथिली — १३. पृष्ठ ६१–७० — आधुनिक बालगीत। मूल सामग्री: खेलगीत, तुक-लय, अनेक कवि आ संग्रह। परीक्षण: अंगिका.कॉम अमरेन्द्रक पाँच संग्रह आ आन कविसभक उपस्थिति पुष्ट करैत अछि। निष्कर्ष: बाल-काव्य सर्वाधिक विकसित क्षेत्र। ठेठी-अंगिका — १३. पृष्ठ ६१–७० — आधुनिक बालगीत। मूल सामग्री: खेलगीत, तुक-लय, अनेक कवि आरो संग्रह। परीक्षण: अंगिका.कॉम अमरेन्द्र के पाँच संग्रह आरो आन कवि सिनी के उपस्थिति पुष्ट करै छै। निष्कर्ष: बाल-काव्य सभसें विकसित क्षेत्र। मैथिली — १४. पृष्ठ ७१–८० — प्रकृति/समाज/राष्ट्र। मूल सामग्री: प्रकृति, ऋतु, जीव-जगत, सामाजिकता, राष्ट्रबोध आ ज्ञान। परीक्षण: आधुनिक विषय-विस्तार स्पष्ट। निष्कर्ष: लोक-बिम्ब आ आधुनिक विषयक संयोग। ठेठी-अंगिका — १४. पृष्ठ ७१–८० — प्रकृति/समाज/राष्ट्र। मूल सामग्री: प्रकृति, ऋतु, जीव-जगत, सामाजिकता, राष्ट्रबोध आरो ज्ञान। परीक्षण: आधुनिक विषय-विस्तार साफ छै। निष्कर्ष: लोक-बिम्ब आरो आधुनिक विषय के संयोग। मैथिली — १५. पृष्ठ ८१–९१ — पर्यावरण/खण्डकाव्य। मूल सामग्री: पर्यावरण-शिक्षा, व्यक्तित्व, ज्ञान, नैतिकता आ खण्डकाव्य। परीक्षण: आरम्भिक प्रत्यक्ष उपदेश-विरोधी कसौटी आ बादक शिक्षामूलक प्रशंसाक बीच तनाव। निष्कर्ष: आनन्द बनाम शिक्षा मुख्य आलोचनात्मक प्रश्न। ठेठी-अंगिका — १५. पृष्ठ ८१–९१ — पर्यावरण/खण्डकाव्य। मूल सामग्री: पर्यावरण-शिक्षा, व्यक्तित्व, ज्ञान, नैतिकता आरो खण्डकाव्य। परीक्षण: आरम्भिक प्रत्यक्ष उपदेश-विरोधी कसौटी आरो बाद के शिक्षामूलक प्रशंसा के बीच तनाव। निष्कर्ष: आनन्द बनाम शिक्षा मुख्य आलोचनात्मक सवाल। मैथिली — १६. पृष्ठ ९२–९३ — ‘पंचामृत’/बाल-गजल। मूल सामग्री: पाँच बाल-काव्यरूप; बाल-गजल; अमरेन्द्र आ दिनेश बाबा। परीक्षण: विधागत प्रयोग लेल अलग शिल्प-कसौटी आवश्यक। निष्कर्ष: प्रौढ़ विधाक बालोपयोगी पुनर्संस्कार। ठेठी-अंगिका — १६. पृष्ठ ९२–९३ — ‘पंचामृत’/बाल-गजल। मूल सामग्री: पाँच बाल-काव्यरूप; बाल-गजल; अमरेन्द्र आरो दिनेश बाबा। परीक्षण: विधागत प्रयोग लेल अलग शिल्प-कसौटी जरूरी। निष्कर्ष: प्रौढ़ विधा के बालोपयोगी पुनर्संस्कार। मैथिली — १७. पृष्ठ ९४–९७ — बाल-कहानी। मूल सामग्री: काव्यक तुलनामे कम विकास; विविध कथा; अभावक स्पष्ट स्वीकार। परीक्षण: लेखकक आत्मालोचना इतिहासक विश्वसनीयता बढ़बैत अछि। निष्कर्ष: बाल-कहानी निर्माणाधीन क्षेत्र। ठेठी-अंगिका — १७. पृष्ठ ९४–९७ — बाल-कहानी। मूल सामग्री: काव्य के तुलना में कम विकास; विविध कथा; अभाव के स्पष्ट स्वीकार। परीक्षण: लेखक के आत्मालोचना इतिहास के विश्वसनीयता बढ़ावै छै। निष्कर्ष: बाल-कहानी निर्माणाधीन क्षेत्र। मैथिली — १८. पृष्ठ ९८–१०५ — बाल-नाटक/‘पंचगव्य’। मूल सामग्री: एकांकी, सामाजिक समस्या, विज्ञान, बालिका-शिक्षा, चरित्र, संवाद आ व्यंग्य। परीक्षण: पुनर्पाठसँ नाटक अपेक्षाकृत विस्तृत सिद्ध होइत अछि। निष्कर्ष: बाल-नाटक नव संस्करणमे प्रमुख खण्ड। ठेठी-अंगिका — १८. पृष्ठ ९८–१०५ — बाल-नाटक/‘पंचगव्य’। मूल सामग्री: एकांकी, सामाजिक समस्या, विज्ञान, बालिका-शिक्षा, चरित्र, संवाद आरो व्यंग्य। परीक्षण: पुनर्पाठ सें नाटक अपेक्षाकृत विस्तृत सिद्ध होय छै। निष्कर्ष: बाल-नाटक नब संस्करण में प्रमुख खण्ड। मैथिली — १९. पृष्ठ १०६–१०९ — ‘निभुहान’/अन्य नाटक। मूल सामग्री: ध्वनि-प्रदूषण, पर्यावरण, शिक्षा, स्वास्थ्य, रेडियो/गीतिनाट्य; पृष्ठ १०९ पर अन्य बाल-साहित्य। परीक्षण: आधुनिक जनजीवन नाटकक विषय बनैत अछि। निष्कर्ष: सामाजिक ज्ञान आ मंचीयताक संगम। ठेठी-अंगिका — १९. पृष्ठ १०६–१०९ — ‘निभुहान’/आन नाटक। मूल सामग्री: ध्वनि-प्रदूषण, पर्यावरण, शिक्षा, स्वास्थ्य, रेडियो/गीतिनाट्य; पृष्ठ १०९ पर आन बाल-साहित्य। परीक्षण: आधुनिक जनजीवन नाटक के विषय बनै छै। निष्कर्ष: सामाजिक ज्ञान आरो मंचीयता के संगम। मैथिली — २०. पृष्ठ ११०–१११ — निबन्ध/इतिहास/जीवनी। मूल सामग्री: नगर, महापुरुष, स्वतंत्रता-संग्राम, बुद्ध आदि बालोपयोगी गद्य। परीक्षण: ज्ञान-साहित्य लेल तथ्य, भाषा, चित्र आ जिज्ञासा अलग कसौटी माँगैत अछि। निष्कर्ष: बाल-साहित्यक परिधि सांस्कृतिक ज्ञान धरि विस्तार पबैत अछि। ठेठी-अंगिका — २०. पृष्ठ ११०–१११ — निबन्ध/इतिहास/जीवनी। मूल सामग्री: नगर, महापुरुष, स्वतंत्रता-संग्राम, बुद्ध आदि बालोपयोगी गद्य। परीक्षण: ज्ञान-साहित्य लेल तथ्य, भाषा, चित्र आरो जिज्ञासा अलग कसौटी माँगै छै। निष्कर्ष: बाल-साहित्य के परिधि सांस्कृतिक ज्ञान तक विस्तार पावै छै। मैथिली — २१. पृष्ठ ११२–११४ — सन्दर्भ/पत्रिका। मूल सामग्री: लगभग ५२ क्रमांकित स्रोत आ १० पत्रिका। परीक्षण: अभिलेखीय मानचित्रण उपयोगी, मुदा ग्रन्थसूचीगत विवरण असमान। निष्कर्ष: मानकीकृत ग्रन्थ-सूची आ अनुक्रमणिका भविष्यक प्राथमिक सुधार। ठेठी-अंगिका — २१. पृष्ठ ११२–११४ — सन्दर्भ/पत्रिका। मूल सामग्री: लगभग ५२ क्रमांकित स्रोत आरो १० पत्रिका। परीक्षण: अभिलेखीय मानचित्रण उपयोगी, मतरकि ग्रन्थसूचीगत विवरण असमान। निष्कर्ष: मानकीकृत ग्रन्थ-सूची आरो अनुक्रमणिका आगू के प्राथमिक सुधार। मैथिली — २२. सम्पूर्ण ग्रन्थ — लेखक-सर्जक। मूल सामग्री: लेखक स्वयं प्रमुख कवि, नाटककार आ उपन्यासकार; अपन कृतिसभ व्यापक। परीक्षण: भारतवाणीमे २०२१ क श्वेता रानीक अध्ययन आ बालगीत-ग्रंथावली सेहो उपलब्ध। निष्कर्ष: भीतरक साक्ष्य लाभकारी, मुदा चयन-संतुलन स्वतंत्र शोधसँ जाँचनीय। ठेठी-अंगिका — २२. सम्पूर्ण ग्रन्थ — लेखक-सर्जक। मूल सामग्री: लेखक अपने प्रमुख कवि, नाटककार आरो उपन्यासकार; अपन कृति सिनी व्यापक। परीक्षण: भारतवाणी में २०२१ के श्वेता रानी के अध्ययन आरो बालगीत-ग्रंथावली भी उपलब्ध। निष्कर्ष: भीतर के साक्ष्य लाभकारी, मतरकि चयन-संतुलन स्वतंत्र शोध सें जाँचै लायक छै। मैथिली — २३. सम्पूर्ण ग्रन्थ — भाषा/शैली। मूल सामग्री: रचनात्मक सामग्री अंगिका, आलोचनात्मक व्याख्या प्रायः हिन्दी। परीक्षण: पहुँच बढ़ैत अछि, मुदा अंगिका आलोचना-भाषाक स्वायत्तताक प्रश्न उठैत अछि। निष्कर्ष: भाषा सरल आ स्रोत-समृद्ध, पर सूक्ष्म पाठालोचन असमान। ठेठी-अंगिका — २३. सम्पूर्ण ग्रन्थ — भाषा/शैली। मूल सामग्री: रचनात्मक सामग्री अंगिका, आलोचनात्मक व्याख्या प्रायः हिन्दी। परीक्षण: पहुँच बढ़ै छै, मतरकि अंगिका आलोचना-भाषा के स्वायत्तता के सवाल उठै छै। निष्कर्ष: भाषा सरल आरो स्रोत-समृद्ध, पर सूक्ष्म पाठालोचन असमान। मैथिली — २४. सम्पूर्ण ग्रन्थ — समग्र मूल्य। मूल सामग्री: लोक-स्मृति, विधा-विस्तार आ स्रोत-सूची। परीक्षण: सहायक स्रोत मूल निष्कर्षकेँ पर्याप्त समर्थन दैत अछि। निष्कर्ष: ई अन्तिम इतिहास नहि, बल्कि आधार-ग्रन्थ अछि। ठेठी-अंगिका — २४. सम्पूर्ण ग्रन्थ — समग्र मूल्य। मूल सामग्री: लोक-स्मृति, विधा-विस्तार आरो स्रोत-सूची। परीक्षण: सहायक स्रोत मूल निष्कर्ष कें पर्याप्त समर्थन दै छै। निष्कर्ष: ई आखिरी इतिहास नै, बल्कि आधार-ग्रन्थ छै। 2. ग्रन्थक निर्माण-प्रकृति: संकलित अनुभवक शक्ति आ संरचनात्मक सीमा ठेठी-अंगिका: 2. ग्रन्थ के निर्माण-प्रकृति: संकलित अनुभव के शक्ति आरो संरचनात्मक सीमा मैथिली — आत्मकथनमे लेखक स्पष्ट करैत छथि जे ई पोथी आरम्भसँ एकहि योजनाक अन्तर्गत लिखल अखण्ड ग्रन्थ नहि छल। समय-समयपर सम्पादित बाल-साहित्य आ लोरी-साहित्य सम्बन्धी कोश/ग्रन्थ लेल लिखल आलेख, पहिने प्रकाशित अंगिका भाषा तथा लोकसाहित्य सम्बन्धी सामग्री, आ बादमे जोड़ल नव सूचना—एहि सभकेँ संशोधित-संयोजित कऽ वर्तमान रूप देल गेल। लेखक स्वयं सम्भावित कमीकेँ स्वीकार करैत छथि। (मूल पोथी, पृ. 6) ठेठी-अंगिका — आत्मकथन में लेखक स्पष्ट करै छै जे ई पोथी आरम्भ सें एकहि योजना के अन्तर्गत लिखलों अखण्ड ग्रन्थ नै छेलै। समय-समयपर सम्पादित बाल-साहित्य आरो लोरी-साहित्य सम्बन्धी कोश/ग्रन्थ लेल लिखलों आलेख, पहिने प्रकाशित अंगिका भाषा तथा लोकसाहित्य सम्बन्धी सामग्री, आरो बाद में जोड़लों नव सूचना—ई सब कें संशोधित-संयोजित करी कें वर्तमान रूप देलों गेलों। लेखक अपने सम्भावित कमी कें स्वीकार करै छै। (मूल पोथी, पृ. 6) मैथिली — एहि निर्माण-पद्धतिक दू विपरीत परिणाम अछि। पहिल, दीर्घ समयक अध्ययन, संकलन, स्मृति, निजी पुस्तक-संग्रह आ पत्र-पत्रिकासँ प्राप्त सामग्री एकठाम जमा भऽ गेल अछि। छोट भाषिक साहित्यिक क्षेत्रक इतिहास लेल ई बहुमूल्य स्थिति अछि, कारण अनेक स्रोत अल्पप्रचलित प्रकाशनमे छितरायल रहैत अछि। दोसर, स्वतन्त्र आलेखसभक मूल संरचना बचल रहबाक कारण पुनरावृत्ति, सूचीप्रधानता, विषयान्तर, असमान विस्तार आ आलोचनात्मक गहराइक अन्तर देखाइत अछि। ठेठी-अंगिका — ई निर्माण-पद्धति के दू विपरीत परिणाम छै। पहिल, दीर्घ समय के अध्ययन, संकलन, स्मृति, निजी पुस्तक-संग्रह आरो पत्र-पत्रिका सें प्राप्त सामग्री एके जगह जमा होय गेलों छै। छोट भाषिक साहित्यिक क्षेत्र के इतिहास लेल ई बहुमूल्य स्थिति छै, कारण अनेक स्रोत अल्पप्रचलित प्रकाशन में छितरायलों रहै छै। दोसर, स्वतन्त्र आलेख सिनी के मूल संरचना बचलों रहै के कारण पुनरावृत्ति, सूचीप्रधानता, विषयान्तर, असमान विस्तार आरो आलोचनात्मक गहराइ के अन्तर देखाय छै। मैथिली — एहि कारण पोथीकेँ ‘एक रेखीय इतिहास’ मात्र नहि, बल्कि साहित्यिक अभिलेख, आलोचनात्मक निबन्ध-संग्रह आ विधागत सर्वेक्षणक संयुक्त रूप मानब उचित अछि। भविष्यक संशोधित संस्करणमे अध्याय-अन्त निष्कर्ष, कालक्रम, लेखक-सूची, विधागत सारणी आ पुनरावृत्ति-सम्पादन जोड़ल जाए तँ एहि सम्पदाक उपयोग बहुत बढ़ि सकैत अछि। संकलनात्मक शक्ति आ संरचनात्मक असमानता—दुनू ग्रन्थक निर्माण-इतिहाससँ निकलैत अछि; असमानताक मूल कारण लेखकक विषय-ज्ञान नहि, बल्कि अलग-अलग समयमे तैयार सामग्रीक संयोजन अछि। ठेठी-अंगिका — ई कारण पोथी कें ‘एक रेखीय इतिहास’ मात्र नै, बल्कि साहित्यिक अभिलेख, आलोचनात्मक निबन्ध-संग्रह आरो विधागत सर्वेक्षण के संयुक्त रूप मानब उचित छै। आगू के संस्करण में अध्याय-अन्त निष्कर्ष, कालक्रम, लेखक-सूची, विधागत सारणी आरो पुनरावृत्ति-सम्पादन जोड़लों जाए तें ई सम्पदा के उपयोग बहुत बढ़ि सकै छै। संकलनात्मक शक्ति आरो संरचनात्मक असमानता—दूनो ग्रन्थ के निर्माण-इतिहास सें निकलै छै; असमानता के मूल कारण लेखक के विषय-ज्ञान नै, बल्कि अलग-अलग समय में तैयार सामग्री के संयोजन छै। संरचना ठेठी-अंगिका: बनावट / ढाँचा मैथिली — समग्र सामग्री दू अध्यायमे विभक्त अछि। पहिल अध्याय “अंगिका-बाल-लोकसाहित्य” मौखिक परम्पराक अध्ययन थिक, आ दोसर “आधुनिक अंगिका बाल-साहित्य” शिष्ट अर्थात् लिखित परम्पराक। ई विभाजन अपने-आपमे लेखकक मूल स्थापना केँ ढाँचा दैत अछि—जे आधुनिक बाल-साहित्यमे जे किछु श्रेष्ठ अछि, से लोक-साहित्यक भूमि पर ठाढ़ होएबाक कारणें अछि। ठेठी-अंगिका — सब्भे सामग्री दू अध्याय में बँटलों छै। पहिलों अध्याय “अंगिका-बाल-लोकसाहित्य” मुँहजबानी परम्परा के अध्ययन छै, आरो दोसरका “आधुनिक अंगिका बाल-साहित्य” सिस्ट यानी लिखलों परम्परा के। ई बँटवारा अपने-आप में लेखक के मूल बात के ढाँचा दै छै—कि आधुनिक बाल-साहित्य में जे कुछ बढ़िया छै, से लोक-साहित्य के जमीन पर ठाढ़ होय के कारणें छै। रचनाकार: डॉ. अमरेन्द्रक साहित्यिक यात्रा आ अवदान ठेठी-अंगिका: रचनाकार: डॉ. अमरेन्द्र के साहित्यिक यात्रा आरो अवदान मैथिली — डॉ. अमरेन्द्र अंगिका आ हिन्दीक एकटा एहन बहुआयामी साहित्यकार छथि, जिनका अंगिकाकेँ साहित्यिक गरिमा देबाक श्रेय देल जाइत अछि। ५ जनवरी १९४९ केँ बांका जिलाक रूपसार ग्राममे जन्मल डॉ. अमरेन्द्र अपन साहित्य-साधना सँ महाकाव्य, खण्डकाव्य, बाल-साहित्य, आ आलोचनाक क्षेत्रमे प्रतिमान स्थापित केलन्हि अछि। ठेठी-अंगिका — डॉ. अमरेन्द्र अंगिका आरो हिन्दीक एगो एहन बहुआयामी साहित्यकार छै, जिनका अंगिकाकेँ साहित्यिक गरिमा दै के श्रेय देलों जाय छै। ५ जनवरी १९४९ कें बांका जिला के रूपसार ग्राम में जन्मल डॉ. अमरेन्द्र अपन साहित्य-साधना सें महाकाव्य, खण्डकाव्य, बाल-साहित्य, आरो आलोचना के क्षेत्र में प्रतिमान स्थापित करलकै छै। जीवन-परिचय आ साहित्यिक अवदान ठेठी-अंगिका: जीवन-परिचय आरो साहित्यिक अवदान मैथिली — पूरा नाम: डॉ. अमरेन्द्र कुमार सिन्हा ठेठी-अंगिका — पूरा नाम: डॉ. अमरेन्द्र कुमार सिन्हा मैथिली — जन्म तिथि आ स्थान: ५ जनवरी १९४९, ग्राम- रूपसार, बांका, बिहार ठेठी-अंगिका — जन्म तिथि आरो स्थान: ५ जनवरी १९४९, ग्राम- रूपसार, बांका, बिहार मैथिली — माता-पिता: स्व. पँचा रानी सिन्हा आ स्व. नरसिंह प्रसाद सिन्हा ठेठी-अंगिका — माता-पिता: स्व. पँचा रानी सिन्हा आरो स्व. नरसिंह प्रसाद सिन्हा मैथिली — प्रमुख अंगिका रचना (बाल-साहित्य): ढोल बजै छै ढम्मक ढम, बुतरू के तुतरू, एक छड़ी पर अंडा नाचै, बाजै बीन बजावै तीन, बण्टा (उपन्यास) ठेठी-अंगिका — प्रमुख अंगिका रचना (बाल-साहित्य): ढोल बजै छै ढम्मक ढम, बुतरू के तुतरू, एक छड़ी पर अंडा नाचै, बाजै बीन बजावै तीन, बण्टा (उपन्यास) मैथिली — प्रमुख अंगिका रचना (अन्य): पंचगव्य (महाकाव्य), अंगदेव, जटायु, कर्ण (महाकाव्य), ऋष्यशृंग ठेठी-अंगिका — प्रमुख अंगिका रचना (अन्य): पंचगव्य (महाकाव्य), अंगदेव, जटायु, कर्ण (महाकाव्य), ऋष्यशृंग मैथिली — प्रमुख सम्मान/पुरस्कार: भवप्रीतानन्द पुरस्कार, राष्ट्रभाषा पुरस्कार, नन्द पुरस्कार, कर्ण पुरस्कार, सच्चिदानन्द धूमकेतु पुरस्कार ठेठी-अंगिका — प्रमुख सम्मान/पुरस्कार: भवप्रीतानन्द पुरस्कार, राष्ट्रभाषा पुरस्कार, नन्द पुरस्कार, कर्ण पुरस्कार, सच्चिदानन्द धूमकेतु पुरस्कार मैथिली — डॉ. अमरेन्द्रक 'अंगिका बाल-साहित्य' पोथी दू मुख्य खण्डमे विभक्त अछि: 'अंगिका बाल-लोकसाहित्य' आ 'आधुनिक अंगिका बाल-साहित्य'। ई पोथी मूलतः 'भारतीय बाल-साहित्य कोश' लेल लिखल गेल आलेखक विस्तार अछि, जकरा पाछाँ वएह छूटल वा अप्रकाशित सामग्रीकेँ सहेजि कऽ राखबाक गम्भीर उद्देश्य अछि। ठेठी-अंगिका — डॉ. अमरेन्द्र के 'अंगिका बाल-साहित्य' पोथी दू मुख्य खण्ड में विभक्त छै: 'अंगिका बाल-लोकसाहित्य' आरो 'आधुनिक अंगिका बाल-साहित्य'। ई पोथी मूलतः 'भारतीय बाल-साहित्य कोश' लेली लिखलों गेलों आलेखक विस्तार छै, जेकरा पाछाँ वएह छूटल वा अप्रकाशित सामग्री कें सहेजि कऽ राखबाक गम्भीर उद्देश्य छै। 3. बाल-मनक सौन्दर्यशास्त्र: ग्रन्थक केन्द्रीय स्थापना ठेठी-अंगिका: 3. बाल-मन के सौन्दर्यशास्त्र: ग्रन्थ के केन्द्रीय स्थापना मैथिली — पृष्ठ 8 पर लेखक बाल-साहित्यक जे कसौटी प्रस्तुत करैत छथि, से सम्पूर्ण पोथीक मूल्याङ्कन लेल मूल चाबी अछि। बालक द्वारा रचल हो वा वयस्क द्वारा बालक लेल—रचनामे बाल-मनक अभिव्यक्ति सर्वप्रथम आवश्यक अछि। वस्तु देखबाक बालकीय तरीका, सोच, कल्पना-शक्ति, तर्क, जिद, माँग मनबेबाक ढङ्ग, चित्र आ संगीतक आकर्षण साहित्यक रूप-निर्धारक तत्त्व मानल गेल अछि। प्रत्यक्ष शिक्षण वा संदेश-वाचनकेँ लेखक पीछे राखैत छथि; संदेश हो तँ व्यञ्जना, संकेत, कथा, खेल वा रसक भीतरसँ उभरय। (मूल पोथी, पृ. 8–9) ठेठी-अंगिका — पृष्ठ 8 पर लेखक बाल-साहित्य के जे कसौटी प्रस्तुत करै छै, से सम्पूर्ण पोथी के मूल्याङ्कन लेल मूल चाबी छै। बालक द्वारा रचलों हो वा वयस्क द्वारा बालक लेल—रचना में बाल-मन के अभिव्यक्ति सर्वप्रथम आवश्यक छै। वस्तु देखै के बालकीय तरीका, सोच, कल्पना-शक्ति, तर्क, जिद, माँग मनावै के ढङ्ग, चित्र आरो संगीत के आकर्षण साहित्य के रूप-निर्धारक तत्त्व मानलों गेलों छै। प्रत्यक्ष शिक्षण वा संदेश-वाचन कें लेखक पीछे राखै छै; संदेश हो तें व्यञ्जना, संकेत, कथा, खेल वा रस के भीतर सें उभरै। (मूल पोथी, पृ. 8–9) मैथिली — एहि विचारक विशेष महत्त्व अछि, कारण बाल-साहित्य प्रायः उपदेश देबाक सरल माध्यम मानि लेल जाइत अछि। डॉ. अमरेन्द्र एहि प्रवृत्तिक विरुद्ध बालकक अनुभव-जगतकेँ साहित्यिक स्वायत्तता दैत छथि। Hans-Heino Ewers बालोपयुक्तता सम्बन्धी अध्ययनमे पूछैत छथि जे साहित्य बालकक आवश्यकता, इच्छा आ मूल्यक अनुरूप कोना बनैत अछि। एहि व्यापक अवधारणासँ तुलना करैत ‘अंगिका बाल-साहित्य’क बाल-मन केन्द्रित कसौटी एक स्थानीय, सहज आ व्यवहारिक समकक्ष ठहरैत अछि। ठेठी-अंगिका — ई विचार के विशेष महत्त्व छै, कारण बाल-साहित्य प्रायः उपदेश दै के सरल माध्यम मान कें लेल जाय छै। डॉ. अमरेन्द्र ई प्रवृत्ति के विरुद्ध बालक के अनुभव-जगत कें साहित्यिक स्वायत्तता दै छै। Hans-Heino Ewers बालोपयुक्तता सम्बन्धी अध्ययन में पूछै जे जे साहित्य बालक के आवश्यकता, इच्छा आरो मूल्य के अनुरूप केना बनै छै। ई व्यापक अवधारणा सें तुलना करै ‘अंगिका बाल-साहित्य’ के बाल-मन केन्द्रित कसौटी एक स्थानीय, सहज आरो व्यवहारिक समकक्ष ठहरै छै। मैथिली — मुदा एहि सिद्धान्तक भीतर एक रोचक तनाव सेहो अछि। ग्रन्थक बादक भागमे नैतिक शिक्षा, पर्यावरण-शिक्षा, राष्ट्रबोध, जीवनी, स्वास्थ्य, अन्धविश्वास-विरोध आदि शिक्षामूलक साहित्यक प्रशंसा बहुत अछि। अर्थात आरम्भमे प्रत्यक्ष उपदेश गौण, मुदा साहित्येतिहास लिखैत समय शिक्षाप्रद गुण फेर महत्त्वपूर्ण। ई साधारण विरोधाभास नहि; बाल-साहित्यक ऐतिहासिक द्वैध अछि—आनन्द आ संस्कार, खेल आ शिक्षा, स्वायत्त बाल-दृष्टि आ समाजक अपेक्षा। पोथीक मूल सौन्दर्यशास्त्रक सर्वोत्तम रूप तखन देखाइत अछि जखन शिक्षामूलक कथ्य बालकक क्रिया, संवाद, लय, हास्य, कल्पना वा कथा-तनावमे घुलि जाइत अछि। ठेठी-अंगिका — मतरकि ई सिद्धान्त के भीतर एक रोचक तनाव भी छै। ग्रन्थ के बाद के भाग में नैतिक शिक्षा, पर्यावरण-शिक्षा, राष्ट्रबोध, जीवनी, स्वास्थ्य, अन्धविश्वास-विरोध आदि शिक्षामूलक साहित्य के प्रशंसा बहुत छै। अर्थात आरम्भ में प्रत्यक्ष उपदेश गौण, मतरकि साहित्येतिहास लिखै समय शिक्षाप्रद गुण फेनू महत्त्वपूर्ण। ई साधारण विरोधाभास नै; बाल-साहित्य के ऐतिहासिक द्वैध छै—आनन्द आरो संस्कार, खेल आरो शिक्षा, स्वायत्त बाल-दृष्टि आरो समाज के अपेक्षा। पोथी के मूल सौन्दर्यशास्त्र के सर्वोत्तम रूप तबें देखाय छै जबें शिक्षामूलक कथ्य बालक के क्रिया, संवाद, लय, हास्य, कल्पना वा कथा-तनाव में घुलि जाय छै। 4. बाल-लोकसाहित्य: आधारभूमि आ जीवित अभिलेख ठेठी-अंगिका: 4. बाल-लोकसाहित्य: आधारभूमि आरो जीवित अभिलेख मैथिली — पहिल खण्ड अंगिका बाल-लोकसाहित्यक विस्तृत संसार खोलैत अछि। एतय साहित्य पुस्तकक पृष्ठपर नहि, जीवनक क्रियामे बसल अछि। बच्चाकेँ सुतबैत काल लोरी, तेल-मालिश वा भोजनक समय गायल पद, खेलमे बोलल तुक, समूहक प्रतिस्पर्धात्मक गीत, पहेली, हास्य, पशु-पक्षी आ लोककथा—सभ साहित्यक अंग बनैत अछि। लेखक एहि सामग्रीकेँ अस्पष्ट ‘लोक-संस्कृति’क श्रेणीमे छोड़ैत नहि, बल्कि उमेर, प्रयोजन, लय, खेलक प्रकार आ कथात्मक प्रकृतिक आधारपर उपरूप पहिचानबाक प्रयास करैत छथि। ठेठी-अंगिका — पहिल खण्ड अंगिका बाल-लोकसाहित्य के विस्तृत संसार खोलै छै। एतै साहित्य पुस्तक के पृष्ठपर नै, जीवन के क्रिया में बसलों छै। बच्चा कें सुतावै काल लोरी, तेल-मालिश वा भोजन के समय गायलों पद, खेल में बोललों तुक, समूह के प्रतिस्पर्धात्मक गीत, पहेली, हास्य, पशु-पक्षी आरो लोककथा— सिनी साहित्य के अंग बनै छै। लेखक ई सामग्री कें अस्पष्ट ‘लोक-संस्कृति’ के श्रेणी में छोड़ै नै, बल्कि उमेर, प्रयोजन, लय, खेल के प्रकार आरो कथात्मक प्रकृति के आधारपर उपरूप पहिचानै के प्रयास करै छै। मैथिली — ई खण्डक पहिल महत्त्व दस्तावेजीकरण अछि। मौखिक सामग्रीक अस्तित्व स्मृति आ जीवित गायनपर निर्भर रहैत अछि; पीढ़ी बदलला पर शब्द, धुन, प्रसंग आ खेलक नियम बदलि सकैत अछि। लेखक उपलब्ध संग्रह, अध्ययन आ मुद्रित स्रोतक सहारे एक पाठ्य-अभिलेख तैयार करैत छथि। Angika.com क स्वतंत्र साहित्यिक सर्वेक्षण सेहो अंगिका बाल-लोककाव्यक विविधता आ विपुलता तथा ओकर बहुत अंश लोककण्ठमे सुरक्षित रहबाक बात कहैत, नरेश पाण्डेय चकोर आ चन्द्रप्रकाश जगप्रियक संकलनकार्यकेँ महत्त्वपूर्ण मानैत अछि। एहि बाहरी साक्ष्यसँ मूल पोथीक अभिलेखन-भूमिका पुष्ट होइत अछि। ठेठी-अंगिका — ई खण्ड के पहिल महत्त्व दस्तावेजीकरण छै। मौखिक सामग्री के अस्तित्व स्मृति आरो जीवित गायनपर निर्भर रहै छै; पीढ़ी बदलला पर शब्द, धुन, प्रसंग आरो खेल के नियम बदलि सकै छै। लेखक उपलब्ध संग्रह, अध्ययन आरो मुद्रित स्रोत के सहारे एक पाठ्य-अभिलेख तैयार करै छै। Angika.com के स्वतंत्र साहित्यिक सर्वेक्षण भी अंगिका बाल-लोककाव्य के विविधता आरो विपुलता तथा ओकर बहुत अंश लोककण्ठ में सुरक्षित रहै के बात कहै, नरेश पाण्डेय चकोर आरो चन्द्रप्रकाश जगप्रिय के संकलनकार्य कें महत्त्वपूर्ण मानै छै। ई बाहरी साक्ष्य सें मूल पोथी के अभिलेखन-भूमिका पुष्ट होय छै। मैथिली — दोसर महत्त्व ई जे लोकसाहित्य आधुनिक साहित्यक ‘कच्चा माल’ मात्र नहि। लोरीक अपन लय-संगीत, पहेलीक बौद्धिक खेल, तुक्तकक ध्वनि-आनन्द, खेलगीतक सामूहिक प्रदर्शन, लोककथाक परिवर्तनशील कथा-जीवन—ई सभ अपने पूर्ण सौन्दर्य-व्यवस्था अछि। तथापि पोथीक संरचना कखनो लोककेँ आधुनिक लिखित साहित्यक पूर्वपीठिका बना देबाक जोखिम लैत अछि। समीक्षात्मक रूपेँ लोकसाहित्यक स्वायत्तता सेहो मानल जाए। ठेठी-अंगिका — दोसर महत्त्व ई जे लोकसाहित्य आधुनिक साहित्य के ‘कच्चा माल’ मात्र नै। लोरी के आपनों लय-संगीत, पहेली के बौद्धिक खेल, तुक्तक के ध्वनि-आनन्द, खेलगीत के सामूहिक प्रदर्शन, लोककथा के परिवर्तनशील कथा-जीवन—ई सिनी अपने पूर्ण सौन्दर्य-व्यवस्था छै। तथापि पोथी के संरचना कखनियों लोक कें आधुनिक लिखित साहित्य के पूर्वपीठिका बना दै के जोखिम लै छै। समीक्षात्मक रूपेँ लोकसाहित्य के स्वायत्तता भी मानलों जाए। मैथिली — लिखित संरक्षणक स्वाभाविक सीमा सेहो ध्यान योग्य अछि। खेलगीतक शब्द लिखि लेलासँ धुन, ताल, देहक गति, खेलक नियम, उमेर-समूहक सहभागिता, ऋतु, स्थान आ प्रदर्शनक परिस्थिति नहि बचैत अछि। भविष्यक शोधक अगिला चरण ऑडियो-वीडियो लोक-अभिलेख, गायक/कथावाचकक परिचय, स्थान, तिथि, प्रसंग आ variant पाठक दस्तावेजीकरण होएत। एहि दृष्टिसँ पोथी समाप्त परियोजना नहि, field archive क प्रारम्भिक नक्शा अछि। ठेठी-अंगिका — लिखित संरक्षण के स्वाभाविक सीमा भी ध्यान योग्य छै। खेलगीत के शब्द लिख कें लेला सें धुन, ताल, देह के गति, खेल के नियम, उमेर-समूह के सहभागिता, ऋतु, स्थान आरो प्रदर्शन के परिस्थिति नै बचै छै। आगू के शोध के आगू के चरण ऑडियो-वीडियो लोक-अभिलेख, गायक/कथावाचक के परिचय, स्थान, तिथि, प्रसंग आरो variant पाठक दस्तावेजीकरण होतै। ई दृष्टि सें पोथी समाप्त परियोजना नै, field archive के प्रारम्भिक नक्शा छै। पाठ-सर्वेक्षण: प्रथम अध्याय — लोक-मूलक अन्वेषण ठेठी-अंगिका: पाठ-सर्वेक्षण : पहिलों अध्याय — लोक-मूल के खोज मैथिली — पहिल अध्यायक सभसँ सबल पक्ष अछि ओकर प्रामाणिक प्राथमिक सामग्री। लेखक शिशु-कालसँ किशोर-काल धरिक जीवन-प्रसंग—डेग धरनाइ, तेल-मालिश, खान-पान आ निन्न पाड़नाइ—सभक संग जुड़ल लोरी आ बाल-गीत केँ प्रसंगानुसार सजा कए राखैत छथि। दृष्टान्तस्वरूप, तेल-मालिशक ई सरल-सुन्दर गीत अंग-धूलिकासँ उद्धृत अछि— ठेठी-अंगिका — पहिलों अध्याय के सबसें मजबूत पक्ष छै ओकर सच्चा प्राथमिक सामग्री। लेखक नान्हपन सें किशोरपन तक के जिनगी-परसंग—डेग धरना, तेल-मालिश, खाना-पीना आरो सुताना—सब्भे सें जुड़लों लोरी आरो बाल-गीत के परसंग के हिसाब सें सजा कें राखै छै। जइसन कि, तेल-मालिश के ई सोझ-सुन्नर गीत अंग-धूलिका सें लेलों छै— मैथिली — तेल दे टडुवा, नूनु रे बढुवा ठेठी-अंगिका — तेल दे टडुवा, नूनु रे बढुवा मैथिली — तेली केँ तेलाय जाय, नुनू मोटाय जाय ठेठी-अंगिका — तेली कें तेलाय जाय, नुनू मोटाय जाय मैथिली — तेल करैं चप-चप, नुनू बढ़ौं लप-लप। ठेठी-अंगिका — तेल करैं चप-चप, नुनू बढ़ौं लप-लप। मैथिली — (अंग-धूलिका, पृ. ८) ठेठी-अंगिका — (अंग-धूलिका, पृ. ८) मैथिली — एहन पदमे लेखक ठीके देखबैत छथि जे बाल-साहित्यक प्राण अर्थ (अभिधा)मे नहि, बल्कि ध्वनि आ लयक व्यंजनामे बसैत अछि—संदेश व्यंजनामे उभरैत अछि, अभिधामे नहि। इएह दृष्टि तुक्तक-काव्यक विवेचनमे परिपक्व होइत अछि, जतय ओ शिशु-गीतक निरर्थक-प्रतीत शब्द-संयोजन केँ ध्वन्यात्मकता आ संगीत-प्रधानताक आधार पर सार्थक सिद्ध करैत छथि। ठेठी-अंगिका — एहन पद में लेखक ठीके देखाबै छै कि बाल-साहित्य के परान अरथ (अभिधा) में नै, बल्कि धुन आरो लय के व्यंजना में बसै छै—संदेस व्यंजना में उभरै छै, अभिधा में नै। इहे नजर तुक्तक-काव्य के विवेचन में आरो पाकल होय जाय छै, जहाँ ऊ सिसु-गीत के बेमतलब जइसन लागै वाला सबद-संयोजन के ध्वन्यात्मकता आरो संगीत-परधानता के आधार पर सारथक साबित करी दै छै। खण्ड १: अंगिका बाल-लोकसाहित्यक तात्विक आ मनोवैज्ञानिक विवेचन ठेठी-अंगिका: खण्ड १: अंगिका बाल-लोकसाहित्य के तात्विक आरो मनोवैज्ञानिक विवेचन मैथिली — लोकसाहित्य कोनो भाषाक अघोषित इतिहास आ लोक-मनोविज्ञानक साक्षात् दर्पण होइत अछि। डॉ. अमरेन्द्र अपन ग्रन्थक प्रथम अध्यायमे बाल-लोकसाहित्यक मनोवैज्ञानिक आ वैज्ञानिक आधारकेँ स्पष्ट करैत छथि। हुनकर तर्क अछि जे वैज्ञानिक दृष्टिसँ शिशु अपन गर्भावस्थासँ हे एक विशेष प्रकारक सङ्गीत सँ नीन्द्रावस्थामे रहैत अछि। माए द्वारा गाओल जाए वला लोरीमे ओही सङ्गीतक गुञ्जन होइत अछि। ठेठी-अंगिका — लोकसाहित्य कोनो भाषा के अघोषित इतिहास आरो लोक-मनोविज्ञान के साक्षात् दर्पण होय छै। डॉ. अमरेन्द्र अपन ग्रन्थ के प्रथम अध्याय में बाल-लोकसाहित्य के मनोवैज्ञानिक आरो वैज्ञानिक आधारकेँ स्पष्ट करै छै। हुनकर तर्क छै जे वैज्ञानिक दृष्टि सें शिशु अपन गर्भावस्था सें ही एक विशेष प्रकारक सङ्गीत सें नीन्द्रावस्था में रहै छै। माए द्वारा गाओल जाए वला लोरी में ओही सङ्गीत के गुञ्जन होय छै। 5. लोरी, शिशु-काव्य आ मातृस्वर: साहित्यक पहिल देहरी ठेठी-अंगिका: 5. लोरी, शिशु-काव्य आरो मातृस्वर: साहित्य के पहिल देहरी मैथिली — पोथी लोरीकेँ बाल-साहित्यक आदि रूपसभमे राखैत अछि। शिशु, संगीत, नींद आ मातृक स्वरक सम्बन्धसँ चर्चा आरम्भ भऽ लोरी शिशु-जीवनक पहिल साहित्यिक-संगीतात्मक अनुभव बनि उठैत अछि। आलोचनात्मक दृष्टिसँ महत्त्वपूर्ण बात ई अछि जे लोरी एतय पाठ नहि, सम्बन्ध अछि—माँक स्वर, शिशुक देह, लय, स्पर्श आ नींदक संयुक्त अनुभव। ठेठी-अंगिका — पोथी लोरी कें बाल-साहित्य के आदि रूप सिनी में राखै छै। शिशु, संगीत, नींद आरो माय के स्वर के सम्बन्ध सें चर्चा आरम्भ होय कें लोरी शिशु-जीवन के पहिल साहित्यिक-संगीतात्मक अनुभव बनी उठै छै। आलोचनात्मक दृष्टि सें महत्त्वपूर्ण बात ई छै जे लोरी एतै पाठ नै, सम्बन्ध छै—माय के स्वर, शिशु के देह, लय, स्पर्श आरो नींद के संयुक्त अनुभव। मैथिली — मुद्रित पुस्तक पढ़बाक पहिने बच्चा ध्वनि ग्रहण करैत अछि; अर्थ बुझबाक पहिने पुनरावृत्ति, स्वराघात आ तालक प्रतिक्रिया करैत अछि। एहि कारण लोरी आ तुक्तक साहित्यिक विकासक निम्न स्तर नहि, भाषा-अनुभवक मूल रूप अछि। पोथीक उदाहरणसभ परिवार, भोजन, तेल-मालिश, नींद आ दैनिक क्रियाकेँ काव्यक सामग्री बनबैत अछि। बाल-साहित्यक आरम्भ भव्य कल्पनासँ नहि, परिचित देह-जगतसँ होइत अछि। ठेठी-अंगिका — मुद्रित पुस्तक पढ़ै के पहिने बच्चा ध्वनि ग्रहण करै छै; अर्थ बुझै के पहिने पुनरावृत्ति, स्वराघात आरो ताल के प्रतिक्रिया करै छै। ई कारण लोरी आरो तुक्तक साहित्यिक विकास के निम्न स्तर नै, भाषा-अनुभव के मूल रूप छै। पोथी के उदाहरण सिनी परिवार, भोजन, तेल-मालिश, नींद आरो दैनिक क्रिया कें काव्य के सामग्री बनावै छै। बाल-साहित्य के आरम्भ भव्य कल्पना सें नै, परिचित देह-जगत सें होय छै। मैथिली — मातृस्वरक केन्द्रता संग एक आलोचनात्मक प्रश्न सेहो उठैत अछि: लोक-पालन-पोषणमे पिता, दादी-दादा, भाई-बहिन, पड़ोस आ अन्य देखभालकर्ता सभक भूमिका कतेक अछि? भविष्यक field study बालगीतक पूरा घरेलू-सामुदायिक नेटवर्क देखबैत ग्रन्थक मातृकेन्द्रित सामग्रीकेँ अधिक विस्तृत सामाजिक परिप्रेक्ष्य दऽ सकैत अछि। साहित्यिक दृष्टिसँ लोरीक मुख्य गुण सरलता नहि, श्रवणीयता अछि; ध्वनि-साम्य, पुनरावृत्ति, लघु पद, परिचित शब्द आ लय शिशुक ग्रहणशीलताक अनुसार भाषा बनबैत अछि। ठेठी-अंगिका — मातृस्वर के केन्द्रता संग एक आलोचनात्मक प्रश्न भी उठै छै: लोक-पालन-पोषण में पिता, दादी-दादा, भाई-बहिन, पड़ोस आरो अन्य देखभालकर्ता सिनी के भूमिका कत्तें छै? आगू के field study बालगीत के पूरा घरेलू-सामतरकियिक नेटवर्क देखावै ग्रन्थ के मातृकेन्द्रित सामग्री कें अधिक विस्तृत सामाजिक परिप्रेक्ष्य दै कें सकै छै। साहित्यिक दृष्टि सें लोरी के मुख्य गुण सरलता नै, श्रवणीयता छै; ध्वनि-साम्य, पुनरावृत्ति, लघु पद, परिचित शब्द आरो लय शिशु के ग्रहणशीलता के अनुसार भाषा बनावै छै। लोरी: वात्सल्य, सङ्गीत आ ध्वन्यात्मकताक अद्भुत सङ्गम ठेठी-अंगिका: लोरी: वात्सल्य, सङ्गीत आरो ध्वन्यात्मकताक अद्भुत सङ्गम मैथिली — बाल-साहित्यक सबसँ प्राचीनतम रूप लोरी अछि। लोरी मात्र बच्चाकेँ सुतेबाक साधन नहि अछि, ई भाषाक प्राथमिक लय आ ध्वनिक ज्ञान बच्चाकेँ दैत अछि। अंगिका लोक-साहित्यमे जे लोरी उपलब्ध अछि, ओहिमे प्रकृति, पशुपक्षी आ पारिवारिक स्नेहक अतीव सुन्दर चित्रण अछि। पोथीसँ एकटा विशुद्ध उद्धरण द्रष्टव्य अछि: ठेठी-अंगिका — बाल-साहित्य के सब सें सभसें पुरान रूप लोरी छै। लोरी मात्र बच्चा केेँ सुतावै के साधन नै छै, ई भाषा के प्राथमिक लय आरो ध्वनि के ज्ञान बच्चा केेँ दै छै। अंगिका लोक-साहित्य में जे लोरी उपलब्ध छै, ओहि में प्रकृति, पशुपक्षी आरो पारिवारिक स्नेह के अतीव सुन्दर चित्रण छै। पोथी सें एगो विशुद्ध उद्धरण द्रष्टव्य छै: मैथिली — घना मंजुर, घना मंजूर कहा पे छिपलै घना मंजूर बाइस बीघा के वनो मे तोहरा लेबौ खोजी जहाँ भी छिपलै घना मंजूर चुप्पा चुप, कुकरू-कूं नूनु करै छौ तोरा सँ प्रीत आवी सुताय जो गावी के गीत। ठेठी-अंगिका — घना मंजुर, घना मंजूर कहा पे छिपलै घना मंजूर बाइस बीघा के वनो मे तोहरा लेबौ खोजी जहाँ भी छिपलै घना मंजूर चुप्पा चुप, कुकरू-कूं नूनु करै छौ तोरा सँ प्रीत आवी सुताय जो गावी के गीत। मैथिली — एहि लोरीक साहित्यिक समीक्षा करितें ई स्पष्ट होइत अछि जे एहिमे ध्वन्यात्मकता ('चुप्पा चुप, कुकरू-कूं') आ लयात्मकता ('मंजूर', 'खोजी', 'गीत') क जे सङ्गम अछि, ओ शिशु-मनकेँ तुरन्त अपन दिस आकृष्ट करैत अछि। डॉ. अमरेन्द्र ई सेहो स्पष्ट करैत छथि जे लोरीक विषय-वस्तु बच्चाकेँ पूर्णतया समझमे आबए ई आवश्यक नहि, अपितु ओकर सुर आ सङ्गीतक जादू शिशु-मस्तिष्क पर प्रभाव डालैत अछि। 'बाइस बीघा के वनो मे' जकाँ पङ्क्तिमे अतिशयोक्ति अलङ्कारक जे सहज प्रयोग अछि, ओ बच्चाक कल्पनाशक्तीकेँ विस्तृत करैत अछि। ठेठी-अंगिका — ई लोरी के साहित्यिक समीक्षा करितें ई साफ होय छै जे ई में ध्वन्यात्मकता ('चुप्पा चुप, कुकरू-कूं') आरो लयात्मकता ('मंजूर', 'खोजी', 'गीत') के जे सङ्गम छै, ऊ शिशु-मनकेँ तुरन्त अपन दिस अपन दिस खींचै छै। डॉ. अमरेन्द्र ई भी साफ करै छै जे लोरी के विषय-वस्तु बच्चा केेँ पूर्णतया समझ में आवै ई आवश्यक नै छै, बल्कि ओकर सुर आरो सङ्गीत के जादू शिशु-मस्तिष्क पर प्रभाव डालै छै। 'बाइस बीघा के वनो मे' जेना पङ्क्ति में अतिशयोक्ति अलङ्कारक जे सहज प्रयोग छै, ऊ बच्चा के कल्पनाशक्तीकेँ विस्तृत करै छै। 6. पहेली आ तुक्तक: अर्थसँ पूर्व ध्वनि, ज्ञानसँ पूर्व खेल ठेठी-अंगिका: 6. पहेली आरो तुक्तक: अर्थ सें पूर्व ध्वनि, ज्ञान सें पूर्व खेल मैथिली — पृष्ठ 10–14 क सामग्री पहेली आ तुक्तक-काव्यकेँ दू भिन्न, मुदा परस्पर पूरक बाल-विधाक रूपमे सामने अनैत अछि। पहेली अर्थक गुप्त खेल अछि: बच्चा संकेत जोड़ैत अछि, अनुमान करैत अछि, गलत उत्तरसँ हँसैत अछि, फेर प्रयास करैत अछि। एकपदीसँ चतुष्पदी रूपक उल्लेख देखबैत अछि जे पहेली छोट भाषिक ढाँचामे बौद्धिक सक्रियता पैदा करैत अछि। लेखक शिशु आ किशोरक ग्रहण-क्षमता बीच भेदक संकेत सेहो करैत छथि। ठेठी-अंगिका — पृष्ठ 10–14 के सामग्री पहेली आरो तुक्तक-काव्य कें दू भिन्न, मतरकि परस्पर पूरक बाल-विधा के रूप में सामने अनै छै। पहेली अर्थ के गुप्त खेल छै: बच्चा संकेत जोड़ै छै, अनुमान करै छै, गलत उत्तर सें हँसै छै, फेनू प्रयास करै छै। एकपदी सें चतुष्पदी रूपक उल्लेख देखावै छै जे पहेली छोट भाषिक ढाँचा में बौद्धिक सक्रियता पैदा करै छै। लेखक शिशु आरो किशोर के ग्रहण-क्षमता बीच भेद के संकेत भी करै छै। मैथिली — तुक्तक-काव्यमे अर्थ पूर्ण स्पष्ट होएब आवश्यक नहि; ध्वनि, तुक, शब्दक खेल, दोहराव आ उच्चारणक आनन्द अग्रभूमिमे अछि। बच्चा भाषाकेँ अर्थ-संकेतक प्रणाली मात्र नहि, आवाजक खिलौना सेहो मानैत अछि। निरर्थकता एतय दोष नहि; ध्वनि-सौन्दर्य, स्मृति आ सहभागिताक साधन अछि। ठेठी-अंगिका — तुक्तक-काव्य में अर्थ पूर्ण स्पष्ट होब आवश्यक नै; ध्वनि, तुक, शब्द के खेल, दोहराव आरो उच्चारण के आनन्द अग्रभूमि में छै। बच्चा भाषा कें अर्थ-संकेतक प्रणाली मात्र नै, आवाज के खिलौना भी मानै छै। निरर्थकता एतै दोष नै; ध्वनि-सौन्दर्य, स्मृति आरो सहभागिता के साधन छै। मैथिली — बाहरी साहित्यिक सूची एहि क्षेत्रक मुद्रित विस्तारक पुष्टि करैत अछि। Angika.com अमरेन्द्रक ‘एक छड़ी पर अंडा नाचै’ केँ बाल-मनोविज्ञान ध्यानमे राखि रचल पहेली-संग्रह आ ‘तुक्तक-मुक्तक’ केँ कम उमेरक बालक लेल रचल कविता-संग्रहक रूपमे दर्ज करैत अछि; Kavita Kosh सेहो ‘तुक्तक मुक्तक’ केँ बाल-कविता/ई-पुस्तक श्रेणीमे राखैत अछि। ग्रन्थक सीमा ई जे उदाहरण बहुत अछि, मुदा ध्वनिविज्ञान, स्मृति-रचना, हास्य वा भाषिक विचलनक विस्तृत close reading कम अछि। भविष्यक शोध एहि corpus पर तुक-योजना, ध्वनि-पुनरावृत्ति, शब्द-निर्माण आ बाल-प्रतिक्रियाक अध्ययन कऽ सकैत अछि। ठेठी-अंगिका — बाहरी साहित्यिक सूची ई क्षेत्र के मुद्रित विस्तार के पुष्टि करै छै। Angika.com अमरेन्द्र के ‘एक छड़ी पर अंडा नाचै’ कें बाल-मनोविज्ञान ध्यान में राख कें रचलों पहेली-संग्रह आरो ‘तुक्तक-मुक्तक’ कें कम उमेर के बालक लेल रचलों कविता-संग्रह के रूप में दर्ज करै छै; Kavita Kosh भी ‘तुक्तक-मुक्तक’ कें बाल-कविता/ई-पुस्तक श्रेणी में राखै छै। ग्रन्थ के सीमा ई जे उदाहरण बहुत छै, मतरकि ध्वनिविज्ञान, स्मृति-रचना, हास्य वा भाषिक विचलन के विस्तृत close reading कम छै। आगू के शोध ई corpus पर तुक-योजना, ध्वनि-पुनरावृत्ति, शब्द-निर्माण आरो बाल-प्रतिक्रिया के अध्ययन करी कें सकै छै। बुझौवल-परम्परा: एक गहन विवेचन ठेठी-अंगिका: बुझौवल-परम्परा : एगो गहरा विवेचन मैथिली — अंगिका बुझौवल (पहेली)क विवेचन एहि पोथीक सभसँ मौलिक अंश थिक, आ एतहि लेखकक वर्गीकरण-कौशल विशेष रूपें उघरैत अछि। ओ बुझौवल केँ पद-संख्याक आधार पर एकपदीसँ चतुष्पदी धरि चारि श्रेणीमे बाँटैत छथि। ई वर्गीकरण मात्र गणनात्मक नहि—ओकरामे एकटा काव्यशास्त्रीय क्रमविकास नुकाएल अछि। एकपदी बुझौवलमे समस्त प्रहेलिका एके बिम्बमे संकुचित भ’ जाइत अछि— ठेठी-अंगिका — अंगिका बुझौवल (पहेली) के विवेचन ई पोथी के सबसें मौलिक हिस्सा छै, आरो एहिजा लेखक के वर्गीकरण के हुनर खास तौर पर उभरै छै। ऊ बुझौवल के पद-गिनती के आधार पर एकपदी सें चतुष्पदी तक चार सरेनी में बाँटै छै। ई बँटवारा खाली गिनती वाला नै छै—ओकरा में एगो काव्यशास्त्रीय क्रम-विकास छिपलों छै। एकपदी बुझौवल में पूरा पहेली एके बिम्ब में सिमटी जाय छै— मैथिली — फरैं नै फूलै, ढकमोरै गाछ। (पान) ठेठी-अंगिका — फरैं नै फूलै, ढकमोरै गाछ। (पान) मैथिली — एतय “फल नहि, फूल नहि, तैयो गाछ केँ लपेटि लै”क विरोधाभास बालक केँ निषेध-द्वारा-परिभाषा सिखबैत अछि; ई अन्यापदेश आ लक्षणाक प्रारम्भिक पाठ थिक। जेना-जेना पद बढ़ैत अछि, बुझौवलमे नाट्यात्मकता प्रवेश करैत अछि। त्रिपदी बुझौवलमे सादृश्य आ द्वन्द्व दुनू अबैत अछि— ठेठी-अंगिका — एहिजा “फल नै, फूल नै, तइयो गाछ के लपेटी लै”—ई विरोधाभास बुतरू के नाकारा-सें-पहचान (निषेध सें परिभाषा) सिखाबै छै; ई अन्योक्ति आरो लक्षणा के पहिलका पाठ छै। जइसन-जइसन पद बढ़ै छै, बुझौवल में नाटकीयता घुसै छै। त्रिपदी बुझौवल में सादृश्य आरो जोड़ी—दुन्नु आबै छै— मैथिली — एक सङ दू साथी रहै ठेठी-अंगिका — एक सङ दू साथी रहै मैथिली — एक चललै, एक सूती रहलै ठेठी-अंगिका — एक चललै, एक सूती रहलै मैथिली — तैयो ओकरों साथ नै छुटलै। (चक्की के दोनों पट्टा) ठेठी-अंगिका — तैयो ओकरों साथ नै छुटलै। (चक्की के दोनों पट्टा) मैथिली — आ चतुष्पदीमे तँ बुझौवल एकटा स्वगत-कथन बनि जाइत अछि, जतय बुझबाक वस्तु स्वयं बजैत अछि— ठेठी-अंगिका — आरो चतुष्पदी में तें बुझौवल एगो अपने-आप-कहनी (स्वगत-कथन) बनी जाय छै, जहाँ बुझै वाला चीज अपने बोलै छै— मैथिली — जबें हम छेलाँ काँच कुमारी ठेठी-अंगिका — जबें हम छेलाँ काँच कुमारी मैथिली — तब तक सहलाँ मार ठेठी-अंगिका — तब तक सहलाँ मार मैथिली — अब हम पहनला लाल घंघरिया ठेठी-अंगिका — अब हम पहनला लाल घंघरिया मैथिली — अब नै सहबौ मार। (हड़िया) ठेठी-अंगिका — अब नै सहबौ मार। (हड़िया) मैथिली — एतय माटिक हाँड़ी अपन जीवन-वृत्तान्त—काँच कुमारीसँ आगिमे पाकि लाल घघरी पहिरब धरि—प्रथम पुरुषमे कहैत अछि। ई बुझौवलक सभसँ परिष्कृत रूप थिक, जतय प्रहेलिका आत्म-कथा आ रूपकक स्तर धरि उठि जाइत अछि। एहि क्रमसँ लेखक (चाहे अनकहने) ई देखा दैत छथि जे अंगिका बुझौवल केवल बुद्धि-विनोद नहि, अपितु उपमा-रूपक-अन्योक्तिक एकटा लघु पाठशाला थिक। ठेठी-अंगिका — एहिजा माटी के हाँड़ी अपन जिनगी के कहानी—काँच कुमारी सें लै कें आगि में पाकी लाल घघरी पहिरै तक—अपने मुँह सें कहै छै। ई बुझौवल के सबसें सुथरा रूप छै, जहाँ पहेली आत्म-कथा आरो रूपक के दरजा तक चढ़ी जाय छै। ई तरहें लेखक (चाहे बिन कहनहिं) ई देखाय दै छै कि अंगिका बुझौवल खाली बुद्धि-विनोद नै, बल्कि उपमा-रूपक-अन्योक्ति के एगो नान्हकी पाठसाला छै। मैथिली — लेखकक सभसँ तीक्ष्ण समीक्षकीय हस्तक्षेप ओतय अछि जतय ओ “पंडित द्वारा पंडित केँ बुद्धिमे पछाड़बा” लेल गढ़ल जटिल बुझौवल केँ बाल-साहित्यक सीमासँ बाहर घोषित करैत छथि। ई निर्णय एकटा कसौटी दैत अछि—बुझौवलक प्रामाणिकता ओकर रूपमे नहि, बाल-बोधक अनुकूलतामे अछि। अर्थात् लेखक बुझौवल केँ लोकसंग्रहक दृष्टिसँ नहि, बाल-मनोविज्ञानक दृष्टिसँ पढ़ैत छथि—इएह हुनकर पद्धतिगत विशिष्टता थिक। ज्ञानशास्त्रीय दृष्टिएँ देखी तँ बुझौवल एकटा लघु प्रमाण-क्रीड़ा थिक: प्रमेय (उत्तर) केँ सादृश्यक ओहार-तर नुकाकए बालक केँ व्याप्ति-ग्रहणक अभ्यास करबैत अछि। मुदा एतहि पोथीक सीमा सेहो प्रकट होइत अछि—लेखक बुझौवल केँ वर्गीकृत करैत छथि, मुदा ओकर आन्तरिक संरचना (ओहार-आ-उत्तरक व्याकरण), ओकर कहन-प्रसंग आ मैथिली-बज्जिका बुझौवलक संग ओकर तुलनात्मक स्थिति—ई सभ अछूता रहि जाइत अछि। वर्गीकरण भेल, मुदा बुझौवलक काव्यशास्त्र लिखबाक प्रतीक्षा एखनहुँ अछि। ठेठी-अंगिका — लेखक के सबसें तेज समीक्षकीय दखल वहाँ छै जहाँ ऊ “पंडित के हाथें पंडित के बुद्धि में पछाड़ै” लेली गढ़लों जटिल बुझौवल के बाल-साहित्य के सीमा सें बाहर के चीज कही दै छै। ई फैसला एगो कसौटी दै छै—बुझौवल के सच्चाई ओकर रूप में नै, बाल-बोध के अनुकूलता में छै। मतलब, लेखक बुझौवल के लोकसंग्रह के नजर सें नै, बाल-मनोविज्ञान के नजर सें पढ़ै छै—इहे हुनकर पद्धति के खासियत छै। ज्ञान के नजर सें देखी तें बुझौवल एगो नान्हकी परमाण-खेल छै : परमेय (जबाब) के सादृश्य के ओहार-तर छिपा कें बुतरू के व्याप्ति-ग्रहण के अभ्यास कराबै छै। मतरकि एहिजे पोथी के सीमा भी खुलै छै—लेखक बुझौवल के बाँटै छै, मतरकि ओकर भीतरी बनावट (ओहार-आरो-जबाब के व्याकरण), ओकर कहै के मौका, आरो मैथिली-बज्जिका बुझौवल के संग ओकर तुलना—ई सब अनछुआ रही जाय छै। बँटवारा भेलै, मतरकि बुझौवल के काव्यशास्त्र लिखै के काम अखनी बाँकिये छै। पहेली वा बुझौवल: संज्ञानात्मक विकासक साधन ठेठी-अंगिका: पहेली वा बुझौवल: संज्ञानात्मक विकास के साधन मैथिली — बालक जखन किशोरावस्थाक दिस अग्रसर होइत अछि, तखन ओकर तार्किक क्षमताक विकास लेल लोक-साहित्यमे पहेलीक विशेष स्थान रहल अछि। बाल-साहित्यमे पहेली बौद्धिक व्यायाम अछि। डॉ. अमरेन्द्र अंगिका पहेलीकेँ एकपदी, द्विपदी, त्रिपदी आ चतुष्पदी रूपमे वर्गीकृत केने छथि। चन्द्रप्रकाश जगप्रिय द्वारा सम्पादित 'अंगिका लोकोक्ति, फेकड़ा आरो बुझौवल' सँ लेखक बहुत रास पहेलीक सन्दर्भ देने छथि। ठेठी-अंगिका — बालक जबें किशोरावस्था के दिस अग्रसर होय छै, तबें ओकर तार्किक क्षमता के विकास लेली लोक-साहित्य में पहेली के विशेष स्थान रहल छै। बाल-साहित्य में पहेली बौद्धिक व्यायाम छै। डॉ. अमरेन्द्र अंगिका पहेलीकेँ एकपदी, द्विपदी, त्रिपदी आरो चतुष्पदी रूप में वर्गीकृत केने छै। चन्द्रप्रकाश जगप्रिय द्वारा सम्पादित 'अंगिका लोकोक्ति, फेकड़ा आरो बुझौवल' सें लेखक बहुत रास पहेली के सन्दर्भ देने छै। पहेली-वर्गीकरण आ उद्धरण ठेठी-अंगिका: पहेली-वर्गीकरण आरो उद्धरण पहेलीक प्रकार · अंगिका पहेली (विशुद्ध उद्धरण) · मैथिली अर्थ (समाधान) ठेठी-अंगिका: पहेली के प्रकार · अंगिका पहेली (मूल उद्धरण) · मैथिली अर्थ (समाधान) मैथिली — एकपदी — मूल अंगिका पहेली: फरै नै फूलै, ढकमोरै गाछ। — मैथिली अर्थ/समाधान: पानक पत्ता ठेठी-अंगिका — एकपदी — मूल अंगिका पहेली: फरै नै फूलै, ढकमोरै गाछ। — मैथिली अर्थ/समाधान: पानक पत्ता मैथिली — एकपदी — मूल अंगिका पहेली: जड़ नै पत्ता, की छेकौ? — मैथिली अर्थ/समाधान: अमरबेल (अमरलत्ता) ठेठी-अंगिका — एकपदी — मूल अंगिका पहेली: जड़ नै पत्ता, की छेकौ? — मैथिली अर्थ/समाधान: अमरबेल (अमरलत्ता) मैथिली — द्विपदी — मूल अंगिका पहेली: सुइया एन्हों सोज्झो / डाँड़ा पर बोज्झो। — मैथिली अर्थ/समाधान: मकईक गाछ ठेठी-अंगिका — द्विपदी — मूल अंगिका पहेली: सुइया एन्हों सोज्झो / डाँड़ा पर बोज्झो। — मैथिली अर्थ/समाधान: मकईक गाछ मैथिली — त्रिपदी — मूल अंगिका पहेली: एक सँ दू साथी रहै / एक चललै, एक सूती रहलै / तैयो ओकरो साथ नै छुटलै। — मैथिली अर्थ/समाधान: जाँतक दुनू पट्टा (चक्की) ठेठी-अंगिका — त्रिपदी — मूल अंगिका पहेली: एक सें दू साथी रहै / एक चललै, एक सूती रहलै / तैयो ओकरो साथ नै छुटलै। — मैथिली अर्थ/समाधान: जाँतक दूनो पट्टा (चक्की) मैथिली — चतुष्पदी — मूल अंगिका पहेली: जबे हम छेलौं काँच कुआरी / तब तक सहलौं मार / अब हम पहनला लाल घंघरिया / अब नै सहबौ मार। — मैथिली अर्थ/समाधान: मरिच (मिरचाय) ठेठी-अंगिका — चतुष्पदी — मूल अंगिका पहेली: जबे हम छेलौं काँच कुआरी / तब तक सहलौं मार / अब हम पहनला लाल घंघरिया / अब नै सहबौ मार। — मैथिली अर्थ/समाधान: मरिच (मिरचाय) मैथिली — एहि पहेली सभक समीक्षा सँ ई स्पष्ट होइत अछि जे एहिमे रूपक आ उपमाक प्रयोग बड्ड सहजता सँ कएल गेल अछि। 'काँच कुआरी' आ 'लाल घंघरिया' सन मानवीकरण (Personification) मरिचकेँ बाल-कौतूहलक केन्द्र बना दैत अछि। ई बाल-साहित्यक उत्कृष्ट उदाहरण अछि जतय प्रकृति आ मानव-जीवनक बीच तादात्म्य स्थापित कएल गेल अछि। 'सुइया एन्हों सोज्झो' मे दृष्टान्त अलङ्कारक छटा बाल-मनकेँ आकर्षित करैत अछि। ठेठी-अंगिका — ई पहेली सिनी के समीक्षा सें ई साफ होय छै जे ई में रूपक आरो उपमा के प्रयोग बहुत सहजता सें करलों गेलों छै। 'काँच कुआरी' आरो 'लाल घंघरिया' जइसन मानवीकरण (Personification) मरिचकेँ बाल-कौतूहल के केन्द्र बना दै छै। ई बाल-साहित्य के उत्कृष्ट उदाहरण छै जहाँ प्रकृति आरो मानव-जीवन के बीच तादात्म्य स्थापित करलों गेलों छै। 'सुइया एन्हों सोज्झो' में दृष्टान्त अलङ्कारक छटा बाल-मनकेँ आकर्षित करै छै। तुक्तक आ शिशु-काव्य (Nonsense Rhymes) ठेठी-अंगिका: तुक्तक आरो शिशु-काव्य (Nonsense Rhymes) मैथिली — शिशु-काव्यक एकटा पैघ हिस्सा ध्वन्यात्मक वा 'तुक्तक' होइत अछि। एहिमे अर्थसँ अधिक ध्वनिक लय पर जेर देल जाइत अछि। अङ्ग्रेजी साहित्यमे जकरा 'Nonsense Rhymes' कहल जाइत अछि, अंगिका बाल-साहित्यमे ओकरो पर्याप्त भण्डार अछि। पोथीमे लेखक विशुद्ध तुक्तक आ अर्द्ध-तुक्तकक भेदन केने छथि। विशुद्ध तुक्तकक एकटा उत्कृष्ट उदाहरण: ठेठी-अंगिका — शिशु-काव्य के एगो बड़का हिस्सा ध्वन्यात्मक वा 'तुक्तक' होय छै। ई में अर्थ सें अधिक ध्वनि के लय पर जेर देलों जाय छै। अङ्ग्रेजी साहित्य में जेकरा 'Nonsense Rhymes' कहल जाय छै, अंगिका बाल-साहित्य में ओकरो पर्याप्त भण्डार छै। पोथी में लेखक विशुद्ध तुक्तक आरो अर्द्ध-तुक्तक के भेदन केने छै। विशुद्ध तुक्तक के एगो उत्कृष्ट उदाहरण: मैथिली — ओ रे रे नुनु ओर बटना माय-बाप गेलौ छौ चिचोर कटना बाप जिमिदरवा छोड़बा पर माय जिमिदरनी डोलबा पर पैला में चूड़ा मचक मारै छै । सीका पर दही हिलोड़ पारै छै । ठेठी-अंगिका — ओ रे रे नुनु ओर बटना माय-बाप गेलौ छौ चिचोर कटना बाप जिमिदरवा छोड़बा पर माय जिमिदरनी डोलबा पर पैला में चूड़ा मचक मारै छै । सीका पर दही हिलोड़ पारै छै । मैथिली — उक्त पंक्तियक विश्लेषण करैत डॉ. अमरेन्द्र लिखैत छथि जे 'ओर बटना', 'चिचोर कटना' सन पद-समूहक कोनो अर्थ-सङ्गति नहि अछि, मुदा ई बालक-मनकेँ गुदगुदाबए लेल पूर्णतः सक्षम अछि। अर्द्ध-तुक्तक ओ होइत अछि जाहिमे किछु दूर धरि अर्थ-सङ्गति भेटैत अछि आ फेर अकारण निरर्थक पद आबि जाइत अछि। एकर सेहो एकटा गजबक उदाहरण पोथीमे उपलब्ध अछि: ठेठी-अंगिका — ई पंक्ति के विश्लेषण करै डॉ. अमरेन्द्र लिखै छै जे 'ओर बटना', 'चिचोर कटना' जइसन पद-समूह के कोनो अर्थ-सङ्गति नै छै, मतरकि ई बालक-मनकेँ गुदगुदाबए लेली पूरा तरह सें सक्षम छै। अर्द्ध-तुक्तक ऊ होय छै जेकरा में कुछु दूर तक अर्थ-सङ्गति मिलै छै आरो फेर अकारण निरर्थक पद आबि जाय छै। एकर भी एगो गजबक उदाहरण पोथी में उपलब्ध छै: मैथिली — एक मटर पैलै छी, एड़िया तर नूकैलै छी सातो गोतनी पीसै छै; एक गोतनी रूसली केकरा ले ? बुढ़बा ले। बुढ़बा गेलौ छै बारी; कौआ नोचै छै दाढ़ी ठेठी-अंगिका — एक मटर पैलै छी, एड़िया तर नूकैलै छी सातो गोतनी पीसै छै; एक गोतनी रूसली केकरा ले ? बुढ़बा ले। बुढ़बा गेलौ छै बारी; कौआ नोचै छै दाढ़ी मैथिली — एहिठाम 'बुढ़बा गेलौ छै बारी' आ 'कौआ नोचै छै दाढ़ी' मे जे हास्य (Humour) उत्पन्न कएल गेल अछि, ओ बच्चाक फंतासी संसारक एकदम समीप अछि। बाल-संवेदना एहि प्रकारक तुक्तक सँ सर्वाधिक प्रफुल्लित होइत अछि। ठेठी-अंगिका — एतै 'बुढ़बा गेलौ छै बारी' आरो 'कौआ नोचै छै दाढ़ी' में जे हास्य (Humour) उत्पन्न करलों गेलों छै, ऊ बच्चा के फंतासी संसार के एकदम समीप छै। बाल-संवेदना ई प्रकारक तुक्तक सें सभसें बेसी प्रफुल्लित होय छै। 7. खेलगीत: पाठ, देह आ समुदाय ठेठी-अंगिका: 7. खेलगीत: पाठ, देह आरो समुदाय मैथिली — खेलगीत सम्बन्धी पृष्ठसभ पोथीक सर्वाधिक जीवित अंशसभमे अछि। बच्चा खेलैत-खेलैत गाबैत अछि; गीत खेलक बाहरी सजावट नहि, खेलक क्रियाक अंग अछि। ऐच्छिक खेल, प्रतिस्पर्धात्मक खेल, बौद्धिक खेल आदि रूपसभक चर्चा देखबैत अछि जे बाल-साहित्यक पाठकीयता चुपचाप पढ़नाइ मात्र नहि। बच्चा बोलैत, दौड़ैत, गिनैत, चुनैत, हारैत-जितैत, हँसैत आ सामूहिक नियम बनबैत साहित्यकेँ जीवित करैत अछि। ठेठी-अंगिका — खेलगीत सम्बन्धी पृष्ठ सिनी पोथी के सर्वाधिक जीवित अंश सिनी में छै। बच्चा खेलै-खेलै गावै छै; गीत खेल के बाहरी सजावट नै, खेल के क्रिया के अंग छै। ऐच्छिक खेल, प्रतिस्पर्धात्मक खेल, बौद्धिक खेल आदि रूप सिनी के चर्चा देखावै छै जे बाल-साहित्य के पाठकीयता चुपचाप पढ़नाइ मात्र नै। बच्चा बोलै, दौड़ै, गिनै, चुनै, हारै-जीतै, हँसै आरो सामूहिक नियम बनावै साहित्य कें जीवित करै छै। मैथिली — एहि ठाम पोथी performance सम्बन्धी एक उपयोगी प्रश्न खोलैत अछि: साहित्य कहाँ समाप्त होइत अछि आ खेल कहाँ आरम्भ? खेलगीतमे शब्द, देह-चाल, समूह-संरचना, ताल, स्थान आ परिस्थिति अलग नहि कएल जा सकैत। शब्दमात्र लिखि लेब एक पाठ बचबैत अछि, पूरा प्रस्तुति नहि। एहि कारण पोथीक दस्तावेजीकरण अमूल्य होइतहुँ अपूर्ण अछि—आ ई अपूर्णता लेखकक व्यक्तिगत कमी नहि, लिखित माध्यमक सीमा अछि। ठेठी-अंगिका — ई जगह पोथी performance सम्बन्धी एक उपयोगी प्रश्न खोलै छै: साहित्य कहाँ समाप्त होय छै आरो खेल कहाँ आरम्भ? खेलगीत में शब्द, देह-चाल, समूह-संरचना, ताल, स्थान आरो परिस्थिति अलग नै करलों जाय सकै। शब्दमात्र लिख कें लेब एक पाठ बचावै छै, पूरा प्रस्तुति नै। ई कारण पोथी के दस्तावेजीकरण अमूल्य होतो भी अपूर्ण छै—आरो ई अपूर्णता लेखक के व्यक्तिगत कमी नै, लिखित माध्यम के सीमा छै। मैथिली — खेलगीत सामाजिक सीखक माध्यम सेहो अछि। संख्या, क्रम, चुनाउ, नियम, बारी, प्रतियोगिता, सहयोग, परिहास, भूमिका-विनिमय—ई सभ बिना औपचारिक पाठशालाक बच्चा सीखैत अछि। भविष्यक शोधमे लिंग-आधारित खेल, उमेर-वर्ग, ग्राम-नगर भेद, मौसम, विद्यालय आ आँगनक अन्तरक अध्ययन कएल जाए तँ अंगिका बाल-संस्कृतिक अधिक सूक्ष्म नक्शा बनि सकैत अछि। लोकसाहित्यक दस्तावेजीकरणक महत्त्व खेलगीतक सन्दर्भमे आरो स्पष्ट होइत अछि: लेखक सामग्री बचौने छथि; अगिला पीढ़ीक शोधक काज ओकर धुन, देह, स्थान आ सामाजिक परिस्थिति बचेनाइ अछि। ठेठी-अंगिका — खेलगीत सामाजिक सीख के माध्यम भी छै। संख्या, क्रम, चुनाउ, नियम, बारी, प्रतियोगिता, सहयोग, परिहास, भूमिका-विनिमय—ई सिनी बिना औपचारिक पाठशाला के बच्चा सीखै छै। आगू के शोध में लिंग-आधारित खेल, उमेर-वर्ग, ग्राम-नगर भेद, मौसम, विद्यालय आरो आँगन के अन्तर के अध्ययन करलों जाए तें अंगिका बाल-संस्कृति के अधिक सूक्ष्म नक्शा बनी सकै छै। लोकसाहित्य के दस्तावेजीकरण के महत्त्व खेलगीत के सन्दर्भ में आरो साफ होय छै: लेखक सामग्री बचाय कें रखलों छै; आगू के पीढ़ी के शोध के काज ओकर धुन, देह, स्थान आरो सामाजिक परिस्थिति बचाय कें रखब छै। खेलगीत: शारीरिक, मानसिक आ सामाजिक विकासक माध्यम ठेठी-अंगिका: खेलगीत: शारीरिक, मानसिक आरो सामाजिक विकास के माध्यम मैथिली — मनोवैज्ञानिक कार्ल ग्रूस (Karl Groos) केँ उद्धृत करैत लेखक अंगिका बाल-खेलगीतकेँ विभिन्न श्रेणीमे बाँटने छथि: गतिशील खेलक गीत, बैसि कऽ खेलबाक गीत, उछल-कूदक गीत, आ बौद्धिक खेलगीत। ठेठी-अंगिका — मनोवैज्ञानिक कार्ल ग्रूस (Karl Groos) कें उद्धृत करै लेखक अंगिका बाल-खेलगीतकेँ विभिन्न श्रेणी में बाँटने छै: गतिशील खेल के गीत, बैसि कऽ खेलै के गीत, उछल-कूद के गीत, आरो बौद्धिक खेलगीत। मैथिली — गतिशील खेलक गीतक एकटा उदाहरण जतय बच्चा एक-दोसराकेँ गुदगुदी लगबैत अछि: ठेठी-अंगिका — गतिशील खेल के गीत के एगो उदाहरण जहाँ बच्चा एक-दोसराकेँ गुदगुदी लगबैत छै: मैथिली — अठ्ठा-पठ्ठा नुनु के सात बेटा राजा, पाता, सीत, वसन्त, कुतवा अरगड़ मारौं, बड़गड़ मारौं पानी पीएं पोखरिऐ जाऊँ नुनुवाँ कहै कांखी तर जाऊँ । ठेठी-अंगिका — अठ्ठा-पठ्ठा नुनु के सात बेटा राजा, पाता, सीत, वसन्त, कुतवा अरगड़ मारौं, बड़गड़ मारौं पानी पीएं पोखरिऐ जाऊँ नुनुवाँ कहै कांखी तर जाऊँ । मैथिली — खेलक समय जे प्रतिस्पर्धा आ सामूहिक सहभागिताक भावना बच्चा सभमे पनपैत अछि, ई गीत ओकर साक्षात् प्रमाण अछि। अंगिकाक 'कवड्डी' खेलक गीतमे सेहो ई प्रतिस्पर्धाक भाव भेटैत अछि: ठेठी-अंगिका — खेल के समय जे प्रतिस्पर्धा आरो सामूहिक सहभागिता के भावना बच्चा सभमे पनपैत छै, ई गीत ओकर साक्षात् प्रमाण छै। अंगिका के 'कवड्डी' खेल के गीत में भी ई प्रतिस्पर्धाक भाव मिलै छै: मैथिली — दुश्मन गोड़ा हो तैयार सरपट दौड़बौ तारो पार ठेठी-अंगिका — दुश्मन गोड़ा हो तैयार सरपट दौड़बौ तारो पार मैथिली — एहि प्रकारक गीत बालकमे सामाजिकता, समूहमे रहबाक प्रवृत्ति, आ हार-जीतकेँ सहजता सँ स्वीकार करबाक मनोविज्ञानक विकास करैत अछि। ठेठी-अंगिका — ई प्रकारक गीत बालक में सामाजिकता, समूह में रहै के प्रवृत्ति, आरो हार-जीतकेँ सहजता सें स्वीकार करै के मनोविज्ञान के विकास करै छै। 8. बाल-लोककथा: मौखिक रूपान्तरण, कथा-आनन्द आ नीति ठेठी-अंगिका: 8. बाल-लोककथा: मौखिक रूपान्तरण, कथा-आनन्द आरो नीति मैथिली — पृष्ठ 25 सँ आरम्भ बाल-लोककथा-विवेचन ग्रन्थक कथात्मक आधार खोलैत अछि। लेखक मौखिक लोककथाक परिवर्तनशीलता स्वीकार करैत छथि: कण्ठसँ कण्ठ, पीढ़ीसँ पीढ़ी, स्थानसँ स्थान कथा रूप बदलि सकैत अछि। पशु-पक्षी, राजकुमार-राजकुमारी, चतुराई, भय, चमत्कार, नीति आ हास्य बालकथाक पारम्परिक सामग्रीक रूपमे उपस्थित अछि। ठेठी-अंगिका — पृष्ठ 25 सें आरम्भ बाल-लोककथा-विवेचन ग्रन्थ के कथात्मक आधार खोलै छै। लेखक मौखिक लोककथा के परिवर्तनशीलता स्वीकार करै छै: कण्ठ सें कण्ठ, पीढ़ी सें पीढ़ी, स्थान सें स्थान कथा रूप बदलि सकै छै। पशु-पक्षी, राजकुमार-राजकुमारी, चतुराई, भय, चमत्कार, नीति आरो हास्य बालकथा के पारम्परिक सामग्री के रूप में उपस्थित छै। मैथिली — एहि अंशक महत्त्व ई जे बाल-साहित्यक लेखक अवधारणा लोकपरम्परामे बदलि जाइत अछि। लिखित आधुनिक कहानीमे लेखकत्व स्पष्ट रहैत अछि; लोककथामे सामूहिक पुनर्कथन स्वयं सृजन अछि। अतः ‘मूल पाठ’ खोजबाक अपेक्षा variant, प्रसंग आ कथावाचकक भूमिका महत्त्वपूर्ण बनैत अछि। पोथी एहि दिशामे पर्याप्त सामग्री दैत अछि, यद्यपि कथानक-प्रकार, motif, कथा-संरचना, पात्र-रूपान्तरण वा कथावाचकीय शैलीक व्यवस्थित विश्लेषण नहि करैत। ठेठी-अंगिका — ई अंश के महत्त्व ई जे बाल-साहित्य के लेखक अवधारणा लोकपरम्परा में बदलि जाय छै। लिखित आधुनिक कहानी में लेखकत्व स्पष्ट रहै छै; लोककथा में सामूहिक पुनर्कथन अपने सृजन छै। अतः ‘मूल पाठ’ खोजै के अपेक्षा variant, प्रसंग आरो कथावाचक के भूमिका महत्त्वपूर्ण बनै छै। पोथी ई दिशा में पर्याप्त सामग्री दै छै, यद्यपि कथानक-प्रकार, motif, कथा-संरचना, पात्र-रूपान्तरण वा कथावाचकीय शैली के व्यवस्थित विश्लेषण नै करै। मैथिली — नीति/शिक्षाक प्रश्न एतय फेर अबैत अछि। लोककथा व्यवहारिक बुद्धि, सावधानी, सदाचार वा परिणामक संकेत दऽ सकैत अछि, मुदा ओकर लोकप्रियता केवल उपदेशक कारण नहि। तनाव, पुनरावृत्ति, बुद्धि-विनोद, असम्भव घटना, चमत्कार, छल, उलटफेर आ कथाक सामूहिक प्रदर्शन आनन्द पैदा करैत अछि। लेखकक आरम्भिक बाल-मन सिद्धान्त लागू कएल जाए तँ उत्तम लोककथा ओ अछि जाहिमे शिक्षा कथाक रसक भीतर समाहित हो। वर्तमान पोथी मूल रूपेँ corpus-builder अछि—ओ कथा-संसारक अस्तित्व, प्रकार आ स्रोत बचबैत अछि; विस्तृत कथावैज्ञानिक आलोचना अगिला शोधक काज अछि। ठेठी-अंगिका — नीति/शिक्षा के प्रश्न एतै फेनू आवै छै। लोककथा व्यवहारिक बुद्धि, सावधानी, सदाचार वा परिणाम के संकेत दै कें सकै छै, मतरकि ओकर लोकप्रियता केवल उपदेश के कारण नै। तनाव, पुनरावृत्ति, बुद्धि-विनोद, असम्भव घटना, चमत्कार, छेलै, उलटफेर आरो कथा के सामूहिक प्रदर्शन आनन्द पैदा करै छै। लेखक के आरम्भिक बाल-मन सिद्धान्त लागू करलों जाए तें उत्तम लोककथा ओ छै जेकरा में शिक्षा कथा के रस के भीतर समाहित हो। वर्तमान पोथी मूल रूपेँ corpus-builder छै—ओ कथा-संसार के अस्तित्व, प्रकार आरो स्रोत बचावै छै; विस्तृत कथावैज्ञानिक आलोचना आगू के शोध के काज छै। बाल-लोककथा: यथार्थ आ कल्पनाक मिश्रण ठेठी-अंगिका: बाल-लोककथा: यथार्थ आरो कल्पनाक मिश्रण मैथिली — बाल-लोककथा बिना कोनो बाल-साहित्यक समीक्षा अधूरी रहत। डॉ. अमरेन्द्र ई स्थापित करैत छथि जे लोककथा वस्तुतः बाल-साहित्य हे अछि, किएक तँ एहिमे जे कौशल आ फंतासी (Fantasy) अछि, ओ बच्चाक मनोविज्ञानकेँ सन्तुष्ट करैत अछि। पोथीमे अंग प्रदेशक ऐतिहासिकता पर गम्भीर विमर्श कएल गेल अछि। आचार्य चतुरसेन आ रामधारी सिंह दिनकरक सन्दर्भ दैत लेखक बतबैत छथि जे प्राचीन कालमे अंग प्रदेशक निवासी 'चम्पा' (भागलपुर) सँ हिन्द-चीन (वियतनाम, कम्बोडिया) धरि अपन उपनिवेश स्थापित केने छलाह, जकर कारणेँ अंगिका लोककथाक प्रभाव दक्षिण-पूर्व एशियाक साहित्यमे सेहो भेटैत अछि। फाहियान आ विक्रमशिला विश्वविद्यालयक सन्दर्भ एहि ऐतिहासिकताकेँ प्रमाणित करैत अछि। ठेठी-अंगिका — बाल-लोककथा बिना कोनो बाल-साहित्य के समीक्षा अधूरी रहत। डॉ. अमरेन्द्र ई स्थापित करै छै जे लोककथा असल में बाल-साहित्य हे छै, काहेकि तें ई में जे कौशल आरो फंतासी (Fantasy) छै, ऊ बच्चा के मनोविज्ञान केेँ सन्तुष्ट करै छै। पोथी में अंग प्रदेश के ऐतिहासिकता पर गम्भीर विमर्श करलों गेलों छै। आचार्य चतुरसेन आरो रामधारी सिंह दिनकरक सन्दर्भ दै लेखक बतावै छै जे प्राचीन काल में अंग प्रदेश के निवासी 'चम्पा' (भागलपुर) सें हिन्द-चीन (वियतनाम, कम्बोडिया) तक अपन उपनिवेश स्थापित केने छेलै, जकर कारणेँ अंगिका लोककथा के प्रभाव दक्षिण-पूर्व एशियाक साहित्य में भी मिलै छै। फाहियान आरो विक्रमशिला विश्वविद्यालयक सन्दर्भ ई ऐतिहासिकताकेँ प्रमाणित करै छै। मैथिली — मीना तिवारी द्वारा सम्पादित 'चलौ खिस्सा के गाँव' आ वाञ्छा भट्ट अंजनक 'फुलझामर' सन लोककथा सङ्ग्रहक पोथीमे चर्चा अछि। एकटा प्रसिद्ध अंगिका बाल-लोककथा 'टेंगटा' क पूर्ण उद्धरण पोथीमे देल गेल अछि: ठेठी-अंगिका — मीना तिवारी द्वारा सम्पादित 'चलौ खिस्सा के गाँव' आरो वाञ्छा भट्ट अंजनक 'फुलझामर' जइसन लोककथा सङ्ग्रह के पोथी में चर्चा छै। एगो प्रसिद्ध अंगिका बाल-लोककथा 'टेंगटा' के पूर्ण उद्धरण पोथी में देलों गेलों छै: मैथिली — एकटा किसान छेलै, वें एक दिन हटिया सँ मछली किनी के आनलगै। किसैनी मछली रांन्है ले बैठली। जहीना मछलीवाला पोटली खोललकी कि एकटा टेंगटा वैमे सँ निकली के कोठी तरो मे नुकाय गेलै ।... "माय! माय आजू सँ तों हमरी माय, हम्में तोरो बेटा। दे, हम्में कलौवो लेके बाबू लग जैबै।" ठेठी-अंगिका — एकटा किसान छेलै, वें एक दिन हटिया सँ मछली किनी के आनलगै। किसैनी मछली रांन्है ले बैठली। जहीना मछलीवाला पोटली खोललकी कि एकटा टेंगटा वैमे सँ निकली के कोठी तरो मे नुकाय गेलै ।... "माय! माय आजू सँ तों हमरी माय, हम्में तोरो बेटा। दे, हम्में कलौवो लेके बाबू लग जैबै।" मैथिली — 'टेंगटा' कथाक समीक्षा: ई कथा एकटा टेंगटा (माछक एकटा प्रजाति) आ किसानक बीचक सम्बन्धकेँ देखबैत अछि। बच्चा सभकेँ पशुपक्षी आ जलीय जीव-जन्तुसँ गप करबाक जे फैंटेसी होइत अछि, ओ एहि कथाक प्राण अछि। टेंगटा जखन एकटा बालकक रूप लऽ कऽ किसानक काज करैत अछि, अपन तीक्ष्ण बुद्धिसँ (चूहा, बाघ, आ आगिक मददि सँ) राजाकेँ सबक सिखबैत अछि, आ अन्ततः किसानकेँ सुखी करैत अछि। ई कथा बाल-मनकेँ ई सन्देश दैत अछि जे छोट सँ छोट जीवमे सेहो अदम्य साहस आ सामर्थ्य भऽ सकैत अछि। नीतिक ई सन्देश बिना कोनो उपदेशात्मक बोझक बच्चाकेँ देल गेल अछि। ठेठी-अंगिका — 'टेंगटा' कथा के समीक्षा: ई कथा एगो टेंगटा (माछक एगो प्रजाति) आरो किसानक बीचक सम्बन्धकेँ देखावै छै। बच्चा सभकेँ पशुपक्षी आरो जलीय जीव-जन्तु सें गप करै के जे फैंटेसी होय छै, ऊ ई कथा के प्राण छै। टेंगटा जबें एगो बालक के रूप लऽ कऽ किसानक काज करै छै, अपन तीक्ष्ण बुद्धि सें (चूहा, बाघ, आरो आगि के मददि सँ) राजाकेँ सबक सिखावै छै, आरो अन्ततः किसानकेँ सुखी करै छै। ई कथा बाल-मनकेँ ई सन्देश दै छै जे छोट सें छोट जीव में भी अदम्य साहस आरो सामर्थ्य होय कें सकै छै। नीति के ई सन्देश बिना कोनो उपदेशात्मक बोझक बच्चा केेँ देलों गेलों छै। 9. अनुवाद: बाल-साहित्यक विस्तार आ भाषा-निर्माण ठेठी-अंगिका: 9. अनुवाद: बाल-साहित्य के विस्तार आरो भाषा-निर्माण मैथिली — आधुनिक अंगिका बाल-साहित्यक इतिहासमे अनुवादकेँ पोथी उल्लेखनीय स्थान दैत अछि। पृष्ठ 44 सँ लेखक अन्य भाषाक बालोपयोगी कथा, संस्कृतक कथा-परम्परा, जातक-कथा, बाइबिल-सम्बद्ध कथा आदि रूपान्तरणक चर्चा करैत छथि। ई सामग्री एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक तर्क सामने अनैत अछि: आधुनिक लिखित बाल-गद्यक आरम्भ केवल मौलिक रचनासँ नहि, अनुवाद आ पुनर्कथनसँ सेहो होइत अछि। ठेठी-अंगिका — आधुनिक अंगिका बाल-साहित्य के इतिहास में अनुवाद कें पोथी उल्लेखनीय स्थान दै छै। पृष्ठ 44 सें लेखक अन्य भाषा के बालोपयोगी कथा, संस्कृत के कथा-परम्परा, जातक-कथा, बाइबिल-सम्बद्ध कथा आदि रूपान्तरण के चर्चा करै छै। ई सामग्री एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक तर्क सामने अनै छै: आधुनिक लिखित बाल-गद्य के आरम्भ केवल मौलिक रचना सें नै, अनुवाद आरो पुनर्कथन सें भी होय छै। मैथिली — सीमित संस्थागत संसाधनवला भाषिक साहित्य लेल अनुवाद द्वितीयक कर्म नहि। अनुवाद नब विधा परिचित करबैत अछि, बालक लेल उपलब्ध पाठक संख्या बढ़बैत अछि, लिखित गद्यक शब्दावली विकसित करैत अछि, विश्वकथाकेँ स्थानीय भाषिक अनुभवमे आनैत अछि। एहि अर्थमे पोथीक अनुवाद-अध्याय भाषा-निर्माणक इतिहास सेहो अछि। ठेठी-अंगिका — सीमित संस्थागत संसाधनवला भाषिक साहित्य लेल अनुवाद द्वितीयक कर्म नै। अनुवाद नब विधा परिचित करावै छै, बालक लेल उपलब्ध पाठक संख्या बढ़ावै छै, लिखित गद्य के शब्दावली विकसित करै छै, विश्वकथा कें स्थानीय भाषिक अनुभव में अनै छै। ई अर्थ में पोथी के अनुवाद-अध्याय भाषा-निर्माण के इतिहास भी छै। मैथिली — मुदा ई खण्ड भविष्यक गहन शोधक निमंत्रण दैत अछि। पोथी प्रायः कौन कथा अनूदित भेल, के अनुवाद केलनि, कोन परम्परासँ आयल—एहि स्तर धरि रहैत अछि। स्रोत-पाठ आ अंगिका लक्ष्य-पाठक तुलनात्मक विश्लेषण कम अछि। बालक लेल रूपान्तरणमे कथानक घटाओल-बढ़ाओल गेल कि नहि? कठिन सांस्कृतिक संकेत स्थानीय बनाओल गेल कि नहि? नाम, भोजन, धर्म, हास्य, संवाद, लय आ नैतिक निष्कर्ष कोना बदलल? ई सभ प्रश्न अनुवाद-अध्ययनक अगिला चरण अछि। ठेठी-अंगिका — मतरकि ई खण्ड आगू के गहन शोध के निमंत्रण दै छै। पोथी प्रायः कौन कथा अनूदित होलै, के अनुवाद केलकै, कोन परम्परा सें आयलों—ई स्तर तक रहै छै। स्रोत-पाठ आरो अंगिका लक्ष्य-पाठक तुलनात्मक विश्लेषण कम छै। बालक लेल रूपान्तरण में कथानक घटावलों-बढ़ावलों गेलों कि नै? कठिन सांस्कृतिक संकेत स्थानीय बनावलों गेलों कि नै? नाम, भोजन, धर्म, हास्य, संवाद, लय आरो नैतिक निष्कर्ष केना बदलों? ई सिनी प्रश्न अनुवाद-अध्ययन के आगू के चरण छै। मैथिली — Reynolds मौखिक आ मुद्रित परम्पराक पीढ़ीगत रूपान्तरणक चर्चा करैत छथि। एहि आलोकमे अंगिका बाल-साहित्यक अनुवाद-इतिहासकेँ भाषा-बीच यात्रा मात्र नहि, माध्यम-बीच यात्राक रूपमे सेहो विस्तार देल जा सकैत अछि—कथा सँ चित्र-पोथी, रेडियो, नाटक, ऑडियो वा डिजिटल रूप धरि। मूल पोथी एहि सम्भावनाक ऐतिहासिक आधार देइत अछि। ठेठी-अंगिका — Reynolds मौखिक आरो मुद्रित परम्परा के पीढ़ीगत रूपान्तरण के चर्चा करै छै। ई आलोक में अंगिका बाल-साहित्य के अनुवाद-इतिहास कें भाषा-बीच यात्रा मात्र नै, माध्यम-बीच यात्रा के रूप में भी विस्तार देलों जाय सकै छै—कथा सें चित्र-पोथी, रेडियो, नाटक, ऑडियो वा डिजिटल रूप तक। मूल पोथी ई सम्भावना के ऐतिहासिक आधार दै छै। पाठ-सर्वेक्षण: दोसर अध्याय — आधुनिक परम्परा ठेठी-अंगिका: पाठ-सर्वेक्षण : दोसरका अध्याय — आधुनिक परम्परा मैथिली — दोसर अध्याय ऐतिहासिक गहराइक कारणें मूल्यवान अछि। लेखक अनुवादित बाल-लोककथाक इतिहास ठेठ अठारहम शताब्दीक ईसाई पादरी (फादर अण्टो नियोकूर)क बाइबिल-कथानुवादसँ प्रारम्भ कए, ग्रियर्सनक “लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया” आ डॉ. माहेश्वरी सिंह महेशक ग्रन्थ धरि पहुँचैत छथि; एहि क्रममे “अंगिका कथा-सरोवर” (२००६)क अठारह संस्कृत-मूलक कथा आ श्रीउमेशक योगदानक चर्चा अछि। आधुनिक मौलिक बाल-कवितामे ओ विषयगत वर्गीकरण—यथा गतिशील प्रकृतिक काव्य—लगबैत छथि आ डॉ. मृदुला शुक्ला (सोन चिरैया), सान्त्वना साह, दिनेश बाबा, अनिरुद्ध प्रसाद विमल, चन्द्रप्रकाश जगप्रिय आदि कविक चर्चा करैत छथि। ठेठी-अंगिका — दोसरका अध्याय अपन ऐतिहासिक गहराई के कारणें कीमती छै। लेखक अनुवादित बाल-लोककथा के इतिहास ठेठ अठारहवीं सदी के ईसाई पादरी (फादर अण्टो नियोकूर) के बाइबिल-कथा-अनुवाद सें सुरू करी कें, ग्रियर्सन के “लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया” आरो डॉ. माहेश्वरी सिंह महेश के ग्रन्थ तक पहुँचै छै; एहि क्रम में “अंगिका कथा-सरोवर” (२००६) के अठारह गो संस्कृत-मूल के कथा आरो श्रीउमेश के योगदान के चर्चा छै। आधुनिक मौलिक बाल-कविता में ऊ विषय के आधार पर वर्गीकरण—जइसन गतिशील परकृति के काव्य—लगाबै छै आरो डॉ. मृदुला शुक्ला (सोन चिरैया), सान्त्वना साह, दिनेश बाबा, अनिरुद्ध प्रसाद विमल, चन्द्रप्रकाश जगप्रिय आदि कवि के चर्चा करै छै। अनुवाद-मीमांसा: एक गहन विवेचन ठेठी-अंगिका: अनुवाद-मीमांसा : एगो गहरा विवेचन मैथिली — अनुवाद-प्रसंग एहि पोथीक दोसर मौलिक योगदान थिक, आ एतय एकटा पूरा अनुवाद-इतिहासक रूपरेखा भेटैत अछि। ध्यान देबाक बात ई जे अंगिकाक सभसँ पुरान उपलब्ध “अनुवाद”—ग्रियर्सनक सर्वेमे संकलित उड़ाहा-पुत्रक (Prodigal Son) दृष्टान्त—मूलतः एकटा मिशनरी आ औपनिवेशिक भाषा-नमूना थिक, कोनो देशज साहित्यिक कर्म नहि। एहिसँ एकटा पैघ प्रश्न ठाढ़ होइत अछि: अनुवाद भाषा-प्रलेखन थिक, आकि साहित्य? पोथीक अन्तर्निहित उत्तर स्पष्ट अछि—ओ अंगिका अनुवाद-परम्परा केँ भाषाविदक नमूना-शीशीसँ निकालि, जीवन्त बाल-साहित्यक कोठलीमे राखि दैत अछि। ई स्थानान्तरण सांस्कृतिक दृष्टिएँ महत्त्वपूर्ण थिक। ठेठी-अंगिका — अनुवाद के परसंग ई पोथी के दोसरका मौलिक देन छै, आरो एहिजा एगो पूरा अनुवाद-इतिहास के रूपरेखा मिलै छै। गौर करै के बात ई छै कि अंगिका के सबसें पुरान उपलब्ध “अनुवाद”—ग्रियर्सन के सर्वे में संकलित उड़ाहा-बेटा (Prodigal Son) के दृष्टान्त—मूल रूप सें एगो मिशनरी आरो औपनिवेशिक भाषा-नमूना छै, कोय देसज साहित्यिक काम नै। एहिसें एगो बड़का सवाल ठाढ़ होय छै : अनुवाद भाषा-प्रलेखन छै, आकि साहित्य? पोथी के भीतरी जबाब साफ छै—ऊ अंगिका के अनुवाद-परम्परा के भाषाविद के नमूना-सीसी सें निकाली कें, जीता-जागता बाल-साहित्य के कोठली में राखी दै छै। ई अदला-बदली सांस्कृतिक नजर सें बड़ा जरूरी छै। मैथिली — एहि अध्यायक सभसँ आत्म-प्रकाशक अंश ओ थिक जतय लेखक अपन कएल तीनू उर्दू बाल-उपन्यास-अनुवाद—जंगल रों पहचान, शिकार आरो शिकारी आ फैसल रों जासूसी—पर विचार करैत छथि। एतय ओ अपन अनुवाद-सिद्धान्त केँ अभ्याससँ गढ़ैत छथि। ओ स्रोत-निष्ठ नहि, लक्ष्य-निष्ठ अनुवादक छथि: मूलक क्रूर दृश्य केँ ओ जानि-बूझि कए एहन रूपमे बदलि दैत छथि जाहिसँ बाल-मन भयभीत नहि होअय, आ ‘शिकार आरो शिकारी’मे पर्यावरण-रक्षाक नव भाव धरि जोड़ि दैत छथि; पात्रक नाम धरि बदलि दैत छथि। ई अनुवाद वस्तुतः अनुसृजन (भावानुवाद) थिक, जकर कसौटी समतुल्यता नहि, प्रयोजन (बाल-उपयुक्तता) अछि। बाल-साहित्यक अनुवाद स्वभावतः रूपान्तर बनि जाइत अछि—इएह बात लेखक अपन कर्मसँ सिद्ध करैत छथि। ठेठी-अंगिका — एहि अध्याय के सबसें अपने-के-खोलै वाला हिस्सा ऊ छै जहाँ लेखक अपन कैलों तीनू उर्दू बाल-उपन्यास-अनुवाद—जंगल रों पहचान, शिकार आरो शिकारी आरो फैसल रों जासूसी—पर विचार करै छै। एहिजा ऊ अपन अनुवाद-सिद्धान्त के अभ्यास सें गढ़ै छै। ऊ स्रोत-निष्ठ नै, लक्ष्य-निष्ठ अनुवादक छै : मूल के करूर दृश्य के ऊ जानी-बूझी कें एहन रूप में बदली दै छै जेकरा सें बाल-मन डेराय नै, आरो ‘शिकार आरो शिकारी’ में पर्यावरण-रक्षा के नया भाव तक जोड़ी दै छै; पात्र के नाम तक बदली दै छै। ई अनुवाद असल में अनुसृजन (भावानुवाद) छै, जेकर कसौटी बरोबरी नै, परयोजन (बाल-उपयुक्तता) छै। बाल-साहित्य के अनुवाद अपने-आप रूपान्तर बनी जाय छै—इहे बात लेखक अपन काम सें साबित करी दै छै। मैथिली — एहि प्रसंगमे लेखकक सभसँ पैघ मीमांसा-दृष्टि ओतय अछि जतय ओ लक्ष्य करैत छथि जे “अंगिका कथा-सरोवर”क किछु कथा (चाणक्य आरो नंदवंश, पंडितराज जगन्नाथ आदि)मे मूल संस्कृत श्लोक केँ कथाक बीच राखि देबासँ जनसामान्यक कथारस टूटि जाइत अछि। ई अत्यन्त सूक्ष्म निरीक्षण थिक—अनुवादक केँ शास्त्रीय प्रामाणिकता (श्लोक बचाकए राखब) आ रसात्मक सम्प्रेषण (प्रवाह) दुनूमे सँ एकटा चुनए पड़ैत अछि; आ बाल तथा जनसामान्य पाठक लेल रसक पक्ष भारी पड़ैत अछि। लेखक स्पष्टतः रस-सम्प्रेषणक पक्षमे ठाढ़ छथि। तथापि, समीक्षकीय सन्तुलनक तकाजा अछि जे किछु सीमा सेहो कहल जाय। एक तँ, अनुवादक स्वयं समीक्षक होएबाक कारणें ई मीमांसा कतहु-कतहु रचना-प्रक्रियाक आत्म-भाष्य बनि जाइत अछि, तटस्थ अनुवाद-आलोचना नहि। दोसर, पोथी अनुकूलनक लाभ (बाल-रक्षा) तँ गनबैत अछि, मुदा ओकर मूल्य (क्षति) नहि तौलैत अछि—जातक-कथाक नैतिक कठोरता आकि लोककथाक ओ भय, जे शिक्षणक दृष्टिएँ सार्थक होइत अछि, अनुकूलनमे कतेक हेरा जाइत अछि, ताहि पर विचार नहि भेल। पूर्ण अनुवाद-मीमांसा अनुकूलनक लाभ आ हानि—दुनू केँ तराजू पर चढ़बितए। ठेठी-अंगिका — एहि परसंग में लेखक के सबसें बड़का मीमांसा-नजर ऊ छै जहाँ ऊ लख करै छै कि “अंगिका कथा-सरोवर” के कुछ कथा (चाणक्य आरो नंदवंश, पंडितराज जगन्नाथ आदि) में मूल संस्कृत श्लोक के कथा के बीच में राखी देला सें जनसामान्य के कथारस टूटी जाय छै। ई बड़ा बारीक निरीक्षण छै—अनुवादक के शास्त्रीय परमाणिकता (श्लोक बचा कें राखब) आरो रसात्मक सम्प्रेषण (बहाव) दुन्नु में सें एक के चुनै पड़ै छै; आरो बाल आरो जनसामान्य पाठक लेली रस के पलड़ा भारी पड़ै छै। लेखक साफ तौर पर रस-सम्प्रेषण के पक्ष में ठाढ़ छै। तइयो, समीक्षा के संतुलन के तकाजा छै कि कुछ सीमा भी कहलों जाय। एक तें, अनुवादक अपने समीक्षक होय के कारणें ई मीमांसा कहीं-कहीं रचना-परक्रिया के अपने-भाष्य बनी जाय छै, तटस्थ अनुवाद-आलोचना नै। दोसर, पोथी अनुकूलन के फायदा (बाल-रक्षा) तें गिनाबै छै, मतरकि ओकर दाम (नुकसान) नै तौलै छै—जातक-कथा के नैतिक कठोरता आकि लोककथा के ऊ डर, जे सिखाबै के नजर सें सारथक होय छै, अनुकूलन में कतेक हेराय जाय छै, ओकरा पर विचार नै भेलै। पूरा अनुवाद-मीमांसा अनुकूलन के फायदा आरो नुकसान—दुन्नु के तराजू पर चढ़ाबितै। खण्ड २: आधुनिक अंगिका बाल-साहित्यक उद्भव आ विकास ठेठी-अंगिका: खण्ड २: आधुनिक अंगिका बाल-साहित्य के उद्भव आरो विकास मैथिली — ग्रन्थक दोसर खण्डमे अंगिका बाल-साहित्यक आधुनिक युगक प्रवृत्तिक सूक्ष्म विश्लेषण कएल गेल अछि। आधुनिक कालमे साहित्यकार लोकनि अनुवाद सँ लऽ कऽ मौलिक रचना धरि, बाल-साहित्यकेँ नव दिशा प्रदान केलन्हि। ठेठी-अंगिका — ग्रन्थ के दोसर खण्ड में अंगिका बाल-साहित्य के आधुनिक युग के प्रवृत्ति के सूक्ष्म विश्लेषण करलों गेलों छै। आधुनिक काल में साहित्यकार लोग सिनी अनुवाद सें लऽ कऽ मौलिक रचना तक, बाल-साहित्य केेँ नव दिशा प्रदान करलकै। अनुवादित साहित्य आ वैश्वीकरणक प्रभाव ठेठी-अंगिका: अनुवादित साहित्य आरो वैश्वीकरणक प्रभाव मैथिली — डॉ. अमरेन्द्र अपन पोथीमे बतबैत छथि जे अंगिका बाल-साहित्यक आधुनिक यात्रा विदेशी आ अन्य भारतीय भाषाक कथा सभक अनुवाद सँ भेल। एहि क्रममे ईसाइ पादरी सभ द्वारा बाइबिलक कथा सभक अनुवाद ('मुक्ति के मार्ग', 'सच्चा जीवन के मार्ग', 'यीशू मसीह के कहानी') सँ लऽ कऽ आधुनिक कालमे नन्दलाल यादव 'सारस्वत' द्वारा चीनी लोककथाक अनुवाद धरि उल्लेखनीय अछि। ठेठी-अंगिका — डॉ. अमरेन्द्र अपन पोथी में बतावै छै जे अंगिका बाल-साहित्य के आधुनिक यात्रा विदेशी आरो अन्य भारतीय भाषा के कथा सिनी के अनुवाद सें भेल। ई क्रम में ईसाइ पादरी सिनी द्वारा बाइबिल के कथा सिनी के अनुवाद ('मुक्ति के मार्ग', 'सच्चा जीवन के मार्ग', 'यीशू मसीह के कहानी') सें लऽ कऽ आधुनिक काल में नन्दलाल यादव 'सारस्वत' द्वारा चीनी लोककथा के अनुवाद तक उल्लेखनीय छै। मैथिली — चीनी लोककथा 'बाढ़ि पर हेना के कब्जा पेलकै चीन देश के महान यू' क अंगिका अनुवादक महत्ता: पोथीमे चीनक 'येलो रिवर' (Yellow River) वा बाढ़िक विभीषिका सँ जुड़ल एकटा कथाक अंगिका रूपान्तरण देल गेल अछि। ई कथा पर्यावरण-संरक्षण आ जल-प्रबन्धनक दृष्टिकोण सँ बड्ड महत्त्वपूर्ण अछि। ठेठी-अंगिका — चीनी लोककथा 'बाढ़ि पर हेना के कब्जा पेलकै चीन देश के महान यू' के अंगिका अनुवाद के महत्ता: पोथी में चीन के 'येलो रिवर' (Yellow River) वा बाढ़ि के विभीषिका सें जुड़ल एगो कथा के अंगिका रूपान्तरण देलों गेलों छै। ई कथा पर्यावरण-संरक्षण आरो जल-प्रबन्धनक दृष्टिकोण सें बहुत महत्त्वपूर्ण छै। मैथिली — "बाढ़ि रोकै के उपाय सोचै लागलै। वें सोचलगै कि जों गामो के बाहर बाँध बनाय देलो जाय, ते बोहो पर कब्जा पालो जावै सकै छै।" ठेठी-अंगिका — "बाढ़ि रोकै के उपाय सोचै लागलै। वें सोचलगै कि जों गामो के बाहर बाँध बनाय देलो जाय, ते बोहो पर कब्जा पालो जावै सकै छै।" मैथिली — समीक्षात्मक दृष्टिसँ, अंग प्रदेश (जे स्वयं कोशी आ गङ्गाक बाढ़ि सँ त्रस्त रहैत अछि) क बच्चा लेल चीनक बाढ़ि प्रबन्धनक ई कथा मात्र फंतासी नहि, अपितु एकटा वैज्ञानिक जागरूकताक पाठ अछि। बाल-साहित्यक माध्यम सँ वैश्विक समस्या (बाढ़ि आ पर्यावरण) केँ स्थानीय भाषा (अंगिका) मे प्रस्तुत करब अनुवादकक आ एहि पोथीक लेखकक एकटा क्रान्तिकारी कदम अछि। एकर अतिरिक्त डॉ. अमरेन्द्र स्वयं संस्कृतक पञ्चतन्त्र आ जातक कथाक अंगिका अनुवाद 'अंगिका कथा-सरोवर' नामक पोथीमे केलन्हि अछि। ठेठी-अंगिका — समीक्षात्मक दृष्टि सें, अंग प्रदेश (जे अपने कोशी आरो गङ्गाक बाढ़ि सें त्रस्त रहै छै) के बच्चा लेली चीन के बाढ़ि प्रबन्धन के ई कथा मात्र फंतासी नै छै, बल्कि एगो वैज्ञानिक जागरूकता के पाठ छै। बाल-साहित्य के माध्यम सें वैश्विक समस्या (बाढ़ि आरो पर्यावरण) कें स्थानीय भाषा (अंगिका) में प्रस्तुत करब अनुवादक के आरो ई पोथी के लेखक के एगो क्रान्तिकारी कदम छै। एकर अतिरिक्त डॉ. अमरेन्द्र अपने संस्कृतक पञ्चतन्त्र आरो जातक कथा के अंगिका अनुवाद 'अंगिका कथा-सरोवर' नामक पोथी में करलकै छै। 10. बाल-उपन्यास: विस्तृत सामाजिक संसारक प्रवेश ठेठी-अंगिका: 10. बाल-उपन्यास: विस्तृत सामाजिक संसार के प्रवेश मैथिली — पृष्ठ 51 पर ‘बाल-उपन्यास’ शीर्षकसँ चर्चा आधुनिक बाल-गद्यक एक महत्त्वपूर्ण विस्तार अछि। डॉ. अमरेन्द्रक ‘बण्टा’ केँ अंगिका बाल-उपन्यासक रूपमे विवेचित कएल गेल अछि। पोथीक अनुसार कथा बालकक जीवन, विद्यालय, शिक्षक, सामाजिक परिस्थिति आ पर्यावरणसँ जुड़ल अनुभवक विस्तृत रूप प्रस्तुत करैत अछि। ठेठी-अंगिका — पृष्ठ 51 पर ‘बाल-उपन्यास’ शीर्षक सें चर्चा आधुनिक बाल-गद्य के एक महत्त्वपूर्ण विस्तार छै। डॉ. अमरेन्द्र के ‘बण्टा’ कें अंगिका बाल-उपन्यास के रूप में विवेचित करलों गेलों छै। पोथी के अनुसार कथा बालक के जीवन, विद्यालय, शिक्षक, सामाजिक परिस्थिति आरो पर्यावरण सें जुड़लों अनुभव के विस्तृत रूप प्रस्तुत करै छै। मैथिली — उपन्यासक महत्त्व बाल-कहानीसँ केवल आकारक अन्तर नहि। लम्बा कथानक बाल-पात्रकेँ समयक भीतर विकसित होएबाक अवसर दैत अछि; परिवार, विद्यालय, साथी, समाज, नैतिक दुविधा आ परिवेशक बीच सम्बन्ध क्रमिक बनैत अछि। एहि कारण बाल-उपन्यास भाषाक कथात्मक क्षमता सेहो जाँचैत अछि। ‘बण्टा’क स्वतंत्र डिजिटल पाठ Gadya Kosh पर उपलब्ध होएब एहि कृतिक बाहरी अस्तित्वक उपयोगी पुष्टि अछि। बाहरी अंगिका लेखक-सूची सेहो ‘बण्टा’ केँ उपन्यासक रूपमे दर्ज करैत अछि। ठेठी-अंगिका — उपन्यास के महत्त्व बाल-कहानी सें केवल आकार के अन्तर नै। लम्बा कथानक बाल-पात्र कें समय के भीतर विकसित होय के अवसर दै छै; परिवार, विद्यालय, साथी, समाज, नैतिक दुविधा आरो परिवेश के बीच सम्बन्ध क्रमिक बनै छै। ई कारण बाल-उपन्यास भाषा के कथात्मक क्षमता भी जाँचै छै। ‘बण्टा’ के स्वतंत्र डिजिटल पाठ Gadya Kosh पर उपलब्ध होब ई कृति के बाहरी अस्तित्व के उपयोगी पुष्टि छै। बाहरी अंगिका लेखक-सूची भी ‘बण्टा’ कें उपन्यास के रूप में दर्ज करै छै। मैथिली — बाल-उपन्यासक चर्चा पूर्ववर्ती खण्डसभक तुलनामे कम विस्तार पबैत अछि, मुदा समग्र सामग्रीसँ स्पष्ट अछि जे आधुनिक अंगिका बाल-साहित्यक विकास-रेखामे उपन्यासक स्थान उल्लेखनीय अछि, भले corpus कविता तुलनामे छोट हो। एहि विधापर भविष्यक शोध पात्र-विकास, विद्यालयीय अनुभव, ग्रामीणता, बाल-स्वायत्तता, कथावाचक, भाषा-स्तर आ आयुवर्गक पाठकीयता जाँचि सकैत अछि। ठेठी-अंगिका — बाल-उपन्यास के चर्चा पहिलका खण्ड सिनी के तुलना में कम विस्तार पावै छै, मतरकि समग्र सामग्री सें साफ छै जे आधुनिक अंगिका बाल-साहित्य के विकास-रेखा में उपन्यास के स्थान उल्लेखनीय छै, भले corpus कविता तुलना में छोट हो। ई विधापर आगू के शोध पात्र-विकास, विद्यालयीय अनुभव, ग्रामीणता, बाल-स्वायत्तता, कथावाचक, भाषा-स्तर आरो आयुवर्ग के पाठकीयता जाँच कें सकै छै। बाल-उपन्यास: 'बण्टा' क वैचारिक आख्यान ठेठी-अंगिका: बाल-उपन्यास: 'बण्टा' के वैचारिक आख्यान मैथिली — अंगिका भाषाक एकमात्र बाल-उपन्यास 'बण्टा' (रचनाकार: डॉ. अमरेन्द्र) क समीक्षा एहि पोथीमे कएल गेल अछि। ई उपन्यास कोनो जादुई वा तिलस्मी कथा नहि अछि, बरु ई बाल-मनोविज्ञान, बच्चाक शिक्षाक प्रति उदासीनता, शिक्षकक अमानवीय व्यवहार (शिक्षक जमुआर) आ आदर्श शिक्षा-पद्धति (शिक्षक इकबाल) पर केन्द्रित अछि। ठेठी-अंगिका — अंगिका भाषा के एकमात्र बाल-उपन्यास 'बण्टा' (रचनाकार: डॉ. अमरेन्द्र) के समीक्षा ई पोथी में करलों गेलों छै। ई उपन्यास कोनो जादुई वा तिलस्मी कथा नै छै, बरु ई बाल-मनोविज्ञान, बच्चा के शिक्षा के प्रति उदासीनता, शिक्षक के अमानवीय व्यवहार (शिक्षक जमुआर) आरो आदर्श शिक्षा-पद्धति (शिक्षक इकबाल) पर केन्द्रित छै। मैथिली — एहि उपन्यासक सबसँ पैघ विशेषता ई अछि जे एहिमे भारतक पूर्व राष्ट्रपति आ मिसाइल मैन डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वारा बच्चा लेल देल गेल दस (१०) आचार-सिद्धान्तकेँ बाल-नायक 'बण्टा' क जीवन-दर्शनक रूपमे प्रस्तुत कएल गेल अछि। ठेठी-अंगिका — ई उपन्यास के सब सें बड़का विशेषता ई छै जे ई में भारतक पूर्व राष्ट्रपति आरो मिसाइल मैन डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वारा बच्चा लेली देलों गेलों दस (१०) आचार-सिद्धान्तकेँ बाल-नायक 'बण्टा' के जीवन-दर्शनक रूप में प्रस्तुत करलों गेलों छै। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलामक आचार-सिद्धान्त (अंगिका बाल-उपन्यास 'बण्टा' सँ उद्धृत) ठेठी-अंगिका: डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलामक आचार-सिद्धान्त (अंगिका बाल-उपन्यास 'बण्टा' सें उद्धृत) मैथिली — मूल अंगिका उद्धरण: पहिलो मंत्र छेकै: हम्में आपनो पढ़ाय आरो कार्य भीतरी मनो सँ करबै आरो महान बनबै। ठेठी-अंगिका — मूल अंगिका उद्धरण: पहिलो मंत्र छेकै: हम्में आपनो पढ़ाय आरो कार्य भीतरी मनो सँ करबै आरो महान बनबै। मैथिली — मूल अंगिका उद्धरण: दूसरो छेकै: आबे सँ हम्में कम-से-कम दस अनपढ़ लोगो के पढ़बौ-लिखबौ सिखैबै। ठेठी-अंगिका — मूल अंगिका उद्धरण: दूसरो छेकै: आबे सँ हम्में कम-से-कम दस अनपढ़ लोगो के पढ़बौ-लिखबौ सिखैबै। मैथिली — मूल अंगिका उद्धरण: तेसरो मंत्र छेकै: हम्में कम-से-कम दस गाछ लगैबै आरो ओकरो अच्छा नाँखी देखभाल करबै। ठेठी-अंगिका — मूल अंगिका उद्धरण: तेसरो मंत्र छेकै: हम्में कम-से-कम दस गाछ लगैबै आरो ओकरो अच्छा नाँखी देखभाल करबै। मैथिली — मूल अंगिका उद्धरण: चौथो मंत्र छेकै: हम्में शहर-गाँव जाय के कम-से-कम पांचो लोगो के नशाखोरी आरो जुआ खेलै के आदत सँ मुक्ति दिलैबै। ठेठी-अंगिका — मूल अंगिका उद्धरण: चौथो मंत्र छेकै: हम्में शहर-गाँव जाय के कम-से-कम पांचो लोगो के नशाखोरी आरो जुआ खेलै के आदत सँ मुक्ति दिलैबै। मैथिली — मूल अंगिका उद्धरण: नौमो मंत्र छेकै: हम्में मंद बुद्धि आरो शारीरिक रूप सँ कमजोर लोगो साथें दोस्ताना व्यवहार करबै। ठेठी-अंगिका — मूल अंगिका उद्धरण: नौमो मंत्र छेकै: हम्में मंद बुद्धि आरो शारीरिक रूप सँ कमजोर लोगो साथें दोस्ताना व्यवहार करबै। मैथिली — मूल अंगिका उद्धरण: दशमो मंत्र छेकै: हम्में आपनो देशवासी आरो देश के सफलता पर गौरव करबै। ठेठी-अंगिका — मूल अंगिका उद्धरण: दशमो मंत्र छेकै: हम्में आपनो देशवासी आरो देश के सफलता पर गौरव करबै। मैथिली — 'बण्टा' बाल-साहित्यक एकटा आदर्श मानक स्थापित करैत अछि। बाल-साहित्यक उद्देश्य मात्र मनोरञ्जन नहि, अपितु चारित्रिक निर्माण (Character Building) सेहो होइत अछि। कलाम साहबक सिद्धान्तकेँ एकटा ग्रामीण अंगिका-भाषी बच्चाक माध्यम सँ स्थापित करब डॉ. अमरेन्द्रक प्रगतिशील आ राष्ट्रवादी दृष्टिकेँ दर्शाबइत अछि। उपन्यासमे भाषाक प्रवाहमयता आ संवादक चुस्ती बच्चाकेँ अन्त धरि बान्हि कऽ रखबामे सक्षम अछि। ठेठी-अंगिका — 'बण्टा' बाल-साहित्य के एगो आदर्श मानक स्थापित करै छै। बाल-साहित्य के उद्देश्य मात्र मनोरञ्जन नै छै, बल्कि चारित्रिक निर्माण (Character Building) भी होय छै। कलाम साहबक सिद्धान्तकेँ एगो ग्रामीण अंगिका-भाषी बच्चा के माध्यम सें स्थापित करब डॉ. अमरेन्द्र के प्रगतिशील आरो राष्ट्रवादी दृष्टिकेँ दर्शाबइत छै। उपन्यासमे भाषा के प्रवाहमयता आरो संवाद के चुस्ती बच्चा केेँ अन्त तक बान्हि कऽ रखबा में सक्षम छै। 11. आधुनिक बाल-काव्य: ग्रन्थक सर्वाधिक समृद्ध क्षेत्र ठेठी-अंगिका: 11. आधुनिक बाल-काव्य: ग्रन्थ के सर्वाधिक समृद्ध क्षेत्र मैथिली — आधुनिक अंगिका बाल-काव्यक विवेचन पोथीक सर्वाधिक विस्तृत, विविध आ आत्मविश्वासी भाग अछि। पृष्ठ 61 सँ खेलगीत, प्रकृति, बाल-व्यक्तित्व, सामाजिक जीवन, राष्ट्रबोध, पर्यावरण, ज्ञान, तुक-लय, हास्य, कथा-आधारित गीत, गजल, खण्डकाव्य आदि अनेक रूप सामने अबैत अछि। लेखक केवल कृति-सूची नहि दैत छथि; बालोपयोगिता, शब्द-संगीत, विषय, कल्पना आ कखनो-कखनो रचनात्मक कमजोरीपर टिप्पणी सेहो करैत छथि। ठेठी-अंगिका — आधुनिक अंगिका बाल-काव्य के विवेचन पोथी के सर्वाधिक विस्तृत, विविध आरो आत्मविश्वासी भाग छै। पृष्ठ 61 सें खेलगीत, प्रकृति, बाल-व्यक्तित्व, सामाजिक जीवन, राष्ट्रबोध, पर्यावरण, ज्ञान, तुक-लय, हास्य, कथा-आधारित गीत, गजल, खण्डकाव्य आदि अनेक रूप सामने आवै छै। लेखक केवल कृति-सूची नै दै छै; बालोपयोगिता, शब्द-संगीत, विषय, कल्पना आरो कखनियों-कखनियों रचनात्मक कमजोरीपर टिप्पणी भी करै छै। मैथिली — बाहरी साहित्यिक सर्वेक्षण एहि निष्कर्षक स्वतंत्र समर्थन दैत अछि। Angika.com अंगिका बाल-लोककाव्यक विपुलता बतबैत अमरेन्द्रक पाँच बालगीत-संग्रह—‘ढोल बजै छै ढम्मक ढम’, ‘बुतरू के तुतरू’, ‘बाजै बीन बजावै तीन’, ‘एक छड़ी पर अंडा नाचै’, ‘तुक्तक-मुक्तक’—क उल्लेख करैत अछि; संगहि सान्त्वना साह, दिनेश बाबा, डॉ. मृदुला शुक्ला तथा ‘अंगिका बालगीत’क आन कविसभक चर्चा करैत अछि। भारतवाणी 2021 क ‘डॉ. अमरेन्द्र ग्रंथावली (खण्ड-1): अंगिका बालगीत समग्र’ केँ सेहो सूचीबद्ध करैत अछि। एतय मूल पोथीक लेखक-केंद्रित सामग्रीकेँ स्वतंत्र प्रकाशन-साक्ष्य भेटैत अछि। ठेठी-अंगिका — बाहरी साहित्यिक सर्वेक्षण ई निष्कर्ष के स्वतंत्र समर्थन दै छै। Angika.com अंगिका बाल-लोककाव्य के विपुलता बतावै अमरेन्द्र के पाँच बालगीत-संग्रह—‘ढोल बजै छै ढम्मक ढम’, ‘बुतरू के तुतरू’, ‘बाजै बीन बजावै तीन’, ‘एक छड़ी पर अंडा नाचै’, ‘तुक्तक-मुक्तक’—के उल्लेख करै छै; संगें सान्त्वना साह, दिनेश बाबा, डॉ. मृदुला शुक्ला तथा ‘अंगिका बालगीत’ के आन कवि सिनी के चर्चा करै छै। भारतवाणी 2021 के ‘डॉ. अमरेन्द्र ग्रंथावली (खण्ड-1): अंगिका बालगीत समग्र’ कें भी सूचीबद्ध करै छै। एतै मूल पोथी के लेखक-केंद्रित सामग्री कें स्वतंत्र प्रकाशन-साक्ष्य भेटै छै। मैथिली — काव्यक समृद्धि केवल पुस्तक-संख्यामे नहि। पोथी देखबैत अछि जे बालगीत छोट बालकक ध्वनि-आनन्दसँ किशोरक सामाजिक ज्ञान धरि, प्रकृतिसँ विज्ञान धरि, खेलसँ राष्ट्रक कल्पना धरि पसरैत अछि। एहि विस्तारक कारण बाल-काव्य अंगिका आधुनिक साहित्यक प्रयोगशाला बनि जाइत अछि—जतय लोकलय, आधुनिक विषय, प्रौढ़ विधा आ बाल-मनक मेल निरन्तर जाँचल जाइत अछि। ठेठी-अंगिका — काव्य के समृद्धि केवल पुस्तक-संख्या में नै। पोथी देखावै छै जे बालगीत छोट बालक के ध्वनि-आनन्द सें किशोर के सामाजिक ज्ञान तक, प्रकृति सें विज्ञान तक, खेल सें राष्ट्र के कल्पना तक पसरै छै। ई विस्तार के कारण बाल-काव्य अंगिका आधुनिक साहित्य के प्रयोगशाला बनि जाय छै—जेतै लोकलय, आधुनिक विषय, प्रौढ़ विधा आरो बाल-मन के मेल निरन्तर जाँचलों जाय छै। मैथिली — मुदा आलोचनात्मक चयनक प्रश्न एतय सर्वाधिक तीक्ष्ण अछि। लेखक स्वयं आधुनिक अंगिका बाल-काव्यक प्रमुख सर्जक छथि, तें हुनक अपन कृतिसभ स्वाभाविक रूपेँ अधिक उपस्थित अछि। एकर लाभ भीतरक साक्ष्य आ प्रकाशन-इतिहासक निकटता; जोखिम अन्य कविसभक तुलनात्मक स्थानक असमानता। भविष्यक साहित्येतिहासमे समान corpus-based कसौटी उपयोगी होएत। ठेठी-अंगिका — मतरकि आलोचनात्मक चयन के प्रश्न एतै सर्वाधिक तीक्ष्ण छै। लेखक अपने आधुनिक अंगिका बाल-काव्य के प्रमुख सर्जक छै, तें हुनकर आपनों कृति सिनी स्वाभाविक रूपेँ अधिक उपस्थित छै। एकर लाभ भीतर के साक्ष्य आरो प्रकाशन-इतिहास के निकटता; जोखिम अन्य कवि सिनी के तुलनात्मक स्थान के असमानता। आगू के साहित्येतिहास में समान corpus-based कसौटी उपयोगी होतै। पाठ-सर्वेक्षण: आधुनिक बाल-कविताक विषयगत वर्गीकरण ठेठी-अंगिका: पाठ-सर्वेक्षण : आधुनिक बाल-कविता के विषयगत वर्गीकरण मैथिली — दोसर अध्यायक तेसर स्तम्भ थिक आधुनिक मौलिक बाल-कविताक विषयगत वर्गीकरण, जतय लेखक अंगिका बाल-कविता केँ विषयक आधार पर किछु भेदमे बाँटैत छथि। मुख्य भेद अछि—गतिशील प्रकृतिक काव्य (चलैत-फिरैत प्रकृति आ जीव-जन्तु; यथा ‘जाड़’, ‘डायनासोर’, ‘कोसी मैया’, आ जीव-जन्तुक बोली-काव्य ‘ढोल बजै छै ढम्मक ढम’); आंचलिक परिवेशक बाल-काव्य (अंग-महाजनपदक भूगोल, वाद्य आ विशिष्ट मिठाई-गट्टा सन खाद्य; अंजनी कुमार सुमन आदि); राष्ट्रीयताक वाहक बाल-गीत (राष्ट्रीय पुरुष आ पर्व—भारत माय, तिरंगा, गांधी बाबा, अब्दुल कलाम; सान्त्वना साह आ राहुल शिवायक ‘माँटी हिन्दुस्तान के’); ज्ञान-शिक्षामूलक बाल-काव्य (गणित आ नैतिक शिक्षा—‘लालच रों फोल’क अक्कड़-बक्कड़ गणना-गीत, सुधीर कुमार प्रोग्रामरक ‘लूर’); पर्यावरण-शिक्षाक कार्यशाला; आ हास्य-व्यंग्य (‘पियक्कड़ मामा’, शंभुनाथ मिस्त्रीक हास्य-गीत)। रूप-दृष्टिएँ ओ नाट्यकाव्य आ कथागीत (डॉ. आभा पूर्वेक ‘खयाली पुलाव’) केँ सेहो अलग रेखांकित करैत छथि। ठेठी-अंगिका — दोसरका अध्याय के तेसरका खम्भा छै आधुनिक मौलिक बाल-कविता के विषयगत वर्गीकरण, जहाँ लेखक अंगिका बाल-कविता के विषय के आधार पर कुछ भेद में बाँटै छै। मुख्य भेद ई छै—गतिशील परकृति के काव्य (चलै-फिरै वाला परकृति आरो जीव-जन्तु; जइसन ‘जाड़’, ‘डायनासोर’, ‘कोसी मैया’, आरो जीव-जन्तु के बोली-काव्य ‘ढोल बजै छै ढम्मक ढम’); आंचलिक परिवेश के बाल-काव्य (अंग-महाजनपद के भूगोल, वाद्य आरो खास मिठाई-गट्टा जइसन खाद्य; अंजनी कुमार सुमन आदि); राष्ट्रीयता के वाहक बाल-गीत (राष्ट्रीय पुरुष आरो परब—भारत माय, तिरंगा, गांधी बाबा, अब्दुल कलाम; सान्त्वना साह आरो राहुल शिवाय के ‘माँटी हिन्दुस्तान के’); ज्ञान-शिक्षा वाला बाल-काव्य (गणित आरो नैतिक शिक्षा—‘लालच रों फोल’ के अक्कड़-बक्कड़ गिनती-गीत, सुधीर कुमार प्रोग्रामर के ‘लूर’); पर्यावरण-शिक्षा के कार्यशाला; आरो हास्य-व्यंग्य (‘पियक्कड़ मामा’, शंभुनाथ मिस्त्री के हास्य-गीत)। रूप के नजर सें ऊ नाट्यकाव्य आरो कथागीत (डॉ. आभा पूर्वे के ‘खयाली पुलाव’) के भी अलग रेखांकित करै छै। आधुनिक अंगिका बाल-कविता: एकटा नव विहान ठेठी-अंगिका: आधुनिक अंगिका बाल-कविता: एगो नव विहान मैथिली — डॉ. अमरेन्द्रक 'ढोल बजै छै ढम्मक ढम', 'बुतरू के तुतरू', 'बाजै बीन बजावै तीन' सन कविता सङ्ग्रह आधुनिक अंगिका बाल-कविताक प्रस्थान-बिन्दु अछि। एहि सङ्ग्रह सभमे पशुपक्षीक संसार सँ लऽ कऽ विज्ञानक चमत्कार धरि सब किछु अछि। ठेठी-अंगिका — डॉ. अमरेन्द्र के 'ढोल बजै छै ढम्मक ढम', 'बुतरू के तुतरू', 'बाजै बीन बजावै तीन' जइसन कविता सङ्ग्रह आधुनिक अंगिका बाल-कविता के प्रस्थान-बिन्दु छै। ई सङ्ग्रह सभमे पशुपक्षी के संसार सें लऽ कऽ विज्ञान के चमत्कार तक सब कुछु छै। मैथिली — 'ढोल बजै छै ढम्मक ढम' क एकटा कविता 'बोली' मे विभिन्न जीव-जन्तुक ध्वनिक जे चित्रण अछि, ओ बच्चाकेँ ध्वन्यात्मक विज्ञान सँ परिचित करबैत अछि: ठेठी-अंगिका — 'ढोल बजै छै ढम्मक ढम' के एगो कविता 'बोली' में विभिन्न जीव-जन्तुक ध्वनि के जे चित्रण छै, ऊ बच्चा केेँ ध्वन्यात्मक विज्ञान सें परिचित करबैत छै: मैथिली — उल्लू ते घुघुआवै छै, मुर्गा बांग लगावै छै हिनहिनावै घोड़ा छै, गड़-गड़-गड़-गड़ सौंढा छै मूसा करै छै चू-चू-चू, कुत्ता भूकै भू-भू-भू ठेठी-अंगिका — उल्लू ते घुघुआवै छै, मुर्गा बांग लगावै छै हिनैनावै घोड़ा छै, गड़-गड़-गड़-गड़ सौंढा छै मूसा करै छै चू-चू-चू, कुत्ता भूकै भू-भू-भू मैथिली — सांत्वना साहक 'बाजै छै बीन', दिनेश बाबाक 'हँसी बिहनकी धूप', आ डॉ. मृदुला शुक्लाक 'सोन चिरैया' अंगिका बाल-कविताक नव-आयाम अछि। डॉ. मृदुला शुक्लाक 'सोन चिरैया' मे प्रकृतिकेँ जे आह्वान कएल गेल अछि, ओ द्रष्टव्य अछि: ठेठी-अंगिका — सांत्वना साहक 'बाजै छै बीन', दिनेश बाबाक 'हँसी बिहनकी धूप', आरो डॉ. मृदुला शुक्लाक 'सोन चिरैया' अंगिका बाल-कविता के नव-आयाम छै। डॉ. मृदुला शुक्लाक 'सोन चिरैया' में प्रकृतिकेँ जे आह्वान करलों गेलों छै, ऊ द्रष्टव्य छै: मैथिली — सुखलो धरती, भुखलो खेत सुखलो नद्दी, पत्थल रेत उमड़ी-घुमड़ी बरसै मेघ भरलै सब ठो ताल-तलैया सोन चिरैया, सोन चिरैया ! ठेठी-अंगिका — सुखलो धरती, भुखलो खेत सुखलो नद्दी, पत्थल रेत उमड़ी-घुमड़ी बरसै मेघ भरलै सब ठो ताल-तलैया सोन चिरैया, सोन चिरैया ! मैथिली — सुधीर कुमार प्रोग्रामरक कवितामे विज्ञानक चमत्कारकेँ बाल-सुलभ ढङ्ग सँ प्रस्तुत कएल गेल अछि। 'टेलिस्कोप' आ 'रडार' पर हुनकर कविता: ठेठी-अंगिका — सुधीर कुमार प्रोग्रामरक कविता में विज्ञान के चमत्कारकेँ बाल-सुलभ ढङ्ग सें प्रस्तुत करलों गेलों छै। 'टेलिस्कोप' आरो 'रडार' पर हुनकर कविता: मैथिली — वाह-वाह टेलिस्कोप दूर के देखौ बाइस्कोप, सीमा पर दुश्मन के टेबी बरसावै गरदौवा तोप। ठेठी-अंगिका — वाह-वाह टेलिस्कोप दूर के देखौ बाइस्कोप, सीमा पर दुश्मन के टेबी बरसावै गरदौवा तोप। मैथिली — ई कविता सभ प्रमाणित करैत अछि जे अंगिका बाल-साहित्य मात्र गाम-देहातक सीमामे बान्हल नहि अछि; ई आधुनिक विज्ञान, रडार, आ टेलिस्कोप जकाँ विषयकेँ सेहो अपन कविताक विषय बना रहल अछि। ई बाल-साहित्यक वैचारिक परिपक्वता (Ideological Maturity) क द्योतक अछि। ठेठी-अंगिका — ई कविता सिनी प्रमाणित करै छै जे अंगिका बाल-साहित्य मात्र गाम-देहातक सीमा में बान्हल नै छै; ई आधुनिक विज्ञान, रडार, आरो टेलिस्कोप जेना विषयकेँ भी अपन कविता के विषय बना रहल छै। ई बाल-साहित्य के वैचारिक परिपक्वता (Ideological Maturity) के द्योतक छै। राष्ट्रीय भावना आ देश-प्रेम ठेठी-अंगिका: राष्ट्रीय भावना आरो देश-प्रेम मैथिली — बाल-साहित्यमे राष्ट्रीयताक सञ्चार एकटा महत्त्वपूर्ण पहलू अछि। राहुल शिवाय रचित 'माटी हिन्दुस्तान के' सङ्ग्रह विशुद्ध रूपेँ देशभक्तिक बाल-गीतक सङ्ग्रह अछि। एहिमे भारतक महान विभूति—बुद्ध, महावीर, शिवाजी, सुभाष चन्द्र बोसक सङ्ग-सङ्ग अंग प्रदेशक शहीद तिलकामांझीक सेहो गान कएल गेल अछि। तिरङ्गा पर रचित ई गीत हृदयस्पर्शी अछि: ठेठी-अंगिका — बाल-साहित्य में राष्ट्रीयता के सञ्चार एगो महत्त्वपूर्ण पहलू छै। राहुल शिवाय रचित 'माटी हिन्दुस्तान के' सङ्ग्रह विशुद्ध रूपेँ देशभक्ति के बाल-गीतक सङ्ग्रह छै। ई में भारतक महान विभूति—बुद्ध, महावीर, शिवाजी, सुभाष चन्द्र बोसक सङ्ग-सङ्ग अंग प्रदेश के शहीद तिलकामांझीक भी गान करलों गेलों छै। तिरङ्गा पर रचित ई गीत हृदयस्पर्शी छै: मैथिली — भारत के छै शान तिरंगा लहर-लहर लहराबै। सबसे ऊपर छै केसरिया भोरे-भोर के लाली; वीर शहीदो के वासन्ती गरिमा गाबै वाली; ठेठी-अंगिका — भारत के छै शान तिरंगा लहर-लहर लहराबै। सबसे ऊपर छै केसरिया भोरे-भोर के लाली; वीर शहीदो के वासन्ती गरिमा गाबै वाली; मैथिली — चन्द्रप्रकाश जगप्रिय आ अंजनी कुमार सुमन सन कवि लोकनि अपन बाल-गीतमे मातृभाषा आ राष्ट्रभाषाक महत्ता पर सेहो प्रकाश डललन्हि अछि। अंगिका बाल-साहित्यमे देशक माटि सँ जुड़ल जे ई सुगन्ध अछि, ओ बच्चाकेँ अपन संस्कृति आ राष्ट्रक प्रति गर्वक अनुभव करबैत अछि। ठेठी-अंगिका — चन्द्रप्रकाश जगप्रिय आरो अंजनी कुमार सुमन जइसन कवि लोग सिनी अपन बाल-गीत में मातृभाषा आरो राष्ट्रभाषाक महत्ता पर भी प्रकाश डललन्हि छै। अंगिका बाल-साहित्य में देशक माटि सें जुड़ल जे ई सुगन्ध छै, ऊ बच्चा केेँ अपन संस्कृति आरो राष्ट्र के प्रति गर्वक अनुभव करावै छै। 12. प्रकृति, पर्यावरण आ आधुनिक ज्ञान: विषय-विस्तारक शक्ति ठेठी-अंगिका: 12. प्रकृति, पर्यावरण आरो आधुनिक ज्ञान: विषय-विस्तार के शक्ति मैथिली — पृष्ठ 71 आसपास प्रकृति-कविताक विवेचन, आ पृष्ठ 81 पर पर्यावरण-शिक्षा सम्बन्धी प्रसंग, पोथीक आधुनिकता-बोधक विशेष पक्ष देखबैत अछि। प्रकृति एतय केवल फूल-पात, वर्षा, पक्षी वा ऋतु-सौन्दर्य नहि; पर्यावरणीय संकट, मनुष्यक व्यवहार, शिक्षा आ बालकक जिम्मेदारीक क्षेत्र सेहो बनैत अछि। एहि कारण लोकपरम्परासँ आयल प्रकृति-बिम्ब आधुनिक पर्यावरण-चेतनामे रूपान्तरित होइत अछि। ठेठी-अंगिका — पृष्ठ 71 आसपास प्रकृति-कविता के विवेचन, आरो पृष्ठ 81 पर पर्यावरण-शिक्षा सम्बन्धी प्रसंग, पोथी के आधुनिकता-बोध के विशेष पक्ष देखावै छै। प्रकृति एतै केवल फूल-पात, वर्षा, पक्षी वा ऋतु-सौन्दर्य नै; पर्यावरणीय संकट, मनुष्य के व्यवहार, शिक्षा आरो बालक के जिम्मेदारी के क्षेत्र भी बनै छै। ई कारण लोकपरम्परा सें आयलों प्रकृति-बिम्ब आधुनिक पर्यावरण-चेतना में रूपान्तरित होय छै। मैथिली — लोकगीतमे प्रकृति जीवनक अभिन्न परिवेश अछि; आधुनिक बाल-काव्यमे प्रकृति कखनो सचेत विषय बनैत अछि—रक्षा करबाक, बुझबाक, वैज्ञानिक कारण जानबाक। साहित्य अनुभवक संग ज्ञानक सेतु बनैत अछि। मुदा लेखकक आरम्भिक कसौटी याद राखब जरूरी अछि: पर्यावरण-संदेश मात्र कविता नहि; बाल-मनक अनुरूप बिम्ब, लय, हास्य, प्रश्न, कथा वा नाटकीयता तकर साहित्यिक मूल्य निर्धारित करत। ठेठी-अंगिका — लोकगीत में प्रकृति जीवन के अभिन्न परिवेश छै; आधुनिक बाल-काव्य में प्रकृति कखनियों सचेत विषय बनै छै—रक्षा करै के, बुझै के, वैज्ञानिक कारण जानै के। साहित्य अनुभव के संग ज्ञान के सेतु बनै छै। मतरकि लेखक के आरम्भिक कसौटी याद राखब जरूरी छै: पर्यावरण-संदेश मात्र कविता नै; बाल-मन के अनुरूप बिम्ब, लय, हास्य, प्रश्न, कथा वा नाटकीयता तकर साहित्यिक मूल्य निर्धारित करत। मैथिली — ग्रन्थ पृष्ठ 95–96 क कथा-विवेचनमे आधुनिक वैज्ञानिक उपकरण/टावर आ पक्षीजीवनक संकट जकाँ विषय अनैत अछि। बादक बाल-नाटकसभमे ध्वनि-प्रदूषण, जंगल, शिक्षा आ स्वास्थ्यक प्रश्न एहि आधुनिक विषय-विस्तारकेँ आरो पुष्ट करैत अछि। Reynolds बाल-साहित्यकेँ समाजक मूल्यसभमे दीक्षित करबाक संग वैकल्पिक भविष्यक कल्पना जगाबयवला साहित्य मानैत छथि; अंगिका उदाहरणसभमे पर्यावरण-विषय एही द्वैतक स्थानीय रूप देखबैत अछि। ठेठी-अंगिका — ग्रन्थ पृष्ठ 95–96 के कथा-विवेचन में आधुनिक वैज्ञानिक उपकरण/टावर आरो पक्षीजीवन के संकट जेना विषय अनै छै। बाद के बाल-नाटक सिनी में ध्वनि-प्रदूषण, जंगल, शिक्षा आरो स्वास्थ्य के प्रश्न ई आधुनिक विषय-विस्तार कें आरो पुष्ट करै छै। Reynolds बाल-साहित्य कें समाज के मूल्य सिनी में दीक्षित करै के संग वैकल्पिक आगू के कल्पना जगावै वाला साहित्य मानै छै; अंगिका उदाहरण सिनी में पर्यावरण-विषय एही द्वैत के स्थानीय रूप देखावै छै। पर्यावरण, विज्ञान आ राष्ट्रीय चेतना: युगानुरूप साहित्य ठेठी-अंगिका: पर्यावरण, विज्ञान आरो राष्ट्रीय चेतना: युगानुरूप साहित्य मैथिली — बाल-साहित्यक सार्थकता तखन धरि पूर्ण नहि मानल जा सकैत अछि जखन धरि ओ नव पीढ़िकेँ आधुनिक युगक ज्वलन्त समस्या सँ परिचित नहि करबय। अंगिका बाल-साहित्य एहि निकष पर पूर्णतः खरा उतरैत अछि। ठेठी-अंगिका — बाल-साहित्य के सार्थकता तबें तक पूर्ण नै मानल जा सकै छै जबें तक ऊ नव पीढ़िकेँ आधुनिक युग के ज्वलन्त समस्या सें परिचित नै करबय। अंगिका बाल-साहित्य ई निकष पर पूरा तरह सें खरा उतरैत छै। मैथिली — पर्यावरण-संरक्षण: डॉ. अमरेन्द्रक 'बुतरू के तुतरू' मे सङ्कलित 'बादल आरो बुतरू' सन कविता होउ वा 'तौहरो घोर' सन कविता जाहिमे मच्छर सँ होमय वला मलेरिया आ गन्दगी पर ध्यान देल गेल अछि, एहि सभक केन्द्रमे स्वच्छता आ पर्यावरण अछि। ठेठी-अंगिका — पर्यावरण-संरक्षण: डॉ. अमरेन्द्र के 'बुतरू के तुतरू' में सङ्कलित 'बादल आरो बुतरू' जइसन कविता होउ वा 'तौहरो घोर' जइसन कविता जाहि में मच्छर सें होमय वला मलेरिया आरो गन्दगी पर ध्यान देलों गेलों छै, ई सिनी के केन्द्र में स्वच्छता आरो पर्यावरण छै। मैथिली — केहनो तोरो ई घर छौ/मच्छर छौ भाय, मच्छर छौ । की सिखले छैं धंधा तोंय/नाली रखभैं गंदा तोंय दलदल एंगनो-बाहर छौ/मच्छर छौ भाय, मच्छर छौ । ठेठी-अंगिका — केहनो तोरो ई घर छौ/मच्छर छौ भाय, मच्छर छौ । की सिखले छैं धंधा तोंय/नाली रखभैं गंदा तोंय दलदल एंगनो-बाहर छौ/मच्छर छौ भाय, मच्छर छौ । मैथिली — जल संरक्षण पर सेहो 'धरती के फूल' (सुधीर कुमार प्रोग्रामर) मे लिखल गेल अछि जे 'मत फेको जानी के पानी / राखो खुच्चा खांही-खंही'। ठेठी-अंगिका — जल संरक्षण पर भी 'धरती के फूल' (सुधीर कुमार प्रोग्रामर) में लिखलों गेलों छै जे 'मत फेको जानी के पानी / राखो खुच्चा खांही-खंही'। मैथिली — शहरीकरण आ रेडिएशनक खतरा: डॉ. आभा पूर्वेक बाल-कथा 'गौरैया-माय के डोर' मे मोबाइल टावरक रेडिएशन सँ पक्षी (विशेषतः गौरैया) क मृत्यु आ लुप्त होबय वला प्रजातिक दर्दकेँ रेखाङ्कित कएल गेल अछि। जखन गौरैया माय अपन बच्चा सँ कहैत अछि: ठेठी-अंगिका — शहरीकरण आरो रेडिएशनक खतरा: डॉ. आभा पूर्वेक बाल-कथा 'गौरैया-माय के डोर' में मोबाइल टावरक रेडिएशन सें पक्षी (विशेषतः गौरैया) के मृत्यु आरो लुप्त होबय वला प्रजाति के दर्दकेँ रेखाङ्कित करलों गेलों छै। जबें गौरैया माय अपन बच्चा सें कहैत छै: मैथिली — "आबे तोरा की बतयौ बेटा, हमरा सिनी के शरीर के, खास करी के दिमाग के बनावटे हेनो छै, कि टावर आरो मोबाइल सँ निकलै वाला तरंग सँ हमरो दिमाग पर बुरा असर पड़ै लागै छै।" ठेठी-अंगिका — "आबे तोरा की बतयौ बेटा, हमरा सिनी के शरीर के, खास करी के दिमाग के बनावटे हेनो छै, कि टावर आरो मोबाइल सँ निकलै वाला तरंग सँ हमरो दिमाग पर बुरा असर पड़ै लागै छै।" मैथिली — ई संवाद मात्र एकटा कथा नहि, अपितु इको-सिस्टम (Ecosystem) क असन्तुलनक एकटा गम्भीर वैज्ञानिक चेतावनी अछि जे बाल-साहित्यक माध्यम सँ नव पीढ़िक मस्तिष्कमे रोपबाक प्रयास कएल गेल अछि। ठेठी-अंगिका — ई संवाद मात्र एगो कथा नै छै, बल्कि इको-सिस्टम (Ecosystem) के असन्तुलन के एगो गम्भीर वैज्ञानिक चेतावनी छै जे बाल-साहित्य के माध्यम सें नया पीढ़ी के मस्तिष्क में रोपबाक प्रयास करलों गेलों छै। 13. ‘पंचामृत’, बाल-गजल आ खण्डकाव्य: विधागत प्रयोगशीलता ठेठी-अंगिका: 13. ‘पंचामृत’, बाल-गजल आरो खण्डकाव्य: विधागत प्रयोगशीलता मैथिली — पृष्ठ 92 पर ‘पंचामृत’ पाँच बाल-काव्यरूपक समूहक रूपमे विवेचित अछि। तकर बाद बाल-गजलपर चर्चा अछि, जतय गजलक प्रौढ़ साहित्यिक परम्पराकेँ बाल-जगतक अनुकूल करबाक प्रयासक उल्लेख भेटैत अछि; अमरेन्द्र आ दिनेश बाबा आदि नाम प्रमुख रूपेँ सामने अबैत अछि। पृष्ठ 91 आसपास खण्डकाव्य-प्रवृत्ति सेहो चर्चा मे अछि। ठेठी-अंगिका — पृष्ठ 92 पर ‘पंचामृत’ पाँच बाल-काव्यरूप के समूह के रूप में विवेचित छै। तकर बाद बाल-गजलपर चर्चा छै, जेतै गजल के प्रौढ़ साहित्यिक परम्परा कें बाल-जगत के अनुकूल करै के प्रयास के उल्लेख भेटै छै; अमरेन्द्र आरो दिनेश बाबा आदि नाम प्रमुख रूपेँ सामने आवै छै। पृष्ठ 91 आसपास खण्डकाव्य-प्रवृत्ति भी चर्चा में छै। मैथिली — एहि सभ प्रयोगक महत्त्व ई अछि जे बाल-कविताक अर्थ केवल छोट तुकबन्दी नहि रहैत। गजल, कथात्मक काव्य, खण्डकाव्य, नाट्यरूप—प्रौढ़ साहित्यक स्थापित विधासभकेँ बालक लेल नब रूप देल जा सकैत अछि। मुदा रूपान्तरण सफल तखने होएत जखन विधाक बाहरी ढाँचा बालकक ग्रहणक्षमता, विषय, लय आ अनुभवक संग मेल खाए। ठेठी-अंगिका — ई सब प्रयोग के महत्त्व ई छै जे बाल-कविता के अर्थ केवल छोट तुकबन्दी नै रहै। गजल, कथात्मक काव्य, खण्डकाव्य, नाट्यरूप—प्रौढ़ साहित्य के स्थापित विधा सिनी कें बालक लेल नब रूप देलों जाय सकै छै। मतरकि रूपान्तरण सफल तबें ही होतै जबें विधा के बाहरी ढाँचा बालक के ग्रहणक्षमता, विषय, लय आरो अनुभव के संग मेल खाए। मैथिली — पोथी कखनो शिल्पक तकनीकी प्रश्न उठबैत अछि, मुदा एकरूप कसौटी सदिखन स्पष्ट नहि। गजल लेल बहर/काफिया/रदीफक शुद्धता, बाल-काव्य लेल आयु-उपयुक्त शब्दावली, खण्डकाव्य लेल कथा-गति—ई सभ अलग कसौटी माँगैत अछि। भविष्यक संस्करणमे विधा-विशेषक कसौटी आरम्भे देल जाए तँ मूल्याङ्कन अधिक पारदर्शी होएत। तथापि ऐतिहासिक अर्थ स्पष्ट अछि: अंगिका बाल-काव्य प्रयोगशील अछि, आ ‘बाल’ विशेषण विधाकेँ छोट नहि करैत; स्थापित रूपकेँ नब पाठक लेल पुनः गढ़बाक चुनौती दैत अछि। ठेठी-अंगिका — पोथी कखनियों शिल्प के तकनीकी प्रश्न उठावै छै, मतरकि एकरूप कसौटी सभे बेर स्पष्ट नै। गजल लेल बहर/काफिया/रदीफ के शुद्धता, बाल-काव्य लेल आयु-उपयुक्त शब्दावली, खण्डकाव्य लेल कथा-गति—ई सिनी अलग कसौटी माँगै छै। आगू के संस्करण में विधा-विशेष के कसौटी आरम्भे देलों जाए तें मूल्याङ्कन अधिक पारदर्शी होतै। तथापि ऐतिहासिक अर्थ स्पष्ट छै: अंगिका बाल-काव्य प्रयोगशील छै, आरो ‘बाल’ विशेषण विधा कें छोट नै करै; स्थापित रूप कें नब पाठक लेल पुनः गढ़ै के चुनौती दै छै। खण्ड ३: बाल-नाटक, खण्डकाव्य आ गजल-शिल्प ठेठी-अंगिका: खण्ड ३: बाल-नाटक, खण्डकाव्य आरो गजल-शिल्प मैथिली — पोथीक अन्तिम चरणमे डॉ. अमरेन्द्र अंगिका बाल-साहित्यक किछु अति विशिष्ट आ अभिनव प्रयोगक चर्चा करैत छथि। बाल-नाटक आ बाल-खण्डकाव्य एहन विधा अछि जतय भाषा आ शिल्पक कौशलक कठिन परीक्षा होइत अछि। ठेठी-अंगिका — पोथी के अन्तिम चरण में डॉ. अमरेन्द्र अंगिका बाल-साहित्य के कुछु अति विशिष्ट आरो अभिनव प्रयोगक चर्चा करै छै। बाल-नाटक आरो बाल-खण्डकाव्य एहन विधा छै जहाँ भाषा आरो शिल्प के कौशलक कठिन परीक्षा होय छै। बाल-खण्डकाव्य: 'घटोत्कच' आ 'पंचामृत' ठेठी-अंगिका: बाल-खण्डकाव्य: 'घटोत्कच' आरो 'पंचामृत' मैथिली — डॉ. अमरेन्द्र स्वयं एकटा सिद्धहस्त नाटककार आ खण्डकाव्य रचयिता छथि। हुनकर खण्डकाव्य 'घटोत्कच' महाभारतक वनपर्व पर आधारित अछि। बच्चा सभमे जादुई आ अलौकिक शक्ति (Supernatural powers) वला पात्रक प्रति जे स्वाभाविक आकर्षण होइत अछि, ओकरा लेखक एहि खण्डकाव्यमे पकड़बाक प्रयास केने छथि। 'घटोत्कच' क तीन सर्ग—प्रत्यक्ष, संघर्ष, आ पतन—मे युद्धक आ भीमक पुत्र घटोत्कचक जे भयानक मुदा बाल-आकर्षक रूपक चित्रण अछि, ओ अद्भुत अछि: ठेठी-अंगिका — डॉ. अमरेन्द्र अपने-आप में एगो सिद्धहस्त नाटककार आरो खण्डकाव्य रचयिता छै। हुनकर खण्डकाव्य 'घटोत्कच' महाभारत के वनपर्व पर आधारित छै। बच्चा सभमे जादुई आरो अलौकिक शक्ति (Supernatural powers) वला पात्र के प्रति जे स्वाभाविक आकर्षण होय छै, ओकरा लेखक ई खण्डकाव्य में पकड़बाक प्रयास केने छै। 'घटोत्कच' के तीन सर्ग—प्रत्यक्ष, संघर्ष, आरो पतन— में युद्धक आरो भीमक पुत्र घटोत्कचक जे भयानक मतरकि बाल-आकर्षक रूपक चित्रण छै, ऊ अद्भुत छै: मैथिली — धरती के सब धूल उड़ैले, बोड़ गाछ के तोड़ लगैले; ताड़ गिरैने, नदी उठैले, पर्वत, पानी जकां बहैले; सोनो के बादल रंग करिया, भादो केरो रात अन्हरिया, ठेठी-अंगिका — धरती के सब धूल उड़ैले, बोड़ गाछ के तोड़ लगैले; ताड़ गिरैने, नदी उठैले, पर्वत, पानी जकां बहैले; सोनो के बादल रंग करिया, भादो केरो रात अन्हरिया, मैथिली — एहिमे 'पानी जकां बहैले' आ 'भादो केरो रात अन्हरिया' सन उपमा बाल-मनमे एकटा चित्र (Visual Imagery) प्रस्तुत करैत अछि। ई खण्डकाव्य प्रमाणित करैत अछि जे बाल-साहित्य मात्र हल्लुक विषयक वस्तु नहि अछि; एहिमे महाकाव्यात्मक विस्तारक सेहो क्षमता अछि। ठेठी-अंगिका — ई में 'पानी जकां बहैले' आरो 'भादो केरो रात अन्हरिया' जइसन उपमा बाल-मन में एगो चित्र (Visual Imagery) प्रस्तुत करै छै। ई खण्डकाव्य प्रमाणित करै छै जे बाल-साहित्य मात्र हल्लुक विषय के वस्तु नै छै; ई में महाकाव्यात्मक विस्तार के भी क्षमता छै। मैथिली — 'पंचामृत' पाँच बाल-काव्य रूपकक सङ्ग्रह अछि, जाहिमे 'चोकर के हलुआ', 'अतिथि सेवा', 'आत्मसमर्पण', 'विशाखा', आ 'बुद्धं शरणं गच्छामि' शामिल अछि। ई रूपक सभ बच्चाकेँ नैतिक आ आध्यात्मिक बल प्रदान करबाक लेल रचित अछि। ठेठी-अंगिका — 'पंचामृत' पाँच बाल-काव्य रूपक के सङ्ग्रह छै, जाहि में 'चोकर के हलुआ', 'अतिथि सेवा', 'आत्मसमर्पण', 'विशाखा', आरो 'बुद्धं शरणं गच्छामि' शामिल छै। ई रूपक सिनी बच्चा केेँ नैतिक आरो आध्यात्मिक बल प्रदान करै के लेली रचित छै। बाल-गजलक नवोन्मेष ठेठी-अंगिका: बाल-गजलक नवोन्मेष मैथिली — गजल जकाँ विधा, जे मूलतः फारसी-उर्दू परम्परा सँ आयल अछि आ जकर मिजाज प्रणय आ दर्शनक होइत अछि, ओकरा बाल-साहित्यक साँचामे ढारब एकटा भगीरथ प्रयास अछि। डॉ. अमरेन्द्र आ दिनेश बाबा सन कवि ई असम्भव काज कऽ देखने छथि। दिनेश बाबाक बाल-गजलक एकटा शे'र दृष्टव्य अछि जतय बच्चाक विविध क्रीड़ा आ समाजक विडम्बनाकेँ एकटा धागामे पिरोबल गेल अछि: ठेठी-अंगिका — गजल जेना विधा, जे मूलतः फारसी-उर्दू परम्परा सें आयल छै आरो जकर मिजाज प्रणय आरो दर्शन के होय छै, ओकरा बाल-साहित्य के साँचा में ढारब एगो भगीरथ प्रयास छै। डॉ. अमरेन्द्र आरो दिनेश बाबा जइसन कवि ई असम्भव काज कऽ देखने छै। दिनेश बाबाक बाल-गजलक एगो शे'र दृष्टव्य छै जहाँ बच्चा के विविध क्रीड़ा आरो समाज के विडम्बनाकेँ एगो धागा में पिरोबल गेल छै: मैथिली — गाय गेलै गोसल्ला मे, पानी पी पनसल्ला मे। आँख बन्द, मन चंचल छै, हाथ फेरावै मल्ला मे। ठेठी-अंगिका — गाय गेलै गोसल्ला मे, पानी पी पनसल्ला मे। आँख बन्द, मन चंचल छै, हाथ फेरावै मल्ला मे। मैथिली — एहि बाल-गजलमे ध्वनिक जे तालमेल (Rhyme scheme) अछि—'गोसल्ला', 'पनसल्ला', 'मल्ला'—ओ बाल-मनकेँ अनायास हे अपन सङ्गीतमे डुबा लेबाक क्षमता रखैत अछि। ठेठी-अंगिका — ई बाल-गजल में ध्वनि के जे तालमेल (Rhyme scheme) छै—'गोसल्ला', 'पनसल्ला', 'मल्ला'—ओ बाल-मनकेँ अनायास हे अपन सङ्गीत में डुबा लेबाक क्षमता रखै छै। 14. आधुनिक बाल-कहानी: अभावक ईमानदार इतिहास ठेठी-अंगिका: 14. आधुनिक बाल-कहानी: अभाव के ईमानदार इतिहास मैथिली — पृष्ठ 94 सँ ‘आधुनिक अंगिका बाल-गद्य साहित्य — बाल-कहानी’क चर्चा आरम्भ होइत अछि। एतय लेखकक आलोचनात्मक ईमानदारी विशेष ध्यान खींचैत अछि। आधुनिक बाल-काव्यक विकासक तुलनामे बाल-कहानी पर्याप्त समृद्ध नहि—ई बात पोथी स्वयं स्वीकार करैत अछि। किछु प्रतिष्ठित कथाकार सामान्य कथा-साहित्यमे प्रसिद्ध रहितहुँ बालक लेल नियमित अंगिका कहानीक परम्परा नहि बना सकलाह। लेखक ‘अंगिका बाल-कहानी’ सन संकलनकेँ एहि विधाक व्यवस्थित आरम्भक महत्त्वपूर्ण बिन्दु मानैत छथि। ठेठी-अंगिका — पृष्ठ 94 सें ‘आधुनिक अंगिका बाल-गद्य साहित्य — बाल-कहानी’ के चर्चा आरम्भ होय छै। एतै लेखक के आलोचनात्मक ईमानदारी विशेष ध्यान खींचै छै। आधुनिक बाल-काव्य के विकास के तुलना में बाल-कहानी पर्याप्त समृद्ध नै—ई बात पोथी अपने स्वीकार करै छै। कुछु प्रतिष्ठित कथाकार सामान्य कथा-साहित्य में प्रसिद्ध रहला पर भी बालक लेल नियमित अंगिका कहानी के परम्परा नै बना सकलै। लेखक ‘अंगिका बाल-कहानी’ सन संकलन कें ई विधा के व्यवस्थित आरम्भ के महत्त्वपूर्ण बिन्दु मानै छै। मैथिली — पृष्ठ 97 पर स्पष्ट भाव ई अछि जे सात-आठ कहानी मात्रसँ पूरा बाल-कथा साहित्य समृद्ध नहि भऽ जाइत। ई आत्मालोचना उल्लेखनीय अछि, कारण साहित्येतिहास प्रायः अपन विषयक उपलब्धि बढ़ा-चढ़ा कऽ देखबैत अछि। एतय लेखक कमीकेँ भविष्यक सृजनक चुनौती बनबैत छथि। एहि कारण पोथीक विश्वसनीयता बढ़ैत अछि। ठेठी-अंगिका — पृष्ठ 97 पर स्पष्ट भाव ई छै जे सात-आठ कहानी मात्र सें पूरा बाल-कथा साहित्य समृद्ध नै होय जाय। ई आत्मालोचना उल्लेखनीय छै, कारण साहित्येतिहास प्रायः आपनों विषय के उपलब्धि बढ़ा-चढ़ा करी कें देखावै छै। एतै लेखक कमी कें आगू के सृजन के चुनौती बनावै छै। ई कारण पोथी के विश्वसनीयता बढ़ै छै। मैथिली — उपलब्ध कहानिसभक विषय-विविधता महत्वपूर्ण अछि: बालकक चतुराई, लोककथाक रूपान्तरण, संस्मरण, सामाजिक शिक्षा, विज्ञान, पर्यावरण, पशु-पक्षी आ आधुनिक जीवन। किछु कहानीक अन्त शिक्षाप्रद निष्कर्ष दिस झुकैत अछि; एतय फेर आरम्भिक बाल-मनक कसौटी लागू करबाक आवश्यकता अछि—कथा अपन पात्र, घटना आ तनावसँ जीबैत अछि कि अन्तिम संदेशसँ? ठेठी-अंगिका — उपलब्ध कहानि सिनी के विषय-विविधता महत्वपूर्ण छै: बालक के चतुराई, लोककथा के रूपान्तरण, संस्मरण, सामाजिक शिक्षा, विज्ञान, पर्यावरण, पशु-पक्षी आरो आधुनिक जीवन। कुछु कहानी के अन्त शिक्षाप्रद निष्कर्ष दिस झुकै छै; एतै फेनू आरम्भिक बाल-मन के कसौटी लागू करै के आवश्यकता छै—कथा आपनों पात्र, घटना आरो तनाव सें जीवै छै कि अन्तिम संदेश सें? मैथिली — एहि खण्डक आत्मालोचनात्मक निष्कर्ष महत्त्वपूर्ण अछि। साथहि स्पष्ट अछि जे कहानीक कमजोरीकेँ मात्र रचनाकारक अभावसँ नहि, प्रकाशन-संरचना, बाल-पत्रिका, पाठक-बाजार, विद्यालयीय ग्रहण, चित्र-पुस्तक संस्कृति आ सम्पादन-परम्पराक प्रश्नसँ सेहो जोड़ि देखबाक चाही। साहित्यिक विधा लेखक मात्रसँ नहि, पूरा संस्थागत पारिस्थितिकीसँ विकसित होइत अछि। ठेठी-अंगिका — ई खण्ड के आत्मालोचनात्मक निष्कर्ष महत्त्वपूर्ण छै। संगें साफ छै जे कहानी के कमजोरी कें मात्र रचनाकार के अभाव सें नै, प्रकाशन-संरचना, बाल-पत्रिका, पाठक-बाजार, विद्यालयीय ग्रहण, चित्र-पुस्तक संस्कृति आरो सम्पादन-परम्परा के प्रश्न सें भी जोड़ कें देखै के चाही। साहित्यिक विधा लेखक मात्र सें नै, पूरा संस्थागत पारिस्थितिकी सें विकसित होय छै। 15. बाल-नाटक: पुनर्पाठसँ उभरल अधिक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र ठेठी-अंगिका: 15. बाल-नाटक: पुनर्पाठ सें उभरलों अधिक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र मैथिली — नाटक, निबन्ध आ जीवनीक क्षेत्रकेँ सूक्ष्मतासँ देखला पर पृष्ठ 98–109 क सामग्री स्पष्ट करैत अछि जे निबन्ध-जीवनी निश्चय छोट अन्तिम खण्ड अछि, मुदा बाल-नाटकपर चर्चा पर्याप्त विस्तृत आ आलोचनात्मक अछि। अतः बाल-नाटककेँ स्वतंत्र प्रमुख उपलब्धिक रूपमे स्थान देब आवश्यक अछि। ठेठी-अंगिका — नाटक, निबन्ध आरो जीवनी के क्षेत्र कें सूक्ष्मता सें देखला पर पृष्ठ 98–109 के सामग्री साफ करै छै जे निबन्ध-जीवनी निश्चय छोट अन्तिम खण्ड छै, मतरकि बाल-नाटकपर चर्चा पर्याप्त विस्तृत आरो आलोचनात्मक छै। अतः बाल-नाटक कें स्वतंत्र प्रमुख उपलब्धि के रूप में स्थान दै के जरूरी छै। मैथिली — पृष्ठ 98 सँ बाल-नाटकक उमेर-प्रश्न, शिशु/बाल/किशोर साहित्यक सीमा आ एकांकीक उपयुक्ततापर विचार अछि। लेखकक तर्क व्यवहारिक अछि: बच्चा छोट आकार, गतिशील घटना, संवाद आ मंचीय क्रियासँ सहज जुड़ैत अछि; लम्बा नाटकक अपेक्षा एकांकी विद्यालयीय वा बालमंचपर अधिक उपयोगी भऽ सकैत अछि। ठेठी-अंगिका — पृष्ठ 98 सें बाल-नाटक के उमेर-प्रश्न, शिशु/बाल/किशोर साहित्य के सीमा आरो एकांकी के उपयुक्ततापर विचार छै। लेखक के तर्क व्यवहारिक छै: बच्चा छोट आकार, गतिशील घटना, संवाद आरो मंचीय क्रिया सें सहज जुड़ै छै; लम्बा नाटक के अपेक्षा एकांकी विद्यालयीय वा बालमंचपर अधिक उपयोगी होय कें सकै छै। मैथिली — ‘पंचगव्य’क पाँच एकांकीक विवेचन पृष्ठ 101–105 मे विशेष महत्त्वपूर्ण अछि। सामाजिक परिवर्तन, पुलिस-प्रशासन, अन्धविश्वास-विरोध, वैज्ञानिक दृष्टि, बालिका-शिक्षा, विवाह, ग्रामीण जीवन आदि विषय नाटकीय घटनामे रूपान्तरित कएल गेल अछि। पृष्ठ 105 पर लेखक चरित्रक जीवितपन, विविध आयुवर्ग, ग्रामीण परिवेश, संवाद आ व्यंग्य-विनोदकेँ सफलता मानैत छथि। ई आलोचना केवल कथ्य-सूची नहि; नाटकक शिल्प—पात्र, संवाद, वातावरण—पर वास्तविक ध्यान अछि। ठेठी-अंगिका — ‘पंचगव्य’ के पाँच एकांकी के विवेचन पृष्ठ 101–105 में विशेष महत्त्वपूर्ण छै। सामाजिक परिवर्तन, पुलिस-प्रशासन, अन्धविश्वास-विरोध, वैज्ञानिक दृष्टि, बालिका-शिक्षा, विवाह, ग्रामीण जीवन आदि विषय नाटकीय घटना में रूपान्तरित करलों गेलों छै। पृष्ठ 105 पर लेखक चरित्र के जीवितपन, विविध आयुवर्ग, ग्रामीण परिवेश, संवाद आरो व्यंग्य-विनोद कें सफलता मानै छै। ई आलोचना केवल कथ्य-सूची नै; नाटक के शिल्प—पात्र, संवाद, वातावरण—पर वास्तविक ध्यान छै। मैथिली — पृष्ठ 106 पर ‘निभुहान’क तीन खण्ड-नाटकक चर्चा ध्वनि-प्रदूषण, किशोर मानसिकता, पर्यावरण आ शिक्षा सन विषय सामने अनैत अछि। पृष्ठ 109 धरि रेडियो, गीतिनाट्य आ स्वास्थ्य-सन्दर्भक चर्चा आधुनिक माध्यमक उपस्थिति देखबैत अछि। एहि कारण बाल-नाटक अंगिका बाल-साहित्यक भीतर सामाजिक ज्ञान, सार्वजनिक स्वास्थ्य, पर्यावरण आ मंचीय मनोरञ्जनक संगम बनैत अछि। आगाँक अध्ययनक दू विशेष दिशा होएत—मुद्रित नाटकक वास्तविक मंचन-इतिहास आ पाठ/प्रदर्शनक अन्तर। ठेठी-अंगिका — पृष्ठ 106 पर ‘निभुहान’ के तीन खण्ड-नाटक के चर्चा ध्वनि-प्रदूषण, किशोर मानसिकता, पर्यावरण आरो शिक्षा सन विषय सामने अनै छै। पृष्ठ 109 तक रेडियो, गीतिनाट्य आरो स्वास्थ्य-सन्दर्भ के चर्चा आधुनिक माध्यम के उपस्थिति देखावै छै। ई कारण बाल-नाटक अंगिका बाल-साहित्य के भीतर सामाजिक ज्ञान, सार्वजनिक स्वास्थ्य, पर्यावरण आरो मंचीय मनोरञ्जन के संगम बनै छै। आगू के शोध के दू विशेष दिशा होतै—मुद्रित नाटक के वास्तविक मंचन-इतिहास आरो पाठ/प्रदर्शन के अन्तर। बाल-नाटक आ एकांकी ठेठी-अंगिका: बाल-नाटक आरो एकांकी मैथिली — किशोर अवस्थाक बच्चाकेँ केन्द्रमे राखि कऽ जे नाटक आ एकांकी रचित भेल अछि, ओ समाजक कुरीति, अन्धविश्वास आ शिक्षाक समस्या पर चोट करैत अछि। डॉ. अमरेन्द्रक 'पंचगव्य' सङ्ग्रहमे पाँचटा बाल-एकांकी अछि: ठेठी-अंगिका — किशोर अवस्थाक बच्चा केेँ केन्द्र में राखि कऽ जे नाटक आरो एकांकी लिखलों गेलों छै, ऊ समाज के कुरीति, अन्धविश्वास आरो शिक्षा के समस्या पर चोट करै छै। डॉ. अमरेन्द्र के 'पंचगव्य' सङ्ग्रह में पाँचटा बाल-एकांकी छै: एकांकी आ सामाजिक/नैतिक विषय-वस्तु ठेठी-अंगिका: एकांकी आरो सामाजिक/नैतिक विषय-वस्तु मैथिली — १. करनी-भरनी साथे-साथ — गामक बदलैत मानसिकता आ राजनीतिक स्वार्थ पर व्यंग्य ठेठी-अंगिका — १. करनी-भरनी साथे-साथ — गामक बदलैत मानसिकता आरो राजनीतिक स्वार्थ पर व्यंग्य मैथिली — २. कलयुग रो सत्ता — दहेज प्रथाक विरोध आ नारी सशक्तीकरण ठेठी-अंगिका — २. कलयुग रो सत्ता — दहेज प्रथाक विरोध आरो नारी सशक्तीकरण मैथिली — ३. पुरानो भूत-नया इलाज — अन्धविश्वास आ तन्त्र-मन्त्रक स्थान पर वैज्ञानिक सोच ठेठी-अंगिका — ३. पुरानो भूत-नया इलाज — अन्धविश्वास आरो तन्त्र-मन्त्रक स्थान पर वैज्ञानिक सोच मैथिली — ४. सा विद्या या विमुक्तये — शिक्षाक अभावमे अपराध (डकैती) क बढब आ विद्याक महत्त्व ठेठी-अंगिका — ४. सा विद्या या विमुक्तये — शिक्षा के अभाव में अपराध (डकैती) के बढब आरो विद्याक महत्त्व मैथिली — ५. मुट्ठी मे धूप — नारी-शिक्षा आ बालिकाकेँ स्वावलम्बी बनबाक प्रेरणा ठेठी-अंगिका — ५. मुट्ठी में धूप — नारी-शिक्षा आरो बालिकाकेँ स्वावलम्बी बनै के प्रेरणा मैथिली — समीक्षाक दृष्टिसँ, ई एकांकी सभ बाल-मनकेँ सामाजिक यथार्थ (Social Realism) सँ परिचित करबैत अछि। 'कलयुग रो सत्ता' मे दहेज प्रथा सन सामाजिक व्याधि पर जे प्रहार अछि—जाहिमे नायिका स्वयं विवाह-मण्डप पर अपन दहेज-लोभी होबए वला पतिकेँ हथकड़ी पहिराबइत अछि—ओ किशोरावस्थामे क्रान्तिकारी चेतना (Revolutionary consciousness) जगाबए लेल अतीव समर्थ अछि। ठेठी-अंगिका — समीक्षा के दृष्टि सें, ई एकांकी सिनी बाल-मनकेँ सामाजिक यथार्थ (Social Realism) सें परिचित करावै छै। 'कलयुग रो सत्ता' में दहेज प्रथा जइसन सामाजिक व्याधि पर जे प्रहार छै—जाहि में नायिका अपने विवाह-मण्डप पर अपन दहेज-लोभी होय वला पतिकेँ हथकड़ी पहिराबइत छै—ओ किशोरावस्था में क्रान्तिकारी चेतना (Revolutionary consciousness) जगाबए लेली अतीव समर्थ छै। मैथिली — तेहने, चन्द्रप्रकाश जगप्रियक 'विटामिन सभा' (रेडियो नाटक) आ 'चतुरन के चतुराई' बाल-नाट्य-काव्यक उत्कृष्ट उदाहरण अछि। 'विटामिन सभा' मे बाबा साहेब अम्बेडकरक जीवन पर रचित रूपक, आ 'गुजरैठा' (Centipede) क आत्मकथ्य बच्चाकेँ मनोरंजनक सङ्ग-सङ्ग प्राणिविज्ञानक सूक्ष्म जानकारी सेहो दैत अछि: ठेठी-अंगिका — तेहने, चन्द्रप्रकाश जगप्रियक 'विटामिन सभा' (रेडियो नाटक) आरो 'चतुरन के चतुराई' बाल-नाट्य-काव्यक उत्कृष्ट उदाहरण छै। 'विटामिन सभा' में बाबा साहेब अम्बेडकरक जीवन पर रचित रूपक, आरो 'गुजरैठा' (Centipede) के आत्मकथ्य बच्चा केेँ मनोरंजनक सङ्ग-सङ्ग प्राणिविज्ञानक सूक्ष्म जानकारी भी दै छै: मैथिली — "देखत्है डरी गेलो नी।... अभी ते हमरा सौ गो टांग ही छै, जरा आरो बढ़ें दौ नी, हमरा मे ३८० टांग तक निकली ऐतै..." ठेठी-अंगिका — "देखत्है डरी गेलो नी।... अभी ते हमरा सौ गो टांग ही छै, जरा आरो बढ़ें दौ नी, हमरा मे ३८० टांग तक निकली ऐतै..." मैथिली — एकटा गुजरैठा (Centipede) क संवादक माध्यम सँ ओकर शारीरिक संरचना (३८० टांग धरि) आ ओकर पारिस्थितिकी तंत्रमे महत्वकेँ स्पष्ट करब—ई आधुनिक बाल-नाटकक सबसँ पैघ उपलब्धि अछि। ठेठी-अंगिका — एगो गुजरैठा (Centipede) के संवाद के माध्यम सें ओकर शारीरिक संरचना (३८० टांग तक) आरो ओकर पारिस्थितिकी तंत्र में महत्त्व कें स्पष्ट करब—ई आधुनिक बाल-नाटक के सभसें बड़का उपलब्धि छै। 16. अन्य बाल-साहित्य: निबन्ध, इतिहास, महापुरुष आ जीवनी ठेठी-अंगिका: 16. अन्य बाल-साहित्य: निबन्ध, इतिहास, महापुरुष आरो जीवनी मैथिली — पृष्ठ 109 पर स्पष्ट शीर्षक ‘अन्य बाल-साहित्य (निबंध और जीवनी साहित्य)’ सँ पोथी बाल-साहित्यक परिधि कविता-कथा-नाटकसँ बाहर लऽ जाइत अछि। पृष्ठ 109–111 मे अंगप्रदेशक प्रमुख नगर, महापुरुष, स्वतंत्रता-संग्रामक व्यक्तित्व, भारतक महापुरुष, बुद्ध आदि विषयक बालोपयोगी गद्यक चर्चा अछि। लेखक इतिहास-सांस्कृतिक ज्ञानकेँ बाल-पाठक धरि पहुँचाबयवला साहित्यक रूपमे देखैत छथि। ठेठी-अंगिका — पृष्ठ 109 पर स्पष्ट शीर्षक ‘अन्य बाल-साहित्य (निबंध और जीवनी साहित्य)’ सें पोथी बाल-साहित्य के परिधि कविता-कथा-नाटक सें बाहर लै कें जाय छै। पृष्ठ 109–111 में अंगप्रदेश के प्रमुख नगर, महापुरुष, स्वतंत्रता-संग्राम के व्यक्तित्व, भारत के महापुरुष, बुद्ध आदि विषय के बालोपयोगी गद्य के चर्चा छै। लेखक इतिहास-सांस्कृतिक ज्ञान कें बाल-पाठक तक पहुँचावै वाला साहित्य के रूप में देखै छै। मैथिली — एहि सामग्रीक मूल्याङ्कन लेल कथा वा कविता जकाँ कसौटी पर्याप्त नहि। ज्ञान-साहित्यमे तथ्यक विश्वसनीयता, चयन, भाषा-सरलता, सन्दर्भ, चित्र, कालक्रम आ जिज्ञासा जगाबयक क्षमता महत्त्वपूर्ण अछि। पोथी विशेष रूपेँ चित्र/व्यक्तित्व-परिचयक बाल-रुचि बढ़ाबयवला भूमिकापर ध्यान दैत अछि। एहि अर्थमे ई खण्ड बाल-साहित्य आ बाल-शिक्षाक सीमा-प्रदेशमे अछि। ठेठी-अंगिका — ई सामग्री के मूल्याङ्कन लेल कथा वा कविता जेना कसौटी पर्याप्त नै। ज्ञान-साहित्य में तथ्य के विश्वसनीयता, चयन, भाषा-सरलता, सन्दर्भ, चित्र, कालक्रम आरो जिज्ञासा जगावै के क्षमता महत्त्वपूर्ण छै। पोथी विशेष रूपेँ चित्र/व्यक्तित्व-परिचय के बाल-रुचि बढ़ावै वाला भूमिकापर ध्यान दै छै। ई अर्थ में ई खण्ड बाल-साहित्य आरो बाल-शिक्षा के सीमा-प्रदेश में छै। मैथिली — एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्तिक प्रश्न उठैत अछि: की बालक लेल लिखल प्रत्येक इतिहास वा जीवनी बाल-साहित्य अछि? केवल बालक लक्ष्य पाठक होएब पर्याप्त नहि; भाषा, संरचना, कथा-गति, दृश्य सामग्री, प्रश्न-जिज्ञासा, आयु-स्तर आ साहित्यिक प्रस्तुति निर्णायक बनैत अछि। पोथी एहि प्रश्नकेँ पूर्ण सिद्धान्तक रूपमे विकसित नहि करैत, मुदा सामग्री उपलब्ध करबैत अछि। निबन्ध-जीवनीक ई विधागत विस्तार स्थानीय सांस्कृतिक ज्ञानक पाठ्य-विश्वकेँ अधिक स्पष्ट करैत अछि। ठेठी-अंगिका — एगो महत्त्वपूर्ण सिद्धान्तिक प्रश्न उठै छै: की बालक लेल लिखलों प्रत्येक इतिहास वा जीवनी बाल-साहित्य छै? केवल बालक लक्ष्य पाठक होब पर्याप्त नै; भाषा, संरचना, कथा-गति, दृश्य सामग्री, प्रश्न-जिज्ञासा, आयु-स्तर आरो साहित्यिक प्रस्तुति निर्णायक बनै छै। पोथी ई प्रश्न कें पूर्ण सिद्धान्त के रूप में विकसित नै करै, मतरकि सामग्री उपलब्ध करावै छै। निबन्ध-जीवनी के ई विधागत विस्तार स्थानीय सांस्कृतिक ज्ञान के पाठ्य-विश्व कें अधिक साफ करै छै। 17. भाषा आ आलोचनात्मक शैली: अंगिका सामग्री, हिन्दी विवेचन ठेठी-अंगिका: 17. भाषा आरो आलोचनात्मक शैली: अंगिका सामग्री, हिन्दी विवेचन मैथिली — ग्रन्थक एक विशिष्ट भाषिक संरचना अछि: रचनात्मक उदाहरण, शीर्षक, गीत, कथा-संवाद आ मूल साहित्यिक संसार अंगिकामे अछि, जखन आलोचनात्मक व्याख्या प्रायः हिन्दी गद्यक माध्यमेँ चलैत अछि। एहि कारण पोथी एक प्रकारक द्विभाषिक आलोचनात्मक दस्तावेज बनैत अछि। ठेठी-अंगिका — ग्रन्थ के एक विशिष्ट भाषिक संरचना छै: रचनात्मक उदाहरण, शीर्षक, गीत, कथा-संवाद आरो मूल साहित्यिक संसार अंगिका में छै, जबें आलोचनात्मक व्याख्या प्रायः हिन्दी गद्य के माध्यम सें चलै छै। ई कारण पोथी एक प्रकार के द्विभाषिक आलोचनात्मक दस्तावेज बनै छै। मैथिली — एहि व्यवस्थाक लाभ अछि। हिन्दी माध्यमेँ व्यापक पाठक, विश्वविद्यालयीय शोधक वा अंगिका पूर्ण रूपेँ नहि पढ़यवला व्यक्ति सेहो साहित्यिक इतिहासक रूपरेखा बुझि सकैत अछि। मुदा एक सांस्कृतिक प्रश्न सेहो अछि: जँ सृजनक भाषा अंगिका अछि, तखन ओकर सौन्दर्यशास्त्र, आलोचनात्मक शब्दावली आ साहित्येतिहासक भाषा स्वयं अंगिकामे कतेक विकसित हो? भविष्यक अंगिका संस्करण स्थानीय आलोचना-भाषाक स्वायत्तता बढ़ा सकैत अछि। ठेठी-अंगिका — ई व्यवस्था के लाभ छै। हिन्दी माध्यम सें व्यापक पाठक, विश्वविद्यालयीय शोध के वा अंगिका पूर्ण रूपेँ नै पढ़ै वाला व्यक्ति भी साहित्यिक इतिहास के रूपरेखा बुझ कें सकै छै। मतरकि एक सांस्कृतिक प्रश्न भी छै: जों सृजन के भाषा अंगिका छै, तबें ओकर सौन्दर्यशास्त्र, आलोचनात्मक शब्दावली आरो साहित्येतिहास के भाषा अपने अंगिका में कत्तें विकसित हो? आगू के अंगिका संस्करण स्थानीय आलोचना-भाषा के स्वायत्तता बढ़ा सकै छै। मैथिली — शैली सामान्यतः सरल, परिचयात्मक आ उदाहरण-समृद्ध अछि। सिद्धान्तक भारी शब्दावली नहि; एहि कारण सामान्य पाठक लेल पहुँच सहज। मुदा शोधक दृष्टिसँ कतेको ठाम कृति/लेखक/विषयक विवरण अधिक, गहन पाठालोचन कम। छन्द, बिम्ब, कथानक, कथावाचक, पात्र-विकास, हास्य, पाठकीय प्रतिक्रिया, आयु-उपयुक्तता, लिंग-वर्गीय प्रतिनिधित्व, चित्र-पाठ सम्बन्ध—एहि सभक समान पद्धतिसँ विश्लेषण कएल जाए तँ आलोचना आरो गहन होएत। ठेठी-अंगिका — शैली सामान्यतः सरल, परिचयात्मक आरो उदाहरण-समृद्ध छै। सिद्धान्त के भारी शब्दावली नै; ई कारण सामान्य पाठक लेल पहुँच सहज। मतरकि शोध के दृष्टि सें कईगो जगह कृति/लेखक/विषय के विवरण अधिक, गहन पाठालोचन कम। छन्द, बिम्ब, कथानक, कथावाचक, पात्र-विकास, हास्य, पाठकीय प्रतिक्रिया, आयु-उपयुक्तता, लिंग-वर्गीय प्रतिनिधित्व, चित्र-पाठ सम्बन्ध—ई सब के एके पद्धति सें विश्लेषण करलों जाए तें आलोचना आरो गहन होतै। मैथिली — एहि सीमाकेँ लेखकक विद्वत्ताक अभाव न मानि ग्रन्थक उद्देश्यक प्रकाशमे देखबाक चाही। ई पोथी पहिले क्षेत्रक नक्शा तैयार करैत अछि; प्रत्येक कृतिक सम्पूर्ण सौन्दर्यशास्त्रीय विश्लेषण ओकर एकल उद्देश्य नहि। तें एहि पर अगिला आलोचकक दायित्व बनैत अछि जे लेखकक संकलित corpus पर विभिन्न आधुनिक पद्धति लागू करय। ठेठी-अंगिका — ई सीमा कें लेखक के विद्वत्ता के अभाव न मान कें ग्रन्थ के उद्देश्य के प्रकाश में देखै के चाही। ई पोथी पहिले क्षेत्र के नक्शा तैयार करै छै; प्रत्येक कृति के सम्पूर्ण सौन्दर्यशास्त्रीय विश्लेषण ओकर एकल उद्देश्य नै। तें ई पर आगू के आलोचक के दायित्व बनै छै जे लेखक के संकलित corpus पर विभिन्न आधुनिक पद्धति लागू करै। 18. सन्दर्भ-सूची आ पत्रिका-संसार: पोथी एक साहित्यिक अभिलेख ठेठी-अंगिका: 18. सन्दर्भ-सूची आरो पत्रिका-संसार: पोथी एक साहित्यिक अभिलेख मैथिली — पृष्ठ 112–114 क सन्दर्भ-खण्ड ग्रन्थक मूल्य बुझबाक लेल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि। लगभग 52 क्रमांकित पुस्तक/स्रोतक सूची तथा दसक आसपास पत्रिकाक नाम—बालगीत, पहेली, कथा, उपन्यास, नाटक, अनुवाद, जीवनी, आलोचना आ पत्रिका—मिलि एक पूरा साहित्यिक परिसंचरण देखबैत अछि। ‘ढोल बजै छै ढम्मक ढम’, ‘बुतरू के तुतरू’, ‘बाजै बीन बजावै तीन’, ‘तुक्तक-मुक्तक’, ‘पंचगव्य’, ‘बण्टा’, ‘अंगिका बालगीत’, ‘अंगिका बालकहानी’ आदि अनेक कृति एहि bibliographic संसारक हिस्सा अछि। ठेठी-अंगिका — पृष्ठ 112–114 के सन्दर्भ-खण्ड ग्रन्थ के मूल्य बुझै के लेल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण छै। लगभग 52 क्रमांकित पुस्तक/स्रोत के सूची तथा दस के आसपास पत्रिका के नाम—बालगीत, पहेली, कथा, उपन्यास, नाटक, अनुवाद, जीवनी, आलोचना आरो पत्रिका—मिली कें एक पूरा साहित्यिक परिसंचरण देखावै छै। ‘ढोल बजै छै ढम्मक ढम’, ‘बुतरू के तुतरू’, ‘बाजै बीन बजावै तीन’, ‘तुक्तक-मुक्तक’, ‘पंचगव्य’, ‘बण्टा’, ‘अंगिका बालगीत’, ‘अंगिका बालकहानी’ आदि अनेक कृति ई bibliographic संसार के हिस्सा छै। मैथिली — ई सूची पोथीकेँ निजी स्मरण वा आत्मप्रशंसा-मात्र होएबसँ रोकैत अछि। पाठक देख सकैत अछि जे इतिहास अनेक पुस्तक, संकलन, अनुवाद, पत्रिका आ लेखकक जालपर आधारित अछि। छोट भाषिक साहित्यक अध्ययनमे एहि प्रकारक bibliography स्वयं शोध-उपकरण अछि, कारण कतेको स्रोत सामान्य राष्ट्रीय पुस्तक-सूचिमे सहज नहि भेटैत। ठेठी-अंगिका — ई सूची पोथी कें निजी स्मरण वा आत्मप्रशंसा-मात्र होएब सें रोकै छै। पाठक देख सकै छै जे इतिहास अनेक पुस्तक, संकलन, अनुवाद, पत्रिका आरो लेखक के जालपर आधारित छै। छोट भाषिक साहित्य के अध्ययन में ई प्रकार के bibliography अपने शोध-उपकरण छै, कारण कईगो स्रोत सामान्य राष्ट्रीय पुस्तक-सूचि में सहज नै भेटै। मैथिली — तथापि bibliographic मानकीकरण आवश्यक अछि। सभ प्रविष्टिमे प्रकाशन-वर्ष, संस्करण, पृष्ठ-संख्या, प्रकाशन-स्थान, ISBN वा सम्पादक-भूमिका समान रूपेँ नहि देल गेल अछि। अगिला संस्करणमे एक मानक शैलीक अनुसार पूर्ण सन्दर्भ, साथे लेखक-सूची, शीर्षक-सूची, विधा-सूची आ वर्ष-क्रम देल जाए तँ पोथी शोधक लेल बहुत अधिक सक्षम होएत। ठेठी-अंगिका — तथापि bibliographic मानकीकरण आवश्यक छै। सिनी प्रविष्टि में प्रकाशन-वर्ष, संस्करण, पृष्ठ-संख्या, प्रकाशन-स्थान, ISBN वा सम्पादक-भूमिका समान रूपेँ नै देलों गेलों छै। आगू के संस्करण में एक मानक शैली के अनुसार पूर्ण सन्दर्भ, साथे लेखक-सूची, शीर्षक-सूची, विधा-सूची आरो वर्ष-क्रम देलों जाए तें पोथी शोध के लेल बहुत अधिक सक्षम होतै। मैथिली — भारतवाणी पर मूल ‘अंगिका बाल-साहित्य’ (2022) संग 2021 क श्वेता रानीक ‘डॉ. अमरेन्द्र का अंगिका बाल साहित्य’ आ अभिनन्दन-संपादित ‘डॉ. अमरेन्द्र ग्रंथावली (खण्ड-1): अंगिका बालगीत समग्र’ सूचीबद्ध अछि। एहि सन्निकट प्रकाशन-समूहसँ स्पष्ट अछि जे 2021–22 धरि अमरेन्द्रक बाल-साहित्य स्वयं आलोचना, सम्पादन आ इतिहास-लेखनक एक केन्द्र बनि चुकल छल। ठेठी-अंगिका — भारतवाणी पर मूल ‘अंगिका बाल-साहित्य’ (2022) संग 2021 के श्वेता रानी के ‘डॉ. अमरेन्द्र का अंगिका बाल साहित्य’ आरो अभिनन्दन-संपादित ‘डॉ. अमरेन्द्र ग्रंथावली (खण्ड-1): अंगिका बालगीत समग्र’ सूचीबद्ध छै। ई सन्निकट प्रकाशन-समूह सें स्पष्ट छै जे 2021–22 तक अमरेन्द्र के बाल-साहित्य अपने आलोचना, सम्पादन आरो इतिहास-लेखन के एक केन्द्र बनी चुकलों छेलै। 19. लेखक स्वयं रचनाकार: भीतरक साक्ष्य आ चयनक प्रश्न ठेठी-अंगिका: 19. लेखक अपने रचनाकार: भीतर के साक्ष्य आरो चयन के प्रश्न मैथिली — डॉ. अमरेन्द्र एहि इतिहासक बाहरी निरीक्षक नहि; ओ स्वयं कवि, बालगीतकार, उपन्यासकार, नाटककार, आलोचक आ सांस्कृतिक कार्यकर्ता छथि। बाहरी लेखक-सूची हुनक ‘ढोल बजै छै ढम्मक ढम’, ‘पंचगव्य’, ‘बुतरू के तुतरू’, ‘बाजै बीन बजावै तीन’, ‘एक छड़ी पर अंडा नाचै’, ‘बण्टा’ आदि कृतिसभक स्वतंत्र प्रकाशन-उपस्थिति दर्ज करैत अछि। एहि कारण पोथी इतिहासकारक किताब आ सर्जकक आत्म-साक्ष्य—दुनू अछि। ठेठी-अंगिका — डॉ. अमरेन्द्र ई इतिहास के बाहरी निरीक्षक नै; ओ अपने कवि, बालगीतकार, उपन्यासकार, नाटककार, आलोचक आरो सांस्कृतिक कार्यकर्ता छै। बाहरी लेखक-सूची हुनकर ‘ढोल बजै छै ढम्मक ढम’, ‘पंचगव्य’, ‘बुतरू के तुतरू’, ‘बाजै बीन बजावै तीन’, ‘एक छड़ी पर अंडा नाचै’, ‘बण्टा’ आदि कृति सिनी के स्वतंत्र प्रकाशन-उपस्थिति दर्ज करै छै। ई कारण पोथी इतिहासकार के किताब आरो सर्जक के आत्म-साक्ष्य—दुनू छै। मैथिली — भीतरक साक्ष्यक लाभ बहुत अछि। लेखककेँ दुर्लभ पुस्तक, पत्रिका, प्रकाशन-परिस्थिति, समकालीन लेखक आ साहित्यिक संस्थासभक सीधा ज्ञान अछि। अनेक अल्पप्रचलित कृतिक नाम शायद एहन भीतरक नेटवर्क बिना इतिहासमे नहि अबैत। मुदा साक्षी स्वयं घटनाक सहभागी अछि, तें दृष्टिकोणक स्थान सेहो पहिचानल जाए। ठेठी-अंगिका — भीतर के साक्ष्य के लाभ बहुत छै। लेखक कें दुर्लभ पुस्तक, पत्रिका, प्रकाशन-परिस्थिति, समकालीन लेखक आरो साहित्यिक संस्था सिनी के सीधा ज्ञान छै। अनेक अल्पप्रचलित कृति के नाम शायद एहन भीतर के नेटवर्क बिना इतिहास में नै आवै। मतरकि साक्षी अपने घटना के सहभागी छै, तें दृष्टिकोण के स्थान भी पहिचानल जाए। मैथिली — लेखकक अपन कृतिसभक संख्या आ विस्तार अधिक होएब आवश्यक रूपेँ अनुचित नहि—जँ वास्तविक corpus मे हुनक योगदान पैघ अछि। बाहरी स्रोत आधुनिक अंगिका बाल-काव्यमे हुनक बहु-कृति उपस्थितिक पुष्टि करैत अछि। तथापि भविष्यक स्वतंत्र इतिहासकेँ सभ प्रमुख रचनाकार लेल समान प्रश्न पूछबाक चाही: कुल कृति, प्रकाशन-वर्ष, पाठक-ग्रहण, पुनर्मुद्रण, विधागत नवाचार, भाषा, शिल्प आ बाल-पाठकीयता। अतः निष्कर्ष आरोप नहि, पद्धतिगत सावधानी अछि: आत्मसाक्ष्यक लाभ स्वीकार करू, संगहि स्वतंत्र bibliographic verification आ comparative corpus तैयार करू। ठेठी-अंगिका — लेखक के आपनों कृति सिनी के संख्या आरो विस्तार अधिक होब आवश्यक रूपेँ अनुचित नै—जों वास्तविक corpus में हुनकर योगदान बड़का छै। बाहरी स्रोत आधुनिक अंगिका बाल-काव्य में हुनकर बहु-कृति उपस्थिति के पुष्टि करै छै। तथापि आगू के स्वतंत्र इतिहास कें सिनी प्रमुख रचनाकार लेल समान प्रश्न पूछै के चाही: कुल कृति, प्रकाशन-वर्ष, पाठक-ग्रहण, पुनर्मुद्रण, विधागत नवाचार, भाषा, शिल्प आरो बाल-पाठकीयता। अतः निष्कर्ष आरोप नै, पद्धतिगत सावधानी छै: आत्मसाक्ष्य के लाभ स्वीकार करू, संगें स्वतंत्र bibliographic verification आरो comparative corpus तैयार करू। 20. पुस्तक, पत्रिका, संग्रह आ डिजिटल पुनरुपस्थिति: संस्थागत पारिस्थितिकी ठेठी-अंगिका: 20. पुस्तक, पत्रिका, संग्रह आरो डिजिटल पुनरुपस्थिति: संस्थागत पारिस्थितिकी मैथिली — पोथी पढ़ैत स्पष्ट होइत अछि जे साहित्य केवल लेखक लिखलनि आ पाठक पढ़लनि—ई दू-बिन्दु व्यवस्था नहि। पत्रिका, सम्पादित संकलन, साहित्यिक संस्था, प्रकाशक, अनुवादक, विद्यालयीय उपयोग, रेडियो/मंच आ बादमे डिजिटल भण्डार—ई सभ मिलि बाल-साहित्यक पारिस्थितिकी बनबैत अछि। पृष्ठ 112–114 क पुस्तक/पत्रिका सूची एहि नेटवर्कक ठोस प्रमाण अछि। ठेठी-अंगिका — पोथी पढ़ै स्पष्ट होय छै जे साहित्य केवल लेखक लिखै छै आरो पाठक पढ़ै छै—ई दू-बिन्दु व्यवस्था नै। पत्रिका, सम्पादित संकलन, साहित्यिक संस्था, प्रकाशक, अनुवादक, विद्यालयीय उपयोग, रेडियो/मंच आरो बाद में डिजिटल भण्डार—ई सिनी मिली कें बाल-साहित्य के पारिस्थितिकी बनावै छै। पृष्ठ 112–114 के पुस्तक/पत्रिका सूची ई नेटवर्क के ठोस प्रमाण छै। मैथिली — उपलब्ध बाहरी स्रोत एहि परिसंचरणक आधुनिक रूप देखबैत अछि। भारतवाणी मूल पोथी तथा सम्बन्धित अध्ययन/ग्रंथावलीकेँ सरकारी भाषा-ज्ञान पोर्टलपर सूचीबद्ध करैत अछि। Kavita Kosh ‘तुक्तक मुक्तक’ केँ ई-पुस्तक/बाल-कविता वर्गमे राखैत अछि, Gadya Kosh पर ‘बण्टा’क अंगिका पाठक भाग उपलब्ध अछि। ई डिजिटल पुनरुपस्थिति देखबैत अछि जे मुद्रित अंगिका बाल-साहित्य नब पाठकीय माध्यममे प्रवेश करि रहल अछि। ठेठी-अंगिका — उपलब्ध बाहरी स्रोत ई परिसंचरण के आधुनिक रूप देखावै छै। भारतवाणी मूल पोथी तथा सम्बन्धित अध्ययन/ग्रंथावली कें सरकारी भाषा-ज्ञान पोर्टलपर सूचीबद्ध करै छै। Kavita Kosh ‘तुक्तक-मुक्तक’ कें ई-पुस्तक/बाल-कविता वर्ग में राखै छै, Gadya Kosh पर ‘बण्टा’ के अंगिका पाठक भाग उपलब्ध छै। ई डिजिटल पुनरुपस्थिति देखावै छै जे मुद्रित अंगिका बाल-साहित्य नब पाठकीय माध्यम में प्रवेश करी कें रहल छै। मैथिली — ग्रन्थ 2022 धरि इतिहास लिखैत अछि; डिजिटल अध्ययनक क्षेत्र तकर बाद आरो बढ़ि सकैत अछि। आगाँक अध्ययनमे ई प्रश्न उठाओल जा सकैत अछि: कोन कृति digitize भेल? कोन audio रूपमे अछि? विद्यालय/घरमे के पढ़ैत अछि? बालक मोबाइल पर मातृभाषा सामग्री कोना ग्रहण करैत अछि? पुरान खेलगीत डिजिटल वीडियोमे बदलला पर प्रदर्शन-परम्परा बचैत अछि कि नब रूप लैत अछि? एहि अर्थमे ‘अंगिका बाल-साहित्य’ अतीतक catalogue मात्र नहि, 2022 बादक परिवर्तन मापबाक baseline सेहो अछि। ठेठी-अंगिका — ग्रन्थ 2022 तक इतिहास लिखै छै; डिजिटल अध्ययन के क्षेत्र तकर बाद आरो बढ़ि सकै छै। नब शोध कें पूछै के चाही: कोन कृति digitize होलै? कोन audio रूप में छै? विद्यालय/घर में के पढ़ै छै? बालक मोबाइल पर मातृभाषा सामग्री केना ग्रहण करै छै? पुरान खेलगीत डिजिटल वीडियो में बदलला पर प्रदर्शन-परम्परा बचै छै कि नब रूप लै छै? ई अर्थ में ‘अंगिका बाल-साहित्य’ अतीत के catalogue मात्र नै, 2022 बाद के परिवर्तन मापै के baseline भी छै। 21. भारतीय आ अन्तरराष्ट्रीय बाल-साहित्य-अध्ययनसँ तुलनात्मक संवाद ठेठी-अंगिका: 21. भारतीय आरो अन्तरराष्ट्रीय बाल-साहित्य-अध्ययन सें तुलनात्मक संवाद मैथिली — डॉ. अमरेन्द्रक पोथी पश्चिमी सिद्धान्तक अनुकरण करबाक उद्देश्यसँ नहि लिखल गेल अछि, आ ओकर मूल्य ताहिमे नहि खोजल जाए। तथापि तुलनात्मक अध्ययनसँ ओकर मौलिक बिन्दु स्पष्ट होइत अछि। Hans-Heino Ewers बाल-साहित्यक वर्गीकरण, बालोपयुक्तता, पाठकक आवश्यकता आ मूल्यक अनुकूलनक प्रश्न उठबैत छथि। मूल पोथीक पृष्ठ 8–9 बाल-मन, कल्पना, तर्क, जिद, लय, चित्र आ अप्रत्यक्ष संदेशकेँ जे महत्त्व दैत अछि, से एहि child-oriented दृष्टिसँ सहज संवाद करैत अछि। ठेठी-अंगिका — डॉ. अमरेन्द्र के पोथी पश्चिमी सिद्धान्त के अनुकरण करै के उद्देश्य सें नै लिखलों गेलों छै, आरो ओकर मूल्य ताहि में नै खोजल जाए। तथापि तुलनात्मक अध्ययन सें ओकर मौलिक बिन्दु स्पष्ट होय छै। Hans-Heino Ewers बाल-साहित्य के वर्गीकरण, बालोपयुक्तता, पाठक के आवश्यकता आरो मूल्य के अनुकूलन के प्रश्न उठावै छै। मूल पोथी के पृष्ठ 8–9 बाल-मन, कल्पना, तर्क, जिद, लय, चित्र आरो अप्रत्यक्ष संदेश कें जे महत्त्व दै छै, से ई child-oriented दृष्टि सें सहज संवाद करै छै। मैथिली — Kimberley Reynolds बाल-साहित्यक इतिहासमे शिक्षामूलक आरम्भ, बादमे विविध विधा, मौखिक परम्परासँ पीढ़ीक साहित्यिक दीक्षा, आ समाजक मूल्य/भविष्यक कल्पनासँ सम्बन्धक चर्चा करैत छथि। अंगिका सामग्रीमे सेहो लोरी-तुक्तक-खेलगीतसँ नैतिक कथा, प्रकृति, विज्ञान, पर्यावरण, स्वास्थ्य आ सामाजिक विषय धरि विस्तार भेटैत अछि। ई समानता ई सिद्ध नहि करैत जे अंगिका विकास कोनो बाहरी मॉडल अनुसरण करैत अछि; मात्र ई देखबैत अछि जे बाल-साहित्यक किछु मूल प्रश्न—आनन्द बनाम शिक्षा, बालक बनाम वयस्क मध्यस्थ, मौखिकता बनाम मुद्रण, उपयुक्तता बनाम साहित्यिक स्वतन्त्रता—अनेक भाषिक संस्कृतिमे पुनः प्रकट होइत अछि। ठेठी-अंगिका — Kimberley Reynolds बाल-साहित्य के इतिहास में शिक्षामूलक आरम्भ, बाद में विविध विधा, मौखिक परम्परा सें पीढ़ी के साहित्यिक दीक्षा, आरो समाज के मूल्य/आगू के कल्पना सें सम्बन्ध के चर्चा करै छै। अंगिका सामग्री में भी लोरी-तुक्तक-खेलगीत सें नैतिक कथा, प्रकृति, विज्ञान, पर्यावरण, स्वास्थ्य आरो सामाजिक विषय तक विस्तार भेटै छै। ई समानता ई सिद्ध नै करै जे अंगिका विकास कोनो बाहरी मॉडल अनुसरण करै छै; मात्र ई देखावै छै जे बाल-साहित्य के कुछु मूल प्रश्न—आनन्द बनाम शिक्षा, बालक बनाम वयस्क मध्यस्थ, मौखिकता बनाम मुद्रण, उपयुक्तता बनाम साहित्यिक स्वतन्त्रता—अनेक भाषिक संस्कृति में पुनः प्रकट होय छै। मैथिली — भारतीय भाषिक तुलना लेल मैथिली, हिन्दी, बंगला, भोजपुरी, मगही आदि बाल-परम्परासँ समान विधागत प्रश्न उठाओल जा सकैत अछि, मुदा बिना समर्पित corpus तुलनात्मक श्रेष्ठता वा प्रभावक दावा उचित नहि। आगाँक तुलनात्मक अध्ययनक सही पद्धति होएत—एके विधा, जइसे लोरी, पहेली, खेलगीत वा बालकथा, लेल समान कालखंड आ समान कसौटी पर समांतर भाषिक corpus बनब। छोट भाषा वा सहभाषाक साहित्यक मूल्य साबित करबाक नामपर अतिरंजना इतिहासक सेवा नहि करैत; ‘अंगिका बाल-साहित्य’क वास्तविक स्रोत-सम्पदा स्वयं पर्याप्त अछि। ठेठी-अंगिका — भारतीय भाषिक तुलना लेल मैथिली, हिन्दी, बंगला, भोजपुरी, मगही आदि बाल-परम्परा सें समान विधागत प्रश्न उठावलों जाय सकै छै, मतरकि बिना समर्पित corpus तुलनात्मक श्रेष्ठता वा प्रभाव के दावा उचित नै। आगू के शोध के सही पद्धति होतै—एके विधा, जइसे लोरी, पहेली, खेलगीत वा बालकथा, लेल समान कालखंड आरो समान कसौटी पर समांतर भाषिक corpus बनब। छोट भाषा वा सहभाषा के साहित्य के मूल्य साबित करै के नामपर अतिरंजना इतिहास के सेवा नै करै; ‘अंगिका बाल-साहित्य’ के वास्तविक स्रोत-सम्पदा अपने पर्याप्त छै। चतुर्आयामी समीक्षा : रस-ध्वनि-वक्रोक्ति, पाश्चात्य सिद्धान्त, नव्य-न्याय आ समान्तर-इतिहास ठेठी-अंगिका: चतुर्आयामी समीक्षा प्रथम आयाम: रस-ध्वनि-वक्रोक्ति (भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टि) ठेठी-अंगिका: पहिलों आयाम : रस-ध्वनि-वक्रोक्ति (भारतीय काव्यशास्त्र के नजर) मैथिली — रस-विचार: बाल-साहित्यक अधिष्ठातृ रस वात्सल्य थिक। तेल-मालिश आ खान-पानक गीतमे शिशु आलम्बन-विभाव, माताक स्पर्श-चेष्टा उद्दीपन-विभाव, आ ‘नुनू मोटाय जाय’, ‘बढ़ौं लप-लप’ सन पद अनुभाव-रूपें वात्सल्यक परिपाक करैत अछि। लेखक (चाहे शास्त्रीय पारिभाषिकता बिना) एहि रस-व्यवस्था केँ प्रसंगानुसार सजाकए अनजानहिं रस-सिद्धान्तक व्यावहारिक प्रयोग करैत छथि। ठेठी-अंगिका — रस के नजर सें : बाल-साहित्य के मुखिया रस वात्सल्य छै। तेल-मालिश आरो खाना-पीना के गीत में सिसु आलम्बन-विभाव, माय के छू-छू-चेष्टा उद्दीपन-विभाव, आरो ‘नुनू मोटाय जाय’, ‘बढ़ौं लप-लप’ जइसन पद अनुभाव के रूप में वात्सल्य के पकाबै छै। लेखक (चाहे शास्त्रीय पारिभाषिकता बिना) एहि रस-व्यवस्था के परसंग के हिसाब सें सजा कें अनजानहिं रस-सिद्धान्त के व्यवहार करी दै छै। मैथिली — ध्वनि-विचार: लेखकक ई कथन जे ‘संदेश व्यंजनामे उभरैत अछि, अभिधामे नहि’—ई आनन्दवर्धनक ध्वनि-सिद्धान्तक ठेठ अंगिका-रूपान्तर थिक। तुक्तक-काव्यक निरर्थक-प्रतीत शब्द वस्तुतः शब्द-शक्तिमूलक ध्वनि—अर्थक अपेक्षा नाद-सौन्दर्यक व्यंजना। बुझौवलमे अर्थ-ध्वनि (उत्तर व्यंग्य रूपमे स्फुरित होइत अछि), आ ‘सोन चिरैया’क वर्षा-आनयनकारी सोन-पक्षीमे वस्तु-ध्वनि (सूखल जीवनमे आशा आ नवजीवनक व्यंजना) प्रकट होइत अछि। ठेठी-अंगिका — ध्वनि के नजर सें : लेखक के ई बात कि ‘संदेस व्यंजना में उभरै छै, अभिधा में नै’—ई आनन्दवर्धन के ध्वनि-सिद्धान्त के ठेठ अंगिका-रूपान्तर छै। तुक्तक-काव्य के बेमतलब जइसन लागै वाला सबद असल में सबद-सक्ति वाला ध्वनि छै—अरथ सें बेसी नाद के सुन्नरता के व्यंजना। बुझौवल में अर्थ-ध्वनि (जबाब व्यंग्य के रूप में फुरै छै), आरो ‘सोन चिरैया’ के बरखा-लानै वाला सोन-पंछी में वस्तु-ध्वनि (सुखलों जिनगी में आस आरो नया-जीवन के व्यंजना) उभरै छै। मैथिली — वक्रोक्ति-विचार: बुझौवल कुन्तकक वक्रोक्तिक शुद्धतम रूप थिक। ‘फरैं नै फूलै’ सन निषेध-मुखी पहेली पद-वक्रता (शब्द-स्तरीय वैचित्र्य) थिक; ‘एक सङ दू साथी’ वाक्य-वक्रता; आ हड़ियाक स्वगत-कथन प्रकरण-प्रबन्ध-वक्रता, जतय समस्त कथन-भंगिमा वक्र भ’ आत्म-कथा बनि जाइत अछि। एतय भारतीय वक्रोक्ति स्वयंसिद्ध रूपें अंगिका लोक-प्रतिभामे मूर्त अछि। ठेठी-अंगिका — वक्रोक्ति के नजर सें : बुझौवल कुन्तक के वक्रोक्ति के सबसें सुथरा रूप छै। ‘फरैं नै फूलै’ जइसन निषेध-मुँहका पहेली पद-वक्रता (सबद-स्तर के वैचित्र्य) छै; ‘एक सङ दू साथी’ वाक्य-वक्रता; आरो हड़िया के स्वगत-कथन प्रकरण-प्रबन्ध-वक्रता, जहाँ पूरा कहै के भंगिमा वक्र होय कें आत्म-कथा बनी जाय छै। एहिजा भारतीय वक्रोक्ति अपने-आप अंगिका लोक-परतिभा में मूरत छै। मैथिली — वक्रोक्ति-विस्तार: कुन्तकक ‘वक्रोक्तिजीवित’मे छह प्रकारक वक्रता (वक्रता-वैचित्र्य) मानल गेल अछि, आ ओ छहो एहि लोक-सामग्रीमे स्तर-स्तर पर साक्षात् भेटैत अछि। (१) वर्ण-विन्यास-वक्रता—वर्ण-योजनाक चारुता, जे ‘चप-चप’, ‘लप-लप’, ‘टूमुक ठुमुक’ सन अनुप्रास-मय नाद-सौन्दर्यमे प्रकट; इएह तुक्तक-काव्यक प्राण थिक। (२) पद-पूर्वार्ध-वक्रता—पदक मूल (प्रातिपदिक)क चयनमे वैचित्र्य, जे ‘नूनु’, ‘बुतरू’, ‘गट्टा’ सन देशज-वात्सल्यमय रूढ़ि-शब्दक चयनमे आ वात्सल्य-द्योतक लघुता-प्रत्ययमे। (३) पद-पराद्ध अर्थात् प्रत्यय-वक्रता—विभक्ति, काल, पुरुष, संख्या आदिक चारुता, जे हड़िया-बुझौवलमे प्रत्यक्ष: ‘छेलाँ...पहनला...सहबौ’मे काल-वक्रता आ प्रथम-पुरुष प्रयोगमे पुरुष-वक्रता। (४) वाक्य-वक्रता—समग्र वाक्यक भंगिमा, जे ‘फरैं नै फूलै, ढकमोरै गाछ’ सन विरोधाभास-वाक्यमे उत्तर केँ व्यंग्य-रूपें सुझबैत अछि। (५) प्रकरण-वक्रता—प्रसंग-रचनाक वक्रता, जे हड़ियाक स्वगत-कथन सन लघु-नाट्य-प्रसंगमे आ जीव-जन्तुक संवाद-गीतमे। (६) प्रबन्ध-वक्रता—समस्त कृतिक संरचनात्मक वक्रता, जे ‘सोन चिरैया’ सन गीतक ध्रुव-आवर्तनक स्थापत्यमे। एहि षड्विध विश्लेषणसँ स्पष्ट अछि जे अंगिका लोक-बाल-काव्य कुन्तकक वक्रोक्तिक जीवन्त, परत-दर-परत मूर्त उदाहरण थिक। ठेठी-अंगिका — वक्रोक्ति-विस्तार : कुन्तक के ‘वक्रोक्तिजीवित’ में छह किसिम के वक्रता (वक्रता-वैचित्र्य) मानलों छै, आरो ऊ छहो एहि लोक-सामग्री में परत-दर-परत साक्षात् मिलै छै। (१) वर्ण-विन्यास-वक्रता—वर्ण-जोड़ के चारुता, जे ‘चप-चप’, ‘लप-लप’, ‘टूमुक ठुमुक’ जइसन अनुप्रास वाला नाद-सुन्नरता में दिखै छै; इहे तुक्तक-काव्य के परान छै। (२) पद-पूर्वार्ध-वक्रता—पद के मूल (प्रातिपदिक) के चुनाव के वैचित्र्य, जे ‘नूनु’, ‘बुतरू’, ‘गट्टा’ जइसन देसज-वात्सल्य वाला रूढ़ि-सबद के चुनाव में आरो लाड़ वाला छोटकाइ-परत्यय में। (३) पद-पराद्ध यानी प्रत्यय-वक्रता—विभक्ति, काल, पुरुष, संख्या आदि के चारुता, जे हड़िया-बुझौवल में सोझे : ‘छेलाँ...पहनला...सहबौ’ में काल-वक्रता आरो पहिलों-पुरुष के परयोग में पुरुष-वक्रता। (४) वाक्य-वक्रता—पूरा वाक्य के भंगिमा, जे ‘फरैं नै फूलै, ढकमोरै गाछ’ जइसन विरोधाभास-वाक्य में जबाब के व्यंग्य के रूप में सुझाबै छै। (५) प्रकरण-वक्रता—परसंग-रचना के वक्रता, जे हड़िया के स्वगत-कथन जइसन नान्हकी-नाट्य-परसंग में आरो जीव-जन्तु के संवाद-गीत में। (६) प्रबन्ध-वक्रता—पूरा कृति के बनावट के वक्रता, जे ‘सोन चिरैया’ जइसन गीत के ध्रुव-लौटान के स्थापत्य में। एहि छह-किसिम विश्लेषण सें साफ छै कि अंगिका लोक-बाल-काव्य कुन्तक के वक्रोक्ति के जिन्दा, परत-दर-परत मूरत उदाहरण छै। दोसर आयाम: पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त ठेठी-अंगिका: दोसरका आयाम : पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त मैथिली — अनुवाद-सिद्धान्त: अमरेन्द्रक बाल-रक्षक रूपान्तर स्कोपोस-सिद्धान्त (फेर्मेयर)क उदाहरण थिक—अनुवादक ‘प्रयोजन’ (बाल-उपयुक्तता) लक्ष्यपाठ केँ निर्धारित करैत अछि, स्रोत-समतुल्यता नहि। ई लक्ष्य-संस्कृति-अभिमुख (टूरी) आ ‘देशीकरण’ (डोमेस्टिकेशन—वेनुती) अनुवाद थिक; जखन कि कथाक बीच संस्कृत श्लोक राखब ‘विदेशीकरण’क अवशेष, जे प्रवाह तोड़ैत अछि—लेखक इएह विदेशीकरण-दोष केँ लक्षित करैत छथि। ठेठी-अंगिका — अनुवाद-सिद्धान्त के नजर सें : अमरेन्द्र के बाल-रक्षक रूपान्तर स्कोपोस-सिद्धान्त (फेर्मेयर) के उदाहरण छै—अनुवाद के ‘परयोजन’ (बाल-उपयुक्तता) लक्ष्य-पाठ के तय करै छै, स्रोत के बरोबरी नै। ई लक्ष्य-संस्कृति-मुँहका (टूरी) आरो ‘देसीकरण’ (वेनुती) वाला अनुवाद छै; जबकि कथा के बीच संस्कृत श्लोक राखब ‘विदेसीकरण’ के बचलों-खुचलों अंस छै, जे बहाव के तोड़ी दै छै—लेखक इहे विदेसीकरण-दोष के पकड़ी लै छै। मैथिली — पाठक-प्रतिक्रिया: बाल-साहित्य ‘अन्तर्निहित पाठक’ (इज़र)क सिद्धान्तक जीवन्त क्षेत्र थिक—एतय अन्तर्निहित पाठक शिशु थिक, आ अनुवादक ओही अन्तर्निहित बालक केँ ध्यानमे राखि क्रूर-दृश्य बदलैत अछि। रूपवाद-दृष्टिएँ बुझौवल श्क्लोव्स्कीक ‘विच्छित्ति’ (defamiliarization)क उदाहरण थिक—पान, चक्की आ हाँड़ी सन परिचित वस्तु केँ अपरिचित बनाकए पुनः-दर्शन करबैत अछि। ई पाश्चात्य विच्छित्ति आ भारतीय वक्रोक्तिक अद्भुत संगम-बिन्दु थिक। लोकसाहित्य-दृष्टिएँ लोरीक पुनरावृत्त पद (‘नूनु... नूनु...’) पैरी-लॉर्डक मौखिक-सूत्रात्मक (oral-formulaic) रचना-विधिक साक्ष्य थिक। ठेठी-अंगिका — पाठक-परतिक्रिया के नजर सें : बाल-साहित्य ‘अन्तर्निहित पाठक’ (इज़र) के सिद्धान्त के जीता-जागता खेत छै—एहिजा अन्तर्निहित पाठक सिसु छै, आरो अनुवाद ओकरे ध्यान में राखी कें करूर-दृश्य बदली दै छै। रूपवाद के नजर सें बुझौवल श्क्लोव्स्की के ‘विच्छित्ति’ (defamiliarization) के उदाहरण छै—पान, चक्की, हाँड़ी जइसन जानल-चिन्हल चीज के अनजान बना कें फेर सें देखाबै छै। ई पाश्चात्य विच्छित्ति आरो भारतीय वक्रोक्ति के अजगुत संगम-बिन्दु छै। लोकसाहित्य के नजर सें लोरी के दोहराइलों पद (‘नूनु... नूनु...’) पैरी-लॉर्ड के मौखिक-सूत्रात्मक रचना-विधि के सबूत छै। तेसर आयाम: नव्य-न्यायमूलक ज्ञानमीमांसा ठेठी-अंगिका: तेसरका आयाम : नव्य-न्याय वाला ज्ञानमीमांसा मैथिली — बुझौवल एकटा प्रमाण-क्रीड़ा थिक: उत्तर प्रमेय थिक, जे सादृश्यक ओहार-तर नुकाएल; ओकर बोध उपमानसँ प्रेरित अनुमिति थिक, जकर मूल व्याप्ति-ग्रहण अछि। बालक ‘गाछ केँ लपेटैत, फल-फूल-रहित’ लक्षण देखि, ओहि लक्षणसँ ‘पान’ प्रमेयक अनुमिति करैत अछि। ‘फरैं नै फूलै’ सन निषेध-मुखी पहेली व्यतिरेकी अनुमानक अभ्यास थिक—जे-जे नहि, ताहि केँ हटाकए शेषसँ निर्णय; ई अभावक ज्ञान (अनुपलब्धि-प्रमाण)क बाल-पाठ थिक। ठेठी-अंगिका — बुझौवल एगो परमाण-खेल छै : जबाब परमेय छै, जे सादृश्य के ओहार-तर छिपलों; ओकर बोध उपमान सें उपजलों अनुमिति छै, जेकर जड़ में व्याप्ति-ग्रहण छै। बुतरू ‘गाछ के लपेटै वाला, फल-फूल-हीन’ लच्छन देखी कें, वहै लच्छन सें ‘पान’ परमेय के अनुमान करी लै छै। ‘फरैं नै फूलै’ जइसन निषेध-मुँहका पहेली व्यतिरेकी अनुमान के अभ्यास छै—जे-जे नै, ओकरा हटा कें बाँकी सें फैसला; ई अभाव के ज्ञान (अनुपलब्धि) के बाल-पाठ छै। मैथिली — बुझौवल आ लोरी शब्दक अभिधा-लक्षणा-व्यञ्जना—तीनू वृत्तिक क्रीड़ास्थल थिक; लेखकक ‘अभिधा बनाम व्यंजना’क भेद प्रकारान्तरे शब्द-शक्ति-मीमांसा थिक। एतबहि नहि, बुझौवल जानि-बूझि विपर्यय (भ्रम) उत्पन्न करैत अछि, जकर निवृत्तिमे प्रमा (यथार्थ ज्ञान) उपजैत अछि—एहि अर्थें बुझौवल ख्याति-विवाद (भ्रमक स्वरूप)क लघु प्रयोगशाला थिक। अनुवादक दिशिमे देखी तँ भावानुवाद पदार्थ (शब्द-अर्थ) केँ नहि, तात्पर्य (वक्तृ-अभिप्रेत) केँ संरक्षित करैत अछि—ई मीमांसक-नैयायिक तात्पर्य-वृत्तिक अनुप्रयोग थिक; अमरेन्द्रक अनुवाद-निर्णय एही सिद्धान्त पर टिकल अछि। ठेठी-अंगिका — बुझौवल आरो लोरी सबद के अभिधा-लक्षणा-व्यञ्जना—तीनू वृत्ति के खेल-मैदान छै; लेखक के ‘अभिधा बनाम व्यंजना’ के फरक असल में सबद-सक्ति-मीमांसा छै। एतने नै, बुझौवल जानी-बूझी कें विपर्यय (भ्रम) पैदा करै छै, जेकर निवृत्ति में प्रमा (सच्चा ज्ञान) उपजै छै—एहि अरथ में बुझौवल ख्याति-विवाद (भ्रम के सरूप) के नान्हकी परयोगशाला छै। अनुवादक के दिसाय देखी तें भावानुवाद पदार्थ (सबद-अरथ) के नै, तात्पर्य (कहै वाला के मनसा) के बचाबै छै—ई मीमांसक-नैयायिक तात्पर्य-वृत्ति के परयोग छै; अमरेन्द्र के अनुवाद-फैसला इहे सिद्धान्त पर टिकलों छै। मैथिली — एहि बुझौवल-अनुमितिक शास्त्रीय आधार गङ्गेश उपाध्यायक ‘तत्त्वचिन्तामणि’क व्याप्तिवादमे भेटैत अछि। ओतय व्याप्तिक पाँच पूर्वपक्षी लक्षण—‘व्याप्ति-पञ्चक’ अर्थात् पञ्चलक्षणी—क परीक्षा आ खण्डनक बाद गङ्गेश अपन सिद्धान्त-लक्षण ‘साध्याभाववदवृत्तित्व’ (जे साध्यक अभावयुक्त अधिकरणमे नहि रहैत, से) प्रस्तुत करैत छथि। बुझौवल-समाधानमे बालक अनजानहिं इएह व्याप्ति-ग्रहण करैत अछि—‘गाछ केँ लपेटैत, फल-फूल-रहित’ लक्षण जतय-जतय, ओतय-ओतय ‘पान’—एहि नियत-साहचर्य (अविनाभाव) केँ पकड़िकए ओ हेतुसँ साध्यक अनुमिति करैत अछि। एहि अर्थें प्रत्येक बुझौवल ओहि शास्त्रीय प्रश्नक—‘व्याप्ति की थिक’—एकटा लघु, लोकोन्मुख अभ्यास थिक। ठेठी-अंगिका — ई बुझौवल-अनुमिति के शास्त्रीय आधार गङ्गेश उपाध्याय के ‘तत्त्वचिन्तामणि’ के व्याप्तिवाद में मिलै छै। ओहिजा व्याप्ति के पाँच पूर्वपक्षी लच्छन—‘व्याप्ति-पञ्चक’ यानी पञ्चलक्षणी—के परीक्षा आरो खण्डन के बाद गङ्गेश अपन सिद्धान्त-लच्छन ‘साध्याभाववदवृत्तित्व’ (जे साध्य के अभाव वाला अधिकरण में नै रहै, से) दै छै। बुझौवल के हल में बुतरू अनजानहिं इहे व्याप्ति-ग्रहण करै छै—‘गाछ के लपेटै वाला, फल-फूल-हीन’ लच्छन जहाँ-जहाँ, ओहिजा-ओहिजा ‘पान’—ई नियत-साहचर्य (अविनाभाव) के पकड़ी कें ऊ हेतु सें साध्य के अनुमान करी लै छै। एहि अरथ में हरेक बुझौवल ओहि शास्त्रीय सवाल—‘व्याप्ति की छै’—के एगो नान्हकी, लोक-मुँहका अभ्यास छै। मैथिली — एहि व्याप्ति-पञ्चक (सिंहव्याघ्र-लक्षण)क पाँचू लक्षणक नामवार परीक्षा बुझौवल पर सोझे लागैत अछि, कारण उत्तम बुझौवल ठीक ओही दोष-सभसँ बचैत अछि, जाहिसँ उत्तम व्याप्ति-लक्षण बचैत अछि— ठेठी-अंगिका — ई व्याप्ति-पञ्चक (सिंहव्याघ्र-लच्छन) के पाँचू लच्छन के नामवार परीक्षा बुझौवल पर सीधे लागै छै, कैलेकि बढ़िया बुझौवल ठीक ओहि दोष सें बचै छै, जेकरा सें बढ़िया व्याप्ति-लच्छन बचै छै— मैथिली — (१) व्यभिचाराभाव-लक्षण: व्याप्ति = हेतुक व्यभिचाराभाव। दोष—अन्योन्याश्रय/आत्माश्रय, कारण ‘व्यभिचार’ स्वयं ‘व्याप्त्यभाव’सँ परिभाषित होइत अछि। (जे बुझौवल उत्तर-ज्ञान केँ पहिनहिं मानिकए चलैत अछि, से चक्रक-दोषग्रस्त।) (२) साध्याभाववदवृत्तित्व-लक्षण (सरल रूप): हेतुक साध्याभावाधिकरणमे अवृत्ति। दोष—अप्रसिद्धि, कारण केवलान्वयी साध्य (यथा ज्ञेयत्व, वाच्यत्व)मे साध्याभाव कतहु अप्रसिद्ध। (जकर अभाव-पक्ष नहि, तकर बुझौवल बालक केँ विरोध-वर्ग नहि दैत, तेँ अनुत्तरणीय।) (३) सामानाधिकरण्य-लक्षण: हेतु-साध्यक एके अधिकरणमे सह-अवस्थान। दोष—अतिव्याप्ति, कारण मात्र सह-अवस्थान व्यभिचारी हेतुमे सेहो सम्भव। (जे बुझौवल केवल एकटा साझा-धर्म दैत अछि—‘हरियर आ बढ़ैत’—से अनेक उत्तरमे लागि जाइत, तेँ द्व्यर्थक।) (४) साध्यवद्-अन्य-अवृत्तित्व-लक्षण: साध्यवान्‌सँ भिन्न सभमे हेतुक अवृत्ति। दोष—अन्योन्याभाव-जटिलता आ भागासिद्धि। (उत्तम बुझौवल इएह करैत अछि—सभ अन्य-उत्तर केँ बहिष्कृत क’ एके दिशि सङ्केत: ‘फल नहि, फूल नहि, गाछ केँ लपेटैत’ सभ आन गाछ केँ हटा ‘पान’ धरि पहुँचबैत अछि।) (५) सिद्धान्त-लक्षण (परिष्कृत): ‘प्रतियोगि-असमानाधिकरण-यत्-समानाधिकरण-अत्यन्ताभाव-अप्रतियोगि-साध्य-सामानाधिकरण्यम्’, संक्षेपमे परिष्कृत साध्याभाववदवृत्तित्व, जे सभ दोष-निवृत्त। (पूर्ण-निर्धारक बुझौवल—यथा हड़ियाक आत्म-कथन, जे लक्षण-समूहसँ अन्य सभ उत्तर केँ अत्यन्त-अभाव-रूपें हटा एके उत्तर छोड़ैत अछि—एही सिद्धान्त-लक्षणक काव्य-प्रतिरूप थिक।) ठेठी-अंगिका — (१) व्यभिचाराभाव-लच्छन : व्याप्ति = हेतु के व्यभिचाराभाव। दोष—अन्योन्याश्रय/आत्माश्रय, कैलेकि ‘व्यभिचार’ अपने ‘व्याप्त्यभाव’ सें परिभाषित होय छै। (जे बुझौवल जबाब के पहिनहिं मानी कें चलै छै, से चक्रक-दोष वाला।) (२) साध्याभाववदवृत्तित्व-लच्छन (सरल रूप) : हेतु के साध्याभाव-अधिकरण में अवृत्ति। दोष—अप्रसिद्धि, कैलेकि केवलान्वयी साध्य (जइसन ज्ञेयत्व, वाच्यत्व) में साध्याभाव कहीं अप्रसिद्ध। (जेकर अभाव-पक्ष नै, ओकर बुझौवल बुतरू के विरोध-वर्ग नै दै, तें अनुत्तरणीय।) (३) सामानाधिकरण्य-लच्छन : हेतु-साध्य के एके अधिकरण में सह-अवस्थान। दोष—अतिव्याप्ति, कैलेकि खाली सह-अवस्थान व्यभिचारी हेतु में भी सम्भव। (जे बुझौवल खाली एगो साझा-धरम दै छै—‘हरियर आरो बढ़ै वाला’—से कई जबाब में लागी जाय छै, तें द्व्यर्थक।) (४) साध्यवद्-अन्य-अवृत्तित्व-लच्छन : साध्यवान् सें भिन्न सब में हेतु के अवृत्ति। दोष—अन्योन्याभाव-जटिलता आरो भागासिद्धि। (बढ़िया बुझौवल इहे करै छै—सब दोसरका जबाब के हटा कें एके ओर संकेत : ‘फल नै, फूल नै, गाछ के लपेटै वाला’ सब आन गाछ के हटा कें ‘पान’ तक पहुँचाबै छै।) (५) सिद्धान्त-लच्छन (परिष्कृत) : ‘प्रतियोगि-असमानाधिकरण-यत्-समानाधिकरण-अत्यन्ताभाव-अप्रतियोगि-साध्य-सामानाधिकरण्यम्’, संच्छेप में परिष्कृत साध्याभाववदवृत्तित्व, जे सब दोष सें मुक्त। (पूरा-निर्धारक बुझौवल—जइसन हड़िया के आत्म-कथन, जे लच्छन-समूह सें दोसरका सब जबाब के अत्यन्त-अभाव के रूप में हटा कें एके जबाब छोड़ै छै—इहे सिद्धान्त-लच्छन के काव्य-रूप छै।) मैथिली — एहि तुलनासँ एकटा नियम उभरैत अछि: जेना अतिव्याप्ति आ अव्याप्ति व्याप्ति-लक्षण केँ दूषित करैत अछि, तहिना द्व्यर्थकता (अतिव्याप्ति) आ अनुत्तरणीयता (अव्याप्ति) बुझौवल केँ दूषित करैत अछि। उत्तम बुझौवल एकटा निर्दोष व्याप्ति-लक्षण जकाँ ‘असंदिग्ध-एकोत्तर’ होइत अछि—इएह अंगिका बुझौवल-परम्पराक अलिखित तर्कशास्त्र थिक। ठेठी-अंगिका — एहि तुलना सें एगो नियम उभरै छै : जइसन अतिव्याप्ति आरो अव्याप्ति व्याप्ति-लच्छन के दूषित करै छै, ओइसने द्व्यर्थकता (अतिव्याप्ति) आरो अनुत्तरणीयता (अव्याप्ति) बुझौवल के दूषित करै छै। बढ़िया बुझौवल एगो निर्दोष व्याप्ति-लच्छन जइसन ‘असंदिग्ध-एके-जबाब वाला’ होय छै—इहे अंगिका बुझौवल-परम्परा के बिन-लिखलों तर्कशास्त्र छै। मैथिली — अनुवाद-प्रसंगमे तात्पर्य-वृत्तिक सिद्धान्त प्रासंगिक थिक। शाब्दबोधक चारि हेतु—आकाङ्क्षा, योग्यता, सन्निधि (आसत्ति) आ तात्पर्य—मे तात्पर्य (वक्तृ-विवक्षा) अर्थ-निर्णायक होइत अछि; जतय मुख्यार्थमे बाध होइत अछि आ तात्पर्य असंगत भ’ जाइत अछि, ओतय लक्षणा प्रवृत्त होइत अछि। भावानुवाद इएह करैत अछि—ओ पदार्थ (पद-वाच्य अर्थ) केँ छोड़ि तात्पर्य (अभिप्रेत भाव) केँ लक्ष्य-भाषामे उतारैत अछि। अमरेन्द्रक बाल-रक्षक रूपान्तर एही तात्पर्य-प्राधान्यक व्यावहारिक रूप थिक—शब्दक दास नहि, तात्पर्यक सेवक। ठेठी-अंगिका — अनुवाद के परसंग में तात्पर्य-वृत्ति के सिद्धान्त कामें के छै। शाब्दबोध के चार हेतु—आकाङ्क्षा, योग्यता, सन्निधि (आसत्ति) आरो तात्पर्य—में तात्पर्य (कहै वाला के विवक्षा) अरथ के तय करै छै; जहाँ मुख्यार्थ में बाध होय छै आरो तात्पर्य बेमेल होय जाय छै, ओहिजा लक्षणा चलै छै। भावानुवाद इहे करै छै—ऊ पदार्थ (पद के वाच्य अरथ) के छोड़ी कें तात्पर्य (मन के भाव) के लक्ष्य-भाषा में उतारै छै। अमरेन्द्र के बाल-रक्षक रूपान्तर इहे तात्पर्य-परधानता के व्यवहार-रूप छै—सबद के गुलाम नै, तात्पर्य के सेवक। चतुर्थ आयाम: विदेह समान्तर-इतिहास-प्रारूप ठेठी-अंगिका: चौथका आयाम : विदेह समान्तर-इतिहास-प्रारूप मैथिली — प्रति-कैनन पाठ: अंगिका बाल-साहित्य—लोक, स्त्री, दलित आ ग्रामीण स्वरक भण्डार—साहित्य-अकादमीक हिन्दी-केन्द्रित संस्थागत इतिहासमे प्रायः अनुपस्थित। एहि सामग्रीक प्रलेखन स्वयं एकटा समान्तर-ऐतिहासिक पुनरुद्धार थिक। स्त्री-कर्तृत्वक उद्घाटन एहि दृष्टिक मर्म थिक: लोरी-सभ मूलतः माताक रचना थिक—एकटा नुकाएल स्त्री-साहित्य-परम्परा। आत्मकथनमे लेखक अपन पुत्री वसुंधराक संकलन-श्रम केँ स्वीकारैत छथि; समान्तर-इतिहास एही मातृ-कर्तृत्व आ स्त्री-श्रम केँ अग्रभूमिमे आनैत अछि, जे ‘लोक’ नामक अनामी कोठलीमे विलीन भ’ गेल छल। ठेठी-अंगिका — प्रति-कैनन पाठ : अंगिका बाल-साहित्य—लोक, स्त्री, दलित आरो गँवई सुर के भण्डार—साहित्य-अकादमी के हिन्दी-केन्द्रित संस्थागत इतिहास में अकसर गायब छै। एहि सामग्री के प्रलेखन अपने-आप में एगो समान्तर-ऐतिहासिक पुनरुद्धार छै। स्त्री-कर्तृत्व के उघारब एहि नजर के मरम छै : लोरी सिनी मूल रूप सें माय के रचना छै—एगो छिपलों स्त्री-साहित्य-परम्परा। आत्मकथन में लेखक अपन बेटी वसुंधरा के संकलन-मेहनत के मानी लै छै; समान्तर-इतिहास वहै माय-कर्तृत्व आरो स्त्री-मेहनत के आगू आनी दै छै, जे ‘लोक’ नाम के बेनाम कोठली में बिलाय गेलों छेलै। मैथिली — औपनिवेशिक प्रलेखनक पुनर्ग्रहण: ईसाई पादरी आ ग्रियर्सनक अनुवाद औपनिवेशिक भाषा-प्रलेखन थिक; पोथी ओकरा भाषाविदक शीशीसँ निकालि जीवन्त बाल-साहित्यमे बदलि दैत अछि—ई पुनर्ग्रहण समान्तर-इतिहासक केन्द्रीय कर्म थिक। मुदा एहि प्रारूपक सभसँ तीक्ष्ण फल स्वयं एहि पोथी पर घूरैत अछि: जे पोथी प्रति-कैनन रचैत अछि, से हिन्दीमे लिखल अछि, मुख्यधारा-प्रकाशनसँ आबैत अछि, आ ओकर ‘सन्दर्भ’ प्रायः लेखकक अपन कृति-सभ थिक। तखन प्रश्न ई जे एहि सर्वेक्षणमे के-के छुटल? अनामी लोक-गायिका, मंच-कलाकार, आ ओ माता, जनिक लोरी ‘लोक’ कहि अनाम राखल गेल। समान्तर-इतिहास प्रति-कैननकेँ सेहो प्रति-प्रश्न करैत अछि—इएह ओकर इमानदारी थिक। ठेठी-अंगिका — औपनिवेशिक प्रलेखन के फेर-हासिल करब : ईसाई पादरी आरो ग्रियर्सन के अनुवाद औपनिवेशिक भाषा-प्रलेखन छै; पोथी ओकरा भाषाविद के सीसी सें निकाली कें जीता-जागता बाल-साहित्य में बदली दै छै—ई फेर-हासिल समान्तर-इतिहास के केन्द्रीय काम छै। मतरकि एहि प्रारूप के सबसें तेज फल अपने एहि पोथी पर घूमी जाय छै : जे पोथी प्रति-कैनन बनाबै छै, से हिन्दी में लिखलों छै, मुख्यधारा-परकाशन सें आबै छै, आरो ओकर ‘संदर्भ’ अकसर लेखक के अपने कृति सिनी छै। तें सवाल ई कि एहि सर्वेक्षण में के-के छुटी गेलै? बेनाम लोक-गायिका, मंच-कलाकार, आरो ऊ माय, जेकर लोरी ‘लोक’ कही कें बेनाम राखी देलों गेलै। समान्तर-इतिहास प्रति-कैनन के भी प्रति-सवाल करै छै—इहे ओकर इमानदारी छै। आधुनिक बाल-कविता: चतुर्आयामी पुनःपाठ ठेठी-अंगिका: आधुनिक बाल-कविता : चतुर्आयामी पुनःपाठ रस-ध्वनि-वक्रोक्ति ठेठी-अंगिका: रस-ध्वनि-वक्रोक्ति मैथिली — विषय-वैविध्यसँ रस-वैविध्य उपजैत अछि—प्रकृति-काव्यमे अद्भुत आ शान्त, हास्य-गीतमे हास्य, राष्ट्रीय-गीतमे वीर आ मातृभूमि-वात्सल्य। मुदा अधिष्ठातृ रस एखनहुँ वात्सल्ये रहैत अछि, कारण सभ रस बाल-आस्वादक हेतु मृदूकृत भ’ अबैत अछि। ध्वनि-दृष्टिएँ ‘गतिशील प्रकृति’ स्वयं ध्वनि-प्रधान थिक: चलैत बिम्ब (स्थिर चाँद-तारा नहि, अपितु उछलैत कौआ आ बहैत नदी) बाल-मन केँ गति-चित्रक व्यंजना दैत अछि—लेखकक ई सूक्ष्म निरीक्षण जे बालक स्थिर चाँदसँ बेसी उछलैत कौआसँ बन्हाइत अछि, वस्तुतः ध्वनि-सिद्धान्तक बाल-मनोवैज्ञानिक रूपान्तर थिक। वक्रोक्ति-दृष्टिएँ एतय एकटा कसौटी उघरैत अछि: राष्ट्रीय आ उपदेश-गीतमे अभिधा (सीधा संदेश) बढ़ैत अछि आ वक्रता घटैत अछि, जखन कि हास्य-व्यंग्य आ गतिशील-प्रकृति-काव्यमे वक्रता आ वैचित्र्य सुरक्षित रहैत अछि। ठेठी-अंगिका — विषय के भाँति-भाँति सें रस के भी भाँति-भाँति उपजै छै—परकृति-काव्य में अद्भुत आरो शान्त, हास्य-गीत में हास्य, राष्ट्रीय-गीत में वीर आरो मातृभूमि-वात्सल्य। मतरकि मुखिया रस अखनी वात्सल्ये रहै छै, कैलेकि सब रस बाल-आस्वाद लेली नरम बनी कें आबै छै। ध्वनि के नजर सें ‘गतिशील परकृति’ अपने ध्वनि-परधान छै : चलै वाला बिम्ब (थिर चाँद-तारा नै, बल्कि उछलै वाला कौआ आरो बहै वाला नदी) बाल-मन के गति-चित्र के व्यंजना दै छै—लेखक के ई बारीक निरीक्षण कि बुतरू थिर चाँद सें बेसी उछलै वाला कौआ सें बन्हाय छै, असल में ध्वनि-सिद्धान्त के बाल-मनोवैज्ञानिक रूपान्तर छै। वक्रोक्ति के नजर सें एहिजा एगो कसौटी उभरै छै : राष्ट्रीय आरो उपदेश-गीत में अभिधा (सीधा संदेस) बढ़ै छै आरो वक्रता घटै छै, जबकि हास्य-व्यंग्य आरो गतिशील-परकृति-काव्य में वक्रता आरो वैचित्र्य बचलों रहै छै। पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त ठेठी-अंगिका: पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त मैथिली — गतिशील-प्रकृति-काव्य बाल-अनुभववाद (पियाजे-सम्मत) केँ प्रतिध्वनित करैत अछि—बालक इन्द्रिय-गति-क्रियासँ जगत् बुझैत अछि, तेँ ‘स्थिरता’सँ ‘गति’क प्राथमिकता बाल-विकास-मनोविज्ञानसँ मेल खाइत अछि। राष्ट्रीय आ शिक्षा-गीतमे ‘उपदेशात्मकता’ (didacticism) प्रबल होइत अछि—एतय बाल-साहित्यक ओ शाश्वत तनाव प्रकट होइत अछि जे ‘शिक्षा’ आ ‘आनन्द’क बीच अछि (रूसो-मूलक उपदेशवाद बनाम आनन्दवादी परम्परा); लेखक अनकहने आनन्दक पक्षमे झुकैत छथि। हास्य-व्यंग्य-गीत (मामा-मामीक विपरीत-चित्र) बख्तिनक ‘कार्निवल’ आ भूमिका-विपर्ययक लोक-रूप थिक, जतय सामाजिक क्रम उनटि-पुनटि हास्य रचैत अछि। आ आंचलिक-काव्य क्षेत्रीय-भाषिक अस्मिताक साक्ष्य थिक—वैश्विक बनाम स्थानीयक समकालीन बहसक बाल-संस्करण। ठेठी-अंगिका — गतिशील-परकृति-काव्य बाल-अनुभववाद (पियाजे-सम्मत) के गूँज छै—बुतरू इन्द्रिय-गति-किरिया सें जगत बुझै छै, तें ‘थिरता’ सें ‘गति’ के पहिलौती बाल-विकास-मनोविज्ञान सें मेल खाय छै। राष्ट्रीय आरो शिक्षा-गीत में ‘उपदेशात्मकता’ (didacticism) जोर पकड़ै छै—एहिजा बाल-साहित्य के ऊ पुरनका तनाव उभरै छै जे ‘शिक्षा’ आरो ‘आनन्द’ के बीच छै (रूसो-वाला उपदेशवाद बनाम आनन्दवादी परम्परा); लेखक बिन कहनहिं आनन्द के पक्ष में झुकै छै। हास्य-व्यंग्य-गीत (मामा-मामी के उलटा-चित्र) बख्तिन के ‘कार्निवल’ आरो भूमिका-विपर्यय के लोक-रूप छै, जहाँ समाजी क्रम उलटी-पुलटी कें हास्य बनाबै छै। आरो आंचलिक-काव्य क्षेत्रीय-भाषिक अस्मिता के सबूत छै—वैश्विक बनाम स्थानीय के आजुक बहस के बाल-रूप। नव्य-न्यायमूलक ज्ञानमीमांसा ठेठी-अंगिका: नव्य-न्याय वाला ज्ञानमीमांसा मैथिली — गणित-गीत (‘लालच रों फोल’क अक्कड़-बक्कड़ गणना) प्रत्यक्षतः संख्या-प्रत्यक्ष आ गणना-अनुमिति सिखबैत अछि—ई प्रमाण-प्रशिक्षणक बाल-रूप थिक। राष्ट्रीय-गीतमे संदेश अभिधा-वृत्तिएँ सोझे अबैत अछि; एतय शब्द-शक्तिमे अभिधाक प्राधान्य आ व्यंजनाक अल्पता काव्यत्व केँ क्षीण करैत अछि—इएह लेखकक ‘अभिधा-दोष’-चेतनाक अनुरूप। गतिशील-प्रकृति-बिम्ब बालक केँ ‘गतिमान्’ धर्मसँ द्रव्यक प्रत्यभिज्ञा करबैत अछि—धर्म-धर्मी-भाव आ क्रिया-आश्रयक बाल-बोध, जे नव्य-न्यायक विशेषण-विशेष्य-विश्लेषणक सहज बीज थिक। ठेठी-अंगिका — गणित-गीत (‘लालच रों फोल’ के अक्कड़-बक्कड़ गिनती) सोझे संख्या-प्रत्यक्ष आरो गिनती-अनुमिति सिखाबै छै—ई परमाण-परसिच्छन के बाल-रूप छै। राष्ट्रीय-गीत में संदेस अभिधा-वृत्ति सें सीधे आबै छै; एहिजा सबद-सक्ति में अभिधा के परधानता आरो व्यंजना के कमी काव्यत्व के घटा दै छै—इहे लेखक के ‘अभिधा-दोष’-चेतना के हिसाब सें छै। गतिशील-परकृति-बिम्ब बुतरू के ‘गतिमान्’ धरम सें दरब के पहचान कराबै छै—धरम-धरमी-भाव आरो किरिया-आश्रय के बाल-बोध, जे नव्य-न्याय के विशेषण-विशेष्य-विश्लेषण के सहज बीज छै। विदेह समान्तर-इतिहास-प्रारूप ठेठी-अंगिका: विदेह समान्तर-इतिहास-प्रारूप मैथिली — आंचलिक-परिवेश-काव्य अंग-अस्मिताक प्रति-कैनन घोषणा थिक—हिन्दी-राष्ट्रभाषा-वर्चस्वक विरुद्ध क्षेत्रीय भाषिक गौरवक स्वर। मुदा एतहि एकटा दुइ-मुखी विरोधाभास प्रकट होइत अछि: राष्ट्रीयता-गीत (भारत माय, तिरंगा) मुख्यधारा-राष्ट्रवादक अनुकरण करैत अछि, आ एतय अंगिका अपन प्रति-कैनन स्वर छोड़ि केन्द्रक स्वरमे गाबय लगैत अछि। एक दिशि आंचलिक आत्म-पुष्टि, दोसर दिशि राष्ट्रीय आत्म-विलय—समान्तर-इतिहास एही द्वैतकेँ लक्षित करैत अछि। आगाँ, स्कूल-गीत (‘इस्कूल चल’, हिन्दी-इंग्लिश-स्कूलक कविता) भाषिक-वर्ग-राजनीति उघारैत अछि—अंग्रेजी-स्कूलक आकांक्षा आ मातृभाषाक चिन्ता; ई सबाल्टर्न शिक्षा-द्वन्द्वक एकटा अनमोल बाल-दस्तावेज़ थिक। ठेठी-अंगिका — आंचलिक-परिवेश-काव्य अंग-अस्मिता के प्रति-कैनन घोषणा छै—हिन्दी-राष्ट्रभाषा-वर्चस्व के खिलाफ क्षेत्रीय भाषिक गौरव के सुर। मतरकि एहिजे एगो दुइ-मुँहका विरोधाभास उभरै छै : राष्ट्रीयता-गीत (भारत माय, तिरंगा) मुख्यधारा-राष्ट्रवाद के नकल करै छै, आरो एहिजा अंगिका अपन प्रति-कैनन सुर छोड़ी कें केन्द्र के सुर में गाबै लागै छै। एक ओर आंचलिक आत्म-पुष्टि, दोसर ओर राष्ट्रीय आत्म-विलय—समान्तर-इतिहास इहे दुहरापन के पकड़ै छै। आगू, स्कूल-गीत (‘इस्कूल चल’, हिन्दी-इंग्लिश-स्कूल के कविता) भाषिक-वर्ग-राजनीति के उघारै छै—अंग्रेजी-स्कूल के आस आरो मातृभाषा के चिन्ता; ई सबाल्टर्न शिक्षा-द्वन्द्व के एगो अनमोल बाल-दस्तावेज छै। समवाय: चारू आयामक संगम ठेठी-अंगिका: समवाय : चारू आयाम के संगम मैथिली — चारू दृष्टि एके बिन्दु पर मिलैत अछि। बुझौवलक वक्रोक्ति (भारतीय), विच्छित्ति (पाश्चात्य), भ्रम-निवृत्ति-जन्य प्रमा (नव्य-न्याय) आ लोक-कर्तृत्वक पुनरुद्धार (समान्तर-इतिहास)—चारू एके सत्य केँ चारि भाषामे कहैत अछि: जे परिचित केँ अपरिचित बना, बोधक क्षण केँ आनन्द बना दैत अछि, आ ओहि आनन्दक स्रष्टा ओ अनाम लोक थिक, जकरा इतिहास बिसरि गेल। इएह अंगिका बाल-साहित्यक मर्म थिक, आ इएह एहि पोथीक—आंशिक—उपलब्धि आ—आंशिक—चूक, दुनू। आ आधुनिक बाल-कवितामे इएह संगम एकटा नव विभाजन-रेखा उघारैत अछि: जतय काव्य आंचलिक, गतिशील आ हास्य दिशि जाइत अछि, ओतय वक्रोक्ति, विच्छित्ति, व्यंजना आ प्रति-कैनन—चारू सजीव रहैत अछि; जतय राष्ट्रीय-उपदेश दिशि झुकैत अछि, ओतय चारू क्षीण भ’ जाइत अछि। इएह आधुनिक अंगिका बाल-कविताक आन्तरिक कसौटी थिक। ठेठी-अंगिका — चारू नजर एके बिन्दु पर मिलै छै। बुझौवल के वक्रोक्ति (भारतीय), विच्छित्ति (पाश्चात्य), भ्रम-निवृत्ति सें उपजलों प्रमा (नव्य-न्याय) आरो लोक-कर्तृत्व के पुनरुद्धार (समान्तर-इतिहास)—चारू एके सच्चाई के चार भाषा में कहै छै : जे जानल-चिन्हल के अनजान बना कें, बोध के छन के आनन्द बना दै छै, आरो ओहि आनन्द के रचनहार ऊ बेनाम लोक छै, जेकरा इतिहास बिसरी गेलै। इहे अंगिका बाल-साहित्य के मरम छै, आरो इहे एहि पोथी के—कुछ हद तक—उपलब्धि आरो—कुछ हद तक—चूक, दुन्नु। आरो आधुनिक बाल-कविता में इहे संगम एगो नया बँटवारा-रेखा उघारै छै : जहाँ काव्य आंचलिक, गतिशील आरो हास्य ओर जाय छै, ओहिजा वक्रोक्ति, विच्छित्ति, व्यंजना आरो प्रति-कैनन—चारू जिन्दा रहै छै; जहाँ राष्ट्रीय-उपदेश ओर झुकै छै, ओहिजा चारू मद्धिम होय जाय छै। इहे आधुनिक अंगिका बाल-कविता के भीतरी कसौटी छै। 22. सामाजिक, लैङ्गिक आ पाठकीय प्रश्न: पोथीसँ आगाँक आलोचनात्मक क्षेत्र ठेठी-अंगिका: 22. सामाजिक, लैङ्गिक आरो पाठकीय प्रश्न: पोथी सें आगाँ के आलोचनात्मक क्षेत्र मैथिली — ग्रन्थ परिवार, माँ-बालक सम्बन्ध, ग्रामीण समाज, विद्यालय, बालिका-शिक्षा, अन्धविश्वास, प्रशासन, पर्यावरण, स्वास्थ्य आदि विषय छूैत अछि। एहि सामग्रीक आधारपर आधुनिक आलोचना किछु नब प्रश्न पूछि सकैत अछि। बालकक रूप एकरूप नहि—उमेर, लिंग, वर्ग, जाति, ग्रामीण/शहरी परिवेश, विद्यालय पहुँच, परिवारक ढाँचा, दिव्यांगता, भाषिक मिश्रण आदिसँ बाल-अनुभव बदलैत अछि। पोथी एहि सभ आयामकेँ व्यवस्थित analytical framework रूपमे नहि अपनबैत, मुदा कतेको सामग्री तकर सम्भावना खोलैत अछि। ठेठी-अंगिका — ग्रन्थ परिवार, माँ-बालक सम्बन्ध, ग्रामीण समाज, विद्यालय, बालिका-शिक्षा, अन्धविश्वास, प्रशासन, पर्यावरण, स्वास्थ्य आदि विषय छूवै छै। ई सामग्री के आधारपर आधुनिक आलोचना कुछु नब प्रश्न पूछ सकै छै। बालक के रूप एकरूप नै—उमेर, लिंग, वर्ग, जाति, ग्रामीण/शहरी परिवेश, विद्यालय पहुँच, परिवार के ढाँचा, दिव्यांगता, भाषिक मिश्रण आदि सें बाल-अनुभव बदलै छै। पोथी ई सब आयाम कें व्यवस्थित analytical framework रूप में नै अपनावै, मतरकि कईगो सामग्री तकर सम्भावना खोलै छै। मैथिली — बालिका-शिक्षा नाटकमे सामाजिक प्रश्न बनैत अछि; मातृस्वर लोकबाल-साहित्यक केन्द्र अछि; ग्रामीण परिवेश अनेक गीत-कथा-नाटकक आधार। आगाँक अध्ययन पूछि सकैत अछि—बालिकाक सक्रियता कोना चित्रित अछि? श्रम करयवला बच्चा, गरीब परिवार, अलग सामाजिक समुदाय वा शहरी बालकक प्रतिनिधित्व कतेक? नैतिक आदर्श बालक आ वास्तविक शरारती/जिद्दी बाल-चरित्रक अनुपात की? बालक स्वयं बोलैत अछि कि वयस्क कथावाचक ओकर behalf पर बोलैत अछि? ठेठी-अंगिका — बालिका-शिक्षा नाटक में सामाजिक प्रश्न बनै छै; मातृस्वर लोकबाल-साहित्य के केन्द्र छै; ग्रामीण परिवेश अनेक गीत-कथा-नाटक के आधार। आगू के शोध पूछ सकै छै—बालिका के सक्रियता केना चित्रित छै? श्रम करै वाला बच्चा, गरीब परिवार, अलग सामाजिक समुदाय वा शहरी बालक के प्रतिनिधित्व कत्तें? नैतिक आदर्श बालक आरो वास्तविक शरारती/जिद्दी बाल-चरित्र के अनुपात की? बालक अपने बोलै छै कि वयस्क कथावाचक ओकर behalf पर बोलै छै? मैथिली — पाठकीय शोधक अभाव सेहो महत्त्वपूर्ण अछि। पोथी प्रायः पाठकक सम्भावित प्रतिक्रिया आलोचकक अनुमानसँ बतबैत अछि। आगाँक पाठकीय अध्ययन—विद्यालयमे पाठ-सत्र, समूह-पठन, बालकक प्रतिक्रिया, पसन्द, स्मृति, चित्र-प्रतिक्रिया, audio बनाम print—साहित्यिक आलोचनाकेँ नब प्रमाण देत। पोथीकेँ आधुनिक सिद्धान्तक कसौटीपर कम साबित करब लक्ष्य नहि; ओकर संकलित सामग्रीकेँ नब शोध-प्रश्नक आधार बनब लक्ष्य अछि। एही अर्थमे ई आधार-ग्रन्थ अछि। ठेठी-अंगिका — पाठकीय शोध के अभाव भी महत्त्वपूर्ण छै। पोथी प्रायः पाठक के सम्भावित प्रतिक्रिया आलोचक के अनुमान सें बतावै छै। आगू के empirical study—विद्यालय में पाठ-सत्र, समूह-पठन, बालक के प्रतिक्रिया, पसन्द, स्मृति, चित्र-प्रतिक्रिया, audio बनाम print—साहित्यिक आलोचना कें नब प्रमाण देत। पोथी कें आधुनिक सिद्धान्त के कसौटीपर कम साबित करब लक्ष्य नै; ओकर संकलित सामग्री कें नब शोध-प्रश्न के आधार बनब लक्ष्य छै। एही अर्थ में ई आधार-ग्रन्थ छै। 23. प्रमुख उपलब्धि: संरक्षण, इतिहास-निर्माण आ विधागत नक्शा ठेठी-अंगिका: 23. प्रमुख उपलब्धि: संरक्षण, इतिहास-निर्माण आरो विधागत नक्शा मैथिली — समग्र अध्ययनक बाद पोथीक पहिल पैघ उपलब्धि संरक्षण अछि। लोरी, पहेली, तुक्तक, खेलगीत, लोककथा, अनुवाद, बालगीत, उपन्यास, कहानी, नाटक, निबन्ध, जीवनी—एहि सभकेँ एकहि आलोचनात्मक छतरीक नीचाँ आनल गेल अछि। छोट पत्रिका, सीमित संस्करण, मौखिक परम्परा आ निजी स्मृतिमे छितरायल सामग्रीक नाम इतिहासमे दर्ज भेल। एहन दस्तावेजीकरण बिना अगिला पीढ़ीक आलोचना अनेक स्रोतसँ वंचित रहि सकैत छल। ठेठी-अंगिका — समग्र अध्ययन के बाद पोथी के पहिल बड़का उपलब्धि संरक्षण छै। लोरी, पहेली, तुक्तक, खेलगीत, लोककथा, अनुवाद, बालगीत, उपन्यास, कहानी, नाटक, निबन्ध, जीवनी—ई सब कें एकहि आलोचनात्मक छतरी के नीचाँ अनलों गेलों छै। छोट पत्रिका, सीमित संस्करण, मौखिक परम्परा आरो निजी स्मृति में छितरायलों सामग्री के नाम इतिहास में दर्ज होलै। एहन दस्तावेजीकरण बिना आगू के पीढ़ी के आलोचना अनेक स्रोत सें वंचित रहि सकै छेलै। मैथिली — दोसर उपलब्धि इतिहास-निर्माण अछि। लेखक बाल-साहित्यक आरम्भ आधुनिक मुद्रणसँ नहि करैत छथि; लोक-शिशु संस्कृति धरि पाछाँ जाइत छथि। तेसर उपलब्धि बाल-मन केन्द्रित कसौटी अछि। साहित्य बच्चाकेँ शिक्षा देबाक माध्यम मात्र नहि; बच्चाक कल्पना, खेल, तर्क, जिद, लय आ अनुभवक अभिव्यक्ति अछि। चारिम उपलब्धि विधागत नक्शा अछि—पहेली, तुक्तक, खेलगीत, गजल, खण्डकाव्य; उपन्यास, कहानी, अनुवाद; एकांकी, खण्ड-नाटक, रेडियो/गीतिनाट्य; इतिहास-जीवनी। ठेठी-अंगिका — दोसर उपलब्धि इतिहास-निर्माण छै। लेखक बाल-साहित्य के आरम्भ आधुनिक मुद्रण सें नै करै छै; लोक-शिशु संस्कृति तक पाछाँ जाय छै। तेसर उपलब्धि बाल-मन केन्द्रित कसौटी छै। साहित्य बच्चा कें शिक्षा दै के माध्यम मात्र नै; बच्चा के कल्पना, खेल, तर्क, जिद, लय आरो अनुभव के अभिव्यक्ति छै। चारिम उपलब्धि विधागत नक्शा छै—पहेली, तुक्तक, खेलगीत, गजल, खण्डकाव्य; उपन्यास, कहानी, अनुवाद; एकांकी, खण्ड-नाटक, रेडियो/गीतिनाट्य; इतिहास-जीवनी। मैथिली — पाँचम उपलब्धि आत्मालोचना अछि। बाल-कहानीक अपर्याप्त विकास मानब, किछु क्षेत्रक कमी स्वीकार करब आ स्रोतक अभावक संकेत देब इतिहासकारक विश्वसनीयता बढ़बैत अछि। छठम उपलब्धि bibliographic memory अछि। अन्तिम सन्दर्भ-सूची आ पत्रिका-सूची पोथीकेँ institutional memory बनबैत अछि। एहि कारण ‘अंगिका बाल-साहित्य’ केवल साहित्यिक समीक्षा नहि, शोध-साधन सेहो अछि। ठेठी-अंगिका — पाँचम उपलब्धि आत्मालोचना छै। बाल-कहानी के अपर्याप्त विकास मानब, कुछु क्षेत्र के कमी स्वीकार करब आरो स्रोत के अभाव के संकेत देब इतिहासकार के विश्वसनीयता बढ़ावै छै। छठम उपलब्धि bibliographic memory छै। अन्तिम सन्दर्भ-सूची आरो पत्रिका-सूची पोथी कें institutional memory बनावै छै। ई कारण ‘अंगिका बाल-साहित्य’ केवल साहित्यिक समीक्षा नै, शोध-साधन भी छै। गुण ठेठी-अंगिका: गुन / खूबी मैथिली — पोथीक सभसँ पैघ उपलब्धि अछि—एकटा उपेक्षित आ छिड़िआयल परम्पराक व्यवस्थित प्रलेखन। जे सामग्री एतय-ओतय बाँटल छल, तकरा एक ठाम आनि, वर्गीकृत कए, स्रोत-सहित प्रस्तुत करब स्वयं एकटा शोध-कर्म थिक। दोसर बलिष्ठ पक्ष अछि लेखकक द्वैध भूमिका—ओ अंगिका बाल-गीतक स्वयं प्रमुख रचयिता छथि, तेँ हुनकर विवेचनमे भीतरी अन्तर्दृष्टि अछि जे बाहरी समीक्षकमे विरल होइत अछि। तेसर, बाल-मनोविज्ञान आ व्यंजना-केन्द्रित काव्य-दृष्टि पोथी केँ मात्र सूची-संकलनसँ ऊपर उठा दैत अछि। ठेठी-अंगिका — पोथी के सबसें बड़का उपलब्धि छै—एगो उपेक्षित आरो छितराइलों परम्परा के सिलसिलेवार प्रलेखन। जे सामग्री एहिठाम-ओहिठाम बिखरलों छेलै, ओकरा एक ठाम आनी, बाँटी कें, स्रोत के संग परस्तुत करब अपने-आप में एगो सोध-काम छै। दोसरका मजबूत पक्ष छै लेखक के दुहरा भूमिका—ऊ अंगिका बाल-गीत के अपने बड़का रचयिता छै, तें हुनकर विवेचन में भीतरी अन्तर्दृष्टि छै, जे बाहरी समीक्षक में कम्मे मिलै छै। तेसर, बाल-मनोविज्ञान आरो व्यंजना-केन्द्रित काव्य-नजर पोथी के खाली सूची-संग्रह सें ऊपर उठाय दै छै। समग्र मूल्याङ्कन आ साहित्यिक महत्ता ठेठी-अंगिका: समग्र मूल्याङ्कन आरो साहित्यिक महत्ता मैथिली — डॉ. अमरेन्द्रक 'अंगिका बाल-साहित्य' कोनो साधारण पोथी नहि अछि। ई एकटा युगान्तकारी शोध-ग्रन्थ अछि जे अंगिका भाषाकेँ एकटा समृद्ध साहित्यिक भाषाक रूपमे स्थापित करैत अछि। मैथिलीक आलोचकक दृष्टिसँ, जँ हम एहि ग्रन्थकेँ देखैत छी, तँ हमरा ई बोध होइत अछि जे मैथिली आ अंगिका दुनूक बाल-साहित्यक जड़ि एक समान अछि। दुनूकेँ लोक-कथा, लोरी, आ बुझौवलमे जे माटिक गन्ध अछि, ओ एक हे अछि। ठेठी-अंगिका — डॉ. अमरेन्द्र के 'अंगिका बाल-साहित्य' कोनो साधारण पोथी नै छै। ई एगो युगान्तकारी शोध-ग्रन्थ छै जे अंगिका भाषाकेँ एगो समृद्ध साहित्यिक भाषा के रूप में स्थापित करै छै। मैथिली के आलोचकक दृष्टि सें, जँ हम ई ग्रन्थकेँ देखैत छी, तें हमरा ई बोध होय छै जे मैथिली आरो अंगिका दुनूक बाल-साहित्य के जड़ि एक समान छै। दुनूकेँ लोक-कथा, लोरी, आरो बुझौवल में जे माटि के गन्ध छै, ऊ एक हे छै। मैथिली — पोथीक प्रमुख उपलब्धि सभ: १. ऐतिहासिक प्रलेखन (Historical Documentation): मौखिक परम्परामे बिलाइत जा रहल लोरी, पहेली आ खेलगीतकेँ एकट्ठा कऽ कऽ डॉ. अमरेन्द्र अंगिकाक एकटा अमूल्य सांस्कृतिक धरोहरकेँ सहेजि लेलन्हि अछि। २. मनोवैज्ञानिक विश्लेषण: बाल-साहित्यक मात्र सङ्ग्रह नहि, अपितु ओकर वैज्ञानिक आ मनोवैज्ञानिक प्रभावक जे विश्लेषण लेखक केने छथि, ओ एहि पोथीकेँ शोध-ग्रन्थक दर्जा दैत अछि। कार्ल ग्रूसक खेल-सिद्धान्तसँ लऽ कऽ शिशु-काव्यक ध्वन्यात्मक सिद्धान्त धरि, लेखकक दृष्टि बड्ड पैना अछि। ३. विस्तार आ वैविध्य: पोथीमे लोककथा सँ लऽ कऽ आधुनिक विज्ञान, मिसाइल मैन कलाम, गजल, रडार, पर्यावरण, आ बाढ़ि प्रबन्धन जकाँ विषयक समावेशन ई सिद्ध करैत अछि जे अंगिका बाल-साहित्य विश्व-साहित्यक सङ्ग कदम मिला कऽ चलि रहल अछि। ४. भाषागत शुद्धता आ प्रवाहमयता: लेखक द्वारा देल गेल समग्र उद्धरण पूर्णतया अंगिका भाषाक ठेठी-देशिल स्वरूपकेँ सुरक्षित रखैत अछि। 'टेंगटा' कथा होउ वा 'बण्टा' उपन्यासक संवाद, भाषाक मिठास आ ओकर आंचलिकता जीबन्त अछि। ठेठी-अंगिका — पोथी के प्रमुख उपलब्धि सिनी: १. ऐतिहासिक प्रलेखन (Historical Documentation): मौखिक परम्परा में बिलाइत जा रहल लोरी, पहेली आरो खेलगीतकेँ एकट्ठा कऽ कऽ डॉ. अमरेन्द्र अंगिका के एगो अमूल्य सांस्कृतिक धरोहरकेँ सहेजि लेलन्हि छै। २. मनोवैज्ञानिक विश्लेषण: बाल-साहित्य के मात्र सङ्ग्रह नै छै, बल्कि ओकर वैज्ञानिक आरो मनोवैज्ञानिक प्रभावक जे विश्लेषण लेखक केने छै, ऊ ई पोथी कें शोध-ग्रन्थक दर्जा दै छै। कार्ल ग्रूसक खेल-सिद्धान्त सें लऽ कऽ शिशु-काव्य के ध्वन्यात्मक सिद्धान्त तक, लेखक के दृष्टि बहुत पैना छै। ३. विस्तार आरो वैविध्य: पोथी में लोककथा सें लऽ कऽ आधुनिक विज्ञान, मिसाइल मैन कलाम, गजल, रडार, पर्यावरण, आरो बाढ़ि प्रबन्धन जेना विषय के समावेशन ई सिद्ध करै छै जे अंगिका बाल-साहित्य विश्व-साहित्यक सङ्ग कदम मिला कऽ चलि रहल छै। ४. भाषागत शुद्धता आरो प्रवाहमयता: लेखक द्वारा देलों गेलों समग्र उद्धरण पूर्णतया अंगिका भाषा के ठेठी-देशिल स्वरूपकेँ सुरक्षित रखै छै। 'टेंगटा' कथा होउ वा 'बण्टा' उपन्यास के संवाद, भाषा के मिठास आरो ओकर आंचलिकता जीबन्त छै। 24. सीमा: सूचीप्रधानता, असमान पाठालोचन, सन्दर्भ-पद्धति आ चयन ठेठी-अंगिका: 24. सीमा: सूचीप्रधानता, असमान पाठालोचन, सन्दर्भ-पद्धति आरो चयन मैथिली — कृतिक महत्त्व स्वीकार करैत ओकर सीमा स्पष्ट कहब आवश्यक अछि। पहिल सीमा संरचनात्मक पुनरावृत्ति अछि, जे संकलित आलेखसभक इतिहाससँ जुड़ल। समान विचार अलग खण्डमे फेर अबैत अछि; किछु क्रम अचानक बदलैत अछि; कतेको ठाम सूची आलोचनापर भारी पड़ैत अछि। ठेठी-अंगिका — कृति के महत्त्व स्वीकार करै ओकर सीमा स्पष्ट कहब आवश्यक छै। पहिल सीमा संरचनात्मक पुनरावृत्ति छै, जे संकलित आलेख सिनी के इतिहास सें जुड़लों। समान विचार अलग खण्ड में फेनू आवै छै; कुछु क्रम अचानक बदलै छै; कईगो जगह सूची आलोचनापर भारी पड़ै छै। मैथिली — दोसर सीमा गहन पाठालोचनक असमानता अछि। नाटकक ‘पंचगव्य’ खण्डमे पात्र, संवाद, व्यंग्य, सामाजिक परिवेशपर पर्याप्त आलोचनात्मक दृष्टि अछि, मुदा अनेक गीत/कथा केवल उदाहरण वा संक्षिप्त टिप्पणी धरि सीमित। यदि प्रत्येक विधा लेल समान विश्लेषण-सूत्र—विषय, भाषा, लय/कथानक, बाल-दृष्टि, आयु-उपयुक्तता, शिल्प, सामाजिक अर्थ—राखल जाए तँ तुलनात्मक निष्कर्ष मजबूत होएत। ठेठी-अंगिका — दोसर सीमा गहन पाठालोचन के असमानता छै। नाटक के ‘पंचगव्य’ खण्ड में पात्र, संवाद, व्यंग्य, सामाजिक परिवेशपर पर्याप्त आलोचनात्मक दृष्टि छै, मतरकि अनेक गीत/कथा केवल उदाहरण वा संक्षिप्त टिप्पणी तक सीमित। यदि प्रत्येक विधा लेल समान विश्लेषण-सूत्र—विषय, भाषा, लय/कथानक, बाल-दृष्टि, आयु-उपयुक्तता, शिल्प, सामाजिक अर्थ—राखलों जाए तें तुलनात्मक निष्कर्ष मजबूत होतै। मैथिली — तेसर सीमा bibliographic मानकीकरण अछि। पृष्ठ 112–114 क स्रोत-सम्पदा बहुमूल्य अछि, मुदा पूर्ण प्रकाशन-वर्ष, संस्करण, पृष्ठ, प्रकाशन-स्थान, ISBN, सम्पादक/अनुवादकक भूमिका सभ ठाम एकरूप नहि। चारिम सीमा लेखक-केंद्रित corpus क सम्भावना अछि; बाहरी स्रोत अमरेन्द्रक वास्तविक व्यापक योगदानक पुष्टि करैत अछि, तथापि स्वतंत्र इतिहास लेल अन्य कवि-कथाकारसभक समान coverage आवश्यक अछि। ठेठी-अंगिका — तेसर सीमा bibliographic मानकीकरण छै। पृष्ठ 112–114 के स्रोत-सम्पदा बहुमूल्य छै, मतरकि पूर्ण प्रकाशन-वर्ष, संस्करण, पृष्ठ, प्रकाशन-स्थान, ISBN, सम्पादक/अनुवादक के भूमिका सिनी जगह एकरूप नै। चारिम सीमा लेखक-केंद्रित corpus के सम्भावना छै; बाहरी स्रोत अमरेन्द्र के वास्तविक व्यापक योगदान के पुष्टि करै छै, तथापि स्वतंत्र इतिहास लेल अन्य कवि-कथाकार सिनी के समान coverage आवश्यक छै। मैथिली — पाँचम सीमा मौखिक सामग्रीक performance metadata अभाव अछि। गीतक शब्द अछि, मुदा धुन, ताल, गायक, स्थान, तिथि, खेल-प्रक्रिया पर्याप्त व्यवस्थित नहि। छठम सीमा पाठकीय अध्ययनक अभाव अछि। बालोपयोगिताक निष्कर्ष प्रायः आलोचकक अनुभवपर आधारित अछि; बाल-पाठकक प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया वा readership data उपलब्ध नहि। ई सीमासभ पोथीक ऐतिहासिक महत्त्व घटबैत नहि; उलटे आगाँक शोधक कार्यक्रम बनबैत अछि। ठेठी-अंगिका — पाँचम सीमा मौखिक सामग्री के performance metadata अभाव छै। गीत के शब्द छै, मतरकि धुन, ताल, गायक, स्थान, तिथि, खेल-प्रक्रिया पर्याप्त व्यवस्थित नै। छठम सीमा पाठकीय अध्ययन के अभाव छै। बालोपयोगिता के निष्कर्ष प्रायः आलोचक के अनुभवपर आधारित छै; बाल-पाठक के प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया वा readership data उपलब्ध नै। ई सीमा सिनी पोथी के ऐतिहासिक महत्त्व घटावै नै; उलटे आगाँ के शोध के कार्यक्रम बनावै छै। सीमा ठेठी-अंगिका: सीमा मैथिली — समीक्षकीय इमानदारीक तकाजा अछि जे किछु सीमा रेखांकित होअय। पहिल आ सभसँ विचारणीय विरोधाभास ई जे “अंगिका बाल-साहित्य” नामक, अंगिका विषयक ई पोथी स्वयं हिन्दीमे लिखल अछि—समीक्षा-भाषा हिन्दी, आ अंगिका केवल उद्धरणमे उपस्थित। जाहि भाषाक साहित्यक वकालत होइत अछि, तकरे विवेचन ओहि भाषामे नहि होएब एकटा पद्धतिगत प्रश्न ठाढ़ करैत अछि। दोसर, “संदर्भ”-सूची लेखकक अपने बाल-गीत-संग्रह सभसँ बेसी भरल अछि—एहिसँ आधार-सामग्री आ समीक्षकीय दूरीक बीच अन्तर किछु धूमिल भ’ जाइत अछि। तेसर, आत्म-स्वीकृत रूपेँ ई आलेख-संग्रह थिक, तेँ एहिमे कतहु-कतहु विश्लेषणक गहराइक ठाम वर्णनात्मक सूचीकरण बेसी भ’ गेल अछि। ठेठी-अंगिका — समीक्षा के इमानदारी के तकाजा छै कि कुछ सीमा भी उजागर होय। पहिलों आरो सबसें सोचै वाला विरोधाभास ई छै कि “अंगिका बाल-साहित्य” नाम के, अंगिका विषय के ई पोथी अपने हिन्दी में लिखलों छै—समीक्षा के भाषा हिन्दी, आरो अंगिका खाली उद्धरण में हाजिर। जे भाषा के साहित्य के वकालत होय छै, वहै भाषा में ओकर विवेचन नै होना एगो पद्धति के सवाल ठाढ़ करी दै छै। दोसर, “संदर्भ”-सूची लेखक के अपने बाल-गीत-संग्रह सिनी सें बेसी भरलों छै—एहिसें आधार-सामग्री आरो समीक्षा के दूरी के बीच के फरक कुछ धुंधला होय जाय छै। तेसर, अपने माननहिं ई आलेख-संग्रह छै, तें एकरा में कहीं-कहीं विवेचन के गहराई के जगह वर्णन के सूचीकरण बेसी होय गेलै। मैथिली — किछु सीमाक सन्दर्भ: पोथी अपन आपमे पूर्ण अछि, तथापि, समीक्षाक धर्म अछि जे समग्र दृष्टिसँ विचार कएल जाय। लेखक स्वयं स्वीकार केने छथि जे अंगिकामे बाल-कहानी आ बाल-पत्रिकायन (Children's magazines) क भारी अभाव अछि। 'अंगिका बाल-कहानी' सङ्ग्रहक अतिरिक्त कोनो गम्भीर कथा-परम्परा नहि विकसित भऽ सकल अछि। जेकाँ फणीश्वर नाथ 'रेणु' अपन साहित्यमे लोककथाक उपयोग केलन्हि, ताहि प्रकारक नव प्रयोग बाल-कथा साहित्यमे अखनो अपेक्षित अछि। 'अजोला बहिन' जकाँ बाल-पत्रिकाक प्रकाशन आर्थिक अभावमे बन्द भऽ जाएब अंगिका बाल-साहित्य लेल एकटा चिन्ताक विषय अछि। ठेठी-अंगिका — कुछु सीमा के सन्दर्भ: पोथी अपन आप में पूर्ण छै, तथापि समीक्षा के धर्म छै जे समग्र दृष्टि सें विचार करलों जाय। लेखक अपने स्वीकार केने छै जे अंगिका में बाल-कहानी आरो बाल-पत्रिकायन (Children's magazines) के भारी अभाव छै। 'अंगिका बाल-कहानी' सङ्ग्रह के अतिरिक्त कोनो गम्भीर कथा-परम्परा विकसित नै होय सकल छै। जइसन फणीश्वर नाथ 'रेणु' अपन साहित्य में लोककथा के उपयोग करलकै, ओइसन नया प्रयोग बाल-कथा साहित्य में अखनो अपेक्षित छै। 'अजोला बहिन' जइसन बाल-पत्रिका के प्रकाशन आर्थिक अभाव में बन्द होय जायब अंगिका बाल-साहित्य लेली एगो चिन्ता के विषय छै। 25. आगाँक संस्करण लेल ठोस सम्पादकीय प्रस्ताव ठेठी-अंगिका: 25. आगू के संस्करण लेल ठोस प्रस्ताव मैथिली — यदि ‘अंगिका बाल-साहित्य’क विस्तारित आलोचनात्मक संस्करण तैयार हो, तँ मूल सामग्री हटे बिना किछु संरचनात्मक सुधार एकरा मानक सन्दर्भग्रन्थ बना सकैत अछि। पहिल, 8–42 आ 43–112 क वर्तमान दू-खंडी ढाँचा बचैत उप-अध्याय क्रमांकित हो: लोरी, पहेली, तुक्तक, खेलगीत, लोककथा, अनुवाद, उपन्यास, गीत-कविता, गजल/खण्डकाव्य, कहानी, नाटक, निबन्ध-जीवनी। ठेठी-अंगिका — यदि ‘अंगिका बाल-साहित्य’ के नब, विस्तारित आलोचनात्मक संस्करण तैयार हो, तें मूल सामग्री हटे बिना कुछु संरचनात्मक सुधार एकरा मानक सन्दर्भग्रन्थ बना सकै छै। पहिल, 8–42 आरो 43–112 के वर्तमान दू-खंडी ढाँचा बचै उप-अध्याय क्रमांकित हो: लोरी, पहेली, तुक्तक, खेलगीत, लोककथा, अनुवाद, उपन्यास, गीत-कविता, गजल/खण्डकाव्य, कहानी, नाटक, निबन्ध-जीवनी। मैथिली — दोसर, प्रत्येक अध्यायक आरम्भमे परिभाषा आ मूल्याङ्कन-कसौटी, अन्तमे संक्षिप्त निष्कर्ष। तेसर, कालक्रम—कृति, लेखक, वर्ष, विधा, प्रकाशक—एक परिशिष्ट रूपमे। चारिम, 52+ स्रोतक मानकीकृत bibliography; पत्रिका सूचीमे प्रकाशन-स्थान, सम्पादक, उपलब्ध वर्ष। पाँचम, लेखक-सूची आ शीर्षक-सूची। छठम, मौखिक सामग्री लेल field metadata: संग्रहकर्ता, कथावाचक/गायक, स्थान, तिथि, प्रसंग, variant। ठेठी-अंगिका — दोसर, प्रत्येक अध्याय के आरम्भ में परिभाषा आरो मूल्याङ्कन-कसौटी, अन्त में संक्षिप्त निष्कर्ष। तेसर, कालक्रम—कृति, लेखक, वर्ष, विधा, प्रकाशक—एक परिशिष्ट रूपमे। चारिम, 52+ स्रोत के मानकीकृत bibliography; पत्रिका सूची में प्रकाशन-स्थान, सम्पादक, उपलब्ध वर्ष। पाँचम, लेखक-सूची आरो शीर्षक-सूची। छठम, मौखिक सामग्री लेल field metadata: संग्रहकर्ता, कथावाचक/गायक, स्थान, तिथि, प्रसंग, variant। मैथिली — सातम, प्रतिनिधि रचनाक गहन पाठालोचन। आठम, अनुवादक अध्यायमे source–target तुलना। नवम, बालकक उमेर-वर्ग स्पष्ट: शिशु, आरम्भिक बालक, मध्य बाल्य, किशोर। दशम, चित्र, ऑडियो QR अथवा digital archive क लिंक—विशेषतः लोरी, खेलगीत, नाटक लेल। एगारहम, बाल-पाठकक वास्तविक प्रतिक्रिया/विद्यालयीय उपयोगपर सर्वेक्षण। बारहम, रचनाकारसभक समान परिचय-ढाँचा। तेरहम, हिन्दी आलोचनात्मक पाठक संग एक पूर्ण अंगिका संस्करण, जाहिसँ अंगिका आलोचना-भाषा स्वयं विकसित हो। ई प्रस्ताव वर्तमान पोथीक बदला नहि; तकर उपलब्ध सामग्रीक अधिक वैज्ञानिक उपयोगक दिशा अछि। ठेठी-अंगिका — सातम, प्रतिनिधि रचना के गहन पाठालोचन। आठम, अनुवादक अध्याय में source–target तुलना। नवम, बालक के उमेर-वर्ग स्पष्ट: शिशु, आरम्भिक बालक, मध्य बाल्य, किशोर। दशम, चित्र, ऑडियो QR अथवा digital archive के लिंक—विशेषतः लोरी, खेलगीत, नाटक लेल। एगारहम, बाल-पाठक के वास्तविक प्रतिक्रिया/विद्यालयीय उपयोगपर सर्वेक्षण। बारहम, रचनाकार सिनी के समान परिचय-ढाँचा। तेरहम, हिन्दी आलोचनात्मक पाठक संग एक पूर्ण अंगिका संस्करण, जाहि सें अंगिका आलोचना-भाषा अपने विकसित हो। ई प्रस्ताव वर्तमान पोथी के बदला नै; तकर उपलब्ध सामग्री के अधिक वैज्ञानिक उपयोग के दिशा छै। 26. समग्र मूल्याङ्कन: आधार-ग्रन्थक रूपमे स्थान ठेठी-अंगिका: 26. समग्र मूल्याङ्कन: आधार-ग्रन्थ के रूप में स्थान मैथिली — ‘अंगिका बाल-साहित्य’क सर्वोच्च उपलब्धि ओकर संरक्षणकारी आ इतिहास-निर्माणकारी भूमिका अछि। जकर बहुत अंश लोककण्ठ, छोट पत्र-पत्रिका, सीमित संस्करणक पुस्तक, अनुवाद, निजी संग्रह वा साहित्यिक स्मृतिमे छितरायल रहि सकैत छल, ओकरा एक आलोचनात्मक छतरीक नीचाँ आनबाक ई महत्त्वपूर्ण प्रयत्न अछि। एहि कारण पोथी डॉ. अमरेन्द्रक व्यक्तिगत आलोचनात्मक कृति रहि नहि जाइत; अंगिका बाल-साहित्यक संस्थागत स्मृति बनबाक क्षमता प्राप्त करैत अछि। ठेठी-अंगिका — ‘अंगिका बाल-साहित्य’ के सर्वोच्च उपलब्धि ओकर संरक्षणकारी आरो इतिहास-निर्माणकारी भूमिका छै। जकर बहुत अंश लोककण्ठ, छोट पत्र-पत्रिका, सीमित संस्करण के पुस्तक, अनुवाद, निजी संग्रह वा साहित्यिक स्मृति में छितरायलों रहि सकै छेलै, ओकरा एक आलोचनात्मक छतरी के नीचाँ अनै के ई महत्त्वपूर्ण प्रयत्न छै। ई कारण पोथी डॉ. अमरेन्द्र के व्यक्तिगत आलोचनात्मक कृति रही नै जाय; अंगिका बाल-साहित्य के संस्थागत स्मृति बनै के क्षमता प्राप्त करै छै। मैथिली — एकर दोसर महत्त्व ई स्थापना अछि जे बाल-साहित्यक जीवन-रस बालकक अपन संसारसँ अबैत अछि—लय, खेल, कल्पना, जिज्ञासा, हास्य, प्रकृति, परिवार, साथी, प्रश्न आ अनुभवसँ। साहित्य बच्चाकेँ ऊपरसँ शिक्षा देबाक साधन मात्र नहि; बच्चाक दृष्टिसँ संसार देखबाक कला अछि। यद्यपि पोथीक बादक अंशमे शिक्षामूलकता मजबूत अछि, मूल child-centred कसौटी सम्पूर्ण अध्ययन लेल आलोचनात्मक आधार दैत अछि। ठेठी-अंगिका — एकर दोसर महत्त्व ई स्थापना छै जे बाल-साहित्य के जीवन-रस बालक के आपनों संसार सें आवै छै—लय, खेल, कल्पना, जिज्ञासा, हास्य, प्रकृति, परिवार, साथी, प्रश्न आरो अनुभव सें। साहित्य बच्चा कें ऊपर सें शिक्षा दै के साधन मात्र नै; बच्चा के दृष्टि सें संसार देखै के कला छै। यद्यपि पोथी के बाद के अंश में शिक्षामूलकता मजबूत छै, मूल child-centred कसौटी सम्पूर्ण अध्ययन लेल आलोचनात्मक आधार दै छै। मैथिली — तेसर, लोकपरम्परा आ आधुनिकताकेँ विरोधी मानबाक बदला पोथी रूपान्तरक सम्बन्ध देखबैत अछि। लोरीक लय आधुनिक गीतमे, लोककथाक कथात्मक संसाधन आधुनिक कहानी/नाटकमे, मौखिक हास्य आ संवाद आधुनिक बालमंचमे, प्रकृतिक परिचित जगत पर्यावरण-चेतनामे—एहन निरन्तरता ग्रन्थक मूल इतिहास-दृष्टि अछि। चारिम, सूक्ष्म पाठालोचन बाल-नाटकक महत्त्वक विशेष पुनर्मूल्याङ्कन करैत अछि। पृष्ठ 98–109 बाल-नाटककेँ आधुनिक सामाजिक समस्या, विज्ञान, शिक्षा, पर्यावरण, स्वास्थ्य, संवाद आ मंचीयताक महत्वपूर्ण क्षेत्र बनबैत अछि। ठेठी-अंगिका — तेसर, लोकपरम्परा आरो आधुनिकता कें विरोधी मानै के बदला पोथी रूपान्तर के सम्बन्ध देखावै छै। लोरी के लय आधुनिक गीत में, लोककथा के कथात्मक संसाधन आधुनिक कहानी/नाटक में, मौखिक हास्य आरो संवाद आधुनिक बालमंच में, प्रकृति के परिचित जगत पर्यावरण-चेतना में—एहन निरन्तरता ग्रन्थ के मूल इतिहास-दृष्टि छै। चारिम, गहन पुनर्पाठ बाल-नाटक के महत्त्व के विशेष पुनर्मूल्याङ्कन करै छै। पृष्ठ 98–109 बाल-नाटक कें आधुनिक सामाजिक समस्या, विज्ञान, शिक्षा, पर्यावरण, स्वास्थ्य, संवाद आरो मंचीयता के महत्वपूर्ण क्षेत्र बनावै छै। मैथिली — उपलब्ध बाहरी स्रोत मूल पोथीक प्रमुख प्रकाशन-तथ्य आ कृतिसभक अस्तित्वक पर्याप्त पुष्टि करैत अछि। भारतवाणी मूल पोथीकेँ 2022 क Children’s Literature रूपमे सूचीबद्ध करैत अछि; 2021 क अमरेन्द्र-केंद्रित अध्ययन आ बालगीत-ग्रंथावली सक्रिय आलोचनात्मक प्रकाशन-परिसरक संकेत दैत अछि। Angika.com, Kavita Kosh आ Gadya Kosh जकाँ सहायक स्रोत प्रमुख कृतिसभक डिजिटल/साहित्यिक उपस्थितिक साक्ष्य दैत अछि। ठेठी-अंगिका — उपलब्ध बाहरी स्रोत मूल पोथी के प्रमुख प्रकाशन-तथ्य आरो कृति सिनी के अस्तित्व के पर्याप्त पुष्टि करै छै। भारतवाणी मूल पोथी कें 2022 के Children’s Literature रूप में सूचीबद्ध करै छै; 2021 के अमरेन्द्र-केंद्रित अध्ययन आरो बालगीत-ग्रंथावली सक्रिय आलोचनात्मक प्रकाशन-परिसर के संकेत दै छै। Angika.com, Kavita Kosh आरो Gadya Kosh जेना सहायक स्रोत प्रमुख कृति सिनी के डिजिटल/साहित्यिक उपस्थिति के साक्ष्य दै छै। मैथिली — सीमासभ वास्तविक अछि—संकलनात्मक पुनरावृत्ति, सूचीप्रधानता, असमान पाठालोचन, bibliographic असंगति, author-centred selection क सम्भावना, performance data आ reader-response क अभाव। मुदा ई सीमा एहि पोथीकेँ अप्रासंगिक नहि बनबैत; ई बतबैत अछि जे अगिला शोध कतऽ सँ आरम्भ हो। ठेठी-अंगिका — सीमा सिनी वास्तविक छै—संकलनात्मक पुनरावृत्ति, सूचीप्रधानता, असमान पाठालोचन, bibliographic असंगति, author-centred selection के सम्भावना, performance data आरो reader-response के अभाव। मतरकि ई सीमा ई पोथी कें अप्रासंगिक नै बनावै; ई बतावै छै जे आगू के शोध कहाँ सें आरम्भ हो। मैथिली — अन्ततः ‘अंगिका बाल-साहित्य’केँ केवल बाल-रचनाक परिचय-पोथी कहब ओकर महत्त्व घटायब होएत। ई लोक-स्मृति, भाषिक अस्मिता, बाल-मन, साहित्यिक आधुनिकता, अनुवाद, विधा-विस्तार आ दस्तावेजीकरणक संगमपर ठाढ़ कृति अछि। एकर सर्वश्रेष्ठ अंश ओ अछि जतय लोरीसँ आधुनिक कविता धरि, खेलसँ नाटक धरि, लोककथासँ पर्यावरणीय/वैज्ञानिक कथा धरि एक सांस्कृतिक निरन्तरता देखाइत अछि। ई पोथी बन्द, अन्तिम इतिहास नहि; अंगिका बाल-साहित्यक विस्तृत इतिहास, पाठ-समीक्षा, प्रदर्शन-अभिलेख, अनुवाद-अध्ययन आ बाल-पाठकीय शोध लेल आधार-ग्रन्थ अछि। ठेठी-अंगिका — अन्ततः ‘अंगिका बाल-साहित्य’कें केवल बाल-रचना के परिचय-पोथी कहब ओकर महत्त्व घटायब होतै। ई लोक-स्मृति, भाषिक अस्मिता, बाल-मन, साहित्यिक आधुनिकता, अनुवाद, विधा-विस्तार आरो दस्तावेजीकरण के संगमपर ठाढ़ कृति छै। एकर सर्वश्रेष्ठ अंश ओ छै जेतै लोरी सें आधुनिक कविता तक, खेल सें नाटक तक, लोककथा सें पर्यावरणीय/वैज्ञानिक कथा तक एक सांस्कृतिक निरन्तरता देखाय छै। ई पोथी बन्द, अन्तिम इतिहास नै; अंगिका बाल-साहित्य के विस्तृत इतिहास, पाठ-समीक्षा, प्रदर्शन-अभिलेख, अनुवाद-अध्ययन आरो बाल-पाठकीय शोध लेल आधार-ग्रन्थ छै। मैथिली — एहि अर्थमे बाल-साहित्य भाषा-परम्पराक छोट कोना नहि। बच्चा जखन अपन मातृभाषामे खेलैत, गाबैत, कथा सुनैत, प्रश्न करैत, पढ़ैत आ अभिनय करैत अछि, तखन ओ भाषा अगिला पीढ़ीमे केवल जीवित नहि रहैत—ओ नब रूपमे सृजित होइत अछि। डॉ. अमरेन्द्रक पोथीक स्थायी साहित्यिक सन्देश एही गहींर बिन्दुपर स्थित अछि। ठेठी-अंगिका — ई अर्थ में बाल-साहित्य भाषा-परम्परा के छोट केना नै। बच्चा जबें आपनों मातृभाषा में खेलै, गावै, कथा सुनै, प्रश्न करै, पढ़ै आरो अभिनय करै छै, तबें ओ भाषा आगू के पीढ़ी में केवल जीवित नै रहै—ओ नब रूप में सृजित होय छै। डॉ. अमरेन्द्र के पोथी के स्थायी साहित्यिक सन्देश एही गहींर बिन्दुपर स्थित छै। सम्पादकीय अभिमत (निष्कर्ष) ठेठी-अंगिका: सम्पादकीय अभिमत (निष्कर्ष) मैथिली — एतेक कहलाक बादो ई पोथी अपन घोषित उद्देश्य—अंगिका बाल-साहित्य पर आगाँ लिखबाक मार्ग खोलब—मे सफल अछि। ओकर स्थायी मूल्य विश्लेषणक नवीनतामे कम, आ प्रलेखनक विश्वसनीयतामे बेसी अछि। विशेषतः पहिल अध्यायक लोक-सामग्री—लोरी, तेल-गीत, डेग-गीत आ बुझौवल—भविष्यक शोधार्थी लेल एकटा प्रामाणिक कोष थिक। डॉ. अमरेन्द्र स्वयं जे विनम्रतासँ एकरा अन्तिम शब्द नहि, प्रारम्भ कहने छथि, समीक्षकक निर्णय सेहो ओही दिशामे जाइत अछि—ई अंगिका बाल-साहित्यक आलोचना-भवनक आधारशिला थिक, शिखर नहि; आ नीक आधारशिलाक इएह गुण होइत अछि जे ओ अपनासँ ऊपर बहुत किछु ठाढ़ होएबाक सम्भावना केँ सम्हारि लैत अछि। विदेह-दृष्टिएँ ई पोथी अंगिका बाल-साहित्य केँ भाषाविदक नमूनासँ जीवन्त परम्परामे बदलबाक ओ पहिल डेग थिक, जकरा आगाँ बढ़ाएब आब समीक्षक-समाजक दायित्व अछि। ठेठी-अंगिका — एतना कहला के बादो ई पोथी अपन घोषित मकसद—अंगिका बाल-साहित्य पर आगू लिखै के रास्ता खोलब—में कामयाब छै। ओकर टिकाऊ कीमत विवेचन के नयापन में कम, आरो प्रलेखन के भरोसा में बेसी छै। खास कें पहिलों अध्याय के लोक-सामग्री—लोरी, तेल-गीत, डेग-गीत आरो बुझौवल—आगू के सोधकर्ता लेली एगो सच्चा खजाना छै। डॉ. अमरेन्द्र अपने जे नरमी सें एकरा आखिरी बात नै, सुरुआत कहलकै, समीक्षक के फैसला भी वहै दिसाय जाय छै—ई अंगिका बाल-साहित्य के आलोचना-घर के नींव छै, चोटी नै; आरो बढ़िया नींव के इहे गुन होय छै कि ऊ अपने सें ऊपर बहुत कुछ ठाढ़ होय के सम्भावना के सम्हारी लै छै। विदेह के नजर सें ई पोथी अंगिका बाल-साहित्य के भाषाविद के नमूना सें जीता-जागता परम्परा में बदलै के पहिलों डेग छै, जेकरा आगू बढ़ाना अब समीक्षक-समाज के जिम्मेवारी छै। निष्कर्ष ठेठी-अंगिका: निष्कर्ष मैथिली — अन्ततः, डॉ. अमरेन्द्र द्वारा लिखित 'अंगिका बाल-साहित्य' अंगिका आ वृहत्तर बिहारी साहित्य-परम्पराक लेल एकटा 'माइल-स्टोन' (Milestone) अछि। बाल-साहित्यकेँ साहित्यक परिधिमे नीचाँ कऽ कऽ देखबाक जे एकटा कुत्सित परम्परा अकादमिक जगतमे रहल अछि, डॉ. अमरेन्द्र अपन एहि शोधपूर्ण ग्रन्थ सँ ओहि भ्रान्तटीकेँ तोड़ैत छथि। ओ प्रमाणित करैत छथि जे बाल-साहित्य समाजक नव-निर्माणक 'फैक्ट्री' अछि। ठेठी-अंगिका — अन्ततः, डॉ. अमरेन्द्र द्वारा लिखित 'अंगिका बाल-साहित्य' अंगिका आरो वृहत्तर बिहारी साहित्य-परम्पराक लेली एगो 'माइल-स्टोन' (Milestone) छै। बाल-साहित्य केेँ साहित्य के परिधि में नीचाँ कऽ कऽ देखै के जे एगो कुत्सित परम्परा अकादमिक जगत में रहल छै, डॉ. अमरेन्द्र अपन ई शोधपूर्ण ग्रन्थ सें वही भ्रान्तटीकेँ तोड़ैत छै। ऊ प्रमाणित करै छै जे बाल-साहित्य समाज के नव-निर्माणक 'फैक्ट्री' छै। मैथिली — मैथिली साहित्यकेँ सेहो अंगिकाक एहि बाल-साहित्यिक आन्दोलन सँ प्रेरणा लेबाक आवश्यकता अछि। भाषाक शुद्धता, लोक-परम्पराक वैज्ञानिक संरक्षण, आ आधुनिकताक सङ्ग कदम सँ कदम मिला कऽ चलबाक जे सन्देश ई पोथी दैत अछि, ओ समस्त क्षेत्रीय भाषाक साहित्यकार लेल अनुकरणीय अछि। डॉ. अमरेन्द्रक ई भगीरथ प्रयास अंगिका साहित्यक इतिहासमे स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत, आ ई पोथी शोधार्थी, साहित्यकार, आ शिक्षाविद् सभक लेल एकटा आधार-ग्रन्थक रूपमे सदैव मार्गदर्शित करैत रहत। ठेठी-अंगिका — मैथिली साहित्यकेँ भी अंगिका के ई बाल-साहित्यिक आन्दोलन सें प्रेरणा लेबाक आवश्यकता छै। भाषा के शुद्धता, लोक-परम्पराक वैज्ञानिक संरक्षण, आरो आधुनिकताक सङ्ग कदम सें कदम मिला कऽ चलबाक जे सन्देश ई पोथी दै छै, ऊ समस्त क्षेत्रीय भाषा के साहित्यकार लेली अनुकरणीय छै। डॉ. अमरेन्द्र के ई भगीरथ प्रयास अंगिका साहित्य के इतिहासमे स्वर्णाक्षर में लिखलों जाएत, आरो ई पोथी शोधार्थी, साहित्यकार, आरो शिक्षाविद् सिनी के लेली एगो आधार-ग्रन्थक रूप में सदैव मार्गदर्शित करै रहत। 27. समग्र निष्कर्षक संक्षिप्त सार ठेठी-अंगिका: 27. समग्र निष्कर्ष के संक्षिप्त सार मैथिली — समग्र पोथीक पाठसँ स्पष्ट अछि जे पोथीक विषय-विस्तार प्रारम्भिक प्रकाशन-तथ्य आ आत्मकथनसँ लऽ सन्दर्भ-पत्रिका सूची धरि एक समग्र बाल-साहित्यिक क्षेत्रक नक्शा बनबैत अछि। लोकसाहित्य खण्डक मुख्य उपविधा लोरी/शिशु गीत, पहेली, तुक्तक, खेलगीत, लोककथा आ अन्तरभाषिक कथा अछि। आधुनिक खण्डक मुख्य उपविधा अनुवादित बाल-कथा, बाल-उपन्यास, बालगीत/कविता, प्रकृति-पर्यावरण/ज्ञान-विषय, गजल/खण्डकाव्य, बाल-कहानी, एकांकी/बाल-नाटक, निबन्ध-इतिहास-जीवनी अछि। ठेठी-अंगिका — सम्पूर्ण 114 पृष्ठ के पुनर्पाठ सें स्पष्ट छै जे पोथी के विषय-विस्तार प्रारम्भिक प्रकाशन-तथ्य आरो आत्मकथन सें लै कें सन्दर्भ-पत्रिका सूची तक एक समग्र बाल-साहित्यिक क्षेत्र के नक्शा बनावै छै। लोकसाहित्य खण्ड के मुख्य उपविधा लोरी/शिशु गीत, पहेली, तुक्तक, खेलगीत, लोककथा आरो अन्तरभाषिक कथा छै। आधुनिक खण्ड के मुख्य उपविधा अनुवादित बाल-कथा, बाल-उपन्यास, बालगीत/कविता, प्रकृति-पर्यावरण/ज्ञान-विषय, गजल/खण्डकाव्य, बाल-कहानी, एकांकी/बाल-नाटक, निबन्ध-इतिहास-जीवनी छै। मैथिली — समग्र विवेचनक मुख्य तर्क—सांस्कृतिक वंशावली, संकलनात्मक निर्माण, बाल-मन, दस्तावेजीकरण, लोक-आधुनिक सेतु, अनुवाद, काव्यक समृद्धि, बाल-कहानीक कमी, नाटक/अन्य विधा, भाषा, उपलब्धि, सीमा आ आधार-ग्रन्थक मूल्य—एहि आलेखमे सुरक्षित अछि। विशेष विस्तार बाल-नाटकक पुनर्मूल्याङ्कन, पृष्ठ 112–114 क bibliography/पत्रिका-संसारक archival विश्लेषण, लेखक-इतिहासकारक दोहरी भूमिकाक पद्धतिगत विवेचन, बाहरी प्रकाशन-सत्यापन, बालोपयुक्तता/मौखिक परम्परा/समाजीकरणक तुलनात्मक सिद्धान्त, तथा performance archive, reader-response आ standard bibliography लेल भविष्यक कार्यक्रम अछि। ठेठी-अंगिका — समग्र विवेचन के मुख्य तर्क—सांस्कृतिक वंशावली, संकलनात्मक निर्माण, बाल-मन, दस्तावेजीकरण, लोक-आधुनिक सेतु, अनुवाद, काव्य के समृद्धि, बाल-कहानी के कमी, नाटक/अन्य विधा, भाषा, उपलब्धि, सीमा आरो आधार-ग्रन्थ के मूल्य—ई आलेख में सुरक्षित छै। विशेष विस्तार बाल-नाटक के पुनर्मूल्याङ्कन, पृष्ठ 112–114 के bibliography/पत्रिका-संसार के archival विश्लेषण, लेखक-इतिहासकार के दोहरी भूमिका के पद्धतिगत विवेचन, बाहरी प्रकाशन-सत्यापन, बालोपयुक्तता/मौखिक परम्परा/समाजीकरण के तुलनात्मक सिद्धान्त, तथा performance archive, reader-response आरो standard bibliography लेल आगू के कार्यक्रम में छै। विस्तृत ग्रन्थ-सूची ई ग्रन्थ-सूचीमे केवल पुस्तक, ग्रन्थ, कोश, संग्रह आ पुस्तकाकार साहित्यिक कृतिसभ राखल गेल अछि। जतय प्रकाशन-वर्ष वा प्रकाशकक स्पष्ट विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे उपलब्ध नहि अछि, ओतय अनुमान नहि जोड़ल गेल अछि। क. समीक्ष्य ग्रन्थ आ डॉ. अमरेन्द्रक बाल-साहित्यिक कृतिसभ १. अमरेन्द्र, डॉ. — अंगिका बाल-साहित्य। समीक्षा प्रकाशन, मुजफ्फरपुर/दिल्ली; प्रथम संस्करण, २०२२। ई प्रस्तुत समीक्षाक मुख्य आधार-ग्रन्थ अछि। पृष्ठ: ११२। मूल्य: दू सय टाका। २. अभिनन्दन (सम्पादक) — डॉ. अमरेन्द्र ग्रंथावली, खण्ड १ : अंगिका बालगीत समग्र। समीक्षा प्रकाशन, मुजफ्फरपुर, २०२१। डॉ. अमरेन्द्रक बालगीत-सृजनक पुस्तकाकार समेकित संकलन। ३. रानी, श्वेता — डॉ. अमरेन्द्र का अंगिका बाल साहित्य। समीक्षा प्रकाशन, मुजफ्फरपुर, २०२१। डॉ. अमरेन्द्रक अंगिका बाल-साहित्यपर केन्द्रित आलोचनात्मक अध्ययन। ४. अमरेन्द्र, डॉ. — ढोल बजै छै ढम्मक ढम। बालगीत-संग्रह। प्रकाशन-वर्ष आ प्रकाशकक स्पष्ट विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे उपलब्ध नहि अछि। ५. अमरेन्द्र, डॉ. — बुतरू के तुतरू। बालगीत-संग्रह। प्रकाशन-वर्ष आ प्रकाशकक स्पष्ट विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे उपलब्ध नहि अछि। ६. अमरेन्द्र, डॉ. — बाजै बीन बजावै तीन। बालगीत-संग्रह। प्रकाशन-वर्ष आ प्रकाशकक स्पष्ट विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे उपलब्ध नहि अछि। ७. अमरेन्द्र, डॉ. — एक छड़ी पर अंडा नाचै। बालकक पहेली, क्रीड़ा आ भाषिक कौतूहलसँ सम्बद्ध पुस्तकाकार कृति। प्रकाशन-विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे नहि देल गेल अछि। ८. अमरेन्द्र, डॉ. — तुक्तक-मुक्तक। शिशु आ लघु आयुवर्गक ध्वनि-प्रधान बाल-कविताक संग्रह। प्रकाशन-विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे उपलब्ध नहि अछि। ९. अमरेन्द्र, डॉ. — बण्टा। अंगिका बाल-उपन्यास। विद्यालय, शिक्षक, बाल-मन, सामाजिक परिस्थिति आ पर्यावरणक विस्तृत कथात्मक संसारपर केन्द्रित कृति। प्रकाशन-विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे स्पष्ट नहि अछि। १०. अमरेन्द्र, डॉ. — अंगिका कथा-सरोवर। २००६। संस्कृत-मूलक कथा, पञ्चतन्त्र-जातक परम्परा आ बालोपयोगी रूपान्तरसँ सम्बद्ध पुस्तक। प्रकाशकक विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे स्पष्ट नहि अछि। ११. अमरेन्द्र, डॉ. — घटोत्कच। बाल-खण्डकाव्य; महाभारतक वनपर्वपर आधारित तीन सर्गक कृति। प्रकाशन-विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे स्पष्ट नहि अछि। १२. अमरेन्द्र, डॉ. — पंचामृत। पाँच बाल-काव्य-रूपकक संग्रह; एहिमे चोकर के हलुआ, अतिथि सेवा, आत्मसमर्पण, विशाखा आ बुद्धं शरणं गच्छामि सम्मिलित अछि। प्रकाशन-विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे स्पष्ट नहि अछि। १३. अमरेन्द्र, डॉ. — पंचगव्य। पाँच बाल-एकांकीक संग्रह; सामाजिक यथार्थ, अन्धविश्वास-विरोध, शिक्षा आ किशोर-चेतनाक प्रसंगसभपर केन्द्रित। प्रकाशन-विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे स्पष्ट नहि अछि। १४. अमरेन्द्र, डॉ. (अनुवादक) — जंगल रों पहचान। उर्दू बाल-उपन्यासक अंगिका रूपान्तर। मूल लेखक, प्रकाशन-वर्ष आ प्रकाशकक विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे स्पष्ट नहि अछि। १५. अमरेन्द्र, डॉ. (अनुवादक) — शिकार आरो शिकारी। उर्दू बाल-उपन्यासक अंगिका रूपान्तर; बालोपयुक्तता आ पर्यावरण-चेतनाक अनुकूलनक उदाहरण। मूल लेखक आ प्रकाशन-विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे स्पष्ट नहि अछि। १६. अमरेन्द्र, डॉ. (अनुवादक) — फैसल रों जासूसी। उर्दू बाल-उपन्यासक अंगिका रूपान्तर। मूल लेखक आ प्रकाशन-विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे स्पष्ट नहि अछि। ख. अंगिका लोकसाहित्य, साहित्येतिहास आ सहायक ग्रन्थ १७. गौतम, डॉ. सुरेश; गौतम, डॉ. वीणा (सम्पादक) — भारतीय बाल-लोकसाहित्य कोश। विभिन्न भारतीय भाषाक बाल-लोकपरम्परासँ सम्बद्ध सम्पादित कोश; डॉ. अमरेन्द्रक किछु आलेखक पूर्व-प्रकाशन-सन्दर्भ एहि कोशसँ जुड़ल अछि। प्रकाशन-विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे पूर्ण रूपेँ उपलब्ध नहि अछि। १८. गौतम, डॉ. सुरेश; गौतम, डॉ. वीणा (सम्पादक) — भारतीय लोरी-साहित्य कोश। भारतीय लोरी-परम्पराक सम्पादित कोश। प्रकाशन-विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे पूर्ण रूपेँ उपलब्ध नहि अछि। १९. जगप्रिय, चन्द्रप्रकाश (सम्पादक) — अंगिका लोकोक्ति, फेकड़ा आरो बुझौवल। अंगिका लोकोक्ति, फेकड़ा आ पहेली-बुझौवलक संकलन; समीक्ष्य ग्रन्थक पहेली-विवेचनमे महत्त्वपूर्ण स्रोत। प्रकाशन-विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे स्पष्ट नहि अछि। २०. तिवारी, मीना (सम्पादक) — चलौ खिस्सा के गाँव। अंगिका लोककथा-संग्रह। प्रकाशन-वर्ष आ प्रकाशकक विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे स्पष्ट नहि अछि। २१. भट्ट, वाञ्छा अंजन — फुलझामर। अंगिका लोककथा-संग्रह। प्रकाशन-वर्ष आ प्रकाशकक विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे स्पष्ट नहि अछि। २२. कुमारी, डॉ. शोभा — अंगिका साहित्य का इतिहास। अंगिका भाषाक साहित्यिक विकास आ परम्परापर केन्द्रित इतिहास-ग्रन्थ। प्रकाशन-विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे स्पष्ट नहि अछि। २३. ग्रियर्सन, जॉर्ज अब्राहम — भारतक भाषिक सर्वेक्षण। १९०३ सँ प्रकाशित भाषावैज्ञानिक सर्वेक्षण-परियोजनाक अन्तर्गत अंगिका/छिका-छिकी सम्बन्धी वर्गीकरणक स्रोत। प्रस्तुत ग्रन्थ-सूचीमे शीर्षक मैथिली रूपमे देल गेल अछि। २४. सिद्धाचार्यसभ — चर्यापद। बौद्ध सिद्धपरम्पराक प्राचीन पद-संग्रह; अंगिका-मैथिली सहित पूर्वी भारतीय आरम्भिक भाषिक-साहित्यिक परम्पराक चर्चामे सन्दर्भित कृति। ग. भारतीय काव्यशास्त्र आ ज्ञानमीमांसाक आधार-ग्रन्थ २५. आनन्दवर्धन — ध्वन्यालोक। ध्वनि, व्यंजना आ काव्यार्थक सिद्धान्तक मूल संस्कृत ग्रन्थ; आलेखमे बालगीत आ बुझौवलक ध्वन्यात्मक तथा व्यंजनात्मक विश्लेषणक सैद्धान्तिक आधार। २६. कुन्तक — वक्रोक्तिजीवित। वक्रोक्ति, वर्ण-विन्यास, पद, वाक्य, प्रकरण आ प्रबन्ध-वक्रताक सिद्धान्तक मूल संस्कृत ग्रन्थ; अंगिका बुझौवल आ बाल-काव्यक वक्र अभिव्यक्तिक विवेचनमे प्रयुक्त। २७. गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। नव्य-न्यायक प्रमुख ज्ञानमीमांसात्मक ग्रन्थ; प्रमाण, अनुमान, व्याप्ति आ ज्ञान-प्रक्रियासँ सम्बद्ध विश्लेषणक दार्शनिक आधार। घ. बाल-साहित्य-अध्ययनक पाश्चात्य आधार-ग्रन्थ — मैथिली शीर्षक-रूपमे २८. रेनॉल्ड्स, किम्बर्ली — बाल-साहित्य : एक अत्यन्त संक्षिप्त परिचय। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय प्रेस, २०११। मौखिक परम्परा, पीढ़ीगत सांस्कृतिक दीक्षा, बाल-साहित्यक इतिहास आ समाजीकरणक प्रश्नसभपर केन्द्रित परिचयात्मक ग्रन्थ। २९. एवर्स, हान्स-हाइनो — बाल-साहित्य-अनुसन्धानक मूलभूत अवधारणासभ। रूटलेज प्रकाशन, २००९। बालोपयुक्तता, वर्गीकरण, साहित्यिक संप्रेषण आ बाल-साहित्य-अध्ययनक आधारभूत अवधारणासभपर केन्द्रित ग्रन्थ। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.२०. गजेन्द्र ठाकुर- ‘बज्जिका गीत-संगीत’ : समेकित द्विभाषिक बहुआयामी साहित्यिक समीक्षा- डॉ. रामेश्वर प्रसादक कृतिक मैथिली–बज्जिका समानान्तर अनुशीलन ‘बज्जिका गीत-संगीत’ : समेकित द्विभाषिक बहुआयामी साहित्यिक समीक्षा डॉ. रामेश्वर प्रसादक कृतिक मैथिली–बज्जिका समानान्तर अनुशीलन समीक्ष्य कृति : ‘बज्जिका गीत-संगीत’ · किशोर प्रकाशन, मुजफ्फरपुर · प्रथम संस्करण, २००० खण्ड १ : चतुर्आयामी आलोचनात्मक अनुशीलन १. सम्पादकीय प्रवेश विदेह अपन आरम्भहिसँ ओहि साहित्यिक न्यायक पक्षधर रहल अछि, जे स्थापित-संस्थागत आलोचना-परम्परासँ छूटल, हाशिया पर ठेलल आ अनसुनल स्वर सभकेँ केन्द्रमे अनैत अछि। समान्तर साहित्य आन्दोलनक मूल प्रतिज्ञा इएह थिक — लोक, स्त्री, दलित, श्रमजीवी आ उपेक्षित समुदायक ओ वाणी, जकरा साहित्य अकादमी-सन संस्थागत साहित्येतिहास प्रायः नामलेवा नहि करैत, तकरा प्रामाणिक आलोचकीय गरिमा देब। विदेह अपन शुरुआते से ओही साहित्यिक न्याय के पक्ष में रहल हय, जे स्थापित-संस्थागत आलोचना-परम्परा से छूटल, हाशिया पर ठेलल आ अनसुनल स्वर सब के केन्द्र में ले आवत हय। समान्तर साहित्य आन्दोलन के मूल परन इहे हय — लोक, स्त्री, दलित, श्रमजीवी आ उपेक्षित समुदाय के ऊ वाणी, जेकरा साहित्य अकादमी-जइसन संस्थागत साहित्येतिहास प्रायः नामलेवा न करे, ओकरा प्रामाणिक आलोचकीय गरिमा देब। एहि दृष्टिएँ, एक मैथिली पत्रिकामे बज्जिका गीत-संग्रहक समीक्षा कोनो विजातीय काज नहि, अपितु सहोदर लोक-वाणी-प्रति एक स्वाभाविक सौहार्द थिक। मैथिली स्वयं हिन्दी-पट्टीक भीतर अपन स्वतन्त्र साहित्यिक अस्मिताक लेल दीर्घ संघर्ष कएने अछि; बज्जिका-सन एक अनुसूची-बाह्य, दोहरा-अधीनस्थ भाषाक साहित्यिक प्रयासकेँ बुझबामे ओ संघर्ष हमरा एक विशेष सहानुभूति दैत अछि। ए नजर से, एगो मैथिली पत्रिका में बज्जिका गीत-संग्रह के समीक्षा कोनो पराया काम न हय, बल्कि सहोदर लोक-वाणी ला एगो स्वाभाविक सौहार्द हय। मैथिली खुद हिन्दी-पट्टी के भीतर अपन अलग साहित्यिक पहचान ला लम्बा संघर्ष कयेलक हय; बज्जिका-जइसन एगो अनुसूची-बाहर, दुहरा-अधीनस्थ भाषा के साहित्यिक प्रयास के समझे में ऊ संघर्ष हमरा एगो खास हमदर्दी देत हय। प्रस्तुत अनुशीलनमे कृतिकेँ चारि आयामसँ जाँचल गेल अछि — (क) भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टि: रस-ध्वनि-वक्रोक्ति; (ख) पाश्चात्य समीक्षा-सिद्धान्त: मार्क्सवाद, संरचनावाद-रूपवाद, उत्तर-औपनिवेशिक ओ अधीनस्थ-विमर्श, संवाद-सिद्धान्त, मौखिकता-प्रदर्शन आ स्त्रीवादी संकेत; (ग) नव्य-न्याय-ज्ञानमीमांसा; आ (घ) विदेह समान्तर-इतिहास-रूपरेखा। एहि चारू दृष्टिक समन्वयसँ एक लोकगीत-संग्रहक बहुस्तरीय पाठ सम्भव भेल अछि। ए अनुशीलन में कृति के चार आयाम से जाँचल गेल हय — (क) भारतीय काव्यशास्त्रीय नजर: रस-ध्वनि-वक्रोक्ति; (ख) पाश्चात्य समीक्षा-सिद्धान्त: मार्क्सवाद, संरचनावाद-रूपवाद, उत्तर-औपनिवेशिक आ अधीनस्थ-विमर्श, संवाद-सिद्धान्त, मौखिकता-प्रदर्शन आ स्त्रीवादी संकेत; (ग) नव्य-न्याय-ज्ञानमीमांसा; आ (घ) विदेह समान्तर-इतिहास-रूपरेखा। ए चारू नजर के मेल से एगो लोकगीत-संग्रह के बहुस्तरीय पाठ सम्भव भेल हय। २. कृति-परिचय ‘बज्जिका गीत-संगीत’ डॉ० रामेश्वर प्रसादक ओ गीत-संग्रह थिक, जे किशोर प्रकाशन, मुजफ्फरपुरसँ सन् २००० मे प्रथम बेर प्रकाशित भेल। लेखक बी०पी०सी० कॉलेज, लालगंज (वैशाली) क प्राचार्य रहलाह आ हिनक लेखनी बज्जिका ओ खड़ी बोली — दुनू भाषामे समान रूपेँ चलैत रहल। ‘कुन्ती के बेटा’ (बज्जिका खण्ड-काव्य), ‘बज्जिका लोकगीत’, ‘हम कहाँ हती’ (बज्जिका ललित निबन्ध), ‘ऐ लाश! सुनो’ आ ‘कहीं विपिन में मधुशाला’ (खड़ी बोली काव्य) — एहि विविध कृति-परम्परामे प्रस्तुत संग्रह हिनक बज्जिका-गीत-साधनाक एक महत्त्वपूर्ण कड़ी थिक। ‘बज्जिका गीत-संगीत’ डॉ० रामेश्वर प्रसाद के ऊ गीत-संग्रह हय, जे किशोर प्रकाशन, मुजफ्फरपुर से सन् २००० में पहिल बेर प्रकाशित भेल। लेखक बी०पी०सी० कॉलेज, लालगंज (वैशाली) के प्राचार्य रहलन आ हुनकर कलम बज्जिका आ खड़ी बोली — दुनू भाषा में बराबर चलल। ‘कुन्ती के बेटा’ (बज्जिका खण्ड-काव्य), ‘बज्जिका लोकगीत’, ‘हम कहाँ हती’ (बज्जिका ललित निबन्ध), ‘ऐ लाश! सुनो’ आ ‘कहीं विपिन में मधुशाला’ (खड़ी बोली काव्य) — एतना रचना के बीच ई संग्रह हुनकर बज्जिका-गीत-साधना के एगो जरूरी कड़ी हय। पोथी ज्येष्ठ पुत्र गोपाल जी किशोरकेँ समर्पित अछि आ एकर भूमिका (परिचय-लेख) राष्ट्रीय संस्कृत संस्थानक आचार्य शम्भुनाथ मिश्र लिखने छथि, जे लेखकक कविताईमे ‘दिनकर-सन प्रखरता’ लक्षित करैत छथि। संग्रहमे कुल एक सय पाँच गीत छथि, जे नौ विषय-वर्गमे विभाजित अछि। एहि गीत सभक विशेषता ई थिक जे ओ केवल पाठ्य नहि, अपितु गेय रचना थिक — लेखकक स्पष्ट अभिप्राय रहलनि जे बज्जिका-भाषी गायक एकरा राग-रागिनीमे बान्हि गाबि सकथि। पोथी ज्येष्ठ पुत्र गोपाल जी किशोर के समर्पित हय आ एकर भूमिका राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के आचार्य शम्भुनाथ मिश्र लिखलन, जे लेखक के कविताई में ‘दिनकर-जइसन प्रखरता’ देखलन। संग्रह में कुल एक सय पाँच गो गीत हय, जे नौ गो विषय-वर्ग में बँटल हय। ए गीत सब के खासियत ई हय कि ऊ खाली पढ़े वला न हय, बल्कि गावे वला रचना हय — लेखक के साफ मंशा रहल कि बज्जिका-भाषी गायक एकरा राग-रागिनी में बान्ह के गा सकस। ३. ‘आत्म-कथन’ आ बज्जिका-भाषा-प्रश्न पोथीक ‘आत्म-कथन’ केवल विनम्र आत्म-निवेदन नहि, अपितु एक भाषिक-सांस्कृतिक घोषणा-पत्र सेहो थिक। लेखक बतबैत छथि जे १९७१ सँ ओ लालगंजमे बज्जिका कवि-गोष्ठीक आयोजन आरम्भ कएलनि, नुक्कड़-सभामे लोकगीत गओलनि, आ १९७६ मे ‘डाक्टर साहेब के बज्जिका लोकगीत’ के नामसँ ओकर एक प्रकाशन कएलनि। मुदा हुनका ई अनुभव भेलनि जे स्वयं गीत-रचनाक अभाव अछि, जाहिसँ गायक लोकनि गाबि सकथि — एहि अभावक पूर्ति करबाक संकल्पसँ प्रस्तुत संग्रह जन्म लेलक। पोथी के ‘आत्म-कथन’ खाली नम्र आत्म-निवेदन न हय, बल्कि एगो भाषिक-सांस्कृतिक घोषणा-पत्र भी हय। लेखक बतवलन कि १९७१ से ऊ लालगंज में बज्जिका कवि-गोष्ठी के आयोजन करे लगलन, नुक्कड़-सभा में लोकगीत गवलन, आ १९७६ में ‘डाक्टर साहेब के बज्जिका लोकगीत’ के नाम से ओकर एगो प्रकाशन कयेलन। लेकिन हुनका ई अनुभव भेल कि खुद गीत-रचना के कमी हय, जेकरा से गायक लोग गा सकस — एही कमी के पूरा करे के संकल्प से ई संग्रह जनम लेलक। एहि निबन्धमे लेखक बज्जिकाक स्वतन्त्र भाषिक अस्तित्वक पक्ष जोर दए राखने छथि। ओ देखबैत छथि जे बज्जिकाक क्रिया-पद क्षेत्र-अनुसार बदलैत अछि — गण्डकक पूर्वी भागमे ‘बा’, दरभंगा-समस्तीपुरमे ‘छी’, मुजफ्फरपुर-हाजीपुरमे ‘हती’ आ शिवहरक तरफ ‘हथ’ — मुदा एतबे विविधतासँ भाषाक एकता नहि टूटैत। ए निबन्ध में लेखक बज्जिका के अलग भाषिक अस्तित्व के पक्ष जोर देके रखलन। ऊ देखवलन कि बज्जिका के क्रिया-पद क्षेत्र-अनुसार बदलत हय — गण्डक के पूरबी भाग में ‘बा’, दरभंगा-समस्तीपुर में ‘छी’, मुजफ्फरपुर-हाजीपुर में ‘हती’ आ शिवहर के तरफ ‘हथ’ — लेकिन एतना बिबिधता से भाषा के एकता न टूटे। एहि सन्दर्भमे ओ लोकोक्ति उद्धृत करैत छथि — “चार कोस पर पानी बदले, आठ कोस पर बानी”। आगाँ बढ़ि ओ ई आग्रह करैत छथि जे बज्जिका पालिसँ विकसित प्राचीन भाषा थिक आ मैथिली-भोजपुरी एकरासँ प्रभावित भेल, न कि एकर विपरीत। एही सन्दर्भ में ऊ लोकोक्ति उठवलन — “चार कोस पर पानी बदले, आठ कोस पर बानी”। आगे बढ़ के ऊ ई दावा कयेलन कि बज्जिका पालि से बिकसित प्राचीन भाषा हय आ मैथिली-भोजपुरी एकरा से प्रभावित भेल, न कि एकर उल्टा। समीक्षकीय दृष्टिएँ ई भाषिक दावा प्रमाण-सिद्ध कम आ आग्रह-मूलक अधिक बुझाइत अछि; आधुनिक भाषा-विज्ञान मैथिली, मगही, भोजपुरी आ बज्जिकाकेँ प्रायः पूर्वी (बिहारी) आर्य-समूहक सहोदर भाषा मानैत अछि, आ एहिमे कोनो एकटाकेँ शेषक जननी सिद्ध करब सरल नहि। किन्तु मूल प्रेरणा — एक उपेक्षित लोक-वाणीकेँ अपन साहित्यिक-गेय पहचान देब — नितान्त सच्चा अछि। लेखक स्वयं ई स्वीकार करैत छथि जे साहित्य-क्षेत्रमे जातीय-प्रतिबद्धता आ साम्प्रदायिक मानसिकतासँ ऊपर उठि ‘साहित्य-सेवा’ हेबाक चाही — ई उदार दृष्टि हिनक भूमिकाक सबसँ स्वस्थ पक्ष थिक। भूमिकामे उद्धृत जगदीश चन्द्र माथुर (वैशाली-महोत्सवक प्रवर्तक) क १९७७ ई० क पत्रक ई परामर्श — जे उत्सवमे लोक (मछुआ) लेल नव गीत बनए के चाही आ ‘धरतीक ओर मुड़ी’ — एहि गीत-रचनाक पाछाँक लोकोन्मुख प्रेरणाकेँ स्पष्ट करैत अछि। समीक्षा के नजर से ई भाषिक दावा प्रमाण-सिद्ध कम आ आग्रह वला जादे लागत हय; आधुनिक भाषा-बिज्ञान मैथिली, मगही, भोजपुरी आ बज्जिका के प्रायः पूरबी (बिहारी) आर्य-समूह के सहोदर भाषा माने हय, आ एहिमें कोनो एक के दोसर के जननी साबित कइल आसान न हय। लेकिन मूल प्रेरणा — एगो उपेक्षित लोक-वाणी के अपन साहित्यिक, गावे वला पहचान देब — एकदम सच्चा हय। लेखक खुद ई मानलन कि साहित्य-क्षेत्र में जातीय-प्रतिबद्धता आ साम्प्रदायिक मानसिकता से ऊपर उठ के ‘साहित्य-सेवा’ होए के चाहीं — ई उदार सोच हुनकर भूमिका के सबसे स्वस्थ पक्ष हय। भूमिका में उठावल जगदीश चन्द्र माथुर (वैशाली-महोत्सव के प्रवर्तक) के १९७७ ई० के पत्र के ई सलाह — कि उत्सव में लोक (मछुआ) ला नया गीत बने के चाहीं आ ‘धरती के ओर मुड़ के’ — ए गीत-रचना के पाछे के लोकोन्मुख प्रेरणा के साफ करत हय। ४. संकलनक संरचना ओ अन्तर्वस्तु-सर्वेक्षण · ४. संग्रह के बनावट आ अन्तर्वस्तु-सर्वेक्षण गीत सभ नौ वर्गमे सजाओल गेल अछि — (क) कृष्ण (१–२०), (ख) श्रृंगार (२१–४२), (ग) नायिका-व्यथा (४३–५२), (घ) प्रकृति (५३–६०), (ङ) मानव-प्रकृति (६१–७८), (च) देश-दशा (७९–८४), (छ) गरीबी (८५–९५), (ज) कृषि (९६–१०३), आ (झ) वसन्त (१०४–१०५)। एहि क्रममे एक स्वाभाविक भाव-यात्रा अछि — भक्ति ओ श्रृंगारसँ आरम्भ भए, प्रकृति होइत, सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ धरि पहुँचि, अन्तमे कृषि-श्रम ओ वसन्तक लयात्मक मधुरतामे विश्राम। लेखकक कहब जे एहिमे तीनू धरातलक गीत — शास्त्रीय गीत, सुगम संगीत आ लोकगीत — समाहित अछि। गीत सब नौ गो वर्ग में सजल हय — (क) कृष्ण (१–२०), (ख) श्रृंगार (२१–४२), (ग) नायिका-व्यथा (४३–५२), (घ) प्रकृति (५३–६०), (ङ) मानव-प्रकृति (६१–७८), (च) देश-दशा (७९–८४), (छ) गरीबी (८५–९५), (ज) कृषि (९६–१०३), आ (झ) वसन्त (१०४–१०५)। ए क्रम में एगो स्वाभाविक भाव-यात्रा हय — भक्ति आ श्रृंगार से शुरू होके, प्रकृति होइत, सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ तक पहुँच के, आखिर में कृषि-श्रम आ वसन्त के लयदार मिठास में विश्राम। लेखक कहलन कि एहिमें तीनू धरातल के गीत — शास्त्रीय गीत, सुगम संगीत आ लोकगीत — समाहित हय। (क) कृष्ण-पदावली कृष्ण-खण्डक बीस गीत विद्यापति-सूरदास परम्पराक फुहार थिक, मुदा बज्जिकाक ठेठ ग्राम्य मुहावरामे ढालल। एतय कृष्ण ‘छलिया’ छथि आ राधाक मन विरह, मान आ उलाहनासँ भरल। प्रथम गीतक टेक — “अब हम कइसे चलूँ डगरिया, लोगवा नजर लगावे ना” — मे लोक-लाजक बीच स्थित प्रेमिकाक द्विविधा ध्वनित अछि; दोसर गीत — “कान्हा चलावे नजरिया, ई कान्हा छलिया” — मे कृष्णक चंचल छलनाक ग्राम्य चित्र। एहि खण्डक सबसँ सशक्त रचना ओतय अछि जतय नाट्य-तत्त्व आबि जाइत अछि — ननदि-भौजाईक संवाद-गीतमे, जतय पनघटक घटनाकेँ लए रस-भरल प्रश्नोत्तर चलैत अछि। कुबजाक उल्लेखसँ राधाक ईर्ष्या-भाव आ अन्यायक बोध मुखर अछि। ‘खेले-खेले कन्हाई’ सन गीतमे वात्सल्य-रसक कोमल स्पर्श सेहो अछि। कृष्ण-खण्ड के बीस गीत विद्यापति-सूरदास परम्परा के फुहार हय, लेकिन बज्जिका के ठेठ गाँव-घर वला मुहावरा में ढालल। इहाँ कृष्ण ‘छलिया’ हथ आ राधा के मन विरह, मान आ उलाहना से भरल। पहिल गीत के टेक — “अब हम कइसे चलूँ डगरिया, लोगवा नजर लगावे ना” — में लोक-लाज के बीच खड़ी प्रेमिका के दुविधा झलकत हय; दोसर गीत — “कान्हा चलावे नजरिया, ई कान्हा छलिया” — में कृष्ण के चंचल छलनी के गाँव-घर वला चित्र। ए खण्ड के सबसे सशक्त रचना ओहिजा हय जहाँ नाट्य-तत्त्व आ जात हय — ननदि-भौजाई के संवाद-गीत में, जहाँ पनघट के घटना के लेके रस-भरल प्रश्नोत्तर चलत हय। कुबजा के जिक्र से राधा के ईर्ष्या-भाव आ अन्याय के बोध मुखर। ‘खेले-खेले कन्हाई’ जइसन गीत में वात्सल्य-रस के कोमल परस भी हय। (ख) श्रृंगार श्रृंगार-खण्ड (२१–४२) मे प्रायः प्रभात, भिनुसार, ऑंख आ अँगनाक बिहारक चित्र आबैत अछि। “ऑंख अलसायेल, बिहँस उठल कंगना” सन पाँतिमे नायिकाक प्रातःकालीन शृंगार-चेष्टाक सजीव आलेखन अछि। एतयक शृंगार देह-प्रधान होइतो लोक-मर्यादाक भीतर रहैत अछि — इच्छा आ संकोचक बीचक तनाव एहि गीत सभक प्राण थिक। श्रृंगार-खण्ड (२१–४२) में प्रायः भोर, भिनुसार, आँख आ अँगना के बिहान के चित्र आवत हय। “आँख अलसायेल, बिहँस उठल कंगना” जइसन पाँति में नायिका के भोर वला सिंगार-चेष्टा के जिन्दा चित्रण हय। इहाँ के श्रृंगार देह-प्रधान होइतो लोक-मर्यादा के भीतर रहत हय — इच्छा आ लाज के बीच के तनाव ए गीत सब के प्राण हय। (ग) नायिका-व्यथा एहि संग्रहक सबसँ मौलिक ओ मार्मिक स्वर एतय मुखर अछि, जतय परम्परागत विरह-काव्य एक जीवन्त सामाजिक दस्तावेज बनि जाइत अछि। एतयक ‘परदेशी’ पति काल्पनिक नहि, अपितु बिहारक श्रम-प्रवासक कठोर यथार्थ थिक — जे रोजी-रोटीक खोजमे ‘कलकतवा’ चलि जाइत छथि। “कि खोजे चललिन बालम के हो कलकतवा” — एहि पाँति एहि प्रवास-वेदनाकेँ लोक-कण्ठ दैत अछि। आगाँ “पिया परदेशिया के कौनो न ठेकान बा” सन गीतमे ओ पति, जे परदेसमे कमाइक अहंकारमे दारू पीबि घर उपेक्षित छोड़ि दैत छथि — नायिकाक व्यथा एतय व्यक्तिगत विरहसँ आगाँ पारिवारिक-सामाजिक टूटनक बोध बनि जाइत अछि। ए संग्रह के सबसे मौलिक आ मरम वला स्वर इहाँ मुखर हय, जहाँ परम्परागत विरह-काव्य एगो जिन्दा सामाजिक दस्तावेज बन जात हय। इहाँ के ‘परदेशी’ पति कल्पना न हय, बल्कि बिहार के श्रम-प्रवास के कठोर यथार्थ हय — जे रोजी-रोटी के खोज में ‘कलकतवा’ चल जात हथ। “कि खोजे चललिन बालम के हो कलकतवा” — ई पाँति ए परदेस-वेदना के लोक-कण्ठ देत हय। आगे “पिया परदेशिया के कौनो न ठेकान बा” जइसन गीत में ऊ पति, जे परदेस में कमाई के घमण्ड में दारू पी के घर उपेक्षित छोड़ देत हथ — नायिका के व्यथा इहाँ निजी विरह से आगे पारिवारिक-सामाजिक टूट के बोध बन जात हय। (घ) प्रकृति प्रकृति-खण्ड (५३–६०) मे कोइलिया, पपीहा, महुआ, फागुन आ चन्दाक ग्राम्य छवि पसरल अछि। “काली रे कोइलिया के साम–साम अँखिया राम, साम लागे ना” सन पाँतिमे ‘साम’ शब्दक श्लेष (साँवर आ श्याम) सँ प्रकृति ओ भक्ति एकठाम बान्हल गेल अछि। ‘कुहुकी-कुहुकी’, ‘टह-टह’, ‘लह-लह’ सन ध्वनि-अलंकारसँ प्रकृतिक ध्वनि-सौन्दर्य गीतमे उतरि आबैत अछि। प्रकृति-खण्ड (५३–६०) में कोइलिया, पपीहा, महुआ, फागुन आ चन्दा के गाँव-घर वला छवि पसरल हय। “काली रे कोइलिया के साम–साम अँखिया राम, साम लागे ना” जइसन पाँति में ‘साम’ शब्द के श्लेष (साँवर आ श्याम) से प्रकृति आ भक्ति एक ठाम बन्हल गेल हय। ‘कुहुकी-कुहुकी’, ‘टह-टह’, ‘लह-लह’ जइसन ध्वनि-अलंकार से प्रकृति के ध्वनि-सुन्दरता गीत में उतर आवत हय। (ङ-च-छ) मानव-प्रकृति, देश-दशा ओ गरीबी · (ङ-च-छ) मानव-प्रकृति, देश-दशा आ गरीबी एहि तीनू खण्डमे कवि सबसँ प्रखर आ प्रतिबद्ध थिक। व्यंग्यक धार तीव्र, लक्ष्य स्पष्ट — कुर्सी, भ्रष्टाचार, नेता आ घूस। “कुर्सी जग के नाच नचयेलक” मे सत्ताक विकृति, आ “हम तऽ एक नम्बर के धरमी, लोगवा भ्रष्टी कहे ना” मे भ्रष्ट व्यक्तिक आत्म-प्रवंचनाक तीखा उपहास अछि। पौराणिक प्रतीकसँ व्यंग्य आर पैघ — “सोचऽ के चलऽ तुलसी आ गेल जमाना गड़बड” मे राम-भरत-रावण-दशरथक कथाकेँ आधुनिक राजनीतिक विद्रूप पर लगाओल गेल। गरीबी-खण्ड (८५–९५) मे महँगाई, करजा, बेटीक दहेज आ दीन-दुखियाक विवशता — “गरीब के समइया राम बिपतिये बाँट जाले” सन पाँतिमे गरीबक विपत्ति-चक्र मुखर अछि। एहि स्वरमे नागार्जुन-सन प्रगतिशील लोक-कविताक प्रतिध्वनि अछि। ए तीनू खण्ड में कवि सबसे प्रखर आ प्रतिबद्ध हय। व्यंग्य के धार तेज, निशाना साफ — कुर्सी, भ्रष्टाचार, नेता आ घूस। “कुर्सी जग के नाच नचयेलक” में सत्ता के विकृति, आ “हम तऽ एक नम्बर के धरमी, लोगवा भ्रष्टी कहे ना” में भ्रष्ट आदमी के आत्म-प्रवंचना के तीखा उपहास। पौराणिक प्रतीक से व्यंग्य आर बड़ — “सोचऽ के चलऽ तुलसी आ गेल जमाना गड़बड” में राम-भरत-रावण-दशरथ के कथा के आज के राजनीतिक विद्रूप पर लगावल गेल। गरीबी-खण्ड (८५–९५) में महँगाई, करजा, बेटी के दहेज आ दीन-दुखिया के लाचारी — “गरीब के समइया राम बिपतिये बाँट जाले” जइसन पाँति में गरीब के बिपत्ति-चक्कर मुखर। ए स्वर में नागार्जुन-जइसन प्रगतिशील लोक-कविता के गूँज हय। (ज-झ) कृषि ओ वसन्त · (ज-झ) कृषि आ वसन्त कृषि-खण्डमे कवि श्रमक गरिमा आ किसानकेँ गाबैत छथि — “चलऽ हम तऽ बनम किसनवा, तूँ किसानिन बनी हऽ ना” आ “काम करू, खाउ गौरव से, तज शोषण के भोग” सन आह्वानमे श्रम-चेतनाक स्वस्थ स्वर अछि। पति-पत्नीक संवाद-गीत (९७–९८) मे गार्हस्थ्यक माधुर्य, आ अन्तमे वसन्त-खण्ड (होली-गीत १०४–१०५) संग्रहकेँ पुनः कृष्ण-लीला आ वासन्ती शृंगारक लयमे लए अनैत अछि — एक सुन्दर वृत्ताकार परिणति। कृषि-खण्ड में कवि श्रम के गरिमा आ किसान के गवलन — “चलऽ हम तऽ बनम किसनवा, तूँ किसानिन बनी हऽ ना” आ “काम करू, खाउ गौरव से, तज शोषण के भोग” जइसन आह्वान में श्रम-चेतना के स्वस्थ स्वर हय। पति-पत्नी के संवाद-गीत (९७–९८) में गिरहस्ती के मिठास, आ आखिर में वसन्त-खण्ड (होली-गीत १०४–१०५) संग्रह के फिर से कृष्ण-लीला आ वसन्ती श्रृंगार के लय में ले आवत हय — एगो सुन्दर गोलाकार परिणति। ५. प्रथम आयाम: रस-ध्वनि-वक्रोक्ति · ५. पहिल आयाम: रस-ध्वनि-वक्रोक्ति ५.१ रस-विवेचन रस-दृष्टिएँ ई संग्रह एक रस-कोश थिक। कृष्ण-खण्डमे स्थायी भाव रति थिक, जे भक्ति-मधुर भावमे परिणत होइत अछि; आलम्बन-विभाव कृष्ण, उद्दीपन यमुना-वंशी-वृन्दावन, अनुभाव नायिकाक चेष्टा, आ व्यभिचारी औत्सुक्य, चिन्ता, ईर्ष्या (कुबजा-प्रसंगे) ओ विषाद। बाल-कृष्ण-गीतमे स्थायी वत्सल-रति सँ वात्सल्य-रस निष्पन्न होइत अछि। रस के नजर से ई संग्रह एगो रस-कोश हय। कृष्ण-खण्ड में स्थायी भाव रति हय, जे भक्ति-मधुर भाव में बदल जात हय; आलम्बन-विभाव कृष्ण, उद्दीपन यमुना-वंशी-वृन्दावन, अनुभाव नायिका के चेष्टा, आ व्यभिचारी औत्सुक्य, चिन्ता, ईर्ष्या (कुबजा-प्रसंग) आ विषाद। बाल-कृष्ण-गीत में स्थायी वत्सल-रति से वात्सल्य-रस निकलत हय। नायिका-व्यथा-खण्डमे एक सूक्ष्म रस-संक्रमण द्रष्टव्य अछि। परम्परया विरह विप्रलम्भ-शृंगार थिक, जाहिमे पुनर्मिलनक आशा निहित रहैत अछि; मुदा जतय विरह सामाजिक-आर्थिक बाध्यता (प्रवास, दारिद्र्य) सँ आरोपित अछि, ओतय आशाक क्षीणतासँ विप्रलम्भ करुण-रसक दिशामे झुकि जाइत अछि। इएह विप्रलम्भ-सँ-करुणक संक्रमण एहि संग्रहक भाव-वैशिष्ट्य थिक। नायिका-व्यथा-खण्ड में एगो सूक्ष्म रस-संक्रमण देखे में आवत हय। आम तौर पर विरह विप्रलम्भ-शृंगार हय, जेहिमें फिर मिले के आशा रहत हय; लेकिन जहाँ विरह सामाजिक-आर्थिक मजबूरी (परदेस, गरीबी) से लादल हय, ओहिजा आशा के कमजोरी से विप्रलम्भ करुण-रस के ओर झुक जात हय। इहे विप्रलम्भ-से-करुण के संक्रमण ए संग्रह के भाव-खासियत हय। मानव-प्रकृति, देश-दशा ओ गरीबीक राजनीतिक गीत परम्परागत रस-योजनाकेँ कसौटी पर चढ़बैत अछि। एतयक भाव न शुद्ध हास्य थिक, न केवल करुण — ओ रोष, आक्रोश आ विद्रोहक ओ आधुनिक स्वर थिक, जकरा शास्त्रीय अष्ट-नव रस-विधानमे सहजे नहि अँटाओल जा सकैत। प्रगतिशील आलोचना जकरा ‘आक्रोश’ वा ‘विद्रोह-रस’ कहैत अछि, ओकर बीज एतय स्पष्ट अछि — आ इएह एहि संग्रहक रस-नवाचार थिक। कृषि-गीतमे श्रम-प्रति उत्साह (कर्म-वीरक अनुरूप ‘श्रम-वीर’) आ ग्राम्य-सन्तोषक शान्त, तथा वसन्त-होलीमे संयोग-शृंगारक उल्लास — रस-वैविध्य पूर्ण अछि। मानव-प्रकृति, देश-दशा आ गरीबी के राजनीतिक गीत परम्परागत रस-योजना के कसौटी पर चढ़ावत हय। इहाँ के भाव न शुद्ध हास्य हय, न खाली करुण — ऊ रोष, आक्रोश आ विद्रोह के ऊ आधुनिक स्वर हय, जेकरा शास्त्रीय अष्ट-नव रस-विधान में आसानी से न अँटावल जा सके। प्रगतिशील आलोचना जेकरा ‘आक्रोश’ या ‘विद्रोह-रस’ कहे हय, ओकर बीज इहाँ साफ हय — आ इहे ए संग्रह के रस-नवाचार हय। कृषि-गीत में श्रम-ला उत्साह (कर्म-वीर के जइसन ‘श्रम-वीर’) आ गाँव-सन्तोष के शान्त, आ वसन्त-होली में संयोग-शृंगार के उल्लास — रस-बिबिधता पूरा हय। ५.२ ध्वनि-विवेचन एहि गीत सभक शक्ति अभिधा-लक्षणासँ बेसी व्यंजनामे अछि। तीनू ध्वनि-भेद एतय भेटैत अछि। वस्तु-ध्वनि: कुबजाक नामोल्लेख कृष्णक उपेक्षाकेँ बिना कहने सुझबैत अछि, आ ‘कलकतवा’ शब्द समस्त प्रवास-त्रासदीकेँ ध्वनित करैत अछि। अलंकार-ध्वनि: ‘साम-साम’क श्लेषसँ (साँवर = श्याम) अर्थ-द्वैत व्यंजित; ‘मन के आग’, ‘नेहिया के डोर’ सन रूपक-ध्वनि। रस-ध्वनि: समस्त नायिका-व्यथा-खण्ड करुण-विप्रलम्भकेँ कहने नहि, अपितु व्यंजित करैत अछि। ए गीत सब के ताकत अभिधा-लक्षणा से जादे व्यंजना में हय। तीनू ध्वनि-भेद इहाँ मिलत हय। वस्तु-ध्वनि: कुबजा के नाम कृष्ण के उपेक्षा के बिना कहले सुझावत हय, आ ‘कलकतवा’ शब्द सारा परदेस-त्रासदी के ध्वनित करत हय। अलंकार-ध्वनि: ‘साम-साम’ के श्लेष से (साँवर = श्याम) अर्थ-द्वैत व्यंजित; ‘मन के आग’, ‘नेहिया के डोर’ जइसन रूपक-ध्वनि। रस-ध्वनि: सारा नायिका-व्यथा-खण्ड करुण-विप्रलम्भ के कहले न, बल्कि व्यंजित करत हय। एहिमे टेक (मुखड़ा) क विशिष्ट ध्वनि-भूमिका अछि। पुनरावृत्तिसँ टेकमे व्यंजना संचित होइत जाइत अछि — प्रत्येक अन्तराक बाद घूमि आबि ओ ध्वनि-घनत्व बढ़बैत अछि, जे आनन्दवर्धनक ‘रस-ध्वनि’क लोक-रूप थिक। एतय अधिकांश ध्वनि विवक्षित-अन्यपर-वाच्य (अर्थशक्तिमूल) प्रकारक थिक — वाच्यार्थ अभीष्ट रहितो ओकरासँ आगाँ इंगित करैत। एहिमें टेक (मुखड़ा) के खास ध्वनि-भूमिका हय। दोहराव से टेक में व्यंजना जुड़त जात हय — हर अन्तरा के बाद घूम के ऊ ध्वनि-घनत्व बढ़ावत हय, जे आनन्दवर्धन के ‘रस-ध्वनि’ के लोक-रूप हय। इहाँ जादेतर ध्वनि विवक्षित-अन्यपर-वाच्य (अर्थशक्तिमूल) प्रकार के हय — वाच्यार्थ चाहितो ओकरा से आगे इशारा करत। ५.३ वक्रोक्ति-विवेचन कुन्तकक मतेँ वक्रोक्ति काव्यक आत्मा थिक। हिनक छह वक्रता-स्तर एहि संग्रह पर एना लागू होइत अछि। (१) वर्ण-विन्यास-वक्रता: ‘कुहुकी-कुहुकी’, ‘टह-टह’, ‘लह-लह’, ‘झन-झन’ सन अनुप्रास आ नाद-चित्रण। (२) पद-पूर्वार्ध-वक्रता: ‘डगरिया’, ‘नजरिया’, ‘बँसुरिया’ सन देशज-तद्भव पद, ‘-इया’ स्नेह-प्रत्ययसँ रुचिर बनल। (३) पद-परार्ध-वक्रता: बज्जिका क्रिया-पद (‘देलऽ’, ‘जाले’, ‘कहे ना’, ‘बनी हऽ’) स्वयं वक्रताक स्थल बनि जाइत अछि, आ भाषिक-सांस्कृतिक आवेश दैत अछि। (४) वाक्य-वक्रता: टेक-पाँति, प्रश्न-रचना (‘अब हम कइसे चलूँ’) आ संवाद-निर्माण। (५) प्रकरण-वक्रता: पनघट-प्रसंग, ननदि-भौजाई ओ पति-पत्नीक संवाद-स्थिति — प्रकरण-स्तरक कौशल। (६) प्रबन्ध-वक्रता: नौ-वर्गीय विषय-योजना (भक्तिसँ वसन्त धरि) एक समग्र प्रबन्ध-वक्रता थिक। कुन्तक के मत से वक्रोक्ति काव्य के आत्मा हय। हुनकर छह वक्रता-स्तर ए संग्रह पर अइसे लागत हय। (१) वर्ण-विन्यास-वक्रता: ‘कुहुकी-कुहुकी’, ‘टह-टह’, ‘लह-लह’, ‘झन-झन’ जइसन अनुप्रास आ नाद-चित्रण। (२) पद-पूर्वार्ध-वक्रता: ‘डगरिया’, ‘नजरिया’, ‘बँसुरिया’ जइसन देशज-तद्भव पद, ‘-इया’ स्नेह-प्रत्यय से रुचिर। (३) पद-परार्ध-वक्रता: बज्जिका क्रिया-पद (‘देलऽ’, ‘जाले’, ‘कहे ना’, ‘बनी हऽ’) खुदे वक्रता के ठाम बन जात हय, आ भाषिक-सांस्कृतिक आवेश देत हय। (४) वाक्य-वक्रता: टेक-पाँति, प्रश्न-रचना (‘अब हम कइसे चलूँ’) आ संवाद-निर्माण। (५) प्रकरण-वक्रता: पनघट-प्रसंग, ननदि-भौजाई आ पति-पत्नी के संवाद-स्थिति — प्रकरण-स्तर के कौशल। (६) प्रबन्ध-वक्रता: नौ-वर्गीय विषय-योजना (भक्ति से वसन्त तक) एगो समग्र प्रबन्ध-वक्रता हय। मूल्यांकन: कविक वक्रता वर्ण- ओ पद-परार्ध-स्तर पर (नाद आ बज्जिका रूप-रचनामे) सर्वाधिक सबल अछि; मुदा जतय ओ सीधा उपदेश-कथनमे उतरि जाइत छथि — विशेषतः किछु राजनीतिक ओ गरीबी-गीतमे — ओतय वक्रता क्षीण भए वाच्यता प्रबल भए जाइत अछि। एतय काव्यक ‘वक्र’ स्वभाव मन्द अछि। मूल्यांकन: कवि के वक्रता वर्ण- आ पद-परार्ध-स्तर पर (नाद आ बज्जिका रूप-रचना में) सबसे मजबूत हय; लेकिन जहाँ ऊ सीधा उपदेश-कथन में उतर जात हथ — खास कर के किछु राजनीतिक आ गरीबी-गीत में — ओहिजा वक्रता कमजोर होके वाच्यता जोर पकड़ लेत हय। ६. द्वितीय आयाम: पाश्चात्य समीक्षा-दृष्टि · ६. दोसर आयाम: पाश्चात्य समीक्षा-दृष्टि ६.१ मार्क्सवादी पाठ देश-दशा ओ गरीबी-गीत वर्ग-चेतनासँ भरल अछि। ‘कलकतवा’-प्रवास ग्राम-नगर श्रम-निष्कासनक ओ ‘श्रमक आरक्षित सेना’क चित्र थिक, जे बिहारकेँ बंगालक उद्योग लेल श्रम-आगारमे बदलि दैत अछि। ‘कुर्सी’-गीत राज्य-यन्त्रक (नेता, अफसर, पुलिसक) आलोचना थिक — अल्थ्यूसरक दमनकारी ओ विचारधारात्मक राज्य-उपकरणक स्मृति एतय जागैत अछि। आधार-अधिरचनाक सम्बन्ध स्पष्ट अछि: आर्थिक आधार (दारिद्र्य, करजा, दहेज) कोना अधिरचनात्मक विपत्तिकेँ निर्धारित करैत अछि, से कवि देखबैत छथि। ‘खून भेल सस्ता’ सन पाँतिमे मानव-जीवनक वस्तुकरण, आ आजादीक ओ आलोचना — जे केवल नेता-अभिनेताकेँ लाभ देलक — उत्तर-औपनिवेशिक बुर्जुआ राज्यक तीखा समीक्षा थिक। कवि, जन-भाषामे गीत रचि, ग्राम्शीय ‘जैविक बुद्धिजीवी’क भूमिकामे ठाढ़ अछि। देश-दशा आ गरीबी-गीत वर्ग-चेतना से भरल हय। ‘कलकतवा’-प्रवास गाँव-नगर श्रम-निकास आ ‘श्रम के आरक्षित सेना’ के चित्र हय, जे बिहार के बंगाल के उद्योग ला श्रम-आगार में बदल देत हय। ‘कुर्सी’-गीत राज्य-यन्त्र (नेता, अफसर, पुलिस) के आलोचना हय — अल्थ्यूसर के दमनकारी आ विचारधारात्मक राज्य-उपकरण के याद इहाँ जागत हय। आधार-अधिरचना के रिश्ता साफ हय: आर्थिक आधार (गरीबी, करजा, दहेज) कइसे अधिरचनात्मक बिपत्ति के तय करत हय, से कवि देखावत हथ। ‘खून भेल सस्ता’ जइसन पाँति में मानव-जीवन के वस्तुकरण, आ आजादी के ऊ आलोचना — जे खाली नेता-अभिनेता के लाभ देलक — उत्तर-औपनिवेशिक बुर्जुआ राज्य के तीखा समीक्षा हय। कवि, जन-भाषा में गीत रच के, ग्राम्शी के ‘जैविक बुद्धिजीवी’ के भूमिका में खड़ा हय। ६.२ संरचनावाद ओ रूपवाद · ६.२ संरचनावाद आ रूपवाद समस्त संग्रह किछु द्विपद-विरोध (binary oppositions) पर संगठित अछि — गाँव/परदेस, गरीब/बड़का, धरती-कुर्पी/कुर्सी, धरमी/भ्रष्ट, अन्न/भूख। ‘कुर्सी’ सत्ताक तरल-संकेतक बनि जाइत अछि, आ कोइलिया-पपीहा विरहक आवर्ती संकेत। रूपवादी दृष्टिएँ टेक संरचनात्मक रीढ़ थिक, आ ब्रुक्स-कथित ‘तनाव’ (tension) इन्द्रिय-सुखद शृंगार-सतह आ नैतिक-सामाजिक अन्तर्धाराक बीच व्याप्त अछि। ‘हम तऽ एक नम्बर के धरमी’ मे नाटकीय व्यंग्य (dramatic irony) अछि — भ्रष्ट वक्ता अनजानहि अपन निन्दा करैत अछि। सारा संग्रह किछु दुई-पद-विरोध पर बनल हय — गाँव/परदेस, गरीब/बड़का, धरती-कुर्पी/कुर्सी, धरमी/भ्रष्ट, अन्न/भूख। ‘कुर्सी’ सत्ता के तरल-संकेत बन जात हय, आ कोइलिया-पपीहा विरह के आवर्ती संकेत। रूपवादी नजर से टेक संरचनात्मक रीढ़ हय, आ ब्रुक्स-कहल ‘तनाव’ इन्द्रिय-सुखद शृंगार-सतह आ नैतिक-सामाजिक अन्तर्धारा के बीच पसरल हय। ‘हम तऽ एक नम्बर के धरमी’ में नाटकीय व्यंग्य हय — भ्रष्ट वक्ता अनजाने अपन निन्दा करत हय। ६.३ उत्तर-औपनिवेशिक ओ अधीनस्थ-विमर्श · ६.३ उत्तर-औपनिवेशिक आ अधीनस्थ-विमर्श स्पिवाकक प्रश्न — ‘की अधीनस्थ बाजि सकैत अछि?’ — एतय प्रासंगिक अछि। कवि परित्यक्ता पत्नी ओ भुखायल किसानक स्वर उधार लैत छथि; मुदा एतय प्रतिनिधित्वक मध्यस्थता अछि — एक शिक्षित प्राचार्य अधीनस्थक ‘बदला’ बाजि रहल छथि, जे स्वयं एक विमर्श-समस्या थिक। तथापि बज्जिका-सन अधीनस्थ भाषाक चयन स्वयं एक विऔपनिवेशिक इंगित थिक — हिन्दी-संस्कृत आधिपत्यक विरुद्ध ‘देशी’ वाणीमे लिखब। ‘कलकतवा’-प्रवास औपनिवेशिक आर्थिक भूगोलक उत्तर-जीवन थिक। स्पिवाक के प्रश्न — ‘का अधीनस्थ बोल सकत हय?’ — इहाँ प्रासंगिक हय। कवि परित्यक्ता पत्नी आ भुखायल किसान के स्वर उधार लेत हथ; लेकिन इहाँ प्रतिनिधित्व के मध्यस्थता हय — एगो पढ़ल-लिखल प्राचार्य अधीनस्थ के ‘बदला’ बोल रहल हथ, जे खुद एगो विमर्श-समस्या हय। तइयो बज्जिका-जइसन अधीनस्थ भाषा के चयन खुदे एगो विऔपनिवेशिक इशारा हय — हिन्दी-संस्कृत के आधिपत्य के खिलाफ ‘देशी’ वाणी में लिखब। ‘कलकतवा’-प्रवास औपनिवेशिक आर्थिक भूगोल के उत्तर-जीवन हय। ६.४ संवाद-सिद्धान्त (बाख्तिन) ननदि-भौजाई आ पति-पत्नीक संवाद-गीत शाब्दिक रूपेँ संवादधर्मी (dialogic) थिक; एतय अनेक स्वरक बहुस्वरता (polyphony) अछि — नायिका, ननदि, किसान, आ आत्म-व्यंग्य करैत नेताक स्वर। होली-गीतमे उत्सव-विपर्यय (carnivalesque) — बरजोरी आ उलटल-संसारक क्षणिक स्वतन्त्रता — दृष्टिगोचर अछि। ननदि-भौजाई आ पति-पत्नी के संवाद-गीत शाब्दिक रूप से संवादधर्मी हय; इहाँ अनेक स्वर के बहुस्वरता हय — नायिका, ननदि, किसान, आ आत्म-व्यंग्य करत नेता के स्वर। होली-गीत में उत्सव-विपर्यय — बरजोरी आ उलटल-संसार के क्षणिक स्वतन्त्रता — देखे में आवत हय। ६.५ मौखिकता ओ प्रदर्शन-सिद्धान्त · ६.५ मौखिकता आ प्रदर्शन-सिद्धान्त ऑङ्ग, पैरी-लॉर्ड आ जुम्थोरक दृष्टिएँ ई रचना मौखिक-सूत्रात्मक (oral-formulaic) थिक — आवर्ती टेक, ‘छलिया’-‘गिरधारी’ सन नाम-सूत्र (epithet), आ स्मृति-सहायक पुनरावृत्ति। पाठ-भेद (mouvance) सेहो अछि — एक्के गीतमे ‘सोहागिन’/‘सुहागिन’क विचलन मौखिक तरलताक प्रमाण थिक। ई गीत ‘पाठ’ नहि, ‘प्रदर्शन’ थिक — वाणीक प्राथमिकता एतय मूल अछि। इएह कारणे सरलता ओ पुनरावृत्तिकेँ दोष नहि, विधा-गुण मानब उचित। ऑङ्ग, पैरी-लॉर्ड आ जुम्थोर के नजर से ई रचना मौखिक-सूत्रात्मक हय — आवर्ती टेक, ‘छलिया’-‘गिरधारी’ जइसन नाम-सूत्र, आ याद-मददगार दोहराव। पाठ-भेद भी हय — एक्के गीत में ‘सोहागिन’/‘सुहागिन’ के फेर-बदल मौखिक तरलता के प्रमाण हय। ई गीत ‘पाठ’ न, ‘प्रदर्शन’ हय — वाणी के पहिलौती इहाँ मूल हय। एही से सरलता आ दोहराव के दोष न, विधा-गुण मानब ठीक हय। ६.६ स्त्रीवादी संकेत नायिका-व्यथा-खण्ड एक लैंगिक कर्तृ-स्थिति (gendered subjectivity) प्रस्तुत करैत अछि — परित्यक्ता, प्रवासीक ‘जीवित-वैधव्य’मे जीबैत स्त्रीक अन्तर्जगत। तथापि द्वैत सेहो अछि: श्रृंगार-गीतमे स्त्री-सौन्दर्यक निर्माण प्रायः पुरुष-दृष्टि (male gaze) सँ भेल अछि। एहि द्वन्द्वकेँ पहिचानब एहि पाठक स्त्रीवादी अवदान थिक। नायिका-व्यथा-खण्ड एगो लैंगिक कर्तृ-स्थिति सामने आनत हय — परित्यक्ता, परदेसी के ‘जीवित-वैधव्य’ में जीत स्त्री के अन्तर्जगत। तइयो द्वैत भी हय: श्रृंगार-गीत में स्त्री-सौन्दर्य के बनावट प्रायः पुरुष-दृष्टि से भेल हय। ए द्वन्द्व के पहचानब ए पाठ के स्त्रीवादी देन हय। ७. तृतीय आयाम: नव्य-न्याय-ज्ञानमीमांसा · ७. तेसर आयाम: नव्य-न्याय-ज्ञानमीमांसा ई आयाम गीत सभक ज्ञान-संरचनाकेँ गङ्गेशोत्तरकालीन नैयायिक उपकरणसँ आलोकित करैत अछि। आरम्भहिमे ई स्पष्ट होअय जे ई ज्ञानमीमांसीय पाठ थिक — ई दावा कदापि नहि जे लोक-कवि सचेत रूपेँ नव्य-न्यायक प्रयोग कएलनि; अपितु ई जे काव्य-बोधमे जे तार्किक-आन्वयिक ढाँचा अन्तर्निहित अछि, ओ एहि दृष्टिएँ विशेष स्पष्टतासँ उद्घाटित होइत अछि। ई आयाम गीत सब के ज्ञान-संरचना के गङ्गेशोत्तरकालीन नैयायिक उपकरण से आलोकित करत हय। शुरुए में ई साफ रहे कि ई ज्ञानमीमांसीय पाठ हय — ई दावा कहियो न कि लोक-कवि जान-बूझ के नव्य-न्याय के प्रयोग कयेलन; बल्कि ई कि काव्य-बोध में जे तार्किक-आन्वयिक ढाँचा भीतरे हय, ऊ ए नजर से खास साफी से खुलत हय। ७.१ शब्द-बोध, शक्ति-ग्रह ओ देशज-संकेत · ७.१ शब्द-बोध, शक्ति-ग्रह आ देशज-संकेत नैयायिकक मतेँ शाब्द-बोध आकाङ्क्षा, योग्यता, आसत्ति (सन्निधि) ओ तात्पर्य — एहि चारि हेतुसँ उत्पन्न होइत अछि, आ पद-पदार्थ-सम्बन्धक ज्ञान (शक्ति-ग्रह) ओकर पूर्ववर्ती कारण थिक। शक्ति-ग्रहक मुख्य उपाय व्यवहार थिक — वृद्ध-व्यवहारसँ बालक संकेत ग्रहण करैत अछि। एहि दृष्टिएँ लोक-गीतक देशज पद (‘डगरिया’, ‘बालम’, ‘सँइया’) क शक्ति-ग्रह ओहि प्रदर्शन-समुदायक व्यवहार-परम्परासँ होइत अछि — गीत स्वयं एक संकेत-ग्राहक सामुदायिक व्यवहार बनि जाइत अछि। लोक-गीतक विरल-वाक्य-रचनामे आकाङ्क्षाक पूर्ति बहुधा प्रकरण ओ तात्पर्यसँ होइत अछि; रिक्त पद साझा सांस्कृतिक प्रकरणसँ भरैत अछि। नैयायिक के मत से शाब्द-बोध आकाङ्क्षा, योग्यता, आसत्ति (सन्निधि) आ तात्पर्य — ए चार हेतु से पैदा होत हय, आ पद-पदार्थ-सम्बन्ध के ज्ञान (शक्ति-ग्रह) ओकर पहिलौका कारण हय। शक्ति-ग्रह के मुख्य उपाय व्यवहार हय — बड़-बुजुर्ग के व्यवहार से बालक संकेत ग्रहण करत हय। ए नजर से लोक-गीत के देशज पद (‘डगरिया’, ‘बालम’, ‘सँइया’) के शक्ति-ग्रह ओही प्रदर्शन-समुदाय के व्यवहार-परम्परा से होत हय — गीत खुदे एगो संकेत-ग्राहक सामुदायिक व्यवहार बन जात हय। लोक-गीत के विरल-वाक्य-रचना में आकाङ्क्षा के पूर्ति जादेतर प्रकरण आ तात्पर्य से होत हय; खाली पद साझा सांस्कृतिक प्रकरण से भर जात हय। ७.२ विषयता-निरूपण: विरह-ज्ञानक आन्वयिक संरचना · ७.२ विषयता-निरूपण: विरह-ज्ञान के आन्वयिक संरचना गङ्गेशोत्तर न्यायमे प्रत्येक ज्ञान अपन विषयक ‘विषयता’-सम्बन्धसँ निरूपित होइत अछि, आ ई विषयता त्रिविध अछि — विशेष्यता, प्रकारता ओ संसर्गता। नायिकाक ज्ञान ‘मम पतिः प्रोषितः’ (हमर पति परदेस गेलाह) केँ लिअ: एतय विशेष्यता पति-निष्ठ थिक, प्रकारता प्रोषितत्व (वा वियोग)-निष्ठ, आ संसर्गता ओहि सम्बन्धमे जे विशेष्य ओ प्रकारकेँ जोड़ैत अछि। समग्र ज्ञान एहि त्रिविध-विषयता-निरूपक थिक। काव्य-प्रभावक कुंजी इएह — पाठक/श्रोताक अनुगामी ज्ञान जखन नायिकाक विरहकेँ ओहि विशिष्ट प्रकारता (करुण-अनुकूल) सँ विषय बनबैत अछि, तखन रस-निष्पत्ति होइत अछि। एना विषयता-सिद्धान्त रस-संचारक आन्वयिक व्याख्या दैत अछि। गङ्गेशोत्तर न्याय में हर ज्ञान अपन विषय के ‘विषयता’-सम्बन्ध से निरूपित होत हय, आ ई विषयता तीन तरह के हय — विशेष्यता, प्रकारता आ संसर्गता। नायिका के ज्ञान ‘मम पतिः प्रोषितः’ (हमर पति परदेस गेलन) के लीं: इहाँ विशेष्यता पति-निष्ठ हय, प्रकारता प्रोषितत्व (या वियोग)-निष्ठ, आ संसर्गता ओही सम्बन्ध में जे विशेष्य आ प्रकार के जोड़त हय। पूरा ज्ञान ए तीन-तरह-विषयता-निरूपक हय। काव्य-प्रभाव के चाबी इहे — पाठक/श्रोता के अनुगामी ज्ञान जब नायिका के विरह के ओही खास प्रकारता (करुण-अनुकूल) से विषय बनावत हय, तब रस-निष्पत्ति होत हय। अइसे विषयता-सिद्धान्त रस-संचार के आन्वयिक व्याख्या देत हय। ७.३ अभाव-ज्ञान: संसर्गाभाव, प्रतियोगिता ओ अवच्छेदक · ७.३ अभाव-ज्ञान: संसर्गाभाव, प्रतियोगिता आ अवच्छेदक विरहक केन्द्रीय ज्ञान ‘पतिः अत्र नास्ति’ एक अभाव-ज्ञान थिक, आ एकर सूक्ष्म-विश्लेषण अवच्छेदक-तन्त्रसँ होइत अछि। ई संसर्गाभाव थिक (अन्योन्याभाव नहि) — पति ‘संयोग-सम्बन्धेँ’ अँगनामे नहि अछि। एतय प्रतियोगी पति, प्रतियोगिता-अवच्छेदक-धर्म पतित्व, आ अवच्छेदक-सम्बन्ध संयोग (वा सामीप्य) थिक; अभावक अधिकरण अँगना/गृह। काव्य-मर्म ई जे सामान्यतः अभाव अनुभवक विषय भेनाइ कठिन, मुदा एतय कवि ओहि संसर्गाभावकेँ उद्दीपन (सूना अँगना, मौन सेज) द्वारा प्रत्यक्ष-कल्प इन्द्रिय-गोचर बना दैत छथि — अभावक ई ‘विषयीकरण’ एहि खण्डक काव्य-शक्ति थिक। विरह के केन्द्रीय ज्ञान ‘पतिः अत्र नास्ति’ एगो अभाव-ज्ञान हय, आ एकर सूक्ष्म-विश्लेषण अवच्छेदक-तन्त्र से होत हय। ई संसर्गाभाव हय (अन्योन्याभाव न) — पति ‘संयोग-सम्बन्ध से’ अँगना में न हय। इहाँ प्रतियोगी पति, प्रतियोगिता-अवच्छेदक-धर्म पतित्व, आ अवच्छेदक-सम्बन्ध संयोग (या सामीप्य) हय; अभाव के अधिकरण अँगना/घर। काव्य-मरम ई कि आम तौर पर अभाव अनुभव के विषय बने में कठिन, लेकिन इहाँ कवि ओही संसर्गाभाव के उद्दीपन (सूना अँगना, चुप सेज) से परतछ-कल्प इन्द्रिय-गोचर बना देत हथ — अभाव के ई ‘विषयीकरण’ ए खण्ड के काव्य-शक्ति हय। ७.४ उपमा-रूपक: मुख्यार्थ-बाध, लक्षणा-बीज ओ गौणी वृत्ति · ७.४ उपमा-रूपक: मुख्यार्थ-बाध, लक्षणा-बीज आ गौणी वृत्ति रूपक-स्थलमे नैयायिक-प्रक्रिया एना अछि: ‘मन के आग’ मे मुख्यार्थ (मनमे वास्तविक अग्नि) क अन्वय-अनुपपत्ति (बाध) होइत अछि; ई मुख्यार्थ-बाध लक्षणाक बीज थिक। तखन लक्षणासँ प्रवृत्ति-निमित्त सादृश्य (सन्तापकत्व) क आश्रयेँ गौणी वृत्ति द्वारा ‘सन्तापक-मानस-वृत्ति’ लक्षित होइत अछि। ‘नेहिया के डोर’ मे बन्धकत्व-सादृश्य प्रवृत्ति-निमित्त। उपमा-स्थलमे सादृश्य-ज्ञान स्वयं उपमान-प्रमाणक फल थिक (सादृश्य-विशिष्ट-पिण्ड-ज्ञान)। नव्य-नैयायिक एहि समस्त प्रक्रियाकेँ शक्ति-लक्षणाक भीतर सम्पन्न मानि, आलंकारिकक पृथक् ‘व्यंजना-वृत्ति’क आवश्यकताक प्रतिरोध करैत छथि। रूपक-ठाम नैयायिक-प्रक्रिया अइसन हय: ‘मन के आग’ में मुख्यार्थ (मन में सचमुच के आग) के अन्वय-अनुपपत्ति (बाध) होत हय; ई मुख्यार्थ-बाध लक्षणा के बीज हय। तब लक्षणा से प्रवृत्ति-निमित्त सादृश्य (सन्तापकत्व) के आश्रय ले के गौणी वृत्ति से ‘सन्तापक-मानस-वृत्ति’ लक्षित होत हय। ‘नेहिया के डोर’ में बन्धकत्व-सादृश्य प्रवृत्ति-निमित्त। उपमा-ठाम सादृश्य-ज्ञान खुदे उपमान-प्रमाण के फल हय (सादृश्य-विशिष्ट-पिण्ड-ज्ञान)। नव्य-नैयायिक ए पूरा प्रक्रिया के शक्ति-लक्षणा के भीतरे पूरा मान के, आलंकारिक के अलग ‘व्यंजना-वृत्ति’ के जरूरत के विरोध करत हथ। ७.५ व्याप्ति, उपाधि ओ सव्यभिचार: सूक्ति-गीतमे · ७.५ व्याप्ति, उपाधि आ सव्यभिचार: सूक्ति-गीत में सूक्ति-गीतक तर्क-संरचना व्याप्ति-विमर्शसँ प्रकाशित होइत अछि। गङ्गेशक सिद्धान्त-लक्षण अनुसार व्याप्ति ‘साध्याभाववद्-अवृत्तित्व’ थिक। “जुल्म करे जे, सब सुख पावे” — पाँति एक व्याप्ति-कल्प सामान्य-नियम (अत्याचार-कर्तृत्व → सुख-प्राप्ति) प्रस्तुत करैत अछि; मुदा ई लोक-अनुभव-विरुद्ध थिक, तेँ वस्तुतः सव्यभिचार (व्यभिचार-दुष्ट) अछि — साध्याभाववान् (दुःखी अत्याचारी) क सत्तासँ हेतु व्यभिचरित होइत अछि, आ एतय ‘धर्म’-रूप उपाधि सेहो सम्भव। कविक चातुर्य इएह जे ओ एहि सव्यभिचारकेँ जानि-बूझि निश्चित-व्याप्तिक भाषामे कहैत छथि; श्रोता जखन ओहि आनैकान्तिकताकेँ पहिचानैत अछि, तखन आक्रोश-रसक व्यंग्य फुटैत अछि। एना विषम-नैतिक यथार्थ एक विडम्बित छद्म-व्याप्तिक रूपमे व्यक्त होइत अछि। सूक्ति-गीत के तर्क-संरचना व्याप्ति-विमर्श से खुलत हय। गङ्गेश के सिद्धान्त-लक्षण के मुताबिक व्याप्ति ‘साध्याभाववद्-अवृत्तित्व’ हय। “जुल्म करे जे, सब सुख पावे” — पाँति एगो व्याप्ति-कल्प सामान्य-नियम (अत्याचार-कर्तृत्व → सुख-प्राप्ति) सामने रखत हय; लेकिन ई लोक-अनुभव-विरुद्ध हय, एही से दरअसल सव्यभिचार (व्यभिचार-दुष्ट) हय — साध्याभाववान् (दुःखी अत्याचारी) के सत्ता से हेतु व्यभिचरित होत हय, आ इहाँ ‘धरम’-रूप उपाधि भी सम्भव। कवि के चतुराई इहे कि ऊ ए सव्यभिचार के जान-बूझ के निश्चित-व्याप्ति के भाषा में कहत हथ; श्रोता जब ओही आनैकान्तिकता के पहचानत हय, तब आक्रोश-रस के व्यंग्य फूटत हय। अइसे विषम-नैतिक यथार्थ एगो विडम्बित छद्म-व्याप्ति के रूप में सामने आवत हय। ७.६ ध्वनि-वि-अनुमिति-वाद: कुबजा-प्रसंगक परामर्श-विश्लेषण · ७.६ ध्वनि-आ-अनुमिति-वाद: कुबजा-प्रसंग के परामर्श-विश्लेषण व्यंजनाकेँ स्वतन्त्र वृत्ति मानब आलंकारिक-पक्ष थिक; नैयायिक (ओ महिमभट्ट-सन ‘अनुमिति-वादी’) एकरा अनुमानमे न्यूनीकृत करैत छथि। कुबजा-प्रसंगकेँ अनुमान-रूपेँ एना पुनर्गठित कयल जा सकैत अछि — पक्ष: कृष्ण; साध्य: राधा-उपेक्षा (अन्यासक्ति); हेतु: कुबजा-अनुरञ्जन-श्रवण सह राधाक उलाहना; व्याप्ति: ‘यत्र अन्य-नायिका-अनुरञ्जनम्, तत्र स्व-नायिका-उपेक्षा’। लिङ्ग-परामर्शसँ व्यंग्यार्थ ‘अनुमिति’ बनि जाइत अछि — पृथक् वृत्ति अनावश्यक। तथापि आनन्दवर्धन-पक्षक प्रत्युत्तर ध्यातव्य: काव्यक चमत्कार अक्रम (एकहि क्षणमे, रसात्मक) थिक, जखन कि अनुमिति क्रम-भावी (परामर्श-पूर्वक) थिक; तेँ ई न्यूनीकरण एक अनुभूति-मूलक मूल्य चुकबैत अछि। दुनू पक्षकेँ यथावत् राखब समीचीन। व्यंजना के स्वतन्त्र वृत्ति मानब आलंकारिक-पक्ष हय; नैयायिक (आ महिमभट्ट-जइसन ‘अनुमिति-वादी’) एकरा अनुमान में घटा देत हथ। कुबजा-प्रसंग के अनुमान-रूप में अइसे फिर-बनावल जा सकत हय — पक्ष: कृष्ण; साध्य: राधा-उपेक्षा (अन्यासक्ति); हेतु: कुबजा-अनुरञ्जन-श्रवण संगे राधा के उलाहना; व्याप्ति: ‘यत्र अन्य-नायिका-अनुरञ्जनम्, तत्र स्व-नायिका-उपेक्षा’। लिङ्ग-परामर्श से व्यंग्यार्थ ‘अनुमिति’ बन जात हय — अलग वृत्ति के जरूरत न। तइयो आनन्दवर्धन-पक्ष के जवाब याद रखे के हय: काव्य के चमत्कार अक्रम (एक्के छन में, रसात्मक) हय, जब कि अनुमिति क्रम-भावी (परामर्श-पूर्वक) हय; एही से ई घटावब एगो अनुभूति-मूलक मूल्य चुका देत हय। दुनू पक्ष के जस के तस रखब ठीक। ७.७ स्मृति, संस्कार ओ उद्बोधक: विरह-गीतक स्मृति-विज्ञान · ७.७ स्मृति, संस्कार आ उद्बोधक: विरह-गीत के स्मृति-विज्ञान विरह-गीत मूलतः स्मृति-जगाबनिहार थिक। नैयायिक-प्रक्रियामे अनुभवसँ संस्कार, आ संस्कारसँ उद्बोधक-सहायेँ स्मृति उत्पन्न होइत अछि। एतय प्रकृति-उद्दीपन (कोइलिया-कूक, चन्दा, फागुन) उद्बोधकक कार्य करैत अछि — ओ प्रवासित प्रियक पूर्व-अनुभव-जन्य संस्कारकेँ जगाबि स्मृति-ज्ञान उत्पन्न करैत अछि, आ ओहि स्मृतिएँ विरह-वेदना तीव्र होइत अछि। एना उद्दीपन-विभावक काव्य-भूमिका नैयायिक स्मृति-कारण-व्यवस्था (संस्कार + उद्बोधक) क समानान्तर अछि। विरह-गीत मूल रूप से स्मृति-जगावे वला हय। नैयायिक-प्रक्रिया में अनुभव से संस्कार, आ संस्कार से उद्बोधक-मदद से स्मृति पैदा होत हय। इहाँ प्रकृति-उद्दीपन (कोइलिया-कूक, चन्दा, फागुन) उद्बोधक के काम करत हय — ऊ परदेसी प्रिय के पहिलौका-अनुभव-जन्य संस्कार के जगा के स्मृति-ज्ञान पैदा करत हय, आ ओही स्मृति से विरह-वेदना तेज होत हय। अइसे उद्दीपन-विभाव के काव्य-भूमिका नैयायिक स्मृति-कारण-व्यवस्था (संस्कार + उद्बोधक) के समानान्तर हय। ७.८ प्रामाण्य-वाद: लोक-गीतक परतः प्रामाण्य · ७.८ प्रामाण्य-वाद: लोक-गीत के परतः प्रामाण्य नैयायिक-मतेँ ज्ञानक प्रामाण्य परतः थिक — ओ संवाद वा प्रवृत्ति-सामर्थ्यसँ ज्ञात होइत अछि (मीमांसकक स्वतः-प्रामाण्यक विपरीत)। लोक-गीत एक आप्त-वाक्य/लोक-शब्द-प्रमाण थिक; सामाजिक दुःखक विषयमे एकर प्रामाण्य ओहि समुदायक सम्वादी अनुभव (लोक-संवाद) सँ परतः सिद्ध होइत अछि। एहि अर्थेँ गीत-गायक-श्रोताक साझा प्रत्यभिज्ञा ओहि साक्ष्यक प्रामाण्य-आपादक थिक — दुःखक सामूहिक सत्यापन। नैयायिक-मत से ज्ञान के प्रामाण्य परतः हय — ऊ संवाद या प्रवृत्ति-सामर्थ्य से जानल जात हय (मीमांसक के स्वतः-प्रामाण्य के उल्टा)। लोक-गीत एगो आप्त-वाक्य/लोक-शब्द-प्रमाण हय; सामाजिक दुःख के बारे में एकर प्रामाण्य ओही समुदाय के सम्वादी अनुभव (लोक-संवाद) से परतः सिद्ध होत हय। ए माने में गीत-गायक-श्रोता के साझा प्रत्यभिज्ञा ओही साक्ष्य के प्रामाण्य-आपादक हय — दुःख के सामूहिक सत्यापन। पुनः स्मरणीय: उपर्युक्त समस्त नैयायिक-विश्लेषण गीत सभक ज्ञान-संरचनाक ‘आलोक’ थिक, कवि-चेतनाक इतिहास नहि। लोक-कवि रस-सिद्ध छथि, तर्क-सिद्ध नहि; तथापि हिनक काव्य-बोधक आन्तर आन्वयिक व्यवस्था एहि दर्शन-दृष्टिएँ जे स्पष्टतासँ उजागर होइत अछि, ओ स्वयं एहि लोक-वाणीक गूढ़ ज्ञान-गरिमाक प्रमाण थिक। फिर से याद रखे के: ऊपर के सब नैयायिक-विश्लेषण गीत सब के ज्ञान-संरचना के ‘आलोक’ हय, कवि-चेतना के इतिहास न। लोक-कवि रस-सिद्ध हथ, तर्क-सिद्ध न; तइयो हुनकर काव्य-बोध के भीतरी आन्वयिक व्यवस्था ए दर्शन-नजर से जे साफी से उजागर होत हय, ऊ खुदे ए लोक-वाणी के गूढ़ ज्ञान-गरिमा के प्रमाण हय। ८. चतुर्थ आयाम: समान्तर-इतिहास-रूपरेखा · ८. चौथा आयाम: समान्तर-इतिहास-रूपरेखा विदेह समान्तर-इतिहास-दृष्टिएँ ई कृति एक प्रति-कैननिक (counter-canonical) पाठ थिक। बज्जिका स्वयं एक अनुसूची-बाह्य, हिन्दी (राजभाषा) आ मैथिली (अनुसूचित) क बीच दोहरा-अधीनस्थ भाषा थिक; प्रस्तुत संग्रह एक भाषाक ओ प्रयास थिक जे संस्थागत साहित्य-अकादमी-कैननसँ बाहर रहि, स्वयंकेँ साहित्यमे लिखि रहल अछि — हाशियासँ लिखल साहित्येतिहास। विदेह समान्तर-इतिहास-नजर से ई कृति एगो प्रति-कैननिक पाठ हय। बज्जिका खुदे एगो अनुसूची-बाहर, हिन्दी (राजभाषा) आ मैथिली (अनुसूचित) के बीच दुहरा-अधीनस्थ भाषा हय; ई संग्रह एगो भाषा के ऊ प्रयास हय जे संस्थागत साहित्य-अकादमी-कैनन से बाहर रह के, खुद के साहित्य में लिख रहल हय — हाशिया से लिखल साहित्येतिहास। स्वर-पुनरुद्धार: स्त्री-स्वर — नायिका-व्यथा-खण्ड परित्यक्ता स्त्रीक, नैहर-ससुरक बीचक द्वैधावस्था (गवना-गीत), आ प्रवासीक ‘जीवित-वैधव्य’क साक्ष्य दैत अछि (यद्यपि रचयिता-मध्यस्थता स्मरणीय)। श्रमिक-किसान-स्वर — कृषि आ गरीबी-खण्ड मेटाओल श्रमिक, प्रवासी ओ करजा-बद्ध किसानक इतिहास-नीचाँसँ (history from below) प्रस्तुत करैत अछि। राजनीतिक गीत उत्तर-औपनिवेशिक राज्यक जन-आलोचना थिक — आधिकारिक राष्ट्रवादी आख्यानक विरुद्ध एक समान्तर इतिहास (आजादीक ओ आलोचना जे दीन-दुखियाकेँ छलक)। स्वर-पुनरुद्धार: स्त्री-स्वर — नायिका-व्यथा-खण्ड परित्यक्ता स्त्री के, नैहर-ससुर के बीच के द्वैधावस्था (गवना-गीत), आ परदेसी के ‘जीवित-वैधव्य’ के साक्ष्य देत हय (यद्यपि रचयिता-मध्यस्थता याद रखे के हय)। श्रमिक-किसान-स्वर — कृषि आ गरीबी-खण्ड मेटावल श्रमिक, परदेसी आ करजा-बद्ध किसान के इतिहास-नीचे से सामने आनत हय। राजनीतिक गीत उत्तर-औपनिवेशिक राज्य के जन-आलोचना हय — आधिकारिक राष्ट्रवादी आख्यान के खिलाफ एगो समान्तर इतिहास (आजादी के ऊ आलोचना जे दीन-दुखिया के छलक)। बज्जिकाक आ मैथिलीक — दुनूक प्रति-कैननिक संघर्षक साम्य एतय स्पष्ट अछि; अधीनस्थ भाषा सभक क्षैतिज एकजुटता एहि पाठक नैतिक केन्द्र थिक। साक्ष्य-मूल्य: समान्तर इतिहासक रूपमे ई गीत लोक-स्मृतिक अभिलेख थिक, जे बीसम शताब्दीक उत्तरार्धक ग्रामीण बिहारक भाव-आर्थिक बनावटकेँ सुरक्षित रखैत अछि। भारतवाणी (CIIL) क अंकीकरण स्वयं एक समान्तर-अभिलेखीय कर्म थिक। लोकतान्त्रिक रूप: गीत मौखिक-प्रदर्शन लेल रचल — साहित्य एक ‘साझी सम्पत्ति’ (commons), न कि अभिजन-सम्पदा; एकर नुक्कड़-सभा-मूल इएह प्रमाणित करैत अछि। बज्जिका के आ मैथिली के — दुनू के प्रति-कैननिक संघर्ष के साम्य इहाँ साफ हय; अधीनस्थ भाषा सब के क्षैतिज एकजुटता ए पाठ के नैतिक केन्द्र हय। साक्ष्य-मूल्य: समान्तर इतिहास के रूप में ई गीत लोक-स्मृति के अभिलेख हय, जे बीसम शताब्दी के उत्तरार्ध के गाँव-बिहार के भाव-आर्थिक बनावट के सुरक्षित रखत हय। भारतवाणी (CIIL) के अंकीकरण खुदे एगो समान्तर-अभिलेखीय काम हय। लोकतान्त्रिक रूप: गीत मौखिक-प्रदर्शन ला रचल — साहित्य एगो ‘साझी सम्पत्ति’, न कि अभिजन-सम्पदा; एकर नुक्कड़-सभा-मूल इहे साबित करत हय। आत्म-आलोचनात्मक टीप (समान्तर-नीति-अनुरूप): लेखकक अपन भाषिक दावा — जे बज्जिका पालि-वंशज ओ मैथिली-भोजपुरीक जननी थिक — प्रति-कैननक भीतरहि ओहि आधिपत्यकारी कैनन-निर्माण-तर्ककेँ दोहरा दैत अछि, जकर विरोध समान्तर आन्दोलन करैत अछि। अर्थात्, बज्जिकाक गरिमा प्राचीनता वा प्राथम्यक ऊर्ध्व-दावासँ स्थापित करब, ओकर समान-किन्तु-भिन्न अधीनस्थ अस्मिताक क्षैतिज गौरवसँ कम वांछनीय थिक। समान्तर-इतिहास-दृष्टि भाषा-सभक क्षैतिज सौहार्दकेँ प्राथम्य-दावा पर वरीयता दैत अछि। आत्म-आलोचनात्मक टीप (समान्तर-नीति के अनुरूप): लेखक के अपन भाषिक दावा — कि बज्जिका पालि-वंशज आ मैथिली-भोजपुरी के जननी हय — प्रति-कैनन के भीतरे ओही आधिपत्यकारी कैनन-निर्माण-तर्क के दोहरा देत हय, जेकर विरोध समान्तर आन्दोलन करत हय। मतलब, बज्जिका के गरिमा प्राचीनता या प्राथम्य के ऊर्ध्व-दावा से खड़ी करब, ओकर समान-लेकिन-भिन्न अधीनस्थ पहचान के क्षैतिज गौरव से कम वांछनीय हय। समान्तर-इतिहास-नजर भाषा सब के क्षैतिज सौहार्द के प्राथम्य-दावा पर तरजीह देत हय। ९. समन्वित मूल्यांकन: शिल्प, उपलब्धि ओ सीमा · ९. समन्वित मूल्यांकन: शिल्प, उपलब्धि आ सीमा शिल्प-दृष्टिएँ संग्रहक रीढ़ टेक थिक; बज्जिका क्रिया-पदक सघन बुनाबट एकर भाषिक पहचान दैत अछि; ग्राम्य-प्रतीक (मटुकिया, बँसुरिया, कोइलिया, चन्दा, धान, अलमुनियाक थरिया) आ ध्वनि-अलंकार एकर लोक-रस भरैत अछि। एक तनाव सेहो अछि — कतहु तत्सम-प्रधान पदावली (‘रणित ललित नव कनक नूपुरवा’) देशज मुहावरासँ पूर्ण एकरूप नहि भए पबैत, जाहिसँ किछु गीतक एकरसता शिथिल भए जाइत अछि। शिल्प के नजर से संग्रह के रीढ़ टेक हय; बज्जिका क्रिया-पद के सघन बुनावट एकर भाषिक पहचान देत हय; गाँव-घर के प्रतीक (मटुकिया, बँसुरिया, कोइलिया, चन्दा, धान, अलमुनिया के थरिया) आ ध्वनि-अलंकार एकर लोक-रस भरत हय। एगो तनाव भी हय — कहीं तत्सम-प्रधान पदावली (‘रणित ललित नव कनक नूपुरवा’) देशज मुहावरा से पूरा एक न हो पावे, जेकरा से किछु गीत के एकरसता ढीली हो जात हय। उपलब्धि: सबसँ पैघ उपलब्धि — विविध विषय ओ रसक एक गेय गीत-कोश, जे लेखकक घोषित लक्ष्य छल। सामाजिक चेतना, जतय विरह प्रवास-यथार्थमे बदलि जाइत आ राजनीतिक व्यंग्य प्रत्यक्ष अछि, एकर स्थायी मूल्य थिक। लोक-जीवनसँ गहन जुड़ाव आ ग्राम्य प्रतीकक प्रामाणिकता एकरा सच्चा लोक-दस्तावेज बनबैत अछि। उपलब्धि: सबसे बड़ उपलब्धि — भाँति-भाँति के बिषय आ रस के एगो गावे वला गीत-कोश, जे लेखक के घोषित लक्ष्य रहल। सामाजिक चेतना, जहाँ विरह परदेस-यथार्थ में बदल जात आ राजनीतिक व्यंग्य सीधा हय, एकर स्थायी मूल्य हय। लोक-जीवन से गहिर जुड़ाव आ गाँव-घर के प्रतीक के सच्चाई एकरा सच्चा लोक-दस्तावेज बनावत हय। सीमा: संग्रह असमान अछि — किछु राजनीतिक ओ गरीबी-गीत काव्यसँ अधिक प्रचारात्मक-उपदेशात्मक (वाच्य, वक्रता ओ ध्वनिसँ रहित) भए जाइत अछि। कृष्ण ओ श्रृंगार-खण्डक अनेक गीत विद्यापति-सूरक परिचित भूमि पर चलैत अछि। प्रतीक-पुनरावृत्ति ओ तत्सम-देशज पदावलीक असंगति खटकैत अछि। भूमिकाक भाषिक दावा सिद्धिसँ अधिक आग्रह थिक, आ प्रतिनिधित्वक मध्यस्थता एक विमर्श-समस्या थिक। तथापि सरलता, टेक-पुनरावृत्ति ओ स्पष्ट भाव — ई सभटा गेयताक अनिवार्य शर्त थिक; एहन गीत मंच पर गाबल जएबाक लेल रचल, न कि केवल पढ़ल जएबाक लेल। सीमा: संग्रह असमान हय — किछु राजनीतिक आ गरीबी-गीत काव्य से जादे प्रचार-वला आ उपदेश-वला (वाच्य, वक्रता आ ध्वनि से रहित) बन जात हय। कृष्ण आ श्रृंगार-खण्ड के अनेक गीत विद्यापति-सूर के जानल जमीन पर चलत हय। प्रतीक-दोहराव आ तत्सम-देशज पदावली के बेमेली खटकत हय। भूमिका के भाषिक दावा सिद्धि से जादे आग्रह हय, आ प्रतिनिधित्व के मध्यस्थता एगो विमर्श-समस्या हय। तइयो सरलता, टेक-दोहराव आ साफ भाव — ई सब गेयता के जरूरी शर्त हय; अइसन गीत मंच पर गावे ला बनल हय, न कि खाली पढ़े ला। १०. उपसंहार चारू आयामक समन्वयसँ स्पष्ट अछि जे ‘बज्जिका गीत-संगीत’ एक बहुस्तरीय कृति थिक — रस-ध्वनि-वक्रोक्तिक दृष्टिएँ ओ लोक-रस-कोश, पाश्चात्य दृष्टिएँ ओ वर्ग-चेतन, संवादधर्मी ओ प्रदर्शन-मूलक पाठ, नव्य-न्यायक दृष्टिएँ अभाव-ज्ञान ओ अनुमान-व्याप्तिसँ बुनल भाव-संरचना, आ समान्तर-इतिहासक दृष्टिएँ एक प्रति-कैननिक, अधीनस्थ-स्वर-वाहक दस्तावेज। चारू आयाम के मेल से साफ हय कि ‘बज्जिका गीत-संगीत’ एगो बहुस्तरीय कृति हय — रस-ध्वनि-वक्रोक्ति के नजर से ऊ लोक-रस-कोश, पाश्चात्य नजर से ऊ वर्ग-चेतन, संवादधर्मी आ प्रदर्शन-मूलक पाठ, नव्य-न्याय के नजर से अभाव-ज्ञान आ अनुमान-व्याप्ति से बुनल भाव-संरचना, आ समान्तर-इतिहास के नजर से एगो प्रति-कैननिक, अधीनस्थ-स्वर-वाहक दस्तावेज। एकर स्थायी मूल्य दुहरा अछि — एक दिस ई बिहारक प्रवास ओ गरीबीक एक लोक-साहित्यिक साक्ष्य थिक, आ दोसर दिस मैथिलीक सहोदर लोक-वाणीक तुलनात्मक अध्ययन तथा समान्तर-साहित्यिक प्रश्नक दृष्टिएँ एक उपयोगी मूल-पाठ। डॉ० रामेश्वर प्रसादक ई संकलन ओहि परम्पराक थिक, जतय कवि जन-साधारणक दिल-दिमागमे अपन भाषाक पहचान बनएबाक लेल गीतकेँ सहज-स्वाभाविक स्रोत मानैत छथि। विदेह समान्तर आन्दोलन जाहि प्रति-कैननकेँ रचबाक स्वप्न देखैत अछि, ई कृति ओहि समान्तर वाङ्मयक एक प्रामाणिक अंग थिक — आ इएह कारणे ओ हमर आलोचकीय आदर-योग्य अछि। एकर स्थायी मूल्य दुहरा हय — एक ओर ई बिहार के परदेस आ गरीबी के एगो लोक-साहित्यिक साक्ष्य हय, आ दोसर ओर मैथिली के सहोदर लोक-वाणी के तुलनात्मक अध्ययन आ समान्तर-साहित्यिक प्रश्न के नजर से एगो जरूरी मूल-पाठ हय। डॉ० रामेश्वर प्रसाद के ई संग्रह ओही परम्परा के हय, जहाँ कवि जन-साधारण के दिल-दिमाग में अपन भाषा के पहचान बनावे ला गीत के सहज-स्वाभाविक स्रोत माने हथ। विदेह समान्तर आन्दोलन जेकर प्रति-कैनन के रचे के सपना देखत हय, ई कृति ओही समान्तर वाङ्मय के एगो प्रामाणिक अंग हय — आ एही से ऊ हमर आलोचकीय आदर के लायक हय। समीक्षा-पद्धति: एहि अनुशीलनमे भारतीय काव्यशास्त्र (रस-ध्वनि-वक्रोक्ति), पाश्चात्य समीक्षा-सिद्धान्त, नव्य-न्याय-ज्ञानमीमांसा ओ विदेह समान्तर-इतिहास-रूपरेखा — एहि चारि आयामकेँ आधार बनाओल गेल अछि। सभटा उद्धरण मूल पोथीसँ यथावत् लेल गेल आ ओकरा विश्लेषणक हेतु सीमित राखल गेल अछि। समीक्षा-पद्धति: ए अनुशीलन में भारतीय काव्यशास्त्र (रस-ध्वनि-वक्रोक्ति), पाश्चात्य समीक्षा-सिद्धान्त, नव्य-न्याय-ज्ञानमीमांसा आ विदेह समान्तर-इतिहास-रूपरेखा — ए चार आयाम के आधार बनावल गेल हय। सब उद्धरण मूल पोथी से जस के तस लेल गेल आ ओकरा बिश्लेषण खातिर सीमित रखल गेल हय। खण्ड २ : निकट-पाठ, गीत-विन्यास आ सामाजिक-सांस्कृतिक विवेचन आलोचनात्मक पद्धति · आलोचना के पद्धति आलोचनात्मक पद्धतिमे तीन स्तर राखल गेल अछि: पहिल, निकट-पाठ—शब्द, बिम्ब, पुनरावृत्ति, लय, टेक, संवाद आ कथ्यक सूक्ष्म अध्ययन; दोसर, भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टिसँ शृंगार, करुण, हास्य, वीर आ लोक-भक्तिक भाव-संरचनाक परीक्षण; तेसर, सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टिसँ ग्राम्य जीवन, स्त्री-अनुभव, गरीबी, कृषि, सत्ता-चिन्ता, भाषा-अस्मिता आ सामुदायिक स्मृतिक अर्थ-विस्तार। आलोचनात्मक पद्धतिमे तीन स्तर राखल गेल हय: पहिल, निकट-पाठ—शब्द, बिम्ब, पुनरावृत्ति, लय, टेक, संवाद आ कथ्यक सूक्ष्म अध्ययन; दोसर, भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टिसे शृंगार, करुण, हास्य, वीर आ लोक-भक्तिक भाव-संरचनाक परीक्षण; तेसर, सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टिसे ग्राम्य जीवन, स्त्री-अनुभव, गरीबी, कृषि, सत्ता-चिन्ता, भाषा-अस्मिता आ सामगरयिक स्मृतिक अर्थ-विस्तार। १. ग्रन्थ-स्वरूप: गीत, कविता आ लोकधुनक संगम · १. पोथी के रूप आ बनावट अब हम कइसे चलूँ डगरिया, लोगवा नजर लगावे ना।। ‘बज्जिका गीत-संगीत’क मूल शक्ति ओकर गेयता अछि। ई साधारण कविता-संग्रह नहि, बल्कि एहन गीत-संग्रह अछि जाहिमे पंक्ति-रचना, ध्वनि, टेक, पुनरावृत्ति आ सम्बोधन सभ मिलि गायनक स्वाभाविक अवकाश बनबैत अछि। अनेक गीतमे पंक्ति छोट अछि, ध्वन्यात्मक लय स्पष्ट अछि आ अन्तिम पद पुनरावृत्तिमूलक अछि। एहि कारण पाठक पढ़ैत-पढ़ैत भीतर सँ धुन सुनबाक अनुभव करैत अछि। ‘बज्जिका गीत-संगीत’ खाली गीत के संग्रह न हय। ई बज्जिका जनजीवन, प्रेम, दुख-सुख, प्रकृति, राजनीति, गरीबी, खेती आ फागुन के एक विस्तृत गेय संसार हय। पोथी मे कुल 105 गो गीत हय, जे कृष्ण, शृंगार, नायिका-व्यथा, प्रकृति, मानव-प्रकृति, देश-दशा, गरीबी, कृषि आ वसन्त—अइ नौ खण्ड मे रखल गेल हय। कृतिक आरम्भ कृष्ण-गीतसँ होइत अछि; तकर बाद शृंगार, नायिका-व्यथा, प्रकृति, सामाजिक यथार्थ, देश-दशा, गरीबी, कृषि आ अन्तमे वसन्त धरि भाव-विस्तार होइत अछि। ई क्रम केवल विषय-विभाजन नहि, बल्कि रसात्मक आरोह-अवरोह अछि—व्यक्तिगत प्रेमसँ सामूहिक जीवन दिस, प्रकृतिसँ राजनीति दिस, आ अन्ततः पुनः उत्सव तथा रंग दिस। अइ क्रम मे कवि पहिले राधा-श्याम आ प्रेम के लोक-संसार से शुरू करै छतन; फेर नायिका के पीर, प्रकृति आ मनुष्य के स्वभाव तक जायत हय; ओकर बाद देश, गरीबी आ खेती के यथार्थ आबय हय; आ अन्त मे वसन्त आ होरी के रंग से पोथी फेर रस-उल्लास मे लौट आवय हय। तैं ई खण्ड-विभाजन खाली सूची न हय, बल्कि भाव के क्रमिक यात्रा हय। एहि आरम्भिक टेकमे ‘डगरिया’ आ ‘नजर लगावे’ जकाँ लोकप्रचलित शब्दावली काव्यक भावकेँ सीधे लोक-जीवनसँ जोड़ैत अछि। ‘डगरिया’ केवल पथ नहि, प्रेमक सार्वजनिक जोखिमक संकेत सेहो बनैत अछि। अइ टेक मे पोथी के मूल सुर साफ सुनाय पड़य हय—सहज लोकबोली, गावे लायक लय, प्रेम के संकोच आ समाज के नजर। ‘डगरिया’ एहाँ खाली रास्ता न हय; ई प्रेम, लोकलाज आ सार्वजनिक निगाह के बीच से निकले वाला जीवन-पथ के संकेत सेहो हय। २. कृष्ण-खण्ड: लोक-भक्ति आ शृंगारक सहअस्तित्व · २. कृष्ण गीत: लोक-भक्ति आ प्रेम के संगम प्रथम बीस गीत कृष्ण-केन्द्रित अछि, मुदा एहि कृष्णक रूप वैदिक-दार्शनिक नहि, लोकजीवनक निकट, राधा-श्यामक प्रेम, मुरली, यमुना, अँगना, पनघट, नजर, विरह आ छेड़छाड़सँ बनल अछि। लेखक कृष्ण-मिथककेँ ग्रामीण भाव-संसारमे उतारैत छथि। एहि रूपान्तरणमे भक्ति आ शृंगार परस्पर विरोधी नहि रहैत, बल्कि एक्के भावधाराक दू छोर बनि जाइत अछि। कृष्ण खण्ड मे भगवान दूर के दार्शनिक देवता बनके न रहतन। ऊ जमुना, पनघट, मुरली, झूला, राधा, गोरी, अँगना आ गाम के बीच अपन लोग जइसन उपस्थित छतन। अइ गीत मे भक्ति आ शृंगार अलग-अलग राह न हय; दून्नो एक-दोसर मे घुलल मिलल हय। राधा-श्याम प्रसंगमे विरह अधिकतर सहज बोलचालक लयमे व्यक्त होइत अछि। अतिशय संस्कृतनिष्ठ अलंकारक बदला लोकबिम्ब, देह-भाषा, नयन, मुरली, यमुना, झूला, बरखा, फागु आ पनघट प्रमुख अछि। एहि कारण काव्यक भावाभिव्यक्ति विद्वज्जनक शास्त्रीय प्रदर्शन नहि, जनभाषाक अपनापन बनि उठैत अछि। कवि के विशेषता हय कि पुरान कृष्ण-कथा के बज्जिका के बोल, चाल आ भाव दे देलन। श्याम, राधा, मुरली, जमुना, चाँद आ पनघट पुरान प्रतीक जरूर हय, परंच स्थानीय भाषा आ क्रियापद ओकरा नया आत्मीयता देलक। कृष्ण-गीतसभक एक उपलब्धि ई अछि जे लेखक मिथकीय पात्रकेँ स्थानीय भाषा-संस्कारमे फेर जिअबैत छथि। सीमा ई अछि जे किछु गीतमे राधा-श्याम, चन्द्र, नयन, फूल आ मुरलीक बिम्ब पुनः-पुनः आयल अछि; ताहिसँ किछु ठाम प्रतीक-नवीनता कम भऽ जाइत अछि। मुदा संगीतात्मकता एहि पुनरावृत्तिकेँ दोषसँ अधिक गायनात्मक गुण बना दैत अछि। किछु गीत मे चाँद, आँख, फूल, मुरली आ रूप के बिम्ब बार-बार आबय हय। पढ़े मे कखनहुँ दोहराव लगय हय, परंच गावे मे ई दोहराव टेक, स्मृति आ लय के ताकत बन जायत हय। ई अंतर गीत-साहित्य के प्रकृति समझे के लेल जरूरी हय। ३. शृंगार: देह, दृष्टि आ प्रतीक्षाक काव्य · ३. शृंगार: नजर, देह, लाज आ प्रतीक्षा शृंगार-खण्डमे प्रेमक दृश्यात्मकता अत्यन्त प्रबल अछि। आँखि, अँचरा, चूनरी, चन्द्र, कमल, बिजली, बादल, सुगन्ध, पायल, केश, अधर आ फूल बारम्बार आबैत अछि। रूपवर्णन प्रायः चलायमान अछि—नायिका देखाइत मात्र नहि, चलैत, हँसैत, झाँकैत, लजैत, प्रतीक्षा करैत आ संवाद करैत अछि। शृंगार खण्ड मे प्रेम बहुत दृश्य रूप मे सामने आबय हय। अँचरा, पायल, आँख, केश, कमल, चाँद, बिजुली, फूल, हवा, रात आ रंग—ई सब प्रेम के भाषा बनल हय। कवि रूप-वर्णन करैत जरूर छतन, पर नायिका खाली देखे के वस्तु बनके न रहय हय; ऊ चलय हय, लजाय हय, हँसय हय, झाँकय हय, प्रतीक्षा करय हय आ कखनहुँ सवाल सेहो करय हय। एहि खण्डक अनेक गीतमे प्रेम सार्वजनिक दृश्य सेहो बनैत अछि। गामक बाट, अँगना, छत, नदी, फूलबारी आ राति—ई सभ प्रेमक मंच बनैत अछि। प्रेमक निजी अनुभूति आ सामुदायिक निगाहक बीच तनाव काव्यकेँ जीवंत बनबैत अछि। गाम के बाट, अँगना, छत, बगइचा आ नदी प्रेम के मंच बन जायत हय। एतय निजी प्रेम आ समाज के निगाह के बीच तनाव बनल रहय हय। अइ कारण गीत मे प्रेम खाली देह के आकर्षण न रहके लोकलाज, दूरी, प्रतीक्षा आ मिलन के पूरा सामाजिक अनुभव बन जायत हय। लेखकक शृंगार-काव्यमे उपमा सरल अछि, मुदा तत्क्षण बोधगम्य। ‘चन्द्र’, ‘कमल’, ‘बिजली’, ‘मधुऋतु’ जकाँ पारंपरिक बिम्ब स्थानीय क्रियापद आ लोकलयक कारण पुनः ताजगी पबैत अछि। यद्यपि किछु ठाम रूप-वर्णन रूढ़ होइत अछि, कुल मिलाकऽ गीतक संगीतात्मक प्रवाह ओकरा बोझिल नहि होमय दैत अछि। किछु ठाम रूप-वर्णन परम्परागत हय, पर बज्जिका के स्थानीय क्रिया, संबोधन आ बोलचाल ओकरा मे नया जीवन भरै हय। कवि जटिल अलंकार न खोजतन; सहज बिम्ब से तुरन्त प्रभाव पैदा करै छतन। ४. नायिका-व्यथा: स्त्री-अनुभवक करुण धरातल · ४. नायिका-व्यथा: औरत के भीतर के आवाज नायिका-व्यथा खण्ड संग्रहक भावात्मक केन्द्रसभमे सँ एक अछि। एतय पति-परदेश, प्रतीक्षा, परिवारक दवाब, अपमान, अकेलापन, प्रेमक असुरक्षा आ स्त्रीक आन्तरिक वाणी उभरैत अछि। ई खण्ड केवल प्रेम-विरह नहि, ग्रामीण स्त्री-जीवनक सामाजिक दबाब सेहो उद्घाटित करैत अछि। नायिका-व्यथा अइ पोथी के सबसे संवेदनशील खण्ड मे से एक हय। एतय परदेश गेल पिया, ससुराल, अकेलापन, इंतजार, दुख, रोष, प्रेम के असुरक्षा आ स्त्री के आत्मस्वर सामने आबय हय। औरत सजावट के पात्र भर न हय; ऊ बोलय हय, पूछय हय, शिकायत करय हय आ कखनहुँ प्रतिरोध सेहो करय हय। विशेष रूपेँ परदेशिया पति, ससुराल, बाल-विवाहक छाया, स्त्रीक असहाय प्रतीक्षा आ संवादहीनता गीतमे बारम्बार आयल अछि। स्त्री पात्र हमेशा निष्क्रिय नहि अछि; कतहु ओ विरोध करैत अछि, कतहु प्रश्न करैत अछि, कतहु अपन प्रेमक अधिकार माँगैत अछि। एहि कारण नायिका-व्यथा कृतिक भावलोककेँ गहिराई प्रदान करैत अछि। अइ खण्ड मे करुण रस के प्रभाव भाषा के सादगी से बढ़ल हय। छोट वाक्य, पुकार, दोहराव आ रोजमर्रा के शब्द दुख के बनावटी न होवे देय हय। नायिका के पीर व्यक्तिगत हय, पर ओकर भीतर परदेश, परिवार, विवाह-संबंध आ स्त्री के सामाजिक स्थिति के संकेत सेहो मिलय हय। करुण रसक प्रस्तुति अत्यधिक विलापपर टिकायल नहि अछि; ओकरा लोकबोलीक साधारण वाक्य, पुकार आ पुनरावृत्ति अधिक प्रभावी बनबैत अछि। ई सरलता कृतिक महत्त्वपूर्ण कलात्मक गुण अछि। एहाँ कवि के उपलब्धि ई हय कि लोकगीत के परिचित ढाँचा मे स्त्री के भावनात्मक संसार के अलग स्थान देल गेल हय। सीमा ई हय कि पोथी के दोसर शृंगारिक गीत मे कखनहुँ स्त्री के बाहरी रूप पर अधिक जोर पड़ल हय। ५. प्रकृति: सजावट नहि, जीवित सहचर · ५. प्रकृति: मनुष्य के जीवित सहचर काजर से सज के आयेल रात में अन्हरिया, सोना अइसन भागल बिहान।। प्रकृति-खण्डमे नदी, हवा, वर्षा, कोयल, मधुऋतु, मेहँदी, फूल, चन्द्र आ हरियर खेत केवल पृष्ठभूमि नहि। प्रकृति मनुष्यक भावक सहभागी अछि। नदी विरह वहबैत अछि, चन्द्र मिलनक संकेत बनैत अछि, वर्षा मनक आवेगक संग चलैत अछि, आ फूल प्रेमक दृश्यात्मक भाषा बनैत अछि। प्रकृति खण्ड मे नदी, पवन, बरखा, कोयल, मेहँदी, फागुन, फूल आ चाँद खाली सजावट न हय। आदमी के मन जइसे बदलय हय, तहिना प्रकृति सेहो भाव के संग बदलैत देखाय पड़य हय। बरखा के संग विरह, चाँद के संग मिलन, फागुन के संग उमंग आ नदी के संग प्रवाह के भाव जुड़ल हय। एहि दू पंक्तिमे राति ‘काजर’सँ सजीव बनैत अछि आ बिहान ‘सोना’ सन चमकैत अछि। लोकबिम्बक एहि सहज रूपान्तरणमे लेखकक चित्रात्मक क्षमता स्पष्ट होइत अछि। अइ पंक्ति मे रात के ‘काजर’ आ बिहान के ‘सोना’ से जो तुलना कैल गेल हय, ओ साधारण होके सेहो चमकीला दृश्य बनाबय हय। लोकजीवन से उठल बिम्ब कवि के सबसे स्वाभाविक काव्य-शक्ति हय। प्रकृतिक सौन्दर्यक संग ग्रामीण पर्यावरणक मूर्त उपस्थिति सेहो अछि—खेत, नदी, पनघट, बाग, कदम्ब, कोयल, फागुन। एहि कारण प्रकृति-चित्रण अमूर्त रोमानी प्रकृति नहि, बल्कि रहन-सहनक भूगोल अछि। प्रकृति के चित्र अमूर्त न हय। खेत, नदी, पनघट, बाग, कदम्ब, कोयल, फागुन—ई सब ओही भूगोल से आयल हय जे जन-जीवन के रोज के हिस्सा हय। तैं प्रकृति अइ पोथी मे पर्यावरण से अधिक जीवन-पद्धति के रूप मे उपस्थित हय। ६. मानव-प्रकृति: सामाजिक व्यंग्यक विस्तार · ६. मानव-प्रकृति: व्यंग्य आ सामाजिक आलोचना ‘मानव-प्रकृति’ खण्डसँ संग्रहक स्वर निर्णायक रूपेँ बदलैत अछि। प्रेम आ ऋतुरागक बाद लेखक अफसर, मंत्री, चुनाव, भ्रष्टाचार, सत्ता, लूट, नैतिक पतन, बेरोजगारी, हिंसा आ सामाजिक विघटनपर तीक्ष्ण दृष्टि दैत छथि। एहि खण्डमे काव्यक गीतात्मकता व्यंग्यक औजार बनैत अछि। ‘मानव-प्रकृति’ खण्ड से पोथी के सुर बदल जायत हय। प्रेम आ ऋतु के बाद अफसर, मंत्री, चुनाव, कुर्सी, भ्रष्टाचार, लूट, बेरोजगारी, हिंसा आ नैतिक पतन सामने आबय हय। कवि गीत के लय मे सामाजिक व्यंग्य करै छतन। अनेक गीत घोषणात्मक अछि; किछु ठाम कविता प्रत्यक्ष राजनीतिक वक्तव्यक निकट पहुँचैत अछि। कलात्मक दृष्टिसँ एहि प्रवृत्तिमे जोखिम अछि, कारण विचार अगर अत्यन्त सीधे आबि जाए तँ बहुअर्थता घटैत अछि। तथापि संग्रहक सामाजिक दस्तावेजी महत्त्व एहि स्पष्टतासँ बढ़ैत अछि। लेखक अपन समयक बेचैनीकेँ लोकलयमे बाँधि दैत छथि। किछु गीत मे बात बहुत सीधा राजनीतिक कथन बन गेल हय। साहित्यिक दृष्टि से एहाँ सूक्ष्मता कखनहुँ कम हो जायत हय, पर समय के दस्तावेज के रूप मे ई अंश बहुत महत्त्वपूर्ण हय। ‘लोकतंत्र’, ‘वोट’, ‘मंत्री’, ‘अफसर’, ‘कुर्सी’ जइसन शब्द बज्जिका गीत के शब्द-संसार मे आधुनिक जीवन के सीधा प्रवेश कराबय हय। राजनीतिक शब्दावली—मंत्री, अफसर, चुनाव, वोट, लोकतंत्र, कुर्सी—लोकगीतक पारंपरिक शब्दकोशमे आधुनिक हस्तक्षेप अछि। ई मिश्रण कृतिक ऐतिहासिकता निश्चित करैत अछि। अइ खण्ड के सबसे खास बात ई हय कि कवि लोकगीत के केवल प्रेम आ ऋतु तक सीमित न रखलन; ओकरा शासन, भ्रष्टाचार आ सामाजिक असंतोष के भाषा बनौलन। ७. देश-दशा: राष्ट्रबोध आ जनचिन्ता · ७. देश-दशा: जन-चिन्ता आ राष्ट्रबोध देश-दशा खण्डमे लेखकक राष्ट्रबोध आदर्शवाद, भ्रष्टाचार-विरोध आ नैतिक आक्रोशक संग बनैत अछि। स्वतंत्रता, लोकतंत्र, गरीबी, सीमावर्ती संकट, शिक्षा, प्रशासन आ सामाजिक अनुशासन जकाँ विषय गीतक रूपमे आयल अछि। देश-दशा के गीत मे स्वतंत्रता, शासन, शिक्षा, सीमा, भ्रष्टाचार आ नागरिक जिम्मेदारी पर चिंता देखाय पड़य हय। एहाँ कवि के ‘हम’ निजी प्रेमी से बदलके समाज के ‘हम’ बन जायत हय। ई गीतसभ कखनो जनगीतक निकट जाइत अछि। एतय निजी ‘हम’ धीरे-धीरे सामूहिक ‘हम’मे बदलैत अछि। काव्यक केन्द्र प्रियतमसँ हटि नागरिक जीवनपर आबि जाइत अछि। एहि रूपान्तरणक कारण संग्रह मात्र प्रेमगीतक पुस्तक नहि रहि सामाजिक चेतनाक दस्तावेज बनैत अछि। किछु गीत जनगीत जइसन स्वर धारण करै हय। कखनहुँ नारा आ उपदेश अधिक हो जायत हय, पर लोकभाषा मे देश के हालत पर सीधा बोलबो अइ पोथी के साहस हय। कवि अपन समय के राजनीतिक बेचैनी के लोकलय मे रखे के प्रयास कैलन। सीमा ई जे प्रत्यक्ष उपदेश वा नारा किछु गीतमे काव्यात्मक जटिलता घटबैत अछि। उपलब्धि ई जे लेखक लोकभाषामे नागरिक आलोचना सम्भव करैत छथि। एहाँ कलात्मक उपलब्धि आ सीमा एके साथ हय—सीधापन जन-संप्रेषण बढ़ाबय हय, पर कखनहुँ बहुअर्थता घटाबय हय। ८. गरीबी: करुणा, आक्रोश आ संरचनात्मक प्रश्न · ८. गरीबी: भूख, मजदूरी आ सम्मान गरीब के समस्या राम विपतिये बाँट जाले।। गरीबी-खण्ड संग्रहक सर्वाधिक सामाजिक रूपेँ मार्मिक अंशसभमे सँ अछि। महँगाई, मजदूरी, भूख, कर्ज, बेटी, खेत, बेरोजगारी, बीमारी आ असमानता एतय नैतिक समस्या नहि मात्र, जीवनक प्रतिदिनक संकट अछि। गरीबी खण्ड मे महँगाई, मजदूरी, बेटी, कर्ज, खेत, पेट, रोजी-रोटी आ असमानता के संकट सामने आबय हय। गरीब आदमी एहाँ दया के पात्र भर न हय; ओकर मेहनत, आत्मसम्मान, विवशता आ संघर्ष के साथ देखल गेल हय। लेखक गरीब पात्रकेँ करुणाक निष्क्रिय वस्तु नहि बनबैत छथि; ओकरा श्रम, आत्मसम्मान आ संघर्षक संग देखैत छथि। किछु गीतमे दैवी पुकार अछि, मुदा ओकर भीतर सामाजिक व्यवस्था विरुद्ध प्रश्न सेहो अछि। ई द्वंद्व ग्रामीण चेतनाक यथार्थवादी चित्र अछि—लोक आस्था आ सामाजिक प्रतिरोध एक्के समय उपस्थित। कहीं भगवान के पुकार हय, कहीं व्यवस्था पर सवाल। ई दून्नो एके साथ चलय हय—लोक-आस्था सेहो, सामाजिक प्रतिरोध सेहो। एही कारण अइ गीत के दुख कृत्रिम न लगय हय। एहि खण्डमे भाषा विशेष प्रभावी अछि, कारण काव्यक शब्दावली जीवनक वास्तविक अर्थव्यवस्थासँ निकलैत अछि। ‘कमा’, ‘मजूरी’, ‘महँगाई’, ‘खेत’, ‘उधार’, ‘रोटी’ जकाँ शब्द भावक आधार बनैत अछि। कमा, मजदूरी, महँगाई, खेत, उधार, रोटी जइसन शब्द कविता के जमीन बनाबय हय। अइ खण्ड मे भाषा के सामाजिक वजन सबसे अधिक महसूस होय हय। ९. कृषि: श्रमक सौन्दर्यशास्त्र · ९. कृषि: मेहनत के सौन्दर्य कृषि-खण्डमे किसानक श्रम, खेतक तैयारी, धान, पानी, हरियर पात, खेतीक संकट, मौसम आ ग्रामीण परिवारक सहयोग गीतात्मक रूप पबैत अछि। एहि अंशमे कृति अपन सामाजिक भूगोलक सर्वाधिक ठोस रूप प्रस्तुत करैत अछि। कृषि खण्ड मे किसान, किसानिन, धान, पानी, खेत, फसल, श्रम आ मौसम के पूरा संसार हय। कवि खेती के खाली हरियर दृश्य के रूप मे न देखलन; ओकर कष्ट, अनिश्चितता, श्रम आ उम्मीद सेहो देखौलन। किसान जीवनकेँ केवल रोमानी हरियालीक रूपमे नहि देखाओल गेल अछि; कष्ट, अनिश्चितता, श्रम आ उत्पादनक कठिनाई सेहो सामने अछि। तथापि खेतीक दृश्यसभमे सामूहिकता आ आशा प्रबल अछि। खेत सामाजिक श्रमक मंच अछि, मात्र प्राकृतिक दृश्य नहि। खेत एहाँ जमीन भर न हय; घर-परिवार, भोजन, सम्मान आ भविष्य के आधार हय। किसान आ किसानिन के संयुक्त उपस्थिति ग्रामीण जीवन के सामूहिक श्रम के रूप सामने आनय हय। एहि गीतसभसँ पोथीक सामाजिक भूगोल सबसँ ठोस रूपमे देखाइत अछि। प्रेमक अँचरा आ पायलसँ चलल भाषा एतय हल, धान, पानी आ श्रम धरि पहुँचि जाइत अछि। अइ गीत से पोथी के सामाजिक भूगोल सबसे ठोस रूप मे देखाय पड़य हय। प्रेम के अँचरा आ पायल से चलल भाषा एहाँ हल, धान, पानी आ श्रम तक पहुँच जायत हय। १०. वसन्त: समापनमे पुनः रस, रंग आ उत्सव · १०. वसन्त आ होरी: रंग मे लौटत समापन मोहन करे बरजोरी, गोरी! कइसे खेलूँ होरी।। अन्तिम दू गीत वसन्त आ होरीक रंगमे संग्रहकेँ पुनः प्रेम, खेल आ उल्लास दिस आनैत अछि। आरम्भ कृष्णसँ भेल छल; अन्त फेर कृष्ण-होरीक रंगमे होइत अछि। एहि वृत्ताकार संरचनासँ कृतिक भीतर एक सांगीतिक समापन-बोध उत्पन्न होइत अछि। पोथी के आखिरी गीत वसन्त आ होरी के हय। शुरुआत कृष्ण से भेल आ अन्त फेर कृष्ण के होरी से—अइ से पोथी एक प्रकार के पूरा घेरा बनाबय हय। समाज, गरीबी, राजनीति आ कृषि जकाँ भारी विषय पार कऽ पाठक फेर रंग, फागु, हास्य आ देहधर्मी उल्लासमे लौटैत अछि। ई समापन काव्यात्मक संतुलन प्रदान करैत अछि। बीच मे राजनीति, गरीबी, देश-दशा आ खेती के गंभीर संसार पार कके पाठक फेर रंग, हँसी, प्रेम आ खेल मे लौटय हय। अइ समापन से पोथी के भाव-संतुलन बनल रहय हय। ११. भाषा: बज्जिकाक आत्मीयता आ बहुरंगी रजिस्टर · ११. बज्जिका भाषा के साहित्यिक ताकत कृतिक भाषा एकर सबसे विशिष्ट उपलब्धि अछि। लेखक बज्जिकाकेँ केवल ‘लोकबोली’क सजावटी रंग नहि, पूर्ण काव्य-माध्यमक रूपमे बरतैत छथि। क्रियापद, सर्वनाम, सम्बोधन, संक्षिप्त वाक्य, ध्वनि-पुनरावृत्ति आ लोकमुहावरा गीतसभकेँ अलग स्वर दैत अछि। अइ पोथी के सबसे बड़ा काम ई हय कि बज्जिका के पूरा साहित्यिक भाषा जइसन बरतल गेल हय। गाम-घर के शब्द, स्थानीय क्रियापद, पुकार, संबोधन, मुहावरा आ ध्वनि—सब गीत के अपना स्वर देय हय। कृतिक भाषामे बज्जिकाक स्थानीय रूपसभक संग हिन्दी, संस्कृतनिष्ठ आ आधुनिक प्रशासनिक शब्दावली सेहो भेटैत अछि। प्रेमगीतमे ‘अँचरा’, ‘डगरिया’, ‘सैयाँ’, ‘गोरिया’, ‘अँगना’ जकाँ आत्मीय शब्द अछि; सामाजिक गीतमे ‘लोकतंत्र’, ‘मंत्री’, ‘चुनाव’, ‘वोट’, ‘प्रशासन’ जकाँ आधुनिक शब्द प्रवेश करैत अछि। एहि बहुस्तरीय रजिस्टरसँ भाषा समयक परिवर्तनकेँ आत्मसात करैत देखाइत अछि। संगे आधुनिक शब्द सेहो आयल हय—चुनाव, मंत्री, अफसर, लोकतंत्र, प्रशासन। मतलब भाषा पुरान लोक-संसार मे बंद न हय; ऊ नया समय के अनुभव आ शब्द के सेहो अपनाबय हय। लेखक आरम्भिक वक्तव्यमे बज्जिकाक क्षेत्रीय रूप आ क्रियापद-विविधतापर अपन मत राखैत छथि। साहित्यिक दृष्टिसँ अधिक महत्त्वपूर्ण बात ई अछि जे कृति स्वयं भाषा प्रयोगक व्यापक नमूना बनि जाइत अछि। साहित्यिक दृष्टि से सबसे महत्त्वपूर्ण बात ई हय कि बज्जिका एहाँ विषय न हय, माध्यम हय। प्रेम से राजनीति आ खेती तक सब कुछ अइ भाषा मे कहे के प्रयास पोथी के ऐतिहासिक महत्त्व बढ़ाबय हय। कविक भाषामे हिन्दी, संस्कृतनिष्ठ पद आ स्थानीय बज्जिका रूप एक संग मिलैत अछि। एहि मिश्रणकेँ केवल ‘शुद्धता’क कसौटीसँ नहि देखबाक चाही; ई बीसम शताब्दीक अन्तिम चरणक सामाजिक सम्पर्क आ बदलैत भाषिक व्यवहारक संकेत सेहो थिक। कवि के भाषा मे हिन्दी, संस्कृतनिष्ठ पद आ स्थानीय बज्जिका रूप एक साथ मिलय हय। ई मिश्रण के केवल ‘शुद्धता’ के कसौटी से न देखे के चाही; ई बीसम सदी के अन्तकालीन सामाजिक संपर्क आ बदलैत भाषिक व्यवहार के संकेत सेहो हय। १२. छन्द, लय, टेक आ ध्वन्यात्मकता · १२. लय, टेक आ ध्वनि गीतसभ कड़ाईसँ एकरूप शास्त्रीय छन्दमे नहि बन्हल अछि। ओकर वास्तविक शक्ति मौखिक लय, दोहराव, पंक्ति-समता, तुक, टेक आ स्वर-गति अछि। अनेक गीतक अन्तिम पंक्ति हर पदक बाद लौटैत अछि; ई पुनरावृत्ति स्मृति आ गायन दुनूकेँ सहज बनबैत अछि। गीत के असली छन्द ओकर बोल आ धुन मे हय। सब गीत एके शास्त्रीय मात्रा मे बन्हल न हय, पर ‘रह-रह’, ‘चल-चल’, ‘कुहकी-कुहकी’, ‘आयेल-आयेल’ जइसन दोहराव लय पैदा करै हय। ध्वनि-संरचनामे ‘रह-रह’, ‘चल-चल’, ‘कुहकी-कुहकी’, ‘आयेल-आयेल’ सन पुनरुक्ति विशेष उल्लेखनीय अछि। एहि ध्वनि-प्रयोगक कारण अर्थ मात्र नहि, गतिशीलता सेहो बनैत अछि। बहुत गीत मे आखिरी पंक्ति बार-बार लौटय हय। गावे मे ई टेक बनय हय, याद रखे मे सहायता करै हय आ भाव के जोर बढ़ाबय हय। किछु गीतमे मात्रिक असमानता पढ़ैत समय खटकैत अछि, मुदा सम्भव अछि गायन-धुन ओकर संतुलन करैत हो। लिखित पाठक आधारपर कहल जा सकैत अछि जे कृतिक छन्द-शक्ति शास्त्रीय मात्रा-गणनासँ अधिक लोक-लयपर निर्भर अछि। लिखित रूप मे कखनहुँ मात्रा असमान लग सकय हय, पर ई संग्रह मूलतः लोक-लय पर आश्रित हय। तैं ओकर संगीतात्मकता के केवल लिखित छन्द के कसौटी से नापब उचित न हय। १३. बिम्ब-प्रतीक आ लोक-संसार कृतिक प्रमुख प्रतीक—चन्द्र, आँखि, फूल, नदी, यमुना, बादल, पवन, कोयल, खेत, अँगना, मुरली, पायल, अँचरा, फागुन—लोकजीवनक परिचित वस्तु अछि। एहि परिचिततासँ कविता तत्काल संप्रेषणीय बनैत अछि। कृतिक प्रमुख प्रतीक—चन्द्र, आँखि, फूल, नदी, यमुना, बादल, पवन, कोयल, खेत, अँगना, मुरली, पायल, अँचरा, फागुन—लोकजीवनक परिचित वस्तु हय। अइ परिचिततासे कविता तत्काल संप्रेषणीय बनय हय। चन्द्र रूप-सौन्दर्यक, नदी विरह आ प्रवाहक, खेत श्रम आ जीवनोपार्जनक, अँगना घरेलू संसारक, पथ/डगरिया सामाजिक निगाह आ जीवन-यात्राक, आ फागुन मुक्त उत्सवक प्रतीक बनैत अछि। लेखक कठिन प्रतीकवाद नहि रचैत छथि; हुनकर प्रतीक पारदर्शी अछि, मुदा गीतक पुनरावृत्तिपूर्ण संरचनामे धीरे-धीरे सांस्कृतिक अर्थ ग्रहण करैत अछि। चन्द्र रूप-सौन्दर्यक, नदी विरह आ प्रवाहक, खेत श्रम आ जीवनोपार्जनक, अँगना घरेलू संसारक, पथ/डगरिया सामाजिक निगाह आ जीवन-यात्राक, आ फागुन मुक्त उत्सवक प्रतीक बनय हय। लेखक कठिन प्रतीकवाद नहि रचैत छतन; हुनकर प्रतीक पारदर्शी हय, मगर गीतक पुनरावृत्तिपूर्ण संरचनामे धीरे-धीरे सांस्कृतिक अर्थ ग्रहण करय हय। १४. स्त्री-दृष्टि: उपलब्धि आ सीमा · १३. औरत के चित्र: परम्परा आ अपना आवाज संग्रहमे स्त्री पात्रक उपस्थिति बहुत व्यापक अछि। ओ प्रेमिका, पत्नी, नायिका, परदेशी पतिक प्रतीक्षारत स्त्री, ग्रामीण युवती, श्रमिक परिवारक सदस्य आ सौन्दर्य-वर्णनक केन्द्र—अनेक रूपमे अछि। नायिका-व्यथा खण्ड स्त्रीक भाव-जगतकेँ अलग स्थान दैत अछि, जे कृतिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि अछि। पोथी मे औरत कई रूप मे आयल हय—राधा, प्रेमिका, पत्नी, परदेशिया के इंतजार करे वाली नायिका, खेत-घर के सदस्य, सजल गोरी आ दुखी स्त्री। ई व्यापक उपस्थिति पोथी के महत्त्वपूर्ण गुण हय। तथापि आलोचनात्मक दृष्टिसँ देखल जाए तँ किछु शृंगार गीत स्त्री-देहकेँ बाहरी दृष्टिसँ देखैत अछि; नयन, केश, रंग, चाल, देह-रूपक वर्णन बहुल अछि। एहि प्रवृत्तिक संग-संग कतहु स्त्रीक प्रतिरोध, प्रश्न आ आत्मस्वर सेहो उपस्थित अछि। अतः संग्रहमे स्त्री-दृष्टि एकरेखीय नहि, बल्कि पारंपरिक सौन्दर्यदृष्टि आ उभरैत आत्म-अभिव्यक्तिक बीच स्थित अछि। पर आलोचना के नजर से देखल जाय त किछु शृंगार गीत मे औरत के बाहरी रूप-देह पर अधिक जोर हय। संगही नायिका-व्यथा मे ओकर अपना आवाज, दुख, सवाल आ विरोध सेहो मिलय हय। तैं पोथी के स्त्री-चित्र एकरंगा न हय; परम्परागत सौन्दर्य-दृष्टि आ स्त्री-अनुभव के आत्मस्वर दून्नो साथ उपस्थित हय। १५. सामाजिक दस्तावेजक रूपमे कृति · १४. सामाजिक दस्तावेज के रूप मे पोथी ई पोथी 2000क आसपास प्रकाशित ग्रामीण उत्तर बिहारक सामाजिक-सांस्कृतिक मनःस्थिति बुझबाक लेल उपयोगी पाठ अछि। एहि गीतसभमे प्रेम आ ऋतु मात्र नहि, बल्कि परदेश, महँगाई, चुनाव, सरकारी व्यवस्था, गरीबी, खेत, मजदूरी, शिक्षा, प्रशासन आ सामाजिक तनावक उपस्थिति अछि। ‘बज्जिका गीत-संगीत’ प्रेम आ प्रकृति के साथ अपन समय के समाज के सेहो लिखय हय। परदेश, महँगाई, चुनाव, सरकारी व्यवस्था, गरीबी, खेत, मजदूरी, बेरोजगारी आ शिक्षा जइसन विषय बताबय हय कि लेखक लोकगीत के आधुनिक जीवन से जोड़ल चाहै छतन। यही कारण ‘बज्जिका गीत-संगीत’क मूल्य केवल सौन्दर्यशास्त्रीय नहि, सांस्कृतिक-अभिलेखीय सेहो अछि। ई भाषा, लोकानुभव आ समयक सामाजिक चिन्ताकेँ एक ठाम सुरक्षित करैत अछि। एही कारण पोथी के महत्त्व खाली ‘सुन्दर गीत’ तक सीमित न हय। ई बज्जिका क्षेत्र के भाषा, भाव, सामाजिक चिन्ता आ सांस्कृतिक स्मृति के दस्तावेज सेहो हय। एहि अर्थमे कृति लोकपरम्परा आ आधुनिक जनचेतनाक बीच एक सेतु जकाँ काज करैत अछि। अइ अर्थ मे कृति लोक परम्परा आ आधुनिक जनचेतना के बीच पुल जइसन काज करै हय। १६. कलात्मक उपलब्धि · १५. पोथी के मुख्य उपलब्धि बज्जिकाकेँ गेय साहित्यिक भाषा रूपमे आत्मविश्वासपूर्वक प्रतिष्ठित करब। बज्जिका मे 105 गो गेय रचना के विस्तृत संसार तैयार कैल गेल हय। 105 गीतकेँ नौ विषयगत खण्डमे व्यवस्थित कऽ व्यापक भाव-संसार बनाबय। कृष्ण-प्रेम से गरीबी, राजनीति, खेती आ वसन्त तक विषय के बड़ी चौड़ाई हय। लोकलय, टेक, पुनरावृत्ति आ सहज तुकक सफल उपयोग। लोक-लय, टेक, पुनरावृत्ति आ सहज तुक के प्रभावी उपयोग भेल हय। कृष्ण-शृंगारसँ राजनीति, गरीबी आ कृषि धरि विषय-विस्तार। गाम, अँगना, नदी, खेत, पनघट, परदेश आ स्त्री-अनुभव के सजीव चित्र मिलय हय। ग्रामीण स्त्री-अनुभव, परदेश, खेत, मौसम आ सामुदायिक जीवनक स्मरणीय चित्र। लोकभाषा मे आधुनिक सामाजिक आ राजनीतिक आलोचना के साहस देखाय पड़य हय। लोकभाषामे आधुनिक लोकतांत्रिक आ सामाजिक आलोचनाक साहस। बज्जिका के साहित्यिक आत्मविश्वास अइ पोथी मे स्पष्ट रूप से उपस्थित हय। १७. सीमासभ · १६. पोथी के सीमा किछु गीतमे चन्द्र, नयन, फूल, रूप, पायल आदि बिम्बक पुनरावृत्ति अधिक अछि। किछु शृंगार गीत मे चाँद, आँख, फूल, रूप जइसन बिम्ब बहुत दोहरायल गेल हय। राजनीतिक गीतसभमे कतहु-कतहु वक्तव्य काव्यक बहुअर्थता पर भारी पड़ैत अछि। किछु राजनीतिक गीत कविता से अधिक भाषण के नजदीक पहुँच जायत हय। शास्त्रीय छन्दक दृष्टिसँ मात्रा-संतुलन सर्वत्र समान नहि अछि; संग्रह मूलतः लोक-लयपर आश्रित अछि। सब ठाम मात्रा-संतुलन एक जइसन न हय; गीत लोक-लय पर अधिक निर्भर हय। किछु शृंगारिक अंशमे स्त्रीक बाहरी सौन्दर्य-वर्णन प्रमुख भऽ जाइत अछि। किछु जगह नारी-सौन्दर्य के बाहरी वर्णन अधिक हय। भाषिक इतिहास सम्बन्धी आरम्भिक दावासभक पुष्टि लेल स्वतंत्र भाषावैज्ञानिक प्रमाण आवश्यक होयत। भाषा-इतिहास संबंधी आरम्भिक दावा के स्वतंत्र भाषावैज्ञानिक प्रमाण से अलग जाँच जरूरी हय। १८. समग्र मूल्याङ्कन · १७. समग्र मूल्याङ्कन ‘बज्जिका गीत-संगीत’क साहित्यिक महत्त्व एहि बातमे अछि जे ई बज्जिकाकेँ केवल लोकसंग्रहक भाषा नहि, समकालीन रचना, प्रेम, व्यंग्य, सामाजिक आलोचना, करुणा आ कृषिजीवनक सक्षम माध्यम बनबैत अछि। लेखकक श्रेष्ठता विशेषतः ओतय प्रकट होइत अछि जतय ओ लोकजीवनक सहज शब्दकेँ गीतक लयमे छोड़ि दैत छथि; ओहि ठाम भाषा स्वयं कविता बनि उठैत अछि। ‘बज्जिका गीत-संगीत’ के असली महत्त्व ई हय कि ई बज्जिका के प्रेम, भक्ति, दुख, हँसी, विरोध, गरीबी, खेती आ देश-चिन्ता—सब कुछ कहे लायक साहित्यिक भाषा के रूप मे बरतय हय। पोथी के सबसे सफल जगह ऊ हय जहाँ कवि बिना भारी सजावट के लोक-शब्द के लय मे छोड़ देथिन; ओही ठाम भाषा स्वयं गीत बन जायत हय। कृतिक कमजोर क्षण ओतय अछि जतय विचार सीधे नारा वा उपदेश बनि जाइत अछि, मुदा ई कमजोरी सेहो ओकर समय-सापेक्ष जनगीतात्मक आकांक्षासँ जुड़ल अछि। समग्र रूपेँ ई पोथी बज्जिका साहित्यक सांस्कृतिक स्मृति, गीत-परम्परा आ आधुनिक सामाजिक चेतनाक बीच एक महत्त्वपूर्ण सेतु रूपेँ देखल जा सकैत अछि। कहीं-कहीं उपदेश आ नारा कलात्मक सूक्ष्मता घटाबय हय, पर पूरा पोथी देखल जाय त ई सीमा ओकर व्यापक सामाजिक आकांक्षा के भीतर समझ मे आबय हय। बज्जिका साहित्य मे अइ कृति के गीत, लोक-स्मृति आ आधुनिक जनचेतना के जोड़त एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप मे देखल जा सकय हय। एहि पोथीक स्थायी उपलब्धि ई अछि जे ई बज्जिकाक लोक-संवेदनाकेँ केवल संग्रह नहि करैत, बल्कि ओकरा समकालीन साहित्यिक अभिव्यक्तिक रूपमे प्रतिष्ठित करबाक प्रयास करैत अछि। अइ पोथी के स्थायी उपलब्धि ई हय कि ई बज्जिका के लोक-संवेदना के मात्र संग्रह न करै हय, बल्कि ओकरा समकालीन साहित्यिक अभिव्यक्ति के रूप मे प्रतिष्ठित करे के प्रयास करै हय। खण्ड ३ : बज्जिका साहित्यक व्यापक ऐतिहासिक, सांस्कृतिक आ भाषिक परिप्रेक्ष्य विस्तृत भौगोलिक ओ सांस्कृतिक परिवेशमे पल्लवित-पुष्पित बज्जिका भाषा ओ एकर लोक-साहित्य, भारतीय उपमहाद्वीपक एकटा अत्यन्त समृद्ध ओ प्राचीन परम्पराक संवाहक अछि। बिहारक मुजफ्फरपुर, वैशाली, सीतामढ़ी, शिवहर, समस्तीपुरक किछु भाग तथा नेपालक तराई क्षेत्र विशेष क' रौतहट ओ सर्लाही जिलामे बाजल जाय वला एहि भाषाकेँ भाषाविज्ञानक दृष्टिकोण सँ केन्द्रीय मैथिलीक 'पश्चिमी उपभाषा' (Western Maithili) क रूपमे वर्गीकृत कएल गेल अछि। वर्ष २००१ क जनगणनाक प्रामाणिक आँकड़ाक अनुसार, भारतमे लगभग १ करोड़ १५ लाख सँ १ करोड़ १८ लाख लोक ओ नेपालमे लगभग २ लाख ३८ हजार लोक बज्जिका बजैत छथि। एतबा विशाल जनसांख्यिकीय आधारक बादो, संस्थागत संरक्षणक अभावमे ई भाषा अपन अस्तित्वक लेल सङ्घर्षरत अछि। एहि पृष्ठभूमिमे डॉ. रामेश्वर प्रसाद द्वारा सम्पादित ओ वर्ष २००० मे किशोर प्रकाशन, मुजफ्फरपुर सँ प्रकाशित पोथी 'बज्जिका गीत-संगीत' लोक-साहित्यक अभिलेखीकरण ओ संरक्षणक दिशा मे एकटा युगान्तरकारी प्रयास अछि। विस्तृत भौगोलिक आ सांस्कृतिक परिवेशमे पल्लवित-पुष्पित बज्जिका भाषा आ एकर लोक-साहित्य, भारतीय उपमहाद्वीपक एगो अत्यन्त समृद्ध आ प्राचीन परम्पराक संवाहक हय। बिहारक मुजफ्फरपुर, वैशाली, सीतामढ़ी, शिवहर, समस्तीपुरक किछु भाग आ नेपालक तराई क्षेत्र विशेष क' रौतहट आ सर्लाही जिलामे बाजल जाय वला अइ भाषाके भाषाविज्ञानक दृष्टिकोण से केन्द्रीय मैथिलीक 'पश्चिमी उपभाषा' (Western Maithili) क रूपमे वर्गीकृत कैल गेल हय। वर्ष २००१ क जनगणनाक प्रामाणिक आँकड़ाक अनुसार, भारतमे लगभग १ करोड़ १५ लाख से १ करोड़ १८ लाख लोक आ नेपालमे लगभग २ लाख ३८ हजार लोक बज्जिका बजय छतन। एतना विशाल जनसांख्यिकीय आधारक बादो, संस्थागत संरक्षणक अभावमे ई भाषा अपन अस्तित्वक लेल सङ्घर्षरत हय। अइ पृष्ठभूमिमे डॉ. रामेश्वर प्रसाद द्वारा सम्पादित आ वर्ष २००० मे किशोर प्रकाशन, मुजफ्फरपुर से प्रकाशित पोथी 'बज्जिका गीत-संगीत' लोक-साहित्यक अभिलेखीकरण आ संरक्षणक दिशा मे एगो युगान्तरकारी प्रयास हय। एहि समीक्षा आलेखक मूल उद्देश्य डॉ. रामेश्वर प्रसादक एहि कृतिकेँ साहित्य, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान ओ भाषाविज्ञानक बहुआयामी निकष पर तौलनाइ अछि। एहि साहित्यिक समीक्षाक सङ्गहि, बज्जिका भाषा ओ लोक-साहित्यक वैज्ञानिक अनुसन्धानक लेल एकटा बहुआयामी अनुसन्धान-रूपरेखा सेहो प्रस्तुत कएल गेल अछि, जे भविष्यक शोधार्थी लोकनिक लेल मार्गदर्शक सिद्ध होएत। अइ समीक्षा आलेखक मूल उद्देश्य डॉ. रामेश्वर प्रसादक अइ कृतिके साहित्य, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान आ भाषाविज्ञानक बहुआयामी निकष पर तौलनाइ हय। अइ साहित्यिक समीक्षाक सङ्गहि, बज्जिका भाषा आ लोक-साहित्यक वैज्ञानिक अनुसन्धानक लेल एगो बहुआयामी अनुसन्धान-रूपरेखा सेहो प्रस्तुत कैल गेल हय, जे भविष्यक शोधार्थी लोकक लेल मार्गदर्शक सिद्ध होत। बज्जिका साहित्यक ऐतिहासिक विकास-क्रम ओ डॉ. रामेश्वर प्रसादक अवदान · बज्जिका साहित्यक ऐतिहासिक विकास-क्रम आ डॉ. रामेश्वर प्रसादक अवदान बज्जिका भाषाक उत्पत्ति प्राचीन 'बज्जी' सङ्घ सँ जुड़ल अछि, जे विश्वक प्राचीनतम गणतन्त्रमे सँ एक छल ओ जाहिक केन्द्र वैशाली छल। भाषाई विकास-क्रममे ई मागधी प्राकृत ओ मागधी अपभ्रंश सँ विकसित भेल अछि, जाहि सँ मैथिली, भोजपुरी, मगही, अङ्गिका, बाङ्ला, असमिया ओ उड़िया जकाँ अन्य भाषासभक सेहो जन्म भेल अछि। ऐतिहासिक रूपें जतय राजकाजक लेल प्राकृतक प्रयोग होइत छल, ओतय धार्मिक कृत्य संस्कृतमे होइत छल, ओ एहि दुनू स्रोत सँ बज्जिकाक शब्दावली समृद्ध भेल अछि। विद्यापतिक अवहट्ट रचनासभ, विशेष क' 'कीर्तिलता', वर्तमान बज्जिकाक संरचनाक अत्यन्त निकट अछि, जे ई प्रमाणित करैत अछि जे ई भाषा अपन मूल स्वरूपकेँ आइ धरि सुरक्षित रखने अछि। बज्जिका भाषाक उत्पत्ति प्राचीन 'बज्जी' सङ्घ से जुड़ल हय, जे विश्वक प्राचीनतम गणतन्त्रमे से एक रहल आ जइक केन्द्र वैशाली रहल। भाषाई विकास-क्रममे ई मागधी प्राकृत आ मागधी अपभ्रंश से विकसित भेल हय, जइ से मैथिली, भोजपुरी, मगही, अङ्गिका, बाङ्ला, असमिया आ उड़िया जकाँ अन्य भाषासबक सेहो जन्म भेल हय। ऐतिहासिक रूपें जतय राजकाजक लेल प्राकृतक प्रयोग होय रहल, ओहाँ धार्मिक कृत्य संस्कृतमे होय रहल, आ अइ दुनू स्रोत से बज्जिकाक शब्दावली समृद्ध भेल हय। विद्यापतिक अवहट्ट रचनासब, विशेष क' 'कीर्तिलता', वर्तमान बज्जिकाक संरचनाक अत्यन्त निकट हय, जे ई प्रमाणित करय हय जे ई भाषा अपन मूल स्वरूपके आइ धरि सुरक्षित रखने हय। बज्जिका साहित्यक इतिहास अत्यन्त प्राचीन ओ गौरवशाली रहल अछि। एकर प्रारम्भिक साहित्यमे गयाधर (रचनाकाल १०४५ ई.), जे वैशालीक रहबला छलाह ओ बौद्ध-धर्मक प्रचारार्थ तिब्बत गेल छलाह, हुनकर रचनासभकेँ राखल जाइत अछि। तदुपरान्त १५६५ ई. मे हलदर दास द्वारा लिखित खण्डकाव्य 'सुदामाचरित्र' प्राप्त होइत अछि, जे सम्पूर्ण रूपें बज्जिका भाषाक प्रतिनिधि रचना मानल जाइत अछि। अठारहम ओ उन्नीसम शताब्दीक सन्धिलग्न पर मँगनीराम (१८१५ ई. क आसपास) द्वारा रचित 'मँगनीराम की साखी', 'रामसागर पोथी' ओ 'अनमोल रतन' बज्जिका साहित्यक अमूल्य धरोहर अछि। बीसम शताब्दीक मध्य ओ उत्तरार्ध सँ बज्जिका साहित्यमे एकटा नवका पुनर्जागरणक उदय भेल, जाहिमे अनेकन विद्वान लोकनि लोक-कण्ठमे विद्यमान साहित्यकेँ लिपिबद्ध करबाक भगीरथ प्रयास कएलनि। एहि नवजागरणक क्रममे विभिन्न साहित्यकार ओ हुनकर रचनासभकेँ बुझनाइ आवश्यक अछि। बज्जिका साहित्यक इतिहास अत्यन्त प्राचीन आ गौरवशाली रहल हय। एकर प्रारम्भिक साहित्यमे गयाधर (रचनाकाल १०४५ ई.), जे वैशालीक रहबला रहथिन आ बौद्ध-धर्मक प्रचारार्थ तिब्बत गेल रहथिन, हुनकर रचनासबके राखल जाय हय। तदुपरान्त १५६५ ई. मे हलदर दास द्वारा लिखित खण्डकाव्य 'सुदामाचरित्र' प्राप्त होय हय, जे सम्पूर्ण रूपें बज्जिका भाषाक प्रतिनिधि रचना मानल जाय हय। अठारहम आ उन्नीसम शताब्दीक सन्धिलग्न पर मँगनीराम (१८१५ ई. क आसपास) द्वारा रचित 'मँगनीराम की साखी', 'रामसागर पोथी' आ 'अनमोल रतन' बज्जिका साहित्यक अमूल्य धरोहर हय। बीसम शताब्दीक मध्य आ उत्तरार्ध से बज्जिका साहित्यमे एगो नवका पुनर्जागरणक उदय भेल, जइमे अनेकन विद्वान लोक लोक-कण्ठमे विद्यमान साहित्यके लिपिबद्ध करबाक भगीरथ प्रयास कैलन। अइ नवजागरणक क्रममे विभिन्न साहित्यकार आ हुनकर रचनासबके बुझनाइ आवश्यक हय। सारणी : बज्जिका साहित्यक प्रतिनिधि रचनाकार, कृति, प्रकाशन आ विधा रचनाकार / सम्पादक महत्त्वपूर्ण कृति / पोथीक नाम प्रकाशन वर्ष ओ प्रकाशक साहित्यक विधा डॉ. रामेश्वर प्रसाद बज्जिका गीत-संगीत, बज्जिका लोकगीत, बज्जिका स्वर सङ्गम २०००, किशोर प्रकाशन, मुजफ्फरपुर लोकगीत सङ्कलन निर्मल मिलिन्द गितिया, तरहात्ती पर तरेगन, खिस्सा पेहानी १९८४, १९९९, अ. भा. बज्जिका सा. सम्मेलन उपन्यासिका, गीत-कविता, कथा प्रफुल्ल कुमार सिंह 'मणि' बज्जिका साहित्य का इतिहास १९९५, हंसराज प्रकाशन, मुजफ्फरपुर साहित्यिक इतिहास डॉ. अवधेश्वर अरुण बज्जिका रामायण (अज्ञात) महाकाव्य चन्द्र किशोर श्वेतांशु इंजुरी भर सिंहोरवा १९७७, समीक्षा प्रकाशन, सीतामढ़ी गीत-कविता सङ्ग्रह योगेन्द्र राय बज्जिका व्याकरण १९८७, शैलेश भूषण, हाजीपुर व्याकरण एहि साहित्यिक विकास-क्रममे डॉ. रामेश्वर प्रसादक भूमिका मात्र एकटा सङ्कलनकर्त्ताक नहि, अपितु एकटा सांस्कृतिक रक्षकक अछि। 'बज्जिका गीत-संगीत' पोथीमे ओ गाम-देहातक अशिक्षित ओ अल्प-शिक्षित कृषक, श्रमिक ओ महिला वर्गकेँ कण्ठस्थ साङ्गीतिक परम्पराकेँ जे रूपें लिपिबद्ध कएलनि अछि, ओ बज्जिकाक लोक-जीवनकेँ जीवन्त करैत अछि। जतय शिष्ट साहित्यमे कृत्रिमता ओ बौद्धिकताक प्रधानता होइत अछि, ओतय लोक-साहित्य, विशेष क' एहि पोथीमे सङ्कलित गीतसभमे, भाव सौन्दर्य ओ नाद सौन्दर्यक प्राकृत निर्झर प्रवाहित होइत अछि। अइ साहित्यिक विकास-क्रममे डॉ. रामेश्वर प्रसादक भूमिका मात्र एगो सङ्कलनकर्त्ताक नहि, बल्कि एगो सांस्कृतिक रक्षकक हय। 'बज्जिका गीत-संगीत' पोथीमे आ गाम-देहातक अशिक्षित आ अल्प-शिक्षित कृषक, श्रमिक आ महिला वर्गके कण्ठस्थ साङ्गीतिक परम्पराके जे रूपें लिपिबद्ध कैलन हय, आ बज्जिकाक लोक-जीवनके जीवन्त करय हय। जतय शिष्ट साहित्यमे कृत्रिमता आ बौद्धिकताक प्रधानता होय हय, ओहाँ लोक-साहित्य, विशेष क' अइ पोथीमे सङ्कलित गीतसबमे, भाव सौन्दर्य आ नाद सौन्दर्यक प्राकृत निर्झर प्रवाहित होय हय। लोक-साङ्गीतिक दर्पणमे समाज: संस्कार ओ जीवन-चक्रक साङ्गीतिक दर्शन · लोक-साङ्गीतिक दर्पणमे समाज: संस्कार आ जीवन-चक्रक साङ्गीतिक दर्शन कोनो भी समाजक मूल आत्मा ओकर लोकगीतमे बसैत अछि। बज्जिका लोकगीत, जाहिक एकटा वृहद् आख्यान 'बज्जिका गीत-संगीत' मे भेटैत अछि, सम्पूर्ण मानवीय जीवन-चक्रकेँ साङ्गीतिक अभिव्यक्तिक माध्यम सँ प्रस्तुत करैत अछि। मिथिला ओ तिरहुतक ई परम्परा रहल अछि जे मानव जीवनक प्रत्येक महत्त्वपूर्ण घटनाकेँ अनुष्ठान ओ गीतक सङ्ग सम्पादित कएल जाइत अछि। भारतीय दर्शनमे वर्णित विभिन्न संस्कारसभमे सँ जन्म, उपनयन (जनेऊ), ओ विवाहक अवसर पर गाओल जाय वला गीतसभक एकटा समृद्ध भण्डार एहि क्षेत्रमे उपलब्ध अछि। कोनो भी समाजक मूल आत्मा ओकर लोकगीतमे बसैत हय। बज्जिका लोकगीत, जइक एगो वृहद् आख्यान 'बज्जिका गीत-संगीत' मे भेटैत हय, सम्पूर्ण मानवीय जीवन-चक्रके साङ्गीतिक अभिव्यक्तिक माध्यम से प्रस्तुत करय हय। मिथिला आ तिरहुतक ई परम्परा रहल हय जे मानव जीवनक प्रत्येक महत्त्वपूर्ण घटनाके अनुष्ठान आ गीतक सङ्ग सम्पादित कैल जाय हय। भारतीय दर्शनमे वर्णित विभिन्न संस्कारसबमे से जन्म, उपनयन (जनेऊ), आ विवाहक अवसर पर गाओल जाय वला गीतसबक एगो समृद्ध भण्डार अइ क्षेत्र मे उपलब्ध हय। सन्तानोत्पत्ति, जे कोनो भी कृषि-प्रधान समाजक लेल वंश-वृद्धि ओ आर्थिक शक्तिक परिचायक मानल जाइत अछि, ओकर उल्लास 'सोहर' ओ 'खेलउना' गीतसभक माध्यम सँ व्यक्त होइत अछि। मुदा ई सोहर गीतसभ केवल हर्षोल्लासक गान नहि अछि। एहि गीतसभक गम्भीर समाजशास्त्रीय ओ मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करला पर ज्ञात होइत अछि जे एहिमे प्रसव-पीडाक मार्मिकता, मृत्यु-भय पर जीवनक विजय, ओ पारिवारिक सम्बन्धक (जेना ननद-भौजाईक बीचक हास-परिहास ओ द्वन्द्व) यथार्थ चित्रण रहैत अछि। प्रसूता स्त्रीक शारीरिक ओ मानसिक यन्त्रणाकेँ साङ्गीतिक रूप द' क' समाज ओकरा एकटा मनोवैज्ञानिक आश्रय प्रदान करैत अछि। सन्तानोत्पत्ति, जे कोनो भी कृषि-प्रधान समाजक लेल वंश-वृद्धि आ आर्थिक शक्तिक परिचायक मानल जाय हय, ओकर उल्लास 'सोहर' आ 'खेलउना' गीतसबक माध्यम से व्यक्त होय हय। मगर ई सोहर गीतसब केवल हर्षोल्लासक गान नहि हय। अइ गीतसबक गम्भीर समाजशास्त्रीय आ मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करला पर ज्ञात होय हय जे अइमे प्रसव-पीडाक मार्मिकता, मृत्यु-भय पर जीवनक विजय, आ पारिवारिक सम्बन्धक (जेना ननद-भौजाईक बीचक हास-परिहास आ द्वन्द्व) यथार्थ चित्रण रहय हय। प्रसूता स्त्रीक शारीरिक आ मानसिक यन्त्रणाके साङ्गीतिक रूप द' क' समाज ओकरा एगो मनोवैज्ञानिक आश्रय प्रदान करय हय। विवाह संस्कारक गीतसभ तँ बज्जिका लोक-साहित्यक मुकुट-मणि अछि। मण्डप छाबय सँ ल' क', वेदी-पूजन, सिन्दूरदान, कोहबर, समुझवनी, ओ अन्तिममे बेटी-विदाई धरिक प्रत्येक विधानक लेल पृथक्-पृथक् गीतसभक विधान अछि। विदाईक अवसर पर गाओल जाय वला बेदनसिक्त गीतसभमे उपमा ओ उत्प्रेक्षा अलङ्कारक जे अप्रतिम भण्डार भेटैत अछि, ओ बड़का-बड़का महाकाव्यसभमे सेहो दुर्लभ अछि। लोक-कवि पिताकेँ 'मानसरोवर', सासुकेँ 'भरल-पूरल वापी' (बावड़ी), माताकेँ 'बहैत गङ्गा', ओ पतिकेँ 'उगैत सूर्य' क रूपमे चित्रित करैत अछि। ई रूपक लोक-मानसक अगाध काव्य-प्रतिभा ओ प्रकृतिकेँ मानवीय सम्बन्धसभक सङ्ग एकरूप करबाक दर्शनकेँ प्रमाणित करैत अछि। विदाईक समय पिताक रोबय सँ गङ्गामे बाढि आबि जेबाक, माताक रोबय सँ आकाशमे अन्हार भ' जेबाक, ओ भाइक रोबय सँ ओकर धोती पाँव धरि भीजि जेबाक जे अतिशयोक्तिपूर्ण मुदा अत्यन्त मार्मिक चित्रण एहि गीतसभमे भेल अछि, ओ कठोर सँ कठोर हृदयकेँ सेहो द्रवित क' देबाक सामर्थ्य रखैत अछि। ई गीतसभ स्पष्ट करैत अछि जे पितृसत्तात्मक समाजमे कन्याकेँ पराया धन मानल जेबाक दर्द कतेक गहीर अछि। विवाह संस्कारक गीतसब तँ बज्जिका लोक-साहित्यक मुकुट-मणि हय। मण्डप छाबय से ल' क', वेदी-पूजन, सिन्दूरदान, कोहबर, समुझवनी, आ अन्तिममे बेटी-विदाई धरिक प्रत्येक विधानक लेल पृथक्-पृथक् गीतसबक विधान हय। विदाईक अवसर पर गाओल जाय वला बेदनसिक्त गीतसबमे उपमा आ उत्प्रेक्षा अलङ्कारक जे अप्रतिम भण्डार भेटैत हय, आ बड़का-बड़का महाकाव्यसबमे सेहो दुर्लभ हय। लोक-कवि पिताके 'मानसरोवर', सासुके 'भरल-पूरल वापी' (बावड़ी), माताके 'बहैत गङ्गा', आ पतिके 'उगैत सूर्य' क रूपमे चित्रित करय हय। ई रूपक लोक-मानसक अगाध काव्य-प्रतिभा आ प्रकृतिके मानवीय सम्बन्धसबक सङ्ग एकरूप करबाक दर्शनके प्रमाणित करय हय। विदाईक समय पिताक रोबय से गङ्गामे बाढि आबि जेबाक, माताक रोबय से आकाशमे अन्हार भ' जेबाक, आ भाइक रोबय से ओकर धोती पाँव धरि भीजि जेबाक जे अतिशयोक्तिपूर्ण मगर अत्यन्त मार्मिक चित्रण अइ गीतसब मे भेल हय, आ कठोर से कठोर हृदयके सेहो द्रवित क' देबाक सामर्थ्य रखैत हय। ई गीतसब स्पष्ट करय हय जे पितृसत्तात्मक समाजमे कन्याके पराया धन मानल जेबाक दर्द कतेक गहीर हय। प्रकृति, कृषि ओ श्रम-संस्कृति: ऋतुगीत ओ जतसारीक नारीवादी विमर्श · प्रकृति, कृषि आ श्रम-संस्कृति: ऋतुगीत आ जतसारीक नारीवादी विमर्श बज्जिका भाषी क्षेत्र पूर्णतः कृषि पर आश्रित अछि, तें एतय क लोक-साहित्य प्रकृतिक लय ओ ऋतुक चक्रक सङ्ग-सङ्ग चलैत अछि। ऋतु परिवर्तनकेँ केवल मौसमक बदलाव नहि, अपितु मानवीय भावनासभक बदलावक रूपमे देखल गेल अछि। फाल्गुन ओ चैत्र मासमे, जखन रबी फसल तयार होइत अछि ओ प्रकृति अपन सम्पूर्ण यौवन पर रहैत अछि, तखन गाओल जाय वला 'होरी' (होली) ओ 'चैती' गीतसभ उल्लास, मादकता ओ प्रेमक लौकिक स्वरूपकेँ व्यक्त करैत अछि। एहि गीतसभमे राधा-कृष्ण वा राम-सीताक प्रेमकेँ ईश्वरीय आवरण सँ मुक्त क' क' एकटा सामान्य कृषक-युगलक प्रेमक रूपमे प्रस्तुत कएल गेल अछि। बज्जिका भाषी क्षेत्र पूर्णतः कृषि पर आश्रित हय, तें एहाँ क लोक-साहित्य प्रकृतिक लय आ ऋतुक चक्रक सङ्ग-सङ्ग चलैत हय। ऋतु परिवर्तनके केवल मौसमक बदलाव नहि, बल्कि मानवीय भावनासबक बदलावक रूपमे देखल गेल हय। फाल्गुन आ चैत्र मासमे, जखन रबी फसल तयार होय हय आ प्रकृति अपन सम्पूर्ण यौवन पर रहय हय, तखन गाओल जाय वला 'होरी' (होली) आ 'चैती' गीतसब उल्लास, मादकता आ प्रेमक लौकिक स्वरूपके व्यक्त करय हय। अइ गीतसब मे राधा-कृष्ण वा राम-सीताक प्रेमके ईश्वरीय आवरण से मुक्त क' क' एगो सामान्य कृषक-युगलक प्रेमक रूपमे प्रस्तुत कैल गेल हय। दोसर दिस, जेठक तपनक बाद जखन वर्षा ऋतुक आगमन होइत अछि, तखन 'कजरी' ओ 'पावस' गीतसभक स्वर गूँजय लगैत अछि। साओन-भादवक अन्हार ओ कजरारी रातिमे जखन मेघ बरसैत अछि, तखन परदेस गेल पतिक प्रतीक्षा करैत विरहदग्धा नायिकाकेँ ई राति 'नागिन' जकाँ डँसय लगैत अछि। एहि गीतसभमे अनुभूतिक जे शीतलता अछि ओ संघर्ष सँ जूझैत श्रमश्रान्त व्यक्तिक लेल सुधा (अमृत) बनि क' बरसैत अछि। प्रकृति ओ प्रेमक ई तादात्म्य बज्जिका साङ्गीतिक परम्पराकेँ विश्व-साहित्यक उच्च कोटिमे स्थापित करैत अछि। दोसर दिस, जेठक तपनक बाद जखन वर्षा ऋतुक आगमन होय हय, तखन 'कजरी' आ 'पावस' गीतसबक स्वर गूँजय लगैत हय। साओन-भादवक अन्हार आ कजरारी रातिमे जखन मेघ बरसैत हय, तखन परदेस गेल पतिक प्रतीक्षा करय विरहदग्धा नायिकाके ई राति 'नागिन' जकाँ डँसय लगैत हय। अइ गीतसब मे अनुभूतिक जे शीतलता हय आ संघर्ष से जूझैत श्रमश्रान्त व्यक्तिक लेल सुधा (अमृत) बनि क' बरसैत हय। प्रकृति आ प्रेमक ई तादात्म्य बज्जिका साङ्गीतिक परम्पराके विश्व-साहित्यक उच्च कोटिमे स्थापित करय हय। श्रम गीत, विशेष रूप सँ 'जतसारी' (जाँत पीसब काल गाओल जाय वला गीत) ओ 'रोपनी' (धान रोपैत काल गाओल जाय वला गीत), बज्जिका लोक-साहित्यक ओ अमूल्य हिस्सा अछि जाहिमे श्रम परिहारक सङ्ग-सङ्ग सामाजिक यथार्थवादक दर्शन होइत अछि। जाँतक घर्षणक सङ्ग-सङ्ग नारीक हृदयक वेदना, सासु-पुतहुक द्वन्द्व, पितृसत्तात्मक समाजमे ओकर दयनीय स्थिति, ओ मुगला-तुर्कक ऐतिहासिक आक्रमणक समयमे स्त्रीक सतीत्वक रक्षाक गाथा सेहो स्वर पाबि क' बाहर अबैत अछि। लोकगीतसभमे नारीक चित्रण पर नारीवादी आलोचनात्मक विमर्श (Feminist Critical Discourse Analysis) सँ ई स्पष्ट होइत अछि जे यद्यपि समाज पुरुष-प्रधान अछि ओ कहावति वा मुहावरासभमे स्त्रीकेँ प्रायः कमजोर वा हीन देखाओल गेल अछि, मुदा जतसारी जकाँ गीतसभ नारीकेँ अपन मौन विद्रोह व्यक्त करबाक एकटा सुरक्षित 'स्पेस' (Space) प्रदान करैत अछि। एतय ओ अपन पीड़क विरुद्ध स्वर उठबैत अछि, जे प्रमाणित करैत अछि जे लोक-साहित्यमे नारी-विमर्श (Feminism) कोनो नवका पश्चिमी अवधारणा नहि अछि, अपितु सदियौ सँ हमरा लोकनिक लोक-कण्ठमे विद्यमान अछि। श्रम गीत, विशेष रूप से 'जतसारी' (जाँत पीसब काल गाओल जाय वला गीत) आ 'रोपनी' (धान रोपैत काल गाओल जाय वला गीत), बज्जिका लोक-साहित्यक आ अमूल्य हिस्सा हय जइमे श्रम परिहारक सङ्ग-सङ्ग सामाजिक यथार्थवादक दर्शन होय हय। जाँतक घर्षणक सङ्ग-सङ्ग नारीक हृदयक वेदना, सासु-पुतहुक द्वन्द्व, पितृसत्तात्मक समाजमे ओकर दयनीय स्थिति, आ मुगला-तुर्कक ऐतिहासिक आक्रमणक समयमे स्त्रीक सतीत्वक रक्षाक गाथा सेहो स्वर पाबि क' बाहर आबय हय। लोकगीतसबमे नारीक चित्रण पर नारीवादी आलोचनात्मक विमर्श (Feminist Critical Discourse Analysis) से ई स्पष्ट होय हय जे हालाँकि समाज पुरुष-प्रधान हय आ कहावति वा मुहावरासबमे स्त्रीके प्रायः कमजोर वा हीन देखाओल गेल हय, मगर जतसारी जकाँ गीतसब नारीके अपन मौन विद्रोह व्यक्त करबाक एगो सुरक्षित 'स्पेस' (Space) प्रदान करय हय। एहाँ आ अपन पीड़क विरुद्ध स्वर उठबैत हय, जे प्रमाणित करय हय जे लोक-साहित्यमे नारी-विमर्श (Feminism) कोनो नवका पश्चिमी अवधारणा नहि हय, बल्कि सदियौ से हमरा लोकक लोक-कण्ठमे विद्यमान हय। सीमान्तकृत समाजक स्वर ओ मिथकीय चेतना: गाथा-गीत ओ पर्यावरण विमर्श · सीमान्तकृत समाजक स्वर आ मिथकीय चेतना: गाथा-गीत आ पर्यावरण विमर्श बज्जिका लोक-साहित्य केवल उच्च वा कुलीन वर्गक संस्कारक वर्णन धरि सीमित नहि अछि, अपितु ई सीमान्तकृत, उपेक्षित ओ दलित वर्गकेँ सेहो सशक्त स्वर प्रदान करैत अछि। एहि सन्दर्भमे मुसहर ओ अन्य कृषक-मजदूर जातिक लोक-देवता 'दीना-भद्री' क गाथा-गीत विशेष रूप सँ उल्लेखनीय अछि। दीना ओ भद्री दुइ भाइ छलाह, जे सामन्ती अत्याचार ओ बेगारीक विरुद्ध सङ्घर्ष कएलनि ओ अपन प्राणक आहुति देलनि। ई गाथा-गीतसभ मिथिला, बज्जिकाञ्चल ओ नेपालक तराई क्षेत्रमे अत्यन्त लोकप्रिय अछि ओ एकरा 'मनुखदेव' (मनुष्य रूपी देवता) क कथाक रूपमे गाओल जाइत अछि। बज्जिका लोक-साहित्य केवल उच्च वा कुलीन वर्गक संस्कारक वर्णन धरि सीमित नहि हय, बल्कि ई सीमान्तकृत, उपेक्षित आ दलित वर्गके सेहो सशक्त स्वर प्रदान करय हय। अइ सन्दर्भ मे मुसहर आ अन्य कृषक-मजदूर जातिक लोक-देवता 'दीना-भद्री' क गाथा-गीत विशेष रूप से उल्लेखनीय हय। दीना आ भद्री दुइ भाइ रहथिन, जे सामन्ती अत्याचार आ बेगारीक विरुद्ध सङ्घर्ष कैलन आ अपन प्राणक आहुति देलनि। ई गाथा-गीतसब मिथिला, बज्जिकाञ्चल आ नेपालक तराई क्षेत्रमे अत्यन्त लोकप्रिय हय आ एकरा 'मनुखदेव' (मनुष्य रूपी देवता) क कथाक रूपमे गाओल जाय हय। एहि लोक-गाथाक पारिस्थितिक-आलोचना (Eco-criticism) करला पर ई स्पष्ट होइत अछि जे दीना-भद्री केवल जातिक नायक नहि छलाह, अपितु ओ पर्यावरण संरक्षणक प्रतीक सेहो छथि। ओकरा लोकनिक सङ्घर्ष जल-स्रोत (पोखरि) ओ वन-सम्पदा पर अधिकारक लेल सामन्तसभक विरुद्ध छल। गाथामे कामा माई ओ सोमारो धनी जकाँ सशक्त स्त्री पात्रक चित्रण अछि जे कृषिक (विशेष क' धानक खेतीक) रक्षा करैत छथि। दलित लोक-साहित्यक ई पर्यावरणीय चेतना (Environmental Movements tied to Folklore) प्रमाणित करैत अछि जे बज्जिका साहित्य समाजक सब वर्गक मिथकीय आख्यान, सङ्घर्ष ओ प्रकृतिक सङ्ग हुनकर तादात्म्यकेँ अपन भीतर पूर्ण गम्भीरताक सङ्ग समाहित कएने अछि। एहि गाथा-गीतसभक संरक्षण ओ गायन सीमान्तकृत वर्गकेँ समाजमे अपन आत्मसम्मान ओ पहचान स्थापित करबामे सहायक सिद्ध भ' रहल अछि। अइ लोक-गाथाक पारिस्थितिक-आलोचना (Eco-criticism) करला पर ई स्पष्ट होय हय जे दीना-भद्री केवल जातिक नायक नहि रहथिन, बल्कि आ पर्यावरण संरक्षणक प्रतीक सेहो छतन। ओकरा लोकक सङ्घर्ष जल-स्रोत (पोखरि) आ वन-सम्पदा पर अधिकारक लेल सामन्तसबक विरुद्ध रहल। गाथामे कामा माई आ सोमारो धनी जकाँ सशक्त स्त्री पात्रक चित्रण हय जे कृषिक (विशेष क' धानक खेतीक) रक्षा करय छतन। दलित लोक-साहित्यक ई पर्यावरणीय चेतना (Environmental Movements tied to Folklore) प्रमाणित करय हय जे बज्जिका साहित्य समाजक सब वर्गक मिथकीय आख्यान, सङ्घर्ष आ प्रकृतिक सङ्ग हुनकर तादात्म्यके अपन भीतर पूर्ण गम्भीरताक सङ्ग समाहित कएने हय। अइ गाथा-गीतसबक संरक्षण आ गायन सीमान्तकृत वर्गके समाजमे अपन आत्मसम्मान आ पहचान स्थापित करबामे सहायक सिद्ध भ' रहल हय। बज्जिका ओ केन्द्रीय मैथिलीक मध्य भाषिक ओ व्याकरणिक सम्बन्धक विश्लेषणात्मक अध्ययन · बज्जिका आ केन्द्रीय मैथिलीक मध्य भाषिक आ व्याकरणिक सम्बन्धक विश्लेषणात्मक अध्ययन 'बज्जिका गीत-संगीत' पोथीक साहित्यिक मूल्याङ्कन तखने पूर्ण ओ प्रामाणिक मानल जायत, जखन एकर भाषिक ओ व्याकरणिक संरचनाकेँ वैज्ञानिक दृष्टिकोण सँ बुझल जाय। बज्जिकाकेँ भाषाविज्ञानमे 'पश्चिमी मैथिली' क उपभाषा मानल गेल अछि, ओ ई एकटा वृहद् मैथिली भाषिक सातत्य (Maithili Dialect Continuum) क अभिन्न अङ्ग अछि। यद्यपि, बज्जिका ओ केन्द्रीय मैथिली (जाहिकेँ मानक मैथिली मानल जाइत अछि) क बीच किछु विशिष्ट व्याकरणिक, ध्वन्यात्मक, ओ रूपतात्त्विक (Morphological) भिन्नतासभ अछि जाहि पर अभिषेक कुमार काश्यप जकाँ भाषाविज्ञानी निरन्तर शोध क' रहल छथि। ई भिन्नतासभ बज्जिकाकेँ एकटा स्वतन्त्र भाषिक पहिचान देबामे सहायक सिद्ध होइत अछि। 'बज्जिका गीत-संगीत' पोथीक साहित्यिक मूल्याङ्कन तखने पूर्ण आ प्रामाणिक मानल जायत, जखन एकर भाषिक आ व्याकरणिक संरचनाके वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बुझल जाय। बज्जिकाके भाषाविज्ञानमे 'पश्चिमी मैथिली' क उपभाषा मानल गेल हय, आ ई एगो वृहद् मैथिली भाषिक सातत्य (Maithili Dialect Continuum) क अभिन्न अङ्ग हय। हालाँकि, बज्जिका आ केन्द्रीय मैथिली (जइके मानक मैथिली मानल जाय हय) क बीच किछु विशिष्ट व्याकरणिक, ध्वन्यात्मक, आ रूपतात्त्विक (Morphological) भिन्नतासब हय जइ पर अभिषेक कुमार काश्यप जकाँ भाषाविज्ञानी निरन्तर शोध क' रहल छतन। ई भिन्नतासब बज्जिकाके एगो स्वतन्त्र भाषिक पहिचान देबामे सहायक सिद्ध होय हय। निश्चल भाषिक विश्लेषणक लेल निम्नलिखित तालिका बज्जिका ओ केन्द्रीय मैथिलीक मुख्य व्याकरणिक विशेषतासभक तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करैत अछि: निश्चल भाषिक विश्लेषणक लेल निम्नलिखित तालिका बज्जिका आ केन्द्रीय मैथिलीक मुख्य व्याकरणिक विशेषतासबक तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करय हय: सारणी : बज्जिका आ केन्द्रीय/मानक मैथिलीक मुख्य भाषिक-व्याकरणिक तुलना व्याकरणिक / भाषिक विशेषता बज्जिका (पश्चिमी मैथिली) केन्द्रीय / मानक मैथिली प्रथम पुरुष सर्वनाम (First Person Pronoun) प्रायः 'हम' (Ham) क व्यापक प्रयोग होइत अछि। 'हम' क सङ्ग-सङ्ग 'मई' / 'मएँ' क प्रयोग सेहो प्रचुर मात्रामे होइत अछि। क्रिया रूप ओ अन्विति (Verb Agreement / Transitivity) क्रियाक रूपमे अधिकतम दुइ टा सन्दर्भ (Two discourse referents - e.g., कर्ता ओ कर्म) केँ एक सङ्ग एन्कोड कएल जा सकैत अछि। क्रियाक रूपमे तीन टा सन्दर्भ (Three discourse referents - e.g., कर्ता, कर्म, ओ सम्प्रदान) केँ एक सङ्ग एन्कोड करबाक जटिल व्यवस्था अछि। ध्वन्यात्मकता ओ उच्चारण (Phonology) महाप्राण (Aspirated) ओ अल्पप्राण (Non-aspirated) ध्वनिसभक विशिष्ट उच्चारण, तथा अनुनासिक (Nasalization) क अत्यन्त प्रचुर प्रयोग होइत अछि। महाप्राण ध्वनिक प्रयोग अछि, मुदा अनुनासिक ध्वनिक सघनता बज्जिकाक तुलनामे किछु भिन्न ओ संयमित अछि। वाक्य संरचना (Syntax) कर्ता-कर्म-क्रिया (SOV - Subject-Object-Verb) संरचनाक अनुसरण करैत अछि, जेना "राम घर जा रहल है" / "सोंटा भुतलेय गेलई हिन्"। कर्ता-कर्म-क्रिया (SOV) संरचना समान रूपें विद्यमान अछि, मुदा सहायक क्रियाक रूप भिन्न होइत अछि। आदरसूचक शब्द ओ क्रिया (Honorifics) आदरसूचक शब्दसभ (जेना 'आप', 'अहाँ', 'तू') क आधार पर क्रियाक रूपमे परिवर्तन होइत अछि। सम्मान सूचक प्रणाली अत्यन्त जटिल अछि ओ वक्ता, श्रोता ओ तेसर व्यक्तिक सामाजिक स्तरक आधार पर क्रिया बदलैत अछि। व्यञ्जन द्वित्व (Consonant Gemination) शब्दसभमे व्यञ्जनकेँ द्वित्व (Geminated) करबाक प्रवृत्ति बेसी अछि, जेना /majjil/ (मज्जिल), /hammar/ (हम्मर)। द्वित्व करबाक प्रवृत्ति अछि, मुदा बज्जिकाक तुलनामे एकर ध्वनि-विज्ञान भिन्न अछि। बज्जिका शब्दावलीक विश्लेषण करला पर ज्ञात होइत अछि जे एहिमे तत्सम (संस्कृत सँ सीधे आगत), तद्भव, ओ देशज शब्दसभक सुन्दर सङ्गम अछि। देशज शब्द ओहि शब्दसभकेँ कहल जाइत अछि जे स्थानीय जनमानस द्वारा बोलचालमे स्वतः गढि लेल गेल अछि ओ जाहिक कोनो संस्कृत वा विदेशी मूल नहि अछि। बज्जिकाक अशिक्षित वा कृषक वर्ग एहन देशज शब्द ओ मुहावराक भरपूर प्रयोग करैत अछि। उदाहरणार्थ, मुहावरा "ढींड़ फुलाना" (गर्भवती होना) वा "निमला के मौगी सबके भौजाई" (गरीबक इज्जत सबके मजाकक साधन) बज्जिका लोक-जीवनक सामाजिक यथार्थ ओ लाक्षणिकता (लक्षणा ओ व्यञ्जना) केँ स्पष्ट करैत अछि। बज्जिका शब्दावलीक विश्लेषण करला पर ज्ञात होय हय जे अइमे तत्सम (संस्कृत से सीधे आगत), तद्भव, आ देशज शब्दसबक सुन्दर सङ्गम हय। देशज शब्द ओइ शब्दसबके कहल जाय हय जे स्थानीय जनमानस द्वारा बोलचालमे स्वतः गढि लेल गेल हय आ जइक कोनो संस्कृत वा विदेशी मूल नहि हय। बज्जिकाक अशिक्षित वा कृषक वर्ग एहन देशज शब्द आ मुहावराक भरपूर प्रयोग करय हय। उदाहरणार्थ, मुहावरा "ढींड़ फुलाना" (गर्भवती होना) वा "निमला के मौगी सबके भौजाई" (गरीबक इज्जत सबके मजाकक साधन) बज्जिका लोक-जीवनक सामाजिक यथार्थ आ लाक्षणिकता (लक्षणा आ व्यञ्जना) के स्पष्ट करय हय। डॉ. रामेश्वर प्रसादक 'बज्जिका गीत-संगीत' पोथीमे प्रयुक्त शब्दावली ई प्रमाणित करैत अछि जे बज्जिका ओ मैथिलीक बीचक सीमा रेखा अत्यन्त क्षीण अछि, मुदा एहिमे प्रयुक्त देशज शब्द ओ क्रिया-पद एकरा एकटा विशिष्ट स्थानीय सुगन्ध प्रदान करैत अछि। डॉ. रामेश्वर प्रसादक 'बज्जिका गीत-संगीत' पोथीमे प्रयुक्त शब्दावली ई प्रमाणित करय हय जे बज्जिका आ मैथिलीक बीचक सीमा रेखा अत्यन्त क्षीण हय, मगर अइमे प्रयुक्त देशज शब्द आ क्रिया-पद एकरा एगो विशिष्ट स्थानीय सुगन्ध प्रदान करय हय। खण्ड ४ : बज्जिका लोक-साहित्य ओ भाषाविज्ञानक बहुआयामी अनुसन्धान-रूपरेखा बज्जिका भाषा, जे नेपाल ओ भारत दुनू देशक लाखो-करोड़ो लोकक मातृभाषा अछि, ओकरा वैश्वीकरण ओ आधुनिकताक प्रभाव सँ बचाबय लेल ओ ओकर अकादमिक महत्त्व स्थापित करबाक लेल केवल सङ्कलन पर्याप्त नहि अछि। डॉ. रामेश्वर प्रसाद द्वारा सङ्कलित गीतसभ ओ सम्पूर्ण बज्जिका लोक-वाङ्मयकेँ वैज्ञानिक, भाषावैज्ञानिक, ओ समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण सँ विश्लेषित करबाक लेल एकटा विस्तृत अनुसन्धान-रूपरेखाक नितान्त आवश्यकता अछि। ई अनुसन्धान-रूपरेखा एकटा अन्तर-अनुशासनात्मक (Interdisciplinary) प्रविधि पर आधारित हेबाक चाही। बज्जिका भाषा, जे नेपाल आ भारत दुनू देशक लाखो-करोड़ो लोकक मातृभाषा हय, ओकरा वैश्वीकरण आ आधुनिकताक प्रभाव से बचाबय लेल आ ओकर अकादमिक महत्त्व स्थापित करबाक लेल केवल सङ्कलन पर्याप्त नहि हय। डॉ. रामेश्वर प्रसाद द्वारा सङ्कलित गीतसब आ सम्पूर्ण बज्जिका लोक-वाङ्मयके वैज्ञानिक, भाषावैज्ञानिक, आ समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से विश्लेषित करबाक लेल एगो विस्तृत अनुसन्धान-रूपरेखाक नितान्त आवश्यकता हय। ई अनुसन्धान-रूपरेखा एगो अन्तर-अनुशासनात्मक (Interdisciplinary) प्रविधि पर आधारित हेबाक चाही। १. अनुसन्धानक प्राथमिक उद्देश्य ओ परिकल्पना (Objectives and Hypothesis) · १. अनुसन्धानक प्राथमिक उद्देश्य आ परिकल्पना (Objectives and Hypothesis) उद्देश्य १ (पाठ्य ओ विषयगत अन्वेषण): डॉ. रामेश्वर प्रसाद ओ अन्य विद्वानसभ द्वारा सङ्कलित लोकगीतसभमे अन्तर्निहित सामाजिक, पारिवारिक, लैङ्गिक (Gender), ओ पर्यावरण-सम्बन्धी विषयवस्तु केँ चिन्हित क' क' ओकर वैज्ञानिक वर्गीकरण करब। उद्देश्य १ (पाठ्य आ विषयगत अन्वेषण): डॉ. रामेश्वर प्रसाद आ अन्य विद्वानसब द्वारा सङ्कलित लोकगीतसबमे अन्तर्निहित सामाजिक, पारिवारिक, लैङ्गिक (Gender), आ पर्यावरण-सम्बन्धी विषयवस्तु के चिन्हित क' क' ओकर वैज्ञानिक वर्गीकरण करब। उद्देश्य २ (व्याकरणिक ओ भाषिक मानचित्रण - Linguistic Mapping): गीतसभमे प्रयुक्त बज्जिका शब्दावली, क्रियाक रूप, कारक (Case marking), ओ वाक्य-विन्यासकेँ केन्द्रीय मैथिली, भोजपुरी ओ मगहीक सङ्ग तुलनात्मक अध्ययन क' क' बज्जिकाक स्वतन्त्र व्याकरणिक नियमसभक कोडिफिकेशन (Codification) करब। उद्देश्य २ (व्याकरणिक आ भाषिक मानचित्रण - Linguistic Mapping): गीतसबमे प्रयुक्त बज्जिका शब्दावली, क्रियाक रूप, कारक (Case marking), आ वाक्य-विन्यासके केन्द्रीय मैथिली, भोजपुरी आ मगहीक सङ्ग तुलनात्मक अध्ययन क' क' बज्जिकाक स्वतन्त्र व्याकरणिक नियमसबक कोडिफिकेशन (Codification) करब। उद्देश्य ३ (नारीवादी ओ सीमान्तकृत विमर्शक डिकोडिंग): लोकगीतसभमे (विशेष रूप सँ जतसारी, सोहर ओ गाथा-गीतसभमे) स्त्री-स्वतन्त्रता, पितृसत्ताक प्रभाव, ओ दीना-भद्री जकाँ गाथामे सीमान्तकृत वर्गक स्वरकेँ डिकोड करब। उद्देश्य ३ (नारीवादी आ सीमान्तकृत विमर्शक डिकोडिंग): लोकगीतसबमे (विशेष रूप से जतसारी, सोहर आ गाथा-गीतसबमे) स्त्री-स्वतन्त्रता, पितृसत्ताक प्रभाव, आ दीना-भद्री जकाँ गाथामे सीमान्तकृत वर्गक स्वरके डिकोड करब। उद्देश्य ४ (डिजिटल संरक्षण ओ कम्प्युटेशनल लिङ्ग्विस्टिक्स): विलुप्त भ' रहल एहि अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर (Intangible Cultural Heritage) केँ डिजिटल माध्यम सँ संरक्षित करबाक उपाय खोजनाइ ओ प्राकृतिक भाषा प्रशोधन (NLP) क लेल कर्पस (Corpus) निर्माण करब। उद्देश्य ४ (डिजिटल संरक्षण आ कम्प्युटेशनल लिङ्ग्विस्टिक्स): विलुप्त भ' रहल अइ अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर (Intangible Cultural Heritage) के डिजिटल माध्यम से संरक्षित करबाक उपाय खोजनाइ आ प्राकृतिक भाषा प्रशोधन (NLP) क लेल कर्पस (Corpus) निर्माण करब। २. सैद्धान्तिक परिप्रेक्ष्य (Theoretical Framework) ई शोध निम्नलिखित आधुनिक सिद्धान्तसभक आलोकमे सम्पादित कएल जायत: ई शोध निम्नलिखित आधुनिक सिद्धान्तसबक आलोकमे सम्पादित कैल जायत: नारीवादी आलोचनात्मक विमर्श (Feminist Critical Discourse Analysis - FCDA): एहि सिद्धान्तिक अन्तर्गत ई देखल जायत जे बज्जिका लोकगीत ओ मुहावरासभमे नारीकेँ कोना प्रस्तुत कएल गेल अछि। की ओ केवल एकटा आज्ञाकारी पुत्री/पत्नीक रूपमे चित्रित अछि, अथवा श्रम गीतसभक माध्यम सँ ओ पितृसत्ताक विरुद्ध अपन प्रतिरोध (Resistance) दर्ज क' रहल अछि?। नारीवादी आलोचनात्मक विमर्श (Feminist Critical Discourse Analysis - FCDA): अइ सिद्धान्तिक अन्तर्गत ई देखल जायत जे बज्जिका लोकगीत आ मुहावरासबमे नारीके कइसे प्रस्तुत कैल गेल हय। की आ केवल एगो आज्ञाकारी पुत्री/पत्नीक रूपमे चित्रित हय, अथवा श्रम गीतसबक माध्यम से आ पितृसत्ताक विरुद्ध अपन प्रतिरोध (Resistance) दर्ज क' रहल हय?। पारिस्थितिक-आलोचना (Eco-criticism): ऋतु गीत, कृषि गीत (रोपनी), ओ दीना-भद्री गाथामे मानव ओ प्रकृतिक अन्तर्सम्बन्ध, वन-सम्पदाक संरक्षण, ओ जल-स्रोतक महत्त्वक अध्ययन कएल जायत। पारिस्थितिक-आलोचना (Eco-criticism): ऋतु गीत, कृषि गीत (रोपनी), आ दीना-भद्री गाथामे मानव आ प्रकृतिक अन्तर्सम्बन्ध, वन-सम्पदाक संरक्षण, आ जल-स्रोतक महत्त्वक अध्ययन कैल जायत। समाजशास्त्रीय भाषाविज्ञान (Sociolinguistics): भाषा ओ समाजक सम्बन्धक अध्ययन; कोना बज्जिका भाषा अपन वक्तासभक (विशेषतः वैशाली, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी ओ नेपालक तराई क्षेत्रमे) सांस्कृतिक पहिचान (Cultural Identity) स्थापित करैत अछि ओ कोना आधुनिकताक कारणें युवा वर्गमे ई भाषा सङ्कटग्रस्त भ' रहल अछि। समाजशास्त्रीय भाषाविज्ञान (Sociolinguistics): भाषा आ समाजक सम्बन्धक अध्ययन; कइसे बज्जिका भाषा अपन वक्तासबक (विशेषतः वैशाली, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी आ नेपालक तराई क्षेत्रमे) सांस्कृतिक पहिचान (Cultural Identity) स्थापित करय हय आ कइसे आधुनिकताक कारणें युवा वर्गमे ई भाषा सङ्कटग्रस्त भ' रहल हय। ३. शोधक कार्यप्रणाली ओ प्रविधि (Research Methodology) · ३. शोधक कार्यप्रणाली आ प्रविधि (Research Methodology) एहि अनुसन्धानकेँ चारि टा क्रमिक चरणमे सम्पादित कएल जायत: अइ अनुसन्धानके चारि टा क्रमिक चरणमे सम्पादित कैल जायत: प्रथम चरण: पाठ्य-सङ्कलन, कोडिंग ओ अर्थ-विश्लेषण (Data Collection, Thematic Coding and Semantic Analysis) · प्रथम चरण: पाठ्य-सङ्कलन, कोडिंग आ अर्थ-विश्लेषण (Data Collection, Thematic Coding and Semantic Analysis) सर्वप्रथम डॉ. रामेश्वर प्रसादक 'बज्जिका गीत-संगीत', 'बज्जिका लोकगीत', ओ निर्मल मिलिन्दक 'तरहात्ती पर तरेगन' जकाँ प्राथमिक स्रोतसभ सँ गीतसभकेँ सङ्कलित कएल जायत। सर्वप्रथम डॉ. रामेश्वर प्रसादक 'बज्जिका गीत-संगीत', 'बज्जिका लोकगीत', आ निर्मल मिलिन्दक 'तरहात्ती पर तरेगन' जकाँ प्राथमिक स्रोतसब से गीतसबके सङ्कलित कैल जायत। गीतसभकेँ अवसर (संस्कार, ऋतु, श्रम, धर्म) क आधार पर वर्गीकृत क' क' क्वालिटेटिव डेटा एनालाइसिस (Qualitative Data Analysis) कएल जायत। गीतसबके अवसर (संस्कार, ऋतु, श्रम, धर्म) क आधार पर वर्गीकृत क' क' क्वालिटेटिव डेटा एनालाइसिस (Qualitative Data Analysis) कैल जायत। गीतसभमे प्रयुक्त उपमा, रूपक, ओ मुहावरासभकेँ चिन्हित क' क' ओकर सांस्कृतिक ओ लाक्षणिक अर्थ निकालल जायत। गीतसबमे प्रयुक्त उपमा, रूपक, आ मुहावरासबके चिन्हित क' क' ओकर सांस्कृतिक आ लाक्षणिक अर्थ निकालल जायत। द्वितीय चरण: भाषिक, रूपतात्त्विक ओ वाक्य-विन्यास विश्लेषण (Morpho-syntactic and Phonological Analysis) · द्वितीय चरण: भाषिक, रूपतात्त्विक आ वाक्य-विन्यास विश्लेषण (Morpho-syntactic and Phonological Analysis) गीतसभक क्रिया-पदसभ ओ सहायक क्रियासभक (Auxiliary verbs) सूक्ष्मता सँ अध्ययन कएल जायत। बज्जिकाकेँ मैथिली सँ पृथक् करय वला महाप्राण ध्वनिसभ (Aspirated sounds), अनुनासिकक प्रयोग, ओ व्यञ्जन द्वित्वक (Gemination) ध्वनिक विश्लेषण कएल जायत। गीतसबक क्रिया-पदसब आ सहायक क्रियासबक (Auxiliary verbs) सूक्ष्मता से अध्ययन कैल जायत। बज्जिकाके मैथिली से पृथक् करय वला महाप्राण ध्वनिसब (Aspirated sounds), अनुनासिकक प्रयोग, आ व्यञ्जन द्वित्वक (Gemination) ध्वनिक विश्लेषण कैल जायत। आदरसूचक शब्दसभ (Honorifics) क प्रयोगकेँ सामाजिक स्तर (Social stratification) क परिप्रेक्ष्यमे देखल जायत। एहि लेल वक्ता ओ श्रोताक बीचक शक्ति-सन्तुलन (Power dynamics) क अध्ययन आवश्यक अछि। आदरसूचक शब्दसब (Honorifics) क प्रयोगके सामाजिक स्तर (Social stratification) क परिप्रेक्ष्यमे देखल जायत। अइ लेल वक्ता आ श्रोताक बीचक शक्ति-सन्तुलन (Power dynamics) क अध्ययन आवश्यक हय। तृतीय चरण: क्षेत्रीय अध्ययन ओ ऐतिहासिक-नृजातीय अनुसन्धान (Ethnographic, Spatial and Historical Study) · तृतीय चरण: क्षेत्रीय अध्ययन आ ऐतिहासिक-नृजातीय अनुसन्धान (Ethnographic, Spatial and Historical Study) पोथीमे वर्णित सांस्कृतिक सन्दर्भसभकेँ वर्तमान तिरहुत प्रमण्डल (मुजफ्फरपुर, वैशाली) ओ नेपालक तराई क्षेत्रक जनजीवन सँ मिला क' देखबाक लेल फील्ड-वर्क (Fieldwork) कएल जायत। पोथीमे वर्णित सांस्कृतिक सन्दर्भसबके वर्तमान तिरहुत प्रमण्डल (मुजफ्फरपुर, वैशाली) आ नेपालक तराई क्षेत्रक जनजीवन से मिला क' देखबाक लेल फील्ड-वर्क (Fieldwork) कैल जायत। गीतसभमे 'बिरहा', 'विदेशिया', ओ अम्बापाली (वैशालीक नगरवधू) क ऐतिहासिक प्रभावकेँ अन्वेषित कएल जायत। रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा लिखित 'अम्बापाली' नाटक ओ बज्जिका लोक-संस्कृतिक गहीर सम्बन्धकेँ ऐतिहासिक साक्ष्यक आधार पर स्थापित कएल जायत। गीतसबमे 'बिरहा', 'विदेशिया', आ अम्बापाली (वैशालीक नगरवधू) क ऐतिहासिक प्रभावके अन्वेषित कैल जायत। रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा लिखित 'अम्बापाली' नाटक आ बज्जिका लोक-संस्कृतिक गहीर सम्बन्धके ऐतिहासिक साक्ष्यक आधार पर स्थापित कैल जायत। भिखारी ठाकुरक 'विदेशिया' परम्परा सँ बज्जिका गीतसभक अन्तर्निहित साम्य ओ वैषम्यक अध्ययन कएल जायत। भिखारी ठाकुरक 'विदेशिया' परम्परा से बज्जिका गीतसबक अन्तर्निहित साम्य आ वैषम्यक अध्ययन कैल जायत। चतुर्थ चरण: डिजिटाइजेशन, भाषा-संरक्षण रणनीति ओ कर्पस निर्माण (Digitization, Conservation Strategy and Corpus Building) · चतुर्थ चरण: डिजिटाइजेशन, भाषा-संरक्षण रणनीति आ कर्पस निर्माण (Digitization, Conservation Strategy and Corpus Building) भारत सरकारक 'भारतीय भाषा संस्थान' (CIIL) ओ 'भारतवाणी' परियोजनाक उद्देश्यक अनुरूप एहि लिखित लोकगीतसभकेँ ध्वन्यात्मक रूपमे (Audio-visual format) रेकर्ड क' क' एकर एकटा 'डिजिटल भाषिक भण्डार' (Digital Linguistic Corpus) तैयार कएल जायत। भारत सरकारक 'भारतीय भाषा संस्थान' (CIIL) आ 'भारतवाणी' परियोजनाक उद्देश्यक अनुरूप अइ लिखित लोकगीतसबके ध्वन्यात्मक रूपमे (Audio-visual format) रेकर्ड क' क' एकर एगो 'डिजिटल भाषिक भण्डार' (Digital Linguistic Corpus) तैयार कैल जायत। कम्प्युटेशनल लिङ्ग्विस्टिक्सकेँ प्रयोग करैत बज्जिका शब्दावलीक 'पार्ट-ऑफ-स्पीच टैगिंग' (POS Tagging) ओ एकटा प्रामाणिक बज्जिका-मैथिली-हिन्दी त्रिभाषी शब्दकोश निर्माणक प्रारूप तैयार कएल जायत। कम्प्युटेशनल लिङ्ग्विस्टिक्सके प्रयोग करय बज्जिका शब्दावलीक 'पार्ट-ऑफ-स्पीच टैगिंग' (POS Tagging) आ एगो प्रामाणिक बज्जिका-मैथिली-हिन्दी त्रिभाषी शब्दकोश निर्माणक प्रारूप तैयार कैल जायत। ४. अध्ययनक सम्भावित परिणाम ओ अकादमिक योगदान (Expected Outcomes) · ४. अध्ययनक सम्भावित परिणाम आ अकादमिक योगदान (Expected Outcomes) ई गहन शोध केवल डॉ. रामेश्वर प्रसादक 'बज्जिका गीत-संगीत' पोथीकेँ एकटा साहित्यिक ग्रन्थक रूपमे पुनर्जीवित नहि करत, अपितु बज्जिका भाषी क्षेत्रक एक करोड़ सँ अधिक वक्तासभक सांस्कृतिक पहिचान ओ आत्मसम्मानकेँ सेहो सुदृढ करत। ई गहन शोध केवल डॉ. रामेश्वर प्रसादक 'बज्जिका गीत-संगीत' पोथीके एगो साहित्यिक ग्रन्थक रूपमे पुनर्जीवित नहि करत, बल्कि बज्जिका भाषी क्षेत्रक एक करोड़ से अधिक वक्तासबक सांस्कृतिक पहिचान आ आत्मसम्मानके सेहो सुदृढ करत। ई अध्ययन अकादमिक जगतमे ई सिद्ध करत जे बज्जिका लोकगीतसभमे मानवीय अनुभूतिक जे विविधता, दार्शनिक गम्भीरता, ओ काव्य-सौन्दर्य अछि, ओ कोनो भी समृद्ध शास्त्रीय वा लिखित साहित्य सँ कम नहि अछि। ई अध्ययन अकादमिक जगतमे ई सिद्ध करत जे बज्जिका लोकगीतसबमे मानवीय अनुभूतिक जे विविधता, दार्शनिक गम्भीरता, आ काव्य-सौन्दर्य हय, आ कोनो भी समृद्ध शास्त्रीय वा लिखित साहित्य से कम नहि हय। भाषाविज्ञानक छात्र ओ शोधार्थीसभक लेल ई एकटा प्रामाणिक सन्दर्भ ग्रन्थक काज करत, जे स्पष्ट करत जे बज्जिका ओ मैथिलीक बीचक सम्बन्ध मात्र बोलीक नहि, अपितु एकटा ऐतिहासिक ओ सातत्यपूर्ण (Continuous) भाषिक विकासक अछि। भाषाविज्ञानक छात्र आ शोधार्थीसबक लेल ई एगो प्रामाणिक सन्दर्भ ग्रन्थक काज करत, जे स्पष्ट करत जे बज्जिका आ मैथिलीक बीचक सम्बन्ध मात्र बोलीक नहि, बल्कि एगो ऐतिहासिक आ सातत्यपूर्ण (Continuous) भाषिक विकासक हय। नीति-निर्मातासभ (Policy Makers) ओ शैक्षणिक संस्थानसभ, जेना कि बिहार विश्वविद्यालय (मुजफ्फरपुर), केँ स्नातक ओ स्नातकोत्तर पाठ्यक्रममे बज्जिका साहित्यक पठन-पाठन सम्मिलित करबाक लेल ई शोध एकटा ठोस आधार प्रदान करत। नीति-निर्मातासब (Policy Makers) आ शैक्षणिक संस्थानसब, जइसे कि बिहार विश्वविद्यालय (मुजफ्फरपुर), के स्नातक आ स्नातकोत्तर पाठ्यक्रममे बज्जिका साहित्यक पठन-पाठन सम्मिलित करबाक लेल ई शोध एगो ठोस आधार प्रदान करत। उपसंहार ओ निष्कर्ष · उपसंहार आ निष्कर्ष डॉ. रामेश्वर प्रसाद द्वारा सम्पादित 'बज्जिका गीत-संगीत' केवल किछु लोकगीतक छपल पोथी मात्र नहि अछि; ई तिरहुत ओ मिथिलाक माटिक, ओतय क आबोहवाक, ओ एहि क्षेत्रक लोकक हृदयक स्पन्दनकेँ शब्दमे बान्हबाक एकटा ऐतिहासिक दस्तावेज अछि। जाँतकेँ घुमबैत काकी-भउजीक दर्द, साओनक रिमझिम फुहारमे कजरी गाबैत विरहिणीक आकुलता, सन्तान जन्मक प्रसव-पीडा सँ उपजल उल्लास, ओ विवाहक मण्डप सँ विदा होइत धीयाक (पुत्रीक) नेत्रक लोड़क जे वर्णन एहि पोथीक प्रतिनिधित्व करैत अछि, ओ समग्र मानव-जातिक अनुभूतिक सार्वभौमिक सत्य अछि। डॉ. रामेश्वर प्रसाद द्वारा सम्पादित 'बज्जिका गीत-संगीत' केवल किछु लोकगीतक छपल पोथी मात्र नहि हय; ई तिरहुत आ मिथिलाक माटिक, ओहाँ क आबोहवाक, आ अइ क्षेत्रक लोकक हृदयक स्पन्दनके शब्दमे बान्हबाक एगो ऐतिहासिक दस्तावेज हय। जाँतके घुमबैत काकी-भउजीक दर्द, साओनक रिमझिम फुहारमे कजरी गाबैत विरहिणीक आकुलता, सन्तान जन्मक प्रसव-पीडा से उपजल उल्लास, आ विवाहक मण्डप से विदा होय धीयाक (पुत्रीक) नेत्रक लोड़क जे वर्णन अइ पोथीक प्रतिनिधित्व करय हय, आ समग्र मानव-जातिक अनुभूतिक सार्वभौमिक सत्य हय। एहि अनुसन्धान-रूपरेखासँ ई बात दृढ़तापूर्वक रेखाङ्कित करैत अछि जे लोक-साहित्यकेँ केवल भावुकता, पुरानी परम्परा, वा गाम-देहातक रागरङ्गक दृष्टिसँ नहि देखल जेबाक चाही। एकरा गम्भीर अकादमिक, भाषावैज्ञानिक, पारिस्थितिक ओ समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण सँ विश्लेषित करबाक आवश्यकता अछि। बज्जिका भाषा ओ एकर समृद्ध साङ्गीतिक परम्परा विश्व-साहित्यक एकटा अमूल्य रत्न अछि, जाहिक प्रत्येक पन्नामे ओ प्रत्येक स्वरमे एकटा सम्पूर्ण युगक धड़कन सुरक्षित अछि। एहि पर यदि प्रस्तावित वैज्ञानिक शोध कएल जाय, तँ ई बज्जिका ओ समग्र मैथिली साहित्यक भण्डारकेँ वैश्विक पटल पर एकटा नव, प्रामाणिक ओ गौरवशाली पहिचान देबामे निश्चित रूपें सफल सिद्ध होएत। ई हमरा लोकनिक सामूहिक उत्तरदायित्व अछि जे एहि अमूर्त धरोहरकेँ कालक गालमे समाहित हेबा सँ रक्षा करी ओ एकरा आगामी पीढीक लेल सहेज क' राखी। अइ अनुसन्धान-रूपरेखासे ई बात दृढ़तापूर्वक रेखाङ्कित करय हय जे लोक-साहित्यके केवल भावुकता, पुरानी परम्परा, वा गाम-देहातक रागरङ्गक दृष्टिसे नहि देखल जेबाक चाही। एकरा गम्भीर अकादमिक, भाषावैज्ञानिक, पारिस्थितिक आ समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से विश्लेषित करबाक आवश्यकता हय। बज्जिका भाषा आ एकर समृद्ध साङ्गीतिक परम्परा विश्व-साहित्यक एगो अमूल्य रत्न हय, जइक प्रत्येक पन्नामे आ प्रत्येक स्वरमे एगो सम्पूर्ण युगक धड़कन सुरक्षित हय। अइ पर यदि प्रस्तावित वैज्ञानिक शोध कैल जाय, तँ ई बज्जिका आ समग्र मैथिली साहित्यक भण्डारके वैश्विक पटल पर एगो नव, प्रामाणिक आ गौरवशाली पहिचान देबामे निश्चित रूपें सफल सिद्ध होत। ई हमरा लोकक सामूहिक उत्तरदायित्व हय जे अइ अमूर्त धरोहरके कालक गालमे समाहित हेबा से रक्षा करी आ एकरा आगामी पीढीक लेल सहेज क' राखी। विस्तृत ग्रन्थ-सूची एहि सूचीमे केवल पोथी आ मुद्रित ग्रन्थ राखल गेल अछि; पत्र-पत्रिका, शोध-पत्र, जाल-स्रोत आ वेबसाइट नहि। जतय प्रकाशन-वर्ष वा प्रकाशकक स्पष्ट सूचना उपलब्ध अछि, ओतय देल गेल अछि; अनिश्चित सूचना अनुमानसँ नहि जोड़ल गेल अछि। विदेशी ग्रन्थसभक शीर्षक पाठक-सुविधा लेल मैथिली रूपमे देल गेल अछि। १. प्राथमिक कृति, बज्जिका साहित्य आ भाषिक स्रोत 1. रामेश्वर प्रसाद। ‘बज्जिका गीत-संगीत’। मुजफ्फरपुर: किशोर प्रकाशन, प्रथम संस्करण, २०००। 2. रामेश्वर प्रसाद। ‘बज्जिका लोकगीत’। मुजफ्फरपुर: किशोर प्रकाशन, २०००। 3. रामेश्वर प्रसाद। ‘बज्जिका स्वर संगम’। मुजफ्फरपुर: किशोर प्रकाशन, २०००। 4. निर्मल मिलिन्द। ‘गितिया’। १९८४। 5. निर्मल मिलिन्द। ‘तरहात्ती पर तरेगन’: बज्जिका गीत आ कविता। १९९९। 6. निर्मल मिलिन्द। ‘खिस्सा पेहानी’: बज्जिकाक प्रतिनिधि कथा-संकलन। अखिल भारतीय बज्जिका साहित्य सम्मेलन, सिकन्दराबाद। 7. प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मणि’। ‘बज्जिका साहित्य का इतिहास’। मुजफ्फरपुर: हंसराज प्रकाशन, १९९५। 8. योगेन्द्र राय। ‘बज्जिका व्याकरण’। हाजीपुर: शैलेश भूषण, १९८७। 9. योगेन्द्र प्रसाद सिन्हा। ‘बज्जिका का स्वरूप’। मुजफ्फरपुर: बज्जिका संस्थान, १९९७। 10. अवधेश्वर अरुण। ‘बज्जिका रामायण’। 11. चन्द्र किशोर श्वेतांशु। ‘इंजुरी भर सिंहोरवा’। सीतामढ़ी: समीक्षा प्रकाशन, १९७७। 12. देवेन्द्र राकेश। ‘साँच में आँच कि?’ मुजफ्फरपुर: अहिल्या प्रकाशन, १९७०। 13. सियाराम तिवारी। ‘बज्जिका भाषा और साहित्य’। पटना: बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, १९६४। 14. सुरेन्द्र मोहन प्रसाद, सम्पादक। ‘बज्जिका-हिन्दी शब्दकोश’। अखिल भारतीय बज्जिका साहित्य सम्मेलन, २०००। 15. विद्यापति। ‘कीर्तिलता’। 16. हलदर दास। ‘सुदामाचरित्र’। 17. मँगनीराम। ‘मँगनीराम की साखी’। 18. मँगनीराम। ‘रामसागर पोथी’। 19. मँगनीराम। ‘अनमोल रतन’। 20. रामवृक्ष बेनीपुरी। ‘अम्बापाली’। 21. भिखारी ठाकुर। ‘विदेशिया’। २. भारतीय काव्यशास्त्र, रस-ध्वनि-वक्रोक्ति आ नव्य-न्याय 22. भरतमुनि। ‘नाट्यशास्त्र’। 23. आनन्दवर्धन। ‘ध्वन्यालोक’। 24. कुन्तक। ‘वक्रोक्तिजीवितम्’। 25. अभिनवगुप्त। ‘अभिनवभारती’: ‘नाट्यशास्त्र’ पर टीका। 26. मम्मट। ‘काव्यप्रकाश’। 27. विश्वनाथ कविराज। ‘साहित्यदर्पण’। 28. गङ्गेश उपाध्याय। ‘तत्त्वचिन्तामणि’। ३. पाश्चात्य आलोचना, समाज-सिद्धान्त, मौखिकता आ प्रदर्शन 29. कार्ल मार्क्स। ‘पूँजी’, पहिल खण्ड। हैम्बर्ग: ओटो मैस्नर प्रकाशन, १८६७। 30. लुई अल्थ्यूसर। ‘लेनिन आ दर्शन तथा अन्य निबन्ध’। लन्दन: न्यू लेफ्ट बुक्स, १९७१। 31. अन्तोनियो ग्राम्शी। ‘कारागार-पुस्तिकासँ चयन’। क्विन्टिन होअर आ जेफ्री नोवेल-स्मिथ, सम्पादक। न्यूयॉर्क: इन्टरनेशनल पब्लिशर्स, १९७१। 32. गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक। ‘उत्तर-औपनिवेशिक तर्कक समालोचना: लुप्त होइत वर्तमानक इतिहास दिस’। कैम्ब्रिज, मैसाचुसेट्स: हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, १९९९। 33. मिखाइल बाख्तिन। ‘दोस्तोयेव्स्कीक काव्यशास्त्रक समस्यासभ’। कैरिल इमर्सन, सम्पादक। मिनेयापोलिस: यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा प्रेस, १९८४। 34. वाल्टर जे. ऑङ्ग। ‘मौखिकता आ साक्षरता: शब्दक प्रौद्योगिकीकरण’। लन्दन: मेथुएन, १९८२। 35. अल्बर्ट बी. लॉर्ड। ‘कथागायक’। कैम्ब्रिज, मैसाचुसेट्स: हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, १९६०। 36. पॉल जुम्थोर। ‘मौखिक कविता: एक परिचय’। मिनेयापोलिस: यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा प्रेस, १९९०। 37. क्लीनथ ब्रुक्स। ‘सुगढ़ कलश: कविताक संरचनाक अध्ययन’। न्यूयॉर्क: हार्कोर्ट ब्रेस, १९४७। 38. रिचर्ड बाउमन। ‘मौखिक कला प्रदर्शनक रूपमे’। रोली, मैसाचुसेट्स: न्यूबरी हाउस, १९७७। 39. ग्रेग गैरार्ड। ‘पारिस्थितिक आलोचना’। लन्दन: राउटलेज, २००४। 40. विलियम लैबोव। ‘समाजभाषावैज्ञानिक प्रतिरूप’। फिलाडेल्फिया: यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिल्वेनिया प्रेस, १९७२। 41. नॉर्मन फेयरक्लफ। ‘भाषा आ सत्ता’। लन्दन: लाँगमैन, १९८९। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.२१. गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली बाल-उपन्यासक समीक्षाशास्त्र गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली बाल-उपन्यासक समीक्षाशास्त्र गजेन्द्र ठाकुरक सैंतीस बाल-उपन्यासक विस्तृत समालोचना (भारतीय आ पाश्चात्य बाल-साहित्य aसमीक्षाशास्त्रक आलोकमे) भूमिका : बाल-साहित्यक समीक्षा-दृष्टि आ ई सैंतीस पोथी एहि पोथीमे गजेन्द्र ठाकुर रचित सैंतीस टा मैथिली बाल-उपन्यासक विस्तृत समीक्षा प्रस्तुत अछि। ई सैंतीसो पोथी कोनो फुटकर संग्रह नहि थिक — ई एकटा सुनियोजित बाल-वाङ्मयक स्थापत्य थिक, जाहिमे आधुनिक मौलिक बाल-कथा, वर्णमाला-शिक्षण, पशु-कथा, चातुर्य-कथा, परीकथा, मिथिलाक वीर-लोकगाथा, प्रेम-गाथा, भक्ति-गाथा, लोकदेवता-चरित, लोकनाट्य आ संगीत-आख्यान — सभटा विधा एक्कहि छत्रक नीचाँ आबि गेल अछि। तेँ एहि सभक समीक्षा सेहो फुटकर नहि भऽ सकैत अछि; एक पोथीक समीक्षा दोसरकेँ अपने घीचि अनैत अछि, जेना एक्कहि पोखरिक घाट सभ एक-दोसरासँ पानिक तरे-तर जुड़ल रहैत अछि। एहि समीक्षा-पोथीक विन्यास ओही अन्तर्जालकेँ पकड़बाक प्रयास थिक। समीक्षाक कसौटी दूटा राखल गेल अछि — भारतीय आ पाश्चात्य, आ दुनूकेँ एक-दोसराक विरुद्ध नहि, पूरक रूपमे प्रयुक्त कएल गेल अछि। भारतीय पक्षमे सभसँ पहिने रस-सिद्धान्त अछि। बाल-साहित्यक प्रयोजन भरत मुनिक नाट्यशास्त्रीय भाषामे कही त' रस-निष्पत्तिये थिक — बालक-पाठक लेल वीर, अद्भुत, हास्य, करुण आ वात्सल्यक अनुपातिक संयोजन। एहि संग्रहमे वीर रसक शिखर दीना-भदरी आ छेछन छथि, करुणक शिखर महुआ घटवारिन आ मोतीदाइ, अद्भुतक शिखर राजा अनसारी आ बिहुला, हास्यक शिखर मूर्खाधिराज आ ऊँटनी, आ वात्सल्यक शिखर बाल गुरु आ वर्णमाला शिक्षा। दोसर भारतीय कसौटी क्षेमेन्द्रक औचित्य-विचार थिक — बाल-पाठक लेल कोन प्रसंग कतेक विस्तारसँ कहल जाए, कतऽ गाथा 'आँखि नीचाँ कऽ लिअए', ई औचित्यक प्रश्न एहि सैंतीसो पोथीमे लेखकक सम्पादकीय विवेकक धुरी थिक आ प्रायः प्रत्येक समीक्षामे एकर चर्च आओत। तेसर कसौटी पञ्चतन्त्र-हितोपदेशक कथामुख-परम्परा थिक — कथाक भीतर कथा, आ कथाक द्वारा नीति; बा-ओमक जे उपक्रम-उपसंहार तरहरिमे परीलोक आ ऊँटनीकेँ बान्हैत अछि, से विष्णु शर्माक ओही प्राचीन शिल्पक मैथिली नवीकरण थिक। चारिम कसौटी ध्वनि-सिद्धान्त थिक — बाल-कथाक व्यंग्यार्थ, जे बच्चाकेँ तुरत आ प्रौढ़केँ बादमे भेटैत छै। पाश्चात्य पक्षमे पाँच टा उपकरण मुख्य रूपेँ प्रयुक्त भेल अछि। पहिल, भ्लादिमीर प्रॉपक कथा-आकृति-विज्ञान (मॉर्फोलॉजी ऑफ द फोकटेल) — निषेध आ निषेध-भंग, दाता-पात्र, जादुई साधन, कठिन कार्य, झूठ नायकक पहिचान सन कथा-प्रकार्य, जे राजा अनसारी, राजा ढोलन, ब्राह्मण आ ठाकुरक कथा सन पोथीमे पाठ्यपुस्तक सन स्पष्ट अछि। दोसर, आर्ने-थॉम्पसन-उथरक कथा-प्ररूप-सूची (ए.टी.यू.) — जतऽ-जतऽ मैथिली कथा विश्व-कथा-प्ररूपसँ मेल खाइत अछि (जेना मूर्खाधिराजमे ए.टी.यू. १६९६, कौवा आ फुद्दीमे शृंखला-कथा-वर्ग, ब्राह्मण आ ठाकुरक कथाक पाथर बननिहार मित्रमे ए.टी.यू. ५१६), ओतऽ ओकर उल्लेख कएल गेल अछि, जाहिसँ मैथिली बाल-साहित्यक विश्व-सन्दर्भ स्पष्ट होअए। तेसर, ब्रूनो बेटेलहाइमक मनोविश्लेषणात्मक स्थापना (द यूजेज़ ऑफ इनचैन्टमेन्ट) — जे परीकथाक अन्हार अंश बच्चाक भीतरक भयकेँ बाहर आनि ओकर परिष्कार करैत अछि, तेँ बाल-कथासँ मृत्यु, डाइन, विश्वासघात सभटा नहि हँटाओल जाए, खाली ओकर प्रस्तुति सम्हारल जाए। चारिम, मारिया निकोलायेवाक 'एटोनॉर्मेटिविटी'क प्रश्न — बाल-साहित्यमे वयस्कक सत्ता आ बालकक कर्तृत्व (एजेंसी)क सन्तुलन; एहि संग्रहक विलक्षणता ई जे एतऽ बेर-बेर बालके निर्णायक अछि — आस्था, ओम, मंशा, बगियाबला बालक, बत्तू, अनसारीक छोट बेटा। पाँचम, पेरी नोडेलमैनक चित्र-पोथी-सिद्धान्त — प्रत्येक पोथीमे 'चित्र' अंकित पटल (पैनल) कथा-गतिकेँ जे दृश्य-लय दैत अछि, से शब्द आ चित्रक ओही द्वि-वाचनक अंग थिक जकर चर्च नोडेलमैन 'वर्ड्स अबाउट पिक्चर्स'मे करैत छथि। संगहि पीटर हंटक बाल-केन्द्रित पाठ, जे.आर.आर. टॉल्कीनक 'यूकैटास्ट्रफी' (सुखान्तक आकस्मिक कृपा), जैक ज़ाइप्सक समाजीकरण-विमर्श आ जॉन स्टीफेन्सक विचारधारा-विश्लेषण यथास्थान आएल अछि। एकटा तेसर कसौटी सेहो अछि, जे ने विशुद्ध भारतीय थिक ने पाश्चात्य — विदेह समानान्तर साहित्य आन्दोलनक अपन प्रतिमान: लोकवेदकेँ शास्त्रक बराबरीमे राखब। एहि संग्रहक सभसँ क्रान्तिकारी पक्ष यएह अछि जे एकर नायक-मण्डली मुसहर दीना-भदरी, दुसाध सलहेस आ चूहड़मल, डोम छेछन, धोबि गरीबन, चमार लालमैन, मलाह अमरसिंह आ गांगो, मरर रघुनी — अर्थात् ओ लोकदेवता-पंक्ति थिक जकरा शिष्ट साहित्य शताब्दियो धरि पछुआड़मे रखने छल। बाल-साहित्यक रूपमे एहि गाथा सभक पुनर्कथन मात्र मनोरंजन नहि, वाङ्मयक लोकतन्त्रीकरण थिक — नव पीढ़ीक मानस-मानचित्रपर सुभाषित पंक्तिक संग सुभाषित समाज सेहो अंकित करब। समीक्षाक क्रम चारि खण्डमे राखल गेल अछि। खण्ड एकमे आधुनिक मौलिक बाल-कथा आ शिक्षण-कथा (समीक्षा १–४); खण्ड दूमे कथा-कथानक, पशुकथा, चातुर्य आ अद्भुत-कथा (समीक्षा ५–१५); खण्ड तीनमे वीर आ प्रेमक लोकगाथा (समीक्षा १६–२६); खण्ड चारिमे भक्ति, लोकदेवता, अनुष्ठान आ कला-गाथा (समीक्षा २७–३७)। प्रत्येक समीक्षामे कथानकक संक्षिप्त दिग्दर्शन, भारतीय दृष्टिसँ रस-औचित्य-विश्लेषण, पाश्चात्य दृष्टिसँ आकृति आ मनोविज्ञान, बाल-उपयुक्तताक परीक्षण, आ अन्तमे संग्रहक आन पोथी सभसँ अन्तर्पाठीय सम्बन्ध — ई पाँच सूत्र निमाहल गेल अछि। पुनरुक्तिसँ बचबाक लेल जे स्थापना एक बेर विस्तारसँ कएल गेल, से आगाँ खाली सन्दर्भ रूपमे आओत। आब समीक्षा आरम्भ। खण्ड एक : आधुनिक मौलिक बाल-कथा आ शिक्षण-कथा १. तरहरिमे परीलोक : धोधरिक ओहि पार मैथिलीक पहिल बाल-डिस्टोपिया संग्रहक ई उद्घाटन-पोथी अपन शिल्प आ साहसमे सभसँ आधुनिक अछि। बा ओमकेँ खिस्सा सुनबैत छथि — दस बरखक आस्था चन्ना गाछीक झमटगर गाछक धोधरिमे पैसि एकटा उज्जर 'परीलोक'मे खसि पड़ैत अछि, जतऽ अफ्रीकाक टुराकोस चिड़ै, मम्बा साँप, आस्ट्रेलियाक कूकाबुरा, एस्कीमो, पेंग्युइन — आठ महादेशक खसल यात्री भेटैत छथि। ओ लोक ऊपरसँ सुन्नर अछि: सात रंगक कियारी, चिक्कन घर्षण-रहित सड़क, सभ प्राणी मनुक्खक बोली बजैत। मुदा आस्थाक प्रश्न-कुशल आँखि एक-एक कऽ परदा उघारैत जाइत अछि — एतऽ हवा नहि बहैत, पात नहि हिलैत, नागरिकक नामक ठाम नम्बर अछि (वनसप्तो ९९९९५७४५), रानीकेँ ककरो देखने नहि अछि, आ महारक ओहि पार रानीक आदेशसँ कूड़ा फेकि-फेकि एकटा रेगिस्तान रचल गेल अछि। अन्तमे पता चलैत अछि जे परीलोक विक्षिप्त वैज्ञानिक सभक छद्म-राज थिक आ 'अन्हार लोक' कहल गेल रेगिस्तानमे चलनिहार वनस्पतिक राजा सभ समानान्तर सुधार-गृह चला रहल छथि — ओतहि साँस अछि, भूख अछि, हृदय अछि। आस्था सपनाक शक्तिसँ आठो धोधरि बन्द करा घर घुरैत अछि। पाश्चात्य दृष्टिसँ ई पोथी तीन परम्पराक संगमपर ठाढ़ अछि। धोधरिमे खसब लुइस कैरलक एलिसक बिलमे खसबाक मैथिली प्रतिध्वनि थिक — भार-हीन खसब, समयक अजीब बहब, ऊपर-नीचाँक लोप। मुदा एलिसक 'नॉनसेन्स' एतऽ क्रमशः लुइस लॉरीक 'द गिवर' सन बाल-डिस्टोपियामे बदलि जाइत अछि: रंगसँ बान्हल श्रम-विभाजन, नामक ठाम संख्या, अदृश्य सत्ता, आ सम्पूर्णताक ओहि पार फेकल गेल 'अन्य'। तेसर परम्परा पारिस्थितिक कथा (इको-फिक्शन)क थिक — कूड़ासँ बनल रेगिस्तान आ ओहिमे ह्वेलक पीठ सन ढिमकापर बोन रोपनिहार चलैत गाछ; प्रकृति एतऽ खलनायक नहि, निर्वासित नायक अछि। त्ज़्वेतान तोदोरोवक शब्दावलीमे कथा 'मार्वलस'सँ उठि कऽ अन्तमे व्याख्यात्मक हेराफेरी (परीलोक = वैज्ञानिकक छद्म) द्वारा विज्ञान-कथाक कात लागि जाइत अछि — बाल-पाठक लेल ई विधा-सन्धि अत्यन्त शिक्षाप्रद अछि। निकोलायेवाक एटोनॉर्मेटिविटीक कसौटीपर पोथी असाधारण अंक पबैत अछि: सम्पूर्ण लोकक सभसँ पैघ शक्ति (सपना सत्य होएब) एकटा दस बरखक बचियाक हाथमे अछि, आ ओ ओकर प्रयोग युद्ध लेल नहि, वार्ता आ द्वार-बन्दी लेल करैत अछि — 'जँ मित्रतासँ गप भऽ जाए, त' झगड़ाक कोन खगता?' ई वाक्य पूरा संग्रहक शान्ति-नीतिक बीज-वाक्य थिक, जकर प्रतिध्वनि बाल गुरु (समीक्षा २)मे ओमक क्षमा-वाक्यमे सुनाएत। भारतीय दृष्टिसँ एतऽ अद्भुत रस प्रधान अछि, मुदा ओकर पाछाँ-पाछाँ शान्तक छाया चलैत अछि — अन्तिम पृष्ठपर बन्द धोधरिक भीतरसँ अबैत 'हल्लुक आवाज' वाला पाँती ध्वनि-सिद्धान्तक उत्कृष्ट उदाहरण थिक: वाच्यार्थ खाली एकटा बन्द दरबज्जा, व्यंग्यार्थ ई जे कोनो प्रश्नक उत्तर सदा लेल नहि मुनाइत अछि। आस्थाक स्टोमेटा-क्लोरोप्लास्टबला वैज्ञानिक जिज्ञासा भारतीय परम्पराक प्रश्नोपनिषदीय शिष्याक आधुनिक रूप थिक — प्रश्न पुछब एतऽ अवज्ञा नहि, विद्या थिक। औचित्य-दृष्टिसँ लेखक डिस्टोपियाक क्रूरताकेँ (संतोला पाँतीक प्रयोगशाला, 'एहने तेज लोकक आवश्यकता'क अशुभ ध्वनि) संकेत धरि राखि बाल-पाठककेँ डर नहि, बेचैनी दैत छथि — आ बेचैनिये चिन्तनक जननी थिक। बा-ओमक उपक्रम-उपसंहार पञ्चतन्त्रक कथामुखक आधुनिकीकरण थिक; ओहि चौखटिक भीतर लालटेनक मिझाएब आ परीलोकक उज्जर अकासक झलफलाएब — दुनूक समान्तरता शिल्पक सूक्ष्मतम स्पर्श थिक। ई चौखटि ऊँटनी (समीक्षा ४)मे फेर खुजत, आ ओम स्वयं बाल गुरुमे नायक बनि प्रकट हएत — संग्रहक स्थापत्यमे ई त्रयी एकटा आन्तरिक वलय बनबैत अछि। २. बाल गुरु : पाँच बरखक क्षमा-दर्शन दिल्लीक एकटा आवासीय परिसर — तेसर महलापर मिथिला (ओमक घर), सोझाँक ब्लॉकमे पंजाब (मंशाक घर), आ मंशाक देखरेखमे ओड़ीसाक किशोरी महुआ। घासक पार्कमे ओम-मंशाक चारि बरखक दोस्ती, नव आएल सुसेनक किचकिची, 'गन्दा' शब्दक तीर, मंशाक गर्जन — 'ओम हमर दोस छी! जे एकरा गन्दा कहैए, से अपने गन्दा अछि!' — आ फेर ओमक ओ उत्तर जे पोथीक हृदय थिक: 'ओ हमरा नै चिन्हैए। नव आएल अछि। तेँ हमरा गन्दा कहलक। जखन ओ हमरा सभकेँ चीन्हि जाएत, त' थोड़बेक गन्दा कहत।' एतबे कथा — मुदा एहि एतबेमे लेखक बाल-साहित्यक ओ दुर्लभ वस्तु रचि देलनि जकरा यथार्थवादी बाल-कथा (रियलिस्टिक फिक्शन) कहल जाइत अछि: ने परी, ने जादू, ने अतीत — आइयेक महानगर, आइयेक बहुभाषिक भारत। पाश्चात्य समीक्षा एहि पोथीकेँ 'पीयर एग्रेशन' अर्थात् समवयस्क-उत्पीड़न (बुलीइंग)क साहित्यक कोटिमे राखत, मुदा तुरत ई अन्तर लक्षित करत जे पश्चिमी बुली-कथाक प्रचलित समाधान — वयस्कक हस्तक्षेप वा प्रतिकार — एतऽ दुनू अस्वीकृत अछि। समाधान स्वयं बालक दैत अछि, आ से संज्ञानात्मक पुनर्रचना (कॉग्निटिव रीफ्रेमिंग)क विधिसँ: आक्रामकक व्यवहारक कारण ओकर दुष्टता नहि, अपरिचय थिक। विकास-मनोविज्ञानक भाषामे ई 'थ्योरी ऑफ माइंड'क असाधारण प्रदर्शन थिक — पाँच बरखसँ छोट बालक दोसराक मानसिक अवस्थाक अनुमानसँ अपन प्रतिक्रिया गढ़ैत अछि। निकोलायेवाक दृष्टिसँ एतऽ सत्ता-व्युत्क्रम (पावर रिवर्सल) द्वि-स्तरीय अछि: बालक वयस्ककेँ सिखबैत अछि (माए अपने स्वीकार करैत छथि — 'के गुरु, के चेला?'), आ कथाक नैतिक केन्द्र लिंग-सन्तुलित अछि — ओम क्षमाक गुरु, त' मंशा साहसक; लेखक स्पष्ट कहैत छथि, 'एक गुरु क्षमाक, एक गुरु साहसक। दुनू मिलि कऽ पूरा पाठ।' ई सन्तुलन ज़ाइप्सक ओहि चेतौनीक उत्तर थिक जे बाल-साहित्य प्रायः धैर्य बालिकाकेँ आ पराक्रम बालककेँ बाँटि दैत अछि — एतऽ उनटा भेल अछि। भारतीय दृष्टिसँ ई कथा क्षमा-वीरताक कथा थिक — 'क्षमा वीरस्य भूषणम्'क बाल-भाष्य। रस-दृष्टिसँ वात्सल्य प्रधान अछि, मुदा ओकर तीन धारा बहैत अछि: जन्म देनिहारि माए, पोसनिहारि महुआ, आ सिखनिहारि माए — 'तीन टा माए छलीह ओहि साँझ ओतय।' महुआक चरित्र संग्रहक सभसँ सूक्ष्म सामाजिक टिप्पणी थिक: ओ अपने बच्चा अछि आ बच्चाक देखरेख करैत अछि; ओकर अपूर्ण ओड़िआ गीत — 'गामक नाम लइते गीतक गरा भरि आएल हो' — प्रवासी बाल-श्रमक करुणाकेँ बिनु भाषण देने कथामे गुहि दैत अछि, आ अन्तमे 'जतय केओ नामसँ चिन्हैत अछि, ओतय गीतक गरा नहि भरैत छै' ई पाँती चीन्हबक ओही दर्शनकेँ महुआ धरि पसारि दैत अछि जे ओम सुसेन लेल कहने छल। अन्तर्पाठीय दृष्टिसँ ओमक ई क्षमा-सूत्र तरहरिमे परीलोकक आस्थाक वार्ता-सूत्रक जोड़ा थिक, आ संग्रहक लोकगाथा-खण्डसँ एकर विरोधाभासी संवाद रोचक अछि — दीना-भदरी (१६) आ मीरांसाहेब (२३)मे अपमान आ हत्याक उत्तर प्रतिशोधसँ भेटैत अछि; बाल गुरु ओही परम्पराक भीतरसँ एकटा वैकल्पिक नीति प्रस्तावित करैत अछि। लेखक दुनूकेँ बिनु निर्णय सुनौने आमने-सामने राखि दैत छथि — ई संग्रहक आन्तरिक द्वन्द्वात्मकता थिक, जकर चर्च उपसंहारमे हएत। ३. वर्णमाला शिक्षा : अंकिता — अक्षर-यात्राक अभिनव प्रयोग ई पोथी संग्रहक एकमात्र विशुद्ध शिक्षण-कथा (डाइडैक्टिक टेक्स्ट) थिक आ अपन घोषित उद्देश्यमे पारदर्शी अछि: अंकिता आ हुनक पिताक एक साँझक पद-यात्रा, जाहिमे प्रत्येक अध्याय मैथिली वर्णमालाक एक-एक वर्गक शब्दसँ गुहल अछि — अ-वर्णक 'अकादारुण', 'अकच्छ', 'अगिनवान', 'अक्खज'सँ शुरू भऽ क-वर्गक 'ओगरबाह', 'कड़ेकमान', 'कदबा', 'कमरसारि' होइत य-हक 'रजनी', 'लस्सा', 'हर्ष' धरि; प्रत्येक अध्यायक अन्तमे प्रश्नोत्तर। पाश्चात्य शिक्षाशास्त्रक इतिहासमे एकर कुल-गोत्र 'एबीसीडेरियम' (वर्णमाला-पोथी) परम्परासँ मिलैत अछि — कॉमेनियसक 'ऑर्बिस पिक्टस'सँ लऽ कऽ आधुनिक अल्फाबेट-बुक धरि। मुदा एतऽ दूटा मौलिकता अछि। पहिल, वर्ण एतऽ चित्र-सूचीमे नहि, कथा-प्रवाहमे अछि — शब्द सन्दर्भमे भेटैत अछि, आ से आधुनिक भाषा-अर्जन-सिद्धान्तक ओहि स्थापनाक अनुकूल थिक जे शब्द-भण्डार सूचीसँ नहि, प्रसंगसँ बनैत अछि। दोसर, अध्यायान्तक प्रश्नोत्तर भाइगोत्स्कीक 'निकटस्थ विकास-क्षेत्र'क व्यावहारिक रूप थिक — बच्चा जे एखने कथामे सुनलक, तकरे तुरत प्रश्न-रूपमे घुरा कऽ स्मृति-स्थिरीकरण; आ लेखकक शिक्षक-टिप्पणी ('खिस्सा कतेक बेर सुनाओल जाए, से बच्चाक क्षमताक हिसाबसँ') वैयक्तिक गतिक ओहि सिद्धान्तकेँ स्वीकारैत अछि जकरा आजुक भाषामे 'डिफरेन्शिएटेड इन्स्ट्रक्शन' कहल जाइत अछि। सभसँ मूल्यवान बात ई जे शब्द-चयन आधुनिक मानकीकृत हिन्दी-छाया शब्द नहि, ठेठ मैथिली लोक-शब्द अछि — 'उड़कुस्सी', 'उकापतङ्ग', 'टाभनेबोक', 'डिहबार' — अर्थात् वर्णमालाक बहन्ने ई पोथी लुप्त होइत शब्द-सम्पदाक संरक्षण-कोश सेहो थिक। भाषा-मृत्युक युगमे अल्पसंख्यक भाषाक बाल-प्राइमर मात्र शिक्षण नहि, प्रतिरोध थिक — ज़ाइप्स जकरा साहित्यक 'सामाजिकीकरण-कार्य' कहैत छथि, से एतऽ भाषिक अस्तित्व-रक्षाक स्तरपर घटित अछि। भारतीय दृष्टिसँ ई पोथी अक्षराभ्यास-संस्कारक कथात्मक रूप थिक; उपक्रममे 'अक्षरमुष्टिका'क जे बिम्ब तरहरिमे परीलोकक बामे आएल छल — बाक झुर्रीबला आंगुरक भीतर ओमक नान्हि आंगुर, 'जेना कलमक भीतर सियाही' — तकर व्यवस्थित पाठ्यक्रम यएह पोथी थिक; दुनूकेँ मिला कऽ पढ़ला पर बुझाइत अछि जे संग्रहमे अक्षर-दीक्षा स्नेह-दीक्षाक अंग थिक। रस-दृष्टिसँ एतऽ वात्सल्यक अत्यन्त घरेलू रूप अछि — थाकल पएर, लालछड़ीक जिद, 'टटका रोटी'क आश्वासन; आ पिताक ई उत्तर जे 'तेज चलल छलहुँ, जइसँ तूँ जल्दी पहुँचि आराम करितह' — अनुशासनक पाछाँ नुकाएल स्नेहक ई उद्घाटन बालक-पाठककेँ माता-पिताक 'कठोरता' पढ़बाक नव चश्मा दैत अछि। सीमा सेहो लक्षित हो: अध्याय-क्रमांकनमे किछु दोहराव (अध्याय ३ दू ठाम) आ उत्तरवर्ती वर्गक संक्षिप्तता सूचित करैत अछि जे ई प्रयोग एखन बीजरूप अछि — लेखक अपनहि शिक्षक-टिप्पणीमे एकरा आगाँ बढ़एबाक निमन्त्रण अभिभावक-शिक्षककेँ देने छथि। संग्रह-स्थापत्यमे ई पोथी सेतु थिक: एम्हर आधुनिक कथा, ओम्हर लोक-शब्दक ओ कोश जकर जीवन्त प्रयोग आगाँक लोकगाथा-खण्डमे भेटत। ४. ऊँटनी : नकलक नोक्सान आ हास्यक अनुशासन बा-ओमक चौखटि फेर खुजैत अछि — ओमक फरमाइश एहि बेर स्पष्ट अछि: 'हास्यबला खिस्सा चाही, डरौना नहि!' आ बा हरियाणाक खेतसँ खिस्सा उठबैत छथि: ऊँटनीक गरदनिमे जालक पात अँटकल, बटोही चारि प्रश्न पुछि गरदनिपर हाथ मारि पात खसा देलक, आ 'हम डॉक्टर छी' कहि बिदा भेल। किसान बुझलक जे डॉक्टरी एतबे थिक — आ गाम-गाम 'हम डॉक्टर छी' चिकरैत एकटा बिमार बुढ़ीपर वैह प्रश्नावली ('बुढ़ी दहिना कात गेल छलीह की?... जालक पातपर मुँह मारने रहथिन् की?') आ वैह हाथ-प्रहार आजमओलक — बुढ़ीक प्राण गेल। लहास कान्ह देबऽ पड़ल, फीस माँगलक त' मारि खएलक — आ दोसर गाममे ओकर 'सीख' एतबे: 'इलाज त' कऽ देबन्हि, मुदा लहासकेँ कान्ह हम नहि देब!' कथा-प्ररूप-विज्ञानक दृष्टिसँ ई विश्वप्रसिद्ध मूर्ख-नकलची (फूलिश इमिटेशन) वर्गक कथा थिक — जर्मन 'डॉक्टर नो-ऑल'सँ लऽ कऽ भारतीय नकलची-गीदड़ धरि पसरल ओ परिवार जाहिमे सफलताक बाह्य रूपक नकल भीतरक विद्या बिनु कएल जाइत अछि। हेनरी बर्गसाँक हास्य-सिद्धान्त एतऽ पाठ्य-पुस्तक जकाँ लागू होइत अछि: हास्य ओतऽ जनमैत अछि जतऽ जीवित विवेकक ठाम यान्त्रिक दोहराव बैसि जाइत अछि — किसान प्रश्नावलीकेँ यन्त्रवत् दोहरबैत अछि, सन्दर्भ बदलि गेल तकर सुधि नहि। मुदा लेखकक साहस ई जे ओ हास्यकेँ बीचहिमे मृत्युसँ टकरा दैत छथि — बुढ़ीक प्राणान्त हास्य-कथाक भीतर एकटा ठण्ढा झोंका थिक, आ यएह एकरा सामान्य हँसौना कथासँ ऊपर उठा 'डार्क कॉमेडी'क बाल-संस्करण बनबैत अछि। बेटेलहाइमक तर्कसँ ई मृत्यु अनुचित नहि — बच्चाकेँ ई बुझब जरूरी छै जे मूर्खता निर्दोष नहि होइत, ओकर मूल्य दोसरो चुकबैत अछि। औचित्य-दृष्टिसँ लेखक मृत्यु-दृश्यकेँ एक्कहि वाक्यमे निपटा ('बुढ़ीक प्राण ओतहि निकलि गेलनि') शोक-विस्तारसँ बचैत छथि — बाल-संस्करणक ओ संयम जे संग्रहमे बेर-बेर देखाएत (अमर बाबा, समीक्षा २४; बगियाक गाछ, समीक्षा ५)। एहि पोथीक असल चमत्कार चौखटिमे अछि। कथा समाप्त भेला पर बा नीति स्पष्ट करैत छथि ('कोनो काज सीखबासँ पहिने ओकर मर्म बुझब आवश्यक, खाली देखा-देखी नहि') — ई पञ्चतन्त्र-शैलीक कथामुख-नीति थिक। मुदा तकर बाद जे होइत अछि से नीति-कथासँ आगाँक वस्तु थिक: ओम पुछैत अछि जे 'अपना दिसुका खिस्सा' की, आ बा उत्तर टारि दैत छथि — 'हमरा भेल जे अहाँकेँ त' अबिते हएत, से नहि कहलहुँ!' कथा अपन अपूर्णताक संग बन्द होइत अछि, आ बालक हँसैत-हँसैत सुतैत अछि। नोडेलमैन जकरा बाल-साहित्यक 'हिडेन एडल्ट' कहैत छथि — पाठक-बालकक पाछाँ ठाढ़ ओ वयस्क जे कथाक चयन आ छँटाइ करैत अछि — से एतऽ स्वयं पात्र बनि कऽ प्रकट अछि: बा अपने ओ सम्पादिका छथि जे की कहब आ की छोड़ब तय करैत छथि। संग्रह-स्थापत्यमे ई पोथी तरहरिमे परीलोकक जोड़ा थिक — ओतऽ बा अद्भुतक द्वार खोलने छलीह, एतऽ हास्यक; आ दुनूक बीच ओहि नकली डॉक्टरक कथा गोनू झा आ दस ठोप बाबा (समीक्षा ११)क ढोंगी बाबासँ सोझे संवाद करैत अछि — ओतऽ नकली विद्वताकेँ असली बुद्धि बेनकाब करैत अछि, एतऽ नकली विद्या अपने अपन भण्डाफोड़ थिक। दुनू मिला कऽ संग्रहक 'प्रामाणिकता-पाठ' पूर्ण होइत अछि: विद्या देखौआसँ नहि, मर्मसँ अबैत अछि। खण्ड दू : कथा-कथानक, पशुकथा, चातुर्य आ अद्भुत-कथा ५. बगियाक गाछ : चातुर्य-कथाक व्याकरण आ ओकर अन्हार कोन मसोमातक बुधियार बेटा बगिया रोपैत अछि, अभूतपूर्व बगियाक गाछ जनमैत अछि, आ ओही गाछपर डाइन बुढ़ियाक नजरि पड़ैत अछि। 'हथाइन', 'मथाइन', 'खोँछाइन'क तीन बहन्नासँ झुकाओल बालक बोरामे बन्द होइत अछि, निन्न पड़ला पर माटि-पाथर-काँट भरि पड़ाइत अछि, दोसर बेर भेष-बदललि डाइनक सप्पतसँ ठकाइत अछि, आ अन्तमे डाइनक बेटीकेँ ऊखड़ि-समाठक छलमे फँसा अपन प्राण बचबैत अछि; बिलाड़िक 'अपन धीया अपने खाँऊ' वाला चेतौनीसँ भेद खुजैत अछि आ डाइनक कुकर्म ओकरे माथ पड़ैत अछि। ई कथा विश्व-कथा-प्ररूपक ओहि सुपरिचित वर्गक मैथिली सदस्य थिक जाहिमे डाइन बालककेँ बोरा/झोरामे भरि घर लऽ जाइत अछि आ बालक बेर-बेर चातुर्यसँ बहराइत अछि (ए.टी.यू. ३२७-परिवार, विशेषतः ३२७सी)। प्रॉपक प्रकार्य-श्रृंखला एतऽ निर्दोष स्पष्टतासँ घटित अछि: निषेध (माए ठगसँ सचेत रहबाक कहने छथि) — निषेध-भंग (बालक सप्पतपर पतिया जाइत अछि) — अपहरण — प्रत्युक्ति — दण्ड। बेटेलहाइमक विश्लेषण एहि वर्गक कथाकेँ बालकक 'निगलल जएबाक' आदिम भयक नाट्यीकरण मानैत अछि — डाइनक 'मसुआइ'क लालसा ओही भयक मूर्त रूप थिक, आ बालकक बेर-बेरक पलायन ओहि भयपर बुद्धिक विजयक पूर्वाभ्यास। एतऽ ध्यान देबऽ जोग अछि जे बालक दू बेर ठकाइत अछि — लेखक चातुर्यकेँ अचूक नहि देखबैत छथि; भूल, पुनः-भूल, आ तखन सीख — ई त्रुटि-सहिष्णु अधिगम-वक्र (लर्निंग कर्व) बाल-मनोविज्ञानक दृष्टिसँ आदर्श अछि, कारण ओ पाठककेँ पूर्णताक नहि, सजगताक पाठ दैत अछि। औचित्य-विचारक कसौटीपर ई पोथी संग्रहक सम्पादकीय नीतिक घोषणापत्र थिक। अध्याय आठक ओहि क्षणपर, जतऽ बालक डाइनक बेटीक संग जे करैत अछि से लोककथाक मूल पाठमे नृशंस अछि, लेखक स्पष्ट लिखैत छथि — 'ई गाथाक सभसँ अन्हार क्षण छल, जकर विस्तार गाथा नहि करत'; आ दसम अध्यायमे फेर — 'गाथा एहि दुखद घटनाक विस्तृत वर्णन नहि करत।' ई 'कथा-संवरण' (नैरेटिव एवर्ज़न)क तकनीक थिक: घटना अस्वीकृत नहि, अवर्णित; बालक-पाठक जनैत अछि जे किछु भयंकर भेल, मुदा ओकर चित्र ओकर कल्पनापर छोड़ल गेल — आ कल्पना सदिखन अपन वहन-क्षमता भरिये चित्र बनबैत अछि। बेटेलहाइम आ आधुनिक 'सैनिटाइजेशन'-विरोधी आलोचनाक बीचक ई मध्यमार्ग संग्रह भरिमे लेखकक हस्ताक्षर-तकनीक थिक (मिलाउ: अमर बाबा २४, मोतीसाएरि २६, ऊँटनी ४)। रस-दृष्टिसँ हास्य आ भयानकक ओ मिश्रण, जकरा उपशीर्षक अपने 'हास्य-रोमांचक' कहैत अछि, डाइनक माथपर 'लघुशंका'बला प्रसंगमे चरमपर अछि — डर हँसीमे विरेचित होइत अछि, आ यएह बाल-कथामे भयानक रसक शास्त्रसम्मत उपचार थिक। अन्तर्पाठीय दृष्टिसँ बालकक गोनू-गोत्र लेखक स्वयं घोषित करैत छथि ('बालक तँ छल गोनू झाक मूल-गोत्रेक') — गोनू झा (११) एकर वयस्क रूप थिक, बत्तू (६) एकर पशु-रूप, आ मूर्खाधिराज (९) एकर व्यतिरेकी छाया: ओतऽ देखब जे बुद्धिक ठाम नकल बैसला पर यएह कथा-व्याकरण केहन उनटि जाइत अछि। ६. बत्तू : निर्बलक वाक्-शक्ति दुर्गापूजाक बलिसँ बचबाक लेल माए-बकड़ीक चेतौनीपर चारि मासक छागर राता-राती बोन पड़ाइत अछि, दू-तीन बरखमे झमटगर दाढ़ी-सींगबला बत्तू बनैत अछि, आ बाघसँ आमने-सामने भेला पर काव्यात्मक डींगसँ ('सिंह खेलहुँ सात... जहिया दस बाघ नञि होए, तहिया परहुँ ठक दऽ उपास') ओकरा भगा दैत अछि। सियार बाघकेँ पएर बान्हि घुरा अनैत अछि, त' बत्तू अन्तिम ब्रह्मास्त्र चलबैत अछि — 'तोरा दू टा बाघ आनए लेल कहलियहु, आ तों एकेटा अनलह?' — बाघ भागल, आ बान्हल सियार घिसिया कऽ मरल। ई कथा भारतीय पशु-कथा-परम्पराक ओहि प्राचीन प्ररूपक थिक जाहिमे दुर्बल पशु वाणीक बलेँ हिंस्र पशुकेँ जीतैत अछि — पञ्चतन्त्रक ओ शृगाल-सिंह-कथा-कुल जकर विश्व-रूप 'द ब्रेव लिटल टेलर'सँ लऽ कऽ तिब्बती-भारतीय 'बाघ आ बकरी' कथा धरि पसरल अछि। एकर केन्द्रीय दार्शनिक प्रस्ताव बाल-पाठक लेल क्रान्तिकारी अछि: वास्तविकता ओतबे नहि होइत जतबा देह, वास्तविकताक एकटा तल भाषासँ रचल जाइत अछि। बाघ बत्तूक देह नहि, बत्तूक वाक्य देखि कऽ भागैत अछि — आधुनिक भाषा-दर्शन जकरा 'परफॉर्मेटिव अटरन्स' कहत, से एतऽ बोनक बीच घटित अछि। संगहि लेखक सावधान छथि जे डींगक ई शक्ति अनैतिक नहि बुझाए — बत्तूक झूठ आत्मरक्षाक झूठ थिक, आ कथाक दण्ड-व्यवस्था स्पष्ट अछि: दण्ड बाघकेँ नहि, सियारकेँ भेटैत अछि, कारण छल ओकर आक्रामक छल; बत्तूक छल रक्षात्मक। 'सियार अपनहि चतुराइक शिकार' — ई काव्य-न्याय (पोएटिक जस्टिस) कथाक नैतिक रीढ़ थिक। रस-दृष्टिसँ एतऽ वीर आ हास्यक ओ दुर्लभ मिश्रण अछि जकरा 'वाग्वीरता' कहल जा सकैत अछि। बेटेलहाइमक पाठ आर गहींर: कथाक आरम्भमे बलिक जे छाया अछि — घरक वयस्क अपने बच्चाकेँ बेचबाक सौदा कऽ रहल छथि — से बालकक ओहि गहींरतम भयकेँ छूबि लैत अछि जे 'हमर रक्षक अपने हमरा त्यागि त' नहि देत?' आ कथाक उत्तर द्वि-स्तरीय अछि: माए चेतबैत छथि (मातृ-रक्षा), मुदा बाँचब बच्चाकेँ अपने पड़ैत छै (आत्म-सामर्थ्य)। घरसँ बोन, बोनसँ आत्मनिर्भरता — ई निर्वासन-सँ-परिपक्वताक चाप (आर्क) पाश्चात्य 'कमिंग ऑफ एज' ढाँचाक विशुद्ध लोक-संस्करण थिक। अन्तर्पाठीयता: दुर्गापूजाक बलि-प्रथाक जे प्रश्न एतऽ बालकक आँखिसँ उठल अछि, से गरीबन बाबा (२८) आ मोतीदाइ (२७)क देव-मनुष्य-सम्बन्धक प्रश्नक लघु-पूर्वाभ्यास थिक; आ बत्तूक 'दू बाघ'बला चालि गोनू झाक 'ओतेक टाक बाँस राखब कतय?' (११) सन प्रश्न-अस्त्रक पशु-कथा-रूप — दुनूमे विजय सूचनाक नहि, सूचना-प्रबन्धनक होइत अछि। ७. कौवा आ फुद्दी : शृंखला-कथाक करुण अन्त दुर्भिक्षमे कौआ आ फुद्दी अपन-अपन बच्चा खएबाक निर्णय करैत अछि; कौआक बच्चा खाएल गेल, मुदा अपन बेर अएला पर धूर्त फुद्दी कौआकेँ गंगामे ठोर धोबऽ पठा दैत अछि। गंगा चुक्का माँगैत छथि, कुम्हार माटि, खेत हिरणक सींग, हिरण सिंह, सिंह गाएक दूध, गाए घास, घास हँसुआ — आ लोहार लग पहुँचि कौआ अपन पूरा शृंखला गीतमे गाबि दैत अछि। लोहार कारी आ लाल दू हँसुआ देखबैत अछि; कौआ ललका — धीपल — हँसुआ लोलमे दबबिते छरपटा कऽ मरि जाइत अछि। ई पोथी संग्रहक विधा-वैविध्यक प्रमाण-पत्र थिक: ई शुद्ध शृंखला-कथा (क्युमुलेटिव टेल, ए.टी.यू. २०३०-वर्ग) थिक — ओ विश्वव्यापी बाल-विधा जाहिमे 'दिस इज़ द हाउस दैट जैक बिल्ट' सन कथा प्रत्येक कड़ीपर पिछला सभटा कड़ी दोहरबैत अछि। एकर शिक्षाशास्त्रीय मूल्य सर्वविदित अछि: दोहराव स्मृति-प्रशिक्षण थिक, बढ़ैत सूची क्रम-बोधक अभ्यास, आ कौआक अन्तिम गीत ('हे लोहार भाए, दिअ हाँसू, काटब घास, खुआयब गाय...') बालक-श्रोताक संग सामूहिक वाचनक निमन्त्रण — मौखिक परम्पराक ओ सहभागी क्षण जकरा लिखित पाठ सेहो सुरक्षित रखने अछि। मुदा लेखक एहि प्रफुल्ल विधाक भीतर दूटा गम्भीर वस्तु राखि देने छथि। पहिल, आरम्भक दुर्भिक्ष-प्रसंग — अपन बच्चा खएबाक निर्णय — लोककथाक ओ निर्मम यथार्थ थिक जकरा लेखक बिनु मोलायम केने एक्कहि अनुच्छेदमे राखि आगाँ बढ़ि जाइत छथि; अकालक स्मृति मिथिलाक सामूहिक स्मृतिक अंग थिक (मिलाउ: रघुनी मरर ३२ आ माधव सिंह ३७, जतऽ अकाल कथाक चालक-शक्ति थिक), आ बाल-पाठक धरि ओकर एकटा प्रतिध्वनि पहुँचब इतिहास-बोधक आरम्भ थिक। दोसर, अन्तक आकस्मिक मृत्यु — टॉल्कीनक 'यूकैटास्ट्रफी'क ठीक उनटा, जकरा 'डिस्कैटास्ट्रफी' कहल जा सकैत अछि: एतेक नमहर परिश्रम-शृंखला एक्कहि गलत चुनाव (ललका हँसुआ)सँ शून्य भऽ गेल। एतऽ समीक्षककेँ ईमानदार प्रश्न उठाबऽ पड़त: की ई अन्त बाल-पाठक लेल बड्ड कठोर नहि? लेखकक अपन उत्तर उपसंहार-अध्यायमे अछि — कथा 'बच्चाकेँ हँसाबैत अछि, आ संगहि सोचबाक लेल विवश करैत अछि।' बेटेलहाइमक पक्षसँ जोड़ी त' उत्तर आर पुष्ट होइत अछि: कौआक मृत्युक असल कारण लोभ नहि, अविवेकी आज्ञापालन थिक — ओ हर शर्त बिनु प्रश्नक मानैत गेल; आ फुद्दीक 'विजय' सेहो विजय नहि — ओकर धूर्तताक दाम ओकर सखीक प्राण भेल। कथा दुनू अतिकेँ — अन्ध-सरलता आ धूर्तता — कठघरामे ठाढ़ करैत अछि, आ मध्यमार्ग (सजग सरलता) अनकहल छोड़ि दैत अछि, जे बालक-पाठकक अपन निष्कर्ष लेल जगह थिक। अन्तर्पाठीयता: फुद्दीक 'शुद्धिकरण'क बहन्ना (गंगामे ठोर धोअब) संग्रहक भक्ति-खण्डक गंगा-महिमा (बड़ सुख सार, ३४)क विडम्बनापूर्ण पूर्व-छाया थिक — ओतऽ गंगा मोक्ष दैत छथि, एतऽ गंगाक बाट मृत्यु धरि जाइत अछि; पवित्रताक भाषा जखन छलक हाथमे पड़ैत अछि तखन कतऽ पहुँचबैत अछि, ई ओकर मार्मिक प्रदर्शन थिक। ८. डोकी डोका : विरह-यात्राक लोक-रूपक डोका-डोकीक अतिशयोक्त प्रेमसँ (तरेगण आनबमे सेकेण्डक देरी क्षम्य, मिनटक नहि) सियार-सियारिनकेँ डाह होइत अछि; सियार डोकीक मोनमे शंका रोपि दैत अछि ('लागय-ए जे ओकर मोन ककरो आन पर छै'), डोका बोन गेल आ घुरल नहि। जोगीक भविष्यवाणी — पूर्व जन्मक शराप, विश्वास छोड़ब त' डोका हेराएत, मुदा सातम दिन भेटत — आ तखन डोकीक खोज-यात्रा: बगुला, सियरबा, वटवृक्ष, हाथी सभक 'एक राति रुकि जाउ'क निमन्त्रण अस्वीकारैत ओ मूसक संग जाइत अछि, जे खिस्सा सुनबैत महल लऽ जाइत अछि। खिस्सा बिसराइत अछि, सुरंग टपाइत अछि, आ सातम रातिमे हलुआक लोहियामे मुँह दऽ मूस मरि जाइत अछि; डोकीक शोक-गीतक बीच दरबज्जा खुजैत अछि — कुरहड़ि नेने डोका ठाढ़। ई छोट पोथी संग्रहक सभसँ स्वप्न-सदृश (ड्रीमलाइक) रचना थिक, आ एकर समीक्षा यथार्थक तर्कसँ नहि, स्वप्न-तर्कसँ करब उचित। पाश्चात्य कथा-शास्त्रमे एकर निकटतम बन्धु ओ 'खोज-यात्रा' (क्वेस्ट) संरचना थिक जाहिमे बाधा सभ भौतिक नहि, प्रलोभनात्मक होइत अछि — प्रत्येक 'रुकि जाउ' एकटा परीक्षा थिक, आ डोकीक शोक-गीत ('बगुला छोड़ल सियरबा छोड़ल, छोड़ल वटक वृक्ष, हाथी सन बलगर, पकड़ल ई मूस') ओहि परीक्षा-शृंखलाक काव्यात्मक लेखा-जोखा। एतऽ एकटा सूक्ष्म आ साहसी चुनाव लक्षित हो: डोकी बलगर हाथीकेँ छोड़ि दुर्बल मूसकेँ संगी चुनैत अछि — खोज-कथाक व्याकरणमे सहायक (हेल्पर)क चुनाव नायकक चरित्रक कसौटी थिक, आ डोकीक ई चुनाव बल-पूजाक विरुद्ध विनम्र-संगतिक पक्षमे अछि; ओकर करुण विडम्बना ई जे वैह विनम्र संगी लोभक एक क्षणमे चलि जाइत अछि। मूसक खिस्सा-सुनएबाक शर्त ('बीच-बीचमे हँ कहैत रहब') मौखिक कथा-परम्पराक श्रोता-धर्मक कथा-भीतर-कथा रूपेँ स्मारक थिक — हुंकारी भरब मिथिलाक खिस्सा-संस्कृतिक प्राण थिक, आ ओकर बिसराएब कथाक बिसराएब बनि जाइत अछि: ई आत्म-सन्दर्भी (मेटाफिक्शनल) क्षण बाल-पाठककेँ अनजाने ई सिखबैत अछि जे कथा वक्ता आ श्रोता दुनूक साझा रचना थिक। भारतीय दृष्टिसँ ई विप्रलम्भ शृंगारक बाल-सुलभ रूपान्तर थिक — प्रेमक वियोग-पक्ष, जकरा लोक-परम्परा बारहमासा आ विरह-गीतमे गबैत अछि, से एतऽ पशु-रूपकमे उतरल अछि, आ रूपक ओकरा बालक लेल सह्य बना दैत अछि। सियारक ईर्ष्या-बीज संग्रहक एकटा आवर्ती आकृति थिक — मिलाउ: पृथ्वीपालक कान-भराइ (मूँगा आ जालिम सिंह, १९), चौधरीक डाह (रघुनी मरर, ३२), तालुकदारक असूया (राजा सलहेस, १७) — लेखक बेर-बेर देखबैत छथि जे सम्बन्ध-भंगक पहिल औजार हथियार नहि, अफवाह होइत अछि। आ 'सातम राति'क संख्या-रहस्य लोककथाक ओहि काल-गणितक अंग थिक जे प्रतीक्षाकेँ नापल जा सकैत बनबैत अछि — बालक लेल अनन्त प्रतीक्षा असह्य, मुदा सात रातिक प्रतीक्षा एकटा खेल; एहि तरहेँ कथा धैर्यक शिक्षा दैत अछि बिनु धैर्यक उपदेश देने। ९. मूर्खाधिराज : उनटल चातुर्य-कथा, आ हास्यक सामाजिक व्याकरण गोपालकक महामूर्ख बेटा — जे अपन बियाहो बिसरि गेल — बाक आदेशपर कनियाँक गौना करबऽ बिदा होइत अछि। मुरही उड़ैत अछि त' 'आऊ, उड़ि जाऊ' कहैत अछि आ चिड़ीमारसँ पिटाइत अछि; सिखल वाक्य 'आबि जो, फँसि जो' चोरक कानमे, 'एहन सभ घरमे होए' श्मशानमे, 'एहन कोनो घरमे नहि होए' बरातमे — प्रत्येक ठाम पिटान, प्रत्येक ठाम नव वाक्य, आ अन्तमे अन्तिम सीख: 'किछु नहि बाजू।' मौन जमाए सासुरसँ कनियाँ नेने घुरैत अछि; घामसँ सिन्दूर धोखराइत अछि त' 'भँगलाहा कपार' बुझि हजामक बकरीसँ कनियाँ बदलि लैत अछि, बकरीसँ कदीमा — आ बाक विलापक बीच 'कदीमाक तरकारी बना कऽ राखू' कहि खेलाए चलि जाइत अछि। ई कथा अन्तर्राष्ट्रीय मूर्ख-कथा-प्ररूप ए.टी.यू. १६९६ ('व्हाट शुड आइ हैव सेड?')क लगभग विशुद्ध मैथिली पाठ थिक — ओ विश्वव्यापी ढाँचा जाहिमे मूर्ख प्रत्येक स्थितिमे पिछला स्थितिक वाक्य बजैत अछि। बर्गसाँक हास्य-सिद्धान्त एतऽ अपन शुद्धतम रूपमे अछि: भाषा, जे सन्दर्भ-सापेक्ष जीवित वस्तु थिक, मूर्खक हाथमे सन्दर्भ-निरपेक्ष यन्त्र बनि जाइत अछि — आ समाज ओहि यन्त्रताकेँ पिटानसँ 'सुधारऽ' चाहैत अछि, मुदा प्रत्येक सुधार नव यन्त्रता जनमबैत अछि। एहि अर्थमे ई कथा भाषा-दर्शनक बाल-प्रयोगशाला थिक: बालक-पाठक हँसैत-हँसैत सीखि जाइत अछि जे शब्दक अर्थ शब्दमे नहि, अवसरमे बसैत अछि — व्यवहारिक भाषा-विज्ञान (प्रैग्मैटिक्स)क एहिसँ सरस पाठ्यपुस्तक कठिन। ई बगियाक गाछ (५) आ बत्तू (६)क ठीक व्यतिरेक थिक — ओतऽ नायक सन्दर्भ पढ़ि कऽ भाषा गढ़ैत अछि, एतऽ नायक भाषा रटि कऽ सन्दर्भसँ टकराइत अछि; तीनू मिला कऽ संग्रहक वाक्-शिक्षाक पूर्ण पाठ्यक्रम बनैत अछि। मुदा हास्यक तरमे एकटा असुविधाजनक तह अछि जकरा समीक्षा अनदेखा नहि करत: कनियाँ-बकरी-कदीमाक विनिमय-शृंखला। हास्य-प्ररूपक भीतर ई स्त्रीक वस्तुकरणक चित्र सेहो थिक — आ लेखकक बचाव ई जे कथा मूर्खक दृष्टिकोणसँ कहल गेल अछि आ ओकर प्रत्येक विनिमय ओकर मूर्खताक अभियोग-पत्रमे नव धारा जोड़ैत अछि; बाक माथ-पीटब पाठकक नैतिक प्रतिक्रियाक कथा-भीतर प्रतिनिधि थिक। तइयो, वयस्क मध्यस्थ (शिक्षक-अभिभावक) लेल ई पोथी चर्चाक अवसर थिक, दंश-रहित हँसीक नहि — आ सएह एकर शक्ति थिक; जॉन स्टीफेन्स जकरा कथाक 'विचारधारात्मक अन्तराल' कहैत छथि, से एतऽ जानि-बुझि खुजल छोड़ल अछि। रस-दृष्टिसँ ई विशुद्ध हास्यक पोथी थिक, मुदा अन्तिम दृश्यक बाक विलाप हास्यमे करुणक ओ बूँद टपका दैत अछि जे मैथिली हास्य-परम्पराक (हरिमोहन झाक स्मृति सहज अछि) विशिष्ट स्वाद थिक — हँसी, जकर कोरमे कनी नोर। १०. भाट-भाटिन : प्रहेलिका, विश्वासघात आ बहिनक बुद्धि भाटिन मणिधारी गहुमनसँ गुप्त प्रेम करैत अछि — साँपकेँ नीक निकुत, पतिकेँ बसिया-खोसिया; आ अन्तमे साँपकेँ पतिक वधक आदेश। पनहीमे नुकाएल साँप झारला पर खसैत अछि आ भाटक हाथे मरैत अछि। भाटिन शोकमे साँपक नौ टुकड़ी कऽ खाट-मचिया-तेल-नून-डाँर-खोपामे नुका प्राणघातक प्रहेलिका रचैत अछि — उत्तर नहि त' 'भकसी झोंका कऽ' मृत्यु। भाट दू दिनक मोहलतिपर बहिन लग जाइत अछि; धर्मशालामे दीप सभ रातिमे गप करैत भेद खोलि दैत अछि, आ बहिन प्रति-शर्त राखि प्रहेलिका फोड़ि भाटिनकेँ ओकरे रचल दण्ड दैत अछि। ई कथा विश्व-लोककथाक दू प्राचीन धाराक संगम थिक: सर्प-प्रेमी स्त्रीक कथा-वर्ग आ प्राणघातक प्रहेलिका (नेक रिडल)क कथा-वर्ग, जाहिमे पहेलीक उत्तरपर जीवन टँगल रहैत अछि। प्रहेलिका-कथाक मनोविज्ञान बाल-साहित्यमे विशेष मूल्यवान अछि: पहेली ज्ञानक नाटकीयकरण थिक — जे जनैत अछि से जीबैत अछि; आ एतऽ ज्ञानक स्रोत अलौकिक श्रवण (दीप-संवाद) थिक, जे लोककथाक ओहि गहींर विश्वासकेँ कहैत अछि जे सत्य कतहु ने कतहु बाजल जाइत रहैत अछि — सुननिहार चाही। दीपक गप करब मैथिली घर-आँगनक ओहि जीवित वस्तु-लोकक अंग थिक जतऽ चूल्हि, ढेकी, दीप सभक अपन प्राण मानल जाइत अछि; बाल-पाठक लेल ई सजीवतावादी (एनिमिस्टिक) कल्पना पियाजे-वर्णित बाल-चिन्तनक स्वाभाविक भाषा थिक — कथा बालकक अपन विश्व-बोधमे बजैत अछि। एहि पोथीक नैतिक केन्द्र बहिन थिक, आ ई संग्रहक स्त्री-कर्तृत्व-शृंखलाक महत्वपूर्ण कड़ी: मंशा (२), आस्था (१), बिहुला (३३), मोतीसाएरि (२६)क संग ई बहिन ओहि पाँतीमे ठाढ़ अछि जे संकटक क्षणमे निर्णय अपन हाथमे लैत अछि। ओकर विधि लक्षित हो — ओ ने कानैत अछि ने सोझे आक्रमण करैत अछि; ओ भाटिनक अपने खेल-नियम ('प्रहेलिका बुझि सकल त'...')केँ उनटा कऽ ओकरेपर चला दैत अछि: विधिक द्वारा विधिक पराजय, जे परिष्कृत न्याय-बोधक लक्षण थिक। औचित्य-दृष्टिसँ अन्तिम दण्ड ('भकसी झोंका कऽ') लोक-पाठक कठोरता नेने अछि आ लेखक ओकरा एक्कहि वाक्यमे, बिनु चित्रण, निपटबैत छथि — कथा-संवरणक वैह तकनीक (मिलाउ समीक्षा ५)। मनोविश्लेषणात्मक स्तरपर पति-वधक षड्यन्त्र आ नौ टुकड़ीक गोपन बाल-पाठकक चेतन धरि नहि पहुँचैत, मुदा कथाक भाव-सन्देश — घरक भीतरक विश्वासघात सभसँ घातक, आ रक्त-सम्बन्ध (बहिन) संकटक अन्तिम दुर्ग — स्पष्ट पहुँचैत अछि। अन्तर्पाठीयता: पनही झारबाक 'साधारण आदति'सँ प्राण-रक्षा संग्रहक ओहि आवर्ती सूत्रक अंग थिक जे छोट अभ्यास पैघ रक्षा करैत अछि (मिलाउ: रौहिणेयक कान मुनबाक अभ्यास, १४); आ मणिधारी साँपक मणि-बिम्ब ब्राह्मण आ ठाकुरक कथा (१२)क साँप-मणि-प्रसंगसँ सोझ जुड़ैत अछि — दुनू ठाम मणि लोभ आ आलोक दुनूक द्व्यर्थक प्रतीक थिक। ११. गोनू झा आ दस ठोप बाबा : बुद्धिवादक लोक-नायक मिथिलामे सुखाड़; राजाक ढोलहोपर दस ठोप बाबा प्रकट — 'सय वर्ष हिमालयमे तपस्या, यज्ञसँ वर्षा।' पहुनाइसँ घुरल गोनू झा शंकित होइत छथि आ बीस ठोप बाबाक भेष धरि प्रतिस्पर्धी बनि ठाढ़ होइत छथि। 'श्री श्री १०८ बीस ठोप बाबा'क हास्यास्पद दावा-प्रतिदावाक बीच गोनूक एक्कहि शल्य-प्रश्न — 'बाँससँ मेघ खोँचारब? ओतेक टाक बाँस राखैत छी कतय?' — आ ढोंगक भरभराएब; शौचक बहन्ने पड़ाइत बाबाक नकली दाढ़ी लोकक हाथमे नोचा जाइत अछि, आ गोनू अपन नकली मोंछ उतारि असल रूपमे प्रकट होइत छथि। गोनू झा मैथिली लोक-मानसक ओ चिर-नायक छथि जिनक तुलना पाश्चात्य समीक्षा बीरबल, तेनालीराम, नसरुद्दीन होजा आ यूरोपीय टिल ऑयलेनश्पीगेलक अन्तर्राष्ट्रीय चतुर-नायक (ट्रिकस्टर) मण्डलीसँ करत। मुदा एहि कथामे गोनूक ट्रिकस्टर-रूपसँ बेसी महत्वपूर्ण हुनक विधि थिक, जे लगभग वैज्ञानिक पद्धतिक लोक-रूप अछि: दावा सुनू (यज्ञसँ वर्षा), दावाक क्रियाविधि पुछू (कोन विधिये?), उत्तरक भौतिक सम्भाव्यता जाँचू (एतेक नमहर बाँस कतऽ रहत?), आ असंगतिपर निर्णय दिअ। ई प्रश्न-शृंखला कार्ल सेगन जकरा 'बैलनी डिटेक्शन' कहैत छथि तकर मिथिला-संस्करण थिक, आ बाल-पाठक लेल एकर मूल्य अपरम्पार — कथा सिखबैत अछि जे श्रद्धा आ जाँच परस्पर विरोधी नहि; गोनू धर्मक विरुद्ध नहि, ढोंगक विरुद्ध ठाढ़ छथि। लेखकक ई सूक्ष्म रेखांकन (ढोंगीक 'ठोप'क संख्या-स्पर्धाक व्यंग्य, आ गोनूक अपनहु नकली भेष जे अन्तमे स्वेच्छया उतारल जाइत अछि) पाखण्ड आ रणनीतिक भेषक बीचक नैतिक भेदकेँ स्पष्ट करैत अछि: भेष जँ सत्य-उद्घाटन लेल हो त' साधन, आ आत्म-प्रतिष्ठा लेल हो त' पाखण्ड। रस-दृष्टिसँ ई विशुद्ध हास्य थिक, मुदा एकर पृष्ठभूमि — सुखाड़सँ त्रस्त प्रजा — करुणक हल्लुक आस्तर दैत अछि, आ यएह आस्तर व्यंग्यकेँ धार दैत अछि: ढोंगी सभसँ पहिने ओतहि पनपैत अछि जतऽ विपत्ति आ आशाक बजार गरम हो। एहि अर्थमे ई कथा माधव सिंह आ अमता गाम (३७)क पूर्ण प्रतिपक्ष थिक — दुनूक आरम्भ-बिन्दु एक्कहि (मिथिलाक सुखाड़, वर्षाक खोज), मुदा ओतऽ राग-विद्याक प्रामाणिक साधना आकाश झुकबैत अछि आ एतऽ नकली तपस्याक दावा नकली दाढ़ी संग नोचाइत अछि। संग्रह-स्थापत्यमे ई जोड़ी जानि-बुझि रचल बुझाइत अछि: विद्या आ विद्याक स्वाँगक बीचक रेखा — वैह रेखा जे ऊँटनी (४)मे बटोही आ नकलची किसानक बीच छल। निकोलायेवाक सत्ता-विमर्शक दृष्टिसँ एतऽ रोचक ई जे राजसत्ता (राजा) भोरी अछि आ ज्ञान-सत्ता (गोनू) सजग — लोककथाक ई स्थायी विन्यास बाल-पाठकमे सत्ताक प्रति स्वस्थ अ-श्रद्धा आ बुद्धिक प्रति श्रद्धा एक्कहि संग रोपैत अछि। १२. ब्राह्मण आ ठाकुरक कथा : कथा-भीतर-कथाक त्रिवेणी आ वचनक पाथर देबीगंजक ब्राह्मण सत्यनारायण-पूजाक यात्रामे ठाकुरक बच्चाकेँ संग लैत छथि; बच्चाक शर्त — जतऽ किछु नहि बुझाएत, ओतऽ बुझाबऽ पड़त। आ यात्राक तीन दृश्य तीन आख्यान खोलैत अछि: बालु-भारसँ भाँसैत स्त्री-लहासक पाछाँ ऐंठ-लाजसँ धार फानि लेनिहारि रानीक कथा; लात खाइत बकरीक पाछाँ चोला-मंत्रसँ राजाक देह हड़पनिहार विश्वासघाती मित्रक कथा (जकरा परीक बुद्धि सुग्गा-राजाकेँ घुरा बकरीमे कैद कऽ दैत अछि); आ फाँसी चढ़ैत बुढ़ियाक पाछाँ नागवती कन्या, बताह राजकुमार आ मन्त्रीक बेटाक दीर्घ आख्यान — जाहिमे बिधाताक कहल पचीस संकट, भेद खोलैत-खोलैत पाथर बनैत मित्र, आ नवजातक रक्त-स्पर्शसँ पुनर्जीवन धरि सभटा अछि। संरचनाक दृष्टिसँ ई संग्रहक सभसँ महत्वाकांक्षी पोथी थिक — कथा-भीतर-कथाक ओ पेटिका-शिल्प (फ्रेम नैरेटिव) जकर भारतीय वंशावली पञ्चतन्त्र, वेताल-पचीसी आ कथासरित्सागर धरि जाइत अछि: यात्रा चौखटि थिक, जिज्ञासा कुंजी, आ प्रत्येक 'नहि बुझाएब' एकटा नव कथाक ताला खोलैत अछि। बाल-शिक्षाशास्त्रक दृष्टिसँ ई शिल्प अनमोल — बच्चाक 'किएक?'केँ एतऽ डाँटल नहि जाइत, कथासँ पुरस्कृत कएल जाइत अछि; प्रश्नशीलता स्वयं कथा-यन्त्रक ईंधन थिक, जेना तरहरिमे परीलोक (१)मे आस्थाक प्रश्न छल। तेसर आख्यानक पाथर-प्रसंग विश्वकथाक अमर प्ररूप ए.टी.यू. ५१६ ('फेथफुल जॉन')क मैथिली रूप थिक — स्वामीक रक्षामे भेद जननिहार सेवक, जे भेद कहला पर पाथर होइत जाइत अछि आ बालकक रक्तसँ जीबैत अछि; ग्रिम-संकलनक 'ट्रू जॉन'सँ एकर पंक्ति-दर-पंक्ति सादृश्य मैथिली कथा-कोषक विश्व-नागरिकताक प्रमाण थिक। प्रॉपक भाषामे एतऽ वर्जना (भेद नहि कहब), वर्जना-भंग (राजाक हठ), दण्ड (पाथर), आ परिहार (शिशु-रक्त) — पूर्ण चक्र अछि; आ नैतिक भार उनटल अछि: वर्जना-भंग स्वार्थसँ नहि, मित्रक फाँसी-भयसँ भेल, तेँ कथा दण्डो दैत अछि आ मुक्तिओ। भारतीय दृष्टिसँ एहि पोथीक केन्द्रीय रस अद्भुत थिक, मुदा तीनू आख्यानक जोड़सँ जे उठैत अछि से वचन-मीमांसा थिक: पहिल कथामे लाज वचनसँ पैघ (रानी धारमे फानि जाइत छथि), दोसरमे वचनक (मंत्र-विद्याक) दुरुपयोग सर्वनाश अनैत अछि, तेसरमे वचन-रक्षा पाथर बना दैत अछि आ मित्रता ओहि पाथरकेँ फेर मनुक्ख। बालक-श्रोता तीनू सुनि जे निष्कर्ष गढ़त से उपदेशसँ नहि, त्रिकोणीय तुलनासँ आओत — ई पद्धति हितोपदेशक 'कथा-द्वारा-नीति'क परिष्कृत रूप थिक। एकटा आलोचनात्मक टिप्पणी: तेसर आख्यानक घनत्व (बुढ़िया, बताह, अपहरण, बरियाती, पचीस संकट) छोट पाठक लेल एक्कहि बैसारमे भारी पड़ि सकैत अछि; ई पोथी खण्डशः वाचन — ठीक ओहि यात्री-जोड़ी जकाँ, पड़ाव-पड़ाव — माँगैत अछि, आ सएह एकर स्वाभाविक प्रयोग-विधि थिक। अन्तर्पाठीयता: फाँसी चढ़ैत बुढ़ियाक 'अपराध'क पुनर्पाठ (जे दण्ड पाबि रहलि अछि से कथा सुनला पर बुद्धिमती सिद्ध होइत अछि) संग्रहक ओहि आवर्ती न्याय-प्रश्नसँ जुड़ैत अछि जे दृश्य-प्रमाण आ सत्यक बीच दूरी होइत अछि — वैह प्रश्न जे राजा सलहेस (१७)मे हारक झूठ-बरामदगी आ नैका बनिजारा (२१)मे बारीक कलंकमे फेर उठत। १३. राजा अनसारी : सपनाक भाषा आ 'घुरि कऽ नहि तकबा'क तप राजा अनसारी सपना देखैत छथि — घरमे हीरा-मोती झहरैत, मोजर चुनि-चुनि सभ खाइत — आ छोट बेटा वचन दैत अछि: 'हम ओकरा पूरा कऽ देब।' बोनमे भाइ सभसँ बिछुड़ल बालक बटोहीक संकेतपर इनारमे खसैत अछि, भैरवानन्द जोगीक सेवासँ वरदान पबैत अछि, सुग्गा बनि सात समुद्र पार अमरफल आनऽ जाइत अछि — पहिल बेर परीक 'घुरि कऽ देख'क पुकारपर घुरि कऽ तकैत मरैत अछि, जोगीक चुट्टासँ जीबि दोसर बेर बिनु घुरि तकने सफल होइत अछि। फेर कलम-गाछीक तीन बहिन, आ अन्तमे जोगीक विचित्र आदेश: तीनू परी आ अपन गरदनिमे एक्के संग चक्कू — आ सोनाक गाछ, रूपाक ठाढ़ि, झहरैत मोती। घरपर राजा 'तीनटा औरत'केँ देखि बेटाकेँ बेवकूफ कहैत छथि; बेटा भरल नगरक सोझाँ क्रिया दोहरबैत अछि, आ सपना साकार। ई संग्रहक सभसँ विशुद्ध अद्भुत-कथा (वंडर टेल) थिक, आ प्रॉपक प्रकार्य-सूचीक लगभग प्रत्येक खाना भरैत अछि: अभाव (सपनाक अपूर्ति), प्रस्थान, दाता (जोगी), कठिन कार्य, वर्जना ('घुरि कऽ नहि देखिहँ'), वर्जना-भंग, मृत्यु-पुनर्जीवन, आ रूपान्तरणकारी समापन। 'घुरि कऽ नहि तकबा'क वर्जना विश्व-पुराकथाक ओ गहींर आकृति थिक जे ऑर्फियस-यूरीडिसीसँ लऽ कऽ लोतक पत्नी धरि पसरल अछि — आ एकर मनोवैज्ञानिक अर्थ बाल-पाठक धरि सोझे पहुँचैत अछि: कोनो-कोनो काज एकाग्रता माँगैत अछि जाहिमे पाछाँक पुकार — शंका, प्रलोभन, अतीत — दिस तकलो मृत्यु थिक। बालक पहिल बेर हारैत अछि आ दोसर बेर जीतैत अछि; ई पुनरावृत्ति-सहित-सुधार (मिलाउ बगियाक गाछ, ५) संग्रहक अधिगम-दर्शनक स्थायी मुद्रा थिक। अन्तिम चक्कू-प्रसंग — जकर तर्क कथा जानि-बुझि नहि खोलैत अछि — अद्भुत-कथाक ओहि स्वप्न-तर्कक चरम थिक जतऽ बलिदान-सदृश क्रिया (अपनहु गरदनि!) रूपान्तरणक द्वार थिक; एकर व्याख्या-भार पाठकपर छोड़ब लेखकक साहसिक औचित्य-निर्णय थिक, कारण व्याख्या कएने ई जादू व्याकरण बनि जाइत। एहि कथाक दोसर स्तर सपनाक अर्थ-मीमांसा थिक। राजा सपनाकेँ शाब्दिक वस्तु बुझैत छथि (गाछ = गाछ), बेटा ओकरा सम्बन्धपरक सत्य बुझैत अछि (गाछ = परी-सहयोगसँ प्रकट होइत समृद्धि); आ कथाक व्यंग्य ई जे 'बेवकूफ' कहल गेल बालके सपना-साक्षर सिद्ध होइत अछि। तरहरिमे परीलोक (१)सँ एकर संवाद सोझ अछि — ओतऽ सपना यन्त्रवत् सत्य होइत छल आ ओकर राजनीतिक दुरुपयोग होइत छल; एतऽ सपना श्रम, सेवा आ वर्जना-पालनक बाट सत्य होइत अछि। दुनू मिला कऽ संग्रह बाल-पाठककेँ सपनाक दूटा पाठ दैत अछि: सपना शक्ति थिक, आ शक्तिक चरित्र ओकर साधन-पथसँ बनैत अछि। रस-दृष्टिसँ अद्भुतक संग वात्सल्यक हल्लुक रंग (पिताक चिन्ता, बेटाक वचन) आ अन्तमे सामूहिक विस्मयक ओ दृश्य अछि जतऽ भरल नगर मोजर चुनि रहल अछि — लोककथाक सुखान्त सदिखन सामुदायिक होइत अछि, वैयक्तिक नहि; ई सूत्र आगाँ बिहुला (३३) आ माधव सिंह (३७)मे फेर भेटत। १४. डाकू रौहिणेय : एक वाक्यक शक्ति — जैन कथा-परम्पराक बाल-रत्न मगधमे बिम्बिसारक राज आ रौहिणेय डाकूक आतंक — मुदा ई डाकू धनीकेँ लूटि गरीबमे बाँटैत अछि, तेँ जनता ओकर कवच थिक। पिता लौहखुरक मरणासन्न आदेश: महावीरक प्रवचन कहियो नहि सुनिहँ। अभयकुमार मंत्रीक पाँच-दिना प्रतिज्ञाक बीच रौहिणेय राजमहलेमे डकैतीक दुस्साहस करैत अछि; बाटमे प्रवचन-स्थल लग कान मुनने जाइत काल पएरमे काँट गड़ैत अछि, आ काँट निकालबाक एक क्षणमे एक्कहि वाक्य कानमे पड़ि जाइत अछि — देवताकेँ घाम नहि छुटैत छनि, माला नहि मौलाइत छनि, पएर धरती नहि छुबैत छनि, पिपनी नहि खसैत छनि। पकड़ाएल रौहिणेय 'दुर्गा किसान'क झूठसँ बचैत अछि; अभयकुमार मदिरा पिया नकली स्वर्ग रचबैत छथि — गन्धर्व-अप्सरा, इन्द्रक दूत, आ पाप-स्वीकृतिक माँग। मुदा रौहिणेय देखैत अछि: ई 'देवता' सभ घामे-पसीने छथि, माला मौलाएल, पएर धरतीपर — आ ओ अनसुनल वाक्यक बलेँ छल भाँपि पुण्ये-पुण्य गनबैत अछि। अभयदान भेटला पर सभ सत्य कहि, सभटा धन ठुकरा, ओही महावीरक दीक्षा माँगि लैत अछि जिनक एक वाक्य ओकर प्राण बचौलक। ई पोथी संग्रहमे विधागत रूपेँ अनूठा थिक — ई मिथिलाक लोकगाथा नहि, जैन कथा-साहित्यक (आवश्यक-चूर्णि आ परवर्ती कथाकोष-परम्पराक) प्रसिद्ध आख्यानक मैथिली बाल-रूपान्तर थिक, आ एकर उपस्थिति संग्रहक सांस्कृतिक क्षितिजकेँ मगध-विदेहक प्राचीन साझा भूगोल धरि पसारि दैत अछि। कथाक बौद्धिक केन्द्र एकटा तर्कशास्त्रीय रत्न थिक: निषिद्ध ज्ञानक एक कण सेहो निर्णायक भऽ सकैत अछि — पिता प्रवचनकेँ 'बर्बादी' कहि वर्जित केलनि, आ वैह प्रवचनक एक वाक्य बेटाक प्राण-रक्षक भेल; वर्जना अपने अपन खण्डन सिद्ध भेल। पाश्चात्य समीक्षा एतऽ 'एपिस्टेमिक थ्रिलर'क आद्य-रूप देखत — जासूसी कथाक ओ आनन्द जतऽ विजय बलसँ नहि, अवलोकन आ अनुमानसँ भेटैत अछि: रौहिणेय नकली स्वर्गक 'देवता'क घाम आ मौलाएल माला ओहिना पढ़ैत अछि जेना कोनो गुप्तचर सुराग। आ प्रतिपक्षमे अभयकुमार छथि — मंत्री-बुद्धिक ओ परम्परा जे नीति-कथामे चाणक्यसँ अभयकुमार धरि चलैत अछि; दू बुद्धिक ई द्वन्द्व (छली आ छल-भेदी) बाल-पाठक लेल शतरंज सन रोमांचक अछि, जाहिमे रक्तपात एक्को बूँद नहि। नैतिक स्थापत्य सूक्ष्म अछि। रौहिणेयक 'रॉबिन हुड' रूप (धनीसँ लऽ गरीबकेँ) कथाकेँ ओकर पक्षमे झुकबैत अछि, मुदा कथा ओकर मुक्ति डकैतीक औचित्यसँ नहि, डकैतीक त्यागसँ करबैत अछि — सहानुभूति आ अनुमोदनक ई भेद विचारधारा-सजग बाल-साहित्यक कसौटी थिक। रूपान्तरणक विश्वसनीयता एहिमे अछि जे ओ चमत्कारसँ नहि, कृतज्ञतासँ अबैत अछि: 'जाहि वचनसँ जान बचल, तकर दीक्षा लेब।' अन्तर्पाठीयता: नकली स्वर्गक भण्डाफोड़ गोनू झा (११)क ढोंगी-भेदनक राज-प्रायोजित संस्करण थिक — ओतऽ नकली बाबाकेँ असली बुद्धि पकड़ैत अछि, एतऽ नकली स्वर्गकेँ असली श्रुति; आ पिताक वर्जना-वाक्य बत्तू (६) आ राजा अनसारी (१३)क वर्जना-प्रकार्यक दार्शनिक शिखर थिक — संग्रह भरिमे वर्जना कतहु रक्षक अछि, कतहु परीक्षक, आ एतऽ स्वयं मिथ्या सिद्ध होइत अछि। हिंसा-रहित रोमांच, तर्क-प्रधान कथानक आ आन्तरिक रूपान्तरण — तीनू मिला कऽ ई पोथी संग्रहक बौद्धिकतम रचना थिक। १५. राजा ढोलन : शाप, गोपन आ चिट्ठीक महाकाव्य गढ़ नारियलक राजा दक्ष 'नहि बिकाएल समान कीनब'क हठमे सूत कीनैत छथि आ राज्य-लक्ष्मी रुसि जाइत छथि; गरीब राजा गढ़पिंगलमे घोड़-सेवक बनैत छथि। दुनू राजाक घर एक्कहि दिन सन्तान — आ ज्योतिषीय 'छठी रातिक बियाह'क विवशतामे नवजात मड़ुवन आ नोकरक नवजात बेटा ढोलनक बियाह भऽ जाइत अछि। घुरती बाटमे बाघ-वध पर बाघिनक शाप — 'तोहर बेटाक कनियाँकेँ राँड़ कऽ देब' — आ भयभीत पिता भेद गाड़ि दैत छथि: साढ़िन खधाइमे, बेटा मालिनक फुलवाड़ीमे, बियाहक स्मृति चुप्पीमे। ओम्हर जुआन मड़ुवन जबुना-कात बारह बरखक सदाव्रत बाँटि पति ताकैत छथि; बनिजाराक पत्र जादूगरनी हरेबा-परेबा जरा दैत अछि, सुग्गाक पत्र मालिन आगिमे दऽ दैत अछि, आ तेसर बेर गाँजा-भाँग-अफीमधारी महात्माक मोहिनी बाँसुरी सभ जादू चीरि ढोलन धरि पत्र पहुँचा दैत अछि। तरुआरि लऽ पुछला पर पिताक स्वीकारोक्ति, पिल्लू लागलि साढ़िनक उद्धार, बाघिन-वध, आ सासुरमे फुलवाड़ी उजाड़बाक उत्पातसँ पहिचान — अन्तमे डोली, बिदागरी आ राज। ई संग्रहक सभसँ जटिल कथानकबला अद्भुत-गाथा थिक, आ एकर समीक्षा-कुंजी संचार थिक: ई पूरा महाकाव्य असलमे तीन चिट्ठीक कथा थिक। शाप सूचनाकेँ वर्जित करैत अछि, पिता सूचनाकेँ गाड़ैत छथि, जादूगरनी सूचनाकेँ जरबैत अछि — आ मुक्ति ओहि क्षण होइत अछि जखन सूचना पहुँचि जाइत अछि। बाल-पाठक अनजाने सीखैत अछि जे परिवारक अधिकांश दुख षड्यन्त्रसँ बेसी गोपनसँ जनमैत अछि; पिताक मौन 'रक्षा' छल, मुदा ओकर मूल्य साढ़िनक बरखो-बन्दी, बेटाक पहिचान-लोप आ पुतोहुक बारह बरखक प्रतीक्षा भेल। प्रॉप-दृष्टिसँ कथा दू पीढ़ीक दू चक्र थिक — पिताक चक्र (दोष-पतन-प्रवास) आ पुत्रक चक्र (अज्ञान-उद्घाटन-प्रतिकार), आ पुत्र ठीक ओतऽ सफल होइत अछि जतऽ पिता विफल छलाह: पिता बाघ मारि शाप कमओलनि, पुत्र बाघिन मारि शाप काटलक; पिता भेद नुकओलनि, पुत्र भेद उघारलक। ई पीढ़ी-सुधारक आकृति (मिलाउ: रौहिणेय १४, जे पिताक वर्जना उलटबैत अछि) संग्रहक गहींर आशावाद थिक — सन्तान माता-पिताक भूलक कैदी नहि। स्त्री-पक्ष एतऽ विशेष समीक्ष्य अछि। मड़ुवन निष्क्रिय प्रतीक्षारत नायिका नहि छथि — सदाव्रतक संस्था खोलब सूचना-संग्रहक सार्वजनिक केन्द्र रचब थिक (वैह युक्ति ब्राह्मण आ ठाकुरक कथा, १२क परी अपनओने छलि), आ तीन-तीन संचार-माध्यम (बनिजारा, सुग्गा, साधु) आजमाएब रणनीतिक धैर्यक परिचय; प्रतिपक्षमे सेहो स्त्रिये अछि — हरेबा-परेबाक जादूगरनी-जोड़ी — तेँ कथा लिंगकेँ नहि, नीयतकेँ पक्ष-विपक्षमे बाँटैत अछि। साढ़िनक प्रसंग संग्रहक पशु-करुणाक मार्मिकतम पृष्ठ थिक: निर्दोष पशुक बरखो-बन्दी आ पिल्लू लागल देहक उद्धार — बालक-पाठकक संवेदना एतऽ जे पाठ पढ़ैत अछि से उपदेशक कोनो पोथी नहि दऽ सकैत। रस-दृष्टिसँ अद्भुत आ करुणक ई दीर्घ संयोजन अन्तमे शान्तमे विश्राम पबैत अछि; आ 'नोकरक बेटा'क राजा बनब संग्रहक ओहि समतावादी ध्वनिक अंग थिक जे लोकगाथा-खण्डमे (दीना-भदरीसँ छेछन धरि) पूर्ण स्वरमे बाजत। खण्ड तीन : वीर आ प्रेमक लोकगाथा १६. दीना-भदरी : सुभाषित माटिक दू बेटा — दुखान्त वीरगाथाक शिखर जोगियानगरक मुसहर भाइ दीना-भदरी — पाँच-पाँच मोनक कोदारि, दिन भरिमे बिगहा भरि जमीन, आ बलक संग धरम। जाँजरक जमीन्दार कनक सिंह हुनका 'बड़द' बनाबऽ चाहैत अछि, मारि खा कऽ भागैत अछि; ओकर स्त्री बुधनी सलहेस-थानपर तप कऽ वर माँगैत अछि — 'दीना-भदरीक प्राण।' वचन-बान्हल सलहेस अपनहि प्रिय वीरकेँ सपना दऽ कटैया बोन बजबैत छथि; खुनीमा बाघकेँ दीना 'जय राजा सलहेस' कहैत मल्ल-युद्धमे पछाड़ैत छथि, मुदा बगराक भेष धेने बाघिनक छलसँ दुनू भाइ मारल जाइत छथि। आगाँ चमत्कार-शृंखला: तूरक पलड़ापर बैसल भाइ-आत्मासँ भरि दोकान तौलाएब, श्राद्ध-भोजमे बारिक बनि परसब, हंसाक चीन्ह, सात तह कपड़ा फाड़ि बहराएल माए-दूध; फेर मोरंग-अंचलमे डेढ़ सए अत्याचारीक संहार, बुधनीक अन्त, आ सलहेसक प्रायश्चित्त-वचन — 'जतए हमर पूजा, ततए अहाँक पूजा।' ई पोथी संग्रहक वीरगाथा-खण्डक आधार-स्तम्भ थिक आ मैथिली लोक-महाकाव्य-परम्पराक बाल-द्वार। पाश्चात्य शोक-काव्यशास्त्रक भाषामे ई विशुद्ध ट्रेजेडी थिक — मुदा ग्रीक ढाँचासँ एकटा निर्णायक भेद संग: एतऽ नायकक कोनो 'ट्रैजिक फ्लॉ' नहि; दोष व्यवस्थामे अछि — वचन-धर्मक ओ यान्त्रिकी जे देवताकेँ सेहो अन्यायक औजार बना दैत अछि। सलहेसक धर्मसंकट ('वचन तोड़थि त' देवत्व टूटए, वचन राखथि त' न्याय टूटए') बाल-पाठकक आगाँ पहिल बेर ई प्रश्न रखैत अछि जे नियम आ न्याय सदिखन एक नहि होइत — नैतिक विकासक कोलबर्ग-वर्णित ओहि सीढ़ीक चढ़ाइ जतऽ बालक नियम-पालनसँ ऊपर उठि नियमक न्याय्यता जोखए लगैत अछि। आ दुखान्तक प्रतिसन्तुलनमे लोक-परम्पराक अपन 'यूकैटास्ट्रफी' अछि — मृत्युक ओहि पार न्यायक दोसर पारी: पलड़ा, दूध, डेढ़ सए संहार, आ पूजाक अर्द्धांश। टॉल्कीन जकरा सुखान्तक आकस्मिक कृपा कहैत छथि, से एतऽ मरणोत्तर न्यायक रूपमे अबैत अछि; बाल-पाठक सीखैत अछि जे कथाक अन्त आ न्यायक अन्त एक नहि — 'समय सभसँ पैघ अदालत थिक।' भारतीय दृष्टिसँ एतऽ वीर आ करुणक ओ युग्म अछि जकरा भवभूति 'एको रसः करुण एव' कहि करुणकेँ मूल मानने छथि — दीनाक बाघ-विजय वीरक शिखर, आ ठीक ओकर बाद बगराक छल करुणक खाधि; रसक ई झूला बाल-हृदयक भाव-शिक्षा (इमोशनल एजुकेशन) थिक। सात तह कपड़ा फाड़ि बहराएल दूधक बिम्ब वात्सल्यक ओ चरम थिक जतऽ शरीर-शास्त्र चुप भऽ जाइत अछि आ काव्य बजैत अछि — 'माएक दूध, संसारक सभसँ पैघ प्रमाण।' आ सामाजिक स्तरपर ई गाथा विदेह समानान्तर प्रतिमानक घोषणापत्र थिक: मुसहर बोनिहार भाइक पूजा देवताक संग बँटाएब — 'देवता आ बोनिहार, एक्कहि आंगनमे, एक्कहि धूप-दीपमे' — भारतीय भक्ति-लोकतन्त्रक ओ वाक्य थिक जकरा कोनो समाजशास्त्र एतेक सुन्दर नहि कहि सकैत। अन्तर्पाठीयता संग्रहक सभसँ घन एतहि अछि: सलहेस एतऽ विवश देवता छथि आ राजा सलहेस (१७)मे संघर्षरत मनुक्ख — दुनू पोथी मिला कऽ लोकदेवताक जीवन-वृत्त (मनुष्यसँ देवत्व धरि) पूर्ण होइत अछि; बुधनीक तप मोतीदाइ (२७)क तपक अन्हार जोड़ा थिक — एक्कहि विधि (हठ-तप), उनटा प्रयोजन (प्राण-हरण बनाम सन्तान-याचना); आ बगरा-भेषक छल-मृत्यु अमर बाबा (२४) आ बहुरा गोढ़िन (२५)क ओहि सूत्रसँ जुड़ैत अछि जे वीर बलसँ नहि, छलसँ मरैत अछि। १७. राजा सलहेस : उपाधिक स्वतन्त्रता आ तंत्र-रक्षित न्याय मोरंगक दुसाध सिपाही सलहेस — सिंहासन-हीन, मुदा जन-हृदयक 'राजा'। तालुकदार नौरंगी बहादुर थापाकेँ ई उपाधि नहि सोहाइत छन्हि: 'लोककेँ मना कऽ दियौक!' — 'लोकक मोन जे ओ ककरा की बजाओत!' एहि असम्भव आदेशपर सलहेस मोरंग छोड़ैत छथि। बारह बरखसँ आँचर बन्हने मालिन दबना — कमरू-कमख्याक तंत्र-विदुषी — हुनका सात सए सिपाहीक सरदार बनबा दैत छथि; पदच्युत चूहड़मल रानीक नौ लाखक हार सलहेसक ओछैनमे नुका षड्यन्त्र रचैत अछि; दबनाक काली-मन्दिरक साधनासँ चूहड़मल खून बोकरि सभ बकि दैत अछि; सलहेस मुक्त, पदोन्नत, आ अन्तमे दबना-सलहेसक बियाह। एहि गाथाक बौद्धिक केन्द्र उपाधि-विवाद थिक, आ ई बाल-पाठक लेल राजनीति-दर्शनक पहिल पाठ अछि: 'राजा' शब्दपर एकाधिकार ककर — सत्ताक आकि समाजक? सलहेसक तर्क ('ई जन द्वारा देल पदवी... हम छोड़ियो देब, लोक त' कहबे करत') भाषाक लोकतन्त्रक तर्क थिक — नाम ओ वस्तु थिक जे देनिहारक मोनमे रहैत अछि, आ मोनपर कोनो तालुकदारक हुकुम नहि चलैत। ज़ाइप्सक विचारधारा-विश्लेषणक भाषामे ई कथा वैधता (लेजिटिमेसी)क दू स्रोतक टक्कर थिक — पद-सत्ता बनाम सेवा-सत्ता — आ लोक-परम्परा असंदिग्ध रूपेँ दोसरक पक्षमे मतदान करैत अछि। दोसर समीक्ष्य आयाम दबना छथि: अस्वीकृत प्रेमिका, जे प्रतिशोध नहि, प्रमाण चुनैत अछि — ओकर तंत्र-विद्या एतऽ 'फोरेन्सिक' यन्त्रक काज करैत अछि (सत्य बोकरब!), अर्थात् अलौकिक शक्ति न्याय-प्रक्रियाक सेवामे अछि, प्रतिहिंसाक नहि। बारह बरखक प्रतीक्षा-रूपक संग्रहक आवर्ती काल-मात्रक थिक (मिलाउ: ज्योति पँजियार ३१, नैका बनिजारा २१, राजा ढोलन १५क मड़ुवन) — लोक-कल्पनामे बारह बरख तपस्याक पूर्णांक थिक, आ दबनाक प्रेम ओही पूर्णांकसँ नापल गेल अछि। औचित्य-दृष्टिसँ लेखक वैद्यक आत्महत्याक आरम्भिक प्रसंगकेँ एक्कहि अनुच्छेदमे सूचना-मात्र राखि (बाल-पाठ लेल उचित संक्षेप) कथाक भार षड्यन्त्र-भेदनपर रखने छथि, आ चूहड़मलक यातना-दृश्य ('खून बोकरब')केँ अलौकिक-दण्डक कोटिमे राखल गेल अछि जतऽ बाल-पाठक ओकरा जादुई न्याय बुझैत अछि, शारीरिक हिंसा नहि। अन्तर्पाठीय स्तरपर ई पोथी संग्रहक सभसँ रोचक नाम-गुत्थी रचैत अछि: एतुक्का खलनायक 'चूहड़मल' आ चौहड़मल आ रेशमा (१८)क नायक चूहड़मल — नाम एक, चरित्र-लोक भिन्न। ई लोक-परम्पराक ओहि ऐतिहासिक द्वन्द्वक स्मृति-चिन्ह थिक जाहिमे सलहेस-गाथा आ चूहड़मल-गाथा भिन्न-भिन्न समुदायक गौरव-गीत रहल अछि; लेखक दुनूकेँ अपन-अपन गाथामे अपन-अपन नायकत्व दऽ कऽ ओहि बहुस्वरताकेँ सुरक्षित रखलनि — बाल-पाठक अनजाने सीखैत अछि जे एक्कहि नामक कथा कहनिहारक ठामसँ बदलि जाइत अछि, आ इतिहासक ई बहु-कण्ठता दोष नहि, धरोहरि थिक। दीना-भदरी (१६)क विवश देवता आ एतुक्का संघर्षशील मनुक्ख मिला कऽ पढ़ब — यएह एहि जोड़ीक सम्यक् पाठ-विधि थिक। १८. चौहड़मल आ रेशमा : शोनितक सिनूर — निषिद्ध प्रेमक स्मारक मोकामा घाट। दूधबंसी बोनिहार-पहलमान चूहड़मल आ भूमिहार हवेलीक बेटी रेशमा — पहिल नजरि रेशमाक, आ बरखो धरि 'नहि' चूहड़मलक: 'अहाँ हवेलीक बेटी, हम घाटक बोनिहार।' भेद खुजला पर पहरा, भाड़ाक हत्यारा रामजीत-मन्ने खाँक उनटा वध, दूधबंसी टोलपर हवेलीक चढ़ाइ — आ ओकरा रोकनिहारि स्वयं रेशमा: 'हमर कारणसँ निर्दोषक रक्त बहत, त' पहिने हमर!' रामसखीक जादूसँ अदृश्य भेँट, काली-मन्दिरमे बियाह जतऽ सिनूरक ठाम चूहड़मल अपन शोनितसँ माँग भरैत अछि; घेराबन्दी, महुक गाछपर रेशमाक रक्षा, अन्तिम युद्धमे जितैत वीरक ठीक ओही क्षण कलुआ सिपाही द्वारा रेशमाक अपहरण, घोड़ाक वध, आ 'रेशमा-रेशमा' टेरैत प्राणान्त। अन्त: मोकामा टालक रेशमा-चूहड़मल मन्दिर आ सर्वजातीय मेला। ई गाथा संग्रहक प्रेम-दुखान्तक शिखर थिक आ एकर समीक्षा-कुंजी ओ एक बिम्ब थिक जे विश्व प्रेम-साहित्यमे मैथिलीक अपन योगदान कहल जाए योग्य अछि — शोनितक सिनूर। सिन्दूर संस्थाक प्रतीक थिक, शोनित प्राणक; दुनूक ई विनिमय कहैत अछि जे जतऽ संस्था प्रेमकेँ सामग्री नहि दैत, ओतऽ प्रेम अपन देहसँ सामग्री रचि लैत अछि। पाश्चात्य तुलनात्मक दृष्टि सहजहि रोमियो-जूलियट मोन पाड़त — कुल-वैरक बीच प्रेम, गुप्त विवाह, दुखान्त — मुदा भेद निर्णायक अछि: शेक्सपियरक वैर दू समान कुलक थिक, एतऽ वैर ऊर्ध्वाधर अछि — जाति आ वर्गक सीढ़ीपर; तेँ ई ट्रेजेडी नियतिक नहि, संरचनाक थिक, आ एकर 'खलनायक' कोनो व्यक्ति नहि, 'ओ सभटा देवाल जे मनुक्ख मनुक्खक बीच ठाढ़ करैत आयल अछि।' रेशमाक चरित्र-रेखा विशेष समीक्ष्य: ओ प्रेमक आरम्भकर्त्री अछि (लोकगाथामे दुर्लभ), टोल-रक्षामे मध्यस्थ, आ पहरा-भेदनमे योजनाकार — निकोलायेवाक कसौटीपर सम्पूर्ण कर्तृत्व; आ तइयो अन्तमे गाथा ओकर नियति चुप्पीमे छोड़ैत अछि — लेखकक टिप्पणी ('ई चुप्पी कोनो वर्णनसँ बेसी करुण थिक') औचित्य-विचारक उत्कृष्ट प्रयोग थिक: जतऽ लोक-पाठ अनेक आ पीड़ादायक हो, ओतऽ बाल-संस्करणक मौन सम्मानो थिक आ संवरणो। रस-दृष्टिसँ शृंगार (सम्भोग नहि, विशुद्ध पूर्वराग) आ वीरक युग्मपर करुणक विजय अछि, मुदा अन्तिम अध्याय करुणकेँ शान्तमे बदलि दैत अछि — मन्दिर आ मेला: 'प्रेमी मरि जाइत अछि, प्रेम मेला बनि जाइत अछि।' ई मरणोत्तर सामुदायिक स्वीकृति दीना-भदरी (१६)क पूजा-वचनक लौकिक संस्करण थिक — ओतऽ देवता क्षमा माँगैत छथि, एतऽ समाज; दुनू ठाम स्मृति न्यायक अन्तिम अदालत थिक। मूँगा आ जालिम सिंह (१९)सँ एकर तुलना अनिवार्य अछि आ अगिला समीक्षामे विस्तारसँ हएत — एतबे संकेत जे ओतहु शोनितेक सिनूर अछि, मुदा अन्त सुखान्त; दुनू गाथा मिला कऽ लेखक अन्तर्जातीय प्रेमक दुनू सम्भव नियति — समाजक जीत आ प्रेमक जीत — बाल-पाठकक आगाँ बिनु कोनो झूठ आश्वासनक राखि दैत छथि। १९. मूँगा आ जालिम सिंह : वैह आगि, दोसर अन्त बेतिया राज। इनार लग राजपूत सरदार जालिम सिंह आ दूधबंसी कन्या मूँगाक पहिल भेँट; दरबारी मुँहलग्गू पृथ्वीपालक कान-भराइ, मलाह पट्टूक अकेले हमलावर-संहार आ अन्तमे स्वामीक नामपर बलिदान; गुरु मौनी बाबाक 'छोड़ि दे मूँगाक संग'क अनसुनल आदेश; बोनमे कनुआ — सवा मोन दूध आ खस्सीक खुराकबला, बाघ-शिकारी महींसक सवार — जकर खाँड़ा तर बान्हलि मूँगा; ठीक क्षणपर जालिमक आगमन, महींस-वध, कनुआ-वध, आ ओतहि बोनमे शोनितक सिनूर। फेर घरक भीतरक युद्ध: भाइ कुँअरक विद्रोह, माएक स्वीकृति, भाइक वार आ घाव, वैद्यक द्वारपर मूँगाक रतजग्गा — आ अन्तमे कनैत माए-भाइक पश्चाताप, 'प्रेमसँ घर लऽ' जाएब। ई गाथा चौहड़मल आ रेशमा (१८)क जोड़ी-पाठ थिक, आ दुनूकेँ आमने-सामने राखब एहि समीक्षा-पोथीक एकटा केन्द्रीय अभ्यास। समान तत्व गनू: अन्तर्जातीय प्रेम, जल-स्रोत लग पहिल भेँट (घाट/इनार), ईर्ष्यालु षड्यन्त्रकारी, स्वामिभक्त सहायकक बलिदान (ओतऽ टोल, एतऽ पट्टू), शोनितक सिनूर, आ अपनहि पक्षक हिंसा। मुदा परिणाम उनटा — आ कारणक विश्लेषणे दुनू गाथाक असल समीक्षा थिक। रेशमा-कथामे हिंसाक स्रोत हवेली अन्त धरि अटल रहैत अछि; मूँगा-कथामे हिंसाक स्रोत (भाइ) पश्चाताप धरि पहुँचैत अछि — अर्थात् लेखक-सम्पादित लोक-स्मृति एतऽ ई सम्भावना सुरक्षित रखने अछि जे जाति-दुर्ग भीतरसँ सेहो टूटि सकैत अछि, जखन माए सन कोनो कड़ी पहिने झुकए ('माएक स्वीकृति एहि नव गृहस्थीक पहिल आधार')। बाल-पाठक लेल ई जोड़ी आशा आ यथार्थक ओ सन्तुलित खुराक थिक जकर अनुशंसा बाल-साहित्य-चिन्तक बेर-बेर करैत छथि: एकसर सुखान्त झूठ बजितए, एकसर दुखान्त निराश करितए। एहि गाथाक अपन स्वतन्त्र वैशिष्ट्य सेहो लक्षित हो। पहिल, मौनी बाबाक प्रसंग — सिद्ध गुरुक आदेश आ नायकक मौन अवज्ञा — लोकगाथामे विरल साहसक क्षण थिक: कथा गुरु-वाक्यकेँ अन्तिम सत्य नहि मानैत ('नियति साधुक वाणीसँ सेहो पैघ'), आ प्रेमक पक्षमे शास्त्र-वाक्यक ई सविनय उल्लंघन भक्ति-काव्यक ओहि परम्परासँ जुड़ैत अछि जतऽ प्रेम स्वयं प्रमाण थिक। दोसर, कनुआक चित्र — अतिशय आहार, बाघ-शिकारी महींस — लोक-अतिशयोक्तिक ओ शैली थिक जे भयकेँ विराटतासँ नापैत अछि; बाल-कल्पना लेल ई 'लार्जर दैन लाइफ' प्रतिपक्षी रोमांचक व्याकरण थिक। तेसर, पट्टूक बलिदान: मलाह सहायकक ई मृत्यु गाथाक नैतिक मूल्य-सूची घोषित करैत अछि — निष्ठाक मोल गाथा कहियो नहि बिसरैत ('दोस्तीक ई मोल जालिम जिनगी भरि नहि बिसरलाह'), आ ई सूत्र संग्रहक मित्रता-कथा-शृंखला (लालमैन बाबा २९, ब्राह्मण-ठाकुर १२क पाथर-मित्र, दीना-भदरीक जीतन यादव १६)क अंग थिक। रस-यात्रा एतऽ शृंगार-वीर-करुण होइत शान्त धरि पूर्ण वृत्त बनबैत अछि — आ 'इनार लगक साधारण भेँटसँ... घरक आँगन धरि'क अन्तिम पाँती ओकर सूत्र-वाक्य। २०. महुआ घटवारिन : बिकाइत बेटी आ धारक स्वतन्त्रता परमान घाटक महुआ — 'गूथल आँटामे एक चुटकी केसर' सन सुन्दरि, सतवंती; गँजेरी बाप, नजरि-चोर सतमाए। साओन-भादवक रातिमे वणिककेँ तेल लगएबा लेल जबरन पठाओल जाएब, फूलमतीक ढाढ़स, मोरंगमे प्रतीक्षारत प्रेमीक स्मृति — आ फेर हरकाराक गुप्त सन्देश: सतमाए बेटीकेँ सौदागरक हाथ बेचि देलक। बीच धारमे पतवार छीनल गेल, 'सभटा पाइ चुका देल गेल अछि' — आ महुआ ओ केलनि जे एहि गाथाकेँ अमर केलक: बिनु चेतावनी धारमे छलाँग, उनटा धार मोरंग दिस; सौदागरक छोटका सिपाही — जे गुप्त प्रेम करऽ लागल छल — पाछाँ कूदल, आ दुनू डूमि गेल। अन्त: साओन-भादवक धारमे घटवारकेँ महुआक दर्शन, आ प्रत्येक दर्शनसँ खिस्साक पुनरारम्भ — 'एकटा छलीह महुआ घटवारिन...' ई गाथा संग्रहक करुणतम रचना थिक आ एकर समीक्षा साहसक माँग करैत अछि, कारण एकर विषय बाल-साहित्यक 'सुरक्षित' सूचीसँ बाहरक थिक — कन्या-विक्रय। लेखकक औचित्य-कौशल एतऽ चरमपर अछि: विक्रयक वाणिज्यिक ब्योरा नहि, ओकर अनुभूति-पक्ष कथाक केन्द्रमे अछि — 'ओ खाली एकटा व्यापारक वस्तु बना देल गेल छलि, बिनु अपन इच्छाक'; आ महुआक प्रश्न ('नोन चटा केँ किए नहि मारलँह, पोसलँह एहि दिन खातिर?') बाल-पाठकक करेजमे सोझे उतरैत अछि, कारण ओ अर्थशास्त्र नहि, विश्वासघातक भाषा बजैत अछि। पाश्चात्य दृष्टिसँ महुआक छलाँग आत्मघात नहि, 'एजेंसी'क अन्तिम अभिव्यक्ति थिक — कथाक अपन शब्द: 'ई आत्मसमर्पण नहि, आत्मरक्षाक अन्तिम योजना छल'; ओ मृत्यु नहि, मोरंग — प्रेम आ स्वतन्त्रता — दिस कूदल छलि, आ धार हारि गेलि। ई भेद बाल-मध्यस्थ (शिक्षक-अभिभावक) लेल रेखांकित करब आवश्यक: गाथा पलायन नहि, प्रतिरोध सिखबैत अछि — 'हम बिकाएब नहि' एकर मूल-मंत्र थिक। सतमाए-आकृति विश्व-लोककथाक सर्वाधिक व्याप्त आकृति थिक (सिन्ड्रेलासँ हैन्सेल-ग्रेटेल धरि), आ बेटेलहाइम एकरा बालकक द्विधा-भावक (माए भली/माए कठोर) विभाजित प्रक्षेपण मानैत छथि; मुदा एतऽ ओ मनोवैज्ञानिक रूपक सामाजिक यथार्थसँ भारी भऽ गेल अछि — लोकगाथा जनैत अछि जे मिथिलाक घाट-कातमे बेटीक सौदा कल्पना नहि रहल अछि। छोटका सिपाहीक छलाँग गाथाक सभसँ सूक्ष्म स्पर्श थिक: दमन-यन्त्रक भीतरसँ एक हृदयक विद्रोह — खरीदल गेल पहरेदार अपन मनुष्यता घुरा लैत अछि, भलहिं मूल्य प्राण हो; ई ब्योरा कथाकेँ सरल खल-चित्रणसँ बचबैत अछि। आ अन्तक चक्रीय संरचना — दर्शनसँ कथारम्भ — मौखिक परम्पराक आत्म-चित्र थिक: महुआ अमर अछि कारण ओ कहल जाइत रहैत अछि; कथा अपन जीवन-रहस्य अपने घोषित करैत अछि। अन्तर्पाठीयता: मोतीसाएरि (२६)मे बेटी सन्दूकमे बहाओल जाएत, एतऽ धारमे बेचल गेलि — दुनू 'बहाओल बेटी'क गाथा थिक, आ दुनूक अन्तमे बेटी लोक-स्मृतिक जल-देवी सन उपस्थिति पबैत अछि; संगहि साओन-भादवक धारक ई भयाकुल सौन्दर्य जट-जटिन (३६)क वर्षा-अनुष्ठानक ऋतु-चक्रसँ जुड़ैत अछि — एक्कहि भादवक धारमे लोक कतऽ नाच रचैत अछि, कतऽ महुआ हेराइत अछि। २१. नैका बनिजारा : अनुपस्थित पतिक गवाही — अँठीक अभिज्ञान वणिकपुत्र शोभनायकक बियाह भेल आ गृहस्थ-सुखसँ पहिनहि मोरंग-प्रवास। बाटमे गाछ तर डकहर-दम्पतिक गप कानमे पड़ल — 'ई राति बड़ शुभ, एहि राति पत्नीक संग जे रहत तकरा प्रतिभावान पुत्र' — आ शोभनायक गुप्त रूपेँ घर घुरि, लोकोपवादक भयेँ अभिज्ञान-स्वरूप अँठी दऽ, फेर मोरंग। बारह बरखक व्यापार, आ एम्हर गर्भवती बारीपर सासु-ससुरक सन्देह, निर्वासन, देवर चतुरगनक आश्रय, आ लोकगीतक कानब — 'तब बारी रे कानय जार बेजारो कानै रे ना।' तेरहम बरख शोभनायक घुरलाह, अँठी देखा सत्य प्रमाणित, परिवार पुनः एक। ई गाथा संग्रहक 'अभिज्ञान-कथा'क प्रतिनिधि थिक — ओ प्राचीन कथा-प्ररूप जाहिमे बिछुड़ल दम्पतिक सत्य कोनो चिन्ह-वस्तुपर टँगल रहैत अछि; संस्कृत परम्पराक अभिज्ञानशाकुन्तलक अँगूठी सहजहि मोन पड़त, आ ई स्मरण अनुचित नहि — दुनू ठाम स्त्रीक चरित्रपर समाजक सन्देह आ वस्तु-प्रमाणसँ ओकर निवारण; भेद ई जे शकुन्तलाक अँगूठी हेरा जाइत अछि आ नाटक विस्मरणक त्रासदी रचैत अछि, एतऽ अँठी सुरक्षित रहैत अछि आ त्रासदी विस्मरणक नहि, अनुपस्थितिक थिक। समीक्षाक असल प्रश्न एतऽ नैतिक अछि, आ ईमानदार समीक्षा ओकरा उठाओत: शोभनायक अँठी बारीकेँ देलनि, मुदा सत्य सासु-ससुरकेँ नहि कहलनि — 'लोकोपवाद'सँ बचबाक जे युक्ति छल, वैह बारीक बारह बरखक कलंक-भोगक कारण बनल। गाथा एकरा सोझे अभियोग नहि बनबैत, मुदा बारीक गीतक करुणा ओकर मौन अभियोग-पत्र थिक — आ राजा ढोलन (१५)क समीक्षामे जे स्थापना भेल छल (परिवारक दुख षड्यन्त्रसँ बेसी गोपनसँ), से एतऽ दोसर प्रमाण पबैत अछि। बाल-पाठक लेल ई जोड़ी-पाठ मूल्यवान: दुनू गाथामे पुरुषक 'रक्षात्मक' चुप्पी स्त्रीक दीर्घ पीड़ा बनैत अछि। चतुरगनक चरित्र — जे सत्य जनैत अछि आ निर्वासिताकेँ आश्रय दैत अछि — लोकगाथाक ओ विवेक-स्वर थिक जे देखबैत अछि जे परिवारक भीतरो सत्यक पक्षधर बचल रहैत अछि; ई कुँअर (१९)क प्रति-चित्र थिक — ओतऽ देवर-भाइ हिंसक, एतऽ रक्षक। डकहर-संवादक श्रवण-प्रसंग लोककथाक ओहि विश्व-व्यापी युक्तिक अंग थिक जाहिमे पशु-पक्षीक गप मनुष्यक नियति खोलैत अछि (मिलाउ: भाट-भाटिनक दीप-संवाद १०, बिहुलाक धोबिन-प्रसंग ३३) — ज्ञानक ई आकस्मिक, अ-स्वामित्व स्रोत लोक-ज्ञानमीमांसाक विशेषता थिक: सत्य सुनबा जोग कान चाही, हुनर नहि। रस-दृष्टिसँ करुण-प्रधान ई गाथा अन्तमे शान्त-सुखान्त अछि, आ एकर स्थायी उपलब्धि बारीक गीत-पाँती थिक — लोकगीतक ई प्रत्यक्ष उद्धरण संग्रहमे विरल अछि आ गाथा-गायन-परम्पराक स्वाद बाल-पाठ धरि अनैत अछि; संगीत-तत्वक एहि उपस्थितिक पूर्ण विकास माधव सिंह आ अमता गाम (३७)मे भेटत। २२. छेछन : डंका, दंगल आ डोम-वीरताक अखराहा सहिदापुरक डोम सरदार मानिकचन्दक अखराहामे टँगल डंका — जे बजाओत, से पहिने पोसुआ सुग्गर चटियासँ लड़त; चटियाकेँ जीतत से मानिकचन्दसँ, आ मानिकचन्दकेँ हराओत से बहिन पनमाक वर। छेछन महराज पाँच पसेरीक कत्ता नेने अबैत छथि, चिलममे मेदनीफूल भरि पीबि डंकापर चोट करैत छथि; चटिया पहिने पड़ाइत अछि, फेर झपटला पर छेछन ओकर दुनू पएर पकड़ि चीरि दैत छथि; मानिकचन्दसँ दंगल, विजय, आ प्रसन्न मानिकचन्द द्वारा पनमाक बियाह। उत्तरार्धमे यादव लोकदेवता कृष्णारामक बसबिट्टीसँ बाँस काटब, सुबरन हाथीक आगमन, आ कत्तापर हाथीक पएर — गाथा एहि नव द्वन्द्वक घोषणापर, छेछनक 'अन्ततः विजयी संघर्ष'क लोक-स्मृति-सूचना संग, विश्राम लैत अछि। ई गाथा संग्रहक वीर-रसक सभसँ निर्मिश्र रचना थिक — ने प्रेम-कथा, ने भक्ति-चमत्कार; विशुद्ध शक्ति-परीक्षा, आ ओकर रंगमंच अखराहा। पाश्चात्य दृष्टिसँ ई 'चैलेन्ज नैरेटिव'क विशुद्ध रूप थिक — सार्वजनिक चुनौती (डंका), श्रेणीबद्ध परीक्षा (पशु, फेर मनुष्य), आ घोषित पुरस्कार; मध्यकालीन यूरोपक 'टूर्नामेन्ट रोमान्स'सँ एकर संरचना-सादृश्य लक्षणीय अछि, मुदा सामाजिक अर्थ ठीक उनटा: ओतऽ अखराहा अभिजातक रंगभूमि, एतऽ ओ समाजक ओहि तलक गौरव-मंच थिक जकरा वर्ण-व्यवस्था अस्पृश्य कहने छल। दंगल-विजयक बाद मानिकचन्दक प्रसन्नता ('दुखी नहि भेला — अपितु प्रसन्न भेला') एहि गाथाक नैतिक रत्न थिक: प्रतियोगिता एतऽ शत्रुता नहि, सम्बन्ध-निर्माणक विधि थिक — 'ई प्रतियोगिता शत्रुतामे नहि बदलल, अपितु सम्मान आ पारिवारिक बन्धनमे परिणत भेल।' बाल-पाठक लेल खेल-भावना (स्पोर्ट्समैनशिप)क एहिसँ जीवन्त पाठ दुर्लभ — हारल पक्ष अपमानित नहि, जोड़ल जाइत अछि। रस-दृष्टिसँ चटिया-द्वन्द्वमे वीरक संग अद्भुतक स्पर्श अछि (सुग्गरक भागब — वीरक तेजक अलौकिक स्वीकृति), आ चिलम-मेदनीफूलक तैयारी लोक-वीरताक ओहि देशज मुद्राक अंग थिक जे नायककेँ शास्त्रीय आदर्शसँ नहि, अपन समुदायक जीवन-शैलीसँ गढ़ैत अछि — लेखक एकरा ने महिमामण्डित करैत छथि ने सेन्सर; लोक-पाठक प्रामाणिकता बाल-पाठ धरि सुरक्षित अछि। उत्तरार्धक अपूर्ण द्वन्द्व (कृष्णाराम-सुबरन प्रसंग) समीक्षा-दृष्टिसँ रोचक निर्णय थिक: गाथा चरम-बिन्दुपर रुकि 'आगाँक विकास लोक-स्मृतिमे सुरक्षित' कहि दैत अछि — ई मौखिक परम्पराक ओहि यथार्थक ईमानदार स्वीकृति थिक जे लोकगाथाक कोनो 'अन्तिम संस्करण' नहि होइत; बाल-पाठक लेल ई खुजल अन्त कल्पना-अभ्यासक निमन्त्रण थिक। अन्तर्पाठीयता: कृष्णाराम एतऽ हाथी-आरूढ़ लोकदेवता छथि आ मोतीसाएरि (२६)मे भाड़ापर कन्या छीननिहार यादव सरदार — एक्कहि नामक ई द्वि-रूपता (मिलाउ: चूहड़मल, समीक्षा १७-१८) लोक-परम्पराक बहुकण्ठताक दोसर प्रमाण थिक; आ डंका-चुनौतीक सार्वजनिकता अमर बाबा (२४)क बैदला-अखराहासँ सोझ जुड़ैत अछि — दुनू ठाम घाट-अखराहा न्यायक लोक-मंच थिक, भेद ई जे ओतऽ अखराहा अत्याचारीक अड्डा छल आ एतऽ सम्मानक तराजू। २३. मीरांसाहेब : जन्मसँ पहिने अनाथ — बदला, मर्यादा आ मरणोत्तर पहरा डिलरीनगरक सैयद-घरेन — पिता आ सभ बेटा — नूनजागढ़क एक्कहि युद्धमे समाप्त; हवेलीमे बचलि गर्भवती विधवा, आ शोकक बीच जनमल मीरां। माए हुनका युद्धसँ दूर रखबाक प्रण करैत छथि, कम बयसमे बियाह करा गृहस्थीक डोरि बन्हैत छथि — मुदा 'जे मोन भीतरसँ निर्णय कऽ चुकल हो, ओकर चुप्पी सहमति नहि, तैयारी होइत अछि।' एक भोर कोठली खाली; मीरां असगरे नूनजागढ़, माटि माथसँ लगा — 'अब्बा, भाइजान — मीरां आबि गेल' — बदला पूर्ण, आ ओतहि रुकि: ने राज्य, ने लूट; 'बदला हुनका लेल आगि नहि छल जे पसरैत जाए; ओ कर्ज छल, जे चुकता भेल आ बही बन्द।' घुरती, 'मीरांसाहेब' उपाधिक स्वतःस्फूर्त जन्म, आ देहान्तक बादो नगरमे शान्ति — 'मीरांसाहेब गेल नहि छथि, पहरापर छथि।' ई गाथा संग्रहक वीर-खण्डमे एकटा विशिष्ट स्वर अनैत अछि — मुस्लिम लोक-वीरक गाथा, आ तकर संग ई प्रमाण जे मिथिलाक लोक-देवायतन मजहबी सीमासँ चाकर अछि: जेना दीना-भदरी, सलहेस, छेछन थान पओलनि, तहिना मीरांसाहेब हवामे 'शान्ति बनि' रहि गेलाह। समीक्षाक केन्द्रीय प्रश्न एतऽ बदलाक नैतिकता थिक, आ लेखकक उपचार असाधारण सूक्ष्म अछि। एक दिस गाथा बदलाकेँ रोकबाक दुनू स्वर — माए ('बदलासँ मुइल लोक नहि जीबैत') आ पत्नी ('अहाँक जिनगीपर आब हमरो अधिकार') — पूरा गरिमासँ रखैत अछि; दोसर दिस मीरांक प्रस्थानकेँ रोमांचित नहि, अनिवार्य-सन प्रस्तुत करैत अछि; आ तेसर — निर्णायक — स्पर्श ई जे वीरताक असल परीक्षा युद्धमे नहि, युद्धक बाद अछि: रुकि जाएब। 'हिसाब बन्द केलनि आ घोड़ा घुमा लेलनि' — प्रतिशोध-कथाक विश्व-भण्डारमे ई आत्म-सीमित बदला विरल अछि, आ बाल-पाठक लेल यएह एकर औचित्य-कवच थिक: कथा हिंसाकेँ अन्तहीन चक्र नहि, बन्द बही देखबैत अछि। तुलना करू बाल गुरु (२)सँ — ओतऽ अपमानक उत्तर चीन्हब छल, एतऽ रक्तक उत्तर रक्त; संग्रह दुनू नीतिकेँ अपन-अपन लोकमे सत्य रहऽ दैत अछि, आ पाठकक विवेक दुनूक बीच अपन बाट ताकत — ई अ-निर्णय लेखकीय दुर्बलता नहि, द्वन्द्वात्मक शिक्षण थिक। मनोविश्लेषणात्मक स्तरपर 'जन्मसँ पहिने अनाथ'क स्थिति गाथाकेँ शोक-साहित्य (ग्रीफ लिटरेचर)क कोटिमे सेहो रखैत अछि: मीरांक पूरा बाल्यकाल एकटा अनुपस्थित पिताक छायामे बीतल — 'रक्त अपन भाषा अपने बजैत अछि' — आ हुनक यात्रा मनोवैज्ञानिक भाषामे शोकक समापन-कर्म (क्लोज़र) थिक; माटि माथसँ लगएबाक मुद्रा श्राद्ध-मुद्रा थिक, युद्ध-मुद्रा नहि। रस-दृष्टिसँ वीरक भीतर करुणक ई अन्तर्धारा (विधवाक देहरि, खाली खुट्टी, बिनु हल्लाक प्रस्थान) गाथाकेँ ओहि उपशीर्षक-वाक्य धरि पहुँचबैत अछि जे संग्रहक वीर-दर्शनक सूत्र बनबा जोग अछि: 'वीरता एतय गरजैत नहि अछि — चुपचाप अपन कर्तव्य पूरा करैत अछि, आ चलि जाइत अछि।' मरणोत्तर पहरा-विश्वासक समाजशास्त्र गरीबन बाबा (२८) आ लालमैन बाबा (२९)क भगता-परम्परासँ मिलत; भेद ई जे ओतऽ लोकदेवत्व अनुष्ठान-बद्ध अछि, एतऽ ओ विशुद्ध स्मृति-नीति थिक — 'दुष्ट लोक हुनक नामसँ डराइत छल, आ दुखी लोक हुनक नामसँ बल पबैत छल।' २४. अमर बाबा : रक्षाक मूल्य — वीरगाथाक आत्म-परीक्षा कमला धारक जन्म, किसान-मलाहक जीवन-धुरी, आ जुआन धारक यशपर बैदला सरदारक खोट — 'कमलासँ बियाह करब, बलजोड़ी!' मलाहक तपसँ भोला बाबाक उपाय: शिवरा गाममे अमरसिंहक जन्म, अखराहामे गढ़ल देह, बैदलाकेँ माटि, आ अन्तिम पटकनीमे बैदलाक अन्त। मुदा गाथा एतऽ नहि रुकैत — भीड़क भयसँ 'खानदाने नष्ट हो'क माँग, आ अमरसिंह बैदलाक गर्भवती कनियाँकेँ मारि दैत छथि; 'गाथा एहि ठाम आँखि नीचाँ कऽ लैत अछि; हम सेहो करी।' मुइलि माएक कोखिसँ जनमल बालक दूना बलगर भेल; कमला अपने ओकर प्राण-भेद बतओलनि, अमरसिंह ओकरा मारलनि — 'ओ बाट ओ ककरो नहि बतौलनि।' साँझमे विजयी, मुदा भारी, अमरसिंह धारक कात असगरे बैसल छथि; मरणोपरान्त गहमर, आ बूढ़ मलाहक दू प्रार्थना — 'एक रक्षाक लेल, आ एक क्षमाक लेल।' ई संग्रहक सभसँ साहसिक पोथी थिक, कारण ई वीरगाथाक भीतरसँ वीरगाथाक आलोचना करैत अछि। लोक-वीर-कथाक सामान्य व्याकरणमे नायकक प्रत्येक वध न्याय्य होइत अछि; एतऽ लेखक ओहि व्याकरणकेँ तोड़ि कऽ लिखैत छथि — 'जे भेल, से गाथाक सभसँ अन्हार पन्ना थिक... वीरताक तरुआरि जखन डरक हाथमे चलि जाइत अछि, तखन ओ जे काटैत अछि, से घा' बनि कऽ काटनिहारेक करेजमे रहि जाइत अछि।' गर्भवतीक वधकेँ गाथा ने उचित ठहरबैत अछि ने नायकपर थोपल कलंक बना मेटबैत अछि — ओ ओकरा भीड़-भय ('भयक अपन तर्क होइत छै, आ भीड़क अपन वेग')क परिणाम रूपेँ दर्ज करैत अछि आ ओकर नैतिक भार नायकक करेजपर सदा लेल छोड़ि दैत अछि। पाश्चात्य समीक्षा-भाषामे ई 'मोरल इन्जरी'क कथा थिक — योद्धाक ओ घाव जे देहपर नहि, अन्तःकरणपर लगैत अछि; बाल-साहित्यमे एकर उपस्थिति क्रान्तिकारी अछि, कारण ई बालककेँ वीरताक विज्ञापन नहि, वीरताक बही-खाता देखबैत अछि। आ नियतिक प्रत्युत्तर — मुइलि माएक कोखिसँ दूना बलगर बेटा — प्रतिहिंसा-चक्रक ओ बीज-गणित थिक जकरा गाथा एक्कहि वाक्यमे कहि दैत अछि: 'हिसाब एतेक आसान नहि, अमरसिंह।' औचित्य-दृष्टिसँ 'गाथा आँखि नीचाँ कऽ लैत अछि' वाला वाक्य संग्रहक कथा-संवरण-तकनीकक (मिलाउ: बगियाक गाछ ५) आत्म-सचेत घोषणा थिक — लेखक बाल-पाठककेँ दृश्य नहि दैत छथि, मुदा दृश्यक नैतिक ओजन पूरा-पूरी दैत छथि; ई 'बाल-संस्करण'क ओ आदर्श थिक जतऽ सरलीकरण सत्य-लोप नहि बनैत। कमलाक भेद-कथन-प्रसंगक गोपन ('ओ बाट ककरो नहि बतौलनि') मौखिक परम्पराक रहस्य-रक्षाक सुन्दर अनुकरण थिक — किछु ज्ञान गाथो नहि बाँटैत। रस-यात्रा वीरसँ करुण होइत शान्तमे — मुदा ई शान्त विजयक नहि, आत्म-परीक्षाक शान्त थिक; दू प्रार्थनाबला अन्तिम बिम्ब भारतीय परम्पराक प्रायश्चित्त-विधानक लोक-रूप थिक। अन्तर्पाठीयता: बैदलाक बलजोड़ी-घोषणा मनसा (३३)क 'हमर पूजा कर'क लौकिक प्रतिध्वनि थिक — दुनू ठाम बलसँ माँगल सम्बन्ध/श्रद्धा अस्वीकृत होइत अछि; आ धार-देवीक रक्षा-भार मलाह-पुत्रपर पड़ब गांगोदेवीक भगता (३०) आ बड़ सुख सार (३४)क जल-भक्तिसँ मिला कऽ संग्रहक 'जल-वाङ्मय'क अंग बनैत अछि, जकर समग्र चर्च उपसंहारमे हएत। २५. बहुरा गोढ़िन नटुआदयाल : तंत्र, नृत्य आ जटिलताक सौन्दर्य कमला-बलानक संगमपर केवटीक बेटी बहुरा गोढ़िन — हक्कलि, कमरू-सिद्ध, गाछ हँकनिहारि, क्रोधमे बरियातीकेँ बत्तु बना देनिहारि; आ भरौड़क राजकुमार दुलरा दयाल, जे नृत्य सीखि 'नटुआ' भेलाह आ बहुराक पुत्रीसँ प्रेम केलनि। व्यापारी जयसिंहक कुचक्र, मंत्री मल्लक आँखिक ज्योति-हरण, गुरु मंगलक आदेशपर कामाख्या-यात्रा — चण्डिका-मन्दिरक योगिनीसँ षट्नृत्य, सर्रैयाक भुवनमोहिनीसँ ओकर अंग, वागेश्वरीक भयावह थानपर 'अनहद' आ 'आज्ञाचक्र'क सिद्धि, कानमे करिया-जादू-काटक मंत्र। घुरला पर बहुराक सुखाओल कमला, आरोप-प्रत्यारोप, नटुआक नृत्यसँ धार 'जलाजल', आ विनम्र क्षमा-याचनासँ बहुराक हृदय-परिवर्तन — 'आब तोँ भेलह हमर बेटीक योग्य।' बरियाती, तीन पान, इनार-डोरीक रहस्य, मल्लक आँखिक वापसी — आ बियाहक घाटेपर अपने शिष्यक चक्कू; मरणासन्न नटुआ पटोर कमला मैयाकेँ चढ़बैत छथि, धार खूने-खूनाम; कामाख्याक जादूगरनी हुनका जिया कऽ विश्वासघातीक बलि कमलाकेँ चढ़बैत छथि। लेखक अपनहि उपक्रममे स्वीकारैत छथि — 'ई गाथा जटिल अछि, जेना कमला-बलानक धार स्वयं' — आ समीक्षाक पहिल काज एहि जटिलताक बचाव थिक। बाल-साहित्य-चिन्तनमे एकटा प्रचलित पूर्वाग्रह अछि जे बालक लेल कथा सरल-रेखीय हो; एकर विरुद्ध पीटर हंट सन आलोचक बेर-बेर स्मरण करबैत छथि जे बालक जटिल संगीत, जटिल खेल, जटिल सम्बन्ध सम्हारैत अछि — शर्त एतबे जे प्रत्येक मोड़ भाव-सत्यपर टिकल हो। बहुरा-गाथाक मोड़ सभ ओही कसौटीपर खरा अछि: क्रोध, साधना, क्षमा, विश्वासघात, बलिदान, पुनर्जीवन — प्रत्येक संक्रमणक भावनात्मक तर्क स्पष्ट अछि, भलहिं घटना-तर्क स्वप्नवत्। बहुराक चरित्र संग्रहक सभसँ जटिल स्त्री-चित्र थिक — 'ओ प्रेममयी सेहो छलि, आ भयंकरो': अपन वरकेँ मारि जादू सिखनिहारि, आ मल्लक आँखि घुरओनिहारि; लेखकक टिप्पणी ('बहुरा हृदयसँ दयालु छलि, खाली क्रोधमे भयंकर') बाल-पाठककेँ खल/साधुक द्वि-खण्डीय ढाँचासँ बाहर पात्र पढ़ब सिखबैत अछि — नैतिक जटिलता-बोधक ई दीक्षा निकोलायेवा-वर्णित परिपक्व पाठकत्वक दिशामे पहिल डेग थिक। दोसर समीक्ष्य आयाम नृत्य-तंत्रक युग्म थिक। नटुआक साधना-क्रम (षट्नृत्य, अनहद, आज्ञाचक्र) कला आ योगकेँ एक्कहि सीढ़ीक डेग बनबैत अछि — भारतीय सौन्दर्य-दर्शनक ओ स्थापना जे नृत्य देह-विद्या नहि, चेतना-विद्या थिक; आ 'नृत्यसँ धारकेँ जलाजल करब' ओकर कथा-रूप प्रमाण। ई माधव सिंह (३७)क राग-वर्षा-प्रसंगक तांत्रिक जोड़ा थिक — ओतऽ स्वर आकाश झुकबैत अछि, एतऽ नृत्य पाताल खोलैत अछि; दुनू मिला कऽ संग्रहक कला-मीमांसा पूर्ण होइत अछि: सिद्ध कला प्रकृतिक सहभागिनी थिक। 'आहि रे बा'क आवर्ती पुकार मौखिक गायन-परम्पराक टेक (रिफ्रेन) थिक जे लिखित पाठमे सुरक्षित रहि गाथाक गेयता स्मरण करबैत अछि। औचित्य-प्रश्न अन्तिम बलि-प्रसंगपर उठत — प्रतिशोधक ई चक्र बाल-पाठ लेल कठोर अछि; लेखकक सन्तुलन ई जे बलि 'न्यायक एकटा जटिल रूप' कहल गेल अछि, अनुमोदित आदर्श नहि, आ गाथाक अन्तिम स्वर मिलन-उत्सव नहि, चिन्तन-भार थिक — 'कोनो सरल सुखान्त नहि।' कामाख्या-सूत्र एहि गाथाकेँ सलहेस (१७)क दबना आ रघुनी मरर (३२)क कामाख्या-कृपासँ जोड़ैत अछि — संग्रहमे कामरूप-कामाख्या लोक-तंत्रक ओ विद्यापीठ थिक जतऽसँ शक्ति अबैत अछि, आ शक्तिक नैतिक दिशा पात्रक नीयत तय करैत अछि। २६. मोतीसाएरि : कुण्डली, लोभ आ सन्दूकमे बन्द बेटी मोरंगक निःसन्तान राजा भीमसेनक यज्ञसँ जनमलि मोतीसाएरि; राज-पंडित कुण्डलीमे पढ़ैत अछि — 'एहि कन्यासँ जे बियाह करत, से प्रपंचक सभटा सुखक अधिकारी' — आ लोभमे झूठ भविष्यवाणी रचैत अछि: 'ई रहतीह त' राज्यक समापन।' सन्दूकमे बन्द बेटी धारमे; घाटपर प्रतीक्षारत पंडितक हाथ धार चूकबि दैत अछि; बोनक सरदार गवल सन्दूक पाबि — 'आइसँ तों हमर बेटी छेँ' — बिनु जाति-कुल पुछने पालैत अछि। पंडितक दोसर चालि: पुत्र-लिलसामे राजाकेँ 'गवली सरदारक पुत्री'सँ बियाहक सलाह; गवलक अस्वीकार, राजसेनाक हारि, कृष्णारामकेँ अदहा राज्यक सौदा, मरछौरक धूर्त-धूरिमे छीनल गेलि मोतीसाएरि — आ राजभवनमे अनजान पिताक बियाह-प्रस्ताव। दिव्य दृष्टिसँ सभ भेद देखि मोतीसाएरि शाप दैत छथि — 'जे राज्य अपन बेटीक ई गति करैत अछि, से राज्य नहि रहत' — आ अन्तर्धान: मोक्ष। राज्य समाप्त, पंडित बिनु नामक विलीन, आ बोनक धारमे भोरका उज्जर आकृति। ई गाथा संग्रहक सभसँ तीव्र सामाजिक अभियोग-पत्र थिक, आ एकर अभियुक्त तीन लोभ छथि जकरा उपक्रम अपने गनबैत अछि — पंडितक, राजाक, सत्ताक। समीक्षाक पहिल टिप्पणी ज्ञान-सत्ताक दुरुपयोगपर: पंडित एतऽ ओ आकृति थिक जकर हाथमे व्याख्याक एकाधिकार अछि ('ज्योतिष हुनके हाथ, शास्त्र हुनके जीह') — आ कथा देखबैत अछि जे अ-जाँचल विशेषज्ञता राजसत्तासँ बेसी घातक भऽ सकैत अछि; गोनू झा (११)क ढोंगी-भेदन-पाठक ई गम्भीर, राजनीतिक संस्करण थिक — ओतऽ ढोंग हास्यमे नोचाएल, एतऽ ओ एकटा बेटीक जिनगी आ एकटा राज्यक अस्तित्व निगलि गेल। दोसर टिप्पणी गवलपर — 'जे धार दऽ जाए, से धरोहरि': बोनक ई दत्तक-नीति रक्त-शुद्धताक पूरा शास्त्रपर लोक-विवेकक फैसला थिक; कथाक एकमात्र सुख-अध्याय ओतहि अछि जतऽ जाति-कुल नहि पुछल गेल — विदेह समानान्तर प्रतिमानक दृष्टिसँ ई गाथाक हृदय-स्थल थिक। अन्तिम प्रस्ताव-प्रसंग — अनजान पिताक अपन बेटीक आगाँ बियाहक प्रस्ताव — लोककथाक ओहि प्राचीन, विश्वव्यापी वर्जना-प्रसंग-वर्गक अछि जकरा कथा-प्ररूप-सूची 'अस्वाभाविक विवाह-प्रस्ताव'क कोटिमे राखैत अछि; लेखकक औचित्य-प्रबन्धन एतऽ चरम-सतर्क अछि: प्रसंग एक्कहि क्षणमे — 'क्षण भरि लेल समय ठाढ़ भऽ गेल' — रुकि जाइत अछि, ब्योरा शून्य, आ तुरत कथा ओकरा पंडितक 'रचल जाल'क रूपमे पुनर्व्याख्यायित कऽ नैतिक भार षड्यन्त्रकारीपर घुमा दैत अछि। मोतीसाएरिक प्रतिक्रिया — नोर नहि, अग्नि; पलायन नहि, शाप; आ शापक बाद मोक्ष — बाल-पाठक लेल पीड़िताक ओ चित्र थिक जे पीड़ामे परिभाषित नहि होइत: 'ओ एहि पूरा खिस्सामे एक्को बेर नहि हारलि।' महुआ (२०)सँ जोड़ी-पाठ अनिवार्य: दुनू 'बहाओल/बेचल बेटी'क गाथा, दुनूमे जल अन्तिम शरण, आ दुनूक अन्तमे लोक-स्मृति बेटीकेँ धारक अधिष्ठात्री बना लैत अछि — भेद ई जे महुआ प्रेम दिस कूदल छलि आ मोतीसाएरि प्रपंचसँ ऊपर उठि गेलि; करुण आ शान्तक ई दू भिन्न निकास संग्रहक स्त्री-दुख-मीमांसाक दू धुरी थिक। आ अन्तिम पाँती — 'बेटीकेँ धारमे बहओनिहार राज्य अपने बहि जाइत अछि' — बाल-कथाक भेषमे राज्य-नीतिक सूक्ति थिक; ध्वनि-सिद्धान्तक भाषामे वाच्य कथा-निष्कर्ष, व्यंग्य समकालीन चेतौनी। खण्ड चारि : भक्ति, लोकदेवता, अनुष्ठान आ कला-गाथा २७. मोतीदाइ : छह दिनक मातृत्व — भक्तिक हिसाब आ करुणाक सिलेट उजैनीक रजक भगतिन मोतीदाइ — गहिल माताक पीड़ीक नित्य-सेविका, आ अपन घरमे खाली कोरा। गोबर पाथैत साँझ गुअरटोलीक जनानीक ओल सन बोल — 'बाँझ... जकरा देखने माल-जाल बिसखि जाएत' — आ आहत भगतिनक विद्रोह-भक्ति: अपने हाथे पीड़ी खोदब, 'प्रकट होउ माता!' गहिल माता प्रकट होइत छथि, इन्द्रक दरबार जा कऽ बही देखबैत छथि — 'पूर्व जन्मक फल, बच्चा नहि लिखल' — मोतीदाइ मरबाक सूरसार करैत छथि, माता दोसर बेर हठ लऽ जाइत छथि, आ करुणा विधानमे एक पाँती जोड़ैत अछि: बच्चा हएत, मुदा छठिहारी दिन मरि जाएत। मोतीदाइक उत्तर — 'जे कोरा जिनगी भरि खाली रहल, तकरा लेल छहो दिन छह जुग' — छह दिनक सम्पूर्ण मातृत्व, छठिहारीक दीप तर बालकक अन्त, आ फेर भगता-रूपमे मोतीदाइक नव जीवन: दोसराक खाली कोराक उत्तर बननिहारि। ई गाथा संग्रहक करुण रसक सभसँ परिष्कृत रचना थिक, कारण एकर करुणा घटनासँ नहि, चयनसँ जनमैत अछि — मोतीदाइ जानि-बुझि छह दिनक सुख आ सातम दिनक शोक स्वीकारैत छथि, आ ई सूचित-सहमति (इन्फॉर्म्ड कन्सेन्ट) त्रासदीकेँ गरिमा दैत अछि। पाश्चात्य समीक्षा एतऽ 'थियोडिसी'क — दुखक दैवी न्याय्यताक — लोक-विमर्श देखत: कथा तीन स्तरक उत्तर रचैत अछि — विधान (बही), करुणा (देवीक हठ), आ अर्थ-रूपान्तरण (कलंक-मोचन)। अन्तिम स्तर सभसँ सूक्ष्म: 'बाँझ होएबाक दुख मुदा खतम भेलन्हि' — बच्चा नहि रहल, मुदा 'बाँझ'क लांछन सदा लेल धोआ गेल; गाथा दुख आ अपमानक भेद करैत अछि, आ देखबैत अछि जे समाज-प्रदत्त अपमान प्रायः नियति-प्रदत्त दुखसँ भारी होइत अछि। बाल-पाठक एहि भेदकेँ सिद्धान्त रूपेँ नहि, कथा-रूपेँ आत्मसात् करैत अछि — आ संगहि गुअरटोलीक जनानी-टोली मार्फत शब्द-हिंसाक पाठ: 'एक बात अछि भीतरे-भीतर कानब, आ दोसर बात अछि गामक बाटपर अशुभ कहाएब।' भारतीय दृष्टिसँ पीड़ी-खोदब-प्रसंग भक्ति-मीमांसाक रत्न थिक — 'ई विद्रोह नहि छल, ई भक्तिक अन्तिम भाषा छल: जेना बच्चा माएक आँचर घीचैत अछि।' भक्तकेँ देवतासँ झगड़बाक अधिकार — सूर-मीराँसँ लऽ कऽ लोक-भगतिन धरि — भारतीय भक्तिक ओ लोकतान्त्रिक मुद्रा थिक जे प्रार्थनाकेँ याचनासँ ऊपर सम्बन्ध बनबैत अछि; आ देवीक द्वि-यात्रा (देवी स्वयं याचिका!) ओहि सम्बन्धक पराकाष्ठा। इन्द्रक बही-प्रसंग कर्म-सिद्धान्तक बाल-सुलभ मूर्तन थिक, मुदा कथाक जोर विधानपर नहि, विधानक भीतरक 'सिलेट'पर अछि — 'जतय करुणा किछु पाँति जोड़ि सकैत अछि': नियतिवाद आ करुणावादक ई सन्धि-रेखा गाथाक दार्शनिक उपलब्धि थिक। अन्तर्पाठीयता: बुधनी (१६)क तप आ मोतीदाइक तप — विधि एक, ध्रुव उनटा — संग्रहक तप-मीमांसाक दू छोर थिक: तप शक्ति थिक, दिशा भक्तक; आ भगता-संस्थाक जे रूप एतऽ करुणासँ जनमल, तकर पुरुष-रूप गरीबन बाबा (२८) आ लालमैन बाबा (२९)मे न्याय-चक्रसँ जनमत — तीनू मिला कऽ मिथिलाक भगता-परम्पराक पूर्ण त्रिकोण। २८. गरीबन बाबा : अनजान भूल, दैवी दण्ड आ सामूहिक प्रायश्चित्त उधरा गामक तीन संगी — बरहम ठाकुर, घासी यादव, गरीबन धोबि; अखराहा लग कमला माइक पीड़ीमे गरीबनक पएर अनजाने लागि गेल। कुपित कमला मैया इन्द्रक दरबारसँ बाघिन आनि दण्ड देलनि — अखराहामे असमान युद्ध, गरीबनक वध, लहास कमला धारमे। धोबिया घाटपर एक धोबि काजक असुविधामे लहासकेँ सहटारि बहा देलक — दोसर अनजान भूल। कनियाँक आर्तनादपर गरीबनक आत्मा भगता-देहमे बाजल: सभ धोबि मिलि लहास निकालि दाह-संस्कार करथि, नहि त' भट्ठीमे कपड़ा जरत। सामूहिक खोज, विधिवत् संस्कार, शाप-निवारण — आ तहियासँ गरीबन बाबा भट्ठीक रक्षक। ई छोट गाथा संग्रहक धर्म-समाजशास्त्रीय दृष्टिसँ सभसँ पारदर्शी पाठ थिक — लोकदेवता-निर्माणक पूरा प्रक्रिया एतऽ चारि चरणमे खुजल अछि: अन्यायपूर्ण मृत्यु, मरणोत्तर अनादर, आत्माक माँग, सामूहिक परिहार — आ परिहारक संस्थाकरण (भट्ठीक रक्षक)। धर्मक मानवशास्त्र जकरा 'कल्ट-निर्माण'क आख्यान कहत, से एतऽ बाल-कथाक सरलतामे उपलब्ध अछि, आ एकर शैक्षिक मूल्य ई जे बालक अपन परिवेशक भगता-गहबर-परम्पराकेँ अन्धविश्वास वा तमाशा नहि, अर्थपूर्ण सामाजिक स्मृति-विधान रूपेँ बुझऽ लगैत अछि। कथाक नैतिक व्याकरणमे केन्द्रीय पद 'अनजान-सुनजान' थिक — दुनू भूल (पएर लागब, लहास सहटारब) निर्दोष-भाव छल, आ तइयो परिणाम भोगल गेल; कथा एतऽ आशय आ प्रभावक भेदक कठिन पाठ पढ़बैत अछि: अनजानो भूलक सामाजिक मरम्मत करऽ पड़ैत अछि — क्षमा माँगब आशयक स्वीकृति नहि, प्रभावक जिम्मेदारी थिक। आधुनिक नैतिक-शिक्षाक भाषामे ई 'जवाबदेही बिनु लज्जाक' (एकाउन्टेबिलिटी विदाउट शेम)क लोक-पाठ थिक। समीक्षा-दृष्टिसँ देवीक दण्ड-अनुपातपर प्रश्न उठब स्वाभाविक — अनजान स्पर्शपर प्राणदण्ड? — आ गाथाक अपन उत्तर ओकर संरचनामे अछि: कथा देवीक दण्डकेँ अनुकरणीय नहि, आरम्भ-बिन्दु बनबैत अछि, आ ओकर सम्पूर्ण ऊर्जा मरम्मत-पक्षमे लगबैत अछि; अन्तिम अध्यायक शब्द — 'पीड़ित स्वयं रक्षक बनि सकैत अछि' — दण्ड-कथाकेँ रूपान्तरण-कथामे बदलि दैत अछि। बत्तू (६)क बलि-प्रश्न आ एतुक्का कोप-प्रश्न मिला कऽ संग्रह देव-मनुष्य-सम्बन्धक जे चित्र बनबैत अछि से भय-मुक्त नहि, मुदा संवाद-युक्त अछि — देवता एतऽ अन्तिम शब्द नहि, वार्ताक दोसर पक्ष छथि। तीन-संगीक आरम्भिक चित्र (ठाकुर-यादव-धोबिक साझा अखराहा) गाथाक सामाजिक स्वप्न-रेखा थिक जकरा आलोचक अनदेखा नहि करत: जाति-नाम गनल गेल अछि, मुदा अखराहामे ओ सभ 'संगी' छथि — आ लोकदेवत्व अन्तमे ओही धोबिकेँ भेटैत अछि जकर श्रम (भट्ठी, कपड़ा) कथाक धुरी थिक; श्रमक ई अभिषेक विदेह समानान्तर प्रतिमानक बीज-सूत्र थिक, जे लालमैन बाबा (२९) आ रघुनी मरर (३२)मे आगाँ बढ़त। २९. लालमैन बाबा : बाघिनपर संकोच आ अन्तिम इच्छाक वजन नौहट्टाक दू चमार संगी — मनसाराम आ लालमैन — संगे महीस चरबैत। बघिनियाक आक्रमणपर लालमैन महीस-रक्षामे लड़लाह, मुदा स्त्रीजातिक बाघिनपर पूर्ण बल नहि लगओलनि — आ मारल गेलाह। मरैत काल अन्तिम अनुरोध: 'हमर दाह-संस्कार नीकसँ कएल जाए।' मनसाराम गामपर किछु नहि कहलक; क्रुद्ध आत्मा ओकरा 'बका कऽ' मारि देलक; गाम सभटा बुझि सामूहिक दाह-संस्कार केलक, आत्माकेँ शान्ति भेटल, आ लालमैन बाबा भगता-रूपमे पूजित भेलाह। ई गाथा संग्रहक सभसँ संक्षिप्त वीर-भक्ति-रचनामे सँ अछि, मुदा एकर नैतिक घनत्व असाधारण। पहिल समीक्ष्य बिन्दु ओ संकोच थिक जे लालमैनक प्राण लेलक — 'स्त्रीजातिक बाघिनपर पूर्ण बलसँ प्रहार करबासँ हिचकला।' ई ब्योरा लोक-नीतिशास्त्रक विलक्षण क्षण थिक: नायकक शौर्य-संहिता (स्त्री-जातिपर वार नहि) पशु-जगत् धरि विस्तृत अछि, आ कथा एहि अति-विस्तारक मूल्य (प्राण) देखबितो ओकरा मूर्खता नहि कहैत — 'ई त्याग आ नैतिकताक मूल्य अत्यन्त भारी छल'; अर्थात् गाथा नैतिक नियमक त्रासद पक्ष स्वीकारैत अछि बिनु नियमकेँ हँसी उड़ौने। बाल-पाठक लेल ई 'महग सिद्धान्त'क पहिल भेँट थिक — ओ प्रश्न जे परिपक्व नैतिकताक द्वार खोलैत अछि: की सिद्धान्त तखनो राखी जखन दाम प्राण हो? कथा उत्तर नहि, आदर दैत अछि — आ आदर उत्तरसँ बेसी सिखबैत अछि। दोसर केन्द्र अन्तिम-इच्छाक संस्था थिक। मरणासन्नक अनुरोध लोक-विधानमे लगभग ऋण थिक, आ मनसारामक चुप्पी — जकर कारण गाथा ईमानदारीसँ अनिश्चित छोड़ैत अछि ('भय, स्वार्थ, वा उपेक्षा') — ओहि ऋणक अस्वीकार; प्रतिशोधक जे रूप आत्मा लैत अछि से बाल-पाठ लेल कठोर अछि, मुदा औचित्य-प्रबन्धन फेर संवरण-विधिसँ भेल अछि (वध-क्रिया एक पदमे, ब्योरा शून्य), आ कथाक गुरुत्व-केन्द्र तुरत सामूहिक-प्रायश्चित्त दिस घुसकि जाइत अछि — ठीक गरीबन बाबा (२८)क ढाँचा: व्यक्तिक भूल, समुदायक मरम्मत। दुनू गाथाक ई समान्तरता संग्रह-स्थापत्यक सचेत जोड़ी बुझाइत अछि — धोबि आ चमार, दुनू श्रम-समुदायक लोकदेवता, दुनूक देवत्वक जड़िमे मरणोत्तर सम्मानक प्रश्न; समाजशास्त्रीय पाठ ई जे जकरा जीवितमे सम्मान दुर्लभ, लोक-धर्म ओकरा मरणोत्तर सम्मानक संस्था रचि दैत अछि — आ बाल-मानसमे ई गाथा-जोड़ी सम्मानक वितरण-न्यायक बीज रोपैत अछि। मित्रता-विश्वासघातक अक्षपर ई गाथा संग्रहक मित्र-शृंखला (पट्टू १९, जीतन १६, पाथर-मित्र १२)क अन्हार ध्रुव थिक — ओतऽ मित्र प्राण दैत अछि, एतऽ मित्र वचनो नहि दैत; दुनू ध्रुवक बीच बाल-पाठकक अपन मैत्री-नीति आकार लेत। ३०. गांगोदेवीक भगता : नामक शक्ति — सभसँ कोमल भक्ति-गाथा साओनक मेला; गांगोदेवीक साँए भाय-पिताक संग माछ मारऽ गेलाह — मोनमे योजना: 'माछ बेचि गांगो लेल चूड़ी-लहठी आनब।' दिन भरि जालमे खाली डोका-हराशंख; अन्तिम प्रयासमे कनियाँक नाम लऽ जाल — 'ई अन्तिम बेर छी गांगो... क्षमा करब!' — आ जाल माछसँ एतेक भरल जे घिंचने नहि घिंचाए। दोसर दिन फेर वैह; भाय-पिताक हिस्सामे वैह डोका-काँकड़ु, आ रहस्य खुजल: गांगोक नाममे शक्ति। ई विश्वास मलाह-समुदायमे पसरल, आ आइयो जाल फेकबासँ पहिने गांगोक स्मरण — 'गांगोदेवीक भगता।' ई संग्रहक सभसँ छोट आ सभसँ कोमल पोथी थिक, आ एकर समीक्षा एकर लघुताक बचावसँ शुरू हो। लेखक अपने रेखांकित करैत छथि — 'एहिमे कोनो राक्षस नहि, कोनो युद्ध नहि, कोनो जटिल षड्यन्त्र नहि' — आ यएह एकर विधागत साहस थिक: चमत्कार-कथाक पूरा तामझामकेँ ई गाथा एक दाम्पत्य-सम्बोधन धरि घटा दैत अछि। चमत्कारक स्रोत की? कथाक अपन उत्तर मनोवैज्ञानिक रूपेँ सटीक अछि — 'ई विनम्रता, ई श्रद्धा, ई चमत्कारक असली स्रोत' : पतिक ओ वाक्य ('क्षमा करब') जाहिमे पुरुष अपन विफलता पत्नीक आगाँ स्वीकारैत अछि; लोक-परम्पराक पितृसत्तात्मक व्याकरणमे ई सम्बोधन-मुद्रा अपने आपमे लघु-क्रान्ति थिक, आ गाथा ओही मुद्राकेँ फलदायिनी देखबैत अछि। पाश्चात्य भाषा-दर्शनक ओ 'परफॉर्मेटिव' सूत्र जे बत्तू (६)मे डींगक रूपमे छल, एतऽ अपन विलोम-रूपमे अछि: ओतऽ वाक्य भय रचैत छल, एतऽ नाम श्रद्धा रचैत अछि — दुनू मिला कऽ संग्रहक वाक्-मीमांसा पूर्ण: शब्दक शक्ति ओकर भावसँ अबैत अछि। धर्म-समाजशास्त्रक दृष्टिसँ ई गाथा भगता-परम्पराक चारिम आ विलक्षण रूप थिक: मोतीदाइ (२७) करुणासँ, गरीबन (२८) आ लालमैन (२९) न्याय-चक्रसँ देवत्व धरि पहुँचलाह — गांगो बिनु मृत्युक, बिनु दुखक, विशुद्ध प्रेम-स्मृतिसँ; 'एकटा परिवारक व्यक्तिगत अनुभव सामूहिक विश्वास बनल' — लोक-धर्मक ई सभसँ सौम्य जन्म-कथा थिक। आ श्रम-पक्ष लक्षित हो: ई आस्था-कथा असलमे जीविका-कथा थिक — जाल, सरैया, हाट, चूड़ी-लहठीक अर्थतन्त्र; भक्ति एतऽ श्रमक विकल्प नहि, श्रमक साथी थिक ('जाल फेकबासँ पहिने स्मरण' — स्मरणक बाद जाल फेकनाइ त' रहबे कएल)। बाल-पाठक लेल एकर सन्देश-संरचना आदर्श अछि: चमत्कार अछि (कल्पना-पोषण), मुदा ओ लॉटरी नहि — ओ सम्बन्ध, विनम्रता आ परिश्रमक त्रिकोणपर टिकल अछि। अमर बाबा (२४)क मलाह-तप आ बड़ सुख सार (३४)क गंगा-कृपाक बीच ई गाथा जल-जीवी समुदायक भक्ति-वाङ्मयक मध्य-स्वर थिक — आ तीनू मिला कऽ संग्रहक ई स्थापना बनैत अछि जे मिथिलाक जल-संस्कृतिमे धार जीविका, देवी आ साक्षी तीनू एक्कहि संग थिक। ३१. ज्योति पँजियार : एक इनकारक बारह बरख — शापसँ वरदान धरि पम्पीपुरक सिद्ध तांत्रिक ज्योति पँजियार गहबर बनएबामे मग्न छलाह; भिक्षुक-वेशमे आएल कुलदेवता धर्मराज 'ज्योतिक हाथेटासँ भीख' माँगलनि, आ ज्योति मना कऽ देलनि — 'गहबर बनायब छोड़ि कऽ नहि आयब।' शाप: निर्धनता आ कुष्ठ। बहिनक द्वारपर अवहेलना, ओइटदलमे संगीक शरण, तांत्रिकक निर्देश — बारह बरख कदलीवनमे धर्मराजक आराधना। बाटमे शापक छाया: छाह देनिहार सैनी गाछ सुखा कऽ खसल, पानि आनऽ गेलि कोइली बिहाड़िमे मरलि। महिसबार-रूप धर्मराजक संकेत, वर-पातपर लिखल 'यैह छी अछमितपुर', निःसन्तान राजाकेँ छागर-वरदान, बारह बरखक तप — आ तखन पुनर्जीवनक शृंखला: कोइली जीलि, धार बहलि, सैनी गाछ हरिआएल, छागर-राजपुत्रक युग्म-रहस्य खुजल; ज्योति गमछामे गहबर नेने पम्पीपुर घुरलाह। एहि गाथाक दार्शनिक केन्द्र ओ प्रश्न थिक जे भक्ति-साहित्यमे बेर-बेर उठैत अछि: सेवा आ साक्षात्कारमे टकराव भेला पर के पैघ? ज्योति गहबर (देवताक घर) बनबैत छलाह आ देवताकेँ (भिक्षुक-रूपमे) टारि देलनि — कथाक निदान स्पष्ट अछि: 'काज आ भक्तिक बीच ज्योति काजकेँ चुनलनि' — अर्थात् साधन साध्यसँ पैघ भऽ गेल; शाप एही व्युत्क्रमक दण्ड थिक, अहंकारक नहि त' असावधान प्राथमिकता-बोधक। ई सूक्ष्म भेद बाल-पाठ लेल मूल्यवान: कथा 'आलसी'केँ नहि, 'अति-व्यस्त'केँ चेतबैत अछि — आधुनिक जीवनक ओ रोग जकरा कोनो युगक बालक अपन अभिभावकमे चिन्हि सकैत अछि। शाप-वहनक जे चित्र आगाँ अबैत अछि — छाया-मात्रसँ गाछक मृत्यु, सेवामे कोइलीक अन्त — से संग्रहक सभसँ मार्मिक 'संक्रामक दुर्भाग्य'क बिम्ब थिक: दुख असगर नहि रहैत, प्रियजन धरि पसरैत अछि; आ ज्योतिक प्रतिक्रिया ('आब हर डेगमे सतर्कता — कतहु आर किओ आहत नहि होअए') दुखक भीतर जनमैत करुणाक चित्र। बारह बरखक तप संग्रहक काल-मात्रकक (मिलाउ: दबना १७, मड़ुवन १५, बारह-बरखा सदाव्रत १२, नैका २१) पूर्णतम प्रयोग थिक, आ पुनर्जीवन-शृंखला ओकर फल-गणित: जे-जे शापसँ मरल, से-से तपसँ जीलि — क्षति आ मरम्मतक ई सन्तुलित बही लोक-न्यायक आदर्श-चित्र थिक, जकर विलोम (क्षतिक अपूरणीयता) संग्रह अमर बाबा (२४)मे देखा चुकल अछि; दुनू मिला कऽ पाठक सीखत जे कोन क्षति घुरैत अछि आ कोन नहि। छागर-राजपुत्रक युग्म-प्राण-रहस्य (छागर खुजत त' पुत्र घुरत) लोककथाक 'बाह्य-प्राण' (एक्सटर्नल सोल) आकृतिक स्नेह-रूप थिक — प्राण एतऽ राक्षसक सुग्गामे नहि, वरदानक पाठामे बसैत अछि। आ अन्तिम बिम्ब — 'गमछामे गहबर' — गाथाक उत्तर-वाक्य थिक: जे गहबर बनएबाक हठमे देवता टारल गेल छलाह, से आब एतेक हल्लुक भेल जे गमछामे बान्हल चलैत अछि; भक्ति भारसँ हल्लुकता दिस — ई यात्रा-रेखा उगना (३५)क ओहि प्रश्नक पूर्व-पीठिका थिक जे भेष आ भक्तिक भारकेँ सोझे उठाओत। ३२. रघुनी मरर : भक्तिक कवच आ झूठ आरोपक अदालत अकालमे गाम छोड़ि रघुनी मरर बिदिया बरहमपुर पहुँचलाह; जुगल प्रसादक दंगल जीति सय बीघा दान पओलनि, सुगमामे बथान बसओलनि। जमीन्दारी गागोरी राजकेँ बिकाएल; सिमरीक चौधरीक दलानपर नाच-प्रसंगमे रघुनीक उदारता (नटुआकेँ जोड़ी गाय) चौधरीक डाह बनल। मकदूम जोगीक तीन प्रहार — मन्त्रल सरिसो निष्फल, चण्डिका-सिद्धिसँ सय बाघक घेरामे वध मुदा कामाख्याक हाथेँ पुनर्जीवन, तेसर बेर जोगीक मुट्ठी बन्दक-बन्द — तीनू विफल। तखन कानूनी छल: 'लगान नहि देने अछि, आ लोककेँ मना करैत अछि'; सिपाही भाइ देवदत्तकेँ पकड़लक, रस्तामे रघुनी देखार रहितो सिपाहीकेँ अदृश्य; काल-कोठरीमे कोड़ा चलओनिहारकेँ उनटे चोट — राजाक भूल-स्वीकृति, लगान-बन्दी रैयतक रिहाई, आ रघुनीसँ घट्टीक सम्मान-याचना। ई गाथा संग्रहक 'अजेय भक्त'-आकृतिक प्रतिनिधि थिक, आ एकर समीक्षा-कुंजी आक्रमणक त्रि-स्तरीय सीढ़ी थिक: जादू (व्यक्तिगत), हिंसा (सय बाघ), आ अन्तमे राज्य-यन्त्र (झूठ आरोप, गिरफ्तारी, कोड़ा) — कथा देखबैत अछि जे ईर्ष्या जखन सोझ बलमे हारैत अछि तखन संस्थाक भेष धरैत अछि, आ तेसर हथियार पहिल दुनूसँ घातक: बाघसँ कामाख्या बचा लेलनि, मुदा झूठ आरोपक शिकार निर्दोष भाइ भेलाह। बाल-पाठक लेल ई सीढ़ी अन्याय-साक्षरताक पाठ्यक्रम थिक — अन्याय सदिखन राक्षस-रूपमे नहि, कागज-रूपमे सेहो अबैत अछि। दैवी हस्तक्षेपक जे रूप अन्तमे अबैत अछि — कोड़ा चलओनिहारकेँ उनटे चोट — से लोक-न्यायक ओ काव्य-सूत्र थिक जे दण्डकेँ दण्डकेपर घुमा दैत अछि (मिलाउ: भाट-भाटिनक प्रति-शर्त १०, बगियाक डाइनक कर्मफल ५); हिंसा एतऽ नायक नहि करैत — व्यवस्था अपने आपसँ टकराइत अछि, आ ई अ-हिंसक न्याय-कल्पना बाल-पाठ लेल आदर्श अछि। चौधरीक डाहक जन्म-प्रसंग सूक्ष्म सामाजिक अवलोकन थिक: रघुनीक उदारता (गाय-दान) चौधरीकेँ 'नीचाँ देखाएब' बुझाएल — कथा देखबैत अछि जे ईर्ष्या अपमानसँ नहि, दोसराक गुणेसँ जनमि सकैत अछि; संग्रहक ईर्ष्या-शृंखला (सियार ८, पृथ्वीपाल १९, थापा १७)मे ई सभसँ सूक्ष्म कड़ी थिक, कारण एतऽ ईर्ष्याक 'कारण' पीड़ित द्वारा कएल गेल कोनो अपकार नहि, उपकारक शैली थिक। रघुनीक अजेयताक स्रोत कथा स्पष्ट रखैत अछि — 'रघुनी देवी भक्त छलाह, तेँ जादू नहि चललैक' — मुदा एतऽ एकटा समीक्षकीय सतर्कता आवश्यक: भक्ति-कवचक ई सूत्र बाल-मानसमे 'भक्त = अभेद्य'क सरल समीकरण नहि बनए, ताहि लेल संग्रह अपने प्रतिपक्ष रखने अछि — दीना-भदरी (१६) परम भक्त रहितो छलसँ मारल गेलाह; दुनू गाथाक जोड़ी-पाठ भक्ति-फलक जटिलता सिखबैत अछि। अन्तमे राजाक 'घट्टी'-याचना — दण्ड-अधिकारीक सम्मान-याचक बनि जाएब — सत्ता-व्युत्क्रमक ओ लोक-क्षण थिक जकरा निकोलायेवाक सिद्धान्त बाल-साहित्यक गहींरतम सुख कहत: बालक (आ बोनिहार) ओहि क्षणक साक्षी बनैत अछि जखन तराजू उनटैत अछि। ३३. बिहुला : थम्हपर बैसलि हठ — मनसा-गाथाक बाल-रूपान्तर चम्पानगरक चाँद सौदागर — चौदह जहाजक स्वामी, शिवक अनन्य भक्त: 'ई माथ एक्कहि ठाम झुकैत अछि।' कैलास त्यागि मान्यता-भूखलि मनसा हुनकहिसँ पूजा माँगलनि; इनकारपर सात बेटाक वध, चौदह जहाजक डूब — तइयो सौदागर नहि झुकलाह: 'भयसँ झुकल माथक कोन मोल?' राखक ढेरीमे चिनगी — लखिन्दरक जन्म; अखण्ड-सौभाग्यवती बिहुलासँ बियाह, जालीक कोहबर, आ पातरो-सँ-पातर भऽ पैसलि मनसाक डंक। केराक थम्हपर लहासक संग बिहुला — 'हमर सोहाग जतय जाएत, हम ओतहि जाएब'; त्रिवेणीक धोबिनक मृत्यु-जीवन-खेलसँ बाट भेटल, मनसा-द्वार धरि तप, आ माँग असगर सोहागक नहि — 'लखिन्दर आ हुनक जेठ सातो भाइ, सभक प्राण।' आठ प्राणक वापसी, चम्पानगरमे आठ आरती, आ मनसा-बिहुलाक युग्म-पूजाक जन्म। ई गाथा पूर्वी भारतक विशाल मनसा-मंगल-परम्पराक मैथिली बाल-रूपान्तर थिक, आ रूपान्तरणक कौशल एकर समीक्षाक पहिल विषय। मूल परम्पराक विस्तार (मंगलकाव्यक सहस्रो पाँती) एतऽ बारह अध्यायक सुगठित चापमे बान्हल गेल अछि, आ लेखकक जोर-वितरण अर्थपूर्ण: देवी-सौदागरक जिद-युद्ध पूर्वार्ध, बिहुलाक यात्रा उत्तरार्ध — अर्थात् गाथाक गुरुत्व-केन्द्र सत्ता-संघर्षसँ सरकि कऽ स्त्री-हठक तीर्थ-यात्रापर आबि गेल अछि। चाँद सौदागरक चरित्र-रेखा बाल-पाठ लेल असाधारण जटिल उपहार थिक: ओ नायक छथि आकि हठी? कथाक उत्तर — दुनू; 'हुनक शोक पहाड़ छल, मुदा निष्ठा पहाड़सँ ऊँच' — आ भयाधारित पूजाक हुनक अस्वीकार ('जे देवी सात निर्दोषक प्राण लऽ सकैत छथि, से पूजा नहि — भय माँगि रहल छथि') धर्म-मीमांसाक ओ प्रश्न थिक जे बालकक मोनमे बेर-बेर उठैत अछि आ जकरा प्रायः दाबि देल जाइत अछि; गाथा ओकरा दाबैत नहि, आ अन्तमे समाधान सेहो भय-मार्गसँ नहि, कृतज्ञता-मार्गसँ अबैत अछि — 'कृतज्ञताक पूजा भयक पूजासँ सदिखन पैघ।' बिहुलाक यात्रा प्रॉप-दृष्टिसँ विशुद्ध नायक-यात्रा थिक — प्रस्थान, सहायक-भेँट (धोबिन = दाता-आकृति), कठिन तप, वरदान, घुरती — मुदा एकर क्रान्ति ई जे यात्री नव-विवाहिता स्त्री थिक आ यात्राक वाहन पतिक लहासबला थम्ह: विश्व बाल-साहित्यमे एहन बिम्ब दोसर ताकब कठिन। जोसेफ कैम्पबेलक 'नायक-यात्रा'क एकरेखीय पौरुष-ढाँचापर ई गाथा लोक-परम्पराक अपन संशोधन थिक — बिहुलाक शस्त्र हठ, सेवा आ प्रश्न ('देवीक क्रोध पुरुषपर छल — दण्ड कनियाँ किए भोगय?') थिक; आ अन्तिम माँगक विस्तार ('अपना लेल आएलि, सभक लेल माँगलक — यएह बिहुलाकेँ बिहुला बनबैत अछि') व्यक्तिगत मोक्षसँ सामुदायिक कल्याण दिसक ओ छलाँग थिक जे भारतीय भक्ति-नायिकाकेँ पाश्चात्य 'क्वेस्ट-हीरो'सँ अलगबैत अछि। मनसाक चरित्रमे 'मान्यताक भूख'क मानवीकरण ('भूख मनुक्खे सन') देवता-चित्रणक लोक-साहसक उदाहरण थिक — आ अन्तमे देवी-मनुष्याक युग्म-पूजा ओहि साहसक संस्थागत फल: 'भक्ति आ शक्तिक एहन जोड़ी आन कोन गाथामे?' अन्तर्पाठीयता घन अछि: 'बिहुला बनू'क लोकोक्ति-रूप समापन गाथाकेँ जीवित मुहावरामे बदलैत अछि (मिलाउ: 'बोधि कायस्थ जेकाँ गंगा लाभ', ३४); कोहबर-रक्षाक विफल जाली मोतीसाएरिक सन्दूक (२६)क प्रति-बिम्ब थिक — ओतऽ बन्द कएनाइ अन्याय छल, एतऽ रक्षा, आ दुनू विफल: लोक-गाथा बेर-बेर कहैत अछि जे नियति ताला नहि मानैत, तप मानैत अछि। ३४. बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे : निष्कलंक जीवन आ साहित्य-तीर्थ मिथिला-दरबारक बोधि कायस्थ — दरमाहासँ गुजर, बचल राशि दान-पुण्यमे, भरि जन्म हिंसा-लालसासँ दूर, भोलाबाबाक भक्त। मृत्यु-काल निकट बुझि गंगा-लाभक संकल्प; अदहा कोसक दूरीएसँ गंगाकेँ सम्बोधन — आ गंगा माय तट तोड़ि आबि हुनका अपनामे समाहित कऽ लेलनि; सोझे स्वर्ग। ई घटना विद्यापति-पूर्वक; विद्यापति एकरा पुरुष-परीक्षामे बान्हलनि आ एहीपर अमर मैथिली पद रचलनि — 'बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे।' ई संग्रहक सभसँ छोट कथानक थिक — एकहि चमत्कार, एकहि पात्र — मुदा एकर समीक्षा-भार सभसँ बहुस्तरीय, कारण ई कथा-पोथी होइतो साहित्येतिहास-पोथी थिक। पहिल स्तर: चरित्र-चित्रणक विलोम-विधि। लोक-कथाक नायक प्रायः कर्मसँ चिन्हल जाइत अछि; बोधि कायस्थ अ-कर्मसँ चिन्हल छथि — जे-जे नहि केलनि (हिंसा, पर-स्त्री-धन-लालसा, संग्रह) सएह हुनक चरित थिक। बाल-साहित्यमे ई 'नकारात्मक स्थान'क चरित्र-कला दुर्लभ आ मूल्यवान: वीरताक कोनो दृश्य बिना कथा एकटा आदर्श ठाढ़ कऽ दैत अछि — आ आदर्शक कसौटी अन्तिम परीक्षामे अछि: अदहा कोससँ पुकारब श्रद्धाक दुस्साहस थिक ('ई कार्य कोनो अहंकार वा दुस्साहस नहि छल — पूर्ण समर्पित भक्तक निश्छल याचना'), आ गंगाक तट तोड़ब ओकर प्रतिदान। भक्ति-मीमांसाक भाषामे ई 'मर्यादा-भंजक कृपा'क कथा थिक — नियम (तट) प्रेमक आगाँ झुकैत अछि; बिहुला (३३)मे नियति तपसँ झुकल छलि, एतऽ भूगोल भक्तिसँ। दोसर स्तर साहित्य-चेतना थिक, आ एतहि ई पोथी संग्रहमे अद्वितीय: कथा अपन साहित्यिक जीवनी अपने कहैत अछि — घटना, फेर पुरुष-परीक्षामे संस्कृत-ग्रन्थन, फेर मैथिली पदमे काव्यीकरण, फेर लोकोक्ति ('बोधि कायस्थ जेकाँ गंगा लाभ')। बाल-पाठकक आगाँ एतऽ पहिल बेर ई प्रक्रिया खुजैत अछि जे कथा कोना पोथी बनैत अछि आ पोथी कोना संस्कृति — पाठ-परम्परा (टेक्स्चुअल ट्रान्समिशन)क ई आत्म-कथा साहित्य-शिक्षाक बीज-पाठ थिक। आ विद्यापतिक ई उपस्थिति संग्रह-स्थापत्यक एकटा त्रयी खोलैत अछि: बड़ सुख सार (विद्यापति कथाकार-गायक), उगना (३५: विद्यापति पात्र), जट-जटिन (३६: विद्यापति-युगक दरबारसँ जनमल लोकनाट्य) — तीनू मिला कऽ बाल-पाठकक आगाँ महाकविक तीन मुख — रचयिता, भक्त, आ युग — क्रमशः प्रकट होइत अछि; ई साहित्येतिहासक कथा-द्वारा-शिक्षण संग्रहक मौलिक शैक्षिक प्रयोग थिक। रस-दृष्टिसँ ई विशुद्ध शान्त-रसक रचना थिक — संग्रहमे एकसरि — आ मृत्युक जे चित्र एतऽ अछि (स्वेच्छया, प्रतीक्षित, कृपा-सिक्त) से बाल-मानसमे मृत्यु-भयक ठाम मृत्यु-गरिमाक पहिल परिचय रोपैत अछि: बेटेलहाइम जकरा परीकथाक गहींरतम सेवा कहैत छथि — अन्तक संग सन्धि — से एतऽ बिनु कोनो राक्षसक, एकटा नदीक कोरामे सम्पन्न होइत अछि। ३५. उगना : नोकर बनल महादेव — भक्तिक सभसँ मधुर उलटफेर कैलासपर विद्यापतिक नचारी सुनि झूमैत शिव — आ साध: 'ई गीत लगमे रहि कऽ सुनी।' उगना-रूपमे विद्यापतिक नोकरी; जेठक बाटमे मूर्छित कविकेँ जटा खोलि गंगधारसँ पानि; गंगाजलक स्वादसँ भेद-बोध, शिवक शर्त — 'जहिया मुँहसँ हमर असली नाम निकलत, तहिये अन्तर्धान।' कैलासपर एकाकिनी पार्वतीक तेतरि-चालि: गाछ रित्त, उगना खाली हाथ, चन्दनक बाढ़नि — आ विद्यापतिक करेजसँ फूटल 'हा शिव!' अन्तर्धान। विक्षिप्त कवि — 'उगना रे मोर कतय गेलाह' — आ भीठ-भगवानपुरमे उगना महादेवक थान। ई गाथा संग्रहक भक्ति-खण्डक मुकुट-मणि थिक, आ एकर केन्द्रीय अद्भुत ओ व्युत्क्रम थिक जकरा कथा अपने 'भक्ति-साहित्यक सभसँ मधुर उलटफेर' कहैत अछि: सेव्य सेवक बनल — गीतक भूखेँ। भक्ति-दर्शनक परिभाषामे ई 'भगवानक भक्त-वात्सल्य'क चरम-कथा थिक, मुदा एकर बाल-साहित्यिक मूल्य दोसर तलपर अछि: ई घरेलूताक कथा थिक। शिव एतऽ बासन माँजैत छथि, तेतरि ताकऽ जाइत छथि, बाढ़नि सहैत छथि — 'मिथिला अपन देवताकेँ सेहो घरक लोक बना लैत अछि — यएह एकर सभसँ पैघ सिद्धि' — आ बालक-पाठक लेल एहिसँ पैघ धर्म-शिक्षा की जे परमात्मा रसोई-घर धरि सहज छथि? नोडेलमैनक 'हिडेन एडल्ट'क उनटा एतऽ 'हिडेन गॉड' अछि — आ ओकर छिपाव-श्रम स्वयं तप थिक: 'जादू करितथि त' भेष टूटि जइतनि; भेष निमाहब सेहो एकटा तपस्या छल।' गाथाक त्रासद यन्त्र-रचना निर्दोष अछि आ समीक्षा ओकर तीन पुर्जा अलगाओत। पहिल, शर्तक स्वभाव: भेद नाम-उच्चारणपर टँगल अछि — आ नाम ठीक ओही क्षण निकलैत अछि जखन भक्ति सभसँ तीव्र अछि (शिवपर बाढ़नि देखि चुप रहब भक्तक वशसँ बाहर); 'शर्त हुनके टूटल, मुदा तोड़बाक कारण? — भक्तिए' — त्रासदीक ई आत्म-घाती तर्क (जे बचाबए चाहै छी, सएह गमबैत छी) विश्व-साहित्यक गहींरतम आकृतिमे सँ अछि, आ एतऽ ओ बाल-सुलभ स्पष्टतासँ घटित अछि। दोसर, पार्वतीक पक्ष: कथा हुनका खलनायिका नहि बनबैत — हुनक चालि 'प्रेमक अधिकारसँ उपजल' अछि; तेसर, चन्दनक निर्दोषता: 'ओ त' नोकरपर तमसाइल छलीह — देवतापर नहि... जँ किनको दोष दी, त' ओहि प्रेमकेँ दिअनु जे भगवानकेँ नोकर बना देलक' — तीनू पुर्जा मिला कऽ ई दोष-हीन त्रासदी बनैत अछि, जतऽ बाल-पाठक कानत मुदा ककरोसँ घृणा नहि करत; भाव-शिक्षाक दृष्टिसँ ई आदर्श शोक-पाठ थिक। आ अन्त — बिछोहसँ गहींराएल गीत ('दुख कविक डूबि थिक — आ ओही डूबिसँ मोती') — कला-मीमांसाक ओ सूत्र थिक जे माधव सिंह (३७) धरि बाजत: कला आ वेदनाक अन्तर्संयोग। ज्योति पँजियार (३१)क 'सेवा बनाम साक्षात्कार'क प्रश्न एतऽ उनटल रूपमे अछि — ओतऽ भक्त देवताकेँ टारलनि, एतऽ देवता भक्तक सेवा माँगलनि; दुनूक जोड़ी-पाठ भक्तिक द्वि-दिश यातायात देखबैत अछि। ३६. जट-जटिन : स्त्रीगणक अपन रंगमंच — प्रेम, गृहस्थी आ वर्षाक अनुष्ठान महाराज शिव सिंह (१४१२-१४४६)क युग; संगीतकार जयट विद्यापति-पदावलीकेँ राग-रागिनीमे बान्हनिहार — आ जट-जटिन नाटकक रचयिता, स्वयं जटक भूमिका केनिहार। साओन-भादवक शुक्ल-रातिमे स्त्रीगणक अभिनीत ई लोकनाट्य: जट-जटिन आ दुनूक सखी-मण्डली; नैहर-यात्राक हठ आ बाढ़ि, बिदागरीक विधि-चर्चा, झूमरक निमन्त्रण ('कोन पातपर चढ़ि कऽ?' — 'पुरैनीक'), प्रतीकात्मक बियाह, गहनाक माँगमे हाथी धरि बिका जाएब, मोरंग-प्रवास, सोनारक प्रलोभनक अस्वीकार, छौंकीक स्पर्शपर रूसब, झोल-मकड़ा भरल घर, आ पुनर्मिलन; अन्तमे बेंग-कुटाइ आ झगराहि स्त्रीक दरबज्जापर फेकब — 'जतेक गारि, ततेक बरखा।' ई पोथी संग्रहमे विधागत रूपेँ असाधारण थिक — ई कथाक पुनर्कथन नहि, एकटा जीवित लोकनाट्यक कथात्मक प्रलेखन थिक, आ एकर समीक्षा-भाषा रंगमंच-शास्त्रसँ आबए पड़त। पहिल स्थापना: ई स्त्रीगणक अपन रंगमंच थिक — रचना पुरुषक (जयट), मुदा प्रदर्शन, पात्र, दर्शक सभ स्त्री; पितृसत्तात्मक समाजक भीतर ई ऋतु-बद्ध 'अपन जगह' (विक्टर टर्नरक भाषामे लिमिनल स्पेस) थिक जतऽ गृहस्थीक दबल स्वर — नैहरक हूक, गहनाक साध, छौंकी-स्पर्शक अपमान, सौतिनक भय — मंचपर बाजि सकैत अछि; 'दर्शक स्त्रीगणकेँ अपनहि जीवनक झलक' — नाट्य-चिकित्सा (ड्रामा थेरेपी)क ई लोक-रूप समीक्षाक आदरक पात्र थिक। बाल-पाठ लेल एकर मूल्य द्वि-स्तरीय: बालिका अपन माए-काकीक सांस्कृतिक सम्पदासँ परिचित होइत अछि, आ बालक ओहि गृहस्थ-संवेदनासँ जे प्रायः ओकर पाठ्यक्रमसँ बाहर रहैत अछि। दोसर स्थापना अनुष्ठान-पक्षपर, आ एतऽ समीक्षा ईमानदार रहत। बेंग-कुटाइक वर्षा-अनुष्ठान अनुकम्पा-जादू (सिम्पैथेटिक मैजिक)क शास्त्रीय उदाहरण थिक — फ्रेज़रक स्वर्ण-शाखा-परम्पराक विश्लेषण एतऽ सोझ लागू — मुदा आधुनिक बाल-संवेदना (आ पशु-करुणा, जकरा संग्रह अपने साढ़िन-प्रसंग १५ आ कोइली-प्रसंग ३१ मे पोसने अछि)क कसौटीपर ई प्रसंग असहज अछि। लेखकक उपचार प्रलेखनक थिक, अनुशंसाक नहि — क्रिया 'लोक-विश्वाससँ जुड़ल अनुष्ठान' रूपेँ दर्ज अछि, महिमामण्डित नहि; आ समीक्षाक अनुशंसा ई जे वयस्क-मध्यस्थ एहि अध्यायकेँ चर्चा-द्वार बनाबथि: लोक-परम्परा संग्रहालय-वस्तु नहि, जीवित नदी थिक जे अपन धार बदलैत रहैत अछि — की-की धरोहरि थिक आ की-की पुनर्विचार-योग्य, ई विवेक-अभ्यास सांस्कृतिक शिक्षाक अंग थिक। संरचना-दृष्टिसँ नाटकक कथा-चाप (मिलन-कलह-विरह-पुनर्मिलन) दाम्पत्यक पूर्ण ऋतु-चक्र थिक आ वर्षा-चक्रसँ ओकर समान्तरता (रूसब = सुखाड़, मिलन = बरखा) गाथाक गहींर रूपक: गृहस्थी आ खेती एक्कहि मौसम-विज्ञानपर चलैत अछि। विद्यापति-त्रयी (३४-३५-३६)क ई तेसर फलक युगक सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि दैत अछि, आ महुआ (२०)क साओन-भादवसँ एकर ऋतु-सम्बन्ध संग्रहक 'भादव-वाङ्मय'केँ पूर्ण करैत अछि — एक्कहि भरल धार, कतऽ शोक, कतऽ समारोह। ३७. माधव सिंह आ अमता गाम : राग मेघ-मल्हार — कला-गाथाक समापन-स्वर दुर्भिक्ष-पीड़ित मिथिला; दरबारक मंत्रणामे नेपाल-दरबारक चारि संगीतज्ञ भाइक चर्च; राधाकृष्ण आ करताराम अएलाह — ध्रुवपद-साधक, संगतिमे पखावजी भीम मल्लिक। नोम-तोमक आलापसँ घटा उमड़ल, बन्दिश-थापसँ पहिल बुन्नी, आ एहन झमाझम जे दरबारेमे पानि पैसि गेल; दूत गाम-गाम — 'कतहु रुक्ख नहि' — तखन गायन-विश्राम। कृतज्ञ राजा दुनू भाइकेँ अमता गाममे बसओलनि — जतऽ खीरीक गाछक फरमे दूध; राजाक नेम बनल अमतामे ध्रुवपद-श्रवण। मृत्यु-कालमे अन्तिम इच्छा — 'हमरा अमता लऽ चलू, एक बेर ध्रुवपद' — आ पालकी बाटेमे, अमता पहुँचबासँ पहिने, राजाक प्राणान्त। खीरीक फरसँ ओहि साँझ 'दूधक ठाम नोर'; बहुत दिन मौनक बाद अमतामे फेर तानपूरा — पहिल राग मेघ-मल्हार, आ बिनु बादलक बुन्नी। संग्रहक ई समापन-गाथा (हमर क्रममे) जानि-बुझि एतऽ राखल गेल — कारण ई पूरा संग्रहक कला-मीमांसाक निष्कर्ष-अध्याय थिक। 'ई गाथा तरुआरिक नहि, तानक थिक' — उपक्रमक ई घोषणा वीरगाथा-खण्डक पूरा शस्त्र-वाङ्मयक आगाँ एकटा वैकल्पिक शक्ति-सिद्धान्त रखैत अछि: सिद्ध कला प्रकृतिक सहभागिनी थिक ('राग जँ साँच हो, साधना जँ पूर्ण हो, त' आकाशो श्रोता बनि जाइत अछि')। राग-वर्षाक ई आख्यान भारतीय संगीत-परम्पराक ओहि सुप्रसिद्ध विश्वास-वंशक थिक जे मेघ-मल्हारकेँ वर्षा-शक्ति दैत अछि; समीक्षा एकरा वैज्ञानिक दावा नहि, कला-श्रद्धाक रूपक रूपेँ पढ़त — आ रूपकक अर्थ गहींर अछि: सुखाड़ एतऽ खाली मौसम नहि, समाजक प्राण-शोष थिक, आ संगीत ओकर प्राण-संचार; 'एतय राग सुनाएब नहि, प्राण घुरायब अछि।' गोनू झा (११)क संग एकर पूर्व-नियोजित जोड़ी-पाठ (एक्कहि सुखाड़, नकली तप बनाम असली साधना)क चर्च ओतऽ भऽ चुकल; एतऽ जोड़बाक बात ई जे दुनू गाथा मिला कऽ बाल-पाठककेँ प्रामाणिकताक कसौटी दैत अछि — दावाक भव्यता नहि, साधनाक गहींराइ। गाथाक उत्तरार्ध — अपूर्ण अन्तिम इच्छा — संग्रहक सभसँ संयत दुखान्त थिक: 'कोनो शाप नहि, कोनो युद्ध नहि — खाली एकटा अधूरा इच्छा।' मृत्यु एतऽ दण्ड नहि, विघ्न नहि — बस बाटक छोट पड़ब; आ बाल-साहित्यमे मृत्युक ई तेसर मुख (बड़ सुख सारक कृपा-मृत्यु आ वीरगाथाक युद्ध-मृत्युक बाद) मृत्यु-शिक्षाक वर्णक्रम पूर्ण करैत अछि — बालक सीखैत अछि जे किछु इच्छा अधूरो रहि जाइत अछि, आ तइयो जीवन व्यर्थ नहि: 'राजा रस्तेमे रहि गेलाह — मुदा खिस्सामे ओ अमता पहुँचि गेलाह, सदा लेल।' कथा-द्वारा-अमरत्वक ई अन्तिम वाक्य पूरा संग्रहक आत्म-वक्तव्य थिक — सैंतीसो पोथी यएह करैत अछि: जे बाटमे रहि गेल (मुसहर भाइ, घटवारिन, बोनिहार, भगतिन, राजा) तकरा खिस्सामे गन्तव्य धरि पहुँचबैत अछि। करतारामक शोक-मौन आ फेर मेघ-मल्हारसँ पुनरारम्भ ('स्वरक अर्घ्ये असल श्राद्ध') उगना (३५)क बिछोह-गीतक सिद्धान्तक व्यावहारिक रूप थिक; आ खीरीक गाछक दूध-नोर संग्रहक अन्तिम, अविस्मरणीय करुण-बिम्ब — प्रकृति एतऽ दर्शक नहि, शोक-सभासद थिक। उपसंहार : सैंतीस पोथी, एक वाङ्मय एहि सैंतीस समीक्षाक अन्तमे ओ प्रश्न फेर उठाउ जे भूमिकामे राखल गेल छल: की ई सैंतीस स्वतन्त्र पोथी थिक आकि एक वाङ्मय? समीक्षा-यात्राक साक्ष्य दोसर उत्तरक पक्षमे अछि, आ ओकर आधार-स्तम्भ गनाओल जाए। पहिल स्तम्भ आवर्ती शिल्प-मुद्रा थिक। बा-ओमक कथामुख (१, ४) पञ्चतन्त्र-परम्पराक नवीकरण रूपेँ संग्रहकेँ खोलैत आ हास्यमे बन्द करैत अछि; 'चित्र'-पटलक दृश्य-लय सभ पोथीमे शब्द-चित्रक द्वि-वाचन रचैत अछि; आ सभसँ विशिष्ट — कथा-संवरणक तकनीक: 'गाथा आँखि नीचाँ कऽ लैत अछि' (२४), 'जकर विस्तार गाथा नहि करत' (५, २६), मृत्यु-दृश्यक एक-पदी निष्पत्ति (४, १०, २९)। ई संवरण बाल-संस्करणक ओ स्वर्ण-मध्य थिक जतऽ बेटेलहाइम-सम्मत अन्हार सुरक्षित रहैत अछि आ औचित्य-सम्मत संयम सेहो — सत्य-लोप बिनु सरलीकरण। संगहि सूक्ति-वाक्यक नैरेटर-स्वर ('बदला घुरि कऽ घर जाइत अछि, न्याय घुरि कऽ आबैत अछि'; 'समय सभसँ पैघ अदालत थिक'; 'प्रेमी मरि जाइत अछि, प्रेम मेला बनि जाइत अछि') संग्रहकेँ एकटा साझा प्रज्ञा-कोश दैत अछि, आ प्रायः प्रत्येक गाथाक 'आइयो...'-समापन कथाकेँ जीवित परम्परासँ जोड़ि लोक-स्मृतिक निरन्तरता घोषित करैत अछि। दोसर स्तम्भ अन्तर्पाठीय जाल थिक, जकर गाँठ सभ समीक्षा-क्रममे खुजल: सलहेसक द्वि-रूप (१६-१७), चूहड़मल आ कृष्णारामक नाम-द्वैत (१७-१८, २२-२६), शोनितक सिनूरक युग्म (१८-१९), 'बहाओल बेटी'क जोड़ी (२०-२६), बारह-बरखा काल-मात्रक (१२, १५, १७, २१, ३१), कामाख्या-सूत्र (१७, २५, ३२), भगता-चतुष्क (२७-३०), वर्जना-प्रकार्यक वर्णक्रम (६, १३, १४, ३५), विद्यापति-त्रयी (३४-३६), सुखाड़-जोड़ी (११, ३७), आ जल-वाङ्मय — कमला, गंगा, परमान, जबुना, त्रिवेणी — जाहिमे धार जीविका, देवी, शरण, साक्षी आ श्मशान पाँचो रूपमे उपस्थित अछि। ई जाल पाठकसँ जोड़ी-पाठ आ तुलना-पाठ माँगैत अछि, आ सएह एहि समीक्षा-पोथीक विधि रहल। तेसर स्तम्भ मूल्य-स्थापत्य थिक, आ एकर विशेषता एकस्वरता नहि, द्वन्द्वात्मकता अछि। क्षमा (२) आ प्रतिशोध (१६, २३) आमने-सामने छथि; गुरु-वाक्य (१९मे अवज्ञात) आ पितृ-वाक्य (१४मे मिथ्या-सिद्ध) प्रश्नांकित छथि; भक्ति-कवच (३२) आ भक्तक वध (१६) संगहि सत्य छथि; अन्तर्जातीय प्रेमक दुनू नियति (१८-१९) बिनु झूठ आश्वासनक राखल अछि। संग्रह उपदेश नहि दैत — प्रतिमान-युग्म दैत अछि, आ निर्णयक अखराहा पाठकक विवेक लेल खुजल छोड़ैत अछि; बाल-साहित्यक ई भरोस — जे बालक द्वन्द्व सम्हारि सकैत अछि — पीटर हंट-वर्णित बाल-सम्मानक चरम रूप थिक। आ एहि सभक ऊपर ओ सामाजिक स्वप्न ठाढ़ अछि जे विदेह समानान्तर प्रतिमानक प्राण थिक: मुसहर, दुसाध, डोम, धोबि, चमार, मलाह, केवट, रजक, मरर — सभक गाथा एक्कहि गौरव-ग्रन्थमालामे, देवता आ बोनिहार 'एक्कहि आंगनमे, एक्कहि धूप-दीपमे'; आ ओकर संग स्त्री-कर्तृत्वक अटूट पाँती — आस्था, मंशा, दबना, रेशमा, मूँगा, महुआ, बिहुला, मोतीसाएरि, मड़ुवन, बारी, भाटक बहिन, मोतीदाइ — जे संग्रहकेँ बाल-साहित्यक संग समता-साहित्य सेहो बनबैत अछि। अन्तमे, एहि वाङ्मयक ऐतिहासिक अर्थ। मैथिली बाल-साहित्यकेँ एतऽ एक्कहि संग तीन वस्तु भेटल अछि: आधुनिक मौलिक कल्पना (डिस्टोपिया धरि), लोक-कोशक व्यवस्थित बाल-द्वार (गाथा, कथा, नाट्य, संगीत), आ अपन समीक्षा-योग्यता — अर्थात् एहन पाठ जे रस-औचित्यसँ प्रॉप-बेटेलहाइम धरि प्रत्येक कसौटीपर विश्लेषण सहि सकए आ प्रत्येकसँ नव अर्थ दिअए। जे बालक ई सैंतीस पोथी पढ़त, से खाली सैंतीस खिस्सा नहि पढ़त — ओ एकटा भाषाक स्मृति, एकटा समाजक विवेक आ एकटा परम्पराक भविष्य पढ़त। आ जे समीक्षक एकरा पढ़त, से मानत जे मैथिली बाल-उपन्यास आब कोनो 'अभावक क्षेत्र' नहि — ओ एकटा भरल-पूरल, आत्म-सचेत, विश्व-संवादी वाङ्मय थिक, जकर घाट सभ एक्कहि पोखरिक थिक, आ पोखरिक नाम — मिथिला। समाप्त VIDEHA: विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका: ISSN 2229-547X: www.videha.co.in अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.२२. गजेन्द्र ठाकुर- नाट्य-नवग्रह गजेन्द्र ठाकुर- नाट्य-नवग्रह नअ मैथिली नाटकक अन्तर्सम्बन्धित समीक्षा कमलाक भगता · दानवीर दधीची · अपाला आत्रेयी · भऽ जाएब छू · जलोदीप संकर्षण · गंगा ब्रिज · मचण्ड · उल्कामुख नाटककार गजेन्द्र ठाकुर सम्पादक, विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) | ISSN 2229-547X विषय-सूची भूमिका : नअ नाटक, एकटा रंग-चिन्तन १. कमलाक भगता : निशान, परम्परा आ अन्धानुकरणक हास्य-शल्यक्रिया २. दानवीर दधीची : हड्डीक दन्तकथासँ ज्ञान-दान धरि ३. अपाला आत्रेयी : देहक दाग, दृष्टिक रोग आ ऋचाक जन्म ४. भऽ जाएब छू : मैथिलीक पहिल जलवायु-चेतना चौबटिया नाटकक पाठ ५. जलोदीप : बाढ़ि, बच्चा आ पानिक बाटक नाट्यशास्त्र ६. संकर्षण : चोटकेँ सत्कार कहबाक रोग आ आत्मबोधक जुत्ता ७. गंगा ब्रिज : विकासक बलिवेदीपर इतिहासक ठक-ठुक ८. मचण्ड : भाषा, न्याय आ आतंकक त्रिकोणमे मनुक्ख ९. उल्कामुख : स्मृति-विस्मृतिक महासंग्राम — नाट्य-शृंखलाक शिखर उपसंहार : नअ नाटक, एक नाट्य-दर्शन भूमिका : नअ नाटक, एकटा रंग-चिन्तन प्रस्तुत पोथीमे गजेन्द्र ठाकुरक नअ टा मैथिली नाटकक समीक्षा एकत्र कएल गेल अछि — कमलाक भगता, दानवीर दधीची, अपाला आत्रेयी, भऽ जाएब छू, जलोदीप, संकर्षण, गंगा ब्रिज, मचण्ड आ उल्कामुख। पहिल पाँचटा रचना बाल-नाटकक कोटिमे अबैत अछि आ शेष चारिटा प्रौढ़ दर्शक लेल लिखल गेल अछि। मुदा ई विभाजन प्रशासनिक मात्र अछि; नअटा नाटक मिलि कऽ एकटा अखण्ड रंग-चिन्तन प्रस्तुत करैत अछि, जकर एक छोरपर कमलाक भगताक सूत्रधारक सोझ सीख अछि — पूछू, बुझू, फेर करू — आ दोसर छोरपर उल्कामुखक आचार्य सिंहक गूढ़ सूत्र — अपूर्ण पाठक विस्मरण नै भऽ सकैए, विस्मरण होइए मात्र पूर्ण पाठ। एक बाल-दर्शककेँ प्रश्न करब सिखबैत अछि, दोसर प्रौढ़ दर्शककेँ स्मरणक राजनीति बुझबैत अछि; दुनूक बीच सात टा सीढ़ी अछि आ प्रत्येक सीढ़ी अपनासँ पहिलुका आ बदुका सीढ़ीकेँ अरघबैत अछि। एहि पोथीक पद्धति द्विस्तरीय अछि। पहिल स्तरपर प्रत्येक नाटकक स्वतंत्र समीक्षा अछि — कथा-संरचना, मंच-विधान, रस-योजना आ वैचारिक अन्तर्वस्तुक विवेचन। दोसर स्तरपर प्रत्येक समीक्षा शेष आठ नाटकसँ अपन सम्बन्ध-सूत्र जोड़ैत अछि, जकरा जूलिया क्रिस्तेवा अन्तर्पाठीयता कहैत छथि — कोनो पाठ असगर नहि जनमैत अछि, ओ आन पाठ सभक उद्धरण, प्रतिध्वनि आ रूपान्तरणक ताना-बानासँ बुनल जाइत अछि। ई नअ नाटक एक्के नाटककारक कलमसँ निकलल अछि, तेँ एतऽ अन्तर्पाठीयता आकस्मिक नहि, सायास अछि: दधीची आ जलोदीप दुनूक अन्तमे एक्के फुसफुसाहटि सुनाइ दैत अछि — ई असल बात अछि; भऽ जाएब छूक किशोर बुच्चीक नाम अपाला अछि, जे अपाला आत्रेयीक नायिकाक स्मरण करबैत अछि; संकर्षण आ उल्कामुख दुनू अंकक बदला कल्लोलमे बँटल अछि; गंगा ब्रिजक डंका आ उल्कामुखक लोकगीत दुनू लिखित इतिहासक समानान्तर लोक-स्मृतिक वाहक अछि। ई सभ सूत्र पकड़लापर नअ नाटक नअ टा फराक पोथी नहि, एकटा नाट्य-नवग्रह बुझाइत अछि। सैद्धान्तिक उपकरणक चुनाव विषयानुसार कएल गेल अछि। भारतीय पक्षमे भरतक नाट्यशास्त्रक रस-व्यवस्था, नाट्यधर्मी-लोकधर्मी भेद, सूत्रधार-परम्परा आ रंगमंचक अंग-विभाजन; अभिनवगुप्तक साधारणीकरण; आनन्दवर्धनक ध्वनि; कुन्तकक वक्रोक्ति; क्षेमेन्द्रक औचित्य-विचार; आ मैथिलीक अपन कीर्तनियाँ तथा लोकगाथा-परम्पराक कसौटी प्रयुक्त भेल अछि। पाश्चात्य पक्षमे अरस्तूक काव्यशास्त्र, बर्गसाँक हास्य-विवेचन, ब्रेष्टक महाकाव्यात्मक रंगमंच आ शिक्षा-नाटक, पिस्काटरक दस्तावेजी रंगमंच, बादल सरकारक तेसर रंगमंच, सफदर हाशमीक नुक्कड़-परम्परा, आगुस्तो बोआलक दमित लोकक रंगमंच, टी.आइ.ई. (थिएटर इन एजुकेशन) आन्दोलन, पीटर स्लेडक बाल-नाट्य सिद्धान्त, ब्रायन वे आ डोरोथी हीथकोटक शिक्षा-नाट्य पद्धति, ब्रूनो बेटेलहाइमक लोककथा-मनोविज्ञान, लेव भाइगोत्स्कीक खेल-सिद्धान्त, अर्विंग गॉफमनक कलंक-विमर्श, काफ्का आ पिरान्देलोक आधुनिकतावादी दृष्टि, वाल्टर बेन्यामिनक इतिहास-दर्शन आ यान असमानक सांस्कृतिक स्मृति-सिद्धान्त सहायक भेल अछि। कोनो सिद्धान्त नाटकपर बाहरसँ लादल नहि गेल अछि; जतऽ पाठ स्वयं जाहि कसौटीक माँग करैत अछि, ओतहि ओ कसौटी लगाओल गेल अछि। बाल-नाट्य आ प्रौढ़-नाट्यक सिद्धान्त-भेदपर एकटा गप एतहि स्पष्ट कऽ देब उचित। पीटर स्लेड बाल-नाटककेँ प्रौढ़ रंगमंचक छोट संस्करण नहि, एकटा स्वतंत्र कला-रूप मानैत छथि, जकर प्राण अछि खेल, सहभागिता आ वृत्ताकार स्थान; डोरोथी हीथकोट बच्चाकेँ विशेषज्ञक चोगा (मैंटल ऑफ द एक्सपर्ट) पहिरा कऽ ज्ञानक भीतरसँ सोचब सिखबैत छथि। एहि पोथीक पाँचू बाल-नाटक एहि कसौटीपर परखल गेल अछि — ओ सभ बच्चाकेँ उपदेश सुननिहार नहि, प्रश्न पुछनिहार, खेल खेलनिहार आ प्रतिज्ञा केनिहार बनबैत अछि। प्रौढ़ नाटक सभमे ठीक उनटा दिशा अछि — ओतऽ दर्शकक सहज विश्वास तोड़ल जाइत अछि, ब्रेष्टक भाषामे परिचितकेँ अपरिचित बनाओल जाइत अछि, जाहिसँ दर्शक भावुक बहावमे नहि भँसिया कऽ विचार करथि। एक दिस बच्चाकेँ संसारसँ जोड़बाक कला, दोसर दिस प्रौढ़केँ संसारसँ टोकबाक कला — दुनूक बीच जे सेतु अछि, सएह ई नअ नाटक। समीक्षाक क्रम एहि पोथीमे पठन-यात्राक क्रम अछि: पहिने पाँच बाल-नाटक — लोककथा (कमलाक भगता), वैदिक आख्यान (दानवीर दधीची, अपाला आत्रेयी), आ समकालीन संकट (भऽ जाएब छू, जलोदीप); तकर बाद चारि प्रौढ़ नाटक — व्यक्तिक दंभ (संकर्षण), व्यवस्थाक हिंसा (गंगा ब्रिज), राज्य आ आतंकक द्वन्द्व (मचण्ड) आ अन्तमे स्मृतिक महासंग्राम (उल्कामुख), जे शेष आठूकेँ अपनामे समेटि लैत अछि। पाठक चाहथि तँ कोनो एकटा समीक्षा फराक पढ़ि सकैत छथि, मुदा अन्तर्पाठीय सूत्र सभक असल स्वाद क्रमसँ पढ़लापर भेटत। १. कमलाक भगता : निशान, परम्परा आ अन्धानुकरणक हास्य-शल्यक्रिया कमलाक भगता एहि नाट्य-शृंखलाक सभसँ छोट रचना अछि आ सम्भवतः सभसँ चोटगर सेहो। उपशीर्षक स्वयं घोषणा करैत अछि — अन्धानुकरणपर एकटा चोटगर हास्य-शिक्षाप्रद बाल-नाटक — आ सूत्रधार आरम्भहिमे कहि दैत छथि जे कथा संस्कृत साहित्यक प्रसिद्ध कथापर आधारित अछि। कथा-वस्तु सरल अछि: एकटा भिखमंगा बरखक बचाओल पाइक चुकड़ी लऽ कऽ कमला-स्नान करऽ अबैत अछि, जनकपुर जा कऽ कमलाक भगता बनबाक सपना लेने। चोरीक डरे ओ चुकड़ी बालुमे गाड़ि दैत अछि आ चिन्हबाक हेतु ओहिपर पएरसँ बालु चढ़ा कऽ शिवलिंग बना दैत अछि। तकर बाद जे होइत अछि से एहि नाटकक असल नाट्य-घटना अछि: एक-एक कऽ अबैत स्नानार्थी ओहि शिवलिंगकेँ स्थानीय विधान बुझि अपन-अपन शिवलिंग बनबऽ लगैत छथि, मंच हर-हर महादेवक अनघोलसँ भरि जाइत अछि, आ नहा कऽ घुरल भिखमंगा शिवलिंगक समुद्रमे अपन निशान हेरा दैत अछि। सूत्रधारक निष्कर्ष-वाक्य एहि नाटकक बीज-मंत्र अछि — चिन्ह अपना लेल बनल छल, परम्परा सभ लेल बनि गेल। भरतक रस-व्यवस्थामे हास्यक स्थायी भाव हास अछि, आ भरत हासक दू भेद करैत छथि — आत्मस्थ, जाहिमे पात्र स्वयं हँसैत अछि, आ परस्थ, जाहिमे पात्रक चेष्टा देखि आन हँसैत अछि। कमलाक भगताक हास्य विशुद्ध परस्थ अछि: मंचपर कियो नहि हँसैत अछि — भिखमंगा गम्भीर अछि, स्नानार्थी सभ श्रद्धालु छथि — मुदा दर्शक-दीर्घामे हँसीक लहरि उठैत अछि, कारण दर्शक ओ जनैत छथि जे पात्र नहि जनैत अछि। नाट्य-समीक्षाक भाषामे ई विडम्बनाजन्य हास्य (ड्रामेटिक आइरनी) अछि आ बाल-दर्शक लेल एकर विशेष महत्व अछि: बच्चा एतऽ पात्रसँ बेसी जननिहार स्थितिमे राखल जाइत अछि, जे ओकर आत्मविश्वास बढ़बैत अछि आ सीखकेँ उपदेश नहि, अपन खोज बुझबैत अछि। आनन्दवर्धनक ध्वनि-सिद्धान्तक कसौटीपर सूत्रधारक अन्तिम वाक्य उल्लेखनीय अछि — वाच्यार्थ एकटा घाटक घटनाक वर्णन अछि, मुदा व्यंग्यार्थ समस्त कर्मकाण्ड, सामाजिक रीति आ भेँड़ियाधसान संस्कृतिपर पसरि जाइत अछि। क्षेमेन्द्रक औचित्य-दृष्टिसँ सेहो रचना खरा अछि: बाल-दर्शक लेल दण्ड-विधान हिंसक नहि अछि — भिखमंगाकेँ मारि नहि पड़ैत अछि, ओकर धन मात्र ओकरे बनाओल निशानक भीड़मे हेरा जाइत अछि, माने दण्ड कथाक तर्कसँ उपजैत अछि, बाहरसँ नहि आबैत अछि। पाश्चात्य कसौटीपर ई रचना ब्रेष्टक शिक्षा-नाटक (लेयरश्ट्यूक) क निकट अछि — एहन नाटक जकर उद्देश्य दर्शककेँ आनन्दक संग एकटा विश्लेषण-क्षमता देब अछि। अन्तमे सभ पात्र मिलि कऽ दर्शक दिस उन्मुख भऽ जे सामूहिक वाक्य बजैत छथि — पूछू, बुझू, फेर करू। आँखि मूनि कऽ नकल नहि करू — से ब्रेष्टक प्रत्यक्ष सम्बोधन (डाइरेक्ट एड्रेस) क तकनीक अछि, जे चारिम देवाल तोड़ि दर्शककेँ निर्णायक बनबैत अछि। ब्रूनो बेटेलहाइम लोककथाक मनोवैज्ञानिक कार्य ई बतबैत छथि जे ओ बच्चाक भीतरक डर — एतऽ सम्पत्ति हेरेबाक डर — केँ सुरक्षित काल्पनिक ढाँचामे प्रकट कऽ ओकर निष्पत्ति करैत अछि; भिखमंगाक क्षति बच्चाकेँ डरबैत नहि अछि, सावधान करैत अछि, कारण कथाक अन्तमे समुदाय बालु समेटबाक सामूहिक अभिनय करैत अछि — क्षतिक बाद मरोम्मतिक छवि। अन्तर्पाठीय दृष्टिसँ कमलाक भगता एहि शृंखलाक बीज-नाटक अछि। एकर केन्द्रीय रोग — बिनु कारण बुझने क्रिया दोहराएब — प्रौढ़ रूपमे संकर्षणमे घुरि कऽ अबैत अछि: ओतऽ तीनटा कारी कुकुर बेरा-बेरी मधुर-दोकानपर चोट खाइत अछि आ प्रत्येक अपन चोटकेँ सत्कार कहि दोसराकेँ ओही बाटे पठबैत अछि — माने कमलाक भगताक स्नानार्थी-भीड़ ओतऽ तीन पात्रमे घनीभूत भऽ गेल अछि, आ अनुकरणक रोगमे आत्म-प्रवंचनाक नव परत जुड़ि गेल अछि। दोसर दिस जलोदीप आ भऽ जाएब छू एकर प्रतिषेध (एंटीडोट) प्रस्तुत करैत अछि — ओतऽ बच्चा सभ भीड़क विपरीत प्रश्न पुछनिहार अछि; कमलाक भगता जाहि व्याधिक निदान करैत अछि, ओ दुनू नाटक ओकर चिकित्सा-पद्धति सिखबैत अछि। आ उल्कामुखमे यएह रोग अपन सभसँ भयावह रूपमे प्रकट होइत अछि — आचार्य सरभक रटन्त विद्या, जतऽ बिनु बुझने पाठ यादि कराओल जाइत अछि; शिवलिंगक नकलसँ शास्त्रक नकल धरिक ई यात्रा एहि नाट्य-संसारक एकटा सुसंगत चिन्ता-रेखा अछि। सीमाक चर्च करी तँ नाटकक संरचना एक्के घटना आ एक्के व्यंग्यपर टिकल अछि, तेँ मंचनमे गति आ ध्वनि-विधानक अनुशासन अनिवार्य अछि — पाठमे देल ध्वनि-संकेत (भिक्षाक स्वर, सिक्का खनखन, कमलाक धार, बालु कोड़बाक सरसराहटि, भीड़क अनघोल आ अन्तक चुप्पी) एकटा पूरा श्रव्य-वास्तु रचैत अछि आ चुप्पीक ओ अन्तिम क्षण, जखन भीड़ बुझि जाइत अछि जे विधान बतौनिहारकेँ कारण नहि बुझल छल, एहि छोट नाटकक सभसँ पैघ रंग-क्षण अछि। छोट कलेवरमे एतेक परिपूर्ण वृत्त बहुत कम बाल-नाटकमे भेटैत अछि। २. दानवीर दधीची : हड्डीक दन्तकथासँ ज्ञान-दान धरि दानवीर दधीचीक सभसँ साहसिक निर्णय ओकर उपशीर्षकहिमे अछि — ज्ञान, प्रतिज्ञा आ सत्यक रक्षाक वैदिक नाट्य-गाथा — आ मंच-निर्देशहिमे स्पष्ट कएल गेल अछि जे सुधारल पाठमे दधीचीक दानकेँ हड्डी-दंतकथा नहि, बल्कि ज्ञान, प्रतिज्ञा, पात्रता आ सत्यक रक्षा रूपमे प्रस्तुत कएल गेल अछि। नाटकक अन्तमे सूत्रधार एहि पुनर्पाठकेँ घोषित करैत छथि: दधीची अपन देह नहि, ज्ञान, प्रतिज्ञा आ सत्यक रक्षा दान केलन्हि; हड्डीसँ वज्र बनएबाक कथा पछाति पौराणिक लोकनिक अनर्थ अछि। ई कोनो मनगढ़न्त संशोधन नहि — वैदिक वाङ्मयमे दध्यङ् आथर्वणक कथा मधुविद्या आ अश्व-मस्तकसँ जुड़ल अछि, जकर संकेत ऋग्वेदक अश्विनौ-सूक्त आ शतपथ ब्राह्मणक मधु-काण्ड धरि जाइत अछि; हड्डी-वज्रक प्रचलित रूप परवर्ती पौराणिक विकास अछि। रोलाँ बार्थ मिथककेँ एहन वाणी कहैत छथि जे इतिहासकेँ प्रकृति बना दैत अछि — जे बात कहियो कोनो विशेष अर्थमे कहल गेल छल, ओ मिथक बनि सर्वकालिक आ निर्विवाद बुझाए लगैत अछि। ई नाटक ठीक उनटा क्रिया करैत अछि: जमल मिथककेँ फेरसँ इतिहास आ अर्थमे घोरैत अछि, आ बाल-दर्शककेँ अन्तिम पाँतीमे सोझे कहि दैत अछि — कथा बदलि सकैए, मुदा सत्यक खोज बन्न नहि हेबाक चाही। बाल-नाटकमे स्रोत-समीक्षाक ई पाठ अनूठा अछि। रस-योजनाक दृष्टिसँ नाटकक शीर्षक स्वयं सिद्धान्त-सङ्केत अछि। संस्कृत काव्यशास्त्रमे वीर रसक तीन भेद मानल गेल अछि — युद्धवीर, धर्मवीर आ दानवीर; दानवीर दधीची शीर्षकहिसँ घोषणा करैत अछि जे एतऽ वीर रसक आलम्बन युद्ध नहि, दान अछि, आ ओहो दान भौतिक वस्तुक नहि, विद्याक। इन्द्रक बज्र-प्रहारक क्षणमे भयानक आ अश्विनौक शल्य-चमत्कारमे अद्भुतक स्पर्श अछि, मुदा समग्र रस-परिपाक शान्त दिस झुकल अछि — महर्षिक ओ वाक्य जे ई शरीर तँ अछि क्षणभंगुर... ताहि डरसँ हम ब्रह्म विद्याक लोप नहि होए देबैक, शान्त रसक स्थायी भाव निर्वेद (शम) क विशुद्ध अभिव्यक्ति अछि। भरतक नाट्यशास्त्र मंचपर वधक प्रत्यक्ष प्रदर्शनकेँ अनुचित मानैत अछि, आ ई नाटक ओहि मर्यादाक रचनात्मक पालन करैत अछि: गरदनि कटबाक दुनू क्षण परदाक अधखसल-अधउठल खेलमे, प्रकाश आ ध्वनिक संकेतसँ निष्पन्न होइत अछि — मंच-निर्देश स्पष्ट कहैत अछि, ध्वनि आ प्रकाशसँ भय, हिंसा नहि। नाट्यधर्मी शैलीक ई प्रयोग — परदाक बेर-बेर उठब-खसब, जे शल्यक्रियाक कालखण्डकेँ छाँटि दैत अछि — बाल-रंगमंच लेल हिंसा-चित्रणक एकटा अनुकरणीय समाधान अछि। पात्र-रचनामे अरस्तूक काव्यशास्त्रक दूटा केन्द्रीय युक्ति सक्रिय अछि — पेरिपेटिया (भाग्य-पलट) आ एनाग्नोरिसिस (आत्म-पहचान), आ दुनू दधीचीमे नहि, इन्द्रमे घटित होइत अछि। जे इन्द्र पहिल दृश्यमे आश्वासन पहिने लिअ, प्रश्न बादमे — क कूट-नीतिसँ विद्या झटकैत छथि आ ज्ञान पर पहरा हमर रहत कहि धमकी दऽ जाइत छथि, वएह तेसर चरणमे काँपैत हाथे बज्र लेने क्षमा माँगैत छथि — हम ज्ञानक रक्षा करबाक नाम पर ज्ञानक हत्या करऽ गेल रही। खलनायकक ई आन्तरिक यात्रा नाटककेँ सपाट नीति-कथासँ ऊपर उठबैत अछि; प्रतिपक्षमे अश्विनौक पात्रता-तर्क — सेवा हमरा पात्र बनेलक, पद नहि — दानक शास्त्रीय शर्त (पात्रे दानम्) केँ आधुनिक, श्रम-सम्मानक अर्थ दैत अछि। ध्यान देबा जोग अछि जे च्यवन-प्रसंग आ सोमपीथी बनबाक कथा-सूत्र वैदिक-पौराणिक परम्परासँ प्रामाणिक रूपेँ आनल गेल अछि। अन्तर्पाठीय जालमे दानवीर दधीचीक सभसँ गहींर सूत्र उल्कामुखसँ जुड़ैत अछि। इन्द्रक धमकी — ई मधु-विद्या ककरो देलहुँ तँ माथ खसत — आ उल्कामुखक चौपाड़िक ओ व्यवस्था, जतऽ बाहरक विद्यार्थीकेँ तत्वचिन्तामणिक प्रतिलिपि आ सार-संक्षेप धरिक अनुमति नहि छल, एक्के अपराधक दू युग अछि: ज्ञानपर पहरा। दधीची ओहि पहराक उत्तर अपन देहक जोखिमसँ दैत छथि, गंगेश-वल्लभा गीतक माध्यमे — मुदा दुनू ठाम नाटककारक पक्ष एक्के अछि, जकरा दधीचीक वाक्यमे कहल गेल अछि: ज्ञान रोकेनिहारसँ पैघ अपराधी कियो नहि। दोसर सूत्र अपाला आत्रेयीसँ अछि — दुनू वैदिक बाल-नाटक अछि, दुनूमे गुरुकुल-जीवनक विस्तृत आ प्रामाणिक चित्रण अछि, आ दुनूमे विद्या अन्ततः देहक सीमासँ पैघ सिद्ध होइत अछि: ओतऽ अपालाक ऋचा त्वचाक दागसँ, एतऽ दधीचीक मधुविद्या गरदनिक कटानसँ। आ तेसर सूत्र कमलाक भगतासँ — ओतुका बिनु कारण बुझने नकल एतऽ इन्द्रक आरम्भिक रूपमे झलकैत अछि, जे ज्ञान चाहैत छथि प्रतिष्ठा लेल, बुझबा लेल नहि। नाटकक अन्तिम फुसफुसाहटि — ई असल बात अछि — शब्दशः जलोदीपक समापनमे घुरि कऽ अबैत अछि; ई नाटककारक हस्ताक्षर-ध्वनि अछि, जकर चर्च उपसंहारमे हएत। मंचन-दृष्टिसँ तीन लोकक भाव-विभाजन — आश्रममे स्वर्णिम शान्ति, इन्द्रक प्रवेशमे तीख उजास, युद्धस्थलमे धुआँमय लालिमा — प्रकाश-परिकल्पनाकेँ अर्थ-वाहक बनबैत अछि, आ शर्यणा जलाशय तथा शस्त्र-निर्माणक सूची (त्रिसंधि व्रज, सूचीमुख, विकंकतीमुख आदि) वैदिक सन्दर्भक गन्ध बचौने रखैत अछि। अन्तिम चेतावनी — शस्त्रक धर्म रक्षा अछि, दंभ नहि — नाटककेँ युद्धोन्मादसँ बचा कऽ ओकर शान्त-रसीय समापन सुरक्षित करैत अछि। ३. अपाला आत्रेयी : देहक दाग, दृष्टिक रोग आ ऋचाक जन्म अपाला आत्रेयी एहि शृंखलाक तेसर वैदिक-स्रोत रचना अछि आ सम्भवतः सभसँ साहसी, कारण एकर नायिका ऋग्वेदक ओ विरल स्त्री-द्रष्टा अछि जिनक सूक्त संहितामे सुरक्षित अछि। नाटक सात दृश्यमे अपालाक जीवन-वृत्त रचैत अछि: आश्रमक जिज्ञासु बालिका, कन्या आ कुमार दुनूक उपनयन आ शिक्षा, त्वक्-रोग (श्वेत कुष्ठ) क आगमन, कृशाश्वसँ विवाह, पतिक क्रमिक उदासीनता, आत्मसम्मानक संग पितृ-तपोवन प्रत्यावर्तन, सोम थकुचैत इन्द्र-स्तुति, रोग-मुक्ति आ ब्रह्मोदय सभामे अपन ऋचाक ऋक्-प्रवेश। सोम-दृश्यक सामग्री — छोट खुट्टीक सोम, दाँतसँ थकुचल, तीन ठामक उत्पत्तिक प्रार्थना (पिताक मस्तक, खेत आ उदर), रथ आ युगक छिद्रसँ शुद्धि, सूर्यसमान त्वचा — ऋग्वैदिक अपाला-सूक्तक प्रामाणिक प्रतिध्वनि अछि; नाटककार श्रुतिक बिम्ब-सामग्रीकेँ मंच-क्रियामे बदलैत छथि, ओकरा तोड़ैत-मरोड़ैत नहि छथि। मंच-सज्जामे साही, गोहि आ गिरगिटक उपस्थिति सेहो सूक्तक त्वचा-रूपान्तरण-प्रतीकसँ आएल अछि। एहि नाटकक वैचारिक केन्द्र एकटा सूक्ष्म व्युत्क्रम अछि, जे अपालाक वाक्यमे धारदार भऽ कऽ बहराइत अछि — दाग देहपर अछि, दृष्टि अहाँक बीमार भेल अछि। अर्विंग गॉफमनक कलंक-सिद्धान्त (स्टिग्मा) कहैत अछि जे कलंक देहक गुण नहि, समाजक दृष्टिक सम्बन्ध अछि — कलंकित व्यक्तिक पहचान ओकर समग्रतासँ काटि कऽ एक्के चिन्हपर सीमित कऽ देल जाइत अछि। नाटक एहि सिद्धान्तकेँ जेना पूर्वहिसँ जनैत अछि: अत्रि आरम्भहिमे चिन्तित छथि जे रोग देहपर अछि, मुदा समाज एकरा आत्मापर आरोप बना दै छै, आ कृशाश्वक स्वीकारोक्ति — हमरा भीतर संघर्ष अछि प्रेम आ वासनाक... हम अपन दुर्बलता कहि रहल छी, ओकरा धर्मक नाम नहि दऽ सकै छी — खलनायकत्वक जगह मानवीय दुर्बलताक ईमानदार चित्र अछि। ई ईमानदारी नाटककेँ मेलोड्रामासँ बचबैत अछि: कृशाश्व दुष्ट नहि छथि, हुनक दृष्टि रोगग्रस्त अछि, आ नाटकक करुणा दुनू दिस बँटैत अछि। मुदा समापनमे नाटक करुण रसक अश्रु-मार्ग नहि पकड़ैत अछि — अपाला घुरल कृशाश्वक पश्चात्तापकेँ स्वीकारो नहि करैत छथि, अस्वीकारो नहि; ओ मात्र अपन नव पहचान घोषित करैत छथि: हम अपाला आत्रेयी छी — ककरो दया नहि, अपन ऋचाक दृष्टा। करुणसँ वीरमे रसक ई संक्रमण — जकरा आत्मगौरवक वीर कहल जा सकैत अछि — एहि नाटकक शास्त्रीय उपलब्धि अछि, आ अन्तिम प्रकाश-निर्देश (अपाला दिस वेदीक प्रकाश बढ़ैत, कृशाश्व दिस मद्धिम) ओकर मंचीय मुहर। स्त्री-विमर्शक कसौटीपर नाटकक सभसँ मूल्यवान पक्ष ई अछि जे ओ अपालाकेँ पीड़िता-कथासँ निकालि स्रष्टा-कथामे स्थापित करैत अछि। ब्रह्मोदय सभाक ऋषिगण जखन कहैत छथि — सम्मिलित करबाक आ नहि करबाक तँ प्रश्ने नहि अछि। ई तँ आइसँ ऋकक भाग भेल। अपालाक नाम मंत्रसँ अलग नहि कएल जाए — तखन नाटक स्त्री-रचनाकारक नाम-सहित स्वीकृतिक ओ आदर्श रचैत अछि जकर ठीक विलोम उल्कामुखमे देखाओल गेल अछि, जतऽ वल्लभाक गीत नाम कटा कऽ बँसबिट्टीक भुतहा गीत बनि भटकैत अछि आ आचार्य सिंह-व्याघ्र नाम-लोपसँ प्रतीक बनि जाइत छथि। दुनू नाटक मिलि कऽ स्मृति-राजनीतिक दू ध्रुव देखबैत अछि: नाम-सहित स्मरण (अपाला) आ नाम-रहित विस्मरण (वल्लभा)। सूत्रधारक समापन-वाक्य — देहक घाव भरि सकैए, दृष्टिक घाव विद्यासँ भरैए — एहि शृंखलाक विद्या-केन्द्रित दर्शनकेँ दधीचीक ज्ञान-दानसँ जोड़ैत अछि; ओतऽ विद्या मृत्युसँ पैघ छल, एतऽ कलंकसँ। बाल-नाट्य सिद्धान्तक दृष्टिसँ किछु बारीक निर्णय प्रशंसनीय अछि। रोगक दृश्य-संकेत हलुक उज्जर कपड़ा आ प्रकाशसँ, उपहाससँ नहि — ई निर्देश क्षेमेन्द्रक औचित्य आ आधुनिक समावेशी शिक्षा-दृष्टि दुनूक संगम अछि: बाल-दर्शक रोगकेँ देखथि, मुदा घृणा वा हास्यक वस्तु नहि बनए। उपनयन-दृश्यमे अत्रिक घोषणा — एतय कन्या आ कुमार दुनूकेँ प्रश्न करबाक अधिकार अछि; प्रश्ने विद्याक पहिल सीढ़ी अछि — भऽ जाएब छू आ जलोदीपक प्रश्न-संस्कृतिक वैदिक पूर्वज अछि, आ आश्रम-नियमक विवरण (वनक प्राणी अवध्य, अकृष्टपच्य अन्नक प्रयोग, हरिणकेँ निर्विघ्न टहलबाक अनुमति) भऽ जाएब छूक पारिस्थितिकी-चेतनाकेँ प्राचीन आधार दैत अछि — विद्या ओ प्रकृति, दुनू पर अधिकार नहि, सेवा करबाक अछि। स्मरणीय जे भऽ जाएब छूक किशोर बुच्चीक नाम अपाला आ किशोर बौआक जोड़ीदार जयन्त अछि — नाटककार अपन बाल-पात्रकेँ अपनहि नाट्य-संसारक पूर्वजक नाम दऽ कऽ एकटा भीतरी स्मृति-शृंखला चलबैत छथि, जे एहि पोथीक अन्तर्पाठीय पद्धतिकेँ स्वयं नाटककारक अभिप्राय सिद्ध करैत अछि। सीमा-पक्षमे दृश्य दूक शिक्षा-सूची (वर्ण, मात्रा, बलाघात, साम-गान आदि) मंचनमे स्थैतिक भऽ सकैत अछि, मुदा पाठ स्वयं एकर उत्तर दैत अछि — अपालाक बीच-बीचक प्रश्न (जँ उच्चारणमे दोष होइ तँ अर्थ बदलि जाइ छै; जँ दृष्टिमे दोष होइ तँ मनुक्ख बदलि जाइ छै) सूचनाकेँ संवादमे गूँथि दैत अछि। समग्रतः अपाला आत्रेयी बाल-नाटकक चोगामे एकटा परिपक्व स्त्री-गौरव-नाट्य अछि, जे करुणाक जगह सम्मान माँगैत अछि। ४. भऽ जाएब छू : मैथिलीक पहिल जलवायु-चेतना चौबटिया नाटकक पाठ भऽ जाएब छू अपन उपशीर्षकमे दूटा दाबी करैत अछि — मैथिलीक पहिल जलवायु-चेतना (क्लाइमेट फिक्शन) नाटक, आ बाल चौबटिया-सड़क नाटक — आ दुनू दाबीक निर्वाह रचना-विधानमे स्पष्ट अछि। एतऽ ने मंच अछि, ने परदा; सूत्रधार भीड़केँ हाक दैत छथि — घेराबा बना लिअ — आ निर्देश दर्शकहुकेँ कहैत अछि जे गोल घेरा बना कऽ हबाक रास्ता खाली राखथि। ई वृत्ताकार, उपकरण-मुक्त, दर्शक-वेष्टित स्थान बादल सरकारक तेसर रंगमंचक मूल-मंत्र अछि — एहन रंगमंच जे प्रेक्षागृहक अर्थतंत्रसँ मुक्त भऽ लोकक बीच चलि जाए — आ सफदर हाशमीक नुक्कड़-परम्पराक सेहो, जतऽ नाटक दर्शक लग जाइत अछि, दर्शक नाटक लग नहि। सूत्रधार आ भीड़सँ निकलल कलाकारक आरम्भिक नोक-झोंक (नाटक देखलासँ भोजन चलतौ रौ?) नुक्कड़-शैलीक प्रामाणिक उद्घाटन अछि, आ सूत्रधारक उत्तर — पेटक भूख, मोनक भूख, बोलीक भूख आ हबाक भूख — नाटकक विषयकेँ रोजी-रोटीक प्रश्नसँ जोड़ि कऽ जलवायु-विमर्शक ओहि आलोचनाक उत्तर पहिनहि दऽ दैत अछि जे एकरा सम्पन्न लोकक विलास कहैत अछि। संरचना तीन भागमे अछि — सृष्टिक पात्र सभ, विज्ञान आ कल्पना, आ प्रतिज्ञा — आ पात्र-योजना पीटर स्लेडक बाल-नाट्य सिद्धान्तक पाठ्य-पुस्तकीय उदाहरण अछि। आठ कलाकार आठ भूमिका उठबैत छथि: चिड़ै-भगजोगनी (ओम, आस्था), गाछ-बृच्छ (जयन्त, अपाला), सूर्य-तरेगण आ चन्द्र (विजय, विजया), भूत-प्रेत बनल असफल वैज्ञानिक नेकलाल आ स्वप्न-कल्पना बनलि रामवती। स्लेड कहैत छथि जे बच्चाक खेलमे वस्तु आ प्राणी बनि जेबाक क्षमता (प्रोजेक्टेड आ पर्सनल प्ले) ओकर सहज कला अछि; ई नाटक ओही क्षमताकेँ रंग-विधान बना लैत अछि — मनुष्येतर संसार मंचपर बाजैत अछि, आ जलवायु-संकट अमूर्त आँकड़ा नहि रहि पात्रक जीवन-मरणक प्रश्न बनि जाइत अछि। विज्ञान-सम्प्रेषणक स्तरपर नाटक अद्भुत रूपेँ ठोस अछि: भगजोगनीक शीतल प्रकाश (जैव-दीप्ति) आ नेकलालक सोलह आनामे पन्द्रह आना गर्मी बला अकुशल प्रकाशक तुलना ऊर्जा-दक्षताक पूरा पाठ एक बिम्बमे दऽ दैत अछि; यूकेलिप्टस-प्रसंग (जे गाछ माटिक प्यास नै बुझै, ओकरा रोपलासँ जंगल नहि बनै छै) देसी प्रजातिक पारिस्थितिकी-तर्क अछि; आ बीया महीसक केसमे फँसि दूर देश जेबाक गीत बीज-प्रकीर्णनक विज्ञानकेँ लोकगीतक लयमे बान्हि दैत अछि। कल्पना (रामवती) आ विज्ञान (नेकलाल) क नोक-झोंक एहि नाटकक दार्शनिक धुरी अछि — बुझलो गप जँ व्यवहारमे नहि उतरल तँ विज्ञानो अधूरा — जे ज्ञान आ आचरणक ओही खाधिकेँ चिन्हैत अछि जकरा कमलाक भगता नकलक रूपमे आ संकर्षण दंभक रूपमे देखबैत अछि। आगुस्तो बोआलक दमित लोकक रंगमंचक केन्द्रीय अवधारणा अछि प्रेक्षक-कर्ता (स्पेक्ट-एक्टर) — दर्शक जे देखिते-देखिते कर्ता बनि जाए। भऽ जाएब छूक तेसर भाग ठीक यएह करैत अछि: आठू पात्र अपन-अपन प्रतिज्ञा बजैत छथि (हम जतेक काटब, ताहिसँ बेसी रोपब; हम देसी गाछ चिन्हब, बीया बचाएब; हम पुरान गलती मानब...) आ तखन दर्शक दिस हाथ पसारि पुछैत छथि — कहू, अहाँ सभ सेहो? — आ निर्देश अछि जे कलाकार दर्शकसँ हँ कहाबथि। बोआल रंगमंचकेँ क्रान्तिक पूर्वाभ्यास कहैत छथि; एतऽ ओ पूर्वाभ्यास प्रतिज्ञाक सामूहिक उच्चारण अछि। खोंखीक प्रयोग नाटकक सभसँ मार्मिक ध्वनि-युक्ति अछि — गाछक मरणक गीतक बाद सभ पात्र खोंखी करैत छथि आ ओ खोंखी धीरे-धीरे तालमे बदलि जाइत अछि: प्रदूषणक देह-चिन्ह कलाक लयमे रूपान्तरित भऽ प्रतिरोधक ऊर्जा बनि जाइत अछि। शीर्षक-सूत्र स्वयं ध्वनि-सिद्धान्तक चमत्कार अछि — भऽ जाएब छू बाल-खेल (छू-मन्तर) क निर्दोष शब्दमे विलुप्तिक आतंक भरि दैत अछि, आ अन्तिम पंक्ति ओकर प्रतिषेध रचैत अछि: जड़ि बचत तँ भऽ जाएब छू नहि; जड़ि बचत तँ बचि जाएब छी। अन्तर्पाठीय दृष्टिसँ ई नाटक जलोदीपक जोड़ीदार अछि — दुनू समकालीन पर्यावरण-संकटक बाल-नाटक अछि, एकमे हबा बीमार अछि, दोसरमे पानि बाट माँगैत अछि; दुनूक अन्त सामूहिक प्रतिज्ञासँ होइत अछि आ दुनूमे संकटक मूल कारण प्रकृति नहि, मनुक्खक अ-कल्पनाशील व्यवहार अछि। कमलाक भगतासँ एकर सम्बन्ध विलोमक अछि: ओतऽ भीड़ बिनु प्रश्नक नकल करैत अछि, एतऽ घेरामे ठाढ़ भीड़सँ प्रश्न पुछल जाइत अछि आ उत्तर (हँ) कहाओल जाइत अछि — भीड़सँ समुदाय बनेबाक ई प्रक्रिया एहि दुनू नाटककेँ एक्के सिक्काक दू पिठ बनबैत अछि। आ नेकलालक आत्म-स्वीकृति — असफल वैज्ञानिक छी हम... हम नै कऽ सकलौं कल्पना — संकर्षणक अन्तिम आत्मबोध (ठकान जुत्तामे नहि, हमर घमण्डमे लगल) क बाल-संस्करण अछि: दुनू ठाम नाटकक नैतिक शिखर आत्म-दोष-स्वीकार अछि, दोसरापर दोषारोपण नहि। मंचन-सम्भावनाक दृष्टिसँ लेजर-लाइटसँ भगजोगनीक संकेत, चद्दरिक अढ़, फोटो-पट्टी सन सस्त-सुलभ उपकरण चौबटिया प्रदर्शनक व्यावहारिकता सिद्ध करैत अछि। सीमा एतबे जे आठ पात्रक समानान्तर विकासमे किछु स्वर (विजय-विजया) अपेक्षाकृत कम विकसित रहि जाइत अछि; मुदा सड़क-नाटकक द्रुत लयमे ई सन्तुलन क्षम्य अछि। समग्रतः ई रचना मैथिली बाल-रंगमंचकेँ एकटा नव विधा — जलवायु-नाट्य — क द्वार खोलि दैत अछि। ५. जलोदीप : बाढ़ि, बच्चा आ पानिक बाटक नाट्यशास्त्र जलोदीप बाढ़ि-सुरक्षा आ जल-निकासीक सामाजिक बाल-नाटक अछि आ एहि शृंखलामे समकालीन यथार्थक सभसँ लग ठाढ़ रचना। पूर्वदृश्यमे चारू कात जलामय अछि, एकटा बच्चा बाढ़िसँ निकलि हाथ बढ़बैत अछि आ ओकर वाक्य — हम तँ ठीके छी। मुदा हम्मर... — पूरा हेबासँ पहिनहि अन्हार पसरि जाइत अछि; ई अधूरा वाक्य पूरा नाटकक करुण-बीज अछि, कारण बादमे बुझल जाइत अछि जे घरक दीवार बाँचि गेल, घरक हँसी पानिमे चलि गेल। पाँच अंकक यात्रा एहि शोकसँ शुरू भऽ सामूहिक संकल्पपर खतम होइत अछि, आ बीचमे ओ दृश्य अछि जे एहि नाटककेँ बाल-रंगमंचक सिद्धान्त-ग्रन्थमे जगह दिया सकैत अछि — पहाड़क खेल। चौकीपर बैसल चारि बच्चा कटोरी, लोटा, भीजल कपड़ा, माटिक ढेला, काठी आ उलटल थारीसँ अपन इलाकाक नक्शा बनबैत अछि: लकीर नदी, ढेला गाम, काठी बान्ह, आ उलटल थारी राजमार्ग — नाम सड़क, काम दीवार। चारिम बच्चा लोटासँ पानि ढारैत अछि आ पानि सड़कक ओहि पार अटकि जाइत अछि — बाढ़िक समस्त अभियांत्रिकी एक खेलमे प्रत्यक्ष भऽ जाइत अछि। डोरोथी हीथकोटक प्रसिद्ध पद्धति अछि विशेषज्ञक चोगा (मैंटल ऑफ द एक्सपर्ट): बच्चाकेँ ओहि विशेषज्ञक भूमिका दऽ देल जाए जकर ज्ञान ओकरा सिखेबाक अछि, तखन ओ ज्ञान भीतरसँ, दायित्वक संग अर्जित होइत अछि। एतऽ बच्चा सभ खेलहिमे अभियन्ता बनि जाइत अछि — पहिल लोक स्वयं कहैत छथि, देखू, बच्चा सभ सेहो अभियंता बनि गेल — आ हुनक खेल-निष्कर्ष (पुल गाड़ी लेल बनल छै। पानि लेल की बनल छै?) प्रौढ़ सभक आँखि खोलैत अछि। लेव भाइगोत्स्कीक खेल-सिद्धान्त कहैत अछि जे खेलमे बच्चा अपन वास्तविक उमेरसँ माथ भरि ऊँच भऽ जाइत अछि; जलोदीपक नाट्य-युक्ति यएह अछि — ज्ञानक दिशा उनटा दैत अछि, बच्चासँ प्रौढ़ दिस। नाटकक दोसर बल ओकर तथ्य-अनुशासन अछि। बान्ह काटल जेबाक चर्च अफवाहक रूपमे अबैत अछि आ तुरत टोकल जाइत अछि — सुनै छिऐ से सत्य नहियो भऽ सकै छै — ई ज्ञान-मीमांसीय सावधानी बाल-नाटकमे विरल अछि। ठेकेदारक बचाव-वाक्य — प्रकृतिक प्रकोप छल... एहन बाढ़ि शताब्दीमे एक बेर अबैत अछि — केँ लोक आँकड़ासँ काटैत अछि: पछिला पाँच बरखमे तीन बेर हमर आँगन डुमल। आ अभियंताक विश्लेषण बाढ़िकेँ एक खलनायकपर नहि, कारण-जालपर टाँगैत अछि: नदीक पुरान बाट बन्द, पोखरि भरल, निचला जमीनपर बस्ती, ऊँच सड़क, छोट कलभर्ट — सभ मिलि कऽ बाढ़िक जाल बनल। टी.आइ.ई. (थिएटर इन एजुकेशन) आन्दोलनक आदर्श संरचना यएह मानल जाइत अछि — कथा-संवेदना, तथ्य-विश्लेषण आ कार्य-सूत्र तीनूक संयोग — आ जलोदीपक चारिम-पाँचम अंक ओकर पूर्ण निर्वाह करैत अछि: राहत, गामक जल-पथ नक्शा, कलभर्ट-निरीक्षण, मरम्मतिक खुल्लमखुल्ला हिसाब, बच्चाकेँ तैरनाइक शिक्षा, नालामे प्लास्टिक-निषेध, बरखा-पूर्व सफाइ आ पानिक बाट बला विकास — आठ सूत्र, जे मंचसँ उतरि कऽ कोनो गामक पंचायत-प्रस्ताव बनि सकैत अछि। बोआलक मंच (फोरम) रंगमंचमे दर्शक समाधान प्रस्तावित करैत छथि; एतऽ ओ काज पात्र-समुदाय करैत अछि, मुदा प्रक्रियाक लोकतांत्रिक बनावट — मुखिया, लोक, अभियंता, बच्चा सभक क्रमशः एक-एक सूत्र — फोरमक भावनाकेँ भीतरसँ जीबैत अछि। शीर्षक-प्रतीक जलोदीप नाटकक काव्य-शिखर अछि: बाढ़िक रातिमे बच्चा सभ पात आ कटोरीपर दीप तैरबैत अछि — बाढ़िमे दीप? पानि बुझा देत। — तैं तऽ नाव चाही। दीपकेँ पानिपर तैराउ। जलमे दीप। जलोदीप। जे पानि घर लऽ गेल, ओही पानिपर स्मृति आ आशाक दीप — विरोधाभासक ई बिम्ब आनन्दवर्धनक ध्वनि-कसौटीपर खरा अछि, कारण दीप एतऽ वस्तु नहि, व्यंजना अछि: ई दीप हमर बाबू लेल... आब ई दीप बुझत नहि, जँ हम सभ बात याद राखब। स्मृति-दीपक ई अर्थ नाटककेँ उल्कामुखक स्मरण-दर्शनसँ जोड़ैत अछि — ओतऽ विस्मरणक विरुद्ध गीत अछि, एतऽ दीप; आ समापनक फुसफुसाहटि — ई असल बात अछि — शब्दशः दानवीर दधीचीक अन्तिम ध्वनि अछि, जे दुनू नाटककेँ एक्के सत्य-मुद्रासँ मोहरबन्द करैत अछि। गंगा ब्रिजसँ एकर सम्बन्ध एहि पोथीक सभसँ शिक्षाप्रद युग्म अछि। दुनू नाटक एक्के विषय — जल, अधोसंरचना, भ्रष्टाचार — पर अछि, मुदा बाल आ प्रौढ़ संस्करणक भेद स्पष्ट अछि: जलोदीपमे ठेकेदार अन्ततः झुकैत अछि (हम... हम सूची देब) आ गाम जागि जाइत अछि; गंगा ब्रिजमे व्यवस्था ईमानदार अभियन्ताकेँ रोलरक नीचाँ पिचड़ा दैत अछि। बाल-नाटकक आशावाद कृत्रिम नहि अछि — ओ बोआल आ हीथकोट दुनूक शिक्षाशास्त्रीय सिद्धान्तसँ निकलल अछि जे बच्चाकेँ कर्तृत्वक अनुभव (एजेंसी) देब ओकर नागरिक-निर्माणक पहिल शर्त अछि — मुदा दुनू नाटककेँ आमने-सामने राखि पढ़ला उत्तर बुझाइत अछि जे नाटककार एक्के प्रश्नक दू उत्तर नहि, दू उमेरक दू दायित्व देखा रहल छथि: बच्चाकेँ सम्भावना, प्रौढ़केँ चेतावनी। चारिम बच्चाक अन्तिम सूत्र-वाक्य — पानि शत्रु नहि, रोकेल बाट शत्रु अछि। विकास शत्रु नहि, अन्हा विकास शत्रु अछि — एहि युग्मक साझा घोषणा-पत्र अछि। ६. संकर्षण : चोटकेँ सत्कार कहबाक रोग आ आत्मबोधक जुत्ता संकर्षण एहि शृंखलाक पहिल प्रौढ़ नाटक अछि आ एकर उपशीर्षक — दंभ, झूठ-सत्कार आ आत्मबोधक पाँच-कल्लोलक मैथिली नाटक — तीनू शब्दमे पूरा वृत्त बान्हि दैत अछि। उपक्रममे नाटककार अपन नायक-खलनायकक परिचय दैत छथि: असल अन्हार ओकर दंभ, डर आ झूठक चमकमे अछि, आ घोषणा करैत छथि जे दिल्लीक चोर-बजारसँ ठकाओल एकटा जुत्ता ओकरा वैह आइना देखा देत जे भरि जिनगी ओ आनकेँ देखबैत रहल। पाँच कल्लोल — प्रतिष्ठाक बीआ, झूठ जड़ि पकड़ैत अछि, बियाह आ बड़ाइक बजार, शहरक आइना, आ आत्मबोधक जुत्ता — दंभक अंकुरण, विस्तार, सामाजिक-पारिवारिक प्रसार, टकराव आ विसर्जनक क्रमबद्ध वनस्पति-शास्त्र अछि; कल्लोल शब्द (लहरि) संरचनाकेँ अंकक यांत्रिक विभाजनसँ मुक्त कऽ भावक उठान-गिरानक संकेत बनि जाइत अछि — ई इकाई उल्कामुखमे सेहो प्रयुक्त अछि, मुदा ओतऽ लहरि स्मृतिक अछि, एतऽ दंभक; एक्के छन्दमे दू राग। हास्य-विवेचनमे आँरी बर्गसाँक सूत्र अछि जे हास्य जीवितपर चढ़ल यांत्रिकतासँ उपजैत अछि — जखन मनुक्ख परिस्थिति बदललोपर एक्के जड़ चेष्टा दोहरबैत अछि, तखन ओ हास्यास्पद भऽ जाइत अछि। संकर्षणक समस्त प्रहसन एहि यांत्रिकताक प्रदर्शनी अछि: कलक्टरसँ दबाड़ खा कऽ स्टेनोक कक्षमे बैसब आ गाममे कहब जे कलक्टर साहेब रोकि लेलन्हि; पंचैतीक दण्डक बाद कंठी लेब आ भोरहिमे रोहुपर कोदारि चलाएब; जगन्नाथ-यात्रामे फल छोड़बाक विधानमे कुसियार छोड़ब, जाहिसँ गुरक चाह मना कऽ चुकन्दरक रसियन चीनी बला चाह पीबि सकी। भाष्करक सुनाओल तीन टा कारी कुकुरक खिस्सा एहि यांत्रिकताक कथा-भीतर-कथा (उपाख्यान) अछि आ बर्गसाँक दोसर युक्ति — पुनरावृत्ति आ हिमगोलक (स्नोबॉल) — क आदर्श उदाहरण: पहिल कुकुर बटखराक चोटकेँ बटखरासँ जोखि कऽ जिलेबी कहैत अछि, दोसर धीपल पानिकेँ गरमागरम जिलेबी, तेसर बन्द सटर आ लाठीक पिटानकेँ आबैये नहि दैत रहथि, कहैत रहथि आर खाऊ — प्रत्येक झूठ अगिला कुकुरकेँ चोट दिस पठबैत अछि। भाष्करक टिप्पणी खिस्साक मर्म खोलि दैत अछि: ई खिस्सा सत्कारक नहि, चोटकेँ सत्कार कहबाक रोगक अछि। एतहि कमलाक भगतासँ एकर नाभि-नाल जुड़ैत अछि — ओतऽ भीड़ बिनु कारण बुझने आनक क्रिया दोहरबैत अछि, एतऽ व्यक्ति अपन क्षतिकेँ प्रतिष्ठा कहि दोहराबऽ योग्य बनबैत अछि; अन्धानुकरण आ आत्म-प्रवंचना एक्के ज्ञान-रोगक बहिरंग आ अन्तरंग रूप अछि। मुदा नाटक केवल प्रहसन नहि अछि; एकर भीतर व्यंग्यक धार निरन्तर सामाजिक आलोचनामे बदलैत रहैत अछि। संकर्षणक बोली दोसराक जीवनमे जहर घोरैत अछि — पसीझक काँटक रस बला जुल्मी दबाइ ननकिड़बाक प्राण लऽ सकैत छल, जँ नित्या काका नहि टोकितथि (जे नहि बुझै, ओकर चुप रहबो दवा होइत छैक); टेलीफोन डायरी बला निराधार डरसँ गोनर भाइ अपन डायरी फाड़ि दैत छथि। कुन्तकक वक्रोक्ति-सिद्धान्त — कथनक वक्रता स्वयं काव्यत्व अछि — संकर्षणक भाषामे उनटल रूपमे सक्रिय अछि: ओकर हरेक वक्र-वाक्य (बूढ़ीकेँ सीट माँगलापर माँ। ई बौआ नहि। बौआक तीन टा बौआ; कनियाँक प्रशंसामे मुदा रंग कनेक हमरासँ डीप छन्हि) आत्म-श्रेष्ठताक अलंकार अछि, आ नाटककार देखबैत छथि जे वक्रोक्ति जखन सत्यसँ कटि जाइत अछि तखन ओ कला नहि, व्याधि बनि जाइत अछि। नेपथ्यसँ आएल पत्नीक एक्के वाक्य — दुलारू नहि छी तें घर चलैए। जे दिन दुलारू भऽ जाएब, से दिन अहाँक दंभक गोबर के काढ़त? — एहि नाटकक स्त्री-स्वर अछि: मंचपर बिनु अएने, एक वाक्यमे, ओ संकर्षणक समस्त पुरुष-दंभक अर्थशास्त्र खोलि दैत छथि। चारिम-पाँचम कल्लोलमे नाटक अरस्तूक कसौटीपर चढ़ैत अछि। अलीगढ़मे पुलिस खेसारीक बिड़ियाकेँ गाजा कहि बीस टाका छोड़ि सभटा पाइ लऽ लैत अछि — जे बोली गाममे सभकेँ डरबैत छल, से शहरमे स्वयं डरक शिकार भऽ जाइत अछि; ई पेरिपेटिया (दशा-पलट) अछि। आ चोर-बजारमे पड़ोसीक नामपर ठकाएल जुत्ताक सोल जहिया करेज जेकाँ बाहर आबि जाइत अछि, तहिया एनाग्नोरिसिस (पहचान) घटित होइत अछि — मुदा अरस्तूक नायक-सन नियतिक नहि, अपन चरित्रक पहचान: साँच कहू गोनर, ठकान जुत्तामे नहि, हमर घमण्डमे लगल। सूत्रधार उपसंहारमे ठीक कहैत छथि जे एहि एक्के वाक्यमे ओतेक साहस अछि, जतेक भरि नाटकमे कतहु नहि — हास्य रसक ई विसर्जन शान्तमे होइत अछि, अट्टहासमे नहि, आ अन्तिम मंच-निर्देश (गोनर हँसैत नहि — ई आब हँसबाक क्षण नहि, बुझबाक क्षण अछि) रस-संक्रमणकेँ मंचीय अनुशासन दैत अछि। अन्तर्पाठीय दृष्टिसँ अलीगढ़-प्रकरण मचण्डक पूर्वाभास अछि — निर्दोषक झोरामे राज्य अपराध ताकि लैत अछि, ओतऽ बिड़िया गाजा बनैत अछि, एतऽ प्रेशर कुकर नशाक खेप; आ सूत्रधारक अन्तिम प्रश्न — हमरा सभक भीतरो कतौ कोनो संकर्षण नुकाएल त' नहि अछि? — दर्शक-सम्बोधनक वएह ब्रेष्टीय युक्ति अछि जे कमलाक भगता आ भऽ जाएब छूमे बाल-रूपेँ प्रयुक्त भेल अछि। संरचनात्मक सीमा ई अछि जे प्रसंग-मालाक (एपिसोडिक) बनावटमे किछु अंक — यथा गुरक चाह — स्वतंत्र लतीफा जकाँ बुझा सकैत अछि; मुदा ध्यानसँ देखला उत्तर प्रत्येक प्रसंग दंभक कोनो ने कोनो नव क्षेत्र (प्रशासन, धर्म, वैद्यक, विवाह, रूप, भोजन, भूगोल) जोड़ैत अछि, आ बेटाक पलायन बला अंक — जेकरा सभकेँ सिखबैत फिरलहुँ, अपन घरक बाट ओकरा नहि सिखा सकलहुँ — प्रहसनक भीतर करुणक ओ सुरंग खोलि दैत अछि जाहि बाटे नाटक अपन गम्भीर समापन धरि पहुँचैत अछि। ७. गंगा ब्रिज : विकासक बलिवेदीपर इतिहासक ठक-ठुक गंगा ब्रिज विकास, भ्रष्टाचार आ बलिदानपर एकटा मार्मिक नाटक अछि, मुदा एकर असल विषय पुल नहि, इतिहास-लेखन अछि — के मरैत अछि, के लिखैत अछि, आ लिखल इतिहासमे मरनिहारक की बचैत अछि। नाटक पाँच भाग आ आठ पल्लवमे पसरल अछि आ एकर काल-विस्तार असाधारण अछि: १५ अगस्त १९४७ क स्कूली झण्डोत्सवसँ लऽ कऽ ओहि दिन धरि, जखन रिटायर मुख्य अभियन्ता अपन लिखल पोथी गंगा ब्रिजक लोकार्पण करबैत छथि आ नबका मुख्यमंत्री जर्जर पुलक बगलमे दोसर पुलक घोषणा कऽ चुकल छथि। एहि ऐतिहासिक फलकपर बर्टोल्ट ब्रेष्टक महाकाव्यात्मक रंगमंचक लगभग समस्त उपकरण सक्रिय अछि: ढोलहो देनहारक बेर-बेर घुरैत उद्घोष (सुनै जाउ, सुनै जाउ... मजदूर चाही) दृश्य-शृंखलाकेँ काटैत-जोड़ैत गीत-पट्टी अछि; डंका बजबैत दूटा लोक कोरस अछि, जे घटनाकेँ टिप्पणीसँ ठंढा करैत अछि (सरकार ककरा कहै छिहीं? — बहस, जे लोकतंत्रक नागरिक-शास्त्र ठेठ मैथिलीमे पढ़ा दैत अछि); आ मजदूर सभक फ्रीज भऽ जाएब — जखन अभियन्ता आ ठिकेदारक आभासी संवाद चलैत अछि — दूरीकरण (फेरफ्रेमडुंग) क प्रत्यक्ष मंच-विधि अछि: दर्शक घटनामे बहि नहि सकैत छथि, हुनका देखाओल जाइत अछि जे ई देखाओल जा रहल अछि। एर्विन पिस्काटरक दस्तावेजी रंगमंचक परम्परामे नाटक आँकड़ा आ संस्थागत ब्योरासँ नहि डराइत अछि: पछिला मास तीस टा मजदूर मरि गेल। एक सालमे तीन सए मजदूर मरि गेल। मात्र दस गोटेक परिवारकेँ अनुकम्पाक अनुशंसा भेलै; रामधनीक मशीनमे फँसल हाथपर पट्टीक बदला बोरा; टेण्डरक भीतरी रास्ता; कमीशनक शृंखला — नेता, दोसर इन्जीनियर, गुण्डा। ठिकेदारक लम्बा स्वीकारोक्ति एहि नाटकक सभसँ जटिल नैतिक दस्तावेज अछि: ओ अभियन्ताक बालु-चालब बला विधि मानि कमीशन बन्द केलक, अभियन्ताक बदली भऽ गेल, आ ठिकेदार घुरि कऽ पुरान रास्तापर आबि गेल — हम अपन बच्चाक नाम स्कूलसँ नै कटबा सकै छी। एतऽ खलनायक व्यवस्था अछि, व्यक्ति नहि; ठिकेदार धरि ओकर बन्धक अछि। एहि व्यवस्था-चित्रणक शिखर मुख्यमंत्री-मुख्य अभियन्ताक ओ संवाद अछि जतऽ ईमानदार अभियन्ताकेँ खपेबाक विकल्प सभ एक-एक कऽ खारिज होइत अछि — गोली मारब (भगत सिंह बनि जाएत), करप्शन-चार्ज (छापामे खाट टा भेटत), आत्महत्या (आत्महत्या करैबला जीब नै अछि) — आ अन्ततः निर्णय होइत अछि: ओ दुर्घटना लगतै। रोलरक नीचाँ देल गेल ई मृत्यु आ ओकरापर ओछाओल दुर्घटनाक चादरि राज्यक कथा-निर्माण-यंत्रक नग्न प्रदर्शन अछि। अन्तिम पल्लव — पोथी-लोकार्पण — एहि नाटककेँ इतिहास-दर्शनक ऊँचाइ दैत अछि। मुख्य अभियन्ताक वाक्य — इतिहासक काम घाव खोलब नहि, पट्टी बाँधब अछि — चाहे भीतर मवाद रहि जाए — आ मुख्यमंत्रीक प्रशस्ति (जे आवाज बीचमे उठल, से विकासक धूलि छल; जे खून गिरल, से बलिदानक रंग छल) सुनैत काल वाल्टर बेन्यामिनक ओ प्रसिद्ध सूत्र मोन पड़ैत अछि जे सभ्यताक एहन कोनो दस्तावेज नहि, जे संगहि बर्बरताक दस्तावेज नहि होअए, आ ईहो जे इतिहास विजेताक सहानुभूतिमे लिखल जाइत अछि। नाटक एहि लिखित इतिहासक समानान्तर एकटा श्रव्य प्रति-इतिहास ठाढ़ करैत अछि: मजदूरक ठक-ठुक, जकरा अन्तमे डंका-वादक कहैत अछि — ई ठक-ठुक पुलक नहि, इतिहासक हड्डीक आवाज छिऐ। लिखितम् बनाम ध्वनि — ई द्वन्द्व उल्कामुखक केन्द्रीय द्वन्द्वक (पोथीमे नाम कटत, गीतमे साँस बचत) प्रौढ़-राजनीतिक संस्करण अछि; ओतऽ चौपाड़ि गीतकेँ बँसबिट्टीमे धकेलैत अछि, एतऽ सत्ता प्रत्यक्षदर्शीक स्मृतिकेँ धन्यवाद, धन्यवाद, धन्यवादक यांत्रिक मुस्कीसँ ढाकि दैत अछि — ई दोहराओल धन्यवाद ब्रेष्टक गेस्टुस (सामाजिक सम्बन्धकेँ देह-मुद्रामे जमा देनिहार क्रिया) क चमकैत उदाहरण अछि। रस-योजनामे नाटक करुण आ रौद्रक बीच वीभत्स-स्पर्शी व्यंग्य चलबैत अछि, मुदा भरतक रस-मिश्रण-विधानक कुशल पालनक संग: बतही माए आ इन्जीनियरक विधवाक विलाप (आब कागज कतऽ अछि? ई बच्चा सभक आँखि बाजत) शुद्ध करुण अछि; एम.एल.ए.क नीलगाय-भाषण आ चारि अढ़ैया चिन्नीक होड़ हास्यक ओ लोकधर्मी छिट्टा अछि जे शोक-कथाकेँ जीवन-रससँ सिक्त रखैत अछि; आ बच्चा ३ क त्रि-आयामी यात्रा — बकड़ी तकैत स्कूल-भगोड़ा, ठेलाबला, आ भदोहीक बन्धुआ मजदूरीसँ भागल श्रमिक — राष्ट्रीय विकास-गाथाक ओ पाताल देखबैत अछि जतऽ स्वतंत्र देश। स्वतंत्र स्कूल। स्वतंत्र कॉलेजक व्यंग्य-मंत्र कानमे गूँजैत रहि जाइत अछि। अन्तर्पाठीय दृष्टिसँ जलोदीप एकर बाल-प्रतिबिम्ब अछि (कलभर्ट, बान्ह, कागज बनाम जमीन — ओतऽ समुदाय जीतैत अछि, एतऽ हारैत अछि), मचण्ड एकर अगिला डेग (व्यवस्थाक हिंसा प्रक्रियागत रूप धरैत अछि), आ अभियन्ताक अन्तिम आश्वासन-वाक्य — आशा देनिहारकेँ कुचलि देल जेतै तँ आशा मरत नै; ओकर आवाज डंकामे, हथौड़ामे, पुलक दरारिमे बसि जेतै — उल्कामुखक स्मृति-सिद्धान्तक गंगातटीय घोषणा अछि। मंचन-चुनौती स्पष्ट अछि — विशाल पात्र-संख्या, चालीस बरखसँ ऊपरक काल-छलाँग, आ पल्लव-संरचनाक तीव्र दृश्यान्तर — मुदा ढोलहो-डंकाक ध्वनि-चौखट एहि सभकेँ बान्हि लैत अछि: जहिया-जहिया दृश्य बदलैत अछि, वएह उद्घोष घुरैत अछि, आ दर्शक बुझि जाइत छथि जे पुल जतऽ छल ततहि अछि — हिलैत, चिप्पी माँगैत। नाटकक अन्तिम विडम्बना यएह अछि जे परदा खसैत काल सेहो ढोलहो देनहार मजदूर माँगि रहल अछि; वृत्त पूरा भेल, मरोम्मति नहि। ८. मचण्ड : भाषा, न्याय आ आतंकक त्रिकोणमे मनुक्ख मचण्ड एहि शृंखलाक सभसँ तीक्ष्ण समकालीन रचना अछि आ एकर केन्द्रमे एकटा एहन मनुक्ख अछि जकरा लग भाषा नहि अछि — माने अपन भाषा अछि, मुदा ओकरा बुझनिहार कियो नहि। मुतालिफ तमिल-भाषी युवा अछि, दिल्लीक अदालत-हाजतमे बन्द, आ भाषा अनुवादक (बा अनुवादिका) आरम्भहिमे ओकर स्थिति एक वाक्यमे कहि दैत छथि: जे शहर ओकरा अपराधी कहैए, से ओकर नामो ठीकसँ नहि बजा पबैए। फ्रान्ज़ काफ्काक द ट्रायलक योज़ेफ के.केँ ओकर अपराध नहि बुझल छै; मुतालिफक स्थिति ओहूसँ आगाँ अछि — ओकरा अभियोगक भाषे नहि बुझल छै। खुफिया अधिकारीक वाक्य — न्याय जँ भाषा नै बुझत तँ न्याय नहि, प्रक्रिया मात्र रहि जाएत — एहि नाटकक विधिशास्त्रीय थीसिस अछि, आ पात्र-सूचीमे अनुवादकक परिचय (शब्दक पुल, मुदा पुलो कखनो-कखनो अधूरा रहि जाइत अछि) ओकर काव्य-सूत्र। मैथिली सन हाशियाक भाषामे एकटा तमिल-भाषीक भाषिक निर्वासनक कथा कहब अपनहिमे एकटा राजनीतिक वक्तव्य अछि — जे भाषा स्वयं केन्द्रसँ अनसुनल अछि, वएह दोसर अनसुनल भाषाक पक्ष लऽ रहल अछि। नाटकक सभसँ सूक्ष्म रंग-युक्ति भोजनक पैकेट अछि। पहिल अंकमे खुफिया अधिकारी हाजतमे मुतालिफकेँ रतुका भोजनक पैकेट पठबैत छथि; मुतालिफ हाथ जोड़ि हिचुकि-हिचुकि कानऽ लगैत अछि — ओकर रुदनमे धन्यवाद आ भय दुनू अछि — आ अन्तिम मंच-निर्देशमे अन्हारमे केवल भोजनक खाली पैकेटपर प्रकाश रहि जाइत अछि, संगहि खुफिया अधिकारीक ओ अनुगूँज जे एकटा भोजनक पैकेट कखनो-कखनो अदालतसँ पैघ गवाही दैए। ब्रेष्टक गेस्टुस-सिद्धान्तमे कोनो एकटा ठोस क्रिया समग्र सामाजिक सम्बन्धकेँ देह दऽ दैत अछि; एतऽ भोजन-दान ओ क्रिया अछि जे राज्य आ अभियुक्तक बीच अभियोग-पत्रसँ बाहरक एकटा मनुष्य-सम्बन्ध रचैत अछि, आ पूरा नाटक एही सम्बन्धक परीक्षा अछि। बाबाधाम बला लम्बा प्रसंग — लुल्हा जे बीस बरखसँ पाँव-पैदल जाइत अछि आ महीसे चराबैत अछि, पीअर बच्चा जे हवागाड़ीसँ जाइत अछि आ कोठापर कोठा उठबैत अछि — पहिल दृष्टिमे विषयान्तर बुझाइत अछि, मुदा वस्तुतः ई नाटकक रूपक-कोष अछि: खुफिया अधिकारीक निष्कर्ष (पाँव-पैदल बा शतरंजक सिपाही। राजा-रानी नै छी देश। देश छी मुतालिफ। देश छी लुल्हा) शतरंजक ओही गोटी-बिम्बकेँ राष्ट्र-परिभाषामे बदलि दैत अछि जाहिसँ ओ मुतालिफकेँ चिन्हने छला — ई तँ शतरंजक गोटी अछि, पाँव-पैदल सिपाही। जे हाथ गोटी चलबैए, से हाथ कतऽ अछि? दोसर अंकक खुफिया अधिकारी–आतंकी लीडर संवाद एहि नाटकक बौद्धिक रीढ़ अछि, आ एकर विन्यास ध्यान देबा जोग: बीचमे टेबुल नहि, जेना एक अदृश्य खाई अछि; बहस बढ़ला पर दुनूक छाया एक-दोसरामे पैसए लागए — मंच-निर्देश स्वयं थीसिस अछि। संवादक भीतर लालडेंगा-प्रसंग पिस्काटर-शैलीक दस्तावेजी अन्तर्वेश अछि — मिज़ोरम-समझौताक वास्तविक इतिहास एतऽ शान्तिक पक्षमे तर्क बनि कऽ आएल अछि (महान नेता अपन जनताकेँ बीच मझधारमे नै छोड़ै छै) — आ प्रतिपक्षमे आतंकी लीडरक आक्षेप-शृंखला (अहाँ फैक्ट्री खोलि देबै तँ ओ दरबान बनि जाएत... अहाँक दया सेहो अहाँक विरुद्ध गवाही दैए। दया, अधिकारी साहेब, सत्तासँ बेसी खतरनाक हथियार अछि) राज्यक विकास-प्रतिश्रुतिक ओही खोखलपनकेँ छूबैत अछि जकरा गंगा ब्रिज बलिदानक बयानबाजीमे देखौने छल। शीर्षक-शब्द मचण्ड एहि बहसक धुरीपर दुनू दिस घूमि जाइत अछि: पहिने खुफिया अधिकारी आतंकी सभकेँ कहैत छथि — बेरोजगारीक खाली कटोरामे अहाँ बारूद भरै छी। मचण्ड छी अहाँ सभ — आ उत्तरमे गरदनि पकड़ल आतंकी लीडर हाँफैत बजैत अछि: अहूँ मचण्ड छी, सरकारी मचण्ड... फर्क एतबे जे अहाँ वर्दीमे छी, हम जंगलमे। एक्के विशेषणक ई अदला-बदली नाटकक दर्पण-संरचना अछि — दुनू पक्ष एक-दोसराकेँ अपन प्रतिबिम्ब देखैत अछि, आ दर्शक कोनो सुविधाजनक पक्ष नहि पबैत छथि। तेसर अंक पेरिपेटिया अछि: बेल पाबि निकलल मुतालिफ आब भयक जगह एक अजीब स्थिरता लेने घुरैत अछि, आ अनुवादकक माध्यमे कहबैत अछि जे ओ जेलसँ एलाक बाद अहाँ जकाँ बनऽ चाहलक मुदा पुलिस थाना, पत्रकार, गामक बेरोजगारी आ नामपर लागल दाग ओकरा से नै करऽ देलकै — जेकरा समाज निर्दोष मानि नहि सकै, ओकरा अपराधी बनबामे देर नहि लगै छै। पीड़ित आ कर्ताक ई स्थान-परिवर्तन ओकर पहिल अंकक हिचुकीसँ नापल जाए तँ नाटकक करुणा बुझाइत अछि: व्यवस्था अपने हाथे अपन विरोधी गढ़ैत अछि। चारिम अंकक आत्म-चिन्तनमे नाटक मेटा-रंगमंचीय भऽ जाइत अछि — खुफिया अधिकारीकेँ मोन पड़ैत छन्हि जे मुतालिफ कहैत छल, हम कथा लिखै छी... ऐ यात्रामे एकटा कथाक प्लॉटे भेट गेल... ओइ कथाक नायक मुतालिफ रहत — माने जाहि कथाकेँ दर्शक देखि रहल छथि, से भीतरहिसँ लिखा रहल अछि, आ नायकत्वक दावेदारी ओकरा लग अछि जकरा लग भाषा नहि छल। मुदा नायक बनब आ बचि जाएब, दुनू अलग बात अछि — ई वाक्य समापनकेँ कोनो समाधानसँ वंचित राखि खुला छोड़ि दैत अछि; बादल सरकार-परम्पराक ई अ-समापन दर्शककेँ उत्तरदायित्व सौंपब अछि, राहत नहि। अन्तर्पाठीय दृष्टिसँ मचण्ड गंगा ब्रिज आ उल्कामुखक बीचक कड़ी अछि: गंगा ब्रिजमे राज्य असहमतकेँ रोलरसँ पिचड़ा दैत अछि, मचण्डमे ओकरा प्रक्रियामे ओझरा दैत अछि — हिंसाक ई विकास-क्रम (देह-दमनसँ तंत्र-दमन धरि) दुनूकेँ संगे पढ़लापर देखार होइत अछि; आ मुतालिफक इशारा-भाषा उल्कामुखक हीरूक गीत-भाषाक समानधर्मा अछि — दुनू ओ स्वर अछि जकरा सत्ताक कान नहि सुनैत अछि, आ दुनू नाटकमे वएह स्वर अन्ततः कथाक केन्द्र बनि जाइत अछि। संकर्षणक अलीगढ़-प्रकरणसँ एकर पूर्व-सम्बन्धक चर्च ओतुका समीक्षामे भऽ चुकल अछि — बिड़िया आ प्रेशर कुकर, दुनू ठाम राज्यक आँखि निर्दोष वस्तुमे अपराध पढ़ैत अछि। ध्वनि-विधान (कोर्टक कोलाहल, हथकड़ीक खनखन, अनुवादकक रुकि-रुकि बाजल स्वर, आ अन्तमे दूरक अजान-घंटीक मिश्रित नगर-ध्वनि) भाषा आ सत्ताक दूरीकेँ श्रव्य बनौने रहैत अछि; समग्रतः मचण्ड मैथिली रंगमंचपर राजनीतिक थ्रिलरक कलेवरमे न्याय-दर्शनक नाटक अछि। ९. उल्कामुख : स्मृति-विस्मृतिक महासंग्राम — नाट्य-शृंखलाक शिखर उल्कामुख एहि नअ नाटकक वट-वृक्ष अछि — विदेह नाट्य उत्सव २०१२ मे बेचन ठाकुरक निर्देशनमे मंचित, आ पाठक अनुसार मंच-परिकल्पना भरत नाट्यशास्त्रक अनुरूप। ई दाबी अलंकार नहि अछि: मंच-निर्देशमे रंगपीठ, रंगशीर्ष आ मत्तवारणीक शास्त्रीय अंग-विभाजनक क्रियात्मक प्रयोग भेल अछि — पात्र मत्तवारणीसँ रंगपीठ अबैत छथि, प्रकाश रंगशीर्षपर केन्द्रित होइत अछि — जे आधुनिक भारतीय रंगमंचहुमे विरल अछि। संरचना कल्लोलमे अछि (संकर्षण जकाँ, मुदा एतऽ लहरि स्मृतिक अछि), आ केन्द्रीय मंच-प्रतीकक रूपान्तरण नाटकक अर्थ-यात्राक नक्शा अछि: पहिलसँ चारिम कल्लोल धरि मंचपर शतरंजक डिजाइन बनाओल घन राखल रहैत अछि — भूत आ कल्पनाक प्रतीक — आ पाँचम कल्लोलसँ ओकर जगह गोला लऽ लैत अछि, वास्तविकताक प्रतीक; पाठक शब्दमे, घनक कोना मेटि गेल; आब वृत्त अछि, जे स्मरणकेँ घुमा कऽ फेर सोझाँ आनत। संकेतसँ वास्तव, कल्पनासँ सत्य — ई ज्यामितीय रूपक (कोनसँ वृत्त) एहि नाटकक समूचा दर्शन एक वस्तुमे गूँथि दैत अछि। पूर्वार्द्धक विषय ऐतिहासिक अछि: तत्त्वचिन्तामणिकार गंगेश उपाध्याय, जे श्रीहर्षक खण्डन-प्रहारसँ न्यायकेँ बचा नव्य-न्यायक स्थापना केलन्हि, आ जिनक विषयमे परम्परा पितृ परोक्षे पञ्च वर्ष व्यतीते गंगेशोत्पत्ति सन विलक्षण किंवदन्ती आ चर्मकारिणीसँ विवाहक कथा रखने अछि — नाटक एहि परम्परा-सूत्र सभकेँ (पुत्र वर्द्धमानक सुकविकैरवकाननेन्दुः बला कवि-प्रशस्ति सहित) नाट्य-वस्तु बनबैत अछि आ हुनक प्रेमिका-पत्नीकेँ वल्लभा नाम दऽ ओहि प्रेमक कथा रचैत अछि जकर चर्च शास्त्र-परम्परा नहि करैत अछि। एतहि नाटकक मूल प्रश्न जनमैत अछि: तत्त्वचिन्तामणिपर भाष्यपर भाष्य, टीकापर टीका लिखाइत रहल, मुदा गंगेशक कविता भऽ गेल उल्कामुख — माने हेरा गेल, नाम-मात्र बनि गेल। आचार्य व्याघ्र आ आचार्य सिंह — जिनक चर्च गंगेश ग्रन्थमे बिनु असल नामक केने छथि — मंचपर भूत बनि कऽ अबैत छथि आ अपन दशाक व्याख्या स्वयं करैत छथि: नाम नुकेलासँ मनुक्ख धीरे-धीरे प्रतीक बनैए, प्रतीकसँ कथा, आ कथासँ दोष। यान असमानक सांस्कृतिक स्मृति-सिद्धान्त एतऽ प्रत्यक्ष मंचित बुझाइत अछि — संस्थागत, लिखित, अभिलेखीय स्मृति (चौपाड़ि, टीका-परम्परा) आ जीवित, वाचिक, गीत-वाहित स्मृतिक द्वन्द्व; वल्लभाक घोषणा एहि द्वन्द्वक अमर सूत्र अछि: जँ पोथीमे नाम कटत, गीतमे साँस बचत। आ जे प्रेम सात सए बर्ख इन्तजार कऽ सकै छै, ओकरा बँसबिट्टी रोकि नै सकत। विस्मरणक तंत्र-पक्ष आचार्य सरभ आ हुनक शिष्य (खिखिर, शाही, नढ़िया, बिज्जी) क प्रसंगमे अछि — रटन्त विद्या, जतऽ बिनु बुझने पाठ यादि कराओल जाइत अछि जइसँ सभ बिसरि जाथि गंगेश आ वल्लभाकेँ, आ प्रश्न पुछनिहार शिष्य मारल जाइत अछि (आब रटन्त विद्या बचत, प्रश्न मरत)। एकर प्रतिरोध-शस्त्र अछि संकेत: आचार्य सिंहक सूत्र — अपूर्ण पाठक विस्मरण नै भऽ सकैए, विस्मरण होइए मात्र पूर्ण पाठ — एहि नाटकक ज्ञान-मीमांसीय हीरा अछि; जे बात अधूरी, बिम्ब-रूप, गीत-रूप बचल रहैत अछि, से दिमागमे काँट जकाँ गड़ल रहैत अछि आ कहियो ने कहियो पूरा हएबाक माँग करैत अछि — उल्कामुख वएह संकेत अछि। एहि पूर्वार्द्धक मेटा-नाट्यीयता चकित करैत अछि: पात्र सभ जनैत छथि जे ओ कल्पना छथि (हम पूर्ण कल्पना छी शिष्य खिखिर? — आचार्य, अहाँ कल्पना छी आ हम सभ कल्पना बनैबला छी), आ पिरान्देलोक सिक्स कैरेक्टर्स इन सर्च ऑफ एन ऑथरक स्मृति दिअबैत छथि — मुदा एतऽ पात्र लेखक नहि, स्मरण ताकि रहल छथि। संगहि लोकगाथाक पूरा कोष मंचपर उतरैत अछि — दीना-भदरिक गाथा (जकरा वल्लभा आ गंगेश बेरा-बेरी गाबि कऽ खेलैत छथि), गोरिल-बालगोरैय्या, सलहेस-फोटरा गीदर, विषहरि आ गोसाउनिक गीत — आ कीर्तनियाँ-परम्परा बला गीत-प्रधान मैथिल रंग-स्मृति एहि नाटकक देह बनि जाइत अछि; नाराशंसी (जन-प्रशस्ति गाथा) शब्दक बेर-बेर प्रयोग सूचित करैत अछि जे नाटककार लोकगाथाकेँ अलंकरण नहि, इतिहास-लेखनक वैकल्पिक विधा मानैत छथि। पाँचम कल्लोलसँ नाटक सात सए बरखक छलाँग लगबैत अछि आ सभ पात्र नव जन्म लैत छथि — गंगेश गंगाधर बनैत छथि, वल्लभा कुमरसुता, भगता जटा, आचार्य सरभ राजा कीर्ति सिंह (नाम स्वयं मिथिलाक ओइनवार राज-स्मृति जगबैत अछि)। गंगाधरक कथा — यज्ञोपवीतक अस्वीकार, दलित गायक हीरू आ ऋषि जटाकेँ गुरु मानब, सप्तरीक बोनक पाठशाला, दरबारमे एकसँ सए धरिक जोड़केँ जोड़ा-विधिसँ पाँच हजार पचास निकालि देखाएब, कुमरसुतासँ विवाह, आ अनुभव मण्डलक स्थापना जइमे ने कोनो जातिक भेद छै आ ने स्त्री-पुरुषक भेद — एकटा भिन्न ऐतिहासिक स्रोतसँ ऊर्जा लैत अछि, आ नाटक ई स्रोत नुकबैत नहि अछि: जटाक शिष्य स्पष्ट कहैत अछि जे गुरु दक्षिण दिशासँ बासवेश्वरक खिस्सा सुनि कऽ आएल छथि आ कहै छथि जे मिथिलामे सेहो हेतै ई सभ। कल्याणक शरण-आन्दोलन, अनुभव मंटप, आ अन्तर्जातीय विवाहपर राजदण्डक ओ इतिहास एतऽ मैथिल भूगोलमे रोपल गेल अछि — मेधा (ब्राह्मण सेनापतिक बेटी) आ जीवे (चर्मकारक बेटा) क प्रतिलोम विवाहपर राजा आँखि निकालि हाथीसँ पिचड़ेबाक आदेश दैत अछि, आ ओकर वाक्य — जे प्रेम जातिक पार देखलक, ओकर आँखि राजसिंहासन सहि नै सकैए — पूर्वार्द्धक ओहि निषेधकेँ (प्रेम जँ जातिक देवालपर चढ़ि जाए तँ देवालक रखवार सभकेँ आगि लागि जाइ छै) राज-हिंसामे परिणत कऽ दैत अछि। तकर बाद माधवक गुप्त प्रतिशोध-अभियान, रुद्रमतिक भात-दृश्यक लोकनाट्यीय कठोरता, राजवध आ माधवक आत्महत्या — आ अन्तमे मरणासन्न गंगाधरक ओ आत्मालोचन जे एहि नाटककेँ प्रचार-नाट्यसँ सर्वथा अलग कऽ दैत अछि: यएह टा डर अछि जे बदलाक भावक ई आगि अनुभवमण्डलकेँ एकटा उल्कामुखी जाति नै बना दै... जे दरबज्जा हम खोललौं, ओ हमरा गेलाक बाद फेर बन्द नै होउ। आन्दोलन अपनहि प्रति-पहचानमे नव जाति बनि जेबाक जोखिम — ई आत्म-सजगता ब्रेष्टक ऐतिहासीकरणक सार्थकता अछि: चौदहम शताब्दीक कथा वर्तमानक हरेक आन्दोलनसँ प्रश्न पुछैत अछि। रस-दृष्टिसँ उल्कामुख अद्भुत (भुतहा बँसबिट्टी, उड़ियाइत पात्र, ताबीज), करुण (मेधा-जीवे, गंगाधरक मृत्यु) आ शान्तक संकर अछि, आ ओकर श्रव्य-समापन — घनक खरखराहटि आ गोलाक घरघराहटि एक संग, फेर दूरसँ घुरैत लोकगीतक एक पंक्ति, जेना विस्मरण फेर हारि रहल हो — ध्वनि-नाट्यक दुर्लभ उपलब्धि अछि। अन्तर्पाठीय दृष्टिसँ ई नाटक शेष आठूक संगम अछि: दधीचीक ज्ञान-पहरा एतऽ चौपाड़िक प्रतिलिपि-निषेध बनल अछि; अपालाक नाम-सहित स्वीकृतिक ठीक विलोम वल्लभाक नाम-लोप अछि; कमलाक भगताक बिनु-बुझल नकल एतऽ रटन्त विद्याक संस्था बनि गेल अछि; बाल-नाटक सभक प्रश्न-संस्कृति (प्रश्ने विद्याक पहिल सीढ़ी) एतऽ अनुभव मण्डल बनि फड़ैत अछि; गंगा ब्रिजक लिखित-इतिहास बनाम डंका एतऽ पोथी बनाम गीत अछि; आ मचण्डक अनसुनल भाषा एतऽ हीरूक गीत बनि सत्ताक कान धरि पहुँचबाक बाट ताकैत अछि। जँ एहि नअ नाटकक कोनो एकटा वाक्यकेँ समूचा शृंखलाक ध्येय-वाक्य बनाबी, तँ ओ वल्लभाक अछि — नाम काटू, गीत काटू, देह काटू, मुदा प्रेमक ध्वनि कतऽ काटब? उपसंहार : नअ नाटक, एक नाट्य-दर्शन नअ समीक्षाक बाद आब ओ सूत्र-जाल समेटल जाए जे एहि रचना-समूहकेँ पोथी बनबैत अछि। पहिल सूत्र सूत्रधार-परम्परा अछि: कमलाक भगता, दानवीर दधीची, भऽ जाएब छू, अपाला आत्रेयी, संकर्षण आ उल्कामुख — छह टा नाटकमे सूत्रधार उपस्थित छथि, कतहु हाक देनिहार, कतहु व्याख्याकार, कतहु दर्शकसँ प्रश्न पुछनिहार। भरतक पूर्वरंग-विधानसँ चलल ई पात्र एतऽ आधुनिक कथावाचक (नैरेटर) आ ब्रेष्टीय टिप्पणीकारक बीचक सेतु अछि, आ जतऽ सूत्रधार नहि छथि (जलोदीप, गंगा ब्रिज, मचण्ड) ओतऽ ओकर काज कोनो ध्वनि-यंत्र करैत अछि — ढोलहो-डंका, हेलिकॉप्टरक घरघराहटि, अनुवादकक स्वर। दोसर सूत्र ओ हस्ताक्षर-ध्वनि अछि जकर चर्च बेर-बेर भेल — ई असल बात अछि — जे दानवीर दधीचीक अन्तमे फुसफुसाहटि बनि आ जलोदीपक अन्तमे सामूहिक धुन बनि अबैत अछि: सत्यक ई मुहर नाटककारक अपन शैली-चिन्ह अछि, जेना चित्रकार कोनमे अपन संकेताक्षर छोड़ि जाइत छथि। तेसर सूत्र देह-ध्वनिक अछि। भऽ जाएब छूमे गाछक मरणक बाद पात्र सभक खोंखी तालमे बदलैत अछि; उल्कामुखमे भगता आ ऋषि जटाक उकासी दृश्य-सन्धिक घण्टी अछि आ गंगाधरक अन्तिम खोंखीक संग नाटक प्राण त्यागैत अछि। खोंखी — देहक ओ अनैच्छिक स्वर जे ने भाषा अछि ने गीत — एहि नाट्य-संसारमे संकटक सभसँ ईमानदार सूचक अछि: पर्यावरणक संकट, देहक संकट, स्मृतिक संकट। चारिम सूत्र जलक अछि: कमलाक धारसँ (कमलाक भगता) गंगा धरि (गंगा ब्रिज), बाढ़िक जलप्रलयसँ (जलोदीप) शर्यणा जलाशय धरि (दानवीर दधीची) — जल एतऽ कतहु साक्षी अछि, कतहु न्यायाधीश (प्रमाण पानि अछि), कतहु बलि माँगनिहार भ्रमक आवरण (ई गंगा... खून चाही एकरा — जे वस्तुतः सत्ताक अपन भूख छल)। आ पाँचम सूत्र ज्ञानक अछि, जे एहि पोथीक समीक्षा सभमे डेग-डेगपर देखार भेल: बिनु कारण बुझने नकल (कमलाक भगता) → ज्ञानपर पहरा (दानवीर दधीची) → प्रश्नक अधिकार (अपाला आत्रेयी) → कल्पना आ व्यवहारक संयोग (भऽ जाएब छू) → बच्चाक विशेषज्ञता (जलोदीप) → आत्म-प्रवंचना (संकर्षण) → इतिहासक पट्टी-बन्हाइ (गंगा ब्रिज) → भाषाहीनक न्याय (मचण्ड) → रटन्त बनाम बुझन्त आ स्मृतिक रक्षा (उल्कामुख)। ई कोनो बिखरल विषय-सूची नहि, एकटा क्रमबद्ध ज्ञान-मीमांसा अछि — प्रश्नसँ स्मरण धरि। बाल आ प्रौढ़ नाट्यक सिद्धान्त-भेदपर एहि शृंखलाक अपन उत्तर सेहो आब स्पष्ट कहल जा सकैत अछि। पाँचू बाल-नाटक स्लेड-हीथकोट-बोआल परम्पराक अनुरूप बच्चाकेँ कर्ता बनबैत अछि आ सभक अन्त आशा वा प्रतिज्ञापर होइत अछि; चारू प्रौढ़ नाटक ब्रेष्ट-पिस्काटर-सरकार परम्पराक अनुरूप दर्शकक सुविधा तोड़ैत अछि आ तीनटाक अन्त अ-समाधानपर (संकर्षण एकमात्र अपवाद अछि, जतऽ आत्मबोध भेटैत अछि — मुदा ओहो हँसीक नहि, बुझबाक क्षणपर)। तथापि दुनू धारा एक्के नदीक अछि: बाल-नाटकक प्रतिज्ञा (पूछू, बुझू, फेर करू) जँ निमहल जाए तँ प्रौढ़ नाटकक त्रासदी — रोलरक नीचाँक अभियन्ता, जेलक मुतालिफ, हाथीक पएर तरक मेधा-जीवे — टारल जा सकैत अछि; प्रौढ़ नाटक ओही भविष्यक चित्र अछि जे प्रश्न नहि पुछनिहार बच्चाक प्रतीक्षा करैत अछि। एहि अर्थमे नअ नाटकक ई समुच्चय एकटा पूर्ण रंग-शिक्षाक्रम अछि — कमला घाटक बालुसँ उल्कामुखी ताबीज धरि — जकरा विद्यालय, गाम-मंच आ नगर-प्रेक्षागृह तीनू ठाम, क्रमसँ वा फराक-फराक, खेलाएल जा सकैत अछि। अन्तमे एकटा प्रस्ताव: जँ ककरो एहि नअमे सँ मात्र दूटा नाटक पढ़बाक वा खेलेबाक अवसर होनि, तँ ओ कमलाक भगता आ उल्कामुख चुनथि — शृंखलाक सभसँ छोट आ सभसँ पैघ रचना। पहिल सिखबैत अछि जे बिनु बुझने केलहा काज केहन विधान बनि जाइत अछि, दोसर देखबैत अछि जे बिनु बुझने रटलहा विद्या केहन विस्मरण बनि जाइत अछि — आ दुनूक बीचक सात नाटक ओही दू ध्रुवक बीच मनुक्खक, समाजक आ स्मृतिक यात्रा अछि। नाटककार अपन सूत्रधारक मुँहे जे कहौने छथि, से एहि पोथीक अन्तिम पाँती बनए योग्य अछि: कथा बदलि सकैए, मुदा सत्यक खोज बन्न नहि हेबाक चाही। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.२३. भारतीय दलित साहित्य: मैथिली अनुवाद, समीक्षा आ सौन्दर्यशास्त्र भारतीय दलित साहित्य: मैथिली अनुवाद, समीक्षा आ सौन्दर्यशास्त्र काव्य • कथा • अनुवाद • समीक्षा-सिद्धान्त • रस-दृष्टि • समानान्तर साहित्यिक परम्परा समेकित संस्करण — मूल दस्तावेजमे संकलित सभ समीक्षा, सैद्धान्तिक विवेचन, साहित्यिक पाठ आ अनुलग्नककेँ एकहि सम्पादकीय क्रममे प्रस्तुत कएल गेल अछि। पुनरावृत्त सामग्रीकेँ केवल सत्यापित दोहरावक स्थितिमे समेटल गेल अछि; मूल आशय आ सामग्री सुरक्षित राखल गेल अछि। विषय-संकेत १. तेलुगु दलित काव्य आ दलित-स्त्री काव्य २. गुजराती आ उड़िया दलित काव्य ३. तेलुगु दलित लघुकथा आ उपन्यास ४. समग्र अनुवाद-समीक्षा आ रस-सिद्धान्त ५. मैथिली मूल/अनूदित दलित साहित्य लेल समीक्षा-सिद्धान्त ६. विद्यापति, विदेसिया आ समानान्तर साहित्यिक अनुलग्नक ७. ग्रन्थ-सूची दलित काव्य समीक्षा: बोयी भीमन्नाक दू टा कविता जरैत खोपड़ी सभ आ हमर पैतृक अधिकार प्रारम्भिक टिप्पणी बोयी भीमन्ना (१९२०–२००१) तेलुगु दलित साहित्यक एकटा स्तम्भ छलाह। हुनकर कविता मात्र व्यक्तिगत पीड़ाक अभिव्यक्ति नहि, बल्कि एकटा सामूहिक ऐतिहासिक चेतनाक दस्तावेज थिक। प्रस्तुत दूनू कविता — गुडिसेलु कालिपोतुन्नायी आ ना वारसत्वपु हक्कुलु — हुनकर काव्य-संसारक दूटा भिन्न मुदा परस्पर-सम्बद्ध आयाम प्रस्तुत करैत अछि: एक दिस धार्मिक हिंसाक चक्रव्यूह, दोसर दिस पौराणिक इतिहासक पुनर्पाठ। १. काव्य-रूप आ संरचना जरैत खोपड़ी सभ एहि कविताक सर्वाधिक उल्लेखनीय शिल्पगत विशेषता थिक एकर प्रश्न-उत्तर संरचना। कविता लगातार स्वयंसँ प्रश्न पुछैत अछि — "ई केकर खोपड़ी? ", "कतय सँ बेर-बेर उगि अबैत छैक? " — आ फेर स्वयं उत्तर दैत अछि, मुदा ओ उत्तर पुनः एकटा नव प्रश्नमे परिणत भऽ जाइत अछि। ई संरचना सुकरात-पद्धतिक स्मरण दिअबैत अछि, जतय प्रश्नक शृंखलासँ सत्यक उद्घाटन होइत अछि — मुदा एतय सत्य कोनो दार्शनिक निष्कर्षमे नहि, बल्कि एकटा कड़वा सामाजिक यथार्थमे अवस्थित होइत अछि। पुनरावृत्ति — "जरि रहल अछि", "उगि अबैत छैक" — एकटा मन्त्र-प्रभाव सृजित करैत अछि। अनुप्रास-आरम्भ (एकहि शब्दसँ पंक्ति आरम्भ करबाक काव्य-विधि) आ अन्त्य-पुनरावृत्ति (पंक्तिक अन्तमे एकहि शब्द दोहराएब) दूनूक प्रयोग एहि कविताकेँ मौखिक परम्पराक, लोकगीतक निकट लबैत अछि — एहिसँ ई अनुमान होइत अछि जे भीमन्ना दलित मौखिक-सांस्कृतिक परम्पराकेँ लिखित कवितामे अन्तर्निहित करैत छथि। हमर पैतृक अधिकार एहि कवितामे संरचना अधिक खण्डित आ आख्यानात्मक अछि। कविता एक पौराणिक प्रसंगसँ दोसरमे कूदैत अछि — वशिष्ठ, अरुन्धती, मत्स्यगन्धी, व्यास — जेना एकटा उद्विग्न इतिहास-पाठक गोटेक पृष्ठ पलटैत छल। ई खण्डितपना आकस्मिक नहि; ई दलित इतिहास-बोधक प्रतीक थिक जतय स्मृति पूर्ण नहि, बल्कि चोराएल आ तितर-बितर कएल गेल अछि। कविताक अन्तिम पंक्तियाँ लम्बी, भारी साँसक जकाँ चलैत अछि — "मात्र गर्व सँ फ्याँकि देबाक लेल! / सम्पूर्ण सम्मान सँ साँस लेबाक लेल! " — ई समापन एकटा विजय-घोषणा थिक, मुदा एहिमे विजय-उल्लास नहि, बल्कि एकटा गंभीर, गहिर मुक्तिक अनुभव अछि। २. भाषा आ रूपक खोपड़ीक रूपक जरैत खोपड़ी सभक केन्द्रीय बिम्ब — जरैत आ बारम्बार पुनर्जन्म लैत खोपड़ी — अत्यन्त बहुस्तरीय अछि। एकटा स्तरपर ई स्पष्टतः जातीय हिंसाक संकेत करैत अछि: दलितक ऊपर सामूहिक हिंसाक इतिहास, खोपड़ी काटल जाएब, जराएल जाएब। दोसर स्तरपर ई हिन्दू पुनर्जन्म-दर्शनक व्यंग्यात्मक उपयोग थिक — कवि पुछैत छथि: जँ पुनर्जन्मक सिद्धांत सत्य अछि, तँ एही दलितकेँ बारम्बार किएक जराएल जाइत छैक? पुनर्जन्म तँ मोक्षक मार्ग छल — मुदा दलितक लेल ई एकटा अन्तहीन दुष्चक्र बनि जाइत अछि। ई फ्रान्ट्ज़ फानोंक धरतीक अभागल (औपनिवेशिक शोषणक विरुद्ध क्रान्तिक दार्शनिक ग्रन्थ) क ओहि विश्लेषणसँ मेल खाइत अछि जतय ओ देखाबैत छथि जे औपनिवेशिक आ जातीय व्यवस्था पीड़ितकेँ हिंसाक चक्रमे एहन तरहसँ फँसाबैत अछि जे पीड़ित स्वयं ओहि चक्रकेँ सामान्य मानऽ लगैत अछि — जाधरि "एहि खोपड़ीक रहस्य एकर बासिन्दा सभकेँ पता नै चलि जाय। " कब्रिस्तान खनबाक रूपक हमर पैतृक अधिकारमे कब्रिस्तान खनबाक बिम्ब असाधारण जटिल अछि। सामान्यतः कब्रिस्तान खनब मृत्युसँ सम्बद्ध, अमंगल। मुदा एतय कवि एकर अर्थ उलटि दैत छथि — कब्रिस्तान खनब पुनर्प्राप्तिक कार्य थिक। जे दफनाएल गेल छल — दलितक वैदिक पहचान, हुनकर ऐतिहासिक अधिकार — तकरा खनिकऽ बाहर अनब एकटा क्रान्तिकारी कार्य बनि जाइत अछि। एहिमे वाल्टर बेंजामिनक "इतिहासक दर्शन पर थीसिस" (इतिहासकेँ विजेताक दृष्टिसँ नहि, पीड़ितक दृष्टिसँ देखबाक माँग करैत दार्शनिक निबन्ध) क प्रतिध्वनि सुनाइत अछि। बेंजामिन कहैत छथि जे इतिहास सदैव विजेताक दृष्टिकोणसँ लिखाइत अछि, आ क्रान्तिकारी कार्य थिक "खतरनाक स्मृति" केँ — खतरनाक स्मृति — पुनर्जीवित करब। भीमन्ना ठीक इएह करैत छथि: ओ ओहि "खतरनाक स्मृति" खनैत छथि जकरा ब्राह्मणवादी इतिहास-लेखनी दफनाकऽ रखने छल। ३. पौराणिक-विरोधी पाठ हमर पैतृक अधिकार दलित साहित्यक एकटा महत्त्वपूर्ण परम्परामे स्थित अछि — पौराणिक आख्यानक उल्टा पाठ। एहि परम्पराकेँ बी. आर. आम्बेडकर हिन्दू धर्मक पहेलियाँ आ शूद्र के छलाह? मे प्रतिष्ठित कएल छलाह। भीमन्ना एही विधिसँ पूरा महाभारत-रामायण-वेद-परम्पराकेँ प्रश्नांकित करैत छथि। कविताक मूल तर्क ई थिक: वैदिक-आर्य परम्पराक महान व्यक्तित्व सब वास्तवमे जातिहीन वा दलित मूलक छलाह — वशिष्ठ, मत्स्यगन्धी, व्यास। मुदा ब्राह्मणवादी इतिहासने हुनका "आर्य" बना देलक, आ हुनकर वास्तविक वंशजकेँ — दलितकेँ — बहिष्कृत राखल। ई एकटा ऐतिहासिक विडम्बनाक उद्घाटन थिक। एतय निम्नवर्गीय अध्ययन (हाशियाक लोकसभक इतिहास आ आवाजकेँ केन्द्रमे आनबाक विद्वत्-परम्परा) क दृष्टिकोण प्रासंगिक अछि। गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक की निम्नवर्ग बाजि सकैत अछि? मे पुछैत छथि जे की दलित-स्त्री अपन आवाजमे इतिहासमे उपस्थित भऽ सकैत अछि? भीमन्नाक कविता एहि प्रश्नक उत्तर थिक: ओ निम्नवर्गकेँ बोलबाइत छथि — मत्स्यगन्धीकेँ, अम्बा-अम्बालिकाकेँ, जे महाभारतमे मात्र वस्तु छलीह, हुनका एकटा स्वयं-निर्णय-शक्ति दैत छथि — "जँ ओ थप्पड़ मारि कऽ दाँत तोड़ि देने रहितथि..." — ई प्रतिकूल-ऐतिहासिक कल्पना (जँ इतिहास उलटा होइत तऽ की होइत — एहि कल्पनाक माध्यमसँ इतिहासक पुनर्पाठ) निम्नवर्गक स्वयं-निर्णय-शक्तिक पुनर्सृजन थिक। ४. स्त्री-दलित आयाम एहि दूनू कवितामे — विशेषकरि हमर पैतृक अधिकारमे — एकटा स्त्री-दलित बहु-उत्पीड़न-दृष्टि (जाति आ लिंग दूनूक एकसाथ उत्पीड़नक विश्लेषण) स्पष्ट अछि। अरुन्धती, मत्स्यगन्धी, अम्बा, अम्बालिका — ई सब स्त्री छथि जिनका पर एकहि साथ जाति-आधारित आ लिंग-आधारित शोषण भेल। कविता हिनका मात्र पीड़िताक रूपमे नहि, बल्कि सम्भावित विद्रोहिणीक रूपमे प्रस्तुत करैत अछि। किम्बर्ले क्रेन्शॉक बहु-उत्पीड़न-सिद्धांत (जाहिमे ओ देखाबैत छथि जे जाति, लिंग आ वर्गक उत्पीड़न अलग-अलग नहि, एकहि साथ घटित होइत अछि) एतय प्रत्यक्षतः लागू होइत अछि। भीमन्ना — एकटा दलित पुरुष कवि — एहि बहु-उत्पीड़न-दृष्टिसँ काव्य-रचना करैत छथि, जे हिनकर काव्य-दृष्टिक विशालताक प्रमाण थिक। ५. दलित सौन्दर्यशास्त्र दलित साहित्यक आलोचकगण — शरणकुमार लिम्बाले (दलित साहित्यक सौन्दर्यशास्त्र दिस), ओमप्रकाश वाल्मीकि — बारम्बार रेखांकित कएल अछि जे दलित साहित्यकेँ पाश्चात्य काव्यशास्त्रक मानकसँ नहि नापल जा सकैत अछि। दलित कवितामे: क्रोध एकटा सौन्दर्य-श्रेणी थिक, दोष नहि। राजनीतिक प्रत्यक्षता कलात्मक कमजोरी नहि, बल्कि नैतिक आवश्यकता थिक। व्यक्तिगत आ सामूहिक अनुभव एकाकार अछि — "मैं" सदैव एकटा सामाजिक "हम"क प्रतिनिधि थिक। भीमन्नाक दूनू कविता एहि सौन्दर्यशास्त्रक उत्कृष्ट उदाहरण थिक। जरैत खोपड़ी सभक क्रोध वाग्-आडम्बर (केवल भाषणकलाक लेल प्रयुक्त खोखल भावना) नहि — ओ एकटा प्रामाणिक नैतिक भावना थिक। हमर पैतृक अधिकारक विद्वत्ता — पौराणिक सन्दर्भ, इतिहास-बोध — एकटा मात्र पाण्डित्य-प्रदर्शन नहि, बल्कि आत्म-सम्मानक सांस्कृतिक परियोजना थिक। ६. अनुवादक चुनौती एहि कविताक मैथिली अनुवाद (जे स्वयं अंग्रेजी अनुवादसँ कएल गेल अछि) एकटा दोहरा अनुवाद थिक — तेलुगु → अंग्रेजी → मैथिली। एहिमे किछु काव्यिक क्षति अवश्यम्भावी अछि। उदाहरणत: गुडिसेलु (खोपड़ी/घर) शब्दमे तेलुगुमे एकटा दोहरा अर्थ अछि — घर जे जराएल जाइत अछि। मैथिलीमे "खोपड़ी" शब्द ओ द्व्यर्थता (एकहि शब्दक दू अर्थ) खूब राखि सकल अछि। मुदा "ना वारसत्वपु हक्कुलु"क भावनात्मक तीव्रता — जाहिमे "मेरा" (ना) आ "अधिकार" (हक्कुलु) दूनू पर समान बल अछि — मैथिलीमे "हमर पैतृक अधिकार" मे कनेक विसर्जित भेल अछि। एहि दोहरे अनुवादक सीमाक भीतरहु दूनू कविताक मूल काव्य-शक्ति मैथिलीमे आयल अछि — एहि कारण जे भीमन्नाक विचारक बलसँ कोनो भाषा-माध्यम दलित नहि बना सकैत अछि। निष्कर्ष बोयी भीमन्नाक ई दू टा कविता दलित साहित्यक ओहि उच्चतम स्तरपर स्थित अछि जतय काव्य-शिल्प आ राजनीतिक दर्शन एकाकार भऽ जाइत अछि। जरैत खोपड़ी सभ धार्मिक हिंसाक चक्रवर्ती प्रकृतिकेँ एकटा रहस्यवादी प्रश्नक रूपमे प्रस्तुत करैत अछि, जखन कि हमर पैतृक अधिकार इतिहासक उलटा पाठ कऽ दलित अस्मिताक पुनर्प्रतिष्ठाक घोषणा करैत अछि। दूनू कविता मिलिकऽ एकटा सम्पूर्ण दलित-दर्शन प्रस्तुत करैत अछि: प्रश्न करब, स्मरण करब, पुनर्दावा करब, आ अन्ततः गर्वसँ मुक्त श्वास लेब। ई मात्र कविता नहि — ई एकटा सभ्यता-संघर्षक दस्तावेज थिक। दलित-स्त्री काव्य समीक्षा: जे. सुभद्राक चारि टा कविता लोढ़ब, लाण्डा, साड़ीक कोर, अव्वा प्रारम्भिक टिप्पणी जे. सुभद्रा तेलुगु दलित-स्त्री काव्यक एकटा विशिष्ट स्वर छथि। बोयी भीमन्नाक कविता जतय ऐतिहासिक-पौराणिक आयामसँ दलित-अस्मिताक पुनर्पाठ करैत अछि, सुभद्राक कविता देह, श्रम, आ घरेलू वस्तु — चाम, घैला, साड़ीक कोर — कें काव्य-केन्द्रमे स्थापित करैत अछि। हिनकर चारू कविता मिलिकऽ एकटा सम्पूर्ण दलित-स्त्री जीवनक समग्र दृश्य प्रस्तुत करैत अछि: खेतसँ घर धरि, श्रमसँ मातृत्व धरि, भूखसँ सम्मान धरि। १. काव्य-रूप आ संरचना लोढ़ब एहि कविताक संरचना सूचीबद्ध श्रमक (श्रम-सूची) रूपमे अछि। भोरसँ रातिक सब काज एकपर एक आबैत अछि — बुहारब, निपब, पानि भरब, गोबर हटाएब — बिना कोनो विराम वा संयोजनक। ई सूची-रूप आकस्मिक नहि; ई दलित-स्त्रीक जीवनक साँसहीन निरन्तरता क प्रतिनिधित्व करैत अछि। वॉल्ट व्हिटमैन क आत्मगीत मे सेहो श्रम-सूचीक प्रयोग अछि — मुदा ओतय सूची मुक्तिक प्रतीक अछि; एतय ई बन्धनक। अन्तिम प्रश्न — "ई बन्धुआ जिनगी कोना खतम हएत? " — पूरा कविताक भारकेँ एकटा छोट डोरीमे बान्हि दैत अछि। वक्तृत्वात्मक प्रश्न नहि, ई एकटा वास्तविक, अनुत्तरित प्रश्न थिक। लाण्डा एहि कविताक संरचना प्रक्रिया-आख्यान अछि — चाम सड़बाक, साफ करबाक, मुलायम बनाएबाक पूरा प्रक्रिया। ई तकनीकी सूक्ष्मता काव्यमे असामान्य अछि। अमलतासक गुद्दी, तेतरिक बीआ — ई सब लोक-ज्ञानक (देशज ज्ञान) अभिलेखीकरण थिक जे सुभद्रा काव्यक भीतर कऽ रहल छथि। एहि अर्थमे ई कविता एकटा नृवंशविज्ञानात्मक दस्तावेज सेहो थिक। कविताक अन्तमे — "चरचराइत जुत्ता आ ढोल बनबा लेल— / ओ ढोल पर मधुर ताल दैत छथि" — एकटा कड़वा विडम्बना थिक। जे चाम स्त्री घृणित परिस्थितिमे तैयार करैत अछि, ओही चामसँ बनल ढोलपर पति "मधुर ताल" दैत अछि। श्रम आ कला, पीड़ा आ सौन्दर्य — एहि दूनूक बीचक विषम सम्बन्ध सुभद्रा एतय उजागर करैत छथि। साड़ीक कोर ई चारूमे सर्वाधिक लम्बा आ जटिल कविता थिक। एकर संरचना विस्तारित रूपक पर आधारित अछि — साड़ीक कोर एकहि वस्तु अछि जे बारम्बार नव रूप धरैत अछि: ओछाउन, छाता, थैली, गद्दी, रक्षक, माय। ई रूपान्तरण-शृंखला दलित-स्त्रीक जीवनक बहुरूपताकेँ प्रतिबिम्बित करैत अछि — जे एकहि साथ श्रमिक, माय, पत्नी, भिखारिन आ जीवट-योद्धा छथि। अन्तिम पंक्तियाँ — "ई हमर छाती पर पहरा दऽ रहल कपड़ा नै अछि" — शीर्षककेँ ही नकारि दैत अछि। ई क्रियात्मक विरोधाभास थिक: शीर्षकमे जे कहल गेल, कविता ओकरा अस्वीकार करैत अछि। एहिसँ एकटा द्वन्द्वात्मक तनाव सृजित होइत अछि — कोन अर्थमे साड़ीक कोर पहरेदार नहि अछि? एहि प्रश्नकेँ कवि खुला रखैत छथि। अव्वा एहि कविताक संरचना सर्वाधिक गीतात्मक आ शोकगाथात्मक (शोकगीतात्मक) अछि। "अव्वा" शब्दक पुनरावृत्ति — जे तेलुगुमे "माँ" थिक — एकटा आह्वान क रूप धारण करैत अछि, जेना कोनो अनुष्ठानमे देवीकेँ बजाएल जाइत हो। मुदा ई देवी घरेलू श्रमक देवी छथि, सोनाक सिंहासनपर विराजित नहि। कविताक बिम्ब-शृंखला असाधारण रूपसँ घनी अछि: सूरज जे आकाशक कालीनमे हरा गेल, खाली कोठीक धानक दाना, फाटल ढोलकक थाप। ई सब अभाव आ विस्थापनक रूपक थिक। २. केन्द्रीय रूपक: वस्तु-काव्यशास्त्र सुभद्राक काव्यक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता थिक — साधारण वस्तुकेँ काव्य-केन्द्र बनाएब: लाण्डा (चमड़ा सड़ाएबाक पात्र), घैला, साड़ीक कोर, कोदारि, हँसुआ। पाश्चात्य काव्यशास्त्रमे वस्तु-कविता (वस्तु-कविता / वस्तु-कविता) एकटा प्रतिष्ठित परम्परा थिक — राइनर मारिया रिल्के क नवीन कवितासभ एकर उत्कृष्ट उदाहरण अछि। मुदा रिल्के क वस्तु सब सौन्दर्य-वस्तु छथि — अपोलोक मूर्ति, पँथर। सुभद्राक वस्तु सब श्रम-वस्तु छथि — जे घृणित, 臭 (दुर्गन्धयुक्त), मैल, आ सामाजिक रूपसँ अपमानित अछि। एहिमे दलित वस्तु-काव्यशास्त्र क एकटा नव काव्यशास्त्र उभरैत अछि: वस्तुक माध्यमसँ दलित-स्त्रीक श्रम, ज्ञान, आ अस्मिताकेँ दृश्यमान करब। जे समाज देखय नहि चाहैत — चाम सड़ब, माटिमे अनाजक कण लोढ़ब — कवि तकरा साहित्यक केन्द्रमे रखैत छथि। ३. देह-राजनीति आ भौतिक यथार्थ लाण्डामे एकटा पंक्ति असाधारण थिक: "भले हमर अन्तड़ी मुँह सँ बाहर आबि जाय, / भले मूर्छित भऽ जाय — कीड़ा-मकोड़ा आ गन्धक कारण, / ई चाम कमायबाक नियति सहबे पड़ैत अछि! " ई देह-अन्तरक प्रत्यक्ष यथार्थवाद — आन्तरिक अंगक उल्लेख, घ्राण-प्रतिक्रिया, शारीरिक मूर्छा — दलित साहित्यक एकटा विशिष्ट प्रवृत्ति थिक जकरा गोपाल गुरु "उग्र देहाधारित अनुभूति" कहैत छथि। उच्च-जातीय साहित्यमे देह सामान्यतः आदर्शीकृत वा अमूर्त होइत अछि। दलित साहित्यमे देह ठोस, पीड़ित, आ श्रमरत होइत अछि — एहिमे कोनो पक्षसमर्थनात्मक सफाइ नहि। साड़ीक कोरमे देहक उपस्थिति भिन्न रूपमे अछि — घाम, नोर, रजस्वला — ई सब देहक द्रव-प्रवाह (देह-द्रव) थिक जकरा ब्राह्मणवादी शुद्धता-प्रदूषण-व्यवस्था "अशुद्ध" मानैत अछि। सुभद्रा एहि सबकेँ काव्यमे सहज रूपसँ स्वीकारैत छथि — ई शुद्धता-मिथकक खण्डन थिक। जूलिया क्रिस्तेवा क घृणित-बहिष्करण सिद्धांत एतय प्रासंगिक अछि। क्रिस्तेवा क अनुसार समाज ओहि तत्वकेँ "घृणित-बहिष्कृत" — घृणित, बहिष्कृत — मानैत अछि जे शरीरक सीमाकेँ तोड़ैत अछि: रक्त, मल, सड़न। सुभद्रा एहि घृणित-बहिष्कृत तत्वकेँ अपन काव्यक विषय बनाकऽ सामाजिक घृणित-बहिष्करण केँ ही अस्वीकार करैत छथि। ४. बहु-उत्पीड़न-अन्तर्सम्बन्ध: जाति, लिंग, आ वर्ग एहि चारू कवितामे जाति, लिंग, आ वर्ग — तीनू एकहि साथ उपस्थित छथि, आ हिनकर पारस्परिक क्रिया कखनो अलग नहि होइत अछि। लोढ़बमे: जमीन्दारक घर काज करबाक बाध्यता (वर्ग+जाति) + "खरड़ा सँ मारि" (जातीय हिंसा) + एकर पूरा बोझ स्त्री पर (लिंग)। अव्वामे: "पिताक रिसक भट्ठीमे झुलसि जाइत छथि" — घरेलू हिंसा (लिंग) + "सेठ-सामन्त सब ओकरा हल-जोत सँ दूर रखने छथि" (जाति+वर्ग) — एकहि स्त्रीक जीवनमे एकहि साथ। किम्बर्ले क्रेन्शॉ क बहु-उत्पीड़न-अन्तर्सम्बन्ध-सिद्धांत एतय शाब्दिक रूपसँ साकार होइत अछि। दलित-स्त्री न मात्र दलितक प्रतिनिधि छथि, न मात्र स्त्रीक — ओ एकटा तृतीय श्रेणी थिक जकर अनुभव एहि दूनूसँ भिन्न आ अधिक जटिल अछि। शर्मिला रेगे एहि सन्दर्भमे "दलित-नारीवादी दृष्टिस्थान" क अवधारणा प्रस्तुत कएल छथि — दलित-स्त्रीक दृष्टिकोण एकटा ज्ञानमीमांसात्मक विशेषाधिकार थिक, कारण ओ उत्पीड़नक सर्वाधिक गहन स्तरपर अछि। सुभद्राक कविता एहि दृष्टिस्थान सँ लिखाएल अछि। ५. मातृत्व आ अभाव: अव्वा क विशेष पाठ अव्वा मातृत्व-काव्यक एकटा असाधारण पुनर्पाठ थिक। हिन्दी-संस्कृत साहित्यमे माँ सामान्यतः त्याग, कोमलता, आ पोषणक प्रतीक थिक — यशोदा, कौशल्या। सुभद्राक "अव्वा" एहिसँ मूलतः भिन्न छथि। ओ माय छथि जे लोरी नहि गा सकैत छथि, कारण ओ काज पर छथि। ओ माय छथि जिनकर हाथ कठोर आ मैल अछि, कारण ओ सदैव खेत-पथारमे छथि। ओ माय छथि जे गोदमे नहि सुता सकैत छथि, कारण ओ जमीन्दारक बन्धुआ छथि। एहिमे एड्रियन रिच क स्त्रीक रूपमे जन्म क प्रतिध्वनि अछि जतय ओ मातृत्व केँ संस्था आ अनुभव — दू स्तरपर विश्लेषित करैत छथि। सुभद्राक अव्वाक लेल मातृत्वक संस्था (प्रेम देब, दुलारब) आ मातृत्वक अनुभव (जीवित रहब, खुआएब) — दूनू एकहि साथ उपस्थित छथि, मुदा पहिल सदैव दोसराक अधीन। जीवित रहब दुलारसँ पहिने आबैत अछि — ई दलित-माँक त्रासदी थिक। ६. लोक-सौन्दर्यशास्त्र आ देशज ज्ञान लाण्डामे अमलतास आ तेतरिक विशिष्ट उपयोग, साड़ीक कोरमे "मैसम्मा देवी"क सन्दर्भ, अव्वामे रोपनी-बिछुड़प-दौनीक गीत — ई सब दलित लोक-परम्पराक काव्यिक अभिलेखीकरण थिक। गणेश देवी विस्मृतिक बाद मे तर्क करैत छथि जे भारतीय साहित्यिक आलोचना सदैव संस्कृत/उर्दू/अंग्रेजीक मान्य साहित्यिक परम्परा केँ केन्द्रमे रखलक आ दलित-आदिवासी मौखिक परम्पराकेँ "साहित्येतर" मानलक। सुभद्राक कविता एहि मान्य परम्परासँ बहिष्करण केँ अस्वीकार करैत अछि — ओ दलित लोक-ज्ञानकेँ, मौखिक परम्पराकेँ, क्षेत्रीय वनस्पति-ज्ञानकेँ काव्यक उच्च-भूमि पर स्थापित करैत छथि। ७. साड़ीक कोर आ जयप्रभाक प्रसंग कविताक अन्तमे एकटा महत्त्वपूर्ण पादटिप्पणी अछि — जयप्रभाक तेलुगु नारीवादी कविता "साड़ीक कोरकेँ आगि लगा दिअ" क सन्दर्भ। जयप्रभाक कविता साड़ीक कोरकेँ पितृसत्ताक प्रतीक मानि ओकरा जराएबाक आह्वान करैत अछि। सुभद्रा एहि उच्च-जातीय नारीवादी दृष्टिकोणसँ स्पष्टतः असहमत छथि। हिनकर अव्वाक लेल साड़ीक कोर न पितृसत्ताक प्रतीक थिक, न मुक्तिक शत्रु। ओ जीवन-निर्वाहक उपकरण थिक — ओछाउन, रक्षा, थैली, माय। एकरा जराएब माने ओहि एकमात्र वस्तुकेँ जराएब जे एकर पास अछि। ई अन्तः-नारीवादी संवाद अत्यन्त महत्त्वपूर्ण थिक। ऑड्रे लॉर्ड बाहरी बहिनमे कहैत छथि: "मालिकक औजार मालिकक घरकेँ कहियो ध्वस्त नहि करत" — मुदा एतय मुद्दा ई थिक जे कोन नारीवाद, कार नारीवाद? दलित-स्त्रीक दृष्टिसँ उच्च-जातीय नारीवादी प्रतीकशास्त्र कखनो-कखनो वर्ग-अन्ध आ जाति-अन्ध भऽ जाइत अछि। सुभद्रा एहि अन्धताकेँ — बिना उग्रतासँ, किन्तु दृढ़तासँ — चुनौती दैत छथि। ८. भाषा आ मैथिली अनुवादक सन्दर्भ ई कविता सब तेलुगु → अंग्रेजी → मैथिली — तीन स्तरक यात्रा कएल अछि। एहि यात्रामे किछु महत्त्वपूर्ण सन्दर्भ सुरक्षित रहल: "लाण्डा" — तेलुगु शब्द जेना-अछि रखल गेल, जे उचित निर्णय थिक। एकर मैथिली अनुवाद कठिन होइत, आ मूल तकनीकी-सांस्कृतिक शब्दक शक्ति खत्म भऽ जाइत। "अव्वा" — एहिमे "माय" नहि कहल गेल, "अव्वा" कहल गेल। एहिसँ तेलुगु-सांस्कृतिक विशिष्टता बचल रहल। मुदा "कोंगु ना बोचे मीद कावलुंदे बोन्थपेग्गडु" (साड़ीक कोर) — तेलुगु शीर्षकक देहगत तात्कालिकता मैथिलीमे किछु मन्द भेल अछि। तेलुगुमे "बोचे" (छाती/उर) आ "कावलुंदे" (पहरेदारी) — दूनू शब्दक शारीरिक-राजनीतिक तनाव मैथिली "छाती पर पहरा दऽ रहल कपड़ा" मे अपेक्षाकृत शाब्दिक भऽ गेल। निष्कर्ष जे. सुभद्राक ई चारू कविता मिलिकऽ एकटा दलित-स्त्री जीवनक महाकाव्य रचैत अछि — विखण्डित, मुदा सम्पूर्ण। श्रमसँ मातृत्व धरि, देहसँ इतिहास धरि, एकटा साड़ीक कोरसँ पूरा सभ्यता-संघर्ष धरि। हिनकर काव्य-उपलब्धि ई थिक जे ओ कखनो शिकायत नहि करैत छथि — ओ गवाही दैत छथि। सिमोन वेल न्याय आ दयाक बीच एहि अन्तरकेँ महत्त्वपूर्ण मानैत छलीह: शिकायत पीड़ितसँ आबैत अछि, गवाही साक्षीसँ। सुभद्रा अपन जीवनक साक्षी बनैत छथि — आ एहिसँ हुनकर कविता मात्र व्यक्तिगत आर्तनाद नहि, बल्कि ऐतिहासिक दस्तावेज बनि जाइत अछि। अन्तिम पंक्ति — "ओ कहियो ओहि सीमा धरि नै पहुँचल जतय-जतय हमर अव्वा घुमलीह" — सम्पूर्ण संग्रहक समाधिलेख थिक: भाषा, इतिहास, आ सभ्यता — सब मिलिकऽ दलित-स्त्रीक जीवनक सम्पूर्ण भूगोलकेँ चिन्हित करय मे विफल रहल अछि। दलित-स्त्री काव्य समीक्षा (जारी): तुलनात्मक आ संश्लेषणात्मक अध्ययन ९. दूनू कवि एकसंग: भीमन्ना आ सुभद्राक काव्य-संवाद एहि समीक्षाक दूनू खण्ड — भीमन्नाक पाँच कविता आ सुभद्राक चारि कविता — एकसंग पढ़लापर एकटा द्वन्द्वात्मक संवाद उभरैत अछि जे दलित साहित्यक भीतरक जटिलताकेँ उजागर करैत अछि। दृष्टिकोणक भेद भीमन्ना ऊपरसँ देखैत छथि — इतिहास, पुराण, दर्शन, सभ्यताक दीर्घकालिक चाप। हुनकर काव्य-कैमरा व्यापक-दृष्टि अछि। सुभद्रा भीतरसँ देखैत छथि — देह, वस्तु, श्रम, घर, माय। हुनकर काव्य-कैमरा निकट-दृष्टि अछि। भीमन्नाक हमर पैतृक अधिकार व्यास आ वशिष्ठक इतिहासक खनन करैत अछि — एकटा व्यापक इतिहास। सुभद्राक अव्वा एकटा अनाम माँक एकटा दिनक श्रमकेँ चित्रित करैत अछि — एकटा सूक्ष्म इतिहास। मुदा दूनू एकहि सत्यक दू दिस थिक: ऐतिहासिक अपहरण आ दैनिक착취 (शोषण) — एक सिक्काक दू मुँह। एहि अर्थमे दूनू कविक संग्रह मिलिकऽ कार्लो गिन्ज़बर्ग क सूक्ष्म इतिहास आ मार्क्सवादी व्यापक इतिहास क सेतु बनाबैत अछि — जतय व्यक्तिगत जीवनक क्षुद्र विवरण सामाजिक संरचनाक महाकाव्यसँ जुड़ि जाइत अछि। प्रश्न आ गवाहीक भेद भीमन्ना प्रश्न करैत छथि — "ई खोपड़ी सब कोना बेर-बेर उगि अबैत छैक? ", "ई दुष्चक्र कतेक दिन चलत? " हुनकर कविता प्रश्नात्मक शैली मे अछि। सुभद्रा गवाही दैत छथि — "जखन हमर पति अपना हाथे चूना लगा कऽ चाम दैत छथि", "हमरा याद नै अछि कि कहियो अव्वाक डाँरकेँ कसिया कऽ पकड़ि लटकल रहलहुँ। " हुनकर कविता साक्ष्यात्मक शैली मे अछि। पाश्चात्य साहित्य-सिद्धांतमे साक्ष्य एकटा विशेष विधा थिक जकर विकास यहूदी-विनाशकाण्ड साहित्यमे भेल — एली विज़ेल, प्रीमो लेवी। मुदा शोशाना फेलमैन आ डोरी लाउब साक्ष्य: साक्षीपनक संकट मे देखाबैत छथि जे साक्ष्य मात्र तथ्यात्मक प्रतिवेदन नहि थिक — ई एकटा नैतिक कर्म थिक जाहिमे पीड़ित अपन अनुभवकेँ साक्ष्यमे रूपान्तरित करैत अछि। सुभद्राक प्रत्येक कविता एहि अर्थमे साक्ष्य थिक। १०. दलित काव्यमे प्रकृति-बिम्ब: एकटा पुनर्पाठ उच्च-जातीय हिन्दी-संस्कृत काव्यमे प्रकृति सामान्यतः सौन्दर्य-अनुभवक क्षेत्र थिक — कालिदासक मेघदूतमे यक्षक विरहक पृष्ठभूमि, छायावादमे आत्माक आरोपण। एहि परम्परामे प्रकृति रोमाण्टिक अछि। सुभद्राक प्रकृति-बिम्ब मूलतः भिन्न अछि: अव्वामे — "मुर्गाक स्वर सँ पहिने उगैत सूरज तापैत अछि अव्वाक आँखिमे" — सूरज उगनाइ एतय काव्यिक सौन्दर्य नहि, श्रमक आरम्भ-संकेत थिक। सूरज माँकेँ जगाबैत नहि — जरबैत अछि। साड़ीक कोरमे — "बरखामे साड़ीक कोर बनि जाइत अछि अमलतासक फूलक छाता" — अमलतास उच्च-जातीय कविमे सौन्दर्यक विषय होइत; एतय ओ व्यावहारिक आश्रय थिक। लोढ़बमे — धूरि, पाथरक दरारि, माटि — ई सब भू-दृश्य थिक जाहिमे दलित-स्त्री काज करैत अछि, जकरा छायावादी कवि कहियो नहि देखलथि। एहि अर्थमे सुभद्रा ग्राम्य-रोमानी विचारधारा केँ — जे ग्रामीण प्रकृतिकेँ शान्तिक स्थल मानैत अछि — ध्वस्त करैत छथि। रेमंड विलियम्स देश आ शहर मे देखाओल अछि जे ग्राम्य-रोमानी दृष्टि एकटा वर्ग-षड्यन्त्र थिक जे श्रमकेँ अदृश्य करैत अछि। सुभद्राक कविता ओहि अदृश्य श्रमकेँ दृश्यमान करैत अछि। ११. काव्यमे मौन आ अनुपस्थिति दूनू कविक रचनामे जे कहल नहि गेल से कहल गेलासँ कम महत्त्वपूर्ण नहि। भीमन्नाक जरैत खोपड़ी सभ मे हत्यारा कहियो नामित नहि होइत — "धर्म" एकटा अमूर्त शक्ति थिक। एहि रणनीतिक अनामिता मे एकटा साहित्यिक कूटनीति अछि: हत्यारा जखन व्यवस्था हो, व्यक्ति नहि, तखन ओकरा नामित करब आवश्यक नहि — कारण नाम लेलासँ व्यवस्था नहि बदलैत। सुभद्राक अव्वा मे माँक आवाज अनुपस्थित अछि। ओ गाबैत छथि — मुदा हम हुनकर गीत नहि सुनैत छी; ओ बाजैत छथि — मुदा हम हुनकर शब्द नहि जनैत छी। ई मौन दलित-स्त्रीक ऐतिहासिक अनुपस्थिति क प्रतीक थिक — जे इतिहासमे कहियो कर्ता-विषय नहि बनलीह, सदैव वस्तु रहलीह। जाक देरिदा चिह्न-अवशेष क अवधारणामे कहैत छथि जे अर्थ मात्र उपस्थितिमे नहि, अनुपस्थितिक निशानमे सेहो निहित होइत अछि। सुभद्राक कविताक मौन — अव्वाक न-सुनाएल लोरी, न-कहाएल शब्द — एहि चिह्न-अवशेष थिक जतय दलित-स्त्रीक इतिहास अंकित अछि। १२. क्रोध, शोक, आ गरिमा: तीन भावनात्मक स्वर एहि नव कवितामे — भीमन्नाक पाँच आ सुभद्राक चारि — तीन टा प्रमुख भावनात्मक स्वर अछि: क्रोध — भीमन्नाक जरैत खोपड़ी सभ आ हमर पैतृक अधिकारमे। ई क्रोध दार्शनिक क्रोध थिक — व्यक्तिगत नहि, सांस्कृतिक। शोक — सुभद्राक अव्वा आ लोढ़बमे। ई शोक सामूहिक शोक थिक — एकटा पूरा पीढ़ीक खोएल जीवनक लेल। गरिमा — साड़ीक कोरक अन्तिम पंक्तियाँमे, हमर पैतृक अधिकारक अन्तिम उद्घोषमे। ई गरिमा अर्जित थिक — दयापर आधारित नहि, अधिकारपर आधारित। अरस्तू काव्यमे भावनात्मक विरेचन — भावनात्मक शुद्धि — क बात करैत छथि। मुदा दलित काव्यमे भावनात्मक विरेचन एकटा भिन्न प्रकृतिक होइत अछि। ई दर्शकक भावनात्मक शुद्धिक लेल नहि — ई समाजक नैतिक शुद्धिक आह्वान थिक। आम्बेडकर कहैत छलाह: "हम कोनो समुदायक प्रगति ओहि अंशसँ मापैत छी, जतेक प्रगति ओहि समुदायक स्त्रीसभ कएलनि अछि। " एहि कसौटीपर ई कविता सब समाजकेँ नापैत छथि — आ समाज विफल पाबैत अछि। १३. मैथिली साहित्यिक परम्परा आ दलित काव्यक प्रासंगिकता एहि तेलुगु दलित कवितासभक मैथिलीमे अनुवाद — विदेह पत्रिकाक माध्यमसँ — एकटा साहित्यिक-सांस्कृतिक परियोजना थिक जकर महत्त्व केवल अनुवादक तकनीकी उपलब्धिसँ परे जाइत अछि। मैथिली साहित्यमे दलित स्वर ऐतिहासिक रूपसँ प्रान्तीय रहल अछि। साहित्य अकादेमी-स्वीकृत मैथिली मान्य साहित्यिक परम्परा सामान्यतः ब्राह्मण-कायस्थ-केन्द्रित रहल अछि — विद्यापतिसँ लऽकऽ आधुनिक काल धरि। मैथिली समानान्तर धारा साहित्य आन्दोलनक बाद विद्यापतिक पदावली स्थित “बिदेसिया”, हुनकर ज्योतिरीश्वर-पूर्व कालमे निर्धारित भऽ सकल। [अनुलग्नक: १ मैथिलीक मूल आ अनूदित दलित गद्य-पद्य साहित्य लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त/ अनुलग्नक: २: विद्यापतिक विदेसियाक एकटा समालोचनात्मक मूल्यांकन; अनुलग्नक -३; मैथिलीक आदिकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व)-गजेन्द्र ठाकुर; अनुलग्नक: ४: विद्यापतिक बिदेसिया- पिआ देसाँतर- बिदापत नाचक अलाबे मैथिली नाटकक एकटा समानान्तर दुनियाँ] एहि संदर्भमे तेलुगु दलित-स्त्री कवितासभक मैथिली अनुवाद एकटा मान्य साहित्यिक परम्परामे हस्तक्षेप थिक। ई अनुवाद मैथिली पाठककेँ कहैत अछि: दलित-स्त्रीक यथार्थ तेलुगुक मात्र विषय नहि थिक — ओ मिथिलाक भूमिमे सेहो उतना ही उपस्थित अछि। भौगोलिक विशिष्टता (तेलुगु सन्दर्भ) आ सामाजिक सार्वभौमिकता (दलित-स्त्री उत्पीड़न) — दूनूकेँ एकहि साथ स्वीकारब एहि अनुवाद-परियोजनाक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक-राजनीतिक निर्णय थिक। समानान्तर साहित्य आन्दोलन क जे दृष्टि विदेह प्रतिनिधित्व करैत अछि — मान्य साहित्यिक परम्परा-बाहरक, लोक-परम्परा-समृद्ध, दलित-स्त्री-स्वर-समावेशी — ओहि दृष्टिक एहि कविता सब जीवित प्रमाण थिक। १४. अन्तिम संश्लेषण: एकटा नव काव्यशास्त्र भीमन्ना आ सुभद्राक ई नव कविता मिलिकऽ दलित काव्यशास्त्रक किछु मूलभूत सिद्धान्त स्थापित करैत अछि जे पाश्चात्य आ उच्च-जातीय भारतीय काव्यशास्त्रसँ मूलतः भिन्न अछि: प्रथम — काव्य-विषयक लोकतन्त्र: चाम सड़ब, माटिमे अनाज लोढ़ब, पुरानि साड़ीक कोर — ई सब उतने काव्य-योग्य थिक जतेक मेघदूतक यक्ष-विरह वा कामायनीक श्रद्धा। द्वितीय — भावनाक नैतिक स्वीकृति: क्रोध, घृणा, शोक — ई रससिद्धान्तमे अपूर्ण मानल जाइत अछि (शान्त रस सर्वोच्च)। दलित काव्यमे क्रोध नैतिक रूपसँ आवश्यक थिक। तृतीय — राजनीति आ सौन्दर्यक अभेद: "कला कलाक लेल" (कला मात्र कलाक लेल) दलित काव्यमे अर्थहीन अछि। कविता एकटा सामाजिक कार्य थिक — गवाही, आरोप, आ मुक्तिक आह्वान एकहि साथ। चतुर्थ — स्थानीय ज्ञानक सम्मान: अमलतास, तेतरि, मैसम्मा देवी, लाण्डा — ई सब दलित ज्ञानमीमांसा थिक जे पुस्तकीय ज्ञानसँ पूर्व आ कखनो-कखनो श्रेष्ठ अछि। पञ्चम — देह एकटा राजनीतिक भूमि थिक: दलित-स्त्रीक देह — जे जरैत अछि, थकैत अछि, सड़ैत अछि, नोर बहबैत अछि — एहि देहपर जाति, वर्ग, आ लिंगक तीनू व्यवस्था एकसाथ काम करैत अछि। एहि देहकेँ काव्यमे दृश्यमान करब राजनीतिक कार्य थिक। समापन ऑड्रे लॉर्ड मौनक भाषा आ क्रियामे रूपान्तरण मे लिखैत छथि जे मौन हमरा नहि बचाओत — "अहाँक मौन अहाँक रक्षा नहि करत। " बोयी भीमन्ना आ जे. सुभद्रा — दूनू — एहि मौनकेँ तोड़ैत छथि। भीमन्ना इतिहासक मौनकेँ, सुभद्रा दैनिक जीवनक मौनकेँ। एकटा भाषासँ दोसर भाषामे — तेलुगुसँ मैथिलीमे — ई आवाज सब यात्रा करैत अछि। अनुवाद एतय मात्र भाषान्तर नहि — ई एकजुटताक कार्य थिक: एक दलित समुदाय दोसर दलित समुदायक आवाजकेँ सुनैत अछि, पहचानैत अछि, आ अपन भाषामे ओकरा जीवित राखैत अछि। एहि अर्थमे ई नव कविता — भीमन्नाक आ सुभद्राक — मैथिली साहित्यमे मात्र एकटा अनुवाद नहि, एकटा नव काव्य-परम्पराक बीजारोपण थिक। दलित-स्त्री काव्य समीक्षा: चल्लपल्ल्ली स्वरूपरानीक दू टा कविता मान्केनापुव्वु आ माटि-भेल हाथ प्रारम्भिक टिप्पणी चल्लपल्ल्ली स्वरूपरानी तेलुगु दलित-स्त्री काव्यक एकटा विशिष्ट आवाज छथि जे भीमन्ना आ सुभद्राक काव्य-परम्पराकेँ एकटा नव आयाम दैत अछि। जतय भीमन्ना ऐतिहासिक-पौराणिक स्तरपर आ सुभद्रा वस्तु-श्रम-मातृत्व क स्तरपर काज करैत छथि, स्वरूपरानीक काव्य एकटा तृतीय स्थान ग्रहण करैत अछि — ओ व्यक्तिगत चेतनाक रूपान्तरण केँ केन्द्रमे रखैत छथि। हुनकर कविता "हम" सँ शुरू होइत अछि आ "हम" पर समाप्त होइत अछि — मुदा ई "हम" यात्राक दूनू छोरपर भिन्न अछि। १. काव्य-रूप आ संरचना मान्केनापुव्वु एहि कविताक संरचना एकटा त्रि-स्तरीय आख्यान थिक। पहिल स्तरमे कविताक आरम्भमे एकटा केन्द्रीय रूपक स्थापित होइत अछि — काँटेदार झाड़ीमे फँसल नीला चिरै। दोसर आ दीर्घतम स्तरमे एकटा अनुप्रास-आरम्भ शृंखला (एकहि शब्दसँ बारम्बार आरम्भ होयबाक काव्य-विधि) अछि — "जखन... तखन" — जे छह बेर दोहराएल जाइत अछि। तेसर स्तरमे कविता अकस्मात् मोड़ लैत अछि — "मुदा जखन हमर सहनशीलता खतम होइत अछि" — आ विस्फोटक उद्घोषमे परिणत भऽ जाइत अछि। ई त्रि-स्तरीय संरचना थीसिस-एन्टीथीसिस-सिन्थेसिस (स्थापना-खण्डन-समन्वय) क द्वन्द्वात्मक प्रतिरूप थिक। मुदा हेगेलीय द्वन्द्ववादसँ ई भिन्न एहि अर्थमे जे एतय समन्वय कोनो समझौता नहि — ई विद्रोह थिक। "जखन... तखन" क छह आवृत्तिमे ध्यान देबाक योग्य अछि जे प्रत्येक "तखन" मे आत्म-निषेधक इच्छा व्यक्त होइत अछि — बीउ जकाँ धँसब, नाक बन्द करब, मुट्ठीमे सिमटि जाएब, सीसा ढारब, मुँड़ धँसाएब। ई पाँच विशिष्ट आत्म-निषेध-बिम्ब अछि जे एकत्र भऽ एकटा संचित पीड़ा (बहुत रास पीड़ाक एकत्र भार) सृजित करैत अछि। मुदा एहि संचित पीड़ाक तीव्रता ही अन्तिम विस्फोटकेँ विश्वसनीय बनाबैत अछि। माटि-भेल हाथ एहि कविताक संरचना कालक्रमानुसार (समयक क्रमसँ) अछि — भोरसँ साँझ धरि, जवानीसँ जीर्णता धरि। मुदा ई कालक्रम सरल रेखीय नहि — ई सर्पिलाकार (घुमैत-घुमैत ऊपर-नीचाँ जाइत) अछि। एकहि दिन बेर-बेर दोहराएल जाइत अछि, एकहि वर्ष बेर-बेर, एकहि जीवन बेर-बेर। एहि पुनरावर्ती सर्पिलाकारसँ एकटा गहिर शून्यवाद (जीवनमे कोनो अर्थ नै देखबाक भाव) उभरैत अछि — कोनो परिवर्तन नहि, कोनो अन्त नहि। सुभद्राक अव्वा सँ तुलना करलापर: दूनू माँक कविता थिक, दूनूमे श्रमक वर्णन अछि — मुदा अव्वामे पुत्री-दृष्टि अछि, माटि-भेल हाथमे तृतीय-पुरुष साक्षी-दृष्टि अछि। ई भेद महत्त्वपूर्ण अछि: स्वरूपरानी एतय माँकेँ प्रेमसँ नहि, न्यायिक दृष्टिसँ देखैत छथि। २. केन्द्रीय रूपक: चिरै, फूल, आ माटि नीला चिरै आ सेमरक फूल मान्केनापुव्वुक दू टा प्रमुख बिम्ब — काँटेदार झाड़ीमे फँसल नीला चिरै आ अन्तमे खिलैत सेमरक लाल फूल — एकटा वर्ण-यात्रा (रंगक माध्यमसँ भावनात्मक यात्रा) प्रस्तुत करैत अछि। नीला रंग (चिरैक) — उदासी, बन्धन, आकाशक प्रति अतृप्त लालसाक प्रतीक। लाल रंग (सेमरक फूलक) — विद्रोह, रक्त, जीवन-शक्तिक प्रतीक। सेमरक फूल (सेमर) तेलुगु-आन्ध्र संस्कृतिमे एकटा विशिष्ट अर्थ राखैत अछि — ई काँटेदार गाछपर फुटैत अछि, शीतकालमे जखन पात नहि रहैत छैक, तखन एकाकी चमकदार लाल फूल। ई प्रतिकूलतामे फूलबाक सांस्कृतिक प्रतीक थिक। स्वरूपरानी एहि देशज प्रतीकशास्त्रकेँ दलित-स्त्री-चेतनाक रूपकमे रूपान्तरित करैत छथि। पाश्चात्य काव्यमे फीनिक्स (पौराणिक पक्षी जे जरिकऽ पुनर्जन्म लैत अछि) क रूपक एहिसँ मेल खाइत अछि — मुदा फीनिक्स राखमे भस्म भऽ जाइत अछि, फेर उठैत अछि। स्वरूपरानीक नायिका भस्म नहि होइत — ओ काँटेक बीचहि फूलैत अछि। ई एकटा महत्त्वपूर्ण भेद थिक: दलित-स्त्रीक मुक्ति विनाशसँ नहि आबैत — रूपान्तरणसँ आबैत अछि। माटि-भेल हाथ माटि-भेल हाथक शीर्षक-रूपक बहु-आयामी अछि। "माटि-भेल हाथ" — श्रमसँ माटिमे धँसल हाथ — एकटा शाब्दिक वर्णन थिक। मुदा एहिमे माटि बनब (मनुष्यताक अवमूल्यन) आ माटिसँ बनब (मूल तात्त्विक पहचान) दूनू अर्थ निहित अछि। लोढ़बमे सुभद्रा माटिमे अनाजक कण खोजैत छथि। माटि-भेल हाथमे स्वरूपरानी माटिमे स्त्री स्वयं विलीन होइत देखैत छथि। ई उत्तरोत्तर-वृद्धि (क्रमशः बढ़ैत तीव्रता) महत्त्वपूर्ण थिक — श्रम जखन एतेक तीव्र होइत अछि जे श्रमिक आ माटि एकाकार भऽ जाइत अछि, ई वस्तुकरण (मनुष्यकेँ वस्तु मानब) क चरम अवस्था थिक। मार्क्स आर्थिक आ दार्शनिक पाण्डुलिपि मे अलगावग्रस्त श्रम (जाहिमे मजदूर अपन काजसँ, अपन मानवतासँ आ प्रकृतिसँ कटि जाइत अछि) क वर्णन करैत छथि। स्वरूपरानीक "माटि-भेल हाथ" एहि अलगावक शारीरिक प्रतीक थिक। ३. "जखन... तखन" शृंखलाक विश्लेषण मान्केनापुव्वुक छह-आवृत्त "जखन... तखन" शृंखला एकटा उत्पीड़नक वर्गीकरण (उत्पीड़नक विभिन्न स्तरक सूची) प्रस्तुत करैत अछि। प्रत्येक "जखन" मे उत्पीड़नक एकटा भिन्न स्तर अछि: पहिल — घरेलू सौन्दर्यशास्त्रक नियन्त्रण: काजर-टिकुली नहि लगाएब। ई सर्वाधिक अन्तरंग स्तर थिक — स्वयं अपन देहपर नियन्त्रण। दोसर — स्थानिक नियन्त्रण: "दुर्गन्धित गाम" — दलित बस्तीक शारीरिक घेराबन्दी। तेसर — शैक्षिक बहिष्कार: उच्च-शिक्षाक देहरीपर जाति-आधारित अस्वीकृति। चतुर्थ — आरक्षण-आधारित कलंकारोपण: "कोटा सँ अबैत छी" — आरक्षणकेँ अपमानक हथियार बनाएब। पञ्चम — यौन-वस्तुकरण (स्त्रीकेँ मात्र भोगक वस्तु मानब): विवाहयोग्य नहि, मात्र काम-वासनाक वस्तु। ई पाँचू स्तर मिलिकऽ दलित-स्त्रीक जीवनक चतुर्दिक घेराबन्दी दर्शाबैत अछि — घर, गाम, शिक्षा, काज, विवाह — सब दिससँ घेराएल। एहि घेराबन्दीक यथार्थवाद पैट्रिशिया हिल कॉलिन्स क प्रभुत्वक जाल (जाहिमे ओ देखाबैत छथि जे उत्पीड़न एकटा एकल शक्ति नहि, बल्कि परस्पर-गुँथल व्यवस्थासभक समूह थिक) सिद्धांतसँ मेल खाइत अछि। विशेष रूपसँ महत्त्वपूर्ण अछि आरक्षण-कलंकारोपण क उल्लेख — जे भीमन्ना वा सुभद्राक कवितामे अनुपस्थित अछि। स्वरूपरानी एतय समकालीन दलित अनुभव केँ समेटैत छथि: शिक्षा आ सरकारी नौकरीमे प्रवेश पाबिकऽ सेहो दलित-स्त्री "कोटा-लाभार्थी" क रूपमे कलंकित होइत रहैत अछि। ई इक्कीसवीं सदीक उत्पीड़नक नव रूप थिक जे पुरान सामाजिक ऊँच-नीचकेँ नव भाषामे कायम राखैत अछि। ४. देह-राजनीति: दू भिन्न पथ दूनू कवितामे देहक उपस्थिति अछि — मुदा दू भिन्न पथपर। मान्केनापुव्वुमे देह क्षमता आ विद्रोहक स्थल थिक। "हम खिलि उठब", "हम बहि पड़ब" — ई देह जे अन्त धरि काँटमे फँसल छल, ओ अन्तमे स्वयं-निर्णय-शक्ति (अपना विषयमे निर्णय लेबाक अधिकार) प्राप्त करैत अछि। माटि-भेल हाथमे देह क्षय आ उपभोगक स्थल थिक। "जे गेंदा फूल जकाँ चमकैत छल, / झुराएल पातक डारि सन फीका होइत जाइत छनि" — ई देह श्रम आ पितृसत्ताक दोहरा उपभोगसँ विनष्ट होइत अछि। एहि दू पथमे एकटा पीढ़ी-अन्तर देखल जा सकैत अछि। मान्केनापुव्वुक "हम" सम्भवतः शिक्षित, जागरूक, विद्रोही — नव पीढ़ीक दलित-स्त्री। माटि-भेल हाथक "ओ" सम्भवतः अशिक्षित, अनजान, थकल — पुरान पीढ़ीक दलित-स्त्री। दूनू एकहि व्यवस्थाक उत्पाद छथि — मुदा चेतनाक स्तरपर भिन्न। फ्रान्ट्ज फानों द रेचेड ऑफ द अर्थ मे उपनिवेशित चेतनाक दू स्तर देखाबैत छथि: जे व्यवस्थाकेँ भीतरसँ स्वीकार कऽ लेलक, आ जे ओकरा अस्वीकार करय लागल। स्वरूपरानी एहि दूनू चेतनाकेँ एकहि संग्रहमे — दू कवितामे — प्रस्तुत करैत छथि। ५. पति-आकृति: दू कवितामे तुलना दूनू कवितामे पति उपस्थित अछि — मुदा भिन्न रूपमे। मान्केनापुव्वुमे — "घरमे पुरुष-नियन्त्रण एक गाल पर थप्पड़ मारैत अछि" — पति एकटा नामहीन शक्ति थिक, जाति-व्यवस्थाक बराबरीक भागीदार। नाम नहि, चेहरा नहि — मात्र शक्ति। माटि-भेल हाथमे — "पति तैयार अछि ओकर घाम शराब जकाँ पी जयबा लेल" आ "साँझमे पतिक हाथ-पैरक मारि सहि" — पति ठोस उत्पीड़क थिक, दैनिक जीवनमे उपस्थित। ई वैपरीत्य साहित्यिक-राजनीतिक दृष्टिसँ महत्त्वपूर्ण अछि। पहिल कवितामे पितृसत्ता संरचनागत (व्यवस्थाक रूपमे) थिक; दोसरमे ओ अन्तर्वैयक्तिक (दू व्यक्तिक बीचक) थिक। दूनू सत्य छथि — मुदा दूनू मिलिकऽ पितृसत्ताक पूर्ण चित्र बनाबैत अछि: ओ एकहि साथ व्यवस्था आ व्यक्ति दूनू छथि। बेल हुक्स नारीवादी सिद्धांत: हाशियासँ केन्द्र धरि मे तर्क करैत छथि जे नारीवादी आन्दोलन कहियो-कहियो पितृसत्ताकेँ मात्र संरचनागत देखैत अछि आ व्यक्तिगत पुरुष-हिंसाकेँ कम महत्त्व दैत अछि — वा एकर विपरीत। स्वरूपरानीक दूनू कविता मिलिकऽ एहि मिथ्या द्विकल्पकेँ अस्वीकार करैत अछि। ६. अन्तिम बिम्ब: दू विरोधी समापन मान्केनापुव्वु एकटा विजयी समापन पर समाप्त होइत अछि: "हम खिलि उठब मान्केनापुव्वु जकाँ! / हम बहि पड़ब धारा जकाँ, / पार कऽ क्लेशक वन। " ई समापन पाठककेँ भावनात्मक विरेचन (पीड़ाक पश्चात् भावनाक शुद्धि) दैत अछि — पीड़ाक पश्चात् विजयक अनुभव। मुदा ई विरेचन सस्ता नहि — ओ पूरा कविताक संचित पीड़ाक बाद आबैत अछि, एहि कारण ओकर भार असाधारण अछि। माटि-भेल हाथ एकटा त्रासद समापन पर समाप्त होइत अछि: "जीवनक पाथर-परती रस्ता पर— / भूखक क्रूस ढोइत। " "क्रूस" शब्दक प्रयोग एतय अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि। ई ईसाई प्रतीकशास्त्र क उधार थिक — यीशुक क्रूस-वहन। मुदा एतय ई लौकिक अर्थमे प्रयुक्त: दलित-स्त्री कोनो मुक्तिक आश्वासन बिना, कोनो पुनरुत्थान बिना, क्रूस ढोइत रहैत अछि। ई पुनरुत्थान-विहीन सूलीचढ़ाई थिक — जे ईसाई प्रतीकशास्त्रसँ अधिक क्रूर चित्र थिक। अल्बेर कामू सिसिफसक मिथक मे अर्थहीनता-दर्शन (जीवनमे कोनो पूर्वनिर्धारित अर्थ नहि) क वर्णन करैत छथि — सिसिफस जे पत्थर बेर-बेर ऊपर ढकेलैत अछि, ओ बेर-बेर खसैत अछि। कामू कहैत छथि: "सिसिफसकेँ सुखी मानब पड़त। " मुदा स्वरूपरानीक नायिकाक लेल ई अस्तित्ववादी समाधान उपलब्ध नहि — कारण कामूक सिसिफस एकटा अमूर्त दार्शनिक आकृति थिक, स्वरूपरानीक नायिका ऐतिहासिक, भौतिक, देहधारी छथि। ७. सुभद्रासँ तुलना: समानता आ भेद दूनू कवि दलित-स्त्री जीवनकेँ काव्य-विषय बनाबैत छथि — मुदा हुनकर काव्य-दृष्टिमे कई महत्त्वपूर्ण भेद अछि: गति: सुभद्राक कविता धीमी, ध्यानस्थ अछि — एक-एक वस्तुकेँ, एक-एक क्षणकेँ पूरा ध्यानसँ देखैत। स्वरूपरानीक कविता तीव्र, आवेगपूर्ण अछि — जेना कोनो बाँध टूटि रहल हो। दृष्टिकोण: सुभद्रा भीतरी साक्षी छथि — ओ स्वयं ओही जीवनमे छथि। स्वरूपरानी मान्केनापुव्वुमे भीतरी साक्षी छथि, माटि-भेल हाथमे करुणाशील बाहरी साक्षी — ओ दोसर स्त्रीक जीवन देखैत छथि। समाधान: सुभद्राक साड़ीक कोर समाधान-विहीन, खुला-अन्त थिक। स्वरूपरानीक मान्केनापुव्वु स्पष्ट समाधान दैत अछि — विद्रोह आ खिलनाइ। एहि अर्थमे स्वरूपरानी अधिक घोषणापत्र-प्रकृतिक छथि — हुनकर काव्यमे एकटा राजनीतिक घोषणापत्रक तत्त्व अछि। ८. भाषा-शैलीक विशेषता मान्केनापुव्वुमे एकटा ध्यानयोग्य भाषिक विशेषता थिक — इन्द्रिय-विशिष्टताक अपेक्षाकृत अभाव। कविता भावनात्मक आ वैचारिक धरातलपर काम करैत अछि, ठोस इन्द्रिय-विवरणपर कम। ई सुभद्राक काव्यसँ भिन्न जतय अमलतासक गुद्दी, तेतरिक बीआ, घैलाक गद्दी — सब ठोस-इन्द्रिय-ग्राह्य अछि। मुदा माटि-भेल हाथमे इन्द्रिय-समृद्धि उपस्थित अछि — "ठेहुन भरि कीचड़", "अन्तड़ी पेटमे भयंकर नाच", "बामन-बासनक सङ्गीत"। एहिसँ बुझाइत अछि जे स्वरूपरानीक काव्य-भण्डारमे दूनू प्रकारक भाषा उपलब्ध अछि — ओ प्रसंग अनुसार चुनैत छथि। "बामन-बासनक सङ्गीत" — बर्तन माँजबाक आवाजकेँ "सङ्गीत" कहब — एकटा कटु व्यंग्य थिक। उच्च-वर्गीय सौन्दर्यशास्त्र जे वायलिन-सितारमे संगीत देखैत अछि, दलित-स्त्रीक लेल भोरक पहिल "संगीत" काँसाक बर्तनक खनखनाहट थिक। ई सौन्दर्य-मूल्यक उलटपालट स्वरूपरानीक काव्य-बुद्धिक प्रमाण थिक। ९. तीनू कवि: एकटा समग्र दृष्टि एहि समीक्षाक तेसर खण्डमे आबिकऽ — भीमन्ना, सुभद्रा, आ स्वरूपरानी — तीनूकेँ एकसंग देखलापर तेलुगु दलित काव्यक एकटा त्रिकोणीय संरचना उभरैत अछि: भीमन्ना — इतिहास आ दर्शनक कवि: व्यापक स्तरपर जाति-व्यवस्थाक ऐतिहासिक आ पौराणिक आधारकेँ प्रश्नांकित करैत छथि। सुभद्रा — श्रम आ वस्तुक कवि: सूक्ष्म स्तरपर दैनिक जीवनक ठोस यथार्थकेँ — एक-एक वस्तुकेँ, एक-एक श्रमकेँ — दृश्यमान करैत छथि। स्वरूपरानी — चेतना आ रूपान्तरणक कवि: मध्यवर्ती स्तरपर — इतिहास आ दैनिकताक बीचक — व्यक्तिगत चेतनाकेँ, उत्पीड़नक आन्तरिक अनुभवकेँ, आ ओहि चेतनाक रूपान्तरणकेँ पकड़ैत छथि। तीनू मिलिकऽ सम्पूर्ण दलित-स्त्री अनुभव केँ आवृत्त करैत अछि — बाहरसँ भीतर धरि, इतिहाससँ वर्तमान धरि, पीड़ासँ विद्रोह धरि। निष्कर्ष चल्लपल्ल्ली स्वरूपरानीक ई दू कविता — मान्केनापुव्वु आ माटि-भेल हाथ — दलित-स्त्री काव्यमे आशा आ निराशाक द्वन्द्वक सर्वोत्तम अभिव्यक्ति थिक। मान्केनापुव्वु कहैत अछि: हम फूलब — काँटेक बावजूद। माटि-भेल हाथ कहैत अछि: बिना संरचनागत परिवर्तनक, ई फूलनाइ सम्भव नहि। दूनू कविता मिलिकऽ एकटा सम्पूर्ण राजनीतिक सन्देश बनाबैत अछि: व्यक्तिगत विद्रोह सम्भव आ आवश्यक थिक — मुदा जाधरि संरचनागत परिवर्तन नहि होएत, ताधरि माटि-भेल हाथक नायिका बेर-बेर जन्म लेत आ बेर-बेर क्रूस ढोइत जीवन समाप्त करत। ई दोहरा सत्य — व्यक्तिगत मुक्तिक सम्भावना आ सामूहिक मुक्तिक अनिवार्यता — स्वरूपरानीक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण काव्य-उपलब्धि थिक। दलित-स्त्री काव्य समीक्षा: दरिशे शशिनिर्मलाक तीन कविता हमही छी जे सभ किछु हारि देलहुँ, हम रजस्वला कपड़ा ओढ़ि रहल छी, एकटा दलित स्त्री प्रारम्भिक टिप्पणी दरिशे शशिनिर्मला तेलुगु दलित-स्त्री काव्यक एकटा सर्वाधिक उग्र आ टकराहटी (सोझे-सोझ मुकाबला करैत) आवाज छथि। भीमन्नाक ऐतिहासिक-दार्शनिक विश्लेषण, सुभद्राक श्रम-वस्तु-काव्य, स्वरूपरानीक व्यक्तिगत-चेतनाक रूपान्तरण — ई सभसँ आगाँ बढ़िकऽ शशिनिर्मला एकटा सर्वथा भिन्न काव्य-भूमि ग्रहण करैत छथि। ओ एकहि साथ तीन दिस मुँह कऽ लड़ैत छथि: उच्च-जातीय पुरुषक विरुद्ध, दलित पुरुषक विरुद्ध, आ उच्च-जातीय स्त्रीक विरुद्ध। एहि त्रिमुखी संघर्ष मे हुनकर काव्य एकटा ऐसन राजनीतिक भूमि ग्रहण करैत अछि जे तेलुगु दलित काव्य-परम्परामे असाधारण थिक। १. काव्य-रूप आ संरचना हमही छी जे सभ किछु हारि देलहुँ एहि कविताक संरचना सम्वाद-रूप (दू पक्षक बीच प्रत्यक्ष बातचीतक काव्यिक प्रस्तुति) मे अछि — मुदा एकटा असाधारण सम्वाद जतय दोसर पक्ष कहियो उत्तर नहि दैत। "अहाँ" — एकटा उच्च-जातीय स्त्री — कविताक सम्पूर्ण लक्ष्य थिक। कवि हुनकासँ बाजैत छथि, मुदा हुनकर उत्तरक प्रतीक्षा नहि करैत — कारण ओ उत्तर सम्भव नहि। ई एकपक्षीय सम्वाद (जाहिमे एके पक्ष बाजैत अछि) काव्यशास्त्रमे एकटा विशिष्ट विधि थिक। शेक्सपियरक नाटकमे एकालाप (अकेले बाजब) जे भीतरक द्वन्द्व उजागर करैत अछि — ओहिसँ ई भिन्न। एतय एकालाप नहि, अनसुनाएल सम्वाद अछि। कवि बाजैत छथि — दोसर पक्ष सुनैत नहि। एहि संरचनागत बधिरता मे उच्च-जातीय स्त्री-नारीवादक असलियत प्रकट होइत अछि। कविताक अन्तिम पाँच पंक्ति प्रश्नक रूपमे आबैत अछि — "की अहाँ एक डेग नीचाँ उतरि आयब? ", "की हम एक्के पगडण्डी पर चलब? " — ई वक्तृत्वात्मक (वक्तृत्वकलापूर्ण) प्रश्न नहि, वास्तविक परीक्षा थिक। कवि उच्च-जातीय स्त्रीकेँ एकटा ठोस चुनाव (ठोस निर्णय) लेबाक लेल बाध्य करैत छथि। हम रजस्वला कपड़ा ओढ़ि रहल छी एहि कविताक संरचना सर्वाधिक जटिल आ बहुस्तरीय अछि। ई एकहि साथ व्यक्तिगत आर्तनाद, राजनीतिक घोषणापत्र, आ ऐतिहासिक दस्तावेज थिक। संरचना तीन स्तरपर काम करैत अछि: पहिल स्तर — व्यक्तिगत देह-अनुभव: रजस्वला, घाम, कुआँपर अपमान। दोसर स्तर — सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण: मीडिया, पुलिस, न्यायालय, जाति-हिंसा। तेसर स्तर — ऐतिहासिक साक्ष्य: अलिसम्मा, मुथव्वा, महादेवम्मा — वास्तविक पीड़िताक नाम। ई तीनू स्तर कवितामे एकाकार भऽ जाइत अछि — व्यक्तिगत, सामाजिक, आ ऐतिहासिक एकहि साँसमे। एहि त्रि-स्तरीय एकत्व मे शशिनिर्मलाक काव्य-शक्तिक मूल निहित अछि। एकटा दलित स्त्री एहि कविताक संरचना उत्तरोत्तर विस्तारित आरोप-सूची (क्रमशः बढ़ैत दोषारोपणक शृंखला) थिक। प्रत्येक पंक्ति एकटा नव अपमान, एकटा नव शोषण जोड़ैत अछि — जाधरि ई सूची एतेक भारी नहि भऽ जाइत जे पाठक दबा जाय। मुदा अन्तमे एकटा अकस्मात् उलटपालट होइत अछि — "आब हम अपन मुँह आ आँखि खोलि रहल छी" — जे पूरा कविताक भारकेँ विद्रोहमे रूपान्तरित कऽ दैत अछि। संरचनात्मक दृष्टिसँ ई शास्त्रीय सोनेट क परम्पराक विलोम थिक। सोनेट सामान्यतः समस्या-प्रस्तुति आ फेर समाधानक संरचनामे चलैत अछि। एतय समस्या-प्रस्तुति एतेक दीर्घ आ तीव्र अछि जे ओ स्वयं काव्यक मुख्य शरीर बनि जाइत अछि — आ समाधान मात्र दू पंक्तिमे, विस्फोटक रूपमे, आबैत अछि। २. शीर्षकक राजनीति तीनू कवितामे शीर्षक स्वयं एकटा राजनीतिक वक्तव्य थिक। "हमही छी जे सभ किछु हारि देलहुँ" — एहिमे व्यंग्यात्मक स्व-आरोपण (खुद अपनापर दोष लगाएब, मुदा व्यंग्यमे) अछि। कवि कहैत छथि: हँ, हम हारल — मुदा एहि हार लेल दोषी के? शीर्षक उत्तर नहि दैत — पाठककेँ पुछैत अछि। "हम रजस्वला कपड़ा ओढ़ि रहल छी" — "रजस्वला" शब्द हिन्दू-ब्राह्मणवादी शुद्धता-प्रदूषण-व्यवस्थामे अत्यन्त कलंकित मानल जाइत अछि। एकरा शीर्षक बनाएब एकटा जानबूझिकऽ उकसाएब (जे सुनैत अछि तकरा असहज करब) थिक। जे समाज एहि शब्दसँ घृणा करैत अछि, ओहि समाजक "झूठा तर्क" आ "चतुराई" पर ई कपड़ा ओढ़ाएब — एकटा काव्यिक प्रतिशोध थिक। "एकटा दलित स्त्री" — ई सर्वाधिक सरल आ एहि कारण सर्वाधिक शक्तिशाली शीर्षक थिक। "एकटा" — अनिश्चित एकवचन — ई कहैत अछि: ई कोनो एकटा व्यक्तिक कहानी नहि, ई सब दलित स्त्रीक कहानी थिक। ई शीर्षक एकहि साथ व्यक्तिगत आ सार्वभौमिक अछि। ३. उच्च-जातीय स्त्री-नारीवादक आलोचना: हमही छी जे सभ किछु हारि देलहुँ ई कविता तेलुगु — वरन् समस्त भारतीय — दलित साहित्यमे एकटा दुर्लभ काव्यिक साहस क प्रदर्शन करैत अछि: ई उच्च-जातीय स्त्रीकेँ सोझे सम्बोधित करैत अछि आ हुनकर नारीवादी दावेकेँ प्रश्नांकित करैत अछि। कविताक केन्द्रीय प्रसंग ई थिक: उच्च-जातीय स्त्री (सम्भवतः कवयित्रीक नियोक्त्री वा पड़ोसिन) हुनकर पतिसँ कहैत छथि "रे मूर्ख! " — अर्थात् ओ दलित स्त्रीक पक्षमे बाजैत प्रतीत होइत छथि। मुदा ओही नारीवादी उच्च-जातीय स्त्री अपन बेटीक आक्रामकताकेँ नहि रोकैत छथि, दलित स्त्रीकेँ "मातहत" मानैत छथि, आ अन्ततः हुनकर पक्षमे "वकालत" (पैरवी) केवल तखन करैत छथि जखन दलित स्त्री स्वयं "मुट्ठी बान्हि" लेत। ई नारीवादक दोहरा मानदण्ड (उच्च-जातीय स्त्रीक नारीवाद जे दलित-स्त्रीक पक्षमे बाजैत अछि मुदा व्यवहारमे जाति-पदानुक्रम कायम राखैत अछि) क उद्घाटन थिक। ओड्रे लोर्ड सिस्टर आउटसाइडर (जाहिमे श्वेत नारीवादक जाति-अन्धताक आलोचना कएल गेल अछि) मे कहैत छथि जे स्त्री-एकजुटताक दावा तखन खोखल भऽ जाइत अछि जखन ओहिमे वर्ग आ जातिक भेद स्वीकार नहि कएल जाइत। शशिनिर्मलाक कविता एहि सिद्धांतकेँ ठोस भारतीय-जातीय यथार्थमे उतारैत अछि। उमा चक्रवर्ती जातिकरण पितृसत्ता (जाहिमे ई देखाओल गेल अछि जे जाति आ लिंग एकहि व्यवस्थाक दू पाँखि थिक) मे तर्क करैत छथि जे भारतमे उच्च-जातीय स्त्री एकहि साथ पितृसत्ताक पीड़ित (लिंगक आधारपर) आ जाति-व्यवस्थाक लाभार्थी (जातिक आधारपर) छथि। शशिनिर्मलाक कविता एहि द्वन्द्वकेँ — बिना किसी सैद्धान्तिक आवरणक, नग्न यथार्थमे — प्रस्तुत करैत अछि। "जाधरि केवल पुरुष वा केवल स्त्री अछि, तब धरि कोनो समस्या नै" — ई पंक्ति सम्पूर्ण कविताक दार्शनिक सार थिक। जखन पहचान केवल एकल-आयामी (मात्र लिंग वा मात्र जाति) रहैत अछि, तखन समझौता सम्भव। जखन दलित-स्त्री अपन बहु-आयामी पहचान (जाति+लिंग+वर्ग) दृढ़तासँ ग्रहण करैत अछि — तखन वर्जना-रेखाक संघर्ष शुरू होइत अछि। ४. देह, शुद्धता, आ प्रतिरोध: हम रजस्वला कपड़ा ओढ़ि रहल छी एहि कविताक केन्द्रीय रूपक — रजस्वला कपड़ा — बहुस्तरीय काव्यिक कार्य करैत अछि। शुद्धता-मिथकक खण्डन हिन्दू वर्णाश्रम व्यवस्थामे रजस्वला स्त्री अशुद्ध मानल जाइत अछि। एहि कपड़ाकेँ "ओढ़नाइ" — अर्थात् स्वयंकेँ एहिसँ ढाँकब — एकटा उलटपालट थिक: जे समाज एहि कपड़ासँ स्त्रीकेँ अशुद्ध मानैत अछि, ओहि समाजक झूठ पर एहि "अशुद्ध" कपड़ाकेँ ओढ़ाएब — अर्थात् अशुद्धताकेँ शस्त्र बनाएब। जूलिया क्रिस्तेवाक घृणित-सिद्धांत (जाहिमे ओ देखाबैत छथि जे समाज ओहि चीजसँ घृणा करैत अछि जे शरीरक सीमाकेँ तोड़ैत अछि — रक्त, स्राव, मल — आ एहि घृणाक माध्यमसँ सामाजिक पदानुक्रम कायम राखैत अछि) एतय पुनः प्रासंगिक अछि। शशिनिर्मला एहि घृणित तत्त्वकेँ राजनीतिक शस्त्रमे रूपान्तरित करैत छथि। ऐतिहासिक साक्ष्य कविताक अन्तमे अलिसम्मा, मुथव्वा, आ महादेवम्माक उल्लेख — जिनका उच्च-जातीय पुरुषद्वारा नग्न कऽ घुमाओल गेल — एकटा ऐतिहासिक लंगर (इतिहासक ठोस घटनाक माध्यमसँ कविताकेँ वास्तविकतासँ जोड़ब) थिक। एहिसँ कविता मात्र व्यक्तिगत काव्योद्गार नहि रहैत — ओ एकटा सामूहिक स्मृतिक पात्र बनि जाइत अछि। वाल्टर बेंजामिनक खतरनाक स्मृति क अवधारणा एतय पुनः स्मरणीय अछि — मुदा एतय ई स्मृति और भी खतरनाक अछि, कारण ओ अमूर्त ऐतिहासिक तथ्य नहि, वास्तविक स्त्रीक नाम थिक। संस्थागत विफलता "न तऽ पुलिसक लाठी, / न न्यायालयक दृष्टि — / हमर छिलल चाम सँ किछु लेना-देना अछि" — ई पंक्तियाँ राज्य-तन्त्रक जाति-पक्षधरता केँ स्पष्टतः उजागर करैत अछि। पुलिस आ न्यायालय — जे निष्पक्ष न्यायक प्रतीक माने जाइत छथि — एतय दलित-स्त्रीक लेल उदासीन वा शत्रुतापूर्ण संस्था छथि। मिशेल फूकोक सत्ता-ज्ञान सम्बन्ध (जाहिमे ओ देखाबैत छथि जे न्याय-व्यवस्था, चिकित्सा-व्यवस्था, आदि संस्था सब वास्तवमे तटस्थ नहि बल्कि सत्ता-सम्बन्धक उपकरण थिक) एतय साकार होइत अछि। शशिनिर्मला एहि दार्शनिक अन्तर्दृष्टिकेँ कविताक भाषामे — बिना किसी सैद्धान्तिक पारिभाषिक शब्दावलीक — प्रस्तुत करैत छथि। ५. त्रिमुखी उत्पीड़न: एकटा दलित स्त्री एकटा दलित स्त्री तेलुगु दलित काव्यमे सर्वाधिक राजनीतिक रूपसँ जटिल कविताक एकटा उदाहरण थिक, कारण ई एकहि साथ तीन उत्पीड़कसँ लड़ैत अछि। कविताक पहिल भाग (आरम्भसँ "हमर देहक बल बूँद-बूँद टपाबैत अछि" धरि) — उच्च-जातीय पुरुष क उत्पीड़नक वर्णन। कविताक दोसर भाग ("की कारण? / हमर अपन दलित लोक..." सँ) — दलित पुरुष क उत्पीड़नक उल्लेख — "हमरा अपन कपड़ा सुखाबय बला डोरी बनाबैत", "हुनकर खोपड़ीक खम्भा-किल्ली बनौने राखय लेल"। कविताक तेसर भाग ("की कारण? / हमर अपन स्त्री-जाति..." सँ) — उच्च-जातीय स्त्री क उत्पीड़न — "हमरा हुनकर उच्च जातिक साड़ीक किनारी बनाबैत छथि। " ई त्रिमुखी उत्पीड़नक स्वीकृति दलित-स्त्री काव्यमे असाधारण साहसिक कार्य थिक। दलित पुरुषक उत्पीड़नकेँ स्वीकार करब — ई दलित एकजुटताक राजनीतिमे एकटा वर्जित विषय रहल अछि। शशिनिर्मला एहि वर्जनाकेँ तोड़ैत छथि। बाबासाहेब आम्बेडकर कहने छलाह जे दलित-स्त्रीक दशा दलितमे सबसँ दयनीय थिक — ओ जातिक आधारपर समाजसँ, लिंगक आधारपर दलित समुदायसँ, आ वर्गक आधारपर उच्च-जातीय स्त्रीसँ — तीनू दिससँ बहिष्कृत छथि। शशिनिर्मलाक ई कविता आम्बेडकरक एहि अन्तर्दृष्टिकेँ काव्यात्मक प्रमाण दैत अछि। शर्मिला रेगेक दलित-नारीवादी दृष्टिबिन्दु (जाहिमे ओ तर्क करैत छथि जे दलित-स्त्रीक दृष्टिकोण एकटा ज्ञान-मीमांसीय विशेषाधिकार थिक, कारण ओ उत्पीड़नक सर्वाधिक गहन स्तरपर जीबैत अछि) एतय काव्यमे साकार होइत अछि — "एकटा दलित स्त्री" ओहि स्थानसँ बाजैत अछि जतय तीनू उत्पीड़न-व्यवस्था एकसाथ आबैत अछि। ६. रूपकक विश्लेषण: शरीर-राजनीति तीनू कवितामे शारीरिक रूपक (देहसँ जुड़ल प्रतीक) असाधारण रूपसँ तीव्र आ विविध अछि। हमही छी जे सभ किछु हारि देलहुँमे — "हमरा काँट-कुस जकाँ नोचि-नोचि कऽ मुर्गी बना देलकै" — ई पशुकरण (मनुष्यकेँ पशु बनाएब) क रूपक थिक। "मुर्गी" — ओहि पशुक रूप जे बिना प्रतिरोधक नोचल जाइत अछि। हम रजस्वला कपड़ा ओढ़ि रहल छीमे — "हमर मुँह, / जे लगातार घाम बहबैत अछि, / जानैत अछि अदृश्य रहि कऽ जीबाक मतलब" — मुँह एतय अभिव्यक्ति आ दमन दूनूक स्थल थिक। घाम बहाएब = काज करब = दृश्यमान होएब। मुदा समाज दलित-स्त्रीकेँ अदृश्य रखैत अछि। एकटा दलित स्त्रीमे — "हमर जोड़ल हाथमे मूतैत अछि" — ई सर्वाधिक कच्चा, सर्वाधिक अपमानित बिम्ब थिक। प्रार्थना-मुद्रामे जोड़ल हाथ — जे श्रद्धाक प्रतीक थिक — तकरामे मूतब: ई पवित्रताक सर्वोच्च अपमान थिक। शशिनिर्मला एहि बिम्बमे कोनो काव्यिक संयम नहि करैत छथि — कारण यथार्थ स्वयं संयम-विहीन थिक। फ्रान्ट्ज फानोंक उपनिवेशित देह (जाहिमे ओ देखाबैत छथि जे उपनिवेशवाद सर्वप्रथम शरीरपर आक्रमण करैत अछि — शरीरकेँ अपमानित कऽ, नियन्त्रित कऽ, ओ आत्माकेँ तोड़ैत अछि) क अवधारणा एतय तीनू कवितामे एकसाथ लागू होइत अछि। ७. भाषा-शैली: उग्रताक काव्यशास्त्र शशिनिर्मलाक भाषा पूर्ववर्ती सभ कविसँ अधिक उग्र, अधिक प्रत्यक्ष, आ अधिक टकराहटी अछि। एहि उग्रताक साहित्यिक-राजनीतिक महत्त्व अछि। सुभद्राक भाषा ध्यानस्थ गवाही थिक — ओ देखैत आ देखाबैत छथि। स्वरूपरानीक भाषा आवेगपूर्ण उद्घोष थिक — ओ टूटिकऽ बाजैत छथि। शशिनिर्मलाक भाषा सोझ आरोप थिक — ओ नामकऽ, अँगुरी उठाकऽ, आँखिमे आँखि डालिकऽ बाजैत छथि। "हमर नाकमे नकेल डालि कऽ खेलबैत अछि" — नकेल पशुक लेल होइत अछि, मनुष्यक लेल नहि। एहि रूपकमे पशुकरणक राजनीति (दलित-स्त्रीकेँ मनुष्यसँ पशुमे रूपान्तरित करबाक सामाजिक प्रक्रिया) सोझे-सोझ कहल गेल अछि। "हमरा दुहि लेल भैंस बनाबैत अछि" — श्रम-शोषणकेँ पशु-दोहनक रूपकमे देखाएब — एहिमे मार्क्सक अतिरिक्त मूल्यक अपहरण (मजदूरक श्रमसँ उत्पन्न मूल्यकेँ मालिकद्वारा हड़पब) आ जातीय शोषण दूनू एकहि बिम्बमे समाहित अछि। ८. पूर्ववर्ती कविसँ तुलना: एकटा समग्र काव्य-वंश-वृक्ष एहि समीक्षा-शृंखलामे अध्ययन कएल पाँचू कवि — भीमन्ना, सुभद्रा, स्वरूपरानी, आ शशिनिर्मला — मिलिकऽ तेलुगु दलित काव्यक एकटा सम्पूर्ण काव्य-वंश-वृक्ष बनाबैत छथि: भीमन्ना — इतिहास आ पुराणक पुनर्पाठ; व्यापक-दृष्टि; दलित पहचानक पुनर्स्थापना। सुभद्रा — श्रम, वस्तु, आ मातृत्व; सूक्ष्म-दृष्टि; दैनिक जीवनक काव्यात्मक अभिलेखीकरण। स्वरूपरानी — व्यक्तिगत चेतनाक रूपान्तरण; मध्य-दृष्टि (मध्यवर्ती दृष्टि जे व्यक्तिगत आ सामाजिकक बीच अछि); आशा-निराशाक द्वन्द्व। शशिनिर्मला — त्रिमुखी संघर्ष; टकराहटी-दृष्टि; नारीवादक भीतरक अन्तर्विरोधकेँ उजागर करब। ई चारू कवि मिलिकऽ एकटा द्वन्द्वात्मक यात्रा पूरा करैत छथि — इतिहाससँ आरम्भ कऽ (भीमन्ना), दैनिक जीवनमे उतरि (सुभद्रा), व्यक्तिगत चेतनाकेँ जगा (स्वरूपरानी), आ अन्ततः सब दिससँ टकरा (शशिनिर्मला)। निष्कर्ष दरिशे शशिनिर्मलाक तीन कविता दलित-स्त्री काव्यकेँ एकटा नव राजनीतिक भूमि पर लऽ जाइत अछि। ओ उहो कहैत छथि जे कहब कठिन थिक — दलित पुरुषक उत्पीड़न, उच्च-जातीय नारीवादक पाखण्ड, राज्य-तन्त्रक जाति-पक्षधरता — बिना किसी शब्द-संयमक, बिना किसी कूटनीतिक। हुनकर काव्यमे सौन्दर्य क्रोधमे निहित अछि, शिल्प उग्रतामे निहित अछि, दर्शन ठोस शारीरिक यथार्थमे निहित अछि। ई दलित-स्त्री काव्यशास्त्रक ओहि परम्पराक चरमोत्कर्ष थिक जे शरणकुमार लिम्बाले, ओमप्रकाश वाल्मीकि, आ आम्बेडकरक विचार-परम्परासँ शक्ति लैत अछि। अन्तिम पंक्ति — "देखी की हुनकर करामात देखबैत छथि" — एकटा चुनौती थिक: दलित-स्त्री आब दर्शक नहि, प्रश्नकर्ता अछि। ई प्रश्न समाजकेँ, नारीवादकेँ, दलित आन्दोलनकेँ — सभकेँ — पुछल गेल अछि। आ एहि प्रश्नक उत्तर देनाइ — साहित्यक नहि, इतिहासक कार्य थिक। दलित-स्त्री काव्य समीक्षा: एम. गौरीक कविता मेहदी लागल हाथ प्रारम्भिक टिप्पणी एम. गौरी तेलुगु दलित-स्त्री काव्य-परम्पराक एकटा सर्वथा विशिष्ट स्वर छथि। जतय शशिनिर्मला त्रिमुखी संघर्ष क काव्य लिखैत छथि, सुभद्रा श्रम-वस्तुक काव्य रचैत छथि, आ भीमन्ना पौराणिक पुनर्पाठ करैत छथि — गौरी एहि सबसँ भिन्न एकटा रणनीति अपनाबैत छथि: ओ पौराणिक आख्यानकेँ उलटिकऽ कृष्णसँ सोझे बाजैत छथि — आ ई संवाद एकटा दलित-चर्मकार स्त्रीक काव्यिक आत्म-घोषणा बनि जाइत अछि। एहि एकटा कवितामे जे काव्य-जटिलता, पौराणिक-विरोधी पाठ, शिल्प-कौशल, आ राजनीतिक साहस एकत्र अछि — ओ एकरा तेलुगु दलित काव्यक सर्वोच्च रचनासभमे स्थापित करैत अछि। १. काव्य-रूप आ संरचना प्रत्यक्ष सम्बोधन-संरचना ई कविता द्वितीय पुरुष सम्बोधन (सोझे "अहाँ" कहिकऽ बाजब) मे रचल गेल अछि — आ ओ "अहाँ" स्वयं श्रीकृष्ण छथि। ई एकटा असाधारण साहसिक काव्य-निर्णय थिक। भारतीय काव्य-परम्परामे कृष्णकेँ सम्बोधित करब एकटा सुदीर्घ परम्परा थिक — मीराबाई, सूरदास, जयदेव — मुदा ओहि सभमे सम्बोधक भक्त छथि, कृष्ण-श्रेष्ठ आ सम्बोधक-तुच्छ क सम्बन्ध थिक। गौरी एहि पदानुक्रमकेँ उलटि दैत छथि। ओ कृष्णकेँ सम्बोधित करैत छथि — मुदा भक्तक रूपमे नहि, चुनौती देनिहारक रूपमे। "की देखि सकैत छी अहाँ ओकरा बिना मूर्छित भेने? ", "की हमर रगत सँ सनल हाथकेँ चूमि सकैत छी? " — ई प्रश्न भक्तिक नहि, परीक्षाक प्रश्न छथि। तीन-स्तरीय काव्य-चाप कविता तीन स्पष्ट खण्डमे विभक्त अछि: पहिल खण्ड — "हमर गली बनल अछि मास-रगत सँ" सँ "एकटा सुदृढ़ साँढ़केँ सोझे भेदि देबाक खेल" धरि। एतय कर्मक जगत — चर्मकार-स्त्रीक दैनिक श्रम — स्थापित होइत अछि। दोसर खण्ड — "अहाँ, ओ वीर कृष्ण! " सँ "चाम-खालक परदा पाछू? " धरि। एतय पौराणिक-विरोधी संवाद — कृष्णक तीनू रूपकेँ (मायाविनाशक, ग्वाल-बालिन-प्रेमी, बंशीवादक) प्रश्नांकित करब — चलैत अछि। तेसर खण्ड — "हमर गली आब पालतू पिल्ला सभक लेल उपयुक्त नै रहल" सँ अन्त धरि। एतय दलित-स्त्रीक आत्म-घोषणा — अपन श्रम, अपन देह, अपन गरिमाक पुनर्दावा — होइत अछि। ई तीन-चाप एकटा थीसिस-एन्टीथीसिस-सिन्थेसिस (स्थापना-खण्डन-समन्वय) क द्वन्द्वात्मक संरचना थिक — मुदा एतय समन्वय कोनो मध्यमार्ग नहि, विद्रोही आत्म-प्रतिष्ठा थिक। २. पौराणिक-विरोधी पाठ: कृष्णक तीन रूपक खण्डन गौरी एकहि कवितामे कृष्णक तीन पौराणिक रूपकेँ क्रमशः सम्बोधित करैत छथि — आ तीनूक विरुद्ध दलित-स्त्रीक यथार्थ खड़ा करैत छथि। पहिल रूप: मायाविनाशक कृष्ण "अहाँ, ओ वीर कृष्ण! / जे दैत्य-मायकेँ दूध पिया कऽ मारि देलहुँ" — ई पूतना-वधक सन्दर्भ थिक। पूराणमे कृष्ण विष-स्तनपान करनिहारी पूतनाकेँ मारैत छथि — ई दैवी वीरताक प्रतीक थिक। गौरी एहि "वीरता"केँ चुनौती दैत छथि: "हम अहाँकेँ मासक दू टा लच्छी आ रगतक एकटा पात्र देखाएब। / की देखि सकैत छी अहाँ ओकरा बिना मूर्छित भेने? " — चर्मकार-स्त्री प्रतिदिन जे काज करैत अछि — मास-रगतसँ काम — ओ कृष्णक "वीरता"सँ अधिक वास्तविक आ अधिक साहसी थिक। पौराणिक वीरता आ दलित दैनिक-श्रमक ई तुलना अत्यन्त कड़वी आ अत्यन्त सत्य अछि। दोसर रूप: ग्वाल-बालिन-प्रेमी कृष्ण "अहाँ, ओ ग्वाल-बालिन सभक वस्त्र छल सँ हड़पि लेनिहार" — ई वस्त्रहरण-प्रसंग क सन्दर्भ थिक जे भक्ति-परम्परामे दिव्य-क्रीड़ा (ईश्वरक लीला) मानल जाइत अछि। गौरी एहि "दिव्य-क्रीड़ा"केँ यौन-शोषणक दृष्टिसँ पढ़ैत छथि — आ फेर चुनौती दैत छथि: "की हमर हृदय चोरि सकैत छी, / जे हम सुरक्षित रखने छी — / चाम-खालक परदा पाछू? " हृदय "चाम-खालक परदा" पाछू सुरक्षित अछि — ई अत्यन्त जटिल रूपक थिक। चाम-खाल = चर्मकार-स्त्रीक व्यवसाय-पहचान = जे समाज "अशुद्ध" मानैत अछि। ओही "अशुद्ध" पहचान रक्षा-कवच बनि जाइत अछि — कृष्णक प्रेम-षड्यन्त्रसँ बचाबैत। तेसर रूप: बंशीवादक कृष्ण "अहाँ, ओ जे बंसुरी सँ काम-संदेश पठबैत छलहुँ, / की पढ़ि सकैत छी प्रेम-संदेश जे हम अपन कोमल अङ्गुरि सँ देहरी पर लिखने छी? " — कृष्णक बंसुरी भक्ति-काव्यमे दिव्य-प्रेमक प्रतीक थिक। मुदा एतय दलित-स्त्रीक "देहरी पर लिखल" प्रेम-संदेश अधिक ठोस, अधिक वास्तविक, अधिक मानवीय थिक। "देहरी" — चौखट — एकटा सीमा-प्रतीक थिक। दलित-स्त्री देहरी पर लिखैत छथि — न भीतर (उच्च-जातीय घरक), न बाहर। देहरीपर लिखल प्रेम सीमान्त प्रेम (हाशियाक अनुभव) थिक। भीमन्नाक पौराणिक-विरोधी पाठ (जाहिमे ओ पुराणक मूल आख्यानकेँ उलटिकऽ दलित-दृष्टिसँ पढ़ैत छथि) परम्पराकेँ गौरी एतय काव्यात्मक संवादक रूपमे अधिक नाटकीय ढंगसँ प्रस्तुत करैत छथि। ३. शीर्षकक बहुस्तरीय अर्थ "मेहदी लागल हाथ" — ई शीर्षक अत्यन्त द्व्यर्थी (दोहरा अर्थवाला) थिक। पहिल अर्थ — भारतीय सांस्कृतिक परम्परामे मेहदी विवाह-उत्सवक प्रतीक थिक — शृङ्गार, सौभाग्य, प्रेम। "मेहदी लागल हाथ" माने उत्सव-मग्न हाथ। दोसर अर्थ — कविताक भीतर, "मेहदी" वास्तवमे रगत थिक। "की हमर रगत सँ सनल हाथकेँ चूमि सकैत छी, / बिना मेहदी लागल? " — एतय रगत = मेहदी। चर्मकार-स्त्रीक हाथपर जे रगत अछि, ओ श्रमक मेहदी थिक — विवाहक नहि। ई विलोम-प्रतीक (एकटा शुभ प्रतीककेँ उलटिकऽ श्रम-यथार्थक प्रतीक बनाएब) दलित सौन्दर्यशास्त्रक एकटा उत्कृष्ट उदाहरण थिक। उच्च-जातीय संस्कृतिमे मेहदी = सौन्दर्य आ उत्सव। दलित-चर्मकार-स्त्रीक जीवनमे मेहदी = रगत आ श्रम। गौरी एहि दूनू अर्थकेँ एकहि शब्दमे एकत्र करैत छथि। ४. चाम-खालक रूपक: दलित-पहचानक पुनर्दावा कविताक सर्वाधिक शक्तिशाली भाग थिक अन्तिम खण्ड — जतय चाम-खाल (जे समाज "अशुद्ध" मानैत अछि) कविताक केन्द्रीय पुनर्दावे-रूपक बनि जाइत अछि: "जखन हमर चाम अमलतास सँ धोयल जाइत अछि, / अहाँक आङ्गुरि सभक दाग मेटाबैत — / ई बनि जाइत अछि ढोल, / शुद्ध सङ्गीत गुञ्जाबैत। " एहि पंक्तिमे तीन स्तरीय रूपान्तरण घटित होइत अछि: पहिल — कृष्णक आङ्गुरिक दाग (जे ग्वाल-बालिनक वस्त्र चोरएलनि, जे बंसुरी बजौलनि) चामपर अंकित अछि — अर्थात् उच्च-जातीय सांस्कृतिक दावेक छाप दलित-देहपर अछि। दोसर — अमलतास (जे लाण्डा कवितामे सुभद्रा सेहो प्रयोग कएल छथि) सँ धोएलापर ई दाग मेटाइत अछि — अर्थात् देशज ज्ञान-परम्परा उच्च-जातीय सांस्कृतिक दावेकेँ मेटाबैत अछि। तेसर — धोएल चाम ढोल बनैत अछि जे शुद्ध सङ्गीत गुञ्जाबैत अछि। ई अत्यन्त महत्त्वपूर्ण थिक: जे समाज चर्मकारक चामकेँ "अशुद्ध" मानैत अछि, ओही चामसँ बनल ढोल "शुद्ध सङ्गीत" उत्पन्न करैत अछि। ई शुद्धता-अशुद्धता मिथकक पूर्ण खण्डन थिक — तर्कसँ नहि, रूपकसँ। स्वरूपरानीक लाण्डा मे सेहो ढोलक प्रसंग आयल छल — मुदा ओतय ढोल पतिक श्रमक प्रतीक छल। एतय ढोल दलित-स्त्री-पहचानक प्रतीक थिक — स्वयं ओकर देह जे "अशुद्ध" मानल गेल, ओ सङ्गीत-स्रोत बनि जाइत अछि। जूलिया क्रिस्तेवाक घृणित-सिद्धांत (जाहिमे ओ देखाबैत छथि जे समाज शरीरक स्रावसभकेँ, जानवरक मांससभकेँ "घृणित" आ "अशुद्ध" मानि सामाजिक पदानुक्रम कायम राखैत अछि) एतय काव्यात्मक प्रत्युत्तर पाबैत अछि: गौरी "घृणित" केँ "सुन्दर" मे, "अशुद्ध" केँ "शुद्ध सङ्गीत" मे रूपान्तरित करैत छथि। ५. खेल-रूपक आ बहादुरी कविताक आरम्भ एकटा काव्यिक आमन्त्रण सँ होइत अछि — "की हमरा संग खेलय लेल नै आयब? " — जे बच्चाक निर्दोष खेल-निमन्त्रण जकाँ प्रतीत होइत अछि। मुदा तुरन्त स्पष्ट भऽ जाइत अछि जे ई खेल वास्तविक साँढ़केँ भेदबाक खेल थिक। "ओहि जुलूसमे बैल-बलदक डरपोक खेल नै, / हम अहाँकेँ एकटा बहादुरीक खेल देखाएब" — एतय एकटा श्रेणी-तुलना अछि। जे लोग धार्मिक जुलूसमे बधिया बैल-बलदकेँ सजाकऽ घुमाबैत छथि — ओ "डरपोक खेल" थिक। दलित-चर्मकार स्त्रीक काज — सुदृढ़ साँढ़केँ भेदब — वास्तविक बहादुरी थिक। भारतीय लोक-परम्परामे जल्लीकट्टु (साँढ़सँ लड़ाइ) एकटा वीरता-प्रदर्शनक खेल थिक। गौरी एहि लोक-परम्पराकेँ दलित-स्त्री-श्रमक रूपक बनाकऽ उच्च-जातीय सांस्कृतिक वीरता-परिभाषाकेँ चुनौती दैत छथि: वास्तविक वीरता धर्म-जुलूसमे नहि, दैनिक श्रममे अछि। ६. "बिना झुकल रीढ़": दलित गरिमाक काव्यिक घोषणा "आउ, / जँ आबि सकैत छी, / हड्डी चुनब सिखाएब — / हम अहाँकेँ बिना झुकल रीढ़ देखाएब। " ई पंक्ति सम्पूर्ण कविताक दार्शनिक-राजनीतिक सार थिक। "हड्डी चुनब" — चर्मकार-स्त्रीक व्यावसायिक कार्य — एतय ज्ञान-हस्तान्तरणक रूप धारण करैत अछि। ओ कृष्णकेँ सिखाएब चाहैत छथि। शिक्षक दलित-स्त्री, छात्र कृष्ण — ई पदानुक्रमक पूर्ण विलोम थिक। "बिना झुकल रीढ़" — एहिमे दोहरा अर्थ अछि। शाब्दिक अर्थ: पशुक मेरुदण्ड जे सीधा अछि, जे झुकल नहि। रूपकार्थ: दलित-स्त्रीक आत्म-सम्मान जे झुकल नहि। बाबासाहेब आम्बेडकर कहने छलाह: "जीवन दीर्घ होएबासँ महत्त्वपूर्ण अछि जे ओ महान होए। " गौरीक दलित-स्त्री दीर्घजीवी नहि — अजेय छथि। ७. "पाप नै" — धार्मिक नैतिकताक खण्डन "ई पाप नै छैक माटि भेल पानिक, / ई पाप नै छैक 'अपराधी' चामक। " "अपराधी चाम" — एतय उद्धरण-चिह्न महत्त्वपूर्ण अछि। समाज जे चामकेँ "अपराधी" कहैत अछि, ओ समाजक मिथ्या नैतिकता थिक। गौरी एहि नैतिकताकेँ सोझे अस्वीकार करैत छथि। ब्राह्मणवादी धर्म-शास्त्रमे चर्मकार-कार्य पाप मानल जाइत अछि — पिछला जन्मक कर्मफल। गौरी एहि कर्मफल-सिद्धांत केँ सोझे नकारैत छथि: "ई पाप नै छैक। " ई दू शब्द — "पाप नै" — सम्पूर्ण ब्राह्मणवादी नैतिक-आर्थिक व्यवस्थाक विरुद्ध काव्यिक घोषणापत्र थिक। फ्रेडरिक नीत्शेक नैतिकताक पुनर्मूल्यांकन (जाहिमे ओ तर्क करैत छथि जे प्रचलित नैतिकता सत्य नहि, बल्कि सत्ताधारीक हितमे निर्मित नियमसभ थिक) क प्रतिध्वनि एतय अछि — मुदा गौरी नीत्शेक दर्शन पढ़िकऽ नहि, जीवनक यथार्थसँ एहि निष्कर्षपर पहुँचैत छथि। ८. जल-रूपक: शुद्धताक नव परिभाषा "जखन पानि भाप बनि काल बादरिमे बदलैत अछि बिजलीक बूँद बरसाबय लेल, / तखन गलीक पवित्रता पारदर्शी भऽ जाइत छैक। " एहि पंक्तिमे भौतिक विज्ञान आ काव्यिक रूपक एकाकार अछि। जल जखन भाप बनैत अछि — ओ अदृश्य भऽ जाइत अछि। फेर बादरमे परिणत भऽ बिजली बरसाबैत अछि — शक्तिरूप धारण करैत अछि। दलित-स्त्रीक गली जे समाज "अपवित्र" मानैत अछि — ओहि गलीक पवित्रता तखन "पारदर्शी" अर्थात् स्पष्ट भऽ जाइत अछि जखन ई रूपान्तरण घटित होइत अछि। पारदर्शिता = सत्यक प्रकट होएब। एहि रूपकमे हेगेलीय द्वन्द्व (जाहिमे विरोधी तत्त्वसभक संघर्षसँ नव सत्य उदित होइत अछि) क काव्यात्मक प्रतिनिधित्व अछि — मुदा एतय ई अमूर्त दर्शन नहि, माटि आ पानिक ठोस यथार्थ थिक। ९. भीमन्नासँ तुलना: पौराणिक-विरोधी पाठक दू रूप भीमन्नाक हमर पैतृक अधिकार आ गौरीक मेहदी लागल हाथ — दूनू पौराणिक पुनर्पाठ करैत अछि। मुदा रणनीतिमे भेद अछि: भीमन्ना पुराणक ऐतिहासिक तर्क देखाबैत छथि — व्यास, वशिष्ठ, मत्स्यगन्धी वास्तवमे दलित मूलक छलाह, एहि ऐतिहासिक सत्यकेँ उजागर करब। हुनकर रणनीति विद्वत्तापूर्ण पुनर्पाठ थिक। गौरी पुराणक नाटकीय संवाद करैत छथि — कृष्णसँ सोझे बाजैत छथि, हुनका चुनौती दैत छथि, हुनका अपन गलीमे आमन्त्रित करैत छथि। हुनकर रणनीति काव्यात्मक टकराहट थिक। दूनू मिलिकऽ दलित काव्यमे पौराणिक-विरोधी पाठक सम्पूर्ण स्पेक्ट्रम (पूरा विस्तार) प्रस्तुत करैत अछि — तर्कसँ आक्रमण आ संवादसँ आक्रमण। १०. सुभद्राक लाण्डा सँ साम्य: ढोलक प्रतीक जेना ऊपर उल्लेख कएल, सुभद्राक लाण्डा आ गौरीक मेहदी लागल हाथ — दूनूमे ढोलक प्रतीक अछि। मुदा भिन्न सन्दर्भमे: लाण्डामे — "चरचराइत जुत्ता आ ढोल बनबा लेल— / ओ ढोल पर मधुर ताल दैत छथि" — ढोल पतिक कलाक प्रतीक थिक। स्त्रीक श्रम पतिक कलामे रूपान्तरित होइत अछि — एहिमे श्रम-अलगावक कड़वाहट थिक। मेहदी लागल हाथमे — ढोल दलित-स्त्रीक स्वयंक पहचानक प्रतीक थिक। ओकर देह, ओकर श्रम, ओकर चाम — ई सब शुद्ध सङ्गीतक स्रोत थिक। एतय श्रम-अलगाव नहि — श्रम-उत्सव थिक। ई दूनू कवितामे ढोलक भिन्न-भिन्न उपयोग दलित-स्त्री काव्यमे एकहि प्रतीकक बहुस्वरता दर्शाबैत अछि। निष्कर्ष एम. गौरीक मेहदी लागल हाथ तेलुगु दलित काव्यक एकटा शिखर-रचना थिक। एहि एकटा कवितामे: पौराणिक आ आधुनिक एकाकार अछि — कृष्ण आ चर्मकार-स्त्री एकहि स्थानपर ठाढ़ छथि। शिल्प आ राजनीति एकाकार अछि — रूपकक सौन्दर्य आ सामाजिक आरोप एकहि साँसमे अछि। व्यक्तिगत आ सामूहिक एकाकार अछि — एकटा स्त्रीक स्वर समस्त दलित-चर्मकार समुदायक स्वर बनि जाइत अछि। अन्तमे — "ई बनि जाइत अछि ढोल, / शुद्ध सङ्गीत गुञ्जाबैत" — गौरी जे कहैत छथि से थिक: दलित-स्त्रीक देह, श्रम, आ पहचान — जकरा समाज "अशुद्ध" कहैत अछि — ओ वास्तवमे सर्वाधिक शुद्ध सङ्गीतक स्रोत थिक। ई मात्र काव्यिक रूपक नहि — ई एकटा सम्पूर्ण सभ्यता-दृष्टि थिक। दलित-स्त्री काव्य समीक्षा: मद्दुरी विजयश्रीक कविता अलिसम्माक स्राप प्रारम्भिक टिप्पणी मद्दुरी विजयश्रीक अलिसम्माक स्राप तेलुगु दलित-स्त्री काव्य-परम्पराक एकटा असाधारण काव्यिक उपलब्धि थिक। एहि लघु कवितामे — मात्र तीस-एक पंक्तिमे — एतेक काव्य-जटिलता, एतेक ऐतिहासिक-पौराणिक घनत्व, आ एतेक राजनीतिक साहस एकत्र अछि जे ई अपने वर्गमे एकटा विशिष्ट स्थान ग्रहण करैत अछि। एहि कवितामे तीन कालखण्ड एकसाथ उपस्थित अछि: रामायण-काल (शूर्पणखाक नासिका-छेदन), समकालीन इतिहास (अलिसम्माक वास्तविक घटना), आ वर्तमान (दलित-स्त्रीक समकालीन संकट)। ई त्रि-कालिक एकत्व कवितामे एकटा असाधारण काव्यिक समय-सम्पीड़न सृजित करैत अछि। १. काव्य-रूप आ संरचना आरम्भिक पूर्वाभास कविताक पहिल तीन पंक्ति — "अहाँकेँ ई अद्भुत लागि सकैत अछि, / अहाँकेँ ई हास्यास्पद लागि सकैत अछि, / अहाँकेँ ई बहुत घिनौना लागि सकैत अछि" — एकटा अनुप्रास-आरम्भ शृंखला थिक जे तीन भिन्न पाठक-प्रतिक्रियाक पूर्वानुमान करैत अछि। ई संरचना अत्यन्त परिकलित अछि। कवि जानैत छथि जे हुनकर कविता तीन प्रकारक पाठक पढ़त: जे अद्भुत मानत (उदारवादी), जे हँसत (व्यंग्यकारी), जे घृणा करत (प्रतिक्रियावादी)। तीनूकेँ एकहि साथ सम्बोधित कऽ कवि ई स्पष्ट करैत छथि — "मुदा हम आब एकटा नव प्रश्न छी" — कोनो प्रतिक्रियासँ निरपेक्ष, कविताक अस्तित्व अटल अछि। आत्म-परिचयक संरचना कविताक मध्य-भाग एकटा क्रमिक आत्म-परिचय थिक — नकारात्मकसँ सकारात्मक दिस: पहिल — जे नहि अछि: आरक्षित सीटपर नहि बैसि सकैत, सम्मानजनक उपाधि नहि अछि। दोसर — जे अछि: दुख, लुढ़कनाइ, वासनाक शिकार। तेसर — नामकरण: "हम अलिसम्मा छी" — एहि पंक्तिपर कविता एकटा नव स्तरपर प्रवेश करैत अछि। ई संरचना नकारात्मक परिभाषासँ स्व-घोषणा दिस कविताक यात्रा थिक — जे अन्ततः स्राप-उद्घोष मे परिणत होइत अछि। अन्तिम विस्फोट अन्तिम खण्ड — "रे पशु सब! / हम अहाँ सभकेँ स्राप दैत छी" — एकटा अकस्मात् स्वर-परिवर्तन थिक। पूरा कविता जे एक सधल, विश्लेषणात्मक स्वरमे चलैत आएल छल — ओ एतय एकाएक उग्र हुङ्कारमे परिणत भऽ जाइत अछि। ई काव्यिक भूकम्प थिक। २. अलिसम्मा: ऐतिहासिक व्यक्तित्व आ काव्यिक प्रतीक शशिनिर्मलाक हम रजस्वला कपड़ा ओढ़ि रहल छी मे अलिसम्माक उल्लेख भेल छल — मुदा ओतय ओ नामोल्लेखमात्र छलीह। विजयश्री एतय अलिसम्माकेँ काव्यक वक्ता बनाबैत छथि — ओ स्वयं बाजैत छथि। अलिसम्मा एकटा वास्तविक ऐतिहासिक व्यक्ति छथि — आन्ध्र प्रदेशमे एकटा दलित स्त्री जिनका उच्च-जातीय पुरुषसभद्वारा सार्वजनिक रूपसँ नग्न कऽ घुमाओल गेल छल। ई घटना दलित स्त्री-उत्पीड़नक प्रतीक-घटना बनि गेल। विजयश्री एहि ऐतिहासिक व्यक्तिकेँ काव्यिक वाचक बनाकऽ दू काज एकसाथ करैत छथि: पहिल — अलिसम्माकेँ वस्तुसँ विषय (वस्तु सँ कर्ता-विषय) मे रूपान्तरित करैत छथि। इतिहासमे ओ एकटा पीड़ित छलीह जिनकर कहानी दोसरसभ कहैत छथि। एतय ओ स्वयं बाजैत छथि। दोसर — अलिसम्माकेँ सार्वभौमिक बनाबैत छथि। "हम अलिसम्मा छी" — एहि पंक्तिमे "हम" मात्र एकटा व्यक्ति नहि, समस्त दलित-स्त्री थिक। गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाकक "निम्नवर्ग कि बाजि सकैत अछि? " (की निम्नवर्ग अपन आवाजमे इतिहासमे उपस्थित भऽ सकैत अछि? ) प्रश्नक उत्तर विजयश्री एतय देैत छथि: हँ, एहि कवितामे। अलिसम्मा बाजि रहल छथि। ३. पौराणिक-ऐतिहासिक समानान्तरता: शूर्पणखा आ अलिसम्मा कविताक सर्वाधिक साहसिक काव्यिक निर्णय थिक — शूर्पणखाक नासिका-छेदन आ अलिसम्माक सार्वजनिक नग्नीकरण कें एकहि पंक्तिमे जोड़ब: "पहिले हमर कान-नाक काटल गेल छल प्रभु रामक आदेश पर। / आब हालहिमे, / हम पुलिसक हाथमे बिना कारण दुख बनि गेलहुँ। " एहि समानान्तरतामे अनेक अर्थ-स्तर अछि: पहिल स्तर — दूनू घटनामे उत्पीड़क पुरुष छथि आ पीड़ित दलित/बहिष्कृत स्त्री। शूर्पणखा राक्षस-कुलक — समाजक "अन्य" (जे मुख्यधाराक बाहर अछि)। अलिसम्मा दलित-कुलक — समाजक "अन्य"। दोसर स्तर — दूनू घटनामे राज्य-शक्ति उत्पीड़नमे सहभागी अछि। रामक आदेशपर लक्ष्मण नासिका काटैत छथि। पुलिसक हाथे अलिसम्मा पीड़ित होइत छथि। धर्म-राज्य (रामायण-काल) आ आधुनिक राज्य — दूनू एकहि काज करैत अछि। तेसर स्तर — रामायणमे शूर्पणखाक कामनाकेँ अपराध मानल गेल — ओ राम वा लक्ष्मणसँ विवाह चाहने छलीह। अलिसम्माक अस्तित्वकेँ अपराध मानल गेल। दूनू घटनामे स्त्री-इच्छा वा स्त्री-उपस्थिति उत्पीड़नक कारण बनैत अछि। चतुर्थ स्तर — "प्रभु राम" — एहिमे "प्रभु" शब्द व्यंग्यात्मक अछि। जे "प्रभु" (भगवान, रक्षक) थिक, ओ स्त्री-उत्पीड़नक आदेश दैत अछि। ई धर्म-आधारित नैतिकताक खण्डन थिक। भीमन्नाक पौराणिक-विरोधी पाठ (जाहिमे ओ महाभारतक व्यक्तित्वसभकेँ पुनर्पाठ करैत छलाह) परम्पराक एहि रचना और आगाँ जाइत अछि। भीमन्ना इतिहासक पुनर्पाठ करैत छलाह — विजयश्री इतिहासकेँ वर्तमानसँ जोड़ि देखाबैत छथि जे कोनो किछु नहि बदलल। ४. "नव प्रश्न" क दर्शन "मुदा हम आब एकटा नव प्रश्न छी" — ई पंक्ति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण थिक। परम्परागत दर्शनमे प्रश्न एकटा साधन थिक, उत्तर लक्ष्य थिक। सुकरात-पद्धतिमे प्रश्न सत्यक दिस लऽ जाइत अछि। मुदा विजयश्री कहैत छथि: हम स्वयं प्रश्न छी। ई अस्तित्ववादी घोषणा थिक। दलित-स्त्री कोनो उत्तर नहि, स्वयं प्रश्न अछि — समाजक लेल, व्यवस्थाक लेल, इतिहासक लेल। जाधरि दलित-स्त्री जीवित अछि, प्रश्न समाप्त नहि होएत। सिमोन द बोवुआर दोसर लिंग (जाहिमे ओ तर्क करैत छथि जे स्त्री सदैव "दोसर" — पुरुषक सापेक्षमे परिभाषित — रहल अछि) क "दोसर"पन एतय दलित-जाति-आयामसँ अधिक जटिल भऽ जाइत अछि। दलित-स्त्री "दोसर" नहि — प्रश्न अछि — जे उत्तर मागैत अछि। ५. "स्राप" क काव्यिक-राजनीतिक महत्त्व कविताक शीर्षक आ अन्तिम उद्घोष — "स्राप" — अत्यन्त बहुस्तरीय अछि। धार्मिक परम्परामे स्राप हिन्दू धर्म-परम्परामे ऋषि-मुनिक स्राप अत्यन्त शक्तिशाली मानल जाइत अछि। ब्रह्माक स्राप, दुर्वासाक स्राप — ई सब अपरिवर्तनीय होइत अछि। स्राप देबाक अधिकार सदैव उच्च-जातीय पुरुषक छलनि। विजयश्री एहि स्राप-अधिकारकेँ दलित-स्त्रीक हाथमे दैत छथि। ई पदानुक्रमक उलटपालट थिक: जे कहियो स्राप पाबैत छल — ओ आब स्राप दैत अछि। स्रापक विषय-वस्तु "हम अहाँ सभकेँ स्राप दैत छी कि अहाँ मानवमे परिणत भऽ जाउ — / अपन पूँछ आ नुकीला दाँत तोड़ि-मोड़ि कऽ। " ई स्राप अत्यन्त असाधारण थिक। सामान्यतः स्राप विनाशक होइत अछि — मरह, भस्म होह, पशु बनह। विजयश्रीक स्राप रूपान्तरणक थिक — मानव बनह। एहिमे एकटा गहिर दार्शनिक कटाक्ष अछि: जे उत्पीड़क छथि — पुलिस, उच्च-जाति, पशु-समान व्यवहार करनिहार — ओ वास्तवमे पशु छथि। हुनका मानव बनबाक स्राप देब — ई सर्वोच्च व्यंग्य थिक। एहिमे फ्रान्ट्ज फानोंक उपनिवेशवाद-विरोधी दर्शनक प्रतिध्वनि अछि — जतय ओ तर्क करैत छथि जे उपनिवेशक/उत्पीड़क वास्तवमे अपन मानवता खो चुकल अछि। पीड़ित अधिक मानवीय अछि, उत्पीड़क कम। विजयश्री एहि तर्ककेँ काव्यिक स्राप मे रूपान्तरित करैत छथि। ६. सम्मानजनक उपाधिक अनुपस्थिति "जखन बोलल जाइत अछि वा चिच्चाओल जाइत अछि, / तऽ कोनो सम्मानजनक उपाधि नै अछि हमर नामक आगाँ वा पाछू लगबा लेल। " ई पंक्ति भाषा आ सामाजिक पहचानक सम्बन्धकेँ उजागर करैत अछि। भारतीय समाजमे नामक आगाँ-पाछू लगाएल जाइत — "श्रीमती", "डॉक्टर", "स्वर्गीय", जातिसूचक उपनाम — ई सब सामाजिक मान्यताक चिह्न थिक। दलित-स्त्री जखन बाजैत वा चिच्चाबैत अछि — ओ नामहीन थिक। न "श्रीमती" (विवाहित सम्मान), न जाति-उपनाम (जे समाजमे स्थान दैत अछि), न पेशेगत उपाधि। भाषाशास्त्री पियरे बोर्दोक भाषिक पूँजी (जाहिमे ओ देखाबैत छथि जे भाषामे सामाजिक शक्ति-सम्बन्ध प्रतिबिम्बित होइत अछि) क अवधारणा एतय लागू होइत अछि। नामकरण-अधिकार एकटा सामाजिक शक्ति थिक। दलित-स्त्रीक नामक आगाँ-पाछू शून्य अछि — ई शून्यता समाजमे हुनकर अनुपस्थिति क प्रतीक थिक। ७. आरक्षित सीटक रूपक "यद्यपि खाली अछि, / मुदा स्त्री सभ लेल आरक्षित सीट पर नै बैसि सकैत छी। " ई पंक्ति समकालीन दलित-स्त्री अनुभवक अत्यन्त सटीक काव्यिक प्रस्तुति थिक। बस, ट्रेन, कार्यालयमे "महिला आरक्षित" सीट सैद्धान्तिक रूपसँ सब स्त्रीक लेल होइत अछि। मुदा व्यवहारमे दलित-स्त्री ओहिपर बैसि नहि सकैत — कारण उच्च-जातीय स्त्री वा पुरुष विरोध करैत अछि। एहि रूपकमे कानून आ यथार्थक भेद प्रकट होइत अछि। भारतीय संविधान समानताक गारन्टी दैत अछि — मुदा सामाजिक यथार्थमे ई गारन्टी खाली सीट जकाँ अछि — उपस्थित, मुदा अगम्य। स्वरूपरानीक आरक्षण-कलंकारोपण (कोटा-सँ-आयल कहिकऽ अपमान) आ विजयश्रीक आरक्षित-सीट-अगम्यता — दूनू मिलिकऽ दलित-स्त्रीक सांवैधानिक अधिकार आ सामाजिक वास्तविकताक विरोधाभास दर्शाबैत अछि। ८. "न्यायालय रूपी आँखिमे बाती" "हम अलिसम्मा छी, / जे न्यायालय रूपी आँखिमे बाती जलौने छलहुँ। " ई रूपक असाधारण काव्यिक घनत्व राखैत अछि। "न्यायालय रूपी आँखि" — न्याय-प्रतीकमे अन्धी देवी (जस्टिशिया, पट्टी-बान्हल आँखिसँ) पाश्चात्य परम्परामे अछि — जे कहैत अछि न्याय पक्षपातरहित अछि। मुदा भारतीय सन्दर्भमे न्यायालय जाति-वर्गक पक्षधर रहल अछि। "आँखिमे बाती जलाएब" — सामान्यतः दीपक बाती जलाएब आलोक-प्रसार थिक। मुदा आँखिमे बाती जलाएब यन्त्रणा थिक। दलित-स्त्रीक न्यायालयमे जाएब — जे न्याय-प्राप्तिक लेल होएबाक चाही — यातना-अनुभव बनि जाइत अछि। एहि रूपकमे आशा आ विडम्बना एकहि साथ अछि: अलिसम्मा न्यायालयमे आलोक आनय गेलीह — मुदा ओहि "आँखि"मे बाती जरल, जरैत रहल। ९. "स्त्री आ दलित भऽ कऽ सेहो हम अखन धरि जीवित छी" ई पंक्ति दलित-स्त्री काव्यक सार-वाक्य थिक। "सेहो" — ई एकटा शब्द सम्पूर्ण उत्पीड़नक इतिहास समेटि लैत अछि। स्त्री भऽ कऽ उत्पीड़न। दलित भऽ कऽ उत्पीड़न। दूनू एकसाथ। "सेहो" कहैत अछि: एहि सभक बावजूद। ई जीवनक राजनीतिक कार्य थिक। पॉल गिलरॉय "जिएब, हँसब, प्रेम करब" केँ उत्पीड़नक विरुद्ध सांस्कृतिक प्रतिरोध मानैत छथि। विजयश्रीक "अखन धरि जीवित छी" एहि अर्थमे जीवित रहनाइ स्वयं विद्रोह थिक। १०. पाँचू कवि: एकटा अन्तिम संश्लेषण एहि सम्पूर्ण समीक्षा-शृंखलामे हम पाँच तेलुगु दलित कवि — भीमन्ना, सुभद्रा, स्वरूपरानी, शशिनिर्मला, गौरी, आ विजयश्री — क अध्ययन कएल। सभ मिलिकऽ एकटा सम्पूर्ण दलित-स्त्री काव्य-ब्रह्माण्ड निर्मित करैत अछि: भीमन्ना — इतिहास-दर्पण। पुराण-इतिहासक उलटपालट। सुभद्रा — श्रम-दर्पण। दैनिक जीवनक वस्तु-संसारक काव्य। स्वरूपरानी — चेतना-दर्पण। व्यक्तिगत रूपान्तरणक यात्रा। शशिनिर्मला — संघर्ष-दर्पण। त्रिमुखी उत्पीड़नसँ त्रिमुखी संघर्ष। गौरी — पहचान-दर्पण। "अशुद्ध" पहचानकेँ शुद्ध सङ्गीतमे रूपान्तरण। विजयश्री — न्याय-दर्पण। इतिहासक पीड़ितकेँ वाचक बनाएब, स्रापकेँ शस्त्र बनाएब। ई छहू दर्पण मिलिकऽ दलित-स्त्री अस्तित्वक सम्पूर्ण प्रतिबिम्ब बनाबैत अछि। निष्कर्ष मद्दुरी विजयश्रीक अलिसम्माक स्राप तेलुगु दलित काव्यक एहि पूरा शृंखलाक सर्वोच्च काव्यिक क्षण थिक। एहि कवितामे: इतिहास बाजैत अछि — अलिसम्मा, जे वस्तु छलीह, वाचक बनि जाइत छथि। पुराण खण्डित होइत अछि — रामक "प्रभुत्व" आ पुलिसक "अधिकार" एकहि पंक्तिमे जोड़ल जाइत अछि। भाषा विद्रोह करैत अछि — "स्राप" — जे उच्च-जातिक विशेषाधिकार छल — दलित-स्त्रीक शस्त्र बनि जाइत अछि। दर्शन जन्म लैत अछि — जीवित रहनाइ विद्रोह थिक, प्रश्न बनब शक्ति थिक। अन्तिम पंक्ति — "अपन पूँछ आ नुकीला दाँत तोड़ि-मोड़ि कऽ" — एकटा भविष्यक माँग थिक। जाधरि उत्पीड़क अपन पशुता नहि छोड़त, ताधरि स्राप सक्रिय रहत। ई माँग समाजकेँ, व्यवस्थाकेँ, इतिहासकेँ — सभकेँ — पुछल गेल अछि। आ ई प्रश्न — "हम आब एकटा नव प्रश्न छी" — तेलुगु दलित काव्यक एहि सम्पूर्ण शृंखलाक अन्तिम, अनुत्तरित, आ सर्वाधिक शक्तिशाली स्वर थिक। गुजराती दलित कविता [गुजरातीसँ अंग्रेजी अनुवाद हेमांग देसाई; अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा। अनीश गारंगेक "पोस्टर", राजेन्द्र वडेलक 'जीता' "सम्भोग", उमेश सोलंकीक "लोक, जमि जाए", "खरड़ाक डाँट सभ" गुजराती दलित काव्य समीक्षा: चारि कविता अनीश गारंगे, राजेन्द्र वडेल 'जीता', उमेश सोलंकी प्रारम्भिक टिप्पणी एहि संग्रहमे प्रस्तुत गुजराती दलित कविता — तेलुगु परम्पराक पश्चात् — एकटा भिन्न भाषिक-सांस्कृतिक भूमि पर दलित अनुभवक काव्यात्मक अभिव्यक्ति थिक। तेलुगु कवितासभमे जे स्त्री-दलित स्वर प्रमुख छल, एतय पुरुष-दलित स्वर अधिक केन्द्रीय अछि — मुदा वडेलक सम्भोग मे स्त्री-दलित यथार्थ पुनः प्रकट होइत अछि। तीनू कवि — गारंगे, वडेल, सोलंकी — तीन भिन्न काव्य-रणनीति अपनाबैत छथि: गारंगे नगर-यथार्थवाद (शहरी जीवनक ठोस-इन्द्रिय-ग्राह्य यथार्थ), वडेल यौन-राजनीतिक साक्ष्य, आ सोलंकी जमाव-रूपक आ गान्धी-विरोधी व्यंग्य। एहि तीनू मिलिकऽ गुजराती दलित काव्यक एकटा सम्पूर्ण नगर-राजनीतिक चित्र निर्मित करैत अछि। १. अनीश गारंगे: पोस्टर काव्य-रूप आ संरचना पोस्टर एकटा वृत्ताकार संरचना (जाहिमे पहिल पंक्ति अन्तिम पंक्ति बनि जाइत अछि) मे रचल गेल अछि। "ई खुरदुरा चेहरा बला पोस्टर सब हमर ऐना जकाँ अछि" — कविता एहिसँ आरम्भ होइत अछि आ एहिपर समाप्त। ई वृत्तीय संरचना दलित अस्तित्वक अन्तहीन चक्रकेँ प्रतीकात्मक रूपसँ व्यक्त करैत अछि — जाहिमे कोनो निकास नहि। मध्यमे जे पंक्तिसभ अछि — सिनेमा बैनर, विज्ञापन, शोक-सभा, शौचालय, रैली, रेलवे स्टेशन, रिक्शा, लापता-व्यक्ति-पोस्टर — ई सब नगर-जीवनक टुकड़े थिक। संरचनात्मक दृष्टिसँ ई कोलाज-काव्य (असम्बद्ध प्रतीत होइत टुकड़ासभकेँ एकत्र कऽ अर्थ-निर्माण करबाक काव्य-विधि) थिक। पोस्टर-रूपकक बहुस्तरीयता "पोस्टर" शब्द एहि कवितामे अत्यन्त बहु-अर्थी थिक: पहिल अर्थ — पोस्टर अस्थायी होइत अछि। ओ एकटा दिन चिपकैत अछि, भोरमे छिलि जाइत अछि। दलित-अस्तित्व सेहो समाजक दृष्टिमे अस्थायी, प्रतिस्थापनयोग्य (जकरा बदलल जा सकय) थिक। दोसर अर्थ — पोस्टर सार्वजनिक होइत अछि — सब देखैत अछि, कोनो ध्यान नहि दैत। दलित-व्यक्ति सेहो दृश्यमान मुदा अदृश्य थिक। तेसर अर्थ — पोस्टर बहुरूपी होइत अछि — सिनेमा, विज्ञापन, राजनीतिक रैली, लापता-व्यक्ति — सब किसमक पोस्टर अछि। दलित-व्यक्ति सेहो समाजक विभिन्न संस्थाद्वारा विभिन्न उद्देश्यसँ प्रयुक्त होइत अछि। "ऐना" (दर्पण) — कविताक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रूपक। पोस्टर जे दलितक "ऐना" थिक — ई विडम्बना थिक। ऐना प्रामाणिक प्रतिबिम्ब दैत अछि। मुदा पोस्टर विकृत, अपमानित, प्रयोजनानुसार निर्मित छवि थिक। अर्थात्: समाज दलितकेँ जे "ऐना" देखाबैत अछि — ओ मिथ्या दर्पण थिक। जाक् लाकाँक दर्पण-अवस्था (जाहिमे ओ तर्क करैत छथि जे बच्चा दर्पणमे अपन प्रतिबिम्ब देखिकऽ अपन "मैं" निर्मित करैत अछि) एतय नकारात्मक रूपसँ लागू होइत अछि। दलित-व्यक्ति जे "ऐना" (पोस्टर) देखैत अछि, ओहिमे विकृत आत्म-छवि थिक — समाजद्वारा थोपल। नगर-यथार्थवाद "अहाँ 'पे-एण्ड-यूज' शौचालय सभमे हमरा पर पेशाब करैत छी" — ई पंक्ति अत्यन्त प्रत्यक्ष अछि। "पे-एण्ड-यूज शौचालय" — नगर-जीवनक एकटा ठोस स्थान — एतय सामाजिक अपमानक रूपक थिक। पैसा देकऽ शौचालयमे प्रवेशक अधिकार थिक — मुदा दलितपर पेशाब निःशुल्क होइत अछि। "हम बेकार कागजक गोला छी" — ई आत्म-वस्तुकरण (स्वयंकेँ वस्तु मानब) थिक — मुदा ई आत्म-वस्तुकरण आत्म-घृणासँ नहि, सामाजिक यथार्थक स्वीकृतिसँ आबैत अछि। कविता कहैत अछि: समाज हमरा एहि रूपमे देखैत अछि। "खमण-खाड़ी" — ई गुजराती खाद्य-पदार्थ एतय सांस्कृतिक-भौगोलिक पहचान थिक। "खमण-खाड़ी सँ सनल चेहरा" — गुजराती संस्कृतिक मध्यवर्गीय-उच्च-जातीय छवि (खमण-ढोकला जे गुजरातक प्रतीक-खाद्य बनि गेल) दलित-चेहरापर लागल अछि — अपमानजनक, व्यंग्यात्मक रूपसँ। वाल्टर बेंजामिनक नगर-अनुभव (जाहिमे ओ तर्क करैत छथि जे आधुनिक नगर मानवकेँ वस्तुसमूहमे विलीन कऽ दैत अछि) एतय दलित-नगर-अनुभवमे अधिक जटिल भऽ जाइत अछि: नगर मात्र अनामकरण नहि करैत, जातीय कलंकित-निर्माण सेहो करैत अछि। २. राजेन्द्र वडेल 'जीता': सम्भोग काव्य-रूप: यौन-राजनीतिक साक्ष्य सम्भोग तेलुगु-दलित काव्य-शृंखलामे शशिनिर्मलाक यौन-राजनीतिक स्वरक गुजराती प्रतिरूप थिक — मुदा एकटा महत्त्वपूर्ण भेदसँ: एतय वक्ता पुरुष अछि, आ कविता उच्च-जातीय पुरुष आ दलित स्त्रीक शारीरिक सम्बन्धक विश्लेषण करैत अछि। ई एकटा अत्यन्त साहसिक काव्य-निर्णय थिक। सामान्यतः यौन-सम्बन्ध निजी विषय मानल जाइत अछि। वडेल एकरा राजनीतिक विश्लेषणक विषय बनाबैत छथि। "दुर्गन्धित" शरीर "अहाँक शरीर दलित स्त्री सभकेँ कुचलैत अहाँक पूर्वज सँ दुर्गन्धित छल" — ई पंक्ति अत्यन्त जटिल अछि। "दुर्गन्धित" — सामान्यतः दलित-जातिकेँ "अशुद्ध" आ "दुर्गन्धित" कहल जाइत अछि। वडेल एहि प्रदूषण-कलंककेँ उलटि दैत छथि: उच्च-जातीय शरीर दलित-स्त्री-बलात्कारक इतिहाससँ दुर्गन्धित अछि। "पूर्वज सँ" — ई शब्द महत्त्वपूर्ण थिक। ई कोनो व्यक्तिगत पाप नहि — ई पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलैत आएल ऐतिहासिक शोषण थिक। उच्च-जातीय पुरुषक शरीरमे ओहि पूर्वजसभक कर्म भौतिक रूपसँ उपस्थित अछि। वडेलक एहि पंक्तिमे एपिजेनेटिक्स (जाहिमे विज्ञान देखाबैत अछि जे पूर्वजक अनुभव वंशजक जीवशास्त्रमे प्रभाव छोड़ैत अछि) क काव्यात्मक प्रतिनिधित्व अछि। आ एहिसँ फानोंक उपनिवेशित देह (जाहिमे ओ देखाबैत छथि जे उपनिवेशकक शरीरमे हिंसाक इतिहास अंकित अछि) क अवधारणा सेहो। अन्तिम उद्घोष: "भारत" आ "भारती" "हमर सम्भोग सँ जँ बेटा जन्मल / तऽ हुनकर नाम 'भारत' राखू / जँ बेटी तऽ 'भारती'। " ई कवितामे सर्वाधिक विस्फोटक पंक्ति थिक। एहिमे कई अर्थ-स्तर एकसाथ अछि: पहिल स्तर — "भारत" आ "भारती" राष्ट्रीय पहचानक नाम थिक — राष्ट्र-प्रतीक। दलित-स्त्री आ उच्च-जातीय पुरुषक सन्तानकेँ "भारत" कहब — ई राष्ट्र-निर्माणक वास्तविक इतिहास उजागर करैत अछि। भारत-राष्ट्र एहि जाति-यौन-हिंसाक उत्पाद थिक। दोसर स्तर — "भारत माता" क राष्ट्रवादी कल्पनामे माँ उच्च-जातीय, पवित्र होइत छथि। वडेल देखाबैत छथि जे वास्तविक "भारत माता" दलित-स्त्री छथि — जिनकर शरीरपर राष्ट्रक इतिहास लिखाएल गेल। तेसर स्तर — "जँ बेटा" / "जँ बेटी" — ई काल्पनिक वाक्य-रचना एकटा भविष्यक माँग थिक: एहि सत्यकेँ स्वीकार करू। बी. आर. आम्बेडकर जाति-विनाश मे तर्क करैत छलाह जे जातिक स्थायित्व अन्तर्विवाह (जाहिमे उच्च-जाति अपन जातिभित्तर विवाह करैत अछि) पर निर्भर थिक। वडेलक कविता एहि तर्ककेँ उलटिकऽ देखाबैत अछि: जाति-विनाश केवल विवाहसँ नहि, जाति-हिंसाक इतिहासकेँ स्वीकार करबासँ आरम्भ होइत अछि। ३. उमेश सोलंकी: लोक, जमि जाय काव्य-रूप: जमाव-रूपकक विस्तार लोक, जमि जाय एकटा एकल विस्तारित रूपक (एकटा मूल बिम्बकेँ कविताभरि विस्तारित करबाक विधि) पर आधारित अछि। "जमि जाय" (जमि जाएब होएब, जमि जाएब) — ई एकटा सरल भौतिक क्रिया — कवितामे एकटा जटिल राजनीतिक रूपक बनि जाइत अछि। संरचना पुनरारम्भात्मक (बारम्बार एकहि शब्दसँ आरम्भ) अछि — "जमि जाय" क आवृत्ति कवितामे एकटा मन्त्र-गुण लबैत अछि। मुदा ई मन्त्र भक्तिक नहि — क्रान्तिक थिक। "जमाव"क राजनीतिक दर्शन सोलंकी जे "जमाव" चाहैत छथि — ओ स्थिरताक विरोधमे नहि, बल्कि स्थिरताक माध्यमसँ परिवर्तनक माँग थिक। "केतलीमे चाय जमि जाय" — चाय गतिशीलताक, उष्णताक प्रतीक थिक — जे रोज बनैत-पिआइत अछि। एकर जमब = दैनिक सामान्यताक बन्द होएब। "टकाक स्पर्श मात्र सँ कोमल आङ्गुरि सब मरल समुद्री शैलमे जमि जाय" — "टका" (धन) आ "कोमल आङ्गुरि" — पूँजीवादी श्रम-शोषणक रूपक। जे आङ्गुरि धन स्पर्श करैत अछि, ओ मृत शिलामे परिणत होइत अछि — पूँजी मानवकेँ पाथर बनाबैत अछि। "कुहेसाक ई मोटा चादर छँटबा लेल" — "कुहेसा" (कुहासा, कोहरा) — अज्ञान, भ्रम, झूठ क रूपक थिक। जाहि सामाजिक भ्रमले दलित-उत्पीड़न सामान्य लागैत अछि — ओ "कुहेसा" केवल जमावसँ — अर्थात् आमूल रोकसँ — हटत। मार्क्सक जमा हुआ श्रम (संचित श्रम — जाहिमे ओ तर्क करैत छथि जे पूँजी वास्तवमे श्रमिकक जमाएल श्रम थिक जे मालिकक हाथमे चलि जाइत अछि) क अवधारणासँ सोलंकीक "जमाव" एकटा काव्यिक सम्वाद करैत अछि: यदि श्रम "जमि जाय" — अर्थात् हड़ताल — तऽ ओ व्यवस्था चरमरा जाइत अछि जे एहि श्रमपर टिकल अछि। ४. उमेश सोलंकी: खरड़ाक डाँट सब काव्य-रूप: व्यंग्यात्मक सम्बोधन खरड़ाक डाँट सब एकटा सोझ सम्बोधन-कविता थिक — गान्धीजीकेँ सोझे बाजैत। एहि काव्य-विधिमे गौरीक मेहदी लागल हाथ (कृष्णसँ सम्बोधन) आ विजयश्रीक अलिसम्माक स्राप (उत्पीड़ककेँ सम्बोधन) क साम्य अछि। मुदा ई कविताक सम्बोधन अनन्य थिक: गान्धी — जे दलितक "महात्मा" (हितैषी) होएबाक दावा करैत छलाह — हुनकासँ रोष आ निराशा क सोझ अभिव्यक्ति। गान्धी-आम्बेडकर द्वन्द्वक काव्यिक प्रतिनिधित्व भारतीय इतिहासमे गान्धी-आम्बेडकर विवाद सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक-दार्शनिक विवाद छल। गान्धी "हरिजन" कहि दलितकेँ हिन्दू व्यवस्थाक भीतर सुधारक माध्यमसँ उठाएब चाहैत छलाह। आम्बेडकर एहि व्यवस्थाकेँ जड़सँ अस्वीकार करैत छलाह। सोलंकी एहि ऐतिहासिक विवादकेँ काव्यमे लबैत छथि: "अहाँक खादी बहुत जल्दी घिसि जाइत छैक" — खादी गान्धीक प्रतीक थिक — स्वदेशी, सादगी, राष्ट्रीयता। "घिसि जाएब" = प्रतीकक खोखलापन उजागर होएब। गान्धीक आदर्श दलितक जीवनमे टिकाऊ नहि सिद्ध भेल। "पर्खि पर फ्रेममे बन्द जीवन सँ अहाँ निश्चय घृणा करैत हएब" — सरकारी दफ्तरमे, स्कूलमे, घरमे — गान्धीक तस्वीर फ्रेममे बन्द अछि। ई "फ्रेम" प्रतिष्ठापनक प्रतीक थिक — गान्धीकेँ संग्रहालय-वस्तु बनाएब, जाहिसँ हुनकर वास्तविक विचारक समाजपर प्रभाव नहि पड़ए। "अहाँ ककरा लेल मुस्कुरा रहल छी? " — ई प्रश्न अत्यन्त तीखा थिक। गान्धीक तस्वीरमे मुस्कान अछि। मुदा जाहि दलित-समुदायक लेल ओ काज करैत होएबाक दावा करैत छलाह — हुनकर जीवनमे मुस्कानक कोनो कारण नहि। ओ मुस्कान केकर लेल? "खरड़ाक डाँट" शीर्षक — "खरड़ाक डाँट सब" — अत्यन्त बहु-अर्थी थिक। "खरड़ा" (झाड़ू, झाड़ू) गान्धीक स्वच्छता-आन्दोलनक प्रतीक थिक। मुदा "खरड़ाक डाँट" (झाड़ूक डण्ठल) — ओ जे बाँचि जाइत अछि जखन झाड़ू घिसि जाइत अछि। कविता एहि अवशेषसभकेँ — जे स्वच्छता-आन्दोलनक पश्चात् बाँचल लोगसभ — देखाबैत अछि: "शहरक गुप्त गली सभमे झाड़ूक डण्ठलक कूड़ा — / ओ सब बड़बड़बैत अछि / करहैत अछि। " ई "बड़बड़ाएब" आ "करहाएब" — जे दलित-सफाईकर्मीसभ गान्धीक "स्वच्छता" आन्दोलनसँ बाहर छोड़ल गेल — हुनकर यन्त्रणाक शब्द थिक। जुलाई २००९: ऐतिहासिक प्रसंग कविताक अन्तमे प्रसंग-टिप्पणी अछि: अहमदाबादमे जुलाई २००९ मे भेल दारूक त्रासदी। एहि घटनामे नकली दारू पिबिकऽ मुख्यतः दलित-मजदूर मृत्युकेँ प्राप्त भेलाह। गान्धी दारू-विरोधी छलाह। गुजरात मद्य-निषेध-राज्य (मद्यनिषेध-राज्य) थिक — गान्धीक आदर्शक भूमि। मुदा ओहि "गान्धीवादी" राज्यमे दलित-मजदूर नकली दारूसँ मरैत अछि। "गान्धी / हम अहाँक मुँड़ पर दारू डालि दैत छी" — ई पंक्ति अत्यन्त उग्र थिक। गान्धीक मुँड़पर दारू — जे हुनकर सबसँ बड़ वर्जना छल — ढारब: ई पूर्ण अस्वीकृति थिक। "धिक्कार / अहाँक खोपड़ी पर दारूक थैला जाय" — ई श्राप थिक — विजयश्रीक अलिसम्माक स्राप जकाँ। मुदा एतय श्राप अधिक व्यंग्यात्मक थिक: दारू — जे गान्धीक विरुद्ध छल — गान्धीपर। बी. आर. आम्बेडकरक गान्धी-आलोचना — जे गान्धी दलितक नामपर राजनीति करैत छलाह मुदा जाति-व्यवस्थाकेँ मूलतः नहि बदलैत छलाह — सोलंकीक कवितामे काव्यिक रूप धारण करैत अछि। ५. तुलनात्मक विश्लेषण: तेलुगु बनाम गुजराती एहि गुजराती कवितासभकेँ तेलुगु परम्परासँ तुलना करलापर कई महत्त्वपूर्ण भेद आ साम्य उभरैत अछि: नगर-केन्द्रितता: तेलुगु दलित कविता प्रायः ग्रामीण-कृषि यथार्थसँ जुड़ल अछि — खेत, धान, जमीन्दार। गुजराती कविता नगर-केन्द्रित अछि — रेलवे स्टेशन, रिक्शा, शौचालय, विज्ञापन। ई दलित-अनुभवक भौगोलिक विविधता दर्शाबैत अछि। पुरुष-स्वर: तेलुगु दलित काव्य-शृंखलामे स्त्री-स्वर प्रभावी छल। गुजराती संग्रहमे तीनू कवि पुरुष छथि। एहिसँ क्षेत्रीय दलित-आन्दोलनक भिन्न-भिन्न रूप प्रकट होइत अछि। गान्धी-प्रसंग: तेलुगु दलित कवितामे गान्धीक उल्लेख प्रायः नहि। गुजराती दलित कवितामे — जे गान्धीक गृह-प्रदेशमे लिखल गेल — गान्धी-आम्बेडकर विवाद केन्द्रीय थिक। ई स्थानीय इतिहासक काव्यमे प्रवेश थिक। काव्य-भाषा: तेलुगु कवितामे देशज प्रतीक (अमलतास, तेतरि, मैसम्मा देवी) प्रचुर। गुजराती कवितामे नागरिक-आधुनिक प्रतीक (पोस्टर, विज्ञापन, पे-एण्ड-यूज शौचालय) अधिक। ६. अनुवाद-शृंखलाक विशेष टिप्पणी एहि कविता गुजराती → अंग्रेजी → मैथिली — तीन स्तरक यात्रा कएल। तेलुगु कवितासभक अनुवादसँ एकटा महत्त्वपूर्ण भेद थिक: तेलुगु → अंग्रेजी अनुवाद पुरुषोत्तम के. द्वारा कएल गेल, गुजराती → अंग्रेजी हेमांग देसाई द्वारा। हेमांग देसाई स्वयं गुजराती दलित साहित्यक विद्वान छथि — ई अन्दरूनी अनुवादक (जे उहो संस्कृतिक सदस्य छथि जाहिसँ अनुवाद होइत अछि) काज थिक। एहिसँ सांस्कृतिक-विशिष्ट सन्दर्भ (जेना "खमण-खाड़ी", "खरड़ा") बेसी प्रामाणिकतासँ अनूदित भेल। निष्कर्ष गुजराती दलित काव्यक ई चारि कविता मिलिकऽ नगर-दलित अनुभवक एकटा सम्पूर्ण चित्र प्रस्तुत करैत अछि: गारंगेक पोस्टर — दलित-अस्तित्वक अदृश्यता आ विकृत-दृश्यताक काव्य। वडेलक सम्भोग — जाति-यौन-हिंसाक इतिहासकेँ राष्ट्र-निर्माणसँ जोड़बाक काव्य। सोलंकीक लोक, जमि जाय — आमूल रोकक, हड़तालक, व्यवस्था-ठहरावक काव्य। सोलंकीक खरड़ाक डाँट सब — गान्धीवाद आ दलित-यथार्थक विरोधाभासक काव्य। चारू मिलिकऽ एकटा काव्यिक घोषणापत्र बनाबैत अछि: आधुनिक भारतीय राज्य — ओकर प्रतीक (गान्धी, राष्ट्र-ध्वज, संविधान) आ ओकर संस्था (पुलिस, न्यायालय, मीडिया) — दलित-अस्तित्वक न्याय देएबमे विफल रहल अछि। आ जाधरि ई विफलता जारी रहत, ताधरि दलित काव्य — तेलुगुमे, गुजरातीमे, मैथिलीमे — प्रश्न करैत, गवाही दैत, स्राप दैत रहत। बासुदेव सुनानीक उड़िया दलित कविता; उड़िया सँ अंग्रेजी अनुवाद: सैलेन राउत्रे; अंग्रेजी सँ मैथिली अनुवाद: गजेन्द्र ठाकुर उड़िया दलित काव्य समीक्षा: बासुदेव सुनानीक दू टा कविता अखनो बहुत किछु होबाक बाकी अछि आ पता आ सदानन्द प्रारम्भिक टिप्पणी बासुदेव सुनानी उड़िया दलित काव्यक एकटा विशिष्ट आ जटिल स्वर छथि। तेलुगु आ गुजराती दलित कवितासभसँ भिन्न — जाहिमे प्रायः प्रत्यक्ष राजनीतिक उद्घोष वा व्यक्तिगत पीड़ाक साक्ष्य केन्द्रमे छल — सुनानीक कविता रहस्यवादी आ दार्शनिक आयामक माध्यमसँ दलित-अनुभवकेँ व्यक्त करैत अछि। हुनकर काव्य-भाषा रूपकात्मक घनत्वसँ परिपूर्ण अछि — जाहिमे बूँद, बीउ, माछ, बगुला, समुद्र — ई सब प्राकृतिक-ब्रह्माण्डीय बिम्ब दलित-अस्मिताक अदृश्यता आ संघर्षक काव्यिक अभिव्यक्ति बनि जाइत अछि। एहि संग्रहमे तीन सम्बद्ध काव्य-खण्ड अछि — अखनो बहुत किछु होबाक बाकी अछि, पता, आ सदानन्द — जे मिलिकऽ एकटा त्रि-आयामी काव्यिक तर्क प्रस्तुत करैत अछि: अस्तित्वक चेतावनी, अस्तित्वक अदृश्यता, आ अस्तित्वक भोलापन आ विडम्बना। १. काव्य-रूप आ संरचना अखनो बहुत किछु होबाक बाकी अछि एहि कवितामे दू टा प्रतिध्वनि-पंक्ति (आवर्ती पंक्ति) बारम्बार आबैत अछि — "तैयो हमरा लगैत अछि नै जानि किएक / जे मात्र कोना पर / किछु लटकि-झूलि कऽ रहल अछि" — कविताक आरम्भमे आ मध्यमे। ई पुनरावृत्ति एकटा अनिश्चितताक स्थायी भाव सृजित करैत अछि — जेना कोनो बात अधूरी हो, जेना कोनो विस्फोट होएबाक बाकी हो। संरचना विरोधाभासी युग्मसभपर आधारित अछि: "घण्टीक आवाज" बनाम "ढोलकक विस्फोट", "लकड़ी-पातक सङ्ग्रह" बनाम "घरक विध्वंस", "पाञ्चजन्य" बनाम "सब सँ छोट प्रतिक्रिया"। ई युग्म दलित-अस्मिताक द्विध्रुवीय तनाव — अदृश्यता आ विस्फोट — दर्शाबैत अछि। पता एहि कवितामे संरचना विखण्डित आत्म-चित्रणक अछि। "हम अखनहुँ छी..." — ई पंक्ति तीन बेर आबैत अछि, तीन भिन्न रूपमे: पहिल — वृद्धा स्त्री (जे विवाह-बरातमे दीप ढोइत अछि)। दोसर — रोगी बूढ़ (जे मन्दिर-आगाँ भिक्षा माँगैत अछि)। तेसर — सुतल बच्चा (जे ठण्डमे चबूतरापर पड़ल अछि)। ई तीनू दलित-अस्तित्वक तीन पीढ़ी थिक — वृद्धा, प्रौढ़, शिशु — सब एकहि अदृश्यतामे जीबैत। "तैयो अहाँकेँ पता चाही! / अजब गप! " — ई व्यंग्यात्मक आश्चर्य (कवि स्वयं अचम्भित छथि जे हुनकर पताक माँग कएल जाइत अछि, जखन कि हुनकर अस्तित्व त सब ठाम अछि) सम्पूर्ण कविताक भावनात्मक केन्द्र थिक। सदानन्द ई कविताक संरचना नाटकीय एकालाप थिक — एकटा वास्तविक व्यक्ति, सदानन्द, जे किसान-मेलामे पुरस्कार लेबा आएल छल, समुद्र देखैत अछि। ई सरल-यथार्थवादी संरचना पूर्ववर्ती दूनू कवितासँ भिन्न अछि। मुदा एहि सरलताक भीतर एकटा गहिर राजनीतिक प्रश्न छुपल अछि: "हमर इलाकामे अकाल किएक नै पड़त? / जखन सब पानि समुद्र पर बन्धक राखल अछि। " २. "पाञ्चजन्य" आ "बज्र": पौराणिक रूपकक दलित-प्रयोग "हम जानैत छी जे एतय कोनो आवाज / 'पाञ्चजन्य' सँ कम नै अछि। / सब सँ छोट प्रतिक्रिया / बज्रक समान गर्जन करैत अछि। " "पाञ्चजन्य" — कृष्णक शंख — जे महाभारत-युद्धक आरम्भक संकेत थिक। एहि रूपकमे दलित-आवाज कृष्णक शंखसँ तुलित अछि। भीमन्नाक पौराणिक-विरोधी पाठ (जाहिमे ओ महाभारतक पात्रसभकेँ दलित-दृष्टिसँ पुनर्पाठ करैत छलाह) क परम्परामे सुनानी एतय भिन्न काज करैत छथि: ओ पौराणिक प्रतीककेँ विरोध नहि करैत, उधार लैत छथि — आ कहैत छथि जे दलित-आवाज ओहि पवित्र ध्वनिसँ कम नहि। ई एकटा पुनर्दावाक रणनीति थिक। भीमन्ना कहैत छलाह: पुराणक इतिहास गलत लिखल गेल। सुनानी कहैत छथि: हमर आवाज ओहि पुराणक सर्वोच्च प्रतीकसँ समतुल्य अछि। ३. बूँद, बीउ, आ गर्भवती स्त्री: आशाक त्रि-रूपक अखनो बहुत किछु होबाक बाकी अछि क अन्तिम खण्डमे तीन आशा-बिम्ब एकसाथ आबैत अछि: "एतय आकाशमे एहने एकटा बूँद अछि / जे अस्पष्ट होइतो चमकैत छैक / आ इन्द्रधनुषक एकटा मीठ सपना देखि कऽ बेर-बेर / प्रण लेने अछि विशाल आकाशकेँ रङ्ग देबाक। " "एतय एकटा बीउ प्रतिज्ञा लेने अछि अङ्कुरित होबाक / सब किछु हरियर करबाक इच्छा सङ्गे। " "आ एतय दुःखमे / एकटा परित्यक्ता गर्भवती स्त्री / शान्त क्षणक खोजीमे अछि — / एहन बच्चा जन्म देबा लेल / जे सात गोटे योद्धाक सामना कऽ कऽ ओकरा रोकि सकय। " ई तीनू बिम्ब क्रमशः बढ़ैत शक्तिक (क्रमवर्धमान शक्ति) शृंखला थिक: बूँद → बीउ → योद्धाक माँ। बूँद — सर्वाधिक क्षुद्र, अस्पष्ट। मुदा ओ इन्द्रधनुषक सपना राखैत अछि — क्षुद्रतामे विशालताक आकाङ्क्षा। बीउ — बूँदसँ बड़। ओ अंकुरित होएबाक प्रतिज्ञा करैत अछि — निष्क्रिय इच्छा नहि, सक्रिय संकल्प। गर्भवती स्त्री — सर्वाधिक शक्तिशाली। ओ "परित्यक्ता" थिक — समाजद्वारा छोड़ल। मुदा ओ "सात योद्धाक सामना करनिहार" बच्चा जन्म देएबाक प्रतीक्षामे अछि। एहि परित्यक्ता गर्भवती स्त्री क बिम्बमे तेलुगु कवयित्रीसभक स्वर प्रतिध्वनित होइत अछि — सुभद्राक "अव्वा", स्वरूपरानीक "माटि-भेल हाथ"। मुदा सुनानी एहि स्त्रीकेँ भविष्यक क्रान्तिक जननी बनाबैत छथि। ४. पता कविता: अदृश्यता आ सर्वव्यापकताक विरोधाभास पता कविताक केन्द्रीय विरोधाभास थिक: दलित-अस्तित्व सब ठाम उपस्थित अछि — मुदा अदृश्य अछि। "शुरू सँ अन्त धरि / हमर उपस्थिति / चिउँटीक टिमटिमाइत लाइन सन फैलल अछि / आ झाँझक ठनकार सन गूँजैत छैक। " "चिउँटीक लाइन" — सूक्ष्म, अनन्त, श्रमशील — मुदा किओ ध्यान नहि दैत। "झाँझक ठनकार" — ध्वनि उपस्थित अछि, किओ सुनैत नहि। "हमर पताक लेल / अहाँकेँ आब पार्सल पठेबाक जरूरत नै / जेकर ठिकाना 'केयर अफ' सूर्य वा चन्द्रमा हो। " ई पंक्ति अत्यन्त व्यंग्यात्मक अछि। समाज दलितकेँ खोजय चाहैत अछि — मुदा गलत ठामपर। सूर्य-चन्द्रमा — अर्थात् अमूर्त, दार्शनिक, आध्यात्मिक स्थान — मे खोजैत अछि। जखन कि दलित "ओही अन्हार गलीमे" अछि — ठोस, भौतिक, दैनिक स्थानमे। एहिमे गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाकक "निम्नवर्गक अदृश्यता" (जाहिमे ओ तर्क करैत छथि जे बुद्धिजीवी-वर्ग दलितकेँ खोजय चाहैत अछि मुदा ओहि स्थानमे जतय ओ नहि अछि) सिद्धांत काव्यिक रूप धारण करैत अछि। "जँ अहाँ सकैत छी / तऽ कृपया हमरा पठाउ — / धूप भरल सुन्दर सपना सब। " ई उलटा माँग थिक। दलित ठिकाना नहि दैत — सपना माँगैत अछि। ई व्यंग्य थिक: जे समाज दलितक पताक माँग करैत अछि — ओ स्वयं दलितकेँ सपना नहि दैत। ५. माछ-रूपक: विलुप्तिक कगार "हम तैरि रहल छी एकटा छोट सपना-सजल माछ सन / एकटा विलुप्त होइत पोखरिक मुट्ठी भरि पानिमे। " ई रूपक पर्यावरणीय आ सामाजिक विनाशकेँ एकहि बिम्बमे जोड़ैत अछि। पोखरि विलुप्त भऽ रहल अछि — ई भारतक कृषि-जल-संकटक सन्दर्भ थिक। माछ — जे दलित-जातिसभक पारम्परिक जीविका थिक — "मुट्ठी भरि पानिमे" जीबैत अछि। "सपना-सजल माछ" — ई बिम्ब अत्यन्त सुन्दर आ दुखद दूनू थिक। माछ सपना राखैत अछि — मुदा पोखरि सुकाइत जा रहल अछि। उमेश सोलंकीक लोक, जमि जाय मे "जमाव" परिवर्तनक माँग छल। सुनानीक "विलुप्त होइत पोखरि" — ई परिवर्तनक अनुपस्थितिक परिणाम दर्शाबैत अछि। "की हम समुद्रमे कूदि पड़ी ओकरा अमृत देबा लेल / वा गहीर खनि कऽ धक्का दी बासुकी नागक कोमल मुँड़केँ / जे संसारकेँ सन्तुलित रखने अछि? " ई पौराणिक दुविधा थिक। बासुकी नाग — जे समुद्र-मन्थनमे रस्सी बनल छल — संसारकेँ सन्तुलित रखने अछि। दलित-व्यक्ति पुछैत अछि: की हम व्यवस्थाकेँ अमृत दी (अर्थात् योगदान करी) वा व्यवस्थाकेँ हिला दी (बासुकीकेँ धक्का दी)? ई क्रान्ति बनाम सहयोगक दार्शनिक प्रश्न थिक — जे समस्त दलित राजनीतिक-दार्शनिक परम्पराक मूल प्रश्न थिक। ६. सदानन्द: लघुकथा-काव्य आ किसान-दृष्टि सदानन्द कविता एहि शृंखलाक सर्वथा भिन्न स्वर थिक। पूर्ववर्ती दूनू कवितामे काव्यिक "हम" — एकटा अमूर्त, सामूहिक दलित-चेतना — वक्ता छल। एतय एकटा ठोस व्यक्ति — नाम, गाम, कारण सहित — उपस्थित अछि। "हमर नाम सदानन्द अछि। / हमर गामक नाम नागाँव अछि। / हम किसान मेला लेल भुवनेश्वर आयल छी / सब सँ पैघ भिण्डी लेल राज्यपालक पुरस्कार लेबा लेल। " ई आत्म-परिचय अत्यन्त सरल आ अत्यन्त गहिर थिक। साहित्यमे दलित-पात्र प्रायः अनामक, सामूहिक होइत अछि। सदानन्दकेँ नाम, गाम, आ उपलब्धि दैब — ई व्यक्तित्वक राजनीति थिक। "सब सँ पैघ भिण्डी" — ई विवरण हास्यास्पद प्रतीत होइत अछि। मुदा एहिमे गहिर व्यंग्य अछि: किसान जे वर्षभरि खेतमे काज करैत अछि, ओकर सर्वोच्च सम्मान "सब सँ पैघ भिण्डी" थिक। ई कृषि-श्रमक अवमूल्यन आ किसानक सरलताक एकहि साथ चित्रण थिक। समुद्र-दृश्यक विडम्बना "समुद्र देखि कऽ अहाँ कहलहुँ / जे हम नै बुझलहुँ / बल्कि हम गलत बुझलहुँ — / लहर सभकेँ" सदानन्द पहिल बेर समुद्र देखैत अछि। शहरी बुद्धिजीवी (जे "अहाँ" छथि) कहैत छथि — तूँ नहि बुझलही। सदानन्द स्वीकार करैत अछि: "शायद / हम गलत बुझलहुँ। " मुदा कविताक अन्तमे ई "गलत बुझनाइ" एकटा सत्य-उद्घाटन बनि जाइत अछि: "हमर इलाकामे अकाल किएक नै पड़त? / जखन सब पानि समुद्र पर बन्धक राखल अछि। " सदानन्द समुद्र "गलत" बुझलनि — मुदा हुनकर "गलत बुझनाइ"मे एकटा राजनीतिक सत्य अछि जे बुद्धिजीवी देखैत नहि। समुद्र — जे भव्य, विशाल, आ प्रशंसित अछि — वास्तवमे किसानक पानिकेँ बन्धकमे राखनिहार थिक। ई ज्ञान-मीमांसीय उलटपालट (जाहिमे "अशिक्षित" किसानक दृष्टि "शिक्षित" बुद्धिजीवीक दृष्टिसँ अधिक तीक्ष्ण प्रमाणित होइत अछि) अत्यन्त महत्त्वपूर्ण थिक। गणेश देवीक "भाषाक पश्चात् भूलनाइ" (जाहिमे ओ तर्क करैत छथि जे मौखिक-लोक-परम्पराक ज्ञान पुस्तकीय ज्ञानसँ अनेक बेर श्रेष्ठ होइत अछि) एतय काव्यिक प्रमाण पाबैत अछि। ७. "बगुला सँ कटि जाएब": खेलाड़ीपन आ विघ्न "मुदा खेलाड़ीपनमे मग्न रहैत / सब सँ अशुभ क्षण पर / हम बगुला सँ कटि जाइत छी। " "बगुला" — एकटा शिकारी पक्षी — जे माछ खाइत अछि। माछ-रूपक (जाहिमे दलित-अस्तित्व माछ थिक) क सन्दर्भमे — "बगुला सँ कटि जाएब" = व्यवस्थाद्वारा विनष्ट होएब। "खेलाड़ीपनमे मग्न" — ई विडम्बना थिक: ठीक जहिया दलित-व्यक्ति स्वयंकेँ मुक्त, आनन्दित अनुभव करैत अछि — तहिया आघात आबैत अछि। एहि बिम्बमे दलित-जीवनक अनिश्चितताक काव्यिक सत्य अछि: सुख सदैव अस्थायी थिक, संकट सदैव अकस्मात् आबैत अछि। ८. तुलनात्मक विश्लेषण: उड़िया बनाम तेलुगु-गुजराती रहस्यवाद बनाम यथार्थवाद: तेलुगु दलित कविता (विशेषकरि सुभद्रा, शशिनिर्मला) कड़वा यथार्थवादी थिक — ठोस, इन्द्रिय-ग्राह्य। सुनानीक कविता रहस्यवादी-प्राकृतिक बिम्बसँ भरल — बूँद, बीउ, माछ, इन्द्रधनुष। ई उड़िया काव्य-परम्परा क प्रभाव थिक जाहिमे प्रकृति-बिम्बक दीर्घ परम्परा अछि। आशावाद बनाम निराशावाद: गुजराती कवितामे (विशेषकरि सोलंकीक लोक, जमि जाय) क्रान्तिकारी उद्बोधन अछि। सुनानीक कवितामे आशा आ संशय दूनू एकसाथ — बूँद इन्द्रधनुष देखैत अछि मुदा पोखरि सुकाइत अछि। व्यक्तित्व बनाम सामूहिकता: सदानन्द मे एकटा ठोस व्यक्ति उपस्थित अछि — जे तेलुगु-गुजराती कवितामे प्रायः अनामक "हम" थिक। ई उड़िया कवितामे व्यक्तित्व-रक्षाक काव्यिक प्रतिबद्धता थिक। बुद्धिजीवी-किसान विवाद: सदानन्द मे जे "अहाँ" (शहरी बुद्धिजीवी) आ "हम" (किसान) क संवाद अछि — ई तेलुगु-गुजराती कवितामे अनुपस्थित थिक। सुनानी एहि अन्तर्वर्गीय दलित-विवादकेँ काव्यमे लबैत छथि। ९. अनुवाद-शृंखलाक विशेष टिप्पणी उड़िया → अंग्रेजी अनुवाद सैलेन राउत्रेद्वारा — एहिमे उड़िया काव्य-परम्पराक किछु विशिष्टता सुरक्षित रखल गेल अछि। "पाञ्चजन्य", "बासुकी नाग" — ई उड़िया-हिन्दू पौराणिक सन्दर्भ अंग्रेजीमे अनूदित नहि, मात्र लिप्यन्तरित कएल गेल — जे उचित निर्णय थिक। मैथिलीमे गजेन्द्र ठाकुरक अनुवादमे "चिउँटीक टिमटिमाइत लाइन", "झाँझक ठनकार" — ई मैथिली-सुलभ बिम्ब मूल उड़ियाक संगीतात्मकता कें आंशिक रूपसँ सुरक्षित रखैत अछि। निष्कर्ष बासुदेव सुनानीक ई तीन काव्य-खण्ड — अखनो बहुत किछु होबाक बाकी अछि, पता, सदानन्द — उड़िया दलित काव्यक एकटा विशिष्ट दार्शनिक-काव्यिक परम्परा प्रस्तुत करैत अछि। पहिल खण्डमे — चेतावनी: किछु होएबाक बाकी अछि, विस्फोट आबि रहल अछि। दोसर खण्डमे — साक्ष्य: हम सब ठाम छी मुदा अदृश्य छी, हमर पता "अन्हार गली" मे अछि। तेसर खण्डमे — विडम्बना: सदानन्द "गलत बुझलनि" — मुदा हुनकर गलत बुझनाइमे सत्य अछि जे बुद्धिजीवी देखि नहि सकैत। तीनू मिलिकऽ एकटा सम्पूर्ण दलित-अस्तित्व-दर्शन प्रस्तुत करैत अछि: हम उपस्थित छी (साक्ष्य), हम बदलाव आनब (चेतावनी), हम अपन दृष्टिसँ सत्य देखैत छी (विडम्बना-खण्डन)। अन्तिम पंक्ति — "कारण हम अखनहुँ रहैत छी ओही अन्हार गलीमे / जतय हम सदिखन रहलहुँ। / सदिखन। " — एहि सम्पूर्ण संग्रहक, आ सम्भवतः समस्त भारतीय दलित काव्यक, सर्वाधिक शान्त आ सर्वाधिक शक्तिशाली अन्तिम शब्द थिक। "सदिखन" — एहि एकटा शब्दमे इतिहास, वर्तमान, आ अदृश्यताक सम्पूर्ण भार अछि। दलित लघुकथा समीक्षा: दू टा तेलुगु रचना कोलकलुरी इनोचक कौआ आ विनोदिनीक कारी स्याही प्रारम्भिक टिप्पणी एहि समीक्षा-शृंखलामे अखन धरि हम काव्य क अध्ययन कएलहुँ। आब दू टा लघुकथा — कौआ आ कारी स्याही — प्रस्तुत अछि। ई दूनू रचना दलित साहित्यक गद्य-परम्परा क प्रतिनिधित्व करैत अछि, आ काव्यसँ भिन्न एकटा कथा-माध्यमक विशिष्ट शक्ति दर्शाबैत अछि। दूनू कथाक बीच एकटा काव्यात्मक विरोधाभास अछि: कौआ बाहरी यथार्थ — समुदाय, अनुष्ठान, शक्ति-सम्बन्ध — क कथा थिक; कारी स्याही आन्तरिक यथार्थ — व्यक्तिगत सम्बन्ध, बाल-मनोविज्ञान, आ जातिक क्षण-भर-मे-प्रकट-होएबाक — क कथा थिक। दूनू मिलिकऽ दलित-अनुभवक बाह्य आ आन्तरिक दूनू आयाम उजागर करैत अछि। १. कौआ: कथा-संरचना आ शिल्प आख्यान-दृष्टि कथा तृतीय-पुरुष सर्वज्ञ (सर्वज्ञ कथावाचक) दृष्टिकोणसँ लिखल गेल अछि — मुदा ई सर्वज्ञता चयनात्मक अछि। कथाकार अव्वाक मनक हालत जनैत छथि, बण्डोडुक इतिहास जनैत छथि, कौआसभक व्यवहार जनैत छथि — मुदा कहियो निर्णय नहि दैत। ई तटस्थ-आख्यान (तटस्थ आख्यान) एकटा विशिष्ट कथा-प्रभाव सृजित करैत अछि: पाठक स्वयं निर्णय लैत अछि। कालक्रम आ सूचना कथाक संरचना घटनाक बीचसँ आरम्भ थिक — कौआसभ पहिनेसँ काँव-काँव कऽ रहल अछि, बण्डोडु पहिनेसँ कार्यरत अछि। प्रसंग-सूचना (पृष्ठकथा) — बण्डोडुक जाति, हुनकर आचार-विधि, परिवारक दुर्दशा — क्रमशः, कथाक बीचमे, अनायास रूपसँ प्रकट होइत अछि। ई विलम्बित-सूचना (विलम्बित उद्घाटन) तकनीक पाठककेँ पहिने कथाक सतहपर खेँचैत अछि — कौआक हलचल, बण्डोडुक उपस्थिति — आ तखन धीरे-धीरे सामाजिक जटिलता उजागर होइत अछि। कथाक त्रि-स्तरीय संरचना पहिल स्तर — घटना: कौआसभ काँव-काँव करैत अछि, झोपड़ी घेराएल अछि, बण्डोडु भोजन माँगैत अछि। दोसर स्तर — सामाजिक व्याख्या: बण्डोडुक जाति, हुनकर विधि, कौआ-बण्डोडु सम्बन्ध, मादिग समुदायक प्रतिक्रिया। तेसर स्तर — दार्शनिक प्रश्न: मुक्ति आ श्राप कि एकहि वस्तु? कौआ आ बण्डोडु शत्रु वा परिवार? २. कौआ: बण्डोडु — एकटा अद्वितीय साहित्यिक चरित्र बण्डोडु तेलुगु दलित साहित्यमे — सम्भवतः समस्त भारतीय साहित्यमे — एकटा अद्वितीय चरित्र थिक। ओ दलितमे सबसँ नीचाँ — दसम उप-जाति, जे मात्र मादिगसभसँ भिक्षा माँगिकऽ जीबैत अछि। चरित्रक विरोधाभास बण्डोडु शक्तिहीन थिक — भिखारी, जातिक सबसँ निम्न। मुदा ओ शक्तिशाली सेहो थिक — "हठी राजासँ शक्तिशाली", कौआसभकेँ नियन्त्रित करैत, पूरा समुदायकेँ बन्धक बनाबैत। ई विरोधाभासी शक्ति कतयसँ आबैत अछि? कथा कहैत अछि: हुनकर एकमात्र विशेषज्ञता — कौआ मारब — ओहि समाजमे एकटा अद्वितीय सत्ता दैत अछि जतय कौआकेँ कोनो ध्वंश नहि करैत। एहि चरित्र-निर्माणमे मिशेल फूको क सत्ता-सिद्धांत (जाहिमे ओ तर्क करैत छथि जे सत्ता सदैव ऊपरसँ नहि आबैत, ओ विशेषज्ञताक स्थानीय बिन्दुसभमे निहित होइत अछि) साकार होइत अछि। बण्डोडुक सत्ता हुनकर जातिसँ नहि — हुनकर अद्वितीय ज्ञानसँ आबैत अछि। बण्डोडु आ "घृणित" क राजनीति "बण्डोडु जका घृणित भिखारी दुनियामे कतहियो नै देखल जा सकै छै। " — कथाकार एहि वाक्यमे समाजक दृष्टि प्रस्तुत करैत छथि। मुदा ओही समाज बण्डोडुसँ डरल सेहो अछि। जूलिया क्रिस्तेवा क घृणित-सिद्धांत एतय अत्यन्त प्रासंगिक अछि: बण्डोडु समाजक "घृणित-बहिष्कृत" (घृणित-बहिष्कृत) छथि — मुदा ओही घृणाक कारण ओ अपरिहार्य सेहो छथि। जे "घृणित" मानल जाइत अछि — कौआ-मांस, उल्टी, दुर्गन्ध — ओहि सबपर बण्डोडुक एकाधिकार हुनका एकटा विचित्र सत्ता दैत अछि। ३. कौआ: कौआ-रूपकक बहुस्तरीयता कौआ एहि कथामे मात्र एकटा पक्षी नहि — ओ बहुस्तरीय रूपक थिक। कौआ बनाम समाज भारतीय लोक-परम्परामे कौआ पूर्वजक आत्मा, अशुभ-सूचक, सामूहिक स्मृतिक प्रतीक थिक। एहि कथामे कौआसभ एकटा सामूहिक न्याय-व्यवस्था स्थापित करैत अछि — जे मानव-समाजक न्याय-व्यवस्थासँ अधिक प्रत्यक्ष आ तत्काल अछि। जखन बण्डोडुकेँ भोजन नहि मिलैत — कौआ प्रतिशोध लैत अछि। ई स्वतःस्फूर्त न्याय थिक — कोनो न्यायालय नहि, कोनो कानून नहि। कौआ-बण्डोडु सम्बन्ध कथाक सर्वाधिक दार्शनिक प्रश्न: "का कौआ आ बण्डोडु दुश्मन अछि? वा, ओ एक-दोसराक परिवार (अपन) अछि? " ई प्रश्नक कोनो सरल उत्तर नहि। बण्डोडु कौआ मारैत अछि — मुदा कौआ बण्डोडुक समर्थनमे काँव-काँव करैत अछि। दूनू एकहि सामाजिक हाशिया पर छथि — दूनू समाजद्वारा अनुपयोगी, दूनू एकहि अदृश्यतामे जीबैत। एहि हाशिया-एकजुटता (हाशियाक एकजुटता) मे कथाक मूल तर्क निहित अछि। ४. कौआ: "मुक्ति एक श्राप मात्र अछि" — केन्द्रीय विरोधाभास कथाक दार्शनिक चरम-बिन्दु थिक: "बण्डोडु फिनु कहियो ओइ घरमे भीख माँगबा लेल नै आबत। ई एक मुक्ति (सैल्वेशन) अछि। मुक्ति एक श्राप (कर्स) मात्र अछि। तखनसँ, ई एक एहन घर होत जतऽ कौआ नै बैसै। एक एहन घर जतऽ बण्डोडु भीख नै माँगै। ई अपमान (इन्सल्ट)क बात अछि। एक बहिष्कार (एक्सकम्युनिकेशन)! " एहि विरोधाभासमे दलित-सामाजिक-यथार्थक गहनतम अन्तर्दृष्टि निहित अछि: बण्डोडुक नहि आएब = मुक्ति (हुनकर भिक्षा-बोझसँ मुक्ति)। बण्डोडुक नहि आएब = श्राप (ओहि घरक सामाजिक-अनुष्ठानिक मृत्यु)। कौआक नहि बैसब = मुक्ति (हमलासँ मुक्ति)। कौआक नहि बैसब = श्राप (ओहि घर अपमानित, बहिष्कृत)। ई मुक्ति=श्राप समीकरण दलित-सामाजिक-व्यवस्थाक एकटा क्रूर सत्य उजागर करैत अछि: एहि व्यवस्थामे मुक्ति आ बन्धन एकहि वस्तु थिक। जे बाहर जाइत अछि, ओ बहिष्कृत होइत अछि। जे भीतर रहैत अछि, ओ शोषित होइत अछि। कोनो तेसर विकल्प नहि। विजयश्रीक अलिसम्माक स्राप मे "स्राप मानवतामे परिणत करबाक" थिक। इनोचक कथामे "मुक्ति स्वयं श्राप थिक। " दूनू मिलिकऽ दलित-अनुभवक विरोधाभासी यथार्थ सम्पूर्णतासँ व्यक्त करैत अछि। ५. कौआ: गरीबी आ नैतिक जटिलता कथाक एकटा महत्त्वपूर्ण आयाम: अव्वाक परिवार पीड़ित नहि, असहाय अछि। "हुनका लेल एकरा कोनो फरक नै पड़ै छल कि ओ बण्डोडुक विनती सुनैत छथि वा नै। ओ किछु कऽ नै सकैत छल। " ई गरीबीक नैतिक जटिलता थिक। कथा बण्डोडुकेँ पीड़ित देखाबैत अछि — मुदा अव्वाक परिवारकेँ खलनायक नहि देखाबैत अछि। दूनू व्यवस्थाक शिकार छथि — बस हुनकर शिकार-स्तर भिन्न अछि। एहि नैतिक-जटिलताक प्रस्तुति इनोचक कथा-शिल्पक सर्वोच्च उपलब्धि थिक। दलित साहित्यमे कहियो-कहियो उत्पीड़क-पीड़ित क सरल द्विभाजन प्रस्तुत होइत अछि। इनोच एहिसँ आगाँ जाकऽ बहुस्तरीय उत्पीड़न देखाबैत छथि। ६. कारी स्याही: कथा-संरचना आ शिल्प प्रथम-पुरुष आख्यान कारी स्याही प्रथम-पुरुष मे लिखल गेल अछि — "हम" वक्ता एकटा दलित-ईसाई स्त्री छथि। ई आख्यान-दृष्टि कौआ सँ मौलिक रूपसँ भिन्न अछि। एतय अनुभवक आन्तरिकता — घटना जेना अनुभव होइत तेना — कथाक केन्द्र थिक। विलम्बित-प्रकाशन कथाक संरचनागत आश्चर्य थिक: पूरा कथा एकटा निर्दोष, आनन्दपूर्ण बच्ची-आगन्तुकक मीठ प्रसंगक रूपमे चलैत अछि — आ अचानक, अन्तिम एक-तिहाईमे, जाति-प्रश्न आबैत अछि आ सम्पूर्ण आनन्दकेँ एकहि क्षणमे विनष्ट कऽ दैत अछि। ई विलम्बित-प्रकाशन (विलम्बित-प्रकटन) तकनीक अत्यन्त प्रभावशाली थिक। यदि कथा आरम्भसँे जाति-संघर्षक होइत — पाठक मानसिक रूपसँ तैयार रहित। जाहिमे सब किछु सुन्दर आ निर्दोष लागैत हो, तहिमे जातिक अकस्मात् प्रकटन पाठककेँ उसी यातनासँ आहत करैत अछि जे वक्ताकेँ। भाषाक दू स्तर कथामे दू भाषाई स्तर एकसाथ अछि: पहिल — काव्यात्मक-रूपकात्मक भाषा (जे बच्चीक वर्णनमे प्रयुक्त): "तितलीक पंखसँ बुनल फ्रॉक", "मुस्कानक काफिला", "चाँदनीमे डुबल पंखुड़ी", "इन्द्रधनुषक चमक"। दोसर — नग्न-यथार्थवादी भाषा (जे जाति-प्रश्नक पश्चात्): "का अहाँ हरिजन छी? ", "हमर कोनो हरिजन दोस्त नहि। " ई भाषाई विभाजन कथाक थीमेटिक विभाजनकेँ प्रतिबिम्बित करैत अछि: जातिसँ पहिले — सौन्दर्य, निर्दोषता, मानवीय सम्बन्ध। जातिक प्रकटन — भाषाक सौन्दर्य विनष्ट। ७. कारी स्याही: श्रिया — एकटा जटिल बाल-चरित्र श्रिया एहि कथाक सर्वाधिक जटिल साहित्यिक उपलब्धि थिक। ओ एकहि साथ: निर्दोष — पशुपर दया, डायरी लिखनाइ, वृद्धाक सहायता। जिज्ञासु — सब किछु जानय चाहब, प्रश्न पुछब। प्रेमिल — वक्तासँ स्वाभाविक स्नेह। जाति-संस्कारित — माता-पिताक जाति-पूर्वग्रहक अचेतन वाहक। ई चरित्र-जटिलता जाति-समाजीकरणक (जाति-संस्कारण) सर्वाधिक सूक्ष्म चित्रण थिक। श्रिया जानबूझिकऽ जाति-भेद नहि करैत — ओ सिखाएल गेल अछि। हुनकर माता-पिताक "कोनो हरिजन दोस्त नहि" — ई श्रियामे स्वाभाविक बनि गेल अछि। पियाज़े (पियाजे) क बाल-विकास सिद्धांत (जाहिमे ओ तर्क करैत छथि जे बच्चा सामाजिक नियम अनुकरणसँ सीखैत अछि, तर्कसँ नहि) एतय साकार होइत अछि। श्रिया अपन माता-पिताक जाति-व्यवहारक अनुकरण करैत अछि — बिना बुझने कि एहिसँ कोनो नैतिक समस्या अछि। एहि चरित्रक माध्यमसँ विनोदिनी एकटा कठिन प्रश्न पुछैत छथि: जाति-व्यवस्थाक पुनर्उत्पादन (पुनरुत्पादन) कतय होइत अछि? माता-पिताक स्पष्ट शिक्षा मे — मुदा ओहुसँ अधिक, हुनकर मौन व्यवहारमे, जे बच्चा स्वाभाविक बनि लैत अछि। ८. कारी स्याही: "कारी स्याही" रूपक शीर्षक-रूपक — कारी स्याही — कथाक कथा-भीतर परिभाषित होइत अछि: "हम जे बेसी पसिन्न करै छी, ओकरा नीला स्याहीमे लिखै छी; हम जे नापसिन्न करै छी, ओकरा कारी स्याहीमे लिखै छी। " श्रिया नीला स्याही = प्रेम, पसिन्न। श्रिया कारी स्याही = घृणा, नापसिन्न। कथाक अन्तमे — वक्ता दलित-ईसाई "कारी स्याही" मे लिखल जाएत। ई रूपकक विस्फोट थिक। मुदा एहि रूपकमे एकटा अतिरिक्त परत अछि: "कारी" (काली) — दलित-देहक वर्ण, जकरा समाज हमेशासँ नकारात्मक मानैत अछि। श्रियाक कारी स्याही = "काला" रंगक नकारात्मकता = वर्ण-जाति-संगम (रंग-जाति सम्बन्ध)। फ्रान्ट्ज फानों कारी चमड़ी, उज्जर मुखौटा (जाहिमे ओ तर्क करैत छथि जे उपनिवेशित-काला व्यक्ति अपन कालेपनकेँ उपनिवेशक दृष्टिसँ नकारात्मक देखय लगैत अछि) क भारतीय-जातीय संस्करण एतय प्रकट होइत अछि। ९. कारी स्याही: "महिमा" — अनुपस्थित चरित्रक उपस्थिति कथामे एकटा अनुपस्थित चरित्र — महिमा — अत्यन्त महत्त्वपूर्ण थिक। "एक बेर हम अपन दोस्त महिमाक घरमे हुनकर माए द्वारा परोसल नाश्ता खेलियै। से हम कारी स्याहीमे लिखलियै। " महिमा "हरिजन" थिक — श्रिया स्वयं कहैत अछि। हुनकर घरमे खाएब "कारी स्याही" योग्य थिक। मुदा श्रिया महिमासँ दोस्ती करैत अछि — मात्र हुनकर घरमे खाएब वर्जित अछि। ई जाति-व्यवहारक सूक्ष्म विभाजन दर्शाबैत अछि: व्यक्तिगत सम्पर्क सम्भव, मुदा भोजन-साझेदारी — जे जातिक सर्वाधिक गहिर वर्जना थिक — असम्भव। बी. आर. आम्बेडकर जाति-विच्छेद मे कहने छलाह जे जाति-व्यवस्थाक सर्वाधिक दृढ़ नियम रोटी-बेटी (खाएब-विवाह) क नियम थिक। श्रियाक व्यवहार एहि "रोटी" नियमकेँ बाल-मस्तिष्कमे दर्शाबैत अछि। १०. कारी स्याही: अन्तिम बिम्ब — तितली आ कैटरपिलर कथाक अन्तिम पंक्ति: "पूरा कमरामे सूखल तितली सभ हमरापर रेंगैत कैटरपिलरमे बदलि गेल। " ई रूपकात्मक परिवर्तन सम्पूर्ण कथाक काव्यिक सार थिक। कथाक आरम्भमे श्रिया तितली छल — सुन्दर, स्वतन्त्र, उड़नशील। कथाक अन्तमे ओ कैटरपिलर (सुगा) बनि जाइत अछि — रेंगनिहार, धरतीसँ लागल, कुरूप। "सूखल तितली" — मृत सौन्दर्यक प्रतीक। जे जीवन्त लागैत छल — ओ वास्तवमे मृत छल। ई बिम्बमे सम्पूर्ण कथाक विचार-सार अछि: बाल-निर्दोषता जे तितली लागैत अछि — ओ वास्तवमे जाति-संस्कारक कैटरपिलर थिक। सौन्दर्य जे मुस्कान लागैत छल — ओ जाति-घृणाक आवरण छल। उड़नाइ जे स्वतन्त्रता लागैत छल — ओ विशेषाधिकार छल। वर्जीनिया वुल्फ क चेतना-प्रवाह तकनीकक उपयोग — जाहिमे वक्ताक आन्तरिक अनुभव बाह्य घटनासँ मिलिकऽ एकाकार होइत अछि — एतय विनोदिनी भारतीय-दलित सन्दर्भमे अत्यन्त प्रभावशाली रूपसँ प्रयुक्त करैत छथि। ११. दूनू कथाक तुलना: दू काव्य-दृष्टि विषय-वस्तुक समानता दूनू कथामे जाति-व्यवस्था केन्द्रमे थिक। दूनूमे अनुष्ठान आ आचार (अनुष्ठान आ व्यवहार) — भोजन देएब, दोस्ती करब — जाति-रेखाकेँ दर्शाबैत अछि। दृष्टिकोणक भेद कौआ — समुदाय-स्तर पर जाति-व्यवस्था: एकटा पूरा समुदायक अनुष्ठानिक जीवन। कारी स्याही — व्यक्तिगत-स्तर पर जाति-व्यवस्था: एकटा सम्बन्धमे जातिक अकस्मात् प्रकटन। समय-बोधक भेद कौआ — सदियों पुरान व्यवस्था। "बण्डोडु हर राति एक विशेष परिवारमे भोजन माँगै लेल आबै छथि। " — ई चिरकालीन अनुष्ठान थिक। कारी स्याही — एक दिनक घटना। मुदा ओहि एक दिनमे सदियों पुरान व्यवस्था प्रकट होइत अछि। लिंग-आयाम कौआ — वक्ता पुरुष-लेखक (इनोच), केन्द्रीय चरित्र पुरुष (बण्डोडु), मुदा स्त्री (अव्वा) कथाक नैतिक केन्द्र। कारी स्याही — स्त्री-लेखक (विनोदिनी), स्त्री-वक्ता, स्त्री-बालिका (श्रिया) — सम्पूर्णतः स्त्री-केन्द्रित। १२. काव्य बनाम कथा: माध्यमक विशिष्टता एहि दू लघुकथाक समीक्षासँ एकटा महत्त्वपूर्ण साहित्यिक प्रश्न उठैत अछि: दलित-अनुभवक अभिव्यक्तिक लेल काव्य बनाम गद्य — कोन माध्यम अधिक शक्तिशाली? काव्यक शक्ति: तीव्रता, घनत्व, संकेत। भीमन्नाक जरैत खोपड़ी सभ, गौरीक मेहदी लागल हाथ — ई कवितासभ एकटा क्षणकेँ अनन्त बनाबैत अछि। गद्यक शक्ति: विस्तार, जटिलता, बाल-मनोविज्ञान, सामाजिक-अनुष्ठानक विवरण। कारी स्याही मे श्रियाक क्रमिक परिवर्तन — मुस्कानसँ घृणा धरि — केवल गद्यमे इतेक प्रभावशाली रूपसँ सम्भव छल। कौआ मे बण्डोडुक जटिल सामाजिक स्थिति — दलितमे दलित, शक्तिहीनमे शक्तिशाली — काव्यमे एतेक विस्तारसँ नहि आबि सकैत छल। दूनू माध्यम परस्पर-पूरक थिक। दलित साहित्यक सम्पूर्णता काव्य आ गद्य — दूनूमे अछि। निष्कर्ष कोलकलुरी इनोचक कौआ आ विनोदिनीक कारी स्याही — दूनू मिलिकऽ तेलुगु दलित गद्य-साहित्यक दू महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थिक। कौआ — बाहरी व्यवस्थाक जटिलता: मुक्ति आ श्राप एकहि, शक्तिहीनमे शक्ति, घृणित मे अपरिहार्य। एकटा समुदाय-स्तरीय दर्शन। कारी स्याही — आन्तरिक अनुभवक यातना: निर्दोषताक आवरणमे जाति-घृणा, एकटा मुस्कानमे छुपल कैटरपिलर। एकटा व्यक्तिगत-स्तरीय आघात। दूनू कथाक अन्तिम प्रश्न एकहि थिक: कौआ — "गरीबीक कारण भोजन नहि देबा लेल, एतेक प्रतिशोधक होएबाक चाही? " कारी स्याही — "दोस्त छी, आ ई सब जानब आवश्यक अछि? " दूनू प्रश्न अनुत्तरित रहैत अछि — पाठककेँ, समाजकेँ, इतिहासकेँ उत्तर देबाक लेल। आ जाधरि ई उत्तर नहि आएत, ताधरि दलित साहित्य — काव्यमे, गद्यमे, मैथिलीमे, तेलुगुमे — प्रश्न करैत रहत। साहित्यिक समीक्षा: सदा लेल मित्र (जिगिरी) पेद्दिंति अशोक कुमारक तेलुगु उपन्यास प्रारम्भिक टिप्पणी सदा लेल मित्र (मूल तेलुगु: जिगिरी) एहि समीक्षा-शृंखलामे अखन धरि अध्ययन कएल गेल समस्त रचनासँ संरचनागत रूपसँ भिन्न अछि। कविता आ लघुकथाक पश्चात् एकटा पूर्ण उपन्यासक अंश प्रस्तुत अछि — आ ई अंश उपन्यासक सम्पूर्ण भावनात्मक-दार्शनिक यात्राकेँ आवृत्त करैत अछि। एहि उपन्यासक केन्द्रमे एकटा असाधारण मैत्री थिक — एकटा मनुष्यक (ईमाम) आ एकटा भालूक (शादुल) बीच — जे दलित-हाशिया-कलन्दर समुदायक सामाजिक-राजनीतिक संकटक मेटाफर बनि जाइत अछि। एहि अर्थमे ई उपन्यास दलित-आदिवासी साहित्यक एकटा नव आयाम उद्घाटित करैत अछि: जाति नहि, जातीय-सांस्कृतिक विलुप्ति केन्द्रमे अछि। १. उपन्यासक संरचना आ तकनीक आरम्भ: घटनाक बीचसँ आरम्भ उपन्यासक आरम्भ एकटा विलम्बित-प्रकटन तकनीकसँ होइत अछि। पहिल पंक्तिमे — "सूरज उगलै। सूरज सेहो अस्त भऽ गेलै। " — एकटा ब्रह्माण्डीय उदासीनता व्यक्त होइत अछि। सूरजकेँ कोनो फरक नहि पड़ैत — ईमाम अछि वा नहि। ई अस्तित्ववादी उद्घाटन उपन्यासक मूल प्रश्नकेँ — की मनुष्यक अस्तित्वक कोनो मूल्य अछि? — पहिले पंक्तिसँे स्थापित करैत अछि। ईमाम आ शादुलक परिचय तुलनात्मक रूपसँ होइत अछि: "ईमाम, एकटा मनुष्य, जे अपन पशुक चारू कात पशु जकाँ घूमैत छल" — आ "शादुल... वास्तवमे मनुष्य नै, बल्कि एकटा पशु छल... एकटा सौम्य प्राणी बनि गेल छल। " एहि विलोम-परिचयमे उपन्यासक केन्द्रीय विरोधाभास अछि: मनुष्य पशु जकाँ, पशु मनुष्य जकाँ। एहि विरोधाभासमे कलन्दर-समुदायक मनुष्यताहरण आ शादुलक मानवीकरण एकहि साथ व्यक्त होइत अछि। काल-प्रवाह उपन्यासक कालक्रम रैखिक नहि — ई वर्तमान-भूत-भविष्यक त्रिकोणमे चलैत अछि। वर्तमानमे — ईमामक अनुपस्थिति, बिबम्मा आ चाँदक प्रतीक्षा। भूतकालमे — शादुलकेँ पकड़बाक रात्रि, बीस वर्षक संगति, मल्ला रेड्डीसँ संघर्ष। भविष्यमे — जमीनक सपना, नव जीवनक आकाङ्क्षा। ई अरैखिक आख्यान (असरल आख्यान) उपन्यासमे स्मृति आ यथार्थक बीच एकटा निरन्तर तनाव सृजित करैत अछि। २. चरित्र-विश्लेषण ईमाम: त्रासदीक नायक ईमाम एकटा क्लासिक त्रासद नायक थिक। हुनकर त्रासद दोष — जँ एकरा दोष कहल जा सकय — थिक हुनकर प्रेमक अपरिमितता। ओ शादुलसँ एतेक प्रेम करैत छथि जे व्यावहारिक यथार्थकेँ स्वीकार करैत नहि बनैत। मुदा एहि उपन्यासमे ईमामकेँ "दोष" देनाइ अनुचित होएत। हुनकर त्रासदी व्यक्तिगत कमजोरीसँ नहि — सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्थासँ उत्पन्न अछि। जमीन-अधिकार, पुलिस-उत्पीड़न, पशु-संरक्षण कानून — ई सब मिलिकऽ ईमामकेँ असम्भव चुनावक सामना करबैत अछि: अपन मित्र वा अपन परिवारक भविष्य। ईमामक आन्तरिक एकालाप — "आँखि मूँदि कऽ हमरा पर पूरा विश्वास करैत हमर पाछू-पाछू किएक चलि रहल छी शादुल? किएक नै हमरा मारि दइत छी? " — अपराधबोध आ असहायता दूनूकेँ एकहि साथ व्यक्त करैत अछि। ई आत्म-आरोप उपन्यासक सर्वाधिक मार्मिक क्षणसभमे सँ एक थिक। शादुल: मानवीय पशु शादुलक चरित्र उपन्यासक सर्वाधिक साहित्यिक उपलब्धि थिक। ओ न मात्र एकटा पशु, न मात्र एकटा रूपक — दूनूक एकत्व थिक। शादुलक भावनात्मक बुद्धिमत्ता अत्यन्त सूक्ष्मतासँ चित्रित अछि: "ईमामक आवाजक लहजासँ, शादुल स्थितिक अन्दाज लगा लैत छल। " ओ ईमामक खुशी-दुख, भय-आशा — सब पढ़ि लैत अछि। बिना शब्दक, बिना भाषाक, ओ सर्वाधिक संवेदनशील सदस्य थिक ओहि परिवारक। अन्तिम दृश्यमे — "शादुल आबि कऽ ओकरा बगलमे बैसि गेल, अपन मुँड़ ईमामक कोरामे राखि कऽ" — ई निष्कपट प्रेम (बिना शर्तक प्रेम) थिक। शादुल जानैत नहि जे ईमाम ओकर हत्याक योजना बना रहल छथि — आ एहि अनजानपनमे विश्वासघातक सर्वोच्च यातना अछि। बिबम्मा: परिवर्तनक प्रतीक बिबम्मा उपन्यासमे सर्वाधिक जटिल स्त्री-चरित्र थिक। ओ शादुलकेँ "पिछला जन्ममे हमर बच्चा रहल हएत" कहैत छलीह — आ ओही स्त्री अन्तमे शादुलकेँ त्यागबाक लेल हुनकर पतिकेँ उकसाबैत छथि। ई नैतिक रूपान्तरण (नैतिक परिवर्तन) कोनो विलेनी (खलनायकी) नहि — जीवन-रक्षा-वृत्ति (जीवन-वृत्तिक) परिणाम थिक। जमीनक सपना — जे पहिले कहियो सम्भव नहि लागल छल — ओ सपना देखिकऽ बिबम्माक प्राथमिकता बदलि गेल। एहि चरित्रमे नैतिक द्विविधा (नैतिक द्विधा) उपन्यासक सर्वाधिक यथार्थवादी पक्ष थिक। न बिबम्मा खलनायिका, न पीड़िता — ओ मानव थिक जे असम्भव परिस्थितिमे जीवनक चुनाव करैत अछि। चाँद: नव पीढ़ीक आकाङ्क्षा आ क्रूरता चाँद उपन्यासक सर्वाधिक विवादास्पद चरित्र थिक। एक दिससँ — ओ शादुलसँ प्रेम करैत छल, ओकरा "दू टा बाबू" मानैत छल। दोसर दिससँ — ओ शादुलकेँ जीवितहि गाड़बाक योजना बनाबैत अछि। ई विरोधाभास पीढ़ीगत परिवर्तन (पीढ़ी-परिवर्तन) क प्रतीक थिक। चाँदक पीढ़ीक लेल जमीन-स्थायित्व शादुलक प्रेमसँ अधिक महत्त्वपूर्ण अछि। ओ नव भारतक प्रतीक थिक — जे परम्परागत बन्धनसँ मुक्त होयबाक इच्छा रखैत अछि, मुदा एहि मुक्तिक कीमत नहि देखैत। कार्ल मार्क्स क अलगाव सिद्धान्तक एकटा नव आयाम एतय प्रकट होइत अछि: चाँद अपन सांस्कृतिक पहचानसँ अलगाएल अछि। शादुल मात्र एकटा भालू नहि — ओ कलन्दर-संस्कृतिक जीवित प्रतीक थिक। चाँद जखन शादुलकेँ त्यागैत अछि, ओ वास्तवमे अपन समुदायक इतिहासकेँ त्यागैत अछि। ३. भालू-नाच: सांस्कृतिक अर्थशास्त्र उपन्यासक केन्द्रीय सांस्कृतिक-आर्थिक संघर्ष थिक: पशु-संरक्षण कानून बनाम कलन्दर-जीविका। कानूनक विरोधाभास भारतमे १९७२क वन्यजीव संरक्षण अधिनियम आ बादमे पशु क्रूरता निवारण अधिनियम कलन्दर सभक परम्परागत व्यवसाय — भालू-नाच — केँ अवैध घोषित कएलक। एहि कानूनक नैतिक आधार थिक: पशुक कल्याण। मुदा एकर अनैच्छिक परिणाम थिक: कलन्दर समुदायक आर्थिक विनाश। उपन्यास एहि विरोधाभासकेँ न्यायसंगत ढंगसँ प्रस्तुत करैत अछि — कानूनकेँ न सरल रूपसँ समर्थन, न सरल रूपसँ विरोध। ईमाम शादुलकेँ प्रेम करैत छथि — ओ क्रूर नहि। मुदा शादुलक बिना हुनकर जीविका नहि। अमर्त्य सेन क क्षमता-दृष्टि (क्षमता-दृष्टिकोण) — जाहिमे ओ तर्क करैत छथि जे मानव-विकास मात्र आर्थिक नहि, सांस्कृतिक-सामाजिक क्षमताक पूर्ण विकास थिक — एतय प्रासंगिक अछि। कलन्दरसभसँ हुनकर परम्परागत कौशल, हुनकर सांस्कृतिक पहचान, आ हुनकर आजीविका — तीनू एकहि साथ छीनल जा रहल अछि। भालू-नाचक सौन्दर्यशास्त्र उपन्यासमे शादुलक करतबसभक वर्णन — "बटुकम्मा नृत्य, रोटी तैयार करब, घोड़ा पर चढ़ब..." — एकटा लोक-सौन्दर्यशास्त्रक अभिलेखीकरण थिक। ई करतब मात्र मनोरंजन नहि — एहिमे पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित ज्ञान निहित अछि। गणेश देवी क "विस्मृतिक बाद" (जाहिमे ओ तर्क करैत छथि जे आदिवासी-लोक ज्ञान-परम्परासभकेँ भारतीय साहित्य-आलोचनाने अनदेखा कएल) — एतय प्रत्यक्षतः लागू होइत अछि। शादुलक करतब एकटा जीवित सांस्कृतिक धरोहर थिक जे नष्ट होइत अछि। ४. मैत्रीक दर्शन: उपन्यासक केन्द्रीय विचार जिगिरी शब्दक अर्थ तेलुगुमे "जिगरी दोस्त" — सर्वाधिक घनिष्ठ मित्र। मुदा उपन्यासमे ई मैत्री मनुष्य-मनुष्यक बीच नहि, मनुष्य-पशुक बीच थिक। मैत्रीक तत्त्व-विज्ञान अल्बेर कामू "सिसिफसक मिथक" मे कहैत छथि जे एकजुटता — एकहि नियतिमे बँधल दू प्राणीक बीच — अर्थहीन जीवनमे अर्थ-सृजनक एकमात्र माध्यम थिक। ईमाम आ शादुलक मैत्री एहि कामू-सदृश एकजुटता क सर्वोत्तम उदाहरण थिक। दूनू समाजक "घृणित-बहिष्कृत" (घृणित-बहिष्कृत) थिक। ईमाम — खानाबदोश, निम्न-जाति, अशिक्षित। शादुल — जंगली, अशुद्ध, खतरनाक। दूनूकेँ समाज उपयोगी मुदा अस्वीकार्य मानैत अछि। "जकर कोनो आवाज नै अछि, ओकरा कौआ सभ सेहू हल्का मानि लै छथि" — कौआ लघुकथाक एहि पंक्तिक प्रतिध्वनि जिगिरी मे सेहो सुनाइत अछि। शादुल बाजि नहि सकैत — तेँ ओकर आवाजक अनुपस्थिति ओकरा समाजक दृष्टिमे कम महत्त्वपूर्ण बनाबैत अछि। मैत्रीक विश्वासघात उपन्यासक सर्वाधिक यातनादायक क्षण थिक: ईमाम जहरयुक्त गुड़ शादुलक हाथमे दैत छथि। "गुड़ पकड़ाबैत काल ईमामक हाथ काँपि रहल छल। शादुल ओकरा लेलक आ चबाय लागल। ईमाम देखैत रहल, ओकर आँखि नोर सँ धुँधला छल। " एहि दृश्यमे यहूदाक चुम्बन — विश्वासघातक पुराण-प्रतीक — क प्रतिध्वनि अछि। मुदा एतय ईमाम स्वेच्छासँ विश्वासघाती नहि — ओ असम्भव परिस्थितिमे असम्भव चुनाव करैत छथि। एफ. दोस्तोयेव्स्की अपराध आ दण्ड मे दर्शाबैत छथि जे नैतिक अपराधबोध (नैतिक अपराध-बोध) हत्यासँ अधिक भयंकर होइत अछि। ईमाम शादुलकेँ शारीरिक रूपसँ मारि दैत छथि — मुदा आत्मिक रूपसँ स्वयं मरि जाइत छथि। ५. जमीन-प्रश्न: दलित-आदिवासी राजनीति उपन्यासमे जमीनक पट्टा एकटा कथा-चालक वस्तु थिक — जे सम्पूर्ण कथा-तनावकेँ सञ्चालित करैत अछि। जमीनक राजनीति कलन्दरसभकेँ जमीन-अधिकारसँ ऐतिहासिक रूपसँ वञ्चित राखल गेल — कारण ओ भ्रमणशील छल। जे जमीनपर स्थाई रूपसँ नहि रहय, ओ जमीनक मालिक कइ प्रकारेँ हो? एहि प्रशासनिक तर्कमे कलन्दर-समुदायक सम्पूर्ण अस्तित्व-संकट निहित अछि। एमआरओ (मण्डल राजस्व अधिकारी) जे शर्त रखैत अछि — "भालू फेर आसपास नै देखल जाय" — ई आधुनिक भारतीय राज्यक प्रतीक थिक। राज्य एकहि साथ कलन्दरकेँ जमीन दैत अछि (पुनर्वास) आ हुनकर पहचानकेँ नष्ट करैत अछि (भालू-त्याग)। ई विरोधाभासी आधुनिकीकरण थिक। बुच्चैया: वर्गीय-जातीय प्रतिस्पर्धा बुच्चैयाक प्रसंग — जे ईमामक नामपर अपन जमीन-अधिकार खोइत अछि — एकटा महत्त्वपूर्ण उप-कथा थिक। एहिमे दलितसभक आन्तरिक प्रतिस्पर्धा दर्शाएल गेल अछि: कलन्दर बनाम स्थानीय दलित — दूनू सीमित संसाधनक लेल प्रतिस्पर्धा करैत अछि। ई हाशियाक भीतरक संघर्ष तेलुगु दलित कवितासभमे शशिनिर्मला जे देखाबैत छलीह — दलित पुरुषक दलित-स्त्री-उत्पीड़न — ओकर उपन्यास-रूप थिक। ६. भालू-पकड़बाक रात: लोक-ज्ञानक काव्यशास्त्र उपन्यासमे भालू-पकड़बाक प्रसंग — ईमाम, बिबम्मा, आ मादा भालूक त्रिकोणीय संघर्ष — महाकाव्यिक गुण राखैत अछि। "आगि देखि कऽ मादा भालू दू कदम पाछू हटि गेली। " — ईमाम जानैत छलाह जे भालू आगिसँ डराइत अछि। बिबम्मा जानैत छलीह जे सूखल खजूर-पात जरायब। दूनू मिलिकऽ एकटा सामूहिक देशज ज्ञान प्रयुक्त करैत छथि। एहि प्रसंगमे तेलुगु दलित काव्यक देशज ज्ञान क महत्त्व — जे सुभद्रा, गौरी आदिक कवितामे देशज वनस्पति-ज्ञानक रूपमे प्रकट होइत छल — उपन्यासमे जीवन-रक्षाक व्यावहारिक ज्ञानक रूपमे प्रकट होइत अछि। ७. अन्तिम दृश्य: मौनक सौन्दर्यशास्त्र उपन्यासक अन्तिम खण्ड — शादुलक मृत्यु — न्यूनतम भाषामे लिखल गेल अछि: "किछु क्षणक बाद शादुल डगमगाबय लागल। ओ एकटा हल्का कराह भरलक आ ढहि पड़ल। ईमाम ओकरा बगलमे बैसल रहल, हाथ शादुलक मुँड़ पर राखि कऽ, जखन धरि भालूक साँस बन्द नै भऽ गेल। वन सन्न छल। " ई न्यूनतम गद्य अत्यन्त शक्तिशाली थिक। जे कहल नहि गेल — ईमामक चिच्चायब, शादुलक छटपटाहट — ओ मौनमे अधिक मुखर अछि। अर्नेस्ट हेमिंग्वे क "हिमशैल सिद्धान्त" (जाहिमे ओ तर्क करैत छथि जे उत्तम गद्यमे जे अनकहल रहैत अछि ओ कहलसँ अधिक शक्तिशाली होइत अछि) एतय सर्वोत्कृष्ट रूपसँ लागू होइत अछि। "ईमाम अनुभव कएलक जे ओकर एकटा अंश शादुल संग मरि गेल। " — ई एकटा पंक्ति पाठकक हृदयमे एकटा अमोचनीय टीस छोड़ि जाइत अछि। ८. अनुवाद-शृंखला: तेलुगु → अंग्रेजी → मैथिली अनुवादकक टिप्पणीक महत्त्व पी. जयलक्ष्मीक अनुवादक-टिप्पणी स्वयं एकटा महत्त्वपूर्ण पाठ-परिपाठ थिक। ओ "सांस्कृतिक अनुवाद" क अवधारणा उठाबैत छथि — जाहिमे भाषान्तरसँ अधिक सांस्कृतिक-संवेदनाक हस्तान्तरण आवश्यक थिक। "स्थानीय रंग" (स्थानीय रंग) — उर्दू शब्द, तेलंगाना कहावत, देशज वनस्पति — एहि सबकेँ सुरक्षित रखब अनुवाद-नैतिकता क महत्त्वपूर्ण निर्णय थिक। मैथिलीमे उर्दू जिगिरी मे तेलंगानाक मुस्लिम-कलन्दर समुदायक उर्दू-मिश्रित भाषा — "अब्बा", "अम्मी", "अल्लाह", "शादुल" — मैथिलीमे यथावत् राखल गेल। एहिसँ दूटा काज भेल: पहिल — तेलंगानाक सांस्कृतिक-भाषिक विशिष्टता सुरक्षित रहल। दोसर — मैथिली पाठककेँ एकटा भिन्न सांस्कृतिक ब्रह्माण्डसँ साक्षात्कार भेल। लॉरेन्स वेन्यूटी क विदेशीपन-संरक्षण रणनीति (जाहिमे अनुवादक मूलक विदेशीपन कायम रखैत अछि) एतय प्रयुक्त अछि — आ ई उचित थिक। ९. जिगिरी आ दलित साहित्य-शृंखला: तुलनात्मक स्थान एहि सम्पूर्ण समीक्षा-शृंखलामे — कविता, लघुकथा, आ आब उपन्यास — जिगिरी एकटा विशिष्ट स्थान ग्रहण करैत अछि। बोयी भीमन्ना — दलित इतिहासक ऊर्ध्व-दृष्टि (व्यापक दृष्टि)। सुभद्रा — दैनिक श्रमक सूक्ष्म-दृष्टि (सूक्ष्म दृष्टि)। कोलकलुरी इनोच (कौआ) — सामुदायिक अनुष्ठानक मध्य-दृष्टि (मध्य दृष्टि)। जिगिरी — ई सबसँ विस्तृत आख्यान — जाहिमे व्यक्तिगत मैत्री, पारिवारिक संघर्ष, सामुदायिक राजनीति, आ राज्य-शक्ति — सब एकहि आख्यानमे समाहित अछि। एहि अर्थमे जिगिरी तेलुगु दलित साहित्यक महाकाव्यिक स्वर थिक। निष्कर्ष पेद्दिंति अशोक कुमारक सदा लेल मित्र एकटा बहु-स्तरीय उत्कृष्ट कृति थिक जे: साहित्यिक स्तरपर — मनुष्य-पशु मैत्रीक माध्यमसँ प्रेम, विश्वास, आ विश्वासघातक काव्यशास्त्र प्रस्तुत करैत अछि। सामाजिक स्तरपर — कलन्दर समुदायक सांस्कृतिक विलुप्तिकेँ साहित्यिक स्मृतिमे सुरक्षित करैत अछि। राजनीतिक स्तरपर — पशु-अधिकार बनाम मानव-अधिकारक विरोधाभासकेँ न्यायसंगत ढंगसँ प्रश्नांकित करैत अछि। दार्शनिक स्तरपर — मैत्रीक असम्भव परिस्थिति — जतय प्रेम आ जीवित रहनाइ परस्पर-विरोधी हो — क त्रासद यथार्थ उद्घाटित करैत अछि। उपन्यासक अन्तिम सत्य — "धरती ओकर छल, मुदा एकर कीमत ईमाम लेल सहय सँ बाहर छल" — समस्त दलित-आदिवासी साहित्यक केन्द्रीय प्रश्नकेँ एकटा वाक्यमे समेटि लैत अछि: "विकास" आ "अधिकार" की कोनो समुदायक आत्माक हत्याकऽ कीमतपर खरीदल जा सकैत अछि? एहि प्रश्नक उत्तर उपन्यास नहि दैत — पाठककेँ, समाजकेँ, राज्यकेँ दैत छोड़ि दैत अछि। समग्र समीक्षा: तेलुगु, गुजराती आ उड़िया दलित साहित्यक मैथिली अनुवाद विदेह समानान्तर साहित्य आन्दोलन आ मैथिलीमे दलित साहित्यक पूर्ति प्रारम्भिक टिप्पणी: एकटा ऐतिहासिक परियोजना एहि समीक्षा-शृंखलामे हम जे साहित्य पढ़लहुँ — तेलुगु कविता (बोयी भीमन्ना, जे. सुभद्रा, चल्लपल्ल्ली स्वरूपरानी, दरिशे शशिनिर्मला, एम. गौरी, मद्दुरी विजयश्री), गुजराती कविता (अनीश गारंगे, राजेन्द्र वडेल, उमेश सोलंकी), उड़िया कविता (बासुदेव सुनानी), तेलुगु लघुकथा (कोलकलुरी इनोच, विनोदिनी), आ तेलुगु उपन्यास (पेद्दिंति अशोक कुमार) — ई सब मिलिकऽ एकटा सुचिन्तित साहित्यिक परियोजना थिक। एहि परियोजनाक नाम — विदेह, विदेह — मैथिली भाषाक प्रथम फोर्टनाइटली (पाक्षिक) ई-पत्रिका, जाहिक सम्पादक गजेन्द्र ठाकुर छथि। एहि समीक्षाक उद्देश्य तीन स्तरपर अछि: पहिल — प्रस्तुत साहित्यक काव्यशास्त्रीय मूल्यांकन; दोसर — एहि अनुवाद-परियोजनाक सांस्कृतिक-राजनीतिक महत्त्वक विश्लेषण; तेसर — विदेह समानान्तर साहित्य आन्दोलनक दलित-साहित्य-अनुवादसँ सम्बन्धक अन्वेषण। भाग एक: साहित्यिक मूल्यांकन १. काव्य: तीन भाषाक दलित स्वर तेलुगु काव्य-परम्परा तेलुगु दलित काव्य एहि संग्रहमे सर्वाधिक विस्तृत आ विविध अछि। छह कवि — भीमन्ना, सुभद्रा, स्वरूपरानी, शशिनिर्मला, गौरी, विजयश्री — मिलिकऽ एकटा सम्पूर्ण काव्य-ब्रह्माण्ड निर्मित करैत छथि। भीमन्ना (१९२०-२००१) एहि परम्पराक पितामह थिक। जरैत खोपड़ी सभ आ हमर पैतृक अधिकार — दूनू कविता मिलिकऽ दलित काव्यक दू प्रमुख रणनीति दर्शाबैत अछि: धार्मिक हिंसाक चक्रव्यूहक प्रश्नांकन आ पौराणिक इतिहासक पुनर्पाठ। पुनरावृत्ति आ अनुप्रास-आरम्भक माध्यमसँ भीमन्ना दलित मौखिक परम्पराकेँ लिखित कवितामे अन्तर्निहित करैत छथि — ई काव्य-शिल्पक एकटा विशिष्ट उपलब्धि थिक। सुभद्रा — श्रम, वस्तु, आ मातृत्वक कवयित्री — दलित-स्त्री जीवनक सूक्ष्म इतिहास लिखैत छथि। साड़ीक कोर मे एकटा साधारण कपड़ाक टुकड़ा — जे ओछाउन, छाता, थैली, रक्षक, माय — सब बनि जाइत अछि — एकटा विस्तारित रूपक क उत्कृष्ट उदाहरण थिक। जयप्रभाक "साड़ी जराएब" क उच्च-जातीय नारीवादी प्रतीकशास्त्रक विरुद्ध सुभद्राक दलित-नारीवादी प्रत्युत्तर — "ओकरा आगि लगा कऽ हम कोना बचि सकैत छी? " — अन्तः-नारीवादी संवाद (नारीवाद-भीतरक संवाद) क एकटा महत्त्वपूर्ण क्षण थिक। स्वरूपरानी व्यक्तिगत चेतनाक रूपान्तरणक कवयित्री छथि। मान्केनापुव्वु मे छह बेर दोहराएल "जखन...तखन" शृंखला — जे उत्पीड़नक वर्गीकरण प्रस्तुत करैत अछि — काव्यशास्त्रक दृष्टिसँ अत्यन्त परिकलित अछि। माटि-भेल हाथ मे गेंदा फूलसँ झुराएल पातक रूपान्तरण श्रम-शोषणक शारीरिक यथार्थ थिक। शशिनिर्मला सर्वाधिक उग्र आ टकराहटी आवाज थिक। हमही छी जे सभ किछु हारि देलहुँ मे उच्च-जातीय स्त्रीसँ सोझ सम्बोधन — "अहाँ हमरा मातहत बुझि अपमानित कएल गेल" — किम्बर्ले क्रेन्शॉ क बहु-उत्पीड़न-अन्तर्सम्बन्ध सिद्धान्तकेँ काव्यमे साकार करैत अछि। हम रजस्वला कपड़ा ओढ़ि रहल छी मे ऐतिहासिक पीड़िताक नामोल्लेख (अलिसम्मा, मुथव्वा, महादेवम्मा) साक्ष्य-काव्यक (साक्ष्यात्मक कविता) उत्कृष्ट उदाहरण थिक। एम. गौरी — मेहदी लागल हाथ — तेलुगु दलित काव्यक सर्वोच्च काव्यिक उपलब्धिसभमे सँ एक थिक। कृष्णक तीन पौराणिक रूप (मायाविनाशक, ग्वाल-बालिन-प्रेमी, बंशीवादक) क क्रमशः खण्डन करैत चर्मकार-स्त्री अपन रगत-सनल हाथकेँ मेहदी बनाबैत छथि — एहि एकटा शीर्षकमे शुभता-अशुभताक सम्पूर्ण दलित-विरोधाभास निहित अछि। "जखन हमर चाम अमलतास सँ धोयल जाइत अछि... ई बनि जाइत अछि ढोल, शुद्ध सङ्गीत गुञ्जाबैत" — एहि अन्तिम बिम्बमे जूलिया क्रिस्तेवा क घृणित-बहिष्करण (घृणित) सिद्धान्तक काव्यिक खण्डन होइत अछि। मद्दुरी विजयश्री क अलिसम्माक स्राप — शूर्पणखाक नासिका-छेदन आ अलिसम्माक नग्नीकरणकेँ एकहि पंक्तिमे जोड़ब — पौराणिक-ऐतिहासिक समानान्तरताक सर्वाधिक साहसिक काव्यिक निर्णय थिक। अन्तिम स्राप — "हम अहाँ सभकेँ स्राप दैत छी कि अहाँ मानवमे परिणत भऽ जाउ" — फ्रान्ट्ज फानों क उपनिवेशित-उपनिवेशक-मानवता-खोज सिद्धान्तकेँ काव्यिक स्रापमे रूपान्तरित करैत अछि। गुजराती काव्य-परम्परा अनीश गारंगे क पोस्टर नगर-यथार्थवादक उत्कृष्ट उदाहरण थिक। "ई खुरदुरा चेहरा बला पोस्टर सब हमर ऐना जकाँ अछि" — ई वृत्ताकार संरचना आ जाक लाकाँ क दर्पण-अवस्था सिद्धान्तक नकारात्मक प्रयोग दलित-नगर-अनुभवक विकृत-दर्पण उजागर करैत अछि। राजेन्द्र वडेल 'जीता' क सम्भोग — "जँ बेटा जन्मल तऽ नाम 'भारत' राखू, जँ बेटी तऽ 'भारती'" — जाति-यौन-हिंसाक इतिहासकेँ राष्ट्र-निर्माणसँ जोड़बाक सर्वाधिक विस्फोटक काव्यिक क्षण थिक। उमेश सोलंकी क दू कविता भिन्न रणनीति प्रयुक्त करैत अछि। लोक, जमि जाय मे "जमाव" एकटा एकल विस्तारित रूपक पर आधारित है जे मार्क्स क हिकमत (हड़ताल) सिद्धान्तसँ काव्यिक संवाद करैत अछि। खरड़ाक डाँट सब गान्धीसँ सोझ व्यंग्यात्मक सम्बोधन थिक — गान्धीवाद आ दलित-यथार्थक विरोधाभासक काव्यिक प्रमाण — जाहिमे आम्बेडकर क गान्धी-आलोचना काव्य-रूप धारण करैत अछि। उड़िया काव्य-परम्परा बासुदेव सुनानी क तीन काव्य-खण्ड — अखनो बहुत किछु होबाक बाकी अछि, पता, सदानन्द — उड़िया दलित काव्यक दार्शनिक-रहस्यवादी आयाम दर्शाबैत अछि। बूँद, बीउ, माछ, समुद्र — ई प्राकृतिक बिम्ब तेलुगु-गुजराती कवितासभक ठोस नगरीय यथार्थसँ मूलतः भिन्न काव्य-भूमि थिक। सदानन्द — जाहिमे एकटा किसान "गलत" बुझलनि मुदा हुनकर "गलत बुझनाइ"मे राजनीतिक सत्य छल — निम्नवर्गीय ज्ञानमीमांसा (निम्नवर्गीय ज्ञान-मीमांसा) क उत्कृष्ट काव्यिक उदाहरण थिक। २. गद्य: लघुकथा आ उपन्यास कौआ आ कारी स्याही दूनू लघुकथा दलित गद्य-परम्पराक भिन्न आयाम दर्शाबैत अछि। कोलकलुरी इनोच क कौआ — बण्डोडु, कौआ, आ अव्वाक परिवार — त्रिकोणीय शक्ति-सम्बन्धक नैतिक जटिलताक कथा थिक। "मुक्ति एक श्राप मात्र अछि" — एहि विरोधाभासमे दलित-सामाजिक-व्यवस्थाक गहनतम सत्य निहित अछि। बण्डोडु — दलितमे सबसँ नीचाँ — हुनकर एकमात्र विशेषज्ञता (कौआ-मारब) हुनका अपरिहार्य बनाबैत अछि — मिशेल फूको क सत्ता-ज्ञान सम्बन्धक कथा-रूप। विनोदिनी क कारी स्याही — "हम नीला स्याहीमे लिखैत छी जे पसिन्न अछि, कारी स्याहीमे जे नापसिन्न" — ई शीर्षक-रूपक कथाक संरचनागत आश्चर्य थिक। बच्ची श्रियाक चरित्र — एकहि साथ निर्दोष, प्रेमिल, आ जाति-संस्कारित — बाल-मनोविज्ञानमे जाति-समाजीकरणक सूक्ष्मतम चित्रण थिक। "पूरा कमरामे सूखल तितली सभ हमरापर रेंगैत कैटरपिलरमे बदलि गेल" — ई अन्तिम बिम्ब सम्पूर्ण कथाक सार थिक। सदा लेल मित्र (जिगिरी) पेद्दिंति अशोक कुमारक उपन्यास एहि समग्र परियोजनाक महाकाव्यिक शिखर थिक। ईमाम-शादुलक मैत्री — मनुष्य आ भालूक बीच — अल्बेर कामू क एकजुटता सिद्धान्तकेँ दलित-आदिवासी सन्दर्भमे साकार करैत अछि। दूनू "घृणित-बहिष्कृत" (घृणित-बहिष्कृत) थिक — ईमाम खानाबदोश, निम्न-जाति; शादुल जंगली, अशुद्ध — आ एहि साझा हाशियापर एकटा हिकमत एकजुटता (हाशिया-एकजुटता) जन्म लैत अछि। "गुड़ पकड़ाबैत काल ईमामक हाथ काँपि रहल छल" — ई यहूदा-क्षण (विश्वासघातक क्षण) उपन्यासक सर्वाधिक मार्मिक बिन्दु थिक। दोस्तोयेव्स्की क नैतिक अपराधबोध (नैतिक अपराध-बोध) क सिद्धान्त एतय साकार होइत अछि — ईमाम शादुलकेँ मारैत अछि मुदा आत्मिक रूपसँ स्वयं मरि जाइत छथि। "वन सन्न छल" — हेमिंग्वे क हिमशैल सिद्धान्त (हिमशैल-सिद्धान्त) क श्रेष्ठतम प्रयोग। जे अनकहल — ईमामक विलाप, शादुलक छटपटाहट — ओ मौनमे अधिक वाचाल अछि। भाग दू: विदेह समानान्तर साहित्य आन्दोलन आ दलित-साहित्य-अनुवाद ३. विदेहक समानान्तर साहित्य आन्दोलन: एकटा परिचय विदेह (videha.co.in, ISSN 2229-547X) मैथिलीक प्रथम पाक्षिक ई-पत्रिका थिक जाहिक स्थापना गजेन्द्र ठाकुर लगभग सन् २०००मे कएल। एहि पत्रिका आ एहिसँ सम्बद्ध समानान्तर साहित्य आन्दोलन क दृष्टि स्पष्ट रूपसँ परिभाषित थिक: साहित्य अकादेमी-मान्य-परम्परागत मैथिली साहित्यसँ भिन्न एकटा समानान्तर धारा — जाहिमे लोक, दलित, आ स्त्री साहित्यिक स्वरकेँ केन्द्रमे स्थापित कएल जाय। मैथिली साहित्यक मुख्यधारा मान्य साहित्य-परम्परा ऐतिहासिक रूपसँ ब्राह्मण-कायस्थ-केन्द्रित रहल अछि — विद्यापतिसँ चन्दा झासँ आधुनिक काल धरि। आब जा कऽ विद्यापतिक गएर-ब्राह्मण स्वरूप [ज्योतिरीश्वर-पूर्व] पर चर्चा समानान्तर धारा शुरु केलक अछि। [अनुलग्नक: २: विद्यापतिक विदेसियाक एकटा समालोचनात्मक मूल्यांकन] एहि मान्य साहित्यिक परम्परामे दलित-स्वर नगण्य रहल अछि। विदेह एहि मान्य परम्परासँ बहिष्करण (परम्परा-बाहरीकरण) क सचेत प्रतिरोध थिक। ४. अनुवाद परियोजनाक तीन स्तम्भ पहिल स्तम्भ: भाषिक पुल-निर्माण तेलुगु, गुजराती, आ उड़िया — तीन भिन्न भाषिक-सांस्कृतिक क्षेत्र — क दलित साहित्यकेँ मैथिलीमे आनब एकटा बहुदिशीय (बहु-दिशीय) भाषिक पुल-निर्माण थिक। अनुवाद-शृंखला प्रायः दोहरा वा तेहरा रहल: तेलुगु → अंग्रेजी (पुरुषोत्तम के., पी. जयलक्ष्मी) → मैथिली (गजेन्द्र ठाकुर) गुजराती → अंग्रेजी (हेमांग देसाई) → मैथिली (गजेन्द्र ठाकुर) उड़िया → अंग्रेजी (सैलेन राउत्रे) → मैथिली (गजेन्द्र ठाकुर) एहि परोक्ष अनुवाद (अप्रत्यक्ष अनुवाद) मे काव्यिक क्षति अवश्यम्भावी छल — मुदा सांस्कृतिक-सामाजिक सन्देशक हस्तान्तरण सफलतापूर्वक भेल। कारण दलित साहित्यक विचारक बल भाषा-माध्यमसँ प्रायः अधिक शक्तिशाली होइत अछि। दोसर स्तम्भ: सांस्कृतिक एकजुटताक निर्माण वाल्टर बेंजामिन "अनुवादककेँ सांस्कृतिक राजदूत" कहैत छथि। एहि परियोजनामे अनुवाद मात्र साहित्यिक नहि — ई राजनीतिक एकजुटताक कार्य थिक। तेलुगुक अलिसम्मा, गुजरातक गारंगेक "खुरदुरा चेहरा", उड़ियाक सदानन्दक अकाल — ई सब मैथिली पाठककेँ कहैत अछि: दलित उत्पीड़न क्षेत्रीय नहि, राष्ट्रीय समस्या थिक। मिथिलाक मुसहर, दुसाध, चमार — हुनकर जीवन-यथार्थ आन्ध्रक, गुजरातक, उड़ियाक दलित-जीवनसँ मूलतः भिन्न नहि। तेसर स्तम्भ: मान्य साहित्यिक परम्परा-हस्तक्षेप एहि अनुवाद-परियोजनाक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक-राजनीतिक कार्य थिक मैथिली मान्य साहित्यिक परम्परा मे हस्तक्षेप करब। शाहिद अमीन आ ज्ञानेन्द्र पाण्डेय जे निम्नवर्गीय अध्ययन क माध्यमसँ इतिहासमे कएल, विदेह साहित्यमे ओएह काज करैत अछि — मान्य साहित्यिक परम्परा-बाहरक स्वरकेँ साहित्यिक चर्चाक केन्द्रमे लाएब। मैथिली साहित्य अकादेमी पुरस्कार विजेता रचनासभ आ विदेहमे प्रकाशित दलित-अनुवाद — दूनू एकहि भाषाक भीतर दू समानान्तर परम्परा थिक। विदेहक दावा थिक जे एहि समानान्तरताक स्वीकृति मैथिली साहित्यकेँ अधिक सम्पूर्ण बनाएत। ५. मैथिलीमे दलित-स्वरक ऐतिहासिक अनुपस्थिति मान्य-परम्परागत मैथिली साहित्यमे दलित विद्यापतिक श्रृंगार-काव्यमे — जे मैथिली साहित्यक सर्वोच्च मानक थिक — दलित-जीवन अनुपस्थित अछि। ओ उच्च-जातीय सौन्दर्यशास्त्र क काव्य थिक। मुदा हुनकर “बिदेसिया” “पिआ देशांतर” मे ओ उपलब्ध अछि। आधुनिक मैथिली कवि — हरिमोहन झा, राजकमल चौधरी — ने ब्राह्मण-कायस्थ दृष्टि (ब्राह्मण-कायस्थ दृष्टिकोण)सँ लिखल, जाहिमे दलित-यथार्थ प्रान्तीय (हाशियापर) रहल। मैथिलीमे "दलित साहित्य" क कोनो स्वतन्त्र परम्परा स्थापित नहि भेल — जेना मराठीमे नामदेव ढसाल, दया पवार; तेलुगुमे भीमन्ना; हिन्दीमे ओमप्रकाश वाल्मीकि। एकर कारण: मिथिला क्षेत्रमे दलित समुदाय — मुसहर, दुसाध, धोबी, चमार — सब ऐतिहासिक रूपसँ साक्षरता-वञ्चित रहल। लिखित साहित्यिक परम्परा निर्माणक अवसरहि नहि भेटल। मौखिक परम्परासभ (मौखिक परम्परा) — लोकगीत, कथा — रहल, मुदा ओ कहियो लिखित मान्य-परम्परागत साहित्यमे परिणत नहि भेल। विदेहक हस्तक्षेप एहि ऐतिहासिक अनुपस्थितिक सामना करैत विदेहक रणनीति द्वि-स्तरीय थिक: तात्कालिक रणनीति: अन्य भारतीय भाषाक दलित साहित्यक अनुवाद आनि मैथिली पाठककेँ दलित साहित्यक स्वाद, भाषा, आ राजनीति सँ परिचित कराएब। दीर्घकालिक रणनीति: एहि अनुवादसँ प्रेरित मैथिली दलित लेखकसभक उद्भव — जे अपन भाषामे, अपन अनुभवसँ लिखब। फ्रान्ट्ज फानों धरतीक अभागल मे कहैत छथि जे उपनिवेशित साहित्य क विकास तीन चरणमे होइत अछि: पहिल — उपनिवेशकक भाषामे अनुकरण; दोसर — अपन संस्कृतिक जड़क खोज; तेसर — जन-साहित्यक निर्माण। मैथिली दलित साहित्यक लेल विदेहक अनुवाद-परियोजना एहि दोसर चरणक — "अपन जड़क खोज" क — समानान्तर प्रयास थिक। ६. अनुवाद-नीति: सिद्धान्त आ व्यवहार देशज शब्दक संरक्षण एहि परियोजनाक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अनुवाद निर्णय (अनुवाद-निर्णय) थिक: देशज शब्दसभकेँ यथावत् राखब। "लाण्डा", "अव्वा", "मान्केनापुव्वु", "अलिसम्मा", "जिगिरी", "बण्डोडु", "जाजी", "इप्पा" — ई सब मैथिलीमे अनूदित नहि, मात्र लिप्यन्तरित कएल गेल। लॉरेन्स वेन्यूटी क विदेशीपन-संरक्षण रणनीति (विदेशीकरण-रणनीति) — जाहिमे मूलक विदेशीपन सुरक्षित राखल जाइत अछि — एतय सुचिन्तित रूपसँ प्रयुक्त। एहिसँ मैथिली पाठककेँ दू सन्देश एकहि साथ मिलैत अछि: पहिल — ई संस्कृति तोहर संस्कृतिसँ भिन्न थिक (विदेशीपन); दोसर — ई यथार्थ तोहरासँ मूलतः भिन्न नहि थिक (एकजुटता)। ई सांस्कृतिक अनुवादक सर्वोत्तम कार्य थिक। भाषाक बहुलता जिगिरी मे तेलंगानाक उर्दू-मिश्रित तेलुगु — "अब्बा", "अम्मी", "अल्लाह", "तावीज", "कलन्दर" — मैथिलीमे सेहो उर्दू रूपमे राखल गेल। एहिसँ कथाक भाषिक बनावट सुरक्षित रहल। एहि निर्णयमे एकटा निहित राजनीतिक वक्तव्य (अन्तर्निहित राजनीतिक वक्तव्य) अछि: मुस्लिम-कलन्दर समुदायक सांस्कृतिक-भाषिक पहचान साहित्यिक मानदण्डसभमे बराबरक अधिकार राखैत अछि। शब्दावली आ परिशिष्ट जिगिरी क अनुवादमे विस्तृत शब्दावली आ परिशिष्ट संलग्न थिक — कलन्दर समुदायक सामाजिक-राजनीतिक इतिहास सहित। ई पाठ-सहायक संरचना (पाठ-सहायक उपकरण) अनुवादकेँ मात्र साहित्यिक नहि, दस्तावेजी मूल्य सेहो दैत अछि। भाग तीन: दलित काव्यशास्त्रक नव सिद्धान्त ७. मैथिलीमे प्रविष्ट नव काव्यशास्त्रीय सिद्धान्त एहि समग्र परियोजनाक माध्यमसँ मैथिली साहित्यमे कई नव काव्यशास्त्रीय सिद्धान्त प्रविष्ट भेल — जे परम्परागत मैथिली काव्यशास्त्रसँ मूलतः भिन्न थिक। हमर (गजेन्द्र ठाकुर) मैथिली समीक्षाशास्त्रक आधारपर दलित साहित्यक समीक्षा सम्भव भेल अछि। भारतीय रस सिद्धान्तक दृष्टिकोणसँ मैथिलीमे अनूदित दलित साहित्यक समीक्षा प्रस्तावना: रस आ दलित साहित्यक समागमक प्रश्न भारतीय साहित्यशास्त्रक केन्द्रबिन्दु रस सिद्धान्त अछि। भरतमुनिसँ अभिनवगुप्त धरि ई सिद्धान्तक विकास भेल अछि जे साहित्यक आस्वादक प्रधानता पर बल दैत अछि। रसक निष्पत्ति स्थायी भाव सँ होइत अछि—शृङ्गार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स, अद्भुत, शान्त। प्रश्न उठैत अछि: दलित साहित्य, जे स्वयंकेँ दर्द (पीड़ा) आ आक्रोश (क्रोध) क दस्तावेजक रूपमे प्रस्तुत करैत अछि, ई रसक श्रेणीमे कतय स्थान पाबैत अछि? वीभत्स (घृणा) आ रौद्र (क्रोध) के स्थायी भाव रसक परिणति पाबि सकैत अछि की नहि? ई संकलन—जे तेलुगु, गुजराती, उड़िया दलित साहित्यक मैथिली अनुवाद अछि—एहि प्रश्नकेँ तीव्रतासँ उठाबैत अछि। ई समीक्षा भारतीय रस सिद्धान्तक ढाँचामे एहि साहित्यक मूल्याङ्कन करत, विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी भावक संयोजन देखत, आ प्रश्न करत की एहि रचनासभ सहृदय लेल आस्वादक अनुभव बनि पाबैत अछि की नहि। प्रथम अध्याय: शृङ्गारक विपर्यास—प्रेम, वियोग आ शरीरक दलित स्वर शास्त्रीय शृङ्गार रसक आधार रति नामक स्थायी भाव अछि। ई प्रेम, मिलन, वियोग—दुनू अवस्थामे रसक सृजना करैत अछि। मुदा दलित साहित्यमे शृङ्गारक स्वरूप भिन्न देखाइत अछि। जे. सुभद्राक "साड़ीक कोर" शीर्षक कवितामे स्त्री-शरीर, श्रम, आ शृङ्गारक पारम्परिक प्रतीक सभक विपर्यास देखाबैत अछि। "हमर भूख सँ सटल हमर साड़ीक कोर लटकल रहैत अछि हमर पेट पर, बान्हक कातक 'मैसम्मा' देवी जकाँ। " एतय शृङ्गारक विभाव (नायिका, सौन्दर्य, मिलनक इच्छा)क स्थान पर श्रम, भूख, मातृत्व आ देहक दुर्गन्ध स्थापित भेल अछि। साड़ीक कोर, जे शास्त्रीय सन्दर्भमे आभूषण, लज्जा, स्त्रीत्वक प्रतीक छल, एतय घाम-पसीना पोछबाक कपड़ा, बच्चाक पालना, रजस्वला कपड़ाक ओढ़नी, पानि भरबाक गद्दी बनि जाइत अछि। ई विभावक पूर्ण परिवर्तन अछि। शृङ्गारक अनुभाव (हाव-भाव, मुस्कान, अपाङ्गता)क स्थान पर शरीरक धूरि चाटनाइ, भीजल रजस्वला कपड़ा, चूल्हा-चौकीमे अङ्गुरि जरबाइ जहिना वीभत्स (घृणा) आ करुण (दया)क मिश्रित अनुभाव स्थापित भेल अछि। एहि प्रकारेँ, दलित स्त्री-शरीरक शृङ्गार शास्त्रीय अलंकारिक शरीर नै अछि, बल्कि श्रमक शरीर, जीविकाक शरीर, प्रताड़नाक शरीर अछि। अभिनवगुप्तक भाषामे, एतय साधारणीकरण (साधारणीकरण)क प्रक्रिया भिन्न अछि। शास्त्रीय शृङ्गारमे रतिकेँ सार्वभौम अनुभवमे परिणत करैत छल, जतय दलित साहित्यमे श्रम आ अभावक विशिष्टता साधारणीकरणक विरोध करैत अछि। ई साधारणीकरणक अस्वीकार रस सिद्धान्तक सामने पैघ चुनौती अछि। चल्लपल्ली स्वरूपरानीक "मान्केनापुव्वु" (सेमरक फूल जकाँ लाल) शीर्षक कवितामे ई विपर्यास और स्पष्ट होइत अछि: "घरमे पुरुष-नियन्त्रण एक गाल पर थप्पड़ मारैत अछि, जखन कि गलीमे जाति-नियन्त्रण दोसर गाल पर। " एतय शृङ्गारक विप्रलम्भ (वियोग)क स्थान पर जाति-व्यवस्थाक हिंसा आ पितृसत्ताक हिंसाक दोहरा उपस्थिति अछि। कामदेव, रति, वियोग—ई सब शास्त्रीय शृङ्गारक स्थायी भाव सभक स्थान पर गुलामीक बेड़ी, सहनशीलता, क्रोध जहिना व्यभिचारी भाव सभ मुख्य होइत अछि। कविताक अन्तमे "हम खिलि उठब मान्केनापुव्वु जकाँ! "—एहि विद्रोहक स्वर शृङ्गारक संयोग नै, बल्कि वीर रसक आभास कराबैत अछि। मुदा ई वीर रस शास्त्रीय आश्रय-दाता-राजा-योद्धाक परिधिमे नै, बल्कि दलित स्त्रीक आत्म-स्वातन्त्र्यक संघर्षमे स्थापित अछि। द्वितीय अध्याय: रौद्र आ वीर—क्रोध, प्रतिरोध आ अस्मिताक रस दलित साहित्यक सबसँ प्रबल स्वर क्रोध अछि। शास्त्रीय रौद्र रसक स्थायी भाव क्रोध अछि। अभिनवगुप्तक अनुसार, रौद्रक विभाव अछि—क्रोधक कारण, आक्रोश, अपमान, असत्य, अन्याय। अनुभाव अछि—लाल आँखि, भौंहक टेढ़ाई, होठक कम्पन, हाथ-गोड़क फड़फड़ाहट, शस्त्र उठाबाइ। व्यभिचारी भाव अछि—आवेग, उग्रता, अधैर्य, आत्म-ग्लानि, भय। बोयी भीमन्नाक "हमर पैतृक अधिकार" शीर्षक कवितामे रौद्रक पूर्ण विकास देखाइत अछि: "व्यास, वास्तुकार आर्य जातिक पहिचानक, स्वयं जे हो, एकटा नीच जातिक मानुस छलाह। आजु ओ एकटा जाति-हिन्दू छथि, जखन कि हम, जे हुनकर जातिक छी, एकटा दलित-अजाति छी—ई भारतीय परम्परा अछि! " एतय क्रोधक विभाव अछि—वैदिक महानताक अधिकार चोराएल गेल, बहिष्कार, वञ्चना। अनुभाव अछि—कब्रिस्तान खननाइ, पैतृक अधिकारक खोज, घोषणा। ई रौद्र रस शास्त्रीय असुर-दैत्य-वधक परिधिसँ भिन्न अछि। एतय क्रोधक आश्रय दलित समुदाय अछि, आ विषय सवर्ण हिन्दूत्वक ऐतिहासिक अपराध अछि। रौद्रक ई प्रयोग शान्तिक लेल नै, न्यायक लेल अछि। मुदा प्रश्न उठैत अछि: की एहि रौद्रक आस्वाद संभव अछि? अभिनवगुप्तक अनुसार, रसक आस्वाद लेल वैमुख्य (सौन्दर्यात्मक दूरी) आवश्यक अछि। मुदा दलित साहित्यमे वैमुख्यक स्थान पर अभिज्ञता (तादात्म्य) अछि। पाठक दूरसँ क्रोध नै देखैत, बल्कि भीतरसँ क्रोधक अनुभव करैत अछि। ई रौद्रक आस्वादक संभावनाकेँ जटिल बनाबैत अछि। की ई सहृदय लेल रस अछि, वा संदेश? की ई आनन्द दैत अछि, वा असुविधा? राजेन्द्र वडेल 'जीता'क "सम्भोग" शीर्षक कवितामे रौद्र आ वीभत्सक घातक संयोग देखाबैत अछि: "हमर कोमल होंठ अहाँक होंठ छुअलक उच्च जातिक खुरदरापनक अनुभूति भेल। जखन अहाँक छिपल नजरि हमर नम आँखि पाबल दिनदहाड़े बलात्कारक एकटा भूत हमर सोझाँ नाचल। " एतय शृङ्गारक संयोगक विभाव—कोमल होंठ, होंठक स्पर्श, नम आँखि—वीभत्स (बलात्कार) आ रौद्र (क्रोध)मे परिणत होइत अछि। ई शृङ्गार-वीभत्स-रौद्रक त्रिवेणी अछि। शास्त्रीय रस सिद्धान्तमे एकटा रचनामे अनेक रसक अङ्गी-अङ्ग भाव स्वीकार अछि। मुदा एतय रस सभ परस्पर विरोधी अछि—शृङ्गार आ वीभत्सक संयोग शास्त्रीय सिद्धान्तमे दुर्लभ अछि। ई संयोग दलित साहित्यक विशिष्टता अछि: प्रेम आ हिंसा एकहि ठाम रहैत अछि। तृतीय अध्याय: करुण आ वीभत्स—पीड़ाक सौन्दर्यशास्त्र शास्त्रीय करुण रसक स्थायी भाव शोक अछि। विभाव अछि—प्रियक वियोग, अभिशाप, विपत्ति। अनुभाव अछि—आँसु, विलाप, मूर्च्छा, शरीरक शिथिलता। वीभत्स रसक स्थायी भाव जुगुप्सा (घृणा) अछि। विभाव अछि—दुर्गन्ध, रक्त, मांस, मल-मूत्र, शव। दलित साहित्यमे करुण आ वीभत्स अक्सर एक संग चलैत अछि। कोलकलुरी इनोचक "कौआ" (काकी) कहानीमे ई संयोग स्पष्ट देखाइत अछि। बण्डोडु नामक मादिग (चर्मकार) उपजातिक भिखारीक कथा अछि। ओ कौआ सभकेँ मारि कऽ खाइत अछि, आ जकरा ओ भोजन नै देब, ओकर घर पर कौआ सभ आक्रमण करैत अछि। कहानीमे वीभत्सक विभाव अछि—कौआक मांस, सड़ाए गन्ध, वमन, पाँखिक पुड़िया। अनुभाव अछि—काँव-काँव, ठोक मारब, आँखि नोचब, पीड़ा। मुदा ई वीभत्सक आस्वाद शास्त्रीय शव-मांस-रक्तक आस्वादसँ भिन्न अछि। शास्त्रीय वीभत्स दूरी सँ अनुभव कराबैत अछि। एतय दूरी नै अछि। ई वीभत्स जीविकाक अंग अछि—चामक कमाइ, भोजनक अभाव, जीवन-मरणक संघर्ष। बण्डोडु कौआ मारैत अछि किएक? भूख सँ। वीभत्स एतय असहायताक प्रतीक अछि, घृणाक नै। "ओ कौआ सभ लेल काल अछि! वास्तवमे ओ ओकरा जकाँ देखाइत अछि। ओकर रोंआ काँटक झुण्ड जकाँ अछि। जँ कोनो कौआ ओकर मुँड़ पर ठोक मारत, तऽ ओ ओहिमे उलझि जायत आ ओहि दिनक भोजन लेल पकड़ा जायत। " बण्डोडु स्वयं वीभत्सक विषय नै, वीभत्सक शिकार अछि। ई वीभत्स करुणसँ मिलि जाइत अछि। बण्डोडुक उपस्थिति मात्रसँ कौआ सभ भागि जाइत अछि। ओ समाजक सबसँ निचला पायदान पर अछि, मुदा कौआ सभक दुनियामे ओ शक्ति अछि। ई विपर्यास—शक्ति आ असहायताक द्वन्द्व—करुण आ वीभत्सक संगम सृजना करैत अछि। विनोदिनीक "कारी मसि" (ब्लैक इंक) कहानीमे करुणक अधिक तीव्र रूप देखाबैत अछि। आठ वर्षक बच्ची श्रिया, जे अपन हरिजन (दलित) पड़ोसी आन्टीकेँ प्रेम करैत छलीह, जखन ओकर जाति जानि लेत, तऽ ओकर चेहराक रङ्ग बदलि जाइत अछि: "की अहाँ सचमुच हरिजन छी? हमरा सच बताउ! " बच्चीक चेहराक सब रङ्ग धीरे-धीरे गायब भऽ गेल, धूसर रङ्ग धारण कऽ लेलक। करुणक विभाव अछि—प्रेमक वियोग, बाल-सुलभ निर्दोषता, जाति-व्यवस्थाक भयानकता। अनुभाव अछि—चेहराक रङ्ग बदलाइ, दौड़ि कऽ भागि जाइ, घृणाक दृष्टि। एतय करुण बाल-वियोगक परम्परागत स्वरूपसँ भिन्न अछि। वियोग प्रेमी-प्रेमिकाक नै, बल्कि मित्रताक अछि। आ कारण दैवी विपत्ति नै, जाति-व्यवस्थाक विष अछि। ई करुण रौद्रक समीप आबि जाइत अछि, मुदा रौद्रमे परिणत नै होइत—किएक संहारक असमर्थता सँ। चतुर्थ अध्याय: शान्त आ अद्भुत—मुक्ति, आश्चर्य आ प्रतिरोधक अन्य सौन्दर्यशास्त्र शास्त्रीय शान्त रसक स्थायी भाव निर्वेद (वैराग्य) अछि। अद्भुत रसक स्थायी भाव विस्मय अछि। दलित साहित्यमे ई दुनू रसक उपस्थिति सीमित अछि, मुदा पूर्णतः अनुपस्थित नै अछि। बासुदेव सुनानीक उड़िया कविताक अनुवादमे अद्भुतक आभास देखाबैत अछि: "एतय आकाशमे एहने एकटा बूँद अछि जे अस्पष्ट होइतो चमकैत छैक आ इन्द्रधनुषक एकटा मीठ सपना देखि कऽ बेर-बेर प्रण लेने अछि विशाल आकाशकेँ रङ्ग देबाक। " ई अद्भुत प्रतिरोधक अद्भुत अछि—अन्धार बोयनिहार सभक बीच एक बूँद प्रकाशक, विनाशक बीच सृजनक सम्भावना। मुदा ई अद्भुत शास्त्रीय दिव्य-चरित्र-दर्शनक अद्भुत नै अछि। ई अद्भुत आशाक अछि, सम्भावनाक अछि, अधूरापनक अछि। कवि कहैत अछि: "अखनो बहुत किछु होबाक बाकी अछि। " ई अद्भुत अधूरा अछि, अपूर्ण अछि। शान्त रस दलित साहित्यमे लगभग अनुपस्थित अछि। कारण? शान्तक निर्वेद (वैराग्य) संसार-त्यागक माग अछि। दलित साहित्य संसार-प्राप्तिक संघर्ष अछि—जमीन, मान-सम्मान, अधिकार, पहिचान। शान्त विरामक माग करैत अछि; दलित साहित्य संग्रामक अछि। एकर अपवाद मात्र मृत्युक क्षणमे देखाबैत अछि। "सदा लेल मित्र" उपन्यासक अन्तमे, जखन ईमाम शादुलकेँ जहर दैत अछि, तखन शान्तक आभास होइत अछि: "वन सन्न छल। ईमाम अनुभव कएलक जे ओकर एकटा अंश शादुल संग मरि गेल। " मुदा ई शान्त निर्वेद नै, शोक अछि। करुणक एहन तीव्रता जे शान्तक सीमा पर ठोकर खाइत अछि, मुदा शान्तमे नै बदलैत। पञ्चम अध्याय: रसक अभाव आ रसक नव रूप दलित साहित्यक सबसँ पैघ चुनौती रस सिद्धान्तक सामने ई अछि जे ई साहित्य अभावक साहित्य अछि। अभाव—भोजनक, वस्त्रक, आश्रयक, सम्मानक, अधिकारक। रस सिद्धान्त आनन्दक सिद्धान्त अछि। अभाव सँ आनन्द कइ प्रकारेँ उपजैत अछि? ई प्रश्न रस सिद्धान्तक सीमाकेँ रेखाङ्कित करैत अछि। उमेश सोलंकीक "लोक, जमि जाय" शीर्षक कवितामे अभावक सौन्दर्यशास्त्र देखाबैत अछि: "केतलीमे चाय जमि जाय सुपारीक टुकड़ा पाथर बनि जाय। सब्जी पाथरमे बदलि जाय पकोड़ी कङ्कड़ बनि जाय। " पाथर आ कङ्कड़—ई वीभत्सक विभाव छथि। मुदा एतय वीभत्स जीवनक यथार्थ अछि। अभाव एहन स्तर पर पहुँचि जाइत अछि जे भोजन पाथर बनि जाइत अछि। ई अतियथार्थ (अतियथार्थवाद) वीभत्सक नव रूप सृजना करैत अछि। अनीश गारंगेक "पोस्टर" शीर्षक कवितामे अभावक दोसर रूप देखाबैत अछि: "ई खुरदुरा चेहरा बला पोस्टर सब हमर ऐना जकाँ अछि। ... लापता व्यक्ति सभक पोस्टर हर दिन चेहरा बदलैत छैक। " अनुपस्थिति एतय उपस्थिति बनि जाइत अछि। लापता व्यक्तिक पोस्टर दलित चेहराक ऐना अछि। ई अद्भुतक विभाव अछि—अनुपस्थितिक उपस्थिति। मुदा ई अद्भुत विस्मय नै, सन्देह सृजना करैत अछि। चेहरा अछि, मुदा पहिचान नै अछि। उपस्थिति अछि, मुदा अस्तित्व नै अछि। निष्कर्ष: रस सिद्धान्तक पुनर्विचार दलित साहित्य रस सिद्धान्तक सामने किछु मूलभूत प्रश्न राखैत अछि: १. की रस केवल आनन्द अछि? अभिनवगुप्त रसक आनन्दक रूपमे परिभाषित करैत छथि। मुदा दलित साहित्य आनन्द नै, सत्यक दस्तावेज अछि। पीड़ा, क्रोध, घृणा, असहायता—ई सभ रसक परिणति पाबि सकैत अछि वा नै? यदि रस आनन्द अछि, तऽ ई सभ अनानन्दक आनन्दमे कइ प्रकारेँ परिणत होइत अछि? ई प्रश्न रस सिद्धान्तक पुनर्विचारक माग करैत अछि। २. साधारणीकरणक सीमा: रस सिद्धान्त विशिष्टकेँ सार्वभौममे परिणत करैत अछि। दलित साहित्य विशिष्टपर बल दैत अछि—दलित स्त्रीक विशिष्ट शरीर, जाति-व्यवस्थाक विशिष्ट हिंसा, चर्मकारक विशिष्ट भूख। की ई विशिष्ट सार्वभौममे परिणत होइत अछि? यदि होइत अछि, तऽ कइ प्रकारेँ? ई प्रश्न साधारणीकरणक प्रक्रियाक पुनर्मूल्यांकनक माग करैत अछि। ३. रसक संख्या: शास्त्रीय रसक संख्या नौ (वा अभिनवगुप्तक अनुसार दश) अछि। दलित साहित्य नव रसक नव रूप सामने राखैत अछि—श्रम रस, अभाव रस, प्रतिरोध रस, अस्मिता रस। की ई नव रसक उपरस वा अङ्गरसक रूपमे स्वीकार कएल जा सकैत अछि, वा नव रसक रूपमे? ई प्रश्न रस सिद्धान्तक विस्तारक माग करैत अछि। ४. आस्वादक राजनीति: रस सिद्धान्त सहृदयक अवधारणा पर आधारित अछि—जे साधारणीकरणमे समर्थ अछि, जे दूरी बनाए राखि सकैत अछि। दलित साहित्यक पाठक—जे दलित अछि वा नै—दूरी बनाए राखि सकैत अछि? पीड़ाक आस्वाद संभव अछि? यदि संभव अछि, तऽ ई आस्वादक नैतिकताक प्रश्न उठैत अछि। की पीड़ाक आस्वाद उत्पीड़नक पुनरुत्पादन तँ नै अछि? ई प्रश्न आस्वादक राजनीतिकेँ रेखाङ्कित करैत अछि। ई संकलन—तेलुगु, गुजराती, उड़िया दलित साहित्यक मैथिली अनुवाद—रस सिद्धान्तक सीमा आ सम्भावना दुनूकेँ सामने राखैत अछि। एक दिशामे, ई साहित्य शास्त्रीय रस सिद्धान्तक अपर्याप्तता देखाबैत अछि—रौद्र, वीभत्स, करुणक पारम्परिक ढाँचा एहि साहित्यक आस्वादक पूर्ण व्याख्या नै करि सकैत अछि। दोसर दिशामे, ई साहित्य रस सिद्धान्तक विस्तारक सम्भावना देखाबैत अछि—श्रम, अभाव, प्रतिरोध, अस्मिता जहिना नव स्थायी भाव सभ रसक नव रूप सृजना करि सकैत अछि। अन्तमे, एहि साहित्यक समक्ष सबसँ पैघ प्रश्न ई अछि: की ई साहित्य सहृदयक आस्वादक लेल अछि, वा सहृदयक जागरणक लेल? यदि आस्वाद अछि, तऽ ई आस्वादक स्वरूप की अछि? यदि जागरण अछि, तऽ ई जागरणक सौन्दर्यशास्त्र की अछि? ई प्रश्न सभ भारतीय साहित्यशास्त्रक सामने खुला अछि, आ एहि संकलन ओकरा तीव्रता सँ उठाबैत अछि। फ्रेंड्स फॉरएवर (जिगिरी) उपन्यासक अनुवादकक टिप्पणीमे एक वाक्य अछि: "ई अनुवाद मात्र साहित्यिक वा भाषिक नै अछि, बल्कि ई सचेत अछि जे कोनो संस्कृति अपन भाषासँ अलग नै भऽ सकैत अछि। " ई वाक्य रस सिद्धान्तक सन्दर्भमे सेहो सत्य अछि: कोनो साहित्य अपन रस सिद्धान्तसँ अलग नै भऽ सकैत अछि। दलित साहित्य अपन नव रस सिद्धान्तक माग करैत अछि—जे श्रम, अभाव, प्रतिरोध, अस्मिताक स्थायी भावक रूपमे स्वीकार करय, जे दूरी नै, निकटताक आस्वादक सम्भावना खोजय, जे पीड़ाक आनन्दमे परिणति नै, बल्कि पीड़ाक सत्यक आस्वादक मार्ग खोजय। ई संकलन ओहि नव रस सिद्धान्तक खोजमे एकटा महत्वपूर्ण पड़ाव अछि। ई समीक्षा भारतीय रस सिद्धान्तक पारम्परिक ढाँचाकेँ आलोचनात्मक रूपसँ प्रयोग करैत, दलित साहित्यक विशिष्टता रेखाङ्कित करैत अछि। रस सिद्धान्तक कोनो हठधर्मी प्रयोग नै कएल गेल अछि, बल्कि ओकर जीवन्तता आ विस्तारक सम्भावना खोजल गेल अछि। दलित साहित्य रस सिद्धान्तक अन्त नै, ओकर नव जन्मक आह्वान करैत अछि। रस-सिद्धान्तक पुनर्परिभाषा परम्परागत मैथिली काव्यशास्त्रमे —पारम्परिक विद्यापति-परम्परामे (समानान्तर विद्यापति परम्परामे नै)— शृंगार रस सर्वोच्च थिक, शान्त रस मोक्षदायक। रौद्र रस (क्रोध) सदैव सहायक रस, प्रधान नहि। दलित काव्य एहि पदानुक्रम कें उलटि दैत अछि। शरणकुमार लिम्बाले क दलित साहित्यक सौन्दर्यशास्त्र दिस मे जे तर्क अछि — क्रोध एकटा सौन्दर्य-श्रेणी थिक, दोष नहि — ओ एहि अनुवादक माध्यमसँ मैथिली साहित्यिक-चर्चामे प्रवेश करैत अछि। भीमन्नाक जरैत खोपड़ी सभ क क्रोध वाग्-कौशल (वाग्-आडम्बर) नहि — प्रामाणिक नैतिक भावना थिक। ई क्रोध रस-सिद्धान्त मे नव स्थान माँगैत अछि। काव्य-विषयक लोकतन्त्र परम्परागत मैथिली काव्यमे — यहाँ तक कि आधुनिक काव्यमे सेहो — काव्य-योग्य विषय सीमित रहल: प्रेम, विरह, प्रकृति, दर्शन। श्रम-वस्तु (लाण्डा, घैला, साड़ीक कोर) काव्य-केन्द्र नहि बनल। एहि परियोजनाक माध्यमसँ मैथिली पाठककेँ पहिल बेर दलित वस्तु-काव्यशास्त्र सँ परिचय होइत अछि — जाहिमे साड़ीक कोर, भालूक चाम, पोस्टर — ई सब उतने काव्य-योग्य थिक जतेक कालिदासक मेघ वा विद्यापतिक नायिका। देह-राजनीतिक काव्यशास्त्र मैथिली शृंगार-काव्यमे देह सौन्दर्य-विषय थिक — आदर्शीकृत, काव्यात्मक। दलित काव्यमे देह श्रम-विषय, पीड़ा-विषय, आ प्रतिरोध-विषय थिक — गोपाल गुरु क उग्र देहाधारित अनुभूति (मूलगामी देह-साक्षात्कार)। सुभद्राक लाण्डा मे "भले हमर अन्तड़ी मुँह सँ बाहर आबि जाय" — ई देह-अन्तरक प्रत्यक्ष यथार्थवाद (शारीरिक-यथार्थवाद) मैथिली काव्यमे नव भाषा लाबैत अछि। साक्ष्य-काव्यशास्त्र शोशाना फेलमैन आ डोरी लाउब साक्ष्य: साक्षीपनक संकट मे जे साक्ष्य-विधा परिभाषित कएल — जाहिमे पीड़ित अपन अनुभवकेँ साक्ष्यमे रूपान्तरित करैत अछि — ओ मैथिलीमे पहिलेपरक एहि अनुवाद-परियोजनाक माध्यमसँ प्रवेश करैत अछि। सुभद्रा गवाही दैत छथि, भीमन्ना प्रश्न करैत छथि, विजयश्री स्राप दैत छथि — ई सब साक्ष्य-काव्यशास्त्रक भिन्न रूप थिक। भाग चारि: समीक्षाक निष्कर्ष-संश्लेषण ८. सफलताक मूल्यांकन जे उत्कृष्ट रूपसँ सफल भेल केन्द्रीय विचारक हस्तान्तरण — भीमन्नाक पौराणिक-विरोधी तर्क, शशिनिर्मलाक त्रिमुखी संघर्ष, सोलंकीक गान्धी-व्यंग्य, सुनानीक "सदिखन", ईमाम-शादुलक मैत्री — ई सब मैथिलीमे पूर्णतः उपस्थित अछि। देशज प्रतीकशास्त्रक संरक्षण — मैसम्मा देवी, अमलतास, मान्केनापुव्वु, लाण्डा, जिगिरी — एहि सबक मौलिक शक्ति मैथिलीमे बचल। भावनात्मक तीव्रताक संचरण — पाठककेँ ईमामक हाथ काँपनाइ, विजयश्रीक स्राप, श्रियाक मुस्कानक तितलीसँ कैटरपिलरमे रूपान्तरण — ई सब मैथिली पाठक सेहो अनुभव करैत अछि। सीमा आ अपूर्णता ध्वनि-सौन्दर्यक आंशिक क्षति — तेलुगु, गुजराती, उड़ियाक अपन संगीतात्मकता अंग्रेजीसँ होइत मैथिलीमे कमजोर भेल। "पाञ्चजन्य", "बासुकी" — एहि शब्दसभक उड़िया उच्चारण-सौन्दर्य मैथिलीमे स्वाभाविक नहि। स्त्री-अनुवादकक अनुपस्थिति — सुभद्रा, शशिनिर्मला, गौरी, विनोदिनीक स्त्री-देह-अनुभव-केन्द्रित रचनासभक अनुवाद स्त्री-अनुवादक द्वारा अधिक प्रामाणिक होइत। मूल भाषासँ सोझ अनुवादक अभाव — तेलुगु → मैथिली, गुजराती → मैथिली — एहन सोझ अनुवाद भेल रहितैक तऽ मध्यवर्ती भाषा क क्षतिसँ बचल जाइत। नागरिक-शब्द-भण्डारक सीमा — मैथिली मुख्यतः ग्रामीण-काव्यात्मक परम्परासँ अबैत अछि। गुजराती कवितामे "पे-एण्ड-यूज शौचालय", "रिक्शाक अश्लील हुड" — ई नागरिक-आधुनिक सन्दर्भ मैथिलीमे बेसुर लागैत अछि। ९. तुलनात्मक काव्य-मानचित्र तीन भाषाक दलित काव्यक तुलनात्मक मानचित्र एहि प्रकार थिक: तेलुगु — देह, श्रम, इतिहास, पौराणिक-पुनर्पाठ, नारीवाद-भीतरक संवाद — सर्वाधिक विविध। गुजराती — नगर-यथार्थ, गान्धी-आलोचना, राष्ट्र-निर्माण-आलोचना — राजनीतिक-ऐतिहासिक। उड़िया — दार्शनिक-रहस्यवाद, किसान-दृष्टि, निम्नवर्गीय ज्ञानमीमांसा — अस्तित्ववादी-दार्शनिक। तीनू मिलिकऽ दलित-अनुभवक त्रिआयामी चित्र प्रस्तुत करैत अछि — बाहरसँ भीतर, इतिहाससँ वर्तमान, पीड़ासँ विद्रोह। १०. मैथिली साहित्यपर दीर्घकालिक प्रभावक सम्भावना एहि परियोजनाक दीर्घकालिक महत्त्व एहि अनुवादसभ स्वयं नहि — ई अनुवाद जे प्रेरणा आ मानक स्थापित करत। मैथिली दलित लेखकक उद्भव — मिथिलाक दलित समुदायसभ — मुसहर, दुसाध, चमार, धोबी — जखन मैथिलीमे दलित साहित्यक भाषा, शिल्प, आ राजनीति देखत, जखन बुझत जे हुनकर जीवन-यथार्थ साहित्यिक रूपसँ अभिव्यक्त कएल जा सकैत अछि — तखन स्वयंलेखन (स्वतःलेखन) सम्भव होएत। साहित्य अकादेमी मान्य साहित्यिक दबाव क प्रतिरोध — विदेहक दलित-अनुवाद मैथिली साहित्य अकादेमी मान्य साहित्यिक परम्पराकेँ वैकल्पिक मानक प्रस्तुत करैत अछि। जे साहित्य मान्य-परम्परागत होएबाक "योग्य" थिक, ओकर परिभाषा विस्तृत करैत अछि। अन्य भारतीय दलित परम्पराक मैथिलीमे प्रवेश — मराठी दलित काव्य (नामदेव ढसाल, दया पवार), बंगला दलित साहित्य, पंजाबी दलित काव्य — एहि परियोजनाक विस्तारसँ सम्पूर्ण अखिल-भारतीय दलित साहित्यिक परम्परा मैथिलीमे प्रवेश कऽ सकैत अछि। अन्तिम निष्कर्ष: एकटा सभ्यता-परियोजना ऑड्रे लॉर्ड मौनक भाषा आ क्रियामे रूपान्तरण मे कहैत छथि: "कविता विलासिता नहि; ई जीवनक अनिवार्य आवश्यकता अछि। " ई दलित काव्यक लेल तऽ अक्षरशः सत्य थिक। विदेहक दलित-साहित्य-अनुवाद परियोजना — एहि समग्र दृष्टिसँ — पाँच स्तरपर एकहि साथ काम करैत अछि: भाषिक स्तरपर: तेलुगु, गुजराती, उड़िया आ मैथिलीक बीच भाषिक सेतु-निर्माण। साहित्यिक स्तरपर: मैथिली मान्य साहित्यिक परम्परा मे दलित-स्वरक प्रवेश — नव काव्यशास्त्रीय सिद्धान्त सहित। सांस्कृतिक स्तरपर: भिन्न-भिन्न दलित समुदायक सांस्कृतिक स्मृतिक संरक्षण — कलन्दरसभक भालू-नाच, चर्मकारसभक लाण्डा-ज्ञान, दलित-स्त्रीक साड़ीक कोर। राजनीतिक स्तरपर: दलित उत्पीड़नक अखिल-भारतीय यथार्थकेँ मैथिली पाठककेँ दर्शाएब — एहि सन्देशक संग जे मिथिलाक दलित आ आन्ध्रक दलित एकहि नियतिक भागीदार छथि। ऐतिहासिक स्तरपर: मैथिली दलित साहित्यिक परम्पराक बीजारोपण — जे स्वयं विदेहक अनुवाद नहि, ओहिसँ प्रेरित भावी मैथिली दलित लेखन होएत। बासुदेव सुनानीक शब्द एहि सम्पूर्ण परियोजनाक उपयुक्त समापन-स्वर थिक: "एतय एकटा बीउ प्रतिज्ञा लेने अछि अङ्कुरित होबाक — सब किछु हरियर करबाक इच्छा सङ्गे। " ई बीउ बोआएल गेल अछि। जे माटिमे बोआएल अछि ओ मिथिलाक माटि थिक। जे बीउ बोआएल गेल अछि ओ सत्यक, न्यायक, मानवीय गरिमाक, आ दलित-आवाजक बीउ थिक। आ जे वृक्ष उगत — ओ मैथिली दलित साहित्यक वृक्ष होएत — जकर जड़ मिथिलाक माटिमे, शाखा आम्बेडकर आ भीमन्नाक विचारमे, आ पात विदेहक समानान्तर साहित्य आन्दोलनक ऊर्जासँ हरियर। अनुलग्नक: १ मैथिलीक मूल आ अनूदित दलित गद्य-पद्य साहित्य लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त प्रस्तावना: समीक्षा सिद्धान्तक आवश्यकता कोनो भाषाक साहित्यक समीक्षा लेल एकटा सुसंगत सैद्धान्तिक ढाँचाक आवश्यकता होइत अछि। मैथिली साहित्यक समीक्षाक इतिहासमे पारम्परिक भारतीय सिद्धान्त (रस, अलंकार, ध्वनि, रीति, औचित्य) आधुनिक कालमे पाश्चात्य सिद्धान्त (मार्क्सवाद, नारीवाद, उत्तर-आधुनिकतावाद, उपनिवेशवाद-उत्तर सिद्धान्त) दुनूक प्रभाव देखाबैत अछि। मुदा एहि सभ सिद्धान्तक एकीकृत रूपमे प्रयोग करबाक प्रयास सीमित रहल अछि, विशेषतः दलित साहित्य, महिला साहित्य, अनूदित साहित्य जहिना विधाक क्षेत्रसभमे। प्रस्तुत समीक्षा सिद्धान्तक उद्देश्य अछि—भारतीय आ पाश्चात्य साहित्य सिद्धान्तक समन्वय करैत मैथिली मूल आ अनूदित गद्य-पद्य साहित्यक मूल्यांकन लेल एकटा व्यवस्थित ढाँचा प्रस्तुत करब। ई सिद्धान्त न तऽ पूर्णतः भारतीय अछि, न पूर्णतः पाश्चात्य; ई दुनूक संवादसँ निर्मित एकटा तृतीय मार्ग अछि—जे मैथिली साहित्यक विशिष्टता (भाषा, संस्कृति, क्षेत्रीय अस्मिता) केँ केन्द्रमे राखैत, वैश्विक सैद्धान्तिक विकाससँ संवाद करैत अछि। प्रथम अध्याय: समीक्षा सिद्धान्तक आधारभूत तत्व १.१ स्थानीयता आ सार्वभौमिकताक समन्वय कोनो समीक्षा सिद्धान्तक पहिल चुनौती ई अछि जे ओ स्थानीय (मैथिली) साहित्यक विशिष्टता केँ सम्मान करय, मुदा सार्वभौमिक (भारतीय वा वैश्विक) साहित्यिक मानदण्डसँ संवाद करय। मैथिली साहित्यक विशिष्टता अछि: - क्षेत्रीय भाषाक अस्मिता: मैथिली भारतक उनतालीस भाषासभमे सँ एकटा, जकर अपन हजार वर्षक साहित्यिक परम्परा अछि (विद्यापतिसँ वर्तमान धरि)। - लोक आ शास्त्रक संगम: मैथिली साहित्यमे बिदापत नाच, सोहर, समदौनी, पगरी जहिना लोक-परम्परासभक गहिर उपस्थिति अछि। - प्रवासक अनुभव: मैथिली भाषी सभक विस्थापन (प्रवास) दलित साहित्य, महिला साहित्य, आ अनूदित साहित्यक एकटा केन्द्रीय विषय अछि। एहि विशिष्टता केँ केन्द्रमे राखैत, ई समीक्षा सिद्धान्त स्थानीय-सार्वभौमिक संवाद पर बल दैत अछि। अर्थात्, मैथिली साहित्यक मूल्यांकन लेल भारतीय सिद्धान्त (रस, ध्वनि, वक्रोक्ति) आ पाश्चात्य सिद्धान्त (उपनिवेशवाद-उत्तर, नारीवाद, उत्तर-आधुनिकतावाद) दुनूक प्रयोग करब, मुदा मैथिली साहित्यक स्थानीय सन्दर्भक अधीन राखि कऽ। १.२ मूल आ अनूदित साहित्यक समानता आ अन्तर ई समीक्षा सिद्धान्त मूल आ अनूदित साहित्यक बीच कोनो पदानुक्रम स्वीकार नै करत। दुनूक समान महत्व अछि, कारण: - मैथिली अनुवाद साहित्य (जेना प्रस्तुत संकलनमे तेलुगु, गुजराती, उड़िया दलित साहित्यक अनुवाद) मैथिली साहित्यक दायराकेँ विस्तार करैत अछि। - अनुवाद दोसरक आवाज (अन्यक स्वर) केँ मैथिली साहित्यमे स्थान दैत अछि—जे भारतीय साहित्यक बहुभाषीक स्वरूप लेल आवश्यक अछि। - मुदा अनुवादक मूल्यांकन लेल अनुवाद-विशिष्ट मापदण्ड आवश्यक अछि: निष्ठा (निष्ठा) वा मुक्ति (स्वातन्त्र्य)क पुरान द्वन्द्वसँ बाहर निकलि कऽ, अनुवादक सर्जनात्मकता पर ध्यान देब। १.३ गद्य आ पद्यक भिन्नता ई समीक्षा सिद्धान्त गद्य आ पद्यक बीच स्पष्ट अन्तर स्वीकार करत: - पद्य लेल भारतीय सिद्धान्त—रस, ध्वनि, अलंकार, छन्द—क अधिक उपयोगी अछि, कारण पद्यक संक्षिप्तता, लय, प्रतीकात्मकता एहि सिद्धान्तक अनुकूल अछि। - गद्य (कहानी, उपन्यास, नाटक, निबन्ध) लेल पाश्चात्य सिद्धान्त—मार्क्सवाद, नारीवाद, उपनिवेशवाद-उत्तर—क अधिक उपयोगी अछि, कारण गद्य विस्तार, चरित्र-विकास, सामाजिक-राजनीतिक सन्दर्भ पर अधिक निर्भर अछि। - मुदा ई विभाजन निरपेक्ष नै अछि; समीक्षक अपन विवेकसँ दुनूक संयोग करि सकैत अछि। द्वितीय अध्याय: भारतीय सिद्धान्तक प्रयोग २.१ रस सिद्धान्त रस सिद्धान्त भारतीय साहित्यशास्त्रक केन्द्रबिन्दु अछि। एहि समीक्षा सिद्धान्तमे रसक प्रयोग निम्नलिखित तरिकासँ कएल जायत: क. रसक नव रूप: शास्त्रीय नव रस (शृङ्गार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स, अद्भुत, शान्त) मैथिली साहित्यमे उपलब्ध अछि, मुदा ओकर स्वरूप भिन्न अछि। उदाहरण लेल, दलित साहित्यमे रौद्रक आश्रय राजा-योद्धा नै, बल्कि दलित समुदाय अछि; शृङ्गारक विभाव प्रेमी-प्रेमिका नै, बल्कि श्रम-शरीर अछि। ख. स्थायी भावक विस्तार: ई समीक्षा सिद्धान्त नव स्थायी भावक स्वीकार करत—श्रम, अभाव, प्रतिरोध, अस्मिता, प्रवास। ई सभ मैथिली साहित्यक विशिष्ट अनुभव अछि, आ ई सभ रसक परिणति पाबि सकैत अछि। ग. साधारणीकरणक पुनर्विचार: शास्त्रीय रस सिद्धान्त साधारणीकरण (साधारणीकरण) पर बल दैत अछि। मुदा दलित साहित्य, महिला साहित्य, प्रवासी साहित्यमे विशिष्टता (विशिष्टता) केँ सम्मान करबाक आवश्यकता अछि। ई समीक्षा सिद्धान्त साधारणीकरण आ विशिष्टताक द्वन्द्वकेँ समाधान करबाक लेल विशिष्ट-सार्वभौमिक (विशिष्ट-सार्वभौमिक)क अवधारणा प्रस्तावित करत—अर्थात्, विशिष्ट अनुभवकेँ सार्वभौमिक रूपमे प्रस्तुत नै करि, बल्कि विशिष्टक सार्वभौमिक महत्वकेँ स्थापित करब। २.२ ध्वनि सिद्धान्त (आनन्दवर्धन) ध्वनि सिद्धान्त व्यङ्ग्य (व्यञ्जित अर्थ) पर बल दैत अछि। मैथिली साहित्यक समीक्षामे ध्वनिक प्रयोग निम्नलिखित रूपमे होयत: क. व्यङ्ग्यक स्तर: मैथिली कविता (विद्यापतिसँ वर्तमान धरि) व्यङ्ग्य पर अधिक निर्भर अछि। समीक्षककेँ अभिधा (शाब्दिक अर्थ), लक्षणा (रूपकात्मक अर्थ), आ व्यञ्जना (व्यञ्जित अर्थ)क भेद करबाक आवश्यकता अछि। ख. ध्वनि आ अनुवाद: अनूदित साहित्यमे व्यङ्ग्यक अनुवाद सबसँ पैघ चुनौती अछि। ई समीक्षा सिद्धान्त मानैत अछि जे अनुवादक व्यङ्ग्यकेँ यथासंभव बचाए राखबाक चाही, मुदा जतय संभव नै अछि, ओतय सर्जनात्मक अनुवाद (सर्जनात्मक अनुवाद) केँ स्वीकार करबाक चाही। २.३ अलंकार सिद्धान्त अलंकार (उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, आदि) भारतीय साहित्यक सौन्दर्यशास्त्रक अभिन्न अंग अछि। ई समीक्षा सिद्धान्तमे: क. अलंकारक सामाजिकता: मैथिली दलित साहित्यमे अलंकार केवल अलंकरण (अलंकरण) लेल नै, बल्कि प्रतिरोधक साधनक रूपमे प्रयोग होइत अछि। उदाहरण लेल, साड़ीक कोर कवितामे मैसम्मा देवीक उपमा—ई व्यङ्ग्य सवर्ण-हिन्दू देवी-परम्पराक विपर्यास करैत अछि। ख. लोक-अलंकार: मैथिली साहित्यमे लोक-अलंकार (लोक-अलंकरण)क अलग परम्परा अछि—जेना कहावत, मुहावरा, लोकोक्ति। ई सभकेँ शास्त्रीय अलंकारक समान मूल्य देनाइ आवश्यक अछि। २.४ रीति सिद्धान्त (वामन) रीति सिद्धान्त शैली (शैली) पर बल दैत अछि। मैथिली साहित्यमे: क. मैथिलीक शैलीगत विशिष्टता: मैथिली भाषाक मधुरता, कोमलता, प्रवाह—ई सभ शैलीगत गुण अछि जे समीक्षामे ध्यान देबाक चाही। ख. अनुवादमे शैली: अनूदित साहित्यमे मूलक शैली (स्रोत-शैली) आ लक्ष्यक शैली (लक्ष्य-शैली)क बीच सन्तुलन समीक्षाक महत्वपूर्ण मुद्दा अछि। तृतीय अध्याय: पाश्चात्य सिद्धान्तक प्रयोग ३.१ उपनिवेशवाद-उत्तर सिद्धान्त उपनिवेशवाद-उत्तर सिद्धान्त (एडवर्ड सईद, गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक, होमी के. भाभा, दीपेश चक्रवर्ती) मैथिली साहित्यक समीक्षाक लेल अत्यन्त उपयोगी अछि, कारण: क. उपनिवेशक भाषा-नीति: मैथिली सदियों सँ उपनिवेशक भाषा (संस्कृत, फारसी, उर्दू, अंग्रेजी, हिन्दी)क प्रभावमे रहल अछि। ई समीक्षा सिद्धान्त पूछत: मैथिली साहित्य एहि उपनिवेशी दबावक सामना कइ प्रकारेँ करैत अछि? प्रतिरोधक रूप की अछि? समायोजनक रूप की अछि? ख. सबाल्टर्न (निम्नवर्गीय)क आवाज: गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाकक प्रश्न—"केन सबाल्टर्न बाजि सकैत अछि? "—मैथिली दलित साहित्य, महिला साहित्य, प्रवासी साहित्यक समीक्षाक लेल मूलभूत अछि। ई समीक्षा सिद्धान्त पूछत: मैथिली साहित्यमे सबाल्टर्न (दलित, महिला, प्रवासी, आदिवासी) के आवाज कइ प्रकारेँ प्रस्तुत अछि? के ओ आवाज मध्यस्थता (मध्यस्थता)सँ मुक्त अछि? यदि नै, तऽ ओ मध्यस्थता सशक्तीकरण (सशक्तीकरण) अछि वा पुनरुत्पादन (पुनरुत्पादन)? ख. प्रान्तीयकरण: दीपेश चक्रवर्तीक प्रान्तीयकरण (यूरोपकेँ प्रान्तीय बनाब)क अवधारणा मैथिली साहित्यक समीक्षाक लेल प्रासंगिक अछि। मैथिली साहित्यकेँ क्षेत्रीय (क्षेत्रीय)क श्रेणीमे सीमित करबाक प्रवृत्तिक विरोध करैत, ई समीक्षा सिद्धान्त मैथिली साहित्यक वैश्विक महत्वकेँ स्थापित करबाक प्रयास करत। ३.२ नारीवादी सिद्धान्त नारीवादी सिद्धान्त (वर्जीनिया वुल्फ, साइमोन द बोवा, जूडिथ बटलर) मैथिली साहित्यमे महिलाक अनुभव, शरीर, आवाज, प्रतिरोधक विश्लेषण लेल आवश्यक अछि। क. स्त्री-लेखनक विश्लेषण: मैथिली साहित्यमे महिला लेखिकाक उपस्थिति बढ़ैत अछि (जेना—उषा किरण खान, सुभद्रा झा, आदि)। ई समीक्षा सिद्धान्त पूछत: महिला लेखिकाक स्वर पुरुष लेखकक स्त्री-चरित्रसँ कइ प्रकारेँ भिन्न अछि? ख. शरीरक राजनीति: मैथिली साहित्यमे स्त्री-शरीरक प्रतिनिधित्व केन्द्रीय मुद्दा अछि। नारीवादी सिद्धान्तक सहायतासँ समीक्षक विश्लेषण करि सकैत अछि जे स्त्री-शरीर शृङ्गारक अलंकार अछि वा श्रमक दस्तावेज? वासनाक विषय अछि वा प्रतिरोधक स्थान? ग. अन्तर्विच्छेदीयता (बहु-उत्पीड़न-अन्तर्सम्बन्ध): दलित नारीवाद (जेना—शैला देवी, बीमा भीम) जाति आ लिङ्गक दोहरा उत्पीड़नक विश्लेषण करैत अछि। ई समीक्षा सिद्धान्त अन्तर्विच्छेदीयताकेँ केन्द्रमे राखैत अछि, अर्थात्—मैथिली साहित्यमे स्त्रीक अनुभव जाति, वर्ग, क्षेत्र, धर्मक सँगममे देखब। ३.३ मार्क्सवादी सिद्धान्त मार्क्सवादी सिद्धान्त (कार्ल मार्क्स, जॉर्ज लुकाच, एंटोनियो ग्राम्सी) साहित्यक वर्ग-संघर्ष, आर्थिक-आधार, विचारधाराक विश्लेषण लेल उपयोगी अछि। क. वर्ग-संघर्ष: मैथिली साहित्यमे जमीन्दार-किसान, मजूर-मालिक, सवर्ण-दलितक द्वन्द्व केन्द्रीय विषय अछि। मार्क्सवादी सिद्धान्त एहि द्वन्द्वक आर्थिक आधारक विश्लेषण करैत अछि। ख. हेगेमोनी (प्रभुत्व): ग्राम्सीक हेगेमोनीक अवधारणा मैथिली साहित्यमे सवर्ण-वर्चस्वक सांस्कृतिक रूपक विश्लेषण लेल उपयोगी अछि। उदाहरण लेल, विद्यापतिकेँ ब्राह्मण घोषित करबाक प्रक्रिया—ई हेगेमोनीक कार्य अछि। ग. बाजार-पूँजीवाद: अनूदित साहित्य, विशेषतः दलित साहित्यक अनुवाद, बाजार आ प्रकाशन-उद्योगक दबावमे आबि रहल अछि। मार्क्सवादी समीक्षा एहि आर्थिक-राजनीतिक सन्दर्भक विश्लेषण करैत अछि। ३.४ उत्तर-आधुनिकतावाद आ उत्तर-संरचनावाद उत्तर-आधुनिकतावाद (ज्याँ-फ्राँस्वा ल्योतार) आ उत्तर-संरचनावाद (जाक देरिदा, मिशेल फूको) सत्य, पहिचान, लेखक, इतिहास जहिना अवधारणासभक अस्थिरता पर बल दैत अछि। क. पहिचानक अस्थिरता: मैथिली साहित्यमे मैथिल पहिचान—भाषिक, सांस्कृतिक, क्षेत्रीय—स्वाभाविक नै, बल्कि निर्मित (निर्मित) अछि। उत्तर-आधुनिक समीक्षा एहि निर्माणक प्रक्रियाक विश्लेषण करैत अछि। ख. लेखकक मृत्यु: देरिदाक लेखकक मृत्यु (लेखकक मृत्यु)क अवधारणा अनूदित साहित्यक समीक्षाक लेल विशेष रूपसँ प्रासंगिक अछि। अनुवादमे मूल-लेखक आ अनुवादकक बीचक सीमा धुंधला भऽ जाइत अछि। ई समीक्षा सिद्धान्त लेखकक अवधारणाकेँ अनुवाद-प्रक्रियाक सन्दर्भमे पुनर्विचार करबाक प्रस्ताव करैत अछि। ग. इतिहासक विखण्डन: फूकोक इतिहासक पुरातत्व (इतिहासक पुरातत्त्व) मैथिली साहित्यक इतिहास-लेखनक आलोचनात्मक पुनर्पाठ लेल उपयोगी अछि। उदाहरण लेल, विद्यापतिक जाति-निर्माणक इतिहास—ई इतिहास-लेखनक राजनीतिक विश्लेषणक माग करैत अछि। चतुर्थ अध्याय: समीक्षा सिद्धान्तक व्यावहारिक ढाँचा ४.१ समीक्षाक स्तर ई समीक्षा सिद्धान्त साहित्यिक कृतिक विश्लेषण लेल पाँच स्तर प्रस्तावित करत: प्रथम स्तर: भाषिक विश्लेषण - मैथिली भाषाक शैली, लय, शब्दावली, व्याकरणिक विशिष्टताक विश्लेषण। - अनूदित साहित्यमे स्रोत भाषा (स्रोत-भाषा) आ लक्ष्य भाषा (लक्ष्य-भाषा)क बीच समानता आ अन्तरक विश्लेषण। द्वितीय स्तर: शैलीगत विश्लेषण - भारतीय सिद्धान्तक प्रयोग—रीति, अलंकार, गुण, दोष। - पाश्चात्य सिद्धान्तक प्रयोग—शैली, आख्यान-तकनीक (आख्यान तकनीक), बिम्ब-विधान (बिम्ब-योजना), प्रतीक (प्रतीकशास्त्र)। तृतीय स्तर: रस-ध्वनि विश्लेषण - कृतिक स्थायी भावक पहिचान। - विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी भावक विश्लेषण। - व्यङ्ग्यक स्तरक पहिचान आ विश्लेषण। - रस-निष्पत्तिक प्रक्रियाक मूल्यांकन। चतुर्थ स्तर: सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण - मार्क्सवादी सिद्धान्त—वर्ग-संघर्ष, आर्थिक-आधार, विचारधारा। - नारीवादी सिद्धान्त—लिङ्ग-राजनीति, शरीरक राजनीति, अन्तर्विच्छेदीयता। - उपनिवेशवाद-उत्तर सिद्धान्त—सबाल्टर्न आवाज, प्रान्तीयकरण, अनुवाद-राजनीति। पञ्चम स्तर: आस्वादक विश्लेषण (सौन्दर्यात्मक विश्लेषण) - सहृदयक दृष्टिसँ कृतिक आस्वादक अनुभव। - दूरी (दूरी) आ निकटता (निकटता)क द्वन्द्व। - पीड़ाक आस्वादक नैतिकता (नैतिकता क पीड़ाक आस्वाद)। ४.२ विधा-विशिष्ट विश्लेषण क. कविता लेल: - छन्द, लय, अन्त्यानुप्रास (तुक), तुक (लय)क विश्लेषण—भारतीय सिद्धान्तक अधिक प्रयोग। - बिम्ब (बिम्ब), प्रतीक (प्रतीक), रूपक (रूपक)क विश्लेषण—पाश्चात्य सिद्धान्तक प्रयोग। - व्यङ्ग्य (ध्वनि)क स्तरक पहिचान। ख. कहानी आ उपन्यास (लघुकथा आ उपन्यास) लेल: - आख्यान-तकनीक (आख्यान तकनीक)—सर्वज्ञ-आख्यान, प्रथम-पुरुष-आख्यान, बहु-आख्यान। - चरित्र-विकास (चरित्र विकास)—गोल-चरित्र (बहुआयामी चरित्र), सपाट-चरित्र (एकरेखीय चरित्र), अस्तित्ववादी-चरित्र। - कथानक (कथानक)—रेखीय (रैखिक), चक्रीय (चक्रीय), खण्डित (विखण्डित), प्रवाह-चेतना (चेतना-प्रवाह)। - समय-संरचना (काल-संरचना)—कालक्रम, अकालक्रम, पुनर्स्मरण (पूर्वस्मृति), पूर्व-सूचन (पूर्वाभास)। ग. नाटक लेल: - रङ्गमञ्चीयता (रङ्गमञ्चीयता)—अभिनय, वाद्य, संवाद, दर्शक-सम्बन्ध। - भारतीय नाट्यशास्त्रक सिद्धान्त—वृत्ति, प्रवृत्ति, पुरुष-प्रकृति, नायक-नायिका-भेद। - पाश्चात्य नाट्य-सिद्धान्त—एपिक थियेटर (ब्रेख्त), एब्सर्ड थियेटर (बेकेट, इयोनेस्को), फेमिनिस्ट थियेटर। घ. अनुवाद साहित्य (अनूदित साहित्य) लेल: - स्रोत भाषा (स्रोत-भाषा) आ लक्ष्य भाषा (लक्ष्य-भाषा)क बीच समकक्षता (समतुल्यता)क स्तर। - व्यङ्ग्यक अनुवाद—ध्वनिक हानि वा संरक्षण। - सांस्कृतिक-अनुवाद (सांस्कृतिक अनुवाद)—स्थानीयताक वैश्विक सन्दर्भमे प्रस्तुति। - अनुवादकक सर्जनात्मकता (सर्जनात्मकता)—निष्ठा (निष्ठा) आ मुक्ति (स्वातन्त्र्य)क सन्तुलन। ४.३ मैथिली साहित्यक विशिष्ट श्रेणीसभ ई समीक्षा सिद्धान्त मैथिली साहित्यक निम्नलिखित विशिष्ट श्रेणीसभक स्वीकार करत: क. लोक-साहित्य: बिदापत नाच, सोहर, समदौनी, पगरी, विवाह-गीत, चौरा-चौरी, झूमर—ई सभ विधाक विश्लेषण लेल लोक-सौन्दर्यशास्त्र (लोक सौन्दर्यशास्त्र)क विकास आवश्यक अछि। ख. दलित साहित्य: मैथिली दलित साहित्य अपेक्षाकृत नव अछि, मुदा तेजीसँ बढ़ि रहल अछि। ई साहित्यक विश्लेषण लेल दलित सौन्दर्यशास्त्र (दलित सौन्दर्यशास्त्र)—दर्द, आक्रोश, प्रतिरोध, अस्मिता, संघर्ष—क अवधारणा आवश्यक अछि। ग. महिला साहित्य (स्त्री-साहित्य): मैथिली महिला साहित्यमे स्त्री-शरीर, गृह-बाहिर, मातृत्व, वासना, प्रतिरोध जहिना विषय सभक विश्लेषण लेल नारीवादी सौन्दर्यशास्त्र (नारीवादी सौन्दर्यशास्त्र) आवश्यक अछि। घ. प्रवासी साहित्य: मैथिली प्रवासी साहित्य (जे दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, आ प्रवासी देशसभमे लिखल जाइत अछि)क विश्लेषण लेल प्रवासी सौन्दर्यशास्त्र (प्रवासी सौन्दर्यशास्त्र)—बहुपहिचान, हाइब्रिडिटी, मूल-विस्थापन—क अवधारणा आवश्यक अछि। पञ्चम अध्याय: समीक्षा सिद्धान्तक उदाहरणात्मक प्रयोग ५.१ उदाहरण: प्रस्तुत संकलनक समीक्षा प्रस्तुत संकलन (मैथिलीमे अनूदित दलित साहित्य)क विश्लेषण निम्नलिखित स्तर पर होयत: प्रथम स्तर: भाषिक विश्लेषण - मैथिली अनुवादमे मूल तेलुगु, गुजराती, उड़िया भाषाक लय, शब्दावली, मुहावराकेँ कइ प्रकारेँ प्रस्तुत कएल गेल अछि? - उर्दू शब्दसभ (जे तेलुगु तेलंगाना बोलीमे उपस्थित अछि)क मैथिली अनुवादमे कइ प्रकारेँ स्थानीयकरण (स्थानीयकरण) कएल गेल अछि? द्वितीय स्तर: शैलीगत विश्लेषण - कवितासभमे बिम्ब-विधान (जेना—जरैत खोपड़ी, साड़ीक कोर, मान्केनापुव्वु)क प्रयोग कइ प्रकारेँ दलित सौन्दर्यशास्त्रक निर्माण करैत अछि? - कहानी ("कौआ", "कारी मसि")मे आख्यान-तकनीक (यथार्थवादी, प्रतीकात्मक, रूपकात्मक)क प्रयोग की अछि? तृतीय स्तर: रस-ध्वनि विश्लेषण - रौद्र, वीभत्स, करुण—ई तीन रसक स्थायी भावक पहिचान। - शृङ्गारक विपर्यास—श्रम-शरीर, अभाव-शरीरक शृङ्गारक रूपमे प्रस्तुति। - व्यङ्ग्यक स्तर—जरैत खोपड़ीक व्यङ्ग्य (दलित-अस्मिता, धर्म-राजनीति, पुनर्जन्म-विडम्बना)। चतुर्थ स्तर: सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण - वर्ग-संघर्ष—जमीन्दार-किसान, पूँजी-श्रमिकक द्वन्द्व। - जाति-राजनीति—सवर्ण-दलितक द्वन्द्व, अस्पृश्यता, जाति-हिंसा। - लिङ्ग-राजनीति—पितृसत्ता, स्त्री-शरीरक उत्पीड़न, दलित-स्त्रीक दोहरा उत्पीड़न। - सबाल्टर्न आवाज—मादिग (चर्मकार), बण्डोडु, कलन्दर (भालू-नचबै बला) जहिना हाशियाकृत समुदायक प्रतिनिधित्व। पञ्चम स्तर: आस्वादक विश्लेषण - पीड़ाक आस्वाद—की पाठक दलित-पीड़ाक आस्वाद करि सकैत अछि? यदि करि सकैत अछि, तऽ ई आस्वादक नैतिकता की अछि? - दूरी आ निकटता—दलित-पाठक आ गैर-दलित-पाठकक आस्वादक अनुभव भिन्न होइत अछि वा नै? - रस-निष्पत्ति—की एहि साहित्यमे रसक निष्पत्ति भेल अछि, वा ई रसक सीमा पर ठोकर खाइत अछि? षष्ठ अध्याय: समीक्षा सिद्धान्तक सीमा आ सम्भावना ६.१ सीमा (सीमासभ) कोनो सिद्धान्त पूर्ण नै होइत अछि। ई समीक्षा सिद्धान्तक निम्नलिखित सीमा अछि: क. समन्वयक कठिनाई: भारतीय आ पाश्चात्य सिद्धान्तक शब्दावली, अवधारणा, दर्शन भिन्न अछि। ओकर समन्वय हमेशा तनाव (तनाव) सृजना करैत अछि। ई सिद्धान्त ओहि तनावकेँ दमन नै करैत, बल्कि सर्जनात्मक रूपमे प्रयोग करबाक सुझाव दैत अछि। ख. मैथिली साहित्यक विविधता: मैथिली साहित्य विद्यापतिसँ वर्तमान धरि अपार विविधतासँ भरल अछि—महाकाव्य, पद्यावली, लोक-नाट्य, आधुनिक कविता, उपन्यास, कहानी, दलित-लेखन, महिला-लेखन, प्रवासी-लेखन। एकटा सिद्धान्त सभ विधाक पूर्ण व्याख्या करि सकय, ई दावा करब अनुचित अछि। ई सिद्धान्त लचीलापन (लचीलापन) पर बल दैत अछि—समीक्षक अपन विवेकसँ सिद्धान्तक प्रयोग करत। ग. अनुवादक विशिष्टता: अनूदित साहित्यक समीक्षा लेल मूल आ अनुवादक दुनूक ज्ञान आवश्यक अछि। मुदा सभ समीक्षक बहुभाषी नै होइत अछि। ई सिद्धान्त अनुवाद-समीक्षाक सीमाकेँ स्वीकार करैत अछि, आ सहयोगात्मक समीक्षा (सहयोगात्मक समीक्षा)क सम्भावना खोजैत अछि। ६.२ सम्भावना (सम्भावनासभ) क. अन्तःविषयकता: ई समीक्षा सिद्धान्त साहित्यकेँ इतिहास, समाजशास्त्र, राजनीति-विज्ञान, दर्शन, भाषा-विज्ञानसँ जोड़ैत अछि। ई अन्तःविषयक दृष्टि मैथिली साहित्यक बहु-आयामी (बहुआयामी) विश्लेषणक सम्भावना खोलैत अछि। ख. तुलनात्मक साहित्य: ई सिद्धान्त मैथिली साहित्यक अन्य भारतीय भाषाक साहित्य (तेलुगु, गुजराती, उड़िया, बंगला, हिन्दी) आ वैश्विक साहित्यसँ तुलनात्मक अध्ययनक सम्भावना खोलैत अछि। ग. अनुवाद-अध्ययन: ई सिद्धान्त अनुवादकेँ गौण (गौण) नै, बल्कि सर्जनात्मक (सर्जनात्मक) विधाक रूपमे स्थापित करैत अछि। ई अनुवाद-समीक्षाक विकासक सम्भावना खोलैत अछि। घ. सिद्धान्तक स्थानीयकरण: ई सिद्धान्त पाश्चात्य सिद्धान्तक स्वीकार आ आलोचना दुनूक प्रस्ताव करैत अछि—उपनिवेशवाद-उत्तर (उपनिवेशवाद-उत्तर) सिद्धान्तक प्रयोग करैत, मुदा यूरोकेन्द्रिक (यूरोप-केन्द्रित) प्रवृत्तिक आलोचना सेहो करैत अछि। निष्कर्ष: समीक्षा सिद्धान्तक भविष्य ई समीक्षा सिद्धान्त भारतीय आ पाश्चात्य सिद्धान्तक समन्वयक प्रयास अछि, मुदा ई समन्वय अन्तर्विरोधसँ मुक्त नै अछि। ई अन्तर्विरोध सिद्धान्तक दुर्बलता नै, बल्कि शक्ति अछि—कारण ई साहित्यक जटिलताक स्वीकार करैत अछि, ओकरा सरल करबाक प्रयास नै करैत। मैथिली साहित्य, अपन हजार वर्षक इतिहास, अपन लोक-शास्त्र-संगम, अपन प्रवास-अनुभव, अपन दलित-महिला-आवाजक उदय—एहि सभ विशिष्टता लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्तक आवश्यकता अछि जे स्थानीय (स्थानीय) केँ केन्द्रमे राखैत, वैश्विक (वैश्विक)सँ संवाद करय। ई सिद्धान्त ओहि आवश्यकताक उत्तर देबाक प्रयास अछि। ई सिद्धान्त अन्तिम सत्यक दावा नै करत; ई प्रारम्भिक बिन्दु अछि। ई मैथिली साहित्यक समीक्षाक नव द्वार खोलैत अछि—जतय रस आ दर्द, ध्वनि आ प्रतिरोध, अलंकार आ हाइब्रिडिटी, शान्त आ संघर्षक संवाद संभव होइत अछि। समीक्षकक अन्तिम टिप्पणी: कोनो समीक्षा सिद्धान्त जीवित तखन होइत अछि, जखन ओ विकसित (विकसित होब) होइत रहैत अछि, प्रश्न करैत रहैत अछि, नव साहित्यिक अनुभवक सामना करैत रहैत अछि। ई सिद्धान्त ओहि विकासक आमन्त्रण अछि। मैथिली साहित्यक भविष्यक समीक्षा एहि आमन्त्रणक प्रतिक्रिया देति रहत। परिशिष्ट: समीक्षा सिद्धान्तक संक्षिप्त रूपरेखा विश्लेषण स्तर भारतीय सिद्धान्त पाश्चात्य सिद्धान्त मैथिली विशिष्टता भाषिक शब्द-शक्ति, व्याकरण स्टाइलिस्टिक्स, लिंग्विस्टिक्स मैथिली उच्चारण, मुहावरा शैलीगत रीति, अलंकार, गुण, दोष नैरेटोलॉजी, इमेजरी, सिंबोलिज्म लोक-अलंकार, कहावत रस-ध्वनि रस, ध्वनि, व्यङ्ग्य फेनोमेनोलॉजी, हर्मेन्यूटिक्स दलित-रस, प्रवास-रस सामाजिक - मार्क्सवाद, नारीवाद, पोस्टकोलोनियल जाति-लिङ्ग-वर्ग-प्रवास आस्वादक सहृदय, व्युत्पत्ति रिसेप्शन थ्योरी, रीडर-रेस्पॉन्स दलित-पाठक, गैर-दलित-पाठक ई रूपरेखा समीक्षककेँ लचीलापन दैत अछि—अपन विवेकसँ स्तर आ सिद्धान्तक चयन करबाक स्वतन्त्रता। दलित साहित्य लेल समीक्षा सिद्धान्त: भारतीय आ पाश्चात्य साहित्य सिद्धान्तक आधार पर मैथिली मूल आ अनूदित दलित गद्य-पद्य साहित्यक विशिष्ट समीक्षा हेतु प्रस्तावना: दलित साहित्यक समीक्षाक विशिष्ट आवश्यकता दलित साहित्य केवल साहित्यक विधा नै अछि; ई एकटा आन्दोलन अछि, प्रतिरोधक एकटा घोषणापत्र अछि। ई दर्द (पीड़ा), आक्रोश (आक्रोश), अस्मिता (अस्मिता), संघर्ष (संघर्ष) केँ अपन केन्द्रबिन्दु बनाबैत अछि। एहि कारण, दलित साहित्यक समीक्षा लेल सामान्य साहित्यिक सिद्धान्त अपर्याप्त अछि। एकटा विशिष्ट समीक्षा सिद्धान्तक आवश्यकता अछि—जे दलित साहित्यक विशिष्टता (विशिष्टता) केँ स्वीकार करय, ओकर राजनीति (राजनीति) केँ समझय, आ ओकर सौन्दर्यशास्त्र (सौन्दर्यशास्त्र) केँ रस सिद्धान्तक परम्परासँ संवाद कराबय। प्रस्तुत सिद्धान्त भारतीय (रस, ध्वनि, अलंकार, रीति, औचित्य) आ पाश्चात्य (मार्क्सवाद, नारीवाद, उपनिवेशवाद-उत्तर, दलित-आन्दोलन सिद्धान्त, उत्तर-आधुनिकतावाद) सिद्धान्तक समन्वय करैत, मैथिली मूल आ अनूदित दलित गद्य-पद्य साहित्यक समीक्षा लेल एकटा फाइन-ट्यून्ड ढाँचा प्रस्तुत करैत अछि। प्रथम अध्याय: दलित साहित्यक विशिष्टता—सैद्धान्तिक आधार १.१ दलित सौन्दर्यशास्त्रक आधारभूत तत्व दलित साहित्यक सौन्दर्यशास्त्र शास्त्रीय सौन्दर्यशास्त्रसँ मूलतः भिन्न अछि। शास्त्रीय सौन्दर्यशास्त्र (रस, अलंकार, ध्वनि) सहृदयक आस्वाद पर केन्द्रित अछि; दलित सौन्दर्यशास्त्र दलित-अनुभवक प्रामाणिकता (प्रामाणिकता) पर केन्द्रित अछि। ई सिद्धान्त निम्नलिखित दलित-विशिष्ट अवधारणासभक स्वीकार करत: क. दर्द (पीड़ा) स्थायी भावक रूपमे: शास्त्रीय रस सिद्धान्तमे करुण (करुणा)क स्थायी भाव शोक (शोक) अछि। मुदा दलित साहित्यमे शोक नै, दर्द—जे शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, ऐतिहासिक—सब स्तर पर व्याप्त अछि। ई सिद्धान्त दर्दकेँ स्थायी भावक रूपमे स्वीकार करत, आ ओकर रस-परिणतिक सम्भावना खोजत। ख. आक्रोश रौद्रक विस्तारक रूपमे: शास्त्रीय रौद्र (उग्र क्रोध)क स्थायी भाव क्रोध अछि, आ ओकर आश्रय राजा-योद्धा (असुर-दैत्य-वध) अछि। दलित साहित्यमे आक्रोशक आश्रय दलित समुदाय अछि, आ ओकर विषय जाति-व्यवस्था अछि। ई सिद्धान्त आक्रोशकेँ रौद्रक विस्तार (आ नव रूप)क रूपमे स्वीकार करत। ग. अस्मिता वीरक नव रूपक रूपमे: शास्त्रीय वीर (वीर)क स्थायी भाव उत्साह अछि, आ ओकर आश्रय राजा-क्षत्रिय-योद्धा अछि। दलित साहित्यमे अस्मिताक उत्साह दलित-पहिचानक पुनर्निर्माण (पुनर्दावा) अछि। ई सिद्धान्त अस्मिताकेँ वीरक नव रूपक रूपमे स्वीकार करत। घ. संघर्ष रसक नव रूपक रूपमे: श्रम, अभाव, प्रतिरोध, प्रवास—ई सभ स्थायी भाव शास्त्रीय रसक कोनो श्रेणीमे सीधा नै अबैत अछि। ई सिद्धान्त ई सभकेँ नव स्थायी भावक रूपमे स्वीकार करत, आ ओकर रस-परिणति (श्रम-रस, अभाव-रस, प्रतिरोध-रस, प्रवास-रस)क सम्भावना खोजत। १.२ दलित साहित्यक सामाजिक-राजनीतिक आधार क. जाति-व्यवस्थाक केन्द्रीयता: दलित साहित्यक समीक्षा लेल जाति-व्यवस्था केन्द्रीय श्रेणी अछि। वर्ग (वर्ग), लिङ्ग (लिंग), क्षेत्र (क्षेत्र) सभ महत्वपूर्ण अछि, मुदा जाति (जाति) दलित साहित्यक मूल-संरचना (प्राथमिक संरचना) अछि। ख. अस्पृश्यताक अनुभव: अस्पृश्यता (अस्पृश्यता) केवल सामाजिक नै, मानसिक, शारीरिक, आध्यात्मिक—सब स्तर पर दलित-अनुभवक केन्द्रीय तत्व (केन्द्रीय तत्त्व) अछि। दलित साहित्यक समीक्षामे अस्पृश्यताक सौन्दर्यशास्त्र (अस्पृश्यताक सौन्दर्यशास्त्र)क विकास आवश्यक अछि। ग. बहिष्कारक राजनीति: दलित साहित्य बहिष्कार (बहिष्करण)क दस्तावेज अछि—शिक्षासँ, धर्मसँ, समाजसँ, इतिहाससँ, साहित्यसँ। दलित साहित्यक समीक्षा एहि बहिष्कारक संरचना (संरचना) आ प्रतिरोधक रणनीति (रणनीति)क विश्लेषण करत। घ. दलित-इतिहासक पुनर्लेखन: दलित साहित्य इतिहास (इतिहास)केँ पुनः लिखबाक (पुनर्लेखन) प्रयास अछि—सवर्ण-इतिहास-लेखनक विरुद्ध (विरुद्ध) आ दलित-दृष्टि (दलित दृष्टिकोण)सँ इतिहासक पुनर्निर्माण (पुनर्निर्माण)। दलित साहित्यक समीक्षा एहि इतिहास-लेखनक राजनीति (इतिहासलेखनक राजनीति)क विश्लेषण करत। द्वितीय अध्याय: दलित साहित्य लेल भारतीय सिद्धान्तक फाइन-ट्यूनिंग २.१ रस सिद्धान्तक दलित-पुनर्पाठ क. दर्द-रस (पीड़ा रस)क प्रस्तावना शास्त्रीय रस सिद्धान्तमे दर्द (पीड़ा) केवल करुण (करुणा)क अनुभाव (परिणाम) अछि, स्थायी भाव (स्थायी भाव) नै। दलित साहित्यक अनुभवसँ ई सिद्धान्त दर्दकेँ स्थायी भावक रूपमे स्वीकार करैत अछि: - स्थायी भाव: दर्द (पीड़ा) - विभाव (विभाव): जाति-हिंसा, अस्पृश्यता, भूख, बेरोजगारी, प्रवास, शोषण, अपमान, बहिष्कार - अनुभाव (अनुभाव): आँसु, विलाप, शरीरक पीड़ा, मौन, क्रोध, प्रतिरोध, एकाकीपन, आत्म-हत्या - व्यभिचारी भाव (सञ्चारी भाव): निराशा, आशा, क्रोध, भय, घृणा, लज्जा, गर्व, उत्साह - रस-निष्पत्ति: दर्द-रस ख. आक्रोश-रस (आक्रोश रस)क प्रस्तावना शास्त्रीय रौद्र (उग्र क्रोध) दलित साहित्यक आक्रोश (आक्रोश)क पूर्ण व्याख्या नै करि सकैत, कारण रौद्रक आश्रय (कर्ता-विषय) राजा-योद्धा अछि, आक्रोशक आश्रय दलित समुदाय। ई सिद्धान्त आक्रोश-रसक प्रस्ताव करैत अछि: - स्थायी भाव: आक्रोश - विभाव: जाति-अपमान, शोषण, अत्याचार, न्याय-विहीनता, ऐतिहासिक अन्याय - अनुभाव: चीत्कार, प्रतिरोध-गीत, संघर्ष-आन्दोलन, लेखन-क्रान्ति, आत्म-साक्ष्य - व्यभिचारी भाव: क्रोध, घृणा, उत्साह, साहस, भय, आशा, निराशा - रस-निष्पत्ति: आक्रोश-रस ग. अस्मिता-रस (अस्मिता रस)क प्रस्तावना शास्त्रीय वीर (वीर) दलित साहित्यक अस्मिता (अस्मिता)क पूर्ण व्याख्या नै करि सकैत, कारण वीरक आश्रय क्षत्रिय-योद्धा अछि, अस्मिताक आश्रय दलित-पुनर्जागरण (दलित पुनर्जागरण)। ई सिद्धान्त अस्मिता-रसक प्रस्ताव करैत अछि: - स्थायी भाव: अस्मिता - विभाव: दलित-इतिहासक पुनर्खोज, दलित-प्रतीकक पुनर्स्थापना, दलित-भाषाक पुनर्निर्माण - अनुभाव: गर्व, आत्म-विश्वास, साहस, संघर्ष, एकता, संगठन - व्यभिचारी भाव: उत्साह, गर्व, क्रोध, आशा, निराशा, संकल्प - रस-निष्पत्ति: अस्मिता-रस घ. संघर्ष-रस (संघर्ष रस)क प्रस्तावना श्रम, अभाव, प्रतिरोध, प्रवास—ई सभ स्थायी भाव दलित साहित्यक केन्द्रीय अनुभव अछि। ई सिद्धान्त संघर्ष-रसक प्रस्ताव करैत अछि: - स्थायी भाव: संघर्ष - विभाव: श्रम, अभाव, प्रतिरोध, प्रवास, जीविका-संघर्ष - अनुभाव: श्रम-गीत, प्रतिरोध-गीत, प्रवास-गीत, शरीरक थकावट, संघर्षक आँसु - व्यभिचारी भाव: निराशा, आशा, क्रोध, उत्साह, भय, साहस - रस-निष्पत्ति: संघर्ष-रस २.२ ध्वनि सिद्धान्तक दलित-पुनर्पाठ ध्वनि सिद्धान्त (आनन्दवर्धन) व्यङ्ग्य (व्यञ्जित अर्थ) पर बल दैत अछि। दलित साहित्यमे व्यङ्ग्यक तीन स्तर विशेष रूपसँ महत्वपूर्ण अछि: क. व्यङ्ग्यक प्रथम स्तर—शाब्दिक व्यङ्ग्य: शब्दक शाब्दिक (शाब्दिक) अर्थ आ व्यङ्ग्य (व्यञ्जित) अर्थक बीचक अन्तर। उदाहरण लेल, "हमर पैतृक अधिकार" कवितामे कब्रिस्तान खननाइ—शाब्दिक अर्थ अछि मुर्दा-खोदाइ, व्यङ्ग्य अर्थ अछि अधिकार-खोज। ख. व्यङ्ग्यक द्वितीय स्तर—पौराणिक व्यङ्ग्य: पुराण-इतिहासक प्रतीकसभक दलित-दृष्टिसँ पुनर्पाठ। उदाहरण लेल, "हमर पैतृक अधिकार" कवितामे व्यास, अरुन्धती, मत्स्यगन्धी—ई सभ पौराणिक चरित्रक दलित-दृष्टिसँ पुनर्व्याख्या। ग. व्यङ्ग्यक तृतीय स्तर—वैचारिक व्यङ्ग्य: जाति-व्यवस्था, धर्म, राजनीति, इतिहास—ई सभ विचारधारा (विचारधारा)क दलित-दृष्टिसँ व्यङ्ग्य। उदाहरण लेल, "जरैत खोपड़ी सभ" कवितामे पुनर्जन्मक अवधारणाक व्यङ्ग्य—धर्मक आवरणमे जाति-हिंसाक स्थापना। २.३ अलंकार सिद्धान्तक दलित-पुनर्पाठ अलंकार केवल अलंकरण (अलंकरण) नै, दलित साहित्यमे प्रतिरोधक हथियार अछि: क. विपर्यास-अलंकार (उलट-अलंकार): शास्त्रीय अलंकारक दलित-विपर्यास। उदाहरण लेल, साड़ीक कोर कवितामे मैसम्मा देवीक उपमा—ई उपमा-अलंकारक विपर्यास अछि, जतय देवी (शास्त्रीय आदर्श)क श्रम-शरीर (दलित-यथार्थ)मे परिणत कएल गेल अछि। ख. लोक-अलंकार: शास्त्रीय अलंकार (उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, आदि)क संग-संग लोक-अलंकार—कहावत, मुहावरा, लोकोक्ति, पहेली, लोक-गीतक अलंकार—केँ समान मूल्य देनाइ। उदाहरण लेल, "गुड़-पीटल पाथर जकाँ अचल" (सदा लेल मित्र उपन्यासमे)—ई लोक-अलंकार अछि। ग. अभाव-अलंकार (अनुपस्थिति-अलंकार): अभाव (अनुपस्थिति) केँ अलंकारक रूपमे प्रयोग। उदाहरण लेल, "लोक, जमि जाय" कवितामे खालीपन, पाथर, कङ्कड़—ई सभ अभावक प्रतीक अछि, जे अभाव-अलंकारक रूपमे प्रयोग भेल अछि। २.४ रीति सिद्धान्तक दलित-पुनर्पाठ रीति सिद्धान्त (वामन) शैली (शैली) पर बल दैत अछि। दलित साहित्यक शैलीगत विशिष्टता: क. प्रतिरोधक शैली (प्रतिरोध-शैली): शास्त्रीय माधुर्य-गुण (माधुर्य) वा ओज-गुण (ओज)क विपरीत, दलित साहित्यक शैली तीक्ष्ण, कर्कश, अश्लील, विद्रोही होइत अछि। ई शैली शास्त्रीय-शैलीक दलित-विपर्यास अछि। ख. साक्षी-शैली (साक्ष्य-शैली): दलित साहित्यक शैली साक्षी (साक्ष्य)क शैली अछि—आत्म-कथा, अनुभव-कथा, दस्तावेज-कथा। ई शैली व्यक्तिगत (व्यक्तिगत) आ सामूहिक (सामूहिक)क बीच सीमा-रेखा मिटाबैत अछि। ग. लोक-शैली: दलित साहित्यक शैली लोक-भाषा, लोक-गीत, लोक-कथा, लोक-नाट्यसँ गहिर रूपसँ जुड़ल अछि। ई लोक-शैली शास्त्रीय-शैलीक दलित-प्रतिरोध अछि। तृतीय अध्याय: दलित साहित्य लेल पाश्चात्य सिद्धान्तक फाइन-ट्यूनिंग ३.१ उपनिवेशवाद-उत्तर सिद्धान्तक दलित-पुनर्पाठ क. सबाल्टर्न (निम्नवर्गीय)क दलित-पुनर्पाठ: गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाकक प्रश्न—"केन सबाल्टर्न बाजि सकैत अछि? "—दलित साहित्यक समीक्षाक लेल मूलभूत अछि। दलित साहित्य सबाल्टर्न (उपनिवेशवाद-उत्तर सिद्धान्तक श्रेणी) आ दलित (भारतीय जाति-व्यवस्थाक श्रेणी)क बीच तनाव (तनाव) केँ प्रकट करैत अछि। ई सिद्धान्त पूछत: दलित साहित्यमे सबाल्टर्नक आवाज मध्यस्थता (मध्यस्थता)सँ मुक्त अछि वा नै? यदि मुक्त नै अछि, तऽ ओ मध्यस्थता सशक्तीकरण (सशक्तीकरण) अछि वा पुनरुत्पादन (पुनरुत्पादन)? ख. प्रान्तीयकरणक दलित-पुनर्पाठ: दीपेश चक्रवर्तीक प्रान्तीयकरण (यूरोपकेँ प्रान्तीय बनाब)क अवधारणा दलित साहित्यक समीक्षाक लेल प्रासंगिक अछि। दलित साहित्य सवर्ण-साहित्य (ब्राह्मणवादी साहित्य)केँ प्रान्तीय (प्रान्तीय) सिद्ध करबाक प्रयास अछि—जे सार्वभौमिक (सार्वभौमिक)क दावा करैत अछि, मुदा वास्तवमे जाति-विशिष्ट (जाति-विशिष्ट) अछि। दलित साहित्यक समीक्षा एहि सार्वभौमिक-दावाक विखण्डन (विखण्डन) करैत अछि। ग. हाइब्रिडिटी (संकरता)क दलित-पुनर्पाठ: होमी के. भाभाक हाइब्रिडिटी (संकरता) दलित साहित्यक पहिचान-राजनीति (अस्मिता-राजनीति)क विश्लेषण लेल उपयोगी अछि। दलित साहित्य सवर्ण-संस्कृति आ दलित-संस्कृतिक बीच हाइब्रिड स्थान पर खड़ा अछि—न त पूर्णतः सवर्ण-आत्मसात (आत्मसात), न पूर्णतः दलित-मुक्त (मुक्त)। ई हाइब्रिडिटी दलित साहित्यक तनाव (तनाव) आ रचनात्मकता (सर्जनात्मकता)क स्रोत अछि। ३.२ दलित-नारीवाद (दलित नारीवाद)क सिद्धान्तक प्रयोग क. अन्तर्विच्छेदीयता (बहु-उत्पीड़न-अन्तर्सम्बन्ध): दलित-नारीवाद (जेना—शैला देवी, बीमा भीम, जे. सुभद्रा, विनोदिनी) जाति आ लिङ्गक दोहरा उत्पीड़नक विश्लेषण करैत अछि। दलित साहित्यक समीक्षा लेल अन्तर्विच्छेदीयता (बहु-उत्पीड़न-अन्तर्सम्बन्ध) केन्द्रीय श्रेणी अछि—जे जाति, लिङ्ग, वर्ग, क्षेत्र, धर्मक संगम (संगम) पर दलित-स्त्रीक अनुभवक विश्लेषण करत। ख. शरीरक राजनीति (देह-राजनीति): दलित-स्त्री-शरीर शास्त्रीय-शृङ्गारक अलंकार नै, श्रमक दस्तावेज अछि। दलित साहित्यक समीक्षा शरीरक राजनीतिक विश्लेषण करत—शरीर कइ प्रकारेँ जाति-व्यवस्थाक निशान (चिह्न) बनि जाइत अछि? शरीर कइ प्रकारेँ प्रतिरोधक स्थान (स्थल) बनि जाइत अछि? ग. दलित-स्त्री-स्वर (दलित-स्त्री स्वर): दलित-स्त्री-स्वर दलित-स्वर आ स्त्री-स्वरक बीच एकटा तृतीय-स्थान (तृतीय स्थान) अछि—जे दलित-पुरुष-स्वरसँ भिन्न अछि, आ सवर्ण-स्त्री-स्वरसँ सेहो भिन्न अछि। दलित साहित्यक समीक्षा एहि तृतीय-स्थानक विशिष्टता (विशिष्टता)क विश्लेषण करत। ३.३ मार्क्सवादी सिद्धान्तक दलित-पुनर्पाठ क. वर्ग आ जातिक द्वन्द्व: मार्क्सवादी सिद्धान्त वर्ग-संघर्ष (वर्ग-संघर्ष) पर बल दैत अछि। दलित साहित्य वर्ग-संघर्षक जाति-संघर्ष (जाति-संघर्ष)क रूपमे प्रस्तुत करैत अछि। दलित साहित्यक समीक्षा वर्ग आ जातिक बीच संवाद (संवाद) आ तनाव (तनाव)क विश्लेषण करत। ख. हेगेमोनी (प्रभुत्व)क दलित-पुनर्पाठ: ग्राम्सीक हेगेमोनी (प्रभुत्व) दलित साहित्यक सवर्ण-वर्चस्व (ब्राह्मणवादी प्रभुत्व)क सांस्कृतिक रूपक विश्लेषण लेल उपयोगी अछि। उदाहरण लेल, विद्यापतिकेँ ब्राह्मण घोषित करबाक प्रक्रिया—ई हेगेमोनीक सांस्कृतिक कार्य अछि। दलित साहित्य ओहि हेगेमोनीक विरुद्ध (विरुद्ध) लिखल जाइत अछि। ग. बाजार-पूँजीवादक दलित-समीक्षा: दलित साहित्यक प्रकाशन-उद्योग (प्रकाशन-उद्योग), बाजार (बाजार), पुरस्कार (पुरस्कार)क राजनीति (राजनीति)क समीक्षा आवश्यक अछि। मार्क्सवादी समीक्षा पूछत: दलित साहित्य बाजारक दबावमे सर्जनात्मकता (सर्जनात्मकता) खोइ रहल अछि वा नै? पुरस्कार सशक्तीकरण (सशक्तीकरण) अछि वा सह-विकल्प (सह-विकल्पन)? ३.४ दलित-आन्दोलन सिद्धान्त (दलित आन्दोलन सिद्धान्त) *क. जोतिराव फुलेक गुलामगिरी (गुलामगिरी)क परम्परा: फुलेक गुलामगिरी (1873) दलित साहित्यक आधार-ग्रन्थ (आधार-ग्रन्थ) अछि। दलित साहित्यक समीक्षा गुलामगिरीसँ शुरू भऽ वर्तमान दलित साहित्य धरिक सातत्य (सातत्य) आ परिवर्तन* (परिवर्तन)क विश्लेषण करत। *ख. डॉ. बी. आर. अम्बेडकरक बौद्धिक परम्परा (बौद्धिक परम्परा): अम्बेडकरक बौद्धिक परम्परा—जाति-विच्छेद (जाति-विच्छेद), बौद्ध-धर्म-परिवर्तन (बौद्ध धर्म-परिवर्तन), संविधान-निर्माण (संविधान-निर्माण)—दलित साहित्यक वैचारिक आधार (वैचारिक आधार) अछि। दलित साहित्यक समीक्षा एहि बौद्धिक परम्पराक साहित्यिक* रूपक विश्लेषण करत। *ग. दलित-पैंथर (दलित पैंथर्स)क प्रतिरोध-साहित्य (प्रतिरोध-साहित्य): 1970 क दशकक दलित-पैंथर आन्दोलन दलित साहित्यक आक्रोश-शैली (आक्रोश शैली)क निर्माण (निर्माण)मे मूलभूत भूमिका निभौलनि। दलित साहित्यक समीक्षा दलित-पैंथरसँ वर्तमान दलित साहित्य धरिक निरन्तरता (सातत्य) आ विच्छेद* (विच्छेद)क विश्लेषण करत। चतुर्थ अध्याय: दलित साहित्य लेल समीक्षा सिद्धान्तक व्यावहारिक ढाँचा ४.१ दलित साहित्यक समीक्षाक स्तर प्रथम स्तर: जाति-विश्लेषण - कृतिक जाति-संरचना (जाति संरचना)क पहिचान—पात्र (चरित्रसभ) के जाति की अछि? कथानक (कथानक) जाति-सम्बन्धक कइ प्रकारेँ प्रतिनिधित्व करैत अछि? लेखक (लेखक)क जाति-स्थिति (जाति स्थिति) कृतिक दृष्टि (दृष्टिकोण)केँ कइ प्रकारेँ निर्धारित करैत अछि? - अस्पृश्यता (अस्पृश्यता), जाति-हिंसा (जाति-हिंसा), जाति-भेद (जाति भेदभाव)क सौन्दर्यशास्त्र (सौन्दर्यशास्त्र)क विश्लेषण। द्वितीय स्तर: दलित-सौन्दर्यशास्त्र (दलित सौन्दर्यशास्त्र) विश्लेषण - दर्द (पीड़ा), आक्रोश (आक्रोश), अस्मिता (अस्मिता), संघर्ष (संघर्ष)—ई सभ स्थायी भावक रस-परिणति (रस-निष्पत्ति)क विश्लेषण। - प्रतिरोध-शैली (प्रतिरोध-शैली), साक्षी-शैली (साक्ष्य-शैली), लोक-शैली (लोक-शैली)क विश्लेषण। - विपर्यास-अलंकार (उलट-अलंकार), अभाव-अलंकार (अनुपस्थिति-अलंकार), लोक-अलंकार (लोक-अलंकार)क विश्लेषण। तृतीय स्तर: सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण - जाति-राजनीति (जाति राजनीति): सवर्ण-दलित द्वन्द्व, आरक्षण, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, दलित-आन्दोलन। - वर्ग-राजनीति (वर्ग राजनीति): जमीन्दार-किसान, पूँजी-श्रमिक, आर्थिक शोषण। - लिङ्ग-राजनीति (लिंग राजनीति): दलित-स्त्रीक दोहरा उत्पीड़न, शरीरक राजनीति, दलित-नारीवाद। - प्रवास-राजनीति (प्रवास राजनीति): प्रवासक अर्थशास्त्र, प्रवासक मनोविज्ञान, प्रवासक अस्मिता। चतुर्थ स्तर: ऐतिहासिक-अभिलेखीय विश्लेषण - दलित-इतिहासक पुनर्लेखन (पुनर्लेखन)क प्रक्रियाक विश्लेषण। - सवर्ण-इतिहास-लेखन (ब्राह्मणवादी इतिहासलेखन)क विखण्डन (विखण्डन)। - मौन-इतिहास (मौन इतिहास)क पुनर्निर्माण (पुनर्निर्माण)—जे लिखित-इतिहास (लिखित इतिहास)मे अनुपस्थित अछि, ओकर लोक-इतिहास (लोक इतिहास), मौखिक-इतिहास (मौखिक इतिहास), दलित-इतिहास (दलित इतिहास)क पुनर्पाठ (पुनर्पाठ)। पञ्चम स्तर: आस्वाद-राजनीति विश्लेषण (सौन्दर्य-अनुभवक राजनीति) - दलित-पाठक (दलित पाठक) आ गैर-दलित-पाठक (गैर-दलित पाठक)क आस्वादक अनुभव भिन्न अछि वा नै? - दर्दक आस्वाद (पीड़ाक आस्वाद)क नैतिकता (नैतिकता) की अछि? पीड़ाक सौन्दर्यीकरण (पीड़ाक सौन्दर्यीकरण) उत्पीड़नक पुनरुत्पादन (उत्पीड़नक पुनरुत्पादन) तँ नै अछि? - सहृदय (सहानुभूतिशील पाठक)क अवधारणा दलित-सन्दर्भ (दलित सन्दर्भ)मे कइ प्रकारेँ पुनर्परिभाषित (पुनर्परिभाषित) करबाक चाही? ४.२ दलित साहित्यक विधा-विशिष्ट विश्लेषण क. दलित कविता लेल: - छन्द-लय (छन्द-लय)क विश्लेषण—की पारम्परिक छन्द (जेना—दोहा, चौपाई, सोरठा) प्रयोग भेल अछि, वा मुक्त-छन्द (मुक्तछन्द)? - बिम्ब-प्रतीक (बिम्ब-प्रतीक)क विश्लेषण—जरैत खोपड़ी, साड़ीक कोर, मान्केनापुव्वु, कारी मसि—ई सभ दलित-बिम्ब (दलित बिम्ब) कइ प्रकारेँ प्रतिरोधक प्रतीक (प्रतीक क प्रतिरोध) बनि जाइत अछि? - व्यङ्ग्य-ध्वनि (व्यञ्जना)क विश्लेषण—कविताक शाब्दिक-अर्थ (शाब्दिक अर्थ) आ व्यङ्ग्य-अर्थ (व्यञ्जित अर्थ)क बीच दलित-दृष्टि (दलित दृष्टिकोण) कइ प्रकारेँ स्थापित होइत अछि? ख. दलित कहानी आ उपन्यास (दलित लघुकथा आ उपन्यास) लेल: - आख्यान-तकनीक (आख्यान तकनीक)—प्रथम-पुरुष-आख्यान (प्रथम-पुरुष आख्यान) आ साक्षी-शैली (साक्ष्य-शैली) दलित साहित्यमे विशेष रूपसँ महत्वपूर्ण अछि, कारण ई प्रामाणिकता (प्रामाणिकता)क दावा करैत अछि। - चरित्र-विकास (चरित्र विकास)—दलित-चरित्र (दलित चरित्र)क मनोविज्ञान (मनोविज्ञान), सवर्ण-चरित्र (सवर्ण चरित्र)क प्रतिनिधित्व (प्रतिनिधित्व), चरित्र-सम्बन्ध (चरित्र सम्बन्ध) जाति-व्यवस्थाक कइ प्रकारेँ पुनरुत्पादन (पुनरुत्पादन) वा प्रतिरोध (प्रतिरोध) करैत अछि? - स्थान-काल (देश-काल)क राजनीति—गाम (गाम), शहर (शहर), वन (वन), झोपड़ी (झोपड़ी), महल (महल), थाना (पुलिस थाना)—ई सभ स्थान (स्थान) जाति-व्यवस्थाक भौगोलिक-संरचना (भौगोलिक संरचना) कइ प्रकारेँ प्रतिबिम्बित करैत अछि? ग. दलित नाटक लेल: - रङ्गमञ्चीयता (रङ्गमञ्चीयता)—बिदापत नाच, जात्रा, तमाशा, लोक-नाट्य (लोक-रङ्गमञ्च)क परम्परासँ दलित-नाटकक सम्बन्ध। - अभिनय-वाद्य-संवाद (अभिनय-सङ्गीत-संवाद)—शरीर (देह), आवाज (स्वर), लय (लय) दलित-नाटकमे प्रतिरोधक हथियार (प्रतिरोधक हथियार) कइ प्रकारेँ बनि जाइत अछि? - दर्शक-सम्बन्ध (दर्शक-सम्बन्ध)—दलित-नाटक दर्शककेँ सहृदय (सहानुभूतिशील) नै, सहभागी (सहभागी) बनाबैत अछि। ई दर्शक-सम्बन्धक विश्लेषण। घ. अनूदित दलित साहित्य लेल: - अनुवादक-सर्जनात्मकता (अनुवादकक सर्जनात्मकता)—स्रोत-भाषा (स्रोत-भाषा)क दलित-स्वर (दलित स्वर) लक्ष्य-भाषा (लक्ष्य-भाषा)मे कइ प्रकारेँ प्रतिष्ठापित (स्थापित) अछि? - सांस्कृतिक-अनुवाद (सांस्कृतिक अनुवाद)—जाति-व्यवस्था, दलित-अनुभव, प्रतिरोध-परम्परा—ई सभ सांस्कृतिक-श्रेणी (सांस्कृतिक श्रेणीसभ) अनुवाद-प्रक्रिया (अनुवाद-प्रक्रिया)मे कइ प्रकारेँ स्थानीयकृत (स्थानीयकृत) अछि? - दलित-अनुवादक राजनीति (दलित अनुवादक राजनीति)—दलित-साहित्यक अनुवाद दलित-आवाजक विस्तार (विस्तार) अछि वा विकृति (विकृति)? अनुवाद दलित-साहित्यकेँ वैश्विक-पाठक (वैश्विक पाठक) धरि पहुँचाबैत अछि वा मुख्यधारा-साहित्यक सह-विकल्प (सह-विकल्पन)क हथियार (हथियार) बनि जाइत अछि? पञ्चम अध्याय: दलित साहित्यक समीक्षा सिद्धान्तक उदाहरणात्मक प्रयोग ५.१ प्रस्तुत संकलन (मैथिलीमे अनूदित दलित साहित्य)क समीक्षा प्रथम स्तर: जाति-विश्लेषण - संकलनक केन्द्रीय-विषय (केन्द्रीय विषय) जाति-व्यवस्था अछि—जाति-हिंसा (जाति-हिंसा), अस्पृश्यता (अस्पृश्यता), दलित-प्रतिरोध (दलित प्रतिरोध), दलित-अस्मिता (दलित अस्मिता)। - पात्र-जाति (चरित्र जाति)—दलित-पात्र (दलित चरित्रसभ): बोयी भीमन्नाक कविताक व्यास, अरुन्धती, मत्स्यगन्धी (पौराणिक-दलित); जे. सुभद्राक दलित-स्त्री-श्रमिक; कोलकलुरी इनोचक बण्डोडु (मादिग); पेद्दिंति अशोक कुमारक ईमाम (कलन्दर)। - सवर्ण-पात्र (सवर्ण चरित्रसभ): जमीन्दार, पटेल, एमआरओ, एसआई, सरपंच, बच्ची श्रिया (जे दलित-विरोधी (दलित-विरोधी) बनि जाइत अछि)। द्वितीय स्तर: दलित-सौन्दर्यशास्त्र विश्लेषण - स्थायी भाव (स्थायी भाव): दर्द (जे. सुभद्राक "लोढ़ब", "अव्वा"), आक्रोश (बोयी भीमन्नाक "हमर पैतृक अधिकार"), अस्मिता (चल्लपल्ली स्वरूपरानीक "मान्केनापुव्वु"), संघर्ष (कोलकलुरी इनोचक "कौआ", पेद्दिंति अशोक कुमारक सदा लेल मित्र)। - रस-निष्पत्ति (रस-निष्पत्ति): दर्द-रस (पीड़ा रस), आक्रोश-रस (आक्रोश रस), अस्मिता-रस (अस्मिता रस), संघर्ष-रस (संघर्ष रस)। - प्रतिरोध-शैली (प्रतिरोध-शैली): तीक्ष्ण, कर्कश, विद्रोही भाषा; साक्षी-शैली (साक्ष्य-शैली): प्रथम-पुरुष-आख्यान, आत्म-कथात्मक शैली; लोक-शैली (लोक-शैली): कहावत, मुहावरा, लोक-गीतक प्रयोग। तृतीय स्तर: सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण - जाति-राजनीति: सवर्ण-दलित द्वन्द्व, जाति-हिंसा, अस्पृश्यता, जाति-व्यवस्थाक मनोविज्ञान। - वर्ग-राजनीति: जमीन्दार-किसान द्वन्द्व, पूँजी-श्रमिक द्वन्द्व, आर्थिक शोषण। - लिङ्ग-राजनीति: दलित-स्त्रीक दोहरा उत्पीड़न, शरीरक राजनीति, दलित-नारीवादी स्वर। - प्रवास-राजनीति: सदा लेल मित्र उपन्यासमे प्रवास (प्रवास)क अर्थशास्त्र आ मनोविज्ञान। चतुर्थ स्तर: ऐतिहासिक-अभिलेखीय विश्लेषण - पौराणिक-इतिहासक दलित-पुनर्पाठ: बोयी भीमन्नाक व्यास, अरुन्धती, मत्स्यगन्धीक पुनर्व्याख्या। - मध्यकालीन-इतिहासक दलित-पुनर्पाठ: जाति-व्यवस्था, दलित-प्रतिरोधक ऐतिहासिक-दस्तावेज (ऐतिहासिक दस्तावेज)क पुनर्पाठ। - आधुनिक-इतिहासक दलित-पुनर्पाठ: गान्धी, अम्बेडकर, दलित-आन्दोलनक प्रतिनिधित्व (गुजराती कविता "खरड़ाक डाँट सब" मे गान्धी पर व्यंग्य)। पञ्चम स्तर: आस्वाद-राजनीति विश्लेषण - दलित-पाठक (दलित पाठक): संकलन पहिचान (अस्मिता)क आस्वाद (आस्वाद) प्रदान करैत अछि—अपन-दर्दक साहित्यिक-अभिव्यक्ति (साहित्यिक अभिव्यक्ति)। - गैर-दलित-पाठक (गैर-दलित पाठक): संकलन असुविधा (असुविधा) आ जागरण (जागरण)क अनुभव प्रदान करैत अछि—दूसरक-दर्दक साक्षी (साक्षी) बनबाक अवसर। - दर्दक आस्वादक नैतिकता (नैतिकता क पीड़ाक आस्वाद): संकलन पीड़ाक सौन्दर्यीकरण (सौन्दर्यीकरण) नै करैत, बल्कि पीड़ाक दस्तावेजीकरण (दस्तावेजीकरण) करैत अछि। ई दस्तावेजीकरण पाठककेँ पीड़ाक साक्षी (साक्षी) बनाबैत अछि, उपभोक्ता (उपभोक्ता) नै। षष्ठ अध्याय: दलित साहित्यक समीक्षा सिद्धान्तक सीमा आ सम्भावना ६.१ सीमा (सीमासभ) क. सैद्धान्तिक-समन्वयक कठिनाई: भारतीय (रस, ध्वनि, अलंकार) आ पाश्चात्य (मार्क्सवाद, नारीवाद, उपनिवेशवाद-उत्तर) सिद्धान्तक शब्दावली (शब्दावली), दर्शन (दर्शन), प्राथमिकता (प्राथमिकता) भिन्न अछि। ओकर समन्वय हमेशा तनाव (तनाव) सृजना करैत अछि। ई सिद्धान्त ओहि तनावकेँ दमन (दमन) नै करैत, बल्कि सर्जनात्मक (सर्जनात्मक) रूपमे प्रयोग करबाक सुझाव दैत अछि। ख. दलित-साहित्यक आन्तरिक-विविधता: दलित साहित्य एकरूप (एकरूप) नै अछि—दलित-कविता, दलित-कहानी, दलित-उपन्यास, दलित-नाटक, दलित-आत्मकथा, दलित-समीक्षा—ई सभक शैलीगत, संरचनात्मक, वैचारिक भिन्नता अछि। एकटा सिद्धान्त सभ विधाक पूर्ण व्याख्या करि सकय, ई दावा करब अनुचित अछि। ई सिद्धान्त लचीलापन (लचीलापन) पर बल दैत अछि—समीक्षक अपन विवेकसँ सिद्धान्तक प्रयोग करत। ग. अनूदित-दलित-साहित्यक विशिष्टता: अनूदित दलित साहित्यक समीक्षा लेल मूल-भाषा (स्रोत-भाषा) आ अनुवाद-भाषा (लक्ष्य-भाषा) दुनूक ज्ञान आवश्यक अछि। मुदा सभ समीक्षक बहुभाषी नै होइत अछि। ई सिद्धान्त अनुवाद-समीक्षाक सीमाकेँ स्वीकार करैत अछि, आ सहयोगात्मक समीक्षा (सहयोगात्मक समीक्षा)क सम्भावना खोजैत अछि। घ. दलित-समीक्षाक संस्थागत-सीमा: दलित साहित्यक समीक्षा शैक्षणिक-संस्थान (शैक्षणिक संस्थासभ), प्रकाशन-उद्योग (प्रकाशन-उद्योग), पुरस्कार-व्यवस्था (पुरस्कार-व्यवस्था)क दबाव (दबाव)मे आबि रहल अछि। ई संस्थागत-सीमा (संस्थागत सीमा) दलित-समीक्षाक स्वतन्त्रता (स्वायत्तता) पर प्रश्न चिन्ह लगाबैत अछि। ६.२ सम्भावना (सम्भावनासभ) क. दलित-सौन्दर्यशास्त्रक विकास (दलित सौन्दर्यशास्त्रक विकास): ई समीक्षा सिद्धान्त दलित-सौन्दर्यशास्त्र (दलित सौन्दर्यशास्त्र)क सैद्धान्तिक-आधार (सैद्धान्तिक आधार) प्रदान करैत अछि—दर्द, आक्रोश, अस्मिता, संघर्ष केँ स्थायी भाव (स्थायी भाव)क रूपमे स्थापित करैत अछि, आ ओकर रस-परिणति (रस-निष्पत्ति)क सम्भावना खोजैत अछि। ख. अन्तःविषयकता: ई समीक्षा सिद्धान्त साहित्यकेँ समाजशास्त्र, इतिहास, राजनीति-विज्ञान, दर्शन, मानव-विज्ञान (मानवविज्ञान)सँ जोड़ैत अछि। ई अन्तःविषयक (अन्तःविषयक) दृष्टि दलित साहित्यक बहु-आयामी (बहुआयामी) विश्लेषणक सम्भावना खोलैत अछि। ग. तुलनात्मक-दलित-साहित्य-अध्ययन (तुलनात्मक दलित साहित्य-अध्ययन): ई सिद्धान्त मैथिली-दलित-साहित्यक तेलुगु, गुजराती, उड़िया, तमिल, कन्नड़, मराठी, हिन्दी, बंगला—सभ भारतीय भाषाक दलित साहित्यसँ तुलनात्मक अध्ययनक सम्भावना खोलैत अछि। ई तुलनात्मक-दलित-साहित्य-अध्ययन (तुलनात्मक दलित साहित्य-अध्ययन) भारतीय दलित साहित्यक एकता (एकता) आ विविधता (विविधता) दुनूक विश्लेषण करत। घ. अनुवाद-अध्ययनक दलित-पुनर्पाठ: ई सिद्धान्त अनुवादकेँ गौण (गौण) नै, बल्कि सर्जनात्मक (सर्जनात्मक) विधाक रूपमे स्थापित करैत अछि। दलित-अनुवाद-अध्ययन (दलित अनुवाद-अध्ययन) दलित साहित्यक भाषा-अन्तर-प्रवाह (अन्तरभाषिक प्रवाह)क विश्लेषण करत। ङ. दलित-समीक्षाक वैश्वीकरण: ई सिद्धान्त दलित-समीक्षाकेँ वैश्विक-सैद्धान्तिक-चर्चा (वैश्विक सैद्धान्तिक विमर्श)सँ जोड़ैत अछि—उपनिवेशवाद-उत्तर (उपनिवेशवाद-उत्तर), सबाल्टर्न (निम्नवर्गीय), अन्तर्विच्छेदीयता (बहु-उत्पीड़न-अन्तर्सम्बन्ध), दर्द-की-राजनीति (पीड़ाक राजनीति), साक्षी-साहित्य (साक्ष्य-साहित्य) जहिना वैश्विक सैद्धान्तिक धारासभसँ दलित साहित्यक संवाद (संवाद) स्थापित करैत अछि। निष्कर्ष: दलित साहित्यक समीक्षा सिद्धान्तक भविष्य दलित साहित्य केवल साहित्य नै अछि; ई एकटा आन्दोलन अछि, प्रतिरोधक एकटा घोषणापत्र अछि। एहि कारण, दलित साहित्यक समीक्षा लेल सामान्य साहित्यिक सिद्धान्त अपर्याप्त अछि। ई समीक्षा सिद्धान्त भारतीय (रस, ध्वनि, अलंकार, रीति) आ पाश्चात्य (मार्क्सवाद, नारीवाद, उपनिवेशवाद-उत्तर, दलित-आन्दोलन सिद्धान्त) सिद्धान्तक समन्वय (संश्लेषण) करैत, दलित साहित्यक विशिष्टता (विशिष्टता) केँ केन्द्रमे राखैत अछि। ई सिद्धान्त अन्तिम-सत्य (अन्तिम सत्य)क दावा नै करैत अछि; ई प्रारम्भिक-बिन्दु (प्रारम्भिक बिन्दु) अछि। ई दलित साहित्यक समीक्षाक नव-द्वार (नव द्वार) खोलैत अछि—जतय दर्द-रस (पीड़ा रस) आ आक्रोश-रस (आक्रोश रस), अस्मिता-रस (अस्मिता रस) आ संघर्ष-रस (संघर्ष रस)क सैद्धान्तिक-प्रतिष्ठा (सैद्धान्तिक वैधता) संभव होइत अछि। दलित साहित्यक भविष्यक समीक्षा एहि प्रारम्भिक-बिन्दुसँ आगाँ (आगाँ) बढ़त—दलित-सौन्दर्यशास्त्र (दलित सौन्दर्यशास्त्र)क समृद्धि (समृद्धि), तुलनात्मक-दलित-साहित्य-अध्ययन (तुलनात्मक दलित साहित्य-अध्ययन)क विस्तार (विस्तार), दलित-अनुवाद-अध्ययन (दलित अनुवाद-अध्ययन)क विकास (विकास), दलित-समीक्षाक वैश्वीकरण (दलित-समीक्षाक वैश्वीकरण)—ई सभ दिशासभमे। परिशिष्ट: दलित साहित्यक समीक्षा सिद्धान्तक संक्षिप्त रूपरेखा विश्लेषण स्तर भारतीय सिद्धान्त (दलित-पुनर्पाठ) पाश्चात्य सिद्धान्त (दलित-पुनर्पाठ) दलित-विशिष्टता जाति-विश्लेषण - जाति-राजनीति, अस्पृश्यता, जाति-हिंसा पात्र-जाति, लेखक-जाति, कथानक-जाति दलित-सौन्दर्यशास्त्र दर्द-रस, आक्रोश-रस, अस्मिता-रस, संघर्ष-रस - विपर्यास-अलंकार, अभाव-अलंकार, लोक-अलंकार सामाजिक-राजनीतिक - जाति-वर्ग-लिङ्ग-प्रवास-राजनीति अन्तर्विच्छेदीयता, दलित-नारीवाद, सबाल्टर्न-आवाज ऐतिहासिक-अभिलेखीय - उपनिवेशवाद-उत्तर, पुरातत्व-विधि दलित-इतिहास-पुनर्लेखन, मौन-इतिहास-पुनर्निर्माण आस्वाद-राजनीति सहृदय (दलित-पुनर्पाठ) रिसेप्शन थ्योरी, रीडर-रेस्पॉन्स दलित-पाठक, गैर-दलित-पाठक, दर्दक आस्वादक नैतिकता ई रूपरेखा समीक्षककेँ लचीलापन (लचीलापन) दैत अछि—अपन विवेक (विवेक)सँ स्तर आ सिद्धान्तक चयन करबाक, आ दलित-साहित्यक विशिष्ट-सन्दर्भ (विशिष्ट सन्दर्भ)मे प्रयोग करबाक स्वतन्त्रता। समीक्षकक अन्तिम टिप्पणी: दलित साहित्यक समीक्षा सैद्धान्तिक-शुद्धता (सैद्धान्तिक शुद्धता)क दावा नै करैत, साहित्यिक-प्रामाणिकता (साहित्यिक प्रामाणिकता)क खोज करैत अछि। ई सिद्धान्त ओहि खोजक दिशा-निर्देश (दिशानिर्देश) मात्र अछि। दलित साहित्य जीवित (जीवित) अछि, विकसित (विकसित होइत) अछि, प्रतिरोध (प्रतिरोध करैत) अछि। ओकर समीक्षा सेहो जीवित, विकसित, प्रतिरोधी होबाक चाही। ई सिद्धान्त ओहि प्रतिरोधी-समीक्षा (प्रतिरोधी समीक्षा)क आमन्त्रण (आमन्त्रण) अछि। अनुलग्नक: २: विद्यापतिक विदेसियाक एकटा समालोचनात्मक मूल्यांकन पाश्चात्य समालोचना-सिद्धान्त आ भारतीय सौन्दर्यशास्त्रीय परम्पराक संयुक्त दृष्टिसँ एहि मैथिली नाट्य-पाठ—अथवा विद्यापतिक पदावलीमे निहित प्रदर्शन-पटकथा—केँ बहुविध पद्धतिसँ पढ़ल जा सकैत अछि। आगाँक समालोचनात्मक पाठ उपनिवेशवाद-उत्तर सिद्धान्त, नारीवादी समालोचना, प्रदर्शन-अध्ययन, तुलनात्मक साहित्य आ संस्कृत रस-परम्परा सहित विविध दृष्टिकोणकेँ एकत्र करैत अछि। १. विधा आ वर्गीकरणक समस्या पाठ स्वयंकेँ विद्यापतिक विदेसिया परम्पराक "समानान्तर ब्रह्माण्ड"क रूपमे घोषित करैत अछि। ई दावा तुरंत एकटा आधारभूत प्रश्न उठाबैत अछि: की ई एकटा पुनरुद्धार अछि, पुनर्निर्माण अछि, रूपान्तरण अछि, या ओहसँ बहुत अधिक जटिल कोनो चीज? लेखक रचनाकेँ प्रलेखन (रामखेलावन मण्डल जहिना दलक) आ सृजन ( "ई परिकल्पित नाटक प्रस्तुत अछि" ) दुनूक रूपमे प्रस्तुत करैत अछि। विधाक ई अस्थिरता कोनो दोष नै अछि, बल्कि एकटा उत्पादक तनाव अछि, जेकरा पाठ कहियो पूर्ण रूपसँ हल नै करि पाबैत अछि। उत्तर-संरचनावादी दृष्टिसँ, ई अनिर्धार्यता कोनो "प्रामाणिक" लोक परम्पराक पुनर्प्राप्तिक असम्भवताक उद्घाटन करैत अछि। लेखकक अपन ढाँचा—जे एहि बात पर ध्यान दैत अछि जे सालहेस आ चूड़ामल जहिना व्यक्तित्वसभ पर "कोनो शोध नै भेल अछि"—विरोधाभासी रूपसँ ओह अभिलेखीय अधिकार केँ कमजोर करैत अछि, जकर दावा पाठ एक साथ करैत अछि। ई रचना जाक देरिदाक शब्दावलीमे अभिलेख ज्वर (अभिलेख-ज्वर) बनि जाइत अछि: उत्पत्तिकेँ पुनः प्राप्त करबाक एह बेचैनी, जे कहियो स्थिर नै छल। औपचारिक समालोचना एह बात पर ध्यान देति कि नाटक गीत-नाट्यक संरचना अपनाबैत अछि, मुदा नियमित नाट्यकीय अनुशासनक अभाव अछि। रङ्गमञ्च निर्देशन न्यूनतम अछि, सात दृश्यसभक बीचक सम्बन्ध अस्पष्ट अछि, आ विद्यपति स्वयं एकटा पात्रक रूपमे प्रवेश करैत अछि, अर्थ समझाबैत अछि, आ "अन्धकारमे विलीन" भ जाइत अछि—ई सभ एकटा ब्रेख्तीय विमोहन प्रभाव (अलगाव-प्रभाव) सृजना करैत अछि, जकरा पाठ अपन लेल कोनो सैद्धान्तिक व्याख्या नै करैत अछि। की विद्यापति संस्कृत परम्पराक सूत्रधार अछि? एकटा ब्रेख्तीय कथाकार जे नाटकीय भ्रमकेँ उजागर करैत अछि? या एकटा भक्ति उपस्थिति जे कवि-संतक अधिकारक आह्वान करैत अछि? पाठ निर्णय लेनाइ अस्वीकार करैत अछि, आ ई अस्वीकार, जखन कि बहु व्याख्याक सम्भावना राखैत अछि, तखन संरचनात्मक असंगतिक कारणो बनि जाइत अछि। २. प्रवास आख्यान: उपनिवेशवाद-उत्तर आ सबाल्टर्न पाठ एकर विषयगत केन्द्रबिन्दु अछि प्रवास—आ ओकर प्रतीक्षाक स्त्री-अनुभव। लेखक भोजपुरी विदेसिया परम्परा (भिखारी ठाकुरद्वारा उदाहरित) आ मैथिली सन्दर्भक बीच एकटा महत्वपूर्ण अन्तर खिचैत अछि, तर्क करैत अछि जे मिथिलामे प्रवास "हालिया घटना" अछि, जबकि भोजपुरीमे श्रम प्रवासक लम्बा आ अधिक गहन संस्कृति अछि। उपनिवेशवाद-उत्तर दृष्टिसँ, ई भेद सावधानीपूर्वक परीक्षणक माग करैत अछि। लेखकक ई दावा जे भोजपुरी साहित्य "परिमाणक दृष्टिसँ मैथिली सँ कम समृद्ध" अछि मुदा किछु क्षेत्रसभमे "गुणवत्ताक दृष्टिसँ बेसी" अछि, एकटा अन्तर्निहित पदानुक्रम पर टिकल अछि, जकर पाठ कहियो विखण्डन नै करैत अछि। "समृद्धि" आ "गुणवत्ता"क मानदण्ड केकर अछि? ई तुलना भिखारी ठाकुरक विदेसिया केँ अपन "मार्मस्पर्शी रूप" लेल मूल्यवान ठहराबैत अछि, जबकि मैथिली साहित्यक "बोझिल" महाकाव्यात्मक आख्यानसभक समालोचना करैत अछि। ई एकटा मूल्यवान अन्तर्दृष्टि अछि, मुदा एकरा अधिक कठोर सैद्धान्तिकीकरणक आवश्यकता अछि। मैथिली साहित्यिक संस्कृति महाकाव्य रूपसभकेँ लोककथा पर कियों वरीयता दैत अछि? एकर उत्तर साहित्यक समाजशास्त्रमे निहित अछि: मैथिलीक ब्राह्मण्य प्रतिष्ठा (पण्डित आ सरनाट अभिजात वर्गक भाषाक रूपमे) बनाम भोजपुरी साहित्यिक अभिव्यक्तिक अधिक जन-साधारण, श्रमजीवी मूल। सबाल्टर्न अध्ययनक एकटा पाठ ओहु आगा धकेलत। एहि नाटकमे स्त्री पात्र—प्रतीक्षारत युवती, यात्रीकेँ फेरि देबिहार ननद, मञ्चपर बाहर मरि जाए सास—पितृसत्तात्मक संरचनाक भीतरक आवाज अछि, जकरा पाठ बिना पर्याप्त प्रश्नकेँ पुनरुत्पादित करैत अछि। जखन युवती गाबैत अछि, "हम एकाकी छी, हमर पिय देशान्तर, " तखन ओ रस परम्पराक केन्द्रीय विरहक अभिनय करैत अछि। मुदा की पाठ एहि पीड़ाक कोनो नारीवादी समालोचना प्रस्तुत करैत अछि, या ओ स्त्रीक प्रतीक्षाकेँ उदात्त रूपमे सौन्दर्यीकृत करैत अछि? रस ढाँचा करुण आ विप्रलम्भ शृङ्गारकेँ महत्व देत, मुदा गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक जहिना नारीवादी समालोचक पूछत: की सबाल्टर्न स्त्री एतय बाजि सकैत अछि, या ओ केवल पुरुष-रचित पद्य आ एकटा पुरुष कवि-पात्रक माध्यम अछि, जे दर्शकसभक लेल ओकर अनुभवक व्याख्या करैत अछि? ३. रस, भक्ति, आ सौन्दर्यात्मक दूरीक प्रश्न पाठ स्पष्ट रूपसँ विद्यापतिक पदावली पर आधारित अछि, जे शृङ्गार आ भक्ति दुनू परम्परासभमे सहभागी अछि। नेपाल पदावलीसँ गीतसभक चयन—जे विरह, वियोग आ प्रेमीक प्रतीक्षामे स्त्रीक दशाक चिन्तासँ सम्बन्धित अछि—रचनाकेँ ओह विरह सौन्दर्यशास्त्रमे स्थापित करैत अछि, जे संस्कृत काव्यशास्त्रकेँ उत्तर भारतक भक्ति साहित्यसँ जोड़ैत अछि। अभिनवगुप्तक ध्वनि सिद्धान्तक दृष्टिसँ, एहि गीतसभक व्यङ्ग्य (व्यंजित अर्थ) प्रवासी पति कऽ प्रतीक्षा करैत स्त्रीक शाब्दिक आख्यानकेँ पार करि जाइत अछि। विदेसिया रूपक बनि जाइत अछि: दिव्यसँ वियुक्त आत्माक लेल, अपन सांस्कृतिक जड़सँ विच्छिन्न मिथिला क्षेत्रक लेल, विस्थापनक युगमे मैथिली भाषा स्वयंक लेल। मुदा जखन विद्यापति रङ्गमञ्च पर "अर्थ समझाबय" आबैत अछि, तखन पाठ ओह जोखिमक सामना करैत अछि, जेकरा रस परम्परा मूलभूत त्रुटि मानैत अछि: विभाव आ अनुभाव केँ व्यङ्ग्यद्वारा रस उत्पन्न करबाक अनुमति देनाइक बदला, स्पष्ट करि देल जाइत अछि। कवि-पात्रक व्याख्यात्मक हस्तक्षेप मूल पद्यसभक बहुअर्थीताकेँ समतल करि दैत अछि। भक्ति पाठ अधिक उदार हो सकैत अछि। उत्तर भारतक भक्ति परम्परासभमे, विरहक रस स्वयं एकटा प्रकारक साक्षात्कार अछि। युवती राधा अछि; पिय देशान्तर कृष्ण अछि; प्रतीक्षा दिव्यसँ मिलनक आत्माक तड़प अछि। कवि-सन्तक रूपमे विद्यापतिक उपस्थिति एहि पाठकेँ बल देबैत अछि: ओ केवल टीकाकार नै अछि, बल्कि एकटा सन्त अछि, जकर पद्य स्वयं साधनाक रूप अछि। नाटकक प्रदर्शन सन्दर्भ—जतय रामक नाम पर दल अछि आ समूह भक्ति-नाटकक रूपमे मञ्चन करैत अछि—एहि व्याख्याक समर्थन करैत अछि। तथापि, पाठक अपन ढाँचा भक्तिपरक निष्कर्षकेँ पूर्ण रूपसँ स्वीकार नै करैत। अन्तिम पंक्ति, पिय देशान्तरक अवधारणाक "विवेकशील दर्शकसभक समक्ष प्रस्तुत" आ "गहन श्रद्धाक साथ अर्पित" कहल गेल अछि, एकटा समालोचनात्मक दूरी बनाए राखैत अछि। नाटक न त पूर्ण रूपसँ भक्ति रङ्गमञ्च अछि, न पूर्ण रूपसँ धर्मनिरपेक्ष लोक नाट्य। ई संकरता उत्पादक अछि, मुदा कहियो कहियो अस्थिरो सेहो। ४. अन्तर्पाठ्यता आ प्रभावक चिन्ता पाठक भिखारी ठाकुरक विदेसियासँ सम्बन्ध ओकर सबसँ महत्वपूर्ण अन्तर्पाठ्य सगाई अछि। हेरोल्ड ब्लूमक प्रभावक चिन्ता (प्रभावक चिन्ता) एकटा उपयोगी ढाँचा प्रदान करैत अछि: मैथिली पाठ अपन भोजपुरी पूर्ववर्तीसँ भिन्न एकटा स्थान बनाबाक संघर्ष करैत अछि, जखन कि ओकरा ओही अनिवार्य रूपसँ आकार देल गेल अछि। लेखक दावा करैत अछि जे मैथिलीमे भोजपुरी विदेसियाक "सूक्ष्म विवरण"क अभाव अछि, सालहेस आ चूड़ामलकेँ एहन आख्यानक उदाहरणक रूपमे उद्धृत करैत अछि जे "क्षेत्रीय सीमाकेँ पार करैत अछि" मुदा जाहि पर पर्याप्त शोध नै भेल अछि। ई कानन (मान्य साहित्यिक परम्परा)क बारेमे एकटा दावा अछि: जे मैथिली लोक साहित्यक संस्कृतिकृत महाकाव्य परम्पराक तुलनामे उपेक्षा कएल गेल अछि। प्रस्तुत नाटककेँ एक प्रकारक कानन-समालोचना (मान्य-परम्परागत समीक्षा)क प्रदर्शनक रूपमे पढ़ल जा सकैत अछि, जे हाशियाकृत चीजकेँ पुनः प्राप्त करैत अछि। मुदा नाटकक विद्यापति पर निर्भरता—मैथिली साहित्यमे सबसँ अधिक कानन-सम्मत व्यक्तित्व—एहि परियोजनाकेँ जटिल बनाबैत अछि। लेखक प्रभावी रूपसँ सबसँ प्रतिष्ठित मैथिली साहित्यिक व्यक्तित्वक उपयोग एकटा लोक परम्पराकेँ प्राधिकार प्रदान करबाक लेल करैत अछि, जे संभवतः विद्यापतिक अपन रचनाकर्म ऐतिहासिक रूपसँ हाशियाकृत केनए छल। ई एकटा उपनिवेशवाद-उत्तर पुनर्प्राप्तिक इशारा अछि, मुदा ई अभिजात साहित्यिक रूपसभक मध्यस्थता बिना "लोक" धरि पहुँचबाक कठिनाईकेँ सेहो प्रकट करैत अछि। पाठक-प्रतिक्रिया समालोचक ध्यान देत कि पाठक अपन परियोजनाक स्पष्ट ढाँचा—लम्बा गद्य प्रस्तावना, दलक विस्तृत विवरण, नगेन्द्रनाथ गुप्तक संस्करणक उद्धरण—एकटा विशिष्ट पठन-अनुबन्ध सृजना करैत अछि। दर्शककेँ बिना मध्यस्थताक रस अनुभव करबाक आमन्त्रण नै देल जाइत, बल्कि निर्माणक प्रक्रिया, अभिलेखीय श्रम, क्षेत्रीय साहित्यिक परम्परासभक राजनीति केँ समझबाक आमन्त्रण देल जाइत अछि। ई रूपान्तरण-नाटकीय (आत्म-रङ्गमञ्चीय) आयाम नाटकक सबसँ विशिष्ट योगदान अछि। ५. प्रदर्शन अध्ययन आ दर्शकत्वक प्रश्न एकटा प्रदर्शन पाठक रूपमे, विद्यापतिक विदेसिया एकटा सीमान्त स्थानमे विद्यमान अछि। ई न त पूर्ण पटकथा अछि, न प्रदर्शन अभिलेख। रङ्गमञ्च निर्देशन न्यूनतम अछि: "कवि विद्यापति प्रवेश करैत अछि, " "युवती प्रतीकात्मक रूपसँ एकटा दोकान खोलैत अछि, " "अन्धकार पसरैत अछि। " एकटा प्रदर्शन अध्ययन विद्वान पूछत: एतय की दस्तावेजीकृत कएल जाइत अछि? कोनो विशिष्ट दलक लीला? कोनो लुप्त परम्पराक पुनर्निर्माण? या भविष्यक प्रदर्शन लेल एकटा पटकथा? पाठक प्रत्येक गीतक राग (धनाशी, मलावा, कोलार, घनाशी) पर विस्तृत ध्यान संगीतात्मक विशिष्टताक सुझाव दैत अछि। मुदा बिना स्वरलिपि या प्रदर्शन निर्देशनक, ई केवल नाम मात्र अछि। नाटककार, या प्रलेखक, एकटा पाठकक परिकल्पना करैत अछि जे एहि संगीत परम्परासभसँ गहिर परिचित अछि—एकटा पाठक, अर्थात्, जे पहिने सँ मैथिली प्रदर्शन संस्कृतिक भीतर अछि। ई दर्शक-सम्बोधनक प्रश्न उठबैत अछि: ई पाठ केकर लेल अछि? उपलब्ध अंग्रेजी अनुवाद मैथिलीभाषी पाठक-वर्गसँ परे एकटा अतिरिक्त दर्शक-वर्गक सम्भावना देखबैत अछि। तथापि, नाटकक भीतर गीतसभक अनुवाद नहि कएल गेल अछि; मैथिली मूल प्रस्तुत अछि आ ओकर अर्थ मैथिली गद्यमे देल गेल अछि। भाषा आ अनुवादक ई तह होमी भाभाक शब्दावलीमे “तृतीय स्थान” सृजित करैत अछि—न पूर्णतः मैथिली, न पूर्णतः अंग्रेजी; न केवल प्रदर्शन, न केवल प्रलेखन; न केवल लोक, न केवल शास्त्रीय। ६. साहित्यिक तुलनाक राजनीति लेखकक भोजपुरी आ मैथिलीक बारेमे तुलनात्मक टिप्पणीसभ समाज-समालोचनात्मक दृष्टिसँ ध्यानाकर्षक अछि। "भोजपुरी साहित्य मैथिली सँ परिमाणमे कम समृद्ध अछि, " पाठ दावा करैत अछि, "मुदा गुणवत्ताक दृष्टिसँ किछु क्षेत्रसभमे ई मैथिली सँ बेसी अछि। " ई एकटा उत्तेजक दावा अछि जे, यदि विश्लेषित कएल जाय, त उत्तर भारतीय साहित्यिक संस्कृतिक भीतर गहन पदानुक्रमकेँ उजागर करत। मैथिलीक एकटा शास्त्रीय साहित्यिक परम्परा अछि जे विद्यापति (१४-१५वीं शताब्दी) धरि जाइत अछि, एकटा मान्यता प्राप्त व्याकरण (मैथिली व्याकरण) अछि, आ विद्वतापूर्ण उत्पादनक लम्बा इतिहास अछि। भोजपुरी, अपन विशाल वक्ता संख्या के बावजूद, ऐतिहासिक रूपसँ एकटा बोलीक रूपमे कलंकित कएल गेल अछि, भाषा नै, एकर साहित्यिक परम्परासभकेँ हिन्दी आ मैथिली दुनू अभिजात वर्गद्वारा हाशियाकृत कएल गेल अछि। लेखकक ई दावा जे भोजपुरी किछु गुणात्मक क्षेत्रसभमे—विशेषतः विदेसिया परम्परामे—"श्रेष्ठ" अछि, एहि पदानुक्रमक एकटा रणनीतिक विपर्यास अछि। ई भोजपुरी लेल ओह चीजक दावा करैत अछि जे ओकरा अस्वीकार कएल गेल छल: सौन्दर्यात्मक परिष्कार, भावनात्मक गहराई, आ सांस्कृतिक मूल्य। तथापि, पाठ एहि विपर्यासक पूर्ण सैद्धान्तिकीकरण नै करैत अछि। ई ओह तुलनात्मक ढाँचामे फँसल रहैत अछि, जेकरा ओ चुनौती देनाइ चाहैत अछि। एकटा सच्चा उपनिवेश-उन्मूलनवादी (उपनिवेश-मुक्त) समालोचना पूछत: तुलना कियों करब? प्रत्येक परम्पराकेँ अपन सौन्दर्यात्मक मापदण्ड, अपन मूल्यक मानदण्ड देबाक कियों नै देनाइ? तुलना ओह पदानुक्रमसभकेँ पुनः प्रतिष्ठापित करबाक जोखिम उठाबैत अछि, जकर ओ समालोचना करैत अछि। ७. अनिराकृत प्रश्न आ उत्पादक अस्पष्टतासभ पाठ किछु प्रश्नसभकेँ अनिराकृत छोड़ैत अछि, आ ई मौन समालोचक लेल उत्पादक अछि: १. विद्यापतिक स्थिति: की ओ नाटकक भीतर एकटा पात्र अछि, स्रोत सामग्रीक लेखक अछि, एकटा सूत्रधार आकृति अछि, या एकटा भक्ति उपस्थिति? पाठक उत्तर अछि "सभटा, " आ ई बहुलता एकर शक्ति आ दुर्बलता दुनू अछि। २. सात दृश्यसभक बीच सम्बन्ध: दृश्यसभ एकटा स्थिति—एकटा स्त्री, एकटा यात्री, विदेश गेल प्रेमीक याद—क भिन्नता प्रस्तुत करैत प्रतीत होइत अछि। मुदा की ई एकटा आख्यानात्मक प्रगति बनाबैत अछि? एकटा अनुष्ठान चक्र? सौन्दर्यात्मक भिन्नता (प्रकार)क एकटा श्रृंखला? पाड नै कहैत अछि। ३. लिङ्गक राजनीति: युवतीक स्वर गीतसभ पर हावी अछि, मुदा ओकर एजेन्सी सीमित अछि। ओ यात्रीकेँ मना नै सकैत, नै जा सकैत, नै अपन पतिसँ सीधा बाजि सकैत अछि। पाड ई सीमाकेँ बिना टिप्पणीकेँ पुनरुत्पादित करैत अछि। की ई स्रोत सामग्रीक प्रति निष्ठा अछि, या समालोचनात्मक दूरीक विफलता? ४. ननदक भूमिका: बादक दृश्यसभमे, ओ गायब भ जाइत अछि, यात्री आ युवती अकेला रहि जाइत अछि। एहि सम्बन्धक की भेल? पाडक मौन सुझावपूर्ण अछि मुदा अपूर्ण सेहो। ५. अन्त्य: अन्तिम "विलीन" पिय देशान्तरमे अस्पष्ट अछि। की ई प्रेमीक सँ मिलन अछि? मृत्यु? नाटकीय भ्रमक पतन? पाड, संभवतः जानि बूझि कऽ, व्याख्याकेँ रोकि राखैत अछि। ८. निष्कर्ष: एकटा समालोचनात्मक अभिग्रहणक दिशामे औपचारिक सुसंगति, विषयगत जटिलता, आ परम्परा-नवाचारक बीच उत्पादक तनाव—एहि मानकसभ पर विद्यापतिक विदेसिया पर्याप्त रुचिक रचना अछि, मुदा अनिराकृत अन्तर्विरोधसभक सेहो। एकर सबसँ बड़ शक्ति एकर अन्तरालीय स्थिति (अन्तरालीय स्थिति) अछि: लोक आ शास्त्रीयक बीच, मैथिली आ भोजपुरीक बीच, प्रदर्शन आ पाठक बीच, भक्ति आ समालोचनाक बीच। ई स्थिति एकरा ओह तनावसभकेँ मञ्चित करबाक अनुमति दैत अछि, जे आधुनिक मैथिली अस्मिताकेँ परिभाषित करैत अछि—एकटा गौरवशाली साहित्यिक अतीत आ वर्तमानक आर्थिक अनिश्चितताक बीच, संस्कृतिकृत प्रतिष्ठा आ लोक जीवन्तताक बीच, विरहक वेदना आ राजनीतिक मान्यताक मागक बीच फँसल। एकर सबसँ बड़ दुर्बलता अछि एकर सैद्धान्तिक अपर्याप्त विस्तार। पाड जानैत अछि जे ओ की करबाक चाहैत अछि—एकटा परम्पराकेँ पुनः प्राप्त करबाक, विद्यापतिकेँ सम्मान करबाक, मैथिली प्रवासक वर्तमान क्षणसँ बाजि करबाक—मुदा ओ हमेशा नै जानैत अछि जे ओ कइ प्रकारेँ ई करि रहल अछि। विधाक अस्थिरता, अस्पष्ट रङ्गमञ्चन, विद्यापतिक पात्रक रूपमे अनिराकृत भूमिका: ई अपने आपमे दोष नै अछि, मुदा ई एकटा आत्म-विवेचनात्मक विवरणक माग करैत अछि, जे पाड प्रदान नै करैत अछि। अभिग्रहण-केन्द्रित समालोचक ध्यान देत कि ई पाड अब बहु सन्दर्भसभमे विद्यमान अछि: मैथिली पाठकसभ लेल, ई सांस्कृतिक स्मृतिक एकटा दस्तावेज अछि; अंग्रेजी पाठकसभ लेल, एकटा अनूदित जिज्ञासा; भारतीय रङ्गमञ्चक विद्वान लेल, प्रदर्शन परम्परासभक अभिलेखीकरणक चुनौतीसभक एकटा केस स्टडी। प्रत्येक पठन सन्दर्भ एकटा भिन्न पाड उत्पन्न करैत अछि। अन्ततः, विद्यापतिक विदेसिया ओहिमे सफल अछि जे ई संभवतः सबसँ मौलिक रूपसँ प्रयास करैत अछि: मैथिली विदेसिया—प्रवासी, आ प्रतीक्षारत स्त्री—क अनुभवकेँ मिथिलाक सबसँ प्रतिष्ठित साहित्यिक परम्पराक भीतर रखबाक। एहन करि कऽ, ई एकटा दावा करैत अछि: जे श्रम प्रवासक पीड़ा राधा-कृष्णक विरह जकर समान सौन्दर्यात्मक ध्यानक हकदार अछि; जे लोक शास्त्रक भीतर अछि; जे विस्थापनक वर्तमान क्षण शताब्दी-पुरान काव्य भाषाक संसाधनसभक माग करैत अछि। की पाड ई दावाकेँ पूर्ण रूपसँ प्राप्त करैत अछि, ई समालोचक लेल एकटा खुला प्रश्न अछि। मुदा दावा स्वयं—आ एकर अभिव्यक्तिक श्रम—सम्मानक माग करैत अछि। पाँच सैद्धान्तिक दृष्टिकोणसभद्वारा विद्यापतिक विदेसियाक एकटा समालोचनात्मक पाठ १. गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक: की मैथिली सबाल्टर्न बाजि सकैत अछि? स्पिवाकक आधारभूत प्रश्न—"केन सबाल्टर्न बाजि सकैत अछि? "—ओह तंत्रकेँ पूछैत अछि जकर द्वारा हाशियाकृत विषयसभकेँ प्रभुत्वशाली प्रवचनमे प्रतिनिधिकृत कएल जाइत अछि, जे हमेशा संस्थागत आ वैचारिक संरचनासभद्वारा मध्यस्थ होइत अछि जे प्रामाणिक आत्म-अभिव्यक्तिकेँ अवरुद्ध करैत अछि। विद्यापतिक विदेसिया स्पिवाकीय विश्लेषणक लेल एकटा बाध्यकारी केस स्टडी प्रस्तुत करैत अछि, ठीक ओहि कारण जे ई प्रतिनिधित्वक ओह संकटकेँ मञ्चित करैत अछि, जकर सैद्धान्तिकीकरण ओकर काज करैत अछि। युवती जे नाटकक गीतसभ पर हावी अछि, सतह पर एकटा सबाल्टर्न आकृतिक रूपमे प्रकट होइत अछि: एकटा ग्रामीण स्त्री जकर पति श्रम लेल प्रवास करि गेल अछि, जे पितृसत्तात्मक आ आर्थिक संरचनासभक भीतर अपन स्थितिक अनिश्चिततासँ जूझबाक लेल छोड़ि देल गेल अछि, जे ओकरा कोनो एजेन्सी नै दैत अछि। तथापि, ओकर वाणी—गीत जे ओ गाबैत अछि—ओकर अपन नै अछि। ई विद्यापतिक रचना अछि, जे १४-१५वीं शताब्दीक एकटा पुरुष कवि, बहु पाठ्य संचरण ( नेपाल पदावली, नगेन्द्रनाथ गुप्तक संकलन) द्वारा मध्यस्थ, आ समकालीन नाटककार/प्रलेखक द्वारा अरू मध्यस्थ, जे चयन, व्यवस्था आ ढाँचा प्रदान करैत अछि। युवती बाजैत अछि, मुदा जे ओ बाजैत अछि, ओ पहिने सँ अभिजात पुरुष-रचित साहित्यक एकटा उद्धरण अछि। स्पिवाकक उपनिवेशवादक "ज्ञानमूलक हिंसा" (ज्ञानमीमांसात्मक हिंसा) क समालोचना एतय भारतीय साहित्यिक संस्कृतिक भीतर आन्तरिक उपनिवेशवादसभ धरि विस्तारित होइत अछि। नाटककारक ढाँचा—जे मैथिलीमे भोजपुरी लोक आख्यानक "सूक्ष्म विवरण"क अभाव अछि—प्रामाणिक लोक अभिव्यक्तिक बारेमे एकटा बेचैनी प्रकट करैत अछि, जे नाटक विद्यापतिक पद्यसभकेँ एक प्रकारक आदि-लोक अभिलेखक रूपमे पुनः प्राप्त करि कऽ हल करबाक प्रयास करैत अछि। मुदा स्पिवाक पूछत: एहि पुनर्प्राप्तिमे की मिटाएल जाइत अछि? वास्तविक मैथिली महिला जे प्रवास केनए अछि, या प्रवासीक प्रतीक्षा केनए अछि, ओकर स्थान एकटा साहित्यिक निर्माण—संस्कृतिकृत काव्यशास्त्रक विरहिणी—ले लैत अछि। सबाल्टर्न स्त्री आर कोनो चीजक प्रतीक बनि जाइत अछि: मैथिली सांस्कृतिक अस्मिता, साहित्यिक परम्पराक प्रतिष्ठा, कवि-सन्तक अधिकार। नाटकक अन्तिम इशारा—अन्धकारसँ उदित होइत पिय देशान्तर (विदेश सँ लौटल प्रेमी) क अस्पष्ट उपस्थिति—स्पिवाकीय दृष्टिसँ विशेष रूपसँ शिक्षाप्रद अछि। की ई मिलन अछि? मुक्ति? पाड ई अनिराकृत छोड़ैत अछि। मुदा स्पिवाक ध्यान देत कि सबाल्टर्न स्त्रीक इच्छा अन्ततः पुरुष आकृतिक वापसी पर विस्थापित भ जाइत अछि। युवतीक प्रतीक्षा अपन पूर्ति ओकर अपन एजेन्सीमे नै, बल्कि प्रेमीक आगमनमे पाबैत अछि। ओकर विषयता पूर्ण रूपसँ ओकर अनुपस्थिति आ उपस्थितिक सापेक्ष निर्मित अछि। ओ बाजैत अछि, मुदा ओ ओकर बारेमे, ओकर लेल, ओकरा बाजैत अछि। ओकर अपन स्वर, ओकर अपन इच्छा जकाँ, मध्यस्थ बनि रहैत अछि। नाटककारक अपन स्थान ओह समस्याक दर्पण करैत अछि जेकरा स्पिवाक पहिचान करैत अछि। एकटा शिक्षित, संभवतः शहरी, संभवतः पुरुष या पुरुष-पहिचान वाला व्यक्तिक रूपमे जे एहि ग्रामीण प्रदर्शन परम्परासभक दस्तावेजीकरण आ ढाँचा प्रदान करैत अछि, नाटककार ओह प्रतिनिधित्वक कार्यकेँ स्वयं करैत अछि, जकर स्पिवाक समालोचना करैत अछि। लम्बा गद्य प्रस्तावना—दलक, गाम, प्रदर्शन इतिहासक अभिलेखीय विवरण—नृवंशविज्ञान सम्बन्धी अधिकारक दावाक रूपमे कार्य करैत अछि। मुदा की ई प्रलेखन सबाल्टर्न वाणीकेँ सक्षम करैत अछि या अवरुद्ध? युवती गाबैत अछि, मुदा ओकर गीत टीकाकृत, अनूदित, व्याख्यात अछि—पहिल नाटकक भीतर पात्रक रूपमे विद्यापति द्वारा, फिर नाटककारक ढाँचा द्वारा, फिर एहि समालोचक द्वारा। मध्यस्थताक प्रत्येक तह केँ कोनो बिना मध्यस्थताक सबाल्टर्न स्वरसँ अधिक दूर करि दैत अछि। स्पिवाक हमरा याद दियैत अछि जे "सबाल्टर्नकेँ बाजि देनाइ" क इच्छा स्वयं एकटा पाश्चात्य-बौद्धिक कल्पना अछि, प्रामाणिकताक पुनः प्राप्तिक एकटा परियोजना जे अनिवार्य रूपसँ ओह संरचनासभक पुनरुत्पादन करैत अछि जेकरा ओ विखण्डित करबाक चाहैत अछि। विद्यापतिक विदेसिया एहि विरोधाभाससँ बचि नै सकैत अछि, मुदा ई एकरा असामान्य आत्म-जागरूकताक साथ मञ्चित करैत अछि। जखन विद्यापति पात्र युवतीक गीतसभक "अर्थ समझाबय" आबैत अछि, तखन नाटक समालोचकक अपन कार्यकेँ रूपकित करैत अछि। प्रश्न अछि: की नाटक एहि रूपककेँ एकटा समस्या क रूपमे पहिचान करैत अछि, या ई भोलेपनसँ कविक व्याख्यात्मक अधिकारक उत्सव मनाबैत अछि? २. दीपेश चक्रवर्ती: मैथिली साहित्यिक कल्पनाकेँ प्रान्तीयकरण चक्रवर्तीक प्रान्तीयकरण यूरोप (यूरोपकेँ प्रान्तीय बनाब) तर्क करैत अछि जे ऐतिहासिकतावाद (इतिहासवाद)—इतिहास लेखनक यूरोपीय मोड, जे एकटा सार्वभौमिक, रैखिक कालगतिकी मानैत अछि—आधुनिक दक्षिण एशियाई चिन्तनकेँ एहन तरहसँ संरचित केनए अछि जे कालगतिकीय अनुभवक अन्य रूपसभकेँ अवरुद्ध करैत अछि। चक्रवर्ती एकटा इतिहासलेखनक आह्वान करैत अछि जे "देवताक राजनीति" आ अस्तित्वक अन्य एहन मोडसभक लेल स्थान बनाबय, जे धर्मनिरपेक्ष, विकासवादी समयमे समाहित नै होइत अछि। विद्यापतिक विदेसिया चक्रवर्तीक ढाँचाक अनुप्रयोगक लेल एकटा समृद्ध स्थल प्रदान करैत अछि कारण ई एक साथ अनेक असंगत कालगतिकीसभमे संचालित होइत अछि। नाटक प्रवासक बारेमे अछि, जे एकटा आधुनिक आर्थिक परिघटना अछि: पाड टिप्पणी करैत अछि जे मिथिलामे प्रवास "हालिया घटना" अछि, जे "गाम उजाड़ भ गेल अछि। " तथापि, एहि आधुनिक स्थितिक प्रतिनिधित्वक लेल नाटकक सौन्दर्यात्मक संसाधन विद्यापतिक १४वीं शताब्दीक पदावलीसँ आहरित अछि, जे एकटा पूर्व-आधुनिक, भक्ति-शृङ्गार परम्परासँ सम्बन्धित अछि। जे युवती अपन प्रवासी पति कऽ प्रतीक्षा करैत अछि, ओ एक साथ एकटा समकालीन मैथिली स्त्री आ राधा कृष्णक प्रतीक्षारत अछि। पाड एहि कालगतिकीसभक बीच चयन नै करैत अछि; ई दुनूमे एक साथ निवास करैत अछि। चक्रवर्ती एहिकेँ ऐतिहासिकतावादक कालक्रमिक शुद्धताक मागक एकटा अस्वीकारक रूपमे पहिचान करत। नाटक ई कहबाक अस्वीकार करैत अछि: "ई अछि पूर्व-आधुनिक विरह परम्परा; ई अछि आधुनिक प्रवास आख्यान। " बल्कि, ई जोर दैत अछि जे श्रम प्रवासक आधुनिक अनुभव विरहक एकटा रूप अछि, जे समकालीन मैथिली प्रवासीक अनिश्चितता आत्माक अपन प्रियतमक लेल शाश्वत तड़प अछि। ई कोनो रूपकात्मक प्रतिस्थापन नै अछि बल्कि एकटा कालगतिकीय अध्यारोपण (कालिक अध्यारोपण) अछि: दुइ समय एकटा स्थानमे विद्यमान। पाडक मैथिली आ भोजपुरी साहित्यिक परम्परासभक बीच तुलना सेहो चक्रवर्तीय पाठक आमन्त्रित करैत अछि। नाटककार दावा करैत अछि जे भोजपुरीक विदेसिया परम्परा किछु गुणात्मक क्षेत्रसभमे "श्रेष्ठ" अछि, जबकि मैथिली "बोझिल" महाकाव्यात्मक आख्यानसभसँ बाँधल अछि। ई, अन्य बातसभक अतिरिक्त, साहित्यिक समयक बारेमे एकटा दावा अछि। तर्क अछि जे भोजपुरीमे एकटा आधुनिक, प्रतिक्रियाशील, लोक-भाषायी यथार्थवाद (भिखारी ठाकुरक प्रवासी पीड़ाक मार्मिक गीत) उत्पन्न भेल अछि, जबकि मैथिली संस्कृत अतीतक "भारी" रूपसभमे फँसल अछि। नाटकक परियोजना—विद्यापतिक प्रयोग करि कऽ वर्तमानसँ बाजि करबाक—एहि ऐतिहासिकतावादी धारणाकेँ प्रान्तीयकृत करबाक एकटा प्रयासक रूपमे पढ़ल जा सकैत अछि जे "आधुनिक" रूप (यथार्थवाद, उपन्यास, धर्मनिरपेक्ष आख्यान) केवल आधुनिक अनुभवक प्रतिनिधित्वक पर्याप्त माध्यम अछि। मुदा चक्रवर्ती एहि कालगतिकीय संकरताक रोमान्टिकाइजेशनक विरुद्ध सेहो सचेत करबैत अछि। नाटकक विद्यापतिक अधिकारक आह्वान—कवि-सन्त जे विदेसिया परम्पराकेँ प्रमाणित करैत अछि—ओह ब्राह्मण्य प्रतिष्ठा संरचनासभक पुनरुत्पादन करबाक जोखिम उठाबैत अछि, जे ऐतिहासिक रूपसँ लोक अभिव्यक्तिकेँ हाशियाकृत केनए अछि। युवतीक गीत स्वीकार्य होइत अछि, संभवतः, कारण ई विद्यापतिक गीत अछि। आधुनिक प्रवासीक पीड़ा सौन्दर्यात्मक रूपसँ वैध होइत अछि कारण ई एकटा कानन-सम्मत साहित्यिक परम्पराद्वारा ढाँचाबद्ध अछि। चक्रवर्ती पूछत: की हमरा एहन वर्तमानक राजनीति भ सकैत अछि जेकरा पूर्व-आधुनिक पवित्रक प्राधिकरणक आवश्यकता नै अछि? नाटकक प्रदर्शन सन्दर्भ—रामक नाम पर दल, भक्ति-नाटकक रूपमे मञ्चन—एकटा उत्तर सुझावैत अछि। रामखेलावन मण्डलक अभ्यासकर्तासभक लेल, विद्यापति कोनो अधिकार नै अछि जे आधुनिक चिन्तासभकेँ वैधता प्रदान करबाक लेल आहूत कएल गेल हो; ओ एकटा निरन्तर भक्ति अभ्यासक भीतर एकटा जीवित उपस्थिति अछि। "आधुनिक" आ "पूर्व-आधुनिक"क बीचक अन्तर ओकरा लेल एहन रूपमे विद्यमान नै होइत, जेना ई साक्षर समालोचकक लेल अछि। चक्रवर्ती हमरा आग्रह करबैत अछि जे हम ई केँ गम्भीरतासँ लेबू: रामखेलावन परम्पराक कालगतिकी ऐतिहासिकतावादी समय नै, अनुष्ठानिक समय अछि, चक्रीय समय अछि, लीला (दिव्य क्रीडा) क समय अछि। यूरोपकेँ प्रान्तीयकृत करबाक अर्थ अछि ओह ऐतिहासिकतावादी धारणासभकेँ प्रान्तीयकृत करबाक जे हमरा विद्यापतिक उपस्थितिकेँ एकटा अनाक्रोनिज्मक रूपमे देखबाक लेल बाध्य करैत अछि, न कि एकटा निरन्तरताक रूपमे। ३. ए. के. रामानुजन: लोक आ शास्त्रीय काननक अन्तर्क्रिया रामानुजनक जीवन-कार्य भारतीय साहित्यमे "लोक" आ "शास्त्रीय" परम्परासभक बीच पदानुक्रमिक विरोधकेँ चुनौती देबाक लेल समर्पित छल। ओ प्रदर्शित केलखिन जे ई श्रेणीसभ स्थिर सार नै अछि, बल्कि गतिशील, परस्पर गठन करैत रूप अछि। "शास्त्रीय" निरन्तर "लोक" संसाधनसभ पर आकर्षित करैत अछि; "लोक" "शास्त्रीय" रूपसभकेँ आत्मसात आ रूपान्तरित करैत अछि। रामानुजनक स्पीकिंग ऑफ शिव, द इन्टीरियर ल्याण्डस्केप, आ फोल्कटेल्स फ्रम इण्डियाक अनुवाद ओकर विधिक उदाहरण अछि: लोक परम्परासभकेँ काननिक पाठसभक समान गम्भीरतासँ व्यवहार करबाक, ओकर औपचारिक परिष्कार आ सांस्कृतिक जटिलताक प्रति ध्यान देबाक। विद्यापतिक विदेसिया अनेक प्रकारसँ रामानुजन-शैलीक एकटा पाठ अछि। ई स्पष्ट रूपसँ विद्यापति—मैथिली साहित्यक सबसँ काननिक आकृति—आ विदेसियाक लोक प्रदर्शन परम्परासभक बीच सम्बन्धसँ सम्बन्धित अछि। नाटककार टिप्पणी करैत अछि जे विद्यापतिक पदावलीमे "शुद्ध विदेसिया" पद्य अछि, विशेषतः नेपाल पदावलीमे, ई सुझाव दैत अछि जे शास्त्रीय कवि स्वयं लोक विषय आ रूपसभसँ जुड़ल छल। वर्णित प्रदर्शन दल—रामखेलावन मण्डल, रामरक्षा चौधरी नाट्यकला परिषद—लोकप्रिय प्रदर्शन सन्दर्भसभमे एहि पद्यसभक चालू जीवनक प्रतिनिधित्व करैत अछि। पाठ "उच्च" साहित्यिक परम्पराकेँ "निम्न" प्रदर्शन परम्परासँ अलग करबाक अस्वीकार करैत अछि। रामानुजन नाटकक अनुवादक प्रति विशेष रुचि लेत—केवल भाषिक अनुवाद नै, बल्कि विधा, रजिस्टर आ सामाजिक जगतक बीच अनुवाद। युवतीक गीत शृङ्गार आ विरहक बीच, शास्त्रीय राग प्रणाली (धनाशी, मलावा, कोलार, घनाशी) आ रङ्गमञ्च निर्देशनक लोक-भाषायी मुहावराक बीच आवाजाही करैत अछि। विद्यापति पात्र "अर्थ समझाबय" आबैत अछि, विद्वान-टीकाकारक कार्य करैत अछि जे शास्त्रीय पाठ आ लोकप्रिय अभिग्रहणक बीच मध्यस्थता करैत अछि। तथापि, ई मध्यस्थता एकदिशीय नै अछि: विद्यापति गाबैक बाद युवती सेहो पद्यसभक व्याख्या करैत अछि, "एकर अर्थ पर विस्तार" करैत अछि। अर्थ शास्त्रीय अधिकारद्वारा स्थिर नै करल जाइत, बल्कि संवादात्मक प्रदर्शनद्वारा उद्भूत होइत अछि। रामानुजनक "सन्दर्भ-संवेदनशील" अर्थक अवधारणा—ओकर आग्रह जे भारतीय साहित्यिक रूपसभकेँ ओकर प्रदर्शन सन्दर्भसभक भीतर समझल जाए—एहि पाठक पढ़बाक लेल महत्वपूर्ण अछि। नाटक पाश्चात्य अर्थमे एकटा "पाठ" नै अछि बल्कि प्रदर्शन-लेल-पटकथा अछि, एकटा दस्तावेज जे एकटा मूर्त, संगीतमय, अनुष्ठानिक घटनाक संकेत करैत अछि। राग पर विस्तृत ध्यान, प्रवेश आ निकास चिह्नित करैत रङ्गमञ्च निर्देशन, पात्र आ दर्शकक बीच अन्तर्क्रिया (दृश्य ७ मे यात्री दर्शकक ओर इशारा करैत अछि)—सभ एकटा प्रदर्शन परम्पराक संकेत करैत अछि जे ओकर साहित्यिक सामग्रीमे घटाएल नै जा सकैत अछि। रामानुजन पाठक क्षेत्रीय विशिष्टताक प्रति सगाई केँ सेहो नोट करत। नाटककारक समस्तीपुर, पूर्णिया, सुपौल, सहरसाक दलक सावधानीपूर्वक प्रलेखन—गाम, पञ्चायत, डाकघरक नामकरण—मात्र पुरातन-वस्तु-प्रेम नै अछि। ई स्थानक बारेमे एकटा दावा अछि: जे ई परम्परा विशिष्ट समुदायसभक विशिष्ट स्थानसभमे अछि, जे ओकर अर्थ स्थानीय भूगोल आ इतिहासमे निहित अछि। ई क्षेत्रीय आधार शास्त्रीय संस्कृत सौन्दर्यशास्त्र आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्त दुनूक सार्वभौमिकीकरण प्रवृत्तिकेँ चुनौती दैत अछि। तथापि, रामानुजन ओह अनुपस्थिति केँ सेहो नोट करत, जे एहि पाठक पीछा करैत अछि। नाटककार विलाप करैत अछि जे सालहेस आ चूड़ामल जहिना लोक व्यक्तित्वसभ पर "कोनो शोध नै भेल अछि, " जे मैथिलीमे भोजपुरीमे भेटल विस्तृत लोक आख्यानसभक कमी अछि। ई, रामानुजनक शब्दावलीमे, काननक अपन लोक स्रोतसभकेँ पहिचान करबाक विफलता अछि। शास्त्रीय मैथिली परम्परा, संभवतः, लोक सामग्रीसभकेँ बिना स्वीकार कऽ आत्मसात करि लेलक, ओकरा "बोझिल" महाकाव्यात्मक रूपसभमे रूपान्तरित करि देनए जे ओकर लोक-भाषायी मूलकेँ अस्पष्ट करि दैत अछि। नाटकक परियोजना—विद्यापतिक पदावलीक भीतर विदेसियाकेँ पुनः प्राप्त करबाक—एहि प्रक्रियाकेँ उलटबाक एकटा प्रयास अछि, ई देखाबाक लेल जे शास्त्रीय कवि सेहो एकटा लोक कवि छल, जे काननिक पाठक भीतर स्त्री, प्रवासी आ बञ्चितक आवाज अछि। ४. रुस्तम भारुचा: भारतीय रङ्गमञ्च आ प्रदर्शनक राजनीति भारुचाक काज निरन्तर भारतीय प्रदर्शन परम्परासभक पश्चिम-उन्मुख "आधुनिक" रङ्गमञ्च आ राज्य-प्रायोजित "लोक" पुनरुद्धार आन्दोलन दुनू द्वारा उपयोगिताकेँ चुनौती देबैत अछि। थिएटर एन्ड द वर्ल्ड आ द पॉलिटिक्स ऑफ कल्चरल प्रैक्टिसमे, भारुचा विशिष्ट सन्दर्भ, समुदाय आ शक्ति सम्बन्धसभ पर कठोर ध्यान देबाक तर्क करैत अछि, जकर भीतर प्रदर्शन परम्परासभ विद्यमान अछि। ओ "अन्तर-सांस्कृतिक" रङ्गमञ्चसँ संशयित अछि, जे सौन्दर्यात्मक रूपसभकेँ ओकर सामाजिक आधारसँ उखाड़ि लैत अछि, आ एहन तरहसँ "लोक" परम्परासभकेँ शहरी, मध्यम-वर्गीय, या अन्तर्राष्ट्रीय दर्शकसभक लेल पुनः प्याकेज कएल जाबाक आलोचनात्मक अछि। विद्यापतिक विदेसिया ठीक ओह विवादित स्थानमे विद्यमान अछि, जेकर भारुचा मानचित्रण करैत अछि। पाड प्रदर्शन परम्परासभक दस्तावेजीकरण करैत अछि—रामखेलावन मण्डल, रामरक्षा चौधरी नाट्यकला परिषद—जे ऐतिहासिक रूपसँ ग्रामीण मैथिली समुदायसभमे निहित छल। ई दल स्थानीय दर्शकसभक लेल, ग्रामीण परिवेशमे, अनुष्ठानिक आ भक्ति चक्रक भागक रूपमे प्रदर्शन करैत छल। तथापि, पाड जेना हमरा लग अछि, ओ एकटा प्रलेखन अछि, एकटा अनुवाद अछि, एकटा प्रस्तुति अछि "विवेकशील दर्शकसभक समक्ष"—अर्थात्, एकटा एहन दर्शकक समक्ष, जे आवश्यक रूपसँ मूल ग्रामीण समुदाय नै अछि। नाटक, अपन वर्तमान रूपमे, अपन मूल प्रदर्शन सन्दर्भसँ उखाड़ि लेल गेल अछि आ एकटा भिन्न जनता—मैथिली पाठक, संभवतः, मुदा (अनुवादक माध्यमसँ) अंग्रेजी-भाषी विद्वान आ विद्यार्थी—केँ अर्पित कएल गेल अछि। भारुचा पूछत: एहि उखाड़बाकिमे की नुकसान होइत अछि? पाडमे रङ्गमञ्च निर्देशन न्यूनतम अछि: "रङ्गमञ्च पर, हमर विदेसिया विदाई लैत अछि, " "युवती प्रतीकात्मक रूपसँ एकटा दोकान खोलैत अछि। " जे कहियो रामखेलावन मण्डलकेँ प्रदर्शन करैत नै देखलक, ओकरा लेल ई निर्देशन केवल एहि बातक सबसँ न्यूनतम सुझाव दैत अछि जे प्रदर्शन देखल जा सकैत छल, सुनल जा सकैत छल, महसूस कएल जा सकैत छल। रागक नाम देल गेल अछि मुदा स्वरलिपिबद्ध नै; गति संकेतित अछि मुदा कोरियोग्राफिड नै; दर्शक अन्तर्क्रिया नोट कएल गेल अछि मुदा वर्णित नै। पाड प्रदर्शनक एक प्रकारक प्रेत बनि जाइत अछि, किछु सूचना संरक्षित करैत अछि मुदा ओह मूर्त, संवेदी, सामुदायिक आयामसभकेँ खोइ दैत अछि, जकरा भारुचा अघटनीय (अवघटनीय) मानैत अछि। भारुचा एहि परम्परासभक साहित्यिक-समालोचनात्मक उपकरणक भीतर ढाँचाबद्धीकरण केँ सेहो प्रश्न करत। लम्बा गद्य प्रस्तावना—मैथिली आ भोजपुरीक बीच एकर तुलना, नगेन्द्रनाथ गुप्तक संस्करणक उद्धरण, विदेसिया परम्पराक भीतर विद्यापतिकेँ स्थापित करबाक—एकटा शैक्षणिक ढाँचाक गठन करैत अछि जे मूल अभ्यासकर्तासभक लेल पराया भ सकैत अछि। नाटक विद्यापतिक विदेसियाक "समानान्तर ब्रह्माण्ड"क रूपमे प्रस्तुत अछि, एकटा वाक्यांश जे एकटा जीवित प्रदर्शन परम्पराक बदला एकटा साहित्यिक-अन्तर्पाठ्य सम्बन्धक सुझाव दैत अछि। भारुचा पूछत: ई पाड केकर लेल अछि? आ ई केकर हितक सेवा करैत अछि? नाटकक भिखारी ठाकुरक विदेसिया परम्परासँ सम्बन्ध भारुचाक दृष्टिसँ विशेष रूपसँ महत्वपूर्ण अछि। नाटककार टिप्पणी करैत अछि जे भिखारी ठाकुरक विदेसिया कलकत्तामे प्रवासीक रूपमे ओकर अपन अनुभव आ भोजपुरी-भाषी समुदायसभक लेल ओकर प्रदर्शनसँ उद्भूत भेल छल। ई, भारुचाक शब्दावलीमे, एकटा समुदाय-आधारित रङ्गमञ्च छल: अपन अभ्यासकर्ता आ दर्शकसभक जीवित अनुभवमे निहित, ओकर आवश्यकता आ चिन्तासभक प्रति प्रतिक्रियाशील। प्रस्तुत पाडक विद्यापतिक पद्यसभक माध्यमसँ एकटा मैथिली विदेसिया बनाबाक प्रयास, ओकर विपरीत, एकटा साहित्यिक निर्माण अछि: ई समकालीन अनुभवक बदला एकटा काननिक कविसँ अधिकार आकर्षित करैत अछि। भारुचा पूछत: की ई प्रतिस्थापन—आधुनिक प्रवासक लेल शास्त्रीय विरह—समकालीन मैथिली प्रवासीसभक विशिष्ट पीड़ाक न्याय करैत अछि, या ई ओह पीड़ाकेँ एहन रूपमे सौन्दर्यीकृत करैत अछि जे ओकरा ओकर भौतिक वास्तविकतासँ दूर करि दैत अछि? पाडक अन्तिम इशारा—"पिय देशान्तरक ई अवधारणा एहन विवेकशील दर्शकसभक समक्ष प्रस्तुत अछि। मैथिली प्रवासीक (विदेसिया) वर्तमान दशाक बीच, ई अर्पण महाकवि विद्यापतिक प्रति गहन श्रद्धाक साथ प्रस्तुत अछि"—ओह तनावकेँ उजागर करैत अछि जेकर भारुचा पहिचान करैत अछि। प्रवासीक "दशा" स्वीकार कएल जाइत अछि मुदा फिर विस्थापित: अर्पण प्रवासीसभकेँ नै, विद्यापतिकेँ कएल जाइत अछि। "विवेकशील दर्शक" केँ सामाजिक स्थितिक प्रति प्रतिक्रिया देबाक बदला सौन्दर्यात्मक अवधारणाक सराहना करबाक आमन्त्रण देल जाइत अछि। भारुचा आग्रह करत कि एकटा सच्चा राजनीतिक रङ्गमञ्च एहि विस्थापनकेँ अनुमति नै देत; ई सौन्दर्यात्मक ढाँचाक ऊपर भौतिक पीड़ाक प्राथमिकता पर जोर देत। ५. एडवर्ड सईद: यात्रा करैत सिद्धान्त आ उत्पत्तिक प्रश्न सईदक "यात्रा करैत सिद्धान्त" (यात्रा करैत सिद्धान्त) क अवधारणा एहि बात पर ध्यान दैत अछि जे कइ प्रकारेँ विचार, पाठ आ अभ्यास सांस्कृतिक आ ऐतिहासिक सन्दर्भसभमे यात्रा करैत अछि, अनिवार्य रूपसँ प्रक्रियामे रूपान्तरित होइत अछि। "ट्रैवलिंग थ्योरी" आ "ट्रैवलिंग थ्योरी रिकन्सिडर्ड"मे, सईद तर्क करैत अछि जे सिद्धान्त यात्रा करत समय शक्ति खोबैत या पाबैत अछि, ओकर अर्थ ओह सन्दर्भसभद्वारा आकारित होइत अछि जे ओ प्रवेश करैत अछि, आ "उत्पत्ति"क प्रश्न हमेशा एहि गतिविधिसभद्वारा जटिल होइत अछि। लेट स्टाइल पर ओकर बादक काज सेहो एहि बात पर विचार करबाक लेल संसाधन प्रदान करैत अछि जे कइ प्रकारेँ परम्परासभ बादक अभ्यासकर्तासभद्वारा अभिग्रहीत, अनुकूलित आ पुनः सजीव कएल जाइत अछि। विद्यापतिक विदेसिया एकटा पाठ अछि जे उत्पत्ति आ ओकर जटिलतासभसँ गहिर सम्बन्धित अछि। नाटककार परम्पराकेँ बहु वंशावलीसभक माध्यमसँ अनुरेखित करैत अछि: कटघराक रामखेलावन मण्डल, गायाघाटक रामरक्षा चौधरी नाट्यकला परिषद, पूर्णियाक पिय देशान्तर दल। ई प्रामाणिकताक, उत्पत्तिक दावा अछि जे परम्पराकेँ विशिष्ट समुदाय आ स्थानसभमे आधारित करैत अछि। तथापि, पाड ई सेहो स्वीकार करैत अछि जे विदेसिया परम्परा स्वयं एकटा यात्रा करबैवाला अछि: ई पूर्णियासँ सुपौल, सहरसा, समस्तीपुर जाइत अछि; ई नेपाल (नेपाल पदावली) सँ बिहार यात्रा करैत अछि; ई विद्यापतिक १४वीं शताब्दीक दरबारसँ २१वीं शताब्दीक ग्रामीण प्रदर्शन धरि यात्रा करैत अछि। सईदक रुचि होत कि पाड विदेसिया परम्पराक भोजपुरी उत्पत्तिकेँ कइ प्रकारेँ संभालैत अछि। भिखारी ठाकुरक विदेसिया केँ एकटा पूर्ववर्ती, प्रभावशाली पाठक रूपमे स्वीकार कएल जाइत अछि—एतय धरि जे मैथिली पाठकेँ ओकर विरुद्ध अपनाकेँ परिभाषित करबाक पड़ैत अछि। नाटककारक ई दावा जे भोजपुरी किछु गुणात्मक क्षेत्रसभमे "श्रेष्ठ" अछि, सईदक शब्दावलीमे, यात्रा करबैवाला परम्पराक शक्तिक एकटा स्वीकारोक्ति अछि। मैथिली पाड भिखारी ठाकुरकेँ अनदेखा नै करि सकैत अछि; ओकरा ओकर साथ संघर्ष करबाक, ओकरा आत्मसात करबाक, ओकर माध्यमसँ आ ओकर विरुद्ध अपनाकेँ परिभाषित करबाक पड़ैत अछि। ई प्रभावक चिन्ता अछि, मुदा यात्रा करैत सिद्धान्तक उत्पादक गतिशीलता सेहो: भोजपुरी विदेसिया मैथिलीमे यात्रा करैत अछि आ मैथिली साहित्यिक परम्परा की करि सकैत अछि, ओकर पुनर्विचार करबाक लेल बाध्य करैत अछि। पाडक विद्यापति (१४-१५वीं शताब्दीक आकृति)क एकटा आधुनिक भोजपुरी परम्पराक प्रतिक्रिया देबाक लेल उपयोग यात्रा करैत सिद्धान्तक एकटा रूप अछि। विद्यापतिक पदावली अपन मूल दरबारी-भक्ति सन्दर्भसँ यात्रा करैत मैथिली विदेसियाक समकालीन प्रदर्शन सन्दर्भमे प्रवेश करैत अछि। कवि-सन्त, एहि नव सन्दर्भमे, ओह रूपमे परिणत होइत अछि जे ओ पहिने कहियो नै छल: श्रम प्रवासक एकटा वृत्तान्तकार। ई कोनो साधारण अर्थमे "गलत पठन" नै अछि बल्कि एकटा सर्जनात्मक उपयोगिता अछि, नव आवश्यकतासभकेँ पूरा करबाक लेल एकटा परम्पराक पुनः सजीवीकरण। सईद एहिकेँ यात्रा करैत सिद्धान्तक जीवन्तता क रूपमे पहिचान करत: विचार नव शक्ति प्राप्त करैत अछि जखन ओ नव सन्दर्भसभमे प्रवेश करैत अछि, तखन सेहो (विशेषतः तखन) जखन ओह सन्दर्भसभक ओकर उद्भावकर्ताद्वारा पूर्वानुमान नै कएल गेल छल। पाडक शोधक प्रति चिन्ता—सालहेस आ चूड़ामल जहिना व्यक्तित्वसभ पर "कोनो शोध नै भेल अछि" क विलाप—यात्रा करैत सिद्धान्तक एकटा भिन्न प्रकार प्रकट करैत अछि: शैक्षणिक ज्ञान अभ्यासक लोक परम्परासभमे गति। नाटककार, एकटा साक्षर, शैक्षणिक सन्दर्भमे स्थित या ओकरा सम्बोधित करैत, अभिलेखीय अनुसन्धान, पाठ्य समालोचना, आ ऐतिहासिक प्रलेखनक मूल्यसभकेँ प्रदर्शन परम्परासभ पर आरोपित करैत अछि जे संभवतः एहि मूल्यसभक अनुसार संचालित नै भ रहल छल। सईद नोट करत कि ई कोनो तटस्थ कार्य नै अछि; ई ओह परम्परासभकेँ रूपान्तरित करैत अछि जेकरा ओ दस्तावेजीकृत करबाक चाहैत अछि, ओकरा मापदण्ड (जेना "शोध")क अधीन करैत अछि जे अन्यत्र उत्पन्न होइत अछि। अन्तमे, सईदक "प्रतिपक्षीय पठन" (प्रतिपक्षीय पठन) क अवधारणा पाडक बहु, अतिव्यापी उत्पत्तिसभकेँ समझबाक एकटा मार्ग प्रदान करैत अछि। नाटक एक साथ अछि: रामखेलावन मण्डलक प्रदर्शन परम्पराक एकटा दस्तावेज; विद्यापतिक विदेसिया पद्यसभक एकटा पुनर्निर्माण; भिखारी ठाकुरक भोजपुरी विदेसियाक एकटा प्रतिक्रिया; मैथिली साहित्यिक संस्कृतिमे एकटा योगदान; भविष्यक मञ्चनक लेल एकटा प्रदर्शन पाठ; आ शैक्षणिक अध्ययनक एकटा वस्तु। ई प्रतिस्पर्धी उत्पत्ति नै अछि बल्कि सह-अस्तित्वशील अछि, एकटा प्रतिपक्षीय रचनामे संगीत पंक्ति जकाँ स्तरित। एकटा उत्पत्तिकेँ दोसर पर प्राथमिकता देनाइ—ई कहबाक जे "वास्तविक" पाठ रामखेलावन मण्डलक प्रदर्शन अछि, या विद्यापतिक पद्य, या नाटककारक सृजन—पाठक आधारभूत स्थितिकेँ अस्वीकार करबाक होत: एकटा यात्रा करबैवाला, रूपान्तरित, बहु-मूलीय सांस्कृतिक वस्तुक रूपमे। संश्लेषण: अभिसरण आ विचलन ई पाँच सैद्धान्तिक दृष्टिकोण, जखन कि ओकर उत्पत्ति आ प्रतिबद्धतामे भिन्न अछि, विद्यापतिक विदेसियाक बारेमे किछु मुख्य अन्तर्दृष्टिसभ पर अभिसरण करैत अछि: १. मध्यस्थताक समस्या: स्पिवाक, चक्रवर्ती आ सईद सभ, भिन्न तरिकासँ, एहि बात पर जोर दैत अछि जे सबाल्टर्न, पूर्व-आधुनिक, "मूल" हमेशा पहिने सँ मध्यस्थ होइत अछि। युवती विद्यापतिक माध्यम बिना नै बाजैत अछि; विद्यापति प्रदर्शन परम्परासभक माध्यम बिना नै बाजैत अछि; प्रदर्शन परम्परासभ प्रलेखनक माध्यम बिना नै बाजैत अछि। पाड मध्यस्थता पर स्वयं एकटा चिन्तन अछि। २. पुनर्प्राप्तिक राजनीति: रामानुजन आ भारुचा दुनू शास्त्रीय ढाँचाक माध्यमसँ लोक परम्परासभकेँ "पुनः प्राप्त" करबाक परियोजनाक प्रश्न करैत अछि। रामानुजनक लेल, शास्त्रीय आ लोक हमेशा पहिने सँ जुड़ल अछि; भारुचाक लेल, पुनर्प्राप्ति उपयोगिताक एकटा रूप भ सकैत अछि। पाडक विद्यापतिकेँ विदेसिया परम्पराक लेल दावा करबाक प्रयास एक साथ काननक एकटा कट्टरपन्थी लोकतान्त्रीकरण अछि आ लोक अभ्यासक विशिष्टताक संभावित विलोपन सेहो। ३. कालगतिकी आ इतिहास: चक्रवर्ती आ सईद दुनू सांस्कृतिक विकासक रैखिक, ऐतिहासिकतावादी विवरणसभकेँ चुनौती दैत अछि। पाडक विद्यापतिक विरह आ आधुनिक प्रवासक अध्यारोपण, १४वीं शताब्दीक कवि २१वीं शताब्दीक स्थितिसँ बाजैत अछि एहि आग्रह, ऐतिहासिकतावादी धारणाकेँ अस्वीकार करैत अछि जे प्रत्येक युगक अपन उपयुक्त सौन्दर्यात्मक रूप होइत अछि। ई अनाक्रोनिज्म नै, बल्कि समयसँ एकटा भिन्न सम्बन्ध अछि। ४. दर्शकक प्रश्न: स्पिवाक पूछैत अछि के बाजैत अछि; भारुचा पूछैत अछि केकरा लेल। पाडक बहु दर्शक—ग्रामीण प्रदर्शन समुदाय, मैथिली पाठक, अंग्रेजी-भाषी विद्वान—कोनो सरल उत्तरकेँ जटिल बनाबैत अछि। नाटक विभिन्न जनताक लेल विभिन्न रूपसभमे विद्यमान अछि, आ ई विभिन्न अस्तित्व एकटा "मूल"मे घटाएल नै जा सकैत अछि। ५. सिद्धान्तक सीमा: एहि सिद्धान्तकारसभमे सँ प्रत्येक हमरा याद दियैत अछि जे सिद्धान्तक सीमा अछि। स्पिवाकक सबाल्टर्न अन्ततः नै बाजि सकैत; चक्रवर्तीक गैर-ऐतिहासिकतावादी कालगतिकीसभ शैक्षणिक गद्यमे प्रतिनिधित्व करबाक लेल कठिन अछि; रामानुजनक लोक-शास्त्रीय संश्लेषण विद्वतापूर्ण श्रेणीसभद्वारा पूर्ण रूपसँ कब्जा नै कएल जा सकैत; भारुचाक मूर्त प्रदर्शन प्रलेखनसँ बचि जाइत अछि; सईदक यात्रा करैत सिद्धान्त हमेशा उपयोगिताक दोसर रूप बनि जाबाक जोखिम उठाबैत अछि। विद्यापतिक विदेसिया संभवतः ठीक एहि तनावसभकेँ हल करबाक अस्वीकार करबामे, बहु, आंशिक आ अपूर्ण बनि रहबाक आग्रह करबामे सफल अछि। समापन चिन्तन एहि सैद्धान्तिक परम्परासभक आलोकमे विद्यापतिक विदेसिया एकहि साथ आलोकित आ अशान्त करैत अछि। पाठ स्वयंकेँ विद्यापतिक प्रति अर्पणक रूपमे, लोक परम्पराक एकटा दस्तावेजक रूपमे, समकालीन प्रवासक एकटा प्रतिक्रियाक रूपमे, आ एकटा प्रदर्शन-पटकथाक रूपमे प्रस्तुत करैत अछि। ई ओहि प्रकारक सैद्धान्तिक प्रभुत्वक प्रतिरोध करैत अछि जे एकरा एकटा अर्थ, एकटा उत्पत्ति, एकटा दर्शकसँ बाँधि देत। सम्भवतः ई एकर सबसँ पैघ शक्ति अछि: ई शास्त्रीय आ लोक, पाठ आ प्रदर्शन, अतीत आ वर्तमानक बीच तनावसभकेँ हल नहि करैत, बल्कि ओहि तनावसभकेँ एहन ईमानदारीसँ मञ्चित करैत अछि जकर प्रतिध्वनि सैद्धान्तिक समालोचनामे सुनाइत अछि। एहि पाँच सिद्धान्तकारक प्रत्येक दृष्टि एहि पाठमे अपन चिन्ताक कोनो-न-कोनो रूप देखैत अछि। स्पिवाक निम्नवर्गक मध्यस्थ वाणी देखैत छथि; चक्रवर्ती गैर-इतिहासवादी कालगतिकी देखैत छथि; रामानुजन लोक-शास्त्रीय निरन्तरता देखैत छथि; भारुचा प्रदर्शन-प्रलेखनक राजनीति देखैत छथि; सईद यात्रा करैत सिद्धान्तक क्रियाशीलता देखैत छथि। मुदा कोनो दृष्टि ई दावा नहि करैत जे पाठ ओकर ढाँचामे घटाओल जा सकैत अछि। पाठ सिद्धान्तकेँ अतिक्रमण करैत अछि, जेना सांस्कृतिक वस्तु प्रायः करैत अछि। ओही अतिक्रमण एकरा समालोचनात्मक ध्यानक योग्य बनाबैत अछि आ समालोचकक काजकेँ सदैव आनुपातिक, सदैव अपूर्ण, आगाँक पठन लेल सदैव खुला राखैत अछि। अनुलग्नक -३; मैथिलीक आदिकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व)-गजेन्द्र ठाकुर विद्यापति: किछु प्रचलित कुप्रचारक निराकरण समानान्तर परम्पराक विद्यापति आ पाग विद्यापतिक संस्कृत ग्रन्थमे ठक्कुर विद्यापति कृता लिखल अछि/ आ ओ विद्यापति ब्राह्मण छथि। हमर उद्देश्य मैथिली बला विद्यापतिसँ अछि... जै सम्बन्धमे हम चर्चा केलौं जे हुनका किए पाग पहिरा कऽ "हम्मर विद्यापति" बना लेल गेल... ई तखन नै भेल जखन बिदापत नाचक माध्यमसँ आठ सए बर्ख गएर ब्राह्मण समुदाय विद्यापतिकेँ जिएने रखलक, मुदा तखन भेल जखन बंगाल विद्यापति केँ आ गोविन्ददासकेँ अपन बना लेलक आ बंगालेक विद्वान राजकृष्ण मुखोपाध्याय सर्वप्रथम कहलन्हि जे विद्यापति मिथिलाक भाषाक कवि छथि आ बंगालेक नगेन्द्रनाथ गुप्त सर्वप्रथम कहलन्हि जे गोविन्ददास सेहो मिथिलाक भाषाक कवि छथि आ जखन ई तथ्य सोझाँ उठल तँ पहिने तँ सगर बंगाल हुनकापर मार-मार कऽ उठल आ बादमे मानि गेल। फेर मिथिलाक विद्वानकेँ सोह एलन्हि आ विद्यापतिक संस्कृत ग्रन्थ, गोविन्ददास नाम्ना आ विद्यापति नाम्ना पञ्जीमे उपलब्ध विवरण दऽ विद्यापति ठाकुर आ गोविन्ददास झा (! ! ! ) निकालल गेल- रमानाथ झाक पञ्जीक सतही ज्ञान आ सीमित दृष्टिकोण नोकसान पहुँचेलक। फेर अनचोक्के पाग पहिरा कऽ विद्यापति (मैथिली बला, संस्कृत बला नै) केँ "हम्मर विद्यापति" ब्राह्मण वर्ग द्वारा बना लेल गेल। किछु गोटे ज्योतिरीश्वरक भातिज कहि विद्यापतिकेँ सम्बोधित करऽ लगलाह! ! मुदा कवीश्वर ज्योतिरीश्वर सन बहुत रास कवि पज्जीमे उपलब्ध छथि। आ जे नामक अन्तर विद्यापतिमे आबि जाइ छन्हि (जखन कि सभ काज प्लानिंगसँ भेलै तैयो एकटा सबूत बचि गेलै) से ज्योतिरीश्वरमे किए नै अबैए। राम ठाकुर अहाँ बंगाल किए जाइ छी, पूर्णियाँमे ग्रामदेवताक पूजामे हम गेल छी आ राम ठाकुर (भगवान)केँ देवता रूपमे ढेपाबला खेतमे हम देखने छी, कियो जोति देने रहै। मिथिलासँ छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेशमे गेल रहथि, मध्य प्रदेशसँ राज्यसभा सांसद प्रभात झा कहि रहल छला, जे बरही (काष्ठकार) मिथिलासँ गेला तँ मैथिली भाषी हेबाक कारण लोक हुनका झाजी कहए लागल, आ ओ सभ आब झा टाइटिल रखै छथि, प्रभात झा कैंपेनिंग कऽ देलखिन्ह आ एक वोटसँ केण्डीडेट जीति गेलै। हमरा अहाँ सभकेँ ई अनुभव अछि जे कोनो टाइटिल हुअए पहिने, पटनो धरिमे लोक झाजी वा झौआ ओकरा कहि दै छै। बंगालक मालदह जिलामे ४-५ गाममे मैथिल ब्राह्मणक टाइटिल ओझा छै, आ अलीगढ़मे मैथिल ब्राह्म्ण (ब्रजस्थ मैथिल)क शर्मा। पञ्जीमे कतेक विद्यापतिक विवरण पञ्जीमे कतेक विद्यापतिक विवरण उपलब्ध अछि: १.पनिचोभ सँ विद्यापतिसुत रमापतिक विवाह विद्यापतिक- माता(देवदासी)-दूषण पंजी २.महो केशवो सुत म.म.पाō गोविन्‍द सुता महो लक्ष्‍मीनाथ म.म. विद्यापति म.म. दामोदर ३.महामहो विद्यापति गंगोली सँ मानकुढ़ वासी कविराज गणेश्‍वर ४.घोसोतसँ म.म. गोविन्‍द सुता म. लक्ष्‍मीधर म.म. विद्यापति ५.राजपण्डित म.म. उ. विद्यापति ६.करमहासँ देवनाथ सुत कवि विद्यापति ७.गुणपति सन्‍तति-पठोङगी)। । विद्यापति-पुडरीक-मछदी। केशव-अमरावती। ८.। । सिंहाश्रम सँविद्यापति द्दौo भागीरथ सुतौ कुलेश्‍वर: ९.सिधूक: ए सुता देल्‍हन विश्‍वनाथ श्रीनाथा: सिंहाश्रम सँ विद्यापति दौ। । १०.मिश्र जयदेव (७६/०६) सुता नगवाड़ घोसोत सँ महामहोपाध्‍याय विद्यापति दौ ११.महामहोपाध्‍याय गोविन्‍द सुता महामहो लक्ष्‍मीनाथा परनामक (२०९/०५) ठकरू मo मo उपाo विद्यापति १२.द्दौo। । एवम् ठo विद्यापति मातृक चक्रं। । १३.महोमहोपाध्‍याय विद्यापति सुता अनिरूद्ध अनन्‍त अच्‍युता: एकहरा सँ काशी दौ १४.सदुoसुपे सुतौ दामोदर: ए सुतौ डालूक: पवौलीसँ गोढि दौ डालू (३४/०६) सुतो विद्यापति १५.सुता शिरू पदम लाखू गादूका: एकहरा सँ श्री कर सुत चान्‍द दौ खौआल सँ भूले द्दौo मधुसूदन सुता उमापति (८४/०१) विद्यापति १६.मुसै सुता खौआल सँ डालू सुत विद्यापति दौ भण्‍डारिसम सँ शुभे द्दौo ठo १७.सोदरपुर सँ छोटाई दौ (२८/०८) बसाउन सुता पशुपति विद्यापति १८.कल्‍याण सुता करमहा सँ विद्यापति दौ १९.जालय सँ रामेश्‍वरसुत महिघर दौ यमुगाम सँ गेणाई द्दौo विद्यापति सुतो भगीरथ: २०.हरखू गोविन्‍दा सकo गुणे सुत विद्यापति दौ सुरगन सँ होरे द्दौo २१.कृष्‍णपति सुता मुरारि विद्यापति प्रजापति टकबाल सँ रामकर दौ। । २२.कविन्‍द्र पदांकित मo मo उo रघुनाथा करमहा सँ विद्यापति दौ २३.सुतो विद्यापति माण्‍डरसँ यग्‍यपति दौ २४.तल्‍हनपुर सँ गढ़वय द्दौ. विद्यापति २५.यशु सुतो रविपति रूद्रपति विद्यापति चन्‍द्रपति २६.नरउन सँ विद्यापति दौ २७.रविपति सुतो कृष्‍णपति विद्यापति घुसौत सँ होरे दौ। । २८.विद्यापति सुता बेलउँच सँराम दौ २९.गुणे सुत गौरीपति विद्यापति लक्ष्‍मीपति कुलपतिय: दरिo दिवाकर दौ ३०.महिपति झाक मातामह कवि कोकिल विद्यापति ठाकर) दामोदर सुतो पाँसदु. हरिदेव: नरउनसँ माङनि दौ ३१.गणपति सुतो कवि कोकिल राजपण्डित मo मo उपाo विद्यापति: ए सुतौ हरिपति धनपति। । ३२.महामहोपाध्‍याय विद्यापतिसुता हृषिकेश ३३.हरपति सुता विद्यापति काशी दामोदरा: ३४.रतिपति सुता सोदरo विद्यापति दौ ३५.विद्यापति प्रपौत्र पौत्र हरिश्‍वर धनेश्‍वर सुतो गोन्‍दूक पालीसँ ज्ञानदौ। । ३६.विद्यापति द्दौ. वेणी सुतो रविनाथ: ३७.सोदरo विद्यापति द्दौo निकार ३८.श्रीपति सुतो विद्यापति परानौ दरिहरा ३९.सोदरo विद्यापति द्दौo मिश्र कमलनयन सुता हरिअम सँ बछाई दौ ४०.रवौआलसँ सोने दौ देवनाथ सुतो कवि विद्यापति पचही सोदरपुरसँ जगन्‍नाथ दौ ४१.गोपी सुतो विद्यापति वाचस्‍पति शीवा हरिअमसँ नारायण दौ। । ४२.विद्यापति निधि प्र. धरापतिय: ४३.तरौनी करमहासँ महिधर दौ। । (४६/०३) विद्यापति (१११/०३) सुतो मधुसूदन: ४४.कुलानन्‍द हृदयनन्‍दनो कर. पनाई दौ (१०९//१०६) विद्यापति (३१४/०५) सुता प्रितिनाथ शोभनाथ महिनाथा: ४५.उँमापति सुत विद्यापति सुतो जयपति: ४६.जागू सुता सुरपति हरिपति प्रभापति गिरपति विद्यापतिय: ४७.हचलू सुता हरपति विद्यापति महो ज्ञानपति दिनपति मणिकंठा ४८.कृष्‍ण सुता रमापति श्रीपति रत्‍नपति विद्यापति: बूधवाल सँ धीरू दौ। । ४९.दाशे सुता दयोरी खण्‍डबला सँ गोपीनाथ दौ (८५//०२) विद्यापति सुत जीवनाथ ५०.नरउन सँ विद्यापति द्दौo ५१.धर्माधिक रणिक बाटू सुतो विद्यापति ५२.सोदरपुर सँ गयन दौ विद्यापति सुता रमापति होरिल हररवू जिवाईका माण्‍डर सँ सोढू दौ। । ५३.खौआल सँ रघुनाथ दौ (५४//०७) विद्यापति सुत जानू ५४.टकबालसँ विद्यापति द्दौ मतिनाथ ५५.खण्‍डबलासँ विद्यापति सुत जीवनाथ दौ ५६.करमहा सँ विद्यापति द्दौo विश्‍वनाथ ५७.कृष्‍णपति सुतो उँमापति (बo २८/०१) विद्यापति (३०२/०३) पण्‍डुआ सँ पाँ भगीरथ दौ ५८.महो हरिकृष्‍ण सुता खौआल सँ विद्यापति दौ ५९.मधुसूदन सुतो विद्यापति: अलय सँ अनिरूद्ध दौ ६०.माण्‍डर सँ देवशर्म्‍म द्दौo विद्यापति सुता नरउन सँ बदनी दौ ६१.ठo श्‍याम सुतो पुरन्‍दर परमानन्‍दो माण्‍डर सँ विद्यापति दौ ६२.विद्यापति सुता सोदरपुर सँ जयराम ६३.धर्मेश्‍वरौ खौआल सँ हराई सुत मनोहर दौ रूद सुतो राम: गंगोली सँ देवे दौ विस्‍फी सँ कवि कोकिल राज पण्डित मo मo पाo विद्यापति द्दौo राम सुतो भिरवूक: फनन्‍दह सँ लोचन दौ पकलिया सँ दिनू द्दौo भिरवू सुतो हराइक: सोदरपुर सँ विर सुत हरिदौ खौआल सँ शुभे द्दौo हराई सुता मोहन मनोहरा कमल नारायणा: सोदरपुर सँ जगन्‍नाथ सुत भवानी दौ भवानी सुतो हरिदेव सदायकौ हरिअम सँ गोविन्‍द सुत श्रीधर दौ सकo जागे द्दौo मनोहर सुता करमहा सँ रतनपति सुत कृष्‍णदाश दौ कृष्‍णदाश सुता सोदरपुर सँ मधुसूदन सुत सुन्‍दर दौ (४७//०५) दरिहरा सँ मुशाई द्दौo हरि सुतो प्राणपति: सोदरपुर सँ नारायण सुत ननू दौ (११०//०१) (१०१//०१) नारायण सुतो ननूक: वुधवाल सँ बहुड़ी दौ (१८०/०४) दामोदर सुतो बहुड़ीक: सोदरपुर सँ परमानन्‍द सुत कांगव दौ परमानन्‍द सुतो कांगव: माण्‍डर सँ हलघर सुत पीताम्‍बर दौ (५८//०५) करमहा सँ श्रीराम द्दौo कांगव सुता करमहा सँ शिवदेव सुत कारम दौ माण्‍डर सँ वावू दौहित्र दौo ६४. वावू दुर्गापति सिंह: सुतो वावू विद्यापति सिंह: करमहा सँ हरिनाथ सुत तारानाथ दौ ६५. खौआल सँ युवराज द्दौo बावू विद्यापति सिंह सुतो वावू गिरिजापति सिंह ६६.वावू गंगापति सिंह सुता भेषपति सिंह विद्यापति सिंह ६७.वावू भेषपति सिंह पत्‍नी अन्‍तर्जातीय ए सुत हंसपति सिंह: वावू विद्यापति सिंह सुतो रमन कुमार सिंह: ६८.बाला सुतो भैया कल्‍याणौ खौआल सँ विद्यापति दौ ६९.विश्‍वनाथ काशीनाथा: अलय सँ विद्यापति दौ ७०.पाठक विद्यापति सुतो दुखमंजन कलरौ आसी एकहरा सँ उँमानन्‍द दौ ७१.नरपति सुता कल्‍याणपुर विस्‍फी सँ सुन्‍दर दौ कमलनयन सुत नारायण सुतो सुन्‍दर: करमहा सँ विद्यापति दौ ७२.मुरारि सुता दामोदर विद्यापति महिघर आनन्‍दा: ७३.विद्यापति सुता पद्मापति सभापति आदिपति गणपतिय: । । ७४.विद्यापति सुतो छीतू परमानन्‍दो माण्‍डर सँ नरपति दौ बहेराढ़ी सँ गदाधर द्दौo ७५.अलय सँ कमल सुत नकटू दौ. विद्यापति सुत जीवनाथ सुतो परम: दरि. राम दौ। । ७६.करमहा सँ विद्यापति सुत मधुसूदन दौ ७७.मानी सोदरपुर सँ वाचस्‍पति सुत विद्यापति दौ ७८.खण्‍डबला सँ वावू दुर्गापति सिंह सुत वावू विद्यापति सिंह दौ ७९.खौआल सँ विद्यापति दौ ठ. मधुरापति सुतो वाछ शिवानन्‍दनो८०.सोदरपुर सँ बैद्यनाथ द्दौ. हरिकृष्‍ण सुता खौआल सँ मधुसूदनसुत विद्यापति दौ ८१.मधुसूदन सुत विद्यापति दौ ८२.दरिहरा सँ रमापति सुत वेणी दौ अलय सँ कृष्‍णपति सुत विद्यापति द्दौ ८३.अलय सँ विद्यापति द्दौ.॥ ८४.ज्‍यो. शिवनन्‍दन सुतो विद्यापति. ८५.खौआल सँ भवदेव सुत विद्यापति दौ. ८६.पाठक कृष्‍णपति सुतो उषापति विद्यापति. ८७.विद्यापति सुतो दुखभंजन कलरो एकहरा सँ देवानन्‍द सुत उँमानन्‍द दौ ८८.अलय सँ विद्यापति सुत कलरु दौ ८९.कारु सुता पिताम्‍बर विद्यापति देवकीमाना का सोदरपुर सँ वैदयनाथ सुत जयि दौ ९०.सुरोइ प्र. शारदानन्‍द सुता गौरीनन्‍दन वाचस्‍पति प्र. विद्यापति दिवाकर प्र. मन्‍दू रत्‍नाकर प्र.भ्र. भोलन जी का नग. घुसौत सँ दामोदर सुत उग्रमोहन दौ एकहरा सँ शोभानन्‍द द्दौ.९१.खौआल सँ विद्यापति दौ. आब आउ मूल मुद्दापर हमरा राजपण्डित आ आर कतेक रास धर्माधिकारणिक विद्यापति सभ जैमे एकटा देवदासीक पुत्र सेहो रहथि, केर ब्राह्मण हेबामे कोनो सन्देह नै अछि। हम विद्यापति ठक्कुरः आ कीर्तिलता कीर्तिपताका नै वरन विद्यापति पद्यावलीक गप कऽ रहल छी। तेँ कोनो ओझरीमे नै रहल जाए। आब आउ गएर ब्राह्मण द्वारा गाओल बिदापत, जे ज्योतिरीश्वरसँ पूर्व (सम्भवतः ) बार्बर कास्टमे भेल रहथि आ तकर प्रमाण ज्योतिरीश्वर द्वारा वर्णन रत्नाकरमे ऐ कवि आ ओकर कृतिक चर्चा अछि। महादेव मूलतः गएर ब्राह्मणक देवता रहथि, आस्ते-आस्ते ओ ब्राह्मण लोकनि द्वारा अपनाओल गेलाह। विद्यापतिक कोनो पद्यावलीक रचनामे हुनकर संस्कृत/ अवहट्ठ लेखक हेबाक चर्च नै अछि। मुदा हुनकर रचना (संस्कृत आ अवहट्ठक विरुद्ध, जे दोसर विद्यापतिक रचना छी, जे ब्राह्मण रहथि) सर्वहाराक लेल जे दर्द अछि से संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिमे किए नै अछि? उदाहरण देखू। विद्यापतिक बिदेसिया- पिआ देसाँतर आ बिदापत नाच भोजपुरीक साहित्य मैथिलीसँ कम समृद्ध अछि मुदा से अछि मात्र परिमाणमे, गुणवत्ताक दृष्टिमे ई कतेक क्षेत्रमे आगाँ अछि। भोजपुरीक भिखाड़ी ठाकुरक बिदेसियाक सन्दर्भमे हम ई कहि रहल छी। भिखाड़ी ठाकुर कलकत्तामे प्रवासी रहथि, घुरि कय अएलाह आ भोजपुर क्षेत्रमे अपन कष्टक वर्णन जाहि मर्मस्पर्शी रूपसँ गामे-गामे घुमि कए आ गाबि कए सुनओलन्हि से बनल बिदेसिया नाटक। मिथिलामे प्रवास आजुक घटना छी, गामक-गाम सुन्न भऽ गेल अछि। मिथिलाक बिदेसिया लोकनि देशक कोन-कोनमे पसरि गेल छथि। मुदा पहिने भोजपुर इलाका जेकाँ प्रवासक घटना मिथिलामे नहि छल। प्रवास मोरंग धरि सीमित छल जे नेपालक मिथिलांचल क्षेत्र अछि। आ ताहिसँ मैथिलीमे लोकगाथाक सूक्ष्म विवरणक बड़ अभाव, जे अछियो से लोकगाथा नायकक विवरण नहि वरन महाकाव्यक नायकक मैथिलीमे विवरण जेकाँ अछि, आ बोझिल अछि, भिखाड़ी ठाकुरक बिदेसियाक जोड़ नहि। सलहेसक कथाक विवरण लिअ, क्षेत्रीय परिधि पार करिते सलहेस राजासँ चोर बनि जाइत छथि आ चोरसँ राजा। तहिना चूहड़मल क्षेत्रीय परिधि पार करिते जतए सलहेस राजा बनैत छथि ओतए चोर बनि जाइत छथि, आ जतए सलहेस चोर कहल जाइत छथि ओतुक्का राजा/ शक्तिशालीक रूपेँ जानल जाइत छथि। मुदा एहि सभपर कोनो शोध नहि भए सकल अछि। एहि क्रममे विद्यापतिक पद्यावलीक पद सभमे तकैत हमरा समक्ष विभिन्न प्रकारक गीत सभ सोझाँमे आएल। एहिमे जे अधिकांश छल से रहए प्रेमी-प्रेमिकाक विरहक विवरण आ बिदेसियाक जे मूल कनसेप्ट अछि- रोजी-रोटी आ आजीविका लेल मोन-मारि कए प्रवास, ताहिसँ फराक। तखन जा कए हमरा किछु विशुद्ध बिदेसिया जकरा विद्यापति पिआ-देसाँतर कहैत छथि भेटल। एहिमे स्वाभाविक रूपेँ अधिकांश विद्यापतिक नेपाल पद्यावलीसँ भेटल आ एकटा नगेन्द्रनाथ गुप्तक संग्रीहीत पद्यावलीसँ। मोरंग नेपाल स्थित मिथिलाक भाग अछि आ प्रवास लेल प्रसिद्ध छल, से एकर सम्भावित कारण। ताहि आधारपर विद्यापतिक पिआ देसाँतर स्टेजपर खेलायल जाइत छल। से बिदापत नाच आ पिआ देसाँतर दू टा नाटक बिदापतक पद्यावलीपर आधारित अछि। मैथिल बिदेसिया लोकनिक वर्तमान दुर्दशाक बीच ई महाकवि विद्यापतिक प्रति ससम्मान अर्पित अछि। की ई दर्द अवहट्ठ आ संस्कृतक विद्यापतिमे छन्हि? पद्यावली एकटा पैरेलल संस्कृतिक द्योतक अछि। एक्के समयमे संस्कृत आ अवहट्ठ एक्के लेखक लिख लेत, ओकरा कष्ट छै जे अवहट्ठमे लिखलापर विद्वान ओकर उपहास करै छथि, मुदा ई दर्द की एकर लेशोमात्र पद्यावलीक विद्यापतिमे नै छन्हि। ओतए तँ उल्लास आ दर्द छै, सर्वहाराक उल्लास आ दर्द। ओ विद्यापति जे संस्कृत आ अवहट्ठ (पालि ताली नै) ओ राजपण्डित छला से विद्वान रहथि, हुनका अवहट्ठोमे लिखलापर लोक निन्दा करन्हि। मुदा मैथिलीक विद्यापति जे पैरेलल परम्पराक अंग छथि, ओइसँ दूर छला। ई पैरेलल परम्परा ऋगवेदक समयसँ छै (ओइ समयमे नाराशंसी रहै)। ई पैरेलल परम्पराक विद्यापति बार्बर कास्टक रहबे करथि, वा ब्राह्मण कास्टक रहबे करथि, से इतिहास ओइपर मौन अछि। मुदा लोककथा आ परम्परा, बिदापतक सर्वहारासँ सघन सम्बन्ध, बिस्फीक परम्परा हुनका गएर ब्राह्मण सिद्ध करैए। संस्कृत आ अवहट्ठक कोनो पाँति नहिये ओइ विद्यापतिक पद्यावलीक चर्चा करैए; आ नहिये पद्यावली पद्यावलीक विद्यापतिक संस्कृत वा अवहट्ठ केर रचनाक चर्चा करैए। संस्कृत आ अवहट्ठ मुस्लिम आक्रमणक, जनौ आ मन्दिर भ्रष्ट हेबापर दुखी अछि मुदा पद्यावली तँ सर्वहाराक हर्ष, उल्लास आ संघर्ष अछि; ओइ तरहक हाक्रोस ओतए नै। आ जखन मैथिलीबला विद्यापति ब्राह्मण रहबो करथि वा नै तहीपर सवाल अछि तखन पाग पहिरा कऽ कोन सोच हम सभ पैदा कऽ रहल छी, "विद्यापति" हम्मर छलाह की नै? की विद्यापतिक ब्राह्मण नै रहलासँ ओ हमर नै हेताह? की हुनकर "पिआ देशांतर" बला माइग्रेशन बला गीत महत्वहीन भए जेतै? की हुनकर सृन्गरिक गीतक मात्र चर्चा कोनो षड़यंत्र तं नै? विद्यापति सन कविकेँ पाग पहिरा कऽ जातिगत बन्धनमे बान्हब कतेक सही अछि? ‎"मध्यकालीन मिथिला"मे विजय कुमार ठाकुर लिखै छथि: "मिथिलाक धार्मिक क्षेत्रमे एहि सामन्तवादी युगीन धार्मिक विचारधाराक प्रभाव एहन सर्वव्यापी छल जे एखनहुँ एहि परम्पराक निम्नलिखित अवशेष समाजमे विद्यमान अछि: ...(घ) पाग सेहो तांत्रिक विचारधारासँ सम्बद्ध अछि। " (पृ.२६) तँ ईहो तंत्र मंत्र बियाह उपनयन धरि ने रहए दियौ। किए ओइ पैरेलल परम्पराक विद्यापतिकेँ ओइमे सानै छियन्हि। जँ ओ बार्बर कास्टक रहथि तैयो आ जँ ब्राह्मण रहथि तँ आरो (कारण २१म शताब्दीक ब्राह्मणक कट्टरता तँ देखिये रहल छी आ ई हजार साल पुराण ब्राह्मण जँ पैरेलल परम्पराक रहथि तँ पागरूपी सामन्तवादी अवशेष तांत्रिक धार्मिक कर्ममे मात्र प्रयुक्त हुअए, विद्यापतिक माथपर नै)। दू विद्यापति: किछु किंवदन्ती आ किछु तथ्य: बोधि कायस्थ: उगना महादेव मैथिलीक आदिकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व) मैथिलीक आदिकवि विद्यापति ( विद्यापतिक चित्र: विदेह चित्रकला सम्मानसँ पुरस्कृत पनकलाल मण्डल द्वारा) कवीश्वर ज्योतिरीश्वर(लगभग १२७५-१३५०)सँ पूर्व (कारण ज्योतिरीश्वरक ग्रन्थमे हिनक चर्च अछि), मैथिलीक आदि कवि। संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापति ठक्कुरःसँ भिन्न। सम्भवतः बिस्फी गामक बार्बर कास्टक श्री महेश ठाकुरक पुत्र। समानान्तर परम्पराक बिदापत नाचमे विद्यापति पद्यावलीक (ज्योतिरीश्वरसँ पूर्वसँ) नृत्य-अभिनय होइत अछि। ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापति: - कश्मीरक अभिनव गुप्त (दशम शताब्दीक अन्त आ एगारहम शताब्दीक प्रारम्भ)- ग्रन्थ ईश्वर प्रत्याभिज्ञा- विभर्षिणी मे विद्यापतिक उल्लेख करै छथि। श्रीधर दासक सदुक्तिकर्णामृत, (रचना ११ फरबरी १२०६, मध्यकालीन मिथिला, वि.कु. ठाकुर)- श्रीधर दास विद्यापतिक पाँच टा पद उद्धृत केने छथि जे विद्यापतिक पद्यावलीक भाषा छी। जाव न मालतो कर परगास तावे न ताहि मधुकर विलास। आ मुन्दला मुकुल कतय मकरन्द ज्योतिरीश्वर (१२७५-१३५०) षष्ठः कल्लोल- ॥अथ विद्यावन्त वर्णना॥ अष्टमः कल्लोलः- ॥अथ राज्य वर्णना॥ मे उल्लेख। समानान्तर परम्पराक बिदापत नाचमे विद्यापति पद्यावलीक (ज्योतिरीश्वरसँ पूर्वसँ) नृत्य-अभिनय होइत अछि। विद्यापति ठक्कुरः 1350-1435 विषएवार बिस्फी-काश्यप (राजा शिवसिंहक दरबारी) आ संस्कृत आ अवहट्ठ लेखक। कीर्तिलता, कीर्तिपताका, पुरुष परीक्षा, गोरक्षविजय, लिखनावली आदि ग्रंथ समेत विपुल संख्यामे कालजयी रचना। ई मैथिलीक आदिकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व)सँ भिन्न छथि। बोधि कायस्थ विद्यापति ठक्कुरःक पुरुष परीक्षामे हिनक गंगालाभक कथा वर्णित अछि। महाकवि विद्यापति(ज्योतिरीश्वर पूर्व मैथिली पद्यावली सभक लेखक) क विषयमे सेहो गंगालाभक ई कथा प्रचलित आ बादमे विद्यापति ठक्कुरक (संस्कृत आ अवहट्ठक लेखक)विषयमे सेहो गंगालाभक ई कथा प्रचलित भेल। उगना महादेव महादेव (उगनारूपी) विद्यापतिक अहिठाम गीत सुनबा लेल उगना नोकर बनि रहैत छलाह। मैथिलीक आदिकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व) आ विद्यापति ठक्कुरः (संस्कृत आ अवहट्ठक लेखक आ राजा शिवसिंहक दरबारी) दुनूसँ सम्बद्ध कऽ उगनाक ई कथा प्रसिद्ध भेल। विद्यापतिक मिथिला सांस्कृतिक परिषद द्वारा यज्ञोपवीत संस्कार आ पाग-प्रतिष्ठापन संस्कृत आ अवहट्ठ बला विद्यापति ठक्कुरः आ कविकोकिल विद्यापतिक बीचक अन्तर "मिथिला सांस्कृतिक परिषद" आ ओइसँ जुड़ल "किशोरीकान्त मिश्र" आदि नै बुझि सकला वा नै बूझऽ चाहलन्हि। ऐतिहासिक लिखित तथ्य अछि जे गोनू झा १०५०-११५० मे भेलाह मुदा उषा किरण खान संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिसँ हुनकर शास्त्रार्थ करबै छथि (हिन्दीक ऐतिहासिक उपन्यास सिरजनहार, भारतीय ज्ञानपीठमे)। वीरेन्द्र झा कहै छथि जे गोनू झा ५०० साल पहिने भेला आ तारानन्द वियोगी गोनू झा केँ ३०० साल पहिने भेल मानै छथि (दुनू गोटेक हिन्दीमे प्रकाशित गोनू झापर पोथी, क्रमसँ राजकमल प्रकाशन आ नेशनल बुक ट्रस्टसँ प्रकाशित) तँ विभा रानीक गोनू झापर हिन्दी पोथी (वाणी प्रकाशन) मे कुणाल गोनू झाकेँ भव सिंहक राज्यमे (१४म शताब्दी) भेल मानैत छथि। जखन पंजीमे उपलब्ध लिखित अभिलेखन गोनू झाकेँ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिसँ दस पीढ़ी पहिने अभिलेखित करैत अछि, तखन ई हाल अछि। समानान्तर परम्पराक विद्यापति आ पाग- विद्यापतिक संस्कृत ग्रन्थमे ठक्कुर विद्यापति कृता लिखल अछि/ आ ओ विद्यापति ब्राह्मण छथि। हमर उद्देश्य मैथिली पद्यावली बला विद्यापतिसँ अछि, हुनका किए पाग पहिरा कऽ "हम्मर विद्यापति" बना लेल गेल। ई तखन नै भेल जखन बिदापत नाचक माध्यमसँ आठ सए बर्ख गएर ब्राह्मण समुदाय विद्यापतिकेँ जिएने रखलक, मुदा तखन भेल जखन बंगाल विद्यापति आ गोविन्ददासक पद्यावलीकेँ अपन बना लेलक मुदा बंगालेक विद्वान राजकृष्ण मुखोपाध्याय सर्वप्रथम १८७५ ई. मे कहलन्हि जे विद्यापति मिथिलाक कवि छथि आ बंगालेक नगेन्द्रनाथ गुप्त सर्वप्रथम कहलन्हि जे गोविन्ददास सेहो मिथिलाक कवि छथि आ जखन ई तथ्य सोझाँ उठल तँ पहिने तँ सगर बंगाल हुनकापर मार-मार कऽ उठल आ बादमे मानि गेल। राजकृष्ण मुखोपाध्याय जइ विद्यापतिकेँ मिथिलाक कहने रहथि ओ पद्यावलीक विद्यापतिक सन्दर्भमे छल, संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापति ठक्कुरः केँ बंगाल कहियो अपन नै कहने छल। ज्योतिरीश्वरक संस्कृत धूर्तसमागम नाटक आ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक गोरक्षविजय नाटक मध्य देल मैथिली गीत सेहो पद्यावलीक पुरान परम्पराक द्योतक अछि आ ऐ दुनू लेखकपर मैथिली पद्यावलीक प्रभाव देखबैत अछि। फेर मिथिलाक विद्वानकेँ सोह एलन्हि आ विद्यापतिक संस्कृत-अवहट्ठ ग्रन्थ, गोविन्ददास नाम्ना आ विद्यापति नाम्ना पञ्जीमे उपलब्ध विवरण दऽ विद्यापति ठाकुर आ गोविन्ददास झा (! ! ! ) निकालल गेल, एतऽ रमानाथ झाक पञ्जीक सतही ज्ञान आ सीमित दृष्टिकोण नोकसान पहुँचेलक। फेर अनचोक्के पाग पहिरा कऽ (मिथिला सांस्कृतिक परिषद- ई संस्था भारतक स्वतंत्रताक बाद विद्यापतिकेँ पाग पहिरा कऽ हुनका ब्राह्मण घोषित करबाक कुकृत्य केलक) विद्यापति (मैथिली बला, संस्कृत बला नै) केँ "हम्मर विद्यापति" ब्राह्मण वर्ग द्वारा बना लेल गेल। मुदा कवीश्वर ज्योतिरीश्वर सन बहुत रास कवि पञ्जीमे उपलब्ध छथि। आ जे नामक अन्तर विद्यापतिमे आबि जाइ छन्हि (जखन कि सभ काज प्लानिंगसँ भेलै तैयो एकटा सबूत बचि गेलै) से ज्योतिरीश्वरमे किए नै अबैए। आब आउ गएर ब्राह्मण द्वारा गाओल बिदापत, जे ज्योतिरीश्वरसँ पूर्व (सम्भवतः) नौआ ठाकुर जातिमे भेल रहथि आ तकर प्रमाणमे ज्योतिरीश्वर द्वारा वर्णन रत्नाकरमे ऐ कविक चर्चा अछि। विद्यापतिक कोनो पद्यावलीक रचनामे अपन संस्कृत/ अवहट्ठ लेखक हेबाक चर्च नै केने छथि। मुदा हुनकर रचना (संस्कृत आ अवहट्ठक विरुद्ध, जे दोसर विद्यापतिक रचना छी, जे ब्राह्मण रहथि) सर्वहाराक लेल जे दर्द अछि से संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिमे किए नै अछि? संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापति तँ सर्वहारासँ घृणा करै छथि आ लिखित रूपमे कट्टर ब्राह्मण छथि। मुदा पद्यावलीक विद्यापति तँ निश्छल छथि, किछु कट्टर पद कट्टर ब्राह्मणवादी सम्पादक लोकनि द्वारा घोसोआओल गेल अछि (हास्यास्पद रूपमे)। पिआ देसान्तर (विद्यापतिक बिदेसिया)क कन्सेप्ट आब सुधीगणक समक्ष अछि आ मैथिल बिदेसिया लोकनिक वर्तमान दुर्दशाक बीच ई महाकवि विद्यापतिक प्रति ससम्मान अर्पित अछि। की ई दर्द अवहट्ठ आ संस्कृतक विद्यापतिमे छन्हि? पद्यावली एकटा पैरेलल संस्कृतिक द्योतक अछि। एक्के समयमे संस्कृत आ अवहट्ठ एक्के लेखक लिख लेत, ओकरा कष्ट छै जे अवहट्ठमे लिखलापर विद्वान ओकर उपहास करै छथि, मुदा ई दर्द की एकर लेशोमात्र पद्यावलीक विद्यापतिमे छन्हि? ओतए तँ उल्लास आ दर्द छै, सर्वहाराक उल्लास आ दर्द। ओ विद्यापति जे संस्कृत आ अवहट्ठ मे लिखलन्हि ओ राजपण्डित छला से विद्वान रहथि, हुनका अवहट्ठोमे लिखलापर लोक निन्दा करन्हि। मुदा मैथिलीक विद्यापति जे पैरेलल परम्पराक अंग छथि, ओइसँ दूर छला। ई पैरेलल परम्परा ऋगवेदक समयसँ छै (ओइ समयमे नाराशंसी रहै)। ई पैरेलल परम्पराक विद्यापति नौआ ठाकुर जातिक रहबे करथि, वा ब्राह्मण जातिक रहबे करथि, से इतिहास ओइपर मौन अछि। मुदा लोककथा आ परम्परा, बिदापतक सर्वहारासँ सघन सम्बन्ध, बिस्फीक परम्परा हुनका गएर ब्राह्मण सिद्ध करैए। संस्कृत आ अवहट्ठक कोनो पाँति नहिये ओइ विद्यापतिक पद्यावलीक चर्चा करैए आ नहिये पद्यावली पद्यावलीक विद्यापतिक संस्कृत वा अवहट्ठ केर रचनाक चर्चा करैए। संस्कृत आ अवहट्ठ मुस्लिम आक्रमणक, जनौ आ मन्दिर भ्रष्ट हेबापर दुखी अछि मुदा पद्यावली तँ सर्वहाराक हर्ष, उल्लास आ संघर्ष अछि; ओइ तरहक हाक्रोस ओतए नै, हुनका समएमे तँ प्रायः मुस्लिम मिथिलामे रहबो नै करथि। आ जखन मैथिलीबला विद्यापति ब्राह्मण रहबो करथि वा नै तहीपर सवाल अछि तखन पाग पहिरा कऽ कोन सोच हम सभ पैदा कऽ रहल छी, "विद्यापति" हम्मर छलाह कि नै? की विद्यापतिक ब्राह्मण नै रहलासँ ओ हमर नै हेताह? की हुनकर "पिआ देशांतर" बला माइग्रेशन बला गीत महत्वहीन भऽ जेतै? की हुनकर शृंगारिक गीतक मात्र चर्चा कोनो षडयंत्र तँ नै? विद्यापति सन कविकेँ पाग पहिरा कऽ जातिगत बन्धनमे बान्हब कतेक सही अछि? "मध्यकालीन मिथिला"मे विजय कुमार ठाकुर लिखै छथि: "मिथिलाक धार्मिक क्षेत्रमे एहि सामन्तवादी युगीन धार्मिक विचारधाराक प्रभाव एहन सर्वव्यापी छल जे एखनहुँ एहि परम्पराक निम्नलिखित अवशेष समाजमे विद्यमान अछि: ...(घ) पाग सेहो तांत्रिक विचारधारासँ सम्बद्ध अछि। " (पृ.२६) तँ ईहो तंत्र मंत्र बियाह उपनयन धरि ने रहए दियौ। किए ओइ पैरेलल परम्पराक विद्यापतिकेँ ओइमे सानै छियन्हि। आ ई कुकृत्य किशोरीकान्त मिश्रक मिथिला सांस्कृतिक परिषद केलक। ऐ तरहक लोक जै मिथिलाक संस्कृतिक रक्षक, ओ संस्कृति आ भाषा जँ आइयो बाँचल छै, तँ ई ओइ संस्कृति आ भाषाक विशेषता छिऐ। चेतना समितिक पत्रिकामे मानेश्वर मनुज मंच सापेक्ष बयानमे जगदीश प्रसाद मण्डलक उपन्यासक संख्या मात्र ४ लिखलन्हि! ! ! जगदीश प्रसाद मण्डलक नाममे जँ मण्डल टाइटिल नै रहैत मात्र जगदीश प्रसाद रहैत तँ रमानाथ झाक अनुयायी हुनका श्रोत्रिय, अमर-रामदेव झाक अनुयायी हुनका ब्राह्मण आ "लालदासक स्मारिका"क लेखक वर्मा जी हुनका कायस्थ घोषित कऽ दैतथि। आ जँ जगदीश प्रसाद मण्डलक फोटो उपलब्ध नै रहितै तँ किशोरीकान्त मिश्रक प्रतिक्रियावादी मिथिला सांस्कृतिक परिषद जगदीश प्रसाद मण्डलक यज्ञोपवीत संस्कार कऽ हुनका पाग पहिरा फेर वएह कुकृत्य करितए जे ओ विद्यापतिक संग एक हजार सालक बाद केलक। आ बेरमाक कोनो बुढ़बा माटिक ढिमकाकेँ देखबैत जगदीश प्रसाद "झा/ ठक्कुरः" केर काल्पनिक घराड़ी, यएह छी, घोषित कऽ दितए। मलंगियाक बेटा, रामदेव झाक बेटा आ ढेर रास छद्मनामीक देल गाड़ि सेहो विदेहमे बिना काँट-छाँटक छपने अछि, जे लोक पढ़ि सकए, किछु गाड़ि जे नै छापल जा सकैए, सएह टा नै छपने छी। आ गारिक डरसँ अखन धरिक मैथिली आ मिथिलाक इतिहासकार ऐ विषयपर इशारा तँ केलन्हि मुदा आगाँ नै बढ़ला। तेँ ओ ज्योतिरीश्वर(१२७५-१३५०) पूर्व विद्यापतिये रहथि से फेर सिद्ध होइए। जयदेव (लगभग १२००)क गीत-नृत्य आ किरतनियाँ ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिक पद्यावली मेल खाइत अछि, संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक काव्य सौष्ठवसँ मेल नै खाइत अछि। आब पुनः आबी मिथिला सांस्कृतिक परिषदक मंच। ई परिषद विद्यापतिक यज्ञोपवीत संस्कार नै, मैथिलीक यज्ञोपवीत संस्कार केलक। ओकर विद्यापतिकेँ पहिराओल पाग, कोलकातासँ बिन्ध्येश्वर मण्डल आ श्रीकान्त मण्डलकेँ लुप्त कऽ देलक आ मैथिलीक यज्ञोपवीत संस्कार पूर्ण भऽ गेल। संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक जातिगत कट्टरताक बानगी देखी: - कीर्तिलता- जाति-अजातिक विवाह अधम कएँ पारक। पुरुष-परीक्षामे विद्यापति कथा कहैत-कहैत लेखकीय वक्तव्य दै छथि कि राजपूतक स्त्री चरित्रहीन होइत अछि, ई ओहिना भेल जेना अथर्ववेदमे शूद्रक पत्नीकेँ बिना स्वीकृतिक कियो हाथ पकड़ि लऽ जा सए बला वक्तव्य, अथर्ववेद बा कोनो वेदमे ओइ तरहक वक्तव्य कहियो नै आयल छल। शुक्ल यजुर्वेद (२६.२)-यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः। ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च। । हम सभ गोटेकें ई पवित्र वाणी (वेदवाणी) सुनाबी। ब्राह्मणकें, क्षत्रियकें, शूद्रकें आ आर्यकें; अपन लोककें आ अपरिचितकें सेहो (माने सभकें)। मुदा ऐ वेदवाक्यक विपरीत मनुस्मृति वेदवाणीक अध्ययन/ श्रवणकें समाजक किछु गोटे लेल निषेध करऽ चाहलक, मुदा स्मृति सेहो वेदवाक्यकें प्रमाण मानैत अछि (शब्द प्रमाण) तें तकर विरुद्ध देल ओकर निर्देश स्वयं अमान्य भऽ जाइत अछि। मुदा पुरुष परीक्षामे तँ अछि, आ अहाँकँ लगैए जे संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतक ई साधांस हेतन्हि जे अपन आश्रयदाताक जातिक स्त्रीक प्रति एहेन लिखि सकता? संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति जाति-अजातिपर विशेष बल दै छथि, रक्त शुद्धता/ जाति हुनका लेल महत्वपूर्ण छन्हि। संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति कहै छथि- अकुलीन कोनो दयाक अधिकारी नै अछि! ! आ सौन्दर्य मात्र धनिक आ विशिष्ट वर्गक एकाधिकार अछि! ! संस्कृत आ अवहट्ठबला (किशोरीकान्त मिश्रक मिथिला सांस्कृतिक परिषदक जनौ आ पागबला) विद्यापति कहै छथि- जाति सामाजिक जीवनमे अन्तिम निर्धारक तत्व अछि। जे खराप कुलमे जन्म लैए ओ दुष्ट दिमागक साँप मात्र बनि सकैए! ! किशोरीकान्त मिश्रक मिथिला सांस्कृतिक परिषदक जनौ आ पागबला संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति कहै छथि- ओ देश जतऽ जातिक निअम लागू नै होइए से म्लेच्छ देश थिक। (मध्यकालीन मिथिलाक समाज आ अर्थव्यवस्थाक पक्ष — उपेन्द्र ठाकुर) अमीर खुसरोसँ पहिने पागक वर्णन हमरा नै भेटल अछि। मुदा ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापति (पद्यावलीक लेखक) कहै छथि: - नृप इथि काहु करथि नहि साति। पुरख महत सब हमर सजाति॥ ताहि द्वारे राजा ककरो दण्ड नहि दैत छथि आ सभटा पैघ लोक एके रंग छथि। गोविन्ददासक पद्यो क्लिष्ट छलन्हि आ एकर समानान्तर परम्परा सेहो नै छल (सम्भवतः सवर्ण मध्य प्रचलनक कारण ई दुनू चीज छल), से बिदापत नाच जकाँ ओ एतुक्का माँटिमे संरक्षित नै भऽ सकल। गंगेश उपाध्यायक तत्त्वचिन्तामणिक चर्चा मुदा वर्धमान जे हुनका सुकविकैरवकाननेन्दुः कहै छथि, ओ कविता सभ कतऽ गेल? पक्षधर लिखैपर प्रतिबन्ध लगेलन्हि मुदा रघुनाथ शिरोमणि आ हुनकर शिष्य “उदयन” आ “गंगेश”क कृतिकेँ रटि कऽ चलि गेलाह आ नवद्वीपमे नव्य-न्याय स्कूलक स्थापनाक संगे बंगालसँ विद्यार्थी एनाइ बन्द भऽ गेल। ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापति: - कश्मीरक अभिनव गुप्त (दशम शताब्दीक अन्त आ एगारहम शताब्दीक प्रारम्भ)- ग्रन्थ “ईश्वर प्रत्याभिज्ञा- विभर्षिणी” मे विद्यापतिक उल्लेख करै छथि। श्रीधर दासक सदुक्तिकर्णामृत, - श्रीधर दास विद्यापतिक पाँच टा पद उद्धृत केने छथि जे विद्यापतिक पद्यावलीक भाषा छी। “जाव न मालतो कर परगास तावे न ताहि मधुकर विलास।” आ “मुन्दला मुकुल कतय मकरन्द” (मध्यकालीन मिथिला, विजय कुमार ठाकुर) ज्योतिरीश्वर (१२७५-१३५०) षष्ठः कल्लोल- ॥अथ विद्यावन्त वर्णना॥….. विदातञो आस्थान भीतर भउ. तका पछा तेलङ्गी. मरहठी. वि। दओतिनी दुइ चित्रकइ गाङ्ग जउन निहालि अइसनि देषुअह. चउआञ्चरि चीरि एकहोङ्क परिहने …….से कइसन देषु. जइसे प्रयागक्षेत्र सरस्वतीकेँ गङ्गाजमुनाक सम्वाहि। का हो तइसे ता विदाञोतके दुअओ सम्वाहिका हो भउअह. दशञुन्धी राजा अवधान कराउ. विदाञोत आस्थान वइसु. (विदाञोत (पुरुख) भीतर भेल, तकर पाछाँ तेलङ्गी, मरहठी। विदओतनी (स्त्री) दूटा रंगक गङ्गा यमुनामे नहायलि एहन देखाइए। चारि-चारि आँचरबला चीर एकहकटा पहिरने। से केहन देखू. जेना प्रयागक्षेत्र सरस्वतीकेँ गङ्गाजमुनाक संगबे तेहने ओइ विदाञोतकेँ दुनू सम्वाहिका। दशञुन्धी राजाकेँ अवधान करेलक, विदाञोत स्थानपर बैसला। अष्टमः कल्लोलः- ॥अथ राज्य वर्णना॥ …विदाञोत त। न्हिक गीत. नृत्य. वाद्य. ताल. घाघर परिठरइतेँ आह… विदाञोत लोकनिक गीत, नृत्य, वाद्य, ताल, घाघर पहीरि कऽ भेल। उगना महादेव: महादेव (उगनारूपी) विद्यापतिक ऐठाम गीत सुनबा लेल उगना नोकर बनि रहै छलाह। मैथिलीक आदिकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व) आ विद्यापति ठक्कुरः (संस्कृत आ अवहट्ठक लेखक आ राजा शिवसिंहक दरबारी) दुनूसँ सम्बद्ध कऽ उगनाक ई कथा प्रसिद्ध भेल। बोधि कायस्थ: विद्यापति ठक्कुरःक पुरुष परीक्षामे हिनक गंगालाभक कथा वर्णित अछि। महाकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व मैथिली पद्यावली सभक लेखक) क विषयमे सेहो गंगालाभक ई कथा प्रचलित छल आ बादमे विद्यापति ठक्कुरक (संस्कृत आ अवहट्ठक लेखक) विषयमे सेहो गंगालाभक ई कथा प्रचलित भेल। विद्यापति ठक्कुरःक संस्कृत साहित्य मिथिलाक विद्वान परम्पराक लोपक बाद सोझाँ आएल, आ संस्कृत साहित्यमे विद्यापति ठक्कुरःक कोनो खास चर्च नै भेटैत अछि आ बंगालक विद्यार्थीक एनाइयो कम भऽ गेल छल, जे अबितो रहथि हुनका लेल विद्यापति ठक्कुरःक संस्कृत आ अवहट्ठ साहित्य समकालीनक साहित्य छल जे खतम होइत विद्वता परम्पराक साहित्य छल आ सेहो तखन लिखाइये रहल छल, मुदा ज्योतिरीश्वर-पूर्व पद्यावली प्रसिद्धि प्राप्त कऽ लेने छल। ओइ कालक गोनू वा विद्यापतिक समय पाग रहबो करए सेहो निश्चित नै, कारण अमीर खुसरो (१२५३-१३२५) मात्र एकर चर्च केने छथि। विजय कुमार ठाकुर एकरा सामन्तवादी प्रतीक आ तंत्र मंत्रसँ सम्बद्ध मानै छथि। मुस्लिम आक्रमणक बाद अधीनस्थ सामन्तकेँ ई पहिराओल गेल हएत आ ई मुस्लिम टोपीसँ मेल खाइतो अछि, आ मात्र ब्राह्मण-कायस्थ मुस्लिम आक्रमणक बाद मिथिलामे सामन्त रहथि (राजपूत नै) आ आइयो अही दू वर्गक बीच ई कहियो काल बियाह आदिमे प्रयुक्त होइए। महाकवि विद्यापति- कवीश्वर ज्योतिरीश्वर(लगभग १२७५-१३५०)सँ पूर्व (कारण ज्योतिरीश्वरक ग्रन्थमे हिनक चर्च अछि), मैथिलीक आदि कवि। संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापति ठक्कुरःसँ भिन्न। सम्भवतः बिस्फी गामक नौआ ठाकुर श्री महेश ठाकुरक पुत्र (परम्परा अनुसार)। समानान्तर परम्पराक बिदापत नाचमे विद्यापति पद्यावलीक (ज्योतिरीश्वरसँ पूर्वसँ) नृत्य-अभिनय होइत अछि। विद्यापति ठक्कुरः १३५०-१४३५ विषएवार बिस्फी-काश्यप (राजा शिवसिंहक दरबारी) आ संस्कृत आ अवहट्ठ लेखक। कीर्तिलता, कीर्तिपताका, पुरुष परीक्षा, गोरक्षविजय, लिखनावली आदि ग्रंथ समेत विपुल संख्यामे कालजयी रचना। ई मैथिलीक आदिकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व)सँ भिन्न छथि। फणीश्वरनाथ रेणु बिदापत नाचपर रिपोर्ताज लिखलनि जे १ अगस्त १९४५ ई. केँ साप्ताहिक “विश्वमित्र”मे प्रकाशित भेल। ऐ रिपोर्ताजक महत्व अछि, कारण ई ऐ विषयपर ज्योतिरीश्वर द्वारा लिखित विवरणक ७०० बर्ख बाद लिखल गेल आ ऐ ७०० बर्खमे जे विद्यापतिकेँ समानान्तर परम्परा जिआ कऽ रखलक। आ जे एकरा जिआ कऽ रखलक ओकरासँ अनचोक्के विद्यापति छीनि लेल गेलन्हि। बिदेश्वर ठाकुर विद्यापति गीत गबैत आ हाक्रोश करैत मृत्युकेँ प्राप्त केलन्हि जे विद्यापतिकेँ पाग पहिरा कऽ ब्राह्मण सभ छीनि लेलक। ब्रह्मपुराक कानूनगो बद्री प्रसाद ठाकुर, पोखरिभीड़ाक बिनोद ठाकुर, रुद्रपुरक सरयुग ठाकुर आ मेंहथक जयराम ठाकुर आ बिस्फीक सौँसे गाम आइयो ई रटि रहल छथि। शालिग्राम यादव, अवधिया ठाकुर बिस्फी गामक परम्पराक गवाह छथि। विद्यापति कर्मकाण्डीय अपहरण मे हुनकर जन्म आदिक प्रति सभ तरहक अनर्गल तर्क उपस्थित होइत रहल मुदा हुनकर समानान्तर परम्पराक मादे कोनो शोध-पत्रमे चर्चो धरि नै भेल। ई आलेख बिदेश्वर ठाकुर सन हजारक हजार समानान्तर परम्पराक लोकक प्रति समर्पित अछि जे बिदापतक ज्योतिरीश्वर आ फणीश्वरनाथ रेणुक दुनू आलेखक बीच विद्यापतिकेँ जिआ कऽ रखलन्हि। मिथिलाक शतपथ ब्राह्मणक परम्परा आ मिथिलाक समानान्तर परम्परा वैदिक संस्कृतक प्राचीनतम ग्रन्थ ऋगवेदसँ पहिनेसँ भाषा अस्तित्वमे रहल हएत। कतेक मौखिक साहित्य जेना गाथा, नाराशंसी, दैवत कथा आ आख्यान सभ ओहिमे रचल गेल हएत। एहने गाथा सभक गायकक लेल “गाथिन”, “गातुविद्” आ “गाथपति” ऋगवेदमे प्रयुक्त भेल। वैदिक कालेसँ गाथा आ नाराशंसी समानान्तर रूपमे रहल। प्राकृतसँ वैदिक संस्कृत बहार भेल आकि वैदिक संस्कृतसँ प्राकृत? वेदमे नाराशंसी नाम्ना जन आख्यान यएह सिद्ध करैत अछि जे दुनू समानान्तर रूपेँ बहुत दिन धरि चलल। ई समानान्तर परम्परा दुनूकेँ प्रभावित केलक। आब ऋगवेद देखू- ओतए दुर्लभ लेल- दूलभ, (ऋगवेद ४.९.८) प्रयोग की सिद्ध करैत अछि? अथर्ववेदमे पश्चात् लेल पश्चा (अथर्ववेद १०.४.१०) की सिद्ध करैत अछि? गोपथ ब्राह्मणमे प्रतिसन्धाय लेल प्रतिसंहाय की सिद्द करैत अछि? (गोपथ ब्राह्मण २.४)। जे आर्य छथि से भारतक पच्छिम भागसँ मिथिलामे एलाह, आ हुनका सभक एबासँ पूर्व वेदक किछु अंश विद्यमान छल, तेँ ने बहुत रास शब्द जे मैथिलीमे अछि, बहुत रास उच्चारण जे मैथिलीमे अछि ओ वैदिक संस्कृतमे अछि, मुदा लौकिक संस्कृतमे नै अछि। अविद्या, कर्मसिद्धान्त, जन्म आ पुनर्जन्मक आवाजाही आ मोक्ष ई सभ अनार्यसँ आर्यकेँ भेटलै। तेँ ने उपनिषदमे मोक्ष प्राप्तिक मार्ग छै, स्वर्ग प्राप्तिक नै। मोक्ष भेटत कोना? यज्ञ केलासँ? नै, ई भेटत ज्ञानसँ आ मनन-चिन्तन आ समाधिसँ। राजा जनकक संरक्षणमे याज्ञवल्क्य बृहदारण्यक उपनिषदक तिरहुतक अनार्य क्षेत्रमे रचना केलन्हि। वाचस्पति मिश्र सांख्यकारिकाक सन्तावनम सूत्रक व्याख्या करैत कहै छथि जे की ई कहि सकै छी जे अचेतन दूध केर पोषणसँ परु पोसाइए आ अचेतन प्रकृतिक संचालनसँ जीवकेँ मुक्तिक ज्ञान भेटैए? ईश्वर तँ स्वयंमे पूर्ण छथि तँ ओ कोन उद्देश्ये विश्वक सृष्टि करताह आ जीव लेल जँ ओ सृष्टि करताह तँ सृष्टिक बादे तँ जीव बन्हाइए आ सृष्टिसँ पूर्व तँ बन्हेबाक प्रश्ने नै अछि, तखन जीवक प्रति कथीक दया? से प्रकृति द्वारा सृष्टि होइए आ जीव अपन प्रयाससँ अपवर्गक प्राप्ति करै छथि। आ विवेकसँ होइए प्रलय। से ईश्वरवाद नै निरीश्वरवाद अछि वाचस्पतिक व्याख्या। प्रकृति संचालनमे जँ ईश्वर भाग लै छथि तँ ओ चेतन प्रक्रिया हएत जे कोनो उद्देश्येसँ हएत आ तकर कोनो खगता ईश्वरकेँ छन्हिये नै। न्यायसूत्रक रचना केनिहार मिथिलाक गौतम सोलह पदार्थक ज्ञानसँ जीवक निःश्रेयस प्राप्त करबाक चर्च करै छथि, मुदा ऐ सभमे ईश्वरक कतौ चर्च नै अछि जे हुनको द्वारा मुक्ति सम्भव अछि। वैशेषिक सूत्र कहैए जे वेद विद्वान लोकनि द्वारा रचल गेल अछि नै कि ईश्वर द्वारा। कुमारिल भट्ट कहै छथि जे सृष्टिक पूर्व ईश्वरक विषयमे कोनो विश्वसनीय चर्चा असम्भव अछि। शतपथ ब्राह्मणक तथाकथित मुख्य धारा, आ तकर समानान्तर मुख्यधारा: ब्राह्मण आ गएर ब्राह्मणवाद मिथिलामे शुरुएसँ रहल अछि। ज्योतिरीश्वर लिखै छथि- बौध पक्ष अइसन- आपात भीषण। अगतिशील शतपथ ब्राह्मणक परम्परा नामक साम्यताक कारण संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिकेँ पूज्य बनबैपर बिर्त अछि। ऋक् आ नाराशंसी, महाकवि विद्यापति आ पागबला विद्यापति, मोक्ष आ स्वर्ग-नर्क ई दुनू परस्पर विरोधी विचारधारा मिथिलामे रहल। शतपथ ब्राह्मणक विदेघमाथव आ पुराणक निमि दुनू गोटेक पुरोहित गौतम छथि से दुनू एके छथि आ एतएसँ विदेह राज्यक प्रारम्भ। माथवक पुरहित गौतम मित्रविन्द यज्ञक/ बलिक प्रारम्भ कएलन्हि आ पुनः एकर पुनःस्थापना भेल महाजनक-२ क समयमे याज्ञवल्क्य द्वारा। मैत्रेयी, याज्ञवल्क्य, सीता, जनककेँ रटैत-रटैत ई परम्परा विद्यापतिक यज्ञोपवीत संस्कार आ पाग प्रतिष्ठापन जइ तीव्र गतिये केलक से ओकर शतपथ ब्राह्मणक तथाकथित मुख्य धाराक अनुकूल छल। १७६० ई.क माधव सिंहक शाखा पञ्जीक आदेशक बाद मिथिलामे ब्राह्मण आ कायस्थ मध्य नव-कुलीनवादक प्रसार भेल आ भलमानुस (बत्तेसगमिया) उपजातिक कर्ण कायस्थमे आ स्रोत्रिय उपजातिक मैथिल ब्राह्मणमे उत्पत्ति भेल, ओइसँ शारीरिक आ मानसिक बीमारी ऐ दुनू उपजाति मध्य भयंकर रूपसँ बढ़ल, संगे बहुविवाह, बाल-विवाहक आ विधवाक संख्यामे अत्यधिक वृद्धि भेल। आ ईहो जइ शान्तिपूर्ण रूपसँ आ तीव्रगतिसँ भेल से शतपथ ब्राह्मणक तथाकथित मुख्य धाराक अनुकूल छल। विद्यापतिपर दिनेश्वर लाल आनन्द आ रामवृक्ष बेनीपुरीक विचार दिनेश्वर लाल आनन्दकेँ भ्रम रहन्हि, ओइ कालमे पञ्जी गुप्त चीज रहै, जे संस्कृत आ अवहट्ठ बला विद्यापतिक विषएवार बिस्फीकेँ पञ्जीमे जयवार (निम्न कोटिक) कऽ देल गेल रहै। शाखा पञ्जी १७६० ई.सँ पहिने रहबे नै करै आ तकर प्रमाण अछि जे अयाची मिश्रक मूलक निचुलका पीढ़ी स्रोत्रिय उपजातिमे अछि आ ब्राह्मण उपजातिमे सेहो। ई ओहिना अछि जे सिन्धु घाटी सभ्यतामे बड़द रहै मुदा गाय नै (सीलपर), मुदा बिनु गाय बड़दक उत्पत्ति कोना हएत। दिनेश्वर लाल आनन्दकेँ पञ्जीक सभ तथ्य उपलब्ध नै रहन्हि, प्रायः पद्यावली बला विद्यापति आ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक एक्के हेबाक दुष्प्रचारमे हुनका लागल हेतन्हि जे अवहट्ठमे लिखबाक कारण जँ विषएवार बिस्फीकेँ पञ्जीमे जयवार करबाक सम्बन्धसँ जोड़ल जाए तँ विद्यापति ठक्कुरः किए क्रान्तिकारी भेलाह से व्याख्या कएल जा सकत। मुदा दिनेश्वर लाल आनन्द सेहो मानै छथि जे पद्यावलीक हुनकर (विद्यापतिक) हाथक तँ छोड़ू, हुनकर कालोमे संगृहीत पदक कोनो विवरण नै अछि। मुदा से कोना सम्भव जखन संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति अपन संस्कृत आ अवहट्ठ ग्रन्थ सभ टहंकारसँ आरम्भ आ समापन करै छथि, के राजा-रानी हुनका प्रेरित केलखिन्ह, ककर आश्रित छलाह, सभ वर्णन दैत। पूर्ण लेखकीय अन्दाज, सरस्वती आ लक्ष्मी दुनुक बल; तखन पद्यावलीमे से किए नै? दिनेश्वर लाल आनन्द गुम्म छथि। संस्कृत आ अवहट्ठ बला विद्यापति अपन आश्रयदाताक विषयमे लिखने छथि मुदा कोनो संस्कृत आ अवहट्ठ ग्रन्थमे अपना विषयमे किछुओ नै लिखने छथि। ओ अवह्ट्ठ लिखबोमे दवाबक अनुभव करै छथि, जे तखुनका मुख्य परम्पराक साहित्यिक भाषा छल। मुदा ज्योतिरीश्वरपूर्व विद्यापतिक प्रभाव एतेक छलन्हि जे हुनका संस्कृत नाटक गोरक्षविजयमे मैथिली गीत लिखऽ पड़लन्हि (जेना विदाञोतक पहिल रिपोर्ताज लिखनिहार ज्योतिरीश्वरकेँ संस्कृत नाटक धूर्तसमागममे मैथिली गीत लिखऽ पड़लन्हि)। गोविन्द झा ज्योतिरीश्वरक विदाञोतमे विद्यापतिक परम्परा देखि लै छथि, चर्च करै छथि मुदा ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिकेँ आगाँ किए नै बढ़ा पबैत छथि जखन बिदेश्वर ठाकुर गाबि-गाबि कऽ प्राण त्यागि रहल छथि? विद्यापति नाटकमे विद्यापतिकेँ प्यास जतऽ लगलन्हि ओ नाटक लेखकक गाम कोना भऽ जाइए? सभ अपना-अपना हिसाबसँ “हम्मर विद्यापति”पर नाटक लिखि रहल छथि। रामबृक्ष बेनीपुरी लग सेहो पञ्जीक तथ्य नै छन्हि। एकटा उपजातिक बनोतरी आ किंवदन्तीक आधारपर ओ केशव मिश्रक विद्यापतिपर हँसब लिखै छथि; द्वैत परिशिष्टक ई केशव मिश्र वाचस्पति-२ (१४००-१४९०) क पौत्र छथि। एकटा आर केशव मिश्र (११५० लगभग) छथि जे तर्कभाष लिखै छथि आ जकर समीक्षा तत्वचिन्तामणिकारक गंगेशक पुत्र वर्धमान “तर्कप्रकाश”मे करै छथि। आनन्द कुमारस्वामे जतेक शोध १९१५ ई. मे केने रहथि ओइसँ एक्को डेग आगाँ नहिये बेनीपुरी जा सकलथि नहिये आनन्दस्वामीक सए बर्ख बाद कियो दोसर मुख्यधाराक शोधकर्ता जा सकल छथि। वएग उगनाक कथा बेनीपुरी कहै छथि, मुदा महादेव संस्कृत आ अवहट्ठक कट्टर विद्यापतिक “शैवसर्वस्वसार”पर कैलाशमे नचता आकि ज्योतिरीश्वरपूर्व विद्यापतिक नचारीपर, ओइपर गुम छथि। आनन्द कुमारस्वामी जकाँ बेनीपुरीकेँ बुझल छन्हि जे संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिक हाथक लिखल भागवत उपलब्ध अछि आ इहो जे विद्यापतिकेँ गंगालाभ कोना भेलन्हि, गंगा हुनका अपनामे लीलि लेलखिन्ह। आनन्द कुमारस्वामी जकाँ बेनीपुरीकेँ संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिक लिखल पुरुषपरीक्षाक विषयमे सुनल छन्हि मुदा पढ़ल नै छन्हि, आ से नै तँ हुनका बुझल रहितन्हि जे संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापति गंगालाभक कथा बोधि कायस्थक विषयमे लिखने छथि। ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिक विषयमे ई कथा उगनाक कथा सन प्रचलित छल जे बादमे संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिसँ कर्मकाण्डीय रूपमे जोड़ल गेल आ पुरुषपरीक्षाक कथा बोधि कायस्थ एकर प्रमाण अछि। कीर्तिपताकाकेँ बेनीपुरी मैथिली गीतक संग्रह कहै छथिइ! ! पूछि-पाछि कऽ शोध कएल जाइ छै? जे आधार कुमारस्वामी सए बर्ख पहिने रखलन्हि, ओइपर सुखाएल मुख्यधारा किए नै आगाँ बढ़ल कारण ई शतपथ ब्राह्मणवादी मुख्यधारा ओकरा एकर अनुमति नै दै छै। मुदा बिना कोनो प्रमाणक शिवसिंहक मित्र पुरादित्यकेँ भूमिहार ब्राह्मण सिद्ध कऽ दै छथि, ओहिना जेना गोविन्ददास (झा) केँ रमानाथ झा स्रोत्रिय बतेलन्हि (सुकुमार सेन तकरा हास्यास्पद मानै छथि), आ रामदेव झा ब्राह्मण सिद्ध करै छथि आ कालिदासकेँ वर्माजी (लालदास स्मारिकामे) कायस्थ सिद्ध करै छथि। संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति पूर्ण कर्मकाण्डक संग पुस्तकक प्रारम्भ आ अन्त करै छथि, राजा-रानी-आश्रयदाताकेँ मोन पाड़ै छथि मुदा अपन चर्च नै करै छथि। मुदा पद्यावली लोककण्ठमे किए रहि गेल, पुस्तकक तामझाम ओ तकरा किए नै देलन्हि, कारण ओ हुनकासँ कए सए पूर्वक रचना छल, जखन पागक उत्पत्ति मिथिलामे नै भेल छल। पद्यावलीमे रूपनारायण, शिवसिंह, लखिमा, देव सिंह, हर सिंह, पद्म सिंह, विश्वास देवे, अर्जुन-अमर, राघव सिंह, रुद्र सिंह, धीर सिंह, भैरव सिंह, चन्द्र सिंह आदि बादमे घोसिआएल गेल, जे गीतक लयकेँ प्रभावित करैत स्पष्ट रूपसँ दृष्टिगोचर होइत अछि। संस्कृत-अवहट्ठबला विद्यापति भू-परिक्रमा (देव सिंह), कीर्तिलता (कीर्ति सिंह आ वीर सिंह), कीर्तिपताका, गोरक्षविजय (शिव सिंह), लिखनावली (पुरादित्य), दान वाक्यावली (रानी धीरमति) आदि स्पष्ट रूपसँ राज्याश्रित रचना छल। गोरक्षविजय नाटक भैरव पूजाक अवसरपर लिखल गेल आ ऐ मे धूर्त समागम सन मैथिली गीत छल जे ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिक भयंकर प्रभाव स्वरूप छल। नामक असमानता नै रहैत तँ ज्योतिरीश्वकेँ ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापति बना देल जाइत। निष्कर्ष तत्वचिन्तामणिकारक गंगेश १२००० ग्रन्थक बराबर एकटा ग्रन्थ लिखलन्हि। प्रोफेसर दिनेशचन्द्र भट्टाचार्य “मिथिलामे नव्य-न्यायक इतिहास” मे लिखै छथि- “जे परिवार सामाजिक स्थितिमे निम्न मानल जाइत छल, से आब मिथिलामे लुप्त भऽ गेल अछि… गंगेशक परिवार पूर्णतः उपेक्षित अछि, आ हमरा सभसँ हुनकर पिताक नाम धरि जनबाक अपेक्षा नहि कएल जाइत अछि।” आ ई सभ सूचना, ओ लिखै छथि, हुनका प्रो. आर.झा (रमानाथ झा) देलखिन्ह! आब आउ पञ्जीमे वर्णित तथ्यपर- ओइमे स्पष्ट रूपसँ लिखल अछि जे तत्वचिन्तामणिकारक गंगेशक जन्म पिताक मृत्युक पाँच वर्ष बाद भेलन्हि आ ओ चर्मकारिणीसँ विवाह केलन्हि, तँ ई गप रमानाथ झा दिनेशचन्द्र भट्टाचार्यसँ किए नुकेलन्हि? एकटा उपजाति द्वारा हिनकर मूर्खसँ विद्वान बनबाक गपपसारल गेलन्हि आ हिनका खतम करबाक साजिश भेल। गंगेशक पुत्र वर्द्धमान गंगेशकेँ सुकविकैरवकाननेन्दुः कहै छथि। मुदा गंगेश सन प्रसिद्ध विद्वानक कविता कोन साजिशक अन्तर्गत आइ उपलब्ध नै अछि से ऊपर देल उदाहरणसँ स्पष्ट अछि। बंगालक वासुदेव पक्षधर मिश्रक सहपाठी रहथि, मिथिला पढ़ैले एला, शलाका परीक्षा उत्तीर्ण केलन्हि आ सर्वभौम उपाधि भेटलन्ह्। वासुदेव गंगेशक तत्वचिन्तामणि आ उदयनक न्यायकुसुमांजलिक कारिकाकेँ कंठस्थ कऽ लेलन्हि। पक्षधर आ आन मिथिलाक शिक्षक तत्वचिन्तामणि लिखबाक (प्रतिलिपि करबाक) अनुमति नै दै छला! वासुदेवक शिष्य रघुनाथ शिरोमणि अपन गुरु पक्षधर मिश्रकेँ शास्त्रार्थमे हरा प्रमाणित करबाक अधिकार लेलन्हि। नव्यन्याय स्कूलक नवद्वीपमे वासुदेव-रघुनाथ द्वारा स्थापना भेल। पक्षधर मिश्र संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक समकालीन छला। आ रघुनाथक संग बंगालसँ मिथिला विद्यार्थीक आगमन बन्द भऽ गेल। शिवसिंह द्वारा संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिकेँ जे बिस्फी ताम्रपत्र देल गेल तकरा ग्रियर्सन फर्जी कहलन्हि कारण ओ विद्यापतिक पद्यावलीसँ परिचित रहथि आ बूझि गेल रहथि जे ओइ विद्यापतिकेँ ई ताम्रपत्र भेटब असम्भव छल। मुदा ई ताम्रपत्र तँ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिकेँ भेटल छलन्हि आ दुनूक बीचक अन्तर ग्रियर्सन नै सोचि सकला। मुदा से म.म. हरप्रसाद शास्त्री सोचलन्हि आ ऐ ताम्रपत्रकेँ असली बतेलन्हि। श्रीधरदासक सदुक्तिकर्णामृतमे कैवर्त पपीहाक गंगापर स्तुति गीत अछि। राधाकृष्णक गीत अछि। लक्ष्मणसेनक राज कवि धोयी (जोलहा) रहथि। लखिमा ठकुराइन पद्यावली नै लिखलन्हि संस्कृतमे पद्य लिखलन्हि (ग्रियर्सन)। श्रीधरदासक अभिलेख अंधरा ठाढ़ीमे अछि आ ओ नान्यदेव आ गंगदेवक मंत्री रहथि। हुनकर वंशज अमिअकर संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक समकालीन रहथि। गंगदेवकेँ उपेन्द्र ठाकुर कलचुरी मानै छथि। विजय कुमार ठाकुर कलचुरि कर्णक स्तुतिमे सदुक्तिकर्णामृत (श्रीधरदास)क विद्यापतिक गीतकेँ मानै छथि। राधाकृष्ण चौधरीक मत ऐ सँ भिन्न छन्हि। कोनो परिस्थितिमे ई विद्यापति ज्योतिरीश्वर पूर्व रहथि। “रामचरित”- विग्रहपाल-३ कर्णकेँ हरेलन्हि, ऐ सम्बन्धमे बेगूसरायसँ उत्तर १६ किमी. नौलागढ़सँ दूटा पाल अभिलेख राधाकृष्ण चौधरीकेँ भेटलन्हि। ओहो कर्ण ११म शताब्दीक छथि। ज्योतरीश्वर पूर्व विद्यापतिक पद्यावली बंगालमे प्रसिद्ध अछि। ज्योतिरीश्वरक धूर्त समागम दक्षिण भारतमे प्रसिद्ध अछि। आ तकर बाद बंगालसँ मिथिलामे विद्यार्थी एनाइ बन्द भऽ गेल आ संगे मिथिलाक नाटक आ पद्यावलीक बहिर्गमन सेहो। अनुलग्नक: ३ केर अनुलग्नक क फणीश्वर नाथ रेणु: एकटा लोकगीतक विद्यापति भूमिका महाकवि विद्यापतिपर “खोज”करैत काल हमरा लागल जे एक अध्यायक शीर्षक राख’ पड़त- “खेतिहर-बोनिहार आ बहलमानक कवि विद्यापति”। कारण पूर्णियाँ-सहरसाक इलाकामे आइयो विद्यापतिक पद्यावली गाबि-गाबि क’ भाव देखाक’नाचैबलाक मण्डली सभ अछि। ऐ मण्डली सभक नायक महिसवार, चरबाह आ गाड़ीक बहलमाने होइ छथि प्रायः। मैथिल पण्डित लोकनिसँ पुछलौं , ई कोना भेल? बजला, अहाँ कोन फेरामे पड़ल छी? अही सभ मूर्खक कारण आइ विद्यापतिक दुर्दशा भ’ रहल अछि। ऐ मामूली लोक सभक मोनमे जखन एलै विद्यापतिक नामपर “चारिटा पद्यावली” जोड़ि देलक। ..अहाँ दिग्भ्रमित भ’ रहल छी। .. मिथिलाक पण्डितक वर्जना-वाणीपर कान-बात नै दैत हम सहर्ष सहरसा (बा सहर्षा? ) यात्राक तैयारी शुरू क’देलौं। ..कनचीरा गाम एकटा एहन गाम अछि जइपर दू-दू जिलाक जिला अधिकारीक शासन चलैत अछि। अदहा गाम सहरसामे, अदहा गाम पूर्णियाँमे। ... कनचीराक विद्यापति-मण्डलीक नाम दुनू जिलाक लोक लै छथि। ... जइ दिन कनचीरा गाम पहुँचलौं, गाममे एकटा अघट घटना घटित भ’ गेल रहै। दस सालसँ इलाकाक प्रतिनिधित्व करैबला नेताजी चुनावमे चितंग भ’ गेल रहथि। तइ द्वारे ओइ राति नाच-गानक दोसरे मतलब निकालल जा सकै छल, ऐ डरे “विद्यापति-मण्डली”क नायक जनकदास नाच करबाक अनुमति नै देलनि। दोसर राति ओ बड्ड खुशामद करेलाक बाद अनुमति देलनि। नायक जनकदास बड्ड तर्क-वितर्क केलाक बाद घुमा-फिरा क’ दोहरा-तेहरा क’ कहलनि, “विद्यापति- नाच” क जन्म हुनके परिवारमे पहिले-पहिल भेल। विस्तारसँ ओ कहियो किछु नै कहलनि। आ हुनका जखन ई विश्वास भ’ गेलनि जे “विद्यापति नाच मण्डली”क नामपर खर्च करबा लेल हजार- दू हजार टाका सरकारक खजानासँ ल’ क’ हम नै बहराएल छी, तखन ओ मृदंगपर थाप देलनि। राति भरि नाच देखैत रहलौं। गाए चरबैबला छौड़ा, साड़ी पहीर विरहिनी राधा बनि गेलि आ कानि-कानि गाबए लागलि- “कतेक दिवस हरि खेपब हो, तुम एसकरि नारी!” दोसर दिन, जनकदाससँ ऐ नाचक उत्पत्तिक इतिहास पुछलौं तँ ओ बाजल- नै जानि कहियासँ ऐ नाचक मूलगैनी हमरा परिवारमे चलैत आबि रहल अछि। जनकदासक ऐ उदासीक कारण छल- हमर टेपरेकार्डर। .. चुप्पे-चुप्पे सभ गीत फीतामे अहाँ भरि लेलौं, चलाकीसँ। मंगनीमे अपन काज सुतारि लेलौं अहाँ? आ, अंतिममे पचास टाका नगदी देलाक बादो ओ हमर ऐ प्रश्नक कोनो उत्तर नै देलनि कि खेतिहर-बोनिहार, चरवाह आ बहलमान सभ कहिया आ केना विद्यापतिक पद्यावलीकेँ गाबि-गाबि नाचब प्रारम्भ केलनि। जनकदासक पलानीमे पुआरपर पड़ल रही दिन भरि, ओकरा दया नै लगलै। ओकर मसोमात जवान बेटी हमरा दिससँ पैरवी केलक, तखनो ओ नै पसिझल, अपन खानदानीक “हँसी” करबैबला गप के “गजट” मे “छापी” कराब’ चाहत? बुरहा जनकदास बड़द खोलि चरबै लेल चलि गेला। हम ओकर पलानीमे पड़ल रहलौं आ तकर बादे एकटा खिस्सा सुनलौं बा सपना देखलौं बा“भ्रम”मे पड़ि गेलौं- ई नै कहि सकै छी। अनुलग्नक: ३ केर अनुलग्नक ख बिदापत नाच (मूल रिपोर्ताज फणीश्वरनाथ रेणु) बिदापत नाच ऐ नाचक उत्पत्ति दरभंगा जिलामे भेलै, एहन अंदाज कएल जाइ छै | लेकिन अपने मातृभूमिमे ई कोन तरहक अवस्थामे अछि एकरा कहबाक जरूरत नै बुझाइत अछि, परंच उत्तरी बिहारक किछु जिला आ भागलपुर, पूर्णिया आदिक गाम सभमे आइयो एकर कद्र छै। ई छोटका लोक सभक नाच बनि कऽ रहि गेल अछि। तथाकथित भद्र समाजक लोक एकरा देखबामे अपन हेठी बुझै छथि। मुदा मुसहर, धाँगड़, दुसाधक ठाम विवाह, मुंडन संगे अन्य अवसरोपर एकर धूम मचल रहै छै। ऐ नाचमे सात-आठ टा कलाकार रहै छै आ दुइए टा वाद्य यन्त्र- मृदंग आ मंजीरा रहै छै। तँ चलू। बिदापत-नाचक आनंद उठाबी। अपन भद्रताकेँ किछु काल लेल त्यागि.… धृंग धा, धृंग धा तिन्ना- बाजि कऽ मृदंग बौक भऽ गेल। कुन कुन कुन कुन... मजीरा स्वरमे संग देलकै। गननायकं फलदायकं पंडितम् पतितम्... अहाँ सभ हँसू जुनि। ई मंगलाचरण छलै, शुद्ध संस्कृतमे। धृंगा धृंगा धृंगा धृंगा- मृदंग बाजऽ लागल। किनकां, किनकां, किनकां, किनकां.. मजीरा संग देलकै। नाचैबला चारू तरफ जेम्हर-जेम्हर समाजी छल, चक्कर देनाइ शुरू केलक। ओकर पाछू बिपटा सेहो घिरनी जकाँ चक्कर लगा रहल छल आ मुँहकेँ रंग-बिरंगक बनबैत ओय -ओय -ओय -ओय बाजि रहल छल। धिरिनांगी, धिरिनांगी, धिरिनांगी, धिरिनांगी- मृदंग ताल बदलि दोसर सुर निकाललक। किनकां, किनकां... आब रहए दिअ। बड़ नचौलौं... आब बादमे नाचक कथा हेतै। नाच करैबला एकेटा जगहपर जमा भऽ झूमऽ लागल। धिरिनांगि तिनता, तिटक-तिटक धा, तिटकल गदगिन धा। ताल समाप्त भेल आ नाचो शेष भऽ गेल आ नाचैबला सभ घोघ तानि दर्शक मंडलीमे जा बैसल। नाचमे जे बिपटा बनल छल ओ नाच करनिहारकेँ ताकऽ लागल। धृंगा-धृंगा... 'धिन-तिनक तिनक, धिन तिनक-तिनक'- मृदंग बाजल। समाजी सुरमे सुर मिलेलक। 'हे लेल परबेश परम सुकुमारि हंस गमन वृषभान दुलारि.…' नचनियाँ सभ उठि बिपटा लग आबि गेल आ हर्षित भऽ बिपटा ओय ओय ओय ओय केनाइ शुरू कऽ देलक। 'धिन-तिनक् तिनक् धिन-तिनक् तिनक्' 'हे! तन मन बदन पवन सहजोर हे दामिनी ऊपर उगलन्हि चाना...' नाच करऽबला सभ घोघ हटा लेलक आ चंद्रमुख (घुटल दाढ़ी, मोंछ आ बेडोल, केहने सन कऽ मुँह) देख दर्शको सभ हँसैत-हँसैत नेहाल भऽ जाइत अछि। नचनियाँ निच्चाँ दिस ताकि रहल, लाज सँ लज्जावती लता सन सिकुड़ल नाच कऽ रहल छल वा छली। बिपटा ओकरा अपना दिस आकर्षित करबाक कोशिश कऽ रहल अछि। “हे बिहँसि उठलि पिऊ देखि सुहागिनी लाज बदन लेल फेरि..” नचनियाँ बिहुँसि कऽ मुँह फेर लेलक। हँसऽ कालमे तमाकुल सेवनसँ जे दाँत सभ कारी भेल छल से चमकि उठल। कृपया अहाँ सभ शांत भऽ जाउ। जी, जी हँ। विद्यापतिक पद्यावली भऽ सकैत अछि, परंच ई छी 'बिदापत नाच'। न्यू थियेटर्स, विद्यापति, कानन बाला. पहाड़ी सान्यालक बक-बक बंद करै जाउ। आखिरी अलाप शुरू कऽ देलौं। अहाँ सभकेँ कतेक बुझाउ जे ई 'बिदापत नाच' छिऐ आ ओ नाच करैबला टहलू पासवान, ओकर बाप बड़का डकैत छल। बापकेँ काला पानीक सजा भऽ गेलै। माय केकरो आन सने चलि गेलै आ ई बच्चेसँ नाचऽ लागल। अपन जवानीक दिनमे एकर धूम मचल रहै छलै... धूम मचबै छलै धूम। एकर आवभाव देखि तँ परबतिया अपन बसल-बसाएल गृहस्थी छोड़ि एकरा सने रातिये राति पड़ा आएल। हँ तँ टहलू पासवान गाबि सकैत अछि जे... अँगना आएत जब रसिया पलट चलब हम इषत् हँसिया कान्ह जतन बहु करयिन्ह धृन्ना धृंगा, तिना-तिन्ना- मृदंग आब दोसर ताल बदललक। किन्ना- किन्ना.. मंजीरा सेहो ताल बदललक। “सखि हे... सखि हे, कि पूछसि अनुभव मोहे..” “जनम अवधि हम रूप निहारलौं, तबहु न तिरपित भेल |" 'अरे? चुप! चुप! ! ' -बिपटा खिसिया कऽ चुप करा रहल अछि। एक टा समाजी गमछाक कोड़ा बनेनाइ शुरू केलक। बिपटा कहनाइ आरम्भ केलक जे ओकरा पीट कऽ अनेरे समए बर्बाद कएल जा रहल अछि। जमींदारक जूता खाइत-खाइत ओकर पीठक चमरी मोट भऽ गेल छै। ओ अइ लेल मात्र चुप करा रहल छल.. “कि ओ जन्म भरि केकर रूप निहारैत रहल'... जखन ओकरा बुझा गेलै जे ओकरे रूप, तँ खुशी भऽ तुरंत पॉकेटसँ एकटा छोटका एना निकालि सगर्वसँ अपन मुँह देखऽ लागल। गीत समाप्त भेल, आब बिपटा महादेवक बेर छनि। -हे नेक जी (नायक जी)। -हूँ। -आब हमरो सुनू। “बाप रे! बाप रे कोन दुर्गति नहि भेल सात साल हम सूद चुकाओल, तबहुँ उरिन नहि भेलौं। कोल्हुक बड़द सन खटलौं राति-दिन कारज बढ़त हि गेल थारी बेच पटवारीकेँ देलियन्हि, लोटा बेच चौकीदारी। बकरी बेच सिपाहीकेँ देलियन्हि फटकनाथ गिरधारी।” किछु बुझलिऐ अहाँ सभ.. अहूँ सभ पूराक पूरा फटकनाथ गिरधारी छी। कने दर्शककेँ देखियन्हु ने जे ओ सभ की बुझलनि जे हँसैत-हँसैत पेटमे दर्द हुअ लगलनि। 'धृंगा-धृंगा, धिधिन्ना तिन्ना '.… “सखि हे! ई माह भादर, भरल बादर, शून्य मंदिर मोर। ...” सुन्दर! सुन्दर! ! ठीके विद्यापति मैथिल कोकिल.… अहाँ सभ फेर भसियाए लगलौं, अहूँ सभ बिपटासँ कम नै छी। कतबो मना कएल जाए ओकरा जकाँ सभ गीतपर किछु ने किछु सुनाबऽ लागै छी। ई लिअ, बिपटा महोदय फेर टपकला... “ई माह भादर, बरिसे बादर, चुअत छप्पर मोर।” “हहा-हहा...! !” दर्शक मंडली हँसैत-हँसैत लोट-पोट भऽ रहल अछि। हँ एक टा बात कहब बिसरि गेलौं जे बिपटा अपनाकेँ कृष्ण बुझैत अछि आ परदेशी साजन सेहो, लेकिन संगे इहो बात नै बिसरैत अछि जे कि ओ कलरू मुसहर अछि, हलहलियाक रहनिहार आ मनुष्य रहितो ओ बुझै छै जे कोल्हूक बड़दसँ बेसी ओकर हैसियत नै छै। नाचएबला सभ जखन ओकर गरदनिमे बाँहि मान-अभिमानसँ प्रेमक प्रदर्शन करैत बुझबैत छै कि ---माधव तजि के चललौं विदेश। .. तखनि ओ बिसरि जाइत अछि जे ओ कृष्ण अछि आ गोकुलसँ मथुरा जा रहल अछि। ओकरा सामने जीवनक विषमता मूर्त रूप भऽ नाचि उठै छै आ ओ बुझबै छै- 'नहिं बरसल अदरा (आद्रा नक्षत्र) नहि अशरेस, चारु दिस देखै छी बुढ़ियाक केश.… माछ काछू सब गेल पाताल, अब कि पड़त सखि महा अकाल, दिन भरि खटि के एक सेर धान, एकरा से कैसे बचत परान, छोडि- छोडि सजनि जाइ छी विदेश’ फेर दोसरे क्षण जखन नर्तक गाबऽ लागै छै- 'गोद लय बलमाकेँ चललि बाजार हटिया के लोग पूछे, के लागे तोहार। सासू जी के लड़िका, ननद के जेठ भाय, पूर्व के लिखल स्वामी छिक् हे हमार। ' आब बिकटा बच्चा जकाँ जिलेबी, बताशा आ खिलौना लेल छिरिऐ लागल.. तखने एकटा नचनिया गीत गेलक-- राति जखन भिनसरवा रे, पहूँ (स्वामी) आयल हमार। कर कौशल कर कँपइत रे हरवा उर जार कर पंकज उर थपइत रे मुखचन्द्र निहार” बिपटा बीचेमे रोकि कऽ एकटा समाजीसँ एकर अर्थ बुझबै लेल कहै छै आ समाजी खुलि कऽ अइ गीतपर टीका करऽ लागल। केना नायिका पुआरपर अपन झोपड़ीमे सुतल छलय आ बिपटा आएल छल। चलू दर्शक सभक बीचमे। कारी-कारी मोटगर आ गठगर देहबला नवयौवना मंद-मंद मुसकीकेँ दबा आ एक दोसरकेँ केहुनिया-केहुनिया कऽ कनफुसकी करैमे आनंदित भऽ बिपटाक दिस एक टक निहारि रहल छलि। अधेड़ उम्रक मौगी सभ बनावटी तामस व्यक्त कऽ युवती सभकेँ रोकए चाहै छै, लेकिन दबल हँसी आ गुदगुदायल हृदए कखन मानै छै। एम्हर नचनियाँ सभ आलाप कऽ उठल। “चलू मन, चलू मन... ससुरालि जइबै हो रामा, कि आहो रामा, नैहरा मे अगिया लगाइब रे कि... युवती चंचल भऽ जाइ छै आ युवक लोकनिक नसमे बिजली दौड़ऽ लगलनि। नाच आब खत्म हुअबला छै- “चलू मन, चलू मन धिन धिनक धिनक, धिन धिनक धिनक… कि आहो रामा, नैहरा मे अगिया लगाइब रे कि...! डिम डिमिक डिमिक, डिम डिमिक डिमिक...” अरे ई की? ओहो, चेथरू गुँसाइ जी छथि। गुँसाइ जी कबीरक भक्त छथि। दस-पंद्रह साल पहिने जमींदार साहबक कहलापर ओ झूठ गवाही नै देलनि। ऐपर जमींदार खिसिया कऽ गुँसाइ जी केँ बेघर कऽ देलकनि आ तखनेसँ ओ बैरागी भऽ गेला। खंजरी, झोरा आ चिमटा, जटा आ नमगर दाढ़ी... ई लिअ। गुँसाइ जी खंजरी बजा बजा नचनियाँ संगे नाच करऽ लागला... “डिम डिमिक डिमिक, डिम डिमिक डिमिक कि आहो रामा नैहरा मे अगिया.. बात ई छै जे चेथरू गुँसाइ जी अइ गीतकेँ पूरा निर्गुण मानै छै। अहा! ओकर धँसल आँखिमे नोर चमकि उठै छै। आ नाच समाप्त भऽ गेल। (फणीश्वरनाथ रेणुक ई रिपोर्ताज साप्ताहिक “विश्वामित्र”क १ अगस्त १९४५ क अंकमे प्रकाशित भेल छल। ई हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद (मधुपनाथ झा द्वारा, विदेह: सदेह ११) फणीश्वरनाथ रेणुकेँ समर्पित कएल जा रहल अछि। ) अनुलग्नक: ४: विद्यापतिक बिदेसिया- पिआ देसाँतर- बिदापत नाचक अलाबे मैथिली नाटकक एकटा समानान्तर दुनियाँ रामखेलावन मण्‍डल गाम- कटघटरा, प्रखण्‍ड– शि‍वाजीनगर, जिला- समस्तीपुर, हिनके संग बिन्देश्वर मण्‍डल सेहो छलाह। उठैत मैथिली कोरस आ माँ गै माँ तूँ हमरा बंदूक मंगा दे कि‍ हम तँ माँ सि‍पाही हेबै- एखनो लोककेँ मोन छन्‍हि‍। ऐ मंडली द्वारा रेशमा-चूहड़, शीत-वसन्‍त, अल्हाऊदल, नटुआ दयाल ई सभ पद्य नाटि‍का प्रस्‍तुत कएल जाइत छल। पूर्णियासँ पि‍आ देसाँतर (मैथि‍ली बि‍देसि‍या)क टीम सुपौल-सहरसा-समस्तीपुर आदि ठाम अबैत छल। हसन हुसन नाटि‍का होइत छल। रामरक्षा चौधरी नाट्यकला परि‍षद, ग्राम- गायघाट, पंचायत करि‍यन, पो. वैद्यनाथपुर, जि‍ला- समस्‍तीपुर वि‍द्यापति‍ नाटक गोरखपुर धरि‍ खेलाएल छल। ऐ मंडली द्वारा प्रस्‍तुत अन्‍य नाटक अछि- लौंगि‍या मेरचाइ, वि‍द्यापति‍, चीनीक लड्डू आ बसात। भोजपुरीक साहित्य मैथिलीसँ कम समृद्ध अछि मुदा से अछि मात्र परिमाणमे, गुणवत्ताक दृष्टिमे ई कतेक क्षेत्रमे आगाँ अछि। भोजपुरीक भिखाड़ी ठाकुरक बिदेसियाक सन्दर्भमे हम ई कहि रहल छी। भिखाड़ी ठाकुर कलकत्तामे प्रवासी रहथि, घुरि कय अएलाह आ भोजपुर क्षेत्रमे अपन कष्टक वर्णन जाहि मर्मस्पर्शी रूपसँ गामे-गामे घुमि कए आ गाबि कए सुनओलन्हि से बनल बिदेसिया नाटक। मिथिलामे प्रवास आजुक घटना छी, गामक-गाम सुन्न भऽ गेल अछि। मिथिलाक बिदेसिया लोकनि देशक कोन-कोनमे पसरि गेल छथि। मुदा पहिने भोजपुर इलाका जेकाँ प्रवासक घटना मिथिलामे नहि छल। प्रवास मोरंग धरि सीमित छल जे नेपालक मिथिलांचल क्षेत्र अछि। आ ताहिसँ मैथिलीमे लोकगाथाक सूक्ष्म विवरणक बड़ अभाव, जे अछियो से लोकगाथा नायकक विवरण नहि वरन महाकाव्यक नायकक मैथिलीमे विवरण जेकाँ अछि, आ बोझिल अछि, भिखाड़ी ठाकुरक बिदेसियाक जोड़ नहि। सलहेसक कथाक विवरण लिअ, क्षेत्रीय परिधि पार करिते सलहेस राजासँ चोर बनि जाइत छथि आ चोरसँ राजा। तहिना चूहड़मल क्षेत्रीय परिधि पार करिते जतए सलहेस राजा बनैत छथि ओतए चोर बनि जाइत छथि, आ जतए सलहेस चोर कहल जाइत छथि ओतुक्का राजा/ शक्तिशालीक रूपेँ जानल जाइत छथि। मुदा एहि सभपर कोनो शोध नहि भए सकल अछि। एहि क्रममे विद्यापतिक पद्यावलीक पद सभमे तकैत हमरा समक्ष विभिन्न प्रकारक गीत सभ सोझाँमे आएल। एहिमे जे अधिकांश छल से रहए प्रेमी-प्रेमिकाक विरहक विवरण आ बिदेसियाक जे मूल कनसेप्ट अछि- रोजी-रोटी आ आजीविका लेल मोन-मारि कए प्रवास, ताहिसँ फराक। तखन जा कए हमरा किछु विशुद्ध बिदेसिया जकरा विद्यापति पिआ-देसाँतर कहैत छथि भेटल। एहिमे स्वाभाविक रूपेँ अधिकांश विद्यापतिक नेपाल पद्यावलीसँ भेटल आ एकटा नगेन्द्रनाथ गुप्तक संग्रीहीत पद्यावलीसँ। मोरंग नेपाल स्थित मिथिलाक भाग अछि आ प्रवास लेल प्रसिद्ध छल, से एकर सम्भावित कारण। ताहि आधारपर ई संकल्पित नाटिका प्रस्तुत अछि। विद्यापतिक पिआ देसाँतर दृश्य १ स्टेजपर हमर बिदेसिया बिदेस नोकरीक लेल बिदा होइत छथि आ जुवती गबैत छथि- गीतक बीचमे एकटा पथिक अबैत छथि। मंचक दोसर छोड़पर चोर लोकनि धपाइत नुकायल छथि। मंचक दोसर छोरपर कोतवाल आ शुभ्र धोतीधारी पेटपर हाथ देने निफिकिर बैसल छथि। धनछी रागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पद्यावली)- हम जुवती, पति गेलाह बिदेस। लग नहि बसए पड़उसिहु लेस। हम युवती छी आ हमर पति बिदेस गेल छथि। लगमे पड़ोसीक कोनो अवशेष नहि अछि। सासु ननन्द किछुआओ नहि जान। आँखि रतौन्धी, सुनए न कान। सास आ ननदि सेहो किछु नहि बुझैत छथि। हुनकर सभक आँखिमे रतौँधी छन्हि आ ओ सभ कानसँ सेहो किछु नहि सुनैत छथि। जागह पथिक, जाह जनु भोर। राति अन्धार, गाम बड़ चोर। हे पथिक! निन्नकेँ त्यागू। काल्हि भोरमे नहि आऊ। अन्हरिया राति अछि आ गाममे बड्ड चोर सभ अछि। सपनेहु भाओर न देअ कोटबार। पओलेहु लोते न करए बिचार। कोतबाल स्वपनहुमे पहरा नहि दैत अछि आ नोत देलोपर विचार नहि करैत अछि। नृप इथि काहु करथि नहि साति। पुरख महत सब हमर सजाति॥ ताहि द्वारे राजा ककरो दण्ड नहि दैत छथि आ सभटा पैघ लोक एके रंग छथि। विद्यापति कवि एह रस गाब। उकुतिहि भाव जनाब। विद्यापति कवि ई रस गबैत छथि। उकतीसँ भाव जना रहलीह अछि। विद्यापति कविक प्रवेश होइत छन्हि। कोतवालक लग शुभ्र-धोतीधारी आ एकटा गरीबक आगमन होइत अछि। कोतवाल आभाससँ धोतीधारीक पक्षमे निर्णय सुनबैत छथि आ मंचक दोसर कोनपर बैसलि जुवती माथ पिटैत छथि। गीतक अन्तिम चारि पाँती विद्यापति कवि गबैत छथि। दृश्य २ जुवती एकटा दोकान खोलने छथि, सांकेतिक। मंचक दोसर कातसँ सासु आ ननदिकेँ जएबाक आ क्रेता पथिकक अएबाक संग युवती गेनाइ शुरू करैत छथि आ सभ पाँतिक बाद विद्यापति मंचपर अबैत छथि अर्थ कहैत छथि आ अंधकारमे विलीन भऽ जाइत छथि। मुदा अन्तिम पाँती विद्यापति गबैत छथि आ जुवती ओकर अर्थ बँचैत छथि। मालवरागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पद्यावली)- बड़ि जुड़ि एहि तरुक छाहरि, ठामे ठामे बस गाम। एहि गाछक छाह बड्ड शीतल अछि। ठामे-ठाम गाम बसल अछि। हम एकसरि, पिआ देसाँतर, नहि दुरजन नाम। हम असगरि छी, प्रिय परदेसमे छथि, कतहु दुर्जनक नाम नहि अछि। पथिक हे, एथा लेह बिसराम। हे पथिक! एतय विश्राम करू। जत बेसाहब किछु न महघ, सबे मिल एहि ठाम। जे किछु कीनब, किछुओ महग नहि। सभ किछु एतए भेटत। सासु नहि घर, पर परिजन ननन्द सहजे भोरि। घरमे सासु नहि छथि, परिजन दूरमे छथि आ ननदि स्वभावसँ सरल छथि। एतहु पथिक विमुख जाएब तबे अनाइति मोरि। एतेक रहितो जे अहाँ विमुख भए जाएब तँ आब हमर सक्क नहि अछि। भन विद्यापति सुन तञे जुवती जे पुर परक आस। विद्यापति कहैत छथि- हे युवती! सुनू जे अहाँ दोसराक आस पूरा करैत छी। दृश्य ३ एहि गीतमे विद्यापति नहि छथि। जुवतीक ननदि पथिककेँ दबारि रहल छथि, से देखि जुवतीकेँ अपन पिआ देसाँतर मोन पड़ि जाइत छन्हि। ओ ननदि आ सखीकेँ सम्बोधित कए गीत गबैत छथि। गीतक अर्थ सखी कहैत छथि, सभ पाँतीक बाद। धनछीरागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पद्यावली)- परतह परदेस, परहिक आस। विमुख न करिअ, अबस दिस बास। परदेसमे नित्य दोसराक आस रहैत अछि। से ककरो विमुख नहि करबाक चाही। अवश्य वास देबाक चाही। एतहि जानिअ सखि पिअतम-कथा। हे सखी! प्रियतमक लेल एतबी कथा बुझू। भल मन्द नन्दन हे मने अनुमानि। पथिककेँ न बोलिअ टूटलि बानि। हे ननदि! मोनमे नीक-अधलाहक अनुमान कऽ पथिककेँ टूटल गप नहि बाजू। चरन-पखारन, आसन-दान। मधुरहु वचने करिअ समधान। चरण पखारू, आसन दियौक आ मधुर वचन कहि सान्त्वना दियन्हु। ए सखि अनुचित एते दुर जाए। आओर करिअ जत अधिक बड़ाइ। हे सखी पथिक एतयसँ दूर जायत से अनुचित से ओकर आर बड़ाई करू। दृश्य ४ जुवती आ ननदि नगर आबि ठौर धेने छथि। एकटा पथिक आबि आश्रय मँगैत छथि तँ जुवती गबैत छथि आ ननदि सभ पाँतीक बाद अर्थ कहैत छथि। बीचमे चारि पाँती बिना अर्थक नेपथ्यसँ अबैत अछि। फेर जुवती आगाँ गबैत छथि आ ननदि अर्थ बजैत छथि। अन्तमे अन्तिम दू पाँती विद्यापति आबि गबैत छथि। दृश्यक अन्तमे ननदि कहैत छथि जे हम जे ओहि दिन पथिककेँ दबारि रहल छलहुँ से अहाँकेँ नीक नहि लागल रहए, मुदा आइ पथिककेँ आश्रय किएक नहि देलियैक। कोलाररागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पद्यावली)- हम एकसरि, पिअतम नहि गाम। तेँ मोहि तरतम देइते ठाम। हम एकसरि छी आ प्रियतम गाममे नहि छथि। ताहि द्वारे राति बिताबए लेल कहबामे हमरा तारतम्य भऽ रहल अछि। अनतहु कतहु देअइतहुँ बास। दोसर न देखिअ पड़ओसिओ पास। यदि क्यो लगमे रहितथि तँ दोसर ठाम कतहु बास देखा दैतहुँ। छमह हे पथिक, करिअ हमे काह। बास नगर भमि अनतह चाह। हे पथिक क्षमा करू आ जाऊ आ नगरमे कतहु बास ताकू। आँतर पाँतर, साँझक बेरि। परदेस बसिअ अनाइति हेरि। बीचमे प्रान्तर अछि सन्ध्याक समय अछि आ परदेसमे भविष्यकेँ सोचैत काज करबाक चाही। मोरा मन हे खनहि खन भाँग। जौवन गोपब कत मनसिज जाग। चल चल पथिक करिअ प... काह। वास नगर भमि अनतहु चाह। सात पच घर तन्हि सजि देल। पिआ देसान्तर आन्तर भेल। बारह वर्ष अवधि कए गेल। चारि वर्ष तन्हि गेला भेल। घोर पयोधर जामिनि भेद। जे करतब ता करह परिछेद। भयाओन मेघ अछि, रतुका गप छी सोचि कए निर्णय करू। भनइ विद्यापति नागरि-रीति। व्याज-वचने उपजाब पिरीति। विद्यापति कहैत छथि, ई नगरक रीति अछि जे कटु वचनसँ प्रीति अनैत अछि। दृश्य ५ अहू दृश्यमे विद्यापति नहि छथि। एकटा पथिक अबैत छथि मुदा सासु-ननदि ककरो नहि देखि बास करबासँ संकोचवश मना कए आगाँ बढ़ि जाइत छथि। जुवती गबैत छथि। घनछीरागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पद्यावली)- उचित बसए मोर मनमथ चोर। चेरिआ बुढ़िआ करए अगोर। कामदेव रूपी चोरक लेल हमर अवस्था ठीक अछि। बुढ़िया चेरी पहरा दऽ रहल छथि। बारह बरख अवधि कए गेल। चारि बरख तन्हि गेलाँ भेल। बारहम बरखक रही, तखन ओ गेलाह आ आब चारि बर्ख तकर भऽ गेल। बास चाहैत होअ पथिकहु लाज। सासु ननन्द नहि अछए समाज। सास आ ननदि क्यो संग नहि छथि आ पथिक सेहो डेरा देबासँ लजाइत छथि। सात पाँच घर तन्हि सजि देल। पिआ देसाँतर आँतर भेल। ओ कामदेव लेल घर सजा कए देशान्तर चलि गेलाह आ हमरा सभक बीचमे अन्तर आबि गेल। पड़ेओस वास जोएनसत भेल। थाने थाने अवयव सबे गेल। पड़ोसक बास जेना सय योजनक भऽ गेल सभ सर-सम्बन्धी जतए ततए चलि गेलाह। नुकाबिअ तिमिरक सान्धि। पड़उसिनि देअए फड़की बान्धि। लोकक समूह अन्हारमे विलीन भऽ गेल, पड़ोसिन फाटकि बन्न कए लेलन्हि। मोरा मन हे खनहि खन भाग। गमन गोपब कत मनमथ जाग। हमर मोन क्षण-क्षण भागि रहल अछि। कामदेव जागि रहल छथि गमनकेँ कतेक काल धरि नुकाएब। दृश्य ६ एहि दृश्यमे सेहो, नहि तँ ननदि छथि, नहिये सासु आ नहिये विद्यापति। एकटा अतिथि अबैत छथि आकि तखने मेघ लाधि दैत अछि आ जुवती गबैत छथि। धनछीरागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पद्यावली)- अपना मन्दिर बैसलि अछलिहुँ, घर नहि दोसर केवा। अपन घरमे बैसल छलहुँ, घरमे क्यो दोसर नहि छल, तहिखने पहिआ पाहोन आएल बरिसए लागल देवा। तखने पथिक अतिथि अएलाह आ बरखा लाधि देलक। के जान कि बोलति पिसुन पड़ौसिनि वचनक भेल अवकासे। की बजतीह ईर्ष्यालु पड़ोसिन से नहि जानि, बजबाक अवसर जे भेटि गेलन्हि। घोर अन्धार, निरन्तर धारा दिवसहि रजनी भाने। दिनहिमे रात्रि जेकाँ होमए लागल। कञोने कहब हमे, के पतिअएत, जगत विदित पँचबाने। हम ककरा कहब आ के पतियायत। कारण कामदेवक ख्याति तँ जगत भरिमे अछि। दृश्य ७ मंचक एक दिससँ सासुक मृत्युक बाद हुनकर लहाश निकलैत छन्हि आ मंचपर अन्हार होइत अछि। फेर इजोत भेलापर ननदिक वर हुनका सासुर लए जाइत छन्हि। पथिक रस्तापर छथि दर्शकगणक मध्य आ दर्शकगणकेँ इशारा करैत जुवती गीत गबैत छथि आ विद्यापति सभ पाँतिक बाद अर्थ कहैत छथि। अन्तिम दू पाँतिमे विद्यापति गीत आ अर्थ दुनू बजैत छथि- विद्यापति अन्तिम दू पाँति आ ओकर अर्थ कैक बेर दोहराबैत छथि। नगेन्द्रनाथ गुप्त सम्पादित पद्यावली- सासु जरातुरि भेली। ननन्दि अछलि सेहो सासुर गेली। सासु चलि बसलीह, ननदि सेहो सासुर गेलीह तैसन न देखिअ कोई। रयनि जगाए सम्भासन होई। क्यो नहि सम्भाषणक लेल पर्यन्त, एहि पुर एहे बेबहारे। काहुक केओ नहि करए पुछारे। एतुका एहन बेबहार, ककरो क्यो पुछारी नहि करैत अछि। मोरि पिअतमकाँ कहबा। हमे एकसरि धनि कत दिन रहबा। हमर पिअतमकेँ कहब, हम असगरे कतेक दिन रहब। पथिक, कहब मोर कन्ता। हम सनि रमनि न तेज रसमन्ता। पथिक हुनका कहबन्हि, हमरा सन रमणिक रसक तेज कखन धरि रहत। भनइ विद्यापति गाबे। भमि-भमि विरहिनि पथुक बुझाबे। विद्यापति गबैत छथि, विरहनि घूमि-घूमि कए पथिककेँ कहि रहल छथि। विद्यापति गबैत-गबैत कनेक खसैत छथि- अन्हार पसरए लगैत अछि तँ एक गोटे जुवती दिस अन्हारसँ अबैत अस्पष्ट देखना जाइत छथि। की वैह छथि पिआ देसान्तर! ! हँ, आकि नहि! ! ! पिआ देसान्तरक घोल होइत अछि आ मंचपर संगीतक मध्य पटाक्षेप होइत अछि। पिआ देसान्तरक ई कन्सेप्ट सुधीगणक समक्ष अछि आ मैथिल बिदेसिया लोकनिक वर्तमान दुर्दशाक बीच ई महाकवि विद्यापतिक प्रति ससम्मान अर्पित अछि। (विद्यापतिक पद्य- नगेन्द्रनाथ गुप्तक विद्यापति पद्यावलीसँ। ) ग्रन्थ-सूची आ सन्दर्भ-सूची नोट: नीचाँक सूची मूल दस्तावेजमे उल्लिखित प्राथमिक रचना, लेखक आ सैद्धान्तिक ग्रन्थपर आधारित अछि। जतय मूल दस्तावेज प्रकाशन-वर्ष/प्रकाशक नहि दैत अछि, ओतय अप्रमाणित विवरण नहि जोड़ल गेल अछि। क. प्राथमिक साहित्य आ समीक्षित रचना • बोयी भीमन्ना — “जरैत खोपड़ी सभ”; “हमर पैतृक अधिकार”। • जे. सुभद्रा — “लोढ़ब”; “लाण्डा”; “साड़ीक कोर”; “अव्वा”। • चल्लपल्ल्ली स्वरूपरानी — “मान्केनापुव्वु”; “माटि-भेल हाथ”। • दरिशे शशिनिर्मला — “हमही छी जे सभ किछु हारि देलहुँ”; “हम रजस्वला कपड़ा ओढ़ि रहल छी”; “एकटा दलित स्त्री”। • एम. गौरी — “मेहदी लागल हाथ”। • मद्दुरी विजयश्री — “अलिसम्माक स्राप”। • अनीश गारंगे — “पोस्टर”। • राजेन्द्र वडेल ‘जीता’ — “सम्भोग”। • उमेश सोलंकी — “लोक, जमि जाए”; “खरड़ाक डाँट सभ”। • बासुदेव सुनानी — “अखनो बहुत किछु होबाक बाकी अछि”; “पता”; “सदानन्द”। • कोलकलुरी इनोच — “कौआ”। • विनोदिनी — “कारी स्याही”। • पेद्दिंति अशोक कुमार — “सदा लेल मित्र (जिगिरी)”। • विद्यापति — पदावली; नगेन्द्रनाथ गुप्त-सम्पादित पाठक सन्दर्भ सहित। • फणीश्वरनाथ रेणु — “बिदापत नाच” (रिपोर्ताज); मैथिली रूपान्तरक सन्दर्भ सहित। • “विद्यापतिक पिआ देसाँतर” — दस्तावेजमे प्रस्तुत नाट्य-पाठ। ख. दलित चिन्तन, आलोचना आ सामाजिक सिद्धान्त • डॉ. बी. आर. आम्बेडकर — जाति-विच्छेद; शूद्र के छलाह?; हिन्दू धर्मक पहेलियाँ। • जोतिराव फुले — गुलामगिरी। • शरणकुमार लिम्बाले — दलित साहित्यक सौन्दर्यशास्त्र दिस। • ओमप्रकाश वाल्मीकि — दलित साहित्य आ सौन्दर्यशास्त्र सम्बन्धी आलोचनात्मक लेखन। • फ्रान्ट्ज फानों — धरतीक अभागल; कारी चमड़ी, उज्जर मुखौटा। • वाल्टर बेंजामिन — इतिहासक दर्शन पर थीसिस। • गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक — “की निम्नवर्ग बाजि सकैत अछि?” • शर्मिला रेगे — दलित-नारीवादी दृष्टिस्थान सम्बन्धी लेखन। • पैट्रिशिया हिल कॉलिन्स — प्रभुत्वक जाल आ अन्तर्सम्बन्धी उत्पीड़न सम्बन्धी सिद्धान्त। ग. साहित्य-सिद्धान्त, संस्कृति आ अनुवाद • रेमंड विलियम्स — देश आ शहर। • एड्रियन रिच — स्त्रीक रूपमे जन्म। • गणेश देवी — विस्मृतिक बाद। • ऑड्रे लॉर्ड — बाहरी बहिन; “मौनक भाषा आ क्रियामे रूपान्तरण”। • शोशाना फेलमैन आ डोरी लाउब — साक्ष्य: साक्षीपनक संकट। • अल्बेर कामू — सिसिफसक मिथक। • एफ. दोस्तोयेव्स्की — अपराध आ दण्ड। • दीपेश चक्रवर्ती — यूरोपकेँ प्रान्तीय बनाब। • होमी भाभा — तृतीय स्थान आ सांस्कृतिक संकरता सम्बन्धी सिद्धान्त। • एडवर्ड सईद — यात्रा करैत सिद्धान्त आ प्रतिपक्षीय पठन सम्बन्धी लेखन। • ए. के. रामानुजन — लोक आ शास्त्रीय परम्पराक अन्तर्क्रिया सम्बन्धी लेखन। • रुस्तम भारुचा — भारतीय रङ्गमञ्च आ प्रदर्शनक राजनीति सम्बन्धी लेखन। • हेरॉल्ड ब्लूम — प्रभावक चिन्ता। • लॉरेन्स वेन्यूटी — अनुवाद-नैतिकता आ विदेशीपन-संरक्षण सम्बन्धी सिद्धान्त। घ. मिथिला, विद्यापति आ नव्य-न्याय सन्दर्भ • दिनेशचन्द्र भट्टाचार्य — मिथिलामे नव्य-न्यायक इतिहास। • उपेन्द्र ठाकुर — मध्यकालीन मिथिलाक समाज आ अर्थव्यवस्थाक पक्ष। • विद्यापति सम्बन्धी पदावली, लोक-प्रदर्शन आ विदेसिया परम्पराक दस्तावेजमे उद्धृत/पुनर्प्रस्तुत सन्दर्भ। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। २.२४. गङ्गेश उपाध्याय जीवन, तर्कशास्त्र, तत्त्वचिन्तामणि आ नव्य-न्याय परम्परामे विरासत विशेष आलेख गङ्गेश उपाध्याय जीवन, तर्कशास्त्र, तत्त्वचिन्तामणि आ नव्य-न्याय परम्परामे विरासत सार ई समेकित आलेख गङ्गेश उपाध्यायक जीवन-वृत्त, पञ्जी-साक्ष्य, तत्त्वचिन्तामणिक चारि प्रमाण-खण्ड, ज्ञानक वैधता-अवैधता, प्रत्यक्ष-अनुमान-उपमान-शब्द, व्याप्ति, कारकवाद, अवच्छेदक-आधारित नव्य-न्याय भाषा, टीका-परम्परा, विश्व-दर्शनक तुलनात्मक सन्दर्भ, आ मिथिलाक समानान्तर बौद्धिक इतिहासक परिप्रेक्ष्यकेँ एक क्रममे रखैत अछि। दोहराओल विवेचनकेँ यथासम्भव समेकित कऽ मूल तर्क, उदाहरण, अभिलेखीय विवरण आ तकनीकी विश्लेषण अक्षुण्ण राखल गेल अछि। विषय-विन्यास · १. जीवन, सन्दर्भ आ प्रारम्भिक दार्शनिक रूपरेखा · २. विस्तृत ज्ञानमीमांसीय परीक्षण · ३. तकनीकी नव्य-न्याय, कारकवाद आ आधुनिक पठन · ४. अभिलेखीय साक्ष्य, प्रत्यक्षखण्ड आ सांस्कृतिक पुनर्पाठ · परिशिष्ट · ग्रन्थसूची भाग १ · जीवन, सन्दर्भ आ दार्शनिक रूपरेखा परिचय: मिथिलाक एक दार्शनिक मिथिलाक भूमि एशियामे संस्कृत बौद्धिक संस्कृतिक सबसँ निरन्तर उत्पादक केन्द्रसभमे सँ एक रहल अछि। एतय राजा जनकक दरबारमे बृहदारण्यक उपनिषदक दार्शनिक संवाद भेल; एतय याज्ञवल्क्य, गौतम, आ कात्यायन — जे न्याय-सूत्र परम्परा आ वैदिक व्याकरण दुनूकेँ केन्द्रीय नाम अछि — सभकेँ मैथिल मूल आ मैथिली सम्बन्ध बताएल जाइत अछि; एतय कवि विद्यापति मैथिलीमे गीत गाबलक जे लोक साहित्यकेँ महान बनौलक; एतय खगोलशास्त्री-गणितज्ञ आर्यभट्ट अपन प्रारम्भिक बौद्धिक श्वास लेलक। ई परिवेशमे — उत्पादक, वाद-विवादप्रिय, गहन शैक्षिक — गङ्गेश उपाध्याय अपन रचना केलक जे भारतीय दर्शनक चेहरा बदलि देलक। चौदहम् शताब्दीक प्रारम्भमे गङ्गेश उपाध्याय तत्त्वचिन्तामणि — सत्यक विचार-रत्न — क रचना केलक, ई रचना भारतक बौद्धिक परिदृश्यक स्थायी रूपसँ परिवर्तित क देलक। तत्त्व-चिन्तामणि (शाब्दिक अर्थ 'सत्यक विचार-रत्न', प्रमाण-चिन्तामणि या केवल चिन्तामणि सेहो कहल जाइत अछि) गङ्गेशक एकमात्र जीवित महान कृति अछि। ई एकटा प्रमाण-शास्त्र अछि — ज्ञानक वैध साधन पर एकटा ग्रन्थ — जे चारि भागमे विभाजित अछि: (१) प्रत्यक्ष-खण्ड (प्रत्यक्ष), (२) अनुमान-खण्ड (अनुमान), (३) उपमान-खण्ड (तुलना/सादृश्य), आ (४) शब्द-खण्ड (शाब्दिक प्रमाण)। तत्त्व-चिन्तामणि गङ्गेशक एकमात्र जीवित कृति अछि आ संस्कृत परम्परामे सबसँ बेसी टीका-टिप्पणी भेल ग्रन्थसभमे सँ एक अछि। पहिनेक न्याय-वैशेषिक लेखनक सम्पूर्ण-श्रेणी-आच्छादन छोड़ि आ अपनाकेँ केवल प्रमाणसभमे सीमित कए गङ्गेश परम्पराकेँ एकटा नीक लक्ष्य आ एकर अनुरूप नव नाम देलक। हुनकर समय सँ पहिनेक सभ न्याय साहित्य प्राचीन-न्याय (पुरान तर्क) कहलाइत अछि; हुनकर रचना सँ आगाक सभ नव्य-न्याय (नव तर्क)। ई काल-विभाजन, यद्यपि सरल अछि, एकरा गुणात्मक परिवर्तनक सच्चाई पकड़ैत अछि: शब्दावलीमे, पद्धतिमे, विश्लेषणात्मक सटीकताक स्तरमे, आ पुरान सभ टीका-टिप्पणीकेँ हटा कए तत्त्व-चिन्तामणिकेँ विद्यालयक एकमात्र केन्द्रीय ग्रन्थक रूपमे स्थापित करवामे। जखन गङ्गेश एहि विद्यालयक समेकन करनिहार अछि, तखन ई पद्धतिक वास्तविक संस्थापक जकरा हुनका सिद्ध केलक, ओ छलह ११म् शताब्दीक बहुश्रुत उदयनाचार्य, जकर परिशुद्धि आ कुसुमाञ्जलि प्राचीन न्याय युगकेँ समाप्त करबाक सीमा प्रदान केलक। आधुनिक शैक्षिक सहमति, जाहिमे स्टैनफोर्ड इन्साइक्लोपीडिया ऑफ फिलॉसफी सेहो अछि, गङ्गेशकेँ मिथिला राज्यक एकटा 'महोपाध्याय' (ग्रेट प्रोफेसर) क रूपमे पहिचान करैत अछि। मुख्यधाराक भारतीय दार्शनिक इतिहासलेखनमे गङ्गेश उपाध्यायकेँ नव्य-न्यायक निर्विवाद वास्तुकारक रूपमे श्रद्धा कएल जाइत अछि। हुनकर हिन्दी मोनोग्राफ, 'भारतीय साहित्य के निर्माता: गङ्गेश उपाध्याय' मे, उदयनाथ झा 'आशोक' गङ्गेशक तिथि लगभग १३००–१३५० ई. ठहरबैत छथि। झा एकटा विद्वानक चित्र अंकित करैत छथि जे 'महामहोपाध्याय' क प्रतिष्ठित उपाधि अर्जित केलक — ई उपाधि मिथिलामे केवल ओहि दार्शनिकसभकेँ लेल सुरक्षित छल जे न्याय, मीमांसा आ धर्मशास्त्रमे अद्वितीय निपुणता रखैत छल। एहि प्रकारे, दिनेश चन्द्र भट्टाचार्यक 'हिस्ट्री ऑफ नव्य न्याय इन मिथिला' मिथिलाक बौद्धिक वंशावलीक अनुसरण करैत अछि, जे गौतमक प्राचीन प्रमेय-केन्द्रित (तत्त्वमीमांसात्मक) न्याय सँ गङ्गेशक प्रमाण-केन्द्रित (ज्ञानमीमांसीय) कठोरता धरि विकासक मानचित्र तइर करैत अछि। ई सभ परिष्कृत, रूढ़िवादी विवरणसभकेँ दूषण पंजी (मिथिलामे सामाजिक अपराध या 'दोष' के वंशावली रिकॉर्ड) सँ तुलना करैत एकटा महत्वपूर्ण विसंगति उजागर होइत अछि, जेना विदेह समानांतर इतिहास अनुसन्धानमे विस्तार सँ प्रलेखित अछि। दूषण पंजी गङ्गेश उपाध्यायक बारेमे दुई विस्फोटक जीवनी विवरण उजागर करैत अछि: १. जन्म विसंगति: गङ्गेश अपन मान्य पिताक मृत्युक पाँच वर्ष बाद जन्मल छल। २. अपरम्परागत विवाह: हुनका एकटा चर्मकारिणी (चमड़ा सिझावै वाली जातिक महिला) सँ विवाह केलक। सत्यक इतिहासलेखीय 'सम्मान-हत्या' मुख्यधाराक ग्रन्थ आ दूषण पंजीक बीचक विसंगति आकस्मिक नै अछि; ई एकटा सक्रिय इतिहासलेखीय दमन अछि। प्रो. रामानाथ झा, आधुनिक मैथिली पंजी व्यवस्थाक एक केन्द्रीय व्यक्ति, एहि विशिष्ट दूषण पंजी अभिलेखसभकेँ दबाबै लेल समानांतर इतिहास अभिलेखमे उल्लिखित अछि। किएक कए गङ्गेश मिथिलाकेँ भारतीय तर्कक निर्विवाद राजधानी धरि पहुँचौलक, ओकर 'अवैध' जन्म आ बाह्य-जातीय विवाहक स्वीकारोक्ति युगक ब्राह्मण्य शुद्धता कथाओंकेँ खतरामे डालि देलक। परिणामस्वरूप, रूढ़िवादी इतिहासकार सभ ओहि बातमे संलग्न भेल जे समानांतर इतिहास 'हुनकर विरासतक सम्मान-हत्या' कहैत अछि। उदयनाथ झाक हालिया मोनोग्राफ ई चुप्पीक परम्परा जारी रखैत अछि, पूर्ण रूपसँ गङ्गेशक संस्कृत उपाधि आ दार्शनिक प्रतिष्ठापर ध्यान केन्द्रित करैत आ ओकर हाशियाकृत व्यक्तिगत पृष्ठभूमिक सामाजिक-ऐतिहासिक वास्तविकताकेँ अनदेखा करैत अछि। ई दमनक मान्यता आधुनिक विद्वत्ता लेल महत्वपूर्ण अछि, किएक एकरा गङ्गेशकेँ केवल एकटा अभिजात तर्कशास्त्रीक रूपमे नै, बल्कि एकटा प्रतिभाशाली मस्तिष्कक रूपमे चित्रित करैत अछि जे अपार सामाजिक बहिष्कारकेँ पार कएलक। नव्य-न्यायक संक्रमण: प्रमेय सँ प्रमाणक प्रतिमान बदलाव जेना कार्ल एच. पॉटर 'एन्साइक्लोपीडिया ऑफ इंडियन फिलॉसफीज' (खण्ड ६) मे उल्लेख करैत छथि, शास्त्रीय न्याय षोडश पदार्थसभ सँ निपटैत छल, जाहिमे आन्टोलॉजी, ज्ञानमीमांसा आ वाद-विवाद द्वन्द्वशास्त्र मिलाएल छल। गङ्गेश विशाल तत्त्वमीमांसात्मक ढाँचाकेँ हटा कए केवल प्रमाणपर — ज्ञान प्राप्तिक वैध साधनपर — ध्यान केन्द्रित कए एकटा अभूतपूर्व प्रतिमान बदलावक शुरुआत केलक। तत्त्वचिन्तामणिकेँ पूर्ण रूपसँ ज्ञानमीमांसापर समर्पित कए, गङ्गेश एकटा अति-सटीक तकनीकी भाषा विकसित केलक। हुनका नव तार्किक संचालक (जेना अवच्छेदक) बनौलक ताकि अस्पष्टता सँ बचल जाए, ई विधि जेकरा स्टीफन फिलिप्स आ बेन-अमी शार्फस्टाइन २०म् शताब्दीक पश्चिमी विश्लेषणात्मक दार्शनिक जेना फ्रेगे या रसेलक विश्लेषणात्मक कठोरता सँ बराबरी करैत छथि। प्रत्यक्ष खण्ड तत्त्वचिन्तामणिक पहिल आ आधारभूत पुस्तक प्रत्यक्ष खण्ड अछि। वी.पी. भट्ट आ एस.सी. विद्याभूषणक विस्तृत अनुवाद आ व्याख्या पर निर्भर रहि, ई खण्ड प्रत्यक्ष बोधक तंत्र परिभाषित करैत अछि। मङ्गलवाद आ प्रामाण्यवाद (ज्ञानक वैधता) गङ्गेश मङ्गलवाद (आशीर्वचन) सँ शुरुआत करैत अछि, कार्यक सफल समापन लेल देवता (शिव) केँ आह्वान करबाक आवश्यकताक औचित्य सिद्ध करैत अछि। ओकर बाद ओ अत्यधिक विवादित प्रामाण्यवाद (वैधताक सिद्धान्त) मे प्रवेश करैत अछि। • मीमांसक दृष्टिकोण: प्रभाकर आ कुमारिल स्वतः प्रामाण्य (आन्तरिक वैधता)क तर्क करैत छल — जे ज्ञान उत्पन्न भेला क्षण सँ अपन वैधता आपु स्वयं प्रमाणित करैत अछि। • गङ्गेशक नैयायिक दृष्टिकोण: गङ्गेश परतः प्रामाण्य (बाह्य वैधता)क प्रबलतापूर्वक बचाओ करैत अछि। ओ तर्क करैत अछि जे कोनो बोधक वैधता आपु स्वयं ज्ञान द्वारा अन्तर्निहित रूपसँ ज्ञात नै होइत, बल्कि बादमे सफल व्यावहारिक गतिविधि (संवादिप्रवृत्ति) द्वारा अनुमानित होइत अछि। उदाहरण लेल, पानि देखबाक मात्र तखन वैध ज्ञानक रूपमे प्रमाणित होइत अछि जखन कोनो ओकरा पास जाइत अछि आ सफलतापूर्वक अपन प्यास बुझाबैत अछि। सन्निकर्ष (इन्द्रिय-विषय सम्पर्क) प्रत्यक्ष (प्रत्यक्ष) के इन्द्रियार्थसन्निकर्ष सँ उत्पन्न बोधक रूपमे परिभाषित कएल गेल अछि। गङ्गेश छहि प्रकारक सामान्य सम्पर्कक विवरण देबैत छथि: १. संयोग (संयोग): जेना, आँखि सँ घड़ा देखबा। २. संयुक्त-समवाय (संयुक्त वस्तुमे समवाय): आँखि सँ घड़ाक रंग देखबा। ३. संयुक्त-समवेत-समवाय (संयुक्त वस्तुमे समवेत तत्वक समवाय): आँखि सँ सार्वभौमिक 'रंगत्व' देखबा। ४. समवाय (समवाय): कान सँ शब्द सुनबा। ५. समवेत-समवाय (समवेत तत्वमे समवाय): कान सँ सार्वभौमिक 'शब्दत्व' क अनुभव करबा। ६. विशेष्यनविशेष्यभाव (विशेषण-विशेष्य सम्बन्ध): अभावक प्रत्यक्ष (जेना, फर्शपर घड़ाक अनुपस्थिति देखबा)। सविकल्पक आ निर्विकल्पक • निर्विकल्पक (निर्विकल्पक प्रत्यक्ष): कोनो वस्तुक उसकर विशेषणसभक बिना, अवधारणा-पूर्वक, केवल कच्चा आकलन। ई अकथनीय आ अभाषिक होइत अछि। • सविकल्पक (सविकल्पक प्रत्यक्ष): कोनो वस्तुक उसकर गुणसभक साथ सम्बन्धपूर्वक बोध (जेना, "ई नील घड़ा अछि")। केवल सविकल्पक प्रत्यक्षके भाषामे व्यक्त कएल जा सकैत अछि आ सत्य या असत्यक रूपमे निर्णय कएल जा सकैत अछि। अलौकिक सन्निकर्ष (असाधारण प्रत्यक्ष) गङ्गेश तीन प्रकारक असाधारण प्रत्यक्षक रूपरेखा देबैत छथि, जे न्यायक पश्चिमी अनुभववाद सँ अलग करैत अछि: १. सामान्यलक्षण: एकटा सदस्यके देखि पूरा सार्वभौमिक वर्गक सभ सदस्यसभकेँ प्रत्यक्ष करबा (जेना, धुएँक एकटा उदाहरण देखि सामान्य रूपसँ सब 'धुआँ' के जानबा)। २. ज्ञानलक्षण: स्मृतिपर आधारित एकटा अन्तःसंवेदी प्रत्यक्ष (जेना, चन्दनक लकड़ी देखि ओकरा सुगन्धित होबाक 'प्रत्यक्ष' करबा, बिना सुँघलै)। ३. योगज: योगिक या रहस्यमय प्रत्यक्ष जे गुप्त, भूत या भविष्यक वस्तुसभकेँ देखबा। अनुमान खण्ड अनुमान खण्ड, जेकर व्यापक रूपसँ वी.पी. भट्ट द्वारा अनुवाद कएल गेल अछि आ स्टीफन फिलिप्स द्वारा गहन विश्लेषण कएल गेल अछि, नव्य-न्यायक तार्किक संरचनाक मूल अछि। व्याप्तिक अवधारणा (व्याप्ति) अनुमान व्याप्ति पर निर्भर करैत अछि — हेतु (जेना, धुआँ) आ साध्य (जेना, आगि)क बीच अविनाभाव सम्बन्ध। गङ्गेश पहिनेक तर्कशास्त्रीसभ द्वारा प्रस्तावित व्याप्तिपञ्चक (पाँच अस्थायी परिभाषा)क विश्लेषण करैत अछि आ सभटाकेँ खण्डन करैत अछि किएक एकरा असमानाधिकरण धर्मसभक मामलामे विफलता भेटैत अछि। ओकर बाद ओ अपन सिद्धान्तलक्षण (अन्तिम परिभाषा) स्थापित करैत अछि: व्याप्ति अर्थात् साध्यक अभावक आश्रयमे हेतुक अनुपस्थिति। ईश्वरानुमान (ईश्वरक अनुमान) गङ्गेश अनुमानक माध्यम सँ ईश्वरक अस्तित्व सिद्ध करबाक लेल एकटा खण्ड समर्पित करैत अछि। ओ तर्क करैत अछि जे पृथ्वी, अंकुर आदिकेँ एकटा बुद्धिमान निर्माता होएबाक चाही, किएक एकरा कार्य छथि, जेना घड़ा कुम्हारक कार्य अछि। ई सीधा नास्तिक मीमांसा आ बौद्ध विद्यालयसभक खण्डन करैत अछि। हेत्वाभास (हेत्वाभास) गङ्गेश तार्किक हेत्वाभास (हेत्वाभास — 'जे हेतुक रूपमे प्रतीत होइत अछि मुदा नै अछि') क सूक्ष्म वर्गीकरण करैत अछि। एहिमे सव्यभिचार (अनियमित हेतु), विरुद्ध (विरोधी हेतु), सत्प्रतिपक्ष (समान बलक प्रतिहेतु), असिद्ध (असिद्ध हेतु), आ बाधित (बाधित हेतु) शामिल अछि। उपमान खण्ड जखन बौद्ध आ वैशेषिक उपमानकेँ अनुमानमे सम्मिलित करि देलक, तखन गङ्गेश एकरा एकटा स्वतन्त्र प्रमाणक रूपमे बचाओ करैत अछि। उपमान ओ प्रक्रिया अछि जाहि द्वारा कोनो व्यक्ति अनुभूत समानता द्वारा शब्दक अर्थ सीखैत अछि। उदाहरण लेल, एकटा नगरवासीके कहल जाइत अछि जे गवय (जङ्गली बैल) गाय जकाँ देखाबैत अछि। जखन ओ जंगलमे प्रवेश करैत अछि आ गाय सँ मिलैत जानवर देखैत अछि, तखन निर्देशक स्मृति आ दृश्य समानता मिलि वैध ज्ञान उत्पन्न करैत अछि: "ई जानवर अछि जकरा 'गवय' शब्द कहैत अछि।" शब्द खण्ड अन्तिम पुस्तकमे, गङ्गेश शब्द, अर्थ आ वाक्यसभक विश्लेषण करैत अछि। शब्दकेँ आप्तोपदेश (विश्वसनीय प्रामाणिक व्यक्तिक निर्देश)क रूपमे परिभाषित कएल गेल अछि। ओ वाक्यक सार्थक ज्ञान देबाक लेल चारि आवश्यक शर्तसभक रूपरेखा देबैत छथि: १. आकाङ्क्षा (आकाङ्क्षा): शब्दसभक एक-दोसरकेँ पूरा करबाक वाक्यात्मक आवश्यकता (जेना, "लाओ" सँ "का?"क आकाङ्क्षा)। २. योग्यता (अर्थगत योग्यता): शब्दसभक तार्किक संगतता (जेना, "ओ आगि सँ पौधा सिंचैत अछि" मे योग्यता नै अछि)। ३. सन्निधि (सन्निधि): शब्दसभक समीप कालिक क्रममे उच्चारण। ४. तात्पर्य (तात्पर्य): वक्ताक सन्दर्भ या आशय, विशेष रूपसँ अस्पष्ट शब्दसभ जेना 'सैन्धव' (जकर अर्थ नमक आ घोड़ा दुनू होइत अछि) लेल महत्वपूर्ण। जेना एस.सी. विद्याभूषण बताबैत छथि, गङ्गेश स्पष्ट रूपसँ संकेत (चेष्टा), जनश्रुति, या ऐतिह्यकेँ स्वतन्त्र प्रमाणक रूपमे सम्मिलित करबाक खण्डन करैत अछि, हुनका शब्द या अनुमानमे समाहित करैत अछि। स्टैनफोर्ड इन्साइक्लोपीडिया ऑफ फिलॉसफी (एसईपी) आ बेन-अमी शार्फस्टाइनक 'अ कम्पेरेटिव हिस्ट्री ऑफ वर्ल्ड फिलॉसफी' क अनुसार, नव्य-न्याय विद्यालय विश्व बौद्धिक उपलब्धिक एक शिखर अछि। जखन पश्चिमी दर्शन प्रायः ज्ञानमीमांसा, आन्टोलॉजी आ भाषाविज्ञानक अलग-अलग करैत अछि, तखन गङ्गेश हुनका एकटा एकल, अत्यधिक तकनीकी सटीकताक भाषामे संगलित क देलक। स्टीफन फिलिप्स बल देबैत छथि जे गङ्गेशक सत्य (प्रमा) क परिभाषा — जे एकटा बोध अछि जे वास्तविकता सँ मेल खाबैत अछि, बिना व्यक्तिपरक संदेहक हस्तक्षेपक — नव्य-न्यायकेँ मजबूत ज्ञानमीमांसीय यथार्थवादक शिविरमे मजबूती सँ रखैत अछि। शार्फस्टाइन नोट करैत छथि जे नव्य-न्यायक शैक्षिक गहनता पश्चिमी मध्ययुगीन शैक्षिकतावाद (थॉमस एक्विनास या विलियम ऑफ ओक्कम) सँ अत्यधिक तुलनीय अछि, मुदा एकर भाषाई निरूपणमे गणितीय रूपसँ सटीक अछि। गङ्गेश उपाध्यायक अध्ययन हुनकर विशाल दार्शनिक बुद्धिमत्ता आ हुनकर समयक कठोर सामाजिक-राजनीतिक वास्तविकताक बीच सन्तुलन बना बनाब मँग करैत अछि। उदयनाथ झा 'आशोक' द्वारा रचित रूढ़िवादी मोनोग्राफ आ रामानाथ झाक इतिहासलेखन हुनकर दार्शनिक विरासतकेँ सफलतापूर्वक संरक्षित करैत छथि मुदा दूषण पंजीक दबाकि ऐतिहासिक सत्यनिष्ठाक परीक्षामे विफल होइत छथि। तत्त्वचिन्तामणि एक अद्वितीय तार्किक सटीकताक उत्कृष्ट कृति बनल रहैत अछि, मुदा वास्तविक 'विचार-रत्न' हुनकर लेखकक मानवीय वास्तविकताक समझ छी — एकटा व्यक्ति जे पारम्परिक वैधता सँ बाहर जन्मल, अपन जाति सँ बाहर विवाह केलक, तथापि १४म् शताब्दीक भारतक बौद्धिक दुनियाँ पर विजय प्राप्त केलक। लेखकक वास्तविक नाम छल की? उत्तर ई अछि जे औपचारिक या संस्कारिक नाम गङ्गेश्वर छल, जबकि दैनिक या व्यवहारिक नाम गङ्गेश छल। ई दुई प्रकारक साक्ष्य सँ निश्चित रूपसँ स्थापित अछि। पहिल, गङ्गेश आपु स्वयं तत्त्व-चिन्तामणिक मङ्गलाचरण (आशीर्वचन श्लोक) मे प्रथम पुरुषमे 'गङ्गेश-स्तुते मितेन वचसे श्री-तत्त्व-चिन्तामणिम्' लिखैत छथि — 'गङ्गेश' नामक प्रयोग करैत। दोसर, हुनकर पुत्र आ मुख्य शिष्य वर्धमान, किरणावली-प्रकाशमे, अपन पिता आ गुरुक रूपमे स्पष्ट रूपसँ 'गङ्गेश्वर' के प्रणाम करैत छथि: 'न्यायाम्भोज-पतङ्गाय मीमांसा-पारदृश्वने / गङ्गेश्वराय गुरवे पित्रे श्वभवते नमः।' ई नाम 'गङ्गेश्वर' कुसुमाञ्जलि-प्रकाशमे सेहो प्रकट होइत अछि। एहि प्रकारे दुनू नाम अलग-अलग व्यक्ति नै भऽ एकटे व्यक्तिक औपचारिक आ अनौपचारिक पदनाम अछि। पंजी वंशावली अभिलेख सभ समान जीवनी स्थान आ सम्बन्धसभक सन्दर्भमे दुनू नामसभकेँ उल्लेख करैत अछि, आ 'छादन' गामकेँ पंजी-प्रबन्धमे 'छादनं तत्त्व-चिन्तामणि-कारक महामहोपाध्याय परमगुरुः गङ्गेश्वरः' क रूपमे उद्धृत कएल गेल अछि। वर्धमानक स्पष्ट गवाही, एकरा सँ अधिक, ई कायम राखबा असम्भव करि देबैत अछि जे दुनू नाम अलग-अलग व्यक्तिक अछि: जे व्यक्ति अपन कृति मे 'गङ्गेश-स्तुते' लिखलक, हुनकर पुत्र द्वारा 'गङ्गेश्वर गुरवे पित्रे' क रूपमे प्रणाम कएल गेल, जेना एकर संगे वर्धमान ओही श्लोकमे न्याय आ मीमांसाक समानता बताबैत अछि — ई विशेषता गङ्गेशक अपन आशीर्वचन श्लोकमे सेहो भेटैत अछि। गङ्गेशक जन्मस्थानक प्रश्नमे पर्याप्त विद्वत्तापूर्ण विवाद भेल अछि। विभिन्न विद्वान सभ अलग-अलग गामसभक प्रस्ताव केनए अछि: (१) मङ्गरौनी (या मङ्गलवनी), मधुबनी मण्डलक एकटा गाम; (२) किर्यन (किरियं सेहो), दरभंगा सँ १२ माइल दक्षिण-पूर्वमे एकटा गाम; (३) चकउती; आ (४) चाजं (ऐतिहासिक रूपसँ छादन), अखन मुजफ्फरपुर जिलामे तुर्की रेलवे स्टेशनक नजदीक। पंजी अभिलेख, जकर गवाही एहि प्रश्नसभमे सबसँ आधिकारिक अछि, लगातार गङ्गेशकेँ 'छादनसंभूत' — छादन/चाजं क मूल निवासी — क रूपमे वर्णन करैत अछि। चाजं गाम, तुर्की चौक सँ पश्चिम लगभग तीन किलोमीटर दूर, सबसँ संभावित स्थानक रूपमे, आ चारो तरफ रुपौली, बहिलवारा, आ सुपना जकाँ गामसभ सँ घेरल अछि — एहि मे सँ अन्तिम गाम गङ्गेशक पुत्र सूपन सँ जुड़ल अछि। तिब्बती यात्री धर्मस्वामी, जे करणाट राजा रामसिंहदेवक शासनकाल (१२३४ ई.) मे मिथिला भ्रमण केलक, 'तो-की' नामक स्थानक उल्लेख केलक जतय जैन आ बौद्ध अनुयायी बहुत छल — ई 'तो-की' के अखनक 'तुर्की' सँ पहिचानल जाइत अछि, जाहि नजदीक गङ्गेशक चाजं गाम अछि। अल्पमत दृष्टिकोण, राजेन्द्रनाथ घोष द्वारा प्रस्तुत आ बंगाली स्रोतसभ पर आधारित, ई मानैत अछि जे गङ्गेश बंगाली छल। घोष आपु स्वयं अन्ततः हुनका मिथिलावासी आ मैथिल ब्राह्मण कहैत छथि। पंजी अभिलेख, जेना एम.एम. फणिभूषण तर्कवागीश कहैत छथि, हुनकर जन्मभूमि 'मङ्गौरी' कहैत अछि — मुदा गाम-विशिष्ट पंजी अभिलेख अधिक स्थिरतापूर्वक 'छादन'क तर्फ इशारा करैत अछि। गङ्गेशक गोत्र काश्यपगोत्रीय अछि। हुनकर 'मूल' (पंजी प्रणालीमे पैतृक गाम-सम्बद्धता) 'सिरिसबे-छादन' छल — अर्थात, ओ सिरिसबा मूल, विशेष रूपसँ ओकर छादन शाखा, सँ सम्बन्ध रखैत छल। पंजी अभिलेख हुनका 'सिरिसबे-छादन मूल' काश्यपगोत्रीय क रूपमे पहिचान करैत अछि। हुनकर पिताक नाम गिरीश्वर उपाध्याय छल, जे गङ्गेशक जन्म सँ पाँच वर्ष पहिने देहान्त करि गेलाह। किछु पंजी अभिलेख देखाबैत छथि जे हुनकर आपु स्वयंक औपचारिक नाम गङ्गेश्वर आ बोलचालक नाम गङ्गेश छल। हुनकर दुई पत्नी छल: पहिल सँ हुनका एकटा बेटी आ ज्येष्ठ पुत्र वर्धमान भेल; दोसर सँ पुत्र सूपन आ हर भेल। पंजी साक्ष्य ई सेहो स्थापित करैत अछि जे वर्धमानक बेटीक विवाह शाण्डिल्य-गोत्रीय खण्डवाला-मूल (विश्वनाथ-सुत शिवनाथक वंश) मे भेल, वर्धमानक पुत्र चन्द्रक-बलभद्र-शोभाक विवाह छादन-संभूत परिवारसभ सँ भेल, सूपनक बेटीक विवाह जिजिवाला-मूल शाण्डिल्य-गोत्रीय सँ भेल, आ सूपन स्वयं भाण्डारिसमय मूल मे विवाह केलक। पी. राजेन्द्रनाथ घोष क अनुसार, गङ्गेश अपन पिताकेँ जल्दी खो देलक आ अपन मामाक घर किर्यन गाममे पालल गेल, जतय हुनकर मामा एकटा पाठशाला चलैत छल। बालक गङ्गेश प्रारम्भमे बहुत विद्वत्तापूर्ण योग्यता नै देखौलक आ ओकरा किछु हद धरि एकटा मन्द बुद्धिक छात्र मानल जाइत छल। एकटा पौराणिक कथा जे विभिन्न रूपमे प्रचलित छल, ओ कहैत अछि जे काति गङ्गेशके हुनकर मामाक पत्नी द्वारा चिढ़ाएल गेल — ओकरा 'गौः' (गाय या मूर्ख) कहल गेल। ई घटना 'गोत्व' (गाय-स्वभाव, या कुल-पहिचान) पर एकटा उल्लेखनीय संस्कृत श्लेष-रचनाकेँ प्रेरित केलक, जे गङ्गेश स्वतःस्फूर्त रूपसँ रचलक आ जाहि द्वारा हुनकर मामा एकटा आश्चर्यजनक गुप्त बुद्धिमत्ताक पहिचान केलक, हुनका आलिंगन केलक आ ओकरा सब किछु सिखाबाक प्रतिज्ञा केलक। चाहे ई कथा शाब्दिक रूपसँ सत्य हो या नै, ई एकटा वास्तविक दार्शनिक बिन्दुकेँ सांकेतिक रूपमे व्यक्त करैत अछि: 'गोत्व' पर श्लोक आपु स्वयं सार्वभौमिक (सामान्य) क प्रश्न पर एकटा छोट अभ्यास अछि जे नव्य-न्याय तर्कक हृदयमे अछि। गङ्गेशक प्रारम्भिक लोककथा गोत्व के बारेमे एकटा श्लेषपूर्ण दार्शनिक तर्क केन्द्रित होएनाइ अत्यधिक उपयुक्त अछि। एन.एस. रामानुजताताचार्यक ग्रन्थमे उल्लेख अछि जे गङ्गेशक पहिल पत्नी सँ एकटा पुत्र आ दोसर सँ दुई पुत्र (सूपन आ हर) छल; ज्येष्ठ पुत्र वर्धमान छल। तीनु भाई — वर्धमान, सूपन, आ हर — के पुरुष-वंशज नै छल। मुदा दूषण पंजीकेँ कहबाक लेल आर किछु अछि। ई रचना सँ एकटा दार्शनिक क्रान्तिक शुरुआत भेल जकर प्रभाव मिथिला, बंगाल, नवद्वीप, मद्रास, महाराष्ट्र, काश्मीर आ अन्ततः सम्पूर्ण भारतमे अनुभव कएल गेल, जे पिछला पाँच सय वर्षक संस्कृत विद्वत्ताकेँ एकरा बिना अकल्पनीय बना देलक। मिथिला सम्बन्ध केवल जीवनी संबन्धी नै अछि। गङ्गेशक मातृभूमि नव्य-न्याय विद्वत्ताक बौद्धिक केन्द्र बनल रहल अछि, आ ओही बौद्धिक धरोहर अखनो जर्नल 'विदेह' (विदेह वेब-अभिलेख, आईएसएसएन २२२९-५४७X) मे जीवित अछि, जे आरम्भ सँ (लगभग २०००) मैथिली भाषा, साहित्य आ संस्कृतिक लेल एकटा डिजिटल अभिलेखक रूपमे सेवा करैत अछि — ओहि सभ्यतागत भूमि जतय गङ्गेश खड़ा छल। विदेह अभिलेख मिथिलाक इतिहास, हुनकर दार्शनिक, आ हुनकर साहित्यिक परम्परा सँ जुड़ल रचनासभक डिजिटल संस्करण बनाए रखैत अछि, जाहिमे विद्यापति-पूर्व कविता आ पंजी अभिलेख शामिल अछि। गङ्गेश, एहि प्रकारे, केवल दर्शनक इतिहास सँ नै, बल्कि जीवित सांस्कृतिक स्मृतिक सेहो अछि जे मैथिल विद्वान सभ आजो पुनः प्राप्त करैत आ प्रसारित करैत अछि। नवद्वीपक विश्वविद्यालय, जे १५०३ ई. मे स्थापित भेल, मुख्य रूपसँ महान टीकाकार रघुनाथ शिरोमणिक कारण तत्त्व-चिन्तामणिक बंगालमे लोकप्रियता के मुख्य माध्यम बनल। बंगाल सँ ई रचना मद्रास, महाराष्ट्र, आ काश्मीर धरि फैलल, आ दुई शताब्दीक भीतर ई उपमहाद्वीपमे जानल गेल। सतीश चन्द्र विद्याभूषण अपन परिचयमे नोट करैत छथि जे "आधुनिक भारतमे संस्कृत विद्वत्ता के कोनो मूल्य नै मानल जाइत अछि जब तक ई तत्त्व-चिन्तामणि या कम सँ कम एकर कोनो भागक ज्ञान सँ साथ नै होइत।" गङ्गेश, जे गङ्गेश्वर सेहो कहलाइत छथि आ उपाध्याय उपनामसँ विभूषित, कमला नदीक तट पर, दरभंगा सँ बारह माइल दक्षिण-पूर्व, करिओन गाममे बारहम् शताब्दीक अन्तिम चतुर्थांशमे (सतीश चन्द्र विद्याभूषण द्वारा निश्चित रूपसँ लगभग १२०० ई. निर्धारित; स्टैनफोर्ड इन्साइक्लोपीडिया ऑफ फिलॉसफी द्वारा बादक वंशावली आ पाण्डुलिपि साक्ष्यक आधार पर चौदहम् शताब्दीक पहिल भागमे संशोधित) जन्मल छल। हुनकर पिताक नाम नवद्वीप परम्परा सँ जुड़ल अछि; बादक अभिलेखीय साक्ष्य हुनकर वंशजसभकेँ दरभंगा क्षेत्रमे रखैत अछि। धनुखा अभिलेख, जे जनकपुरक नजदीक एकटा कुँआ सँ जुड़ल पाथरक पट्ट पर भेटल अछि, गङ्गेशक शिष्यसभक सात पीढ़ी धरि भगीरथ ठक्कुर (जीवनकाल लगभग १५५६ ई.) धरि के वंशक अनुरेखण करैत अछि, जे पीछेक तरफ गङ्गेश स्वयंकेँ बारहम् शताब्दीक अन्त या चौदहम् शताब्दीक आरम्भमे रखैत अछि। पूर्व-आधुनिक कालमे मिथिलाक बौद्धिक प्रतिष्ठा एकर शैक्षिक संरक्षण प्रणाली पर टिकल छल, जे पण्डितसभकेँ (विद्वान विद्वान) अनेक विषयसभमे समर्थन करैत छल। ई क्षेत्रक ब्राह्मण परिवार न्याय, मीमांसा, वेदान्त, व्याकरण, ज्योतिष आ कानूनमे पीढ़ी-दर-पीढ़ी विशेषज्ञ बनाए रखैत छल। गङ्गेश एहि परम्पराक भीतर काज केलक आ हुनकर समकालीनसभ द्वारा जगद्गुरु (विद्याभूषणक शब्दमे 'डिस्टिंग्विश्ड प्रोफेसर', जे विश्व-शिक्षकक समकक्ष अछि) क रूपमे मान्यता देल गेल। हुनकर निपुणता केवल न्यायमे सीमित नै छल: ओ, स्टैनफोर्ड इन्साइक्लोपीडिया ऑफ फिलॉसफीक विवरणक अनुसार, मीमांसा, वैदिक व्याख्याशास्त्रक विद्यालय, के एकटा महान उस्ताद सेहो छल, आ पाणिनिक व्याकरण परम्परा आ महाकाव्य साहित्य सँ सेहो पूर्ण रूपसँ परिचित छल, तत्त्व-चिन्तामणि मे कतेक स्थान पर भगवद्गीताक उद्धरण देबैत छल। मिथिलाक भूमि, जे वर्तमान बिहार आ दक्षिणी नेपालक गंगा-मैदानमे फैलल अछि, वी.पी. भट्ट अपन अनुवादक प्रस्तावना (२०१२) मे उपलब्धिक परिमाण बताबैत छथि: 'भारतीय दर्शनक छहि प्रणालीसभमे सँ एक, न्याय शास्त्र, ने भारतमे दर्शन, तर्क आ ज्ञानमीमांसाक विकास आ विश्लेषणमे महत्वपूर्ण भूमिका निभौलक... हालाँकि, नव्य-न्यायक आगमन न्याय दर्शनक दृष्टिकोणमे एकटा क्रान्तिकारी परिवर्तन लेलक। ई सभ न्याय आ वैशेषिक अवधारणा सभकेँ व्यवस्थित केलक आ चारि शीर्षक सभक तहत लेलक, अर्थात् १) प्रत्यक्ष, २) अनुमान, ३) उपमान आ ४) शब्द... टी.सी. मे विभिन्न सिद्धान्तसभक प्रस्तुतिकरणमे प्रयुक्त पद्धति ने भारतमे तेरहम् शताब्दी ई. सँ अठारहम् शताब्दी ई. धरि पाँच सय वर्षक अवधिमे दार्शनिक लेखन पर गहन प्रभाव डाललक; आ लगभग सभ शास्त्रकार टी.सी. क पद्धतिक प्रस्तुतिकरण अपनायलक।' ओ आगा कहैत छथि: 'दर्शन, तर्क आ ज्ञानमीमांसाक सन्दर्भमे ग्रन्थ (टी.सी.) के महत्व पर पर्याप्त बल देबा अतिशयोक्ति नै होइत।' बेन-अमी शार्फस्टाइनक 'अ कम्पेरेटिव हिस्ट्री ऑफ वर्ल्ड फिलॉसफी' मे, गङ्गेशकेँ डेसकार्टेस आ लाइबनिजक साथ-साथ तीन दार्शनिकसभमे सँ एकक रूपमे रखल गेल अछि जकर साझा विषय पद्धतिगत रूपसँ प्रयुक्त तर्कक माध्यम सँ निश्चितताक खोज अछि। शार्फस्टाइनक लेल, तीनु दार्शनिक सभ एकटा मौलिक अभिविन्यास साझा करैत छथि: ओ तर्कशास्त्री अछि एहि अर्थमे जे ओ दुनियाँ के समझबाक चाहैत छथि तर्क पद्धतिकेँ अलग करि आ सिद्ध करि, नै कि एकर विषय-वस्तु के। 'गङ्गेश अपन काज के करैत अछि, आगमन क सबसँ भरोसेमंद साधन, नियमितता सुनिश्चित करबाक लेल एकटा मौजूदा तार्किक तकनीककेँ सिद्ध करबाक लेल।' हुनकर रचना, शार्फस्टाइन कहैत छथि, हुनका 'द ज्वैलर' क उपाधि देलक — जे एकटा विचार-रत्न बनौलक — आ एकर लगभग तीन सौ पृष्ठ 'अनुमानित रूपसँ दस लाख पृष्ठक टीका-टिप्पणी के लेल उत्तरदायी छल।' पॉटर-भट्टाचार्य 'एन्साइक्लोपीडिया ऑफ इंडियन फिलॉसफीज' (१९९३) सरल रूपसँ कहैत अछि: 'गङ्गेशक एकटा अद्वितीय प्रतिभा छल, जे हुनका विश्वक उत्कृष्ट दार्शनिक मस्तिष्कसभमे सुरक्षित रूपसँ रखैत अछि।' न्याय विद्यालय अपन शास्त्रीय स्थापना गौतमक न्याय-सूत्र (लगभग १०० ई.) आ वात्स्यायनक एकर प्रारम्भिक प्रमुख टीका (लगभग ४०० ई.) सँ पता लगाबैत अछि। ई विद्यालय बाह्य जगतक प्रति गहन यथार्थवाद आ प्रमाणसभक (ज्ञानक वैध स्रोत) व्यवस्थित विवरण सँ विशेषता रखैत अछि: प्रत्यक्ष (प्रत्यक्ष), अनुमान (अनुमान), उपमान (सादृश्य), आ शब्द (शाब्दिक प्रमाण)। लगभग एक सहस्राब्दी धरि, उद्द्योतकर (लगभग ६०० ई.), वाचस्पति मिश्र (लगभग ९५० ई.), आ उदयन (लगभग १००० ई.) सहित टीकाकारसभ प्रणालीक विस्तार केलक, उदयन सबसँ महत्वपूर्ण रूपसँ एकरा वैशेषिक श्रेणी-आन्टोलॉजी सँ मिला देलक। गङ्गेश स्पष्ट रूपसँ स्वयंकेँ उदयनक अनुयायीक रूपमे स्थापित केलक आ सात वैशेषिक श्रेणी — द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय, आ अभाव — केँ अपन ज्ञानमीमांसीय परियोजनाक तत्त्वमीमांसात्मक ढाँचाक रूपमे शामिल केलक। गङ्गेश द्वारा शुरू कएल 'पुरान' न्याय (प्राचीन-न्याय) आ 'नव' न्याय (नव्य-न्याय)क बीच अन्तर, जेना स्टैनफोर्ड इन्साइक्लोपीडिया ऑफ फिलॉसफी सावधान करैत अछि, एकटा साफ-सुथरा विच्छेद नै अछि। लगभग दुई-हजार वर्षक इतिहासमे, विकास निरन्तर छल। तथापि, तत्त्व-चिन्तामणि ने एकटा गुणात्मक परिवर्तन प्राप्त केलक: ई सूत्र-टीकाक परम्पराकेँ हटा देलक, असाधारण सटीकताक एकटा नव विश्लेषणात्मक शब्दावली खड़ा केलक, आ प्रत्येक बादक नैयायिक के हुनका सँ निपटबाक लेल बाध्य क देलक। गङ्गेशक पूर्ववर्ती मणिकण्ठ मिश्र मे अधिकांश तकनीकी उपकरण मौजूद छल, आ बौद्ध तर्कशास्त्री धर्मकीर्ति (लगभग ६०० ई.) हेत्वाभास पर गङ्गेशक कतेक चर्चाक पूर्वानुमान केनए छल, मुदा हुनकर सँ पहिने कोनो परम्पराकेँ इतना व्यापक रूपसँ संश्लेषित आ विस्तारित नै केनए छल। पूर्ण शीर्षक तत्त्व-चिन्तामणिक अर्थ 'सत्यक विचार-रत्न' (तत्त्व = सत्य/वास्तविकता; चिन्तामणि = चिन्ताक एकटा मनोकामना पूरक रत्न, रूपक रूपसँ विचारक रत्न) अछि। एकरा प्रमाण-चिन्तामणि सेहो कहल जाइत अछि, 'ज्ञानक विचार-रत्न'। शीर्षक एक साथ ज्ञानमीमांसीय आ आकांक्षापूर्ण अछि: ई वैध ज्ञानक समझक इच्छा पूरा करबाक रत्न होबाक दावा करैत अछि। गङ्गेश कार्यक शुरुआत शिवकेँ आशीर्वचन सँ करैत अछि, जे न्यायक मङ्गल-वाद (आशीर्वादक आह्वान) क अभ्यास सँ मेल खाबैत अछि, आ तुरन्त प्रश्नमे कूद जाइत अछि जे प्रमा (वैध ज्ञान) का अछि। पुस्तक १ — प्रत्यक्ष-खण्ड (प्रत्यक्ष): चारि पुस्तकसभमे सबसँ लम्बा आ दार्शनिक रूपसँ सबसँ समृद्ध, ई सामान्य ज्ञान सिद्धान्त, वैध आ अवैध बोधक प्रकृति, प्रत्यक्ष प्रक्रियाक एकटा विस्तृत घटनाविज्ञान जाहिमे सामान्य (लौकिक) आ अतीन्द्रिय (अलौकिक) रूप शामिल अछि, समवायक सिद्धान्त, अभावक समस्या, आ मनक परमाणु प्रकृति स्थापित करैत अछि। ई निर्विकल्पक आ सविकल्पक प्रत्यक्ष, आ अनुव्यवसाय (आत्म-चेतना) के सिद्धान्त पर चर्चाक साथ समाप्त होइत अछि। पुस्तक २ — अनुमान-खण्ड (अनुमान): तकनीकी रूपसँ सबसँ कठिन आ प्रभावशाली खण्ड, ई अनुमानात्मक ज्ञानक शर्तसभ, सर्वोपरि महत्वपूर्ण अवधारणा व्याप्ति (अविनाभाव सम्बन्ध या 'व्याप्ति'), उपाधि (सशर्त मध्य पद) क सिद्धान्त, हेत्वाभासक वर्गीकरण, आ न्याय (सिलोजिज्म) केँ अपन-लेल (स्वार्थानुमान) आ पर-लेल (परार्थानुमान) दुनू रूपमे काम करैत अछि। एहिमे आत्मक अस्तित्वक प्रमाण, एकटा ईश्वरवादी तर्क (ईश्वरानुमान), आ मुक्तिक संभावनाक प्रमाण सेहो शामिल अछि। पुस्तक ३ — उपमान-खण्ड (तुलना): चारि पुस्तकसभमे सबसँ छोट, ई तर्क करैत अछि जे सादृश्य एकटा वास्तविक रूपसँ भिन्न प्रमाण गठित करैत अछि जे अनुभूत समानता द्वारा शब्द-अर्थक ज्ञान देबैत अछि। मानक उदाहरण — एकटा यात्री 'गवय' (एक प्रकारक भैंस) शब्द 'गाय जकाँ' क विवरण सँ सीखैत अछि आ जङ्गलमे जानवरक पहिचान करैत अछि — दर्शाबैत अछि जे सादृश्य ज्ञान प्रत्यक्ष आ अनुमान दुनू मे अपरिवर्तनीय अछि। पुस्तक ४ — शब्द-खण्ड (शाब्दिक प्रमाण): भाषा पर एकटा प्रमाणक रूपमे विस्तृत विश्लेषण, जाहिमे वैध भाषणक परिभाषा, सार्थक उच्चारणक शर्त (आकाङ्क्षा/अपेक्षा, योग्यता/शब्दार्थ योग्यता, आसत्ति/समीपता, तात्पर्य/आशय), शक्ति (सामर्थ्य) आ लक्षणा (गौण अर्थ) क प्रकृति, समस्त शब्दक श्रेणी, क्रियात्मक प्रत्यय, धातु आ उपसर्ग, शब्दक सिद्धान्त, आ वैदिक विधि (आज्ञा) क विस्तृत प्रश्न शामिल अछि। एहि अध्यायमे, स्टैनफोर्ड इन्साइक्लोपीडिया ऑफ फिलॉसफी क अनुसार, सम्पूर्ण तत्त्व-चिन्तामणि मे सबसँ लम्बा एकल खण्ड अछि, जे लक्षणा (गौण अर्थ) के लेल समर्पित अछि। ज्ञानमीमांसा आ तर्क सत्य आ त्रुटि: गङ्गेशक वैध ज्ञानक सिद्धान्त सत्यक परिभाषा (प्रामाण्यवाद) पॉटर इन्साइक्लोपीडिया (पृ. ५३-५४) प्रत्यक्ष-खण्डक प्रामाण्यवाद खण्डमे निर्धारित गङ्गेशक सत्यक सिद्धान्तक एकटा सटीक तकनीकी सूत्रीकरण प्रदान करैत अछि। गङ्गेश सत्य (प्रामाण्य) केँ परिभाषित करैत अछि: '(क) या तऽ एकटा बोध होएबाक चाही जकर मुख्य विशेष्य, १०, ओहि चीजमे अछि जे १० के धारण करैत अछि, या (ख) एकटा बोध होएबाक चाही जे १० के सम्बन्ध ओहि चीज सँ अछि जे १० के धारण करैत अछि।' ई कहैत अछि जे एकटा प्रमाण (वैध बोध) एकटा बोध अछि (क) जकर विधेय पद अपन कर्ता पद सँ सम्बन्धित अछि, या (ख) जे सही रूपसँ एकटा गुण १० केँ एकटा सत्ताकेँ बताबैत अछि जे वास्तवमे १० के धारण करैत अछि। इन्साइक्लोपीडिया नोट करैत अछि जे 'गङ्गेश, अपन विश्लेषणक पक्षमे, तर्क करैत अछि जे केवल तखन (क) या (ख) संतुष्ट होइत अछि, तखन व्यक्ति प्रश्नगत बोध पर आधारित कार्य करैत अछि। एकर अतिरिक्त, ओ तर्क करैत अछि, ई सत्यक सबसँ किफायती विवरण अछि।' महत्वपूर्ण रूपसँ, गङ्गेश ई सत्यक एकटा 'सामान्य मंच' विश्लेषणक रूपमे प्रस्तुत करैत अछि — ई सूत्रीकरण सभ विद्यालयसभकेँ लेल स्वीकार्य अछि चाहे ओ सत्य स्वतः-प्रामाण्य या परतः-प्रामाण्य अछि पर ओकर दृष्टिकोण जेना सेहो हो। शार्फस्टाइनक तुलनात्मक दृष्टिकोण एहि ज्ञानमीमांसीय रुखक महत्व पर प्रकाश डालैत अछि: 'गङ्गेश न्यायक वास्तविक, बाह्य दुनियाँमे विश्वास, वास्तविक, अभौतिक आत्मामे विश्वास, आ प्रत्यक्ष आ अनुमान, प्रत्येक एक-दोसरक सहायता करैत, निश्चितता धरि पहुँचबाक विशेष क्षमतामे प्रतिबद्ध अछि।' मीमांसकक आत्म-प्रमाणीकरण थीसिस (जे मानैत छल जे प्रत्येक बोध उत्पन्न भेला पर आपु स्वयं प्रमाणित होइत अछि) क विपरीत, गङ्गेश कायम रखैत अछि जे प्रमाणीकरणकेँ दोसर-स्तरीय अनुमानात्मक कार्यक आवश्यकता होइत अछि। जेना ओ संशयवादीक विरुद्ध तर्क करैत अछि: 'अनुमान पर आपन तर्क अनुमान पर निर्भर अछि। जखन अहाँ कहैत छी जे अनुमान ज्ञानक कोनो साधन नै अछि, त अहाँक अर्थ ई अछि जे ई कहनाए की अनुमान एहि प्रकारक साधन अछि, संदिग्ध या असत्य अछि। मुदा ई कि संदिग्ध या असत्य अछि, प्रत्यक्ष द्वारा ज्ञात नै होए सकैत अछि।' प्रतिबन्धक-प्रतिबद्ध सम्बन्ध आ ज्ञानमीमांसीय तर्क पॉटर इन्साइक्लोपीडिया बोधक सिद्धान्त पर नव्य-न्यायक सिद्धान्तक एकटा प्रमुख विशेषता पर प्रकाश डालैत अछि जे औचित्यक सिद्धान्तक लेल दार्शनिक रूपसँ महत्वपूर्ण अछि: प्रतिबन्धक-प्रतिबद्ध सम्बन्ध (प्रतिबन्धक-प्रतिबद्ध सम्बन्ध)। ई केवल एकटा मनोवैज्ञानिक नियम नै अछि जे दुई चीज पर एक साथ ध्यान देबाक असम्भवताक बारेमे अछि; ई एकटा ज्ञानमीमांसीय तर्कक नियम अछि जे बोधक वस्तुसभ द्वारा निर्धारित होइत अछि। जखन प क बोध एकटा सचेतन कृत्यक रूपमे बना रहैत अछि, ई पक अभाव क बोधक उत्पत्तिक रोकैत अछि, केवल मनोवैज्ञानिक प्रतिस्पर्धा सँ नै, बल्कि तार्किक आवश्यकता सँ: 'एकटा कृत्यक उपस्थिति दोसर कृत्यक उत्पत्तिक रोकैत अछि, ताकि ओ कभी सह-उपस्थित नै होए सकैत, एक पलक लेल सेहो नै।' ई सम्बन्ध संदेहक सिद्धान्त आ तर्क (परिकल्पनात्मक तर्क) द्वारा संदेहक समाधान लेल महत्वपूर्ण अछि। इन्साइक्लोपीडिया बताबैत अछि जे ई सिद्धान्त काति आगमन (आगमन) क समस्या — विशेष रूपसँ व्याप्ति पर संदेह काति समाधान होइत अछि — के समाधान करैत अछि: 'न्याय सिद्धान्त ई अछि जे निर्णायक कारक एतय विचारकमे संदेहक उपस्थिति या अनुपस्थिति अछि... जे कोनो व्यक्तिकेँ ई संदेह होइत अछि जे हेतु (हेतु) एकटा सव्यभिचारी होए सकैत अछि, ओ तब धरि हेतु आ साध्य क बीच व्याप्ति नै जानि सकत, जब धरि हुनका ओ संदेह रहैत अछि। एतय प्रश्न अछि: का ई नियम एकटा मनोवैज्ञानिक नियम अछि? न्याय दुई प्रकारक अवरोधक बीच अन्तर करैत अछि... ओ एकटा बोधक अवस्थाक दोसर बोधक अवस्था द्वारा ओकर वस्तुसभक कारण सँ अवरोधक एक अलग प्रकारमे रुचि रखैत अछि। जे चीज कोनो व्यक्तिकेँ एकटा विशिष्ट व्याप्ति जानबा सँ रोकैत अछि, ओ हुनकर मानसिक संरचना नै अछि, बल्कि ई तथ्य अछि जे हुनका एकटा विशिष्ट संदेह अछि।' ई ज्ञानमीमांसीय तर्क अछि, मनोविज्ञान नै। प्रत्यक्षक सिद्धान्त प्रत्यक्ष आ आत्म गङ्गेशक प्रत्यक्षक विवरण मन आ आत्मक एकटा समृद्ध तत्वमीमांसामे अन्तर्निहित अछि। शार्फस्टाइनक व्याख्या प्रकाश डालैत अछि: 'न्याय सिद्धान्तमे मन एकटा अचेतन आन्तरिक इन्द्रिय या कारण अछि जे बाह्य इन्द्रियसभ सँ आवैवाली क्रमिक संवेदनासभकेँ सचेतन आत्माक धरि पहुँचाबैत अछि... मन एक समयमे केवल एकटा इन्द्रिय सँ जुड़ सकैत अछि। ई सीमा केँ मनक आकार अत्यन्त न्यूनतम, एकटा परमाणुक आकार होएबाक सूचित करैत अछि... ई आत्मा अछि जे स्मृतिक लेल जिम्मेदार अछि... यदि कोनो स्थायी, मध्यस्थ आत्मा नै होएत, तऽ अतीतमे नील क प्रत्यक्ष बादमे ओही नील क स्मृतिक लेल काति जिम्मेदार होएत? यदि आत्मा आ ओ स्मृति जे ओ संरक्षित करैत अछि नै होएत, तऽ कोनो काति ई व्याख्या करि सकत कि एक बात जे मैं अपन बायाँ आँखि सँ देखल छल, बादमे मोर दहिना आँखि सँ पहिचानल जाइत अछि?' आत्मा शरीर, इन्द्रियसभ, या मनमे अपरिवर्तनीय नै अछि — ई चेतनाक अद्वितीय आधार आ स्मृति, पहिचान, आ अन्तःसंवेदी संश्लेषणक स्थान अछि। निर्विकल्पक आ सविकल्पक प्रत्यक्ष गङ्गेशक निर्विकल्पक (अनिश्चित) आ सविकल्पक (निश्चित) प्रत्यक्षक बीच अन्तर हुनकर सबसँ दार्शनिक रूपसँ महत्वपूर्ण योगदानसभमे सँ एक अछि। शार्फस्टाइन अनिश्चित चरणकेँ अवधारणा-रहित जागरूकताक रूपमे वर्णन करैत अछि — जे नाम, सार्वभौमिक आदि सँ जुड़ल नै होइत, जे कोनो चीज के योग्य रूपमे नै समझैत अछि आ जे कोनो विशेषण सँ पूर्ण रूपसँ रहित अछि। एकर बाद जे आबैत अछि, ओ संरचित, सम्बन्धात्मक, योग्य — अवधारणा-युक्त जागरूकता होइत अछि। हम जे अनुभव करैत छी, ओकरा पूर्ण रूपसँ तखन जानैत छी जखन हम एकरा सार्वभौमिक क विशिष्ट सँ बनल जटिलता क रूपमे जागरूक होइत छी, आ कहि सकैत छी — विजयी स्वरमे — घड़ा, या ई घड़ा अछि। निर्विकल्पक प्रत्यक्षक अस्तित्व मानबाक दार्शनिक आवश्यकता दुनू स्रोतसभमे स्पष्ट रूपसँ बताएल गेल अछि। पॉटर इन्साइक्लोपीडियामे गङ्गेशक अपन उदाहरणक उपचार सँ: यदि कोनो सार्वभौमिक या सामान्य गुणसभकेँ (जेना पश्चिमी दर्शनमे) उदाहरण धारण करबाक रूपमे सोचैत अछि, बजाय विशेषसभमे निहित होएबाक, तऽ कोनो एकटा भारतीय दृष्टिकोणक अनुवाद करैत अछि जे न त प्लेटोनिक अछि न त अरस्तूवादी। एकटा विशेषण (विशेषण) सम्बन्धित अछि विशेष्य (विशेष्य या धर्मी) सँ। जखन कोनो घड़ाक प्रत्यक्ष करैत अछि, तऽ सार्वभौमिक घटत्व (विशेषण, विशेषण) विशेषण अछि; व्यक्तिगत घड़ा विशेष्य अछि। निर्विकल्पक प्रत्यक्ष एहि विशेष्य आ विशेषणकेँ कियो सम्बन्धात्मक विधान सँ पहिने अलग-अलग रूपमे पंजीकृत करैत अछि; ई व्याख्या करैत अछि जे काति हम एक प्रकारक चीजक सामना पहिल बेर करि सकैत छी आ फरो सेहो ओकरा सही रूपसँ वर्गीकृत करि सकैत छी। अनुव्यवसाय (अनुव्यवसाय) अनुव्यवसायक सिद्धान्त — प्रत्यक्ष जे पूर्ववर्ती बोधकेँ अपन वस्तुक रूपमे लैत अछि — गङ्गेशक प्रमाणीकरणक विवरणक लेल दार्शनिक रूपसँ महत्वपूर्ण अछि। शार्फस्टाइन 'सरल जागरूकता' केँ 'आत्म-चिंतनशील जागरूकता या पश्चात्-बोध, शब्दसभमे व्यक्त जेना मैं एहि बात सँ जागरूक छी' क रूपमे वर्णन करैत अछि। पॉटर इन्साइक्लोपीडिया आत्मनिरीक्षणात्मक संरचना निर्दिष्ट करैत अछि: 'एकटा बोध एकटा संस्कार उत्पन्न करि सकैत अछि; वास्तवमे, कोनो संस्कार केवल कोनो कृत्यक कारण सँ ही उत्पन्न होए सकैत अछि... आत्मनिरीक्षणात्मक कृत्य केवल एकटा छलाँग पीछा अछि जे कृत्य जे एकर सामग्री अछि। जाग्रत अवस्थामे दुई बोधक बीच कोनो अनुभूत अन्तराल नै होइत अछि। जखन पूर्ववर्ती बोध अपन दोसर चरणमे (अवधिक) होइत अछि, तखन उत्तरवर्ती बोध उत्पन्न होइत अछि आ पूर्ववर्ती के बदलि देइत अछि।' गङ्गेश तर्क करैत अछि जे अनुव्यवसाय विस्तारित बोधक आशयात्मक संरचनाक सम्बन्धमे अचूक अछि — यद्यपि एकर सत्यताक सम्बन्धमे नै। भ्रम: अन्यथाख्यातिवाद 'अन्यथाख्यातिवाद' — सिद्धान्त जे भ्रम एकटा चीजक 'एकरा सँ भिन्न' रूपमे जागरूकतामे समाविष्ट अछि — प्रत्यक्ष-खण्डक सबसँ लम्बा खण्डसभमे सँ एक अछि। शार्फस्टाइनक विवरण: 'जखन सेहो कोनो रस्सी के साँप समझल जाइत अछि, तखन किछु सच्चा ज्ञान अछि, जमीन पर पड़ल वस्तुक 'ईपन' क ज्ञान। प्रत्यक्ष बोधक झूठा भाग वस्तुत: जे देखल जाइत अछि, ओकर एक अलग प्रकारक वस्तु सँ आंशिक या पूर्ण पहिचान पर निर्भर करैत अछि... साक्ष्य जे साबित करैत अछि जे मोर प्रत्यक्ष बोध समग्र रूपमे सही या गलत अछि, ओ बोध सँ अनुसरण करैवाली कार्यसभक सफलता या विफलता अछि: केवल साँप, रस्सी नै, वास्तवमे डंसैत अछि।' गङ्गेश उदयनक अनुसरण करैत अछि जे प्रारम्भिक बोध (जे गलत नै होए सकैत) आ बादक, संरचित बोध (जाहिमे गलती संभव अछि) क बीच अन्तर करैत अछि। भ्रामक बोधक सामग्री सदा पूर्ववर्ती वास्तविक बोधसभ सँ अनुरेखणीय होइत अछि — शुक्ति भ्रममे रजतत्व पूर्ववर्ती वास्तविक रजतक प्रत्यक्ष सँ आबैत अछि। ई गङ्गेशक त्रुटिक विवरणकेँ मजबूती सँ यथार्थवादी बनाबैत अछि। अनुमानक सिद्धान्त: व्याप्ति समस्या आ एकर समाधान व्याप्ति (व्याप्ति): दार्शनिक दाँव गङ्गेशक सबसँ बड़ तकनीकी उपलब्धि व्याप्ति (अविनाभाव सम्बन्ध, 'व्याप्ति') क एकर निर्णायक विवरण अछि। दार्शनिक दाँव विशाल अछि: व्याप्ति ओ सम्बन्ध अछि जे सभ अनुमानक आधार अछि, आ एकर एकटा पर्याप्त परिभाषा वास्तविक अनुमान आ छद्म-अनुमानक बीच अन्तर करबाक लेल आवश्यक अछि। शार्फस्टाइन मौलिक धारणा समझाबैत छथि: 'गङ्गेशक लेल, व्याप्ति अर्थात् हेतु या कारणक स्वभाव सँ उत्पन्न बिना शर्त सम्बन्ध, जेना धूम्रता (धुआँपन) क अग्निता (आगिपन) सँ अविनाभाव सम्बन्ध, जे ई मामलामे आगिक प्रकृति आ आगिक उत्पादक धुआँक प्रकृति सँ व्याख्या कएल जा सकैत अछि। ज्ञान केँ बिना शर्त कहबाक अर्थ ई सेहो अछि जे हम कोनो ऐसन चीज नै जानैत छी जे सम्बन्ध केँ आकस्मिक दर्शाबैत अछि।' अपन अन्तिम परिभाषा पर पहुँचबा सँ पहिने, गङ्गेश कतेक पूर्व प्रयाससभ पर विचार करैत अछि आ हुनका अस्वीकार करैत अछि। शार्फस्टाइन नोट करैत छथि जे ओ 'इक्कीस प्रस्ताव' खारिज करैत अछि (झा 'आशोक' मोनोग्राफ चौबीस कहैत अछि, उप-प्रकारक गिनती करि)। पॉटर इन्साइक्लोपीडिया सबसँ तकनीकी रूपसँ सटीक विवरण प्रदान करैत अछि। पहिल परिभाषा प्रस्तुत — 'अव्यभिचार' — विफल होइत अछि किएक 'ई उन मामलासभमे लागू नै होइत अछि जतय साध्य (साध्य) अलोकस-व्यापी अछि।' बादक परिभाषा प्रत्येक विशिष्ट प्रतिउदाहरणसभ पर ठोकर खाबैत अछि, विशेष रूपसँ 'वृक्षमे बन्दर' के मामला जतय आरोपित गुण अलोकस-व्यापी अछि। अन्तिम, निर्णायक परिभाषा अछि: 'व्याप्ति अर्थात् गुण १० (हेतु) क गुण ख (साध्य) क सह-अस्तित्व, जे ओहि निरपेक्ष अभावक प्रतियोगिताक अवच्छेदक सँ योग्य नै अछि जे १० क साथ सामानाधिकरण्य रखैत अछि आ अपन प्रतियोगी सँ सामानाधिकरण्य नै रखैत अछि।' शार्फस्टाइन गोकूपक सरलीकृत संस्करण प्रस्तुत करैत अछि: 'क द्वारा ख क व्याप्ति अछि यदि, आ केवल यदि, क क ख सँ सामानाधिकरण्य एहि प्रकारे अछि जे ख उन चीजसभमे सँ कोनो नै अछि जे वर्गक रूपमे क के कोनो स्थान सँ पूर्ण रूपसँ अनुपस्थित अछि।' व्याप्ति पर संदेहक समाधान: तर्क पॉटर इन्साइक्लोपीडिया व्याप्ति पर संदेहक समाधान करबामे तर्क (परिकल्पनात्मक / अप्रमाणिक तर्क) काति कार्य करैत अछि, एकर सबसँ पूर्ण उपचार प्रदान करैत अछि। न्याय सिद्धान्त अछि जे व्याप्ति पर संदेह व्याप्तिक बोधक अवरोधकक रूपमे कार्य करैत अछि। तर्क आपु स्वयं व्याप्ति-ज्ञान नै देबैत अछि; ई ओ संदेह केँ दूर करैत अछि जे ओ बोधक रोकि रहल छल। धुआँ-आगि उदाहरण पर एकटा तर्क तर्कक औपचारिक संरचना ई प्रकार चलैत अछि: 'यदि धुआँ आगि सँ विचलित होएत तऽ ओ आगि सँ उत्पन्न नै होएत। मुदा धुआँ आगि सँ उत्पन्न अछि। एहि कारण, धुआँ आगि सँ विचलित नै होए सकैत।' संदेहक समाधान एहि प्रकारे नव आगमनात्मक साक्ष्य जोड़ि नै, बल्कि ई दर्शाबैत अछि जे संदेह बनाए रखबा सँ एकटा निष्कर्ष निकलैत अछि जे दुनू पक्ष असत्य मानैत अछि। ई कारण अछि जे गङ्गेश उदयनक व्यावहारिक तर्क सँ संशयवादीक विरुद्ध सहमत अछि: 'ओ यदि धुआँ उत्पन्न करबाक चाहैत अछि तऽ आगि सदा जराबैत अछि... संशयवादीक अपन क्रिया संदेह केँ निरर्थक करि देबैत अछि।' इन्साइक्लोपीडिया पश्चिमी आगमन (आगमन) दर्शन सँ एकटा महत्वपूर्ण अन्तर खिचैत अछि: 'न्याय सिद्धान्त अछि जे किछु मामलामे केवल एकटा अवलोकन पर्याप्त अछि, जबकि दोसर मामलामे असंख्य अवलोकन सेहो पर्याप्त नै होइत अछि, व्याप्तिक ज्ञान उत्पन्न करबाक लेल। निर्णायक कारक एतय विचारकमे संदेहक उपस्थिति या अनुपस्थिति अछि... यद्यपि संदेह अछि या नै, ई पूर्ण रूपसँ व्यक्तिपरक मामला अछि, तथापि न्याय सिद्धान्त मनोवैज्ञानिक नै अछि। न्याय एकटा सार्वभौमिक नियम कहैत अछि: जे कोनो व्यक्तिकेँ ई संदेह होइत अछि जे हेतु (हेतु) एकटा सव्यभिचारी होए सकैत अछि, ओ तब धरि हेतु आ साध्य क बीच व्याप्ति नै जानि सकत, जब धरि हुनका ओ संदेह रहैत अछि।' आगा, नव्य-न्याय आगमन (आगमन) केँ कार्य-कारण या प्रकृतिक एकरूपताक नियमक आह्वान द्वारा औचित्य सिद्ध करबाक पश्चिमी प्रवृत्ति सँ अलग अछि: 'न्याय क अनुसार ई जानबाक पर्याप्त अछि जे दुई चीज सदा सह-उपस्थित अछि; हमें एहि तथ्यक कोनो कारण देबाक प्रयास करबाक आवश्यकता नै अछि।' उपाधि (अतिरिक्त शर्त) आ हेत्वाभास उपाधि (सशर्त मध्य पद, अतिरिक्त शर्त) क अवधारणा गङ्गेशक छद्म-अनुमानसभक पहिचान करबाक आ रोकबाक उपकरण अछि। एकटा उपाधि उपाधि-गुण एगो गुण अछि जे साध्य साध्य क व्याप्त करैत अछि (सभ साध्य, उपाधि-गुण अछि) मुदा हेतु हेतु केँ व्याप्त नै करैत अछि (किछु हेतु, उपाधि-गुण नै अछि)। जखन एहि प्रकारक उपाधि-गुण अस्तित्वमे अछि, तखन हेतु द्वारा साध्य क आभासी व्याप्ति टूटि जाइत अछि: हेतु-उदाहरण अछि जे साध्य नै अछि, किएक उपाधि-गुण ओ हेतु-उदाहरणसभ सँ अनुपस्थित अछि। शास्त्रीय नव्य-न्याय उदाहरण: आभासी अनुमान 'धुआँ-उत्पादक चीज आगि-उत्पादक अछि, किएक एकरा उत्पाद अछि' उपाधि 'गीला-ईंधन-होएबाक' द्वारा अवरुद्ध अछि — गीला ईंधन धुआँ-उत्पादक अछि मुदा आगि-उत्पादक नै अछि। अनुमान-खण्डमे उपाधि पर खण्ड (उपाधिवाद) कतेक उप-प्रकरणसभ धरि फैलल अछि आ सम्पूर्ण तत्त्व-चिन्तामणिमे सबसँ तकनीकी रूपसँ कठिन खण्डसभमे सँ एक अछि। पाँच हेत्वाभास (हेत्वाभास) हेत्वाभासप्रकरण अनुमान-खण्डक अन्तिम प्रमुख खण्ड अछि। पाँच छद्म-हेतुसभक अन्तर कएल गेल अछि: (१) सव्यभिचार (अनियमित/चंचल — हेतु सपक्ष आ विपक्ष दुनू मे पाबैत अछि); (२) विरुद्ध (विरोधी — हेतु इच्छित निष्कर्षक विपरीत साबित करैत अछि); (३) सत्प्रतिपक्ष (समान-बलक प्रतिहेतु द्वारा सन्तुलित); (४) असिद्ध (अस्थापित — हेतुक उपस्थिति, प्रकृति, या व्याप्ति संदिग्ध अछि); (५) बाधित (पहिने सँ पराजित — निष्कर्ष पहिने सँ ज्ञात बातक विरोधाभास करैत अछि)। एहि हेत्वाभाससभक नव्य-न्याय उपचार, विशेष रूपसँ सव्यभिचारक साधारण (सामान्य/सार्वभौमिक) आ असाधारण (असामान्य/विशिष्ट) मे विभाजन आ अनैकान्तिकक एकटा उपश्रेणीक रूपमे जोड़बा, न्याय-सूत्रक मूल पाँच सँ बहुत आगा बढ़ि जाइत अछि। तीन दार्शनिक अनुमान तकनीकी तर्क सँ परे, गङ्गेश तीन विवादास्पद दार्शनिक अनुमान आगा बढ़ाबैत अछि। आत्मक प्रमाण (आत्मन्) केवल-व्यतिरेकी (केवल-व्यतिरेकी) अनुमानक रूप लैत अछि: 'प्रत्येक जीवित शरीरमे आत्मा अछि, किएक प्रत्येक जीवित शरीरमे प्राण अछि, घड़ा जकाँ नै।' हुनकर ईश्वरवादी अनुमान तर्क करैत अछि जे पृथ्वी आ अन्य कार्यसभक एकटा सचेतन कर्ता हुनकर नैमित्तिक कारणक रूपमे अछि, किएक एकरा कार्य अछि, घड़ा जकाँ, परमाणु जकाँ नै। मुक्तिक संभावनाक अनुमान (मुक्ति-साधक-अनुमान) दीपकक बुझबाक सादृश्यक उपयोग करैत अछि जे तर्क करबाक लेल जे दुःख, एकटा निरन्तर कार्य-गुण होएबाक कारण, सैद्धान्तिक रूपमे पूर्ण रूपसँ समाप्त कएल जा सकैत अछि। ई तीनु नव्य-न्याय अनुमानात्मक तंत्र — केवलान्वयी आ केवल-व्यतिरेकी अनुमान, उपाधि, आ तर्कक अपन विशिष्ट उपचार सहित — केँ प्रदर्शित करबाक लेल उतनाए काम करैत अछि जतना ओ अपन तात्विक निष्कर्ष स्थापित करबाक लेल। उपमान (सादृश्य) आ शब्द (शाब्दिक प्रमाण)क सिद्धान्त गङ्गेशक लेल, उपमान (सादृश्य/तुलना) सख्त रूपसँ ओ प्रमाण अछि जाहि द्वारा कोनो व्यक्ति अनुभूत समानता द्वारा शब्द आ एकर वस्तुक बीच सम्बन्ध सीखैत अछि। मानक उदाहरण: एकटा यात्रीके कहल जाइत अछि जे गवय (एकटा विशाल गोजातीय) गाय जकाँ देखाबैत अछि; जङ्गलमे जानवर सँ सामना भेला पर, यात्री ज्ञान बनाबैत अछि 'ई, जे गाय जकाँ अछि, ओहि चीज अछि जकरा 'गवय' शब्द कहैत अछि।' एहि प्रमाणक परिणाम (उपमिति) शब्द-वस्तु सम्बन्ध (साद्यसाधनसम्बन्ध) क ज्ञान अछि। गङ्गेश उपमानकेँ प्रत्यक्ष आ अनुमान दुनू मे अपरिवर्तनीय बताबैत अछि — प्रमुख कदम ई अछि जे वनवासीक कथन 'गवय गाय जकाँ अछि' एकटा विवरण सँ अधिक कार्य करैत अछि (जे केवल एकटा तथ्यक प्रत्यक्ष या शाब्दिक ज्ञान दे सकत अछि) मुदा एकटा अर्थ-वाहक उच्चारणक रूपमे जे श्रोताक वस्तु सँ सीधा सामना द्वारा शब्द-अर्थ-सम्बन्धक नव ज्ञान उत्पन्न करैत अछि। शब्द: प्रमाणक अपरिवर्तनीयता शब्द-खण्ड शाब्दिक प्रमाणक एकटा चौथा, अपरिवर्तनीय प्रमाणक रूपमे बचाओ करैत अछि। न्यूनीकरणवादी कदमक विरुद्ध — शब्द वास्तवमे वक्ताक विश्वसनीयता सँ अनुमान अछि — गङ्गेश तर्क करैत अछि जे अनुमानात्मक शृंखला आपु स्वयं शाब्दिक ज्ञान पूर्वकल्पित करैत अछि: अहाँ 'ई वक्ता प कहैत अछि' क आधार सेहो नै बना सकैत छी जब तक अहाँ कथन नै समझैत छी, जे पहिने सँ एकटा शाब्दिक कार्य अछि। प्रमाणक अद्वितीय भाषाई तंत्र — आकाङ्क्षा (वाक्यात्मक अपेक्षा), योग्यता (शब्दार्थ योग्यता), आसत्ति (समयिक समीपता), आ तात्पर्य (वक्ताक आशय) — कोनो अनुमानात्मक प्रक्रिया सँ अलग अछि। तात्पर्यवाद खण्ड गङ्गेशक नवाचार प्रस्तुत करैत अछि: लक्षणा (गौण अर्थ) क ट्रिगर सामान्य धारणा जकाँ योग्यता (शब्दार्थ योग्यता) क उल्लंघन नै अछि, बल्कि समग्र वाक्यात्मक सम्बन्ध (अन्वय) क उल्लंघन अछि। प्रसिद्ध उदाहरण — 'गंगायां घोषः' (गंगा पर बस्ती) — लक्षणाक आवश्यकता ई नै अछि किएक 'गंगा' आ 'बस्ती' शब्दार्थ रूपसँ असंगत अछि, बल्कि किएक समग्र निर्माण नदीक जलक प्राथमिक संदर्भ सँ सुसंगत नै करल जा सकैत अछि। वर्धमान उपाध्याय: तत्काल उत्तराधिकारी वर्धमान गङ्गेशक ज्येष्ठ पुत्र छल अपन पहिल पत्नी सँ, आ तत्त्व-चिन्तामणिक प्राथमिक प्रसारक छल। ओ आपु स्वयं सेहो पर्याप्त प्रतिष्ठाक एकटा दार्शनिक छल। हुनकर रचनासभमे शामिल अछि: कुसुमाञ्जलि-प्रकाश, किरणावली-प्रकाश, तात्पर्य-परिशुद्धि (न्यायनिबन्ध-प्रकाश कहल जाइत अछि), आत्मतत्त्वविवेक-प्रकाश, श्रीवल्लभाचार्यक न्यायलीलावती-प्रकाश, खण्डनखण्डखाद्य-प्रकाश, आ केशवमिश्रक तर्कभाषा-प्रकाश। एकटा अलग, स्वतन्त्र रूपसँ आरोपित रचना न्यायसूत्रवृत्ति 'अन्वीक्षण्ययतत्त्वबोध' अछि। वर्धमान, अपन पिता सँ भिन्न, जानबूझि अपन टीकासभ 'जेना हमर पिता कहैत छथि' (अस्मत्पुत्रुच्चरणास्तु) क ध्वज तहत लिखलक, उदयन आ श्रीवल्लभक रचनासभ सँ तत्त्व-चिन्तामणिक सिद्धान्तसभक लेन्स सँ जुड़ल। ओ अपन समयक लगभग प्रत्येक प्रमुख दार्शनिक रचना पर प्रकाश टीका लिखलक। देवानन्दपंजी हुनका 'उपयकारक' कहैत अछि — जे चीजसभकेँ उपयोगमे लाबैवाला। डॉ. किशोरनाथ झा क उद्धरण: यद्यपि वर्धमान तत्त्व-चिन्तामणि पर सीधा टीका नै लिखलक (संभवतः किएक हुनकर पिता जीवित छल जखन रचना प्रसारित भ रहल छल आ ओ एकरा समयपूर्व मानलक), 'हुनकर शैली सभ टीकामे तत्त्व-चिन्तामणिक उद्धृत करबाक अछि जेना प्रासंगिक सन्दर्भ, जतय तत्त्व-चिन्तामणिक सिद्धान्त सदा परिलक्षित होइत अछि।' टीका परम्परा (व्याख्या-परम्परा) तत्त्व-चिन्तामणि पर टीका परम्परा संस्कृत परम्परामे सबसँ विस्तृत विद्वत्तापूर्ण संचयनसभमे सँ एक अछि। पक्षधर-रघुनाथ-नवद्वीप अक्ष तत्त्व-चिन्तामणिक लोकप्रियताक निर्णायक क्षण पक्षधर उपाध्याय (जे जयदेव मिश्र सेहो कहल जाइत अछि, १५म् शताब्दी) द्वारा 'आलोक' क रचना छल। वासुदेव सार्वभौम, महान नवद्वीप विद्वान, प्रारम्भमे पक्षधर मिश्र (हुनकर मामा हरिमिश्रक छात्र) सँ पढ़बाक आएल छल; मुदा पक्षधर हुनका फेर जाएबाक कहलक, हुनका पहिने हरिमिश्रक अधीन पढ़बाक निर्देश देत, जाहि पर वासुदेव वापस गेल आ बादमे अपन छात्र रघुनाथ शिरोमणिकेँ मिथिला पढ़बाक भेजलक। जखन रघुनाथ पक्षधरक संग तत्त्व-चिन्तामणि पढ़बाक आएल, तखन कहानी अछि जे पक्षधर हुनका पुछलक जे इन्द्र के छल (सामान्यलक्षण प्रत्यक्ष पर एकटा चाल प्रश्न — का कोनो 'इन्द्रत्व' क सार्वभौमिक द्वारा एक साथ सभ इन्द्रसभक प्रत्यक्ष करि सकैत अछि)। रघुनाथक उत्तर, दुई-आँखि आ तीन-आँखि प्राणीसभक प्रकारक बीच अन्तर करैत, पक्षधरके एतना प्रभावित केलक जे ओ हुनका पहिने सँ 'शिरोमणि' (तर्कशास्त्रीसभक शिरोमणि) घोषित क देलक। पूरा आदान-प्रदान नव्य-न्यायक चकाचौंध द्वन्द्वशास्त्रीय संस्कृतिक उदाहरण अछि। रघुनाथ शिरोमणिक दीधिति नव्य-न्याय परम्पराक सबसँ महत्वपूर्ण द्वितीयक ग्रन्थ अछि, जे सभ अन्य टीकाक प्रभावमे ग्रहण करि देलक। नवद्वीपमे आधारित, रघुनाथ गङ्गेशक अन्तर्दृष्टिकेँ एकटा व्यवस्थित ढाँचामे विकसित केलक जे वर्तमान धरि बिना रुकावट अध्ययन कएल गेल अछि। दीधिति पर आपु स्वयं टीकासभ आकर्षित केलक उपमहाद्वीप भरिक विद्वानसभ सँ: रामकृष्णभट्टाचार्य (लीलावती), रघुनाथ विद्यालंकार (दीधितिप्रतिबिम्ब), कृष्णदास सार्वभौम (प्रसारिणी), मथुरानाथ तर्कवागीश (रहस्य), जगदीश तर्कालंकार (जागदीशी), गदाधर भट्टाचार्य (गादाधर), आ रुद्र-न्यायवाचस्पति (सारंग्रह), अनेक दोसरसभक बीच। मैथिल परम्परा मिथिलामे आपु स्वयं, टीका परम्परा वर्धमानक तत्त्व-चिन्तामणि सँ अपन प्रकाश टीकासभक माध्यम सँ अन्तर्निहित जुड़ाव सँ शुरू भेल, पक्षधरक आलोक (जे नवद्वीप परम्पराक प्रज्वलित केलक) सँ जारी रहल, आ पक्षधरक छात्र नरहरि उपाध्यायक 'दूषणोद्धार', पक्षधरक पुत्र माधव मिश्रक 'दीपिका', आ अनेक मैथिल प्रकरण ग्रन्थसभ द्वारा विस्तारित भेल। आलोकपरम्परा (पक्षधरक वंश, जे यज्ञपति द्वारा अनुसरण कएल गेल) आ दूषणोद्धार-परम्परा (नरहरिक वंश) क बीच आन्तरिक विद्वत्तापूर्ण विवाद — उपाधि-सिद्ध आ सव्यभिचार प्रकरणसभ पर व्याख्यात्मक मतभेद सँ अलग — देखाबैत अछि जे काति दुनू विद्यालय सभ शताब्दीसभ धरि नव्य-न्यायक आन्तरिक विकासक संचालन केलक। ज्ञात टीकाकार: एक चयन २३ ज्ञात टीकाकारसभमे सँ, पहिने उल्लिखितसभ सँ परे, सबसँ महत्वपूर्ण अछि: पटनाभ मिश्र (प्रकाश), गोकुलनाथोपाध्याय (रश्मिचक्र/चक्ररश्मि), गोपीनाथ ठाकुर (मणिसार), वासुदेव मिश्र (न्यायसिद्धान्तसार/दीप्ति), माधव मिश्र पक्षधरसुत (दीपिका), माधव मिश्र खांतरसुत (माधवी), हीरादास न्यायालंकार (अनुमान-खण्ड पर प्रकाश), कणाद तर्कवागीश (टीका), भवानन्द सिद्धान्तवागीश (भवानन्दी), रामानुज दीक्षित (दर्पण), श्रीकण्ठ दीक्षित (टीका), हनुमद-भट्ट (वाक्यार्थ-दीपिका), चन्द्र-नारायण भट्ट (अनुगम), राजचूडामणि मखिन (दर्पण), आ धर्मराजवीरेन्द्र (तर्कचूडामणि)। गङ्गेश आ मिथिलाक सभ्यतागत धरोहर: विदेह परिप्रेक्ष्य विदेह पत्रिका (विदेह वेब-अभिलेख, आईएसएसएन २२२९-५४७X), पहिल मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका जे लगभग २००० ई. सँ निरन्तर संचालित अछि, मिथिलाक जीवित सांस्कृतिक धरोहरक प्रमुख डिजिटल अभिलेख अछि। एकर पुस्तकालय (विदेह पोथी अभिलेख) सैकड़ों पाठकेँ पीडीएफ प्रारूपमे उपलब्ध कराबैत अछि — बौद्धगानपद (हरप्रसाद शास्त्री संस्करण १९०७ मे संरक्षित प्रारम्भिक बंगाली-मैथिली सिद्ध रचना), विद्यापति संग्रह, आधुनिक मैथिली कथा, कविता, नाटक, समालोचना, महिला साहित्य, दलित साहित्य, लोक विद्वत्ता, आ भाषाई अनुसन्धान धरि। पंजी अभिलेख — ग्यारह हजार सँ अधिक ताड़पत्र अभिलेख जे प्रीति ठाकुर द्वारा २२ खण्डमे संकलित, स्क्यान, आ सूचीबद्ध कएल गेल अछि — विदेह अभिलेखक माध्यम सँ उपलब्ध अछि आ मैथिल ब्राह्मण विद्वत्तापूर्ण समुदायक सामाजिक इतिहासक लेल एकल सबसँ महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत अछि, जाहि समुदायमे गङ्गेश रहल। पंजी प्रणालीक वंशावली अभिलेख गङ्गेशक नाम, गोत्र, मूल, परिवार सम्बन्ध, आ गाम 'छादन' हुनकर पैतृक घरक रूपमे अंकित केलक। पंजी परम्पराक बिना — जे विदेह अभिलेख सक्रिय रूपसँ अङ्कीकृत आ संरक्षित करैत अछि — गङ्गेशक जीवनी के बारेमे जतना हम जानैत छी, ओकर बहुत किछु खोइ जाएत। आशीश अंचिन्हारक 'मैथिली वेब पत्रकारिताक इतिहास' आ प्रीति कारण सेतु बान्हल ('रेडिफाइनिंग मैथिली'), दुनू विदेह अभिलेखक माध्यम सँ उपलब्ध, समानांतर साहित्य आन्दोलनक प्रलेखीकरण करैत अछि जे मैथिली लोक, दलित, आ महिला साहित्यिक आवाजसभकेँ संस्कृत दार्शनिक कैनन सँगे पुनः प्राप्त आ उत्सव मनाबैत अछि। गङ्गेशक असाधारण रूपसँ अमूर्त आ तकनीकी उपलब्धि मैथिली सभ्यतागत अभिव्यक्तिक पूर्ण स्पेक्ट्रमक एक छोर पर अछि; बौद्धगानपदक लोकगीत, गोनू झाक हास्य कथा, सल्हेस महाकाव्य परम्परा, आ अंचिन्हारक 'अंचिन्हार आखर' द्वारा समर्थित आधुनिक मैथिली गजल परम्परा दोसर छोर पर अछि। विदेह परियोजनाक ई सभटाकेँ एक साथ राखबाक आग्रह — महामहोपाध्याय आ लोक-कवि, तत्त्व-चिन्तामणि आ चर्या-पद — एकर सबसँ महत्वपूर्ण सांस्कृतिक-राजनीतिक वक्तव्य अछि। गङ्गेश सम्पूर्ण मिथिलाक अछि, केवल एकर संस्कृत अभिजात वर्गक नै। राधाकृष्ण चौधरीक 'मिथिलाक इतिहास', जयकान्त मिश्रक 'अ हिस्ट्री ऑफ मैथिली लिटरेचर, वॉल्यूम १', आ उपेन्द्र ठाकुरक 'हिस्ट्री ऑफ मिथिला' — सभ विदेह अभिलेखक माध्यम सँ उपलब्ध — गङ्गेशक लेल व्यापक ऐतिहासिक आ साहित्यिक सन्दर्भ प्रदान करैत अछि। ओ हुनका एकटा सभ्यतामे अन्तर्निहित देखाबैत छथि जे एक साथ सर्वोच्च तकनीकी दर्शन आ सबसँ घनिष्ठ लोक अभिव्यक्ति, सबसँ कठोर तर्क आ सबसँ कोमल भक्ति कविता केँ मूल्यवान मानैत छल। ओही मिथिला जे तत्त्व-चिन्तामणि उत्पादन केलक, विद्यापतिक पद सेहो उत्पादन केलक — आ ई ओहि सम्पूर्ण सभ्यतागत धरोहरक निरन्तर अस्तित्व अछि, जे अखन विदेहक माध्यम सँ डिजिटल रूपसँ संरक्षित कएल जाइत अछि, जे गङ्गेशक रचनाकेँ एकर सबसँ पूर्ण अर्थ देबैत अछि। निष्कर्ष: स्थायी उपलब्धि गङ्गेश उपाध्यायक तत्त्व-चिन्तामणि, कोनो सेहो मापदण्ड सँ, ढाई हजार वर्षक भारतीय दर्शनक इतिहासमे दस या पन्द्रह सबसँ परिणामकारी रचनासभमे सँ एक अछि। ई प्रत्येक पूर्ववर्ती न्याय ग्रन्थकेँ अध्ययन आ टीकाक केन्द्रीय वस्तुक रूपमे विस्थापित क देलक; ई भारतक तार्किक परम्पराकेँ एकर सबसँ सटीक विश्लेषणात्मक शब्दावली प्रदान केलक; ई न्यायक प्रभावकेँ व्याकरण, न्यायशास्त्र, चिकित्सा, आ सौन्दर्यशास्त्र सहित संस्कृत विद्याक प्रत्येक शाखामे विस्तारित केलक; आ ई नव्य-न्याय विद्यालयक रचना केलक जकर टीकाकार आ उप-टीकाकार सभ दुनियाँ के कोनो सेहो परम्परामे निरन्तर व्यवस्थित दार्शनिक लेखनक सबसँ विशाल निकायसभमे सँ एक अछि। मिथिलामे जन्मल, पण्डित गिरीश्वरक पुत्र, संस्कारिक नाम गङ्गेश्वर आ दैनिक नाम गङ्गेश धारण करबैवाला, न्याय, मीमांसा, आ धर्मशास्त्रमे निपुणता लेल ही आरक्षित परम्परा द्वारा महामहोपाध्यायक उपाधि सँ सम्मानित, हरिसिंहदेव (करणाट राजासभमे सबसँ सांस्कृतिक रूपसँ प्रतिभाशाली) क शासनकालमे सक्रिय, आ संभवतः चादना/चाजं गाममे रहल जे अखन मुजफ्फरपुर जिलामे तुर्की स्टेशनक नजदीक अछि — ई जीवनी रूपरेखा अछि जे पंजी अभिलेख, तत्त्व-चिन्तामणिक आन्तरिक साक्ष्य, आ दिनांकित समकालीनसभक बाह्य साक्ष्यक संयुक्त गवाही सँ उभरैत अछि। जीवनी-साक्ष्यक विस्तृत टिप्पणी लेखकक वास्तविक नाम लेखकक वास्तविक नाम की छल? उत्तर अछि जे औपचारिक वा कर्मकांडी नाम गङ्गेश्वर छल, जखनकि दैनिक वा व्यावहारिक नाम गङ्गेश। ई दू प्रकारक साक्ष्यद्वारा निर्णायक रूपेँ स्थापित अछि। प्रथमतः, गङ्गेश स्वयं तत्त्वचिन्तामणिक मङ्गलाचरण (आह्वान श्लोक) मे प्रथम पुरुषमे 'गङ्गेश-स्तुते मितेन वचसे श्री-तत्त्वचिन्तामणिम्' लिखैत छथि — 'गङ्गेश' नामक उपयोग करैत। द्वितीयतः, हुनकर पुत्र आ प्राथमिक शिष्य वर्धमान, किरणावली-प्रकाश मे, अपन पिता आ गुरुक रूपमे स्पष्टतः 'गङ्गेश्वर' क नमन करैत छथि: 'न्यायाम्भोज-पतंगाय मीमांसा-पारदृश्वने / गङ्गेश्वराय गुरवे पित्रे भवते नमः।' एही नाम 'गङ्गेश्वर' कुसुमाञ्जलि-प्रकाश मे भी आउत छैक। पञ्जी वंशावली अभिलेख दुनू नामसभकेँ समान जीवनी-स्थलसभ आ संबंधसभसँ जोड़ैत छथि, आ एही स्थान 'चादन' ग्रामकेँ पञ्जी-प्रबंधमे 'चादनं तत्त्वचिन्तामणि-कारक महामहोपाध्याय परमगुरुः गङ्गेश्वरः' क रूपमे उद्धृत कएल गेल अछि। जन्मस्थान गङ्गेशक जन्मस्थान प्रश्न बहुत शैक्षणिक विवाद उत्पन्न केने अछि। विभिन्न विद्वानसभ विभिन्न ग्रामसभक प्रस्ताव केलनि: (१) मंगरौनी (वा मंगलवानी), मधुबनी मंडलक एक ग्राम; (२) किर्यन (किरियं सेहो), दरभंगासँ १२ मील दक्षिण-पूर्वमे; (३) चकौटी; आ (४) छाजं (ऐतिहासिक छादन), अखन मुजफ्फरपुर जिलामे तुर्की रेलवे स्टेशनक निकट। पञ्जी अभिलेख, एहि प्रश्नसभ लेल जिनकर साक्ष्य सर्वाधिक प्रामाणिक अछि, निरंतर गङ्गेशकेँ 'छादन-संभूत' — छादन/छाजंक मूल निवासी — वर्णित करैत छथि। तिब्बती यात्री धर्मस्वामी, जे कर्णाट राजा रामसिंहदेवक शासनकाल (१२३४ ई.) मे मिथिला आएल छलाह, 'तो-कि' नामक एक स्थानिता उल्लेख केलनि जाहिक निकट जैन आ बौद्ध अनुयायी प्रचुर संख्यामे छल — ई 'तो-कि' वर्तमान 'तुर्की' सँ अभिन्न मानल जाइत अछि, जाहिक निकट गङ्गेशक छाजं ग्राम अवस्थित अछि। गोत्र आ परिवार गङ्गेशक गोत्र काश्यपगोत्रीय अछि। पञ्जी प्रणालीमे हुनकर 'मूल' (पूर्वज-ग्राम-संबंध) 'सिरिसबे-छादन' छल — अर्थात् ओ सिरिसब मूलक, विशेषतः हुनकर छादन शाखासँ संबंधित छलाह। पञ्जी अभिलेख हुनका 'सिरिसबे-छादन मूल' काश्यपगोत्रीय क रूपमे अभिलेखित करैत अछि। हुनकर पिताक नाम गीरीश्वर उपाध्याय छल, जिनकर मृत्यु गङ्गेशक जन्मसँ पाँच वर्ष पूर्व भेल छल। किछु पञ्जी अभिलेखमे देखल जाइत अछि जे हुनकर औपचारिक नाम गङ्गेश्वर आ प्रचलित नाम गङ्गेश छल। हुनकर दू पत्नी छलनि: प्रथमासँ एक कन्या आ ज्येष्ठ पुत्र वर्धमान; द्वितीयासँ पुत्र सूपन आ हर। पञ्जी साक्ष्य ई भी स्थापित करैत अछि जे वर्धमानक कन्याक विवाह शाण्डिल्य-गोत्रीय खंडवाला-मूल (विश्वनाथ-सुत शिवनाथक वंशमे), वर्धमानक पुत्र चंद्रक-बलभद्र-शोभाक विवाह छादन-संभूत परिवारसभसँ, सूपनक कन्याक विवाह जिजिवाल-मूल शाण्डिल्य-गोत्रीयमे, आ सूपनक स्वयं विवाह भंडारीसमय मूलमे भेल। भाग २ · ज्ञानमीमांसाक विस्तृत परीक्षण ज्ञानमीमांसीय आवश्यकतासभ, ओहि संयम, वैध ज्ञानक प्रकृति आ शर्तसभक अलावा कोनो चीज पर चर्चा करबाक ओ इनकार, ओहि चीज छल जे तत्त्व-चिन्तामणिकेँ एकर विश्व-परिवर्तनकारी शक्ति देलक। नव्य-न्याय विद्यालय जे शुरू केलक / भारतीय दार्शनिक परम्पराकेँ विचारक सटीकता आ तर्कक कठोरतामे प्रशिक्षित केलक, जे 'बुद्धि आ प्रतिभाक कसौटी, सोनाक कसौटी' क रूपमे कार्य करैत अछि। गङ्गेश मिथिलाक, भारतक, आ विश्वक दार्शनिक धरोहरक अछि। विदेह पत्रिकाक मिथिलाक बौद्धिक आ साहित्यिक धरोहरक चालू डिजिटल संरक्षण — पंजी अभिलेख सँ जे गङ्गेशक गाम, गोत्र, आ परिवार तक अंकित करैत अछि, समकालीन मैथिली रचनात्मक लेखन धरि जे ओ सभ्यताक निरन्तरता रखैत अछि जे हुनका परिभाषित करबामे सहायक छल — वास्तविक अर्थमे, ओ परम्पराक जीवित संस्थागत उत्तराधिकारी अछि जे हुनका मूर्त रूप देनए छल। ई विद्यापति सँ दलित महिला कविता धरि ग्रन्थसभक अभिलेख करैत अछि, ओ ओही सभ्यतागत प्रतिबद्धता केँ आगा ले जाबैत अछि जे कठोर विचार आ अभिव्यक्तिपूर्ण स्वतंत्रता केँ उत्पादन केनए छल, जे सात शताब्दी पहिने, विश्व दर्शनक उत्कृष्ट कृतिसभमे सँ एक उत्पादन केनए छल। ज्ञानमीमांसीय योगदान वैध ज्ञानक प्रकृति (प्रमा) गङ्गेशक ज्ञानमीमांसा प्रमाक परिभाषा सँ शुरुआत करैत अछि: वैध ज्ञान अर्थात् चीजक जेना अछि, वैसा ज्ञान — विशेष रूपसँ, एकटा सार्वभौमिक प्रकृतिक वास्तविक रूपसँ अपन कर्ता विषयमे निवास करबाक ज्ञान। चाँदीक एक टुकड़ा के चाँदी जानबा वैध ज्ञान अछि किएक "चाँदीपन" वास्तविक रूपसँ ओहि व्यक्तिगत चाँदीमे अपन विषयक रूपमे निवास करैत अछि। एहि विपरीत, शुक्ति (सीप) के चाँदी समझबा अप्रमा (अवैध ज्ञान या अन्यथा-ख्याति, "चीजक एकरा सँ भिन्न ज्ञान") अछि, किएक चाँदीपन शुक्तिमे निवास नै करैत अछि। गङ्गेश ओहि दृष्टिकोण केँ आगा बढ़ाबैत अछि जे समकालीन पश्चिमी दर्शन विश्वसनीयतावादी (रिलायबिलिस्ट), वास्तवमे अपूरणीय-बाह्यवादी (इनफैलिबिलिस्ट-एक्सटर्नलिस्ट) क रूपमे पहिचान करत — वास्तविक ज्ञान स्रोत (प्रमाण) कभी गुमराह नै करैत अछि। केवल छद्म-स्रोत (प्रमाणाभास) करैत अछि। स्रोत आपु स्वयं — प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द — तथ्यात्मक रूपसँ परिभाषित अछि; भ्रम आ त्रुटि वास्तविक स्रोत सँ नै, बल्कि ओहि चीज सँ उत्पन्न होइत अछि जे एकर भेस धरैत अछि। ई गङ्गेशकेँ दुनू कायम राखबाक अनुमति देबैत अछि: भ्रमणशीलता (हम कोनो सेहो अवसर पर गलत होए सकैत छी) आ स्रोत-अपूरणीयता (वास्तविक स्रोत, जखन संचालनमे अछि, सदा सत्य देबैत अछि)। प्रमाणीकरण: परतः-प्रामाण्य (बाह्य वैधता) भारतीय ज्ञानमीमांसामे एक केन्द्रीय बहस अछि जे ज्ञानक वैधता स्वयं-प्रमाणित (स्वतः-प्रामाण्य, जेना मीमांसक मानैत छल) होइत अछि या बाह्य प्रमाणीकरण (परतः-प्रामाण्य) के आवश्यकता होइत अछि। गङ्गेश बादक लेल तर्क करैत अछि। एकटा बोध (अनुभव) प्राथमिक रूपसँ वैध मानल जाइत अछि — हम स्वाभाविक रूपसँ आ स्वतः हमरा सँ प्रस्तुत नव सूचना सत्य मानि लैत छी — मुदा प्राथमिकता केँ खण्डन कएल जा सकैत अछि आ संदेहक मामलामे, ज्ञान स्रोतक पहिचान या कार्यमे व्यावहारिक सफलता द्वारा आगा अनुमानात्मक प्रमाणीकरणक आवश्यकता होइत अछि। मीमांसक दावा जे बोध आपु स्वयं प्रमाणित अछि, गङ्गेश तर्क करैत अछि, संदेहक घटनात्मक वास्तविकता केँ खाता नै करि सकैत अछि: यदि प्रत्येक बोध आपु स्वयं अन्तर्निहित रूपसँ उत्पन्न भेला पर सत्य प्रमाणित होएत, तऽ हम कभी एकटा यथार्थ प्रत्यक्ष पर संदेह नै करि सकैत, मुदा हम स्पष्ट रूपसँ करैत छी। प्रत्यक्षक परिभाषा गङ्गेशक प्रत्यक्षक परिभाषा अक्षपादक न्याय-सूत्रक मूल सूत्रीकरण पर निर्माण करैत अछि मुदा पर्याप्त रूपसँ परिष्कृत करैत अछि। स्वीकृत परिभाषा (इन्द्रियक एकर वस्तु सँ समागम सँ उत्पन्न ज्ञान, अव्यभिचारी, या तऽ चिंतनशील या अचिंतनशील होएबाक) क विरुद्ध, गङ्गेश तर्क करैत अछि जे ई दुनू बहुत व्यापक अछि (स्मृति आ आत्माक अनुमान शामिल करैत अछि) आ बहुत संकीर्ण अछि (ईश्वरक प्रत्यक्ष बहिष्कृत करैत अछि)। हुनकर पसंदीदा विशेषता अछि: प्रत्यक्ष एकटा अपरोक्ष ज्ञान अछि जकर नैमित्तिक कारण कोनो अन्य ज्ञान नै अछि। ई एकरा अनुमान (जकर नैमित्तिक कारण आधारसभ पर विचार अछि) आ शब्द (जकर नैमित्तिक कारण कथनक बोध अछि) सँ अलग करैत अछि। सामान्य आ अतीन्द्रिय प्रत्यक्ष न्याय परम्पराक अनुसरण करैत, गङ्गेश इन्द्रिय आ एकर वस्तुक बीच प्रत्यक्ष समागमक दुई व्यापक श्रेणीसभक अन्तर करैत अछि। सामान्य समागम (लौकिक-सन्निकर्ष) छहि तरह सँ होइत अछि: (१) संयोग — आँखि क घड़ा सँ मिलन; (२) संयुक्त-समवाय — आँखि आ घड़ाक रंग; (३) संयुक्त-समवेत-समवाय — आँखि आ रंग-जाति; (४) समवाय — कान आ आकाशमे निहित शब्द; (५) समवेत-समवाय — कान आ शब्दक जाति शब्दत्व; (६) विशेषणता — आँखि आ फर्श पर घड़ाक अभाव। अतीन्द्रिय समागम (अलौकिक-सन्निकर्ष) के तीन रूप अछि: (१) सामान्य-लक्षण — धुएँक सार्वभौमिक प्रकृति आ एहि प्रकारे सभ समय आ सभ स्थान पर धुएँक सभ मामलासभक प्रत्यक्ष करबा; (२) ज्ञान-लक्षण — "अप्रत्यक्ष प्रत्यक्ष" जे पश्चिमी मनोविज्ञानमे मान्य अछि, जेना जखन चन्दन देखि हम स्मरण सक्रिय भेला द्वारा सुगन्ध केँ प्रत्यक्ष करैत छी; (३) योगज — उन्नत तपस्वीसभक प्रत्यक्ष शक्ति। गङ्गेशक सबसँ दार्शनिक रूपसँ परिष्कृत योगदानसभमे सँ एक निर्विकल्पक (अनिश्चित, अचिंतनशील) आ सविकल्पक (निश्चित, चिंतनशील) प्रत्यक्षक बीच अन्तर सँ सम्बन्धित अछि। निर्विकल्पक प्रत्यक्ष पहिल, अतीन्द्रिय, अवधारणा-मुक्त क्षण अछि जाहिमे एकटा विषय आ एकर सार्वभौमिक प्रकृति अलग-अलग रूपमे पंजीकृत होइत अछि, ओ जुड़बा सँ पहिने — "केवल घड़ा" या "केवल घटत्व" बिना कोनो सम्बन्धात्मक विशिष्टताक। सविकल्पक प्रत्यक्ष बादक, अवधारणा-युक्त, एकटा विशेष्य क एकटा विशेषण द्वारा जागरूकता अछि: "ई घड़ा अछि," जतय घटत्व ई के विधेय कएल गेल अछि। गङ्गेश एकटा प्रसिद्ध विचार प्रयोगक प्रयोग करैत अछि: एकटा बच्चा जे पहिल बेर गाय सँ सामना करैत अछि, ओ तर्क करैत अछि, विशेषणक एकटा निर्विकल्पक बोध द्वारा गोत्व केँ समझि सकैत अछि आ सही रूपसँ कहि सकैत अछि "ओ गाय अछि," बिना पूर्व गाय-अनुभवक। ई समस्या केँ समाधान करैत अछि जे काति अवधारणा बिना पूर्व अवधारणा-धारणा पूर्वकल्पित कए प्रत्यक्षमे उत्पन्न होए सकैत अछि — एकटा समस्या जे विश्लेषणात्मक ज्ञानमीमांसा "गैर-दोक्सास्टिक" या "गैर-असर्टिव" प्रत्यक्ष अवस्थासभक धारणा द्वारा संबोधित करैत अछि। गङ्गेशक अनुव्यवसायक सिद्धान्त — एकटा प्रत्यक्ष जे पूर्ववर्ती बोध केँ अपन वस्तुक रूपमे लैत अछि — हुनकर उत्तर अछि प्रश्नक जे काति कोनो जानैत अछि जे ओ का जानैत अछि। ओ तर्क करैत अछि जे एहि प्रकारक आत्म-निर्देशित प्रत्यक्ष विस्तारित बोधक आशयात्मक सामग्री (विषयता) क सम्बन्धमे अचूक अछि, यद्यपि एकर सत्यताक सम्बन्धमे नै। एकटा प्रत्यक्ष जागरूकता केँ अनुभव करि आ एकरा प्रत्यक्ष (अनुमानात्मक या स्मृतिपरकक बजाय) क रूपमे पहिचान करि, विषय प्रमाणीकरण या प्रश्न करबाक लेल एकटा सुरक्षित आधार प्राप्त करैत अछि। ई सिद्धान्त गङ्गेशक ज्ञानमीमांसा केँ आत्मनिरीक्षण, द्वितीय-क्रम ज्ञान, आ आत्म-चेतना पर पश्चिमी चर्चाक साथ उत्पादक संवादमे रखैत अछि। अनुमानक सिद्धान्त (अनुमान) अविनाभाव सम्बन्ध (व्याप्ति) अनुमान सिद्धान्तमे गङ्गेशक सबसँ बड़ उपलब्धि व्याप्ति (अविनाभाव सम्बन्ध, अक्सर "व्याप्ति" या "प्राकृतिक अन्तर्निहितता" क रूपमे अनुवादित) क एकर निर्णायक परिभाषा अछि। एकटा व्याप्ति एकटा अनुमान केँ आधार देबैत अछि: जे धुआँ आगि केँ व्याप्त करैत अछि (जतय धुआँ अछि, ततय आगि अछि) पहाड़ पर देखल धुआँ सँ ओहि पहाड़ पर आगिक अनुमान केँ अधिकृत करैत अछि। चुनौती अछि व्याप्ति केँ एहि प्रकारे परिभाषित करबाक जे (१) साधारण अनुमानसभक संभालि सकए, (२) विशेष रूपसँ सकारात्मक अनुमानसभ केँ शामिल करए जतय साध्यक कोनो नकारात्मक उदाहरण नै अछि, आ (३) उपाधि (सशर्त मध्य पद) क समस्या सँ बचए। चौबीस पूर्व परिभाषासभक (जाहिमे "सिंह" आ "व्याघ्र" क उपाधिसभ तहत आगा बढ़ाएल गेल सभ शामिल अछि — सिंह-व्याघ्रोक्त-व्याप्तिलक्षण) जाँच आ अस्वीकार करबाक बाद, गङ्गेश अपन सिद्धान्त-लक्षण (अन्तिम परिभाषा) पर पहुँचैत अछि: व्याप्ति अर्थात् हेतु (हेतु) आ साध्य (साध्य) क सह-अस्तित्व जे ओहि निरपेक्ष अभावक प्रतियोगिताक प्रकृति सँ योग्य नै अछि जे (क) हेतु क समान आश्रयमे रहैत अछि, मुदा (ख) ओहि प्रतियोगी क सम्बन्धमे भिन्न आश्रयमे रहैत अछि। विद्याभूषणक परिचय एहि विस्तृत द्वन्द्वशास्त्रक एकटा सुलभ सारांश प्रदान करैत अछि, जे प्रसिद्ध वृत्ताकार आरेखसभ धुआँ-आगि, अभिधेय-ज्ञेय, वृक्ष-वानर, आ दोसरसभ सहित पूरा अछि, जे क्रमिक अस्थायी आ अन्तिम परिभाषासभक उदाहरण दैत अछि। न्याय (सिलोजिज्म) आ परार्थानुमान गङ्गेश अनुमानक दुई विधाक अन्तर्गत विश्लेषण करैत अछि। स्वार्थानुमान (स्व-लेल अनुमान) ओ संज्ञानात्मक प्रक्रिया अछि जाहि द्वारा कोनो व्यक्ति अनुमानात्मक ज्ञान पर पहुँचैत अछि: रसोईघर आ यज्ञशालामे धुआँ केँ आगि क साथ बार-बार सह-उपस्थित देखि, कोनो व्यक्ति पहाड़ पर धुआँ देखैत अछि, व्याप्ति केँ स्मरण करैत अछि, आ ज्ञान पर पहुँचैत अछि जे पहाड़ आगि सँ भरल अछि। प्रमुख मानसिक घटना अछि परामर्श — चिह्न पर विचार, ज्ञान जे "धुआँ, जे आगि क साथ अविनाभाव सम्बन्धमे अछि, एहि पहाड़ मे निवास करैत अछि।" ई अनुमिति (अनुमानात्मक निष्कर्ष) क कारण अछि। परार्थानुमान (दोसर-लेल अनुमान) पाँच-अवयवी न्याय (सिलोजिज्म) द्वारा अपन अनुमानक प्रदर्शन अछि: (१) प्रतिज्ञा (प्रस्ताव) — "ई पहाड़ आगि सँ भरल अछि"; (२) हेतु (कारण) — "किएक ई धुआँ सँ भरल अछि"; (३) उदाहरणम (उदाहरण) — "जे किछु धुआँ अछि, ओकरा आगि अछि, जेना रसोईघर"; (४) उपनय (अनुप्रयोग) — "ई पहाड़ सेहो धुआँ अछि"; (५) निगमनम् (निष्कर्ष) — "एहि कारण ई पहाड़ आगि सँ भरल अछि।" न्याय श्रोतामे "चिह्न पर विचार" (परामर्श) उत्पन्न करैत अछि जे हुनकर अनुमानात्मक ज्ञानमे परिणत होइत अछि। हेत्वाभास (हेत्वाभास) गङ्गेशक हेत्वाभास (हेत्वाभास, शाब्दिक अर्थ "कारणक आभास") क विश्लेषण, विद्याभूषण द्वारा उद्धृत विद्वानक शब्दमे, "बौद्धिक उपलब्धिक क्षेत्रमे विश्वक एक आश्चर्य" अछि। दोषपूर्ण हेतुक पाँच प्रकारक पहिचान कएल गेल अछि: (१) सव्यभिचार (अनियमित या विचलित) — एकटा हेतु जे सपक्ष (सजातीय) आ विपक्ष (विजातीय) दुनू उदाहरणसभमे होइत अछि; (२) विरुद्ध (विरोधी) — एकटा हेतु जे साध्यक विपरीत साबित करैत अछि; (३) सत्प्रतिपक्षित (समान-बलक प्रतिहेतु द्वारा सन्तुलित) — एकटा हेतु जे एकटा समान बलक प्रतिअनुमान द्वारा मेल खाबैत अछि; (४) असिद्ध (अस्थापित) — एकटा हेतु जकर आश्रय पर, अपन प्रकृतिमे, या अपन व्याप्तिमे उपस्थिति अस्थापित अछि; (५) बाधित (असंगत/पहिने सँ पराजित) — एकटा हेतु जे निष्कर्षक ओर ले जाइत अछि जे पहिने सँ ज्ञानक दोसर साधन द्वारा खण्डन कएल गेल अछि। तकनीकी तर्क सँ परे, गङ्गेश तीन विवादास्पद अनुमान आगा बढ़ाबैत अछि। आत्मक प्रमाण (आत्मन्) केवल-व्यतिरेकी अनुमानक रूप लैत अछि: "प्रत्येक जीवित शरीरमे आत्मा अछि, किएक प्रत्येक जीवित शरीरमे प्राण अछि, घड़ा जकाँ नै।" हुनकर ईश्वरवादी अनुमान तर्क करैत अछि: "पृथ्वी आ तत्समानक एकटा सचेतन कर्ता नैमित्तिक कारणक रूपमे अछि, किएक एकरा कार्य अछि, घड़ा जकाँ, परमाणु जकाँ नै।" मुक्तिक संभावनाक प्रमाण (मुक्ति) दीपकक बुझबाक सादृश्य द्वारा एकटा जटिल अनुमान केँ नियोजित करैत अछि, तर्क करैत अछि जे दुःख, एकटा निरन्तर गुण होएबाक कारण जे केवल एकटा कार्यक रूपमे होइत अछि, सैद्धान्तिक रूपमे पूर्ण रूपसँ नष्ट कएल जा सकैत अछि। ई तीनु अनुमानात्मक प्रणालीक प्रदर्शनक रूपमे सेहो काम करैत अछि — उपाधि, तर्क (परिकल्पनात्मक तर्क), आ सपक्ष/विपक्ष उदाहरणक अपन विशिष्ट उपचार सहित — जेना ओ वास्तविक तात्विक या मोक्षशास्त्रीय थीसिस अछि। उपमान (सादृश्य)क सिद्धान्त उपमान, तुलना या सादृश्य, गङ्गेशक लेल सख्त रूपसँ ज्ञानक ओ स्रोत अछि जाहि द्वारा कोनो व्यक्ति शब्द आ एकर वाच्यक बीच सम्बन्ध सीखैत अछि। मानक उदाहरण: एकटा विषय, बताएल गेल जे गवय (बाइसन जकाँ जानवर) गाय जकाँ अछि, बादमे जङ्गलमे जानवर सँ सामना करैत अछि आ ओकरा गवयक रूपमे पहिचान करैत अछि — ई पहिचानक साधन सादृश्य ज्ञान अछि। गङ्गेश मानैत अछि जे ई ज्ञान वास्तविक रूपसँ अपरिवर्तनीय अछि: ई प्रत्यक्ष सँ अनुरेखण नै कएल जा सकैत अछि (जे वर्तमान उदाहरण सँ परे कतेक मामलासभमे धरि रहल सम्बन्ध केँ नै देखि सकैत अछि) न अनुमान सँ (जे व्याप्तिक ज्ञानक आवश्यकता होइत अछि, मुदा एतय कोनो एहि प्रकारक व्याप्ति उपलब्ध नै अछि)। उपमानक व्यापार (संचालन) बड़कक शिक्षाप्रद उच्चारणक स्मरण अछि; एकर परिणाम (उपमिति) नाम आ नामितक सम्बन्धक ज्ञान अछि। शब्द (शाब्दिक प्रमाण)क सिद्धान्त भाषाक एकटा अपरिवर्तनीय प्रमाणक रूपमे न्याय-सूत्र (१.१.७) क अनुसरण करैत, गङ्गेश स्वीकार करैत अछि जे शाब्दिक प्रमाण विश्वसनीय विशेषज्ञ (आप्त-वाक्य) क सत्य कथन अछि। योगाचार बौद्धसभक विरुद्ध जे भाषाक सत्य-योग्यताक अस्वीकार करैत छथि, आ वैशेषिकसभक विरुद्ध जे शाब्दिक ज्ञान केँ अनुमानमे न्यूनीकृत करबाक चाहैत छथि, गङ्गेश तर्क करैत अछि जे शब्द एकटा अद्वितीय भाषाई तंत्र द्वारा काम करैत अछि। श्रोताक ज्ञान अनुमानात्मक तर्क "ई वक्ता जानैत अछि आ सत्य बताबाक आशय रखैत अछि" सँ नै, बल्कि तुरन्त शब्दसभक एकटा सार्थक समग्रक रूपमे जुड़ल समझ सँ उत्पन्न होइत अछि — एकटा प्रक्रिया जे विश्लेषणात्मक रूपसँ प्रत्यक्ष आ अनुमान दुनू सँ अलग अछि। शाब्दिक ज्ञानक शर्तसभ गङ्गेश चारि वाक्यात्मक शर्तसभक पहिचान करैत अछि जे एकटा कथनक शाब्दिक ज्ञान उत्पन्न करबाक लेल पूरा होएबाक चाही: (१) आकाङ्क्षा — वाक्यात्मक अपेक्षा, प्रत्येक शब्दक दोसरक आवश्यकता एकटा जुड़ल अर्थ उत्पन्न करबाक लेल; (२) योग्यता — शब्दार्थ योग्यता, समझबाक लेल कोनो वैध अवरोधक अनुपस्थिति; (३) आसत्ति — समीपता, शब्दसभक अत्यधिक विराम बिना उच्चारण; (४) तात्पर्य — वक्ताक एकटा विशिष्ट अर्थ बताबाक आशय। गङ्गेशक नवाचार अछि लक्षणा (गौण/अप्रत्यक्ष अर्थ) क ट्रिगर केँ पुनर्व्याख्या करबाक, नै योग्यता क उल्लंघनक रूपमे (जेना आम तौर पर मानल जाइत छल), बल्कि अन्वय (समग्र निर्माणात्मक सम्बन्ध) क उल्लंघनक रूपमे, एकटा सूक्ष्म आ अधिक सटीक मापदण्ड। शक्ति (सामर्थ्य) आ लक्षणा (गौण अर्थ) शब्द अध्याय एकटा समृद्ध भाषाई अर्थक सिद्धान्तमे परिणत होइत अछि। प्रत्येक शब्दमे एकटा शक्ति (सामर्थ्य) अछि — एकर वाच्य क स्मरण उत्पन्न करबाक क्षमता — जे ईश्वरक इच्छा सँ (प्राथमिक/स्थायी सामर्थ्यक लेल) या मनुष्यक इच्छा सँ (तकनीकी/आकस्मिक सामर्थ्यक लेल) प्राप्त होइत अछि। शब्दक वाच्य सदा एकटा व्यक्ति होइत अछि जे अपन सार्वभौमिक सँ योग्य, दुनू साधारण बोधमे अविभाज्य। जतय प्राथमिक वाच्य वाक्यक जुड़ल अर्थक साथ सुसंगत नै होए सकैत अछि, ततय लक्षणा (गौण अर्थ) संचालित होइत अछि, श्रोताकेँ सम्बन्धित अर्थक ओर निर्देशित करैत अछि — जेना "गंगायां घोषः" (गंगा पर बस्ती) नदीक जलक बजाय एकर तट केँ इंगित करैत अछि। गङ्गेशक लक्षणाक एकटा किफायती व्याख्यात्मक उपकरणक रूपमे बचाओ उन सभक विरुद्ध जे सभ गौण अर्थ केँ प्राथमिक संदर्भ या अर्थक बहुलता मे न्यूनीकृत करबाक चाहैत छथि, तत्त्व-चिन्तामणि मे सबसँ तकनीकी रूपसँ प्रतिभाशाली तर्कसभमे सँ एक अछि। तत्त्वमीमांसात्मक प्रतिबद्धतासभ गङ्गेशक ज्ञानमीमांसीय परियोजना न्याय आ वैशेषिकक उदयनक संश्लेषण सँ विरासतमे प्राप्त एकटा मजबूत यथार्थवादी आन्टोलॉजीमे आधारित अछि। सात श्रेणी — द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय, आ अभाव — हुनकर ज्ञान सिद्धान्तक तत्त्वमीमांसात्मक फर्नीचर प्रदान करैत अछि। ज्ञान आ अन्य मानसिक घटना वास्तविक आ अन्तर्विषयी रूपसँ ज्ञेय मानल जाइत अछि। सार्वभौमिक वास्तविक आवर्ती गुण अछि जे द्रव्य आ एकर गुण दुनू केँ योग्य करैत अछि; समवाय ओ "तत्त्वमीमांसात्मक गोंद" अछि जे गुण आ सार्वभौमिक सभकेँ अपन आधारसभ सँ एकटा सम्बन्धमे बान्धैत अछि जे आगा विश्लेषण नै कएल जा सकैत अछि। अभावक प्रति गङ्गेशक उपचार विशेष रूपसँ सूक्ष्म अछि। उन सभक विरुद्ध जे अभाव केँ एकटा अलग तत्त्वमीमांसात्मक श्रेणीक रूपमे अस्वीकार करैत छथि, ओ तर्क करैत अछि जे फर्श पर घड़ाक अनुपस्थितिक हमर प्रत्यक्ष केवल फर्शक विशेषतासभ सँ व्याख्या नै कएल जा सकैत अछि — फर्श पर किछु ("अभाव" एकटा अलग विशेषक रूपमे) होएबाक चाही जे घड़ाक अनुभव करबामे हमर विफलतामे काम करैत अछि, जे प्रतियोगी अछि। अभावक दुई मुख्य प्रकार अछि: सार्वभौमिक (पूर्ववर्ती, उत्तरवर्ती, नित्य) आ इतरेतराभाव (पहिचान-आधारित)। प्रत्येकक अपन प्रत्यक्ष तंत्र आ ज्ञानमीमांसीय परिणाम अछि। प्रभाव आ विरासत नव्य-न्याय विद्यालय तत्त्व-चिन्तामणि ने सभ पूर्ववर्ती न्याय साहित्य केँ तुरन्त ग्रहण क देलक। एकर रचना क एक शताब्दीक भीतर ई भारतक मुख्य सांस्कृतिक केन्द्रसभमे अध्ययन आ टीका कएल जा रहल छल। नवद्वीप (बंगाल) परम्परा असाधारण परिष्कारक टीकाकार उत्पादन केलक — रघुनाथ शिरोमणि, जगदीश, गदाधर — जे गङ्गेशक विश्लेषणात्मक शब्दावली, विशेष रूपसँ एकर विशेषणता (विशेषणता) क सिद्धान्त आ अभावक तर्क, केँ बीसम् शताब्दी सँ पहिने कोनो सेहो दार्शनिक परम्परामे अभूतपूर्व एकटा अमूर्त प्रतीकात्मक पथरीमे विकसित केलक। प्रभाव मीमांसा, वेदान्त, व्याकरण, धर्मशास्त्र, आ चिकित्सा धरि विस्तारित भेल, किएक विभिन्न विषयसभक विद्वान नव्य-न्यायक तकनीकी शब्दावली अपनाक अपन स्थितिसभ अधिक सटीकताक संगे बताबाक लागल। मिथिला आ जीवित परम्परा मिथिलामे आपु स्वयं — आ ई विदेह पत्रिकाक लेल विशेष महत्व रखैत अछि — तत्त्व-चिन्तामणि पण्डित शिक्षाक शिखर बनल रहल। दरभंगा राज शैक्षिक संरक्षणक एकटा परम्परा बनाए रखलक जे मिथिलामे नव्य-न्याय अध्ययन केँ संरक्षित केलक, भले नवद्वीप एकर अधिक प्रसिद्ध केन्द्र बनल। पंजी प्रणाली (मैथिल ब्राह्मण परिवारक वंशावली अभिलेख), जे प्रीति ठाकुर विदेह अभिलेखक लेल ग्यारह हजार सँ अधिक ताड़पत्र अभिलेखसभक संकलन, स्क्यान, आ सूचीबद्ध केनए अछि, सीधा उन सामाजिक संरचनासभ सँ जुड़ल अछि जे उस पण्डित परम्परा केँ उत्पादन आ निरन्तरता देलक जाहिमे गङ्गेश काज केलक। विदेह अभिलेखक मैथिली आ संस्कृत पाण्डुलिपिसभक संरक्षण, जाहिमे ठक्कुर आ मिश्र सभक रचना शामिल अछि जे गङ्गेशक सर्कलक प्रत्यक्ष बौद्धिक वंशज छल, सात शताब्दी पार जीवित विद्वत्तापूर्ण सम्बन्ध बनाबैत अछि। आधुनिक विद्वत्ता तत्त्व-चिन्तामणि पर पश्चिमी विद्वत्ता सतीश चन्द्र विद्याभूषणक 'हिस्ट्री ऑफ इंडियन लॉजिक' (१९२१) आ कामाख्यानाथ तर्कवागीश द्वारा मथुरानाथक माथुरी टीकाक साथ सम्पादित बिब्लियोथेका इंडिका संस्करण (१८८४-१९०१) सँ गम्भीरतापूर्वक शुरू भेल। बीसम् शताब्दीमे व्यक्तिगत खण्डसभक आंशिक अनुवाद देखलक: सी. गोकूपक व्याप्ति अध्यायक अध्ययन (१९६७), बी.के. मतिलालक अभाव आ निर्विकल्पक प्रत्यक्ष पर काम, शिबजिबन भट्टाचार्यक कतेक खण्डसभक विस्तृत विश्लेषण, आ दोसर। तत्त्व-चिन्तामणिक पहिल पूर्ण अंग्रेजी अनुवाद तीन खण्डमे स्टीफन एच. फिलिप्स द्वारा २०२० मे (ब्लूम्सबरी) प्रकाशित भेल, जे सम्पूर्ण ग्रन्थ केँ पहिल बेर गैर-संस्कृत पाठकसभक लेल सुलभ बना देलक। नाम, जन्मस्थान, परिवार, आ कालक्रम गङ्गेश या गङ्गेश्वर? साहित्य अकादमी मोनोग्राफ निर्णायक रूपसँ स्थापित करैत अछि जे औपचारिक नाम गङ्गेश्वर आ बोलचालक नाम गङ्गेश छल — दुनू एकटे व्यक्तिके निर्देशित करैत अछि। हुनकर पुत्र वर्धमान किरणावलीप्रकाशमे 'गङ्गेश्वराय गुरवे पित्रे' प्रणाम करैत अछि; गङ्गेश आपु स्वयं तत्त्वचिन्तामणिक आशीर्वचन श्लोकमे 'गङ्गेश-स्तुते मितेन वचसे श्री-तत्त्व-चिन्तामणिम्' लिखैत अछि। पंजी अभिलेख हुनका 'तत्त्व-चिन्तामणि-कारक महामहोपाध्याय परमगुरुः गङ्गेश्वरः' क रूपमे वर्णन करैत अछि। पॉटर इन्साइक्लोपीडिया पुष्टि करैत अछि: 'गङ्गेश मिथिलाक मूल निवासी छल। देखाबैत अछि जे हुनकर जन्म आ पालन-पोषण चादना नामक गाममे भेल, जे अब पहिचान योग्य नै अछि, मुदा ओ बादक जीवनमे करिओनमे रहल, जे उदयनक गाम छल, दरभंगा सँ लगभग बारह माइल दक्षिण-पूर्व। ओ काश्यप गोत्र सँ सम्बन्ध रखैत छल। परम्परा अछि जे हुनकर कतेक पत्नी, तीन पुत्र आ एकटा बेटी छल। पुत्रसभमे सँ एक वर्धमान छल। परस्पर विरोधी परम्परा कहैत अछि जे गङ्गेश या तऽ (क) एकटा महान प्रतिभाशाली छल या (ख) एकटा अनपढ़ बच्चा छल।' समानांतर इतिहासक पुनःप्राप्ति: दमित पंजी साक्ष्य मैथिली साहित्यक समानांतर इतिहास — जेना विदेह आन्दोलन आ गजेन्द्र ठाकुर द्वारा प्रलेखित — गङ्गेशक जीवनीक एकटा आयाम प्रकट करैत अछि जे संस्थागत इतिहासकार द्वारा जानबूझि दमन कएल गेल छल। पंजी प्रणाली, जे १४म् शताब्दीमे हरिसिंहदेवक अधीन स्थापित भेल, मैथिल ब्राह्मणक वंशावली अभिलेखन पद्धति अछि। जखन विदेह आन्दोलन २००९ मे दूषण पंजी अभिलेख अङ्कीकृत आ जारी केलक, तखन ओ उजागर केलक जे समानांतर इतिहास 'गङ्गेश उपाध्यायक विरासतक सम्मान-हत्या' कहैत अछि। मूल पंजी अभिलेख प्रकट करैत अछि जे गङ्गेश उपाध्याय एकटा चर्मकारिणी — चमड़ा सिझावै वाली जातिक महिला — सँ विवाह केनए छल आ ई जे हुनकर पिताक मृत्युक पाँच वर्ष बाद जन्म भेल छल। ई तथ्य, जे गङ्गेशक एकटा अविवाद्य ब्राह्मण रूढ़िवादिताक व्यक्ति क रूपमे चित्र केँ जटिल बनाबैत अछि, रामानाथ झा (साहित्य अकादमीमे मैथिलीक पहिल संयोजक) द्वारा दमन कएल गेल छल जखन ओ इतिहासकार दिनेश चन्द्र भट्टाचार्य केँ जीवनी सूचना संप्रेषित केलक। साहित्य अकादमीक २०१६ मोनोग्राफ गङ्गेश पर, समानांतर इतिहास नोट करैत अछि, ई दमन केँ कायम राखलक। समानांतर इतिहास एहि प्रकारे गङ्गेश केँ ब्राह्मण्य विद्वत्ताक एकटा स्मारकक रूपमे नै, बल्कि एकटा व्यक्तिक रूपमे प्रस्तुत करैत अछि जे, तत्त्वचिन्तामणिक अपन द्वन्द्वशास्त्रीय पद्धति जकाँ, हुनका पर लागू प्रत्येक धारणा केँ चुनौती देबैत अछि। एहि जीवनी पुनःप्राप्तिक गहन प्रभाव अछि। पंजी प्रणाली आपु स्वयं जाति नियन्त्रणक एकटा साधन छल — तथापि एकर अपन अभिलेख, जखन जारी भेल, ओ जाति शुद्धता कथा केँ कमजोर करैत अछि जे एकरा बनाए रखबाक लेल डिजाइन कएल गेल छल। गङ्गेश, जे दार्शनिक जे आग्रह करैत छल जे प्रत्येक परिभाषाकेँ एकर सभ संभावित प्रतिउदाहरणसभक विरुद्ध परीक्षण कएल जाए, समानांतर इतिहासमे एकटा व्यक्ति बनि जाइत अछि जकर जीवन आपु स्वयं जाति विचारधारा केँ एकटा प्रतिउदाहरण अछि जे बादमे हुनका दावा केलक। जेना शार्फस्टाइन नव्य-न्याय पद्धति क बारेमे अवलोकन केनए छल: 'ओ आ हुनकर अनुयायी परिभाषासभ रचना करैत छथि जे मन केँ फैलाबैत अछि आ सटीक आलोचना केँ आमन्त्रित करैत अछि' — ओही आलोचनात्मक भावना जे हुनकर तर्क केँ सजीव केलक, हुनकर सामाजिक अस्तित्व केँ सेहो सजीव केलक, यदि पंजी साक्ष्य स्वीकार कएल जाए। कालक्रम पॉटर इन्साइक्लोपीडियाक आधिकारिक मूल्यांकन गङ्गेशक तिथि फ्लोरुइट १३२० ई. निर्धारित करैत अछि। प्रमुख पाण्डुलिपि साक्ष्य: वर्धमानक कुसुमाञ्जलिप्रकाशक एकटा प्रति बचल अछि 'शिलालेखीय साक्ष्य पर १३००-१३६० क अवधि सँ उत्पन्न' बताएल गेल; गङ्गेश श्रीहर्षक खण्डनखण्डखाद्य उद्धृत करैत अछि, आ श्रीहर्ष निश्चित रूपसँ १२३३ सँ पूर्व अछि। शाक १३१० (१३८८ ई.) मे संकलित पंजी अभिलेख हुनका 'तत्त्वचिन्तामणिकारक' क विशेषण सँ पहिचान करैत अछि — तत्त्वचिन्तामणिक निर्माता। साहित्य अकादमी मोनोग्राफ १२७०-१३७० ई. क एक सीमा प्रदान करैत अछि; शार्फस्टाइन फ्लोरुइट १३२० ई. क प्रयोग करैत अछि। समानांतर इतिहास, गङ्गेशक पिताक मृत्युक पाँच वर्ष बाद जन्म भेलबाक पंजी साक्ष्य केँ उद्धृत करैत, नोट करैत अछि जे ई जीवनी विवरण हुनकर सक्रिय जीवन केँ हरिसिंहदेव (लगभग १२९५-१३२६ ई.) क करणाट-वंश कालमे मजबूती सँ रखैत अछि। मिथिला, करणाट वंश, आ बौद्धिक परिस्थितिकी हरिसिंहदेव (लगभग १२९५-१३२६ ई.) क अधीन करणाट वंश गङ्गेशक जीवनक राजनीतिक ढाँचा छल। हरिसिंहदेव संस्कृत विद्याक एकटा उदार संरक्षक छल। ओ १३१० ई. मे पंजी वंशावली अभिलेख केँ आदेश देलक; हुनकर मन्त्री चण्डेश्वर ठाकुर बहुधा लिखलक; ओ एकटा दरबार बनाए रखलक जाहिमे युगक महानतम् संस्कृत पण्डित प्रतिस्पर्धा आ सहयोग करैत छल। समानांतर इतिहास ई केँ मिथिलाक न्याय-मीमांसा विद्याक केन्द्रक रूपमे लम्बा इतिहासक भीतर प्रासंगिक बनाबैत अछि — जे बौद्धिक राजधानी छल जे, डी.सी. भट्टाचार्य द्वारा प्रलेखित, सात शताब्दी पार गङ्गेश-पूर्ववर्ती २४ मैथिल नैयायिक उत्पादन केलक। मुदा समानांतर इतिहास ई सेहो आग्रह करैत अछि जे ई दरबारी संस्कृति एकटा बहिष्कारी सामाजिक आधार पर निर्मित छल। ओही पंजी प्रणाली जे गङ्गेशक प्रतिभा केँ प्रलेखित केलक, जाति अन्तर्विवाह केँ लागू केलक आ एकर मानदण्डसभक उल्लंघन करबैवालाक वंशावली 'अयोग्यता' अंकित केलक। गङ्गेशक अपन अन्तर्जातीय विवाहक दूषण पंजी सँ पुनःप्राप्ति एहि प्रकारे दुगुना महत्वपूर्ण अछि: ई पंजी केँ एकटा साधनक रूपमे देखाबैत अछि जे उन सभक बारेमे विध्वंसकारी तथ्य दुनू दबा सकैत छल आ अनजानेमे संरक्षित सेहो करि सकैत छल जे ओ उत्सव मनाबैक दावा करैत छल। तत्त्वचिन्तामणि — संरचना, नवीनता, आ नव्य-न्याय प्रणाली तत्त्वचिन्तामणि आ नव्य-न्यायक प्रकृति संरचना आ दायरा वी.पी. भट्टक प्रस्तावना भारतीय बौद्धिक इतिहासमे तत्त्वचिन्तामणिक स्थानक एकटा स्पष्ट विवरण प्रदान करैत अछि: 'तत्त्व चिन्तामणि (टी.सी.) क रचना मिथिलाक गङ्गेशोपाध्याय द्वारा तेरहम् शताब्दी ई. मे केल गेल छल। ई भारतीय ज्ञान आ तर्क सिद्धान्तक विकासमे एकटा नव युगक शुरुआत केलक आ नव्य-न्याय पर विभिन्न ग्रन्थसभमे पहिल कृति मानल जाइत अछि। ई चारि पुस्तकसभमे विभाजित अछि, अर्थात् प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान आ शब्द आ नव्य-न्यायक षोडश श्रेणीसभकेँ चारि शीर्षकसभक तहत लेलक।' केवल प्रत्यक्ष-खण्ड, जेना भट्टक अनुवाद प्रकट करैत अछि, १३ प्रमुख प्रकरण (उप-खण्ड) अछि: मङ्गलवाद, प्रामाण्यवाद, प्रमालक्षण, अप्रमावाद, प्रत्यक्षवाद, समवायवाद/सन्निकर्षवाद, अनुपलब्धिवाद, अभाववाद, प्रत्यक्षकारणवाद, मनोऽणुत्ववाद, प्रत्यभिज्ञावाद/अनुव्यवसायवाद, निर्विकल्पकवाद, आ सविकल्पकवाद। पॉटर-भट्टाचार्य इन्साइक्लोपीडिया नवाचार केँ चित्रित करैत अछि: 'नव्यन्याय वास्तवमे बोधक एकटा तर्क अछि।' अपन चिन्ता केँ केवल प्रमाण (ज्ञानक वैध स्रोत) धरि सीमित करि आ पहिनेक न्याय ग्रन्थसभक सभ-श्रेणी ढाँचाकेँ त्यागि, तत्त्वचिन्तामणि अभूतपूर्व विश्लेषणात्मक सटीकता प्राप्त केलक। संस्कृत शब्द ज्ञान, जे 'जागरूकता' क रूपमे अनुवादित अछि, केवल प्रस्तावनात्मक कृत्यसभ नै, बल्कि सचेतन आकलनक कोनो सेहो अवस्था केँ दर्शाबैत अछि। एकटा ज्ञान सदा एकटा प्रासंगिक घटना अछि — किछु जे एकटा समयमे होइत अछि — कभी एकटा संवेगात्मक विश्वास नै अछि। संवेगक लेल संगत शब्द अछि संस्कार: अचेतन स्मृति-निशान जे, जखन सक्रिय होइत अछि, सचेतन स्मरण उत्पन्न करैत अछि। पद्धति: ई अध्ययन किएक करब? भट्ट शैक्षणिक आवश्यकता पर जोर देबैत छथि: 'एहि कारण, ई आवश्यक अछि जे दर्शनक छात्र आ विद्वान दर्शनक सिद्धान्तसभक जटिलतासभ समझबाक लेल नव्य-न्याय पद्धतिक तर्क सँ परिचित होएब... एहि कारण, टी.सी. क अध्ययन केवल एकर सामग्रीक लेल नै, बल्कि एकर पद्धतिक लेल सेहो आवश्यक अछि।' पद्धति पर ई आग्रह आपु स्वयं दार्शनिक रूपसँ महत्वपूर्ण अछि। तत्त्वचिन्तामणि केवल निष्कर्ष पर नै पहुँचैत अछि — ई निष्कर्ष पर पहुँचबाक एकटा तरीका प्रदर्शित करैत अछि जे अगला पाँच शताब्दी धरि संस्कृत दर्शनमे बौद्धिक कठोरताक मानक बनल। शार्फस्टाइन, अपन तुलनात्मक मूल्यांकनमे, केन्द्रीय पद्धतिगत विशेषता केँ पहिचान करैत अछि: 'गङ्गेश दर्शन केँ एकटा विशिष्ट भाषामे निपुण व्यक्तिसभक निस्संदेह क्षेत्र बना देबैत अछि। ओ आ हुनकर अनुयायी परिभाषासभ रचना करैत छथि जे मन केँ फैलाबैत अछि आ सटीक आलोचना केँ आमन्त्रित करैत अछि, मुदा केवल उन सभक लेल जे प्रासंगिक तकनीकी शब्द आ तर्क पद्धतिसभमे निपुण भऽ गेल अछि।' आ तथापि, जेना समानांतर इतिहास हमरा याद दिलाबैत अछि, पद्धतिक ई विशिष्टता आपु स्वयं जाति बहिष्कारक एकटा साधन बनल — एकटा भाषा जे केवल उन सभक लेल सुलभ छल जिनका पण्डित प्रशिक्षणक वर्ष अर्जित करबाक लेल सामाजिक पूंजी छल। ज्ञानमीमांसा — ज्ञान, वैधता, आ त्रुटि ज्ञानक प्रकृति (ज्ञान) — एकटा व्यापक तुलनात्मक विवरण विद्यालयसभक बीच ज्ञान: भट्टक परिचय वी.पी. भट्टक प्रत्यक्ष खण्ड अनुवादक सामान्य परिचय कोनो एकल अंग्रेजी स्रोतमे उपलब्ध भारतीय ज्ञान सिद्धान्तसभक सबसँ व्यवस्थित तुलनात्मक सर्वेक्षण प्रदान करैत अछि। ई सबसँ मूलभूत प्रश्न सँ शुरुआत करैत अछि: ज्ञान का अछि? ज्ञान (ज्ञान), भट्ट समझाबैत छथि, न्याय सूत्र (१.१.१५) आ वैशेषिक सूत्र (८.२) मे बुद्धि (बोध) के अर्थ होइत अछि; वैध ज्ञान एकटा विशेष प्रकारक बोध (बुद्धि विशेष) अछि। न्यायमे ज्ञान बोध या आकलनक गठन करैत अछि आ वस्तुक प्रकाशन (अर्थ प्रकाश) मे समाविष्ट अछि। नैयायिक प्रतिस्पर्धी विवरणसभ केँ अस्वीकार करैत छथि: बौद्ध आ मीमांसकक विरुद्ध जे ज्ञान केँ एकटा क्रिया (क्रिया) मानैत छथि, न्याय तर्क करैत अछि जे गतिविधि सिद्धान्त 'ज्ञान आ क्रिया क्रिया क जानबाक क्रिया क बीच भ्रम सँ उत्पन्न होइत अछि।' सांख्य आ योग प्रणालीक विरुद्ध जे ज्ञान केँ बुद्धि (बुद्धि) क एकटा परिणाम (परिणाम) मानैत छथि, न्याय आपत्ति करैत अछि जे केवल आत्मा — नै अबुद्धि मन-सिद्धान्त — ज्ञानक आधार होए सकैत अछि। ज्ञान आत्माक एकटा गुण (गुण) अछि, नै एकटा क्रिया, नै बुद्धिक एकटा परिणाम। ज्ञानक वर्गीकरण: नैयायिक ज्ञान केँ मुख्य रूपसँ दुई प्रकारमे विभाजित करैत छथि — अनुभव (प्रत्यक्ष अनुभव) आ स्मृति (स्मरण)। अनुभव वस्तुसभक सीधा प्रकट करैत अछि; स्मृति वस्तुसभक सीधा प्रस्तुत कए बिना पूर्ववर्ती ज्ञानक पुनरुत्पादन अछि। अनुभव आ स्मृति दुनू वैध (प्रमा) या अवैध (अप्रमा) होए सकैत अछि, हुनकर कारणसभ पर निर्भर करि। वैध ज्ञान (प्रमा) — मूल परिभाषा भट्ट पूर्ण तुलनात्मक उपकरण सहित न्याय परिभाषा प्रदान करैत अछि: वैध ज्ञान (प्रमा) अर्थात् 'चीजक जेना अछि, वैसा ज्ञान' (यथार्थज्ञान)। ई एकटा वस्तुक यथार्थ अनुभव (यथार्थानुभव) अछि। वैध ज्ञान वास्तविकताक एकटा अनुभव अछि। ई एकटा निश्चित आ प्रमाणित बोध (असंदिग्ध) सेहो अछि, आ एहि कारण सन्देह, त्रुटि आ तर्क जकाँ सभ प्रकारक अवैध ज्ञान केँ बहिष्कृत करैत अछि, साथे स्मृति केँ सेहो। वैध ज्ञान सत्य या अचूक ज्ञान अछि — ई एकर वस्तुक अनुभव सँ विरोधाभास नै करैत अछि (अर्थव्यभिचारिन्)। प्रसिद्ध उदाहरण: 'ई घड़ा अछि' (अयं घटः) एकटा वैध ज्ञान अछि, किएक ई घड़ाक घटत्वक गुण द्वारा चित्रित ज्ञान अछि। एहि प्रकारे, वैध ज्ञान (न्यायकोश) केँ एकटा वस्तुक ज्ञानक रूपमे परिभाषित कएल जा सकैत अछि जाहिमे एकर निहित गुण एकर विशेषताक रूपमे बोध कएल जाइत अछि। वैध ज्ञानमे तीन कारक शामिल अछि: प्रमाता (विषय), प्रमेय (वस्तु), आ प्रमाण (ज्ञानक साधन)। ज्ञानक साधन (प्रमाण) ज्ञान उत्पादन करबाक विशेष कारण (असाधारण कारण) अछि — ई एकटा कार्यकारी कारण अछि जे वैध ज्ञान प्राप्त करबामे सहायक होइत अछि आ एहि कारण ज्ञानक विधि अछि। महान विद्यालयसभक बहस: अन्तर्निहित बनाम बाह्य वैधता भट्टक परिचयक सबसँ दार्शनिक रूपसँ समृद्ध खण्ड ज्ञानक वैधता आ अवैधताक महान अन्तःसम्प्रदायिक बहसक सर्वेक्षण करैत अछि — चाहे ई गठित आ ज्ञात अन्तर्निहित रूपसँ (स्वतः) होइत अछि या बाह्य रूपसँ (परतः)। ई सीधा गङ्गेशक अपन प्रामाण्यवाद खण्ड पर मैप करैत अछि। सांख्य सामान्यतः स्वीकार करैत छल जे वैधता आ अवैधता दुनू अन्तर्निहित स्थितिसभ द्वारा गठित आ ज्ञात होइत अछि — ज्ञान उत्पादन करबैवाला कारणसभक समग्रता द्वारा। बौद्ध मानैत छथि जे ज्ञानमे असत्यता या अवैधता अन्तर्निहित अछि, जबकि सत्यता या वैधता बाह्य अछि। मीमांसक आ वेदान्ती स्वीकार करैत छथि जे ज्ञानक वैधता स्वयं-स्पष्ट आ अन्तर्निहित स्थितिसभ द्वारा गठित अछि, जबकि ज्ञानक अवैधता दोसरसभ द्वारा साक्ष्यित आ बाह्य स्थितिसभ द्वारा ज्ञात होइत अछि। नैयायिक, तथापि, सामान्यतः स्वीकार करैत छथि जे दुनू बाह्य स्थितिसभ द्वारा गठित आ ज्ञात होइत अछि (परतः)। ज्ञानक वैधता आ अवैधता स्वयं-स्पष्ट नै अछि; ओ बाह्य स्थितिसभ सँ अनुमानित होएबाक चाही। सांख्य-मीमांसा अन्तर्निहित-वैधता स्थितिक न्याय उत्तर निर्णायक अछि: 'यदि वैधता एहि प्रकारे होएत, तऽ कोनो अवैध ज्ञान बिल्कुल नै होएत। वैध ज्ञान केवल ज्ञान सँ अधिक अछि; आ एहि कारण ज्ञानक वैधता केँ ज्ञानक अवैधता जकाँ किछु विशेष स्थितिसभ आ विशेषतासभ द्वारा गठित होएबाक आवश्यकता अछि। यदि वैधता ज्ञानमे अन्तर्निहित होएत, तऽ प्रत्येक ज्ञान सत्यता आ वैधता धारण करत आ सन्देह आ त्रुटि अस्थिर भऽ जाएत।' पश्चिमी सत्य सिद्धान्त, जेना भट्ट सर्वेक्षण करैत छथि, देखाबैत अछि जे 'पश्चिममे भारतीय ज्ञानक वैधता आ अवैधताक सिद्धान्तक कोनो सटीक समानान्तर नै अछि।' रीड सोचैत छथि सत्य केवल ज्ञान अपन काम करैत अछि; यथार्थवादी मानैत छथि सत्य तथ्यसभ सँ संगति अछि; अलेक्जेंडर मानैत छथि सुसंगति सत्यक आधार अछि; प्रयोगवादी मानैत छथि सत्य व्यावहारिक रूपसँ उपयोगी परिणाम उत्पन्न करबाक क्षमतामे निहित अछि। नैयायिक स्थिति — जे न वैधता न अवैधता स्वयं-स्पष्ट अछि, दुनू बाह्य स्थितिसभ सँ अनुमानक आवश्यकता, जेना सफल या असफल गतिविधि — वास्तविक रूपसँ अद्वितीय अछि। अवैध ज्ञान: सन्देह, त्रुटि, आ तर्क भट्ट तीन प्रकारक अवैध ज्ञानक व्यवस्थित विवरण प्रदान करैत अछि जे गङ्गेशक तत्त्वचिन्तामणि संबोधित करैत अछि। सन्देह (संशय) एकटा ही वस्तु क सम्बन्धमे विरोधाभासी बोध (विमर्श) अछि, जे एकटा ही वस्तु केँ आरोपित विभिन्न विरोधाभासी गुणसभक बोधसभक गठन करैत अछि। 'ई खम्भा अछि या मनुष्य?' — सन्देह बिना कोनो भेदक निश्चित बोध पर पहुँचै बिना विकल्पसभक बीच डोलैत अछि। सन्देह पाँच कारणसभ सँ उत्पन्न होए सकैत अछि: सामान्य गुण, अद्वितीय गुण, आत्मा क सम्बन्धमे परस्पर विरोधी गवाहीक कारण, प्रत्यक्षक अनियमितताक कारण, आ किसी वस्तुक अस्तित्व या अनस्तित्वक अनुपलब्धिक कारण। त्रुटि या भ्रम (विपर्यय) अवैध ज्ञानक दोसर प्रकार अछि — 'किसी वस्तुक जेना नै अछि, तेना बोध' (अयथार्थ)। एकटा त्रुटिमे, कोनो वस्तु केँ किछु गैर-मौजूद गुण धारण करबाक रूपमे बोध कएल जाइत अछि। नैयायिक प्रस्ताव करैत छथि जे त्रुटि अवैध ज्ञान (अन्यथाख्याति) अछि: जखन वैध ज्ञान वस्तुनिष्ठ अछि, तखन अवैध ज्ञान व्यक्तिपरक अछि वस्तु पर किछु बाहरी विशेषतासभक अध्यारोपणक कारण। भ्रममे, इन्द्रिय किछु दोषक कारण वस्तु (शुक्ति) क वास्तविक विशेषतासभ केँ निश्चित करबामे विफल रहैत अछि, आ ई एकरामे किछु गैर-मौजूद बाहरी विशेषता (चाँदी) केँ आरोपित करैत अछि। एहि प्रकारे त्रुटि वस्तु (शुक्ति) केँ किछु दोसर (चाँदी) क रूपमे निर्णयमे परिणत होइत अछि — अन्यथा ख्याति। भ्रम सिद्धान्तसभक तुलनात्मक विश्लेषण विस्तृत अछि। बौद्ध (योगाचार) प्रस्ताव करैत छथि जे त्रुटि या भ्रम व्यक्तिपरक विचारक बाह्य या अतिरिक्त मानसिक वास्तविकता क रूपमे (आत्म-ख्याति) अछि। माध्यमिक, जे सभ अस्तित्व केँ नकारैत छथि, अनस्तित्वक ज्ञानक सिद्धान्त केँ नकारैत छथि। वाचस्पति मिश्र प्रस्ताव करैत छथि जे त्रुटि असत् (असत्-ख्याति) क ज्ञान अछि। प्रभाकर मीमांसक मानैत छथि जे त्रुटि वस्तुक अज्ञान या अबोध (अख्याति) अछि। अद्वैतवादी प्रस्ताव करैत छथि जे त्रुटि या भ्रम अव्याख्येय (अनिर्वचनीय) क ज्ञान अछि। नैयायिक एहि सभ केँ खण्डन करैत छथि, आग्रह करैत जे त्रुटि एकटा विभेदक आ निश्चित ज्ञान होएबाक चाही जे गतिविधि उत्पन्न करैत अछि — ई अज्ञान नै होए सकैत, किएक एकरामे वस्तुक जेना नै अछि, तेना ज्ञान अस्तित्वमे अछि। तर्क (परिकल्पनात्मक तर्क) अवैध ज्ञानक तेसर प्रकार अछि। ई एकटा प्रकारक निहितार्थपूर्ण तर्क अछि जाहि द्वारा कोनो तर्कक वैधताक परीक्षण कएल जा सकैत अछि। तर्कमे तर्क प्रक्रिया (तर्क भाषा, पृ.४३) किछु अस्थिर प्रस्तावसभ (अनिष्ट प्रसङ्ग) क निष्कर्षणमे समाविष्ट अछि, जकर तार्किक प्रभाव प्रतिप्रस्तावक समर्थन करबैवाला प्रस्तावसभक अवैधताक उजागर करबाक अछि। पाँच प्रकारक तर्क — आत्माश्रय, अन्योन्याश्रय, चक्रक, अनवस्था, आ प्रमाणबाधितार्थप्रसङ्ग — सीधा गङ्गेशक अपन अनुमान-खण्डमे तर्क प्रकार्य पर मैप करैत अछि। प्रत्यक्ष (प्रत्यक्ष) — तत्त्वचिन्तामणिक पहिल पुस्तक प्रत्यक्षक प्रकृति आ परिभाषा न्याय परिभाषा आ गङ्गेशक नवाचार भट्टक प्रत्यक्ष (प्रत्यक्ष) क प्रकृति पर परिचय एकर दार्शनिक आधारभूत स्थिति सँ शुरुआत करैत अछि: 'प्रत्यक्ष (प्रत्यक्ष) ज्ञानक सबसँ मौलिक आ अन्तिम परीक्षण अछि। कोनो अनुमान आदि क सत्यता या वैधता पर प्रश्न उठा सकैत अछि; मुदा प्रत्यक्षक सत्यता या वैधता पर प्रश्न नै उठा सकैत अछि; ई प्रश्न सँ परे अछि।' प्राच्य-नैयायिक (पुरान न्याय) प्रत्यक्ष केँ इन्द्रियार्थसन्निकर्ष (इन्द्रिय-वस्तु सम्पर्क) सँ उत्पन्न ज्ञानक रूपमे परिभाषित करैत छथि। ई परिभाषा शब्द प्रत्यक्षक व्युत्पत्तिपरक अर्थक अनुसरण करैत अछि (न्यायभाष्य, १.१.४ पर): प्रत्यक्ष अर्थात् वस्तुसभ तक पहुँचबाक लेल इन्द्रियसभक संचालन। हालाँकि, गङ्गेशक नव्य-नैयायिक (तत्त्व चिन्तामणि १.३...) प्रत्यक्ष केँ एकटा अपरोक्ष ज्ञान (साक्षात्कारी ज्ञान) क रूपमे परिभाषित करैत छथि जे कोनो पूर्ववर्ती ज्ञानक साधनता (ज्ञानकारणकं ज्ञानम्) बिना उत्पन्न होइत अछि। हुनकर अनुसार, एहि प्रकारक परिभाषा प्रत्यक्षक सभ मामलासभमे लागू होइत अछि, किएक अपरोक्षता (साक्षात्कारित्व) आ बिना पूर्ववर्ती ज्ञानक उत्पन्न भेल अवस्था सभ प्रत्यक्षमे सामान्य अछि। एहि प्रकारे, केवल नव्यक प्रत्यक्षक परिभाषा — एकटा अपरोक्ष ज्ञान जे बिना पूर्ववर्ती ज्ञानक उत्पन्न भेल — सभ प्रत्यक्षक मामलासभमे लागू होइत अछि; आ अपरोक्षता सभ प्रत्यक्षक एकटा आवश्यक विशेषता अछि। भट्ट एहि नवाचारक तुलना पश्चिमी दृष्टिकोण सँ करैत छथि: 'पश्चिमी दर्शनक अनुसार, प्रत्यक्षक सत्यता अप्रश्ननीय आ स्वयं-स्पष्ट अछि। एहि प्रकारे, जे.एफ. मिल (अ सिस्टम ऑफ लॉजिक, पृ.४), कहैत अछि जे चेतना (अन्तर्ज्ञान) द्वारा हमरा जे किछु ज्ञात अछि, ओ प्रश्नक संभावना सँ परे ज्ञात अछि। आ डब्ल्यू.टी. मार्विन (द न्यू रियलिज्म, पृ.६६) कहैत अछि जे प्रत्यक्ष अन्तिम निर्णायक परीक्षण अछि आ एहि प्रकारे ई अपन संभावनाक पूर्वकल्पना नै करैत अछि।' बौद्ध परिभाषा — प्रत्यक्ष केँ कोनो सेहो कल्पना सँ रहित (कल्पनापोढम्) एकटा दिएल वस्तुक अचूक बोधक रूपमे — खण्डन कएल जाइत अछि किएक 'यदि प्रत्यक्ष वस्तुसभ द्वारा निर्धारित अछि, तऽ सभ सच्चा ज्ञान प्रत्यक्ष होएबाक चाही।' वेदान्ती प्रत्यक्ष केँ तात्कालिक आ कालातीत ज्ञान (चैतन्य) क रूपमे परिभाषित करैत छथि — मुदा ई मानसिक परिवर्तन (मनोवृत्ति) केँ वस्तुसभ सँ अलग नै करैत अछि, किएक प्रत्यक्षक तात्कालिकता केवल इन्द्रिय-उत्तेजना सँ उत्पन्न नै होए सकैत अछि। इन्द्रियसभ, मन, आत्मा, आ हुनकर कार्यसभ भट्ट प्रत्यक्ष तंत्रक एकटा विस्तृत विवरण प्रदान करैत अछि। न्याय कहैत अछि जे प्रत्यक्ष इन्द्रिय-वस्तु-सम्पर्क सँ उत्पन्न होइत अछि आ आत्मा मनक माध्यम सँ वस्तु सँ सम्पर्कमे आबैत अछि; प्रत्यक्षक उत्पादनमे चारि कार्यकारी कारण शामिल अछि: इन्द्रियसभ, वस्तु, मन (मनस्), आ आत्मा (न्याय सूत्र, १.१.४)। नैयायिक आ वैशेषिक मानैत छथि जे मन (मनस्) आत्मा (आत्मन्) मे स्थित आन्तरिक इन्द्रिय (अन्तरिन्द्रिय) क गठन करैत अछि। वस्तुसभक प्रत्यक्ष केवल बाह्य इन्द्रियसभक वस्तुसभ सँ सम्पर्क सँ उत्पन्न नै होए सकैत अछि; प्रत्यक्ष तखन उत्पन्न होए सकैत अछि जखन बाह्य इन्द्रियसभ आन्तरिक इन्द्रिय मन सँ सम्पर्कमे आबैत अछि। चूँकि मन परमाणु आकारक अछि, विभिन्न बाह्य इन्द्रियसभ अलग-अलग समय पर मन सँ सम्पर्कमे आबि विभिन्न वस्तुसभक प्रत्यक्ष उत्पन्न करि सकैत अछि। आत्मा (आत्मन्) व्यक्तिगत आत्मा (जीवात्मन्) क गठन करैत अछि जे सभ ज्ञानक आधार अछि। ज्ञान आ अन्य गुण केवल आत्माक अछि आ आत्माक अलावा कोनो अन्य भौतिक पदार्थ केँ नै अछि, किएक ओ मानसिक अछि। आत्मा विभिन्न शरीरसभमे भिन्न अछि आ नित्य (नित्य) आ सर्वव्यापी या विभु (विभु) अछि। नैयायिक (भाषापरिच्छेद, ५१) वेदान्त दृष्टिकोण नै स्वीकार करैत छथि जे आत्मा नित्य आ स्वयं-प्रकाशित बुद्धि (चित्) अछि। बरु, ई द्रव्य (द्रव्य) अछि जे बुद्धि जकाँ गुणसभक आधार अछि आ एहि कारण अहं या मैं चेतनाक स्थानक रूपमे जानल जाइत अछि। इन्द्रियसभ (इन्द्रिय) छहि अछि: घ्राण (घ्राण), रसना (रसना), चक्षु (चक्षु), त्वक् (त्वक्), श्रोत्र (श्रोत्र) आ आन्तरिक इन्द्रिय या मन (मनस्)। इन्द्रियसभक कार्य वस्तुसभक प्रत्यक्ष उत्पन्न करैत अछि; इन्द्रियसभ केवल वस्तुसभ सँ सीधा सम्पर्क सँ कार्य करैत अछि। इन्द्रिय-वस्तु-सम्पर्क छहि प्रकारक अछि: १) संयोग; २) संयुक्त समवाय; ३) संयुक्त समवेत समवाय; ४) समवाय; ५) समवेत समवाय; आ ६) विशेषणता। सामान्य आ असाधारण प्रत्यक्ष प्रत्यक्ष दुई प्रकारक अछि: सामान्य प्रत्यक्ष (लौकिक) आ असाधारण प्रत्यक्ष (अलौकिक)। सामान्य प्रत्यक्ष इन्द्रिय-वस्तु-सम्पर्क सँ उत्पन्न होइत अछि; जबकि असाधारण प्रत्यक्ष असामान्य माध्यम सँ उत्पन्न होइत अछि। सामान्य प्रत्यक्ष आगा दुई प्रकारमे विभाजित अछि: बाह्य प्रत्यक्ष (बाह्य) आ आन्तरिक प्रत्यक्ष (मानस)। बाह्य प्रत्यक्ष छहि इन्द्रिय सम्पर्कसभ सँ सम्बन्धित अछि; आन्तरिक प्रत्यक्ष (भाषापरिच्छेद, ५७) आन्तरिक इन्द्रिय मन (मनस्) सँ उत्पन्न होइत अछि आ एकर वस्तु सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, ज्ञान आ प्रयत्नक भावनासभ अछि। न्याय प्रणाली तीन प्रकारक असाधारण (अलौकिक) प्रत्यक्ष केँ मान्यता देबैत अछि: १) सामान्य लक्षण द्वारा विशेषित अनिश्चित प्रत्यक्ष; २) ज्ञानलक्षण द्वारा विशेषित प्रत्यक्ष; आ ३) योगज (अन्तर्ज्ञानपूर्ण सम्पर्क) द्वारा विशेषित प्रत्यक्ष। सामान्य लक्षण द्वारा विशेषित प्रत्यक्ष असाधारण प्रत्यक्षक पहिल प्रकार गठित करैत अछि — ई सार्वभौमिक या सामान्य गुण द्वारा विशेषित वस्तुसभक सम्पूर्ण वर्गक एकटा प्रत्यक्ष अछि। उदाहरण: 'ई घड़ा अछि' (अयं घटः) घटत्वक सार्वभौमिक द्वारा विशेषित घड़ाक एकटा प्रत्यक्ष अछि। नैयायिक मानैत छथि ई एकटा आवश्यकता अछि — यदि सार्वभौमिक द्वारा विशेषित प्रत्यक्ष स्वीकार नै कएल जाए, तऽ 'जतय धुआँ अछि, ततय आगि अछि' जकाँ अविनाभाव सम्बन्धक ज्ञान अस्थिर भऽ जाएत। ज्ञानलक्षण द्वारा विशेषित प्रत्यक्ष असाधारण ज्ञानक दोसर प्रकार गठित करैत अछि। ई ज्ञानक संचालन (विषयियस्य तस्यैव व्यापारः) द्वारा अर्जित इन्द्रियसभ सँ सम्पर्कमे एकटा वस्तुक प्रत्यक्ष अछि। उदाहरण: 'हम सुगन्धित चन्दन देखैत छी' (सुरभिचन्दनम्) ज्ञानलक्षण द्वारा विशेषित एकटा प्रत्यक्ष अछि, किएक सुगन्धित चन्दन दृष्टि इन्द्रिय सँ प्राप्त नै कएल जा सकैत अछि, आ एकरा ज्ञानक संचालन द्वारा प्राप्त करबाक आवश्यकता होइत अछि। नैयायिक आगा कहैत छथि जे 'ई (शुक्ति) चाँदीक टुकड़ा अछि' (इदं रजतम्) जकाँ भ्रम सेहो चाँदीक पूर्ववर्ती ज्ञानक संचालन द्वारा समझाएबाक आवश्यकता अछि, किएक दृष्टि इन्द्रिय केवल शुक्ति सँ सम्पर्कमे अछि, चाँदी सँ नै। ज्ञानलक्षण (योगज) द्वारा विशेषित प्रत्यक्ष तेसर प्रकार गठित करैत अछि — ई ध्यान (योगाभ्यास जनितो धर्म विशेषः) द्वारा मनमे उत्पन्न शक्तिसभ सँ अतीत, वर्तमान आ भविष्यक वस्तुसभक प्रत्यक्ष अछि। निर्विकल्पक आ सविकल्पक प्रत्यक्ष — गङ्गेशक मूल सिद्धान्त सामान्य प्रत्यक्षक तीन प्रकार भट्ट क अनुसार, सामान्य प्रत्यक्ष तीन प्रकारक अछि: १) निर्विकल्पक प्रत्यक्ष, २) सविकल्पक प्रत्यक्ष, आ ३) प्रत्यभिज्ञा या अनुव्यवसाय। निर्विकल्पक प्रत्यक्ष या ज्ञान (निर्विकल्पक) सामान्य प्रत्यक्षक पहिल प्रकार गठित करैत अछि। ई वस्तुसभक सबसँ अमूर्त दृष्टि अछि — शाब्दिक सम्बन्ध बिना वस्तुक अस्तित्वक एकटा सरल बोध। सविकल्पक प्रत्यक्ष वस्तुसभक एकर गुणसभ सहित सबसँ मूर्त प्रत्यक्ष अछि। प्रत्यभिज्ञा सविकल्पक प्रत्यक्षक पश्चात्-ज्ञान अछि आ निर्विकल्पक आ सविकल्पक दुनू सँ स्पष्ट रूपसँ भिन्न अछि। निर्विकल्पक प्रत्यक्ष पर अन्तःसम्प्रदायिक बहस वेदान्ती (रामानुज ब्रह्मसूत्र १.१.१ पर) मानैत छथि जे निर्विकल्पक ज्ञान शुद्ध सत्ता (सन्मात्र) क ज्ञान अछि — 'ई किछु अछि' (इदं किञ्चित्) — आ एकरामे कोनो सम्बन्ध या गुणसभक विशिष्टता शामिल नै अछि। बौद्ध मानैत छथि (प्रमाणसमुच्चय, अध्याय १) जे निर्विकल्पक ज्ञान वैध ज्ञानक एकमात्र प्रकार अछि — ई कोनो सेहो विचार या कल्पना सँ रहित (कल्पनापोढम्) अछि। मीमांसक मानैत छथि जे निर्विकल्पक ज्ञान एकटा वास्तविक व्यक्तिक एकटा प्रत्यक्ष बोध अछि जे सार्वभौमिक आ विशिष्टक एकता अछि। हालाँकि, प्रभाकर मीमांसकक स्थिति महत्वपूर्ण अछि: निर्विकल्पक ज्ञान इन्द्रियसभ आ वस्तुसभक बीच सम्पर्क पर स्वतःस्फूर्त रूपसँ उत्पन्न होइत अछि — ई बच्चा आ तत्समानक प्रत्यक्ष अछि। तथापि प्रभाकर मीमांसकक भाषाविद्सभक खण्डन सेहो महत्वपूर्ण अछि: निर्विकल्पक ज्ञान किसी वस्तुक पहिल अनुभव अछि आ शाब्दिक सम्बन्ध बिना वस्तुक अस्तित्वक एकटा सरल बोध अछि। जखन सविकल्पक ज्ञानमे वस्तु आ एकर गुण विषय-विधेय सम्बन्धमे खड़ा रहैत अछि, तखन निर्विकल्पक ज्ञानमे ओही वस्तु आ गुण असम्बद्ध अछि आ विषय-विधेय सम्बन्धमे नै रहैत अछि। नैयायिक, दोसर दिशा सँ, मानैत छथि जे निर्विकल्पक ज्ञान एकटा वास्तविक मुदा अतीन्द्रिय सचेतन अवस्था (अतीन्द्रिय) अछि। चूँकि ई एकटा अनिश्चित वस्तुक अविभेदित अनुभूति अछि, ई निश्चित प्रत्यक्ष नै होए सकैत अछि। सविकल्पक प्रत्यक्ष आ विशिष्ट संरचना सविकल्पक प्रत्यक्ष या ज्ञान (सविकल्पक) सामान्य प्रत्यक्षक दोसर प्रकार गठित करैत अछि। ई वस्तुसभक एकर गुणसभ सहित सबसँ मूर्त प्रत्यक्ष अछि। वेदान्ती (रामानुज ब्रह्मसूत्र १.१.१ पर) मानैत छथि जे सविकल्पक ज्ञान एकटा वस्तुक एकटा विशिष्ट ज्ञान अछि जे एकरा दोसर वस्तुसभ सँ अलग करैत अछि (विकल्प)। नव अद्वैतवादी ज्ञानमीमांसकसभ सँ सहमत अछि जे सविकल्पक ज्ञान एकटा व्यक्तिगत सम्पूर्णक रूपमे वस्तुक एकटा शाब्दिक निर्णय अछि। बौद्ध (न्यायवार्तिकतात्पर्यटीका, १.१.४ पर) मानैत छथि जे सविकल्पक ज्ञान एकटा शाब्दिक अभिव्यक्ति अछि जाहिमे एकटा वस्तु नाम, वर्ग आदि (नामजात्यादियोजनसहित) क अवधारणासभ द्वारा निर्धारित होइत अछि। नैयायिक (भाषापरिच्छेद, ५८) मानैत छथि जे सविकल्पक ज्ञान एकटा विशिष्ट ज्ञान (विशिष्ट ज्ञान) अछि जाहिमे वस्तु गुणसभ द्वारा योग्य जानल जाइत अछि। हुनकर अनुसार, प्रत्यक्षक वस्तु एतय किछु गुणसभ द्वारा योग्य जानल जाइत अछि। उदाहरण लेल, सविकल्पक ज्ञान एकटा निर्णय अछि जेना 'ई गाय अछि' (अयं गौः) जाहिमे वस्तु गाय गोत्वक गुण द्वारा योग्य जानल जाइत अछि। एहि प्रकारे, सविकल्पक ज्ञान एकटा प्रस्ताव अछि जाहिमे विषय वस्तु या व्यक्ति अछि आ विधेय गुण अछि। जखन निर्विकल्पक सामान्य प्रत्यक्षक पहिल चरण अछि, तखन सविकल्पक प्रत्यक्षक दोसर चरण अछि। प्रत्यभिज्ञा (पहिचान, अनुव्यवसाय) प्रत्यभिज्ञा (प्रत्यभिज्ञा या अनुव्यवसाय) सामान्य प्रत्यक्षक तेसर प्रकार गठित करैत अछि। ई सविकल्पक प्रत्यक्षक पश्चात्-ज्ञान अछि आ निर्विकल्पक आ सविकल्पक दुनू सँ स्पष्ट रूपसँ भिन्न अछि। पहिचान (प्रत्यभिज्ञा), सामान्य अर्थमे, वस्तुक प्रकृतिक एहि प्रकारे बोध के अर्थ अछि; आ ई, संकीर्ण अर्थमे, पहिने सँ ज्ञात किसी वस्तु केँ फेर सँ जानबाक अर्थ अछि। पहिचान (प्रत्यभिज्ञा) क प्रयोग न्याय दर्शनमे एहि दोसर संकीर्ण अर्थमे होइत अछि। नैयायिक (मिताभाषिणी, पृ.२५) मानैत छथि जे पहिचान अखन प्रत्यक्ष कएल गेल किसी वस्तु केँ पहिने प्रत्यक्ष कएल गेल वस्तुक रूपमे ज्ञान अछि। उदाहरण लेल, पहिचान 'ई (देवदत्त) ओ देवदत्त अछि' (सोऽयं देवदत्तः) अखन प्रत्यक्ष कएल गेल देवदत्तक पहिने प्रत्यक्ष कएल गेल देवदत्तक रूपमे ज्ञान अछि। एहि प्रकारक पहिचान दुनू इन्द्रियसभ आ वस्तुसभक पूर्ववर्ती अनुभवक संस्कार (संस्कार) द्वारा उत्पन्न ज्ञान अछि (न्यायमञ्जरी, पृ.४५९)। एहि प्रकारे, पहिचान प्रत्यक्ष आ स्मरण दुनू गठित करैत अछि, किएक ई दुनू इन्द्रियसभ आ संस्कारसभ द्वारा उत्पन्न होइत अछि। तुलनात्मक आ विश्व-दार्शनिक परिप्रेक्ष्य गङ्गेश, डेसकार्टेस, आ लाइबनिज: तर्क-संवेदनशील तत्वमीमांसा शार्फस्टाइनक 'अ कम्पेरेटिव हिस्ट्री' क सबसँ प्रकाश डालबैवाला योगदानसभमे सँ एक अध्याय १० ('तर्क-संवेदनशील, पद्धतिगत तत्वमीमांसा: गङ्गेश, डेसकार्टेस, लाइबनिज') मे गङ्गेशक डेसकार्टेस (१५९६-१६५०) आ लाइबनिज (१६४६-१७१६) क साथ व्यवस्थित तुलना अछि। आयोजन थीम पद्धतिगत रूपसँ प्रयुक्त तर्कक माध्यम सँ निश्चितताक खोज अछि — प्रत्येक दार्शनिक ज्ञान केँ तर्क पद्धतिकेँ सिद्ध करि स्थापित करबाक चाहैत अछि, नै कि अधिक अनुभवजन्य सामग्री जोड़ि। शार्फस्टाइन कतेक संरचनात्मक समानतासभक पहिचान करैत अछि। तीनु दार्शनिक प्रतिबद्ध तर्कशास्त्री अछि जे तर्क-विधिसभक सुधार करबाक चाहैत अछि आ हुनका मानवीय चिन्ताक पूर्ण दायरामे लागू करबाक — केवल दर्शन नै, बल्कि जीवनक लेल सेहो, डेसकार्टेसक मामलामे चिकित्सा तक, आ लाइबनिजक मामलामे कानून तक। गङ्गेशक वैध आगमन आ किफायती व्याख्याक समस्यासभ सँ जुड़ाव भावना मे समकालीन विज्ञानक दार्शनिकसभ जकाँ अछि।' तीनु सेहो 'दुनियाँक समझक लेल एकटा तत्वमीमांसीय रूपसँ अप्रश्ननीय आधार खोजैत छथि जे अनुभवजन्य आ सैद्धान्तिक आ धर्मनिरपेक्ष आ पवित्र केँ जोड़ैत अछि।' आ तीनु तीव्र संशयवादी चुनौतिसभक प्रतिक्रिया देबैत छथि — गङ्गेश चार्वाक आ श्रीहर्ष केँ, डेसकार्टेस कार्टेशियन दानव केँ, लाइबनिज कट्टर अनुभववाद केँ। विपरीततासभ सेहो समान रूपसँ शिक्षाप्रद अछि। डेसकार्टेस परम्परा सँ टूटैत अछि, स्रोत उद्धृत करबा सँ इनकार करैत अछि; गङ्गेश, सभ भारतीय दार्शनिक जकाँ, अपन पूर्ववर्ती उदयन सँ आदरपूर्वक जुड़ैत अछि, भले ओ हुनका सँ विदा होएत। डेसकार्टेसक विधि स्वयंसिद्ध-निगमनात्मक अछि, जे स्पष्ट आ विशिष्ट विचारसभक माध्यम सँ निश्चितताक लक्ष्य रखैत अछि; गङ्गेशक विधि परिभाषा-द्वन्द्वात्मक अछि, जे व्याप्ति आ अन्य प्रमुख अवधारणासभक प्रतिस्पर्धी परिभाषासभक व्यापक जाँच आ अस्वीकारक माध्यम सँ निश्चितताक लक्ष्य रखैत अछि। लाइबनिज, वास्तविक रचनात्मक तर्कशास्त्री, नव प्रारूपवादक आविष्कार करैत अछि; गङ्गेश पूर्ण रूपसँ एकटा विरासतमे प्राप्त शब्दावलीक भीतर काम करैत अछि मुदा अपन परिभाषा विश्लेषणक सटीकता आ पूर्णता द्वारा एकरा रूपान्तरित करैत अछि। शार्फस्टाइनक अपन तुलनात्मक निर्णय: 'गङ्गेश दर्शन केँ एकटा विशिष्ट भाषामे निपुण व्यक्तिसभक निस्संदेह क्षेत्र बना देबैत अछि। ओ आ हुनकर अनुयायी परिभाषासभ रचना करैत छथि जे मन केँ फैलाबैत अछि आ सटीक आलोचना केँ आमन्त्रित करैत अछि, मुदा केवल उन सभक लेल जे प्रासंगिक तकनीकी शब्द आ तर्क पद्धतिसभमे निपुण भऽ गेल अछि।' गङ्गेश जे नव्य-न्याय प्रणालीक शुरुआत केलक, प्रभावी रूपसँ दार्शनिक प्रवचनक लेल एकटा औपचारिक भाषा बनौलक जे उन्नीसम् शताब्दीक अन्तमे यूरोपमे प्रतीकात्मक तर्कक विकासक आश्चर्यजनक तरिकासभमे पूर्वानुमान करैत अछि — यद्यपि प्रतीकात्मक संकेतन बिना। गङ्गेश आ उदयन: परम्पराक भीतर नवाचार गङ्गेश आ हुनकर सबसँ महत्वपूर्ण पूर्ववर्ती उदयन (फ्लोरुइट १०५० ई.) क बीच सम्बन्ध शार्फस्टाइन आ पॉटर इन्साइक्लोपीडिया दुनूमे एक केन्द्रीय विषय अछि। शार्फस्टाइन नोट करैत छथि: 'किएक हुनकर दर्शनक बहुत किछु उदयनक विस्तार अछि, जाहि पर हम एतय आकर्षित करैत छी, गङ्गेशक मौलिकता हुनकर द्वन्द्वशास्त्रमे, जिस सावधानी आ तीक्ष्णता सँ ओ तर्क करैत अछि — बाल बाँटबा, कहबा आसान अछि — मौलिक सिद्धान्त सँ अधिक प्रदर्शित होइत अछि।' एकटा फुटनोट जोड़ैत अछि: 'उदयन दुनूमे सँ अधिक मौलिक होए सकैत अछि। अधिक मौलिकता गङ्गेशक उत्तराधिकारी, टीकाकार आ आलोचक, रघुनाथ (फ्लोरुइट १५०० ई.) केँ सेहो आरोपित कएल गेल अछि।' पॉटर इन्साइक्लोपीडिया शार्फस्टाइनक तुलनात्मक अध्याय (हुनकर पुस्तकक अध्याय ९, उदयन पर) केँ गङ्गेश अध्याय पढ़बाक लेल दार्शनिक सन्दर्भ प्रदान करबाक रूपमे पहिचान करैत अछि। हालाँकि, पॉटर इन्साइक्लोपीडिया गङ्गेशक मौलिकताक अधिक सूक्ष्म मूल्यांकन प्रदान करैत अछि। महत्वपूर्ण नवाचार अछि: (१) सभ पूर्व प्रयाससभक व्यापक जाँचक बाद व्याप्तिक निर्णायक उपचार; (२) प्रतिबन्धक-प्रतिबद्ध सिद्धान्तक बोधक एकटा व्यवस्थित तर्कमे विकास; (३) बौद्ध सँ मीमांसाक प्राथमिक प्रतिद्वन्द्वीक रूपमे परिवर्तन — जे चौदहम् शताब्दीक भारतक बदलल दार्शनिक परिदृश्य केँ प्रतिबिम्बित करैत अछि; (४) शब्द-खण्डक 'भाषाई मोड़', जे नव्य-न्याय केँ भाषा दर्शनक अपन संस्करण देलक; आ (५) सबसँ ऊपर, तत्त्व-चिन्तामणि आपु स्वयंक माध्यम सँ एकटा नव बौद्धिक समुदायक सृजना — एकटा ग्रन्थ जे सभ बादक नैयायिक बहसक लेल सामान्य सन्दर्भ बिन्दु बनल। तत्त्वमीमांसात्मक ढाँचा आ रघुनाथ शिरोमणि नव्य-न्याय तत्वमीमांसा: श्रेणी आ हुनकर नियति पॉटर इन्साइक्लोपीडियाक परिचय (अध्याय ३, 'तत्वमीमांसा') सात वैशेषिक श्रेणीसभक गङ्गेश सँ रघुनाथ शिरोमणि धरि विकासक अनुरेखण करैत अछि, ई दर्शाबैत अछि जे काति नव्य-न्यायक विश्लेषणात्मक कठोरता धीरे-धीरे ओ तत्त्वमीमांसात्मक संरचना केँ कमजोर क देलक जे एकरा विरासतमे मिलल छल। गङ्गेश आपु स्वयं तत्त्वमीमांसात्मक रूपसँ रूढ़िवादी अछि, सात श्रेणीसभक ढाँचाक भीतर काम करैत अछि — द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय, अभाव। ओ समवाय केँ 'एकटा अलग श्रेणी, जे ई असमाप्य अछि, जे ई बोधगम्य अछि, आ ई एक अछि' क रूपमे बचाओ करैत अछि। ओ एहि दृष्टिकोणक विरुद्ध तर्क करैत अछि जे अभाव केँ अभेदक पक्षमे समाप्त कएल जा सकैत अछि। सार्वभौमिक पर, इन्साइक्लोपीडिया एकटा क्रमिक विकास नोट करैत अछि: 'रघुनाथक समय धरि उचित सार्वभौमिकक संख्या, शायद बिना एकरा पहिचान कए, घटि गेल छल। उदयनक छहि आवश्यकतासभक निहितार्थ धीरे-धीरे लगभग किसी सेहो उम्मीदवार केँ उचित सार्वभौमिकक स्थिति सँ वंचित करबाक रूपमे पहिचानल गेल। रघुनाथक समय धरि व्यावहारिक रूपसँ कोनो सार्वभौमिक नै अछि। एकर बजाय, सामान्य गुणसभ केँ यौगिक आरोपित गुण (उपाधि) क रूपमे मानल जाइत अछि, आ एकटा अलग श्रेणीक स्थिति कभी-कभी हुनका प्रदान कएल जाइत अछि।' इन्साइक्लोपीडिया नोट करैत अछि जे ई 'आदर्शवाद केँ एकटा गम्भीर समर्पण' क रूपमे देखल जा सकैत अछि — आ वास्तवमे, अद्वैत वेदान्त आलोचक नव्य-न्यायक सार्वभौमिकसभक आरोपित गुणक रूपमे पुनर्वर्गीकरणमे एकर दावा कएल गेल यथार्थवादक लेल एकटा अस्थिर आधार पाबैत छल। अभावक उपचार विशेष रूपसँ आकर्षक विकासक क्षेत्र अछि। गङ्गेश प्रत्यक्ष-खण्डमे एकरा एकटा अध्याय समर्पित करैत अछि, मुदा ओ अभावक अभावक समस्या नै उठाबैत अछि। बादक टीकाकार, विशेष रूपसँ रघुनाथ, जे 'किसी चीजक निरपेक्ष अभावक निरपेक्ष अभाव ओही चीज अछि' केँ अपन कार्यशील सिद्धान्तक रूपमे लैत अछि, परिमाणीकरणक उपकरणक रूपमे बढ़ती तकनीकी परिष्कार क साथ अभावसभक प्रयोग करैत अछि। इन्साइक्लोपीडिया नोट करैत अछि जे 'गङ्गेश सँ रघुनाथ धरि नव्यन्यायक विकासक सबसँ आकर्षक विशेषतासभमे सँ एक अछि परिमाणीकरणक साधनक रूपमे अभावसभक प्रयोगमे उल्लेखनीय वृद्धि।' रघुनाथ शिरोमणि: गङ्गेशक महान आलोचक आ उत्तराधिकारी पॉटर इन्साइक्लोपीडिया रघुनाथ शिरोमणि (फ्लोरुइट १५०० ई.) केँ खण्ड ६ मे सर्वेक्षण काल समाप्त करबैवाला आ सभ बादक नव्य-न्यायक लेल एजेंडा निर्धारित करबैवाला व्यक्तिक रूपमे भूमिका देबैत अछि। रघुनाथक पक्षधर मिश्र (जयदेव) सँ मिथिलामे साक्षात्कारक प्रसिद्ध कहानी — झा 'आशोक' मोनोग्राफमे संरक्षित — ओ बिन्दु केँ चिह्नित करैत अछि जतय नवद्वीप (बंगाल) परम्परा नव्य-न्यायक आगा विकासक प्राथमिक वाहन बनल। रघुनाथक तत्त्व-चिन्तामणि पर दीधिति परम्पराक सबसँ महत्वपूर्ण द्वितीयक ग्रन्थ अछि, जे जगदीश आ गदाधर सँ आगा अपन विशाल टीका साहित्य उत्पन्न केलक। रघुनाथक गङ्गेश सँ सम्बन्ध आलोचनात्मक विस्तारक अछि: ओ गङ्गेशक ढाँचा स्वीकार करैत अछि जबकि लगभग प्रत्येक विशिष्ट सिद्धान्त केँ कट्टरपंथी संशोधन केँ अधीन करैत अछि। इन्साइक्लोपीडियाक शब्दमे: 'रघुनाथ गङ्गेशक तर्क (कतेक तकनीकी बिन्दुसभ पर) अस्वीकार करैत अछि' — आ वास्तवमे पैटर्न पूरा खण्डमे दोहराबैत अछि। सार्वभौमिक पर, जतय गङ्गेश रूढ़िवादी अछि, रघुनाथ लगभग सभ उचित सार्वभौमिक केँ समाप्त करि देबैत अछि, सामान्य गुणसभक आरोपित गुण (उपाधि) क रूपमे मानैत अछि। विशेष पर, ओ श्रेणी केँ पूर्ण रूपसँ समाप्त करि देबैत अछि। समवाय पर, जतय गङ्गेश एकटा एकल समवाय क बचाओ करैत अछि, रघुनाथ घोषित करैत अछि जे जतना जोड़ी जोड़ी सम्बन्धित होएबाक अछि, उतना समवाय अछि। अवच्छेदकत्व सम्बन्ध पर, ई रघुनाथ अछि जे एकरा विश्लेषणक एकटा विशेष रूपसँ महत्वपूर्ण उपकरण बनाबैत अछि। पॉटर इन्साइक्लोपीडिया सारांशित करैत अछि: 'रघुनाथक उपकरणक कतना हुनकर आविष्कार छल, आ कतना ओ अपन शिक्षकसभ आ परम्परा सँ प्राप्त केलक, जे दुई महान नैयायिकसभक बीच हस्तक्षेप करबैवाला व्यक्तिसभक निकट अध्ययन नै कएल गेल, तब धरि कहबा असम्भव अछि।' विरासत, टीका परम्परा, आ मिथिलाक जीवित धरोहर टीका परम्परा तत्त्व-चिन्तामणि पर टीका परम्परा संस्कृत साहित्यमे सबसँ विस्तृत परम्परासभमे सँ एक अछि। झा 'आशोक' मोनोग्राफ २३ ज्ञात टीकाकारसभक एकटा तालिका प्रदान करैत अछि हुनकर रचनासभक साथ; पॉटर इन्साइक्लोपीडिया हुनका गङ्गेश आ वटेश्वर सँ रघुनाथ शिरोमणि धरि पचास क्रमांकित प्रविष्टिसभमे सर्वेक्षण करैत अछि। परम्परा भौगोलिक रूपसँ तीन परम्परासभमे विभाजित अछि: मैथिल, बाङ्गाल (नवद्वीप), आ दक्षिण। मिथिलामे, परम्परा वर्धमान उपाध्यायक अन्तर्निहित जुड़ाव सँ पक्षधर मिश्र (जयदेव) 'आलोक' टीका आ बादक आलोक-परम्परा (पक्षधर-यज्ञपति रेखा) आ दूषणोद्धार-परम्परा (नरहरि-माधव रेखा) क बीच आन्तरिक विवाद धरि चलैत अछि। बंगालमे, रघुनाथ शिरोमणिक दीधिति अध्ययनक प्राथमिक वस्तु बनल, जे रुचिदत्त मिश्र, जगदीश तर्कालंकार, गदाधर भट्टाचार्य, मथुरानाथ तर्कवागीश, आ अनेक दोसर सँ टीकासभ आकर्षित केलक। शार्फस्टाइन मतिलाल केँ परम्पराक उपलब्धि पर उद्धृत करैत छथि: 'नव्य-न्यायक उस्ताद पहिने निष्कर्ष नै रचैत छल आ बादमे सिद्धान्त सँ हुनका औचित्य देबैत छल। ओ गम्भीरतापूर्वक वास्तविकताक अनुसरण करबामे संलग्न छल, जतय सेहो ओ हुनका ले जाए, अपन पूर्वाग्रहसभ केँ यथासंभव हल्का रूपसँ थोपैत छल... ई ठीक ओही गुण अछि जे मैं आधुनिक विज्ञान आ दर्शनक रचनात्मक कार्यकर्तासभमे सराहनीय पाबैत छी।' पॉटर इन्साइक्लोपीडिया (प्रस्तावना) एहि परम्परा द्वारा प्रस्तुत विद्वत्तापूर्ण चुनौती केँ स्पष्ट करैत अछि: 'भारतक दुई सबसँ उल्लेखनीय दार्शनिक, गङ्गेश आ रघुनाथ शिरोमणि, एहि पृष्ठसभमे शामिल अछि — वास्तवमे, ओ सर्वेक्षण काल शुरू आ समाप्त करैत अछि... लगभग १३१० आ १५१० क बीच केवल दुई सौ वर्ष। एहि छोट अवधि पर एहि गहन ध्यानक लेल अच्छा कारण अछि।' आशय ई अछि जे विश्व दर्शनमे अन्यत्र समान अवधि शायद ही कभी एकटा परम्परामे तुलनीय प्रतिष्ठाक दुई व्यक्ति उत्पन्न करैत अछि — आ हुनकर बीचक दुई शताब्दी दर्जनों टीकाकार उत्पन्न केलक जकर रचना उच्चतम स्तर पर एकटा निरन्तर, आत्म-आलोचनात्मक, दार्शनिक रूपसँ कठोर वार्तालाप गठित करैत अछि। मैथिली संस्कृतिक समानांतर इतिहासमे गङ्गेश मुख्यधारा बनाम समानांतर इतिहासलेखन मैथिली साहित्यक समानांतर इतिहास — जेना विदेह आन्दोलनक अनुसन्धान आ दस्तावेज 'अ पैरेलल हिस्ट्री ऑफ मैथिली लिटरेचर' मे प्रलेखित — संस्थागत मैथिली साहित्यिक कैननक लेल एकटा व्यापक प्रतिकथा प्रस्तुत करैत अछि। मुख्यधाराक इतिहास, जेना जयकान्त मिश्रक दुई-खण्डीय 'हिस्ट्री ऑफ मैथिली लिटरेचर' (१९४९-१९५०) मे क्रिस्टलाइज भेल आ १९६५ सँ साहित्य अकादमी द्वारा संस्थागत रूपसँ लागू कएल गेल, 'मूल रूपसँ पहिचान-निर्माणमे एकटा अभ्यास छल, जे मैथिली केँ हिन्दीक बोलीक बजाय एकटा स्वतन्त्र भाषाक रूपमे स्थापित करबाक लेल डिजाइन कएल गेल छल। जबकि ई रचना मैथिलीक भारतीय संविधानक आठम् अनुसूचीमे अन्ततः मान्यता दिलाबामे सहायक छल, समानांतर इतिहास तर्क करैत अछि जे ओ एकटा रूढ़िवादी, ब्राह्मण-केन्द्रित मानक सेहो स्थापित केलक जे उदारवादी आ उपेक्षित आवाजसभकेँ बहिष्कृत केलक।' समानांतर इतिहास नौ परतसभमे प्रकट होइत अछि: (१) बौद्ध आधार — २३ सिद्ध कविसभ (लुइपाद, कण्हपाद, सरहा) के ५० चर्यापद मैथिली गीतक सच्चा जड़क रूपमे; (२) दुई विद्यापति — विदेहक सबसँ महत्वपूर्ण विद्वत्तापूर्ण हस्तक्षेपसभमे सँ एक, प्रसिद्ध पदावली कवि (ज्योतिरीश्वर-पूर्व) केँ संस्कृत/अवहट्ट लेखक विद्यापति ठक्कुरह (१३५०-१४३५) सँ अलग करबाक; (३) दमित गङ्गेश — मूल पंजी पाण्डुलिपि साबित करैत अछि जे दार्शनिक गङ्गेश उपाध्याय एकटा अन्तर्जातीय सम्बन्ध सँ जन्मल छल; (४) औपनिवेशिक युगक विरोध कविता — फतुरीलालक अकाल कविता (१८७३-७४); (५) हरिमोहन झाक बहिष्कार; (६) जीवित उस्ताद — राजदेव मण्डल आ बेचन ठाकुर; (७) विनीत उत्पल/ आशीष अनचिन्हार द्वारा आरटीआई खुलासा (२०११-१२) ९०%+ साहित्य अकादमी नियुक्ति सलाहकार बोर्डक मित्र/रिश्तेदार केँ गेल; (८) नेपाल पक्ष — नेपाल तराईक मैथिली समान रूपसँ केन्द्रीय; (९) डिजिटल प्रतिकार-अभिलेख — विदेह आपु स्वयं। दमित गङ्गेश — एक विरासतक सम्मान-हत्या समानांतर इतिहास गङ्गेशक जीवनीक संस्थागत उपचार केँ 'सम्मान-हत्या' कहैत अछि। विशिष्ट आरोप, दूषण पंजी (वंशावली अभिलेखक 'काली किताब', जे गजेन्द्र ठाकुरक विदेह द्वारा २००९ मे जारी) सँ प्रलेखित: गङ्गेश उपाध्याय एकटा चर्मकारिणी (चमड़ा सिझावै वाली जातिक महिला) सँ विवाह केनए छल आ हुनकर पिताक मृत्युक पाँच वर्ष बाद जन्म भेल छल। ई सूचना रामानाथ झा — साहित्य अकादमीमे मैथिलीक पहिल संयोजक आ संस्थागत मैथिली कैननक प्राथमिक द्वारपाल — द्वारा दमन कएल गेल छल जखन ओ इतिहासकार दिनेश चन्द्र भट्टाचार्य केँ साथ संवाद केलक। साहित्य अकादमीक २०१६ मोनोग्राफ गङ्गेश पर, भारतीय साहित्यक निर्माता शृंखलामे उदयनाथ झा 'आशोक' द्वारा प्रकाशित, दमन केँ कायम राखलक। ई पुनःप्राप्तिक महत्व जीवनी सँ परे अछि। पंजी प्रणाली — जे संस्थागत इतिहास सांस्कृतिक विशिष्टताक चिह्नक रूपमे मानैत अछि — जाति शुद्धता बनाए रखबाक लेल डिजाइन कएल गेल छल, वंशावली डेटा रिकार्ड करि जे विवाह गठबन्धन केँ लागू या अस्वीकार करबाक लेल प्रयोग कएल जा सकत छल। दूषण पंजी अभिलेख जारी करि, विदेह आन्दोलन प्रदर्शित केलक जे ई प्रणाली आपु स्वयं, जखन ईमानदारी सँ जाँचल जाए, तऽ शुद्धता क विचारधारा केँ कमजोर करैत अछि जे एकरा बनाए रखबाक लेल छल। मिथिला परम्पराक सबसँ महान दार्शनिक, जे व्यक्ति प्रत्येक परिभाषाक प्रत्येक संभावित प्रतिउदाहरणक विरुद्ध परीक्षण करबाक आग्रह करैत छल, एकटा जीवन जीवलक जे आपु स्वयं जाति मानदण्डसभक एकटा प्रतिउदाहरण छल जे बादमे हुनका दावा केलक। मैथिलीक व्यापक बौद्धिक परिस्थितिकीमे गङ्गेश समानांतर इतिहास गङ्गेश केँ संस्थागत कथा सँ अनुमति देबाक अपेक्षा अधिक बहुलवादी बौद्धिक परिस्थितिकीक भीतर रखैत अछि। ओही १४म् शताब्दीक मिथिला जे तत्त्वचिन्तामणि उत्पादन केलक, ओहिमे नाथ सम्प्रदाय साहित्यमे सिद्धाचार्य परम्पराक प्रभाव सेहो छल; ज्योतिरीश्वर ठाकुरक वर्णनरत्नाकर (कोनो पूर्वोत्तर भारतीय भाषामे सबसँ पुरान गद्य रचना) एकर अरबी आ फारसी उधार शब्दसभ सहित; आ अन्तर्जातीय सांस्कृतिक नेटवर्क जाहिमे गङ्गेशक अपन परिवार स्पष्ट रूपसँ भाग लेनए छल। समानांतर इतिहास नोट करैत अछि जे 'मिथिला कोनो एहि प्रकारक संघर्ष नै छल, जे कारण अछि जे तर्कशास्त्र या न्यायशास्त्र, एकर मिथिलामे प्रगति इतनी उच्च छल जे भारतक कोनो अन्य क्षेत्र उतना न्याय विद्वान या न्याय ग्रन्थ उत्पादन नै केलक' — मुदा जोड़ैत अछि जे ई बौद्धिक उत्कृष्टता एकटा सामाजिक दुनियाँमे प्राप्त आ संचालित भेल जे संस्थागत इतिहास स्वीकार करबाक अपेक्षा अधिक जटिल छल। लिपि, भाषा, आ डिजिटल पुनःप्राप्ति समानांतर इतिहास मिथिलाक लिपिसभक इतिहास केँ सांस्कृतिक पहिचानक केन्द्रीय रूपमे दस्तावेज करैत अछि। तिरहुता लिपि (मिथिलाक्षर), गुप्त लिपिक पूर्वी किसिम सँ विकसित, लगभग एक सहस्राब्दी धरि सभ शैक्षिक, सांस्कृतिक आ धार्मिक मामलासभक लेल प्रयोग कएल गेल। बीसम् शताब्दीमे देवनागरीमे संक्रमण — मुद्रण सुविधा आ हिन्दी-पेटी प्रशासनिक तर्क सँ प्रेरित — समानांतर इतिहासकारसभ द्वारा सांस्कृतिक अधिकार हननक एकटा रूपक रूपमे देखल जाइत अछि। विदेह आन्दोलनक यूनिकोडमे तिरहुता (२०१४) क सफल मानकीकरण आ डिजिटल फ़ॉन्टक विकास भाषाई संप्रभुताक एकटा तकनीकी पुनःदावा क अभ्यावेदन करैत अछि। डिजिटल अभिलेख विदेह ने मिथिलाक बौद्धिक धरोहर क चारो ओर निर्माण केनए अछि — हजारों अङ्कीकृत पुस्तक, ११,००० अनुलेखित ताड़पत्र तिरहुता पाण्डुलिपि, दूषण पंजी अभिलेख, पहिल मैथिली वेबसाइट एकत्रीकरणकर्ता, तिरहुता यूनिकोड प्रतिनिधित्व, आ मैथिली गूगल ट्रांसलेट आ विकिपीडिया स्थानीयकरण — जे समानांतर इतिहास 'जीवित समानांतर संस्था' कहैत अछि, गठित करैत अछि। गङ्गेशक तत्त्वचिन्तामणि एहि अभिलेख सँ ब्राह्मण्य रूढ़िवादिताक स्मारकक रूपमे नै, बल्कि एकटा सम्पूर्ण सभ्यतागत धरोहरक भागक रूपमे सम्बन्धित अछि जकर जटिलता संस्थागत कथा ने लगातार कम करि कए बतौलक। मैथिली गजलक पुनरुत्थान: अंचिन्हार आखर समानांतर इतिहास मैथिली समानांतर साहित्य आन्दोलनक सबसँ उल्लेखनीय हालिया उपलब्धिसभमे सँ एक — अंचिन्हार आखर समूहक माध्यम सँ मैथिली गजलक पुनरुत्थान — केँ दस्तावेज करैत अछि। आन्दोलन ११ अप्रैल २००८ केँ अंचिन्हार आखर ब्लगक शुभारम्भ सँ शुरू भेल, जे आशीष अंचिन्हार द्वारा शुरू कएल गेल, बादमे गजेन्द्र ठाकुर द्वारा सह-सम्पादित। एक दशकक भीतर, ई ३५० से ४०० नव आ पहिने सँ उपेक्षित लेखकसभकेँ मैथिली साहित्यिक मुख्यधारामे लानेलक, संस्थागत द्वारपालसभक पूर्ण रूपसँ दरकिनार करि। गजल — एकटा अरबी-फारसी काव्य रूप अपन दोहा (शेर/बैत), कठोर मात्रात्मक पैटर्न (बहर), तुक (क़ाफ़िया), अंतरा (रदीफ), आ अन्तिम दोहामे कविक हस्ताक्षर (मकता तखल्लुस सहित) सँ परिभाषित — लम्बा समय धरि संस्थागत मैथिली साहित्यिक प्रतिष्ठान द्वारा एकर उर्दू आ मुस्लिम सांस्कृतिक परम्परा सँ जुड़ावक कारण विरोध कएल गेल छल। समानांतर इतिहास विडम्बना बताबैत अछि: ज्योतिरीश्वरक वर्णनरत्नाकर अरबी आ फारसी उधार शब्दसभक प्रयोग करैत अछि, आ मुस्लिम बुनकरसभक बोली (जोलाहीबोली) आपु स्वयं मैथिलीक एकटा क्रियोल रूप अछि। 'इक्कीसम् शताब्दीमे मैथिली गजलक औपचारिक पुनरुत्थान एहि कारण एकटा विच्छेद सँ कम आ दमित अन्तःसांस्कृतिक धागाक पुनःप्राप्ति सँ अधिक अछि।' गजेन्द्र ठाकुर, मैथिलीक पहिल 'अरूजी' (गजल छन्दशास्त्रक विद्वान) क रूपमे मान्य, पहिल 'गजलशास्त्रम्' (मैथिली गजल छन्दशास्त्र) क रचना केलक, जे समकालीन कविसभक लेल एकटा व्यवस्थित सैद्धान्तिक ढाँचा प्रदान केलक आ प्रदर्शित केलक जे क़ाफ़िया-रदीफ संरचना केँ मैथिलीक प्राकृत आ अपभ्रंश सँ प्राप्त मोरिक छन्द परम्परा मे सफलतापूर्वक अनुकूलित कएल जा सकैत अछि। ओही कठोरता जे गङ्गेश व्याप्ति परिभाषासभ पर लागू केनए छल — प्रत्येक परिभाषाक प्रतिउदाहरणसभक विरुद्ध परीक्षण करबाक जब धरि सबसँ सटीक सूत्रीकरण पर नै पहुँचल जाए — आन्दोलन द्वारा गजल छन्दशास्त्र पर लागू कएल जाइत अछि, औपचारिक नियम स्थापित करैत जे मैथिली गजल केँ एकटा सुसंगत विधा बनाबैत अछि, नै एकटा ढीला अनुकूलन। निष्कर्ष भाग ३ · तकनीकी नव्य-न्याय, कारकवाद आ आधुनिक पठन गङ्गेश उपाध्याय: दर्शन, इतिहास, आ प्रतिरोध एहि शोध-प्रबन्ध छहि प्रमुख स्रोतसभक माध्यम सँ गङ्गेश उपाध्याय केँ अनुरेखण केनए अछि जे एकर बीच हुनकर महत्वक छहि अलग-अलग पहलू पर प्रकाश डालैत अछि। साहित्य अकादमी मोनोग्राफ आ डी.सी. भट्टाचार्यक 'हिस्ट्री' सँ: हुनकर जीवनी विवरण — नाम, जन्मस्थान, गोत्र, परिवार, कालक्रम, २४ पूर्ववर्ती जे हुनका संश्लेषित आ पार कएलक। पॉटर-भट्टाचार्य इन्साइक्लोपीडिया सँ: नव्य-न्यायक तकनीकी संरचना — एकर सम्बन्धात्मक शब्दावली, बोधक तर्क, सत्य आ जागरूकताक सिद्धान्त, आ गङ्गेश सँ रघुनाथ शिरोमणि धरि प्रक्षेपवक्र। शार्फस्टाइनक तुलनात्मक इतिहास सँ: विश्व दर्शनमे हुनकर स्थान डेसकार्टेस आ लाइबनिज क संग, आ अन्तःसांस्कृतिक ढाँचामे हुनकर पद्धतिगत कठोरताक अर्थ। वी.पी. भट्टक प्रत्यक्ष खण्ड अनुवाद सँ: तत्त्वचिन्तामणिक पहिल पुस्तक अंग्रेजीमे — ज्ञानक पूर्ण सिद्धान्त एकर तुलनात्मक आधार सँ लेल वैध आ अवैध ज्ञान, प्रत्यक्ष, एकर प्रकार, निर्विकल्पक आ सविकल्पक बोध, पहिचान, आ असाधारण प्रत्यक्ष धरि, सांख्य, बौद्ध, मीमांसा, वेदान्त, आ जैन स्थितिसभ सँ अन्तःसम्प्रदायिक बहससभ व्यवस्थित रूपसँ मानचित्रित कएल। समानांतर इतिहास सँ: दूषण पंजी सँ दमित जीवनी तथ्य, गङ्गेशक विरासतक संस्थागत सम्मान-हत्या, आ एकर पूर्ण मिथिलाक एकटा व्यक्तिक रूपमे पुनःप्राप्ति — नै केवल एकर अभिजात अल्पसंख्यक। तत्त्वचिन्तामणिक तीन सौ पृष्ठ, जे दस लाख पृष्ठक टीका-टिप्पणी उत्पन्न केलक, एकटा व्यक्ति द्वारा उत्पादित छल जकर जीवन बादमे हुनका दावा करबैवाली जाति रूढ़िवादिता सँ सहमत नै छल। संस्कृत परम्पराक सबसँ महान तर्कशास्त्री, दार्शनिक जे आग्रह करैत छल जे प्रत्येक परिभाषाक प्रत्येक संभावित प्रतिउदाहरणक विरुद्ध परीक्षण कएल जाए, एकटा प्रतिउदाहरण जीवलक। ई, शायद, समानांतर इतिहास गङ्गेशक बारेमे सबसँ गहन सबक अछि: जे हुनकर दार्शनिक विधि आ हुनकर जीवनी वास्तविकता विरोधाभासी नै बल्कि अभिसारी अछि — दुनू ओ सिद्धान्त केँ मूर्त रूप देबैत अछि जे वास्तविकता कोनो एकल ढाँचा सँ अधिक जटिल अछि, आ जे ईमानदार जाँच केँ प्रत्येक धारणा, चाहे कतना सेहो गहर धरि धरल गेल हो, संशोधित करबाक इच्छा मँग करैत अछि। वी.पी. भट्टक प्रस्तावना तत्त्वचिन्तामणिक निरन्तर प्रासंगिकताक दृष्टिकोण सँ समाप्त होइत अछि: 'दर्शन, तर्क आ ज्ञानमीमांसाक सन्दर्भमे ग्रन्थ (टी.सी.) के महत्व पर पर्याप्त बल देबा अतिशयोक्ति नै होइत।' पॉटर इन्साइक्लोपीडिया: 'गङ्गेशक एकटा अद्वितीय प्रतिभा छल, जे हुनका विश्वक उत्कृष्ट दार्शनिक मस्तिष्कसभमे सुरक्षित रूपसँ रखैत अछि।' समानांतर इतिहास: ओ एकटा अन्तर्जातीय सम्बन्ध सँ जन्मल छल आ हुनकर विरासत हुनका सम्मान करबाक दावा करबैवाला लोकनि द्वारा दमन कएल गेल छल। शार्फस्टाइन: वैध आगमन सँ हुनकर जुड़ाव 'भावना मे समकालीन विज्ञानक दार्शनिकसभ जकाँ अछि।' विदेह: ओ सम्पूर्ण मिथिलाक अछि, एकर द्वारपालसभक नै। सभ छहि दृष्टिकोण आवश्यक अछि। कोनो एक अकेल पर्याप्त नै अछि। जे व्यक्ति तत्त्वचिन्तामणिक प्रारम्भिक श्लोकमे 'गङ्गेश-स्तुते मितेन वचसे' — मैं, गङ्गेश, ई संक्षेपमे कहैत छी — लिखलक, ओ अपन शर्त पर लेल जाएबाक माँग करैत छल। सात शताब्दीक टीका, संस्थागत विनियोजन, समानांतर इतिहास पुनःप्राप्ति, आ डिजिटल अभिलेखन अखनो ओ शर्तसभक सामग्री केँ समाप्त नै केनए अछि। तत्त्वचिन्तामणि (टी.सी.) क "विस्मयकारी अगम्य शैली आ विचार" ने लम्बा समय धरि अनुवादकसभकेँ रोकि राखल छल। तथापि ओही विश्लेषणात्मक कठोरता — बाल-विभाजन भेद, प्रतिस्पर्धी परिभाषासभक व्यापक गणना आ अस्वीकार, माँग जे प्रत्येक पद ठीक ओही भार ढोए जे एकरा पर रखल गेल अछि — ठीक ओही चीज अछि जे गङ्गेश केँ केवल एकटा ऐतिहासिक जिज्ञासा नै बल्कि दार्शनिक उद्यममे एकटा स्थायी योगदान बनाबैत अछि: एकटा प्रदर्शन जे विचारक स्पष्टता, जतय सेहो प्राप्त कएल जाए, एकटा मानवीय उपलब्धि अछि जे परम्परा, भाषा, आ समयक सीमासभक पार करैत अछि। गङ्गेश न्याय-वैशेषिक संश्लेषण केँ परिष्कृत करबैवाला आ बौद्ध तर्क सँ खण्डन करबैवाला पूर्ववर्तीसभक लम्बा शृंखला सँ विरासतमे प्राप्त एकटा तर्क-संवेदनशील तत्वमीमांसा केँ परिष्कृत केलक: • उदयनाचार्य: 'वास्तविक संस्थापक' जकर लक्षणमाला संशयवादीसभ द्वारा हमलाक गेल वैध ज्ञान (प्रमा) क पहिल परिभाषा प्रदान केलक। • मणिकण्ठ मिश्र: न्यायरत्नक लेखक, जकर अनुमान आ व्याप्ति पर काम गङ्गेशक लेल एकटा प्राथमिक स्रोत छल, जे हुनका प्रायः अनाम रूपसँ उद्धृत करैत छल। • तरणि मिश्र: रत्नकोषक लेखक, जकर निषेध आ कार्य-कारण पर दृष्टिकोण गङ्गेश द्वारा उद्धृत आ प्रायः खण्डन कएल गेल। • शशधर: न्यायसिद्धान्तदीपक लेखक, जकर जटिल शैली 'चमकीला सोना' जकाँ विषयसभ पर गङ्गेशक जटिलताक टेम्पलेट प्रदान केलक। • सोणदोपाध्याय: एकटा विद्वान जे निषेधक सिद्धान्तकेँ पथ प्रदर्शन केनए छल जतय प्रतियोगिता एकटा भिन्न आश्रय (व्यधिकरण-धर्मावच्छिन्न-प्रतियोगिता) मे रहैवाला गुण द्वारा निर्धारित होइत अछि। गङ्गेशक पारिवारिक जीवनमे हुनकर पत्नी वल्लभा, तीन पुत्र — वर्धमान, सूपन, आ हरिशर्मा — आ एकटा बेटी छल। • वर्धमान उपाध्याय: ज्येष्ठ पुत्र आ गङ्गेशक छात्र, ओ एकटा प्रसिद्ध विद्वान बनल जे प्रकाश आ उपाय टीका लिखलक, पुरान आ नव तर्कक बीच पुल बनौलक। • बेटी: ओ बभनियम गामक साठे उपाध्याय सँ विवाह केलक, आ हुनकर पुत्र रत्नाकर वंशावली अभिलेखमे गङ्गेशक पोता क रूपमे अंकित अछि। समानांतर इतिहास आन्दोलन, विदेह अभिलेख द्वारा संचालित, गङ्गेशक वंश सँ सम्बन्धित विवादास्पद विवरण पुनः प्राप्त केनए अछि जे रामानाथ झा जकाँ संस्थागत इतिहासकार द्वारा दमन कएल गेल छल। 'दूषण पंजी' (ब्लैक बुक), २००९ मे डिजिटल रूपसँ जारी, एकटा 'गुप्त' अभिलेख समाविष्ट करैत अछि जे गङ्गेश अपन पिताक मृत्युक पाँच वर्ष बाद (पितृ परोक्षे पञ्च वर्ष व्यतीते) जन्मल छल। आगा, ई अभिलेख हुनकर पत्नी वल्लभा केँ चर्मकारिणी (चमड़ा सिझावै वाली जाति) क रूपमे पहिचान करैत अछि। समानांतर शोधकर्ता तर्क करैत छथि जे ई तथ्य अभिजात सामाजिक पदानुक्रम बनाए रखबाक लेल दमन कएल गेल, दमन केँ एकर सच्ची विरासतक 'सम्मान-हत्या' क रूपमे वर्णन करैत छथि। तकनीकी पद्धति: बोधक तर्क नव्य-न्याय मूल रूपसँ एकटा 'प्रमाण-न्याय' (ज्ञान-स्रोतक तर्क) अछि, जे प्राचीन विद्यालयक श्रेणी-केन्द्रित 'पदार्थ-न्याय' क विपरीत अछि। ई बोधक अवस्थासभक विशिष्ट पहलुसभ केँ इंगित करबाक लेल 'सम्बन्धात्मक अमूर्तता' (रिलेशनल एब्स्ट्रैक्ट्स) क उपयोग करैत अछि: • ज्ञान (ज्ञान): एकटा प्रासंगिक बोधात्मक कृत्यक रूपमे परिभाषित जे 'प्रतिबन्धक-प्रतिबद्ध सम्बन्ध' (प्रतिबन्धकता) पर संचालित होइत अछि, जतय एकटा ज्ञान दोसरा केँ अवरुद्ध करि सकैत अछि। • विशेषण-विशेष्य ढाँचा: प्रस्तावनात्मक जागरूकता क रूपमे संरचित अछि , एकटा विशेष्य ( ) क एकटा विशेषण ( ) द्वारा एकटा सम्बन्ध ( ) क माध्यम सँ योग्य प्रतिनिधित्व करैत अछि। • अवच्छेदक (अवच्छेदक): 'प्रस्तुतिकरणक विधा' जे ठीक-ठीक बताबैत अछि जे कोन गुण सम्बन्ध संभव बनाबैत अछि। उदाहरण लेल, एकटा नील घड़ामे, घटत्व घड़ामे निवास करबैवाली विशेष्यताक अवच्छेदक अछि। • परिमाणीकरण (परिमाणीकरण): नव्य-न्याय पश्चिमी परिमाणीकरणक परिणाम अमूर्तता द्वारा प्राप्त करैत अछि, जेना 'धुएँमे आगिक अभावक आश्रय द्वारा वर्णित आगिक अभावक एकटा सामान्य अभाव अछि'। तत्त्वचिन्तामणिक संरचनात्मक अवलोकन तत्त्वचिन्तामणि चारि प्रमाणसभक चारो ओर संगठित अछि आ लगभग १२,००० ग्रन्थि सहित ४६ व्यापक खण्ड (प्रकरण) मे विभाजित अछि। पुस्तक एक: प्रत्यक्ष खण्ड २५ उप-खण्डसभमे विभाजित, ई प्रत्यक्ष केँ ज्ञानक प्राथमिक स्रोतक रूपमे स्थापित करैत अछि। • मङ्गलवाद: गङ्गेश बहस करैत अछि जे का शुभ आशीर्वाद बाधासभ दूर करैत अछि या पूर्णता उत्पन्न करैत अछि, निष्कर्ष निकालैत अछि जे ओ अन्वय-व्यतिरेकक तर्क द्वारा बाधासभ दूर करैत अछि। • प्रामाण्य-वाद: एकटा 'अतिविश्वसनीयतावादी' या 'अपूरणीयवादी' दृष्टिकोण क बचाओ करैत अछि जतय ज्ञानक वास्तविक स्रोत तथ्यात्मक अछि। ओ मीमांसा सिद्धान्त 'स्वतः-प्रामाण्य' (आत्म-प्रमाणीकरण) केँ अस्वीकार करैत अछि, बनाए रखैत अछि जे ज्ञान बाह्य रूपसँ बादक गतिविधिक सफलता द्वारा प्रमाणित होइत अछि। • अनुव्यवसाय (अनुव्यवसाय): मनक अपन अवस्थासभक आन्तरिक प्रत्यक्ष। गङ्गेश एहि केँ अचूक मानैत अछि। • प्रत्यक्षक चरण: निर्विकल्पक (विशेषणसभक अनिश्चित बोध) केँ सविकल्पक (निश्चित, अवधारणा-युक्त प्रत्यक्ष) सँ अलग करैत अछि। • तात्विक बहससभ: भट्टक अनुवादक खण्ड २ मे वायु केँ स्पर्श द्वारा बोध कएल जाएबाक बहस आ सिद्धान्त शामिल अछि जे सोना एकटा अग्निमय प्रकाश अछि नै कि पार्थिव पदार्थ। • आन्तरिक अङ्ग (मनस्): गङ्गेश स्थापित करैत अछि जे मन परमाणु आकार (अणु) अछि ताकि ई समझाएल जा सकए जे काति अनेक प्रत्यक्ष एक साथ किएक नै होए सकैत अछि। पुस्तक दुई: अनुमान खण्ड रचनाक सबसँ जटिल भाग, जे प्राकृतिक अन्तर्निहितता या व्याप्ति सँ निपटैत अछि। • सिंह-व्याघ्रि परिभाषा: व्याप्तिक प्रसिद्ध 'सिंह-व्याघ्री' परिभाषासभ शामिल अछि। • पक्षता: अनुमानात्मक विषयक शर्त, जे एकटा गुण-धारकक रूपमे परिभाषित जतय साध्य स्थापित करबाक इच्छा अछि। • ईश्वरानुमान: विश्वक कार्य होएबाक आधार पर विश्वक कर्ताक रूपमे ईश्वर केँ स्थापित करैत अछि। पुस्तक तीन: उपमान खण्ड सबसँ छोट खण्ड, ज्ञात आ अज्ञात वस्तु (जेना गाय आ गवय) क बीच समानताक ज्ञानक विश्लेषण करैत अछि। पुस्तक चार: शब्द खण्ड त्रयीक एक-तिहाई गठन करैत अछि आ शाब्दिक बोध (शब्दबोध) पर केन्द्रित अछि। • शब्दबोधक आवश्यकतासभ: वाक्यात्मक अपेक्षा (आकाङ्क्षा), तार्किक संगतता (योग्यता), समीपता (आसत्ति), आ वक्ताक आशय (तात्पर्य) आवश्यक अछि। कारकवाद: व्याकरण आ तर्कक एकटा संश्लेषण कारक-वाद, शब्द-खण्डमे पाबल जाइत अछि, क्रिया (क्रिया) क सम्बन्धमे संज्ञासभ निभाबैवाला शब्दार्थ आ वाक्यात्मक भूमिकासभक जाँच करैत अछि। • कारकक परिभाषा: क्रियाक सम्पादनमे सहायक कारक (क्रिया-निर्वर्तकम्)। • कर्तृक प्रधानता: स्वतन्त्र कारक (स्वतन्त्रः कर्ता) क रूपमे परिभाषित, विशेष रूपसँ कृतिमत्व (इच्छाशक्ति या मानसिक प्रयासक धारण) सँ विशेषता। • परिणामक आश्रय (कर्मन्): वस्तु केँ विश्लेषण कएल जाइत अछि क्रियाक परिणामक आधार (फलाश्रय) क रूपमे। • पदानुक्रम: कर्तृ, कर्मन्, आ करण प्रमुख कारक अछि, जबकि सम्प्रदान, अपादान, आ अधिकरण आश्रित अछि। • समास विश्लेषण: गङ्गेश छहि प्रकारक समासक एकटा व्यापक विश्लेषण प्रदान करैत अछि, जाहिमे बहुव्रीहि आ तत्पुरुष शामिल अछि। आधुनिक वैश्विक प्रभाव आ अनुवाद (२००५–२०२५) २१म् शताब्दीमे अंग्रेजीमे व्याख्यात्मक अनुवादक निश्चित पूर्णता देखल गेल: १. स्टीफन फिलिप्स (२०२०): एकटा तीन-खण्डीय टिप्पणी सहित अनुवाद, 'ज्वेल ऑफ रिफ्लेक्शन ऑन द ट्रुथ अबाउट ज्ञानमीमांसा' (ब्लूम्सबरी), गङ्गेशक 'अतिविश्वसनीयतावाद' केँ आधुनिक विश्लेषणात्मक दर्शनक लेल सुलभ बनाबैत अछि। २. वी.पी. भट्ट (२००५–२०२५): एकटा बहु-खण्डीय शृंखला पूर्वीय बुक लिंकर्स, दिल्ली द्वारा प्रकाशित: • शब्द (शब्द-खण्ड): २००५ (२ खण्ड)। • प्रत्यक्ष (प्रत्यक्ष-खण्ड): २०१२ (२ खण्ड)। • अनुमान (अनुमान-खण्ड): २०२१ (२ खण्ड)। • ईश्वरानुमान आ उपमान (ईश्वरानुमान आ उपमान-खण्ड): २०२५ (२ खण्ड)। तुलनात्मक आ संगणनात्मक परिप्रेक्ष्य बेन-अमी शार्फस्टाइन गङ्गेश केँ 'तर्क-संवेदनशील पद्धतिगत तत्वमीमांसा'क अन्तर्गत वर्गीकृत करैत अछि, डेसकार्टेस आ लाइबनिज सँ समानता खिचैत अछि। आधुनिक शोधकर्ता नोट करैत छथि जे नव्य-न्यायक अवच्छेदकक पदानुक्रमित उपयोग आधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता आ प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण (एनएलपी) सँ संगत अछि। डिजिटल लोकतंत्रीकरण आ अभिलेखीय प्रतिरोध समकालीन विदेह आन्दोलन मिथिलाक धरोहरक संरक्षणक लेल डिजिटल मंचसभक उपयोग करैत अछि, ११,००० ताड़पत्र तिरहुता पाण्डुलिपिसभक अनुलेखन करैत आ यूनिकोडक लेल तिरहुता (मिथिलाक्षर) लिपिक मानकीकरण करैत अछि। दूषण पंजी केँ होस्ट करि, ओ 'विचार-रत्न' क एकटा लोकतांत्रिक आ बहुआयामी समझ सुनिश्चित करैत अछि। गङ्गेश उपाध्यायक विरासत भारतीय बौद्धिक परम्पराक शिखरक रूपमे खड़ा अछि। जखन संस्थागत इतिहास तार्किक नवाचार आ धार्मिक रूढ़िवादिता पर जोर देबैत अछि, तखन डिजिटल अभिलेखसभ द्वारा पुनः प्राप्त समानांतर इतिहासलेखन हुनकर जीवनीक उपेक्षित आ विवादास्पद पहलुसभ, जेना एकर अन्तर्जातीय विवाह आ एकर पितृत्वक दमित अभिलेख, पुनः प्राप्त करैत अछि। २०२५ मे वी.पी. भट्टक अनुवादक पूर्णता सुनिश्चित करैत अछि जे एकर ज्ञान सिद्धान्त अर्थ, क्रिया, आ वास्तविकता पर वैश्विक बहससभ केँ प्रकाशित करबाक लेल जारी रहत। गङ्गेश उपाध्याय काश्यप-गोत्रीय मैथिल ब्राह्मण छल जे मिथिलामे करणाट वंशक पतन (११९१–१३२६ ई.) आ ओइनिवार वंशक उदय (१३४४–१४१३ ई.) क बीच एकटा महत्वपूर्ण राजनीतिक संक्रमणकालमे रहल। वंशावली उत्तराधिकार हुनकर अवधि लगभग १३००–१३५० ई. स्थापित करैत अछि। जखन पारम्परिक विवरण हुनका करिओन गाममे रखैत अछि, तखन पूर्वज अभिलेख हुनका मुख्य रूपसँ चादना गाम सँ जोड़ैत अछि, जे राजा द्वारा हुनकर परिवार केँ उपहारमे देल गेल छल। मिथिलामे, ओ 'जगद्गुरु' आ 'महामहोपाध्याय' क प्रतिष्ठित उपाधि धारण केनए छल। गङ्गेश उपाध्याय (फ्लोरुइट १३२० ई.) विश्व दर्शनक इतिहासमे सबसँ तकनीकी रूपसँ निपुण आ दार्शनिक रूपसँ परिणामकारी विचारकसभमे सँ एक अछि। तत्त्व-चिन्तामणिक उपलब्धि — जेना पॉटर इन्साइक्लोपीडिया, शार्फस्टाइनक तुलनात्मक इतिहास, आ विदेह अभिलेखक प्रासंगिक सामग्री सभ अपन-अपन दृष्टिकोण सँ पुष्टि करैत अछि — केवल एकटा परम्पराक आन्तरिक बहस केँ आगा बढ़ाबैक नै छल, बल्कि उन स्थितिसभ केँ रूपान्तरित करबाक छल जे सभ बादक भारतीय दार्शनिक विचार आयोजित कएल गेल। पॉटर इन्साइक्लोपीडियाक फैसला: 'गङ्गेशक एकटा अद्वितीय प्रतिभा छल, जे हुनका विश्वक उत्कृष्ट दार्शनिक मस्तिष्कसभमे सुरक्षित रूपसँ रखैत अछि।' शार्फस्टाइनक तुलनात्मक निर्णय: जे गङ्गेशक 'वैध आगमन आ किफायती व्याख्याक समस्यासभ सँ जुड़ाव भावना मे समकालीन विज्ञानक दार्शनिकसभ जकाँ अछि।' गङ्गेश तर्क विकसित केलक, एकर सिद्धान्तसभ केँ एकटा व्यवस्थित रूप देनए, आ सत्य आ असत्यक बीच अन्तर केलक। ई मूल्यांकन — विश्वकोशीय विद्वत्ता, तुलनात्मक इतिहास, आ मैथिली बौद्धिक जीवनी सँ — एकटा निष्कर्ष पर अभिसरण होइत अछि: जे तत्त्व-चिन्तामणि मे, मिथिलाक एकटा दार्शनिक चौदहम् शताब्दीमे एकटा रचना बनौलक जकर विचारक सटीकता, तर्कक कठोरता, आ एकटा महान सभ्यता पर परिवर्तनकारी प्रभाव मानव मनक स्थायी उपलब्धिसभमे मान्यताक हकदार अछि। समानांतर साहित्य आन्दोलन जे मैथिली लोक, दलित, आ महिला साहित्यिक आवाजसभकेँ संस्कृत दार्शनिक कैननक साथे पुनः प्राप्त आ उत्सव मनाबैत अछि जे तत्त्व-चिन्तामणि उत्पादन केलक। विदेह परियोजनाक मिथिलाक सम्पूर्ण सांस्कृतिक उत्पादन केँ एक साथ राखबाक आग्रह — महामहोपाध्याय आ लोक-कवि, तत्त्व-चिन्तामणि आ चर्या-पद, व्याप्ति-द्वन्द्वशास्त्र आ विद्यापति पद — एकर सबसँ महत्वपूर्ण सांस्कृतिक-राजनीतिक वक्तव्य अछि। गङ्गेश सम्पूर्ण मिथिलाक अछि, केवल एकर संस्कृत अभिजात वर्गक नै। भाग ४ · अभिलेखीय साक्ष्य, प्रत्यक्षखण्ड आ सांस्कृतिक पुनर्पाठ ई गङ्गेश उपाध्याय (फ्लोरुइट १३२० ई., मिथिला) पर अब धरि कोनो भाषामे उत्पादित सबसँ व्यापक विद्वत्तापूर्ण अध्ययन क एकत्र करैत अछि। सात प्रमुख स्रोतसभ पर आधारित — साहित्य अकादमी मोनोग्राफ (झा आशोक, २०१६), डी.सी. भट्टाचार्यक 'हिस्ट्री ऑफ नव्य-न्याय इन मिथिला' (१९५८), कार्ल एच. पॉटर आ शिबजिबन भट्टाचार्यक 'एन्साइक्लोपीडिया ऑफ इंडियन फिलॉसफीज' खण्ड ६ (१९९३), बेन-अमी शार्फस्टाइनक 'अ कम्पेरेटिव हिस्ट्री ऑफ वर्ल्ड फिलॉसफी' (एसयूएनवाई, १९९८), वी.पी. भट्टक तत्त्वचिन्तामणि पर अनुवाद आ टीका, गजेन्द्र ठाकुरक विदेह/पंजी प्रबन्ध मूल दूषण पंजी अभिलेख (२००९ जारी) सहित, आ स्टीफन एच. फिलिप्सक स्टैनफोर्ड इन्साइक्लोपीडिया ऑफ फिलॉसफीमे गङ्गेश पर प्रविष्टि (२०२०) आ अन्य स्रोतसभ — शोध-प्रबन्ध हुनकर महत्वक प्रत्येक आयाम क अनुरेखण करैत अछि: जीवनी, ग्रंथीय, ज्ञानमीमांसीय, तार्किक, विश्व-तुलनात्मक, टीका-ऐतिहासिक, आ सभ्यतागत। विशेष ध्यान पूरे वी.पी. भट्टक प्रत्यक्ष-खण्ड अनुवादक सामग्री पर देनए गेल अछि, जे मङ्गलवाद, पूर्ण प्रामाण्यवाद (गुण-दोष बहस, वैधताक गठन खण्ड, आ प्रभाकर-नैयायिक द्वन्द्वशास्त्र सहित), प्रमालक्षण, त्रुटिक सिद्धान्त एकर सम्पूर्ण नैयायिक रूपमे, सन्निकर्ष-वाद, समवायवाद, अभाववाद, प्रत्यक्षकारणवाद, मनोऽणुत्ववाद, प्रत्यभिज्ञावाद, निर्विकल्पकवाद, आ सविकल्पकवाद केँ शामिल करैत अछि। प्राथमिक-स्रोत दूषण पंजी पाठ पुनरुत्पादित आ पूर्ण विश्लेषण कएल गेल अछि। जीवन, उपाधि, आ दमित पंजी साक्ष्य गङ्गेशक उपाधि आ पंजी गवाही स्टीफन एच. फिलिप्स स्टैनफोर्ड इन्साइक्लोपीडिया ऑफ फिलॉसफी (२०२०) मे लिखैत छथि: 'मिथिलामे रखल वंशावली अभिलेख सुझाबैत अछि जे हुनकर एकटा पत्नी आ तीन पुत्र आ एकटा बेटी छल। एकटा बच्चा प्रसिद्ध न्याय लेखक, वर्धमान छल। गङ्गेश स्पष्ट रूपसँ अपन जीवनकालमे बहुत प्रसिद्धि प्राप्त केलक, जगद्गुरु क रूपमे उल्लिखित, जे हुनकर समयक शैक्षिक संस्थासभक लेल 'डिस्टिंग्विश्ड युनिवर्सिटी प्रोफेसर' क स्थूल समकक्ष होत।' गजेन्द्र ठाकुर सीधा पंजी अभिलेख सँ लेल आगा सटीकता जोड़ैत छथि: गङ्गेश केवल जगद्गुरु नै, बल्कि परमगुरु — सर्वोच्च शिक्षक उपाधि — सेहो धारण केनए छल। पंजी क अनुसार, मिथिलाक सम्पूर्ण अभिलेखित बौद्धिक इतिहासमे केवल एकटा अन्य व्यक्ति परमगुरुक उपाधि धारण केनए छल: नूतन वाचस्पति (पूर्ववर्ती वाचस्पति मिश्रक उत्तराधिकारी), जे गङ्गेशक बाद आएल। ई गङ्गेश केँ मिथिलाक सम्पूर्ण इतिहासमे ठीक दुई परमगुरुसभमे सँ एक बनाबैत अछि। गङ्गेशक स्मृतिक साथ कएल गेल अन्याय — 'पहिल रामानाथ झा द्वारा, तखन उदयनाथ झा आशोक द्वारा' — एहि कारण मिथिलाक सम्पूर्ण परम्परामे सबसँ सजाएल दार्शनिकक जीवनी दबाबैक मे समाविष्ट अछि। वी.पी. भट्टक अनुवाद गङ्गेशक प्रारम्भिक श्लोकसभमे समर्पण आ आत्म-प्रस्तुति क पुष्टि करैत अछि: 'शिक्षकसभ सँ तर्कशास्त्र सीखि, गुरुसभक सिद्धान्त अर्थात् प्रभाकर मीमांसकसभक सिद्धान्त जानि, दुनू विद्यालयसभक सम्पूर्ण सार विचारक दिव्य नेत्र सँ अवलोकन करि, दोषसभक झुण्डक कारण सबसँ कठिन नियमसभक मामलामे निर्णायक सिद्धान्तसभक शिक्षाक गङ्गेश, उपाध्याय, तत्त्व-चिन्तामणिक रचना मापल शब्दसभ सँ करैत अछि।' वाक्यांश 'मितेन वचसे' — मापल शब्दसभ सँ — तत्त्वचिन्तामणिक पद्धतिक गङ्गेशक अपन चित्रण अछि: सटीक, किफायती, यथार्थ। दूषण पंजी: मूल पाठ आ विश्लेषण पंजी प्रणाली आ हरिसिंहदेव पंजी प्रणाली मिथिलाक अन्तिम महान करणाट राजा हरिसिंहदेव (जन्म १२९४ ई., राज्यारोहण १३०७ ई., गियासुद्दीन तुगलक सँ पराजयक बाद नेपाल भागल १३२४-२५ ई.) द्वारा स्थापित कएल गेल छल। संस्थापक पंजीकार गुणाकर झा (मैथिल ब्राह्मण), शंकरदत्त (कर्ण कायस्थ), विजयदत्त (क्षत्रिय) छल। पंजी अपन वर्तमान स्वरूपमे शाक १२४८ (१३२६ ई.) मे मिथिलाक पण्डितसभ द्वारा औपचारिक रूप देल गेल। हरिसिंहदेव नान्यदेवक वंशज छल, जे शाक १००९ मे करणाट वंश स्थापित केनए छल। बादक संशोधन मिथिलेश महाराजा माधव सिंह द्वारा १७६० ई. मे आदेशित कएल गेल; ई संशोधनक बाद (आ १८०० ई. सँ पहिने नै) मैथिल ब्राह्मणसभक बीच श्रोत्रिय उपजाति उत्पन्न भेल। नेपालक मिथिला भागमे आजो मैथिल ब्राह्मणसभक बीच कोनो श्रोत्रिय उपजाति नै अछि। पंजी पाण्डुलिपिसभक अङ्कीकरण गजेन्द्र ठाकुर द्वारा २००७ आ २००९ क बीच कएल गेल। अंशुमान पाण्डे (पीएचडी, मिशिगन विश्वविद्यालय, २०१४) स्वीकार करैत छथि: 'नयाँ दिल्लीक गजेन्द्र ठाकुर हमरा २००७ मे मैथिल ब्राह्मणक वंशावली अभिलेखक अङ्कीकृत प्रति प्रदान केनए छल... हम २००७ मे गजेन्द्र ठाकुर सँ पंजी अभिलेखक एकटा पूर्ण अङ्कीकृत सेट प्राप्त करबाक लेल पर्याप्त भाग्यशाली छलाह।' पाण्डुलिपिसभ २००९ मे विदेह वेब-अभिलेख आ गूगल बुक्स पर विदेह पोथीमे अपलोड कएल गेल। गङ्गेशक लेल दूषण पंजी प्रविष्टि — मूल मैथिली पाठ निम्नलिखित गङ्गेशक लेल मूल पंजी प्रविष्टि अछि, जे दूषण पंजी (पंजी प्रबन्ध खण्ड १ & २, गजेन्द्र ठाकुर/विदेह, २००९ जारी) सँ पुनरुत्पादित: ४९. १८८/२. चर्मकारिणी। मन्दर। वभनियम। छदन। तत्त्वचिन्तामणि-कारक-गङ्गेश। छदन-गङ्गेश-कनक / रत्नाकरमात्र (अज्ञात) / गङ्गेश / वल्लभ / भवै / महेश्वर // // जीवे २१//१० छदन सँ तत्त्व चिन्तामणि कारक जगद्गुरु गङ्गेश छदन सँ तत्त्व चिन्तामणि कारक गङ्गेश-की वल्लभ चर्मकारिणी पितृ-परोक्षे पञ्च वर्ष व्यतीते तत्त्व चिन्तामणि कारक गङ्गेश-उत्पत्ति --- चर्मकारिणी मेधा-क संतान-क लगिमे छलन्हि छदन सँ तत्त्व चिन्तामणि कारक म.म. गङ्गेश तत्त्व चिन्तामणि कारक म.म.पा. गङ्गेश-विषयक लेख प्राचीन पंजी सँ उपलब्ध। पितृ-परोक्षे पञ्च वर्ष व्यतीते गङ्गेशोत्पत्तिः इति प्राचीन लेखनीयः कुत्रापि देवानन्द पंजी ३९-२: छदन सँ जगद्गुरु गङ्गेश सुताया वभनियम सँ जनादित्य सुत साधुकार पत्नी देवानन्द पंजी ३३९-३: जगद्गुरु गङ्गेश सुता सूपन दौ भाण्डारिसमास सँ हरादित्य दौ। पुत्र सुताच गोरा, जाजीवल सँ जीवे पत्नी, सुता सन्दगाही भवेश्वर। अत्र अस्थाने सूपन-भ्रातृ हरिशर्मा दारिति क्वचित् जाजीवल ग्राम देवानन्द पंजी ३०=५: छदन सँ उपयाकारक म.म.पा. वर्धमान सुताच खण्डवाला सँ विश्वनाथ सुता शिवनाथ पत्नी। गङ्गेश --- म.म. वर्धमान / सूपन / हरिशर्मा प्रविष्टि स्पष्ट अछि। गजेन्द्र ठाकुर सारांशित करैत छथि: 'तत्त्वचिन्तामणिक गङ्गेश अपन पिताक मृत्युक पाँच वर्ष बाद जन्मल छल आ ओ एकटा चर्मकारिणी (तान्तर) सँ विवाह केनए छल। तत्त्वचिन्तामणिक लेखक गङ्गेश एकटा ग्रन्थ १२,००० ग्रन्थि समकक्ष लिखलक।' पहिचान कएल गेल बच्चा: वल्लभ (चर्मकारिणी पत्नी सँ), भवै, महेश्वर; आ जीवे (एकटा बेटी)। देवानन्द पंजी आगा वंशजक पहिचान करैत अछि: सूपन (गङ्गेशक पुत्र), आ वर्धमान (म.म. = महामहोपाध्याय), हुनकर बच्चासभमे सँ सबसँ प्रतिष्ठित विद्वान। दमन शृंखला आ एकर परिणाम डी.सी. भट्टाचार्य 'हिस्ट्री ऑफ नव्य-न्याय इन मिथिला' (१९५८, अध्याय ३, पृ. ९६-९९) मे लिखैत छथि: 'जे परिवार सामाजिक स्थितिमे निम्न छल, ओ अखन मिथिलामे विलुप्त अछि — गङ्गेशक परिवार पूर्ण रूपसँ उपेक्षित अछि आ हमरा हुनकर पिताक नाम सेहो जानबाक अपेक्षा नै कएल जाइत... चूँकि गङ्गेशक कोनो अन्य सन्दर्भ नै अछि, हम मानि सकैत छी जे परिवार फेर सँ महत्वहीन भऽ गेल आ हुनकर पुत्रक मृत्युक तुरन्त बाद विलुप्त भऽ गेल।' ओ स्पष्ट रूपसँ कहैत अछि जे ई सभ सूचना प्रो. रामानाथ झा द्वारा आपूर्ति कएल गेल छल। गजेन्द्र ठाकुर ई केँ 'पूर्ण असत्य' कहैत छथि — देवानन्द पंजी अभिलेख नामित गामसभमे गङ्गेशक वंशज केँ अनेक पीढ़ी धरि देखाबैत अछि। २०१६ साहित्य अकादमी मोनोग्राफ उदयनाथ झा आशोक द्वारा (गङ्गेश उपाध्याय, भारतीय साहित्यक निर्माता शृंखला) दमन केँ कायम राखलक: 'ओ मुद्दा केँ भ्रमित करबाक प्रयास करैत अछि, मुदा अखन कम सँ कम २००९ सँ कोनो भ्रम नै अछि। मुदा २०१६ मे साहित्य अकादमी जातिवादी एजेंडा केँ आगा बढ़ाबैत देखाबैत अछि। उदयनाथ झा हुनकर नाम, वंश आदि खोजबाक ढोंग करैत अछि, जतय खोजबाक लेल किछु नै अछि, तथापि ओ सत्य बताबाक साहस नै जुटा सकलक, आ अन्तत: २०१६ मे ओही तथ्य दोहराबैत अछि जे दिनेशचन्द्र भट्टाचार्य पहिने सँ १९५८ मे प्रकाशित करि चुकल छल' (गजेन्द्र ठाकुर)। नव्य-न्याय विद्यालयक लेल परिणाम: बंगालक वासुदेव सार्वभौम पक्षधर मिश्रक सहपाठीक रूपमे मिथिला पढ़बाक आएल, शलाका परीक्षा उत्तीर्ण केलक आ सार्वभौमक उपाधि प्राप्त केलक। ओ तत्त्वचिन्तामणि (किएक पक्षधर आ मिथिलाक अन्य शिक्षक एकर नकल करबाक अनुमति देनए नै छल) आ उदयनक न्यायकुसुमाञ्जलि-कारिका कण्ठस्थ केलक। रघुनाथ शिरोमणि, वासुदेवक शिष्य, शास्त्रार्थ मे अपन गुरु पक्षधर केँ पराजित केलक आ प्रमाणीकरणक अधिकार लेलक। नव्य-न्याय विद्यालक बाद नवद्वीपमे स्थापना भेल। रघुनाथ शिरोमणिक बाद, बंगालक छात्र मिथिला आबै बन्द क देलक। 'नव्य-न्याय विद्यालयक मिथिला सँ विलुप्ति, जेना ऊपर वर्णित अछि, गङ्गेश उपाध्याय आ हुनकर परिवारक सम्मान-हत्या क विरुद्ध प्रकृतिक बदला छल' (गजेन्द्र ठाकुर)। वर्धमान, गङ्गेशक पुत्र, गङ्गेश केँ 'सुकविकैरवकाननेंदुः' — सुकविसभक जङ्गलमे चन्द्रमा — कहैत अछि। वर्धमानक अपन लेखनमे संरक्षित ई काव्यात्मक उपाधि आपु स्वयं वंशावली साक्ष्यक एकटा रूप अछि जे पंजी अभिलेख पुष्टि करैत अछि: गङ्गेश तर्कक साथ-साथ कविता सेहो लिखलक, मुदा हुनकर काव्य संग्रह पूर्ण रूपसँ खोइ गेल अछि — 'गङ्गेश जकाँ प्रसिद्ध विद्वानक कविता अखन उपलब्ध नै होएबाक अन्तर्निहित षड्यन्त्र स्पष्ट अछि' (गजेन्द्र ठाकुर)। गङ्गेश आ तत्त्वचिन्तामणिक पूर्ण अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर दस्तावेज करैत अछि जे दुई विद्वान अखन तत्त्वचिन्तामणिक पूर्ण अंग्रेजी अनुवाद उत्पादन केनए अछि। स्टीफन एच. फिलिप्सक 'ज्वेल ऑफ रिफ्लेक्शन ऑन द ट्रुथ अबाउट ज्ञानमीमांसा: अ कम्प्लीट एंड अनोटेटेड ट्रांसलेशन ऑफ द तत्त्व-चिन्ता-मणि' (ब्लूम्सबरी एकेडमिक, २०२०) सभ चारि पुस्तकक पहिल एकल-अनुवादक अंग्रेजी रूपान्तरण अछि। वी.पी. भट्ट अखन सभ चारि पुस्तक आठ खण्डमे पूर्ण केनए अछि: शब्द खण्ड (२ खण्ड, २००५); प्रत्यक्ष खण्ड (२ खण्ड, २०१२); अनुमान खण्ड (२ खण्ड, २०२१); ईश्वरानुमान आ उपमान खण्ड (२ खण्ड, २०२५) — सभ पूर्वीय बुक लिंकर्स, दिल्ली द्वारा प्रकाशित, परिचय, संस्कृत पाठ, अनुवाद आ व्याख्या सहित। फिलिप्सक प्रति गजेन्द्र ठाकुर द्वारा उल्लिखित अन्याय: किएक रामानाथ झाक दमन भट्टाचार्यक १९५८ इतिहासमे आ तखन २०१६ साहित्य अकादमी मोनोग्राफमे प्रसारित भेल, फिलिप्स — जे जीवनी सूचनाक लेल एहि स्रोतसभ पर निर्भर रहबाक लेल बाध्य छल — गङ्गेशक परिवार आ सामाजिक स्थितिक बारेमे अपूर्ण आ विकृत तथ्य प्राप्त केलक। २०म् आ २१म् शताब्दीक दमनक 'दूष्परिणाम' एहि प्रकारे पहिल पश्चिमी विद्वान पर पड़ल जे सम्पूर्ण तत्त्वचिन्तामणिक अनुवाद केलक। दूषण पंजी अभिलेख, विदेह द्वारा २००९ मे जारी, सुधार अछि जे फिलिप्स आ गङ्गेशक प्रत्येक बादक विद्वानक लेल आवश्यक अछि। तत्त्वचिन्तामणि — संरचना, दायरा, आ नव्य-न्याय रचना आ एकर सांस्कृतिक स्थान वी.पी. भट्टक प्रत्यक्ष खण्ड अनुवादक प्रस्तावना तत्त्वचिन्तामणि केँ नव्य-न्यायक पहिल आ परिभाषित रचनाक रूपमे वर्णन करैत अछि: ई 'भारतीय ज्ञान आ तर्क सिद्धान्तक विकासमे एकटा नव युगक शुरुआत केलक' आ 'नव्य-न्यायक षोडश श्रेणीसभकेँ चारि शीर्षकसभ' प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, आ शाब्दिक प्रमाणक तहत लेलक। एकर अनुवाद इतिहासमे: भट्टक आठ-खण्डीय शृंखला (२००५-२०२५) सभ चारि पुस्तक केँ शामिल करैत अछि; फिलिप्सक ब्लूम्सबरी २०२० एकल-खण्ड अनुवाद सेहो एकरा करैत अछि। दुनू रचना एक साथ पाठ केँ पहिल बेर अन्तर्राष्ट्रीय दार्शनिक समुदायक लेल सुलभ बनाबैत अछि। शार्फस्टाइनक तुलनात्मक निर्णय: गङ्गेशक ३००-पृष्ठ पाठ 'अनुमानित रूपसँ दस लाख पृष्ठक टीका-टिप्पणी के लेल उत्तरदायी छल।' पॉटर-भट्टाचार्य: 'गङ्गेशक एकटा अद्वितीय प्रतिभा छल, जे हुनका विश्वक उत्कृष्ट दार्शनिक मस्तिष्कसभमे सुरक्षित रूपसँ रखैत अछि।' भट्टक अनुवादमे केवल प्रत्यक्ष खण्ड दुई खण्डमे ८०० सँ अधिक पृष्ठ धरि फैलल अछि, आ ई चारि पुस्तकसभमे सँ केवल पहिल अछि। एकटा पाठक एकर टीका-टिप्पणी सँ माप केवल मात्रात्मक नै अछि: एकर अर्थ ई अछि जे गङ्गेशक बाद पाँच सय वर्ष धरि, कोनो गम्भीर भारतीय दार्शनिक हुनकर शब्दावली, हुनकर परिभाषा, आ हुनकर पद्धति बिना नै सोचि सकत छल। ज्ञानमीमांसा — प्रत्यक्ष-खण्ड पूर्ण रूपमे सभ तेरह खण्डक अवलोकन तत्त्वचिन्तामणिक प्रत्यक्ष-खण्ड तेरह प्रमुख प्रकरण (उप-खण्ड) सँ मिलल अछि, जेना वी.पी. भट्टक दुई-खण्डीय अनुवाद द्वारा प्रलेखित: (१) मङ्गलवाद; (२) प्रामाण्यवाद; (३) प्रमालक्षण; (४) अप्रमावाद; (५) प्रत्यक्षवाद; (६) समवायवाद / सन्निकर्षवाद; (७) अनुपलब्धिवाद; (८) अभाववाद; (९) प्रत्यक्षकारणवाद; (१०) मनोऽणुत्ववाद; (११) प्रत्यभिज्ञावाद / अनुव्यवसायवाद; (१२) निर्विकल्पकवाद; (१३) सविकल्पकवाद। भट्टक अनुवादक खण्ड १ सामान्य परिचय आ प्रारम्भिक खण्डसभ केँ शामिल करैत अछि; खण्ड २ (पृ. २६२-८०३) मङ्गलवाद सँ सविकल्पकवाद धरि केँ शामिल करैत अछि। मङ्गलवाद (१.१) गङ्गेश तत्त्वचिन्तामणिक शुरुआत भगवान ईश्वर केँ प्रणाम सँ करैत अछि: 'तीन पुरसभक संहारक आ अनन्त महिमाक; जे, यद्यपि गुण सँ परे अछि, अच्युत संकल्पक अछि, तीन गुणसभक माध्यम सँ ब्रह्माण्डक कारण अछि, तीन नित्य पहलुसभक प्रकृतिक अछि, तीन रूपक अछि आ सृष्टि, स्थिति आ विनाशक कार्य करैत अछि, आ करुणाक सागर आ तीनों लोकक एकमात्र परम शरण अछि' (भट्ट खण्ड २, पृ. २६२)। मङ्गलवाद खण्ड २ क एक महत्वपूर्ण भाग घेरैत अछि किएक ई दार्शनिक रूपसँ भारित अछि: एकरा काजक शुरुआतमे आशीर्वाद कार्यक पूर्णता सँ कार्यकारण सम्बन्ध रखैत अछि (मङ्गल-कारणत्व) ई स्थापित करबाक आवश्यकता होइत अछि। गङ्गेश पहिल मीमांसक दृष्टिकोण प्रस्तुत करैत अछि (१.१.२): शिक्षकसभ सँ तर्कशास्त्र सीखि, गुरुसभक सिद्धान्त (प्रभाकर मीमांसक) जानि, दुनू विद्यालयसभक सम्पूर्ण सार विचारक दिव्य नेत्र सँ अवलोकन करि, गङ्गेश तत्त्व-चिन्तामणिक रचना 'मापल शब्दसभ' (मितेन वचसे) सँ करैत अछि। शीर्षकक औचित्य (१.१.३): 'विद्वानसभ द्वारा (विचारक) रत्नक पालिस करबाक क्रिया अर्थात् भयंकर नास्तिकसभ (बौद्ध) के अज्ञानक अन्धकार दूर करबाक क्रिया अछि। ई संभव अछि, किएक न त विरोधीसभ (बौद्ध आदि) के दृष्टिकोणमे जाँचक कौशलक अनुरेखण कएल जा सकैत अछि, न अपन प्रणाली (न्याय) क निर्णायक सिद्धान्त स्थापित करबैवाला शब्दसभमे दरिद्रताक अनुरेखण कएल जा सकैत अछि।' गङ्गेश एहि प्रकारे अपन प्रारम्भिक पंक्तिसभ सँ घोषणा करैत अछि जे एकर परियोजना एक साथ रचनात्मक (न्याय प्रणाली स्थापित करबाक) आ विवादात्मक (बौद्ध चुनौती दूर करबाक) अछि। मङ्गलक कार्य-कारण पर बहस (१.१.५-२५, भट्ट खण्ड २, पृ. २६५-३००): बौद्ध आपत्ति करैत छथि जे मङ्गलक कार्य-कारण अन्वय-व्यतिरेक द्वारा निश्चित नै कएल जा सकैत अछि। मीमांसक परिशेष-अनुमान द्वारा उत्तर देबैत छथि। गङ्गेश स्थापित करैत अछि जे मङ्गल आरम्भ कएल गतिविधिक एकटा सहायक अनुष्ठानक रूपमे उचित अछि, बाधाक विनाश द्वारा पूर्णताक फल उत्पन्न करैत अछि — वैदिक आहुति द्वारा उत्पन्न पारलौकिक पुण्य द्वारा नै। तर्क (परिकल्पनात्मक तर्क) क पाँच-प्रकार वर्गीकरण एहि सन्दर्भमे उत्पन्न होइत अछि: आत्माश्रय, अन्योन्याश्रय, चक्रक, अनवस्था, आ प्रमाणबाधितार्थप्रसङ्ग। प्रामाण्यवाद (२.२) — पूर्ण विवरण आन्तरिक बनाम बाह्य वैधता प्रामाण्यवाद (प्रामाण्यवाद) भट्ट खण्ड २, पृ. ३००-४१० केँ घेरैत अछि, आ प्रत्यक्ष-खण्डक सबसँ दार्शनिक रूपसँ घनत्वपूर्ण खण्ड अछि। केन्द्रीय बहस: का ज्ञानक वैधता (प्रामाण्य/प्रमाणत्व) अन्तर्निहित रूपसँ (स्वतः) गठित आ ज्ञात होइत अछि या बाह्य रूपसँ (परतः)? सांख्य-मीमांसा स्थिति (स्वतः): वैधता आ अवैधता दुनू स्वयं-प्रमाणित अछि, ज्ञान उत्पादन करबैवाला कारणसभक समग्रता द्वारा गठित आ ज्ञात। बौद्ध स्थिति: ज्ञानमे अवैधता अन्तर्निहित अछि, सत्यता बाह्य अछि। नैयायिक स्थिति (परतः): वैधता आ अवैधता दुनू बाह्य स्थितिसभ — सफल या असफल गतिविधि — केँ एकर गठन आ निर्धारणक लेल आवश्यकता होइत अछि। नैयायिक परिभाषा: 'ज्ञानक वैधता या प्रामाणिकताक निर्धारणक स्वतःत्व या तऽ पहिल ज्ञानसभक कारणसभक समग्रता द्वारा जे निर्धारित होइत अछि, एकर अवस्था अछि, या प्रामाणिकताक सभ आश्रयसभक निर्धारण करबैवाला द्वारा निर्धारित होएबाक अवस्था अछि, या ओही प्रामाणिकताक सन्दर्भ करबैवाला उत्पादित ज्ञान द्वारा निर्धारित होएबाक अवस्था अछि। आ ज्ञानक प्रामाणिकताक निर्धारणक परतस्त्व अर्थात् कारणसभक समग्रता बिना निर्धारित होएबाक अवस्था अछि।' (भट्ट खण्ड २, पृ. ३४२-३४३) गुण-दोष बहस: वैधताक गठन प्रामाण्य-उत्पत्ति-वाद (वैधताक गठन या उत्पादनक सिद्धान्त) भट्ट खण्ड २ (पृ. ३७०-४१०) मे स्थापित करैत अछि जे वैध ज्ञान देखल वस्तुक साथ सम्पूर्ण इन्द्रिय-विषय-सम्पर्क जकाँ सभ गुणसभक सामूहिक उपस्थितिमे उत्पन्न होइत अछि, आ अवैध ज्ञान एहि प्रकारक गुणसभक अनुपस्थितिमे उत्पन्न होइत अछि। मीमांसक आपत्ति करैत छथि (१.२.३५): वैध ज्ञान सँ भिन्न होएबाक अवस्था (प्रामाण्यत्व) साध्यक स्थापना या अनुमानमे एकटा विचलित स्थिति (उपाधि) अछि। नैयायिकक खण्डन: किएक हेतु (हेतु) जेना भिन्न वर्गक कार्य होएबाक अवस्था (विजातीय कार्यत्व) साध्य जेना भिन्न वर्गक कारण सँ उत्पन्न होएबाक अवस्था (विजातीय कारण जन्यत्व) सँ व्याप्त अछि, तहिना तथाकथित विचलित स्थिति (उपाधि) साध्य केँ व्याप्त नै करि सकैत — हेतु केँ विचलित नै करि सकैत। प्रमुख ज्ञानमीमांसीय सिद्धान्त (१.२.३६): वैध ज्ञान सम्पूर्ण इन्द्रिय-विषय-सम्पर्क जकाँ सभ गुणसभक सामूहिक उपस्थितिमे उत्पन्न होइत अछि, आ अवैध ज्ञान इन्द्रिय-विषय-सम्पर्क आदिक अनुपस्थितिमे (तदभाव) उत्पन्न होइत अछि। एहि कारण, गुणक (गुण) उपस्थिति वैध ज्ञानक कारण अछि आ गुणक अनुपस्थिति (तदभाव) अवैध ज्ञानक कारण अछि। नैयायिक आगा केवल दोषक अभाव (दोषाभाव) आ गुणक सकारात्मक उपस्थिति नै, वैध ज्ञानक कारणक रूपमे स्वीकार कएल जा सकैत अछि, एहि सुझावक खण्डन करैत छथि। निर्णायक तर्क: दोषक अभाव (दोषाभाव) केवल वैध ज्ञानक कारणसभक समग्रतामे अन्तरक सूचक (समग्रि भेदोपलक्षक) अछि, कारणत्वक अवच्छेदक होएबाक द्वारा। चीन गुलाब उदाहरण: स्फटिक पर चीन गुलाबक उपस्थितिमे श्वेत रूपक वैध ज्ञान उत्पन्न नै होइत अछि; स्फटिक पर चीन गुलाबक अनुपस्थितिमे श्वेत रूपक वैध ज्ञान उत्पन्न होइत अछि। एहि कारण, दोषक अनुपस्थिति सेहो वैध ज्ञानक कारण होएबाक चाही, अनावश्यक नै होएबाक द्वारा। ज्ञानक वैधतामे विश्वास प्रामाण्यवादक अन्तिम खण्ड (१.२.३१, भट्ट खण्ड २, पृ. ४९३): 'किछु दोसर सभ एतय एहि प्रकारे आपत्ति करैत छथि: जखन किछु ज्ञानसभ नैयायिक द्वारा अवैध स्वीकार कएल जाइत अछि, तखन ज्ञानक वैधतामे विश्वास काति संभव होएत? हालाँकि, ई आपत्ति सही नै अछि। ज्ञानक वैधता या प्रामाणिकताक निर्धारणक साधन पहिने सँ कहल या समझाएल गेल अछि।' ज्ञानमे विरोधाभासक नियम: ज्ञानक अवैधता (ज्ञान मिथ्यात्वे) विरोधाभासी ज्ञान (बाध्य बाधक व्यवस्था) द्वारा विरोधाभासित अछि। ई स्थापित करैत अछि जे अवैध ज्ञान एकटा अवैध बोधक स्वीकारोक्ति द्वारा अनावश्यक नै कएल जाएत; बल्कि, अवैध ज्ञानक भ्रामकता (भ्रमत्व बुद्धि) क विचार आपु स्वयं विरोधाभासी ज्ञान द्वारा विरोधाभासित अछि। प्रमालक्षण (वैध ज्ञानक परिभाषा) गङ्गेशक प्रमाक औपचारिक परिभाषा, जेना भट्ट खण्ड २ द्वारा अनुवादित: 'या तऽ (क) एकटा बोध होएबाक चाही जकर मुख्य विशेषण १० ओहि चीजमे अछि जे १० के धारण करैत अछि, या (ख) एकटा बोध होएबाक चाही जे १० के सम्बन्ध ओहि चीज सँ अछि जे १० के धारण करैत अछि।' नैयायिक मानैत छथि जे सविकल्पक (निश्चित) ज्ञान एकटा विशिष्ट ज्ञान (विशिष्ट ज्ञान) अछि एकटा वस्तुक एकर गुणसभ द्वारा योग्य क रूपमे। उदाहरण लेल, 'ई गाय अछि' (अयं गौः) एकटा वैध ज्ञान अछि किएक गाय गोत्वक गुण द्वारा योग्य जानल जाइत अछि। खण्ड २ मे अप्रमावाद (अवैध ज्ञानक सिद्धान्त) त्रुटिक विशिष्ट रूप स्थापित करैत अछि। विशिष्ट नैयायिक दावा: अवैध ज्ञान (ज्ञान मिथ्यात्वे) आ विरोधाभासी ज्ञानक बीच विरोधाभासक नियम रहैत अछि किएक अवैध ज्ञानक भ्रामकताक पहलू आपु स्वयं विरोधाभासी ज्ञान द्वारा विरोधाभासित अछि। प्रभाकर मीमांसकक वैकल्पिक स्थिति — जे भ्रमक पहलू केँ विरोधाभासित नै कएल जा सकैत किएक ओ सदा विद्यमान अछि — खण्डन कएल जाइत अछि: नैयायिक तर्क करैत छथि जे गतिविधिक पहलू (अवैध ज्ञान उत्पन्न करबाक) केँ विरोधाभासित नै कएल जा सकैत, किएक अतीत गतिविधि आदि पहिने सँ भऽ चुकल अछि, आ एहि कारण भ्रामकताक विचार (भ्रमत्व बुद्धि) ही विरोधाभासित होइत अछि। प्रत्यक्षक सिद्धान्त आ सन्निकर्ष (१.५-६) गङ्गेशक प्रत्यक्षक परिभाषा नव्य-नैयायिक परिभाषा: प्रत्यक्ष (प्रत्यक्ष) एकटा साक्षात्कारी ज्ञान (साक्षात्कारी ज्ञान) अछि जे कोनो पूर्ववर्ती ज्ञानक साधनता बिना उत्पन्न भेल। ई परिभाषा प्रत्यक्षक सभ मामलासभ — सामान्य (लौकिक) आ असाधारण (अलौकिक) — पर लागू होइत अछि, किएक साक्षात्कारित्व (तात्कालिकता) आवश्यक आ सार्वभौमिक विशेषता अछि। प्राच्य (पुरान न्याय) परिभाषा — इन्द्रियार्थसन्निकर्ष सँ उत्पन्न ज्ञान — बहुत संकीर्ण अछि: ई केवल मानवीय प्रत्यक्ष पर लागू होइत अछि आ दिव्य प्रत्यक्ष पर लागू नै होइत अछि जे इन्द्रिय-विषय-सम्पर्क बिना उत्पन्न होइत अछि (न्याय कुसुमाञ्जलिः, १.१)। सन्निकर्ष-वाद (सन्निकर्ष-वाद, १.५) खण्ड २, फाइल १ क पूरा दोसर भाग घेरैत अछि — पृ. ५१८-५३७ — आ प्रत्यक्ष सिद्धान्तक तकनीकी मूल अछि। सन्निकर्ष-वाद (सम्पर्क सम्बन्ध सिद्धान्त) सन्निकर्ष-वाद (सम्पर्क सम्बन्ध सिद्धान्त) स्थापित करैत अछि जे काति छहि प्रकारक इन्द्रिय-विषय-सम्पर्क सम्पर्क सम्बन्धक रूपमे कार्य करैत अछि। भट्ट खण्ड २ (पृ. ५१८-५३७) सँ प्रमुख तर्क: पूर्वपक्षी आपत्ति करैत अछि जे सम्पूर्ण वस्तु (अवयवि ग्रह) क प्रत्यक्ष केवल इन्द्रिय सँ जुड़ल वस्तुमे समवाय (संयुक्त समवायिन्) सँ संभव अछि; आ एहि कारण, इन्द्रिय सँ सम्पर्कक सम्बन्ध सम्पूर्ण वस्तुक प्रत्यक्षक कारण होएबाक आवश्यकता नै अछि। नैयायिक उत्तर: इन्द्रियक संयोग (इन्द्रिय संयोग) द्रव्यक कारण मानल जाइत अछि, आ एहि कारण ओही अन्य द्रव्य जेना सम्पूर्ण वस्तुक कारण मानल जा सकैत अछि। इन्द्रिय सँ जुड़ल वस्तुमे समवाय (संयुक्त समवाय) केँ सम्पूर्ण वस्तुक कारणक रूपमे आग्रह नै कएल जा सकैत संक्षिप्तताक कारण, किएक एकर कारणत्व (कारणता) केँ फेर सँ मानबाक आवश्यकता होएत। निर्णायक खण्ड (१.५.२२-२३): शब्द कानक छिद्र सँ घेरल आकाशमे बोध कएल जाइत अछि। केवल कानक छिद्र सँ घेरल आकाश श्रोत्र अछि। किएक, ओही आवश्यक अछि आ संक्षिप्तता अछि; ओही कानक छिद्र सँ घेरल आकाश सामान्य शब्दक प्रत्यक्षक कारण निर्धारित कएल जाइत अछि। केवल किसी वस्तुक प्रत्यक्षक साधन, जबकि शरीर सँ जुड़ल, इन्द्रिय (इन्द्रिय) अछि। अनुभव 'हम वीणाक शब्द कानक छिद्र सँ सुनैत छी' केवल कानक छिद्र सँ घेरल आकाश केँ कानक प्रत्यक्षक साधन साबित करैत अछि। अन्तिम निर्धारण: शब्दत्व केँ रूपत्वादि न्याय (रूपत्वादि न्याय) द्वारा सार्वभौमिक गुण साबित कएल जा सकैत अछि। 'एहि प्रकारे श्री गङ्गेशोपाध्याय द्वारा रचित तत्त्वचिन्तामणिमे प्रत्यक्षमे सन्निकर्ष-वाद समाप्त भेल।' समवायवाद (१.६) — समवाय सम्पर्क सम्बन्धक रूपमे समवाय-वाद (समवाय-वाद, खण्ड १.६) खण्ड २ फाइल २ क शुरुआत (पृ. ५३८-५७०) घेरैत अछि। गङ्गेश प्रारम्भिक दृष्टिकोण (पूर्वपक्ष) सँ शुरुआत करैत अछि जे समवाय केँ सम्पर्क सम्बन्धक रूपमे स्थापित नै कएल जा सकैत, किएक ओही समवाय सार्वभौमिक गुण, गुण, आदि क सम्पर्क सम्बन्ध नै होए सकैत समवायक असिद्धताक कारण (समवायसिद्धि)। सिद्धान्तीक तर्क: सार्वभौमिक गुण (जाति), गुण (गुण), क्रिया (क्रिया), आ हुनकर संबंधित आश्रयसभ एक-दोसर सँ समवाय द्वारा सम्बन्धित अनुभव कएल जाइत अछि (मिथः संबद्धौ), आ विशिष्ट ज्ञान आ विशिष्ट पदनाम असम्बद्ध प्रकृतिक दुई सत्तासभ (असम्बद्ध स्वरूप द्वये) क सम्बन्धमे संभव नै अछि। एहि कारण समवाय केँ सम्बन्धक रूपमे स्वीकार कएल जाएबाक चाही। पूर्वपक्षीक खण्डन: समवायक सम्बन्ध सम्बद्ध सत्तासभक अनुभव (संबद्धानुभव) क आधार पर विशेषण (विशेषण) क रूपमे प्रकट नै होए सकैत; समवायक सम्बन्ध न त विशेष्य क रूपमे प्रकट होए सकैत, न अपन स्वरूपमे एकटा स्वतन्त्र वस्तुक रूपमे; समवायक वस्तुत्वक अनुभव जेना 'हम समवाय जानैत छी' क अनुपस्थिति अछि। नैयायिकक अन्तिम उत्तर (१.६.१८): जखन अभाव समवायक माध्यम सँ होइत अछि, तखन विनाश अन्तर्निहित कारणक हानि पर खोइ जाएबाक आवश्यकता होएत। आ सकारात्मकता केँ निर्धारक कारणक रूपमे नै रखल जा सकैत जे जे खोएबाक अछि, ओकरा बनाबैत। निर्णायक निर्धारण: अन्तर्निहित वस्तुमे समवाय (समवेत समवाय) केँ शब्दत्वक प्रत्यक्ष उत्पन्न करबैवाला सम्पर्क सम्बन्ध (ग्राहक) होएबाक आवश्यकता नै अछि शब्दत्वक सार्वभौमिक गुणक अनुपस्थितिक कारण (शब्दत्व)। गङ्गेशक अनुसार, शब्दत्व केँ रूपत्वादि न्याय (रूपत्वादि न्याय) द्वारा सार्वभौमिक गुण साबित कएल जा सकैत अछि। अभाववाद (१.८), प्रत्यक्षकारणवाद (१.९), आ मनोऽणुत्ववाद (१.१०) अभाववाद (अभाव-वाद) अभाव-वाद (अभाव-वाद, खण्ड १.८) मीमांसकक आपत्ति सँ शुरुआत करैत अछि: वस्तुसभक अभाव केवल खाली आश्रयक अस्तित्वक प्रकृति (भावात्मन्) अछि। प्राच्य नैयायिकक उत्तर: वस्तुसभक अभावक अविरोधी ज्ञान जेना 'घड़ा जमीन पर नै अछि' वास्तवमे विद्यमान पाबल जाइत अछि; ई ज्ञान केवल आश्रय (जमीन) पर आधारित नै होए सकैत। आगा निर्धारण (१.८.३): विशेष अभावाश्रय अछि — विशिष्टता अभावक स्थान अछि। वस्तुसभक अभाव एकटा विशिष्ट आश्रय जेना जमीन सँ घेरल अनुभव कएल जाइत अछि; एहि कारण अभाव एकटा अलग तत्त्वमीमांसात्मक श्रेणी अछि। प्रत्यक्षकारणवाद (१.९) प्रत्यक्ष-कारण-वाद (प्रत्यक्ष-कारण-वाद) वायुक परमाणु अप्रत्यक्षता स्थापित करैत अछि। नवीन स्थिति: केवल बोधगम्य स्पर्श (उद्भूत स्पर्श मात्र) स्पर्श इन्द्रिय द्वारा द्रव्यक बोधगम्यताक कारण नै अछि। निर्णायक तर्क: स्पर्श आ रूप सँ सम्बन्धित अभिव्यक्तित्व (उद्भवत्व जाति) क सार्वभौमिक गुण केवल कारणत्वक अवच्छेदक (कारणतावच्छेदके) गठित करैत अछि — ओ कारण (कारणे) नै अछि। एहि कारण वायु अप्रत्यक्ष अछि। ई सीधा अनुमान-खण्डमे विकसित कार्य-कारण सिद्धान्त सँ जुड़ैत अछि। मनोऽणुत्ववाद (१.९/१०) मनोऽणुत्ववाद (मनक परमाणु प्रकृतिक सिद्धान्त) स्थापित करैत अछि जे मनस् (मन) परमाणु (अणु) अछि। केन्द्रीय तर्क: यदि मन सर्वव्यापी होएत, तऽ विभिन्न बाह्य इन्द्रियसभ एकरा सँ एक साथ सम्पर्कमे आबि पाँच भिन्न गुणसभक एक साथ प्रत्यक्ष उत्पन्न करि सकत। मुदा हम क्रमिक, वास्तविक रूपसँ एक साथ नै, बहु-इन्द्रिय प्रत्यक्ष अनुभव करैत छी। परमाणु मन अंगसभक संगति (सङ्कोच विकास) द्वारा विस्तार आ संकुचित होइत अछि, एक साथताक आभास आ क्रमिक उत्पादन दुनू क समझाबैत अछि। मीमांसक आपत्ति (१.१०.१९): बड़ गोल रोटी खाबैत पाँच भिन्न गुणसभक पाँच भिन्न ज्ञान काति उत्पन्न होइत अछि? नैयायिक उत्तर: पाँच ज्ञानक एक साथताक ज्ञान बाधाक अनुपस्थितिमे एकटा वास्तविकता (प्रमा) अछि। जखन मनक कोनो एकटा इन्द्रिय सँ निकट या तीव्र सम्पर्क पाँच भिन्न प्रत्यक्षात्मक ज्ञानसभक लेल बाधक (बाधक) अछि, तखन मन केँ पाँच भाग सँ मिलल एकटा सम्पूर्ण (अवयविन्) मानल जा सकैत अछि, आ दुनू प्रकारक ज्ञान केँ मनक भागसभक विस्तार आ संकुचन (सङ्कोच विकासाभ्याम्) द्वारा समझाएल जा सकैत अछि। प्रत्यभिज्ञा, निर्विकल्पक, आ सविकल्पक ज्ञानक सिद्धान्त (१.११-१३) प्रत्यभिज्ञा (अनुव्यवसाय / पहिचान) प्रत्यभिज्ञा-वाद (पहिचान-वाद, १.११) पहिचान केँ सामान्य प्रत्यक्षक तेसर प्रकारक रूपमे स्थापित करैत अछि — निर्विकल्पक आ सविकल्पकक बाद — अपन संरचना सहित जे दुनू मे अपरिवर्तनीय अछि। नैयायिक स्थापित करैत छथि जे प्रत्यक्ष वैध ज्ञानक साधन नै अछि जे साधारण पहिल ज्ञान केँ आत्म-सचेत साबित करैत अछि; किएक, साधारण पहिल ज्ञानक 'हम ई चाँदीक रूपमे जानैत छी' (इदम् अहं जानामि) रूप धारण करबाक स्थापित नै कएल गेल अछि। प्रमुख तर्क: वस्तुक लेल गतिविधि ज्ञानक वस्तुसभक निर्धारण सँ देखल जाइत अछि; साधारण पहिल ज्ञान केवल वस्तुक आपु स्वयं केँ सन्दर्भित करैत अछि; ई आत्मा केँ अपन वस्तुक रूपमे सन्दर्भित करबाक अनुभव नै कएल गेल अछि। एहि कारण पहिचान (सोऽयं देवदत्तः — 'ई ओ देवदत्त अछि') दुनू इन्द्रियसभ आ पूर्व अनुभवक संस्कार (संस्कार) द्वारा उत्पन्न होइत अछि। निर्विकल्पक ज्ञान — गङ्गेशक स्वयंक स्थिति निर्विकल्पक-वाद (निर्विकल्पक-वाद, १.१२) मे गङ्गेशक अपन स्थितिक सबसँ सावधान वक्तव्य अछि: निर्विकल्पक ज्ञान गोत्व (विशेषण) क ज्ञान अछि जखन विशेषण गोत्व गायमे प्रकट होइत अछि — केवल गोत्व (गोत्व), आ गोत्वक विशिष्टता (तद्वैशिष्ट्य) नै, ततय उत्पन्न होइत अछि। सिद्धान्तीक आपत्ति: विशेषण गोत्व विशिष्ट प्रत्यक्षात्मक ज्ञानमे अपन गुण द्वारा योग्य (स्वधर्म विशिष्ट) क रूपमे प्रकट होए सकैत अछि। गङ्गेशक खण्डन: एहि प्रकारक गुण पहिने सँ अज्ञात अछि; एकर प्रकटन अनवस्था उत्पन्न करत। निर्णायक निर्धारण: विशेषण सार्थक (१.१२.९) अछि — विशेषण जे अनुमानमे असिद्धताक दूर करैत अछि, ओ विशेषण अछि जे वास्तविक रूपसँ उपयोगी अछि। केवल गोत्व, नै गोत्वत्व-त्व, ई कार्य करैत अछि। सविकल्पक ज्ञान — अन्तिम खण्ड सविकल्पक-वाद (निश्चित ज्ञान-वाद, १.१३) अन्तिम अध्याय अछि। गङ्गेश: सविकल्पक (सविकल्पक) एकटा विशिष्ट ज्ञान (विशिष्ट ज्ञान) अछि जेना 'ई (गाय) गाय अछि' (गौर् अयम्)। ई एकटा प्रत्यक्ष अछि, किएक सार्वभौमिक गुण गोत्व आदि जकाँ वस्तुसभ अन्ततः वास्तविक (परमार्थ सत्) अछि आ ओही ज्ञान इन्द्रियसभक वस्तु सँ सम्पर्क सम्बन्ध सँ उत्पन्न होइत अछि। एकटा सविकल्पक ज्ञान सेहो एकटा विशिष्ट पहिचान (प्रत्यभिज्ञा) उत्पन्न करैत अछि जे इन्द्रियसभ सँ उत्पन्न — 'हम जानैत छी जे ई गाय ओ गाय अछि' (सोऽयम्) — जे संस्कार सहकारिणीक सहयोगी कारणक कारण, वस्तु 'गाय' केँ तत्-त्व द्वारा योग्य इदम्-त्व द्वारा योग्य वस्तु 'गाय' सँ पहिचान क वर्णन करैत अछि। खण्ड २ अन्त (पृ. ८०३) सविकल्पक-वादक समाप्ति पर, तत्त्वचिन्तामणिक प्रत्यक्ष-खण्ड केँ पूर्ण करैत अछि। भट्टक कोलोफोन: 'एहि प्रकारे श्री गङ्गेशोपाध्याय द्वारा रचित तत्त्वचिन्तामणिक प्रत्यक्ष खण्ड समाप्त भेल।' तुलनात्मक आ विश्व-दार्शनिक आयाम बेन-अमी शार्फस्टाइनक 'अ कम्पेरेटिव हिस्ट्री ऑफ वर्ल्ड फिलॉसफी' क अध्याय १० गङ्गेश केँ डेसकार्टेस आ लाइबनिज क साथ विषयक तहत रखैत अछि: पद्धतिगत रूपसँ प्रयुक्त तर्कक माध्यम सँ निश्चितताक खोज। तीनु दार्शनिक तर्क पद्धतिकेँ आपु स्वयं केँ दार्शनिक जाँचक प्राथमिक वस्तुक रूपमे अलग करैत छथि, नै कि अधिक अनुभवजन्य सामग्री जोड़ि। 'गङ्गेशक वैध आगमन आ किफायती व्याख्याक समस्यासभ सँ जुड़ाव भावना मे समकालीन विज्ञानक दार्शनिकसभ जकाँ अछि।' तीनु तीव्र संशयवादी चुनौतिसभक प्रतिक्रिया सेहो देबैत छथि — गङ्गेश चार्वाक आ श्रीहर्ष केँ, डेसकार्टेस कार्टेशियन दानव केँ, लाइबनिज कट्टर अनुभववाद केँ। व्याप्तिक २२-परिभाषा उपचार आ डेसकार्टेसक पद्धतिक बीच विशिष्ट समानान्तर संरचनात्मक अछि: गङ्गेश एकटा परिभाषा प्रस्ताव करैत अछि, प्रतिबन्धक-प्रतिबद्ध सम्बन्धक माध्यम सँ एकटा प्रतिउदाहरण उत्पन्न करैत अछि, परिभाषा केँ अस्वीकार करैत अछि, आ आगा बढ़ैत अछि — जब धरि कोनो प्रतिउदाहरण उत्पन्न नै कएल जा सकैत। ई डेसकार्टेसक 'कठिनाइसभ केँ यथासंभव अनेक भागसभमे विभाजित करू आ सरल सँ जटिल केँ आगा बढ़ू' क द्वन्द्वशास्त्रीय संस्करण अछि। अन्तर: डेसकार्टेस व्यक्तिगत निश्चितता सँ बाहर केँ निर्माण करैत अछि; गङ्गेश एकटा सामुदायिक परम्पराक सटीकता केँ भीतर परिष्कृत करैत अछि। दुनू ज्ञान स्थापित करबाक लेल तर्क लागू करैत अछि, मुदा विपरीत दिशासभ सँ। शार्फस्टाइनक अवलोकनक सामाजिक आयाम — जे गङ्गेश 'दर्शन केँ एकटा विशिष्ट भाषामे निपुण व्यक्तिसभक निस्संदेह क्षेत्र बना देबैत अछि' — दूषण पंजी साक्ष्यक विरुद्ध पढ़ल जाए पर अपन पूर्ण महत्व प्राप्त करैत अछि। दार्शनिक जे संस्कृत परम्परामे सबसँ तकनीकी रूपसँ कठिन ज्ञान-प्रणाली बनौलक, ओ आपु स्वयं, जीवनी रूपसँ, ओ सामाजिक पदानुक्रम सँ पूर्ण रूपसँ नियंत्रित नै छल जे परम्परा सेवा करैत छल। एकर दार्शनिक विधि (प्रत्येक परिभाषाक प्रत्येक प्रतिउदाहरणक विरुद्ध परीक्षण करू) आ एकर जीवनी वास्तविकता (एकटा जीवन जे आपु स्वयं जाति-शुद्धता मानदण्डसभक एकटा प्रतिउदाहरण छल) आकस्मिक समानतासभ नै बल्कि संरचनात्मक अभिसरण अछि। टीका परम्परा — वर्धमान सँ रघुनाथ शिरोमणि पॉटर-भट्टाचार्य इन्साइक्लोपीडिया खण्ड ६ अवधि १३१०-१५१० ई. पार पचास लेखकसभक केँ शामिल करैत अछि। रघुनाथ शिरोमणिक दीधिति निर्णायक द्वितीयक ग्रन्थ अछि, जे जगदीश तर्कशंकर आ गदाधर भट्टाचार्य सँ आगा अपन विशाल टीका साहित्य उत्पन्न करैत अछि। इन्साइक्लोपीडिया नोट करैत अछि जे 'एहि सम्बन्धसभक सबसँ जटिल उपयोग दीधिति परम्परामे जागरूकताक विश्लेषणक सम्बन्धमे होइत अछि' — एकटा परम्परा जे केवल ई कारण उत्पन्न होए सकैत छल किएक गङ्गेश तत्त्वचिन्तामणिमे, ओ संकल्पनात्मक ढाँचा बनौलक जाहि भीतर एहि प्रकारक विश्लेषण संभव छल। नव्य-न्याय विद्यालयक मिथिला सँ नवद्वीपमे प्रसारण — गजेन्द्र ठाकुर द्वारा पंजी अभिलेख सँ प्रलेखित — दुनू संस्थागत आ दार्शनिक कथा अछि। पक्षधर मिश्रक तत्त्वचिन्तामणिक नकल करबाक अनुमति देबा सँ इनकार, जे वासुदेव सार्वभौम केँ एकरा कण्ठस्थ करबाक लेल बाध्य केलक, विरोधाभासी रूपसँ पाठक प्रसारण सुरक्षित केलक: जे नकल नै कएल जा सकत छल, ओ पाण्डुलिपि प्रसारणक अनिश्चिततासभ सँ खोइल नै सकत छल, किएक ई एकटा मानव स्मृतिमे वहन कएल गेल छल जे एकरा अक्षुण्ण राखबाक लेल प्रशिक्षित छल। विद्यालय बंगाल चल गेल; पाठ बचल रहल। मैथिली साहित्यक समानांतर इतिहास आ गङ्गेशक सभ्यतागत स्थान नौ-परत समानांतर इतिहासमे गङ्गेश मैथिली साहित्यक समानांतर इतिहास — जेना गजेन्द्र ठाकुर/विदेह द्वारा प्रलेखित — नौ परतसभमे प्रकट होइत अछि: (१) बौद्ध चर्यापद आधार; (२) दुई विद्यापति; (३) दमित गङ्गेश (दूषण पंजी सँ); (४) अकाल विरोध कविता; (५) हरिमोहन झाक बहिष्कार; (६) जीवित उस्ताद (राजदेव मण्डल, बेचन ठाकुर); (७) आरटीआई खुलासा (विनीत उत्पल/आशीष अंचिन्हार: साहित्य अकादमी मैथिली नियुक्तिसभक ९०%+ सलाहकार बोर्डक मित्र/रिश्तेदार केँ गेल); (८) नेपाल मल्ल धागा; (९) विदेहक डिजिटल प्रतिकार-अभिलेख। गङ्गेशक जीवनीक दमन परत ३ आ ९ मे दार्शनिक आ राजनीतिक जोड़ैत अछि: ओही संस्थागत संस्कृति जे हरिमोहन झा (सबसँ लोकप्रिय मैथिली व्यंग्यकार, जे ब्राह्मण रूढ़िवादिता पर हमला करैत छल) केँ साहित्य अकादमी पुरस्कार सँ वंचित केलक, ओ सुनिश्चित केलक जे गङ्गेशक बारेमे दूषण पंजी तथ्य गुप्त राखल जाए। साहित्य अकादमीक २०१६ गङ्गेश पर मोनोग्राफ — जे विदेहक २००९ जारीक बाद रिकर्ड सीधा करबाक एकटा अवसर होएबाक चाही छल — एकरा बदले दमन केँ दोहरौलक। विदेहक डिजिटल अभिलेख आ गङ्गेशक पुनःप्राप्ति विदेहक ११,००० ताड़पत्र तिरहुता-लिपि पाण्डुलिपिसभ (गङ्गेशक जीवनी दस्तावेज करबैवाला पंजी अभिलेख सहित) क अङ्कीकरण, यूनिकोडमे तिरहुता (२०१४) क सफल मानकीकरण, मैथिली विकिपीडिया आ गूगल ट्रांसलेट स्थानीयकरण, आ विदेह पोथी डिजिटल पुस्तकालय मिलि समानांतर इतिहास जे 'एकटा जीवित समानांतर संस्था' कहैत अछि, गठित करैत अछि। गङ्गेशक तत्त्वचिन्तामणि एहि अभिलेख सँ ब्राह्मण्य रूढ़िवादिताक स्मारकक रूपमे नै, बल्कि एकटा सम्पूर्ण सभ्यतागत धरोहरक भागक रूपमे सम्बन्धित अछि। अंचिन्हार आखर समूह (आशीष अंचिन्हार आ गजेन्द्र ठाकुर, २००८ सँ) द्वारा मैथिली गजल पुनरुत्थान समानांतर साहित्य आन्दोलनक सबसँ विशिष्ट औपचारिक उपलब्धि क अभ्यावेदन करैत अछि। गजेन्द्र ठाकुर, मैथिलीक पहिल अरूजी (गजल छन्दशास्त्र विद्वान) क रूपमे मान्य, गजलशास्त्रम् क रचना केलक। ओही आलोचनात्मक कठोरता जे गङ्गेशक व्याप्तिक २२-परिभाषा उपचार केँ सजीव करैत अछि, आन्दोलनक कठोर छन्द नियमसभ पर आग्रह केँ सजीव करैत अछि। दुनू दार्शनिक आ आन्दोलन सिद्धान्त लागू करैत अछि: प्रत्येक दावाक प्रत्येक संभावित प्रतिउदाहरणक विरुद्ध परीक्षण करू, तब धरि संशोधित करू जब धरि कोनो दोष नै रहैत। दूषण पंजी (गजेन्द्र ठाकुर/विदेह, २००९): दमित जीवनी सत्य — अपन पिताक मृत्युक पाँच वर्ष बाद जन्म, एकटा चर्मकारिणी सँ विवाह, मिथिला ब्राह्मण मानकसभ द्वारा हुनकर परिवार 'निम्न सामाजिक स्थिति', हुनकर कविता जानबूझि दमन द्वारा पूर्ण रूपसँ खोइल। समानांतर इतिहास: दमन संस्थागत पैटर्नक रूपमे, डिजिटल पुनःप्राप्ति सभ्यतागत प्रतिरोधक रूपमे। एकटा एकल सिद्धान्त जे गङ्गेश आपु स्वयं तत्त्वचिन्तामणिक शुरुआतमे प्रतिपादित केनए छल: 'मापल शब्दसभ' सँ रचना, दुनू विद्यालयसभक 'सम्पूर्ण सार विचारक दिव्य नेत्र सँ अवलोकन' करबाक बाद। प्रत्येक परिभाषाक परीक्षण कएल जाए; कोनो दोष नै रहए। समानांतर इतिहास आन्दोलन ओही सिद्धान्त अपन विषय पर लागू केनए अछि: प्रत्येक स्रोतक जाँच कएल गेल, प्रत्येक दावाक परीक्षण कएल गेल, कोनो आवश्यक तथ्य दमन नै कएल गेल। परिशिष्ट १ · अनुपलब्धि, समवाय, मनोऽणुत्व आ शब्दशास्त्रम् परिशिष्ट परिशिष्ट १: अनुपलब्धिक अवैधताक सिद्धान्त आ आगा विस्तार [परिशिष्ट १, २, ३, ४, ५ क मैथिली अनुवाद, मूल अंग्रेजी पाठक समान पूर्णता, तकनीकी सटीकता एवं विस्तार सहित] परिशिष्ट १: अनुपलब्धि-वाद (१.७) आ आगा विस्तार क. अनुपलब्धि-वाद (अनुपलब्धि-वाद, १.७) अनुपलब्धि-वाद (अनुपलब्धि-वाद) प्रत्यक्ष-खण्डक सबसँ दार्शनिक रूपसँ सूक्ष्म खण्डसभमे सँ एक अछि। ई अभावक सकारात्मक तत्त्वमीमांसात्मक स्थिति स्थापित करैत अछि, एहि दृष्टिकोणक विरुद्ध जे अनुपलब्धि (अनुपलब्धि) आपु स्वयं एकटा प्रमाण (ज्ञानक वैध स्रोत) अछि — एहि स्थिति प्रभाकर मीमांसक आ किछु वेदान्ती धारण करैत छल। प्रारम्भिक तर्क (१.७.१): गङ्गेश तर्क करैत अछि जे वस्तुसभक अभावक अनुपलब्धि (अभावानुपलब्धा) वस्तुसभक अस्तित्वक ज्ञान (भाव ग्रह) क कारण नै होए सकैत, किएक ई वस्तुसभक अस्तित्वक ज्ञान (भाव धी) द्वारा अनावश्यक होइत अछि। वस्तुसभक अस्तित्वक ज्ञान (भाव धी) कभी विलम्बित नै होइत, वस्तुसभक अभावक अनुपलब्धि बिना, बशर्ते कि इन्द्रियसभ आ वस्तुसभक बीच सम्पर्क (इन्द्रियार्थसन्निकर्ष) उपस्थित हो। भट्टसभक आपत्ति: इन्द्रिय (इन्द्रिय) वस्तुसभक अभावक ज्ञान (अभाव ग्रहे) क मामलामे कारण (हेतु) होएबाक चाही, किएक ओही वस्तुसभक अभावक ज्ञानक साधन नियुक्त कएल गेल अछि (तदनुविधानात्)। नैयायिकक उत्तर: इन्द्रियसभ, जेना आँखि, वस्तुसभक अभावक आश्रयक ज्ञान उत्पन्न करि समाप्त होइत अछि (तदुपक्षयात्), किएक इन्द्रियसभ वस्तुसभक अभाव सँ सम्बद्ध या सम्पर्क सम्बन्धमे नै अछि; आ इन्द्रियसभ केवल उन सभक ज्ञान उत्पन्न करैत अछि जे हुनका सँ सम्बद्ध अछि। 'इन्द्रिय प्रमाण नै अछि' (१.७.२): वस्तुसभक अभावक आश्रयक ज्ञान इन्द्रियक संचालन अछि; आ एहि कारण, ओही इन्द्रिय वस्तुसभक अभावक ज्ञानमे आश्रयक ज्ञान द्वारा अनावश्यक नै अछि। इन्द्रियक संचालनक अवस्था (व्यापारत्व) केवल इन्द्रियसभक कारणत्वक स्थापना पर स्थापित होइत अछि; मुदा इन्द्रियसभक कारणत्व आपु स्वयं स्थापित नै अछि, किएक इन्द्रियसभक वस्तुसभ सँ कोनो सम्पर्क सम्बन्धक अनुपस्थितिक कारण — वस्तुसभक अभाव इन्द्रियसभ सँ परे (अतीन्द्रिय) अछि। वेदान्तीक दृष्टिकोण (१.७.३): किएक वस्तुसभक अभाव केवल इन्द्रिय सँ जानल जाएबाक चाही, केवल विशेषणता, अर्थात् आत्म-सम्बन्ध सम्बन्ध (विशेषणता), केँ वस्तुसभक अभावक प्रत्यक्षमे सम्पर्क सम्बन्धक रूपमे मानबाक आवश्यकता अछि। हालाँकि, नैयायिक एहि क खण्डन करैत छथि: गैर-दुर्बल इन्द्रिय (अनुपक्षीणेन्द्रिय) रूप आदिक प्रत्यक्षमे साधन नियुक्त कएल जाइत अछि; आ एहि कारण केवल संयुक्त समवाय ततय सम्पर्क सम्बन्ध अछि। मुदा चूँकि इन्द्रिय एतय (इह) वस्तुसभक अभावक प्रत्यक्षक मामलामे, केवल वस्तुसभक अभावक आश्रयक ज्ञान उत्पन्न करि दुर्बल भऽ गेल अछि, ओही इन्द्रिय केँ विशेषणता (प्राप्त्यन्तर) क कोनो अन्य सम्पर्क सम्बन्ध मानबाक आवश्यकता नै अछि। नैयायिकक निर्णायक स्थिति (१.७.११): नैयायिकक निर्णायक दृष्टिकोण अछि जे केवल एकटा अलग वस्तुसभक अभाव, जे एकटा प्रतियोगी केँ सन्दर्भित करैत अछि, अनुभव कएल जाइत अछि। उदाहरण लेल, अनुभव एहि प्रकारक अछि जेना 'ई घड़ा नै अछि' आ 'ई वस्त्र नै अछि' आदि। वस्तुसभक अभावक केवल खाली आश्रय कभी अनुभव नै कएल जाइत अछि। एहि कारण, प्रतियोगी केँ वस्तुसभक अभावक ज्ञान सँ जानल जाएबाक चाही। अनुभव साबित करैत अछि जे वस्तुसभक अभावक ज्ञान प्रतियोगीक ज्ञान पर निर्भर अछि, गायक सादृश्य जकाँ। आ केवल खाली आश्रय वस्तुसभक अभाव गठित नै करैत अछि; किएक केवल खाली आश्रयक ज्ञान प्रतियोगीक ज्ञान बिना सेहो संभव अछि। वस्तुसभक अभाव एकटा अलग सकारात्मक श्रेणी (प्रतियोगिमदाधिकरण) अछि — ई वस्तुसभक अभाव (अभाव) होएबाक अवस्था अछि। ई निर्णायक रूपसँ अभाव केँ छहि वैशेषिक श्रेणीसभ सँ परे सातम् श्रेणीक रूपमे स्थापित करैत अछि, एकर अपन सम्पर्क सम्बन्ध (विशेषणता) सहित। ख. खण्ड ७-८ सीमा: अभावक सम्बन्धमे अनुपलब्धिक अवैधता अभाव-वाद (खण्ड १.८) सीधा अनुपलब्धि-वाद खण्ड पर निर्माण करैत अछि। प्रमुख संक्रमण तर्क: केवल खाली आश्रय जेना जमीनक ओही ज्ञान वस्तुसभक अभावक ज्ञानक दुनू वस्तु (प्रमेय) आ साधन (प्रमाण) गठित करैत अछि, ज्ञानसभक स्वप्रकाशत्व (स्वप्रकाशत्व) कारण। प्रभाकर मीमांसक एहि आपत्ति क खण्डन करैत छथि जे जखन केवल खाली आश्रय जेना जमीनक ज्ञान वस्तुसभक अभावक ज्ञान गठित करैत अछि, तखन प्रतियोगी जेना घड़ा (प्रतियोगी ज्ञान अपेक्षा) क ज्ञानक अपेक्षा आवश्यक नै होएत। अभावक लेल नैयायिकक अन्तिम निर्धारण: केवल एकटा अलग वस्तुसभक अभाव, जे एकटा प्रतियोगी केँ सन्दर्भित करैत अछि, अनुभव कएल जाइत अछि। ज्ञान आ उपयोग जेना 'जमीन पर घड़ाक अभाव अछि' विद्यमान पाबल जाइत अछि — आ एहि प्रकारक ज्ञान केवल आश्रय (जमीन) पर आधारित नै होए सकैत, किएक तखन ओही ज्ञान घड़ा धारण करबैवाली जमीनमे आकस्मिक भऽ जाएत। 'घड़ाक अभाव' शब्दक प्रयोगक वस्तु होएबाक अवस्था केवल तखन प्रतियोगी धारण करबाक अवस्था सँ निर्धारित होइत अछि जखन एकर 'घड़ाक अभाव' शब्दक प्रयोगक वस्तु होएबाक अवस्था अछि। एहि प्रकारे, परस्पर निर्भरता आकस्मिक भऽ जाइत अछि — आ नैयायिक समाधान: 'गायक सादृश्य' शब्दक प्रयोगक वस्तु होएबाक अवस्था, गायक ज्ञान सँ उत्पन्न, 'गवयक गाय सँ सादृश्य' क रूपमे स्वीकार कएल जाए, आ एहि प्रकारे एकटा अलग सादृश्य स्वीकार करबाक पर्याप्त अछि। ग. समवाय पर नैयायिक-सिद्धान्ती बहस: पूर्ण प्रलेखीकरण समवाय-वाद (१.६) भट्ट खण्ड २ मे सम्पूर्ण प्रत्यक्ष-खण्डक सबसँ तकनीकी रूपसँ जटिल बहससभमे सँ एक अछि। केन्द्रीय मुद्दा: का समवाय (समवाय) ओ सम्पर्क सम्बन्ध अछि जे विशिष्ट ज्ञान उत्पन्न करैत अछि? सिद्धान्ती स्थापित करैत छथि (१.६.१) जे सार्वभौमिक गुण (जाति), गुण (गुण), क्रिया (क्रिया) आ हुनकर आश्रयसभ समवाय द्वारा परस्पर सम्बन्धित अनुभव कएल जाइत अछि (मिथः संबद्धौ)। विशिष्ट ज्ञान आ विशिष्ट पदनाम असम्बद्ध प्रकृतिक दुई सत्तासभ (असम्बद्ध स्वरूप द्वये) क सम्बन्धमे संभव नै अछि। पूर्वपक्षीक समवाय केँ सम्पर्क सम्बन्धक रूपमे बहु-चरणीय खण्डन: (१) समवायक सम्बन्ध सम्बद्ध सत्तासभक अनुभव (संबद्धानुभव) क आधार पर विशेषण (विशेषण) क रूपमे प्रकट नै होए सकैत; (२) सम्पर्क स्थापित करबैवाला अनुभवक विपरीत, समवाय स्थापित करबैवाला अनुभव ('ई दुई वस्तु अन्तर्निहित अछि') क अनुपस्थिति अछि; (३) समवायक सम्बन्ध न त विशेष्य क रूपमे प्रकट होए सकैत, न अपन स्वरूपमे एकटा स्वतन्त्र वस्तुक रूपमे; (४) समवायक वस्तुत्वक अनुभव जेना 'हम समवाय जानैत छी' क अनुपस्थिति अछि। नव्यक उत्तर (१.६.६): नव्य प्रस्ताव करैत छथि जे समवाय स्थापित करबैवाला अनुमान अछि जे 'गुण, क्रिया या सार्वभौमिक गुणक विशिष्ट ज्ञान सम्बन्धी उपवाक्य सँ भिन्न सम्बन्धक सन्दर्भ करैत अछि।' ई अनुमान दोषपूर्ण नै अछि जे हेतु अभावादि विशिष्ट बुद्धि (अभावादि विशिष्ट बुद्धि) क मामलामे विचलित होइत अछि। अन्य विद्वानसभ (अन्ये) क दृष्टिकोण (१.६.३): अनुमान इन्द्रियक सम्पर्क सम्बन्धक घटक भागक रूपमे स्थापित होइत अछि, सम्पर्कक सम्बन्धक रद्दीकरण पर। मुदा नैयायिक एहि क खण्डन करैत छथि: इन्द्रिय अपन स्वभाव सँ अपन सँ सम्बद्ध वस्तुक ज्ञान उत्पन्न करैत अछि (स्वसम्बद्ध व्यवहार कारिन्)। सार्वभौमिक गुण आदिक ज्ञान इन्द्रियसभ सँ सम्बन्ध (गुण आदिक जे (इन्द्रिय सँ) जुड़ल अछि) सँ उत्पन्न होइत अछि। एहि कारण, समवाय केँ सम्पर्क सम्बन्धक रूपमे स्वीकार करैत सेहो, आत्म-सम्बन्ध सम्बन्ध (विशेषणता) आवश्यक अछि। भट्टसभक दृष्टिकोण (१.६.३ जारी): अनुमान इन्द्रियक सम्पर्क सम्बन्धक घटक भागक रूपमे स्थापित होइत अछि, सम्पर्कक सम्बन्धक रद्दीकरण पर, अनुमान सँ जे 'शब्द, सार्वभौमिक गुण आ रूप आदि इन्द्रियसभ सँ सम्बन्धित अछि; किएक ओ बोधगम्य अछि, घड़ा जकाँ।' किएक इन्द्रिय अपन सँ सम्बद्ध वस्तुक ज्ञान उत्पन्न करैत अछि। एहि कारण अछि, समवाय बोधगम्य नै अछि, किएक ओही कोनो इन्द्रिय सँ सम्बन्ध नै रखैत अछि। नैयायिकक अन्तिम निर्धारण (१.६.१८): शब्दत्व केँ रूपत्वादि न्याय (रूपत्वादि न्याय) द्वारा सार्वभौमिक गुण साबित कएल जा सकैत अछि। ई निर्णायक रूपसँ समवाय केँ सार्वभौमिक (रूपत्व) आ एकर उदाहरणसभक बीच पुलक रूपमे एकर भूमिकाक माध्यम सँ सम्पर्क सम्बन्धक रूपमे स्थापित करैत अछि। घ. मनोऽणुत्ववाद: मनक परमाणु प्रकृतिक सिद्धान्त — पूर्ण विवरण मनोऽणुत्ववाद (मनोऽणुत्ववाद, १.१०) स्थापित करैत अछि जे मनस् (मन) परमाणु (अणु) अछि — न्यूनतम, अविभाज्य आकार धारण करैत अछि। भट्ट खण्ड २ मे केन्द्रीय तर्क शृंखला: यदि मन सर्वव्यापी (विभु) होएत, तऽ विभिन्न बाह्य इन्द्रियसभ एकरा सँ एक साथ सम्पर्कमे आबि पाँच भिन्न गुणसभक एक साथ प्रत्यक्ष उत्पन्न करि सकत। मुदा पाँच गुणसभक एक साथ ज्ञान बाधाक अनुपस्थितिमे एकटा वास्तविकता (प्रमा) अछि। नैयायिक प्रस्ताव करैत छथि: जखन मनक कोनो एकटा इन्द्रिय सँ निकट या तीव्र सम्पर्क पाँच भिन्न प्रत्यक्षात्मक ज्ञानसभक लेल बाधक (बाधक) अछि, तखन मन केँ भागसभ सँ मिलल एकटा सम्पूर्ण (अवयविन्) मानल जा सकैत अछि — पाँच भिन्न गुणसभक पाँच भिन्न प्रत्यक्षात्मक ज्ञान आ एकटा एकल गुणक एकटा ज्ञान केँ मनक भागसभक संगतिक विस्तार आ संकुचन (सङ्कोच विकासाभ्याम्) द्वारा समझाएल जा सकैत अछि। मीमांसक आपत्ति (१.१०.१९, भट्ट खण्ड २, पृ. ७१८-७२५): एकटा बड़ गोल रोटी खाबैत, पाँच भिन्न गुणसभ (जेना गन्ध, स्वाद, रूप, स्पर्श आ शब्द) क पाँच भिन्न ज्ञान पाँच इन्द्रियसभ सँ उत्पन्न होइत अछि। ई नैयायिकक सिद्धान्त द्वारा काति समझाएल जाइत अछि? नैयायिक उत्तर: पाँच भिन्न प्रत्यक्षात्मक ज्ञानसभक उत्पादनमे एकटा क्रम (क्रम) अस्तित्वमे अछि। पाँच ज्ञानक एक साथताक ज्ञान बाधाक अनुपस्थितिमे एकटा वास्तविकता (प्रमा) अछि। इन्द्रिय (श्रोत्र) अनेक शब्दसभक लेल सक्षम अछि (नाना शब्द ग्रह): नैयायिक उत्तर करैत छथि जे सुख आदि गुणसभमे अन्तर एक साथ अनेक लोकनि द्वारा गाएल समान गीत सुनबाक मामलामे अनुभव कएल जाइत अछि, एक व्यक्ति द्वारा गाएल गीतक तुलनामे। एहि कारण कान एक साथ अनेक शब्दसभक प्रत्यक्षक लेल सक्षम होएबाक आवश्यकता अछि — आ ई केवल तखन संभव अछि जखन परमाणु मन अपन भागसभक संगति द्वारा विस्तारित होइत अछि। ङ. गङ्गेशक शब्दशास्त्रम् — लघुकथा आ एकर महत्व गजेन्द्र ठाकुरक मैथिली लघुकथा 'शब्दशास्त्रम्' (शब्दक विज्ञान), गङ्गेश उपाध्यायक वास्तविक पंजी अभिलेख पर आधारित, लेखक आपु स्वयं द्वारा अनुवादित आ इंडियन लिटरेचर खण्ड ५८, नं. २ (२८०), मार्च-अप्रैल २०१४, पृ. ७८-९३ (१६ पृष्ठ, साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित) मे प्रकाशित भेल। ई प्रकाशन कतेक स्तर पर महत्वपूर्ण अछि: ई विदेहक ऐतिहासिक तथ्य दमन करबैवाली संस्थासभ (साहित्य अकादमी) मे रचनात्मक कथा क रूपमे जीवनी पुनःप्राप्ति प्रकाशित करबाक समानांतर रणनीति क अभ्यावेदन करैत अछि; ई दूषण पंजी अभिलेख केँ कथा रूपमे प्रलेखित करैत अछि; आ ई जीवनी दमन केँ साहित्य अकादमीक अपन प्रकाशनसभमे सार्वजनिक साहित्यिक रिकर्डक विषयक रूपमे स्थापित करैत अछि — ओही संस्था जकर २०१६ गङ्गेश पर मोनोग्राफ दमन केँ कायम राखलक। शीर्षक 'शब्दशास्त्रम्' (शब्दक विज्ञान) आपु स्वयं एकटा दार्शनिक सन्दर्भ अछि: शब्द-शास्त्र शाब्दिक प्रमाण (शब्द-प्रमाण) क अनुशासन अछि, तत्त्वचिन्तामणिक चौथा प्रमाण। कथा एहि प्रकारे गङ्गेशक दार्शनिक परियोजना आ हुनकर जीवनी स्थितिक बीच सम्बन्ध केँ नाटकीय रूप देबैत अछि — एकटा व्यक्ति जकर वैध शाब्दिक प्रमाणक विज्ञान आपु स्वयंक बारेमे दमित जीवनी सत्य पुनः प्राप्त करबाक कार्य पर लागू अछि। च. पक्षधर मिश्र, विद्यापति, आ दुई-परम्परा समस्या गजेन्द्र ठाकुरक पंजी अनुसन्धान अवधिक बौद्धिक इतिहासमे आगा सटीकता जोड़ैत अछि: 'पक्षधर मिश्र विद्यापति (जे पदावली लेखक सँ अलग जे ज्योतिरीश्वर-पूर्व कालक छल) क समकालीन छल जे संस्कृत आ अवहट्टमे लिखलक।' ई समानांतर इतिहासक दुई-विद्यापति समस्या पर केन्द्रीय विद्वत्तापूर्ण हस्तक्षेपक पुष्टि करैत अछि: प्रसिद्ध पदावली कवि संस्कृत/अवहट्ट लेखक विद्यापति ठक्कुरह (१३५०-१४३५ ई.) सँ अलग अछि। जे विद्वान पक्षधर मिश्र (संस्कृत/अवहट्ट विद्यापति) सँ बहसमे लिप्त छल, ओ लोक-गीत कवि सँ अलग व्यक्ति छल जकर गीत पूर्वी भारतमे फैलल। ई अन्तर, पंजी साक्ष्य द्वारा स्थापित, गङ्गेशक तिथिकरण आ मिथिलाक बौद्धिक इतिहास सँ सीधा सम्बन्ध रखैत अछि। पक्षधर मिश्र — मिथिलाक शिक्षक जे तत्त्वचिन्तामणिक नकल करबाक अनुमति देबा सँ इनकार केलक, वासुदेव सार्वभौम केँ एकरा कण्ठस्थ करबाक लेल बाध्य केलक — संस्कृत/अवहट्ट विद्यापतिक समकालीन छल, जे हुनका १४म् शताब्दीक अन्त सँ १५म् शताब्दीक आरम्भमे रखैत अछि। ई रघुनाथ शिरोमणि (फ्लोरुइट १५०० ई.) क वासुदेवक शिष्यक रूपमे मानक तिथिकरण सँ संगत अछि, आ अनुक्रम पुष्टि करैत अछि: गङ्गेश (फ्लोरुइट १३२०) → वर्धमान → पक्षधर → वासुदेव सार्वभौम → रघुनाथ शिरोमणि। छ. ग्रन्थसूची अद्यतन — भट्टक अनुवादक सभ खण्ड परिशिष्ट २–५ · कारकवाद, व्याप्ति, वैश्विक अध्येता आ तुलनात्मक तर्क परिशिष्ट २: कारकवाद गङ्गेश उपाध्यायक तत्त्वचिन्तामणिमे कारकवादक ज्ञानमीमांसात्मक आ शब्दार्थक आधार तत्त्वचिन्तामणि के शब्दखंड मे गङ्गेशक कारकवाद व्याकरणिक सिद्धांत, तर्कशास्त्र, आ संज्ञानात्मक विज्ञानक एहन जंक्शन पर स्थित अछि जाहिठाम ई बोधगम्य अभिकर्ताओंक क्रियासभसँ संबंध की एक परिष्कृत विवरण प्रदान करैत अछि। शब्दबोधक सैद्धांतिक सिद्धांत कारकसभमे प्रवेशसँ पहिले गङ्गेशद्वारा परिभाषित शब्दबोध (शाब्द अनुभूति) क आवश्यकताओंकेँ समझब आवश्यक। एक वाक्य केवल शब्दोंका संग्रह नहि अछि अपितु एक संरचित सत्ता अछि जाहिकेँ चार शर्तसभकेँ पूर्ण करब आवश्यक: आकांक्षा (वाक्यगत प्रत्याशा), योग्यता (संगतता), असत्ति (निकटता), आ तात्पर्य (वक्ताक आशय)। कारकवाद: व्याकरण आ तर्कशास्त्रक संयोजन कारक ओ कारण-भाव अछि जे किसी क्रियाकेँ साध्य करैत अछि (क्रिया-निर्वर्तकम्)। नव्य-न्यायमे, एहिक विश्लेषण कार्य-कारणताक दृष्टिसँ होइत अछि। प्रत्येक कारक एक विशिष्ट कारण-कारक (कारण) अछि जे क्रियाक अंतिम परिणाम (फल) मे योगदान दैत अछि। कर्ता (कर्त्ता): स्वतंत्र कारक (स्वतन्त्रः कर्ता)। नव्य-न्यायक तकनीकी परिष्करणमे, कर्ताक विशेषता कृतिमत्व अछि — संकल्प (कृति) क अधिकार। ई परिभाषा महत्त्वपूर्ण, कारण ई न्यायकेँ सचेत अभिकर्ता आ जड़ उपकरणक बीच अंतर करबाकेँ सक्षम बनाइत अछि। कर्म (कर्मन्): परम्परागत रूपेँ कर्मकेँ कर्ताद्वारा सर्वाधिक अभीष्ट (कर्तुरिप्सिततमं कर्म) क रूपमे परिभाषित कएल जाइत अछि। गङ्गेश एहिक विश्लेषण फल-अधिकरणत्व (फल-श्रयत्वम्) की अवधारणाद्वारा करैत छथि। ऐतिहासिक काल-क्रम भारतीय तर्कशास्त्र आ ज्ञानमीमांसाक ऐतिहासिक काल-क्रम: • प्राचीन काल (६५० ई.पू. – १०० ई.) — न्यायसूत्र — अक्षपाद गौतम • मध्यकालीन काल (१०० ई. – १२०० ई.) — प्रमाणसमुच्चय — दिग्नाग, धर्मकीर्ति, उदयन • आधुनिक काल (१२०० ई. से) — तत्त्वचिन्तामणि — गङ्गेश उपाध्याय, रघुनाथ शिरोमणि परिशिष्ट ३: गङ्गेशक नव्य-न्याय: तर्कशास्त्र, भाषा, आ व्याप्ति — एक तुलनात्मक अध्ययन गङ्गेश उपाध्यायक तत्त्वचिन्तामणि (तत्त्वचिन्तामणि) पर आधारित ई अध्ययन नव्य-न्यायक तीन प्रमुख क्षेत्रोंमे बौद्धिक भूमिक मानचित्रण करैत अछि: भाषा-दर्शन (क्रिया-धातु आ क्रिया-प्रत्यय), औपचारिक तर्कशास्त्र (व्याप्ति आ हुनकर परिभाषा), आ ज्ञानमीमांसात्मक ढाँचा। तोशीहिरो वाडाक चार पेपर, जे.एल. शॉक अध्ययन (संगति), आ यूको मियासाकाक गङ्गेश आ रघुनाथ शिरोमणिमे व्याप्ति-परिभाषाक चित्रात्मक विवरण मिलाइकेँ प्रकट करैत अछि जे गङ्गेशक परियोजना असंबद्ध तकनीकी अभ्यासोंका समूह नहि, अपितु एकीकृत ज्ञानमीमांसात्मक उद्यम अछि। साझा ज्ञानमीमांसात्मक आधार: यथार्थवाद आ अनुभूतिक संरचना सभी छह पेपरोंके पूर्व सामान्य ज्ञानमीमांसात्मक ढाँचाकेँ समझब आवश्यक। मियासाकाक पेपर एकरा सर्वाधिक स्पष्ट रूपेँ कहैत अछि: नव्य-न्याय पूर्ण यथार्थवाद अछि। प्रत्येक विशिष्टज्ञान (विशिष्टज्ञान) मे विशेषण (विशेषण/प्रकार), विशेष्य (विशेष्य), आ हुनकर संयोजक (संबंध) की संरचना होइत अछि। महत्त्वपूर्णतः, ई संरचना मानसिक निर्माण वा अनुभवपर आरोपित भाषाई रूप नहि प्रस्तुत करैत — ई बाह्य जगतकी वास्तविक संरचनाक मानचित्रण करैत अछि जेना अनुभूत। व्याप्तिक परिभाषा: औपचारिक संरचना आ आद्यात्मिक आधार गङ्गेशक निर्णायक परिभाषा मियासाकाक पेपर आ वाडाक १९९४ पेपर दुनू गङ्गेशक व्याप्तिक निर्णायक परिभाषाकेँ संबोधित करैत छथि: 'प्रतियोग्य-असामानाधिकरण-यत्-सामानाधिकरणात्यन्ताभाव-प्रतियोगितावच्छेदकावच्छिन्न-यं यन् न भवति तेन समं तस्य सामानाधिकरण्यं व्याप्तिः।' अर्थात्: 'व्याप्ति ओ वस्तु १० क ख सहित सहस्थिति अछि जे एहन नहि जे एक अवच्छेदकद्वारा निर्धारित हो जे ओ अभावक प्रतियोगिताक अवच्छेदक अछि जे १० के साथ किसी लोकमे सहस्थित हो आ अपने प्रतियोगीक साथ कोई लोक साझा न करे।' वाडाक १९९४ पेपर एहि परिभाषाक ऐतिहासिक स्रोतकेँ शशधरक न्यायसिद्धांतदीपसँ खोजैत अछि, दर्शाइत जे गङ्गेश शशधरक प्रारूप-परिभाषामे अवच्छेदक (परिसीमक) क अवधारणाकेँ प्रस्तुत कए उसे परिष्कृत केलनि। संगति (प्रासंगिकता) — दार्शनिक अन्वेषणक तर्कशास्त्र शॉक संगतिक छह प्रकारोंका सूचीबद्ध करैत छथि: (१) प्रसंग (स्मृति-संदर्भ), (२) उपोद्धात (न्यायोचितता), (३) हेतु (कारण), (४) अवसर (आपत्तिजनक प्रश्नसभक समाप्ति), (५) निर्वाहक-एकत्व (समान कारण होएब), आ (६) कार्य-एकत्व (समान प्रभाव होएब)। प्रत्येक प्रकार दो अनुभूतियोंकी वस्तुसभक बीच एक भिन्न वास्तविक संबंध निर्दिष्ट करैत अछि। अवच्छेदक — एक एकीकरण अवधारणा शायद सबसे उल्लेखनीय खोज जे सभ छह पेपरोंकेँ पढ़िकेँ उभरैत अछि ओ अछि सभ तीन क्षेत्रोंमे अवच्छेदक (परिसीमक) अवधारणाक केँद्रीय आ एकीकृत भूमिका। तार्किक क्षेत्रमे: प्रतियोगिताक अवच्छेदक गङ्गेशक व्याप्ति-परिभाषामे मुख्य नवाचार अछि। ई चलन-समस्या (चालनी-न्याय) केँ रोकैत अछि। क्रिया-धातुसभक शब्दार्थ क्षेत्रमे: कारण-अवस्थाक अवच्छेदक गङ्गेश धातुवादक भाग तृतीय खण्ड मे प्रस्तुत करैत छथि। क्रिया-प्रत्ययसभक शब्दार्थ क्षेत्रमे: अवच्छेदक गङ्गेशक सामानाधिकरण्यक पुनर्परिभाषाद्वारा कार्य करैत अछि। परिशिष्ट ४: पश्चिमी आ पूर्व-एशियाई गङ्गेश उपाध्याय विद्वान पश्चिमी दार्शनिक आ तत्त्वचिन्तामणि अ. डेनियल एच.एच. इंगॉल्स — पथ-प्रदर्शक (हार्वर्ड, १९५१) गङ्गेशक ग्रंथक साथ पहिल गंभीर पश्चिमी शैक्षणिक संपर्क इंगॉल्सद्वारा भेल। १९५५ के अपने निबंध 'भारतमे तर्कशास्त्र' मे इंगॉल्स प्राचीन न्याय विद्यालयक संबंधमे नव्य-न्यायक तीन मुख्य नवाचारोंको अलग केलनि: 'परिसीमन (अवच्छेदकता) की अवधारणाद्वारा संभव सामान्यीकरणक एक नव विधि; प्रतिज्ञावादी तर्कशास्त्रक प्रमेयोंसँ समान कई नियमोंक खोज; संबंधोंकी परिभाषामे नव रुचि आ इन संबंधोंका बहुत जटिल संक्रियाओंमे उपयोग।' एहिसभकेँ औपचारिक नवाचार क रूपमे पहचानल गेल। ब. फ्रेगे-रसेल-नव्य-न्याय तुलना सर्वाधिक नाटकीय पश्चिमी समानांतर गङ्गेशद्वारा प्रारंभ नव्य-न्याय आंदोलन आ पश्चिममे प्रतीकात्मक तर्कशास्त्रमे क्रांतिक बीच दर्शाया गया है। साहित्यमे नव्य-न्याय आंदोलनकेँ फ्रेगे, रसेल, आ विट्गेंस्टाइनक लेखनमे पश्चिममे १९वीं शताब्दीक अंत आ २०वीं शताब्दीक प्रारंभमे प्रतीकात्मक तर्कशास्त्रक उदय आ हुनकर तत्सम दार्शनिक चिंतनसँ प्रभावोंमे तुलनीय आंदोलन क रूपमे वर्णित कएल गेल अछि। ग. स्टीफन एच. फिलिप्स — व्यवस्थित पश्चिमी संपर्क (२००४) फिलिप्स आ तातचार्यक ज्ञानमीमांसा ऑफ परसेप्शन (२००४), तत्त्वचिन्तामणिक प्रत्यक्षखंडक अनुवाद, मे एक प्रस्तावना सम्मिलित अछि जाहिमे आवश्यक सैद्धांतिक आ ऐतिहासिक पृष्ठभूमि तथा पश्चिमी ज्ञानमीमांसात्मक परम्पराओंसँ न्यायक तुलना शामिल अछि। घ. बिमल कृष्ण मतिलाल — 'मतिलाल रणनीति' (ऑक्सफोर्ड) बिमल कृष्ण मतिलाल (१९३५-१९९१) एक प्रख्यात दार्शनिक छलाह जिनकर लेखनमे भारतीय दार्शनिक परम्पराकेँ एक व्यापक तर्कशास्त्र आ ज्ञानमीमांसा-समेट प्रणालीक रूपमे प्रस्तुत कएल गेल। १९७७ सँ १९९१ तक हुनकर ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालयमे पूर्वी धर्म आ नैतिकताक स्पाल्डिंग प्रोफेसरक पदपर थे। जापानी दार्शनिक आ तत्त्वचिन्तामणि अ. तोशिहिरो वाडा (नागोया विश्वविद्यालय) वाडा नागोया विश्वविद्यालयसँ डी.लिट्. (२००२) प्राप्त केलनि आ मुख्यतः नव्य-न्यायमे तर्कशास्त्र आ भाषा-दर्शनपर कार्य करैत छथि। हुनकर दृष्टिकोण परम्परागत संस्कृत भाषाशास्त्रकेँ औपचारिक तर्कशास्त्र आ दृश्य आरेखशास्त्रक उपकरणसभसँ संयुक्त करैत अछि। वाडाक नव्य-न्याय फिलॉसफी ऑफ लैंग्वेज मे, गङ्गेशक तत्त्वचिन्तामणिक 'आख्यातवाद' (क्रिया-प्रत्यय खंड) क विश्लेषण करैत, ओ रिक्त पदसभ जेहेन 'गोल त्रिभुज', 'फ्रांसक वर्तमान राजा', आ 'खरहाक सींग' पर नव्य-न्यायक उपचारक विवरण दैत छथि। ई आखिरी बिंदु दार्शनिक दृष्टिसँ उल्लेखनीय: रिक्त पदसभ (अर्थशून्य निर्देश) पर नव्य-न्यायक उपचार सीधे बर्ट्रांड रसेलक 'ऑन डिनोटिंग' (१९०५) — अवास्तविक वस्तुओंक निर्देश-समस्या — सँ समानांतर अछि। परिशिष्ट ५: इज़राइल आ गङ्गेश उपाध्याय तालमूडी तर्कशास्त्र परम्परा — इज़राइलक अपन विश्लेषणात्मक समानांतर ई वो परम्परा अछि तालमूडी तर्कशास्त्र (हिग्गायोन तालमूदी) क, जाहि विषयमे इजरायली आ प्रवासी यहूदी शिष्यत्वमे गहन आधुनिक औपचारिकीकरण भए रहल अछि। अ. तालमूडी तर्कशास्त्र परियोजना (डोव गब्बे, बार-इलान / किंग्स कॉलेज लंदन) तालमूडी तर्कशास्त्र परियोजना, २००८ सँ चल रहल, आधुनिक तार्किक उपकरणसभक उपयोगकरैत तालमूडी तर्कक तार्किक विश्लेषण प्रस्तुत करैत अछि। ई परियोजना तालमूडी तर्कशास्त्रक सिद्धांतोंकी जांच करैत अछि आ प्रत्येक सिद्धांत हेतु एक-एक पुस्तकक श्रृंखला प्रकाशित करैत अछि। ब. संरचनात्मक तुलना: नव्य-न्याय आ तालमूडी तर्कशास्त्र दुनू परम्पराओंक बीच समानांतर संरचनात्मक रूपेँ महत्त्वपूर्ण अछि: • व्याप्ति (अव्यभिचारी सहगमन) ~ बिन्यान अव (कानूनी पूर्वोदाहरणसँ उपमान-विस्तार) • उपाधि (अनुमान-खंडन शर्त) ~ पिर्का (तालमूडी खंडन) • पक्ष, साध्य, हेतु ~ निद्दोन, मेलमेद, लिमुद (विषय, पूर्वदृष्टांत, व्युत्पन्न नियम) • अवच्छेदकता (गुणक क्षेत्र-परिसीमन) ~ गेजेरा शावा (किसी नियमक क्षेत्र सीमित करनिहार परिभाषात्मक समतुल्यता) • शब्दखंड (साक्ष्यक ज्ञानमीमांसा) ~ तालमूडी मेसिराह, श्मुआह, काबालाह (मौखिक प्रसारणकी ज्ञानमीमांसा) दुनू परम्पराएँ एक प्राकृतिक-भाषा आधारमे (संस्कृत आ अरामी क्रमशः) कठोर तकनीकी भाषाओंका विकास केलनि, दुनू ओहि प्रश्न सँ सरोकार रखैत छल जे कहियाँ अनुमान वैध अछि आ कहियाँ असफल, आ दुनू धार्मिक-कानूनी संदर्भोंमे उभरलीं जाहिठाम तार्किक परिशुद्धता के दाँव उच्च छल। ग. माध्ययुगीन यहूदी दर्शन आ न्याय आस्तिक तर्क न्याय विद्यालयक व्यापक परम्परा आ यहूदी दर्शनक बीच एक अप्रत्यक्ष संपर्क बिंदु अछि: ईश्वरक अस्तित्व हेतु ब्रह्मांडीय आ प्रयोजनात्मक तर्क। उदयनक न्यायकुसुमाञ्जलि (११वीं शताब्दी) आ गङ्गेशक ढाँचेमे विकसित न्याय विद्यालय मेमोनाइड्सक गाइड फॉर द पर्प्लेक्ड (१२वीं शताब्दी) क ब्रह्मांडीय तर्कोंसँ संरचनात्मक तुलनीय विश्व-सृजनक ईश्वर (ईश्वर) हेतु कठोर तार्किक तर्क विकसित केलनि। घ. इज़राइल इंस्टीट्यूट फॉर एडवांस्ड स्टडीज — एक संभावित स्थल इज़राइल इंस्टीट्यूट फॉर एडवांस्ड स्टडीज (भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान), हिब्रू विश्वविद्यालय, जेरूसलेमद्वारा १९७५ मे स्थापित, एक स्व-शासी निकाय अछि जाहिक मिशन अकादमिकसभक बहु-विषयक शिक्षण समुदाय बनाएब अछि। भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान पूर्वमे तुलनात्मक दर्शन आ विज्ञान-इतिहासमे शोध समूहसभकेँ आयोजित कए चुकल अछि। ङ. बेन-आमी शार्फस्टाइन (१९१९-२०१९) — इज़राइली-अमेरिकी दार्शनिक बेन-आमी शार्फस्टाइन तेल अवीव विश्वविद्यालयमे दर्शनशास्त्र विभागक संस्थापक सदस्य थे। हुनकर महत्त्वपूर्ण कृति ए कम्पेरेटिव हिस्ट्री ऑफ वर्ल्ड फिलॉसफी: फ्रॉम द उपनिषद्स टू कांट (१९९८) मे बेन-आमी शार्फस्टाइन गङ्गेश उपाध्याय (नव्य-न्यायक १४वीं शताब्दीक संस्थापक) केँ एक अद्वितीय वैश्विक संदर्भमे रखैत छथि। हुनकर दर्शनकेँ 'तर्क-संवेदनशील, पद्धतिगत अद्यात्मशास्त्र' वर्गीकृत करैत हुनकर गङ्गेशकेँ देकार्त आ लाइबनिजक साथ रखैत छथि। शार्फस्टाइन गङ्गेशकेँ हुनकर अभूतपूर्व स्पष्टता आ बौद्धिक ईमानदारी हेतु प्रशंसा करैत छथि। हुनकर दृष्टिकोणमे, नव्य-न्याय 'मृत' विद्वतावाद नहि, अपितु मानवीय विश्लेषणात्मक उपलब्धिक एक शिखर अछि जाहि औपचारिक परिशुद्धताक स्तरकेँ पश्चिम १९वीं वा २०वीं शताब्दीक अंत तक नहि पहुँच सकल। तत्त्वचिन्तामणिमे उद्धृत प्रमुख पूर्ववर्ती ग्रन्थ • मण्डनमिश्र। ब्रह्मसिद्धि। [गङ्गेश द्वारा शब्द-खण्डमे उद्धृत।] • प्रभाकर मिश्र। तात्पर्याचार्य। [प्रामाण्यवाद खण्डमे उद्धृत।] • वाचस्पति मिश्र। तात्पर्यटीका, भामती, न्यायसूचीनिबन्ध। [सम्पूर्ण उद्धृत।] • उदयन। कुसुमाञ्जलि, किरणावली, परिशुद्धि, आत्मतत्त्वविवेक, न्यायकुसुमाञ्जलि। [गङ्गेशक प्राथमिक स्वीकृत पूर्ववर्ती।] • श्रीवल्लभाचार्य। न्यायलीलावती। [अनुमान आ शब्द खण्डसभमे उद्धृत।] • जयन्तभट्ट। न्यायमञ्जरी। [उद्धृत।] • शिवादित्य मिश्र। सप्तपदार्थी। [निर्विकल्पकवादमे उद्धृत — 'शिवादित्य' सन्दर्भ ई रचनाक अछि, लगभग १०५०-११५० ई., यद्यपि उद्धृत श्लोक जीवित पाठमे उपलब्ध नै अछि।] • मणिकण्ठ मिश्र। न्यायरत्न। [एकटा महत्वपूर्ण तत्काल पूर्ववर्तीक रूपमे सम्पूर्ण उद्धृत।] • तरणि मिश्र (तर्कवर्द्धन)। रत्नकोष। [विशेषणोपलक्षणवादमे उद्धृत।] ग्रन्थसूची गङ्गेश उपाध्याय। तत्त्वचिन्तामणि, चारि खण्ड। सम्पादक कामाख्यानाथ तर्कवागीश; मथुरानाथ तर्कवागीशक टीका सहित। कलकत्ता: एशियाटिक सोसाइटी, बिब्लियोथेका इण्डिका, १८८४–१९०१; पुनर्मुद्रण १९९०–९१। गङ्गेश उपाध्याय। तत्त्वचिन्तामणि — प्रत्यक्षखण्ड। सम्पादक एन. एस. रामानुज ताताचार्य; रुचिदत्त मिश्रक प्रकाश आ रामकृष्णाध्वरिनक उपटीका सहित। तिरुपति: केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ, १९७२। भट्ट, वी. पी.। शब्द: तत्त्वचिन्तामणिक शब्दखण्ड, परिचय, संस्कृत पाठ, अनुवाद आ व्याख्या सहित, दू खण्ड। दिल्ली: ईस्टर्न बुक लिंकर्स, २००५। भट्ट, वी. पी.। प्रत्यक्ष: तत्त्वचिन्तामणिक प्रत्यक्षखण्ड, परिचय, संस्कृत पाठ, अनुवाद आ व्याख्या सहित, दू खण्ड। दिल्ली: ईस्टर्न बुक लिंकर्स, २०१२। भट्ट, वी. पी.। अनुमान: तत्त्वचिन्तामणिक अनुमानखण्ड, दू खण्ड। दिल्ली: ईस्टर्न बुक लिंकर्स, २०२१। भट्ट, वी. पी.। ईश्वरानुमान आ उपमान: तत्त्वचिन्तामणिक सम्बन्धित खण्ड, दू खण्ड। दिल्ली: ईस्टर्न बुक लिंकर्स, २०२५। फिलिप्स, स्टीफन एच.। ज्ञानमीमांसाक सत्य पर विचार-रत्न: गङ्गेशक तत्त्वचिन्तामणिक सम्पूर्ण टिप्पणी-सहित अनुवाद, तीन खण्ड। लन्दन: ब्लूम्सबरी अकादमिक, २०२०। झा “अशोक”, उदयनाथ। गङ्गेश उपाध्याय। भारतीय साहित्यक निर्माता शृंखला। नव दिल्ली: साहित्य अकादेमी, २०१६। भट्टाचार्य, दिनेश चन्द्र। मिथिलामे नव्य-न्यायक इतिहास। दरभंगा: मिथिला इंस्टिट्यूट, १९५८। विद्याभूषण, सतीश चन्द्र। भारतीय तर्कशास्त्रक इतिहास। कलकत्ता: कलकत्ता विश्वविद्यालय, १९२१। दासगुप्त, सुरेन्द्रनाथ। भारतीय दर्शनक इतिहास, खण्ड १–२। कैम्ब्रिज: कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय प्रेस, १९२२–३२। पॉटर, कार्ल एच. आ शिवजीवन भट्टाचार्य, सम्पादक। भारतीय दर्शनक विश्वकोश, खण्ड ६: गङ्गेश सँ रघुनाथ शिरोमणि धरि न्याय-वैशेषिक विश्लेषण। प्रिन्सटन आ दिल्ली: प्रिन्सटन विश्वविद्यालय प्रेस / मोतीलाल बनारसीदास, १९९३। शार्फस्टाइन, बेन-अमी। विश्व-दर्शनक तुलनात्मक इतिहास: उपनिषद सँ कान्ट धरि। अल्बानी: स्टेट युनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क प्रेस, १९९८; 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पुनरावृत्ति हटाकऽ विशिष्ट तथ्य, उदाहरण, मतभेद, सामाजिक इतिहास आ आलोचनात्मक आपत्ति सुरक्षित। सम्पादकीय रूपरेखा एकभाषी मैथिली · सुपरस्क्रिप्ट-विहीन · स्रोत-विरोध स्पष्ट · विस्तृत बिबलियोग्राफी · २०/२० स्रोत-कवरेज ऑडिट मुख्य बात पञ्जी–प्रबन्धकेँ मात्र वंशावली कहब ओकर आधा अर्थ बुझब होयत। ई विवाह–अधिकार जाँचबाक युक्ति, गाँव–आधारित सामाजिक मानचित्र, विद्वत् उपाधि आ पेशागत परिवर्तनक अभिलेख, स्त्रीक अप्रत्यक्ष उपस्थिति, जाति–व्यवस्थाक अनुशासन आ उल्लंघन दुनूक दस्तावेज, आ हस्तलिखित पाण्डुलिपिसँ डिजिटल अभिलेख धरि चलैत स्मृति–प्रणाली—सभ एक संग अछि। प्रस्तावना: एकटा जीवित अभिलेखक अनेक रूप मिथिलाक पञ्जी–प्रबन्ध भारतक वंशावली–परम्परासभमे एकटा असाधारण रूप अछि। उपलब्ध रिपोर्टसभ एकरा कखनो ‘मानव डेटाबेस’, कखनो ‘सामाजिक तकनीक’, कखनो ‘वंश–स्मृति’, कखनो ‘विवाह–अधिकारक न्यायिक उपकरण’, कखनो ‘जीनोम मानचित्रण’ आ कखनो ‘प्रतिरोधी अभिलेख’ कहैत अछि। ई सभ नाम अलग–अलग कोण देखबैत अछि। पञ्जीमे व्यक्ति मात्र पिता–पुत्रक रेखामे नहि अबैत अछि; ओकर गोत्र, प्रवर, मूल, मूलग्राम, शाखा, मातृक सम्बन्ध, विवाह–संबन्ध, उपाधि, पेशा, निवास–परिवर्तन, राजकीय वा शैक्षिक प्रतिष्ठा, आ कतेको बेर सामाजिक ‘दोष’ सेहो दर्ज होइत अछि। एहि कारणेँ पञ्जी एकहि समय वंशावली, सामाजिक भूगोल, विवाह–नियम, पेशागत इतिहास आ सांस्कृतिक स्मृतिक पाठ बनि जाइत अछि। समेकित स्रोत–संग्रहमे पञ्जी–व्यवस्थाक सामान्य सिद्धान्त, दूषण–पञ्जीक ९७ तालिकाक व्याख्या, प्राचीन पञ्जीक आरम्भिक खण्ड, खण्ड १ केर पृष्ठ ६६–३४७, खण्ड २ केर पृष्ठ ३४८–६९०, नगराम–पञ्जीक विभिन्न ब्लॉक, पञ्जिका–नगरामी, ‘जीनोम मैपिंग’ शीर्षकवला खण्ड, शोध–रिपोर्ट, तुलनात्मक वंशावली सिद्धान्त आ एकटा विस्तृत प्रश्नोत्तर–संग्रह सम्मिलित अछि। किछु रिपोर्ट एक्के तथ्यकेँ अलग भाषा, अलग सिद्धान्त वा अलग दाबी संग दोहरबैत अछि। एतए पुनरावृत्ति हटाओल गेल अछि, मुदा परस्पर–विरोधी दाबी हटाओल नहि गेल; ओकरा ‘स्रोत–भिन्नता’क रूपमे स्पष्ट कएल गेल अछि। स्रोत–वाचनक सावधानी स्रोत-भिन्नता आ प्रमाणक स्तर किछु रिपोर्ट ४५० ई. सँ २००९ ई. धरि ‘अविच्छिन्न’ पञ्जी–स्मृति कहैत अछि, जखन कि विशिष्ट पाण्डुलिपि–स्तरक सुरक्षित सामग्रीक घनत्व मध्यकाल आ विशेषतः उत्तर–मध्यकाल/आधुनिक कालमे बेसी देखाइत अछि। हरिसिंहदेवक शासन–तिथि आ शक १२४८/१३२६ ई. केर संस्थानीकरण–वर्णनमे सेहो कालक्रमगत असंगति भेटैत अछि। ‘जीनोम’ वा ‘क्रोमोसोम’ सम्बन्धी कथन आधुनिक आनुवंशिकीमे प्रमाणित समतुल्यता नहि, बल्कि स्रोत–लेखकसभक व्याख्यात्मक उपमा अछि। एहि आलेखमे एहन दाबीकेँ दाबी/उपमा/परम्परागत व्याख्याक रूपेँ प्रस्तुत कएल गेल अछि, स्थापित वैज्ञानिक तथ्यक रूपेँ नहि। १. मिथिला: भूगोल, ज्ञान–परम्परा आ पञ्जीक सामाजिक भूमि स्रोतसभ मिथिलाकेँ विदेह, तिरभुक्ति, तिरहुत आ मिथिलाञ्चल सन ऐतिहासिक नामसँ चिन्हैत अछि। उत्तरमे हिमालय, दक्षिणमे गङ्गा, पश्चिममे गण्डक आ पूर्वमे महानन्दा धरि पसरेल भूभागक रूपमे एकर सांस्कृतिक परिधि वर्णित अछि। आधुनिक राजनीतिक सीमासँ ई सांस्कृतिक परिधि छोट नहि होइत; उत्तर बिहारक दरभंगा, मधुबनी, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, सहरसा, सुपौल, पूर्णिया, कटिहार, अररिया, चम्पारण, भागलपुर–मुंगेर क्षेत्रसँ लऽ कऽ नेपालक तराई आ जनकपुर–काठमाण्डू दिशाक सम्बन्ध पञ्जीमे बारम्बार भेटैत अछि। मिथिलाक विद्वत् परम्परा न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, वेदान्त, व्याकरण, ज्योतिष आ धर्मशास्त्रक शिक्षण–संस्थानसँ जुड़ल रहल। पञ्जी–रिपोर्टसभ एहि ज्ञान–परम्परा आ वंश–परम्पराकेँ एक–दोसरसँ अलग नहि मानैत अछि। ‘महामहोपाध्याय’, ‘नैयायिक’, ‘वैयाकरण’, ‘ज्योतिर्विद्’, ‘पण्डितराज’, ‘साहित्याचार्य’, ‘वैदिक’, ‘आचार्य’ सन उपाधि वंश–प्रविष्टिमे नामक संग दर्ज होइत अछि। बादक कालमे एहि ठाम ‘वकील’, ‘जज’, ‘प्रोफेसर’, ‘इञ्जिनियर’, ‘आई.ए.एस.’, ‘आई.पी.एस.’, ‘डी.आई.जी.’, ‘एम.ए.’, ‘पीएच.डी.’, विश्वविद्यालयक कुलपति, आयकर अधिकारी आ अन्य आधुनिक पद सेहो ओही वंश–सूत्रक बीच प्रवेश करैत अछि। एहि निरन्तरतासँ पञ्जी केवल पुरान समाजक अवशेष नहि, बदलैत समाजक अभिलेख बनि जाइत अछि। रिपोर्टसभक एकटा महत्त्वपूर्ण सामाजिक निष्कर्ष ई अछि जे गाँवक नाम पञ्जीमे मात्र पता नहि। मूलग्राम सामाजिक ‘निर्देशाङ्क’ बनैत अछि। जखन परिवार अपन मूल गाँव छोड़ि दोसर गाँव, शहर वा देश जाइत अछि, तखन मूल आ नव निवास दुनूक स्मृति राखब जरूरी होइत अछि, नहि तँ विवाह–सम्बन्धक गणना टूटि सकैत अछि। एहि कारणेँ मण्डर, सोदरपुर, करमहा, दरिहरा, खौआल, सरिसब, पाली, बेलौंच, जजिवाल, पण्डुआ, पबौली, सौराठ, महिषी, लोआ–सुगौन, राजग्राम, सिमराँवगढ़, कटिहार, कोलकाता आ नेपालक ठामसभ एकहि अभिलेखी नेटवर्कमे आबि जाइत अछि। २. समूह–लेख्यसँ पञ्जी–प्रबन्ध धरि: संस्थानीकरणक कथा पञ्जी–परम्पराक पूर्वरूपक चर्चा ‘समूह–लेख्य’ नामसँ कएल गेल अछि। रिपोर्टसभ कुमारिल भट्टक ‘तन्त्रवार्त्तिक’क एकटा कथनक आधार पर कहैत अछि जे कुलीन वा संस्कारित परिवार अपन पितामह–प्रपितामहक वंश, गुण–दोष आ वैवाहिक योग्यता लिखित रूपमे सुरक्षित रखैत छल। एहि उल्लेखकेँ पञ्जी–प्रबन्धक सीधा संस्थागत आरम्भ मानब उचित नहि, मुदा ई स्पष्ट करैत अछि जे परिवार–आधारित वंश–स्मृति आ लिखित सूचीक विचार मध्यकालसँ बहुत पहिने विद्यमान छल। तेरहम–चौदहम शताब्दीक संक्रमणक कथा स्रोतसभमे हरिनाथ उपाध्यायसँ जुड़ल अछि। कथाक अलग–अलग रूप भेटैत अछि। एक रूपमे विद्वान हरिनाथ उपाध्याय अपूर्ण वंश–स्मृतिक कारण निषिद्ध निकट सम्बन्धमे विवाह कऽ लेलनि। दोसर विस्तृत रूपमे हुनकर पत्नीपर दुषाध समुदायसँ सम्बन्धक आरोप लगाओल गेल, अग्नि–परीक्षामे हाथ जरल, आ विदुषी लखिमाक व्याख्यासँ ई निष्कर्ष निकलल जे पत्नी व्यभिचारिणी नहि, बल्कि पति स्वयं निषिद्ध स्वजन–विवाहक कारण धर्मशास्त्रीय संकटमे छलाह। पुनर्परीक्षाक कथा ई संकेत करैत अछि जे समस्या नैतिक दोषसँ बेसी वंश–ज्ञानक अभावक रूपमे पढ़ल गेल। एहि प्रसंगक ऐतिहासिकता, तिथि आ विवरण पर स्रोतसभ समान नहि, मुदा सभ रिपोर्ट एकटा बात पर जोर दैत अछि—वंश–स्मृति व्यक्तिगत परिवारक भरोसासँ बाहर निकालि पेशागत, लिखित आ संस्थागत अभिलेख बनाओल गेल। शक १२४८ अर्थात १३२६ ई. कऽ संस्थानीकरणक परम्परागत तिथि देल जाइत अछि। महाराज हरिसिंहदेवक नाम एहि आदेशसँ जोड़ल अछि; किछु रिपोर्ट हुनकर शासनक समाप्ति १३२४ ई. कऽ लग राखैत अछि, जाहिसँ तिथि–संघर्ष उत्पन्न होइत अछि। एहि कारणेँ ‘१३२६ ई.’ केँ एतए पञ्जी–परम्पराक स्वीकृत संस्थानीकरण–तिथि कहब अधिक सुरक्षित अछि, न कि हर विवरणक निर्विवाद आधुनिक ऐतिहासिक सत्य। गुणाकर झाकेँ ब्राह्मण–पञ्जीक प्रमुख पञ्जीकार, शङ्करदत्तकेँ कर्ण कायस्थक अभिलेखक अधिकारी आ विजयदत्तकेँ क्षत्रिय—विशेषतः गन्धवरिया राजपूत—पञ्जीक दायित्व देबाक उल्लेख अछि। किछु रिपोर्ट ‘विश्वचक्र सम्मेलन’ वा जामसम/पण्डौल क्षेत्रमे विस्तृत वंश–संग्रहक उल्लेख करैत अछि। परिचेता वा क्षेत्रीय संग्राहक परिवारक वयोवृद्ध सदस्यसँ वंश–सूचना लैत, ओकर तुलना दोसर परिवारक अभिलेखसँ करैत आ मूल/बीजी पुरुष/शाखा निश्चित करैत छल। ई प्रक्रिया मौखिक स्मृतिसँ लिखित पारस्परिक सत्यापन दिसक संक्रमण बुझबामे उपयोगी अछि। विदुषी लखिमा वा ठाकुराइन लखिमाक भूमिका सेहो किछु रिपोर्टमे विशेष रूपेँ अबैत अछि। हुनका धर्मशास्त्रक प्रखर ज्ञाता, रति मिश्रक पुत्री तथा न्याय–धर्मशास्त्रीय परम्परासँ जुड़ल विदुषीक रूपमे प्रस्तुत कएल गेल अछि। ई विवरण स्त्रीक बौद्धिक उपस्थिति देखबैत अछि, यद्यपि मुख्य पञ्जी–रचना पुरुषवंश केन्द्रित रहल। २क. संस्थानीकरणक विस्तृत परम्परा: सम्मेलन, स्त्री–विद्वान आ सामाजिक अनुष्ठान किछु रिपोर्ट संस्थानीकरणक कथाकेँ आर विस्तारसँ दैत अछि। ओहि अनुसार जामसम/पण्डौल क्षेत्रमे ‘विश्वचक्र सम्मेलन’ नामक विद्वत् सभा भेल, जतए गाँव–गाँवक वंश, गोत्र, प्रवर, मूल, प्रवास–ग्राम आ विवाह–सूचना संकलित करबाक राजकीय योजना बनल। सम्मेलनक तिथि किछु स्रोत १३२७ ई. कहैत अछि, जखनकि संस्थानीकरण शक १२४८ अर्थात १३२६ ई. देल गेल अछि। एहि एक–वर्षक अन्तरकेँ सम्भवतः आदेश, सर्वेक्षण आ सम्मेलनक अलग चरण मानल जा सकैत अछि, मुदा मूल राजकीय दस्तावेजक स्वतंत्र सत्यापन आवश्यक अछि। विस्तृत परम्परामे ठाकुराइन लखिमा नामक स्त्री–विद्वानक उल्लेख विशेष महत्त्वक अछि। हुनका धर्मशास्त्रक प्रखर ज्ञाता आ हरिनाथ उपाध्याय प्रसंगक वंशीय जटिलता बुझनिहार विदुषी कहि प्रस्तुत कएल गेल अछि। किछु संस्करणमे अग्नि–परीक्षाक घटना बाद विद्वत् सभा समस्या नहि बुझि सकल, तखन लखिमा सम्बन्ध–रेखा खोलि निषिद्ध नातेदारी पहिचानलनि। ई कथा ऐतिहासिक तथ्य, लोकस्मृति आ संस्थानीकरणक प्रतीक—तीनू स्तर पर पढ़ल जा सकैत अछि। मूल समकालीन प्रमाण उपलब्ध नहि रहबाक स्थिति मे लखिमाक भूमिकाकेँ ‘पञ्जी–परम्परामे संरक्षित कथन’ कहब उचित अछि। वाजसनेयी आ छान्दोग्य एकटा रिपोर्ट मैथिल ब्राह्मणक वैदिक–रूढ़ि अनुसार दू मुख्य समूह बतबैत अछि—वाजसनेयी, जे शुक्ल यजुर्वेदक माध्यन्दिन शाखासँ जोड़ल छथि, आ छान्दोग्य, जे सामवेदक कौथुम शाखासँ जोड़ल छथि। स्रोत उपनयन आ विवाह–संस्कारमे किछु प्रक्रिया–भेद सेहो लिखैत अछि। वाजसनेयी उपनयनक चारि चरण—चूड़ाकरण, उपनयन, वेदारम्भ, समावर्तन—क उल्लेख अछि; छान्दोग्य सूचीमे नामकरण, चूड़ाकरण, उपनयन, समावर्तन देल अछि। विवाहक बाबत वाजसनेयी प्रक्रिया एक सतत् अनुष्ठान रूपमे, छान्दोग्य प्रक्रिया ‘पूर्व–विवाह’ आ ‘उत्तर–विवाह’ दू भागमे, उत्तर–विवाह अरुन्धती दर्शनक बाद रात्रिमे—एहन विवरण रिपोर्टमे अछि। ई अनुष्ठान–भेद पञ्जीक मुख्य वंशीय संरचना नहि, मुदा विवाह–सामाजिक पृष्ठभूमिक हिस्सा अछि। क्षेत्र, परिवार आ काल अनुसार व्यवहार बदलि सकैत अछि। पञ्चगौड़ आ पञ्चद्राविड़क व्यापक वर्गीकरण स्रोत–रिपोर्ट मैथिल ब्राह्मणकेँ उत्तर भारतीय ‘पञ्चगौड़’ समूहक एक अंश रूपमे रखैत अछि—उत्कल, कान्यकुब्ज, गौड़, मैथिल, सारस्वत—आ विन्ध्यक दक्षिण ‘पञ्चद्राविड़’—कर्णाट, गुर्जर, तैलंग, द्राविड़, महाराष्ट्रीय—क पारम्परिक सूची दैत अछि। ई वृहत्तर पुराणोत्तर सामाजिक वर्गीकरण पञ्जीक स्थानीय गोत्र–मूल संरचनासँ अलग स्तरक पहचान अछि। एकरा आधुनिक जातीय–भाषिक विज्ञानक स्थिर वर्गीकरण नहि, ऐतिहासिक ब्राह्मणिक आत्म–वर्गीकरण बुझल जाए। ३. पञ्जीक प्रकार: एकटा बहु–रजिस्टर व्यवस्था विभिन्न रिपोर्ट पञ्जीकेँ सात प्रकारमे बाँटैत अछि। नामक वर्तनी आ कार्य–विवरणमे हल्का अन्तर अछि, मुदा समेकित रूप निम्न अछि: मूल पञ्जी — मूल वंश, मूलग्राम, बीजी पुरुष आ मूल पहचानक आधारभूत रजिस्टर। शाखा पञ्जी — मूलसँ निकलल शाखा, नव निवास, सामाजिक उपवर्ग आ किछु कालमे ‘उपटीप’/नगराम सन विशेष खण्ड। गोत्र पञ्जी — गोत्र, प्रवर आ प्राचीन मूलक वर्गीकरण। पत्र पञ्जी — सन्तति/अपत्य, नव पीढ़ी आ विवाह–संयोजन दर्ज करयवला जीवित रजिस्टर। दूषण पञ्जी — वंशीय ‘क्षरण’, नियम–विरुद्ध विवाह, अज्ञात मातृवंश, अन्तर्जातीय/अन्तर्धार्मिक सम्बन्ध, सामाजिक विवाद वा दोष–चिह्नक अभिलेख। उटेढ़/उतेढ़ पञ्जी — विवाहक पूर्वज–जाँच; मातृ–पितृ पक्षक विस्तृत वंश–मानचित्र। अस्वजन्य–पत्र/सिद्धान्त–पत्र — निषिद्ध रक्त–संबन्ध नहि रहबाक प्रमाण तथा विवाह–अधिकारक औपचारिक निर्णय। किछु स्रोत ‘अस्वजन्य–पत्र पञ्जी’मे स्त्री–नामक विशेष संरक्षण, खास कऽ रसाढ़–अररिया क्षेत्रक उदाहरण देैत अछि। दोसर स्रोत मुख्य पञ्जीमे स्त्रीक नामक न्यूनता पर जोर दैत अछि। दुनू बात एक संग सम्भव अछि: मुख्य पितृवंशीय श्रृंखला स्त्रीकेँ अक्सर ‘फलाँ गाँवसँ फलाँक पुत्रक दौ’ सन सम्बन्ध–सूत्रमे रखैत अछि, मुदा विशेष रजिस्टर, विवाह–जाँच वा असाधारण प्रविष्टिमे स्त्रीक नाम, पेशा वा उपलब्धि दर्ज भऽ सकैत अछि। पञ्जी एकटा ‘रिलेशनल’ अभिलेख आधुनिक डेटाबेसक उपमा स्रोतसभमे बारम्बार आयल अछि। एकटा प्रविष्टिमे व्यक्ति–नाम प्राथमिक पहचान होइत अछि; पिता, मूल, गाँव, मातृक गाँव, दौ/द्दौ, शाखा–सन्दर्भ, पृष्ठ–संख्या वा अन्य खण्डक कोड पारस्परिक लिंकक काज करैत अछि। ‘बी ४१/८’, ‘उ.प्र. २७०/५’, ‘२७०/२’ सन कोड कागजी ‘हाइपरलिंक’ जकाँ कार्य करैत अछि। ई तुलना उपयोगी अछि, मुदा याद रखबाक चाही जे पञ्जी आधुनिक डेटाबेस नहि छल; ओकर संरचना लिखित संक्षिप्त सूत्र, विशेषज्ञ स्मृति आ अनेक पोथीक पारस्परिक परामर्श पर टिकल छल। ४. गोत्र, प्रवर, मूल, मूलग्राम आ बीजी पुरुष पञ्जी–वाचनक आधारभूत पहचान चारि स्तरपर बनैत अछि—गोत्र, प्रवर, मूल आ मूलग्राम। गोत्र व्यापक पितृवंशीय ऋषि–परम्परा अछि। प्रवर वैदिक ऋषि–समूहक अनुष्ठानिक पहचान अछि। मूल गोत्रक भीतर एकटा ऐतिहासिक शाखा वा वंश–एकक अछि। मूलग्राम ओ भौगोलिक ठाम अछि जकरा संग बीजी पुरुष अथवा प्रारम्भिक ज्ञात पूर्वजक पहचान जोड़ल गेल। परिवार जखन दोसर ठाम बसल, नव ठाम शाखा वा निवासक रूपमे जुड़ैत गेल। रिपोर्टसभ २० गोत्रक सूची दैत अछि: शाण्डिल्य, वत्स, सावर्ण, काश्यप, पराशर, भारद्वाज, कात्यायन, गर्ग, कौशिक, आलम्बुकाक्ष, कृष्णात्रेय, गौतम, मौद्गल्य, वशिष्ठ, कौण्डिन्य, उपमन्यु, कपिल, विष्णुवृद्धि, ताण्डि आ जातूकर्ण। अलग–अलग खण्डमे सक्रिय गोत्रक संख्या कम भऽ सकैत अछि; उदाहरणार्थ प्राचीन पञ्जीक एकटा खण्डक आँकड़ामे १७ गोत्रक प्रभावी उपस्थिति कहल गेल अछि। ई विरोध नहि, बल्कि विशिष्ट खण्डक वास्तविक प्रतिनिधित्व आ सम्पूर्ण परम्परागत सूचीक अन्तर हो सकैत अछि। प्रवरक सूचीमे त्रिप्रवर आ पञ्चप्रवरक भेद अबैत अछि। स्रोतसभ विशेष रूपेँ वत्स आ सावर्णक उदाहरण दैत अछि: गोत्र अलग रहितो प्रवर–ऋषि समान मानल गेल, तेँ परम्परागत विवाह–जाँचमे ई जोड़ी निषिद्ध मानल जाइत अछि। एहि उदाहरणसँ बुझाइत अछि जे पञ्जी–व्यवस्था केवल ‘गोत्र अलग अछि कि नहि’ पर नहि रुकैत, प्रवर–साम्य सेहो देखैत अछि। मूलक कुल संख्या १६७ देल गेल अछि। ‘मुख्य’ मूल पहिने ३४, बादमे फनन्दह मूलक खानाम शाखाकेँ जोड़ि ३५ मानल गेल—एहन विवरण अनेक रिपोर्टमे दोहरायल अछि। एहि ३५ मूलकेँ आयन्त श्रेष्ठ, प्रजायन्त/दोसर श्रेणी आ मध्यम मूलक श्रेणीमे बाँटबाक परम्परा वर्णित अछि। नामक वर्तनी अलग–अलग रिपोर्टमे बदलैत अछि—खड़ौरे/खड़ौरै, खौआल/खौआर, बुधबाड़/बुधवाल, मदार, दरिहर, घुसौत, तिसौत, करमहा, नरौन, बभनियाँ, हरिअम, सरिसब, सोदरपुर, गंगोली, पबौली, कुजौली, अले, पाली, सकराढ़ी, विशे, फनन्दह, उचित, पण्डुआ, कटाइ, तिलाइ, दीघ, बेलौंच, एकहर, पानिछोभ, बलियास, जजिवाल, टकवाल आदि। ई वर्तनी–परिवर्तन स्वयं पञ्जीक मौखिक–लिखित संक्रमणक प्रमाण अछि। मूल एकटा भौगोलिक ‘पता’ मात्र नहि एकहि गोत्रमे अनेक मूल होइत अछि। काश्यप गोत्रक सम्बन्धमे ७४ शाखाक उल्लेख भेटैत अछि; मण्डरक एकटा प्राचीन आधार–बिन्दुसँ गढ़, मंगरौनी आदि शाखा जोड़ल गेल अछि। ‘बीजी पुरुष’ एहि उपशाखाक प्रारम्भिक ज्ञात पुरुष–पूर्वज अछि। एतए मूल जैविक डी.एन.ए. चिह्न नहि; ई अभिलेखीय–सामाजिक पहचान अछि। आधुनिक आनुवंशिक वंशावलीसँ तुलना करैत काल ई भेद अनिवार्य अछि। ५. उटेढ़, बत्तीस पूर्वज आ सोलह छठ्ठी: विवाह–जाँचक गणित विवाहक समय पञ्जीकार प्रस्तावित वर–कन्याक विस्तृत पूर्वज–मानचित्र बनबैत छल, जकरा स्रोतसभ ‘उटेढ़’, ‘उतेढ़’ वा ‘उठेढ़ा’ लिखैत अछि। रिपोर्टसभ एकरा ३२ मूल/पूर्वजक वंश–विन्यास कहैत अछि। ई ३२ संख्या कतेको विवरणमे पाँच पीढ़ी पीछे पसरेल ३२ पूर्वजक गणितसँ जोड़ल अछि; किछु विवरण १६ पितृ–पक्ष आ १६ मातृ–पक्ष कहैत अछि। पारम्परिक सूत्रक व्यावहारिक उद्देश्य एक्के अछि—विवाहक दुनू पक्षमे निषिद्ध निकट रक्त–संबन्धक पुनरावृत्ति खोजब। उटेढ़क भीतर ‘सोलह छठ्ठी’ विशेष तकनीकी जाँच अछि। स्रोत–प्रश्नोत्तर एकर सम्बन्ध–बिन्दुसभ बहुत विस्तारसँ गनैत अछि—पितामहक पितामह, पितामहक मातामह, पितामहीक पितामह/मातामह, मातामहक पितामह/मातामह, मातामहीक पितामह/मातामह आ एहि शाखासभक उर्ध्व सम्बन्ध। सार ई जे कन्याक सोलह विशिष्ट षष्ठ–स्थिति पूर्वजकेँ वरक वंश–पट्टीसँ मिलाओल जाइत अछि। परम्परागत धर्मशास्त्रीय सूत्र मातृपक्षमे पाँच आ पितृपक्षमे सात पीढ़ी छोड़बाक बातसँ जोड़ल अछि। किछु पञ्जी–रिपोर्ट कहैत अछि जे महामहोपाध्याय महेश ठाकुरक प्रभावक बाद व्यवहारमे पितृपक्षक सीमा छह पीढ़ी मानल गेल, अर्थात सातम पीढ़ी विवाहयोग्य भेल। दोसर रिपोर्ट श्रोत्रिय लेल ५ मातृ + ७ पितृ आ पञ्जीबद्ध/वंशज लेल ५ मातृ + ६ पितृ नियमक उल्लेख करैत अछि। प्रश्नोत्तर–स्रोत एहि श्रेणीगत भेदकेँ बादक सामाजिक निर्माण कहि मूल धर्मशास्त्रीय नियम सभ लेल समान मानबाक तर्क रखैत अछि। समेकित निष्कर्ष ई अछि जे ‘५/७’ आदर्श सूत्र आ ‘५/६’ व्यवहारिक संशोधन दुनू स्रोत–परम्परामे मौजूद अछि; एकरा एक–दोसरक बदला चुपचाप नहि राखल जा सकैत अछि। विवाह–अधिकारक प्रमुख निषेध स्रोतसभ चारि, पाँच वा सात नियमक अलग–अलग सूची दैत अछि। संकलित रूपमे मुख्य निषेध ई अछि: समान गोत्रमे विवाह नहि; समान प्रवरमे विवाह नहि; निषिद्ध मातृ–सपिण्ड सम्बन्ध नहि; निषिद्ध पितृ–सपिण्ड सम्बन्ध नहि; ‘काठमामा’ अर्थात सौतेली माताक भाइक सन्ततिक विशेष निषेध; किछु व्याख्यामे प्रत्यक्ष पितामह/मातामहक निकट सन्तति निषेध; किछु सामाजिक नियममे जेठ सन्तान अविवाहित रहिते छोटक विवाह आ जीवित पत्नीक सगी बहिनसँ विवाहपर आपत्ति। एहि सभ जाँचक बाद पञ्जीकार ‘सिद्धान्त’ अथवा ‘अस्वजन्य–पत्र’ दैत छल। सिद्धान्त मात्र ज्योतिषीय शुभमुहूर्त नहि, बल्कि वंशीय पात्रताक प्रमाण बुझल गेल अछि। एतए ‘अधिकार’ शब्दक अर्थ—ई विवाह परम्परागत अभिलेखी नियमक भीतर मान्य अछि कि नहि। आनुवंशिकी सम्बन्धी सावधानी रिपोर्टसभ सोलह छठ्ठी, गोत्र–प्रवर आ सपिण्ड नियमकेँ ‘प्राचीन जीनोम मानचित्रण’ वा ‘क्रोमोसोम–जाँच’क समतुल्य कहबाक प्रयास करैत अछि। एतए ‘रक्त–दूरी’ जाँचक सामाजिक उद्देश्य आधुनिक आनुवंशिक परामर्शसँ तुलना योग्य जरूर अछि, मुदा गोत्र/मूल/प्रवर आधुनिक डी.एन.ए. मार्कर नहि। पञ्जी–आधारित निषेध सामाजिक–वंशावली सूचना पर आधारित छल; आधुनिक आनुवंशिकी जैविक परीक्षण, जनसंख्या आँकड़ा आ आणविक प्रमाण पर। तुलना उपमा अछि, समरूप विज्ञान नहि। ५क. सोलह छठ्ठीक विस्तृत सम्बन्ध–मानचित्र आ एक व्यवहारिक उदाहरण स्रोतक एक विस्तृत तालिका सोलह छठ्ठीकेँ सम्बन्ध–पथक रूपमे खोलैत अछि। शब्दावली अलग पञ्जीकारक पाठमे बदलि सकैत अछि, मुदा समेकित सम्बन्ध–रूप निम्न अछि: कन्याक पितृपक्षक वृद्ध–प्रपितामहक पितामह; ओहि वृद्ध पितृ–पूर्वजक ससुर; पितृ–प्रपितामहक मातामहक पिता; ओहि मातामहक ससुर; पितामहीक पितृपक्षक वृद्ध–पूर्वज; पिताक मातामहक मातामह; पितामहीक मातृपक्षक वृद्ध–पूर्वज; पितामहीक मातामहक मातामह; मातामहक पितृपक्षक वृद्ध–पूर्वज; मातृ–प्रपितामहक मातामह; मातामहक मातृपक्षक वृद्ध–पूर्वज; मातामहक मातामहक मातामह; मातामहीक पितृपक्षक वृद्ध–पूर्वज; मातामहीक पितामहक मातामह; मातामहीक मातृपक्षक वृद्ध–पूर्वज; मातामहीक मातामहक मातामह। ई सूची कागजपर सरल प्रतीत होइत अछि, व्यवहारमे प्रत्येक बिन्दु अलग मूल, ग्राम आ अनेक पीढ़ीक क्रॉस–सन्दर्भ माँगैत अछि। किछु प्रश्नोत्तर–स्रोत ‘मातृपक्ष’क परिभाषा बहुत कठोर करैत अछि: जे सम्बन्ध कन्याक आफ्नी माताक जैविक वंशमार्गसँ अबैत अछि, ताहिमे मात्र मातृपक्षीय सीमा लागू हो; पितृवंशक भीतर विवाहसँ जुड़ल स्त्री–पूर्वजकेँ स्वचालित रूपेँ मातृपक्ष नहि मानल जाए। शशिनाथ झाक पुत्रीक विवाह–जाँच एकटा विस्तृत उदाहरणमे करमहा–बेहट वंशक शशिनाथ झाक पुत्री आ विट्ठो निवासी करमहा–बेहट सम्बन्धी वरक प्रस्तावित विवाहक उटेढ़ बनाओल गेल। कन्याक मातृपक्ष खण्डबला–भौरक नारायणदत्त ठाकुरसँ जुड़ल; वरक पितृपक्ष दरिहरा–रतौलीक गोपीनन्द झा आदि सँ। सोलह छठ्ठी मिलानमे कन्याक चौदहम छठ्ठी—सोदरपुर–दिगौन्धक कौशिल्यानन्द मिश्र—वरक पितृवंशक निषिद्ध सीमा भीतर सेहो भेटल। स्रोतक अनुसार एहि ओवरलैपक कारण पञ्जीकार सिद्धान्त–पत्र देबासँ मना कएलनि। एहि केसक महत्त्व ई जे ‘छठ्ठी’ अमूर्त सूची नहि, विवाह निर्णयक कार्यरत एल्गोरिथ्म छल। किछु प्रश्नोत्तर एकटा ‘मातृ अपवाद’क उल्लेख करैत अछि—जँ समान छठ्ठी केवल वरक मातृपक्षमे एहन दूरीपर अछि जे पाँच पीढ़ीक निषिद्ध सीमा पार भऽ गेल, तखन विवाह सम्भव भऽ सकैत अछि। एहि नियमक व्यवहारिक रूप अलग पञ्जीकारक परम्परासँ सत्यापित होयबाक चाही। ६. पञ्जीकार: स्मृतिक पेशेवर, अभिलेखक रक्षक पञ्जीकार वंशावली पढ़यवला ‘क्लर्क’ मात्र नहि। ओकर काज पुरान पोथी पढ़ब, शाखा–सन्दर्भ मिलान करब, उटेढ़ बनाब, विवाह–अधिकार तय करब, नवी जन्म–विवाह सूचना जोड़ब, सामाजिक विवादमे अभिलेख देखब आ पोथीक भौतिक संरक्षण करब छल। कई रिपोर्ट १८५ पञ्जी वा पञ्जीकार–परिवारक उल्लेख करैत अछि। ई संख्या स्रोत–सापेक्ष अछि, मुदा पेशागत वितरणक व्यापकता देखबैत अछि। पाण्डुलिपिसभ ताड़पत्र, भूर्ज/छाल, बादमे हस्तनिर्मित कागजपर मिथिलाक्षर/तिरहुता लिपिमे लिखल गेल। किछु निर्देश जल, तेल, ढीला वा अनुपयुक्त बन्धनसँ रक्षा, वर्षमे नियंत्रित धूप देब, काठक आवरण, डोरीक ब्रह्मग्रन्थि–जकाँ बाँधन आ वनस्पतिजन्य मसिक उपयोगक उल्लेख करैत अछि। किछु रिपोर्ट सूर्य सिंह राशिमे रहबाक समय—लगभग अगस्त–सितम्बर—पोथी धूपमे सुखेबाक परम्परा लिखैत अछि। एहि निर्देशकेँ आधुनिक संरक्षण–विज्ञानक विकल्प नहि, ऐतिहासिक अभिलेखक देखभालक स्थानीय ज्ञान बुझबाक चाही। पञ्जीकारक नैतिकता पर स्रोतसभ कठोर अछि। अभिलेख नहि देखिकऽ निजी स्मृति वा मनमानी नियमसँ निर्णय, अत्यधिक शुल्क, वंश–घड़न्त, दर्जा–बढ़ेबाक लेल लेन–देन—सभक आलोचना भेटैत अछि। ‘पञ्जीकार संस्कृतिक रक्षक अछि, शुल्क–वसूल व्यवसायी नहि’ सन भाव रिपोर्टमे उद्धृत अछि। ई आत्मालोचना महत्त्वपूर्ण अछि, कारण व्यवस्था अपन भ्रष्टाचारक सम्भावना केँ पहचानैत अछि। ६क. पञ्जीकारक प्रशिक्षण, धौत परीक्षा आ सभागाछी किछु आधुनिक रिपोर्ट दरभंगा राजक संरक्षणकालमे पञ्जीकार बनबाक लेल लगभग दस वर्षक अध्ययन आ ‘धौत परीक्षा’ नामक कठोर परीक्षणक परम्परा लिखैत अछि। परीक्षा उत्तीर्ण विद्वान राजकीय मान्यता पबैत छल, बादमे राज–व्यवस्था समाप्त भेलापर पेशा वंशानुगत परिवारक हाथमे अधिक केन्द्रित भेल—ई स्रोतक कथन अछि। एहि संस्थागत इतिहासक स्वतंत्र अभिलेखी जाँच उपयोगी होएत, मुदा पञ्जीकारक विशेषज्ञता सामान्य लिपिक–कौशलसँ बहुत बेसी छल, से मूल ग्रन्थक जटिलता सँ स्पष्ट अछि। रिपोर्टसभ विवाह–जाँच लेल ‘सभागाछी’ नामक सार्वजनिक विवाह–सभा स्थलक उल्लेख करैत अछि; एक स्रोत चौदह राजकीय/परम्परागत सभागाछीक दावा करैत अछि। आमगाछी आ खुला मैदानमे परिवार, पञ्जीकार आ विद्वान जमा होइत, वंश–जाँचक बाद सिद्धान्त–पत्र देल जाइत। सौराठ सभा एहि परम्पराक सर्वाधिक चर्चित आधुनिक रूप अछि। सभागाछी केवल वर–कन्या खोजक बाजार नहि, पञ्जी अभिलेखक सार्वजनिक सत्यापन, विद्वत् संवाद आ सामाजिक नियमनक मंच छल। ६ख. पञ्जीकारक कार्य–विभाजन आ जाति–विशिष्ट सत्यापन हरिसिंहदेवक कथामे गुणाकर झा ब्राह्मण, शंकरदत्त कर्ण कायस्थ आ विजयदत्त क्षत्रिय/गंधवारिया राजपूतक वंशावलीक प्रमुख नियुक्त कहि वर्णित छथि। प्रश्नोत्तर–स्रोत गुणाकर झाक पूर्व विद्वत्ता/क्षेत्र–सम्बन्धी सर्वेक्षणक कारण चयन होयबाक संकेत करैत अछि। अलग समुदाय लेल अलग पञ्जीकार होयबाक अर्थ नियम पूर्णतः समान छल, से जरूरी नहि; वंशावलीक आधारभूत लक्ष्य समान होइतहुँ गोत्र, कुल, विवाह–परम्परा आ अभिलेख–रूप समुदाय अनुसार बदलि सकैत अछि। गैर–ब्राह्मण पञ्जीक बचेबाक स्थिति कमजोर कहल गेल अछि; एहि कारण मैथिल ब्राह्मण पञ्जीक उपलब्धि पूरे मिथिलाक सभ जाति–समुदायक समान अभिलेखीय स्थिति मानि नहि लेल जाए। ७. मिथिलाक्षर, कैथी–देवनागरी आ डिजिटल रूपान्तरण पुरान पञ्जी मिथिलाक्षर/तिरहुता लिपिमे सुरक्षित रहल। बादक मुद्रित आ डिजिटाइज्ड संस्करणमे देवनागरी, कतेको ठाम कैथी–प्रभावित देवनागरी वा समान सामग्रीक दू–स्तम्भीय रूप भेटैत अछि। प्राचीन पञ्जी खण्ड १ आ ६६–३४७ पृष्ठक रिपोर्ट दुनू स्तम्भमे समान वंश–सूचना रहबाक बात कहैत अछि—एक स्तम्भ परम्परागत लिपि–रूपक निकट, दोसर अपेक्षाकृत पठनीय देवनागरी–रूप। लिपि–ज्ञानक ह्रास पञ्जी–परम्पराक प्रमुख संकट मानल गेल अछि। जखन पोथी पढ़यवला विशेषज्ञ कम भऽ रहल छथि, तखन परिवार अपन अभिलेख स्वतंत्र रूपसँ सत्यापित नहि कऽ पबैत अछि। डिजिटल छवि, देवनागरी लिप्यन्तरण, खोजयोग्य पाठ, ग्राम–सूची, गोत्र–मूल अनुक्रमणिका आ पारस्परिक लिंक एहि संकटक उत्तरक रूपमे प्रस्तुत अछि। २००० ई.क बाद डिजिटल प्रयास, २००७–२००९ धरि स्कैन/प्रकाशन, आ २००८ केर आन्तरिक लेखकीय तिथि सन साक्ष्य देखबैत अछि जे पञ्जी कागजसँ डिजिटल माध्यम दिस सचेत रूपेँ बढ़ल। स्रोतसभ हजारो छवि, डी.वी.डी. अभिलेख, ऑनलाइन प्रकाशन आ मुद्रित ‘जीनोम मैपिंग’ ग्रन्थक चर्चा करैत अछि। सार्वजनिक पहुँचक लाभ—वंश–स्मृति सुरक्षित, शोध सरल, प्रवासी समुदायक पहुँच—स्पष्ट अछि। मुदा जोखिम सेहो अछि: सन्दर्भ–विहीन डेटा, निजी पारिवारिक सूचना, गलत स्वचालित पढ़ाइ, मूल लिपिक त्रुटिपूर्ण लिप्यन्तरण, आ पञ्जीकारक मौखिक विशेषज्ञता सँ अलग कएल डेटा। उचित डिजिटल रूपान्तरणमे उच्च–गुणवत्ताक छवि, मूल पृष्ठ–संख्या, लिपि–स्तर, सम्पादकीय संशोधनक इतिहास, नियंत्रित शब्दावली, ग्राम–नामक वैकल्पिक वर्तनी, आ पञ्जीकारक व्याख्या—सभ संग राखब चाही। ८. सामाजिक श्रेणी: श्रोत्रिय, योग्य, पञ्जीबद्ध, वंशधर आ जयवार पञ्जी–प्रबन्धक मूल विवाह–जाँचक उद्देश्यक संग धीरे–धीरे सामाजिक श्रेणीकरण जुड़ल। रिपोर्टसभ श्रोत्रिय, योग्य, पञ्जीबद्ध/वंशज, वंशधर आ जयवार सन श्रेणी देैत अछि। श्रोत्रिय उच्च वैदिक–अध्ययन, अनुष्ठानिक अनुशासन आ प्रतिष्ठित वैवाहिक सम्बन्धक समूह; योग्य उच्च किन्तु श्रोत्रियसँ निम्न श्रेणी; पञ्जीबद्ध अभिलेखमे विधिवत् दर्ज वंश; वंशधर किछु व्याख्यामे उच्च श्रेणीसँ नीचे गेल शाखा; जयवार अपूर्ण अभिलेख वा औपचारिक श्रेणीकरणसँ बाहर परिवारक नामक रूपमे अबैत अछि। स्थानीय नाम ‘सोइत’, ‘जोग’, ‘भलमानुष’ आदि सेहो किछु रिपोर्टमे देल अछि। स्रोतसभ दावा करैत अछि जे आरम्भिक पञ्जी मुख्यतः वंश–सत्यापनक साधन छल, सामाजिक ‘उच्च–नीच’क कठोर उपश्रेणी बादमे बढ़ल। महाराज माधव सिंहक काल—अठारहम शताब्दी—मे शाखा पञ्जीक विकास, श्रेणीगत कठोरता आ विवाह–संबन्धक प्रतिष्ठा–बाजारक विस्तारक चर्चा अछि। ‘पञ्जी आ पानी नीचाँ जाए’ सन धारणा उच्च परिवारक निम्न श्रेणीमे विवाहक बाद सामाजिक दर्जा क्रमशः घटबाक तर्कक प्रतीक बनल। रिपोर्टसभ ई सेहो कहैत अछि जे पहिल–दोसर उच्च श्रोत्रिय उपश्रेणी एहन प्रक्रियासँ समाप्त भऽ गेल। दर्जा–बढ़ेबाक लेन–देन आ सामाजिक विकृति प्रश्नोत्तर आ रिपोर्टसभमे पैसाक बदला वंशीय श्रेणी ‘अपग्रेड’ करबाक आदेश/प्रमाण, लोकिक प्रतिष्ठा, पञ्जीकारपर दबाव आ सामाजिक प्रतिष्ठाक खरीद–बिक्रीक आरोप भेटैत अछि। एहि प्रसंगकेँ तथ्यक रूपमे एकरे आधार पर अंतिम सिद्धान्त नहि मानल जा सकैत अछि, मुदा स्रोत–संग्रह ई विषय लगातार उठबैत अछि। एतए मूल बिन्दु ई अछि जे जे व्यवस्था प्रमाणिक वंश–जाँच लेल बनल, ओहि पर सामाजिक पूँजी आ धनक प्रभाव पड़बाक सम्भावना स्वयं स्रोतसभ मानैत अछि। उच्च श्रेणी पुरुषक अनेक विवाह, ‘बिकौआ’ प्रथा, बाल–विवाह, दहेज आ व्यापक विधवापनक समस्या सेहो किछु रिपोर्टमे एहि श्रेणी–व्यवस्थासँ जोड़ल अछि। उन्नीसम शताब्दीक उत्तरार्धमे सुधार–प्रयासक चर्चा, विशेषतः १८७६ ई. केर सदर कमिटी, पञ्जीकार आ समाजक प्रतिज्ञा, आ १८७६–१८७८ बीच २,२८९ विवाहक निगरानीक आँकड़ा स्रोत–संग्रहमे अछि। एहि आँकड़ाकेँ स्रोतक दाबी बुझैत उपयोग कएल जाए; स्वतंत्र अभिलेखी सत्यापन भविष्यक शोध–विषय अछि। ८क. मूलक पाँच सामाजिक श्रेणी, चौगोला आ पछबरिपार किछु स्रोत मूल–समूहकेँ तीन प्रमुख प्रतिष्ठा–स्तर—आयन्त श्रेष्ठ, प्रजायन्त/वरन्त, मध्यम—मे देैत अछि; एक विस्तृत रिपोर्ट रघुदेव झासँ सम्बद्ध पाँच–स्तरीय वर्गीकरण सेहो प्रस्तुत करैत अछि: आयन्त, वरन्त, मध्यम, अधम, अधमाधम। ई पाँच–स्तरीय सूची सामाजिक मूल्याङ्कनक इतिहासक दस्तावेज अछि; आधुनिक मानव–मूल्य वा जैविक गुणवत्ता संग एकर कोनो सम्बन्ध नहि। स्रोत–रूप निम्न अछि: आयन्त: खड़ौरै, खौआल, बुधवाल, मदार, दरिहरा, घुसौत, तिसौत, नरौन, करमहा, बभनियाँ, हरिअम, सरिसब, सोदरपुरिया। वरन्त: गंगोलीवर, पबौलीवर, कुजौलीवर, अलेवर, बहिदवार, सकराढ़ीवर, पालीवर। मध्यम: दीघवे, बेलौंचे, एकहरै, पानिछोभे, बलियासे, जजिवालै, टकवालै, पण्डुआ, सकुन। अधम: फनन्दहवर, दसौतीवर, अलरिये, कोदरिये, कोठुए, महुए, बसावनै। अधमाधम: सुरगनै, लगुड़दहै, दहीभटावर, सतलखै, उचितिवर, विसाइवर, जलैवर। नामक वर्तनी रिपोर्टसँ रिपोर्ट बदलैत अछि; ऊपरक सूची स्रोतक ध्वन्यात्मक रूपक मैथिलीकरण अछि। एकहि मूल अलग कालमे अलग सामाजिक श्रेणीमे गेल कि नहि, एहि प्रश्न लेल शाखा–पञ्जीक कालक्रम चाही। श्रोत्रिय ‘चौगोला’ एक रिपोर्ट श्रोत्रिय समूहक भीतर आठ ‘चौगोला’ अथवा अनुष्ठानिक स्तरक उल्लेख करैत अछि आ कुल बत्तीस रजिस्टरक व्यवस्था कहैत अछि। उपलब्ध उदाहरण–तालिकामे पहिल तीन स्तरक परिवार देखाओल गेल अछि: पहिल स्तरमे दरिहरा–रतौलीक भरथियार झा, पबौली–बधियामक भदै झा, सोदरपुर–रैयामक बभन झा, सरिसब–जोंकीक पीताम्बर झा; दोसर स्तरमे करमहा–अनलक रघुनी झा, बुधवाल–डुमराक नारायण झा, सकराढ़ी–परहटक देबै झा, खण्डबला–भौरक गंगाधर झा; तेसर स्तरमे सोदरपुर–सरिसबक बाबू मिश्र, खण्डबला–भौरक बलभद्र ठाकुर, तिसौत–कुआक तिसौत झा, सोदरपुर–रैयामक रामदेव मिश्र। रिपोर्ट सभ आठ स्तरक पूरा सूची नहि दैत, तेँ जे उपलब्ध अछि ओतबे राखल गेल अछि। पछबरिपारक पन्द्रह श्रेणी स्रोत महाराज रामेश्वर सिंहक १९२९ ई. केर व्यवस्था संग ‘पछबरिपार’क पन्द्रह सामाजिक ग्रेड, कुल १५३ रजिस्टर आ ‘लौकिक’ प्रतिष्ठा–नामक चर्चा करैत अछि। उदाहरणक रूपमे—प्रथम श्रेणी नरपति झा (सकराढ़ी–हरदी), माधव मिश्र (सोदरपुर–रोहड़), गोनू मिश्र (सोदरपुर–कटका), भैयन झा (बुधवाल–डुमरा); द्वितीय पदुम झा, श्रीकान्त झा, मधुपति मिश्र; तृतीय गहनानन्द झा; चतुर्थ छितरी झा; पाँचम हरिनारायण ठाकुर आ सुखै झा; छठम तरैवल्ला चौधरी; सातम बदनी झा; आठम बोधकृष्ण झा; नवम रतिकर झा; दशम दामोदर झा; एगारहम मणिकान्त झा; बारहम नकट झा; तेरहम घनश्याम झा; चौदहम घनसीराम चौधरी; पन्द्रहम चतुर ठाकुर। प्रश्नोत्तर–स्रोत एहि वर्गीकरणकेँ तीखा आलोचनात्मक दृष्टिसँ पढ़ैत अछि। ओकर अनुसार सामाजिक प्रतिष्ठा पञ्जीक मूल विवाह–सुरक्षा उद्देश्यपर हावी भेल, किछु राजकीय आदेश आ धन–लेनदेनद्वारा श्रेणी–बढ़ोत्तरीक आरोप उठल, आ ‘लौकिक’ सामाजिक मुद्रा बनि गेल। एहन आरोपक स्वतंत्र अभिलेखी सत्यापन जरूरी अछि; तथापि स्रोतक भीतर ई आत्मालोचना बारम्बार अछि। ९. दूषण–पञ्जी: नियमभङ्गकेँ मिटेबाक नहि, दर्ज करबाक परम्परा दूषण–पञ्जी पञ्जी–व्यवस्थाक सभसँ जटिल आ असुविधाजनक दस्तावेज अछि। ‘दूषण’ या ‘क्षरण’ शब्द सामाजिक मान्यताक दृष्टिसँ वंशमे आयल विचलनक संकेत अछि। आश्चर्य ई जे व्यवस्था जे नियम–विरुद्ध विवाह रोकबाक लेल बनल, ओ नियमभङ्गकेँ नष्ट नहि करैत अछि; दर्ज करैत अछि। स्रोतसभ एहि विरोधाभासकेँ दूषण–पञ्जीक बौद्धिक महत्त्व मानैत अछि। ९७ तालिकाक विश्लेषणमे अनेक प्रकारक प्रविष्टि वर्गीकृत अछि: चर्मकार/चर्मकारिणी सम्बन्ध; यवन वा मुस्लिम स्त्रीक सम्बन्ध; देवदासी सन्तति; विधवा–सन्तति; गुरु–पत्नी सम्बन्ध; ‘पथ–पतिता’ कहि दर्ज स्त्री; अन्तरजातीय विवाह; अज्ञात कुल/मातृवंश; पश्चिम देशसँ आयल अज्ञात परिवार; ‘परमब्राह्मण’/महापात्र परिवारक विवादास्पद सम्बन्ध; सामाजिक प्रतिष्ठाक भीतर–बाहर गेल शाखा; आ कतेको एहन प्रविष्टि जतए साथी समुदाय स्पष्ट नामसँ नहि लिखल, केवल ‘अन्तर्जातीय’ वा ‘अज्ञात’ कहल गेल। किछु रिपोर्ट छह पीढ़ीक पश्चात पुनः पूर्ण सामाजिक एकीकरणक उदाहरण दैत अछि। देवधर/चमारु/गङ्गाधरक उदाहरणमे एकटा गैर–स्वीकृत विवाहक सन्तति आगामी पीढ़ीसभमे सरिसब, सकराढ़ी, पानिछोभ, दरिहरा, पाली, नरवाल आदि मान्य मूलसँ विवाह करैत पुनः समाजक भीतर स्थिर होइत देखाओल गेल। एहि कारणेँ दूषण–पञ्जीकेँ केवल ‘काला पोथी’ कहब अपूर्ण अछि; ई सामाजिक बहिष्कार आ पुनःसमावेशन दुनूक इतिहास अछि। मुस्लिम/यवन, देवदासी आ विधवा प्रविष्टि दौलतजहाँ नामक यवन स्त्री दूटा तालिकामे मातृपूर्वजक रूपमे अबैत छथि; हुनका डगराक माता कहि नदम/गंगोली–खौआल नेटवर्कसँ जोड़ल गेल अछि। ‘चाँपो यवन’ सन दोसर प्रविष्टि सेहो अछि। एहि उदाहरणसभसँ धर्म–समुदायक सीमा व्यवहारमे जतेक कठोर मानल जाइत अछि, जीवन–स्तरपर ओतेक निरपेक्ष नहि छल—कम–से–कम एहन सम्बन्ध भेल आ अभिलेखमे बचल। देवदासी प्रविष्टिसभ तालिका १६–२१क समूहक रूपमे वर्णित अछि। हरिहरक माता, ‘विद्यापतिक माता’, लाखूक माता आदि देवदासी कहि दर्ज छथि। एतए ‘विद्यापति’ नाम प्रसिद्ध कवि सँ आवश्यकतः एक्के व्यक्ति अछि, से स्वतः मानब उचित नहि; पञ्जीमे नाम–पुनरावृत्ति बहुत अछि। विधवाक सन्तति तालिका २८ आ ९४मे भेटैत अछि। ‘वार्तिनी विधवा’ सन पद स्त्रीक सामाजिक/आर्थिक सक्रियताक संकेत दे सकैत अछि, मुदा अर्थ–निर्णय सावधानीसँ करबाक चाही। ‘गुरु–पत्नी’ विवाह, ‘पथ–पतिता’ स्त्री, अज्ञात मातृकुल आ अन्तरजातीय सम्बन्धक प्रविष्टि देखबैत अछि जे पञ्जीकार असुविधाजनक तथ्यकेँ पूर्णतया मेटा नहि देलनि। निश्चित रूपेँ भाषा स्वयं जाति–आधारित मूल्य–निर्णयसँ भरल अछि; आजुक दृष्टिसँ ‘दूषण’ श्रेणी आलोचनात्मक पुनर्पाठ माँगैत अछि। मुदा इतिहासकार लेल ठीक ई मूल्याङ्कनात्मक भाषा समाजक शक्ति–संरचना देखबैत अछि। ९क. दूषण–पञ्जीमे स्वास्थ्य–दोष सम्बन्धी दाबी एक विस्तृत रिपोर्ट दूषण–पञ्जीमे सामाजिक विवाह–विचलनक संग किछु स्वास्थ्य/शारीरिक अवस्थाक वंशीय नोट सेहो रहबाक दावा करैत अछि। ओ अपस्मारी (मिर्गी/आक्षेपक इतिहास), उन्मादी (दीर्घ मानसिक विक्षोभ कहि वर्णित), आ कुञ्जी (अन्धत्व, बहिरापन, जन्मजात लंगड़ापन आदि शारीरिक विकृति कहि समेटल) सन श्रेणी दैत अछि। मूल दूषण–पञ्जीक पृष्ठ–विशिष्ट आलोचनात्मक संस्करण बिना एहि श्रेणीसभक सीमा निश्चित नहि कएल जा सकैत अछि। एहन अभिलेख भेटब ऐतिहासिक रूपेँ महत्त्वपूर्ण होएत, कारण परिवार स्वास्थ्य–लक्षणक पीढ़ीगत पुनरावृत्ति ध्यानमे रखैत छल। मुदा एकरा ‘प्राचीन चिकित्सा–जीनोमिक्स’ कहि आधुनिक आनुवंशिक रोग–विज्ञानक समतुल्य मानब अनुचित अछि। मिर्गी, मानसिक रोग, अन्धत्व वा चलन–विकलता अनेक आनुवंशिक आ गैर–आनुवंशिक कारणसँ हो सकैत अछि; पञ्जीमे नैदानिक परीक्षण नहि छल। स्रोतक स्वास्थ्य–नोटकेँ ऐतिहासिक सामाजिक–चिकित्सकीय अवलोकन रूपमे पढ़ल जाए। दूषण आ पुनर्समावेशनक विस्तृत उदाहरण एक स्रोत अनेक शाखाक ‘अमान्य/अज्ञात’ विवाह आ बादक सामाजिक स्थिति गनबैत अछि: पालीक देवशर्मा शाखामे अज्ञात जाति–स्त्री; बुधवालक गोविन्द शाखामे अज्ञात स्त्री; सरिसबक श्रीनाथ शाखामे अज्ञात स्त्री; दरिहराक भीम शाखामे एहन विवाहक बाद मध्यम स्थिति; सोदरपुरक श्रीहरि शाखामे शाखा–विभाजन; हरिअमक वासुदेव शाखामे अनेक पीढ़ी बाद एकीकरण; पानिछोभक मधुकर शाखामे मातृवंशक माध्यमसँ निगरानी; सरिसबक भवनाथ शाखामे छठम पीढ़ी बाद ‘शुद्धि’; गंगोलीक डगर शाखामे यवनी दौलतजहाँ; खण्डबला–भौरक सुरपति शाखामे आसामक कोच राजवंशी राजाक पुत्री सोहागोसँ सम्बन्ध; सोदरपुरक गोविन्द शाखामे मेधा चर्मकारिणी; आ हदिनी शाखामे हाड़ी समुदायसँ सम्बन्ध। एहि सूचीक सामाजिक शब्दावली स्रोतकालीन मूल्य–निर्णय अछि; समेकित आलेख ओकरा आधुनिक सत्य–मूल्यांकन नहि, ऐतिहासिक वर्गीकरणक प्रमाण रूपमे राखैत अछि। १०. गङ्गेश उपाध्याय प्रसंग: वंश, दर्शन आ विवाद दूषण–पञ्जीसम्बन्धी रिपोर्टसभक सभसँ तीखा दावा नव्य–न्यायक संस्थापक गङ्गेश उपाध्यायसँ जुड़ल अछि। तालिका ४९–५१, प्रविष्टि १८८/२, १८९/१, १८९/२ तथा अन्य मूल–पञ्जी सन्दर्भक आधार पर रिपोर्ट कहैत अछि जे गङ्गेशक पत्नी वल्लभा चर्मकारिणी मूलक छलथि; किछु पाठ गङ्गेशक जन्म पिता निधनक पाँच वर्ष बाद भेल कहि पुरान हाशिया–टिप्पणी उद्धृत करैत अछि। एहि संग गङ्गेशक पुत्र वर्धमान, सुपन/हरिशर्मा, आगेक गोराँ, भवेश्वर आदि वंश–सूत्रक चर्चा अछि। रिपोर्टसभ एहि अभिलेखक आधार पर बीसम शताब्दीक किछु विद्वानपर आरोप लगबैत अछि जे गङ्गेशक परिवारक सामाजिक पृष्ठभूमि वा दूषण–पञ्जी सम्बन्धी सामग्री दबाओल गेल। दिनेशचन्द्र भट्टाचार्यक नव्य–न्याय इतिहास, रामनाथ झासँ प्राप्त सूचना, उदयनाथ झा ‘अशोक’ आदि नाम एहि विवादमे अबैत अछि। समेकित आलेखक जिम्मेदारी ई आरोपकेँ स्रोत–रिपोर्टक आरोपक रूपमे राखब अछि; बिना स्वतंत्र अभिलेख–समीक्षा ककरो ऊपर ‘जानि–बुझि दमन’क अंतिम ऐतिहासिक फैसला देब उचित नहि। गङ्गेशक ‘तत्त्वचिन्तामणि’ नव्य–न्याय परम्पराक आधारग्रन्थ अछि। रिपोर्ट हुनकर ‘जगद्गुरु’ आ ‘परमगुरु’ उपाधि, वर्धमानक विद्वत्ता, मिथिलासँ नवद्वीप दिस नव्य–न्याय प्रसार, वासुदेवक अध्ययन, पक्षधर मिश्र, रघुनाथ शिरोमणि आदि प्रसंग जोड़ैत अछि। एहि कथा सँ दूटा इतिहास एकठाम जुड़ैत अछि—दार्शनिक ग्रन्थक बौद्धिक इतिहास आ परिवारक सामाजिक इतिहास। एहि सामग्री पर आधारित ‘शब्दशास्त्रम्’ नामक मैथिली कथा तथा ओकर अंग्रेजी अनुवादक प्रकाशनक उल्लेख स्रोतमे अछि। ई उदाहरण देखबैत अछि जे वंशावली–अभिलेख साहित्यक स्रोत सेहो बनि सकैत अछि। पञ्जी जखन एकटा अप्रत्याशित सामाजिक तथ्य बचबैत अछि, आधुनिक लेखक ओकरा कथा, आलोचना वा वैकल्पिक इतिहासक रूप दे सकैत अछि। १०क. गङ्गेश प्रसंगमे स्रोत–पाठक सूक्ष्म भेद दूषण–पञ्जीसम्बन्धी फाइलसभ परस्पर नितान्त एकरूप नहि। एक मुख्य प्रतिवेदन तालिका ४९/प्रविष्टि १८८/२मे गङ्गेशक पत्नी वल्लभाकेँ चर्मकारिणी मूलक कहैत अछि; तालिका ५०/१८९/१मे मेधा चर्मकारिणी नामक एक दोसर स्त्रीक दीर्घ वंश–पथ अलग दर्ज अछि। एक विस्तृत बादक रिपोर्ट मेधाकेँ गङ्गेशक माता कहि देैत अछि, जखन कि दूषण–पञ्जीक विशिष्ट विश्लेषण ओकरा अलग वंशक स्त्री मानैत अछि। एहि विरोधक कारण समेकित निष्कर्षमे वल्लभा सम्बन्धी दाबी स्रोत–विशिष्ट रूपेँ राखल गेल अछि, आ ‘मेधा गङ्गेशक माता’ कथनकेँ निश्चित तथ्य नहि मानल गेल। मूल मिथिलाक्षर पृष्ठ १८८/२–१८९/२क पुनर्पाठ एहि विवादक सर्वोत्तम समाधान होएत। देवानन्द पञ्जीक प्रविष्टि ३३९/३मे सुपन/हरिशर्मा, हुनकर पुत्र हरादित्य, बेटी गोरा आ जजिवाल/सन्दगही सम्बन्धक बहु–पीढ़ी शृंखला; प्रविष्टि ३०/५मे वर्धमानक पुत्रीक खण्डबला सम्बन्ध—एहन उदाहरण गङ्गेशक वंश ‘तत्काल समाप्त’ भेल दाबीसँ असंगत स्रोत–साक्ष्य रूपमे प्रस्तुत कएल गेल अछि। एहि आधार पर बीसम शताब्दीक विद्वानपर ‘सूचना दबेबाक’ आरोप रिपोर्टमे अछि; आरोपक ऐतिहासिक निर्णय लेल विद्वानक मूल पत्राचार, संस्करण, उपलब्ध अभिलेख आ प्रकाशन–कालक जाँच आवश्यक अछि। १०ख. आर्यभट, चैतन्य आ प्रसिद्ध व्यक्ति सम्बन्धी स्रोत–दाबी एकटा विस्तृत रिपोर्ट मण्डर–मंगरौनी शाखाक बीजी पुरुष त्रिनयन भट्टसँ आर्यभटक वंश जोड़बाक दावा करैत अछि आ पन्द्रह पीढ़ीक एक शृंखला दैत अछि—त्रिनयन भट्ट, उदयभट्ट, विजयभट्ट, सुलोचन, भट्ट, धर्मजाति मिश्र, धराजाति मिश्र, ब्रह्मराज मिश्र, त्रिपुराजाति मिश्र, विधुजाति मिश्र, अजय सिंह, विजय सिंह, आदिवराह, महावराह, दुर्योधन सिंह, महामहोपाध्याय नरसिंह। रिपोर्ट एहि शृंखलाकेँ आर्यभटक पारिवारिक पृष्ठभूमिसँ जोड़ैत अछि, मुदा नाम, कालक्रम आ समकालीन बाह्य साक्ष्यक स्वतंत्र जाँच बिना एहन पहचान स्वीकार करब सुरक्षित नहि। एहि आलेखमे ई ‘स्रोत–रिपोर्टक वंशीय दाबी’ रूपमे मात्र सुरक्षित अछि। ओही रिपोर्ट वत्स गोत्र, करमहा–तरौनी शाखाक रामपति उपाध्याय—जिनका विष्णुपुरी/परमानन्दपुरी सेहो कहैत अछि—मार्फत चैतन्य महाप्रभुक आध्यात्मिक/विद्वत् सम्बन्ध जोड़बाक दावा करैत अछि। ई ‘जैविक वंश’ आ ‘गुरु–शिष्य परम्परा’क भेद स्पष्ट राखब जरूरी अछि। पञ्जी जँ रामपति उपाध्यायक परिवार देैत अछि, ताहिसँ चैतन्यक रक्तवंश स्वतः सिद्ध नहि होइत; अधिकतम व्यापक भक्ति–आन्दोलन आ मिथिलाक विद्वानक सम्पर्कक शोध–सुराग भेटैत अछि। एहि प्रकार प्रसिद्ध नामक प्रविष्टि—आर्यभट, विद्यापति, ज्योतिरीश्वर, गङ्गेश, गंगानाथ—लेल नियम एक्के रहत: नाम–साम्य आरम्भिक संकेत अछि, पहचानक प्रमाण नहि। ११. स्त्री, मातृवंश आ पञ्जीक मौन पञ्जी मूलतः पितृवंशीय ढाँचा अछि। नामक मुख्य श्रृंखला पिता–पुत्रक क्रममे आगाँ बढ़ैत अछि; गोत्र आ मूल सेहो पितृपक्षीय पहचानक आधार पर चलैत अछि। एहि कारणेँ पहिल नजरिमे स्त्री लगभग अनुपस्थित बुझाइत छथि। मुदा विवाह–जाँचक वास्तविक गणित स्त्री–विहीन भऽ सकैत नहि। ‘दौ’, ‘द्दौ’, मातृग्राम, मातामह–पक्ष, पाँच मातृ–सपिण्ड, सोलह छठ्ठी—ई सभ मातृसम्बन्धकेँ अभिलेखक भीतर अनिवार्य बना दैत अछि। अर्थात स्त्रीक नाम नहि लिखल रहि सकैत अछि, मुदा हुनकर वंशीय स्थान बिना विवाह–निर्णय सम्भव नहि। एहि विरोधाभासकेँ ‘संरचनात्मक उपस्थिति आ नामगत अनुपस्थिति’ कहि सकैत छी। कन्याक पिताक नाम, मातृग्राम, नानाक मूल, दादी–नानीक वंश–सूत्र आदि विवाह–जाँचमे जरूरी छल; तैँ स्त्री सम्बन्धक सूचना नेटवर्कक केन्द्रीय कड़ी अछि। मुख्य पाठक पुरुष–केंद्रित शैली ओकरा दृश्य रूपेँ दबा दैत अछि। दूषण–पञ्जी, अस्वजन्य–पत्र, विवाह–कोलोफोन, दोसर पत्नी ‘अपरा’क शाखा, आ आधुनिक पेशागत प्रविष्टि एहि मौनमे दरार खोलैत अछि। किछु स्रोत रसाढ़–अररिया सम्बन्धी विशेष अस्वजन्य–पत्रमे स्त्रीक नाम व्यवस्थित रूपेँ लिखल होयबाक दावा करैत अछि। आधुनिक नगराम–पञ्जीमे ‘पत्नी अनीता’, ‘पहिल आई.ए.एस. बेटी’ सन उल्लेख भेटैत अछि। दोसर दिस मुख्य वंश–पंक्तिमे बहुसंख्य स्त्री ‘फलाँ गाँवक दौ’ बनि रहि जाइत छथि। एहि दुनू प्रकारक प्रमाणक संयुक्त अर्थ ई नहि जे पञ्जी ‘स्त्रीवादी’ अभिलेख छल, आ नहि ई जे स्त्री पूर्णतः गायब छलथि। सही निष्कर्ष ई अछि जे पञ्जी विवाह–व्यवस्था कारण मातृवंशक डेटा रखैत छल, मुदा सामाजिक प्रतिष्ठा आ नामकरणक प्राथमिकता पुरुष पर केन्द्रित छल। दूषण–पञ्जीमे स्त्रीक देह सामाजिक सीमा बनैत अछि चर्मकारिणी, यवन, देवदासी, विधवा, गुरु–पत्नी, ‘पथ–पतिता’, अज्ञात कुलक स्त्री—दूषण–पञ्जीक बहुत श्रेणी स्त्रीक सामाजिक अवस्थाकेँ वंशीय ‘दूषण’क वाहक बनबैत अछि। ई भाषिक संरचना स्वयं समयक जाति–पितृसत्तात्मक नैतिकताक दस्तावेज अछि। मुदा इतिहासकार लेल एतबे महत्त्वपूर्ण बात ई जे ओ स्त्री, जकरा मुख्य प्रशस्तिमूलक वंशावली छोड़ि सकैत छल, ‘दूषण’क कारणेँ नाम वा सम्बन्धक रूपमे बचि गेलीह। अभिलेखक कलंककारी श्रेणी आधुनिक शोधमे उलटि कऽ हाशियाक सामाजिक इतिहासक स्रोत बनैत अछि। विवाह, विधवापन आ बहुविवाह सामाजिक श्रेणीकरण, उच्च कुलक वरक मांग आ ‘बिकौआ’ बहुविवाह सम्बन्धी रिपोर्टसभ स्त्रीक जीवनपर पञ्जी–व्यवस्थाक अप्रत्यक्ष प्रभाव देखबैत अछि। कतिपय पुरुषक चारि, पाँच, छह अथवा ओहूसँ अधिक विवाहक कोलोफोन अछि; किछु रिपोर्ट अत्यधिक उदाहरणमे बारह धरि विवाहक उल्लेख करैत अछि। एहिसँ केवल पुरुषक प्रतिष्ठा नहि, अनेक स्त्रीक विधवापन, बालविवाह, आर्थिक लेन–देन आ पारिवारिक असमानताक इतिहास जुड़ल अछि। सदर कमिटी सन सुधार–प्रयास एहि कारणेँ पञ्जी इतिहासक बाहरी घटना नहि, ओकर सामाजिक परिणामक प्रतिक्रिया छल। पाठ-विधि जखन पञ्जी स्त्रीक नाम नहि दैत अछि, तखन ‘डेटा नहि अछि’ कहब पर्याप्त नहि। मातृग्राम, दौ/द्दौ, अपरा शाखा, विवाह–तिथि, दूषण–श्रेणी आ ससुराल–सूत्र मिलाकऽ स्त्रीक संरचनात्मक उपस्थिति पुनर्निर्मित करबाक पड़ैत अछि। १२. प्राचीन पञ्जी, खण्ड १: पृष्ठ १–६५ — वंश–व्याकरणक आधार प्राचीन पञ्जी खण्ड १क पहिल ६५ पृष्ठ पञ्जीक ‘व्याकरण’ बुझबाक लेल मूल पाठ अछि। आरम्भिक सूत्र ‘अथ पत्र पञ्जी लिख्यते’ अभिलेखक औपचारिकता स्पष्ट करैत अछि। एहि खण्डमे व्यक्ति–नाम, पिता, पुत्र, मूल, ग्राम, दौ, वैकल्पिक नाम, विद्वत्ता–उपाधि आ मातृक–चक्र छोट–छोट सूत्रमे सँकलित अछि। रिपोर्टक गणना अनुसार कम–से–कम १२२ नामित गाँव, १७ सक्रिय गोत्र, ५५ सँ बेसी मातृक–चक्र, लगभग ४७ महामहोपाध्याय तथा हजारो व्यक्ति एहि हिस्सामे अभिलेखित छथि। ‘लगभग पाँच हजार व्यक्ति’क आँकड़ा स्रोत–रिपोर्टक अनुमान अछि; मूल गणनाक स्वतंत्र पुनःपरीक्षा उपयोगी रहत। गंगौलीक हलायुध: ऐतिहासिक आधार–बिन्दु पहिल खण्डक उल्लेखनीय वंश–श्रृंखलामे गंगौलीक हलायुध प्रमुख छथि। रिपोर्ट हुनका बंगालक बल्लाल सेनक कालक विद्वान हलायुधसँ जोड़बाक सम्भावना रखैत अछि आ कालक्रम लगभग बारहम शताब्दीक उत्तरार्ध मानैत अछि। हुनकर सन्तान–श्रृंखलामे वीर, नारायण, शूलपाणि आदि नाम अबैत अछि। भाई–क्रमक सूचक ‘०५/०४’ सन संकेत ई देखबैत अछि जे पञ्जी केवल सीधा वंश नहि, सहोदरक आपसी स्थान सेहो दर्ज करैत छल। ऐतिहासिक व्यक्तिक समान नामक समस्या एतओ अछि; अतः पहचानकेँ गोत्र, मूल, ग्राम, पीढ़ी आ समकालीन सन्दर्भसँ जाँचना जरूरी अछि। महामहोपाध्याय आ ज्ञानक भूगोल खौआल–सरिसब–खण्डबला क्षेत्रमे महामहोपाध्याय उपाधि धारक विद्वानक घनत्व स्रोत–रिपोर्ट विशेष रूपेँ रेखांकित करैत अछि। व्याकरण, न्याय, ज्योतिष, वैदिक अध्ययन, धर्मशास्त्र आदिक उपाधि परिवारक वंशीय सूचनाक संग लिखल अछि। नरसिंह नामक विद्वानक श्रृंखला अठारह पीढ़ी धरि विद्वत्ता–परम्परा देखेबाक दाबी करैत अछि। ई पञ्जीकेँ बौद्धिक इतिहासक वैकल्पिक स्रोत बनबैत अछि—विश्वविद्यालय अथवा राजकीय सूचीसँ बाहर परिवारगत ज्ञान–परम्पराक लगातार सूत्र एतए सुरक्षित अछि। राजकीय पद आ प्रशासन ‘शान्तिविग्रहिक’ देवदित्य सन पदनाम, राजकीय सम्मान, धर्माधिकार, भण्डार अथवा दरबार–सम्बन्धी उपाधि देखबैत अछि जे पञ्जी ब्राह्मणिक अनुष्ठानक सूची मात्र नहि। राज्य–प्रशासन आ विद्वान परिवारक पारस्परिक सम्बन्ध सेहो वंशक हिस्सा बनैत अछि। एहि प्रकारक पदनामसँ समयक राजनीतिक संरचना, राजकीय संरक्षण आ शिक्षित वर्गक भूमिका पुनर्निर्मित भऽ सकैत अछि। असाधारण प्रविष्टि ‘डोम टेकरी’क संग चतुर्वेदाध्यायी कामदेवक प्रविष्टि सामाजिक सीमा आ पेशागत/समुदायगत नामक जटिलता देखबैत अछि। ‘अयाची’ सन उपाधि याचना नहि करबाक तपस्वी आदर्शक संकेत अछि। ‘तेगच्छिया’ वा क्षीण शाखा सम्बन्धी टिप्पणी एहन महत्वपूर्ण उदाहरण अछि जतए पञ्जी स्वयं कहैत अछि जे शाखाक सूचना अपूर्ण भऽ गेल अथवा स्मृति टूटल। एहि कारणेँ पञ्जी सर्वज्ञ, त्रुटिहीन डेटाबेस नहि; ओकर भीतर ‘ज्ञानक क्षय’ सेहो दर्ज अछि। मातृका–चक्र श्रीधर, सोरे, गंगाधर, बैद्यनाथ आदिक नामसँ जुड़ल ५५ सँ बेसी मातृका–चक्रक उल्लेख विवाह–सम्बन्धक नेटवर्कक घनत्व देखबैत अछि। पितृवंशीय मुख्य श्रृंखलाक समानान्तर मातृसम्बन्धक घूमैत वृत्त एक परिवारकेँ अनेक गाँव आ मूलसँ जोड़ैत अछि। पञ्जीक भूगोल वास्तवमे विवाहक भूगोल अछि। १८५६ ई. केर कोलोफोन एकटा महत्त्वपूर्ण कोलोफोन शक १७७८, श्रावण कृष्ण तृतीया—लगभग १८५६ ई.—क तिथि दैत अछि। पण्डुआक रामानन्द नामक लेखक/नकलनवीस, लक्ष्मीधरक पुत्र गणेशक प्रसंग आ प्रतिलिपिक नोट ई सिद्ध करैत अछि जे पुरान वंश–सामग्री उन्नीसम शताब्दीमे पुनर्लिखित/संरक्षित होइत रहल। अतः पाण्डुलिपिक लिखाइ–तिथि आ ओकर भीतर वर्णित वंशक आरम्भ–तिथि अलग–अलग वस्तु अछि। १२क. षड्यन्त्री विद्वान, वशैठी अभिलेख आ राजपूत कुल: अतिरिक्त स्रोत–सुराग एक विस्तृत रिपोर्ट ‘षड्यन्त्री’ शब्दसँ छओ शास्त्र/दर्शनमे प्रवीण विद्वानक परम्परा उल्लेख करैत अछि आ तेरह नामक सूची दैत अछि: महामहोपाध्याय गोधी शर्मा, माधव शर्मा, आद्य माधव शर्मा, शंकर शर्मा, यज्ञपति शर्मा, परशुराम शर्मा, वामदेव शर्मा, पीताम्बर शर्मा विद्यानिधि, गोकुलनाथ शर्मा फनन्दह, जगन्नाथ शर्मा फनन्दह, वंशधर शर्मा राजनपुरा–दरिहरा, रघुनाथ शर्मा फनन्दह, तथा उपाध्याय दत्त/विष्णुदत्त शर्मा परमानन्दपुरी। उपलब्ध स्रोत ई सूची देैत अछि; प्रत्येक नामक विशिष्ट शास्त्रीय कृति आ काल स्वतंत्र ग्रन्थ–साक्ष्यसँ मिलान योग्य अछि। ओही रिपोर्ट वशैठी/अररिया क्षेत्रक एक मन्दिर–लेखमे सुरगन–लोआम राजपरिवारक रानी इन्द्रवतीक सात पीढ़ीक वंश–वर्णन पञ्जीसँ मेल खायबाक दावा करैत अछि। जँ मूल शिलालेख/प्रतिलिपि उपलब्ध हो, ई पञ्जी–वंशक स्वतंत्र बाह्य सत्यापनक उत्तम उदाहरण हो सकैत अछि। समेकित आलेख एहन दाबीकेँ शोध–कार्यसूची रूपमे राखैत अछि, बिना शिलालेख प्रत्यक्ष देखनाइ अंतिम पुष्टिक रूपमे नहि। ‘वर्णरत्नाकर’मे बासठि राजपूत कुलक उल्लेख सम्बन्धी रिपोर्टक कथन सेहो व्यापक मिथिला समाजक संकेत अछि। पञ्जी–प्रबन्धक उपलब्ध ब्राह्मण–केन्द्रित सामग्री बाहर क्षत्रिय, कर्ण कायस्थ, राजपूत आ अन्य समूहक अभिलेखीय परम्परा संग तुलनात्मक शोध जरूरी अछि। १३. खण्ड १क विस्तार: पृष्ठ ६६–३४७ — करमहा केन्द्र, नेपाल गलियारा आ वर्तमानकालीन विवाह पृष्ठ ६६–३४७ पर पञ्जी अचानक स्थिर ‘प्राचीन’ दस्तावेज नहि रहैत; ओ जीवित रजिस्टर बनि उठैत अछि। करमहा नाम स्रोत–गणनामे लगभग २९२ बेर आएल अछि, जे पहिल भागक मण्डर–केन्द्रित परिदृश्यक तुलना मे भूगोलक केन्द्र बदलबाक संकेत अछि। रतौली–दरिहरा–खौआल, तरौनी, डुमरा, गंगोरा, कन्हौली, महिषी, लोहना, जगौर, झंझारपुर आ नेपाल–समीपक अनेक ठाम नया नेटवर्क बनबैत अछि। रतौली–दरिहरा आ करमहा त्रिकोण रतौली–दरिहरा उपसमूह आ करमहा–खौआल सम्बन्ध बौद्धिक तथा वैवाहिक केन्द्रक पूर्वोत्तर विस्तार देखबैत अछि। गाँव–सूची मात्र नक्शा नहि; जतेक बेर एक गाँव मातृग्राम, मूलग्राम, वर्तमान निवास अथवा विवाह–सूत्र बनि अबैत अछि, ओहि अनुपातमे ओकर सामाजिक ‘केन्द्रीयता’ बढ़ैत अछि। पञ्जी एहि प्रकार मध्यकालीन मिथिलाक सूक्ष्म सामाजिक नक्शा बनि जाइत अछि। ‘अवलम्ब–सरस्वती–दाङ्कित’ आ नव विद्वत् उपाधि बटेश पुरुषोत्तम, हरिश्वरक पुत्र, संग ‘अवलम्ब–सरस्वती–दाङ्कित महामहोपाध्याय’ सन दुर्लभ उपाधि स्रोत–रिपोर्ट चिन्हित करैत अछि। ‘सर्वज्ञ गरीब’ सन विरोधाभासी उपनाम, वैदिक उपशाखा, पाँ/पञ्च सन विद्वान–परिवारक सूचक, ठाकुर उपसर्ग—ई सभ नाम–संस्कृतिक विविध स्तर देखबैत अछि। उपाधि पञ्जीमे केवल अलंकरण नहि; परिवारक ज्ञान–पेशा आ प्रतिष्ठाक ऐतिहासिक टैग बनि जाइत अछि। महाराज माधव सिंहक एकीकरण महाराज माधव सिंहक विस्तृत उपाधि सहित प्रविष्टि राजपरिवारकेँ सामान्य दौ–सूत्र आ विवाह नेटवर्कक भीतर रखैत अछि। राजाक वंश पञ्जीक नियमसँ बाहर विशेष ‘राजकीय परिशिष्ट’ नहि, बल्कि अन्य परिवार जकाँ सम्बन्ध–रेखामे समाहित अछि। एहि सँ राजकीय वैधता आ ब्राह्मणिक वंश–अभिलेखक परस्पर निर्भरता देखाइत अछि। माधव सिंहक पुत्रसभक अलग प्रविष्टि एहि एकीकरणकेँ आगाँ बढ़बैत अछि। मुगलकालीन प्रशासनक चिन्ह ‘चातुर्मासिक मनसबदार हजारी’ रामानन्द चौधरी मणिकानन्दनक पद मुगल प्रशासनिक शब्दावलीक स्थानीय वंशावलीमे प्रवेशक उदाहरण अछि। बादक ‘राय’, ‘राजा’, ‘महाराजा’ उपाधिसभ संग पढ़ल जाए तँ पञ्जी राजसत्ताक परिवर्तनक नामिक अभिलेख बनैत अछि। भौआलवासी: नेपाल–दिस प्रवासन ‘भौआलवासी’ प्रविष्टि काठमाण्डू उपत्यका अथवा नेपालक भौआलसँ सम्बन्धित प्रवासी शाखाक संकेत मानल गेल अछि। सिमरावाड़, मलिंगिया–कुजौली आ सीमा–ग्रामक नेटवर्क मिथिला–नेपालक ऐतिहासिक आवागमनकेँ पञ्जी–स्तरपर पकड़ैत अछि। आधुनिक राष्ट्रीय सीमा बनबाक बहुत पहिने विवाह, विद्या आ सेवा कारण परिवारक आवागमन सामान्य छल। २००३–२००४ केर विवाह: समयक असाधारण संकुचन एहि खण्डक सभसँ उल्लेखनीय विशेषता तिथियुक्त आधुनिक विवाह–कोलोफोन अछि—१ दिसम्बर २००३, ९ दिसम्बर २००३, १५ दिसम्बर २००३, २० जनवरी २००४, २१ दिसम्बर २००४ आदि। चौबीस सँ बेसी एहन प्रविष्टि स्रोत–रिपोर्ट गनैत अछि। प्राचीन वंश–श्रृंखलाक ठीक भीतर ई आधुनिक तिथि देखबैत अछि जे पञ्जी ‘मृत’ इतिहास नहि, अद्यतन होइत विधिक–सामाजिक साधन छल। एकहि पृष्ठपर मध्यकालीन विद्वान, अठारहम शताब्दीक राजा आ एक्कैसम शताब्दीक विवाह मिलि जाइत अछि—रिपोर्ट एकरा ‘कालिक संकुचन’ कहैत अछि। ‘कवि विद्यापति’ नामक सावधानी एकटा बादक प्रविष्टिमे ‘कवि विद्यापति’ स्पष्ट लिखल अछि। मुदा पञ्जीमे नाम पुनरावृत्ति बहुत; केवल ‘विद्यापति’ नाम देखिकऽ प्रसिद्ध मैथिल कवि विद्यापति ठाकुरक समानता मानि लेब प्रमाण नहि। सही पहचान लेल मूल, ग्राम, पिता, पीढ़ी, तिथि आ सम्बद्ध शाखाक मेल आवश्यक अछि। एहि उदाहरणक महत्त्व नाम–पहचानक पद्धति सिखेबामे अछि। १४. खण्ड २: पृष्ठ ३४८–६९० — पञ्जी आधुनिक भारतक संग खण्ड २क ३४८–६९० पृष्ठ पर स्रोत–गणना अनुसार सोदरपुर लगभग ८५३, मण्डर ६२१ आ करमहा ५८० उल्लेखक संग केन्द्रबिन्दु बदलैत अछि। गाँवक आवृत्ति केवल जनसंख्या नहि, विवाह–संबन्ध, प्रतिष्ठित परिवार आ शाखा–सन्दर्भक मिश्रित सूचक अछि। एहि खण्डमे पञ्जी औपनिवेशिक आ स्वतन्त्र भारतक प्रशासन, विश्वविद्यालय, विदेश–विवाह, आधुनिक डिग्री आ पेशा सहज रूपेँ ग्रहण करैत अछि। माधव सिंहसँ कामेश्वर सिंह धरि दरभंगा राजक वंशावली माधव सिंहसँ आगाँ कामेश्वर सिंह धरि विस्तृत राजकीय श्रृंखला बनबैत अछि। कामेश्वर सिंहक प्रविष्टिमे ब्रिटिश साम्राज्यक ‘के.सी.आई.ई.’ सम्मान तथा ‘लिट्.’ सन शैक्षिक सूचकक प्रवेश स्रोत–रिपोर्ट चिन्हित करैत अछि। पुरान ‘महाराजाधिराज’ आ आधुनिक औपनिवेशिक सम्मान एकहि व्यक्ति–टैगमे मिलैत अछि। ई नामिक स्तर सत्ता–परिवर्तनक संक्षिप्त इतिहास अछि। स्वीडेनक अन्तरधार्मिक विवाह आ अन्तरजातीय विवाह स्वीडेनमे भेल ‘अन्तर्धार्मिक विवाह’ तथा अलग ‘अन्तरजातीय विवाह’क प्रविष्टि पञ्जी–प्रणालीक आधुनिक अनुकूलनक खास उदाहरण अछि। महत्वपूर्ण बात ई जे एहन विवाहक बाद वंश–श्रृंखला बन्द नहि होइत; टिप्पणी कोष्ठक/नोटक रूपमे जुड़ैत अछि आ सन्तति आगाँ दर्ज रहैत अछि। ई दूषण–पञ्जीक पुरान तर्कक आधुनिक प्रतिध्वनि जकाँ अछि—नियमभङ्ग वा नवा सामाजिक घटना अभिलेखक अन्त नहि, नव डेटा बनैत अछि। अभिनव–सरस्वती आ आधुनिक विश्वविद्यालय ‘अभिनव–सरस्वती’ सन विद्वत् उपाधि परम्परा जीवित रहैत अछि, मुदा संगहि कलकत्ता विश्वविद्यालयक मैथिली विभागक प्राध्यापक/व्याकरणाचार्य, आधुनिक शिक्षित पेशेवर, सरकारी अधिकारी, अधिवक्ता आदि पञ्जीमे प्रवेश करैत छथि। महिषी एकटा विद्वत् उपकेन्द्रक रूपमे उभरैत अछि; रिपोर्ट ओकर दीर्घ दार्शनिक प्रतिष्ठाकेँ मण्डन मिश्रक स्मृति–संग जोड़ि देखैत अछि, यद्यपि विशिष्ट वंश–समानताक स्वतंत्र सत्यापन आवश्यक अछि। राय परिवार: मुगलसँ ब्रिटिश प्रशासन धरि ‘राय’ उपाधि एहि खण्डमे लगभग ५३ बेर कहि गनल गेल अछि। मुगलकालीन राजस्व/प्रशासनिक सम्मानसँ औपनिवेशिक काल धरि एकहि उपाधि परिवारक सामाजिक पहचान बनि रहैत अछि। पञ्जी नामक भीतर राजनीतिक इतिहासक ‘दीर्घकाल’ देखबैत अछि—राज बदलैत अछि, मुदा स्थानीय प्रतिष्ठा–सूचक पुनर्परिभाषित भऽ कऽ बचैत अछि। कवि जीवकर्ण आ ‘मधुरकवि’ माघव कवि जीवकर्ण आ ‘मधुरकवि माघव’ सन स्पष्ट साहित्यिक उपाधि पञ्जीकेँ मैथिली साहित्येतिहासक सहायक स्रोत बनबैत अछि। एहि प्रविष्टिसभक आधार पर रचना–सूची स्वतः सिद्ध नहि होइत, मुदा ‘कवि’क सामाजिक पहचान, ग्राम, परिवार, विवाह–संबन्ध आ सम्भावित कालक्रम खोजबाक आधार भेटैत अछि। विवाह–कोलोफोनक विस्तार खण्ड २मे लगभग ४१ तिथियुक्त विवाह–कोलोफोनक चर्चा अछि; तिथि उन्नीसम शताब्दीक उत्तरार्धसँ सितम्बर २००४ धरि पसरेल अछि। कतिपय पुरुषक चारि–सँ–छह विवाह दर्ज अछि। एकर सामाजिक अर्थ केवल ‘डेटा समृद्ध’ नहि—बहुविवाह, विधवापन, पुनर्विवाह, पारिवारिक रणनीति आ श्रेणीगत विवाह–बाजारक अध्ययनक सामग्री अछि। शहरी चिह्न ‘राजा रामलोचन (कटिहार)’, ‘कोलकाता (पाली)’, ‘सन्हवासी करमहा’ सन संयुक्त निवास–सूचक मूलग्रामक स्थिर अर्थ बदलैत अछि। परिवार मूलसँ जुड़ल रहैत अछि, मुदा पेशा/राजनीति कारण शहरमे बसैत अछि। पञ्जी एतए ‘मूल’ आ ‘निवास’केँ अलग परतमे रखबाक दिशा दैत अछि—आधुनिक डिजिटल डेटाबेस बनबैत काल ई भेद विशेष महत्त्वपूर्ण रहत। १५. उपटीप आ ‘जीनोम पञ्जी’: वंशक लघु–प्रबन्ध ‘पञ्जी–प्रबन्ध’, ‘उपटीप’ वा ‘उटिप’ शीर्षक स्रोतसभ वंशावलीकेँ लगातार सूक्ष्म शाखामे खोलैत अछि। एकटा छोट प्रविष्टि पहिने देखल जाए तँ नामक ढेर बुझाइत अछि; सम्बन्ध–चिह्न मिलाओल जाए तँ ओ अनेक परिवारक विवाह, मातृग्राम, पद, प्रवास, शिक्षण आ राजकीय सेवाक जाल बनि जाइत अछि। पितृवंशीय मेरुदण्ड, द्विपक्षीय विवाह–संजाल मुख्य वंश पिता–पुत्रक श्रृंखला अछि, मुदा प्रत्येक ‘दौ’ अथवा ‘द्दौ’ पर मातृ परिवार प्रवेश करैत अछि। एहि कारण पञ्जी ‘शुद्ध पितृवंशावली’ कहब अधूरा अछि। वंशक मेरुदण्ड पितृपक्षीय अछि, विवाह–जाल द्विपक्षीय। आधुनिक नेटवर्क–विश्लेषणमे व्यक्ति एकटा नोड, पिता–पुत्र रेखा एक प्रकारक सम्बन्ध, विवाह आ मातृग्राम दोसर प्रकारक सम्बन्ध बनि सकैत अछि। खण्डबला सिंह परिवार: सामाजिक सेतु किछु रिपोर्ट खण्डबला सिंह परिवारकेँ ब्राह्मणेतर—कहीं भूमिहारसदृश, कहीं कायस्थ–सदृश—सामाजिक सेतु मानि चर्चा करैत अछि। शब्दावली स्रोतसभमे एकरूप नहि; तेँ परिवारक निश्चित जातिगत पहचान बिना मूल पञ्जी पुनर्पाठ नहि देल जा सकैत अछि। तथापि एतबे स्पष्ट अछि जे पञ्जी–नेटवर्क केवल एक बंद अन्तर्विवाही वृत्तक व्यवहारिक चित्र नहि; विशिष्ट काल/परिवारमे बाहरी वैवाहिक सम्बन्धक अभिलेख सेहो अछि। लोआम–सुगौना राय परिवार लोआम–सुगौना खण्डमे चन्द्रनारायण राय, राजा देवनारायण आ आधुनिक प्रशासनिक सेवाधारी पीढ़ीक उल्लेख दीर्घ सामाजिक गतिशीलता देखबैत अछि। आधुनिक आई.ए.एस. अधिकारी नरेश चन्द्रक नाम स्रोतमे एहि श्रृंखलाक एकटा छोर बनैत अछि। एतए पञ्जी स्थानीय प्रतिष्ठित परिवारसँ आधुनिक अखिलभारतीय प्रशासन धरि पेशागत परिवर्तनक रेखा खींचैत अछि। भौर–राजग्राम क्षत्रिय/ठाकुर परिवार भौर–राजग्रामक ठाकुर/क्षत्रिय परिवार—कृष्ण सिंह आदि—पञ्जीक ब्राह्मण–केन्द्रित मुख्य परम्परासँ बाहर सम्बन्धित अभिलेखीय जगत खोलैत अछि। प्रारम्भिक संस्थानीकरणक कथामे गुणाकर झा ब्राह्मण, शंकरदत्त कर्ण कायस्थ, विजयदत्त क्षत्रिय/गंधवारिया समूहक पञ्जीकार कहि वर्णित छथि। आधुनिक उपलब्ध सामग्री असमान अछि; किछु गैर–ब्राह्मण पञ्जी परम्परा क्षीण अथवा नष्ट भेल कहि स्रोत चिन्ता व्यक्त करैत अछि। नव्य–न्याय आ शिक्षित वंश ‘नैयायिक’ उपाधि, महामहोपाध्याय, ‘सर गंगानाथ’ सन पहचान, आचार्य रामनाथ एम.ए., पीएच.डी., प्राध्यापक तन्त्रनाथ आदि नाम पञ्जीकेँ ज्ञान–परम्पराक सामाजिक नक्शा बनबैत अछि। ‘सर गंगानाथ’क पहचान गंगानाथ झासँ सम्भावित मानल गेल अछि, मुदा जँ मूल प्रविष्टि पर्याप्त विवरण नहि दैत अछि तँ एहि समानताकेँ सम्भावना रूपमे रखब उचित अछि। ९ जुलाई २००८ केर आन्तरिक तिथि आषाढ़ मास, बुधदिन, ९ जुलाई २००८ केर कोलोफोन डिजिटल सम्पादनक समय–सूचक अछि। एहि सन तिथि स्रोतक स्तरभेद बुझबैत अछि: वंशीय सामग्री शताब्दी पुरान भऽ सकैत अछि, प्रतिलिपि उन्नीसम/बीसम शताब्दीक, आ डिजिटल सम्पादन एक्कैसम शताब्दीक। आलोचनात्मक संस्करणमे एहि तीनू कालक मेटाडेटा अलग राखब अनिवार्य अछि। ‘जीनोम’ शब्दक उपयोग ग्रन्थ–परियोजना ‘जीनोम मानचित्रण ४५० ई.–२००९ ई.’ सन शीर्षकसँ पञ्जीक विस्तृत वंश–सूचनाकेँ आधुनिक रूपक दैत अछि। एहि रूपकक शक्ति अछि—दीर्घकालिक पारिवारिक नेटवर्क, विवाह–दूरी, जनसंख्या इतिहास, प्रवासक चित्र। सीमा सेहो स्पष्ट अछि—पञ्जीमे जैविक नमूना, डी.एन.ए. अनुक्रम, गुणसूत्रीय परीक्षण वा सांख्यिक आनुवंशिक सत्यापन नहि। अतः ‘जीनोम’ एहि परियोजनामे सांस्कृतिक–वंशावली मानचित्रणक रूपक/आकांक्षा बुझल जाए, आधुनिक आणविक जीनोमिक्सक प्रत्यक्ष दाबी नहि। १६. नगराम, खण्ड ३: ग्राम–समूहक भीतर आधुनिक पेशाक प्रवेश नगराम पञ्जी गाँव–आधारित खण्डमे व्यवस्थित अछि। प्रत्येक ब्लॉकक प्रारम्भ ‘नगराम’/‘ग्रामारम्भ’क संकेत, देवता–स्मरण, तत्पश्चात व्यक्ति, सुत/सुता, ग्राम, दौ/द्दौ आ पारस्परिक कोडसँ होइत अछि। एहि रूपक कारण पूरा पाठ एकटा सामाजिक मानचित्र जकाँ पढ़ल जा सकैत अछि। गाँव–नामक अस्थिर वर्तनी एकहि गाँव अलग पृष्ठमे ध्वन्यात्मक, संस्कृतनिष्ठ अथवा लेखक–विशिष्ट वर्तनीसँ अबैत अछि। स्रोत–रिपोर्ट लगभग साठि–सँ–अस्सी वैकल्पिक रूप सामान्यीकरणक आवश्यकता मानैत अछि। डिजिटल संस्करणमे एकटा ‘मानक नाम’ थोपि मूल पाठ मिटा देब उचित नहि; मूल वर्तनी, मानक आधुनिक रूप, जिला/प्रखण्ड आ भौगोलिक पहचान अलग–अलग क्षेत्रमे राखल जाए। सन्दहपुर–सिशपुर: औपचारिक आ लोकनाम प्रारम्भिक ब्लॉकसभमे एक व्यक्ति वा गाँवक औपचारिक नामक संग ‘प्र.’ अथवा परिचित लोकनाम देखाइत अछि—आँखी, नहरा सन नाम। ई द्विनाम पद्धति मौखिक समाजक पहचान–वास्तविकता बचबैत अछि। दस्तावेजी नाम आ घर/गामक नाम दुनू बिना व्यक्ति–पहचान अधूरी भऽ सकैत अछि। खांगुड़–पदहिया: ‘यन्त्रज्ञ’ ब्लॉक ३३मे ‘यन्त्रज्ञ’ सन पद आधुनिक अभियान्त्रिक/तकनीकी पेशाक आरम्भिक संकेत रूपमे पढ़ल गेल अछि। पारम्परिक महामहोपाध्याय, ज्योतिषी, वैयाकरणक बीच यन्त्र–ज्ञानक पेशा देखबैत अछि जे पञ्जी पेशागत परिवर्तनकेँ ग्रहण करैत रहल। कन्हौली–मंगरौनी: न्यायाधीश, आई.ए.एस. आ कम्युनिस्ट सांसद ब्लॉक १२२क एकहि सम्बन्ध–जालमे न्यायमूर्ति अमरनाथ, प्राध्यापक त्रिलोकनाथ आई.ए.एस., कम्युनिस्ट सांसद/सी.पी.एम. सम्बन्धी उल्लेख आ परम्परागत वैयाकरण ससुरालक सूत्र भेटैत अछि। आधुनिक राज्य, वाम राजनीति आ शास्त्रीय विद्या एकहि परिवार–जालमे उपस्थित अछि। पञ्जी एतए विचारधाराक पक्ष नहि लैत; सम्बन्ध दर्ज करैत अछि। रैयाम–राजहड़ा: विश्वविद्यालयीय परिवार ब्लॉक १४८मे महामहोपाध्याय परम्पराक संग इलाहाबाद विश्वविद्यालयक पूर्व कुलपति, डॉ. उमेश, मैथिली साहित्येतिहासक प्राध्यापक जयकान्त, भूविज्ञानी प्राध्यापक कृष्णकान्त आदि एकटा घन शिक्षित समूह बनबैत छथि। ज्ञानक वंशीय विरासत एतए शास्त्रीय पदवीसँ आधुनिक विश्वविद्यालयीय विशेषज्ञता दिस रूप बदलैत अछि। रोहड़–भवानीपुर: राजनीतिक वंश ब्लॉक १८३क चौधरी बच्चू परिवार आ क्षेत्रीय राजनीतिक प्रभाव देखबैत अछि जे आधुनिक लोकतांत्रिक राजनीति सेहो वंशीय स्मृतिक हिस्सा बनि गेल। नामावलीमे ‘किशोर’, ‘नारायण’, ‘इन्द्र’ आदि प्रत्यय पीढ़ीगत नामकरण–रुचि देखबैत अछि। पेशाक तीन काल नगराम रिपोर्ट पेशागत उपाधिक दीर्घकालिक परिवर्तन तीन मोट कालमे देखैत अछि। पहिल—वैदिक, न्याय, व्याकरण, ज्योतिष, धर्मशास्त्र, महामहोपाध्याय। दोसर—औपनिवेशिक कानून, वकील, न्यायिक पद, राजस्व/प्रशासन, रेलवे/तकनीकी सेवा। तेसर—स्वतन्त्र भारतक प्राध्यापक, वैज्ञानिक, अभियन्ता, चिकित्सक, आई.ए.एस., आई.पी.एस., सांसद, न्यायाधीश। एहि क्रमकेँ कठोर काल–सीमा नहि, पर सामाजिक पेशागत परिवर्तनक उपयोगी प्रवृत्ति मानल जा सकैत अछि। नामकरणक कालक्रम स्रोतसभ शिव–सम्बन्धी ‘नाथ’, ‘ईश्वर’, ‘शंकर’ नामक पुरान प्रभुत्व; अठारहम–उन्नीसम शताब्दीमे ‘नारायण’, ‘कृष्ण’; औपनिवेशिक कालमे ‘चन्द्र’, ‘मोहन’, ‘बहादुर’, ‘राय’; बीसम शताब्दीमे ‘कुमार’ आ छोट आधुनिक नामक वृद्धि देखबैत अछि। ई भाषिक आँकड़ा पञ्जीकेँ नामविज्ञानक दुर्लभ दीर्घकालीन संग्रह बनबैत अछि। प्रवास मधुबनी–दरभंगा केन्द्रसँ पूर्णिया–बनैली, मुजफ्फरपुर, भागलपुर–मुंगेर, सहरसा–सुपौल, चम्पारण, नेपाल तराई, काठमाण्डू आ बादमे महानगर/राष्ट्रिय प्रशासनिक केन्द्र धरि परिवारक फैलाव भेटैत अछि। मूलग्राम पहचान बदलैत नहि, मुदा निवास आ पेशा बदलैत अछि। एहि कारणेँ पञ्जी ‘स्थिर जाति’क कथा सँ बेसी गतिशील प्रवासक कथा सेहो अछि। १७. पञ्जिका–नगरामी, ब्लॉक २२६–३५२: लोकनाम, डिग्री आ पेशागत वंश नगरामीक एहि भागमे वंशावली आधुनिक सामाजिक इतिहासक सूक्ष्म कोश बनि जाइत अछि। व्यक्ति–नामक संग घर–नाम, पेशा, डिग्री, विश्वविद्यालय, अदालत, सरकारी सेवा आ बेटी धरि पेशागत उपलब्धिक उल्लेख बढ़ैत अछि। पारम्परिक सूत्र नहि टूटैत; ओकर भीतर नवा सूचना–क्षेत्र जुड़ैत अछि। मंगौनी, हाटी आ समौलीक शाखा ब्लॉक २२६मे मंगौनीसँ मदरीक देवकीनन्दन–रेखा, २२६–२२७मे वंशमणि उपशाखा, २२८मे भ्रातृजन रेखा आ २३०–२३२मे हाटी–सतलखा/विलखिनद सम्बन्ध लगातार छोटे सूत्रमे चलैत अछि। चानुराझा हरिदास झाक प्रविष्टि लोकनाम आ औपचारिक नामक सह–अस्तित्व देखबैत अछि। एहि भागक महत्त्व ‘महान व्यक्ति’ मात्र नहि, छोट शाखाक लगातार पुनर्संयोजन अछि। समौली: नामक सांस्कृतिक विविधता ब्लॉक २३८मे प्रद्युम्नक पुत्र राजीवलोचन, कमल, घोघन; ब्लॉक २४४मे नीलाम्बर, महीपति, उपे तथा सनाफूल, फेकन, छोटा सन लोकाभिमुख नाम एकहि श्रृंखलामे अछि। संस्कृतनिष्ठ दीर्घ नाम, भक्ति–नाम, फूल/प्रकृति–सम्बन्धी नाम, उपनाम, संक्षिप्त घर–नाम—सभ एकहि परिवारमे चलैत अछि। पञ्जी भाषाक ‘मानक’ रूप नहि, जीवित नाम–संस्कृति पकड़ैत अछि। बलिराजपुर–चोपता: शिक्षा आ अभियान्त्रिकी ब्लॉक २५३मे बुवुआजी/जयकृष्णक परिवार; कुमारजी, अमरनाथ, पीताम्बर/नवलकिशोर, जगदीश, सत्यनारायण; नवलकिशोरक पुत्र प्राध्यापक श्यामानन्द, अभियन्ता मनोज कुमार, सुबोध कुमार आदि आधुनिक पेशागत परिवर्तनक स्पष्ट श्रृंखला अछि। ब्लॉक २५४मे ‘साहित्याचार्य प्राध्यापक डॉ. विश्वम्भर मिश्र “वागीश”’—परम्परागत साहित्याचार्य, आधुनिक विश्वविद्यालयीय ‘प्राध्यापक–डॉक्टर’ आ साहित्यिक उपनाम एकहि पहचानमे जुड़ैत अछि। तिथि आ डिग्रीक सूचक ‘१९३४ तृतीय एम.ए.’ सन सूत्र एहन कालचिह्न अछि जतए आधुनिक विश्वविद्यालयीय डिग्री वंश–सूचनाक योग्य विवरण मानल गेल। दोहर एम.ए., अभियन्ता, प्लीडर/वकील, आयकर सेवा, आयोग आदि पेशा अब कुल–प्रतिष्ठाक नवा भाषा बनैत अछि। पुरान महामहोपाध्याय पद मिटैत नहि; ओकर बगलमे नवा डिग्री उगैत अछि। अधिवक्ता परिवार आ कानूनक पेशा ब्लॉक ३०७मे वकील ब्रजमोहनक परिवार—नरेन्द्रमोहन एम.एस., प्राचार्य, विधि–संकाय, अन्य अधिवक्ता—औपनिवेशिक तथा उत्तर–औपनिवेशिक कानूनी पेशाक वंशीय विस्तार देखबैत अछि। पञ्जी समाजक पेशागत पूँजी पीढ़ी–दर–पीढ़ी कतेक टिकैत वा बदलैत अछि, एकर सूक्ष्म अध्ययन सम्भव करैत अछि। मैथिली लेखकक स्पष्ट परिचय ब्लॉक ३१६मे डॉ. प्राध्यापक वेदनाथकेँ स्पष्ट ‘मैथिली भाषा लेखक’ कहि दर्ज कएल गेल अछि। साहित्येतिहास लेल ई खास महत्त्वक अछि: व्यक्तिक रचनात्मक पहचान स्वयं पारिवारिक रजिस्टरक हिस्सा बनल। एहन प्रविष्टि अन्य कवि/लेखक नामक सत्यापन लेल मॉडल दे सकैत अछि। आई.पी.एस.–आई.ए.एस. परिवार आ बेटी ब्लॉक ३४५–३४६मे महावीर आई.पी.एस., डी.आई.जी. तथा हुनकर पुत्र अरुण/अमित आई.ए.एस. सन प्रविष्टि आधुनिक अखिलभारतीय सेवाक प्रतिष्ठा देखबैत अछि। विशेष रूपेँ ‘पहिल आई.ए.एस. बेटी’क उल्लेख स्त्रीक पेशागत उपलब्धि वंश–पाठमे दर्ज होयबाक अपवादात्मक क्षण अछि। ई अपवाद स्वयं बतबैत अछि जे स्त्रीक पेशागत नाम सामान्य नियम नहि छल, मुदा सामाजिक मूल्य बदलिते अभिलेखक चयन–मानदण्ड बदलि सकैत अछि। कलकत्ता उच्च न्यायालयक ‘जूरी’ ब्लॉक ३४७मे ‘पाटक बौन’क कलकत्ता उच्च न्यायालयक जूरी रूपमे उल्लेख औपनिवेशिक न्याय–व्यवस्थाक स्थानीय सामाजिक इतिहासक निशान अछि। पञ्जीमे एहन छोट पद–सूचक औपचारिक सरकारी अभिलेख खोजबाक सुराग बनि सकैत अछि। हरिअमक गहिर वंश ब्लॉक ३५२मे पशुपतिक पाँच ‘–पति’ नामधारी पुत्र, सरिसब/बेलौंच सन प्रतिष्ठित मातृसम्बन्ध आ गहिर पीढ़ी–क्रम एक साथ अछि। एहि प्रकारक प्रविष्टि नामकरण, वैवाहिक प्रतिष्ठा आ शाखा–विस्तार तीनूकेँ जोड़ैत अछि। १८. नगराम, ब्लॉक ३५९–४६६: देवता–स्मरणसँ राजवंश आ आधुनिक अधिकारी धरि एहि खण्डक प्रत्येक ब्लॉक प्रायः देवता–स्मरण, ‘ग्रामारम्भ’, वंशीय सूत्र आ पारस्परिक कोडसँ बनल अछि। उद्घाटनमे शिव/शैव नामक बहुलता स्रोत–रिपोर्ट कुलदेवता अथवा स्थानीय धार्मिक स्मृतिक संकेत मानैत अछि। ई व्याख्या सम्भाव्य अछि; प्रत्येक देव–नामकेँ अनिवार्य कुलदेवता मानबाक पहिले मूल परम्परा/स्थानीय साक्ष्य जाँचब आवश्यक अछि। विचाढ़ी–कुआ आ परहट–चानपुरा ब्लॉक ३५९–३६२क विचाढ़ी–कुआ समूह अनेक पीढ़ी, मातृसम्बन्ध आ गाँव–परिवर्तनक मूल संरचना देखबैत अछि। ३६३–३६७क परहट–चानपुरामे महामहोपाध्याय खगेश, ‘राजा विद्यानिधि हृदयनिधि’, चतुश्चरण यज्ञकर्ता धीरेन्द्र सन उपाधि धार्मिक, विद्वत् आ राजकीय प्रतिष्ठाकेँ एकहि वंशजालमे जोड़ैत अछि। मंगौरी–खोजपुर: घन विद्वत् परिवार ब्लॉक ३७०–३७६मे साधु उपाध्याय रामभद्रक आसपास पण्डितराज, महामहोपाध्याय मधुसूदन, महामहोपाध्याय बैद्यनाथ–पीताम्बर, उमानन्द, महामहोपाध्याय वागीश आदि विद्वानक सघन श्रृंखला अछि। ई एकटा ‘ज्ञान परिवार’क सामाजिक इतिहास अछि। विद्या केवल व्यक्तिगत प्रतिभा नहि, शिक्षण–संस्कृति, पुस्तक, गुरु, वैवाहिक नेटवर्क आ संरक्षणक संयुक्त पारिस्थितिकी हो सकैत अछि। पिलखवाड़–मंगौरी आ अलय–लगमा ब्लॉक ३७९–३८२ महामहोपाध्याय वागीशक शाखा आगाँ लैत अछि। ३८३–३८७ अलय–लगमा गलियारामे ‘दत्त’ प्रत्यययुक्त नामक घनत्व नाम–विज्ञानक विशिष्ट उपसमूह बनबैत अछि। परिवारक भीतर नाम–पैटर्न वंश–पहचानक अनौपचारिक सहायक चिह्न हो सकैत अछि, मुदा केवल नामसँ वंश–सम्बन्ध सिद्ध नहि। बैगनी–बंसी राजपरिवार ब्लॉक ३८८–३९५मे बैगनी/बंसी राजवंश, बनैली/रामगढ़ सम्बन्ध, राजा कीर्त्यानन्द सिंह बहादुर आ संगीत–संबन्धी उपाधि आधुनिक राजकीय–सांस्कृतिक संरक्षणक इतिहास खोलैत अछि। राजघराना पञ्जीक भीतर विवाह–सूत्रसँ जुड़ैत अछि; एहि कारण पञ्जी स्थानीय राजनीतिक इतिहासक वंशीय स्रोत बनैत अछि। परमगढ़–पिण्डारुच आ चौधरी परिवार ब्लॉक ३९२–३९८मे चौधरी परिवार, आधुनिक ‘कुमार’/‘चन्द्र’ नाम आ क्षेत्रीय प्रतिष्ठा सामाजिक परिवर्तनक मध्यवर्ती रूप देखबैत अछि। न तो ई पूरा शास्त्रीय उपाधि–युग अछि, न पूर्ण आधुनिक पेशागत पहचान; दुनू मिश्रित छथि। जगतपुर–ओइन: सिमरौंगढ़ राजवंश ब्लॉक ४०२–४०६ ओइन/ओइन्हा सम्बन्धी राजवंशक दीर्घ प्रशस्तिमूलक अनुक्रम दैत अछि। राजा–पण्डित कामेश्वर, राजा भोगीश्वर, महा–महत्तक कुसुमेश्वर, महाराजाधिराज भवेश्वर/भवसिंह आदि नाम तथा शक ७६८—लगभग ८४६ ई.—सन प्राचीन तिथि रिपोर्ट चिन्हित करैत अछि। एहन अति–प्राचीन तिथिक उपयोग अत्यन्त सावधानीसँ करबाक चाही: पञ्जी–परम्पराक भीतर दाबी रूपेँ महत्त्वपूर्ण, मुदा अभिलेख–विज्ञान, समकालीन शिलालेख/ग्रन्थ आ वंश–पीढ़ीक स्वतंत्र जाँच बिना ऐतिहासिक तथ्यक अंतिम प्रमाण नहि। नहस–खौआल: विद्वानसँ आई.ए.एस./आई.पी.एस. ब्लॉक ४२०–४२८मे ज्योतिषी आ शास्त्रीय विद्वान परिवार बादक आधुनिक प्रशासनिक सेवासँ जुड़ैत अछि। ई परिवर्तन पञ्जीक दीर्घकालिक मूल्य अछि: एकहि वंशमे ‘ज्ञानक पेशा’ बदलैत अछि, सामाजिक पूँजी नव संस्था—विश्वविद्यालय, न्यायालय, नौकरशाही—दिस प्रवाहित होइत अछि। चानपुरा, सुखैत–पिलखवाड़ आ परिधीय समूह ४२९–४३४क चानपुरा सामाजिक समूह, ४४७–४५०क सुखैत–पिलखवाड़ महामहोपाध्याय नेना रेखा, ‘ज्ञानी’, ‘ध्यानी’ सन दार्शनिक नाम, तथा ४५१–४६६क परहट, सतलखा, मुंगेर, लोहना, रोहड़, सुपौल/नेपाल सीमा–क्षेत्र पञ्जीक केन्द्रीय भूगोलकेँ विस्तृत करैत अछि। स्रोत–रिपोर्ट एहि भागमे औसतन ८–१२ पीढ़ी, किछु जगह १५–१८ पीढ़ी, तीन हजारसँ बेसी व्यक्ति आ दुई सयसँ बेसी गाँवक अनुमान दैत अछि। ई मात्र रिपोर्ट–आधारित परिमाण अछि; डिजिटल गिनतीसँ सत्यापन सम्भव अछि। मातृग्रामक आवृत्ति एहि चयनित भागमे स्रोत–रिपोर्ट सोदरपुर, दरभरा, पाली, बेलौंच, खौआल, करमहा, जजिवाल, सरिसब, पबौसल, मण्डर, एकहर आदिक उच्च आवृत्ति बतबैत अछि। जँ ई आवृत्ति मूल पृष्ठपर मशीन–सहायित जाँचसँ पुष्ट हो, तखन विवाह–नेटवर्कक ‘केन्द्रीय गाँव’ पहिचानबाक ठोस आधार बनि सकैत अछि। १९. पूर्णिया आ पूर्वी मिथिलाक सामाजिक भूगोल एकटा पृथक रिपोर्ट पञ्जी–विमर्शकेँ पूर्णिया, असंगा, श्रीपुर, हवेली, धरमपुर आ पूर्वी मिथिलाक स्थानीय इतिहाससँ जोड़ैत अछि। एहि सामग्रीकेँ मुख्य वंश–सिद्धान्तक दोहराव बुझि छोड़ब उचित नहि, कारण एतए विशिष्ट गाँव, मन्दिर, विद्वान, स्वतन्त्रता–सेनानी आ स्थानीय परिवारक स्मृति अछि। जहानपुर आ १७०८ ई. केर मूर्ति–स्थापना जहानपुरक प्रसंगमे १७०८ ई. मे मूर्ति–प्रतिष्ठाक उल्लेख स्थानीय धार्मिक इतिहासक तिथि–सूचक अछि। पुण्यानन्द झा, गिरानन्द ठाकुर, रासमोहन झा आदि नामक संग ई गाँवक सांस्कृतिक निरन्तरता बनबैत अछि। जँ मूल स्थापत्य/शिलालेख उपलब्ध हो, पञ्जी आ स्थानीय परम्परा एक–दोसरक सत्यापन करि सकैत अछि। स्वतन्त्रता आन्दोलनक स्मृति पूर्वी मिथिलाक गाँवसभमे स्वतन्त्रता–सेनानी परिवारक उल्लेख आधुनिक राजनीतिक इतिहास पञ्जीक सामाजिक स्मृतिसँ जोड़ैत अछि। एहन सामग्री औपचारिक स्वतन्त्रता–सेनानी सूची, जिला गजेटियर आ मौखिक इतिहाससँ मिलान योग्य अछि। पञ्जी परिवारक दृष्टिसँ घटना देखबैत अछि; राज्य–अभिलेख सार्वजनिक पद/घटना दृष्टिसँ। दुनूक संयुक्त पाठ बेसी पूर्ण होइत अछि। विष्णुपुर, गुणानन्द–तीर्थानन्द आ विश्वविद्यालयीय सम्बन्ध विष्णुपुर सम्बन्धी परिवार, गुणानन्द/तीर्थानन्द, मिथिला विश्वविद्यालयक कुलपति–संबंधी वंश–सूत्र आधुनिक उच्च शिक्षाक क्षेत्रीय सामाजिक आधार देखबैत अछि। विश्वविद्यालयक इतिहास केवल संस्था–स्थापनाक कथा नहि; स्थानीय विद्वान परिवारक दीर्घ शिक्षण–परम्परा ओकर पृष्ठभूमि हो सकैत अछि। नाशिरा, ज्योतिरीश्वर ठाकुर आ अन्य विद्वत् स्मृति नाशिरा/नशिरा क्षेत्रमे ज्योतिरीश्वर ठाकुरक नामसँ सम्बन्ध जोड़बाक स्रोत–दाबी साहित्येतिहासक दृष्टिसँ रोचक अछि। ‘वर्णरत्नाकर’क रचनाकार ज्योतिरीश्वरक ऐतिहासिक पहचान स्वतंत्र स्रोतसँ पुष्ट अछि, मुदा विशिष्ट पञ्जी–वंश–समानता हेतु मूल वंश–प्रविष्टि, कालक्रम आ ग्राम–सूत्रक विस्तृत जाँच चाही। समेकित आलेख एहि सम्बन्धकेँ शोध–सुराग रूपेँ रखैत अछि, सिद्ध वंशानुक्रम रूपेँ नहि। धरमपुर, सुरगन लोआम, सरमस्त अली खाँ धरमपुर आ सुरगन लोआमक स्थानीय इतिहासमे सरमस्त अली खाँ, राघव सिंह, रसाढ़क विद्वान आ धमदाहाक विद्वत् परिवार सन नाम साम्प्रदायिक आ राजकीय अन्तर्क्रियाक व्यापक सामाजिक चित्र दैत अछि। पञ्जी–केन्द्रित मिथिला अध्ययन यदि केवल ब्राह्मण परिवारक भीतर सिमटि जाए, तखन एहि साझा क्षेत्रीय इतिहासक बड़ा भाग छूटि जाएत। २०. पञ्जीक भाषा: सूत्र, व्याकरण आ नाम–विज्ञान पञ्जी पूर्ण गद्य नहि। ओकर मुख्य शक्ति संक्षिप्त सूत्रात्मक व्याकरण अछि। ‘फलाँ सुत’, ‘सुतौ’, ‘सुता’, ‘फलाँ गाँवसँ फलाँ दौ’, ‘द्दौ’, ‘अपरा’, ‘मूल’, ‘प्र.’, ‘नी’ आदि संकेत बहुत कम शब्दमे सम्बन्धक प्रकार बतबैत अछि। एहि कारण पञ्जी पढ़ब सीखब आधुनिक संक्षेप–कोड पढ़बाक जकाँ अछि। सुत, सुतौ, सुता ‘सुत’ एक पुत्र, ‘सुतौ’ दू पुत्र अथवा द्विवचन, ‘सुता’ पुत्री/सन्तानक विशेष सन्दर्भ—प्रयोग पाण्डुलिपि अनुसार बदलि सकैत अछि। मूल लिपि पढ़ैत काल व्याकरणिक संख्या आ लिपिक संक्षेपक भेद जाँचना चाही। स्वचालित पाठ–निर्माणमे सभ रूपकेँ एक ‘पुत्र’ बना देब सम्बन्ध–डेटा बिगाड़ि सकैत अछि। दौ/द्दौ: मातृसम्बन्धक कोड ‘दौ’ सामान्यतः दौहित्र/मातृसम्बन्धी लिंकक संक्षिप्त संकेत रूपमे व्याख्यायित अछि; ‘द्दौ’ दोहरा मातृ–सन्दर्भ वा दोसर स्तरक क्रॉस–लिंक देखबैत अछि। किछु रिपोर्ट अनुवादमे ‘मातुल–भानजा’ अथवा ‘दौहित्र’ अर्थ अलग–अलग दैत अछि। डिजिटल शब्दकोश बनबैत काल एकल अंग्रेजी समतुल्य थोपबाक बदला सन्दर्भ–आधारित सम्बन्ध–प्रकार राखब चाही। ‘प्र.’ आ द्विनाम ‘प्र.’ प्रचलित नाम, परिचित उपनाम, कतेको ठाम ‘प्रथम’क संक्षेप जकाँ पढ़ल गेल अछि। जँ एकहि संक्षेपक अनेक अर्थ सम्भव हो, संपादकीय संस्करणमे मूल संकेत अक्षुण्ण राखि टिप्पणी दियौ। समौली आ नगरामक लोकनाम देखबैत अछि जे घर–नाम व्यक्ति–पहचानक वास्तविक उपकरण छल। संस्कृत, मैथिली, फारसी आ अंग्रेजी प्रभाव पुरान सूत्र संस्कृतनिष्ठ—राजा, उपाध्याय, महामहोपाध्याय, ज्योतिषी, वैयाकरण, शान्तिविग्रहिक। मध्यकालीन/मुगल स्तरमे राय, मनसबदार, हजारी, चौधरी सन फारसी–प्रशासनिक शब्द प्रवेश करैत अछि। औपनिवेशिक कालमे वकील, प्लीडर, जूरी, विश्वविद्यालय, डिग्री; आधुनिक कालमे अभियन्ता, प्राध्यापक, चिकित्सक, वैज्ञानिक, प्रशासक। नामक भीतर भाषिक ऋण–शब्द सामाजिक संस्था बदलबाक जीवित साक्ष्य अछि। स्थाननामक इतिहास गाँवक पुरान वर्तनी आधुनिक राजस्व–नामसँ भिन्न रहि सकैत अछि। एक ठाम ‘मंगरौनी’, दोसर ‘मंगौरी’; ‘सोदरपुर’, ‘सोडरपुरा’; ‘खौआल’, ‘खौआर’; ‘दरिहर’, ‘दरिहरा’। ध्वनि–परिवर्तन, स्थानीय उच्चारण, लिपिकारक शैली आ देवनागरी लिप्यन्तरण सब मिलि रूप बदलैत अछि। पञ्जी भाषावैज्ञानिक लेल स्थाननामक दीर्घकालीन भण्डार अछि। नामक सात प्रकार नगरामी रिपोर्ट नामसभकेँ मोट तौर पर सात प्रवृत्तिमे पढ़ैत अछि: देवता–आधारित नाम; संस्कृत साहित्यिक/दार्शनिक नाम; वैष्णव/शैव भक्ति–नाम; फारसी–प्रभावित प्रशासनिक नाम; लोक/घर–नाम; औपनिवेशिक–आधुनिक संयुक्त नाम; पेशागत/उपाधि–सहित नाम। ई वर्ग कठोर नहि, पर हजारो नामक दीर्घकालिक परिवर्तन अध्ययन लेल उपयोगी प्रारूप अछि। २१. पञ्जी सामाजिक स्मृति, सत्ता आ ज्ञानक संस्था वंशावली केवल ‘केकर पिता के’ नहि। ओ समाज निर्णय करैत अछि जे केकर स्मृति सार्वजनिक रूपेँ सुरक्षित हो, केकर नाम प्रतिष्ठित उपाधि संग लिखल जाए, केकर सम्बन्ध ‘दूषण’ कहि दर्ज हो, आ केकर शाखा अपूर्ण रहि जाए। एहि अर्थमे पञ्जी स्मृति आ सत्ता दुनू अछि। ‘स्मृतिक पेशेवर’ पञ्जीकार पञ्जीकारक विशेषज्ञता लिखित पोथी, मौखिक परम्परा आ सामाजिक प्रमाणक संगम छल। परिवार अपन सात–दस पीढ़ी याद रखि सकैत छल, मुदा सैकड़ों गाँवक पारस्परिक विवाह–सूत्र, प्रवर, मूल, दूषण आ शाखा–सन्दर्भ पेशेवर स्मृति बिना कठिन छल। पञ्जीकार समाजक ‘स्मृति–विशेषज्ञ’ बनैत अछि। लिखित स्मृति मौखिक परम्पराकेँ समाप्त नहि करैत अछि पञ्जीक संक्षिप्त सूत्र स्वयं बतबैत अछि जे पाठ अकेला पर्याप्त नहि। संक्षेप, ग्राम–उपनाम, शाखा–सूत्र, पृष्ठ–सन्दर्भक अर्थ पञ्जीकार मौखिक रूपेँ खोलैत छल। तैँ लिखित/मौखिककेँ विरोधी नहि, सहजीवी मानबाक चाही। डिजिटल रूपान्तरणक सभसँ पैघ जोखिम ई मौखिक व्याख्या खो देब अछि। सामाजिक श्रेणीकरणक यन्त्र श्रोत्रिय, योग्य, पञ्जीबद्ध, वंशधर, जयवार; उच्च/मध्यम मूल; शाखा–पञ्जी; विवाह–प्रमाण—ई सभ सामाजिक प्रतिष्ठाक औपचारिक रूप दे सकैत अछि। जँ वंश–जाँच विवाह–अधिकार तय करैत अछि, तखन अभिलेख सामाजिक जीवनक प्रवेश–द्वार बनि जाइत अछि। एहि संरचनाकेँ लुई द्यूमोँक जाति–श्रेणी, मैक्स वेबरक प्रतिष्ठा–समूह, पियेर बुरदियोक सांस्कृतिक/सामाजिक पूँजी, मिशेल फूकोक ज्ञान–सत्ता जकाँ आधुनिक सिद्धान्तसँ पढ़ल जा सकैत अछि; मुदा सिद्धान्त स्रोतपर थोपल नहि जाए। दूषण–पञ्जी ‘प्रतिस्मृति’ रूपमे मुख्य पञ्जी प्रतिष्ठित वंशक स्वीकृत क्रम लिखैत अछि; दूषण–पञ्जी नियमभङ्ग, निषिद्ध सम्बन्ध, हाशियाक जाति/समुदाय, विधवा, देवदासी, अज्ञात मातृकुल आ सामाजिक विवाद दर्ज करैत अछि। एहि अर्थमे दूषण–पञ्जी मुख्य स्मृतिक छाया–अभिलेख अछि। जे बात गौरवक वंशावली छोड़ि देत, ‘दूषण’क रजिस्टर ओकरा बचा सकैत अछि। ज्ञानक क्षय: ‘तेगच्छिया समस्या’ किछु शाखाक सम्बन्धमे पञ्जी स्वयं सूचना–क्षय स्वीकार करैत अछि। एहि आत्मसीमाक कारण अभिलेखक विश्वसनीयता जटिल बनैत अछि—ओ सर्वज्ञता दावा नहि करैत, किन्तु जतेक ज्ञात अछि ओतेक सूत्र राखैत अछि। आधुनिक डेटाबेस सेहो ‘अज्ञात’ मानकेँ वैध डेटा मानय; रिक्त स्थान भरबाक लेल अनुमानित नाम जोड़ब अभिलेखीय अपराध होयत। २२. तुलनात्मक वंशावली: विश्वक अन्य परम्परासँ संवाद स्रोत–रिपोर्टसभ चीनी ‘जुपु’ कुल–वृत्तान्त, यहूदी यिखुस, यूरोपीय कुलचिह्न/राजवंशावली, माओरी वाकापापा, राजपूत वंशावली, आधुनिक धार्मिक वंश–संग्रह आदि संग पञ्जीक तुलना करैत अछि। तुलना उपयोगी तखन अछि जखन समानता आ भिन्नता दुनू देखल जाए। चीनी कुल–वृत्तान्त बहुधा पितृवंशीय कुल द्वारा निश्चित अन्तरालपर पुनर्संकलित होइत; पञ्जी पेशेवर पञ्जीकार आ विवाह–जाँच संस्था संग अधिक निकट जुड़ल। यहूदी यिखुस धार्मिक स्थिति आ विवाह–पात्रता संग सम्बन्धित, मुदा पञ्जी जकाँ ग्राम–मूल–दौक व्यापक स्थानीय क्रॉस–रेफरेंस जरूरी नहि। यूरोपीय कुलचिह्न/नवाबी वंशावली मुख्यतः कुलीन वर्ग केन्द्रित; मिथिलाक पञ्जी एक विशिष्ट धार्मिक–पेशागत समुदायक बहुत व्यापक परिवार–जाल समेटैत अछि। राजपूत चारण/भाट परम्परा दक्षिण एशियाक निकटतम तुलनात्मक उदाहरणसभमे अछि, किन्तु लिखित क्रॉस–सन्दर्भक संरचना अलग अछि। पञ्जीक विशिष्टता पञ्जीक विशिष्टता ‘सबसे पुरान’ वा ‘सबसे वैज्ञानिक’ कहि अतिशयोक्ति करबामे नहि। ओकर ठोस विशेषता अछि: दीर्घकालिक बहु–पीढ़ी अभिलेख; पेशेवर वंशावलीकार; विवाह–पूर्व जाँचक प्रत्यक्ष सामाजिक कार्य; गोत्र–प्रवर–मूल–मातृग्रामक बहुस्तरीय पहचान; दूषणक पृथक रजिस्टर; ग्राम–आधारित क्रॉस–रेफरेंस; आ आधुनिक काल धरि अद्यतन होयबाक प्रमाण। एहि संयोजनक तुलनात्मक अध्ययन वास्तवमे महत्त्वपूर्ण अछि। नव्य–न्यायसँ पद्धतिगत समानता किछु स्रोत पञ्जीक सूत्रात्मकता आ नव्य–न्यायक विश्लेषणात्मक भाषामे सांस्कृतिक समानता देखैत अछि। सीधा ऐतिहासिक कारण–संबंध सिद्ध नहि, मुदा मिथिलाक बौद्धिक वातावरणमे सूक्ष्म वर्गीकरण, सम्बन्धक तकनीकी शब्द, अपवाद, प्रमाण आ निर्णयक प्रवृत्ति दुनू परम्परामे दिखाई देैत अछि। पञ्जीकारक निर्णय प्रत्यक्ष अभिलेख, पूर्व–प्रमाण आ सम्बन्ध–मिलान पर आधारित होयबाक आदर्श ‘प्रमाण’ सम्बन्धी दार्शनिक संवेदनासँ संवाद योग्य अछि। २३. पञ्जी आ आधुनिक संकट: जीवित संस्था सँ संकटग्रस्त अभिलेख धरि एक्कैसम शताब्दीमे पञ्जीसमक्ष दू विपरीत स्थिति अछि। एक दिस डिजिटल छवि, खोज, देवनागरी लिप्यन्तरण आ सार्वजनिक पहुँच पहिने सँ अधिक सम्भव अछि; दोसर दिस परम्परागत पञ्जीकारक पेशा, मिथिलाक्षर पढ़बाक कौशल, पोथीक भौतिक अवस्था आ विवाहमे पञ्जी–जाँचक व्यवहारिक प्रयोग कमजोर भऽ रहल अछि। तकनीकी संरक्षण होइत समाजिक उपयोग बदलि रहल अछि। विवाहमे पञ्जी–जाँचक घटैत प्रयोग एकटा आधुनिक रिपोर्ट अनुमान दैत अछि जे लगभग पाँचम हिस्सा विवाह पञ्जी–जाँच बिना होइत अछि। एहि प्रतिशतक स्वतंत्र क्षेत्रीय सर्वेक्षण उपलब्ध नहि, अतः एकरा ‘स्रोतक अनुमान’ रूपमे मात्र लेल जाए। तथापि व्यापक प्रवृत्ति विश्वसनीय अछि: शिक्षा, शहरीकरण, अन्तर्जातीय/अन्तरधार्मिक विवाह, प्रेम–विवाह, प्रवास आ वैवाहिक वेबसाइटक कारण पञ्जीकारक अनिवार्य भूमिका घटल अछि। पञ्जीकारक आर्थिक अस्थिरता जँ परिवार वर्षमे कतेको बेर मात्र पञ्जीकारक सेवा लैत अछि, तखन विशेषज्ञताकेँ पूर्णकालिक पेशा रूपमे टिकेनाइ कठिन होइत अछि। युवा पीढ़ी अन्य रोजगार चुनैत अछि। एहि स्थिति मे पोथी पढ़बाक कौशल ‘व्यक्तिगत पूँजी’ रूपमे वृद्ध पञ्जीकारक संग समाप्त भऽ सकैत अछि। संरक्षणक अर्थ केवल स्कैन नहि; विशेषज्ञक वाचन, उच्चारण, संक्षेपक अर्थ, ग्राम–पहचान आ विवादित शाखाक मौखिक इतिहास रिकॉर्ड करब सेहो अछि। भौतिक क्षय आर्द्रता, दीमक, कीड़ा, अम्लीय कागज, अनुचित धूप, जल, तेल, धूल आ बारम्बार हाथ लगबाक कारण पोथी नष्ट होइत अछि। पुरान स्थानीय संरक्षण–विधि सम्मान योग्य अछि, मुदा वर्तमान संग्रह लेल अभिलेखीय तापमान–आर्द्रता, अम्लमुक्त आवरण, कीट–नियन्त्रण, उच्च–रिजोल्यूशन छवि आ आपदा–बैकअप जरूरी अछि। मूल पोथी डिजिटाइज होयबाक बादो सुरक्षित रहबाक चाही; डिजिटल प्रति मूलक विकल्प नहि, उपयोगक प्रतिरूप अछि। गोपनीयता आ नैतिकता आधुनिक पञ्जीमे जीवित व्यक्ति, विवाह, अन्तरजातीय सम्बन्ध, तथाकथित ‘दूषण’, पेशा, सम्भवतः व्यक्तिगत विवादक सूचना अछि। सभ डेटा खुला इंटरनेटपर बिना सीमा राखब नैतिक समस्या पैदा कऽ सकैत अछि। ऐतिहासिक सार्वजनिक दस्तावेज आ जीवित व्यक्तिक संवेदनशील पारिवारिक विवरणक अलग नीति चाही। दूषण–पञ्जीक जातिसूचक अपमानजनक पद मूल स्रोतक आलोचनात्मक अध्ययन लेल राखल जा सकैत अछि, मुदा आधुनिक व्यक्ति पर कलंकक रूपमे पुनर्प्रयोग अनुचित अछि। २४. डिजिटल पुनर्निर्माण: पञ्जीकेँ खोजयोग्य बनायब, अर्थ नहि गुमायब पञ्जीक डिजिटलीकरण लेल केवल पृष्ठक तस्वीर पर्याप्त नहि। एकटा समुचित डिजिटल संस्करणकेँ पाँच स्तर चाही: मूल छवि; लिप्यन्तरण; सामान्यीकृत पाठ; सम्बन्धित डेटा; सम्पादकीय टिप्पणी। सभ स्तर आपस मे लिंक रहय, मुदा मूल पाठ कखनो ओवरराइट नहि हो। २४.१ मूल छवि प्रत्येक पृष्ठ उच्च–रिजोल्यूशन रंगीन छविमे, स्केल/रंग–सन्दर्भ सहित, मूल खण्ड–पृष्ठ क्रममे संग्रहित हो। फाइल नाम स्थायी पहचान–संख्या पर आधारित हो। एकहि पृष्ठक नवा स्कैन आयल तँ पुरान प्रति मेटायल नहि, संस्करण इतिहास राखल जाए। २४.२ लिप्यन्तरण मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यन्तरण अक्षर–निष्ठ हो। संदिग्ध अक्षर चिन्हित, मिटाओल भाग, हाशिया, संक्षेप, दुरुस्ति, पुनर्लेखन अलग संकेतसँ दर्ज हो। अनुमानित पाठकेँ निश्चित पाठ जकाँ नहि देखाओल जाए। २४.३ सामान्यीकरण ग्राम–नाम, व्यक्तिनाम, उपाधि आ तिथि खोजयोग्य बनेबाक लेल मानक रूप जोड़ल जा सकैत अछि, मुदा मूल वर्तनी साथ राखल जाए। उदाहरणतः ‘मंगरौनी/मंगौरी’क मानक आधुनिक पहचान एकटा क्षेत्र हो, मूल पाठ दोसर। एही प्रकार ‘खौआल/खौआर’, ‘सोदरपुर/सोडरपुरा’ आदि। २४.४ सम्बन्ध–डेटा प्रत्येक व्यक्तिक स्थायी पहचान–संख्या; पिता, माता जँ ज्ञात, पुत्र/पुत्री, पति/पत्नी, मातृकुल, गोत्र, प्रवर, मूल, मूलग्राम, निवासग्राम, पेशा, उपाधि, स्रोत पृष्ठ, शाखा–कोड, विवाह–तिथि—सभ अलग क्षेत्र हो। ‘दौ/द्दौ’क सम्बन्ध प्रकार मूल भाषासँ जुड़ल रहय। जँ अर्थ विवादित हो तँ ‘अनिश्चित’ मान्य विकल्प हो। २४.५ प्रमाणक स्तर प्रत्येक निष्कर्षकेँ प्रमाण–श्रेणी देल जा सकैत अछि: मूल पाण्डुलिपिमे प्रत्यक्ष; बादक प्रतिलिपिमे; मुद्रित सम्पादन; पञ्जीकारक मौखिक व्याख्या; आधुनिक रिपोर्टक अनुमान; बाहरी ऐतिहासिक स्रोतसँ पुष्ट। एहि बिना डिजिटल डेटाबेस ‘सब तथ्य समान’क भ्रम पैदा करत। सम्बन्ध–नक्शा आ स्थान–नक्शा डिजिटल पञ्जी वंश–वृक्ष मात्र नहि, नेटवर्क हो। एक व्यक्ति अनेक विवाह, अनेक मातृसम्बन्ध, उपनाम, प्रवास आ शाखा–सन्दर्भसँ जुड़ल रहि सकैत अछि। तैँ वृक्षक संग नेटवर्क–दृश्य आवश्यक अछि। गाँवक ऐतिहासिक नाम आधुनिक निर्देशांकसँ जोडल जाए तँ विवाह–प्रवासक समयानुसार मानचित्र बनि सकैत अछि। मुदा भूगोलिक पहचान अनुमानित हो तँ ओकर अनिश्चितता स्पष्ट हो। मशीन–पठनक सीमा मिथिलाक्षर पाण्डुलिपिपर स्वचालित अक्षर–पहचान अभी त्रुटिपूर्ण हो सकैत अछि। विशेषतः संक्षेप, पुरान हस्तलेख, दाग, टूटा अक्षर, संयुक्ताक्षर आ ग्रामनाम गलत पढ़ायल जा सकैत अछि। मशीन सहायिका हो, अंतिम संपादक नहि। प्रत्येक महत्वपूर्ण सम्बन्ध मानव सत्यापनक बाद प्रकाशित हो। डिजिटल सिद्धान्त मूल छवि सत्यापनक आधार; लिप्यन्तरण पाठक सेतु; सामान्यीकरण खोजक साधन; सम्बन्ध–डेटा विश्लेषणक संरचना; टिप्पणी अनिश्चितताक ईमानदार अभिलेख। २५. पञ्जी इतिहासक आलोचनात्मक सीमा पञ्जी अत्यन्त मूल्यवान अछि, मुदा मूल्यवान होयबाक अर्थ त्रुटिहीन नहि। स्रोतसभक उत्साही दावा आ अभिलेखीय प्रमाणक स्तर अलग करब जरूरी अछि। ४५० ई. सँ २००९ ई.: ‘लगातार’ शब्द पर सावधानी परियोजनाक शीर्षक ४५० ई. सँ २००९ ई. धरि वंश–स्मृति कहैत अछि। किछु रिपोर्ट आर्यभट, प्राचीन विद्वान वा प्रारम्भिक राजवंशक सहारे पाँचम–नवम शताब्दी धरि वंश–जड़ जोड़बाक प्रयास करैत अछि। मुदा उपलब्ध प्रतिलिपि, लिखित खण्ड, आ आधुनिक सम्पादन बहुत बादक हो सकैत अछि। ‘४५०–२००९’केँ परियोजनाक दावाक काल–परिधि मानल जाए; हर वर्ष अथवा हर पीढ़ीक समकालीन निरन्तर दस्तावेजी प्रमाण मानब अभी उचित नहि। १३२६ ई. आ हरिसिंहदेवक तिथि शक १२४८ = १३२६ ई. संस्थानीकरणक तिथि अनेक स्रोतमे अछि। दोसर ऐतिहासिक कालक्रम हरिसिंहदेवक शासन समाप्ति लगभग १३२४ ई. मानैत अछि। सम्भावना अछि जे शक–पाठ, ईस्वी रूपान्तरण, राजकीय आदेशक तिथि, बादक परम्परा अथवा व्यक्ति–पहचानमे भेद अछि। समेकित आलेख एहि असंगतिकेँ ज्योंक–त्यों चिन्हित करैत अछि; बिना मूल दिनांकित दस्तावेजकेँ एकटा संस्करण ‘सही’ घोषित नहि करैत अछि। गोत्रक संख्या सम्पूर्ण परम्परागत सूची २० गोत्र देैत अछि; प्राचीन पञ्जीक विशिष्ट खण्डमे १७ गोत्र सक्रिय रूपेँ भेटबाक गणना अछि। ई सम्भवतः नमूना–प्रतिनिधित्वक अन्तर। किछु स्रोत विभिन्न गोत्रक मूल–संख्या सेहो अलग गनैत अछि—उदाहरणतः भारद्वाज, गर्ग, पराशरक संख्या। डिजिटल मूल–पाठक पूर्ण सूचकांक बनलाक बाद संख्या निश्चित करब उचित रहत। १६७ मूल, ३४/३५ प्रमुख १६७ कुल मूल आ ३४ प्रमुख, फनन्दहक खानाम शाखा जोड़ि ३५, स्रोतसभमे बारम्बार अछि। मुदा ‘प्रमुख’क ऐतिहासिक मानदण्ड, काल, क्षेत्र आ श्रेणीगत राजनीति पर आलोचनात्मक अध्ययन चाही। सामाजिक प्रतिष्ठाकेँ प्राकृतिक अथवा जैविक श्रेष्ठता जकाँ प्रस्तुत नहि कएल जाए। ५/७ बनाम ५/६ धर्मशास्त्रीय सपिण्ड नियम आ पञ्जीकारक व्यवहारिक संशोधनक भेद ऊपर स्पष्ट अछि। एक रिपोर्ट श्रोत्रिय/पञ्जीबद्ध अनुसार अलग सीमा, दोसर सभ लेल समान धर्मशास्त्रीय सीमा दैत अछि। डिजिटल नियम–इंजन बनबैत काल ‘एक शाश्वत नियम’ कोड करब ऐतिहासिक विविधता मिटा देत। नियमक संस्करण, काल आ सामाजिक समूह अलग मेटाडेटा चाही। जीनोम/गुणसूत्रीय दावा किछु रिपोर्ट आधुनिक आनुवंशिकी जकाँ ‘साझा डी.एन.ए. प्रतिशत’, वाई–गुणसूत्रीय बहिर्विवाह अथवा पाँचम/सातम पीढ़ी पर हानिकारक एलील ‘समाप्त’ होयबाक ठोस संख्या देैत अछि। एहन दाबी आधुनिक जनसंख्या–आनुवंशिकी बिना वैज्ञानिक परीक्षणक मान्य नहि। पञ्जीक विवाह–दूरी नियम निकट सम्बन्ध टारबाक सामाजिक प्रणाली जरूर अछि; ओकरा विशिष्ट आणविक आनुवंशिक सीमा संग एक–एक मिलान करब अतिरंजना होयत। प्रसिद्ध नामक समानता ‘विद्यापति’, ‘गङ्गेश’, ‘गंगानाथ’, ‘ज्योतिरीश्वर’, ‘आर्यभट’ सन नाम इतिहासक प्रसिद्ध व्यक्तिसँ मिलैत अछि। वंशावलीमे नाम–पुनरावृत्ति सामान्य अछि। पहचान लेल पिता, मूल, ग्राम, पीढ़ी, काल, उपाधि आ बाहरी प्रमाणक संगति जरूरी। केवल नाम–समानताकेँ ‘प्रमाण’ नहि मानल जाए। सामाजिक श्रेणीक स्रोत–पक्षपात पञ्जी मुख्यतः विशिष्ट जाति/कुल समूहक संस्था रहल; तैँ सम्पूर्ण मिथिलाक जनसांख्यिकी एकरासँ नहि लिखल जा सकैत अछि। दूषण–पञ्जी हाशियाक समूहक नाम बचबैत अछि, मुदा मुख्य वंशक दृष्टि प्रायः उच्चवर्णीय पुरुषक अछि। मिथिलाक पूर्ण सामाजिक इतिहास लेल कृषक, दलित, आदिवासी, मुस्लिम, महिला, कारीगर, व्यापारी, अन्य जाति–समुदाय, राजकीय रेकर्ड, लोकसाहित्य, शिलालेख, जमीन–अभिलेख आ मौखिक इतिहास सभ जोड़बाक पड़त। २६. पञ्जी एकटा साहित्यिक रूप: सूक्ष्म वाक्य, विराट संसार पञ्जीकेँ साहित्य कहब पहिने विचित्र बुझाइत अछि। कथानक नहि, चरित्र–वर्णन नहि, दृश्य–चित्रण नहि। मुदा हजारो संक्षिप्त वाक्य एक संग पढ़ल जाए तँ समय, विवाह, प्रवास, राजसत्ता, ज्ञान, प्रतिष्ठा, पतन, पुनर्समावेशन, उपनाम, पेशा आ स्मृतिक विराट सामूहिक कथा बनैत अछि। सूत्रक काव्यात्मकता ‘फलाँ सुत’, ‘फलाँसँ दौ’, ‘अपरा’, ‘प्र.’, ‘ग्रामारम्भ’—भाषा अत्यल्प अछि। ई ‘अल्पाक्षर, बहुअर्थ’ शैली पाठककेँ रिक्त स्थान भरबाक लेल बाध्य करैत अछि। एकटा स्त्रीक नाम नहि, केवल ओकर गाँव; एक राजाक उपाधि अत्यन्त दीर्घ; एक विद्वानक नामक बाद ‘अयाची’; एक शाखाक बाद ‘लुप्त’। एहि असमान विवरणमे समाजक मूल्य–क्रम प्रकट होइत अछि। उपनामक कथा ‘सर्वज्ञ गरीब’, ‘आँखी’, ‘नहरा’, ‘वागीश’, ‘अयाची’—नाम स्वयं सूक्ष्म कथा अछि। औपचारिक वंशावली लोकनामकेँ स्थान देत अछि, तखन अभिलेखक कठोरता मानवीय होइत अछि। घरक नाम, विद्वत् उपाधि, राजकीय सम्मान, पेशा—सभ व्यक्तिक सामाजिक ‘चरित्र’क एक पंक्ति बनैत अछि। समयक सम्पादन पञ्जीमे १८५६क नकलनवीस तिथि, २००३क विवाह, २००८क संपादन आ प्राचीन राजवंश एक साथ रहैत अछि। साहित्यिक दृष्टिसँ ई बहुकालिक पाठ अछि—पुरान पृष्ठ पर नवा जीवन लिखल जाइत रहल। एहि बहुकालिकता केँ आधुनिक सम्पादनमे मिटा कऽ ‘साफ कालक्रम’ बनायब स्रोतक प्रकृति बिगाड़त। ‘शब्दशास्त्रम्’ आ पञ्जीसँ कथा गङ्गेश सम्बन्धी वंशावली–विवाद पर आधारित मैथिली कथा ‘शब्दशास्त्रम्’ देखबैत अछि जे अभिलेख आधुनिक कल्पनाशील साहित्यकेँ प्रेरित कऽ सकैत अछि। अभिलेखीय तथ्य आ कथा अलग विधा अछि; साहित्य ऐतिहासिक रिक्ति पर कल्पना करि सकैत अछि, मुदा शोध–आलेखकेँ कल्पना आ प्रमाणक सीमा स्पष्ट राखबाक चाही। २७. समेकित निष्कर्ष: पञ्जी एकटा जीवित सामाजिक डेटा–संस्कृति मिथिलाक पञ्जी–प्रबन्धक महत्त्व केवल ओकर प्राचीनता नहि। ओकर वास्तविक महत्त्व संरचनामे अछि। गोत्र, प्रवर, मूल, मूलग्राम, बीजी पुरुष, उटेढ़, मातृग्राम, दौ/द्दौ, शाखा, दूषण, विवाह–कोलोफोन, पेशागत उपाधि, ग्राम–कोड—सभ मिलि एकटा बहुस्तरीय सामाजिक स्मृति बनबैत अछि। ई स्मृति विवाह नियमन करैत छल, सामाजिक श्रेणी बनबैत छल, राज्य आ विद्वान परिवारक सम्बन्ध बचबैत छल, प्रवास चिन्हित करैत छल, नाम आ भाषाक परिवर्तन दर्ज करैत छल, कतेको हाशियाक सम्बन्धकेँ ‘दूषण’क रूपमे सही, नष्ट होयसँ बचबैत छल, आ आधुनिक विश्वविद्यालय/नौकरशाही धरि परिवारक रूपान्तरण देखबैत छल। पञ्जीक आलोचना सेहो ओतबे जरूरी अछि। जातिगत श्रेणी, स्त्रीक नामगत अनुपस्थिति, ‘दूषण’क कलंककारी भाषा, धन/प्रतिष्ठाक सम्भावित हस्तक्षेप, प्रसिद्ध व्यक्तिसँ नाम–समानताक अतिशयोक्ति, जीनोम–रूपकक वैज्ञानिक सीमा, तिथि–विरोध, अपूर्ण शाखा—ई सभ ओकर अध्ययनक हिस्सा अछि, बाधा नहि। आलोचनात्मक पढ़ाइ पञ्जीकेँ कमजोर नहि करैत; ओकरा ऐतिहासिक स्रोत रूपमे बेसी विश्वसनीय बनबैत अछि। डिजिटल युगमे सभसँ उपयोगी भविष्य एहन अछि जतए मूल मिथिलाक्षर छवि, देवनागरी लिप्यन्तरण, ग्राम/नाम सामान्यीकरण, सम्बन्धित डेटाबेस, पञ्जीकारक मौखिक ज्ञान, गोपनीयता–नीति आ आलोचनात्मक टिप्पणी एक संग उपलब्ध हो। एहन परियोजना वंश खोजबामे सहायक होएत, मुदा ओहूसँ आगे—मिथिलाक सामाजिक इतिहास, भाषाविज्ञान, नामविज्ञान, प्रवासन, राजनीतिक इतिहास, ज्ञान–परम्परा, स्त्री–अध्ययन आ डिजिटल मानविकी लेल दीर्घकालीन आधार बनि सकैत अछि। अन्तिम सूत्र पञ्जीकेँ न अचूक विज्ञान मानल जाए, न केवल जातिगत अवशेष। ओ एकटा ऐतिहासिक सामाजिक प्रौद्योगिकी अछि—जकर भीतर स्मृति, नियम, सत्ता, परिवार, भूगोल आ ज्ञान शताब्दीसँ एक–दोसरक संग लिखाइत रहल। बिबलियोग्राफी प्राथमिक ग्रन्थ आ अभिलेख दूषण–पञ्जी। मिथिलाक्षर मूल पाण्डुलिपि–संग्रह; ताड़पत्र, छाल/कागजक प्रतिलिपि तथा डिजिटाइज्ड छवि–संग्रह। सार्वजनिक डिजिटल विमोचन २००९। देवानन्द पञ्जी। मैथिल ब्राह्मण वंशावली रजिस्टर; विशिष्ट प्रविष्टि ३०/५, ३९/२, ३३९/३ आदि स्रोत–रिपोर्टमे उद्धृत। गजेन्द्र ठाकुर (सम्पा.)। पञ्जी–प्रबन्ध, खण्ड १–२ तथा सम्बन्धित प्राचीन पञ्जी/नगराम खण्ड। विदेह प्रकाशन/श्रुति प्रकाशन परम्पराक डिजिटल–मुद्रित संस्करण। गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा, विद्यानन्द झा। जीनोम मानचित्रण (४५० ई.–२००९ ई.): मिथिलाक पञ्जी–प्रबन्ध। खण्डानुसार सम्पादित प्रकाशन, २०१२क संस्करणक उल्लेख स्रोत–संग्रहमे अछि। मूलग्राम पञ्जी, खण्ड १–७; प्राचीन पञ्जी; मोहनानन्द झा शाखा–पञ्जी। पञ्जी–परम्पराक मूल/शाखा अभिलेख। कुमारिल भट्ट। तन्त्रवार्त्तिक। समूह–लेख्य सम्बन्धी प्राचीन सन्दर्भक स्रोत। मनुस्मृति। सपिण्ड, विवाह आ वंशसम्बन्धी धर्मशास्त्रीय सूत्र। याज्ञवल्क्यस्मृति। सपिण्ड/विवाह सम्बन्धी धर्मशास्त्रीय आधार। वाल्मीकि रामायण। विवाहक समय कुल–वंश उद्घोष सम्बन्धी स्रोत–उद्धरण। ऋग्वेद–संहिता। सन्तति, वंश आ अमृतत्व सम्बन्धी स्रोत–उद्धरण। बृहद्ब्रह्मपुराण। सन्तान–द्वारा वंश–निरन्तरता सम्बन्धी उद्धरण। ज्योतिरीश्वर ठाकुर। वर्णरत्नाकर। कर्णाटकालीन मिथिला आ सांस्कृतिक इतिहासक प्रमुख ग्रन्थ। इतिहास, दर्शन, वंशावली आ समाज–अध्ययन दिनेशचन्द्र भट्टाचार्य। मिथिलामे नव्य–न्यायक इतिहास। १९५८। गङ्गेश उपाध्याय तथा नव्य–न्याय परम्परासम्बन्धी अध्ययन। अंशुमान पाण्डेय। मध्यकालीन मिथिलामे ब्राह्मण पहचानक पुनर्गठन: उत्तर बिहारक मैथिल ब्राह्मणक जातीय पहचानक उद्गम। मिशिगन विश्वविद्यालयक शोधप्रबन्ध, २०१४। स्टीफन फिलिप्स। तत्त्वचिन्तामणिक ज्ञानमीमांसात्मक सत्यपर विमर्शक रत्न: पूर्ण टीकायुक्त अनुवाद। ब्लूम्सबरी अकादमिक, २०२०। वी. पी. भट्ट। तत्त्वचिन्तामणि: शब्द, प्रत्यक्ष, अनुमान, ईश्वरानुमान आ उपमान खण्डक अंग्रेजी अनुवाद। चारि खण्ड, ईस्टर्न बुक लिंकर्स, दिल्ली, २००५–२०२५। जी. पी. मर्डॉक। सामाजिक संरचना। १९४९। तुलनात्मक नातेदारी–अध्ययन। डब्ल्यू. एच. आर. रिवर्स। नातेदारी आ सामाजिक संगठन। १९१४। लुई आंरी। पुरान जेनेवा परिवार। १९५६। ऐतिहासिक जनसांख्यिकी आ परिवार–पुनर्निर्माणक अध्ययन। ई. ए. रिग्ली (सम्पा.)। अंग्रेजी ऐतिहासिक जनसांख्यिकीक परिचय। १९६६। फ्रांस्वाज जोनाबेन्द। परिवार आ नातेदारी पर नृवैज्ञानिक दृष्टि। १९८६। लुई द्यूमोँ। होमो हाइरार्किकस: जाति–व्यवस्था आ ओकर निहितार्थ। शिकागो विश्वविद्यालय प्रेस, १९७०। अर्विंग गॉफमैन। कलंक: क्षतिग्रस्त सामाजिक पहचानक प्रबन्धन पर टिप्पणी। १९६३। मौरिस हाल्बवाक्स। सामूहिक स्मृति पर। शिकागो विश्वविद्यालय प्रेस, १९९२। पॉल कॉनर्टन। समाज कोना स्मरण करैत अछि। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय प्रेस, १९८९। मार्सेल मॉस। दान पर निबन्ध। १९२५। रॉबर्ट के. मर्टन। विज्ञानक समाजशास्त्र। शिकागो विश्वविद्यालय प्रेस, १९७३। पियेर नोरा (सम्पा.)। स्मृतिक स्थान। तीन खण्ड, गालिमार, १९८४–१९९२। क्लोद लेवी–स्ट्रॉस। नातेदारीक प्राथमिक संरचना। विवाह–सन्धि आ नातेदारीक तुलनात्मक सिद्धान्त। गजेन्द्र ठाकुर। ‘शब्दशास्त्रम्’। मैथिली कथा; अंग्रेजी अनुवाद ‘शब्दक विज्ञान’ साहित्यिक पत्रिकामे २०१४ मे प्रकाशित। स्रोत–अॉडिट आ समेकन प्रतिवेदन ऑडिटक पद्धति ज़िप भीतरक सभ २० वर्ड फाइल अलग निकालि अनुच्छेद आ तालिका–कोष्ठक सहित पाठ–परीक्षण कएल गेल। प्रारम्भिक स्रोत–संग्रह लगभग १,२५,८१४ शब्दक छल (शब्द–विभाजन पद्धति अनुसार थोड़ा अन्तर सम्भव)। बारम्बार एकहि सिद्धान्त, गोत्र–सूची, विवाह–नियम, पञ्जी–प्रकार, इतिहासक कथा आ डिजिटल परियोजना अलग रिपोर्टमे पुनरावृत्त छल। समेकनमे समानार्थी पुनरावृत्ति एक बेर राखल गेल, मुदा हर फाइलक विशिष्ट तथ्य, उदाहरण, विवाद, स्थान, व्यक्ति, खण्ड/ब्लॉक आ आलोचनात्मक बिन्दु विषयानुसार समाहित कएल गेल। मूल फाइलसभमे कुल ५४८ सुपरस्क्रिप्ट–रन भेटल—मुख्यतः प्रश्नोत्तर आ रिपोर्ट ०१–०३क संदर्भ–संख्या। समेकित आलेख नवा दस्तावेज रूपमे बनाओल गेल अछि; एहि कारण सुपरस्क्रिप्ट हटाओल गेल अछि आ पुस्तक–सन्दर्भ बिबलियोग्राफीमे सामान्य रूपेँ देल गेल अछि। मूल प्रतिवेदनसभमे भेटल कार्य–प्रक्रिया सम्बन्धी असम्बद्ध वाक्य, समाप्ति–सूचक पंक्ति आ आलेख–विषयसँ असम्बद्ध संपादकीय निर्देश अंतिम आलेखमे नहि राखल गेल। २० स्रोत फाइलक कवरेज–सूची क्रम स्रोत फाइल स्रोत शब्द (लगभग) समेकित आलेखमे मुख्य स्थान कवरेज टिप्पणी १ ० — आरम्भिक पञ्जी–विमर्श ३,१८८ §२–१०, §२३–२५ मूल पञ्जी–इतिहास, विवाह–नियम, सामाजिक श्रेणी, डिजिटल प्रश्न; विशिष्ट तथ्य सुरक्षित, पुनरावृत्ति हटाओल। २ ०० — दूषण पञ्जी ६,०७४ §९–११ ९७ दूषण तालिका, गङ्गेश प्रसंग, स्त्री/हाशिया, पुनर्समावेशन; प्रक्रिया–वाक्य हटाओल। ३ ०१ — दूषण–पञ्जी वंशावली–सिद्धान्त अध्ययन ४,१६७ §३–१०, §२१–२५ सात पञ्जी, ३२ पूर्वज, गोत्र–प्रवर, तुलनात्मक सिद्धान्त, दूषण प्रतिअभिलेख, ज्ञानमीमांसा। ४ ०२ — दूषण–पञ्जी शोध–प्रतिवेदन ४,५२७ §९–११, §२१–२२, बिबलियोग्राफी नृविज्ञान, जाति–गतिशीलता, गङ्गेश वंश, स्मृति/कलंक, प्राथमिक/द्वितीयक सन्दर्भ। ५ १.० — पञ्जी वंशावली–सिद्धान्त अध्ययन ४,६८१ §२–८, §२१–२५ वंश–सिद्धान्त, मूल/बीजी पुरुष, उटेढ़, पेशेवर पञ्जीकार, सामाजिक श्रेणी, आधुनिक संकट। ६ १.१.१ — प्राचीन पञ्जी खण्ड १ शोध–प्रतिवेदन ४,००८ §१२ पृष्ठ १–६५, हलायुध, विद्वत् श्रृंखला, १२२ गाँव, मातृका–चक्र, १८५६ कोलोफोन। ७ १.१.२ — पञ्जी खण्ड १ पृष्ठ ६६–३४७ शोध–प्रतिवेदन ४,९७७ §१३ करमहा, रतौली–दरिहरा, अवलम्ब–सरस्वती, माधव सिंह, नेपाल, २००३–०४ विवाह। ८ १.१.३ — पञ्जी खण्ड २ पृष्ठ ३४८–६९० शोध–प्रतिवेदन ४,६०१ §१४ सोदरपुर केन्द्र, राजवंश, के.सी.आई.ई., स्वीडेन विवाह, विश्वविद्यालय, कवि, आधुनिकता। ९ १.२.१ — जीनोम पञ्जी–प्रबन्ध शास्त्रीय प्रतिवेदन ४,७२४ §१५, §२१–२५ उपटीप, सामाजिक नेटवर्क, पितृवंश/मातृसम्बन्ध, जीनोम रूपक, आधुनिक रूपान्तरण। १० १.२.२ — मिथिला पञ्जीक जीनोम–विमर्श प्रतिवेदन ५,८२० §१५, §१९, §२३–२५ लोआम–सुगौना, भौर–राजग्राम, शिक्षित वंश, २००८ तिथि, सामाजिक आलोचना; असम्बद्ध कार्य–प्रक्रिया वाक्य हटाओल। ११ १.३.१ — नगराम पञ्जी विश्लेषण ५,८३१ §१६ ब्लॉक १–२२५, लोकनाम, यन्त्रज्ञ, न्यायाधीश/आई.ए.एस./सांसद, पेशा, प्रवास, नामविज्ञान। १२ १.३.२ — पञ्जिका–नगरामी विश्लेषणात्मक प्रतिवेदन ५,९५६ §१७ ब्लॉक २२६–३५२, समौली, बलिराजपुर, वागीश, वकील, लेखक, आई.पी.एस./आई.ए.एस. बेटी, जूरी। १३ १.३.३ — पञ्जी–प्रबन्ध विश्लेषण ४,९७३ §१८ ब्लॉक ३५९–४६६, विद्वत् समूह, राजवंश, ओइन/सिमरौंगढ़, नाम–पेशा–भूगोल, क्रॉस–रेफरेंस। १४ २.० — पञ्जी वंशावली–सिद्धान्त अध्ययन ५,६८७ §४–८, §२०–२५ डेटा–स्तर, दस्तावेजी प्रमाण, जनसांख्यिकी, सामाजिक कानून, कम्प्यूटेशनल वंशावली, सीमा। १५ २.१ — पञ्जी–प्रबन्ध शोध–प्रतिवेदन ४,२४२ §२१–२५ सामाजिक स्मृति, सन्धि–सिद्धान्त, श्रेणी, क्रॉस–रेफरेंस, वैश्विक तुलना, डिजिटलीकरणक दाँव। १६ प्रश्नोत्तर–संग्रह २४,१२५ सम्पूर्ण §२–२५ व्यापक प्रश्नोत्तरक विशिष्ट नियम, २० गोत्र, १६ छठ्ठी, सामाजिक विवाद, सुधार, आधुनिक व्याख्या; दोहराव समेकित। १७ रिपोर्ट ०१ ४,०८९ §१–८, §२५ मिथिलाक भू–सीमा, पाल–कर्णाट पृष्ठभूमि, हरिनाथ/लखिमा कथा, गोत्र–मूल तालिका, श्रेणी–विवरण। १८ रिपोर्ट ०२ ९,२८५ §२–२५ अनेक पूर्व रिपोर्टक विस्तृत पुनरावृत्ति + दमन/दूषण, सिद्धान्त, तालिका; अनन्य तथ्य समाहित, पुनरावृत्ति हटाओल। १९ रिपोर्ट ०३ ३,७८४ §१९, §२३–२५ पूर्णिया/पूर्वी मिथिला, जहानपुर १७०८, स्थानीय विद्वान/स्वतन्त्रता–स्मृति, पञ्जीकार संकट, संरक्षण। २० रिपोर्ट २ ११,०७५ §३–८, §२०–२५ शिक्षण–मार्गदर्शिका शैलीक पञ्जी–सिद्धान्त, २० गोत्र, १६७ मूल, विवाह–नियम, पहिल उदाहरण–तालिका; दोहराव समेकित। विषयगत क्रॉस–चेक पञ्जीक उद्गम, समूह–लेख्य, संस्थानीकरण, हरिनाथ–लखिमा कथा: समाहित। गुणाकर झा, शंकरदत्त, विजयदत्त तथा पञ्जीकार संस्था: समाहित। सात प्रकारक पञ्जी: समाहित। २० गोत्र, प्रवर, १६७ मूल, ३४/३५ प्रमुख मूल, बीजी पुरुष: समाहित। ३२ पूर्वज, १६ छठ्ठी, ५/७ आ ५/६ विवाद, काठमामा आदि नियम: समाहित। श्रोत्रिय/योग्य/पञ्जीबद्ध/वंशधर/जयवार, शाखा–पञ्जी, सामाजिक अवनति/उन्नयन, बिकौआ, सुधार–कमिटी: समाहित। मिथिलाक्षर, पाण्डुलिपि–संरक्षण, नकल, डिजिटल संस्करण: समाहित। दूषण–पञ्जीक ९७ तालिका, चर्मकारिणी, यवन, देवदासी, विधवा, गुरु–पत्नी, पथ–पतिता, अज्ञात कुल, पुनर्समावेशन: समाहित। गङ्गेश उपाध्याय सम्बन्धी विवाद आ विद्वत्–दमनक आरोप: स्रोत–दाबी रूपमे समाहित। स्त्रीक संरचनात्मक उपस्थिति/नामगत अनुपस्थिति, विशेष स्त्री–नाम, आधुनिक पेशागत बेटी: समाहित। प्राचीन पञ्जी खण्ड १, पृष्ठ १–६५: मुख्य गाँव, हलायुध, विद्वान, पद, मातृका–चक्र, कोलोफोन: समाहित। पृष्ठ ६६–३४७: करमहा, रतौली–दरिहरा, अवलम्ब–सरस्वती, माधव सिंह, मनसबदार, नेपाल, आधुनिक विवाह: समाहित। पृष्ठ ३४८–६९०: सोदरपुर, राजवंश, औपनिवेशिक सम्मान, स्वीडेन/अन्तरजातीय विवाह, विश्वविद्यालय, कवि, पेशा: समाहित। जीनोम/उपटीप खण्ड: लोआम–सुगौना, भौर–राजग्राम, खण्डबला, न्याय–विद्वान, २००८ तिथि: समाहित। नगराम १–२२५: सन्दहपुर, खांगुड़, कन्हौली, रैयाम, रोहड़, पेशा, नाम, प्रवास: समाहित। नगरामी २२६–३५२: समौली, बलिराजपुर, आधुनिक डिग्री, वकील, लेखक, आई.पी.एस./आई.ए.एस., स्त्री उपलब्धि: समाहित। नगराम ३५९–४६६: विचाढ़ी, परहट, मंगौरी, पिलखवाड़, बैगनी, ओइन राजवंश, नहस, चानपुरा, परिधीय गाँव: समाहित। पूर्णिया/पूर्वी मिथिला, स्थानीय मन्दिर/विद्वान/स्वतन्त्रता स्मृति: समाहित। पञ्जीक सूत्र–भाषा, द्विनाम, पेशागत उपाधि, नामविज्ञान, स्थाननाम: समाहित। सामाजिक स्मृति, शक्ति, तुलनात्मक वंशावली, नव्य–न्याय ज्ञानमीमांसा: समाहित। आधुनिक संकट, भौतिक संरक्षण, आर्थिक संकट, गोपनीयता, डिजिटल डेटा–मॉडल: समाहित। स्रोत–विरोध, तिथि–विरोध, गोत्र/मूल संख्या, जीनोम दाबी, प्रसिद्ध नामक पहचान, पक्षपात: स्पष्ट आलोचनात्मक रूपमे समाहित। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। पद्य Poetry ३.१. तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम'] मूल तेलुगु: नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव) मैथिली अनुवाद: मानेश्वर मनुज [खण्ड ९] ३.२. अशोक कुमार ठाकुर-कारगिलक अमर वीर/संघर्षक अमर ज्योति/माछी खोजय घाव,दुश्मन खोजय दाँव।/ लोकनायक राजा सल्हेश स्तवन ३.३. राजदेव मंडल- संबोधन ३.४. बद्रीनाथ राय ’अमात्य’- किएक सूतल छी यौ! ३.५. परमेश्वर कापड़ि- हमर रचनागत अदका-फदका ३.६. आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल ३.७. राम शंकर झा"मैथिल"- झिझिया ३.१. तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम'] मूल तेलुगु: नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव) मैथिली अनुवाद: मानेश्वर मनुज [खण्ड ९] तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम' केर लेखक छथि नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव)] मूल तेलुगु लेखक नग्नमुनि एक परिचय नाम: मानेपल्लि हृषीकेशवराव जन्म: 15 मई 1940 जन्म स्थान: शहर- तेनाली, जिला- गुंटूर (आंध्र प्रदेश) वृत्ति: चीफ ऑडिटर, आंध्र प्रदेश विधान सभा, तकर बाद डिप्टी सेक्रेटरी, ओतहि लिंक: पहिने साम्यवादी (कम्युनिस्ट), बादमे राष्ट्रवादी (नेशनलिस्ट) संस्था: अविभाज्यक जनतंत्र, 1990 आंदोलन: दिगम्बर कविता आन्दोलन 1965 लक्ष्य: नंगट, भूखल, दीन, दरिद्रक हित कृति: उदयिंचनि उदयलु (ओ उदय जे उदित नहि भेल) पूर्वा हवा जम्मि चेट्ट विशेष: 1977 ई. मे बहुचर्चित काव्य- 'कोय्या गुर्रम' (KOYA-GURRAM), जकर अर्थ अछि- 'काठक घोड़ा', भाव- 'नकली सरकार'। 19 नवम्बर 1977, शनि दिन बंगालक खाड़ीमे पचास-साठि फुट ऊँच लहड़ि उमड़ि कऽ कृष्णा जिलाक दिविसीमा क्षेत्रकेँ डुबा कऽ नष्ट कऽ देलक। हजारो लोक मारल गेलाह। ई घटना काव्यक वस्तु बनल। विषय आ परिस्थितिसँ उपजल ई काव्य हिन्दी कवि मुक्तिबोधक 'अंधेरे में' क बराबरीक अछि। मैथिली अनुवादक नाम: मानेश्वर मनुज जन्म: गाम- गम्हरिया (बेनीपट्टी) मधुबनी। जनवरी 1958 (प्रमाण पत्रक अनुसार)। वृत्ति: भारतीय नौसेनामे तकनीकी सहायक, तकर बाद भारतीय रेलक वाणिज्य विभाग सँ (रिटायर्ड)। कृति: 'सम्बन्ध', कथा संग्रह (मैथिली) 2007 'कि', कविता संग्रह (मैथिली) 2011 'परिवर्तन', कहानी संग्रह (हिन्दी) 2019 'बेघर', कविता संग्रह (हिन्दी) 2022 'तालाब', कहानी संग्रह (हिन्दी) 2024 अनुभव: विभिन्न भाषा सँ हिन्दी आ मैथिलीमे अनुवाद। हिन्दी आ मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिकामे लेख, कविता, कथा, कहानी इत्यादि प्रकाशित। अनुवादकक टिप्पणी: अनेक तेलुगुमित्र, स्वयं नग्नमुनि जी, हिन्दी तथा अंग्रेजी मे अनुदित पुस्तकक मदति सँ दीर्घ काल तक मंथन कयलाक बाद अनुवाद कयल गेल अछि। ई नग्नमुनिक प्रसिद्ध कविता अछि। नग्नमुनि सँ लगातार हमर पत्राचार होइत छल। ओ अंग्रेजी आ तेलुगुक विद्वान छलथि। हुनक किछु पत्र देसिल-बयना, हैदराबाद मे छपल अछि। -मानेश्वर मनुज सम्पादकीय टिप्पणी (खण्ड-९) ई खण्ड प्रलयक — स्पष्टतः समुद्री महाविनाश सुनामी— पर लिखल एकटा सशक्त शोकगीत थिक, जकर सभसँ पैघ शक्ति अछि ओकर संरचनात्मक विरोधाभास। आरम्भमे कवि अधरतियाक ओहि सार्वभौम क्षणकेँ रचैत छथि जतऽ प्रेम, वसन्त, यौवन, कोँढ़ीक फुलायब — समस्त सृजनक भाषा एक भऽ जाइत छै। ई दीर्घ, ऐन्द्रिक भूमिका जानि-बूझिकऽ रचल गेल अछि, जाहिसँ "मुदा नहि, नहि!" — ई एक पाँती — पाठककेँ ओहिना झकझोरि दैत छै जेना लहरि तटकेँ। सृजनक क्षण अकस्मात् संहारक क्षणमे बदलि जाइत अछि; इएह विपर्यय कविताक धुरी थिक। बिम्ब-विधान प्रशंसनीय अछि — नदीक जल पीबि मोटगर अजगर बनल सागर, छिलकाबला अंडा सन सूर्य-बिम्ब, कूड़ा-कर्कटक ढेरी लग छिटकल अन्नक दाना सन नक्षत्र। ई अन्तिम बिम्ब विशेष मार्मिक, कारण ब्रह्माण्डक वैभवकेँ ओ सड़कक कातक दरिद्रतासँ जोड़ि दैत अछि — प्रलय आ दैनिक अभाव एक्के दृष्टिमे। "काठक घोड़ा (नकली सरकार)" वला व्यंग्य कवितामे राजनीतिक स्वर आनैत अछि — प्राकृतिक आपदाक संग शासकीय निष्क्रियताक मौन साक्षी-भाव। अन्तमे "सन्नाटा"क चारि-बेरक आवृत्ति ध्वनि-सिद्धान्तक दृष्टिएँ सटीक — शब्दक कविता स्वयं निःशब्दतामे विसर्जित होइत अछि, जे विषयक अनुरूपे थिक। अनुवादपर किछु सम्पादकीय सुझाव: (क) "वक्त", "वाकिफ", "बल्कि" सन उर्दू-हिन्दी शब्द कविताक अन्यथा निखरल मैथिली रजिस्टरसँ किछु बाहर लगैत अछि — "समय", "परिचित", "अपितु/वरन्" पर विचार कएल जा सकैत अछि। (ख) कोष्ठकमे "(नकली सरकार)" देब बिम्बक व्याख्या स्वयं कऽ देब थिक; पाठक पर छोड़ला सँ काठक घोड़ाक ध्वनि आर गहींर होइत। (ग) मध्य भागमे "समय छलै"क आवृत्ति लयकारी अछि, मुदा एक-दू ठाम छँटला सँ कसाव बढ़त। समग्रतः — ऐन्द्रिकतासँ आर्तनाद धरिक यात्रा करैत ई कविता अनूदित मैथिली प्रलय-काव्यमे एकटा उल्लेखनीय स्वर थिक। - गजेन्द्र ठाकुर नग्नमुनिक तेलुगु काव्य 'काठक घोड़ा' (कोया गुर्रम) खण्ड-९ ओहि क्षण धरि अधरतियाक विश्वभरिक भाषा एक छलै ओ दू शरीर केँ एक होबक क्षण छलै ओ घड़ी दू बिंदु केँ एक होबक छलै ओ चमड़ी सँ नव सपनाक संचारक समय छलै ओ वसंतक आगमनक पर शरीर केँ विचलित होबक समय छलै चिड़ै-चुनमुन जकाँ हर्ष-उल्लास सँ पाँखि फड़फड़ाबक समय छलै जवानीक उमंग सँ ओतप्रोत उछलऽ-कुदक समय छलै ओ गाछ-वृक्ष केँ उठक आ कोँढ़ी केँ फूल देवक समय छलै, फलित होबक समय छलै लजाइत कि बौराइत, दू तन केँ गला जोड़क समय छलै आकाश तारा केँ हिलब पर तारा सँ उठैत चमक नयन भरि तिरपित होबक समय छलै ओहि सँ अनभिज्ञ मौन अगरबत्ती केँ धुँआ सँ गुनगुनायबाक वक्त छलै। ओ कोनो घरक कथा भऽ सकैत छलै ओ कोनो खोपड़ीक गाथा भऽ सकैत छलै ओ कोनो बाट-घाटक व्यथा भऽ सकैत छलै पुरुष, स्त्री केँ गरदनि सँ गरदनि जोड़ि लैत छै बच्चा माँक स्तन ठोर सँ टटोलैत छै मुदा नहि, नहि! ओहि क्षण ओ किछुओ नहि छल ओहि क्षण वेदना आ सिर्फ व्यथा छलै सबकिछु आर्तनादे सत्य बनि गेल छलै काठक घोड़ा (नकली सरकार) सब जनैत छलै मुदा ओ गुमसुम सब देखैत ठाढ़ छल समुद्रक लहरि सत्य सँ वाकिफ छल लहरि पर बनल खूनक धब्बा केँ सत्य मालूम भेल। नदी सबहक सम्पूर्ण जल, अपना बाँहि मे भरि ओकरा पी-पी कऽ मोटगर अजगर बनल सागर पल्थी मारि बैस गेल आराम सँ काल भूगोल, वृक्ष, पक्षी, जंतु आ जीवराशि पर अन्हारक परदा डारि ओकरा दबोचि लेलकै! जलक रस्सी सँ सबहक गला चभि देलकै लहरि सँ हँसैत, विकट अट्टाहास करैत फुफकार मारैत प्रलयकारी सागर उमड़ि पड़लै ओ नोनछराह सागर जे प्यास नहि मेटा सकैत आइ ओ सम्पूर्ण जीवराशि केँ गीरऽ मे बनल सक्षम ओ ढेरी सब पड़ल छल, लहरक नहि बल्कि लाशक ढेरी छल, शरीरक अंगप्रत्यंग जे हवा मे झूमि रहल छल, ओ प्रलय के धागा मे। एकाएक लाखो उन्मत्त तरंग उमड़ि पड़ल ओहि तरंगक फनक विकराल फुफकार सँ झरैत तरल पदार्थ आ छिलकावला अंडा सन लागि रहल छल सूर्य बिंब। अहि सूर्य बिंबक ओहि पार कारी-कारी मेघ, कड़कैत विजुरी आ ठनका मे जरि-भुनि खाक भऽ गेल छलै चंद्रमाक बिंब ओहि चंद्रमाक बिंबक ओहि पार सड़कक कात छोर पर जन्मल कूड़ा-कर्कटक ढेड़ीक लग ठाढ़ कुकुर, सूअर आ मनुक्खक हड्डीक गुत्थम-गुत्थी सँ फटल-पुरान चेथड़ी सन छितराएल, पड़ल, अन्नक दाना सन लगैत छल नक्षत्र ओतऽ। ओहि नक्षत्रक ओहि पार, बीहड़ जंगल सन सम्पूर्ण विश्व केँ घेरने धार्मिक ग्रंथक सूक्तिक ओहि पार भीषण हत्याक ओहि पार जीवन केँ गीर गेलै सन्नाटा रोशनी केँ गीर गेलै सन्नाटा शब्द सँ पार निकलि गेलै, सन्नाटा विश्व केँ अप्पन मुट्ठी मे बंद कऽ लाशक और मे बसि गेलै, सन्नाटा। -मानेश्वर मनुज आदर्श नगर कॉलोनी गोशाला रोड मधुबनी पिन - 847211 मो. - 9920674861 / 7464077106 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.२. अशोक कुमार ठाकुर-कारगिलक अमर वीर/संघर्षक अमर ज्योति/माछी खोजय घाव,दुश्मन खोजय दाँव।/ लोकनायक राजा सल्हेश स्तवन अशोक कुमार ठाकुर कारगिलक अमर वीर/संघर्षक अमर ज्योति/माछी खोजय घाव,दुश्मन खोजय दाँव।/ लोकनायक राजा सल्हेश स्तवन १ कारगिलक अमर वीर

हिमगिरिक चोटी गर्जि उठल, भारतक रणध्वज फहरायल। शौर्य, त्याग आ बलिदानसँ, दुश्मनक साहस थरथरायल॥

बर्फक शय्यामे सुतल जवान, सीनामे ज्वालामुखि जलैत। "जय भारत"क उद्घोष करैत, मृत्युसँ आँखि मिला लड़ैत॥

गोली, बम आ अग्निवर्षा, कखनो पग नहि डोलल। मातृभूमिक रक्षाक खातिर, प्राणक दीप स्वयं खोलल॥

तिरंगाक सम्मान बचाबय, रक्तक गंग बहा देलनि। कारगिलक प्रत्येक शिलापर, वीरताक गाथा लिखि देलनि॥

माय कहलक—"जा बेटा निर्भय, देशक मान बढ़ाबह।" वीर सपूत हँसैत विदा भेल, प्राण दऽ कऽ वचन निभाबह॥

शत्रु बुझलक भारत सोइत, ई ओकर भ्रम टूटि गेल। एक-एक रणबाँकुराक समक्ष, अहंकार सभ चूरि भेल॥

आउ नमन करिऐ ओ वीरकेँ, जिनकर अमर बलिदान। जिनक कृपासँ सुरक्षित अछि, हमर भारत, हमर सम्मान॥

जय जवान! जय भारत! जय कारगिल विजय दिवस! २ संघर्षक अमर ज्योति

भोरक संग सपना लऽ निकलल, आँखिमे नव आस। ज्ञानक दीप जराबय लेल, हृदयमे अटल विश्वास॥

नहि छल हाथमे कोनो शस्त्र, नहि छल मनमे द्वेष। न्याय,शिक्षा आ उज्ज्वल भविष्य, एतबे छल संदेश॥

भीड़क शोरमे एकाएक, मौन भऽ गेल स्वर। मायक कोरामे नोर बरसल, कानल सगरो घर॥

बापक माथ झुकि गेल चुपचाप, टूटल मनक आधार। भाइ-बहिनक रिक्त नयनमे, उठल करुण पुकार॥

अहाँक अधूरा सपना सभ, आब नहि मरि पायत। प्रत्येक विद्यार्थीक साहसमे, अहाँक स्वर गुँजायत॥

शिक्षाक मंदिर पावन रहय, रहय न्यायक मान। युवाक सपना सुरक्षित रहय, एतबे देशक शान॥

नहि रहू वैर, नहि रहू क्रोध, बढ़ू प्रेमक बाट। संवादे सँ दूर होअय, सभ मतभेदक घाट॥

धरती माँ अहाँकेँ अपन, अँकवारिमे सुतौलनि। सत्य,साहस आ संघर्षक, दीप अमर जरौलनि॥

युग-युग धरि स्मरण रहत, अहाँक निष्कलुष प्रीति। एकटा संघर्षक बेटी, बनि गेल प्रेरणागीति॥

"शिक्षा,न्याय आ संघर्षक बाट पर अमर जीवन समर्पित। करनिहार एकटा साहसी बेटीक पावन स्मृतिमे॥

३ माछी खोजय घाव,दुश्मन खोजय दाँव।

माछी खोजय घाव सदा, दुश्मन खोजय दाँव। कमजोरी जँ देखलक कतौ, दिय लगैत अछि ताव॥

घरमे जखन फूटि पड़य, टूटय प्रेमक तार। ओही बाटे दुश्मन घुसय, करय खुशीक संहार॥

एकतामे बल बसैत छै, बाँटबामे अपमान। जतय मिलि कऽ लोक रहैत, ततय बढ़ैत सम्मान॥

नफरतक बीया नहि रोपू, रोपू प्रेमक फूल। क्रोध आ ईर्ष्या छोड़ि कऽ, बनू विवेकक मूल॥

माछी जकाँ नहि बनू ककरो, घावे-घाव निहारि। मरहम बनि कऽ पीड़ा हरू, मिठगर बाति उचारि॥

जीवनक ई सीख अमर छै, राखू सदा ध्यान। माछी खोजय घाव, मुदा सज्जन खोजय समाधान॥

४ लोकनायक राजा सल्हेश स्तवन

॥ मंगल-दोहा ॥

मिथिलाक पुण्य धरणिपर, उज्ज्वल अहाँक नाम। लोकनायक सल्हेश प्रभु, स्वीकारू प्रणाम॥

॥ चौपाई ॥

जय जय मिथिल-मुकुट-मणि देवा। जन-जनक विश्वासक सेवा॥

सत्य-धर्मक दृढ़ रखवारा। दीन-दुखीक परम सहारा॥

वन-उपवन आ नदी-पोखरि। राखल सभक मान सदा भरि॥

निर्बलक बनि दृढ़ आधार। कएल न्यायक सतत प्रचार॥

लोभ-मोहसँ दूर सदिखन। जन-हित लेल समर्पित जीवन॥

जाति-पाँतिक भेद नसौलनि। समताक दीप निरन्तर जारौलनि॥

प्रेम, दया, क्षमा आ सेवा। एहने छल अहाँक सद्भावा॥

शौर्यक ज्योति प्रखर प्रज्वलित। अहाँक यश अछि चिर उज्ज्वलित॥

लोक-गीत आ लोकक गाथा। अहाँहि सँ पबैत अछि माथा॥

गाम-गाम उत्सव मनाबय। बाल-वृद्ध गुणगान सुनाबय॥

मिथिल-भूमि धन्य कहाबय। अहाँक यश संसार गाबय॥

॥ दोहा ॥

न्याय, दया, समभाव सँ, उज्ज्वल कयल समाज। युग-युग जीवित रहत,छथि लोकनायक महाराज॥

॥ विनय ॥

चरण-कमलमे शीश नवाबी। भक्ति-भावसँ वंदन करबी॥

मिथिल-भूमि पर कृपा बरसाउ। सभक जीवन मंगल बनाउ॥

सत्य-धर्मक राहि देखाउ। प्रेमक दीप निरन्तर जाराउ॥

॥ समापन-दोहा ॥

मिथिल-मानक दीप छी, जन-जनक विश्वास। सल्हेशक अमर यश रहय, धरती आ आकाश॥

-अशोक कुमार ठाकुर; ग्राम–करमौली, पोस्ट–करमौली, थाना–खजौली, जिला–मधुबनी (बिहार); मोबाइल नंबर:8709568993, जनसेवा:एस.डी.आर.एफ. मे कार्यरत सिपाही। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.३. राजदेव मंडल- संबोधन राजदेव मंडल संबोधन संबोधन हमरा नचबैत अछि कखनो इएह हमरा बचबैत अछि अहाँक केना करब संबोधन कखनो बनै छी हित कखनो बनै छी दुसमन । अहाँ हरपल बदलै छी संबध तहिना हमहूँ बदलै छी संबोधन जॅं अहाँ निरन्तर बदलैते रहबै संबध आ हम बदलैते रहबै संबोधन तॅं एक दिन संबोधनक बन मे हम हेरा जाएब आ अहाँ कालक चक्कीमे पेरा जाएब । -राजदेव मंडल, Mob-9199592920, mandalraj151960@gmail.com अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.४. बद्रीनाथ राय ’अमात्य’- किएक सूतल छी यौ! बद्रीनाथ राय ’अमात्य’ किएक सूतल छी यौ!

कर्मनिष्ठ कर्पूरी हमर महान। कतऽ सूतल छी यौ! कर्मनिष्ठ कर्पूरी हमर महान। । 1

शोषण चक्र चलै छै एखनो, वंचित पिसा रहल छै। हम छी दलित उपेक्षित शोषित, अहीं हमर भगवान।। कतऽ सूतल....... 2

अन्हरिया सिंहासन बैसल, खा बैसल संसाधन। बहुत विवशता वंचित के छै, उगियौ पूनम चान।। किएक सूतल...... 3

कुक्कुड़ व्यास पीठपर बैसल, अजपा जाप करैए। उपजल धान चरैए साँढ़े, कहबैए श्रीमान ।। कतऽ सूतल...... 4

हमर नोर झहरैए एखनो , नञि सरकार तकैए। रास बिहारी मंडल काका, करियौ उचित निदान। । कतऽ सूतल छी......। 5

कर्णक छै उपहासित जीवन, शंम्बूक नित्य मरैए। रोटीक टुकड़ा छीनल जाइए, जागु दया निधान।। कतऽ सूतल.......। 6

हँसी हमर अछि बन्हकी लागल, अपमानित अछि जीवन। घोर अन्हरिया के मुट्ठीमे, बन्द सुरुज छै चान।। कतऽ सूतल छी........। 7

नोरे मे बोरल जीवन अछि, एखनो देह उघारे। देखियौ एखनो कानि रहल अछि, बहुजन के संतान। कतऽ सूतल छी यौ......। 8

लाठीसँ संवाद होइत अछि, सत्य बात के बाजत? हम जे एखनो साँस लैत छी, अहींके ई अवदान। । किएक सूतल छी.......। 9

छै समाजमे बहुत विषमता, महग पानि खूँन छै सस्ता। शोषितके भगवान अहीं छी, वंचित के छी प्राण।। किएक सूतल छी......। 10

हमर व्यथा सुनियौ यौ काका, सत्ये बात कहै छी। हम लहासके जगा रहल छी, अद्भुत अछि अभियान। । किएक सूतल छी यौ.........। 11

बेंग बेङ बजैए जोरे एखनो, कोयली मौन व्रती छै। मत्स्य न्याय व्याप्त छै एखनो, करू हमर उत्थान। । किएक सूतल छी यौ....। 12

अंगुठा काटल गेल हमरो, अछि अवरुद्ध विकास । खूँनसँ लथपथ देह प्राण अछि, विधा दियऽ नव दान।। किएक सूतल छी.......। 13 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.५. परमेश्वर कापड़ि- हमर रचनागत अदका-फदका परमेश्वर कापड़ि हमर रचनागत अदका-फदका

घास चरए गाइ, दूध दिए भरि झबही, देश चरए नेता, राजनीति करए घबही।

लाज नै सरकारके, नङटे नाचए राजनीति, नेता छिटए भाषणके बिआ, ई छी कुटनीति।

ओ नेता की नेता भेल, जे ने रहए भ्रष्टाचारी। घूस कमीसनक पूजी-पगहापर, जे करए जनताक पैकारी।।

आधुनिकताक नव विधानमे, हे नारी, ब्वाय-फ्रैण्ड अधिकारिणी। वैश्वीकरणक उधसल बिहाड़िमे, अहाँ देह प्रदर्शनक आधारणी।

नेता परिकल सत्तामे, दल करए फेरबदली, नीति-सिद्धान्तके मारि गोली, केहुना पोकेट भरि ली।

नेता मारए माछ उपछए राजनीतिक खत्ता। जनताके हे टुटरुम टूट, सरकार एत' चौधरी बोलाता।।

ऐ पार, ओइ पार नदीमे नकसिक पाइन, भगबा खोलि पार उतरब, ई कोन बाइन।

जनान्दोलनमे जनता जान-प्राण देलक, सम्झौता क' नेतबा सरकारटा बनौलक।

सत्य बड़ बिख होइछ, के ने जनैए, लोक झूठेके भजाक', उठि बैसैए।

सम्हरु, टिटकारी नै पारु, मुह फुला देत, बढ़ल चललै जमाना, नव हाक-वाक दैत ।

चन्ना-मामा भार लाबे, घुट-घुट खाए बौआ, सुतल, निन गबैत रहए, जागे पलङक पौआ। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.६. आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल आशीष अनचिन्हार २ टा गजल १

तेहन इशारा भऽ गेलै सभटा खुलासा भऽ गेलै

इच्छे हमर मारि देलक केहन जमाना भऽ गेलै

मिश्री जकाँ आँखि लागल सपना बताशा भऽ गेलै

पाखंड छै चान सूरज जुल्मो सितारा भऽ गेलै

हुनकर कृपा पाबि बहुते किशमिश छुहारा भऽ गेलै

सभ पाँतिमे 2212-2122 मात्राक्रम अछि।

चानन टिक्का आर मसुआइ अजगुत खेला भाइ रे भाइ

दुनियाँ माने अतबे बूझू झूर झमेला लाइ लपटाइ

ई सभ भेलै लेकिन फेरो की सभ हेतै दाइ गे दाइ

सुख के माने तिलबा हेतै दुख के माने लाइ चुड़लाइ

हुनके जकाँ हम हाथ जोड़ल हुनके जकाँ हमहूँ नितराइ

सभ पाँतिमे 22-22-22 मात्राक्रम अछि। दू अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि। अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। ३.७. राम शंकर झा"मैथिल"- झिझिया राम शंकर झा"मैथिल" झिझिया

आजु जगदम्बा अंगना खेलबै झिझिया आबु आबु हे सीता बहिना -२ आबु आबु हे सियाजी कें सखियां..! आजु जगदम्बा अंगना खेलबै झिझिया आबु आबु हे सियाजी कें सखियां कर जोड़ि करैय छी निहोरा हमसभ धीया-पुता हमसभ नेनाह भुटका आस लगेलिय जें दिनराति आजु जगदम्बा अंगना खेलबै झिझिया आबु आबु हे सीता बहिना -२ आबु आबु हे सियाजी कें सखियां..! अन्हि तअ जगत कें कल्याणी अन्हि अम्बे काली कमला रुद्राणी सबकें कष्ट हरियौ हे मैया महरानी अन्हि कें भरोसे मैया नौवो दिन पुजा करबैय नौवो राति खेलबैय जें झिझिया आजु जगदम्बा अंगना खेलबै झिझिया आबु आबु हे सीता बहिना -२ आबु आबु हे सियाजी कें सखियां..! मिथिला कें धरती सँ निकललहुँ हे अन्हि मिथिला कें धिया अन्हि सभकें मनोरथ पुरा केलहुँ अन्हि सभकें ह्रदय कें जुरबियौ डैइन नेना-जोगिन सँ रक्षा करबैय अन्हि कें चरण मे सभ समांग देलकै पेटकुनियाँ हे हमर सीता बहिना आजु जगदम्बा अंगना खेलबै झिझिया आबु आबु हे सीता बहिना -२ आबु आबु हे सियाजी कें सखियां नाचि नाचि झूमि झूमि मैया कें रिझेबै अन्हि सभ कें गोदी भरलहूँ अन्हि सभ कें सेनुरक लाज रखबैय अन्हा जगत मे केकरा नहि तारलहुँ अन्हा कें छोड़ि जेबैय किनका शरण मे अन्हि कें शक्ति सँ बमकैत महादेव अन्हि कें भक्ति सँ चमकाए दिनकर दीनानाथ आजु जगदम्बा अंगना खेलबै झिझिया आबु आबु हे सीता बहिना -२ आबु आबु हे सियाजी कें सखियां..! अन्हा कें छोड़ि कें सुनत मनक बतिया हमसभ भेलहूँ कपूत सखियां..! बाबु जनक कें छोड़ि आन्हा बसलहुँ ठाकुर जी कें सङ्ग अवध नगरिया अन्हि कें बाट जोहैत बितल उमरिया झरि झरि आँखि सँ नोर बहाय दिन रतिया अन्हा छोड़ि किनका आंचर सँ पोछबै तयौ खेलबैय हमसभ झिझिया आजु जगदम्बा अंगना खेलबै झिझिया आबु आबु हे सीता बहिना -२ आबु आबु हे सियाजी कें सखियां..! नहि अछि ज्ञान नहि अछि ध्यान कोन विधि करब अन्हा कें गुणगान क्षमा करब हे दुर्गा -दुर्गतिनाशनी आजु जगदम्बा अंगना खेलबै झिझिया आबु आबु हे सीता बहिना -२ आबु आबु हे सियाजी कें सखियां..! आबु आबु हे सियाजी कें सखियां..!!

-राम शंकर झा"मैथिल", उघरा, दरभंगा, Mo -7970778787, Mail - jharam1977@gmail.com

अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ। 1 विदेह ४४७|| 1 गजेन्द्र ठाकुर

Vr aT aT aT nO nO OO Ow aw oly) लेटे विदेह by 4 7 = & —e| [का S w im ४४७ - वर्ष १९ - मास 224 <TD मैथिली साहित्य आन्दोलन मानुषीमिह संस्कृताम्‌ Maithill Sahitya Andolan - Manusim iha Samskrtam Q © 6) © © ©) wSF 5 © I S55 © © © 6? ~o_ * ~~ EP PP oe *? तय सी प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका * सन्‌ २००० सँ Videha — the First Maithili Fortnightly e-Journal * Since 2000 सम्पादक : गजेन्द्र ठाकुर EDITOR : GAJENDRA THAKUR पद Sew ISSN 2229-547X www.wideha.co.in 08 अगस्त २०२६ * 0 August 2026 न ey) Ci aT aT aT a aT a a aT a a

गए हाल TOME I-IV / VOLUMES -00 | A Parallel History of | Mithila & Maithili Literature with Critical Appreciations of Representative Maithili Writers 2 Reg = by | | GAJENDRA THAKUR | editor, Videha eJournal VIDEHA + PARALLEL LITERARY MOVEMENT se + ISSN 2229-547X - est. 2000 - Delhi - MMXXVI

FROM THE SERIES The Videha Parallel Library a centuries of Maithili letters — from the Buddhist Charyapadas | of the eighth century to the digital insurgency of the twenty-first — | gathered under a single critical lens. Across one hundred volumes the | Videha Parallel Library has assembled the suppressed, the neglected, | the folk, the Dalit, the women’s, and the diasporic traditions of Maithili literature into a counter-archive to the official canon curated by the Sahitya Akademi. This volume brings that project to its threshold. Applying Bharata’s rasa-theory, Anandavardhana’s dhvani, Kuntaka's vakrokti, Gahgesa Upadhyaya’s Navya-Nyaya pramana system, Bakhtinian dialogism, Spivak’s subaltern historiography, and the Videha Parallel History Framework, it offers sustained critical appreciations of one hundred contemporary and historical Maithili writers — poets, novelists, dramatists, essayists, theorists, and translators — whose work constitutes the living parallel tradition. “The parallel is not the marginal but the truthful, in long delay.” WHAT THIS VOLUME CONTAINS, >> One hundred chapter-length critical appreciations, each paired with a portrait image »® A historical synthesis from 8th-century Charydpadas to contemporary digital publishing >> Indigenous theory (Navya-Nyaya, rasa, dhvani) alongside Western and postcolonial lenses >> Archival recovery of the Dooshan Panji records on Gafigesa Upadhyaya of Mithila pes ABOUT THE AUTHOR | GAJENDRA THAKUR — Maithili author, editor, and literary scholar — founder | of the Videha Parallel Literary Movement and founded the Videha eJournal in | | 2000 and has edited it without interruption since. He writes in Maithili, Hindi, ‘i and English, and has authored scholarly monographs on Gangesa Upadhyaya’s Navya-Nyaya and the parallel history of Mithila’s literary cultures. SON 978-93-5832-486-6 VIDEHA | | till | | | | | Fe AEE nee > हि, ISSN 2229-547X - videha.co.in

Mets eee ecoding the nit at है दर a Panji of Mithila oa Surprising Insights from India and Pp a | lal l Nepal's Oldest Social Network The Panji system of Mithila is a remarkable example of how communities preserved, recorded and td e transmitted social memory across generations. Spanning centuries, it functions as one of the world’s oldest social networks—long before the हू digital age. This book decodes the structure, gt. purpose and significance of Panji, bringing to light Surprising Insights from its value for understanding kinship, migration, India and Nepal's Oldest marriage alliances and societal organization in Ps Social Network India and Nepal. थी, au Bridging tradition with modern research, this work TDi ig कि हि. ae offers surprising insights for scholars of sociology, ea ii; Ni A ote ee - WON GA. anthropology and genomic genealogy. It opens new i= a rate ys a oe किए pathways for interdisciplinary studies, showing how Sy CxS wee ancient records can inform contemporary social Mh ¢ ere nl ae ~ science and genealogical mapping. ' tee. cet s\ \ Seca ES ५१६ सी Gajendra Thakur ye —— 5 ap we, ae: £ Hh | | धर है... ap 6) ee pig ऊ | डक gee. \ For the Research Students of ew if NX. रे Sociology, Anthropology and a, Dy Jy AX Genome/ Geneological Mappin Sn? oh an & ie BPS 9 ०9९9: = ee = oD ) A EN. LP EB ८ Vary फनी दी के 2 4 We aa q ISBN 978-93-595-894-5 www.videha.co.in Aas we 25 Zee FESS igi agi he AS rad ae ne eae Gajendra Thakur निधि lee Editor ISBN videha.co.in Videha Maithili eJournal

VIDEHA DECODING THE PANJI OF MITHILA VOLUME II Genealogical Mapping, Mula, Dusan, and the Videha Panji Search System Panji is Mithila’s grammar of memory. पज्जी मिथिलाक स्मृतिक व्याकरण अछि। Gajendra Thakur Editor Videha — First Maithili Fortnightly eJournal www.videha.co.in

== the Panji of Mithila Volume II Decoding the Panji of Mithila Volume II introduces Mithila’s Panji Prabandha as a layered archive of genealogy, marriage rules, mila, milagrama, gotra-pravara, maternal lines, scholarly titles, Diisan records, village memory, and historical persons. The book explains Panji as genealogical mapping, not modern DNA, and proposes the Videha Panji Search System as a responsible digital search aid. Important Ethical Note Panji records are historical and genealogical sources. They are not modern genetic proof, legal proof, or automatic marriage clearance. Diisan records must not be used to stigmatize living persons, families, villages, or communities. Scan to read पुढ़ खोलनाक लेल स्कैन करू काका see नाक A ey pest a a हि re a Videha — First Maithili Fortnightly eJournal www.videha.co.in

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E a eel ae et a a eo a EN OF la! yy ie DECODING THE RS SY | cE gay PANII १४ iy” Hi Sich न | STS <i H | 0? se — BASED ON DUSHAN PANJI — neaal Ke H Decoding the Panji of Mithila, Volume VI, based on Dushan Panji, ‘el Had is a detailed scholarly exploration of one of Mithila’s most ll bead H Heed difficult genealogical archives. This volume explains the logic of et fl easf Panji entries, mool and migration, maternal and daughter lines, Hei कि H caste and marriage records, named women, social vocabulary, : $33 Fi x, H and the ethical challenges of reading Dushan Panji today. i: x H Hal It combines close entry-by-entry decoding with historical taal । $3 interpretation, making a difficult source accessible without | ee H ey i losing its complexity. The book is intended for researchers, tel H 3) students, family historians, and all readers interested in Mithila, tl all LPS genealogy, caste, social history, and textual preservation. coal | €33 4) Gajendra Thakur is a researcher and writer associated with पा eH Videha and the study of Mithila’s literary, historical, and Hei 3} of E: a मिल <> | genealogical traditions. i 3 H मन I Maal eit, fa “lft i i (Deel fs | 2 © t H पक m hee i Re re || Hal H 3 i a Scan to visit www.videha.co.in oA | es TING हे न हि 4 Head aN VIDEHA eJOURNAL fade elo RS, eg LATS) | i के Ea a EERE ET a Oy H 89: के“ BiG Bo Ooo Sob GG SB ey SM]

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